Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
The Mahabharat Shalya Parv
Front matter
कर्णपर्व का सूचीपत्र Page न २ राष्ट्र वर्मजय Iudex to Bara, Pary मध्याप विषय Chap er Contents १कर्ण फा सेना पदि होना ६२०० 1. Karan mide oomin nder 6207 2. Dhritrashtra aud Sanjaya 10 3 Do Do 11 16 “धृतराष्ट्र का विलाप 4. Dhritrashtra's grief--- ५ संजय पचन 5. Sanjaya's talk 19 ६तया 6. Do 26 ७तथा 7. Du 31 ८तथा 8. Do 35 ९धतराष्ट्रका विलाप 9. Dhiitrashtra's ६ 39 ief १० कर्ण का सेगा पति होना 10, haran', installation 50 11 Formation of army 57 ११ सेना व्यूह कीरचना 12 Ksheudhurti slain 63 १२ क्षेम धू यव 13 Vind and Anuvindslain १३ बिन्दा नुबिन्द पच १.चितवन 14. Chit:a slain 73 ७३ 78 १. सयामा कायुद्ध 15. Ashwathaina fights 83 १९ अश्वत्थामा घ अर्जुन 16.Ashwathama and Arjan 90 १७ अश्त्यामकी परालय 17. Ashwathama defeated १८दंडधार घध 18 Dandidhar slain 95 19. General fighting 99 २० पाण्ड्य वध ६३०७ 20. Pandye sirin 6307 १४ 21 Goneral fighting 14 २२तथा 22. Do Do 19 २३ सरदेव दुशासन युब २३ 23 23.S.hader and Dashasan २४ कर्ण का पराक्रम २३ 24. Karan's bravery 26 २५ मुतसो सौवन युद्ध 20.8utsom anSuval 35 २६ शिखंडी व कृतवर्मा 26 Stuklandı 2nd &rtrarare 47 २७ अर्जुन की विजप . 27. Arjun's victory 45 २८ संकुक युद्ध ५० 28. Goneral fighting 50 २९ तथा Do Do 56 ३० पृथम दिन का युध 30 Fust day's fighting GO ३१ कर्ण व दुर्योधन 31 Karan and Duryodhan G7 २२ शल्य सारथी 32. Slanlyn as drivar 76 ३३ त्रिपुर का पाण्यान 33. History of Tripur 84 34 ३४तथा Do 31 ३५ शपसारयी 35 Svalya as driver 6110 ३६ त्रिपुर का आख्यान 36 History of Tripur 16 १९संकुर युद्ध २१ संकुल युख ५६) 29. . Do SN.. महाभारत LIBRA >शल्यपर्व व गदापर्व- श्रीवेदव्यास रचित संस्कृतमूल ॥ हिन्दी और अंग्रेजी अनुवादसहित ।। THE MAHABIJARAT SHAL YA PARY The Sanskrit lest of Mahärsin Vyag with complete English and Hindi translation. मिमको " रामकृष्ण कम्पनी मुरादाबादने सम्पप्रमाकर प्रेसमें "छपवाकर प्रकाशितक्रिया Publislied by Kam Krishn & Co. of Moradabad पुस्तक मिसनेका पar. रामकृष्ण कम्पनी मुरादाबादः Te bo lad of the publishers Bam Krishn & Co. Moradabad.
महाभारत. AVB8 S N. 4 A CIBRARI शल्यपर्व . Yocer नारायण नमस्त्य नरञ्चध नरोत्तमम || देवी सरस्वताश्चैव ततो जयमुदीरयेत् ।। अनमेजय उवाच । एव निपातिते कर्णे समरे सव्यसाविना । अल्पावशिष्टाः कुरघ किमकुर्वत धै छिज ॥ १ ॥ उदीय॑माणञ्च पल दृष्टबा राजा मुयोधन । पाण्ड भासकालच किम्मापयत कौरव ॥ २ ॥ एतदिच्छाम्यह श्रीनु तदाय विशोत्तम नहि तृप्यामि पूर्वपापबनधास्त महत् ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच । तत कहते राजन धार्तराष्ट्र सुयोधन भूश शोकाणेष मंग्नो निराश सर्वतोऽभवत् । हा कण हा कर्ण इति शोषमान पुन पुन । इच्छात स्पशिविर प्रायादतशेर्पप श्रीनारायणजीको नरोनम नरको भौर सरस्वतीदेवाको नमस्कारकरके जपनाम इतिहासको वर्णन करते हैं जनमेजय बोला कि हे ब्राह्मण इसमकार अर्जुनके हाथ मे युद्ध में कर्णके गिरानेपर थोडेसे बचेहुये कौरवों ने क्याकिया । । कौरव दुर्योधन ने अपनी सेनाको साहस रहित देख कर समयके अनुसार पाण्डवों के साथ कौनमा वम्म किया । २ । हे जाणुगों में श्रेष्ठ मै यह सुनना चाहताहू माप इसको वर्णन कीजिये क्योंकि मैं अपने माघीन वृद्धक चरित्रों के सुनने म नृप्त नीं होताहूं। ३ । वैशम्पायन वाले हराजा फिर कर्णक मरनेपर धृतराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन अहे शोक समुद्र में डूबकर सब प्रकार से इ खीहुआ । ४ । हाय कर्ण हाय कण इसप्रकार वारम्बार शोचता मरने से बचेहुगे शेपराजाभों समेत बडे दुःखसे अपने डरेकोआया ।५ । मूतपुत्र कर्णके मरनेका स्मरणकरते और शास HA1, A PARV CHÅ I'ITRI Hlau img lored down to Xirayan, Nas the lest of malos, and the gale nf learning, an nocount of the great war,18 gren Anull, " What did the rest of the Kauravae do at the fall of Karaa! What did Duryodlan do nlen he saw haown army loss heart I wiali to hear all thus, best of Binhome, ſo I am not yet satisfied ty th hearing the exploits of rus fore fathers Va shampagan, said "At the doash of Karna, Duryodhan an plunged 11 tl e can of grief Crying ont' Alus haran alas Karail'in the excess of grief, he went Jaway to bacamp with the rest of the warriors 5. Romemberingkarana - JananeJATA 4 nong: Sinlyn Parav 168211 मह ॥५॥ स समापमानोपितुमिः शासनिगितः । गमि मतपत्रवध स्मरन् ६ सय पलायितsa TIME संप्रामे मिशन फमा पुलाप नियको • ७ : शपं समापति का विधिवद्राप्रपामारमा निमयो राजन् हमशेष पैः मा nan मुतगुज युस पुराना पनरतधष्ठ दयामरणो पगम .in: शल्पो महाराज या कममा । तसे गाय माशाम्हे धर्मराजंग पातितः ॥ .. nai दुर्योधमो राजापुरमा मिति । भातृश्य जारपेश रिजालगत् ॥ यस्यार परिया महारय हाराहम कोन भीमतीनपातितः। १२॥ सरिमन हते मागास हतशिष्टानयो रथा सम्मानिशि राजेन्द्र मान पाम्पास निकाम् ॥ १३ ॥ सस पूर्वान्हसमये शिविर घोष समय । प्रपिधेश पुर दीमो दुश्मशोकसम निति हेतुप्रास राजाओं के समझानेपर भी दुर्योधन ने मुखको नहींपाका राजा देवइच्छा को बलवान मानकर युद्ध के निमित्त निश्य करके फिर पदकाने के लिये निकला ! ७ हे रामा या रानाओं में भेष दुम्पोधन मिर्मिर को सेनापति करके मरनेसे बवे पे शेषराजामों गमेत युद्ध के लिये पता । रे भरतर्षभ इसके अनन्तर काश्यीय और पागढवीय सेनाकायुद्ध देवासुर युद्ध के ममान | महाकठिनहुआ। ९ । हे महाराज तर रामा शस्य युद्ध में सेनाका नाश करने अपनी सेनाके मरजानेके पछि मध्याहन के समय धर्मराज के हाथमे मारागा ।१०। इसके पीछे राजा दुरोधा उन लोगोंको जितके कि परमारेगये भूमिमे हटाकर शत्रुमों के भगसे बड़े गम्भार तड़ागमें प्रवेश करगा। इसके पछि उसदिनके भामरे महरमें महारायणों मे घेरकर इसे बुलाकर वो वेग पूरक भीममेनके हाथमे गिरायागया 1 १२ । हे राजेन्द्र उम बड़े धनुषधारीके मरनेपर शेष वने महारथियों ने रात्रिक समग पायाल देशी सेनाके लोगोंको मारा ॥११॥ उसके पछि दुख और शोचसे संयुक्त समय मा काल के समय अपने दरेमे चलकर महान खितं नित्त होकर पुरमें पाया । १४ । वह मृत संजयपुरमें प्रवेश death Duryodlian was nol colesoled in spite of the exertion of the kings. Knowing Fate to be all powerful, lie came out again to fight. Having installed Shalya as the commander of his armiar, ho came out frith the rest of the Warriors to fight The two arbiter then fought like'gnds dud asura Haviny slato a large rumbər of warriors, Shalya Kas slain by Yudhishthir at müday. 10. lhog taling with hien the kinsuień of the s'aia warriors, Duryodhan entored a deep lake for the fear of fuel. In the third part of this day he was challengad to fight by Bhim and ethier warrios, nad forced to come out of water, he Was sláin by Bhım, 1 be rest of the Kaules is slew the l'anchal wir1018 at night. T'hori Srajaya wuch grieved and dejscted, wawe out oikein text in the mording abd of bered the city Fergunbsppy He suterad 166833) Valıhat विश्व पुरं भुजाधुधिरय दुखितः । वर्षमानस्ततो गन प्रविवेश निवेशनम् ॥ १५ सरोदस मरव्याघ्र हा राजनिति दुःम्वित । अहो यत विनियास्मो निधर्मम महामनः ॥१६॥मो पुषलवान कालो गतिश्च विगमा तया । शऋतुल्पबलाः सर्वे मंत्राज्यात पाणवः ॥ १७॥ र धतु पुरो राजन् जनः सः मुखमयम् । क्लेशेन महता पुर्ण सर्वतो गजसत्तम । प्रमरोद मुशोद्विग्नों हा गजनिति मस्वरम् ॥ ८ ॥ माकुमार राया तत् पुर मप्रत । पातनाद ततश्चक्रे थत्वा पिनिहत नृपर्म ॥ १९॥धावतभाग्यश्याम त त्रीपुरुषांस्तथा । नष्टचित्ता नियोगमतान् शोकन भूशपीडितम् ।। २० ।। तथा स यिदल. सूतः प्रविश्य नृपतिक्षयम् । पदर्श नृपतिश्रेष्ठ महायचक्षुषमीवरम् ॥२१॥षा चासीनमनघ समन्तात् परिचारितम् । स्नुिषामि भैरतभेष्ठं गारधाऱ्या विदुरेण च तथान्यश्च सहन्द्रिश्च शातिमश्व हिनै सदा ॥ २२ ॥ तमेव चा ध्यायन्त कर्णस्य निधन प्रति । रुदन्यामधीद्वाय राजांन जनमेजय करके महाग्लेशितमन अपनी भुजामोको जार करके कांपा हुभा फिर राजम- दिर में आया । १५ ।रे नरोत्तम वह अत्यन्त दुःखी हाय गना हाय राजा यह कहताहुआ रोदन करनेलगा वेडे कष्टकी वातहै कि हम महात्मा मरनेसे नाश हो गये । १७ । भाश्चर्य है कि काल बड़ा बली है इनीमकार सकी गतिभी दी है निज स्थान पर कि इग्न समान महापराक्रमी सब शुरवीर पाण्डों के हाथ से पारेगय । १७। हे रामाभोंमें श्रेष्ठ ननमय वह सब मनुष्यों के ममृद नगरमें संजयको देखतेही सब साओरको पडे दुःखोंसे संपुक्तये हे नरोत्तमकुमार पालकों तक अत्यन्त न्याकुम यह सब नगर चारों ओरसे हायरामा हायराना इस प्रकार ऊंचे स्वरोस पुकारता रोदन करनेलगा इसकेपछि रामाको पराहमा सुनकर सश्ने महापाड़ाके शम्दाकप ॥१२॥ उग मपय वहां हमने उन स्त्री पुरुषों को भी दौड़ता हुँमा देखा भोकि नाशमान पिस उन्मत्त और शोक से महापीडामान थे। २० । इस प्रकार महाव्याकुल मन उम मूतने रानमन्दिर में प्रश करके राजाओं में श्रेष्ठ ज्ञानरूपी नेत्र रखनेशले निप्पाप चारों ओर का पुत्र वन्धुओं ममतं गान्धारी | विदुर और अन्ग इष्टमित्र और जातवालों से घिरेहुये कर्णक मरने विषण में उत्ती प्रपोजन को ध्यानकरते थेठेहुगे महाराज धनराध का देखा है जनमेजय the city with upruisal arins and trenbling body and monio to the royal pialaos. 15. He went out crying, " A las hing! We are undone and hard topt you " The pura lo were much grieved at the sight of 8 njngt and the yiunk and old begail to veep crying, “Alus hing." They pero much gricrel to rear of the king's death Men and women were wet routing in all directiots with grief aad diemug. Having entered the royal place th dry dejected spirits, he saw the bing surrounded by edns, kihsthen, Gadhiri, Vidur and other friends, talling about [६८३४) Taggi Shalya Parv (6834) ॥ २३ ॥ नानिहटममाः सुतो धापसन्दिग्धया गिरा | सन्जयोहं नरव्याघ्र नमस्ते भर ६ ॥ २४ ॥ मद्राधिपो इत. शल्यः शकुनिः सौबलस्तथा । उलूकः पुनरव्याघ कैम्पोरदीयमामः ॥२५॥ शंसप्तका हतास काम्बोजाबशक सह मिलेच्छाध पार्वतीयाश्च यवनाच निपतिताः ॥ २६ ॥माच्या हताहाराज दाक्षिणात्यास सर्वशः । उदीच्या निहताः सधैं प्रतीच्याच नराधिप ॥ २७ ॥ राजानो राजपुत्राश्च सबंधो निहता नृप। दुर्योधनो हतो राजा पयो पालुवेन ह ॥ २८ ॥ भग्नसक्यो महाराज शेते पांशुष रूषितः पृष्टद्युम्नो हतो राजन् शिरसण्टी वापराजितः ॥ २९ ॥ उत्तमोजा युधामन्युस्तथा राजन प्रमदकाः । पाश्चामाश्च मरध्यानाशेयश्च मिस् दिता; ॥ ३० ॥ तव पुत्रा हताः सर्व दीपदेवा भारत । कर्णपुत्रो हत पूरी वृषसमो महाबल. ३१ || नराविनिहताः सं गजाध घिमिमदिताः। धिन नराम्र यह दुखी चित मूत अश्रुपातों से युक्त गद्गग वाणी से राताहुआ राजा घृत राष्ट्र से पा वचन बोला कि हे नरोत्तम मैं संजप है हे भरतपम तुमको नाकारह । २४ मद्रदेशका राजा शल्प मागपा उसी कार सविलका पुत्र शनी मारा गया'हे पुरुषोत्तम पराक्रमी तिथ्य उचूक और शकुनी समेत संत्र काम्बोज देशी और ममतक पारेगये और म्लेच्छ पहाड़ी और यवन मारेगये । १६ ! हे महाराज राना राष्ट्र सब पूर्वीय दक्षिणीय उत्तरीय और पश्चिमीय राजा लोग मारेगये । २७ । इनके सिवाय सव राजा और राजकुमार मारे गये और रामा दुर्योधन भी उसीमकारमे मारागया जैसे किपांडव भीममेन में मभामें मनिझा करीयर । २८ ॥ हे महारान वह दूटी जंघाम' धूलमें पड़ा सोना धृयुम्न और अपराजित शिखण्डी भी मारागया।२९।इसीप्रकार नरोचमउत्सांजा; युशमन्यु,भद्रक नाम क्षत्री पांचालदेशी और मेरीदेशी मरिंगये । १० । हे भर तवंशी आपके सब पुत्र और द्रौपदी के सर बेटे मारेगये और "कर्णका पुत्र बड़ा शृग्वीर वृषसम मारागये । ३१ | सब मनुष्य पारंगगे हाथी नाशईये रयतवार Katan. With tere in his ayes and voice choked with grief, the saia to Dhuratashtra,;" I am Sanjaya, site, and bow at your fort.24"Šnalga, the king of Madra is sian and so is Sakuni the son of Savar. The Canlujas an ! $ insaptks, with Kastavya, Uluk, Sabuni, mlechas, hill met and Yayans, are alain The warriors of the Eust. Svath, North and West are also no mure. The other kings and princes too are dead and Pliim lias falfilled his purnise by slayın: Duryndoan in the mange mentioned by him in the court, He lies in dust with his thigh broken Dhrishtadyumn and invincivile Suikhandi are also Hain .. All your sons and those of Draupad, are slain, with Frisbased the brave Bon of Karan. All tht men, clephants, cara and hores core destroged in battle. A ferp only of the tents, ere iba -- (6835) Malabharat 1८३५] हयाच पतिता युधि ॥ ३२ ॥ किचिव शिविरं सावकानां कृत प्रभो । पाण्ड घाना कुरुणाञ्च समासाथ परस्परम् ॥ ३३ ॥ प्रायः श्रीशेषमयजगत् कालेन मोदितम् । सप्त पाण्डपत. शेषा धाराष्ट्राला प्रय ॥ १४ ॥ते वध तातर पञ्च वासुदेवाय सात्यकि । कृपक्ष कृतवर्माच द्रौणि जयताम्बर ॥ ३५ ॥ तथा प्ये महाराज रथिमी नृपसतना अक्षौहिनीणां सर्वासा समेतानां जनेश्वर ॥ ३६॥ एने शेषा महाराज साये निधनंगा: कालेन निहत जग भरतषभ । दुर्योधन पुरतं करमा धेरंच भारत॥३७॥वैशम्पायन उवाच । एतच्छुत्प्रापय कूर धृतराष्ट्रोजेने निपपात महाराज गतसत्यो महीतले तस्मिीन्नपतिते भूमी विधुरोपि हा अंश । निपपात महाराज राजव्यसनकर्षितः ॥ ३९॥ गान्धारी नूपश्रेष्ठ. सर्वाश्च कुरघोषित । पतिता सहसा स्मी श्रुत्वा कर वषः स्मृताः ॥ ४० ॥ नि सन्न पतित और घोड़े युद्ध में गिरपडे ३२ । हे समर्थपरस्पर सम्मुख होकरआपके, पेट पांडवोंके और कौरवोंके कुछ डेरे वाकी रहे । ११ । यह संसार वहुधा कालसे गोहिग खियोंका शेष रखनेवाला हुआ पांडवोंकी और से सात और आपकी और के तीन शेष रहगये हैं। ३१ । भाव वह पांचों भाई वासुदेवजी और मात्यकी और भापकी भोर विजयी लोगों में श्रेष्ठ कृपाचार्ग कृतवर्मा और अश्वथामा शेपरहे है । । राजाभों में भ्रष्ट महाराजा धृतराष्ट्र इकट्ठी होनेवाली आपकी सत्र भदौडिगियों में आप, के यह तीनरयी जीवत रहेहैं। १६ ।हे भरतपम महाराज धृतराष्ट्र यही केवल बचे हैं और सब नाशोगपे हे भरतवंशी निश्चयकरके शत्रुता पूर्वक दुयों धनको भागे करके सय जगत कालसे मारागपा । १७ । वैशम्पायन वोले हे महा. राज यह राजा धृतराष्ट्र इस कठिन और महादु खदायी वचनकोमुनकर अनेत, होकर पृथ्वीपर गिरपड़ा । १८ । उस धृतराष्ट्र के पृथ्वीपर गिरनेपर शोक मोर दुखिसे पीड़ामान बड़े पशमान विदुरजीमा गिरपड़े ३९।हेराजेन्द्र गान्धारी भादि सर कौरवों की त्रिपांनी उन कठोर वचनोंको मुनकर अकस्मात पृथ्वीपर गिरपड़ी । ४० 1 तत्र राजमहल निरर्थक वचनों से युक्त अचत होकर पृथ्वीपर ऐसे गिर remnants of tho ar butucen your 80118 And the Pandavas only reninin, with the excoplion of seron on their side and thirco uf yourt. Tho five Punday brothers, with Yasudev nod Satyalı, un tho sido of tlo Pandards, and Kropacharya, Kritsarma and Abhiwatiraraa temain from among your warriors. 35. Out of all your Assainbied nkahnubionthreo trarriors romun, the restano destroyed. Duryodban's enanty has caused the destraction of the mould." Da licaring this Dhritisahtrs foll dove sonsuless, Vidur tuo, afflicted with brief hud boromo 1.snsible Gandling and uther haurav watten lira their 8c36-, Thw cutira royal family lay on earth like s prcsur Wouten surrow 3836 - (६८३६) शल्पपव Shalya ! ary भमा तदासीदाजगण्डलम् । प्रलापयुक्त महति विधायत पटे यथा ॥ ११ ॥ कच्छण तु ततो गला धृतराष्ट्रो सही निररमत प्राणाम् पुप्रयसनकर्षित ॥४२॥ जाना तु स नृप सन्नापमान सुदु नित । उदीय च दिश सी क्षत्तार वाफ्यमब्रवीत् ॥ ४३ । पिन् क्षत्तमहामास ५ गतिभरतर्षभाममानाघस्य सुभृश पुहीनस्य सर्पत ४४ ॥ एवमुक्पा ततो भयो विमहो निपपात रात तया पतित हष्ट्वा बान्धया येस्य केचन ।।५। शीतैस्त सिविस्तापैर्विव्याजाने रपि स तु दोघेण कालेग प्रत्याश्वस्तो मदीपसि ॥४६ । नष्णी यो महीपाल पुत्र व्यसनकर्षित । निश्वसन जिहाग इव कुक्षिप्तो विशाम्पते ।। १७॥ सजयोप्या दचत्र रष्ट्या राजानमातुरम तथा सर्घा त्रिय धेर धारी, यशस्विनी IBCN ततो दीपेण कालेन विदुर वाक्यतनात् । धृतराष्टो नरश्रेष्ठ मुहमामो मुहमा ॥ ४९ ॥ गच्छन्तु पोषित सर्या गापारी व प्रशस्विनी । सथेमे सुहृद सः अश्यते मे मनोभशम् ॥५०॥ एवमुत्तस्तत क्षत्ता ता खियो भरतपम । बिसर्जयामास शपमान पुन पुन । ५१ मिश्चक्रमुस्तात सर्वाता लियो भरतर्षभ । सहद पदा जैसे कि बडे वसपर खचाहआ चित्र होता है ।४१। उसके पीछे पुत्रके दुम्स से राजा वृतराष्ट्र ने पढे दुख पूर्वक धीरे धीरे माणोंको प्राप्त किया। 8२। फिर यह राना पचनताको पाकर कम्पता हुआ महादु खी सब दिशाभों को देखकर विदुरनीसे यह वचन पोला : ४३॥ दे बुद्धिमान बडे ज्ञानी भरतर्षभ विदुरजी मुझ सब पुर्षों से विहीन और अनाथ के तुम्ही गतिहो । ४४ । इस प्रकार कहकर फिर भवत होकर गिरपडा इस गीत से पडे हुये उस धृतराष्ट्रको देखकर ) १५. उस के बान्धरने उसको शीतल जलोंसे सींचा और पजनोंसे हवामी की फिर वह राजा बहुत देरके पछि चैरान्पहुंआ । ४५ । हे राजा मटके में दाले सर्पकी समान वासले और पुत्रके शकिसे पीडामान और मौन उस राजाने ध्यानकिया । ४७ । फिर वहाँ राजाको दु.खी देखकर सनपभी रोया जसीप्रकार यशवन्ती गान्धारी और सब अन्य स्त्रियां भी रोदन करनेलगी । ४८ । इस के पीछे वारं पार मोहित राजा धृतराष्ट्र बहुत देरके पीछ विदुरजी से वह वचन वोला । ४९ । कि सास्त्रियां और यशवान गान्धारी और मेरे सत्र मुहद जनलोग यहां से चले जाय मेरावित्त अत्यन्त मूर्षित होताहै । ५० । हे भरतर्षभ इसके पीछे उसके उस painted on a cangast. Prince Dhritrasli era gradually regained consciqua. With trumbling Lody, focling in all directions, he said to Vidur "V193 Vudur, being deprived of syns and bolp, I have only you for refugo. Ilaving said this the king again became inspasıbla. H49 kiasmen eprinkled Inn oror with cold rator and faoned bim long before ho regainod consciousness 46, Hissing lilo a borpent pent up in a jar the king meditated silently over the grief of b18 son's death Badjass - ne39 (-6637) Mahatbharat... (१८१७. सासाराष्ट्रका राजानमातुरम् ॥ ५३॥ ततो नरपतिमातु लब्धसन परन्तर सायोबीको रोदमान भृशानुरम् ।। ५३ । प्राजा निस्वसन्त: मान्न मामासम्ममासयत.क्षता साधुग्णाह ।। ५४ ॥ , पारपणि बाल्यवयपर्वणि धृतराष्ट्रप्रमोहे प्रथमे ऽध्यायः ।। शम्पायन उवाच । विसपामय नागपु धाराष्ट्रोम्बिकासुतः । पिललाए महा राजकुमाखातरं गतः ॥१॥ सध्यमिव निदरिय करीधन्यन् पुनः पुस । चिस्य, महाराज.तोषचनमनपीत ॥ २॥ पुनराष्ट्र उवाच । अहो पर माद्दुःख पदह बबनको मुनकर विदुरजीने उन बाग्मार' कम्पायमान लियाको यड़े धीरजम रिदाकिया । ५१. सर.नियो उस स्थान से निकल गई। और-सप मुद लोगभी रामाको देखकर चलेगये ॥५२॥ इसके पीछे संजयने उस राजाको मचेतता पुर-महादुरली मार रोदन करनेवाला देखा. उस वारम्बार वास लेनेवाले म रामको विदुरमीने हाथ जोड़कर मधुरवाणी से विश्वास कराया ।.५५ ।, . क अध्यायं.२॥ वैशम्पायन होसे हे महाराज व स्त्रियों के विदाकरदेने पर अम्बिका के पत्र धृतराष्ट्रने विलाप किया और यहादुःखको पाया। हे महारान बारम्बार अपन हापोंको पाते उस धृतराष्ट्रने उपण वासाओंको लेकर और बहुत चिन्ता पचन कहा।। हे सूतं यह महादुःख और दुःखका स्थान है जो मैं wept to 'ses.king in.that slate. Gandhiti and other wontenion, ipt orer his grief, Then Dhritrashtra said to Vidar, " Let all the wormed w Gandhari depart from here. Leave me alone, for I am fainting with grief."'At this Vidur Consoled the women xod sent them away The women and kicamen left the king alone. Beeing the king shed lears in great distiew, Vidur respecifully cooled bīm" 54. 17- • CHAHTER II . Vaishanpayan said, "At the departure of the womeu, Dhritrashtra wept for grief, With trembling bands and deep sighs, he said, in great distress, "It grieves me niuch to hear that the Pandavas are all- (६८३८) 78998 Shalyo Paray (6838 पारधामणे । शमिणभाष्यांचे व पत्तः सत वृणोमि ॥३॥ वनमारमय भून. इयं सुरई मम । वडापा निहतान् पुत्रान् दीयंते न सहस्रधा लिन्तयित्वा पपरालकीणा संजय । मध चाहतान पुत्रान् भृशं मे दीर्घते मनः ॥५॥ मन्धस्वादि तेलतु न मे रूपानदर्शनम् । पुत्रस्नेह कृता प्रीतिनिरपमंतेषु भारिता ॥ ६ ॥ पालमाव मतिकान्तान् यौवनस्यीय तानाम् । मध्यप्राप्तांस्तया शुरषा हा भास तदाम ॥ ॥ तानघ निहतान् भ्रस्वा हृतम्बयान हतौजसः । ननभे के कविच्छान्ति पुधाधिमिर मिप्लुः ॥ ८॥ पहा हि पुत्र राजेन्द्र ममानाथस्य साम्प्रतम स्वपाहीनो मरवाही का यास्थाम्यई गतिम कर्थ र पृथिवीपाला स्थक्रया नात समागम । शेषे विनिता भूमीप्राक कुनृतो यया ॥१०गतिभूषा महागज शानामा सुरक्षा तथा । मग वाच मावीर विराप शामिगच्छति।। तुझा पालाको कुशल पूर्वक अविनाशी मुनताह । । । निश्चय करके मेराहदक वजके सगान कठोरहै जो पुत्रों को पराहुआ मुनकर हजारों टुकड़े नहींहोता है ।। हे संजय नोंकी वालकीड़ा और प्रस्तांको शोचकर मार अब वेटोंको मृतक, मुनकर मेरारीच अत्यन्त फटता है। जो अन्धेपने से मुझको उनके रुपको दर्शन नहीं होताथा परन्तु पुत्रेतासे उत्पश्चाई भीति मदैव उनपर नियनथी । ऐनिष्पाप मैं उनको बाल्यावस्थाके ग्यतीत करनेवाले मौर तरुण सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होताथा । . । उन पुत्रोंके दुख समुद्र में वाहुमा में उन बड़े तेज स्वियोंको ऐषर्य से रहित और मराहुआ-सुनकर कहीं शान्ती को नहीं पाता है। राजेन्द्र पुत्र अब मुझ अनाथ के सम्मुख भावो;२ हे.महावाहु मैं तुम से गहतहोकर किसगनिको पाऊंगा।९। हे तात तुम,किसमकार मिले हुये रामाओं: को छोड़कर माकृत नीच मन्त्री रखनेवाले, रानाके समान पृषकहोकर पृथ्वीपर सोतहो । १०। महाराज वीर तुम जातवाले और सहदानोंके, गति होकरमुख अन्धे और सड़को त्यागकर कहाँ जानोगे । हेराजा तेरी बह छपापीत और safe and sound Surely my heart is very hard for it does not split anto a thousand parts on hearing, the news of the death of my suns. My mind is n great distress to hear of the death of ny-sons, when I remombor their playlul boyhood. 5. I loved thom much, though I could not be there on account of blindness. I felt inuich' joy, when! prard that they had passed thóir böyhood and turned youthe. On lacering of the death of thoso glorious ones I am plunged in the ocean of grial and can find no poace in nag mind. Coino to me my princely son. To what atnte shall f bo reduced without you? Why do you 'sloop in death like a king'laring foolish ninir ters, when you'lınd no way good warriors to protect you ?10 Bzing the reloge of your Friends and clan, whers alcyou.ging, fleur ng me o'd and whnd ! - - RAL १६८३९) शल्यप Slialyn'Pary (6939 सो का सा च ते प्रीतिःलांचं गमन् मुमानित | कर्ष विनिहतः पापैः संयुगेणा- जितः ॥१२ को न मामुचित काले तति साततिं पश्यति । महाराति सततं लोकनायति चासकृत् ॥ १३ ॥ परियग्य च मां कण्ठे 'स्नेहेनक्लिम्मलोचन मनु माधीति कार तत् साधु पदमेव च ॥ १४ ॥ ननु नामहिमश्री पवनं तव पुत्रक। भूयेसो मम पृथ्वीय पर्ण पार्यस्य नो तथा ॥ १५॥ भगदत्त कपः शल्य' आधस्यो अयया भूरिश्रवाः शलश्चैव सोमवतीय पाहिलकः ॥१६अश्यायामाच मोजम मागच महाबलः । हवलश्च काशीश. शकुनिधापि सौषला नी १७ ॥ म्लेच्छाम बहुसाहन शकाध यवनेसह । मुदक्षिण फाम्बोजस्निगधिपतिस्तथा ॥ १८ ॥ भीमः पिताव मारवाजोय गीतमः शुमायुधाच्युतायुश शतायुभेष बीर्यवान् १९॥जलसन्धोऽयाप्पश्रृङ्गी राक्षसचाप्यलायुधः अलम्वुपों महाबाहुः सुवास |महारयः ॥२० पते धान्य व वयो राजानो राजसत्तम । मदर्थ मुद्यता. सई प्राणी शिष्टाचारया.युदों में अजेय होकर तुम पाण्डवों के हाथ से कैसे मारेग । १२ । समयपर उठनेवाला होकर पुमको वारपार कौनकहेगा कि हे तात महाराज और ई लोकनीय मीति से आईनेत्र होकर तुम कण्ठ में मिलकर मुझसे शिक्षाकरो हे. कौरव-उस शुभवचन को 'मुझसे कहो। १४ पुत्र निश्चय करके मैंने तेरे इस वचन को मना कि यह वहुन पृथ्वी से भरी है वैसे, कुन्तीक पुत्रकी नहीं है.। १५ । भगदन कृपाचार्य, शल्य, प्रन्तिदेशको राजा जयद्रथ, शल सोम दन बालीक । ३. अजस्थामा, कुसंवर्मा, महावली मगंधकी रामा हदलः काशी का राना धवलका पुत्र राजांशकुनी । १७ । बहुत से हजारों बेच्छ गवना समेत भक, मुइक्षिण, कीम्बोज, राजा त्रिमर्म । १८ । भीष्मपितामह, भारद्वाज, द्रोणा चार्य, गौतम कृपाचार्य पराक्रमी श्रुतायु. अच्युतायु, बातायु.। १९ । जल सन्ध, आध्यशृंगी, भलायुधं राक्षस महावा मलमुप,महारथी मगह।१०।हे In spite of your mocy, love, good manncs und 1x zincibility, how were you stain by the Pandavas ? Rising botimes, who will call me father Haad Makanij shelling taersetatiction'sad mmbracing Tea after " What are your orders ?." Addreds me in the same sweut words lonce'more.''Ilave pften "heard yola say, "The kingdom does not belong to the son of Kuntis it'Joes to 'me 15 Bhagdatta, Ktipur chðiya, Shalya the princos of Avanti, Jayadrath, Suala, 'Somdatta, Publtk, Ashwitlena, the brave king of Mayadh, Brahadtal, the king of Kashi,'Shahani the son ol Sayol, thousands of mlechas, Yavans tra Shake, Sadakshari, Kamboj, the king rot Trigart, Bhishm the grandfather, Drona, Kriracharya, . brave Sirutayv, Achyutayur Statayu; - Jalasailali, Aistyaslırıngi,* Alayudh'the rutishas, braves Arkistusb8dvakid and other great kings are ready to lay down theiri said, (6840) BIxhaliharat 1201 रूपा मारणे ॥ २१ ॥ येषामपि धितो युरे माहीम पारपारित शोधाविया स्पा पार्यान् पाउचाला सर्वश ॥२२॥षदीप पसाल छोपरासयुष सात्यकुिन्तिम अगलमय घटोत्कचः ॥ २३। एको स्येव महाराज समा सनिवारण । समरे पाण्डवेयानां संकुलो व्यमिधारताम || पुन पहिला बीरा कमराव गण्डवै । अथवा सर्व एवं पाषाविमि ! यो सह राजेन्द्र हनियन्ति च नाम्मृध २॥षणको मासा मिनिष्णतिपरिवार । २६ ॥ ता नृपतयो पारा स्थास्यन्ति मम शासने । यो प्रणेतावासदेपो महामल मम सन्मयते गजन्निति मामनपाच ॥ २७॥ स्वारपास भूत "शो मम सन्निधौ । शक्तितो अनुपश्यामि निसान पारवाम्म ॥२८ गते red स्थिता यत्र हम्यन्ते मम पुत्रका व्यायामाना समरे किमबागपत ॥ २९ ॥ भोमनिहतो पत्र लोकनाथ प्रहारधान शिबिम समासाच भूगेन्दार राजर्षि यह सब राजा और अन्य परतसे राजा सा पो पुछमें भाणों को स्थान करके मेरे निमित्त तैयार हैं। २१ । नोंके मध्य में नियत और भाइयोंसे संयुक्त में युद्ध में सब पाण्डव और पाञ्चालों से युद्ध करूगा । २१ राजामों में बेटे मैं युद्धमें चन्देरी देशी राजा द्रौपदीके पुत्र सात्पीक कुन्तभोज और पटोकप रातम के साथ युद्ध करुगा हे महाराण में क्रोधपुछ अकेलाभी 'युद्ध में सम्मुख दोहनेवाले इन पांडवोंके हटाने में समर्थ हूँ । २४ । फिर पाण्डयों के साप शता करनेव ले, सब वारलोग साथ होकर क्यों न समय होंगराजन अपवा यासप सबलोग परिवोंके मागे पछिवास मत्र शूरवीरसि सहेंगे और उनको बुर में मोरेंगे ।.२५ । केहा की मेरे साप होकर पाण्डवोंको मारेगा इसकपोछे रांना लोग मेरी आमा निपतहोंगे और जो धनों का सामी और रक्षक बासुदेव है है राजा अहं शखोंको नहीं धारणकोगा उसने अमामे पर प्रतिश करली है । २७ । हे मत मैंने बहुधा अपने सम्मुख काये उसने अपनको मुनाकि युद्ध में शक्तिस, पांडवों को मृतक देखताहू । २८ । वनों मध्यमें पुरके पाप lives for my Surrounded by the and my brothers, I shall fight with the Pandavas and Pancbals I shall fight with the Warriors of Chanderi the soga of Draupadi, Satsaki, Kuntbboj and Gbatutkach. I tap alone withstap i all the Pandavas coming together, Why's all I not able to d) it when assisted by 80 many warrio s 1 Thes men will fight with the followits of the Pandava and will play tiem in battle 5. Karan alone can slay the Pandaru, Then the kings will obey me Vanader the lender the Paodarns wall art hear arins as he has promiskd to do so." I myself heard uften from him but the shakti kould use the deatb of the Pande TH. Most of my xong vat zlasa by Baita, What could be the - 9717998 Shalya I'ATAY (68411 अनुपम । ३० प्रोनच प्राणो यत्र सर्वसामानपारग मित पाये मी जिमन्यादागधेवा ॥१॥ भूरिभवा हतो पर; सामदत्तश्च मयुगे। प्राहलीकरण महाराज किमापनागपेवतः ॥ ३२ ॥ भगदसोरता यत्र गजयुद्धविशारद जपा यनिहताकिमपागधन ॥ ३३ ॥ मुदक्षिणी हनो यत्र जलमा पारवा, तापुरमायुसाएर फिमम्बागधयतः ॥ ३४ ॥ महानालस्नया पांच्या सर्व शसpal रमितापावे. संभ किमयागयत । ३५ ।। वो सो पर मागाव महापस । उप्रायुधस विनात प्रतिमाम अनुप्मताम्।।३६. बाम्ती नितीगतंय नराधिप ।सशतकाच पE फिमायागयत ॥ ३७॥ बलमरमया राजा राक्षसचाप्यलायुर । आप्पणिय निहत किमन्य प्रागपत नारायणा ता यत्र गोरला युरदुमंदा म्लच्छाध बहुसाना किमयागषतः ॥ ३९॥ शकुनि संघलो यत्र ग्यश्च महावल. निहत मालो करने मेरे पुत्र सरायुके पुत्र धामपनके हायसे बहुवा युद्धमा मधिकतर परते इसमें पारबके सिपाप दूनही वाव पाहे । २९ । जिस स्थानपर लोकनाथ प्रताप बान बाष्पनी शिखीको सम्मुल पाकर ऐम मारेग जैसे कि श्रृगालोको पाकर महापगेन्द्र सिंहमारामाताहै। । जिम स्थानपर मब अख शखों कुशल होगाचार्य बाम पाण्डवों के हायसे मारेगये तो भारबसे दुमरी कौन बात है १। इसपर निभा सोपदत्त और महाराम वालीक मारेगये और हाधियों के पद में कुशल भगदत्त मारागया और लपद्रय पारागया इसमें मारके सिगाप: कोनसी वास । ३३ । दक्षिन परिव जनसन्च. मारागया वहां भारव्य से दूसरी बात क्या है कि श्रुतायु और मध्युतायु मारेगये।४। और उमीप्रकार सपास धारियों वेल महाबली पाण्ड्य पदमें पायडवोंके हाथसे पारागया वहां प्रारूप से दूसरी बात पारे ।। ३५ । निस स्थानार महाबली सखल,मागध, और धनुष भारियों का मजा पराक्रमी उग्रायुध दोनों अपन्तिदेश के गजा और राजा गि मारेगये और बहुत से संसतक मारेगये वहां प्रारम्प से दूसरी बात क्या है ३. उसीमकार रामा.अलंचुप और अलाय राक्षम और आयश्रृगपी मार Cause of this otbar than Fata'? None but Falo caused the death of glorious Blishñ who was alain by Smihbaodi and others as a lon bv Jackala 50. It was the working of late that caused the death of Dronacharya, Bhurnbhava, Sonudatta, Prince Vahltk, Bhagdatia who was clever in elephant war, Jayadrath, Sudakshin, Paurar, Jolasanuh, Shrutayu, achyatay u and Pandya. 35 It was on account of Esto that Vrihadval, Vyragudi, the two princas of Avåuti and the kings of Tugat were slain. Maay Sapsa jataks wure slow on well an Alamrush, Alayadb, Arsbysslssog, the Gopal and Narayan WAITION and thousands of mlecbas, . All this was done by Fate, Wbo 4 6842) Mahabharat यावर ॥ ५४ धीर किमम्पदागधेयत ॥ ४० ॥ यत्र पूरा महामानः सर्वधमापारगा." बायो। निहता मूत महेन्द्रसमषिकमा १ मानादेशसमा मनिषा माप नियता समरे सर्वे किमयमागधेषतः ॥ ४२ ॥ पुनाथ मे “विनिहता पत्रांधेत महाबला । पयस्या भ्रातरण किमयागधेयत. " भागधेयसमायुक्तो ध्रुषमुत्परते नर । यस्तुमाग्यममायुक्त सशुम प्राप्नु मह बिमुक सामाग्यः पुष मायाम भविष्यामि र शत्रुघश 'गत. ॥ ४५ ॥ मान्यत्र पर मम्मे पाया सारते प्रमो । सोह धन गमिष्यामि निर्धातिसक्षये ॥ ६ ॥ हिमपा श्रेयो बनाय गमनादते । इमामवस्था प्राप्तस्य लूनपक्षस्य सय ४७ दुय्यों धनो तो पा शल्यस्य मिहतो युधि । दु शासनो विधानस विकर्णम भावल ॥४८॥ कय हि मीमसेनस्य प्रोग्य शब्द मुखमम । पकन समरे पेनत पुत्रशत गया चहां मारब्धसे दूसरी बात क्याहै । १८. जिसस्थानमें 'युद्ध दुर्मद गोपाल बार नारापण नाम शूरवीर मारेगये और हजारों म्लेच्छ मारेगये वहां मारब्ध से दूमरी पाताकपाहै । ३९१, जिस स्थानपर सौवलका पुत्र मावली बार शाकुनी कैतष्प सेना समेत मारागयावहां पारम्घसे दूमरीका क्या 11४०, हे मृत संजय | जिस स्थानपर शरमहात्मा और सप अनशनों में कुशल माइन्द्र के समान परा- कमी नानामकार के देशों के स्वामी बहुत से मत्री युद्धमें मारे गये वही मारम्भ से दूगरी यात क्याहै । ४२ । मेरे महाबली पुत्र और पौष समान अवस्थामा मारेगये वहाँ दूसरीवाद क्याई । । । निजप करकेमनुष्य प्रारम्पको सायकर उत्पन्न होनाहै जो प्रारब्धवान् है वह मुखकोपाता । ४४। सन्जय अपनभारम्भ मारपत्रों से रहिव शत्रुमों की प्राधीनता में वर्तमान में भर सर(गा ४५ है समर्थ पूरा पनवास के सिराव दूसरी बात भेष्ठ नहीं मानताई सौ पुत्रों और अपने जातके लोगोंसे रहित मैं जातवामी के नाशहोन पर बनको जाऊगा ४६। बन जानेके सिवाय कोई दूसरीबात मेरेकल्पाणकी नहीं रहेसम्जय जोकि मपरकेच 'पक्षीके समान इस दशाका पानवासाहू । ४७ । जिस पदमें दुर्योधन, शल्या महापली दुश्शासन, पाल और महावली विकर्ण पारागपा तप में भामसेन els, excopt Fute, could cruss the death or shakana and Kaitaryanvi their armios 40. Was it not Fale that caured the 'dealam of ko. many warriors powerful like Indra; with my song, grundsors and their companions ! Man's destiny coinos with big buth and the fortunato only are bappy Being oll and deprived of gnns by Fate, bow shall I be able to ine opprssed by foes ? 45. I eco no cours betterithan living in furçsta nfter this great destruction of song and hidsiden. Nolite othor than that of forests, can do me good, when I n 1911 et le Pringlese bird. Ilov shall I bear the harsi words of Bliós tho Tay?
- 1 (१८४३) upati Shalya l'arv 16843) मम ॥४. सवनातस्प पुर्योधनयम । पु.अशोकाभिसन्तप्तो न भोपाषा गिराशम्पायन उवाबी एस शोकसन्तत पार्षिकोत चाय मुरमुखमामः पुत्राधिमिरमिप्लुतः ॥ ५१ ॥ विळप्प 'सुधिर काल प्रराष्ट्रोस्थिकामुत वीण निस्य बिन्तपित्या परामयम् ॥ ५२ ॥ शॉकर्म महताविष्ट सातलो भरतर्षभ । पुनर्गायल्गाणि सूत पर्यपृच्छययातमम ॥ ५३ मत राष्ट्र जपाचा । भीष्मद्रोणी रती शुरवा मूतपुत्रनपातितम । सेनापति प्रणेता किम कुन्ति मामकाः ॥५४॥ यं यं सेनाप्रणेतार' युधि कुर्वन्ति मामकाः। मारिकालेमतं निम्नन्ति पाण्डवाः ॥ ५५ ॥ परमेव तो भीम पश्यत रिमालमेष इसी प्रोमा सर्वेशमेष प्रश्यताम् ॥ ५६" एक मेषरता फर्ण सूतपुत्र प्रतापवान् । सराबकानो सरेषां पश्यताकिटिना in कठोर शन्दों को कैसे मूंगा भिम अकेले ने युद्ध में मेरे सौ पुत्रोंको मारा दोनोमरनेसे दु:खी और शेयस त्यात तितकर मैं उस कारमा वर्यालाप करनेवाले भीमसनके कठोर वचनोंको नहीं पनगा। ५० वैशम्पा. मन बोले किनिसके आधा मारेगये वह राजा इसमकार शोक से सपा हुआ भारम्बार अचे पुत्रोंके शोकमें हुये । ११ । अम्विकोके पुत्र भरतर्षभ पंडेशोक से पूर्णडली. धृतराष्ट्रने बड़ी दस्तकाविलापकर लम्बी साप्ता लेकर अपना परी. जय को बोलकरके फिर गावस्गण के पुत्र मून संजयसे पुरूपात पूछ।।५।। धृतराष्ट्र बोलेकि मेरे पुत्रोंने भाष्म द्रोगाचार्यको मृतक और सेनाके स्वामी कर्णको गिरायाहुआ पुर्नफर किसको सेनापति किया । ५५ ।। मेरेपुत्रोंने जिस 'निसको स्वामी और सेनापति बनाया पापडयोंने योती सफ्यमें उस एस को पारी १५५ । 'युद्धके मस्तक पर वर्तमान भाम मी तुम्हारे देखतेडुये मारेगये इसीप्रकार द्रोणाचार्य मा. सबके देखते मारेगये । १६ । ऐसही राजाओं समंत तुम सबके देखते भूतका पुत्र मतावान् कर्ण अर्जुन के हायसे मारागया । ५७ । मुझको पथमही महात्मा बिंदुरजीने समझाया था कि यह सवमृष्टी दुर्योधनसे अपराधसे नाशको. पावंगी slansDuryodhan, Salya, Dushasxn, Shal and Vikarn Full of sorrow and grief for the death of Daryodhan, I shall not be able to hear this .woras of Bhim." 50. Varshampayan continued that Dhrntrashtra, full of sorrow and grief for the death of Daryodhan and heaving deep sugbon on account of his defest.' asked the Sat "ro, give' all the account in detail, kaging, " Whoin did my 'donis adstal és commander of their armor after the death of Bhishm, Drona "and" Karan! All the commander of our army wero alain 'by the Pandayas one after another 55.« Bbwisen and Drovachaiya were slain by the Pandavas in your presence Karan too,"was slain hy Asjan belore your fery eyes, Vidur had predicted the destructioit १ क (6844), Muhallintat पूयमा मुक्ताप दुरण माना दुयोधनापरान प्रविमशिपति:५८. वि सम्यक पायन्ति मूढा. सम्यगंधक्ष्य च । तदिदं मम हम्ब तथा भूतन्यस्त सत् ॥ १९ ॥ यज्ञात स धर्मात्मा विदुर. सर्वधर्मवित् । तत्रयां समनुप्रास सत्यमीरितम् ॥६० ४ देयोपचित्तेन यन्मया न त पुरा। माफ तस्वी गावल्गणे पुनः ॥ ६१ । को वे मुखमनीकानामामीत निपातित । सामुदायको पा प्रत्युध्यो रपी,॥ १२ ॥ रक्षन दक्षिणाय भद्रगजल संयुगे। वामम्बा पोहघुकामस्य को वा धीरस्य पृष्ठत ॥६३ ॥ कयासमेत मद्ररायो महाबल निहतः पाण्यं सख्ये पुत्रो वा मम सजय ॥ १४ ॥ सिपाही भारसानां महाक्षयम् । थथा व निहत. सख्ये पुत्रों दुर्योधमो मम ॥६५॥ पांचालाय प्रयास निहता ,सपदानुगा । धृष्टद्युम्न शिखण्डी चौपा, मारमा ॥ १५ ॥ पाण्डवाइच यथा युपधास्तयोमौत मारबती युधि । रूपात उनको । ५८,पर कोई अज्ञानी बहुत विचारकर अच्छीरीतिपर ध्यान नहीं करतो. का कच्चा विचार मुम, प्रशानीकाही है वह वचन बैसाहीमा । ५१. सधम्मों के माननेवाले उन विदुरभी ने जो जो कहाया वह सत्य कहाहुमापन उसी प्रकारस प्रत्यक्षमा । ६२ । पूर्णसमय में देवसे इतचित्त मैंने जो उनके पचनों को नहीं किया उसी अन्याय का यह फल वर्तमान आहे संजय बब फिर को ।। के गिरानेपर घेनाओंका मुख्य कौनहुमा और कान रथी अर्जुन और वामदेवजी के सम्मुखगया,, ',६२ । युद्ध में युद्धाकांक्षी शल्यके दाहिनेषक को किसने रक्षित किया और किमने उस वीरके वापचक्रकी रक्षाकी और किसने पीछे से रक्षाकरी ।६। हे संजय तमलोगों के एकत्र स्थित होनेपर. महावली शस्स और मेरापुत्र युद्ध में कैसे पाण्डवों के हाथमे मारागया । ३ भरतवंशियोंके उससब पर नामा को मुख्यता से कहा-जिसमकार युद्ध में मेरापुत्र दुग्योधन मसिगा। १५ । और ममे सब पांचाल धृष्टपुम्न शिखी, अपने पोछे चलनेवालों समेत और द्रौपदी के पांचोंपुत्र मारेगयोद६ ।, और जे कि सब,पाण्डव दोनों पादव कृपाचार्ष कृतवर्मा of the warriors by tiid lault ot Duryodbeu i muude a mistake becode I gavo no lend to h18. Mords which have proved true. Vidur, who knows all about dların, bnd spokon crap. 60. This is the rosult of my not giving ear to, his words. Pray tell me, Banjaya, box it happened Wha santne neet londer after Karan, to facs Arjun and Vasudev an,battle. The protected the right wheel, the left rheel Aud rear of Bhalya ! , Hluw were Slialya and Duryodhaz slain by the Pandavas in spitte of all our warriosa! Describe the great Adestractivé luttle in whuh my an'iray pain. How were the Poochala, Düruhta dynmn and Elskhands, sathil er klb were and the role of Draupadi Poul. How and wll tin Pauttaras. athi Yadams, Kripacharya, --- 3983) L (५) 03198 Slinlya !'arv मारवाजस्य चारमः ॥ ६७ ॥ यया याशंचन युद्ध घृधमत्ततः। अनिल श्रीतु विष्यामि कुशको शसि सञ्जय ।५८ ।। इति शत्पपणि शल्प वर्षणि धाा अपोतीयाध्यायः २ ॥ ..' .~rnet सर उवा भणु राजमयहितो यया वृत्ती जमक्षय कुरूणा पापा समासाथ परस्परम् ॥ १ ॥ निहतो मतपुत्रे तु पाण्डयेन महात्मना । बिदुतेषु च सम्येषु समातिषु चासत ॥२॥ घोरे मनुष्यदेहाना माजी गजवरक्षये, यत्तत् से पाय-सिंहनादमधाकरोत् । तदा तप.सतानाजन प्रापिति मुगमयम inसम्मातुंमनीकानि म चैधाथ परामगे । आमोहिते कर्ण तब योवस्थ कस्वाचित मिजो माविनामगाधे घिgar । अपर पारमिच्छन्तो और भरमाजका पौत्र अश्वत्थामा यह सप युद्धमे बचे ।६. इसके पीछ जिसमकार मेसा पहुआ उस सबको मुना चाहताई हे संजय तुम वर्णन करने में बड़े कुमाहो६८॥ 'अध्याय ३1 संजय बोले कि हे राजा सावधान होकर मुनो नसे कि युदभूमि में मनुष्यों शरीरोंका अत्यन्त घोर नाश वा रानाभों की हानिहोजाने और कर्णके मरनेपर पाण्डयों ने सिंहनाद किये तब आपके पुत्रों में बड़ामारी भय उत्पन हुआ। कर्म भरनेपर आपके किसी भूरवीरकी भी सेनाओंकी बढ़ाई और शीघ पराक्रम करने के सारस की बुद्धी नहींहुई । ४ । जैसे कि नौका राहत अथाह जल में नौकाके टूटनेपर व्यापारी लोग अपार जलके पार होने की इच्छा रखनेपाल होते हैं उसी कार भजनके हायसे सेनापति कर्णके मरनेपर आपके लोग रसाके चाहनेवाले Kritvarma and Asb wathama escape destruction } Pray tell me, Sanjaya, in full detail, how it all happened." 68. . -- - . . CHAPTERJII Sanjaya raid, " Hear it carefuly, king, how at thedeath of Karan and other warrior tbe Pandavas Toared and the Kauravns flod for fear. None of your great warriors jotended to face the Pandaras (at the death of Karan. Your men zought protection after the death of, l'aret w merchants wish for land when their hip is yrеched in the mideti 6846) Mahabharat - हने द्वीपे फिरोटिना ॥ ५॥ मतपुत्रे इते राजन् वितस्ताः शरधिक्षताः समाचा नाथ गिउम्तो मृगाःसिंहाव । भग्गनाइच वृधः शाणदेष्ट्री बोगा ॥ ६॥ प्रत्यायाम सायान्हे निजिता सव्यसाचिना । इतमाग षिषस्ता निकता निशितैः शरैः सूतपुत्रे ते राजा पुत्रा प्रायन भियात् ।। 'विषाः सर्व काग्दिशीका वितसः भन्योऽयमभि निघ्नन्तो पीक्षमाणामयादिता ॥८॥ मामेष सूमे धीमत्सुमेव च घृकादरः । अमियातीति मन्यानाः पेतुर्मस्लु भारत ॥९॥षामन्य रथामन्ये गलानन्ये महारथाः । आरुह्य जयसम्पमान पादाताविप नभपात । १०॥ कुरैः सन्दना मग्ना सादिनच महारथः। पदातिसंघाशाइयोधः पलापभिश हताः ॥ ११ ॥ व्यालतस्कर संकीण साहाना बया ने तथा त्वदीया निहते सतपुत्रे दामषम् ॥ १२ ॥ एतारोहातथा नागान्धि हुये ५।राजा मूतपुरके मरनेपर भयभीत शस्त्रोंसे पायल आपके भनाथ लोग नायक ऐसेचाहेनर लोप जोकि मिहोते पीडामान हायटीशाखावामबैक औरटीडायाला सर्प रक्षाको चात।। सार्थक लके समय अर्जुनसे पराजित मृतकवीरवाले , तीक्ष्ण वाणोंभे घायल होकर लोग हटमागे । ७ । हे राजा कर्णके मरतेही यंत्र वाकवयों से रहित अचेत भयभीत और परस्पर महन करनेवाले और भयसेव्याकुल होकर देसनवाले भापकेपुत्र महाभयातुर होकरभागे । ८ । और यहनिश्चय जानकर कि अर्जुन भार भीम हमारेही सम्मुख माते यह मानते हुपे महा न्याकुलतास मिरकर मृतक पायहोगये । ९ । किसी महारयीने घोड़ोंपर किसीने हाथियों पर किसी ने, स्थापर चढ़कर बड़े वेगसे भयभीत कर अपने पदाविषों को त्यागकपा।१० साथियोंस रथ महारथियों से अव सवार और भयसे व्याकुल भागनेवाले घोड़ों से, पदातियों के समूह मारेगये । १।। जैसे कि सर्प और चौरसि भरेहुये बनमें अपने | मंगके लोगोंमे पृषकहोकर मनुष्यों की जोदशाहोती हे राजा उसीमकारकर्णके मरनेपर, भापक शूरवीरों कोभी वहीदशादुई । १२ । अथवा जैसेकि मृतक सवारवाले. हाथी of waterr. 5. Terrified at the death ol Karan and wounded by weapone your men wished for a protector like orpharts attached by a lion, oxen with brokon horng or serponts with brobon teeth. Wouniled und defeated by Arjun's arrows, your men retreated by the evening. Doprival of Aruns and armour, foulishly charging ono another and terrified, your sms fled in terror. Byliving that Arjan aud Bhim wore oferywhere encountering them, they were nearly dead. They rode their horacs, elephants and care and Red it torror, leaving their foote 10. Cars, horsos and men store destroyed by the fiting war riors Your mes were in cablusion like those who are separated from thoir companiɔng in a forest full of thiuves and serpento. Al the clouds! of <** ar, they reid lilu riderless elephants or like men iritha brukon (६८४७) शरथप Shatya Paray (6847) मालपारा स पार्यमय फमपश्यन् – मानुगः ॥ १३ ॥ तान् प्रेक्ष्य इवत सगंन भीमसेनमारतान् । दुर्योधमाय स्वस्त हादरा कावेदमप्रवीत् १५॥ नातिकामिप्यते गायों घनुपाणिमयस्थितम् । अघने धत्तमान न शनाइवान प्रयोदर ॥१६॥ समरे गुणमान हि कौन्तेयो मोन सशय गोत्सहिंदभ्यतिमात मलामिव महार्णव ॥ १७॥ अपार्जुन समाविद मानिनच वृकोदरम् । निहाय शिष्टान राम कक्ष्यानुण्यमानुपाम् ॥ १८ ॥ तच्छुरा कुरुराजस्य शरापंसदश पक्ष । सूनो हेम परिउन्नानाधानचोदयात् ॥ १९ ॥ गवारघरथहीनास पादाताष मारिष पञ्चविंशति साहमा प्रावधागरिव २० । तान भीमसेन सखो दृष्टयम्मम पार्वत । बलेन चतुरङ्गन परिक्षिप्याइनच्उर. ॥ ॥ प्रत्ययुध्यन्न त सर्व भीमसेन और टेहाथवाले मनुष्य होते। इसीप्रकार प्रापके सवमनुष्य संसार भरकाही अर्जुन रूप देखते हुये भयमे पाडामानहुये । १३ । भीमसेनके भयसे पीडित होकर भागता हआसवको देखकर और उनहजारों हारोंकोभी भागां देखकर दुग्योधन ने बड़ा हाहाकार करके फिर अपने सारथीसे यह वचन कहा । १५ । कि अर्जुन सबसेना के मारने को मुम धनुषगरी के होतेहुये नहीं आसक्ताहै इसमे अपने घोडाको रोको १६॥ मैं निस्सन्देह उस पद्धकरनेवाले अर्जुन को अवश्य मारुगा वह मुझको ऐमे उल्लघन नहीं करसता है जैसे कि महासमुद्र अपनी मय दा नहीं उल्लान करसक्ता है । १७ । अब मैं श्रीकृष्णजी समेत अर्जुन को ना बहा अकारी मीमतेनको और इसी प्रकार सब बाकी पचेडुये शत्रुओं को मारकर की के ऋण से उद्धार हूंगा। १८ । सारथ ने कौरवों के राजा दम्पोधन के उस कनिका,जो कि शूर और श्रेष्ठ लोगोंके कहने के समान था मुनकर मुवर्ण के सामानों से आच्छादित घोड़ों को बड़े धीरेपने से घलापमान किया ||९। हश्रेष्ठ फिर रयघोड़े और हाथियों से रहित आपके पच्चीस हजार पदाता युद्धके निर्मित निपतहुये । २० । फिर अस्पन्त क्रोधयुक्त भीमसेन और धृष्टतुम्न ने वागिणी सेना समेत उन पदातियोंको घेरकर मारा । २१ वहसव सीमसेन और धृष्टद्युम्न Iley thought that they saw Arjun evoywhere and were confased with terror. Seing them runding anay for fear of Bhim, Duryodban faul to the driver, Arjun cannot destroy the whole army as long as I am alise, Check your horses to flat l nay klay him. He cannot withstand near the ocean can not pass over the count Having slain Shri Kuislin with Arjun and the rest of the enemies, together with Bbim, I shall satisfy the debt of Karan warlıhe laugu igeot Duryodhan, the driver gently drove the gold deched horses, Destitute of horses and elephants, twenty five thousands of your warriors stood by him. 20 Thon Bhim and Dhrushtadyama, mach enraged, surrounded them with their armies and slow them. aruis A " Henr ng the . (6848) Mahalhalal सपापनम् । पापातयोचान्य जगृहुस्तत्र नामनो ॥ २२ ॥ मयत रणे भीमस्ते मृधे पर्युपस्थिते । सोधार्य रथातूर्ण गदापाणिरयुध्यत ॥ २॥ सायरने भूमिष्ठान्य पक्षी कादरः । योधयामास कोरयो भजाये समाश्रितः ॥ २४॥ जातम्पपरिच्छन्ना प्रगृहा महनी गदाम । म्यवधीत्तापकान् सर्वान्दण्डपाणिरियासः पदानगोतिरिधाश्त्यक्तजीवितवान्धवाः । भीममद्रवन सम्बे पक्ष चलने यथा । २६ " आसाथ भोगसनं ते संरब्धा युमधुर्मदाः । विशुः सान एन्ट्रना मतमामा इशारतकम् ॥ २७ ॥ श्येनपधचरद्भीमः सहगन मपया-तबार विशतिमाहातापानामपोषयत् ॥ २८ ॥वा तत् परवाना मीमः सत्यमा क्रमः एम्न पुरस्काय पुनस्तस्यी महावः ॥ २९ ॥ माद्रीपुत्री तुशासित क सम्मुख होकर युद्ध करने लगे और किसी ५ ने पाण्डव भार पुन नामोंको लेकर पुकारा २२ । संघउन सम्मुख माहुये पहातियों से युद भीमसेन कोषरूप हुये और बड़ी शीघ्रता से अपने रथसे सतर हाथमें गदा. युद करने लगा। २३ । भपने भुजबल में हदरूप धर्मको . चाहनेवाले रथमें समार कुन्ती के पुत्र भीमसन ने रपपर चढ़कर उन पदातिया से युद्ध नहीं किया II में दण्डधारी यमराज के समान भीमसेन ने सुवर्ण से माण्डव अपनी गदाकोधका लेकर पदाती होकर आपके संघ पदातियों को मारा ! २५ । फिर पर मदानी | भी अपने प्यारे जीवनको त्याग करके युद्धमें भीमसेनके सम्मुख से गये बसेकि ऑग्नि में पतंग जाते हैं । २६ । वह सबलोगायुद्धमें क्रोधयुक्त युद्धदुर्मद बायोम को पाकर अकस्माद ऐसे नाशहोगपे जैसे कि जीवोंके समूह मृत्युको देखकर नाशहाजाते हैं । २७ । फिर वाजकी समान गदा हाथमें लिपे घूमनेवाले भीमसेनने आपके पच्चीस हजार पदातियोंको मारा ।२८ फिर वह महापराक्रमी अतुलपलमी मसेन उस पदातियों की सेनाको मारकर घुम्नको अमे करके पहार हुआ । २९ । महारथी नकुल महदेव पीर सापकी शकुनाके सम्मुस से और बड़े चित्त होकर दुर्योधनकी सेनाको मारते हुये बड़ी शीघ्रता से सम्मुख Tley facel Blism and Dhirishtadyumn in battle and challenged them to fight. Bhim was onrnged at this and coming down from his rar, be Sought them with his jnace. Firn on his duty and rolying on the strenght of his ardır, he did uut like to play them from his car. Like Yam tho wioldor of stuff, Bliim, taking his golden[mace in bis limod, fon: mldiers. Not caring for their life; they faced Bbim me insects fall into fira 26. They were destroyed by Bhim as if they and incou Denih limsill. Itoaming like a bawk, maso in band, Bhim slut twenty fro thousasds of your loo. Haviog alain tho foot soldiery, Ibito stood by Dhriebtaigume Nakul, Ssbader and Set gaki landslalaniand.ale, iba army of Daryolban with choorlu! - mler Four [६८४९) शल्यपर्व Shalya Parv (6849) बिमारण जवेमाश्यान इन्षा हन्तुकामा महारला ॥ ३० ॥ तस्थान रार मुपहसे निहस्य शित शर समाधापरस्परिनाला युखमभूमहत। " सतो थमायो रामन् रयानीकमगारन । विश्रुत विपुलोरे' गाणीवविसिपमाभनु ॥२॥ कणसारधिमायान्तं शाश्वतहय रयम् । म मम्मापि योनारपदीया माह मयात् ॥ ३३ ॥ विप्रहीनरयाषाश्च शरैस परिवारिता, । पपिंगतिया रसा पार्यमार्छन् पदातय ॥ ३४ ॥ हरषा सत् पुरुपातीक बालानां महारय १.३५ भीमसेन पुरस्करप नधित् प्रत्यपद्यत ।। ३६ ॥ पाराषतसपीच कोविदार बाजराघष्टद्युम्न रणे इष्टुवा वदीया प्राद्रधन भयात् ॥ ३७ ॥ गान्धारण बोराममनुसृत्य यशस्विनौ । नचिरात् प्रत्याश्येता माद्रीपुत्री ससात्यकी॥३८॥कि तान शिबण्डा पदोपदेयाश्च मारिष । हरया रपदीय [महत सैन्य जयापार दौड़े।३० बर्षात वह अपने तीक्ष्ण वाणोंस बहुतसे सवारो को मारकर शीघवा से उसके सम्मुम्ब दौ? और घडा युद्धहुमा ।। हे मा फिर भर्जुन ने भीमापकी रयाली सेनासे सम्मुख जाकर तीनों लाकों में प्रसिद्ध अपगांडीव धनुष कोर्टकारा । ३२। आपके मुद्धकी शूरवीर उस स्थ को जिस में कि श्रीकृष्णजी सारथी और शेष घोड़ों से युक्त था देखकर और युद्ध करनेशले मनकोभी देखकर मागे । ३३ । रमोसे रहित भौर बाणों से पाहामान पच्चीस इमार पदतियों में कालको पापा । ३४ । पांचालोंका महारयी अत्यन्त साहसी पुरषोतम श्रीमान् धृष्टद्युम्न उनको मारकर । ३५ । थोड़ेही कालमें भायसेन को भाने करके दिखाई दिया । ३० सक अापके शूरवीर उस कपोत वर्ण घोड़े और कोविदाररूपी ध्वनापारी धृष्टद्युम्न को युद्धमें देखकर भयभीत होकर भागे । ३७। और यशस्वी नकुल और सहदेवउस शीघ अस्रोंक चलानेवाले गान्धारपतिको स्मरण करके सात्यकि समेत थोडीही देरमै दृष्टिपडे । १८ । श्रेष्ठ इसी प्रकार | पाकितान शिखण्डी और द्रौपदी के पुत्रोंन आपकी बढ़ी सेनाको मारकर बढे शलों को बनाया । १९ । फिर वह आपके शूरवीरों को मुख मेडकर भागतेहुपे 1 hey slut 1141 mero 14 hér-emen Hud fought a lord fight Ar jun to), entered the field of battle and twanged bis Gandı buw 32 Sveing the car driven by Siri Kuisha nnd drawn by white horsos, your Warriors fled away froin Arjun. D stitute of cars and wou ded by RTTOWE, the twenty five thousands of foot rolliere met therr death. Having slain them, the brave leader of the Panchals, Dhrushtadyuwa Was sccompanied by Bhim Your warriors fled at the sght of Dhrushtadyumn the possessor of pigeon-cloured horses and kob dar atandard. Nakul and Sahadev, with Satyaky hastened to face Sus. tua & milarly, Chehijan, Shikbandi and the sons of Draupadi blow Abar coachs after slaying your warTi018. Seeing your son turn face, minds 6850) Mlalisbharata (६८५०) ९ सालाघकान् प्रेक्ष्य द्रवती घे परांमुखान् । अभ्यधावन्त निम्तो हपान जिया वृषा इव ॥ ४० ॥ सेनाशेषं तं दृष्ट्या नव पुत्रस्य पाण्डयः । व्यर रिचत सध्यसाची चोध घलवानप। ४१॥ तस पनं शरराजन् सहसा समपाकि स्त् ॥ ४२ ॥ रजसा चोदतेनाथ न स्म किचन दृश्यते ॥ ४३ ॥ अन्धकानको लोके रामने महीतले दिशःसषी महाराज सापकाः प्रावधन मयात् ॥ ४४ ॥ भग्यमाने सन्येषु कुरामा विशाम्पतिः परेषामात्मनश्चय समन्नार समुपाद्रवत् ॥ ४५ ॥ तवा इयोधन मीनाजुहापाय पाण्डवान् । युद्धाय भरतश्रेष्टां देवानिय पुसयति ॥ ४६y. संपनमभिगन्नं सहिताः समुपादयन् | नानाशखएजः झुद्धा भरसंयन्तो मुसहर ॥४७॥ दुर्योधनोऽप्य सम्शातानगिन् व्यधमच्छरः । सत्रा परीसर झुख शक शोतसहमशः ॥४८॥ तत्राद्भुतमपश्याम तय पुत्रस्य पीरूपम् । यदेक-साहितामशेर रणे युक्त पाण्डवान् ॥ ४९ ॥ दुर्योधन स्पसैन्य मपश्यद्भश विक्षतम् । ५० ॥ ततो देखकर ऐमे मम्मुख आकर वर्तमान हुये जैसे कि दैलोंको विजय करके क्रोधयुक्त पल वर्तमान होते हैं 1४1 राजा इसक पछि महा पराक्रमी पापडव भर्नुन मापकी बाकी बचीईई सेनाको देखकर क्रोधयुक्त हुआ । ४१ 1. वाणों की वर्षा करके उसमेना को हकदिया फिर अन्धकार होजाने पर कुछ,दिखाई नहीं दिया । | हेमहागन लोकके इन तेज होने और पृथ्वी को धूलयुक्त हानेपर ; आपके संब शूरवीर भयभीत होकरभागे । १४ । हे गजा सेना छिन भिन्न होनेपर आपका पुषग्योधन मम्मुखमानेवाले शभोंकी भोरकोदोह।। ५ । इमकेपीछे दुर्योधन ने मत्र पाण्डयोंको युद्धकं लिये ऐसे बुलाया जैसे कि हे भरतर्पम पूर्व समग । ना बलिने देवताओंको धुलाया था। ४६ । नाना प्रकार के-शस्त्रोंसे युक्त कोष युक्त बारम्बार की दंत और गणना करतेहुये एक माधही, उसके सम्मुसगरे INS मपीछ यही मयसे अव्याकुल चित्त क्रोधपुक्त दुग्योधनने गाने मरण पाणों से हमारी सेना के लोगों को मारा | ८ | उस स्थानपर हमने भापत्र की अपूर्ण धरतको देगा कि अकेलादी उनसघ इकटठे होनेवाले पापों से they at mallshu billa altor conquering other bulls.10 S ring the rest your army teleno fun, Uravu Arjun was onmzed Ilu covcro tha ariny with thu nhuser of artuira Nothing was to botern in the dark. At the slaughter of their pxoplo, while the field suas eprelopa ed in dust, your warrion turnal birk, 41 At tho dispersion of tlı army, your on Duryodhan rushil ngninst the finer. He cliniengcd thic l'andaras to fight as Buli fimil Anne the gode. They came ou togethe, daunting and romrug in anger. Intrerid in danger, Durga dung gler chaquads of sparrion mith his aliarp AIMRAVO uw there sho wrotdorlal powers of your Bja so alono fought with miny - lof whola (6851 १६८५१॥ शल्पपई Salyn Paray वस्थाप्य राजेन्द्र कृतपुदि सबारमा । हर्षपनिय तान् पौधानिद पचनमब्रवीत् ॥५१ । न त देश प्रपश्यामि पृषि पर्षतेषु । पत्र यातायु पाषा कि सन १ ॥ १२ ॥ स्वापि बलं तेषां कृष्णीव मशविक्षती । पछि सर्वे तिमो धोनो विजयो भवेत् ॥ ५३ । विप्रयातास्तु वो मित्रान् पारवा तिकि लिपान् । अनुसत्य हनिष्यन्ति श्रेोम समरेषध ॥ ५५ ॥ मुख मात्रामिको मृत्यु सधण युध्यत । ततो दुख न जामात प्रेत्यवानरयमानुने ५५॥ भ्रषन्तु सत्रिया स पावन्ता वै समागता । द्विपको भीमसेनस्य कुखस्य परमेष्यथ ।। ५६ ॥ पिताम हेरारित न धर्म हातुमय ।। ५७ ॥ न च कर्मास्ति पापीय क्षत्रियस्थ पलायनात ५४ ॥ न युद्ध धर्माच्या हि पन्या स्वगंस्प कोरषा । मुधिोणाग्जितालाकार युद्ध करन लगा। ५० । इसके पीछे उस महात्माने अपनी सेनाको अत्यन्त दुखी देखा हे रामा उप्तप्तमय आपका बुद्धिमान पुत्र उन दुखी शूरवीरों को वडा करके उनको मन करता हुआ यह वचन बोग। ५१ । किमैं उसदेशको नहीं देखताहूं जहांगर तुम भयमे पीडित होकर जामो और यहाँ पाण्डवों के यमे वमने पाओ तुमको भागने से क्यालाभहै । ५२ । उनकी सेना बहुतकमरहगई है और श्रीकृष्ण अर्जुन अत्यत घायलहै यदि तुम सबठहरो तोमेरी पूरीविजय है। ५ । नो तुम भागोगे या थरहागे तो पांडवलोग अपराधी जानकर तुमलोगों को पीछाकरके भारेंगे इस्से हमारा और तुम्ह रा युद्धमेंही मरने अप्ठहै । ५४ । क्षत्री धर्मसे युद्धमें लहनेवालों की मृत्युकाहोना सुखरूप है क्योंकि मरने के दाखों की नहीं भोगताहै शीघ्रही मरकर अविनाशी गतिको पाताहै। ५५ । तुमजितने क्षत्री अवइकठे हुयेहो सब वित्तलगाकर सुनो देखो भागनसे एकतो क्रोधरूप हमारेशत्रु भीमसेनके माधानहागे दूसरे इन संमार में अपकीर्तिपाकर स्वर्ग वासी न होगे इसहेतुसे हम लोगोंको अपने पूर्वजों के किये के धर्मका त्यागना उचित नहीं है । ५७ । भागने से अधिक और कोई पापाप क्षत्रीका धर्मनी है हे कौरव लोगों युद्धमे बढकर warriors of the Pandavas 50 Scanng bis warriorg in grout distics ho said to them, "I see no place where you can hide yoursolf and be safe from the Pandavay Vhat 18 the use of your runnigawa, " Their army is exceedingly reduced in number and Krebs and Aajun are badly wounded 1 can yet win a cumplote victory, if you stand fruniy, They will chase you, if you run aray or disperse. It is therefore better to die fighting. A kehatrya falling down in battle, does not feel the pange of death and scon attnins to ab uudestructible state 50g Hedr ma attentively all the warriors h ro nesebbled If you run away from battle you will fall a poy tu Bhim and shall forego beavod There is no greater sin for a kshatrya then his runding vay' from battle and no daty is tole preferable to hiu tha tigatia, Fou (6852) Maliabharat !७८५३ सपा योध समश्नुते ।। ५९ ॥ तस्य तद्वचनासन्न पूरयित्वा महारथाः। पुनरेवाल सतत क्षत्रिया, पाण्डवान् मति । पराजयामृप्यन्त. चित्ताश्च विक्रमे ॥ १॥ लव प्रपते युग पनरेष सुदारुणम् । तापकाना - परेषाच बंधामुारणोपमम् । हिरपुरोगा ससम्येन पाण्डमाम् । अन्यधाय-महाराज पुत्रो पुथ्योषमता + विद्वाल्पपर्वणि झाल्यवधपति, कौरव चिलाप सृतीयोऽध्यायः ।। सजय उवाच । पतितानथनीदांश्च रांश्चापि महात्मनाम रणे विमिरताम दृष्ट्या नागान पीच मारिष ॥१॥ मायोधनञ्चाति धारं रुद्रस्याफ्री साविषय भत्रियोंका कोई उत्तमधर्म नहीं है है शरवीग जो भरमौजाभोगे थोड़ेही दिनोंमें शोघ लोकों को भोगोगे । १९ । महारथी क्षम उस राजादुर्योधनके वचन, की प्रशंसा करके फिर भी पराजयको । महनेवाले पराक्रममें प्रदत्तचित्तहोकर पायडयों के सम्मुख वर्तमानहुये । ६. उसके पछि फिरभी आपके युद्धका और दूसरे प्रति पक्षी लोगों का का भय कारी देवापुरों के युद्ध के समान युद्ध जारीहुआ हे महारान आपका के दुर्योधन सब सेना समेत उन पाण्डवों के सम्मुख दौड़ा जिनका कि प्राय अधिष्ठिर था ६१॥ अध्याय ४॥ हे भरतवंशी गिरहुये रथों के नीड़ और महात्मा के रथोंको और थुर मरेहुये हाथी और पतियों को देखकर । । । और रुदनी के बिहार क्रीडास्थान will gain heaven in onse of death. They praised Duryodhan's worde And aguins attacked the Pandurns. The lattio was again very dreadin' liko ibat Lotween the gods and agurs Your son, Duryodhan fusbé agamut tus Pandavas who were led by Yudhishthir." 61. CHAPTER IV oing this care of the groat man iors, clophants and font Holdiers des troyed in battle, the with field of battlo like tho pleunaro-ground 30 Hodra thoasında of kings fillca en deegra x by Arjan's prowcs, Also yourron defeated and dejected, your armic difpureed and crying - - शल्यपर्व Salya Party (6853) मास्याति गतानान्तु राम शासनश || २ | विमुले तघ पुत्रे नु शोकोपाहतास भूशाविरमेषु सैन्येषु सृष्ट्वा पधिस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥ ध्यायमानेषु सत्येपु दुख प्रामधु भारत । पलामा मध्यमानाना शुधा नितमुत्तमम ॥ ४॥ अमिशान नरेन्द्राणां विकृत मय संयुगे । कृपाविष्ट कृपोगजन बय शीलसमनिता ।। ५ । अग्रवीत् तत्र मेस्त्री सोऽभिक्षाप जमाधिपम् । दुर्योधन मन्युरशाद्वचन पधनक्षम ॥ ६॥ दुर्योधन मिबोधेद यत्वा पक्ष्यामि भारत । श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेऽनय ४७॥ मथुराधर्माच्छ्यान ये पन्धा राजेन्द्र विद्यते । य स मश्रित्य युध्याते क्षत्रिया क्षत्रि वर्षभ ॥ ८॥ पुत्र भ्राता पिता वैव स्थलीयो मातुलस्तथा । सम्बन्धिाधवाश्चध पोष्या घे माजीविना ॥ ९ ॥ षधे चघ परो धर्मस्तथाधर्म पलायने । तस्मादधारा समापला जीविका पितार्षिन ॥ १॥ तत्र या प्रति पश्यामि फिञ्चदेव हिन बच इते भीमे व द्रोणे व कर्णे चेष महारथे ॥ ११॥ जयद्रये च निहते तब भ्रातृप समान वही भयानक युद्धभूमिको वा अपकालि पानवाले सैकड़ों हजारों रानाभी को। २ । और अर्जुनके पराक्रम को देखकर आपके बेटे के मुख फेरने शोक से घायल चित्तहोने सेनाओं के अत्यन्त व्याकुलहाने । ३ । सेनाके दुखीध्यान करने पाले होनेपर मयीहुई सेनाओं के कठिनशन्दको सनकर । भोर युद्धमें राजाओं की पीचानों क चिनों को टूटाहुआ दखकर और पाय और शीलस्वभाव से कृपासे पूर्ण वा तेजस्वी वालपमें कुशल गुरु कृपाचार्यजी । ५। राजा के पास जाकर बड़े कोषयुक्त होकर उस दुर्योधनसे घोले १६ । कि हे भरतर्षभजो मैं तुमसे कहताई उसको समझो हे महारान उसको मुनकर जो तुमको अच्छा लगे उसको करना । ७ । हे रामेन्द्र निश्चय करके धर्षयुद्ध से अधिक कोईकल्याण करनेवाला मार्ग नहीं हे क्षत्रियों में श्रेष्ठ उत्तम क्षत्रियलोग भी उसी मार्ग में नियत होकर लड़ते है । ८ । वेटा भाई पिता भानजा, मामा नातेदार भाई वधु के साथ लड़नेके योग्यहै । ९ । मग्ने में श्रेष्ठ धर्म है और भागना महाअधर्म है सी हेतुसे जीवनकी इच्छा रखनेवाले क्षत्रियों ने भयकारी घोर जीविकाको प्राप्त कपा है। यहाँ मैं तुझसे कुछ हित करनेवाला वचन कहताहूं कि भीष्म {ोणाचार्य महारपी कर्ण। ११ । जयद्रय आपके बढ़तसे भाई और भापके बेटे n distress and thes.andards of kings broken down aged Kipacuarys, 112.3 rrercy, glory, good jnannors, power of speech and and anger, Baid to Duryodhan. " Hear me attentively, kings and tben do as you like urely nothing can be better than a jast war for just warriors Suns, prothers, fathers, sister's sons untls, and kinsmen may be fought with t 18 the duty of a kshatrya to die fighting, while there can be no sin Teater than running away from batil. It is therefore that køba ryas Jave adopted this mode of living 10 I shall non give you blutary advies W bom should we make our leader when Bligim, युक्त Boine 1 (6854) Malinbharat (६८५४) चानघ । रमणे तर पुत्रेच किं शेष पर्युपाक्षम हे ॥ १२ ॥ घेषमा समासस्य राज्ये मसिमकुमहि । ते सन्त्यज्य तनूर्य ता रा नायिदां गतिम् ॥ १३ ॥ पयविर मिनाभूता गुणवमिहार एपण धर्तयिष्याम पातयित्वा नृपाम् बहून् ॥ १४ ॥ सपि च जोपद्मि मन पराजित | कृष्णनेत्री महायाहु देवैरपि दुरासद १५ इन्द्रकामुक बनाम मिन्द्रफेनु मियोंछितम् । धानर थे तुमाला सधचा चमः ॥ १६ ॥ सिंहनादन भोमस्य पाञ्चजन्य स्वनन च । गाण्डीय निर्वागत सहष्यन्ति मनासि ॥ १७॥ धरतीय महाविद्यु'गुष्णन्ती नयनप्रमाम् । ' मिव चामिद्ध गाण्डीव समश्यत ॥ १८ ॥ नाम्गुनद विचित्रश्च धूयमान महर दृश्यते दिक्षु सर्वामु विद्युदभ्रघनेप्षिय ॥ १। खेताश्च धेगसम्पन्ना शशिकार मप्रभा । पिवन्त र नाकामा रणे युक्ताश्च पाजिम ॥ २० ॥ उखमानाचणे लक्ष्मण के मरनेपर किम शेष बचे हुय प्रधान की वर्तमानता करें। १२ । इमकि के ऊपर भार रग्वका राज्य में अमः प्रबन्ध जारी करतेथे उन शूरवीरों ने शरी को त्याग करके प्रमशानियों की गतियोंको पाया । १३ । हम उन प्रसंसनी महारथियों के रिना बहुन से राजाभों को गिरनेपर दुखी है । १४ । श्रीकृष्णव मपान रखनेवाला महापाइ अर्जुन देवताभोंसे भी दु खसे सम्मुखता के यो और सब जीवधारियों से अजेय है। १५ । इन्द्रधनुप और घनरूप इन्द्रध्व समान ऊंची वानर पना को पाकर वह बड़ी सेना कम्पायमान हुई ।१५। भीमसे के सिंनाद पांचजन्य शंखका शब्द और गाण्डीव धनुपके शब्दों से हमारे चि न्याकुल होते है ।१७१ चक्षुके प्रकाशको चुराता घूमता और बड़ी विजलीसम आलातचक्र के समान घूमता गाण्डीव धनुष दिखाई पड़ा। १८ । एवर्णना धनुष बड़ा दिशाभों में चलायमान ऐसे दिखाई पड़ा जैसे कि वादलों में विज दिखाई देतीहै । १९ । श्वेतर्चन्द्रमा के समान मकाशमान अपनी तीव्रतासे 'यु घोड़े भाकाशको पानकरते स्यमें संयुक्त हैं।२० जैसे कि वायुसेयुक्त वादलहों Drona, bravo Karan, Jayadrath, with uuuny of your brotliers al your ton Lakehman, are slain Our great statemen dieslao in batt TV thout those grent warriors, we have had to suffer tho loss of mat kings. Led by Shri Krishn, Arjun is a worthy match for gods al Manvincible by all other beings. 15. The armes dieperse at the eng of ha bor and spabadoor like the bow and Lannor of Indra, O hearta tremble with the sounds Bhim's roar, the blasts of Pancl Janga conch and tho tvang of Gandıy bow, wluch dazzles the sig ith its circular movement and speed and brightnees like that lightning The gold-docked box was seen in all directions like lightni in the midst of cloide Winta Ithe the mom, his horsoa Beem touch tho ol y rith their speed 20. Shri Krislin drives thioes शल्यपर्व Shalya Paray (6855) पायुनष पलाहकाः जाम्बूनदधिचित्राङ्गा हवन्ते चार्जुनं रणे ॥ २१ ॥ ताव तले राजभर्जुनोत्रविदाम्बरः। गहनं शिशिर फर्श ददाहाग्निरियोस्थितः ॥ २२ ॥ गाहमान मनपानि महेन्दशहशप्रभम् । धनञ्जयमपश्याम चतुर्दष्ट्रामव द्विपम् ॥२३॥ विक्षो यतं सेनान्ते प्रासयन्तञ्च पापियान् । धनञ्जयमपश्याम नलिनीमिय कुजरम ।२४। पासपन तथा पोधान् धनुर्घोषण पाण्डवम् । भूय एवमायाम सिंह मृग गणानिध॥२५मलोकमहेष्वासो वृषमी सर्व धन्विनाम । मामुक्तकषत्री कृष्णो लोक मध्य व्यराजताम् ॥ २६ ॥ अद्य सप्तदशाहानि धर्चमानस्य भारत । संग्रामस्यातिघी' रस्थ पध्यतांचाभितो युधि ।। २७ ॥ वायनेय विनानि तवानीकानि सर्घश | शाई मोदजालानि ध्यशीयंन्त समन्ततः ॥ २८ ॥ तां नावमित्र पर्यम्नां घातम्रता महा नये । तब सेना महाराज सभ्यताची व्यकमायत् ॥ २९ ॥ य नु ते पत पन्नो उसीपकार श्रीकृष्णजीकी सवारीस युक्त मुवर्णजटित अङ्कवाले घोड़े युद्ध में अर्जुनको | लेचलने हैं। २१ । हे राजा अस्त्रज्ञों में श्रेष्ठ अर्जुन ने युद्धभूमिमें उस आपकी सेनाको ऐसे भस्मकराया जैसे कि उठाहुआ अग्नि बड़े घने शुष्कवनको भरम करदेता है । २२ । हमने चारदात रखवाले हाथीके समान सेनामों के मॅझानेकाले महाइन्द्रो समान महाशमान भर्जुनको देखा । २३ । जैसे कि कमळक बनको हाथी छिन्नभिन्न करंदताहै उसीमकार आपकी सेनाके छिन्नभिन्न करने वाले बार राजामों को भयभीत करनेवाले अर्जुन को देखो । २४ । और जैसे कि सिंह मृगों के समूहों को भयभीत करताहै उसीमकार धनुपके शब्द से डरानेवाले अर्जुन को फिर देखा । २५ मव लोकके बड़े धनुपधारियों में श्रेष्ठ कवचधारी श्रीकृष्ण और अर्जुनलोकमें शोभायमानहुये । २६ । हे भरतवंशी अब पुरमें चारोंभोरके मरनेवालों के महाघोरयुद्धों के सत्रहदिन व्यतीतये 1,२७ भापकी सय सेना चारोंभोरमे ऐसे पृथक् २ होगई जैते कि वायुसे शरदऋतु के बादकों के समूह पृथक् २रोज ते हैं । २८ । हे महाराज अर्जुन आपकी सेनाको मे अत्यन्त कम्पापमान किया जैसे कि समुप्रमें वायुपे घूमनेवाली और चारों भारी मे दूरनेवाली नौका हाता तेरा सेनापति कर्ण कहांगया और पीछे चलनेवालों decked 1101833 of Arjun nu tue wind does the clouds. Arjun the buat of warriors destroyed your army as fire dous a dry forest. 8Aw Arjud crash your army like thu four tasked clephant of Indra. H. tramploš domn your army and terrified the warriors as an. elephxat cruskos a foresc of lotus Ho terrified your warriors with the tvang of his boir as a lion does a herd of decr. 25. Shri Krisho and Arjan thu but of warciors looked glorious in the field has been ragiog for the last ssrentoen dags and your arm or aro dissorted like tho cl suds by sind. Arjun shook your warriors as a storm at sea does a boat. Where is Karan tho commander of soar Wo The war 6850) Maliahliniat (६८५६ भूत पप नु द्रोणः सहानुगः । अहं पध च क्ष चारमा ते हादिषयच तथा क्सनु दुशासनश्च भ्राता ते भ्रातृभिः सहित घ नु I. ३० ॥ वाणगोचरसंप्रारं प्रेस्य । जयद्रथम । सम्बन्धिनस्तथा मे' न सहायानमातुलस्तिथा ॥ ३१ ॥ सर्वान् विक्रम मिषतो लोकचाकम्य मुद्धनि । जयद्रयो हतो गजा किन्नुशंषमुपासा ॥ ३२ घेह स पुमानस्ति यो विजेप्यति पण्डवम ॥ ३३ ॥ सस्प चास्त्राणे दिग्यानि विज धानि महात्मनः । गाण्डीवस्य च नि?पो घीयांनि हात दिनः ॥ ३५॥ नचन्द्र पथा गतिः. सेनेयं इतनायका । नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीषाकुलतांगता । ३५. ध्वजिम्योतनेत्रायां यथेट श्वेतवाहनः ! चरिष्यति महाबाहुः करिमारष संज्वलन '॥ ३६॥ सात्यधिध यो गोभीमसेनस्य चोभयोः । दारयेत गिरीन् सर्वान् शो येतच.सागरान् ॥ ३७॥ उवाच पाक्यं यद्रोमः समाम विशाम्पते । कतंच समेत द्रोणाचार्य कांगये मैं कहां और तेरा शरीर कहां कृतवमा कहाँ ना भाइयों समेत तेरा भाई दुश्शामन कहाँहै।३०। पाणोंके लक्ष्यों में वर्तमान जयद्रषके |देखकर उसीमकार नाते रिश्तेदार भाई साथी और मामा मादिकों को देख कर किसकी वर्तमानता करें। ३। सब के देखते पराक्रम करके सव लोक | मस्तकपरं उल्लंघन करके राजा जयद्रथ को मारा-फिर और कौन से शेष बचेहुये के वर्तमानता करें। ३२ । यहां ऐसा कौनसा मनुष्यहै जोपांडव अर्जुनको विजयक सक्ता है उसमहात्माके अस्त्र बड़े दिग और नानाप्रकार के हैं और गांडी धनुप का शब्द हमारे बल पराक्रमों को हरताहै । ३४ । जैसे कि चन्द्रमासे रहि! रात्रि भशोभित होती है उसमकारकी यह सेनाहै जिसका कि प्रधान मारांगय भौर जैसे हाथीसे सो हुपे वृक्षवाली नदी होती है उसीमकारसे इस सेनाने में महाम्याकुलता को पाया । ३५ । जिसका कि प्रधान मारागया उस सेनामें मह वाहु अर्जुन स्वेच्छाचारी होकर ऐसे घूमेगा जैसे कि मूख, वनमें ज्यसित: अग्नि घूमती है । १६ । सात्यकि और भीमसेन इन दोनोंका जो वेगहै। सव पर्वतोंक तोड़कर समुद्रों कोभी शुष्ककरसक्ता है । ३७ । हे राजा भीमसेनने सभाके मध्य armios ? Whoro ara Drona and his followers! Where are yo 2001, Kritrarma and Dushasan; with your other brothers ? 30. Haring - looked at the death of Jayadrath and other kinematt, whom shall sro rely upon. Who is liere to conquer Arjun. Ho has powerful wcapona And the sound of Gandir bow deprives us of prower. By the fall of its commander the army looks ominous like a woonless night or like a river whose trees are broken down by an elephant 35, At the fall of the commandor of the array, Arjan will roam like fire in a dry forest. The prowess of Satyaki and Bhim can break through the mountains and soak the ocean dry. Bhim barfalllled all the rors he made in court, and will do so again. Protected by the -- -- शल्यपर्व Shalya Parv 6867 सकतं तेन भूयात्र करिष्यति ॥३८॥ प्रमुखस्थे तदा कणे धलं पाण्डषरक्षितम्।दुरा सर तथा गुप्त रड गाण्डीवधन्यना ॥ ३९॥ युष्माभिस्तानि चीणानि याम्यसाधूमि साधुषु। मकारणकताम्येष तेषां वः फलमागतम् ॥eoमात्मनोधै स्खयालोको पत्नतः सा माहतः । स ते संशयितस्तात आत्माच भरतर्षम ॥ ४१ ॥ रक्ष दुप्पोधनास्माना मात्मा सर्वस्य भावनम् । भिन्न हिभाजन तात दिशो गच्छति ततम् ॥४२॥ हीय मानेन वै सन्धिः परंएव्यः समेनच । विग्रहो पानेन नीतिीपा वृहस्पतेः ॥४३॥ से वयं पाण्डुपुत्रेयो हानश्व बलशक्तितः । तदत्र पाण्सवैः साई सन्धि मन्ये क्षम प्रमो॥४४॥ न जानीते हि यः प्रेयः श्रेयषामन्यते । स क्षिप्रं भ्रश्पते राज्याच भयानुधिन्दति ॥४५॥ प्रणिपत्य हि राजाने राज्य पदि'लमेमहि । श्रेयः स्याम तु गीदयन राजन गन्तुं परामषम् ॥४६॥ वैचित्रवीर्यवचनात झपाशीलो युधिष्ठिरः। जो जो पचन को वहस सत्य किये और आगे भी करेगा । २८ । तवकर्ण के सम्मुख नियत होनेपर गांडीवधनुषधारी सनकृन और रक्षित वह पाएटवीय सेना कठिनता से सम्मुखता के योग्य और रक्षितईई तुमने भी बहकर्म किये जो कि साधुभों के मध्यमें नीचार्म गिनजाते हैं और वहसव कर्म तुमने निहतुक किये इमी से उनका फल तुमको प्राप्त हुमा है । ४० । हे भरतर्षभ तुमने उपायों से सब पृथ्वी को विजय किया हे तात यह सब पृथ्वी और सेरा शरीर सन्दंडों में पहलहै । ४१ । हे दुर्योधन प्रात्माकी रक्षाकर आत्माही सबका पानई हे सात पात्रके खरिडत होनेपर उसमें की सब वस्तु इधर उधर दशादिशाओं में वहजाती हैं । ४१ । विनाश पानवाले दुर्वल मनुष्य को सान्ध करलेना योग्यहे और बाद पुक्त को पुद्ध करना पोग्य यह वृहस्पतिजी की नाति है । ४३ । हे सपर्य सो हम अपने पराक्रम पाण्डवोंसे न्यून सो यहां अघ पारडवोस सन्धिकरनाही में उचित मानताहं । ४४ । जो कल्याणको नहींजानताह और कल्याणक अपमान करताहै वह शीघही राज्यसताक्ष्ण और रहित होकर करयाण को नहीं पाताहै । ४५ । जो हम राजाको मुककर राज्यको पायें तो हमारा कल्याणहोय हे राजा भमानतासे परामप पानके योग्यनहीं है। १० । दपावान राना युधिष्ठिर राजा bcuror of Gandiy, the Pandav army was ablo to cope with Karon. You committed many rinful deeds luy poor solfisbness and are now reaping the fruit of your doinga 40. The land so capniagly conquored by you and your loly itself are in danger. Save yoursalf, Duryodhan, because self in the rostul mbich contains all and at the break ing it things ran away in all directions. A weak porson shoald try to scare prace, though a strong ipan may engago in 5ghtiog. This is the opinion of Vribaspati. We should make peace with the Papdaras, because we are inferior to them in prowc99. To who does Rob think of his own good, loses this kingdom and all. 45. of Our good (6858) Mabalharat (१८५८) विमियुजीत राज्य यां गोपिन्दयचनेन च ॥ ४७ पछ्याहि दृषीकेशाराजामपरा जितम् । अर्जुनं मामसेनश्च सय कुखुरसंशयम् ॥ १८ ॥नातिकामप्यते कृष्णो बम कोरपस्य ।। धृतराष्ट्रस्य मन्ये नापि कृष्णस्य पाण्डवः ॥४९॥ एतत् प्रेममा मन्पे तष पनि विप्रहमान त्यां प्रीमि फार्पण्यात न प्राणपरिरक्षणात । पथ्य राजन प्रधीमि त्वा तत्पराम मरिसि ॥ ५० ॥ इति शो पिलप्पमत पार सो घच । वाघमुष्पच निश्यस्य सुशोच घ मुमोह व ॥५१॥ इति शल्यपर्वणि शल्ययधपर्वणि कृपाचार्यवाफ्ये चतुर्थोऽध्यायः ।। धृतराष्ट्र और गोविन्दजीके वचनोसतुमकोराज्यसे संयुक्तकरेगा। ४७ । इन्द्रियों के स्वामी श्रीकपणजी अजेयराजा युधिष्ठिरसे और अर्जुन भीमसन सेभीजों कुछकोंगे वह सब उनके कहनेको निस्सन्देह करेंगे । ४८ । श्रीयाणजी कौरव धृतराष्ट्रके वचन को उल्लंघन नहीं करेंगे और पाण्डव भी श्रीकृष्णनी के वचनको उल्लंघन नहीं करेगा यह मै निश्चय मानताहूं । ४९ । मै पाण्डवोंके साथ तेरी सन्धिको शुभ कल्याणकारी मानता हूँ शत्रुताको नहीं मानता हूं मैं अशूरता और माणों की रक्षा, के अर्थ तुमसे नहीं कहता हूं मैं केवल तेरे कल्याण के अर्थ उपकारी वन, कहताहूं नहीं तो तू पृद्धभूमिमें पढ़ाहुभा होकर मेरे पचनों को स्मरण करेगा इस प्रकार वह रद्ध शारदत कृपाचार्यजी यह विलाप करके लम्बी और उष्णधासाओं, को छोड़कर महाअचेत होगये ५१ ॥ lies in bowing to the king. We should not suffer defeat by.our own folly Mlereitul Yudhishthur will do ay lic is tzlà by Diritrashti a'and Govind and will give you your kingduin Yodbish'thir," Bbim and" Arjun will do without liesitation, what they alo told todo by Govind. Shri Krishn will not refuse the request of Dhritrash tra: Your peace with the Pandavas tvill be good for you. It is not that I ascribe cowardice or fear to you, but I believe that your food lies in peace- You will remember my words, if you donot wind them, when you will be lying on the field of battle. Haping said this, old Kripacharya, beaving deep sighs, Lecamo seitselees” 51. - J [६८५९) शल्यपर्व Shalya Parv (6836) मञ्जय उवाच एषमुकत्तता राजा गौतमेन पशस्विना निश्वस्य दीर्घ मुगाच दरणीमासाद्विशाम्पते ॥१॥ ततो मुहत्तं स ध्याया घाराष्ट्रो महामना । कृप शारद्वत पाक्यामित्युवाच परन्तपः । २॥ पत् किीञ्चत् मुहदा याच्यं तत् सर्व धापिनो घहम् । कृतन्च भवता सर्व प्राणासन्त्यज्य युध्यता ।। ३ ॥ गाहमानम नाकानि युध्यमान महारथैः । पाण्डधरतितजोभिलोकस्वामनुहटवान् ॥ ४ ।। मुहद' याददं पापर्य भवता भाषितो घहम । म मा प्रीणाति तत् सर्व मुपोरिव मेपलम ५५॥ तुकारण युक्त दित पचनमुत्तमम् । उपमानं महाबाहो न मे विनाप्रध रोचते ॥ ६ राज्यातिनिधास्मामिः कथं सोरमासु विश्वसत् । अक्षयूतन नुपति जितोस्माभिमाबलः । स कयं मम पाक्यानि अध्याय एष तु ॥ ७ तथा दौत्यन समास कृष्ण पार्थहिते रतः। षिप्रलयो हपीफेशस्तच्च कर्माधिचारितम् । स च मे अध्याय ५॥ संजय बोले कि राजा यशवान गौतम कृपाचार्य के ऐसे वचनोंको सुनकर राजादुम्योधनभी लम्बी और उष्णश्वालाओं को लेकर मानहोगया । १ । वह शत्रुओं का तपानेवाला महासाहसी दुर्योधन एक मुहर्त ध्यान करके शारद्वत कृपाचार्य से यह वचनबोला । २ । कि जो कुछ शुभचिन्तकों को सहना योग्यह यह सबवातें मैने सुनी उन सयकहनेवाले शुभचिन्तकोंने भी माणों को त्यागकर भापकेसाथ युद्धकिया । । । महातेजस्वी महारथी पांडवोंकेसाथ लड़नेवाले और सेनाओं के मैंमानेवाले तुमको सरलाकोंने देखा । ४ । मुझको जो आप शुभ- चिन्तकोंने ऐस पचन सुनाये हैं यहसव आपलोगों के यचन मुझे ऐसेमसमता नहीं करते हैं जैसे कि मरने के इच्छावानको औषधी प्रसन्न नहींकरती 1५। हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ महावाहु, सहेतुक हितकारी वचनों से मुसको प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती है यह बड़ापनाच राजायुधिष्टिर पाशों के छूतमें हमसे पराजित हुआ है और राज्यसे भी रहित कियागया है पद्द हमारे ऊपर कस विश्वासकरेगा। भाद् धद हमारे वचनों पर कैसे श्रद्धाकरेगा इसीप्रकार दूत होकर भानेवाले मार पांडदों की वृदि में मीत करनेवाले इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्णजीमी ।। CHAPTCR P Sinjaya raid, "Haring licord the words of firipacharya, Duryodbon heaved deep fighs and became silent. Ho thought for a whilo and then said, "I have lieard your salutary advice. My well wishers have fought and dicd. All the people have seen you figbting with tho Pandayas. Your advice does not please me like medicine to a sich man 5, I am not ploss-d with your adsice, because Yudhishthir was deprired of his sealth and kingdom 10 gambling and will not Shri Krishn too, who cho o lo nic as aa ambasgndor of Peaco nas decrired by us, He is not liko'y lo put his trust in -- t1out uits 6860) M.habharat १६८६० पचन नहान कपमेयामिपद्यते ॥ ९॥ विललाप हि यत् कृष्णा सभामा समेयुषी न सम्बर्षयते कृष्णो म राज्यहरणं तथा ॥ १० । एकमाणाषुमी कृष्णावस्योत्पतिसं हती। पुरा पच्छ्रतमेयासीदद्य पश्यामि तत् प्रभो ।। ११ । स्वनीपत श्रावा दुःख स्वपिति केशधः । कृतागसो धयन्तस्य स मदर्थ कक्षमेत् ॥ १२ ॥ भीम मन्योविनाशेन न श लमतनः । स कथं मद्धिते यनं प्रकरिष्यति पापितः ॥१३॥ मध्यमः पाण्डषसीणा भीमसनो महाबलः । प्रतिक्षातच तेनोन स मध्येतन संग येत् ॥ १४॥ उभौ ती यद्धनिस्त्रिशाबुमी वापसकङ्कटौ । कृतरावुभौ पोरी मावपि यमोपमा ।। १५॥ धृष्टद्युम्न शिक्षण्डी च कृतघेरी मया सह । तो क मयितं धान प्रकुरीत द्विजोत्तम ॥ १६ ॥ दुःशासनेन यत् कृष्णा एकपना रजस्वका । परि क्लिासामध्ये सर्पलोकस्य पश्यतः ॥ १७ ॥ तथा विषसमा दामो स्मरस्यापि ठगेगये उसकर्मको आपने नहीं विचरा हे ब्राह्मण वह किसमकार से मेरे वचनों को अंगीकार करेगा। ९ । जो द्रौपदीने ममाके मध्यमें विलापकिया है उसकोऔर उसमकारके राज्यहरणको श्रीकृष्णजी कभी नहीं सहेंगे । १० । श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों एकमाण और मित्रहै ऐसा पूर्वसमय में हमने मुनाहै हेप्रभु अब मैं उस को देखताई । ११ । केशवजी अपने भानजेको मृतक सुनकर दुःखसे सोतेहैं हम उसके अपराधी वह हमारे निमिच ऐसा कैसे करेंगे और अर्जुनभी अभिमन्यु के नाशमान होनेसे भानन्दको नहींपाताहै वह मार्थना करनेसे भी मेरी वृद्धि में कैसे उपाय करेगा। मैंझला पांडव महाबली भीमसेन वहा ताब है 'उस ने उंग्रे मतिज्ञाकरी है वह अवश्य शत्रुताकरेगा कभी शांतीको नहीं पायेगा। १४ । यह नकुल और सहदेव दोनों वार खड्ग और कवचधारी दोनों पात्रता करने वाले और अश्विनीकुमारोंके समान है ।१५ । और धृष्टद्युम्न या शिखर मेरेसाथ शत्रुता करनेवाले हैं हे नाली में श्रेष्ठ वह दोनों मेरी रद्धिमें कैसउपाय करसक्त । १५ । दुरशासनने सवलोकोंके देखतेहुये एकवस्त्र रखनेवाली रमस्वला द्रौपदी को जो सभाकेमध्यमें दुःखीकिया।१७। उसवातको भवतक यह पाण्डव स्मरण करके me. S'ri Krona will not forgive the wrong dana se Draupadi za Shri Krishn and Arjun are one soul and two bodies. I have heard it from old mon and seen it myself. he is much grioved at Abbimanju's death. Having suffured wrong from may not do any thing.for us. Arjun too, in displeased with us on account of Abhimanyu's death. Bravo Bhini 13 infuriated Ho has vowed to destroy us and will 200 act otherwise. Both the warriors, Nakul and Sahadev, armed with #word and armour, oro liko Ashwini kamars in pruvoss And have bitter camity with us. 15. Dhrishtadyuon and 8Sikhandi are my onemirs and I cnn expect no good from them. 16. In the proaenco of all courtier, Dushasan insulted Drupadi who wasonly covered with us, die -- शल्यपर्न hty Py (686) पाहमा ननिवारमितु शपया सग्रामात पात २८॥ यदा द्रौपदा कृष्णा मदिनाशाय दुनिता। उप्र तप नप प्रणा भणाममिद्धय । स्थण्डिल नि पदा शेते पापद्वैग्स्य यातनम् ॥ १९ ॥ निक्षिप्प मान दञ्च धामुदघहादग । कृष्णाया पषत्या शुश्रूषण यु रुन सदा ॥ २० । इति सर्य समुशद्ध न निति कथम्चन १२१ अभिमन्योर्षिनाशेन सन्वय स कथ मया २ क्यश्च नाम भुक्त्यमा पृथिवीं सागराम्पराम । पाण्याना प्रम देन मा राज्यमकण्टकम् । २३ । उपर्यु परि रानावलि वा भास्करो यथा। युधिष्ठिर पथ पश्चादनुपास्यामि दासवत २४॥ कय भुष वा स्वांभोगान् दत्ता दयाश्च फुप्फलान् कृपण धर्तयिष्यामि कपणे सहजीविकाम् ॥ २५ ॥ नाश्यामि से पाक्यमुक्त स्निग्ध द्वित त्यानतु दुखो पान वह शत्रुमोके तपानेवाले पागडय युद्धमे हटाने के योग्य न 1 १८ 1 जब द्रौपदीका दुख दियागयाथा तर उसपहाद सी कृष्णा द्रौपदीनेमेरे नाश और अपने दोके प्रयोजनकी सिद्धीक निमित्त बडे तपकीकियांद और तबतक सदैव पृथ्वीर शयन करती है जबतक कि शत्रुताका भ.तोगा ।१९१ वासुदेवजीकी सगीवहिन अपनी प्रधानता और अहंकारको त्यागकर मौर द्रौपदी सदेव दासीरूपहोकर सेवाकरती है यहसब अच्छीरीतिमे क्रोधों भरेहये किसीमकारसे भी शांतीको नहीं पासते । २१ । अभिमन्युके नाश हानेसे किस मकार वह युधिष्ठिर मेरेसाथ सन्धिकरने को योग्यहोगा भार प्रकट है कि इस सागराम्परा पृथ्वीको भोगकर 1 २२ । फिर किसपकारसे पागहब को कृपापाकर | इसको भोगूगा और मैं किसरीतिसे राज्यको करूगा निश्चय करके पूर्य:समानसत्र रामाओं के ऊपर प्रकापमान हाकर फिर कैमे में दास के समान होकर भुधिष्ठिरके पीछे चलगा ।२४१ अपने भाप घरे पडे भोगोंको भोगकर मार देनेके मोग्प अनेकदानों को देकर किममकार से नीचोंकेमाय नीच जीविकामे अपना निर्वाहकगा।२५॥में प्रापके वचनोंकी निन्दानहींकरताहू मापने मधुर स्वच्छ और | मिपकारी वचन को मैं किप्ती दशामें भी समयके अनुसार सन्धिको भेष्ट नहीं n sing'o cloth. To l'andavas still romembur those wrongs and will not desist from fight ng Draupadi porſormol a forero «sccturism for our destruction on account of the wrons vu liad dono hor. She wil Bicep on carth as long as her enemics exist. Yrsudov's wister der ves Draupedo liko n mtidsryant without any touch of pride nod both nra tauch displeased with us 21. I dhısıthir will not malo peace with ur, for wo havo slun Abhimanyu daviog ruled oror this wido world, I would not b9 a king by the fnvour of tho Pandavas, llavice shono like the Sun, I would never like to follow Yudhishthir Having lired a lifo of creo and given donntions, I would not pass my lilo liko ordinary men 25 fonot blame you for yo ir Wurds which torcoreet and salutorg but I do not think peace advisuble, I like to fig'it and not to 16802) Minhallint सन्धिमहं मन्ये प्राप्तकाल कयाम्चन ॥ २६॥ मुनीतमनुपश्यामि मयुद्धेन परता। नायं क्लीवाति कल. मयोधुं काल एष न.॥ २७ ॥ इधं में यहुभियोईता विप्रेषु दक्षिणा । प्राप्ताः कामाः श्रुता येदाः शणा मान च स्थितम् ॥ २८ ॥ भृत्या में सुभ तातात दोनचा वृतो जनः । नोत्सहेद्य जिनष्ट पाण्डघान वक्तुमरशम ॥ २९. जितानि परराष्ट्राणि राष्ट्रमनु गालितम् । भुक्ताश्च विविधा भोगाग्निवर्ग: सविता मया। पितृणा जनमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य धोभयोः ॥ ३० ॥ न भूषं मत स्तीद कुरोगज्य कुनो यश । इह फीतिबंधातम्या सा च युदेन नान्यथा॥३१॥ गृहे यत क्षत्रियस्या निधनं तदिगतिम् । अधर्मः मुहानेर यस्पामर गृहे ॥३२॥ अरपये यो विमुञ्चेत समामेषा तनु नर । ऋतुनाहृत्य महतो महिमानं स गश्चति ॥ ३३ ॥ कृपणं क्लिपना जरयाभिरिप्लुन । नियंत रदता मशासीनां मस मानताई । २६ । शत्रुमा पानेयाले में युद्ध में अच्छी नीतिको देखनाई यह समप युद्ध करनकाह नपुंमकबनने का नहीं है । २७ । मैंने बहुतसे यशोंसेपूजन किये और ब्राह्मणों का दक्षिणा दी सब अभीष्टों को प्राप्त किया बदा को श्रवण किश शत्रुमोंके मस्तकपर नियतहआ और दासका. पोपणकरके मैंने दुखी लोगों कोभी दुःखोंसे छुटाया हे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ में पाएर व से ऐमा कहनेको उत्साह नहीं करताहूँ ॥२९॥ दूसरों के देशोंको विपकिपा अपने देशका पोपणाच्या नानामकार के अंगोगे और मैंने धर्म अर्थ काम इनतीनों वर्गो का भी सेवन किया क्षत्रीधर्म और पितृलोग इनदोनोंके ऋणोंस भी प्रणता माप्तकरी । ३० । इमलोक में मुख ओषमाशीनहीं है राज्य और यशकहाँ है यहां केवल कीतिही प्राप्त करनेके योग्यहै परन्तु वह कीर्ति युद्धसे मातहोती है दूसरे मकारसे नहीं होतीहै । ३१ । घरमें जो क्षत्रीको मृत्य है वहभी निन्दाके योग्यमै घरमें शय्यापर मरना महा अधर्म है ।।१२। जो मनुष्य यनमें भयवा युद्ध में शरीर को त्यागकरता है वह यशके फलोको पाकर बड़ी दताको पाता। दृद्धावस्थासयुक्त रोगीमनुष्य दुःसकी बातोको करता मोर रोतामा रुदनकरने दाले नातवाली में जो मरता है वह पुरुपनहीं है । ३४ । है अभी नानामकारके sit idlo like a cunuch. I have performed eacrifices ond donations I hero satisfied my dsires, heard the Vedar, crushed enemies, main tained porvants and relieved the needy. I have no rnind to bcg the l'andates for peaos. I have conquored kings, ruled my lingdorn, lined in luxary and satisfied tho debts of warriorg aud pitris,30. IIappiress in not stationary in this world, hur en hingdom and farac w Famo is worth aapuring in tho world nod tho only way of amuiring it is liy war. Tu dio in luis luso it not good for a warrior. IIo sho dies fighting or in a forest reaps the morit of performing sacrifico'. One who dtor of sicknon or ollage, wapsose by kin.mon, is not nsn gi en (६८६३) शल्यपर्व Shalya Parav (10863) पूरुषः ॥ ३४ ॥ त्यक्त्वा तु विविधान् भोगान प्राप्तानां परगांगतिम् । अपादानी मुयु जैन शकलोकताम ॥ ३५ ॥ शूराणामार्गवृत्तानां समानेपनियत्तिनाम् । धीमता सत्यसन्धानां सर्वेषां तुयाजिनाग । शनायभूथपूमानां य ाससिपिष्टो ॥ ३६ ॥ मुदा नूनं प्रपश्यन्ति युद्ध झुप्मरमाङ्गणाः । पश्यन्ति नूनं पितरः पूजितान् मुरससदि। अप्सरोमिः परिवृतान मोदमानास्त्रिपिष्टंप : ३८॥ पम्यानममरति शो चाप्यनित्तिाम.। अपि ते. संगत मार्ग पयमध्यारुहेमहि ॥ ३९ ॥ पितामहेन छन तथाचार्यग धीमता । जयद्रथेन कर्णेन तथा दुशासनेन च ॥ ४० ॥ घटमाना मद स्पिन हताः शूरा नराधिगः शेिरने लोहिताक्तांगाः पृथिव्यां शरविक्षताः ॥ ४ ॥ उत्तमालषिद शग थयोक्तकतुयाजिनः । त्यक्त्वा प्राणान यथान्योन्यगिसमस्थ घिीयताः ॥ ४२ ॥ स्त्वय रचितः पन्था दुर्गयो हि मुख भवेत् । सम्पतमिहावेगे स्पिद्भिरिम सम्नतिम् ॥४३॥ ये मदर्थे हताः शरास्तेषां छनमनुस्मरन् । ऋणं तत् भौगोंको तागकर के शुभयुद्ध से परपगति पानेवाले पुरुषों के गेकों को और सदैव इन्द्रकेही पास रहूंगा निश्चयकरके शूरवीर श्रेष्ठ चलन युद्धमें मुख नफेरने वाले बुद्धिमान सत्पसंकल्प सवयज्ञों के करनेवाले और शस्त्ररूपी यज्ञ स्नान से पवित्र पुरुपोंका शिवास स्वर्ग में है निश्चय वात है कि युद्धमें अप्सरानों के मपूर आनन्दपूर्वक देखने है । ३७ । भौर यह भी निश्चपहै कि पितृमोग उन दिवताओंकी सभामें पूजित भमराओं से ग्याप्त उनस्वर्गमें भानन्द करनेवालों को देखते हैं दाताओं से चलायाहुआ मार्ग दमरों से अधिककर्म करनवाले सनशरों मेभी मात कियागया है हम उसमार्गमें पढ़नाचाहते हैं । ३९ । वृद्धभीष्मपितामह | उनीमकार वृद्ध बुद्धिमान द्रोणाचार्य जयद्रय कर्ण और शासनभी वह मर्ग मामकिपा । ४० । इस मेर प्रयोजन के लिय उपाय करनेवाले शूरवीर राजालोग मारेगये वह सबलोग रुधिरमें लिप्तवाणों से विदीर्णभंग पृथ्वीपर सोवे है । ४१ । उत्तम अनकि माता महाशूर वेदोक्त विमे यज्ञकरनेवाले न्याय के अनुसार युदमें माणोंको त्यागकरके इन्द्रभवनमें नियत हैं । ४२ । चढ़ाई करनेवाले वडे, विगवान और इमलोक में मद्गानिको पानेवाले उनलोगों से या दुप्पाप्य मार्ग रबागपा है जोकि फिर कठिनतासे प्रामहोगा जो शर मेरे निमित्त मारेगये Ishxll lenro all the worldly enjoy uionts to remain for ever in tho region of Indra where the brave and loly go. Thie groups apsaras Aro lookig thuis way frow licaven. Tho vay of the goudly 19 trodden by tho Drave, and I wish to go the way whiclı old Bhisbin, Dronacharya, Jayadiath, Karan and Mushasan hnro gono. 40. Tho borotts sho huru dud Tur me are lying on esrth ill bleedin4 buxlios, The good warriora laviy lost their lives lave gone to thio region of India This difficult ray 18 trodden only by tho braso; I rencouber tho decda of । 6864) Mahabharat प्रतिमचानो न राज्ये मन मादधे १४४॥ पातयित्या पयस्याश भ्रादनप पितामहान । जीवित पदि रक्षय लोको मा गहयाधुधम् ॥ ४५ ॥ कीश तनषेद्राज्य ममहीनस्थ धन्धुभि । सखिभिश्च सहद्भिश्च प्रणिप यच पाण्डयन । ४६ ॥ साहताश कथा जगनास्थ परामयम् । मयुद्धेन तत या प्राप्स्यापि न नद-यथा ॥४॥पय तुम्यों धनेनोका सर्वे सम्पूज्य तहच । साधु साविति राजान क्षत्रिया सयमापिरे ।। ४८॥ पराजयमशाच-त पृतचित्ताश्च विक्रमे । सधैं विनिश्चिता योधुसुदनमानसोमवार ॥ ४९ ॥ ततो घाहान् समाश्यास्य सव युखाभिनन्दिन । ऊने द्वियोजने गम्बा प्रस्पतिष्ठत कारवा ॥ ५० ॥ ॥कारी विद्मे पुण्य प्रमणे दिमयन शुमे । अरुणा सर स्वती प्राप्य पए सस्नुश्च त जरम् । तप पुत्रतोत्साहा पर्यषन्ति ते तत ॥५१॥ पर्यवस्थाप्य वात्मानमन्योन्यन पुनस्तदा । सर्वे राजन् यवतम्त क्षत्रियr कालवादिता ॥५२॥ इति शल्यवघार्वणि दुर्योधन याक्ये पचमोऽध्याय.५॥ उनके कर्मको स्मरण करता और उनके ऋणोंसे भऋण होने के निमित्त राज्यमें अपना निसनहीं करता हू । ४४ । समान अवस्थावाले भाई और पिता पितामहा दिकों को गिराकर जो अपने जीवनकी रक्षाकरूंगा तो निश्वपकरके सर समार मेरी निन्दाकरेगा। ४५ । पाण्डवको झककर मित्र शुंभचिन्तक और वाग्धों से रहिन मुझ राजाका वह राज्य कैसा होगा ।४६ सो मैं इसप्रकार से इस संसार के नाशकों करके उत्तम युद्ध के द्वारावर्गको पाऊगा पह विपरीन नहीं है। इसप्रकार से उस के पचनोंको सुनकर उसकी प्रशंसा करके सब वत्री लोग राजासे यह वमन बोले कि धन्य है धन्य है । ४८ ॥ वह मर पराजयके न शोषने पामे पराक्रम करने म महतचित्त यस्करने में निश्चय करके पडे साहसीएये ४९ इसके पीछे युद्धको स्वीकार करनेवाले सर कारकों ने मवारियों को विमास देकर कुछ कम दो योजन पर जाकर नियत । ५० । चारोंमोरसे मकाशमान वनोंसे रहित पवित्र हिमाचल पर्वतके सुन्दर शुभ शिखरपर बरुणवर्णा सरस्वती को पाकर उस में स्नान किया और उसके जलको भी पानकिया।५१। तर फिर आपके पुत्रके द्वारा साहस रखनेवाले वह सब गुगीर परस्पर चिनको स्थिर करके वहांसे लोटे अर्थात हेराजा कारकी प्रेरणासे सवतत्री लोटमाये । ५२ ॥ । of the no who linvo del for my baho and wishi no longer to rule tha land without relieving inyoull of their debio All the world will blame une, ItI shall rule the land alter tle tall af my linsunen.45. How can I love youn to the Panday for the rako of kingda Hiving caused! destruction of the world, I shall dio fighting" Having heard these worda 11c warriors pris d lum Dessous of [ghting, their courago buchin dubly etcong The Kauravae atool at a distance of two miles on their respoctive care 50. They bathod in the rud waters of the Saraswali aud drank of its waters Thua they ruturned to light by the natigation ot Time "2. 1 [६८६५) शल्या Shalya Parav (686) सञ्जय उवाच । मय हेमवते प्रस्थे स्थिना युद्धाभिनन्दिन । सर्व एष महाराज पोवास्ता समागता ॥१॥ शल्यश्च चित्रसेनश्च शनिश्च महारथ । मायामा कृपधेष कृतथा व सास्वत ॥ २॥ सुपेणोरिएसनश्च धृतसेनछ धीर्यवान् । जयत समय राजानरसे सत्रमुरितास ३॥ रणे कणे इसे धीरे धासिता जितकाशिीम। मालमा शर्म पुत्रा हिमपन्तमृते गिरिम् ॥ ४॥ तेऽत्रुधन सहितास्तत्र राजान शल्य सनिधी । छलयमा रणे शन् सम्पूज्य विधियसदा॥ ५॥ करवा सेनाप्रणेतार परष याधुमहसि । येनामिगुप्ता संग्रामे जयेमासहदो वयम (१६। ततो दुय्योधम स्थिरचारपयवरोत्तमम्सर्वयुदपिधानमन्तकप्रतिम युधि ७॥ स्थल प्रत्छन्नाश रस कम्युनीव मिरम्बदम् । हयाकोपपपत्राक्ष व्याघ्रास्य मेमगीरबम् । स्थाणोपस्य सशसन्धमेप्रगतिस्यने । पुष्टलिष्ठायतभुज मुविस्तीर्णयनारसम् ॥ ९ ॥ जये पल अध्याय ६। सम्ञप बोले हे महाराज इसके पीछे उस हिमालयके मस्थपर युद्धको उत्तम माननंताले सत्र शूरवीर इकठे हुपे । १ । महारथी शल्प, चित्रोहन शकुनि, अश्व स्थामा, कृपाचार्य, यादय कृतवर्मा, । २ । पराक्रमी मुपेण, अरिष्टसेन,धृतसन और अमरमेन नाम यह सब राजा लोग रात्रि में निवासी हुये इसके पीछे । ३ । युद्ध में भीरकर्ण के मारेजानेपर विमपसे शोभा पानेवाले पाण्डवों से भयभीत भापके पुत्रों ने विना हिमाचल पर्वतके मानन्दको नहीं पाया। ४ । हे राजा तव वहां बुद्ध में सपाय करनेवाले वालोग एक साथही शल्प के सम्मुख विधिपूर्वक प्रशंसा करसह राजासे यह वपनयोले ।५।कि आप अभी अपना सेनापति नियतकरके अधुनोंसे लाईन के योग्यहो और ऐसा सेनापति करिये जिससे कि हमलोग पुरमें रक्षितहोकर शत्रुओंको विजयकरें। ६ । तमसो दुग्योधन उत्तम रथमें मियत बोकर अवरयामाजी से बोला कि जो युद्धों में समकारके युद्धों के चमत्कारों के माननेपाल युद्धमें काम्के समान 19 1 उत्तम अगोंसे गुप्त शिरवाला कपुपोष मिपमापी प्रसन्नचिस कमल के समान नेत्र पाम्रके समान मुख रखनेवाला मेह पर्वतक समान गौरवता रखनेवाला । ८ 1 स्कन्ध गति और शब्दसे नन्दीगणक समान हप्पुष्ट लिष्ट आयत भुजावाला भार बहुत बड़ेसघन पक्षस्थलवाला । ९ । CHAPTER VI Sanjaya said, " The warriors regenbled at the foot of the Himal ayes Brave Shalya, ChitraseD, Shakunt, Ashwathama, formpacharya Kntvarma, Susben, Diritsen and Jayatsen, rested for the night After tho death of Karan Your sons tertified of the Pandavas, Were ll at ease Then praising Shalya in the midst of the age ombled Warriore, they said. 5 " You are fit to bt the leader of the ormon conquer our foes, " Then Duryodha said to Ashwathama tho . (6866) Mahabharat च सशमरुणानुजयातयो । आदित्यस्पाविषा तुल्यं घुध्या चोशनसा सम्म ॥१०॥ कान्तिरूपमुखश्वविभिश्चन्द्रमसा समम् । काञ्चनोत्पलसंघात सदृश दिलसन्धिकम् । १६॥ मवृत्तोगकटीजघ मुगाद स्पंगुलीनयम् । स्मृया स्मृत्व शु गुणाधात्रा यानानिनिर्मितम् ॥ १२ ॥ सर्घलक्षणसम्पन्न, निपुणं श्रुतिसागरम । मनार नरसारीपामजेय शत्रुभिर्चलात १३शादशांग यचतुप्मादमिश्यस घेदतत्वत । सांगाध चतुरीपदान सम्पगाण्यानपञ्चमान् ॥ १४ ॥ आराध्य ऽयम्बफ यत्नात संप्रमहातपा अयोनिजायामुत्पन्ना द्रोणनायोनिजन य॥ १५ ॥ तमप्रतिमेकर्माण रणामदश भुधि । रग सर्प विधानां गुणार्णधमनिदिता ॥ १६ ॥ समस्यरवारम जातुभ्यमवस्यामानमप्रषीत । य पुरस्कृत्य सहिता युधि लेयाम पाण्ड्याम् ॥ १७॥ सीत्रता और घमें वायु और गरुडके सनान तेजमें सूर्यके समान और बुद्धि में शुकनी के समान । १० । कान्तीरूप; और मुख इनमीनों ऐश्वर्यों से चन्द्रमाके सदा मुनहरी कमल समूहों के समान सच्छ अंगके जोड़ । ११ । गोल टोग कमर पार जपावाला मु-दरचरण उंगली दौर नख रम्बजेवाला है ईशर ने पारम्बार गणों को स्मरण करके उपायसे उत्पन्न किया है। १२ । और अन्य सब लक्षणों से युक्त वह सावधान वेदोंका समुद्र और अंगोंमे शधुनोंका विना करनेवाला बल परामपके द्वारा शत्रुओंसे अजेयहै । ११ । जो दशभग और चारचरण रखनेवाले बाण और अखोंको मूलसमेत जानता है और अंगों समेत चारोंयेद जिन में पांचवा इतिहासहै उनसवको अच्छोरीतित पहा ।।४। वह यहा तेजस्वी उपायके मास उप्रपोंसे शिवजीको आराधनकरके पोनिसे जन्म नशेनेवाले द्रोणाचार्य से रास्त्रीमें उत्पन्नभा जो कि योनसे उत्पन्न नहीं है । १५ । पापका पुत्र उम अनुपम कर्म और ससमे पृथ्वीपर पाप सविधाओंमें पूर्ण गुगोंके समुद्र शत्रुभों के विनय फरनेशाले । १६ । अश्वत्थामामामे पाम जाकर पढी शीघ्रनामे उनम योगा कि हम साथोकर जिगको भनगामाकरके पांडवोंको विजयको । Niallful mirpur likı.Dorth in the fisid of bactiu, of great arine, rulous and bevist, liic Greur in atrun thuni proro-s, glorious liko thu Sun Andliku Sluhril. Ww107, 10 Liko tlo 1110 an in the splouduur ol face, with lumbos dhe lutus flsvers, rolllad luge, wiitts and taughe, with Jan Junifit, fingora and nult ha hybrda crusted by God with all the intensitive Pina01921 uſ all luchy minrhe, bio is clevor, and leeruvent at the Vodaw, that couqu rer of fucs by lus mintchless pruwers rumer by Join us the pronaul conolull wraxny Rashtratulnel the frur!ulenth History. Birm from the gloriour Arvika ad alsof S118a, W'll ruta y HUI, Dronostiar ya gato birth to Ashwethrina132y3man who was born of no roasn Yuur son tilat to Adhiwathiana tha soa querer of fas and said, "909 Dtsex 15.
3867) शल्यपर्व Shalya !'ary गुरुपुत्रोध सर्वेषामस्माकं पामा गतिः । मस्तिस्मानियोगाते कोस्तु सेनापनिर्मम ॥ १८॥ दाणिरुवाच । अयं फुलेन परियेण तेजसा यशसा ध्रियाँ । सर्वंगणेः ममुदितः शल्यो नोन्तु सम्पतिः ॥ १९ ॥ भागिनेयाभिजांस्त्यक्त्या कृनहोस्मानुपागतः। महा सेना महापाहुमहासेन इवापरः ॥ २०॥ एन सेनापति सत्या पति नपससम। समय: मा अयोस्माभिर्देषः स्कन्दमिघाजिवम ॥ २१ ॥ तथोके द्रोणपुत्रेण सर्थ एप नग पि. परिचार्य स्थिताः शल्यं जयशब्दांश्व चक्रिरे । युद्धाप च मतिश्चक्रुराये शन परं ययुः ॥ २२ ॥ ततो दुर्योधनः शल्य भूमौ स्थित्या रये स्थितम् । उवाच प्राञ्जलि वा द्रोणमामलम रणे ॥ २३ ॥ अयं सः कालः सातो मित्राणां मित्र चामल । यंत्र मित्रममित्रम्धा परीक्षा घुधा जनाः ॥ २५ ॥ स भवानस्तु नः शूराः उमको आप वनाइये आप गुरूजीके पुत्र इस हेतुसे आपकी आमासे उसका निर्ण होना चाहिये कि मेरा सेनापति कौन होय । १८ । अक्षत्थामा जी बोले कि कुल तेन वल यश लक्ष्मी और सब गुगों से पूर्ण यह शल्प हमारा सेना पति होय । १९ । पारका. ज्ञाता बड़ी सेनाका स्वामी महावाहु दूसरे स्वामि कार्तिक के समान यह शल्प, अपने निजभान नों को त्यागकरके हमारेपास आया । २१ हे उत्तम राजा गो: इस शल्य राजाको अपना सेनापति बनाकर हम लोगऐसे शत्रुओं के विजय करनेको योग्यहोंगे जैसे कि सामिकातिकनीकी सेनापति यनाके देवनाओंको विनय मातहई । २१ । अश्वत्थामा के इसपकार के वचनोंको सुनकर सब महारथी राजा शरपको घेरकर चारोंपोरको खडे हुये और विजयके शब्दों को किया । १२ । युद्ध में सबने बुद्धिकी और उत्तम निवासस्थान को प्राप्त किया इसके पीछे दुर्योधन उस रयसवार युद्ध में द्रोणाचार्य और भीमके समान शल्यको हाथ जोड़कर वोला । २१ । मित्रोंके पार पत्र मित्रों का वह समय यतमान हुआई जिसमें कि पुद्धिमान लोग अपने मित्र और शाओंकी परीक्षा लेने हैं । २४ । हेर भरप हमारी सेनाके मुखार से पति होनये । २५ जिससे कि हमलोग युदकरनेवाले पांचोंको सम्मुख पाकर वित्रप of Acharys, pray lut me know whom I should make the leader of my armice." Ashwathalua enid, "Lot this Saniya endued with glory, famo, strength and all the good qualities, be the leader of our armior. This lord of great arning like a second Kartik, has left has sister's sons to come to us out of gratitude. 20, With Shalyn to lead us, ne shall conquer our enomics as the army of gods as picturious unvor tho landetsluip of Kartik." On hearing Ashwathama's words, all the war. nors stood rouod Shalya. They sent forth cties of victory and woro ready to bylic Thor with claspxu hands Duryoduan Baid to Shalya, " Dior friend, it is not timp for us to tost our fricods and forces. Be (6868) Mahabharat (६८६८) प्रणेता वाहिनीमुखे । रणञ्च याते भपति पाण्यामन्दघेतम ॥ २५ ॥ भविष्यति सहामात्या पाचाला निराधमा । शल्य उवाच । यत्त माम-बखेराजन दुखराज करोमि तत् । यत् प्रियाथै हि मे सर्व प्राणा राज्यं धनानि ॥ २७ ॥ रोषन उवाच । सनापत्येन वरये यमाई मातुलातुलम् । सोस्मान पाहि युधा श्रेष्ठ कन्दो देवानवाहपे ॥ २८ ॥ अभिविन्यप्य राजेन्द्र योनामिष पाषकि । जहि शनन रणे धीर महेन्द्रो दानवाधिष ॥ २९ ॥ इतिश्री शल्पपणि शत्यषधपर्वणि दुग्योधनधास्य पष्ठोड याय ॥ करें आपकेयुद्ध करनेपर निर्बुद्धी पांढय अपने मंत्री और पांचालों समेत पासे रहितहोंगे । शल्पयोला कि राजा जोतुम यमको मानतेहोरेकोबराममैं इसको करूगा क्योंकि मेरे तन धन माण और राज्य सव सेरेपी हिसके निमित्त हैं । २७५ दुर्योधनवोला है मामानी में भाप श्रेष्ठ मुरुपको सेनापति बनाना चाहता हूँ सो माप युद्ध में हमारी ऐसी रक्षाकरो जो कि साधिकार्तिकमीने युबमें देवा भोंकी रसाकरी थी। २८ । हे राजेन्द्र ऐसे अभिषिक्त होगाभो जैसे कि देशाओं के सेनापति आग्नरूप शिपजीके पुत्र स्वामिकार्तिकजीने अधिषचनपामाया और शघुओंको ऐसे मारी जैसे कि महाइन्द्र दानों को मारता ॥२९॥ 25 « leader to put amics to slal} win the Panda na ander your leuderslup llic foolish Pandavas and their allios tho Panchala will bo poworless nainst you." Stolyn onid, I shall do what you say, l'rince for I laro dudicatod ng lifu nnd property to you." Duryodhan Bend, I wish to instal you as the commandor of my Armion and you will protect us ag Kartik did thio army of gols We shall anoint you to be our leadır as the gols did Kartik Stuy the loes ny, Indru elnya thednonvas 129 16869) A - - yoga Shalya l'nony सञ्जय उवाच । एतच्छुत्रा बचो रामो मराजः प्रतापवान् । दुर्योधनं तदा राजन धाक्षमेतदुवाच ॥१॥ दुर्योधन महायाहो ऋण याफ्रविदाम्पर । याप्रेती मन्यसे कृष्णी रथस्थी रयिनाम्बरी ॥ २॥ म मे तुल्याधुभावती: पाहुये क्यचन अघता पृथियों सों समरापुरमानाम । योधयेथे रणमले संकुख. किमुपाण्डवान् ॥३॥ विजष्ये च रणे पार्यान् सोमकांश्च समागतान् । मह सेवाप्रणेता ते भविष्यामि संशप । ४॥ तच हाहं विधापामिन तरिष्यन्ति य पर । इति सत्यं प्रधीम्येष दुर्योधन न संशयः ॥ ५॥ एवमुक्तस्ततो राजा मदाधिपतिमासा । अश्यषिश्चन सेमाया माये भारतसत्तम । घिधिना शासन दृएरूपो विशाम्पते ॥ ७ ॥ मामि विक ततस्तस्मिन सिंहनादो महानभूत् । तप से येषवाचन्त धादित्राणि च भ रत इटावासललो योषा मदकाच महारथा । तुष्टुवुनी राजाने शल्पमादयशोमिनम अन्याय ७॥ संजय बोले कि हे राजा तव प्रतापवान् राजा मद्रने राजादुर्योधन के वचन को 'मुनकर इस वचनको कहा । १ हे महावाहु रामादुयोधन इस वचनको सुनो जिन इनरय समार श्रीकृष्ण और अर्जुनको तू रथियों में श्रेष्ठ मानताहै । २ । यह दोनों सुनवलमें किसीमकार से भी मेरे समान नहीं हैं शोधयुक्त होकर मैं युद्ध के मुखपर देवता अमुर और ' मनुप्यों समेत युद्धमें सम्बद्ध होकर सब पृर्धाके मनुष्यों से युद्ध करसक्ताह फिर पाण्डवों से कैसे नहीं लइसका । ३ । युद्ध, सम्मुख भानेवाले पाण्डव और सोभकीको विजय करूंगा मैं निस्सन्देह तेरा सेनों पति डूंगा !४ बार ऐसे व्यूहको रगा निमको कि मतेपदीलोग नहीं तरसते रिदुर्योधन यह मैं निस्सन्देह सत्य सत्यही कहताहूं। ५ । इसके अनन्तर इसमकार कहेहुये रामाने शीघही मद्रके रानाको सेनामें भाभिषेककराया हे भरतर्षभ राजा सराष्ट्र उसमसमप दुय्याधन ने शास्त्रोक्त विधि के अनुसार ऐसा किया । . इसके पीछे उस के अभिषेक करनेपर बड़े सिंहनाद हुये और आपकी सेना में मायने । ८ । इसके अनन्तर मद्रदेशी महारथी शूरवीर लोग बहुत मसभाये और CHAPTER VII Sanjaya raid, "On hearing the words of Duryodhan, glorious king of Madra, said, " Hear me, valiant Dorsodhan : Shri Krishn and Arjan whom you call the best of warriors, are not my cuala in the strength of arme I can withstand gods, Burs and men, whrn I am enraged in tho ficld of battle. I shall conquer the Pandavas and Somake and shall be the leader of your armics. I sball forin a phala: impregnablo by the enemies. You may rely on my word " 5. At this Shaiya was made commander of thoarmire, with pmper eremonies Your trarriors roared lund roars and bent musical instrumenta. Tlie .
(६८७७) মাখা (6870) MInhabharat ॥९॥ जय राजश्चिरंजीष जहि शत्रून् समागतान् । तघ चाहुचलं प्राप्य, महायला ॥ १० ॥ निपिला पृधियों सा प्रशासन्तु इतद्विषः । त्यहि शको जैतु समुरासुरमानधान् । मर्त्यधर्मान् इह तु किम सोमकसम्जयां ॥ ११॥ एष सासू अमानस्तु मद्राणामधिपो पली । हर्ष पाप नदा पीते दुरापमझतात्ममि ॥१२॥ शल्य उवाच । भय चाहं रणे सर्वान् पाञ्चालान सह पाण्डवैः । निहनिष्यामि स्वर्ग पास्यामि पाइतः ॥ १३ ॥ अय पश्यन्तु मालोका विचरन्तमभीतवत् । म पाण्डुसता. सई वासुदेवः ससात्यकिः ॥ १४ ॥ पालादयश्चैव, द्रोपदेवाय सर्पश । धृष्टतुम्न शिखण्डी च सधैं चापि प्रमद का ॥ ११॥ विक्रम मन पर धनुपम महाबलम् । लाघवचस्रधीयच भुप्रयोश्च पलं युधि ॥ १६ প্রয় এই म पार्था मिलाश्च पह धारणे. याश मे बल घावोः सम्पदनेयु याच मे॥१७॥ युद्धको शोभा देनेवाले राजाशल्प की प्रशंसाकी । १ ।किराना तेरी विजय होय भौर म सम्मुस आनेशाले शत्रुओं को मारो और महापली नारायः मापके भुनपल को पाकर । १० । शत्रुओं से रहित होकर इस पृथ्वीपर राम करो निश्चयकरके तुम युद्ध में देवता भपुर और मनुष्यों के विजय काल को समर्थहो फिर यहां मरण धर्मयाले सोमक और सज्जपलोग क्या पदार्य हैं। इसमकारसे प्रशंसित होनेपर मद्रदेशका स्वामी रानाशल्य बहुत प्रसन्नाभा ।।२९ शल्प बोला कि हेराजा भरमै युद्धमें सब पांचालोको पाण्डवों समेत मारूंगा प्रथम मरकर स्वर्गको जाऊंगा । १३ । अश्लोग निययके ममान मुझ धूमनेवाले को देखें अवमर पाराव सात्यकि समेत वासुदेवजी । १४ । पांचालदेशी, चन्देश देशी,सार द्रौपदी के पुत्र, टयुम्न, शिवगही और सब मभद्रकभी। १५ । मेरे पराक्रम और पनुपके पडे पत्तकोदेवा और युदय मेरेमनरलकी इस्वलापरता और अखकर को देखो १६ । अयमा पागडय सिद्ध चारणों समेत मेरी भुनाओं में सावन और जैसे कि भलों में मेरी शिता है नमको देखें । १० व पापरयों के people of Malra rcro very glad and praiseul Shalya, saying, "Mw), you guiu victory over the onemiesi liny tho sons of Dhrtrasllra gue them. Bolres rid of their vnemies and rulo the land Surely you can conqaor gods, asura nod mon. Tho Salsand Srinjiyas ara no match for you li. Shalsa tha king of Madra was much pluszd at this and raid, "Thali alay I tho Pancial and Pandasas or shall dic fighting People will ma mo roaming fuarlously. Tho Pandoras, wit' Istyaki and Vunder, In Panthals the Chanderis, the was of Draupali, Durint. twiyaan Suthsmilt, and the Prabhairala will entho strength of my Armi un drug drilerily in 1111? mapa Lut the ParisTA**** my process and law mo i thin torld of lail'd mall multp 1 Dame Bhishm and Kuran in promou Ani vall dortios tho arais ofere [६८७१) शल्यपर्व Shalya Parv 16871) अध मे विक्रम इष्ट्वा पाण्डवानां महारथा प्रतीकारपरा भूत्वा चे एन्ना विविधा' कियाः ॥ १८ ॥ अव सैन्यानि पाण्दूनां द्रापयिष्ये समन्ततः द्रोणभीमापति विभी "मनगुपच संयुगे। विधरिये रणे युध्यन् प्रियाथै तप कौरव ॥ १० ॥ सम्जय रखाच । अभिषिक्त सदा भाल्ये तघ सन्येषु मानद । न कर्णव्यतन केचित् मेनिरे भर 'तर्षभ । २० ॥ हटा सुमनसभेष पभूस्तत्र सनिकाः । मेनिरे निहतान् पार्थान मद्र राज शेगतान् ॥ २१ ॥ प्रा प्राप्य सेना तु तापकी भरतर्षभ । तां रात्रि मुखिनी मुप्ता मुस्थविधा च सामवत् ॥ २२ ॥ सैन्यस्य तव तं शब्दं शुत्वा राजा युधिष्ठिरः। पाणयमनत्रीवाक्यं सर्व क्षत्रस्य धनः ॥ २३ ॥ मद्रराज कृपः पाल्यो धार्तराष्ट्रेण माधव । सेनापतिहेवासः सर्वसन्येषु पूजित ॥ २४ ॥ एनजज्ञात्वा यथा भूतं कुरु याधष यत् क्षमम । मवानेता च गोप्ता च विधस्त्र यदनन्तरम् ॥ २५॥ तमप्रवीग हाराज वासुदधो जनाधिपम् । पायनिमहं जाने यधातत्त्वेन भारत ०६) मी महारथी मेरे पराक्रम को देखकर और सम्मुखता में सहायक होकर नानापकार के कर्मकरो । १८ । हे समर्थ कौरव भव में युद्ध में द्रोणाचार्य भीष्म और कर्मको तल्लंघनकर पाण्डवों की सेनामी. को नारोंपोरसे भगाऊंगा और तेरे हितके.लिये युबमि में लड़तामा धूमूंगा । १९ । संजय बोले कि हेवड़ाई देनेवाले भरतर्षभ उमसमय शल्पके सेनापति होनेपर भापकी सेना में किसीनेभी कर्णके दुःखको नहीं पाना । २० । भौर सेनाकलोग वहुन प्रसन्न चिनाईये और पाण्डवों को जामद्र। के माधान माना । २१ । हे भरतर्षभ फिर आपकी सेना बड़ी प्रसन्नताको पाकर उसरात्रि मुखसे सोनेवाली होकर वित्तसे सावधानहुई । २२ ॥राजा यधिष्ठिर सेनाके सव शब्दको सुनकर सब क्षत्रियों के समक्ष में श्रीकृष्णजी से यह बचनवाला । २१ । हे माधवजी दुर्योधन ने बड़े धनुषधारी सब सेना पूनिता मद्रके राजा अस्पको अपना सेनापति कियाहै । २४ । हे माधानी यह जैसा हुआई उसको जानकर जो उचितहोय उसको करिये भाप हमारेस्वामी भोर रिक्षक हैं इससे जैसा मानिये वैसा बड़ी शीघवामे करना योग्पहै । २५ । हे महारामं यह मुनकर बाह- दिवंनी राजा युधिष्ठिर से वोले कि हे भरतपम में शल्यको मुस्यता समेत जानता Pandavas. Fighting in your cause, I shall roam in'tbe field of battle." Sanjaya continued, - None of your warriors blissed Koran, when Shalya was installed as the commander of your arnies. 20 The people of the army roro much pleased and thought that Shalya would conquer the Pendosas. Your warriors slept com{xusedly during that bight. Haring loud abouts of the Kauravas, Yodhishthir said to Vasuder in the presence of his warriors, " Duryodhan bas mado mights Shalga tho ccinmander of lia omses Do nhat you docm aecful, Madline, frs sou are cur ford and protector. » 25. To this Varuder repied, " I know the propers of Sbolyarel)... Ho - 192 6872) Mahabharat बांध महातेजा महारमा व विशपत । कृतीच चित्रयोधी व संयुको सायक ॥ २७॥ यादग्भीष्मो यथा द्रोणो पारकर्ण संयुगे। ताहशसद्विशिष्टो वा मद्रगो मतो मम ॥ २८ ॥ युध्यमानस्य तस्यानी चिन्तयविध भारत । योबारमाधिमावि तुल्पापं जनाधिप ॥२९॥ शिवायर्जुनीमानां सास्वतस्य च मारताना तथा बलेनाध्यधिको रणे ।३०। मद्रराजो महाराज सिंहद्विरदविक्रमः परित स्यमीः काले कालः क्रुद्धः प्रजाम्बिय ॥ ३१॥ तस्थापन प्रपश्यामि प्रतियोबारमारने स्थामने पुरुश्याम शाईलसमविकपम् ।। ३२ ॥ सदेवलोक तरिमलाANE पुमान भवत्। मद्रगजे रणे योहन्यात कुयनन्दन ३३६अन्यहनि युयशोम पल तप तस्माजहि रणे शलए मधानिय शम्बरम ॥ ३४ ॥ भोपायसी धार्तराष्ट्रंण सारतः। तवैव विजयो नन एते मद्रयो युधि ॥ ३५ ॥ तरिमन इने हूँ । २६ । वह अधिकतम पराक्रमी महात्मा वड़ातेजस्वी अभ्यस्त अपूर्म युदाई और हस्तलाधना से संयुक्त है । २७ । युद्ध में जैसे कि भाम द्रोणाचार्य और कर्णये मेरे मत से राजामदभी उनके समान अया उनसे भी प्रार है । २८ । हे भरतवंशी रामा युधिष्ठिर मैं शोचतामा भी उस युदर्शन में मारने काले शूरवीर शल्पके समान किसीको भी उससे बहन के योग्य नहीं पाग । १९ । हे भरतवंशी वह शल्प यलमें इन शिखण्डी मर्जुन भीमसेन सारपी और धृष्टयम्न से भी अधिक है।३० । महाराज सिंह और हाथी के समान परी कमी निर्णय राजामद समय पर ऐसा घूमेगा जैसे कि कोधपुक्त काल संसारी मृाष्टे में घूपताहै । ३१ हे पुरुषोचम अब मे,युद्ध में तुम गाईलके समान परानी के पिवाय उमको सम्मुखता करनेगला नहीं देखलाई सरवनन्दन देवताओं समेत इम सम्पूर्ण माष्टमें नुनम अधिक दूमरा पुरुष नहीं है जोकि पर में शोधयुक्त हुपे गनामद को मार । ७।इस से पुमि में प्रतिदिन पर करनेवाले और अपनी सेनाके सिमभिन करनेवाले इसाशनपत्री पुदमें पेमेपाधिम कन्दने शम्मरको माराया। ३४। यह गौर अमेप पीर दुपिन से मसाले साय मोठा पानशालाई युर में इस रानामदके मरनेपर तेरी पित्र। matchilors warrior and hay wonilorful duxcority of band. Won musl or oren naporior lo Bhisho, Drona and Karan in promet i Link there is no warrior of your nrruy cipablo of being a msech ta hlas. II is vuprorior to Shiklandı. Arjun, Bhim, Sitzari nad Dhirish indymo. 30. Full of protihr like lion und clo, lant, lo will rosia lite Death in Se full of lustele. Nono in the trull of gwla an mir Yus mort con may sleding v Jaslon, wit's thic -I repliva of you. slay Bliaisa hic desisogur of your arms as fara hul slain Sliema Taro Thust ioriscilla Antior is much respectat try Daryollaa. The rittory in your, it you contay liin.:. All the army Dane 16873 (६८७३) D2998 Shalya l'ary सर्व भाराष्ट्रस्पषलं मात् । एतत् श्रुत्वा महाराज वचनं मम साम्प्रतम्। प्रत्युपाहि रमे पायं मद्रराजं मार ॥ ३६॥ जरिवैन महाध हो वासयो ममुचि यथा॥३७॥ मात्र दया कार्या मातुलोयं ममेति धे। क्षत्रधर्म पुरस्करय सहि मद्रजनधरम ॥३८॥ भीष्मद्रोणार्णवं तीर कर्णपातालसम्मम् मा निमज्जाच सगणः शन्य मासाथ गोपदम ॥ ३९ ॥ यच्च ते तपसी पीयेयच्च क्षात्रयलं तव तदर्शय रणे सर्प जहिचन महारथम ॥ ४० ॥ एतायदुक्या पचन केशयः परवीरता । अगाम शिधर सायं पूज्ययानोध पाण्डयः ॥ ४१ ॥ केशपे तु तदा याते धर्मराजो युधिया विसज्य सर्वान् भ्रातच पाउचालानथ सोमफान् । मुम्वाप रजनी तान्तु विशल्या कुजरः॥४२॥सेच सवें महेसा.पाचालाः पाण्डपास्तथा। कर्णस्य निधने हा सुधुपुस्ता निशान्तदा ॥४३॥ गज्वरं महेशर्स तीर्णपार महारयम् । बसूब पाराडर उप्त के प्ररनेपर दुर्योधन की सब यही सना मृतकरूप है। महाराज अब तुम मेरे इस वचनको सुनकर युद्ध में महारथी शल्य के सम्मुखनायो । २६ । हे महावाहु इसको ऐम मारो जैसे कि इन्द्रने नमुचिको माराया । १७ । इस पर अपना मामा जानकर दया न करना चाहिये तुम क्षत्री धर्मको आगे कर के राजामद को मारो । ३८ । कर्ण रूप पाताल से उत्पन्न होनेवाले भीष्म और द्रोणाचार्य रूपी समुद्र को सरकर सेना समूह सपेत इस गोपदके समान स्रोतरूपी धरपको पाकर इस में मतहयो । १२ । अपने तपके वलको और क्षत्रीपनेके बलको दिखलाभो भार इस महारथी को मारो। ४ । इस के पछि पारडवोंसे पूजित शत्रुओं के धारों के मारनंगळे केशवजी इम वचनको कहकर सायंकाल के समय अपने डेरेको गपे । ११ । फिर केशवनी के चलेजाने पर धर्मराज युधिष्ठिर सप भाई पांचाळ और सेनाके लोगोंको विदा कर के विना पापल हापीके समान उस रात्रि सोपा । ४२ | और कनके मरनेसे बड़े प्रसन्नचित्त वह सब पाण्डव मार पांचाल भी आनन्दरो सोये । ४। हे श्रेष्ठ मूतपुत्र के मरनेपर पाएडवों की dban will be lifelose at his death. Acting upon my advice, you should faco Shalya and slay him as Indra had dono Namacbi.37. Donot spare him becaqsu lie is your nncle. Think of your daty as a warrior and slay him. Having crossed the Ocean, tvith Karan as its bod And Bhishm and Drona as its billows, you scod not drown your. self in the shallow water of Stalga. Show tho strength of your asceticism and Isha tryahord and slay him." 40. Having sard this, Vasudor the destroyer of focs, went to his tent at the close of the day. At the departuro of leabav, Yudhishthir dismissed his brothers and other farriors for the night and himself slept onundly like an unfounded elephnot. The Pandavas and the Panchals too, te poscd * (6874) Mahabharat (६८७४) पाण्डवेयानां सैन्य प्रमुदित निशि। सूतपुत्रस्य निधने जयं लब्ध्वा च मारिष ॥४६॥, इति शल्पपर्वणि बाल्यपर्वणि शल्यसेनापत्याभिषेके सप्तमोऽध्यायः॥ -- "सञ्जय उवाच । व्यतीतायां रजन्यान्तु राजा पुर्योधनस्तदा ।. अवधीत्तायकोन सर्वान् सन्नान्नां महारथाः ॥ १ ॥ रास्तु मतमानाय समनात सा चमूः । अयोज धास्तूर्णं पपंधाधस्तथापर ॥२ ॥ अकल्प्यन्त घ मातनाः समनह्यन्त पत्तयः ।। धादित्राणाञ्च निनदः प्रादुरासीद्विशाम्पते ॥ ३ ॥ योधनार्थ हि सैन्यानां योपानां चाप्युदीर्यताम ॥४॥ ततो पलानि सर्वाणि समाविष्टानि भारत । सनधन्यव दह, 'शुमन्यु छत्वा निवर्सनम ॥ ५ ॥ शल्यं सेनापति कृत्वा मदराज महारथाः। विभज्य | सेनावाले जो कि बड़े धनुपधारी और पारहोनेवाले होकर महारथी थे विजय को पांकर नापसे रहित अत्यन्त प्रसन्न हुये । ४६ । अध्याय ८॥ संजय बोले कि फिर रात्रिके व्यतीत होनेपर दुयोधन आपके संब शूरवीरोंसे बोला हे महारथियो सन्नद्ध होकर भलंकन हो जावो तब राना के विचार को जानकर वह सेना' अलंकन हुई और शीग्रही रयोंको जोड़ कर उसीमकार से शूरवीर लोग चारोंभोरसे दौड़े। २ । हाथी अलंकृत होकर पतियां सन्नद्ध हुई. बाजोंके शब्द मकरहुये ३ । हे भरतवंशी इसके पीछे युद्ध के निमित्त गुरवीर | सेना के लोगोंकी वार्तालाप करतेहुपे शेपवचीहुई सवसेना मृत्युको लौटाकर दृष्टपड़ी महारथी लोग पदके राजाशल्यको सेनापति करके और सबसेनाको विभागकरके in sweet sleep at the death of Karan. Thi lover of the Pandari warriors abatod and they felt' joyful at the death of Karan,"; " -- । CNA PTFR VIII * Sanjaya said, "At the end of the night, Daryodhan thus addressed his warrior, "" Prepare for battle, "brave men." Tho army was 'made roady at the king's yord and mounted cheir cars. The elephants add 'foot soldiors prepared themselves with the beat of musical instruments. The sarriors, careless of life returned to fight. 5. With Shalya to lend, the armies were divided into various parts and became (६८७५) शल्यपर्व Shalya Paray (0875) पल संवमनीफेपु व्यवस्थिताः ॥ ६ ॥ ततः सर्वे समागम्य पुत्रेण तय सनिकाः । कृपय कृतधर्माच द्रौणि माल्योय सौचलं. ७ ॥ मन्ये च पार्थिवाः शेषाः समय चक्रिरे तदा । नन एमेन योद्धध्यं कथन्चिदपि पाण्डवः॥ ८॥ यो जंकः पाण्डयुध्येद्यो पा युध्यन्तमुत्वजत् । स-पञ्चभिभवेत. पातकैचोपपातक अन्योन्यं परिरक्षद्रियों सव्यं महिनश्च न. १२॥ एवं ते समयं करवा स तत्र महारथा मद्रराज पुरस्कृत्य सूर्णमध्यवर परान् ॥ १० ॥ तद पाण्डवाः सर्वे व्यूह्य सत्यं महारणे । अभ्पयुः कारवानाजन योत्स्यमानासमन्ततः ॥ ११ ॥ सवलं भरतश्रेष्ठ क्षुब्धाणयसमस्बनम समुद्भवाणवाकारमुख़्तरपकुवरम् ॥ १२॥ धृतराष्ट्र उवाच । द्रोणस्य भीष्मस्थ पधै राधेयस्य मया श्रुतम् । पातनं शस मे भूयः शल्पस्याथ मुतस्य मे ॥१३॥ कथं रणे हतः शल्यो ध राजेन सञ्जय. । भीमसेनेन धलिना पुत्रो बुर्योधनो मम अनेकनाम भागों से युक्तड्डये । ६। और वह सेनामी भाकर नियतहुई इस के पार कृपाचार्य कृतवर्मा असत्यामा शल्प शकुनि और अन्य अन्य शेपघचेहुये राजाओं ने अपनी अपनी सब सेनाओं समेत इकट्ठे होकर आपके पुत्रसे मिलकर यह सलाह करी। 1कि किमीदशामें भी एक मनुष्यको पहियों के साथ शुद्ध नकरना चाहये। ८ । जो अकेला पाण्डवों के साथ युद्ध करे अथवा जो अकेले लड़ने | वाले को - त्याग करे यह पातक और उपपातकनाम पांच पापोंसे संयुक्तहोय परस्पर रक्षाकग्नेवाले और साथ रहनेवालं हमलोगों को लड़नाचाहिये १। वहां वहसव महारथी इसमकारसे नियमकरके और राजापद्रको भागे करके शीघ्रही शनुओं के सम्मुख गये ।१० । हे राजा इसीपकार सब, पाण्डवभी अपनी सब सेनाको अलंकत करके बड़े युद्ध में युद्धामिलापी होकर चारोंआर से कौरवों के सम्मुखगये । ११ । हे भरतर्षभ वह सेना जिसमें स्थ और हाथी चढ़ाई करनेवाले थे व्याकुल समुद्र के समान शब्दायमान उठेहुये समुद्र के रूपहुई । १२। धृतराष्ट्र बोले कि मैंने द्रोणचार्य भाप्प और कर्णका गिराना धना फिर अप म शल्य और मेरे पुत्रका गिराना मुझमे कहो । १३ । हे संजप युद्ध में शल्य ready for action. Then Kripacharya, Krityarma Ashwathama, Shalya Sbaluni and other warrior kings, with their attondants proposed to your son that none of their warriors should fight singly with the Prodavas and that he who broke this rulo vas to to left to his own fate as a sinful wretch, without receiving any ad from bis alhes. Having coino to this resolution, tho warriors soon faced the enemy. Tlio Pandavas too arrayed their armies and rushed to the field of battle. .Tho army of elephants and cars, mads a noise like that ol, the ocean in a storm." Dhritrashtra said, “ I have beard of the fall of "Droba, Bhishmand Karad. Pray.tdl mc of the death of slalsa red .
16876) Malaliharnt ॥९॥ माय उपाच कार्य मनुष्यदेहानां तथा नागाश्घसंक्षयम् । अणु रामस्थिरो भूरघा सपाम शसतो मम ॥ १५॥ आशा पलधसी राजन पुत्राणान्ते मतदार द्रोणे च भीमेधा सूतपुत्रे च 'पातिते । शल्यः पार्यात्रणे सर्वानिहनिम्पति मारिष ॥ १६ हदये फरषा समावस्ये व भारत । मद्रराजघ समरे समाभिग्य यहारयम् । नाथपन्त तदारगानसमन्यत मुतस्तष ॥ १८ ॥ यदा कर्णे हते पासिंह माद प्रचफिरे । तदा राजन् धार्तराष्ट्रानावियेश महन्न्यम् ॥ १९॥ तान् समाश्यास्प तु तदा मद्रराज प्रतारयान् व्यूह्य व्यूई महाराज सर्वतोभद्रभूमिमत् ॥ २० ॥ प्रस्तु यो रणे पार्थाम्मदराजः प्रतापवान् । विधुन्वन् कार्मुक चि गलबत्तरम्॥२९॥ एयप्रघरमास्थाय संग्घयाश्य यहारयः । तस्य सीता महाराज रथस्थाशोमवयम् ॥ २२ ॥ स तेन सम्वृत्तो पीरो रथेनामित्रकर्षणः । तस्थौ शूगे महागज पुत्राणान्ते किंसप्रकारसे धर्मराजके हाथसे मारागया और भीमन मेरे पुत्रको कैसे मारा २४ संजय बोले कि हे राजा उसयुद्ध में जो घोड़े हाथी भादिके शरीरों के नाम उनको सावधान होकर हनो । १५ । भीम द्रोणाचार्य आर कर्ण के गिराने पर आपके पुत्रोंको घडीमल आशाहुई थी कि शल्प युद्ध में सब प.एडवों को मारेगा । १६ । श्रेष्ठ भरसर्पम उस आशाको हृदयमें धरकर बड़े विश्वास युक्त होकर । १७ । और युद्धमें महारथी राजामद्रके आश्रित होकर आपके पुप्रने अपने को सनाथ माना। १८ । हे राजा जव कर्णके मरनेपर पाण्डवोंने सिंहनाद किये तब धृतराष्टके पुत्रोंको महाभय उत्पन्नहुभा। १९ । हेमहाराज उस समय प्रतापमान राजामद उनको विश्वास युक्त करके और सब सामान से अलंकृत सर्वतोभ नाम | ब्यूहको रचकर । २० प्रतापवान, महारथी शल्य अत्यन्त उत्तम सिन्धुदेशी घोड़ों के उत्तम स्थपर मवार होकर रत्नों से अटित बड़भार के सहनेवाले महावेगवान् धनुपको चलायमान करता हुभा पाण्डवों के सम्मुख गया हेमहाराज यहांजाकर उसके नियत रथके सारथीने उस रथ समेत सिग्धुदेशी घोड़ोंको शोभायपानकिया my son. How was Shalya blain by Yudhishtbir " Sınjaga said, "Hear of the great destruction of horses and elephante.,15. At the fall of Bhishm, Drona and Karan, your sons bad a strong bope that Shalya would slay the Pandavag. With this hope in their minds and relying on the promiso of Shalya, your son thought himself wollprotected. The Kauravas nere much afraid, whon the Pandavas roared at the fall of Knrad. The king of Madra consoled them and formed the armies into an array known as the best of all. 20. Mighty Sbalya mounted his good car, drawn by the horses of Bindbu breed, and moving his huge bow decked with precious stones, he faced tho l'andayag. His driver droto his car drawn by the lorbos of 108771 1 (१८७७) peagi Shalya ! arv मयप्रणत् ॥ २३ ॥ प्रयाणे मगजोभन्मुख ध्यहस्य दशित । मद्रके सहिलो बोर. वर्षपुष दुर्जये । ॥ सगमत् कुनयर्मा च त्रिगत परिवारित गौतमो ने पारे शोध जयने सह ॥ २२ ॥ अवस्थामा पृष्ठनोभत् काम्बोज परिवा सिता दुवाँधनोभयग्मध्ये रक्षित कुरुपुद्गवै ॥ २६ ॥ हयागीकेन महता सीवलभागि संत प्रिययौसर्वसैन्येन कैतव्यश्च महारथ ।। २७ । पाण्डघाच, महंग्यासा प्रयत्न सम्यनिन्दिता । त्रिधा भूषा महाराज तव सैन्यमुपादन २८ धृपयुम्न शिखण्डी सात्यकिश्च महारथ । शल्यस्य चाहिनी तूर्णमभिदुगह ॥ २९ ॥ ततो युधि हिरो राजा स्वेनानकिन सम्बन । शल्पमेधामिदुद्राय जिघामभरतर्षभ । २२ । हे राना शत्रुओंको पीडा देनेवाला शूरवीर उस स्थपर सवार बह राजा शल्य आप के पुत्रों के भयको दूरकरताहुआ पद्धभूमिमें नियतहुआ । २३ । उस पुदमें कवचपारी शत्रोंभे युक्त वह राजा पल्प मद्रदेशी वरि और कठिनतासे विषय होनेवाले कर्णके पुत्रोंसमेत व्यूहका मुग्वहुआ। २४ । विगतदेशियों से हित कतवमा वाम भागपर नियतहमा भोर शक और यवनों समेत कृपाचार्य दक्षिण भागपर नियतहुये। २५। और काम्बोज देशियोंको साथलेकर अश्वत्थामा पीछे की भोर हुये उत्तमकौरवोंसे रक्षित दुर्योधन मध्यमें नियतहुआ। २६ । और घोडोंकी बड़ी सेनासे युक्त महारथी शकुनी और कैतम्य सब सेना समेत चले । २७ । तब वह बड़े धनुषधारी निर्दोष पाण्डव सेना को अलकत और सानभाग करके भापकी सेना के सम्मुख दोहे ।२८। महारथी धृष्टपुम्न शिखंडी और सात्यकी यह सब बड़ी शीघ्रता से शल्यकी सेना के सम्मुख दौड़े। २९।। भरतर्षभ'अपनी सेना से युक्त मारनेका अभिलापी राजा युधिष्ठिर शल्य के सम्मुख दौड़ा । १० और शत्रुओंका मारनेवाला अर्जुन वेगयुक्त होकर वडे धनुप पारी कृतवर्मा और संसप्तकों के समूहोंके सम्मुखगया। '३१ । राजेन्द्र युद्धमें Sindhu broed and stationed it in the fiuld of battle Salya the destroyer of foes, mpunt d on that car, dispelled the fear of your song as he stationed himself in the fil1. With the sons of haran fby his side, the invincible wurrJur king of Maurr stood at the entrance of the arrdy Kritvarma, sith the people of Irrgart, stood on bis left and Kripacharye syith the Shakns and Yayans stood on, the right 25 Ashwathama with the warriors of Camboj stood on the rear and Duryodhan, guarded by the Kauravas, stood in the widdle Buahuni Bod Kaitavya wero followed by a large number of cavalry Tbe (Pendavas, dividing their armies into three parts, rushed against your army Brave Dhrishtadyamn, Shıkhandi and Satyak: hastened to face Shalya's army, and Yudhishthir, with his nrny, des rous, of slaying faced Shalys, 30 Arjun, tho destroyer of foes in his fory (0878) Malabhaint पापिया मोपासम न. शशाहा । संशप्तकगणांधेष गिताभिप्रदुदुधे ॥ ३१ ॥ मौतम भीमसेगा प सामकाच महारथा । मध्यपर्तन्त गन्द्र जिघांसन्तः परोन युधि ॥ ३२॥ माद्रीपुत्री तु शकुनिमुलकाच महारयम् । ससैन्य सहसेनी तु उपतष तुराहणे ॥ ३३ ॥ तनायुतशो योधातायका. पाण्डधानणे । मायवतन्त सकुना विविधायुधपाणयः ॥ ३४ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । हते भीष्मे महेपासे द्रोणे करें महा रये। वयल्पावशिष्टेषु पांडयेषु संयुगे: ३५॥मुसंरब्धेषु पाथ पराक्रान्तेषु सजाय मारकानां परेशान किं शिष्टमभवलम् ॥ ३६ ॥ सम्जय उवाच । पाये परे राजन युवायसमपस्थिता । पायघासीदलं शिष्ट संप्रामे तमियोधमे ॥ १६ ॥'पका दश सहस्राणि रथानां भरतर्षभ । दश दन्तिसहस्राणि सप्त व सतानि च ॥३८i पूर्ण शतसहमे में हवाना भरतर्षभ । नरकोस्य तथा तिसो पलमेतत्तवाभवत् ॥ ३९॥ वाभोंके मारन के इरावान महारथी सोमकनाम क्षत्री और भीमसेन कृपाचार्य के सम्मुखगरे । ३३ । और सेनासमेत वह नकुल भौर सहदेव पुद्धमें उन सेनासमत नियत होनेवाले महारथी शकुनि और उलूकके सम्मुख नियतहुये। ५। इसी प्रकार नानाप्रकारके शस्त्र हाथ में रखनेवाले अत्यन्त क्रोषयुक्त हमारों भाप शूरवीर युद्ध में पाण्डवोंके सम्मुख हुये । ३४ । धृतराष्ट बोले कि युद्ध में महारथी महाधनुषधारी भीष्म द्रोणाचार्य और कर्ण के मरने, और कौरसीय पापडवीय सेनाके थोडे लोगों के शंपरहनेपर । ३५ । और पाण्डवोंके अत्यन्त कोपयुक होकर पढ़ाई करनेपर हमारेमित्र मार दूसरोंकी सेना कितनी पाकीरही । ३६ । संजय बोले कि राजा जैसे प्रकारसे हम और हमारे प्रविपक्षी युद्ध के निमित्त सम्मुख नियतापे और युदसे जितनी सेना बाकीरही उसको मुझसे मुनिये ।।३७ । हे भरतर्षभ रयों की संख्या ग्यास हजार हाथियोंकी दशहजार साथी 1.101 घोड़ोंकी, पूर्ण संख्या दोहजार पहआपकी सेना वारहकोटि पदातियोंसमेस शेपरही और रथों की संख्या छाहजार हाथी छ।हजार घोड़े दशहजार और दो करोड़पदाती faced Kritvarma and the Sanspitaks Bhimson trithi tho Arnsy of Smaks fuced Kripacharya. Nakul and Sihadev, with their arnies, faced Shahuni and Uluk, Thousands of your armed warriors faced the Pandavas. Dhritrashtra Baid, "At the full of Bhishna, Drons and haran, wlien a small pution of the armies of tho Kauraras and Pandavas remained and the Pandavas Attacked us in fury, the ar mios of both sides must havo boon nonderfully reduced Pray tell no low niany word luft."' 36. Binjaya said, " Hoar hoy the Kauravas and Panda as opposed ono nnother and what portion of the armies was left: the numbur of cars ya cloven thousands, ble phants wore ten thousands and gaven fiuadreds in' rumor, horses were tso thousands and thero were twenty initions of foot fornun:
३ [६८७१) शल्यपर्य Shilya Pary (68701 धानां षट् सहस्राणि षट सहस्त्राम कुम्जरा दश चाबसानानि पति कोटाब भारत ॥ ४० ॥ एतले पाण्या नामषरुपमाहये । पर एक समाजम्मु शुखाप भरतपम ॥४१एवं विभज्य राजेन्द्र मद्रराजमते स्थिता. पारवान् प्रत्युतीयाम जयगुया. १. प्रमल्यष ॥ ४२ ॥ तथैव पाण्डवाः शूरा समरे, जितकाशिनः । उपयाता माधा. पाचाला यशखिन ॥ ४३ ॥ पर मेव महाराज परस्परपोषण । उपपाता मरस्यात्रा पूर्ण सत्य प्रति प्रभो ॥ ४५ ॥ ततः प्रायते युद्ध घोरप भ्या माम तापकानां परेषांच निशतामितरेतरम् ॥ ४५० इति शल्यःणि पाल्पणि व्यूहनिर्माने अष्टमोऽध्याप' ८॥ ६ भ यह पाण्डवोंकी सेना बाकीरही हे भरतवंशी यहसब मिलकर युद्ध के निमित्त आये, ४॥रानेन्द्र इसप्रकार राजामद्रके मनमें निपत विजपके लोभी क्रोधयुक्त हमलोग सेनाको विभाग करके पाण्डवों के सम्मुख गये । ४२ । इसीप्रकार विजय शोभा पानेवाले शूरपांडव और यशवान नरोत्तम पांचाल सम्मुखाये । ४३ । हेमर महा राज इमपकार परस्पर विजपाभिलापी नरोत्तमलोग प्रात:कालकी संध्याकसमय सम्पुसा.४४।इसके पीछे परस्सर मारनेपाले पांडव और भापकपुत्रोंका युद्ध महा पाररूप होकर भयानक जारीहुमा ४५ ॥ - 2 " 5 - 2 Frpart of your army. , Tho Pandav army consisted of sie thousands of el-phonie, ns many cars, ten thousand Borse aud twenty'millious foot, Thus the king of Aladia divided our armný desuous of gaming victory over the Pandavas. The Panilivas and Panchals too, attaked us tol gain vrtory In the battle betwwen the Pandavas and your song Waa very terribly" । - 16880) (१८८०) Mahabharnb सजग उद्यान । सतः प्रववृते युद्ध कुरूणां भयवद्धनम् । सज्जपः सह राजेन्द्र घोरं देवासुरोपमम् ॥ १ ॥रा ग्यगौघाश्च सादिनच बहस्रशः। बार्जिनच परी कान्ताः समाजग्मुः परस्पाम् ॥ २॥ नागानां भीगरूपाणा द्रवत निस्वनी महान् । अभूयत या काले जलदानां नभस्तले ॥ ३॥ नागरे पाहताः काँचद्विरषा विमो भषन् । अष्ट्रवन्त रणे पारा द्रोग्यमाणा मदोरकरे ॥ ४॥ योधान पावरक्षा र नस्तत्र शिाक्षताः शरैः सम्पयामासुः परलाकाय भारत ॥५॥ सादिनः गिलिता गजन् परियार्य महारथान् । विचरतो रणेऽध्यान प्रासंक्तिष्टिभिस्तथा ॥६. घनिन पुरुशा केचित् परिधार्य महारथान् । एफ घय आसाध"प्रेषयेयुमक्षयम् ॥ ७॥नागा रथयाश्चान्ये गरिघायं महारथाः । साम्तरायुधिन अनुषमाण महा रथम ॥ ॥ तथा संरथिनं कुछ पिकिरात शरान पहुन् । नागा महाराज परि अध्याय ९॥ रे राजा फिर कौरवोंका युद्ध नो मृजियों के साथ जारीहुआ वह घोरभयका बढ़ानेवाला देवासुर युद्धके समानया चढ़ाई करनेवाले हजारों मनुष्य और रथ घोड़ोंके समूह अश्वसधार और घोड़े परस्पर में भिड़े ।' भयानकरूप हारियों भागने के ऐसे शब्द सुनेगये जैस कि समयपर भाकाश में बादलों के शब्द होते हार्थियों से घायल कितनेही रथसवार रयों समेत गिरपड़े और युद्ध में मतवाले हाथियों से भगायेहुये वीरभागे ।।। भरतवंशी" वहीं शिक्षासे रखसवारों ने पोड़ों के समूहों को 'भार चरगौरक्षकों को बाणोंसे परसाक में भेगा १५। और इसीपकार युद्ध में घूमनेवाले शिक्षिक असतारों ने महारथियों को पास शक्ति और दुधारे सद्गोंसेमारा और किसनेही धनुषधारी मनुष्यों ने महा रथियों को घेरकर बहुतोंने एकको पाकर यमलोक में भेजा। और रथियोंमें श्रेष्ठ दूसरे महारथियों ने हाथीको घेरकर मारा हे महाराज इसी प्रकार मौके से सड़नेराले महारथी, को । ८ । और बहुत वाणोंसे लड़नेवाले क्रोधयुक्त रवीको CHAPTER IX • The Khurnras fought with the Brinjayas a dreadful battle likel that of the gods and danaras, Thousands of men, Art and horno mot together. The dreadful olepliante inado a tromerdous nuiro like that of thunder. Marry car-warriors fell down wounded by olephants or) ran auay in terror, The well-trained car-frarriora sent horses and guards to tho region of Yam with their arrowe, 5. The trainod horsemen to, blev great warriors with jarolina and wordă; The Brmier surrounded great warriors and many of them put bingla warriors to death. Some good car-Tarriora Lurrounded and killed eleplaats. Similarly, clophants surrounded and sley the good bglating men. The riders of oloplanta and cara mot and slow tho riders of elephants sad 1 (६८८ शल्यप Shalya Party (1881) कार्य समन्तत ॥९॥ मागो नागमगिरथ रथी घराधन रणे । शक्तितोमर मारा बिनुनम भारत ॥ १० ॥ पादातानवमृन्दन्ती रथयारणवाजिन । रणमय पर एवम्त कुर्वन्नो मांदाकुलम् ॥११ । इयाय पावत चामरे सपशोभिता. हसा मिषत प्रस्थ पिबन्त इव मेदिनीम् ॥ १२ ॥तषान्तु घाजिनां भूमि खुचित्रा यि शाम्पते । मशीभत पथा नारी का क्षतविक्षता ॥ १३॥ धाजिनां खुरसम्म रथ ममिस्वमेन । पत्तीनाञ्चागि शम्देन मागानां हितेन च ॥ १४ ॥ बावित्राणाश पोषेण शहा मिनेन च । सभयत्रादिता भूमिर्मिधासरिय भारत।१५ ॥ धनुषा समानाना मिनिशानाञ्च दाप्यताम् । कषचाना प्रभाभिश्च न जायत् किचन ॥ १५ ॥ वहयो बारपश्छिमा नागराजकरोपमा' | उद्वेष्टम्ते विचेष्टर वर्ग कुरित दाम् ॥ १७ ॥ शिरसाद महाराज पंतता पसुधागले । यतानामिन हाथियों नेचारोभारसे घेरकरमारादिभरतवंशी हायीने हाथीकोसम्मुख होकर माग भौर स्थीने रथीको शक्ति तोमर और नाराचों से मारा । १० । रथ हाथी मार घोड़े पदातियोंको मर्दनफरते बड़ी ब्याकुलताको उत्पन्नकरते युद्ध में दिखाईपड़े 1 ११ और चापरासे शोभायमान घोडे मानों पृथ्वीको पानकरते चारोंभोर को ऐसे दौरस कि हिमालयके शिभरपर इस दौड़ते हैं । १२ । है राजा उन घोडों के सुरोंसे चिन्हिन पृथ्वी ऐसे शोभायमान हुई जैसे कि स्त्री हायों के नसीस विदीर्ण होती है ।११॥ घोड़ों के खुरोंके शब्द रथनेमियों शब्द हाथियों की विग्याई बाजों के शब्द मौर शंखों के शब्दों से पृथ्वी ऐसी शादायमान हुई 'हे भरमवंशी जैसे कि परस्पर अघात करनेवाली हवाओं के पृथ्वी पर गिरने से उत्पन्न होनेवाले शब्द होते हैं । १५ । उस समय बन्द करने पाले धनुष प्रकाशित खड्ग और शरीर के कवचों के प्रकाशों से कुछ नहीं जानागया। १९ गमराज की सूंड के समान टूटी, हुई वहुनसी सुना व्याकुस और भोधक चेष्टा करती हुई भयानक वेगोंको करती थी 1991 हे महाराज पृथ्वी cara respectively with their javeling, toiners and darts. 10 Cars, olephants and horses crushed the foot soldiers and cansed couternation uwong there Foress, decsed with chamars, ran mahdrectomy like swang oper bills, as if they would drink the earth Tho ground marked with the horses, hoofs looked like a woman scratched by finger nails Filled with the noise of hoofs, wbeels, cres, grunts and conchs, the field rang as if with a storm of wiad 13. Loud sounding bows, bright swords and shining armours were to be seen everywhere. Arms like the trunks of elephants made various, movements at there fall The heads of the waruots fell down with a crash like that of the fallmg palm-tres fruits The ground covered with blood-stained heads jookod glorious as if strevn over with lotus flowers of golden hue. शप पत्तियों - - - (6882) Mahabharat (६८८२) शालेय फलानां भूयते स्मनः ॥ १८ ॥ शिरोभिः पमितभाति यघिराधमुग्धग. सपनीयनिर्भः काले नमिरिष भारत ॥ १९ उमत्तनपनेस्तैस्तु गतसत्यः, मुषिक्षत व्यधाजत .. मही राजन् पुण्डरीकरिधावृता । ..२०, । पाभिवन्दना दिक्षित सफेयरमायाः । पतितौति धमधा यथा शक्रयजे तथा 1,२१॥ ऊरुभिश्च नराणां पिनियस महादघे । हस्ति हस्तोपमै रम्पैः संवृतं तद्रणासनम२२ ।। फबघशतसङ्कीर्ण छत्रचामर सकुलम् । सेनापमं तच्छु शुभे धनं पुष्पाचितं यथा ।। २३ / तत्र योधा महाराज विचरन्तो धमीतवत् । श्यन्ते रुधिराक्ता पुष्पिता दवबिशुकाः ॥ २०॥ मातङ्गा पाप्यष्यत शरतोमर पडिताः । पतन्तस्तत्र वश्रेष छिनांभ्रसाशारणे ॥ २५ ॥ गजानीक महाराज घध्यमान महात्मभिः । यदीर्यत विशः सर्वा पोसनुषा घना ह५ ॥ २६ ॥ ते गजा मेघसङ्कनशाः पेतुरों समन्ततः ! पर गिरतहुये शिरों के ऐसे शब्द मुनेगये जैसे कि ताल के वक्षोंसे गिरतेहुये फलों के शब्द होते हैं । १८ । रुधिर से लिप्स पढेहये शिरोसे पृषी एमे :प्रकाश मान हुई जैसे कि समयपर सुनहरी कमलों से शोभित होती है। १९ । हे राजा फैलेंहुये नेत्र निर्जीव और भत्यन्त, पायल उन नरोंसे युक्तहोकर बंद पृथ्वीऐसे शोभायमानदुई जैसे कि कमलोंसे शोभित होती है । २० । चन्दनसलिल बहुमूल्म रत्नमयी केयुर रखनेवाली पड़ीहुई भुजामोंसे पृथ्वीऐसे- प्रकाशयुक्ताई जैसे कि, इन्द्रकी वनाओं से । २। बड़े युद्ध में काटीदुई महाराजाओंकी जंघाओं से होमाती है भार हाय की, मडके , समान दूसरी जंघाओंसे वह युदभूमि व्यास होगई । २२ । सैकड़ों घोड़ोंसे मच्छिादित छत्र चामरों से व्याकुसःवह सेनारूप वन ऐसे शोभायमान हुभा.जैसे कि फूलोंसे चिताहुप्रा .वन होताहै.२॥ महाराज | निभयके समान घूमनवालं शूरवीर रुधिरमे लिप्त अंग ऐसे दिखाई पड़े जैसे कि प्रफुल्लित किं कके वृक्ष होते हैं।२४। वाण और तोमरों से परिनिहाया भी जहाँ तहाँ हुये वादलोंके समान गिरतेहुये हप्टपड़े । २५ । और महात्मामों के हाथड़े 'घायल ई वह हाथियों की सेना सव दिशाभोंमें ऐसे-छिन्न भिन्न रोगई जैसेक वायुमे छिन्न भिन्नं बादल होते हैं ।२६। अर्थात् बह वादलके रूप "The lifeless bodies, with open eyes, maie the ground look like a forest of lolur. 20;; Decked with Handal paste and valuablo 'ornámonts,'the -argis lay down on earth: like Indra's banners. The thighs of the warriors lay like the trunks of elephants. With horses, umbrellas and chåiñars, thic battlefield' looked like a forrst in bloona: Warrioi's, |Vith ble-ding: bodies, roaming there, looked like Kinshuk trees in 'toom'Elephants trounded by' arrowatarid tömnirs fell down::liko clouds. 25. The arniy of elephants, sougued by the arrow&:of the Warriors, "dispersed like"clouds by tho wind. The cloud-like , . म . अपाता १८८३)- शत्यप Shalya Paray. 19883 यानां सादिमिः साई पतितानां' स्तितः ॥ २८ ॥ सम्जा रणभुमी तु : 'वृक्षास्थिशर्करा ॥ २९ ॥ -मुजेनका छत्रहला गदापा ।।३. केंषधोणी सम्पमा पसाकाविरमा धकाधलीजुधा त्रिवेणुवहुंकावृतां ॥३१राणा जननी भाषणो भयपनी प्रावतत नही रोद्रा कुरामजयसंकुला ॥ ३२ ॥al नों पितृलोकांप पान्तीमति मेरधाम । घोहननोमिस्ते शूराः परियवाहवः ॥३३॥ पमान तथा यु निर्मयदि विशाम्पसे । बसूरङ्गक्षये पोरे पूर्व देवांरोपो ३८ ग्माकोशन: शान्धवाचाये त तत्र परतपा । कोशद्रियान्धमाश्या ये निधपसिरे ॥ ३५॥ निर्मय्यादेतया युद्ध वर्तमाने मयानका हराधी चारोंओर से ऐसे गिरपड़े हे समर्थ जैसे कि मलंयकाल में वनसे टूटे हुये पहाड़ गिरते हैं ।२७१ सवारों समेत पृथ्वीपर पड़ेहये घोड़ों के समूह जहाँ जहाँ पर्वत के समान दिखाईदिये। फिर युद्धभूमिमैपरलोककी और को चईनेवासी नदी उत्पाई जिस में रुधिर जल रथ भार ध्वना वृक्ष''हाई कंकड़ भूना नक पर्नुप झिरने हाथी पर्वत घोड़े पापाण वसा कीच छत्र इस और गदा नहषधी । ३. वह नदी काच और.पगड़िपोंसे पूर्ण और पताकारूपी सुन्दरत रखनेवाली रथकै पहिपे रूप चकवाली से पूर्ण निगुरुप दण्डके से संयुक्तं शूरों की मसन्नता उत्पन्न करनेवाली और भयभीतों के भोंकी' बढ़ानेवाली कौरव और मुनियों से व्याकुल महारुद्र नदी जारी हुई। ३२ परिवरूप भुनारखनेवाले वह शूरलोग पितृलोक के निमित्त बहनेवाली उक'बड़ी भयानक नदी को सवारी रूप नौकामोंके द्वारा तरें । ३।। हेराजा इसमकार उस अमादारूप युद्ध के नारी ने पर जो कि पूर्वसमय में होनेवाले देयामर युद्धके समान था और घोर तरंगिणी सेनाके नाशवान होनेपर जहां तहां अन्य वान्धव पुकारे पुकारनेपाले उन वाग्धवों के कारण से भयसे पाडावान दूसरे शूरवीर नियत हुये । २५ । इस elephants fell dowa hore and thore liko hills struck down by vajra The horses with their riders lay down here and there like hills, Then átriver of blood flowed down, loading to the next world, having blood fof water, cars for eddies, banners for trees, bonos for pebbles, ar nus for ish, bows for Waterfalls;"elephants tor hille, horses for stones, fat for mire, ambrollas for cranes and maces tor boats.. 30. It was full of Arboretúrba'ns, banners and wheuls and other parti of cars,'causing terror to tho timid and joy to the brave, and was full of the 'Khulares and Srinjayas. . With their club-like arms, the warriors 'crossed that drčadſul-river ly means of their cars. When the battle was raging furiously, like that between gods and asurs, without rule, the war.
(6884) M:hnhharat ६८८४ अर्जुनो भीमसेनश मोहयाश्चतु पराम् ॥ २६ ॥ सा पायमाना महती सेना तब जनाधिए ममुबत्तत्र तत्रैव योपिन्मदयशादव ॥ ३० ॥ मोरपिया ali सेमा भीमसेनपानम्जयो दध्मतुर्षारिजी तत्र सिंहनादान नेदतु ॥ ३८ । शुतु महाशब्द प्रद्युम्न शिखण्डिनी। धर्मराज पुरस्कस्य मद्रराजमभिदुतौ ॥ ३१ ॥ सत्रा श्चर्यमपस्पाम घोररूप विशाम्पते । शल्येन स ता. सूरा यरयु पन्त भाग ॥ ४० ॥ माद्रापुत्रौतु रमसी कुताखो युद्धदुर्मदी । अन्यथातो परायुक्ती जिगी पाती षळ तय ॥४१॥ ततो न्यवत पल तापक भरतर्षभ । शरै प्रकाधा पाणी जितकाशिमि ॥४२॥ वध्यमानाचम् सा तु पुत्राणां प्रेक्षता तवा भेजे दिशो महाराज अणुवाद धन्वभिः ॥४३॥ हाहाकारो महान जले पोधाना तष मारत तितिति बाप्या सीट्राधितामा महात्मनाम । क्षत्रियाणा सदान्योन्यसयुगे अयमिता मकार उस अमर्याद भयानक युद्धके वर्तमान होनेपर अर्जुन और भीमसेन ने शत्रुओंको अचेत किया । ३६ । सब हेराना यह आपकी बड़ी सेना महापापस होकर जहाँ तहां ऐसी अचेत हुई जैसे कि नशेकी दशा में स्त्री अचेत होमाती है । ३७ । वहाँ भीमसेन और अर्जुन ने उस सेनाको अचेत करके बालोंको बनाकर सिंहनादों को किपा 114। फिर बड़े शन्दको मुनतेही धृष्टद्युम्न, और शिखमी धर्मराजको भागेकरके राजामद्रके सम्मुख गये । ३९ । हे राजा तव व हमने एक भयानक रूप आमर्यको देखा जो शल्य से भिटे हुये पूरभागी होकर युद्ध करगलगे। ४० । फिर वेगवान अस्त्रज्ञ युददुपद शीघ्रता से युक्त भापकी सेनाके विजय करने के अभिलापी नकुल और सहदेव सम्मुख गये। ३१॥ हे भरतर्षभ इसके पीछे वह आपकी सेना लौटी जो कि विजय से शोभित पांडवों के पाखों से अत्यन्त पायलथी । ४२ । फिर उस पायल सेनाने आपके पुत्रों के देखता दिशाओं का सेवन किया वह सब सेना वाणोंकी वर्षात अत्यन्त संयुक्त गरे राजा तप भापके शूरवारों का बड़ा हाहाकार उत्पन्न हुआ और युद्धमें परस्पर विजयामिलापी महात्मा पांडवों समेत नत्रियों के विपरवान्दहये ।४४ । इसकेपार non alled out for help to thor Ammar and Friends and stand share in terror, 35, In that battle without rule, Arjun and Bhim wada the onewites lose their senses Your great army, Oking, became ineensible vita wounas liko a drunken woman Having made your warriora inseneble, Bhim and Arjun blew their conchband roared loud On hearing their sounds, Shikbundi and Darishtadyumn, led by Yudhishthur, faced Shalya, The latter disporsed them to the didozemont of all 4 Then brave Nakýl and Sustador, desirous of fighting, faced Shalyn Your Army, wounded by the arrows of the Pandavas, turned back and dispersed in all directions in the preselce of your son l'hen there were cries of dismay among the warriors, TOGIS.
[६८८५) yang Shalya Pary (6895) भावपम्मेव मम्मा पास्तव स.िकाः। पपरवा युये प्रिधान पुत्रान् मातृनय पिलमहान् । मानुमान मागिनेयांश्च तथा सम्बन्धिपायान् ॥ ४५ ॥ प्यान द्विपां सस्परमातो बोधा मुसरमशः I मारमाणकोरसास्वापका भरतर्षभ ।। ४ ।। इति शल्पपर्वणि शल्पयधपर्वणि संकुलयुद्धे नवमोऽध्यायः ९॥ सब्जय उभच। तत् प्रमग्नं वरप्पा मद्रराजः प्रतापवार उता सारधि सूर्ण दपाषा मनोजधान १ ॥ एष तिष्ठति राजा पादुपुत्रो युधिष्ठिरः । मश्रियमाणेन पारवेण विराजता ॥२॥ मत्र प्रापथ माक्षि पश्य मे सारये पांचोंके हाथ पराजित आपकी सेनाकेलोग युद्ध में अपने प्यारेपुत्र भाई और पिता पापायाँमा पाग करके । १५ । घोड़े हाधियोंको शीघ्र पलानेवाले शरबीर मामा भानने मादि नातेदारों को छोड़कर चारॉमारसे चलदिये अर्यात हे भरतर्षभ भापके शूरवीर अपनी रक्षामें उत्साह करनेवाले हुपे । ४६ ॥ अध्याय १०॥ सम्नप वाले कि प्रतापवान् रानामद्र उस पराजिनहुई सेनाको देखकर अपने सारधी से बोला कि मनके समान इन शीघ्रगामी घोड़ों का शीघ्रता से पलायमान करो यह पाण्डका पुत्र राजा युधिष्ठिर शेत शोभायमान छत्र को धारण किये शोभापमान कर नियत है। २। हे सारथी वहां जल्दीसे मुझको पहुंचा कर मेरे बलको देख आ युद्ध में पाण्डव लोग मेरे भागे नियत होनेको समर्म नहीं while tbo Pandav warriors cried out 'Sray, stay' Your warriors, der feated by the Pandavas, rno away, leaving their sons, brothers, fatbers and grandfathers behind then 45 They ran away iu ther avilt cars, leaving ancies, [519Cers' sons and other kinsmen and thinking of their own safety alone."46. CHAPTER X. Banjaya said, Seeing the army defeated, Sbaiya said to the driver, “ Drive the horses fasta Yonder stands. Yudhishthir under 19 whitr Umbrella. Take me there at once and see my brength. The Pandavas till not be able to stand before me - - 6886) Nubbliarat (६८८६) बलम | समर्था हि मे पार्था स्थातुमय पुरो युधि ।३ ।। एवमुतस्तत प्रायान्मद्र राजस्। सारथिः। यत्र राजा सत्यसन्धी धर्मराजो युधिष्ठरः ॥ ४ ॥ अपतत्तक सष्ठसा पाण्डवानां महालम् । दधारको रण शल्यो घेलोक्तामधार्णधम् ॥ ५ ॥ पाण्डवाना वलीघस्तु शल्यमासाद्य मारिल । व्यतिष्ठन तदा युद्ध सिन्धानंग इवान लम् ॥ मजन्तु समरे दृष्टया युद्धाय विष्ठितम् । कुरव सन्यवन्त मृत्यु या नियतनम् ॥ ७ ॥ सयु राजनित्तषु व्यूढानीकेषु मागश । प्रायति महारोन. समाम शोणितोदा ॥८॥ समाच्छन्त्रिप्रसेनात नकुलो युद्धदुर्मद । । ती परस्पर भासाय चित्रकाकधारिणी । मेघाविष यथोट्टस दाक्षणोत्सरवर्षिणी ॥ १० ॥ शर तोय सिपिचतुस्ती परस्परगाहरे । नान्तरं तत्र पश्यामि पाण्डवस्येतरा पा उभी कृतानो पलिनी रपच -षिशारदो। परस्परषधे यत्ती छिद्रान्वेषणतत्परौः हैं । । । इस प्रकार के वचन को सुनकर वह राजा मद्रका सारथी वहाहीकोचला जहां कि मस्पसंकल्प धर्मराज राजा युधि हर था। ४। और वह पांडवों की सेना भी अकस्मात, पढ़ाई करनेवाली- हुई और अकेले शल्यनेही युद्ध में जन सबको ऐसे रोका जैने, कि उठेहुये समुद्रको मर्यादा रोकती है। ५। हे भेष्ठ तब | पायडबोंकी सेनाका समूह शल्यका पाकर युद्धमें ऐसे नियत हुआ जैसे कि पर्वत को पाकर समुद्रका बग नियत होताहै । ६ । फिर युद्ध के निमित्त युद्धभूमि में नियत राजामदको देखकर मृत्युको पीछे करके सब कौरव लौटे । ७। इराना वह भागकी हुई लोग उन अलंकृत सेनाओं के लौटने पर रुधिररूप जल रखनेवाला महा रौद्र युद्ध मारम्भ हुआ। ८ । युद्धमें दुर्मद नकुल ने पित्रसेनको सम्मुख पाया उन दोनो अपूर्व धनुपधारियोंने परस्पर सम्मुख होकर । ९ । युद्धौ पाणरूपी जलोंसे परस्पर एसे सींचा जसे कि दक्षिण और उत्तरसे उठेदुये वर्षाकरनेवाले दो वादल होतहैं ।१०वहां हमने पाण्डवों के अथवा अन्य लोगों के अन्तरको नहीं देखा वह दोनों मखम बलवान स्यचर्या में सावधान परस्पर मारने में उपाय करने पाले छिद्रोंके भन्वेषण में मवृत्तत्र । १२ । हे महाराज फिर चित्रसेन ने पीत O1 hearing this, the driver drove the car to the place where Yudhish. The Pandav army attached Shalya, but be checked it an the coast checks tho rising ocean. 5 The Pandav aimy resist d Shalya as a hill rostols tlie ocean. the king of Madra stend firmly in the field of buttlo, the hauray warriors came back without fear of life The divisions of the Panday the army met the returning warriors and produced a riger of blood Nakul was attacked by Chitrasen and the two warriors showered arrows over each other 10. Tho Kauravas and the Pandavas were mixed together. The two slultul rari108, clever in driving car, looked for enth ot 101'd delocta Chitra en cut down Nakal's bow, near the handle, with a - thir was. Then seeing Izko rain (१८८७) Terge S'inlyn Parne 16887। ॥ १२॥ चित्रमेनस्तु भरलेन पसेन निाशतेन च । नकुला महाराज मुछिदेशेषिक नबनु ॥ तन छिनघावान राम ने जिलाशितैः । निमि शरैरममा-नो ललाट समार्पयत् ॥ १५ ॥ हयावांस्य शोस्तीपणे प्रपयामास मृत्यय । नया ध्वज सारथिम्न विभित्रि भरपातयत् ॥ १५ ॥ स शत्रुमानिमुक्त लालस्य नाम शी । नकुल शुशुभे राजत्रिमग इय पर्वत ।। १६ । स छिन्नध-या विरथ खड्गमादाय यो छ। रथादवारद्वार शैलानादिध केशरी । पद्भ्यामापततस्तस्य शरवृष्टिं समाएजत् ॥ १७॥ नकुलोऽप्यनसत्ता ये धर्मणा मघुविक्रम । चित्रसेन रथ प्राप्य चित्रयोधी जितनम ॥१८मारोह महापार सर्व सैन्यस्य पश्यत ॥१९॥सकुण्डल समुफट मुनस स्वायतेक्षणम् चित्रसेनशिर कापादपाहरत् पाण्डष । अपपात रयापस्थे दिवाकर समप्रम ॥ २० ॥ चित्रसेन विशस्तन्तु इष्टुमा त महारया । साधुवादस्वनांचा वर्ण तीक्ष्णधार मलसे नकुलके षड धनुषको मूटके स्थानपर काटा।फिर भयसे उम्पन व्याकुलतासे रहित ने इसटूटे धनुपवाले को सुनहरी पुंख और तेजधार तीन वानों से ललाटपर घायल किया । १४ । और उसके घोडों को भी अपने तीक्ष्ण वाणों से कालवशाकिया इस प्रकार ध्वजा और सारथी कोभी 'तीन तीन पाणी से गिराया।१५राजा वह नकुल शत्रुको भुनासे छुटे ड्ये ललाटपर नियत तीनवाणों से तनि शिवरवाले पर्वत के समान शोभायमानदुमा । १६ । वह टूटे धनुप रयंस विहीन होकर बीर नकुल दान तलबारको लेकर रथ से ऐसे उतरा जैसे कि पर्वत के शिखर से कसरी सिंह उतरता है ।१७। तब उसने उम पदाती भानेवाले के ऊपर बाणों की वर्षाकरी उस सेज पराक्रमी नकुर ने भी पल के द्वारा उस वाणाष्टिं को निष्फल किया फिर अपूर्व शूरवीर पकारको जीतनेवाला महापा नकल चित्रसन के रथको पाकर सघ ..सेना के देखते हुये उसपर चढ़ा। १८ । बहानाकर उस नकुल ने धन्दरमुख दड नत्र कुण्डल और मुकुटधारी चित्र सेनके शिरको उसके शरीरसे जुदाकिया वह मूग्य के समान महातेजस्वी रथके बठने के स्थानपर गिरपडा । २० । फिर वहां महारथियों ने मारह चित्रसेन को sharp arpow or yellon colour, an I wounded him on the forehead tri with. three Sharp arrote fitted with gold fexthers, Ae sluv his horses and cut down the banner and driver with three arrow each 15. Wound ed by three arrows stand ng on 14 forebesd Nahul looked liko, three peaked mountain Depuived of luss bow and car, Nakul came dorvo from the car, with slield and swu d, as a lion comes down from a hil, Then he showered arows over Nakal and the latter bade them useless by his skill Thien Nakul approached the car of Chitra sen und mounted it He cut off Chilrasons head, adorned' with beautilul face, largo eyes ear rings and diadem and the latter's body fell down from his seat in the car 20 The brave warriors, seeing ३ . । 18 -- (G888) taliabharat १६८८८ सिंहनादाध पुपलान् ॥ २१ गिश मारमा कर्णपुत्री महारयो । मुपेण सत्यसेनश्च मुग्धती निशिताउरान ॥ २२ ॥ तमोयाषता पूर्ण पाण्डवं रचिना परो । जिघांसमो यथा नागव्य धो राजन् महावने । २३ ॥ तायवर्षता सामने बाप्येनं महारथम । शरोधान सम्यगस्यस्तो जीमनी सलिल यथा ॥ २४ ॥ स शरै सरतो विद प्रहरी र पार । अन्यत् क कमावाय रथमारहा वीर्यवान मातिष्ठत् रणे पोर. क्रुद्ध षातक ॥ २५ । तस्य ता मातग राजन शग शमत पर्वमि ।रय शिकलीक समायो विशाम्पते ॥ २६ ॥ तन प्रदर नकुलधाम चतुगे रहे । अयान निशिस्लोकी मस्थतना शामिन ॥ २७ ॥ तत् सन्धाय नाराच हकमपुख शिलाशितम् । अनुधिच्छेद राजेन्द्र सत्यसमस्य पाण्डव ॥ २८ ॥ श्रयान्य रथमायाय धनुरादाय चाणाम् । सरयसेन सुणश्च पाण्डव धापताम् ॥ २९ ॥ मविपसावममातो मात्र प्रतापपान । छाभ्यां पाहा देखकर धन्य धन्य शब्दोंसे मशंसा करी और बड़े सिंहनादोंको किया:२३ पुत्र मारियो सपेण और सत्यसन मरेहुये अपने भाई को देखकर नाना प्रकार के माणोंको छोड़ते । २३ । शीघही रथियोंप श्रेष्ठ पाण्डव नकुलको मारने के भभि- सपाहीकर ऐसे सम्मुख दीई नैसे कि महायनमें हाथी के मारने के आधेिलापी दोव्याम दौडते है। २३ । वा दोनों वाण समूहों को अच्छीरीति से छोड़ इस महारथी के ऊपर ऐसे वर्षा करनेवाले हुऐ जसे कि दो बादल जलकी वर्षा करते १२ साओरके पाण' प य और अस्प-त प्रमन्न पराक्रमी नकुल दूसरे पतुष | लेकर और रथपर चढ़ार क्रोधयुक्त कालके समान युद्ध में निपत हुआ। २६ । हे राजा उनदोनों भाइयों ने टेट पूर्व वाले बाणों से उसके रंयको खण्ड २ करना भारम्भ किया । २६ । उसके पीछे नकुलने हँसकर अपने तीक्ष्णवार चारपाणों से | सत्यसनके चारों घोड़ोंको मारा ! २७ । फिर धुनहरी पुंष साक्ष्ण धार नारानको धनुष पर चढ़ाकर सत्यसन के धनुषको भी काटा । २८ । इसके पीछे दूसरे रथमें सवारहोकर दूसरे धनुष को लेकर सत्यसन और सपेण नकुल के सम्मुख दौरे । २१ । हे महाराज भयजनित व्याकुलता से रहित मापदान नकुल ने युद्ध के Chutrasen dead, applnuded Nakul and roared like tons. Karan's sona, Sushen and Satyasen, seeing their brother Chitrasea dead, rushed on to slay Nabal like tro lions rushing against an elephant They Bhowered on bun their arrows like rain Wounded by arrots, bravo Nakul tuok up another bow and stund with it in the field of battle like Death in rage. 25 Tho two brothers began to break througla Tbon Makul, with a mile, elew the four lorses of Sutyagen with four arrows, and with another sbap UTTON cut his bow. Hidunt. another car, Satyaken and Bashen susked agajust Nalul, Free bis cal -ing शल्यपर्व Shalya Parv (6369) TERIA मम । ३० जण तत सा पाण्डवस्थ मनुष पसर गुदेव महारत ।। ३१ ।।अपाम्प्रवनुरादाय नकुलः क्रोधमूहितः । भोपामे केन विधि । ३२.॥ सत्यसमधनुस्तावापन मारिताविरमा 'तत अवशजनाः ॥ ३३ ॥ अथान्यमनुरादाय अनुमासामा औसादयामास, समताद पाहुनन्दनम् ॥ ३४ ॥ मधि बाबाराबार माह परवीरहा। सरपसेन सुषेण च प्राध्या शभ्यामविष्यत ॥ ३५३ सायन प्रत्यविध्येतो पृथं धमजिह्मगः । सारपिचास्य राजेन्द्र शितविषि भानु रे ।। सस्पसमोरपेशाम्तु मकुलस्प धनुस्ता पृषक रायो विछय तहत प्रतापमान ३७स रतिरचालित्रयशा परामृषत् । स्वर्णदण्यामकुण्टाम्रो सलधाता एनिमेलाम । ३८ ॥ लैलिदानामिष विभो मागकन्या महाविषाम् । समु पिसस्पसेनस्य संयुगे ॥ ३० ॥सा तस्य इयं संस्प धिमेद बाधा पुस्खपर दौमामोंसे उनदोनों को छेदा । ३० । इसके पछि क्रोपयुक्त महारथी सोये समने अपने चरमस नकुलके बड़े धनुपको काटा । ३१ । तर पछि कोपसे मूरिन नकुलने दूसरे धनुषको लेकर पांच धागोंसे मुषेणको छेदा एक मागसे पनाको काटा । १२ । और बड़े बेगसे युद्धमें सत्यसन के धनुप और मायाकोभी काटा इससलामोंने बहाउञ्चशब्दकिया । ३। इसकेपछि शव के मारनेवाले पारके साश्नाले दूसरे धनुप को लेकर भागों को वर्षाले उसने पापड सन्दन नकुलको सर औरसे आच्छादित करदिया 11 | शत्रुओंके मारने बारे नकुलने उन पापोंको इटाकर सत्यसेन और सुपेणको दो २ बानीसे छेदी ॥३५॥ हे राजा उन दोनों ने भी अपने जुदै २ वाणों से उसको छेदा और उसके सारपीको साणवाणोसे घायलकिया।३६। फिर तलाधवी प्रतापवान सत्यसन ने नकुलके धनुष और रयके ईशादण्ट को पृथक २ वाणोंसे काटा १५७ उस रथ पर नियत मातरंटी ने सुनहरीदण्ड स्वच्छधार तेलसे मनोहुई पड़ी निर्मक स्य शक्ति जो कि अठोंको चाटनेवाली बड़ी पैलीनागकन्या के समानथी उसको उठाकर युद्ध में सत्यसेनके ऊपर छोड़ा । २२ । हेराजा उस शक्तिने युद्ध सत्यसन के के सीखएड करीदये तमवह अचेत और निर्मावहोकर रथसे पृथ्वीपर गिर from anxiety of fear, Nakul piereed tbers with tyro arropa 30. Then Susbød, with a sme cat Nakul's box, Ingerrible with anger, Nakul took tp another bow and pierced Sulçn with five arrows. He cut also Satyasen's banner, handguard and bow. The people cried in dramay, Botook up Apothor bord bow and covered Nahul with arruss Nakul checked their arrows and pierced thep, with two. They too, pierced hund and his driver with their sharp artDW8,36, Satyasen cut down the box and yoke of Nakul. Nakul hurled at Satyasen a sharp, clean and.welloiledepasrlikon poisonosanake.The arrear broke Satyasen's heart into (6890) Mahabharat नृप । पपात रथाद्र गतसत्त्वाल्पचेतनः ॥ ४० ॥ भ्रातरं निहतं दृष्ट्या सुषेण: ki ritiनिक . C . . 2 स्नु ततः कुदः पाण्डवं विशिखामभिः । मुतसामच पित्या पाया। 4. यत् ॥ ४५ ॥ ततः कुरो महागज नकलः परधीही शरस्तस्य दिशा सादय! मास वेगवान् । ४६ ॥ ततो गृहीत्या तापमानमर्द्धचन्द्र सुतेजनम् । स धेगयुक्त विक्षेप कर्णपुत्रस्प संयुगे ॥ ४ ॥ तस्य तेन शिर कापाबहार नपसत्ता पश्येता संप सन्य नां तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४८ ॥ संहतः प्रापतदाजनकुलंग महात्मना नदीधेगा 'दिवारुंगनालीरजः पादपों महान् ॥ ४ ॥ कर्णपुत्रवधं दृष्ट्या नकुतस्य च विक्राम। पड़ा। ४ । क्रोपस मुच्चामान सपेण अपने इस भाईको भी सराहा देखकर ताक्षणबाणों से पदाती नकुलपरवपी करनेलगा। ४१ । फिरयुदमें पिताको चाहता rमा मुतसोम उसके पासगया इसके पीछे. भरतर्षभं नकुल मतसोम के यार सवार होकर । ४२ । ऐसे शोभायमान हुभा जैसे कि पर्वत पर नियत केसरी सिंहहोता है उमने दूसरे धनुपको लेकर सुपेणसे अच्छा युद्धकिया। उन दोनों पड़े महारथियों ने परस्पर सम्मुख होकर बाणों की वर्षा से परस्पर मारने में उपाय किये।, ४४ । इसके पाछे कापयुक्त सुपेण ने पाण्डवको और सुतसोम को तीन तीन बाणों से उसकी छाती और भुजामों पा पागल हो । ४६ । इसकेका शत्रुता क्रोधयुक्त वेगवान नकुलने वाणोंसे उसकी दिशामाको इकादयान सके पाछे सीक्षण नोक सुन्दर वेतवाले 'वेगवान अर्द्धचन्द्र नाम नागको लेकर पुदमें कर्णपुत्रपरफै।५८हे राजाओमधेष्ठ सब सेनाके लोगों के देखते उसे वाणई से उम के शिरको काटहाला यह आश्र्चपमा हुआ।४८फिर उस मागमा नमुल हायो माराहुमा वदवार ऐसे गिरपड़ा जैसे कि बड़ा भारी नदी के तटको क्ष नदीके येगसे गिर पड़ना । ४९ । हे.भरतर्षभ भापकी सेना कणके पुत्रों मरण .auntireti parts and he toll down senseless from this CIT.:10. Earaged Saxlien showered arrows over Nakul,' Sutorin kent to his ineler Nakul and took hinn upon his car. Mounting his son's car, Nakui Imkerd glorious liko n lion standing on a hill. He took up' núhthoe lou and fought with Sushen. Buith the carriors' tried tónlny "ACT other with their arrort. Then Sushon trouuided Nilul and his so with three arrows each on tho arms and thresht: 43:"Nakalavired hiin rithairmws and discharged at him a criment ahaprd. irror and svīt's it cut off his had to the amazinant of all. Sirockby. Matuled Arrowe, fushen foll dorn like a riseraidé trco aprisililig có fuccor Bon --- - -- 79999 Shalya Perny (10891 प्रदान भपात सेना तावकी भरतर्षभ ।। ५० ! सातु सेना महाराज, मद्रराजःप्रताप यान । पालय शार. सेनापतिररिदम ॥ ११ अभीस्तस्यो महाराज पवस्थाप्य वाहिनीम सिंहनादं भृश परया धनुः शाप दारुणम् ॥ १२ ॥ तावका सार राजन रक्षिता धम्पना प्रत्युद्ययररातीस्ने समस्तादिगतापया.५३ ।। मराज मोपात परिपार्य समन्तत: स्थिता राजन मारमानो पोदकामाः समन्ततः।।५।। सात्यकिभीमसेनश्च मानीपुत्रौ च पाण्डपो । युधिष्ठिरं पुरकरय ईमिपप्रभारदानम् ६ ५५ परिवार्य रजे मारा सिंहनाद प्रचफ्रिो माणशदरवायोगान का विविध मुद्यः ॥५६॥ तर तायन: संयं महाधिपतिमअसा । परिवार मुसंar पुनयुद्धमरावयन् ॥ ५७ ॥ तत. ते युध भी मपयर्यगम् । तापकानां परेवा मृत्य कृत्या निधनम् ॥ ५८ ॥ यथा देवासुर युचं पूर्घमासीविशाम्पते । मभीताना को भार नकुलके पगमको देखकर भयभीतहोकर भागी । ५० । वस समय शत्रुओके विनय करनेवाले प्रतापवान् शूरसेनापति, राजामने युद्ध में उस सेनाको रक्षित किया । ५१ ! और आप उस सेनाको नियत करके धनुपके भवानक शब्द और बड़े सिंहनादको करके निर्भप होकर गियर्त हुया । ५२ । हे राजा पुद्धमें हद धनप्रधारी से रक्षित मार पाड़ासे.रहित वह सबलोग शत्रुओं के सम्मुख गये ॥३॥ और युद्धाभिलाषी बडे माहसी वीर अंस पड़े धनुपपारी राजाको पारोभोरसे मध्यवर्ती करके रंगके चारों और नियत हुये। ५४ । सात्यकि पाण्डव भीमसेन नकुल और सहदेव उन सवारों ने सजावान शत्रु मा के ' विजय किरनेवाले युधि तिरको रंगकरके ५६ गार चारों ओरसे अपना मध्यवर्ती करके सिंहान दकिये और वारम्बार वाणी के उग्र शब्द और नानाकार के सिंहनादों को किया । ६६ । इसीफार त्यस कोपयुक्त प्रापके शूरवीरों ने बड़े वेगसे रामा मद्र को अपना मध्यवर्ती करके फिर युद्ध करना सीकार किया १५५ । इसके मनन्तर मृत्यु को पीछे करके आपके शरीर और प्रतिपक्षियों के वह युद्ध जारीहुपे नोकि पभातों के भपके बहानेवाले थे। ५८ हे राजा जैसे कि पूर्ण समयमें देवासुर water. Seeing the death of Karan's aons and Nakul's prowess, your' army disperssb surterror. 50 Glorious Shalya, the destroyer of foes and commander of armies, protected the armies Having coufosted the warriord, the stood making e dreadlt ul Doise with his bows utterms leonino rosra. Pretected by buin tho warriors opposed the eneny. They cawe round the great archar prin and protected him on all aides SaryakarBha, Nakul, sshadev and othere, led by Yudhishthur and desirous of conquering, joared like lions all round their leaderThey twadged their shows and roarod. 50. In the same inanner, your Warriors canjo jound tbe kiog of Madra and again prepared to fight Your warriors, fearless of their lives, and the Pandavas fought a (6892) Nahahharnt तथा राजन यगराष्ट्रवियर्वमा ॥ ५९ ॥ ततः कपिलमो. राजन हत्या संस्काने मध्यभाषत ता. सेना कौरपी पाण्डुनन्दन ।। ६० .तच पापडशाः स धामापुरो ममा अभ्यधावन्त ता सेना विस्जन्तः शिताराम ॥ ६ ॥ पासवेरकोजा सम्मोहः समायतन ध जारनीकानि दिशो विशिलपा : १२ मापून माणा निशितः शो: पाषचोदितः विधीय, विद्धता कार्यमाना समन्वत ॥६३ ॥ कौरव्यवध्य अमः पाण्डुपुर्वमहारयः तव पारखी सेनाः शरे राजस तारणहन्यत पुत्रने शतशोध सहस्रशः ।। १५ । सेन. मशासात माने परस्परम पाले समपपती वर्णमु सरिताविष ।। ६५ मारिश तलवार कानांमदअयम् । पाण्डवानाच रामेन्द्र तथाभूते महाहवे ॥ १६ ॥ इति शल्पपणि शल्यवधपर्वणि संकुलपूदे दशमोध्याया। नाम संग्राम हुमा या उसी प्रकार इन निर्भय योगों के पद परामरे देश बहानेकाले हु। ५९ । हे राजा इसके पीछ वानर, नाभरी अनन्य बन युद्ध में. संसानों को मारकर उस कारवीय सेनाके सम्मुख ग 1 सीमकार सब पांडक जिनमें अग्रगामी पम्नया मोंको को गेराम सेना सम्मुखापे । ६. 1 पाहनों से घिरहुये उन लोगोंका ऐसा कहा मोर उपस पा. सेना ने दिशा और विदिशामों को नहीं परिचानापाखों से पायमान धार बाणोंसे पूर्ण बहुत मृत, भूरोपामी मावि परोप से पलापमान । ६३ । वह कोरवीयसेना महारषी पांगों के पाप से माई रामा भीमकार मापके पुत्रों के बाणों से पालाकी मी मरों से धुर में, चारों भार से मारीगई ।१४। पर दोनों सेना प्रपs an होकर ऐसी पाकुल हुई. जसे कि दो नदिया पाती ६५ ॥ रामेन्द्र इसके पीछे उस प्रकार के पड़े पदमें आपके पुत्र और पैसों का भए तत्पन्न हुमा ६५॥ lattlo wlich cured tortor to the timid. Their fightips, like that of godi and brunt, avullad thu populations of tho region of Xaro. Art bannored Arjnn, having slain the Sanuptake oppened. Who kn, Army. 60. Tho Pandayan, led by Dhrishtadyurn, came on dimburg. ing their aroxs burropodal ly cho Panderne, met wie manier som forsad and coull nut distinguish the directious. The Koome my. wadratroyed by the artuks of the Pandara, and the latter war s'ain by tlo krok of your w Much wounded and diniy teed, kilang armirememagitated like tworiternesturing for amous Tara utlo Pauntarie*GC.
शल्यप, Shalya Paray (1993) सञ्जय उवाच । तस्मिन् विलुलि ते परस्परम । पाप यांधेषु निनवास च दान्त ॥ १॥ फूजता स्तमता पदा: महाघ । पिटुपु म्हा राज हयेषु बहुधा तदा ॥ २४ प्रक्षये दारुणे जाते सहारे सर्पदनाम । नानाशस्त्रस मात्राये पतिपितापद्विगे ॥३॥हणे यु इसापडान भीरूणां मयने । गाहमा मेषु पोधेषु परस्परयधषिपु । ४ ॥ .म.दागे मह घोरे वर्तमाने दुरोदरे । संग्रामे घोररूपेतु यमराष्ट्रविवर्द्धने ५१ पाण्डया स्तावक संन्यं व्यधमन्त शितः शतिष साबका योधा जनुः पाण्डवसैनिकान् ॥ ६। तारमतथा पत्तमाने युद्ध भारमयावह पूर्वान्हे वैध संग्राम भास्करो दयन प्रति ॥७१ लब्धलक्ष्याः परे राजप्रक्षिनाश महात्मना । अयोध य स्तय पलं मृत्यु कृत्या निवर्तनम् ॥ ८ घलिमिः पांडत न्धलक्ष्यः प्रहारिभिः कौरव्यसौदत् पृतना मृमीच ग्नि समाफुला ॥९॥ ता पृष्ट्या अध्याय ११ । संजय चोले कि उससमय परस्पर युद्ध करनेवाली वह दोनों सेना शूरवीरों के भागने हार्थिया के विधान पुकारने गर्जन पदाति योंके भागने बहुत प्रकार से घोड़ोंके भागने सब जीवोंके भयकारी घरे नाशके वर्तमान होने । ४ । और युद्ध में मतवाले पुरुषों के प्रसन्न करनेवाले भयभीतोंके भय बढ़ानेवाले ग्य और हाथियों से युक्त नानाप्रकार के भिड़ने परस्पा मारनेके अभिलापी शूरवीरों के सेना में प्रवेश करने और बड़े घोर जीव नाशरूपा द्यूतके होनेपर पाण्डवोंने यम राजके देशके बढ़ानेवाले घोररूप युद्ध में तीक्ष्ण वाणों से आपकी सेना को छिन्न मिन्न करदिया उसीमकार आपके वारोंनेभी पांडवोंकी सेनाके लोगों को मारा। भयभीतों के भपके उत्पन्न करनेवाले उस युद्धके जारीहोने पर मूर्योदय के पीछे दिनके प्रथमभाग के वर्तनान होनेपर महात्मा से रक्षित लक्ष्यभेदन करनेवाले प्रतिपक्षी मृत्युको पीछ करके प्रापकी सेना से युद्ध करनेलगे। ८ । उन बलवान अहंकारी लक्ष्यभेदी और महार करनेवाले पाए डवों से कौरवीयसेना ऐसे पाहामान हुई जैसे कि अग्निसे ब्याकुल मृगी। ९। और जैसे कि निर्षल गौ कीच में फंशी CHAPTER XI Sanjaya said," Bohli, the armiey came together. There was a great noise of the warriors running away: the shrieks of elephants, the ci jes of foot soldiers, the stampede of hors;s and the droadful destruction pleasing to the brave and terrilying the timid. The armies of elephants and horses met in battle; destruction of life was dreadful and the Pandavns routed your army with their arrows Your warriors too, destroyed the Pandar army. s. When the battle, torrifying to the timed, was going on in the first part of the day, the archiers of the opposite party fought with your army. The powerful orchers of the Pandavas wounded your warriors and terrified them like deer in a burning forest. Secing them : - ( 6894) M thablarat (६८९४) सीदती सेना पके गाभिय दुर्वलाम् । जज्जिहीर्षुस्तदा शल्यः प्रायात् पाण्डुचमू प्रति ॥ १० ॥ मद्राराजस्तु संकुद्धा गृहीत्वा धनरुत्तमम् । सभ्यद्रयत् संग्राम पांडपानांतता पिनः ॥ ११ ॥ पाण्डयापि महाराज समरे जितकाशिनः । मद्रराज समासाद्य विध्यधु निशितैः शरैः ॥ १२ ॥ तत शाशसीवणर्मद्रराजो महायल.' । अईयाभास ता सेना धर्मराजस्य पश्यतः ॥ १३ ॥ प्रादुगसम्मतो राजन्ननिमित्तान्यनेकशः। चचाल शद कुर्याणा मही चापि सपर्वता ॥ १५ ॥ सदण्डालदीतामा दीर्यमाणाः समन्तत । उल्का भूमि दिवः पंतुराहत्य रविमण्डलम् ॥ १५ ॥ मृगाश्च पाश्चापि पक्षिणा विशाम्पते । अपसव्यं तदा चः सनी ने पाशो नृा ॥ १६ ॥ भगुलाधरापुत्री शशि जेन समन्धिता। घर पाण्ड पुत्राणां पुरस्तात् सर्वभुजाम् ॥ १७ ॥ शनावम बज्ज्याला नेत्राण्याहत्य पनी शिरः स्लीयन भृशं कालालकाश्च केतुपु ।। १८ ॥ पीड़ित होती है ता उम प्रकार से पीड़ागान सेनाको देखकर उनके छुटाने का। अभिलापी राना- शल्प पाण्डवीय सेनाके सम्मुख गया । १० । अर्थात् अत्यन्त काधयुक्त राजामद उत्तम धनुपको लेकर युद्ध मारनेका अभिलापी होकर पायो । | के मम्मुवा गया। १ । हे महाराज युद्धमे विजयी शोभायमान पांडवोंने भी राजा मद्रको पाकर तीक्ष्णधारवाले वाणोंमे घ यल किया । १२ । इसके पीछे पड़े पराक्रमी राना मद्रने सैकड़ों वाणों से उस सेनाको धर्मराजके देग्यतेहये पीड़ामान किया । १३ । हेरामा इम के अनन्तर बहुतमे अशुभ लक्षणों के चिन्ह प्रवदह और पर्वतों समेत शब्द करनेवाली पृथ्वी भी कम्पायमान हुई। १४ । चारोंऔर से फटनेवाली दण्ड भोर शूल रखनेवाली प्रकाशित उल्का सूर्यमण्डल को भेद कर स्वर्गसे पृथ्वीपर गिरी । १५ । हेरामा बहुधा मृग भैंसे और पतियोंने . भी मापकी सेनाको दक्षिण किया । १६ । शुक्र और मंगल बुधसे संयुक्तहुगे यह शकुन पांडवों के पीछे और अन्य सब राजाभाकं मागेहुय भौर नेत्रोंको घायन | करके वरसनेवाली याला शत्रों की नोकोंपर भकटहुई और का उलुक धना और शिरों पर बैठगये । १८ । उमकेपीछे सेनाके समूहों में घूमनेवालोंको महाउन lihc a pruek cow sluch in mud tho hmy of Madrn, desirous of rescuing his meu, laced the Pnndar as. -10., II0 oppscel them with his buw. TIU Pandav warriors too, wounded hrum Glorious king of Mndra wound. ed the Prudny warriors in the presenes or ludiislithir, Thero were many bad omous and this carti with her mountains shook. Bright mr teurs f-ildarnun oarth from tiro sky. 15. Deer, buffiloos and birds circled round your army. Shura approached the planots Langal and Budh. Theso onmens appeared behinil the Pandavra ani bluro other king. Tao firo aparks, dazzling tho cyc, pranul,nt the prints of the treaproua, crows and on's atos or lliu bun irt. Then there are aleyere battle lytsevia tho syo armis T... Kra, 11 with their -- [६८९५) शत्यप Shalya Prv (6895) ततप्ताद्धमत्युप्रमभवत् संघचरणाम् ॥ १९ ॥ तत सापयनीकानि सन्निपत्र जनाधिप । अध्ययु कारया राजन् पाण्डवानामनीकिनीम ॥ २० ॥ शलास्तु शरवण घर्षन्निय सहमहक । अध्ययपददीनामा कुन्तीपुर युधिष्ठिरम् ।। २१ ॥ भीमसेन शरे श्वापि सामपुखे शिलाशित । द्रौपदेयास्तथा सन माद्रीपुत्री च पाण्डवी २२॥ पृष्टद्युम्नच शनय शिखण्डिनमथापि च । एकैक दशभिणिर्विघ्याध च महाधल ॥ २३ ॥ ततोऽसृजद्वाण धर्मान्ते मघानिय ॥ २४ ॥ तत प्रभरका राजन् सोम काश्च सहवश । पतिता पात्यमानाश्च दृश्यन्त शल्यसाय ॥ २५ ॥ भ्रमराणामिय' वाता शलभानामिव ब्रता. । हादिन्य इव मेघेश्य शल्यस्य व्यपतन शरा ॥ २६ ॥ द्विरदा तुरगाश्चाती पत्तये रधिनातथा त्यस्य पाणर्यपतन ध्यभ्रमन् प्यनद । स्तथा ॥ २७ ॥ माविष्ट इय मन्युना मदेशां गौरुषेण च । प्राच्छादयदरीन सरपे काल एष्ट धारक । चिनईमानो मद्रेशो मघवादो महावल ॥२८॥ सा पध्यमाना शत्येन युदहुभा । १९ । इसोपीछे कौस सब सेनाओंपर चढ़ाई करनेवाले होकर पांडवों की सेना के सम्मुख गरे । २० । फिर प्रसन्नचिच शल्य वाणोंकी वर्षाकरता कुन्ती केपुत्र युधिष्ठिरपर वर्षा करने लगा । २१ । बड़े पराक्रमी ने सुनहरी पुषवाळे और तीक्ष्णधारखाले दश २ वाणों से भीमसेन और सब द्रुपदके पुनों समेत नकुछ सहदेव धृष्टद्युम्न सान्यात और शिखण्डी को भी घायल किया '१२३ । इसके पीछे ऐमी वाणोंकी वर्षाकरी जैसे कि वी मृतु में इन्द्र करता है । २४ । हेराज 'इसके पीछे हजारों सोमक और प्रभद्रक न म क्षत्री शल्यके धाणों से गिरतेहुये एसे दिखाईपड़े जैसे कि भौरोंके झुड और टीदियों के समूह दोलते हैं और जैसे किवादलों से बिजली गिरती है उसी मकार शल्यके वाण गिरे । २६ । हाथी घोड़े पति ग्थी यह सब पीडामान शल्यके वाणों से महाच्याकुल घूमते और शब्दों को करते गिरपड़े । ०७१ राजामद क्रोध और शूरता में पूर्ण होकर कालमृष्टि में अन्तके समान गजने वादल के समान शब्दायमान बड़े वलयान राजा मद्ने युद्ध में शत्रुओं को भच्छीरीतिसे प्रान्छादितकिया शल्यके हाथमे घायल पाण्डीय सेना arinies opposed the Pandavas 20 Thon Slnya shon ered his arrows' over Yudhishtur He wounded Bhusm, the sons of Dupnd. Nakul Sahadev, Dhrushtndynan, Satyaki and Shikhandi with his gold-le ked arroirs were sun falling duin by Shalya's arrons like lights of locusts or lightning Eleplants, horses foot and car wan jora fiili do in shriek ing, wounded ly Shalya's arrows. The bruse ling of Madra, 1ming like thurder covered the foes with his arrows. Wounded by Shalya, the Pandav arny ran to Yudhishthir Then braya Shalya, havingr destroyed your army with his arrore, wounded Then thousands of Sonak, and Piabl drabs (6896) Mihal fiarnt (६८९६) पाण्डानामनीकनी । अजातशत्रु कौन्तेय मध्यावधिधिरम् ॥ ३९ ॥ तां समर्थ तत सरय रघुपस्त शित गरे । शरयर्पण महता युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ ३० ॥ समाप ता। पत्य कुरो राजा युधिष्ठिर । अगारयच्छरैम्तीमत्त द्विमिवांकुशे । ३१ ॥ तस्य शल्य शर घोर मुमोचासीविषोपमम् । स निर्मित महात्मान बेगेन म्यतच्च गाम् ॥ ३२ ॥ ततो तृकोदर कुछ शरय वि०॥ध समि । पञ्चभि सहदेषस्तु नकुलो दशमि शरै ॥ ३३ ॥ द्रौपदेगाध शत्रुघ्न शरमातापनि शरे । मध्यवर्षम हावेग मघा इव महीधरम् । ३४ ॥ ततो रष्ट्या तुद्यमान शन्य पाय समन्तत । कृत पर्मा कृपधैव सकुशाषभ्यधावसाम् ॥३० । उकश्च महावीर्य शानियापि सौषल । स्मयमानस्तु शगकरश्वत्थामा महारथ 1 तय पुत्राध कारी येन जुगुपु शल्यमाहेष ॥ ३६॥ भीमसेग त्रिमिर्षिवा कृषी शिलीमुग्वे । वाणघर्षण मरता कपमधार कुन्तीके पुत्र अजातशत्र प्रधिष्ठिर की मार दोही। २९ । इसस पछि यडे पराक्रमी झाल्य ने तीक्ष्णवाणों से उस सेनाको युद्धमें मईन करके वही वाणों की बर्षा से युधिष्ठिर को पीडामान किया । क्राषयुक्त राजा युधिष्ठिरने पति और घोडों समेत उप्स मातहये शन्यको तीक्ष्णवाणों से ऐसे रोका जैसे कि अकुशों से मतवाले हाथीको रोकते हैं । ३१ । शल्यने विषैले सर्पके ममान घोरवाण उसके ऊपर छोडा वह वाण महात्मा युधिष्ठिरको छेदकर बड़ी तीव्रता से पृथ्वीपर गिरा । ३२ । इसके पीछे क्रोधयुक्त भीमसेन ने शल्यको सात वाणों से घायल किया सहदेव ने पांचसे और नकुलन दशवाणोंसे घायल किया। २३ । और द्रौपदीके पुत्र उस शत्रुओं के मारनवाले शल्य पर वाणों की ऐसी बपी करनेलने जैसे कि बादल पर्वत पर करते है । ३४ । इस के पछि चारोंओर को पांडवों के हायसे पीड़ामान माल्यको देखकर अत्यन्त क्रोधयुक्त कृतवर्मा और कृपाचार्य सम्मुख दोडे । १५ । और पहा पराक्रमी उलूक और सौवलका पुत्र शकुनी या रूप सम्मुखगये । फिर युद्ध में महावली अश्वत्थामा भौर भापके सब पुत्रों ने धरिपने से मिलकर शल्पकी रक्षाकरी। ३६ । कृतवर्मा ने शिली मुख नाम तीनवाणों से as Yudhathur 30 Yudhiskthit, checked the advance of Shalya an elephant is checked with goads Salya discharged at him an arrow like a poisonous serpent, which pierced him and fell down ou the ground Bhim then wounded Shalya with soyon arrows. Sahadev and Nakul wounded him with firo and ten urowe respectivoiy. The sons of Draupadi slovered thetr arrows on Shalya like raio 8.6 ing Shalyo wounded by the Pendaras from all sidoe KritParma and Krpacharya rushed to help him. BrareUlak and Sliabunt the.son af.
16897 । [६८९७) Jeug: Ghalya Patav पते ३७ छपः दुयो पाणषरताडपत् । द्रौपदेयांश्च शकुनियमी व बोनिरस्यात् ॥ ३८ ॥ दुर्योधनो युघभिष्ठ आह केशवार्जुनौ । समस्ययातूप्रतेजाः हरेमानली ॥३९॥ शतान्यासंग्रवदीयानां परैः सह । घोररूपाणि वित्रालि तरतत्र विशाम्पते ird॥ ऋष्पवणान् जघानाम्यान मोजो भीमस्य संयुगे। सोक्ती स्वापरयासताका पादुनन्दनः । कालो दण्डमिवोधम्य गदापाणिग्युध्यत ॥४१॥प्रमुखें सहदेवस्य जधानावांव मद्रराट् । ततः शनस्य सनयं सादेयोऽसि नावधीत् ॥ ४२ ॥ गीतमः पुनराचार्यों धृष्टद्युम्नमयोधयत् । असम्भ्रान्तमसम्मान्तो पलवान यत्नवसरम ४३॥ श्रौपदेयास्तथा धीराने दशभिः शरैः । मषिध्यदा पापमुतीमातिमः स्मर्षिक ४४ ॥ पुनश्च भीमकाय अघानाश्यांस्तथा । सोक्तार्य रयानणे हतायः पाण्डुनन्दनः ॥ ४५ ॥ कालो दण्डमियोधम्य गदां कुरो भीमसेन को छेदकर बड़ी बाणों की दृष्टिसे से उस मोधरूपको रोका । ३७ ॥ इसके पीछे क्रोधयुक्तने वाणोंकी बीस धृष्टद्युम्न को पीडामान किया शकुनी द्रौपदी के पुत्रोंके और अवस्थामा नकुल और सहदेव के सम्मुख गया । १८॥ गुख कामों में श्रेष्ठ यदा तेजस्वी पराक्रमी दुर्योधन पद्धये अर्जुन और केशव जीके सम्मुस गया और बाणों सेभी घायल किया । ३९ । राजा इसमकार महां नहाँ भापके गूरवीरों के सैकड़ों पन्द्वयुद्ध शत्रुओं के साथ महा घोररूप और अपूर्णहुपे । ४० । भौजवंशी कनवर्मा ने युद्धमें भीमसेनके रीछ पर्ण छड़ों को मारा मृतक घोड़ेशले उस पांडुननन्दन भीमसेनने स्थकी बैठकसे उतरकर काल दडो समान हायमें गदाको लकर युद्धकिया । ४१ । राजाम ने सादवके सम्मुख म घोडाको माफिर सहदेवने शल्यके पुत्रको खड्गसे मारा । १२ । और कृपाचार्य धृपयुम्न से युद्ध करनेलगे भयजनित व्याकुलता से रहित उपाय करनेवाले प्राचार्य के पुत्र गुरूजी उस भ्राता से रहित उपाय करनेवाले पृष्टद्युम्न से अच्छेप्रकार से सह न्यून क्रोषयुक्त अश्वत्थामाने मन्द मुसकान के साथ द्रौपदी के प्रत्येक शूरवीर पुत्र को दश दश वाणों से घायल किया । ४४ । इसके पाछे भीमसेन के घोड़ी को मारा मृतक घोदेयाले यहे पराक्रमी उस पायदुनन्दन Saral faced by Putuluvas. Then Ashwathatna and your song guard Kritya"ma piorced Bhim with throa arrows and then checked fit with many moro. Ho wounded Dhrishtadyumn to Shakani opposod the sons of Kunti and Ashrathamn opposu Nakul and Sabador. Glorious Durgadhan ficou Arjun and Keeliav and wounded them with Atrotua. Tlius your warriors fought mody duels witb tho l'andatas, 40. Kritvarmi slev Bliru's borse down from his car and lought with his maco which tes like tho staff of Yam. The king of Aadra then slon Sahadora's bones and tho latter slew Shalya's son with his sword. Kripacharyo fought with Dhrialtrdgumn. The Lsso great warrior fought well. Thos Ashtra od Sbalya Bluo gat -- (6898) Maliabharat महाबल धामास तुगाव रयन वृतपर्मण ! नवर्ग त्वयनुत्य स्थायद प्रात् ।। ४६ ॥ शल्योपि राजन् मद्धो निघ्नन् सोमपाण्डवान् । पुनरेष शित धोर्णयोधीपरमपीडपत् ॥ ४७ ॥ तस्य भीमो रणे फल सदष्टदशनच्छद । विनाशा याभिसन्धाय गदामादत्तार्यवान् ॥४८॥ यमदण्डप्रकिाशा कालरात्रिमिघोधनाम । गजयाजिमनुष्याणा प्राप्पानराकरणीमति ॥ ४९ ॥ हेमपट्टपरिक्षप्तामुलका प्रज्वलिता पियशश्यां व्यालीसिपात्युग्रा पाल्यायोमधीम् ॥ ५० । चन्दनागुरुपदाता प्रम दामसिनामिव । यसामेदोनदिग्धाङ्गी जिहवा वैषस्थतीमिय।। ५१ ॥ पटुघण्टारच धती पासतीमशनीमिघ । निर्मुकासीविषाकारा पृत गजपदैरपि ॥ ५२ ॥ त्रासनी रिपुस-याना से यपरिपर्पणीम् । मनुष्यलोके विख्याता गिरिशृङ्गविदारणीम् ॥ १३ ॥ भीममेनने शीघही रथप्ते उतरकर कालदण्ड के समान गदा को उठाकर कृत 'वर्मा के रथ और घोडों को चूर्ण फिया कृतवर्माभी उस रथ से कूदकर हटगा { ४६ । इराना फिर सोपक और पाटयों को मारते अत्यन्त क्रोधयुक्त शल्यने भी ण वाणों से युधिष्ठिर को फिर पीडामान किया । ४७ । क्रोधयुक्त दांतोंको पीसकर पराक्रमी भीमसेन ने युद्धमे उसके नाश के निमित्त प्रकाश देखकर गदाको दिया । ४८। जो कि यमराजके दण्डरूप कालरात्रि के समान ऊची हाथी घोडे और मनुष्यों के प्राणों की नाश करनेवाला सुबर्ण के बखोंसे मढीहुई मलित उरकाके समान शैश्यमें रहनेवाली सर्पिणी के समान घडी उन या सपान १५० । लोहगयी चन्दन और अगरसे लिप्त स्वेच्छाचारी तरुण स्त्रीके समान वमा रापरसे लिप्स अग वेवसती देवी की जियाके समान । ५१.) मैकडों सुंदर घण्टों के समान शब्दापमान इन्द्र वन के समान कांचनी से छुने विपघर सर्पकी समान हाधीक मदों से सम्बन्ध रखनेवाली । ५ । शव ओं की सेनामाका भयगीत करनेवाली अपनी सेनाओंकी प्रसन्न करनेवाली निलोको ख्यात पर्वतोंके शिखरोंची तोडनेवाळीथी । ५३ । जैसे कि बलवान thuun waniled D cupuis 50/1S li ith ten arrows esh and thent slew Bhu's hot of Bhim tho con of Pandu got dorn from his cars and puthi husi1900 siungho i tiie ca: nud l101 es ot Asltwathama Krit run jumped dlori from his car 46 Thon slag in the Sianis and Pandavas, o iragu Sialy 17,410 vo roded Yudhishthir will bigarrous Brave Bhun gnashia hi teuth 1 auber tool frp 2119 maou like the a oft of i am on the night of Deuth slayer of elephants horses abilinen, ricrel with gold cbth bright 11h€ aparl of fire, made in Shakya dreadſtil 'ake a sinks ir suri, mudo 11011, de-ked with kindal pa itu and nutie, gnlf willed like a roung woman like the tongue of Varvaswath stained in blood and fat ringing with beautiful bellé, toho Fajra or likai a gante freed from its shin and dispuller of the madness of olephants M शल्यपर्व Shalya :Parv 16899) यथा के लासमबने महेश्वरसखं चली । आधयामास कौन्तेयः सिद्धमलेकाधिगम् । ५४ । यथा माया मयान् हप्तान महन् गन्धमादने । जघान् गुहाकान् कुखोमन्द गर्य महायलः । पार्यमाणोपि बहुभिद्रौपद्याः प्रियमस्थित. ॥ ५५ ॥ त पन्नगणि रत्नाद्यामधानि वनगौरवाम् । समुदभ्य महाबाहुः शल्यमभ्यद्रवद्रणे ॥५६॥ गया युद्धकुशलतया दारुणनादया । पोधयामास शल्यस्य चतुरीश्वान्महाजयान्। ५॥ततः शल्यो रंगे शुद्ध पाने पक्षसि तोमरम् । निवखान नदन धीरो मर्म मित्व स्य सोश्य गास..५८ कोदारपसम्भ्रान्तस्तमेवोद्धत्य तोमरम् । यन्तारं यदराजस्या निर्विभेद ततो हिदि ।। ५९ ॥ स भिन्नमा रुधिरं वमन् वित्रस्तमानसः । पपाताभिमुखो दानो मद्ररा. जस्त्वपकिमत् । ६॥शतप्रतिकृतं दृष्ट्या शल्पो घिस्मितमानस । गदामाथित्य धारात्मा भीमसेन ने के उश भवन में शिवजीके मित्र अत्यन्त क्रोधयुक्त कुवेरजी क बुलाया। ५४ । भौर मन्दिरके लिये मायारूप अहंकारी बहुत से गुह्यकों को गंध 'मादन पर्वतपर मारा बहुत से रुके हुये और द्रौपदी के हितमें नियत होकर भीमसेन ने ऐसा पराक्रम किया। ५५। वह महाबाहु यजमाण और रत्नोंसे नदिन.अष्ट कोण रखनेवाली बजके समान महाभारी उसगदाको उठाकर युद्ध में शल्य के सम्मुख गया । ६६ । उस युद्ध कुशल ने इस भयकारी शब्दवाली गदासे शल्य के चित्तके समान शीघ्रगामी चारों घोड़ोंको मारा । ५७ । इसके पीछे युद्धकोष युक्त गरोहये वीर शल्पने तोमरको भीमसेनकी बड़ी छातीपर मारा यह उसके कंवच को काटकर गिरपड़ा । ५८ । फिर भयनित व्याकुलता रहित भीम सेनने उसी तोमरको घटाकर राजा मद्र के सारथीको छातीपर छेदा वह टूटे कवच चित्त भयभीत रुधिर को वमन करना । ५९ । महादुःखी होकर समक्ष मही गिरपहा मोर राजा मद्र इंटगया आप रित्त धैर्यमती पुद्धिवाले राजाशल्प ने । ६० । कर्म के बदले कर्म को देखकर गदाको लेकर शत्रुको देखा उसके 52. It was the terior of fuos, giver of joy to friends, of world wide turno breahor of mountain peaks, with which mighty Bhim challenged Kuver the friend of Shiv and billed many Guhyaks at Gaodhtuadau for the sake of the flowers to pluuse D.aupads, and with which he did pany deeds of prowest although he was opposed by many. 55. Such was the heavy octagonal maco studded with precious jewels and hard as vajra, which Bhim used to opposa Shalya. With it ho slow the four horses of,shalya, swift like the mind. Ennged Shniya, with a roar, struck # Cornar at the breast of Binm. 1: cut though Bhin's arruour and fell dowa ou the ground. Without any ansiety fear, Bhunu Bumble up tho enme tornar am piered with it the breast of Shalya's driver into fall dou 11 dead, sonuttig Worl. The bing of St surn, Ares + + (6900) Mahabharat (६९९०) प्रत्यभिधमयक्षत ।। ६९ ॥ ततः ममनसः पार्या भीमसेनन पूजयन् । तदा कर्म समामे घोरमक्लिएफर्मणः ॥२॥ इनि शल्यपर्वणि शल्यवधपर्वणि संकलयुद्धे एकादशोऽध्यायः ११॥ सजय उवाच । पति प्रेक्ष्य पन्ता शल्यः सर्यायसी गदाम् । मादाय तरसा राजस्तस्थौ गिरिरियाघलः । १ ॥ तं दीप्तगिव कालानि पाशदस्तमिवान्तकमास श्रृङ्गमिष कैलासं सघशीमध घासबम् ॥ २॥ सालमिष हया पने मशमिम विषम जनाश्यपतनीमः प्रगृह्य महती गदाम ॥ ३ ॥ ततः शङ्कप्रणादश्य तूरोणाच सह नया सिंहनादाश्च सम्शे शराणां हर्पघलनः॥ ४ ॥ प्रेक्षात: सतची हि पौधा धोधमक्षाद्विषो तापफाश्च परे चैप साधुसाश्वित्यपूजयन् ।। ५ न हि मद्राधिपादयो पछि पसन्नचित्त पांडयोंने युद्धमें असाधारण कर्मवाले भीममेनफेलसकर्मको देखकर उसकी प्रशंशा करी ६२॥ अध्याय १२॥ संजप पोछे कि हेगमा तापल्प सारथीको गिराहमा देखकर केवल लोह मयी गदाको सीबतासे लेल्लर पर्वरके समान निश्चय कर नियतहुआ।१। भीम (सेन तीयतासे बड़ी गदाको लेकर उसमकाशित कालाग्निके समान पाशधारी पमराज शिखरधारी कैलास के समान गधारी इन्द्रके शूलधारी रुद्रके और पनके मतवाले हाथी के समान शल्य के मम्मुख टूटा । ३। उसके पाणे खाद इनारों वाजोंके कठिन शब्द और रोंकी प्रसघ्राके पढ़ानेवाले सिंहनाद उत्पन्न हुगे । सब मोरसे उस रणभूमिके यड़े हाथीरूप भीमसेन और शल्पको देखकर मापके और पदियोंके सूरोंने धन्य धन्य शब्दकिया । ५ 1 युद्ध में शल्प और ing that fnir reply to his bloss, oppool with his mundo. Thm PandAYMA applauded the matchless proves of Bhim. G2. . CHAPTER XII Sanjaya anid, "Sooing his driver fallon down, Slalya at once took up his iron maco and stood filo n hill. Bhim too, cargo down upon Shalyar glorious }ilo the hro of pralaya, Yam, Kailas, Indra, Raira or clephant. Then thero vero lican! sounds of thodunds of inusical instrumente ani lomino tainn, firinging to the karriurn, The Predaran . 20533 [६९०१) शल्यपर्व Salyn Parar (6901. रामावा यदुनन्दनात् । खोदमुत्सहने धेग भीमसेनस्य संयुगं ॥ ६ तथा मद्राधिप स्थापि गदाधेग महात्मनः । सोमुत्सहते नान्यो पोधो युधि वृकोदरात । ७॥ तो | पृषाविष नईन्ती मण्डलानि पिचरतु । श्रावलिगनपदो धीरो मद्रराजवृकोदरी । " मलापसमागेपु गदाधिहरणेपुची निर्षिशश्मभूएवं तयोः पुरुसिंहयोः ॥९॥ सप्त हेममयः शुभ्रषभूष भयपर्धिनी । अग्निज्वालरिवाषना पर शल्यस्य सा गदा ॥१॥ तव चरतो मार्गान मण्डलेषु महारमनः । विद्युदभ्रप्रतीकाशा भीमस्य शुशुभे गदा ॥१९॥ ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदया गदा। दह्यमाने रये राजन् ससूज पाष काचिष ॥ १२॥ तथा भीमेन. शल्पस्य ताडिता गदया गदा । अकारवर्षे मुमुखे तबद्भुतमिधामत् ॥ १३ ॥ दन्तरिव महामागी शरिष मार्षभो । परिव सदान्योन्य गदाप्रापी निजानतु.॥ १४ ॥ लौ गदानिहोत्रः क्षणेन रुधिरोक्षितौ । यदुनंदन वलदेवजीके सिवाय दूमरा मनुष्य भीमसेन क वेगके सहन को समर्थ नहीं होसका है ।६। उसी प्रकार युद्ध में भीमसेनके मिवाय दूसरा शूरवीर महात्मा बाल्यकी गदाके वेगके सहने को उत्साह नहीं करसक्ता है यह चेष्टा करनेवाले हपभकेतुल्य गर्जनेवाले गदाधारी शल्प और भीमसेन मण्डलोंको धूपे । ८॥ मंडळ घूमने के मार्ग और गदाके प्रहारों में उनदोनों पुरुषासमों का युद्ध समान हुआ शल्यकी धुनाई हुई कर गदा तायेहये सवर्णकी वनीहुई मज्वलित अग्नि के समान उबाल वस्त्रोंसे भयकी वदानेवाली हुई । १० । इसीमकार मण्डलों में मार्गोके घूमनेवारे महात्मा भीमसेन की गदा विजली वादस से समान शोभा यमान हुई । ११ । हे राजा रानामदकी गदास पापल । आकाश में चलनेवाले के समान भीमसेनकी · गदाने भग्निकी ज्वालाओं को छोड़ा । १२ । इसी प्रकार सेनकी गदा से घायल शस्यकी गदा अंगारों की वर्षा करनेवाली ई वह भाश्चर्यमाहुआ।।।। जैसे दोबड़े हाथी दांतों से और बड़े पैल साँगास महार करें उसीमकार उनदोनोंनभी परस्पर गदाओं से प्रहार किया फिर वहदोनों सण मात्रमेही रुधिरमे लिप्तशरीर गदा से घायल अंग ऐसे देखने के योग्यहये जैसे and launavou cheer Buim and Shalya who stool in the fold of battle like elepbants, 5. Nono except Shalya and Balter tho Yadav could withstand the velocity of Bhinn; similarly, none oxcept Bhım. could have the courage to bear the Irlows of Shalya'a aiac. Salya and Bhim, with their mices, moved in circles like to buljo. Both the warriors were cqaal in their movement and the use of the mace. The nace hurled by Shalya, duched with burnished gold and covered with cloth bright ng fire, was the terror of fuos. 10. Similarly, the mace of Bhim, who moved in cirles, flashied like lightning in the midst of clouds. Bhim'a mace etruck by that of Shalys in the air, shod sparks of fire. - Similsris Shalya's mace dropped firo as it stuck Bhim's - ( 6902) " Aalhalkharat (६९०२) प्रेक्षणीयतराक्षास्तां पुषिताविय,किंशुको 1,१९॥ गदया मद्रगोन सव्यदक्षिणमाहतः। भीमसेनो महाबाईन पचालायलोपमः ।. १६ ॥ तथा भीमगदागम्ताव्यमानो मा मुंहः । शल्यो नाविन्यये रामन् दन्तिने महागिरिः ॥ १७ ॥ अथवे दिक्षु सर्वाम तयोः पुरुषसिहयोः ।गदानिपातसहायो पजयोरिव निस्वनः ॥ १८ ॥ नित्य तु महा पीयों सपुरिछागायुती पुनरन्तरमागंस्थागण्यलागि पिचेरता, ॥ १९ ॥ सपा ध्येय पदाम्य सनिपातोमपतयो । उद्यम्य लोहदण्टाभ्यामतिमानुभकर्मणो ॥२०॥ प्रार्थपानी तदानयोग्य मण्डलानि पिचेरतुः। क्रिपाविशे कृतिनी दर्शयामासतुम्नदा ॥२१॥मयोपम्य गदे.घोरे सवाविव पर्वती। ताषाजमतुल्योन्य यथा भूमियो पली ।। २२ । ती परस्परवेगाध गदाभ्यां मशविक्षती । युगपत पेततु रामाविम पजाविध ॥ २३ ! उभवोः सेनयोराहा हाहाकृतोऽमपन्. भृश मर्मण्यमिहता कि किंशुकके दो तहोते हैं । १५ । वाल्यकी गदा से वाम और दक्षिणमोर से घायल वह-पर्वतके समान, भीमसेन कंपायमान नहीं हुमा.। १६ । उसी प्रकार भीमसेनकी वेगयुक्त सदा से प्रारम्बार घायल शल्पभी ऐसे ..पीडामान नहीं हुआ मैले कि हाथी से घायल पर्वत पी.ड़ामान नहीं होता। .१७i उजदोनों पुरुषोत्तमों की गदाओंके आघातित शब्द जो किवंज के शॉन्द की समान थे दश दिशामों | में मनेगये। १८ गदा ऊंची करनेवाले बड़े पराक्रमी यह दोनों लौटकर फिर मांगोंमें नियत होकर मण्डलों को घमे, १९ । इसके पीछे आठमरण पास जाकर और गदाँको उठाकर.वदिसे बाहर कर्म करनेवाले. उन दोनों की.. पढ़ा इया लोहके दंडोंसे हुई । २० । तब वह दोनों बड़े , कुशल महा. अभ्यासी विजय के चाहने वाले दोनों मण्डलों, को घुमे उससमय ' दोनों ने अपने अपने मुरूप कम्मों को दिखाया। इसके पो.उन दोनों ने शिखरधारी पर्वतोंके समान घोर गदाओं को उठाकरः परस्सर में ऐसे पायल किया जैसे कि भूकम्पमें दो पर्वत परस्पर घायल करते हैं । २२ । वह दोनों पार परस्पर क्रोपयुक्त गदामों समपन्य घायलं इन्द्र-धना के समान एक साथ ही गिपरे । २३ । तवं दोनों m.auce and the qovplo vole ainazed.' Thoy fought with tivir mucos aí' two clupihants tight with their luska it as two bulls fight withi' their Jiorns, Withi thvir bullied woundcu by maco blows, clicy loukod liko 'Kinsluk freon iri bloom' 15: Wounded by Shalgu's made from the right and leit, Blin rèinninul motionless liku a hill. Similarly, Blatya too, wounded by'l.hiu's micu rumuind uuslaken liku a hiill struck liy în üleplant. Tuo suunds of tho blows of their buss wero hoard 10 All direction. With uprised aiace, tho tro Warriors inorod in circles. Then muving agit packs forward, the two wonder-working worriors fought withviroa clubs 20. Then they mured in circles, Trithing to Iniu victory and allowing their skill. Then thoy roined their macrt lite - 1 1 शल्यप Shalya Pafay (1003) धुभावात मुयिहचला ॥ २४ ॥ ततः परथमागंप्य माणामृषभं पली ! पोवाहः कपाशा तर्णमायोधनादय ५२५।। क्षीरविहलवान निमगत् पनवरियत: । भीम लेनो गदापाणिः समागम मद्रपम् । २६ ॥ ततस्तु नायका शेग नामा शश्रममा युताः । नानावित्रशम्दन पाण्डुसेनागयोधयन् ॥ २७ ॥ मुशायुधिस्य शस्त्रं शब्देन माता सतःमापद्रयन्महाराज दुग्धोनपुरोगमा ।। २८ | तदनोकमभिप्रक्ष्य तो पाण्डु नन्दनाः । प्रययुः सिंहनादेन दुर्योधनपुरीमान् । '२९ तेषामापततावणे पुषसो भरतपम । प्रामेन चकितान विराध हृदये मृशम् ॥३०॥ स पप.त रथोपरते ता पुत्रेण ताड़ित रुविरोधपशिलनः प्रविश्य घिपलं तम्॥ ३१॥विषि तानं कृष्ट्या पाण्डवानां महारथाः, मसदस्यय पन्त शराणि भाग:21 तामानामनी सेनामोंके वीर लोग हाहाकार करनेलगे मर्म स्थलों में अत्यन्त घायल दोनों अचेत होगये । २४ । इसके पीछे पराक्रमी कृपाचार्य राजामद्रका अपने रथपर बैठाकर युद्धभूमि से दूर लेगये । २५ । भीमसेन नशंकरनाले के समान एक सिपिप मेंही अतामे सचेत होकर उठां और गदा हाथमें लेकर राजामंद्रको बुलाया।२६ । इसके पीछे नानाप्रकारके शत्रों में संयुक्त आपके "शूरवीरों ने नानावाजों समेत पापडी सेनामे युदं किग । २७ । हे महाराज इसके अनन्तर वा सब शूरवीर जिनका अग्रत्तों दुर्योधनधा दोनों भुजा और शवों को ऊंचा करके बड़े भाडो समेत सम्मुख गये। २८ । फिर वह पाडुनन्दन उससना को, सम्मुख देखकर सिंहनादों समेत दुर्योधनादिकके सम्मुवाये । २९ । हेभरतर्षभ आपके पुत्रने शीग्रही उनभाते हुभों के मध्यमें चौकसानको मास से हृदयपर कठिन घायलींकया । ३० । आपके पुत्रसे घायल गधरसे लिप्त वह चेकितान बड़ी: अचेतताको पाकर रके बैठने के स्थानपर गिरपड़ा । ३१॥ पांडवोंके महाधियों ने चकितानको घायल और अयेत देखकर वारीसमे बाणों की वर्षाको परसाया।३३। hill tope and soundcl osch other lihe two fills falling over each other in an coi thquake Wounded by onchi ntlar's 'maccē, they full down. simultaneously like Indra's brors: Ths warriors of both armijos criod in dismny. Wounded in the vilal quarts, thay, bechino intentable Tuon Kripadbaryn took op Glıniya on his car and romóvod bim far from the fiuld. 25. Liko an intricatod nian, Bhim cazuo 'to his sonsc! in a muinont and challenged the hing of Alaura to receive the blows of his musco. Your trarriols, with the beat of musical instruments, fuugbt bravely with tho Paoday army. No warrior, led by Dur. yodhan, Went to fight with uprnixul arins. Tho 90119 of Panda opposed the Kaumy warriors Your son tyounded Chichiton on tho bresat. 30. Wounded by Duryallian, Chekitan, with blealiny Ixaly fainted on his car. Tho Panday tartiom scoing Chokitan insensible, -- + 71 A (690) Muhabharat (१९०४) केषु पाण्डवा जिनकाशिन । व्यचरत महाराज प्रेक्षणीयाः समन्ततः॥३॥ कृतधर्मा व सोषल महाबलः । अयोधयन धर्मराजं मद्रराज पुरस्कृती. ..३५ ।। त्रिसाम्रा रथा राजस्लप पुत्रेण वदिताः । अयोधयात विजपं द्रोणिपुत्रपुररंकृताः ३५ ॥ विजये धृतसङ्कलग समभित्यक जीवित प्रावि नाषकाः राजन हंसा इप महत् सरः ॥ ३६। ततो युद्धमभधोरं परस्पर वर्धषिणाम् । अन्योऽयवस युक्त मन्योन्यप्रीति वनम् ॥ ३८ ॥ तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे राजन् धारयरझये। आनलनेरित घोरमुचस्या पार्थिव रजः ॥ ३९ ॥ श्रयणानामधेयाना पाण्डधानात्र कीर्तनात् । परस्पर विजानीमो ये चायुध्यन्नमीतषत् ॥ ४० ॥ तद्रज पुरुषम्या शोणितेन प्रसामिप्तम् । दिशश्च विमला राजस्तस्मिन् स्तमसिगामि ते ॥४१॥ तथा प्रवृचे समामे भीमम्पे मथानके। ताबकानां परम्न मातीत कश्चित् पसंमुख १२॥ ब्रह्मलोकररा भूत्या प्रार्थयन्ती जयं युधि । मयुद्धेन पराकाम्ता नए स्वर्ग हे महाराज विजय से शोभायमान भौर पारोंभोरसे दर्शनीय पांबलोग आपकी सेनामें घूमनेलगे। ३३ 1 वटे पराक्रमी कृपाचार्य, कृतवर्मा और शकुनी ने जिनमें भगवर्ती रानामद्रया उन सबने धर्मरान से युद्ध किया ।३४ा है, राजा मापके पुत्रकी प्रेरणामे पन तीनहजार रथियोंने जिन के अग्रवर्ती अश्वत्थामा थे भर्जुनसे युद्धकिया । १५ । विजयमें संकल्प करनेवाले मार युद्ध में जीवन को स्यागनेराळे मापके शूरवीरों ने सेनामें ऐसे प्रवेश किया जैसे कि हंस बड़े शरो बरमें प्रवेश करते हैं। ६ । इसके पाउ परस्पर मारनेके अभिलाषी उन बारी का महाघोर युदहमा जोकि परस्पर मारने की अभिमापासे युक्त और अन्योन्य श्रोति बहानेरालाया । ३८ । हे श्रेष्ठ राजा वीरोंके नाशकारी उस युंदके जारी होनेपर वासे उठाईहुई घोर घट पृथ्वी से उठी । ३९ । पांडवों के कहने पार नामों के मुननेसे हमने परस्परमें उनको नाना जानिर्भयके समान युद्ध करते। पुरुषोचर पप धूल रूपिरमे शानहोगई उस अंधेरेके होनेपर साफ दिशा विदिताई। ४१। इसमकार भयभीतों के भय के बहानगले घोर युद्धके.मान होनेपर आपके भार प्रतिपक्षियों के पीरों में से किसी ने मुम्बको नहिडा.४॥ blowared their arruts and raincu victoriously in tho midst of your Army. Glorious Kripcarga, Krityarinn and Slabini, lod by Shalyn, fought with Yudhislithir. Urged by your son, threo thousand war riora led by Ashrathana, fought with Arjun. 35. Your warnors Caroliet of their lives ont to l to held ur biltlo as awany enter a like Then dourous of slaying one anothor, theyf sught rory land to presso their frienda A nevar storm of dust arose from that destructiro battla il'o cull dutingurut the Pandares and oor karriors lig callia, thair name 40. Thon the das subnded, tho dirinon dsaptrarel ant the dirvetinos inune clear. I'len the battle, lemnlyın; tot's timil, [१९०१) शल्यपर्व Shalya Parv (6905) म मोप्स nan मन्तपिण्डपिमोक्षार्थ मित्रकाय्यविनिश्चिता । स्वर्गसकमनसो बोधा युधिरे तो ।। ४४॥ नानास्पाणि शस्त्राणि विसजन्ता 'महारया । अन्योन्य मभिगअन्त प्रहरन्त परस्परम् ॥ ४५ ॥हत विध्यते गृहीत प्रहरध्य निकन्तत । इति स्म पाप धयने तप पाच घे रणे ॥ ४६ ॥ ततो शल्यो महाराज धर्मराज 'युधिष्ठिरम । विव्याध निशितैोणर्हन्तुकामो महारथम् । ४७ ॥ तस्य पार्थो महा राज नाराचान पे चतुर्दश । मर्माण्युदिश्य मर्ममा निचखान् हसन्निब ४८ मावाये पापड पान्तुकामो महायशा । विव्याध समरे कुयो बहुभि फङ्कपत्रिीभ ।४९॥ अबस्यो महाराज शरेणानतपर्वणा । युधिष्ठिर समाजघ्ने सर्वसम्यस्य पश्यत ॥ ५० ॥ धर्मराजोपि सक्दो मद्रराज महापशा । विव्याध' निशितैोण कडा णवाजित । ५१॥ चन्द्रसेन सप्तत्या सूतश्च नपाम शरे । दुमसेनम्धतु पन्या युद्धभूममें शुभयुद्धसे विजय के अभिलाषी और स्वर्गके चाहनेवाले लोग प्रलोक के अमिलापी होकर चढ़ाई करनेवाले हुये। ४३ । तब स्वामीके कार्य में निश्चय करनेयाले और स्वर्गमें प्रचचित्त शूरवीर स्वामीके अमोदकके विमोक्षार्थ युद्ध करनेलगे । ४४ । महारयी लोग नानाप्रकार के शस्त्रीको छोड़ते परस्पर सम्मुख गर्जतेहुये युद्ध में मवृत्तहुये और गहार करनेलगे । ४५ । उससमय आप की भार उनकी सेनामें मारो छेदो पकड़ो महारकरो यहीशब्द मुनेगये । ४६ । हेमहाराज इप्तकें पाछे मारने के अभिलापी शल्पन महारथी धर्मराज युधिष्ठिरको तजपार वाणों से घायलकिया । १७ । फिर मर्मके ज्ञाता हंसतेहुये युधिष्ठिरने पों को सक्ष्यकरके चौदह नाराचाकोमारा ! ४८ । फिर युद्धमें क्रोधयुक्त राजा मद्रने कंकपक्षवाले बहुतमे बाणों से युधिष्ठिरको ढककर घायलोकया|४९। हेमहाराज फिर सबसेनाके देखते टेढे पर्ववाले बाणोंसेभी युधिष्ठिरको चापलीकया । ५०॥ कोषयुक्त बड़ेयशवान धर्मराजनेभी तीक्ष्णपार कंकार मोरपक्षसे नटित वाणों राजामठको घायलीकया ।५१ । इसको घायलकरके महारथीने चन्द्रसेनको सहर tag thus ming, noue of the warriors of both sides turned face De Birous of fighting aud going to heaven, tho Warriors attacked one an other Lutont on going to heaven through fighting, they tried to make umends for the food which they got from their masters. They encounterod onu another with loud roars and dischsrged their weapons Perce, Buize and slay were the words hoard from both armies. 46 Salya istoot on blaymg 1 adhishthur, wounded him withaba parross Yodhulthir, with a slnilo, wounded him with fourteen darts on the vital parts Tho enraged king of Jadra hid and wounded his advert ary with his artour. He again wounded Yu lhishthir witb punted darta, 50 Yudhishthir was enraged at this and wounded the klug of Madrn with arrows fitted with Bank and p-cock feathers. Then 14 (6906) Mahabharat (६९०६) निजघान महारथ ॥ ५२ ॥ वक्राक्ष हने शल्य पाण्डपेन महात्मना । निजधान ततो राजश्चदीन धै पञ्चविंशति ॥ ५३॥ सात्यकि पाचविंशत्या भीमसेनच शतमि । माद्रीपुत्री शतेनाली विव्याध निशितैः शरै ॥ ५४॥ एवं विचरतस्तस्य सप्रामे गा सत्तम । समययच्छितान पार्थ. शरानाशाविषोपमान ॥ ५५ ॥ मजाचास्य समरे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर । प्रमुख घर्तमानस्य भल्लेनापाहरदयात् ॥ ५६ ॥ पाण्युपुत्रेण वे तस्य केतु छिन्न महाहवे। निपत तमश्याम गिरिभृगमिषाहतम् ॥ ५७ ॥ पानिप तित एट्या पाण्याध व्यवस्थितम् । संयोगराजोमूच्छरय मुमोच ॥८॥ शल्प सायकवर्षेण पर्जन्य इव श्रृष्टिमान् । अभ्यवर्षमेपामा क्षत्रियान क्षत्रिय ॥ ५९ ॥ सायकि भीमसेनञ्च मादीपुत्री च पाण्डवी । एक पञ्चभिर्षिया युधि ष्ठिरमपीच्यत् ॥ ६० ॥ ततो धाणमय जाल पितत पाण्डवोरासि । अपश्याम महाराज बाणसे सारथाको नौवाणसे और द्रुपमेनको चौंसट पाणोंसे घायल किया । ५२। हे राजा महात्मा पांडव के हाथ से चक्र के रक्षक के परने पर शल्यने पच्चीस चन्देरी देशियों को मारा । ५३ । रणभूमि में पच्चीस वाणसे सात्यकिको साठ वाणी भीमसेनको और सौ वाणोंसे नकुल और सहदेवको घायलोकया ५४॥ क्षत्रि पोंके नाश करनेवाले पाण्डपने विपले सर्पकी समान वाणों को उस इसप्रकार घूमने वारके ऊपर फेंके । ५५ । कुन्तीफे पुत्र युधिष्ठिरने इस सम्मुख वर्तमानकी ध्वजाको रथके युद्ध द्वारा जुदाकिया । ५६ । हँसतेहुपे पाण्डयन इसमकार से उसकी घना को काटा और हमने पर्वतके दूटे शिखरके समान उसको गिरते हुये देखा । ५४ मद्रका राजा गिरीहईजनाको भार सम्मुख वर्तमान युधिष्ठिरको देखकर अत्यन्त कोषयुक्त होकर पाणोंकी वर्षा करने लगा 1५८ा क्षत्रियों में श्रेष्ठ बड़ा साहमी शल्य वी करनेवाले बादलों क समान पाणों की वर्षासे क्षत्रियों पर घी करनेलगा । ५९ । और जोम मात्याक, माममेन, युधिष्ठिर, नकुल और सईदव इनकोपांच चाणों से छेखकर युधिष्ठिर को पीडामान फिमा १०इसके पीछे युधिष्ठिर की the bravo warrior wounded Chinnding in with sovanty darts, his coach man with mino and Dromen with wyty four. As the fall of Ing wha! guards by the great Panday, Shulya slow twenty fiva Chandari war. riors. Then he wounded Satyaba with twenty five arrowe, Bhim with seven and Nakuland &nhades with a hundred Thc Pandares discharged at bim arrows like prisonous taal.es, Yudhishthur cut down hrs adversary's standard from his cr. Woraw tho standard, cut down by the Pandav, falling like a noullai. poak Soolog his stand-rd fallen and Yudhishthir before hun, Shalya showered on bio ling arrows Brnyo Blialyn t lo best of warriors sent fyrtly on warriors n light of Anow: Having wounded Satyakı, Bhild, i udhisfitfir, Nakal nod Suhadov, ho wounded Yudhishthir again Wc 5774 bis arroirs puertins - like rain सरप Shalys Parv 10907) मेधजालमिवोन्द्रतम् ॥६॥ तस्य शल्यो रणे यो चाणे सन्नामि । दिश प्रमा दयामास प्रदिशश्च महारथ ॥ ६२ ॥ तता युधिष्ठिरो राजा वाणजालेन पीडित । धम्माविका तो जम्मो वृत्रहमा यथा ॥ ६३ ॥ इति शल्यपर्वणि शल्यवधपर्वणि शल्ययुधिष्ठिरयुदेद्वादशोऽध्याय १२ ॥ है- सत्रय उवाच । पीडिते धर्मराजेतु पराजेन मारि । सात्यकिमीमसेन माद्रीपुत्री च पाण्डवी रिवार्य रथे शल्पपीउधागामुराहवे ॥१॥ तमेक पाभि एषापाज्यमान महारयै । साधुवादो महाम् जश सिमाधासन प्रहर्षितामा मियभाषत मुनपवापि सगता ॥३॥ भीमसेनो रणे शल्पभूम पराक्रमे । छातीपर बठेहुये मेघ जालकी समान फलेहुये वाण जालों को देखा । ३१ । युद्ध में क्रोधयुक्त महारथी शल्यने गुप्तप्रन्यीवाले वाणोंसे उत्तकी दिशा और विदिशामों को दरदिया। ६२। इसके पछि वाणनालों से पीडामान राजा युधिष्ठिर पराक्रम से ऐसे रहिन होगया जैसे कि इन्दके हाथसे जम्भमपुर हुआथा । ६३ । अपाय १५॥ सम्सय बोले हे श्रेष्ठ रानामदहाथमे धर्मराज पाडामानहानेपर सात्याक धापसेन और मादीपुत्राने रयोंसे सत्यको घेरकर युद्धमें पीडामान किया। १। बहुबसे महारथियों के हायर उस अकेले को पीडामान देखकर । २ । वड़ा धन्य. वाद का शब्द उत्पमहुआ और सिद्धलोग बहुत प्रसन्नहुये और मिजय मुनियों नेभा पाश्चर्य माना।सभाममन ने पराक्रम में भाळरूप शल्यको यद्धमें through Yudi sht tir's bie ist like clu le Bavo Shalya hid him with artiys su all directions Wounded by arrors, fathestitbir lost theart liho Janbh rounded by lidra 63 caAPTER XII Sanjaya said Yadhishthir being sjunded by Shalsa Bhing Satyahi aod tho suns of Hadro surrounded the latter with thor cara and wounded him in battle, People applauded and cheerod, Bidhan were pleased add the escombled munts were smazed. Bhim pleroed Faluaat Shalya with one arrow and theo wounded bin with seven more. Satyali roanded him mth a hundred Antofa for the sake of - शिवाप (6908) Mahabharat (६९०८) एकेन विध्या वाणेन पुनर्विव्याध सप्तभिः ।४। सात्यकिधाशतेनेनं धर्मपुत्रपलिया। मद्रे वामथाकीर्य सिंहनादमयानदत् ॥५॥ नकुल पञ्चभिश्चैन सादेव सप्तभिः! विधात तु ततस्तुणे पुनर्विव्याध सप्तमिः ॥ ६ ॥ स तु गे, रण यसः पीडित हारथैः । शिष्य कामुक धोरं धेगपदारसाधनम् ॥ ७॥ सात्याकं पञ्चविंशत्यां शल्यो विव्याध मारिप । भीमसेन त्रिशप्तत्या नकुलं सप्तभिस्तथा ॥ ८॥ ततः सपि सहदेवस्थ धनियमः । उिवा भलेन' समरे विधाम त्रिसप्तभि ॥९॥सादातु समरे मातुले भूविषयमम् । ससमन्यवः कस्या पामिासमताडयत शरैराशीधिषाकारज्वलज्ज्वलनसभिः॥१०॥सारथिनास्य समरे शरणानतपर्वणा । विव्याध भूसंकुबस्तच भूयसिमिः शरे ।। ११ ॥ मानसनस्तु सप्तत्या सारयकिनमिः शमी धर्मराजस्तपा पन्ना गात्र शल्य समार्पयत् शतता शल्यो महाराज निर्षित स्तमहारयः । सुनाव रुधिरं गावगैरिकं पर्वतो. यथा ॥ १३॥ एकवाण से घायलकरके फिर सातवाणोंसेछेदा फिर सात्यकी-धर्मपुत्रकी इच्छासे सौवाणों से राजामद्रको ढककर सिंहनादको गर्म । ५ नकुल नै पचिर्वाण से और सहदेव ने सात वाणोंसे उसको छेदकर फिर शीघही वमको पवियाणों स छेदा । ६ । फिर उन महाराधियोंसे पाडामान युदमें उपाय करनेवाले शूरशरप ने वेग नाशक और भारकेधारण करनेवाले घोरधनुप को बचकर । सात्यकी को पच्चीसवाण से- भीमसेन को तिहत्तर- वाणसे और नकुलको सातवाणसे घायल किया 16 । इसके पीछे शल्यने धनुषधारी सम्देव के धनुष को विशिष नाम व णत भरने काटकर उसको इवीस वाण दा। ९ । इसके पछि सरदेखने दूमरे धनुषको तैयार करके बड़े भेजस्वी मामाको सन 'पांच वाणों में घायल किया जो कि विने सर्पके समान भौर प्रशीलन भग्निके ममान फिर अगन्न क्रोधवृक्तने टेटे पर्ववाले वाणसे जप्त के सारथीको अन्यन्तछेदा और उसको भी मानवाणों से घायल किया । ११ । भीममेन ने सत्तर वासासे सात्यकि ने नौवरणोंमे और धर्मराजने साठ वाणासे शल्पको अगापर पापल किया। १३॥ हे महारान फिर उन महारथियों के हाथो घायन हुये शल्यने अपने अंगोंसे रुपिर Yurilishthir and roared a loud roar, 5. Nakul vognded hiin' with tive und Saliadur with fourteen Wounied by thoro bravo narriors, valuint Salsa droit lus luurd low and wounded Satyaki with twilly Siva Arroys, Blum with events three and Nuhul nith tyen. Ikea le cut down the bow and arrors of Balindov and wounded hini with errenty one darts. Sihidov took up anottier bov and wounded bois uncle with five afrowy, poisonous hho serpants and bright liho tire. And, niliis rajohn picscad him sot the arrows and his driver with one. Blir sounded him sith seronty arrows, Satyaki Foundod him with pinc and Yudhishthir with sixty. Woondel by tboir arrown, शर - [६०००) श गपyhka Ptr ((100) तांध साम् महेप्यासाद पयाम प्रध झा, दिगन्त ? मियामत 8 तारण मन धापुरम्य पति . सर सज्य, स. हि महाथ ॥ १५ ॥ अन्यद्धारादाय लामृत ध्वजरथ प्राच्छ दयच्छर १६ । सायमन सर धर्मपुत्रस्य सायके । युधिष्ठिरमथानिध्यमिनिशिन शो ॥ १७ । नात्य माफि तु तत सुद्धी धर्मन शगाहो । गहाणामधिप धार शगधै ममगार 1॥ १८॥ स सायचे प्राचन्छन ' शुण मधमा । भीममेनमुग्यास्ताच निगरिसर ताडयत् ।। १९ ॥ तस्य हा महाराज पात्यारु मचिम मोमर प्रयामा सणंदण्ड महाधनम् ॥ २० ॥ मागसलोय नारच ज्वलन्त मिय पनगर , रालो माक्तिसिहदशा गदा शुभाम् । २१॥ धर्मराज शननीन्नु निवाग्म शन्यमाये। सानाइद पवाशु पन्चाना भुजमान नाम्यामास समर शरनमा को पत्रे गिराया कि पान धारोको गिना त उमने पांच.. बाणा से उन सा बढे २ अनुपधारियोंको वेगने हा गह,आश्चमा हुआ हे श्रेष्ठ पिर उममारधाो युद्ध में दून मला धानके धनुषाकाग 1-1 फिर धर्मपत्र नगी नमरे धनुषको लेकर गल्यका पढे माथी लगा पार थके, गाध हक विनावासमपुत्र के गायकोंन इकुहरे उन बाल्य र समधार देशवाणा । युपिष्ठिरतो दर, । २७ । फिर नागा गे धर्मजागीरन , हानेपर कोयु पकिने मद्र देशियों के गजाधो वाण मह मे नाम 141 उपनगरमोत्यकि के घड़े अनुपये काटा आर. डा भीमोनीन • तास वीडित किया १९१९ ॥ हे महागज म यहाणी प्रयुक्त मानिने दण्डवाले बहुपून खग्गरको उमपर चलाया । ..! योमर ने मलिन सपके समान नागचको बक्ला शामिका और सहदेव ने शुनगटाको चाया । २' । युद्धव शेयके मारने को गाविती धम्माजने शनी को चलाया पाचोक हाथमे छोडेढ़य और, भात प्रश्न : दानामुने रोग । २२ शल्यो सात्यकि के चुनाये योicat,612 yr droups/11) | am intein dropsc lou ed water To as wonde juf an, bir parred all thov nors with five a rwe onth and with ons errow, the cut down ludhishthl's bow 15 or tool up anoph rhyavan i covere! Satya g kanne and car wist khup arroy Ihen 8.tý aki covered tl s 1 194 OM dra nnd soindo I Bhim and otbe a sv th three arropa each Sitz Aht of true pi se dis.haiged at him a tonar 20 Parn Bhim dischargel n dart 3rds like a serpent, Nukuld clerg das jag and Szlader hurlei 2 mace cus rf lot qe Shalya Yudhishth d aclargecs, chalaghin San in fire . 1r o} the five end coming to varls ll him Shalya c' count iliul Sattapis toma.rith a drt Yudhar . De 6310) Malinlarat (१९९०) 'स मद्रराट् । ०२. सात्यकिमरितं शल्ये मालीश्वव्द तोमरम् । भीमेन प्रतिनागि भरं कनकभूषणम् ।विधा चिच्छेद हस्तः प्रतापवान् । २४ । मकुलप्रेषितां शर्ति मदण्डा भयापहाम् । गदाश्च सहदयेन शरोघे समधारय ।। २५ ॥ शरायास शतमी त गधिग्छेद मारत । पश्यतां पाण्डुपुत्राणां सिंहमाद ननाद च । मामृष सातु शमयः शनजियमाहवे ।। २६॥ अथान्यनुरादाश्च सात्यकिः क्रोधडितः! द्वाभ्यां मदेश्वर विमा सारथिमच त्रिभिः शरैः ॥ २७ ॥ ततः शल्यो महाराज सर्क स्तान पाम शरैः विव्याध सभृश क्रुद्धस्तोत्ररिष महाधिपान् । २८ ॥ ते पार्य माणाः समरे मद्रराजेन भारत । न शेकुः प्रमुझे स्थातुं सहश शत्रु निमदनाः॥ २९॥ तता दुर्योधनोराजा दृष्ट्वा शल्पस्य विक्रमम् । निहतान् पाण्डवान भेने पाणालान सजयान् ॥ ३० ॥ ततो राजमहाबाहुर्भीमसेनः तारखान् । सस्यज्य मनपा प्राणान् मद्राधिपमयोधपत् ॥ ३१ ॥ नकुलः सहदेय सात्यकिश्च महाबलः । परिवार्य तदा हुये तोमरको भल्लमे काटा इस्तलायत्री प्रतापरान् शल्यने भीमसेन के पलाये हुये सुवर्ण से भकृत वाणको भी युद्ध में दो खण्ड किया । २४ । और नकुलकी | चलाई हुई महाभय कारी शक्तिको और सहदेवकी फेंकीहुई गदाका वाणों के समूहों से काटा ।२५। हेभरतवंशी दो वाणो राजाकी उस शतानीको काटा और सब पांडवों के देखते सिंहनादांसे गर्ना सात्यकिने युद्ध में शत्रुकी विनयको नहीं सहा । २६ । तब क्रोधसे मुमीमान सात्यकिने दूसरे धनुषको लेकर दोवाणसे शल्पको घायल करके तीन वाणसे सारथीको घायल किया । २७ । इसके पीछे कोपभरे शल्यने उन सब को दशवाणों से ऐसा कठिन पायस किया जैसे कि भकुशी से बड़े हाथियों को करते हैं । २८ । वह शत्रुओं के मारनेवाले मारथी पुदमें राजाम से रोकेपे होकर उसके सम्मुख नियत होनेको समर्थ नाहिये । २९ । इसके पीछे राजादुर्योधन ने शल्यके पराक्रमको देखकर पाण्डव पांचाल और नियोंको मृतकरूप माना । १० । हे राजा फिर प्रतापवान महावार भीम | सेनने चिच से जीवनको त्याग.करके रामा मासे युद्धकिया। १ । भोर को He dexterously cut Bhim's arrow into two and cut dusen Nakul's dreadful spear and Sahadeva's nace with this arrows 25. He cut down Yudhishthir's ghataghni with two arrons and rared loud roass in the pleaner of all the landaras. Satyaki could not bear this and in Orccuiro rago, Younded him with two arrows aud the driver with three, Theo Shalya wounded thom all sith ton arrows ay olrplants Aro wounded by guads. Those gront warriors checked by tho hing of Madra, could opposo liiin no longor. Seeing Shriya's proros, Dur yodlian thought that tho l'andavas, Panchals and Srinjayayat will le Do nore 30. Then glorious Bhim, fearles of life: fight with the king of MInuta Brave Nakul, Sahder and Satyaki, surroundia SIRIYA शल्यप Shalya Paray (6911 शल्पं समन्त्रावकिराछर ॥३२॥ स चतुर्भिमवास पाण्डवानां महारय । वृत লাৰ মা সন্ত্রাস: মহানু। যে গমনী কান্ত স্থায় ; ५ करत असानाशु मदराजस्य पार्थिवः ॥ ३४ ॥ तस्मिस्तु मिशन शूर सरक्ष महारय । महराजपिपलधाम सोनकांस्त्वकिरन्छरः॥ ३५ ॥ ममाउन्नांततस्तांस्त राजन वीक्ष्य म सोनका । चिन्तयामास समो धर्मराज युधिष्ठिरः॥ ३॥ मूनं पयेत् मत्य सम्मायो मात । न हि मोरण राजा भयपन बने म ॥३७॥ ततः सरथनांगावा पाण्याः पाण्डवंश । मदश्वर समानद पोरयन्तः सतात' ॥ ३८ ॥ नामाशांपघहुलो शष्टि सारथनाम । व्यधमत् समर राजा महासाणाय भारतः ॥ ३९ ॥ ततः कनकपुरा त प्रात्यक्षिप्त घियतमाम । शरष्टिमपश्याम शल भानामिनायतिम ॥ ४० ॥ ते शरा मदर जेन प्रेगिता रणनि । सम्पतम्त स्म पराक्रमो नकुल सहदेव ओर सात्यांक ने शल्यको घेरकर चारों ओरको वाणों से भाषणदित करांदया । ३२ फिर पांडवों के बड़े धनुषधारी महाराथयों से घिरेहुये उस प्रतापवान गनामद ने मवसे युद्धकिया। १३ । हे राजा ता धम्मपुत्र युधिष्ठिरने पड़े युद्ध में अपने पुरममे सस राजामद्रके चक्र रक्षकको सीघ्रता से मारा । ३४ । फिर उम शूर महारयो चक्ररसक मारेमानेपर बड़े वयान रामा यदने बाणोंमे सेनाक सर लोगोंका दकदिया ।३।इसके पीछे धर्मराज युधिष्ठिरने युद्धमें पागों से उके ये उन सेना के लोगों को देखकर चिन्ताकरी कि माधवनीका पर पचन कैस निश्चय करके सत्पडोय कि हे पांडवोंक बड़ेभाई युद्धमें क्रोपयुक्त राजाशरप मेरी सेनाका नाश नहीं करेगा। ३. 1 इतके मनन्तर चारों ओरसे पीड़ित करते पांडवों ने स्थ हाथी और घोड़ों समेत जाकर राजा पाको प्राप्त किया । ३८ । राजाने नानाप्रकार के शखों समेत उठीई वाणीष्टको युद्धमें ऐसे छिभिन्न किया जसे कि वायु बड़े बड़े वादलों को अलग करंदता है । ९ । इसके पाप भरपजानत आकाश पत्नमान सुनहरी पुरखो के बाणष्टिको शल भाओं के समूों के समान देखा युद्धके मुखपर राजामद्रके चलायहुये यह पाण from all sides and yognded them with their arrows Surrounded by the grrat Pandav marriors glorinuMadira opposed them all. Yudhish thir slew his wbeol guard. At liis death Sjalya covered all the warriors with Art-W8. Seeing them so cuvered with arrows, he ferred that the prediction of Madhav to tbe effect that Slalya would not be able to destroy tho Pandny army, was not going to be arrect. Then wounding and elnymg from s'l tider, the Pandavas opposed Shalsa with their elephants, care and bors-The kiog dispersed the ahower ol their weapolis ng the wind does the coude. The darts of Shalya were to be seca like locusts in the air or like flights of birds 40. The onldadlecker Artan 8 of Shalga besatified the sky, corering the warriors - 16913 08998 Shalya l'arv मंजय उवाच । अर्जुनो द्रौणिना विको युद्ध बहुभिराशुगैः तस्य भानुचरै शरैलिंगाना महारथै. ॥ १॥ द्रौनियव्याध समरे प्रिभिरेव शिलीमुखे । तथेत रामहवासान वायां द्वाश्यां धनञ्जयः ॥ २॥ बघ महाबाहुः शरवरवाकि रत् । शरकण्टाकितास्ते तु तापका भरतर्षम । न जहुः समरे पय बध्यमानाः शितः शरः ॥ ३ ॥ तेन शरवर्षेण द्रोणपुत्रपुयेगा । अयोधयन्त सम परियार्य महार थम् ४॥ तैस्तु क्षिप्ताः शरा राजन कास्त्रियभूषिता । बर्जुनस्य रथोपस्थ पर यामासु रम्जसा ॥५॥ तया कृष्णा महेप्शसापभी सचन्धिमाम् । शपीक्यापित भाङ्गो प्रहष्टा युद्धदुर्मदा ॥ ६॥ दरो रयच माणि ईवा योक्ताणि या विभो । युग वेषानुकर्ष शरभूममया May नेता ने राजम्नैयापि च धुनमा पारशं सत्र पार्थस्य तापका प्रक्रिरेस रय सर्वतो भाति विपुल नित गरे। अध्याय १४ ॥ सुरुमप बोले कि युद्ध में अश्वत्थामा भौर इसके प्रागे पीछेवरे विगत देशिया मूर महाथियों के पाणोंसे रिटेदुगे मजुरने । १ । युद्ध न शिली मुखवाणास अश्वत्यामाको घ यल किया उसीपकार अन्य शूरवीराकोभी भर्जुन ने दोदो वाणों से छेदा ।।। हे महाराज फिर पाणों की पी से आच्छादित करदिया हे भरसम वाणों से विदीर्ण उन आपके मूवीसने जोकि तेमबाणा से पीडामान थे अर्जुनको पाकर त्याग नहीं किया। यह महारथी जिनके प्रश्न वती भलत्यामाजो थे उन्हेंनि रयोंके समूहों म अर्जुनको घेरकर युदकिया। ४ । | हे राजा उनके छोय सुवर्ण पडत चाप्पाने थेगमे अर्जुन के रथ बैठने के स्थानको भरदिया ।५ । सीप्रकार संघ धनुषमारियों में श्रेष्ठ बरे धनुषपाती भीकृष्ण और अर्जुनको पाोंने चाक मा देवकर युद्धमें दुर्मद शूरवीर मान्न हुये । मयं तब कुवर या रस, डोतर, युग, अनुकर्ष यह मप ग्यके आ पाप होगये 1 9 1 राजा पसमयमें यहां आपके शुरषीरों में जैसीदा अग्नुनको करी बेसी दशा पूर्वसमप में न देसीगई न सुनीगई। ८ । वह रथ पुस्ख युक्त नागवाणों से सब ओरको ऐमा दिवाई देताया जैसे कार रोकदो CHAPTER XIV Binjaya said, " Pierced l; t19 Arows of Ashwatham & ? the warriors of Trigart, Arjuin 11 thu for many with three arrufgang the rest with two armig en la H. covered.ndta with his arrore Younded by then your terrio“) oppisod Arjun well Ited by Ashwa thama, they surrour'ded Arjun with their tary atd filed Arjou's car with their arront.5.S..ing arjun and Kirahu wourlal with darts,thu brive Warriors were please] Arrossz were on all prts of tho cat. Arja. Fai norer before we or liati ti lo in sich a slight His dar loved like a celestial car sharing with thoss al. of mag There at (6314) Mahabharat (६९१४) उल्काशन संपति यमानमिष भूतले ॥ ९ ॥ तताजुनी महाराज शरे सन्ननाभि अबाकिरत्या पृतना मेघो घृष्ट्या गधाचलम् ॥ १०॥ ते वध्यमानास पानामा द्विते. शो । पार्यभूनममन्यन्त प्रेक्षमाणास्तथाषिधाम् ॥ ११॥ तनोद्भुतशरज्यालो धनुः शम्दानिलो महान् । सेनेत्रन ददादांशु नाषकं पार्थपाषक ॥ १२ ॥ वाणा परतं चापि युगानाच धरातले । तूणीराणां पताकानां ध्वजानाञ्च रौ. सह ॥ १३ ॥ ईसा नामनुकगंगा त्रिवेणूनाश भारत । अक्षाणामथ पोक्त्राणा प्रतोदनोच सर्वश ॥१४॥ शिरसा पतताम्वैध कुण्डलोणीषधारिणाम । भुजानाञ्च महाराज अंघानाच सह प्रश.॥ १५ ॥ छत्राणा व्यजन. साई मुकुटानांव राशयः। समश्यन्त पार्थस्य रय मागपु भारत ॥ १६ ॥ तत कुशुस्य पार्थस्य रथमार्गे पिशाम्यते । अगम्यम्पा पृथिवी मांसशोणितफईमा ॥ १७ ॥ बभूव भरतश्रेष्ठ रुद्रस्याक्रोडने यया । भीरूणा बासन मनी शराणा हर्षयर्द्धनी ॥ १८ ॥ इत्या तु समरं पार्थः सहनं वे परन्तप । रथानां उल्कामों से प्रकाशमान विमान होताहै । ९ । हे महाराज फिर अर्जुनने गुप्तग्रन्थी वाले वापसे उमकी सेनाको ऐसा ढकदिया जैन बादल अपनी पप से पर्वत को ढक देताहै । १० । पद्धमें उन पाणोंसे जिनपर कि अर्जुनका नाम चिन्हितया घायल और उसमकारके अर्जुनको देखतेतये उनलोगोंने लोकको अर्जुनका माना । १ । उस अर्जुनरूपी अग्नि ने जिसकी क्रोधरूपी ज्वालासे उत्पन्न होने वाले वाण हा और धनुपके घड़े शब्दथे उस अग्निने शीघ्रही सेनारूपी ईंधन को भस्मकिया। १२ । हे भरतवंशी महाबाहु धृतराष्ट्र अर्जुनके रथमागों में पृथ्वी पर गिरते चक्र रथ युग तुणीर और रथोंसमेत पत का ध्वजा ।। ईशा, अनुकर्प विष्णु, भक्ष, योक्तर और सर्वप्रकारके चाबुक।१४। कुण्डल और वेष्टनधारी गिरेहुये शिर सहस्रोंभुजा और जया।१५ व्यजनासमेत छन और मुकुटोंकेढेर चारोंओर दिखाई पड़े । १६ । है राजा इसके पीछे क्रोधयुक्त भर्जुनके रथमार्ग में पृथ्वी दुर्गभ्य और माम घिरकी कीच रखनेवाली होगई । १७ । हे भरतर्षभ यह रणभूमिमें स्नीके कीदाधान के समान भयभीतों का भय वढानेपाली भोर शूरवीगेकी प्रसन्नता बढानेवाली हुई । १८ । फिर शत्रुओंका तप्तकरनेवाला अर्जुन युद्धर्म कवच rnard his arrows over your army. 10 Wounded by the arrows ejabı ssed with Arjun'a:naids, they thought that all the world was fall of Alju119 Arising from the fire of Arjun's wratii, the arrows like a storm of wind, burnt your ai my as fire does dry wood Car wheels, yokon, quivers, staudards, whipe, ear.rings, with thousands of well decked xrms, fane, unbrellas and heaps of diadems were in lw sen all over the path traad by Arjun's car '16 The ground b came improga ablo "ith Mesh and bloxxl It was like the pleasuru ground of Rodra dreadful to the timid and ploasing to the brave. Having slun two thousand car-warriors, Arjun shodo liko smokeless fire He looked - शल्यपर्व Shalya Paray 16415 सपस्यानां विमोग्निरिव स्वलन् । १८ . यथा हि मगधानग्निर्जगदग्धा चराच रम् । विमो दृश्यते राजंस्तथा पार्थो महारथः ॥ २० ॥ दणिस्तु समरे दृपया पांड वस्य पराक्रमम् । रपेनानिपताफेन पाण्डधं प्रत्यवारयत् ॥ २१ ॥ तायुमो पुरध्यान प्रेताश्वो रमिनार समीयतुप्तथा सूर्ण परम्परवधैषिणी ॥ २२ ॥ तयोरासी महा गज बाणधर्ष सदारुणम् । ओम्त यार्पथा पिस्तपान्ते भरतपम ॥ २३ ॥ अन्योन्याप सिंमी तो तुशार. सनतपर्वभिः । ततझतुम॒घन्योन्यं भाषा अपमाधिय । २५ ॥ तयोयुद्धं महाराज वि सममिवाभवत् । अत्राणां सङ्गमश्चय धोरस्तबाभवा पुन ॥ २५ ॥ ततोऽर्जुन द्वादशमी रुक्मपुर. मुतेजी । यामदेवच दशमिद्रीणिविव्याध मारत ॥ १६ ॥ dत. प्रहस्य पामत्सुक्षिपदाण्डिवं धनुः । मानयित्या मुहतु सुरु पुत्र महारये ॥ १७॥ पश्वमनरथम्यक सव्यसाची महारय । मृदुर्व ततवन त्रिमि बिध्याप यफ ॥ २८ हलाय तु र तिष्ठन् द्रोणनस्तदा समपन् । मुषल पाण्डु धारी दोहजार रधियोंको मारकर निर्धूम अग्निके समान प्रकाशमान हुमा । १९॥ हे रामा नैसे कि मलयकाल में भगवान अग्नि सघ जड़ चैत योंको भस्मारके निर्धम दिखाई देते हैं उसीपकार कुन्तीका पुत्र अर्जुन दिखाई पड़ा । २० । फिर अश्वत्यामाने युद्धमें अर्जुनके पराक्रमको देखकर बड़ी पताकावाले स्थसमेत अर्जुन को गेका । २१ । तब परपर मारने के अभिलापी धनुपधारयों में श्रेष्ठ वह दोनों पुरुषोत्तम परस्पर सम्मुख हुये । २५ । हेमहारान उन दोनोंकी वाणष्ट ऐसीवड़ी भपकारी हुई जने कि वामृत वर्षा करनेपाल दोयादलोंकी होती है।२।। तब पापर ईवी करनेवाले उन दोनोंने गुप्तग्रन्धीवाले पाणोंसे ऐसे परस्पर घायल किया नै कि सागोसे दोपल परस्सर घायल करते हैं । २५ । हे महाराज उन दोनोंका पद देरतक सीधाभा इसके पीछे पहा शोंका घोरभंघटनहुमा। २५ । तर अश्वत्थामा ने मुनहरी पुंख और सुन्दरदेववाले चारह वाणों से अर्जुनको मार दश वाणोंसे वामदेवजीको घायल किया । २६ । इसके पीछे भर्जुनने यात हंसकर गाण्डीव भनुप को टंकारा और उस बड़े पुदमें एक मुहूर्त गरूका पुत्र मानकर । २७ । महारथी अर्जनने घोड़े सारथी और घनासे रहित किया इसके पोछे पड़ी मृतासे तीनशायकोसभी उसको घायल किया 1 २८ । तब मृतक घो? like the fire of praaja wluch destroge all Sveing Arjun's prowes, Aslis alliapia charkedl law with bis car. Tho two warriors then opp-at mel ollior and shumeral nrrota libe 11. They wounded each other as two bulls do with tle tr livros, Their battle was worribio and thero was a great cullochon of weapn. " Tbeu Asu vathara Wounded Arjun witli twilio acd Vasudev with to? ATUTTI. Then Arjun txangal tho gandi bow with a smile and depriyou the precor. tor's son of horrees, drusor and banner and mullig lut luon with three Arrows, Arliwathatua sinios, seut forth a clubat Arjur, whirs eing 20.
(6916) Mahaliharat । पुत्राय चक्षेप परिधोपमम् ॥ २९ ॥ समनन्तं सपमा हेमपदृषिभूषितम् । बिजेद | साधा पीर पाय: शत्रुनियहणः ।। ३१ सछि मुपल हष्टया द्रोणि पामकोएन । गददे परिघंघोर नगेन्द्रशिनरोपमम् । निन्छप ध पार्याय द्रोणर्युशपिशारद॥३॥ तमन्तमामय कुछ परिध प्रेक्ष्य पाण्ठ । अर्जुनस्त्वरितो जम्ने चगि सायकोत्तरी ॥ २२ ॥ ॥ छिन्नः पतिती भी पार्थाणेमहामृधे । दायर पृथिवी हाणा ममासीष A ॥ ३३ ॥ सतोपरनियोजन विध्याध पाण्डमा । मोतिवियो प्रलयता पान हमाह म सनातनवा क्रीणि गोड स्वे व्यवस्तिः ॥ २३ पातु ततो मारवाजोमबार माफिरछरमा सनर पश्यतः",३५१ तातुरघो यानी पांचालानां महारथः । रग मेघोषेण मोगियापायन ॥ २६॥ विकर्षन वै धनु श्रेष्ठ समारसह इदम् । अलमागिन मधिनाया विशत् ॥ २७ ॥ मुरथ पर संकुनमापत महारथम् । मोध समरे, सौपि वाले रम्पर नियत मन्दमुसकान करते अश्वत्थामा ने परिघाके समान मूशतकी शासन के ऊपर फेंका। २९ । शत्रुओं के मारनेवाले वीर अहुनने उस गर्गमयी बससे अलंकृत अकस्मात आये सूपलको सातखण्डकिये । ३० 1 बडे शोभारत अवस्थामा ने मूपमको हारा देखकर हिमालय के शिवरीमान महामोर परिषको दायर्मेतिमा मुद्धमें सावधान रम्पत्यामाने उसको अर्जुन के ऊपर का २१ । पण्डुनन्दन अर्जुनने उस बारारूप शोधमरी हुई परियको देखकर , शीघ्र हो पाप सम वागो स्तरावर निया ३२ हे गरनभ घड़े युद्ध मनके वाण से टूटी हुई पैच परिए पृतीक रहाराज मों के निचोंको विदीर्ण करतीहाली परही गिरपसी । ३३ । उसके पीछे को अन्य मानमार्णो अप्रत्याको घायल किया सब वरुपान मन के अधार अत्यन्त वापस स बड़े पराक्रमी भवत्यामानी अपनी मारतायें लियत हु।।३४ इसके पीछे महारथी मादार प्रश्न स्यामाने परथनाम खत्रीको सब शमिमीले गरे मामा के महरि ढकादया ॥२१॥ इस परन्तर पापाळीला महारथी हरय एम में बादल के समान मन्दाग पान स्थकी सवारी मे जवाणगाके सम्मुम म था ॥३६॥ स . पारने सारे पाले उसम दृष्ट धनुषो को हुये उसने पीनर सर्प के नामों the gold decled rint coving tos arda hım, cutit into seved posts $0 foaing $$4a broken mta pica 9, liq tool np & laugos parigh and Burled it as Arjun. Ent the later cot tiue niso into two. Catdowa by Arjir's arrows thr" paregh foll down on carth, rending the heart of the warriora Arjan lut Asherati me again with three arrows, the Initer trod in is glory on receiving the rounds. He covered Burath by this arrows 35. Then Surat, thr Panchal warrior, fore ! Ashwatta UP Or his car and covered then math nrrorg like linecr sarget, Sceing lin advance in bis rago, Alisetinna rag eurngu 111,07 srpen -- M । + gergå S'alya 1.aray 16917) हत इषोरगः,५.३८ ॥.त्रिशि,भ्रकुरी हत्या सक्कणीपरिसंलिहन् ।पक्षमा रोषाअनुामवमृज्य च । मुच तीक्ष्ण नारराय यमदण्डापमं युधि ॥ ३९ ॥ स तस्य' रदय भिस्वा,प्रविषशातिवेगितः । शानिरिवोत्कृष्ट विदार्य प्राण तलम् । ४० ॥ ततः स पतिता भूमी नाराधेम समाइतः पत्रेणेव तथा श्रङ्ग पर्वतस्थापिदारितम ॥४१॥ तमिस्तु निहते-चार द्रोणपुत्र प्रतापवान् । आमोह तर्ण तमेध गगिनां |घर: ॥४२॥ ततः सजो महाराज नौणिराहपदुदः । अर्जुन योधयामास संशप्तक, धृतो रणे ॥४३ । सयुद्धं मुमहच्वासीदेकस्य बहुमिः सह मध्यान्दनगते सूये,यमः राष्ट्रपिवयनम् ॥ ४४ ताश्चर्यमपश्याम दृष्ट्या तेसंक्रमम् । यदेको युगपती सर समयोधपदर्जुनः ॥ ४५ ॥ विमईस्तु महानामीदर्जुनस्प परैः सह । शतक्रतोया पूर्व महत्या दैत्यसेन या-1.४६. 1 इति शत्रवधपर्वणि संकुल युद्ध चतुर्दशोध्याय १॥ उसको हकदिया । ३. । भातेहुये महारथी मुरथको क्रोधयुक्त देखकर अश्वत्थामा ने दण्डसे घायल. सर्पके समान .युद्धमें क्रोधीकया I Cोठोंको चाटते अश्वत्यामाने भृकुटीको तीन शिखावली करके बड़े पोषसे. उमवीर मुरथको दिखकर धनुषकी मत्यंचाको चढ़ाकर यमदण्डके समान, प्रकाशित तीक्ष्ण नाराच को छोड़।। ३९ । इन्द्रयज के समान छोड़ा हुआ षद,नागच उसके हृदयको तोड़, 'पुत्री को धीरकर बड़े वेगसे;प्रवेश कर गया । ४०, इसके पीछे नाराचसे.विदीर्ण यह-वीर पृथ्वीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि ननसे फटनेवाले पदाइका शिखर गिरत! है।-४१ ॥ उस वार के मरनेपर.रथियोंमें श्रेष्ठ प्रतापयान अश्वत्थामा शीघ्रही उसी, स्थपर सवारहुये। ४२ हे महाराज फिर युददुर्मद महाभलंकृत -युद्ध में संसप्तकों ममेत भश्चत्वामाने फिर भर्जन,से: युद्धकिया;।४। वहां मध्याह्नवी मूर्यके वर्तमान होनेपर एकका बहुगों के साथ ., वह बड़ा :युद्धहुमा जोकि यमरान के देशका बहानेवाला था 1४४॥ यहां हगने उन्हों के पराक्रमको देखकर बड़ाः मार्य किया जो अकेला अर्जुन. एकः साथ होनेपाले बहुत से वीरोंसे लड़ा। ४५॥ एक का बहुतोंके साथ ऐसा बदा-पद्धहुआ जैसे कि पूर्वसमयमें इन्द्रका युद्ध देस्यों की पड़ी सेनाके साथ आया ४६ ।। woduded by a stick. Surath advanaxl'lowards hiw. Ashwathama discharged nt linı'nn nrror liku a vonvmous boabe. The arroio lav? ing picred through his breast entered the ground with great fotce. 10 .wourided by that arrow ho fol down like a crug detached from a hill. Having slnin liimi, Ashwathama suon tuounted his car, and followed. by the Sansapitahay la luught with Arjun. The battle was Beveren't rioon and increusol'llie population of'the region of Inm. We were amazed to seo tuo prvu.3 of Arjun who alone fought with viazy. and his batile was like tlint of Indra withgirls in the days of old. : 4G ।
1 3 116918) Dinuliharat (१९१८) सजय उराच । दुर्योधमा महाराज धपरम्नश्व पार्षत । धातु समास शर शागसमाकुलम् ॥ १॥ तोराप्तीमहाराज शरवारा सम्रा । अम्बु दान यथा पाले जलधारा समन्तत ॥२ | राजातु पार्षत विष्वा शरे पञ्चभिराशुगे । द्रोण ह तामुग्रए पुनर्षियाव रातमि. ॥ ३॥ कृपयुम्नन्तु समरे बलवार विक्रम । सप्तरया विशिष्माना पै दुर्योधनपाडयत् । ४॥ पारित प्रेक्ष्य राजान मोटरया भर तर्षभ । हत्या सना मार्ग परिषय स पार्थनम ॥ ५ | स परिबन शूर सर्वतो तिभृशम् । ग्यचरत् समर राजन् दर्शयल लावधम् ॥६॥ शिखण्डी रुतधर्माण गौतम महारयम् । प्रभद्रकै समायुक्ती योवयाभास धमिती ॥ ७॥ तत्रापि मुम रघुवं घोरका विशाम्पते । प्रणान सम्स्यज्यतां युद्ध प्राणतामि देवमे ॥ ८ शल्य स्तुशरवर्षाणि विमुञ्चन् सर्वतो दिशम् । पाण्डयान पाडयामास ससात्यकिवृकोदरान अध्याय १५॥ संजय गेले हे महाराज दुग्याधन और धृष्टद्युम्न ने भी बड़ा युद्धकिया वह युभी धागा और शक्तियों से व्याप्तमा ।।।हे महाराम उन दोनोंकी वागधारा ऐने प्रकल्हई जैसे कि समयपर चारों ओर से बादलों की जलधारा होताहै । २। फिर राजा दुर्योधन ने शीघ्रगामी पापवाणोंमे धृष्टद्युम्नको घायलकर के प्रमाण रखनेवाले द्रोणाचार्ग के मारनेवाले धृष्टधुम्न को साववाोस छैदा । ३ । फिर बलवान् इद पराक्रमी धृष्टद्युम्न ने युद्ध में दुर्योधन को सतर विशिखोंसे पाहामान किया । ४। भरतर्षभ तब उसके सगे भाइयों ने रानाको पीडामान देखकर बड़ी सेनासमेत घेलिपा । ५ । उससमय सबओरको उन भतिथियों से घिराहुभा वह शूर युद्धमें अस्त्रोंकी तीव्रता दिखाता हुआ मच्छेप्रकार से भ्रमण करनलगा । ६ । प्रमाकनाम त्रियों से सयक्त शिखण्डी ने धनुषधारी महारथी चाय और कमबर्मासे युद्धकिया । ७। राजामाणों के प्रतरूपी युद्ध में प्राणों के त्यागनेवाले उनलोगोंका घोररूप महायुद्धहुआ। । । फिर दिशाभों में शणघृष्टिको । करतेहुये CHAPTER XV Sanjaya said, " Duryodhan and Dhrrohtadyumn fought well with ATTONs and spears They showered their durts like rain Duryodhan wounded Darishtadyumn the slayer of Diona with five arrows and agana hit him with seren more The latter wounded the formor with Boventy Duryodhan's own brothers seeing hiri bu iflicted, surround ed him with their cars 5 Surrounded by those great warriors that bravo varnor shotrod his skill in the use of soapons Sarkhandi followed by the Prabhadrake, fought with Krtpacharya and Kritrarına Engaged in tho gam) al life and death, thoy fought a dreadful fight Showering lus arrows, Shulya soanded Sityahı anl Bhim tlio grea warriors of the Pandavas 'Similarly, Nakul and shadev, fullut . शल्यप Shalya Pary (6919) ॥९॥ तपोभी च यमायुखे यमतुल्यपराक्रमी । योधगमास राजेन्द्र धेग अबलेन च॥१०॥ शल्यसापकनुमानां पाण्डवानां महाघ । त्रातारं नास्यदच्न कौचत्ता महारथाः ॥ ११ ॥ ततस्तु नकुर भूपे धर्मराजे प्रपीडित । मिद्राय पोन मातुले माद्रिनम्वन ११२ ॥ श्राच्या समरे शल्यं नकुशः परधीरहा । विश्वाध चैन परामिः समयमातनार ।। १३ ॥ सपा शर्वाण कर्मा परिमार्जितः । सर्णपुंसः शिला पति धनुषधप्रचोदितः ॥ १४ ॥ शल्पस्तु पीडितस्तेम स्पन्नांयेण महात्मना । नकुलं पारपामास पत्रिीमनतपर्वमिः। १५ ।। ततो युधिधिोराना भीमसेनोऽथ सात्यकि। सहदेव माद्रपो मद्रराजमुपादयन् ॥ १६॥ ताना एवाशु पूरयाणाम्रयस्वनः। विश विदिशय कम्पयानांच मेदिनीम प्रतिजग्राहसमरे सेमापतिरमित्रजित॥१७॥ युधिष्ठिरं त्रिमिर्षिा भीमसेन सप्तमिः । सात्यकिय शतनाजी सावं त्रिभिः शरः ॥१८॥ ततस्तु सयरमपिं नकुलस्य महात्मनः । मद्रेश्वरः क्षुरप्रेण तदा विर अपने पांडवोंको सात्यकि और भीमसेन समेत पीड़ितकिया। १। हे राजेन्द्र इसी प्रकार अश्विनीकुमारोंके समान पाक्रमी उनदोनों नकुल और सहदेवले भी बल पराकम और अखोंकी मामर्थ्यके द्वारा प्रदकिया । १० । उसबई युद्ध में किसी | महाराने शल्यके शापकोंसे घायल पांवोंके रतकको नहींपाया। ११ । उसके पीछे माद्रीनन्दन शूर नकुन धर्मराजके अत्यन्त पीडामान होनेपर तीबतासे मामाजी के सम्मुखगया । १२ । शत्रुओं के मारनेवाले कन्दमुसकान करते नकुल ने युद्धमें इस बाल्यको ढककर उन बड़े उग्र दावाणोंसे छातापरं घायलकिया।१३। जोक लोहमपी कारीगरके हाथमे साफ मुनहर्ग पुरख तेजधार धनुपरूपी यंत्रसे प्रेरणा किये हुपेथे । १४ । फिर उस महात्मा भानजेके हायसे पीडामान शल्पने टेदेपर्ववाले बाणोंसे नमुलको पीडामान किया। १५ । इसके पीछे राजायुधिष्ठिर भीमसेन सात्यकि मादीनन्दन सहदव यह सब राजामद्रके सम्मुखगये। १६ । दिशाओंको रथों के शब्दों से पूर्ण करते भौर पृथ्वीको कॅपति शीघ्र मातहुगे उन वीरों को । १७ । युद्धमें शत्रु विजयी सेनापति शल्यने रोका तीनणसे युधिष्ठिरको पाचसे भीमसेनको सात्यकि को सौपाणोंसे और सहदेवको तीनवाणोसे छेदाभेष्ठ prowess like the Ashwinknmars, fought a good fight. 10. The Pandey warriors, wounded by Stualyn's arrowa,could find no protector. Souing Yudhishathir much afllichad, Nakul tho son of Madni opporou ins uncle. He wounded Sualya on the breast, with ten arrowa mado ontirely of iron, wall cleaned, sharp pointad and shot from the nuachinery ut bis bow. Wounded by his nepher, Shalça soanded niu with a dhrte 15. Jhen Yudhishthir. Bhim, Satyati and Sahader opposed Shalss, Filling the dinctiili Tith the sounds of their car wheels and shaking the earth, those gruat warriors were checked by shalya, who wounded Yudhishthir witbitbros arrows, 6920) Malhal harab मारिष । सदशीत विछिन्न धनु' शल्पस्य सायकै ॥ ३०) भयाण्यदनुरादाय माद्री पुत्रो महाथ । मद्रराजरये पूर्ण पूरयामास पत्रिम | युधिष्ठिरस्तु मदेश। सा देयश्च मारिष । दशभिशमणिहरम्यनमविध्यताम् ॥ २२ ॥ म मसेनस्तु तं बड्या सारयकिनसभि शर.। मद्रराजमभिद्रस्य जनतु' कङ्कपषिभि ॥ २३ ॥ मदराजन्नत कुखः सात्यकि मघभि शर । विध्याघ भूपा सप्तरया शरांगा मतंपर्षणाम् ॥ २५ ॥ अथास्य सशरचाप मुष्टौ घिच्छद मागिहवाच चतुर संख्ये प्रेषयामास मयो ॥ २५ ॥ चिर) सात्यकि रामराजो महारथ ।विशिखामा शनमाजघाम RA तत माद्रीपुत्रौ च सरधी मञ्च पाश्वम् । युधिष्ठिरस्य विव्याप दशभि शरैः ॥ २७ ॥ तपाद्भुतमपक्षपाम मद्रराजस्य पौरुषम् । यदन सहिताः पार्थी नामपन्त सयुगे ॥ २८ ॥ अथान्य रयमास्याय सात्यकि सस्थषिक्रम पडिताम् फिर भी राजामदने महात्मा नकुलके धनुषवाण को तुमसकाटा तेष'शल्य केशायकों से कटाटुआ यह धनुप गिरेंपडा । २०। इसके पीछे महारथी नकुलने दूसरे धनुर्प को लेकर शीघ्रही राजामदके रंधको पोणोंमें भरदिया । श्रेष्ठ फिर युधिष्ठिर और सहदेवने दर्श २ वाणीमे इस मद्रके रागको छाती पर घायल किया । २२ । भार भीमसेनेने राजामद्रके सम्मुख जाकर कपक्षयुक्त साठवाणोंसे और सात्यकी ने दर्श वाणों से उसको घायल किया । २३ । इसके पीछे कीधयुक्त राजामद ने सात्यकी को टेटे पवाले नो भार सत्तरवणों से वायलंकिया' २४ इसके अनन्तर इसके धनुपको भी बाण समेत मृठके स्थानपर काटकर चारोबोड़ों की' भी कालके वंशकिया । २५ । महारथी राजामद्र ने सात्यकि को 'विश्य देख का सौं विशिषों में उत्तको चारों ओर मे घायल किया।२६। हे कौरव फिरक्रोध से पूर्णने मादीके दोनों पुत्र भीमसेन और युधिष्ठिरको दशरवाणों से घायल किया । २७ । वही हमने राजामद्रके अपूर्ण पराक्रमको देखा कि सर्व पांडव मिलकर भी उनके साथ युद्ध में सम्मुख नहीं हुयै ।२८ । इसके पीछे वलवान सत्य पराक्रमी Bhim with a hundred and Saladoy with three "Ho cut down.Nahul's "bow with a dart 20 He took up another bow and filled Shalya's car with irroys. Yudhishthir and Sahadev wounded him with ten arrows onth on the breast, Bhim and Silyakt wounded him with severi and ted arrowa rasp' cligely Slialya, much enraged, wounded Satyakı with seventy me arrows and having cut his busy, slow his horses too, 25 The bia90 king of Madro, geslag Satyaki deprived of the use of his car, woundot him from all sides He wounded the two sons of Madra, with Bhim and Yudhishthir, eacl. with ten arrows. Than wo baw the matchless pronos of the bing of Medra abom all the Pandavas together could not oppose. Braye Satyahı mounted another che and Seciag the Pandayas aflcted by Sbalya, facod tbo'latter.
A (१९२१) शल्यपर्व Shalya Parv 189211 गण्डा हा मद्ररात्रशान् । अभिदुद्राय पेगेन मद्राणामधिगं पली ॥ २० ॥ थापन र नस्य शला ममितिशोमन । प्रत्यधयों रनरमत्तो मत्तमिद्विगम ॥ ३० ॥ स मनिपातस्तुमुलो धभूवाझुदर्शन । सात्ययेचा शरस्य मदाणामधिपस्य च पाहशो पुगत. शम्परामागजयो ॥ ३२ ॥ सात्यकि प्रेक्ष्य समरे मद्रराज व्यवस्थितम् । विष्याप दशभिर्याङ्गस्तिष्ठ मिष्ठेलि चामधीत् ॥३३ ॥ मद्रराजस्तु मुझा विलेन महारनना । सात्यार्फि प्रतिविम्याच चित्रपुरी शिनः ॥ ३४॥ तत पार्षा महासा सरितामिसनं नृपः। अपरमधातूणे मातुल घधकांक्षया ॥ ३५ ॥ तन भासीत पराई स्तुमुल शोणिोदक शराणां युध्यमानानां खिहानामिव नई साम ।। ३६ ॥ सेपामासीन्महाराज प्रतिक्षेप परस्म । सिंहानाममिप्सुना कूजतामिय सयुभे । ३७ ॥anाणसहस्राघराकीणी धमुचामपत् । अन्तरीक्षम्त सहसा धाण सनमभूत्तदा ॥ ३८ घार बहुधा कृत तत्र ममन्तत सम्रच्छाये सजने सास्यकि दूसरे रपार निपन होकर समापदके आधीन और पाहामान पांडगे को देखकर तीयता से शल्यके मम्मुखगया । २९ । युद्धका शोभा दनवाला शल्प रथकी सवारीसे उस भाते हुये रयीके सम्मुख ऐसे गया जैसे कि मतवाला हाया मतगाले हाथी के सम्मुख होगाई । ३० । शूर सात्यकि का और राजामद्रका वह युद्ध ऐशा कठिन हुभा । जैसा कि पूर्व समय, सम्बर और देवरामकायुद्ध हुआया ३२ । सात्यकि ने युद्ध में सम्मुख पर्षमान नामको देखकर दशवाणों मे पायल करके निप्ठपादकिया।३५॥ फिर उस महात्माके हाथमे कठिन यायल रामामने अपूर्व पुंखवाले तीक्ष्ण बाणों से सात्यकिको घायल किया । ३४ । | इसके पीछे बड़े धनुपधारी पांडव मुनय भार यादव रयोंकी सवारीमें मामाके पारने की इन्छाओं से शीघ्र सम्मुलगये। ३५ । उसके पछि सिंहके समान गजेने वाले शूरवीरोंका महाकठिन युद्ध रुधिररूपी जक रखनेवाला जारी हुआ । ३६ । हे महारान युद्ध मांसके अभिलापी सिंहोंके समान गर्ननेवाले उन घरों की पासर पाई गहुन अछी हुई। ३७ । उनों के बाणों से हनारों समूहों में पृथ्वी भागादित होगई और भन्नरिक्षभी अकामात वाण होगया । ३८ वचारों Shalyn oppyat him at ona msl elephant doos another. 30, The battle botrrsen Satyaki and 8 alga vas bard like that of Slimrar anul taira ia the days of old cing Shalga before tim, Satyaki wounded him. with tch arrora and aard 'Sas, stay." Hard pressod by bım, &inlya vogadel Bityakı with shrep arrows. The great Panday archery, with the injagas and Yudaras, ca mo n ther care to opposs Shalya. 35 Then the warriors Caught hard wnb loodud roan Like lions, grendy for desh, they attackod one' Another. Thd ground was covered with thoir arrowl The clouds of xytowe made tbc sir dark as if overcoat with clouds The gold 8 - (6922) Malablarat (६९२२) चौमाहात्मभि । ३९॥ तत्र राजम्छरेर्मुक्तीगर्मुक्तीरव पन्नगे । स्वर्णपुले प्रकाशा यवन्त दिशस्तदा ।। ४० ॥ तत्राद्भुत परचक्रे शल्प शनिहिण । यदेक समरे शरो योधयामास घे घहून ॥४१॥ मराजमुजोत्कृष्ट कहिणघोजित । सपना शोधाररवाफीयंत मेदिनी ॥४२ सत्र शल्यरय राजन विचरन्त महाये । अपश्याम पया पूर्व शक्रस्यामरसक्षये ।। ४३ ॥ इति शल्पपर्वणि शल्यवधपर्वणि संकुलयुद्धपञ्चदशो ध्या,१५ ॥ ar b सम्भय उधारात सैन्यास्तव विमो मदराजपुरस्कृता । पुमरस्यद्रधन पायर्यान धेगेन महता रणेसापीडितास्ताषका सर्वे प्रषायन्तो रणोरकटाक्षणेनैव पार्याले पर मोरसे अनेक प्रकारके वाणोंका भन्धकार करनेपर महात्माभोंके छोड़े हुये वाणोंसे बादलों से कीसी छाया उत्पन्न होगई । ३९ । हे राजा बहर मुनहरी पुंखवाले प्रकाश मान काचली से छुटे सोंके समान छोड़े हुये बाणों से दिशा शोभायमान हुई।४। शत्रुषों के मारनेवाले शल्पने वड़ा अपूर्व कर्मकिया जो अकेलेही शूरवीर ने युद्धमें पहुनीक साथ लडाईकरी । ४१ । राजामंद्रकी भुजासे छोडे हुये कंक और. मोरके परोंसे नटित गिरते हुये घोरवाणोंसे पृथ्वी आच्छादित होगई। ४२ । वहां बड़े युद में शल्यके घूमो हुये रयको ऐसे प्रकारका देखा जैसे कि पूर्व ग्रमपमें अमरोंके नाश में इन्द्र का रथ हुआथा ४३ ॥ 3 अध्याय १६॥ मंजय बोले कि हे समय इसकपीछे भापकी सेनाके लोग जिनका अप्री राजामदया यही तीम्रता से फिर पांडवों के सम्मुख गये। । युद्धमें मतवाले और decked Hirow, bright lika srpunte freod from skına, brantified the land everywhere 40, Shalya the destroyer of foes did deoda of wonder Alone he fought with many and covered the earth with Arrows fitted with valture and peacoch quills We saw Shalya's car ronning in the field of battle like that of logra at the time of 119 destroyiog the asurs" 43. CHAPTER XVI Sanjaya 841d, " Then the marri018 of your army, headed by the Ling of Madra, again opposed tho Pandarus and dispersed them with - शल्यप Shalya Paray (1023) चार सालोडयन् ॥ २॥ ते पायमाना बुरभि पाण्डपा नायतस्थिरे निषाध्यमाणा मीमन पश्यतो कृष्णपर्थियो ॥३॥ ततो धनम्जय कुख अप सह पदानुग । भवाकि गण कृतधर्मानमेव च ॥ ४॥ शनि सहदेवश्च संस- समवारय । नाळ पात स्थिया मदराजमक्षत ॥ ५॥ द्रौपदेयान मरेन्द्राश भविष्ठान समवारयन् । प्रोणपुत्रञ्च पाभ्याल्प शिखण्डी समधारयन् ॥ ६ ॥ भीमसेनस्तु राजान गदापाणि रपारपत् । शरयन्तु सह सैन्येन कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर 11 तत समय ससक सत्रह तावकामां परेषाञ्च सप्रामेबनिवतिनाम् ॥ ८ ॥ पश्यामकर्म शस्यस्पातिमाहवणे । यदक ससैन्यानि पाण्यसनामयुध्यत # ९॥ व्यद्रश्यन्त तदा शयो युधिष्ठिरसमीगत । र, चन्द्रमसोभ्यास शनैश्चर इष मह ॥ १०॥ पाडयित्वा तु गजान राशीविशोपमै I मध्यधावत पुमीम शरवरषाकिरन् ॥ ११ ॥ तस्य पाहामान दौड़ते हुये भाप के उन सब शरवीरोंने आधिक्यता से क्षणभरमें ही पांडवोंको छिन्न भिन्न करदिया ।२। कौरवोधायक यह पांडव श्रीकृष्ण और अर्जुनके देखते भीमसेनसे रोकहुयेभी युद्ध में नियत नही । ३ । उसके पीछे कोष युक्त अर्जुनने कृपाचार्य और कृतवर्मा को उनके साथियों समैन वाण समूहोंसे दक दिपा । ४ सहदेव ने शकुनी को उप्तकी सेना समेत हटाया नकुलने एक भागमें निपत होकर राजाभदको देण। ५। और द्रौपदी पुषोंने भी बहुत रामाभोंको रोका पाचारदेशी शिखण्डीने अश्वत्थामाको रोका। ६ । और गदाधारी भीमसेन ने रामाय्योधनको रोका कुन्नी के पुत्र युधिष्ठिरने सेनासमेत शल्यको रोका। इसक पछि युदसे न लौटनेवाले आपके शूरवीर और मतिपक्षियों के शूरवीरों का युद्ध जहां तहां बहुत कठिन हुमा ।। यहाँ हमने युद्धौ शल्यके बहुन बरे कर्मको देखा जोकि अकेलेनेही पाहयों की सब सेनाओं से युद्ध किया । ९ । तर शल्प उस युद्ध में युधिष्ठिरके समक्ष में ऐमा दिखाई पड़ा जैसे कि चन्द्रमा का सम्मुख पनीचर नक्षत्र दिखाई देता है। फिर विषैले सर्पकी समान पाणौसेर जा को पमान करके भीममेनके सम्मुख दीटा और वाणों की वर्षा से ढकदिया ibo Mights of their arrows Wounded by the Kauravas, the Pandavas could not stay in spite of the exertions of Bhim and fled away in the presjach of Irishu aad Arjan Thon Arjun hid brspucharya, Anttorms and their follwers with arrows. Sabader checked Slakun and his arruy Add Nakul opposod dnalyn 5 The aods of Draupadi checked many kings and şluktardı chicaked Ashwatham. Bhim the tacu baror checked Duryodhao and Yudhishthir checked Shalyu Then your warriors ſought band with thc Paudaras TWO nok Shalyn'y provossHe alono fou lit against many he WRA Kada opposing Yudislithe ag Saturn dous tim mcos. 10 Having wounded tho king with his darts liko yeuomons sarpeuls bo rushed and bus atmy .- - (6924) Mahalharat (६९२४) तरलाघर रष्ट्या तप च एतानताम् । अपूजयाननीकानि परेषा ताबकानि च ॥१२॥ पीयमानास्तु शत्येन पाण्डया भूविक्षता । प्राष्ट्रपति रण हिवाशिमान युधिष्ठिरे । यध्यमानेष्यगोषेषु मनराजन पाण्य. । समयमापनो धर्मराज युधिष्ठिर. ॥ १४ ॥सत पौरपमास्थाय गदराजमपीयत । जपो पारनु जोति बुद्धिम धारय। १५ ॥ समायाप्रति सन्मानन क्षणच माम मोद्रोण कर्ण ये चान्ये पृथिषीक्षित.॥ १६॥ कारवाये पगाrat. Rमामे धन : यथामागं यथोरसाहमपन्त कृतपरिणः ॥ १७॥ मागोऽमशिए एकोऽयं मम शल्यो महारया । सोहम युधा जैतुमाशस भद्रकेश्वरम् । तत्र यम्मानस मद्य तत् सर्व निग. दामि य. ॥ १८ ॥ चमरक्षाविमी पूरी मम मात्रपतीसुतौ । अजेयो पासघनापि समरे धीरसम्मती॥ १९ ॥ साध्यिमो मातुल युवं समधर्मपुरस्ट तो । मध्यप्रति युष्यंता मानाही सत्यनगरी ॥२०॥ मामा शल्यो रणे (न्ता तं वाह भमस्तु घ । इति सत्या । ११ । प्रापको और दूसरों की सेनाओं ने उसकी इस्तनापरता और अनन्नताकी प्रशंसा करी । १२ : फिर शल्पके हाथले पाहापान अत्यन्त पापल पांडव युधि घरको पुकारते हुये युद्धको छोड़भागे । १३ । रामामदके हाथसे सेनाओंकि पायल होनेपर धर्मराज पाण्डव युधिष्ठिर क्रोधके वशीभूत हुये । १४ । इसके पछि विजय होय वं पराजपहोप यह निषय करनेवाले युधिष्ठिरने वारता में नियत होकर राजामद्रको पीडामान किया । १५ । सबभाई और माधव श्रीकृष्णमी को बुलाकर बोला कि भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण आदिक जो अन्य राजालोग थे।करिवी के निमित्त उपाय करनेवाले उन लोगों ने युद्धमें नाशको पाया,भापलागे भाग और उत्साहके समान पराकम करनेवाले । १७ । यह महारथी अकेली शल्य मेरा भाग शेपहै सो मैं अय युद्धके द्वारा रानामदको विजय करने की आशा करता अब जो मेरे चित्तकी इच्छा है वह सर मापसे कहता हूं। १४ । माद्रीके पुत्र शेर नकुल और सहदेन मेरे चक्के रक्षकहोय जोकि युद्धमें इन्द्रसेभी मनेयहो कर वारी के प्राकृत है । १९ । अच्छा है यप युद्ध में सत्रीधर्म को भागकरनेवाले पति- against Blnu nud wounded bin witlu la 18 arrows, The warriors of both sidos praised bis dexterity of hand Exceedingly wounded by Shalya's arrows they ran away calling Yudh ishthir for help. Yu. dhuhtuur was enraged to see his army tvounded by Dalys. Standing fi mly for victory or defeat, Yudhishthir wounded Shalyn 15 He gathered his brothors and Sari Krishn and said, " Bhishm, Dronn Karaa and others have died fighting for the Kautavas, You have slain them all Shalye alone remains a9 my share and I mean to conquer lum I therefore say to you wiat passes in my mind, Lu: Nakul and Sebedev invincible by India, guard my wheels and let them tight with thur uncle' Shilya" like geol keliatı yas 20. Either Shalya will stay शल्य Shalya Party (1925) मिमी वाणी लोकपीग नियोधत ॥ २१ ॥ योत्स्याई मालेगाघ क्षनधर्मेण पार्थिवा स्थय सममिसम्याय विजयायेतराय यः ॥ २५॥ तम्प मेऽपनि सापकरणानि च । संयुज्यन्तु ग्थे क्षिम शारनपदययोजफा. ॥ २३ ॥ शनयो दक्षिण च धम्म स्तोत्तम् । पृष्ठगोपो भरपच मम पार्यों धनञ्जयः॥ २४ । पुर सगे ममाघास्तु भीमाशम्रतापर. । पयायविक शल्यषिप्यामि महामृधे ॥ २५ ॥ यमुहा तथा चकु. सई गल. मियविण ॥ २३ ।। नय प्रहर्ष, सन्याना पुनासीत् तदा मृध । पाचालानी सोमकामा मत्स्यानाच विशेषत, २७ ॥imal at सदाराजा,रत्या समभ्ययात् । तत.शंपाच भेरचि शतशश्चैव पुपलान् । अगदयात पाश्चाता सिंहनादांश्च नेदिरे ।। २८ ॥ तेषघायात सरख्या मदराजन्तरास्सिन मिहता हपजे नाम नादन फुरुपुद्धा ॥ २९ ॥ हादेन गजघण्टात माद्वानों निगदेग च। सूर्यशदेन छाके योग्य संत्यसकल्प नकुल और सहदेव मेरे निमित्त मामा से युदकरें। २० शल्य युद्ध में मुझसो 'मारेगा अथरा मैं उसको मारूंगा तुम्हारा कल्याणदीय 'हे लोकवीर राजालोगो तुम मेरे इस मत्य मत्य बननको जानो ।२१ । मै तनी धर्म से मामाके साथ सड़ेगा में विजय य पराजय को निश्चय कर रहूंगा । २२ । अब मेरे सब शस्त्र और सामानों को रथ जोड़नेव ले मनुष्य बहुत शीघ्रता से बास्त्र के अनुसार स्थपर रपखे । २३ । सात्यकि दक्षिणी चक्रकी' और धृष्टद्युम्न उत्तरचक्र की रक्षाकरें अब मेरे पृष्ठका रक्षक पांडा अर्जुन होय । २४ । और अन पशिस्त्रधारियों में श्रेष्ठ बलवान भीममेन होय इसप्रकार शल्प से युद्ध में अधिक हूंगा । २५ । इस प्रकार के वचन सुनकर राजाके हित चाहनेवाले सब लोगोंने उसी प्रकार किया २६। इसके पीछ सेना में बड़ी प्रसन्नता उत्पन्नहुइ विशेष करके पांचाल सोमक और मस्यदेशी लोगोकी प्रमनता वहत कंदहुई । २७ । तब राजायुधिष्ठिर मतिज्ञाको करके शल्यके सम्मुखगया उसकेपछि पांचालोंने सैकड़ों शंख और उत्तम भरियोंको बनाया और सिंहनादोकोकिया।२८ आर क्रोधंयुक्त होकर उस राजामद के सम्मुख दौड़े' फिर येष्ठ कौरव प्रसन्नतासे उत्पन्न बड़े ma or I shall clay him • ] shall fight with my uncle Jiks a brave, man for victory or defeat. Let theia put all the requisites ou uy car. Let Satyakı protoet my right wheel and Dhrrohladyumn the Led Arjun protect my baik and Bhim the fore runner of my warriors lead the way. Thee I shall become cupe los to Shalya. " 25• Having heard this, all the well wishers of the king did. as they were told to do. The people of the army, specially the Panchale, Someke and Matsyae, were much pleased. Haring formed this resolution, ) udbyhthir faced Shulga and the Panchals Hounded || conchs and drums and roared leonine roats They attached tre king of Nadra in anger The Kauravas ringing the earth with left one nA (69) I will be गहता मादयस्तथ मेदिनीम् ३०॥ तान प्रत्यगृहनातू पुत्रस्त प्रगजब पीयवान् । महामेधानिय घान् शालाबानोदयाघुगी॥ ३१॥ शत्यस्तु समर लाधी धर्मराज मम् । वर्ष शायण घर्षण मघयामिव ३२॥ सधैर पुकाजोपि प्रगृह्य बधिर धनु । द्रोणोपरशा वियिधान् पर्शयाना महामगा । ३३ ॥ वपर्प शरण चित्र लघुप मुष्ट पनि वास्प पिचर विदर्श घरतो रणे ॥ ३४ ॥ साधुभी विविधषाणस्तत क्षात परस्परम् । शालापामिर पराकानषिधाइये ॥ ३५ ॥ भीमस्तु तव पुत्रेण रणशीन सगत पाल्प सात्यकिय मादीपुत्री च पापी । शानिप्रमुखान् वीरान प्रत्यगृहम समग्तत । १६ तदासीनमुल युर पुनरेव जयरिणाम | तासको परेप राम् उर्मप्रित H३७दुधमत भीमय शरणाम Anas | शब्दमाले हाथियों के घी भीर शेखों के शश और ती वाजे गदे शब्द से रथीको शब्दापमान करते सम्मुखहये।३ उमममय आपके पुत्र भौर पराकमारामा मदने उन रात पांडवोंको ऐसे रोका जो कि भताचल मार उदयाचल पर्वत बहुतमे बड़े र बादलों को रोकते हैं।। १ । फिर युद्ध में प्रशंतनीय शल्प पाणों की, व से शत्रुओं के विजय करनेवाले धर्मगनपर वर्षा करनेलगा जैसे किना की वी इन्द्र बरसाता है। १३ । उसीप्रकार बरे स हसी कौरवराजनेभीव्रोणाचार्य की नानाभिक्षाओं को दिखगो वाणों की वर्षा को बरसाया । ३३ । यह वारण दृष्टि अपूर्ण तरुण और मनोहरवा और युद्ध में घूमते हुये उसक छिको किसी ने नहींदेखा ।।४। उन दोनोंने नानाप्रकार के पाणोंसे परसा ऐने घायल किया जो कि मांसके अभिलापी युद्धमें पराक्रम करनेवाले दो शार्दूल होता । ३५ फिर भीमसेन उस युद्धमें कुशल आपके पुत्रमे लड़ा धृष्टद्युम्न, सात्यकि पांडय' नकुल' और सहदेवने शनी प्राविक वारों को चारोंमोर से रोका । १६ । रेरामा भापकी कुमत्रता होनेपर विनमामिलापी आपके पुत्र और प्रतिपक्षियों का | फिर युद्ध जारीहुआ । ३७ । दुर्योधन ने रे पगले वाणो भीममेनकी उसध्वना elephant bells, conchs and trumpets, facud tt.om.80 Then yout pon and Bhalyn checked the Pandavas as Ingh lills check clouds, Brave Shalya showered his arroiive Yudlitslither the destroyer of foca The Kaurav prince gave proof of the superior tralainy which be bad recorved from Drona and showered arrowr. Ilat shower of au1oWA puntchless, sharp and spteresting Nono could see any defect in binn wbilo ho was roaming in the field of battle, I hoy wounded ono anothot with arrow! liko txo li ns greedy for flesh Tlion Blum fought with your son and Dhrishtndyumn, Batyakt, Nakul, Rul giladov chiclod your warı sors. There was a very dreadfut batthu beticen tho w partios on açovunt of your evil poloy Duryodhan cut dosen the gold decked standard of Bluin bright like tho Sin THU [६९२७) शहरप Shalya Paray 16927) धादिश्य संपामे बज रेमविधिनम् ॥ ३८॥ स किगीयाजालेन महता चामाशंग गपाल मचिर: मण्य भीमसनम्य मापद | ३९. 11 पुनधापि धनुधिध गराजकरोप मम् । अरेण सिाधारण प्रयकर्त नराधिप10स छिनारा तेजरी रयशस्था मरे तपषिदोगसि विझम्य सरयोपस्थ आविशत् । तस्मिन् मोहमनुमाप्त पुनरेव एको परः । यतुर शिरः कायान् सुप्रेिणारशक्षा ॥ ४२ ॥ ससूना पास्तस्कारमा दाय मारन । पदयन्त दिशो राजन् हारस्कारस्तताभवत् ॥ ४३ ॥ समयभार प्रणा द्रोणपुमो महारपः । कृपय छतवर्गाच पुत्रं पति ॥ ४४ तस्मिन् निललिते सम्पे प्रतापस पामगा गालीचा विस्फार्म पतामह १४५॥ युधिष्ठिरस्तु देशम पायामा संचोदयनश्वान पस्तषणांमनोजधान #inाइसमपश्याग कुन्तीपुत्रे युधिष्ठिरे। पुरा भूरया मृान्तिी सत्ता वाम को नोकि मूर्यके सपान प्रकाशमान भौर सुपर्णसे अलंकृतथी काटा।३८ हेपटाई देनेवाले भीमसनकी यह जा जोकि क्षुद्रटिकाभों के बडेजालले सुन्दर दर्शन और चित्त रोचक पी युद्धभूमि में गिरपड़ी ॥३९॥ फिर राजाने उसके उस धनुपके जो कि रत्नोंसे जटित मार गजराजकी मुंडके समान था तीक्ष्णधारयाले क्षुरपसे काटा । ४० । उसटे धनुषाले जस्सी पराक्रमाने स्थशक्तिमे आफपुप्रकोछाती पर छेदा तर पह रपके बैठने के स्थानपर गिरपडा। ४१ । तव उसके भवेतहोनेपर भीमसेनने पुरमसे उसके गारफि शिरकोकाटा । ४२ । हे भरनयंशीरामा धृत राष्ट्र तक जाने पर घोड़े जिाका कि साथी मारागपा रथको लेकर 'दिशाओं को मागे घस हेतुमे वडा हाहाकार हुमा । ४३ । या घलयन सस्थामा कृपा. चार्य कृतवर्मा, मापन चाहनेवाले यहमव रक्षाके निमित "उसकी भोरकी दौड़े ४ा उस सेनाके चलायमान होनेपर उसके पीछे भागेवाले लोग भयभीत हुरे बम गागडीव धनुषधारीने धनुषको टंकारकर उनको वाणोंसेमारा । ४५, फिर गोधात युधिष्ठिर चित्तके समान शीघ्रगामी अपने शेतवर्ण के घोड़ेको चलायं मान करता राजामद्रके सम्मुख दौड़ा । ४६ । वहाँ हमने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर में standard of Mim, fit trd with small bells add pleasing to the oye, 'down on the ground. The king cut also his geň bedecked "bow, liko the trunk of an elephant, with his shorp edged Arrow, 40. Bhim pierced your son's breast with a spear and he fell down on his seat Thion Bhiwu cut duy n the fond of his driver with an arrow. The driverlege horsog ran away with tho car and there were crics of dismay raised front all the warrios, Mighty Ashwatha'ma Kripaoharya, Krotvarına 'nnd luix other well-wishereran or to help him. During that hubbab 119 followers wero coufused aid tho violder of Gandiy hit thon with his ariowa: Then Yudhishthir in his car drawn by wlute horse, stiſt like the mind, attackał the king of - fen ja the car, (GB) Mahabarat (१९२८) गोव्यत् ॥ ४७ ॥ विनाक्षम्नु को-नवेपणानध मन्यु चिद योपामिशित भले शतसहनश ॥ ४८ ॥ या या प्रत्युद्ययो सेगतता ज्येष्ठ स. पाण्डुप । शो रपातयद्राजन् गिरीन् यजेरियोत्ती. ० ४९ ॥ साधमूसध्धजस्थान धिन पारयन् यहन् । माक्रीदेको घलगन् पयनस्तोयदानिय ॥ ५० ॥ साश्वारोहाच तुरगान पत्ती थैव सहस्रश । व्यपाथयत संग्रामे खो र पनिर ॥ ५१ ॥ भूम्यायोधनस्या, शरय समन्वत । यपद्रवत मदेश तिए शल्येति चारपात् ॥ ५२ ॥ तस्य तस्व रित हष्ट्या संग्रामे भीमकर्मण 1 मित्रमुत्ताधका सबै शस्यत्वेन समस्यात् ।। ५३५ त स्तोतु मुसाको प्रमाप्य सलिलो सत्रौ । समाहय तहमयोगासवनी समीयतु, ॥५४॥ शल्पस्तु शरण युधिष्ठिरवाफिरत् । मद्रराजाच कौम्नेय शावरबाकि अपूर्व चमत्कार को देखा कि नो प्रथम मृदु और जिन्दी होकर फिर कठिन हुआ। ४७ । फिर फैलेने को पसे कमागमान कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिरने तीक्ष्णधार भल्लों से लाखों शूरवीको मारा । ४८ राजा यह बडा पाण्डव जिस सेनाके सम्मुख गपा उस सेनाको वाणोंसे ऐमा गिराया जैसे कि उत्तम- वजों से पर्वतों को गिराते है । ४९ । अकेला पराक्रनीघोडे सारथी धजा और स्यममेन बहुतसे रथ सवारों को गिराता ऐमा क्रीडा करनेवाला हुमा जेते वायु बादलोको गिराकर क्रीडा करनेवाला होता है । ५० । उसने युद्ध में अश्वमवार घोडे और पतियों को ऐसे हजारों प्रकारसे नाशकिया जो कि क्रोधरूप रुद्रनी पशु भोंका नाश करते हैं.५४॥ चारोंमोर वाणों की वाम रणभूमिको निर्जन करके राजा मद्रके सम्मुख जाकर तिष्ठरशकों को किया ॥५२॥ आपो सव शूवीर उमभपकारी कर्मकता युधिष्ठिरके उसकर्मको युद्धमें देखकर भयभीतहुपे फिर शस्य उसके सम्मुख गया 1५३, तर पददोनों अत्यन्त क्रोधयुक्त शङ्खाको वजाकर परस्पर युलाते , और घुडकताये सम्मुखपे । ५४ । सम शल्यने वाणों की वर्षा से युधिष्ठिरको पीडामान किया और कु तोकेपुत्रने भी वाणों की दृष्टियों से रामाशयको हादिया। ५५ । Dadra Thin 16 saw the wonderful prowess of Yadhishther who, mld in the bozmnng wo hard at last. Then with cyos dilated in anger, he killed thousands of Warriors with luis arrow Hb slow the Warriors with his allows, In wlintevar direction he wenthus moun tains fall dora by vajra. fiking horses, drivers, bannora and Cars fall down with hus ai ruw, 119 displate them as the wind does the clouly 50 HD destioyall the horse anl foot in thousan ls of ways as Ridra destroys animals Annulating the people of thia army. hu laco I the king of Midra and said to liim, Saty, saty Seeing the prowess and the dreadful doods, tho warriors were terified Shalya again opposod lum They attacked and challenged oach other with the blasts of conchs and woundcu rach othur with their 1. .
16929 geng Shiniga, arv रत् ॥ ५५ ॥ यहश्येता सदा राजन् कडूपनिभिगहने उद्धिनरुधिरो शारी मद्रराज युधिधरी ॥५६॥ पुष्पितापिय रेजानेखने शारगलिम्किी । दीप्यमानी महात्मानी मेदतुर्युव दुर्मद ।। ५७ ॥ सप्दया सर्वाणि सैन्यानि नाध्ययस्यस्ततोज्जयम हस्या मद्राधिप पार्थों भोल्यसेव वसुन्धराम् । शल्यो वा पाउच हत्या पद्यातुर्योधनाय गाम ॥ ५९ ॥ इतीय निधो मामूद्योधागो तत्र भारत । प्रदक्षिणमभूत् सर्व धर्मग जस्य युध्यत ॥ ६ ॥ ततः शरशतं शल्या मुमोवान युधिष्ठिरे। धनुश्वास्य शिता प्रेण धान निरकतत ॥ ६१ सन्यत् फार्मुकादाय शल्यं भारतत्रिभि । अपि यत् कार्मुकश्चास्थ सरेण निरसन्यत ॥ ६२ ॥ अपास्य निजधानावांचतुरो नतप पनि वाध्यामतिशितागाभ्यामुमो च पगसारथी ॥ १२ सोस्य वाप्यमानेन पातन मिशिंतन ।मुख वमानस्य मनापाहरघजम् । ततः प्रम तत् सन्य वोधनमरिन्दम ॥ ६४ तो महाधिपं द्रौणिरभ्यधावसधारतम् । भारोप्य स्थर | सब शरप और युधिष्ठिर दोनोनीर वालों से पितहुये रुधिरसे पूर्ण शरीर दिखाई पड़े । ५६ । प. प्रफुल्लित शारमनी और किंश नाम क्षोंके समान दोनों शोभायमानहुये उन प्रकाशमान प्रागोंके छा से दुर्मद दोनों पो देखकर सब सेनाके लागाने विजय को नहीं निश्च किया मर्थात् यह सङ्कल्प विफल करने लगे कि बन जानिये पांडव शल्पको मारकर पृथ्वीको भोगेगा प पाएडव को मारकर शल्य इम पृथ्वी को भोगेगा, अथवा शल्प पाण्डयको मारफर इस सब पृथ्वीको धनके अर्थदेगा ।५९ हे भरतर्षभ यहां शस्वीरों को यह निश्चय | नहीं हुआ युद्ध करनेवाले धर्मराज के सप सहनादिक दाहिनेहुये । ६० । इसके पछि शल्यने सौ वाणोंको युधिष्ठिरपा छोडा और उसके पशुपको विष्णधार वाले तुरसे काटा ।३१। उसने दूसरे धनुपको मेकर शल्यमा तानसी यागासेछेदा और तुरसे है। उसके घनुपकोकाटा फिर टेपर्चयाले वाणों मे उसके चापोड़ों को मारा और तीक्ष्ण दोवाणों से दोनों भागे पीछे वालों समेत साधी को गरा । ६३ । फिर प्रकाशित पात तीक्ष्णधार पाण से और भलसे उसके। घना को काटा हे शत्रुओं के विनय करनेवाले इसके अनन्तर यह दुर्योधन 55. The bodies of both Shalya und Yudhishthir Tele" pirerced all through with arrows and loohod like Kingruk or Shainali treon in bloom. Nuno of the satriors could dai couclusion of victory from their battle, i o. they did nnt know whothor Shalya woulil xlay Yudhishthir or the latter would slay tho foi mor. Good omens oppear. al to the right or Yurihishthir during the battlo. GO. Then Shalya dischargod a hundred arrows at Yudhish thir and cut bis bowy with a dart. Ha tuok up another boy and wounded Shalya with thos hundred Arrows, cutting his byt with an arrow and breaking his standard with another. At thir Daryr«lhan's nrmy diaporal. Ashwa. - arrors.
(6930) Malial,harat (१९३०) यनेनं सराय प्रयुधे ॥ १६॥ मुत्तगि यो गत्या नई माने युधिष्ठिर स्थित्वा ततो मनपनिरन्य स्थानमान्यत.॥६॥शिधिवत: कासित दिव्य महाम्युमिना दितम् मानपात्रोपफर दिपता लोमहर्षणमा ६८ इति शम्पर्षणि शरपाणि सत्ययुरिग्युन्दे पोडशो'ध्या १६ ॥ . सञ्जय उवाच । प्रधाग्यमतुरादाय पनवगातरम् । युधिष्ठिर मनपतिविध्या सिंह वानदत् ॥ १ ॥ ततः स शरवण पर्जन्य घ वृष्टिमान् । अस्य मधारमा क्षत्रियान क्षत्रियर्षभः ॥ २ ॥ सास्या दशभिर्विग भमि त्रिगिस्तथा । सहषषं विभिाषया युधीष्ठरमपोउयत् ॥ ३॥ ततामयामधासान साश्यान सरथपुज मी सेना छिम मिन्न होगई । ६५ । उसके पीछे अपत्यामाजी उसा दशापाले शकी ओर दौडे और उसको अपने स्थपर बैठाकर शीघ्रता से चल दिये । ६६ । यहदोनों एक मुहर्त चलकर युधिष्ठिरके गने पर नियतहुये तब राजा शल्य उम दूसरे धपर सनार मा । ६७ । जोकि गिधि अनुसार अलंकृत पढे बादल के समान शदायमान बड़े बड़े अख शस्त्र यन्त्रोंसे पूर्ण और शुओं के रोमांचों का खरा करने पाला था ६८।। अध्याय १७॥ मजय वोगे कि इनके अनंता पराक्रमी राजाशल्य बड़े वेगवान दूसरे धनुष का लेकर घुधिष्टिरको छत्तागुमा सिंहके समान गर्छ । १। फिर वहा माहसी मगि अष्ठ शल्प वर्षा के बादलों के समान पाणोंकी वर्षा से शानियों पर वर्षा करनेगा । २ । सास्पति को दपाषाण मे भीमसेन को तीनधाणसे सहदेवको भी तीनवाण मे छेदकर उसने युधिष्ठिरको पीडामान किया ३ पिशिसनामषाणों athome rushed tonards inlys and took bim on his car Thoyi ppvuod Yaslinon'ithur for a tims and titen Sijalya inaunter another car, properly furnishid, rumbling like thumler, full of arms anel Heapone and terrifying tho foes, " 68. CIIAPTER XVII • Then Shaly + took up another than a str ng lor nul reared a lion's røar altor sounding Yudbishthur. Then ho shorrored nrong libo raid oro: tho kobntrgas Do rounded Sujya sul - [६२३१० शल्पश्यं Sniya Parv (6931) रसा अक्षारास पिशिलकाभिरिव कुस्कारान् ॥ ४ ॥ कुजरा दुजरारोहाम मानपत्रयायिमः Iraiva रपिभि शाजधान धिगाम्बर ॥ ५ ॥ माईविच्छेद प तथा सायुधानुकतनानि च 1 चकार मही पोचतीणी घेदी कुशीष दया समरिसम्म मृत्युमिधासकम । परिवारमा पाण्डपाश्चालमोगका ..! भीमसनध शिनेध नप्ता माद्रपाल पुत्री. पुरुषप्रधा। समागतं भागवलेन रामा पर्याप्ताम्योग्यमपाहवयन्त ॥ ततस्तु शूरा. समरे नरेन्द्र महेश्या ग्राम सुधाम्परिष्ठम् । मायाप्यं धन समरे नवीरं अनुः शरैः पत्रिीमहप्रवेगः ॥सर दिजो भीमसनेम राजा मानीमुनाभ्यामय माधवेग । प्राधिर्ण पत्रिभर प्रगस्तना तरे धमिजने ॥ १७ ॥ तोरणे साधकाना रयौया सवीय महावित शरा मे उन नई पनुपारियों को घोड़े रव और कृवरों समेन ऐमा पीड़ापान किया जो कि उस्कामों से हानियों को गाड़त करते है I उम रथियों में श्रेष्ठनेहाथी हायोंके समार घोड़े पेड़ों सवार और रथों को रथ मनारों समेत मारा ।। और सतारो शस्त्रे और बनाओं ममेत नजाओंको काटा और पृथ्वीको शूरवीरों से ऐमा माछादित करदिया कि यह की वेदीको कुशामों से भारछादित करते हैं । अत्यन्त नोपयुक्त पाण्डव पांचाल और सोमकोंने उसमकार कालो मपान शJओं की रोनाडे मारनेवाले शल्पको चारों भोर से घेरलिया • ७ । इसके पीछे पुरुषोत्तम मल सहदेव सात्यकि भार भीमसेनने भयकारी पलपाले राना युधिष्ठिरसे भिड़े ये समर्थ दालको परस्पर बुलाया ।८। इसके पीछे शूरोंने उम शूरवीरों में श्रेष्ठ नरवीर महाराम शरणको पाकर और युद्धगें उसको घेरकर बड़े वेगाम वाणोंसे पागल किया । ९ । भीमसेन नकुल, सहदेव और सात्यकिसे मान्छे मकार रक्षित धर्मपुत्र युधिष्ठिाने पड़े वेगवान पाणों से राजामद्रको छातीपर वापस किया।१०। इसके पछि भरछी भलंत बड़े उत्तम भापके रचियों के समूहोंने युद्ध में राजामका वा!से पाहामान देखकर दुर्योधन के मनसे शल्यको Satyaki ivitit ton arrow: Bhim and Saludow with thrwe each aod Yudluslitinur with many. Ile frit them oou therl horses, Chis and yokes na olupinnts to attokod hy sparks of hts Ho cut down the 'elephants, carb und hurzes with their riders 5. Ho duxtorously cut down blo standards and filloj tiie Oxrth with the bodies of warntora an allais are spread over with Kusl& grass The Pandavar, Panchals And Sumaks, niuch crayed, surrounded Shalya tho dustruyor, of four Theo Nakul, &atyakı, Sahadev and Bhuo challenged Shalya who was engaged in.fighting with Sudarshtiir. Surrounding trave Suys in * the field of battle, they rounded him with slap arrows. Protocted by Bum, Nakul, Saltadev and Salyuki, Yudhishthur wounded Shalya on the breast 10 Your ghout warriors seeing king Shalya tell aimed arrow and rejoiced n! in buccc53, । (0932) MInbabharat (६९३२) तम् । नराः सर्वे परिधः मुसज्जा सुधनव्यानुगते समन्तात् ॥ ११ ॥ ततो बुत मद्रजमाधिपा रणे युधिष्ठिर । समिरविध्यत् । सञ्चापि पार्यो नमि' पृषकर्षि व्याच गजरतुमुले महात्मा ॥ १९ ॥ भाकपूर्णायतसंप्रयुक्तः सरेस्तथा सपति तेल धौसः । अन्योन्यमाच्छादयतां महारथी गद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरश्च ॥ १३ ॥ सतस्तु पूर्ण समरे महारथी परपरस्यान्तरमोक्षमायो । शरमेश वियतनतमी महा पली शत्रुभिरण्यधृप्या ॥ १४ तयाईनुज्याललनिस्वनो महान महेन्द्रवनावितुरूप निस्वनः । परस्पर घाणगणेमहात्मनो प्रवर्षतोमंद्रयपाण्डवारयोः । ११ सो धेरठ व्याघ्रशिशुप्रकाश महायनेम्यागिपगृशिनाविव । पिपाणिमो.नागयराषिोत्कटी तत्त क्षतुः संयुगजातप्पी ॥ १६ ॥ सनस्तु मद्राधिपतिर्महात्मा युधिष्ठिर भीमधलं प्रसा। विव्याध पीर हदयतिवेग शरेण मर्याग्गिममममेण ॥ १७ ॥ सतोऽति विग्रोथ युधि प्ठिरसदा मुसमक्तेन शरेण राजन् । जघान पदाधिपान महारमा मुरमच लेभे आगे से मध्यवर्ती किया । ११ । इसके पीछे राजागने युद्ध में युधिष्ठिरको शीघ्रता पूर्वक सातवाणों से घायल किया हे महाराज महात्मा युधिष्ठिरने मी समुल युद्ध में प्रपत्कनाम नौ बाणों से उसको घायल किया । १२॥ तव.युद्ध में दोनों महारथी युधिष्ठिर और शल्पने कानतक खंचार छोडहय तेलो साफ किये हुये वाोंसे परस्पर ढकदिया ।१३। फिर परस्पर अवकाश दूंढनेराले शत्रुओं से निर्भय बड़े, बलवान महारथी राजाओं में श्रेष्ठ दोनोंने शीघ्रही बाणोंसे पठिन घायल किया ११४३परस्पर घाण समूहों समेत धनुप चनेनाले महात्मा राजाशल्य और युधिष्ठिर की प्रत्यंचाके ऐसे पड़े शव्यपे जो कि पहाइन्छके बजके समान शब्दायमान थे । १५ । वह दोनों महावन में मांसाभिलाषी व्यामों के बच्चों के समान घूमनेवाले, हुये और युद्ध में अहङ्कारी टोनोंने बड़े इन्ती हाथियों के समान परस्पर घायल किया । १६ उसके पछि महात्मा राजीमद्रने भयानक पराग वाले राजा युधिष्ठिर को रोककर मूनिके समान प्रकाशित याणासउपपड़े वेगवान् वीरको हदयपर घायठ किया । १७ । हे राजा इसके पीछ अत्यंत घायल युधिष्ठिरने भी अच्छे प्रकार पलाये हुये वाण से राजामद्र को.घायल किया और बहुत मानन्द को thus surrounded by thu cnemics, camo round him by Duryodhna's order. Shalya vouddad Yudhishthir with ervon Arrows and the latter piorced tho formor with nino darts. Both the warriors covered each other with well old arrows and wounded ench other. Tho bounds of thoir bowstrings were like those of the wjra of Indra.' 15. Tboy roaned like young lions în soarch of flesh and woundod ench other like two largatashed clophnats. Having checked Yudhish. thir, the king of Madra wounded him on the breast with arrows Yudhishthir wounded Simlys with a Salya with eyos real bright liko the Sun or fire.
1६९३३) 77egou Slınly: Pary (6983) ऋषयः गाम १८ तता मुहतांदिक पार्धियन्द्रो ला सांघिसरत नत्रः। शतेन पायपरित जधान सहस्रनप्रतिमपभायः १९॥ त्यस्ततो धर्ममुतो महामा शल्यस्थ यो भवमिः । मिला हस्तापनीयम् धर्म जधान पमिस्त्वरितः स्कैः ॥ २० ॥ ततस्तु मद्राधिपतिः प्रहटा धनुकिय प्रसृजन पृषत्कान् । वाश्यां इंगयो तय गनश्चिच्छेद चापं कुरुपुङ्गवस्य॥ ११ ॥ न तोऽन्यत् समर प्रवासी धनघोरतर महात्मा शल्यं हि या शरैः समन्तात् यया महेन्दी; मैमुचि सिताः॥२ ततस्तु शलो नमिः पृषभामस्य राक्षस युधिषिण निरय रोक्मे पंदुषमणी तपोर्विदारमामास भुजी महात्मा ॥ २३ ॥ ततोऽपरेण माल नाजसोमो धनुम्माय । कृपश्च नस्यैव जंधान मन गहोराशा सोनि मुख पपीतामधियापि युधिष्ठिरस्य शाश्चतुभिधान पाहान् । पाश्च रियो करीनहारमा योधक्षय सुतस्य गेहः ॥ २५ ॥ तथा राजन भीमसका पोर्या इस पछि इन्द्र के समान मनौव पाले क्रोधसे रक्त ने महाराज शल्य ने एक महत्ता में संचतता को पाकर सौ वाण से शीघ्रही' पाण्डव को घावल किया 1781 शीषता करते धर्मपुत्र महात्मा ने कोयुक्त होकर पृपंतनाम | नीवाणों से शलपी छाती और मुवा के कयन' को छेदकर दूसरे छापकों भी पागल किपा २० । इसकेपछि बड़े प्रसन्न रामाने धनुपको बैंचकर पकानड़ा मार कोसोंमें श्रेष्ठ रामायुधिष्ठिरके धनुप दोवाणोंस काटा ।२।। इस कार पुढे में महात्मा' सनायुधिटिउर ने भी बड़े घोर दूसरे नवीन धनुपको | लेकर रणनोक वाले वाणों से शल्पको चारों भोर से ऐसे घायल किया श्रमे कि महाइन्दन नीच अनुर को यायन गाया | तब मामशल्य ने नापाकाले भाभतेन और राना विडिके सुन्दर सर्णमपी कवचों को काटकर इन दोनों की भनाओं को पायल किया। इसके पी मूर्याग्नि के समान मकाशित क्षुर से राना के धनुष को मोड़ा और कृपाचार्य ने छः थाणों से उसके सारथी को मारा तमें यह सारधी सम्मुख गिरपड़ा। १४ । रानाभद्र ने ito anger coming soon to courciousncas voanded end Panday ittto | "Iruitrot arrovs. Yudhishthir in his rage rounded inlya wth niry arroits and pierced fris aturoar witir six mure: 20. Tiren cheerfully "shooting arote, Fille. cut down Youbiertbir's bow with two darts. Yohisitfrit took up another few how and wounded Shalya with Blarg poittał*Arrows 'as Indro had done Namachis Shalya pierced through the gold arrows of Yudbishthir ard Bliim and, wounded tein' on the inbre, 23. Then it eut dow tbe king's, bow with a | bright datt Krijncharynislery this driver and mads bimal doys from' tire car. The king of Madriglow tiro four horses of Yudhisk. thirant destroyed the warriors of Yudhisththir. 25..At this Bhim. .
- ( 6934) Mulinlah unt 1 (६९३४) भद्राधिपस्याशु ततो महात्मा | छिस्था धनुदस्यता शरण छायावियत सुभूश नरम्दम् ॥ २६ ॥ श्रथापरण स्थ जहार पन्तु कायाच्छिर सन्महनीयमध्यात् । जपान चातुर स शीघ्र ततो भृश कुगिनी भीममेन ॥ २७ ॥ तमप्रणो सर्वधनुरा णागकञ्चत समेति गम् । भीम शोनाकिर उराणा माद्रीपुत्र साधना ने सापकमोहिन वीक्ष्य शल्य भीम शरैस चर्त धर्म । २८ । सामीमोमेम निकृतवर्मा मद्राधिपमं सहस्रनारम् ॥१९प्रगृह्य वाच म्यान्महात्मा प्रकाप कुम्नीसतामध्यधावत् । छित्वा रथेशा नकुलस्य सोय युधिष्ठिर भीमवलोक्यमापन ॥ ३७॥ तत्रापि राजानमर्थात् पतन कुस् ययवान्तकमापत-सम हो औष दया शिखण्डी शिनच नप्ता सहसा परायु । ३१ ॥ अथास्य वर्माप्रतिम म्यकत्ती मोमहारमा दशमि पर खडगम्च भएठन चर्स मुटो नदन् प्रहरसव सम्य माये ॥ ३२ ॥ ततू कम मीमस्य समीक्ष्य रास्ते पाण्डयान प्रवरा योधा. बाद प्रय भी चारोमोरसे गठिक चरबी का मारकर उस राजके, शूरवीरों बड़ा विनाश किया । ५५ । राजा के उस दशावाला करनेपर महात्मा भीमोन नशीब होतीरान परेनुमोकाट दा वाणों ने राम को कठिन घायल किया । २६ । फिर उपाय पूरक दुसरे वाणने उसके सारथी के शिर को देह से जुदा किया और महाक्रोधित होकर उस व युपत्र मे शीघ्रही चारों घोड़ों को भी मारा । २० । और सब धनुषधारियों में भेष्ठ उप्र भीमसेनने युद्ध में भकेले घमनेवाले बडे वेगवान को सौवाणों से घायल किया इसीप्रकार मादीके पुत्र सहदेवने भी भीपसेन के शायकों से शल्पको मोहित देखकर बालों से उस के कवचको काटा । २८ । भीमसेन और सहदवके हाथने टूटे कवचवाला महात्मा राजामद्र इनार नक्षत्र रखनेगाली दाल । २१ । और खड्गका लेकर स्थस कदके कुलीक पुनके सम्मुख दौरा फिर वहभपकारी पराक्रमाला मालके रपके ईशादर को काटकर प्रविष्ठिर के सम्मुख दोहा । ३० । तदनन्तर पृष्टद्युम्न द्रौपदी के पुत्र शिखंडी और सात्यकी भी भकामात् उस कोषयुक्त उछलते और कालके समान भानेहुये राजा शल्पके सम्मुखहो । ३१ । तर अत्यन्त प्रसन्न और गौते माया cut auw Shintya’s bun and woundud lu witu two NYUW# le cut down tło lead ut hus durer and II 1:18 Ragu Buw bes lour Lui 84-9, Bbrou the best of archiers Ruunded bra wilia a lundiul anuwa Lo HIO mautior, baladei ttu Hun et Madrs, would Sivalya muundod by the disuws of Sualya, pead througho | 16 ArmHour will owu artuwa. With lus armour poucou by Satudov, Shalya touk Datty tuned shull ond sword and Jurupaag durra fiona lisas, rasiou Ho cut down tuc yuku of Natui'ouir ud abid at Yudhishthu. 30 Ibu Dhablitmus uwa, tl mulis ul Draujuoti, And Ba'zaki tuo, fuccel kulk Soulyn who was cuning laho Duh m against him 1995 शल्यप Shalya Paray पुशमुरमयन्तः । असाथ दध्मुः शशसन्निकाशान् । ३३ ॥ मेनाप शन्देन विभी पोन तवामिगु पालमप्रदृष्टम् । स्वदामिमतं रुधिरोक्षिता विसशकल्पञ्च तथा विषष्पम् ॥ ३४॥ स मदराज सहमायक्रोणी भीमाप्रग. पाण्याधमुख्य युधि | स्यामिमुखं अधेम सिंह यथा मृगतो प्रयानः | ३५॥ स धर्मराजो नितासमत शोधन मिसनप्रकाश हष्टया तु मद्राधिपति स्म पूर्ण समभ्यधावत्तारि घलेन ५३६ गोविग्दधापय परिसं लिचित्य दधे मान शल्पविनाशनाय । साराजोमि राश्यमते रपे विपन शक्किमयाभिकावन् ३७॥ तच्चापि शल्यस्य निशम्य कर्म चारमनोमागमवावशिषम् । स्मृत्वा मम शल्याधेयतारमा पथोक मेत्रावरजस्य बके ॥ ३८॥स घराजा मणि हमदण्ड जमाह शफि कमरकाशाम् । नेत्र व भीमसन ने दश पूपरकों से उसकी अनुपम दालको काटा और भापकी सेना में गर्मवे पे उसने खड्गको भी पकड़ने की मूठपर काटा । १२ । उन पायहरों के अस्थत उसम और प्रसन्नचित रण समूहों ने भीमसेन के उस कर्मको देखकर बड़े आशर्षित होकर शब्दकिये और चन्द्रमाके समान प्रकाशित शवों को धजाया ।१३। फिर म भयकारी शब्दसे भापकी भनेप सेगके समूह व्याकुल रुधिर सेलित शरीर भौर अचेत होकर नामान हुये । ३४ । भीमसेन मिनका भग्रवर्ती थो उन पाण्डवों के श्रेष्ठ शुरवीरों से पापल वह राजामद्र भकस्मात् तीता से युधिष्ठिरके सम्मुख ऐने गया कि मृगझे पकड़न को निह जाता है । ३२॥ मृत घोड़े और सारधीयाले क्रोधमे ज्वलित रूप अग्निके समान प्रकाशित उस धर्मराजने बलसे सम्मुख दौड़नेवाले अपने शत्रु शरूपको देखकर । १६ । शीघही गोविन्दमी के वचनको विचारकर शल्यो मारने का विचार किया मृतक घोड़े और सारथीवाले रयपर निया उम धर्मरामने शकिको चाहा । ३७। उस स्थानपर भी महात्मा युधिष्ठिरने महात्मा शल्पके कर्मको देखकर और शेप वने हुये अपनेही भागको विचार करके शल्यके मारने में ऐसे वित्त किया जो कि भीकृष्णमी ने कहाथा । ३८ । उस धर्मराज ने मणि और सुवर्ण से नहित दण्ड Bhim, with a cheorful roar, cut lire shield and 8 ord daras wondered at Bhin's prowess and blew their plute conchs. Your warriors vere perplexed on hearing that noise and ininted with the loss of blood. Wounded by the Pandavus led by Bhim, Shalga hagtened face Yudhislitlur ng lion faces deer 35 Glorious Yudlighthor in raze, seeing his adversary advance loraras bus, tu notulered the words of Gwind and thought of laying Sinlys. He took up a spear on his car, 841n Shalge,'ji Solore bians and remembering that it was his own duty to Yudhislithir thought of s'ayınha according to the prediction of He took up a jewelled spear and opening his eyes wide Iho 1 an to him, Xrisho -- 6936) (६९३६) - Mahabharat दोमे सासा विकृस्य मद्राधिप नुसुममा निक्षत् ॥ ३९ ॥ निरीक्षितो 'नरदेव' राक्षा नात्मना निहंतकल्मगेण । अभन्न यस्मसान्मद्रराजस्तन्नो प्रतिभानि राजन ॥४०॥ ततस्तु शक्ति रुचि रोप्रदेण्डा मणियालालिमा प्रदर्शनाम । 'विक्षी वेगत मुभृश महारमा मद्राधिपार प्रवर कुरुगाम् ॥ ४१ ॥ दासामना महमा बलेन सवि स्फुलिङ्गा सहमा पतन्तीम | प्रेक्षन्त सब कुरव समेत दियो युगाने महतामियो एकाम ॥ ४२ ॥ ता कालरात्रीमिव पाशहस्सा यमस्य धात्रीमिव चाम्ररूपाम स ब्रह्म दण्डप्रतिमाममोर्चा ससर्ज यत्तो युधि धर्मराज' ॥ ४३ ॥ ग धनगप्रयासमपानभोज नैरभ्यर्षिचता पाण्डुसते प्रयत्नात् । सम्पतयाग्निप्रातमा ज्वलम्ही थामथवाहिर सीमिवोग्राम् ॥ ४५ ॥ शानहेनो प्रसिनिमितान्ता स्वष्टा रिपूणाममुदेवभक्ष्याम् । भूपन्तरीक्षन्तु जलाशयानि प्रसा भूतानि निहातुर्माशाम ५४५ घण्टापवाझमिषि बजमार्ग बंदूचित्रा तपनीयदण्डाम् । स्वष्टा प्रयत्नानिग्रमेन फ्लप्ता प्राविमन्त प्रक्त सवर्ष के समान प्रकाशित भाकी को लिया और - अकस्मात् प्रकाशकार नेत्रोंको खोलकर क्रोध से पूर्ण चित्तने राजामद्रको देखा । १२ । उस पवित्रात्मा और पापोसि रहित नरदेन राजा युधिष्ठिरसे देखाएमा यह शल्प अत्यन्त भस्म नहीं हुआ हे राजा यही मुझको बड़ा भाश्चर्य होताहै । ४० । इसके पीछे कौवों में भत्तान्त श्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिरने उस सन्दर उपदंडवाली, मसियों से जटित अग्निरूप अत्यन्त प्रकाशित शक्तिको बड़े वैगसे राजामदके ऊपरफेका । ४१। उस के पछि सब इकटूठेडुये कौरवों ने उस मकाशित और स्फुलिंग, संयुक्त अकस्मात बड़े बेगसे गिरनीहई शक्तिको ऐसे देखा जैसे कि प्रलयकाल के समय आकाशामें, बड़ी उल्कामों को देखते हैं । ४२ । पाशधारी कालरात्रिके समान यमरामकी जय रूप धात्री के समान ब्रह्मदण्डकी सूरत इस सफल शक्तिको युद्धमें उपाय करने | वाले धर्मराजने छोड़ा। ४३ । जो कि पाडवोंकी भोरसे बड़े उपाय, पूर्वक, गंध माला, आसन, भोजन और पानसे पूजित सम्बनकनाम भग्निके सरूप मलित रूप अथर्वागिरमी नाम उग्रकत्या समान ॥४४॥ शिवजी के लिय खप्टा देवनकी बनाई हुई शत्रुओके माण और शरीरों की भक्षण करनेवाली और इटकरके पृथ्वी Dinge, looked at the hing of Malm It is a wouder that Shala was not burnt done by the angry gaze of Yudhishthur, 40. Then Yudlushthir hurled at Shalsa the bright spenr studied with Jewels Tho hauravas san the spuer falling Tiher motor sidhishthir dischiarged 16 like the stalf of Yam. It was Lept carefully by the Pandaras annd Aweot scenla nnd garlands and was wol shipped by theçou It was made by Twashta for Sale and was the destroyer of the lives and bodies of fues de rell Ay capable of slaying aquatic anglais Fitted with bells, banpcre and garlands, decked with jovely, fitted with a golden staff and made with great application by Trashta i (6937 स्पपर्ण Shalya Parv करीममीमामलायस्मादधिकहना मात्रैश्च धाररमिमन्व्य पानात | ARTS मार्गेण मन परेन पाप महाधिपतनदानीम् ॥ ४७ । इदोमम पापेस्पमिगार्जमामी सायकापान्त कर पपुम् । प्रसाट याहु सुहद मपाणि कान नृत्यनिष धर्मराजः necratसयंशपाया महिनां स्वशक्ति युधिष्ठिरणाप्रतिधारपंरियांम् । प्रतिमहायामिन मई शल्यः सम्बग्मामम्तिीमाज्यधाराम ।। ४१ सा तस्य मर्माणि विदार्य शुभ्र मुग पिशाच व मिया । विषेश गातोयमिधाप्रसक्ता यशोविशाल नृपसत्र हन्ती ॥R मासानिकस्यविनिम्नतम मस्पन्दन सम्मवेन । संसिकगात्री रुधिरण सोऽभूत कौनो यथा स्कन्दहतो महादिः ॥ ५१ ॥ प्रसार्य पाहूच रातो मस सिन बनेन । महेन्द्र यातियो महारमा पसाहसं भ्रष्ट्र निघालस्स.५ ५२ । बाडू मसाभिमुखो धर्मराजस्यं मद्रराट् । ततो निपतिता अन्तरिम भादिकों के रस्साले और जलमें रहनेवाले जीवोंके मारने में समर्थ ।१५१ घंटा, पताका मार माण यजकी माला रखनेवाली धैदूर्य से जटित स्वर्ण पपी बरधारी बड़ेनियम भौर सपायके सारा सा देवताकी बनाईहई ब्रामणों से भयुवा करनगालों की नाश करनेपाली सफल ४ा घल और बड़े उपाय से | उस वेगवान शक्तिको घोर मन्त्रो संयुक्त करके उमराजा महके मारनेके निमित्त उसय रीति से छोड़ा। ४७ । जैसे कि शिवजीने अन्यकके नाश करनेवाले वाणको छोड़ाषा सीपकार क्रोधसे नाचते मे और हे पापी मारह इस प्रकार गर्नतेये युधिष्ठिरने बहुत हद सुन्दर हायवाली भुजाको फैलाकर छोड़ा.४८ युपिटरकी सब सामर्शसे छोड़ाई भपूर्व पराक्रम और घृतको धारामे अच्छेगकार से. होमी हुई अग्मिने समान उस सुन्दर शक्तिको पकड़ने के निमित्त सम्मुल गर्ना । ४१ । यह भक्ति उसके सर मस्सों समेत उज्यक और बड़ी छ तीको फाड़कर | राबाके बड़े अशको विख्यात करती हुई पृथी और जलमें प्रवेश करगई । ५. । तब बप शल्य नाक आँख कान और मुवो निकलनेवाली पेश करनेवाले घाष से सस्पन्न होनेमाल हायरसे माछ मकार लिमाङ्गहोकर जैसे कि स्वामिकार्तिक लोक हायो घायल कॉरनाम बड़ा पर्यत हुभाया । ५। उसीप्रकार यह महात्मा ***as the dostruyer of the enemies of Brahmins, 46 Yudhishtliis burled it with great force and read over it mantras lo slay Shalya. Dancing in anger liko S'viv at the trove of discharging arrow to slay Andbak,' and crying out, "I have slain three," Yudhishthir dis. charged it from his outstretched hand Hurlrd with great' force, like fire fød' by libations, the spéar came upon Sbalya, who ndvanced to seize it with a rear, But it broke thiouyh his breast and entered 'the ground with great force, '50 Moving his limbs and dropping din blood from his body, Shalya w 19 wounded as Kraunch was by Wounded in the vital parts by Yudhishthir's spear, - । RArtik.
- (6938) Mahabharat (१९३८) | समापन्द्रपज इमेजितः ॥ ५३ ॥ ससपा मिसानो सिधिरेण - समुक्षित प्रत्युद्गत इस ना माया स नरपउषः ॥ ५५ ॥ घिरभुक्ता पमुमती प्रिया काम्सामिष प्रभ. सौ. रणेः समाश्लिष्य प्रमुप्त इष सोऽभवत् ॥ ५५ ॥ ये धर्मात्ममा युद्ध निहतो धर्ममनुना । सम्यग्धुत पविष्ट प्राशाम्नाऽग्निरियावरे ॥ ५६ शपत्या विभिनहदयं विप्रयुकायुधधजम् । प्रशाम्तमति पदशं लक्ष्मीनव उपमुश्त्रत ॥ ५७ ॥ ततो युधिष्ठिरश्चापमादायेन्द्रधनुः प्रमम. | पधात् द्विषतः संख्ये खगराहिय पान गान् । देहांश्च निशितैर्मरले रिपूणां नाशयत् क्षणा॥ ५९॥ ततः पार्थस्य पाणीधे चूना सनिकास्तव । निमीलिताक्षा. वियन्तो मशमन्योन्यमर्दिताः। स्यादन्तो पिर हशिस्त्रायुधजीषिताः । ६० स: शले निपतित मद्रराजानुजो युधा। मातुः सर्षे, इन्द्रकं गजराजकी मूरत और युधिष्ठिरकी शक्ति से टूठे पर्मस्थलवाला शल्य भुजाओं को परमरकर रथसे पृथ्वीपर ऐसे गिरा जैसे कि वजूसे ताहिन पर्वतका शिखर होता है । ५२ । इसके पछि मद्रका राजा धर्मराज के सम्मुख भुजाओं की पारकर इन्भाती धना के समान ऊंचा पृथ्वी पर गिरपड़ा। ५३ । सरकार सब प्रगोगे घायल पिरो भराहा वह नरोत्तम.शस्य मतिमें सम्मुख जानवाले के समान पृथीप गिरपड़ा । १४ । वह प्रभु पृथीको मानीपारी नोके समान पहुन कालाक भोगकर गिरताहुआ दोभायमान । ६५ । सब अंगोगे प्यारी स्त्रीके माश छातीपर मिक शयन करनेवाले के समान"धर्मात्मा धर्मपुत्र के हाथ से धनपी युद्धर्मे मग्नेपा इसप्रकार शान्त हुआ जिसमकार यज्ञमें अच्छे प्रकार होगीहुई स्विटनाम भग्नि देवता होते हैं । १६ । शक्ति से फटा हृदय हे शाख भौर जापाले मृमक राजा मद्रको इस दशाभी शोभा ने नही छोड़ा। ५७ । इस के पछि युधिष्ठिरने इन्द्रधनुपके समान प्रकाशवान धनुषको लेकर युद्ध में शत्रुओं को ऐमे छिम मित्र किया जैसे गाड़ रापाको करना है। ओर जगार भल्लों से शत्रुओं के शरीरको एकमाणपरमी नाश करदिया। ५९॥ इसके पाछे पाण्डयों के पाण 'पूडोसे ढकेडपे पंदने मापकी सेना के लोग शनों को.चलाये। परस्पर कठिन Shulyx fall down on ourth like a muntain peal struck down bị vajrn. He fell doren with nutstrutchcu lunds like Indra's banners, With all tlir parts of his wdy drupping bluar's Shalya fell down as si going forwnd to inuet n friend, He fell down on garth as if it were, over his Inloved wife, GG, With all the parts of the boily touching the ground like the body of a loloved yaman, ho found out by tha hands of Yadlushthir like guli Sknelti over the fire with lobations. With lig brenat, arms and bannor broken, Shalya hokedykrious even in death, Tahing np lasetrong laws and powerful orrore, Yudhishthir, Vegns to deatroy, the enemies. 59. Covered with errors, with eyes shat, your sarriors were sororely wounded with woapons, and shedding .
vergi g'uiya PACEV 16189) मस्तुस्पोरवी पाण्यामध्ययात् ॥ ६१ . भिशाप च नरश्रेष्ठो नागभिस्वग्न हास्यापविति भ्रातुश्चमीयुंयुद्धदुर्मद ॥६२। त षिव्याघाशुगै. अभिधर्मगजस्कर त्रिव' पाकचास्थ चिड़ेद रंगभ्यां नमेषच०६३मतमास्य दीप्यमानन सुरर्टर शितेन च । प्रमुखे पत्तमानस्य भरतनापाहरच्छिर ME || लाडली तद्दष्टशे पन मान शिरोग्यात । पुण्यक्षयमिय प्राण्य पतन्तं स्वगंवासिनम् ॥ ६५ ।। तस्यापत्ती बनु शगर पतितं रथात् रुधिरेणामिक्ता हट्या सैन्यमभज्यत ।। ६६ । शिचि प्रकचे तस्मिन् हते मदनपानुजे । माहाकार चिकुर्वाणा पुरयो विप्रादयु ॥ १७ ॥ राध्यासुजन राष्ट्वा सांसफास्त्पता जीविता.। वित्र पाण्डपभपादनाध्यतालमा भृशम् ॥१८ तास्तथा भयगतान फोरयान भरतर्षभ । शिनता फिरन् बाणैरभ्य बत सापति तमारान महेष्वासमप्रसहा दुपसदम् । हादिस्यस्परितो माझमहुये और शरीरों से रोरों को छोड़ते शस्त्र पार जीवन से जुदेहुये । ६० । इस के पीछे शाप के मिरगेपर राजामद्रका छाटा तरुण अवस्था पाला सब गुणों में पाई के समाग रथी पाण्डव युधिष्ठिर के सम्मुख गया । ६.1 और शीग्रता करनेवाले नरोतग ने बहुत नाराघों से घायन किया यह युद्ध में दुर्मर मृतक माईका बदला लेनेका अभिलापी हा । ६२ । फिर शीघ्रना करनेवाले धर्मराजन छावागोसे उमको घायल किया वाणोंसे ही उस के धनुष ध्वजा को काटकर महाशमान अत्यन्त और तीक्ष्ण भन्लो सम-सम्मुख वर्चमान के शिक्षकों काटा ६.६४ । तर यह कडलगारी शिर स्थते गिरताहमा ऐसा दिखाई पडा जैसे शुभकर्म फलफे नाशको पाकर स्थर्गसे न्यून मनुष्य होताह ६५ फिर शिरसे रहित ।। उसका शरीर रथसे गिरपड़ा रुधिरसे लिप्त शरीरको देखकर सेना छिन्न पिन्न होगई।१६ उस अपूर्व कवंगधारी मायके छोटे भाई के मानेपर हाहाक र करनेवाले कौरव भागे ६७ । तर शल्य के छोटभाई को मराहमा देखकर आपके शूरवीर जीतनके त्यागनेवाले धुलो अत्यन्त लिप्न शीर पाण्डव युधिष्ठिरोमयसे भयभीत होगरे । ६८। हे भरतर्षभ शिनीका पौत्र सात्यकी धागोले दस्ता उसमकार छिमाभन्न होनेवाले कौरलोंके सम्मुख वर्तमानहुआ। ६९ । तब शीघ्रता कानेवाले blood troun their budies, were deprived of weaping and lives. Then at clip fail of Shalya, liis younger b other, & young mun and us goods warior is his brother, luced Yudhishthur and wounded him with maby arions He tried hard to avonge box brotber's death Yudh Ishihar wounded him with all arows and then cut luis busy and beautiful lead, with one arios toch. The head, dicked with earrings, talling down from tbs cat looked like one falling down hum heaven at the expnation of musits. headless body fell down from the car and the arw103 d 14 Oised at the sight of it. «At the death of Shalya's younger brother, this hadravas fed with cries Colorch witli Llood and dust sour,sar . 60. Hs .
- 6940) Mnhalibarat ( १९४० गजनप्रत्यगृहनादभीतषत् ॥ ७० . ता सोतो वहात्मानी वाणयापाजितो हाईिक्यः सात्यांकष सिंहा वय वात्कटौ।। ७ । धुमिनिलामाबादयन्ती परस्परम् । मचिमिरिप मर्यस दिवाकरसमा ७२ ॥ चापमागवलोहतार मार्गणान् दृष्णिसिंहपा। आकाशे सापश्याम पतङ्गानेश शांध गान् ॥ ७॥ सात्या दशभिर्यध्या हयांचास्य प्रिमि. शरैः। चापकन छिंदवासियो नया ॥ ७४ ॥ तनिकृतं धनुःश्रेष्ठ मपास्य शिनिपुङ्गवः । अस्यवादस घेगेम बंगपत्तरमा घर ॥ ७९ ॥ सदादाय धनुः श्रेष्ठ परिठः सर्पर्धा पनाम् । गर्दिक दशभिर्माणः प्रत्य विष्यत् स्तनान्तर ।। ७६ ॥ ततो रय युगशाञ्च छिरा मल्ले मुसंपते. मांस स्थायधीनर्णमुमो पाणिंसारयो । ७७ ॥ ततस्तै विरपरषा कर शायः प्रमों। अपवारशिप रसमारोदर पोर्पवान् ।। ७८ ॥ मगम राजन विषये काम कृतवर्माने निर्मपके समान उस घड़ेधनुधारा सहन के अयोग्य कठिन मासे सम्मुख के कानेपोम मातेहगे,सासकीको रोता है । वह दोनों महात्मा बड़े प्रश्न संक्षा पागल पादा कृतनी और साराकी मम्मुख हुय । ७१ पृथ्य समान रात्री मा दानां शुद्ध प्रकाशमान यालोम पापा ऐसे जाने 'नाला जप्त कि मूर्य की किरणों रो जातहैं । ७१। इसने उन दोनों सत्तम पादोंकि धनुष मागा भौर पम उठडपे आताश में वर्तमान वालों के शीत गामी पतियों के समान देखा । नार्मा ने दर्शमाण में मासकोको और तीन पाणं से उसके घोडाको घामकरके देदे पयाल एक पानी उसके धनध को काटा सापक ने उस टूटेंगे उत्तम धनुपको डालकर बनास दूसरे द धनपको मिपा ७Iसा धन पारियोंमें भष्ठतात्पीने उतधनुष को लेकर दश वालों से पापो को छाती पर किया । ७३ । इपके पी रपयुम और इशादण्ड हो भने अन्ठ पत्ताय हुये भल्लो काटकर शीघडी उग घोड़ें सारथी और पछि बननेवाले का पारा !.हे प्रभुता पराक्रमी शादत का मार्ग उसको रिप देग्यकर जघना से भको रथार पटाकर दूर माये । ७८ । riora fled away alrnid of Yudhisthir. Silyahi tho mod ,n or Shmi, Inood tho dispersing Kauring and collined them with arrowr. 70. fritrarno opposed solant Syaki who wa' mimian on fearlculs. The two Yodaras, Kritvariun and Satyaki, invincible and ol lion's POUHCI), covered anch other with arrows likn the rays of the 8.11. Yo baw their arrog'a flyin; liko birds. Kritvarmi voundai Silyaki with ton arrors and loin horect with thround cut his be with one more...Suyaki droppni thy Irokrnirur anl torrk up nnothrr.is. Satyaki to last of cliers findet Irterarma williten Arrow on the brant and cutting down the inrts of your enrso the dyreret horthand folcrer.gring hindTornlofor. Krivacants took luntar Away frun this field of lattia Atlintill of the king of " (१९५१) Teligi Shalya Par (6941) मंजि, दुप्पोधनपलं सर्व पुनराप्ती नराखम ॥ ७: तप्तपरे नाचुपत क्षम चरमसारते । धनन्तु हतयिष्ठं तत्तदासीत् परामुग्नम् ॥ ८०. सतो मुहूर्ताप स्थान रजो भीम समुरिथमम् । यिविधैः शोणितमा प्रशानं पुरुष ॥ ८१ तता दुर्योधमो राष्ट्रवा मग्न स्त्रलमस्तिकात् । जयेनापतन पार्थानेकः सनिधारयत्॥४२॥ पाण्डवान् सरवान् सपा धुमान पनि मानव दुराधर्ष शिवगरवाकि रत् ।। ८३ ते परे नायवर्तम मा मृत्युमियागतम् । अधाधं रयमास्थान हादि थोपियधर्मत ।। ८४ । ततो युधिष्ठिरो राजा स्वरगाणा महारयः । चतुनिया भावान पत्रिभिः सूत्तधर्मणः । विपाध गौतमश्चापि पडमितिले मतेजनः ।। ८५॥ मरधामा ततो मातावं घिरधीकृतम् । तमपोवाह हार्दिक स्वायन युधिष्ठि रात ।। ८६ ॥ तमः शारततोऽएाभिःप्रत्यविध्यधुधिष्ठिरम । विख्याध चावानिशते । देशमा राना,मदके परन और जना विस्थ होने पर दुर्योधन की सत्र सेना फिर मुख फेरनेवाली हुई। ७ । इसहेजने और धूठते .सेनाके दाजानपर दूसरे पक्षवाले नहीं जानेगये सा.यह बहुत मारी ई सेना मुखौंको फेरगई। ८ । पुरुषोत्तम् इसके पछि उनलोगोने एक मुहूत ही उठीहुई पृथ्वीकी धूलको नाना प्रकार के रूधिरों के बहनेसे छिड़का हुमा देखा । १। उससेमय दुर्योधनने सम्मुख से अपनी सेनाको छिन्न भिन्न देखकर तायनामे मानेवाले सब पाडवों को अकेलेने हो रोका-1.८२ । रथ सबार . पांडवों को धृष्टघुम्नको और अजेय सात्यकि | को ताहणाणों से रोका 100 उससमय-शत्रुलोग उसकेसम्मुख ऐगे नहीं हुये जैसे कि मरण धर्मवाले जीव आयेहु काल के सम्मुखं, नहीं वर्तमान होते हैं. इसके पछि कृतवर्मा भी दूसरे स्थपर सवार होकर लौटा। तब शीघ्रता करनेवाले पहारथी रामा युधिष्ठिर ने चारयाणों से कृतवर्मा के घोड़ोंको मारकर कृपाचार्यको भी धन्दर वेषाले छः मल्लों से घायल क्रिया । ८५ । इसके पीछे अश्वत्थामा भी राजा के आघातसे घोड़े और रथसे विहीन कृतवर्मा को अपने रथ के द्वारा युधिष्ठिरके सम्मुख से हटालेगया। ८६ । इसके पीछे कृपाचार्य नेभी छ.वाणों Madra nnd destruction of Kritvarma's car, Duryodhan's army turned auk. Curred with us, ne arly, W210s0 warring 'hoù 'boea slain in large auibore, turard face. 80. Then the dust subsided by the sprinkling of blood. 8jving his arny disporged, Duryodlian alone checked all the Pandavas 82. Ho cheoked the Pandavag, Dhrish. tadyumn and invincibla Satyaki. The focs could, not face him Haus mortals cannot oppose Death: Kritvarala ton, mounted another car and turned back. Then Yudbishthir slew Kritvarma's horses with four darts and wounded Kripacharya with six more. 85 Ashwatbamu took hinu op bia car and tenis the presence of Yudhish Then Kripachai ya ton, wounded Yodhishthu with cix arrows iim away fror thirapris (६४१) (6942) Malalharnt सपाटाभ.शिलीमुखः ॥ ८ ॥ एवमेतामहाराज युवशेषमपतन । तर दुमन्त्रि राजन् सापुत्रस्य भारत।। मस्मिन्महेपासवरे विशसे संप्राममायाँ कुरुगन पार्थाः समेताः पामप्रष्टाः शंशान् प्रदमुहनमीक्ष्य शक्ष्यम् ॥ ८९ ॥ युधिष्ठिराच प्रशशंपुराजी पुग मुग त्रयधे पधेन्द्रम | चकुश्चमानाविधायशदान निनादयन्तो पमुषा समन्तात् ।। ९० ।। X इति शल्पपर्षणि शल्यापपर्वणि प्रत्याधे सप्तदशोध्यागः १७ ॥ धृतराष्ट्र साजरपान । शलोतु निहते राजन महराजपदानुगारियाः सप्तशता लीग नियुमहतो बलान् । १॥ दु: नरंतु द्विरदमारवायलसनिमम्। उप्रेणं त्रियमा से युधिष्ठिर को घायल किया और उसी प्रकारतेनधार आठ शिलीमुखनाम माणों से घोड़ोंको भी घायल किया। ८७ । हे भरतवंशी महाराज राजा पत्रममेत भापकी कुमन्त्रतासे या शेष लोगोंका पद वर्तमान हुआ। ८८ पुद मेष्ठ कौरवक हायसे उस धनुपधारियोंमें श्रेष्ठ शल्यके मारेजाने पर अत्यन्त प्रसन चिच पाण्डव लोगोंने इकठे होकर शंखोंको बजाया । ८९ । और युद्धभूमि युधिष्ठिरकी ऐसी प्रशंसाकरी जैसे कि पूर्वसमय में हवामुरके मारने पर देवताओं ने इनकी मशंसा करीया फिर उनलोगोंने चारों ओरसे पृथ्वी को शदायमान करके नानाकार चानोंको सजाया ९० ॥ अध्याय १८॥ संजय बोले हे राजा शल्पके मरनेपर उस राजामद्रके मागे में वाले सावसौ महारथी वीर बड़ी सेनाको साथ लेकर बाहर निकले ।१।फिरशिर and his horses with eight. The great distruction of the reipaíoder of your forces was caused by your evil policy and that of At the death of Shalya by the great archer, the Pandavas bley their conchs and prai-ed Yudhishthir a9 the gods bád eulogised. Indra at the death of Vritrasar." They sounded many masical instruments and filled the earth with their-sounds." 90." yonr son CHAPTER XVIII Sanjaya srid," At the destis of Jadra geven binndrois' of his follo para came out to fight; Jounting a buge elephant, with ámbrálınd.
शस्यप Shalya Parv (6943) माज्यमानभवामः म गम्तव्यं न गम्सम्यामिति मद्रामधारयत । २॥ दुगोंध नेन धारामाणाः पुनः पुनः युधिष्ठिर जिघांसन्तः पाडूना प्राविशन पनम से तुं शरा महाराज कृतचित्ताः मुयोधने । धनुः शब्दं महत् कृत्या सहायुध्यन्त. पास ४॥ भुश च निहतं शल्यं धर्मपुत्रश्च पीडितम् । मदराजप्रियांसक्तमंद्र कानां महारथैः ॥ ५॥ माझंगाम ततः पार्थों गाण्डी विक्षिपन धनुः । पूरयनपोषण दिशः सो महारथः ॥ ६॥ ततोऽर्जुनश्च भीमच माई पुत्री ध पाण्डौ । सात्यकिश्च नरेखाम्रो द्रोपदाच सर्वशः ॥ ७॥ धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पाञ्चाला सासोमः युधिष्ठिरं परीसम्तः समन्तात् परवान् ॥ ८ ॥ते समन्तात पाना पाण्या: पुरुषर्षभाः क्षोभयन्ति म त सेना मकराः सागर यथा शानिय महावामा कम यन्ति स्म तापकान् ॥ ९॥ पुरोपातेन गंगेव सोन्यमाणा महानदी । ब्यक्षामत तदा पर धारण किये छषों से और पामरोंसे युक्त दुर्योधनने पर्वताकार हाथीपर पढ़कर. मद्रे देशियोंकों निषध किया किमको न जाना चाहिये न जाना चाहिये। दुर्योधन से बारम्बार रोकाये यह वीर युधिष्ठिर के मारने अभिलापी होकर पांडवों की सेनामें पहुँचे । ३। हे' महाराज फिर लड़ने में प्रदत्त चित्त वह शूरवीर धनुषों के बड़े शब्दोंको करके पांडवों से युद्ध करनेलगे । ४। शल्पको मतक-और धर्मपुत्र युधिष्ठिरको राजामद्रके हितकारी मद्रदेशी महारथियों से पीडामान सन करें । अर्जुन अपने गांडीन' धनुपको टंकारताभाया वह महारथी अर्जुन सब दिशामों को शब्दों से पूर्णकरता युद्ध में प्रापहुँचा। उसकेपीछे पांच अर्जुनभीम सेन नकुळ सादेव नरोत्तम सात्यकी द्रौपदी के सब पुत्र । ७ । धृष्टद्युम्न शिखंडी मौर सोमकासमंत सब पांचाल इन सब युधि ठेर के चाहनेवाले लोगोंने गजा युधिष्ठिरको मध्यवर्ती किया। चरीिरसे घिरेहुये उन पुरुषोत्तम पाहोंने उस सब सेनाको ऐसे छिन भित्र किया जैसे कि समुद्रको मगर छिन्न भिन्न करता है और पाप के पुगेको ऐसे कंपायमान किया जैसे कि वृक्षोंको बड़ी तीव वायु कपायमान करतीहै । ९ । हेरामा तब पांडवी सेना मी फिर ऐसे उथल पुथल हुई and chamars, Duryndhan asked the Mudra warriors not to go. Though |chacked by. Duryodhan, thoss warriore, deairous of •laying Yudhish. thir, entered. the army. lotent on dying, they 'fught with the ,Pandavas smid the hard sounds of bows. Hearing that Shaly. was dead and that his followers were afflicting Yudhishthir, Arjun came on twanging his Ganday bow and filliog the directions with its Rounda. . . Then the Pandards, Han, Bbim, Nakul and Sahader Satyaki the best of men, all the sons of Draupadi, the Panchals with Dhrishtadyumo, Saikhandi and the Somaks and other well wishers 'came round Yudhishthir. They dispersed your army as a crocodile, agitates the ocean and shook your array as the wind shakes large । अपचन् (6944) Nalınbluntat (६४) गाजन पाण्डमा भ्यजिनी पुन ॥ १ ॥ प्रकाध से। महती महामाना महागया। घबरच कुशुम्तत्र पथ स राजा युधिष्ठिरः ॥ ११॥ भ्रातर पाण्डना ,शा सश्यले ना फेचन । पाम्बाला या महावीर्या शिमण्डी च महारथ धृप्रद्युम्नोध शैनयो द्रौप देया महारथा ॥ १२॥ qध तान् पदिम र द्रौपदेया महारथा युध्यमानांश्च मदरामपदानुगान् ॥ १३॥ रयैर्विमपिता केचित् केचिच्छिदाम्यते। प्रत्यदृश्यन्त समरे तायका निता शरै ॥ १५ ॥ मालोक्य पाण्डपान् युझे घोशण धीरान् सहस्रशः । पार्यमाणा ययुरािस्तष पुत्रण भरत ॥ १५ ॥ दुर्योधनस्तुतार धीरान धारयामास सान्वयन् । म वास्य शासन काचतत्र व महारथ ॥ १६ ॥ नता गान्धाराजस्य पुत्र शकुनिरवीत् । दुय्योधन महाराज बचन बचनाम: ॥ १७ । किञ्च न. प्रेक्षमाणाना गदाणा हन्यत पलम् ।न युक्तमेतत् समरे स्पषि जैसे सम्मुखकी वायु से गंगानदी व्याकुल होताहै । १० । महात्मा महाग्थी. लोग बड़ी सेनामें प्रवश करके जहां तहा पुकारे कि यह रामायुधिष्ठिर कहांहै ।। भार उसके वहशूरवीर भाई कहा है वहां कोई दिवाई नहीं देत धृष्टद्युम्न सात्यीक की द्रौपदके सत्र पुत्र वडेपराक्रमी पांचाल आर महारथी शिखडी का है। १२ इसप्रकार वार्तालाप करनेवाल उन शूरोंको द्रौपदी के महारथी पुत्रोंने और युयु धानने पायल किया । १३ । राजामद्र के पीछे चलनेवाले कितनेही तोवाणों माईत और कितनही दूरीहुई बड़ी घनामों से विनाश हुये युदमें माप के शूर बीर शत्रुओं के हाथमे मरेडये दिखाई पड़े।१४। हेभरतवंशी वह लोग युद्ध में पांडवी, को और चारोंभोर से शूरवीरोंको देखकर आपके पुत्र से रुके हुये हाकर बड़ी तावता पूर्वक गये १५ । और क्रोधके दूरकरने के लिये दुयोधनने मधुर बचन कहकर उन वीरोंको रोका तब यहां किसी महारथी ने उसकी आज्ञा को, नहीं किया। १६, इसो पो गांगर देश के राजाका पुत्र व ालाप में कुशल शनि दुर्योधन मे वोला ।१७। कि हे भरतवशी यह क्यानात है कि जो हमारे देखतेहुपे मद्रदेशियों की सेना मारीगानी है युद्ध में तेरे नियत होनेपर यहवात उचित troos. Your army was ngıtated like the river Ganges'm a storm of wind, 10, The brave warriors cried out, Wbero 13 'Yadlushtiur ? Where are lus b ave brotlieis ? None is sean horo Where are Dhirishi tadyumin, Satyahi, tlo sons of Draupadi thebravu Panchals and val arit Shikliandi? Tlius cuying they w s our ded by the sons of Draupadi and Yuyudlian lhe followers of Suly ), wound-dby Ariol& aud their banners broken, met their death Tour Wal Tiors were destroyed by the enemjed Seeing the Panday warriors all round thorn and checked by your son, they faced the enemy in battle 15. Duryo. dhan tused to pacify their anger by owcot wor la but they would not ।
--- । शप Sulya Part (6946 मिति भारत १८॥ सहितमियोप्यामित्येवं समयः रुत । अथ स्मात पग मेलो सयम प । १९ ॥ दुग्योधन उराच । पार्यमाणा मया पूर्व ते धनु चोभमा परिसंहिता स प्रकाः पाण्डग्राहिनीम् ॥ २० ॥ शकुनिरुवाच । प्रशासन बीत रणे कुर्वन्त्यर्पिना । भलं मोसु तयेतेषां नायं काल उपेसितम् - २॥ वाम संग सभूप मशाजिरयाजरा ! परित्रातुं महंगासान मदराजपदा अमान ॥ २२॥ अन्योरिक्षामो यरनम महता नृप । एवं सर्वेनुसब्धिय प्रययु मंत्र समका: एवमुक्तस्तनो राजा पन ता पुन प्रययो सिंहनादन कम्प पनि मेदिन म ।। २५३ हत विध्यत गुनीत प्रहरय निकन्तत । इत्यासीतुमुल. शमलव सम्यस्थ भारत । २५॥ पाण्डवास्तु रणे या गदराजेपदानुगान् । सदि वाम गुल्ममास्थाय मध्यमम् ॥ २६ ॥ ते मुहीमें घोग हस्तादस्ति पिर्शा और योग्य नहीं है।८ • इन के माय होकर भी युद्धकाना नाहिये क्योंकि तुमने नियम विपाही रागा फिर झिम हेतुमे मरनेवाले दूसरे मनुष्यों को क्षमाकरता 11 दुर्योधन बोला कि मथम मे रोकने परभी मेरे वचन को नहीं किया यह स पानी सेना में प्रवेश करके मारेगो.. शकुान ने ॥ कि युद्धमें क्रोष दुकवर स्वामीकी आज्ञाको नहीं करते हैं क्रोधको दूर करिये यह समय छन मोगों के स्वागनेका नहीं है । २१ । घोड़े रथ सौर हाथियों समेत हम सब निश्चय करके रामाप के पछि घटनेवाले पड़े धनुपधारियों की रक्षा के लिये चलें । २ रेरामा बड़े उपायों में परस्पर रक्षाकरें ऐसा विचार कर वह सर वहांगरे जहापर कि वह मेनाके मोगधे । २।। इसकेपोछे बड़ी सेना समेत रानादुर्योधन पृथ्वीको सिंहनादों से पाताहमा चलदिया । २४ । हे भरतवंशी फिर आपकी सेनाका वा कठिन सन्द हुआ कि पारो लदो पकड़ो प्रहारकरो शिरों को काटो। २५ | फिर पायटर राजामदके पछि चलनेवानाको एक माय देखकर 'मध्यवती गुरमनाम सेनाले भाग में नियन होकर सम्मुख वर्तमान हुये । २६ । हे राना रानाम के Then wisu Bhakuul said to Duryodhan. “Wliy are Ehe ermile of Matra bung destroyed in our presence! It should nnt bo in your presence You should agg st thoin in fighting. Wayao you look on their ciestrurtion !" Duryodhan sud, " Thoy did not hear me and outcrel the Panilne arny to meet their distruction. "20. Shakuni anid, " Enraged warriors in bittie art apt to disobey - their superiora. You must not be angryd leave them in the lureh, Let us follow the filends of shalya and assist +lsar with our care, Horsus aud elephants Let us protect thom will." Having come to the resolutws, they all went there where those warriors, were Duryodhan mat on sbaking the earth with his leonine roars. The cries of your rarriors were, "Blay, prerce, Be12v-chargi and behead!" 25. The hear him, (6946) Mahabharat (६९५६) पते । निएता प्रत्यहश्यन्त मद्रराजपदानुगाः ॥ २७ ॥ ततो न. सम्प्रयातानी समंदा सरस्चिन । हृष्टा किलकिलाशब्दमकुर्वन् सहिताः परे ॥ २८ ॥ अथे स्थितावि जण्डानि समाश्यन्त सर्यशः 1 पपात महती चोलका मध्ये चादित्यमण्डलात् ।। ५९ रथमम्नैर्युगाक्षश्च निहतैश्च महारथैः । अश्वनिपतितश्चैध सछनाद्वसुन्धरा ॥ .॥ पातायमानस्तुरगयुगासक्तस्ततस्तत । अरश्यन्त महाराज योधास्तत्र रणाजिरे २१, ग्निचक्रावधान केचिदस्तुगा रणे । रथा केचिदादाय दिशो दश विधाम 1॥३२॥ तत्र तत्र व्याश्यन्त येन क्लिप्टा स्म घाजिन । रथिना पतमान या श्यन्त नृशोत्तम । गगणात प्रच्युता सिद्धा. पुण्यानामिव संक्षये ॥ ३३, ॥ निहतेपुर, शरेषु महाराजानुगेषु चै ॥ ३४ ॥ मध्यानापततश्चैध हट्या पार्था ,महारथा माया सन्त बगेम अपगृमा प्रारिण ॥ ३६ ॥ वाणशम्बरवान् कृत्या विमान शानि पाछे चलनेवाले यह वीर युद्ध में एक मुहर्त मरमही मोये दिखाई पड़े। ७॥ इप्स केपीछे हमारे जानेपर मदेशियोंके मारनेवाले बंगवान प्रसन्नचित्र प्रासपासियों ने एक साधही किलकिला शब्दीकया । ८ । सब ओर से उठे हुये धी दिखाई पड़े और सूर्यमंडल के म यसे बड़ी उस्का पातहुई। ,२९ । टूटेरथ युगपक्ष मृतक महारथी और पढ़ेहुये हाथियों से पृथ्वी माच्छादित होगई। ३० मा रज वहां, युद्ध भूमि में शूरवीर वायु के समान शीघ्रगामी और जहाँ तहाँ युगाँसे चिपटे हुय घाड़ों समेत दिखाई दिये । ३१ । युद्धमें कितनेही घाड़े टूटे परियों वाले रथको लवले और कितनेही श्रीधरी को लेकर दशों दिशाओं को भागे ।१२। जहां तहां योक्तरों से चिपटे हुये घोड़े दृष्टिपड़े हे राजाओं में श्रेष्ठ कहीं गिरते हुये स्थी ऐसे दृष्टिगोचर हुये जैसे कि शुभकर्म फलों के समानहोंने पर, आकाश स गिरेपे सिद्ध दिखाई देते है । ३३ । राजामद्रके पीछे चलनेवाने शूरवीरोंके मरनेपर । ३४। विजय के लोभी प्रहार करनेवाले महारथी परिष हमलोगों को आताहुआ देखकर तीव्रता से सम्मुख वर्तमान हुये।। ३५ । शंखों के शब्दों से संयुक्त वाणोंका शब्द करते हम लोगोंको पाकर लक्ष्यभेदन करनेवाले Pandavas seeing the followers of the hing of Madra together, formadº themsels os into an array and faced them. The Madrug were found defeated in an instant, and at our approach the Pandav warrior Maused oheerful cries The head's bodies rose everywhere and meteors were detached fion the sun's orb. The ground, wax covered with brohen cars, dead Triors and fallen elephantr. 30 The Warriors more seen clinging to the soles of cars or to the swift horses, Horns dragged the cars with broken wheels and topkaray their warriors in all dıractions Horses clung to jokes and the fallivg carriors were seen like sidlas falling dus fiom leasen at to expiry of their ments, At the fall of the followers of Madca, tuo Pandavas (६९४७) शल्यपर्व Mahabharat (6947) वन । भन्मोस्तु पुनरासाद्य उपलक्ष्याः प्रहारिणः ।' शरासनानि धुग्याना लिहमा दान प्रचंकुश ३६ ॥ ततो हतममिप्रेक्ष्य मदराजधले महत् । प्रद्रराज समो रहवा र निपातितम दुर्योधनबल सर्व पुनरासीत पर्पमुखम् ।। ३७ ॥ध्यमाने महाराज पार्जितकोशिभिः। दिशा मेजेऽथ सम्मा प्रोसित दयाम्यमिक इति शस्तपर्वणि शल्यवधपर्वणि दुर्योधनसैन्यापपाने अष्टादशोऽध्यायः १८i . असमय उवाच । पतित युधि दुख मद्रराजेमहारये तावकालय पुनधि प्रयो विमला भवम् ॥ १ ॥ पणिो नाविमनायां ययागधिषप्लो । अपार पारमिच्छतो. নেইমামেলায় মায়সভিমালাকাষা। লাখ লাখ प्रभार करनेवाले और धनुएके चलायमान करनेवालों ने सिंहनादोंको किया ।१६॥ उसके पीछ; राजाम की बड़ी सेनाको मरा मा. देखकर भौर, शूरवीर रानाभद्र को पुद भूमि में गिरा हुआ देख कर दुर्योधन की सब सेना फिर मुख फरनेवाली हुई । ३७। हे महाराज विजय से शोभायमान हर मनुषधारी पांडवों से घायल भयसे व्याकुल भयभीत सेनाने दिशामोंको सेवन किया २८ . अध्याय १९॥ | संजयबोले कि युद्धमें भगेय महारथी रानामद्रके मरनेपर आपके पत्र और युदकती लोग बहुधा मुख फेरनेवाले हुये । १। जैसे कि भयाह और विना नौका वाले समुद्र में नौका दृढने पर व्यापारी लोग पारपानेके अभिलापी होते हैं उसी desirous of victóry opposed us for a long time.'. Mixing the soundā of towebing with lliuse of conchs, they attacked pa syith: leovine toare 36. Seeing the great ermy of Madre destroyed and their king fallen down, all the army of Duryodban torped back. Wounded, by; the victorious Panderas and terrified, we run away, in alt directions.." 38.'!. tite : CHAPTER XIX ...Sanjaya said, “ At the fall of invincible Shálga, goue 'blóns para wairiora turned back. Like traders anxious to cross the ocean at the wreck of their boat, your warriors desired for protertion'at thin 16318) Mahabhnrat मृगाः सिंहहिंसा इच॥ .. .. वृषा यथा भग्न,गा शीता गजा ke : मध्यान्हे प्रत्यपायाम. निजिता जातशत्रुणा । मधातु मनीकानि न च राजद पराको । आसीदबुद्धिहने शल्ये तक योधस्य कस्तीपत् ५. भीमे द्रोण व मिहते सूतपुत्रे च भारत । यददुःख ता योगानो भयबासीविका पते। तय स च नः शोको भूय एवाश्यपर्तत ॥ ६॥निराशास्तु नये तस्मिन् हो/ शल्ये महारथे ॥ ७ हतप्रयोग विध्यस्ता लिन्ताधशित शरः । मद्रराजे ते राजन योधास्त प्रादषन् भयात् ॥ ८॥ मयानन्य गजागन्ये रथानचे महारथा| मामा जवसम्पमा पदाता.पाद्रधन मयात्॥९॥हिलारनाश्च मातंगा गिरिकपा प्रशारिक समा इषन हते शल्ये अकुशांगुष्ठधोदिताः ॥ १०:॥से रणादरतधेष्ठ धकाः प्रावण दिशः धावतचाप्यदृश्यन्त श्वसमानाः शाहताः ॥ १२ ॥ ती प्रमाणान दुलार प्रकार महात्मा युधिष्ठिरके हापसे सूर शल्य के मारेमानेपर भपारमें पारके चाहने बालेहये।। हे महाराभ वह भयभीत वाणोंगे धापळ अनाथ होकर इस प्रकार नार्थो के चारनेवाःहुये जिस मकार सिंहसे पीड़ामान मृग । ३ ' टूटे सींगवाले बेल और टूटे दांतोंवाले हाथी होते हैं उसीपकार अमात शभु युधिष्ठिरसे विजय किये हुये हमलोग भी गध्याहन के समय हटमाये।४। हे रामा शल्य परनेपरमापके किसी शुरवीर का साहस सेना कादी करने और पराक्रम करने में नहीं मा हे भरतवंशी भीम द्रोणाचार्ग और कर्ण के मरनेपर मापके भर गांडो जो दुख और भय आधा हे राजा वही अब हुआ हमारा वहमय और शोककर पसमान हुमा ।६। महारथी शल्पके मरनेपर उस विजयमें अनाशाहुई।७।हेरामा रामापदके मरनेपर वह शुरवीर जो कि तीक्षायाणोसे घानम पाणित हुये पार जिनके बड़ेवार मारेगपे ये सब भयभीत होकर भागे। कोई मारीयोड़ों पर कोई रयोंपर कोई हाधिपोंपर सवारहोकर भागे । और पदातीही सीमसासे भागा। 'शल्पके मरनेपर पर्षतरूप प्रहार करनेवाले दोहजार हाथी बम और अंगूठे से चपायपान कर भागे । १०१ हे भरतर्षभ यह आपके शूरवीर युदो दिमागे को माग बार पाणोसे प प वासलेने और दोदते हुये दिसाई पड़े। १९॥ विनर death of Shalya Terrified and wounded, they missed * protector liko dcer attacked by n lion. Liho oxen witi brokeo forns or liko elephants with brohen tusky, wo vero duſorted and mutent loy You dhishthis at midday. None of your marriors cou'd bure the heart to show big prowoks aſtor the dau of Shalyn 5 Thoy word in the Anno dangor and four as they were at the death of Bislim, Drona and Karan. Wo woro kolest of ricinoy at the duath of Saiya The rounded and defealed warriors, lo** chia wero dend, dedit fant. Tloy flol with the lio-se, le pliante or cars or on fout. Two thonnania of inpliantı, uired by trada awl tíma, les aros. 10 - .. T#498 Shalya Pass (6949) रममा हतोत्साहन पराजिनान् । मापस पापालाः पाण्डवा अपविण ॥१२॥ पाणशमरवयापिसिंहनाद पुक' शनाराम शगणां दारण. समपचन ११३॥रएम कोरर सत्यं मपत्रस्तं प्रांवातम् । सम्योग मममा पाउमाला: पागः सर१४॥ मय गमा सत्यनिजितामित्रो युधिष्ठिर । अघ दुय्यांधनो सानो सानपतिधिया । १५॥ मप शुरषाइत पुत्र धृतरण अनेचरः। विवल: पतितोसमी किलित प्रतियताम् ॥ १६ ॥ अघ जानातु कौन्तेयं समय सन्धि मामाचारमानातु दुर्भधा गहयिष्यति पापकृत् ॥१७अव म सस्य स्मरता मुमती हितमामय प्रभृति पार्थी प्रेग्यभूत उपावरन् विमानातु नृपो एस पत् मात पापुमदन. १८ अपकणय महाप मानातु स महीपतिः । अचार्जुन उपोष बोरं जानातु संयुगे । मामास पल म बाहुधांश्च पलमाइ ।। २० । अध अभिलापी पांचाल और पाहन उन अपाहसी पराजित छिन्न भिम और भागे हमको देखकर पीछे दोहे । १२ । शुरवीरों के वाणोंके उसम शब्द सिंहनाद और अंसों के बाद महाभयकारी प्रकट हुगे । ।। पाण्डनों समेत पांच लोग पन कौरतीय सेना के लोगोंको भय पीत और भागेहुये देखकर परस्पर में पर अपन बोले।१४॥ कि आमचे धैर्यवाला राजा युधिष्ठिरको मता शत्रु वालाई मा दुर्योधन प्रकाशवान राजलक्ष्मी से रहितंहआ।१५। भव राजा धृतराष्ट्रपत्रको | मराहमा नकर पृथ्वी पर पड़ाहुभा अचेत होकर गगप्रस होगा। १६ । अब अर्जुन को सब धनुषपारियों में श्रेष्ठ और समर्थ मानो अब वह पापकी दुर्बुद्धी अपनाही निन्दा करेगा । १७ । प्रा हितकारी वचनके कहनेवाले विदुरजी के बननों को स्मरणकरेगा भर से लेकर नौकरके समान पुधिष्ठिरकी उपासन करता राजा धृतराष्ट्र उसदुःखको जानेगा नो पढिोंने पाया। १८ । अब राजा भीकृष्णकभी माहात्म्यको जानेगा भव युद्ध में अर्जुन के धनुषके घोर शब्द मे मार लड़ाईम दोनोंभुना और प्रस्त्रों के सब वलको जानेगा । २० । जैसे कि Your warriors fran away froin the field ot battle, wounded and aighing The Punchals and Pandavas, desirous of victory, checked tho routed l'aura pas. There were dreadful sounds from the leonino roaia, conchs and bows of the Farriors, Tos l'ancials and the Paad avas, seeiog the Kauravas torror striken and flying, sud among thenaelves, "Yudhjahthir of true prowest 18 now withont enemies and Duryodhan has lost lus wealth. 13. Prince Dhritrashtra will now be baset with faintness and disease on heariug of the death of buy He will know that Arjun is the best of archers and will blatae his own coil policy. He will now remember the salutary adrice of Vidur and will consider it derogatory to his dignity to attend on Yudhichthn like a ressant He will know the grpalnog Bons, - - (6150)- rii Mohabljarát 15 प्रास्पति भामस्य बल धारं महारंगना हत दुबोधने युद्ध शक्रेणयामुरे पले । यत् कृत भीमसन दुःशासनबधे तदानान्यः कत्तीति लोकेस्मिन्नत भीम महा: घलम् ॥ २२.जानतामचं ज्येष्ठस्य पाण्डवही पराक्रमम् । मद्रराज प श्रुत्सदेखें। रपि दुगसम ।-२३ ॥ मय जास्यति संग्राम माद्रीपुत्रौ च पाण्डवो । निहते सीपले रे गान्धारेचसशः ॥ २४ ॥ कय तेषां जयोस स्याघेषां योगा: मर्मजप सांयकिभीमसेन धष्टपुनाव पार्षत ॥ २५॥ द्रौपदीतनया विश 'माहीत्री व पाण्डयौ । शिखाडाव महेवासो राजा वैध युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥ येषाच जगतो, मायो नायः कृणो जनार्दनः । कथं तेषां जयो न स्थायी धर्मो म्याश्रय 'भा द्रोणम कर्णश्च मद्ररामानमेव अथान्यान्नृपतीन् सान शतशोध सह 'मः ॥२८१ कोम्ब शोरगे जेतुमो पार्थात् युधिष्ठिरानी पस्या गायोपोन इन्द्र के हाथ से विलिनाम प्रमुर पारगिया उसीपकार युद्धमें आमरानके मरने पर महात्मा भीमसेन के घोर पर.क्रमको जानेगा। २१ जिस भीमसेनने दुशासमके मारने में जो कमिगा उस कर्मको महात्मा भीमसेन के सिवाय दूसरा कौन भनय करसक्ता है ।२२देवताओं से भी अनेय राजामद्र को मृतक सुन कर.बड़े परिर के पराक्रमको भी जानेगा मा शूरवीर शकुनि और सब नाधार देशियों के मरनेपर युद्धमें पांडव नकुल और "सहदेवकों भी मानना १२४ाउन लोगोंकी विप कैसे नहीं होसक्ती जिन्हों के शूरवीर अर्जुन सात्यकि, भीमसेन धृष्टद्युम्न । २५॥ दीपदी के पांचों पुत्र पांच नकुल सहदेव पड़ापनुष धारी शिखण्डी और राजा युधिष्ठिर है ।२६। भौर संब जगदके स्वामी दुष्ट सहारी श्रीकृष्णली जिन्होंके नाया हैं और धर्म जिन्होंका भाश्रम स्थान है उन्हों की विजन कैसे नहीं होसती । भीमद्रोणाचार्य कर्ण रानाम और अन्य सैकड़ों हजारों राजाओंकोयुद्ध में विजय करनेको पामर युधिष्ठिर के सिवाय कौन समर्थ सदेव धर्म और यशके भंडार इन्द्रियों के सामी श्रीवामी मिसके af Shri Krishna as well as Arjuu's strongth of. arms in ihe field of batlle -20. He will know the proiross of Bhirn on laaring the death of Saklya like Bali - Blsin by Indra: Whoolse . can do adved such' Rs way done by Blim in slaying Duslia-83 1. Henring (luo deštli of' the king of Aladra, invinciblo by Indra, bo will know the prowess of the oldest Panday. He will know of the pronesir Nakul and Sahador when I will bröl the death of Shakunis and tho Puno chale.' Why should thoy not wiu who hayo Arjun, 'Satyaki,] Blijo, Dhrishtidyulan, this five sons of Draápadi, Nakul and Solinders the great archer Shikhandi and prince Yudhishthir for their waist 16 They are sure to win slu baru Shri Krishn thu destruser or tho wriched for thuir.qirolector_snil Dhar nu for their rruge. Bhishma . (६९५१), 17419 Maliubhardt (.69510 सदा धर्मयशानिधिः ॥ २९ ॥ स्पेय पदमाताने हा महता का प्रमाण कान पुरे सजया पृष्ठतोन्ययुः ॥ ३० ॥ धनञ्जयो रयानी मध्यवर्तन धोरणं वान् । मात्रीपुत्री व शकुनि सात्यकिश्च महारथः ॥ ३१ ॥ तान् प्रेक्ष्य द्रषतः सर्वान भीमसन मयादिवान् । दुर्योधनलदा मूतमय वीहिस्मयभित्र ॥ ३२ ॥ मामतिकमते पायों भतुं गणिरवस्थितः जघने सर्वसन्यानो ममादयान प्रतिपादय । ३३ । अधने, समान किन्यो मां धनञ्चयः । नसिहत व्यतिक्रान्तुं घेलाभिष महोदधिः ३४॥ पश्य सेन्य महत् मत पाण्डवैः सममितम् । सग्यरेण समुन्न पदेयरमैन समन्ततः ।। ३५॥ सिंहनादांश्च पाशा श्रृणु घोरामहभियान् । तस्माधादिशः मत अधनं परिपालयन् ॥ ३६॥ माय स्थिते च समरे युध्यमाने च पाण्डवम् । पुनराव सेमत माम बलमोजता ॥ ३७॥ तच्छुत्वा तव पुत्रस शासरश का सर स्वामी, २९. संपकार वार्तालाप करते वह मानन्द से युक्तं अन्तःकरण से अत्यन्त प्रफुरिक्त बह लोग आपके भागेहुपे शूरवीरो पो चले ।। पराक्रमी मर्जुन रथकी सेना के सम्मुख वर्षमान हमा और. महारथीः सात्यकि नकल और सहदेव यह नानो सकुनी के सम्मुखहुगे । ३१. । तव दुर्योधन उन सबको भीमसेन के भय से पीडापान और भागता मा देखकर आश्चर्य करता हुआ अपने सारथी से बोला । १२ कि धनुष हाथमें लिये सम्मुख नियत अर्जुन मुनको उलंघन करताहै, सब सेनाओं के मध्य में मेरे घोडाको पहुंचामा । ३५ । कुन्तीको पुत्र भर्जुन मुफ सेनाके मध्य में वर्तमान इसके उल्लंघन करनेको ऐसे उत्साह नहीं करेगा जैसे कि महासमुद्र मादा को नहीं उल्लंघन करसका है । १४ । हेमूत पोडवों से पराजितदइ सेनाको देखो और चाराओरसे, इससेनाकी उठीही धूल. को देखो। और वह भपकारी घोर सिंहनादोंको मुनो इसटेतुमे डेमूत सेना के मध्यको रक्षा करताहुआ.धीरे चल.३६। सेना में मेरे नियतहोने और पहियों के रोकनपर शीघही. मेरी सेना साधतासे फिर लौटेगी । सारथीने आपके पुत्रके, Dcous, Karas, Shalya and thousands of other kings could not be conquered excopte by Yadbishibir who has shri Krishn for his masteri" Thue talking your warriors followed them.36. Valiant' Arjun find the army. Satyaki, Nakul and Sahidev opposed Shakuni - Being them distressed and dying, Duryodhan, much amazed," said to his charioteer, Arjun with his bow is operatepping me. Drive my borkes in the midst of the armies and Arjun will not be able to overstep me as the ocean cannot pass uper the coast. Look at the army defeated by the Paada yas and the dust rising from thon. 'Hear the jharp leöniño tvare. "Drire the. bogsss, slowly in the midst of the army. My, arury: kill again return to duty on seeing my car in the midst or the army. Hearing tbe bave words of yourson, the driver druve the horas deckbu n (6952) Malabharat पिंगसंउमान शनैरश्यानचोदयात् ॥ ३८॥ गजाघरोपहीमापारमानपदान 'एकविंशतिसाइमा संयुगायावतरियरे ॥ ३९ ॥ नामादेशसभन्दता नानानगरवामिनः। अवस्थितास्तदा योधाः प्रार्थपन्तो मायशः ॥ ४० ॥ तेषामापतता तर सहयात परस्परम समई: मुमहान यो घोररूपों भयानकः ॥ ४१ ॥ भीमसेनस्तदा राज पृष्टद्युम्नश पार्षापलेन चतुरड्रेन नानादेयानवायत् ॥ ४२ ॥ भीममेषापम्त रणेथे तु पदातयः । प्रहास्फोरसदृष्टा धीरलोक पिपासवः ॥ ४३ ॥ मामा भीम सेनन्तु सरधा युगभदाः । घाईदा विस्थपन कथाRA.." परिधार्य रणे भीम निमस्ते समन्ततः । मध्यमानः समरे पदाधिगणपत म चचाल बता स्थानान्मनाक व पर्वत: ॥ ४५ ॥ ते तुकुमा महाराज पाral उसशूर और श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य वचमको मुनकर मुवर्णके समानसे ये घोड़ोंको धोरेपनेसे चलायमान किया । ३८ । हाथी घोड़े और रथियोंसे रहित देह की प्रीतिको त्यागनेवाले इक्कीस मार पदावी युद्ध करने को नियतहुये । १९ । तब नाना देशों मत्सम होनेवाले अपूर्व नगरों में रहनेवाले शूरवीर बड़े याको चाइने नियतहये । ४० । वहां उन प्रसन्नचित्त मानेराल का वह परस्परवड़ा युद्ध उत्पाआ जो कि घोररूप और भयानक था। राजा तब भीमसेन और घुम्न ने चतुरंगिणी सेनासमेत उन'नानादेवा निवासियों को रोका किर सिंहनाद और भुजदंडों के शब्दों समेत अत्यन्त सम्र वीर लोकोंके जाने मभिलाषी अन्य पदाती भामसेन के सम्मुख वतमान हुये । कोषयुक युर दुर्मद धृतराष्ट्र क पुत्र भीमसेनको पाकर गर्मना करनेगे .और. परी कथाको नहीं कहा ४४॥उन सबने युदमें भीमसेन को घेरकर चारों ओर से घापस किया इसके पी, युद्ध में पदाती समूहोंसे गिराधा मौर घायल वह भीमसेन अपने निष स्थानमे ऐसे चलायमान नहींहुमा असे कि मैनाक पर्वत सता । ४५ दिमहाराज फिर पाण्डवोंके महारथी कोपयुक्तहुये और मारने प्रहर with gold te ppings. Destituto of elophants and horsos and carel au of their lives, twenty one thousands of warrioi8 Blagod for battle. The Warriors of diferent countries were engaged in fighting 40. The figliling was dreadtul to the extremo Bbrinsen and Dhrisbtadyumn oliockod those warriora of dillerent countries 42. Then with leolino roars and the boating of arros, the cboorful Warrior desiruusof going to this region of horopa, upp sd Bhim un fout. Tuo onraged sons of Dhritraalitra voared at the sight of Bhim and chd nothing else. Surrounding Bhim in the fold of buttlo thoy.wound. of him from all aidon Surrogadod by the foot soldiers and woundod by meh, Bhim did not movo from his place hke a bill Thon tho Pandar warriora woró oaragod and chockad othor warrior 15.
- netgi Shalya Parv 69531 महारमिगृहात प्राहा गांधापन्यानपारवन् ॥ ४६ ॥ मयत र भीमन पघुगरियो । मोऽवतीय रमापूर्ण पदाति समुपस्थितजासम्पप्रतिष्ठान प्राममानी गदाम ॥ ४८ अषधीसावकार बांधान पाणिरियामकः । रथाश शिपहीनांस्तु तान् मीमो गणपला ९॥ एकविंशतिसाहसान पानीनबपोपपत् हरमा तत् पुरानी भीम सरपपगम ॥५०॥ धृष्टएम्न पुरस्कृत्य नाचरात् परम एयन पादाता मिदना स्मी शियिरं कषिपसिना सिमानाष पातेन कर्णिकार: सुपिताः । ५१ ॥ बानापुष्पखोपेता मामाकुण्डलधारिणः नानाजात्या बताता भामाशामागताः॥५२॥ पास पदातीनां माबलम् ।निकृतं विभी रोधोर भयानकम ॥ ५३॥ युधिष्ठिरयुगगास्तु सहमेन्या महारथा न्यावर मामानं पुर्व रोप तर ५ ते सतावका रट्या मोपासा. पलान् । नाश्यपस्त ते पुत्र पमरालयम् ॥ ५५ ॥ तद्भुतमपश्याम तर परम पोषम्। रोकर अन २ शूरवीरों को रोका। ता भीमसेन युद्ध में उनचारों ओरको नियत पदानियों के कारण मोरयुक्त हुभा और शीघ्रही रथसे उतर मुवर्णसे मड़ी हुई बड़ी गदाको सेयर आपभी पदाती होकर नियतहमा ४८ । और दण्डधारी कालकपमान होकर आपके भरतीसमेत रथ घोड़ेमेरहित पदातियों को मारा 1 ४९ । अत्याद उस युदय कीस हजार पदानियोंको मारकर रुधिरीलप्त शरीरसे शोभापमान हुमा । ५० । बार थोड़ेसी समयमें धृष्टद्युम्नको मागेकरके दृष्टिगोचर हुमा भार बह सर पदानी पसरु कपिरसे लिसहोकर पृध्वपिर शयन करगपे जैसे कि पुष्पित कर्णकारके पास टूटकर गिरेहों उसी प्रकार नानाप्रकार के अंशोंसे संयुक्त नानामकारक कुरा रखनेवाले नानाजाति के बहुत प्रकार के देशों से आनेवाले शूरवीर मारेगये । ५२ । पताका और धमाभों से ढकीहुई पदातियों की बड़ी सेनाक सांग लेटेइये महापार रूप और भयानक होकर भोभापपान । ५। । और सब सेनाके लाग और महारथी जिनके अपनी | युधिष्ठिरथे वह सब आपके पुत्र पारमा दुयापनके सम्मान दोहे ५४। उन सबनेवई धनुषधारी भोर मुन्न फिरहुये आपके शुरखोरोंको देखकर आप के पुत्र को ऐसे उल्लंघन न किया जसे कि समुहको मपीदा नहीं उल्लंघन करसक्ती । ५५ । 'Chew Bhim was eordged on account of the attuok and soon coming down from his car, he stood on foot with his maca Like Death, witli his staff.hoslew the foot soldiers who had no cara and ho ses. He slew the twenty one thousand of warriors and looked glurioux with hin blood staind body. 50. In a short time he was seen with Dlıriobtadyumn and foot soldiers luy on earth with bleadiny holien like Kidshak trood ja bloom struck down by the wild. Discked with earrings the Warriors of various countrios lay dead there foot soldi9ry, with their standards and banners looked dreadful as The (69541) Mahabharat पद सरिता-पार्या न शकुरतिक्षितुम् ॥ ५६, मातिापपातात, तथाई पता यने । दुर्योधन स्वक सैन्यमन्त्रीद्भाविक्षतम् ॥ ५७ मते देशं प्रपश्यामि पृथियां पर्वतेषु धा । यत्र यातान्न पो हन्युः पाण्डवाः किस्तेन । ५. हाचं वय सेषां कृष्णां च भृशविक्षती । यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो.धु नो विजयो भवेत् ॥ ५९॥ विप्रयातास्तु मा भिधात् पाण्डया कृतकिल्विषा । अनुसृत्य निष्यन्ति अयोगः समरे स्थितम् : ६०॥ अणुध्वं क्षत्रियाः सर्वे पांघन्तोत्र समागताः। यदा शूरमा मोरञ्च मारयन्तफा सदा । को नु मुढो,न युध्पेत पुरुषः क्षत्रिमनुषः ।। २ भयो मो भीमसेनस्य क्रुद्धस्य प्रमुखस्थितम् । सुखसांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम ॥६३ ॥ जित्ने मुखमाप्नोति हाः प्रत्ये महाफलम् । न युबंधाच्छ्यान - पन्या: वहाँ हमने आपके पुत्रकी उस भपूर्व वीरता को देखा जा सर्व पाराहव उस अकेले को युद्धमें नरनंघन करनेको समर्थ नहीं हुये। ५६। बदुतदर नजानेवाले भागने भत्तावित प्रत्पत घायल अपनी सेनासे यह वचन कहा कि मैं ध्वी और पर्वतोंमें भी उस देशको नहीं देखता हू जहाँमर जानवाले तुप लोगों को पाण्डव नहीं मारें भ गेनसे क्या प्रयोजन है । ५८ उन्होकी सेनाथोड़ी है और श्रीकृष्ण समेत . भर्जुन अत्यन्त पायल है जो इस सर्व 'यहा निर्गत होजाय तो अवश्य स्मारी विजयहोप । ५९ । अनहित करनेवाले पाण्डव भागहुये और छिमभिम होनेवाले तुमलोगों को पीछे करके मारेंगे इससे युद्ध मेंही हमारा.मरना श्रेष्ठ है !.. | जितने भत्री यहां इकट्ठ न्यासा सुनो जव कि काल सदय शर भोर भएमांतोंकोभी मारता है तो कौन अज्ञान पुरूप असल सीहोकर युद्ध नहीं करे । ६१ । कोषयुक्त भीमसेनके सम्मुख. हमारा कल्पाण निस्त है साधर्म में लड़नेपाली को युद्धमेदीमरना मुखदायी है । ६३ । मनुष्य को परमे भी कभी मरना सप्रीधर्मसे लड़नेवाले की मृत्यु मनामन है दा विजय करके मुखको पाता है और मराहमा परलोकमें बहे फको पाता है. कोपनिषय choy lns on the grouod. The arrus bert by Yudhish bif- ruglicu. lagripst. Duryodlisn Sociog, your Farriora , turn back, they could not overstep laius as tho Oloun can noi cassover itä Jenndary. Then *uman the Fronderlal bravery of your son whoin a' tha Paudarne togetber could not overstep. 06 Tirens ho sail to his wounded Wartor who intonded aight, " I donot soe öplast on hilin or plaina Where you can be safe froin the Pandaiw. Winnt null you pain lig Bight ? Their army is stuall and sun riskin and Arjun di souhiload. We are sure to w if ve vithstand "them The Pathartient Hill chavo you'in your flight. It is therefore groel to die fighting. 1. L*} lo nsemblel warriors host in tlmib oparta Koi wo bravo ned Forsturard. sring this, thy among martions foolsh "onough to . शल्यपर्व Sanlya Pare (6955] al-कोरवाः । भनिदोष सान् लोकार इता युद्ध प्राप्स्यप। ६५ । भुषानु वयन तापजायरया च पार्थिवाः पुनरयान्यवन्त पाण्डवानाततायिन... पोपतंद सपाध्यूढानीका महारिणः । प्रत्युत्तदा पार्या जयगृशाः प्रमन्यवः INR नेम्जयों रथेनाजायपतं धीर्यषा विभु त्रिषु लोकेषुः गावीर म्याक्षिपधनः ६८ ॥ माद्रीपुत्री तुं शकुनि सारपकिन महायला मिनास्पतम् पारा.यतीताय पलम् ॥ ६९ ॥ :: होते शल्यपर्वणि अल्पवधपर्वणि संकुलयुद्धे ऊनविंशोऽध्यायः १९ ॥ ., M 104 करके,सर्गका मार्ग धर्मयुदसे उत्तम कोई नहीं है युद्ध में मरनेवाला योडेही समयमें मता होनेवाले लोकोंको, भोगता है। ६५ । राजालोग उसके वचनको मुनकर और बड़ी प्रशंसा करके शत्रोंकों धारण करके फिर पाण्डयों के सम्मुख भाकर पत्तमानहुये । ६६ । अलपत सेना समेत शास्त्रधारी विजप के आकांक्षी और कोपयुक्त वह पाण्डव शीघही उन आनेवालों के सम्मुखगये । ६७ । पराक्रमी अर्जुन की सवारी से युदधाम में यर्तमान हुआ और तोनालीकमें विख्यात गांडवि धनुपको ठकारा वहा पराक्रमी सात्यकि नकुल और सहदेव पह तनावीर तीम्रता से उस और शकुनी के सम्मुखगये, निधरको कि आपकी सेनायी ॥ - - to die in at to light.par gooti. battle is gixod for war Why should we nob idio fig.... iivate mappy it.we gain victory and áttain heaven in case of death. The easiest wav to hnaven lies! :'s direct • "Pand: his car #wisu ww wvirow Blog vo-suyakir" Naku and; Sahadev. oppose "Shakuni and his armys . T -mire ........
- (6936) Mahabharat सञ्जय उवाच । सनिष्कृते चलीधे तु शाशे मोगणाधिपः। IS समः पाण्ड्ना ममहाळम् ॥ २ ॥ आस्थाप मुमहामांग ममि पोwrim मेरोषणपत्यमशिवगणमईनम् ॥ २॥ वोसो महान माइले प्रमतः मशितोवा गण मित्यम् । सुरपित: शास्त्रीवनिश्वयोः सहोपवास समए राम || स्थितो अपरो भ्व पयोदयस्थ, सविता तपाम् ३ सब मागावरे राज अयुध्यो पाण्डमतान् समन्तात् ।शितः परदिवार पावि मोजातिका सोः॥४॥ तत. शरान् सजतो महारणे बोगम जनतो बमाय at तर दाशु से परे । यथा परा पनघरस्य देवा । पैरामणस्परप बतिमरत्या पुरा बासरस्येव राजन् ॥ ५॥ ते पाण्डवा सामसम्प्रयास समेकनागपगुम तात् । सहस्रशो विधरन्तमे यथा महेन्द्रस्व ग* समोरे ॥ संघायमागन्तु अध्याय १०॥ संजय बोले कि सेना के समूहके लौटनेपर म्मेदों के समूहों का रामामा क्रोधयुक्त शाल पाण्डवों की बड़ी सेना के सम्मुख गरा। ? । मतवाले पर्मा कार अंहकारी ऐरावत के समान शत्रुओं समूहों के मान करनेवाले पोपी पर सवार । २ । जो भद्नाम बड़े कुलमें उत्पन्न सदैव दुर्योधन से पूभितया शास्त्र के निशप माननेवाले मनुष्यों से अलग हाथी युद्धमें मिसकी सदेव सवारी या रेरामा बह राजामों में श्रेष्ठ हाथीपर निपत होकर उस प्रकारका विदित शेताया जैसे कि प्रातःकाल के समप उदयाचल पर नियत सूपं होता। रस भत्यन्त उत्तम हाथीकी मवारी से उन इकट्ठे होनेवा पापों के सम्मुख गया और उसने बड़े तेजवान वेगवान इन्द्र बनके समानामहाघोर पतों से पारगा को पापनाकपा । ४ । इसके पीछे पड़े पद पाणोंको गेडनेरासे मौर शूरवीरोंको यमलोकमें पहुंचाने वाले उस राजाका दि अपने और दूसरे भरती ने भी ऐसे नहीं देखा त कि पूप्तिमयों ऐरावत हाथीपर सबार सेवामान करनेपाल पत्रधारी इन्द्र के छिद्रोंको बताभों ने बार बारों ने नहीं देखा उन पारस सोपक भार मनियों में चारों पर कोरमारों प्रकार से यूपनेपास CHAPTERA Banjaya raid, " Altho return of tho armies, the king of mlechno Balra much enraged, isced tha Pandar army. Ho mar momnted on mad clephant huge ann hilt or Airavat, of Bondan family, kept lung by Durrouian for thio parpins of war. Moonlod on tlint els plant, the king looked florinus liko the moming San and formed the l'andaru. Hlo wopada (licer with his mijn lijn sitowi. Fighting ber mine eile mihu out Any weaknes in him ** non erald find out theirfreth Indra rbile mounterm Ararat in the watchende und neuen The Pandata Brks and Banjayaram . 1-10 शल्पप: Hi Part TET, परेषा परीतकल्प विषमा.समन्तात् नेवाचतस्य सम. मग महिमयमानम्नु, परस्पर तदा ॥७॥ ततः प्रमग्ना सरमा महावमः सा पाण्डया लेन नराधिपेन दिशा सतमःमामा प्रधाविता गजेन्द्रवर्ग तमपारयन्नी ॥रा च नो गयी, प्रममा सबै सदीया युधि घोधमुमयाः । मम्पूजयसभ नगधिपते, शमान प्रमः शयिसाधकाशान् । भूत्वा निनाद:धकारवाणा विमुक्त साशनशाद । सनापतिः पाण्डसनयान पांचाप्टपुत्रो नमार्ण गात् ॥ १०॥ तस्तु में कि महात्मा प्रस्युध्यो स्वरमान जया । जम्भी यथा समागमे घे नागेन्द्रीगण मिन्द्रधाराम || ११॥ तमापतन्तं सहसाब रटवा पांचालगंशं युधि राजसिर त विप प्रेमयामामार्ग प्राय राजन् दपदारमजस्कार से ने विप महसीभ्यास तसमविष्णग्निपतिमा परकैः । करधोनिशियनीगनमुस्लिामध्य मापकले.हायीको सम्मुख एमे देखा नसे कि मा. इन्द्रके. हाधीको देवाया। सब प्रतिपक्षियों की सेना, चारोंऔरमे भागीहुई और माणमाप दिलाई पट्टी और युद्ध में परस्पर अत्यन्त महन पायेगे. भयो नियत नहीं हुये . ७ । फिर पांडवों 'की बराबड़ी सेना.उस रामा,के हायसे अकस्मात् परनितईई और गजेन्द्र के उत्स, वेगके पारको,न-पाकर भास्मात् चारों भोरको दौड़ी। आपके सप उत्तम शूरवीरों ने युद्धमे-उस वेगवान सेनाको प्रगजितईई देखकर उसराजाकी प्रशंसा करी और चंद्रवणे, वेन शेखोंको धज्ञाया। पांडव और सब्जियों के सेनापान धृष्टद्युम्नने कौरवोंकी वह शेखों के द्वाराकीहुई गजना सुनकर सहन नहीं किया। इसकेपछि शीघ्रता करनेवाग महात्मा धृष्टद्युम्न विजयके निच उस हाथी के सम्मुख ऐसेगा जैसीक इन्द्र के सम्मुख भनाम आसुर इन्द्रकी सवारी के गजराज ऐरावत के सम्मुख गयाथां । ११ । उसरांनाओंमें श्रेष्ठने उसप्रकस्मा वं आतेहुये धृष्टद्युम्नको देखकर शीघ्रतासे अपने उस राधीको दुपदके पुत्र घुम्नके मारनेके निमित्र चलायमान किया ! | उसष्टद्युम्नने अग्नि के रूम कारीगर के साथस सफा कियहुये तेजधार प्रकाशित भार बड़े बैंगनि उत्तम परक नाम the alentheniramiovindginal direction like airerat.s:Ther the army at the fring tyas to be seen deal or flying'in all diés-tions and cald not ately for fear. The Pandav army vás defeáted by thiet king and ran away in all directions. · Sseing the Pandav nimy touted your 'árriors Spraises tho king and blow' white 'conche Dhrishtadyuting the cumtaauder of tlie Pandar • forees, could not bear to hear the blasts of their couche. 10:3To gain ristory, Dhrishtadyumn attacked this eler .phant as Jadibh hati opposed Airavat tko dlephant of Indra; '{The king skaing Dhriebtadyung advance towards 'bımoelf arged bis elephaot at hiin. Dhrish tadyuinu wounded the elephant coming towards him with three well-cleaned arrows.. Hopsinr wounded.the elephant with . (-6958) Malablarat (१९५८ १३ ततो पाणन पासनान् महारमा नाराच मुख्यान 'विस' संस्तुबिदा परमोगे तदा परावृत्य मशं प्रयुष ॥ १५॥ तं'नागराज सहसा प्रणुन विद्राव्याण निगृह्म शाल्वः । तोत्राशेः प्रेषयामास पाचीलराज रथं प्रविश्य ।। १५ । राति सासा तु माग घटद्युम्नः स्वरयाच्छीमेष । गदा प्रवाशअन धारी भूमि प्रपन्नो भयविहवला ॥ स प इमरिमति साई सार्क समूतं सहसा घिमघ। उक्षिप्य म्न महाधिपाय पोययामार वसुन्धरातल ! १७ पाञ्चालराजस्य मम हदक्षा तानि नागवरण हेन । समम्वधावत् सहसा जवेन भीम: शिखण्डी च शिनश्च मr in ८॥शरेगे सरसा निगृह्य तथामनो सागसतो गास्य सि संगृहीतो रथिमिर्गजों जमा तार्यमाण संख्ये । १९ ॥ ततः पृरकान प्रषवर्ष राजा मज्यों यथा रश्मिशालार सानपाणां से उस अकस्मात् मानेहये हाथी को घायल किया। १५ । इसके पीले उसी महात्माने अन्य पांच नारादों को उस हाथी के पर गडावरम साथी युद्ध में उन वाणों से मत्यन्त घायल और घूमकर तीव्रता से भागा। फिर शाल ने अस्मत् मागे हुये और चलायमान उस गजराज को लटाकर. घुम्नके रथको जतलाकर शीघ्र चाबुक और अंकुशों के द्वारा भेगा । १६ फिर, अकस्मात् आतेहुपे उस हायोको देखकर भयसे व्याकुम शरीर वार घुम्न शीघ्रही अपनी गदाको रथमे लेकर तीव्रता पूर्वकार्य पर वर्तमान हुमा । १६ उसाहे गर्नतेय गयी ने उस मरणं से भलंकत रथको योड़े और सारी समेत मास्मादम से उठाकर पृथीपर पूर्ण करडासा । १७ । तर म उत्तम हाथी से पीडामान राजा द्रुपद के पुत्रको देखकर भाममेन साहा और शिरी या 'तीनों अकस्मात् पड़ी जी से उसकी बार दौरे । १८ । भौर स्माद उस मानेराले हाथी के बेगको रोका वा रायी उन रपियों से युद्ध में परागौर सकाइमा कम्पायमानामा। १९ । इसके पीछे राजा बारस पृषकों की धाराबोर five arrows on the forehead ard dinde bim turn face. Slalwa brought back the elephant and urged him with ships nnd goads at tbe.cat of DErisbtadyuent. 15. Broing that elephant advanco towarda hin, Dharuhtadyumo jumped dowa frou bw car with bia mace. The elepbant crushed iato proces the car, driver and horser by dashing it to the ground with trai trunk. Sociog Dhristiladyumn troubled lig tho clopbant, Bhim, 8styaki sod 84kbaudi roshed towards him and clocked tho ulephaal Burrounded by them, bo clepbasis tremble, Thoy ahuwend upon thoni hie Arons libo the rays of the Sun. Lie 31 Sosing that dceod of Shand, the Psacliale, dlatura a od 8 injáyı. thecked the elepbant from all orden Drupadis an advanced some shop Tagga Shalya Pai (69TOT समन्ताद रागाधनामा रयोगा.प्रतत्र ततस्त सातत् कर्मशालाम समीप सर्वे पाशालमरस्याप सम्जयामाहान दयम्त स्म युधे वि समं मानधनराप्रपाः शापामारामास्वरितातु रोगदा प्रगृह्याचलयामा ससम्ममं भारत शत्रुधाती जपेन पारोऽनुससार नागम । २२ ॥ ततस्तु नाग परणी परामर्द मतं जनवप्रकाशमगद समासाच मृशं जषान पाचालराजस्व सुत नरस्सीnane मिनकुम्भः सहला विनय मुखात् प्रभूने क्षतज विमुञ्चत पात भागोभापीपराभ. शितिप्रकम्प पलितो यथाद्रि IR४ निपास्यमाने तु तदा प्रेम हाते तब पुस सम्पास शामराजस्थ शिनिप्रवीरोहार मल्लन नि ॥ १५॥ तिमाको युषि सावतेन पपात भूमी सह नागराला । यथाविक्षसरसा प्रबिण देवाधिपदिम ॥२६॥ इति वास्यपथि प्रत्यरषपर्वणि शासवधे विंशोऽध्यायः १० ।। से ऐसी वा करने लगा जैसे कि किरणो के भालको मूर्य परसाता है उन श्रीप्रगामी वाणों से पायल रयों के समूा एक सापही तभागे । २० । हे राजा नरोंमें उत्तम और हाहाकारों से शब्द करनेवाले सब पाञ्चाल मत्स्य मौर मृनय देशियों ने शास के उस कर्मको देखकर उस हाथी को चारोंओरसे रोका । २० । भरतवंशी वह शत्रुओं का मारनेवाला शूरवीर गुपदका पुत्र शीघ्रही प्रान्ती से रवित पर्वतके शिखरकी समान गदाको लेकर ' तीव्रतासे हाथी की और चना ।।२१। फिर पुग्नने उस गदाको लेकर उस पर्वताकार बादल के समान मदसाहनेवाले हाथी को बहुत घायलकिया। २। वह पर्वतसम हाथी टाकुंभाप्रकस्माद गर्नकर मुखसे बहुत रुधिर को छोड़ता ऐसे गिरपदा से कि भूकम्पासनेसे पति गिरता है ।२४॥ तब गमराम के गिराने और आपके पुत्रकी सेना के साकार करनेपर मशिनियों में बड़े वीर सावीक ने राजा शाल्ल के शिरको भरलसे काटा । २५ । युद्धमें यादव के हायसे कटाशिर बह रामा | गजराज समेत पृथपिर ऐसे गिरगड़ा जो कि देरराम के चलापमान बज से दूटा पनि का बड़ा शिखर होताहै। १६ । at with his mince and woun led the huge beast. I gunded and vomiting blood from its inoath, the elephaut fell down like hill by,an Barthquake. At tho, fall of the elephant, when your warriors were crying,out with grief, Styali beheaded Shalre with a sharp arrow. vith had head cut off by the Xaday, the king and locephant foll doka fike bul'atruck by the vajra of India. " 26 7 ।
A - HTR (8900) Mahabharat (६९६०) सन्जय उवाच । तस्मिस्तु निहते शरेशाल्वे समितिशोमने । तमामध्यलm दातेनेष महादुमः ॥१॥ तत् प्रमग्न पलं हटवा का महारथ वधासमरे र शत्रुसैन्य महापला ॥२॥ सभिवृत्तास्तु ते थारा हा सात्वतमाहबे शैलापमं सिं राजन् कीर्यमाणं शरयु छ । तताप्रियते युद्ध कुरुणा पाण्डेयैः सह निवृत्तांना महा राज मृत्यु कृपा निवर्तनम् ॥ ४ाश्वयं मयुद्ध हावतस्य परैः सहा यदेको पारयामास पाण्डुसेनां दुरासदम् ॥ ॥ तेषामन्योन्यसहयां कते कर्मणि दुधरे। सिंहनाद भइष्टानां दिवम्पृक सुमहानभूत् ॥ तेन शम्न विधाला गावाला मरत | शितप्ता महानायचपन सात्यकिः । ७.स समासा रामान क्षमकीत महाबलम: सप्तमितिशिनेगरनयद्यमसादनम् ॥ ८॥ तमाया महाया प्रक्षिपन्त शिवारान् । जरेनाश्यपतडीमा हार्दिक्य. शिनिपुङ्गथम ॥ ९॥ सिंहानिय अध्याय ३१॥ संजय बोले कि उस युद्धके शोभा देनेवाले शूर शास्त्रकै मरमेर भापती सेना त्रितासे ऐती पृथक्-२ हुई जैसे कि वायुसे बड़े वृक्ष पृथर होजाते है ।। बड़े वलबान शूरवीर महारथी कृतवर्मा ने उस सेना को पृथक् हुमा देखकर युद्धही रोकी र हेराजा वहरि उस पर्वत के समान युद्ध में नियत वाणों में डके हुपे यादवको युद्ध में देखकर लौटे ।३। इसके अनन्तर मृत्युको पीछे कालौटनेवाले कौरनों का युद्ध पाडवों के साथ जारीहुभा । ४ । वहाँ यादव का युद्ध प्रतिपक्षियों के सभपूर्व हुमा जो अकेलेनही कठिनतासे रोकन के. योग्य पांडयातनाको रोका परस्पर शुभचिन्तक लोगोंके उस कठिन कम करनेपर अत्यन्ततासे उनलोगों के सिंहनाद : प्रकाश अथवा स्वर्ग के भी स्पर्श करनेवाले हुये ।। हे भरतर्षभ उस शक्दको सुनकर पांचालदशा भयभीत हुये फिर शिमी का पौष :उसक सम्मुख वर्तमानमा । ७ । बड़े पराक्रमी राजा नेमकीनि को पाकर तेज धारबाले सातत्राणों से यमलोक में पहुँचाया।८ । तब बुद्धिमान कृतन से उस तेजवाणों के फेकनवाले पातेहुये महापाई सास्पीक के सम्मुख दौड़ा । ९ । अत्यन्त उसम शत्रों के पारण करनेवाले रथियों में मेड " CHAPTER.XXI Sanjaya caid, " Att lio fall of vålaat Bhalwa your warriors dispersen ed like treed in a storm of wind, Bravo-Kritvarma checked the dispersion, fur see ng the Yedas ſirm like a hill under the rain of wrore, tuby came back to fight : Then the Kauravas fought feer Idasis with the Pandavas The Yadný fuugfit a wounderful bulle with the food, for slore le chochod the great Panday army. 3. Thº lãonino roare of his friends- touched the sky, 'The Panchala wote bersfied with lor cries and Satyaki tho gradooi of shini opposed bim. Finding Praca Kehemkirli before him, bo alov him with marca , महावाहु सात्यकि । - . -- - शल्यपर्यSbalya Parv (69611 नमोधोना रोयनाम्बरी मायामि गामवारिणो .irnimal. सरपोचालयोधामापे नृपोछम । सका. ममपन्त तयौधोरं गमागमे ॥१५॥ नाप शासनेश पायामहारयो । अनि यो मात्र कुरी॥ १२॥ परन्ती विविधामा दिपयशिनिपुगयो । मुहपईयतायेतो वाणष्ट्रया,परस्परम ..१३॥ पापवेगवलोयुतान्माणान शुष्मिसिंहपोकाशे समपश्याम पतंगानिष शीघ्रगान १५॥ तमे सरयकमाणमासाद्य दिशात्मज.. । मयिध्यमितिचितु चितुगेरपान ॥ १५ ॥ स दोघाहु सद्धम्तोत्रादित यहि प्रशामिः तय र्माणमविपत् परमेधुभिः। १६ ॥ ततः पूर्णाधनोत्रममा शिलाशितः सारया शिमिराहस्य धनुरेकेन विच्छिदे ॥ १७ ॥ निकृष्ठं सदनु श्रेष्ठ नएस शिनिपुङ्गवः । मायदादरा बेगेन शेनेप: सशरं धनुः ॥ १८ ॥ तदादाय धनु धे परिठ. सर्वधम्पि धनुषधारी सिंहों के समान बजनेवाले दोनों सम्पुग्वदौडे। रून दोनों के घोर संग्राम में पागडा आदिक उत्तम २ राजालग और पाञ्चालीसमेत भन्प अन्य भूपीर देखनेवाले हुये । ११ । अत्यंत प्रसन्न हाथी के समान उस एष्णो और अन्धक कुलके महारोपयों ने नाराच और वस्तदन्तनाम वाणों से परस्पर पायन किया । १२ । नानामकारके मागाको घूमनवाळे वह दोनों कृतवर्मा और सात्यक परस्सरकी बाण ष्टी से बारम्यार गुतहोंगपे हमने उन दृष्गियों | में श्रेष्ठोंके पनुषाकी वीयता और पलमे ऊंचे फेके हुये चाणोंको ओकांश में शघ्रगामी पक्षियों के समान देखा । १४ । हाईक्यले पुन कृतवभीने उस अकेले सस्पकर्माको पाकर निधार चारवाणोंसे उमके चारोघोडाको घायल किया। उस लम्नी मुनाबारे भरपन्त शोधयुक्त चायुक से पीडामान हाथी के समतुल्य ने माठ असम वाणोंमे कृतवर्मा को घायर किया 1.६ | उसके पीछे कृववम्नीने अपकार वचकर तेजधार तीन वाणोंसे सात्यकि को घायल करके एकवाण से धनुषकों काटा । १७ । फिर शिनियों में श्रेष्ठ सास्यकि ने जस हटे धनपकोसाल कर बड़े वेगसे वाणसमेत दूसरे धनुपको हायमें लिया। १८ । र धनुषधारियों में Tues wire britvørma rushed against Satyuši who way diy. charging blu afrowa fast. The two great archers opposed each other rouring like lions 10. Tbo Prodavas, slie Panchals aod other kinga lobod or thod && they fought. The two berpce of Vrieboj sand Andbak families sognded euch other with their sharp arrow: Mgr. iog mo different directions, they covered each other with tho akowers of their arrow We saw tbe lights of their brrow in the air "like the flights of tbeir arrows in the gir like the lights of birde, Knit- Varms wounded the four borg39 of Satyakı with four arrowa", 15. Emragod uke an elephant porcod with goadı, he pounded Kritrerma with sigtat artow, Barwg wounded Satyaki with these arrons arrow , (6962). Mababharat नाम् । भारोप्य के महाधियों महाधिर्मावल' ॥ १९॥ अमृष्यमाणो अनुवाद कृतवर्मणा । कुक्तिीतिरप शीघ्र कृतवमाणमययात् ॥ २० ॥ ततस्तु निशिनाणी शाम शिनिपुंगवः । अघान मतचा ध्याश्च कृतवर्मण ॥ २१ ॥ ततो राजन मोवास कृतवी महारथः । हताश्वसन संप्रेक्ष्य रहमपरिष्कतम ॥ २२ ॥ शेषेण महताविपः शलमुपम्य मारिष ।विशेष भुजगेन जियांमु शिनिपुङ्गवम् ॥ २३ ॥ तल सावतोबाजो निमिंध निशितै शरैः । णितं पातयामास मोरयात्रिय गांध पम् । तमोऽपरेण भल्लेन हनं समताडयत् ॥ २४ ॥ स युद्धे युयुधानेन ताइयो हत सारथि । कतवर्मा कतारेण धरणीमापपत ॥ २५॥ तस्मिन् सारथकिना घोर द्वरये विरयीकृते । समपद्यत सर्वेषां सैन्यानां सुमहद्रयम् ॥ २६ ॥ पुत्रस्य नबवास्य विषाद. समपयत । इतमते हताश्वे तु विरथे कृतपर्मणि ॥ २७ ॥ नाच समा श्रेष्ठ बड़ा पराक्रमी इद्धिमान बलवान और कृतवर्मा के हायसे धनुपके तोड़ने को न सहनेवाका क्रोधयुक्त अतिरथी सात्यकि उस उत्तम लिये हुये धनुष को |चढ़ा कर शीघही कृतवर्मा के सम्मुख गया । २० । वहाँ जाकरं सात्पकि ने अत्यन्त तेजप र दशवाणों से कृतवर्मा के ध्वजासमेत सारथी और घोडों को मारा । २१ । इसके पछे बड़े धनुषगरी महारथी वडे क्रोधयुक्त मालकिक मारने के छावान कृतवर्मा ने सुवर्ण के समानवाले स्थको मृतक - घोडे, सारथीवाला देखकर भूलको उठाकर अपनी भुनाके वेगसे फेंका। ३।। युद्धभूमि में माधव को मोहित करत पादव फतरमा के फेंके हुये उस शूलको सात्यकि ने तेजधार बाणों से काटकर चूर्ण करके गिराया इसके पीछे दूसरे,भल से उसको कठिन घायल किया ।२४। उस शुभ युद्धमें बहे अनन्न सात्यकि के हाथसे मृतक घोड़े और मारांवाले कृतवर्मा ने पृथ्वीको प्राप्तकिया ।२५। उस रथ युद्धमें सात्यकिके हाथ से चार कृतवमा के विस्थ करने पर सब सेनाओं को बहाभय वर्तमान दुमा ।१६। भोर भापका पुत्रभी महाम्या कुल हुआ रे राजा मूत सारथी के मरने और कतवर्मा के विस्थ होनेपर उस शत्रु ओं के विजयी को सतक सारथी और hritvormi cut hi, bo with one arrow Satyaki Ehe best of Shou dropped the broken bow and at once took ap another... Nit bearing the b saknga of hre how by Krtvarms, Satyakı oppurea liim with the drawa bow. 20. With ten arrows he cat ard.tilled:Kritrarma's atandard, driver and horget Desirous of sluging brave Batyahı, aod 49114 hug gold on our destitute of horses and doser : kimtgarma hurled at his adversary # speal with grent fucor Szoing the spear spring twarda lum) Satynkı cut it into pieces with #zs Bhatp, Arrow "ahd anuited hardvessary tith another! With his horses and dover islub liye Buts ahi, Krit tartna come down on the ground. 25, There wiuagreat cotsternation smong the arres, when Ritrarmarwa - शक्य ShalysPri (6963) मतमरिलमम् । प्रधायत कृपा पर निर्भानु शिनिपुवम् ॥ २८॥ समारोय रयोपत्ये मिक्ता सविनाम | अपोवा महाशास्तूणमामोधमा ॥ २९॥ शैमेयानिष्ठिते राजन विरये कृतवाणि । दुयोधनाल सबै पुनरासीत परी मुखम् ॥ ३०॥ तत् परे नापश्यात सैन्ये तु रजसाइते । मायका प्रदुमा राजन दुख्योधनमो नृपम् । ३१॥ दुग्योधनस्तु संप्रेकर मानं स्वपलमस्तिकात । जाप पासपूर्ण सोधेको पपायत ॥ ३२ ॥ पाण्डष सर्वान भकुमो धरापमा पार्ष तम् । भिडिन द्रौपदेयान् पाइचालानांबरे गगा. ॥ ३३ ॥कया मोमकाध पांचालोष माल असम्म दुराधर्ष शि शरतास्यात् ।। ३. । मतिष्ठदादो यस्मात् पुषलश मरावल यया परे महानग्निम्मंन्त्रपून प्रकारावान् । तथा दुग्यों पाडवाला देखकर सात्यकि के मारनेके अभिलाषी कपाचार्य सम्मुख दाह । २८ भोर सत्र पनुपधारियों के देखते हुये उस महाबाहु को स्थके, बैठने के स्थान में पैठाकर शीघही युद्धभूमि से दूरलेगये । २९ । हे राजा सात्यकि नियतहोने और कृतवर्मा के विरथ होनेपर दुर्योधनकी सब सेना फिर मुखौंको फेरगई ।।.। सेना की धूम से टकहुये प्रति पक्षियों ने उसको नहीं जाना हे राजा उस समय सिवाय राजा दुर्योधनके और सब आपके शग्वीरमागे । ३१ । फिर दुर्योधनने सम्मुख से अपनी सेना को देखकर तांत्रता से शीघही सम्मुख पाकर भलेनी सबको रोका । ३२ । और अत्यन्त कोषयुक्त ने सब पापडव धृष्टद्युम्न द्रोपदी के म 'पापालाकी सेनाओं के समूह केकय सोमक और मृज्जियों को ताक्षणवाणों में का 1३४। भापका पुत्र बड़ा वलवान सावधान और अजेय युद्ध में भ्रान्ती से रहित होकर नियत हुआ, राजा दुर्योधन सब पोरसे तपाता हुभा युद्ध में उत्त प्रकार नियत हुभा जैसे कि यज्ञ में मन्त्रसेपरित्र बड़ा अग्नि होता है । ३५ और प्रतिपनीलोग पद्धमें उसके सम्मुख ऐसे नहीं वर्तमान हुपे जैसे कि मत्यु के deprived of bis car by Satyakı Lour son tuo was in great distres. Seeing Krst varma deprived of car, duvar and forgon, Bropacharya rurhed on to slay Satyakı, He took Knitvarur upon Lis car in the prebonco of all the warriors and took him far alvay from the field of battle, Duryodhan's army again turned face on seeing Satyakist prowess in depriving Kritvarma of wis car. 30. He was covered with the dust raised by the army. All the hauray warriors ran away with the exception of Duryodhan Seing bis arwy routed, Bpr yo. dhon al pe checked tbe Poudar aray, including Whriebtadyumn, the sons of Draupadi and the Panchal, Kakaya, Sopak and Srijaya warriors, with his starp ariowe. Your son, powocfal, çarelal aod invincible, stood resolutely there Ho stood in his glory like to 8 Digret over by the librations ota sacrifice the enemies could al.
(6914 Mahabharat चनो राजा समामे सपतामात ॥ ३४ ॥ त परे माम्बपन्त मत्या मध्युबार। मथाय रथमास्थाय ईषय समपद्यत ॥ ३६ । इति शक्यपर्वणि शरण मंकुरगद एकविंशोध्याग ०१॥ 7 - सजय उवाच। पुत्रस्तु ते महाराज पस्यो रथिमापर. पुरमा बमो पुणे यथा चन्द्र प्रतापवान् । १॥ तस्य पाणसहस्तु मममी पराम शिपित बाणधारामिरिष पर्वतान् ॥ २ ॥न च सोस्ति पुकारक्षित पाण्डवानो माहियो गजो रयो वापि योस्य प्राणैरविक्षत ॥ ३॥ समरे पोई पश्यामि विशाम्पते । तु वाणचितोभदै पुत्रेण तव भारत ॥ ४ ॥ यया सायक रमसा समुद्भतेन वादिनी । प्रत्यहश्यस सछन्ना तया प्रागैर्महात्मन ॥ ५॥ वाणम् भागे मस्येलाके के रहने वाले नी वत्तमान होते इसके पीर कृतवर्मा दूसरे रखपर सवार होकर युद्धभूमि में आया ३६ ॥ मध्याय २२॥ । संजप बोले हे महाराज, रथियों में श्रेष्ठ रथमें मवार भापका पुत्र युद्ध में उत्साहवाला ऐसे शोभायमान हुभा जैसे कि प्रतापवान रुद्र जी मियत होकर शोभित होते हैं। १ { उसके हजारों वाणोंसे पृथ्वी भान्छादित होगई उसने शचभी को पाणोंसे ऐसे सींचा जेसे कि धाराभों से बादल पहाड़ों को सींचता है पांढयों के नासागर में ऐसा कोई मनुष्प घोडा हाथी और रथ नहीं था जो कि उसके पाणों से विदीर्ण न हुआ हो ।।। हे भरताशी रामाकृतराष्ट्र हमने जिस जिए शूरवीरको युद्धमें देखा वह वह भापके बेटे के पाणों से सदाहुमा या । । समकार सेनाकी उनीहुई धूलसे सेना ढकीहुई दिखाई पड़ी उसीमकार महात्माके witholand bim na mortals exgott opp st Death Kntyarns mounted another car and came into the fied of battle " 38 Mara CHAPTER XXII Sanjaya faid' Your son the best of car svartioin, mourled on hla Gur, dorug prowess in battle, looked Glorious lik» Rodra The earth *** a vered with thoutands of h18 Arrows which he showered like rancrer the enemier No h rso, ci phant or rar of the Pandavas broained untouched by hss 313 All the warriors, that wonkr there. Fere wour deu by thu ? ZOTS of sout sod, Tho wholo unoy (१९६५) शस्पy Shalya Pary (6965) नामपश्याम पृषिर्षी कृथिवीपते । पुर्योधनेन प्रकृता सिमरन अश्विना ।। ६॥तपु पोषसामेषु तापकेषु परेषु ।एको दुयोधनमासीत् स पुमानिति मे मतिः ॥ ७ । सत्रामपश्याम तप पुत्रस्य विक्रम । पदेन सहिता पार्या माग्यवश भारत ॥ युधिष्ठिरं शतेनानी विव्याध भरतर्षम । भीमसंनश्च सप्तत्या सहदेवान सप्ततिः । मकुलम्प चतुःषष्ट्या पृष्टद्युम्नच पञ्चभिः। सप्तमिद्रागदयक्ष त्रिमर्षिया सायकिम् । धनुमिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष ॥ १० ॥ तदपास्य अनुष्ठिान माद्रीपुत्रः प्रतापवार मध्यभाषत् राजानं प्रगृह्मास्यन्महवनः । ततो दुर्योधन ललये विष्पाप दभिः शरैः॥ ११ ॥ नकुलस्तु ततो, पारो राजानं नवमिः शर। भोररूपम्मेहेन्यासो विम्याध प ममादर्थ ॥१२॥ सात्यकिश्चापि राजानं शरणाम अपक्षणा । द्रौपदेयालिसप्तरया धर्मराजशपम्बनिः। मशीत्या मीमसेनश्च शर राना दुर्योधन के वाणोंसे भी इकाईयो । ५। हे रामा हस्तलाघवी धनुपधारी दुर्योधन के हायसे वाणरूप कोईई पृथ्वी को हमने देखा । ६। भापके और प्रतिपक्षियों के हजारों शूरवीरोंके मध्य में वह अकेला दुर्योधनही पुरुषासिंह हुआ यह मेरामत है 101हे भरतवंशी वहां हमने आपके पुत्र के इस भपूर्व पराक्रमको देखा जो सत्र मिलकरभी पांडव लोग उसके सम्मुख वर्तमान नहीं हुये । ८।हे भरतर्षभ उसने युद्धभूमि में युधिष्ठिरको सौचाणसे भीमसेनको सचरवाणसे सहदेवको सातवाण से १९। नहलको चौसठ राणसे धृष्टद्युम्नको पांचवाणसे द्रौपदी के पुत्रोंको सातसे और सात्यकि को तीनवाण से घायल किया हे श्रेष्ठ उसने भल्लसे सादेवके धनुष को काटा । १० । तब प्रतापवान पादीका पुत्र उस टूटे धनुषको डालकर दूसरे धनुप को लेकर राजाके सम्मुख दौड़ा और दशवाणों से दुर्योधन को घायल किया । ११ । इसके पीछे वार नकुरघोरका वटे नौवाणों से राजाको घायल करके वडी जाने से गर्मा। १९ । सात्यकिने भी टेढ़े पावाले एकवाणमे द्रौपदीके पुत्रों तिहत्तर बाणों से धर्म राजने पाच वाणमे और भीमसेनने अस्सी वाणों से राजा was covered by Duryodhaa's Arrows us with the sturio of dust 5. We saw the earth all arrows with the dexterity of Duryodbarı. Among your warriors and those of the enemies, Duryodhan was the only lien.hearted man in my opimon We saw the wonderfal prowess of Duryodlı x, for all the Paudayas together could niet withstand him. He wounded Yudhishtbır with a bundred arrow, Bhim with seventy, Sabadev with seven, Nakul with sixty four Dbrishtadyumun with five, the cons of Draup di with seven and Satyaki with thiee. He cut Şahadeva's bow with a dalt 10. The glorious sod of Madri la d aside the broken bow and taking up another, lushed agarust the king. He wounded the king with tea arrows Brave Nakui wounded Fon with nine sharp arrows and 10a ed a Jond roar F- (6466) Nlahuhlarat गमाई गत् ॥ १३ । समन्तातु कार्यमाणस्तु पाणामधेन्महात्मभिः नन-वचार मा गज सर्वसम्यस्य पश्यतः ॥ १५ लायव सौपचापि पार्यःनेक महाममा पति सर्वाणि भूतानि दा सर्वमानवाः ॥ १९॥ धार्तराष्ट्र हि राजेश यात्वा तु स्वरूप मन्तरम् अपश्यमाना राजान पर्थपति दशिता .१६, नेपामायतता धोरस्तुभुल समजायत । क्षुब्धस्य हि समुद्रस्य प्रांटकाले यथा स्थन् । १७॥ समासाद्य रणेत तु राजानमपगजितम् । प्रत्युधयुम्भदेवासा, पाण्यानाततापिनः ॥ १८॥ भीमसेन र म दोणपुत्रो न्यधारयत ।। १९ ततो पाणैर्महाराज प्रमु. सतो.दिशम !! यसरणे धीरा न दिश प्रदिशस्तथा ॥ २० ॥ तावुभौ रफर्माणानुपौ। भारत दुबई घोररूपमयुध्येता कृतप्रतिकृतपिणी । प्रासयन्ती जगत,सर्थ, ज्यामपसीनरव २५ शनिस्न रण, पीरो युधिष्ठिरमताडपत् । तस्याश्वाधतुरो हत्या मुघलश मुतो बली। को पीडामान किया। १३ । चारोंभोर महात्माओं के वाणों की वर्ष से काटुआ दयोधन सब सेनाके देखते हुये कम्पायमान नहीं हुआ। ४.। सक.मनुष्यों ने महात्मा की, हस्तलाघवता साप्ठलगा और वलको भी सब जीवधारियों से अधिक देसा १५ ।हे. राजेन्द्र थोडे अन्तरको न देखनेवाले कवचधारी, आपके मुरविर पुत्रा गंजा के चारोंआर-आकर वर्तमानहये १७ उन चढ़ाई करनेवालके ऐसे घोर शब्द: उत्पन हुये । जैसे,कि वर्षाऋतु में बेगमें भानेवाले समुद्रको शम्दीते है।-१७, फिर वह बड़े धनुपधारी गुदमें अजेय राजाको पाकर शस्त्रधारी-पांडवोंके सम्मुखागो १८ अश्वत्थामाने, क्राधयुक्त भीमसेनको युद्ध में रोका ।१९५,हे.महाराज इसकेगी। सत्र-दिशाओं से छोड़ेहुये वाणों के कारण से वीरोंने, दिशा विदिशासमों को नहीं। जाना । २० । उन दोनों निर्दयकर्मी कठिनतासे सहने के योग्प अखों के काटने। वालोंने घोररूप, युद्ध किया जो कि प्रत्पचाके आघात से, कठिन चर्मखोकाले और सब दिशामोको भयते पूर्ण करनेवाले थे। २१ । इसके अनन्तर, भरभकुनी ने युद्ध में युधिष्ठिरवो पायलंकिया युद्धमें सब सेनाओंको कम्मरमानी करत-उस Satyz kı too, wounded bum, with one anow, the sons of Draupadin Founded hjin with thirre ench and Yudwiebthir and did the same with five and eighty arrows respocuively. Cover ed with arrows from all sides. Duryodhan did not istakei in, thes nudst of warriors.. His dexterity war above all warriors surroundod him on all siles. The sounds of their encounter, were like thoºo of the Oman 11 a storm The great archers with the invincib e pruuce oppose the Pandavas. Aslıwatharaj checked Blupir in battle The warrors cr ull cco nothing but arrows in all directionary 20 The two cuels arriors fou, li lud and filled the directions with the rounds of their bou strings and cause fer, Thea braye Shakums, udhiphthir and having slain the four horses shook Bhi 115. The . Founded म marou Shalya Parv 169671 मदिम्मकार बसमान समन्यानि कम्पयन॥२२॥पस्मिन्नन्तरेचौर राजानमपराजिनम 'अपवाद नाजा सहदेव प्रतापगार २३ ॥ সয়া মাথায় धर्मराज युधिष्ठिर शनिधामनिया पुमान्याय पञ्चमि निनाद च महानाद (प्रवर सचिबनाम। २४ तदभमनिच धोरमञ्च मारिल प्रकोतिजनासिर कारसविर्तम।१५ उल्कस्तु मईसि भैलबुद्ध भादपि वदमेयात्मा शरवः समेत ॥२६अयन नकुहर सीपलस्य सुतरण शरवणे महनों मातात पर चाय ॥ २७ गतीत समेरे घोग पुलमुनी महारथौ । योधयन्मापयेतो परस्पर तागसौ २८ । तथैव ऋतधर्मा तु शैनेय शेतापनम् । योधयन शुशुभाराज घले कहिये । २६॥ दुर्योधनी धनुरिछत्या दृष्टयनस्य मयुर्ग | अंयनै छिन पनि विव्याध निश शरे । ३०॥ धृष्टद्युम्नोऽपि समरे भगृहा परमायुधम जान थोष योगसंपन्यता संबंधान्यनाम् ॥ ३१ ॥ तयोर मचासात समाने भरतर्षभ । प्रा बाधया सह भस्वामहस्तमो ॥ ३२॥ गीतमस्तु रणे शो दयान महाष सवलक पुत्रम उमक चारों घौडॉको मारकर कठोर शब्दकिया सी मन्तरमें प्रतापवान सहदेव युद्ध में अमेयवार राजाको रथके द्वारा दूग्लेगयो ।२३ । इसके पीछे धर्मगज युधिष्ठिरने दूसरे यिपर सवार होकर मौवाणों से शकुनाको घापस करके फिर पत्रिवाणसे घायल किंग और संर धनुप धारियों में अत्यंत श्रेष्ठ वडे शन्दसे गर्छ। ३४ श्रेष्ठ रह युद अपूर्व यकारी रूप देखेमत्र ली की प्रसन्नता उत्पन्न करनेवाला और सिद्धचारणों से सीपत हुना। २५ फिरवरी सामी उल्कापारोंोरसें वाणोंकी एघ्यिों समन उम पडे धनुषधारी युद्धदुर्भद नालुके सम्मुखगया । २६ । उसीमकार शूरवीर नकुलने-युद्ध में शकुनीके पुत्रका वाणोंकी वर्षा के द्वारा चाराओरसे रोका । २७ 1. उत्तयुद्ध में वह दानोंवार'कुलीन महारथी परस्पर, अपराध करने वाले लडतेहुये दिखाई पड़े ।२८। उसीमकार शानुओं का तपानवाला तात्पति कृतवमसि लडहिआ ऐमा शोभायमान हुमा राजा जैसे कि युद्ध में बलिसे लडता हुआ इन्द्र शोभित हुा यो । २० । इसके पीछ दुर्योधन ने युद्ध में घृष्टद्युम्न के धनुषको काटकर इस टुदै धनुपवाले को तीक्ष्ण धारवाणों से घायल किया। तवे पृष्टद्युम्न भी युद्ध में उत्तम शस्त्रको लेकर सर्व धनुषधारियों के देखते रोजा से युद्ध करनेलगा। ३१ | ह भरतर्षभइसकपीछे युद्ध भूमि में ऐमा बड़ामारी युद्धहुआ जप्ते मद मानवाले दो मतवाले हाथियों का युद्ध होता है । १२ । इसके पीछे युद्ध मोधयुक्त वीर , कृपाचार्यने वड़े, बलवान In the mentime, glorious Sahader took Yudhieltbii his cat and removed him for away from the scene of action then Yudhilahtar mounted another car and wound ed Shaktor with nine and five arróns raspect voly, and sreda loud rideThe battle m'as dreadfal and plezant' to took at and wat patagused by 8 dbag and Charuti? Then brart Uluk, slowerman Arrol, faced aliant Naku! fitt the shower of his arrowd ,27 The two noble warriors were da bagnating with great att Sallz ake lighting with Brits artist, - the armies with his harsh roare 00 -- Nakal cho deu *he son of Shakuri -- 69f81 Mahabharat भान । विव्याध बहुमि शोः शरै सन्नतपमि ॥ ३३ ॥ तम्ब तेत्मपएचमिनिये रिष देहिन । घाररूपम सम्बा निर्मय्यांदमतापपरियामारि न्द्रियणीय वालिशम । स च वान पिसयच्छन् प्रत्यरोपपदारये ॥ ३५ ॥ पशिस सूच तस्य ते. सागरत । उत्थायोरयापच यथा हिनामिन्दिर्षियो।३॥रा चयनर सार्य दन्तिनो दन्तिभिस्तथा ।प्यास्य समायुका रबिनो चीनमा फुलवाभषयो धोररूप विशाम्पते ॥ ३८ ॥ इहवाद मांग समिति प्रभो । युवान्यासन्महाराज घोराणि च बहूनि ॥ ३९॥ ते समासाप समरे पासर मरिन्दमा । विध्याध अनुश्च समासाच महाहवे ।। ४० ॥ तेषांशसमुबूत रज स्लीप्रमाश्यत । बानेनघोरत राजन् धापनियावसादिमि ॥४१॥ रमिसमुक्त द्रोपदीक पुत्राको गुप्त अन्धीवाले बहुत पाणोंमे घायल किया।इनका उमकेसापऐसा युद्धहुआजैसे कि शरीरवालेका युद्ध इन्द्रियोंके साय हाताई घोररूप बन्धुओंका अयोग्प और मर्यादा युद्ध वर्तमान हुआ। ३४। परन्तु उनको ऐसा पीडाबान नहीं किया जैसे कि इन्द्रियां वालकको पीड़ित नहीं करती क्रोधवृक्त होकर उनाने पद म उनके साथ युद्ध किया। ३५ हे भरतवंशी इसप्रकार उनका उनों के साथ ऐमा भपूर्वयुद्ध हुआ जैसे कि शरीरवालेका युद्ध उठउठकर इन्द्रियों से होता है। १६ । मनुष्य मनुष्योंके साथ हाथी हाथियों के साथ घोड़े घोड़ों के साथ और स्थी रथियोंके साथ भिडगपे इस रीतिसे वह युद्ध महाघोररूप और सकुछ हुआ nारे प्रभु महाराज यह अपूर्व है घोर है रुद्रदै इसमकारके बहुत घोरपुदहुये ॥५॥ जन शत्रुओं के विनय करनेवालों ने युद्धमें परस्पर एकएक को पाकर वापस किया भार मारा। ४० । हराजा तव उन्हों के शों से प्रकट होनेवाली बड़ी धूम दिखाई पडी और वहुतसें भवसवारोंकीपासे ऊपी उठी । ४१। रथंकी नपिपासे बार loohed glorinue lhe Indra fighting with Ball. Then Diryodhan cut Dhrishtadyun na's bow and wounded him with sharp arrow. 30 Dhrishtadyumn too, fougbt hard with the king There was a severe struggle between them like that of two mad elephanta Krpacharya wounded the song of Draupadı with sharp ai rowe. Their, battle was like that between body and limb: The fighting was without rule, but he could not distress them as the organs of senses cánhnt overpower a chuld They fought hard with free Their battle was wordorful like that between body and organs Men, met with mon, elez lants with elephants, horses with horses and cars with cars. The battle then became dreadful and general Those destroyers of fones wounded and slow one another 40. There yas a great storm 'of dust will movements of horsdien, cars anů elephants, hiding the Sun The Susurd covered with that dust, became dark and the Warriors 35 TestShalya Pury (6169) निभासमापितिमा सम्मानिल विपर्ष यो Rawr सपनाबारे नियमीतते । साादितामाडीमरा मराran m. विपसार बार समतल करणसिकापा ममौ भरतसतमin उपाशाम्पतली सी धोरदर्शनम Rasपश्यं महाराज युबानि भारत १४५ पपा प्राण बचाई मापाहे वे मुदाणमा वर्मन त गजेन्द्र तो सपमा प्रभावाम सतमुल सम्रा पतामभूत् । मनमायेच रचमानस्वस ॥४७॥ - -- विशल्पपर्वणि प्रत्यक्षपति संबुजादे बाशिोध्यायः २५ ॥ - पजाय उपायामाने तथा युद्ध घोरर भवानके ममग्यत बार पुषस्य पातस्तु बनाता सविधाप्यं शारण । पुत्राने पोपमा हाथियों की भासामों से उठनेवाली सायंकालकी सी मरुपतासे युक्त मूर्य के मार्गमें गई । १२ । उस धूलसे काहुमा सूर्य प्रकाश से रातिमा ता भी चोर वह महारथी शूर गये । भरतर्षभ फिर एक मुहालयेही चारोंभोर से सब सरण होगया क्योंकि वीरों के रिसे आई पृथ्वीपर !४१ वह पोरदर्शन काटन भूल मातहोगई हे भरतांशी माराम फिर इन्दनाम युद्धोंको देखा।।५। मध्यान के समय बल पराक्रमके समान सहा भपकारी र पुरमाहे राजेन्द्र तब पहा करके सरकाश दिखाई पड़े।साचौर पुरमें गिरनेपा पागों ऐसेबागेर शम्दाये जैसे कि पर्मतपर बसोवासोंक पर बनाके पन्दाोते हैं ।। ५७ ॥' - H *- अध्याय २३ । संजय बोले कि इसमकार घोररूप भयकारी आपके बेटोंकायुर पारणों के साप वर्तमान होनेपर सेना छिम निभाई। १। फिर भापके पुत्रने बड़े उपायों became invisble. Then the dust storm cleared and subsided with the blood shed and duels were fought. There was a severe struggle at middry and the armours shous trigbt Thers Re18 hard sounds of the fall of arroks like those of the forest of bamboo: barning onall. '47 CHAPTER XXIII 11 Sanjaya sall " When your sous were ighting a dreadful baitle 1 MAT (((469701) Alahabharat ५६७०) मामुपाण्डवानामनीकिनीम् ॥ २॥ निवृताः सहसा योधास्तव पुत्रप्रियेषिण वृत्तेषु तेषेष युद्धमासीत मुदारुणम ॥ ३॥ तावकानां भरेषाऽयं देवाररणागेगमे । परेषा तब सैन्ये बा.नासीत् कचिवापरामुखम् मग भने गनन 'गुध्यन्त सनामिन परस्परम् । तेषां झयो महानासीत् युध्यतामितरेनरम् ॥ ५॥ ततो युधिष्ठिरो राजा क्रोधेन महत्ता युवः । जिगीप्रमाण: संग्रामे धाराष्ट्रान् समाजकान् ।। ६॥ निमिः शाखविधानमः शिलाशितः पतभिर्मिजधानवानागं कृतवर्मण: 100 अश्वत्थामा व हार्दिक पमपोवाह यशस्थिनम् । अथ शारद्वतोऽष्टाभिः प्रत्यकिय त्रि टिम 1 ततो दुर्योधनो राजा रथान सप्त,शनावण । प्रययत्र गजावे धर्मपुत्रो युधिष्टिरः ॥२॥ ते या चिभियुका मनोमारुतरंहसः। अश्वद्रवन्त संग्रामे कौन्ते यस्य रथं प्रति ॥ १० ॥ ते समन्तात् महाराज परिवार्य युधिष्ठिरम् भाश्यं मायके से उन महारथियों को रोककर पांडवोंकी सेनासे युद्धकिया। २ । आपके पुत्र विन चाहनेवाले शूरवीर अंकामा लौटें और उन्हीं के लौटनेपर। आपके शूरवीर और दूसरोंके शूरवीरों का युद्ध' देवासुर संग्रामके समान बड़ा भनक हुमायूसरो में और भापकी सेना में किसी ने भी मुसको नहीं मोड़ा। ४. ध्यान और नामों के द्वारा परस्पर लड़तेथे तब उन परसर युद्ध करनेवाले पागका बड़ा नाश हुमा ५ ! इसके पीछे पड़े काधमरे युद्ध में गजाओं समेत धृतराष्ट्रक पुत्रों पिनय करने. अभिलापी रामायुधिष्ठिरने का सुनहर पुर्ख तोहणधार तान मासे रूपाचार्यको न्यायलकरके चार नारोंचोंसे नवाक घोड़ोंकोमारा । । अंकापापी उस यशवान कृतवर्माको युद्धभूमि से दिलेगये इसपी कपा चार चारगाणों से युधिष्ठिरको.पायल किया जानवरोजार्दुर्योधनने सातसा रयियों को युर में उस स्थानपर भेजा जहाँपर कि यह 'धम्मपुत्र राजा युधिष्ठिर था। ९ । शीघ्र वायुके समान शीघ्रगामी वह रथ रथियों समेत युद्ध में युधिष्ठिर यकी भोरगये । १० । हे महाराज उन सब रथियोंने चारोंओर से युधिष्ठिरको with the Pandavas, their army-ras routed. Your son :rgan rallied lific army with great oxertion and fought with łua Faaduras. Your son's well-wishers came back all of a sudden and then the battle was dreadful liko that dotycen the gods and, nsurp., Tho warriorg'on both sides fought uplinchingly. They fought by guoro-calling out thoir hnnies, and there was a grunti destruotion of warriors on Ixlt sidde Pudbjohthiç dotirons of gaining victory ovor your sons, much onralgi led, wounded Kripacharya and blese kritrarima's horses with four darta Ashwathama took Kritvarma far away from the field of Then Kriprcharya woundet kadhishthir with eightarrora. Duryodhan #cnt duren hundred car-carriors to attack Yudhishtbir and they ryshod, against bim with the spread of thouriod. JQT Boy : - baltia 161711 शाय Shulyam पर विचार या धर्मा रियलयाएनम माम्प्यात भिकान्डिामा र १२ ॥राप्रपाययुक्त जान लेसनर MAIYAमा कुन्तीपुत्र युधि'हाम्॥ १॥ अपने ग संग्राम: शोणिका Twit पारस्या रुपास्य यमराषिषचन ११५ र समान हरमा MATAपिनाम् RIVE सपाजाले पुनरेवाऽपयारपन ॥ तत्र एवं मह मासीतष पुत्रस्य पाना चापि तिम्) १६ माने तथा युरेनिमर्यादि, ममतः मानेषु पोधेपुनावकमतरेषु Prod विरसु पयोधेषु शमश परितः । उ सिंहमादध गजिन धिनाम' ७.१८॥ मतिप्रख युद्ध छिपमामा मर्मसु । धावमाने या अपसिंपु मावि १९॥ संहारे सो जा पृथियो मोसम्भो । यधीनामुत्तमस्त्रीजीसमन्ता करणे तदा । २०॥ निमावि ततः पुरे वर्तमान मुद्रारण। मादुरासन् विनाशायः घेरकर गायकोंसे ऐसा गुप्तकरदिया जैसे कि मर्यको बादल गप्तकर देते हैं। उन। अत्यन्त क्रोधयुद्धं शिखगही आदिक रथियों ने कौरवों से उस मकार, घिरे.ह, युधिष्ठिरको देखकर सहन नहीं किया। उत्तम घोडासे युक्त अवघटिकायों, से भलत रयों की सवारीसे आपहुंचे भार कुन्तीक पुत्र युधिष्ठिा को चारोंओर 'रक्षित करनेगल हुये। इसके पीच पात्र और करवोंका वह युदजारी हुआ जोकि रुद्ररूप रुधिररूपी जलसे युक्त पमराजके देशको बढ़ानेवालाया ।१४.। पांचालीसम्न पांडवों ने सातौं यियोंको मारकर कौरवों के युद्धकताओं को रिका । १५ । वहां और भापके पुत्र के ऐसा वड़ युद्धदुभी' जैसी न देखाया, नसना-१६ इसपकार चारों भोराको वेमयदि युद्धोंके जारी होने पर और मापक और दूसरों के शूरवीरों के मरनेपर और 'उत्तम शखा के वज़ने उंचे सिंहनाद हमे धपधारियोंके गर्जना के साथ शूरवीरोंके गर्नपर। हावडे युद्धलि मर्मस्थलों के घायल होने और विजपाभिलाषी शूरवारों के दोडनेपर सबभोर से पृथ्वोपर शोकके उत्पन्न करनेवाले नाशके उत्पन्न होने और बहुत उत्तम कलांगनाओं के मांग.मिटाने । २० । वहेभयानक और अमर्याद . युद्धके वर्तमान surrounded Yudhushthart, from pll sidesrådd Midi huru with "arrbus as the clouds hide the sun', Slubanur and otherarovuld not bear to 8064 Yudhishthyr. thus surrounded by.thes, Raurares and cume to its tretc with ther carssana protected him..'The Pandavas and Kasravis then fought it dreadfulis battlothat: augmented thror pnpålåtroll 'or Yau's abode... The Panchaly and Par.davas | Blew the Woren hundred:) car, warriors audilecked the Kauravas. 16. A battle like that of your song and, the Pandavas pag unseen and' unticard of betére. Whon be battle thus raged without any rule 'atld the warrshi's of both sides, vypreibergslar, conchis wore blown the warriors a poated (6373) Maſalharat (६९७२) तमोत्पाता. मुशारुणा: २१ चचाल सम्वं कुर्वाणा सपर्यतचनामी सरणा: बोल्मका राजन गौरमा समन्ततः । उल्का तुहियो भमायाहत्य रमिल सम् । २२॥ विशनाता प्रापुरासन नीः शरवर्षिण । मणि मुमधर्मागापयु मामवहाराम ॥ १३ ॥ एतार घोराननारय समुत्पातान् मुहाइनान् । पुनपुंजाप सम्मार सत्रियालस्युरम्पया ! रमणीये कुमण्ये स्वर्ग यिसा२४॥ ततो गाचार राजस्प पुत्रः शकुनिम्नति । युध्यामप्रतो यावत् पृष्ठतो हम्मि पागवान ॥ २५॥ ततो सत्राताना मद्योधास्तपस्विनःश किलकिलाशम्ममतापरे तथा ॥ २६ ॥ भस्मास्तु पुनरासाप लपलल्या दुगसाः। शरासनानि घुम्वन्तः शरवाकिन् । २७ ॥ ततो इतं पर राजन भदराजवल तथा दुग्योधन रोनपर नाशके चोतन कानेवाले महाभपानक उत्पात प्रकटाये .. २१ । पनि और बनोंके समेन शब्द करनेाली पृषी कम्पापमान और हे राजा दवा मालाओं समेत पोरोभारको फनीहुई उल्का । २२ । मूर्यमण्डलको घायल करके सासे पृथ्वीमर गिरी । और कदर पत्थर बरसानेवाली वायुप्रकडहुई हाथियों मे भागाले बार कठिन कम्पन उत्पन्न हुआ। इन को भयानक और पोर रातों को अनादर करके पाड़ासे रहित स्वर्गके अभिलापी सभी लोग मुद करनेका मताकरके मूल 'हममें निपतपे । १४। इसके पीछे गांधार देश के रामाका पुत्र शकुनी या बोला कि तुम तबतक भागेसे पुदकरो जबतक कि बि पी की भोरम परियों को मार । २५ । इसके पास पाई करनेवामे हम सोनोमान में वेगवान प्रमाचित मादेधी और अन्य भूरवारों ने लिरिसा भन्न किया । २६ । लक्ष्य के बात करनेवाले कठिनता से सम्मुखता पोग्ब और अनुमोको बल पमान करनेामे उन परिखों ने हमको फिर पाकर बाबा की वर्ग and rounded one another in the vital parte, The Warriors ran on for pictory and one omonis causing rear and grier, runking mady noblo women to becuto widows, apppxoned during that drewllal battle.l. The earth, with her forests and mountains, took and metoors fell down in in the Sun. A xirid storm bicu, bringing piccon of atono *th it Elephants shed tents and thoro #MA Ditor earthquake Disregarding thietsut drradial clamitio, tho warrior, dotitute of entering mradis', stood resolately to fight Tlien Blakuni, the son of the king of Gaudhar, mid, "Yon nany top tho l'andatas eng gol xnd I shall atuack them from rear.!5. Then thi wartion of sina Anong us wlo a tn miend its njim THPantar Archon niin Jul o, baru *itia oir atrine and ording the Hladia --- . १९७३) 79aşi #lyx Porv (173) प्या पुनमसीत परामुखम् ॥ २८ ॥ धारराजस्तु पुनपाक्यमा तता वली निव, मधर्मना प्रा युकिं स्तन १ २२ ॥ अनीर शप्ताहमश्वानी भरताना भासीहाधाजस्य विमल प्रासयोपिनाम् ॥ ३० ॥ यमन तेन विक्रम्य वसंमाने जा सये 1 पछत पाण्डधानीकाजनिीत शर ॥ ३१ ॥ तदनभित्र पनिन क्षियमाण, समन्तत : ममज्यत महाराज पापना सुमालम् ॥ ३१ । सतो युधि पर प्रय, भग्न स्वपमतिकात् । अभ्यचोदयदप्यम सहदेव महायर म ॥ ३ ॥ असा मुवल पुत्रोनोजिधन पाश्य देशि सना नद्रयत्वप पश्य पाण्डप दुर्भातम् ॥ ३४॥ गच्छद्रोपदेशश्व शानि सौवल अहि । रयानीकमा सये पाञ्चालसाहितोमध ४३९गरु उम्तु फुजरा स धजिनध मह त्वया । पादाता तिसाहस्रा शकुनि सई ताजहि ॥ ३६॥ ततो गना सप्तशताव्यापपाणिरावृता । पञ्च माश्यमहमाणि से आरछ दिन किया है राजा फिर रानामती सेग शत्रुओं के हाथ में"मारी गई उसको देखकर दुर्योधन की सेना फिर मुखफेर चली । २८ । तब गान्धार के राजा पराक्रमी शकुनी ने यह वचनकहा कि हे धर्म के न जानने वाले वार गोगों कौटो युद्धको तुमके। भागने से क्या प्रपोजन है । २९ । हे भरतर्षभ राजा गान्धार के शूरवीर जोकि बढे २ प्राप्तोंसे रहनेवाले ये उन्हों की घोडा वाली दहिजार सेनाधों 1,३० । मनुष्यों के नाश'वर्तमान होनारस सेनासमेत 'पराक्रम करके तेजधार वाणों से पागध्वी सेनाको छकी मोरस मारा । ३। महाराज जैसे कि वायु से हटायाहुआ व दल'चारोंओरसे फटजाता है उसीमकार डॉकी यह वही सेन छिन्नभिन्नईई । १२ । उसके पी. सावधान युधिष्ठिरने | अपनी सेनाको सम्मुग्यसे छिन्न भिर देखकर घेडे पराक्रमी सहदेवको प्रेरणाकरी कि यह मुगलका पुत्र हमारी जघन सेनाको पीडामान करके नियंतहै और सेनाको माररही है हेपाटव तुम इस दुर्घद्धा को देखो। ३५ तुम द्रौपदी के पुत्रों समेव भामो और इस शाकुनाको मारो हे निप्पाप मैं घुम्नको साथ लेकर रथकी सेनाका नाशकरूगा । ३५ । सब हाथी घोडे और तीन हजार पदाती तेरे सापजायें उन सब सेनाओं से युक्त होकर तुम शकुनीको मागे।।६। इसके पीछे Awarriors again slaughtered, Duryodhu's army turned back Then' Blahani the punce of Gandhar said, ' Come bach Warriors' Tight again. What will you gain by flight ! The army of Gandhar; armed with prasoa, ten thousand strong, attached thu niny of te The Pandap army then dispersed like ja cluid by the storm of wind Then wise Yudhishthir, seeing his army. disperbe, said to Sabádev, Shahuniis destroying our ariny, look to him, Pardzy Take the song ot Draupady with you and slay Shakoni, I with Dłırıslıtadyunin sliall destroy the car warriors Let all the horseiden elej liants aud theo thousand toot Pandavas from bebind 31 । 60 with सोयलस्थ - (6974), Mrljaliharnt सरदेष धीर्यवान् ॥ ३७॥ पादानाच बिमाइन्ना द्रौपदंशाश्व मशः रणे , पति तु शान युद्धमैदम् ॥ ३८ ॥ नतस्तु सीबको राजन्न यतिक्रम्य. पाण्यान जधान पृत्त सना अपरमप्रतापवान् ॥ ३९ ॥ अश्वारोहास्तु सरम्ग पाण्डवाई नरस्रिनाम् । प्राविशन् सौनलानीकमध्यतिक्रम्य तालवान् ॥ ४. ते सत्र सादित शरा महबलम् । गजमधेच मिष्ठन्तः शरसंग्वाकिग्न ॥ ४१ ॥ तदुधत गदाप्रासमहापुरासेवितम् । प्रावता महद राजा दुमन्त्रित तब उपारमन्त ज्याशनां मेक्षिका पिनो भवन् । महि स्वेषां परं पा विशेष न्यहईयत ॥ ३ ॥ भरपाधिमष्टानां शक्तानां भर । ज्योतिपामिव सम्पतिमपश्यन् कुरुपाया .४४ प्रष्ठभिधमलांमिश्च तत्रतत्र विशाम्पते । सम्पतन्तीभिराफाशमावत बहर शोमत ॥ ४५ ॥ प्रासानां पतता अन् रूपमासीत् समन्ततः । शलमानामियाकाशे धनुषधारियों मे युक्त सातसो हाथी और पांच हजार घोड़े पराक्रमी सहदेव ॥३७॥ तीन हजार पदाती और, द्रौपदी के पुत्र यह सब मिल र उस युद्धदुर्मद शकुनी के मम्मुख गये । ३८ । हे राजा इमक अनातर शकुनी ,को उल्लंघन करके विनपामिलाया मतापत्रान् सहदेव ने पीछे की ओरसे मारा । १९ । फिर वेगवान पांडवों के क्रोधयुक्त अवसवार उनरथियोंको उल्लंघनकर शकुनीकी सेना में पाँचे. 1. ४० । वहां युद्धमें नियत उन प्रश्नसवारों ने शकुनीकी बड़ी सेनाको काणों की वर्षा से दकदिया । ४३ हे राजा आपकी कमन्त्रतासे, वह युद्ध, जारी हुआ नोकि गदा और मास उठानेवाळे महात्माओं से सेवितथा जिसमें धनुषों की प्रत्यञ्चाओंके शब्द बन्दहोगये रथी कुतूहल, दर्शाहुये, भार अपने और दूसरोंकी, मुख्यतामा दृष्टि न पड़ी।४३॥ हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ उनकौरव और पांडवोंकी नाओं से छोड़ी हुई, शक्तियों का गिरना नक्षत्रों के आकाश से.,पतन होने के समान हुमा ४४ हे राजा, जहां तहां गिरहुये निर्मल दुधारा सद्गों से संयुक्त 'आकाश बहुत शोभायमान हुआ। ४५ । हे भावर्षभ राजा धृतराष्ट्र सर चारों ओरyou. shy Shahini's a my with their help.:56. Then the nreherTirreke. seven kundredelephants, five thousand horses valiant & thudov, with three thousand foot and the song of Drauprdi, all went together to oppuse Shakuni.shakunt was attacked by Sahadeva's army from the rear. Then Panday warriors dispersed the oar-warriors and faqed Shakuns's force, Thu horsemen covered Sjakuoi's army with arroy, 41. Thero was! a terrible battle fought with proses and mices of tho warriors and alli this was the rosult of your evil policy Then the sounds of the bow strings ansed; the car warriors were in great. distrees, and the to, videa woto not distinguished. The fall ot their spears was like that of the fall of stars from tho sky; Duble-edged swords or se been falling down from air 45. The puasss falling down froin all anime - - .. - - - शक्य Shalya Pary 16975) तमा भरमतम ॥ ४६॥ रुधिरातिनसबांगा धिप्रापदनियानाभा या परिलम्ति स्म शतशोऽप महसूशः । अन्योऽयं सन्निविष्टाभ समासाद्य. पास्परम् . ४७, ॥ माविक्षनागपने धमन्तो रधिर मुखः । ततोऽमघमो घोरं सैन्ये तु खसा ने ४८ तानपानमतोऽद्रासं तस्मादेशादान्दिमान । अवान् राजन्मनुष्यधि तमसा संबते मति ॥४iगो निपतितश्चान्ये धमन्ना रुधिर बहु केशाशिसमालग्ना न कुपितुं नरा ॥ ५० ॥ अन्योन्याश्वपृष्ठेभ्यो विपन्नो महायला मल्लाव समासायनिज रितरतरम् । अवध प्रकारांत बहवोत्र गताः भूमी निपतिताश्चान्ये बहधो.विजयैषिणः । तत्र तत्र व्यदृश्यन्त पुरुषारमानिनः ॥५२॥ एकोतिनश्चिमभुरपसिरोहः ।, महणत महा कोणी शोष' महशः ५३ रन शक्य त्रासोनन्तुपश्यन कनचित् । इस्त्ययगोदरतरवाते घर पातले ॥ ५४॥ धिमेक्षितप्तभाहरासखवायुधः । नानाप्रहरणबारः परस्पषधे से गिरते हो मासों से रूप ऐसहये जैसे कि आकाश में शलभाके समूहों के रूप होते है रुधिर से लित सम्पूर्ण शरीर भौर वाणी से घायल हजारो घोडे चारों और से गिर परस्पर सम्मुख होकर चूर्ण होगपे.।४७ मुखोसे कारकी, वमनारत पापल दृष्टिपड़े शत्रुओं के विजप करने पर फिर सनाकी धूल से संयुक्त होनेपर घोर अन्धकार हुआ.' ४८ तन मन्धकार से ढकजानेपर उन घोड़ों और मनुष्यों को उस स्थानेस हटाहुभा देखा ४९iकितनेही रुधिरकी वमन करतेहुये पृथ्वीपर गिर ५. घोड़ोंकी पीठ से परस्पर खेचनेवाले वाणों में चिपटे हुये मनुष्य गोंकी चेष्टा करने का समर्थ नहीं हुये मल्लों के समान मिलकर-परस्पर में मारा और बहुत से निर्जीव मनुष्य .घोहों से दूरदूरतक । ऐवं नेगये । ५१, बहुत से विजयामिलापी अपने को शूर माननेवाले मनुष्य जहाँ सही, पृथ्वीपर पहेहुये दिखाई पड़े । १२. रुधिरसे लिप्त ,भुन केशांसे रहित हज़ारों मनुष्यों से आच्छा जिपी दिखाइपड़ी ।। | सवारों समेत मृतक घोड़ों-से, पृथ्वी के आच्छादित होनेपर घोड़ेकी सवारीसे दूरभाना असंभव होगया। ५४ । रुधिरसे लिममव शरीर kot like fliebra nf Jurnau. Thuanule af burges wunded logo arrons, fell down everywhere and were dashe l'to piecea Vomitting and wounded, they foll down everywhere and again the warriors were curerid with dusty Hoises and men met in darknegg and fell down shedding blod. Pinned to the backs of horaes, the warriors were unable to move. They slew one another like wrestlers, while maany dardbodies irere dragged by horses, Many brave warriors Day dead on Harth. Tlie earth was covered with dead bodies broken litabs and hairless head! There was no room for horks to pass, over the dead bodies of men and horses. 54. The wounded and bleeding warriors, fighting hard, and using various weapons, - blorid, + (6976) Malial hart निषि मुसन्नि समागे तभूपिष्ठसनिक ॥ ५ ॥स मुह ततो युद्ध। सौष लोय विशाम्पते। पटसाहय शिपायान्युनिस्तत ॥ ५६ । तथैव पाण्डवा नीक रुधिरेण समुलितम् । सटसाहसहयै शिष्टरपायाद्वारसाहनम् ॥ ५७ ॥ श्वा रोहास्तु पाण्डुनामशन रुधिरोशिमा मुसन्निविटा संग्रामे भूयिष्ठे स्पॉजीविता ॥५८ ॥ नेह शक । लियोद्ध पुत एव महागजे रथानेव रथा यान्तु कुजरा कुले रानपि ॥ ५९॥ प्रतियातो. हि शकुनि स्वानीकर्मपस्थित । न म सोषलो रामा युद्धप्रागमिष्यति ॥ ६ ॥ ततस्तु द्रोपदाच चमत्ता महावि॥ ययुः पांचालयो घृण्वनो पहारथ ६१। सहद गेपि कोरल्यो रामेधे समुत्थिने । एकाकी प्रयया सत्र यत्र राजा धुधिष्ठिर ।। ६२'। ततस्तए प्रयातेपु शकुनि सौनपुन । गातोशामत् यो धृष्टद्युम्नस्य वाहिनीम् । ६३ ॥ तत पुनातुमुल युट यतमा ममवर्तत। तापकाना परेषाञ्च परस्परषषिणम् । ६४॥ ते -योऽयमवेक्षत शख धनुपमादि के उठानेवाले नानामकार के महार करनेवाले घाररूप परस्पर मारने के अभिलापी युद्धमें सेनांक मनुष्योंके समीपवर्ती जिनके कि बहुत से मनुष्य 'मारेगये उन लागौंसमेत युद्ध में एक महूर्त भर लड़कर वह शकुनी शेष सहचार घोडो समेत इटगया ।०६। उमीमकार रुधिर से लिस रयकी संगारीवाली पारदवीयसेनाभी शेष बचेहुये रस हजार घोडों समेत हटाई ५७॥ महुन समोर युद्धमें 'जीवन त्यागनेवाले रुधिरसे भरे पाण्डवीप प्रभावार बोले।०८कि यह अब कि दापियों से लड़ना असंभव है तो वहें हाधियोंमे लहना कैमे संभव होगा 'रथ रयों और हाथी हाधिोकही सम्मुखजाय १५९ वह सम्मुख होनेवासा शाकुनी सेना में नियतहै रामाशकुनी फिर पदको प्राप्त नहीं करेगा ६०। इसके पीछे द्रौपदी के पुत्र और मतवाले बर हाथी वहां गये जहां कि पांचालदेशी महारथी धृष्टद्युम्न arगधर बादल सरकारय मादे भी मना वहांगा नहाँपर गमा युधिष्ठिरये ॥६५॥ इसके पछि उनको चाहोने पर क्रोमक शकुनी ने अपने पस में नियंत दई पृष्टयान की सेनाको मारा । ६।। फिर माणों को त्यागकर परसर मारने के अभिलापी आपके और प्रतिपक्षियों के शूरवीरोंका वह कठिन युब appronched the army of Shakuni, vrlo laving some of hie warruars dend, removed the lonaindor tyluch 1918 or thousind in numbe 56. The Pandav yarrios stayed with th• roin uning fix the usand kors At the et uzliter of their warriora thio Panlas horrenten Bild, it smpossible turns to engranith la go clephante 18t cat warrime and ulejlants face tho clepliants Tonir standr Sinkuti let hini biglat nu word Then to runs of Draupali nccompanied by mond elep'inntu went to the police iliere Dhiruhtady uma wa Saliajer loo FDESCU tho storm of dust and approachal Yudbinlithur 2.cn Shakan destroyed this army of Dhrshtadyumn Tlio battlo was Vito and destructure on both sides and thousands of farnota . ६.७७) शल्यप simlya Pare (6-71 तस्मिन् वारसमागमे । योधा गाताजन् शतशोऽथ सहसा ।। ६५ ।। मसिमि पिठधमानामा शिरसा लोकसईये। प्रादुरासीन्महाशब्दस्तालाना तितामिव ॥ ६६ . विमुलाना शरीगणी भिनाना पतता भुधि । सायुधानाच वाहूनामरूणाच विशा पता मासीरवटाशम्द समहालोमहर्षण ॥ ६ ॥ निम्न तो निशित शत्रधातम् धान पितृनपि । योधा परिपतन्ति स्म यामिषाने खगा ॥ ६ ॥ गन्धोऽध प्रति सवा समासाद्य परम् । अह पूर्वमह पूर्वमिति म्यनन सहमश ॥६. सघा तेनासन रिश्वारोहगतामुभि । हता परिपतन्ति स्म शतशोध सघमंश ॥ ७॥ सपुरता प्रतिपिष्टानामश्यानो शीघ्रचारिणाम | स्तनताच मनुष्याणा संबमामा विशाम्पते ॥ ७१ . शक्तृष्टिप्रासशब्दस्तु तुमुल समजायत । भिन्दतां परममाणि राजन ईम्पत्रिते तव ॥ ७२ ॥ प्रमाभिभूता सरधा श्रान्सकाहाँ पिपासिता । विक्ष ताम शित शस्त्रैश्यवर्धन्त तावका ॥५३॥ मत्ता रुधिरगन्धेन पदधोत्र वित। इसमान हुभा हे राजा उस वीरोंकी सम्मुखता में उन्होंने परस्पर देखा सैकड़ों मारों शूरवीर चारों ओर से दोडे । ६५ । समार के नाश में खड्गोंसे कटवाले शिरोंके ऐसे वडे शब्द प्रकटहुये जैसे कि गिरते हुये तालफलों के शव्द होते हैं 18। हे राजा कवचोंसे रहित टूटेग पृथीपर गिरतेहुये शरीर शस्त्रधारी भुमा और धामों के चटचटानाम शब्द बडे कठोर और गेमाचे खो करनवाले उत्पन्न ९. ६७ 1 तागधार शस्त्रों से भाई पिता और पुत्रों को मारते शूरवीर चारों मोरसे ऐसे दौडे जैसे कि मांस के निमित्त पनी ३८ परस्पर फ्रीधयुक्त एक दूसरे को पाकर प्रथम मैं प्रथम मै इसप्रकार से कहकर हजारों ने प्रहार किये । ६। मोर कठिन महारों से निर्जीव मामनोंसे क्युत अवसवारों के कारण से हमारों चार धाराओरको दाडे । ७० । हे राजा फहरते मर्दन युक्त सीवगामी घोड़ों के और मस्कृत गजेनेवाले मनुप्पी के और शक्ति मास और वुशारे खड़गों के कठोर शब्द वर्चमान हुये हे राजा आपके कुविचार में शत्रुके मर्मस्थलों के काटन वाले पुरुपोंके वडे शब्दहुय । ७२ । परिश्रम से दवापे क्रोधयुक्त प्यासे थकीसवारी पाने और तेजवाणों से अत्यन घायल आपके शूरवीर सम्मुख वर्तमान हुये । ०३ । वहां रविर की गन्ध से मतवाले और अचेत यहुत गनुष्यों ने समीप attacked or o another, 65 The sounds of tite i lling hoada veru tiko the tall of palat fruits The sounds of the full of headlias bodies and limbo were also dreadful Slayın; fuʻlors, brothers and song with sharp Teason- tlsoy rushed against one another liko ravenave birds They via with one anothor in the attach and thousan is of the nderless hores8 wore to be seen ruslar: Intther and thither, 70 The norse from tho fall of swifo hores, the roars of watriots and of the fall of weapons was drendla! The cries of the Warriors, catlıog the vital parts of the enemies, nas tremendous Your warriors, thred:
".. 44 - (6478) Mahabharat (१९७८) जनु पनि स्थकांश्चय प्राप्तान प्राप्ताननन्तरान् ॥ ७ ॥ वहस गतप्राणाः क्षत्रिय जयदिनः । भूमीवाश्यपसमाजन शरीष्टीराहता. ।। ७५ ॥ पृफगृमनगालाit सुमुले मोदनेहनि । बासीलक्षपो घोरस्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥ ७ ॥ रामायस छन्ना भूमिरासीविशाम्पते । रुधिरोदकचित्रा व मीरुणा भयवर्धिनी ॥ असिमिः पहिशे. शूलममाणाः पुन पुनः । तायकाः पाण्याच नायवर्सन्त मारत huevi प्रहरम्तो पधाशक्ति यावत् प्राणस्थ धारणम् । योधाः परिपतम्ति स्म घमन्ती रुधिर प्रणे.।७२ शिगे गृहीत्या केशेषु कम्यश्च व्याश्यत । उम्प शितं खडग रुधिरक परिप्लुतम् ।। ८०॥ अथोत्थितेषु बहुपु कंपन्धं जनाधिप । तथा सपिागधेन योधान कमलमाविशत् ॥ ८१ ॥ मन्दी भूते तत शम्ने पाण्डधाना महमलम् । अल्पावशिष्ट अनगाले शत्रुओं समेत अपनेही शवीगेको मारा । ७४ | और विजपाभिलापीमरे हुये बहुत से क्षत्री वाणों की वर्षा से घायल होकर पृथ्वीपर गिरपड़े। ७५ । भरिये गिद्ध और शगालोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाला भाप के पुत्र के देखेतहुपे सेना का घोर नाश हुआ । ७६ । हे राजा पृनी मनुष्य और घोहों के शरीरों से ढकगई पिर प जल रखनेवाली महाअपूर्व भयभीतोंका भयवदानेवाली होगई। ०७ । हे भरत बंशी खड्ग पटिश और शूलों से वारम्पार घायन पांडव और आपके शूरवीर मही लौटे । ७८ । जबतक शरीर में माण शेष रहे,तवतक सामर्थ्य के अनुसार युद करतेरहे प्रोंमे रुधिरको डालतेहुपे शूरवीर चारोंभोर को दौड़े ४९,और पड़ अधीत रंड शिरको 'वालोंसे पकड़कर रुधिरसे भरेहुये तीक्ष्ण खड्गको उठाकर दिखाई दिया। 6.हे राजा इसके पीछे बहुन एंडोंके पवनेपर उसमकारके धिरकी गंध से शूसीर मछित होनेलगे। ८१ उसके पीछ ,शब्दके, न्यून होने पर शकुना घोड़े शेष नहुये घोड़ों समेत पांचाल देशियोंकी बड़ीसेनाके सम्मुख enraged and thusty, with cirea beasts and wounded by sharp weupona at rod rendy to fight. Aladdoned with the scent of blood and 40141.5sible, many people slow their own warriors, Denirous of victory many inruis, wounded by arrows, lay dead on earth. 79 Increasing the j'y of wolves, vultures and jackals, the destruction of your warriors was great in the prosence The earth WA® covered with the oi pies of inen and beauty With the overflow of ut blood the yrrund 'Vis dieadful to look at Wounded again and avan hy weapons the Warthits of both side did not give way and fought on as long as life endured. Diopping blond from their hodies, the warriors rushed in all directions A ventlass trunk was eren seizing tiént by the balr in'one hand and a boord in the other 80. Then many hoafless bours cose up and the stench frem blood wade the warriors lose their senses. When the noise, lossenet, Shakunt with A small rembant of his army opposed the large array of the Panchala. of your 801) A - शल्यपर्ष Shalya Pary (6979) तुएगायत सौबल.'॥ ८२५ ततोश्यघावारवारताः पाण्डवा जयद्धिनः। पदा तथा नागा सादिनचोचतायधाः ॥ ८३ ॥ कोष्ठकीकृत्य चाप्यन परिक्षिप्य च मशः शस्त्रनानाविधजनुयश्च पारं तितीर्षभः ॥ ८४ । वदीयोस्तान्तु संप्रेक्ष्यस तसमभिदतान् । साधपत्तिद्विपाथा' पाण्डवानभिदुद्रुवु ॥८५ | केचित् पदातष' पनि टिभिश्च परस्पाम् । निजध्नुः समरे शराः क्षीणशयास्ततोऽपतन ।। ८६ ॥ र यो रथिन. पेतुषिभ्यो पस्तिसादिन । निमानेभ्य इव भ्रष्टा' सिद्धा' पुण्पक्षये पथा ।। ८७ ॥ एतमन्योन्यमोमस्ता योधा जनुमहामृधे । पितुन मातृन पयस्याश्च पत्रा मपि मया ॥ ८ ॥ पधमासीदमर्याद युद्ध मरतसत्तम । प्रासासिषाणकालिले बमाने मदारणे ।। ८९ ॥ इमि शल्यपर्वणि शल्यवधणि संकुलद्ध त्रयोविंशोध्यायः २३ ॥ r वर्तमान हुआ। ८२ । इसकेपीछे विजयाभिलापी पांडव शीघही सम्मुख दौडे पख उठानेवाले युद्ध अन्तर्पर पहुँचने के इच्छावान पदाती हाथी और अश्व संवारों ने उसको चारोंऔर में सवप्रकार से घेरकर नानाप्रकार के शव से घायल किया । ८४ । फिर आपके रथ घोड़े पचि और हायी सरमोरसे चढ़ाई करनेवाले धनं पांडवों को देखकर सम्मुख पहुँचे । ८५ । और शनों से कितनेही शूरवीर पदातियोंने युद्ध में परणयात मौर मुष्टिकाओं से परस्पर घायल किया और करके फिर गिरपड़े । ८६ । रथी रथपर से और हाथी के सार हाथी परसे ऐसे गिरपड़े जैसे कि पुराप फलके क्षीणहोनेसे विमानपर चढ़े हुये सिद्ध स्वर्गसे गिरतेहैं।८७ इस कार महादुःखित शूरवीरोने परस्पर प्रहार किये और इसीमकार अन्य लोगोंने पिता भाई समान वयवाले और पुत्रों कोभी मारा हे भरतर्षभ इसप्रकार मासखंग बार बाणोंसे युक्त बड़ा भयानक युद्ध वर्तमान होनेपर बड़ीही मर्यादाई ८९॥" nooi The Pandavas dourrous of victory rushed on and sarrounded him with thoir elephants and horseman to make an and of him They Founded him with their weapons Pandar As, seeing him thus surrounded, attached him on all sides. 85. The foot wounded one another with their fiets an] kicks and feli down fighting. Warriors fell down from their cars and elephants es sidhas fall down froin celestial cars at the expiration of thoir monte, The sarriors nttacked one another and blev eron their fathers, brothers, sons and trends. Thus they fought with different sorts de reapony rad observod no rules. The horse and foot of the . 89.
- - - 6980) Mahabonent समय उवाच । तस्मिन् शब्द मदी, जाने पागनिहत, घले । अयः साशत; शिष्टरुपयर्तत सोपलः ॥ १॥ स पा वा घाहिनी तूर्ण मत्री स्वरन् युधि : युध्यता मिति सहयः पुन पुनरिन्दमाः ॥ २॥ अपृच्छतु क्षत्रियास्तत्र व नु राजा महारय । शॉनस्तु वः श्रुत्वा न ऊचुर्मरतर्प । असी तिष्ठति कौरव्यो रणमध्ये महारय ॥३॥ यत्रेतत् समच्छ पूर्णवादसमप्रमम् । यो सननुत्राणा ग्यास्तिष्ठरित दंशिताः॥४॥ पौष शब्दस्तुमुलः पर्यायनिनदीपम: Jan गच्छ दुत राजस्तो, प्रयास कारयम् । एवमुक्तस्त तैः शरै शनि. सीक्लस्तदा प्रपयो:तत्र यत्रासो पुत्रस्तव नराधिप । सर्वतः सहता धीरः सारेग्यनितिभिः ॥ ततो दुर्योधर्म दृष्ट्या स्थानीय व्यरस्थितम् । सस्थास्तायकान् सर्वान् हयन शकुनिस्ततः ।। दुर्योधनमिद पास्य हरूपो विशाम्पते। इनकावधारमानं मन्यमानोनवीनृपम् ॥८॥जाहराजधानीकमश्वाः सर्वे जिता मया । नात्पक्या जोषितं संख्ये शक्यो अध्याय २४ ॥ समय बोले कि उसके मृदु होने और पांडवोंके हाथ सेनाके भारेजाने पर शकुनी शेष बचे हुये साततौघोडों समेत हदगया । १ । मुद में शीघ्रताकरता. हुमा वह शकुनी सेना के पास शीघ्र , पहुँचकर यह पारम्बार बचन बोला कि, अत्यन प्रपन्नपित्त और शत्रुओं के विजग करनेवालो तुम युद्ध करो । २ । और वहां सत्र क्षत्रियों से पूछा कि वह दुर्योधन कहाँ है हे भरतर्षभ तब यह क्षत्रीलोग- शकुनी के बचनको मुनकर बोले कि वह महारथी कौरव युद्ध में वहां वर्तमान है जहां वह पूर्णचन्द्रमा के समान उसका छत्र दिखाई देताहै जहां पर कि यह कवचधारी शस्त्रलिये.रथीलोग नियत है। ४। और वहाँ जहाँपर यह वादलकेसमान' उत्तम घोरशन्द वर्तमान हे राजा तुम वहां शीघ्रजाको जाकर तुम उस : कौरव राजको देखोगे । ५ । उन शूरोंके ऐसे बचन सुनकर वह शकुनी चहांगया हेराजा, वापर वह आपका पुत्र युद्धर्मे सुखन - मोहनेवाले वीरों से चारोंमोर को क्षित या। ६ । यहां रयको सेना मपेत दुर्योधनको नियत देखकर आपके सव रथियोंको 1 CHAPTER XXIV Sanjaya' said, " When the noise subsided and the army was being plestroyed by the Pandavas, Sliahuni retreated’with seven handied horse, He came' near the Karriors and said to them agaju' anů hgain, "Fight cheerfully, my warriors." He then enquired of the Whuruabouts of Duryodhan aud they said, "He is yonder where you poe tho moun ļıke umbrella and the warriors are standug with bright Armoura. He is there where you li ar a sound like that of thunder Go there at once and you will seu tho Kaurav jirineo " Having theard the words-of-those warriore, Shakunl went to the placs wliere. - । से (६९८९) Tanga ulintya Part 1109811 अतुं युधिरि ९॥ हने सस्मिवयान के पाण्डपेनानिगालो । गजानकार हनियाम. पाताधनामा १ ॥ अपातु पवन तस्य तायका अयधिना । अनाव बन get पाण्डवानामनीकिनीम् | ११॥ स वित्तूणीरा प्रमहीत पानसमा ! शरासनानि धु-यामा विना प्रचफिर ॥ १२ ॥ ततो ज्यातनिर्धाच पुनरासीरि हस्पते प्रागसागणाप विमुक्तानी हुदारुण , १३ nan समीपगतान इन जनायतकामुंहान् । उपत्र वकीपुत्र कुतोपुत्रो धनग्मय ॥ १५ ॥ चोर यायानसमात प्रविशन गर्णयम् । मतमा गमिष्यामि शो निशितै शा; ॥ १५॥ भादश दिनायर युद्धस्थास्य जनाईन । वर्तमानस्य महतः समासाच परस्परम ॥ १६ ॥ अनन्तकल्पा जिनो भूत्वा धग मारमनाम क्षियमय गता युके प्रसन्न करता । । मसनमुक्ति अपने को तकृत्य मामता शकनी राजा दुर्योधन पह पचन बोला हे रामा अब तम यकी सेनाको मारी में सब घोडे विजय किये युद्ध में जीवनको रयागन करके पुधिष्ठिर विजय करने के पेपनी । ९ । पारडयों से रचित उस स्थकी सेनाके मरनेपर इन हाथी पाती भादि सर्व को मारेंगे विनयाभिलाषी अप्सनमित्त भाषके पुत्र उसके वचन को सुनकर तीव्रता से पाण्डवों की सेना के सम्मुख दौड़े। ११ । सब सूणीर बांधे धनुषों को चलाय मान करते धनुषधारियों ने सिंहनाद किंगे । १२१ राजा इसके पीछे मस्यञ्चा भारतलों समेत अच्छे प्रकार से छोटेहये वाणों के फिर महाभयकारी शब्द प्रकार हये।।३। कुन्तीका पुत्र अर्जुन पन सम्मुख वर्तमान तीनतासे धनुष ग्गनेवालोको दिनकर श्रीकृष्णजी से यह वचन चौना । १४ । कि आप भान्तिसे रहित होकर पोरों को चलायमान करो और सेनारूपी समुद्र में प्रवेश कारपे भा में अपार बाणों से शत्रों के नाश को करूगा । १५ । हे जनाईनजी परस्पर सम्मान होते मे इस महाभारी युद्ध को होतेडुपे अब भनाइ दिन हुये 1 1 इन Duryodhan was surrondod and guasded by upinching warior Seeing the prince there, and pleusing the warriore, Shahunı sad lo Duryodhan," Slay the army of car Part ros, 1 laro conquered to horses. You cannoto qusr Yudhisti ir without risking your ond, lift At the desti uction of thic or "wrriors protected by the Paodaros, we shall olay the elephants, foot and otliera" Your sons, desirous of victory, chcerfully rushed against the army of the Paydayas, Furorsbed srith quivers and moving thor boys the archers raised Izogine roars Then the sounds from buwstrings, beating of plama and arrows mew Again tremood 144 Arjan sceing them equipped with borso comig barils bim, eud to Krohn," Drive the horses carefully and enter the Ostan of the army I shall destroy the eneming with my sharp arrows 15 The nar has been raging for oigt troa days, - - तमस्त (6982) Afnlinbhirit पश्न देयं पयायिधम् । १७ ॥ समुद्रालाच बल धार्तराष्ट्रस्य माधव । अस्माना माघ मन्जाते गे पोपममच्युन ॥ १८ ॥ हते भीमे तु संन्दध्याच्छिषं शादिर माधया न च तत्तवान् मूढो धाराष्ट्र मालिशः॥१९ उक्त भीषण यद्वा हिन पथ्यच माधध' सच्चापि नासो कृतवान् घातबुद्धिः मुपोधन निहने भी प्रच्युते पृथिवीतले । न जाने कारण किन्नु येन युद्धर्मपत्तत मूदास्तु सर्वथा मनोधाराष्ट्रान मुबालशान । पतित शान्तनो पुझे येकाः संयुगे पुनः ॥ २२॥ अनन्तरच निहने द्रोणे ब्रह्मविदाम्बरे । गधे च विषण च नेवाशीम्यत धेिशसम्।।२३ अल्पावशिष्ट सन्यस्मिन् सूतपुत्रेचपातितेसिपुत्र नरम्यान नैयाशाम्यत शसम । २४ । भुतायुषि हते शरे अलमन्ध च पौरखे । दुतायुधे 'न अपनी नैया महात्माओं की प्रसंख्य : सेना ने अब युद्ध में नाशको पाया देव को देखिय [कि कैसा है। १७॥ हे अविनाशी माधवजी समद्रकी समान दुर्योधन की मेना हमको पकिर , गोपद के समान देखने में आई 'हे माघी- भीष्मके मरने पर जो यह सन्धि करलेना तो यहां के सब लोगोंकी कुशल होजाती परन्तु अज्ञान निर्बुद्धि दुर्योधन ने उसको नहीं माना। १९ । माघरजी भामजी ने भी जो बड़ा हितकारी शुभदापक वचन की इस 'निर्बुदि। युर्योधन ने उम को भी नहीं कियाग २० । 'कठिन युद्ध में उन मौर्मनी के पृथ्वी पर गिरनेपर में नहीं जानताएं कि कौनसा कारणहै जिससे कि युद्ध जारीहुआ । मैं सक मकारसे धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भज्ञान भार निर्बुदि मानताएं कि जिन्होंने भीमनी के भी गिरनेपर युद किया । २२। इसके अन्तर ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ,दीण। चार्य कर्ण और विकणके मरनेपर भी विनाशने शान्तिको नहीं पाया । २३ । इस सेना के बाड़े बाकी रहने और नरोत्तम कर्ण के पुत्र समेत गिरानेपर नाशन शान्ति को नहीं पाया । २४ बीर श्रुतायुश पौरव जलसिन्धु और राजा श्रुतायुधक मरने O Janardan, and the numaruus Bruly of these great wara lot of tires béén destroyod, Look at the working ut Deuliny, Immortal Ma thav, the Ocban like army of Duryodhan conìing towards us looks like a small pond. All the warriors would be safe, it Duryodlian hnd made pui ca at Ithe fall of Blum, but the fool paid no heed Foolishi Duryodhán gave, no ear to the salutary advice of 'Blishni I donat know why "the battle ag' allowed to controus at the fall of Bhishm. I knop that the sons of Dhrt-ashtia are quite foolish ag thoy continued the wat at the la!l of . Bliskim. The battle was not discontinged at the fall or Druhá, "Karan and Viharrit 'It did not cease even when buly 's spiell portiod nt tlio army was Jeft at the fall of karag and hue bou. The hostmtiees eld not ceaset at the fal:ot Shratnyush, PAuTHY, Jalsuidith and Suntay udy : 25 It did not starts at the fall of 20 n- है शल्यपर्वShalya Pary (6983) शाम्यत देशसम्॥२५॥ मरिश्रयसि शल्ये च शालय वा जनाईना भावत्येच घरेषु नैयाशाम्पतधेशसम् ॥ २६ ॥ जयद्रये च निहते राक्षसांबायलायुधे। वाहली. सोमदत्ते व नैनाशाम्यत देशप्तम् ॥ २७ ॥ भगदत्तं ते शरे काम्बोजेव.सुदाणे ।। सुशासने व निहते नेवाशाम्य धेशसम : २८७,इष्ट्वा च निहतान् शाद.पृथक्ष्मा इलिकास्नुपान पकिनच रणे कृष्ण नेवाशाम्य वेशसम ॥ २९ ॥ अक्षापडणी हता. राष्ट्रमा भीमसेनन संयुगे । मोहामा परिघा लोमानवाशाम्यत पेशल || ३00 को नुराजाकुलंगातःकारखेयो विशेषतः। निरंयक महवर कुम्पादन्यः सुयोधनाद॥३१॥ गुण तोचक बारवा बलतः। शौर्यतोपि वा अगदः को नु युध्येत जानन शो हितो रितम्॥ ३९॥ यन तस्य मनो शासीत्ययोक्तस्य हितस्य च प्रशमे :पाण्डवः सास सोन्यस्य अणुयात् कथम् ॥ ३३ ॥ पेन शाम्तनयो मीमो झोणो विधुर एवं प्रत्या परभी नाशहाना बन्द नहीं हुभो ।१५। हेजनाईननी भूरिश्रवा शल्पा शाल और. दोनों अवन्ति देशके.वीर. गजालोगों के भी मरनेपर, नाशहानाः चन्द नहीं हमा । २६ । जयद्रथै मलायुध. सक्षम वालींक सोमदत्त'शूर मंगदत्त काम्बोज मुदः तिण और दुश्शासन के पानेपर भी यह क्षत्रियोंका नाश वन्द नहींहुआ.१२८१ हे कृष्णजी पृथंक मण्डलवाले शूरवी. पराक्रमी राजाओं को युद्धमें मरादुभा देख कर भी नाशवाद नहीं हुआ। २९ भीमसेन के हायता असोहिणी के प्रधान लोगों को मृतक देखकर मोह और लोभम नाश वन्दनहीं हुआ। राजाओं के:पाने मुख्यकर कौरों के घर में उत्पनहोकर दुर्भश्नके सिराय कौनपुरुष निरर्थक.बड़ी शत्रुता को करेगार गुण बल और शूरता से भी अधिक जानकर हानि लाभको जानता हुमा कानमा 'बुद्धिमान मनुष्य युद्ध कोंगी । ३।। जो तुम्हारे भी हितकारी वचनोंके करने से उस दुर्योधनका चित्त पाण्डवों के | साथ सन्धि करने में नहीं हुभा वह फिर दूसरेके पचनकों को मुनसक्तादेगा। Bhurishirava, 8.alya, s alwaard.tlié two párrióra of Avanti: It did not cause' atithe fall of Jayadrat;** Aluyurth the Faks lina;"Vahlik,'| Somdatta, 7 brave Bhagdátes, Camboj; Sudakihin ang Dahnsin, The destruction of the warriors did not cease at tlio, fall, of so many: kings. He was, toolishi enough not to stop. fight when, Bhim had destroyed an, akshaulhinioi good, warriors. 3Q.. Born is the family: of kings and specially of Rausas, kings, no man,, except Duryodhap, would , contract (such a great bonity for nothing. What vise, man. Enowing his enemy to. be superior to him in , gord qualities and.. atrength, would contract. enmity ?,How, conld, Duryodhan -liaten to other men, when he was foolish enough to disregard; your:,adrice to makow.peace with the Pandavao? What remedy was left to bipo, ho fatly refused to the advice of Bhishm, Drona and Vidar!. What । . 1(6984) Mahablarat स्याताः शमस्याय किग्नु तम्याच भेषजम् ॥३४॥ मोदराबनिता पनःप्रस्तातो जनाईन । नथा माता हित वाक्यं भाषमाणा हितैषिणी । प्रयागता समस स्माद्रोचद्वचः ॥३५॥ कुलान्तकरणा व्यक्तं जात एष जनार्दन । संचास्य रखते बधानतिष विशाम्पते।। नैष दास्यति नो राज्यमिति मे मतिरेच्युत ॥ ३ ॥ उक्तोऽहं बहुशस्नान विदुरेण महामना । न जोवन दास्यने माग धानगष्ट्रः कपचन ॥ ३७॥ यावत् प्राणाधारयति धृतराष्ट्रीप मानद । तस्माद्युस्मामु पाषामा र यति पातकम् ॥ ३८॥च शक्याम्यथा अतुमने युज्न माधव । रपवीत् सदामो शिविर सत्यदर्शनः ॥ ३९ ॥ तत् सर्वमध जानामि व्यषसा दुगरमन यस बचन तेम विदुरेण महामना ॥ ४५ ॥ यो हि श्रुत्वा धमः पश्यं जामदग्न्यायथातथमा अनामन्यत वुबिधु नाशमुख स्थितः ॥४१ । उक्त हि बहुभिः सिर्जातमा भुषो सन्धि के विषय में भीष्म द्रोणाचार्य और , विदुरजी को भा जिसने उचर दिया अब यसका कौनसा. इलज है। ३. । हेजनाईननी जिसने अपनी माता से हितकारी मनों के कहनेवालेटद्धापना और माताओं कोभी वारम्बार अनादर करके उत्तरदिया वह कैमे दूसरे के सपनों को अंगीकार करमताई।। ३५ हेमा मूदन जी प्रकटौ कि यह कुलका नाश करनेवाला • उत्पन्नहुमा हे विशाम्पते उसी प्रकार इसकी चेष्टा मोर नाते देखी जाती है कि यह हमको राज्य महो देगा भावनाशी : मेरा यह मतहै ।। ३६ । हे बड़ाई दनवाले भाई मुझसे बहुधा पारमा विदुरने कहा था कि दुर्योधन कभी अपने जीते जी राज्यका भाग नही देगा दुर्योधन जबतक जोवता तबतक हमानिरपराधियों के साथ पापक्रम करेगा -माधानी बह विना युद्धकिये और किसीमकारसमो-विजय करने योग्य नहीं है न्याय के देखनेवाले विदुरनाने सदैव मुझसे यही कहा कि ३९ को मा उसदुरात्माके सब निषयको प्रार जो वचन , उसमहात्मा विदुरनी ने कहा। पसको जानूंगा ! ४ । जिप्त दुद्धिने परशुरामजी के सत्य और परिणाम में रित कारी वचनों को सुनकर अपमान किया इससे निश्चय मातहोताई कि वह नाथ के सम्मुख नियत हुआ है । ४ । दुर्योधन के उत्पन्न होनेपर बहुत सिदसोगों othor man's advice would he huar who foolishly disregarded the advico of his paronts ? 35. 'It is clear, O Madhusudan that Duryodhna was born to destroy his own family. It was? Bf therofora that he tried to deprive us of our Lingdom. Vidar hal often told po that Daryodlian would not give us ar poperty during his life trae. He will continue his lostilities towards us, without any fault of ours, as long as he lives, He cannot bo conquered without fight. ing. Wie Vidur bas often told me this I shall dom see his revolution and the prediation of Vidur. 40. From his disregarding the salutary advice of Parashuram, J bolsovo tbat Duryodhsh is bent on में शल्यप shalya Pare (6985) भवन प्राय दुरात्माने क्षयं यत्र गमिष्यति ॥ ४२ ॥ तदिन पचन मिक जनाईक यात्रारिराजानी दुग्योधमकृतभृशम् । सोध सर्वात्रणे पोधानिानि ज्यामि माधव ॥४३॥ क्षत्रिय हनम्वद्य शल्पे च शिविर कृत । पचाय पारमोस्मामि मधुग ऐचरिष्यति । ३४॥ तदन्त हि ममेरमनुमानेन माधघ । एष पश्यामि बाणे पिम्स प्रक्षयाम्यया ॥४१॥विदरस्य च शक्यन घष्टया दुरात्मनः । माह भारलवार याम्मि शिते गरे दुग्पॉधन दुगस्मान याहिनीवास्य सयुगे ॥ ४६॥ समय करिष्यामि धनराजस्य माधव । स्वतद्दुल सन्यं धार्तराष्ट्रस्य पश्यत: ॥४७॥ सजय एघ । अमापुहस्ता दागाहस्तथोक्त सव्यसाचिना तबलाधर्माम बाबाममी. प्राविशवण ॥४८॥ शगसनधन धार शक्तिकण्ठकसपूनम । दापरिष पन्चारग्यमागमहादुमम् ॥४९॥ हयपनिलसाको गाहमाना महापशा। उपरोष वाया कि इस दुरारमा दुयुद्धिको प्राप्त होकर बहत से क्षत्रियों के कुलनाश होगायेंगे । ४२ । हे जनाईनभी उन्होंका पारम्बार कहाहुभा पवचन भव सस्प होरहा कि दुर्योधन के कारण से यहतो ममख्य राजाओं का माए होमया सारेमापवजा भर युद्ध म मय शुरवीरों को माल्गा । ४३ क्षत्रियों मात्र परन बोर,डेरा के जल्दासे खालीहाने पर भपने परणके लिप बा दुर्योधन स्मारे साथ युद्ध करने का अगोकार करंगा । ४४।ई अनाहनमी अनमानसावदित तारक माधुताका अनु वही हागाई श्रीकृष्णना में अपनी बुद्धि से शोपना गरमी के वचन भार इस दुरात्माके कम से एमाही देखताहू पर इस हेतु समाप उम सेना में चला जबतक युद्ध में मेजवाणी से इस दुरामा हुवोधनको आरपको सेनाको माझगा | १६ | गरुड़ध्वनजो अब म दुर्योधन के दवंत इस निवल मेनाको मार र धम्मराज का कुशलताको करूगा । ४७ । समय बोले कि अर्जुन क इस प्रकार वचन को समकर हायमें रहती पकड़नेवाले श्री कृष्णो ने नियत्तास उससेनाम मवंशाकया । ८ । बड़े साहसी गोविन्दजी बड़ी पताका ग्यको सवारामे उस सेनाको मझात हय एमन लगे कि भाग साभार बाला से भयानक शक्तिही कांटा से पूर्ण गदा और परिधमुरतं मार्ग destroying himself. Many aidhas predicted at the birth of Duryohan that bo would cause the destruction of many warrior fimilima Those manifold predictions aro no conslag out tron, for en many kshatryas have been destroged on his sccount, I shall now alay all thu Warriors, O Madhav. At the detraction of all his marrinnu when all the tonla are empty Duryodhan will come before us to dle and I onpross that the he tilities will then end. Thus thak, the predictina of Vider will come out to be true and that will be the end of that all matured fool Tabe mo therefore in iho midst of the army .) that I Islay Duryodban's Army I chall set the miod of Yudhishthir at esse (6986 " Mahabharat (६९८६) चन गोविन्दो रयेनासिपताफिना ॥:५०:॥ ते स्याः पाण्डवा राजन घहन्तो ममाहये । दिक्षु सम्याश्यन्न दाशाण प्रचोदिता' ॥ ५१ ।। ततः, प्रापाद्रोनाजी.सल्यसाची परन्तपः शिरछरशतांतीक्ष्णान धारिधारा इयाम्बुदा प्रादुरासीन्महाशम्दः शगणां नतपर्वणाम् ॥ १२ ॥इमिश्छाद्यमानानां समरे सव्यसाचिना । असज्जन्सस्ननुत्रेषु शरोधाः प्राप्तम् मुनि ॥ ५३.१ इन्द्राशनिसमस्पर्शी गाण्डीवप्रपिता शराः । मगधा गान समारय हांश्चापि विशाम्पते । अपतन्त रणे पाणाः पतङ्गा घ घोषिण ॥५४॥ आसीत् सर्थमधलं गाण्डीघप्रेषितैः शरैः । न मानायन्त समरे दिशो वा विदिशोपि. घा ॥ ५५ ॥ सर्घमामीजगत् पूर्ण प्रार्थनामाङ्कित शरैः । रुक्मपुखस्तलधोने काप रिमार्जिनः ॥५६॥ ते दह्यमानाः पार्थेन पावकेने कुरामा समासीदन्त कोरल्या रखनेवाला स्य हायी रूप बड़े वृक्षवाला घोड़े और पत्तिरूपी लतामों से संयुक्त | सेनारूपी वनों । ५० । हे'राजा युद्धमें श्रीकृष्णजी से चलायमान वा श्वेत घोड़ें अर्जुनको सवार कियेहुये सव दिशाओं में दिखाई पड़े । ५१ । 'इस पार्छ | शत्रुओंकी तपानेवाला अर्जुन सैकड़ों वणिजाड़ों को फैलाता रथी सवारीसे | युद्ध में ऐसे आयो जैसे कि जकी धाराओं को वरसाता पादल आता है युद्ध-म अर्जुन के बाणों से ढके हुये 'शूरवीर और टेढ़े पूर्ववाले वाणों के बड़े शब्द मर्कटहये । ५२ | गांडीवो धनुषसे चलाये हुये इन्द्रवज्रकी समान स्पर्शवाले कवयों पर लगतेहुये वाण समूह पृथ्वापर मच्छे गिरे । ६३ हेमराजा वह बाणहायीऔर घोड़ों को मारकर पक्षियों के समान युद्धभूमि में गिरपड़े । २४ा गांडीव धनपके चलाये ये वाणों से सब पृथ्वी ऐसी दकगई कि गुदमें दिशा और विदिशा भी नहीं जानीगई । १५ । अर्जुनके नामों से अकित मुनहरी पुख' तेलसे साफ, हुपे और कारीगरके माने हुये वासों से सर्व जगत पूर्ण, होगया । ५६ । अनिके समान अजुनसे भस्म होनेवाले, तेज वाणोंसे घायल उन घोररूपं हाथियों ने after playing tlus weakened army. 47. Sarjaya anid, "Having heard, Atjun's words Shree Krishn feirles ly entered the army Lnturing the niny býith This huge blubered car, biaya Govind fra nedia the midst of the variors. Armed with prages, words, -arrowimaces and clubs and full of cars, elephants, foot and horse,50. Driven. by.san Krishn, the whito horser, sarrying Afjan, looked in alll directions , Then Arjun the destroyer of foesrcains son into the field of battle, shovering'arrows from his car like a cload' pouring forth rash covered with Arjau's arrows, the warfibrs made a tremendous' hoise with their art wys Nitcharged from the Gundro bow, the vajra like arms priced that armoura of the arriors and fell down on earth. Slujung elephants and horses they fell down in the field of battle like birds., The field of battle Fag covered rith Arrowr'dis, - (६२८७)- शल्या Shalya Parv (69871) 11 वापमान पांघान् ॥ - इस सुघोषः भारितम शुष्कलावितान भृश समृलो ज्वलनः प्रतापी ॥५१॥ एवं स नाग मंगणाप्रतापी शराचिरुच्चार्यचतिमतेजाः दाइ सर्वो तब पुत्रसेनाममृष्यमाणा सरसा सरस्यो ।। ६० ॥ तस्येष प्राणहगः समुक्ता नासजन वै धर्मम, रुक्मपुरखाः नमवितोय प्रमोध वाण मरे हय वा परमापे, घा ! ६१ ॥ अनेकरूपाकातीमाई घाणमधारयानाकर नुप्रविश्य । स एष एकस्तष, पुत्रसेनां जघान - दैत्यानिय बापाणि " इति शल्य पर्वणि शल्य वर्धेपर्वणि "अर्जुनपराक्रमे चतुर्विशाध्यायः २४ ॥ भर्जुनको त्याग नहीं किया। ५७ । सूर्य के समान प्रकाश मान तेजस्वी धनुपत्रागा धारी अर्जुन ने युद्ध में लड़नेवालों को ऐसे : भस्म किया जैसे कि, ज्वलित रूप मग्निीसूखे वनको भरम करता है । ५८ जैसे कि उनके समीप वनवासियोंस छोड़ाआ कालामार्ग अथवा बड़े शब्द रखनेवाली वृद्धि युक्त प्रताप अग्नि उस सूखे वनको भिस्मकरे.जोकि बहुत से वृक्षों से पूर्ण होकर सूक्ष्म लेताओं से आच्छा दित होय। १९ । इसी प्रकार नाराषों मे संता करनेवाले वाणरूप छोटी बड़ी बाला रखनेवाले बड़े तेजस्वी वेगवान अशान्तिचित्त •अर्जुन ने आपके पुत्रकी सब सेनाको नाशकरदिया । ६० । अच्छे प्रकारसे छोड़ेहेये:सुनहरी मुख जीवन हरनेवाले उसके बाण कयोंको भेदकर पारहोगये उसने मनुष्यं घोड़े और उत्तम हाथीपर भी एकके सिवाय दुसरे वाणको नहीं मारा । ६१. उस अकेले में महा रपियोंकी सेनामें मवेश करके बहुत प्रकारके रूपवाले बाणों से आपके 'पुत्रकी सेनाको ऐसे मारा जैसे कि दैत्य लोगोंको बनधारी इन्द्र मारता है ६२॥ ": cbarged from the Gandis bów and the directions became invisible.55. | 'The field was full of well 'rubbed and oiled arrows" taarked with | Arjun's name. Burning as if it vera with fire 'by the sharp arrove, the elephants did not leave Arjun. Glorious like thic Sun, the grent; atcher Aijuri, consumisd the warriors as fire burns a dry forest: "Tho; field of battle was like the black path left by foresters aftór burning a forest "full of trees and creepers. Thus Arjun destroyed your warriors' with his arrstys.. 60. The arrows well discharged and! destructire of life piercultinough the arm urs. He nu rani keconds arrows to destroy meo, horses and elephants. Having entore, the army. xlone, he destroyed your sun's warriora with his strorsai Indra the wielder of vajra destroys the Daityo. 62.
. . (GB) Mahabat सञ्जर्व उवाच । अस्यता पतमामानां शराणामनिवर्तिनाम । साल्पमकरोमो गाण्डोनेनं धनञ्जयः ॥ इद्रीशामसमपनविषयामहोजसा विसंजन रयते घाणान् धारा सुश्चभिवाम्बुदः ॥२॥ तत् सैन्य भरतश्रेष्ठ वध्यमान किरिना । संघ उद्राय सलमासष पुत्रस्य पश्यतः ॥३॥ पिढ्न आदन परित्यय यस्यानपि चापरे। रतधुय्यारथा केचिस तसूतास्तथापरे । भग्नेशागुगचकाक्षाः केचिदानन विशाम्पस ॥४॥ मन्येषां सायका मीणास्तथाप्ये शापीडिताः । वझता युगपत केचित् भाद्रपद अपपीडिताः ॥ ५ ॥ कंचित् पुत्रानुपादाय इतभूयिष्यवाहमा | निधः पिसमाये सहायानपरे ॥ ६॥ बांधा नरध्यानातुन सम्बन्धिनस्त कोई खुत्स्य पतन विशाम्पतं ॥ ७॥ वहघोष मशं विसापुथमाना महारया। अध्याय.२६ ॥ समय बोले कि अर्जुनने गाण्डीव धनुपके द्वारा सी धनुषधारी उपाय वाले और मखम मोहनेवाले शुरवीरों के संकल्पों को मिष्फल करदिया। इन्द्रवनके समान स्पर्शवाले असा महा प्रकाशित बाणों को छोड़ता से दिखाई देताया मैले कि जलधाराओं को छोड़ता पावल दिखाई पड़ता है। भरतर्षभ अर्जुन के हायसे घायल वहसमा आपके पुत्रके देखतेहुषे मुदसे भागीर । कितनेही भाई पिता और समान अवस्था वालों को भी छोड़करभागे। को मृतक घोडेवाले और कोईमृतक सारधीवाले रेष दिसाई पड़े हे रामा कितने ही रय टूटे बादएर युग और चनावाले हुये । ४ । और दूसरों के सायकों ने माताको पाया मोरे वाणोंसे पाडावानहुये कितनेही विना घायलहुये -ही पपसे पीड़ित होकर मागे । ५। और जिनके बहुत भाई बन्धुमारेगये ऐसे बहुत से मनुष्य पुत्र भाई आदि को लेकरभागे कोई पिताको फोई साथी बान्धव नातेदार और भाइयों को पुकारे 14 और हे राजा कितनेही जहां तहां सामान को छोड़कर भागे फिर यहां बहुतसे महारथी कठिन घायल और अचेतहोकर अर्जुन के वाणसे घापल और CHAPTER XXVI Sanjayn said, " With arrows discharged from tho Gaudit bow ho made the resolucions of the unflinching warriors futile. Discharg ing vajra like arrows which were unbearable and bright, he looked liko a cloud eending forth rails Wounded by his arrows, the Tarriors iled in tho presence of your son. Mady fled away leaving their fathers brothere, and friends.. Bome lost their horres-and others lost thuir divers and had the parts of their cars broken. Others were deprived of aridws and were theniselves wounded, whilo wome fled in urrus without receiving rounds. 5, Those whorekinetoen Birra slain, fled awry with the rest of their relations, Tor their fatherry ythers, thoir compinions and kinstmen. Some flad - - Sotne alled - (6959) ॥ शल्या Shilya Parv स्त स्म दृश्यन्ते पार्थवाणाहता नरा ॥ ८ ॥ वानन्ये रयमारोप्य अवास्याय मुहूर्त म । विधारताच विराश्च पुयुताय जग्मिरें ।। ९ । तानपास्य गता केचित् पुन 'वयु संघ (कुन्तस्तव पुत्र शासन युद्धदुर्भदा ॥ १: "n पानीथमपरे पीत्वा पग्यावायच घाहनम् बर्माणि च समारोप्य कचित् भरतसा ॥ ११ ॥ समा वास्यांपो मातृन निक्षिप्य शियिोऽपि च । पुनानन्ये पितृनन्धे पुनर्मुदाचिय १२ ॥ मजयित्वा या चित् ययामुख्य विशाम्पते । नाप्रय पाण्डधानीपुर युदगरोचपन् ।॥ १३॥शप किणीजाल समाच्छना पभासिरे प्रैलोक्यधि अब युवा तथा देतेपदानया ॥ १४ागम्य सहसा केचिद्रय स्वर्णविभूषिते । पाण्यानानोकेषु धृष्टद्यम्नप्रबोधपन् ।। १५ ॥धृष्टद्युम्नोऽपि पाश्चात्य शिखण्डी श्राम लो दिवई, पड़े ।८ बहुतले उनको स्थपर सवार करक एक मुहूत विश्वास कराके काट रहित अच्छेपकार तृप्तकरके फिर युद्ध के निमित्त भेने गये कितने युद्धामिलापी लोग उन को छोडकर आप के 'पुत्रकी आज्ञा को मान कर फिर युद्धमें गये । १०। बहुत युददुर्मद जलको पाकर साराको आराम देकर और कित दि िकवचोंको बदलकर पदगये । ११ हे भरतर्षभ कितनेही अपने भाइयों को ढेरे छोड विश्वातदेकर चलदिये किसीने पुत्रोंको किसीके पिनाओं को डरे छोडकर युद्धकोही स्वीकारकिया ।१२।और कितनेही शूरवीरों ने उत्तम रयाका अलतारके पांडवीपसना में प्रवेशकरके फिर युद्धको स्वीपर किया 1 १॥ यह शूर घोटकाओंके जालोरो युक्त ऐस शोभायमान पे जैसे कि तीनों ब्रोकों की विनय में प्रवृत्त दैत्य और दानव होते हैं । १४ ६ कितन ही ताराने सुवर्ण से अलकत रथों का सवारी से पागडयोंकी सेनामें आकरधृिष्टद्युम्न से युद्ध किया। वा पाचालदेशी घुम्न महारथी शिखण्डी और नकुल के पुत्र माता away leaving their godz. wlany warriors wounded and insensible, were seen garming with the founds ol Arjun's auora. Somettere lifted on cars and ngam sent to light after a few monterts of ncipite. Some desirous of fighting left then und went to battle by the order of your #01 Soin' went to fight after dripking water, giving rest to their beasts and changiog ther armours. Sjes lert their brothers, in thios tunts and sent to battle after consoling them thó r5004 had fatliers in the tants and went te fight Sime prepared, their existand estered the Pandar army for the sake of fighting Thin-e birrer arriors, with amali bells, loohet glarse 8 like Latyns and D 1 1983 desirous of vitory over the three kuulda Some itarri se sont don yuld decled curs, entered the Pandav arug and funge with Dit talifaulynast 15 Dhristhirdyumn of Panchal Some foft m । (6BB) Mahallintat (३.८) सजर्व उपाच । अस्यता पतमानागा राणामनितिनाम् । सरपमरोमो गाण्डौन धनञ्जय ॥१॥ इद्रीशनिसमस्पर्भानविषयामहोजसो विजन रयते घाणान् धाराशीभवाम्बुद ॥ २॥ तत् सैन्य भरतश्रेष्ठ वध्यमान फिरोदिना । सत्र बुद्राय संसामात्तष पुत्रस्य पश्यतः ॥३॥ पितृन भात परिस्थस्य वयस्थानपि वापरे। सिधुप्पारधा केचिरससूसास्तथापरे भग्नेशायुगचकाक्षा केचिदास सिम्पति ॥४॥ अन्येषां सायका मीणास्तधाम्ये शेरपीडिता शिक्षता युगपत् कवित्वर स्पपीडिता ॥ ५ ॥ कंचित् पुत्रानुपादा तभूयिष्ठवाहमा। निशु. सिमस्ये सहापानपरे पुन १६॥ बांधवार्थ नरध्यान, मातुन सम्बन्धिनस्तथा । पुत्सृश्य त तन विशाम्पत ॥ ७ ॥ बदघोऽत्रमश घिसा घमाना महारथा निज अध्याय २६ ।। सच बोले कि अर्जुनने गाण्डीव धनुपके द्वारा बैग धर्नुपधारी उपाय करणे वाले और मुख म मोधनेवाले भावीरों के संकल्पों को मिष्फल करदिया। इन्द्रवपके समान स्पर्शवाले असाध महा मकाशित पाणों को लोहता ऐसे दिखाई देताथा जैसे कि जलधाराओं को छोड़ता पावल दिखाई पड़ता है। सामरतन भर्मन के हाथोपायल पहलेमा प्रापके पुत्र के देखतेहुषे मुदसे भागी॥ कितनेही भाई पिता और समान अवस्था बालों को भी छोडकरभागे कोई मृतक घोडेवाले और कोईमृतक सारपीवाले २५ दिखाई पड़े हे रामा कितने ही रख ढे शादएड युग और पाकवाले हुये । ४. और दूसरों के सायकों ने मताने पायो पसरे वाणोंसे पाहायानहुये कितनही विना घायलढुये ही पपसे पीड़ित होकर भागे । ५ । और मिनके बहुत भाई बन्धुमारेगये ऐसे बहुत से मनुष्य पुत्र भाई आदि को लेकरमागे कोई पिताको कोई साथी बान्धव नातेदार और भाइयों को पुकारे और हे राजा कितनेही जहा तहाँ सामान को छोड़कर भाग फिर यहां बहुतसे महारथी कठिन घायल और अचेतहोकर अर्जुन के वाणोंसे पापल भार CHAPTER XVI Banjaya bard, With arrows discharged from the Gaudir bow ho made tlie resolutions of the unflinching warrior8 futile Discharg ing vujra lile arriws which were unbearable and bright, he looked liko a cloud sending forth roin. Wounded by his arrows, the warrios fled in tho presence of your son. Many filed away leaving their fathers brothers, and fr ends. Bome lost their horses and others lost thoir duivers and had the parts of their can broken, Otherd woro deprived of aridws and sere thensolves founded, tpbilo some fied in terris without receiving rounds Those whore winstpen were plain, iled alty with the rest of their relations , Sotra called Tor ti air fathers, utleis tlor commpions hud kunstnen Some flad 5 FA “शल्या Shilya Pary (6959), मन्त स्म इश्पन्ते पार्थयाणाहता नराः ॥ ८ ॥ वानन्ये रथमारोप्य धषास्याथ मुहर्स कम् । विधाताच वितृष्णाय पुर्नयुद्धाय जन्मिरे ।। ९ ॥ सानपास्य गता केचित् पुन युयु सधः । कुर्वन्ततिय पुत्र शासन युददुर्भदाः ॥ १० ॥ पानीपमपरे पीत्वा परयोदवास्य च हिनम् । धर्माणि समारोप्य फेधित भरतसत्तम । १९ ॥समा वास्यापो भ्रातृन निक्षिप्य शिधिोऽपि च । पुनानन्ये पितृनन्ये पुगयुरारोचयन | मयित्वा रथान् वैचित यथामुख्यं विशाम्पते । आप्लुस्य पाण्डधानी पुग युद्धारोंच यन् ॥ १३॥ शराकिीडम्पी जाल. समाच्छन्ना बासिरे। त्रैलोक्यधि जय युवा तथा देतेपदानवा १४ ॥ यागम्य सहसा केचिद्रः स्वर्णविभूषितः । पाण्डवानागनी के धृष्टद्युम्नमशेषयन् ॥ १५ ॥धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः शिखण्डी श्राम लो दिवाई पड़े ! बहुतः उनको रथपर सवार करके एक मुहू विशीत कराके धकाध्यो, रहिन अच्छेप्रकार, तृप्तकरके फिर युद्ध के निमित भेजे गये कितने युद्धाभिलाषी लोग उन को छोड़कर आप के पुत्रकी आज्ञा को मानकर फिर युद्धमै गये ३.१० बहुतो युद्धदुर्भद जलको पाकर सारीको आराम देवर भोर कितनेहा कंवचीको बदलकर पट गये । । । हे भरतर्षभ कितनेही अपने भाइयों को डेरेमें छोड़ विश्वासदेकर चळदिये किसीने पुत्रोंको किसी के पिनाओंको टरेमें छोड़कर युद्धको स्वीकारकिया ।१।और कितनेही शूरवीरों ने त्रयोंको अनारके पांडवीपसना में प्रवेशकरके फिर युद्धको स्वीकार कियाँ ३, १॥ वह 'शूर क्षुद्रपारकाओंके जालोरो युक्त ऐस शोभायमान हप जैसे कि तीनों छोकों की विषय में प्रवृत्त दैत्य और दानव होते हैं । १४ । कितने ही शुरवीरीने सुवर्ण से अलंकृत रयोंको सवारी से पाण्डवोंकी सेनामें आकर धृष्टद्युम्न से युद्ध । २दा पाँचीलदेशी Jएम्ने पहारथी शिखण्डी और नकूल के पुत्र शती avay,leaving their goods. Many warrions, younded And insdisable, 'were seen gaopinig with the Wourids of Atjun's niows in some it ere. lifted 'on cars and again sent to fight after a few momer's of respite. Some, desrous of fighting left them sad sent to battle by the vider of your bón.. Soine went to fight after drinking water, giving rest to their beasts and changing tbeir ai moters. Sum- left their brothers in their tents and went to battle after consoling than. Şime loft 'thon lods aou'fathers in the tents and went to fight some prepared their čirt and entered the Panday'army for the sale of fighting.i Those bave varios, with small bells, looher glorjous like Dartyrs 'ånd Davas desirous of vk tury over the three ruild. Some ffariiit's, 'wonrted or gold dechid curs, entered the Panday aad fuqight irth Diuislıtadyumu 15 Dhrisli tadyumn of Panchal army (6090) Malabharat च महारथः । नाकुलिधं शतानीका स्थानीकममोधयन् ॥ १६ ॥ पाञ्चाल्यस्तु तत' क्रुद्धः सम्येन महता वृत । अभ्यधावत् सुसंरग्धास्तावका मुद्यता १७ ॥ तत स्थापनमस्तस्य तष पुत्रो जमाधिप । वाणसंघानने कान वै प्रेषयामास भारत ॥ १८ ॥ धृष्टद्युम्नस्ततो राजस्तष पुत्रेण धन्धिना । नारामिः शिनं पाहोहासि चार्षितः ॥ १९ ॥ सोऽतिविद्धो महापासस्तोत्रादित व द्विपः । स्तुरो वा प्रेषया मास मुरयो । सारथेचास्य भरलेन शिरः कापावणारत् ॥ २० ॥ ततो ध्योधनो राजा पृष्ठमारा वाजिनः । अपाक्रामवतरधो नातिदूरमरियम ॥ श्या तुत 'विकान्त स्यमनीक महावल. तत्र पुत्रो महाराज प्रययौ पत्र सौवला. २२ ॥ तो रथेषुभग्मेषु निसाहस्सा महाद्विपा. पाण्याप्रथिनः पयसमन्तात् पप्पंवारयन ॥ २३॥ घृता समरे पञ्च गजानीकन मारत अशोमम्तमरत्व प्रहाच्याला घन नोकने रथकी सेनासे युद्धकिया । १६ । इसके पीछे कोपयुक्त औखड़ी सेनासे युक्त मारनेको सन्न प्रद्युम्न मापकेपुत्रों के सम्मुखगया । १७ । फिर उस धृष्णनके आनेपर आपकेपुत्र राजा दुर्योधनने वाों के बहुत से समूहोंको चलाया कि इसके अनन्तर आपके धनुषधारी पुत्र से घायलहुये धृष्टयुम्न ने शीघका गरके हाथो मांजेहुये नाराच अर्द्धनाराच और वत्सदन्य नाप बाणों से दोनों मुजा और छातीपर घायल किया .१९। चाकते. पीड़ित हाय के समान शत्यन्वं न पल उसबड़े धनुषधारीने वाणों से उसके चारोघड़ोंको मारगला और उसके साथी के शिरको भी भल्लकद्वारा धड़ेसे अलग किया । २० । फिर विनयी राजा दुर्योधन रथ दृढ़नेसे घोडेकीही पाठपर चढ़कर थोड़ीहीवूर गया । ३१.... महाराज फिर भापका वडा बलवान पुत्र सेनाको पराक्रमसे हीनदेखकर वहांगणा जहाँपरकि शकुनीया । २२ । तदनन्तर रथोंके सूटनेपर तानहमार पड़े हाथियोंने पांचों महारथी पांवों को चारोंभोर से घेरलिपा। २१ *valiant 8 sikloodi and Nakul's son Shulaoik opposed the car warriors, Etaged Dhuishtadyumn, desirous of slaying and nocompanied by a largu arwy, opposed your SUDA, Yvar son Duryodhan discharged many arrows at Dhrishtadyumn Wounded by your valiant son, Dhirislıtadyumn wounded him in return on the arms and breast, with well cleaned atcov, Like a waunded clephnat, that great warrior Blow his four hure09 and babead d the driver, 20 Princo Duryodhan cho conquerer of fues, being dopri cd cf bir tat, rutiented on bosse Then your valant son, seeing the army lose heart, went to At cho breakın, dorn of cara thiroo thousand clephants Qurmounded the livo maruinry on all aida' Surrounded by the army of eleplianes, the fire buroo: lvolei gloriuos liko stnk surtounded by clouds. Then the good marhaman, Arun, whuis winte horso vero back. Snakuni -- शल्यपEShalya Parv (60913 Re१४॥ तानो महाराज लम्धलशा महाभुज । विनियो रणेनैव श्वेताश्त कृष्णसागपः ॥ १५ ॥ ते समन्तात् परिश्ता कुरः पर्वतापमी । मारांची मालस्ती गंबानीकमपोषपत | कवाणनिस्तामपश्याम महागडात् । पतिताम् पात्य भानाम निभित्र सम्पमाधिमा ॥२७॥ मीमसेनस्तु सान या नागामसगजोपम. करेण व महती गदाम वशाली । अयाप्लुस्य रथातूर्ण दरपाणिरियातकः ॥२८॥ तमतगद रष्ट्या पागा महाग्यम्। यिंत्रमुस्तायका सम्पा शकपुत्र प्रमुमुक्षु । भाविजन प स गदाले पृकोदो ॥ २९ ॥ गदया भीमसमन मिन्नकुम्मात्रज स्खलाम् धापमानापयाम कुजपन् पर्वतोपमान ॥ ३० ॥ प्रधाय्य कुम्जगस्ते तु भीमसेनगवाहता। तुगत करवा छिन्नपक्षाचादयः ॥ ३१ ॥ मान मिनकुम्मान मुबार प्रयमाणानितस्ततः। परमानांस्तु सप्रय वित्रषुस्तष सीनकाः ॥ ३२ ॥ युधि भरतवंशी युद्ध में हाथियों की सनासे घिरहुये यह पांचों नरोधम ऐसे शोभापमान हुमे मे कि बादलों से घिरेहुये ग्रहहोते हैं । २४ । इसके पछि प्रेत घोड़े और श्रीकृष्णको सारथी रखनेवाला लक्ष्यभेदी महावाहु अर्जुनस्थ की मारी मे बाहर निकला । २५ । चारॉऔर पताकार हाथियों में घिरे उस अजुनले निमंड और तीक्ष्ण नाराषों से हाथियों की मनाका नाशकिया । । हीपर हमने अर्जुन के.एकहां पाणमें बड़े हाथियों को घायल मृतक और गिरता आदखा । २७ । फिर मतवाले, हाथीके समान पराक्रमी भीमगेन उन हाय को देखक गदाको हाथपलिये हाथियों के सम्मुख गपा इसके पछि दण्ड हाथ में रखनेवाले कालो समान शोघरयस कूदकर गदा उठानेवाले, उसंपांडवों के महापाको देखकर आपको सेनाके लोग भयभीत हुये और विष्टापुत्र को भी नगराया भीमसेन के गदा हाय में लेने से सब सेना व्याकुल हुइ । २९ । हमने भीमसन को गदा से उन पताकार मदझाईनमाले हायरों को टूटकम और दाताहुआ देखा। ३० ।फर भीममनकी गदा से घायल पाहायों भागे और टूटेपक्षाले पर्वतोंके समान शब्द करते पृथ्वीपर गिापड़े 11 आपको सेनाकेलोग उनटूटे कुम पर उधर से भागो और गिरते हुये बहुत से हाथियों को देखकर भय ariven by Buri Krishn, came out in his car and destroyed the bage elephants with his sharp urrows. Then we saty huge elephanta Founded, dead and fallen with single armowa of Arjun Then Bhim. sen fall of prowess like a mad elephant, seeing those elephants, opposed them with his mace Seeing the Pandar bear ng his mace like the staff of Yam, your warriors were much terrified. All the Army ** distregsod when Blim took op Wunded by Bluni's maca, the clopbants filed and fell down screaming / ke winged mountains. 31. Yoor warriors vere terrified to see those elephants Founded and falling down. Enraged Yadhishthir, Nahul and his race.
STAR - (63921 Mahabharat ठिरोपि समृद्धो माद्रीपुत्री ध पाण्डयौ । गार्म पुत्र शितर्वाणधनुर्धे गजयोधिनः ॥ ३३ ॥घटद्यम्नस्तु सार पराजित्य नराधिपम, । अपफ्रान्ते तप मुँते दयपष्ठ समा निने । हा च पाण्डमान् सर्वान् फुरजरे परिवारितान् ॥ ४ा घृणाम्ना महा गज सह सर्वे. प्रभद्रकै । पुत्र पाञ्चालराजस्य जिघातु कु-जगन् प्रयो। ३५ ॥ अष्ट्वा तु रधानीके दुर्योधनमरिन्दमम ।। अश्वत्थामा कृपय, अतरमा च सात्वत । अच्छन् शशियास्तन क्व नु दुर्योधनोगतः। ३६॥ अश्यागना राजान वर्तमाने जनक्षय । मन्वाना निहत तम तघ पुणे महारथा । विषणवदना भत्या सरप पृच्छन्त त सुतम् ॥३२. आई केचिद्धते मते प्रयातो पत्र सौवलं ॥३८ अपर मधुर नत्र क्षत्रिया भुगतता । दुग्योधनेन वि कार्य द्रव्यध्ध यदि जीवति । युध्यध्व सहिता सर्वे कि यो गजा फरिष्यति ॥ ३१॥ ते क्षत्रिया क्षतर्गानभूयिष्ठपान्धा। शी सपडियमानाथ नातिव्यक्तमिवावुरन् । म सर्वे पल हम्मी पनामबार भीतहुये । ३२ । क्रोध क्त युधिप्ठेिर और पांडव नकुल सहदेव भी गृपक्ष से। जटिन तीक्ष्ण बाणों से रोगको यमलोकमें पहुंचाया । ३३ धृपयुम्य पुदी जिी को पराजय करके और अकी सवारी से भाप पुके हरजाने पर पाहवों को हाथियों से घिराशा देखकर 'सबभटको समेत हाथियों के मारने का अभिलापहिोकर पलदिगा। १० । और शनु विजयी दुर्योधन को रथोकी सेना में न दखकर उन भवत्यामा, कंपाचार्य 'और'यादव कृतवमान क्षत्रियों से पूछा कि दुर्योधन कहोगया। 1 । अर्थात मनुष्यों का नाश वर्तमान नेपर आपके पुत्र महारयी राजाको न देखते और मृतकहूंगी मानते उनकारों ने मुर, को रूपातर करके गवसे आपके पत्रको पूछा जाकितनेही लोगान तो यह कहा कि मारथीके मरनेपर वह वहां गया है जहाँपर 'कि राजा फुना है तब अत्यन्त पोपल दूमरे 'क्षत्रीवाले कि दुर्योधन से आपको क्या काम है 'खानी जीवा है सब मिलकर युद्धवरो राजा तुम्हारा क्याकरेगा ।।। जिनकी बहुतसी सका रियां मारीगई वहसत्री घायल अंग वाणोंसे पीडित बड़े धीरपनेसे महगोले । ४० ॥ Supadev, too, sles the wirisors #th their Arioits Gtlud with vulture fenttiers, Hans vanquithed tho lung; ilim) Rennfellbo horsel nch, 'Dhrislıé udyumn saw tho Pandivas surrounded by elepliants and sent on Path the Pat'ınlrahs to'sias kela" 5 Not kaving Dursnuhan the dextroyer of tuos" in the midst of us ring Asli wnthinish hrpucharys nd Kritvarmı usled them of hy whereabouts They Hont that is ROI ona che ad And with altered Apparilanco ashii 1 hoy sere told Lint lie Isail Lớno to Sluhani Otheta muels soumia sax? " Want hovej bu to do wilia Dursndhan who is Hiding You ninet fight in_ollier, ulint hirvu sou to do with tlle koly?" Ito klizi ya much so inded and deprised of their basit, en moitly,' Ist us slay the apiny will which heart surroanedd -- slott hat - TAGlinlya Pary 1109231) वागिताः । एते सबै गजान हत्या उपायान्ति स्म गण्डयाः १.४१, भूत्वा, तु. पचन तेषामश्वत्थामा महाबलः । मित्त्वा पाउचालराजस्य, सदर्नाक दुरुसहम ॥ काय कधर्माच प्रययुयंत्र सावलः रियानी के परित्यज्य शूरा मुदधन्विनः ।। ४३ ॥ तत तेषु प्रयानेपुधाम्नपुरस्मता आरयुः पाण्डया। राजन् चिनिनन्तः स्म नायकानं ४५ ॥रा तु तानापततः सरहान महारयान् । पराकान्तास्नया वीसविशि जीवित तदा विवर्णमुसपिठमभवत्तावक बलम् ॥ ५५ परितोणवलान् दृष्ट्या तानई परिवारितान् । राजन वदेन द्वयाने त्यक्त्या जीवितमात्मनः । अस्मना पञ्चमोऽयुध्य पाञ्चालस्थ चलन छ । तस्मिन् देशे व्यवस्थाप्य यत्र गारद्वत: स्थित ४७॥ संप्रयुवा वयं पथ फिीटिशरपीडिताः । धृष्टद्युम्न सानिकि तंत्र नाभूपा महान् । जितानेन पयं स ध्यपयाम रणाततः ॥ ४८ ॥ अथाषस्य सारयार्क तमुपा कि हम इस सब सेनोको पारें जिससे कि चारोंभोरेको घिरेहुये हैं यह.सब पांडव हाथियों को मारकर सम्मुखमाये.. । ४१। फिर उन्हों.के बचनको सुनकर बड़े पराक्रमी अश्वत्थामा कपानार्य कृतवर्मा:यह तीनो कठिनता से सम्मुखना के योग्य राजा पांचाल की सेनाको चीरकर वहांगये जहाँपर कि. शकुनी. था. अर्थात यई दद-धनुपधारी शूर पोंकी सेनाको त्याग करके वहांगये हे राजा इनके चले जानेपर-धृष्टद्युम्न को भावी रखनेवाले पांडव..आपके शूरवीरों को मारते हुये वहां आपहुंचे । ४४...तब उन अत्यन्त प्रसन्न आतेहुये महारथियों को देख कर और उसप्रकार पराक्रम करनेवाले चारोंको, जानकर आपकी सेना जीवन से निराश होकर अत्यन्त विवर्णमुखवाली होगई। ४५...हे राना, में उन नाश बान सेनामों को और चारों ओर से घिरेहुओं को देखकर अपने जीवन को त्यागकरके दो.अग रखनेवाली सेनासमेतः। ४६ : उसस्थानपर गया जहापरक कृपाचाय बत्तमानये वहाँ नियतहोकर अपने शरीरसे पांचवें राजा पांचालकी सेना.से युद्ध करनेलगा.1:४७, अर्जुनके बाणों से पीडामान हमपांचों बडितह में वहाँ धृष्टद्युम्न से हमारा महारौद्र और घोरयुद्धहुआ हम सब उससे पराजय होकर The Pandavas having slaid "eleplidils 'atu"Borhing towards “rs, 47. Kripacharya Ashwathamila and 'K Fitvamma'rishta 'tStugli lke drity of Panchal Went to the planet fyheite's-sákudi WasAt' tkbir Neptfitte, the Pandaváš led by. Dlirikladyimme ho un baying your Waridi uscalug-0.dbe powerful War iura 'cboing toiveirds'théineta Gry; your Warriors frith all téred applărancébecano Ropeless of Info. 1.16 nrni Ticatne dihopil-ss offlife and "afighting with the Prince dded ivith the farioivator Atjun... Therë we fought'a iliendſul fight with Dhrisltadyump, and were dafeated by-him. 48. - Then I SAN.Satyaki coming towardsush ." .
-- (6924) Maliabharat (६९९४) यानं महाधम । रचतु. शतधारो मानायवदाइवे ॥ ४९. ॥ धृष्टद्युम्नाई मुक्त कथञ्चिच्छातिमाहनात् । गतितो माधवानीकं दुपतीतरफ यथा (तत्र युद्ध माघार मुहमतिदारुणम् ॥ ५॥ ॥ सात्यपिस्तु महाबाहुर्मम हत्वा परिच्छेदम । विवाहमगृहनामा मछिन पतितं भुवि ॥५१॥ ततो मुहादिव तवजानीकर्मयत । गदशा भीमसेनन नारावार्जुनेन च ॥५२॥ प्रतिक्ष्दैि महानाग समन्तात् पर्वतोपमे । नातिप्रसिदेव मति पाण्डवानामाया ॥५३ ॥ रयमार्गासातधके भीमसेनो महा पल पाना महाराज पाकर्षन् महागजान् ॥ ५५ ॥ अवस्थामा कोष कृतवर्मा व साया। अपश्यन्नो स्थानीफ दुर्योधनमरिन्दमम । राजानं मायामा यहाँसे हट माये । ४८ . इसके पाछे मैंने 'सम्युम्व आनेवाले सात्पकि को देखा वहीर पारसौ रथयों समेत मेरे सम्मुख दांडा । ४९ । और मैं कुछ यकी सवारी वाले शुम्न से छूटा और कृतवमांकी सेनाकी और ऐसे दौड़ा जैसे पापी नरक को जाता है वहांपर एकमुहतं तक घोरयुद्धहुआ। ५० फरमहागा साल्पकिने मेरे घोड़े भादिको मारकर मुझ भवेत और पृथीपर गिरेहुये को जीना पकड़ किया । ५१ । इसके एक मुहूर्तमेंही भीमसेन की गदा और अर्जुन के नाराचोंसे वह हाधियों की सेना नाशवान हुई । ५२ । चारोंओरसे पर्वतोंके समान चूर्णशरीर वाळे वडे हाथियों से पांडवों का मार्ग प्रविदितसा होगया। ५३ हेमाराज इसके पछि हाथियों को हटाते व पराक्रमी भीममेनने पांडवों के रथमार्गको साफ किया। ५४ । अमस्यामा, कृपाचार्य यादव कृतवर्मा' रपकी सेनामें उम शत्रु विजयी दुर्योधनको न देखनेवाले इनमक लोगोंने आपके पुर्व महारथी रामा दुर्योधनको निर्णय भार खोजकिया। ५५ । और पृष्टपुम्न को गेडकर वहांगये He ruslól nyainst me with four hundrod warriors and I loft Dhrishta dyumu whose bensts wore tired, I ran towards the arıny of Kritrarima like a stniul man falling into liull. There a truatul battin was fought for some time 50 Then Satyahi slew my horse Illl down konsless on the ground and he buized my alivo Then the warriors of our army wero destroyed by the arrows of Ajrun and by Bhim's nace The patla of the Pandavas was obstructed by the bodies of oloplants Then Bhim dragged asido tiro olephants and cleared the way for the cars of the Pandavas, Ashwathams, Krip. acharya and Krityarma tra Yadav, not scoing Daryolhan in tho midut of the warriors, tan on ja searall of luo Thoy lolt Dlinults' dyuran and went to the place miere Shaluar mas Thor wore much 110794 Sulya Pary (160951 सुस्तष पुत्र महायम ५५॥ परित्यज्य च पाचाला प्रयाता पत्र बलः । राजा पशनसम्शिाना माने जमाये ॥ ५ ॥ इति वास्यपर्व या शस्यवधपर्वणि संकुलपदे पञ्चविंशोध्यायः १५ orrent वजय उवाच गजानी र तस्मिन पाण्डपुत्रेण भारत । अयमाने लेख भीमसेनेन,संयुगे॥१॥ वरन्ताव तथा रा भीमसेनमरियमम्। दाहसं यथा करमात प्राणहारिणम् ॥ २॥ सत्य समरें: राजन् हनशेषाः सुतास्तव परश्य माने कोरणे पुत्र पुरधाधने तक लोदरा सहिता भूत्वा , भीमसेनमुपाया ..." धर्मर्षका भतारतमा भरिषलो रषिः जात्सेना, सुमातच तथा दुर्विष हो रिहा are दुर्विमोचननामा बधस्तथैव च। श्रुतौ च महाबाहुः सर्व युद्धविशारदा नही पर कि शकुनी था यहसा मनुष्यों का नाशहोंने पर, और रामाको न देखने से ग्याकुल हुये ॥५६। है अध्याय २३॥ संनय बोले कि पाण्डव अर्जुन के रायसे उस स्थकी सनाके पारने और युर. में भीमसेन के हायसे सेनाके नाशहोनेपर । । । और फ्रोपयुक्त प्राणों के रनेवाले पंडारी कालके समान घूमते पाविमपी भीमसेनको देखकर । २ । भरनेसे शेष वचेहुये भापके पुत्र युद्ध में , इकट्ठे होकर अपने बड़ेभाई कौरव दुयोधन के दिखाई न देनेपर सर सगाई इकट्ठे होकर भीमसेन के सम्मुख गये । ३. दुर्म: पण, श्रुतान्त, जपत्र, भरिवल, रवि जयरसेन, मुनात. मात्रुहन्ना - दुर्वेश, दुर्वि, distrosed to sou tloir army destroyed and at not finding ibu king there."56. - CHAI'TER XXXVI Sonjaya orid, " At the dootruction of the car warriors by Ar. jun and Bhim and at the sight of Bhim maming with his triaco liko the stalf of Yaww, your retriting sone, coming together and not acing Duryodban among thom, opposed Bhim in a buly, Durmainan Bhrutant, Jayatri, Bhuribai, Hari, Inyatsen, Sujat, Durresh the destruger of fixes, Durrimiclish, Duelquradharsh and braro Shrutarın.
- ६५16), Malalimat (३९९ ॥५॥ इत्ये,सहिता भत्या तर पुरा समन्ततः । भीमसेनमाम य रुरुधु. सवतो दिशम् । ६॥ ततो भी यो महाराज स्थरथ पनरास्थिन । मुमोच निशितान् घाणा पुत्राणा तय मर्मम् ॥ ७ ॥ ते कार्यमाणा भरपुत्रालय महारणे । भीमसेनम पाकर्षन प्रघादिर कुरम् ॥ ॥८॥ नत प्रदो रण म शिरे दुर्मर्षणस्य ह । भुरप्रेण प्रम ४शशु पानयामास भाले । ततोऽरेण मल्लेने सर्वावरणमेदिनी । सुता तसंवधीन्द्री मस्तव पुत्र महारयम् १० ॥ जयतेन तनो विद्या नाराचन हसनिय । पातयामास फारस्य रधोपस्थादरिन्दम । स पपात रयाद्राजर ममौ नूर्ण ममार च ॥ ११॥ श्रुती ततो भीम कुरो निन्याध ते सुत । शतेन गृध्रशानां शराणां नतपणाम् ॥ १२॥ तत. मोरणे भीमो न भरिषक रथिम् । श्रीननास्त्रिभिराने दिग्निप्रतिम. शर ॥ १३ ते सायात ममा सन्दने यो महारया । बसने परायला निवाइय मोचन, दुप्पंधर्ष महाबाहु · श्रुता युद्ध में कुशल इन' सब आपके पुत्रों ने साथ कर चारों ओरस भीमसेनके सम्मुख जोकर सब दिशाओं से रोका । महाराज तब तो भीमॉन फिर अपने स्थपर सवारहुये और आपके पुत्रों के मर्म स्थलोपर तेजधारवा वाणोंको मारा । ७ वडेयद में भीममेनके हथिसे घायल सन पापके पुत्रोंने भीममेनको ऐमे घेरलिया जैसे कि मिस्थान से हामी को घरलेते हैं ८। तदनन्तर कोपयुक्त भीममेन ने दुर्मर्पण के शिर को तुरम से काटकर शीघ्री पृथ्वीपर गिराया फिर भीमसेन ने सब कवनों के काटनेवाले दूसरे भलसे भापके पुत्र महारथी श्रुतान्तकोमाग । १० । फिर इसतेहुपे शत्रु विजमीने जयसेनको नाराच से पायल करके उस कौरवको भी रथके स्थान गिराया हे राजा यह शीग्रही रयंसे गिरतेही मरगा । ११ । इसकेपीछे आपके पुत्र क्रोधयुक्त श्रुत ने भूपक्षसे जटित टेटे पर्ववाले सौवाणों से 'भीमसेन को घायल किया। १२ । इसके पछि युद्ध में क्रोधपुक्त भीमभेन ने विप निके समान तीनवाणों से जपत्र भूरिसल मार रवि इन तीनोंको घायल किपा १३३ वह मुबा Call these, clover in fighting, checked Bhiun from the sides. G- 'Then | Bhim again mounted liis car and hit your sons on the vital pastea Wounded by Bhu's arrow your song 8 irr sunded hun likc an cippliant Then Blum cut Durmaralian's hard with a sharp arrow, and willa another armour piscinz dart, lig slow Sirutant That dan! troyer of los, with a smily, wounds ! Sayats u with an arrow and.' mado hun {n}l down from his car. Jy snon loll dowa dond freni ling Than y wrapn Slirutissa, much corazod, wounded Blits with a bundnd thirp errors, Enraged Bhim soundof Jnyatom Bhumsal, and Mavi with t've arrows liko įgiaan er liri, hul wey feldono fross thur enim liko Llooning honobak trees riedl yn' Thru [3]susn the Joy or offte, nous, I and slay israel 1 10 CHE शल्यार्षShniya Parv ( 6997) किंगुका १५ सपोणतन्मने भाराचेन पानपा दुविमोचनमाहस्प प्रषयामाम मुस्पये ॥ १५ ॥ महत प्रापतमा स्वरयादधिनाम्पर । गिरेस्तु फटको भग्ना माफ तेनेव पादप ॥ १६ ॥ दुषततत्र पुनाव मुती त । एक स्पषधीत् सस्ये मायां प्राभ्याञ्चसमुख तो शिलीमुखपियानो पतन रथसत्तमा । १७॥ वा पतन्न मपरममिवीस्प मुनतधामग्लेन प्रतिविम्याध मी दुर्विषहरण सपपात हतो पाहात पश्यतो सर्वधग्विनाम ॥ १८॥रटया तु निहतान मानन् पहनेन संयुग । अमषध रामापत्र भुपा भीममस्यात् ।। १९ । विक्षिपन ममहच्याप कासस्वाधिषितम् । पिसजन साधि विशनि प्रतिमान् यहून । २० ॥सतु राजन् धनुरिछत्या पास महामृधे । मन छिन्नयन्धान विंशत्या समधारित ॥ २१ ॥ ततोऽ सम् रादाय भीमसेनो महारय अयाकिरता मुन तिष्ठ तिष्ठति पारधीत् ॥ २२ ॥ महदा महारथी रयोंमे ऐसे गिरपडे जैसे कि वसन्त भूतु में कटहुये पाप्पत किशुक क क्ष गिरते हैं। १४ । इसके पीछे शत्रुमंतापी भीमसेन ने दूसरे भल्लनाम नारांच से दुर्विमोचन को घायल करके मृत्युके वशकिया । १५ । वह महारधी मृतक होक। रवसे ऐसे गिरपरा जैन कि पर्वतपर उत्पन्न होनेवाला वायु से टूटाहुआ रक्ष गिरता है ।२६। इसके पीछे सेनाके मुखपर दुष्पपर्ष और धनावनाम आपके पुत्रोंको बुद्धमें दोर वाणसे मारा वह उत्तमरथी शिलीमुख वाण से घायल शरीर होकर पधीपर गिरपड़े । १७ । इसके पीछे भीमसेन ने युददाम में गिरते हुये भापके पुत्रको देखकर दुर्विमाको भी भल्लसे पद्धगिराया चा मराहमा सब धनुष धारियों के देखो रथसे गिरपडा । १८ । युद्धमें एक के हाथमे मरेडपे बहुत माइपों को देखकर क्रोचमें भराहमा श्रुत; भीपमेनके सम्मुख गया। १९ । मुवासे बलकृत बड़े धनुषको कारता विष अग्निके समान बहुत वाणों को छोड़ता हआ गया । २० बोराना इसने उस बडे युद्ध में भीमभेन के धनु को काटकर इमटूटे अनुपवाले को वास वाण घ पल किया ।११। इसके पीछे महारथी भीमसेनने दूसरे धनुमको लेकर भापके पुषको घायल करके विष्ठसचन कहा । २२ । उन दोनों mochan with another dart, 15 Thst warrior fell down dead from his car like a trec struck down by the wind from a bill Then be slets your sons Dashpradharsh and Sujat and those good warriors fell dota wooaded on earth 8xing them fall down, Bhim slev Durvishah, who fell down from his cst in the presence of archers Seeing many brothers blarn by one, Shrutarva opposed Bhim in a rege Twanging his huge bow and discharging numerous arrows Thke poison or fim he went beloro him. 20 He cut Bhim's bow and wounded bin with twentę arrong. Valiant Bhim trok apan the low and wounded your son with a cry of sthy, atay: Tre bottle between them was like that of Jambh and 10 }rs There they covered tbe 3} - ५- ( 6998) Mahabhaint (६९९८) सीतप युद्ध चित्ररूप भयानकन । राशि समर पूर्व जामवामवय र्षिभो । २३.", तयौता शरैर्मुक्तर्यमदण्डनिभै शितैः ।, सणाच्छन्ना धग सर्वा खञ्च सर्या दिश स्तथा, ॥ २४ ॥ ततः शुन मद्धो,धनुरादाय स यकैः । भामसन रग राजन् पाहतो, रुसि चार्पयत् ॥ २५॥ सौतिषिद्धोमहागज तव पुत्रेण धन्विना | भीमः संवृक्षों क्षुब्धः पर्वणीव महोदधिः ॥२६ ॥ ततो भीमो रुपाविष्टः पुत्रस्य तब मारिए। सारथि चतुरश्चाश्वान् यार्णनिभ्ये यमक्षयम् । २७ । निरय तं समालक्ष्य शिशिखैलामवाहिमि: अयाकिग्दमेयामा दशयन पाणिलाघवम् ।। २८ । अनी विरो राजभाददे खडगवां मणो । अथ भ्याददा खड्ग शतचन्द्रश्च मरनुमत । क्षुरप्रेण शिर. कापात. पानया- मास पाण्डः ॥ २९॥ छिगोचमागस्य ततः क्षुग्ण महात्मन सपात कायः स रथा समनुनादयन । ३ । तस्मिन् । निपानेते पोरे तावका-मयमोहिता। मशद्रवन्त का महा अपूर्व और भंगकारी युद्ध ऐमा शोभायमान हुआ जैसा कि पूर्वसमय जभ और इन्द्रका युद्ध शोभित हुआ था।२३ । वहां उन दोनों के यमराज के दंण्डके समान तेजवाणों से सब पृथी आकाश और दिशा विदिशा ढेक गई । २४. हे रोना इसके पीछे प्रत्यन क्रोधयुक्त श्रुतर्वाने धनुपको लेकर युद्धमें शांगको समीमतेनको दोनों भुजाओं समेत छातीपर घायन किया। २५ । हे महा राज आपके धनुपधारी पुत्र हायमे अत्यन्त घायल होकर क्रोधयुक्त यह भीमसेन ऐमे वेगमें प्राप्त होगया जैसे कि पर्वकाल में समुद्रं वेगवान् ' होजाता है । देश हे श्रेष्ठ इसके पछि क्रोधसे पूर्ण भीमसेन ने वाणों से श्राप पुत्रके 'सारथी और चारोघोडों को यमलोक में पहुँचाया । १७ । 'हस्तलाधव को दिखाते हुये बड़े साहसी भीमनन उसको विग्येदेखकर विशिखों से ढकदिया।२८ाहेराजारथसे रहित श्रुत ने खड्ग और दालकोलियां फिर खड्ग और सौ चन्द्रमागरखनेवाली प्रका | शित ढालके धारण करनेवाले इस 'श्रुतके शिरको भी "भीमसेनने धुरमकेद्वारा शीरसे जुदाकरादिया । २९ । तव उसका शरीरभी पृथ्वी को शन्दीयमान करता रंथसे गिरपड़ा । ३० । उसवीरके गिरनेपर भगसे अचेत युद्ध के भभिलापी: आप and directions with their darts like the staff of Yam, Thea Siratarvy mush enraged wounded Bhim on both arms and bheasr. 25. Exc •ed ingly wounded by your son; Bhim became furious 'like the sua at full woon. 'They sle.s your son's horses and driver and covered him with his sharp arrows Deprived of car, Bhutarva took slield and sword, but Bhim cut his head also vith an arrrw and it fall down on earth with a crash. 30. At the fall of that warrior, your soldiers insonsible with fear and désirous of fighting, faced Blum. llecheckal the army, advancing like the ocean and Armed with urinrand'armouc ard they surrounded iiim on all siles. 'Thon Blu, burrounded by thou, wounded thow with His sharp arrow's tis Indratluca'nsurs. Thon . - G009 Taggå Ghalya Part - संग्रामे भीमसेन युयुत्सवः ॥ ३१ ॥ नानापतत एवार तशेषालार्णवात : दारात प्रतिजग्राह भीमसेन प्रतापवान् । ते तु तं च समासाद्य परिवः समन्ततः ॥ ३२ ॥ ततस्तु संवतो भीमलायकनिशितै शर: पीडयामास तान' सर्वान् महस्रांश इनाम रान् ॥ ३३ ॥ ततः पञ्च शतान् हत्या सरकथान् महारथान | नयान कुजराना पुनः सप्तशतं युधि ॥ ३४ ॥ हत्वा दशसहस्राणि पत्तीनां परमेषुभिः पाजिनाच शतान्या पाण्डधः स विराजते ॥ ३५ ॥ भीमसेनस्तु कौन्तेयो हत्वा युरे मुंतांस्तव ! मेने कतार्थमात्मानं सफलं जन्म च भो ॥ ३६ ॥ ते तथा युध्यमान ध विनिमन्तचं ताबकान् । क्षितु नोरसहन्त स तव सैन्यानि मारिप ॥ ३७ । विद्राव्य नु, कुरुन् सास्तव त्या पदानुगा । दोश्यों शब्दं ततश्च के श्रामथानो महाद्विपान् ॥ ३८ ॥ दतभूयिष्ठयोधातुतव सेना विशाम्पते । फिचिपा महाराज रुपमा सम्पर्य ॥३९॥ इति शल्यपर्वणि शल्पवधपर्वणि दुर्मर्पणादिवघे पहविंशोध्याय, २६ ॥ के शूरवीर लोग युद्धमें भीमसेनके सम्मुखगये । पर मरने शेपवचीहुई समुद्र के समान शीघं आनेवाली सेनाकैकवर्चस्रधारी शूरवीरों को प्रतापवान भीममेन ने शीघही रोका उन्होंने भी उसको पाकर 'चारों ओरमे घेर लिया । १२ । इसके पाघिरेय भीमसेनने आप उन सबारवीरों को ताक्षणधारवाले बाणों से हेमे पाड़ामान किया जसे कि असुरोंको इन्द्र पाडावान करता है । ३३ । इसके पीछे युद्ध पाचसी कवचधारी महारथियों को मारकर 'फिर सतिसो हाथियों की सेना को मारा, ३४॥ यद भेष्ठ,भीमसेन वाणांसे दशहजार पत्तियों"और पाठसौ पोडों को मारकर शोभायपान हा । ३६ । है प्रभु कुन्ती के पत्र भीमसेनने मापके पुत्रों को मारकर अपने को अभीष्ट माप्तकरनेवाला और सफलजन्मवाला माना। ३६ हे श्रेष्ठ भापकी सेना के लोगोंने उसमकार युद्ध करनेवाले और आपके घरों के मारनेवाले उस भीमसेनके देखनको उत्साह नहीं किया (३७. फिर सब कौरवोंको भगाकर और उन पर्छ चलनेवालाको मारकर बड़े हार्थियों के डरानेवालेने बड़ी भुनाओं से शब्द किया । १४ | हमहाराज राजा धृतराष्ट्र फिर आपकी सेना निस के. कि. बहतो. शूरवीर मरगये. वह, कुशेप. और दुली प्राकर वर्तमानणे. ३०.". slaying five haadred Warriors in batte, ho put søren hundred elephants to deaib Having slun ten thousind fuot and cight hinndred horse, he looked glimous 35 Having slain your cong, Bhim. thought that the desire of his heart way accomplished. Your varriors darst nut opposo Bhin the slayer of your sone. Having routed the Kauravas and slain their followers, Bhiu tho terror of olophanto’mada a noise with the beating of his art, Then o king,'your array, of which great patiora vrbce slam and fery oalg remained, stood dejected and distreecd" 3G * . 17000) NI alaliharut सम्जय उवाच । दुग्योधनो महाराज मुदर्शवापि ते मुः। इतशी तश संम्ये वाजिम व्यवस्थिती ॥ ॥ ततो दुय्योधन हटा पाजिम स्पितम्। उवाच देवीपुत्र कुन्तीपुत्रं धनम्नयम् ॥२ ।। शत्रयो तभूयिष्ठा मातप. परिपालिताः । गृह सजपचासौ मित्त शिनिपुणव.i३ परिश्रान्तश्च नकुल बादेवश्च मारत । योधयिस्वा रप्पे पापान धार्तराष्ट्रात महानुगान ॥ ४॥ दुर्योधनममित्यज्य ३२ प । व्यवस्थिता । कृपश्च कृतामा चीणिक महारयः५ सौ तिष्ठति पाचा श्रिया परमया युतः। दुरधनवल हरवा सा सर्वे प्रमंद्र ६ । मसौ दुग्योधन पार्थ पाजिमध्ये व्यवस्थित । उत्रेण धियमाणेन प्रेक्षमाणो मु.॥७॥ प्रतिव्यूब पले सर्व रणमध्ये व्यवस्थित । एनं हवा शिर्षागेकीकरयो भविष्यसि ८॥ गर्जानीक हत रष्ट्या साश्च प्राप्तमरिन्दमम् । यावान विद्रयेत तोवर अध्याय २॥ संजय बोले हे पहाराज तब मरनेसे शेषवचेहुपे आपके पुत्र दुर्योधन और मुदर्श युद्धमें घोड़ों के मामवती होकर वर्तमानइये । इसके पीछे देवकीनन्दन भीरप्पाजी घोड़ों के मध्य में दयाँधन को देखकर कुन्ती के पुत्र भर्जुन से पोरे ।। कशा बहुत नाशयुक्तहुये और जातपाले हटायेगये और यह सात्यकि सन्जय कोपकड़कर लौटायोभरतवंशी नकुल और सहदेवधृतराष्ट्रकपापी पुत्रों और उनके सब साथियोंसे लड़तेश्यकग ।।। और उपाचार्य कृतार्या और महारपी पक्ष त्थामा यह तानों दुर्योधन को त्यागकरके नियतहुये । ५ । बड़ी शोभासे युक्त पा धृष्टद्युम्न दुर्योधनकी सेनाको मारकर सबमभद्रको समेत नियत है । ६ । राजा शिरपर धारण कियेही छत्र समेत बारम्बार देखता मा यह दुर्योधन घोड़ों के मध्यवर्ती । ७ । सब सेनाको अलंकृत करके पुद भूमिमें उपस्थित होकर नियत । इसको सारण पाणों से मारकर कृतकृत्य होजायगा, यकी सेनाको पलक और तुझ शत्रुविजयी को वर्षमान देखकर नवतक पा लोग नहींभाग तवयक इस CHAPTER XXVII, Sanjaya sid, “ Then your remaining sons Duryodhan" and Budarshani, with their borstnieri, stvod in the field of bardie. Then Shri Krishin the son of Dovali, seeing Daryodban in the midst of hernomen, said to Arjun, "Many enemies aro destroyed and put to Arghte Satyaki has brought Sunjaya a captıyc. Sabadov are tned of fighting with the sons of Dhritrashtra and thoir followers and Kropacharya, Entvarma and Ashwathuma bare left Duryodlıun Having destroyed Duryudhau's army, Dhrahtadguson oland, with the Prabbadiaks. 6 Vider tho sbade of an anbrella Duryodhan stande among borkomen throwns delong glandet, 8lay him with your sbarp arrows to accomplish your parpost. Play thema before, they rer atay at your sight maid the Nalul and . (७०) शक्ष्यपर्व Shalya Part (7001) मुंबोधनपर यातु कधित पाचालय क्षिप्रमागम्यतामिति । परिप्रान्तकलस्तात मेष मुख्यत किल्विषो ॥ १० ॥ संघ हवा बलं सर संग्रामे मग जिंतान पांडु सुनार मत्वा कपं धारयते महत् ।। ११. निहतं घपले मत्ा पडितम्चापिपांडः। पमे पति संग्राम अधायधारमनो नृपः। यमुक्तः फाल्गुनातु कृष्णं वचनममधीव ॥ १२॥ धृतराष्ट्रमताः स इता भीमेन मानद । पाताधास्थिताण वाग्ध मषि मतः॥१॥रता मोमो हतो द्रोण को चर्तनो हतः। मद्रराजोरत: शल्यो इतः काश्यः ॥१४" या पञ्चशता शिक्षा शकुनें सौघलस्य च । रयानाशते शिम तुनाईन | दन्तिमाच शतं मागं त्रिसामाः पदातयः॥ १५ ॥ मस्थामा रुपचव निगाधिपतिस्तथा। उनका शकुनिश्चेष फूतषमा च मास्वतः ॥ १६॥ एतलमभूच्छेषं धार्तराष्ट्रस्य माधय । मोक्षो न नून कालादि विद्यते भुवि दुर्योधनको मारे १९ । कोई पृष्टपुम्न के पास जाकर उसको जल्दीसे ळावे. जबतक पर नहीं आयेगा सक्तक यह थकीहुई सेनावान्टा पापी नहीं छूटेगा ॥१०॥ धृतराष्ट्र कापुर युद्धमें प्रापकी सघसेवाको मारकर पांडवोंको विनय कियाहुआ मानकर पहे रूपको धारण करता है ११ । वह राजा पाउनके हायसे अपनी सेनाको मराहुना और पाडापान देखकर युद्ध में अपने मरनेके लिये अवश्य वर्षमान होगा यह पचन सुनकर अर्जुन ने श्रीकृष्णजी से यह वचन कहा । १२ । धृत राष्ट्रके सब पुत्र भीमसेनही के हाथमे मारेगपे हैं है , श्रीकृष्णजी जो पह दोनों निपत यह अब नहीं रहेंगे अर्थात् पारेजायेंगे ।१३। भीष्मनी मारेगये द्रोणाचार्य पारेगये और इसीमकार कुंडल कवचका दान करनेवाला कर्णभी मारामपा, मात्य और जयद्रय पारागया हे श्रीकृष्णजी सौषटके पुत्र शकुनी के सभी पापसी 'यो मेष रहगय हैं हे जनाईनजी उसके सौ रय कुछ ऊपर सौ हाथी और तीन मार पदाती शेप रहे हैं । १५ । अश्वत्थामा कृपाचार्य राजा त्रिगर उलूक शकुनी और यादव कुववर्मा । १६ ! हे पापर इतनी योयन की मेना बाकी destruction of their aruy Some une must be sent for Uhrish tusdyuna, for Duryodhan, whose army is tired, will not be slain without his helpt 10. Daryodhan expects to conquer him by slaying your Haray: bot seoing all his army destroyed he will be prepared to fight." At this Arjani said to Brislio, " All the sons of Dliritrashtra liavo beco destroged by Bhim and those two tlo reciern out of the whole lot will not their death in the same mander. Bhishm, Drong mad Karen bars already been slain as well as Shalya and Jagadrath Firo bandred horsemon remain with Shabani Ho has more than a hundred care, as many elephants, with three thousand foot. 15. Ashwathuna, Kripacharya, the king of T'rigart, Uluk, Shetani and Kritzarm tho Yadar are tho roupants of Daryodhan's Warrior राजा 70020 Mababharat (७००२)" फस्पचित् ॥ १७ ॥ तथा,विनिहते सैन्ये पश्य दुर्योधन स्थितम् । अद्यापनि महाराजो हतामित्रो भविष्यति । न हि मे मोक्ष्यते कश्चित् परेपामिति चिन्तये ॥ यद्य समरं कृष्णं, म हास्यन्ति रणोत्कटा। तान् वै संर्घान् हनिष्यामि यद्यपि, स्युरमानुगः । १९ । अद्य युद्धे सुक्षकको दीर्घ राज प्रजागरम् । अपनप्यामि गांधार पातयित्वा शितैः शरैः ॥ २० ॥ निकृत्या दुराचारी यानि रत्नानि सौपला सभापामहरपते पुनस्तान्योहराम्यहम् ॥ २१ ॥ अथ तो अपि यत्स्यन्ति सर्वा नागपुरस्त्रियः । भुत्वां, पता पुत्रांश्च पाण्डवनिहतान युधि ॥ २२॥ समाप्तमध चै फर्म सधैं कृष्ण भविष्यति, मयं दुग्योधनी दीप्ती भियं प्राणांध त्वक्ष्यति ॥ २३ ॥ नापयानि भयात के समा माय चेन्मम । निहत विद्धि घाणेय धाराष्ट्र मालिशम् ॥ २४ । मभ घेतदर्शक्त ये पाजिन्दरिन्दम । सोढुं ज्यातलगिधोष यादि यान्निहन्म्यहम् ॥ २५ ॥ एवंग निश्चयकरके पृथ्वीपर कालसे किसीको बचना नहीं है । १७ । इसीप्रकार सेनाके मरनेपर दुर्योधन को नियत देखो महाराज युधिष्ठिरं भाजके दिन : मृतक शर्नु वालाहोगा शत्रुओं में मेरे हाथसे कोई नहीं बचकर जाता है. यह विचारकर हैं श्रीजी आजके दिन जो यह पदोत्कट लोग युद्ध त्याय नहीं करेंगे तो निश्चय करके चाहै इन में मनुष्यों के विशेप.देवता भादिक भी होंगे तभी इन संयको मारूंगा । १९ । भव युद्ध में अत्यन्त कोपयुक्त होकर में तैनापोनि शकुनी को मारकर राजा युधिष्ठिर के बड़े जागरण को दूर कगा।२० निश्चय करके दुराचारी शकुनी के छलसे निम रत्नीको सभा द्यूतके मध्य में लिया हमें फिर उनको दंगा । २१ । भव हस्तिनापुरकी सब त्रियांभी युद्ध में पांडवों में दाय से मारे 'हुपे अपने पति और पुत्रों को जानेमा २२२ श्रीकृष्णनी भवही निश्चय करके सर्वकार्य पूर्ण होगा अब दुयोधन अपनी प्रकाशित लक्ष्मी समेत प्राणों को भी त्याग करेगा। २३ । जब कि वह भयभीतता के कारण मेरे: युद्ध से नहीं हटता है हे 'श्रीणनी बड़े मंगानी दुर्योधन को भाप मृतकही मानो। शिवमों के विनंग करनेवाले यह घोड़ों के समूह मेरी मत्पञ्चा और तलके शब्दों के संहने को असमर्थ हैं आप चलिये मैं जबतक इन्हींको मार । २५ हे राजा Surely none can scaya Death on earth. Duryodisun is standing is knite ur tho great logy. Princo Yudhishthir is siire to be without an evenly, Hindny.: None of the enemies shall scape fion me. If theso marrions Honut levyo the field of battlo to day, sleg sliali in luis eren il Chey. in se grada 'ninong them. I shall now slay Shakimi with my sintp. tross and dispol the nightmare of Yudhishthir. 20 ioballinks hach from Sjakuni, tha joselu shrich ho tenk away from yodliia? innblink. The tranets of lastridappar till licic of the desilop Finirhuainruly and sant... Strals.all our work wift trussimintinaca' Play... Doryxilian. will timishrillint gold mins his life.. Irthi (७.३) शत्यप Shalya Parv 170031 वस्तु दाशार पाण्डवन मनम्चिना । अबोद यात्राजन् दुर्योधनवल मात ॥ ६ । तदनीकमभिप्रेक्ष्य त्रय सज्जा महाग्था | भीमसेनोऽर्जुनश्चैव सहदेवश्च मारिया प्रययु मिदनादन दुर्योधनजिघासया । २७ ॥ तान् प्रेक्ष्य सहितान् सधान जयेनोध तफाकान् । सायलोभ्यद्रयाचे पाण्डघानाततायिन ॥ २८ ॥ सुदर्शनस्तष मना भीनतम ममभ्ययात् । सुशा शकुनिशेष युयघाते किरीटिना । सहदेव तब सता, इयपृष्टगतोश्ययात् ॥ २९ ॥ ततो हि यत्नत क्षिम तव पुत्रो जनाधिप । प्रासेन बार पस्य शिरसि माहरदृशम् ॥ ३० ॥ सोपाविशदथोपस्थ तव पुत्रेण धाडित ! रुधिगलु नमयोङ्ग मासाविष इव ३५सत् । ३१॥ प्रतिलभ्य तत सहा सहदेवो विश म्पत । दुरपोवन शोनीण सकुद्ध समवाकिरत् ॥ ३२ ॥ पार्योपि युधि विक्रम्प कुन्तीपुर, वह साहनी अर्जुन के इमपकार पचनो को मुनकर श्रीकृष्णमी ने घे हो,को दुर्योधन की सेनामें चलायमान किया २॥ हे अप्उ उस मेनाको देखकर तीनों कांच और शस्त्र धारण करनेवाले महारथी भीमसेन अर्जुन और सहदेव सिंह नाही समा दुर्योधन के मारनेको इच्छासे चले"। २७ । शकुनी तीव्रता पूर्वक सब साथ मिलेहुये उन धनुषों के उठानेपाली को देखकर युद्ध में मारनेका अभि लोपी होकर पांडवों के सम्पुष गया । २८ । आपका पुत्र सुदर्शन भीमसेन के सम्मुख गया सुशर्मा और शकुनी अर्जुन के साथ युद्ध करनेलगा पोडे की पाठपर सवार आपका पुत्र दुर्योधन सहदेव के सम्मुख गया । २१॥ हेराना मिर भापके पुत्रने घिही उपाय पूर्वक माससे सहदेव के शिरपर कठिन महार किया {"३० । आपके पुनसे घायल वह सहदेव रयके बैठनेक स्थानपर रुपिरो लिा शरीर और पिपले सर्पकी समान श्वासलेता गिरपडा । ३ । हे राजा,थोड़ी देर पछि सहदेवने सचेतताको पाकर बडे क्रोषयुक्त ने तेजवाणों से दुर्योधनको घायर किया । ३२ । कुन्तीके पुत्र अर्जुनने भी युद्ध में परामम करके शूरों के शिरों को does not run as ay with bear from my p esence he 19 sure to lose his {ife. The hors m n can not ben tho sounds of my bowstring, Os go and slay them 25 Hno ng heard the words of bravd Arjuri, Suu Krishn drove lus horses into tlie army of Daryodhan See n. tlnt army, the three warriors, Bhim, Arjun and Sahader, equipped with arns and asuiour, went on to slay Daryodhao S-eing the advance of those Warriors Siakuni opposed them. Tour sun Sudarshan opposed Bhios and Arjun fought with Susharma and 11 thuni, Duryo dhan, on lo seback, opposed Suhador and hit hru hird on tho liend Wound d and bleeding wil y ur au's llow Salindo y sat or hugent and fall do vn righ ng like a velomous 89 pant le rega nu cons bugn 135 in a sho t time and wounded Duryodhan with sbarp arrows Arjan shoxed h 8 prowess by cutting off the boods of the - Lt 30 (7004) Mahabharat 1७००४ धनत्रयाणामपृश्या शिगास निच॥ ३३ ॥ तदनी तदा पापों मा मामिः । पातपित्या हणन सालिग ना रथान् पयो ॥३४॥ ततसे काrar भरवा त्रिगर्तानां महारथा ! भर्जुनं बासुदेव शरवरघाकिरन् ॥ ३५ ॥ सत्यबर्मा बमालियरप्रेण महापशाः। ततोप स्यन्दनस्यशां चिलिदे पाण्डुनन्दनः ॥ ३॥ शिलाशितम व विमो सुग्ण महायशाः शिरधिच्छेद प्रहसंस्ततकाचनभूषणम् ।। ३७ ॥ सत्पेषुमय चादत्त योधमा मिषतां ततः । यथा सिंहोवने राजन भृग परिखुम, क्षतः । ३८ ॥ तं निहस्य ततः पार्यः सुशर्माण त्रिभिः शरैः । विवा तानहनत सर्वा पाक्मविभूनितान् ॥ ३९ ॥ तमः प्राधास्वरन पार्थो दीर्घकालं सुसंभृतम् । मुमधन कोपि ताण स्पलाधिपति प्रति ॥ ४०॥ तमर्जुनः पृश्कानो शतेन भरतर्षभ पूक्विा ततो पायानइनसस्य पन्धिनः ॥ ४१ ॥ ततः शरं समाधाय यमदण्डोपर्म घोड़ोंकी पाठपर काटकर उससेनाको तीक्ष्णधारखाले वागोंसे छिन्नभिन्न किया इस प्रकार से वह सब घोड़ोंको गिराकर त्रिगर्तदेशी रथियों के सम्मुख गया । ३४ सब उन त्रिगर्गदेशियों के रथियों ने इकट्ठे होकर अर्जुन पौर वासुदेवजी को वाणों की वर्षामों से दादिया । ३५ । फिर बड़े यशस्वी क्ष.मसे सस्पकर्माको गिराकर उसके रयके ईशाको तेजधार चरमसे काटा। १६ । और अकस्मात्री प्रवर्ण के कुण्डलों से अलंकत शिरको भी काटा तन वह आपके शुतारों में देखने पे युद्ध में गिरपदा ।। हे गमा जिसमकार बनमें भूखा सिंहसगको मारना वसी मकार अर्जुनने उमको मारकर तीनमाणों से मुशर्मा को घायल करके मुवर्ण के भूपणों से अलंकृत उन सत्र रथियों को मारा । ३९ । इसके पीछे बहुत कालसे इकठे कियेहुये क्रोधके विषको छोड़ना अर्जुन उसमस्यलके राजाके सम्मुख दौड़ा४० भरतपम भर्जुनने उसको सौ पृषकोंसे घायन करके उस धनुषधारी के घोड़ोंको मारा । ४१ । इसके पीछे हँसतेहुये अर्जुनने यमरान के दण्ड के समान बाणको पढ़ाकर मुशर्माको लक्ष्य बनाकर शीघ्रतासे छोड़ा उस कोषक मनुषधारी car-trarriurs and routing your army with his sharp arrowr. Having slaiu tho horsemen, ho opposed the warriors of Trigart. They covered Arjun And Vasudev witli the shower of their urrow. 35. Then be eles Satyahatma sith a slorp Arrow and cut down the parts of liin car. His head adorned utth ear-rings soon foll down in the presenon of sous warriors. having slain him as a hungry lion does a deor, Arjun wounded Susharun with thro arroys and slow the worriors dockod with guld o’nuinents Dropping tho prison of his long pont up anger, Arjun opposed the king of Prasthal and having Honudel him with a hundred arrows, wlaw lus honos too Thea Arjun with a smile, having put to Lix bww a sharp arrow, dirchargei it at Bushartin. The diruw discharged by tbat enraged warrior, pierced . . (७०५) शल्यपर्व Shilya Part (7005) परम । संशर्माण समुद्दिश्य चित्रेपाणु हंसनिय ॥ ४२ ॥ संशर प्रेषितस्तेन क्रोध दप्तिन प्रविना मुशणि समलिपि विभेद हृदयं रणे ॥ ४३ ॥ स गतीमुमहाराज, पति धरणातले । नन्दयन् पाण्डवान् सर्वान् व्ययंचापि तापकान् ॥ ४४। मुंशर्माण रणे हा पुधानस्य महारथान् । सप्त चाटी चत्रिशच्च शायरलयत् संयम् ॥४५ । ततोस्य निशिणि सर्वात हत्वा पदानुगान् । पयाभारती सेना इतशेषा महा रप || भीमस्तु समरेश पुत्र त जनाधिप । सुदर्शनमदृश्यन्तं शरचय सभित्र ॥४७॥ तताऽस्य प्रहसन कुद्ध. शिा काथादपाहरत् । सुरप्रेण सुतीक्ष्णेन स रत प्रापतद्रवि ॥४८॥ तस्मिस्तु निस्ते घोरे ततस्तस्प पदानुगा । परिवनु रणे भीम कस्तो विशिखाच्छितान् ४९ततस्तु निशितास्तदनाक दृकोदर... इन्द्राशनिसम स्पर्शः समन्तात् पर्यधारित ततक्षणातु ताने 'भीमो न्यहनगरतर्षभ ॥ ५० ॥ तिपुच्छिद्यमाने सेनाध्यक्षा महाबलाः भीमसेनं समासाद्य ततो युपन्त भारत ॥ ५१।। तस्तु सर्वान् शर राजन्नवाकिरत पाण्डवः । तथष (के छोडेडु वाणने मुशर्माको युद्धमे हृदयपरं छेदा १४३ । हे महाराज फिर वह निनींव होकर सब पाण्डों को प्रसन्न करता और अ पके पुत्रोंको पीड़ा देता हमा पृथ्वीपर गिरपड़ा । २४ा सुशर्मा को युद्धमें मारकर उस के पैनालीस महा रवी पुत्रों की शायकों से यमलोक में पहुँचायो । ४६। इसके अनन्तर इमैके सब अनुगामियों को तेजधार वाणों से मारकर 'वहं 'महारंथी. मग्ने से शेष वचीहुई भरतवंशियों की सेनाके.मम्मुख गया.४६.और.पद्धमें क्रोधयुक्त मतेहुये भीमसेन ने सुदर्शन को वाणों से गुप्त कादिपा ! ४० । फिर क्रोधभरे हँसतेहुपे ने इसके शिरको भी शरीरसे जुदा किया तब वह प्रत्य-त तेज चरमो मृतक होकर धीपर गिरपडा । ४६ । उस वीरके मरनेपर विशिखं नाम चाणोंको फैलाते उस के पछि, चलनेवालों ने भीममेन को घेरलिया । ४९ । इसके पीछ भीमसेनने इन्द्र | वनके समान स्पर्श तेज गारवाले वाणी से भापकी सेनाको सबभोरसे घायल किया हे भरतर्पम भीमसेन एक क्षणही उसं सेनाको मारा । ६० । उनके मरनेपर बड़े पराक्रमी सेना के प्रधानों ने भीमसेन को पाकर युद्धकियो । ५१ तिव Sunu.me.arsha JIVARNA And the lister .tall dinnddaul ntaspur Laoslavas amint grieving you 'auns. Having slain Susharma, be Bler forty five of his sons with his sharp arrows 45. Then tie slew all his followers, and wpp ved the rest of tho Kaurss army. Bhims-, omuling 10 anger, lud Sudarshan with lus Allows and several lis hoad fion the body Ho cntdown !19 head with a smile and the dead body fell down on eith. Al die death of that'wale rior, his fullusers sgrrounded Buim and hid fun with their abiaip arrww Thun Bhin wounded then with lus shirp-ed:od arrow nud slew then it an llustan.50_The clness of the army thou fought with Thum at the lalital thul saal ltsra, bit Bhumbler titm alon, Similarly l 47.
k (7006) Melisbharat तारका गजन पाण्यान, महारथान् ।.रण माता- समसात् पचार यम् ॥ ४५ ॥ पाकुळ सदसत् सर्व पाडवानां पर सरसावकामा समान युपुरसताम् ॥ ५३॥ तत्र पोधानता.पेतुः परस्परसमाइताः । उमयोः तनयो र संशोषता वाधवान् ॥ ५४ इति शल्यपर्वाय मल्यधपर्वणि संकुलयुद्धे सप्तविंशोपायः २४ा. सजय पवार तस्मिन् प्रहरी संग्रामे नाबाजिगजाये शनिःसीपको सहदेष समात् ॥ संतोस्थापततस्तूर्ण सरदेषः प्रतापमान मास पतङ्गनिष शीघ्रगान ! उलूकच रणे भीमं विव्याध वर्षभिः शेरेः ॥ २ ॥ भीमसेनने उन सबकोभी, वेजबाणों से घायर किया.हे राषा इसीप्रकार आपके शूरवारों ने महारथी पाडकों को.बड़ी बाणों की वर्षा से पाओरको राका : २२॥ पांडवों का और भापके शूरवारों का नह युद्ध महाभ्याकुर करनेवाला ही उस समय वहां अपने बान्धवों को भोचते परस्पर घायल दोनों सेनाओं के पूर बार बड़ाई करनेवाले - १४॥ . भाय २८॥ संभय पोले हेरामा ममुष्प-हापी और घोड़ोंके नाशकारी उस पके होनेपर सोवलका पुत्र शकुंनी सहदेव के सम्मुखगया । इसके पीछे उस प्रताप वान सहदेवने शीघेही उसे आतेहुये के ऊपर पतंगों के समान शीघ्रगामी बानों, के समूहों को लाया फिर उलूकनें दशवाणों से युद्ध में भीमसेन को धारण किया । ३. हे राजा-फिर शकुनी ने तानबाणों से घायल करके नवे भागको your warrios hid the Panday army with their arrows, and the strugglo was seyere, Grieved for your binamen, the warriors of both sides attacked one another. " 54. iwar CHAPTER XXVIII - Sanjaya snid, " At the comigencement of the battle which was dust uotive ut elephants, hurres aud tuen, Shakuni opposed Sabadev. Glorious Sabucley. showered over hita arrows like a flight of locusts, Then Uluk wounded Bhim witli ten arrows. Then he wounded Sabas dop with thieu Brruts and covered biw with ninety more. The 'warriore - TATT* Shalya Part (700) ना भी किया निम शौ.। सापकानां नपत्या के सहदेवमानित र समरे राजन ममासाप परस्परम। विधधुनिशिनमाण कारण Me पु. शिलाधौतेराकांत प्रहित शरे ॥ ४॥ तेषाशापभुजावटा शर शिकागते । माडगइरहिया सर्वा धारा पपोमध ॥ ५ ॥ ततोरणे मोबः रेप पीयंपाद परतु कटन सहये कुर्वन्तो मुम्हापसी ताश्या मतल तर भारत । अन्धकारमियाकाशममप सत्रह ७ । मन रिवादि शरश्छन्नर्षिशागते । तत्र तत्र को मार्गो विकर्षनिहगान पहुन् । Pranitarन्नु सावायोधिमि । धमिर्षिनिकतम प्रासश्चिमरिष.९ । पवित्र तिमि त योमरम समन्तत । सरमा पृथिवी जत्रे कुसुम शबलाप ...पाल महाराज समासार परस्सरण । न्यसरत गणेश विमिनन्त परम उपचनपन गेषात् मन्योधपुटेमुंखे । सलेमीनापन सिनिम १२. अनिमहाराज नागकरोममे सादे सतनुब से सहदेवो किदिया। ।। हे राजेन्द्र उन शूरोंने पुछमें सम्मुख होकर उन क मार पोरषदों से अटिन ताक्षणवाणोंसे घायन किया जो कि मुनहरी पुल शिला से सच से कानतक बँचकर चोइथे ४। उहाँ के धनुप और भुवासे छोटीई पाणदिने मन दिशाभोंको ऐमे दरदिया जैसे कि जलकी धाराओं से बादल दबदेता है । इसके पीछे युद्ध में क्रोधपुक्क भीममन और पराक्रमी सहदेर दोनों बडापकी पर अलप करनेहुये भ्रमण करनेपगे ६ दे मरनवेशी समाएकी सेना ननों के वाणों से टकई नहीं नहीं भाकाश अन्धकाररूप हुमा १७ ॥ और पाजाम दोहुये पारोंओर दौडसे और बहुत मृतकोंको संपते हुवे घोसे जाtant मार्ग संयुक्तमा श्रेष्ठ असतारों के साथ मृतक योग के सपूर टेकामास सहन शक्ति और तोमरों से भी परोपोर में ऐसी यो विदित दुई जैसे कि पुष्पोंसे शाल गुप्तहोते हैं। महारान यहां गुरपीर परस्पर सम्मुखोकर युद्धमें क्रोपयुक्त परस्पर मारदे बोप्रकार से भ्रमण करनसग १॥ कोषमे ले ने दोनों मोठोंके काटनेवाले कुण्डलपारी कमनकी किंगरस के समान दुतों से पृथ्वी गई।१२। समर्थ महाराम गमरामकी मूहकी समान भामू Founded 011e another with Arrous fitted with vulture and pascuck feathers and whetted on stone The shower of Brrons diecharged from their bus covered all directions as cloads pour forth mint 5 Thor Bhim, much enraged, ecd plant Saladey making a harus round there and your army was bed with their arrows The sky ww dark sad the way was obstructed by hunes drabging te derd. The ground was covered witd all sorts of weapons as wade aro by Morers10 The Farriors coaded bither and thither, alaying one another with arrows. With eyes dilated Danger with lotus like facen tho henda corned tho ground. The broken arms, like the trooks of . (7003) Nahabhnat (१७००८) कवन्धेत्यादिछन्नैर्नृत्यभिचापरयुधि । मायादगर्न ॥१५॥ अल्पायशिष्टे सैन्ये तु कौरवेयान् महावे यमसादा का तस्मिन्नन्तरे शरत सोपलेषः प्रतापपान मासन सहदेयस्य शिरशि प्राहरशम सिविहवलो महागंज रेयोपस्य उपाविशत् ॥ १६॥ सईदेव तया दृष्दा भीमसनःप्रतापवान् सिसैन्यानिसको धारयामास मात ॥१७. निर्षिभद च नाराचैः शशा सहनशविनिजिक रोच्चैध सिंहनादपरिन्दमः ॥१८॥ तेन शन्दन चित्रस्ताः सबै सहयधारणालात धम् सहसा भता'शकुंगेध पदानुगाः ॥ १९ ॥'मग्नानय तान रेप्ट्वा राजा दुषों धनाचवीत् । नियतनमधर्मना युध्यध्वं किं स्तेन धः ॥ २० ॥ इह कौन्ति समाचार प्रेस लोकान् समश्नुते । प्राणान जाति पो धारों युधि पृदय वर्ष बन्द कवचः खड्ग और फरसा धारण करनेवाली-टूटीभुजा । १० और-- युद्ध टूटेखड़े और नृत्य करते अन्य रुण्डों से पृथ्वी महाघोर और मांसाहारी जीवों के समूहों से पूर्ण होगई ।।१४। फिर-पोडीसेना शप रहनेपर, पांडवोंने, अत्यन्त प्रसन्न होकर पढ़े युद्ध कौरवों को यमलोक में पहुंचाया- १५ । इराजा उसी अन्तर में प्रतापवान सकुनीने पास से सहदेवके शिरपर कठिन प्रहार किया हे महारा, उस भारी महारसे वह सहदेव व्याकुल होकर रथके बैठने के स्थानपरही बैठाया 1१६। इसके पीछे अत्यन्त कोपयुक्त प्रतापवान सीमसेन सहदेवको देखकर सब सेनामों को रोका । , और इमारों शूरवारों को नाराचों से दो फिर उस शत्रुविनगीने उनको छेदेकर सिंहनाद किया ।।४। उसं.शंब्ररी सकुनी के सर्वार्थी घोड़े-आर. हाथियों समेत वापर गिरपड़े और भयभीत होकर अस्मान भागे । फिर गला दुर्योधन ने उन छिन भित्र सनाओंमें कहा है, धर्म के ने जाननेवाले शूरवीरों लौटो युरो यु.दसेभागने में तुम्हारा क्या प्रयोजनह ! २०॥ जो वीर युद्ध में पाठको न दिखाताहुआ सन्मुख होकर अपने प्राणों, को त्याग करताहै यह इप्सलोक में शुभकीर्ति को पांकर.मरनेके पछि शुभवोंकों को भोगाई elephants, deckeel with,ornaments and ben iny respons, together with other pirts uf-the-bendy, moving in various directions and catlisorvat birdo ivere seen hein und' inéia over'the gróūrid. "When a smáfl part of the army sus tëft; the Pandavhs, well please. I, sent the "Kaitra más to the region of Yum. 15. In the mean timə"gloridn't-Sitaküni hit! Silinder haid in the head and the latter ext-'ddwroń luisgráf in thio ear. Then Bhilueen, much euraged at. ther wounds of.:Sahadeyr clicked'ébe-army-aud piered thousands of yarriors': with cartowa rhem that contrnerer.of foes piered him with a roar... The elephantr aid horsinen feil. down on earth with that roar and filed away in deitut Then Prinză“Daryolbán "addressid the nitted ating saving o be bäck sarriors and fight? phat will gun gain' byl running शल्यपर्वShalyn Parv (7009) मुक्तास्तु ते. राना, सौघलस्य पदानुगाः पाण्डवानास्यवद्रत मृत्यु कृत्वा निवर्तनम | १२॥ द्रवद्भिस्तत्र राजेन्द्र कृतः शब्दोतिदारुणः । अग्धसागरसङ्काशः क्षभितः सर्वतो भिवंत ॥ २३॥ तांस्तथापततो दृष्ट्वा सौपलस्य पदानुगान् ! प्रत्युदयुमहाराज पांडधा विजयेस्थिता:॥२४ प्रत्याश्वास्यं न दुर्धर्षः संहदेवो विशाम्पते। शकुनि दशाम विवाहयांचाप त्रिभिः शरैः धनुविच्छंद शरः सौबलस्य : हसन्निव ॥२५॥ मथाम्ययनुरादाय शनियुद्धदुर्मदः । विव्याध:नकुळं पापा भमसेनन : सप्तमिः' २६ उल्कोपि महागज भीमं विव्याध: सप्तभिः सहदेवश.सप्तत्या परीप्सन पितरं रणे ॥२७॥ ते भीमसेनः समरविवाघ निशितैः शरैः। शकुनिञ्च चतुष्टया | वास्तश्चि त्रिभित्रिभिः॥ २८ ॥ ते इंग्यमाना भीमेन नाराचम्मलपायितःसादेव रणे क्रवाश्छादयन् शरप्टिमिः । पर्वतं वारिधारामि सविद्युत इवाम्बुधः ॥ २९ ॥ ततो रानाके इसमझार कहनेपर शकुनी के वह साथी मृत्युको पीछ करके पाण्डयों के सम्मुख वर्तमान हमें। २२ । हे राजाविहाँ भागने दौईनेवाले वारोंने बड़े भयकारी शब्दकियों वासेना' वेगयुक्त सागरके समान संबं:ोरसे व्याकुल होगई है महाराज इसके पीछे विजयका निमित्त सम्बद्ध पाण्डवं शकुनीके न माथियों को आगे देखकर सम्मुख गरे । २४ा फिर अप सहदेवन, विश्राम लेकर दशवाणोंसे शकनीकोःयागला करके तानाणोंमे उस कें,घोड़ोंको घायल किया और इंसनेमे ने वाणोंमें शकुनी धनुषकोकाया ।।२५ इसकेपीछे युद्धमें दुर्मद शकुनी ने मरेचनुपको लेकर साठवाण से नकुलको और सातवाण से भमिमने को पापलाकिया । २६.। हेरानी जिनमें पिता के चाहनेवाले उलक ने भी सातवाण भीपमेनको और सत्तरवाण.से सहदेव को घायल किया।२५। भीमसेनने उसको नीवाणं से शकुनी को चौंसठवाण से और इसर उपरके पावर्ती शूरवीरों को तीन र वाणो घायल किया भीममेनके तीक्ष्णनाराचों से पायल और क्रोधयुक्त उनाशवीरों ने युद्ध में वाणों की वर्षा से कहदेवको ऐसे हक दिया जमे कि बिजली रखनेवी बादल जम्की-धाराओं से पहाइको हक देते nitay ! 20,7 A warrior whordoes not cutt lack in battle ani dies figiting: gets fame in ethis world and good régions in the next!, Thos addressed by the link 'Sbakuni'x'elepbants come lacke , The.warsiuss ruluined with a great 'aproar' and, filled the field of battle, with a sound-like that of ths' srelling surges... The : Pandayas desirous of vidlory; seeing S inkani's companions thore, opposed theu, Surinc:blo &aliader símiling woundel S iakoni vith tēn arrows and his horeca will four. 25: Shakuni taking up another bow, rounded. Nakul with sixty Arrons and Sahados Tith seven, - Ulak the son ol Siakuni Younded Bhim with seven ärtors and Siladov with forents. · Blim.Irounded him with uine rarrors, Shakuni witli kixty four and their lollowers है (7010) Mahablinrut (७.१०) स्थापतनः शाः सहदेव प्रतापवान् । उनका मानापाररि... जगाम रमाइमि सादेवेन पानिन । रुधिराप्लुनसशको नन्दयन् पास युधि ॥३१॥ पातु निस्तरमा शकुनिसत्र मारन । लाभकण्ठो पिनि बोपन मनुस्मा ५ ३२ ॥ वितीयस्था मुसपरपस प्रससह समासा निर्भािवस्या साप॥ ३३ ॥ सानपारा शगम्मुतार शरसंध प्रतापवान् सारे महाराज धनुभिव्द संयुगे ४॥जिन्ने धनुषि राजेन्द्र शकुमिः सौबलमा रिपुल बग सहदेवाय प्रारिणोत् ॥३५॥ समापन सहसा घोर विशाम्पते। विधा दिमछेर समरे सौपन सबिए । ३६ मसिरसा विधा विष प्रगमसी गदाम । प्रारिणोत् सहदेवाय सामोपातहति ॥३॥ तत या महामो रानिमियोधताम।प्रेषयामास संकुम पार पति सोबल ॥ ३८ ॥aमापयन्सी हैं। १ ९वहारान इसके पीछे मतापवान शूर सहदेव ने इस सम्मुख दौड़ने उलूक के घिरको मलसेकाटा।बह गघिरसे लिसणगर सादेवका गिराया हुमा युद्ध में पांडवों को असम करता हुमा रथमे पृथीपर गिरायो भरसंबंशी वर शकुनी अपने पुत्रको मराहुआ देखकर विदुरमोके वचन को स्मरण करता भामुमों से पूर्ण कराठ पदे भासलेकर एक मुहर्षता चिन्ता करने लगा. फिर अश्रुपूरित नेत्रवाले उस शकुनी ने सहदेवको पाकर तीन शासकों से पायल किया । १३ । हे महाराज प्रतापनि सहदेव ने अपने वाण समूहों से उनको पे पापों को हटाकर युद में धनुष को काटा॥राजेन्द्र धनु के टूटनेपर सौरलके न शकुनी ने बड़े सड्गको लेकर सईदेव के ऊपर चलाया । १५ । पसते इसे सादेव ने उस अकस्मात भातेहुये शकुनी कयोरप सहग को समसपर करदिया। सग को सगिरा देखकर बड़ी गदा को लेकर सादेवके ऊपर फेंका वर गदा भी निष्फल होकर पृथीपर गिरपड़ी। इसके | पीछे अत्यन्त कोषयुक्त शकुनी ने महाघोर कालगात्र के समान उठाई हुई घोर शकिको सहदेवपर चलाया । ३८ । ससेहु सहदेवने अपने वर्ण भूषित पापोंसे with three arrows each. Wounded by the sharp arrows of Bhim, the enraged warriors covored him with arrows like rain of clouds. Then Bubadey cut down Uluk's head with a dart. 30. Şlain by &rlader ha full down from the car, plessing the Pandavas. Seeing his son dead, Shakuai with eyes full of wars and sighing, meditated for some time and then wounded Bolader with three arrong. Glorious Sshadey checked bin arrowa with his own and cut fue buw. Haring dropped his broken bow, Shakuni took up his large sword and hurled it at Suhadev Then Salinder, with a suile, cut his dreadful aword into plecosras When his sword was cut off, he burled a mace at Sabador, but th#t too, fell down without doing ite work, Then Stakun, much enragedt Shalya Par (70111 बहसारे काम्चनपणे पण शिक्षणमा सहरेको सचिव ३:॥मा पपात निषा विधाममा कनकमपणा शोरमाया यादीमा गगणादे सहा ॥शक्ति विनिाता टुवा सौषलम्च माहितम | दुम्बुमारका सबै भये जाने ससोषमा ४१ अयोरक्रुष्ट मास्चासीत् पाण्डजितकाशाभ । घाखंगालत समें प्रापये विमुखामयन् ॥ ४२ ॥ १२ वैषिमनसो घटुवा मादीपुर पताषा । करसाहारयामा मयुगे ॥४३॥ ततो गान्धारगुत पुरवजप धृतम् । माससाद रणे यात मदयोथ सोपलम् ॥ ४. समशमातिष्ठन्त सस्मयामि नारन काम्यमानेन सहदेव समात् ॥ ४५ ॥ भधिस्थ बनवत त्या व्यास पामुमारनु । स सोपलमभिरय गावपा शिलाशित भृशमानत असतो रिय मानिमः ।। ६ ।। उवार मेवाती निगा स्मारयनिय मधमे स्थिरो स्वायुध्यस्थ पुरुषो भव ॥ ४ ॥ यत्तदा हापस मह. प्लान सभात। फलम उस आतीहुई शक्तिको युद्धमें लान सरह करादेष ११९ । वह वर्ष से अबकृत तीन स्थानसे टूटी शक्ति पृथ्वीपर ऐसे गिरपहा असे कि प्रकाशित गिरने सन्नी बिनली माकाश से गिरती है। शक्तिको टूटी और शकुनीको पोड़ा पान देखकर भय उत्पन्न होनेपर शकुनी समेत मापके सब शूरवीर भागे। ४१। इसके पीछे विप से शोभापमान पलोंकी भोरका बड़ा शब्दहा तब भाप सब शूरवीर पुल फेरगये । ४ मादीके पुत्र प्रतापवान ने उनको उदास वित रेसकर युदर्भहनारों पाणों से रोका।फिर सादेवने पुष्ट गांधार देवी पोड़ोंसे रक्षित विजय में प्रचचित युद्धमें वर्तमान होनेवाले शकुनी को समास पापा ४४ हे राजा सहदेव उस सम्मुख नियत होनेवाले शकुनीको अपना भाग स्परणकरके मुवर्ण के अनचाले रपत्री सवारीसे सम्मुलगया। १५ । और बड़े बल पान र धनुषको चाकर टकार। उस 'कोपयुक्त ने शकुनी के सम्मुख जाकर पृध्रसयुक्त ताणाणों से ऐसे कठिन घायल किया जैसे कि पादुकों से बड़े पापीको घायल करते हैं। ४६ । वह बुद्धिमान उसको रोककर स्मरण करावा एमापोला कि सत्रियधर्म में निश्त और पूरा कर युद्ध करो ४७ हे मानी burled a dreadful spour at bmw but the latter, with a boile, et it down into three and its tured parts fell down wb caith like the bright lightning. 8-ong bis sp-ar brukun aod Shakunt wuuaded, your Warriors fled with him. The Puudavas raised tules of victory and your wartits burned their faces. The son of Mlades, seeing tbord dejected, checked thurn with thuusands of arrowr. 4. Then he found Shabani, with the powerlul hores of Gandhar, before him, and think say him to bo his own portioo, hemppused him with his car aaj twang. ed ha bow. He wounded Sbslun hand with fins arrows as do phatas are wounded with de 16. Hothon addred bimal . - 167012) Maaliharat (१२) प्रशिकणस्तस्य दुर्मने । २८ ॥ निहतास्त दुर माना ते मानहसने मुंगी बुयों धन कुलाना शिष्टस्य घार मानुस । ५९ ॥ भय ते निहनिमाम रेणा मागत शि वृक्षात् फलीभवारिक लगुडेन प्रमाथि ५॥ मुस्त्या महाराज महर्दयो हार । सक्रधानाशाईलो थेगेनीमिर्जगामह ॥ ५१॥ अभिगम्य तु दुर्घ सह दिवो युधानि विकायलरुवाप कोधेन प्रदहीनत । ५२ शनि दशििधया चतुर्भिधारप गाजा। छ। घनश्च स्थगि सिंहशानात्। ६३ । छिन्न धनुश्छा सददेवन सौपरेमा विश्व हामि सर्व मर्मर साय ॥ ५४!! ततो भूयो महाराज सहदर प्रतापवान् शफी प्रयामास शर्षि दुरासदाम ॥ ५५ ॥ ततस्तु कुम मुबलस्य पुणे मावापत सन विमहे । माखन जाम्मद पणेन जियांमुरकाभिपपात शीघ्रम" ५६ ॥ माद्र मुनस्तस्य समुछ। तपास मुवृत्ती जब मभा पाशके घर में जा तुम मप्तनहुये थे हे दुर्बुद्धि अब उस दुष्कर्म के | फन को देखो । ४८ वह सब, दुरात्मा तो मरेगये जो पूर्व में हमको सेथे प्रवास दुर्योधन के कुलो भस्म के ग्नाले प्रतिरूप तुम्ही मागे मामाजी शेपरहेहो । ४९। अब पुरसमे कोटेछो तेरे शिरको ऐने, जुद्राकरूगा जैसे कि,महार करनेवाली- लाठी से वृक्षका फल तोड़ो, है,। ६० । हे महाराज अत्यन्त क्रोधपृक्त बड़े पराक्रमी नरोत्तम सहदेवने इसप्रकार कहकर वेडे, वेगसे उसको घायल किया । 1 बडे, अजेय शूरवीरों के प्रगान क्रोधले जलते हुये महदेवने चलवान धनुपको बैंवकर १५४१ दशवाणों में शकुनीको और चारवाणमे उसके घोडों को घायल करके उसके छन मा धनुषको काटकर सिंहके समान गर्जनाकी ५३ । अर्थात वह शनी सहदेवके हाथ से टूटे धनुप,ध्वजा और छत्रवाला-कियागया और बहुत शायकों से सर मर्मस्थलोपर अत्यन्त घायल हुआ ५४ हे महाराज इसके पीछे प्रतापवान सहदेवने कठिनता से सहने के योग्य वाणों की वर्षा को फिर शकुनी के ऊपर किया । ५५ । तवतो अत्यन्त क्रोधयुक्त और युद्ध सुवर्ण से जटित मासके द्वारा | माद्रीनन्दन सहदेवके मारने की इच्छासे शीघही, भकेला शकुनी उसके पास Fight like a kshatrya and you will sưe the result of your, exultation at the game of lice in the court Chosz wiched men wb laughed at us ar slainrı -You are the only d strnyor of family uncle, Ishall now sever your hear from your body like a fruit,froni a Having suid his Sah dev; again wounded luio laid with his arrows Burning with the excess of anger, Sahadov, woun! ed Shahumi watli ten a rows and his borses syith four, and having cat down his bow be roared a le uino ir ir Slakuni's binner and uinbrella were severed and he say wounded on tbe vital pir 83, Thu el ous Salhnder again slhawered arring over hum 53. Then Shnl unt - 2. fllow: tree "50 .ni पात्या, Salya Pain (2013) कामु जी रणाने! मस्तिभिर्युगपत् सचानन द चालिरसममा तस्याशुकारी सुसमाहितेम मुगिन दृढ यसन । मलले ने सणातिनशिल शरीरात् प्रममा भव ॥ ५८ ॥ शरण कातस्मविभूषितन दिया रान मुसंशितेन हातमागायुवि पाण्डवन पपा भमो सरलभ्य एन. ।। ५९ स तच्छिरोधगयता शरे सुवर्णपुलेन शिलाशिनेन । प्रायेरवत् कुपित. पाण्डपथा यत्तत फुलणामनयस्य मलम् ॥ ६॥ कृतीतमा शनि समय मा शमन उधगईगात्रम् । योधार दीया भय नष्टसत्ता दिश अग्नुः गृहीतशस्त्रा. ॥ ६१ ॥ यिमता गुमुन विसंज्ञा गोण्डीधा सम ना भयाहिता मरियागांगा पदातयथैव स धार्तराष्ट्रा तो रन्कुिनि पातयित्वा मुदायितीमारत पाण्यt शेखान प्रदान सार प्रहरी सवा सनिकान हर्षन .१३ ॥ तम्बाति स प्रतिमपन्तो गया। ६६ । फिर माद्री पुत्रने एकनाथ तीनपलमे उसके उठाये हुने प्राप्त और मन्दरगोल भनाओंको युद्धके मुख पर कांटा भौर,वडे वेगसे युद्धभाम में उच्चावर स गर्नेनाकरी ६७ फिर शीता करनेवाले सहदेवते सुनहरी पुल हद शिलापम घिमेहुये सब कवच आदिसे पार होनेवाले श्रेष्ठति से चलायेर भल्लसे उसके शिरको शरीर से जुदाकिया। पटा सुवर्णसे मलकर सूर्य के समान प्रकाश मान अच्छकार चलायेहुये सादेवके वामसे युद्ध में कटाहुआ शिर पृथीपर गिरपहा । ५९ कोषयुक्त पहियों ने सुनहरी पुंख, तेनधार, वेगवान घाणसे सके उस कटेये शिरको बहुत दूरफेंका जोकि कौरवों के अन्यायका मूलथापा अपि शूरपोर उस टूटे और पृथीपर पहेहुये रुधिरमें लिप्तशरीर-मानी को देखकर भयत पराक्रमहीन होकर दिशाओं को भाग १६१-। शुकमुख अचेत और गारी धनुप शब्दसे विदाण भयसे पीड़ित हटे और पापलाय.पोड़े भार हाच बाले पदाती होकर दुर्योधन समेत भागे । ६२:1 हे मरतवंशी ईसके अनन्तरं रथसे शंकुनी को गिराकर प्रसन्नतायुक्त अत्यन्त, हर्पित अन्त करण और केशरजी' समेत सेनाके लोगों को मान्न करनेवाले पाएडयों ने युद्धर approached Silinder to dlny kim 'in-fois rare vith n pras" But Sahadev cut with tlırec arrows us upraised arms and tho roared with a loud roar, 1ken lo severed las head from his body Hith a very sharp arrow, capable of porcing through all armouis Cut asunder by Saladeva's s carp airum, Siakuni's load,full down of ourth, the enraged Pandava: hurled 111 head at a great diolanto at he was the ront of all oril 60. Yuut warriors so rng tub blond etted of Swahuni flolany in all directions. The firot soldiers, with pached moutls, insensible, tørrihed tith tho kounds of Gandır burr, triti broken cars aud sounded btA«t3, ran away with Dni yodhan >]lno ing remorod Suidh upi's body liom lille ihi, the choerful worriors of pras and (7014) Mahabharat: ...... (७१) या:धाणा...संहदेवमाजी दिया हतो 'कत्तिको दुरामा लामो वार रणे स्वति ॥ ६४ ।। .. .....इविवशल्यपर्वणि शल्पपपपर्वणि शकुन्तलू कवघे अष्टाविंशोध्यायः २८॥ :: AT८ . संजय उवाच। ततः कुशा महाराज सीबलस्थ पदागाः पिया जीवितमा कन्द पाण्डया पराग्यन् ॥ १॥ तानतुनः प्रत्यगृहणात् महदेवजय तः । श्रीम सेना तेजस्वी कुनामीविपदर्शनः ॥२म शक्त्यापासहलाना सदोष निघासताम। रुपमंकरोन्मोघं गाण्डीवेन पनपा ३ में संगृहीतायुधान् वाहून बोधानामभि शाखाको बनायो । तर सघ प्रमन्न लोगाने युद्धमें उस सहदेवकी पनन पूर्वकं प्रमसाकरी हे वीर यह छली और दुरात्मा शकुंनी मारग्घसी न समय रेहाय से मारागेया ३४॥ . 18gi - अध्याय ११।। संजय बोलो महारान इसके पीछे भाकुनी के कोपयुक्त साथियों ने जीवन का स्मारके पांडवों को चारपोरसे रोका। सहदेवकी वियम मनाचत अर्जुन और क्रोधयुक्त विष सर्प के समान दिखाई देवाला तेजस्वी भमिसन इन दोनों ने उन संब शकुनी के साथियों को रोका । २ । अर्जुन ने गांडीव धनुष के द्वारा शक्ति दुधारे सर्ग और मास हायमें रखनेवाले सहदेवई मारने के माँ लोप उन लोगीका. सका निष्फलकिया । और भल्लों से उन सम्मुख दौडने Elio Pandaraš pleseed Keshiav and others with 'thio blasts of their conche. They praised Sanidev, saying: "Itis by good luck that you bare slain deceitful and ill-natured. Sliakuni and his son.." Gt..more । SH :- . CHAPTER XXIX Sanjaya said, '**.Then tl'enraged companions of Shakuni; lenving all! care for life, checked the . Pandarus frumn'all sidex 'Trying to securo victory tv Sahadev; Arjun And' Bhim - checked. Shakuni's Followers. With luis Gandis' bow, Arjun made' futile the attenipis oruiche marriors desirous of Blaying Sihader with their weapons, and cultricir hmails with his dårtr, They fall dead in the ground and were on . १ शल्पपर्व Shalya Parv (7015) भावामा मलेबिच्छेद धीमान, शिस्यपि यानपि, ४ . हयाः, प्रायपयन यसुधा विगतालयः । सरता लोकधाराणा प्रता: साम्राचिना ॥५॥ ततो दुरंगों पारामा रमाशयलसंक्षयम् रतशेषान् समानीय कुसता विभो ॥६॥ कुजराधधिर पादान पल्तप । उपवासस्तिान साद घातराष्ट्र परः on समासाथ रगे सर्वान् पाण्डशन् समुहगणान् । पाचाल्पश्चापि, सबल रखा चीन निवसंत ॥८॥ तस्य ते शिरसा जपचन गुमदुर्मदाः । परयुपयु,रण,पार्या सब पुन शासनात । तानस्यापततः शीघ्रं तशवाम्म हारण। शराजीव कारे पाणः समाकिरन् । १०॥ तसैन्य भरतश्रेष्ठ मुहूसन महारमाभिः । यो ज्यतरणं माप वार नायविन्दत । प्रतिष्ठमानन्तु मयानावतिष्ठति दशितम् ॥११॥ मविपरिधापन्द्रिः सैन्येन रजसावृतः। न प्राधान्त समरे दिशा, प्रविशनणा ॥ १२ ॥ संतस्तु पासवान कानि:सत्य पहषो जनाः नन्, तापकान युसमा पाले शूरवीरोंके शास्त्रगरी भुजाओं समेत गिरों को भी काटा) ४। तब वह मृतक निर्जीव होकर.पृथ्वी पर गिरपड़े। उम लोकवीर घूमनेवासे भर्जुनके हावसे सब पारेगये। ५। इसके पीछे शत्रुभाका तपानेवाला : क्रोक्त पका-पुत्र:रामा दुर्योधन अपनी सेनाका नाश देखकर पाने से शेष बचे हुये बहुत से पहाची घोड़े, और पदातियों के समूहों को इकट्ठाकरके : उनमे यह वचन बोला कि युद्धमें पाकरा मित्र समूहों समेत पांडगे को और सेना समेत : पृष्टद्युम्न को:भी, गरकर शीघ लोटो।८। पद्धथे दुमद वासावार उसके वचनाको शिरस. अंगी कार करके पांखों के सम्मुख गये । ९ । पांडवों ने बड़े युद्ध में विपैले सर्प की सिमानाबानों से परने से शेपाहुये सम्मुख.आनालों को घायल किया । 11 हे भरतर्षभ एक मुहर्तमेंही वह सब सेना :युद्ध को ..पाकर महात्मामों के हाथ से मातगई और किसी अपने रसको नहीं पाया..वहशस्त्रधारी सना भयंभीर होकर नियम नहीं होतीथी । चारोंमोर-को दौड़नेवाले घोड़ों-कौनसे ज्याप्त दिशा और विदिशा नहीं जानागई।१२.इसके पछि पांडवीय सेना बहुत मनुष्यों ने निकल कर युद्ध एकमुहमरमही आपकी सेनाके लगेगोंकी-मारा है- मरत and all sl sia by Arjun's arrow, Then your enraged-pop, destroyer of focs, seeing the destruction of his warriors, rallied the elephant mon, borso and foot, and said, “ Slay the Pandaras and their 'Allios including Doriohtadyum. The warriors, obeying Duryodhoo faced tho Pandavon. The Pandavas wounded them with their darts liko ranormous serpents. 10, All that army werdestroyed by them in an instantDostitute of proteotors thog ran apay for fear, Eatólop.' ed with the dust raised by elephants the directions woro visible. Then many persons coming out of the Pandav army, sld your army and anpiluilated it. The olven als'uaulinis collected by -- - roti * ॥ (1016) it Malubarátt नादिय भारती नतो निःशेषममयत् तत् सैन्य नव भारत १३ मझौरिया समे तास्तु म पुत्रस्य भारत एकादशहा युर तभी पा संजयः गंजसमे ताप के पहात्म। एको दुर्योधनोराजनात"भृश भतः ॥ १५॥ तो वीक्ष्य दिशः मर्धा हा शंन्यान मेदिनीमा होमा सर्मयोश्चम घोक्षय संयुगे । १६ । मुदितान संगमानकाना समन्ततः वाणशन राय भ्राधा नेपामहात्मनाम'१७ दुर्योधनों महाराज पालनाभिसंतःअपने मनश्वक विनियल वाइम ॥ १८ धनगष्ट्र उवाच । निहत मार्गक सय नि शेष शिविर को पाण्डमामा घले र किन्ने रोग नदी निम्म छनों वह कुशक्षा पास सजा ॥ १९ ॥ यमन दुख्योधनों मन्दः कृतयोस्त नया मम विलक्षय तदा वाम पर पिवीपतिः ३॥ मजय'उचिरथानी सहन न मन लागे तानि च पनि नामहन णि पत्तानाञ्च शशी शतच्छमभद्राजा पाण्डवानां मादलम् 1पा गृप हि घटयुम्तो स्थितः ॥२२॥ एक RT शत भापकी मेना समाया होगई। हे प्रभु आपकेंद्र पुर्व बट्टी होनेपाली यह परिह असोहिंगो युदमें पाण्डव और मृजियों के हाथ से मानगईशा हे रोजी आपके उन हजारों महात्मा राजामों में में कयल अंकजा राजा दुर्योधन भत्ताधापन दिखाई पड़ा। इसके पोउ मंत्र. दिशामों को दिखकरनौर सेव शूरवारों में रहित पृथी' को और युद्ध में मन्ननाः कर्वक अभीष्ट प्रत करनेवाले चारोंमरिमे गननेपाल प्रांडों को देखकर मार उन महा साना के बाणों के शब्दों को सुनकर।।१७ दयाधन यूछा से पूर्ण हुमा फिर सेना और मारियों सहित ने इंटनाने में नित किया धृतराष्ट्र बाले हे मन मेरी सना मरने और डरों के खालोकिरनेपर पांडवों की सेना में, क्या शेषरहा और उसममय मेरेपुत्र प्रभागे दुयोधन ने सेना का नाश को देखकर अकलेनेही जो किया उमेकोभी कहो ३० सय बोले कि दोनार सातमागाचा पाचाजार घोड़ें और देश जार प्रदातो।। २ । यह बड़ी सेनाता पडिवोंकी वाकीगनिमको कि'धृष्टयम्न युद्धमें अलंकृत करनियाstat yours: in vere thus stain by the Paídavás and Srijngas: ''Prince Founded and hlivo out of the whole lot in all' directionë' arid" finding the field kwanging thoir; bowo, Därýváhản, with a fainting hesitantanded ta Mathrubhus all, warring and the Pándovag exultibigan jøy' and reponat. Diritráshtra said, IIaw many warries romainod with the Pandayas when all my army was destrnyod and die tenlis were compty Telling plac it was that my unfortunates son Diyodlari "did then. "Sinjaýa 'said, * 7'wu ghousands and seven hundred ele phants, live thousarid horse and ten thousand root werstucteine znames of this l'anuar Arnay Ted by Dhrish taūyumn.Princo-Daryodhan ... - . in tēraushalga Parv (17017))1 सष्टता दुर्गाधनों नपा गापश्यत् ममरे कश्चित् महायं गिनाम्या महामानान् पनि स्वसध्यान मक्षयम् । नयां हटवा महाराज कसा पृथिवी पानात स्त्रय मुत्सृज्य प्रमुखः प्रधद्रणा ॥३४दामादाय तेजस्वी पैदातिः प्रस्थिती इंदमें । मातिरं तनावी पीभ्यामेवा नराधिपः: सस्मार बनान मिशाल धीमनः ॥ २६ ॥ इदं न महापाका विदुरों दृष्ट्वान् पुरा: महद्वेग समरमांक क्षत्रियाणाञ्च लयुगे ॥ २७॥ एवं विचिन्तयनिम्तु प्रविविक्षहंदं ततः । दुःख सातादियो रट्या राजा लक्षणम् ॥ २८ ॥ पाण्डघापि महाराज दृष्टद्युम्नपुरोगमा: पक्षान्त समातिय राजन यलं प्रति ॥ २९ ॥ शक्त्यष्टिपासहलाना पलानामभि गाजताम् । मालपमेकरोन्मांध गाण्डायन धनञ्जयः ॥ ३०॥ तान् हत्वा निशिताण सामारया सावाधुभिः । रथे शतंय तिष्ठनिजुना बीमत ३१॥ सुचल रत भरतर्षभ, इसके पीछे धियों में श्रष्ठ अकेले राजा गाँधनने युद्ध में किसी माथीको लही देखा ॥२॥ है.महाराज उम अकेले राजाने उपकार गति ये शत्रुओंको प्रार अपनी सेनाक नाशको देखकर आपकाएंत्र दुर्योधन अपने मृतक घोडेको छाइंकायुदस की ओर भागा और बड़ी जम्बो अपनी गदोको लेकर हुदकोचला फिरपदल ही योडीदर जाकर उसने एसके अभ्यासी महायुद्धिमान विदुर जाक वचनकाम्माण किया। २.६ कि निश्चय करके पूनममय में बड़े ज्ञानी विदुरजाने.युम हमलोगों र अन्य सब भत्रियों के नाशको मानलिंग या २७ हरांजा वैद - दयाशन सप्तकार आधिक चिचाकरता हमें मवेश कग्जाने का प्रमिलापी सनाके लाप को देखकर शोक से महादःखी हुमा । २८ । हे महाराज राजाधृतराय इसके पाठ बहमन पाण्डव मजनका अग्रवती, वृष्टद्युस्न था. अत्यन्त कोषयुक्त होकर भापको सेनासम्मुखदोहे ::२९ । अनुन ने गाण्डीव.धनुपके द्वारा उन मन्व गर्जन लाले शक्ति धारा सहग और पामों को हाथ में रखनेवाले शूरवारों को सङ्कल्प निष्फल किया। उन सबको मन्त्री और वान्धेवा समत ताण,धारबान जागांसे मारकर शेत प्रोडबाल रथ पर अर्जुन पहुन , शामांयमान भी .. २१ ॥ fund lumsalr along without a "comrade Soring this great Opatrnction of tha 'nrmy and the 'epoming roaring tona. 'your Er Duryodhan,"Lott, his horroe, and went on font, tawiris the Eat He went towards Alska armed with his macr. " Go ward for some time, ho remembered the worde of wiso Viir. 26 Ho chor said to himself. : Surely wire Vidiur, knows of the great destruction of our artinies. " "Thus thinking. Durjrahat, intention entering the lake, was very, sorrowfal at the loss of his army Then All the Papdayas led by. Durish tadynoon, much enraged, rushed opt your frig, with his Gandiv bow Aijun made tailpild intentios.off.o arriors armed with various weapaine. *Having (7018 IT Mahabharat पुरे माजिरायपुरे महायनमिय लिग्नमभवसायबलम् ॥ ३२॥ मनशनमारने वले दुर्योधनस्यानाम्यो महायो राजन् जीयमानी व्यहरयन ॥ ३३ ॥ द्रोणपुत्रा से पीरातच कुत्तयर्मण । पाच गौतमाद्राजन् पार्थिवाच्च तवात्मवात् ॥ ३४॥ म्नस्तु मा रष्ट्या सन् सात्यकिमप्रीत किमनेन गृहीनेन नामेनार्थोऽनिजी । बता ॥३५॥धृष्टद्युम्नषच शुत्वा शिनेनंता मारय । उद्यम्य निशिनं सहा इन्तु मामुद्यतस्तदा ॥ ३६ ॥ तमागम्य महाप्राज्ञ कृष्णो द्वैपायनोऽवधीत । मुरूपता माणे जीपन्न हन्तव्य कयञ्चन ॥ ३७॥ द्वैपायनवचः शुत्या शिनता ताजाल, तिमी मामधीमा स्वस्ति सञ्जय साधय ॥ ३८ ॥ अनुशातस्त्वा तेन न्यलयमा निरा युध । प्रातिष्ट येन मगर सायाग्दे संधिरोक्षित ॥ ३९ ॥ फ्रोशमात्रमपाकान्त गदा पाणिमस्थितम् प दुर्योधन राजन्नपश्य मशषिक्षतम् पाणिमयस्थितम् ... पोड़े हाथी और रथोंसमेत सौबलके पुत्र शकुर्नाके मग्नेपर आपकी सेना टूटेये महावन की समान होगई । १२ । वीर अश्वत्थामा कृतवर्मा गौतम कृपाचार्य मोरा आपके पुत्र राजा दुर्योधन के मिपाप दूपरा जीवता हुमा कोई महारथी देखने में नहीं आया ।।४। फिर धृष्टद्युम्न मुझको देखकर हँसताहुआ सात्यकी से गोला कि इसके पकडने से क्या प्रयोजन है और जीवत हुये से भी कुछमी प्रयोगन सिद्धनहीं है । ३५ । तत्र महारथी सापकी धृष्टद्युम्नो वचनको सुनकर और तेनधार खड्गको उठाकर मेरे मारने को उद्युक्त हुयी । १६ तिर बड़वाने ज्यामजीने पाकर उससे कहा कि मज्जप को जीवता छोडा इस को कभी न मारना चाहिये।३७व्यासजीके वचनको सुनकर हाथ जोडके सात्यकी मुझको 'छाड़करे मुझपे यह वचन वोला । ३८ कि हे सज्जय तुम कल्याण का सीधन करो तर मैं उसकी आज्ञापाकर कवच और शवोंको त्यागार रुधिरसे भरा हुआ सायंकाल के ममय जिरी नगरयों उपाकी भोरको चलदिया एककोस हटाने का गदा हायलिऐ नियत प्रत्य न घायल शगेर मैंने राजा दुर्योधन को देखा है, slain them with their hinsmen and followers, Arjun lookeddi glorious' on his car drawn by white horses At the fall of Skikuni and Fis elephants and cars, your army loohed like a forest of broken trees. No warrior of your arıny wu living except Ashwathama, Kritvarma, Kripucharya and your yon Daryodhan, Looking at me, Dhrishta. dyumn sud to Satyaki with a smile. It is useless to keep him alive As a captive' On hearing the words of Dhrishtadyumn,' setyakı! was ready roelny nue with fuis sharp skord 36 Thern wise Vyaa interceded and told him to set me free alive. With joined palme, Satyaks released me, saying, You are fiee Sanjaya.' At this, I left arms and armour & id with blag iing body took the way to the city Alter walking a mile, I saw Daryodhan in 1119 blood stained budy holding luis mace in his hand, 40 With eya full of tears he - शल्यपShalya Parv (7019) सासु मापभूपर्णाक्षो न शक्नोत्पमिवीक्षितुम् । उपप्रेक्षता मा पा तदा दोगमवस्थितम् ॥ ४१ ॥ तवाहमपि शोचन्तं राष्ट्रका निमाये। मान माशक वक्तुं किश्चिदुःखपरिप्लुतः ॥ ४२- ततोऽस्म तदई । सर्वमुक्तवान मा तदा वायनप्रसादारुप जीवतो मोक्षमारमनः ॥ ३ मुहर्चमिक पयारवा प्रतिकार चेतनाम् । मातृव ससैन्यानि समपृच्छत मा ततः । ४४ ॥ तस्मै तद हमा स स प्रत्यदर्शिवान भ्रातच निहतान् सर्वान सैन्यश्च विनिपातितमः ॥ ४५ ॥ प्रयः किल रथाः शिष्टातायफानो नराधिप । इति प्रस्थानहाले मां कृष्णद्वैपायनोऽत्र पात् । ४६॥ सदीर्घमिव निश्यस्य विप्रेक्ष्य च पुनः पुनः । असो मां पाणिना स्पृष्ट्वा पुत्रस्ते पर भारत ।। ४.५ ॥ त्वदन्यो मेहसंग्रामे कधिजीवति सजय । द्वितीयं न हि पश्यामि समहायाच पाण्डवा. ॥ ४५ ॥ घूया. सम्प्रय रामानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । रोना उसप्तमप वह अवमों से पूर्णनेत्र मेरी ओर देखनेको समर्थ नहीं इसमकार दुःखी नियत मुझको देखकर वहसरहा । ४१ । और मैंभी युद्ध में शोच करनेवाले उस अकेलेको देखकर पड़े दुःखमे संयुक्त होकर एक मुहूर्त भर भी गालाप करने की समय नहीं हुआ । ४१। इस के अनन्तर मैंने अपने सब पकड़े जानेका तान उसने कहा और व्यासजीकी कृपास अपने नीवते हुपे झुटोन को वर्णनकिया । ४३ । इसके पीछे उसने,एक मुहूर्त ध्यानकरके सचेतता को पाकर 'भाइयोममेत सत्र सेना के लोगों को मुझमे पूछा । ४४ । तब अपने नेत्र से देखनेवाले मैंने सर वृत्तान्त उमसे कहा ' सर भाइयों का मरना और सेनाका नाशदानावर्णन किया । ४५ । हे राजा निश्चपकरके आपके तीनरची वाकी हैं यह हचम्ति घळते समय व्यासजीने मुझने कहाहै । ४६ । तब लम्बीश्वासा लेकर और पारम्बार शोककर उस श्राप के पुत्रने मुझको हाय से स्पर्शकरके यह वचन कहा Twiकि हे मप इन युद्धमें तेरे सिवाय अब कोई जीवता नहीं है यहाँकिसी मरे को नहीं देखताहूं और पांडव सहायतावाले हैं । ४८ . हे सञ्जय भव तुम | उसमानरूपी नेत्र रखनेवाले महाराज धृतराष्ट्र से कहना कि आपकी पुष दुर्गापन was bañlly able to look at wc and waited for my arrival. Sucing him along and in great distress, I romained tongue-tied for a while, and then I told him of my capture and release by the intercession of Vyas, bio regained consciousness after some timo and enquired about his brothers and warrior:, I told him of the destruction of all of them as I hd seed. 45. I told him that I was informed by Vyan that his three warriors hnd scaped destruction, doop sighs aud grief, Laving touched me with his hand, your sodo maid, (0, 8 jaya that none except yox is aliva i eco none on say sule, while thu Paudas as liavu friends. Inforna niy father that hit son lass entered the liko. Daititute of friends, bune and brother Then with 170207) viTalabhniat"HT २.) हुरोधमस्त सुनः प्रविष्टों सदगिस्युत ॥ ४९गी सहद्भिः स्वाहीहीनः पुत्र तृभिरेय पाच ते राज्य की जीत भाइश माझीया समिई मात्र मुक्त गाहयात् । मस्तिोयंहदे तुम जीत मिशेषिक्षतम् ॥ रामदा राजाप्राविशतं इदैनृप मस्तम्मयत तोयञ्च मायया मनुजाधिपः ।। ५२ ॥ तस्मिर गरिदे तु नीथान धातवाहनान् । अपश्यं संहितान करने में समुपेयुषः ॥ ५३॥ छ माहितं वीरं द्रोशिश्च रथिनां वरम् । मोजेञ्च कतरमाण सहिन शरविक्ष शान् ॥ ५४॥ ते सर्व मामभिक्ष्य पूर्णमयाचोदयन् । उपया येवमामधुरिष्टयां जीयति सम्म ५५ अपृच्छयष ते सर्वे पुनं तव शम धिपम मिचरोधनों राजा. स नो जीवति, साजयो :५६क्षिावधासवानह तेश्यस्तदा कुशलिन नपं । तच्चेष समाधयामा बुग्योधनाप्रीत ! हृदयघामाचक्ष में प्रविष्टा नराधा ॥ ५७॥ अश्यायामा तु तदानिशम्य वचनं मम । हुदै..विपुल प्रेक्षा...करुणे पण हदगें प्रवेश करगया.।। ४९ ।। उसमकारके मित्र पुत्र और भाइयों स रहितमा पांडवों से राजपहरण होनेपर मुझना कोन :मनुष्य जीवना रहता है । ईस, संब वृत्तातको और बड़े द्धमें से छुटाहुआ इस हदकै जलमें गुप्त अंत्यन्त पागल जीपमा हुआ मुझको कहदेना। ५२ हे महाराज .ऐसा कहकर वा उस बड़े हूँदमें, प्रवेश करगया वहां ह्रदमें जाकर रागाने अपनी माया से जलको नियत किया। ५२ । हृदमें उसके प्रवेश करजानपर मुझ अकेलेने उस स्थान पर आने के अभिलपी यकी सवारीवाले तीन रथियोंको देखा.१९॥ अर्थात् सारत कपा चार्य रथियों में श्रेष्ठ वार अश्वत्थामा, भोजवंशी कृतवर्मा, इनतीनों को बाणों से. घायल साथ २. मानेवालोंको देखा, ५४। उन सक्ने मुझको देखकर शीघ्रही घोड़ोंको चलायमान किया और समीप भाकर मुमते बोले कि..हे सज्जय सू: मारन से जीवता है । १५। यह कहकर सबने प्रापके पुत्र राजाको मुझसे पूछा कि हसनप बुद हुमाए राजाधित जीवता है. तब मैंने उसगजाकी कुशलताकही और वह मब वान भी उनसे कहीं ज़ो,दुर्योधननें मुझसे कहीर्थी और उस इदको भी बताया जिसमें कि राजा प्रवेश किये हुधा ! ५० । हे राजा अश्वत्थामा ने इस. मेरे and seprived of kingdohh by the Pandavas, what forson. ike rive our wish fur life, 50.. Tell him thuilt I havountered the false much wounded yet ulivo! Having said this has entered the lake and stopped tlio tinatiin of water 'by his osyn skill: When lohid onuzred water, :1 taw three warriors otuwing that way with tired leasts. They Kripacharya, Ashwathamu and Krityarua wounded with Arrows and coming together. They moved their horses fasip at the siglt of me and cuning clo a to me thøy beid, " It is by good luck that you are alive. O Sanjiya" 55 tuving said tliis, they voqyo ót of inte about your con, suying. 'Duryalhin alivery. Thone taja Limum ho vas alifu and reputol bsfore.ibelp the_jords of Dúrýodlian' ' Is our H ७१२१) साल्यपर्व,halyn Par 17021 देवयत । १८ । अहो घिन.स.जानाति, जीवितास्मान्न गाधिपः । पर्याप्ता दि वयं सेन सहयोधयितु परान् । ५९. ते तु तत्र चिरं फालं विलंय च म महारणाः।-प्राद । त.तु मां रपमारोपण कृपस्यमपरि ॥ ६१ तत्र गुलमाः हरित्रनाम तिच संक्षपम् ।। ६२॥ तता या महो प्रययुनार प्रति ॥ ६३ ॥ तत्र विकाश शब्दः श्रुत्वा तवलसंक्षयम् ॥ ६४ ॥ ततस्तु यापता राजन मान्दनया ध मुहुमुह फरव्य इव शब्देन नादयन्त्यो महातलम् Dोजानु, फरजेश्चापि पाणिमिध शिरांस्युन । लुलु चुध तदा केशान् क्रोशं न्यस्तंत्र तत्र । ६६ ॥ हाहाकारपिनावियो चिनिनाना उगास च मोशन्त्यस्त रुरुदुन्दमाना विशाम्पते ॥ १७ ॥ तनो दुर्योधनामात्याः सार्थकण्ठा मंशातुः वचन को मुनकर उस बड़े इदको देखकर दया से विलाप किया ।५८ कि हो शिकार हैराना इमको जीयता नहीं जानता है उसके साथहोकर इमलोग शत्रुओं से युद्ध करने को समर्थ हैं । ५९१ वह रधिया में श्रेष्ठ महाग्यी वही बहुत दरत विलापकरके और यु में पांडवों को देखकर भागे ६ मेग्नेसे बचेडुये पहे. सोनारथा पाचार्य के अच्छे अलका स्थपर मुझको देठाकर सेना के निवास स्थान में आप ६ वहां मूके अस्त होने पर भयभीत होकर सब गुरमा अर्थाद वृक्ष आपके पुत्रों का नाश सुनकर पुकारे ६२ हे महाराज इसके पीछे स्त्रियों के रक्षक हद मनु रानी आदि को लेकर नारको चले गया उस सेनाके नाशिको सुनकर पुकारती और रोतीहुई सब स्लिंगों के बड़े शब्द प्रकदईये । ६४ हे राजा बारम्बार शिन्द कानेवाले उन खिोंने करी पक्षीके समान अपने मार्च शब्दासे पृथ्वीको शब्द यमान किया ६५ ॥ तव जहाँपुकारती हुई स्त्रियोंने उंगलियों और हायसि अपनेरशिको पाटी और शिरोंके पालोको उखाड़ा हेरांजा वहां हाहाकार करके शब्द करनेवाली मौरे छाती पीटनेपाली शोचती पुकारती खिया रोदन करनेलगी 1.६७। इसके पीछे दुर्योधनके. अमात्य जोकि I pointed to the take"which the king had entered. Heiring my words and looking at the lake, Ashrathama wêrt'for griet, saging. It is pity that the king thinks'us duda" Accompanied by' lim, we city fight the foes." Those Warriors iwept long an I then fied away Pati Ithe sight of the Pandavas. 60.: 'Taking ims on their excellent ear, they came to the camp, whers at the closs of the dig all the trees were betrailiag tlie'ſato of yoursoas.' Then tho old guards of women accompanied this alan and other romen to the city and the women of tho city cried out iritti grief on licaring the newe.' Tlny sereamuri loko Kurri birds and billed the earth 'with thicie' worgs **65! - . " गय शीघडी नगरको नहीं। ७१ । मोर-गोपाल विपाल प्रादिकासा नगरकी. (7022) Malablarat (७२२ राजदागनुपादार प्रययुनगरं प्रति वेयासक्तहस्ताब दायध्यक्षा विशागते । शयनीयानि शुभ्राणिहर्यास्तरणयन्ति समादाय युस्तूर्ण नगर जनामिणः ।। ६२ । हपूर्धा या मारयों मास्क नापि वेश्मसु । दहशुस्ता महाराज जना यान्ती पर प्रति । तालियो मरतश्रेष्ठ सौकुमार्यसप्तन्विताः। प्रथपुनगरंतर्ग इतस्त्र, जनान्धवाः । ७२ . अ गोपाला विपीले यो प्रान्तो नगर प्रति । ययुम्मा संभ्रान्ता भीमसेसपाहिताः ॥ ७३ । अपि चर्ण भयं तीन पायें शोभूत मदारगम प्रेक्षमाणास्तराम्पोन्यमांवनगरं प्रति । तस्मितथा वर्तमाने वि भरी दाणे युयुत्सुः शोकसमूह प्राप्तकालमचिन्तयत् ॥ जितो दुर्योधनः सल्ये पाण्डबर्मामविक्रमः । एकादशंचमत्ता भ्रातरधास्य मदिताः ॥ ६॥ हतार्थ करणः सबै मोमो : सस: मिमेको विमुक्तस्तु भाग्योगोपswationagala मासु भों से मदद कम और अत्यन्त दुःखी ये रानी मादि को लेकर नगरको चलदिये हे राजा हाथमें तलिये रक्षक लोग और द्वाराध्यक्ष बहुमूल्प के उम्म अपनों को लेकर शीघ्र मासे नगरको गरे । ६१ महाराज जोलिया महलों में से प्रथम कभी सूर्य से भी नहीं देखाईयों उन खिों को पुर), आतेंडुप, लोगोंने देखा. भरतर्षभ वह कोमम शरीवाली लिया जिनके सजनामा मारे मोर दोहे भीमसेन के भयमे पीडित भोर भ्रान्ती से पुक्तं मनुष्य बने । उनको भी बड़ा असब और कठिनभय उत्पन्नहुआ तव परस्पर देखते हुये नगर. भी-मोर बोहे । ७१. इसमकार उस अत्यन्त भयानक भगोड़के वर्तमान पोनेपर FIRने समय के अनुसार विताकरी कि युद्ध में भयानक पराक्रमाले पायाने ग्यारह भदौडिसी सेनाके सामी योपनको विजयाकया उसके भाई माग और बहस कारणलोग जिनककिमी मीमऔर द्रोणाचार्यये बरभी मारेग में अकेला प्रारम्ध और ईश्वरकी इच्छासे वचाई : 1 ७७ । सब हेरे भाद 'The wooping women:beat their licado and tore their finit. They boat their breasts: and wopti with tears in thoir cyos and voice chokol with grief como to ino city, with tho quoil. The guards with starou 'in thoir, limods, and doorkoepers with oloin and precious bxls went in lasts to the city. Tho ro aun Tho were not to Lo scon even by the Sun in their palacy woro seen onturing the city by tho people.71. The, delicato Woidon W1090 kinsman wero sinin, came to the city in hnito. Tho comhords too, came back and loot thoir nonton by tho four of Bhim. They ran in terror towAnIs tho city looking at onclı otnor. During that general flight, Yuyut thnught in his mini, " Tha l'andata of realfal pruncus fiavo anqueros Duryelhon the owner ." Tho attendants of Duryodhan . (७.२३) 12998 Shalya Pary (7029), च सवाणि शिषिराणि समन्ततः । इतस्तत पलायन्ते इतनाथा इतौजसः७४ागर एपूर्ण दुःखार्चा भयव्याकुललोचना।हरिणा इव वित्रस्ताः प्रेक्ष्यमाणा विशो दश १४७९॥दुग्योधनस्य सविधायकॅनिदवशेषिताः।राजदारानुपादाय याक्षरं प्रति ॥ ८0 H प्रातकालमह मन्ये प्रयशं तैः सह प्रभो । युधिष्ठिरमनुहाप्य धामदेवं तथा च। एतदर्थ महाबाहुरुभयोः सन्यवेदयत् ।। ८१॥ तस्य प्राता मषद्राजा नियंकर वेदिता । परिवज्य महामायापुत्रं व्यसञ्जयत् ।। ८२ ॥ ततः स्वरथमास्थान दुतमशानवादेयत् । सम्पादयितांचापि राजदारान् पुरं प्रति ॥ ८३ ष सहितः सिमस्त गच्छनि भास्करे । प्रविष्टो पास्तिनपुर वारपकण्ठोभ्रलोचनः ॥ ८४ ॥ मर श्यत महामा विदुर नाचलोसनम राना समीपनिष्क्रान्तं शोकोपातचेतसम९५॥ समाधीत सत्पतिः प्रणतन्यप्रतः स्थितम् । मस्मिन् कुरुक्षये पत्ते दिष्ट्या व पुत्र बपिसि ॥ ८॥ विना राहः प्रवेशा किमसि स्वमिहागतःपतन्मे कारण सावित के लोग चारों भोर से भागे जिनके सामी मारेगये वह कान्ति शोमा गीत बिपूर्वरूप दुःखसे पाहापान भयसे न्याकुल चतु इधर उधरसे ऐसे भागते हैं कि पैसे कि सिंहसे भयभीत मंगादशोदिशाओं को देखतेत्ये भागते हैं. 1 ८९ ॥ दुर्योधन के भधान और सलाहकार जो कुछ बाकीरहे बह राजकी त्रियोंको कर नगरकी ओर दौड़े । ८० । हे प्रभु मैं उनके साय नगरमें पांच, मानाही समयके अनुसार उचित मानताह महावाह युयुत्सूने युधिष्ठिर और भीमसेनको मतवाकर इस प्रयोजनको प्रकटकिया। ८१ । सदेव दयावान राजा युधिष्ठिर उसपर प्रसन्न माता महाबाहुने मिलकर उस युवरमको विदा किया उसके पीछे उसने रपपर सवार होकर भीनही घोड़ोंको चलापमान किया और भागती ई रामविपाको पुरमें लेगपा । ३ । सूर्य के अस्तहोनेपर मांसुओंसे पूर्णनेत्र और गादकण्ठ | पुयुत्सू उन सबको सायलिये, शीघ्रही हस्तिनापुरमें पहुंचा । ८४ । और भाईनेत्र शोकसे व्याकुलपित्त वडेगानी गनाको और समीपसे निकले ये गिदुरनी को देवा । ८५ । बर सच्चे वाले विदुरनी उस नम्रीभून मागे नियत होनेवाले युपुरम से बोले हे पुत्र इस कौरवों के नाश होनेमें दम पारम्पसे जांबतेहो । ८५। of eleren akshsabinis. His brothers too are slain as well as tho Kaurayas who had Bhishma and Dronacharya for their leador. Tato has kept we alive.77. The people ran away from the tenta. Thoy whose relations were slain, in battle ran away like dvor terrifiad of lion. Tho rest of the advisors of Daryodhan went away towards the city with women. 80. To reach with them in the city ras the best cours; in soy opinion. Bravo Yusatsu bogkod leave of Yudhishthir and Bhim. 'Yudhishthir, who say ever kind hearted, allowed Yufalsa to go away. Yuyutsu mounted his car and soon brought the worden to the city. iWith eyes full of tears at sunsot, and roica chuked with grief, Yuyutan soan brought tbou to Hastlina Vidur saw hin much distressed and said, « You alone pur.
. .. (7024) Entehatihirat १७२४) रेण निवेदेष ॥२७॥ युयुत्सरशानिहते शकुनी तात सहातितधान्य शेष परीधारीरोजामियनस्ततःस्वकासाहयमुस्मृज्य प्रमुख प्राइवयात् ।।.८८.१ अपेक्रान्ते तु नृपता स्कन्धायारनिघशनातामययाकुर्शित सर्वप्रौद्रधनगरं प्रति॥८॥ {चाहनेसमारोप्यपध्यक्षाः प्राप्रपन् सहकेशवमन : प्रविष्टो हास्तिपुरं रमन लोकान् प्रधावतान् ॥९॥ एतत् श्रुत्वा तु पचनं श्यापुत्रेण मात्रित प्राप्तकर लिमिति झारा विदुरःसर्व धर्मवित् । मपूजयदयात्मा, युयुमुधाक्यकोधिवम् ९२॥ प्राप्तकालमिद सधै तो भरतनये । मारमिह विधानतः योभिगम्ता युधिष्ठिरम .१३॥ एतापरवा पचम विदुः सर्पधचित् । युयुत्सु समनुशाप्य तषिषण नृपक्ष पायुयुत्सुरपितामस्षिगृहेन्यषत तदा॥८४ातिइदप्रवेशपर्वणि एकोनतिशोध्याया; राजांक पहुंचने विना तू यहाँ यो माया है इस सब कारणका व्यारे समता मुझसे कि 16। युयुत्सुखोला "मरनेसे शेषावचेहये:परिवारका '. . . भयसे पूर्व की ओर भागगयाटी सेना के निवास स्थानके लोगगरानीक दूर चले नानेपर भियसेपाकुल होकर सब नगरको भाग ८९: । इसके पीछे प्रधान भरिकोरी पार नोकरचाकर लोगराजा दुर्योधन समेत सब.भाईयोंकी खियों को सवारया पर धेठोकर सेनासे भागे।'९०उसके पीछे मैं केशरजी समेत रामा युधिष्ठिर से पूछकर दौड़ते हुये मनुष्यों की रक्षा करनाभाहस्तिनापुरमें आया । युयुत्त के कहे हुये इस बमनको सुनकर सर्वधर्मश वड़े मुद्धिवान विदुरमा न युपुत्म की प्रशंसाकरी और यह वपन , हा ९३ कि यह सर्व समय के अनुसार है अब त यहां रहकर प्रातःकाल युधिष्ठिरके पासजापग: ॥३॥ मूभर विदुरजीने इतनी बात कहकर और युपत्यू से पूछकर राजमहलमें कया युयुल्स भी उस रात्रिको अपने घर में रहा। bare scaped from. general destruction of the 'Babravar s'oü loft'tlid 'king Löhinid?" Pray tell mo all that has happonad."*** Yuyutubsaid, "At tho fall.of Bhakuni and his followers, Duryodhan. left the rest of the Warriors and, rani away for fear.. Tho purple: Eleft hshind, ria' towards the city in consternation, १ . The principali sorvanto brought the tomon of Duryodhan and his brothers to tho, city:90: Toeked' por maission of Kashar and Yud'rishthis and lavar Pcome with tho returning mon, protecting them is the way." At this Vilar praised who lamano action of Yugalsa and said;" It was pro: . what you did, Rant horo for thio night and return to Yuálsúhtuir carly in tho morning" Huring lalkod with Yuyutsu, Vidar şulurned to tbopolaco with tears in his eyes, while Yugatsu.remained there, tortha night."942- . Wily lives ॥ । - शत्यपर्वSI niya Pary (7025) धृतराष्ट्र उवाच । हतेषु सर्वमेयेषु पाण्डुपुत्र रणाजिरे | म सैन्यायशिष्टात किमकुर्वत सजय ॥१॥ स्तरमा पश्चैव द्रोणपुरश्च वीर्यवान् । दुर्योधनध मन्दारमा राजा विमकरोत्तदा ॥२॥ मजय उवाच । सप्रद्रवत्सु दारेषु क्षत्रियाणा महारपनाम विद्रुते शिविर शून्ये मृशेद्विग्नाखयो त्या ॥ ३ ॥ निशम्य पाण्डुपुत्राणा तता विपिनांचनम् । विद्युत शिविर हष्टग सायाहने राजगृद्धिन । स्थान नारों यम्नेत्र ततस्ते इदमभ्ययु ॥ ४ ॥ युधिष्ठिरोपि धर्मारमा भ्रातृभि सहितोरणे । दृष्ट पर्यचरद्राजन दुर्योधनयवासया ॥ ५॥ मार्गमागास्तु सकुशास्तव पुत्र जयेषिण । चालतो वेपमाणास्तु पापश्यन् जनाधिपम् ॥ ६ ॥ स हि तीग्रेण धेगेन गदापाणिर पाक्रमत् । त इद प्राविशन्चापि विध:पाप स्वमायया ॥ ७ ॥ यशातु पाण्डया: ग़दापर्व अध्याय 30॥ धृतराष्ट्र बोले हे संजय युद्धभूमि में, पाण्डवों के हायसे मव सेनाके मरनेपर मेरी उन शेसाचीहुई। सेनामोंने कोनताकम किया । १ । उससमय पराक्रमी कृतवर्मा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और निर्बुद्धि रामा दुर्योधन ने क्या किया । २ । संजय बोले कि महात्मा क्षत्रियों की स्त्रियों के शीघ्र चले जाने भागनाने और डेरों के खाली होनेपर विजयके अभिलापी अत्यत व्याकुल सनिारथियों ने । ३ । विजय करनेवाले पाएडवों के शब्दोंको, मुनकर- और सायकालके समय हेरेको भागाभा देखकर वहां निवामको स्वीकार नहीं किया और वहां से चलकर फिर वह हदकेही समीपगये । ४ । धर्मात्मा युधिष्ठिर भी भाइयोंसमेत युद्धमें रसन्नचित्त दुर्योधन के मारने की इच्छा में चारोंऔर को भ्रषण करनेलगा। ५ । हे राजा फिर गत्वन क्रोपयुक्त आपके पुनके निजयकरनेके अभिलापी पांडच नसके सोजको करनलंगे विचार पूर्वक उपायसे दूदनेवालोंने राजाको नहीं देखा । ६ । वह बडे वर्गममेत गदाहायमें लेकर दूर चलागया और अपनी मायासे जलको रोककर उस CHAPTER XXX GADA PARV Dhritrashtra sald, ** \l bat did the rest of the warriors, who had scaped destruction from the Pandavas do ? What ad valisut Kirst | ivarma, hnpacharye, Ashwathama and foolhah Duryodhan do ?" San JAGA 41d, “When the women of the varnors had vacatod the tonts, tbe three warriors anxious for victory, did not like to stay there to hear the victorious cries of the Pandavas and to see their own camp deserted They went again acar the tank Yadhwahtuir tuo juat and hu brothers roamed hero and there in search of Daryodban. 5, Thon desirons of conquering your Bons, the Paoda vas went out in .
(7026) Mahabharat (७०२६) सधै सुपरिभात चाहना. ततः पशिविरं प्राप्य पतिष्ठन्तः । स सीनका ॥ ततः कृपध द्रौणिश्च कृतवर्मा व सात्वतः । सनिषिषु प्रयातेपुण्या तास्त इदं शनैः ॥ ९॥ ते तं इदं समासाद्य पत्र शेते जनाधिपः । अपमान्त र राजानं सुत्तमम्भसि ॥ १० ॥राजन्नुत्तिष्ठ युध्यस्थ सहास्माभियुधिष्ठिम्म जित्वा घा पृषिर्षी मुदध हतो धा स्वर्गमाप्नुहि ॥ ११ ॥ तेषामपि बलं सधैं रत दुग्योधनं स्थया । प्रतिषिदोश्च भूयिष्ठ ये शिष्टास्तत्र सैनिकाः ॥१२॥ न ते घेगं विपरिवंशका स्तष विशाम्पते । अस्माभिरभिगुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत ॥१३॥ दुरपोधन उमा। दिष्ट्या पश्यामि घो मुक्तानीहशात् पुरुपक्षयात् । पाण्डफोरषसम्माज्जीवमानाचं रर्षमान ॥ १४॥ विजेपामो घयं सर्वे विधाता विगतलमाः । मन्तश्च परिभाता पपञ्च मसपिक्षताः । उदीय बलं तेषां तेन यु न रोचये ॥ १५ ॥ न स्वतबद्धतं हृदमें प्रवेश करगया । ७। जब सब पांडम बहुतकी सवारीवाले हुनेवारे को पाकर अपनी सेनाके लोगासमेत हेरेमें नियतहुयोराइसके पीछे कृपाचार्य,ममत्थामा पाण्डवोंके डोमें प्रवेशकरने पर बड़ी सावधानी और अलवतासे उसइदके १९पासगये उन्होंने उस हदको जहाँपर कि राजा सोचाया पाकर।१०। मनमें सोने वाले अजेय राजाटुर्योधनसे कहा कि राजा उठो हमारेसाय होकर युधिष्ठिरसे युदकरो 1१॥ौरउमको विजयकरके पृथ्वीको गो अथवामृतकहोकर स्वर्गको पावोरदुर्योधन तुमनेभी उन्होंकी सब सेनामारी । १२ । और वहांजो सेवाकेलोग वा उनको अत्यन्त घायल किया हे रोजा पहभापके वेग सहनेको समर्थ नहीं है। जवा तुम हमपे रक्षितहोकर लड़ोगे हे भरतवंशी इस कारण से भाप उठो तर दुर्योधन बोला कि मारन्धसे इसमकारके पाण्डव और कौरवों के मनुष्यों के नाश होनेपर युद्धमे पचे। ५। और जीवतेहपे गम नरोत्तमों को देखताई विभाम करनेवाले और पकावटसे रहित हमलोग सब मिलकर चित्रयोरेंगे आप थके हुये हैं और हम अत्यंत पापळ है भार उन्होंकी सेना वही इससे युद्धको स्वीकार नहीं करता । १५ हे वारलोगो •या अपूर्वगात नहीं है मो Bearch of him, but they could not find him. He had gopo away for, orwed with bin maco, and entered tho lako altor stopping the motion of water with his skill. Tho Pandayag much tirad, returned to their camp. Kripacharya and Ashwatham appruachod tlo lake unnoda by tho Pandavas Finding Duryodhınn withio valor, they said to fun,.'' Rive up, king, and coins with to the field of battla 11. Conquer him torule over the carth or to'gaic hcaren aſtor death You Loo havo dostroyed a great portion of their ariny. Tho rest of their grmy in m'ich worded and can no longer withstand your volocity, scu trill lend s to fight Then be up and doing." Duryodhan naid, "It is by good luck that Iscoyon safe after the great destructs (७०२७) शल्यपर्ध Shalya Parv (7027 धीरा यो महाविद मनः । अस्माल परा मतिर्न तु फाल. पराक्रमे । १६ । विश्रा म्यका निशामध' भवद्भिः सहितो रणे। प्रतियोत्स्थाम्यां शन प्रोन मेस्त्वत्र संशयः ॥ १७ ॥ सम्जप उपाध ! एषमुत्तोप्रवीद्रोणी राजानं युद्धदुर्मदम् । उसिष्ठ जर मदन्त घियामो रणे परान् ॥ १८ ॥ रष्ट्यापूतन दानेन सत्येन व अधेम नाशपे राजन् यथा बच निहनिम्यामि सोमकाद॥१९०मा स्म यकृतां प्रीति मार्या सबमोषिताम् । यदीमा रजनी घुष्ठान निहन्मि पगणे ॥ २३ ॥ नाहत्या सर्व पाशालार विमारय कवचं विमो । इति सत्पं नवीम्पेतन्मे घणु जनाधिप ॥ ११ ॥ तेषु सम्बापमाणेषु पाधास्त देशमाययुः । मोसमारपरिश्रान्ता: पानीपाय याचा ६,२२ ॥ ते हि नित्यं महाराज भीमसेनस्य लुम्बकाः । मांसमारानुपाजहफ्त्या पर मषा विमो ग२३ ते तत्राधिष्ठिजास्त सर्व तद्वचनं रहः । दुर्योधनयमेष शुभः तुम्हारा चित्त बड़ा उत्साहयुक्त है और हममें बड़ी सामर्थ्य है परन्तु पराक्रम का 'समय नहीं है । १६ । भर मैं एक रात्रि विश्राम करके आप लोगोंके साथ प्रात काल के समय युदमें शत्रुमों से लडूंगा इसमें मुझको संशय नहीं है ।१७. संजयवोले कि इमकार दर्शनके वचनोंको सुनकर अश्वत्थामाजी उस युद्धदुर्मद राजासबोले राना उठो माहोप हम शमुओंको विजयकरेंगे । १८ । हे राजेन्द्र प्रत्र में यह वा वावड़ी आदिक सकर्म दान सरसता और विजपकी भापय स्वसाकि में सोमकों को मारूंगा । १९ । में. या करनेवाले सज्जनों के योग्य फलोकोको नरी पाऊजो इस रात्रि के व्यतीत होनेपर युद्धमें शत्रुमोकोनहींमारूं।२०। हेसमर्थ सब पांचालोको रिनागारे ये कवचको नहीं उतारूंगा पा तुमसे सत्प २ कह बाई राना उसको मुझने सुनो । २१ । उन्हों की वार्तालाप करनेकी दशा में मासके भार से पहुये पिक लोग से उस स्थानपर पाये,। १२ । हे सपर्यं महाराज नह बाधिक सदर बड़ी भक्तिपूर्वक मांसों के भारोंको भीमसेन के पास सातेथे ॥२॥ परस्पर मिनहुये और वहाँपर वर्तमान होनेवाले धन वपिकोने एकान ion of the Kauravas and Pandares. You can win thom to doubt Wo are yet mock tired and rounde 1 and they were alill winy tvar. Iriors ia their army. I therefore am not prepared to fight. It is no wonder that you still desire to fight; but though we have puller, think it is to time to show our pruwe48 17. Having rested one night, Isball with you to fight with the foes." Sanjays said, • Having heard the words of Daryodhan, Ashwathamsagun said, "Hire up. king, we shall yet win. I swear by my goud doods that I shall destray the simixs. 20 May I not get the fratt of my good deeds, it I donot slay the kyes at Sunrist. t shall never put off my gran sur without slaying theto." While they wala thus talking together some butchere passad tirut 114g. They always supplied mert - go 1-1-7028---- -Mahabharat 1७०२८) बजता मिथ ॥ २४ ॥ तेपि म महेण्यामा अयुदार्थिात कौश्य नियम परमय स्तदा चै पुनकाक्षिण ॥ २५॥ तौस्तयों समुदाय कौरवाणां महारथाम् । अयु बमनसम्चैध राजान स्थितमम्मसि ॥ २६॥ तेषां भ्रन्या च संघाद गंग सलिले सतः । व्याघायजानन राजेन्द्र सलिलस्य मुयोवनम् ॥ २७ ॥ ते पूर्व पाण्डुपुत्रेण पृष्टा ह्यासन मत तघी यहागात गजानं परिमार्गात पुत्रम्प स्मृत्वा तद्भाषित तदा । अन्योऽयमनुषमाजम् मृगव्याधी. शनैरिदम् ॥१९॥ दुर्योधन पापयामो धन दास्पति पाण्डय सुम्पतगिह न रुपातौ दे दुर्योधनो नुपः । तस्माद्गडामहे सर्व पर राजा युधिष्ठिर । मापातु 'सलिले मुने दुर्योधनममर्पणम् ॥ ३॥ धृतरष्ट्रिात्मज तस्मै भीमसेनाय धीमने । शयान' सलिली संघे कयामो धनुते ।। ३२ ॥'सनो दास्यति सुप्रीतो धनानि पलायुते । किना तमें उन्होंके संघ वचन और दुर्योधनके वचनोंको मुना । १४ । तब कौरवक-युद्ध से अनिछावान होनेपर' उन सब युद्धाभिलापी चहे. धनुपधारियोंने भी युदक निमित्त बड़ा हैठकिया | २५॥ हे राजेन्द्र उन वधिकों ने कौरवों के उन महाथियों को उसमकार देखकर और युद्धसे अनिन्छीवाने हृदमें नियत राजाको जाजार । २६ । उन्होंकी और जल में वर्तमान राजाकी वार्तालाप को सुनकर जल, निपत दुर्योधनको जीना । २७ । दैवकी इच्छा से समीप मे उन वधिको से राजा के खोज करनेवाले पाण्डवों ने पूछा आपके पुत्रको । २६ हे राज तम वह मृगोंक मारनेशले पाण्डवों के वचनको स्मरण करके परिपने से पह बोले । ३९ । कि जो हम दुर्योधन को बतादेंगे तो पाण्डव इम को धन दो राजा दुर्योधन इस जल में गुप्तहैं इस हेतुमें हम सब उम जलेमें सोनेवाले कोयुक्त दुर्योधन के प्रकट करने को वहाँपर चले जहाँ पर कि राजा यधिष्ठिर है ।। हम सब इस जल में सोनवाले धृवराष्ट्र के पुत्रको उस घुद्धिमान् धनवान् भीमसन से वर्णन करें। इस बातको 'सुनकर 'अत्यन्त प्रसन्नचित्त वह भीमसेन हम to Bunu. They heard thore conversation by chance, while they were instigating Duryodhan to fight 25 Syeing the Kaurava sarriors“there talking with Duryodhan who was then unwilling to fight they kñow the latter, to by'luidden in the taol. 27 The butchero fiad beon'ques ? troned by tho Panduras about your son They remembered thoso words and sad gontly with one another, " Tha Pandavas will gure ush imraonso włalth or our giving them an information nbout Duryodhan, who in lying here hid len in the tank, Let us go away to unfortu We shall intorm Wis: and wealthy Bhim of the whereabouts of Duryodhon and ho will give us immense wealth Why should we trouble murulves about getting more flesh” ing tlus courted tohurtlovy Kent with lords of flesh to the camp परस्परम Yudhish tlsur 31 Inv- (709) Gods Parv गदापर्व मसिम शुरण परिफिलटेन शोषिणा ॥ ३३॥ एषमुपरवा तु ते व्याधा. समाराधना पिनः ।मासमारानुपादाय प्रत्युःशिषिरं प्रत ॥ ३४ ॥ पाण्यापि महाराज लम्प, यस्याः प्रहारिणः भपरपमाना' समरे दुख्योधन उपस्थितम् ॥ ३५ ॥ निकस्तरय पारस्पते पारं गमनेप्सः । धारान् सेषयामामुः समन्तातद्रणाजिरे ॥३६॥ अगम्म सत. सबै मष्ट दुर्योधनं नृपम म्यवेश्यन्त सहिता धर्मराजस्य सनिका ।।७।। सपा तहषनं श्रुत्वा चाराणा भरतर्षभ ।चिन्तामभ्यागमतीमा निशश्वास व पार्थिव ३८पस्यिनावानाना पापडूना भरतर्षमातस्माद्देशादाक्रम्य त्वरिता लुब्धकाविमो माजग्मुशिविर या दृष्टा दुय्योधन नूपम् पार्यमाणाः प्रविष्टाव भीमसेनस्श पातः ॥ ४० ॥ ते तु पाण्षमासाघ भीमसेन महाबलम् । तस्मै तत् सर्षमाचल्युप पर पवे श्रुतम् । ४१॥ ततो वृकोदर राजन् दश तेषा धन बहु । धर्मराजाप तत् समाचक्ष परमपः मसौदुर्योधनोराजन विशातो मम धके । सन्तान को पास धन देगा हम को इस सूखे और भाषात से उत्तम कठिन मांस से क्या म। तत्र अत्यन्त प्रसन्नविस धनके अभिलापी यह वधिक इस प्रकार कहकर और माम के धोनों को लेकर डेरे में गये। ३४ । हे महाराज सापको मात मारकर्चा पुद में नियत दुर्योधनको न देखनेवाले । ३५ । भौर उसपापीके, छळके पन्तए मचनेके अभिलापी उन पांडवों ने भी उस युद्धभूमिमें चारोंओर दूतों को भेजा । ३५ । उसके पीछे धर्मराजकी सब सेना के लोगों ने एकसाथ भाकर दुर्योधन का गुप्तहोना वर्णनाकया हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ राजा ने दूतों के उस पचनको मुनकर कठिन चिन्ता को पाया और बारम्बार मामालपा । ३८ । हे भरतर्षभ समयं धृतर इसके पीछे शीघ्रता करनेवाले षह वधिक उस स्थानसे चलकर दुःखीचित्त निपत होनेवाले पांडवों के डेरे को आये और राजा दुर्योधन को देखकर प्रसन्नचित्त मार रोके हुपे भी भीमसेन के देखतेहुये प्रवेश करगये 1४९ । वहां उन्हों ने बड़े बलवान पापडत भीमसेनको पाकर वह सब वृत्तासमो पहां मुनाया भीमसेन से कहा । ४ । हे राजा इसकेपीछे शत्रु के तपानवास भीमसेनने उन्होंको बहुतसा धन देकर वह सब वृतान्त धर्मराज से कहा कि रेरामा उस दुर्योधनका पता बधिकों के कहने से मुझको विदितहमा I be good Panday marksmen, nt brag able to find out Duryodhan and desirous of makivg an end of his enmity, sent their spies in search of him. 36. The warriors informed Yudhishthir that they could not And Durypdlian and the king was very anxious to bear that now! Ho ugbed again and again In the meantime, the butchers came to the Panday camp and full of jog at finding out the whereabouts of Daryo dhao, they entered the camp, paying to lied to the watchmen's contence. 40 Then they say brávelBbia and told bim what they had beard, Blumn gave them a rich reward in return and Id to ३ !
17030 . 16 Mahabharat सलिल शेने यस्याएँ परितस्थ ॥४३॥ स्वचो भीमसेनस्य प्रिय युवा विशाम्पते । अजातशत्रु गेल्यो वास्तु सह सादर । ४४ ॥ सच भुरवा मरेमा प्रति सलिल इदम् । क्षिप्रमेव ततोऽगच्छत् पुरस्कृत्य जनाईनमः ॥ ४५ ॥ तत मितीला शब्द प्रागसीद्विशाम्पते। पाण्डवाना प्रहदाना पाञ्चालानाश्च सर्वश... । सिंहनदासता वेडाम मातमा रिता क्षत्रिया गजन अग्राम राम ॥४७॥ हात पापो धार्तराष्ट्रो अधपसणे । प्राकोशन सोमकास्तक एका समन्तत ॥४८॥ पामाशु प्रपाताना रयाना तत्र गिनाम् । बभूव मुल. दिवरपृक पृथिवीपते ॥ ४९ ॥ दुर्योधन परप्सन्तस्तत्र तत्र युधिष्ठिरम् । मन्यु रिताले 4 राजान धातवाहना: ॥ ५९॥ अर्जुनो भीमसेनच माद्रीपुत्री र पारो। घष्टषुम्नश्च पाश्चात्य शिस्त्रण्डी चापराजित ॥५६ ॥ उत्तमौला युधामन्यु साल वह जल को स्थिरकरके सोता है जिाके लिये अप दुख मानने से । ४३ राजा वह कुन्नीका पुत्र अनावश युधिष्ठिा भीमसेन के उस मियवचनको सुनकर | सगै म हुपों समेत बहुत प्रसमहुआ । ४ । इदके जलमें मवेप करनेवाले अनुपधारी उस दुर्योधन को सुनकर श्रीकृष्णजी को भागे करके शीघ्रता से वहां पहूँचे । ४५ । और अत्यन्त प्रसन्न सप पाण्डव धौर. पातालों के कलका शन्द प्रकर हु।। ४६ । हे भरतर्षभ इसकेपछि सिंहनाद और दिको भी किया रे राजा साधना करनेवाले क्षत्री व्यासजी के हृदको गये। ४७ । वहाँ अत्यन्त मतपत्ति सोमा युद्ध में चारोंओर से वारम्वार पुकारे कि पापी दुर्योधनको मानलिया और देखाहै । ४८। हे पृथ्वीनाय वहां उन शघ्र चलनेवाले रेगवान रपियोंके कठिन शब्द स्वर्गको स्पर्श करनेवालेहुये । ४९ वह थकी मबारीबाले दयोधन के चाहनेवाले वटी शीघ्रता करनेवाले क्षत्रा जहांतहा राजा युधिष्ठिर पीछे पसे 1 ५० अर्जुन, भीपमेन, पाण्डव नकुल, सहदेव, पांचालदेशका गमा पृयुम्ना अजेय शिखडी । ५१ 1 उत्तमौना, युधाम यु, महारथी सात्यकी और को पांचों Yudhishthan hatho Lattles lrd bronght lim vews of Duryodhan, and 11 att alattor, tlie c buee yl 10 tuuch anxiety, was sleep ng uodor water wheb llu lind mode motionless, Yndhishthur and his brothers werp much paud to hear the charahed nerys brought by Bhim Heaſe g tuat Dury olban hid entered the lake, thia Panduras led by Buri hrisha, hastaned to tho pluco and a great od 50 mg beard of tho Pandavas and Panchals near the lalo of Vyas as they approached it. 17 Tha ateerful Somaks raised war crieg saying, “ We have found out sinfal Dnryodhan Tho noro irons th : car-warriors rong in The hal itryas, trith tired Brass leitolls of me? Daryo. dhan llamad Yurdushtbit' in baste Arjun, Bhiu, Nahal, Boladlısa, Dhristoly ann the princ0 of Panelinle, in rihaillo alikhandi theor 50 (७२३९ - - (7031) Gads Parv महापर्व जियारपः। पावालानाबा दीपदेयाश्च भारत सोनगाध धत पदातर ॥५२॥ ततः प्राप्तो महाराज धर्मराजः प्रतापगन् हिर शांत या शोधनोऽभव । शीतामलल दृय द्वितीयमिव सागरम् ॥५३॥ माया सहिलं न प्राभूते स्ति. मुं. मस्या विविता देवयोगे। भारत ॥ ५४॥ सलिलागत. ते दु. कस्यचित् प्रभो। मानुष पुगेन्द्र गदाहलो जनाविप ॥ ५५ ।। ततो दुग्योधनो राजा सलिलान्तर्गतो पसन् ।, शभुवे तुमुल शब्द जलदोप मनिस्थानमा ५६ ॥ युधिष्ठिरस्तुं राजेन्द्र त हासा सोदरे । आजगार महाराज तप पुत्रवणाय घे ॥ ५७॥ महता शंखनादने रयनेमिस्यनेन च। अघ.महारण कम्पवापि मेदिनीम ॥ ५८ ॥ यघिठि सेयर त्वा शब्द महारथी: । छत वर्मा कपो द्रोणी राजानामिदमयुग्मं ॥ १९ ॥ इमे यायादृष्टा पाण्डया' जितका के शेष रथी ये वह भौर द्रौपदी के पुत्र सम घोड़े हाथी और सैकड़ों पदाती पारुपले १५२ । हे महाराज इसके पीछे मनापान धर्मराज व्यासनीक उस घोरदपर पहुँने जिसमें कि दुर्योधनया और जो कि शीतलना युक्त निर्मल जलसे पूर्ण रहा पिए हुद धनो मागरके समान था । ५३ । जिसमें प्रापका पुत्र मायासे अमको रोककर नियतया,हे भरतवंशी वा वडी अपूर्व घुद्धियाला भार दैवयोगसे ५४. जल के मध्य वर्तमान शूरवीरोंका मारगेवालाया हे प्रभु महाराज धृतराष्ट्र वह गदाधारी राना दुर्योधन किसी मनुष्यकोभी मिलना असंभवथा । ६५ । उसे के.पीछे जलके में वर्तमान रामा दुर्योधनने वादलोंकी गर्जना के समान कठिन शम्दको मुंना । ५६॥ हे राजेन्द्र महाराज फिर रामा युधिष्ठिर अपने सगे भाइयों समेत आपके पुत्र को मारने के लिये उस हृदपर आये ५७ ।' सिके और स्थनेमियों के बड़े शब्द समेत बड़ीधूल को उठाते और पृथ्वी को भी केपायमान करत मापहुँचें ॥५८ महारथी कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा युधिष्ठिरकी सेनाको देखकर राजासे यह वचन बोला५९कि अत्यन्त प्रसन्नचित्त विमयसे शोभा पानवाले यह सप पांडवातेहैं तबतक ईमका अपभाज्ञादें कि हम यहसि हठनायादा Uttamauja, Yudhamanga, braro Satyakı and the rest of the Pancha) warriors, with the song of Draupadi and elephants, hors s' and foot, by thous ånds, followed the Glorions indhishthir thua Approached the lake of Vyds in which Duryodhra lay hidden and which was full of clear and cold water like a second ocean. 53, Your got had inäde its waters mntroplees by his art and crept withid That destroyer of foes, of extraordinary wisdoti, arnhed #itfi qunce, Duryda dhjan had made huweelf in disible to all men 55 Hudiu aithin the Waters of the lake Diyodban heard the thunderne de of the frarriors of Yu lioshthur, with his brothers d sirous' of slag*ng your मध्य -- (७०३२) Mahabharat (7032) शिन । अपयास्यामहे ताथदनुजानातु नोमषार ६॥धुयोधनस्तु सत् श्रुत्वा तेषां तत्र तरस्थिनाम् । तथेत्युक्त्म हद तं वै माययास्तम्भयत् प्रभो ॥१॥ ते त्वनुशाप्य रामान भशं शोकपरायणा । जगतुरं महाराज कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६२ ॥ ते गोपी प्रधान न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष । पविशन्त मृशं श्रान्ता चिन्तयन्तो नृपं प्रति ॥ ३॥ विष्टाय सलिलं मुप्तो धाराष्ट्रो महाबलः । पाण्डपाश्चापि संप्राप्तास्तं देशं पुर भीप्सः ॥ ६४ ॥ कथं नु युस मषिक्षा कयं राजा भविष्यति । कथं नु पाण्डवागर प्रतिपास्यन्ति कौरवम् । ६५ । इत्येवं चिन्तयानास्तु रथयोश्वान् विमुच्यते तमा साम्चक्रिरे राजम् रुपमभृतयोरयाः ॥६६॥ इति भी शल्यपण हृदपवेशपणि दुर्योधनान्वेषणे त्रिंशोध्यायः ॥ - 1 प्रभु तब उस दुर्योधन ने उन धेगवानों के उम वचनको सुनकर और मात मछा कहकर माया से उस जलको रोकदिया । ६१ । हे महाराज फिर से पूर्ण कृपाचार्य आदिक रथी राजाको पू कर दूर चलेगपे । १२ । भेटमा arti दर मार्गपर जाकर एक वटके बसको देखकर अत्यंत थकईये रामाके विषय में शोचते निवासीहुये । ६३ । बड़ा पसवान् दुर्योधन जलको रोककर सोयी और पदके अभिलाषी पांडव भी उस पानपर पहुँचे । ६५ । किस प्रकार सांगा और कैसे राजाहोगा बार कैसे पांडालोग उस कौरव दुर्योधनको पायेंगे । १८ । हे राजा इसप्रकार चिन्ता करते उन कृपाचार्य मादक रायेयोंने रयोंसे घोड़ों को रार वहां निवास किया'१६ ॥ ison, cume uporn the brink of the lnke. raising a storm of dust, makingi i tremondoda noise with their concha and car wheels and shaling the earth. Brave Kritvorm., Kripacharya and Ashwathama, seeing the aring of Yodhishthir coming towards thom,, said to the prince, The victorious l'andavas are coming cheerſally this way. Give us there lore perinission to retire to somo other place." Daryodhan heard their words and replying in the affirmantire, again made the watora motion lers ol. Kripacharya and others, having got the king's permission. removed thomselves far from the pince and at od under the shade of banyan tree, dejected and caroworn on ecosant of Duryodhan. The uttor lay under the motionlesy iraler, whilo the Taniloror reached there Kripacharya and others rested under the tree, thinking about thc was, the stato of tho king and the pro ibilty of the Pandavas fiod. ing him, " 66.
4 [४] Gailx Parv one (708) सम्जप उगाच । ततस्तेवपयातपुरयेषु त्रिषु पारा तर प्रत्यपरत यत्र दुवोधनोऽमष १॥ मासाच घपुर धेष्ठं तदा दैपायन इदम् । स्तम्मित पार्न राष्ट्रेण स्वातं सलिलाशयम् । वासुदेवमिदं पापमापीत फुरनम्वनः । पश्येमा पारराष्ट्रेण मायामासु प्रयोजिताम् । पिएम सलिलं शेते? नारय मानुषतो भयम ॥३॥दयों मायामिमां कृत्वा सललागतोयम् । निरपा निकृतिप्रमोन मे जोवर विमोपतपस्प समरे सधं कुरते वनभूत स्वयम तथा इतं युई डोका पति माधव ५॥ वामदंध उवाच । मापाविन इमां माया माषया जात भारत । मायापी मायया..अभ्यः सत्यमेतयुधिष्ठिर ॥ ६ ॥ क्रिपाध्यामिमायाम. मुप्रयोयलस्विं भरतभेष्ठ मायामाने सुयोजनम् ॥ १॥ क्रियाभ्युपारिन्देश निता देवदानवाः । शिपायणायेभिलियो महारRATE क्रियायुपा मिरपा महासुरःहिरण्यकशिपुव क्रिपया निमुदिती महतो 1. अध्याय ३१॥ समय बोले कि इसके उन तीनों रथियों के दूर चलेजाने पर उन पांडोंने बप्त हुदको पापा जिसमें कि दुर्योधनया ।। १ । कौरवों में श्रेष्ठ तब दुपयोपनसे अपल कियेहुये उसव्यासहदको और "जलमें सोनेशले राजाको देखकर कौरव मन्दन युधिष्ठिर वामदेवजीसे यंडवचन बोले । दुर्योधनकी जलबें संयुक्तकी हुई इस मायाको देखा कि जलको रोककर मोताद इसको मनुष्य से भयनहीं है। इस देवीमाया को प्रकट करके करके मध्य में वर्तमान छल संयुक्त वादे कारखनेवाला यह नुयोधन मेरेहायंस अब जीवताहुआ नहीं वचसक्ता । जो माम अजधारी युदमें इन्द्रभी इसकी सहायता करें तौभी हेमांधवजी पदमें इसको सपलोग परामादेखेंगे ।।.वासुदेवजी वाले कि भरतवंशी मापारनेवालेकी इस:माया को मायाकेही द्वारा नागकरो । आयात्री. पुरुष मागाके द्वारा मारमे के योग्य है हे युधिष्ठिर यह सत्य है कि यह राजादुर्योधन बहुत उपाय और कर्मों के द्वारा जलमें मामाको संयुक्त करके सोताई। ७१ हे भरतर्षभ तुम इस मापात्मा माद छलीशोमारो इन्द्रने भी कर्ष और उपायोंके द्वारा देस्य और दानवों के CHAPTER, XXXI Sanjayn said, " When the three warriors bad remored themselves far away, the Pandavas came upon the laks in which 'Duryodhan lay bilden, Finding the water motionless and Duryodhan-lying down under it, Yadbishthir said to l'asodoy, "Look at the water made motionless by the art of Dargodban, who is sleeping within tree from all danger of human beings. Deceitful Duryodian hiding within that water cannot scape death. People will see him dead eson ff Indra the wielder of rajra : come to his help." Vasrder replied, ve सामाई [७०३४] Ntalablarit 1703"' राजन क्रिययेव न संशयः ॥ ९ ॥ ता पुलपयनयो गणो नाम राक्षस: । रामेण निहतो,राजन सानुमाय. सहानुगः । क्रिपया.पांगमास्थाय तथा स्थाविधिकम १ झिपायुपायनिहतो पुरा रा रातनौ । तारक महादेत्यो विप्रवित्तिय वीर्य धान् ॥ ११॥ बानागिरिलल श्रेषत्रिीशराश तथा विभो । मुग्लोपमुम्माधमुरी क्रिपयुष निमरिती ॥१२॥शियुपायरिद्रेशनिदेव मुम्यते रिमो- प्रिपा बलयत राज मायतु किशिधुधिष्ठिर ॥ १३ ॥ दरवाश्च: हामवाघ रामसा,पार्थिवास्तपा किया युपायनिहताः क्रिया तस्मात् समाधर ॥ १४ , " सम्जय उपाय। इयुक्तो पाये Hamशिव। अलस्यं ने महाराज नम पु मानलम, मध्यभापत कोशेष: महभिष भारत ॥ १५ ॥ सुयोधन किमयोऽपमारम्मोस कृतवया । भारी है ८ महाना इन्द्र के हाथ से बहुत कर्म और उपायों को मारा रानावार बांधागया और बड़े कर्म और उद्योगों के द्वारा महाअसुर हिरणपाक्ष और हिरण्य शप-शोनोंभाइ मारेगपे,हेराना वृत्रामृरभी को फेहािरा निस्सन्देह, मारागपा ९.! हे राजा सीपकार पुरुन्त्यका पुत्र रावण नाम राक्षस भने सायियों समेत श्रीरामचन्द्रनी के हायसे मारागया। 2०. इसीप्रकार तुम भी कर्म करने में नियत होकर पराक्रमकरो समर्थ राजायुधिष्ठिर उमी प्रकार कर्म पार उपायों के द्वारा दोनों मानीन राक्षम मेरे हाथ से. मारेगये बड़ा दैत्य मारक भार पराक्रमी निपचित्ति बानापी इल्लल भार शिशिरा भो, मारेगये इसी प्रकार मन्द उपद अमुरभी कही मारेगो हे समर्थ इदमी कर्म मार : उपायों के क्षरार्गो भोगता है हे रामा पुधिष्ठिर, कर्म अवलो दूमरा दुसस महा।।१३दैरपादाना राक्षस उमीपकार, रामालोग कर्म: और उपयोगी पारा मारेगम हेतुले कर्मको माछोरीतिमै करो। १४ । संजयकोले महाराज **Drylroy by art tho canning of that deceifful wan: It is god to play the deceitral by doceit. It in true that Duryodhan has made him. islrshetrb ander water_ by his artialicrs. . Dritroy tim with your skall my Indra had dono the Deitsas neid iDanayAX. King Balı tas trated by Indra's cubning.css and the tuto properlul Brothors, Hiran: gtikal and Himsiya kashipairers siain with frest e Partion add kill. Vriternur (OO ## blen no doubt still great difficulty. Similarly, Paran the son of Pulastya, with his brothets end kinsert vins ]Xin by Ram Cherodrt. 10, Acébratily therefore, Yudhistir, 1 myself slox thu tro powerfat ralshares ofald. The great Vsifyas Tarak. Viprachitti, Vatapi, llwit nod Trishira pero alain and bhorring Sund and Uprund *cro #lmin by brato died. Indre crjngs the kingdom of heaven a i S (7015) Gaila Parv गाय (७.३५॥ पातयिया सबकुलम्ब विशाम्पत It i #लाशयं प्रविशंप मजवित MITRA | उति राजन योगा संहारमामा मुयोधनसतेमर श्रेष्ठ समानःसते गतः । पसल सलिल माता राजन वस्थितः । बरेशर जमां जपन्ति समदिपिये तक्यतो मय शस्य सलिलायन उत्तिष्ठ राजने युज्यस्त्र क्षत्रियोसि कुलोपः यो वियोण कुले बम्म बरस कोरवेश प्रतिमाम चारमनः । युवादीतलतातोय प्राविंद तितिष्ठीस ॥ २१ - अयुर मध्ययस्याने नै धर्म सनातन । ममाम्यही मारणे राजपम 'पारमगरमा नियुद्धे व जिजीनियु: माधिपतितारष्ट्या पुत्रात मावन गितम्तथा । २३ सम्यग्धिको iala'मानु 'जान पाया घातपित्वाक वात देविसि स २४ । रमामी भरतवंशी धृतराष्ट्रबासुदेवनी से समझाये हुये तेनंबत हँसतेहुये कुन्ती के पुत्र पारस युधिष्ठिरने उस जल निपल व बलवान मापके पुत्र से: यह काक 1१५ हे दुपधिन तुमने जन्न के मंग में पह प्रारम्भ कर्म किस निमित किमाई गंगा सब क्षत्रियों के कुलों को और आने कुलको मरवाकर 1-२६॥ भव: अपने जीवन को पातामा इदमें घुसाभा बैठी हे दुर्योधन उठो मार हमारेसाथ पुरकरी है मौतम यां तेरा अभिमान और अहम्भाव कहाँगया जोमा भीत होकर तुम जत्रको रोककर नियत हुयेहो । १८ । सा लोग तुमको सभा कहते हैं नल सोनेवाले आपको उस पताको, निरर्थक मानता.१९। राजा निलो युदकरो कलीन क्षत्रीको और अधिकतर' यवंशी हो अपने कुल: और। जन्मको यादक।। २० । सो कौरव कुलंमें अपने जन्मको कहनाभा कैसे युद्ध से भयभीत होके जलमें प्रोश करके नियत है। २२ । युद्धका और राज्यका त्याग अथवा स्वर्ग के निमित उपाय 'न' करना गइ माचीन धर्म नहीं है हैं 'रांना युद्ध से भागना नीनों का कर्महे सर्गक देशाला नहीं है। निषय करके युद्ध पारको न पाकर किपरीसे तुम जीवन के अभिलाषी हो इन पड़ेहुये पुत्र भाई कर पादपुरुषों को देख कर । २३ । नानदार समानव माया और वान्त्रों की result of his exertions and schemes. Action is all.powerful, Yudhish tir.. Daityas, Danavar as well us kings, were slain by action; therefore act sell, Yudliishathir, "Sanjaya suid, " Th118 ad vied by Vasudev, Yodhjahithir the son of Kauti, irith a smile, said to your sou ishoras biding within the late 15. *** Why have you hid yourself withia the lako i after bringing about the death of your sinsinen and wait riors conie out nazil figlit with yo. Where is your pride gone : l'hy åre you staying under water ! Y J are famous for your bravery, but you | are tuaking yourself infanious by your cowardice: You'are' L'ora! .
A ७.३६) Nishaliliarat. मरामि भारत । गरोद मवि दुई सय मत ॥ १५ ॥ (T036) दिरा पसाप नाश कथम्पनीका पारपा पनि माRI | सत्यमुत्ति युष्पक वित्रीय अपमारमनः मातीपरपा सांसद मापदेष मुयोधन । २७ । मेवानी जीविते पुदि काम्या प्रमंपिकीय मर्म पाशिपविधन सुयोधन (२८ ॥ तु कर्णमपाधिस्य पनि चापि सोक्षम MA सम्मोहायमात्माम दुवमा । २९ ॥ सत पाप समाव रामति सुपर भारत । हिसारियो माात रोषन पलापार ॥ ३० ते तर सतात मान मुपोवन कालिकाता माता का रिफायत महत् ॥ ३५॥ कामना पाता कि मेरे जलाशयेसचिष्ठ पर धर्मनगरस ।। ३९ समस्या पजिस्य मषि षिमिमाम । नया भरवाकराम कैसे हद में निपत है। २४ । अपने को पूर मानवापरत घर नहीं है। 'भरतवंशी दुर्बुद्धि सर ले गों के समस में तुम मिथ्या कहते हो कि में कर। २५ । भानुभाको देखकर सूतीर किसीमकार से भी नहीं भागने में तुम त्रिम बचि से युद्ध को त्याग करनेहो । २३ । उसको कहो मा सुमठो युद्धको और अपने भनेको दकरो । दुर्योधन सव भाई और सेना को भरपाकर पुन करो। २१और क्षत्रीधर्म में निपत होकर पर्म करने की रणसे सुसमरामा को भव जीवनमें बुद्धि न करनी चाहिये । १८ । कर्ण और सौबलके पुत्र बनी के आश्रम होहर भपनेमी सदैव जीवनेवाला माना इस भूलमे जो तुमने अपने को नहीं जाना हे भरतवंशी पाप बरा दासरूप में सम्मुख होकर पुद को शुभसा राजाहोकर मोहसे किस और भागने को भगीकार करे । २० गयो चन यह वारता और मांकार कहांगये और वह पराक्रम और पड़ी कहां गई। १२ री माता कहाँगई तहाग में क्यों सोश भी इस से तुम उठकर सीधर्म से पुदकरो ! १२ हपको विमय करके इसार anong ktags #pecally Kserre king. Rimember your linoge, $$ Hora awong Kaoratas Why are you biding under water ! It zo nel copmatible with old custoins to giro up figliting or kingdom and the does itself done pot lead one tu liealon Iluw do jau Wah Lolio with out mabibg an end of fighting i Har aro y ubiding in tho lako, whne so may of your knamen he alarm, You call yourself brare, butyou Aro not maand your saging sila 25 Braye med donot ruo away and lights from otmice, why kara yos adopted this couis I Riso fourlessly Eight "ben all yow mea are no more Aking likogouskould mo more rish to lire You always relnod on Karan and Batons. THE *ase mistake Yxou are committing & hin Fighl by ahead a kingts foolish enough th desert the berael battle 1 30 meream DP Gada Parv गदापर्व (७०३७) गोस्माभिर्ममी स्वस्यसि भारत ॥३३॥एष ते पामो पम्मः सृष्टो पात्रा महामना। रुक या तथ्य राजा अब महारथ ॥ ३४ ॥ सत्रय उपाएपमुको महाराज पुत्रेण धीमता । सलिलवस्तव सुत इदं धमनमप्रवीत् । ३५० दुग्योधनो उवाच । सच महाराज यदी प्राणिनमा विशेत् । न प्राणभयाद्रीती ग्यातोऽस्मि भारत ॥ ३६ ॥ मरथचानिषङ्गीच निहतः पाणि साथि: रायः । एकसाप्यगणः संख्ये प्रत्याश्यासमरोचषम् ॥ ३७ ॥ न प्राणतोन भयान पादाविशाम्पते । इदमम्मः प्रविष्टोस्मि श्रमाविदमनुष्ठितम । ३८ ॥ त्वचा हि कौन्तेय ये चाप्यनुगतास्तथ । महमुत्याए पः सर्षान पतियोत्स्यामि संयुगे॥३८ धिष्ठिर उवाच । आस्ता पप स म चिरयां मृगयामहे । तदिदांनी समुत्तिष्ठ यस्वे सुपोषन ॥ ४0 1 रवा पा समरे पार्थान् स्फीतं राज्यमवाप्नुहि । निहतो ज्यकरी अथवा हमारे हायसे मराहुभा होकर पृथ्वीपर सोयेगा।।महारपी हात्मा ईकार ने यह तेरा उत्तम धर्म उत्पन्न किया है इसको विधिपूर्वक करों और रामा होमाभो । १४ । संजय बोले हे महाराज जलमें नियत और बुद्धिमान धर्मरानके इसप्रकार के बचनों को सुनकर आपका पुत्र या वचन वोला । ३५ । हे महाबाहु यह अपूर्व बात नहीं है जो जीवधारी में भय परेश होय हे भरतवंशी मैं जीव के भय से डरा हुमा नहीं बैठा हूं। १६ । रथ और तूणीरसे रहित मृतक सारथी और साथवाला होकर अपने समूह से पृथक् होकर युद्धमें अकेला होकर मैने इस विश्राम को अमोकार किया । ३७१ हे राजा माणों के कारण भय से और व्याकुलताने में इस जन नहीं घुमत हूं मैंने केवल थकावट से यह कर्म किया । १८ । हे कुन्ती के पुत्र तुम विश्रामकरो और जो तेरे ओर पास वाले. वह भी विश्रापकर मैं इस जलसे निकलकर युद्धमें तुम सबसे लहूंगा । ३९ । पौधे हिर बोले कि हम विश्राम करचुके हैं और विलम्ब तुमको अन्वेषण करते है पुयोधन इस हेतुने अब उठो और यहाँ युद्धकरो । ४ । युद्ध में पांडवों को your bravery and pride gone, Suyodhan; where are 'thy prowess and waggery! Where is thy knowledge of weapons ? Why are you sleeping in the tank ? Come out and fight, You will rule the king dom if you win us or shall lie dead on earth and be slain by us. DJ your duty for which you are created by God and bo a king." Sanjaya said, " hiaving heard the words of Yudhishthir from water your son aaid, 35. " It is no wonder if one ba affected by four, yet I am not Afraid for my life. Deprived of car, quiver, driver, attendants and warriors, I stood in need of some rast 37. I have not entered water for fear of lift, it was only exhaustion that prompted me to do so. You and followers nust rost a while and ttan I shall come out of the lake to fighte " Yudhishthir said, "Wo bare taken reat and your । (७.३८) Mahal hai.it (7038) पा रणस्माभिधारलाकमवाप्स्यसि ॥४१॥ दुर्योधन उवाच । यदर्थ राज्यमिच्छामि कुरूणा कुरुनन्दन । त इमे निहता सर्व भ्रातरो मे जनश्वर ॥ ४२ ॥ क्षीणरत्नाथ पृषिधी इतक्षत्रियपुङ्गवाम् । नाभ्युत्सहाम्यह मात विधामिय योषितम् ॥ १३ ॥ अद्यापि त्यहमाशसे त्या विजेतु युधिष्ठिरा मक्ता पश्चालपाण्डुनामुत्साह भरतर्षभ ॥४४॥ नविदानीमहं मन्ये कार्य सुद्धेन कर्हि चित् । द्रोणे कणे च सशान्ते निहते च पितामहे ॥४९॥ अस्त्विदानीमिय राजन् केवला पृथिवी तव । असहायो हि को राजा राज्यामिच्छेत् प्रशासितुम् । ४६। सुहृदस्तारशान् हत्या पुत्रान् भ्रातृन पितृनपि। भवद्भिश्च हृते राज्ये को नु जीवेत् मादृश ॥ ४॥ अह धन गमिष्यामि छजिन प्रति पासितः। रतिदिनास्ति मे राज हतपक्षस्य भार ४८॥ हतधान्धवभूयिष्ठा हताश्वा मारकर दियुक्त राज्यको पात्रो अथवा युद्ध में हमारे हाथ से मरकर को पाभोगे । ४१ । दुर्योधन चोळे हे कौरब नन्दन राजायुधिष्ठिर मै जिन कौरवों के लिये राज्यको चाहताया वह सब मेरे भाई मारे गये । ४२ । मैं इस रत्नों से राहित मृतक उत्तम क्षत्रियोंवाली विधवास्त्रीके समान पृथ्वी के भोगनेको उत्साह नहीं करताहू । ४ । हे भरतर्षभ युधिष्ठिर मै अपभी पाडयों समंत पाचालों के उत्साहों को तोडकर तेरे बिजय करनेको प्राशाकरताह ! ४४ । अब मैं द्रोणाचार्य कर्ण और भीष्मपितामह के मरनेपर किसीसमय भी युद्धसे अपने कार्यको नहीं मानताई । ४५ । हे राजा भव यहसव पृथ्वी तेरीहो अपने साथियोंसे रहित होकर कौनसा राजा राज्यपर राज्यशासन करनेकी इच्छाकरेगा।४६ उसप्रकारके मित्र पुत्र भाइयों और वृद्धोंक भी मारकर और आपलोगों से राज्यहरण होनेपर मुझसा कौन मनुष्य जीवतारहेगा । ४७ । हे भरतशी भै मृगचर्म को धारण करने वाला होकर उनको जाऊगा जिसके पक्षवाले लोग मारेगये उस राज्य में मेरी प्रीति नहीं है । । । हेराना जिप्तमें बहुत वान्धव घोडे और हाथी आदिक मारे। have buen seeking long for you So you must rise up and fight 40 Slay the Pandavas and gain kingdom or be slain by us 'Duryodhan Bard,' All my brothers and Khurivas for whom I wished to secure the kingdom, are slain and I Une not enjoy ti o earth widowed of those jowels of Warriors I shall yet eruth the pride of the Pandavas and Panchals a hope to win, Aly mind 18 never vacant ot yar after the death of Dropa, Karon - nd Bhishm. Let thung eirth be youlis. What king deprived of bia compino ng sial' u sh to legin 46. What person ļile mo shall wish to live after the death of friends, eons, brotberg and elders and the deprivation of hidgdom þy you ? Lshall puton deor skinsand shall go ato forests for I have no lopo for trolinglom whose The earth deprived of breato, horsemon and elephant que a shall be yours ant jou will enjoy it without Anzioty. I shall so in ton esilo with vicer sk 119 en, for being deprived - all109 are no more 48 - - (70-01 Gada Pare 717198 [७.३९ हतकुञ्जरा । एषा ते पृथिवी राजन् अश्वमा विगतज्वर. ॥ ४९ ॥ घनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी न हि मे निर्जनस्यास्तिजीवितेद्य स्पृहा विभो ॥ ५० ॥ गच्छ रखें भुइस्य राजेन्द्र पृथिवी निहतेश्वराम । हनयोधा नटरला क्षीणधर्मा पयासुसम॥५१॥ सन्जय उवाच । दुर्योधन तव सुत सलिलस्यं महायशा । श्रुत्वा तु फरण वाक्यम भाषत युधिष्ठिरः ॥ ५२ ॥ युधिष्ठिर उवाच । वार्तालामा तात सलिलय प्रभा विधा । नेतन्मनसि मे राजन् वाशितं शकुनेरिय ॥ ५३ ॥ यदि पापि समर्थ स्पास्व दानाप सुयोधन ! नाहमिच्छेयमधनं त्वया दचा प्रशासितुम् ॥ १३ ॥ अधणन गृहरिया स्यया दत्तां महीमिमाम । महि धर्म स्मृतोराजन् क्षत्रियस्य प्रतिमा ॥५५॥ त्यया दत्ता न चेच्छेय पृथिवीमधिलामहम् । स्वान्तु युद्ध विनिजित्य भोक्तास्मि पम धामिमाम् ॥ ५६ ॥ अनीश्वरश्च पृधि कथं व दातुमिच्छसि । त्वयं पृथिवी राजन किन दत्ता सदैव हि । धर्मतो याचमानाना शमायंञ्च कुलस्प नः । ५७ ॥ पाणये गये वहप्तब पृथ्वी तेरी है इसको तुप विगतज्जरहोकर भोगो । ४९1 मैं मृगंचोको धारण करके वनको जाऊंगा हे समर्थ अब जीवन में मुझ भाई पुर्वाने जदेहोनेवाले की इच्छानहीं है । ६० । हे राजेन्द्र तुमनामो और इस पृथ्वीको जिसके स्वामी और शरवर मागपे और जिस में रत्नोंका नाशहुआ और गर्दै प्रकोष्ठादिक जीर्णहोगये मुखपूर्वक भोगो । ५१ । संजय बोले कि वहा यशस्वी' युधिष्ठिर ऐसे दीन वचनों को सुनकर उस जल में निवास करनेवाले 'आपके पुत्र योधन से, बोला। ५२ । हे भाई जलमें निपत तुम पीड़ा के मलापों को मतकही है राजा' पंक्षीके समान निवासकरना मेरे चित्त नहीं है ॥५३॥ हे मुयोधन जो तुम देनेके निमित्त भी समर्थ हो तभी मै तेरी दादुई पृथ्वीपर राज्यशासन करनेकी इच्छा, नहीं करताहूं । ५४. । तेरी दीहुई इस पृथ्वीको अधर्म से नहीं लूंगादानलेना क्षत्रीका धर्मनहीं कहागया है ।१५। मैं तेरी दाईइस सम्पूर्ण पृथ्वीको नहींचाहता, तुझको पुदमें विजय करके इम पृथ्वी को भोगूगा । ५६ | हे राजा तमे स्वामी, न होकर पृथ्वीको कैसे देनावाहवेहो दुमनेयह पृथ्वी उत्तममय पर कुळकी शान्ति के लिये धर्मसे मांगनेवाले हमलोगों को क्योंनहींदी ।। ५७ । मथम, बडेबलवान्। of brothers and sons, I have no desire to live 'ány' longer 50 Go away, Pricce,' and 'rule over the land 'whose lords and invarriors are slain, jewels destroyed and fortifications liecome wenk and old " San jaya said that having, beard th'óse ' bamble words, Yudhishthir said to him, * Donot, mourn from the midst of water, Tabnot wishto lead the life of a bird, I would not lákê the land from you, even if you had the power to give it me. 'I shály not take the land impropera in from you Kshatryas donot receive "charity. * '65 I donot like to receive the whole,eastar, Crom ýour hands, 'I shall win it. Not being the master of it how do you promise to give it away, I by did you m - . (७०४०) Mahabharat (7040) प्रपथं राजन् प्रत्यारयाय महाबलम् । फिीमदानी वासस्विं कोरित चित्रविभ्रम' : ।५८ ॥ अभियुक्तस्तु को राजा दातुमिच्छो मेदिनीम् । नवमद्य मही दातुमाशः कोरपनन्दन ।। ५९। मान्छेतु या बलाद्राजन् स कथं दातुमिच्छसि । मातु निजिस्य संग्रामे पालग मां षमुन्धराम ॥ ६॥ मध्यप्रेणापि पदमिरविधीयेत भारत । तम्मा अपि धेग्मतां न ददाति पुरा भवान् ॥६॥ स सथं पृथिवीमेतां प्रददासि विशाम्पते। मुख्यमं गास्यजःपूर्व ससपं त्यजसि क्षितिम्||६२॥एवमैश्वर्यमासाद्य प्रशास्य पृथिवी मिमाम । कोहिमढी व्यवस्थेत शत्रोहातुं वसुन्धराम ॥ ६३ ॥ यन्तु केबलमौल्येन विमूढो मावबुध्यसे । पृथिवी दातुकामोपि जीवितेन घिमोक्ष्यसे । ६५ । अस्मान पा वं पगजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निहतीस्माभिनजलोकानुत्तमान॥६५॥ माययोर्जीपतो राजन मपि प राय व ध्रुषम्। संगपः सर्वभूताना विजथे मो मनि श्रीकृष्णमी को सरदेकर अब तुम क्यादेतहो । ५८। तेरे चित्तकी प्रान्तिक्या है कौन पराजयहोनेवाला राजा पृथ्वीको देनाचारे कौरवनन्दन भव तुम पृथ्वी के देनेको स्वामी नहींहो न वलसे लेनको समर्थहो सो कैसे देनाचाहते हो मुझको युद्धमें विनयकरके इम पृथ्वीका पालनकरो। ६० । हे भरतवंशी ईके मप्रभागभरभी पृथ्वी जो तुमने हमका पूर्वसमय में नहींदी भव उस, सर्व पृथ्वीको कैसे देतहो । ६१ । प्रथम तो मुई के अग्रभागके भी समान पृथ्वीको नहीं दिया भव उस पृथ्वीको कैसे त्यागकरते हो ।६२। इसमकारके ऐश्वर्यको पाकरऔर इस | पृथ्वीपर राज्यकरके कौनसा मझानी अपने शत्रुको उस पृथ्वी के देनेको नि श्चयकरेगा। १३ । तुप महाप्रज्ञानीहोकर केवल अज्ञानतामेही सावधान ना होते हो पृथ्वीकेदेने का अभिलापीभी होकर तू जीवताहुआ नहीं वचसक्ता ६४। तुम हमको बिजयकरके इस पृथ्वीपर राज्यकरो अथवा हमारे हाथसे परकर उत्तम लोकोंको नाभो । ६५ । हे राजा निश्चय मेरे जीवत रहनेपर हमदोनों की इच्छा not give it us when we, having a right to it, asked it of you for the kafety of the family? Having replied Shri Krishn in the negative why do you intend to give it now! What nonsense you are talking? What conquered Prince can give away kingdom! You bare now no power to give it, uor keep it by force, how do you talk of giving it. You can rule the earth after conquering it from mu, 60. You did not like to give us and equal to needle punt; how do you talk of giving u the entire land now. How do you wish to losse the land of which you did not like to part with eten equal to the point of a needle? Who will be so foolish as to give his kingdam to his enenıy. You bare not even now given up your foolishness, Yon cannot seaps death even if you relinquish yont claim to the kingdom. Lither rulo the (7011) Gadaarv Parb (७०५१ ) पति ॥ १६ ॥ जोषितं तप दुष्प्रन मयि सम्प्रति वर्तते । जीपयेथे स्वह काम न तु ओवितुं समः।।६७ दहने हि कनो पत्नस्त्वयास्मासु विशेषता मासीविश्व विज चापि प्रवेशनः ॥ १८ ॥ त्वया विमिकता गजन् गल्यस्य हरणेन च । प्रियाणा पंचनेद्रौपयाः कर्षणेन च ।। ६९॥ एतस्मात् फारणार पाप जाषितं तेने विद्यते । उप्ति होसिष्ठ युवाष तत्ते पो मषिष्यति ॥ ७० ॥ एषन्तुविविधा पायो अपयुक्ताः पुनः पुनः। कायम्ति म ते धारास्तत्र तत्र जनाधिपं ॥१॥ - हति शरपपर्वणि इंदभवेशपवाण दुर्योधनभरमने एकत्रिंशोध्यायः ११समाप्टेपहृदपर्व . नुमार सब जीवधारियोंको सन्देह होगा ।६६। हे दुर्मुदि राजीवन मुझमें वर्तमान है मैं भीषता रहूंगा परन्तु तुम जीवते रहनेको समय नहींहो । ६७ । राजा तुमने हमारे नाशकरने में बड़े बड़े उपायकिये पर्याद तुमने हमलोगों को विष 4 सपके विपसे जलके हुबोनेसे और राज्यके छीनलने निरादर या प्रयोग भाषिय वचन और द्रौपदी के खंचने से पीड़ापान किया । ६१ । पापी इस कारण से तू जीवताहुआ नहीं बचसक्ता उठ उठ युद्धकर इसीसैकल्याण होगा। ७० । हे राजा उनवीरोंने वहां इसमकार विजय से युक्त नानासकार के वचनों को पारम्बार कहा ७१ ।। kingdom after slaying us or be slain by us and go to the region of the good. The world can not be free from anxiety as long ay both of us live 66. Your life depends on me. I shall outlıve yon You tried your best to destroy us. You tried to käll us by sdake-Bite, drowning and deprivation of kingdom. You insulted as by dragging Draupadi. You cannot therefore scape with your life. Riso; tiss and fight. Your good lies in this. They talked thus again and again. "71.
॥ अथ [७०४२] Mahabharat (7042) धृतराष्ट्र उवाच । एवं सन्तयमानस्तु मम पुत्रो महीपति । प्रकृत्या मन्युमान 'धार कथमासीत् परन्तप. ॥१॥ नहि सन्तर्जना तेन श्रुतपूर्वा कथम्चन । राजमा नि मन्यिच सर्वलोकस्य भोऽभवत्।।२ । यस्पातपरच्छायापि स्वका मानोस्तथा प्रमा। खदायैयाभिमानित्वात् सहेत सैव कयं गिर ॥ ३॥ इयमच पृथिवी सर्धा मम्लेच्छाट विका मृशम् । प्रसादाद्भियतेयस्य प्रत्यक्षं तर सञ्जय॥ ४ ॥स तथा तय॑मानस्तु पाण्डुपुत्रविशेषत । विहीनश्च स्वत्पर्निजने घातो मृशम् ॥ ५ ॥ स श्रुत्वा का घाचो जययुक्ता पुन पुन । किमनीत पाण्डवेपास्तम्ममाचक्ष्य सङ्गस ।। ६॥ सञ्जय उवाच । तज्ज्यमानस्तथा राजन्नुटकस्थस्तवात्मजः युधिष्ठिरण राजेन्द्र भ्रातृभि महितग.ह ॥ स श्रुत्वां फटुका वाचो विषमस्थो जनाधिपः । दीपमुष्णश्च निश्वस्य सलिलस्थ पुन पुन ॥ ८॥ सलिलान्तर्गतो राजा धुन्धन हस्ती पुन पुनः गायुद्धपर्व अध्याय ३२ ॥ 'धृतराष्ट्र बोळे कि शत्रुओं का तपानेवाला स्वभावसे क्रोधयुक्तं वह मेरा पुत्र वार राजादुर्योधन इसप्रकार के कठोर वचनोंको सुनकर केसी दशावाला हुआ । १। उसने पूर्व में कभाभी निन्दित और अप्रतिष्टित वचन नहीं मुंने वह राजाहोने से सवलोकका माननीय हुमा । २ । जिसके अभिमानसे छत्रकी छाया भी सूर्यके ताप से रक्षाकग्नेके कारण दुःखके निमित्त होतीथी वह ऐमेप्रकार के वचनों को कैसे संहसक्ता है । ३ । हे संजय तेरे नेत्रके समनमें यह सम्पूर्ण पृथ्वी म्लेच्छ और आटविकाओं समेत जिसकी प्रसन्नता से सजीवरहतीथी वह अधिकतर पाण्डवों से घुड़कापुमा निर्जनपनमें अपने नौकरों से रहित और शत्रुओंसे घिराहमा था ।५ । उसने विजय से संयुक्त कटुवचनों को वारम्बार सुनकर पाण्डषों से क्याकहा हे संजय वह मुझसे कहो । ६। संजयबोळे हे राजेन्द्र तव 'भाइयों समेत युधिष्ठिरसे घुड़केहये जलमें नियत भापके पुत्र आपत्ति में नियत राजादुर्योधन ने । ७ । कटुवचनो को मुना तब वह वारम्वार लम्बी उष्णश्वास लेकर बारम्बार हाथोंको भी कॅपाता हुआ जलसे बाहर निकला और युद्धक निमित्त चिसको CHAPTER XXX11 Dhri ashta. 9d, " What was the condition of my son who is naturalls of a man's temper, when he heard those harsh words! 8. lel n ses 'eud şuch disomapoctful langnage when he was the lord of, the land and naslespectul by the subjects, lle ylio in his pride felt nnney at the heat 12 Sten under the shado of an-urnbrella, conld Rich language He on whose 'pleasure depended the lito of tio world of Alechas and Atawiko, wag Dsulted in that lonely plrum ly tran lav 74, when he was destitata of sorvaats Add sarri un led by cop hat did he say on hearing the bitter words of the Polis1214111 and agatat Tell me all &hig, Sanjaya. " Sanjaya tot or ir to be (7043) Faltuv [७.४३ मनधकार युखाय राजामशाप्यमापत ॥ ९ ॥ दुर्योधन उपाय । पूयं ससुहृदः पाय: स सराहनाः । महमेका परिवूनो विरयो रयवाहनः॥ १० ॥ आत्तशः रथोपेते घहुभिः परिपारितः । कथमेक पदाति सनशस्त्रो यो मुत्सहे ॥, ११ ॥ एफैन तु मा यूयं पोषध्य युधिष्ठिर । न होको बहुमिरिनाय्यो योधयितु युधि ॥ १२ ॥ विशेषता विकपः भ्रान्तचापतसमाश्रितः । भृशं विक्षतगात्रश्च भान्तवाहनसैनिक ॥ १३ ॥न मे रखतो भयं राजन च पार्थावृकोदरास् । फाल्गुमातासुदेघावा पाचलेभ्योप पा पुनः । १४॥ यमाया युयुधानाद्वा ये चान्ये तय सैनिकाः । एक सर्यानह खो घार यिष्ये पुधि स्थित ॥ १५ ॥ धर्ममला सता कीर्तिमनुष्याणां जनाधिप । धम्मोह कार्तिश्च पालयन् प्रवधीम्यहम् ॥ १६ ॥ यह मुस्थायवः सर्यान् प्रतियोतस्यामि करके राजा युधिधिष्ठिर से बोला । ९ । हे पाण्डवलोगों तुम सब रथ घोड़े और मित्रों समेतहो और मैं अकेला थकाहुमा विग्य और मृतक सवारीवाला । १० । अकेला मात्र होकर दाखउटानेवाले बहुत से रथसवार शूरवीरों से संयुक्त आप लोगोंसे, कैसे लड़नेका उत्साह करसता हूं ॥११॥ हे धुधिष्ठिर तुम एक एक होकर मेरेसाथ युद्धको युद्धने एक मनुष्य बहुतों के साथ न्याय से लड़नेको योग्यनहीं है। १२ । अधिकतर कवर से रहित थका हुमा आपत्ति में फंसा हुआ और अत्यन्त घायल अंग मृतक मवारी सेनांवाला । १५ । हेगजा मुझको तुझमे भयं नहीं है पाण्डव भीमसेन अर्जुन वासुदेवगी और पांचालोसे भी भयनहीं । १४ । नकुल सहदेव सात्यकि से और जो अन्य अन्य पाप की सेना के लोग हैं उन से भी भय नहीं है पद में क्रोधयुक्त होकर में अकेलाही तुम सब को रोकंगा । १५ हे युधिष्ठिर अलोगों की शुभ कीर्ति धर्म का मूल रखनेवाली है मैं यहां धर्म और कीनिको पालन करताहुना यह कहताहूं । १६ । कि मै उठकर तुम sard, " Daunted by Yudhishthur and bis brothers, staying noders water and fallen in misery, Prince Duryodhan heard the bitter words and hearing deep bighs and with shaking hands, he came out of water and said to Yndhishthur. “ Panduvas ! you bave cais, buises und friends with you, while I am nlone, carles, and my horses are dead.10 How I can' fight withoat weapons with you, ho possess weapons, You must fight with me one by one, it is unjust if many wariors fight with one. Destitute of armour, tured, fallan in,crqable, wound, od and de tituta of Curriage. I am nst afraid of you nor have I any fear of Bhim, Arjun, Vasudey and the Panchals. 1 am not afraid of Nakul, Sahadev, Satyakı and other alles of yours, 'Enraged 10 battle I shall check you 15. The fame of gond men has vir. tue for its root and I rely on dharm wben ) sey that I shall fight with all of you Dertitute of car and weapons J s iall destroy you - alone (७०४४) Mahabharat (7044 संयुगे । अनुत्यागतान् सर्वान्मन् संवत्सरो यथा ॥ १७ ॥ अधःप सरथान साया नशस्त्रो विरथोपि सन् । नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता राधिसंक्षये । तेजसा माथि पयामि स्थिरीभवत् पाण्डवाः ॥ १८ ॥ अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां पशस्विनाम्। पालीकोणीष्मणां कर्णस्य च महात्मनः ॥ १९ ॥ जयद्रयस्य शूरस्य भगदचस्य चौमयोः । मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एष ध ॥ २० ॥ पुत्राणां भरतभेट शकुनः सीवलस्य च । मित्राणां मुहदांव घान्धवानां तथैव च।।। २१ ॥ मानण्य मध गलानि हत्या स्वां मातृभिः सह । एतायवुफ्त्या वचन विरराम जनाधिय॥२२॥ युधिष्ठिर उवाच दिष्ट्या त्यमपि जानीसे क्षनधर्म मुयोधन । दिष्ट्या ते वर्तते दुदि. युनायव महाभुज ॥ २३ ॥ दिष्ट्या भूरोसि फोरप्य दिष्ट्या जानासि सारन । पस्त्वमको हिमः सर्वान संयगे योद्धार्मच्छसि ॥ २४ ॥ एक एकेन सङ्गम्य यते सम्म सबके सम्मुख जाकर युद्धमें ऐसे लडूंगा जैसे कि वर्षकी समाति में सब ऋतुओं के सम्मुख होकर वर्षका युद्ध होता है । १७ । भव शस्त्रों से रहित विस्थहोकरमा स्थ घोड़े रखनेवाले तुम सबको ऐसे नाशकरूंगा जैसे कि रात्रिके समाप्त होनेपर सब नक्षत्रोंको सूर्य नष्टकर देता है हे पांडवलोगो नियत होजाओ मैं तुम सब को अपने तेजते नाशकरूंगा।१८। अब मैं यशवान क्षत्रियोंकी अऋणताको पाऊं गाहे भरतर्षभ अव तुझ को तेरे सत्र माइयों समेत मारकर बालीक द्रोणाचार्य भीष्म महात्याकर्ण शूरजयद्रप मद्रका राजा शल्प भूरिश्रवा । २० । अपने पुत्र सौबलके पुत्रशकुनी मित्र शुभ चिन्तक और वान्धवों की प्रणताको पाऊंगा । २१ । यह राजा इतना वचन कहकर मौन होगया ।। २२ । युधिष्ठिर वोले हे अयोधन तुमभी पारब्धसे क्षत्रियधर्मको जानतेहो हे महावाहु मारब्धही से तेरीघुद्धि पद्धकालये वर्तमान है .. ५५ ।हे कौरव प्रारब्धसेही शूरहोकर तू युद्ध को जानताहे जो अलेलाही होकर तू हम सबसे लड़ना चाहता है । २४ । जो शस्त्र तुमको अंगीकृत है उपको लेकर चाहै जिस अकेसही भिड़कर युद्धकर हमास ag the sun close the stars at day break. I shall be thus tres from the debt of warriore. Having slain you and your brothers, I shall evenge the death of Vablik, Drona, Bhishm, Karan, Jayadrath. Shalya, Bhurashrara, my son, Shakuni, friends, well wishers and kinsnien." 21. Having said this, the bing became silent. Then Yudhishthir gaid, " It is fortunate that you know the duties of kshatryas and aro firm on it. Fortunately, you know tow to fight and are ready for it. You may select any weapon you like and mag fight with any warrior you choose and we shall look on your fighting 25. I give you the desire of your heart, you may roign after slaying any onenf us five or yourself go to heaven. " Duryodlisa raid, " If yon are willing to give me a warrior to fight with, I (7043) Gada Parv गदापर्व । ७०४५ ] तमायुधम् । तस्मादाय युप्रेक्षकात स्थिता ॥२५ अमिय काम पार भयो वदाम्यहम् । हत्वक भष नो राजा हतो पास्वगमवाप्नुहि ॥२६॥ दुर्योधन उपाचा एकमेपोमानदेशरोप मम दीयतामा आयुधानामिपञ्चापि तारमसंमते गदा ॥ २७ ॥ भवनामकः शक्यं मां घोमिमन्यते । पदातिश्या संख्येस युपतु मा सह ॥२८॥ वृत्तानि रथयुस नि विचित्राणि पदे पदे इदमे गदायुवं माझुतं मात ॥ २९ ॥ मन्नानामपि पर्याय कहीमच्छन्ति मानधाः । युवाना माप पयायो भवरवनुमते तक॥ ३० ॥ गवणा स्वां मायादो विजेण्यामि सहानुजम ।। पाचालान सञ्जयांचेव येजाये तब सैनिकान मे सम्ममो जातु शमादपि युधि हिर ॥३॥ युधिोष्ठर उवाच । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारे मा पोषय यावन । एक पकन साम्प संयुगे गदया बली ॥ ३२ ॥ पुरुषोभव गधारे युज्यप सुसमाहितः । भय तेरा तमाशा देखने को नियतहैं । २५ । हे वीर भव फिर मैं तेरे इसअभीष्ट को देताएं हम पांचों में एकको मारकर तेरा राज्यहोर प्रपा मंरकर तूं पगको पाते। १५ । दुर्योधन बोला कि जो अब युद्धमें लड़ने को एकशूर मुझे देतेहो तो आपके मतसे शखों में से यह गदाभी चाहीगई । २७ । एकको मारकरही जोराजा के मिलने न मिलने की प्रतिमा है तो हममें एकशूर, जो तुमके योग्य मानता है वह पदाती होकर गदाके द्वारा युद्ध में मुझमे पद्धकरे । २८ । मथम स्थान पर रयों के विचित्र युद जारीहये अब यहाँ गढाका युदं अपूर्व और बड़ा होप । १९ । मनुष्प भलाको भी रचना को करना चाहते हैं अब तेरी बुद्धिम युद्धों कीभी रचना सोप ॥१०॥हे महावाहु भर में गदासे तुझको तेरे छटे भाइयों समेत विजय , कहंगा पागल मनीमादि जो अन्य १ तेरी सेनाके लोग उनको भी विजय करंगा हे युधिष्ठिर कभी इन्द्रसेभी मुझको भय नहीं है । ३१ : युधिष्ठिर बोले हे गान्धारी के पुत्र मुपोषन उठ और मुझमे युद्धकर बलान और अकेला युद्ध में गदाहारा एकके साथ भिड़कर । ३१ । शूरहोना और है गान्धारी के पुत्र भरती shall select thia mace alone as my weapoa 27. As for your protaire to give the kingdom after slaying, oaly one, let ope of you fight with macs on foot. There have been many wonderful' encounters of car-warriora, let us Gigit a wonderful battle with the mace. 'Lat the fighting and weapon be regulatsd according to your direct100-. 30. With my mace I shall conquer you sod your younger brothers :: well as the Panchals, the Srinjaya and other warriors of your army. I am nob afraid eren of Indra." ". Suyodhan, son of Gandbari, Raid Yudhishthir," rise up and fight with me, Be brave 'and fight with one with your mace. Fight carefully and you cannot scape death aven if Indra were to help you." Sanjaya said, " Your son, standing in the midst of water and sighing like a huge snake, coula Matmlhhant (7014) ते जीवितं नास्ति यदीन्द्रोपि तपानय ॥ ३३ ॥ सजय उवाच । एतत् स नरमाईलो मामृष्यत तवा मज सलिलान्तर्गन षने महानाग इत्र श्वसन ॥ ३४ ॥ तयासी चाफ्प्रतोदेन तुगमानः पुनः पुन । धनी न ममृगे राजन्नुत्तमाश्वः शामिव ॥ ३४ ॥ सक्षोभ्य सलिलं धेगानदामादाय धीर्यवान् । अद्रिसारमयीं गुर्श काञ्चनानदष णाम् । अन्तर्जलात् समुत्सम्यौ नागेन्द्र इथ विश्वसन ॥ ३६ ॥म मिरया स्तम्भितं तोप स्कन्धे कृत्वासी गहाम् । उपतिष्ठ: पुत्रने प्रतपप्रश्मियानि ॥ ३५ ॥ ततः शक्यायसी गुर्वी जातुरूपपरिष्कृताम् । गदा परामपक्षीमान् धार्तराष्ट्रो महावल ॥४८॥ गदाहस्तन्तु तं हष्ट्या सधृगमित्र पर्वतम् । प्रजानामिय संमुदं शलपाणि मिवस्पितम् ॥ ४९ ॥ स गदी मारता भानि प्रतपन् मास्कगे यश ॥ ४२ ॥ तमुत्तीर्ण महावाहुं गदाहस्त मरिन्दमम् । मेनिरे सर्वभूतानि दण्डपाणिमिशतकम् ॥ ४१ ॥बन हस्तं पथा शफ शुलहस्तं पथा हरम। ददृशु सर्पपाञ्चाल' पुत्र, तष जनाधिपम् मावधानी से युद्ध करे अब जो इ द्रभी तेरी सहायताकरें तोभा तेराजीवन नहीं है । ३३ । संजय बोले कि उसनरोत्तम जलके मध्यवर्ती सर्पके समान महाशम लेते भापके पुत्रने इस वातको नहीं सहा । १४ । हे राजा उसप्रकारके वचनरूपी कोड़ों से घायल उस दुर्योधन ने उन वचनों को ऐसे नहींतहा जैसे कि उत्तम घाड़ा पावुकको नहीं सहता है । ३५ । वह पराक्रमी वगसे जलको छिन्न भन्न करके मुनहरी वाजूबन्दोंने अलंकन लोहेकी गदाको लेकर सर्पराज के समान शास लेता मलके मध्य में से उठा ॥३६॥ अर्थात वह भापका पुत्र उस रोके हुये नलको हटा कर लोहेकी गदा को कन्धेपर रखकर सूर्य के समान तपाता हुआ जलमे पाहर निकला । ३७ । उमके पछि शैक्य में रहनेवाली लोहेकी भारी वर्ण जटित गदा को बुद्धिम न पड़े पराक्रमी दुर्योधन ने अपने हाथों लिया १३८ । शिखर रखनेवाले पर्वतकेसमान गदा हाथमें रखनेवाले उम दुर्योधनको देखकर उसको क्रोष युक्त नियत होनेवाले शिवजी के समान माना । ३९ । वह भरतवंशी सूर्य के समान तपाताहुआ शोभायमानथा । ४० सब जीवोंने उम जलमे बाहर भाये हुये महाबाहु | गदा हायमें लिये शत्रुविनयी दुर्योधन को दण्डधारी यमराज के समान माना ॥४१॥ not bear this language Wounded by the u lips of words, Duryodtan could not lear them as a uoblo stecd cannot' bar wirip He soon dieperaed the water and came out from it sighing like a prince of his shoulder glorione like the Sun. 37. Then he took up his 'nuble maco mado in Shaikya, in his hand Seing Duryodhan rise up like a mountain pork, they found him like enragedi Rudra And glorious like the Sun, 40. They took him for Yan tho bha ur of staff All tho pruuple were much pleased to per luin and tho Pandavas And Panclıls clips anakes He cam, out of antel with bury iron naco on (7047) Gada Parv गहापर्व (७०४७) ॥ ४२ ॥ तमुत्तीर्णन्तु संप्रेक्ष्य समष्यात सर्वश । पाञ्चाला पाण्याच तेऽग्यो न्यस्य तलाददुः ॥४३॥ अवहासातु तं मया पुत्रो दुर्योधनस्तय। उनत्य नपर्न झुमोदिधक्षुरिष पाण्रधान् । ४४ ॥ त्रिशिक्षा सुकुटी कृत्वा सम्दष्टदशनच्छदा। प्रत्युषाच ततस्तान धै पाण्डयान सहकेशवान् ॥ १९ ॥ दुर्योधन उधाच | अस्तापहा शस्य फलं प्रतिमोरथ पाण्डवाः । गमिष्यथ हताः सा सपाञ्चालायमक्षयम४६॥ सम्जय उधान यतश्च जलात्तम्मात् पुत्रा दुय्योधनस्तथ । अतिष्ठत गदापाणी रुधिोण समुक्षितः ॥ ४७ ॥ तस्य शोणितीदग्पस्य सलिलेन समुक्षितम् । शरीर स्म सदा माति क्षत्रिय महीधर' ॥४८॥ तमुद्यतगद पीर मेनिरे तत्र पाण्डवा । वैवस्वन मिघ कुछ किङ्करोयतणणिनम् ॥ ४९॥ स मेघनिनदो हान्नई नव व गोवृषः । माज हाय तत पार्थान गदया युधि श्रीर्यधान् ॥ ५० ॥ दुर्योधन उवाच । एकेन च मा सब पांचालो ने आपके पुत्र राजा दुर्योधन को उमाका का देखा जैसे कि | बनधारी इन्द्र और शूलधारी रुद्रनीको देखते है । ४२ । सबलोग जलसे व हर निकलनेगले उसदुर्योधनको देखकर बहुत प्रसन्नहुये पौरउन पाञ्चाल और पांडवों ने ताली बनाई। ४।। फिर भापकापुत्र दुर्योधन उनकी ताली बज ने को अपनाहास्य मानकर दोनों नेत्र को खोलके क्रोधयुक्त पांडवों को भस्म करता आसा ॥४४॥ भुकटीको तीन शिखावाळी करके दांतोंको पक्तिको कारता केश वनी समेत पांडवोंसे यह उत्तर वचन बोला । ४५ कि हे पाइवलोगों,तुम इस हास्यके फछको पाभोगे और पांचालों समेत मुझमे मरकर शीघही यमलोक को जानोगे । ४६ । संजय बोले कि वह जलसे निकलाहुभा आपका, पुत्र दुर्योधन | रुधिर से युक्त गदा हाथमें लेकर नियत हुआ। ४७ । तब उस रुधिर से युक्तता शरीर जलसे भाई उसमकारका विदित होताया जैसे कि मानाओं से युक्त पर्वत होताहै । ४८ । वहां पांडवोंने उस गदाऊंची कानेगाले वीरको क्रोधयुक्त दंडधारी यमराज के समान माना।.४९ । उसके पीछे प्रसन्मनासे उपभके समान गर्ननेवाले बादल के समान शब्दायमान पराक्रमी उप्स दुर्योधन ने गद के द्वारा युद्ध में पांडवों को बुलाया । ५० । दुर्योधन वोला हे युधिष्ठिर तुम ‘युद्धमें एक २ मेरे ped their banda Duryodban ras offended at this and with bows contracted in rago gnishing his teetb, thus addressed Keshav and the Pandavas •-(45, " l'ou will run the reward of it, l'andavas and will soon go to the region of Yam together with the anchals." Sanjaya sard, " Your son, Daryodhan coming out of the lake with bleed sig body, looked like a hill with waterfalla The, Pandavas looked up a bim and his mace as You the bearer of staff. Then ballowing like a bull an i thundering like a clow-brave Duryodhan challenged the Pandai as to fight 50. Diryolhan grw, "Come to U0) Maliabharat (7048) बसमासात युधिष्ठिर समयको गमिनायो वीरो गोधपितु युधि । ५१ वर्मा विशेषण धान्तमामु परिप्लुत भृशं विक्षतगात्रय वाहनसीनक ॥ १२ ॥ अवश्यमेव योग्य सरव मया सा। युकान युक्तमित्येतरिस बार सर्वदा ॥५३॥ युधिष्ठिर उवाच ! मा मदिय त प्रहा करमेय सुयोधनादाभिमन्यु करने अभयुधि महारया ॥ ५४ ॥ मनधर्म भृश कर निरपेक्ष सुनिधणम् | ANTRA म्युरभिमन्यु तयागतम् ॥ ५५ । सबै मसी धर्महा. सर्षे शरामनाया मायेन युपता का शोक लि. पा ५ ५६ यकस्तु न इन्तप्यो घडीम में पर। तवाभिमन्यु वयो निजानुस्त्वामते कयम् ॥ ५७ ॥ सर्षों विमृपते जन्तु. कम्यो धर्मदर्शनम्। पदस्थ पिहिन बरालोकस्य पश्यति ॥ ५८॥ मामुग्ध कधीर सम्मखानी भकेला वीर बालों के साथ युद्धमें लग्नेको न्याय के अनुसार योग्य नहीं है । ५२ । अधिकतर कवचस्यागयकाहुआ जलसे आशरीर अत्यन्त पायक भंग मृतक सबारी और सेनाके लोगवाला । ५२ 1 सबको मेरे साए भाग्यही लाना चाहिये तुम सदैव पोप और अयोग्य घातों को मानतहो ॥५३॥ युधिोर गोले हे सुपोधन यह २१ वृद्धि नहीं हुई यह वात तब कैसी हुईथी जब कि बात से हारीथयों ने युद्ध केले अभिमन्युको मारा ! ५४ : पत्रिपधर्म अत्यन्त निय और असंबन्धहै उससमय उस दशाराले अभिमन्युको विपरीत सी से * मरा५५ । भाप सब धर्मों के जाननेवाले शूर और शरीरकी मौत के त्यागनेवाले थे न्यायसे उत्तम के युद्ध करनेवालोंकी इन्द्ररोको उचमांत की है। ५६ जो भोग बातों के हायसे मारनेके योग्य नहीं यही धम्मो सो उसमप तेरी बुद्धिसे बहुत से शुरवीरों ने मिलकर अकेले बालक भाभमन्युको कैसेमारा ५७ दुःख में परेहये सजीव धर्मदर्शन को विचारते हैं और अपने सानपर नियत परलोककेद्वारको बन्दमानते है । ५८६ हे वार काचको पारनको me one by one, Pandayan, for the fighting of one with mang in unlaw & I, opecially when I ata destitate of armour, tired wete without car and army All men must fight with me, You kaut sibat us proper improper 'Yudhislitlir said, " Your poloy was not tous lxfuro when wany warriors slow Abhinangu The works of Xahatrym are rery cruel Hup were you zo cruel to Abbimanyu. 55 You know all dharton!, were Braru and not caring fir life just cause, go to the region of sm. If you think it unyast for . Bingle man to be siain by maay, how it was that many warttors slem Abhimanya perple fallen in misery talk of virtus and think that the door of tho mezt world 19 closed for them Paton you armony, braso mia and tie up yrorlar You may take any other thing that yra atand in need of i gire you a bona you will get be king of you and Thote #bo fight in (709) Gada Part 11 बार मयस्वाधाग्यपि ते मास्ति तदप्यावरस्य भारत ॥५६॥ इयमेकान Forfरपोवदाम्याम् । पखालानां पाण्डवेयाम पेन युमिछसि ॥६.॥ या पानाला हतो या स्वर्गमाप्नुहि । ऋने व जीविताद्वार युध किने विषम सञप उवाष। ततस्तव सुतो राजद धर्म अग्राह कानन विधि मम शिरमान जामनदारिष्कृतम् ॥ १२ ॥ सोऽवशिरमाण' शुभकामनधर्म भानराजन पुषति कायम गैलराडिध ॥६३ सनम.सगदी राजन् सक्षः माममनि । मप्रीत पाण्डधाम् सर्वान पुत्रो दुय्योधनस्ल ।। ६४ । मातृणां भव तामेको पुण्यता गध्या मया । सहदेषेम या पोरस्ये भीमेन नकुलेन था । ६५ ॥ अथवा कारणुमेमाप या या मातम । पोरस्पर सहरं प्राप्य षिजन्ये च रणाजिरे । पाप गमिष्यामि घरस्थान्त सर्गमम् । गदया पुरुषव्याघ्र मिपट्टनिषा En महापुरेमे कमित् सदशोऽस्तीति चिन्तये । गदया पो हनिष्यामि सोनेष समा बार शिरके बालों को पांघो हे भरतवंशी जो दूसरी और कोई वस्तु तेरे पास न नप उसको भी लो । ५९ । और हे वीर फिर मैं तेरे इस एकमनोरथको देवाहूं कि पांचों पांवों में से जिसकेसाथ तुम लड़ना चाहते हो ।६०॥ निश्चय उसको पार कर भाप रामागे अथवा मरकर म्बर्गको जाओगे हे वीर युद्धमें जीवन के सिवाय तेरी कौनसी शिष्टाचारीको करें ।। सञ्जयवोले हे राजा इसकेपीछे भाप पुत्रने मुनारीकरण और जावूनद मुवर्ण से जटित शिरत्राणको लिग । ६१ । तप पर आपकापुत्र शिरवाणको बांधने वाला उज्ज्वल स्वर्णमयी कवच धारण करनेवाला सुवर्ण के पर्वतके पमान शोभायमानहुमा । ६) । हे राजा कवचधारी पहा मलंकत गदापारी मापकापुत्र दुर्योधन युद्धके मुखपर खड़ा होकर सब पारबोंसे पोला ।६४ कि आप सब भाइयों में से एकाई गदालेकर मेरेसाय बुद्ध करे सरदेष भीमसेन अथवा नकुलके साथ युद्धकरूंगा। ६५ । हे भरतर्षभ अपना अब में बुद्धको पार अर्जुनके साथ वा तेरेसाथ लडूंगा और रणभूमि में तुमको विजय करंगा हे पुरुषोत्तम भर में स्वर्णवस्त्रों से मदीहुई गदाकदारापो दुःखसे मिलने के योग्य शत्रुताके अन्तको पाऊंगा। ६७ । गदायुद्ध में मेरे समान कोई नहीं है वही अपने विसमें विचारताहूँ, सम्मुख आनेवाले तुम सकोगदा cunnlay one of the Pandavas or shall go to bosveu siter being slain. What can I do more for you ?" 61. Sanjaya said, 'Then your son, O king, put ona golden ar pour and head-protector adorned with gold, and looked gloriuas like a mountain of gold. Then standing ready to fight, your son saul to the Pandavas," Let one of your bri there come to fight with me with a torce I shall fight with you or Arjun and hope to win you I shall make Rd ond to the edipity by Deans of I have ?* equal to figisting with the altar std shell slay any nde of you connog before for Ind are not jus ill to fight ay mace ७०५० Mahal harat 17050) गतान् ॥ ६८ ॥ न म समर्था सर्वे धै योद्धयायन केचन । न युक्तमात्मना पतष गोंद्धत मच | अथा सफल छतत् करिष्य भवता पुरः ॥ ९॥ मस्मिन महसे सपा मिथ्या घेतद्भविष्यति । गृहमातु च गदा यो घोत्स्यंतच मया Arsen -- हति शल्पपत्रोण गदापद्धपर्वणि युधिष्ठिर दुर्योधन सवादे द्वात्रिंशोध्याय ११॥ सब्जय उपाय । एष दुर्योधने राजन् गजमाने मुहुर्मुहुः । युधिष्ठिरस्य समृद्धी पासदेयोग्रवादिदम् ॥ १॥ यदि नाम एप युद्ध धायेत्या शुधिष्ठिर । अर्जुन नकुलत्रीय सहदधमपि धा । २ ॥ किमिद साहस राजस्वया व्याहृतमीदृशम् । ए। मेव नित त्याजी भव गजा पुरनिति । ३ ॥ एतेन हि कृता योग्या पर्याणीह प्रयोदश । प्रायम्स सेही मारूगा । ६८ । तुमसा न्यायसे मेरेसाथ लडनेको समर्थ नहीं हो इसप्रकार अहंकारसे प्रेरितश्चन अपनी ओरसे कहने के योग्य नहीं हूं। ६९ । अथवा प्राप लोगोंके भागे इस वचनको सफल करूंगा इम मुहूर्त में यह बाब सत्यहा वा | अप्सत्यमोय तुममें से वह मनुष्य गदाको हाथ ले जो कि अब मेरे साथ में लडता चाहता है ७०॥ अध्याय ३३॥ सञ्जय बोले किराना इसपकार वारंवार दुर्योधन के गर्नपर पुधिष्ठिरके ऊपर क्रोधित होकर वासुदेवनी यह वचन बोले ।। । कि हे युधिष्ठिरजी यह युद्ध में तुको अर्जुनको नकुलको सहदेवको भी बुलावे । २ । तो क्याहोगा है राजा तुमने विनाविचारके यह ऐमावचन मोंकहोक रणभूमिमें.एककोती मरकर कौरवों together with me I should not till of iny opin praite- I shall prove my words 1 jour presence So let him who wishes to fight with me come before ine » itu mace 70. do CHAPTER XXXIII Sanjiga shid,' "hen Darsolhan thua lorring again and again, Vasudev sand im anger to Indhathr. yrat will you if he challenses you or Arjur, Nakul and Sahades? Why did you that he might become king after slaying one of the Pandavas? in ling pract sell co an tron statue for thirteen yenih in order to slay Bay You are like Shakugi a gambler, Bhim-en is stroog and powerfa's while Daryodhan is a practical man and therefore the better of the You have given advantage t, the enemy iad thrown yours? and us into difficulty, Who else will give niway his Hinedrabar | helpless enemy after haring conquered' all this formerel that may be able to slay Daryodhan while he is a CEN IVhy do you urge the enemy to fight with $899 king after slaying one of us. Itis doubtful for CTESinge Duryodhan, You have said that he mmy liwaliiiie 170 Gadnuty lub) 79198 ( ७२५१ ) पुको गजन मोमसनजिघा नया । ४ ॥क नाम मवेत् कार्यमस्मामिमरतपः । साहसं कृतासयन्तु हानकोशानुपाता ॥५ मा यमयानुपश्यामि प्रतियोद्धारमा हो । ऋो कोदपत् पार्थात् स ध मातिकतरमः ॥ ६ ॥ तविद एतमा पुनरेष ज्या पुरा। पिपमं शतधेय १९ चैध पिशाम्पते ॥ ७॥ पली भीम समर्थ रुसी राजा मयोधनः । वलयान या काली पेति कृतीरामन् पिशिष्यते ॥ ८॥ सोडा गस्त्वया , शत्रुः सम पथि निर्देशित । यस्तधारमा मुषिधमे फछामापारिता पयम् ॥ ९ ॥ को नु सर्वान् यिनिमित्य शपूर्णकेन पेरिणा। करमान तथा हारयेद्राज्यमाTARIहि पश्यामि तलाके यो दुर्योधन रणे गदा दम विशंतु घशक्तः सदमरोपि हि॥११॥ स कथं पदसै राई युध्यस्थ गदयेति में राजाहोप । ३ । या इमने तेरह वर्षतक भीममेनके मारनेकी इच्छासे लोहेकी मूर्तिपर कृत्यासिद्धकरीहै । ४ । ई भरतर्षभ हमलोगोंकी भोगसे अब कैसे कार्यको सक्ताई है. राजेंद्र तुमने दयाकरके विनापियारे यह कर्मकिया। 1 में युद्धमें उसके सम्मुख लड़नेवाला -रामानमें से किसी राजाको भी नहीं देखता हूं सिवाय पांडव भीमसेन के कि बहभी भर न्त अभ्यास करनेवाला नहीं है । ६। यह घूम फिरभी मापने प्रारम्भकिया जैमा कि पूर्वमे कियाथा हे राजा शकनिकी और तेरी विषमता है । ७ । भीमसेन वलवान और समर्थ है राजा दुर्योधन कर्म का पलवान भौर कर्मकर्ता अधिक है।८। हे राजा इस शत्रुको तुमने सत्य मार्ग में मत किया और अपने को बड़ी आपत्ति में डारकर हम को भी दुःख संयुक्त किया । ९ । कौन मनुष्य सत्र शत्रुओंको विजय करके दुःखमें पड़े हुये अकेले शत्रु केसाथ प्राप्तहोनेवाले राज्यको हारता । १० । मैं लोकमें अब उहपुरूप को नहीं देखताई जोकि युद्धमें गदाहायमें रखनेवाले दुर्योधन के विजय कर ने को समर्थ हो । ११ । भरतवंशी सो तुम किमप्रकार शत्र से कहते हो कि और हमारे मध्य मेंसे एकको मारकर राना। ३ भीमनको पाकर न्यायसे युद्ध करनेवाले हम Bhim, You have nade a mistake in making t'us promise 83 rashls. -5: { Bea as king expuhio of fighting with him with the exception of Bhiw, who is out of practice. You are aga n gambling like before . ६०.
[७०५२] Mahabharat (7052) लि। एकच नो निहस्पाजी भष राजेति भारत । १३ आवृकोदरं समासाप सायी विवे हि: पायता युखमानानां कृती शेप महावक्षः ॥ १४॥ परास्माविरण १ मष राजति में पुन: ननं न राज्यमागेषा पाण्डोः कुम्रपान सम्ततिः। भस्यम्त बमघासाय सृष्टा भैक्षाय धा पुन ॥ १५ ॥ भीमसेन उवाच । मधुमदम मा फार्षि बार यदुनन्दन । अध पार गमिष्यामि धेरस्य भृशदुर्गमम् ।। म सुपोधनं स्ये हनिष्यामि न सशयः । विजयो शुषः कृष्ण धर्मगजस्य एषते ॥ १७ ॥ मापन गुणेनेयं गदा गुरतरीतम । न तथा धाराष्ट्रस्प मा कार्षीमापर यथाम ॥१८॥ महमेन हि गदया संयुगे योबुमुत्सहे । भवन्तः प्रेक्षकाः स मम सन्तुलना दन ।। १९ ॥ सामरामपि लोकांस्त्रीभानाशस्त्रधरान् पुधि । योधयं रणे कण, कि ताप पोपकार ।।२०।। समय उषापा तथा सम्माषमाणातु पासबो कोपरम। लोगों की विजय में सनो है क्योंकि यह बड़ावलवान दुर्योधन कर्मका।।१४॥ फिर तुमने यहभी कहा है कि हममें से एक को मारकर राजाहोमे निश्चय करके पाण्डु और जन्तीकी सन्तान राज्य भोगनेवाली नहीं है केवळ बोपनवास भार धारदार भिक्षा मांगने के अर्थ उत्पन्न करीगई । १५ । भीमसेन बोले मधुदैत्यके मारनेवाले यदुनन्दन भी व्याकुलता मतकरो अब उसी कठिन और दुष्प्राप्य शत्रुनाके भन्दको पाऊंगा । ६। अब मै युद्ध में दुर्योधन को मारूंगा इस में कुछ सन्देश नहीं है हे श्रीकृष्ण जी धर्मराजकी पूर्ण और अव विनय दिखाई देता है । १७ । यह मेरी गदा अर्द्ध भागमें बहुत भारी है ऐसी दुपार्षन भी नहीं है हे माधवजी पाहामतकरो। १८ । मैं युदमें गदासे इसके साथ लड़नेको | उत्साह करताहूं हे नार्दननी आप सब लोग मेरे युद्धके देखनेवाले रो। १९ । केभीकृष्ण जी मैं युद्धमें नानामकार के शस्त्रधारी देवताओं समेत हानों मोकोसे थी युद्ध करपक्ताई तो अब दुयॉनसे योनहीं करूंगा।२०/फिरमसम्म चित्त वासुदेव . . one of ur. Surly Kunt.'s sung aro not born to tu c. They are made to lo merilo and to beg their food." Bhim said, Elayor of Mathu! Ladu Naldao, bo pot confused. I shall make an end of the anuty. 16. I shall slay Duryodhan in battle without doubt and Yudhishthira victory is securo. My mace is rery heavy in the middle Duryodban has no ruch mace. Bo notjanxious, Madhar I dara fight wit'ı Dursodhan; you mart all witness our fight. I can fight against the tiitto rorldo includiog gods, why should I not be able to worootud Duryodhan. 20. Al this Siri Rishn praird Bhim and said, you will no doubt sing Yudbuslitbir's enemy and will + Wa - (7053 Gudants Pubदापर्ण ए मपूजयामास यचनवेदमा ता॥ घामानस्य महामारी धर्मराआ पुधिार मिहतारि पका दीप्ताधि प्राप्तान संशय ॥ २९ । यया घिनिहता संयं धृतराष्ट्र सतारणे राजाना गजाश्च नागाश्च विनिपातित ॥२३॥ कालिंगा माया प्राध्या मम्मारा कुरवाता । स्थानालाय मायुध निरत प्रारजन्दन ॥ २५ । हत्या दुरयों धनचापि प्रपाजो सांगाराम् । धर्मराजाय कामेय या विष्णु शचीपने ।२२।। स्थान प्राप्य रणे पापो धाराष्ट्र विनश्शी | समय सक्थिनी महावा प्रातक्षा पालवियसि ।।२६। यस्मेनंतु सहा पाय योद्धव्यापतराष्ट्रा पतीचबलवाष युसशोध निम्यया ॥ २१॥ तस्तु सत्यकी राजन पूजामास पाण्यम् । २८ ॥ पावाला पाण्डवेयाम धर्मराजपुरोगमा । तो भीमसेनस्य सर्य एमाध्यमय ॥ २९॥ ततो भीमपलो भागो युधिष्ठिराथायत्रीत- गुजर, सब-तिष्ठन्त सप-तमिव भास्करम् ॥ ३० ॥ महमेतेन सङ्गम सयुगे योर्मुसहे । न हि शत्तोरणे जतु मामप जी ने सम्मकार वार्ता करनेवाले भीमसेनकी मशमा। और यह वचन बोलें (श हे महावा वह धर्मराज युधिष्ठिर म्हारे आप्रिनहोकर निस्संदेह मृगक शावाला भार अपनी प्रकाशमान लक्ष्मीको प्राप्त है। २२ । युद्धमें धृतराष्ट्र के | सत्र पूर्व तेरेहीडायो मारेगये राजा राजकुमार और हाधीभी गिरापेगपे । २३ पाण्डुनन्दन कालिंग मगरनिय और गान्धारदेशियों समेत कौरवलोग तुझको बडे यदय पीकर मामये । २॥ हे कु के पुत्र अब तू दुर्योधन को भी मारकर इस सागरम्बरा भीको धर्मराज के एनेकगे जो कि विष्णुने इन्द्रको सिक करीया । २५ । पापी दुधन युद्धमें मुझको पाकर नाशको पावेगा तुम इसकी अब को तोड़कर अपनी प्रतिज्ञा का पालन करोगें। २६ । हे भीमसेन यह दुर्योधन सदैव उपाय क लिन योग्यद यह मदै कर्म कर्ता पळवान और युद्धा कुशलहैं । २७ राजा इसके पीछे सागकी पांचाळ और धर्मराज समेत सब पाण्डवों ने उस भीमसेन की मंशमाकरी अर्थात् संवनेही मीमसेनके उस वन की प्रशंसाकरी । २९ । उसके पछे भयानक पराक्रमी भीमसन उस सजियों समेत नियंत भूर्य के समान मतप्त करनेवाले पधि प्ठेर से गोले। ३० कि मै युद्ध में give in n bus hinglom T'le suns of Dhritrasst a were slain by you along with other prices, and e prants. , Kalingas, lligadhar Card Gandlare, with the Kauravas, were sla'n by you Having shun Durydhan, you wll give the sigitland to Yudhishthir as Vish u bad done with Indre 25• Sialul Daryodhan yıll meat is death In battle and you will, fulfil your promisa by breaking his thigh Dury sdtan should b fought with caref tily, Bum, for ine is powerful and clever tu fighting, Ther'supaki with the Panchal and i udhish thi with the Pandung praised Blum. all the replo pi wised him Then Bhim of-dreidful prowess ord to Yudhishthir who was glorious - - - Mala harat (7053) पुषाधमः ॥ ३१॥ मय क्रोध विमोपामि निहित इंदये भृशम् । मुयोषने धारा साण्डवेऽग्निमियातुन. ॥ ३२ ॥ शल्पमोरिष्यामि तद पाण्डव हुन्छयम् । निरस्य गदया पापमय राजन मुखी भव ॥ ३३॥ मा कीर्तिमा माला प्रतिमोत्ये तवान। प्राणान भियस्य राज्यात मोश्यतेऽप सुयोधनः ॥३॥ रामा तराष्ट्रोऽय भुरपा पुत्रं मघा इसम । स्मरित्यशुभं कर्म यत्त कुनिचिजम् ॥३५॥ इत्युकथा मरतभेष्ठो गदामुद्यम्य धीम्यान । तिष्ठत युद्धाय शको प्रमिवावयन् ।। ३६ ॥गवान ममण्यन थे तब पुराऽतिधीर्यवान् । प्रत्युपस्थित पार्गमचो मतमिष नियम ३७ गदास्त तब मृत युद्धाय समुपस्थितम । दशः पाण्डवाः सो कैलासमिन भारिणम ॥ ३८॥ संमेकाकिनासारा धार्तराष्ट्र महायलम् । वियुयोमष मातंग समय पाण्डवाः ॥ ३९ ॥न सम्मोन चमन प्लानि च यथा । मासीहत्यापन इसके सम्मुखहोकर लड़ने को उस्माई करताहूं यह नीच पुरुष युद्ध में मेरे विमान करने को समर्थ नहीं है । ३१ । अब मै हृदय में रक्खेड्ये कठिन क्रोधको धृतराष्टके पुत्र दुर्योधन पर ऐमें छोडूंगा जैसे कि खारडवपन में अर्जुनने छोड़ाया । १२ । हे पाण्डव अब मैं गदामे पापीको पारकर आपके हृदय में रानेवाले भल्लको उखागा हे रामा मात्र प्रसन्न होजानो। १३ । हे निष्पाप अब मैं कीर्तिरूपी मालाको आपके कंठमें डालूंगा भव या मुयोधन राज्यलक्ष्मी समेत अपने माणोंको त्यागेगा । १४ । भै र राजा धृतराष्ट्र मेरे हाथसे मारेहुये पुत्रको नकर उस दृष्ट कर्मको स्मरण करेगा जो कि शकुनी की- बुद्धिसे उत्पनहुआ। ३५ । हे श्रेष्ठ भरतर्षभ यह कहकर भीमसेन गदाको उठाकर खड़ाहुआ नौर. पुडके निमित्त | उसको ऐसे बुलाया जैसे कि इन्द्रने त्रासुसो बुलायायाया । ३६ । पापका बड़ा पराक्रमी पुत्र उसके बुलानको न सहसा हुआ शीघ्रता से ऐसे सम्मुखहुभा जैसे कि मतवाला हाथी मतवाले साथीके मम्मुख जाता । ३७ । सबपाण्डवों ने गदा हाय में रखनेवाले और सम्पुखनियत मापके पुत्रको शिखर रखनेवाले कैलासके like the Son, “I dare fight agaiast bud, for he cannot conquer me 31: I shall discharge my anger at Duryodhan as Arjun had done in the Khandav forest. Having slain that binner with my moce, I shall romove the dart from yuur breast Be chees ful, king I shall wear the garland of faino round my neck. Duryndlian will give up bus wealth and kingdoms along with his life áni Dluritruslitra wil remom. ber the cruel depdo done by the advice of Shakooi When'he heart of his son's death at my bands. " Having said this, Bhita otood up with' hig mace and challenged him to fight ab Indta had done Vritrakur 67 Not bearing the cha lon go of Bhun, your son fuced him ag one wad elephant faces anottier Thi Pandavas looked on him as on a peak of Kailas The Papilav&s were much pleased to see Duryodhan - 7053) Gada PHIV गहापर्व । ५०५५ । स्थापि स्थित सिंह याहये । ४० ॥ तमुघतगर्द रष्ट्या कैलासमिव लगिणम । माम मेगस्तदा राजन् दुर्योधनमधाधीत ॥ ४१ ॥ रावापि धृतराष्ट्रेण स्वया घामासु यह कृतम् । तदुष्कृतं कर्म पत्त धारणापते ॥ ४२ ॥ द्रौपदीच परिक्लिष्ट ART मध्ये रजा ने द्विजितो राजा हुने निधय त् ॥ ४३ ॥ यानि चाम्यानि दुधामन पागानि कयामसि । मनाग: मुख पार्थेषु तस्य पश्य महत् फलम् ॥ ४॥ ते निहतः शेते शस्तको महायश गांगेयो मरतधेष्ठः सर्वेषां न पिताम: हती द्रोणध कर्णश्च हत शल्पः प्रतापमान : परस्य वादिकासी शकुमिर्मिहतो पुधि ॥ ४६॥ मातरले हताः स पुरा सहसीना: : राजामश्च हता पूरा समरे पनिवर्तिनः ॥४७॥ एते चान्येच निहता बहवः क्षत्रियर्षभा । प्रातिकामी तथा पापो द्रौपचाः क्लेशकयत ॥ ४८ । अपशिष्ट स्वयकः कुलग्नोऽयमपूरपः । वामध्य समानदेखा । ३८ । अपने यूधसे जुदा हाधीके समान अकेले पड़े पसबाम दुर्योधन को पाकर सबपाण्डव अत्यन्तमपन्नहुपे ३९ । दुर्योधनको व्याकुलतामय ग्लानि और पीड़ा नहीं हुई और पदमें सिंहसमान नियतहमा। ४० हे रामा अव भीममेनने उसगदा उठानेगळे शिवरधारी कैलामके समान दुर्योधनको देखकर पहननकदा । ५१ . कि ,राजाधृतराष्ट्रन और तुमने जो हमारे साकिया व को वारणावतनगर में किया उसपापकर्म को. स्मरणकरो। १२ । और जो रजस्वला द्रौपदीको सभामें दुःखी किया और जो शनिकी वृद्धि के निक्षपसे रामापृधिष्ठिर को धूतमें छलमे बिजप्रकिया, और हे दुर्बुद्धी इनके सिवाय जो २ तुमने अन्य पापोंको निरपराधी पाण्डवों के सायकियाहै उसके बड़ेफलको देखा४४) तेरेका णसे मृतक घड़ेपशवान् गांगेय हमसबके पितामह भरतर्षभ भीष्मनी शरशययापर सोते हैं । ४६ । प्रतापवान शल्य कर्ण और द्रोणाचार्यजी मारेगये, और माताका आदि कारण यह शकुनि भी युद्धमैं पारागया १४६॥ और सेना के लोगों समेत तेरे शूरमाई पुत्रादिक भी मारेगये और युदमें परांमुख न होनेवाले शूरवीर राजालोग मारे गपे । ४७ । इनकेसिबाय भन्पर हजारों उत्तमक्षत्रिय मारेगये उसपकार द्रौपदी के दुःख का उत्पन्न करनेवाला पापी मासकामी मारागया । ८ । कुलका नाशकरने stunding like an elephant srpsraetd from its companjong Duryodhan wasneather afiad nor troubled 40 Theo Bþım 82019g that mace berror atand like a hill, said, " Remember that Dbrstraabtra and did to us at Barnavat. Remember the rangs done to Drupadi And your wrongful deprivation of our kmgdom boy the help of Shakuni apd other wougs done to the Pardapar; fur you will reap the toward of thuse acts to day. Bhishma the grandfather of great prowess sleeps un the bed of arrows on account of you 45. Glorious Shalya, Karant und Dronacharya, are Blain as well as Slakunt the root of all enmity. - you M ७०५६] Mali bljarat (10565 4 . । हनिष्यामि गदया नात्र सशय ॥४९, ॥ अद्य तेऽह णे दपै सर्य नाशयिता नेप। राज्याचा विपुला राजन पाण्डरेयुं च दुष्कतम ५०॥धुर्योवन उधाच । किं कथितेन बहुना युपगद्य मय, सह । अथ नेह विनेष्यामि युव श्रद्धा वृकोदरं ॥ ५१ ॥ किन पश्यसि मापाप गदायुद्धपस्थितमा हिमपछिपराकारा प्रगृह्य पाती गदाम ५३॥ गदिन कोच मा पाप जेतुमुत्महने रिपु । स्वायतो बुध्यमानस्य देवपि पुरन्धर । ५३ । मा कृष्ण गर्ज कोन्तय शारदाम्रमियाजलम दर्शयस्य घल युद्धे पायत्तसेच विधते ॥ ५५ ॥ मस्यं तवचन श्रुत्या पाण्डया सहसूजया : 1 सम्पूजयामासुस्त दो विजिगाएर ॥ ५५ त मत्तमिय मातम तल शब्दैन प्रानया । भूयः सहर्षयामाम् पाली नीचपुरुष अकेला तूही शेष रहंगयां आ तुझ को गदासे निस्संदेह मौरंगा । ४९ । हेराना अ मै युद्ध में तेरे सरंकार का नाशकरंगा और विनवकी बडी भाशासमेत पांडवों के साथ तेरे दुष्कर्म को भी दूरकरूंगा । ५०1 दुर्योधन ने कहा है भीमसेन अधिक वार्तालाप करनेसे क्या लाभ है भवतू मेरेसाथ युद्ध कर मैं तेरे युद्ध करने के उस्मा को दूरकरूंगा 1५।। हे पापी हिमाचल के शिनर के ममान वही गदाको लेकर गदायुद्धं में नियत होनेवाले मुझके। क्या नहीं देखता है। ५२ हेदुष्टात्मा अब कौन शत्रु अथवा देवताओंमें इन्द्रभी त्याय से युद्धकरनेवाले | मुझ गधाधारी के मारने को उत्माई करता है । ५३ हे कुन्तीके बेटे जलसे खाली, शरदऋतु के बादल के समान निरर्थक क्यों गर्जता है युद्धमें भर्पने वलको दिख लामो जहांतक तुझमे पराक्रम होसके उमप्सवको दिखलाय । ५५ । विजयाभिलाषी सब पांडवों ने मजिगों समेत उसके उसवरमको सुनकर उसवचनको प्रसंसा करी । ५५ | डेराजा मनुष्यों ने उस हाथी के समान मावाले राजा दुर्गाधनको प्रत्येचा Your Grather and sons ars slain wit your army und unftınchung war Tiong his thousandt like Pmtikami ho 183 the source of so much troubly to Drnupadı. You nlone, t o curse of tho family, romain anel I alall surely slay you with inj inacó I shall crush your pride and hope of victory ayralas four ntisdords done to the Pandavas sor Duryol van Anid, Wlát 19 clic und of talking sd much fixul with mo and 1 di 11 rooliso your daxire fur fight. Do you not 800 stand ing with any foace lihca p-ah of the Ilimalay as ? What enemy including Indra lim wolf, can fight with me? Why dryos roar liko a rate less cloud of Wntr, Shoir jour jir 11 648 ns far as you can The Prodavat an] Srinj 154 (cairous of villity bra.Sodº1118 Tordd and pleasaj Princ Dirsollinn trith the tunse of this restang The . " 70371 Gada Pary 177777 [७०५७ राजन रोपौ नृपम् ॥ ५३॥ वृहीत कुअगस्तत्र या हन्ति वासरत् । शत्राणि सप्रदीप पाण्डवानां जयषिणाम् ॥ ५७n इति शमणि गदायुद्धपर्वणि भीमदुर्योधनवाक्ये नपत्रिशोध्यायः सशच । तस्मिन् युद्ध महाराज मुसहत्ते उदारुणे । उपविष्टेषु सर्वेषु पाण्डमहाममु॥१॥ततस्तालयजो गमस्तयोर्युख उपस्थितोश्रुत्वातील गजन्ना जगाम हलायुध ।। तदृष्ट्या परमप्रीता पाण्डया सहकेशधा उपगम्य पसरविधि पत् प्रत्यपूजयन् ॥३।। पूजयित्वा तत पश्चादिद घचनमयुयन् । शिष्ययो कौशलपुर के शब्दों से फिर प्रपन्न किया । ५६ । वहां हाथी विग्घाहे घोडे रारम्बार हासे और विषय के इच्छावान पांडवों के शस्त्रप्रकाशितहुये ५७ ।। 1 भयाप३४ संजय बोले हे महाराज उस बडे भयकारी युद्धके वर्धमान होने और सब महात्मा पाण्डवोंके वैठकानें । ' और 'नदोनों शिष्यों के युद्ध नियत पर साल ध्वजापारी हलपर वरदेवजी भी उसयुद्धको मुनकर आपलचे । २ । उनको देखकर केशवनी समेत सब पाण्डब लोग अत्यन्त प्रसन्न हुये उनके ममीपजाकर बैंडे पादर मानसमेत लाकर विधिपूर्वक पूजन किया । ३ । हे राजा पूजन करनेके पछि सबलोग यहबचन बोले कि हेवलदेवजी युद्ध में दोनों शिष्योंकी सावधानीको elephrodts granted the lorses a-gh d au l tuu sveapina of the 1 andavas shode bright '07 1 - . -- + CHAPICR XXXIV Sanjaya 6aid, " When the battle wu8 razing fiercely the Pas davxd sat down and the two warriors stood ready to fight Hearing of that battle Balder the bearer of Palm star dard can e there The Pardaras wito kesbar were much pleased to see him and solcomed With great respect and said. See the fight g fy disciples Balulev L Okipg at the Pandavas Sis hn and tivo ७०५६० 17060 -- Mnhai.orat जनमजय उवाच । एयरपदा रामस्तामन् न्युम इपास्यते । आमपोशा याको वृष्णिमि महित प्रभु ॥ १ ॥ साहाय्य धार्तराष्ट्रस्य न व कत्तास्मि केशव मवेष पाण्डु प्रां गमिष्यामि यथागतम ॥ २ ॥ एवमुक्त्वा तदा रामो पात, शत्रु नियईग' । तस्य वागमन भ्यो ब्रह्मन् शासितुमर्हसि ॥ ३ ॥ भास्याह में विसरत कर्थ रोम उपस्थित कथञ्च यात युद्ध कुशली धसि मे मत• ॥ ४॥ वैशम्पयन उमेर उपनयनियिष्षु पाण्उयेषु महात्मसु । प्रेषितो धृतराष्ट्रस्प समीर्ष मेधु पनी शमति : याही हिनार्य सर्वदेछिनाम ॥ ५ ॥ स गत्या हालिमपुर धृतमा समेरपच । उक्तवान पचन नप्य दिनचैध विशेषरा ।। ६ । म च सत् कृतवानाजी वारयात हि ते पुरी ७॥ सन्चाप्य शम तत्र कृष्ण पुरुषसत्तम मागस्त महा घाईरुपप्लानःधिर ८ त प्रयागत कृष्णो धार्तराष्ट्रविमति याय अपाय३६॥ "संजय वाले प्रथम उम युद्ध के वर्तमान हानेपर जा मभु बलानी केशर जीसे पूछकर दाग के साथ यह कह कर गपे । १ कि हे केशवजी मैं पायडवों को और दक्ष की सायता नहीं करूगा जने आयाहू वैसेही चलाजाऊंगा ता शत्रु के मारनेगाले पल देवजी ऐमा बहकर चलेगो फिर जनमेजय मे कहीं कि हे व्रमा भाप फिर उनके प्रागमन के वृत्तांत को मूल समेत वर्मन करने को पोम्यहो कैसे मम्मुख पत्तवान हुये और कैसे युद्धको देखा है भाग पर्णन करने समर्थो । ४ । वैशपायन वोले कि उपप्ठत्री स्थानपर महात्मा पापों के निवाम करने पर सब शरीरयारियों के आनद के अर्थ सन्धि नान | मधुमदनी तर ए के सम्मुख भेजगपे हे महाराज श्री रणनी ने स्तिनापुर पाच धृतराष्ट्र से मिलकर सत्य २ सबकी रद्धा करने वाला पचन कहा । परन्तु बहुतमा करने पर धृतराष्ट्रने उगको नहीं किया । ७ । तब यहां पुरुषोत्तमें भीकृष्णमी सन्धिको न पाकर उपप्नवी स्थानको भाये ।८ । मधुसूदनजी शॉपम् से विदाहोकर अपनी स्थानपर गार मधिके न होने पराणों में. बचन बोले। कार से मेरितहोकर करवगेग मेरे बचनको का? CHAPIIRII\v 863A691H, Janmrjaya at hnd of Vasi mpyan the remain of Balisvalicumit book for hhdgaw way in the bgianing of the facand And Nint lio pould ncither help the hautsysnor que Pandarns to Janmejarn's guastion Varsham yan made the follox. ing reply ---From Updarzaliero ihie PandIAT patayingo, sliri Krisko trase try t*t Hotlimapar vi regotiate pracowanith Micrashtra Shrro Kredisi ile ihtirdut the factors no 30 ar to'lum and the fasirersaneliltilspissga nisdealitha Pundarax.' Tho F .
, STOTTAGaia,Part गाय -पासानिमाथीदान त्रनित ो गया मुम्पज सहिमा म बाबांतरण रोहिणी महामेना. irala कियतामिति तत् रुग्णी नास्प बके वर्चस्तदा ॥१२॥ ततो मन्युपारीता अगाम मदन तापपानीलसरस्वत्या महायशाः १६.मैनप्रयोगण सहित सपाइयः मायामास भोजस्तु उधिनमरिम। युयुधानस रेस्तु पागवान् ॥ १४॥ शरिणये गते गरे पुष्यण मधुसदनापागोषार पुरसहरय ययाभिमुखः कुद | गच्चम्ने पथिस्थस्तुगमा प्रेग्यानमार सतीषााया सापकरणानि च भान बायामानान् । wriमर्थ रजतव धेनुसासि पोजिन कुजराधचित्र हमालि सिममानर्षिता सतीतो पारदम । प्रतियोता पर बालम मेरे साथ पुष्पनक्षत्र पात्रा करो, १.२...। उसके पीछे सेनाको वियत होनेपर बलवानों में श्रेष्ठ, वडे साहसी बलदवजी..अपने भाई श्रीकानमा ११.महावाहु मधुमदनजी, उन्होकी भी सहायता करो परन्तु श्रीकृष्णाजी सम रचनको नहीं किया १५ । इसके पीछे कोपसे पूर्ण :चितयश बान दुनन्दन वलदेवनी सरस्वती तथिको यात्राकरगगे।१३।भर्थात् भनुराधामक्षत्र में भारम्भो' यादवोसमेत चलगपे...फिर शत्रु विजयी... कतवर्मा योधन भाका मिला और सात्यकी समेत वासुदेवजी पोडलों में मयुक्तहुये । १४. शूर मलदेवजी के जानेपर मधुमदनना पप्य नक्षत्रमैं प रडवों को आगे कर के औरंवों के सम्मुख गये। २५ । फिर चलते हुये मार्गमें नियध बलदेवजी ने सेवकों को मासीक तीर्थयात्रा में सब सामान और शमादिको को, लामो और बारकास अग्नियों समय याकरानेवालों को भी, लाओ३सोना चांदी गो. बलं हाथी रय अंट.मादि: सवारियां मार सरकार के सामान को तीर्थयात्राके Klāra vas ürgidžbg. Fate dünnt hearme. Yoo shcúld advanice, miten meja . Paushya, nakaltra.;" 10. Then then the armientele being; formed into parties, ; Baldey, spökets Sari Krishn acid, askód" him to help both sides, witotraged at this and takieg. the Yudaras, w foon vided with:Daryo Mohe Pri- EPALMAIL. ...' :: .. on his P Mpnili And पररामेति पार्थिनीच तदा रामा हुष्ट्वा कृष्ण सपाण्डषम् । दुग्यो NARE की गदापाणिमपस्थितम् ॥ ५ ॥ नावारिंशदहाव्यधदेव मे मिस्तस्म भाषा ततस्तदा गदाहस्ती दुर्योधनवृकोदगे । युद्धभूमिगती धीराघुमावेष है।पेण संप्रपातोऽस्मि शवणे पुनरागतः। शिष्ययो गदायु द्रष्टुकामोस्मि पम्पंपधातमम् ॥८॥ कृष्णी चापि महेण्यासाषभियाध इलामुघम् । सस्पजाते निरखतुः॥७॥ ततो युधिष्ठिरो राजा परियजय हलायुधम् ।स्थागतं कुशलचाम्मे मभिषाप स्थिता राजनीहिणेयं महावलम् १०. भीमसेनाथ बलषान् पुषप्तव जमा । विष तथैव बोधतगदी पूजयामासतुलम् ॥ ११ ॥ स्वागतेन च तं तत्र प्रतिपूज्य नराधिपाः पश्य युखं महावादी इति ते राममनुषन् । एवमुचमहात्मानं रोहिणयमा Mahabharat (7058) देखो । ४ । तब वलदेवजी पाण्डों समेत श्रीकृष्णजी को और हाथमें गलिय, सम्मुख नियत दुर्योधनको देखकर वोले ! ५ । कि अब मुझ तीर्थयात्रा करनेवाले के बयालीस दिन व्यतीतहुये पुष्यनसत्रमें गया और पितृलोक संबन्धी भवण नक्षत्रमें फिरलौट आपाहूं हेमाधव निमय करकैमैं अपने शिष्यके गदायुद्धके देखने का अभिलापी हूं। ५ । इसके पीछे गदा हाथमें रखनेवाले रणभूमि में वर्तमान दोनों वीर दुर्योधन और भीमसेन अत्यन्त शोभायमान हुपे । ७ । तदनन्तर रामा, यधिष्ठिर ने हलधारी वलदेवजी से तिलकर बुद्धिके अनुसार स्वागतपूर्वक उनकी कुशलसेमको पूछा । ८ । बड़े धनुषधारी अत्यन्त प्रसस भीतिमान् श्रीकृष्ण जी, और अर्जुनभी नमस्कार कर के मिळे । राजा उसीप्रकार शूर नकुल सह देव और द्रौपदी के पाचों पुत्र बड़े वळवान वलदेवजीको नमस्कार कर 'के नियत हुये । १० । हेराजा इसके पीछे बलवान भीमसेन और आपके पुत्र गद्रा, उगने पालों ने पलदेवजी का पूजन किया। ११ वापर सब लोग चारोंभोर से स्वागा पूर्वक प्रतिष्ठा करके वलदेवजी से बोले कि हे महाबाहु युद्धको देखो इस प्रकार से सव राजाओंने वलदेवजी से कहा । १२ । तब बड़े तेजस्वी बसदेवमीन the Warriors arined with alace, Beldov taid, " I have been visiting the holy plnces for fo ty tivo days and have returned at this hely, time. Surely, O Madhay, I am desirous of looking at the battle of my two disciples" Then both Duryodhan and Bhim, armed with maces, looked glorious. Yudllushter met Baldov and inquired about his health, while Arjun und & ni Krishn bove) down to him, Nakuli Sahad and the five song of Diaupadi too, saluted brave Balndov. 10, Thien brava Bhim and your son, di med willa maos talu ted Baladı. All men paid their respects to him and said " Look at the battle. Baldor met the Paoday and Srinjaya warriors and inquired about their hta tu and prosperity and having exclorged greeting with . 110599 Gada Pary 117193 महारपा तात्पप तदा राम पाडवा स्यानपि पृच्छतु अशल सर्वात पधिमानिसोजस । तथैव ते समासाय पप्रधदुस्ततममामयम् - १४ प्रत्य भयं ली सनि क्षत्रिपांच महामन । वा कुशलमयुक्तां सम्पिदमन या १५. अन इन सापकिच प्रेग्नास परिपस्यजे ॥ १६ ॥ मनि चनानुपा माप कुशल पर्य छान घिधिषद्वाजन् पूजयामासतुभम ॥ १७ ॥ प्रमा पमिष देवेशामिन्द्रोपेन्द्री मुदापुती । ततोऽप्रीतम मुसो गरिणयमरिन्दमम् ॥ ८ ॥ दमागोमागुर पश्य समेति भारत ॥ १९॥ तेषां ममा श्रीमान् केशध पूर्वज । पविशद परमात पूज्यमामो महारये ॥२० । स पमो राजमावस्यो नोस बोमा सितमम | दिवीप नक्षत्रगणैः परिकीणों निशाकर ॥२१ ॥ मलयो सणि | पातस्तुमुलो से महर्षण । आसीदन्तकरो राजन पेरस्य तप पुत्रयो ॥ २२ ॥ शवि शश्यपणि गदायुदपर्वणि बलदेवागमने चाषिशोध्यायः ३४ ॥ | पाण्डव सभी आदि सब पहात्मा राजाओंसे मिलकर उनकी कुशलक्षेम पूछी इस मकार उन सबने मिलकर बलदेव से चित्त के मानन्दको पूछा । १४ । फिर रसदेवनीने सथ मह स्पा क्षत्रियों को नमस्कारादिक करके और भवस्या के अनु सार कुशलक्षेमके शाब्दों से युक्त वार्तालाप कर के वडी प्रीतिपूर्वक श्रीकृष्ण और सात्यकिसे मिलाप किया। १६ । और उन दोनों को मस्तकपर सूचकर कुशल मंगलको पूछा हराना उन दोनोंने भी उन गुरूनीका विधिपूर्वक ऐने पूजन किया 1७से कि मसन्नीचर इन्द्र और उपेन्द्र ब्रह्माजी का पूजन करते हैं इस के पाछे धर्म के पुत्र युधिष्ठिर उन शधिजयी बलदेवजी से बोले । १८ । कि हे बलदेवनी दोनों भाइयों के इस युद्ध को देखो। १९ । यह सुनकर हेमातवंशी उन थयों से मतठापूर्वक पूजित अत्यन्त प्रसन्न महावाहु श्रीपान बलदेवनी उन के माप में वेठगये । २० । मालाम्बर गौवर्ण वदेवनी राजामों के मन में नियत होकर ऐसे शोभागमान हुगे जैसे कि वर्ग में नक्षत्रों के समूहों से घिरामा चन्द्रमा भोमित होता है । २१ है राजा इस के पछि भाप के उन दोनों पुत्रोंका युद्ध वडा कठिन और रोमहर्पगठ करनेवाला शत्रताका भन्त करनेवाला हुआ।२२। them, affectionately embraced Krishn and Satyaki ho smelled thor, forebeads and inquired about their health, thay too, is their tarni Tespoored hours like a preceptor add worshipped bem 29 Indra and big Founger brother worship Brahma Then Yudh shthir spoke to Balder, Saying, ' Look at the battle of the two couans' At this, Balder sat down in the midst of the Panda yes and looked glorious like the moon surrounded by state. The battle of the two warrius Ha dreadful and awe inspiring" 22, ७०५६ नागम म"..घायम कशक .:. + के निवास करने पर सब- शरीरचारियों के आनन्द के,अर्थ सन्धिको Mahnilarat 117,060 जनम जय उवाच पाने यामो पुष्णिमि: महि मवेयः पाण्डु राणा...:. ..'::::: मा Mir यात शा निपाई णः तस्य चामा :::.:.:.:: ममम बिसारतः सर्थ दाम उपस्थिमः कच दृष्टयात युद्धं कुशलो धसि मे मतः ॥ ५॥ वैश र उपपलपानवियुपु पाण्डवेषु महारमसु । प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीर्ष इंन शमति मायाही हिताय सर्वदेहिनाम् ॥५॥ स गरयावास्तिमपुरे, प्रता समेपिच । उक्त्यान घचन तथ्यं निश्चैवं विशेषतः ॥ ६ ॥ मंच सत् कृतबाहाना बधाश्यात पिते पू. ७ ॥ अवाप्य शमं तत्र कृष्ण: एकंपसत्तमः । आगच्छत महा पारुपले जगyिriiiनतं प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविजितः अध्याय ३५ संजय व से पथम उप युद्ध के वर्षमान होनेपर ना-प्रभु बलदेवजी के पूछकर बगियों के साथ यह कह कर गये।।। कि हे. केशजी में पापडयो की और गधी की सहायता नहीं करूंगा जले आयाहूं वैसेही नलांजाऊंगा। तशयोंके. मारनेपाले पल, देवनी ऐसा पाहकर चलेगो फिर जनमेजयः कहीं कि हे वसा भाग फिर उनके भागमन के वृत्तांत को मूल समेत वनः को योग्यहाँ कैसे मम्मुव पत्तमान हुये और कैसे युद्धको देखा गणन करने में समर्थो । ४ । वैशंपायन बोले कि उपप्ठवी स्थानपर महात्मा मंघुमुदनी धनर ए के सम्मुखं भेजेगपे हे महाराज श्रीकृष्णजी ने real पान धृतराष्ट्र से मिलकर सत्य २ संबकी दृद्धिा करने वाला पचन का परन्तु वहतमा कहने पर धृतराष्ट्रने उगको नहीं किया। यहां अपने भीकरणी सन्धिको न पाकर अपनत्री स्थानको माये । मधुमुदनी का से विदाहोकर उपप्नयो स्थानपर गार मधिक न होने पायों में वपन बोले । : । काल से प्रेरितहोकर कारवलो मरवचनको नकिने CHAPTER XXXV", njiga syil,' Janmejnya aked of: Vait'hatojinynnillion minion of Balitupa't cu ning bo's, foc ho bugis süny is t'a' bugimins of the mar and said that lig would neither help the Kantavine. Por, the Pandasar." vo Janniejasn's questin: Vaishammiyan winde the follow "ing repls --Prin' Upplarya Iliero the Pandanas vite atayinļi B! Krishn ra *cent Britain mor ti rozetinte piacs pics Tritannien Bhiro krishti o'liliripher holttic in the earth hint and the larirer.circlock l's plivyn Dyan Pandayai " Tho - ..
77061) 7V Gala Parenting "[७.६१] प्रभा पानिमावीत न कुतियो महा-कुरव कालचादिना । Miss पाया. पुष्पा सहिमा मक्षा १ मा विमामानेषु धलेषु बलिना anा मातरे कृष्ण रोहिंग गे महामनाः ॥ १॥ तेरोमपि महापारों भाइर्य अनक्रियतामिति तत् कृष्णों नास्य पके बचतदा ॥ १५॥ ततो मन्युपगितामा HATA नमन तिथियात्रहलधर. सास्यां महायशा १६॥ मैनत्रयोगण MEGसया भाभय मास भीजस्तु उधिनमरिन्दमम । युयुधानेन सा पास्तु पासवान् ॥ १४ ॥ रोरिणये गते गरे पुण्यम मसदना पाण्डोषार पुरहस्य यथावनिमुन कुन ॥ १५ ॥ गजनेष पधिस्थरतु गमः प्रेयानुमार। मामातीपात्रा सापकरणानि वम मानावं धारयामानानक सभा १९॥ सुवर्ण रजतव धेनुषासासि जिन कुंजराब रथावत्र भरो पाहमानि ॥१७ : सिममानायता सा सीधीतो परिदम । प्रतिमोत मरसायों बालों तुम मेरे माय पुष्यनक्षत्र में यात्रा करो । १० । उसके पीछे सेनाओं के विभक होनेपर बलवानों में श्रेष्ठ,वडे साहसी बलदेवजी , अपने भाई श्रीकृष्णवीस पोपहावाहु मधुसूदनजी उन्होंकी भी सहायनाकरो परन्तु श्रीकृष्णजी ने उनके समचनको नहीं किया ।११। इसके पीछे क्रोधसे पूर्ण चित्त, पहेंगश बान गहन दन, बलदेवी सरस्वती तर्षिको यात्राकरगये। भधांद भनुराधानत्र के भारम्भमें, यादवोसमेत चलगपे फिर शत्रु, विजयो कनवर्मा योधन भाको मिला और सात्यकी समेत वामदेवजी पांडवों में मयुक्तपे । ४ । शूर अनदेवनी जानेपर मधुसूदनना पुष्य नक्षत्रमै प रयों को आगे कर के गौरवों के सम्मुम्ब गये। ५.. फर चलते हुये मार्गमें नियां बलदेवगी ने सेवकों को मारीफ तापात्रा में सर्व सामान और शमादिकों को लाभो और बारकामे अनियों संपल याकरानेवालों को भी लामो सोना चांदी गौ वन हामी रय Kasam ऊंट मादि सारियां i७. और मनमकार के सामान को तीर्थयात्राके RAiraras urged by Fate donht bear me. You should sadrancer it's mein, Paushya nakshtra " 10 Then when the rules meie being formed into part es, Baldev apske ts 81rı Krishn and asked him to help both-enders, but shri hrishn did not bear him Baldev wat barnged at this and went dway on a pilgrimage to the Sarasvati taking the Yadaras, with him. Ihen hritvarma the destruyer of focó aided with Daryodhan and Vas idev with 8 tyaki sided ith the Pandayar. At the depyture of, Baldev, Shra, Krishyted the Vandarau b. fight in Pushya prakshatrai 15. Then Baldev on tips wag ordered his serious to bring all sko requisites, Anche darmficial fires from Dwarka to the holy places, He sent with werponey - - [७०१२] Inlı bharat (706) गशीमामिन. .१८॥ विजया राजमार पसारा तु या लो महाबल ॥१९॥ सधियात्रायणे राम कुन शासना सरपती प्रतियोग समस्त दामगिगवान् ॥१०॥ भारतिर मसिम सपा असतो. रस्तपास या भरतमोप्रयुक्किम पामगाम . R१ तालिम्पुषी शिना विपुलायुषाम् । रेवगि नामानि विभिमानिसय भरिना राजन् पलप्तानि शस्मा ॥ २९॥ यो पहिलो भाग्य मोतु कामयो तदा । तप तप यमुपासमा स्थित राहणेश्य शासनात् । भयोयरस समय ॥ २४ ॥ वाससि मरानि पहात रणानिस । पूजा ना पतानि बिना मिण्ताम् ॥ १५॥ पत्रय पदरी विप्र सत्रियो काम तस्य सर्व पलतमाश्यत २६यथामुर्ख जन सों पानि तिइति तदा पातुकामस्थ निमित्त शीघलाभो और सुप घ्रिता से चलकर सरस्वती के तटपर भाभो । १८ और सैकड़ों उत्तम वेदपानी वाक्षिक बामणों को भी सामोता कौरवों के नाश होनेपर वह बडे लपान वलदेवजी इस प्राकी भाशा अपने नौकरों को देकर तीर्थयात्राकोगये और चारोंभोरके सरस्वती सायोंकी यात्राकरी । २० । ऋतिम मित्रवर्ग अन्य भेड मगा, रथ, हाथी, घोडे, नोकर, चाकर बैल खच्चर और ऊंटोंसे पुक्क बहुतसी सवारियों समेत थके थकावटप्से पीडायान् शरीर वासक, दृद और आकांक्षा करनेवालों के पूजनकेलिपे दानके योग्य नानामकार की भनेक वस्तुको प्रत्येक स्थानपा वर्तमानकिया । २२ । हे राजा तर जो जों ब्राह्मण जहां जहां भोजन करनेकी इजा करताथा वहां वहां उसके अभीष्ट भोजन को वर्तमान किया । २१। हे रामा वहाँ बलदेव नीकी भामास जहांतहां सेरक भाकार लोग चारोंओर को खानपान के पदार्थों को करतेथे ।२४ वहांयत चाहनेवाले वेदपाठी ब्राह्मणों के पूजनकेनिगे बहुमूल्य बस पलंग और उनके वन तैयार किये । २५ । हे भरतवंशी जहाँपर जो प्राण मधवा क्षत्रियभी जिस स्तु gold, allver, cows, cl tes, elt p raute, cars, mules and camels nt the bank of the Sa awati Tao sat da of tluo Yel khom lưng Brahnien came there At the destruction of t'ie hauiavas, Bidevont te vingt holy flaces all r und the Saraswati 20 Scrificers, friends Brahuane cars, blep ants, houses, servants, oxrn, mules and carnels, with the old young came there, The Biahmad8 everywhere w010 given whatever they desired.' Ralder's servants and attendants nipphed Articles of food and drink. Thøy furnished the Brahmans with prec- Tous beds and elutuor. 25 The Brahwang and hshatryas Wero kupplied with everything they deated. All the pple were happy as and (70637 Gadesiv Parb 148 बानानि पानानि तषितस्य॥२७॥ उमक्षितस्प चान्नानि स्वानि भरतर्षमा उपाइने खाण्यामरणानि य॥ २८ ॥ स प था प्रजमो पजन स्वश्व सुधार । स्वोमनावीर नराणा सत्र गाउनाम ॥ २९ ॥ नित्यप्रमुदिनीपत स्वामस्ययु भात पिण्यापणपण्या नानाजनीन ! मामलोपतो नानागनागिन PM on ततो महमा मियो स्पितरमा पुष्पेषु ना पनि राजन् । बरी RAM दक्षिणा यदुवीरो हलमत् प्रतीत ॥३१॥ वाम्बी धनूध सहनशी वासस कामनायभूगो. ध नानाविधदेशजातानु थानानि दामा शुभान विजय ।। ३२. ग्लानि मुक्कामशिविदुमा श्रग सुधणे रजत मङ्गमा भय समय ताम्रप्रयासमा दो दिजातिप्रवरेषु राम ॥३३॥ एष,सधि प्रददौमहारमा सरस्वतीवीर्यवरेणुधरेषु-भरि । पयो क्रमेणाप्रतिमप्रभावनत कुरुक्षेत्रमुधारवान को माइताथा वापर उसको अभीष्टवस्तु तैयारह दिखाई पर्सी । २६॥ हेभरतर्षभ उस समय सब लोग बड़े भानन्द और खक जाये और उत्तम उत्तम स्थानों निराप्त करते जातेथे वहां मनुष्यों ने चलनेवाले की सवारियों को और ज्याम की पान करनेवाली वस्तुपोंको भार क्षुधायुक्तों के स्वादिष्ट भोजन वन पौर | भूषणों को वर्तमान किया । २८ । वीर राजा जनमेजय नब चलनेवाले मनुष्यों का घई मार्ग मक्का मुखदायी होकर वर्ग के समान चोभायमान हुआ। २९ । सदैव प्रसन्न लोगों से संयुक स्वादिष्ट भोजन रखनेवाली मंगलकारी मार्ग में वर्तमान दुकानोंसे भार बेचने के योग्य वस्तु रखनेवाळे नाना प्रकार के सैकड़ों मनुष्यों में व्याप्त भनेक प्रकारके बुत बल्लियों से युक्ता भांतिभाति ग्लों से भलंकृत था।३०। राजा उसके पो... महात्मा नियम में नियत चित्त यादवों में बड़े वीर ममन चित्त बलदेवजी ने धर्म की देके कारण तीयों पर ब्राह्मण निमित्त धन भार यज्ञकी दक्षिणाको दिया 11वूप देनेवायची अन्दर शाक युक्त सुवर्णशृगी गौवें और नानामकार के देशोंमें उत्पन्न होनेवाले सत्तम घोडे सवारियां और शुभ दासों को ब्रमणों के अर्थ दान किया।१२। बलदेव जीने रस्न माने तो यूंगा, श्रेष्ठ मुवर्ण, शुद्ध पांदी और लोहे नावे के पात्री बड़े बड़े उत्तम मामलों को दान किय । ३।। इसमकार उस:महात्मा ने सरस्वती they went on in ea e and stud at good place: The barsts were provided with fdder and drink and the hungry people were provided with Fholerome food and ornaments: 28. Tue path of thoro pilgima was lihe another paradise. Shopsespers sold delicious food voder tire Blade Tbeo binte Balder gara, Wexlth to Brahmane them milch cows adorn d with giler burns and clothes borger of different couotriea nu i slaves, jawels ar'l utonil, of silver and gold, Thug be distributed mich w altliam ing the Bra imati living on the + of trees Ha gara । (७०६४) Mahabharat (70640 ।। ३४ ॥ जनमेजय उवाच । सारस्वतानां तीनों गुणोरपाई पदस्प मे । कमाल द्विपदा श्रेष्ठ कमानीतभेष ॥ ३५ ॥ पंथा क्रमेण भगवन तायोगामानुश ना प्रवियो भेट पर कोतल दि में ॥ ३६॥ वैशम्पाय तानीतिर राजन गुणोत्पत्तिमच सर्वश मयोपमान थे पुष्य राजेन् कानपूर्व भंडा, राजदुधी भविषमुहविप्रंगणव साम पुण्य प्रभास समुराजगाम को राहमणा कितश्यमान । ३८॥ विकशाप पुराप्य तेज अर्व जगदासयतेलला, एजन्तु तीपयर पिच्या प्रभासनातस्य तन' प्रभास " । जनमजयपाल किम भगवान सोमो यमणा समजत । कपम्च तापपरे तस्मिनीrura ॥ . कपमाप्लुत्य तस्मिस्तु पुनगयापित राशीत समातरम के उत्तम तीधार पातमा धनदिया वह अनुपम प्रभावकाले उत्तम तीवाले बळ देवनी क्रमपूर्वक कुरुक्षेत्रकोगये । १४ । जनमेजपत्रोले हे मिपादों में श्रेष्ठ बैशम्पा' पनजी सरस्वती के तीर्थोके गुण उत्पत्तिफल और यात्राकी विधिकोभी. मुमासेकहो । ३५ रे मदतावर ब्रह्मज्ञानी समर्थ वैशम्पायननी मुसको बहाही उत्साह आप तोंको क्रमपूर्वक वर्णन कीजिये ।-३६॥ वैशम्पायना बोले हे राजेन्द्र राजा जनमे जा तीर्थों के क्रम सर्वगुण और उत्पत्ति को मे सम्पूर्णताके साथ तुमको मुनाता तू उस धर्मकी वादे करनेवाले माहात्म्यो मनसेमुन । १० । हे महाराज प्रथम पर यादवों में परे धार बलदेवजी तिज मित्र और बालों समेत उस -प्रभासक्षेत्र नाम उत्तम और पवित्र कार्यकोगये जिसपर कि चन्द्रमा- यक्ष्मानामगगसे दाखी होकर गयाथा । और शापसे - निहत. होकर तृतीयाके दिनसे सब नगदको प्रकाशित करताहै इमीत से उम चन्द्रमाकी अत्यन्त प्रकाशित किरणों से उत्पन्न हमा यह अत्यन्त उत्तम ता है और इसी हेतुसे उसकानाम प्रभासक्षेत्र हराया | २९ जनमेनप ने पण कि भगवान् चन्द्रमाजीको कैसे , यक्ष्मारोग उत्पन्न हुआ और कैसे वहरोग उस अत्यन्त उत्चमतीर्थ के प्रभावसे नष्टहुआ।... वा चन्द्रमा banks of the Sirastratu till he came back to Kuruksbetra." Then Janmejaya askediol Tashampayarr: Pray, ,cell me the origin-and grentness of the holy places at the Saraswatı-35--I am very an'ciónu to hear about them." Valshanipayan sa d1 e all’téli'ynů all'abrat tlinse holy places. Hear It åttentively First of all,, "Baldev went to Prabhas were the upon was frood of his illness and cars and now Illumines the word. The good and boly place was the outcomo of the bright rays.of the moon, and nas therefore namad -Prabhisir Jacmejaya asked, "What was the cause of tho modli's disease and how. was he cured by Prabhas 140 How was thoʻrnbom cated by Matling at Prabhas f Pray tell me this in detil, " Vaishatmyayan - interry -1003) Gads Parv गहापर्व [G६५ रामपाचा वाद संनया पास्तामादुरोल विज्ञापन सतत म्याद सोमाय में ददौ । म योमनिरती संस्थांना तापरापायी तर राजद सोमस्य शुमकणा शातार संयो विशोलायो पंजीतिमा भूपि । वरिषत मासान्तु रोहिणी अपसम्पदा ततस्यो से भगा तिम्भ निशाफरः साप धो बमवाय तस्माचा मुजे सद तारतमा तेरियामरसहितरम् । ततस्तोः इपिता सोना FHERailwarta पितर पार प्रजापतिमतंग्रिता सोमो वसति मारमा मे महिनामा . I. " ... . - किसस वर्षे स्नानकरके फिर चादयुक्त हुभावो महामुनि! उस सर्व तीत को गोरे समेत बनकरो। वैशम्पायन बोले राजा दसकीजीपी ग्गा नपाई उनमें से सत्ताईस कम्यों चन्द्रमाको दोशविन्यास योग परिकारी पीकर उनकी संख्या के निमित्त हुई राजेन्द्र जो उस शुभकर्म करनेवाले चन्द्रमा लिपति वह सब दीपा और स्वरूप में अनुपमयर्थी उन सत्ताईसों में रोहिनीवरूप और लारपर्यंतामें सबसे रिकवी।४। इससे उस भगवान् चन्द्रमाने सीम भधिक मोतिकी : वहीं उसकेपिका पारी हुई सोमे सदैव उसीको भोगारामेन्द्र चन्द्रमा पूर्वसंमय में रोहिलाकशी समाप बापक स्विडिस हेतुसे महात्मा चन्द्रमाको निक्षत्रनामसे : विरूपात सपी धियुको बड़ी सावधानों ने अपने पिता दक्ष प्रजापति पसिनावर हरिचन्द्रमा इमारपास कभी निवास नहीं करता सदर रोहिली को चारतारा महिने स्वामी सोहम सब उचितहार करनेवासी और करने में महत्व मापके सम्मुख निवाप्त करेंगी। तब समनापतिजी ने सके प्रयाको मुनकर चन्द्रमांत बोले कि तुम सब नियों में समान भाव से पक्राइससे को बड़ा अपर्म स्पर्श नहीं करेगी फिर दान Post.POthis usny daughtera, Daksh gave treaty sevin' to insan Faridamy Bickmpriskshtras' whicb indicaty timektar neki iodiked to him. They were all of large eges atid besütifus facis, bisë Habits Buipaised them at in the Nauty of her perient-ind swas ther.fore mauchi tired Wy het boe bakoi wat sporit üsuch oraz lidoir bör society PRSE: The other wires were truct triperated as this: midiersal complaided of bf bilott'tfieit fátler Dakshitajlı foot Moirittoio minst tvito Rowint: : \#wish tdi lusso ilmahdiin' tY3 st Sits. Tien Dakihid Hood to believo with all his tribos stokriinu diritti १०६८ Mahabhnatr.. 117068) यव बीजानि विविधोनि ॥६५॥ तेषां ये सेमी.मानास्मा किम इति शाखा लोकगुरो, प्रसाद: कर्नुमईसि १६६ बसोवा प्रार PATEL.मलापति समभाषा व्यावसीयमाणा : तुम ममा भागानिव नियति काषित समं पर्सतु.सांस:शशी,imite सरस्वत्या रेती उमज्जन शशलक्षणः । पुनर्विम्यते देत पंचमम मासाउछ क्षयं सोमो मित्यमेव गमिष्यतिः।मातार्यतुं संवा सत्यमे समयो मम ॥७२॥ समुद्रं-पधिमं गरमा सरस्वत्पापिसारम:मारामपतु देणे तव देवता चन्द्रमाके वृत्तान्त को चुनकर इनके पास जाकर गोरे भिगवन आप चन्द्रमाके ऊपर प्रसानिये और अपने शापको लौटाइये या चन्द्रमा नाशवान होकर वशेष बाकीरहा दीखता है.हे देवताओं के ईशर जसरे विनाश बान होने समाए भी लाशयुक्त होगई हैं वरुप भोषी बार-नानासकार के भागों ने विनाशको पाया। ६५ । उनके नाशसे हमारा नाश और सारे बिना अगद सारोगा है.लोकगा.इसवात को जानकर आप रूपाकरने के पोरबहो। इसमकार के देवतामों के पंचनों को धनकर प्रजापतिजी ने देवताओं से कई वचन शाकि मेरवचन विपरीता करता उचित नही ।। ६५. हे सामायो मेराशाप शारदाने से लौटेगा कि चन्द्रमा -सदैव-सब विरों में पारावर पतारकरे ६८...हे देवता लोगो सरस्वती के उत्तम तीर्थ में प्रविा पर्यन्त जलये गोते. गानेवालाहोकर फिर बादपुक्त होगा यह मेरावचन सत्यपत्रमा सदर आधुमास का क्षीणताको पागा, और माधेमहीने सदिको पायेगा यह मग पंचन भी सत्य है ।.५० पश्चिमीय, समुद्र के जिस इंधान पानपर-कि सरस्वती समुद्रको मिलापई, बहीपर जाकर, देववाओं के ईपरका भागधन करके मेसको पाचगान इसकपीछे बह चन्द्रमा ऋषिकी आज्ञानुसार सरस्वती तापकी Longerarury ben us te dieadgulkar of all vois Kid Wesin its curo vaur-maladge" Then The told them how he 40 FPT Band Tigods wenste paksh pranaide.kinato Chandra' and 'Fröke your curse He is decaying. And: a very sma] portion of lying is let. All beings perish og geçoint of biminedicinos and ssedi Have peniahed., Woalso decay for.thi tropron.OR.cam the world orist without us. He kind to us, ranerable. ORAT AR Haring, heard the words of the gods the said, "Teticnok well to revoke my word to my be cured of his,' malady if he behaven Gith all his wires alike. "Ho must plunge in the Fatera of the Swar Watiin order.toissur or his didrase. : I tell Fonrjeerut H. will decided for tal á month and will incrga ,deringetoru nemt E na Became sik 7069) 1 - ममा Gaila P'ALT DETTE 10६९) तत.कान्तिमापतिसरस्थती ततः सोमः स जगामार्यशासनात् । प्रभास प्रथमं तप सासया जगाम है ॥ ७२|| अमावस्या महाजासोन्मजन महाद्युतिः। चौकार प्रमासयामास शीतांशुस्वमशप च : ७३ ॥ देवास्तु सबै राजेन्द्र प्रभास प्राप्य कलमा सोमन सहिमा भगवा वसस्य प्रमुऽभयन् ।। ७५ । नत प्रजापतिः सिसाय देवताः । सो भगवान् श्रीतो भयो षचनमप्रवीत् । ७५. माष मस्या बियापुत्र मा विमान दामन | गच्छयुक्तः सदा भूवा कुरु शासन मम ॥ ७६ ॥ स विछटो महाराज जगामाय स्वमालथम । प्रजाम मुदिता भषा पुल तरधुर्यथा पुरा ॥ ७ ॥ एवं ते सर्वमास्यातं यथा तो नियाकरः । प्रभासद पपाता सानो प्रबरं गमत् ॥ धास्था महाराज निरपशः, शशलक्षणः । स्नास्पा हाप्यायने श्रीमान् प्रमासे arl 'उत्तमे ॥ ७ ॥ मधेनं प्रजानन्ति -प्रमासमिति भूमिग प्रमा हि परमां लेने गये भयम सरस्वती नार्थको जाकर फिर भाम क्षेत्रकोगपे ॥ ७२ ।, अमावस्याके दिन उसमें स्नान करके वह तेजस्वी और उत्तर कानवालेने लांकों को प्रकाशित किया और किरणोंकी शीतलताको पापा ॥ ७॥ ॥ई र जेन्द्र फिर सब देवना प्रभास क्षेत्रनाम • उत्तम तार्थको पाकर , चन्द्रमा - समेत दसीके सम्मुख हप इसके पीछे प्रमापतिजीने, मब देवताओंको विदाकि या फिर प्रसन्नचित्र भगवान प्रजापति ऋषि चन्द्रमामे यह पचनबोले । ७२ । कि हे पुत्र खिपों का अपमान और बालों का अपमान तू कभी मतकर भवनामो और मदेव महत्त होकर (मेरी माताको करो। ७३ । हे महागज फिर उनमे निदाहोकर पह पन्द्रमा अपने कोकको गया और सव माष्ठभी प्रसन्न होकर पूर्वकेही समान फिर नियम 1901 यह सब चन्द्रमाके शापका और शापो निरत्तहोने का इनान्त और प्रभास तीर्थ का सब तीयो मान्त भेष्ठतर होने का भी उत्तम वृत्तात बने, तुम कहा ७८ । हे महाराजा श्रीमन चन्द्रमा सदैव अमावास्या के दिन प्रभासनाम उत्तम धिमें स्नानकरके वृद्धिको पाताहै । ९ । राजा इसहेतुले इमतीर्थको प्रभासक्षेत्र half. 70. He will regaun he glory by worshipping the Lord of goda At the place where the Saraswati meets the Western sen." Thra Chandra went to the Salaryati by the order of the rishi and then went to Prublius. 44d baring bathed there on ainavasya ho regnoed his glory and his rugs hace que voal Bgaia Having so the holy place of Prabhas all the gods again went to Dahah. . He dijes-d the gods and agnio turning ta Chandra suid 75 Never insult Pumen and brahusais. You mustobey me in future. Nur you may go " Then Chandra came back to hi8 OW! region and all tho world befnre. I hare given you an accouat of the carse of tho moon and bathes Avery -the origin of Prabhse, Chandra amavasya at Frey like -- - abharat (17,0661 शशिमोऽग्तिकम । सतंबरपति सभामु चन्द्रमा मम शासनातू ।। ५५ विश्थामा लपा जग्मुः शीतांशुभवन तदा । रुथापि,सीमो भगवान पुनरीष महीपते । रोहिणी निषतरेयष प्रीयमाणो मुहमहु ५॥ ततस्ता सहिता सपा भगः पित्तवन । तर शुभषण युक्तावस्यामोहिताश्रमे । सोमो वससि नास्माम मागहों तक तासा सवयन अरमा दक्षः सोमायाप्रीत । समं पसंस्व भाग्यांसु माया गावचे विरोचन ।। ५३॥ अनारस्य तु समावपं दक्षस्य भगवान शशी । सदिच्या तारा सत्ततस्ता कुपिता पुनः ॥ ५४॥ गवार पितरं माहुःप्रणम्य शिरसा तां । मोमो बमति मारमान तस्मात्रः शरण भर ५५ ॥ गोहिल्या राति चवमाः । न त्यो गणपति.न स्माम स्ने मितिमा सी सोम माविशेद ॥ ५६ ॥ तपा मगर र कुचो पक्षमा विवीप सस सबसे बोले कि चन्द्रमा के पासजाओ. चन्द्रमा मेरी माहासे सबके पास बराबर निवाम करेगा:॥५०ता.उस, प्रकारसे विदा की नई का, सखिया जीताधु चन्द्रपाके.भवनको मई हे;रामा इसपर भी भावान चन्द्रमा: उसींकार बारम्बार प्रीति करनेवाले होकर,रोजीरही.पास रहतेपे । ५१ । इसके अनतर, उन सबों 'ने फिर अपने पितासे: कहा कि हम तप भापकी सेवा में प्रवृत्त होकर प्रापही पास निवासाकरेंगी क्योंकि पापा.हमारे पास निवास नहीं करता है उसने ..मापकभी वचनको नहीं किया ।.५९., दक्षजीने . उन सबके उस ववन को उनकर फिर चन्द्रमासे,कहा कि अत्यन्त प्रकाशमान तुम:त्रियों में, भगवर वीव से जो मेरा कहना करोगे तो मैं तुपको शापदूंगा: फिर भगवान पन्द्रमा दतके चनको भनादर करके रोहिणीकही पास निकासी हुये इस हेतु से घर मियां कर पयुकाई।४। तब उनाने जाकर शिर से प्रणाम करके पिता से कहा कि चन्दमा हमारे पास तिवास नहीं करता है अब आपही हमारे राषिो । ५५ भगवान चन्दा सदैव रोहिणी के पासही निवास करते हैं आपके पचनको र नगिनो हैं और हमपर, प्रीतिकरना ना चाहते हैं इसकारण से हम सब की ऐसी रसाकरो जितके भय से.चन्द्रपा हम अपने पास राखे । ५६ हे. राजा ho miglyt not be uccused of injustice. Daksh dick orderodhiadaughter Ir go to their husband. 50. This ordereil they all wart to the palace of their jord, but again, funnd that he spent auch of his time with Robini.. They again, went to their father and paid, ; We shnit dive; with yon,; for. Chandra Joes not live with ex. He does not care obry your ordera " At this Vaksi),ágsio said to Chanura" you must belars witli all your wivu alike. I el all c1!89 you, if you donot obay mo." Hat Chandma prid'n' brex't* to'nglini Dakah and lised mich Rohini,. The oth or wints were again enrage and boriog to (७०६७ | did not grow on-rearth and ther sap.in plants became tasteless and weaki. At t le decây' of 'medicinal, her by people began to perish und (Fida Parv गदापर्व रोपात सामावस बोलुपतिमापित R..५७: । म यस्मणामिभूतात्मा भयितांगहः शशीमापाप्यारोदामन मोक्षार्ध तरूप पक्षमणः ॥ ५८ दृष्टिीममहाराज विधिामिनिशाफर ने चामुख्यत शापार्दै पम्वाश्यगत ।। १९ । झापमाणे तते सोमेमोरो नजारे । निरास्वादरसासर्प इसवी सतः॥ ६ ॥ मोरमान जातेप्रनिनामपि संक्षयः । शाश्वासन प्रजाः सर्वा क्षीपमाणे निशा तोत्रा समागम्य सोममधुमहीपते । किमिदं मपंसा समीर प्रकाशते कारण विना सर्व येनेई ते महन्द्रयम् ।। २ । भरवा व पचन तो विधालामरसतोमप। एवमुकः प्रत्युषाच सोस्तान् शशक्षण, शापस्य कार माणस तपारममः। ६३ । देवास्तया यचा, शुत्वा गांवा समयाभुबन् । मंगवार सोमे शापोऽय. घिनिषसराम ॥ ॥६४ ॥ मसौ हिचानमाः मीण: दिलायो संगावास्य देवेश प्रजाधापि गता. क्षयम् विधिप कोषक भान दक्षप्रजापति ने उसको सुनकर कोघते यक्ष्मानाम रोगको चन्द्रमा, के पर ही सब पर चन्द्रमा प्रवेश करगया. ५७ फिर यक्ष्मा रोगसे ग्रसित शरीर होकर र चन्द्रमा प्रति दिन क्षीणतासे युक्तहुये । ५८ हे महाराज जनमे जप चन्द्रमाने नानीमकार के यहां से पूजनकरके उस यक्ष्मारोंगके दूरकरनेके भने पायभी किये परन्तु शाप से निवृत्त नहीं हुआ और सदैन तीणताको हो पाया तत्र चन्द्रमाके भागतायुक्त होपा भौषधियां पृथ्वीपर उत्पना नौं हुई सब मोरसे सब समानों से रहिन और निर्बल हुये भौर भाषधियों का विनाश होनेपर जीवोंका भी माशा चन्द्रमाके विनाश युक्त होनेपर सत्र सृष्टि के नीव दुल शरीर हुवाइमपीछे सब देतानाने मिलकर चन्द्रपासे कहा कि आपका. या ऐसा रूप कैसे होगया है कि पलाश नहीं करता भव जिनसे वमको नाम इन सब कारणोंकों आप हममें कह।। ३ । भाहमसे सब वृत्तान्त कहोगे तब हम सब देवता उनका उपाय करेंगे देवताभों के इन पचनों को धनकर चन्द्रमाने उनसे अपने शा.पका कारण भार यक्ष्मारोग होने का सब सत्ता का dowá to klieit"látrici, idey said, Chandia dos nót, live with us and thoretore wo keek your protection. is. He d.sregards your ivords and mako him.keep'u« with l.jm. "'TŁus enraged, Dàkóh rent the diseamet lives with Ruliini. He bears no love towards us. Help ik And which entered the body of the moon and ho hann He tried to teníave the malady by: : the curse was irrevocable and he beci. -- . . day: ou und leaner. Medicines ,,but thoir Didies were lean: 61. Then all the gode coming together, said to Chandras.Wing is you._apppárance. changed?-It sheds light to .
(७०७० Malul matr 17070) सस्मिन्नुसज्य चन्द्रमा ८० ततस्तु चमसान्दमयुगस्यगमवली चमसाझेद इत्येष प जना कथयन्स्युन ॥ ८१ : तत्र दत्ताप दानानि विशिष्टानि हलायुध । उपित्वा रजनीमका स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥ ८२ उदपानमधागच्छत् त्वराधान् .फेशवा प्रा । माघ स्सस्स्यपनश्चय पत्राचार महत् फलम ॥ ३ ॥ स्निग्वत्यायोषधीनाथ भूमेश्व जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नामपि सरस्वतीम ॥ ४ ॥ इति शल्पप गी गदापद्धपर्वाण बलदेवार्थियात्रायो पञ्चत्रिशोध्याय-१५ । क । - जानते हैन्न्द्रमाने उसपे गोते लगाकर बडे प्रकाश को पापा । ८० । इसकेपछि पलवान और अजेय बलदेवजी उR चमस्तोद्भेद सार्थको गये जिसको लोग चमतोद्भद तीर्थ कहती 17 1 फिर हलायुध चलदेवजी वह उत्तम दानोंको देकर एक रात्रि निवास कर विधिपूर्वक स्नानकरके। ८२शोधता करनेवाले केशवजीके बड़े भाई उस उपाननाम तीर्थकोगये नहापर कि बढे माचीन और कल्याणकारी म फलको पागा । 4.३ । हे रागेन्द्र जनमेजय आँपाधियों से भौर पृथ्वी के स्वच्छता युक्त सचिकण होनेमे सिदलोग गुप्तहानेपाली सरस्वतीकोभी जानत है ८६ ॥ T . Prabhae and ori']] at holy place is so yeued because the moon regains his glory by bint ung there 80 Theis valiant Bålder wont to Chanastollied of China dbhard and having bathed there and stay ed there for ono mylit lie gavo dunnt eris 11 on the elder brother of luun sent to Upadan and guined great merit Thus the Aidhas knot the Sarasvati glaich is lioly and ovnt grosse watha med cines," 84 r - 1.07071)... Gada Parr गदागर्व [७.७१) . पैशम्पायन उवाच । तस्मान्नदोगतचापि धपानं यशस्विनः । त्रितस्य च महाराज जगामाय इलायुधः ॥ १॥ तत्र दत्त्वा बहुद्रम्य पूजयित्वा तथा, द्विजान् । उपस्पृश्य च तत्रैवटा पलायुधः ॥ २॥ तत्र धर्मपणे यासीत्रितः स ममहातपाः। को पसता तेन सोग पानी महात्मना ॥ ३॥ तत्र धन समुत्यज्य, भ्रातगै अंग्मतुर्ग जान । ततस्ती शशापायनितो ब्राह्मणसत्तमः॥४॥ जनमेजय उगव.. 'उदगान फर्य मझन् कषच सुमहातपाः । पतितः किंच.सत्यक्ता भ्रातृ द्विजसत्तमः ५ पे का हिस्वनं भ्रातरी जग्मतुगृहान् । कञ्च, यायामास पी सोच कपम् । एतदचिक्ष्य मे घंझन् प्रोतव्यं यदि न्यस ॥ ॥ वैशम्पायन उवाग । आसन पूर्वयुगे राजन् मुनयो नातरलंग: । एकता द्विनश्चय वितधादित्यसनिगमाः ॥ ७ ॥ सप्रजापनि समाः प्रजायन्तम्नवाच । प्रह्मलोक जतः सब तर ग्रामवादिन । अध्याय ३६... 'वैशम्पायन बोले हे महाराज इस कारण से - वनदेवनी पशवान तिमी के पदपान को जो कि नदी में वर्तमान या गये। वहां यातमा धन दानपुण्य कर बामणों को पूज और उसी तीर्थ में स्नानकरके वलदेवजी अत्यन्त प्रसन्न में । २ । यहाँपर वह वहा तपस्वी त्रिन धर्मका करनेवाला बड़ा पूर्ण सिद्धहमा जिस महात्माने कूपमें निवासकरके अमृतको, पान किया। ३...इमको उसके दोनों भाई.कूपमें छोड़कर आनेर घरोंका चलेगये इसके पीछ, बामणों में श्रेष्ठ त्रितने उन दोनोंको शापदिया ! ४ जनमेजय भोला हे वमन किसमकारका कूप या और यह बड़ा तेजानी उस कूग किसरीतिते गिरा और ब्राह्मणों में भेष्ठ दोनों भाइयों ने उसको क्यों त्याग किया, और दोनो भाई..उसको किममकार कंपही छोड़कर घरोंको चलेगपे और कैमे, अमृत को पानकिपा हे ब्रमन जो उमको आप मेरे सुनने के योग्य मानते हो तो मुमो वर्णन करों।म्पिायन योले हे राजा सतयुगमें तीन भाइ माने हुये जो कि एक गित और त्रितनाम से विख्यात मूर्य के समान निस्वीथे। सब मनापति के समान सन्मानेवाले CHAPTER XXXVI; Vaishanpayán said, " Tien Bilder, went to Udao, boly place! of the Tritási. There hé-gsvélarge donations altër baihing in it! Tiere had been a famous righí Who'Uránk dectar in the will: His two |-brothers had left him in the well and Trit hid : cursed them both." Janinejaýa asked: "What sirt of a will it iv10, 'low--the rishi fell vin sin, plig!he was deserted by'his brothers' and how he drank"noctar. -Tell me all this great brahond, if it be worth-ray hearing..", 6., Vaisiama | epiryanisaidy : Therb fers three brothers in Siryig. known as Es, Dwit dr l'rit and glorious like llie Sin They were all' possessed of proe! jeny like Prajpati apdılad iconquerčil the region if. Brahm by their A L L4 - (७.७२) M labharat (7072) तेपातु तपसाता नियमन दोन च । समवनौतमो निश्यं पिता मैग्त सदा ॥९॥ सतु वाण कोलन तेषां प्रतिमाय 1 जगाम भगवानस्थानमनुरूपमिवामनः ॥ १ ॥ राज नबार ये वामन पाया जिम्महरममा ने समें स्वर्गत तस्मितत्व पुत्रानए जयन् : ११ गतु करणा जस्तथा चापयन च ।त्रि समां माप EिAnt १२ ॥ तथा स महमागा मुनयः यलमणा अपूज पामETAIT TIME पितर दुसन १३॥ कर चिकितनो राजन् सानागवेकविता। पाधिम्ना नया वित्ताच ॥ १५ ॥ तपोभुदि समभवन नि पर यामा माननादाय पति पततः ॥ १५ ॥ सोम पारंगम प्य पमहाफारम बसपा राज मातरम पर च ॥ १६ ॥ तथा तुने परि আগা শাখাৰ মৰিাখালবিং শনা থাকা নুনুং। पाउनकासन प्रतिष विधानर प्राची दिश महामान आजग्मुने मायः ॥ १८ ॥ तिने हा रस्ताचानिवत् । एकता दिनव पृष्ठन कालय तपस्या द्वारा बोको विजय करनेवाले भार ब्रह्मवादीथे । ८ धर्मम मोति रखने वाला उनका पिता गोनप नोंके ता, निपप और निन्द्रियपने से सदैव मगम रात था । ९ । फिर या भगवान गौतमऋपि बहुनकाल पीछे उन्होंगी मोति को पाकर अपने योग्य स्थानको गये । .। अनेभनय जो जो रामा उस मला पनमानय उनपर्व ने उन गौतमजी के सर्ग जानेपर उनके पुत्रों को पूमा ।११। फिर उनने उस त्रितने अपने कर्म भार वेदपाठ आदिक आचरणों मेसोमाको पाया जमा कि उसके पिताने पायी ।१२) उसीमकार पवित्र लक्षणमा महामास मुनियों ने भी उम महाभाग है' ऐमा पूजा जिक | पूमिमप उसके पिनाको पूजथे । १३ रामा इसके अनन्ता किसीसमप एक भार दसनाम उमकें दोनों भाइयोंने यज्ञ के और धन के निमित करी । शिकं सपानेवाले उन दोनों का यह विचारहुआ कि वितर्को लेकर सब पान पानीको हाहाकर दक्षिणा में गौरमार १५१ वड़े फलशाले यहको पाकर प्रसन्न हामे मतको पानकरेंगे रेगना तानों माइपों ने किया । १६ । रिपE गांकर दासगाके निमित्त मापनमानों के पास उमीमार चूसकर मनमानी को पाए । १७॥ उमा के द्वारा विधिपूर्णक वन में पन मा पशुमोको Asceticum, Iloir fattor Gautara * much pete with these ascer ticam, voms and contml. Io dun tim Gautam died 10. 111 sody were mads pricela after hio Tot Mas the most respoiled and tas like him farther in learning and tiredo Olhor rishis respectand bima su they did lor father After pime tme lide brottreta wished to AIMN wealth by providing at actiffany Thiey fork Int with there to the Ling's narisom in order to get web and it, Thoyment' to the Eut to get mollh. Tri Isd the way and they went on . , (10733 -Gadaarv Parb गंदापर्व .. { ७०७३ ) परन् ॥ १९ ॥बोधिन्ता ममवारा पशुगण महत् । का नु स्युरिमा गाव मामाया दिपिना नितम् ॥ २०॥ ताबन्योन्य समामाय tra द्विनचा याच अमिए पापी तबियोध जनइयर ॥ २१ ॥ निता यो कुशेलखितो वेदेषु निहित । मन्यास्तु बहुला गालित समुपलेप्स्यते ॥ ३२ ॥ रावी लहितो मत्वा गा प्रकालय बारितोऽपि गच्यता काममावास्यां निहित ॥ ३॥ तेषामांगता रात्री पपि स्याने एकमात् । तत्र पोऽपिरभेत् सरस्वत्यास्त महान् ॥ ४॥ मय त्रिती रक्षा पधितिष्ठ तमामत तपादपसेप्न घे तस्मिन् कूपे पनि ह ॥ १५ ॥ अगाधे ममहापोरे सर्पभूतमयडरे । त्रितस्ततो महाराज पस्यो मुनिसत्तम मार्स नाद ततधके तौतु अभवतु नी ॥ २६ ॥ माया पतित पै भ्रातरापेकतन्तिी । वृक प्रासाराम लोमा समुत्यस्यमतुं ॥ २७ ॥ नाभ्यो पालम्वाभ्यामुत्कृष्ट स. लेकर वह सर्व महर्षि पूदिशाको गये । स्टार महाराज प्रसन्नचित्त वित उन्होंके मागजाताषा और पायें एक और दिन यादोनों पशुओंको हांकतहुपे जातये 118। उस पशुमोके पड़े समूगको देखकर उनदोनोंको चिन्ताई कि इस वित के विनायह गौ किस मंझारसे हमारी होसती है । २० । हे राजा यह विचारकर, एक और बितदोनों पापी भाइयोंने परस्सर मिनार यह वचन कहाँ उसको समझो मित्रा यामि सावधानी भोर वेदोकामी पूर्गज्ञाता है इससे यात्रिन बहूनसी अन्य गौमों को प्राप्त करनेगा । २२ । इसहेतुसे हमदोनों सायशेकर गोआ को, इसकतहुये चलदें और हम दोनोंसे यह होकर वितभी सेच्छापूर्वक माप ।।।। रात्रि में चलनेवास मामि नियत उनके भागे एक भोट्या वर्तमान हुआ और महाही सरस्वती के किनारेपर एफ वड़ा कूपया । १४ । इसके अनन्तर त्रिव मार्ग नियत भेखिये को देखकर वहा भयभीतहोकर हटा और उस कैंप म गिरपग । १५ । जोकि वहा आधि घोर मार सब जीवोंक भएका उत्तम करनेवामा यार पाराज तब मुनिपों में श्रेष्ठ कप में नियत त्रितने पापा के शब्द किसे और मन दोनों भाई मुनियोंने भी मुने । रातिब एक और द्रित दोनोमाई उस कप पढ़े ये त्रिको नाममा भरिये के भपसे और लोभसे उसको उसी कप में पहारमा छोड़कर चलाये । २७ । पशुओं को पानराजे भोर दोनों भाइयों से, driving the cowo which they had got Being in prosess ul if large herd of cattle, they thought of depriving Tuit of his al fre of tlod 20 They std among thems-lkes • Irit is very learned and clever at presiding Bacrifices. He will amase touch wealth Let us d'Ise array thja herd of callie #nd leave him behind "Goinz at right tieg vere mot by * woll'ia the way where there was & dep well at the bank of tho Siraswali Seeing the frulf in his way, Triť nové gadé ja feir and fell down in the well eg The nei war tory deep en dreadful. Tratorio! for help fronı ander the Fell The tw forestiert, -- [७०७५] : Mahabharab -1,7074) मातपाः । उदपान तदा राजन निर्जने पाशुसंघृत : २८ ॥ भिंत आरिमानमालय पे धारुतणावृते । निमग्न भरतश्रेष्ठ गरके दुष्कनी यथा ॥ २९ ॥ स बुधवागणपत प्राहो मृत्योभीती हासोमः सोमः कथं नु पातव्य इतस्पेन मया भवेत् ॥ ३ ॥ स एषम भिनश्चिस्य तस्मिन् को महातपाः । ददर्श चौध तत्र लम्बमामा यच्छया.॥ ३॥ पांशुमस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनिः। अग्नीन् सङ्कलायामास रात्र व मान मेघ च ॥ ३२ ॥ ततस्तां धीरुधं सोम सङ्कल्प सुमहातपाः। वो यषि, सामानि मनसाचिन्तयन्मुनिः ॥ ३३ ॥ प्रावाणः शर्कराः कृत्वां प्रवकेमिषवं नृप। मान्यच सलिलम्चफ्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम ॥ ३४ ॥ सोमस्याभिषय करवा चकार तुमुलं, धनिम् । स चाविशहिवं राजनु स्वन शैक्षस्त्रिंतप वै । समवाप च ते यह पातं प्रमादिभिः ॥ ३५ ॥ वर्तमान तथा यने त्रितस्यं सुमहात्मनः । प्रविग्ने त्रिदिप त्यागेहये उस घड़तपस्वी, प्रितने उस - निजल धूल से युक्त तृणों से आच्छादित कपमें अपनेको इसपकार दूवादेखकर जैसे कि पापी नरकमें बाहोय । २९ । सब उस ज्ञानी-मृत्यूसे भयभीत और अमृतपान न करनेवाले ने बुद्धि से विचार किया, कि यहां पर, नियतहोकर मैं कैसे अमृतकाः पानकरसक्ताई .. ३०- हे भरतर्षभ राजा जनमेजय उस बड़ेतपस्वी ने उसकूपकेभीतर इसप्रकार निश्चय करके, वहीं, दैवयोगसे लटकती हुई एकलताको देखा ! १ उसके पीछे.धूलसे आछादित कूप में मुनिन जलको ध्यान करके आग्नयों को कल्पना करके अपने को होता कल्पना किया । १२ तब उस बड़े तपस्वी मुनिने जस-वीरुधको अमृत कल्पना करके यजुर्वेद और सामवेदकी ऋचामों को चित्त से ध्यान किया। राजा उसने कङ्कड़ोंको खाँडबनाकर चूर्णकिया और जलको घृतवनाकर, देवतामों भांगों को विचार किया । १४., और अमृतके याको करके बड़ी वनिकरी Ek And Dwit, heard his crits, but being aiaidize the Woir as won as abideritbe Iofuence of avūrice; ti ey i drove their cattle away and left „Trit within the well.:: Deserted, hy, bis brothers, ; Trit found himsell within that waterless well, full of dust and, weedo, as one fallen in heil. Then he bethonight, of how he cculd drink héctar while within that deep well. 30. Having come to this résolutiok, tie skir't breep før hanging iyithin the well 'the well full of dust iřas full ovės in aginary for those bolall us necter and recalled, to his mund the hymns of Yoga and Sanred. ho pondored small stones for sugar and mured water in honour of the gods. He began, performing 'sacritico of data wita . . .
महात i 17070) Gara Parv गदापर्व कारणच न बुध्यत । तत मुतुभुल शाम शुश्रावाय वृहस्पति । ३६ ॥ श्रुत्वा वेध प्रवीत् सीन देवान देवपुरोहित त्रितस्य पर्सी यशस्तन गडामहे सुरा ॥ ३०॥ सरि सुजैदल्यान वानपि महातपा । ३८ । तच्छुत्या पवन तस्य सहित सबंदेवता । प्रययुस्तन यत्रासौ प्रिनयन पर्सत ॥ ३९ ॥ ते तत्र गधा विषुधात कूप या सवित पशुत महात्मान ई क्षित याकसु ! ४० । दृष्ट्या मान भिषा परसपा युवम् । अचुधाय महाभा प्रतागाधनोषयम् ४१ प्रचार बिदेवान पश्य मा दिवाकस । अस्मिन् प्रतिभये पे निगान मष्टचेतसम्१॥ ततखितो महागज भागालेषां यथाविधि । गन्त्रयुक्तान समददते व प्रतास्तदामवन् तितो यथाविधि प्राप्तान् मागान प्राप्य दिवौकस ! प्रीतात्मामो दस्तस्मै परान् पान् मनसेच्छाले ॥ ४४ । स तु धन वर.देवास्त्रातुमईत मामित ॥ ॥ ५॥ राजा फिर बम त्रिव का मह शब्द स्वर्ग में ऐसे पहुंचा जैसे कि ब्रह्मवादियों से कियाहुआ पहुंचता है। १५ । इसीति से उस यज्ञको प्राप्त होनेवाले महात्मा त्रित के यज्ञके वर्तमान होनेपर सब स्वर्ग न्याकुल होगया परन्तु कोई कारण नहीं जानागया उसके पीछे, देवताओं के पुरोहित वृहस्पतिजी ने भी उप्त बहे शब्दको पुनकर । ३६ | सब देवताओं से कहा कि हे देवताओं विकायज्ञ वर्तमान उसमचलो। वह तपस्वी कोपयुक्त होकर दूसरे देवताओं कोभीउत्पन्न करसक्ता है! १८ ! उनके उम वचनको सुनकर सब देवता वहाँ गये जहाँ प्रितका वह यस पर्वमानया । ३१ । चन देवताओं ने उस कूपमें जाकर जहा यह यज्ञकम्मों में दीक्षित त्रित वर्तमानया उस महात्मा को देखा । ४० । वही शौभासे युक्त उस महात्माको देखकर देवतालोग उस महाभाग से बोले कि नाग के चाहनेवाले हम सव देवता वर्तमान है ४१ । इसके पीछे वह ऋषि देवताओं से बोला कि हे देवताओ इम भयकारी कुप में बाहुपा बुद्धिसे हीन मुझको देती । ४२ ॥ हे महा | राज इसके अनन्तर त्रितने मत्रों से युक्त भागोंको वियपूर्वक उनके अर्थ दिया तब वह प्रसन्न हुये ।। || उसके पीछे विधिपूर्वक मिलेहुये भागों को पाकर प्रसन्न चित्त देवताओंने उसको यह वरदिये जिनको कि वह मनसे चाहताथा । ४४ । तब उसने इन घरोंको मांगा कि है देवताओं प्रथम तो मुझको इस कूप से निकाल loud sound wluch renci ed heaven 35 Trit disturbed heaven with sacrifice but tre gudi d d not know the reason of the disturbanco Then I rihaspat the p 10st of tie gods sa d, l'rit ia performing sacri thure That sage can create other gods in ing rage this aļl the gods sent to Trit a sacrifi e and 6aw him within the well Then they said tolna, We are all present here to receive our s'tares' The light then sard to the gods' Lok at me with 19 th : well. Then he gave the gods their due shares and they were gratified and gave biru the bjons which he desired He asked them of the - fice let us At 41 Mahabharat (7076) भोपात पेस सोमागतिं लभेत् । १६ ॥ ततधोति राजपात सर स्वती नया शितः समुतस्थी पूजयनिदिधोकस ||पेति निशाना राम पचागत तिवायगमत् प्राता समेत मिलतामा साप सापी म्रात सदा डायपर वाक्य पशाय महातपाः...४९.my लुग्धो युवा यामामामुसज्य प्रभावितो.! वरमाएकाकृती रोद्रीष्ट्रमामिल ॥ ५॥ मपितारी मया शप्ती पापनानेन कर्मणा । प्रसवर युष्योगोलागला तराः ॥,५१ । इत्युक्त तु तदा तर क्षणादेव विशाम्पते। तयामतावाश्येता यामात सत्यवादिनः ॥ ५३॥ तनापयमितविकार : पृष्ट्या,वोपरिवाघुषारपाच विधि कर रक्षाकरौ । ५५ | फिर यह वरदानकरी कि जो इस कप में स्नान भाषमनकरे जर अमृतपान करनेवाले की गतिको पावे। ५६ , हे राजा वस कूपमें तरकी रखनेवाली सरस्वती ऊपर आई उनसे उछलाईमा वा शाप देवताओं को पूजता हुपा ऊपर नियतहमा १४७ हे गंजा फिर देवता इसप्रकार से कहकर अपनेलोकों को पे तवे प्राचिन त्रित भी अपने पानको झापा । ४६ । क्रोधक वो तपस्वी त्रितने उन दोनों ऋपि भाइयों को पाकर कठोर बंधनकहे और शापर्दिया ४९ । कि जो तुम 'पशुओं के लोभमें ' युक्त होकर मुसको गेड़कर भागआये उस हेतुसे वगले के समान भयानकरूम चारोंभोर को घूमनेवाळे और गद रखनेवाले होंगे। ६० । मेरे शाकद्वारा इसपापकर्म के कारण से तुम" ऐसी दशावाहोंने और तुम दोनों की सन्तान गोलांगूल रीछ और बन्दर होगी । ६१ हे राजा तर उसके इप्समकार कहने पर उस सत्यवक्ता के करतेही बह. दोनों साल में न रूपत्राले दिखाईपड़े । ५२ । घड़ेपराक्रमा वलदेवजीने वहांभी आगमन और स्नान पूर्वक नानामकार के दान देकर ब्राह्मणोंको पूजकर मार नदी में.. पर्जमान उत्त the following bring - lüko'me out oi this web. 15. mjesecond baon was that the water of the.well should hare ths effeet of neetary Tko yeyes of the Saraswati entạred the wall and tossed by them the rishi came up glorifying the gods. The gods went to their orm regions, whilo lie took his way home and finding his two brothers, there he was very angry and said, " Becave, you left me for the sake of cattle you. will roam everywhere like greedy birds and will be fur. nished with finge 50. You will thus be', transformed by' wy curre anel your progany will be monkeys and bearo." At thix both the brothers were transformed as he liail predicted. Bálder Lipped water of the well and having nathed in its waters gave the Brahmana large (70771 Gadaary Pubगदापर्ण (७७७ ) पान दायान पूपिरवारशिलान् ॥ ११ ॥ उदपागम तपाइप प्रशस्त पुन पुस । नदीगतमदीनारमा प्राप्त विनशन तदा ॥ १४ ॥ इति वारपपणि गदायुद्धपाणे वलदेवतार्थियात्रापा पत्रिशोध्याय १६ ॥ पाम्पायन उपाय तो गिम राजन गामाय लायुष पिदामीरान प्रति देखापत्रमा सरस्वती परमात् सा भरतभेट देपास सारनी। तस्मातर यो निरय मानिसनेति ह ॥२॥ तत्रायुपस्पृश्पपल साया महाबल । सम् मिततोगत् सरस्परपास्तंटे गरे ३ ॥ तत्र पामास शुभ्रा मिरपकालमत विता कीटमिनिमलामिध कीडन्ति विमलानना |॥ ४॥ तप्रादेषा समापी रुपको देखकर वारम्बार प्रशंसा करके विनशन से थे को मातकिया ५४ ।। अध्याप३७॥ वैशम्पायन पाने हे राजा इसके मनन्तर बलदेवनी उस विनशन तार्य को गये जहां पर कि शुभाभीरों की शत्रुता से सरस्वती गुप्त रोगई। १। इसहेनुप्से ऋपियोंने सदैव से उसको विनशन कहा है वहे बलवान वलदेवजी वहाँभी सर स्वती में स्नान पाचमन करके । ३। फिर सरस्वती के उत्तम किनांम्पर उस सुरभूमिक तथिकोगगे नहो कि निर्मलमुख निरालस्य अप्सरागण्ठ सदैव स्वच्छ प्रिपामों से कीस करती हैं। हे रामा वहाँपर दवता गर्व हरमहीने में उस donations, Then lo went on towards Binashan " 54. CHAPTER XXXVII Vaishampagan sard, Bulder then went to Binashan where the Saraswatı had disappeared on account of the enmity of Abhirs and the holy place Odamed by the riabis, He dipped water there and having hatbed in the went on to Subhoomak, astuated on the bank of the Saraswati where apsaras of beautiful faces always played Gode and gandharvas go there every month and were seen in large numbers, 5 The gods and ptan amuse themselves there with flow Mulajit । (७०७८) (7078) मास मास जोबर । अभिगवन्त तत्तीर्थ पुण्य प्राझणसेवितम् । ५ ॥ संत्रालयात गन्धर्यास्तथैवाप्सरसागणा । समेत्य सहिना राजन् यथाप्राप्त यथासुखम् ॥६ ॥ तत्र मादन्ति देवाश्च वितरचे सधीरुघ । पुण्य पुष्प सदा दिव्य कीर्यमाणा पुन पुन ॥७॥माकीरभूमि सा राजन तासामप्तरसा शुमा सममिकीत विख्याता सरस्व स्पास्तटे बरे ।। ८॥ तत्र स्नारवा च दत्त्वा च यसु विप्राय माध। । धृत्वा गीतच पहि०५ धादित्राणाञ्च निस्थनम् ।। ९ । छायाश्च पिपुला दृष्टया देवगन्धरक्षसाम् गन्धर्वाणा सतातीर्थमगच्छद्र रिणीमुत ॥ १० ॥ विश्वावसुमुखास्तत्र गबर्षास्तपसा निघता । नृत्यवादिवशीतञ्च कुर्वन्ति सुमनोरमम् ॥११॥ तत्र दत्त्वा लघरो विप्रेग्यो विषिध घम् । मनाविक गायराष्ट्र सुवर्ण रजत तथा ॥ १२ । भोजयित्वा विज्ञान कामे सन्तप्य च महाधने । प्रपयो सहितो विस्तूयमानश्च माधन ॥ १३ ॥ तस्मा ग्घर्षतीर्याच महापाइररिन्दन । गर्गझोतो महातीर्थमाजगामफकुण्डली । १४ ॥ तत्र गर्गेण वृक्न तपसा भाषितात्मना । कालझानगतिधेय ज्योतिषाच यतिम ।॥ १५ ॥ उत्पाता दारुणाष शुमाश्च जनमेजय । सरस्यापा शुभे तीयें विदिता बामणोसे सेवित पवित्र तीर्थको जाते है उस स्थानार भप्सरा और गन्धर्वो के समूह दिखाई पडे । ५ ।। रागेन्द्र पापर देवना और पितर साथ मिलकर समय पूर्वक मुखको पाकर वीरुपियों समेत सदैव । ६ । पवित्र दिव्य पुष्पोंसे वाम्बार युक्त होकर क्रीडा करते हैं उन अपराभों की यह शुभभूमि है और सरस्वती के उत्तम तटपर मुभूमिका नाममे प्रसिद्ध है । ८ । पलदेवनी वहां स्नान करके ब्राह्मणों को धनदेकर उस गीत वाद्योंके शब्दोंको मुनकर ।। गन्ध राक्षसों की वडी २ छायाभोंको देखो ये गन्धों के तीर्थको गये । १० । वहां मीति से युक्त विज्ञावसु नाम गन्धर्व बडे चित्तरोचक गात वाद्यों को करते है । पाइल घर भी वहाँ बहुत से ब्राह्मणों को नानाप्रकार के धनों को देकर भेड बकरी गौ खच्चर ऊट और सवर्ण चांदी भादि को दानकरके वडी प्रप्तस्मता से उत्तम पदायों के द्वारा नीमणों को भोजन कराके पड़ी दणिणामों से तेतकर ब्राह्मणों से स्तूपमान गर्व तीर्थ से चले उसके पीछे पलदेवनी गर्गस्रोत थिको गये । १४ । हे जनमेजय वापर तपसे शुद्ध अन्तःकरण शुद्ध महात्मा गर्गजीने त्रिकाल ज्ञानकी गति के द्वारा नक्षत्रोंका व्यतिकम मौर अशुभ भय The holy place of apsaras on the Siraswati is named Subhoomi Baldev bathed there and gave wealth to Brahmana Hotieard the songs of dancing of avşaias there and then went on to the holy place of gandharvas There Vishvavasu was singing his cheerful gave to bralınians miny sheep, gate, cows mu'es and camala and much gold and silver Ho then went to Gargoutra where Gárg lad exz luined the inovercent of stars and tho áppoarshed That holy place is so named after him ers Bongs Ballev of bad omens 16 (18his of - पाधन T [7679) Gals Pais TE । ७०७९] महामना ॥ १६॥ तस्य नाम्ना व नतीर्थ गर्गस्रोत इतिस्मृतम् । तत्र गर्ग महामाग मृपय मुवता नृप । उपासाशनिरनित्य फार धान प्रति प्रभा॥ १७ । तत्र गर महा राज पल तानुलेपन । विधिवाद्ध घन इत्या मुनीना भाषितारममाम् ॥ १८ उच्चावचास्तथा मध्यान् विप्रेयो दिप्रदाय सनिालयामानतोऽगच्छच्छवतीय रहा पशा । १९ ॥ तत्रापश्यन्मदाशस महामेरुमिघोच्छ्रितम् षेपपतसहाशमृति सघनषितम्। सरस्वत्यास्तरे जात नग तालाघजो पली ॥ २० ॥ रक्षा विधावरा अव राक्षसाधामितौजस पिगाचावामितघला यत्र सिमा सरस्रश ॥ ३१ ॥ते सये असन स्यक्त्या फल तस्य वनस्पते प्रनय नियमेश्रय काले कालेस्मभुम्जो२॥ प्रसिध नियमस्त विचरन्त पृथक पृथक। भागमा मनुजन्यचरन पुरषभ । एघ रापाता नरपते लोफेस्मिन् स घनस्पति ॥ २३ । ससानी सरस्वरया लोकविश्रुतम् । तस्मिश्च यदुशाईलो दत्त्या तार्थे पपस्धिनी । त प्रायसानि भागानि कारी उत्पानोंको सरस्सीके शुभ तार्थपर विदित किया । १३ । उन्हीं के नामसे वह सार्थ गर्गस्रोतनामसे विख्यात है। प्रभु राजा नवमेजप वर्धापर मन्दर ब्रतपाले ऋपियोग सदेवकाल मान के निमित महात्मा गर्गमाप के पास वर्तमान रहते थे । १. । हे रामा उतचन्दन लगानेवाओं पलदेवजी वहां जाकर और शुद मन्त करणवाले मानेयोंको धनदेकर । १६ । नानामकार के भोजन के पदार्थ ब्राह्मणों को भोजन कराके बटे यशवान् नीलाम्बरधारी होकर शहतीर्थ को गये। १९१ वापर महामेरुपर्वतके समान ऊचे वनपर्मन की समान ऋषियों के समूहों से सेवित पहापासनाम पृक्षको उस ताल वनाधारी बलवान बलदेव भीने देखा जो कि सरस्वती के किनारेपर था । २० । महापर हजारों सिद पप विद्याधर और. वरे सेजस्वी गाम और बड़े बलवान् पिशाचादिकों ने ,उस, वृक्ष के फलोंको मन और नियमों समेत समप २ पर भोजन क्रिया । २२ । और लन प्राप्त होनेवाले नियमों से पृथक् विचरनेवाले हुये रे पुरुषोत्तम पा सर मनुष्यों की दृष्टि से गुप्त भ्रमण करनेवाले हुगे है नरोत्तम इस प्रकार के वाहन इस लोक में विख्यात हुआ । २ । इसके पीछे का यादवों में भेष्ठ सरस्वती excellent vows lived with Garg to ldarn the knowledge of t me BsI dev gave great wealth to the brahmang there and having fed then well, he went to the holy place knowr ,ag Shankh There he saw Shankh, a tree huge as a mour tan attend d by large numbers of It is a tunted on the bank of the Sraswati 20 Thousands of Sidl as yakshes vidyadhars, glorious rakshases and powerful pisl acles fed on the fruits of tl ut tree and lived there out of tbe sigbt Thus the tree is known tbroughout the world. uf adavas gave there many cows an' being praised by brahmans - -- rishte of men The best - - ७०८०) Mahabharat (7080) पमाणिधिषिवानिय २॥पूजविश्वाविनाय पूजितनपानापुष्पं तपन रासा जगाम इलायुषः॥२५॥ तत्रगत्या मुनीनाष्ट्रवामानाषेशभरान पला । नाप्लुरव महिले पापिपूजयामास पेशिताम्॥ ३६ तपेष दत्वा विप: परिभोगान महान | ततः प्राथाइलो गजन दक्षिणेन सरस्वतीम् ॥ २७ ॥ गधार महावामांतिपूर महा वशाः । धर्मारमा नागधम्मान तापमागमयुगः ॥ २८ ॥ पत्र पगराजस्प बामके समिशनम् । मरातेमहाराज बमि. पन्नगेवंतम्। प्रणारिसरमाण तत्र निपतुरंश ॥ ३९ ॥ तत्र देगसमागम्य वामुकि पग्मग त्तमम् । सर्वपामगराजाम मायपिस्चन पपारिधि परमग यो भयं तत्र षिचतम स्प कौरव ॥ ३० ॥मापि विधिषात्म वियो राजसपनायान् । प्रायात् प्राची दिशं तत्र तथा तीर्थाम्यमेकमाः । साशनसंपानि प्रषितानि परे पदे ॥ ३१ ॥ माग्नुप तेषु तीषु वयोक तम परिमिः करमोगवासनियम र रामानि भरिशः ॥ ३२ ॥ जमिपाव मुनीस्तांस्तु के उस रूत पात्र ताथ का जाकर ताथपर गौओ को दानकरके ताने लोहे के वर्तमान भार नानाप्रकार के वखों समेत प्राणों को पनकर और भाप भबामगों से स्तुातेमान बलदेमजी दैनवन में गये । २५ । वहां जाकर 'बलदेवकी ने नानामकारकी पोषाकधारी मुनियोंको देखकर जलमें स्नानकर ब्राह्मणों को पूम उन प्रामगोंके अर्थ बड़े २ अभीष्ट पदार्थों को दिया फिर बलदेपनी सर स्वती के दक्षिणभोर चले । २७ । और थोड़ी दूरजाकर धर्मात्मा अधिनाकी ने उस नागधन्धानाम तयकोपापा जहां कि मोंके राजा महातेजस्वी रानापाएकी का स्थान परतसे सोसे व्याप्तथा वहांडी चौदाहमार ऋषियोंनेभी निरास शिपाया । २९ । जहाँ देवतामोंने इकठे होकर सपा उत्तम सर्पो के रामा बामुकि को विधिपूर्वक भाभिषेक करागारे कौरव वहां उनको सो से भय नहीं हुमा 1 ३० । वहाभी ब्राह्मणों के अर्थ रत्नसमूहों को विधिपूर्वक देकर पूर्व दिशा को गये वहाँ पदपदपर लाखों शायौँको देखा ३१॥ और जैस असे ऋषियोंने कहा उसी उपकारसे उन तीयों में स्नानकर उपवास नियपादिक करके सब प्रकार के दानोंको देके । ११ । उन तावासी मुनिपोंको दण्डवद करके मार्ग पूराकर वहां went to Dwait forest. There he saw many munis and gave them the objects of their desi-e. Then he went to the south of the Sarannati and roached the holy place known as Nagdhanwa, the seat of glorious Vasuki the prince of enakes, wbere fourteen thousand munis dwelt and where that prince of nakes was anointed by gods. There they bad no fear from nakes 30. Having given large donations to brahmans, they went towards the East. On their way they found numerous holy p'acos at every step He observed you and bathod t tlie piacee pointed out by righis, still going fi&xttant op the (7031) Gada Parv गदापर्व [७.८१1 हा सीनिवासिमः । प्रिययौ पत्र भूषः सरस्वती ॥ ३५॥ प्रामुखी नियते शष्टिांताता था ऋषीणां नैमिषेयाणामधे माय मारमनाम ॥३४॥ निर तातो सरिभेष्ठा तारट्या तु लांगली। धभूष विस्मितो रामन् पल शताबुलं परः ॥३५॥ जनमेजय उस कामात सरस्वती मयन् निरत्ता प्रांमुणी ततः । ग्पासातुमेतदिष्यामि समाष[सचम ॥ ३६॥ फरिममित कारणे तत्र पिरिमतो पहुनाइन । निता देतुना केन कथमेव सरिवरा ॥३७॥ पैशम्पायन उवाच । पूर्व कृत युगे राजन् नैमिषयास्तपस्विनः । वत्ताने मुधिपुने सो मावश वार्षिक १८॥ अपयो बहमो राजंस्तत् सत्रमभिपेदिरे । उपिरवा महाभागाप्तस्मिन् सोपा विधि ३९ नियने नैमिषीपे धे समावयवार्षिक । माजामुपस्तर पावस्ती कारणात् ॥ ४॥ अषीणां प्रलपातु सरस्वरमा विशाम्पो । हानि नगरायम्से फुले दक्षिण तदा ॥ ११॥ समतपत्र पावत्तापरिजसत्तमाः । लोमानर से सरस्वती के पूर्वमुख होकर । ३५। फिर ऐसे सौटे जैसे कि वायु से प्रतिपादन अर्थात् नैमिपलासी महात्मा भूपियों के दर्शनोंके निमित्तलौटे है राना बतचन्दन से लिप्त शरीर इसापूध बलदेवनी वहाँपर उस नदिपोंमें शेष्ठ सौटी ई सरस्वतीको देखकर अत्यन्त माश्चर्ययुक्त इये । १५ । जनमंत्रप ने पूछा कि ब्राह्मण सरस्वती किसहेतुसे पूभिमुल लौटी अध्ययों में मेष्टमें इस सर वर्णन को मुना चाहताहूं। १९ । वापर पदुनन्दन चरदेवजी किपकारणा से | भाचपयुक्त हुपे और वह उत्तमनदी किसहेतुसे और किसपकार इसति से लौटी 1१७ पैशम्पायन बोके कि हे राजा पूर्व सतयुग में नैमिश्वासी बहुतसेतपस्वी ऋणि बारहवर्ष के बड़े यह वर्तमानरोनेपर । ३८ । उस यामें आये वह महाभाग उस यझमें विधिपूर्वक निवासकरके । १९ । नैमिषार गयमें वारहरप के या समान होनेपर नार्थ के कारण से वहांगये। ४. राजा ता ऋषियों भाधिपतामे सास्वती के दक्षिण तटरे तीर्थों कीसंख्या र रोसकी ।४ो नरोनम महांक bauk of the drraswati. Then they tuned, as cluude pushed by the wind, to see the rishis of Naimish. He was much abt inished to kee the turnings of the Saraswati. " 33. Janueyaya raid, " Why did the Sarasivati turn Eastwardy? I wish to hear from you, best of brahmang. What caused the won ler of Balder at the tu.ning of the Sunswut?" Vaishampayan said, " In Sityug, many ruhis of Naimisl attended a twelve-year sacrifice which was then berag per furined They staid there tur twelve years and went away at the close of the sacrifice to the holy place there. 40.There coint of holy places on the right bank of the Salas natı Sumant panchak the rishis gathered us the bank of the Saraswati und filled the directings with the sounds of the Velic livinus The was no As far as (७०८२ । Mahabbaatr 17082) व्याघ्र नधास्तीर समाश्रिता ॥ ४२ । धता तत्र तेषान्तु मुनीना भावितात्मनाम् । स्ना पायेनातिमहता यभ्यु पूरिता दिश ॥४३॥ अग्निहोत्रस्ततस्तेषा यमाहात्म नाम् । अशोभन सरिश्रेठ दाप्यमाने समन्नत ॥४४॥पालिखिल्ला महाराज अक्षम फुद्दाश्च नायसा । दन्तोलू नलिनश्चा-ये सप्तख्यानास्तापरे ॥ ४५वायुमपा जला हारा पर्णमक्ष्याश्च तापसा । नानानियमयुक्ताश्च तया स्थण्डिल शायिन ॥ ४६ ।। मामन थे मुनपस्तष सरस्वत्या समीपत । शोभयन्त सच्छेिष्ठा गङ्गामिष दिवी कस 1४७. भातराश्च समापेतुEषयस्ता याजिन । तेऽघकाश न दहशु सरस्वत्या महामना । ४८ ॥ तता यज्ञोपवीतस्ते तत्तीर्थ निर्मिमाय धै। जपुयुश्चाग्निहोत्रौपच चकुश्च विविधा प्रिया ।। ४९ ॥ ततस्तमृषिसघात निराश घिन्तयान्वितम् । दर्शया मासंगजेन्द्र सपामये सरस्वती। ५० ॥ तन कुजान् घड्न् कृष्ट्या सनिवृत्ता सरि परराषीणो पुण्यतपसां फारुण्याजनमेजय ॥ ५१ ॥ तयो निवृत्त राजेन्द्र तेपामर्षे सरस्वती । भूष प्रतीच्यामिमुखी प्रसुसाय मरिद्वरा । ५२। मोघागमन कृत्वा तेषां समन्तपचक है बसंतक तह उत्तम प्रामण तार्थ के लोभमे नदी के किनारे पर निबासीहये । ४२ । वहाँपर उन इवन करनेवाले शुद्ध अन्तःकरणयाले मुनियों के वडे वेदपाठ से दिशा पुगहोगई । ४३ । वापर उन महात्माओं केकिपडूपे प्रकाशित भग्निहोत्रों से यह उपनदी चारोंओर से शोभायमान हूई। ४४ । हे महाराज वालाखल्य अस्मकुट दन्तोलूखली प्रसंख्यान ।४५ यापुभक्षी जलाहारीभौरवक्षों के पत्ते खानेवाले नानाप्रकार के नियमों से यक्त मैदान में सोनेपाळे संपरची । ६४ निसरस्वती के सम्मुख ऐसे ठहरेहुये थ जैसे कि नादेयों में श्रेष्ठ श्रीगगा नो को शोभायमान करने देवताहोते हैं ।४७ । यश से पूजन करनेवाले सैकड़ों ऋपमा रन वडेनसवालों ने सस्वती के अवकाशको नहीं देखा । ४८ । इसके पछि उन अपियोने यज्ञोपवीतों से तीर्य को रयकर अग्निहोत्रादिक अनेक प्रकारकी क्रियाओं को किया । ४९ । हे राजेन्द्र इसके पीछे सरस्वतीने उन्हों की मसन्नता के लिये उस निराश चिन्तामे युक्त ऋपि समूहको अपना दर्शन दिया । ५० हे जनमेजय इसके पीछे वह अप्ठ नदी पवित्र तपकरनेवाले पियोंकीदया से बहुत कुजाको करके लौटी ।५११ राजेन्द्र इसीहेनुमे यह श्रेष्ठ सरस्वतीउनके tanks wore illuni ned by sacrifica Bilkbilgna, skoot Dantolukh alie Pracanl hyana living on air, water and leaves of plan's, row obre ving manis, slept on open ground at the henk of the Saraevati As gode pinbellieh the banks of the Gangpe, 47, Thousanda of resif, who lind come to the sacrifice, dd not soe the Shrrara They poures liations over the fire lore and there Then "arastati appear Mito them rastit turned to theta in many #inding cnrners and fired trgards the seat for their sahe, riying. 50. The I 80 dark . 083 Gada Parv गदापर्व (७०८३) भूयो अंजाम्यहम् । इत्यद्भुतं महब्बतदा राजनमहानदी ॥ ५३॥ एवं स फुजोरागन 4 मैमिषीय इति श्रुतः । कुरुक्षेत्र कुरुश्रेष्ठ कुरुप महती क्रियाम् ॥ ५४॥ तत्र दुम्जान बहन रष्ट्या निवृत्ताच मरिद्वाराम् । बभूव विस्मयस्तन समस्याथ महात्मनः ॥ ५५॥ उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद्यदुनन्दन । दया दापान द्विजानिभ्यो माण्डानि विधि धानि च ॥५६ ॥ मध्य भोज्यब्ध विषिषं ब्राह्मणेश्य प्रदाय च । ततः प्रायाद्वलो राजन् पूज्यमानो विगतिमि । ५७ ॥ सरस्पतीतीघरे नानाद्विजगणायुतम् । घगु काश्मयप्लक्षाश्वत्यविभीतफैः ।। ५८ ॥ फफफोलश्च पलाशेश्च करीरैः पालुमि स्तथा । सरस्वतीताररुहस्तमिवियधैस्तथा ।५९ ॥ रूप घनश्चेष पिलेराम्रा तकैस्तथा मितिमुक्तक पाईदय पारिजातैश्च शोभितम् ॥ ६० ॥ कदलीवनभूयिष्ठं रष्टिकान्त मनोहरम्। पाम्यम्युफलपर्णादैईन्तोलखलिफेरपि। ॥ ६१ ॥ तथाइमकु? नेियमुनिभिर्य मितम् । स्वाध्यायघोषलघुष्ट मायूथशताकुलम ॥ ६२ । महिलधर्म लिये लौटकर फिर पश्चिमाभिमुख जारी हुई । ५१ । और कहा कि मैं तुम्हारे माने को सफल करके फिर जानी हूं यह उप्त महानदी ने वडा अपूर्व कर्मकिपा ५३ हे गना इस प्रकार से वह कुन नैमिपी नामसे प्रसिद्ध है हे कौरवोत्तम तुम इस कुरु क्षेत्रमें बड़ी क्रियाको करो। ५४ । वहां बहुत कुंजी समेत लौटीईई सरस्वती को देखकर उन महात्मा वलदेवनी को बड़ा आश्चर्यहुआ ।' ५५ । उम तीधर्मभी यदु नन्दन वलदेवजी विधिपरक स्नानकर ब्राह्मणों को नाना प्रकार के दान देकर नानाभक्ष्य भोज्य पदार्यों से बामणोंको तृप्त करके और ब्राह्मणोंकोसे पनि होक चके । ५७ । फिर हलवारी बलदेवजी उस सप्तनारस्वत तीर्थ को, गये जोकि. सरस्वती के साथमि श्रेष्ठ नानाप्रकारके पक्षीगणों से युक्त बदरी, इंगुद, काश्मय मंन पीपल, विभतिक, कंकोलं, पलाश, करील, पोलू और सरस्वती के तीर्थपर उत्पन्न होनेवाले नानाप्रकार के वृक्षों से शोभित । ६० । करुपवर, विल भाम्रा तक, अतिमुक्तत, भखण्ड और पारिजातकों से शोभित केलों के बहुतवन रखने, वाला प्रिय देखने के योग्य चित्तरोचक वायु जन फल और पचों के खानेवाले दांसों के उलबल रखनेवाले । ६१ । पापाणपर कूटनेवाले वनवासी बहुतते मुनियों से युक्त वेदध्वाने से शान्दापमान मृगों के. अनेक यूथों से व्याकुल । ६२ । हिंसा aftor making your coming finitful. " The river thus drd a rronderfal. deel. Ite turang is known as Kairmishi, and you will do a great dideda iš Kurukshetra, Baldav was prúch astonished to see those windings of the Sarasvati, 55. There too, he gave large", donation and food to bruhmias who blessed him There he went to Sapt-bar. swat, the best of thº holy places on the Sarasvati, abounding i buds and over growo with large trees bearing fruits and flowers, 60 There 18 & large forest of trees, with good air and 'water, where many siger, - [७०८४] Mahabharat (7084) परम मिारपसेवितम् । सप्तसारस्वतं मीर्थमाजगाम इलायुधः । पत्र मानक सशस्तपस्तेष महामुनिः ।। ६३ ॥ इतिगदायुदपर्वाण वलदेवतीर्थयात्रा मारस्वततीर्थोपाख्याने सक्षत्रिशोध्यायः। जनमेजय उवाच । सप्तसारस्वतं कस्माद कश्चमडूणषोमनिः । कथं लाखो भगवान कश्चास्य नियमोऽभवत् । १ । कस्प पंशे समुत्पन्नः फिञ्चापतिं विधी समः। एतदिन्छाम्यहं ओतु घधिद्विजसत्तम ॥ २॥ शम्पायन उवाच । गजन सप्त सरस्वत्यो पामियोप्तमिदं जगन् । आहूता बलनिर्हि तत्र तत्र सरस्वती ॥ रहित और धर्मको उत्तम जाननेवाले मनुष्यों से सेवितथा और जहाँपर महामुनि सिद मंकणक ने तवस्पा कीथी ६१ ॥ अध्याय ३८) जनमेजय व.ले कि सप्तसारस्वत नाम किसहेतुमे हुमा और मङ्कणक नाम मुने कौनथा भार वह समर्थ और सिद्ध कैसेहुआ उसका नियम षयाथा । रे ग्राह्मणोत्तम वह किमके कुल में उत्पन्न होकर क्या पां पढ़ा था इप्तको भाप विरिपूर्वक मुझमे वर्णन कीजिये । २ । वैशम्पायन वोले हे राजा सात सरस्वती जिनसे कि यह जगत् म्याप्त है घन्छवानों से बुलाईहुई सरस्वती जहां तहां He हुई। ३ । उनके नाम यह मुमभा, कांचनाती, विशाला मनोरमा, प्रोपानी, living on frnts wud roots, live. It rings with Vedic hymns and abounds in deer and harmlees nien, where the vage Mankapak purſuri. ed his penancer. "63. CHAPTER XXXVIII Janmejaya said, "Why was Sapt-Saraswat 80 anmed, who was Dlapkapak, huw did he become great and that was his rule of conduct? What family did he belong to and what were his acquirements & Pray tell me all this in detail. " Vaishampayan said, " Thoro aro Baraswatis in the world invoked here aod there by great toen. They are known as Suprabha, Kanchanaboli, Vasliala Mancrama, Oghwati Sururu ard Vin o daha. 4. During the great garsilica of Brahma, reven + 1(7085) Gada Pary 117198 (७०८५) सुप्रमा कामनाली च विशाज्ञा च मनोरमा सरस्वती चोयवती सोपविमलोषका .४॥ पितामहम्य मातो वर्तमाने महामले । मिति पक्षपाटे वै संसिलेषु विजामिषु ॥ ५॥ पुण्याहघोषिमतामा निनदैस्तथा । देवेषु वैष उपप्रेषु तस्मिन् यज्ञविधी सदा ॥ ६॥ तत्र वैध मराज दीक्षित प्रपितामहे । यजतस्तस्थ सण सर्वकामसमृ दिना ॥ ७॥ मनसा चिन्तिता ह्यय धार्यकुशलस्तदा । उपतिष्ठन्ति राजेन्द्र विजाती स्तर तह ॥ ८ ॥ जगुध तत्र गन्धर्धा नऋतुचा सरोगणाः । पावित्राणि च दिशानि पादयामामुरम्जसा ॥ ९ ॥ तस्य यनस्य सम्पत्या तुतुदेवता अपि । विस्मय पर जग्मुः किमु मानुषपोनयः ॥ १०॥ धर्तमाने तपा यो पुष्करस्य पितामहे । अनुबन्न यो राजमार्य पचोर महागुण.॥ ११.न रयमे सरिस्प्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती। छन्या भगवान प्रात: सस्माराय सरस्वतीम् ॥ १२॥ पितामहेन यजता मारमा पुक रेषु वै । सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना तत्र सरस्वती ॥ १३॥ तां रष्ट्या मुनयस्तुशास्त्व रायुकां सरस्वतीम् । पिताम मानयन्ती ऋतुरते बहु मेनिरे ॥ १४ ॥ परमेषा सरित अरेण, विमोलदका । ४ । ब्रह्माजीका पड़ा यज्ञ वर्तमान होने और याके विस्तृत पाड़ेमें निर्मल पुरापाषाचन के शब्द वेदध्वनियों समेत ब्राह्मणों के सिद्धहोने और या विधि देवता भीके सावधान होने । ६ । और वहां ब्रह्मानी के 'दीक्षित होनेपर सप अभीष्ट वस्तुओं से घदियुक्त यशद्वारा उन ब्रह्माजीको । पूजन करते 10 1 धर्म अर्थमें कुशल पुरुषोंके मनसे विचारेहुये भर्थ जहां तहां ब्राह्मणों के पास निपताये हे गजेन्द्र तब वहां गन्धों ने गाया अप्सरागणों ने नृत्य किया और बेगसेसे दिव्य थानों को बनाया । ९ । उस यज्ञकी धनि आदिकसे देवता दिकमी प्रसन्नहुये तो मनुष्य कैसे न प्रसन्न होगा ।१०। हे राजा इसीप्रकार पुष्कर जीमें ब्रह्मामी के नियत रोने और यज्ञ के वर्तमान होनेपर ऋषि बोले कि यह यज्ञ बड़े विशेषवाली नहीं है । ११ । इसहेतुसे कि यहा नदियों में श्रेष्ठनदी सरस्वती दिखाई नहीं देती तब भगवान ब्रह्माजीने उनके बचनको सुनकर सरस्वतीको स्मरण किया । १२ । हे राजेन्द्र वा पुष्करों में या करनेवाले ब्रह्माजीजीबुलाई हुई सरस्वती सुमभानाम प्रकट हुई । १३ । मुनिलोग उस बीघ्रता से एक ब्रह्माजी, की प्रतिष्ठा करनेवाली सरस्वतीको देखकर प्रसन्नहुपे और उस पक्षको भी बड़ा माना । १४ । इस प्रकार यह नदियोंमें श्रेष्ठ सरस्वती ब्रह्माचीकी और बुद्धिमान when the ledic bymns were sung by brahmans and the godo partool of Brahma's sacrifice and paid their respect to buo, tho gandbaryas! apsaras danced and played musical instruments. Gods and men were pleased with those sounds. 10. When Brabma nas per forming ercrifice at Pusbkar the rislis said, " This sacrifice of yours 18 not a wonder, because we donot see Saraswati here. "At this Brahma invoked Ssraswati and she came thero under the name of Sup Abhus Bang and (७०८६) Malal heatr 17086) श्रेष्ठा पुष्कर सरस्वती । पितामहार्य सम्भूना तुष्टयर्थच मनीषिणाम् ॥ १५॥ नैमिषे मुनयो राजन् समागम्य समासते । तत्र चित्रा कया ह्यासम् पद प्रति जनेश्वर ॥१६॥ चलते मुनयो घासन नानास्वाध्यायदिन । ते समागम्य मुनय सस्मरुवें सरस्वतीम् ॥१७ ॥ सा तुपाता महाराज भाभि सत्राजिभि । समागताना राजेन्द्र सहायार्थ महात्मनाम् ॥ १८ ५ माजगाम महामाया तत्रपुण्या सरस्वती । नैमिषे काञ्चनाक्षी तु मुनीना सत्राजिनाम् ॥ १९ ॥ आगता सरिता श्रेष्ठा तत्र' भारत पूजिता । मयस्य यजमानस्य गयेयष महातुम् ।। २० ॥ आता सरिता श्रेष्ठा गययझे सरस्वती। पिशाला ता गये वापप सशितग्रता ॥ २१ ॥ सरित्सा हिमवत्पाश्चात् प्रसुवा शीघ्रगामिनी । हालक तथा पक्षे यजतस्तस्य भारत ।। २२ । समेते सत स्फोते मुनीना मण्डले तदा । उत्तरे कोशलामागे पुण्ये राजन्मदात्मन ॥ २३ । उहाळफेन यजता पूर्व ध्याता सरस्वती । माजगाम सरत्श्रेष्ठा त देशमृषिकारणात् ॥ २४ ॥ पूज्य पियों की प्रसन्नताके लिये प्रकटहुई तब सब मुनिलोग नैमिपमें इकट्ठहोकर, बैठगये और वेदके विषयमें अपूर्व कयाहोने नगी १६ाहेराना जहापर अनेक प्रकार कीऋचा जाननेवाले वह मान बैठेयेउन मुनिपोन मिलकर सरस्वतीको स्मरण किया। १७॥ व यज्ञ पूजन परनेवाले ऋपियों से ध्यानवी हुई धर्मकी दृद्धिका बह महा भाग करणाला नाम सरस्वती इकठे होनेवाले महात्मा ऋषियों की सहायता के निमित्त वहाँ नैमिष में भापहुंची और यससे पूजन करनेवाली मुनियों के भागे प्रकटाई । १० । अर्थात् वा नदियों श्रेष्ठ महापूजित नदी वहाँपर भाई इसके पाउ वह श्रेष्ठ नदी गयदेशमें वडे यमों से पूजन करनेवाले राजा गपकी दुलाई हुई गपके यन में मकट हुई तेजतत पियों ने उस गयकी बुलाईहुई सरस्वती को विशाला कहा । २१ । वह शीघ्र चलनेवाली नदी हिमाचलकी कुक्षसे उत्पन्न हुई हे भातवशी इतीमकार उस पूजन करनेवाले औहालक के यन्त्र में । २२ । सब ओरसे पृदिपुक्त इकट्ठे होनेवाले मुनियों के मण्डल में काशलदेश के पवित्र भागर महामा ! २३ । पूजन करनेवाले औदायको इशान की, हुई सरस्वती. उस पाप के निमित्त से उसदेशामें आपहुची । २४ । जो कि केवल मृगचर्मधारी The Mupls were much plenyed at the sight of her and pulogised th: Thus Saraswati the best of riyers appeared there to pleast tho wise sayo who sat in Naimish and told mony things about the Vedas, The great rusbis, learned in the Vedar, ainting there, invokod tho Saraswati and eho came to thoir bolp by the pano of Kanchanakalu 19. The sbu was in voked by Pnau Gaya at thua Bacrifice and was callol Vuhala This mod riser came out of tho Ilonlayn, larly, in tho sacrifice of A uddalak tto riehus invoked her in the land of Focal Aod sho como thore, 91 It was attended by munu Feards । - facrifice Stunt 1 . .[7037) Gada Parv गदापर्व [७०८७) माना.' मुनिगणैर्वल्कलॉजिनसंवृतः । मनोरमैति पिण्याती सम्र्मनसा कृता ॥ २५. सुरेणष, द्वीपे पुण्ये राजर्षिसविते ।। २६ कुरोध यजमानस्य कुरुक्षेत्र महात्मनः माजगाम महामागी सरिष्ठा 'सरस्वती, ॥ २७ ॥ मोधवत्यपि राजेन्द्र पशिष्ठेन मयात्मना । समाहूता कुरुक्षेत्र दिव्यतोया सर स्वती । २८॥ दशेण पंजता चापि गङ्गीबारे सरस्वती । सोणुरिति विख्याती प्रनता, शीघ्रगामिनी ॥ २९ ॥.विमलोदा भगवती ब्राह्मणा यत्रता पन:, साता पयो तर पुण्ये हेमघते गिरी ॥ ३० ॥ एकीभूतास्ततस्तास्तु :तस्मिस्तीय समागताः । सप्तसार स्वतं तोय ततस्तन प्रथितं भुवि ॥ ३॥ इति सप्त सरस्वत्यो नामतः परिकीर्तिताः। सप्तसारस्वत चैध तीर्य पुण्यं तया स्मृतम ॥३२ ॥ शृणु मडुप कस्यापि कौमारब्रह्मचा रिणः । आपगामवंगांढस्य राजन प्रीडित महतं ॥ ३३॥ इष्ट्रवा परच्छया तंत्र स्त्रियः मम्मसि भारत । स्नायन्ती रुचिरापाङ्गी दिग्वांससमनिन्दिताम् । सरस्वत्पा, महाराज' 'वस्कन्द धीजमम्मसि ॥ ३४ ॥ ततः स तु ज़माइकलसे वै महातपाः । सप्तधा प्रधि मुनियों के समूहों से पूजित थी उन मनसे प्रकंटकी हुई वह सरस्वती मनोरमा नाम से प्रसिद्धहुई। २५ । यज्ञकरनेवाले महात्मा कुरुके इस कुरुक्षेत्र में जो कि राजाऋपियों से सेवितोपवित्र और उम द्वीपमें वर्चमान है वहाँ रेणु नाम महां भाग सरस्वती आई ॥ २७। हे.राजा महात्मा वशिष्ठजी से घुलाई हुई दिव्य जल रखनेवाली प्रोपवती नाम सरस्वती. कुरुक्षेत्र में प्रकटदुई । २४ । और गंगाद्वारपर यह करनेवाले दक्षसे घुलाई ई शीघ्रगामी सरस्वती सुरेणु नाम से प्रसिद्धहुई ।२९।फिरः यज्ञकरनेवाले ब्रह्माजीसे बुलाईहुई विमलादानाम भगवती सरस्वती पवित्र हिमांचल पर्वतपर गई। फिर:सव एत्रहोकर उस तीर्थपर भाई इसीसे वह तीर्थ इस पृथ्वीपर सप्त सारस्वत:नाम से विख्यात हुआ। यह साता सरस्वती नामों समेत.वर्णनकरी इस प्रकारसे या पवित्र तीर्य सप्त. सारस्वत नामसे विख्यात किया गया है। ३१ । हे राजा बाल्यावस्था से ब्रह्मचारी नदी के जल में स्नान करनेवाले प्रङ्कणकनामऋपिके भी उत्तम चरित्रको मुनो। ३३ । हेमरत' वशी, महाराण किसीसमयं वहाँ देवइ छोसे जलमें स्नान करनेवाली एक अति. मनोहर श्रेष्ठ नेत्रबाली निहाप नगीस्त्रीको देखकर सरस्वती के जलमें इनका वीयdeer'akics, and invoked' by then she was c-lled "Manorama. in the sacrifice of Kuru át Kutūkshótra, attended.bš roğal' sages holy and good; Saraswati appeared utider the name of Sirenu" Invoked by Vashisth the Saraswati come under the name of Oghwati, Invoked by Daksh'at Gangadwar, Sartisivati was known as Suréns. Tnyoked by 'Brahrua: Saraswati appeared as Bimaloda on the Himalayas: i. 30.. They all came together at that holy place and therefore it fras known as Sapt-Suraswati. .The, seren saraswatis and their names are rien.
(७.८८) Mahabharat (7088 मागन्तु कलसर जगाम ह ॥ ३५ ॥ तत्रयः सप्त माता अहिरे मरता गणाः यु धेगी पायुधली पाहापायुमण्डलः। ३६. ॥ घायुज्यालो वायुग्ता घायुधवार्थ बाद एय'मेते समुri मरुतां जनयिष्णः ॥ ३७॥ इदमस्यद्भुतं राजन् वृण्याय तरं मुधि । महेश्वरित थाहक त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ३८ ॥ पुरा महणका सिख: कुशाणेति विश्रुतम क्षतः किल करे राजस्तस्य शाकासोऽत्रवत् ॥३९॥ स रस रष्ट्वा हविष्ट प्रनृत्तवान् । ततस्तस्मिन् प्रनृत्ते पै यावर जङ्गमञ्चयत् । प्रनु 'समय वीर ने जसा तस्य मोहितम् ॥ ४० ॥ प्रमादिभिः सुरै राजन्नामि तपोधन: विषप्तो मादे मोर नगधिप । नापं नृत्ये धथा देष तर्ण र कसुमहति ॥ १॥ तो देखो मुनि रहारविष्टमतीय। सुराणां हितकामार्थ महादेवोऽयमापत गरपड़ा ! ३४ | फिर उस बट तपस्नीने , उस वीर्य को कलशमें ,रखदिया फिर कलमामे नियत उस ने सातभागों को पाया । ३५ । अर्याद उसमें बरसात ऋषि उत्पाहुये जिन्होंने मरुद्गणों में अवतार लिपाया उनके नाम पहलै पायुषेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल । ३६ । वायुमाल, वायुरेता और पराक्रमी कायु चक्र इसमकार- मरुतोंके यह ऋषि उत्पन्नहुये, १७हे राजेन्द्र पीपा बड़े भारसर्य कारी उस महर्षिके चरित्रको मनो भो कि तानोलोकों में विरूपात है। १८ । हे राजा निश्चय करके पूर्व समय में मंकणक नाम सिद कुशामों की नोकसे घायल हुमा था तब उसके हायसे शाकरश टपकाया यह मुनागया ३९। यह अपि अपने हायमे टपकेहुये शाकरस को देखकर प्रसन्नता मे नृत्य करनेलगारे वीर फिर उसऋषिके नृत्य करनेपर सब संसारके जर चैतन्यजीव उसके जसे नृत्य करनेनगे । ४. । हे रामातब प्रमादिक देवता और तपोधन ऋषियोंने मादेव भीसे मार्थनाकी कि हेदेवताओंके हेदेवता जैसे यह ऋषि नृत्यको न करे वही आप उपाय करनेको योग्यहो ।.४१। इसके पीछे देवता महादेवमी मुनिको अत्यन्त tioned there and the holy place is known as Sapt saraswat on account of them. Now hear the exploits of Maukanak : Beeing a naked woman of charming appearance and beautiful ayo, his sonen dropp.d down in water. Tu rishi kept it in a vessel and it was divided into waren portions, 35. The soven rishis who wore'bora among Marutas were the is no and are toown as Vasaras, Vayuval, Vayuha Vayuungadal, Vagujwal, Vayurtta and Vayuchakra. Non hear more of that rish'a doods which aro kaowo throughout the throa worlds. The orgo dlankanak pricka i hit hapa with the point of kusha grace and regatablo juice dropped out of the woand, 8-oing that sap com out of it, tho rithi danced with rapture and all tho the bovableand in luo vablar of tho world did the sains, 10. Brahıms scd other rishis beggod Mahadev to styliis ilance, For the good of the gode, Sfalader (1089%2 Gadaarv Parb गदापर्ष ( ७०८९) ॥ ४२९ो ब्राह्मण धर्मज्ञ कि नृत्यते भवान् । हर्षस्थानं किमच सषेदमधिक मुने । तपस्विनो घर्तपये स्थितस्य द्विजसत्तम । ४३ ॥ अविस्वाच । किपालि मे पान कराठाकरसं मतमय हवाई प्रत्तो हण महता विभो ॥ ४५ ॥ पदस्थाप्रधीयो मुनि संगण मोहितम् । अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीति प्रपदप माम ॥५॥ एक्युक्त्वा मुनिश्रेष्ठ महादेवेन धीमता । मंगुल्यग्रेण राजेन्द्र सांगुष्ठलाडितो मवत् ॥ ४६ ॥ ततो भस्म सनादजिनिर्गतं हिमसान्निमम् तरप्टवा प्रारिता राजर समुनिः पादयोगतः । ४७ । मेने देव महादेवमिदश्चोषाध पिरिमतः । नान्यं देवा मन्ये सद्रात परतरं महत् ।। ४८ ॥ सुरामुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि एलईक । रक्षपा सरमिदं विश्व बदन्तीह मनीषिणः ॥ ४९॥ स्वामेघ सर्व विशति पुनरेय युगक्षये मसन्नता में पूर्ण देखकर देवताओं के मियकारी हितके लिये पह वचन बोले । ४२ हे वर्मज्ञ प्रामण आप किस निपित्त नृत्य करतेहो हे मुनेि आपको इतनी मसमता किमरेतुमे हुईहै हे श्रेष्ठ प्राह्मण धर्ममार्ग में तपस्वीकी प्रसन्नताका कारण गया है । ४५ पिरोला हे ब्रह्मन मेरे हायसे टपकेहुये इस शाकरस को क्या तुम नहीं देखतहोई समर्थ मैं इसी शाकरस को देखकर बड़े आनन्द युक्त होकर नावताई। ४४ । तब देवता शिवजी उस रागसे मोरित मुनि से अच्छे प्रकार सकर बोले कि हे घेदपाठी मुझको आश्चर्य नहीं होता है तुम मुझको देखो ।'४५ हे.राजेन्द्र उस अप्ठ मुनि से इसमकार कहकर बुद्धिमान महादेवनी ने अंगुली की नोकसे अपने अंगूठे को ताड़ित किया । ४६ । हे राजाउससे बर्फ | के समान श्वेत भस्म निलली उसको देखकर बड़ी लज्जापाकर वह मुनि उनके दोनों परणोंपर गिरपड़ा । ५७ | उसमे उसको देवताओं का भी देवता महादेव माना और पाश्चानि होकर यह वचन बोला कि मैं रुद्रदेवता से उत्तम और बड़ा मरे किसी देवताको नहीं मानताई । १८ ।। शूलधारी तुम देवता अमुर मादिक Beeing the rishi dance in gloe, asked of him the reason of his sn dong Baying." Why do you dance so joyfully, sage ? A rishi, walking in the path of virtue has no cause to indulge in the manner. you rot sue this vegetable sap dropping from my hand ! I am dancing for this very reason. "said the rishi Mabadev laughed at this and said, " la soo no cause of wonder in this, learned man, " Having & tid this, Mahader beat his thumb with the eod of his fore-fingor and a dust wbite as mou come out of it. the muni much ashamed, fell down at his feet and he kness the god of gode. Then he thus addressed biu, agit. " I say that no god is greater than you You are the refuge of all tho world, bear:r of trido at Wise men say that all the world ITA: croate) by you and it will unite in you agaju af er p alaya. You ए ".. Do है (७०९०). Mahabharat (7090'3 'देवपिन शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ।। ५५ । त्यपि सर्वे स्म हश्यन्ते भाषा में जगातीस्थता. त्यामुपासन्त घरदं देया ब्रह्मादयोनघ ॥ ५१,,॥ सर्वस्वमास देवाना का कारयिताच त्मसादात्- सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोमया । एवं स्तुरवा महादेवं स:ऋषि प्रणतोभवत् ॥ १२ ॥ यदिदचापलं देव. कृतमेतत् स्मयादिकम् । मतः प्रसादयामि त्वां तपो मे ने क्षरेदिति ॥ ५३॥ ततो देवः प्रीतमनास्तमृषि पुनरम पात्तपस्ते चईतां धिप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा । आधमे चेह परस्यामि त्वया सास मर-सदा ॥ ५४॥ सप्तसारस्वत चास्मिनु यो माञ्चिायते नरः । न तस्य. दुल समेत सब जगत्की गातहो, तुम से सब जगत् उत्पन्न हुआ है ऐसा इस. लोकमें पण्डित लोग कहते हैं । ४९ । मलंय कालके पीछे फिर या सर्व जगद तुम ही लय होता है तुम देवताओंसेही जाननको योग्य नहीं हो तो मुझ अल्पवौद्ध से कैस जाननके योग्य होगे । ६० । जो प्रकाश रूपभाव जगदमें नियत हैं वह सब आपके रूपमें दिखाई पड़ते हैं. हे निष्पाप ब्रह्मादिक देवताओंने भी नदी वरदाता की उपासना करी है। ।६। देवताओं के उत्पन्न करनेवाले और सबको कम्मों में प्रवृत्त करनेवाले 'भापही को इसलोक में मव देवता आपकी ही कपासे निर्भपहोकर आनन्द करते हैं वो ऋपि महादेवजी की इस प्रकार स्तुति करके नम्रहोगया । ५२ । और कहनेळगा कि है देवता मैंने जो महकारादिक चपलताकरी है इसलिये भापको प्रसन्न करताहूं' 'और यह चाहगाहूं कि मेरा तप नाशको न.पावे । ५३'। इसके पछि - प्रसन्नचित्त 'शिवजी उमं पिसे बोले है बामण मेरी कपासे तेरातप हजार प्रकार से वृदियुक्त होय और मैं इस "माधम में सदर तेरे सायं निवास करूंगा। ५४ । जो मनुष्य इस सप्त सारस्वत तथि ने मुझको पूजेगा उसको इसलोक और परलोक में कोई दुष्मांप वस्तु नहींहै और 'निस्सन्देह -- are unknowåblo eren by gods, low,CAD 8 person of small nnderstanding knor your 50. You are the seat of all glory and are praised by. Brahma and other gods. You are the creator of gols and you ongage all boings in action. , All the gods enjoy the world fearlessly by your grnce alone. ""Ibo rishi thug humiliated himself beloro Mahador and, said, " I have been.rash enough before you and therefore I requeat your pleasure so that the merit of my ascoticism may not be destroyed... Shir was pleased with the rishi and said," Yonr asceticiem, will ba: frait a thoazandfold by my graco and I shall livo Fith yon. Whoever will sorship mo at 8.pt.siraswnt till Grid nothing difficult to attain and will surely go to the region of Suragral." Tbis is the -------- (709) Gada Pary गदापर्व [७.९१ किम्वद्भवितेह परत्र पासारस्वतञ्च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः ॥ ५५॥ पतन मडणकस्यापि चरितं भरितेजसः । स हि पुत्र मुंफन्यायामुत्पन्नो मातरिश्चना ॥५६॥ इति गदापदपाण वलदेवतीर्थयात्रायां सारततोपाख्याने अष्टत्रिंशोध्यायः ।। . . वैशम्पायन उघाय । उपिया तत्र रामस्तु संपूज्याप्रमयासिनः । तथा मणके' मीति शुभाश्च के हलायुधः ॥ १ ॥ दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो रजनी, तामुपोय । 'पूजितो मुनिसंघच प्रातमन्याप लागली ॥ २ ॥ अनुक्षाप्य मुनीन् सूर्षान् स्पृष्टवा 'वीयच भारत प्रययो त्वरितो रामस्तीहे तोर्महाबलः ॥३॥ तत, शिनसे तीर्थमा जा सारस्वत लोक में 'जायगा;। ५५ ॥ यह बड़े तेजस्वी मंकणक नाम ऋषिका चरित्र पर वैटा हुआ इसी सुकन्या उत्पन्न हुआ है-५६ ॥ अध्याय ३९॥ वैशम्पापन वोले कि इलधारी वलदेवाने वही निवासकरके और आश्रम वासियों को अच्छीरीति से पूजेकर पंकणकऋोप में शुभ प्रीतिकरी ।१ । हे भरत वशी बड़े बलवान् हलायुप' वलदेवजी बाह्मणों को दानदेके उसंगात्रि वहां नि चासकर बड़े प्रातः काल उठकर मुमियोंके समूहोंसे पूजित होकर ।२ । और भापभी, सब मुनियों को पूमकर स्नान आचमनकर तीर्थ केनिमिच शीघ्र चलदिये । ३॥ acoount of the eage Alanhanais' sio was aa offsprig of Suk- Alya. "56. . CHAPTER XXXIX Vaisbampagan said, "Having ataid there, Balder paid respect 'to tho pople of the hermitago and ixod bis miod in Mankadak, riebi. Ha gavo donations to brabimans and aſtor' stayiog lhord a night,' be greeted the munis and was greeted by them in return. . Hothen 'Bippod water and went on to the visic other holy places, He iest risiled Kapal-mocban dedicated to Sbobra, there Mahodar the modi vas freed from tlo hcad of the raksbas cut off and flung by Karn and wbero Shaka bad performed pipances in the days of yorc.'
[७०९२] Mahabharat (709) अगाम हलायुधः । कपालमोचनं नाम यत्र मुक्तो महामुनिः ॥ ४ ॥मरता शिरसा राजन् प्राघो महादरः । राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुग तत्र पूर्व तप स्तप्तं कायेन मुमहात्मना । ५ ॥ यत्रास्य नातिरखिला प्रादुर्भूता महात्मनः। पंत्रस्थ चिन्तयामाम दैत्यदानवषिप्रहम् ॥६॥ तत् प्राध्य व पलो राजतीर्यप्रवरमुखमम् । विणिय ददौ मित्त प्रामणानां महात्मनाम ॥ ७ ॥ जनमेजय उवाच । कपालमोचन महान् कयं यत्र महामुनिः । मुकः कपञ्चास्य शिरो लग्न केन च हेतुना ॥ ८ ॥ वैशम्पायन उवाच । पुरावे दण्डकारण्ये राघवेन महात्मना । वसता राजशार्दूलंगक्ष सान शमयिष्यता | जनस्याने शिरस्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः । झुरंग शितधा रेण तत् पपात महावने ।। १० ॥ महोदरस्प तल्लानं जंघा ! यहच्छया।पने बिच रतो राजन्नस्थि मित्त्रास्फुरत्तदा ॥११ ॥ स तेन लग्गेन तदा द्विजातिन शशाकह। इसके पी वनदेवजी शुक्रजी के कंपालमोचननाम तीयं को गये हे महाराम राजा जनमेजय जहाँपर पूर्वसमयमें रामचन्द्रजीके फेंकैहुये राक्षसके बड़े शिरसे निगलाई जंप बाल महोदरनाम महामुनि मुक्तहुये वापूर्वकालमें बड़े महात्माशुक्रमाने तपकिया । ५ । जहाँपर उस महात्माकी सम्पूर्ण नीति भकटाई वहाँही निषत होकर शुक्रजी ने दैत्य और दानवों के परस्पर विरोधको शोचा । ५ । हे राजा राजावलिने उस अत्यन्त श्रेष्ठ तीर्यको पाकर विधिपूर्वक महात्मा ग्रामखों को धन दिया । ७ । जनमेजय ने कहा हे द्विजर्य इस तीयका कपालमोचन नाम कैसे हुआ उसमें मह.मुनि कैसे छूटे उप्त राससका शिर किसहेतुमे उनकी जघामाचपटा । ८ । वैशम्पायन वोले हे राजेन्द्र पूर्वसमय में दण्डक वनमें निवास करनेवाले राक्षसों के मारने के भीमलापी महात्मा रामचन्द्रजीने । ९ ! जिस स्थान में दुरात्मा राक्षसका शिरकाठा वहां उमवन में तेजधार क्षुरसे काटाहमा वह शिर उल्ला । १० । निश्वप करके दैवयोग से वह शिर महोदर की जघापर चिपटगया अर्थात् यह शिर वनमें घूमनेवाले महोदरके हाडको छेदकर कुछ चेष्टा करनेलगा 5. There Boukrá lind expounded his Politics and thought of the war between the gods and Dunavaa. King Bali hod given tburo im. menso wealth to Brahmars. " Janmejana sard, ' Why was , that, holy place called Kapalmochan, " Why did tho rakslas' lund cling. to the muni's thight " Vaishampayan said, "Staying in Dandai forcat in the days of yoro, with a desire to extirpato ibe rakshason magnanimous Ram Chandri cut off the head of a rakabag mith a sharp weiron. The head thus cat asundr went up and ctung to thie thigh of t10 muni, piercing through his bono and moving the ohila 11. With that loud clung to his Iudy the mini was unablo turisit huis placa; bat to door that he moved on though in great (7193) Garda Pary ITÀ [७.९३) मामगंतु महामस्तीयांन्याय तमानि च ॥ १२ । स पूतिना विस्रषता घदनासों महा मुनि । जगाम सर्वतीयानि पृथिव्याऽचेति न श्रुतम् ।१३ ॥ स गत्या सरित सर्या समुहाच हातपा । कथयामास तत् सर्वभूतीणा मावितानाम् ॥ १४ ॥ जाटत सवतीर्थेषु न च माक्षमधातवान् । स तु शुभ्राय पिनेन्द्रो मुनीना पचनं महत् ॥ १५ ॥ सरस्वत्यातीधर ख्यातमोशनस तदा । सर्वपापप्रशमन सिद्ध क्षेत्रमनुत्तमम् ॥ १६॥ स तु त्या ततस्तत्र तीर्थमोशनस द्विज । तंत ओशनसे तीर्थ तस्योपस्पृशतस्तदा । तच्छिाधरणं मुक्त्वा पपातान्तर्मले तदा ॥ १७ ॥ विमुक्तस्तेन शिरसा पर मुखम घापद । स पाध्यम्तजले मूर्खा जगामादर्शन तदा ॥ १८ ॥ तत स विशिरा राजन् पुतात्मा घातकल्मष ।माजमाधम प्रीत तर यो महोदर ॥ १९ ॥ सोऽथ गत्या थमं पुण्य विप्रेमुको महातपा । कथयामास तत्सर्वमृषीणा भावितात्मनाम् ॥ २० ॥ । १ तब वह बहाशानी ब्राह्मण उस चिपटे हुये शिरके कारण से तीर्थ और | देवाळयों के जाने को समर्थ नहीं हुआ। १२ । उस चिपटे ये दुर्गन्धित शिरके कारण दु खसे पड़ामानभी वह महामुनि पृथ्वी के सब तीर्थोंको गया यह हमने सुना है ।११। उस घडे तपस्वी ने सब नदियों पर और समुद्रोंपर जाकर यह सब सान्त शुद्ध अन्तःकरणवाले पर्यों के सम्मुख जाकर वर्ग,न किया । १४ । सब तीयोंमें स्नान करनेवाल ने उम शिरसे पृथक्ता को नही पाया तब फिर उस ऋपिने मुनियों के वडे इन वर्गों को मुना । १० । कि सरस्वतीका एकउत्तम तीर्थ मोशनस नामसे विख्यात सब पापोंका दूर करनेवाला सिद्धीका क्षेत्र और श्रेष्ठ तरहै । १६ । उसके पीछे उम प्राह्मण ने उस मोशनम तीर्थ में जाकर स्नान किया | तब भौशनम तामें स्नान करने वाले उम ऋपके चरणको छोडकर वह शिर जलके मध्य में गिरपडा । १७ । उस शिरसे छुटेहुये ने बडे आनन्द को पाया मौर उम शिरनेभी जलके म य में गुप्तताको पाया । १८ । हेराजा उसके पीछे उस शिर से पृथक् पवित्र शीर पार्पोका लिप्ततासे रहित सुखी और कृती होकर वह महोदरपि अपने पाश्रमका भाया वहाँ उस शिरसे टूटे उस बडे तपस्वी ने पवित्र आश्रमको जाकर उस सर वृत्तान्तको शुद्ध अन करणवाले ऋषियों He told of his calamity to the necetils whom Le met al tuo banhs of holy nirers and sens, but the head ati i clung to his this He heard froin munis that a holy place on the bank of the 8 iraguatu known as Aasianas vai tho runsover of a119 and pa fection 10. Then the bathed at Aurhan1s and the hed lost his tugh and drupnod in water The rishi wng pleased at being nd of the bond bich disappeared in water, Berog thus frezd from the head how voll as 19 ring, tho rosbt rent to his owo herinitrgo nud told ut asatics of his good luck 20 Tko Asembled rislır then gare the pain HI10. of ।
- (१०९४) Hahabharat (7094) ते श्रुत्वा बाग तस्य ततस्तीधस्य मानद । कपालमोचमिति नामचकु. समागता: २॥स चापि तीर्थप्रवरं पुनर्गत्वा महानृषि । पात्वा पप. सुचिपळ सिरिमा सदा मुनिः ॥ २५ ॥ तत्र दवा पहून दायान विधान संपूज्य माधवः । जगामणि प्रबरो रुपद्रोराश्रमन्नदा ॥२३ ।। तत्र सप्तं तपो घोरमाषिणेन मारत । ब्राह्मण्यं लग्न पास्तत्र विश्वामित्रा महामुनिः ॥ २५ ॥ सर्वकामसमृद्धं है तमाश्रमपदं महत् । मुनि भिप्राह्मणैवेध सेवित सर्वदा विमो॥ २५ ॥ ततो हलधरः श्रीमान् घाममै परिषा रिता । अगा। यत्र राजेन्द्र रूपद्गुरतनुमत्यजत्। २६॥रुपद्गाह्मणो वृदस्तपोरियम भारत । देवस्यासे कृतमना विचिन्त्य बहुधा तदा ॥ २७ ॥ तत सानुपायाव तनयार घे महातपा । सद्गुरववी नयनं मा पृथदकम् ॥२८॥ विज्ञायातीतपस रुषद् से तपोधना, ते थे तोधमुपानिम्युः सरस्वत्याप्त पोधनम् ॥ २९ ॥ स पुस्तया से वर्णन किया । २० । हे वड़ाई देनेवाले इसके पीछे इकट्ठे होनेवाले उन अपियों ने उसके वचनको सुनकर उस तीर्थका नाम कपालमोचन रक्खा । २१ । तर बस महर्पिनभी उस अत्यन्त उत्तम तीर्यको जाकर जलको पान करके बहुत बड़ी सिद्धी को पाया । २२ । वामा दिगोंमें श्रेष्ठ हळघर बलदेवजी बहुत दानोंकोदेखकर वानोंको पूजार उस रुपंगों के पाश्रम को गये जहापर प्राष्टिपेण ने बड़ी घोर तपस्याकरी थी वहाही महामुनि विश्वामित्रने झामण वर्णको पाया।२ व पड़ा स्थान सर अभीष्टोंसे वृद्धियुक्त और सदैव मुनि ब्राह्मणों से सेवित है। समर्थ राजेन्द्र इसके पीछे ब्राह्मणों समेत अबलदेवजी वहांगये जहां कि सपंगोंने अपने शरीरोंको त्यागा । २६ । ई भरतवंशी सदैव तप करनेवाले युद्ध प्राह्मण शारीरके त्यागने में प्रश्न चित्त रुपंगने बहुत प्रकारकी चिन्ता करके अपने सब पुत्रोंको घुलाकर सबमे कहा कि मुझको पृथदक तार्यको लेचलो । २८ । उन सपोधन सुपिकुमारोंने उस योधन रुपंगको वृद नानकर सरसती के उस तार्थ पर पहुंचाया जोकि धर्मकी बृद्धिका कारण "हो तीर्थों से युल और वेद पादियों से सेवितथा । ३० । हे राजा वह बड़ा तपस्नी ऋपियों में श्रेष्ठ रुपंगवहां विधि पुर्वक स्नान करके तार्थ के गुणों को जानकर अत्यन्त प्रसन्न होकर समाप name of Kimpal-ruochan to the holy place The rishis went to that holy place and gumed greas perfection Having visited that holy place and sipped of ita water, Baldev gave large donations to Brab wang, and peoceeded to the hermitage of Rushangs whore Arshtixon had performed a sorore asceticista and Vishwamitra become a Brahman That holy place in the giror of all desires urdu traited by Brahmad.and manis. 25. Tien le, with Brahmans, went to the placo *hero Rus'ynay't had Jial l'ho elder Rushang, before dying, bad asked his song to lako him to Pathodak, The risbi'a sons obased their old fatlier and tool (7097) --Gada Parv गदापर्ण (७०१७) महातेजा जगाम त्रिदिवं मुनिः । एवं सिद्धः स भगवानार्षिणः प्रतापधान् ॥ ९॥ तस्मिन्नेव तद्रा तीर्थ सिन्धुद्वीपः प्रतापवान् । देवापिश्च महागज ब्राह्मण्यं प्रागतुर्म सत् ॥ २०॥ तथा च कौशिकस्तात तपोनिन्यो जितीन्द्रयः । तपसा मुनप्तन ब्राह्म पत्यमवातात् ।। ११ । गाधिर्नाम महानात्ति क्षत्रियः प्रथितो भुपि । तस्य पुत्रोऽम घद्राजन् विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥ स गजा कौशिकतात महायोगभवत किल । स पुनमनिषिच्याथ विश्वामित्रं महातपा ॥ १३ ॥ वेहन्यासे मनश्चके तमूनु प्रणताः प्रजाः । न गन्तव्य महाप्रात त्राहि चास्मान्महाभयात ॥ १५॥ एवमुक्या प्रत्यु धाच ततो गाघि प्रजास्ततः । विश्वस्य जगतो गोना भविष्यति सतो मम ॥ १५ ॥ इत्युक्त्वा तु ततो गाधिषिशामित्रं निवेश्य च । जगाम त्रिीदव राजन विश्वामित्रो भवन्नृपः न शक्नोति पृथिनी यत्नवानपि रक्षितुम :- १६ ॥ तत शुभाष गजा स राक्षसेभ्यो महाभयम् । नियंयौ नगगच्चापि चतुरङ्गवलान्यतः॥ १७ ॥ स यात्या भगवान प्रतापवान मार्टिगेण इस प्रकार से सिद्धहयो। हेमहाराज तब उस तीर्थ में प्रतापवान सिन्धद्वीप और देवापीने बड़े ब्राह्मण भावको पाया। १० । हेतात उसी प्रकार सदैव तप करनेवाले जितेन्दी विश्वामित्रने अच्छेप्रकार से अपहुये तपकेद्वारा ब्राह्मण वर्णको पाया । ११ । एकगाधिनाम क्षत्री इस पृथ्वीपर बड़ा विख्यात हुआ उसका पुत्र विश्वामित्रभी बड़ा प्रतापवान हुआ । १२ । हे तात निश्चयकरके 'वह राजा कौशिक बड़ा बुद्धिमान और प्रजा उस बड़े तपस्वाने विशीपत्र न म पुत्रको राज्य पर अभिपेश कराके १३॥ शरीर त्यागमें चित्तको प्रवृत्त किया व हाथ जोड़कर प्रमालोगोंने उससे कहा कि हे बड़े ज्ञानी आपको धन में न जना चाहिये हमको आप बड़े भयस रक्षाकरो । ११ । इसके पीछे इस प्रकार से प्रजा के वचनक' सुनकर गााधिने प्रजालोगों को उत्तर दिया कि मेरा पुत्र संसार भरेका रक्षकहोगा। १५ । गिजा राजागाधि ऐप्ता वचन कहकर और विश्वामित्र को राज्यसिसन पर बैठाकर स्वर्गको गया और विश्वामित्र राजा हुये विश्वा मित्र भी अनेक उपायों से पृथक्षी की रक्षाारनेको समर्थ नहीं हुआ। १६ । इम of their work in a very short time. Having said this, the glorious muni went to heaven. Then glorious Siadh dwip and Devapi became Brahmans. 10. Similarly, Vishyamitra who lnd control over his organg became a Brahman by meane of asceticism He as the son of a faigous h shatrya named Gadhi, who was very wise and learned. Ho installed liis son V'13samitra on his lirono and intended to leare the world. The subjects humbly ashed bow not to go to furests, but to rom in there to prot-ct them from dunger, Bat Gndhi #aid that his son Viehwaimtra rru'd be their refuge 13. 'Having fald this, Godht left thiobingdout to liin son rad vreot to hearon Vishwamitra (७०१६) Mahabhaatr (7096) जनमेजय उवाच । कयमार्टिषेणो अगवान् विपुलं तप्तवातपः । सिन्धुद्वीपः कथं चापि ब्राह्मण्य लब्धांतदा ॥ देवापिश्च कथं ब्रह्मन् विश्वामित्र सत्तम । तन्ममाचक्ष मगरन् परं कौतूहलं हि मे ॥ २ ॥ वैशम्पायन उवाच । पुरा कृतयुगे राजन्नार्षिणो द्विजोत्तमः । वसन गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रतः ॥ ३, [स्प राजन गुरुकुले वप्ततो नित्यमेव ह । समाति नागमाद्विधा न पिधेदा विशाम्पते ॥४॥ स निर्विनस्ततो रास्तपरतेपे महातपाः । ततो वै तपसा तेन प्रात वेदाननुत्तमान ॥५॥ स विद्वान् वेदयुक्तध सिद्ध श्चाप्यषिसत्तमः । तष तार्थे धरान प्रादात्रीनेव मुमहात, ६ ॥ अस्मिस्तीर्थे महानद्या अद्य प्रभृति मानवः । प्राप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ७ ॥ अद्यप्रभृति। नैवात्र भयं व्यालादपिप्यति । अपि चापेन यत्नेन फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ८ ॥ एवमुफ्त्या अध्याय ४० जनपेजयने पूछा कि भगवान् प्राष्टिषेण ने किस प्रकारसे बड़ी तपस्याको किगा और सिन्धद्वीप देवापी और विश्वामित्र ने किस प्रकार ब्राह्मण वर्ण को पाया हे भगवन वह सम मुझसे कहो क्योंकि सशको सना वहा उत्साह १२॥ वैशम्पायन वोले हे रामा पूर्व सतयुग में दिनों में भेष्ट. भाष्टिपेण सदैव घेदपाठ में प्रीति रखनेवाले सदा गुरुकुलमेंही निवास करते रहे । ३ । सदैव गुरु कुल निर्यास करने परभी उप्त राजऋषि की विद्या और वेदोंने- सम्पूर्णताको नहीं पाग।। इसके पछि उस व्याकुल चित्त तपस्वी ने वहे तप को तपा तव उम तपकेद्वारांपेदों को पाकर । ५ ! उस वृद्धिमान वेदज्ञ सिद्ध पियों में श्रेष्ठ बड़े तपसीने उस तीर्थ के अर्थ यह तीन वरदिये । ६ । अर्थात् • अथसं. लेकर इस महानदी के तार्थ में स्नान करनेवाला मनुष्य अश्वमेधक बड़े फलको पावेगा। भार भवसे लेकर गहां सर्प से किसीको भय नहींहोगा भार थोड़ेही समय में उत्तम फलको पावेगा । ८ । बड़े तेजस्वी मुनि इस प्रकार कहकर स्वर्गकोगये यह CHAPTER XL Janamrjaye asked, " Hot Ud Arshtiken pertorm a severs asceticisin and how wore Sindd-dwip, Devapi a Vishwamitra turned into Brahnırng Pray tell me all this Brahman, fou I um very, anxious to licur it » Vaishampayan said, " in the dinge of $ityuz. Arahtison passed luis whalo life at Gurubul in reading the Vedas, but he course was not complete, Then bo performed a sovero naceticism and acquired a knoklerge of the Vedas.j. That great and learned ascetic granit. al threo bons to tho boly place, namely: ło whir batlies in the holy Jahnoni, will gain the mesit of performing Ashwanedh 'Encrifice; people visiting it will hava'no far from snakca and sell gain tho fruit (70971 Gada Parv गदापर्व (७०१७) महातेजा जगाम प्रिादव मुनि । ५५ सिद्ध. स भगवानाषेिण प्रतापवान् ॥ ९॥ तस्मिन्नेव तद्रा तीर्थ सिन्धुद्वीप प्रतापघान् । देवापिश्च महागज ब्राह्मण्यं प्रागतुम इत् ॥ १० ॥ तथा च कौशिकस्तात तपोनिन्यो जितीन्द्रय । तपसाये मुनप्तन ब्राह्म णत्यमवाप्तवान् । ११ । गाधिर्नाम मष्ठानासीत् क्षत्रिय प्रथितो भुधि । तस्य पुत्रोऽम धद्राजन् विश्वामित्र प्रतापवान् ॥ १२ ॥ स गजा कौशिष स्तात महायोगभवत फिल । स पुत्रमम्ििषच्याथ विश्वामित्र महातपा ॥ १३ ॥ देहन्यासे मनश्चके तमूनु प्रणता प्रजा । न गन्तव्य महाप्राज्ञ त्राहि चास्मामाभयात् ॥ १५॥ एवमुक्य..यु पाच ततो गाधि प्रजास्तत । विश्वस्य जगतो गोपना भविष्यनि सतो मम ॥ १५ ॥ इत्युक्त्वा तु ततो गाधिर्विश्वामित्र निवेश्य च । जगाम प्रिदिव राजन विश्वामित्रो भवन्नृप न शक्नोति पृथिवीं यत्नवानपि रक्षितुम ॥ १६ ॥ तत शुभाष गजा स राक्षश्यो महाभयम् । निययौ नगगनचापिस्तुरगावलान्वित ॥ १७॥स यावा भगवान् प्रतापवान प्राप्टिषेण इस प्रकार से सिद्ध हये।९। हेमहाराज तब उस तीर्थ में प्रतापवान सिधद्वीप और देवापीने बहे ब्राह्मण भावको पाया । । हात उसी प्रकार सदैव तप करनेवाले जितेन्द्री विश्वामित्रने अच्छेप्रकार से पहुये तपकेद्वारा ब्राह्मण वर्गको पाया । ११ । एकगाधिनाम क्षत्री इस पृथ्वापर बड़ा विख्यात हुआ उसका पुत्र विश्वामित्रभी बड़ा प्रतापवान हुआ । १२ । हे तात निश्चयकरके वह राजा कौशिक बड़ा बुद्धिमान और प्रजा उस बड़े तपस्वाने विशामित्र न म पुत्रको गज्य पर अभिषेश कराके !' ३॥ शरीर त्यागमें चित्रको प्रवृत्त किया नव हाथजोड़कर प्रमालोगोंने उससे कहा कि हे बड़े ज्ञानी आपको वन मन जना चाहिये हमको आप बड़े भयस रक्षाकरो । १४ । इसके पीछ इस प्रकार से मना के वचन के सुनकर गाधिने प्रनालोगों को उत्तर दिया कि मेरा पुत्र संसार भरेका रक्षकहोगा१५ हेगजा रानागाधि ऐप्ता वचन कहकर और विश्वामित्र को राज्यसिरासन पर बैठाकर स्वर्गको गया और विश्वामित्र राजा हुये विधा मित्र भी अनेक उपायों से पृथी की रक्षाफरनेको समर्थ नहीं हुआ। १६ । इम of their work 10 & very short time. Haymg said tl18 the glorinus muu went to heaven Then glorious Sindh dwup and Devapı became Brahmans. 10 Similarly, Ishwamitrs who had control over his became a Brahman by means of Asceticism organs He was the sop of a fainous kshatrya named Gadlii, who was very wise and learned Ho installod his 8 in Vislitvamitra on lus throne and intended to leave the world. The subjects humbly asked mo not to go to forests, but to romana there to prot-ct them from disnger. But Gadhi fad that his son Vighwanstra sould be their refuge lo 'Having said this, Guihileft thiobingdon to luis son sad pept in heaven Vishwamitra (700% Gudaury Parbrit तपसा तु तथा युक विश्वामितामहः ममगत महाजा घरदो परमस्य नत ॥२७॥ स तु पो पर राजन् स्याहाह्मणसिपति । तथति चानवादब्रह्मा सर्वतो पितामह । २८ ॥ सलावा तपसा ग्रंण नायव महायशा विचार महीना कृतकाम भुगेपमा १२९ । मस्मिरतीयवर राम प्रदायघि धम् । पचस्थितास्तथा धेनुयानानि शयनानि च ॥ ३० ॥ अय घनाण्यल डार भक्ष्य पेयञ्च शोभनम । भद दरितो राजन् पूजयित्वा द्विजोत्तमान् ।। ३ । ययौ राजस्ततो रामा पस्याधर मासिकात् । यत्र तो तपस्तीत्र दल्यो धक इति श्रुत । ३२ ॥ इतिगदायुरुपर्वाणे मारस्वततीर्थोपाख्याने चलारिंशोध्याय॥४॥ तेजसे मूर्यके समान हुमा ।२६। तर बड़े परदाता ब्रह्माजीने इस प्रकार तपमें प्रवृत्त विशमित्र को और उसके उत्सम तपको स्वीकार किया । २७ । और मांगनेकी आनाकरी सब उसने यह बरमागा कि मैं ब्राह्मण होजाअ उस समय सब लेको के पितामह ब्रह्माजी बोले कि ऐमाही होय ।२८। वह बड़ा यशवान बड़ी तपस्यासे माक्षण वर्ण को पाकर अभीष्ट सिद्धि करनेवाला देवताओं के समान होकर सव पृथ्वीपर घूमा । ३९ । वलदेवजी ने उस उत्तम तीर्थपर बहुत प्रकारका धनदेकर दुग्धवती गौ सवारी वस्त्र भूषण भक्ष्य भोज्य और पानकी यस्तु यह सब दान की रे राजा इस प्रकार से बलदेवजी उन उत्तम ब्राह्मणा को पूजकर समीपही उस वकके भाश्रमको गपे जहां पर दाल्भोकने कठिन तपस्याको कियाथा यह मुना जाता है १२॥ Baranyut: »od sveu on water, air and lex pes of placts and slept in open air. He observed severa . The gods stood in his way but could but succeed and Vishwamitra became glorious like the 8u11. Bra5ma approved 1118 asceticism and uidered hilo tu ask boons asked the rank of Bialımadhood and Brahma granted bis request He became a Brahman by bus asceticism and timed on earth like a god. Baldev gare there cows, anveyances, clothes, ornaments and food and proceded to the neighbouring bermitage of lan, where wa hver that Dalbla vyak had perfui ined a soveru asceticism,” 32.
- - (७.९८) Mahabharat (7098) दामधानं वशिष्ठाश्रमभ्ययात् । तस्य ते हैनिका राजश्वस्त धानयान परन् । १८ ॥ ततस्तु भगवान् निनो धशिष्ठाश्रममभ्ययात् । दहशेऽथ तत सर्व भज्यमान महाबनम ॥ १९ ॥ तस्य कुमो महाराज वशिष्ठो मुनिससमः । राजस्व शवरान् घोरानिति स्वा गामुवाच ॥ २० ॥ तथोक्ता सास्जवेनुः पुरुषार घारदर्शनान् । ते च तनमासाप धभन्नु सर्वोदिशम् ॥ २ ॥ तच्छुत्या विद्वत सन्यं विश्वामित्रस्तु गाधिजः। तपः परमन्यमानतपस्येव मनी दशे ॥२२॥सोऽस्मिस्तीघरे राजन् सरस्वत्याः समा हित नियोश्चोपवासश्च कर्पयन्देहमात्मनः ॥२३॥ जलाहारो बायुभल्या पहार सोऽभवत् । नया स्थ डलशायीच गे नागे नियः पृथक ॥ २४ ॥ असतस्य देवास्तुं वनविन प्रचकिरे । न चास्य नियमावुद्धिरपणाति कदाचन ॥ २५॥ ततः परेण चलेन मस्या बहुविध तप । नेजसा भागे गाषिजः समाचत ॥ २६ ॥ के पोछ उम रानाने रासमोसे बड़े भयको सुना भार चतुरंगिणी सेना समेत नगर मे निकना । १७ । भर बहुत दूर मार्ग बनकर वमिष्टमी के पाश्रमको गया राजा वहां उसकी मेना के लोगों ने बड़े अन्याय किये । १८ तब प्रमाजीके पुत्र भगवान ब्राह्मण वसिष्टनी। मव महावनको टूटा और बिगड़ा देखा । १९ । तब उसपर क्रोधयुक्त होकर मुनियों में श्रेष्ठ वामिनीने अपनी गौसे कहा कि घोर शबरों को उत्पन्नार । २० । उनकी आनामे उमगान घोर दर्शन वाले मनुष्योंको उसन्न किया उन्होंने विश्वामित्रकी सेनाको पाकर सब दिशामों में लिन भिन्न किया। २१ । गाधि के पुत्र विश्वामित्रने उस अपनी भागीहुई सेनाको भागा हुआ सूनकर तपको श्रेष्ठ माननेवाले ने तपही में पित्त किया । २२ । हेराजाउस सावधीने विश्वामित्र ने सरस्वती के उत्तम तथपर नियम और उनकद्वारा अपने शरीरको दुर्बल और कृशांग किया । २३ । और जल वायु और पत्रोंका आहार करनेवाला हुआ और स्पंदिलशायी अर्थात् मैदान में शयन करनेवाला इमा । २॥ और बहुतसे अनेक पृथक् नियमोंको भी वारम्बार किया फिर देवताओं ने उसके प्रतका विघ्नकिया परन्तु इस महात्माकी बुद्धि] नियम से पृथक् नहीं हुई फिर उत्तम उपायों से बहुत प्रकार के तपको करके वह गाधिका पुत्र' was boable to protect his subjects. He heard that the rabshases were toaking a great bavoc and came out of the city with a large army. He went in the hermitage of Vashisth where his scldiers were very junjuste Vashisth the son of Brahma saw his forest destroyed and in anger ordered his cou to poduce Shawars. 20 By his order the cov gave birth to dreadful men who dispersed Vishwamitra'n army. Vishwamitra saw that liis army was rouled by the power of asceticism and thinking that it was the best thing, made up bis mind to engage 1191 Asceticisid. Ho rade bw budy luan jo pesances at the bank of the - 7099% Gadauty Paib its (७०२९ तपसा तु तथा युकं विश्वामित्रतामहः समन्यत महाजा घरदो घरमस्यात् ॥ २७ ॥ स तु पोवा राजन् स्यामा प्राह्मणस्ति । नथति चानचीदवझा सखो। पितामह 1२८॥ स लावा तपसाग्रंण माह्या महायशा विचचा महीना कृतकाम सुरोपमः ॥२९॥ मस्मिरतायवरे राम प्रदाय ििवध धम् । पस्चिास्तथा घेनुयनानि शयनानि च ॥ ३० ॥ अथ घनाण्यर ड्रारं भक्ष्य पेपञ्च शोभनम् । अद दम्परितो राजन् पूजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥ ३६॥ यो राजस्ततो रामा धकस्यायन मस्तिकात् । यत्र तेोपस्तीन दल्यो धक इति श्रुत. ॥ ३२ ॥ इतिगदायुपणि मारस्वततीर्योपाख्याने चतारिशोध्याय४०॥ तेजसे मूर्यके समान हुमा ।२६। तब बड़े वरदाता ब्रह्माजीने इस प्रकार तपमें प्रवृत्त विरामित्र को और उसके उसम तपको स्वीकार किया । २७ । और मांगनेकी आशाकरी सब उसने यह वरमागा कि मैं ब्राह्मण होनाऊ उस समय सब लेको के पितामह ब्रह्माजी बोले कि ऐमाही होप १२८ वह वड़ा यशवान बड़ी तपस्यासे प्राह्मण वर्ण को पाकर अभीष्ट सिद्धि करनेवाला देवताओं के समान होकर सब पृथ्वीपर घूमा । २९ । वलदेवजी ने उस उत्तम तीर्थपर बहुत प्रकारका धनदेकर दुग्धवती गौ सवारी वस्त्र भूपण भक्ष्य भोज्य और पानकी वस्तु यह सब दान की हे राजा इस प्रकार से बलदेवजी उन उत्तम प्राह्मणा को पूजकर समीपी उस वकके माश्रमको गये जहां पर दाभोवको कठिन तपस्याको कियाथा यह मुना जाता है १२॥ Strawuti uod live on water, air and leaves of plants and slept in opon oir. He observed severe 74. The gods stood in his wny but could but succeed and Vishwaluttra became glorious like the sun. Brahma approved lua asceticism acd uidered bilo to ask boons asked the rank of Bralimanhoud and Brahma granted bus request he became a Brahman by his asceticism and roained on earth like god. Baldev gave there cows, angoyances, clothes, ornaments and food and proceeded to the neighbouring bermitage of Wax, where we hear that Dalblayak had performed a soveru sscet usw. 32.
[७१०] Malv bha at (7100) वैशम्पायन उवाच । नहाघोचोयाणि जम्मम, यदुनन्दन । पत्र दाभ्यो को राजनामस्थो महातपा ॥१॥ जुहाप धृतराष्ट्रस्य गट वैचित्रवरिषण । तपसा घोरपेणकर्षया देवमामन । करधेन महतारियो धम्मामा प्रतापवान् । २ । पुरा हि नैमिनीयाणा सो द्वादशवापिके ! वृत्त विश्वजितो ते वै पाञ्चालानुफ्योगमन १३॥ तत्रश्रमयाचन्त दक्षिणार्थ मनीषिण । बलान्वितान् यत्सतरान्निा धोनेक विशतिम् ॥ ४॥ तानत्रयीद्वको दाभ्यो विभजन पनिति । पशनेताना त्या या भिक्षावे राजसत्तमम् ॥ ५॥ एवमुबारा ततो गजानुषीन् सर्वान् प्रतापवान् । जगाम धृमगष्टस्य भयन ब्राह्मगोत्तम ॥ ६ ॥ स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्र जनेश्वरम् । अया चत पशून दाल्भ्य स चैन रुपिशवीत् ॥ ७ ॥ यहच्छया मृतान् रष्टया गास्तदान पसत्तम । एनान पशुम्नय क्षिप्र ब्रह्मरन्धो यहीच्छसि ।। ८ । ऋविस्थध यत्वा अध्याय ४१ ॥ वैशम्पायननी वोले कि यदुनन्दन वलदेवजी उस ब्रह्मयोनि तीर्थ से संयुक्त नधिको गये महापर अपने आपममें नियत बड़े तपस्वी दाभोवकने विचित्र वीर्य पुत्र धृतराष्ट्र के देशको इवन किया और घोररूप तपसे अपने शरीरको दल करता धर्मात्मा मतापवान् बड़े क्रोधो पूर्णहुआ । २ । पूर्वसमय में नीमप निवासियों का बारहवर्ष का यज्ञ ममाप्त होने पर विशाचेति यज्ञ के अन्त में ऋपि लोग पाचाल देशों में गये। । उन ज्ञानी मृपियों ने वहापर दक्षिणा निमित्त राजासे याचना करी उस राजा ने वलवान न्युन अवस्था भौर नाग इक्कीम गौों को दिया। ४ । दाल्भोवक उनमे वोछे कि पशुओं को विभाग को मैं इन पशुओं को छोड़कर उस उत्तम गना से भिक्षा मागूगा !५ । हेशनाप्राह्मणों में श्रेष्ठ मतापवान दाल्भोषक सब ऋपियों से इस प्रकार कहकर धृतराष्ट्र के भवनकोगये ।६। और राजा धृतराष्ट्रके सम्मुख नाकर उससे पशुओंको मांगा ।। तब उस श्रेष्ठ रागाने दैययोगमे गौ वैलों को मृतक देखकर वहे क्रोधपूर्वक उन CH PILR XIL Vaishampajan sad, Flou B alınyını Bilder wer t to Smyeht where the great ascetie Dubhorak bad given libations of ihe countiy of Dhuutrashtra and made bra body l au in anger At the close of the (Medv3 years' sacrifice, the ascetics of Nasmish fint to the cultry of the Panchale, There they usked of the bing for se me. donation, He gavo tbem twentyone yolog, strong and healthy cows Dalbhorak left his share of the cows to be distributod among companions and int nded to ask for himselt of sjue other hins Glorious Dalbluyak then went to the palace of Dhritraslítra and borged for rome Leists, Tbe king, as Fale would have it was chagrined at the death of sopio . - his . । (7101) Gada Parv गदापर्य [५१०३ विस्तापामास धर्मविता मरो षत नृशस पाक्यमुक्को स्म ससदि ॥ ९ ॥ ॥चिल लिया मुान्तु रोषाविछो विजोत्तम । मतिनके विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपत ॥१०॥स तू काय मृताना रे मासानि मुनिसत्तम । जुहाव धाराष्ट्रस्य राष्ट्र नरपते, पुरा। अपकी सरस्वत्यास्तीय प्रबाल्य पावकम् ॥ ११ दालपो महाराज नियम परमास्थित । स रेष हावास्य राष्ट्र मासमहातपा ॥१२ तस्मिस्तु विधि पारस सप्रहत्ते सुदारुगे । अक्षीयत ततो राष्ट्र धृतराष्ट्रस्य पाथिव ॥ १३ ॥ तत प्रमीयमाणन्तदानस्य महीपते । छिपमान यथानन्त यत परशुना विभो । भूषा पगत तम व्यगकीर्षमवेतनम । १५ । रया तथावकीर्णन्तु राष्ट्र स मनुजाधिप । पासून दुर्मना अचिन्तयामास व प्रभु ॥ १५॥ मोक्षार्थमकरायन ब्राह्मण सहित. पुनमगोपगरुन् सक्षीयते राष्ट्रमेव च ॥ १६ ॥ यदा स पथिव क्षिणाते से कहा हे अप्रवन्धो जो तू चाहताहै तो इनपशुओंको शीघ्र लेनाभो । तव धर्मज्ञ ऋषिने उस प्रकार के वचनको सुनकर वही चिन्ताकरी कि बड़े दुख की बात है कि इसने मुझको सभा में ऐसे निर्दय और अनादरता के वचन कहे । तव को से पूर्ण उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने एक मुहूर्नभर चिन्ता करके राना धृतराष्ट्के नाग करनेका विचार किया। १० । पूर्वसमय में इस श्रेष्ठ मुनिने मृतक पशुओं के मासको काटकर राजाधृतराष्ट्रके देशको इवन करदिया सरस्वती के अवकीर्ण तीर्थ में अग्निको प्रज्वलित करके । ११ । बह बड़ा तपस्नी दाभोषक में नियम में निपत हुआ और उन पांपरखण्डों से उसके देशको होमा ! १२ । गना इसके पीछे विधि के अनुसार उस भयानक यहके जारी होनेपर धृतराष्ट्रका देश नाशको प्राप्तहा। १३ । और राजाका वह राज्य पेसा अत्यन्त नाशमा जैसे कि फरसेसे कटा बडापन होता है वह सब देश सहा आपत्रि में फंसा नाशयुक्त होकर अचेत गपा ।१ । राजा वह राजा-अपने देशको इस प्रकार नाच युक्त देखकर महावु खी चित्त हुमा और वडी चिता से युक्त होकर ११म ने ब्राह्मणों समेत राज्य के भापत्तिमे वचनके अनेक उपायकिये परन्तु कन्याण of his cattle und in his rage offered the rışlı their ded b dies, good riabı was for some time lost in pieditation aud was disyarat-d at tho cruri lasuit of the king Then he thou,bt of ruining the kiogdowof Dhritrashtra. He ent olf the budies of those dead beasts and pour ed libations of them over fire to ruin tht cogaery He kept his fire burning at Arkia on the bank of the saraswati and fed it with the preces of flesh. At the commencement if that dreadful sucrifice, the pountry was destroyed like a forest cut down by an ace. The peope lost their coses at that great calamity The kng wasmach diatrended At the dovastation of ha country and wativni many plans to AYO 1 from ruin, but his attoupis all failed He inquired of tho learned TIe Malıut liuqtr - - (7104 विप्रास्तदा । यदा धापि न शनि राष्ट्र मोक्षायितुं नृपः ॥१मय माहित कास्तर पर अनजय । ततो व माचिनकाः प्राहुः पशुर्विप्रकृतस्वषा --१८. मासे ररिहातीनि तव राष्ट्र मुनिकः । तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यारय भयो महान ११ ॥ तस्तत्तपसा कर्म येन ते ह्यनयो महान् । भाकुंजे सरस्वत्या, मसादय पार्थिव ॥ २० ॥ सास्वती ततो गत्ता संराजा यकमनधीत् । मिपत्य शिरसा:भी माजलि भरतर्षभ । प्रसादये का भगवनपराध क्षमस्थ मे २१६ मम दीन लुग्धस्य मान बतचेतसः। त्वं गतिस्त्राव मे नाय: मसाईकर्तुमहति ॥ २२ ॥ तन्तथाविलातु शोकोपहनचेतसमष्ट्विा तस्य कृपाजलेर नाच यो प॥ २३ ॥ ऋषिः 'प्रसस्तस्याभूत सरगरत विहाय सः । मोक्षार्थ तस्य राष्ट्रस्य जहाप पुनर तिम् ॥ २३ ॥ मोक्षयिस्था ततो राष्ट्र प्रतिगृह्य पशून बहूम'। इटारमा नैपिारायं जगाम पनरेव च ॥२५॥ धृतराष्ट्रोऽपि धर्मामा मुस्थवता महामनाः । स्वमेव नगा राजा को नहीं पाया अर्थात् देशका नाशहोना वन्द नहींहमा ।१७। हे निष्पाप जनमेजय जर वर राना समेत सब ब्राह्मण दाबीहुये तर सबने प्रश्नोंके , बतानेवालों से पूसा उन लोगों ने कहा कि पशुभोंके विषय में तुमसे भनादर किया हुभा । १८। एक मुनि गौनों के मतों से तेरे देशको होमता उससे होमेहुये इम, तेरे देश को | बहानाश होरहा है । १९ । यह उसीके तपका बड़ा कर्म है जिससे कि तरावड़ा नाश है राजा सरस्वती के अलकुजमें उमको प्रसन्नारो २० भरतर्षभ इसके परि उस रामा ने सरस्वती को माकर हाथने इ शिर से पृथ्वीपर गिरकर उस कमीन से कहा है भगवन में भापको प्रसन्न करताई परे भपा को.क्षमा करो। २१ • मुझ दुःखी लोभी और प्रमाननासे निव॒दीकी तुम गतिरों तुम मेरे नायो मुझपर कपाकरने के योग्यहो । २२ । इस प्रकार विलाप करनेवाले शोकसे. निदि उस रानाको देखकर उमके दया उत्पन्न हुई और उस देशके नाश न होने के लिये फिर अग्नि आहुतिदी।२४।इसपोछ देशको निर्विघ्नकर व तसे पशुओं को लेकर प्रसनहोकर फिर नौमिपास्ययको गरें । २९ । मार घमारमा सावधान Dhan the cauad of that calamity and wag 'old tint the brahinan whom ho lindinsul od with regard tu botots, was fouling line with peces of dush tu ruin the cuntry. Tucking Wust.0: ulvised to ploure the nauan wou wis pu fui suing the sacrilico nt tu bilik ul the 8 urnxwazi. 20. Thu kung went there and ith jordul polas filling at tbo fostul the secotic naid, " I beau ch you, Bua,wad, pardon my lault conimit ked thrrughavarics and ignorance. Hars me cy on me, my lord. 22. Iha risku fot wrey ut tuo whidiox of the hills aod poured inoio filaliyans to uavu tos Cometry from ruin. Having wide the country tee froin all asluuty hawa gratificad with a prerent of many cuttia and returned to Nairush. 15. Glorious king Diritrashtra- boo - (7103) Gada Parv गदापर्व (७१०३), मनिटे महदिमत ॥२६॥ तत्रता महाराज यहम्पतिरदारपीः। ममुराणाममा पाय भवार व दिवीकताम् ॥ २७ ॥ मासरभिजुहारेटिमलीयन्त तना मुगः । देवते रपिसभामा जितकाशिमिरा ॥ २८॥ सत्राी विधियाप्राह्मणभ्यो महायशा । वाजिनः कुम्जराश्वत रांश्चाश्चतरी युनान ॥२०॥ रत्नानि च महाणि धनं घायल पुलाम । ययौ त महावाहुयात पृथिवीपते ॥ ३० ॥ यत्र यह ययातस्तु महाराज सरस्वती । सपिः पयव सुश्राव नाहुषस्य महात्मनः ॥ ३१ ॥ तत्रया पुरुषव्याघी पयातिः पृथिवीपतिः। आक्राम मुदितो में लोकाच पुष्कलान् ॥ ३९ ॥ पुनानन रावस्तु यपातेयंजत प्रभो। औरा परम रष्ट्वा मतिम्चारमानि शाश्वतीम् रोकामान् ब्राह्मणेभ्यो यान यान पो मनसेत ॥३३ योयत्र स्थित एवेर माइने पसंतरे । तस तस्य सरिच्ठा गृहसदिशयनादिकम् । परम भोजनम्वैध दान मानवि तथा ३४ ॥ते मागमाना रास्तु सम्पदासमन्ताम् । रामानं तुष्टुवुः रहे माइसी भी बड़े द्धिवाले रानाधृतर धने भी अपने नगरको प्राप्ताकपा २६ ॥ महारान उमी वायपर बड़े बुद्धिमान हस्पविजी ने अपरों के नाश और देवताओं की दिके निमित्त मनासे बजने वनकिया इसहेनुस असुरों के नाश और देवताभोंकी बदके निमित्त मामोसे यज्ञ हसनकिया इमहेतुपे अमुरीने विनाशको पाया और युद्ध में विजय से शोभायमान देवताओं के हाथ से राक्षस नाशको मामये । २८ । वड़े यशस्वी वलदेवजी वहाँभी ब्रह्मणों के अर्थ विधिपूर्वक घोड़े हाथी और खच्चरों से युक्रु रथ बहुमून्य रत्न और बहुतसे धनधान्यकोदेकर फिर महाबाह बलदेवजी गयाति तीर्थ को गये ।।। हे पृथ्वं नाय महाराज यहां नहुष के पुत्र महात्मा ययाति के पक्ष में सरसनी ने घृत दूधका पहाया। सब पृथवीका स्वामी पुरुषोत्तम ययाति वहां यनको परके प्रसन्नता मे उपर के उत्तमोकोकोगया भोर श्रेष्ठकोकों को पाया १३३ इसके अनन्नर महाप्रभु रात्रा पयाते के यज्ञकरतेहुगेरदी उदारता और सनातन मक्तिको विचमें धारण करके बामणोंको उन उन अभीष्ट वस्तुओं का दानकिया नो २ इछाके समान जैसी २ वस्तुको चाहता था। १३ । यझरचना में बुलाया हुमा जोरपुरुष यहां निवासीया पसर पुरुषको उस उत्तम नदीने ग्रहोसमेत उत्तम शयनों को दिया पदरम भोजन returned to his own country. At the same place, Prihaspati too, hd fed fire with fierb in crder to bring about the ruin of Asia and the adsancement of gods. Then tleo asurs were suned and alain by the victorious gads, Baldev gare beasts and jewels at this holy place and proceeded to tho holy pluce of Yayatı. 30 There Yayati the wa of Nshash liw at 1119 sacrifico poured butter zod mill in the Siras He ascended to heaven after performing that sacriice. layati garo dusiral oljects and wealth to the BrabWAIS whom he had yummoned to assist at his sacnfice and garo the people of tho lo. Mali, । [७९०५ Malabharat 7104) पीना ददश्वाशिष शुभाः ॥ ३५ ॥ तत्र देषाः सगन्धर्धाः प्राता परस्प समादा विस्मिता मानुषाश्वासन रष्ट्वा तो यन्त्रसम्प्रदम् ॥ ३६॥ ततोलकतुमहाधमकेतु महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः । पशिष्ठागबाई महाभीमवेगं घृतारमा जियतारमा समयाजगाम ॥ ३७॥ इति गदापद्धपर्वणि सारसतोपल्याने एकवतारिंशोध्यायः ।। 47 पूर्वक अनेक प्रकार के दानदि । २४ । राजाके उत्तमयानको स्वीकार करनेवाले उन प्रसन्न-बाह्मणोंने शुभ-आशीर्वादों को देकर राजाको प्रसन्न किया दावा गधयों समेत सब देवता यज्ञके सामानों से प्रसन्नहुये और सन मनुष्य पकी उस सामग्री आदिको देखकर आश्चर्यितहुपे । १६ । इसके पीछे कालवजापारी रहें धर्मध्वज महात्मा शुद्ध अन्तःकरण सदैन' बड़े दानी साहसी और धैर्षमान वनदेव नी बासठनो के उस भयानक वेगवाले तीर्थ को गये ३७ ॥ " . - Cality good loures an the báok of the Sarasvati' and fed them with Folicadias - The Brahmans blessed the king after receiving doiations, There gods and. gandharvas , worsr gratified : with, Hbations and the lookerson wore golazed at, the graped - preparations. Then Bilder virtuous, pareining, mypanimo“ of the palm, proceeded, to viejt 1.1 । १ . (11037 Gadaarv Parb sepas बनमेजय उवाच । वशिष्ठस्थापधारोसो भीमवेगः कथ नु सः । किम सरि ;ष्ठा तमूर्षि प्रत्याहयत् ॥ १॥ कयमस्यामवर कारण किचतत् प्रमोस पृटो महाप्राश न लिप्यामि फध्यति ॥ २ ॥ धेशम्पायन उवाच । विश्वामित्र अवसिष्ठस्य च भारत । भृश वैरमभूद्राज स्तपरसाकृत महत् ॥ ३॥ माघमो पे बशिष्ठस्य स्थाणुतीभवन्महान् । पूर्वत पार्वतस्त्वासीविश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ४ ॥ 4 स्थाणुमहाराज तप्तवान् सुमहत्तपः । पत्रास्य कर्म तमोर प्रवदन्ति मनीषिण ॥५॥ यष्ट्रघा भगवान् स्थाणु पूजयित्वा सरस्वतीय । स्थापयापास हत्ती पाणु तामिति प्रभो ॥ ६ ॥ तत्र तीर्थे मुराः स्कन्दमभ्यपिशनराधिए । सेनापरयेन महमा मुरारिधिमिव हणम ॥ ७॥ तस्मिन् सारस्वते तीयें विश्वामित्रा महामुमि । वशिष्ठ पानयामास तपसोग्रेण तब्उणु ॥८ ॥ विश्वामित्रषशिष्ठी तापहन्यहनि भारत । सो अध्याय ४२ ॥ जनमेजय बोले कि यह वशिष्ठजीका भाषाह नाम तीर्थ को भयानक बेंग वाला है वह कैरोहमा और उस उत्तम नदीने उसको कैसे बहाया। संकीराना कैसेहुई हे प्रभु उसका क्या हेतुई हे बडेज्ञानी पाप मुझसे वर्णन कीजिये में उसके पुमनेसे तृप्त नहीं होता हूं। २ । बैशम्पायन घोले हे भरतवंशी राजा जनमेनप वार्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र के तपकी ईपी से सम्पन्न होनेवाली बड़ी शत्रुता हुई। ३। शिवनी के वधि पर वशिष्ठजी का बड़ा आश्रम हुमा और पूर्वी पक्ष में बुद्धिमान विश्वामित्रका माधम हुमा । हे महाराज जापर शिानीने उप कपको तपाथा वहाही। ज्ञानीलोग इसके घोर कर्मको कहते हैं। ५ । हे मधु जपर प्रा शिवनीने या करके सरस्वतीका पूजन कर, स्थानाम से भासद जस बायको नियत किया। ६ । हे राजा देवताओंने जिस नीर्थपर भमरोंके मारने वाले खामिकार्तिकनी को देवताओं के सेनापति के अधिकारपर अभिोक- कराया 1। उस सारस्वततीर्थ में विश्वामित्र पहागाने ने उग्रनप के बारा वामेनी को CHAPIER XLII Janmejaya said, " How A prah of great relocity became the holy place, of Vasbishth? How did the river carry him! What was the cause of his enmityl Pray tell me all this, I am oot yet autisfied with hearingtta Vasbampayan said, " the enristy between Vashishth and Vishwamitra arose out of their envy of each other's ascitum. Vashishtba's hermitage was Sbuya's holy place, while that of Yahwa. AMERA was pn the eastern wing. The dreadful derd took place where 818 had performed asceticism 3. It was the place called sthant on grcount of the sacrifice of 8 11v and where the good lud made Kaca tik their leader Visbn Amitra buongbt bis tiralYashiobth there by Mohabharat (7108 तपकतो तापो चक्रतुस्ती तपोधनी ॥९॥ तत्राप्यधिसन्तप्तो विश्वामित्रो महामुनि। रपया तेजो पाशष्ठस्प'चिन्तामभिजगामह १०॥ तस्य अधिरिय वासीयर्मनिरमस्थ भारत 'सरस्वती पूर्ण मत्समीप तपोधनम् ॥ १५ । मानयिष्यति बगेम int जपशाम्परमात द्विजधैध धनियामि न सशप । १२ । एनिमिय भगवान विश्वामित्रो महामुनिः । सस्मार सरिता श्रेष्ठ क्रोधमाकलोचनः ॥ १३॥सायाal मुनिना तेन व्याकुलस्य जगाम । सोधेन महावीर्य महाकोपग्ध भाषिनी, १४॥ मत एन पेपमा विवी प्राम्जलितदा । उपनाये मुनिपर विश्वामित्र सास्ती ॥१५॥ हनधारा यथा नारी सामषद निता भक्षम वृहि कि करमानीति भोगाप मुनिसत्तम ॥ १६ ॥ तमुवाच मुनि मुद्धो पशिष्ठ शीघ्रमानय । या निम्मच सच्छू का व्यथिना नदी ।। १७॥ साञ्जलिन्तु तत कृत्वा पुण्डीकनिभेक्षणा। प्राकम्पत चलायमान किया । ८ । हे भरतपंशी उन तपोधन वसिष्टनी भीर विश्वामित्र जीने तपके कारण से उत्पन्न होनेवाली कठिन ईको प्रतिदिन किया।९। यहाँ भी अत्यन्त दुःखी महामुनि विश्वाभित्रने वशिष्ठनी के तेजको देखकर वढी चिन्ता को पाग । १० । ३. भरनबंशी तव सदैव धर्मपर चलनेवाळे उप्त विश्वामित्र की पह माताई कि यह सरस्वती शीघडी उस तपोधन । ११ । भौर नपकरनेवालों में श्रेष्ठ बलिष्ठनीको मेरे सम्मुग्व लावेगी यहां जप आगे तब उस आयेहुये उच्चम ग्राह्मण को निस्सन्देह मारूगा । १० । इस प्रकार उस महामुने कोष से रक्तनेत्र विशामित्र ने निश्चय करके नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती को स्मरण किया। उस अनिके धान करतेती उस प्रकाशमान सरस्वती ने बड़ी व्याकुलता को पापा और इमाबड़े पराक्रमा,विश्वामित्रको बड़ा क्रोधक जाना ।।१४। तब इसकेपीछे कम्गापमान रूपान्तर्मुख हाथजोड़कर सरस्वती इस मुनियों में श्रेष्ठ विश्वामित्रके सम्मुख खडी हुई । १५ 1 और और जैसे कि मृतक वारोंवाली स्त्री होती उसी प्रकार बह सरस्वतभी अस्पन्त दुःखीहुई और उस श्रेष्ठ मुनिसे बोली कि कहॉस्पा आता । १६ । तब क्रोधयुक्त मुनि उससे बोले कि मैं बसिष्टमी को मारूंगाइसमें means of the Strassati, for Violiwamitra / Was Buch caroworn on account of the envy which he felt on account of the greatness of Tashishth 10. Vishwamitra desired that Saraslyatı should brlog Vashishth and then he inteided to slay him. Thus with red oyes, Vishwamitra javoked Sarasvati. She was much distressed in her mind on account of Vishwamitra's anger. But she came before bim with joined hands 15 She cane to lsm like the widow of a warrior slain acd said, " What ie your wish?" The ens aged mun told her that he intended to slayi Vashisbth and that she should bring his At this she shook th fear like a creeper shaken by the wind, but the mum ordered her t; do live bidding without hesitation - Banana । So was 717 Gada Paly IELTS [७१०.) भश भीता वायुनेवाहता लता । १८ । तथा रूपान्तु तो इशा मुमिराह महामदीम भषिचा शिवमानयस्यान्तिकं मय । १९ सा रास्थ पमनापास्वा पाप मिकी तिम वशिष्ठस्थ ममाषच जानन्त्यप्रतिम मुवि । २. साभिगम्य धशिष्ठन्तमिम मिचोदयात् यदुका सरिता श्रष्टा विश्वामिण धीमता २१ । उभयाः शापयो। मातापमाना पुनः पुनः । चिन्तयित्वा महाशापमृपिवित्रासिता भाम् । १२ । कृशाम्च विवर्षाच हवा FिAIRrfualम । ज्याच गहन धारमा पशिष्ठ द्विपक्षावाः । २३ ॥ वशिष्ठ उपाच । पाह्यारमान सपिछेष्ट का शीघ्रगामिनी विश्वामित्रः शपो स्यामा पारध विचारणाम् । २४ । तस्य तवचनं श्रुत्वा कृपा नालस्य सा मस्ति । चिन्तयामास कौरव्या कृत्या सुस्त भवेत् ॥ २५ ॥ तस्या थिता समुपमा पशिष्ठो मय्यतीवहि। कृतवान् हि दया नित्यं तस्य कार्य हित माया॥५६॥ मय फले स्वके रामन् जप-तमृपिसक्षम जहधान कौशिक प्रेक्ष्य सरत्य तुम शीघ्र उनको लाओ यह वचन सुनकर वह नदी बड़ी पीड़ाम न हुइ ।१७१ वह कमललोचन अत्यन्त भयभीत हापजोड़कर ऐने कम्पानहुई जो बायु से साहित लता होती है । १६ । सब वह मुनि उस प्रकारके रूपपाली नदीमे बोले कि तुम विना विचार के वशिष्ठजी को मेरे पाग लाओ १२॥ या उनके पचनको सुनकर और पप करने की इच्छा जानकर पृथ्वीपर पसिष्टनी के अतुल प्रभार को जानतीहुई । १० । उस सरचीन वशिष्ठनो के पास जाार इनासको कर दिपा नदियों में मेष्ठ सरस्वती से बुद्धिमान विश्वामित्रन जा कहाधा ।। उसमे और वशिधनी श.पो भयभीत और वारम्बार कम्पायमान महाशाप को निमार कर अप से अत्यन्त भपभीनथी । २२ । हेराजा द्विपादोमश्रेष्ठ धर्मात्मा वशिष्ठभी उस दुवल विपरीत रूपांतर कि पिन्नासे युक्त सरस्वतीको देखकर यावचनबोले कि नदियों में श्रेष्ठ शीघगामिनी तू अपनी रक्षाकर और मुझको शीघ्रले चल नहीं तो विश्वामित्र तुझको शादेगा इसम तू विनार मतकर । २. हे कौरवतवतो उस नदीने इनकरुणाभ्यासी वसिजी के वचनों को नकर चिता करी कि कोनसी गति और उपाय से शुभकर्महोय । २५ । उमको यह पिता उत्पन्नाईकि पशिष्टमीने मुझपर मदेव दपाकगे है मुझको इनका हिताना योग है। २३ much afraid of Vashishti bertuse she knew, ma'ftantine* 30 Sha wont t'o huand told him all that she san irquirrel to do sha muoh afraid of the curhe of both the riskus. Sa iny i ers shaka with fear, Vashishth raid, "Thunuh of your own safety and take mº to Visbwalditra or he will curse yon At this she thought how to ncoomplteh tis deediin the best way. 25 She was all the whole tinaking of how to requite' Vabishtl's former kuudoces to l'er aba was afraid of Vishwamitra's aogor Then she broke the bank by Tet (१०८) Mahabhiarat (7108) भ्यचिन्तयत् । २७ । इदमन्तमित्येव ततः सा सरिताम्बरा । कुलापहारमकरोत् स्वे थेगेन मा सरिन् ॥ २८ ॥ तेन कूलापहारण मैत्रावणिरोह्यत । उह्यमानः स तुष्टाध रामा राजन् सरस्वतीम् ॥ २० ॥ पितामहस्य सरसः प्रवृत्तासि सरस्वती याद जगत् सर्व यवैपाम्मभिरुत्तमः ॥३०॥ त्वमेपाफाशुगा देवी मेयेपुत्सृजसे पयः । सर्वा मास्त्वमेवेति स्वस्तो घयमधीमहि ॥ ३१ ॥ पुष्टिद्युतिस्तथाकीर्ति सिद्धिबुद्धिमा तया. अमेव सर्वभूतेषु बससीह चतुर्विधा ।। ३२ ॥ एवं सरस्वती राजस्तूयमाना महर्षि धेगेनोबा ते पि विश्वामित्राश्रमं प्रति । न्यवेदयत चाभीक्ष्णं विश्वामित्राय तं मुतिम ।। ३३॥ तधानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः। कथाविषप्रहरणं बशिष्टान्तकर तदा ॥ ३४॥ तन्नु समभिप्रेक्ष्य ब्रह्मवध्याभवानदी। अपोबाह पशिएं तं प्राची विध मसान्त्रता। उभयोः कुर्धती वाक्यं पञ्चयित्वा तु गाषिजम् ॥३५॥ ततोऽपवाहित हटवा रामा तब सरस्वती ने अपने तटपर अपोमादिक करनेवाले ऋषियों में श्रेष्ठ विज्ञामित्र को देखकर चिन्ताकरी । २७ । कि यह समय है इसके पीछे उस नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती ने अपने बेगो किनारेको हटाया । २८ । वशिष्ठजी उसकिनारेके हटानेपे सवार किगये हेराना तरउस समपर सवार ऋपिने सरस्वतीकी प्रशंसाकरी ।२॥ कि हे सरस्वती तुम ब्रह्माजीकी नदी ते जारीहुईहो और यह सबसंसार तेरही उत्तम जलोंसे पास है । १० । हेदेवी माकाशमें वर्तमान होकर तुमहीं बादलों में अमृतको छोड़तीहो और सबजलभी तुम्हींहो हम तुमसे वेदोंकों पढ़ते हैं । ३१ । तुदी पुष्टि प्रतिकति सिद्धि वुद्धि उमा और वागी होकर तुम्ही स्वादाही याजगत् तुम्हारे भाधीन है तुम्ही इन चारों प्रकारके जीवोंमें वासकरतीहो । ३२ हे राजा इस प्रकार महर्षि से स्तुत्यमान सरस्वती ने उस ब्राह्मण को गसे विश्वामित्रके प्राश्रम में पहुंचाया और लेजाकर विश्वामित्रसे उनका आना बारम्बार वर्णन किया । ३३ । नव मरस्वती के लायेहुये उसऋपिको देखकर मेोधयुक्त विश्वामिन ने बशिष्टनी के नाश करनेवाले शस्त्रको चाहा । ३४ । सावधान नदीने उम्र क्रोध her velocity nud curried the piece of land along with Vasbryth, who much **818-il lier hill, saying "You are born of Be shman's river and all the worl: ortets in your watsra. You nectar into clou.ly from heaven and larn the Vedas You are Pushti, Dyuti, Kirti, Sidhi, Budhi, Uma, Vani and swahaand all the world depends upon you. You live in the mamoat of all creatures. “ l'hus praised by hựm, she took him to thş bermitago of Vish Haditra and informed lium of bis coming. Thon Ho wished for a we-pon to slay rim. Afraid of thio in of Brahmicide Savusti carrud him further erat aod thus daceived Vinhwamitra of his prey. 35.' Then Vishramitra in anger sard," Breaso you । - 30 we pour forth from you. -- (7109), Gada Parv गदापर्व (७१०१) वशिष्ठमृषिसत्तमन् । मनधारथ सफ़रो विश्वामित्रो समर्षण ॥३६॥ यमामा सरिच्छेष्ठ बनायस्था पुनर्गता शोणित वह कल्याणि रक्षोसामसु सम्मतम् ।। ३७ ।। सत. सरस्वती शप्ता विश्वामश्रेण धीमता । अवाछोणितरिमभ तोय सपन्सर तदा MIC अपर्षय वाम गन्धर्वाप्सरसस्तथा । सरस्वती तथा राष्ट्या भूभृगछु सिता. ॥ ३९ ॥ एवं पशिणापवाहो लोके स्यातो अनाधिप। भागउच्च पुनमार्ग स्वमेव सरिता बरा ४० इतिगदापुद्धपशि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने द्विचत्वारिंशोध्याय ४२।। युक विश्वामित्रको देखकर ब्रह्महत्या के भय से वशिजाको पूबर्दिश की और वहाया दोनोंके वचनको करनेवाली मरस्वतीने विश्वामित्र को पलकर ऐमा कम कर्म किया ३५॥ तवमत्यात अशान्तचिन क्रोधयुक्त विश्वामित्रवोले किहे उत्समनदी जैसे तुम मुझको छलकर चलीगई हो इस हेतुमे है , कल्यागिनि तम राक्षस गणों के स्वीकृत हाधिरको धारण । १७ । इसके पीछे बुद्धिमान विश्वामित्रसे शापित सरस्वती ने एक वर्षतक रुभिरयुक जलका वहाया । ३८ । इसके अनन्तर ऋषिदेवता अप्सरा और गन्धर्व उसमकारकी सरस्वतीको देवकर अत्यन्त दसी हुये। १९ । हे राजा इसमकार वसिष्ठनीका अपवाह लोकमें प्रसिद्ध इभा तब वह भेष्ठ नदी फिर अपने मार्गको आई ४० ॥ - have deceived Be, you will bave blood for your Water " Thur blood flowed in her bed for a year, to the great grief of Gandhai vas and aparas Thus the fly of Vislistha was known throughout the world and the noble river flowed in her course, 10. ३ । " 1 - ar" [११] Afalinbharat (7110) विशनायव उवाच । सा शप्ता तेन खन पिक्षामित्रेण धीमता स्मितीर्थयो शुझे शोणितं समुपाषात ॥ ॥ अथाजग्मुस्ततो राजमाक्षसास्त भारत त ते शोणितं सोपिषतः मुस्वलास ॥ २ ॥ तृप्ता सुभृशं ते मुखितो विगतज्वरः। नृत्यन्तंबासा या स्वगं जिनस्तथा ॥३॥ कस्य विश कालस्य अषया सुतपो धनाधिपात्रां समाजग्मुः सरस्पस्यो महीपते ॥४तेषु सर्वेषु तीयेषु साप्लुस्य मुनिपुंगवार प्रीति पराम्चामि तपो लुग्धा विशारदा प्रियहि ततो राबरयन तपितसम्बहम् । भागम्य मागास्ततीर्थ दारुणं तबा.६॥रप्ट्या तोयं सरस्वत्याः शोणितेन परिप्लुतम् । पीपमानञ्च रक्षामिभिनपसत्तम ॥ ७॥ तानाष्ट्या राक्षलानराजम्मुनयासंसिप्रता:पारमाणे सरस्यत्याः परयलं प्रपकिरे।८. ते तु स महाभागाः समागम्य महानता आहूय सरिता श्रेष्ठामिद पचममनुषन् कारण अधिकल्याणि किमर्थ ते इथे। वयम् । एवमाफूलदापाता भुषा पासा मरे अयम् ॥ १० ॥ ततः.सा.समाचार.यथावृत्तं प्रवेपती । दुःखितामथ तारया अध्याय,४३ ॥ पैशम्पापन बोले कि क्रोधयुक्त बुद्धिमान् विश्वामित्रसे, शापित सरस्वती उस उत्तम और उज्वल तधिपूर - रूपिरको बहाया ! १ ! हेभरतवंशी राजा जनमें गप इसकेपीछे वहां राक्षसआये और वह सब. रुधिरको : पान करते हुये. मुखपूर्वक रानेलमेः। .१ । उस रूधिरपान करनेसे वह राक्षस वर्ग के विजय करनेवाले पुरुषों के समान भत्पन्न दृप्त मुखी और मरों से रहित हर्षयुक्तहुये। ३ । इसके पीछे तपोधन मषि किसी समय सरस्वती के तीर्थपर हथियात्राको गये। वह तप के लोभी परित और अष्ठमुनि उनसबतीयोंमें स्नान कर श्रेष्ठ प्रीतिको प्राप्तकरके वहां चलेगये.मौर जिसमार्ग से रुधिरका- पहानेघाला. तीर्यथा उस भयानक तीर्थ पर भी वह महाभाग-सब ऋषि गये. पहा रुधिरसे युक्त, सरस्वती के जलको पात राक्षसों से पान कियाँहुआ देखकर और उन गक्षसोंको भी देखकर उन तेजातं मुनियों ने सरस्वतीकी रक्षा में बहुत पाय लिया । ८ । अर्थात् वह पष महाभाग बड़े बनवाले अपि नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती को बुलाकर पहे.परन गोले ।९।हे कल्याणिनि इस तेरे हृदने किसहेतुप्से इस महान्याकुलताको पाया है इसका सब वृत्तान्त वर्णनकरो हम मुनकर इसका निश्चय करेंगे । १० । इसके CHAPTER XLIII Vaishamrayan said, " Cursed by enraged Vishwamitrs, Saraswati flowed blood, in Ler' good and puro stream. Raksbases came and drank of the blood. • They were happy like those who hava conquored paradise and were full of jos.. After Bonetime rishis went to the book of the Surnsnatio The ascetic, desi ous of bathing came tbora and seeing the river full of blod and the rakslase, drinking at it, they made many plans to purge the river. 8. Thoy invoked Saras: 3 -- -- (7111; Gndarry Parb गदापन ऊपले वेतपोधना. ॥११॥ कारण भूत मस्मामि. शापशेष भुतोनध करिभ्यामो षय पान सर्व एव तपोवना ॥ १२॥ एवमुक्या सरिष्ठामचुस्तेय परारम : विमोच मामहेस शापाता सरस्वतीम् ॥ १३ ॥ ते स प्रामणा राजस्तपोभिनियमस्तथा। उपवासैम विविधैर्यमेकातस्तथा । १५॥ माराध्य पशुपार महादेव जाप तिम् । प्रमोक्षयन्त ता देवी सरिन् हां सरस्वतीम् ॥ १५ ॥ तेषान्तु सामान प्रक तिस्थ सरस्वती । प्रसासलिला जो ययापूर्व. तधेष हा विमुक्ता र सरिम्नेष्टा विद्यमी सा यथा पुरा । १६ ॥ रातोय सरसत्या मुनि मस्तैस्सथारुतम । तानेर धारण गम् गक्षसा झुधितास्तदा । १७ घाजील ततो राजप्राससा. क्षण्या दिता । ऊस्मान् वै मुनीन् सर्वान् रुपायुक्तान पुन पु.॥ १८॥ य हि भुषिता धर्माशीनाम शासनान । न च न कामकारो तयं पापकारिण ॥ १९ ॥ पीछे उम कम्पिन सरसती ने सब वृत्तान्त वर्णन किया वह, तपोपन ऋषि उस दुःखो को देखकर कानलगे । कि हे निष्पाप हमने हेतु और शाप दोनोंसुने हम सब तपोधन ऋषि इसके उपायका विचारकरेंगे । ११ । उस भेष्ठ नदीसे ऐमा कहकर फिर ऋषि परस्पर चले कि हम सब इस सरस्वती को निष्पाप करें।११ डेरामा तब उन सब बामणों ने तप नियम और नानाकठिन व्रत और मितन्द्रिय पने से। १। पशुमों के स्वामी जगत्पति महादेवजी को भारापनकरके इस नदियों में, श्रेष्ठ देवी सरस्वतीको पाप अंशसे मुक्तक्रिया १५ । वह सरस्वती उनों के प्रभावमे उसीमकारके मुख्यरूप भार स्वभाववाली हुई जैसी कि पूर्वमें थी शाप से मुक्त बह भेष्ठ नदी पूर्नकही समान शोभायमान हुई । १६ । उन मुनियों से | गुख की उम, सरस्वतीको देखकर तुधार्च राक्षम उनकी शरण में गोगो राजा वा धाते पड़न, रातस हाथ जोड़कर उन दयावान मुनियों से बारमार पद बबन बोले कि म तुघासे दुःखी होकर सनातन धर्म से राहत ने यह इरण -- । HA Hati and said, " Why are your water8 89 detty! pray tell us all about t" 10. Terried Saraswati told ther' all that had happened. To this the rishis replied, " We have heard ab uut the cursa and its cause and a lof us will try to remedy the evil Having said this to her they, consulted among themselves to purge Saraswals of bor sins. The grout ascetics prayed Jabader for thie purpose and got that best, of rivers pirged 15 The 8 traswati became as pure as she was be-/ fore aud. was quite rid of the effect of the cui ne. At this the hungry rakabasos sought the protection of the munia and with joined handa bard, to them again and again, “ Being, afficted with hunger, we can Qot perform our duties and we have no desire to commit bine. be freed from tho effects of our sink. The rear one why we are to Let us . (७११२). MInhabharat, in (7112) युमाकचाप्रमादेन दुष्कृतेन च कर्मा यत् पापं घचतस्माकं या स्मोप्राराक्षसाः ॥२॥ योषिताञ्चैव पाणेन यानिदीषनेन च । एतरह वैश्यशक्षामा उत्रियाणां तक पाये बागान प्रविन्ति ते भवन्ताह पक्षमा २१माचारपंजिव गुरव जन तथा प्राहिणो चायन्ते ते भवन्तीह राक्षसाः ॥ २२ ॥ तत कुलपमिक्षारमा तारण द्विजसत्तमाः । शका भवन्तः सोपा लोकानामपि नारणे ॥२३॥ तेषतु मुनक श्रुत्वा तुष्टुबुस्ता महानर्दम् । मोक्षाय रक्षसां तेषासूनुः प्रयतमानसाः ॥ २४ ॥ महं कीटावपन्नाव पच्चोख्यिान्वित भवेत् । सकेशमधून पितोपहतम्य पात्र सष्टमाणस्य भागोऽसौ रक्षलामिह २५॥ तस्माजनात्या संदा विधातारममाति पज्जयेत् । राक्षसानमसौ सुधरे. यो भुड़के मीरशम ॥२६॥ शौर्घायरया ततस्ती पषस्ते तपोधना. । मोक्षाय राक्षसांनाच नदी तो प्रत्योदय ॥ २७॥ मराणा के अनुसार ग्रंपत्ति नहीं है जो हम पापों को करते। आपकी कपासे पाप कम से छूटजाय वह हमारे पाप जिनसे कि.म ब्रह्मराक्षस है । और बढ़ते जाते हैं उन सब पापों को 'मुनो स्त्रिों के उम पापसे जोकि उत्पत्ति स्थान योनिदोषसे सम्बन्ध रखनेवाला है ।म ब्रह्मराक्षस होते हैं इस प्रकार वैश्य शूद्र और क्षत्रियों में से जो लोग ब्राह्मणों से शत्रुता रखते हैं वह इसलोक में, राक्षस होते हैं । २५ जो लोग गुरु ऋतिज आचार्य और उद्ध, मर्नुको समन सर जीवधारियों का अपमान करते हैं वा इसलोकमें राक्षस होते हैं। राजम बाहोणलोगो आप हमारी रक्षाकरो पाप सबलोकोंके भी तारनमें समर्थ हैं ।।। मुनियों ने उन्हों के वचनोंको सुनकर महानदी की 'स्कृतिकरी और बड़े सावधान उन मुनियोंने उन रामों की मोक्ष के निमित्त उससे कहा | Rत कीटयुक्त ममत केश रखनेवाला त्यागाभा नेत्रोंके भध्रुओं से युक्त जो अनहो इन कारणों से इसलोक त्यागकिया हुआ अमराक्षसों का भागहैं । १६ । इस रेनुसे बुद्धिमान मनुष्य अच्छेपकार जानकर सदैव ऐसे भओं को उपाय, पूर्णक त्यागकर जो ऐसभन्नको खाता है वह राक्षसों के प्रमको खाता है । २२। इसके पीछे उन तपोधन सपियों ने उस तथि को पवित्र, करको राक्षसों का मोसके लिये उस tand why we increase arei-- It is mostly due to the defects of child 'birth in women 'The enemies nf Brahmans are also turned into rak abadee-likewise those ipho insult their preceptors“ and olders. 23. Prot-et uá, Brahmină, you have por ir to purify all to warld. At this the magis bögged Mahanadi to become the means of their salvation From that time, impure fuod as well as its remains aro' sot’apart for táka hases.A wise mau, krowing this should always khun from such food: for he abo eats it éats tlie food of raksjakes. Then thods ascetica naudotha river pñre for the salvation of raksbaser. Knowingithe desite of the danis .
1118) , Gada PAAT गदापर्व [७२१३) महात्वा तत. सा सरिताम्बरा । अरुणामानयामास शंतनु पुरुषम २८॥ तस्या a manा स्नारा तनस्त्यक्त्या दिवं गताः । अरुणायां मागज ब्रह्मवपापहार ar ॥ २९॥ एतमर्थममित्राय देवराजः शतक्रतुः । तस्मितीवर स्मारवा विमुक्ता पामना किता।। ३० । जनमेजय उवाच । किमय भगवान् शको ब्रह्मवध्यामवाप्तवान अमेस्मिथ तीर्थे पे आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ॥ ३१ ॥ शम्पायन उवाच । प्रमुग्ध दुपारपान यथावृत्तं जनेश्वर । यथा विभेद समयं नमुचेर्वासवः पुरा ॥ ३२ ॥ नमु विसवादीत सूर्यरस्मि समाविशत् । तेनेन्द्रः सरथमकरोत् समय चेदमनवीत ५.३३॥ न बाण न शुष्केण न रात्री नापि बाहान बधियाम्यसुरभेष्ट ससे सत्येन ते शपे।। ३४ प स समयं कत्या हट्वा नीहारमीश्वर. पिछंदास्य शिरो राज अपां कोन घासः॥ ५। तच्छिरो नमुश्छिनं पृष्ठतः शकमम्वषाम । मो मित्रहार | नदीको पायमान किया । २० । हे पुरुषोत्तम फिर उसउत्तम नदीने महर्पियोंका विचार मानकर अपने अरुण नाम शीरको वहां वर्षमान किया । २८ राम उस अरुणामें स्नानकर अपने शरीरको छोड़कर स्वर्गको गये हे महा राम बहतीर्थ, वनात्याको दूर करनेवाला है । २९ । निश्चय सौपन्न करनेवाला' देव. सामोंका इन्द्र इस बातको जानकर उस उत्तम तार्य में स्नानकर पापों से निव १०. जनमेनयने कहा कि भगवान् इन्द्रने कैसे प्रमहत्याको पाया और कैसे इसनीमें स्नानकरके पापों से छूटा । ३१ । वैशम्पायन वोले हे रागा.इस चातको मनो यह वृतान्त जैसाहै भोर जिस प्रकार इन्द्रने पूर्वसमय में नमुचि की प्रतिज्ञाको भंगकिया । १२ । भाव इन्द्रसे भपनीत होकर नाच सूर्य की किरणोंमें प्रवेशकरगया इन्द्रने उससे मित्रताकरी और यह वचन पूर्वक प्रतिभाकरी अमरोंमें श्रेष्ठ में जल थल और रात्रि दिनमें भी तुडको कभी न मारूंगा मित्र..सत्यतासे तुझमे शपथ खाताई । ३४ हे रामा उम ईश्वर इन्द्रने वचन प्रतिज्ञा करके नीहारको देखकर जलके फेनसे उसके शिरको काटा । ३५ । tló rivor assumed a red colour and the ralsbases batbuug in the waters of Aruna went to paradise. That holy river, Oking, removes the sia of Brahmicide and Indra the perforiner of a hundred sacrifices, | knowing thrs fact, parified himalt by bathing there. " 30. Jinnejaya asid, " Ew was Indra guilty of slaying a Brahman and how was he purged from sur by thathing there !" Vaishanpayan said, " Hear this wcount as it leppened : 10 former daye Indus broke his promiso with Namuehi. Afraid of (odra, he entered the rays of the Sun at this Indra coatracted with bim . friendship and promiseu tbat, bo would got slag bim dur.ng day and otght oor on land or water. Bat ladra broke bio promise und eut aff Namuchi's heal by walcr fan ng (७१९४) Mahabhaatr (7114) पापेति मवाण राक्रमतिकात् ।। ३६ ॥एवं स शिरसा सेन बोधमान पु पुनः। पितामहाप सन्तप्त पतमर्थ न्यवेदयत् ।। ३०॥ तमम्रीडांकगुरुग्राणायां बधाविधि। गेपस्पृश देवेन्द्र तार्थे पापमयापहे ॥३८ । एरा पुपाजला शक कृता मुनिमिरेष सानिगूढमस्यागमनामिहासीत् पूर्वमेव तु ॥ ३९ ॥ सताभ्यस्यानां देवीं सावधामास पारिणा | सरस्वत्यारुणापाव पुण्योंय सहमो महान् ॥ ४०॥ व यज दोन दर दानापनेकशः । मप्राप्लुत्य मुघोरास्वं पातकादिरमोषसे ॥ ४ । इत्युस. समर स्वरमा कुब्जे जनमेजय । ब्रह्मणो पचनाच्छको, यजयहरनेकश.। ४२ मा दामाम्यनेकानि स्नारया तीर्थे शतकतु इष्ट्या पथापालमिदरुणायामुपास्पद ii) समुत पाप्मना तेन प्रयध्याकनेर । जगाम सहएमनालिदिप घिबरे Henशिरस्तस्वापि नमुचेस्तरेषाप्लुत्य मारतालीका कामवृषान मासमा बाबाजसत्तम ॥४४॥ वैशम्पायन उवाच । तत्राप्युपस्पृश्य पलो मारमा ANS दानानि पृथंगविधानि । अवार्य धर्म परायी जगाम सोमस्य महत सतीर्थम तब वह कटाहुआ नमुचिका शिर समीपमे यह वचन कहता हुमा के पीछे चला किरे मित्रके मारनेवाले पापी कहा जाता है इस प्रकार उस शिरसे बारम्बार कहेहुये महादुःखी इन्दने उस हत्चान्तको नमामीले निवेदन किया। सब लोक गुरू ब्रह्माजी ने उससे कहा कि देवेन्द्र तुम विधिपूर्वक पापों के अपके करनेराले अरुणा तीर्थपर पाकरके स्नानकरो। न मुनियोंसे रचाहुआ पवित्र जनवाला यह ताहे प्रथम भी इलोक्में उस तीर्थ यात्रा गुमहोती ! ३९ । इसके पीछे इन्द्र ने असमादेशके पास नाकर जलसे अपने पवित्राका सरस्वती और अरुणा देवीका यह बड़ा पवित्र संगम । ४० । देवन्द्र यहां तुम पारो और बहुत मकारके दानों दो तुम इस वर्ष में स्नान करके बटे घोर पापों से छूटोगे । ४१ हे मनमेनप ब्रह्माजी के इस सनकोएन कर इन्द्रने सरस्वती के कुनमें यह करके भरुणा स्नान किया।४२ ब्रमारपाके उस पापसे छुगाभा वह प्रसन्नचित्त इन्द स्वर्गको गपा। ४४ । हे रामामों में श्रेष्ठ भरतवंशी नमुचि के उस शिरने भी इसी तीर्थ में स्नानकरके अमीटोंके मामकरने पाले अविनाशी लोकी को पापा । ४५ ॥ वैशम्पायन बोले कि महात्मा और पो।। two of ovening. 35 The serired hend accused Indra.Lingu friend and the latter complained of it before Brahman whosdredbom w bathe in the druga in order to parify himself of thoun, That holy. placo was to malo by niunx Betors that time on the bolo place was secretly ruleslludra want tu Aruda and panfied dimso't attbe junction of the Saraivau and Ar401. 10. Indra forfurdod acrilico thene Al garo larga dranton to get nd of thvan. Healryal Orahma'a compini and bathed at the junction of the Baravanand rune, Pirzad of tha: r, lodra with pine wellbil.adiohin (7115), Gada Part गदापर्व [७११५) बापनमुमेन सोम साक्षात्पुरा विधिवम् पार्थिचन्द्रामविधीमान विप्रमोवश्व होवा परिन् ऋतुमुत्थे महात्मा ॥४७॥ यस्यान्तेभूत् सुमादान पाना नेतेयान राक्ष समास देव। पस्मिन युछ तारकास्य सुतानं यत्र स्कन्दतारक जघान ॥४८॥ समापत्य लग्धपान देखताना महासेनो पत्र दैत्यान्तकर्ता । साक्षाचापि बरसात कालिन सदा कुमारो यष म मराज ॥ ४९ ॥ इतिगदायुरपणि वलदेवतीर्थयात्रायां त्रिचतारिशध्याया४३॥ . 1 - " 3 or कर्म करनेपाले वलदेवजी उस तार्थ में भी स्नानकरके अनेक प्रकार के दोनों के देनेसे धर्मको प्राप्तका के चन्द्रमाके उस बड़े तार्थको गये। ४६ । हे महारान जहां पर साक्षात् चन्द्रमाने पूर्व समय में विधिपूर्वक राजसूययन कियाया उस उत्तमय में दिमान ब्राह्मणों में श्रेष्ठ महात्मा अविजी होताहुपे । ४७ । निसतीर्थ के पास दानदेय और राक्षमोंका महायुद्ध देवताओंके साथ हुआ था और जहां तारक नाम मीठन युद्धहुआ जिसमें स्वामिकार्निकनीने तारक असरको मारा ।।८। और,बापर महासेननाम दैत्यों के नाशकरनेवाले स्वामिकार्तिकजीने देवताओं की सेनापतीको पाया और साक्षात् कुमार कार्तिकेयजी स्थितहुये यहाँपर यह प्रक्षनाम राजतीर्थ था ४९॥ -- में -- muind Namuchi's held also bathed in that it eam and gained good regrons. 45 Taishampayan said " Having bathed at that boly place and gare dun aliung. Baldev proceeled to the holy place where Chandra bad performed Rajsu ya sacrifice which was presided by Atru The great war of the Daityas and gods, known as Taruk, took place is thero and Tarak was slain by Kartık the cominadder to chief of the army of goda That holy place was known As } lakbb ।
(७११६) Mahabharat (7116) अनमजार उवाच । सरस्वत्याः प्रभाषोयमुकस्त द्विजसत्तम। कुमारक्ष्याभिषकन्तु प्रशन पारातुमहसि। पस्मिन् काले व देशे च यथा च वदताम्बर । मामिषिको भगवान विधिना येन ध प्रभुः ॥ २ ॥ स्कन्दो यथा च दैत्यानामकरोत् कदनं महत तथा मे समाचश्व पर कौतूहलहि मे ॥ ३॥ वैशम्पायन उवाच । कुरुवंशस्य सः कौमूहसमिद तप । हर्षमुरणादयत्येष बचो मे जनमेजय ।। ४ ।। हन्त ते कर्यावयामि पातानस्य जनाधिप । मभिषेक कुमास्य प्रमावञ्च महात्मनः ॥ ५॥ तेनो मादेसर कममग्नी प्रपतितं पुरा। तत् सर्वमतो भगवानाशकदग्धुमक्षयम् ॥ । तेनादितिते बची दीप्तिमान हव्यवाहनः । न चैप धारयामास गर्भ तेजोमयं तदा ७ ॥ स गामभिखम्य नियोगाब्रह्मणः प्रमुः। गर्ममाहितधान् दिव्य भास्करोपमतेजसम्॥८४ अप गगाणिसं गर्भमसान्ती विधारणे। उससर्ज गिरी रम्ये हिमषस्यमयते अध्याय ४४॥ मनमेजय बोले बामणों में श्रेष्ठ तुमने यह सरस्ससी का प्रभाप का दिन पम्प कुमार के अभिषेक को भी माप कहने को योग्य हो। १ हे वदतार पा मभु भगवान् स्वामिकार्तिकजी जिसदेश में जिससमय जिसविधि से उत्पन्ना और जिन २ देवनाओंने इन कुमारनी को अभिषेक किया । २ । और उनाने जैसे दैत्योंके बड़े नाशको किया या सत्र वृत्तान्त मुझसे कहिये क्योंकि मुझको उस के सुनने की बड़ी उक्तष्ठा है। ३ । शम्पायन वोले हे जनमेजय का उत्साह कौरववंश के योग्य है यह वचन मेरी प्रसन्नता को उत्पन्न करणारे हे सना बहुत अच्छा मैं कुमारजी के अभिपक और प्रभाव को तुम से करता ह। ५ । पूर्वसमय में शिवजी का तेजरूप बीय माग्न में गिरा सब के मरम करनेवाले भगवान ओग्न उस अविनाशी के भस्म करनेको समर्थ नहीं ।। उस के कारण वह मकाशित ओग्न अत्यन्त तेजस्वी हुये परन्तु उस तेमाप गर्भ को धारण नही करसके । 01 उस प्रभु अग्निने ब्रह्माजीकी मात्रा से गंगामी में माकर उस मूर्य के समान मानसी दिन्प गर्भको नियतकिया तदनन्तर रस, CHAPTER ILIV Jandejasa taid," You baro informod du with the greatness of Saraswati, con tell mu of the installation of thu kiuper. Tell me beat of speakers, when and wheru Kartik was bora, who apointed bin and how ho destroyed tho Dait yar; for I no fury anxious to bear it. " Vaishampayan said. " Your digiro to Hear this acount u worthy of the fannly of tho Kaurasti, and it pleased tur. I al all tell you of tho installation and greatness of ths Kuinir, J. lho glorious nomen of Shiv dipad into tire, but the latter wannable to turan Agribe- Teame moregenous bet could not keep it with him. By Brahman, देरा सुनेने - 17117) Gada PHIV गदापर्व : [.५११५) ॥ ९ ॥ स तत्र वधे लोकानावृस्य ज्वलनात्मजः । दहशुलनाकार ते. गर्भमथ तिका शरस्तम्। महात्मानमनलात्मजमरिषरम।" ममायमिति तास पुत्रार्थियोभिचक्रमुः ।। ११ ॥ तासां विदित्वा भाव तं मातृणां भगवान् प्रभुः । प्रस्त साना पपडुभिर्वदनैरपिवचदा ॥ १२ ॥ तं प्रभाव समालक्ष्य वस्य बालस्प कृत्तिका पर विस्मयमापना देव्यो दिव्यवपुर्वराः ॥ १३॥ यत्तास्पः स भगवान गंगायां गिरि नवीन सशल काञ्चनः सर्वः संघमी कुरुनन्दन ॥ १४ ॥ धर्धता व गर्म पृथिवी तेन रनिता । प्रतक्ष सर्वे संवृत्तरियः काञ्चनाकरः॥ १५ ॥ कुमार सुमायावः कार्तिकेयं इति स्मृतः । गांगेयः पूर्वमभवन्महायोगवलयितः ।। शमेन तपसा चैव वायेण च समन्वितः। यवृधेऽतीय राजेन्द्र चन्द्रवत् प्रियदर्शनः १७॥ स तस्मिन् कांचने दिध्ये शरस्तम्वे श्रिा वृता स्तयमानः सदा से गन्धर्व मुनिभिस्तथा ॥ १८.५ तन मन्यनृत्यन्त देवकन्याः सहन्नदिव्यादिश्रनृत्या स्तुवावधादर्शनाः ॥ १९ । अन्वाते. व नदी. देवं गंगावे. सरितापरावधार गर्भधारण करनेको अक्षम श्रीगंगाजी नेभी देवताओंसे प्रजित मन्दर हिमालय पर्चत पर उसको शेड़ा 1.९ . बह निका पुत्र बहावर अपने तेज से लोकों को व्यास करके वहाहमा इस के पीउ कृत्तिकाओंने उस अग्निरूप गर्भको, देखाः। : ११:1 पुत्रकी अमिलापी,यह सब उस. अग्निके पुत्र महात्मा ईभर को, शरस्तम्बपर देख कर यह हमारा है ऐसा कहकर पुकारी । ११ । वर, भगवान- प्रभुने, उन दुग्धति कराने की उत्सक माताओं के उस:भावको, जानकर छः, मुखों से उन के द्धको पान किया । १२, दिव्य दुग्धधारी छचिकाओंने उस बालक के, अइल प्रभावको जानकर बड़ा आश्चर्यपाना १३. हे कौरव्प जहां कि उस.: पर्वत के मस्तक पर वह कुमार गंगाजी के साथसे छोड़ा गया था वह सब पर्वत सुवर्ण का होकर शोभायमान हुमा ! १४.। उस वदनेताले वालक से पृथीभी रंगोंसें, युक्त होगई इस हेतु से सब पर्वत उवर्ण की खानेहोगये १५-. । वहा पराक्रमी, कुमार कानि कैंय अर्थाद कृत्तिकामों का पुत्र कहा गया वह कुमार बड़े योगवलसे युक्त प्रथम गंगाजी के पुत्राये । १६ । हे राजेन्द्र अन्तःकरण से जितेन्द्रिय तप पराक्रमसमेत चन्द्रमा के.समान अर्पून दर्शनवाला वह कुमार बहुव बदाहुआ।' १७ । वह शोभा से युक्त गन्धर्ष और मुनियों से स्तुत्यमानहोकर उसदिव्य वर्णके शरस्तम्बपर सदैव शयन करताथा॥१.८ाउतीनकार दिव्याय ओनृत्योंकनाता प्रशंना करनेवाली मन्दिर order be put it in Gunga, who being goable to keop it loft it on the Himalayax* There' that child of agpi grew up,filling the world with his glory. The Kritikay saw the glorious child its. Fich.of them. cried out that the child vás héro." Finding thein desirous of feeding him on their milk, he arsulued a form with six facts and the Kritikas were amazed at his greatness and geru him. milk. 'The child. thum left big Gangs on the Himalayas made the incuntain golden. The [[७११.] Malıblarat (7118) पूपिकी चैन विभ्रती रुपमुत्तमम् ॥ २० ॥ जातकमादिका क्रियाश्च वृस्यति । बेदनशतुमूर्तिरुपतस्थे कृताञ्जलि ॥ २१ ॥ धनुर्वेदश्चतुष्पाद शभ्रमामा ससमह । सौन समुपातिष्ठत साक्षाद्वागी म केरला ॥ २२ ॥ स ददर्श महावीपों देवदेवमुग पतिम् । शैल सहासीन भूसघ सततम् ॥ २३ ॥ निकाया सघाना परमाबु तपर्शमा.विकता विकृताकारा विकृताभरणध्वजा. ॥ २४ ॥ व्याघ्रसिंहमवदना विडा लमकरानमा । अषदशमुखाधान्य गजाटवदनास्तथा उलूकवदना कचित् गूगी मायुदर्शनः ॥ २५ ।। क्रौञ्च पारावतनिर्वदनगड्डयेरपि । वापिच्छलकगोधानामजेड कमान्तया । सहशानि अध्याये यत्रतत्र व्यधारयम् ॥ २६ ॥ वलाम्पुरमा भकोचतगदायुधाः । केषिदञ्जनपुजाभा. केविच्छेताचलप्रभा । सप्त मातृगणांचष दर्शनवाली इमारों देवकन्या इसकेपाम अ'कर नृत्यकरनेलगी। १९ । नदियों में श्रेष्ठ श्रीगंगाजीउसके पास नियतदुई और उत्तमरूप को धारण करके पृथ्वीन उसको. धारणका ।२०। यहां हस्पतिजीने उसकेमातम मार्दिक क्रियाओं को कियापौर पारमूति कारण करनेवाला वेदभी हायजोडकर इसकेसम्मुग्व वर्तमानामा।रराचार मरण रखनेवाला धद और सग्रहों समेत अस्त्रों के समूह भी इसकेपास भाकर वर्गमानहुये और वा साक्षात् केरल वाणी भी उसकेपास वर्तमानहुई ।२२। उसने पार्वतानी समेत पुत्र और जीवधारियों के अनेक समूहों सहित वडे पराक्रमीदेवतामों के भी देवता शिवजी महाराजको देखा । २३ । अत्यन सुन्दर और.अपूर्व दर्शनरूप और भूषण रखनेवाले २४। व्याघ,सिंह,रीछ पिडाल,मकर विलावदायी और ऊटके समान मुखरखनेवाले ।२५। कोई उलूक,गिद, भृगाल, क्रौंच कपोत और संकनाम मूगों के समान मुख रखनेवाले सावित, शल्लक, गोपा, बकरी, | भेद और लोंके समान शरीरों को दूसरे पार्षदोंने जहां तहां धारण किया ।२६। किसी पर्वत और बादलके रूप चक्र गदाधारी फितनेही कमळ समूह के earth was covered with colours and the mountains bad mlaes if gold witbit them The child glurious 1 ke the moon soon grow up and lived on the golden ruount un praised by gandburvas and wome Thousands of divine girla düzced and sanbeforo bim, Ganga tho boat of rivers stood before him and the earth bore him in a beautiful form. 20. Vrihar path performed his birth and other ceremontes. The quadruple Vedas tuo, etuud before him with joined bande, Dhanurved, with four feet, Sangrahas and weapons stood Acar as -well as langungo He sa Parsatı with son and valiant Shy tho god of gold with bia multit odos, wiin bure the likeno ss of tigers 1100s, beers, cabe, crocxliles, elephants, chipels, 25, onlı, vulturta | Jackalr, Kraunchte, dear, purcupines, goats, sheep and kine. 26. Some - । Tho । . (709) Guda Parv गदापर्व (७९५९) समाजामूपिशाम्पते २७. साध्या विश्वेष मरुने यसक वितरस्त रा रुद्रादित्यालथा सियाभुजगा दानवा खा २८॥ब्रह्मा स्वयम्भभगवान सपुत्र मा विष्णुना । शकस्त पायदष्ट्रकुमारवरमध्युतम् । २० । नागदप्रमुखाश्चापि दबान्धर्वसत्तमा देव शसिवास वृतिपुरोगमा ॥ ३० ॥ पितरो जगत श्रष्ठा देवानामपि देवता । तेपि तत्र समाजग्मुर्यामा घामाच बर्षश ॥ ३१ ॥ स तु बालापिपलधान महायोग लान्वित । अयाजगाम दवेशशलास्त पिनाकिनम ॥३२ । तमारजन्तमालक्ष्य शिष वस्थासीन्मनोगतम् । युगपच्चैलपुड्याश्च गगाया पायकस्य च ॥ ३३ ॥ कनु पूर्व भय वालो गौरवादभ्युपश्यति । अपि मामिति सर्बशापामासीन्मनोगतम् ॥ ३४ ॥ तेगमेतदभिप्राय वतुर्णामुपलक्ष्यसे । युगपद्योगमास्थाय ससर्ज विविधास्तनु ३५॥ ततोऽभरुन्तुति क्षणेन भगवान प्रभू । तस्य शाखो विशाम्यश्च नैगमेपश्च पृथन: समान और कोई श्वेत पर्वताकारथे। राजा सप्तमाताओं समेत साध्य विश्थे देवा, T, मरुद्रण, अष्टरम, सब पितर एकादशरुद्र, द्वादशसूर्य, सिद्ध, सर्प दानव, गरुडादिकपक्षी । २८ । और विष्णुमी समेत अपने पाप प्रकट होनेवाले भगवान ब्रह्माजी इमीप्रकार इन्द्रभी उस अजेग उत्तम कुमारके देखने को पाठ भाये । २९ । नारदादिक ऋषि, देवता, गर्व देवश्राप सिद्ध जिनके अप्रवी वृहस्पतिजी थे और देवताओं के भी देवता जगत में भेष्ठ पितृगण सब याम और धाम यह सभी आये।।। फिर वडे योगवतसे युक्त वह वालक भी शूल और पिनाक धनुषहाथ रखनेवाले देनतामों के ईश्वर शिव के पास गया।१२। उस भावेहुये कुमारको देखकर शिवजीके चित्तमें यह विचार हुमा कि यह पालक एकवारही पार्वती गगा और अग्नि इन तीनों में से किस के महत्व और गौरव से प्रथम किस के पास जायगा और मेरे पास भी आवेगा या नहीं ।।४. उन शिवजी के पित्तमें यह ध्यानहुमा उस कुमार ने उन सबके इस अभिमायको बानकर एक साथही योग नियत होकर नानाप्रकार के शरीरों को उत्पन्न किया । १५ । इसके पीछे वह भगवान प्रभु सण परमही चारमुर्तिवाला हुआ wore of tho shape of clouds, with docues and maces, others liko A WASH of soot or white bill, The Sadhyay, with the seven mothora, Visbwe dovas, Marutas, Vasun, Pitars, Rudras, Suryse, serpents, Danaras garurs, Bnrabma tho se'f create, witb Vibou, Indra and others osmo to see the prince Narad and other riahir, gods, sandharvas, divine risbis, sidhas led by I rihaspati the god of gods, tho p tru, Yam and Dham came thore 30 The child lben came to Shiv tle bearer of Punak, When he was thus comi: 8, Shiy thought within himself whether the child would go to Ganga, Agar or himself.30 Soon - thua tbought occured in Shiva's mnd, the Kumar Laow it and with the power of yog assamed different shaper, Ho split (७१२०॥ Mahabharat (7120) ॥३६ ! एव स कृत्वा यात्म्धन चतुर्घाभगवान् प्रभु । यतो रुद्रस्तत, स्कन्दो जगामा द्भुतदर्शन ।। ३७ ॥ विशाखस्तु ययौ येन दृषी गिरिपपरमजा । शाखा, ययौवभा बाद वायुमूत्तिर्विमावसम । नेगमयाऽगमनका युमारः पाव कप ॥४०॥ स भारत देहास्त. चवार समरूपिण । सान समभ्ययुरव्यग्रास्तदनुतमिधामवतु ॥४१॥हा॥ कारा महानासीद्देवदानवपक्षसाम् । तद्हरवा मददाश्चर्यमदमुत लोमहर्षणम् ॥ ४२॥ ततो सदश्च देवी च पायक श्च पितामहम् । गड्या सहिता सर्वे प्रणिपेतुगपतिम ifranमाणपत्य ततस्ते तु विधिवदाजपुंगघ । इदमचर्यचो राजनू कार्तिकेयप्रिय प्सया ॥४४॥ अस्य बालस्य भगवनाधिपत्य पथेप्सितम् । अस्मत पियार्थ देवेश सरश दातु हिसि ॥ ४॥ तत स भगवान धीमान् सर्वलोकपितामहा। ममता पित यामास किमय लभतामिति ॥ ४६ ॥ पैश्वर्याणि हि सर्वाणि देवगन्धरससामा भूत यषिगाना पनगानाञ्च सर्यश ॥ ४७ । पूर्वमेवादिदेशासी निकायेषु महात्मनाम् । समपंच तमेश्वर महामतिरमन्यत । ४८ ॥ ततो मुहूर्त स ध्यात्वा देवामा भेयास स्ति । सैनापत्यं ददौ तस्मै सर्वभूतेषु भारत ॥ ४ ॥ सर्वदेषनिकापाना ये राजान ३७ शाष विशाख और नगग नाम मूर्तियां उसके पृष्ठभाग से प्रकटदुई इस प्रकार उस भगवान मभुने अपने को चार रूपयाला करके । ३८ जिधर रुद्रजी उधाही का भपूर्गदर्शन वामिकार्तिकली गये और जिधर देवी पार्वती थी पर विशाखगया और वायुरूप भगवान शाख अग्निके पासगया और अग्नि के.समान प्रकाशित कुमार नेगमेप गगाजी के पासगये । ४० । वाचारों सूर्य के समान शरीर रखनेवाले सत्र एकरूप सावधान उनके पासगये यह भाश्चर्यसा हुआ। ४ । पूर्व और शरीरके रोमार खड़े करनेवाले उस बड़े प्राश्चर्यको देखकर देव दानव और राक्षसोंका बड़ा हाहाकारहमा ४२ उसकेपी र देवी मग्नि मोर गगामी हुन सुदने जगत्पति बनानी को दण्डवत करी । ४३ । और विधिपूर्वक दण्डवत् करके स्वामिजाकिजी को प्रसन्नता के अर्थ या वचन का।।1कि हे देवताओं के ईश्वर भगवान हतारे हित के लिये, इस बालकको इसके योग्य अधिकार देनको , योग्यहा । ४५ । इसके पीछे लोकों के पितामह बुद्धिमान ब्रह्माजी ने चिध में विचार किया कि इसको कौनसा अधिकार दिया। intrbself into four bodies, the three foruis hbowa us Shakh, V18bakh ant Nagameya coming out of his lack Hoving dono thun, ho pron cpoard towards 8biv Shakb wont towarde Agos, Vulaku towards Parwat and glorious Yasgumesa lowards Ganga 40. Tho four bed os glonour like the sun weut in four direct oas to the amrsmont of all, who cried in wonder. Thon Rudra, Varsati, Agni and Ganga bored down to Brahase and said for the good of Kartık," For our arke, grotun child a good post. ' As thus Brabma thought labout the matto, fur thio yli TIOJA OBG pas already a preceptor of all - 7191" Gada PaIT गदापर्व [७१२) परिgar Jarन सर्मान व्यादिदेशास्म सर्पभूतपितामहः । ५. । तर कुमारमा दाप देवा श्रमपुरोगमा । अभिषेकार्थमाजग्मु शैलेन्द्र सहितास्तत ॥ ५५ ॥ पुण्या हिमवती देवी सरिस्ठा समस्वतीम् । समतपश्वकै या वै शिषु लोकपुर विश्रुता ॥ १२॥ तत्र तीरे सरस्वत्याः पुण्ये सर्वगुणान्विते । निषेदुद्देवगन्धी सबै सम्पूर्ण । भामा ५ इलिंगदायुद्धपणियोपविखुर्योधनसंवादे चचत्वाशिध्यायः ४४।। हाय । १६ । प्रथमही इस तेजस्तीने देवता गन्धर्व राक्षस भूत यक्ष पक्ष और सर्प इन सबके ऐसयाको । १७ । महात्माओं के समूहों में उपदेश कियदि इसीसे नरे इद्धिमानों ने उसको सब ऐश्पयों में समर्थ मानाहै (४८। इसके पी देवताओंकी वृद्धि में नियत देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मानीने एक मुहूर्त ध्यानकरके उस पारको सब जीवधारियों का सेनापति किया । ४९ । और उन सब नींवोंको उनके प्राज्ञा कारी होनेकी आझादी जो कि सब देवसमूहों के राजा प्रसिद्धये। ५० । इसकेपीछे प्रमादिक सब देवता मिलकर कुपाको लेकर अभिषेक के लिये गिरिरानके समीप 1 ५.५ धकी द्धिक हेतु नार्दयों में श्रेष्ठ उस हिमाचलको पुत्री देवीसर इदती के पास गये जो कि तीनों लोकों में प्रसिद्ध समन्तपंचक देश में है । ५२ ॥ समावित सब देवता गन्धर्वस सरस्वती के पवित्र पुण्यकारी किनारेपर नाकर वैगये ५३ ॥ T baag, and could do all. For the good of goda, Brauma thought Car A-whils and appointed him commander of all and ordered them to oboy bice. Then all the gods coming together took him to the prince of mountaion to instal bin as commander. They went t goddess Saras wati lia the famous country of Sumant panehak and sat on its bants 53.
-- (७१२२) Mahabharat (7123) वैशम्पायन उवाच । ततोऽभिषेकसम्मारान सर्वान् समृत्य शालता वृहस्पतिः समिनो जुहापानि यथाविधि ॥ ततो हिमवता दते मणिपरशोभिते । विम्य रत्नाचिते पुण्य निषण परमासने ॥ २॥ सर्वमगलसम्भारविधिमन्त्रपुरस्कृतम् । मामि पेचनिक द्रव्यं गृहीत्वा देवता गणा ॥ ३॥ इन्द्रषिष्ण महावीच्या सूर्याचन्द्रमसो तथा धाता चैध विधाता च तथा देवानिलानिलो ॥ ४ ॥ पूष्णा भगेनाय॑म्ना अंशेन च विवस्वता । रुद्रश्च सहितो धीमान् मित्रेण घरुणेन च ॥ ५॥ रुदैर्वसुभिरा वित्यैरस्मिभ्याञ्च कृत प्रभुः । विश्वैर्देवैमरुद्भिश साध्येच पिताभ सरगम्ध घरांसमिश्च यक्षराक्षसपभग. । देवर्षिभिरसस्पेय तथा प्राििमरै ॥ ७॥ खान से लिखिल्याचाहारमधपे. । भृगुभिश्चागिरोभिश्च यतिभिश्च महामभिः ॥ सर्विघाघरै. पुपौयोगसिद्धस्तथा.वृत । पितामहः पुलस्त्यश्च पुलाश्च महातपा, ९॥ भीगय. कस्यपोत्रिश्च मीधि गरेष ध । ऋतुहर प्रचेताश्च मनुईक्षस अध्याय ४५॥ वैशम्पायन बोल इसकेपोछे वास्पतिनीने शास्त्रोक्तरी तिसे अभिपेककी सर सामग्रियों को इकट्ठा करके वृदियुक्त अग्नि में विधिपूर्वक भग्नि देवताकी आहुतिदी। इसके पीछे देवगों ने हिमाचल के दिये हुये अत्यन्त उत्तम मणियों से शोभित दिव्य रत्नों से जटित धर्मकी वृद्धि के हेतुरूप उत्तम आसनपर विराजमान को । २ । सव मगलरूप सामग्रियों समेत विधिपूर्वक मत्रों के द्वारा अभिषेककी वस्तुओं में अभिषेक कराया । 11 बड़े पराक्रमी विष्णुजी इन्द्र, मूर्ष, चन्द्रमा, धाता, विधाता, भाग्नि, वायु । ४ । पूषा, भग, अर्यमा, अश, विवस्वत और मित्र, वरुण समेत रुद्र । ५ । अष्टवक्ष मूर्य, दोनों प्रावनी कुमार विष देवा, मरुद्गण, पितृ, साध्यगण । ६ । गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, सर्प असंख्य ब्रह्ममृपि, देवऋषि, ७ वायुभक्षी, सूर्याशुको पान करनेवाले वैखानस वालखिल्य भूपिभृगुवंशी अगिरावशी महात्मा यती । ८ । सब विद्याधर औरपवित्र योगवाले सिद्ध पुरुषों समेत ब्रह्मानी पुलस्त्य पुलह बड़ेतपस्वी अगिरा।९। CHAPTER XLV Varshampay an said, " Vrihaspati collected all the materials for Installation and poured libations on fire. He as seated OL & Beat studded with jewels and was ap iaklel over with auspitour things and hymns, Prahnu, Indra, Surya, Chandrs, Dhata, Vidhatas Agar, Vayu, Pootha, Bhag, Aryarma, Ansh, Vivaswath, Mantra,Varun) Rudra 5 Vash, Surya, Ashwinikumars Vishwedevar, Maruttas, Pitrts, ardhdne, Gandharvus, aparam, yakshes, rakshasss, Forpsats, numoroue B ahmrishıs, god rist 13, Vaikhana: and Valkbilya risha living on air ag l the rays of the sun, of the families of Bhriga and Augira, Vidyadharas sidha", Brahmar, Pulastya, Pulah, Aagira, - ।
- (7123, Gadaarr Patb गदापर्द ...१० ॥ अतषश्व प्रसव ज्योतिषि व विशाम्पते । सचिमस्थ सरितो बेदाश्चय समासमा ॥११ । समुद्राक्ष शारदेव तायोपि विविधानि च । पित्री चौशिव पादपास अनाधिर १मदितिदेवमाता व हो श्रो. स्वाहा लास्वती। उमा शची सिनीवाली तथा चानुमति कुछ ॥ १३ ॥ राका व भूपणा वैघ परन्पश्चान्या दिवाक साम् । हिमामं विध्यध मेरुवानभूगवान् ॥ १४ ॥ ऐरावत साधुपर फला माहातवर मासार्थमाया ऋतवस्तया राज्यांनी नृप ॥ १५ ॥ उच्च धषा पश्रेष्ठो नागराजय वासकि । मरुतो गाडश्चैव वृक्षायोपधिभिः सा ॥ १६ ॥ धर्मम भगवान देव समाजमुई सगता । कालोयमध मृत्युध यमस्थानुवराव ये ।। १७॥ बहुलवान नाका ये विविधा देवतागण । ते कुमारामिषकार्य समाजग्मु स्ततस्तत. १८॥ जगहस्ते तया राजन सर्व एप विधाकस ािभिषेतिक भाण्ड मारलानि च सर्वश । १९ । दिव्यसम्मारसयुक्त कलस काश्चनैर्नृप । सरस्वतीभि पुष्यमिईयत्तोयामिरेवर ॥ २० ॥ अध्यषिश्चन कुमार सप्रया दिशेकस । कल्यप अनि, मरीचि, भूग, ऋतुहर, मचेता, मनुदक्ष । १० । सब ऋतु, उत्तमग्रह नक्षत्रादिक प्रकाशित शरीरवाली मूर्तिमान नदियां, सनातन वेद इद, नानामकार के वधि, पृथ्वी, स्वर्ग दिशा, वृक्ष देवताओंकीमाता, अदिति, ही, श्री, साहा सरस्ववी, उमा. शची, शिनीवाली, मनुमति, कुहू । १५ । राका, धिपणा और देवतामोंकी अन्य अन्य स्त्रिया हिमाचल विध्यान और भनेक शिखरधारी मेरुपर्वत । १५ । साथियों समेत ऐरावतहाथी, कलाका, मास, पक्ष, ऋतु, दिन रात । १५ । घोड़ों में श्रेष्ठ उच्चैःश्रवा सकाराजा वामकी अरुण गाड बोपायों समेत वृक्ष । १६ । भावान् धर्म देवता, काल, मय, मृत्यु और नोरयम राज के आंग पीछे चलनेवाले हैं वह सब मिले हुये वहआये। १७। और नोनाना प्रकारके देवगण द्धिता से नहीं कडेगये वह कुमारके अभिषेक के लिये जा वहां से आये । १८ हेराना इसकेपीछे उन सब देवताओंने अभिपेकपान और सब माङ्गलिकवस्तुमों को लिया । ११ । हेरामा अत्पन्त प्रसन्नचित्त देवतामोंने दिव्य Kashyny, Atr, Marichi, Bhrigu, hritubar, Pracheta, Manu, Daksh Beasons, constellations, stars, rivers, eterral Vedas, lakes, tirthas Earth, honver, direotrws, th DOI, Adita the mother of gods, Hri, Bhri, Braba, Saraswati, Uma, Sbachu Sainiwali, Apurbati, Kubu, Raka Dbisbaba, and other goddesses, Himachal, Vindhya and other moun taias, Arayat ant bia comcanions divinods of time, month, fortught. reason, day and mght, 15, Uchaushrara the best of horses ; Vasuki, the prince of snakes, garur, trees with medicinal hørbs, Dharm Kal, Yac, Drityu and kis companions and other gods cada at iboipaallation of the Kumar, They took regsels and other auspicous articles asid with gold ressels and holy watera spriakled tho kuwar who is the terror 10 (७९२४), Mahabhaatr. (71240 सेनापति महात्मानमभुगपो भयङ्करम् ॥ २॥ पुरा गया महाराज जरुण जलेशाम तथापिच जगवान नझा बोकपितामहः ।।.२२. ।। कश्यपश्च महातेमापासे नानुकीर्तिताः । तस्मेब्रह्मा ददोमातो पलिनो,यातरइस कामवार्यधरान सिमाना परिषदान प्रभुः।।.२३ ॥ नन्दिसेन लोहितादं घण्टाकर्णश्च सम्मतम् । पपमस्या परं पातं कुमुदमालिनम् ॥ २४ ॥ ततः स्थाणुर्भदायी महापारिषदं प्रभु माया पावर काम कामपाधलान्वितम् । वी. स्कन्दाय राजेन्द्र संगरिविम ५९५ ॥ मदिवेघा युद्ध दैत्यानां भीमकर्मणाम् ! जघान दोयो, सकुदः प्रयुतानि च सामग्रियों से युक्त और सरस्वती के पवित्ररूप दिव्यजलों से पूर्ण सुवर्णके उसकी से उस कुमारको अभिषेक कराया जोकि अमरोंके भयका उत्पन्न करनेवाला महात्मा सेनापत्तिथा । २१ । हे महाराज पूर्वसमय में जैसे कि जलले स्वामी वरण को अभिषेक कराया था उसीप्रकार सब लोकके पितामह भावान माजी १२ और बड़े तेजस्वी कश्यपादिक ऋपि जो लोकमें विख्यात हैं. उन सबने मिलकर अभिषेक कराया मसन्न प्रभु ब्रह्माजी ने इस कुगारके निमित्त बलबान और बार के समान शीघ्रगामी इच्छानुसार पराक्रमी सिद्ध महापार्षदोंको दिपा । २३ । उन के नाम नन्दिसेन, लोहिताक्ष, घमंकण इसका चौथा भनुचर कुमुदमामी नाम से प्रसिद्ध ।। हे राजेन्द्र उसकेपीछे बड़तेजस्वी मभु शिवभीने सेबों मापापारी इच्छानुसार बल पराक्रमी. अमरों के नाश , करनेवाले. महापार्षद काबनाम को स्वामिकार्तिक को दिया । २६ । उस क्रोधयुक्तने देवासर नामयुदमें दोनों से भाकारी कर्म करनेवाले चौदह प्रयुत, दैत्योंको मारा । २६ । सीमकार देशमा ओने असुरोंकी करनेवाली अजेय मोर नैऋत असुरोसे युक्त विष्णए सेना को उसके निमित्त दिमा । २५ । तब इन्द्र समेत सब देवता, गन्धर्व, पक्ष, रातमा माम और पितरों ने विजय का शब्द किया । २८ । उनके पीछे अमरामने दो अनुचर दिये वह दोनों कालरूप बड़े पराकमी और तेजस्वी उन्माय और माय of asure. He was anointed like Varun the lord of waters by Prabme the grandmother of all and glorious riehis like Kabsap and others Brahma gave him powerful .companions, named Nandisen,x yohitakat 'Ghanta Karan and Kumud malilord shix gam.him. hunderdnot Porortal, asur-destorying attendants with Kam at their. hend. 45. That dreadful ope had slain fourteen poworful rakshases, known Prayats in the war of gods and dahavas. ' Similarly the goda gare 'him Taishnari army capable of destroying asure. Then the gods, with Indra; ghandharyae, yakshey, rakshases, munis and pitare cried out * Victory: "Then Yan presented iim two, attendants ofgreat powers Hama Unmath' and 'Pramath::- Surya gaye | him subhrijand र .
-- 71253 Gada Parb गदापर्व (७१२५) ॥३६॥ तथा देषां व दुसरी सेना तसंकुलाम । दशवक्षयरीमयां विष्णु अपिणीम ॥ २५ ॥ जयशब्द तथा चकुवाः सर्व सघासपा गन्धर्वयशरक्षासि मुनयः पितरस्तयां ॥ ३८ ॥ ततः प्रादाद चरी यमः कालो मावुनी। उन्माथचं प्रमा मच महावीच्या महायुती ॥३९ । मुंभ्राजा स्वाश्चैव यो तो मर्यानुयायिनी । तो सूर्यः कार्तिकेयाय ददौ प्रीतः प्रतापवान ।। ३२ ॥ फैलासश्रङ्गसङ्काशी श्वेतमाल्या नुलेपनी। सोमोप्यनुचरो प्रादान्माणस्वमणिमवच॥३॥कालाजिा तथा ज्योतिरात्म जाय हुताशनः । ददापनुचरो पूरी, परंसैन्यप्रमायिनी : ३२॥ परिघञ्च घट चव भीमं च ममहापलम् । दहति दहनश्चय प्रचण्ड पार्यसम्तो । अंशोऽप्यनुचरान पाच ददी स्कादाय धीमते ॥ ३३ ॥ उत्क्रोश पञ्चक व वनदण्डभी ददाय मलपुत्राय बांसवः वरवरहा। तो हि. राधमहेन्द्रस्य जनतुः समरे बहन ॥ ३४ ॥ 'चा विक्रमचय समञ्च महायलंम् । स्कन्दाप श्रीननुवरान् ददी विष्णुर्भमा यशा ॥ ३५. ॥ बर्द्धन नन्दन चैव सर्वविद्याविशारदौ । स्कन्दायाददतुः प्रीतादिननी, नाम थे । २९ । प्रसन्नपिच मंतापवान सूर्यने सुभ्रान और भास्करनाम उन,दोनों अनुचरों को सामिकार्तिक के निमित्त दिया जोकि दोनों सूर्य के पीछे चल नेवाले थे । ३० । चन्द्रमाने भी मणि और समणिनाम उन दो अनुचरोंको दिया जोकि कैलासके शिखर रूप श्वेतमाला और चन्दनधारी थे। ३१. उसी प्रकार भनिने भी अपने पुत्रके लिये नालानिव और ज्योति नाप, दोनों अनुचर जो कि शूर और शत्रकी सेनाके नाशकारी थे उनको दिया ।।२। अंग देवता ने भी बुद्धिमान स्वामिकाक के अर्थ पाव अनुचर दिये उनके नाम परिघ, बंद वलशान भीम, दइति, दहन यह पांचों अत्यन्त शीघ्रगामी और अंगीकृत पराक्रमी थे। १.३ । शत्रुविनयी 'इन्द्रने , उस अग्निके पुत्रकेलिये उत्क्रोश, पंचक, बच घारी, दण्डधारी इन चारों अनुचरोंको, दिया उन दोनों वजधारी और दण्डधारी ने युद्ध में महाइन्द्रके. बहुत शत्रुओं को माराथा । ३४ । बड़े यंशवान विष्णन ने कुमारको वड़ा बलवान चक्र विक्रमक और सक्रम यह तीन 'अनुचर दिये ॥३६॥ वयोम श्रेष्ठ प्रसन्न चित्त मधिनीकुमारों ने वर्द्धन और नन्दननाम दो, भनुचर Bhaskur. Chandra guve bim two attendants huge like bills and Adorned with white sandul and garlands. They aro known as Mani and Bumani. 31. agoi gare bim tno powerful attendante, buona 48 Jwala jivha and jyoti, Parigb, Vat, Buin; Dahati and Daban Were: | presented by'Ansh. Vitkrosh, Panchak, Vajradhari and Dandadhari, were given bin by India Tho two lat named siow many enousies of Indra. Vishnu gave him Chukin, Vikiantak and Sankran. Th to Ashwinikumars gave him Bardhan and Naulan who knew all branches ci knowledge. 36. Dhata garo hiin Kund, Kusum, Kumad, T .
। । ७१२६) Milallant (7126) भरतर्षभ ॥ ३६ ॥दुन्दश्च कुसुमध कुमुवाच महायशाः । इम्वराडम्बरी वैष ददी धाता महात्मने ॥ ३७ " चक्रानुचक्री थलिनी मेघचक्रा बलोकी । ददौ वष्टा महामायी स्कन्दायानुचरावुभौ ॥ ३८ ॥ सुव्रतं सत्यसन्धञ्च ददौ मित्रो महात्मने । कुमाराय महात्मानौ तपोषिधाधरौ प्रभः । सदर्शनीयो घरको त्रिषु लोकेषु विश्रुत ॥ ३९ ॥ सुप्रभञ्च महामान शुभकर्माण मेष च । कार्तिकेपाय सप्रादाद्विधाता लोक विभ्रती॥ | पाणि प्रकारकरच महामायाधिनायुभो । पूर्ण च पार्षदो मादात कार्तिफेयाप भारत॥ ४१ ॥ बलञ्चातिषलग्घ महायत्री महायलो। प्रददौ कार्ति केयाय वायुभरतसत्तम ॥४२॥ घसशतिधसवैष तिमिवक्त्री महावली । प्रवदो कार्ति फेयाय धरुण. लत्यसगर. ॥ ४३ ॥ सपर्चस महात्मानं तययान्यतिवर्चसम् । हिमवान प्रददी गऊ न हुताशनसुताय वै ॥ ४४ ॥ कांचनच महात्मानं मेघमालिन मेव च । ददापचरी मेहरग्निपुत्राय भारत ॥ ४५ ॥ स्थिरचास्थिर चैव मेरेषा स्वामिकार्तिक को दिय वा दोनों भी सब विद्याओं में कुशलथे । ३९ । बड़े यश वान धाताने उस महात्मा के लिये नीचेलिखेहुये अनुचरदिये कुन्द, कुसुम, कुमुद ढंवर, अडम्बर । ३७ . त्वष्टाने स्वामिकार्तिक को चक्र, अनुचक्र यह दोनों अनु चर दिये वह दोनों बड़ेमायावी वलमें मतवाले बड़े बलवान मेघोंकी सेना रखनेवाले थे । ३८ । मभुमित्रने महात्माकुमारकेनिमित्त सुव्रत और सत्यसंध यहदोनों न, चरीदेथे जो कि ता और विद्याके धारण करनेवाले महात्माथे । १९ । विधाताने महात्मा मुवन और शुभकर्म को सामिकार्तिक के निमित्तदिया जो कि प्रसन्न | मूविरदाता तीनोलोक विख्यात थे । ०। हेभरतवंशी पूपाने बड़ेमाया पानीतक और कालिकनाम पार्षदों को स्वामिकार्तिकके अर्थदिया । ४१ । भरतर्षभ वायुने बड़े बलबान और मुखाने नल और अतिक्लनामको स्वामिकार्तिक के लिये दिया। ४२ । सत्यमङ्कस वरुणने निमि मस्पके समान मुखरखनेवाले बड़ेवलवान यम और अतियम नाम अनुचरोंको सामिकार्तिक के लिये दिया । ४३ । हे राना हिमाचलने सुवर्चस और अतिवर्चस नप अनुचरोंको अग्नके पुत्र के लिो दिया १४॥ येरुपर्वत ने महात्मा काचन और मेघमाली नाम उन अनुचरों || को अग्निके पुत्रकोदिया जोकि बड़ेवल पराक्रम रखनेवालेथे १४॥ विन्ध्याचलने Dambar and Adanbar Twashita gave him Chakra und Apuchakra' of great prawess and laders of the armies of cloud. Mitra gave him two attendanis named Subrat and Satyasandh the seat of asceticism and learning. Vidbala gave bim Subrat and Shubhkarm 40 Poosba gavo lum Paritak and Kalık. Vayu gave him powerful attendants paned Val and Atival, Varun of true pops gave hun Yam and Atiyam Himachal him Suvai clins and Ativarchas. Meru' gavo bum. Kanchan and Meghmall Vindhya give him Uchring and . । gave • (7127) Gada Parv गदापर्व (७१२७) परी ददौ । महात्मनेग्निपुत्रीय महावलपराक्रमी ॥४६ । उच्छ्रितम्चाग्निश्रृंगंच मा पाषाणयोधिनी । प्रददाग्निपुत्राय विध्यः पारिषदावुभा ॥ ४७ । संगृह विग्रहंचष समुदापि गदाधरौ । प्रददाग्निपुत्राय महापाग्विावुभौ । ४८ ॥ उन्मादं पुष्पदंतञ्च शंकुकणे तव च । प्रददाग्निपुत्राय पार्वती शुभदर्शना ॥ ४९ ॥ जयं महाजयचेष नागो.ज्वलनसुनधे । प्रददौ पुरुषव्याघ्र बामुकिः पन्नगेश्वरः ॥ ५० ॥ एवं साध्याश्च रुचि,घसः पित्तरस्तथा । सागराः सरितश्चय गिय महाबलाः॥ ५१ ॥ ददुः सेनांगणाध्यक्षान प्लटिशधारिणः । दिव्यप्रहरणोपेता-नान बेशविभूषितान् ॥५२॥ शृण नामानि चाप्येपो येथे स्कन्दप सनिका: । विविधायुधसम्पन्नचित्राभर्णध' मिणः ॥५३॥ शकुको निकुम्भश्च पद्माकमुद एव च । अनन्तो ददशभुजम्नया कृष्णपक्षणको ॥५४॥ घ्राणवा कपिरकाया कानाक्षीजलमा सक्षसन्तजनो जन् कुन दीक स्तमोमबत् ॥ ५५॥ एकाक्षो द्वादशाक्षाच तवैकजटः प्रभुः सत्र पाहुर्विकटो, व्याघ्राक्षः क्षितिकमनः ॥ ५६ । पुण्य नामा सनामाच सुवक्त्रः प्रियद शन.iपरिभूत कोकनदः प्रिय माल्यानुलेपन. ॥ ५७ ॥ अजओदरो गशिराः स्कन्धाक्ष शतलेधनः । बालाजिबः करालश्च शिकेशो जठी हरिः ॥५८ ॥ परिश्रुतः कोक उच्छग अतिशृङ्ग नाम घड़े पापाणसे लड़नेवाले दोपार्षदोंको भग्निके पुत्रकोदिया ४७ समुंद्रनेभी गदाधारी संग्रह भार विग्रहनामदोमहापार्पदों को दिया इसीमकार उन्माद पुष्पदंत और शंकुकर्ण पार्षदोंको शुभ दर्शन पार्वती जीने दिया४९ हे पुरुषोत्तम सपा के राजा वामुकी ने जय और महाजय नाम सपॉकोदिया ।५०। इस मकार साध्य रुद्र वमु पिन सागर नदियां और बड़े २ वलवान् पर्वतों ने सेना के अप्सरोंकोदिया नो कि शूल पष्टिश धारण करनेवाले दिन्य अत्र शंखों से एक और नानाप्रकार की पोशाकों से अलंक थे। ५२ । उन्हों के नामोंकोभी मनों और स्वामिकार्तिक के अन्य २ सेनाके लोग नाना शस्त्रधारी अपूर्व भूपगों से अलंकृत थे उनकेनाम यह है । ५३। शंकुकर्ण, निकुंभ, पन, कुमुद अनंता द्वादश भुजा कृष्ण उपकप्राक, प्राणश्रवा कपिस्कंधाकाचनात जलन्धम अक्षतर्जन कुनदीक, तमोभ्राता एकात, द्वादशाक्ष, प्रमु एकजटा सहस्रावा, रिकट, पाप्रास, क्षितिकंपन पुण्यनामा, मुनामा, मुचक्र, पिपदर्शनं परिश्रुत कोकनद, Atishrinwho fought with globes, Samudra gave him Sangrah and Vigrah and Parysti garo bim Unmad, Pushpdant ond (hanku bain. The P:ince of Sankos gave bim Jaya and Jabajayk .50. Similarly, Sagar, Rudra, Vasn, Pitris, mountains and rivers gave him powerful attendants armed with various weapons and adorned with varioue dresses, Their names are as follows:-Shankuharn, Nilumbb. Fndm, Kumud Anant, Daadushbhuj, Krishn, Upkrishn, Quraathrava, lapiakandh, Kanchanals), Jalandhaw, Alalisenlarjad, Kuadis, Taluabhrakrit, Paksh, Dwadashukab, Ekjats, Sthasravahu, . (७१२८] Mahmbharat 17128) नद कृष्णशो जटाधर । चतुर्दष्ट्रोजियश्च मेघन द पृथुश्रवा ॥५१॥ विद्युतामो धनुर्षो जाठरो मरुताशन । उदराक्षो राक्षध बज्रनामा यसुप्रद ।। ६० । समुद्र धेगी राजेन्द्र शैलकमी तयय च । रोपप्रधाहश्च तथा नन्दोपनन्दको । ६१ ॥ धून वेत कलिङ्गश्च सिद्धार्ण घरदम्तथा । यश्चैक नादरच गानन्दश्च प्रतापमान ॥६२|| आनन्दश्व प्रमोदश्च स्वस्तिको भ्रग्कस्तथा । क्षेमधाहः सुयाहश्च सिद्धपत्रव भारत । ६३ । गोवज कनयापीडी महापारिषदेकर गायना इसनष पाणः साहुगाच वीर्यवान् ॥ ६४ । पैताली बतिगाली व तथा थकवातिको । सज पक्षदिग्पाङ्ग समुद्रोन्मादनश्च ह । ६५ ॥ रणापट प्रहासन श्वतसिद्धश्च नादक । कालकण्ठ. प्रभासश्च तथा कुम्माको पर. ॥ १६ ॥ कालकाक्ष शित भूतलोनयनस्तथा । यसपाह प्रवाहच देण्यास सोपम ६७ मजालश्च महानेजा कपकाथी च भारत। तुहरच तुहाच चित्रपश्च धारयवान् । ६८ ॥ मधुर सुप्रसादश्च किगटी च महाबल । बन्सलो मधुवर्णश्च मिएमाल्यानुलेपन, भमोदर, गनाशेरा, स्कंदास, शाोचन ज्या आजिब करालाक्ष शितिकेशी, जटी, हरि, परिश्रुत कोकनद्, प्याकेश जटाधर चतुर्दष्ट उष्ट्रजिह्व, मेघ नद पृथुश्रव विद्युताक्ष'धनुर्वक्त्र जाठर मरुताशन उदगा रथास बनाम बमुपद १६० । समुद्रवेग' शैलकंपी रूप मेप माह नन्द उपनन्दक धूम्र होत कलिन्द सिद्धार्थ मरद मियक एकनन्द प्रतापवान गोनन्द आनन्द प्रमोद सास्तिक ध्रुवक क्षेमबाहु मुवाहु सिद्धपात्र गोब्रज कनका पड़िनाम महापार्षदोंका ईश्वर गायन हसन वाय पराक्रमी खड्ग वैताली अनिताली कथक वार्तिक इंसज पङ्कदिग्धांग समुद्रों मोदन । ६५ । रणोत्कट, महास, शेतसिद्ध' नन्दक कालकण्ठ, प्रभात इसीप्रकार दूसरा कुभाण्डक काल काक्षा इसी प्रकार जीवोंको मथन करनेवाला शि! यज्ञराह Vikat Vyaglıra'sh, Kshitikampan, Punyanama, Sachakra, Pryadar, shan, Parishrut, Koknnd. Pryamalya iul pan, Ajod r, Gajshir, Skand akşh, Shataloch an, Jwalajıvla karalakshi SutikeshJa i Hars, Parishrut,, Koknad Krislınkesh Jatudhar, Chaturdanslatra, Ushtrajıvba, Meghnad, Prath ishrav, Vidyutaksh, Dhanurvaktra, Jathar, Marutashan, 'Ujáraksh, Ratbaksh, Vajianabls, Vacuprad, 60 Samudraveg, Shailkarnpi, Vrish, Mesh, Pravah, Nand, Upnandah, Dhumra, Shwot Salind, &dhaith Bırad, Pryal, Elnand, Gonand; Anand, Pramod, Swastik, Dhruvak, kshemrahu, ausahu, Sidhpatra, Govraj, kanaka, Pidnam, Gayan the lord of Pursuada Hrean, Var, karg, Vastali, Atitali, Knthal, Vartih, Hansaj, Pank digdhang, Samudronmadan, Rsnotkat, Prahu, Shwet andh, Nindnk Kalkant, Prabhas, Rubhandak, Kalakash, Yuggaval, Plavak, Nevyajı, Smap, glorious Majjal, Kra'h Tuha, Chitradev, Madhur, Suprased valiant Ruritia 63 (7129) Gada Parr गदापर्व [७११९) कलसोदर पर च ॥६९॥ धर्मदा मनमथकर गूचीवक्त्रश्च वायंघान् । श्वेतवषयश्च सास्वत्रच पाण्डुर । ७० ॥ दण्डबाहुः सुवाहुश्च रजः कोफिल कस्तथा । अचल: कमकाक्षश्च धालानामपि य. प्रभू ।। ७१॥ सबारकः कोक्नदो गृध्रपत्रिश्च जम्धुक लोहानवक्त्रो बदन. कुम्मघात्रश्च कुम्भका ।। ७१ ॥ स्वर्णप्रीवश्च कृष्णाजा हस वरच चन्द्रभः। पाणिमूच्चा च शम्बुफ पश्चक्त्रच शिक्षक । चापवत्रच जाम्यूक खरवक्मश्च इंचक || ७३ ।। योगयुक्ता महामान: सतत प्रामाप्रिया । पतामहा महात्मामो महापारियधाश्च ह ॥ ७४ ॥ योधनस्थाश्च वृयाश्च पालाश्च जनमेजय । ताठूश पारिषदाः कुमारगवतस्थिरे। ७५५ क्त्रैर्नानाविध तु अयु नान् जनमेजयाकूर्मकुक्कटवपत्राश्च दीर्धकाच भारता७६ वगो मायुमुखाचिर शशो लूकमुखास्नया खरोष्ट्रवदनाश्चान्य वराहवदनाप्तथा ॥७७|माविशश्चदीर्घ वत्राश्चमारताउन.प्रहरणा कार्यमानानिमेश्रणाश का पारिश्देरायुधानां परि मार, देवपानी, सोप, बड़ा तेजस्वी मज्जाल, क्रथ काय तुहर, तुहार, पराक्रमी चित्रदा मथुर, मुप्रमाद वनरान किसी वसल, मधुपर्ण कलशोदा धर्मइ, मन्म थार पराक्रमी नूचीवत्र क्षेतवत्र,मुवन चावत्र पादुग७० दंडवाह,मुवाह,रज, कोकिलक अचल कनकाक्ष जोकि बालकोंकामी प्रभु है संचारक कोकनद गृध्रपत्र जम्वुक लोहामवस्त्र, जवन, कुम्भवक्त्र उम्भक स्वर्णग्रीव कृष्णोजाईमा चन्द्रभ पाणि शम्वुक पंचवक्त्र शिक्षक चाप जपून खस्वस्थ कुंचा यह सन योग से संयुक्त प्रदेव मसाला व मगोंके प्यारे बड़े साहसी ग्रह्माजी के पुत्र पार्षद जनमेजय हजारों तरूम वालक और झुमार के पास आकर निगतहुये ७५। और जोपार्पद नानाप्रकारके मुखरखनेवाले उनकोंभी मुनो कच्छप और कुक्कुटके समान मुख वाले शशउलू कके समानमुख रखनेवाले गर्दभ,ऊट शूकर,मार्जार और शशात्रके समान देखि रखनेघालयो७१।अब मैं इन सपके शखों का वर्णनकरताई उनको तममुनो Vatsal, Madhuvarn, Kalasodar, Dharmad, Manmathkar, Sachivakt a, Shwetvantra, Claruvaktrn. Pant ur, Dandavahu, Snahu, Raj, Kokilak, Achal, Kannkush, Sancharak, Gridhyapatia Jamvuk, Loha.. vaktra, Javan, Kumbhyábtra, Kumbhak, Swarngrav, lirisinauja, Hansvaktra, Chandrabh. Panikurcha, Bhamruk, Panc'ivaktra. Shkelak, Chashvaktra, Jam vook, Kbarvahtra. Kunchak, der to gods and attendants of Brahina's son, young and ull, cam: by thousands and stood near the Kumar. 75 Tho Parshals trerent various shapes and boro the resemblanca of tortoises, cocki, hrran. ouls, asses, cam-l, hogs, cata and others Now hear an Arcount of the weapons which they boro. Thoy were armed with moses, with wide opon inoutbe, lacus libe donkeys, eyes on thur hins, Licu nabe and arms liko c'ub. Others were arined wit's Suntagums, dasiya (७१३०) Mahabharat (7130) मह 1८० ॥ पाशोधतफरा केचित ब्यादितास्याः नगनना । पृष्ठाक्षा नीलकण्टाश्च तथा परिवाहवः ॥ ८१॥ शतानीच हस्ताश्च तथा मुषलपाणय | भसिमुद्रास्ताच दण्डहस्ताश्च भारत ॥८२ ॥ शूलासिहस्ताश्च तथा महाकाया महावला गदामुण्ड 'पस्ताश्च तथा तोमरणाणयः ।। ८३॥ आयुधविधिोमिहात्मानो महाजघाः । महापलो महावेगा महापारिषदात्तथा ॥ ८ ॥ अभिषेक कुमारस्य दृष्ट्या हा रणप्रियाः । घण्टाजालपिनद्धांगा ननूतुस्ते मह जस ॥ ८५ । एते चान्येच घहयो महापारिषदा नृप । उपतस्थुमहात्मानं का विषयं यशस्विनम् ॥ ८६ ॥ दिव्याश्चाप्य तरीक्षाच पापि पाचानिलोपमाः । व्यादिष्टा देवतः शूरा. स्क-दस्यानुचरामचन् ॥ ८७ ॥ ताशानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अभिषक्त महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ॥ ८८॥' । इतिगदायुदपर्वणि वलदेवे तीर्थयात्रायां स्कन्धाभिपके पंचचत्वारिंशोध्याय! ४५ ॥ , १८०कोई हाथोंसे पाश उठानेवाले,फैलेमुख, गर्धवके समान मुख पृष्ठपर नेत्ररखनेवाले नीलकण्ठ और परिघ शस्त्रकीसमान भुनारखनेवालथे।८१ कोई शतघ्नीचक्रको हाथमें धारण करनेवाले, मूशळ हाथमें रख नेवाले खड्ग मुद्गर और दण्डधारण करने वाले गदा भुशंडी और तोमर हाथमें रखनेवाले नानाप्रकार के घोर शस्त्रों से युक्त । बड़े साहसी और शीघ्रगामी बड़े वलवान वेगवान युद्ध को प्रिय माननेवाले महा पार्पद यह सब कुमार के अभिषेक को देखकर प्रसन्नहुये घण्टा जालसे अलंकृत शरीर व तेजस्वी वह सत्र पार्षद नृत्य करनेलगे।' ८५ । और अन्य २ वहुतसे पहापार्पदभी यशवान् कीर्तिमान प्रतापी महात्मा स्वामिकार्तिकके पास आकर बर्ग मानहुये स्वर्ग आकाश और पृथ्वी से सम्बन्ध रखनेवाले वायु के समान यह सब | शूरवीर देवताओं के आज्ञावर्ती होकर कुमार स्वामिकानिकजी के अनुचरहुये।८७॥ उस प्रकारके हजारों करोडों किन्नु भदों पार्षद उस अभिषेक किपे हुये 'महात्मा कुमारके चारोंओरसे परिघ रूप होकर उसके समीप वर्तमान हुये ८८ ॥ clabu, swords, staves, waces, bhushundis, tumara and other dreadful weapons, They loved fighting and were pleased to witness the instal latiop of the Kumar. They danced in ylee ard rang bel's Other attendanta too, came to him and stord by. They came from heaven, air and earth. They obeyed the comwards of gods and followed Kartib. They numbered hundreds and thousauds of millions and formed a circlo rauad hm." 88 - 7111) Gads Parv गदापर्ध 1७९३१) बैशम्पायन उपाच । शृण मातृगणानाजन् तुमानुचरानिमान् । कार्यमानामा धीर सपत्रगणसूदनान् ॥१॥ यशस्विनीना मातृणा श्रृण नामानि भारत । यामिव्याप्ता अपोलोकाः कल्याणिभिश्चराचरा.॥२॥ प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोस्तनीतथा। श्रीमती बहुला चैव तथैष बहुपुत्रिका "३ ॥ अप्सुलाता च गोपाली घहदाम्पालिका तथा । जयापती मालतिका धुवरला भयङ्करी ॥ ४॥ वसुदामा सुदामा च विशाका नन्दिनी तथा । एकचूडा महापूडा चकनेमिश्ध भारत ॥५॥ उत्तेजना जयसनी कम लाक्ष्यथ शोमना। शत्रुजया तया चैव क्रोधना शलमोखरी॥६। मागधी शुभयात्रा पतीर्थ सेनिश्च भारत । गीतप्रिपा च कल्पाणी करोमिताशनामेघस्पना भोगवती मुभूश्च कनकावती । मलाताक्षी धार्यवती विद्युजिहवा च भारत ।। ८॥ पद्मावती मुनक्षत्रा कन्दरा यहुयोजना । सन्तानिका च कौरव्य कमला व महावला ९॥मदामा पहुदामाच सुममा च यस्विनी । नृत्यप्रिया च राजेन्द्र शतोलूखल मेखळा ।। १० ॥ अध्याय ४६ ॥ वैशम्पायन वाले है चार राजा जनमेजप अब मुझसे इन माताओं के समूहों को मुनो जोकि शत्रु समूहों को मारनेवाले और कुमारके पीछ चलनेवाले हैं। १ । हे भरतवंशी इन यशवान् माताओं के नामों को सुनों जिन कल्याण रूप नामों से तानोलोक विभाग पूर्वक व्याप्त हैं । २। मभावती विशालाक्षी, पालिना, गो- स्तनी, श्रीमती, बहुला, बहुपुत्रका । ३ । अनुजाता, गोपाली, वृहदा, अम्बालिका जयावती, मालीतका, ध्रुवरना, अभयंकरी ।४। वसुदामा मुदामा,विशोका नन्दिनी, एकचूड़ा, महाचूहा, चक्रनेमि । ५ । उत्तेजना, जयत्सेना, कमलाक्षी, शोभना शत्रुजमा, क्रोधना, शलभी, खरी । ६ | माधवी, शुभना, नथिसेनी, गतिविपा, कल्याणी कद्रुरोमा भमिताशना । ७ । मेघस्वना भोगवती मुभ्र कनकावती अना ताली वार्यवती विद्याज्जित्वा । ८ । पद्मावती सुननत्रा कन्दरा बहुयोजना संता निका कमला महायला ! ९ । मुदामा बहुदामा मुममा यशस्विनी नृत्यप्रिया शतो CHAPTER XLVI Thuljen pojan Bund," hear fiom re of the groups (f mothers, destroyers of foes, who followed Kartıb and se spread throughout, the three forlds. Their games are - Prabhayalı, Vishalakslu, Pahta, Gostani, Shreemati, Vahua,Vahuputraka, Apsujata, Gopali, Vralhada, Amvalika, Jaya vats, Malatika, Dhruvratna Abhayankari, Vasudamp, Sudnud, Vishgha, Nandipi, Ekelura, Jaliachura, Chakranen, Utlejana, Jayatsepa, Kumalalshı, Shobhana, Suntrunjaya, Krodbana Shalabbi, Khari, Afadhavi, Shubhvaktra, Tirthsent, Gitprya, Kalyan, Kadruroma Amitashana, Meghswana, Bbogwati, Siburu, Kanakarat Alatahshi Viryaratı Vidyujivha Padosialı Binskshatra Aundars Bahuyojana Santanıka Kapalı Bishabala Sudama Valiudoms 1 (७१३२) Mahallaalr - (7132 शतघण्ठा शतानन्दा भगतादाच माविमी । वपुष्मती चन्द्रशीना भद्रकाली व भारत ॥ ११ ॥ झट्टारिका निमटिका वामा चत्वरवासिनी। सुमङ्गला स्वस्तिमती वृदिफामा भया ॥ १२ ॥६नदा फुप्रसादाच मघदा च जनेश्वरी। एडी भेडी • समेचि यता ली तथा ॥ १३ ॥ दूतिः कालिका वैध देवमिमाच मारत। जम्बुप्तो काफी चैव चित्रसेना तथानला ॥ १४॥ कुवतिका शंखलिका तथा शकु निका पुण्डोरका कोकिलिका कुमिकाथ शतोदी। १५ ॥ उत्क्राधिनी जलेला च महायगाय कगुन्गा | मनोजया कण्टकिनी परिघा पूतना तथा ॥ १६ ॥ के जयन्ति। दिर्धामा शनाय तडित्धमा । मन्दोदरी तुहुण्डी च कोटरा मंधवादिनी ॥ १७ . । समालविणी.लम्बा पसुन्डाविफरियनी । ऊर्यगोधरा और पिंगाक्षी लोह मेखका ॥ १८ ॥ पृथ्वफा मधुलिका मधुफ म्मा तथैव च। पक्षालिफा माफुमिका जरायुर्ज जंगनना ॥ १२ ॥ ख्याता महदहा चव तथा मघा नृप । खण्ड मण्डा च राजेन्द्र पूष्णा मणिकुट्टका । २० ॥ अमोघा चैव पौरव्य तया सम्पयोधरा । गुणा लूखप्लमेखला ।१०। शतघण्टा शतानन्दा भगन्दा भाविनी वपुष्मती · चन्द्रशीता भद्रकाली कंकारका निष्कटिका मामा स्वरगासिनी मुमंगला स्वस्तिम्ती द्धिकाग भयमिया । १२ । धनदा सुप्रसादा भवदा एड़ी मेड़ी समेडी वेतालजननी कण्डूती कालिका देवमित्रा तंबुसी केतकी.चित्रसेना प्रवला । १४ । कुपकुंटिका शंखलिका शकुनिका कुंडारिका कौकुलिका कुंभिका शतोदरी। १५ । उत्कायिनी जलेला महावेगा कंकणा मनोजया बैट केनी परिघा पूतना । १६ केशमी धुटि क्रौशना ताहित्यमा मन्दोदरी तुहुंडी कोटरा मेघवाई ना । १७ । मुगा लाग्नी लम्बा बम चूडा विकधिनी अध्यवेणी धरा पिंगाक्षी लोहमेखला । १८ । पृथुवा मधुनिकी मधुकुंभा यक्षालिका मन्कुगका जरायु जगनना । १९ । ख्याता रहदहा धम धमा सराडरूडा पणा गरिकुष्टिका । २० । अमांधा लम्बपयोधरा वेणुर्याणारा Suprablix Niity apryu Statulukhalmekhala S'istghanta Sbatananda Blugnandu Bluwanı Vupushwati Chundrasbitu Bhadrakali Jhankuri ka Nishikucha Vama Twarvasini Sumingala Swastimati' Vridhikamal Jayoprya, 12. Dhunada Suprasada Bhavada. Erı Bheri Sameri Betul japan: Kuudrii Kulika Devamitra Jacuvusi Ketki Chitrasoria Avala Kukbutika ShankLalka Sbakuniha Kundarika Knukulka Kumbhikai Shatodari, 15. Utkratbini, Jalela, Alabavega, Kunkana, Manojava, Kuntakini Parigha Portoa Keshyantri, Ghati, Kraushna Turitprabba Mando Jari Tuhundi Kotaaa, feghvahini subhaga Lambini Lamba Urdh' veni Dhara, Pingahshi, Lohimekhle, Pr th uvaktra, Madhurikn, Madhu kunlla, Yuhalalika, Slatkunska, Jurayu, Jarjarinans, Khyati Dah. daha, Dhundl emi, Khandbl.anda, Paushns, Marnhustha, Amoghal 20,' Lomljujedlara, Venuvivadbars,' Pingakelii, Lubamekbala.
7133 . महाजपा विष भारत Gada Parb गदापर्ष घरावर पिताशी लोहमसला ॥ २५ ॥ शगोलूकमुखी कृष्णा, बरवा गिधुमारमुखी घेता ,लोहिताक्षी विभाषणा. ૨૨ .3 अटालिका सामरी रोजिह्वा घलोस्कटा । कालिकाषामनिका मुकुटा। • २१ ॥लोहिताक्षो महाकाया हरिपिण्डा व भूमिप । एकत्षचा मुक सुमा एमकर्णीचमारत।२४मुरकी चतुश्कर्णी कर्णप्रावरणातथा धतुम्पनिकताच गोषी महिषानना ॥ २५ ॥ स्वरकी महाको भेरीममहासना | शख कुम्मायेव भगदा व महापला ॥२६॥ गणा व सुगणा वैव तथा भत्यिथ कामदा! तुणपरता सेष भूतितीर्थान्यगोचरा ॥ १७ ॥ पशुदा विच्या चैव सुखदा पमहा पशा (पपोदा गोरिंशदा मुविशाला भारत ॥ २८ ॥ प्रतिष्ठा मुमतिष्ठा रोग माना मुरोयना नोकर्णी मुखकर्णी व शिरा मायनी तथा एकवना मेघरमा मेघमाला विरोचना । २९ ॥ एताधान्याश्च पहषो मातरो मरवर्षमा कार्तिकयाच्या सिंगाती लोहमेखला । २१ शशोलूकमुखी कृष्णा खरजंघा महाजवा शिशुभारमुखी श्वेता लोहिताची विभीषणा । २१ । जयालका कामचरी दीजिवा मोत्कटा कालोदिका वामनिका मुकुटा । २३ । लोहिताक्षी महाकाया हरिपिण्डा एक सपा मुकुममा कृष्णकर्णी'।२४।तुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णभावणी चतुप्पय निकेता गोकर्णी महिपानना ।२५ (खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वना महास्वनाश कुम्भश्रया भगदा, माला । २६ । गणा मुगणा भीति, कामदा चतुप्पथरता, भूति तीर्या, अन्यगोचरा, पशुदा, वित्तदा, मुखदा, महायशा, पयोदा गोमादपदा. पविशाला'।२८ा प्रतिष्ठा मुमतिष्ठा रोचमाना सुरोचना नौकर्णी मुखकर्णी विशराम पिनी एकपात्रा मेघरवा मेघमाग विरोचना । १९ । हे भरतर्षभ यह सस और अपरबहुतसीमावा स्वामिकार्तिकके पाछ चलनेवाली नानारूपाली नारोंधी ।१०।लपनल लम्बेदांत लम्बारस र वनेवाली बलवान् मधुरवचनतरुणअच्छे Shashotukmukhi, himshra, Kharjangha, Mahajava Sh shumarmukta Shwets, Lohitakshi, Vivishina Jilalled Kamcha , Dirghjirha, Va'otkota, Kalobikasi Vanmanika, Mukubr, Lihitaks|1, Mahayala, Ha-1. Panda, ELtwacha, Sukusuma, Krishakarni, Ksburka nt Chaturbkaren Karap ravarn Chatushpath, Nike a Gokarai, Mahishanana 20. Khar karni, MahalatarBheris wara Mahaswana Shankh Kumbhsbrava, Bhagada, Mahavala, Gana Sugars Bbili Kamada Chatushpathrata Bhuttertha, Anyagochara Pembuda Villada Sakhda Mahayasds Pagoda Gamabishda Suvishala Pratishtha Supratishtha Rachmans Suročbana Naukuras J{uklikarai Visharamanthior Ek vaktra JTaghra. va fegbmala, Vyochaun all these and other mothers followed - Kartik by thousands. 30. They had long nails, long teeth, and long mouth, ७१३४). PAN Mahabhout (1134):) पिन्यो नानारूपा सरशः ॥ ३१.. दीधनरायो दीर्थदन्यो दीयतुं आरत सरला गराध योधनस्था: स्खलंकृताः । ३२.। माहात्स्यन र संयुका काम धरास्तथा । निर्मासगात्राः श्वेताश्च तथा काञ्चनसानिमा । कला मनिमासमा नाममरतर्षभ । भरुणामा महामाया दीर्घकेदयः सिताराणी धरामेष, सिंगाल्यो लस्वमेखलाः । लम्पोवो लम्घाणस्तपालमपलोपः।४।। ठाघ्रापस्ताम्रपर्णाशययश्च तथापरः। घरवाः कामवारियो.निमुदिता स्तथा ॥ ३५ ५, याम्या गदारसपा सोम्पा कोयेोथ महराला पाणी मारे यस्तथाग्नेय्यः परतप॥ ३६॥ कायस्पश्चाय कीमापों प्रामपम मातभाग यतया सोयों मारायच महावसाः ॥ ३७॥ उपेणाप्सरसाइंच्या मनोहायों मनो रमाः परोपमा पाक्य तपसूर्या घनदोपमाः ॥३८॥ शंकबीयोगमा बुदे दीप्त्या बहिनसमास्तथा शत्रूणां विगृहे नित्यं मयदारता : भवान्युत काम अलकत ! महात्वतासे युक्त स्वेच्छाचारी रूप धारण करनेवाली मांससे राहत शारीर बेसवर्ष और काम नरूपीं । ३२ । हे भरतर्षभ इसीप्रकार दूसरीदेवी कृष्ण मेषकी मूरत धूम्रवर्ण अरुणवर्ण महाभाग लोकशा रखनेवाली कोई लम्बी मेखला रखनबाली लम्बा, सदर, कान और स्तनः रखनेवाली । १४ । सीमकार दूसरी देवा कनेन लालवर्ण पिंगलाती वरदाता इंग्छानुसार कर्म कर्चा सदैव असम ।, ३५ .समरान रुद्र और चन्द्रमा.समेत बुर से सम्बन्ध, रखनवाले बड़े बलवान लोग वरुण महाइन्द्रः अग्नि । ३६.. बायकमार और ब्रह्माजी से सम्बन्ध रखनवाली देवियां उसीमकार दिया. सूर्य और, वाराहनी में सम्बन्ध रखनेवाली...पड़ी बलवान स्वरूपमें. अप्सरामों के समान चित्त रोचक ,मनको प्रसन करने वाली सोचाओं में कोमिलामों के समान.धन कुवेरकी तुत्य । १७ सब में रुद्र के | समतुल्य और तेजमें भग्निके सदृशीं वह सदैव:शत्रुओं के युद्धमें भयकी देनेवाली होती है । ३९- उत्तीमकार इच्छानुसार रूपधारण करनेवाली वेगमें, वायुके समान ध्यान से बाहर बल पराक्रम रखेबाली ४० । न यत्वर और निर्जन वनम bñd' irere poirorfu!, sweet:voiced, Foung, well-deckids'ionming still Aleshless, white and gold coloured'or of-the colour of clouds -saóbórsand red: "Thøy had long hair long - bėbly ear-and breasts. Others werditored djies’gi vers' of boons'powerful and' cheerful. 35 I boy bad connection Rith Yam, Rudra, Chandra, and Kuver. very: powerfhi, tonnected with India, Váyu, Brabría. -Vishnu, Surya and Barah and were briatitur ....!...., 1713) Gada Parv गदापर्व (७३५० भाष जोशयुसमास्तथा । अचिन्त्यवलवीर्याश्च तथाचित्यपराकमा ॥४२ ५. वृक्षस वरशासियम पथनिकेतना: । गुहाश्मशानवासिन्या शेलप्रनवणालया ॥१॥ सानासानपारिन्यो भानामाल्याम्बरास्तथा । नानाविचित्रवेशाध मानाभापास्तथैवच, ४२ ॥ एते चाइये व पायो गणा शत्रुभयङ्करा । अनुजांमुहारमान त्रिशे वस्त्र सम्मते ॥४॥a. क्यनमदनगवान पाकशासन । गुह्यय एजधाईल बिना शाप मुरविणाम । महास्वा महाघण्टा द्योतमाना सिनप्रभाम् । तरुणाविष्ट जांच पताका भरतर्षभ ।।३५ ददौ पशुपतिस्तस्य सर्वभूतसहाच मुम 1 उमा नाना प्रदरणा तपोवीर विलाधिताम् ॥ १६ ॥ अजेया स्वगुणैर्युक्ता नाम्ना सेना धनश्नपाम रंतुल्यवलगुप्ता बोधानामयुतस्त्रिभि । न सा विजानाति रणातु कदाचिदिनपत्ति तम् ॥ ४५ ॥ विष्णुहंदी वैजयन्ती माला वलपिलिनीम् । उमा ददी विरजसी वाससी यसरिभे ॥४८॥ गगा कमण्डलु विच्यामवोत्रमुशाम दो प्रया निराध करनेवाली, गफा और इमशानवासिन्ध पूर्वतों के झिनों में निवास कर बाली नानाप्रकार के धूपण और माला रखनेवाली नानाप्रकार के विचित्र वेष रखनेपालो यह और अन्य२ बहुत से शत्रुसमूहों को भय उत्पन्न करने वाली उस देवराज की आशा से महात्मा कुमार के पीछे चली । ४५ इम के पीछे मगतान इन्दने दाक्ति जस अमरों के नाशके लि) स्वामिकार्तिक को दिये । ४४। भरतर्षभ जष्ट्राप्रमान शौर बड़े घण्देवाली प्रकाशित शेतप्रभा रखनेवाली, सूर्यके वर्ण पुरुष पताको भी दिया । ४८ । पशुपतिजी ने सब जीवोंकी उस व सेनाको जस डे निमिजदी जो कि पहाउग्र नानाप्रकार के शवों को, धारण करसे गली तुष वा पराकम से युक्त अभय उत्तम गुणवाली धनञ्जय नाम से विख्यात मार स्वामी के समान तीन प्रयुत शूरवीरों से सयुक्त थी वह सेना कभी युद्ध से मुख फेरता नहीं जानती थी और विष्णाजी ने वलको वहाने 'वली विजयन्तीमालादो उमादेषी ने भूपं के समान प्रकाशमान दो दिव्य - बल दिये भी गगानी ने बड़ी पीने से दिव्य और अमृतका त्पन्न करनेवाला उत्तम hurul grounds and bill water falls. 41: They were adorned, with garinods and other opaaments and wero the terror of foes, l'hey followed the Komaç by the order of the prince nf gods. Thën Indra snsa bım weapons to destroy the focs He also garo, the Kumar red bancer with bells jingling from ut 45. She 'gare hum a large arm hich yas dreadful sussessed or the power of asceticiam ineqsquerable and weli qualified loova as Dhananjaya composed of turiythonsand of warriors bravo liko Rudra and unflicchias. Vishnu zavuchim thogarland kubwn as Vaijayanti whích increase.: huja Uma garo hio a pitcher if ne tar, while Yrihaspati gavo buna buff . Pawer and 1114 रागणा [७१३६] Mahabharat (7136) कुमाराप दण्डादेव जास्पतिः ॥ ४२ ॥ गारो दपित पत्र मयूर विवरणम् ॥५॥ मणमासन प्रवदो चरणायुधम् । नागन्तु घरुणोराजा बलधारसमरिचतम ५१॥ कंगाजिनं ततो प्रया ब्रह्मण्या यही प्रमः । समष अयश प्रददी लोकमानः ॥५२ ॥ सनापरयमनुपात फन्दा देवगम्य । शुशुमे वलितोधिमाहितीय व पाक ५३॥ ततः पारिषदेव मावभिन समषित यो त्यविनाशा इलायन परगन् । ५५ ॥ सा मेमा नेत्रमा भीमा सयपटोनिकलना । मर्ग पास मरजी सायुधा साहाकिनी । शारदा पौग्धिांमामि ज्योतिमिरिण शामिता, तसो दबानकापान नामातंगणास्नथा . वादयामामुरव्यमामा गोश्च कृपलान ॥५६॥ तुमुवस्त कारन्तु समें देवा सहासमाः । अगुध वाला अन्नुस न तो महामलिशियों परं ददो रिपून रस्तास्मि कमाल दिया पार इस्पातजा न कुमारके अर्थ दण्ड दिया। ४९ । महरजाने विचित्र पुच्छवाला पन्दर,मोरया । ५० । अरुणने चरणावधवाला ताना दिया फिर राजा वरुणने बल पराक्रमसे युक्त नागदिया । ५१ । इसके मनन्तर प्रभु नामों ने उस बदबामणोंके रक्षक कुमार को कृष्ण, मंगदिया आर युद्धों में विनय को भी दिया। ५२ नव स्वामिकार्तिकी सब देवगणों के सेनानीपद पाकर मरे प्रमालत "मग्नि के समान प्रकाशित होकर शोभायमान फिर पापदा और मातामों से युक्त स्वामिकातिको उत्तम देतामाको अमन करके देखा के नाश करने के लिये चले ६॥ और रातोकोभीवह भयानक रूप मनाघटे ऊंचो वजा भरो शङ्क मुरजा शख और पताका:रखनेवाला प्रकाशित शरीरों में शोभापमान शरदऋर के आकाशको ममान प्रकाशमानयो । इसके पछि देवनाओके समूह और सावधान नौनामकारकै जोवसहान उत्तम और शजीको बजायो । ५। फिर इन्दममेत सब देवताओं ने कुमार स्वामिका तिकको सातको देवगन्धान गाया और अप्परामा के गणों ने नृत्यकिया । नदनन्तर अत्यन्त प्रसनरूप सापिकार्तिकजी ने बाताओं के निमित्त पर वरदान दिया कि मैं उन शत्रुमोको मागा जो तम्हारे। :मारनेके अभिलायो Garur gave him a wonderfàl peacock of beautiful tail, 50, gave him a Tamrarnir having feet for weaporis., Farüb gave him powerful Nag and Brahma gave him a black deer as well as victory in war. Then Kaitik went on with that Iurge army and was glorica like fire. With' Parshads and mother he went on to slay rakshasen whoso urny, was dreadful vith glorious Iodies shining like this of heaven and armed with weapons of sorts; 55. Then, the groupe of gods and other being blow',conchs and, drum...Il.dra and other gods praised Kartik, the gandha-vde sang and apsrras danced. -.-Then Arun starg (7137111 Garla Parv गहापर्व। ये मोबमाविकोपः।।८॥ प्रतिगृह्य पर धास्तस्माधिसतमात् । प्रसारमानो महामामो मेनिरे निहतारिन ।। ५९ ५ सषभिसंधामों होनाक- समीरयता। भपात लोकांनि मोबसे महात्ममा सोनियो महासमो महत्या सेनया- तपाय युषिदत्याना मार्य दिवोकसाम । ६१ व्यसायो जयों सिदिलमीप्रति स्मृतिः । महासेनस्य सन्मानाम अग्नाधिप। ६२ || स तथा भमियां देवः परसवा पलितालातधारिण्या चित्राभरणधर्मपा ॥३॥ गदामुल नाराचशक्तिनोमर स्तिथा । तसिंहमिनादिन्या विनय प्रथयो। गुहः .६४.! दिवा सर्वईतयों राक्षसादानबास्तथा । व्यवसः दिशा सा भयोनिमा समं Han६५ ॥ मम्यहमत देवास्तान विविधा पाण्यः रवा व सततः अब स्कन्दस्तजावलान्वितः ॥ ॥ शव्यसं भगवान भी पनः पुनरवारजन। बदम चात्मनस्तेजो इपिरामल: ६७ ॥ यमान सस्य स्कन्दनामितला. Titता प्रभावित महात्मा देवता माने उस श्रेष्ठ देववासे । वरप्रदानलेकर. शत्रुओको मराह आ माना। १९ मामाकी भोरसे बरके देने पर सवजीव सम्होंग के समता के ऐसे बाद उत्पन्नहुये जिनके मारे तीनोलोक पूर्णहोगये बड़ी सेनासमेत वह सामिकार्तिकनी' युदमें दैत्यों के 'भारनेको और देवतामों के सानिमिताने हे राजा निश्चय करके धर्म सदी लक्ष्मी infri in सेनाके आगे च । ६२ । वा स्वामि कार्षिक देवता भयानक भूल मुद्गर आपमें रखनेवा मालत शबपारी मदार भूषण मार कवच धारण करनेवाले । १३ । गदा मूशस्त नाराच शक्ति पार तोमर धारी बापत सिंह के समान गजनेगले सेना के साथ गर्जतेहुपेरले.३४, ३ भयो, महाग्याकुल सवदेत्य, दानव और राक्षम वाराऔर सब दिशाओं में भागे नानाप्रकारके शखों को में रखनेवाले देवताओं के समस्त गये तब वेत्र, उससे एक भगवान् स्वामिकाचजी ने उस सेना को देख पारम्वार कोपयुक्त होकर भयानकरूप शक्तिको रोग और अपने तेजको ऐसे धारण किया जा किन्यमे दिपक माग्न वेजको धारण करता है। महाराज रहें cheerful Kartik gare the gods a boon. saying, " I shall alas your ene-: mies." At this the gods believed their armies as already slan'and cried ſóc joyKartik then niarc bed to slay the Daityas and to protect tho gola. Gl. Dharm, Sidli, Lakshmi, Dhriti and Sroriti followed Farlik, wbilo bo maiched alged with various wópono apd roaring' like a lion. The Daityas and Danaras 'san for 'fear. They faced the sols with s'çapons and Rs: til hurled his spear again and again in anger and boked glorious like fire. Sparks of firo fell down with bio spear and the wind blew as if it were the time of pralaya.
- भगवान स्वामिका ( ७१३.) Mahabharat: (7138) उल्कावा मह राज पपान बमुघानल ॥ ६८ ॥ सहादयन्तम तयो निर्यातमा तक्षितौ । यथान्तक लसमपे सुघोण स्युस्तथा नृप ॥ ६९ : क्षिप्ता कायदा शार्क मधारानलमनुना तता कोदयो विनिप्पेतु-शकीना. भरतर्षभ ॥ ३१ ॥ सोनो महासेनो जघान भगवान् प्रभु दैत्येन्द्र तारक नाम महावलपराक्रमम् । वृत देत्या युवरियलिभिईशानभूप ७२५ महिषाचाटमि पौईत सरूपे निजनिवान् । त्रिपा दन्वायुधशतजेश न दगभित । ७३, ॥ इदोदर निसर्वध वृत दशभिरीश्वरः। जधानानुचरेसा विधिायुवाणिभि ..७५ ॥ तवाकुर्धन्त विपुल नाद यवतम शाषु। कुमारानुवराजन् पूरयन्तो दिशो दश! नन्तश्च पवल्गुश्च जसुध मुदा मिता १७९ ॥ शकालस्य तु राजेन्द्र ततोधिभिः समन्तत । दग्धा. सहस्रशो पेट्या नाद स्कन्दस्य चापरे ॥ ७६ ॥ त्रैलोक्य त्रासित सर्व जम्ममाणाभिरे नग्धामहाञ्चिताचा , सानादेईता पुरे॥७४ाकयाषतामरता केचित मुर तेजस्वी स्वामिकार्तिक से : शक्ति,मस्त्र के छोडनेपर उल्का की ज्वलित अग्नि पृथ्वीपगिरी 1,६८, । इमीप्रकार बायु से, व युके सपनों के शब्द शब्दको उत्पन्न करते ऐसे पृथ्वी पर गिरे जैसे कि प्रलयकाल में बड़े घोरशब्द होते हैं । ६९। हेभर तभ नव अग्निके पुत्रके हायसे यह बड़ी घोर शक्ति छोड़ीगई। ७० । उप्त शक्ति से करोड़ों शक्तियां उत्पन्नहोगई। '७० । उसकपीछे प्रसन्नचित्त निकजीने खड़े बल पराक्रमवाले तारक अमर को मारा ७९ हेर ज बलवान पाठ पर एकमत भूस्वीर दैत्योंसे युक्त महिषासुरको भी कमारने युद्ध में मारा । ७३॥ फिर उस ईश्वर ने एक करोड दैत्यों समेत त्रिपादको और नानामहार के शखों को हाथमें रखनेवाळे दश निखर्व दैत्यों समेत द्रोदरको मारा ।'७४ । इसमकारसे शत्रुओं के.मरनेपर दशोंदिाओं को पूर्णकरते कुमारके साथियोंने बड़े शब्दकिये और प्रसन्न होकर नृत्यकरते हुये चेष्ठाओंको कर प्रसन्नहुये । ७ । हे राजेन्द्र इसकेपी शक्ति अब के चारोंऔर को मज्नीलत, होनेसे तीनोलोक सघ' मोरसे भयभीतहुये, । ७६। बहुत से शोसमेत हजारों देख "स्वामिकात्तिकजी के शब्दों सेही भस्पहोगये और कितनेही असुर पताकासे घायल होकर मरगये कितनेही Alilljo, 8 pf spears came out from the spear hurled by Kurtis Then Kartikeya şlew Taraf «f gręát prosyeye? He slep alsg alabisha war, and, ha large and powerful army of asura He plev Trpad yith a croro of Satya: armed vith various weapons and alqw Hrad and his great army of rakshaars" Thus, at the fall of those euemier, the companions of the Kumar, álling a!the directions made a great horas and danced with, glee 75 The threp worlds were terrified with tho blaze of tha spear, and lundreds and thousanda of asurs died with the roar of Lord Kartik Others foll down wounded by the canner or 70 - 1 17139) Galla Pan गदापर्व, [७१३९७ द्विषः। कविषारयस्ता निषेधुर्वसधातले केचित्र प्रहरणश्छन्ना वितिपाता युषः ॥ एवं सुरद्विषोने कान घलवानाततायिनः । जघान समरे, धारा कार्ति केपो महाबलः । ९ वाणो नामाप देतेषां चले पुत्रों महाबलः । कोचमतमा धित्य देववधानधावतः ।। । तमभ्ययान्महासेनः सरशमदारधीः। स कार्ति 'च नादनि H. . . . गोलागल ॥ विनिप्प V . -- रबोता। . . 4 "" खगिढत. अग मरकर' गिरपड़े ७८ । इस प्रकार बलवान वारपराक्रमी सामि कार्तिकीन उन: मारने के अभिलाषी असंख्य दैत्य सक्षसादिकों को मारा ।। इसके पीछे पलिके पुत्र महाबली ब्राणनाम दत्यने क्रौचरर्वत में माश्रित होकर । 'देवताभोंके समूहोंको पीडामान किया ८० तब बड़े वाद्धमान स्वामिकात्तिकजी, स देवताओके ३४. पाणके सम्मुखगये उसने स्वामिकाकिनाके भय से कौंच पर्वत की शरणली। इसकेपीछे खड़े' क्रोधयुक्त भगवान, स्वामिकार्तिक ने औचपक्षी के.समान गनेवाले उस और पार्वत, कोअग्निकी दाई शक्ति से पायल किया..।। जो कि' शालबम के गुदामे, सवलवर्ण भयानक वानर और हाथीवाला और बहुत उहनेवाले व्याकुल, प्रतियोवाला दिलसेवाहर दौड़नेवाले सपावाला । ८३। गोलांगूल मागे रीठोंके समूहों से और कुरंगों के शवों से शम्दायमान पृथ्वी और वन, रखनेवालाथा । ८४,। अकस्मात दौड़नेवाले और भागनेवाले शरम और सिंहों से शोचास्तदशाको मातहोनेवाला.वह पर्वत भी. शोभायमान हुआ । ८५ 1 उस पर्वतके शिवरपर रहनेवाले विद्याधर उडले. और ren dowú teliselded at the sonud il bells, Builo some died of the fresunda, of weapons. Thus brave Kirtik, sley an imment army; of rakshasa, Then Van, the son of Vali bid himself within Kjaunch, muntain and' fçopg, thero barassed the army of gode, 80 Wine Katil fucid. Van of gods. He hd bymself within, Kiauuch bill but Kartik pierced' through the hill with the spear presented to cbim,by, Agor The mountain nos full of sal trees, dreadful yanara, elephanti, birds, Bakes, bears, thyrablias ard linas. 85. Thoi pidsadliarus livlog on that bill'sprang « up and birnass. ALTE disturbed by the fall of the spaura Then, thousands of Dailyébw withs wonderful ornaments - 1 the enemy Malubhuatr (11401 Reuोदय विनितु शतशोध सामाप्रदीप्तान पर्वतभेष्टाहिनियाभरनमंत्र सजानुरीतकम्य कमायनुवरायो । ८७। सब भगवानकुयो देद्रम Fi | सदा । समानुजमानाशु देवतिया ८ विभव शरयों को afc परवीरपाकमा हारमा महालः ॥ शकि सिता र तस्व पाणिमति पुनः पुनः एप्रिमायशेमलतो भुपम गवा९ि० वा गुणयोगेन सासाभिमाकोरबस्तीन विनिर्मिनो देयाम शतशो ईता. तत समान देषो निहत्य विधि | समाउपमानो पियुषः परहमा ९॥ मिक गिरियापुत्रे पातित। ततो दुधुभयोजन नेदु रानाम भारत ॥५३॥ मुमुग्योषा पपवर्षमनुत्तमम् । योगिनामोशर दे शतशोय समय • दिग्य गम्भुपादाय को पुष्पा भारत । गन्धवास्तुष्टुयुधेनं पंज्यान माय ॥५५॥ विदेन पस्यसि पितामरगुतं प्रभुम । समाकुमारं सर्वेश योनिम प्रजम,९६ ॥ खिमहेश्वासु केषित पुत्रं विमावसो | उमायाः कृत्तिकानाच शक्तिके संघात शम्दमे पाया किमरलोग न्याकुलहुये । ८६. 1 इसकेपी विचित्र भूषण रखनेवाले हजारों देस. अत्यन्त मलितरूप उस उत्तम पहाड़ से पाहर को दौडे । ८७ । कुमारके पीछे चलनेवालोने पद्में उनको पराजयकरके माराता उमनोपयुक्त भगाननेभो दस्पराज पुत्रको उसके भाईसपेत ऐसेमारा ,जैसे कि देवराजने हवामुरको माराया । ८८ । शत्रुके वारों के मारनेवाले महावली अग्निक पुत्रने बस कामाला और एक रूपालाकरके शक्तिसे क्रौंच पर्वतको घायल किया युद्ध में फेंकी हुई शक्ति बारम्बार उसके हाप में मातीर्थी इस के मनन्तर ऐसे प्रभावले मनशन स्वामिकार्तिकनी शूरता द्विगुणित योग वेज यश और शोभासे महाप्रभात्राले ये उनके साथ क्रौंच पर्नस टूटा मार हजारों देल्प लोग मारेगये । ९१ । उस भगवान देवता ने अमरों को मारकर पुरी से सावंत शेषर बड़े भानन्द · को पाया।। १२ । हे भरतवंशी गमा जनमेजय फिर देवताओं के दून्दुभी और शंख बजे और देवताओं की हजारों स्त्रियों ने उस योनियों के ईश्वर देवता कुमारके ऊपर, पुष्पों की वर्षाको किया । ९४ । और come out of the hill, but the followers of the kumar vanquished And slaw them. The Kumat slew him and his brother as India had slaid Vritiaeur. He broke the Kraunch hill into pieces. Tha'spear kurled by bin-cand hack into live band. Lord Kartik's bravery, glory, fame and pron ees became double. The Krapuch moun tasa was broken and the Daityas Ware slain. 1 91.11Lsving alas the asure the Kumar and his army were much pleased. The gads blow their concha ard drums ard tbuusands of yoddesses spriukled flowers over.kimn. The wind blow u fragrant breeze and the gandbal yas and . -- again and again (7111 Gada Pary गदापर्व गावाम पदयुत ॥ ९७ ॥ एकदाज विधा चैव धतुब महाबलम । योगIAL मीदवार देर शतशोष सहमश ॥ २८ ॥ एतचे कथित राजन्! कार्तिकेयाभिषश्चमम । भावेष सरस्वत्यास्तीर्यवर्य पुण्यताम् ॥ ९९६ धब तीर्थपरतेषु सरशत्रु मारेण महाराज त्रिपिष्टपमियापरम ॥१०० । खयाणि च तत्रस्यो ददाश पृथक पृथक् । तदा नैनमुखोपलेलोक्य पापकात्मज म १०१ ॥ एव स मगस्ति स्मितार्थ यकुलान्तक । मभिषिको महाराज देवसमापति मुरे ॥१०२ तेजस नाम ततीर्थ वा पूर्वमपाम्पति. मभिषिक सुरगणेवरुणो भरतर्षभ ।। १०३ । तस्मितीर्थ बरे लावा स्काभ्यप लागली । ब्राह्मणेभ्यो ददौ रुषम पासास्याभरणानि 1 १.४॥ उषिस्था रजनी सत्र माधव परवीरहा । पूज्यतीवर वच्च स्पृष्ट्वा लोयचं सुन्दर दिवा गन्धियों को लेकर पवित्र वायुचली गन्धयों समेत पह, करनेवाले महर्षियों ने स्तुतिकरी 1,९५ । कोई इस प्रभुको ब्रह्माजीका वह पुत्र निश्चय करते हैं कि ब्रह्मानी से प्रकट होनेवाले सब के आदिभूतं सनत्कुमार नाम है ९६ ! रोई महेशरजीका पुत्र कोई उमा गगा भग्नि और कृत्तिका का पुत्र माते । ९७ । उस योगेश्वर महावली देवता को एक रूप दो रूप चाररूप और हमारों लाखों रूपाला कहते हैं । ९८ । हे राजा कार्तिकेयनी का यह अभिषेक मैंने तुमसे कहा पर सरस्वती के उत्तम तीर्य के मूल हेतुल बह धर्म की वृद्धि को मनो । २९ । हे महाराज कुमारके हाथ से अमरों के मरनेपर वह अत्यन्त उत्तम साथ दूसरे स्वर्ग के समानहुमा । १० । वहाँपर नियत होनेवाले ईश्वर कुमार ने पथर २ राज्य शासनों समेत तीनोलोकों को देवताओं को दिया । १०१। इस मकार उस तीर्थपर दैत्योंके कुलके नाश करनेवाले वह भगवान देव सेनापति | देवताभोंकी ओरसे अभिषेक कियेगये । १०२ । हेभरतर्षभ वा तधि वैनस नाम से प्रसिद्ध है निसायपर जलके सामी वरुण देवता देवसमूहों से अभिषेक किये गये। १०१ । बलदेवजी ने उस उत्तम तार्थपर स्नान करके सामिकाकिनी को पूरकर नुवर्ण वन और भूपणादिक ब्राह्मणों को दान किये । १०४ । शत्रुके वारों rishia praised him Soma say that he is Sanitkumar the son of Brehna, 8omo call him the son of Ganga some of Agni and others of Kntikas, They attribute to bym (ne, two four and million shapes. I have told you the installation of Kartık, dow hear of the holy Saras wat. At the fall of the asyn by Kartik tba holy place became like ranother paradise, 100 The Aumar distributed the world among gude for the sake of management The Rumar Has Anointed copsmasid er of the divịao armies at the bank of the Sanswath The bály alost 18 known as Taijis where Varun the lord of waters wagi anbotod by gndu Balder batted thera and having worshipped Kartile gapa 93 [[७१५३] · Maliabharat ( लांगळी तमनाश्चैव घमघामाघौचमः ॥ ५॥ एतते सर्वमापात भन्ना व रिपुम्हसिायपाभिषिको भगवान स्फन्दो देवः समागतः ॥ १०६ पातिगदापदपर्वणि यकदेवृतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाट्याने पचतारिंशोभ्याया। - जिनमेजय उवाच । मत्यतमिदं प्रझन भुतवानस्मि तस्वतः । माभिष मार वितरेण यथा विधि ॥ ३ ॥ यत्वा पूतमामान, विजानामि कोषमा पनि रोमानिया मनोमम ॥ २ ॥ ममियके कुमारस्य देवानांच वमन्तथा । भाषा मे परमा प्रीतिर्भूषः कौतूहलंहि मे ॥ ३॥ अपाम्पतिः कथं यस्मिन्नभिषिक्त पुरा हो के मारनेवाले पाघर इलधारी बलदेवजी.कहा, एकरात्रि निवास करके उस तार्ष राम महापूज्य तीर्थ को भार उसके जल को स्पर्श करके । १०६ । बड़े प्रसंपत्ति हिये देराका जो हुमने पूछा कि कप्त स्वामिकात्तिकनीका अभिषेक हुमा बास मैंने तुमसे जहा । १०६. 1. जनमेजय बोले कि हे द्विजार्य मैंने कुमारके इस अत्यन्मार अपूर्व अभिषेक को विधिपूर्वक मूल समेत मुना ।। १ । तपोधन मैं जिसको सुनकर अपने पवित्र जानताहूं मेरे शरीरके रोमांच प्रसन्नता से पूर्ण हैं और चितमी मेरा, मित्यन्त प्रसन्न है ।श कुमारके भभिषेक और दैत्यों के नाशको सुनकर मुझको बड़ा आनन्द हुआ । ३ । हे बड़े ज्ञानी श्रेष्ठ वैशम्पायनजी इस तपिर प्राचीन ornaments ti Balmans: 'He stayed there one night and having touched of its hiály water felt great joy: I have told, sove linge all about the installation of Lord"Kartik. "106. tul Mit,... - CHAPTERIXIVII.... Jarinejaya said, " I have heard thoroughly of the installation of i Kunjar and I think' mycelf to be tbor better forrit. - The hair of . body stand with os uitation and my mind is full of glee. lium exceed. ingly pleased to hear of the Kumais installation and of thoi destruct; joo of Daityae". ray let me'kców,'wise: Brahman,thov. Varun' WAA Fay Gada Parv गदापर्व ७१४३ सम्मे भूहि महाप्राज्ञः कुशलो ह्यसि सत्ता. ४॥ वैशम्पायन उवाच !श्रृणु राजनिद, पिनं पूर्णकरपेयथातथम । आदौ कृतयुग राजन् वर्चमाने याविधि ॥ ५ ॥ वरुण देगा, सेवी समेत्येवमयाभूवन् । यथास्मान सुरराष्ट्र शॉ भयेभ्य. पाति सर्वदा ॥५॥ या त्वमपि संवासा सरिता व प्रतिभव। वासश्च ते सहा देवा सागरे मकगः ये समुद्रोप तय पर्श भविष्यति नदीपतिः । सोमेमसाईम तप हानिखी मलियतः ॥ ८॥ एवमसिपति ताम् देवाम् वरुणो वाक्यमन्त्रात् बम्प ar: , समें वह मामगळयर ॥९॥ अपांगति प्रसाई विषिष्टम'कर्मणा । अभिषिष्य ततो देवघराणं पारसा पतिम् ॥ १०॥ मु. स्पानेष स्थानामि वित्या जलेश्ष रम । अमितिलता देवरुपोपि महायशाः ॥ ११ ॥ सरित. सामराव महाश्चापि सरासि । पालथामास विधिमा यथा देधान शतक्रतुः॥ १२ ॥ ताप्युपस्पृश्य विधिध.धम् । अग्नितीय महाप्राशी जगामाप प्रलम्वा । १३ ॥ नष्टो में समय कण देवता कैसे देवताओं से अभिषेक करायेगये उसको भाप कहिये, क्योंकि आप समंद हैं । ४१ वैशम्पाया पोले ऐ राजा इस अपूर्व सान्तको जमे क पूर्ण कराये हुपा है उम सरको यथार्थतासे मुगो कि सन्या के मारम्भमें ॥५॥ सब ठेवता परुप से निराकर पह, पचन वाले कि, जैसे देवराज इन्द्रमको सदैव भयों से रक्षित परवा । ३ । उसीमकार तुम भी सव मादपों के हामीहो इदेवता आपका निवास मारो विवासस्थान सचिरय, दोष-या मादयोंका स्वामी समुद्र आपके आतीन मोगा और आपके दि इयं चन्द्रमाके साथहोंमे तब पण देशा उन देवताओंसे यह वचम पोले कि ऐसाही होष इसके पीछे सक देवतामों में समुद्र विषास करनेनाले बरुण र निलकर । ९ । वेदोक्त कर्मके गोरा संणको जलोंका नापी डिमां फिर देवता लोप जलों के स्वामी धर्षणको अमि- का और पूजनादिक, करके अपने लाकोंको गयें तत्र देवताओं से अभिषेक किये यो परवान वरुप ने भी । पदी सागर नद और सरी' पतों को भी लिपिसे ऐसे पोपणकिया जैसे इन्द्रदेवताओं को पोपण करता है i१६ इसपीछे भलम्ब के मारनेवाले वडेनानी वलदेवजी उन तीर्थ मेंमा स्नान apointed by'gdds in the days of yore. " Varharupayan Rad, " Hote onrefolly'plant kopened in fornier dags : in the bøgtunitig of Sat-yug all tbe gods orite to Varun and said," You are lord of water: und you should save us from all fear as Indra duos. Lut your abut, be among acquatic animals. The Dotan wluch is lord of all rivers, will ubey somr cotnalands, and your 11sc snd.full tilldeyand outlia proon. Varun consented. And tho gods coming togetuer at rashire Haunt- 10. Thea thoy weut to their uru loud** #d Varud ruled over the ocean and rivers as lodra dus ovh pada Baldor bathed at that holy place and hasing givea Jurubels bta lord of waters. - (७१४५)-- Mahabhaatr 171449 श्यते यत्र शमोग. हुमाशन.। लोकालोकविनाशेष प्रादुर्भूते तदानघ । उपवस्थ खुरा यत्र सर्प लोकपितामहम् ।। १४ । अग्निः प्रनष्टो भगवान् कारणञ्च न विसरे। सर्वभूतक्षयो मा भूत् सम्पादय विमानलम् ॥ १५ ॥ जनमेजय उवाच । किमर्थ भगवा मग्नि प्रनष्टो लोकमायन विज्ञातम कथ देवस्तन्ममाचश्व ataa | R६॥ वैशम्पा पन उवाच । भृगा शापाश भीती जातवेदा प्रतापवान्। शर्मागर्ममथासाधननाश भगवात्तत ॥ १७ ॥ प्रनटे तु तदा पहनादेषा सर्वे सवासमा । मम्वैषन्त mat ज्मलन भानु निता. ॥ १८ ॥ तनतीर्यमासाथ शमीगर्भस्थमेक हिलिग तापसमानं यथाविधि।।१९॥देवा स नरव्याघ्र वृहस्पतिपुरोगमा। ज्वलन त समा साच प्रीतीभवन सपासधाः ॥ २०॥ पुनर्यवागतं जग्मु अभक्ष्यच सोभाता भगो शापामहीपाल यदुक प्रमादिना ।। २१ ।। तथाप्याप्लुत्य मतिमान प्रायोनि जगाल आचमन करके नानाप्रकार के धनका दानदेकर उस अग्नितीर्थ की गये।३। महापर कि देवतालोग सवलोकों के पितामह ब्रह्मांजीके समीप नियत हुयें और कहने लगे हे भगवन वहां अग्नि गुप्तहोगये परन्तु इसका हेतु हमनहीं जानते हैं। । १५ शमीगर्भ में वह गुप्तहोनेवाले दिखाई नहीं पड़ते हैं सोहे निष्पाप सब गुप्त प्रकट संसार के नाश प्रकटहोने में सब जीवोंका नाश न होप है "समर्थ इस में पाप भग्निको उत्पम करो । १२ । जनमेजय बोले कि लोकभावन भगवान् भग्नि किंस निमित्त गुप्तहये भौर किस रीतिसे उनको देवताओ ने जाना यह सवसान्त पाप मुझसे कहिये । १६ । वैशम्पायन बोले कि भृगुनी शाप से अत्यन्त भयभीत प्रतापवान भगवान् अग्नि जब शमीगर्भ को पाकर महाय हुये । १७ । त इन्द्र समेत सष देवता अग्निके गुप्तहोनेपर अत्यन्त दुःखी हुये और उस गुप्त होनेवाले अग्नि को अन्वेषण किया । १८। फिर अग्नि ताप को पाकर शमोगर्भ में नियत होनेवाले अग्निको विधिपूर्वक पूजन करके मामी देखा । १९ । हे, नरोत्तम इन्द्रसमेत वह सब देवता जिनके अग्रवी बहस्पतिमी थे उस अग्निको पाकर बहुत प्रसन्न हुये। २० । तदनन्तर अपने लोगों को गये Brahmana, proceeded to the place cuureciated to Agni, where the prids complained before Hrahma of the disappearance of Agusad, asked him to discover Agnt to save tho world from KUAT Janmejaya Ard, . tell me the cart of the disappearance of Agni and also haw the gods discovered.hum.." Vaishampayah said, “ Afraid of the curse of Bhrigu, Agai. disappeared. and Indra and other gods wera much distressed and made the Board loi hins Ti oy came to Aggi-tirti and discovereu huma biddema Sbarth Indra and other gals led by Vrhaupati merubah plodsed to find out Agar Thoy wont back to thor oko pincos eod again 15. tray . (17145) Gnds Parr गदाग [७१४१) ह। ससर्ज भाषान या सर्वलोकपितामह-०२२॥ताप्लुत्य ततो मला सादेः प्रभः पुरा समज तीर्थानि तथा देवतानां ययाविधि ॥ २३॥ तत्र स्नास्था प.पस्कार पनि विविधानि ! कोर प्रययौ तीर्थ या तक्या मानप; धनाधिपर समाप्ती गजषिलः प्रभुः । २५ ॥ तस्यमेव तं राजन्धनानि निषयालया। उपतम्युनरश्रेष्ठ तत्तीय लागली : ॥ २६ ॥ PRAT स्माया लिम पानामागे धनं ददौ । दरसे तत्र तत् स्थान कोरे कामना रुमे । पुरा पर तपमा विपुल मुमाहत्मना । पक्षराना कुरेण बरा लम्बाध पुष्कला'. । २८ ॥ पना धिपत्यं समास देणामिततेजसा । मुरव लोकपाल पुत्र नलकवरम् ॥ २ ॥ या लेप मामाधनाधिपतिरम्जसा । मभिषिक्रवाश्य व समागम्य मनः राजा वह अग्नि भृगनी के शापम सर्वपक्षी हुये उस तार्य में भी बलवादियों के कहने से वह पानी बलदेवनी स्नान करके ब्रह्मयोनि नाम तयको गये जहां पर कि सब लोकों के पितामह प्रभु भगगन् ब्रह्माजी ने । ११। संसारकी पूर्ण मामें देवताओं समेत उस कार्य में स्नान करके ।२१ विवि के अनुसार देवताओं के तीर्थीको उत्पन किया । २४ । बलदेवजी वहांपर स्नानकर अनेक प्रकार के धनोंका दानकरके कुरेर तीर्थको गये बड़े तपस्सी प्रभु कुमेरपीने वहां बड़ी तपस्या करके धनोंकी पिरता को पाया । २५। राजा सब धन और रनों की साने उस तीर्थपर नियत होनेवाले झुबेरजीके पास आकर वर्तमान ईहे नरोलम हलधारी बलदेवत्रीने उस तीर्थपर जाकर । २६ । विधिपूर्वक स्नान कर बाममों के भर्य धनदिया वहां उन्होंने कुबेरजी के उधम मन में उस स्थान को भी देखा जहार पचराट् महात्मा कुरेरजी ने बड़ी तपस्यों करके भेष परों को मात किया पा । २८ । सब धनों की निरता सेजस्त्री रुदजी के साथ मित्रता देवभाव लोकपाल का अधिकार और नलकूबर नाम पुत्रको पापा । २९ । महा शाम वही कुरजी ने ऊपर लिलये अभीयको पाकर उसी स्थान में मरुद्रणों becamo olldevouring by the cuite of Bhrigu. Baldor batbed thero and then proceeded to Brahm-yoni where Brahma had bathed in former Jays and crated a holy place for gods. Having bathed thero and giron donations, Baldev went to tbe holy place of Kuber where the latter had perfurmed asceticum and become the lord of wealth 25, The mines of all wealth and jewels came there to Kurer. Balder batbed at that holy place aod garo donations to Brahmans, Ho saw thero the holy place in the forest where lurer bait performed erroticism sad got toons of becoming lord of wealth, friendship with Rudra, gadhood, the pust of u loh pal and a son named Nalluvar. Thero Kurer got tho aloru boons aod was adointed by Jarulas 30.
(७१५) Mahabharat (71407), ॥ ३० ॥ वाइन नाम तहतं मुसंयुक्त मनोजयम् । विमानं पुष्पक दिव्यं नैश्वर्य मेव च ३१ ताप्लुत्य बला राजन् दत्वा दायांश्च पुष्कलान । जगाम स्वरितो राम तीर्थ श्वेतानुलेगनः ॥ ३२ ॥ नियंत्रित सर्वसत्त्वेनाम्ना पदरंपाचनम् । नानांकफलों पेतं सदा पुषफल शुभम् ।। ३३॥ * इति गदागदपर्वणिः वलदेरतीर्थयात्रायां सप्तचत्वारिशोध्यायः 7 . समेत अभिपेकोभी प्राप्तकिया....... और उनको नेतनाम, राक्षमोका.. राज्य और वह दिव्य सवारों दीगई जो कि इसों से, सेवित मनके ममान शीघ्र गामी पुष्पक विमान है ! वलदेवजी; वहां स्नान करके उत्तमदानोंको देकर शीही सोतानुलेपन नाम निर्यिको ग- १२॥ जो कि सबप्रकार के जीवों से, सेषित अस्य-प.शुभ और सदैवः फलफूल,रखनेवासा बदरपाचन नामहै..३३ Sarita As... He ras, made the ralec,of rakshases and got a'diyino car drawa by, BADS, swift,like the mind. Budey bathed there, and having givendonations, proceeded to Shwetapulepan-tnth high abounds in all shits of bimnijs as well as fu.ts und flowers and is known as Didarpa chadi.33:31 3711;. r . . । JUM - (7147), Eada Parva शम्पायन उवाच। ततस्तीवर रामो यो कदरपाचनम।। तपस्थिविदधारित यत्र कन्या तक्ता भारद्वाजस्थ दुहिता रूपेणाप्रतिमा -मुषि। भ्रषावतीमाम PART माग ब्रह्मचारिणी ॥ ततधार सात्युम नियमहभितार माना राजस्पादिति निश्चित्य भाधिनी ॥ ३ ॥ समास्तस्या प्रतिकारता वहत्य कुरुकुलाबह सारा निगमांस्तांस्तान खभितीमार मुश्चतर ४ तस्वस्तु तेन, वृत्तेन, तपसा nिi मम्ब परया पाकशासनः भाजगामाश्रयं Arriagain. it रूपं विशिष्ठस्य महामतः ।। ६. सा.तं पE नाचारमुनिभिदियः पूजयामास मारत उaiinnertiमादा मनमुनिशाल-किमामापयास प्रमो सर्षमा यथाशविता दास्यामि सुनतःशभक्त्यान ते पाणि न दास्यामि कथन प्रधतियश्चैव तपसा, चातपोधन., शकस्तोषयितव्यो वे मया त्रिभु अपाय ४८ER: वैशमसायन बोले कि इसके पीछे वलदेवजी तपस्वी और सिद्धलोगों से सेरित उसा बदरपाचन नामाचतम तीर्थकोगये जहॉपर शारी ::| भरमान ऋषि की पुत्री सम में भीपर: अनुपम कुमारी, ब्रह्मचारिणी.। २ । बहुत नियमवाली वनस्त्रिी श्रुतावतीनाग कनमाने यह निश्पकरके कि देवराज इन्द्र मेरा पतिहोय; माउन तप किया। काररुप लियो समेत उनती महायता करने के योग्य लियों के करने, उमाके सौर्ष व्यतीताये। राजा भगवान इन्द्र उसके उस पलन भक्ति और सपने मतमहुषे ।।५. देवराज प्रभुइन्द्र महात्मानमवसिष्ठ जीके रुपकों,धारण करके उसके माधम में आये। । इभरतवंशी उसनेउन उग्र सपसीपस्त्रियों में श्रेष्ठ पसिनी को देखकर मुनियों से सीखेहु भाचारों से उनका पूजन किया और पड़ी.नम्र मधुरवाणीसे वह निगम धर्मवाली कल्याणीयह पचमबोली हे प्रभु भगवान मुनियों में श्रेष्ठ आप क्या आझाकरतेहो ।८। हेमन्दर व्रतवाके भव में इन्द्र के प्रभाव सामर्ष के अनुसार जो आप चाहेंगे सो सब बूगी परन्तु किसीदशा में भी तुम को अपना हाथ न दूंगी। १। तपोपन तानों CHAPTER.X4VIII.:: Vaialiampayan said...] Thon : Buldow, went to. Badarpackno, attended by Ascetice and sidhas, Where, the daughter of Bharadwaje; amaiden of matchless, buauty. •named Shrutivitive and Terformed sayare asceticism to make lndra aor spornea. Shes, remained .engaged ia aaceticism for a hundred, genre. Indra was pleased with lier tap.behaviour and dovotion. S• He coms to ther. herujtage in ther/ likeness of Yaebishith aud sho respected: bim like a rishi. Suo said to him in a spect voice, " By the favour of lodra I can give you crery Mahabhaat (71403 पा. १०॥ इत्युक्तो भगवान् : देवः स्मयनिष निर्गस्यताम् ! उवाच नियों बाबा सामिष भारत ११ ॥ उमं तपश्चरसि वै विदिता मेसि संपते । यम समारम्मत याणि हद्दतः ॥ १२॥ तहत सर्व यशाभूत भविष्यति बरामने पंसा: लायते सबै मतपसितिष्ठति ॥ १३॥ बानि स्पानानिदिष्यामि विधान शुभानने। तपसातानि प्रामाणि तपोमल महत सुखम् । १४is करवा तपों घोर देह सम्परा मानवाः कल्याणि भणयों मम ॥ १५ ॥ पञ्चतानि भगे: पनि एमाते । पचायुपका तु मंगान जंगाम बससूदनः ॥ १६॥ मामऽय तातु' रूपाणी ततो जय बापस । अविरे ततस्माभिमाचीर्य मुचमम । तीर्थे तिषियात त्रिषु कोकेमा ॥१७तस्य जिवासनार्थ स भगवान पाशा 'भुक्नीक कर इन त नियम और तपस्या के द्वारा मुमत प्रसन्न करने योग्य है। भरतवंशी इसपकार के बचन सुनकर भगवान देवता मन्दमुस कान करताउसको देखकर और उसके नियमकोमानकर वह मधुरवाणीसे पहवचन पोलाश मुंद व्रतपाली कल्याणिनि मुझको वह सब विदिती जिस प्रयोजन के निमित्त यह कर्मका प्रारम्म तेरे विचमें वर्षमान हुआ और उन्नतप को रती १५. हेमुन्दरसुती जैसा तेरे पित्त में विधारमा बहसमा और मातेने विचार किया है या तपस्या के दाग पाहताहेशुभमुली से कि देवताकों के दिव्य लोक में वह तपसे प्राप्त होने के योग्य है बड़े एखकाल तक 1.४कस्यापिनी इस प्रकार मनुष्य घोर तपस्या करके अपने शरीरको साग कर देखभाष को पाते हैं अब तू मेरे बदन को पुनःसन्दरमत और ऐसपासी इन पांच वदरीफलों को पकाको भगवान इन्द्र इतना करकर चलेंगये। १६ । और उम ने भी. उस कल्याणी से पूछकर वहाँ जपको' नपा इस के पीछे उस माभन से थोड़ी दूरपर वह उस वार्थ वानोलोकों में इन्द्रतीर्थनाम से प्रसिदमा thing you desire with the exception of roy band. I am pleasing Indra rith. my devotion. 10. „Sodra was pleased with her conduct and with a sinila hewiid tu her, " I know all that passes within thy.heutt and the purpose for which you sro performing asceticism, Tho desire! of your heart will bosc omplished. Sul thingy are obtainable through naacsticism:nlone. The divine regions are obtainuble through asceticism iwhich is the rout of all lappinues Through it people become godowbén Ishoy loava their bodios. Give your mind to what I say`aod'cook thiese fivo jujube fruite which I give you." having said this, India wept away. 16. He too, performei aceticism in the vicinity and the placo was known as Indra-tirth. To beat her steadiness clie atbpped ॥
+ (7149% Gada Parr गदापर्व बदराणांमपयन अकारविवुधाइप. ॥ १८ ॥ ततः प्रतता सा राजन् वाग्यता विगत क्लमा । सस्परा शुचिसम्बीता पावके समाधयत् ॥ १९ ॥ अपवद्राज शाईल पर गापि महानता । तस्या पचन्या. मुमहान काळोगात् पुरुषर्षभानेच सातायत दिनच क्षयमभ्यगात ॥ २१ ॥ हुताशनेन दग्धश्च यस्तस्या. काठसम्धयः। अ मान सारवा पशरीरमयादाद । २२। पादौ प्राक्षप्य सा पूर्व पाव चारुदर्शना। दामोधी पुनः पादानुपावर्सयतामा ॥ २३ ॥ चरणी दह्यमानी च नाचिन्तयदनि दिताः। कुर्वाणा पुष्कर का महर्षिप्रियकाम्यया ॥ २४ ॥ न वैमनस्पं तस्यास्तु मुखम दोषपामवत् । सवारमानिनादीय जलमध्येच हर्पिता॥२५॥तच्चास्था वचन नित्यमय पि भारत । तया पदरापेव पक्तव्यानानि करयका ॥२६ ॥ सा तन्ननसि कृत्वा मानं शुमा । अपनदराच्यष न पापण्यात भारत२७ ॥ नस्वास्तु चरणी ।१७ हे पहाई देनेवाले उस देवरान भगवान इन्दने उसकी परीक्षाकलिग वदरफों | का परिपाकहोना बन्द करदिया १८ हेराजा तब वह बड़ीतएम्विनी वार्तालाप में चतुर पकापरसे दिख उसमेंही प्रवृत्त परिव शरीरवालीने भग्निमें लकड़ीरक्खी ९ समायों में श्रेष्ठ बमबड़े ब्रतमाली ने उन वदरफलोंको पकाया । २० । और परिपरप करतेपे उस पकानेवालीका बहुत समय बतीतहुआ पर वह फल नहीं पके और दिन समारोमणा । २१। इसका नितना इंधनका देस्था वा सब भग्नि में भस्महोमपा फिर उसने श्रीनको इंधनसे खाली देखकर अपने शरीको भी भसा करदिया । २२ । प्रथम अपने दोनों चरणोंको अग्निमें डालकर फिर उस | निष्पाप मले ये परगोंको आगेआगे बढ़ाना प्रारम्भ किया महर्पिकी इच्छा से कधिन कर्म करनेपाली निदपिने जलतेहये चरणों से कुछभी दुःख से चिन्ता नहीं की रोंके जलने परभी उसके चित्तमें उदासीनता और रूपान्तरता नहींई घरीरको भाग्नसे ममालित करके जलमें वर्तमान होने के समान प्रसन्न थी । २५1ो परतवंशी उसका वह पचन वारम्वार हृदयमें वर्तमान हुआ कि सब दशा में वदरफल पकाने के योग्याहैं उस शुभकन्याने ।२६] महार्प के उस वचनको विध नियत करके बदइफलों को पकाया परन्तु वह नहींपके । २७ । भगवान the cookiog of those fruits She continued to put one stick aftor anothor into fim to cook them. 20. Nuch time was lost but the fruits were not coobed till it was suneet. All her store of fuel was oxhausted and thon she began to buro her own body. Bho put her Hogs within fire and they burnt gradually, yet shr was carelets of the pange. Her features did not alter under the tral and the was cheerful as if her body was within water. 25. Indra's words, to the effect that she aliould cools them under all conditions. She coked them ca but tu no purpuse Ble remembered Fire Lurot ber [७१५.] Malinbharat (7150) बहिनदार भगवान् स्वयम् । म प तस्या मनो दुखं स्वपमध्यभवत्तदा ॥२८॥ मय सत् कमेनास्याः प्रातखिभुनेश्वरः । ततः सादर्शयामास कन्याये पमात्मनः॥२९॥ उपाय सुरभेस्तो कन्यां मुहानताम् । प्रीतोस्मि ते शुम भक्पा तपसा नियमेन, ॥३॥ तस्मायोगिमत कामः स सम्परस्पतशुमे । त्यस्ता महामागे विदिये माय बरस्यति । ३१ ॥ष ने साधा हिधा लोके भविष्यति । स पापमाप मन माम्मा पायाम : विक्यात त्रिषु लोकेषु प्रातरिभिरभिदुतम् ॥ ३२॥ मास्मिन बलु मामा शुओं तीवोमरे । यथा सतर्पयो समुसितमरुन्धतीम् ॥ ३३ ॥ सतत महामाना गया तम मुशंसिताः । सूरयर्थ फलमूलानि रमाइपयुः किस MY पर्षिता तग बसता हिमवतने । गनाहरिनुपाशाता द्वादशवाशिकी' ॥३५॥ ते रुत्वा पालम तासात तरिक्षमः । भइन्वरपति पत्पाणी समोनिया ममता “३६ मधनी सोच्दा त निपममारिपताम् । पारमत्रिमपन: भनिने मार उसके परचोको गलामा तपमी उसके पिसमें किसी मकारले दाख को लक्लेश नहीं हुमा । १८ । इसकेपछि तीनों भुवनका ईश्वर इन्द्र यसफे को, देखकर प्रसनभा और अपना मुख्यरुप, कसको.दिरापा ।२९। और साद प्रतवाली कन्यासे बोले किसमे मैं तेरे निपम गदि और तपस्या मसन । ३० । हे दर्शन भर चेरा भभीए सिद्धहोगा। महाभाग तू इस शरीर को सागरके स्वर्ग में पेरेसाप मुखपूर्वक निवासकरेंगी ।।१। खुम्परशुटीगाली यह तेग वदरपाचननाम म ती सवपापोंका इरफरेनवाला लोकमें विरूपात होकर नियतहोगा जो कि सानोलोकों में विख्यात पौर बसालियों से सब- मानद । ३३ हेमाभाग निष्पाप निएप करके इस धन और दम तापिर सप्तर्षि अरुन्धतीको त्यागकरके दिमालय पर्मतपर गये।इसके छिपाको महा- भाग तेजप्रतधारी वहा भाकर मानीरिता के निधि र फलमूहों के लेनेको पहा हो या उसहिमालयके उनमें उनतीदिशा प्रभिती ऋषियों के निवास करनेपर पाएका दर्भित वर्तमानमा । २५ सय बद साबपत्ती पहा मा श्रम को पनाकर व्हरे उस समए ६ करयाणिनी सान्ती भी संदेहा Teot, but alio did not give up her object. ludra wts pleased with her derotion and oliqod himsifia bis.true form, ragiog, "I am well pleased with thy dusotion 30. Thy dea ro will be accomplished. After leaving your body you will livo boppily with mo in bcated. This boly place will be respected by all tbo world a Bedarpapbud. leo the seven rubia lelt Arundbuti and wept up the Himalayas, to perform ascouciim ad lived there, casing (ruitaWhile thoy mero iiring thers. siwena genre krere famino took place. 35. Thokaven Baotion continued to live thoro in a hormitage, whilo aropdhati me - (Tial) Gada Part 18 [७१५१) मुपीतो परदस्तदा ।। ३७ ॥ ब्राझं पं ततः कृत्य' महादयो परायणः । तामध्यत्यार परियों मिक्षामिच्छाम्या शुभे ॥३८ । प्रत्युषाच ततः सा तं ग्रामणग्या दर्शना। क्षीणोऽसयो विप्र बहराणीह भय ॥ ३९ ॥ ततोऽधीमहादेवः पानि माते । इत्युका सापसतानि हामणप्रियकम्पपा ॥ ४० ॥ अधिश्रित्य समिनो स्विनीविन्या मनोरमाः पुण्या कथा शुभाव सा तदा । भतीजा सा खना परिवार वावरावार्षिकी ।। ४२ ॥ मनाया पश्चात्या भ्रूण्यन्याय ON THI दिनमः स तपास कालोसीतः मुवारुणः ॥ ४ ॥ ततहते मुना मामा फलाम्यादी पर्वतात ततः स मना मातः प्राधाचारग्धती तदा ॥ ४४ ॥ उपस धर्मज्ञ पथा तपस्या करने में प्रचहुई । ३३ । फिर अरुन्धती. को तो नियम में नियतवेस कर अत्यन्त प्रसनमानि सबबरों के देनेवाले शिवजी महाराज आपहुँचे. । अर्थात बड़े पशवान देवता महादेवजी वामगका रूप धारण करके उसके पृष्ठ भाग,में जाकर बोले कि कि हे शुभस्त्री में भिक्षा को चाहनाई ।।८। तवजसमन्दर दर्शनने रस, बामणको उत्तरदिया कि हे वेदपाठी ,अनाजकाटेर नाशहुमा या आप. बदरफलों को भक्षणकरो । १९ । यहात पुनकर महादेवजी ने कहा कि मुन्दरबत तुम इनवदरफलों को पकाओ इस मकार शिवनी के वचन को मुन कर उस प्रशस्विनी ने बामण के हितके लिये उन वदरफलों को प्रकाशित भग्नि पर चढ़ाकर पकाया मौर, चिचगेचक धर्मकी बाद के अनुरूप दिप कथाओं को भी मुनाया उतने अन्तर में वह बारहवर्ष का दुर्भिक्ष समाप्त हुमा ४३॥ उस भोजन न करनेवाली और शुभकथा सुनानेवाली अन्यती का का बड़ा भयानक समय एक दिन के समान व्यतीत हुआ। ४३ । इस पर मुनियोग- पर्वत फलोको लेकर भागये इसहेतुसे वा प्रसमचित्त भगवान शिवभी. अरुन्पती से बोरे ।।४ कि. भर्मकी. जाननेवाली में सेरे धर्मरूपी ता और नियम से मसभा भन तुम प्रधमकै समान इस मषियोंके पासजाओ। १५ । तदनन्तर "opgaged in performing asceticiana. Shis was pleased with ber dera. tion and himself came to bor in the form of a Brahman.' Ho came to hot from behind her back and begeed alma, 38.' The besutiful womal said to him, “Our store of grain is exhausted, you may taka pluma to eat." At this Mahadev asked her to cook them oud-she, put them on fire. Vbi: the plums were thas being cooked, sho entertained the guest with: religious stories till the-tholva yrass faping bad disappeared. 42. She passed the dreadfully long time litesday. Then the munia came down from the hillar with frute and Shir, much pleased wid to Arundhati," I am well pleased with they recoticiam, " He mentioaed the dood to the rabis, saying." Your - (१९५२) Mahabharat, (1715 पूर्वमिमानूनि ।प्रीतोस्मि तप धर्मझे तगमा नियमेन च ॥४५ Ad: सन्दर्शयामास स्वरूपं भगवान, हरः । प्रोवामीत्तदा सेगस्तस्याश्च धारेत. महत् ।। ४६ ॥ भवानी माप तप समुजितम् । अस्थाय पत्तपो विमान समं तन्मते मम , भनयः दि तपस्विन्या हलतं सुभाम् । मनश्मान्त्या पडल्याश्च च समा बादश पारिता ॥४८॥ ततः प्रोवाच भगवांस्ताभधारुन्धती गुन । वरं वृणोवा, कल्याणि यभिलषितं इहि ॥ ४२ ॥ सामजीत पृथुताम्राक्षी देवं सप्तर्षि ससदि । भगवन् दिमे माननधि र पदिदमुत्तमम् । ५०० सिद्ध देवर्षिदनितं नाम्ना. बदरपावनम् । तथा स्मिन्दधदेवेश त्रिपात्रमुषितः शुचिः । प्राप्नुयादुपचाप्लेन फलं, बादशयाशिकम् ॥ ५९॥ पास्थिति तां देधः प्रत्युवाच तपस्विनीम् । सप्तर्षिभिस्तुतो देयम्लतो नाक पयो मदा ॥५२॥ ऋषयो विस्मयं जग्मुस्तं सपना चाप्यरुन्धसम् ि। अश्रान्तम्चाविषणों झालपासासीम ॥ ५३ ॥ एवं सिविः परां प्राप्ना अन्धरया विशुद्धया । यथा भगवान् हरने अपने कपका अच्छे प्रकारसे दर्शन दिया और उसके बड़े कम्मको धषियोंके आगे वर्णन किया ।४६ कि आपलोगों ने हिमवान पर्व पर जो सप पाकिया और इसकामी हो तपई हे बामगों वह तुम्हारा तप इनके तपकी समान मेरी बुद्धि से नहीं है । ४७ । इस तपासनी ने वही कठिनतासे करने योग्य को पाठे इस भोजन न करनेवाली और वदा पकानेवालो ने बारहवर्ष व्यतीत कि । ४८ । इनके पाछ शिानी अरुन्धती से फिर वोले कि हे कल्याणिनि जो तेरे हृदय में इच्छा होय उगवरको मांगी। ११ तब वह रक्त और दोष नेत्र रखनेवाली मान्यतो सप्तर्पिगों की सभा में देवता शिवजी से बोली कि हे या नान जो आप मुझपर प्रसन्न तो यह तीर्थ अपूर्व होजाय । ५० । अर्थात् सिद्ध देवर्षियोंका गार। बदरपाचन नाममे विरूपात होय हे देवेश इस प्रकार से. इस तोपर तीनरात्रि निवास करने राला, पवित्र मनुष्य बत के द्वारा बारह वर्ष मनके फल को पारे ! ५१। तर देवता ने उम तपस्सिनी 'अरुन्धतीस कहा कि ऐसाही होय तदनन्तर ममागों से स्तूयमान होकर देता शिवजी स्वर्ग को गये । ११॥ अपियों ने भी उम भरुन्ती को देखकर बड़े आश्चर्य को पाया जो किया बट में रहित विपरीत रूप और सुधा पिपासासे युक्तथी । ५३ । इसी से उस A 40-leciona ou tho back of the Himalayas was not equal to that of this WOMAN. 47. She las performed a severa ascsticism and passed tirelve yeara in cuuking the plume," "Thua turning again to Arundhati, Ssie said, " Ask ung biyen you do-ire." Then sbo of large and rod esetaked Shir in the midst of tre sexen risinís, “ If you aru kind to me, let this holy place become , unatohloe Lot this place bạ knowa su Badaipaban tha lavottito resort of sidhas and sagesaad onu rewiding hersithree nights. get tho ment of observings twelrs years Ton..
T15s) Gads Part गदापर्य सपा महामार्ग मदर्थं शीतवते ॥ ५५ ॥ विशणे हि त्यया भदे प्रोयस्मिना सारी तो सपा चद.ददाम्यद्य नियमन मुतौषितः ॥५६॥ अरुन्धत्या वरस्तस्या यो इत्ता महारमना । तस्य पाह प्रभावेन तथ फल्याणि तेजसा । प्रवक्ष्याम्यपर भयो दरमन चाविधि ॥ ५७ ॥ यस्त्वका रजनी तायें वत्स्यते सुसमाहितः । स स्नास्वा प्राप्स्यते लोकारेण्यासात् मुदुर्लभान् ॥ ५८ ॥ इत्युक्त्वा भगवान् देव. साम्राक्षः प्रताप पार । भुवावती तन पुण्यां जगाम त्रिदिवं पुनः ।। ५९ ॥ गते बनधो रागंलाई पात हा पुलाणा मरतधेष्ठ विव्याना पुण्यगन्धिनाम् ॥ ३० ॥ देवदुरदुमयवापि नदुसत्र महारषनाः | मारना वो पुण्यः पुण्यगामी विशाम्पते ॥ ११ ॥ पश्यतु मादेश जगामेन्द्रस्य मायनाम् । तपसोण तं सदावा तेन रेमे सहायुना ॥ १९ ॥ जनमेजय उवाच । का तप्पा भगाम्माता क्य संघसा व शोभना । श्रोतामेव्याम्य अस्पत पवित्र अरुन्तो ने वो मिद्धिको पाया है स्तुतिमान अमावुक बहाभाग करमापति जिस प्रकार से कि तुमने मेरे निमिच इसवत में आधेकताकरी । ६५ । वयामिनि इसमकारके तेरे नियम अत्यन्त प्रसन्न होकर में यह पुरु पर नुसको देताई ५३ । महात्मा शिपनी ने जो वर उस भरुन्वती को दिया हे करवाचाने में उसके प्रभाव और तेरे तेजने यहां विधिपूर्वक श्रेम वरको फिर बाताएं। ५७ । अर्थात् जो अत्यन्न साधान मनुष्प एकराषि इमतीर्य में निवास करेमा वह स्लान के फलते अपने शरीरको त्यागकर बड़े दुष्पाप लोकों को पायेगा 1५८ माराम भावान इन्द्रदेवता श्रुनावती को यह वचन कहकर अपने परित्र स्वर्मको बो। ५५ भरतर्षभ राजा जननेजप वजधारी इन्द्र के गाने पर इस स्थान में पवित्र मुधव दिग पुष्पोंची वाहुई । ६० 1 और बड़े शब्दों से देवता पाने बुनुभो बनाई और पवित्र सुगन्धवामी शीतल मन्दवायु चली 14 और उस पीने इन्दका बीभाषको पाया हे अजेय बहसी उग्रतपो दस सप्तको पाकर उसकेसाथ क्रीड़ा करनेवाली दुई । १२ । जनमेजय बोलाई भगा उसस्ती Shiv granted bor the bowa and being praised by the bosen rishu want to heaven. The fishia were astonished at the conduct of Arundbatı who wanafiicted with hungac and thirst, Thus Arunslhatu gos. Staat përfuation and obarad a Tuw itke you. 53, Bung pleased with thy &uosticisin I give you ag un the boon which Shu hud granted bufore, He who will stay bero foc one night, will gair regions difficult to attaia by others." Having said this to g'urutyati, Indra went to begrep At the departure of ladra a fragrant breeze blew. the gods boat celestial drums and the air was cold and tiagrant. 61. The woman become ledra's wife and lived happily with hurts Jana wojnya sud," I wish to know the name of her mother and by whom । 'TH- Mahabharat (715) विप्र परं कौतालहि मे ॥ १३॥ वैशम्पायन उवाच । भरवाजस्य विमर्षे का रेतो महारमन रिष्ट्रवारसरसमापान्ती प्रताची पृथुशोचनाम् ॥ ६४|| स तु बनाइ तदेता करण अपताम्बर । तदापतत पर्णपुटे सत्र सा त्वमवत मुता. ॥ ६५ ॥ तत्वावजात कर्मादि करवा सो तपोषन । नामधापा सकृतवान् भरद्वाजो महामुनि ॥ १६ ॥ । अभावतीति पारमा देवर्षिगणससदि । स्टेप तामाश्रमे न्यस्पोजगाम हिमबहमम ।। ६७ ॥ तत्राप्युपरप्राय महानुभाषो घमूनि दत्त्वा महाविजय । जगामधी मुसमादितारमा शस्य वृष्णिप्रपरस्त दामास ।। ६८ ॥ इतिगदायुदपर्वणि वळदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने अष्टचत्वारिंशाध्याय ४४ ॥ - की माता कौनयी और उसने कहां पोपणपाया हे द्विजवर्य मुझको धनने का पड़ा उत्साह है इस ये उसको आप वर्णन कीजिये । ६३ । वैशम्पायन बोले कि वढे दिव्यनेपाली एकसमप भातीहुई घृताची अप्सराको देखकर मामा ब्रमर्षि भारद्वाजली का वीर्य पतन हुआ । ६४ । और उसजापकों में बो भेष्ठने अपने गिरेहुये वीर्यको दायर्मेलिया तब एक दोनो में गिरपड़ा उस में यह कन्पा उत्पबई १६. उस महामुनि तपोधन भारद्वाज घुनि ने जातकर्मादिक सब कियापों को कर उसका नामकरणकिया । १६ । धर्मात्माने देवर्षियों के समूहों की सभा श्रुता पती उसका नाम रखा गसको अपने आश्रम में छोड़कर हिमालय के पनको मये । ६७ । तब वह महानुभाव वलदेवजी वहाँ भी स्नान माचमन करके बहुतसे उत्तम बामगों को धनोंका दान देकर चित्त से बड़े सावधान होकर इन्द्रके पामराय।६५ she was broughtup. ' Vaishampayan sand, "At the sight ol beautiful Ghritachi the ansara, the semen of Brahmrishi Bharadwaj fell down He took it up and kept 16 in a vessel made of leates where the girl was born. The muni performed her ceremonies of birth and naming He namod her Sbrutayatı and went to the Himalayas to perform Anceticism, leaving the gul u the hermitage. Baldev bathed at the place and sipped of its water Hegaye there large donatwps and then went to Indra tirth "68.
Gada Pare गदापर्व (७१५५) सपा । इदतीय ततो गत्वा यदूना प्रबरोवली । विमेयो धरला मिरो स्मास्या यथाविधि॥ ॥ तत्र अमरराजोऽसायोजे ऋतुश च परस्पर भनी विपुलधनम् ॥ २ . मिगलान् सरस्थान सर्वान् विविक्षिणान् । ANTIC न योकान् वेदपारगः ॥ ३॥ तान कतून भरतभेष्ठ शतकृत्यो महा पुतिः। प्रामास विधिवतः स्यात शतक्रतुः ॥ ४॥ तस्य नाम्नाव जीपशि सना । तीर्यामीत त्यात सर्व पापप्रमोधनम् ॥ ५॥ उपस्मृत्य व तजाति विपिषमुलायुधः। मामणान पूजयित्वा च सदाशवनभोजनैः । सायबर HARITA अगा| ६॥ यत्र राभो महामागो मार्गपः सुमहातपाः । सरुव प्रविधी ािरतमनिष पुङ्गवाम् ॥ ७ ॥ उपाध्याय पुरुस्करय कश्यपं मुनिसत्तमम् । मायेन सोनमेषशतेन च । प्रददौ दक्षिणाषि पृथिवीं वे ससागराम ॥२॥ अध्याय ४९॥ बम्दापन ने कहा कि इस के पछि यादषों में प्रत्यन्त श्रेष्ठ बलदेवजी ने इन्द्रता माके उस में विधिपूर्वक स्नानकरके ब्राह्मणों निमित्त धन रत्नादिकका दान किया। ।। यहां पर उस देवेन्द्रने सौ यह से पूजन किया था। तब उस ने हस्पतित्री को बहुतमा धनाया था । २ । अर्थात् वहां इन्दने अर्गला रहित पार्यों मनेवाल नानाप्रकार के पन और दक्षिणा रसनेवाले यज्ञों की वैसी ही तैयारी करी जैसी कि वेदों के पूर्णज्ञाता ऋपियों ने कहो।।। भरतर्षभ बड़े रोजस्ती इन्द्रने उन यहों को सौवार विधिपूर्वक पूर्ण किया इसीहेतु से उसका नाम यता मसिद्ध हुआ।४।स के नाप से यह तीर्थ जो कि कल्याणरूप | धर्मकी दिशतु सब पापोंसे छुदानेवाला और माचीन है इन्द्रतीर्थ नाम विलावरमा । ५।'मुशलधारी यलदेवजी बहामी विधिपूर्वक स्नान आचमन कर के भोजन बसादि से भामणोंको पूजकर ६१ वहांसे उस रामतीर्यको गये भो कि तीयोंमें अपम और एमई और जदपिर महाभाग भार्गवपरशुरामजीने बारम्बार CHAPTER XLIX Taiobampayan said, " Then Baldev the best of Yadavas went to the holy place of Indra and baving bathed thero, gaye dupations to Brahmaur. There Todra had performed a bundred sacrifices and given kreat wealth to Yribiashall. His sacrifices wero performed in accordance with the dictatos of the rishie who know the Vedas. Ho performed a bugdred facrifices and was therefoie boots as Sbata Intu. Tbo holy place where he performed those sacrifices was kaosia s Indra-tirib. 3. Bolder bathed and Sipped water tbero and har jag girea food und roimeats to Brahmans, proceeded to Repetirta, the best of holy places wbers Paraburam performed a hundred Axborokibs and gave the whole and, which he bad conquerad (71180 Blahnbliant दषा व दा विविध मानारत्नसमन्धितम् ।सोहास्तिकदासीक सामाविगतमा 'जनम्॥ १० ॥ पुण्य तिथिधरे तत्र देवमपि सेपिते ! मनीषामिवाधाप agrat : मागतम् । ११॥ यत्रानयामास तवा राजस्प माप । पुत्रोदितमहामागो, दो, सिवममः ॥ १२ ॥ अत्र निजित्य संग्रामे, मानुपान देवतालया ! गधान राक्षस अपयका प्रथिवीपते ॥ १६॥ बरं कृतं समाब परुणः परपरिधा। तमिर कमरे पत्ते सप्राम. समजायत् । देवानां दामयानाञ्च लोक्यस्य मयापरः ॥ १५ ॥राज सूरतुरे निवृत्त जनमेजय । बायते सुमहाघोरः समाम अत्रियान मलि १५६. तापि कांगला देव ऋणीनपाच्य पूजया । इतरेयोप्पदाहानमान्य कामो विभुः ॥१६॥ धनमाली ततो पुए स्न्यमानो महभि । तस्मादादित्यतीर्यनाइमाम म लेमणः ॥ १७॥ पत्रेदशा भगवान ज्योतिर्भास्करो गजसनम । ज्योतिमाधिप उस पृथ्वीको जिसमें कि उत्तम २ क्षत्री मारेगये विजप करके 11 मनियों में श्रेष्ठ | उपाध्याय कश्यपजीको आगेकरके सौ मध्यमेषों से पूजन कया और समुद्रौसमत सब पवी को दक्षिणा में दिया !! नानापकारके रत्न गौ बाषी - पोहे वास दासी और भेड बकरियों से:यक बहुत प्रकारके दानोंको देकर बनकोगये।।। यहां पवित्र और भेट देवर्षियोंके गणोंसे सेवित तीर्थपर मुनियों को दएडयम करके यमुना तीर्थपर गये । ११ । राना जहां पर भादीत के पुत्र महाभाम पर्ण वहमने गम्य गड़को प्राप्त किया । १२ । वहां शत्रुओं के बारों के . पारगेमा के वरुणने राजमूर्य यज्ञको प्रात । १२ । शत्रुओं के वीरों के मारने पाणनेः युदमें नरलोकवासी जीव और देवतामों को भी विजय करकं उत्तम बाकी तैयारी की। १३, उस उत्तम यश जारी होनेपर देवता और दानवों का वा युदजारी हुमा जो कि तानोलोकके भयको उत्पन्न करनेवाला था। १४ जनमेजय यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय के सगत होनेपर क्षत्रियों में बड़ा घोरयुद्ध जारीमा वा भी अभी वातुओं के देने में समर्थ वलदेवजी महर्पियों से ग्तुतिमान होकर वहां after slaying the kisbatr; as, to Kashyap and other Brabmany. With it be gave away jewels, cows, elephants, hoires, slaves, sheep, goats and other things and then went to forest 10 Having bowed down to the pois of the place he proceeded to Yalpuna-tirth where Aditi's Bon Varun kad performed a Rajsuya sacrifice after con quoring buman beings and gods. At the communcement of that sacrifice there ongued a war hetween the gods and Datjavas which was the terror of the three worlds. At the end of that sacrifice there was a dreadfui war of kshatryak. Ba dov gave donations there and being praised by great uskos proceeded to Aditya-tarth where Surya had performed ascoticism and become the chief of luminous bodies. Indra and other reda." as, Marutas, sandharvas, apsaras Vgae, Shukder, (71571 Gada Paiv nerad 'प्रमाचाप्यपचत ॥ १८ ॥ तस्या नद्यास्तु तीरे सबै देषा' सोसपा विश्वेदेवा' समकता गन्धसरसच १९ ।। द्वैपायन: शैकश्चव कृष्णश्च मधुसूदन यमान राक्षसांधवाषिशासाश्च विशाम्पते ॥ २०॥ एते चान्ये च वहयो योगसिबसिंह तस्मिस्ती सरस्वत्याः शिषे पुण्ये परन्तप ॥२१॥ तत्र हत्या'पुरा विष्णुरसुरी मधुकैटमी । आप्लुत्य भरतश्रेष्ठ तीर्थप्रवर उसमे । २२ ॥ वैपायमश्व धर्मात्मा त मालत्य भारत । समाप्त परम योग सिविध परमां गताः। २३ " असितो देवळ अषतस्मिन्नेव महातपाः। परमं योगमास्थाय ऋषियोगमवांतषांन ॥२४॥ SE.THERE .... इविषदाइरपान व देवर्षियात्रायासारसतोपाख्याने एकोनपञ्चाशाध्याय ४९ । ."4", मादित्य नाथको गये । १७ । हे राजर्षभ 'जहाँपर ज्योतिरूप भगवान् मूर्य ने पूजन करके प्रकाशित पदार्थों के राज्य और भावको पायो । शानुसंवापी राजा जनमेजय उस नदी के तटेपर, इन्द्रादिक सब देवता विश्वे देवा मरुद्गल गन्धर्व अप्सरा । १९ । व्यासेजी, शंकदेवजी मधुदैत्यसंहारी' श्रीकृष्ण 'नापेक्ष राक्षस और पिशाची निवासी हुये २०। यह और अन्य पवित्र तीर्थ सरस्वती के उस कल्पानारूप पवित्र तीर्थपर योग मिद्धहये. २१॥ हे भरतर्षभ पूर्व समय विष्णनीने मधुकैटभनाम दैत्यको मारकर उस अत्यन्त पवित्र तीर्थ में स्नान करके । २२ । और व्यासजी ने भी नहीं स्नान करके परम योगको पाकर 'सिद्धी को पाया । २३ । वड़े तपस्वी असित और देवलने मी उस तीर्थपर परम योगमें | नियत होकर ऋषि योगको पाग २४ ॥ r ...: ..: Shri Krishna ibe destropur of Madhú, yalšbės, raköhates and pishaches 20. There had been thousands of holy ascetics at the bank of the Baraswats. In the days of yore Vshnu, slow, Madhu-kaitabh and then bathed in the holy ,watera of the Saragwati.. Vyas too, batbed, thero, and, got , perfection. Asit and Deval, the two great Alcotics, bathod thers and I accomplished ascéticien." 24. had lived । M ग । ॥ . . , , .. । १ . Latti ...!' • In [७१५८ Malinbharat 17138) बैशम्पायन उवाच। तस्मिन्नेव तु मारमा सति स्म तपोधन, गाई र धाप प्रतितो देवल गुरा निरयः शुद्धिान्तो यस्ता प्रहातपाः। कर्मणा मनसा वा सम. सर्वेषु अन्तुषु। कोनो महाराज पालन्दाम सस्तुतिः । प्रियामिरे तुझ्यावृत्तिमात समनः काउसने लोभार समपर्ण महातपा देवानापूजीवस्यमातीव विजेः साध्यरतो नित्ये साधर्मपरा यण । ४ ॥ ततोय महाराज रोगमाथाय भिकीयो मुनिमाणी रतीय समाहितः ९॥ दलस्याश्रमे रासस महायुक्ति । पोगवियोमा गसिम प्राप्तो महासा ॥ ६॥ समान महामुनि! देवको दपक नेवाश्चत RISHए तोहाराज विकासोश्ययात पुष मुनिबरं न सय देवल आधारकाले प्रतिमा परिवारजनमेजय । पर अध्याय ६०॥ वैशम्पायनयोले कि पूर्वसषयमें प्रसिध और देवनामाचे दो कि धर्मात्मा और सपकप धनरखनेवाले ग्रहस्थधर्म नियोकर उसी तीर्थपर निवास करनेवाले, हुये 11 पर दोनाऋषि सदैवधर्म करनेवाले पनि जितेंद्री दशके त्यागी नहातपस्वी मन बाय भार शरीरसे सबनीनों में समान .टी।। गोधरहित निन्दादति मोसमान जाननेवाले मिय अमेय समान अदिवासे स्वराजते समान समदशी। वर्ण लोहको दरप जानने और देखनेवाले गडातपस्वी और देवताओं समेत प्रामण पर प्रतिषियों को सदैव पूजने सदारतम्य में प्रवृत्त भार. सदैव धर्म कोही श्रेष्ठ माननेवालथे । राजा इसकेपछि महाभान दिमानं सावधान महा सेनस्वी जगीषव्यनाम मुनि संन्यासी नसतीर्थपर आके योग नियोकर देवस के आश्रममें वसे हे महारान वह महातपस्वी सदैव योगमें नियत और सिदया । ६ । देवलने वहाँ निवाप्त करनेवाले उस महामाने जगीषष्यको देखतही अति- भिधर्म से युक्त कियारे महाराज इमीरीति से उन दोनों का बहुमा समय मतीतदुआ देव ने मुनियों में श्रेष्ठ गीपम्प को नहीं देखा। ८॥ जनमेजय CHAPTERL Vaishalmpayan ta d. “ Art and Doval, vutuous rubis kept horos their. Iliey brdontrol over thuis organs, were great ascetics and looked equally at all longo in mind. speech and body. Free from abger, they #018 ditforest to praiso and dipraise, frond ood foo, kad who just lsbe Yaunaj. They regarded gold like drous and Worshipped gursta like goxls, olerking vow of cell acy and regarding dharau lo bu the best of all things. 8imo tipo piter, Jagiebatja, a Haryass munt, came and settled there to perform ascetickm. Heman great ascetic entirely gives up to yog.3 Deral Worabipped bim Na gyeat for a long time. Deral did not seo bim except at the time . - - . (718 Garla Parr गा [७५९1. सधर्मको नयकाले सदेवलम् ॥e narga मिशुरूपेण प्रात महानिमा Trपरम के प्रति चिपलास्तथा ॥१०॥ देवलन्तु यथाशा पूजयामास भारत भरिन विधिना समावस्वी समालिकदाचित्तस्य नगर देवलस्य महा हममपिता मुमहली जीवा मुनि रपया महापानम् ॥ १२॥ समान्तु समतिकiar पहला पूजपतो मंगलायमनसो मिक्षाभ्यम कियन ॥ १३ विग जंगाम महोदधिम। मन्तरीक्षवरः श्रीमान् कलशं गृह्य देवलः ॥ १४ ॥ बसपामा समर सरिताम्पतिम् | यस्य ततोपपद्नं मागव भारत ४१५४ तास विस्ममित अगामायासितः प्रमः कये शिरणं प्रतः समरे लात एव । इत्येव विगतमामान महादासिननद । स्मारश समुद्रे विधिमा सुविध्य आ६॥ १७॥ कृतजप्याहिना भीमानाNASE' TATIबलशं जलपूर्ण पीत्वा जनमेजर १८॥ तास प्रविशन्नेव स्वमाभनपर मुनिः । तर महबुद्धिमान घम्म सन्यासी आहार और मिक्षा के समयपर देशल के पासभाकर निकतामा । तब देवोपने उस भिकरूपसभानवाले मानि को देखकर बड़ी प्रतिष्ठापूर्वक अत्यन्नमति प्रकटकी.1१० माताशी. सावधान देवऋषि न पियोंकी गई रिषिसे सामय के भनुसार.बहुत गोतक.उस काजकिस देश्योगमे एकसमयमर देवलपिका उस पहावे नसी निक देखोसे यह बड़ी चिवाई। कि मुझ को.इस मुनिका पूजन करतेने पम्पतीत पातु मामतक इतनदासीनकम्मी भिक्षक ने कभी कोईवात: नी कही ।.१५ । इस प्रकार विचारकरते वह अन्तरिक्षचारी, श्रीमान देवलपि संस को लेकर मास को गोरे भरतवंशी ..इसी नदियों के सामी समद्रको मात उसं. धर्मात्माने प्रथम. गोपे आपिन को देखा. १५ 1.उसः में वहाँ देखकर उस स्त्रीने आश्चर्य काके-चिन्ताकरी किया मिटुक. कैसे समुद्रको भाया और कैसे इसने स्नान किया तब उस. मार्षिने ऐसे चिन्ताकरी और विधिपदं समुद्र में स्नान करके उसं. पविधने अपको अपा। भाष और संध्या करनेवाले श्रीमान देशलपि। जलसे पूर्ण कलशको लेकर माने आभयको आये जनमेजय फिर अपने भाश्रम स्थान में प्रवेश करते of taking food and tren. ho rould always treat liin with profound respeoband lore_10. Ro torred hion in this way for many pate - One day he thought within himself, " I have been arring thtt rishi for many years, but he had Qafat said bything. With this thought in bir qind, he went with a reusel to the sea and there be sa Jalgiahavya arrived before him. 15. No wondored at his arrival there to bathed in tbo ves and said his prayer: WFher Doral cap, hock with his posel full of water, bo say Jaigisharya in his owa. bormitage. Bat.tha latter did not apusk to him even thor and cos. .
साग Mahabharat,EE (7160), आसीनमाश्रमे तत्र गोषयमपश्यन ॥ १९ ॥ न व्याहरति वैवेन जैगीषव्य कथाशन काष्ठभूतोश्रमपदे वसति स्म महातपा. १, २०॥ तं इवा चाप्लुत सोये सागरे, रोपमम् । प्रविष्टमाभ्रसञ्चापि पूर्वमेव दर्शस. ॥ २१ ॥ असितो देवलो राजमिसया, मास बुद्धिमान । रवा प्रभाषन्तपसो जैविध्यस्थ,योगजम ।। २२ ॥ चिन्तयामा, राजेन्द्र नदा स मुनिसत्तमः ममा हुए समुद्रेमाश्रमे च कप, स्वयम् ॥ २३ ॥ विगमन्नेव स मुनिमन्त्र पारगः । उत्पपाताश्रमाचस्मादन्तरीक्ष विशाम्पते जिलासा, तदा भिक्षोजेंगीपन्यस्य देवलः ।। २४ । सोन्तर्गक्षचान विज्ञान समपश्यत् समाति, तान | जगीषव्यञ्च ते सिदः पूज्यमानमपश्यत ॥ २५॥ ततो. सितः सुसंरग्धो व्यय सायों दग्रतः ।, अपश्य दिवं यान्तं जैगीषडयंस देवलः ॥ २६ । तस्माउच पिता व प्रजन्त सोन्वपश्यत । पितृलोकाउच तं, यान्त: याम्य लोकमपश्यत • २७ ॥ तस्मादपि समुत्पत्यः सोमलोकमभिप्लुतम प्रअन्तमन्मपश्यत, स, उस मुनिने वहां.आश्रममें बैठे हो, जगपियको ,देखा। १९ । और उस समय परभी जैगीषन्यने किसी प्रकार से कुछ नहीं कहा, फिर वह : महातपस्वी काट पप आश्रम.स्थानमें निवासी.हुआ।२०५। उस. देवलपि ने उसको सदके समान समुद्रके.जलमें स्नान कियाहुआ, देखकर प्रथमही, भिम में, बैठाहुमा देखा-२१॥ राजा तव . बुद्धिमान् असित देवलने चिन्ताः ,करी, अर्थात उस नियों में श्रेष्ठने जैगीपम्प, के यांगले उत्पन्न होनेवाले तपको देखकर बड़ी .चिन्तारी कि मैने नौ'इमको समुद्रपर 'देखाया अब यह मुझसे प्रथमहीं इस. माश्रयमें कैस भागया।.२३ । हे राजा तब वह मन्त्र विद्या.म.पूर्ण देवसमुनि। इसप्रकार विचार करते जैगीपन्य संन्यासीकी परीक्षाके अर्थ उस साधनसे ऊपर आकाशकी और छले । २४ । अन्तरिक्षबारी. और सावधान..सिदोंको देखते बस देवसपिने नगीप को उनं सिद्धोंसे पूनिता पार गविहान देखा । २५ । तदनन्तर उस क्रोधपुक्क हद तमाले प्रतिवदेवलने वहां से चलनेवाले जैगीपज्यको देखा ।२।। उस ने यहाँसे उमको पितृलोकमें भानेवाळा देखा और पितृलोकसे, यमलोकमें भी जाने, वाला उसको देखा । २७ । और उन लोकों से मी उछलकर चन्दलो में नामे वाला उस महामुनि भैगोपयको देखा फिर.अ या करनेगलों के शुभसाका tinued to live there like a wo.xlor (statso. O., Durul gaw, tim pro fogadalskottne ocent milers bethaug 111 w watora 45t Duval" brand at the great power,ot lus avartiçium; fur he had lost him, ou thonashors, but on comsug borns found hm alrundy nturood..' Los Jallubarsa tu Saayasi, Durni oprug up into air io the rogwa of Sulat, but 13w Juharys there also worshippal bychu sidhur 25., PACDsral rested ho region of putrs, Indra Yany, Chandra and the Liyoruzīvas suf supliast, but found Jupisharya overywhors. Thus two sprung up w tla region ul Agolutras wicie tley four bilat.ru - Immum ACTIGN Gads Parv.गदापर्व {७१६३). गैगीषव्यं महामुनिमः । लोकारः समुत्पतन्तस्तु शुभानेकान्तयाजिनामः ॥ २८.५; मताग्निरोत्रिणी लोकांस्ततचाप्युपपात ६॥ दर्शञ्च - पौर्णमासम्म से यजन्ति तपोधनाः ॥ २९ ॥ तेज्या संसह धीमान लोकेभ्यः पशुशाजिनाम्।। ब्रज लोकमसमपरवडेवपूजिताम 1.३० ॥ चातुर्मास्यैर्यहुविधैर्यजन्ते ये तपोधनाः। षां स्थान को बात तयाग्निष्टोमयाजिनाम् ॥ ३१ ॥ अग्निप्दुतेन च तथा ये यजन्ति पोः धमाः । तबरबानम नुसंप्राप्तमपश्यत देवल, ३२॥ पाजपेयं कतुवरं तथा; बहुम: वर्णकम् । प्रारम्ति महाप्रशास्तपा लोकवपश्यत । ३३ ।। यजन्तु राजसूयेन पुण्ड। देणवेष के वेषां लोकापश्यञ्चजिगीपयंसदेयछः ॥३४.अश्वमेघ ऋतुपर नरमेध तव माहगन्ति नराधेष्ठास्त लोकेश्वपश्यत,॥ ३५ ॥ सर्वमेधन प्रापं,तथा सोनामनिश्चये। तेषी लोकेवपश्यञ्च जगोषप्यं स देवलः ॥ ३ . बादशाह भी उसको उछलकर जानेवाला देखो २८ । और वहाँसेभी अग्निहोधियोंके लोक को उछले को सपोधनपि अमावस और पूर्णमासांके दिनं यज्ञों से पूजन करते हैं । २९ । अववा पशुओंके यज्ञ करनेवालोंके लोकोंसे निर्मल और देवपूजितलोक को जानेवाले मुनिकों उस 'बुद्धिमान देवलने देखा जो तपोधन कि चातुर्मास्य नाम गानीमकार के पडोसे पूजन करते हैं, वहाँसे उनके "लोकों में और भग्निम पत्रकरनेवालों के लोकोंको ‘जानेवाले मुनिकोदेखा । ११ शो तपोधन, पारने तय पुत्रन करते हैं उनके जो लोक हैं उस लोक में भी जाते हुये मुनि को देवतापने देखा । ३२ । इसीपकार बहुत सुवर्णपाले पोंमें श्रेष्ठ वाजपेय याको जो बड़े हानी करते हैं उनके भी लोकोंमें जातेहुये मुनिकों देखाजोलोम रानमूर्व पोर पुण्डरीक पदोंसे पूजन करते हैं। उनके लोकामेभी उस जगीपको देवखने देखी। इसीप्रकार जो नरोत्तमपुरुप यज्ञोंमें श्रेष्ठं प्रसव और नरः मेवानी बरते हैं उनके भी लोकों उसकोदेखा ३५ जो लोग कठिनतासे :माप्त गनेवाले सर्वमेध और मूत्रामणि यज्ञको करते हैं उनके लोकों में भी देवलने उस गोषपको देखा ! हे राजा जो लोग द्वादशाह नाम नानाप्रकार के यज्ञोसे पूजनको करवह उस देवलने उस जैगीपव्यको उनके भी लोकों में देखा.३७) इस on.the days of full-moon and no--moon 29. Heam Jainishavya in the, rogion of sacrificera, attended by god and boly;'men vrlo worship with four-monthly sacrifices and others. He saw.him in maujother rotions as well as among the performers of Agnishtom sacrifice, Pasaw.hiun also among tho performers of Vajpeya sacrifices as well as those who perform Rujanya, Pundarik, Ashyamedh Narwchinnal: Sarrama !h. 36.. Ho saw him among the performers of. Dwadas),ali sacrificos; in thg region of Mahaspati, in Golok, in Bralım sacr.f.a and therre gon. After that Jaigisharga disappeared fryr lain sight. Thelleri - . (७१६२) Mahabharat (116M सय यजन्ते विविध प । तेषां लोकेन्यपश्यच जैगोषव्ये सं देवल।। ३७. ॥ मित्र परुणीलों के चादित्यानां तथैव च । सलोकतामनुप्राप्तमाया ततोसिंत ८. दाणाञ्च वसूनाचं स्थानं यच्च वृहस्पतेः । तानि सांग्यतीतानि समपश्यतालिका '४. ३९ ॥ आरुहागरा लोक प्रपातो ब्रह्मसत्रिणाम ।'लोकानपनापत गाय ततोसित ४०ीलोकानारान् विप्रमुत्पता स्वतेजसा। पतिताना लोकां जन्त सोनपश्यत ॥ ४२ ॥ ततो मुनिवरं भयो जैगीषयमचासितः । ताम्बापत योगस्थमन्ताहिकमरिन्दम ।। ४२ ॥ सोचिन्तयामागी जैशीवाय वाला माई अप्रतत्वञ्च सिद्धि योगस्य वातुलाम् ।। ४३ असितापुरुहुन तदा सिंबान लोड सतमान जतः प्राजोलभूत्वा धीरस्तान प्रासनिण: ॥ गौवम्यं न पश्यामि तं. शंसध्वं मौजसम, । एतदिच्छाम्यई धोने पर तहलं हिं में । ४५ सिबा ऊनः शृण देवल भूतार्य सतां नो पढ़यत । जैगोषण्यास .. लोकं शाश्वतामणो गतः ॥ वैशम्पायन उवाच । स भ्रांवा वचनं तेग सिमांनी प्रासंत्रिणाम । के पीछ असिन देवलने अदितिके पुत्र मित्रावरुण और गादिक की सालोक्यता पानेवाले जगीपम्पको देखा। ८ । रुद्रों बसों और सस्पतिश्रीका.जो स्थान है असित देवलने उन सब लोगोंको जैगीपव्य से उल्लंघन किया हुमा देखा । ३९। इसके पीछे गोलोकको चहकर ब्रह्मयज्ञ करनेवालोंके लोकोंको गया, फिर असित देवलने अपने तेजसे तानोलोकोको त्यागकर अन्यलोकों के जाने का निगीपपको देखा और पतिव्रतामों के भी लोकों में; जानेवाले उस मुनिको देखा । ४१ । वा भसित देवलने उस मुनियों में श्रेष्ठ योग नियत सम्मान होनेवाले जैगीषव्यको नहीं देखा । ४५ हे अविनयी जनमेजय उस महाभाग देवलने जैगीपपके मभाव यतकी उसमता और योगकी भी मिली को बिार किया । ४१ । तब मसित देवलने लोकों में श्रेष्ठ सिदोसे, पूछा उस परिहा देवलने हाथ जोड़कर उन प्राय करनेवालों से कहा कि मैं अब उस अंगावर को नहीं देखताई उस कड़े तेनती का सवृत्तान्त वर्णन कीजिये मुंघको उनके जन्त सुननेकी रही उत्कगठा है । १५ ६.सिद्ध वाले एक है. इतकाले देस हम तुमसे इसका वृत्तान्त कहते हैं तुम पनसगाकर सुनो, निश्पय करके गीषम्य सनातन ब्रह्मलोकको गपा । शम्पायन चोने के वा असिव उन नया करनेगले सिदों के वचन को सुनकर शीम जपा को वर्ग thought of the great yo: power and inquired about bim of the nidhas who patirrnod Brahmynjya, with joined .hand, "I donot see Jaigir abia vya Tell me all about bin, for I am very anxious to know," The sidious suidh, Saigiahavya 'has gouo to the region of Bralitat" e't this Otral' began to asceud higher up but'could go no furtber. This the vidhas inid," You cannot go to the region of Brahm where Jnigion - (1639 Gada Pary nigra तितो देवलस्तूर्णमुपपात पपात son: सिमास्तमर्हि देवलं पुनरेगाराम Ranana गन्तुं तपोधन । ब्रह्मणः सदन पिगोषध्यो पदावान ec. शामावत मात्र । तेषां तवचन अत्वा सिद्धानां देवत. पुनः । मानुग्ण लोको स्तार सनियततार ह.॥ ४६॥ स्वमाभमपई पुण्यमाजगाम पतवाद निशा पापाजगीरम्य स देषल. " ५. ॥ ततो नया प्रगम' परेवलोधयुका राष्ट्रवा प्रभाव तपसोगीषम्यस्य योगजम् ॥ ५१ ॥ तat महात्मा जगीषम्स देखल. विनयावनतो राजन्नुपसर्य महामुनिम् मोक्षधर्म समायाभिमानहम् ।। ५३ ॥ तस्य वचन भूत्वा उपदेश चार स.. शिवयोगय पर कार्याकार्याध शाखत ।।५३साम्पासकृतधुरिम्त ततीरमा महान साश्चात्य क्रियाश्चक्रे विधिरटेन कर्मणा।।५४ । सान्यासातर्विस मतानि पिभिः सह । ततो रष्टषा प्रादुकोस्मान समिमणिश्यति ॥५५ । देवलस्तु पर गिरपदा ।४. इसके पीछे मह सब सिद्धलोग देवलसे बोले कि हे तपोधन रखनेवाले देवल उम ब्रह्मलोकमें जानेको तेरीगति नहीं है वेदपाठी जिसको किगीपपने पापा । ८ । वैशम्पायनने कहा कि फिर वह देशल उनसिदों चन को सुनकर क्रमपूर्वक अपने लोकों को उवरे । ४९ । और पक्षी के समान अपने पवित्र स्थान पापको मापे आश्रम में प्रवेश करने वाले अप्स देवरने जैसीपज्य को देख।। ५० { फिर देवलने जैगीषव्य के योगसे उत्पन्न होने ले तपके प्रभावको देखकर धर्मयुक्त बुद्धि के द्वारा विचार किया ।५१। और नम्रता से मुकेहरे उत देवलने महात्मा महामुनि नेगीपप क पास जाकर यह बमन कहा है, भगवन में मौतधर्म नियत होना चाहता हूं। ५। तब जैगीपन्याचे उसके उस बचतको धनकर उपदेश किपा भात् शास्त्र के द्वारा याग और कांकार की परम विधि को उपदेश किया ।५३ ।इसके पछि बड़े तपस्वी ने संम्पासमें प्रच चिघ उसदेवतको देखकर वेदोक्त कर्मों के झारा उसकी सब ani को क्रिया । ५४। इसके पीछे पितर लोगोंसमेत सब जीवधारी उस सम्मासमें गद्धि लगानेवाले देवलको देखकर अत्यन्त रोदन करके कहनेलगे कि, हम कौन र भागदेशा । ५५) समकार दोदिशाआ में धन कानेवाले avya has gone" Then Davul descended lower and lower like a bird till be cape dovo to Lw down permistaba aud ou entering it'he rup, IAugarharyapgap. 50, Tien Davah new the greatness of Jaigntharga and humbly said, "I wish to tread the path of sal çation." Jalgiahavsa then faught him about wbat was to be done and shunned. He taught him the Vedio ways. Tbo pita and other bongs hraing him engaged in 8305 og sept aloud saying, “ ho mu giro - (७१६४) Mahabharat वचः श्रया मताना करुण तथा दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्त. मनोदये ५॥ ततस्तु फलमूलानि पवित्राणि च भारत । पुष्पाण्योषधयक्षेपारोकपते साया पुननों देवलः क्षुद्रो नूनं छेत्स्यति दुर्मति।। अभय सर्षभुतठयो को दया नामुमते ॥ ५८ ततो.भूयो:व्यगणयत् स्वबुध्या मुनिसतमः । मोशे गाई स्वधर्मे किन्न भवहरभवेत् ।। ५९ ॥ इति निधित्य मनसा देवलो राजसत्तम । वक्त्वा गास्थ्य BUR.स मामधर्ममरोचयत् ५.५: ॥ एषमादीनि सञ्चित्व मेषतो निधयानात पान परमां सिद्धि पर योगश्च मारत।।.६१.५.सतो. देवाः समागम्बरपतिपुगे गमा जगीपज्यं तपसास्य प्रशंसन्ति तपस्विनः ॥ ६३,... मथापरिनियरो देवगन नारदस्त था । जगीपश्ये तपो मास्ति विस्मापयति योसितम ॥६३ सय मादिक धीर प्रत्यचुस्तदिवौकसः। मैवमित्येव शंसन्तो लैगीषश्यं मदामुमार ॥ ९६४ मा परतरं किचित्तुस्यमस्ति प्रभावतः । तेजसरतपसवास्थबोगस्य. महामपि दुखित वचनोंको मुनकर देवलने मोनके स्याग करनेको सिप विमा ५६ हे. भरतवंशी फिर पवित्र फलमूल और हजारों औषधिया भीरोदन करनेगी। कि निश्चयकरके वह नीच और दुर्बुद्धी देवल फिर हमको बांटेगा जोकि सब जीवाको निर्भयता देकर 'सावधान नहीं होताहै । ५८। इसके पीछे मुनियों नष्ट देवलने अपनी बुद्धि से फिर विचार किया कि 'मोक्ष और स्व. ध न दोनों में से कौनसा धर्म कल्याणका करनेवाला है । ६२ । हरोमाओवासदेवः लने चिचो निश्यं करके गृहस्थ धर्मको त्यागकर मोक्ष धर्म को स्वीकार किया। फिर देवलने निश्चयसे उनको और अन्य रसव पीलोंको विचार करें परमसिंदी समेत परमयोग को पाया ! ६१ । इसके पीछे उन देवताओं ने जिनमें कि भयत्ती एहस्पतिजीये भाकर जगीपव्यकी और इस तासीक तपकी मीमा करी। ६२ । इसके अनन्तर ऋषियों में श्रेष्ठ नारदजी देवताओं से बोले कि जगीपगमें वप नहींह जोके असित को आश्चर्यपुत करता है। ६॥ इस प्रकार से कहनेवाले बह देवता उसवीर से बोले कि ऐसा नहीं है फिर महामानि गीतन्य की.मसंसा करते हुये योले ६१ क प्रभाव में इससे बड़ा और समान भी कोई नहीं us our share. !" Hearing such words on all sides Deval thought.or 'Forsaking the way to salvation.' Flowers and medicinal herbalkalin wept and said, " Despicable Deval will-again cut us down for he is not careful ia saving life. " Daval thought'agaia whether to choose Salvation or tho liſo of a householder, 3nt at last bo decided to 'ronounce Ethe latter and was engaged in ascoticism. 61. Tion the goda let by Vșihaspati cața aud praised Taigieha sya and Divál, Norad Paid to gode, Axit is wrougly astoniskód at tſië, wwooticiamol Jalžisharya But the gặds would not bøar bin and praiseul Jaigistavşa, baylos 'We Re nene bettrir than or Equar' to boti... " Baidor bathed thoro H 1 . - 11 Chandra performed Rajkuja sacrifice, Baldor bathed there sad har Ashampayan said, "The War of Torak had Iskon place where ing apped water and given doustions, proceeded to the boly place at Berawat, who taught the Vedas to Brab maua during * tnelye (1165, Gada Parv गहापर्व संप्रमानों पारमा अगोषम्यतयासित योरिर स्थायर ती महात्मनोः जापापा ततो महारमा स्थापित हमा, पाप माध्यमांना मोगल महत् सूतीपर ।। १५ । शतिनदाइपहिसदेवरियाबायां सारस्नोपारूपाने पञ्चाशचमोध्यायः ४४॥ रेशम्पारण सामाजियानुापती राजसूयेन भारत तस्मिस्ती महामातीत सामनारकाम १॥ तत्राप्युपसतोरा मानिधारमपान | सारस्पताल मारनामेली जमाम नावालियाममाएपको हिजोसमा । इस महात्मा के वेब ए और योग के समान-गेई नहै । ६३ । धर्मात्मा गीपम्प और असित देवकभी ऐसहरी प्रबारबाले हैं इन दोनों उत्तम महात्मानों कामावेष माग और वर्ष है। १६ । इसके पीछे वह परमार्थकी मात्मा बसदेवजी इस पर भी स्नान भाचमनकर मामला को बहुत धन देकर धर्म को बार चन्द्रमा के वषिको गये अध्याय ६१॥ वैशम्पायन पोरे भरतवंशी जहाँपर चन्द्रमाने राममूयथा से पूजनीकया उस पर तारकासुर से सम्बन्ध रखनेवाला बड़ा युद्धहुआ।नी धर्मात्मा परदेपनी भी नान आचपन करके दानों को देकर सागसतमान के साथ को गरे । पहा पूर्वकालमें सारस्पतमुनि ने बारावके दुनिमें उनपत्राणों को पदापाजनमेजयने कहा कि बारहवर्षको अनाराष्ट्र सारसता and buying nipped water and given doosrious to brwbwawa, proceded to the boly place of Chandra "167. CHAPTER LI Touro . - r M 7 । . प - . - Mahabharat (7166 दानध्यापमास पुरा, सारस्वतो मुनिः ॥ ३॥ जनमेजय उबप। कथं बादशधार्षिषा मनाइयो तपोधन : प्रधानन्यापयामास पुरा'सारस्तो मुनिः ।। पापा उवाच । पासीत पूर्व महाराज, मुनियामानमहातपाः दधीच इति विरुपाती प्रह पारी जितेन्द्रिय ॥ ५॥ तस्यातितपसः शो विति संतत विभो । न स लोभायितुं शक्यः फलैबहुविधती ॥ ॥ प्रलोमनायतस्याय प्राहिलोत्. पाकशासनः । विम्याम प्सरसा या दशमीयामलनुषाम ॥ तस्या तर्पयतो देवा सरस्वत्या महात मनः । समीपतो महाराज सोपतित माविनी,॥८॥ सन्दिपुष.हल्या तस्वयमी पितामनरेतः स्कनं सरस्वस्या तत् सा जमाह निम्ममा ९ ॥ कुक्षी चाप्यप इध ततः पुरुषमासा दधार गमे तो ज्ञानहीं ॥१०ना मुवे बापि समये पुत्र सा सरिझायराम पुत्रमादाय वार्षि प्रति प्रोषि संसदित एषा साजदी मुनिसंभममः। तत प्रोवाच राजेन्द्र दवती पुजमस्यतम् ऋषियों को पदयाशिम्पायनवाल महाराज पूर्व समयमें बुद्धिमान प्रभारी जितेन्द्र दीविनाम विरूपात मुनि थे। पी.ई. समय उसको तपस्या से इन्द्र सदैत्र भयभीता रहताया और उसको नानामकार के फग से 'लभाता या परन्त वह किसी' फलसेमी नही लोमित हुये । १. इसके पीछे इन्धन उसके लमा ने के लिये दिम्य पवित्र और दर्शनीष जनयुपानाम' मसराको उनके पासना १७॥हे महारान यह प्रकाशमान प्रसरा सरस्वती पर देवताओंका तर्पण करनेवाले उस महात्माके सम्मुखहुई ।४। उस दिव्यारवाली अप्सराको देखकर उस शुद अन्तःकरणपाले ऋपिकावीर्य स्खलितहोकर मरस्वती में गिरा उप्स मदीने उसको धारणकिया।९।हे. परुषोतम उसनदीने,ऋषिकेवीपको अपनी बाद में धारण किया अर्भाव इस नदीने अपने पार्य उस, गर्भको अपने उदर में धारण किया १० मध फिर कुछ सभापीछे, इस मेड.नदीने पुषको भी उत्पन्न किया। और पुत्रकोलेकर बसपिके पास गई । ११ राजेन्द्र मानवी पिया कीसभा में उस श्रेष्ठ मुनिको देखकर उनके उस पुत्रको उनको देता हुई यह नवनगोडी (famids."- Janaunejaya said, " Hordid Saraswatich thun during farina ? " Vaishampagan" said,“ ' In former daya there was mise rislu of great fame and sanctity, nawed Dadhichi. "Indra was afraid ol bus ascetarum aud iaduced baro with Tarinas good things. Ha bent to him a beautiful apsara oamed AlinivushSie came beforo hini when he was worshipping gols on the bank of the Saraswati His sowen dropped dowa in the siger se bo zaw, herine Saraswati kept it in her womb for the sake of the sun. After como tiqua nhia brenylet forth & sot and came to the rishis with lica bila presunting; the con guila auai-before the assembly of ascicaubio, and " This is t . (7167) Gada Parv'rişini [७१६०) २॥ ब्रह्म तव पुत्रो पन्द्रकपा धारिता, मयानी इंदया, तेप्तरंस रेतो यत स्म भागलपुराम ॥ १३॥ ततु कुक्षिणा वे ब्रह्मर्ष त्यन्द्रक्त्या तयावहम् । न विनाशमिई गच्छत्व तेज गति नियात् ॥ १४ प्रतिगृहणांव पुत्र स्व मया वरम निन्दितम् इत्युक्त प्रतिजगार प्रीतिचापाप पुष्फलाम १५ ॥ स्वमुतचायनितं. माईन मारिजोत्तमः परिष्वज्य चिर कालं तदा मरतसतम सरस्वत्यै पर प्रादार प्रीयमाणो महामुनि विश्वे देवाः सपितो गन्धर्वाप्सरसा गणा तृप्ति पास्यन्ति सुभगेतर्यमाणास्तधाम्मा ॥ १॥ इत्युक्त्या संत, तुष्टाय बचोभिर्व महां, दीमा पात पर परमपृष्टारमा यथावत अणु पाणिः ।। १८॥ प्रमतासि महामांग सरसो. Aण, पुरा जानन्ति वा सारछठे मुनयः शीतवताः ॥ १९॥ मम प्रियकरीमापि, सत्तपिकाने । तस्माता सारस्वतः पुत्रो मस्त वरपाणिनि ॥३. तशा माना १२ हे ब्रह्मापि यह तेरापुत्र है मैने तेंरीभक्ति से अपने में इसको धारण किया पूर्वकाल में अलंपा मंप्सराको देवकर ओ तेरावीय पतन होगयाथा । उस को है ब्रह्मर्षि मैंने भक्ति से और इस निश्चय कि तेरा योजनाशको न पाये इस हेतुमे उस गर्भको अपनी कोखम धारणाकया १४ , मेरे दियेहुये इस निदोष अपने पुत्रको लो इस प्रकार के सरस्वती वचन को धनकर पिने उस पुप्रको लेकर, वदा आनन्द माना। ५। तब उस श्रेष्ठ बामणने बड़े प्रेमसे अपने पुत्र के मस्तक को मया और बड़ी विलम्बतक उस श्रेष्ठ मानेने अपने पुत्रको गोद लेकर । १६ । सरस्वती को यह पर दिया कि र.सन्दार ऐश्वर्यवान पतरी समेत विश्वेदेवा गन्धर्व अप्सराओं के गण तेरे जलसे हप्तहोकर आनन्द को 'पावेंगे। यह कहकर वचनों सभी उस महानदी को प्रसन्न किया, राजा उस प्रसन्न मोर अत्यन्त आह्लादचित्त ने जसे मकारसे प्रसर किया, उस को मनो। १८ महाभांग अष्ट तुम ब्रह्मांजी के सरोवर से निकलीहो हे जनम नदी तुमको प्रशंसनीय व्रतवाले मुनिलोग जानते हैं।१९। हेमिपदर्शन तुम सदैव मेरा प्रियकरनेपाली भी हो मन्दरी इसी हेतु से तेरा पुत्र नहा पुत्र सारस्वत नाम होगा । औरतेिरा-पुत्र.लोकभावन होकर तेरेही नाम से बिरुगात होगा your cou;' holy mant • Fer'your sukeBI keperaims within my womb. Your seinen fell down at the sight of Alamöosba and I preserved it'for your take Rédeive' yður icnocent'child. "The'rishi was much pleas d'aç tio sight of his son. 15. He gave a boon to Saraswari, Buying Pitars, Vishwedevar, zandbárvás and sparas will be gratified by your Haters. "He pleased her by these words and proused her anifollowir. EYou hate come out of Brahma's takesand, glorious rashiakngs, Yout jyon bárē plezsed me with your devotion and I therefore I your rish as Sarasnath 20. Thu kon of thuns will make your Dime name - (७१५८) Mahabharat 171681 अपित पुजाले कोकमावन सारस्वत इतितो भविष्यति मातपाः ॥ २९॥ 'बादश वार्षिश्यामनारदपा विजयभार | सारस्वतो.महामागे पेदाणायापरिणति ॥ २२ ॥ पाय परिद्रप सदा पुग्यतमा शुभे । भविष्यसि महामागे मतमता व सरस्थति ॥ एवं सा संस्तुमातेन पर लगवा महामनी । पुषमादा मुदिता जगाम भरतर्षभ ॥२४॥ एतस्मिनेष कालं तु विरोधे देवराम | मारणारी होमीर विचार. २५॥ चोपठेमे भगवान शE ant भोपवाव विदुरद्विषाम् ॥ २६ ॥ ततोलवीत मुपद को नमे शापामा परा तापामाधीनस्थ निसन्तु निविष. ॥ २७ ॥ हस्सावाला हो पाता पुरसत्तमाः । पापानि पति विपामो बिर ॥ २८ ॥साधितोस्थीनि यत्नाविपरना । प्राणत्याग कुमारवाषि पारपस लाकामभयान प्राप्तो देवप्रियकरस्तदा । तस्मारिणमिणे भर्थात या मातपस्वी सारस्वत नामसे प्रसिदोगा। यामामा सारपत पार वर्षके दुर्भिक्ष में उचम प्राणों को वेदपढ़ाना २६ शिम महाका सरस्वती सुप मेरी रूपा से सदेर पवित्र नदियों से भी महापवित्र नदी होगी गोरतर्षभ इस प्रकार उस अषि से स्तूयमान वह महानदी बरको पार बड़े मानना पूर्वक अपने पुषको सेकर चलीगई । २४ । उसी समय में देवता और दानों में 'परस्पर विरोष हुमा इस हेतुसे इन्द्र ने उनके मारनेवाग अब बहुत दूंडा परन्तु रिसा भाग नमिता जोकि मरों के मारनेडो समर्थ हो । २ न ने देवताओंसे कहा कि दीपिऋषिके अस्थिके बिना किसी से भी देश- सामों क शत्रु मानमरों के मारनेको में समय नहीं सका २७ इस कारण सेरे जनम देवता लोगो उस उतार से प्रार्थना पूर्वक वा गवना करो को भी आप इसपर उपाकरके अपने हाँको दो । २८१ रन आपके हाड़ों से हम अपने शत्रुओं को मारेंगेो कॉरम्प तप उसीपकार से उन देवतामों में साना किस से उस बामेष्ठ ऋषि ने पति से विधार किन दिनी famous, for he will be called Sarunt. He will teach the Vedas to brabogana durog the twolva your', sacrifice and you will be rockoned the holust among rivom. * Taus praised by the aubt, Sarawati wa much planned and took hesion with hor. 24. In the meantime there bappened to be a great war betwood Datyas and goda Indra sourch. od for a weapon to slay Daitu, but could fiad nodd Thon be mand to gode, "' I can not day your casmin witboat taking.neapons out of the bonds of Dodbichi and you sust beg of bim tro favour of greaking you hia bogea to slay your QABD!01. Tha gods did as they were directo ed to do and Dadlach dying without any bo tatua, ascended to the 4 .. Gads' Partगदापर्व [७१६९) मनाना कार्यामास विरानि नानामहरणायुत ॥ ३१॥ बजामि बाकि मानुपाडांश पुफलान् । सरितीग्रेग तपसा संभूतः परमर्पिणा या पतिनावगुणा लोकमानः । भतिकापास तेजस्वी लोकसारो विनिभितः ॥ ३॥ गः माधुर्महिम्ना प्रपितः प्रभुः । निस्यमशिजतमाम तेजसः पाषासमः MIपने भगवान्मन्वयुद्धेन मारविकोश, विपन प्रबोमन नायवोराको जघान मवतीनव। मय काले पतिका मात्पतिमय हरे बिमामाता राबर मार्गवार्षिकी..३६ ॥ तस्य भाववालियामा रिपामाप प्राइवाज सुधा सर्वतोदिशम् ॥ ७॥eare मानिः सारस्वतस्तदा । मनमा मति प्रोवाच सरसतीindi मानिकपुर गाहारमई संदा । दास्यामि मास्यगणवामिह भारत ॥३९० शामा पितर देवतास्थान आहारमकरोम्नित्यं पाया जारवर बालासा किया और अविनाशी लोको पाया।समाव स्वागत सत्र इन्द्रने उसके हाड़ों से नानाप्रकार के दिनमा चोलार करवाया । अर्थात् बजा कर, गश और समारी दवरों को गोगा और श्रेष्ठ थे अमात्री के पुत्र संसारकै पारे भगना.से निमित्रताको पार करनेवासे संसार भरि पर्वताकार पुष्ट परदेस महान्या से युक्त भरतांशी भगवान इन्द्र ने.स. समय से बला होनेवाले क्षेत्र संयुक शम्दापमान ग्रेहुये पसे । पेत्य पान हे नारों को मारा रे रामा इसके पीर अस्पन्न भयकारी समय में बना पर भारत का दुर्बिम वर्षमान पुमा ३६. उस बारह दुर्भिक मालित माकुस' आमषिका के निमित दशों दिशाओं को पसे मोहरलाल मुनि ने दिशाओं में भागनेवाले उन अपियोंका देसार रहने विचार किया गत समय तरस्वती उनसे पोली | से मुक्को मामा योग नी है में सदैव तेरे आमारके निमित्त बयान मजनों को दूर्मी । १९ो परतवंशी रेमे माता के सपनः मुनहर 'rogions of the good. 38. At big deatia Indra prepared from liis bone Torines more of weapons, such as vajra, discus, maca and atares, and with those hugo weapons, alow the enemies of gode. At the s'ora of but war there was a twelve yeara faming. 36, The riehf. left their, Pisodes for want of food. Stragnat ton, inteided to follow their 540 plo, but by the stopped by Saraswati, who said, “ You need not to Haywhere, y son for Ishall always supply you gred inh for tood. Sarsawat obeyed his tsother's ordere aod gratitied yeala aod fitria with that iand and kept reading the Vedas and Parani. ke. He was always ७२.७० Mahabharat ---(-7110) अथ तस्यामनांवाट्यामतीतायां महर्षयः । अन्योन्य परिप्रपच्छा पुतः स्वाया, यकारणात ॥ ४ ॥ तेषां क्षुधापरीतानां न वेदाभिधावताम् । सर्वेषामेव कश्चित् प्रतिभानपान् ॥ ४२ ॥ अथ कश्चिदपिस्तेषां सारस्तमुपेयिवान् । कुवाण संप तात्माने साध्यायमूरिसत्तमम् ॥ ४३ ॥ स गत्वाचष्ट तेभ्यश्च सारस्वतमीतमभम स्शभ्यायामिरप्रख्यं कुर्वाण विजने वने ॥४४॥ ततः सर्वे समाजग्मुस्तंत्र राजन्महर्षण सारस्वत मुनिधष्ठमिदमूचुः समागताः ।।४५. ॥ अस्मानध्यापयस्वोति ।तानुवाच सतो मनि शिष्यत्वमुपगच्छध्वं विधिवनि ममत्युत ॥ ४६ ॥ तत्रागन्मुनिगणी बालस्था मंसि पुत्रक स तानाईन मे धर्मो नश्यविति पुनर्मुनीन् । ४७ । यो हाधमन व या गृहणीयादाप्यधर्मतः रोयतां तावुभो, शिमं स्यांता वा घेरिणावुभौdिia उस. ऋषि ने उसीपकार से देना और पितरोंको तृप्तकिया माम और पदोंको. धारण करताउमऋपिने सदैव आहारकिया फिर उस दुर्भिक्षके समाप्त होने पर महषियों ने नेदज्ञता के कारण परस्पर पूछा। हे राजेन्द्र धान र चारों ओरको दौड़नेवाले उन सब ऋपियों के वेद विस्मरण होंगये और किसी ने नहीं जाना ।४। इसके अन्तर उनमें से किसी पिने उसंसारस्वत पिको पा के तीक्ष्ण बुद्धि और वेदपाट करनेवाले ऋपियों में अप्ठय :: जसने जाकर उस बड़े तेजस्वी देवताके समान निर्जन बनमें वेदपाठ करने वाले, स स्वत कापे को उन अपने साथी ऋपियों से वर्णन किया । तब वह सरकार मिलकर वहांगये भार मिलाओं ने मुनियों में श्रेष्ठ, सारस्वत मानसे यह वचनकार कि इ मान भाप हम सब मानियों को पेद पदावो तव उस पुनिन उन अपियों में कहा कि तुम विधिपूर्वक परी शिम्यताको माप्तकरो । १६ पतन का महामुनियों समूह; यहवचन पोले कि पुत्र, तुम बालकहो. तब वह सारस्वत, मतियों से बोले कि मेराधर्म नागहोगा। निश्चय करके जो अबसे को और अधर्मी से लेवे उन दोनोंका शीपदी नाशहोता है अपना वह दोनों; परस्पर शत्रु आते पदा पदः सुनकर अषियोंने सी को भविस्यता शतकाला ल. और suppkoil with food, and at theend of tho famino tão rishia weraio marche Of udo sho knewithe Vedas, for being in an ansettled stutawuriage liye long period, they had all forgotten thu Vojas Simbiont of things fpunu icarnicu Sarasvat and spoke of hird to his compinions! *wThanh All the rivniccame together and sreal him tomach Viras He wroot hiiud in touch thom ile' Valar'un moditip”, that they bocaine his Nisciples:46Rut they anid that thu war gora child andha kafd; Ho nlio pratica desplied anschriw agother is ison contrased or antud tuu it'ue his cauty.' Bitlsnilld i tried jou aczor diu's' to [IRIT Gada Parv गदापंव (७ मन पलिवन वित्तेन न बन्धुमि ऋषयाचफिर धर्म योनचान. स नो महान् ॥१९ तश्रुत्वा पचतस्य मुनयाने विधानत । तस्मा वामनुप्राप्य पुनम पन्चक्रिरे ५० पहिनिसहमणि, शिष्यत्व प्रतिपेदिरे। सारस्वतस्य विपदस्याध्यायकारणात मुटु मुष्टि तत सूत्र, दर्भाणा ते हापाहरन् । तस्यासनाय विप्रातस्यापि, मंस्थिता । ५२ ॥ सत्रापि दत्वा च रोहिणेयो महावल कापपूर्वजोय या जगाम र मुदित अमेण रुपात,महद्धकाया म यत्र ।। ५३ ॥ ३ 3 हात गदायुद्धएवणिवलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने एकपञ्चाशोध्याया। PM W । पावों के कारण से उत्सम शनिवाले धर्मको नहीं किया और कहा कि नोशिक्षा श्रीदक उओं अगों समेत, वेदोका पढनेवाला है, वही हममें बड़ाहै, । ४९ ,ऐसा विचारकर मुनियों ने विधिके अनुसार उस सारस्वत मुनि से वेदोंको पाकर फिर मोको किया) २३ । साउ, इन्गर मुनियों ने वेद पढ़नेके कारण मे उस परम पि,सारस्वता की शिष्यता को,पाया J.५१ । वदन तर वह सब उस परमऋषि, मासन क लिप एक मुट्ठी कुशालाय और उस बालक के अधीनता, में, नियत दुय ।१९। इसके पीछे केशवजी के गड भाई.. महावुली, बलदेवनी; बहाभी, पनोंको दान कर के क्रमपूर्वक उस प्रसिद्ध तीर्थपर गये जहाँपर कि एक बहुत, कन्या, व्हरी । ५३। ' dbarn ”Then tbo rishis knew that superiority lay in knowledge and not in years or wealth Thus they learnt the Vedas from him and were agan stablished on the right path 89. Sixty thousands of rishis becano Kis disciples Lach of them brought a handful of Kusla grass for his seat and obøyed his orders Baldev gars charity'at that t'olý plače and proccoded to the place where a very old manden had her obode 53 1 . 1 J (७१७२) Mahabharat (7173) चाममेजय वाघ । कय कुमारी मगवस्तपोयुक्ताभूत पुस । विमान इतेपे को वास्या नियमोमपत् । दुरीमई प्रस्त्वमा तमनुपमः। माम्बाहि तस्सलिलं यथा तपसि सा स्विता ॥२॥ वैशम्पावन बचाकीपत्री ममहावीर्यः कुणिगंगा महायशाः सतया विपुल राजस्तपोवनो... मसाप मुता म समुत्पादितषान विभुः lastषा मुवि गिगों महायशाः | जगात त्रिदिवंगजन सत्यशोधरम बरसादी पुपकनिमेक्षणा माता तपसोप्रेण, करवा अममनिन्दिता । पानीपत पितुम्देवांश सा पुरा ५६ ५ पातु तपसोप्रेण महार समासा पिया रोपमानापि तत्र नेपानिन्दिता । बारमम. सामानमा माया." साबपसोप्रेण पोयिस्वारमनस्तनुम् । पितरेवाडयनरता बम विमो॥ अध्याय ५१॥ मनमेमय बोले कि हे भगवान पूर्व .समयमें यह मार्ग कैसे करें मार किस निमिच तपस्याकरी और उसका क्या निषमणमा निशुष से यह महा भेटे और बड़े कसे करने के योग्य तप एना भईसका पास मूल समेत बत्तान्तको जैसे किपर तप पाचहुई। ३ । वैशम्पासपोरेको रामा पो पराक्रमी और पशमान एक बुमिनर्गनाम पिगे यापागली बड़ी पस्पा करो।। मनसे सुन्दरी पेगिको उत्पन्नकिया तो पुषि गर्गमुनेि उस बन्या को देख और बहुत प्रसनोकर इससोक मेंबरीको सागकर पोये । १। इसके पोर वह मुन्दर भृकुटी कमल बोपना करपाणी' निदोपबहेवारी उपतप के बाग परिश्रम कर के मतों समेत देवा मार पितरों की पूजन करनेवाली ।। हे राजा उस उग्रतपमें ही उसका बा समय व्यतीत दुमा भार उस पितासे दाई निहोंष ने भी कभी पविकी की - CHAPTER LII Janmejaya aaid, " How was the maiden engaged in mmstrelam for what purposs and with what vu#s! I wish to know how she WM engaged in Bevere asceticism. " Vaishampayan said, " There mu glorious rivbt, named Kunigarg. By the power of ascotcutm bogato buth to a beautiful girl He was much pleased with her and left the world for bearer. The beautiful maidon worabipped the gode and pntru. 6. She was engoged all her life in performing Asceticum and bevor wahed to diarry. She dried her body with penance and passed ber trose in devotion in a wilderness. She thought that with bileronesi cf her bdy she had acquired her object of biro sho was ready to dia when she was so fareble that she could no longe -re T (31733 Gada Parगदापर्व, (१७) मामानं मम्पमानापि कृतकाभमाग्धिता पाक्य व राजेन्द्रपाकक्षिता ॥९सा नाशक पदा, गन्तु पदात् पदमपि पंपमा विकार मनेबुदि परोकाय सदा १०irl; मोककागान्तु नारिया शरोम्नारदोऽषीन। जसंतापा स्थायाः कुतो, लोकास्तकांनधे ॥ १९ ॥ पातु श्रुतम स्माभि कोके महाते । तपः परमकं प्राप्त मातु लोकास्थया जिता ॥१२॥ तम्मारवजाः शुरखा साकारपिससदि । तपसौ पच्छामि पाणिप्राइस्य ससम.१३. युके पास्ता समाह पाणि गावलबम्भवः । ऋषि मारभृङ्गवान्नाम मंयप्रेमात १४॥ सधेन.तथापाई,पाणि स्वयामि शामने । ययेका वसन्यं त्वया सा मषेति । तथेति सा मातभृत्य तस्मै. पाणिददी तदाः॥१६. .यथारऐन विधिमा इस हेतुसे कि उसने अपने योग्प पतिको नहीं पाया तब कई बड़े अंतर से अपने शरीरको पारित करके निर्जन इनमें देवता और पितरों 1.हे.राजन्द्र परिश्रम से रहित अपने को अभीष्ट प्राप्त करनेवाली मानकर गा बड़ी तपस्या जीर्ष शरीरहुई । राजा कि वह अपने चरणा से कहाँ बोनेफिरने को भी समय ना रे तर परलोकके जाने में, विधिपूर्वक गदि कोरि नारदजी उन शरीर त्याग की रागवान कुमारी बोल निष्पाप तुप सरकारसे रहित कन्याके लोक कैसे हासत है महायत एम ने देवलोक में ऐसा एनाहै तुमने बड़ी तपस्याकरी : परन्तु लोकों को पिंजय नहीं किया। १२ तवयोमर कुमारी नारदजी के इन वचनोंको सुनकर पियों की सभा में बोली, उत्तम भूपि में प्राधे तपकाल अपने पतिको दंगी ऐसा कानेपर इसके हायको गालके पुत्र शृङ्गवान् ऋषि पकड़ा भार इस नियमों का १४ विहे शोभायमान अब' में तेरे पाणिको इस प्रतिज्ञा के साथ ग्रहण करता है कि जो तूएकरात्रि मेरे साथ निवासकरे तो उसने कहावयास्तु ऐमी माताकर के उसने अपना पाणि उसके हायमंदिया। १६ । गालक्के पुत्र शृगवान्ने वेदोक्त विधिस अग्निमें बनकरके उसको पाणिग्रहण करके विवाद किया। राजा बरखी. रात्रि में तरुण दिव्य भूपण और पत्रों से भी walk., 10: Beeing her ready to dir, Narad said, " How can you enter, hearen without Sanskare. Thive heard it said among.goda that you haye Performed insecticism, but won no regions. At this; bo onid, in the 'assembly of munis : ! sbállígivo Nall' tbo kërit of my ascoticistu to my husband. "At this; Shringvaa thoron of Galak took bold of her hand and promised to marry her on condition that she stayed a night with him. She consented and be married liber recording to the Vedic rites and puurid litotirns to far. '17. Noring that night sle. Cand young, dunned witb ordan erits and drizi, LEAR ~ वरित महान त - . । प . . .. . . ... . २० [[७१७४] Mutabliara (7174) इत्या वाग्नि.विधानतः । चक्रं च पाणिग्रहणं तस्योवाहन गालषिः ॥ १७ । सा रात्रावभवद्राजस्तरुणी घरवर्णिनी। दिव्याभरणवत्रा व दिव्यनगनुलेपनाः ॥११८ ॥ तां रष्ट्या गालविः भीतो दीपयन्तीगिष भिया घास चक्षपामेका प्रभात सांप्रधी चतम् ॥ १९ ॥ यस्त्वपा समयो प्रिनतो मे तपताम्बर तेनोषितास्मि भरते स्वस्ति तेस्तु ब्रजाम्यहम् ॥२०॥ सानुज्ञातानवीयो पोस्मिस्तीयें समाहितः पास्यते रजनीमेका तर्पयित्वा निधौकसः ॥२१॥ पारितमंटो चोकचोटौ सम्यगावरेत योब्रह्मचर्य वर्षाणि फल तस्य लभते सः ॥२२॥ एवमुक्त्वा तत:.सावीदेस्यक्रमा दिवं गया। ऋषिरध्यभषहीनतस्यारूप विचिन्तयन् ॥३२३.. समपेन तपोच कुन्छास्पति गृहीतवान् । साधीपत्वा तदारमान तस्यां स गतिमधियात् । ३४॥दु:खितों न इते शल्प हला संग्राम निहत पाण्ड वान उस, लक्ष्मी किसाथ निवासी ये में श्रेष्मण तुमने और शुभाोय अंब जाताह तयः स निकलकर वह खा. फिर वाला जो सावधान पुरुष इस तीयमे देवताओं को तृप्तकरके एकरात्रि निवासकरें वह उस फलको पाव जो कि अठारन वर्पतंक श्रेष्ठ रीति से. ब्रह्मचर्यको करें। २२। इसके पार्छ वह पतिवता ऐमा कहकर शरीरको त्यागकर स्वर्गको गई और यह अपि भी उस के रूपको, शोचनाहुआ महा दुखी हुमा । २३ । नियम के करण से उसका आधा तप-वड़ी कठिनता से लिया और उसमें प्रात्मा को साधन करके उस की गतिको पापा-१.२४ भरतर्षभ उसके रूप भार तजवस से महा दुःखीने ऐसा किया इसमकार से उसने उस कन्या के शुभचरित्र माचर्य और शुभगात को उससे करर, २५ | उस स्थानपर निपत होनेवाले बलदेवजी ने शल्प को मंतक हुआ सुना शत्रुओं के तपानेवाले वलदेवनी ने वहाँ भी ग्रामणों को दान देकर 'शक्ष्य with bully saying 'vivmo fragrance, Gali vam on, Shringwon lived with that.heautiful woman for a night, In'il ó norning'sburaid him, I have done, my put of, the contact udlived witu gruope night. Tam now. going ayay. ; 20.. "Having. come ovt in tho operi airyshe said, " He , who. lires hero gni night. will gain the merit of remaining in qlibacy for fifty eight yeus& " Having said this, the chaste troman left for liqaver. Thio rishi was tuuch grioverd for her, Ho was looth to retain half tho ns erit of her arceticirm and mado hinsell wortby of lice by purifying his soul. Juch grioved at the I (7170) Gada Parv गवारा { ७१७५) वैस्तदा ॥ २७ ॥ समतपत्रकद्वारासतो निफम्य माधव' । पप्रर्षिगणानाम कुरुले असा यत् फलम् ॥ २८॥ ते पृष्टा प्रदुसित कुरक्षेत्रफल विभो । समाचक्षुर्महात्मा तरी सर्व ययातथम् ॥२९॥ गदायद्धपणे वलदेवतीर्थयात्रायां सारहातोपाख्याने द्विपमाशोध्याय ५३ ॥ - को 'मनका भा_मुना । २७ । इसके पीछे माधव बलदेवजी ने समन्तपञ्चक के द्वारसे निकल कर कुमतुत्रके फलको ऋपियों से पूर्ण ,१८ । हे समर्थ उन यादवों में श्रेष्ठ बलदेवके इन वचनको मुनकर उन महात्माओं ने उस कुरुक्षेत्रका ठीकर फल वर्णन किया। १९ । V loss, he related vil about the old m tid: while there; Boldoy heard Tof the dënth of Shaly: He gave charity' to 'Brahionna"Then be askedsthu.rushishabout the merits of• Kurukshetrans ho came out of Sumant Panchak, "That i best of Yadavag" was then Informed about thy merits of Kurukshetras,295 E .. . thi . - 1 1 -- । --- 1. (७१७३) Malablarab (7176) ऋषयः ऊचुः । प्रजापतेरुत्थरवेदिगम्यते सनातनी राम समन्तपरकम् । समीजिरे यत्र पुरा दिवौकसी चरेणसत्रण महावरदा ॥ १ ॥ पराराजर्षि वरेण धमता पनि घयातिने तेजसा । प्रकृष्टमेतत् कुरुणा 'महामना ततः कुमक्षण मिनीड परये ॥ २ ॥.राम उवाच । किमर्थ कुरुणाकर क्षेत्र नामहात्मनानादिनाम्यह श्रोतु कथ्यमाम तपोधनाः ॥ ३ ॥ अषय ऊचुः पुरा किल कुरुं राम कोन सततोस्थितम् । अस्य शादियान पर्यपृच्छा कारणम् ॥४॥ किमि पर राजन् प्रयलेन पर गति यमेवं कृप्यते क्षितिः ॥ ६॥ कुरुरुवाच । इइये पुरुषाः क्षेत्र मरिष्यन्ति शतकतो। ते गमिष्यन्ति सकृतानु लोकान् पाविजितान् । ६ मवहस्य को जगाम विदिवं प्रम राजर्षिरप्यनिन कवयव वसुन्धराम आगम्यागम्य ने .... 'अध्याय ॥५॥ पिरोले हे बलदेवजी यह समन्तपञ्चक प्रमानी की सनातन सरपेदी की जाती है जोपर कि बड़े दाता देवताभोंने उगम यज्ञकद्वारा मोठेपकार से पूजन किया,॥ १ ॥ समय में राजर्षियों में श्रेष्ठ बड़े, बुद्धिमान और तेजस्वी महात्मा मुख्ने इससत्र को सोताथा इस हेतु से इसकानाप छोकमे रुक्षेत्र मामिल हुमा वनदेवजी बोले हे तपोधन ऋषियों कुरुमः इसक्षेत्रको किमोतुमे ओवर में इसका सब फान्त मुना चाहताई । ३ । ऋषि बोल रे बमदेवजी निअप करके, पूर्नसमय में इन्दने स्वर्ग यो आकर उस संदेश सन्नद और जोतने में मार विष, राना कुर से इसका हेतु पूजा इन्टने कहा कि राजेन्द्र से भार समेव बाप मह पाकाम करते हैं राजर्षि आपकी इसमें क्या करनेकी ti कारन पर पृषी भाप जीवने हैं। ५ । कुरुपाने के दो पुरुषस में शरीरको त्यागकरेंगे वह अपने पुरायो निष्पापलोकों को जागे । इसके पीछे इन्द्र सकर अपने स्वर्ग को चलेगपे भी प्रकार र राषि दुखी होहोकर CHAPTER LIIT, The rishis And Bumartpancuak 15 valled the atemal alter of Bralima, #bac the gods front row. forued sacrifice en Igiven donations, Obras Priac kuru lined till the ground in formēr daya and there. furu the place was called Kv ukshetra. " Baldev raid, " Why did Juru plough it ? i wish to hear all abxat it " The riebis snid, lodra carno fronu bearea and asked Kuru the reason of his so doing. Ho said," What are you duillg, Prince; what ia your aim, and sly do you all the grudod !" Kur ieplod,' Pe ple dying here will be cicabad of their bood nill ge to lonto. " dix laughtdatthia scd turuild 10 poled k llu Prirre rolluid tu libur with the (1771 - Gads Part गदापर्व [७१७७ भूयो भूयोऽधा शतक्रतुंरनिर्विन दृष्ट्वा कृष्णा नाम: सांप्रेणकर्ष मुघा पतन शक्रोधोहेवाप्रायश्चिकीर्षितम् ॥२॥ एतत् भुवा हसदेव साक्षमिद वच । घरेण उन्धता शराजादि शक्यते ॥ १४॥ यदि प्रमीला स्त्री गच्छनि मानव । अस्माननिष्टुपा तुमिमांगो मोन भविष्यति ॥ ११॥ यागम्य च तत शतवा गजर्षिभप्रवीत् । अलं खेदन भधत किवा वसन मम १२ मानवा ये निहारा देवन्त्यषस्यतम्धिता । युधि वा निहता सम्यपि तिवंगा १३ ते स्वर्गभाजी राजेन्द्र भविष्यात महामते यास्थिति तो राणा कुछ शकमुषाय ह॥ १४॥ ततस्तमानुशाध्य प्रहऐनातरमना । अगाम प्रिरिय भूय भिम बहनिमदन. ॥ .५ । एवमेतदुश्रेष्ठ कई राजर्षिणापुगा शरण पायात पुण्य प्राणान् विमुन्वताम् ॥ १६ ॥ ब्रह्मास मरमेष्ठ पुण्ये राजबिभि उमशेषको ओताकरताया और इन्द्र बारम्बार इसी प्रकार में पूछ । और इस र कर चलेजावये । ८ ! जा राजाने उग्रतप से पृथ्वीको बोता तब उस राजर्षि के मनको इच्छाको इन्द्रने देवताओं से कहा । ९ । देवता यह सुनकर इन्दसे यह बचन बोले कि हे इन्द्र जोबनमके तोह राजर्षि को घर से, लुभाना योग्य है मो । इस लोक मनुष्य यों से हमको न पूजकर इस क्षेत्र में। मरकर चर्मको आयगे उस दशामें हमारे भागोंको नाता होगी।११। इसके पीछे इन्द्र ने माकर उस राजर्षि से कहा -आपको कष्ट करना योग्य नहीं में सो कीजिये । १२ हे राजा जोसावधान मनुष्य यहाँ निराहार होकर अथवा युद्ध में अच्छोराति से मरणको पाकर शरीरको त्यागकरेंगे पद्यपि तिर्षक योनि में भी उनका जन्म होणाय तौभी । १३ । हेवढे वद्धिमान राजेन्द्र का स्वर्गभागी होंगेन्द्र के इस बात को सुनकर राजाकुरु ने इन्द्र से कहा कि ऐसाही होय ॥४॥ सब तो इन्द्र बस्यम्त प्रसन्न चित्त से उससे पूछ शीघही स्वर्गको गये ।१५। हे गावों में श्रेष्ठ इस प्रकारसे पूर्मसमय में यह क्षेत्र राजर्षि कुरुसे प्रोतागया और उसीमकार plough, Indra came to him, put the same question again and agura and would return with a laugh. Still the king contaved to labour Then ladra informed the gods with the king's dusse Bod they said, "You sirould lonipt him with a boun if you can, 10. For we shall lose our shares of the sacrificer, il people will cle there to go to baren without performsug them.” Indra card to this hing' and said, " You need tako so much trouble to lenger, if you do what forg, fb0:0"wida men who die bere fastig is a good caus, shall proeesd to heaven. " The king consenthd to uttra's proposal. ladra bado bim farewell and returned to heaven. 15. Thus the i ploughed by Royal Kura and his att was repbos by Brahma and usher goda tu reugh In ra. Thoes 10 Lester pitt in the fnce Be the fold huld waa 1( ७१७८) Mahabharabe (7118) तथा. नावः परतरं पुष्य भूमे स्थान भविष्यति ॥ १७ ॥ इहतप्स्यन्ति,ये,फेविक्षपः परमकं नमः । देहत्यागन के सायास्यन्ति ब्राह्मण, क्षयम् ॥ १८ ॥ ये पुनः पुण्माको वेदानं दास्यन्ति मानवाः । तेषां सहस्राणित भविष्यत्यचिरेण ॥ १८॥ येथे नित्यं मनुजा निवतस्यन्ति गुमैषिणः। यमस्य विषय ते तु न द्रक्ष्यन्ति कदाचन ॥२०॥ यन्ति येच क्रतुभिर्महनिमजेदवराः । तेषां त्रिपिष्टपे पासो यादमिदीपति, ॥ २१ ॥ भपि,चात्र स्वयं शकोजगी गायां सुराधिपः कुरुक्षेत्र निवदां वे तां अषण, हलायुधः ॥ २२ ॥ पांशधोपि कुरुक्षेत्राद्वायुना समुदीरिताः। अपि दुकववकर्माण नियनित परमा गतिम् ॥ २३॥ मुरर्पमा प्रामणसत्तमाय तथा नृगाद्या, नरदेवमुस्थाः। इन्टवा मगहः क्रतुभिनृसिंहा सन्त्यज्य देहान, मुंगति प्रपन्नाः ॥ २४ ॥ तन्तुका, रन्तु योर्यदमन्तरं रामहदानाञ्च मचक्रकस्य च । एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चक प्रताप देवताओं ने और ब्रह्मा ने इन्द्रको आज्ञाकरी इससे श्रेष्ठतर धर्म की बादिका हेत पृथ्वीपर कोई स्थान नहीं होगा। 1-1 जो कोई मनुष्प यहाँ उत्तम तपस्या करेंगे वह सब शरीर को त्यागकर ब्रह्मलोक को जायगे । १८ । और जो पुग्यो मालोग यहाँ धनाधिकका दान करेंगे उन्होंका वह दान थोड़ेही समयमें सहस्रगुना होगा । २१ । और जो भलाचाहनेवाले मनुष्ण सदैव यहां निवास करेंगे वह कभी यमराजके देशको नहीं देखेंगे । २० । औरानो राजालोग यहां बड़े यज्ञों से पूजन करेंगे उन्होंका निवास स्वर्गमें तबतक होगा जबतक कि यह पृथ्वी नियतहै ।२१॥ यहाँ देवताओं के राजा इन्द्रनेभी पाप उस गाथाको गाया है जोकि कुरुक्षेत्र से सम्बन्ध रखनेवाली है हेबिलदेवजी उसको पाप मुनिये । २२ । कि इस कुरुक्षेत्र में वायु से उड़ाई हुई धूल-भी पापी मनुष्य को परमगति देती है ।२३॥ हे नरोत्तपयहां उत्तम देवता बाह्मण और नृगआदिक श्रेष्ठ राजाओंनेभी बड़े पाजेत यो से पूजनकरके अपने अपने शरीरोंको त्यागकर उत्तम गतिको पाया। २४ तान्तुक और आरम्तुक, परशुरामजी के हुद और मचक्रकका जो अन्तरहै. यह कुरुक्षेत्र of earth for the propagation of dharm than Kurukshetra. Those who, perform ascarici m there, will go to the region of Brahm. A charity given there will multiply 4 thousand fold' in a very short time and tie good people living there will ever have to see the region of Yam, 20. The kings who perlom sacrifices there will liye in paradiss as long as the earth la to. ladra tbe Prince of gods #rich A verss about this very place, yhich igns thus ---, The dust of Krikshetra, blown by the wind, falling on a sinfol map, will lead him to salvation. Here gls, brahmaniard royal sages like. Nog psiform u srrific an lobtained goo!', regions after doath: Tho place boundsi by Tarintuk, Arantuk, Parashuren's lake and Machakral (1717911 Gada Parv महापर्व (७१७२ 'सेवधरषेविरुष्यते. • ॥ २५॥ शिषं महत् पुण्यमिदं दिवौकसामुसम्मतं सगुणैः समन्वितम् । अतश्च सर्वेत्र नृपा हता रणे यास्पन्ति पुण्यां ग़तिमक्षयां सदा॥ २६ ॥ इत्युवाच.स्वयं. शक्रः कुरुक्षेत्रमहोदयम्। तच्चानुमोदितं सर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरः ॥२७॥ इति गदापुदपर्वणिवेलदेव वीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने प्रिपञ्चाशाध्यायः ५३ . coa ममन्तपंचक नाम ब्रह्माजीकी उत्तरवेदी कहीजाती है । २५ । यह कल्पाणरूपऔर धर्मकी बड़ी बृद्धिका कारण देवताओंका अङ्गीकृत और सब गुणों से युक्तहै. इस हेतुसे यहाँ सदैव युद्धमें मरहुपे रामालोग पवित्र और अविनाशी गतिको पावेंगे ।२६ । ब्रह्माजीसमेव इन्द्रने भाप अपने मुखसे यह वर्णन किया और ब्रह्मा विष्णु महेश्नर इनतीनों में उस सबको अङ्गीकार किया जा is called Kurukslietia saiņantpánchặk and the altar of Binbnis 23 It is a holy place of great merit and the heroes'dying here iü' battle will áttain indestructible state, Bralimpand); Indrarhimself said this and: Brahma, Fishnu and Muhesla ratified: the predictio4,7". 27., (7180) Vishalihorns देशमापन उषाण कुरुक्षेत्र सतोरट्या दवा दायाच सावतः माम मर दिल्यमगमसनमेजय ॥ १.मधुकानपणोपेतः समन्यमधिसेंकुलम विषिष्टपुतं पुषर्ष पनसासिमुलगा Rषा पादपोष्ट प्रकार पुण्यलक्षणमा तार बान सान कस्याप्रमावरस्याम् ॥ ३॥ तेतु स महात्मान अरावन बाधम अणु विस्तरयो राम बस्यायं पूर्वप्राधमः ॥ ४ ॥ मन विष्णु पुरा देवस्तीत मम् । बास्व विधिवास ता:समानामय प्राणी सिवा कोरम चारिणी रोगगुफदिवयाता सपासिया तपस्विनी॥६॥धभूवधीमस राजन शामिलस्य महामनामुताधृतरता साध्वी निवतावाचारिणी सातुतक्यातपोपोरदुम्बर बीज नगर गतास्वर्ग:महामागा देघमाला सुधा भीममा रोगा . भूषनानामिक्षापाय,पावे.हिमपतोऽयुतः, सयाकारीणि सामिति अध्याय ५४॥ वैशम्पायन वोजनमेमय इसके पीछे पादव बलदेवजी कुरुक्षम को देख दानादि, देकर उस बड़े दिग्य पाश्रमकोगये।।। जो कि मधूक और नामकवनों से संयुक्त सत भार व्योष नाम वृक्षोंसे न्यास चिरावल पक्षों में संयुकधुल्यकारी पनस और अर्जुन माप हतासे संकुलया । २ । यादवों में श्रेष्ठ पवित्र समाले पळदेवीने बस आश्रमको देखकर उन सब ऋषियों से पूछा कि महामति चष्म किसका पाश्रमई । ३॥ हेरामा फिर उन पर महात्माओंने बलदेवजी से कहाकि हवलदेवजी यह को प्रथम जिसका रामहै उसका मूलसमेत सबहतांत सुंनो ॥३॥ यहाँ पूर्वसमपर्ण विष्णु देवताने उत्तमरापको तपाहै और यहाही उनके सब सनातन पाभी विधिपूर्वक पूर्ण हुऐ ॥ ५ ॥ इस स्थानमें कौमार वह्मचारिणी बामणी सिबई पद तपसे सिद्ध योगसे संयुक्त तपस्विनी स्वर्ग कोई ॥ ६ ॥ राजा महात्मा शाडिल्य ऋषिकी पुत्री श्रीमती यतधारिणी पतियता व चारिणी ॥ ७ ॥ ब्रह्मचारिणी होकर वह माभाग देवता बाह्मणोंसे पूजित खियोंकेसाथ काठनता से करने के योग्य घोर तपको तपकर स्वर्गकोगई इसके पीछे महा अमेय बलदेवजी पियों के बचनको मुनकर उस माश्रमको गये ।।८॥ और उनषियों CHAPTER LIy Paistampayan said to Janamejaya," Having scen Kurakshatra and given donations there, Balder went to a bermitage surrounded by various trees, Bonaked of the rishis about its bistory and they said, " Bere Viajou had performed asceticism and completed his sacrifices. 5. Here a Brahman maiden got perfection and went to paradise. She was the daughter of Shaudliya rishi and obsorved the Tow of celibacy. She performed penancea bard lo be done ered by mep, and kving respected by gods aud Biabmans, went to paradiso." Haring beard the talk of those rishit, Balder went to the bermitega.
. 7181) Gada Parv गदापर्व ७१८१ स्वामोऽसलम् ॥९॥ नातिर ततो गत्वा नगतालाबजो बसी । पुण्य नीवर हष्ट्रया विस्मयं परमं गतः १५ प्रमाण सरस्वत्याः पक्षप्रसंवणं चल समाप्त कारण पन प्रवर तापमुत्तमम् ॥ ११॥ इलायुघलन चापि दया दान: महोचकः ॥ १२r. भयुतः सलिल पुसे मुशीते बिमले.शुषो। अन्तयामास पितन देवांश्च रमा मदः । १३. ओप्यकान्तु रजनी पतिमिमांशाणैः सा. मित्रावरुणयों पुण्य अगामा, भव्युतः १४॥ गरियमा व या माफ. प्रतिमानुषन् । वेग कारपनाधमुनाया जगाम १५.. लाया तत्रापि धर्मात्मा परमात. भवाव सिसहिती महापल । उपविध कथाः सुमाः सुभाष पदुधवा तु तिष्ठता ने भारदो भगवानृषिः। भाजगामाय ते देश यंत्र रामो यस्थितः ॥१७॥ जटामण्डलप्तधीतः स्वर्गवारों महातमा हेमवण्डधरो राजन गर्नुपरस्तथा ॥ १८. कच्छपी मुखशयाना गृह्य वीणा मनोरमामा गीत को दबा करके हिमपान पर्वतके पाव सन्ध्याके सवकमाको करके उसपर्वतपर 'बड़े ॥ १ ॥ इसके पीछे तालक्षनाधारी पराक्रमी बलदेवजी ने थोड़ी दूर पर्वतपर माकर दमकी बलिहेतुरूप उत्तम. थिको सरस्वती के और प्लसनाम सिस्नेको देखकर पाइपको पाया और वहाने चलकर कारपवन नाम अत्यंत उत्तम तीर्थको पापा ॥ ११॥ महाबली वलदेवजी वहां भी दान को देकर ॥ १२॥ पवित्र शीतल निमंछ और धर्म की वृद्धि के कारणरूप जल में स्नान करनेवाले युद्धदुर्माने देवता भार पितरोंको बतिीतसे तृप्तकिया ॥ २३ ॥.फिर वह अजेय यती और पामा समेत पाएकरात्रि निवासकरके, मित्रावरुणके पवित्र माश्रमको गये. 1.१४ । इसी कारन उस यमा देशकोगये महापर: कि पूर्म ,समयमें इन्द्र ओन और अयमानाम् देवताओं ने परम भीतिको पापाया। १५ सिस वधिमी मानकर धर्मात्मा पलदेवजी ने परमप्रीतिको पागो सियासत बठे हुरे महापली बसदेवनीने उम्मल कथाओंको एना बसप्रकार उन लोगों पर भगवान मारदऋषि उसस्थानार आये जापर वलदेवनी थे । १७ । हे राजा बह लटामपटल समेत स्वर्णम्पी ववधगि पहातपस्वी संदण्ड धारी कमंडल हायमें सिनृत्यगान साबधान देवता बामणोंके पूजित ( १८ । कलहोंके करनेवाल He bowod down to the rishis, and having pertormed evening service thore, he ascended the hill, A little bigher up he saw the holy place and was astonished at the greatness of the Saraswati and the water, allai., Further on, he visited the holy place, known as Karapran. Having given charity and bathed in the pure, cold and loly' water, ne gratified the pitria. Hasing staped there one night, le proceeded to the hermitage of 'Jitravaiuo. From Karappan be went to the placo at the Yamnina, where the gnda Indra, Agoi ad Aryama lied met in friendship io former days Baldev was, quuh, pleased with ....:7 - ..7182) - ७१८२) . Bhihablarat ध कुशलो देवप्राणपूजितः ॥ १५ प्रका.फलहानाञ्च निवडच कलाश्रियः । देशमगमत्र श्रीमात्रामो प्यस्थितः ॥ २० ॥ प्रत्युत्थाय तु तं-सम्बक पूजयित्वा यत प्रतम् । देषाई पर्यपृच्छत स पंचावर्त करून प्रति ॥ २१ ॥ ततास्यांकरवाजभारत सतीपत समेत पणइत्तमतीव कुरुक्षयम. ॥ २२ तोपोरवानारद दीमयां गिरा। फिलास्थातुं वक्षेत्र व तंत्रभिवानुपाः । २३ । भूतमेतामा पूर्व समेव तपोधन । गिस्त ध्रवणे जावं कोताळमतीय मे... २४ ॥ नारद उवाच । पूर्व मेव इतो भी मो द्रोशः सिधुपतिस्तथा । तो करीन. कणः पुत्राभायमधारयाः ॥ २५ ॥ भरिया रोहिणेव मरावध पीवान ने पायेच परयस्तर म भग पलाः॥ २६ ॥ प्रिया प्राणान परिवंगा जवाय कोरवस्य 4. । राजाभो राजपुत्राय सदैव कलहामियानारदजी उस विरोचक शदवासी अपनी पी नारीणा को लेकर उस देशकोगपे. जहापर.कि.श्रीमान बलदेवजी नियतये । २० वसदे बीने अभ्युत्थान पूर्वक उस साक्यानात देवर्षि नारदको सदर रीतिसे पनकर कौरवोंका रतात पा । २१ ! सर्वघमंड नारदजी ने बलदेवजी से कौरवों के व कठिन : नाशको वर्णन किया । २२ । सव वलदेवजीने भी लेदयुक्त होकर. नारदजीसे कहा कि जो राजालोग पहा वर्तमानये यह सब शानियों का समूह कैसा है।.१३. हे तपोधन, इसको मैंने पूर्व मन परन्तु मा यौरे समेत सब- पूरा वृतान्त आपले धनना चाहता हूँ । ३४ ॥ नारदजी बोले कि मामली तो मंथमही मारेग उसीमकार द्रोणाचार्य और जयद्रय और पुत्र सहित कई मारे, गये.। २५६,हे. पलदेवनी भूरिश्रवा और पराक्रमी राजामद मारेगये इनके विशेष भन्य२ बहुत से ऐसे बलवान लोगपी.. २६ । कौरवोंकी विजय के निमित्त अपने पारमाणों को त्यागकर मारेगा, जो कि: पद्धोंमें मुखन, फेरनेवाले. राजा. और batüing there we then sat down to hear reiigiou: discourses." Wien they were a. Thus seared together, Narad.the - risti 'can to them, 27.1. He wore long locks, golden anthes and had gold stuff end ever in hand. He was skilful in daucing and singing. was depected by gods and hiahiang and faved dissentione. He came i playing on his luta Båldeo stvod ap at his siglit and having given propert reepact to the divine sayer askel of, birn about the Kauravas. 21. Narad informed bim *ot the great destruction of the Kauravas, Baldev vras lucha grieved to hair the sad nowa mod inquired about the other sings assembled thore, Narad , said, Bhishin , was the firsb to fall and then Drona, Jaya Iruth, Karin and his son pere slain, 25. Bhirrislira va and the prince of Jindia are slain like ober, powerful allies of the Kauravas and the princes who wce upaonchifus ja hght. Only thiree persons aro ali ve oa tie side or Duryodian. . Tuey #re Ksigacharya or . " - (11833 Gada Parv गदापय (७१८३) सपरेवापत्रर्तिनः ॥ २५॥ अनिश्च महाबाहोश्रण में सत्र माधय ! पाराष्ट्रयले शेत्रमा समितिमईनाः॥ २८ ॥ कृपश्च कृतवर्मा,च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् । तेपि धे विदुना गम दिशोदश भूयाचदा ॥ २९ ॥ दुर्योधनो इसे नाल्ये प्रदुनेषु कृपादिपु । इदं पापनम् नाम विवेश मशःसिमः ॥ ३० ॥ शयानं घाराष्ट्रन्तु सम्मिते सलिलें तदा । पारडवा:सह कापने धारिमायामिराह यन् ॥ ३१ ॥ स तुधमानो घल, वान् वाग्मी गम समन्ततः उत्थितः सहावीर::प्रल महती गंदाम् ॥ ३२ ॥ स.चायुपगतो योई भीमेत सह साम्प्रतम् । भविष्यति तयोरय, युद्ध राम सुदार गम् ॥ ३३ ॥ यदि फीताले तेति व्रज भाधय मा चिरम् । पश्य युद्धं महाघोर शिष्य योदि मन्यसे ॥ ३४॥ चशम्मायन उपाच । नारदस्य घचः श्रुत्वा तानभ्यर्य विज भान् । सोयिसभामास येतेनाभ्यागताः मह,३५:गम्यतां दाका.चेनि मान्य राजकुमारथे । २७.हे महाभाग माघरजी वहां जोर जावते वो उनको भी मुझसे | मनों युदर्भ मर्दन करनेवाले तानपुरा तो दुयाँधनकी सेनामें बचे हैं । २८ । अर्थात कृपाचार्य, कृतवर्मा और . पराक्रमी, अमत्थामा हे वलदेवजी, वह तीनोभी भयभीतडाकर दशों दिशाओं को भागे । २९॥ शल्पके मरने और कृपाचार्यादिक | तीनों बचे हुये शूरवारों के भागजान पर अत्यन्त दुखी दुर्योधन व्यासजीके द्वैपा यननाम हुदमें प्रवेश करगया । ३० वहां: श्रीकृष्णजी समेत पाण्डवों ने उसजल, नियत और शयन करनेवाले दुर्योधन को उग्र वचनोंसे. पाडावान किया.। ३१,। हे भगवन वळदेवजी तब वह, वार चारों ओर के दुर्वचनों से पीड़ावान होकर उस, हद से गदोको लेकर उठा.। १२ । सो वह भीमसेनसे सम्मुख लड़नेको गया अब दोनोंका भी मानयनिक पदहोगा. हेमाघरजी जो आपको, उप्सयुदके देखनको उत्साहो वोशीघ्रजाओं देर मतकरी आप अपने दोनों शिष्यों के घोरयुद्ध का देखिये ।।४। वैशम्पायन वोलोक बलदेवजीने नारदजीके बचनको मुनकर जन उत्तम ब्राह्मणों को अच्छी रीतिसे पूजकर विदाकिया जो उनके साथ मायेये । ३५। और बड़े प्रसन्नचित्त महाअजय वसदवनों ने साथियोंको भाडाकरी कि Kritvarma and Ashwathama, but thoy tor, ron sway for..fear. At tho full of bis warriors and the rout of Kripacharya and others, Dur. yodhan, 'much grioved, hid bimself in the laku of Vyas. 30. Thero Shri Krisbo and the Pandavas wounded Duryodhan with their harsh words and be came out of the lake with his mace to fight with Bhita. The two warriors will now fight a dreadful battle. You manat bastun to go to the place if you have a mind to witness the battle of your two discipler. " Vaihampayan said that Balduv on hearing the words of Narad sent away the Brahmans who were with him. 35. He ordered his attendants to go to Dwarka and coming down from the hill and .
(७१८४) Malabbarat (7184) शानुगाधिनः ! सोवतीयांचल श्रेष्ठात् नमनपणाव शुमात् ॥ ३६ ॥ ततः प्रतिमाता राम. या ताफल मात् । विप्राणां सनिधी श्लोकमगायविममा युतः ॥ ३५॥ सर नीवाससमा कुतोरतिः सरस्वतीयाससमा. कुनो गणाः सरस्वती माय दिवं गता अमा. सदा स्मरिष्यन्ति नहीं सरस्वतीम् ॥ ३॥ सस्ती सर्वनदीपु पुरंदा सरासी लोकमुखाबापदा ! सरस्पनी प्राप्त जना मुंबकतं मदा: शोचति परत्र वाज ॥ ३९ ॥ ततो मुहर्म प्रोल्या प्रेक्षमाणः सरस्वतीम् । इययुक्त रव शुनमानियत पर तपः ॥ ४२ ॥ स शीमगामिना तेन (पेन यदुपुतः। विभुगीसमास: शिपयुद्ध मुपस्थितम ॥ ४॥ गदागदाणे बकदेवतथियात्रायो सागसतोपाख्याने चमवाशोध्यायः ५४ ॥ . -- समबारका को त्रामो पर्वतार महाष्ठ वनाम शुभं झरनम उमरकर और नायक परेको मुनकर वासनों के सम्मुख इसत्रोक को कहाँकि 11 परस्पतीपर निरास करनेके मिना कोई ही उत्तमगुण नहीं है मब मनुष्य इस सरस्वतीको पाकर दागकाग और वहसदैव सरस्वती नदीको स्मरणकरेंगे । सरनदियों में सरस्वती नदीवर धर्मका कारण सरस्वती. मदैव लोकका भला करनेवाली है मनुष्य इस सरस्वती को पाकर सदैवइस लोक भार परलोक में पापको नहीं शोमते हैं ।३९। इसके पीछे शत्रुसंगापी बलदेवजी मोवि से बारम्बार सरस्वती को देखता सुन्दर घोडेवाले उज्वल रसपर सवार हो । ४ । शिष्यों का वर्गमात युद्ध देखने के अभिकापी वा वलदेवमी उस शीघ्रगामी ,स्यकी सबासे उनके सम्मुख मा पाँचे।४१ । 14 haring beard the mornt of the holy place, he recited the following Verge" There is nothing better than a rodenca on the bank of the Saraswati who has le! mapy to heaven'and they will always rernem bor her. Saraswati is the best of rivers and does good to the world Hıqog got at Sıraswati, ' peçple would never think of committing Then looking. again and agan towards Saraswati, Baldevi mounted his good car and proceedeư to witness the figiet of his two disciples - s.as. ही 11 .
* (7185) Gada Pary गदापर्व [.५१८५) भारपायन उवाच । एव तदमबाई तुमुल जनमेजय । यत्र दुखान्वितो रक्षा पुतराष्ट्रीयवाविदम् । १ ॥ धृतराष्ट्र उवाच ( राम सन्निहित इन्द्रधा गदायुन उप स्थित मम पुत्रः कंध भी प्रत्ययुध्यत संजय ॥ २॥ सञ्जय उवाच। समसानिध्य प्राचार पुत्रोदुर्योधनस्तव । युद्धकामो महावाहु' समहायतवारगंवान् ॥ ३ दशा लालित राजा प्रत्युत्पाप ध मारताप्रीत्या परमया युक्त समय धाविधि। मासनस्य दया तस्मै पर्यप्रच्छादनामयम् ॥ ४॥ ततो युधिष्ठिर रामो प्राक्यमतदुधाच मधुर धर्मसंयुक्तं शूराणा हितमेव च ।। ५॥ मया श्रुतं कथयतामपाणा राजसतमा गोत्र पर प्रणा पावन स्थर्यमेव च । देवतपिगम माह्मणश्च महाममि जतित्र 1. पोल्यमामा ये वह स्पश्यन्ति मानवाः। तेदा स्वर्गे धुवो पास शक्रण समारण ॥८॥ तस्मात समतपय कमिती यांम. द्रुत नगर प्रचितोत्तरभेदी सा देवलो प्रजा 7. ९ मस्मिन्महापुंण्यतम त्रैलोकस्य समांतने । समामे मिया माथ घुष स्वर्ग अध्याय । ५५। वैशम्पायन बोले हे जनमेजय जिस स्थान पर दुखी राजा धृतगट ने यह वन कहाँ के। । संजय मेरापुत्र गदायके पक्षमाल होनेपर पवेरीको समय देखकर कैसे युद्ध में प्रवृत्तामौर किसमकारसे भमिका बदामा संश्यकाल कप का पुत्र महावाहु युदाभिषापी दुर्योधन बलदेवजी की वर्षमानना देवार मत मात्र मा ।।। और हे भरतवंशी वही पीने से धुक्त राजाधिष्ठिर ने हलधारी पलदेवजीको आयोहुशा देखकर बड़े सस्तार पूर्वक उनको उत्तम भासन दिया और उनके कुशल मङ्गलको पूर्वा । तब बलदेवभी ने युधिष्टिर से बड़ा मयुर धर्म से युक्त और भूरोंका हकारी पर पचने कहा कि कि दाई राजाओम श्रेष्ठ मैंने ऋपियों के मुखप्ते मुनाद कुरुक्षेत्र धर्मकी शादिका बड़ा कारण रूप महापात्र स्वयं का देनेवाला होकर देवता और महात्मा बामणों से सेरित है । ७ । वहां पर जो पुढे करनेवाले मनुष्य अपने शरीरको स्यांग करेंगे। जनका निवास निश्चय करके वर्ग में इन्द्र के साथ होमा । ८ । हे राजा इस दिसे शानही यहां से समन्नर्पचक को चलें वह देवलोक में ब्रह्मामी की जेनर Vassliempayad said that kung Dhritraaltra in grd: t gripl asked or Stojaya to describe the attitude of his son 10 barrlo in the piernie o Baldev, and how he fought with Bhiri. 'Şanjaya' said, " Daryodhan was much pleased at the sight of Balder, Yudhishthur welcomed kyperth greatings. Thei. Baldev said to Yndhyshthar these sweet and cçoe words. ** I have heard that Surukshetis 15.4 very holy place! gd, nocokt of gods, risbus alad brab maas. 7. Those who die there fighting will live with Jadra in paradies, Lebils thereforu'go to Swwnat sanchak the altar of Biabus, furlu wlio-diet whose will sarly CHAPTER LY ७१८६.] Mahabharat (7186 भविष्यति ॥ १० ॥ तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रीयुधिष्ठिा । समन्नपञ्चक धीर प्रायादधिमुख प्रमुः ॥११॥ ततो दुर्योधनो गजा प्रगृह्य' महर्ती गदाम । पद्यामन, पदितिमानगाछत् पाण्डधै सह ॥ १२॥ तथा यात गदाहस्त धर्मणा चापि दमितमा अन्तरीक्षगता देवा साधुसावित्यपूजयन् । बार्सिफाश्चारणा पे तुरट्या तेहर्षमागता ॥ १३॥ स पाण्डवै परिवृत कुरुराजस्तयात्मज । मत्तस्पेष गजेन्द्रम्य गतिमास्थाय सोनजत् ॥ १४॥ तत' शस्त्रनिनादेन भरीणाश्च महास्यने । सिंहमाच भराणा दिश. सर्वा. प्रपूरिता ॥ १५॥ प्रतीच्याभिमुख देश यपोहिष्ट सुतेन ते। गत्वा तु ते परिक्षित ममनात सर्वतो दिश ॥ १७ ॥ पक्षिणेन सरस्वत्याश्चापर तीथमुखमम तस्मिन देशे स्थानिरिणे ते तु युद्धमरोचयन् ॥ १८॥ ततो मीमो महाकोटी गदा गृहाय धर्मभूत्। विम्रप महाराज सदृश हि गमत..॥ १९ ॥ अवधीशरखाण सरये, वेदी प्रसिद्ध है उस अत्यन्त पवित्र तीनों लोकके सनातन तीर्थ पर युद्धमें मग्छ को पाकर निश्चय स्वर्ग होगा।"। हे महाराज कुन्ती का पुत्र प्रभु नार युधि तर बहुत अच्छा कहकर समन्तपंचक के सम्मुख गया। १। इसकेपछि तेजस्वी राना दुर्योधन क्रोधसे बड़ी गदाको लेकर. पादों के साथ पदानीही चला । १२ । अन्तरिक्षचारी देवताओं ने उम गदा भोर कावधारी दुर्योधनको देखकर धन्यरकरके वड़ोप्रशसाकरी और जो वायुकेसाथ चलनेवाले सिद्ध चारण थे वह भी उसको देखकर प्रसन्न हुये ॥११वह आपका पुत्र कौरनराज दुर्योधन पाडवति पिराहमा मतवाले गजराजकीसी चालमें निपत होकर चला । १४। फिर शङ्ख भरियोंके वडेशन्द मोर शूर्गके मिहनादोस सब दिशा पूर्णहुई । १५ । और थोड़ेही समयमें वह नरोत्तम कुरुक्षेत्र में पहुने वहा जमे भापके पुत्रने बतलाया उसी प्रकार जाकर यह पश्चिम भोरका देश चारोंओर सब दिशाओं में युक्त होकर परिपिरूपमा ।१७। जोकि सरस्वती के दक्षिण भोरसे दूसरा उत्तमतीर्थ है वहां हरित भूमियुक्त देशमें युद्ध करना नीकार करके नियत किया ! १८। इसके पीछे कवचधारी भीमसेन ने बड़ी कोटिलाली गदाको लेकर गरुड़ के समान, रूपको पारण किया ! १९ । युद्ध” शिरन ए और मुवर्णका कवचधारी भापका पुत्र go to heaven "10 Yudhislithir cinsented to this proposal and went towards Samantpanchuk Duryodhan followed the Pandavas on foot, enaged and armed with big blace The gods in the air praleed him and the sidbas and charans were well pleased. by the Pandasas, your son Duryodhan went on like a prince of elephants, and the directions wore filled with the sounds of concha and drums 15. In a short time they entered Kurukshetra led by your son to the west of the auntry bounded by the Barasirati and Selected & groen spot, Bhimisen armed with waco and armour looked Garur, whila your son protected by lielmet and man looked like - . Surro iided like - 71871 Gada Pair HEIT पाचन वर्मभन । रगज गजन पुत्रस्ते काम पडिक २० 1 ततो दुर्योधनो राजा गदामादाय पीयवान् । भीगसे नमभिमेश्य गजागजमियाहयपत् ॥ २१ । अनि सारयो मामस्तथैपादाय धीर्यपान । आहषयामास नृपति सिंह सिंह पथावने ॥ २२॥ तावुमतगदापाणी दुर्योधनकोदरौ । सयुगे अवकाशते गिरी साशवराविध ॥ २३ ॥ साबुमा समतिकुद्धावुमो मीमपराक्रमी । उभी शिष्यो गदायुसे रोहिणयस्य धीमत १२४॥ उमा शकागो मयवासययारिव तथा सदशकाणी धरुणस्य महापली ॥ २५ ॥ यासुदेवस्व रामस्प था वरणरण व सहशो तो महाराज मधुकैटभयो युधि ॥ २६ ॥ उमा सशकमाणौ तथा सुन्दो पर दया । गमराघणयोश्चैव पारिमु प्राधयानवा २ तथैव काल समौ मृत्याध परन्त। अन्योन्यमभिधान्ती मना विष महाद्विपा ।। २८ 1 पासितासङ्गमे हप्ता शरदीप मदोत्कटो | उभी श्रोधावष दीत पातायुरगाविव ॥ २९ ॥ अन्योन्यभिसरख्या प्रेक्षमाणावरिन्दमौ। उभी मरत भरतशाईलो धिक्रमण समन्यितौ ॥ ३० ॥ सिंहाविध दुराधर्षी गदायुद्धे परन्तपी। सुवर्ण के गिरिशनके समान शोभायमान हुआ। २० । तदनन्तर पराक्रमी दुर्गेधन ने गदाको लेकर भीमसेन को देखकर बुलाया जो हाथीदायी को दुलाता है । २१॥ उसी प्रकार पराक्रमी भीममेनने गद को लेकर राजा को एसे वुलाया कि वनमें सिंहको मिलाताहै । २२ । वह हाथ में गदा उठानेवाले दुर्योधन और श्रा नामोन युद्ध में एमे दिखाई पडे जसे कि दो शिखरधारी पर्वत होते हैं। । १३ । वर दोन म या मोगुस भयायक पराक्रम गदायद्ध में वह कुशल बलदानी क शिन्यय । २४ । मराज और इन्द्रकी तमान फम्प करनेनाले दोनों महाबली वरुण के समान बम्पनी ये ॥२५॥ हे महाराज इसीप्रकार यह दोनों पामु देवने परशुराममा कोर देवता मोर मधुसैटभ दल्योंके समान होकर ।२६ । दोनों सुद, उपसद, राम रावण और नालि,सुग्रीन के समान कर्म करनेवाकेथे ।२४पैसेही शत्रुओं के तपानेवाले वह दोनों कालमृत्युकी समान मतवाले वडे हाथियों के समान परस्पर सम्मुख दौडनेरान थे । २८ । वह मरतशियों में श्रेष्ठ शरदऋतुके मन में हथिनी के मिलापमें मत अहकारी मतवा विजयामिलापी हाथियोंक समान थे । २९ । फिर वह दोनों शत्रुरतापी परस्पर क्रोधयुक्त देखनेवाले और सों के भमान क्रोधक प्रकाशित चिोंके उगलनेवालथे । १०। दोनों भरतर्षभ परामों a mountarty of gold 20 Valiant Duryodhan challenged Bhim like an elephant and the latter challenged the former l7o a lon ito warriors armud with maces looked like peaked mic untain. They face both dec ples of Balder in mace fighting and, were brave like Yam, Indra or Varun 25 1hey were brave hle Vasudev, Parashar rani, auver dadbu-baitabh, Sund and Upsund, Ram and Ravao, „Vali and Sugreve or Death They fought like two mad elephants, They tool d at each other in anger like serpents vomitting venom 30. - TL सरस्टा -Tahabharat (MAS मताधि जिगीपस्तो मातंगी भरतर्षभ । ३१ ॥ सदष्ट्रायुधी बाग व्याधारित सहो । प्रजासहर क्षुधा समुद्राविध दुस्तरी ॥ ३२॥ लोहितांगाधि को यती महारपा पूर्वपश्चिाजो मेघों वायुना क्षुभिती यण ॥ ३३॥ ॥ गजमानी पनि क्षरन्तो प्रस्ताव गमयुक्त महारगानी दीप्तिमन्ती महादली ॥ ३ दिशात इंश्रेष्ठी कालमर्याधियोदिन यानाथिव मुसंरग्धो गज्जन्तापिय तोष अहवाले महाषाह लिही केशरिणार्षिी गजाधिव सुसंधी पलितापिय पी Manशात महात्मानी सङ्गायिय पयंत रोपात प्रमाणोही निरामतों परमगरम ॥३७॥ तो समेतो महात्मानो गवाहस्तौ नरोत्तमा । उभी पासवानों परमसम्मो ॥ ३८ ॥ सपश्यायिय इंपन्तो वृहन्तादिव कम्जरी विषमावि sal दुस्पधिनचौधरी ।। ३९ ॥ इत्याधिपं वलोमसोरेजतुस्ती नरोत्तमौ । ततो व्यानो से परे सिंहों के समान अजेय और गदायुद्ध में कुशलथे । ।२। दोनों ना देना पशाख उखुनेवाले पीर व्याघ्रों के समान दुःखपी उत्सबबाले. मा.के नाश कोपभरे दो समुद्रों के समतुल्युधे । २२ । जैसे पूर्व पश्चिमुकी वायुभे उलन्न होने वाली, बोयु से पलायमान दोवादल होते हैं उसीपकार वह दोनों महारया भी को तयुक्त होकर दौड़नेवालथे । ३१ वर्षाऋतु में कठिन गर्जनाकर किरणों से पुक्त दोबादलकेसमान तेनुस्खी पराक्रमीहोकर महासाइसी । १४ । कौरवोंग अप्ठं वह दोनों उदय९ये. दोकालरूपी सूर्यकेसमान अत्यन्त क्रोधी बाके समान रामनेवाले दोवादलकैरूप दिखाई पड़े। ३५ । केसरी सिंहाकेसमान महाकोषी हा थियों के समाच और ज्वलितअग्नि के समान दोनों महवा ने आनन्द को ३६ । क्रोधसे चलायमान दोनोंहोठ परस्पर देखनेवाले दोनोपहात्मा शिखरभारी पर्वतोकेममान दृष्टिगोचरहुये ।।७ वर दोनोंमहात्मा नरोत्तम मदाओं हायमें लेकर सम्मुख हुये दोनों अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर पापर: अङ्गीकृत थे । ८ । वह दुर्योधन और भीमसेन रिसनेवाले उत्तमघोड़े चिग्याइनेवालेहाथी 'और इंकारनेवाले बलोंके समान दिखाई दिये । ३९ । वह पराक्रमो मतवाले दोनों नाचम दैत्यों के समान शोपायमान हुये है. राजा इसके पीछे दुर्योधन ने They were brave liko lions and were skilful in fighting withi [lle imace: "Like lions having teeth and naile, they were angry. Jika twa seas. They ráa like tvö clouds coining from spposite directions. They were like the two sang of pralaya or like, two , en aged lions, or firo. Biting their lips in anger, they, looked like twobile. • They 'tačied each iter with races and roared like hørees, elephants and bulle! Thájlonked like it.", quitan Duryodhan said to :Ynidbidh. l'hir, Krislin And Bulder, "The pride of Pahchals, Srinjafas and Kaikaya is ready to flit. You may look og at our fight Yadlijeti- पाया ।
(7189) Gads Part गरापर्व समषिमा युधिष्टिरमा मामि सरिताप कष्णेन महामना । रामेणा मितीण वाक्यं शोरीसम्मतम ॥ ४१ ॥ केकय सम्जवेगुप्त पाम्पालभ महात मभिः। ग्यास्यिय पुमं मम मीमप बोमयो । ४५ ॥ पोपविष्टाः पश्यसरे मिनागोभत्या दुर्योधनपत. प्रत्यक्षात तत्तथा ॥ ४॥ || तत: ममुपभिष्टातत् पमहासमरल बिमा दरशे दिवावादिस्यमण्डलम् ॥ ४॥ माये महा पीमार शुशवपूर्वजः । उपविधी महाराज पूज्यमान. समन्तता ॥ ४५ ॥ शुभ रामध्यस्यो नालबालाः सितमः । नरिव सदों वृनो निशि निशाफर ४६. वीता महाराज गवारस्तो मनुःसहो । भन्योम्यं वाग्मियप्राभिस्तनमाणो म्या रिपती ॥ पानि तोम्योन्यमुक्रवाती रुसवमी। सोस्थितीवरी मी पपा ४८ हावे मापदपाय गदायुद्ध पञ्चपञ्चाशोध्याय ५५॥ पहारमा भीम भार बड़े पराक्रमी बलदेवजी मार भाइयोसमेत नियत युधिष्ठिरसे परेवाशायों के समान या बचन कहा । ११ । बो बड़ेमाहमी पाध्याय मृत्री और कैकयदेशियों से अपने को बड़ा कारी मानता या उस भीम से मेरा पुर निश्चयहुआ । ४२। हे युधिष्ठिर तुम इन उत्तम रानामों सपेर इस मेरे मार पीयन के युद्ध को देखो तब युधिष्ठिरने दुर्योधन के पचन मे एकर सादीकिया। ११। इसके अनन्तर वह सब रानमण्डल वहां गया चार कर ऐमा शोभायमान हुमा जैसे कि आकाशमें सूर्यमण्डल शोभित मोह। ४७ हे महाराज उन साके वचि में केशवनी के बड़े भाई महावाहु श्रीवार बलदेरनी भी बैठगये। ४५ । उन्मल वर्ण नीलाम्मरधारा बलदेवजीस रामानों के मध्य ऐसे शोभायमानहुये नौ कि रात्रि में नतरों से संमुक्त पूर्ण पन्द्रमा रोता महारान उसीप्रकार वा दोनों गदा हायमें लिये कठिनता से सहने के योग्य परसर प्राची से घायल करते नियतहुये। ४. पर कौरवों में भेष्ठ वहां अयोग्य अभिय वचनों को परस्पर कहकर ऊपर को देखते ऐसे नियत इये जैसे कि युद्धमें इन्द्र और वृत्रावर नियत हुये थे ४८ ॥ thir complied with Nurgodhan's req'esto The kilgs' circle sitting thoro, looked glonour libe the orb of the Sun Keshava's elder brother, Balder sat in tbeir midst kod looked like the moon in the midst of sture. The two warriors, armed with maces, wounded each o$per with harsh words, and stood in the field of battle liko India and Vatrasur,"43. । अर्थात Jababnarat (7130) पैशम्पायन उवाच । ततो वायुद्धममयतुमुलं मागे. य । पत्र दुःखाधितो राजा धृतराष्ट्रोप्रवीदिदम् ॥ १ . विमस्तु खलु भानुष्यं यस्य निष्टेयनीहशी पक्षांचा भना यत्र एत्रो ममानघ ॥ २॥ आम सर्वानुगतीन मक्त्वा चेमा वसुन्धरा राणा मादाय प्रेगन पतिः प्रस्थिमो रणे ॥ ३॥ भूत्वा हि जगतो नायो घनाथ हब में मुतः गदामुघम्प पो याति किमन्यामधेयतः ॥ ४ ॥ बो दुणेमार पत पुत्रेण मम सम्जय। एवमुक्त्वा सुदुःसानों पिरराम मनावपः। ५॥ सन्जय उपाच स मेघ निनदो हन्निननिय गोवृपः। भाजहाच पा पार्य युगप युधि वीर्यवान् ॥ ६॥ भीममायमाने तु कुरुराजे महात्मनि । प्रादुरासर सुघोराणि रूपाणि पपिघान्युत १७५ बर्वताः मुनिर्घाता. पाशुपम च । बभूवुध दिशः सास्तिमिरेण समावृताः ICAमहामासनिर्धातास्तुमुला लोमहर्षणापितुस्तयोलका शतशः स्फोटपस्यो नमस्त अध्याय ५६॥ वैशम्पायन वोले हे जनमेजय इसके पीछे प्रथम तो वार्यालापकाही कठिन युद्ध हुआ उससमय वहां दुःखिन होकर रानाधृतराष्ट्रने गह वचन कहा 1-21कि निश्चय करके दूस मनुष्य शरीको धिक्कार है निमकी कि ऐसी दशा है हे निष्पाप जिस स्थानपर ग्यारह अक्षौहिणो का सामी मेरापुत्र २। सब राजाओंपर शासन करके इस पृष्ठीको भोगकर गदाको लेकर पड़ी तबितासे युद्ध में पैदलचला जो मेरा पत्र जगका सामोहोकर अनायकेममान गदाको उठाकर चला इसमें मारब्ध से दूसरी बात क्या है। ४ । हे संजय मेरे पुत्रने बड़े दुःखकोपाया दुखित पाड़ित रानाधृतराष्ट्र इस प्रकार कहकर मौन होगया । ५। संजय बोले कि तब प्रसन्न चित्त' पलके समान गो उन पराक्रमी वादल के समान शब्दायमान दुर्योधनने पाय भीमसेन को युद्ध निपिस बुलाया हे महात्मा कौरवराज दुर्योधनकी.ओरसे भी सेन के बुलाने पर नानाप्रकार के घोररूप उत्पात नारीहुये । परस्पर पाया तित शब्दों समेत वायुची धूल की वहुई सर दिशा अन्धकार से पूर्ण हुई। CHAPTER LVL Vaislampayan said, “ The' iwo heroes first fought a hard contested battle of words - Then Ohritrasbt a n warhed, " Via on Manhood, fos" my as the lord of eloven: akwubinis, laying ruled over all the Worldly kings a3, sell as all the land, bad to run on foot, with maça." His going thus armed cannot but ba ascribed to fate. Surely ho was in sore trouble. " Having sard this, Dhrrtrashtrs became: rent Sanjaya continuod, " thén bellowing like a bolt or 'thunderng likes cload, Duryodh a challenged Brim' to fight and lisca yanlong bad onions occurred.' Tue'sind blew with a loud roar and a storm' of dust darkened this faw of lho vartlo, makiog the base of the body stand on and, Thousands of meteors fell down from the sky with a crastr.
- (67191% Grda PATY गदापर्व ( ७१९१ दानापमानसमावियपर्वणि विशाम्पते । पम्प मापं पृथिवी सर समा॥१०दीप्ताव पासा. अपवुन वैः शरीष । गिरीणां शिरुरायेव ग्यप इन्तमहीतले ॥१॥गा बदुविधाकारा संपतिदिशो दस दीमा शिवाय नबर घोररूपा महाकणाः ॥ १२ ॥ निर्घात हायोग यभ्युमणाः । याताय) दिय राजद सुगाभारातदिन ॥ १३ ॥ उपपानगत भापो व्यन्ति ममम्मत। भशहरा महोवादा भूयन्ते स्म तवानप।। १५ । एमाइनि इन्ट्राप निमितानि पुजीवर उवाच नात ज्येष्ठ भरमा युधिष्ठिरम ॥ १५ ॥ मैप शदो र जे महात्मा मा सुशोना । पय काय पिरोक्ष्याति निरः दृश्ये निरन् । .१६ ॥ धने कार देखाप पापको पपा मोरयानि नाम सुनकर ॥१५३ नित्य गरया, पापीम रुकुल पम्प संघ कीर्तिमयी माल प्रतिमोक्या शरीरके रोगायोंकी, सही करनेवाली, वायुयों के कठिन मापात बड़े शब्दों के करनेवाले ये पृथ्वीपर बड़ी शब्दांमान सकयाँ उरका आकाश, से, नि । हे राजा पत्र के विनाही राहूने सूर्यके ग्रमा अर्धाद मिनापके प्राण पड़ा और पृथ्वी वनके सव वृक्षासमत कायमानाई । १० । नीचे मे, कंकड़ पत्या खेचनेवाली बड़ी घोर और प्रकाशित वायुचली और पर्वतों के शिखर पृथ्वापर गिरे ।११ भनेकरूपयाळे मृग दशदिशाओंको दो और घोररूप ज्वलित भयानक मृगलं. भी शब्द करनेलगे। १२ । मह घोर नितिभी शरीरके रोमांच बड़े करनेवाले हुक हे राजा ज्वलितरूप दिशाओं में अशुभसूचक मृग महाघोर अशुभ के प्रकट करनेवाले हुपे। १३ । उस समय कूपों के जलभा नारों मोर को अत्यन्त वादियुक्त हुपे भाकाशवाणी भी चुनीगई। १ । भीममेनने इसप्रकार के उत्पातोंको देखकर अपने बड़ेभाई धारािज युधितिरसे यह पचनकहा ।१५. कि यह' शभागा दुर्योधन युद्धमें मेरे विभषकरनेको समर्थ नहीं है श्वचा में अपने बाराकाल के सीचत फोध 'को। १३ । कौरवगजा दुर्योधन पर पैसे छोडूंगा जैसे कि लाएडप घनमें अग्नि को छोड़ाधा हे पाण्डा में तेरे हय के बड़े शूलको उत्पाडूंना । १७ There wong aruntimely' solar, e lipsa and the earth with her foresta shooke L. {The storm of wind brought pieces of stone with it and. the peaks of mountains felt down on earth. Quad, upuda acampered in all directions and jackals howled Dreadful sounds' wore Leard and anihua's cried oubowidonsly;! Wells qoz-d jut and heaveris falces were heard Having seen adeb bad omens, Bhim said to Yuabushtbir. 15.- Wretekled Duryodhan cannut porporax no. 1 svall disobärge my long pant-up forg'over him as Agm did in the Ktanday forest'. I shall now remove your ansiety. I shall beetra the gauard of fawo for you by slaying Duryodhan with my musco Mahabharat (T19:- पर त्वयि १८॥ रम पापकर्माण गच्या रणम्बंनि । अधासमा निमणि गदयामया १॥ नाय प्रवेष्टा नगरं नारणसाइक्यम् ॥ २०॥ सर्पोत्सर्गस्वराने विपदानस्य भोममे । प्रमाणकोट्यापातस्य दाहस्थ अतुवेश्मनि । २१ ॥ समापामा दासह सर्वस्वहरणसध। वहातबासस्य घनवासस्य वानम ॥ २२ मचान्त मेण बाना गम्ताह भरतर्षभ । एकाम्दा विनिहत्येम मशिष्याम्यात्मनोनणः ॥ २॥ अपायुाराष्ट्रस्य दुर्मतेरकतारमनः। समाप्त भरतश्रेष्ठ मातापित्रोभनम् ॥ पच सोसातु राजन्द्र कुरुराजस्य दुर्भते । समाप्तच महाराज मारीना रशम पुनः ॥ २५॥धा कुरुराजस्य शाम्तनो कुलदुषण । प्राणान् धियश्च राज्यम वाया शेष्यति भूतले ॥ २६ ॥ पजाब तराष्ट्र र श्रुत्वा पुत्रं निपातितप । स्मरिष्यत्य मर्मबलकुनिदुरिजम् ॥ २७॥ इत्युक्त्या यशाडूंछ गदामापाप कोवान्। अर्थात् मे गदाले इसकारोंके कुल में महानीच पापीको मारकर तिरप मालाको आपके शरीरमें धा ग करूगा ।१८ । अब में युद्धमें इस पानी.मारकर इसके परिको इसगदासे खहर करूगा । १९ । यह अब दुवारा हस्तिनापुर गारमें भवेश न करेगा । ३० ।। भरतर्षभ अब में उनसय आगेलिसे दालोंके अन्तको माप्तहंगा जैसे कि शपनपर सर्पका छोड़ना, भोजनमें विषदेना, प्रमाण बोरी में गिराना, लाक्षा गृहमें अलाना, समा हास्यकरना सर्वस्वहरव एक हात होकर बनवास । २५ । इन सक्दुम्वरूपी गोंसे एकहीदिनमें इसको मारकर भऋणग। । १।।हे भरतर्षभ अदुद्धी म्लान अन्तःकरणारे दुर्योधन की आयुही पूर्ण हुई माता पिताका दर्शनभी समाप्तहमारे महाराजेन्द्र भवईदी कौरवरामका मुख और खिपोंका दर्शनभी शम्पूर्णहमा ।२५। बावाननुक कुतको मलंक गानेवाला बुयाँपन लक्ष्मी, राम और माणोंको तागकर TA पर सोयेगा ।२६ मव रानाधृतराष्ट्र के मरे से अपने पुत्रको सुनकर २॥ अपनेउस दुष्टकमको बादफरेगा जो कि शकुनीकी दुदि से उत्पनहुमा रे राजाओं में श्रेष्ठ पराक्रमी भीममेन एसीवाने काकर गदाको हाथमें लेकर युद्ध के निमित्त दुर्योधन को ऐसे बुलातामा सम्मुख निपतहमा नेमे कि इन्द्र सत्रानुरको बुधाता I shall break bia brady into peces and ha will see Hasthioapur no 20. I shall avoage may foruoc wroaza-Siaka bito, pulson in, throwing in the qver, burning of the hous, mocking in the court, deprivation of our all, exile and living incogiuto all shall be aronged in a single day. His days are Qumbaroul Hasball soo hus parents an mors and shall no longer enjog laxary and the society of 25. Duryodhen the curve of s'uantana's family more womon.
Gada Parv गदापर्व बवावि पुनाव सको वृमिघाइप । तमुघतगदं हाटवा केशामिल बसमा पुन: यो तुर्योधनमुवाच ॥ २९ ॥ राख तरादृस्य तथा बिमविचारमः स्मरतदफत कम यर बेरिणावते । ३० । द्रोपदी पर शिमा खवळा । एतेन धज्जितो राजा यस्षया सौपरम ॥३१॥ समस्माभिस्यत्कृतं महत् । विराटनगो र योग्यतगतरिक्ष वाम्य रिप्पा हटोस दुमंते ॥ ३२ ॥ यत्ततेसो भारत xar पानिपोरपिनाठो निदतो वाइसेनिना ॥ ३३॥ हतो होगा कर्णध तथा पापार वैरायेरादिकमा शकुनिः सोपलो रतः। ३४ ॥प्रतिवामी सपा पोशकरत मातरस्ते इताः सर्वे शरा विकातयोधिमः ॥ ३५॥ पते मानिस भाषा । २८ शिवरधारी कैलासके समान उस नदाउगनेवास दुर्यो पर को देबार प्रोषयुक्त भीमसेनने फिर कहा कि हे दुर्योधन राजाघृतराष्ट्रसमेत सुपं याने इन पापकों को स्मरक्षकरो जो कि मरणाबतनगर में इये और सभा रबलमा प्रोपदीको दुःख दिया और जो तेने और शकुनीने रामापीपहिरको चून या और स्ममय ने महावनों में जिस तेरे कारण से बड़े दुःखों को पार पर पोयम्बरके समान होकर हमलोगोंने जिस वु:खको विराटनगर में पाया अव In दुषों के कारण इपको मारता हूँ ॥२॥ दुर्बुदो तुझको मारण्य से दिया है और रेसी कारण से शिखण्डी के पसे मारेदुयें या राषषों में छ मानकाजी के पुत्र प्रतापवान औरषों के पितामह मष्मिजी शरचय्यापर सोतेहैं दोबारामार मतापरान शक्यमाररागया और शत्रुताकी भग्निका उत्पन्न परमवावा सावकका पुत्र अजुनी मारागया । १४ । फिर द्रौपदीका क्लेश उत्पन बरवाला पानी मातेकामी पारागया सिंहके समान युद्धकरनेवाले शूग्पीर तेरे साबमाई मारेलवे ॥३५॥ वेरेसी कारण के यहसब और अन्य बहुतसे राजा मारेनरे shall bloop me ourth síter losing his wealth, kingdom and life. Hearing of kis ma's death, Dhritrashtra will redenber tbe iisdeeda done by bha advice of Bhakuni." Karing said arch words, Bhim took the mace in hand and challenged Duryodhan to Agbt As Indra did Vritrasar. Seving him with upraised mace, oaragal Bhim again said, " You and Dhritrashtra should remombor roar wiched desde done at Barnavat 30. You dragged Draupadi into coort. You and Shakani cheated Yardhishthir io gatobling and we suffered much" bardship of exile for your sale. We live incoguito at Viratnagar; but I shall svenge all wronga to day. It w by good fuck bhat I have fnuod you. Bhishma oleeps on tie bed of arrows slaty by Sidbandı on your account Drone, Karan und glorious - (७१९४) Mahabharat (111) खानवध पहयो निहनास्वत् छत पर मामघ निहनिष्यामि गदया मात्र सगमा ॥ ३६॥ इत्येवमुच्च राजन मापगण युकांदरम् । उवाच पीतमा राजन पुत्रस्त सरप रिझम' ॥ ३७॥ किं कन्यितेन घाना युध्यस स पृदिर । गद्य तेऽहं धिनमामि दिया फुलाघम' ३८ ॥ नैघ दुर्योधन क्षुद्र फेचित्यधेिन 4 शक्यासपितु - यथाम्यः प्राकृनो नः ॥ ३९ ॥ चिरफारोप्सितं विटया इदयस्यमई मन स्वमा सरगदायुध विदेश रुपपादितम् ॥ ४० ॥ धिाचा पोतन कस्थितम दुमते घाण सम्पाद्यतामेषा फार्मणा मा चिर कयाः ॥ ४ ॥ तस्य तरचम भाषी सर्प एपाध्यपूप्रपन् । राशनः सोमकाओष पे तमामन् समागंता ॥ ४२ ततः सम्प जित. संधे. संबहटनगर । भूयो धीरी मतियफ युद्धांग कनन्दन । मामिष मातहतलशदेनराधिप । भूयः सहर्षपाचपुर्योधनसमर्षणम् ॥५॥ अब मैं तुझको निस्सन्देह गदासे मारूंगा । ३६ । हे रागेन्द्र सत्यपरीक्षणी और निर्भय आपकापुर इसप्रकार बड़ेउच्नस्वरसे पालाप करनेवाले भगिसेनसे बोली 1151 कि. हे कुलमें महानीच भीमसेन बहुत बातों से क्यामपोगनी तुम बुद्धको 'अंव में सरे युद्धके उत्साहको भंगकलंगा । ३८ । हे नीच'मै दुर्योधन सुरा “सरीखें किसीमनुष्य के वचन से डरनेके योग्य नहीं हूं बहुतकाल से चाहता हृदयमें नियंत. तेरे साथ मेरा यह गदायुद्ध प्रारबकेही द्वारा देवताओं से मांगा है।४। है दुर्घखी पहुत वालिाप और अपनी प्रशंसाकरने से क्यालाय है, यह पचन कर्मकही धारा प्राप्तकरना योग्यहै विलम्ब पतकरो। ४. ।'उसके उस मननकोमन कर उन राजालोगोंने और सोमकों ने जो वहां इकट्ठे ये उसकी प्रशंप्ताको इसकेपछि वह शरीरके रोमरसे प्रसन्न सबसे 'स्तूयमान 4: कौरमनन्दन दुयोरन युद्धके लिये बुद्धिसेद्वारा फिर धैर्यमें प्रवृत्तहु भा । ४३ ।, गंजाभाने कोषयुक उस दुर्योधनं को जो कि मतवालेहाथीके समानथा तलकेशन्दों से फिर प्रसन्न Shalya are no more as well as Shaun the root of all quil, Platilami the distresser of Draupadi and all your brothers, bravg as Izgns: - 35.. All these and other kings were slain for your sale and I shall, áprgly Folay you with my reace," Having Heard this, your son. १६ truat prowers toplied, " Despicable Mbim! what 19 the use of my mpch not.sense talk: Fight and I shall, satisfy your desire. I cannot possibly fear you. I have long sought, 84, opportunity to fight wind. you and my, long cherished desire iş fulfilled by the fqyoyrof gods, 40, You can derive no benefit from regtary, and self pruse. Aft;withonty further "delay". All the kingą, and, Somnes prasgeds Duryendbags Iwords. Then Duryodhan praused by all, atood calmly wp.the lynga 1(10) Gada Parv गदापर्व [७२९५) महात्मा गहारमान गदामुद्यम्य पाण्डव । अभिदुराव घेगेन धार्तराष्ट्र नकोदर 4.५॥वि फुजरास्तत्र इया हपन्ति चासकत । शाणि चाप्यदीप्यन्त पर बाबअपिणाम ॥४॥ इति गदायुद्धपर्वणि गदा युद्धेः पदपञ्चाशोव्यायः ५६.॥ । लिया । १४ । महात्मा पांडव भीमन अपनी गदाको लेकरतीवता से उस बड़े सासी दुर्भाधन के सम्मुख गया ।४५॥ उसके नातेही पहां हाथी चिग्योड. साहसी दुर्योधन के सम्मुख गया । ८५ । उसके जाते ही वहां हाथी चिन्घोडे बारम्बार घोडे से और विजयामिलापी पाडवों के शस्त्रभी प्रकाशित हुये ४६ ॥ 1 He F cheered him again with a beat of palms. Ehm soon oppoeed him with his mace At bis arrival the horses neigbed, the elephants gidated dad tho weapons of tho Pandavas bocawe builliant 46 Mahabharat सम्भय हवाच । ततोदुर्योधनो एप्ट्वा भीमसेनं तथागबम प्रहापाबदीमामी बेगेन महता नदन् ।॥ १ ॥ साततल्योऽयं शङ्गिणी गोवृषाविका महानिर्यातपोस.' मा गणामजायत ॥ २॥ ममपञ्च तयोयुब तुमुल लामा । बिपीने घुधाग्योऽस्य मिप्रमहादयोरिव ॥३॥ रुधिरोक्षितसर्वाङ्गी गावी माविमो । वण्यात महारानी पुष्पिताविष किंशुको । ४॥ तथा तस्मिन्महामाने सदा कये। मतसङ्करिव र दर्शनीय व्यरोचत । ५॥ तथा तस्मिरमा से तमु महर । उभावधि परिभातौ युध्यमानामरिन्दमौ ॥ ६॥ तोशामायाप पुनरेव पल्सपो । माहाहरवतान्योन्य संगृह्य गदेशभे तो बायो समास्यप्ती मरर्षभो । पलिनी वारणी यवासिता मालसमान बार प्रीतगदावुभो । विस्मयं परम जग्मुदशगाधी माहीत अध्याय ५.॥ सनमयो कि इसके पाछे वढा सादसी दुर्योधन की दीवा से मूर्षका स प्रकार से मातेथे भीमसेन भो देखकर सम्मुख मया ।। गार पारी में समान परस्पर में दोनों दौड़े और गदाके महागेके वो अपनत्यम | न दोनों विजपाभिलापियों का बुद्ध माकोर और महका करनेवाला रेसा दुभा असे कि युद्धमे परस्पर विनयाभिलाषी इन्द्र और महलादका कुमार कषिरसे लिव सब शरीर गदा हाथों में लिये बड़े साहसी दोनों महारत पारे कि तळे समान दिखाई पड़े। ४ । इसमकार उस बड़े भयानक पोर पुदके वर्षमान होनएर आकाश दर्शनीय होकर ऐसा शोभायमान हुमा बैंक वीजनों के सपूओं से होता है । ५ । इस प्रकार उस कठिनतर समुल नाम कपमान होने पर वह शत्रुओं के त्रिनय करनेवाले दोनों शूरमीर पाप।। अनुसन्मापी उनदेनो ने एक मुहर्च समाशासित होकर शुभगदामोदर कर परस्पर विश्राम किया । ७ । फिर उन महापराक्रमी विश्राम किपरे मरोधमों को इयिनीक लिये मतवाले बलयान हाथियों के समान • ८ । एकोपरानी पदा पकड़नेवाले दोनोको भाति से देखकर देवता मनुष्य और मायने रे CHAPTER LVII Sanjaya said, " At the advance of Bhim with a loud roar couragoda Daryodban faced bim. They attacked coch other liks two burned bulls and the wunds from the blows of theit maces were tremendous Thoir battle was revere and dreadful like that between Indra and Prahlad. With blooding bodies, armed with maces, the two brata warriora lonkedikakashuk troos in bloom. Daring alat dreadful buitia tho sky lonked glorious as if full of glow-worms till the to They ronted themauires for some time to tako berons were tired.
(11971 Gada Pary ngint जगवानी विस्मय परम जमदगन्धर्ममामा । २॥ प्रधागदोदयायो पनाकोपरीसराब.सताना विजय समापत ॥ १. " समागाप तसा भयो नासहिमाम्बरी मम्योम्यस्यान्तरं प्रेपुर प्रबकानेतरप्रति ॥ १५ यमदी मामानिमियोपताम् । दशु प्रेशका राजन रोद्र बिरामसी गदाम॥१२॥ पाvिat mrt as भीमसेनस्य संयुगे। मुमुलो पारी मापन Anाषितमस्प्रेिषयासंतोष पाणम। गदाममयेगा at चिस्मिता सबभूव ॥१४ वविविधामागमण्डलानि च भारत । ममता पर ॥ १५ ॥ तो पाएपरमासाथ पत्तायस्पोम्परमणे । माजविण अमातमाते मुहर्मदुः ।।१७ गरीमसेनस्तु मागान पलिया I मर बारिवाणि त्यागतानि १७ मात्राणि चित्राणि, स्थानानि विषि भाध को पापा।९। गदा पकड़नेवाले न दुर्योधन और भीमसेन को दसकर बिबर रोने सडनीबोंको संदेह माममा ।१०। इसके पीछे बलवानों में श्रेष्ठ परस्पर वर चाहनेवाले दोनोंभाई भिडार पत्यन्तर के समान भ्रमण करनेवगे रामा भोकन करनेवालों ने उसी मारनेवाली पारी और इन्द्रवजू समान माई याबदरकी समान गदाको देखा । १२iपुदमे मीम सेनासे पारती महाका एकमुहर बहाकठिन और घोरमान्द वर्तमानमा 1११सके मनन्तर पोषन इस कठिन तामता रखनेवाली, गदा मारने पासे अपने पड भीमसेन को देखकर आर्ययुक्तहमा । १४ । भरतवंशी उस समय भानसेन नानासकार के मार्ग भीर मगरलोंको घूरताआ शोभायमान हुआ ।१५ परस्पर अपनीर रसामें सावधान, जन दोगाने भन्योन्य सम्मुखहोकर परमार से महाराकिये जैसे सानेकी बस्तुकालये दोविलार परस्पर मारकरते? भीमसेन इकमकार के बस से मागोंको घूमा फिर सम्मुख तिर्यक मिनिमम |१७) पूर्न अनान्तर बहुत प्रकारके दाहिने बायें महारस्यानोंका breath. Maq, gods şod Gandbarvay wondered to see them bylting lika two mad elephapts for the sake of a female Ibey doubtfal a Sout the victory of one over the other. 10. Again the Awo that of BITIOro rosmed about Harding each other's blure. The lopkoro on beheld the beaty na es, like the vajra of Indre sod, tho starf af Yam. There was an awful noise from the blows of Bhin's one for some time and Duryodhan woudered at the velocity of his Adresaary's blows, Bhim, Ipaming in various ways and circles, looked glorious, 15 Defique of protecting thep selyes, each of them but kalo adverears, and they fought like to low cats for the sake of fuod. Bhim walked nght and left, straight and crooked, rushing, dashing Long agd ataoding stil) Ho alocd up at Qock whenever be fell down Wera --- 17108 . 11७१ Mahul jIAL: प्रानि की परमीश डाग यमन पनि , ममिदमणमासमा सहप्रभ पानसवर्तवलतमुगप्लुतम्॥ १९॥ उपायलमापन गदायुरविमा एवं तो विपरन्ती तुं न्यानता पर परम : २०... यानी पुनम संतमी । विशन्ती मालिनी मगरलानि विसरतः ॥ २१ ॥ तो दर्शयन्ती समरे युध कीड़ा समन्ततः गाया सामान्य माजानतुरिदमी २९ तो परसरमा साधारष्ट्राच्या हिरवा यदा: अशोभना महाराज शोणितत परिप्लुतो, २३...एवं सदसपुर घोररूपमाला परिवहन कर श्वासोरिया गदारती तता तु मलामणिनी घनी ४.३५ " वृशिणं माल पजन यासंगी यातिन सम्बग्नु मगर तब भीमसेमोगात ".२,, ॥ तथा तुर रतस्तस्य भीम ममि) दुर्योधनी महाराज पाइपदशेताडयत् ॥ २६ ॥ आइतस्तु तदा भीमः पुत्रेण ता छोड़ना बचाना दान वा कानातीना से सम्मुख भनां गिराना और अंचल होनी शत्रुके उठनएर फिर युदकरमा शत्रुके मारनेको चारीमार नाना श के इंटनाने का स्थानका प्रहार बचानेकोलये अककर टमाना मध्यगति,१९ समीप जाकर शरुका मारला चाराओको धूगकर परोपको और बसमान होके हाथ से शत्रुको अपिल करतान माग में मत उन गदाद में कुशल दोनों ने ओक प्रकार से परस्पर घायल किया...फिर धोखादेनेवाले करमा कोषोत्तम दोनों भ्रमंगा कानसर्ग और की करनाले दोनों पायी मप्रकों को घुमे 2 युद्धमें झागंभोरगे युद्ध की क्रीडाको दिखलाते उन दोनों शनुमन्तापियोंने गदाओं में अकस्माय ऐसे पागल किया । जैसे कि, दातांसदो हाथी परस्पर घागल करते है। महाराज बर देना रूपर, से. लिह शरीर परस्पर सम्मुखहोकर, शोभायमानहये । २५ मकार दियतको अन्तपुर, घोररूप युद्ध सषक समतः में ऐमामा नै कि वृत्रासुर और इन्द्र का" आया-किर गई दोनों मावली गदा हार्थोंमें ले 'मएडलों में प्रकृतये रमतपय बुयोधन दाहिने मण्डल में वर्तमान हुआ और भीमसेन यायें मण्डल में वर्तमान हुमा । २५ हे महा राज इस मकार से उस, युद्धके मुखपर भीमसेनको चूमत दुर्योधन में कुक्षि में घायल किया । १६ । हे भरतर्षभ फिर आपके पुत्रसे. घायल, और उसमको and checked his enemy's course or hent low to ward ttt his opponents: bows Hirept for th' blows from before and behind, all 'round, and tho two clever warriors wouóded cach other. - 20. Then the two bertat Kauravus rougit ladlecova une another as it in' plays -- Show. ing their &kill so figltyg ties wounded, each intherilkavitse-tusked! elephauts Ilvese Loxbor ran out blod. 'st tho.cluse of the day-tbe battle was like that betworn indi&- und Vitracur. Then the two wutyTois roam dimartelo v th treir-niarem Duryodhan's was ibuto 14 । .
- मया 1. ....." (U19 Gada Parv. गदा भरिका मानिध्या गायी-महालावायद..॥२ एमानिसमा योग पम समियायलाम । दाशुस्तमहागज भीम मेनस्य दाम २८ Sani गर्दा पारसनं तवारमज समग्रम्य गदा मेरा प्रविष्यात परत २९ गावा माडपोले तप पुत्रस्य भारत शाप मासीत् सतुमुलोज समजायत ३.स परन् युविध मागान .. माईलानि च भागशः। समशाम तजावी. भूयो भागात सोपान माविया सवेगन भीमेन मरती ग संमं सान मुमोचाप्रया गहावना ३२ । भा भीमसेनेन गद दिसा रवी गंगामाथि बहशोभन । ३३ । गदामास्तग. णमाद माम विश पादुसर्याने समोमकान् ॥ २४ ॥ तो शेयन्ती: समरे युद्ध मन्ननगदाभ्यो सामान्योन्यमातुरियोप, ३५॥ तो परस्परमासांप विचार न करते भीमप्सनने भारी गदाको घमा २ नहारान उनलोगोंमे इत्या पर है.ममान घोर नमरान के दरड काममान उठाईईई...२८. भीमसेन की उसः नदो को देखा तब आपके पुतन गहाउठानेले भीमसेन को: देवकर उठाई उस पोरगदाको हितक्रिया १२५ देशवाननापीमावेशी आपके पुत्र की गहरारूप मायुकी नीवा से कठोर शब्द होकर आग्न उताभ हुई !३०:फिर भीमगेनने थी भाना मदा से दुधिनकी गदाको ताड़ित किया उस समय वह दोन समान] बलबार भीमसेन और दुयोधन नाना प्रकार के मार्ग मोर मण्डलों को मोहये, पहिलायमान हुऐ । २।। फिर पलागु भोममेनमे सहित बड़ी गदाने, म समेत अग्निको प्रकट करके बारे लाको काशित नुव भनिन मागमान :अपनी मदाको देखकर लोहमयी, बड़ी भारी-गदाको घुमाता:महा; घोभायमान हमाराम महात्मा की गदापी आयुकी तीव्रता को देखकर सोमको समेत म पागलों को भा उत्पन्नामा १४,युद्ध में चारोबार से युद्ध कोड़ा को दिखाने वार शत्रुमन्तापी: गदामों मेमामात परस्परः पास right circle nud: Phim in the left.: 25, 3.DeryoJjían tuona wounded Bhim in the side. Not caring of the yound: Bhimsivang his heayr: maob The people gaw_the mace of Bhirn upraind like theivajra of Indroar Duryodhan, bit is with his swo. The much of: D'ıryodhan - met with a crash, with the velocity of thọ: „wind; and: fire caine out of. it... 30 Bhim too strucka blow on the macu of Duzy odjinn „Tupp ning.. in.: circles, they wilojke , glorious ;, ! . Fire and . suiska Cama ontinol . Bhimmacs struck: .with : grent s. forest . 'Ster. ing...hiasmacarr shakeu.by : Bhim, Duryodhansi: swing.! his r.irol one and looked glorious. „Ibej:8)maks tund: the Pandarasi wers": afraid of the relocity of Huryodhan's macsa: Thaġ dealt blows withbliermaces and ghoved'; their skill. in fighting-1350,-Eighting *slike ... ault ३२॥ !
Malabharat (1300 बादाम्या हिरदो पथा। मशोभतो महाराज शोणितेन परिप्लुतो ॥ KRT इधुवं पारस्पमसम्मृतम् । परिवहीन र त्रासमयोरियास्थित भीम तव पुत्रों महाल. रश्चितगन मागा कौन्तपमानजुट्टो ॥ १८॥ar भीमो महाषेगांज म्यनदपार कृताम् । मभिकुदस्य रस्तु तारामास सांगा ॥ ३९ ॥ सविस्कुलेन्द्रो निहाइलयोस्तत्राभिवातज । प्रादुरासीर महाराज पापोष जपरिव ४. वेगवस्या तथा तत्र भीमसेनेन मुकया ! निपताव महाराज पापी' समफम्पत ॥ १ ॥ तानामृप्यन कोरस्यो गदा हितारणे मप्रति कुसरदर्शमात्॥४२॥ स सम्य मण्डल राजन्नुहास्य रुतनियर बाब माईन कौस्त गरमा भीमवेगया॥ ३ ॥ तया बिभिहतो नीमः पुत्रेण तपास मामहराज तर तामियामवतमाश्चर्यचापितमोजमापासपर करनेलगे । ३५ हे महाराज जसे कि दो हाथी दांवों से युद्ध करत साकार पादोंनों परस्पर पाकर रुपिरसे लिप्तहोकर शोभायमानहाइमकार दिन सपास सेनेपर या पोरस्प और महा कठिन ऐसा बुर गा जैसे कइन्द्र और कासुर का हुभाया । १७ । आपका महाक्ली पुत्र अपने सम्मुख भीमसेन ने दिखकर अतिर मागों को घूमता हुन्नी के पुत्रके सम्मुस गया। कोपयुक्त भीमसेनने उस कोपयुक्त दुर्गधनकी म जटित रस्मॉस मदा साहित किया । उमसमय उन दोनों के संपट्टन से उत्पन होनेवाला पद पुलिंगों समेत रेमा माटमा बसे रो पणे संपरन से होता महाराज व भीमसेनकी गिरतीहुई उस बनवान मदाने भी अत्यन्त कम्पायमान हुई।४। दुयोधन ने भी मासिस नहाको से" सहा मैसेकि कोषयुक्त मायाला हाथी सम्मुख' मानेवाले एपी को नही सहसा मे निषा करनेवाले गमा ने पायें मंडल को घूमकर भीमसैन र अपनी भयानक वेगवासी गदा से मस्तकपर घायल किया ४॥ महाराण आप को पुरकी उस गदा से घायल पायव भीमसेन कम्पायमान नहीं मायामा साभार । ४४ राजा सर मेना के लोगोंने उसके उस अपूर्म दर्य बड़ी two lusked elephant-, tasir borlies were covered with blood. Thos battlecat the close of the day was like that bouween Indre and Frntrasur. Your non mored in stranger errete at ths ught of Bhim. The latter atracki a blow at the jewellede nace of the former! DOLKO-from tho iwo nascos was like the meeting of two najran 40,- Tha earth sbook with the fall oft Bbam's waca. Duryodban dui nout bour it a co nad dlepbaut does not boar. the onslauglit of another, Monog slatt circle, be wounded Bbum a: the legehend withibu? moostof dreadfullralserty. Tbe lattu did notheisterwith the blor - 26533 (TOT Gads Parv 09196 पगामिलो बीमो माहास पदाद परम ॥ ४५ ॥ ततो गुरुपीसो गरेपी धिमाल Here भीमो भीमपराक्रमः ॥ ॥ प्रहारमाम्तो IN AREमोचनसके तामविस्मयो महान ॥ ७॥ सामोपा मराबरपासी बसा चालपामास पृथिवी महानिर्यातनिर॥ मास्थाrasvataरत स पुनः पुन । गदानिपीत प्रसार भीमराव षि तथा भीम गदा कुरुसत्तमा तारापामास सकुलो बहादेव महा। ५. ॥ गदपा निहतो भीमो मुखमानो.महामारसम्बत पपुवामा ५. हरिमस्त या वर्तमाने जर सोमपERI मोगरामधामसोमवार ॥ ५२ ॥ स तु तेन महारेण मातारित सरितमानसे मुतम् । ५३ " तबस्तु तरसा मीमो गरम त सारी मोगदासे परवापर पायल होकर भी भीमसेन. परलों से एक पार कोकमामा ना४५। तब भयानक पराक्रमी और भीमसेनने पर. जात सहित गाको दुर्योधन के निमित माविक माहवासे कि हे पान दुर्योधनने अपनी इस्तवापरता से उस प्रभार पिन किया कर भी नामाश्चर्यसा हुआ । १७॥हे राना फिर बानसेन यह मेरो समाप शम्दायमान गदा पृथ्वी को कंपित र कौशिक मार नामों कर पारम्बार उम्ली गदा के गिरने को मार भीमसेन मे.लागबानकर पत्यन्त क्रोधयुक्त महावली कौरवोचक दुर्योधन ने समकार परवीनर छातीपर पापल किया ! ५ परे पर मार बदा पावस भार भव भीमसेन ने करने के योग को माँ बामा । ५१ राजा इस प्रकार उसयुद्धक वर्षमान होनेपर सोग और पाप अस्पन्न हतारप होकर चिपसे पुती उपे । ११ । किर पार पापी समान गोषयुक्त हाथी के समान भीमसेन उस हाथीही समान भाग समस मया । ५१ । अर्थात फिर भीमसेन बड़ी कामदा से गस सोब to thy Brnment of all, and they praised his pacieact usha did not more an uch by the blon. 45. Bhia then hurled hugold-decked na kitendo xDaryodhaa, but the lattar fearlessly vurded off' the blow nd the people wondered aths agility Tho thurdering many of Balea putehost agair and again on the ground. Seerage bu ad'reretaryen Mandaartood. Dargodhan deceitfully wounded Bhim on that Skypts 303 Then rounded by your aoa's macs and threamblet Abitude-notikdow what to do. fus Soniaks and the Pandere vert macb-graved at this state of thingé. Bald' again ehdoqotured your Ha A one elophant dose another and burled his muu et billede add Wou.ded by the blow Daryodan tált ound bin oh the side Mibabharat (T203) -- Muye १ तवा मभिदुद्वान पंगेन सिंहो धनगज या ॥ ५० ॥ उपस यं तु राजान पदामाचा विशारद । बोरियत गर्दा राजन मुद्दिश्य सुनतम ५ अताडयनीमसेन पाई अन तदा । स विहंबल, प्रहारेण जानुभ्यामगमरमहीम ॥ ५६, सम्मिन कुमाल अमानध्यामधनीगते । उदतिष्ठभूतो नाद: समयानो अगपते ।। ५७ ॥ तंग मित भुवावजयाना नरर्षभ ! सद्भरतश्रेष्ठ पुत्रस्त समपात । इराष महापामहानाग इस श्वसन् 1 विधक्षभिव नेत्राच्या भीमसे मोक्षत । ५९ ॥ तत स भरतश्रेयो गागाणियाद्रवत् । प्रमधियानव, शिरो भीमसेनस्य, मयुगे ६० स महात्मा.महारमान भीम भीमपराक्रम ! अभाडयत् संदेश पाला कालोपम ६१ ॥ स भूप शुभेपास्ताडिनो गईयारणे । उनिमशिरो रोबर प्रभिन्न व कुजर.॥ ६२ ॥ ततो गधा बारहणीमयोमयी प्रगृह्यसाश आपके पुत्र के सम्मुख ऐसे गाज कि सिंह बडी तीव्रता से जगतो हा के सम्मुख जाता है । ६४। हे राजा गदा छोड़ने में सावधान : धाममनने रामा पास जाकर उस आपके पुत्रको लक्ष्य बनाकर गदाको घुमाया । ५५ मारमा गंदा से भोममेन दुर्योधनको पार्थ अर्थात् कुतियान में घायम किला पस, महार से व्याकुल बा यांधन जघाकेवल पृथ्वीपर गिरपााउम कोरब, दुलम भेटः दुर्योधनको जंघा के बलमे पृथ्वीपर गिरनेपर “मृजियोंकि पशब्द प्रकारामा वई अंगपाते भापका पुत्र उन मुनियों की गर्जनाओंको सुनकर धीमी से मुक्त घः सर्प के समान भाम सते नेत्रों से मारते महावाहु दुर्ग में भाममनको देखा । ३९ । और मर्दा हायमें लेकर भीमसेन के सम्मुख गवा पुर्दमें भीमभेन के शिरको पहन करना चाहते हे माहमी औरंभयान' पराक्रमी रामा दुगाधनने महात्मा भीमसेनको शंख स्थान में घायल किया परन्तु वह पर्णता डार कंपायमान नहीं हुआ । ३।। हे रामा युद्ध में गदा में घायल और कपिर से लिप्त वह भीमसेन मद माइनेवाले हाथी के ममान फिर शोभाषमानमा ६२. इसके पाउ शत्रुमतापी भर्जुन के बड़े भाई भीमसेनं च दारों को मारने वाडी वविजली के समान शब्दायमान लोहेकी गदाको पकई कर बात जोर - dowang the ground. ..The Snnjayas cried at his fall.,'On heatinat their cpios y mar aon strod yp sighung libe a serpeat and faced hoti Vighing.ta hit at the head of Bhum, brare s Duryodhan of dreadfatri prowoeg wounded him on the forehead, but could not ebako ihin. Bhim blooling an I wounded looked like an ulephant yıth juice dippe ping frop 62 Then, Bhini wounded him with iron mace with Wounded by the Lloy, your son felle dowa Jike a 14 Aslı We lliunder CARRORI Gida Parv पाप गानाम् । नारयमित्रगो यलेन विक्रम पुनश्चयानः ॥ न भीम समाभिमगाव सरितदेहबन्धनः । मपिता मारतगताप मारास पूर्णितः ॥ १५ ॥ ततः प्रगाहपुन पाया समीक्य पुत्रं पतित Cataniमुतस्ते प्रतिaad समुपपात शिरलो पण इदा ॥ ५ ॥ पERE ARE महारयः शिमितपत परिभ्रमन् । भास्पद पायम मताधितम स निराको प्रगतीमुपास्पृशत् ।। ६धा ससिंहनाद विमनाद कोरपा AIRE मी युषि भीममोजसा ! पिभद साशनिनुल्यतेजसा गरानिपातन परीक्ष Ansan नितो महामदियाकसमासान ने सुधार. पपात Haniruतिमिनियोकरवर्षमुत्तमम् ॥ ३८॥ ततः परानाविशत्त भय Emai रोसम । महापमानम्न मलेन को निशंम्पई मटर रायते भान पास किया है.६ भीमसेनहाय से घायल होकर बपन्न पायमान शरीरमें आइसापकी पुत्र ऐसगारंपा जी किचन पण पित शालकोन वायु से तादिन घुमता भी पता है। इसके परिवाए . पृथ्वी पर गिरा देखकर सब पायरब लोग गर्ने और | असा फिर आपका पुत्र मवेत होकर एो उठला जैसे किं कि इदनाम तहाग सेती उपसा तब ६५ ता संदेव कोयुक्त शिक्षा पायेहुये के समान बारा वसमते रम मसारधा रानाने आगे नियंत होनेवाले पाण्डव को पोयल शिल सप्याकुलनेनी मा को स्पीकण । ६६ । वह कार पलमें भीमसेन को लापर गिराकर विनोद को गर्ना और वो समान बड़ी तेजस्वी गदा के सारस स कररको ताहा ६॥ इसके पीछे भाकाश से. गेज वाले देवता और अन्तरामोके बमोदय योर देवताभों ने उत्तम पुष्पों कीभी वर्षा करो। ६८ इसके पीले पृथ्वीपर पहेडगे नरोलम को देखकर प्रतिपक्षियों में वहाभयं उत्पन्न हुमा कौरवको यससे पूर्ण और भीमसेन के महान र केयन टने को देख कर प्रपन्त भयभीत हुये। ६९ । इसके पछि भीमसेन एक मुहूर्त में संचतता Buinni sal tree struck dowa hy the wind. The l'anday 03 Oured at the fall; yozi' sun, buat be sprang up in an iostant as an elephant does from alake 65. He #gain wpangod, his adversary with great. rkill bad made sure touchi thy, ground. He reavsdi saeloud roar ar Bulga leta on the ground and broke gumugli bu armour Militie madhe gyde Rul apsarss cried out from therait and ahowerte Huwels. The peoult of the opposing party vera wach terrified as we breakagoi ( 2b.m's aumausais big came to him
tirory
Mahabban
॥ ततो वाचावपळ वेतनो भएर
चलायी लेन तिलभ्य वृकोदलित
इति गदापदपर्वणि गदायुद्ध : समायोचावा ॥
RARMA समुवीण सतोष्ट्वा संग्राम मालीimg
प्रादेश पासिनम् । पोपीयोमुखे को अपमान अपतो.मतो;
पुणो भूशतसमनाईन २. वासुदेव उपात्र उपमेयोनेवास्तुकलोमी
4सी बमपर धागष्ट्रो कोदरा-भीमाबाबम
मामो मोतियायन तु युति हमादेव'मोषणम् (trin NRN
कोपर परसे अणुये अपने मुखको साफ करके पैर्य को प्रारकर बोनों
को जोड़कर अपने को असमें भाभकर निपाक
अध्याय ५८॥
समय बोले कि इसके पीछे अर्जुन उन कौरवों में भेष्ट मापसेकर
अनके बद को देखकर यशमान मादेवजी से पासवन बोला।
थी इन दोनों बाराक युद्धमें भापके विचारसे कौम विधी अपना किसमें नमा
अधिक वर्षों उसको भाप काईये ।२ । वासुदेवजी ने कहा दोनों की
बराबरी और बीमसेन अधिक पलपान है परन्तु पर दुर्योधन भीमसेनमें,
बवासी और उपाय करनेवाला, है। ।। भीमसेन धम्म से युद्ध करने
विजय ना करसक्ता और जो भन्यापसे लड़ेगा तो अवश्य दुर्योधन
करमा ।। और यहभी हमने सुना है कि ममुरलोगों को देशमा ने ससेमी
molt in an instant and clearing his face of blood stood op with great
fortitude. "'70.
"
CHAPTER'LVIII:
Sanjaya said, " Then Arjun, seeing ths battle of Bhim and Dar.
Tedhan, said to Vasuder, " Whom do you think the better of the
two warriors, Visuder! What quality is greater in each in thems"
Visitor naid, They ars equal in training: Bhimrerit morer.
powerſal, lut Duryidhen bas better practice. , Bhimo CanDot Congor
7805) Gada Part गदाप (७२०५) रतिक मुनम ! चिमनु शकण माययो.निति सचे। ५ ५ माथा पाकिबोदनः तामाबामधनी मानिराकमम् ॥ पतिबातम्तुं भीमेन.पूतका धम्म उम्मेणामि सम्मे गति पान मोतिचापि पालपरवारिकर्षणः । मापाविन राजा मावनित मास्थाव पापेन रिष्यतिविषमस्थततो राजा भविपति बुषि पुनरें पामि विधि | धगजाTTARA गरपालिममात कर्म या मोममें नाम कुन जिम प्राप्त पश शिवासिंतम् ॥ १४ विजयः सः पुनः संशयित: तमाम मामातीलाच पार १॥ पविजय गुर पणितं धोरमीदशम मुघों तीकापता'। १३ मंपिचोशनसा : गीतः भयो पुरानन बसविसम्मेनिगद अनु ॥ १४ ॥ पुनरावर्चमानानां मामामा : . मानिइच करके उम.पिरोचनको सही सेन्द्रने, विजय कियाथा जी.मे.इन में बाहर को भी विजय किया. इसकारण. भीमसेन म.पराकम में नियत होकर लीं। मर्जुन भीमसेन ने धूतके समय उस धन से मतिया करीबी कि युदमें तेरी: जंघामों को गदामे तोडूंगा। मो उसनतशी मीमसेन उस प्रतिमा कोभी पूराकरे इससी, छली राजा, को मारे गोपाल में निपत होकर न्यायपूर्वक प्रहार करेगा तो ,रामा युधिष्ठिर परमापरि में फंसेगा । ९ । पाण्डव जो में करता रसको मुमा कि. धर्म, रामपराधसमको फिर, भय मातहमा १०५ हुत- बड़े कामों को करके माध्यापिकड कौरवों को भी मारकर विजय-पूर्वक अत्यन्त उत्तमयश और पता दलेको, मातलिया । ११॥ भ.प्रकार की माप्तहोनेवाली विजय को फिर मदरसे चुरू त्रिपा, अर्जुन धर्मरामको यह बड़ी निद्धिता है। जो विजय बास-प्रकार के एकेही साव पोरयुद्धकी प्रतिज्ञाकरी दुर्योधन अभ्यासी वीर बार पकते. चिदाला है। और शुक्रजीका, कहाभा पहमाचीन और मुख्य प्रपोजनसे युक्त लोकभी मुना भाता है उसको तुम मुझमेसुनो ।१४ कि गैटकर ग्रामपाले पराजित जीवनकी इच्छा करनेवाले और एकाकीपने में बहुये मनुष्य him but with, unfair. fighting. We bear that the gods.. conquered asurs with deception: .Let Bhim fight artfully. Hor • pronmited . at the time of,gamblive.to break Duryodhan's. thigh. He, should fulll his promiso ::Yudhishthir will fall into difficulty. if Bhim fights Lairly. We are again in danger by:tho lault of Yudhishtliir. Bøving plain Bhishm and othor great Kaurap Warriors we have made, Pan and of the enmity; but he • has again endangered, rictory through - 10.
७२०६) Mahabharat (72061 षिणाम् । भैपरिशाणामेकापनगता दिते ॥ १५ ॥ सासोत्पतितानाच निराशा नाञ्च जोयिते । यमप्रतः स्थाणु णापि धननय ॥ १६ ॥ मुयोधनाम भग्न इतमाय इन गतम् । पाशित वनप्रप्तुं निराश राज्पलम्मने । कोऽन्येष मागे पुनर्विन सम हायेत् ॥१७॥ अपिना निजित राज्यं न त सुबोधनः । यस दशणि गदपा कतनिधपः । पात्युरच तिपक व भीमसनाजियाबवा ॥ १९ ॥ पनवेल महापारण्यायेन हतिष्यति, । पर कौरवो राजा धाराष्ट्र अविष्यति ॥ २० ॥ धनन्जयस्तु अतित केशवस्याहारमनः । मेक्षतो भीमसेनस्य सायमूहमता. इयत् .२५ ॥ गृह्यस ततो भीमो गदया प्याद्रणे । मलानि विपित्राणि बम कामातराणि ॥ २२ ॥ दक्षिण मण्डल, सम्य गोमूत्रमाविका प्यचरपरिषो राजार सम्मेलयनिक ॥ २३ ॥ तथैव तव पुत्रोऽपि गदामाभिधारः परम से भयकरना चाहिये कोंकि वह एकसे चित्तवाले हैं। 11 हे अर्जुन अकस्मात चदाई करनेवाले जीवन से निराश शूरवीरों के आगे इन्द्र नियतहोना' सम्भव नहि १६ इस पराजित पता सेनाका हुदमें वर्चयान दुर्योधनको कौनसा बुद्धि पान फिर द्वन्द्वं युद्धमें बुलावे । १७ । दुर्योधन हमारे विजय किये हुये "राज्यको नहीं करसता जो निश्चय करनेवाला दुर्योधन भीगसेनके मारनेकी इच्छासे तरवर्षसे गदा के बारा ऊची नीया और तिरछी गविकरता है ।१९। जो महावाहु भीमसेन इस प्रकार इसको अन्यायसे नहीं मारेगा तो या कौरव दुर्योधन तुम्हाग राजाहोगा । २० फिर अर्जुनने यहात्मा केशवजीके इस वचनको सुनकर.भीमसेनके देखो बाई जंघा को ठोका ।२१। इसके पीछे भीमसेन उस संकेत को पाकर युद्धमें गदांक द्वारा मक प्रादिक पदतमे विचित्र मण्डलीको घूमा ।२२। हेराजा पाण्डव भीमसेन शत्रुको चैत और मोहित करता गोमूत्रकीम मण्डलों को घूमा। उसी मकार गदामार्ग में 'माधान आपका पुत्री भीमसेनके मारने की इच्छाले तीवता hva filly He made a promia to Duryodhan.who 18,80 praliced it. 13 tcp tighting. We litar a famous verse of Shukra we, sbouid'fear" Mike when we liav cunquured, for they are bet on rejonger 15: 1 drtul 14 Udalje ta oppur those who are hopeless of their lives - That frise nian would lia ve challenged ranquished Duryodhan? Dury odban unout recover the kingdou conquered by us. Suruly he bas been prac. tising Maco fort twelva yorgdnd cannot be elain by Dhim out withiune fair meani.Durgithun will be youriking if he is not alin unfarly Maina At this Arjun for ked at Bhim erid tapped his left thig8. Bhim under stood tbe sigo and tuined round ih strangai ciroles 22.9 rao in zguig cucles, making bus opp rneat insensible and your gdů too, clever in the marches of wace fighting, ran'ın' strange'veysa He - (172071 Guda-Pary str8 (७२०७ वित्रा भीमसेनजिघांसया ॥ २४ ॥ माधुवन्ती गरे पोरे पन्दनागुरुका पिते वैरस्था परसंम्तो रमे कुनाविधान्तको ॥ २५ ॥ अन्शोग्य तो जिघामन्नों प्रधागे पुरुष भौ । युयुंचा गारमन्ती पथानांगमिवैषिणः ॥ २६ ॥ मण्डलानि विचित्राणि नरनों मामयों । गदासम्पातजास्तत्र प्रजग्मुः पायफाषिः ॥ २७ ॥ सम प्रहंतोतंत्र रंपालिनीमधे क्षुधयोर्वायुमा राजन योरिय समृद्रयों ॥ २८ ॥ नयोः प्रदरतों स्तुल्य मतकुन्जरयोरिव गदानिर्धातसंहादः महागत समजायत । तस्मिन सहारे वारणे सकने मशम ! उमावपि परिथान्ती युध्यमानायरिदमौ । ३. 'तो मुह समावस्य पुनरेव पान्तणे । मध्यदारयता मुखौं प्रगृह्य महती मंदार ॥३तयो सममषधुर घोरम्पमसंकृतन गदांनिशात राजेन्द्र नसतो परस्परम ३ बजरोहतसाङ्गी रुधिरेणाभि सलुनी । दशाने निमंति, पुष्पितावित से अपूर्व पागीको घूमा। २४ पदन अंगरसे युक्त घोर गदाओं को चलायमान करनेवाले शत्रुताका अन्त चाहवे. १२५ ।परस्पर , मारनेके अभिलापी-नवीर पुरुषोतम यह दोनों, ऐसे. युद्धकरनेवालेहपे जो, कि...सपा का मांस चाहनेवाले दो मुबार युद्ध करतेई । १५.। वहां विचित्र मण्डलोंके घूमनेवाले गजा. दुर्योधन भार मापसेन की गदाओं के मुहार से उत्पन्न होनेवाली अग्तिकी ज्वाला; प्रकाई ।२७। राजा कहाँ बरावर प्रहार करनेवालें. उनं. पराक्रमी शूरोंका घोरंशन्द एसा उत्पन्न हमा अति वायुपे गयुक्त होसमुद्रोंका घोरशन्द होता है। दामनवालेहाय के समान बारमार: प्रहार करनेगळ. उन, दोनों के प्रहार करनेसे.परस्पर गदाओंके संघटन से बहामन्द उत्पन्न हुआ।२९) ता उस भपानक भोर, व्याकुल युद्धमें लड़नेवाले वह दोनों शभुसंतापी यकाये । ३. । अर्थात् अत्रुओं के तपानेवाले क्रोधयुक्त बादोनों एकमुहू ने समाजासतदांके दोनों, गदाभों को पकड़कर फिर विश्राम युक्तहुये ॥३१॥ हे रामेन्द्र गदाओंके प्रहारोसे परस्पर प्रहार करनेवाले दोनोंका घोररूप युद्ध सबके देखते ये मा. फिर युद्धमें चलायमान उन दोनों श्रेष्ठ नेतात वारों ने परस्पर ऐसे पायक किया जसे कि हिमालय पर्वतपर फूलहुये. दो किंशुमके वृक्ष होते हैं भीमसन से कुछ छिद्र, दिखानेपर थोडासा प्रसन्न विच दुर्योधन Using their maces, adornod with randar and agar, and wishing make an end of enuity, the two lsTot8 fouglit like two garapi desirous.of eating serpents: "26. - Sarks of firs came out of their Muces.in - The uoise" of their ighting was like that of two stormy reas. They fought like mad elept anty and made a tremendous. noise with their maces. At last thés were tired of dreadful fighting. They wounded, each other, with their; 'naces and looked like two ing kinshuk trees on the back of the Himalayas, Finding out some Weakness in Bhim, Duryodhan rushed at him in great fary, bat the -- .
७२०८] Mahabharat (72011 किंशुको ।। ३३ । दुर्योधनस्तु पार्थन दियरे मप्रदर्शिते । बामवमानस्तु सहसा प्रससार ॥ ३५ ॥समयसागत माहोरणे प्रेक्य एकादरामपाक्षिपदा तस्मै मंगल महना पसी ॥ ३५ ॥ अयाक्षिप्तान्तु वारपवापुत्रालय विशाम् । भवासपत्तत स्थानात सा मोघा म्पपत वि ॥३६॥ मोक्षपिरा प्रहारत मतलब ससम्भ्रमात । भीमसमान गदया पाररत कुरुमत्तम । ३७ ॥ तस्य विस्यन्दमानेन रुधिरेणामितौजसः प्रभार गुरुणानाच मूउंग समजापन ॥ ३८॥ दुर्योधनो मत पीड़ित पाया । धारणामास भीमोपे शरीरमतिपतम् ॥ ३९ ॥ ममम्पतरि पन प्रहरिपत. मारणे । ततोम प्राहरस्म पुनरेष तवारमा ॥४॥णे मुसिमावस्या दुधन मुपस्थितम । माताजन् भीमसेन प्रतापपार ॥१मातम्त समय सराधमामतीजसा । मोधमस्य प्रभारत विकाभरतपय ॥४२॥जस्थाने मति अकस्मात् दौड़ा । ३४ । विमान बलवान भोपसेनने युद्ध में उस समीप वर्षपान दुर्योधन को देखकर बड़ी तीघनासे उसके ऊपर गदाकोमारा। ५.हेरामाशाप का पुत्र रस गदा चलानेवालको देखकर उम स्थानसे हटगया वह गदा निष्फड | होकर पृथ्वीपर गिरपड़ी । हे कौरवोत्तम तब मापके पुत्रने बड़ी व्याकुलता समत उस पहारको विचारकर भीमसेनको गदा से घायल किया। सरिक | चलायमान रोने और बड़े महार रे गिरनसे उस बड़े तेजस्वी का मूछा होगई।१८। दुर्योधन ने उस युद्ध में पीड़ापान मामसेन को नहीं माना और भीमसेन ने अत्यन्त पीड़ित शरीरको धारण किया।९। आपके पुत्र ने युदमें उसको नियत पार प्रहार करने का इच्छादान माना इसहेतु से फिर इसपर प्रहार नहीं किया १४. रेरामा इसके पीछे मतापमान भीमसेन एक मुहूर्व विधाम करके समता से सम्मुख वर्णनान दुर्योधन के समक्ष में दारा । ४१ । भरतर्षभ रस प्रोपक बरे तेजस्वी आतेहुये को देखकर उसके उस प्रहारको निष्फल करनेकी इच्छा । बरे साहसी भीमसेनको छतमा चाईते आपकै पुग्ने पायान गांव ठारने में मतिकरके उछलना चाहा परन्तु भीमसेनने उस राजाके कर्मकाणे कीराको जानालिया और सम्मुख जाकर सिंहके समान गर्गना करके।४। former dealt the latter a heavy blow with his mace. 35. Seeing the 1Un co approacb lım, your 500 stepped ande and the maco foll dowa on earth. Then your aor wounded his opponent, who became insensible with the beavy blow and lies of blood, bnt ho managed to bida bu, pria from your 400. Stel je bio roady to fight, yoor son Jid apt Baying rested axlule, Bbio rasbod at your 800 wba wishing to avert bis blow thought of spriogog up Bhina repeat the blow - J Gads Parr गदापर्व {७२om क्षय महामनाः । येषोत्पतिनु राजश्उलायापन वृकोदरम्॥४३॥ मधुर होममतदातस्य विकषिमम् । अथास्य सममिनुस्य समुस्कुश्प सिंह *युम्सयतो राजन पुनरेशेस्पतिया उसया प्रारिपोशाजन गा बेगेन mmen. ४५ ॥ सा बज्रनिषसमा मरिता भीमकर्मणा । अब दुनिस्वाथ बम विपशिनी ॥४॥ सपगत गरयात्रा बवामनुनावयर । ग्नोरम बन परप मसीपते ॥४७॥ दुर्गा सविना साशुवर पगार पाल तिमी चापि सशक्षापपर्वता ॥४८॥ तरिक्षत्रिपातो रे. परयो सामशिनार । बापमानामा सार्धाता भण्डसी । पपास पोमा माती पनि पृथिवीती neer शोषितवर्षद पोशुर्पन भारत । पयामासान तव पुरे. निपातिते ।। ५.। वाणी राक्षमानाष पिशाजानो तथैव चमतरीय महामाद अपते भर वर्षम ॥ ५॥ तम शम्न पोरेज मामामय पलिगामा बोरतर. शमो बना बीयम ने मदाको बड़ी सीबतासे उम कालम गले और फिर उछलने, मभिलारी की जवाओं पर चाया। ४ । भवसारी ; कमा भीमसेनसे, माई हुई और वजके सपान घिमास्टवाली इस मदाने दुर्योधन जी दर्शनीय नामों को तोड़ा । ४६ । हे राना भीमसेनके सबसे टूटी अंधावाला वह आपका नरोगपुर प्रधीको शन्दायमान करताउँमा गिरपा । 0 1 उपतष परस्पर संपदा करती बाबुचली धनको सादुई और वृक्ष वन पर्वतोसमेत पृथ्वी कंपाय मामाई । १८ । सब राजामों के स्वामी और सर प्रवीके अधिपति उस दुर्योधन करने पर पड़ी शन्दायमान प्रकाशित भार परस्पर संघहनवाली वायुसमेत पहासी उस्कामिण । १९ । भार कविरसमेत धूल कीमा वाईदे भरतर्षभ वहां दुधन के मिरनेपर इन्द्रने वपकिरी । ५० । इसी प्रकार वारावर भर पिशाचों केबीपद अन्तरिक्ष में सुनाई पड़े । ५१ । उस घार शप से बहन से पक्षियों के भी बड़े घोरशद सा दिशामों में उत्तमये । ५. । और जो यहां पयुष्यासमत घोटे हाथी आदिकथं उन्होंमी दुर्योधन के गिरनेपर बड़ेशब्द किये know his intention, and with a leonine roar, dealt a blow it hus thigh whabe to As rathe actors angHELP 45. The brearry once indian Duryodban's thigh and he teli down on earth with a crush Then .storm of wind blow, dust fell down and the earth with her moun- Aids and trees shouk. At the fall of prioce Durgıdbou, metara fell down with a crash end bleed eland dust fell. ladrarlowered rain at the fall of Duryodhan, 51). The cries of so krbus, puhechen and saksbases were to be heard in the air ard the beants aud birda cried out in all du@otions The sounds of men ard binat# 11014 followed by whose of con cbr ard dilus at the fall of Luizielle Subierno goed wara heard and dreadful trunke, arma and feet danced wi -- ७२१०) Mahabbarst Rb) सर्वतादिशम् । ५२ ॥ ये तत्र जिन रोपा गजाच मनुसह । मुमुपस्ते महामार' तव पुत्रेनिपातिते । भेरी शस्त्रसुङ्गानामभषाच स्वनो महान् । ५३॥ अन्तभूमिगत भा तव पुत्रे निपातिते । बहुपादेवहुभुजे कन्धेघौरदर्शने, त्यधिर्भयम्यांदा दिनाभवन्नए ॥ ५४॥ जप-तोमषन्तन शरुधन्तस्तथैव च । प्राकम्पन्त दो, राजस्तप पुढे निपातिते ॥ ५५ ॥ इदा कपास साधरमुढेमपसचम । मम मम हावेगा प्रतिस्रोतोषहामवन् ॥ ५६ ५ पुंलिंगा इव नायंस्तु नीलिका सामा। दुप्पोपने वदा राजन् पतित तनये तप । ७७ . रष्ट्वा वानद्भुतोपाताद पाखाका पाण्डवै सामाविम्तमनसं सधैं धमूर्भरतर्षभ । ५८॥ ययुधा वधाकाम गरी सरसस्तथा । कथयन्तोद्भुत युद्ध मुतयोस्तव भारत ४९ ॥ तयेष सिमा राजेन्द्र तथा बातिकचारणा निरसिंदरी प्रशसम्तो विप्रजग्मुर्यथागतम् ॥ ६.. इति गदापदपर्वणि गदायुद्धे दुस्पोधनरूभरो अष्टपञ्चाशघ्याय: ५८॥ . मेरी शङ्ख मौर.मदों के रहे शब्दहुये। ५ । आपकेपुत्र दुपानके गिरने पर, पृषी भी शब्दहुपे सप दिशा बहुतसे चरण भुजाओंस और घोर दर्शन नृत्य करनेवाले भयकारी इण्डोसे पूर्णहोगई । ५४ । धजाप्तमेव शत्रभारी वीर भी कम्पापमानहुये। ५५ । हे भरतर्षभ राजा धृतराष्ट मापके पुत्र दुर्योधन के गिरनेपर सदाग और कूपोंनेभी ऊपरको रुविरवाया बढ़ी शीघ्रगामी | नदियां उल्टीवही ५६ स्त्रियां पुरुषोंके समान और पुरुष स्त्रियों के समान होगायो राजा मापके पुत्र दुर्योभन क गिरने पर। ५७ । पांचालों समेत सब पाण्डन उन भपूर्व उत्पातों को देखकर चिचसे व्याकुलहुये । ५ । इसीप्रकार देवता मानधना अप्सरा प्रापके पुत्रोंक अपूर्व युद्धको वर्णन करते हुये इच्छानुसार चलेगस । ५९॥ भार हे राजेन्द्र इसीप्रकार शुद्धायु के साथ चलनेवाले चारस सोग मी. रस दोनों नरोचोंकी प्रशसा करने अपने स्थानोंको चलेगये ६० ॥ round. The banners of the warı tors shob Lakes and wella gave up blood at the fall of your son and rivers changed their coaree Women were turned into men and men into The Panda TAK and Panchals were terrified at the sight of those phenomena Guda ghaadharvas and aptaras we it away talking of your sou's wonderfor bigtit. Ine charang to fles ist air and passed the fighting of the two heroes >> - 55 omen . 60.
- - 117211) Gada Parv गदापर्व जय उवाच ! तपातित तो रमवा महाशालभिषातम । प्रहमनस स रशस्त पाण्डया ॥१५ त मसमिया मान सिंहन विनिपातितम् । पशुपएरो (माण स ते पावि सोमका ॥२॥ ततो दुरोधन हस्खा भीमसेन प्रतापवान् । पतित पौष तमुपागम्येदमापीत्।। ३ । गौगोरिति पुरा मन्द द्रौपदीकवासमा पत् समायां समस्तवा पदसि दुर्मते ॥ ४ ॥ तस्यावासस्म फलमय सम 'पाप्मुरि। एवमुक्त्वा स पामेन पदा मौलिमुपास्पृशत् ।। ५ ॥ तवं कोषमरको भीम परयताईन । पुनरेवाप्रवीद्वाक्य पत्तत आणु नराधिप । येस्मान् पुगमन यन्ति मदा गौरिति गोरिति । तान् पय प्रविनत्याम' पुमारिप्ति गौमिति ॥ ७॥ तारमा नितिधीहनाभरते न पश्चना | स्वधाहुबलमाभित्य प्रषाधामो षय रिपून अध्याय ५९ ॥ संजय बोले कि इसके भनन्तर शाल वृक्षके समान, ऊचे गिरायेहुये उस दुर्योधनको अत्यन्त प्रसन्न विच सब पांडवोंने देखा ।१ । और रोमरसे प्रसन्नउने सब सोमकोंन मी मिहके हाथत्ते गिरायेहये मतवाले हाथी के समान दुर्योधनको देना, २ । इस गीत से मतापवान भीमसेन ने दुर्योधनको मारकर उस गिरायेहुये मृतक पार कौरपेन्द्र के पास जाकर यह कहा । ३ । कि हे दुर्मति प्रभागे जो पूर्व कालमें नुमने सभाके मध्य में हमारा हास्यकरके एकरखा द्रौपदी से जो है गाहे गो कहा। उस हास्य के फरको भव तुमने पाया यह कहकर उसने अपने काम पादसे उसके मुकुर को स्पर्शकिया । ५। इसीप्रकार शत्रुकी सेनाके पीडापान करने | वाले कोषसे रक्तपण भीमसेन ने इसके पछि भी जोर वचन कहे उनको भी सुनों (२४ो अज्ञानी पूर्व कालमें हेगोर ऐसा कहतहुये हमारे सम्मुख नृत्य करनेवाले हुगे उनके मम्मुल भव नाचते है कि गोर । ७ । इस रीति से कहो हमारा उलना अग्निका लगाना छूतका पter भार ठगना नहीं है इम अपने भुनालके आश्रित होकर शत्रुओंको पीड़ा देते हैं । ८ । वह भीमसेन उस बडी शत्रुताके । CHAPTER LIX Sanjaya said · The Panduvas looked with pleasure at Durgo dlau who bud fallen like a bal tree and the Sonaks were overy yed to see hiu fallen down like a mad elephant struck by a frot Having struck down Duryodhan, Bhim went to him and said, 'Foolishi wretch you mooked us in the court by saying cow cow' to Draupdt and this is the fruit of that mockery of youre, " Having salga this, ho touched bis diadem with big left foot and again said to bim thusa words in anger • You dauced before us, saying Com. cow, and wpr rshall ndw do the same. We are now asupged for your decolping us; putting us on fire, gamblng and cheating. Hyping made an end of the enmity, he said to Yudhishthir kpsbar, Arjun, Nakul, Saba ।
- (७२१२) Mababharat (731) ॥८॥ सौवाय वरस्य परस्प पार वृकोदर माह शने प्रास्य युधिाहर के मांध बनम्जय माहवतीमती ह॥९. रजस्थळी द्रौपदी मानपद पे ये बाप त समाज ताम्पश्यन्वं पागधार्तराधामणे हतांस्तपसा मासेम्ब.ton म पुरा पडीतलामोचन का राशो धतराष्ट्रस्य पुत्रा. ते को बा aor शामुकत्या काम वर्ग नरक पा पताम ॥ ११ ॥ पुनधारा पतिसम्मो सन गदाम स्कन्धगत प्रगध । अमिन पावन शिरा, प्रमृध दुर्योधन नेकियोषत ॥ १२ ॥ होत गजन करमतमस्प मुद्रारमता भीमसेनेन पापम पम पूर्वति भावनापन पोगमा सोमकाना मी ॥ १५ ॥ तव पुत्र साथमा कोदरम् । नृपमानाच पुणे धर्मराजोप्रधादिपम् ॥ १४ ॥ गतीति-रिवार प्रतिता परितापथा। गुमनपाराभेनाय कर्मणा विरमाधुना ॥ १५ मा तिला अन्तको पाकर मकर रहे धीरपने से युधिष्टिर, केशवजी, अर्बुव, बकुख, मादर मार मृज्जियों में यह वचन बोले । ९ । कि जोपुरुष रजस्वला बोदीको बारे और लाकर जिनामे सभा नंगी करनाचाहा उन धृतराष्ट्र के पुत्रों को अपने द्रौपदी येपन और पाण्डयों के पराक्रमसे स्तकामा देना । । तिमर में रामा घुसरा मिन निर्दय पुत्रोंने हमको नंपुसक कहाथा का भोग समूहों और सहायकों समेत हमारे हायसे मारेगप हम हमके स्वर्ग होर बाला भरकहोप । ११ । फिर उसने पृथ्वी पर गिरते पे रामाके कमेपर एमाला को मदनकर पानपादसे परको भन्छे अफारसे मऊ बससी दुर्योधन में 1१२ हेरामा सोमको समेत श्रेष्ठ महात्मामाने रामा दुर्योधन के मस्सरस प्रसन्नचित नाचारमा भीमसेन के चरणको वसाहुमा देसार मानी माना ।। उसमकार बाप के पुत्रो मारकर वार्तालाप करनेवाले नौर से माचनवाले भीमसेनसे धर्मराज ने यह रचन का ।।४।किसने वाली मणताको प्रातकिया और अपनी प्रतिभा को प्राझिया अगुवाम गोस dev and he srinmayas,"Lwk attne death of thoss wbobcongs Draupa jato court and ruled to deprive her of her diesr. 10. The song of Dhritrasbira ulo had callod us upmanly b-lore, me now lying dend along with their allies and friends lte care not if we go to hentaa or holl." Then he trampled down the bood and 2040 of Dar. yodban with his loft foot The good warriors among Sonaks and others did not like to see bin touch Duryodban'a head with his fool Then Yudhirathir raid to Bhim w bo kao thus exulung at the deald of Duryodhani, la bave puas an oud of ths onmily and faiblied your promised potiot nou touch hie land with yonr font Deocl forego dbarm. The prince who has fallen down was a brother should not thus behare with him. 16. Dams of our Ju (721) Gada Parv गदार्थ [७.१३) महामाधमतऽतिगा भवेत् । गजा शातिहतश्चायं नेतनयाय तथानघ १६ ॥ एकादश माय करणापि या मामाक्षीभीम पादन गजानं शातिमेषच ॥१७इस नम्रतामायो प्रपसम्पो रतो मृधं । साकारण शोच्योऽय मावास्योऽयमीवर. .१८.furnisसामायो इतमाता जा उत्साविज्दा नातासमेतमा क सण १९ कार्मिको भमसेनोऽसावित्यास पुग जना. सकस्माद्रीमसेन राजाममधितिष्ठसि.२० इयुवा भीमसेनस्तुसथुकण्ठा युधिष्ठिरः। उपर. वाप्रणिधीनो दुर्योधमारण्दमम् ॥२१॥ त मम्युन ते कार्यों मात्मा शोच्यस्त्पपा गया । म पूर्णकृतं कर्म भूघोरमनुभूयते ॥ २२ ॥ पात्रोपदिष विषमं नून फलमसंरक- पृषक होकर । १५ । चरणसे इसके शिरको मर्दन मतकर धर्म तुझको उल्लंघन करनेवासा न होपरे निप्पाप यह राणा और अपना भाई मारागया यह तेरी बात पाके योग्य न है । १६ । हेभीमसेन ग्यारह अक्षणी सेनाके सामी कौरवों के रामा अपने भाईको चरणसे मत दुकरामो 11 मृतक भाई मन्त्रीऔर मागपत सेनाधाना वह राजादूर्योधम युद्धमै मारागया यह सब प्रकार से शोषने के योग्य है हास्यके योग्य नहीं है । १८ । यह पतक मन्त्री भाई सन्नान और पिंपडवाला और पापभी नाशको प्राप्तहमा भाई है तुमने यह न्याप के योग्य मा किया।१२पूर्ण समय में लोगोंने कहा कि यह भीमसेन धर्मका अभ्यासी १ हे भीमसेन तुम धर्मन्न होकर इस राजाको किस :निमित्त चाणों म ठुकराते होणाकिर अश्रुओं से पूर्ण राजा युधिष्ठिर भीमसेन से ऐसे वचन कहकर महा दुखी होकर उस शत्रुविनयी दुर्योधन के पास जाकर यह वचन बोले २॥क हे नाव तुझको क्रोध न करना चाहिये और अपना भी शोच न करना चाहिये निश्चय करफे पूर्वका फिपा हुआ घोगकर्ष फलको अवश्य देता है। १२ हेकौरव्य निश्चय करके, इस रसविपरीत अशुभ और अपवित्र फलबाला का उपदेश किया गया है, जो तुमहमको और हमतुमको मारते हैं । २३ । हे भरतवंशी निश्चयही touch with your foot the hand of your brother who was too lord of elaven aksba uhinis. Being drp ived of brothers, ministers and army. Duryodhan_has been slain in battle Ho 19 worthy of being grieved at and not af nockery. ho hmyself as well as bus ministere brothers and 80118 You live acted unjustly. People say that Bhim n Just, why then have you kioked his head ? " Hav. ing bad this to Bbw, Yudhishthir with eyes (ull of tears turned, to Duryodhan and said," You need not be grieved, brother You should not feel sorrow for yourself, for at ss the fout of cour own foriner misdeeds. It was a qlita ulhuly deed that you and we have fought ts.gether. You have brought on this misery by yeur avarice, pisao and folly. You have brought about the death of our brothes, friends are slain - Mahabharat तमा यद्वय व जिघांमREAचस्मान कुरुसत्तमः॥ २३ ॥ आत्मनो अपराधन महवपमतमीहशम् । प्रायानाम पल्लोमान्मदाद्वाल्याच मारत ॥ २४ ॥ মানয়িন্না থাম মানহণকুলখা। তুম্মা বাঘা স্বাশ্বাশুনানি নিন गतः ॥ २५ तवापराबादस्माभिमानरस्ते महारथाः । निहता ARE विट मावं दुरत्ययम ! २६ | मानशांनी श्लाघ्यो मायानवान | मेषामाशीच्या सर्वावस्थासु कौर 1 कृपश वयिधामातहीना पशुभिः निज ॥२७. प्रतिमा पुत्रागा नप्तृणाशोकविश्वका I इयामि विधवा यथ'शोकारिप्लुताः । १८ ॥ स्वोकः प्रधितो राजन स्वर्ग त निलो . प नासिंहा धै' सभोवाम क्षारुणम् । १२ ॥ स्नु गाय पस्न पाश्चैव धृतरापूरा विवला. । गहयिष्यन्ति नी ननं विधवा शोर कार्पत ॥ ३२ ॥ एवा या सुखाचा निश्वास संपार्थियः । बिल लाप चिरश्चापि धर्मपुत्र युधिष्ठिर ॥ ३१ ॥ दाने गदा दपर्वणि युधितिरविलापे एकोनहितमो माया १९ ॥ - अपने अपराध मे उस प्रकार के बड़े दुःखको प्राप्त किया है जोकि लोभ असार । और भज्ञान से मार हुआ है २४ । हमारे भाई ममानधय पिता पुत्रपौत्र पार अन्यरलागों को पता कर आपभी नाशहमा । २५ । तेरेही अपराधी तो सब भाई हमारे हायसे मामये पार जाताने भी मारे इससे मैं पारम्पकोही कठिनता से पारहानेके योग मानता ई । २६ । हे निष्पाप तेरा आस्मा शोची योग्पनहीं ग मृत्यु प्रशंसा के योग्यई परन्तु हे कौरव भव हम सब दशा में शोचके योग्य है। २। उन भाइयों में राहत होकर इम दुखमे अपना जीवन करेंगे और भाई पुत्रादिकों के शको व्याकुल होंगे । १८ । शोकमें पलं विधवा वधुओं को किस मगारमें देवगा हे रामा तम अकेले चले निश्चय तुमको स्वर्गहोगा इमलोग अवश्य, नरकगामी है और पड़े कठिन दुःखोंको पायेगे । २९ । धृतराष्ट्र के पत्रपोपौत्रों की विपाध्यायल शो से पीडित और विधवाहोकर मारी निन्दाकरगी । दुःखो पीडावान वह धर्मका पुत्र राना युधिष्ठिर इस प्रकार कइकर और मामा को लेकर अत्यन्त पाडावान हुमा ।।। father, Suite, ganrisur, olbura and yourself. iall your brothers pere slain by us by your owo fuult. I sed that Fatu ja suprenie. You are 119t worthy of regtet innocent one, thy douth 18 praisa worlag, but we are undour. Deprived of our cuisinu na kull pass our lila i untry and stoll mourn ther death. How shall I be able to look at thelaweli wrnirn You alonu linna zarned hearea, whilo wa elia)! laliin hell endurulya Sko wsvos of the song and groodows of D':rkrarlatra wall lilagus us for their widowhood * Having said the Yudhishther the guit as much gneved ud hotel long agli* * 31 . ६॥ तस्य तराट - है (12101 Guda Puy ngroht धृतराष्ट्र यमाय । मनमण हत पवा राजान माधवोत्तम । शिमनवादासा बलदेवो म्हायल. ॥ १ ॥ गदायुद्धविशवको गदायविशारद तिवायोहिणया बचममाचक सजय ५२॥ मजय उवाच । अरभिहत रष्ट्शा भीमसेनन ते मुतम् । राम हरता श्रेष्ठदनुक्रोधवलपवली ॥ ३॥ ततो मध्ये नरन्द्राणाम्भबाईल युध । कुर्वदिवस घोर धिाग्यानीमे युधाम ॥ ५ ॥रोपियधो नामे प्रहन धमविद मतदष्ट गदायुर कमवान् य वृकोदर ॥ ५ ॥ मधो माया न दन्तम्यामिति शास्त्र निश्चय । अय स्वशापित स्वच्छन्दात समते भवाणस्य रोष समय-महान । सती लार मुधम्म भीमाभ्यसरी ॥ तस्यो प्रधाहो सहरा रूपमासीन्महा मन । बाबातावचिनस्य तस्येव महागिरे ॥ ८ ॥ अध्याय ६० ॥ धृतराष्ट्र वाले हे मा तत्र मावों में श्रेष्ठ बडे बलवान बन्देजी ो भने परिहये राजाको देखकर क्या का गदा युद्ध, कुशल माधर बलदेवनी ने भो किया यह सब मुझसे कहो ।२। सनयोले कि पहारकत्ताओंमें श्रेष्ठ बलवान बकदेवजी भीमसेनके चरणों स घाता आपक पुत्रको देग्वका बढे क्रोधयुक्तइये 1। इसके पीछे राजाओं के पध्य में ऊची भुना करनेवाले करदेवजी पीड़ित शब्दोंमे यह वचन बोल कि भीममेन पिकाईकिकारहे विकारशनोयुद्ध में ने नाभि के नीके धर्मके विरुद्ध महाराकया यह गदायुद्ध में कभी ना देग्वाथा जिमका कि हे भीमसेन नुमन किया । ५ । नाभि के नीचे महा करना अधर्म है यह शास्त्रको न जाननेवाला प्रज्ञान भीमसेन अपनी इच्छामे कर्म करत है।६ एसे अनेक बातों को कहकर उन वलदेवजी का वडाक्रोध प्रकट हुआ इसकेपछि वह महावली अपने इलको उठाकर भीमसेनके सम्मावगप ' ७ ( उत समय बृप्त ऊची भुमा करनेवाले महात्माकारूप बहुत धातुयुक्त शेन पर्वतके समान हुआ तर नम्रतासे युक्त पराक्रमी केशवनीने वडे उपायकेद्वारा हट तुष्ट लम्मी भुजाओं With up CHAFTER LX Dirtrashtra said, 'What did Baldex the test of Madhavas do on heery tbat the prince Vas unju tly slun I ray tli ne all that he sand and did " Sinjaye sard, " Paldes the best of warriors so ing that your sou was Licked by Bh m, was a ucha enrager ra sed hands and voice choked with 8DL er, hora l, Fienn Bhim You karo_acted against rule in Atriking b low the naval You have done au uct wheb rs never done by those who ight with the mace 5. It wa unjust to do so He has goted wiifully 'Hay ng said this, he showed hig gpger by rushing at Bhin to strike lum with bu werp-a, and 4 - 1( ७२१६) Mahabharat (7216 तमुपतन्तं जग्राह केशधो धिनधानतः । वाहूभ्यां पानत्ताभ्यां प्रपत्मालपाल.९॥ सितासिता पक्षधरी शुशुमातेधिक नदा । नभोगतो या राजभन्दमय्यो दिनक्षवे ॥ १० ॥ उवाच चैन संरब्धं शमयनिष केशवः। आत्मवृद्धिीमत्रवृद्धिमित्रमित्रोदय तथा विपरीत द्विपत्स्येतत् षडविधा वृद्धिरात्ममः ॥ ११ ॥ अरमन्यपि च मिश्रेष्ठ विपरीत यदा भवेत् । सदा घिद्धामनी ग्लानिमाशु शान्तिको भवेत् ॥ १२ । अस्माकं सहज मित्र पाण्डवाः शुद्धपौरुषाः । सकापस्वसुः पुत्राले पनिहताम शम् ॥१३॥ प्रतिज्ञापारमधर्म:क्षत्रियस्यति घेत्याचा मुयोधय गया भल्चास्यूह महाहये । इति पूर्व प्रतिशात भीमेन हि सभातले ॥ १५ ॥ मैत्रेयेणामिशता पूर्णमेष महर्पिणा । अरू भस्पति ते भीमो गति परसप ॥ १६ ॥ अतो दोष न पश्यामि मा घर प्रलान् । योनी. मुख हादश्च सम्बन्धः सह पाण्डयः ॥१७ ॥ सेषो वृषभ, से उछलनेवाले बलदेवजीको बड़े व उसे पकड़ लिया । ९ । ता अबुस्वभाववालों में श्रेष्ठ गौर और श्याम पूर्ण गले वह दानों महात्मा ऐसे अधिक शोभायमान हो हेरामा जैसे कि दिनके अन्त में वर्तमानहोनेवाले चन्द्रमा और सूर्य घोभिनहोते है। १० । केशरजी उन क्रोधयुक्त वलदेवजीको शान्त करके यह पचन बोले कि अपनी वृद्धि, शत्रुकानाश, अपने मित्रकी वृद्धि, शत्रुके मित्रका नाश और अपने मित्रके मित्रकी द्धि भौर शत्रुके मित्र के भित्रका नाश यह कारको अपनी बाद है । ११ । जब अपने में और मित्रोंमें अन्तरहोगा व चिचग्लानिको पायेगा उससमय कोई अशुभ न होगा पवित्र वीरतावा पांडर हमारे भाई मोर मित्रों अपनी फूफोके पुत्र उनका शत्रुओं ने अनादर कियाया। १३ । हम इसलोकमें पातज्ञाके पूरैकरनेको क्षत्रीका धर्म जानते हैं पूर्व समप में भीमसन ने समाके मध्य में प्रतिज्ञाकरपी कि मैं बड़े युदमें दुयोधनकी जघाको अपनी गदा सेतीदूंगा । १५ । शत्रुसंतापी पूर्व में मैत्रेय महर्षि ने. इसको शाप दिगया कि युद्धमें भीपमेन गदा से तेरी पात्रों को तोड़ेगा! ६ाइस, कारणमैं दोपको नहीं देखताएं हे बलदेवजी भाप क्रोप न करो पात्रों से हमारो नातेदारी है और मित्रतामी । in his rage looked like a white hill Valiant Keshop soized him within his powerful arms. The two great men, black and whube, looked like tho aun and moon at ovenia. 10. Having pacified his brother, Krishna said, - 81ccams lies in six thioge – 8ucOoss of solf, fall of fre, friend's suc cess, falloffrirni's enemy, success of inend's Sriend and talk of engrayua fria eoda Ono making adistictios bwtween frionda and zoll,comes to grief. The Panda vna aro your friends and Linsm-n; they ireroin ulud by the onety And a hsbastryn likes to accomplish his vows. Buim la tuado a vow to bresk Duryodhan's thi;lı. 15, Hu was forunorly cu'ul by Hitroya to the effect thetliis t'uigbo would be brolon by Bhim, ilmo there - 17217) Gada Parv गरापर्व (७२१० हिमोविर्मा सुधः पुरुषर्षभ । वासुदेवपचा धुरया सीरमृत माइ धर्मयित् ॥१८॥धर्मः मारत साथमच द्वाभ्यो नियच्छति । अधधापरधरप फामशातिप्रसङ्गिन: IRUों धर्मकामीच फामायाँ पाप्यपीडयन् । धर्मार्थकामान् योमेति सोत्यन्त मुबमारते ॥ २० ॥ तदिर ज्यादुल सर्व कृतं धर्मस्प पीटनात् । भीमसेमेन गोविन्द काय पथान्यमाम् ॥ २१ ॥ कृष्ण उवाच । अरोपणो हि धमारमा सत धर्मपत सामान प्रयापते लोके तस्मात संशाम्य माधः ॥ २२ ॥ प्राप्त कलियुगं विद्धि अनिल पावस्य च । भानुण्य गतु परस्प प्रतिज्ञायाम पाण्उध ॥ २३ ॥ जय कामछलमणि श्रुत्या केशधात स विशाम्पते । मेघ प्रीतिमा रामो धर्म मासदि ॥ २५ ॥ हत्या पोण राजानं धमाल मुयोधनम् । जिल्लयोधीति बोके १७। उन्होंकीही बाद से हमारी वृद्धि है हे पुरुषोत्तम क्रोध न करो धर्मज्ञ बलदेवजी ने यामुदेवनी के वचनको सुनकर कहा । १८ । कि छ'गुणों मे पछीरीति करके प्रभाग किगहुआ धर्मकहाई और दो गुणोंने हानको पाताह वह दोगुण यह है कि बड़े लोभीका अब और भात प्रसगीका काम । ११ । जो पुरुष कामरे धर्म अर्थको अर्थ से धर्म कामको और पमसे काम अर्थको पीड़ा वान न करता धर्म अर्थ कामको माप्त होगाई यह घडे मुखको पाता है । २० । सो धर्मके पाड़ाधान करने से मीभमेन ने यह सब व्याकुलता किया हे गोविन्द जी तुमने मुझसे अपनी इच्छानुसार कहा है धर्म के अनुसार नहीं कहा है । २१॥ श्रीकृष्ण जी वोले कि आप इस लोक में क्रोधरहित धर्मात्मा और सदैव धर्म वत्सल विरूपानहो इस हेतुले आप शान हनिये क्रोध न करिमे । २२ । अब पाप कलियुगको वसमान हुमा नानिये और पार डोकी प्रतिज्ञा को समझो पाण्डवलोग शत्रुता और प्रतिज्ञा की अमृणताको पारें । २३ । मजययोले हैराना उन अमसन्नमा बलदेवजी ने केशवजी से इस छलयुक्त धर्मको भी अनकर सबके समक्ष में इस वचन को कहा । २४ । कि पाण्डव भीमोन धर्मात्मा - fore no fault. You should not be angry with the Pandavas who pri our kid-mon and friends, Our greatness goes hund in land with theira."On hearing the words of Vasudev, he said, "Six virtuss andtba sign of Dharm. The two things deprecatory to it 010 Excosa uf avarice and luste II. who practises dha m, arth and kam, without clashing them together, gets happiness. 20 Bhim forsook dlaim in his conſumon and joy and youalso are saying this against ile dotates." Shri Krishn said, " You' are known througl out the world r8 vnt tous, without anger and friend to the put our. Cub your iteer rod be p4ci. fied. Think of the halı age, the yow of the Pandavas aud the end of ७२१८] Maliábharat (7281 स्मिन् स्पान यास्मृति पाण्डवे ॥१५ । दुय्यधिनापि धर्मात्मा गतिं मास्सन शाख तीम् । मुसयाधी हनो राजा धात्तराष्ट्रो नराधिप ॥२६ युद्धदोक्षाप्रविश्याजी रण जनस्पच : हुवामानमामित्राग्नी साप चावभय यशः ॥२७ ॥ इत्युक्त्या रयमा सय गरिणेप प्रतापवान् । नाभ्रशिखराका प्रयगो द्वारकाप्रति ॥ २८ गाना लं तु सवाशपा पाण्डवाश्चविशाम्पते । रामे द्वारवनी, याते नातिप्रमनलोऽमवन ।। २१ ॥ नतो युधिदिर दोन चिन्तापरमधोमुखम् । शोकोपहनमडूल्य घामदेवाजवी दिदम ॥ ३१ । घासुदय उवाच । धर्मराज किमर्थ त्वमध मनुमन्यसा हतबन्धोय, तस्य पतितस्प विनतम. ॥ ३१ ॥ दुर्योधनस्य भगिन मुद्यमान शिर पड़ा। । उपप्रे क्षसि स्माधर्मन सनराधिप ३२॥ युधिष्ठिर जान । न ममैतत् मिय कृष्ण यद्राजान कादर । पदा मन्यत्पुरत् क्रोधात न च हण्ये कुलक्षये ३३ । निकृत्या राजादयोधन को अपर्म से मारकर इम लाक में अभपूद्ध करनेवालाम मद्ध होगा १२. 1 धर्मात्मा दुर्योधन भी सनातन गाते को पावेगा: काकि सहायुद्ध करने वाला गनादुपिन मारागया ।२०। युद्धदीक्षाको प्राप्तकर और युद्धभाग में युद्धपो यज्ञकी रनना करके अपनेको शत्रुरूपी अग्निों होमकर शुभार्तिरूपी यज्ञस्नान को इमने पाया । २७ । अतशियर और सच्छ वादल रूप बलदेव जा यह कहकर ग्यार मबारहोकर द्वारका को चलेगये । २८ । हेराना वलदेवनी के द्वारकाजानेपर पांडयोसमेत पर पांचाल अत्यन्त प्रमत्र नहीं इये । २९ । इस केपी वासुदेवजी उम दुःखी शोचग्रस्त नीचाशिर करनेगळे शोक से हतांगकल्प युधिष्ठिरमे यह वचन बोले । १० । कि हे धर्मराज तुम किम निमित्त अधर्म को सीकार करता हे रामा नुम घनिहोकर जो इम मृतक भाईले अचत गिरेहुये दर्योधन के शिरको भीमेमन के पोंमें मर्दन कियाहुमा ‘देखकर निषेध नहीं करतो इसका पाहेतु है । ३२ । युधिष्ठिग्दोले हे श्रीकृष्णानी या में नहीं चाहना जो भोपपेनने गोधसे सस शिरो चरणमा इस कुलो नाश में मैं प्रपन्न नहीं होताई । ३३ । हमलोग धृतराष्ट्र के पुत्रों के छलों से उगये इन enrernity." Sanjaya raid tlint having leard the policy of Shree Apurn Biliter could not hulp romahing," Horinz laun virtuous, buryodhan Injustlv, Bhım'n name will bo reinen lured with inji-t ca Virtu sus Duryollnn will nt in the ele;oal Fig1976 by CH Ben hu fop hit jurile ansacrified his owndly on the altar of war."Husing Aud tirs, he moonut i fu car ini wept ayny ti Dsurka 11k Pinslavna ud Panglimla were not liappy after his departure. Then addrcolls Yud. legalithir ulio 179* pungkal in the ss A of sporor, Vrau Ive 9911 * Yhs His #1 for all yn ir virtur, allow: Blum in mod no thai sud of fullen Dong wllinn ? Why h! you not oth m 2" }udetetu, }! - Garik TRI [७२२॥ निता सत्य धाराप्यस्तयो । यहाँग परणायुक्का पन.प्रस्थापितास्म ६ ॥ ३४ ॥ भामसनस्य तदु स्त्रमतीय इदि पर्च।। इति सञ्चित्य धाय मयतस् समुक्षितम ॥ ५॥ स्मारधा सतत लुग्ध कामयशानुगम् । लभता पाण्डव, काम धमें घमीप धात ॥ ३६॥ सजय उवाच । इत्युक्तं धर्मराजेन यासुदेयोनवी दिदम । काम, ताति कृष्छादुकुलावर ॥ ३७॥ इत्युक्तो धासुदेवेन भरप्रियहितषिणा । अन्य। मोदत तत्सर्वं यद्भोमन कृत युधि ॥ ३८ ॥ भीमसेनापि त्याऔ तय पुनमममण । अभियाधामत. स्थित्या सहए. म कुनामनि ॥ ३९ ॥ प्रोवाच सुमहातेजा धरा युधिष्ठिमा पु-फुल्लनपनो जिमफाशी विशाम्पते ॥ ४० ॥ तवाय पृथिवी राजन क्षेमा निहनकण्टका । तां प्रशाधि महाराज स्वधर्मगनुपालय ॥ ४५ ॥ यस्तु कास्य परस्प निकृस्या निकृतिप्रियः । सोय चै निहत शेत पृथिव्या पृथिवीपते ॥ ४२ । दुशा बोगोंने बड़े कठोर और असम वचन कहकर इस मंपको वनमें भेजाथा । ३४ । वह कठिन दुाव भीमन के हृदय में वर्ष शान है । श्रीकृष्णगी मैंने यह विचार कर तरहदी है। .५ । इमहेतुसे पांडव भीमसेन उस निवुद्धि लोभी और कामकी आधीनताम वर्तमान दुर्योधन को परकर धर्मी वा मधम करके भी मानन को मिद्ध करमता है । ३६ । संजयवाले कि धर्मराज के इस प्रकार कहनेपर वासुदर जी इस वचन को दुखमे बोले कि यह इलाकेनुमार होप । १७ । भीमसेन का पय और दिन चाहनेपाल वासुदेवजी के इस मगर कहेंदो वचन को सुनकर धर्मराज ने उस सब अपराधको तमाकिया जोकि युद्ध में भागसेन से कियागया था ।३। हेराजा युद्धभूमि में आपके पुत्रको मारकर क्रोध से रहित अत्यन्त मस्का हाथ जोड़े ममन्नता काशिननेत्र विनयमे शाभागमान महातेजीभीममनसे भी दण्डवत करके प्रागे नियनहोकर धर्मराज युधिष्ठिरगे का । ४० । कि हे राजा र निष्कारक मोर पकारी यद तब भी गरी दे हे महाराज इसपरराज्यकगे और आने को पालनकरी .१। जो छन्नी उलते ही इम शत्रुता का पालन करेनवाला था के राजा वह मरातुम इस पृथ्वीपर पड़ाहुमा सोना है ।४२ । bude to band in se noi am i pl-wred with lisis dest: uouon of the twusly We were deceived by tno suns of Dhritrushtia rud they had sent 114 into exile with very harsh words the dust of those wrongsianbled in the breast of Bhim and therefore I overlooked the matter 3) He could slay forlish avaricious and covetuous Duryodlian justly or uninstly ' Having heart in tushtlhn's wortle, Va-ulty and lugi "Let it le'as yıu say " Beering the words of Vasudev the well wi her of Blun, Yushibthir fosgaye kis fault in breahing the role Thus perda ned, thuerful and with eyes dsalated for guy, glossus Bbw respectfully sand 10 Yudhishtbır. Wituout a thorn, belongs tu thee, king, ule over st justly The deceita of war. 40. “The earth, Mabxblixrs! (१२२०) (73201 सनप्रभृतय सोते चोप्रशदिन । राधेय. शकुनिश्वापि निहतात शत्र संघ सनसमा मही सरनपर्वता। उपावृत्ता महाराज त्यानय नितद्विपमा युधिष्ठिर उवाच । गोवरस्य निधन हो राजा सुपांधन 1.कृष्णस्य मतदारपाय विजितेष पमु-वरा ॥ ४५ ॥ दिष्ट्या गतस्त्वमानण्ये मातु कोषस्य बोगी। दिष्ट्या अपसि दुश्मीदवाशनिपातितः । ४६ ॥ इति गदायुद्धपर्वणि बलदेवसान्त्वनायो पष्टितमोऽध्याय 1) • ६० ।। . -- न पालन करनेवालाथा हे राजा वह-मराहुआ इस पृथ्वपिर पड़ाइमा सोताहै । ४२ और. तुमको कठोरवचन कहनेवाले प्रापके शत्रु कर्ण शकाने और दुश्शासनादिक सब भाभी मारे गये । ४ । हे महाराज या रत्नोंसेपूर्ण मृतक शत्रुवासी पृथी वन पतिा समेत सब भापको प्राप्तहुई ॥४४॥ युधिप्टिरवाले.कि राजामागम दुर्योधनको अब अनुताका अन्तप्राप्तहुआ और अहिष्णन के विचारमें नियतहका हम सबलोगों ने इस पृथ्वीको विजय किया । ५५ । आपने माररूपसे ही दोनों मातामों के काधकी उमणताको पाया है अजेप आप प्राररुपती विनय करतो भोर मारव्यही से यह शत्रुमारेगये ४६ ।। Mul ouero v les dend on earth The enemics wliuspule haral words to you- -Karao, Slinkuri, Dusha-an asid las brothers are «!lextírpatod. You arut jow the master of all the fund together 'with hur for. cate, mille and nuints of jewels and your enednou Alo un inore. Yu. dhishthur replied, ' You have made an end ot onmity by elaying Dur yodhır, and we rupe conquured the land by the advice of Shr Krichn. The tv , mothern will no longer to angry. It is by song furtuna alono bloot you have conquerod and elain tho enen 103. ' 36.
113211) Gnda Parr गदा (७२.१७ तराष्ट्रात दुय्गापन दवा भीमसेनेन संयुगेपाच्या सत्रांच लिम समय १० सम्य उषात दुग्योधन भीमसनेन सयुगे । सिर मेव मराजचमग गया२.प्रधमनसत्र शुष्णन सर पाण्डषा पांचाळा सम्मायक निहते इसमदने ३ मामियानुत्तरीय जि सिमादध मेदिरे । मेवा समाविष्टानिष सोयमुम्परा. धन्याये पाक्षिप उपाशापये जापानिपत्रमुरण्ये महाशाखामन्ये अनुभ दुन्दभी. ॥ ५ विक्रीदुध तयवाये अहम सादिना । मनुषमासलीरा भीमसेममिद पच॥ ६ पुष्कर भवतामे रणध सुमत सम कोरपेन्द्र र रक्षा गदयातितमम् । ७॥ देणपति पास परमसयुगे। सपा स्तममनात शोधमिम मना ॥ ७ तविधि धामार्ग मारलानि च सश । दुर्योधनामिम भर कोम्यो हत्याकोदरात । .. भन्याय।१ पृतराष्ट्रको समय युद्धमें भीमसेन के हायसे मृतक देखकर पांडव और मात्रियों ने स्पा किया। जय बोले महाराज जिममकार सिंहके हायसे मरोये मतवाले अली हाधीको देखते हैं उसीप्रकार युद्ध भीमभेन के दय से पॉवनको बराहुमा देखकर । २ । श्रीणनी समेत प्रसन्नचित पायवपांचाल भार ममियों ने कौरवनन्दन के मरनेपर । ३ । दुपट्टों को घुमा युगकर सिंहन द किये परंतु पृनीने इनमममतासे पूर्ण बरोिंको नहीं सका। ४ । किसी किमीने धनुषाको टकारा किमाने पाका शब्दायमान किया बहनों ने पदे शलोको पाया किसनाने बुन्दमियों को पनाया। ५ । इसीपकार बहुतेरे क्रीडा करनेवाले हुपे बार मापके बहुत से शत्रु पसन्नमनहुये या मशीर बारम्बार भीगनन से यह चन बोले। । किा युद्ध में तुमने कौरवरानको अपनीगदाप्त मारकर वहा कठिन किया। ७. मनुष्यों ने आपक हायसे युद्धमें उस शत्रुके मरनेवा इसमकार का माना जैसे कि इन्द्रक हायम त्रासुर का मरण हुआ था। भानसेन के सिवाय कौनसा मनुष्प उस उसप्रकार के मागों समत घूमने वाले CHAPTER LXI Dbritrashtra sa d, 'Wat dit the Pandavas and 8 ingayas do at the full of Duryodhan" SADJaya replied, " Beng Duryodhan slain by Bum, like a mad el phant slain by a lio, the Pandayan Hid the Panchala, w th Shri Krishn, roared for joy and fluttured their clothes thor shouts rang tbuilt +m. Sretnaised th eu boxystrings, while others sound.d Many enemiea played and were cheerful, They anid again to Bhim, "You bave dr no a famous dred 14 playing thin Kulay prince with your mace, you bave destroyed him as Irdia dd Yritra Who elas excopt Bium. onald slay valent. Duryodhan 1 You their conchs and drumme of your Aur udant threlevalun inapafthanpanimmingnot Vunre . (७२२३) Hahsthya यो रातार बामहायानदुर्गममा यशामेतान्येन सम्पादयितुमीम कुणिय मन धीर संग्राममनि। दुर्योवनाशरो दिल्या पादेन मी " ११५ सिंहन महिासो रो समहुन । दुशासनस्य कोष रियापी पयान ॥ १२ ॥ ये विस राजान मारमान युधिष्ठिरम दिन सागो বিয়েঃ এক ক্ষয়। ৪ দিম সাধgaiথায্যঞ্জনা । আর विष्ट्या धिम्याग्ने प्रचित मुमदशा ॥ १४५ एवं अन ते यंत्र शक मन्दी कवित पथ का निहला मित्र पय नन्दाग भारत ॥ १५ ॥ दुगौधन यति रोमामि पि * ক খবৰ নিৰ নাৰি মৰি যাবে। এখন শাসন অব H Aran | १६॥ तान् दृशान शुरुषम्याना TET पाये. सहारमोस समोर मधुमानः ॥ १६ नय निहतं श भयो दातुं नराधि शरब र दुर्योधनको मारसक्ता था। ९ । तुमने यहां शत्रुताके भन्तको पाया पापका का दूसरों से बड़ी कठिनता से भी करने के योग न था1१०ीर तुमने युद्धभूमि में प्रारब्धये मतवालेहाथी के समान दुर्योधन के शिरको अपेन चरणों में मरनकिता है निष्पाप तुपने उमम युद्धकरके मारब्धसही दुशासन के रुधिर को मे पाना या जो कि भैसेके रुधिरको सिपान करता है । १२ मिनों ने धर्यत्मा राजा युधिष्टिरका अपमान कियाथा उनके शिरपा सुपने अपने कमरे मा पा चरण रसपा । ११ । हे भोनपेन प्रारमहा तुम शाके अपर विराजमान हो और दुर्योधन के मरने से मेरी बड़ी की वीपर हुई। १४. निश्चय करके धारक मरनेपर बन्दीजनों ने जमे इन्द्रको पसल किया। भरतवंशी जमीफार इस सबभी निशाकर तुमको प्रमा करते हैं । १५ दुर्योधन के मानेसे जो हमारे रोमपितहुये बता पर उठेपन ठोर भातशी को पत्र सत्यही मानो इमकारसे भीमसेनकी प्रशंसा करने ही में उस स्थान पर वाति नन इकरलये 1111 Nण्डवों मे एकसी प.तो करनाले उन पुरुपास पांचालों को देखार मतभी पीले कराआमो hara mundo an end of thia 10101ts; to other une could do x duud liks on. Ill. You trampeel down the l-*l of Duryolian wlin was like A fun ciepuntTuil drånie Duhulu's blosul an lion duen tl at bufales y pasywir bray limit on the leadly those who wult arushi-htlir. You has co qurred your ira by gnd luck and h Tub am fwteda lg uluging Dury it. Wn adoro you the bartu dll dra on luymuy Vniritt Trudy opr line su wt fur jos." Withog (6 st ur la list toifodder Mall wille vuit Tu susuttillen Ensein un'*wlul. Thu foil was noriss and gain Hernialthn attishthsashannou te blouse's wil (133 Guda Parv मदापये असामाग्मिरमभिनिता दी । १८ । सहपाtristaram मुग्धः वापस्दा शाममातिगः १९ ।शा राणप्रयागयजय IIT पार्यमानानियिमसन दत्तवान ॥२. Maina पनाम किमने नातितुम्नन लाग्भिः काठमधर्मणा ॥ २१ ॥ रम्वारोत भित्र गजामों पायाधिपाः दिदा काय पापामा सामाnिr: "२२० पति सुवा धिक्षेप कृष्णदुर्योधना नृपः । समयसमापन शाम्पमं २३ ॥ स्किशनोपरि मदोगे यिय मंदिराम । हरा नमी कृत्या वापरपणत पद ॥ २५॥ मन्नतशरीरस्य रूपमासीन्नृपस्य खस्याशीवियस्येव डिप उप भारत ॥ २५ ॥ गणातकणी घग वदनामप्याच तान् । दरगोधनो वाम पालिसमाभिरायत् ॥ २६ ॥ कसदासस्य दायादम ते लज्जासपनेन ।माण मृता शत्रुको फिर मारना नीतिक विपरीतहै यह निदो कठोर वचनामे वा गर पापलमा । १८१पर पारी इसी हेतु मारागया जा कि इसने निकज्जे लामो और पापियों का साथी होकर गभचिन्तकों की आसानों के बिना कोको किया । १५ । इस ६g माने बहुधा दु : द्रंगाचार्य, काचार्ग, भीष्मपितामह, मृमी र पाटकमार्थना करनेपर 4 पिनाके विभागको नहीं दिया 10 । या यह माचपुष्प मित्र भाला शत्रुनी था तौभी इसका यमग्ना योग्यनहीं। वचनों से घायन काठकै समान इसदुयोधनसे मारा क्या मसौजनरे हे राज भी शव स्थपर सवारहोगाओ अब मा चलेंग यह पापाता मंत्री भाई मार शातिपलों समेत प्रारब्ध से ही मारागया । २२ । गमादर्योधन श्रीमानी मे ऐसे निन्दाक वचनोंको मुनकर भोर क्रोधके आधीन होके दनों हाथोंमे पृश्ना को आश्रितहोकर स्फिगनाम अंगके महारे से बैठगया और अपनी बाहको और भृकुटोको टेदीकरके वामदेवजी के ऊपर फेंका ।२४। हे भरतवशी अर्द्धशरीक ऊंचा करनेवाल राजाक रूप दनेहुये क्रोपयुक्त विपले सर्प के समानहुआ। ५ ॥ मागों के नाश करनेवाली महाघोर पाड़ाकोकुछ ध्यान नकरते उस दुर्योधन ने कमेर पचनोंसे वासदेवजी को अत्यन्त पीडावान किया । १६ । कि Dronncharya, Kripucharya, Bhishm, Susnjarag and Pandavar, he did not give the latter their patrimony 20 But, whether frı nda na, bo shonld not by Inuyhed at now Whist alall we gain by insulting hina who is already like a block of wood l 48 wo hav: Blain him and his friend and alliea, let us depart from this place." Having heard' the words of Elisha, Duryodhan 1091 upou his hands in Anger ed's Inoked at him with angry oyes 26. With bia badly half raiard high, 6g linked 11e A vonoigonis paku tradder under front, 1d-rorrdia: the agmics of ileath, he epuko harab woris fo bim, nagias * 1312 of + ७२२४] ACalinbharat (72111 गहायुदई विनियनिक अस मिग्धीति भीमस स्मल मिसाप ॥ TA foamarभे याममधिया ॥२८॥ पातीयत्वा महीपामयुरान सा अया। जिोठपाय बहुभिन नाम से घृणा ॥ २९ ॥ भाग्यहनि शूराणां कुर्वाणः करन मात् । शिजन्डिन पुरस्कार पातितस्ते पितामहः . मशरणाम्मासमा माम स्वागं मुबुमारे चारों तासित भख तत् किन किन मम 1t. समानेन नागपगुमने यिंशन । पापमानम्दया रधो न समार: 1३२॥ वार्य पात्रस्य यास्थित शक्तिमय च । घटेकचे सब स्वचः गात.। ३३ ५ फिग्नहस्तः पायातस्तथा भरिश्रया बीया मिसनला शेन माना ॥ ३५ कुरापोशमं कर्मणः पापंजिगीषा। उपसनाबसे नागेत्रमुतारे ३५ : पुनम पतित पक्रे समासः पराजिनः पाhिa: रेश दास के स तुसको निश्चय कर के इस से सम्मा नहीं जाती है मो में गदायुद्ध में भीमसेन के हाथ से अधर्म से गिगया गया 1 २७ । पर्याय नने पर स्मरण कराया कि इसकी मंधाओं को तोड़ो । २८ । सलपुर से हजारों रामानों को परवा कर यह इसको क्यों नहीं मनमाया ओ अर्जुनको सागाबान से विपाति आप कर्मो से तुझको न उज्मा हैन दया है। २९॥ यतिदिन शूरों के बड़े नाशक करनेवाले भीष्मपितामह को तुम ने शिसभी को मागे करते भगाया ! ३० । दो प्रशस्थामा के सनाम ही को मारकर भाचार्यजी को शास्त्रों से रहित किपा क्या वह मैंने नहीं माना । ५॥ वा पराक्रमी तेरेही कारण से इस निर्दयी धृष्टयुम्न के हायसे गिरापागपा तुमने उसको देखकर निपेत्र नहीं किया ! १९ पास अर्जुन के मारनेगाखी बाई शक्तको घटेकर के ऊपर फेकनाकर निष्फल किया तुमपे भषिक पाप करने बाला कौन है। इसी प्रकार हापवाहुआ शरीर स्पाग नेक ये नियम करने वाला पराक्रमी भूरिश्रवा मेगही पाहापाकर महात्मा सात्य के हाथ से मारा गया। अर्जुनके विनत करने की इच्छाने कर्ण उचम सम्म कारनेरामा Kans' slava ! you ate irriminly not al nord for your share in mag unjust full by Bhim. Having caused the sluaghter Ol thoanaldo of Wartora in the war, you did not say to me what you did to Arjon. You are lot auliaia dif your many wicked dveda You aowd the death wf Bhialım by putting. Blush handı forward. coored line scharga to give up erdia by slaymig na elephant of the venue of asb. watsana. You did not prevent crol Dhrishtndyumnm laying hin. The spmar that should huyo alhin Arjun was made futilo, le cauzo you contriroul to liavo it disebargod on Qbatotkach. Who 1 more siaful than yang 33. Bravo Bhari brava, with broken Arste, wou slnın by Butyaki through your inslagation. Karsn would havo wluu Arjuu by the help <f Abbates the son of fiso prians of sneken - (7225) Colla Parv गदापर्व ७१२५ समरे कांधमध्यप्रोऽननानंगाम ॥ ३१ ॥ यदि नाम्नापि कर्मच भीमद्रामा संयुगे । अनुमा प्रतियुयान ते शादियो Yषम् ॥ ३७॥ यया पुनरमाध्यम जिला मांगण पार्थिवाः समनिष्ठमो वयान्धे बघातिताः । ३८५ वाम राब स्वास गबारे सनमुनधान्यः सण: समुन्नव पापमार्गमनुषितः Mumवारी मोमोजो निपतिता। कर्मधानित संगये तपशीलानुषक: । ४० पायमाना' मा समर्श न दिसाप्ति। पाण्डवेश्यः स्वयम लोमा उकुनिनिश्वात ४१ वि ते भीमसेनाप दत्तं स च पाण्डवाः । प्रदोगिता अतु यो मात्रा सामुदुर्भसा पासेतो व क्लिा ने रजस्वला । सदेव | तावणरमन पण निरपत्रः ३ ॥ मन धर्म सौपनादिना । हुमा सर्पराम के पुत्र अधीन के दुःख से और फिर स्थो चक्रो पृनी में घरमाने की आपत्ति में फंसा हुआ पराजय किया अर्धात मनुष्यों में श्रेष्ठ रियमको घुमनानेसे व्याकुल चित्त कर्ण युद्धमें गिायागयो। ३६ नोमिले ये देणा चार्य, भीम, कर्ण भार पुझो भी सत्य युद्धकरते तो तुम्हारी विनय कभी नगरोसतीथी । ३७ । और सुझी निर्गुण मौर कुमार्गी के कारण से अपने धर्मपर भारद होनेवाले राजा लोग और से अन्य २ लोग वह सभी मारे गये। ३८ । वासुदेवजी बोले हैं गान्धारी के पत्र पापमार्ग में पकनेवाले तुम अपने भई पुत्र नायक और मित्रों के समूहों समेत पारंगये हो । ३९. तेरेही दृष्टकम्मामे शरुधीर टिम और द्रोणाचार्य गिरायेगये और तेरा सायी कर्म की कभी युद्ध में मारागया । ४० । ई भज्ञानी तमने लोभ और शकुनी के पतन के निणय से मेरे बहुत कहनेपर भी पांडवों के बाप दादोंके राज्य के भगको नहीं दिया। ४१ तुमने भीममेन को विषदिया और माता समेत सब पावड़योंको।। लाच गृहमें भस्म किया और सभामें घूतके मध्य रजस्वलाना नदीको दुःखी किया हे कठोरांचच उसासमय तुम मारहालनेके योग्पथे । ४३ जबकि पतोषया के छलके जाननवास शकुनी के द्वारा पूनकर्मअकुशत धर्मर युधिष्ठिर को but he was conquered when his ear wheel stuck in mmad imposible tır.you ta giinvictory, over Brona, Bhishu, &iran and mo in fair way. Yo1. Caured the death of so many kings and narriors." Vaudas said, "You and your kinemes and frionda bare been alain by your aril policy. It wus through your mi-deads that brare Drops and then were alain like your accomplica Kalan,, 40. You did not. give the l'apdaras their purimody in spite of tay 'eejarted waisingu on socount of avarse and the ill advice of Shabut! 1n4.poisupai Bhim and would lave burat the Panderas, with their mothor, in this Wuse of law. You inulla Dragpudi in the cont You deserved . - It was - Mahabharat (1226) निया यर पराजीतस्मादमि स्नो रणे ॥ जयद्रा पापेन या कामाला बने । पाने मृगयाग्वैव तृविन्दारयाश्रमम् ।। ४५ । मभिन्युश्च माल एको निंग। त्वदानिहतः पापस्तस्मादसितोरणे ॥ ४६॥ यायकायम स्मा नानाति प्रभाषसे । धैगुण्येन तात्यर्थं सर्वं हि तदनष्ठिनम् । ४७ ॥ पृस्पतेकशनशी नाप्दश धृतराया। मानापासिलाव तिवान भाम ॥४८॥ लोभेति घलेम स्यं तृपया घशीकन । कृतधानस्यास्याण विपापस्तं मुज्यनाम । दुरषोधन उवाच । गीतं विधिवत भूः प्रशाला ससागरा। मदियितामिनि 'त्राणां फोऽनुम्वन्ततो मया ॥ ५० ॥ यदिष्टं क्षत्रात स्वधर्ममनपश्यताम् । तदिई निधन प्रात कोऽनुस्वस्तात मण ॥ ५१ । देहीं मानुष मोगाः प्राप्ता भमुलमा नृपः पश्चर्यचीत्तमं प्रासं कोऽनुस्वन्ततो मया ॥ ५२ ॥ सम्हसानुजश्वष वर्ग गाता उससे विजय कियाथा इन सब कारणों से तू युद्ध में मारागया है । ५४ । भाखेटमें पाण्डबके जानेपर तृणबिन्दुके भाभमके समीप पनमें द्रौपदी को पापी जयद्रय ने जो दः खादया और मो अवा मभिमन्यु तेरे द पोसे युद्ध में शुनसे श्रा के हाधने मरागया हे पापी तू इन कारणों से युद्धमें मरागया। ४६ । और हमारे किहो जिन करनेके भयोग्य कर्माको काम है यह सब भी तेरेसी दुरागारमे कियेगये हैं। ४७ । तुमने बृहस्पतिजी और शुक्र जीकी शिक्षाको नहीं सुना वृद्धोंका सत्सत नहीं किया । १८ । तुमने मकारक वचनों को नहीं मुना तुम ईगी और लोभके आधीनत्ये इन सब दृष्ट कर्मोको जो तुमने किया है. उत्त के फलको भौगो । ४९ । दुर्योधन ने कहा कि वेदोंको पढा विधि पूर्वक दानदिप सागरों ममत मत्र पृषीपर राज्य किया और शत्रुओं के स्वापर नित | दुभा मुझो भाधिक मफल शभकर्मी कौन ५०। अपने धर्म देखनेवाले क्षत्रियों कानो हितकारी भौर प्रिय है रहो माणने पाया है मुझमे भरिक शुभकर्मा कौन है । ५१ | मैंने राजाओं से दुप्पाप्य शरिफे योग्य गमारी एख ऐश्व कामास किग और उत्तम गगकोर या मुझम पधिक प्रतीकीन । ५३ प्रविन शीमें denih son, y' to help of deceitful Sliah um, gauc entra Yu.flirlithir wlin fara norico in gan blog. You are jurtly al in in battle. You wio lain in bat lo for full for tho Jugudrath, who Inrultad Draup di during lus hunting prition rear the ero trgo of Trinrinda, and for grur thuin in securing ly the belp of many .raniora thydeath. fiAbhimanyuwla nar Nons.- The si ortroniing. gorro o in un frie thricit if you nan withtainen, gari llir ar rico <r. V'ribn.pati and Bukin and gnee Adfear to the sucion il blu inen." You did roi litar íslutary music an Arcouut of aterice arul you are reaping the ſenit of pour niielonie" 19. lur. widhan mil,"Thirorest the Velar, given, in charity-ul-i• orar Eith sadnimy foot at the hand of eart'st; who can so happier 1 - 73131 Gada Pगदापर्व [७२२७) हमव्युन । पूर्व निहता. शोम्तो पयिन्यथ । ५३ ॥ सजय उवाच । अभ्य पक्यस्य निवने दुरुस्य धीमतः । अपान मुमा पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम ॥५॥ माया गया पवित्र सुमनो हाम! जगुश्च सरसो राक्षो पश: सम्बदमेव 11 सिमाम मुनर्वाचः साधु साीि पापिय | बाप सरभिर्धायु पुण्यगायो मात्र राज शि. मनमो वैसविभम । ५७ ! सत्यमानि ने र बामदेव रोगमा दुर्योधनस्य पूजन्तु र प्राडामुपागमन् ॥ ५८॥ स्तवात भया शोमा गुशुचर्हित मामलोग तथा का भूरिभवसमेत ॥ ५९॥ तास्तु दि-तापरान र पापमान वानचेतसः । मोशाचेद कृष्णो मेषदमुभिनिरन र शफ्यातिशीमाखने व स महारथा.। जुयुन वित तु युष्माभिसर । ६१ ॥at कदाचितुरन्तु मेण पाथिय ।ते २ पो मित्र और सर छटे भाइयों संपेत स्वर्गको भाऊगा तुम न संशप होकर अपना जीवन करोगे । २३ । सन्जयोले कि उस बुद्धिमन कौरवरानके इम वचन के ममाप्त होनेपर पवित्र सुगान्धत पुष्पं की बड़ी वाई । ५४ । और गंवाने बड़े चित्तशेधक पानीका पना अप्सरामों ने राजाकी शुभकानि सम्बन्धी गानोंको गाया। ५५ । और सिद्धोंने धन्य शब्द किया शीतक मन्द मुगपित मायुची सब शाकाश दिशाओं समेत वैडूर्य मणि के रगके समान शोभ य मान हुमा १ ५७ । रामदेवनी जिनमें मुरूप है वह सब पीडादेक उन अपूर्वता और दुर्योधनकी पूजाको देखकर कीज्जनहुपे । ५८ ३ भीम द्रोणाचार्य कर्ण और भूरिभवा को अधर्म से माराहुभा मुनकर शोक से पाडत होकर उनकीरीने शाकिया। ५. वादल और सुन्दभी के समान शन्दकाले श्रीकृष्णनी उन पांडवोंको चिन्तायुक्त और दुःखीचिच देखकरयह वचन बोगद कि बढ़तशीघ्र अखचलानेवाला यह दुर्योधन मोरबहमन पराक्रमी महारया युद्ध में सत्य युद्धके द्वारा तुम्हारे हायमे मारन के योग्य नहीं थे । ६१ । यह राजा दुर्योधन chan I' What di ath can be btt r to a kuhatiys than nilai I lived a a la of difficult for other kiugs to obtain, and rulad a va tking dom. Sly you gir brothers and I wll go to leavon, wh logouwl lend affe of a sory "Srjaya FHIs that at the clove of Duryodhan's speech there was a shower of holy atid fra grant fiers, gandharva. beut musical instruerenta and ap aras sang songs in praise of the Prrace. 55 Bidlots Sard, "Well dme, '& old and fragrant bretz hfew and the ky shone lihe lupis lazuli. The Pan lavas, headed by l'agudev, very ashamed at the wonderful espent shata to Dus. yodhan, and were full of sorrow to hear that Blight, Drona, Radni and Whurisbrava wers unjustly slain by them Seeing the Panda erse, (७२२८) Mahabharat (72281 पा भीममा सो महेन्यासा महारथाः ॥ १२ ॥मपानकषावरतु मायायोगेन बास कत पनात सर्व पवाजी भवतां दिमिच्छता ॥ak नवं विध मातु कुडी मिल गई कुतो वो विधयो भूयः कुतो राज्य कुतो धन ॥३४॥ तहि सर्षे महात्मानधत्वातिरपा भुविन शया धर्मतो हन्तुं लोकपालैरपि स्वयम ॥ ६ ॥ लषायं गाणिधागष्ट्रो गतपळमः। म शक्यो धर्मोहम्तुं कालेनादपिटना ॥ १६॥ न घबो भूपि पत्तव्यं यद मानितो रिपुः। मिथ्या पध्यालथोपायैहयः शत्र बोधिमा । ६७ वरनुगतो मागों वैरमुरघातिथिः । सनिवागतः पन्या स संवरनुगम्यते ॥ ६॥ करयाः स्म सायाहो निवासं रोचयाम। सायनागरथाः सर्व पितामो नगपिा searसुदेव पयः श्रुत्वा तवामी पाण्डवैः सह। पांचाला अधमा भीमादिक वीर बरे धनुषधारी महारथी कभी घर्मसे किसी भी मारने के योग्य न थे। ६० । भापलोगोंके भले चाहनेवाले मैंने बहुत उपायभार मागायोग्य के द्वारा रणभूमि में वह सब बारम्बार मारे । ६३ । जो मैं कदाचित ऐमी माया को न करता वो तुमारी विजय और राज्य धन नहीं प्राप्तहोते। वह चारोंमहा रमा मतिरथी इस पृथ्वीपर साक्षात लोकपालसभी धर्मकेद्वारा मारनेके योग्य नथे । ६५ । इसीपकार यह गदा हाथमेलिये अमित दुर्योधन दण्डधारी कामसे भी धर्म धारा पारनेके याग्य नथा तुमको विचमें इस शत्रुके मारने का कोई रिचार करना चाहिये उमीमकार बहुनसे शत्रु छलके द्वारा प्रापसे मारने के योग्यो । ६७ । प्राचीन वृद्ध लोग और अपुगे के मारनेवाले देवना मादि सत्पुरुषों से बनाया हुमा मामी इसी हेतुसे वह सबसे चलाया जाना है । ३८ । तात्पर्य यह कि हम सायङ्काल के समय निवासस्थानों में रिश्राम किया चाहते हैं। रानालोगो हम सब घोहे हाथी और रयासमेत विश्रामहरें । ६१ । तब प्रान्त प्रसन्नचित्त पाण्डवों सहित पानाल वादेवजी के पचन को मुनकर सिंहों के vasto a dejected wool, Shi Krishe said in a volow of thunder. 60. * You could not by far wpans slay Duryodlied ond b18 biava varriors. Pustice Duryodhan as shell As Bheila and other warriors ovuld not be aluin by fair Menna, your well wisher, slet them in the war by various contrivances. You auld nut win the kingdors and wealth without my doing 60. The four famous warriora weil invulnerable even by lokpxis in a fair way. 65. Similarly, Duryodhan, armed with mac and untired Tas janyproachable by the god of death lum. self. You whoall out be sorry for his derth so well us the death of ochors whom you sler by unfair mears. This is the way that gori, the alayers of uur, bave trodden before this, and otbers but follow ther exampl, Wo did well as our beasts stand in need of rout for the night " The l'unchala and the Paqda yao roared like lions on bouring the world of Shrt Krizlin, The kiga blew treir concha aud IIndnar १० ॥1 ।। 7225) Gada Paur गहापर्व [७२२९) मशहटा दिनदुसिंहसघयत् ॥ प्रमापयन खान पाञ्चजन्यच माधयः । हटा दुर्योधन रप्रया निहत पुरुषर्षम ॥ ७ ॥ इति महाभारते गदापर्वणि कृष्णपारहवसंवादे पेकपाप्टतमोध्यायः ११॥ । - सञ्जय उवाच । ततस्ते पपयु सधै निवासाप महीक्षितः शान प्रापपाती पश. परिघाइप 19 १॥ पाण्डमार गच्छतवापि शिपिर नो विशाम्पते । महवा सोयगात् पश्चात युयुतिः सात्यकिस्तण ॥२॥ एयुम्न शिखण्डी बदौपदेयास सशस चाय वाला प्रययु शिविधुत ॥ ३ | 'प्राविशर पार्थ) हस्पिद रतेवरम् । दुराधनस्य शिविर रगगिरते जो ॥ ४. गास परमिष TAमामिद इदम् । स्त्रीचवरभूयिष्ठ वृद्धामात्रपिटकम् ॥ ५ तसंतान पच्युपाति समूहों के समान गर्ने । ७० । हे पुरुषोसम इसके पीछे राजालोग सद्धों को और माधवजी पावजन्य सहाको पजाते दुर्योधन को मृतक देखकर प्रसमहुये १ ॥ अध्याय ६२ मंजय बोले इसके पीछे परिपके समान भुनारखनेवाले बड़े प्रावित ग्रहों को बनाते हुये वह सब राजालोग विश्राम करने के निमित्तचमे ॥ १ ॥ हेरामा हमारे हरेको भानेवाले पांडवों के पीछे पड़े धनुपधारी युयुत्सु और सालकि चले ॥२॥ धृष्टद्युम्न शिखण्डी मार द्रौपदी के पुत्र भार अन्य २ सब धनुषधारी अपने डेगेको गये ।। इसक पीछ मनष्यों के भागनाने पर यह सब. पाण्डव दुर्योधन के उस डेरे में जो कि प्रकाश रहित और मृतक राजावाला था उभ में इसति से मवेशिव हुये जैसे कि युद्धभूमि में प्रवेश करते हैं वह स्थान उत्सव, से रहित पुरके समान और जिमका नाग पारागया उस दूदके.ममा कपाय और के बड़े समूहों से और वृद्ध मनियों से पूर्ण Hinyanya cench, ard sil wers pleased sont forthabusotyodhan." 71. CH4 PTLR LXII Sanjaya said, " Then this great warriors proceeded to take rest for the night, bluwiog their conchs. Yuyutsu and Satyaki followed them to our cup Dhrishtadyuma, Shil bands and the 2008 ul Draapadt, with cther trarriora mootd towards their own totes lhes tło Pandavus entuted tho tent of Duryodhan, wine wie dig itula if light and owner, as if cutering a field of bottlo, They found the place. libe a g! omg city or libos lake duetitute of itselephants. It så full of women and old dicere. 3. Daryrobani's servants, in dirty saj, ७२३०) Wahrbliarit (723) धन दुराधरपुर RBI नालिपुटा राजन काषायमलिनाम्बरा ६॥ शिविर समप्राप्य कुरुराज पाण्डवा. अतिरुमहाराज ग्थेयो रपसमा तो गाण्डीवानाश्त केशवः स्थि: प्रियहिते नित्यमतीव भातमाटाव रोप मक्षस्य च महेपु मधाहमणस्यामि पधारतसत्तम IIIm शिवसेर समेतत श्रेयसवावय । तच्चाकरोतथा धीर. पाहुपुत्रो धनम्नयः ॥ १०॥ मथ पधारत. कुतो रश्मीनुत्सृज्य बाजिनार । अवारोहत मेधावी रथादाजीव मम्मनः ॥ ११ ॥ तथानीण मनानम्मीश्वरे सुमहात्मनि । कपिराई दियो ओ गाण्डीवा: १.|| स दग्यो द्रोणकर्णान्या दिव्यैरीमहारया मादीप्तालिना पशु प्रमज्बाल महीपते ॥ १३ ॥ सोपासना सरमिश्च साश्वः सयुवबन्धुर. । भस्मी भूगोपाड्मा रथो गाण्डीयमन्चन ॥ १४५ तथाभस्मभूतन्तुष्टवा पाण्डसुता प्रभो । समबन विस्मिता गअन्न नभेदमप्रीत् ।। १५ । ताजाले सप्रणय प्राण मलिन बस्त्रों के धारण करनेाले दुर्योधन के लोग परस्पर हाथ जोड़कर उनके पास भाकर वामान थे।६। हे महाराज रथियों में श्रेष्ठ पाण्डव लोग कौरव राज के डे को पाकर स्थों से उतरे। ७। हे भरतर्षभ इसके पछि केशवजी जोकि सदर परियों की शुभचिन्तकला में नियत थे गाण्डी अनुपधारी से बोले।। हे भरतर्षभ इन गाण्डीव धनुषको और दोनों पक्ष नूणीरों उतारी पछि से या उतरू । ९ । तुप भाप उतरो हे निष्पाप इसमें घेरा कल्पाण है का मुन कर उर भर्जुन ने वही किया । इसके अनन्तर पूर्ण पदिमान श्री घड़ों की बागडोरों को छोड़कर अर्जुन के रथस उतरे ।। १५ फिर संब नरों के शिर परमाला के उनग्ने र अर्जुन की दिन्यवना और हनुमान की मतदान होगये । १२ । हे महाराज कर्ण और द्रोणाचार्य के दिव्य भला से भस्माभूत वह महान रथी शीधी विना अग्निके प्रज्वलित भग्निरूप होगया। पर गिरडी म उपाभङ्ग वागडोर घे? और युगबन्धुर समेत भस्म होकर पध्दी होनेवाले ग अर्जुन के स्थका दसहरा पाण्डव लाग उस मकार से भरम अचन मोला । १५ । हाथ जोडकर वही नम्रता में प्रजननें कहा ना भजन पर came to thom iu bumbleusztude. The Pandav Harrivra dismounted their ons at the tent of the Kaurav Pngc, Vaandev, who was alwaje a v ll wisher of the Pandavas, said to the wielder of Gandir, * Kea ive Gundir bow and the inexhaustible quivors from the car. Your gind lies in your cuning down first Arjun did as be me directed to do 10. Then we Shri Kristin, leaving thu'rding of the biorsex, carda down from the cit. At the coming down of the lord of all entirsa Arjun's celertial binner with the apa dieappearel, and hit by the culent i uspio. of Kuran oud Drun schaya, iba great car to, brunet tar buru situats itong Grø. Arjun's cut, with its appar " (723 Gala Parv गदापर्व पस्याभित्राधागोविन्द कस्मानावशी दग्धोऽयमग्निना ॥ १६ ॥ मितामह मयमभवयदुनन्दन । तन्मे हि महाबाहो प्रोतम्य पदि मन्यसे ॥ १७ ॥ वासुदेव प्रयाच मसर्वहुविधईग्ध पूर्वम्वायमर्जुन। मदाधिष्ठितरवाद समरे न विशीर्ण: पर सप १८॥ दानीन्तु विशीर्णोयं दग्धो ब्रह्मालोजमा ।पया विमुक कमेव वाघ सतकर्मणि ॥ १९ ॥षदुतस्मयमानध भगवान् केशवोरिहा। परिचय रामान युधिष्ठिरममावत ॥ २०॥ दिया जयास काम्नेय विएगा ते शवधरिताः । दिष्ट्या गाएबीवधामा च भीमसेनश्च पाण्डवः ॥ २१ ॥ स्वचापि कुशली राजन् माद्रीपुत्रोच पापडी । मुसा बोरक्षपादस्मात् समामानिइतद्विर ॥ २२ ॥ क्षिप्रमुत्तरकालानि कुरु कारयोनि मारत ॥ २३ ॥ उपयातमुलव्यं सह गाण्डीवधन्वना । मात्रय मधुर म पर पुरा वमोचिथा. ॥ २५ ॥ एप भ्राता सखाव तय कृष्ण धनजरः। रक्षितको गोपिन्दनी यह रथ किस हेपे भोग्न के द्वारा भस्म होगया । १६ । हे यदुनन्दन भी यह क्या बड़ा आश्चर्य हुमा हे महाबाहु जो मुनाने के योग्य मुम को जानहो तो उस मन वृत्तानको मूलसमेन मुझमे वर्णनकरो । १७ । वासुदेवजी बोनेई भनुन यह रथ प्रथमही बहुन प्रकार के अस्त्रों से भामरूप होगया था शत्रुसंतापी मेरे सवार होने से यह पृथ्वीपर नहींगिरा । १८ हे मन का मुझ से पृथक् होनेपर और तेरे करिय होने पर यह स्य भस्पीभूत होकर पृषी पर गिरा यह प्रमाद के नेत्र मे भष्म हुआ है। १९ । शाओं के माग्नेवाले मार मन्द्र मुरकान करते भगान कशानो राजा युधिष्ठिर मे मिनार पोले । राना युधितिर तुम पारगमे शत्रुओंको विजय करतहो भोर पारम्पले तेरे सब शत्रु पराजितहुये प्रारब्धसे ही गाण्डीप धनुषधारी अर्जन भमणेन । २१ । नकुल सादेव भोर मापभी कुशलता युक्तहो अब हे मृतकशनुवाले वारों के नाशकर्ता तुम इस युद्धसे निहत्तहुते । २३ । हे भरतवंशी भव करनके योग्य भाग को करो पूर्ण समयमें मधुपर्क निवेदन करके जाग जो यह तुम्हारा जो भारने अर्जुन को मार ओपनियों में तुममे रक्षा योग्य है इस प्रकार मात्र tenances and frees, was turned into aplies and fell down on * earth. The Pandavas were amazed to 100 Arjun's car burning. Then Arjun: Aith closed hande asked of Govind the reason of the combustion of his car and to explain to him the wonder. fulphenomenonif it was worth his hearing. 17.Vasudev replied, "Thia car was already turned into ashes by varicus wer pons; but it aid not down to earth because I was sitting on it. Burnt by Brabmastra it fell down when your worh was done and Ileft it. " Tlon tho destroyer of foes Keshay said 10 Yodhishthir . You conquer your foes by good luck and the saine good fortune has kept Arjun, Bhim Nakulkand Sahadev tale and sound. The tyor us at an ind bod yra may do the needfu'. Having made me s presentel madhuldark at cute ३ (७२३२) Alalinbliorat (7232 महापासस्थापरिस्पति प्रमो ।२५ तव चवं वाणस्य तयेगाहमबुवम् स सव्यसाची गते विजपोध जनेश्वर । २६ । प्राभिः सह राजेन्द्र शरः सप्यारा कम । मुक्तो धारक्ष पदस्मात् समालोगहर्षगात् ॥ २७ ॥ एवमुकस्तु कम्मेन धर्म राजो युधिष्ठिरोगा महाराज प्रत्युषा जनाईनम ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर उवाच ।' प्रमु द्रोणकर्णाभ्यो ब्रह्मास्त्रमरिमांना करदन्य सात साक्षादशियनो पुरस्कार ॥ २७ ॥ भवतस्तु प्रसादेन संशतकगणा जताः । महारगतः पापों पच नासीत परामुखः ॥ ३० ॥ राव घ महाबाहो पर्याय भिमपा। कर्मणामनुसन्मानं तेजस गतिशुभाम् ॥ ३१ ॥ उपप्लध्ये महमें कृष्णो इंपायनाप्रमात् । यतो निताष्णो पतालसोजयः । ३२ ॥ इत्येषमुफे से धीराः शिविरं तक भारत । प्रविश्याय पन्त कोपरासश्यान् ॥ ३३॥ रजत जातरूपञ्चमीनप व मौकिकान् । सूप के कहने का मैंने अङ्गीकार किया था हे रागा वह सत्यपराक्रमी राभाई शूर अर्जुन भाइशों समेत निजपी और रक्षित वारोंके नाशकारी रोमार्पण करनवाले इस माघोर युद्धो नियनहुया ! २७१ हे महारान श्रीकृष्णानी के इस वचनको सुनकर रोमर से हर्पित युधिष्ठिरने जनाईनजी को उत्तर दिया । २८ । किरे शत्रुओं के विजय करनेवाले द्रोणाचार्ग भोर कर्णके छोडे हुये ब्रह्मानको भाप के सिवाय माक्षात् वजधारी इन्द्रभी सहने को योग्य नहीं। २९। आपकोही पास संसप्तकों के समूह विजयीकये जो उस बहेभारी युद्ध में अर्जुन कभी परांमुख नहीं हमा । ३० । हे महावाहु प्रभु इसीप्रकार मैंने अनेकप्रकार से कोंके विस्तार को और तेजकी गतिको जाना। ११ । उपप्ठत्री स्थानपर पास महर्पिने मुझमेकहाया कि जिघर धर्महे उपरही श्रीकृष्णजी हैं और जिधर श्रीकृष्ण भी हैं उधाही विषय है । ३२ । भरतपशी इसपकार कहने पर उन वारों ने अप के डेरेमें प्रवेशकरके - महाकौपाया चांदी,सोने, माण और मोधियोंके हार उपमभूषण •Upaplarya you eatrueryand friend Arjur, and you mast protect Mw". Here is your brother [accepted the charge and Arjun, with oll bra brother, out safe ad victoin us for the dreadfol For eo destructive to war "27. Having heard to wordsot Shri Rri-bp, Yudhisinthir Teplird, Conquerer of to s! Norne, except your-evin Iadra tha poleldur of vajid-coold lear the Biabm: stra* di-charged by Karan Ad Didar, I ke Saniapabeli ere (percome by yoor grace, and Arjun loper sufforeu defeat thiouzhout the great var, 3). I love Reeu wuch of your greatouse and glory. Vyas said to be at U paplaya " Krisha goes band in land with dharm; and victory follows tho footatopa of Krislin." At the, they entered your tentand fouod beapo of jewels and althouver, gold, precious stones, striage of pouls - comu niora, 17213) Gada Pary standa (७२३३) मास्यथ मुख्यानि कम्बलान्यजिनानि च ।। ३४॥ दातीवासमषेयं राज्योगकरणाणि थालेपथ्य घनमक्षय्य मोरे मतभ । उदोशन महानागा नाम निजितारयः ।। ३५ (न तु वीरा समाश्वरथ वरच्य च । असिष्टत मुटुल पापडस खात्यकिस्तथा ॥ ३६॥ मानधन म्हारा धारदेषो महायशाः समाभिमंगला बाय बस्तन्य शिविरादिः ३७ ॥ येत्युका दिते सधै पाण्डया साकिस्तथा। वासुदेवेग सहित माला हियुः ॥ ३८ ॥ ते समालाध सरितं पुण्याममोघवर्ती एप । म्यवसथ हांगण्डया हा शत्रवः ।। ३९ ॥ ततः संप्रेषयामासुर्याद माग साहसयम् । स च प्राय देना यामधः प्रतापवान् । दारुफ रथमारोप्य येन राजा बिहामुतः॥ ५० ॥ तमचः संप्रयास्यात सध्यमुग्रीवधाहनम् । मायामासा मापारी नपुत्रा तपरिघमि ॥ ४१ ॥ २ प्रायाण्डरकस्तःपुरं वाचताम्बरः माख. सादतः क्षिांगाधारी निहतात्मनाम ॥ ४२ । इति गदायुदपर्वणि कृप्यास्य हस्तिनापुरगमने द्विपष्टोऽध्यायः ६२ ॥ शाले, मृगवम्मे, असा दामीदास और राज्य के बहुत से सामानों को पागा भरतपम महाराज वह महाभाग शपुओं रिजगी आपके मसंग को पाकर घड़े वरूपार से पुकार । ५ ! यह भीरपाडा और सात्यकी मायाको छोड़ कर वारम्बार विश्वासित होकर डेरों निगाहुरे।।६ । हेमहाराज इसके पीछे बड़े पशता वासुदेवनी बोले कि हम लोगों को भालके निमित्त डेरोंसे बाहर निवास करना चाहिये । ३७ । यह पुनकर वह पाउच और सारणा उनकी प्राज्ञाको मानकर वासुदेवजी के माथ मङ्गन के लिये डेरेसे वाहरगये ।।८। हेराजा फिर वह सब पाराडन और सात्यकि धर्मकी दिशा निरूप प्रोपवती नदीको पाकर वहीं उस रात्रिको बसे। १९ । इसके पीछे यादव श्रीकृष्णजीको हस्तिनापुर भेजा तब मसापवान पामुदेवजी शीघ्रही तीव्रतासे दारुफ के स्थपररैठकर वहां को चले जारी पर राजा धृतराष्ट्थे । ४० . उससमय पांडवजोग उस यात्रा करने जा मृतपुत्रा घाव नाम घोड़े रखनेवाले श्रीकृष्ण जी से सहवास समझ ये हुये श्रीकृष्णानी उस पुरको गान्धी शोधही उस मृतपुत्रा गान्धारी को पाया ४२॥ arua mente, shunis, deer-aking, tunleaul Eatala -laves and other things They cried out for jay at the sight of ad ina health. I've bravo Paudavas nad satyakistay.d in the truts without anottar.iten glorious Vasudev raits," Our infety lies in starmg our of these tntr." The animous with Styrchi, obryurt bir orders and came out - They rtnyod for that uight at the bank of the Ogh wati. Tien lagu dov vyras do planet to Lanthiuspai and les En Liven to Dhistrarhtra on tho car drigen hy Paruk Whilo land to go on tbv cir draft' #dharya and Sugroro. Garaas, tho Pandara maid to him, “ You muat. confuri Gemiuan winore pous musluru" Inuydi. Ould by thoin, ku went tu the city and poup Fast Gugdhari wices Hugu purut - ७२३४] Pahabbarat (7234 जनमेजय उवाच । किमर्थं गजशाईल धर्मगलो युधिष्ठिा । गान्धार्या प्रेष मामास बासुदेव परन्तपम् ॥ १ ॥ यदा पूर्व गत कृष्ण शमार्थ कारवान्प्रति । मचत लब्ध धान काम ततो युखममूदिवम् ॥ १॥ निहतेषु व योधेषु हने दुर्योधने तदा । पृथिव्या पाण्डवेयस्य नि सपने छत्ते पुधि ।। ३ । धित शिीयर सम्बे ग्राम यशसि मोत्तमे । किन्नु तत् कारण ब्रहम् येन कुम्लो गत पुनः सरकारण प्राभल्प प्रतिभाति मे । पत्रागमदमेयात्मा सयमेव जमाईन ॥५॥ तत्वतो ये समावव सर्वमन्वय्युसचम । यच्चात्र कारण प्रहन कार्य स्मात्य विनिमये ॥६॥ वैशम्पायर उवाच । पशुकोयमाप्रश्ने यम्मासि पार्थिय। तसेर सप्रवक्ष्यामि यथावद्रतर्षभ । ७ ॥ त दुय्योधन रमवा भीमसेग संयुगे अध्याय ६३ ॥ जनमेजय बोले हे न प्रणों में श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने किसहेतुसें शत्रुओं के विजयकरनेवाले वासुदेवजीको गान्धारीके पास भेना । १ । जब प्रथम श्रीकृष्णभी सन्धिके निमित्त कौरवों के पास गये और अपने अभीष्टको नहीं पाया इसी कारण से पह महायुदहुआ । २ । आ शूरवीरोंके मरने और राजा दुर्योधन के पायल होने और इस पृथ्वीपर पांडवों को रणभूमि में निश्शत्रु करने । ३ । मनुष्यों के भागने ढेरोंके खालीहाने और उत्तम शुभकीर्षिके माप्तहे जानेपर ऐता कौनसा कारण है जिसके हेतुने श्रीकृष्णजी हस्तिनापुरकोगये । ४ । हे बड़े बानी साक्षण मुझको यह अल्पकारण नहीं मालूम होता है जय के बड़े ज्ञानी श्रीकृष्णमी आपगपे । ५ । हे अध्वर्यों में श्रेष्ठ इस सत्र वृत्तान्त को मूलसमेत पर्णन करो ।६। वैशम्पायन बोले कि हे भरतवंशी जो तूने मुझसे पूछा है यह प्रश्न तेरे पटने केही योग्य है हे भरतर्षभ मैंमा उसको यथार्थही कहताई । ७ । हे राजा युद्ध में भामसना in क बडे शूरवीर धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन को CHAPTER LXIII Janmejaya raid, "Why did Yudlushathir serd Vasudev, the dose troyer of foes, to Gandharit shri Knshn's former m &tion to the Kauravag for peace was a failure, and the result was thegreat war. Why did he go again after the slaughter of so many warriors, the fall of Duryodhan, the angıbılation of all the enemies of the Pandavas, the evacuation of tents by tlis test and the attuinment of great famel I think thọ reason of his going there this time must be pot a trifling one. Pray explain to me all this at lergth," Vaishampayan eard, • The question that thu hast asked, is worth puting, and I shall teli 16 lo yon: Seving the brave son of Dhrtrashtra enjustly but by (1235) Gada Part गदापर्व युगम्य समय गजन धाराष्ट्र महायलममन्यायेन मया गदायुशन भारत। युधिष्ठिरं महाराज महद्भयमथाविशता ९॥ तियानं महामार्गा गाधारी तप साबिताम् । घोरण तपसा युक्ता त्रैलोक्यमपि सा दहेत ॥ १॥ तस्य चिन्तयमानस्य बुद्धिः समभवत्तदा । गान्धारी क्रोधीतायाः पूर्व प्रशमन भवेत् ॥११॥ साहि पुत्रवध श्रुत्वा कृतमस्मामि दृशम मानसेनाग्निना सुद्धा भस्मसार हारपनि ॥ १२॥ एवं विचिन्य बहुधा मयशेकसमन्वितः बाम रेपनिद बाकधमगजोऽभ्यभाषत ॥ १३ ॥ तव प्रसाटोविन्द राज्य निहतकंटकम । माप्य मनसापीद पातमस्मामिरव्युत ॥ १५ ॥ प्रत्यक्ष मे महायाहो संपामे कोमा पंणे रिमई मुम्हान प्राप्तस्त्वया पादयनादन ।। १५ । त्यपादेव सुरे युद्ध बधाधै मम न्याग से विरुद्ध गदायुद्ध में मराहुआ देखकर युधिष्ठिरको बड़ामय उत्पन्न हुमा 16 । तपसे युक्त सामाग गान्धारी से भयभीत और चिन्ताकरताहुआ भय से उदीपग्नचिता कि वह योग्तपबाली गान्धारी अपने कोपसे तीनों लोकों को भी भापकरसती है । १० । इमहतो उम चिन्ताकरनेवाले युधिष्ठिरका विचारमा कि पथम पसे प्रज्वलित गान्धारी के क्रोधकी शान्ती करनी योग्य । ११ । क्योंकि वह हमारे हाथमे इस प्रकार अपने पुत्रका मरणसुनकर को से पूर्ण माने अग्निरूप मनसे इपको भस्मकरेगी । १२ । भय भौर शोक से एक धर्मरामने इस प्रकार की बहुनसी चिन्ता करके वासुदेवजी से यह वचन कहां । १३॥ हे भविनाशी गोविन्दजी आपकी कृपासे यह भकएटक राज्य हमको प्राप्तहुभा जोकि मनसे भी महादुप्पाप्य या । १४ । इयादवनन्दन महावाहु रोमहर्पण करनेवाल युद्ध में मैंने देखा है कि तुमने बहे युद्धको प्राप्त किया । १५ । तुमने धर्मसमय के देवासरोके युद्ध में अमरोंके मारनेक निमिच देवताओंकी जिसमकार सहायताकरी और दवनाओंके शत्रुमारेगरे । १६. श्रीकृष्णजी उसीमका सहायता करी है और अपने रथवानी Sam's mace, Yudhishthir was in great fear at the thought that with her grest a catto prwt18 Gandhari chuld burn tnd three worlds in anger. 10 Site tnugit of irat athayny her anger so that sha might not turn them down on heaning of the death of her ton. Full of grief und tear, Yudhishthir Bald to Vasudev, " We have cleared our way to thoibrone by your gracs and achitved a fusk difficult to be attained by othef& I have seall your great prowers in the war. You have felpri us as you did the gods in filmer dogs and have Harn our foes as you did thora, How could we cross the great crap of war without your helping Arjud. You suffered for opr make the 15 घरे ७२३६) Muh abharat (72361 रदिगाम । यथा सा गुरादत्त हताश्चाधिषिः ॥ १६ ॥ रघ तथा महाबाहो इस मस्माकमच्युत । सारण्येन च वार्णय भयतादि घृावयम् ॥ १७॥ यदि न शप: फाल्गुनस्य Rधारणे | कथशपो रणे जेतु पदप घलार्णय ॥ १८ ॥ गदामारा विपुला हरिप्रे पितासनम् । शकिमिन्दिर सपर६९ ॥ १९ ॥ असमत कृते त्या का पाध' सुपरषा श्रुताः ।शखाणाञ्च निपाता पै पापमारणे ॥२०॥सेच ते सफला याताहते दुर्योधनेच्युत । नत् मई न यथा नये : कृष्ण तथा कुछ ॥ २२ ॥ सन्देह दोला प्रास नत कृष्ण जये सति। गावात महामायो काध बुध्यस्थ माधय ॥ २२ ॥ ता दि निपं महाभाग तपसो ग्रंण Kिali पुत्रपत्रिवर्ष श्रुत्वा धुम मा समश्यति ॥ १३ ॥ तस्या. प्रसादन वीर पूतकाल मतं मम॥२५॥ कश्चना क्रोधताम्रो पुप्रयसनकारिताम् । पीक्षितुं पुरुषः शकस्षा कोनसे हमारी रक्षाकरी । १७ । जो तुम बड़े युद्धमें अर्जुन के स्वामी न होते तो इस सेनारूपी समुद्रको कैसे पारहोकर विजयकरते । १८ । हे श्रीकृष्णजी मे हमारे कारण से गदा, परिघ, शक्ति, भिन्दिपाल तोमर और फरसोंके बड़े प्रार । १९ । कठोरखवन और युद्ध में वरपर्श के समान सांके गिग्नेको भी सदा । २० । हेअधिनाशी दुर्योधन के मरनेपर भापके कठिन दुख सफलहुये रे श्रीकृष्ण जी अब जिप्तमकार से वह सब पाप के उपकार नाश न होय बही भापको करना उचितहै । २१ । हे माधवनी विजयी होनेपर भी हमारा चिंत संदेहों मोहिहोले के समान झूटताद हे महावाहु भाप गान्धारी के प्रोधको जानिये । १२ । वह महाभाग यशस्विनी सदेव बड़े ताण से पड़ी पीडवान है वह अपने पुत्र पोत्रादिकों के नाशको सुनकर प्रयश्च इपलोगोंको भरमरगी।२४।कार मेरे विचारमें उसका मसन्नकरना सम्यके अनुसार है । २४ । हे पुरुषोत्तप प्रापके सिवा कौर पुरुप उस प्राधमे नत्र भार पुत्रों के शोषसे पीढ़ावान् के देखन २५ हे शत्रुओं के विजप करनेवाले माधवजी कापसे ज्वालसरूप गान्धारी दे कोषके दूर करने का ५i-4 manो स्वीकार है क्योंकि strokes ol va tour texpons it lose touch tras hird like that of vajia, 20. All your lalvur bas borno famt at the death of Duryodban. Now you must do simething more Lu that you former bundness way not bogome uselts, Our minds are in a state of eur peute even after gaining victory, for yu too, are act ignorant of the rnge of Gandhari. She a powerful ascetio and may burn us down for tho death of her Fons and grander 18, To coal hor anger sliould be our foretrost curo 1a my opil 130 Who elre, psc pt you, un look at the red angry of Gandharn test with the grief of her suns ? 25. aur eyes I request -1 (72370 Gads Pary गदापर्व [७१३७ मने पुरुषात्तम २५ वर मे गमन प्राप्त रोचते तब माधष । गान्धार्याः क्रोपदी. मायाप्रशमा मरिन्दम। यहि का विकर्ता व लोकानां प्रमवाप्ययः ॥ २७ ॥ हेतु कारणसंयुकवाक्यैः काल सरितः । सिममेव महाप्रा गान्धार्ग शर्मायापसि ॥२८. पितामह भगवान कृष्णस्तत्र मविष्यति । सर्वथा ते माया गान्धार्याः कोचना शनम् । कई सास्वतां श्रेष्ठ पाण्डवानां हितापिना , २९ ॥ धर्मराजस्य बचने श्रुत्वा यदुकुलोबदः । आमन्ऽप दारकं प्राह रयः सज्जो विधीयताम् ॥३०॥ केशवस्प पघा भूत्वा त्वरमाणोऽय दारुक: । पदयद्यं सज्ज कैशधाय महात्मने ॥३॥ सं रथ पादयश्रेष्ठ समारुह्य परस्तपः जगाम हास्तिनपुर परितः केशवो विभुः ॥ ३२ ॥ ततः प्रायान्महाराज माधवो मगषामथी । नागसाधयमासाद्य प्रविषेश व पायवान् ॥ ३३ ॥ प्रविरुप नगरी पारो रयघोषण नादयन् । विदितो धृतराष्ट्रप सोषतीग्य रयोत्तमात् ॥ ३४ ॥ अगदीनामा धृतराष्ट्रनिषेशनम३५० पूर्षऽधामिगत तुम्ही समृष्टि के कर्म नाशकर्ता और उत्पति के हेतुरूपहोकर अविनाशीहो।२१ हे महावा तुमकार्यकारण से युक्त समपके अनुसार वचनों से शीघही गान्धारीको शान्तकरोगे । २८ । वहां हमारे पितामह भगवान व्यासजीभीहोंगे हे यादवेन्द्र पांडनों के हितकी वात तुमको करनी योग्य है यादपेन्द्रजीने धर्मराजके पचनकरे सुनकर दारुकको बुलाकर कहा कि स्य नपारकरो । ३० । इसके पीछे केशवस के वचनको सुनकर शीघ्रता करनेवाले दारुकने स्यको तैयार करके महास्मा के जीके पास पर्चमान किया।३१। फिर यादवेन्द्र शत्रुसंतापी केशवनी उसस्था सवारहोकर शीघही हस्तिनापुरकोगये । ३२ । और बड़े पराक्रमी और साहस श्रीकृष्णजी हस्तिनापुरमें पहुंचे और रथके शब्दों से शन्दको उत्पन्नेकर, वह वार श्रीकृष्णजी नगर में प्रवेश करके धृतराष्टके गाने पे उत्तम स्थत्ते उतरकर धृतराष्ट्र के महल में पहुँचे । ३५ १ उन जनार्दन केशवनीने वहां पूर्वसे गयेहये और बैठे हुये ऋपियों में श्रेष्ठ पास महानी को देखा व्यासजीके और राजाके भी परण you to go there to appeasa Gandhan's anger; for you are the creator and destroyer of the world. You are the indestractible causoof creation. You will soon appease her anger by your argument. You will find our grandfather Vras thore and may do what is proper. On hearing the words of Yudhiabthis, the lord of the Yadarus ordur. ed Dauk to make his car roady. Daruk prepared the car and informaod Keshav that it was ready. Ho mounted it and hastened to Hasthipapar He soon reached thoro, maling a noise with the rambi. ing of his wheels as ho entered the city. Then ho came down from the car and entered tbe palace of Dhritrashtra, Isere bo saw Vyas the bagd of maharshis already come thero. Keabay touched the fuct एडवों ७२३८ Mahabharat 17238) तब सोपश्यषिसत्तमम ! पादौ पपीब्य कृष्णस्य राक्षश्चापि बताईनः ॥ ३६ ॥ माय ! पादयदायसो गान्धसिंचापि केशवतातु पावभेष्टोतराष्ट्रमधोक्षजः ३७ ॥ पाणिमालम्व्य राजेन्द्र सस्था प्रहरीदह । स मुहादियोत्सृज्य वा शोकसमुनवम् ॥ ३८ ॥ प्रक्षाल्य धारिमा ने वानस्य यथाविधि । उवाच प्रस्तं वाक्य धृतराष्ट्र मरिन्दमः ॥ ३९ ॥ न तेऽस्यविदितं किनिन्दतमव्यस्य भारत । कालस्य च यथावर तघे पुविहित प्रभो ॥ ४० ॥ पतितं पाण्डवा सस्तय चिन्तानुरोधिभिः । कथ कुलक्षयो न स्यातथा क्षय भारत ॥ ४ ॥ भ्रातृभिः समय कृत्वा क्षान्तवान धर्म वत्सलः । पुनश्छलजित शुनिघासोन्यु पागतः ॥ ४२ ॥ मनातवासयों व माना पेशसमातः । अन्ये ध ययः क्लेशस्त्वशतरिय नित्यदा ।। ४३ | मयाचं स्वपमा गम्य युद्धकाल उपदियते । सर्वलोकस्य सानिध्ये प्रामास्वं स यावित ४४ ॥ त्वया कालोपसुन लोभतो म पवर्जिताः । नयापरवामपते स स स गतम को मधं करके । १६ / सावधान केशवजी ने गान्धारीको भी दण्डनक्की हेराना इसके पीछे यादवेन्द्र भीगार,जी । ३ । धृतराष्ट्र, को हायसे पकड़कर बड़े शब्द से रोदन करनेलगे और एक मुहूर्त तक शोकजनित अश्रुपातों को कर के। १८ से दोनों नेत्रीको भोकर विधिपूर्वक आचमन करके समय के अनुसार धृतराष्ट्र न कहा । १२ । कि हे भरतवंशी वीनोंका के पृत्तान्तों को भाप अच्छी राजी से नानोको समयका जैसा जो कुछ दृत्तान्तहै वह सब पापको विदित है को ४० । हे भरतवंशी तरे चित्तके समान कर्मकी सब पाण्डवों से जो यह कुलका शौरसय ात्रियों का नाशहुआ वह कैसे न होय अवश्यही होना उचित था क्योंकि धर्मवत्सल युधिष्ठिरने प्रतिज्ञा करके समाकी भोर छलपून से पराजित पवित्रामा पांडवों को वारास मुभा । १२ ! उन लोगोंने नानावपों को धारण करके मनात पाशी आदि अनेक कारके क्लेशोंको असमयों के समान पाया। ४३ । मैंने | आपयुद्ध मध होनेर समय आपके पारा पाकर मालोगों के समक्ष पाँचगाय तुमसे मांगे । ४४ । परन्तु कालसे मेरित होकर तुमने लोभसे अपने पुत्रों को - ९ of Vyas, Dhritrazhitra and Gandhari. Thon holding tbo bliad king by tho kinni, lo n Opt lnul. I[aving vupt for Bony time, ło wasbed bir eyes with patur and boring tipped water, said to Diritmshtra, * You know well of tho thrco divisions of tiruo. 40. Tho grat den. truotin of the warriors by the Pandavba wv inoritabla. Ynuhishthir overlooked the wrongs and yot lo vas cualed at dica and aint into uz ls. Thay Asubel various disgush and puffered much tu Jiso unknowil. I nyeolf Lalu tu yule on the ord ut battis and brakel of you to giro dictu dva sillages, and urged by Halo und av Arior, 30!
(122) Gada Parr गदापर्व (७२३९) ॥ ४५ ॥ भीमेण सोमदत्तेन थालीकेन पेशव । द्रोणेन च सपुत्रेण विदुरंण च धीमता । याचितस्त्वं शमं नित्यं न च तत् कृतवानसि ॥ ४६॥ कालोपहतधितो हि सों मुह्यति भारत । यथा मुढा भवान पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यत ॥ ४७ ॥ किमन्यत् कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम् ! माघ दोपामहाप्राश पाण्डवेषु निवेशय ॥ ४ ॥ अल्पोप्यतिक्रमो नास्तिा पाण्डवानां महात्मनाम 1 धर्मतो न्यायतश्चैव स्नेहतश्च पर ॥४१॥ एतत् सर्वन्तु विज्ञाय यात्मदोशकृत फलम्। समयां पाण्डुपुत्रेषु न भवान् कामहति ॥ ५०॥ कुल घशश्च पिण्डश्च यच्च पुत्रकृत फलम् गान्धायास्तव चैधाय पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ॥ ५१ ॥ पञ्चैव कुरुशार्दूल गान्धारी च यशस्विनी । मा शुची मरशाईल पाण्डधान प्रति किलिपपम् ॥ ५२ पात संयमनु माया आत्मनश्च व्यति क्रममा शिवत पाण्डवान ध्याहि नमस्ते भरतर्षभ । ५३ ॥ आन सि च महाबाहो निषेध नहीं किया हे राजा मारके अपराध से सच क्षत्रियों क समूहों का नाशहुमा । ४५ । भीम, सोमदत्त, वाइलीक, कृपाचार्य पुत्रममेत द्रोणाचार्य और बुद्धिमान विदुरनी ने सन्धिके निमित्त आपसे वारम्बार मार्थना करी परन्तु नगरे उनमें से किसीके भी वचनको नहीं किया । ४६ भरतवमी काल से घायल चित्त सब मनुष्य ऐसे अचेन होजाते हैं जैसे कि पूर्वममय में इस प्रयोजनके वर्नमान होनेपर आप अज्ञानहुये । ४७ । कालयोग से दूसरी वयावात है निश्चय भाग्यही सवाते मवल, हे वडेज्ञानी आप पाण्डवों में दोपोंको न लगाभो ॥४८महात्मा पाण्डवों में थोड़ोसी भी अमर्यादा नहीं है हे शत्रुसंवापी आप अपनही अपराधसे उत्पन्न होनेवाली इन सब बातोंको जानकर धर्मन्याय और मीति से १४९ पाण्डकों के गुणाम दोप लगाने केयोग्य नहीं हो । ६० । कुल वैष पिण्ड और जो पुत्रहानेका धर्मफल कह सब आपकाऔर गांगरीका पांडवों में नियत है । ५. । हे कौव्य नरोत्तम आप और यशस्विनी गांश पाण्डयों के अपराओं को मतषिचारो ५२ । अपनी ही इससव अमर्यादगी को ध्यानकरके अपने कल्याण बचोंसे पादयोंकी रक्षा करो हे भरतर्षभ आपको नमस्कार है। हेमायाहु मीति और स्वभावसे did not put down your sons and the destruction of all the great warri ors was the result. 15, Bhishm, Somdat, Vahlıs, Kripacharya, Drona and his son, and was Vidur repeatodly Asked you to contract peace, but you did not paind them, People become insensible like you by the vicissitude of Time. Surely Time and Fate are very prorful. You need not find fault with the Pandavas, wise Prince. They never acted agniast law. You must think of your own faults and justice and love befoso Guding fault with them. 50. They are of your own bloud and are dutiful sons to you and Gandhari You and globus Gandhari silould overlook their faults. Thishing of your uwu, talegru1810ns, - ७२४०) Mahabharat (7240) धर्मराजस्य या त्वयि । मतिमरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ॥ ५४॥ एतच्च कदनं छरा शणामुपकारिणाम । दद्यते स विधारात्रौ न समाधिगच्छति ५५ ॥ त्वाञ्चद माशाल गान्धारीच यशम्बिनीम् । स शोधन नगशालो न शान्तिमधिगच्छति ॥ ५६ ॥ इिया परमयाविष्टोभवन्तं नाधिगष्यति पुत्रशोकामिसन्त बुश्ध्यिाकुलितेन्द्रियम् ॥४७॥ एषनुक्या महाराज धृतगष्ट्र पदुत्तमः । उवाच । परमं वाक्यं गान्धारी शोककपिताम् । ५८ ॥ सोचलपि विवोध रखे यस्त्वां पश्यामि मुनते । त्यसमा नास्ति लोकस्मिन्नध सीमन्तिनी शुझे॥ ५९॥ जानासि व यथा राशि सभायां मम सन्निधौ । धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयोः पक्षपोर्षि समा६०॥ उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयः कृतम्।६१ ॥ दुग्योधनस्वया चोक्तो अयाों परुपं पयः। श्रण मदपशंपला पतो धर्मस्ततो जपः ॥६॥तादिदं समनुप्रासं धर्मराजकी जो आपमें भक्ति उसको भाप जानतहो । ५४ । वह युधिष्ठिर अवमा करनेवाले क्षत्रियोंका नाशकरके अहर्निश जलताह और कल्याणको नहीं पाता है ।। १५ । हे नरोत्तम वह पुरुषोत्तम तुमको भौर यशस्विनी गान्धारीको शोचताहुशा शान्सिको नहीं पाता है । ५६ । और बड़ी लज्जामयुक्त वह युधिष्ठिर तुम्हारेपास मो नहीं आतहि जोक पुत्रशोक से दुःखी व्याकुलबुदि भार इन्द्रिपालहो । १७ । हे महागज इस प्रकारसे श्रीकृष्णजी राजा धृतराष्ट्र से कहकर शोक से महापीड़ित गान्धारी से यह वचन बोले । ५८ कि हे मोवलको पुत्री जोमव में तुम से कहूँ उसको पुनकर चित्तसे सपझो हे भे मच इसलोक में तेरे ममान कोई खी नहीं है । ५९ । हे रानी मैं जानताहूं जैसे कि सभाके मध्य मेरेसमक्ष में हमने धर्मभयं से युक्त दोनों ओरका हितकारी वचन कहाथा हे कल्यानी तेरे पुत्रोने उसको नहीं किया । ६१। औरतुमने दुर्योधन से भी यह कठोरवचन कहे कि हे मानी मेरे वचनको सुन जिधर धर्म है उपरही विजयहै । १२ । सो राजपुत्री you should protect them by your good worde; I bow to You know the lovo and devotion of Yudhishthir towards you. Having destroyed the Kshatigas, he does not find rest night and day. He is always sorrowfol for your sake and that of Gandhari. Ho doce not cons to you for sbane, for you are distressed with the grief of your Having said this to Dhritrashtra, Krishn tonied towards Gandhari, who was in great grief, and said, "Hoar my wordan dangh. ter of Sural, and ponder them well. I remember how you gate salu. tary advice to your pons, but they did not hear you. 61. You said to Daryalhan those harsh worsle, “ Henr mo fool: victory accompanies Your words hapo como ont trus and therefore you abould you. " BO18. dharm."
(7241) Gada Par गापर्व [७२४१) दर वाक्यं नृपात्मजे । एवं विदित्वाकल्याणि मारमशांके मनः पाण्डयान विनाशाय मावे बुद्धि कदाचन । राक्षा पासि महाभागे प्रथिरी सचरा बाम । चक्षुसा कोषदीन निईग्धुं तपसो यतात् । ६४ " वासुदेववतः त्या गांधा. तवारुपमाधीत । एवमतामायाहो यया पदीस केशव ॥ ३५॥ माधिमिपंचमानाया मतिः सम्वलिता मम । सा मे व्यवस्थिता शुरवा तप पापं बनाईन ॥ १६. राम स्वग्यस्य परस्य हसपुत्रस्य केशवत्वं गतिः साइतमोरः पावर्तिपदांवर ३६७॥ पावसधा बन गुख प्रछाप पाससा । पुत्रशोकामि समा गान्धारी प्रारोगा MENT एना महावाहुः केशवः शोककर्षिताम तुकारणसंयुक्तवाक्येरावासपत प्रभुः ॥ १९॥ समास्यर गोवाणी धाराष्ट्र माधषः । द्रोणिसहित भावमनु बुध्यत केशः । ततस्त्वरित उत्पाय पादौ मन्नों प्रणम्य । पाय पारा कडाइमा पस्न वर्षमानामा हे कल्यानी इस महारसे जानकर शोकमें चित पतकरो। ३३ । पाण्डयों के नासके लिये तेरी बाद कभी मतहोय हेमहाभाग तुम क्रोधसे ज्यलित नेत्रोंकी अग्नि और तपो वनसे इस सर जड़ चतन्यों समेत पृथ्वीको भस्म करने के समय से ६॥ गापारी वामदेवजी के वचनको मनकर बोसी कि हे महाबाहु केशवजी वह ऐतेही ? जैसे आप कहते हो । ६५ । परन्तु चित्तके भनेक दुःखोंसे मुझ जलनेवाली की बुद्धि पलायमान हुई है। जनार्दन रेशमी आपके वचनों को सुनकर भव वह मेरी बुदि स्थिरहुई । ।५। द्विपाद श्रेष्ठ तुम बार पाण्डवों के साथ इस अन् र भोर असन्तान रामा की गतितो । १७ । यह गांधारी इतना करके अपने मुखको बखसे ढककर पुष 'प्रोक से दुःखी होकर बहुत रोदन करनेलगी। ६८ । इस के पछि महामाहु केशव ने उस शोकपीडिन गांधारीको हेतुकारण संयुक्त वचनों के द्वारा विश्वास कराया १६९ । नाधवजी ने उस धृतराष्ट्र मौर गांधारीको निवास देकर समस्यामा के हृदय के विचारको जाना । ७० । ततो केशरजो शोघही मस्तक से न्यासनी nob give yearself up togaief. Let your mind never think of thodestraction of the Pandavas though you can destroy thu tbreo worlds by your angry eyes. "G4 Having heard the words of Vasudev Gandhari said, You Are right, Vasudev, Aly mind wavered with the exces of grief; but your words have set it at rent. You and the Pandavas are the refuge of this blind old king." Having said this, she covared her face with cloth and wept long and bitterly. Krisha consoled her again with his arguments. Having cinsoled the royal pair, he knew that was passing in the mind of Ashwathapa. I soon touched the feet of Vyas with his forehoul and again said tv Dhritrashtra. " I bor to - - । (७२४२) Mahabharat (7252) नस्य राजेन्द्र तत कारवमवधीत् ॥ ७१ " आपृच्छत्वा कुरुश्रेष्ठ माघ शोक मन, कृथा । द्रोणेः पापोस्त्यभिप्रायम्तनास्मि सहगोस्थित ॥ ७२ ॥ पाण्डवानावधे गौ घुद्धिस्तेन प्रदर्शिता । एतत् श्रुत्वा तु वचन मान्धार्या सहितोब्रवीत । ७३ धृतराष्ट्रो महावाहु केशव केशिमदनम। शीघ्र गच्छ महाबाहो पाण्डवान् परिपालय ॥ ७॥ भूयस्त्वया समेष्यामि क्षिामेव जनाईन । प्रायात्ततस्तु परितो दारुण साध्युत ॥ ७ ॥ वासदेने गते राजन् धाराष्ट्र जनेश्वरम् । आश्वासयदतेयात्मा ध्यासो होक नमस्कृत ॥७६ ॥ वासुदेगेपि धात्मिा कृतकृत्यो जगाम ह । शिविर हास्तिनपुराई इन. पाण्डवा नृप।। ७७ ॥ आगम्य शिविर रात्री घोऽगत पाण्डवान् । तच्च तेश्य । समाख्याय सहितस्तै समाहित.॥ ७८ 1 इति गदापर्वणि धृतराष्ट्रगा-धारपियोधने त्रिपष्टाध्यायः ६३ ॥ SA के चरणों को दण्डग करके फिर कौरवराज धृतराष्ट्रमे बोलो १ कि हे कौरवों में श्रेष्ठ तुम को मैं नमस्कार करताई माप शोक चित्त मतको अवस्थामा का पाप रूपचिस हुआहै इ महेनुप्से मै शोघ्रता से उठाइ।७२) उसेन रात्रि के समय पायवोंके मारने का विचार पक्का प्रकट किया है महाकाहु धृतराष्ट्र गाधारी समेत इस बचन को सुनकर केशी दैत्य के मारनेवाले केशवनी से बोले । ७३ । हे महापाआप शीघ्रजाओ और पावों की रक्षाकरो। ७४ । हे जनार्दन नी मैं फिर भाप से शीर मिलूंमा इसके पीछ अविनाशी केशवजी शीघ्रही दारुक समेतगये। ७५ । राना वामुदेवजी के जानेपर वडे बुद्धिमान भीर छोकमान्य व्यासजी ने राजा धृतराष्ट्र को श्विास कराया । ७६ | धर्मात्मा वासुदेवनी भी समाप्तमनोरय होकर प्रांडवों के देखनकी इच्छासे हस्तिनापुर से डेरेको गये । ७७। और रात्रि के समय हरे को पाकर पांडवों के पासगये और यह सब वृत्ताव उनसे कहकर उन समेत सावधान हुये ७८ ॥ you best of Kauravas, donct judulgo in griet Aabwathaing 19 bent og mischief and therefore I Am in hurry Jle intends slaying the Pandavas at night "To thie Dhritruthtra and GruJhuri replied, " Mako bazte, biato man, and protect the Panda . We eball soon ste 'you again " Then Krishn went away with Druul At is depar. ture vyustoo, consoled the king Being successful phra meaon, Vasudev bastened to the camy and reaching there at uightfall vent directly to the Pand 1Vas and told thoro alat bal happuned "78.
- (7243) Gnda Parv गदापर्थ (૭ર૪૨ धृतराष्ट्र याच । आधष्ठितः पदा मुगिभग्नसक्यो महोगना। शोटीयमानी. पुत्रो किमभाषत सम्नयामत्य कोपनी राजा जातवरस्य पाण्डघु व्यसने परम प्रातः किमा-परमाहवे ॥ २॥ सञ्जय उवाच । शृण राजन् प्रवक्ष्यामि यथा वृत्त नराधिप। राशा पदुर मग्नेन तस्मिन् व्यसन आगते ॥ ३ ॥ मग्नसक्यो नृपो गजन पांना सोपगुपितः । यमयम् मईजात पीक्षा व दिशो दशकमा नियम्य यामेन निषसादुरगो बासरन्धाधुरतानाम्यामभिवक्ष्यमाम॥५॥पाहधरण्यां निम्पिाप मुताबिपः । प्रकीर्णान्नजान् धुन्यदन्तेई तानुपस्पृशनाईयन पाण्डवं.पेष्ठ निश्कदम याप्रवीत् ॥६॥भी भे शाम्तनधे माथे कणे चालभृताम्बरे गीतमे शकुनी चापि होणे शास्त्रभवाम्बरे॥७॥ मयस्याम्नि तथा राक्पेगर व कृतवर्मणि मामबस्था प्राप्ताहिम काली पे दुरतिक्रमः। ॥ ८ ॥ एकादशचम्भा सौहमेतां दशां अध्पाद।। ६४ ॥ धूवराष्ट्र बोले हे सना पसिसे मस्तकपर दवायेहुये टूटी जपा पृथ्वीपर गिरे हुये मेरे बहकारी पुत्रने क्या कहा । । अत्यन्त क्रोधयुक्त और पाण्डवों के सायं मधुना करनेवाले बड़े संकटको प्राप्त राजाने बड़े युद्ध में क्या किया । २॥ सनष पोले हेराना जैमा वृचान्तई उमसब वृत्तान्त को मैं कहताहूं भर्याद उस दुःख प्राप्त होनेपर टूटेगवाले गजाने जो कहाँहै उमको भाप सुनिये । । । हे राजा टूटी नेवा धूलसे लिय शिरके केश वॉरनेवाले उस राजाने वहां दशों दिशाओं को देखकर । ४ । सर्पकी सपान शासनये ने उपायमे वालोंको वाँधकर क्रोध बार शुओंसे पूर्णनेत्रोंसे मुझको देखकर। ६ । मतवाले हाथ के समान अपनी भुनामोंको बारम्बार मलकर विखरेहुवे वालोंको कपाते दाँतों से दानोंको दवाते और युधिष्ठिरकी निन्दाकरते दुर्योधनने शासकर यह कहा । ५ । कि शंतनुके पुत्र भीष्मजी, शनधारियों में श्रेष्ठ कर्ण, कृपाचर्य, शकुनि, महामवज्ञ द्रोणा चार्य, नावधाना, शस्य और शूर कृतवर्मा के नाशाहोनेपर मैंने इस दशाको पापा निवपकरके काल बड़े दुःखसे उल्लंघनकेयोग्यहै । ८ । जो कि ग्यारह अक्षौ " .. CHAPTER LXIV Dhrithashtra said, " What did my proud son, with broken thigh, kay when he was kicked on the head? What did he do at that insult ? Sanjaya said," Hear, O king, what he said : with broken thigh and besmeared with dust he tied the hair of his head and looked in all directions. Hissing like a serpant and adjusting his bair, with eyes rull of tears, ha looked towards me, 5, Rubbing his arms. shaking his diabevelled bair, gnashing his teeth and blaming Yudhishthir, 50 sighed and said, " I have been reduced to this condition at the fall of Bhishm, Karan, kripa, Shakuni. Drona, Ashwathama, Shalya and ७२४४) Muliabharat 4_(7244) गतः । काल प्राप्य महाबाहो न कश्चिदति र मायालय मदाबानो मेस्मिन् आँधति संयुगे। यथाई भीमसेनन युत्कम्य समय त ॥१७ ॥ पनि सुनुशंसानि रुतानि खलु पाण्डवः । भरिभवधि कर्ण च भीमे द्रोपे भीमति ॥ १९ ॥ पश्चा तिज कम नशंसः पाण्यषः कृतम् । न ते सत्म निगमिष्यन्ति दिमे मतिः॥३॥ का मोति. सत्तयुक्तस्व इत्योपाधिकृतं भयं । को पासमव मेतारं बुपासम्मन्तुमीत ॥ १३ ॥ अधर्मेण अलका कोनुहयेत पण्डितः । यथा संप्यते-पाय पाहुपुत्रो वृकोदरः ॥ १४॥ किन्नु विषमतपय मग्नलषयस्य यम्मम । न नीमसेनग पादेन भूदित शिक्षा १५॥ प्रपन्तं मिया अष्टं वर्तमानस्य वाधुषु । एवं कुरानरोषोहि सबै सम्पपूजितः ॥ १६ ॥ ममिको युवधर्म मम माता पितामह सजाय सानोविज्ञाप्यो बचनामम ॥ १७ ॥इट तस्या भूताः सा प्रणावा हिली सनो मुा स्वामी ने भी इसदाको पाषा हे महागार कोई मनुष्य कालको उल्लंघन नहीं करसक्ताहै । ९ । अब तुम उन मेरे शूरवीरों का वर्णन करो जो इस जीपवे हैं जिसमकार नियमको वर्षलधनकर भीमसेनके हाथमे मारा गयाहूं। १० । इसते विदितहोताहै कि परियोंकी भोरसे बहुतनिर्दयकर्म, फिगर निप पायोंकीगोरसे अपकीर्तिसे उत्पन होनेवाग यह कर्म मरिषवा, कर्म, भीष्म और भीमान द्रोणाचार्य के भी साथ किदामा । ११ । इमहेतुसे.मह सब पागटन मेरीडित सत्पुरुष, अपमानको पायेंगे इससे प्राप्तहोनेवाली पि को करके पराक्रमी पुरुषकी कौनसी मतमवाद१२कौन बुद्धिमान् समयकं वामका अपराध करनेको योपी और कानसा पंडित अधर्मसे विषयको पाकर ऐसे मसलहोगा ।१॥ जैसाकि पापी भीमसेन मसभ होताहै ।१४। अबइससे अपूर्वस्या है जो मुझटीजशपाले शिरको क्रोधयुक्त भीमसेनने परणों से मर्दनाकया..१५॥ सन्तप्त करनेवाले सक्ष्मी से सेवित बान्धवों के मध्य में वर्चमान पुरुषको जो मनुष्य ऐसीदशावाला करे हे संजय वही पूजित है । १६ । मेरे माता पितामी धर्मयुद्ध Krityarma Suely Time is hard to xurpass, when the lord of plaven akshauhiuis has come to this state None can overstep Time. Pray tell are of my warriors who are living. From the just treatnent of ma by Bbim, I am sure that the Pandavas have done many cruel deeds, They were unjust to Bhurisbrava, Karan. Bhishm and Drona. They will be surely looked down by good poeple. What ploasura can come out of unfair victory! What wise man will thun insult a king and oxuslt at;bis own wickedness as Bhim has done ? What can be more strange than his crushing down my head after breaking my thigu ? 15. He who punisbca him in tbe midst of his brothere is worthy of respect. My parenta know justice in par and 11.
। (7245:): . Gada Pury गदापर्व [७२४५) संसागरा। मद्धिस्थितममित्राणां जीवतामेष सजय ॥ १८ ॥ दत्ता वाया यथाशके मित्राणाम्य प्रिय कृतम् । अमित्रा धाषिताः सर्व कोनु स्वन्ततरो मया॥ १९ ॥ मानिता बान्धवाः सर्व पश्यः सम्पूजितोजनः । त्रितयं सेधित सर्व कोनु स्वन्ततरो मया ॥२०॥ मा नृपमुख्येषु मानः प्रातःमदुलभामाजानेयतया पात कोऽनुस्वन्ततरो मपा०२१॥ बधीत विधिषद प्राप्तमायुर्निरामयम् । स्वधर्मग जिवा लोका: कोनु स्वन्ततरो मया २२॥ दिएपानाहं जितः संख्ये परान् प्रेप्यवदाश्रितः । दिष्टया मे विपुला लक्ष्मी संत स्वम्य गठा विभो ॥ २३ ॥ यदिष्ट क्षत्रपन्धूनां स्वधर्ममनतिष्ठताम निधनं तन्मया मास कोनुस्वन्ततरो मया ॥ २४ ॥ दिष्ट्या नाई परावृत्ती परात् प्राकृततिः। दिया माविमति काचिद्भजित्वा तु पराजितः ॥ २५ ॥ सुप्त पाथ प्रमत्तं षा यथा इन्याविषेण पाप व्युत्क्रान्तयोग व्युतकम्प समषं इतः ।। २६ ।। अश्वत्थामा महा मागः कृतवर्माव सास्वतः । कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्यावधनान्मम ॥ २७ ॥ अधण को अच्छीरीतिसे जानतेई हे संजय वइदोनों दुःखीमेरे चयनोंसे जतलाने के योग्य हैं। । १७ । भन्छेमकार पनादिककिये प्रजापालन किया और समुद्रों समेत सब पृथ्वीपर राज्यकिया हे संजय जीवने शत्रुओं के मस्तकपर नियतहमा १८ सामर्थ्य के अनुसार दानकिये मित्रोंका हितकिया सपशत्रु पीड़ामान किपे मुझ से अधिक संकर्मी कौनह१९:। सबवान्धयों की प्रतिष्ठाकरी और अपने भाभित कार्यक चाओंको प्रसन्नकिया धर्म धर्म कामादिक सब सेवनाकये मुझ से अधिक मुकर्मी सकृती कौनहै । २० । उत्तम.२ राजामोंपर आज्ञाकरी बड़े दुःखसे प्राप्त होनेवाली भामा से उत्पन्नहोनेवाली नतिष्ठाको पाया आजानेय भकारवाले घोड़ों के द्वारा सवारीकी मुझसे अधिक सुफलवाला कौनहै । २१ । वेदपडकर विधिपूर्वक दान किया नीरोग आयुर्दापाई अपेन धर्मसे लोक प्राप्तकिये. मुझसे अधिक एक कौन है । २२। मैं प्रारब्ध से युद्ध में बिजयवाला नहीं हुआ औरहे मभुपराधसे । नों मेरी धड़ी लक्ष्मीधी वइ, मेरे मरनेपर दूसरे को प्राप्तहुई। २३ । अपने धर्मपर चलनेवाले क्षत्रियोंका जो हित और प्रिय है वह मरण मैंने पाया मुझसे विशेष शुभकमी कौन है । २४ । मैं प्रारब्धहीसे साधारण मनुष्यकी शत्रुता से नहीं हा और मारब्बतेही किसी अपमानको पाकर पराजय नहींहुआ । २५ । जैसे कि सोलहुये को नशेसे अचेत को अथवा विपपान कियेहुयेको कोई मारताहै इसीमकार धर्म के स्वागनेवालेन नियमको त्यागकर मारा ।२६। महाभाग अश्वत्थामा यादव ।। must be informed. I performed sacrifices ruled orer a vast kingdom, crushed.my enāmies, gavi charity, did good to friends and punished foos, who can bo happier than I ? I respected my kiosmon, pleased niy ministera and passed a happy life, who ean be more fortunate than 1 1 20. Iruled over great kings, gained respect and rode over bordea of A ajaesa breed; who can be luckier than I ? I read the Vedas, trave charity; lived a healtáy life and secured good regions by dharm; who , ७२४६) Mababbarat (7246) प्रवृत्तामा पाण्डघानामनेकशः विधासं समयमानां यूयं न गन्तुमर्हय |:२८ ॥ पाति काथानवी द्वाजा पुत्रत्ते सत्य.वक्रमः । गधर्माद्भीमसेनेन निहवायं यथा रणे ॥ २९ ॥ सोई द्रोणं स्वगतं कर्णशल्यावुमी तथा । वृषसेन महावीर्य शकुनिश्चापि सोपलम ।। ३० ॥ जलसम् महावीर्य भगदत्तश्च पयम् । सौमदा मरेघासं सम्धवा जयद्रथम ॥ ३१ ॥ सुशासनपुरोगांध मातनात्मसमांस्तथा । दोशासनिश विकात लक्ष्मण चात्मजावुमी ॥ ३२ ।। एतांचा मुहून् मदीयांश्च सहस्रशः। पृष्टतानुग मिष्यामि साहानाम:॥ ३३ ४ कयं घावन हतार थत्वा भतारण स्पसा मम । रोज्यमाणा दुवानी दुःशलासा भविष्यति ॥ ३४ ॥ स्तुशामि. प्रस्नुपाभिव पृटो राजा पितामम । गान्धारीसहितश्चैय कां गति प्रतिपत्स्यते ॥ ३५ ॥ नूनं वक्ष्मणमा तापि हतपुमा इतेरा । पिनाशं यास्पति शिन कल्याणी पृथुलोचना ।। ३६ ॥ पनि कृतवर्मा, शारद्वत: काचार्य मेरे घचन से कहने के योग्य है ।२७। कि भनेकमकार के अधर्म के फी नियमोंके त्यागनेमाले पांडवों का विश्वास आपको करना उचित नहीं है ।२८ मापका पुत्र सत्यपराक्रमी राजादुयोधन पातिक नाम मिद्धों से बोला कि जैसे मैं अधर्मकी रीतिसे गीमसेन के हाथ से मारागपा।२९। सो मैं स्वर्गवासी द्रोणाचार्य, कर्ण, शम्प, महात्मा पसेन, सौयलका पुत्र शकुनि महा पराक्रमी जलसिन्न, राजाभगदग, पड़े धनुधारी सोमदत्त, सिन्धका राजा जय द्रध, उसीमकार आत्मा के समान दुश्शासनादिक माई, पराक्रमी दुशासनका पुत्र और लक्ष्मण इन दोनों पुत्रों के और अन्य २ इनारों अपने शूरवीरों के | पाछ ऐमे जाऊंगा जैसे कि अपने साथी समूह से पृथक् विदेशी जाता है । १३ । | मेरी बहिन दशला माइयों समेत अपने पतिको मराहुआ मुनकर रोती हुई कमी मा दुःखी होगी। ३४ । मेरा दृद्ध पिता राजाधृतराष्ट्र पुत्र पौत्रोंकी नियों और गान्धारी ममेत किमगति को पायेगा । ३५ । निश्चय करके मृतक पत्र भोर can bo caru Yirtuves that 013-ut! It wax tatu inatuid out giving success in battle and woull giro my great wealth to another na nag death; but I lave rccured the death of a koliatryn; who can bo moro virtuous than mo! It was by Fula that I did aus vivo up cnuity : but I ruiterol no dishonourable defuat and received the death blow liko one who is in a state of unconsciousnoss or has been poisoned. I sa liit against rule, 26. Ashwatlinma, Kritvarma and Kripacharya must koow this. Thoy should novor trust the l'andavas who hayo formakun dharm." Thon turning towards the sidha who liro apon air your son_Duryodhan said, " Blain vojustly by Bhim, I shall follow Drong, Karan, B} alya, Vrisbatcn, Shikuni tho son of Sural, bravo J.candl, king Bonglatt, Sundatta, Jayadrilla tho king of Biodlı Dusba an anii uthur litulhere, Dulwii's wor, Lakelman and thou. saxls of way arcuts tilizaron lihu a stranger who is Irſt behind by - (7247) Gada Parv गदापर्व (७२४७) जानाति वार्णकः परिवाड्याग्विशारदः । करिष्यति महामागो ध्रुवं सापाचति मम ॥ ३७ ।। समन्तपञ्चके पुष्पे त्रिषु लोकेषु विश्रुत । आह निधनमासाध लोकान् प्राप स्यामि शावतान् ॥३८॥ ततो जनसहस्राणि वास्पपूर्णानि मारिष । प्रलाप नृपतेः भ्रस्या व्यद्रयन्त दिशो दश ॥३९ ॥ ससागरचना घोरा पृथिवीसचराचरा विधा हाथ सनिॉदा दिशवाविलामधन् ॥ ४० ॥ ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं न्यवेदयन्। पदा गदायुद्ध पार्थिवस्य च पातनम् ॥ ४१॥ तदाख्याय ततः सर्वं द्रोणपुत्रस्य भारत । यारबाध सुचिरं कालं जग्मुरारी पथागतम् । ४२ ॥ इति गदापर्वणि दुय्यानाविलापे चतुः पंष्टाध्यायः १४ ॥ पतियाली लक्ष्मण की माता नांकि कल्याणी और बड़े नेत्रवाली है वहभी शीघ्रही नाश को पावेगी । २६ । जो ब्राह्मणम्पधागे संन्यासी वार्तालाप में सावधान चार्वाकनाम राक्षस इसबात को जानेगा तो वह महाभाग अवश्य मेग बदला पांडवों से लेगा।।.। मैं इस पवित्र भौर तीनोंलोकों में विख्यात स्यमन्तपंचकमें मृत्यको पाकर गायीन लोकोंको पाऊंगा ।३८! हे श्रेष्ठ इस के अन-तर अश्रुओं से पूर्णनेत्र हजारों मनुष्य गजाके उस दिलापको मुनकर दशों दिशामों को भागे 116। पृथ्वी समुद्र वन और जदचतन्य जीवोसमेत घोररूप शब्दायमान होकर कॉपनेलगी और दिशा सवप्रभासे रहित ई । ४० । उन्होंने अश्वत्थामा को पाकर जैसा वृत्तान्तथा सव वर्णनकिया हे भरतवंशी वह सब गदायुद्धके व्यवहारको और दुर्योधन के गिराने को अश्वत्थामाजी के सम्मुख वर्णन करके वड़ी देरतक ध्यान करके पाडावान होकर अपने २ स्थानोंको चलेगये ४२ । Ers countrymen. 33. Amy sister Dushala must be lamenting the death of her, brothers and husband. To what state my old fatber Dhritrashtra, bis sons' wiv>s and Gandhari will be reduced! 36, Surely. Lakshman's mother of large eyes, whose busband and son are dead, will soon dio. The rakebas Charrak, living in the disguise of a Sanyası Brahman, will surely spenge my death. Having died at boly Samantpanchak, I am sure te get the ancient regions, " Then thousands of people with tears in their eyes, far away in all directions on hearing the lamentations of the prince. The earth with her forers and movable and immovable creatico, ebook with la rumbling norg and the directicos tecame destitate of light. They imformed Ashwathma with what had happened. Having info med Asl w.thma wib the overts of the mace f gliting, they stocd long in meditation and then wended their ways. 42. " --- (७२४८] Alahabharat (7248) सजय उवाच । वातिकाना सकाशातु भुवावुयोधने इतम् । इशिधास्ततो राजन् कौरवाणां महारथाः ॥१॥ विनिर्मिना शिवनिर्गदातोमरशक्रिीमः । मश्व स्थामा कृपश्चैव कुगधर्मा व सात्वत ॥२i सरिता जयनैरश्वैरायोधनमुपांगमन् । तत्रा पश्यन्महात्मानं धाराष्ट्र निपातितम् ॥ ३॥ प्रभग्नं वायुधेन महाशालं पयां बने । भी विधष्टमान धिरेण समुक्षितम् ॥ ४॥म्हागजामिषारण्ये न्याधेन पिनिपाति तम् । विवर्तमान बहुशो घिरौघपरिप्लुतम् ॥ ५॥ यहच्छया निपतितं चक्रमादित्य गोचरम्। महापातसमुत्येन संशुकमिव सागरम् ॥ ६॥ पूर्णचन्द्रमिष न्योम्मि तुपा रावृतमण्डलम । रेणुध्वस्तं दधिभुज मातङ्गसाविकमम् ॥ ७ ॥ वृत भूनगणपतिः क्रव्यादेव समन्ततः । यथा धन लिप्समान त्यपतिसत्तमम् ॥ ८॥ भृकुटीकववक्त्रात क्रोधावृत्तचक्षुषम् । सामर्ष ते नव्यानं व्याघ्र निपतितं यथा ॥ ९॥ तेत रष्ट्या महेन्यासा भूतले पतितं नृपम्। मोहमध्यागमन् सर्वे कपलभूतपो रथाः ॥ १० ॥ अव अध्याय १५. संजय बोले हे राजा मरनेसे शेपवचे कौरवोंके तीनों महारथी अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा दूतों के मुखप्ते राजा दुर्योधन को मरा, हुमा मुनकर शीघ्रगामी घोड़ोंकी मवारीसे बड़े शीघ्रही रणभूमि में माये वहां आकर गा, तोमर, शक्ति और तेजवाणों से अत्यन्त पायल गिरायेहुये महात्मा दुर्यो धनको ऐसे देखा जैस कि बड़े वनमें वायु के वेगते गिरेहुये बड़े शालके वृक्ष को देखते है उमको पृथ्वीपर तड़फता रुविरसे लिप्त ऐसा देखा । ४ । जैसे कि पनमें व्यापके हाधसे गिरायहुये बड़े हाथीको देखते हैं बहुतमकार से रूपान्तर रुधिरसमूह से लिप । ५ देव इच्छासे गिरेहुये मूर्यको किरणों में घूमनेवाले चक्र की समान बड़े वायु के वेगसे उठेहुये घोर समुद्रके तुल्य । ६। माकाश में जीत युक्त मंडलपाले पूर्णचन्द्रमा के शहश धूलसे लिम लम्बी भुजावाळे हाथी के सुरण पराक्रमी । ७। चारों और भूत प्रेतों से व्याप्त और मांसभक्षी जीवसम्हों सेएसे संयुक्त देखा असे कि धनके अभिलापी सेरकों से घिरेहुये उत्तम राजाको देखते 14 टेही भृकुटीबाळे क्रोधसे फैले नेत्र क्रोधमें पूर्ण नरोत्तमको ऐसे देखा जैसे कि गिरोहये व्यापको देखते हैं । ९ । उन कृपाचार्यपादिक सब रथियोंने उस परे धनुपधारी पृथ्वीपर गिरेहुपे राजाको देखकर बड़े मोहको पारा । १० । खोसे CHAPTER LXY Banjaya sad, " Phe three remaining warriors of the Pandaves, Ashwatham Kripacharya and Knit varma the Yadav, bayng heard from the people about the fall of Duryodhan, awe an swift, borada in the fold af battlo. Thoro they say Duryodhan wounded by wave tomar, optar and swift arrowe, libe a huge sal tree struck down by the wind in a larga furcat. They saw him blood stained and aparting with pain, lido a largo elephant destroyed by bunters. With altered 172498 Gand PaIY गदापध" (७२४९) तार्य रयेश्य प्राद्रवमानसन्निधौ । दुयोधनञ्च समक्ष्य म भमाधुपाविशन १२ । ततो द्रौणिमहागग वास्पपूर्णेक्षण वसन् । उवाच भरतश्रेष्ठ सर्व लोकेश्वरेश्वरम् ।। १२ । न नून विद्यते सत्य मानु किञ्चिदेव हि । पत्रत्व पुरुषव्यात्र शेषे पाशुषु रूपित ॥ १३ ॥ भूत्वा हि नृपति. पूर्व समासप्यः च मेदिनीम । कथमेकोऽद्य राजेन्द्र तिष्ठसे निर्जने धने ॥ १४ ॥ दुशासन न पश्यामि नापि को महात्यम् । नापि तान मुरादः सर्धान् किमिद पुरुषर्षभ ॥ १५॥ दुम नून कृता तस्य गति धातु कथञ्चन । कोकानाञ्च मवान् यत्र ते पाशुषु. अपित ॥ १६ ॥ एष मुद्धानिषितानामगधा परन्तप । समश ग्रसते पाशुपश्य कायविपर्ययम् ॥१७कर तेतदमल छ व्यजन क्व च पार्थिव । साचते गाती सेना व गता पार्थिवोत्तम ॥ १८ ॥ तुझिया गति नून कार्याणा कारणान्तरे । यदै लोकगुरुत्या मानेता दशां गत ॥ १९ ॥ अभुधा उनकर राजाके सम्मुखगये और दुर्योधनको देखकर सा पृथ्वीपर पैठगये।।। हे महाराज इसके पीछे अश्रुओंसे पूर्ण नेत्र वासाओंको लेतेहुणे अश्वत्थामानी उस सब राजाओंके महाराज भातर्षभ दुर्योधनसे बोल । १२ । हेपुरुषोत्तम निश्चयकरके इम नरलोक में कोई सत्यवात वर्तमान नहीं है जहांकि आप सरीके लोग धूलमें वित होकर सोतहैं । १३ । हे राजेन्द्र तुम पूर्वकाल में राजा होकर पृथ्वीपर राज्य शासनकरके आ कैसे निर्जन वनमें नियतहो । १४ । मै दुःशासन महारथी कर्ण और उन सब सट्टदों को भी नहीं देखताहूं हेभरतर्षभ यह क्या वातहै । १५ । निश्चय करके किसी दशामें भी काल और लोकों की गति जाननी कठिन जहां कि धूळसे लिप्स आप सोतेहो । १६ । यह श(ओंका तपानेवाला राजाओंके आगे चलकर धूलको कठिनता से स्पर्श करताहै इस विपरीत समय को देखो । १७। हे राजा वह तेरा निर्मलत्र ब्यजन और तेरी बड़ी भारी सेना कहाँगई |१८| निश्चय करके गुप्तरूप होने पर परिणाम दुख से जानने के योग्य जो गेकगुरू होकर आपने इस दशाको पाया । १९ । सवइन्द्रप्स ईपकिरनेवाले भापके कठिन दुखको appearance and bloor stained body, he was like a wheel rolling in the rays of the sun, or like ibe ocean agitated ly the wind, or like the cool full moon, dust-stained, with long arms, of the prowess of an eluphant, surrounued by spirits, goblins and flesh-eating animals, like a king surrounded by avaricious attendants. With contracted brow, and eyos dilated in anger, they found the princo like a fallen tiyor. Kripacharya and other warriors were stupefied at the sight of the They came down fron their cars and sat down beside bin. Then with tears in his eyes Ashwathama thus addi essed hin Surely there are no respectable people left on the face of the enrth whea panple like you lie in dust. Having ruled over a vast bingdum how 18 it that you are here in a desolate woud. I donot see Dushasan, Kuran and other friends of yours. It 14 always difficult to koow the course of Time, when we see you lying on dnet. 8 king 10 13 This destroyer - (७२०) lahnblurat (7250) सर्वमत्येषु श्रीरुपलक्ष्यते । भरतो ग्यमनं हटना सरिस्पीदनो माम् ॥ २०॥ तस्त नबंधनं श्रुत्वा दुखितस्य विशेषतः । उद्यान, राजन पुरस्ले प्राप्तकालमिद वचः ॥ २१: पिज्य ने पाणिभ्यां शोफजं वासामुत्सृजन् । कपादीन स तदा वीरान सर्वा नेय नगधिप ।।२२ ॥ ईशो मधोऽयं धात्र निर्दिष्ट उच्यते । विनासः सर्वभूतानां कालपर्यगमागतः ॥ २३ ॥ सोय मां समनुप्रातः प्रत्यक्ष भवतां हियः । पृथिवी पास विवाहतां निटामुपागत ॥ २४ ॥ दिष्ट्या नादं पत्तो युद्धे कश्याम्पियादि। दिष्ट्याई निइनः नापैश्छलेनेव विशेषतः ॥ २५ ॥ उत्साहश्च कृतो नियं मया दिल्या युयुत्सना । विष्ट्या घाम तो युदे निहतमातियाघर: ॥ २६ ॥ दिया व धोर पश्यामि मुक्तानस्माजनयात् । सालियुक्ताश्च फल्पांश्च तन्मे प्रियमनुत्तमम ॥२७॥ मा पन्तोनुतप्यन्ता साहदानिधनेन में। यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका नपाक्षपा देखकर सब मनुष्यों में लक्ष्मी का रूप विनाशवान् दिखाई देता ।२०। संजय ने कहा हे राजा आपका पुत्र दयाँधन उस महासेदभरे अश्वत्थामाके उस पनको | सुनकर हाथों से अपने दोनों नेत्रों को साफकरके शोक के मामाको छोड़ता उन सर कपचार्यादिक वार से समरके अनुमार यह वचन बोला । २१ । कि यह ऐमालोक ईशरमे उपदेश किपाहुआ धर्म कहा जाताद सब जीवों के नाश ने विपरीनही विपरीत समयको मातकिया । २१ । वही भव मुझकोभी प्रतहुआ है | जोकि भापलोगों के समक्षमें वर्तमान मन पृथ्वकिा पोषणकरके इस दशाको पापा ।२४. मैं पारध्यमे किसी भापचि में भी रणस पराङ्मुख नहीं हुआ रेहो में प्रारब्ध मुरूप करके पापियों के उनसे मारागयाहूं । २५ । युद्धका अभिलापी होकर मैंने मारब्ध से उत्साह किया और मात वान्धों समेत युद्ध में मारामया । २६ । मैं मारब्धसे ही इस मनुष्यों के नाशमे मंहत कस्पाणयुक्त आपलोगों को देखताह पह मरण मेरा बड़ा मियतम भभीष्टहै । २७ । जो भापको वेदप्रमाण of fore and londur of kingf, mild oot blar thu touch of dust; look at tha vicis.itudo ut Time, Yliero are your usubrullm and large army gono Princo ? Surely thould is nlwrzs Jiddon; for being respecto by the world you aru reduced to this staw. Being a rival to Indra, you havo fallin in front troublo and from this wo coucludo that the prospority of all mes is transitory."Smjaya said, " Having heard the pititul word of Ashtratiturun, Duryodlına cleared hit uyms of the tears of gref and thus afircucu Kripacharya and others --" The worldly lunchs and the valus suy that the times are changed at thic dulructioa of creatuna Tho amwisthu cake with my, as you ma Haring Tuled uver the curth, I ara rua tu thjis atiasta lainrer turned laco in any thattinuel is hit thylterit. itounflight ink I dand do the alocul misd was clair along with my warriors and 25. Being (72511 Garlh Parv गदापर्व [७१५१) ॥ २८ ॥ मन्यमानः प्रभावश्च कृष्णस्यामिततेजसः । तेन न वितश्या सत्रधर्मात् स्वनुपितात् ॥ २९ ॥ स मया समनुप्रातो नास्मि शोव्यः कथञ्चन । कृतं भवद्भिः सररामनरूपमिषात्मनः । पतित विजये नित्प देवन्तु दुरतिश्रामम् ॥३०॥ एताब दुक्त्वा पवारपन्याकुललोचनः । तूष्णीचव राजेन्द्र मासौ विघलोमृशम् ॥३१ तथा एका रामामधास्पशोफसमन्धितः । द्रौणि. क्रोधेन जकाल यथा पन्हिजगत्क्षये ॥ सतु को वसमाविष्टः पाणी पाणिं प्रपीच्य ह । याम्पविळपा चा राजान मिदमब्रवीत् । ३३ ॥ पिता मे निहत सुदैः मनृशंसन काणान तथा तन तप्यामि तथा राधस्त्वयाच वै ॥ ३४ ॥ श्रुण धेद यचो मह्य सत्येन पदतः प्रभो। इष्टापूर्तेन बानेम धर्म मुकतेन च ॥ ३५ ॥ अद्याहं सर्वपाञ्चालान धासुदेवस्य पश्यतः । सयों पावहि नेपामि प्रेतराजनिशमम् । अनुशान्तु महाराज, भवाग्गेदातुमर्हति ॥ ३७ ॥ पति पुत्वा तु षय ने द्रोणपुत्रस्या कीरवः । मनसः प्रतिजननं कपंघचनमब्रवीत् । ३८॥ है तो यहापर आपलोम मित्रतासे मेरे मरनेमें दुःखीमतहो क्योंकि मैंने अविनाशी धोक विजय किये । २८ । में बड़े तेजस्वी श्रीकृष्णनी के प्रभाव को माननेवाला हुमा इस हेतुसे में अच्छी रीतिस किये हुये क्षत्रियधर्म से नहीं गिराया गया हूं । २९ । वह मैंने अच्छी रीतिसे प्राप्तीकया मैं कभी शोचके योग्य नहीं हूं भाप गेगों में अपने पोग्य कर्म किये और सदैव विजय में उपाप किये परन्तु दैव दुःखस उल्लंघनके पोप है ।१०। राजेन्द्र इतना वनन कहकर आसुओं से व्याकुलनेध अत्यन्त खेदयुक्त वह गजा दुर्योधन मान होगया । ३१ । फिर अश्व. स्थापानी समकार राजाको शोक और अश्रुनों से संयुक्त देखकर क्रोधमे ऐसे मासिन हुरे जैसे कि प्रलयकाल में मृष्टि के नाश करने की अग्नि प्रज्वलिन होती है । ३२ । उसकोष भरेने हाथों को माड़कर अश्रुओं मे नेत्रोंको भरकरवडे मालित पचनों के द्वारा रामा से यह वचन कहा । ३. कि नीचोंके अत्यन्त निर्दयकर्ष से मेरापिता मारागया उससे ऐमा दुख नहीं पाताहूं जैसे कि अब इस (तरी दशाको देखकर क्लेशित होताई हे प्रभु सस सस्यमा पूर्वक कहनेवाले और कुर पापी सदाग या दान धर्म और अपने पुण्यको शपथखाने वाले के इस वचन को पुनों कि भव मैं सब उपायों से सब पांवालों को वासुदेवजी के देखते हो यमलोक में पहुँचाऊंगा हे महाराज भाप मुझे आज्ञा देने को पोग्गहो netto. 11 12 iurtannte tuat no you ahve wod aua riappy at may death bed. You shou'd not feel sorrow for mo, if you believe the Vedas, for 1 have won the eternal regions. On account of glorious Krisho, I was unfairly bit 1 am well satisfied and eu nut worthy of being sorry for. You have done your part well and tried to conquer, Fate is insurpassable," 30. Having said this, with eyes full of tears in the excess of grief, he became silent. Seeing him so moved with grief, Ashwathama was euraged like the fire of pral17a, Ho jubbed his hands and with eyes full of tears, 8aid to the hing, " My father was Lilled by the cruel deeds of those wretches, but I felt no grief, for, bion as I do at the sight of 1 kwiar by my goud deeds, your dietiers (7252 ७२५२) Vhxbları भाचार्य शीघ्र फलसं जलपूर्ण समानय । स तद्वचनमानाय गो ब्राह्मणस तम. कलसंपूर्णमादाय पोन्तिकमुपागमत॥३९॥तमप्रधान्महाराज पुत्रस्तवविशाम्पते। ममाझया द्विजश्रष्ठ द्रोणपुप्रोभिीषध्यताम् । सैन्यापत्येन मगन्ते मम दिन्छसि प्रियम ५० ॥ राको नियोगाधोदव्य ब्राह्मणन विशेषनः । वर्सता, क्षत्रवण यंत्र घर्मविदो विदुः ॥ ४ ॥ रामस्तु वचन शुत्वा कृप. शारद्वतस्ततः । दीणि राशी नियोगेन सेना पत्येपचयत् ॥ ४२ ॥ सोभिीषको महाराज परिवज्य नृपोत्तमम् । प्रययो सिंहनादेन दिशः सर्या निनादयन् ॥॥॥४३ ॥ दुर्योधनाप राजेन्द्र गणितीधरिप्लुतात निशा प्रतिपदेय सर्वभूतभयावहाम् ॥ ४४ ॥ अपक्रम्य तु ने पूर्ण तस्मादायोधनान्नुप। शोकसीवग्नमनसचिन्ताध्यानपरामवन्॥४५॥समाप्त गदायुद्धपर्व समाप्तञ्चशल्यपर्ण। । ३७ । कौरवराज दुर्योधन अबस्थामा फे इस वचनको जो कि मन के हर्षका बढ़ाने वाला था सुनकर कराचार्य से यह बोला हे आचार्य जी शीनही जलपूर्ण कलश को लाओ । ३८ । वह ब्राह्मणों में श्रेष्ठ भाचार्यजी राजा के उस बचनको जानकर पूर्ण कलश को लेकर राजा के पासगये । ३९ । तब महारान राजा धृतराष्ट्र आपका पुत्र भाषार्यजी से बोला कि हे बामण श्रेष्ठ भापका कल्पाण होय जो आप मेरा दित चाहतहो तो मेरो प्राज्ञा से अश्वत्थामा को सेनापति के अधिकार पर अभिषेक काओ । ४० 1 मुख्यकर क्षत्रियधर्म पर कर्म करनेवाले ब्राह्मण को राजाकी आज्ञा से लड़ना चाहिये यह धर्मज्ञ लोगोंका कहाहमा और जानाहुमा है । ४१ । इस के पीछे शाररत कृपाचार्य ने राजा के वचन को मुनकर उसकी मात्रा से अश्वत्थामा को सेनापति के मधि कारपर अभिषेक कराया । १२ । हे महाराज वह अभिषेक कियाहुआ अश्वत्थामा उस श्रेप्य राजा से मिलकर सब दिशामों को सिंहनाद से शन्दायमान करता चला । ४३ । इसके अनन्तर रुधिरसे लिप्त दुर्योधन ने भी उस सब जीवोंकी भय कारिणी रात्रिको माप्तकिया । ४४ । और वह तीनों महारथी भी रणभूमित इटकर शोकसे व्याकलचित्त चिन्तायुक्त होकर ध्यान में दूवगये ४५ ॥ that ehall say the Panchals in the presence of Vaander, and lark ..... - in an "Hanor the cheerful words of Ashwat Kripacharya, " Bring a pitcher full of the king and brought water pour bim. Then your sa ordered him to install Salwatbama nd the part of the commander in chief, with a spriokling of water 40 "Fur" said by:"A brahınan ia particular should fight by the order of the king. The w cho opinion of wiso men. " Then Enpacharybioetallod Ashwathaus oil lbu post of the compandor a tho king had directod, Thus installed Athxathoma embraad the king and wont on Gllug tho discctions with his wor cry, uryodhan, stained in blond, rodinu? thero during that night, while the three sarnors woru plunged in gtrofand be wol thooselve lether away frnas the field ol battle. । "15.
महाभारत
४ का
सौप्तिक व स्त्री पर्व
।
श्रीवेदव्यास रचित संस्कृतमूल
। हिन्दी भार अंग्रेजी अनुवादसहित ।
THE MAHABHARAT
SAUPTIKPART
The Sanskrit text of Maharshi Vyas
with completo English and Hindi translations
जिसको
रामकृष्ण कम्पनी मुरादाबाद ने
"वप्रभाकर प्रेस में" उपफर प्रकाशित किया।
Published by
Ram Krishna & Co. ofMoradabad
पुस्तक मिलने का पता-
रामाण कम्पनी
मुरादाबाद.
To be bad of the publisher
Ram Krishna & Co.
Aforadabad.
44 ७ सूचीपत्र शल्य व गदा पर्वत Index to Shalya and Gada Pary अध्याय विषय पृष्ठ Chapter contents Page १ धृतराष्ट्र का खेद ६८३१ Dhritrashtra's grief 6831 2. His lamentations 37 २ धृतराष्ट्र का दन ३ तपा ४५] 3, Do 45 ४ कृपाचार्य का पाक्य ५२. 4.Kripa charya's speech 62 ५ दुर्योधनका पाक्य 5. Duryodhan's speech 59 6. DO Do 65 तथा 7.8halya mada commander 69 ७शयका सेनापति होना 8. Arrangement of forcea ८पूहरचना 9. General fighting 80 ९ संकुल युस ८० 10. Do Do 85 १० तथा 11. Mo Do 93 १५ तथा ९३ १२ शल्यप युधिष्ठिर 12. Shalya and Yudhishthir 6900 13. General fighting 7 १२कुल पुर 14. Do Do 13 १४तथा १३ 15. Do Do 18 १५ तथा 16. Shalya and Yudhishthir 22 १६ सय ६ युधिष्ठिर २२ 17. Shalya's death 30 १७शल्यपध ३० 18, Duryodhau's army routed 42 १८ दुर्योधनकी पराजय 19. General fighting १९ संकुल युद्धा 20. Shalya slain 56 २.शष वध 21. General fighting 60 २१ संकुल युग 22. Do Do 64 २२ तथा ६४ 23. Do Do 69 १३तथा ६९ 24. Arjua's bravery 80 २४ अर्जुनका पराक्रम 25. General lighting 88 २५ संकुल बुख २६ दुर्मशणादि का वध ९५ 26 Murmersher and others slein 95 7000 | २७ संकुळ मुख 27 General fighting २८ शकुनि और उलूक पध ६ | 28 Shakuni and Uluk slain १. 29 Entry in the like २९इद प्रवेश 30 Gada Parya, 25 ३० गदा वर्ष प्रारंभ २५ 31 Search for Duryodhan 33 ३३ ३१ दुर्योधन की तलाश १२ युधिष्ठिर दुर्योधन संवाद 33 Yudhishthir and Dryodhan 42 ४२ ३३ भीम घ दुस्योधन संपाद ५० | 33 Bhim and duryodhan 50 34 Baldera's arrival 57 ३४ बलदेव भागमन ३५पलदेवजी की बी यात्रा 35 Baldeya's pilgr mage 60 Yર अध्याय विषय ३६ पलदेवजीकीतीर्थयाश ३७था ३८ तथा ७७ 37 ब ४१ता ४२ तथा ५३ तथा ४४ युधिष्ठिर दुर्योधन संवाद ४५ स्कधी पाख्यान ४६ लारापास्या ४७तया ४८ तघर ४९ तथा ५० तथा तथा ५२तथा ५३ तथा ५४त Do Chapter contents Page ७१/38 Baldeva's pilgrimage 1 do do 17 18 do do 81. ९१ 39 do do 91 १६ 10 do do 96 ७१०० 41 do do 7100 ५/12 do do २०143 do do 10 १६/4 Yndhishthir and Duryodhan IG| २२ 45 The history of Sua dh 22 Straswat 1 ४२. 47. Baldeva's pilgrange ४७48. Do ५५/49 do do 55 ५८50 do do 58 ६५/51 do do 65 ७२.52 do do 72 ७६ 53 do do 76 do 80 in5 fighting with the nuace 85 do do 90 do do do 7202 859 Yudhisthir's grief 14G0 Baidusa's arger 15 २१161.Kushward the Pandavas 21 २० [62 Krishn goes to Histhrrrupur 29 ३४|63 A talk with Ghudliart 84 ४३/64 Duryodhat's griet ४८.5 Aslimattamadipu ed. 48 ५५गदायुम ५६तपा ५७क्षपा ५८ तथा ९.56. ९६157. ७२०४,58. ५९ युधिष्ठिर पा खेद ६० बलदेवजी का कोष ६१ श्रीरप्पा पार सवाद ६२ हस्तिना पुरकोजाना ६३ गान्धारी से पारकरना ६५ वुटपौधा मिलाप ६६५ अत्यामाका मभिषेक 1 कर्णपर्व का सूचीपत्र Rage २ पुनराष्ट्र बमजप Iudex to Karaa Pary विषय मपाप Chap er Contenta पृष्ठ १कर्ण का सेना पर्दि होना ६२०० Karan made commander 6207 80 2 Dhritrashtra and Sanjaya 10 3 Do Do तथा १६4. Dhritrashtra's griti.... 16 ॥धृतराष्ट्र का बिलाप ५सजय वचन 5 Sadjaga's tulle 19 6 ६तथा 110 26 7 ७तथा DI 31 ८तथा ३५। 8. Do ३० ३९ ९.वृतराष्ट्रका विलाप Dlirierzylitra's g sef 39 10. haran', imitallation 50 १० कग का सेना पति होना 11 Formation of army 57 ११ सेना व्यू। कीरचना ६३ 12 Kshetudhurteelam 63 १२ क्षेप न यध 13 Vind and Anuvind elam 69 १३.वि.स नुस्यम्ब क्य 11. Chitra saia 73 १५ चित्रपत्र ७३ 15 Ashwathama hgl ta 78 १५ मश्वस्थ मा कायुख 16 Ashwathama and Arjun 83 १६ मश्वत्थामा प बर्जुन 17.Ashwathama defeated 90 १७ अश्वत्थामा की पराजय 18 Daad Idhar alaia 92 २८दडधार पध १९सकु युद 19 General fighting 99 २० पाप्प वध ६३०७ 20 Pandye slain 6307 २१ सकुछ पुख 21 General fighting २२ तथा 22 Do Do 19 २३ सरदेव दुशासन युद २३ 23 Shrd rand Dashasan 23 २४ कर्ण का पराम २६ | 24. Karar's bravery 26 २५ मुतसोम सौवक युख 20 Sution and Sauval 35 २६ शिवडीव कृतधर्मा 26 gb khar di and Kritvarma $1 २७ अर्जुन की विजय 84 27 Arjun'a voutory 45 २८ सकुळ युम 28 General fighting 50 २९ तथा 29 Do Do 56 ३. पृथम दिन का युद्ध 30 First day's fighting 60 ३१प दुभ्योधन 31 Karan and Duryodhan GT ३२ शल्प सारथी ७६ / 32 Salva as drivar 76 ३३ त्रिपुरका आफ्यान 33 History of Trpur 84 ३४ तथा ९१ Do Do 35 S 1alya 29 driver 6110 16 १६ त्रियु फा मावधान 36 History of Tripur 1 34 ३५ शल्य सारथी Pogo ३९ शत्पसारथी ६१/45. ७२ भन्याय विषय Chapter contents पृष्ठ 37. Do Do 20 ३७तपा 38. Do Do 37 ३८तपा ३१] 39. Shalya ssdrivor 81 40. Karan and Bhalya 96 ४० कर्णध शल्प संवाद ४१स मार काफ ४३ 43 41 Swan and Jackday ५० 42. Karan and Shalya 50 ४२कर्ण शन्य 43. Do Do ४३तथा Do Io ४४ तपा Do Do 1 ४५ तथा 16 General fighting 72 ४६ संकुल युख 17. Do Do 75 ४७तपा ८७ 48-9 Do Do 84 ४८-९तपा 50. Karan's fighting 94 ५० कणं कायुष 6500 ५१ सकुल गुख ६०. 51. Genral fighting 52. Do Da 9 ५३ तथा १४ 53. Do Do ५३ तथा 19 ५५ सप्तप्तक १९ / 54. The Sansaptaks ५५ युधिष्ठिर पराजय २४] 55. Yudhishthir's delrat ૨ 56. General fighting ५६ संकुल युख 29 57. Ashratbama's vow 45 ५७ अश्वत्थामाकाप्रण' ५८ कृष्ण संवाद- ४७ | 58, Krishna's talk 59. Ashwathama's talk 53 ५९ अश्वत्थामा संवाद 60. General fighting 61 ६०सकुल बुर Do Do ६१ तपा 62. Yudhishthir's defsat 79 ६२ युधिष्ठिर पराजय 63 Nakul and Sahader 82 ६३ नहुल सहदेव ८२ 64. General fighting 87 सकुल.युख 65. Arjun goes to Yudhishtbir 95 ६५ अर्जुन का युधिष्ठिर के पास जाना९५ 66. Yudhishthir's talk 98 ६६ युधिष्ठिर सवाद 67. Arjun's vor. 6604 ६७ अर्जुन का प्रण ६६०४ ६८ युधिष्ठिर संवाद ८ 86. Yudhishthir's talk 8 ६९रुण अर्जुन संवाद 69, li rishid and Arjun 12 24 ७० युधिष्ठिर का अपमान 70. Yudhishthir insulted २४ ११ युधिष्ठिर अर्जुन संवाद ३३ 71 Yudhishthiir ana drjun 33 ७२ कृष्णार्जुन संवाद ३८172 Krishn and Arjun 38 ७३ तथा ४३ | 73 Krishn and Arjun 43 ७. अर्जुन की मात्मश्लाघा 74 Arjun's self-praise 6 ७९ 56 l'age 62 मशवाय विषय ७५ संयुख ६६विशोक संवाद ७७ शकुनि पराजय पलब तथा ८.तथा 66 72 89 89 6701 5 '11 17 ६७०१80 23 ८२ भीमावासम दुशासन माल पराजय ५पसेव पण भीन्यवाद और मग भवस्थामा से ८९ कम ९.NERसना ५१ मेसी पृष्ठ Chapter contents ६२/75 Gentral ighting 76 Vishoka's talk ७२ 77 Shakunt's defeat ८२/78 General fighting ८९ 79 Do Do Do Do ५ 81 Do Do 82 Bhim and Dushasan 83 Dasbasan slain २३ 84 Nakul defeated. २९ 85 Vrishasen slain ३५ 86 Shri Krishn's speech XC 87 Laran anů Arjun. ५१ | 88 Ashwathama's speech ५७ 89 Karan and arjun હર 90 The car wheel grounded ८६ 91 Karan's death १८ 192Shalya's speech १८.१ 193 The Kauravas routed 2194Retreat to camp 95 The Kauravas routed 96 Yubishthir'a joy 29 35 38 51 57 72 ५३ कोरलोकी पराजय ५५शिविरको नामा ९५ कोरवोंका मागमा पुधिष्ठिर का 86 98 6801 8 18 20 महाभारत सौप्तिक पर्व भारायणं नमस्य नरम्चैध नरोत्तमम् । देवी सरस्वचिव ततो जयमुदीरयेत् । सब्जय उवाच । ततस्ते सहिता धारा प्रयाता दक्षिणामुसा । उस्लमनवेलायो शिविराभ्यासमागता ॥१०रिमुव्यवाहांस्त्वरिता भीता समभषस्तदा । गहन देशमा साध उन्नान्यविशन्त ते ॥ २ ॥ सेनानिदेशनभितो नातिवमास्पिता. निकृत्ता निशितैः शनः समन्तात् क्षतविक्षता । दीर्घमुग्णञ्च नियस्यपाण्डानेवचिन्तयन ॥ ३. श्रुत्वा च निनदं घोर पाण्डवानां जयैषिणाम अनुसारमयादीत प्रामुला. पावन पुन ॥४॥ ते मुहत्तै ततो गत्वा भारतवादाः पिपासिताः। नामप्यन्त महे श्रीनारायण नरोंमें उत्तम नरको और सरस्वती देशको नमाकार करके जप नाम महाभारत इतिहासको वर्णन करताहूं समयबोलेइसके पीछे वहवीर एकसायही दक्षिण ओरको चले और मूर्यास्तके समय डेरोंके पास पाये ।। तब वहशीबही रयोंको छोड़कर भयभीत दुपे और घनदेशको पाकर गुप्त निवासी हुये ।२। अपनी सेना के निवासस्थान से कुउ थोडेही अन्तरपर नियत हुये तेनशस्त्रोंसे छुटेभंग चारोंओर से घायज उन वीरोंने लम्बी और उष्णश्वासा लेकर पांडवोंकी चिन्ताकरी।।। फिर विजयामिलाप पांडवों के घोर शब्दको सुनकरपीछा करने के भयसे भयभीत होकर पीछकी भारको चलदिये । ४ । वह सब एकमुहू चनकर नृपा और यकीसवारी चाले सह न सके वह बड़े धनुषधारी झोप और प्रशान्तताके आधीन SAUPTIK PART II, CHAPTERI. Having bowed down to Narayad, to the best of males nad to, Saraswati, let us speak of the history of the Victory. Sujaya sand: "Thea the warriors sent tngether southwards and approached the camp at sunset. They came down from thor care in terror and çaterod a densa forest a short distance from their camp. Yith wounded bodies and deep sighs, they thought of the Papdavaa Ihon lenring the dreadful uproar of the victorious Pandavas, they recoded further . T९५५) Muhablarat (7254) घासा. क्रोधामपंधशलता। राशो धन सन्तप्ता मुहूर्स समस्थिताः ।५ ॥ धृतराष्ट्र उयाच । अथ यमिद फर्म रुतं भीमेन सञ्जय । यत् स नागायुतमाणः पुत्रो मम निपातितः ॥ ६ ॥ ५ध्याः सर्वभूतानांबसंहननो युवा । पाण्डवैः समरे पुत्रो निहतो मम सजप ॥ ७ ॥ न दिएमभ्यतिकान्तुं शक्यं गावल्गणे नरैः । यत् समेत्य रणे पाः पुत्री मम निपातितः ॥ ८॥ अद्रिसारमय ननं इदय मम सञ्जय । हतं पुत्रशत श्रुत्वा यन्त्र दीर्ण सहना ॥ ९ ॥ कय धि वृक्षमिथुन हहपुत्रं भविष्यति । न ह्यह पाण्डवेषस्य विषये वस्तुमुत्सहे ॥१०॥ कथ राज्ञः पिता भूत्वा स्वयं राजाच सन्जय प्रेग्यभूत. प्रवर्तय पाण्डवेयस्य शासनात् ॥११५ आशाप्य पृथिवी सर्षी स्थिामा मुनि सञ्जय । कयमध भविष्यामि मेयभूतो दुरन्तकृत् ॥ १२ ॥ कर्य भीमस्य वाक्यानि मोतुं शक्यामि सञ्जय । पेन पुधशत पूर्णमेकेन निहतं मम ॥ १३ ॥ कृतं सत्यं पध मौर राजा के मारे जाने से दुःखी चित्त होकर एक मुहूर्ततक नियत हुपे । ५ । धृतराष्ट्र वोले ह संजय भीमसेनने यह कर्म श्रद्धाके अयोग्य किया जो उसदश हजार हाथी के समान मेरे पुत्रको मारा । । । हे संजय वह मेरापुत्र जो कि सर्व जीवासे अवध्य वजके समान हद शरीरवालाया युद्ध में पांडवों के हाथसेमारागया। हे गोलगणके पुत्र संजप मनुष्यों से प्रारम उल्लंघन करनेके योग्य नहीं है जो मेरा पुत्र पांडवों के सम्मुख होकर मारागया।८। हे संजय निश्चय करके मेरा हृदय पत्थर है जो सौपुत्रों को मृतक मुनकर भी विदीर्ण नहीं होता । ९ । मृतक पुत्रवाला वृद्धों का मिथुन किसमकार से रहेगा मैं पांडवों के देश में निवास करने को विचार नहीं करनाई । १० । हे संजय मैं राजाका पिता भाप राजा होकर पांडवोंका मामावर्ती होकर सेवकके समान केसे कर्मकरूंगा । ११. हेसंजय पृथ्वी पर राज्यशासन करके और सब गजामों के मस्तकपर नियतहोकर कैसे उसकी माज्ञाको पालनकरूंगा जिसने कि मेरे पुत्रोंका एक पूरा सैकड़ा मारडाला। १३ । हे संजय वचन को न करनेवाले उस मेरे पुत्रने महात्मा विदुरजी के वचनको सत्याकया हे, संजय कठिन नाश करनेवालेका मै कैसे आज्ञावहूंगा और किस for fear ol clase, But iley could not go very far with their fueble bodies and (Irelleista, ani hd to stop again. The great warriors, enrag. ed, disenti i d add corrowful at the fall of their prince, staid there for Dhrittasltra said, " It grioves me to hear that Bhim slev my con nho was like a myriad of elepliants, 6 He was unsayable by others, with Lody hard as vajra, yot ho vas slain by the Pandavas, Fate is surely insurmountable, for my son fell down before the Pan. davaa. Surely my heart is hard as it does not break on hearmg the news of the death of my hundred sons an old pair live without sond! I donot tbiuk that I shall live with the Pandavas, Be ing a king and father of a king, how can I obey the Pandayaa? 11. Haring ruled over hings and kingdom, I cannot oboy him who deatroyed my hundrai suns My son has proved the prediction of Vidur | a while." How can PHT- । (7255) Suptik Parv सौतिकपर्व (०२५५) नस्य विदुरस्य महात्मनः । अकुर्वता पचलेन मम पुत्रेण सञ्जय ॥ १४ ॥ अघमण हते तात पुत्र दुर्योधते मम । कृतवर्मा कृपो दौणि किमकुर्वत सन्जय ९५ ॥ सम्ञप, उवाच । गत्वा तु ताबका राजनातिदूरमवस्थिताः । अपस्यन्त धनं घोरं मानादुमलता धृतम् ॥ १६ ॥ ते मुहून्तु विधम्य लब्धतोयहषोत्तमैः । सूर्यास्त मावेलाया समासे दुमहानम् ॥ १७ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिगणावृतम् । नानाद्रुमलतान्छन नाना व्याळनिषेवितम् ॥ १८ ॥ नानातोय. समाकीण नानापुष्पोपशोभितम् । पमिनीशत. संछन नीलोत्पल समायुतम् ॥ १९ ॥ प्रविश्य तद्वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः । शास्त्रासहन संजनं न्यग्रोधं दहशुस्ततः ॥ २० ॥ उपेत्य तु तदा राजन न्यग्रोध ते मा रथाः। दरशुर्षिपदां श्रेष्ठा भैठते थे वनस्पतिम् ॥ २॥ तेवतीर्य रपव विप्रमुख्य च पाजिनः । उपस्पृश्य यथान्यायं सयामधासत प्रमो ॥ २१ ॥ ततोर पर्वतश्रेष्ठ मकार से भीमानके वचन सुननेको समर्थहूंगा । १४ । हे संतप से मेरे पुत्र दुर्योधनके मरनेपर कृतवर्मा कपाचार्य और असत्यामाने क्या किया । १५ 'सजय बोले राजा आपके वार घोड़ीदूर जाकर नियनहुये और नापकार के वृक्ष लताओंसे संयुक्त घोरवनको देखा ।१६ । उन्होंने जल पानवाले उत्तम पाड़ा समेत एक मुहूर्त विश्रामकरके मूर्यास्तके ममय एक ऐसे बनको पाया । १७ । जो कि नानाप्रकार के मृगसमूहोंसे सेवित मांतिमांतिके पक्षीगणोंसे व्याप्त और बहुत प्रकारके वृक्ष लतादिकोंसे भराआडू बहुत भांतिके मर्पोते सेवित ।१८ १ नानामकार के जलों से युक्त बहुत भेदके पुष्पोंसे शोभित सैकड़ों कपलनिों से पूर्ण और नाले कमलों से संयुक्तया। १९ । इसकेपीछे चारोंओरको देखने उन वीरों ने उस तब वनमें प्रवेश करके हजारों शखाओं से युक्त वट वृक्षको देखा।२०। हे राजा घोर उन नरोत्तम महारथियों ने वटवतको पाकर उस उत्तम वृक्ष के नीचे जाक अपनेर रयों से उतरकर घोड़ोंको छोड़ा और न्यायके अनुसार स्नानादिक करके वहसब अपनी २ संध्यावंदन में प्रत्तहुये । २२ । इसके पीछे पर्वतों में उत्तम by his way wardnes - How can I obey that great destroyer? How shall be able to hear Bhim's voice! Wbat did Krit var ma Kripacbn. ya and Ashwathama do, when my sm was unjustly slaint" 15 Sunaye said, “ Your Warriors stond at a short distance and saw the forest of large trees and creoperz. They yate-ed their horses and having testad theinselvus for a while. they found tho ovening como upon them in a part of the forest abounding in deer, birds, trees, cree pi Ys, serpu.ts, mater, flowers and lotua lakes. Wandering in vari uz directions they chine goder a large bangan tree. 20. They cane down from their cars and left their horses They made ablutions and paformed evening Service, In tho meantime the sun disapprarrd and the night, pourisher of all beings, prefailed, "It was a star i (२५६) Mahabharat (72561 मनमा दिधामरे । सर्वस्य जगतो धात्री शधरी समपद्यत ॥२३॥ प्रहनक्षत्रतामिः प्रकीर्णाभिरळकृतम् । नमोशुकमिवामाति प्रेक्षनीयं समन्ततः ॥ २४ ॥ इच्छया ते प्रय लगन्ति ये सत्ता राभिचारिणः। विधाचगश्च ये सत्त्यास्ते निद्राशमागताः ॥ २५॥ रात्रिञ्चरापा सत्यानां निर्धोषोभव सुदारुणः । व्यापाश्च अनुदिता घोरा प्राप्तान शर्वरी ॥ २६ ॥ तस्मिप्राविमुखें घोरे दुःखशीकसमन्विताः । कृतधर्मा कपो द्रौणिरूपों पविविशुः समम् ॥ २७ ॥ तत्रोपशितः शोचतो न्यग्रोधस्य समीपतः । तमेधार्यमति क्रान्तं कुरुपाण्डवयो क्षणम ॥ २८ ॥ निद्रया च परीताङ्गा निषधरणीतले । श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविध शरैः ॥ २९ ॥ ततो निद्राप प्राप्ती कपभोजी महारयो । सुखोचिताय स्वाही निषणी धरणीतले ॥ ३० ॥ ती तु सप्तौ महाराज श्रमशोकसम पिती । महाशयनोपेतो भूमाप शनायवत् ॥३५॥ क्रोधाशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्त भारत । नैव स्म स अगामाय निद्रा सर्प इय श्वसन् ॥ ३२ ॥ मलेमेस निक अस्ताचल में सूर्य के पहुंचने पर सर जगत् की धात्री रात्रि वर्तमान हुई पूर्ण ग्रह नक्षत्र और ताराओं अलंकृत चारोंमोर से दर्शनीय भाकाश स्वर्ण विन्दुओं से जटित यतके समान शोभायमान हुआ । ३४ । जो रात्रि में घूमनेवाले जीव वहसक नींद के स्वाधीन वर्तमान हुपे फिर रात्रि में घूमनेवाले जीवों के मान्द भयानकहुये मांसभक्षी राक्षप्त अत्यन्त प्रसन्न हुये और घोररात्रि वर्तमानहुई १२६ । रात्रिके उसपोर मुखमै दुःखशोक से संयुक्त कृतवर्मा कृपाचार्य और अश्व- 'त्यामा वरावर समीप बेटे उस पटक सम्मुख कौरव और पाण्डवों के होनेवाल नाश को शोचते । २८ नदिसे पूर्णशरीर और पारश्रमसे अत्यन्त संयुक्त नानामकारके वाणों से घायल पृथ्वीपर बैठ गये । २९ । इस पछि दुःखके भयोग्य और एखके योग्य पृथ्वीपर बैठेहुये महारथी कृतवर्मा और कृपाचार्य नांदके वशीभूतहुये ।१०। हे महाराज थकावट और शोकसेयुक्त पूर्वसमयमें बहुमूल्य शयनोंपर सोनवाले वह दोनों अनाथोंके समान पृथ्वीपर सौगये । ३१ । हे भरतवंशी क्रोध और प्रशान्ती में वर्तमान और सर्पोके समान शासळेत अश्वत्थामाजी ने निद्राको नहींपाया ३२ शोकसे जालनरूप उप्त वीरने निद्राको नींपाया तबउस महाबाहुने उस घोरदर्शन night and the sky looktu asit spavgled with gold dute, Sleep prevail. ed over creatures and the night rovers mudu a bideous huite. Carnivorous rakshases were glad at the prospect of that dreadful dark Highl. 26. • farged in grief and sorrow, Kritvarna Kripacharya and Ashwathama sat together Thinking of the great destruction of tho Kauravas and Pandavas, tired and steapy, they sat wounded with Kntvurma und Kiipacharya, unaccustomed to bear such hardships, lay on the ground 30. Full of grief and tired, ti,e two great Warriors, accustomed to sleep on precious beds,slept on bare earth like helpless ones. Enragod ant dissatisfied, sighing like serpents, arrowe.
17257) Sauptik Purv सप्तिकाव [७२५७) दममानो दिम युना। श्रीक्षाञ्चक्रं महायाहुस्तद्वनं घरिदर्शमा ॥ ३३ । घामाणो बनोदेश नानासत्यपिषितम् । अपश्यतमहायान्यग्रोधं बायसैधृतम् ॥ ३४ ॥ तत्र काकसहस्राणि तां निशा पर्यनामयन् । मुसं स्वपन्ति फौरन पृथक पृगुगमय : ॥ ३५॥ सुषु सेषु काकेषु विधेषु समन्ततः। सोऽपश्यत् सरसायातमूलक योर दर्शनम * ३६ ॥ महास्थानं महाकाय हय्यक्षं भुपिंगलम। मुदोघानानल मुबर्ण मिव घेगिम || ३७ । सोऽध शर्म मृई कस लीयमान इयाण्डज.। न्याघस्य an: शाखा माधयामास भारतं ॥ ३८ ॥ सग्निपत्य तु शाखायां न्यप्राधस्य विगमः । सुप्तान जपान मुषाहन पायसान्तकः ॥ ३९ ॥ कंपाश्चिदग्नित् पक्षान शिसिच धर्फ हा धरणांधेष शाञ्चिभज धरणायुधः । मणेनाहत्य बसमा या रसिप स्विता. ४. ॥ तेषां शरीराषयः शरिष विशाम्पते. योधमाल सबै बनकोदेखा । ३ । कि नानाप्रकार के जीवों से संवित बनके कोयको देखते महावाहने चटके वृक्षको काकों से संयुक्त देखा । ३४ । हे कौरव उस पर हमारों काोंने गनिमें निवास किया और मयर निवासी होकर मुख से निद्रा युक्तहो । ३५ । माओरमे उन विश्रब्ध काकोंके सोजानेपर उन अवस्थामाजी ने अस्माद मानेगले घोरदर्शन उलूकको देखा । ३६ । जो कि वडाशन्द बड़ा शरीर पातनेश पिङ्गलवर्ण बहुत लम्बे नख और ऊंची नाक रखनवाला गरुड़ के समान तेवगामी था। ३७ । हे भरतवंशी उस गुप्त आनेवाले के समान पदी ने पशब्द करके बटकी शाखाको चाहा। ३८ । काकोंके कालरूप उसपत्तीने वट चक्षकी शाखापर गिरकर मिलने वाले बहुत से काकोंको मारा । ३९ । चरणरूपी शखधारीने कितनोंही के पक्षप्तमेत शिरोंकोकाटा और कितनोंहीके चरणोंको काटा उस बलवान ने अपने सम्मुख दीखनेवाले अनेक काकों को एक क्षणमात्र में काटा । ४० । राना उनके शरीरों के भंग और शरीरों से चटके हवका मंडल सव भोरसे ढकगया । ४१ । इसके पीछ बह उलूक मनकाकोंको मारकर प्रसन्नहुआ वह शत्रुभोंका पारनेवाला इच्छाके समान शनुओं को मारकर प्रसन्नहुआ। ४२ । Ashwathama ci'd find no sleep That hravo wan lor did not sleep for grief and looked on at the dreadful forest. Looking at the various creatures of the forest, he saw a great number of crows on the banyan tres sleeping soundly and composedly in their nests. 35, Thile the crows were thus eleeping, Ashwathama saw an ill omened owl creep. ing towards them, With ominous sound, large, y llow body, yellow eyes, long claws and hooked beak, it flow fast like a garur. It flow softly and stealthily to a branch of the bagyon tree and killed many crowe. Having claws for weapons, it cut off the heads and wings of some and feet of others. It destroyed many of the crows in a moment, 40. The parts of their bodies covered the circular ground beneath ( ७२५८) Mahabharat (72581 सम्पन्न सातामात् ॥ ४ ॥ तास्तु हवा तत काकान् कोशिको मुदितोऽभवत प्रतिकर यथाका शवणा शत्रसदन । ४२ ॥ वद्रष्ट्या सोपध कर्म कौशिन कृन निशितद्भाध कृतसकंल्पोद्रो गरकोऽवचिन्तयत् । ४२ । उपदेश, कृतानन पक्षिणा मम सयुगे। शत्रमा क्षय गेयुक. प्रासकालश्च में मत... नार समस्या मपान्तु पाण्डवा निनाशिन • बलग्न कतारमाहा लाधलक्ष्या. महारिण ॥४५॥ राध सकाशाषन्तु प्रतिशतो वो मया पितमाग्निसमा वृत्तिमायापारमविनाशि नीम ॥ ४ ॥ न्यायतो युध्यमानाय प्राणायागा न सत्रायः। छाना तु मवेरिमार: शपूणाच झगे महान् ४७f तत्र मशयितादर्य द्योधों निःसशक्षा मषेता व जमाना मन्ते घ शासविशारदा ४८ ॥ पञ्चायत भवेशाय गस्ति लोकानदि तम् । पत। नामध्येण धर्मेण चलना ॥ ४९ ॥ निदिनानिक राधिप उलूमके कियेहुये उस छलयुक्त क का देखकर उस छलमें सकल्पकरनेपाले अकेले अजस्थामाजीने विचारकिया । ४३ कि इस पक्षीने युद्ध में मुमको उपदेश किया मेरे मनसे शत्रुओंका नाशकारी समय वर्तमानमा । ४८ अब विजयी शोभापानेवाले पराक्रमी कृतोत्माह लक्ष्पके मात करनेवाले भौर प्रहारकरनेवाने पाण्डव मेरे हाथ से मारने के योग्य नहीं हैं । ४५ । औरमैन राजाके सम्मुख जन | सबके मारनेकी मतिज्ञाकरी पतंग और अग्निकसमान अपने नाशकरनेवाली नि में महत्तहोकर मुझ पाय से लड़ने वालेका निश्चमाणत्यागहोगा और पलकरके पड़ी सादसमेत शत्रुओं का बड़ानाशाहोगा । ४७ । इसहेतुसजो संशयात्मक प्रयके निरसशयात्मक अहोना योग्यहे जो विद्यावान मनुष्य, वह इसको बहुत मानते हैं 1४८ | ऐसे स्थानपर जो वसनचाह गर्हित और लोकनिन्दितभी होय वह चाश्य धर्म प्रवृत्त होनेवाले मनुष्यको भपकरना योग्य? ४१॥ अशुद मन्तकरणाने पांडवों ने ऐसे उपप्ते भरे ये कमकिये जोकि गर्हित और पदपदपर निन्दित हैं इस विषय में पूर्व समयमें पायक देखनेवाले धर्मका विचारकरनेवाले मुख्पवाके माता लोगोंके कहेहये मुख्य प्रयोजन रचनेव ले ब्लोक सनेनाते हैं। ५१ । रामों के थकमाने पृषा होने और भोजन करने बनाने और प्रशोनेपर की सेनाको मारना चाहिये । ५। जो सेना आधारात्रिको निद्रासमय निद्रास पडत और tha trou. Tho owl was much pleased at the destruction of its enemies, the crown Seoing the dereitful work of tho owl at night, dalawatha ma thou, ht within himself · The bird has taught me. I think the death of the commu3 not far off. The victoriod. Piodavos cannot bu dlala by opon warfaro and I loups made a vow to the king loslay them My car will surely be like that of an insect falling in fire, 162,t honestly sith thou I can destroy them a great oumbora by decent and we caen will not find fault with me. I must act upon paralous prorola Tludac it'ul Pandaraghava porſormu various wicked draci. and wu hear many varits the fact that we should play onomie and their trarik & wh nowy any trud, dupapud 01.244) in cating (12591 Sauptik Pary 7c7*9 (७२-९ सानि कास्सितानि दे। सोपधानि कृताम्येन पाण्डघरकृतात्मामा ५० मस्मिन्न पुरागीता भूयन्ते धर्म चिन्तक । इलोका न्यायमपेक्षनिस्तत्वार्यास्तत्त्वदर्शिमि ॥५५॥ परिभान्ते विदीर्णे या मुलाने पापि शत्रुभि । प्रस्थाने या प्रपेशे षा प्रहर्तव्यं रिपो बलम् ॥५२॥ निद्रामदर व तथा नएप्रणायकम् । भिन्नयोध पलं यच्च विधा युकान पदयते ॥ ५३॥ हस्येव निधधके सुप्ताना निशि मारणे। पाण्डुना सह पायालेदागपुत्रः प्रतापवान ॥ ५५ ॥ स कुरा मतिमात्याय विनिश्चित्य मुहर्मुहुः । मुप्तो प्राषियत्ती तु मातुल भोत्रमेव च ॥५५॥ तो प्रबुदमदात्मानी रुपमोजीमा बलो नोचरं प्रतिषपेता तायुक्त हिया वृतौ ।। ५६ ॥ स मुहूर्चमिव घ्यावा वारूप विमलावीत तो दुयोधनो राजा पकवीरा महावल । यस्यायें पैरमस्माभिरा सपास ५७ ॥ एकाफी बहुभिः शुगर शुद्धविक्रम पारितो भीम सेनेन एकादश्चमपतिः ॥ ५८५ पृकोदरेण देण मुन्शसीमद कृतम् । मोमिषि जस्य शिस पादेन परिमृगता ॥ ५९॥ विनदन्ति च पाञ्चाला. घडन्ति च सन्ति नाश युक्त प्रधान पृथक् २ शूरोंवाली और दोभाग होनेवाली होय । ५। । उसपर प्रहार करना चाहिय प्रतापवान अश्वत्यामाने इसमकार पांचालों समेत रात्रिके समप सोतेहुये पांडवों के मारने का निषय किया । ५४ । उसने निर्दयी बुद्धि में नियतहोकर वारम्बार निश्चयकरके अपने मामा और और भोगवंशी कृतवर्मा इन दोनेा सोनेवालीको जगाया। ५५ । तव उनजगनेवाले महात्मामावली लग्जायुक्त कपाचार्य भौर कृतवाने एकमुहूर्तभर ध्यानकरके मासूमोंसे व्याकुल नेत्रहोकर यह वचत्रकहा कि वहबड़ा बलवान एकवीर राजा दुर्योधन मारागया जिसके हेतुसे हमारी शत्रुता पाण्डवों के साथ ई। ५७ । युद्धमें बहुन नाचों समेत ग्यारह प्रसाहिणी सेनाका हामी बड़े पवित्र पराक्रम वाला अकेला दुर्योधन भीमसेनके हाथ मारागया । ५८ । महाराजाधिराजका शिर जो पैरों से मईनकिया यह नीच नीमसेनने बड़ा निर्दय कीया । ५९ । पांचाल देशी गर्नते हैं क्रीड़ा करते हैं इंसते हैं सैकड़ो शड्डों को बनाते और प्रसन्नचित्त दुन्दभियों को भी and walking or otherwise at a disadvintave. One may attack an enemy at midnight or when they ae divided "Thus glorious Ashwa thama thought of slaying the Pandavas and with this view awakened his anclo and Kritvarma. 55. The two horoes on awakening shed tears and said after maditation - " Brave Duryodhan for whom we made the Pandavas our enemy, is slain The lord of eleven Akshaubinis has fallen in fightiog with Bhim He did & wicked deed in touchtog the king's head with his feat. The Panchals are exaltiag, laughing and sonnding their conchs and drums The sounds of their musical instruments fill the air. We hear the neighing of their horses, thr grunt of their elapbants and the leodine roars of ७२६.] Mallibharat 17260) च । धन्ति डान् शतशो हा नानि च दुन्दुभीन वादित्रधाषस्तुमुना वीमध शखनिस्व. । भनिलेनेरिनो धारो दिश. पूरयतीय ह ॥ ६ ॥ मवाना इष माणानां गजानाशेव वृहताम् । सिंहनादश्च शराणा श्यते सुमहामयम् ॥६२ दिर्श प्राची समाधिस्य दृष्धामा गच्छा भशम् । स्यनेमिस्वनाथैव भूगन्ते लोमहर्षणा ५६३॥ पापही राष्ट्रामा यदिद कदनं कृतम् । अयमेव प्रयःशिष्या अस्मिन्माति वैशः ॥ ६४॥ फेविनाशतप्राणा' केचित् स्वर्या कोषिवा. निरताः पाण्डवयेते मन् कालस्य पर्ययम ॥ ६५ ॥ एवमेनेन माहिन्न कार्येण तत्वतः । यथा स्पे शी निष्ठा कृते कार्यऽपि दुष्करे ॥६६ ॥ भवतोस्तु पदि प्रशान मोहा दपनीयते । पापोऽस्मिन्महत्यर्थे यन्न. श्रेयस्तदुच्यताम् । ६७॥ इति सौसिकारण द्रौणिमन्त्रणायो प्रथमाध्यायः ॥ बनाये हैं । ६० । शटोंके शन्दसियुक्त वायुसे चलायमान वामों के घोरशब्द दिशाओंको पूर्णकरते । ६. मते घोड़े और निहारते हाथियों के वदेशम्द मोर शूरवीरोंकेभी यह मिहनाद सुनेजाते हैं ।६२। पूर्वादेशामें नियत होकर अत्यन्त प्रमन्नचित जानेवालों के रथ नेमियों के शब्द जो कि रोमांचके खड़े करनेवाले हैं वसभी मुनेजाते हैं । ६६ । पाटन लोगोंभे धृतराष्ट्रके पुषोंका जो यह नाशकिया है इसाईमारी नामें हम तीनशेप हैं। ६४ । कितनेही सौ हायों के समान पराक्रमी और कितनेही सरशन विधाओं में कुशल थे वह पाण्डवों के रायसे मारेगये मैं समयकी विपरीनता को मानताएं । ६. निश्चय करके इस प्रकारके इसनेही कर्म मूत्रसमेत विचार करने योग्य जैसे कि काठन कर्म करनेपर भी ऐसीदशा है । ६६ । भारको बुदि यादे मोदी दूर नहो तो इसाड़े प्रयोजनके वर्चमान होनेपर जो हमारा हिवकारी पर भलाह उसको कदो ६० । their warrior 42. Wa hear the runmbling of their cer wheola. The Panduras baru dusimyod all our sarno18 except 48 three. Some of thom lied the strenght of a hundred clephants and clover in figltng. The times are changed no doubt. 65. Surely wo murt give our thought to all thesu things; for wo ars roluced to this condition in spice of our great e forte. Let know ploaso, what is best to bo dopo under the arcuntices, it your jatellest le pot confianded with dsixcse." 67.
(7261) Sauptik Parv सप्तिकपर्व (७२६१) कृप उवाच । श्रुतन्ते वचन सर्व यद्यदुक्त स्वयाषिभो । ममापि तु वचः किञ्चि घ्छृणुष्वाध महाभुज ॥ १ ॥ साधनधान्मानपा सर्व निवद्धा कर्मणोईयो । देवे पुरुष कारच पर ताभ्या न विद्यते । २॥ न हि देवेत सिध्यन्ति कार्याण्येन समान चापि कर्मणफेन द्वापा सिद्धि रोगत ॥ ३॥ ताभ्यामुभाभ्यां सर्वार्थी निवडा राधनाचमा । प्रपत्ताश्चैव दृश्यन्त निवृताश्चैव सर्वश ॥ ४॥ पर्जन्य पवते वर्षन किन्तु साधयते फलम् । कृष्छशेरे तथा वर्षन् किं न साधयते फलम् ॥ ५ ।। उत्थानमा प्पदेवस्य हनुत्थानञ्च दैवतम् । व भवति सर्वत्र पूर्वकस्तत्र निश्चय १६ सुपृष्टे तु यथा देवे सम्यक क्षेत्रच कर्षित । जि महागुण भूयात्तथा सिद्धिहि मानुषी ॥७॥ तपादेव विनिधित्य स्वयंनव प्रपत। प्राना पुरुषकारेतु घतन्ते दाक्ष्यमास्थिता 1८11 अध्याय २॥ कृपाचायं बोले हे समर्थ जो तुमनेकहा वह तुम्हारा सववचन पुना हे महा वाहु अब मेरे कुछ वचनकोभी सुन । १ । कि मारब्ध और उद्योग इन दोनोंक कर्मों में सप वधेहुपे हैं इनदोषातों से कछ अधिक वर्चमान नहीं है । २ । हे श्रेष्ठ अफेले देव सेही समारके कार्य पूरेनहीं होते और न केवल उद्योगही से सिद्ध होते है इसदशामें दोनों के मिळनसेही कार्यकी पूर्णता होतीहै । । । सबछोटे वडे प्रयोजनइ ही दोनों वातोंसे बँधेहुयेई और सब कार्यजारी होकर पूर्णहोते दिखाई पडते है । ४ । पर्वतपर वर्षा करनेवाला पर्जन्य किस फलको मिद्ध नहीं करता है उसीप्रकार जोतहुये खेतमें भी किस फलको माप्त नहीं करताहै । ६ । मारब्ध को श्रेष्ठ माननेवाले उद्योग और उद्योगसे रहित प्रारब्ध भी निष्फल होताहै इन दोनोंको सर्वन निययारते हैं । ६ । जैसे कि अच्छंप्रकार देवकवर्पने और खेत के जोतनेपर वीज वढे गुणवाला होता है उसीप्रकार मनुष्यों का भी अभीष्ट सिद्ध करना है। ७ । इनदोनोंमें देर बलवान है कि वह भापही रिना उपायके फलदेनेको मटत्तहोताहै इसीप्रकार सावधान और ज्ञानी मनुप्प अच्छा निश्चयकरके उपाय में मवृत्तहोत हैं 1 ८ । हे नरोत्तम मनुष्य के सवकर्म उन दोनोंसेही जारी और पूरहो। CHAPTER II Kripacharya sa d' I lave heard all that you said, now hear me all men are bound by Fate and prowess, 1d by nothing morc. All Horhe aro neither p rforiped by Fate alone por by prowess bstu must be united to accomplish deede All stoall and large works depend upon those two i 11 5o and we see their continuition and end rain falls on mountains and fit lús and gas cs fruits at both places 5 Fute and prowess are truntless withou- each other, this is an nd antted Humap ontsrprises depend upon fats as tho hopes of a culin ntor do on salu, Fate, lowuser, 18 more powerful as it can give frust without toil Il lan wen engage in doing things after deep tl ought The fact - (७२६२) Mahabharat (72621 वाश्यांसहिकायार्थामनुम्वाणानरर्षभविपन्तस्मदृश्यते निचास्तु तथषच॥९॥त: पुरुषकार सोपि देवेन सिम्यति। तथास्य कर्मणः क रमिनियतते फलम् ॥१०॥उत्पा मन्तु मनुष्याणादाणो देवपाजतम्। भफले रश्यते लोके सरंगप्युपपदितमा११॥ वत्रालसी मनुपाणां ये मयन्त्यमनस्विनः । उत्थानन्ते विगईन्ति प्राहामानव रोचते. ॥१२ मायशीर कृतं कर्म नाफा रश्यते मुवि । महत्वाच एनईदुख में एयेमा कलम चेष्टाम कुलभते यदि किश्वचष्या । योषा न लभतछत्वा वरंगों तोघुमायपि ॥ १५ ॥ शक्नोति जीपितु दक्षो नीलमः मुखमेधते । श्यन्ते जीवलो के स्मिन सामायो हितषिणः ।।१५।। यदि दतः समारंभात कर्मणों नाइनुते. फलम। नास्पबाच्यं मवेत किंचिलब्धव्यं वाधिगछति । १६॥ भकृत्वा कर्म यो लोके फल, विन्दति धिष्ठित वक्तव्यता पति द्वेषो भवति प्रायः ॥ १॥ एवमेतदवारस्य देखने आते हैं। जो पाप किया है वही देवसे ही सिद्ध होता है इसीमकार इन-कर्मवालाका कर्म सफल होता । १० । सावधान चतुर मनुष्पाका अच्छे प्रकार से किंगामा भी उद्योग जो देवसे रहितद वह लोकमें, निष्फल दिखाई देता है। १।। मनुष्यों में जो लोग आलसी, और असाहसी होने वइ. जयोगको वुराकहते हैं उसको बुद्धिमानलोग अच्छा नहीं मानते हैं । १५ । बहुघा किया हुआ कर्म इस पृथ्वीपर निफ दिखाई देता है फिर दुःखहोताहै और कर्मको, न करके घड़े फल को देखता है । १३॥ कर्मको न करके दैवयोगसे जो कुछ पाताहै और जो कर्म करके भी फलको नहीं पाताहै वह दोनों दर्लभहैं । १४ । साधान मार निरालस्य मनुष्प जीता रहनेको समय होता है और मालस्य पक्कं मनुष्य मुखेते. हदि नहीं पाताहै इस जीबलोक में कर्म करनेमें सावधान लोग बाषा दिके, चाहनेवाले दिखाई देतेहैं । १५ । जो कर्ममें मारधान मनुष्यं प्रारंभ कप से कर्मः फलको नहीं भागता उसकी कुछ निन्दा नहीं होताह जो माटहोने पोग्य अभीष्ट कोन पाता है।६। और भो कर्म को न करके लोक में फलको पाता है वह निन्दित होताह और बहुधा शत्रु होता है। जो मनुष्य इस प्रकार से इसको Tho works of mea aro accomplished by both. Essterprisos becouro successful by the help of providence. 10. The work of wise nien whoa well perforipod can bear no fruit without God's blessing. "The lazy and upoaterpuisiog speak ill of work and are thereforo depisod by tho wisa' A fork done oſtea bears no fruit and the mind is thereby allicted. Tbo fruit of work, by providence aloaa or by prowess alona ia dimcult to attain A careful and earnest worker is able to live while a laxy porean inda lifo a difficulty. '1s Howho duars not got tho fráit'pf actinna by Fate, is not to bo blamed; but ba who gotatbøfrit without work, crentis euomicz, Ho whiwarki contrary to this principo creatos difficultiu:thisis thaopinion of wide neu nork bococa fruit (72631 Sauptik Parraticano २६३ र यस्पतीपथास करोत्यात्मनोऽनीनेर बुद्धिमानव.॥ १८ ॥हान पुरुष कारण पनि देवेन वा पुन । कारणाभ्यामताभ्यामुत्थानमफले भवेद । १९ । हीन पुरुषकारेण कर्म रिवहन सिध्यति । देवतेभ्यो नमस्तस्य यस्त्वर्णन सम्पगीत। दो पाक्षिण्यसम्पमोन समोघ विहन्यते ॥ २० ॥ मुम्पनीहा पुनरिय नो इमानुपसेषते । मापूजति य करोति चहित पक। २१॥ उत्थपोरथाय हि सामान्या परसम्मता ते हम योगे पर मल तन्मूला सिदिष्यठे ।। २२ । सानो पक्षन भूत्वा पोऽयुरधान प्रयो जपेत् । उत्थानस्य फल सम्पद दवा स लभतांचरात् ।२३ ।। सगात् क्रोधाद्यालोभात पोर्यानोहेत मानव मनाशवायमानोच स शीघ्र भ्रश्यते भिष । २५॥ साय दुर्योधनेनाणे लुग्वेनादीधदर्शिना अस म ऽय समारधो मूह स्थाविचिन्तितः ॥ २५॥ रितीननारत्य समन्यासाधुमि सह । धारयमाणोऽ निगदर करके इसके विपरीत कर्म करता है वह अपने मनाँको उत्पन्न करता है | यह बुद्धिमानों की नीति है। १८ । फिर जब उद्योग अथवा देवसे रविवहो ववान दोनों तुमोसे उपाय निप्पलहोता है। १९ । इसलोक में उपायमे रहिन किया हुमा कर्म सिद्ध नहीं होगाई जो मनुष्य देवतापोंको नमस्कार करके प्रगति से प्रयोजनों को चाहतावह आलस्यसे रहित और सावधानी से सयुक्तदै कर्म की निष्फलता से नाशको नहीं पाताहै । २० । फिर अच्छेकर्मकी इच्छा यहाँजो हदका सपनरता मो अपने कल्याणको पूछताद मौर उनके हितकारी वचनों को करता सदैव उठर कर वृक्षों के भङ्गीकृत पुरुष पूराने के योग्य है बहपुरुष अंभीर सिद्धारने में बड़े तेज और मूळरखनेकाली सिथी कहेजात २।। जो मनुष्य सदों वचनों को सुनकर उपाय में महतहोता है वह थोड़े समय में उपायके फलको अच्छीगति से पाता है जो मनुष्य रागक्रोध भय और सोम से अमीरों को चाहता है वह अजितन्द्रिश और अपमान करने वाला शीमही सक्ष्मीसे रहितकर नावादावाद ।२४। सो इसलोभी भार भरी दुर्यो (पनने प्रज्ञानतासे पह विना विचारादुभा असमय कर्म प्रारम्भ किया और निषेध करनेवाले शुभचिन्तकों को अनादर करके नोचोंकी सजा से बडे गणवान less without the help of provideace or prowess. One cannot nccomplish I work without earnestness and the blessing of beaven 20 Oao doing work successfully, should ask the opiaion of old men, The advico of old me lays a safe foundation for work One doing a work with the advice of old men, accomplisheart with but little trouble. Ho who, being avandous and resentful, wishes to accomplish his work, soon becomos despised and loses Wealth. The a ranco va ao] caroleos Duryodhan began his work foolisbly and gave no boed to the advice of old mon. He made the Panda yas this eneanies, Anil natured mancannot be patient and gets intu tiub's by the ill success of (७२६४) Mahabharab (7264) बैरं-पापस्यगणवत्तरे. ॥ २६॥ पूर्वमप्यतिदुःशीलो न धैर्य कर्तुमर्हति । तपत्पर्थे विष नहि मित्राणां न का वचः ॥ २७ ॥ अनुवत्तीमहे यत्तु पयंत पापपूरुषम् । अस्मानाप्य नगप्तस्मात्मातोयं दारुणो महान् ॥ २८ । अनेन तु ममाद्यापि व्पसनेनोपतापिता। मुशिशिन्नयत किश्चित् स्यं श्रेयो नाघवृध्यते॥२९।। मुह्यता तु मनुष्यण प्रशव्या मुहदो जाना । तत्रास्य युद्धिनियतत्र धेयश्च पश्यति ॥ ३० ॥ ततोस्प मूल कार्याणां वुध्या निश्चित्य घे बुधा । तेत्र पृष्टा यथा व्युत्तरफतव्य तथा भवेत् ॥ ३१ ते षय तराष्ट्रच गान्धारीञ्च समेत्यह । उपपृच्छामहे गरया घिदुरथ नहामतिम् ॥ ३२ ॥ ते पृष्टास्तु चंदयुयत् भयो न सान तरम् । तदस्माभि पुन कायमिति में नैष्टिी मति. बनारमात्तु कार्याणां नार्थ सम्पयते पचित् ।। ३३॥ कृते पुरुषकारे च येषां कार्य न सिध्यति । देवेनोपहतास्त तु नात्र कार्य विचारणा ॥ ३४॥ इति सौप्तिकपर्वणि द्रौणि कृपपंवादे द्वितीयाध्यायः,२॥ - पाडवों मे शत्रताकरी । २६ । बड़ा दुभाष मनुष्य प्रयमही धैर्पकरने के योग्य नहीं है और अभीष्ट के पूरे न होनेपर दुःखी होताहे कि मैने अपने मित्रोंका घनन नहीं किया । २७ । हमलोग उसपापी पुरुप पोछ चलते हैं इसहेतु से हमको भी यह भयकारी अनीतिमाप्तईइ २८i अवतक इसदुःखस तपाये ये मुमचिन्ता करने चालेको बुद्धि मपने कुछ कल्याण को नहीं जानती है । २९ । भार अचेत गगुण से दुजापून योग्य उसमें उनमो बुद्धि मोर नम्राई और उसीमें कल्याणको देख॥ है ।।। । इसस्थानपर पूछाये यह ज्ञानीलोग इसके कार्यो मूलोको बुद्धिसे निश्वपकरके गैमे कहें वैसा करना चाहिये और वह उसीमकार से होगा। ३१ । हम सालोग नाकर धृतराष्ट्र गान्धारा और बड़ेशानी विदुरजीसे मिल करके पू यह हमारे पूछने पर जो कह वह निस्मन्देह हमारा कल्याण है । ३२ । सीमको फिर करना चाहिये यह मेरा दमत है कार्यों के मारम्भ किये बिना कोई योजन सिद नहीं होताहे । ३३ । फिर उपाय करनेपर भी जिनका कार्य पूरा नहीं होता रह निस्सन्देह देव मारहये हैं ॥४॥ his enterpriss by Hotlilarmy to (nonds. Wo liavo fallen in thu dig. trust by fillova thit sinful man I donot hnaw yut how to sexuru our sity. An unrise man's good and rafety lhn kakim, tha attoofha Inetik_30. He should ntum thand tiew of ni !!'s alinull oct thosdrie of Dortrauslitra and Gaouan l'o Durallestorise Vilur aun. Theso perious Fill alhnw us the uny 1 tu pracol. Our rafety li * 10 do this and I am reulsou to di Youn* 3 ned withio at paint a7 1 xuraly thwy who futh Asit anditk Ibu "31 men.
- 1265) Saupstik Priv Branco (७०...] समर उगम । रुपस्य वचन श्रुत्या धर्मार्थसहित शुभम् । अश्वत्यामा महाराज दु प्रशोकसपायत ॥ १॥ यतानस्त शाफेन प्रदीप्तनाग्निना यथा । कर मनन्तत छत्या तावुभी रयमापत ॥ २॥ पुरुष पुको बुद्धिर्या पा भवति शोभना । तुमति प पृशा स प्राधा ते स्यया स्यया ॥ ३ ॥ सय रि मन्यते लोक आमान बुद्धिमत्तम्। सस्पात्मा बहुमत सामान प्रशसति । ४॥ सर्वस्व हि स्थका प्रशा साधुवादे प्रति हिता परघुनिष नि दति स्था प्रशसन्ति चासत् ॥ ५ ॥ कारणान्तरयोगेन योगे येपा समा मति । अन्योन्येन प तुप्पन्ति पहुय पन्ति चासकृत् । ६॥ तस्यैव तु मनु स्य सा सा वुद्धिस्तदा तदा। कालयागेविषय्यास प्राप्यन्यान्य विपते ॥ ७ ॥ पिचिरात् पित्तानो मनुष्याणा विशपत । चिचपलव्यमामाप सा सा बुद्धि प्रजापते ॥ ८॥ यह वैद्य कुशलो भावाव्याधि यथाविधि। भैपर इयते यागात् अभ्याग३॥ सजय बोरे हे महाराज तर अनत्यामागी कृपाचार्य क उस कचनको जो कि अत्यन्त शुभ और धर्म भयो सयुक्तथा मुनकर दुःख शाकसे सयुक्त । । चलित अग्निरूप के समान शोकसे प्रज्वलित होकर चित्तको निर्दय करके उन दोनगि घोले । २ । कि पुरुष पुरुपमें जोर बुद्धि होनाह की श्रेष्ठ बहसब प्रथक मधक अपना २ वुद्धिमे प्रसन्न रहते हैं। । । और सब लोकके तनुष्य अपने २ को वडा बुद्धिमान मानते हैं सबकी बुद्धि बहुत अगीकत है और मब अपनी २ प्रशसा करते हैं । ४ । सरकी निजद्धि. अपनी उत्तमनाके वर्णनमें नियतहे दूमरेकी बुद्धिकी निन्दा करते हैं और अपनी बुद्धिकी वारम्बार प्रशमा करते हैं। । सभा में अन्य २ कारणों के वर्तमान होने से जिनलागों की बुद्धि एकसा है वह परस्पर. प्रसन्नहोते हैं और बारम्बार अपने को बहुत मानते हैं। । । उसी उसी मनुष्यकी वा वह बुद्ध जब समयके योगते विपरीतता को पातीहै वे परस्पर विनाशको पात हैं । ७ । मुख्यकर मनुष्यों के चित्तकी विचित्रता से चित्त की गकुलता को पाकर वा वुद्धि उत्पन्न होती है। ८। हे प्रभु इसीप्रकार वहा सावभान वैद्य बुद्धि के अनुनार रोगको जानकर औपधी देनेक द्वारा रोगकी निवृत्ती के लिये CHAPTER III Sanjiya sand, ' Hearing the salutary advice of Kripacharya, Ashwatiama, excass of grief said to the tro "Every man thinks himsaif wlaat bar 3 and Daman d fferent from otha & all men do wbat pleases them and praise thur Oto Wisdom Then praiss themsolves and bl..me there 5 Thosc bo ure of the same opinion in an assembly live happily, wut when they are disunited they meet their destruction, A difference of opinion itses out of ti o fichleness of mind. A wise physici in cures dis *Ses by useful medi Men try to arc mplish their work by their own wisdom and । in warriors Cle - { ७२६६] Malinbharat 17260 प्रसमाधीमति प्रभो । ९॥ एवं कार्पस्य योगार्थ कुर्वन्ति मानषा प्रणयावि स्वया युकास्ता निन्दन्ति मानधा. ॥ १०॥ आपया योधनेमतपणे बुध्या भवति मोहित. मध्येऽन्यया जरायान्तु से राजपते मतिन ! ११ सनवा महामोर समांव वाणिताहशीम । अवाप्य पुरुषो भोज कुरुते बुद्धिकृतिः॥ १२ (एकास्मिरण पुरुष सा सा युद्धिम्मदा तदा। भवत्पत्तप्रवत्वात सा तस्धेदन रोमानिधित्व ও যথাস বা গৰি ৰায়নি। যথা মুক্ত মাথা ব্যাক্তি ) समो हि पुरुषो माज साध्येतदिति निभित । कतुंमारभते तो मारणादि कर्मा ।। १. 1 स हि युकिमाथाय प्रक्षाचापि स्वका नपनेत विविध हित मित्ये जानते । १६॥ उपजाता यसमजा येयमय मटितम । युषयोस्वा प्रणाम मम शोकविनाशिनीम ॥ १७ । प्रज पवि. पत्राः सप्ट्या कम सामु विवाय लावणे चिकित्मा करताहै । ९ । इसीप्रकार मनुष्यभी अपने काम पूरे करन के लियेबाद को करते हैं और अपनी बुदिसे युक्त मनुष्प उसकीनन्दा करते हैं।.। मनुष्य तरुणाम एक अन्य पादसे और सम्पूर्ण भवस्थाके मध्य अन्य बदसे मोहित रोता हरवावस्थाभी अन्यही बादको स्वीकार करता है। १३ बर्मा मनुष्य बड़े पोरदुखको अयरा उसीमकारके ऐशर्षकोभीपाकर बुद्धिको विपरीत करता है। ११ । एकही मनुष्प का बुदिसमय पर उत्पन्न होती है और समय न होनेपर उसको नहीं अक्छी लगती है। और बुदिके अनुसार निश्च करके निस रिचारको अच्छंगीत से देखताहै उसीमार का उत्साह करता। वह बुदि उसके उपायकी करनेवाली हैं। १४ । हे भोजवंश का विक मनुष्य का निश्चय करनेवाला है। मेरा विचार अन्ना और प्रसन्न रोकर मारने भादिक में कर्म करना प्रारम्य करताहै। १५ । सब मनुष्य अपनी और चतुरताको हो जानकर नानापकार कर्म करते हैं और पी भानवेर कि यह मेरा हितकारी कर्म हैं। अबमेरे टु समें उत्पन्न होनेवाला जोगादिचार पैदामाद उस अपने शोक दूर करनेवाले विचार को मैं तुम दोनों से कासा । १७ । ब्रह्माजी ने मृष्टिको उत्पन्न करके और उनमें कर्मको नियत करने blame the wislom of others, 10 fari's wisdom 18 of one sort int youth and of annther in middló or olli age. His intellect deteriorater in distress and excess of say. One's own opinion n not always the Bate. It altera at times. Ha esth his mird to do the work he thinks bust. Every wan tboks his own opinion to bo the best and engagem bim in actions. 15. People do woak according to their own rindom.. Now hoar my opinion which I bare formed in my distresa Drama created the world and made various attributos protinond its various ordons. For inatance, the tendency to read the Vedas among braka nians, prowess among kshatryas, trade among Vaishyas and service *72671 Sauptik Parv सौप्तिकपर्व (९६७) यो समापन गुणमागुणम् ।। १८ मा बेदमप्रयन्तु भत्रिये तेज उसमम पारमाये व एच, सवर्णानुकलताम् ॥ १९॥ मदान्तो ब्राह्मणोऽसास्तिजाः सायिोधमा असो निम्पवे वेश्याः शूद्रश्न प्रतिकल वान् ॥ २० ॥ सोस्मिजाव कुल मेष्ठ प्राणार्या मुपद्धिते । मन्दमाग्यतयामेत क्षत्रधर्ममनुष्टिव ।। क्षत्रधर्म विदित्वाह सिपम सभितः । प्रकृया सुमहत् क न मे तत् साधुसम्मतम् ॥ २२ ॥ पादिव्य दिपायण पाप पिरनिहतं दृष्ट्वा किं नु वक्ष्यामि संस दि.१३ सदमप गंधाका सधम मुपास्य तम गन्तास्मि पदवी राक्षः पितुवा मरारमनः २५ मg, स्वशान्ति पाञ्चाला विश्वस्ता जितकाशिनः । विमुक्त युग्य, साग समनिरताः जय मस्वात्ममभव प्रान्ता व्यायामकर्षिता ॥ २५ ॥ लागि प्रमुतामा मुस्थानां शिक्षिरे स्वके । भवस्फन्दै करिष्यामि शिविरस्याप करम ॥२६ ॥ खानावस्कप चिपिरे प्रेतभूवार विचेतसः। मूदयिष्यामि विकम्य एक.वर्ण,दिशपुण रखनेवाला एक २ गुणधारण किया। १८ । बामण भेष्ठ वे क्षत्रिय भा पराक्रम वैश्य श्रेष्ठ सावधानी कर्म और शूदमें भेष्ठ सब वर्गों जापानकारी होना कहाहै । १९ । आजितेन्द्रिय ब्राह्मण निकृष्ट पराक्रमसे राहत अविष निकार्य में भसादसान वैश्य निकृष्ट और सब बों की आज्ञाका न करने बाबा सूद निकृष्ट होकर निन्दाकिया जाताद । २० । सो मैं बाहरणों के बहेपूजित उपमहमें उत्पन्न हुआएं और प्रभाग्यतासे क्षत्रियधर्मका कर्मकर्ता हुआ. जो रात्रि को जानकर और ब्राह्मणों के शमदमादिगुणों में नियतहोकर, बड़े कर्मनो ककं वह ऐरा म.साधुओं से अर्गकृत नहीं २२ में युद्धमें :दिन्यधनुष भौर मतों को धारणा सा पिताको मृतक देखकर सभा क्या कहूंगा।। २३ । भर में अपनी इण अनुसार उस क्षत्रिय धर्म की उपासना करके राना इयोपन और महाला पिता के भी मार्ग को पाऊंगा । २४ । अपांचाल देशी. दिनयते सोलित पड़े, विश्वस्त सवारी और कवचों से जुदे होकर, प्रसन्नतायुक्त सोते वर पकेट्ये परिश्रम से पादावान अपना विजयको मानकर शपन करेंगे। २९ अपने टेरों में मुखसे नियव और सोनेवाले उन पांचाल देशियों के डेरो के उस नाशको करूंगा जोकि कठिनतासे करने के योग्य है । २६ । अबउन अचता amung sludras., A brahman having no control over senses, a kshatr y"destituter prowc83, & vashya without trade and a disobedient shudra are despised. 20, I am born in a doble brabman family and have been doing the work of a kehatrya 1 wall not done be respect. od among bråbräns, if I do their work. 1 sball not be able to show my face in court without arenging the death of my father. I shall tread $ba path of Duryodban and my father and do the work propor tu a Kahrtryde Thé l'anchals and their beasts are now sleepizg soundly after theit" great victory. They aro destitute of Armours and are 1 (७२६८) Mahabharat (726) मधानिक दानधान् ॥ २७ ॥ अद्य त न सहितान् सर्वान् धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । सद यिष्यामि विक्रम्य कक्ष दीत इवानल । निहत्य क्षेत्र पांचालानशान्तिलम्चाम सत्ता ॥२९ ॥ पाउबाले पु धाराम मद यन्नयसयुगे । पिनाकपाणिः संक्रुख. स्वयं रुद्र पशुश्विच ॥३०॥अघाई सर्प पाचालानिमत्य तिहत्वामहविष्यामिसंधोरणे पाण्डुसुतास्तथा ॥ ३१ ॥ अधाऽई मर्यपाउमा अन्धा भाम शरीरिणीम् । प्रत्यक शस्तेषु भविष्याम्यनृण. पितु ॥ ३२ ॥ दुर्योधनस्य कर्णस्त भीमसैन्धवयोरपि । गमयिष्यामि पाञ्चालान पदवीमध दुर्गभाम् ॥ ३३ ॥ अथ पाञ्चालराजस्थ घट धम्नस्य ये निशि । नचिात् अपिगमि पशोरिव शिरो घलात् ॥ ५४॥ अध पाया पाण्दूना शतिताना मजाशि । खगेम मिशिने माजी प्रमाणिवामि, गौतम ॥ ३५ ॥ अब पाचालसेना तो निहस्य निशि सौप्तिके। मृतकस्य सुचीच घमावण्यामिमहामते ३६ इतिथी सौतिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां तृतीयोऽध्याय ।। ४ । मृतकरूप पांचाल देशियों को हरे में पराजयकरके और पराक्रम करके ऐसे मारूंगा जैसे दानवों को इन्द्र मारताहै । २७ । भर उन धृष्टद्युम्न आदिक सप पांचालों को एक साथही ऐसे मागा मैसे कि बालित भनि मूखे बनको हे श्रेष्ठ मैं पुदमें पांच,लों को मारकर शान्तीको पाऊंगा । २९ । अवमैं युद्धमें पांचालों को मारता पांवालोंको के भाव में ऐमाटुंगा जो कि पशुमोको मारते पशुओं के मध्य में कोषक्त पिनाक धनुपधारी भाप स्टनी होते हैं। ३० । प्रा अत्यन्त प्रसन्न सब पांचालीको मारकाटकर वसीमकार से युद्ध में पांडवोंकोमा पाडावान कहंगा । ११ । अब मे पृथ्वीको सब पांचालों के शरीरोंसे पूर्णकरके प्रत्येकको मारकर पिताके ऋणसे अहूगा । १३ । भव मे पापाको दुर्योधन कर्म भीष्म और जयद्रथ के कठिन मार्ग में पहुषारूंगा। १३ । अब मैं राधिक समय थोड़ी देर में पाचालोके गजाधृष्टद्युम्न के शिरको एसेमधूंगा जैसे कि पशुकेशिरको मर्दन करने ।५४ । हे कपाचार्य जी भव में पांचाल देशियों के और पाण्डवों के सोतहुये पुजोंको रात्रिकेसमय युद्धभूमिमें तेजखड़गसे मधूंगा । १५ । हे व बुद्धिमान अब मै गीतके युद्धमें उम पांचालको सेनाको मारकर कृतकृत्य होकर खीहुँगा ॥३५॥ lying within their tatt, 1 shall destroy them in their camp and sball do a difficult deed 1 shall now slay them as Indra does tho danavas. 1 sball destroy thom as fire doca dry fulest. 1 alall roam among thorn as Shiv tho wielder (f l'innk roawie arong animals. 30. Having slain the Panchals, I shall destroy tho Panda vas. Having destroyed the Panchols, 1 shall be free from the debt of my father. 1 shall cut off the head of Dhruuletudyumn of Pauclul libu that of a Ucast. 1 shall cut or the sleeping seas of the Panchala andPandaran will ny sharp sod 1 tball xainfy ry rogo by alizing ibo aray of Punched abbiglia". 35.- है (7269) Sauptik Parv aitage (७२६९] कृप उवाच । दिष्ट्या ते प्रतिकाव्ये मतियोतयमव्युत। ने या धारयितु शको धम्रपाणिापि स्ययम् ॥ १ ॥ अनुशास्पावनान्तु प्रभाते सहिताघुमौ । अध रात्री विधमस्थ पिमुफकपष:पन । २॥ पाननुयास्यामि कृतपर्मा सात्वतः । परा मभिमस पान्तं रथाघास्थार दशितौ ३ ३ ३ भाणयां अमित शम् श्यो निहन्ता समागमे । विक्रम्य रथिनां प पायाला सपदानुगाम् ॥ ४॥ शतात्यमसि घिफ्रम्प विभाव निशामिमाम् ॥ चिन भारतात स्थप तायलिशामिमाम् ॥ ५॥ विधान्त ध्वपिनिद्रा मुस्थविध मानद । समय समरे शत्रू पधिप्यसि न सशय ॥ ६ ॥ महि स्वां रयिमा श्रेष्ठ प्रगतपरायुधम् । जेतुमुत्सहते काचिदपि देवेषु घासद ७॥ रूपेण सहितं यान्त गुप्तञ्च सधर्मणा । फो द्रोणि युधि सरन्ध योधयेदपि देवराट ॥ ८॥ ते घय मिशि विधान्ता शिनिद्रा विगतज्यरा । प्रभातायौ रजन्पा ये निशान अध्याय ॥४॥ कृपाचार्य पोले कि मारब्धसे बदलाळेने में तेरी अविनाशी बुद्धि उत्पन्नहुई है आप इन्द्रभी तेरे रोकनेको समषं नहीं है । १ । इमदोनों एकसाथी प्रातःकाल के समय तेरेपीछे चलेंगे अब रात्रि कवच और ध्वजासे पृथर होकर विश्राम करो । २ । मैं और पादय कृतवर्मा अलंकृत रथोंपर सवार होकर तुझ शत्रुमा सम्मुख जानेवाले के पीछ चलेंगे । ३ । हे रथियों में भेष्ट मातकाल के समप तुम हम दोनों के साथ सम्मुखतामें पराक्रम करके शत्रु पाञ्चाओं को उनके साथियों समेत मारोगे । ४ । तुप पराक्रम करफे मारने को समर्थ हो इसरात्रि में विधामकरो हे तात तुझको जागते पे बहुत विलम्ब हुई तब तक इसरात्रि में शयनकरो । ५ । विश्रामपुक्त शपन से सावधान चिच तुम युद्ध में शत्रुओं को पाकर मारोगे हे वडाई देनेवाले इसमें संशप नहीं है । ६ । देवतानों के मध्य में इन्द्रभीतुम रथियों में श्रेष्ठ बाम शस्त्रपारी के विजय करने को उत्साह नहीं करता है । ७ । कृतवर्मा में रक्षित और कृपाचार्य के साथ जानेवाले युदमें क्रोषयुक्त यमत्यामा से इन्द्र भी युद्धनहीं करसक्ता । ८। इम रानिमें विश्रामयुक शयन करनेवाले तापसे CHAPTER IV Kripacharya said,' It ia by Fute that you are revenge, even Indra can not deter you from{youi purpose. Both of us together, will follow you in the morning, let ug set aside vur armour and banner and take rest for the night. Kritvarna, the Yadav, and I will follow you, destroyer of fees. Tomorrow you, accompanied by us, will destroy your Fanchal foes. You have the power to slay Take rest during the night, for you have not slept yet. your mina fresh after repuse, you will slay the foes without doubt. Even surrounded by gods, Indra cannot conquer you, brige warriors i rotected by Krityarma and followed by Krspacharya orraged Ashy. resolved to take - 5. With ७२७०) Maablinrat (7270) यामशाप्रधान ॥९॥ तप वस्त्राणि दिव्यानि मम चेव न संशयः । सात्वतोपि मह यासो नित्यं युद्धेषु कोषिषः ॥ १० ॥ ते वयं सहितास्तात सर्वान् शन समागतान् ! प्रसध समरे हत्या प्रति प्रापस्याम पुष्कलाम । विश्रमश्व स्वमन्यनः स्वपचेमा निशा सुखम् ॥ ११ ॥ अदच कृतधर्मा च त्यां प्रयान्त नरोत्तमम् । मानुयास्याप सहितो धन्विनी परतापनी रयिन वरयायान्तं रथमास्याय देशिती ॥१३ ।। स गत्वा शिविरं तेषां नाम विधात्य चाहये । ततः कर्तासि शनां युध्यतां कदनं महत् ॥१४ ॥ इत्याच कदनं तेषां प्रमाते चिरलेहनि । विदरस्व था शकः सूदवित्या महासरान ॥ १५ ॥ त्वं हि शको रणे तु पाचालागां वरूथिनीम | दैत्यसेनामिव कुमः सर्वदाजधसूचन ४.१६ मा त्वां सहित संदये गुप्तञ्च कृतवर्मणा । न सहेत विभुः साक्षात्रपाणि पि स्वयम ॥१७॥ न चाई समरे तात नवमा न चैव ह । निजित्यरणे पापडून म्यप्यास्याय कहिचित्र ॥१८॥ हत्या च समरे बुद्धान् पाञ्चान् पाण्डुभिः सह । रदिप्त पात कालं शत्रुनों के लोगोंको मारेंगे । ९ । तेरे और मेरे दिव्यभवहैं और बड़ा धनुषधारी यादव कृवर्मा भी युद्धोंगे निस्सन्देह सावधान है। १०॥ हेतात म सानों एकसाथ मिलेहुये सप शत्रुओं को हठसे युद्ध में मारकर उत्तम मानन्द को पायेंगे तुम सावधान होकर विश्रामकरो और इस रात्रिमें पुखपूर्वक शयनकरो । ११ । मैं और कावर्मा धनुपधारी शत्रुओं के तपानेवाले कवचधारी दोनों एक साय रथपर सवार होकर तुझ शीव चलनेवाले नरोत्तम रथी के पीछे चलेंगे ११॥ इसके पीछे घुप उन्होंके डेरोंमें जाकर युद्ध में नामको -मुनाकर युद्ध करनेवाले शत्रुओं का बड़ामारी नाश करोगे । १४ । माता काल के समय उनका नाशकर के ऐमे विधारकरो मे कि महा असुरों को मारकर इन्द्र विहार करता है । १५ ॥ तुम पुदमें पायालों की सेनाके विजय करनेको ऐसे समर्थहो जैसे कि सब दानधों का मारनेपाली क्रोधयुक्त इन्द दैत्योंकी सेनाको मारकर विहार करताहै। १६ । पत्रधारी समर्थ साक्षात् इन्द्रभी तुम मेरेसाथी कृतवर्मा से रक्षित को युद्धमें नहीं सहसकाई । १७ । ३ तास में मार कृतवर्मा यु दमें पाएडवों को विजय किये विना कभी लौटकर न भागे । १८ । हम सर युद्धमें नोपयुक्त पांचालों समेत पांडवों thancn is inestiblo in Vatti.) oven by lodro. We phul slay qup icey in tho morning when our ſe ver las abated after repo ko at night. You and I possess divino Weapons and Kritvarma, the great Yadav Archer, is clover in fighting, Wo thres, unitel together, aro sure to destroy our foot. Tako otre to sleep for tho night. Kritrarma and I, casod in armour, will follow your car. You will say them tomiriow as Indra doosasure, 15, You can slay the Panchal warrio s as Indra door the aiurs, Erua Indra cofinot resist you protected and nocom paniod by wo aod Kutvarida no you shall be in light Kritrarmn found I will never return willsont conquering the Pandavas in butilo, - (7271) Sauptik Parv सौप्तिकपर्व नितिध्यामहे सर्पहता धा स्वर्गगावयम् ॥ १९ ॥ सपायैः सहायास्ते प्रभाते षय माहये। सत्यमेतन्महावाहो मनवीमि तधामघ ॥ २० ॥ एवं मुक्तस्ततो द्रोणिर्मातुलेन हित वनः । अन्नचीन्मातुल राजन फोघसरतलोधनः ॥ २१ ॥ भातुरस्य कुतो निद्रा नरस्याभतिस्प च । अर्याचिन्तयतश्चापि कामयानस्य धा पुनः ॥ २२. : तदिदं सम नुमाप्तं पश्य मद्य चतुष्टयम् । यस्य भागश्चतुर्थो में स्वप्नमनाय नाशयेत् ॥ २३ ॥ गाम दुःख लोकस्मिन पितुर्वधमनुस्मरन । हृदयं निहन्मे राज्यपानि न शाम्यति ॥ २४ ॥ यथा च मिहतः पापैः पिता मम विशेषतः मित्यक्षमपि ते सर्व तनो मर्माणि सन्तति ॥ २५ ॥ फधं हि माहोलोके मुहर्तमपि जीवति । द्रोपो हनेति तवायः पाञ्चालानां श्रणोम्यहम् ॥ २६ ॥धृष्टद्युम्नमहत्याजी नाहं जीधितुमुत्सहे। स मे पितु धंधानुध्यो पाउचाला ये च साताः ॥ २७ ॥ पिलापो भगसक्यस्थ यस्तु राज्ञो मया को मारकर लौटेंग अथवा मरकर स्वर्गको जायेंगे। १९ । हे निष्पाप हम मातः- काल युद्धमें सव उपायों से तेरे सहायक हे महावाहु मैं यह तुझसे सत्यर ही कहताहूं । २० । हे राजा मामाजी के ऐसे हितकारी वचनोंको सुनकर क्रोधसे रकने अश्वत्यामाने मामाजीको उत्पादिया ।२१३ किरोगी बोधयुत पनार्दिक के शोचकरनेपाल भौर कामी इनोगोंको निद्रा कहाँसे होसक्तीहै । २२ ।अव पहमेग क्रोध चौथाई उत्पन्न हुभाई वह चौथाई क्रोध दिनके अर्थ शयनका नाशकरना । २१ । इसलोकमें क्या दुःखहै कि पिता के मरण को स्मरणकरता और जैलता हुआ मेरा हृदय अव दिन रात्रि शान्तिको नहीं पाताहै। २४ । मुस्प करके जैसे प्रकारसे मेरा पिता पापियों के हाथसे मारागया वहसव आपके नेत्र गोचर है वह मेरे मम्मों को काटताहै । २५ । लोक में मुझसा मनुष्य एकमुहूर्त भी कैसजासत्ता है जो पाञ्चालोंका वचन सुनता है कि द्रोणाचार्य मारेगये । २६ । में धृष्टद्युम्न को न मारकर जीवते रहनको उत्साह नहीं कर सकाई वहमेरे पिता के मारनेसे काटने के योग्यहै और जो पांच लदेशी इकट्ठे हैं वह सबमी वध्यहैं । २७ । इसकेविशेष Wo shall return after slaying the Pandavas and the Panchals or shall go to paradise. Bulioveme, brave man, we shall helpyou in tonorrow's batia " Hearing the good advice of bis uncle, Ashwatharta replied in "How cau oue find slurp over anger, loss of wealth und love sich ness 1 it is only a fourth part oliny rogo devoloped; butitisur.ough to destroy my sleep at niglit. iiisa anoall ,thing that l rest by night or day as 1 remember the death of my father. You baro sucn Low my fatuur was slain by thoso sinful men und it cuts we to the quick. 25. Ooo lile mo capuot livo in the old when one luurs from tho Panchals that Drugaclarga is clair, I cannot livu without slaying Dbrishtadyuw. He and his 'o lurrers deserv death by taling part in tho slaughter if may fathe'. Erailer, whore heart will out burn at Duryodhan's lansetations that I lur heard ! anger, find no (७२७२) Minhabharat (72721 श्रुतः। स पुनर्हदयं फस्य रस्पापिन निर्दवत् ॥ २८ ॥ कस्य फरुणस्यापि त्राभ्या मनु नायजेत् । नृपतमग्नतपयस्य थुत्या तान्यचः पुनः ॥ २९ ॥ पन्ना मित्रपक्षो मे मयि जीरति निजितः । शोकमे पदं गत्येष पारिवग इवाणंवम्। एकाममनसो मंध तो निद्रा कुतः सुखम् ॥ ३०॥ पादेयार्जुनामांहि तानद परिरक्षितान'। अविस छ मन्मन्ये महेन्द्रगापि मातुल ॥ ३१॥ न चास्मि शक्त संयन्तुं फोपमेत समुत्थितम् । तपश्पामिलासीस्मन् यो मो कोपानिधयेत् । इति मे निश्चिता युधिरपा साधु मताच मे ॥३३॥ धार्मिक तथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभय । पाण्डवानाञ्च विजयो मयं दहताय ॥ ३४॥ सन्तु कदा कत्या शत्रणामय सौप्तिक । ततो मिभागिता चैव स्वप्नाचविगतज्वरा ॥ ३५॥ इति सौप्तिकपर्वाण द्रौमि भत्रिणायां चतुर्थो ध्यायः ॥ ४॥ जो मैंने टूटी जंघापाले राजाका विलापना वह किस निर्दयके भी नित्तको नहीं भस्म करेगा । २८ । फिर टूटी जंघावाले राजाके उसप्रकारके यचों को सनकर कौनसे निर्दय मनुष्य के अश्रुपात नही होंगे । २९ । मेरेजीवते ये जो यह मेरामित्र पक्ष मिजपकिया या मेरे शोकको ऐसे बढ़ाताहै जैसे जलकावेग समुद्रको यदाताहै अब मेराचित्त एकाग्रदै निद्रा और मुख कहां है । ३० । हे श्रेष्ठ में बासु देवनी और अर्जुनसे रक्षित उनलोगों को महाइन्द्रसे भी सहने के योग्य नहीं जान ताहूं । ३१ । और इस उठेपे क्रोध केभी रोकनेको समर्थ नहीं हूँ मैं इसलोकमें ऐसा किसीकांभी नहीं देखताई जो मुझसे मेरेकोघसे रहित करसके इसीप्रकार साधुओं की अंगाकत इसमेरी बुद्धिकोभी कोईनहीं लौटासता । ३३ । मेरे मित्रोंकीपराजय और पाण्डवोंकी विजय जो दूतोंने वर्णनकी वह मेरे हृदयको भस्मकररही है।। ४१ भव में रात्रिके युद्धमें शत्रुमोका नाशकरके फिर तापणे रहितहोकर विश्राम करके शयन करूंगा १५॥ Who will not shed tears-aftor hearing that prince with the broken tługh. The defeat of my friends during my life two incresses my grief like r surge's swell Ify mind is made up and I can have no repose 30 Protuced by Vasudev nail drjuu they ale irresistible even by Indra. I cannot checl ray rning anger. None ern check my angei o turn mo from my purpose The nows of my friend'dis feat und enemics' victory burns my breasl. 1 Ehall be able to find rest after playing my enemient mght, "35 7273) Sauyuik Pal v rucat 1 ७२०३) इप उवाच । मुभूपि दुर्मेधाः पुरुपोयतोद्रियः। नालं वदायतुं फरस्ती धर्मार्था विति मे मतिः ॥ तथैव तावन्मेधावी गिनन शिक्षते। न चाकञ्चन जानाति सोपि धाय निधयम् ॥ २॥ चिरं शपिजड़ः शूरः पण्डित पर्युपास्यद । न स धर्मान् विजानाति दर्षों सुपरसानिव ॥ ३॥ मुहमपि तं प्राश पण्डित परगुंगास्यह। क्षिप्रं धार विजानाति जिठरा सूपरसानिः । शुश्रूपुरत्येव मंधात्री पुरुषो नियतेन्द्रियः । जानीयादागमान सपान प्रावधान पिरोधयेत् ॥ ५ ॥ बनेपरवयमानी योदुरामा पापपूरयः । दिधमत्सत्यकल्पाणं करोति बहु पापफाम । ६॥ नायवना 'तु सहदः प्रति धन्ति पापयत् । निवतन्तु लक्ष्मीनिालक्ष्मीवानियते ॥ ७॥ यया च्वायचे बपि विचिसो नियम्पते । तथैव महदां शवो न शक्सववसीदति ॥ ८ ॥.तथैव अध्याय ५॥ समाचार्य बोले कि दुर्बुद्धी और अजितन्द्रिय मनुष्य गुननेका अभिलापीभी सम्पूर्ण धर्म अर्थ के जाननेको समय नहीं है यामेरामा है । १ । इसीप्रकार शानों के स्मरण रखनेवाली बुद्धिकास्वामी पुरुष जवतक नीतिको नहीं सखिताहे तबतक यहभी धर्म अर्यके निश्चयको नहीं जानता है । २ । असन्त भवान शूरवीर मनुष्य बहुत कालकक भी पढित के पास वर्तमान सेवाकरके धर्मोको ऐसेनहीं जानता ने कि पजनके स्वादुको चम्मच नहीं मानताहै । ३ । ज्ञानी पुरुप एक मुहूर्तभी सपंडित के पास बैठकर शीघ्रही ऐसे धोको जानता है जैसे कि दाल गादिके स्वादुको जिहला पानलेती है। ४ । वुद्धिमान जितेन्द्रिय और सेवाकरने वाला पुष्प सब शाम्राको जानता और प्राक्ष वस्तुओं से विरोध नहीं करता है। ५ । जो दुर्बुदा और पापी पुरुप है वह सच्चेमार्ग में पहुँचाने के योग्य नहीं है वह उपदेश कियेहुये कल्याणको त्यागकरके बहुतसे पापों को करता है। ६ । फिर शुभचिन्तक लोग सनाथ पुरुपको पापसे निपेष करतेहैं और धनकास्वामी उसपाप से लौटता परन्तु पनरहित पुरुप नालौटताहै । ७ । जैसेकि विषयों में प्रदत्तचित्त पुरुप नानाप्रकारके वचनोंसे भाधीन किया जाताहै उभीमकार शुभचिन्तक मित्रसे समझाने के योग्यहै भार जो योग्य नहीं है वह पीड़ापाताई । ८ । इमी प्रकार CHAPTER V. Kritvarma said, ,' I thiok that one having no control over passions cannot bo benefited by advice even if one be willing to hear, and the samo is the caso with one who has read the all1911ar but no Politics, a foolish warrios cannot learn bis duties in the society of Iramed men as tho spoon doos not know tho flavour of things, but a wise nap leaing it in an instant as the tonguo doce the flavour, A vise and obedient pupil having cuntrol over pass.ons leurng all tho Lnobs und is willing to a quiro useful things. 5. An udvist and s'olul man cnn. not go in the right path and comin'ts inany sins by disregarding tho । [७२७१॥ Maliabharat (7274) मुइदं प्राश कुवाणं कर्म पापकम् । प्राज्ञाः संपनियेपन्ति यथा शक्ति पुनः पुनः ॥ ९ ॥ स कल्याण मनः कृत्वानियम्यात्मानमात्मना।कुरु मेघचनेतात येनपश्चान्न तपस्यसे॥१०॥ म यध पूज्यत लोके सुप्तानामिह धर्मतः । तथैवापास्त शत्राणां विमुकरयाजिनाम ॥ ११॥ ये च व्युम्नयामीति ये च स्यु' शरणागताः। विमुक्तम्छा ये च मे चापि सधाहनाः ॥ १२ ॥ मद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विमुक्त कवचा विमो । विश्वस्ता रजनी सर्व प्रेता व विंचतप्तः ॥ १३ ॥ यस्ते जदयस्थान दुोत' पुरुषोऽनुजः।व्यक सनाफे मोरगांध विपुलेशवे । १४ ॥ सनिविदुषां लोके श्रेष्ठ स्त्वमसि विभुत । नच ते जातु लोकस्मिन् समूदमा किर्मिययम् ११५ त्वं पुनः मूर्षसङ्काशः श्योभूत उस्थित रघौ । प्रकाशे सर्वभूनाना विजेतायुधि शायान् ॥ १६ ॥ असंम्भावितहि. त्वयि कर्म विगहिनम् । शुफ्ले रक्तमिव भ्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ॥ १७ ॥ शानीलोग पाएकर्म करनेवाले बुद्धिमान् मित्रको सामर्थ्य के अनुसार बारम्बार निषध करते हैं। ९ । कल्याण में चित्त करके और मनसे बुद्धिको आधीनता में करके मेरे वचनको कर जिसके कारणमे पीछे दुःखी नहो । १० । इस लोकमें सोनेवाले पनुष्यों का मारना और इसीप्रकार मात्र स्य और घोड़ों से रहित मनुष्योंका मारना धर्मो प्रशंसा नहीं किया जाताहै । २१ । जो कई कि मैं तेरा हूँ जो शरणागत होप जो खुलहुये कैश होय और जो मृतक सबारी कालाई । १२ ॥ हे समर्थ इन सबका मारना भी निषेध हैं कवच से रहित मृतक के समान अचेत निधास युक्त सब पाञ्चाल लोग सातहैं । १३ । जो कुटिलपुरुप सदायाले उन पांचाळ देशियोंसे शत्रुताकरेगा वह अथार विना नौकावाले नरकरूपी समुद्र में वेगा । १४ । तुम लोकके सव अत्रज्ञों में श्रेष्ठ विख्यातहे। इसकोस्में कभी तुझसे छोटामा भी पाप नहीं हुआ। ५ । फिर सूर्यके समान तेजस्वी तुप मात काल के समय सूर्योदय होने और सब नीयाके प्रकट होनेपर युद्धमें शत्रुभों के लोगोंको विजय करोगे । १६ । मेरै मतसे तुझमें ऐसा निकृष्ठ और निद्धि कर्म ऐसा असम्भव है जोकि क्षेतरगवालापत रक्तवर्ण-हांना असम्भवहै । १७ । अश्वत्थामा lestons tought to him. Well wishers turn a man from sin, but it is tlie fortunato who follows their advice. It is the duty of lathful friend & to offor all vice, but lie who does not ficar it falls into difficulty. Similarly, wise won binder & vise friend from falling into eril vays. You should oarofully listen to my advice to that you may not full iuto difficulty. To slay a slzoping, unarmed and carless man is not conviendable like that of a refagce or of one with disbovelled hair or of ons whoso beast is dead. T'hi Panchals uro sleeping without armour lıke dcad men. Ho wlio slays them in that stats, will fall into bottom iese puidition. You aro x famours warrior of the futid upd hayo novur coromitto la siis. 15. You can slay your foes in day light भग्नसक्यस्थ (72751 Sauptik Parv लौनिकपर्व महत्यामावा । एवमेव तथात्य मातुलह न संशयः तस्तु पूषमय सेतुः शतधा विदलीकृतः ॥ १८ ॥ प्रत्यक्ष भूमिपालानां भवताम्यापि सनिधो यस्तशस्त्री मम पिठा धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ १९ ॥ कर्णश्च पतिते धकं यस्य रधिनां वरः। उसमे ज्यसमें सम्मो इती गाण्डोषधधना ॥ २०॥ तथा शान्तमपो भीमोग्यम्तशा निरा युधः । शिस्त्रण्डिने पुरात्व हतो गाण्डीवधाधिना ॥ २१ ॥ भरियामहे वासस्तथा मागतो रण। फोसता मूमिपालाना युयुधानेन पातितः ॥ २२ ॥ दुर्योधन भीमेन समेत्य पदमा रोपपता भूमिपालानामधर्मेण निपातितः॥ २५ ॥ एकाकी पनि स्तष परिवार्थ महारथः । ममण नरव्याघ्रो भीमसेनम पातितः ॥ २४ ॥ विनाको पो 'राः परिभृतः । धातिकानां कथयता म में मर्माणि फन्तति ॥२५ ॥ धापार्मिकाः पापाः पान्माला भिन्नसेतयः । ताने भिग्नमर्यादान किं भवान बोडयावानीगा आप कहते हैं वह निस्सन्देह वैशाही है परन्तु प्रथम उन पाखानानेही इस धर्मरूपी पुलको तोड़ाई । १८ । शास्त्र त्यागनेवाला मेरापिता रामानों के समक्ष में प्रापलोगों के मी. देखते ये धृपद्युम्न के हायसे गिरायागया । १९ । पिमाल कर रय चक्र पृथ में घुसनानेपर बड़े दुःखमें डूबाहुआ उस भुनके शरसे मारावा । २० । इसीप्रकार मात्र त्यागनेवाले धनुप भादिकसे ररित तनुष भीष्पनी मा विशको भागकरके अर्जुनके हाथमे मारेगये । २१ । इसीप्रकार पूवमें घरीर पागमे के निमित्त वैठाहुमा मूरिश्रया राजाओं के धुकारणे सारपाककहावते मारागगा । २२ । दुर्योधन गदासमेत मामसेनके सम्मुम प्रोकर रामाजीके देखते अधम्मसे मारागपा । २३ । यहां अकेला नरोत्तम पास रचिोले पिरकर अधर्म पुक्त भीमसेन के हायसे गिरायागया । २४ । मैंने तोंके मुखले दूढी जवापाले रामाका जो विलाप पुना पद मेरे मर्मस्थलों को काट तारे । २९ । एस प्रकारसे पांचालदेशी लोग अधर्मी पौर पापी है जिनका कि धर्मका पुषट नपाई माप इसप्रकास उन पे मर्यादवालोंकी निन्दा नी फरहो You abould keep aloof from such a heicons sin as the white is from Horodh." To iris Astiwatuama replica, " Yua speak the truth uncie But the Pandavas have already broken tho bridge of Virtue, dly father, who had laid eido big weapons, sas slain by Dhrishtadyumn in your own proeun, Karon the liravest of warriors vis wJain by Arjun when the wheel of bis car was stuck in mud. 20. 8 milaily Bhishma tho son of Sbantaou, without a ws and scapons, was slaid by arjan led by shikhandi. In the same manner, Bhurishrava, who had exposed hiauself to death in the fuld of battle, w14 sluis by Baigabi is spite of tsc reinonstrations of all the warriors Duryolan was unjustly hit by him in tho prescace of all the bioge. Flo rocaired an unfair blow when he was aluna and the encry surround {७२७६) Maliubbarat (7276) धिति २६ ॥ पितृहन्तनह हल्या पाञ्चालानी सौप्ति के काम कीट पतंगो वा जन्म प्राय भवामि ॥ २७ ॥ बरे चाइसनेनाच. परिंद में चिकीर्षितमा तस्य मे स्परमाणस्प फुतो निधा कुतः सुख्खा ॥ २८ ॥ स जात पुमाळोके कश्चिम स भविष्यात या भे पादत्त येता येतेपाता मतिम् ॥ २९ लग्जच उथाच । एष मुक्त्वामहाराज द्रोपापुष प्रतापयाम् । एफारसे पोजविरमाला प्रामाभिमुखः परान १३० समज महारमानी भोजशारघमामी। किमर्ष स्वान्दो पुत: किम्य । कार्य विकीर्षितम् ॥ ३१ । एसाथमपणती या द नरर्षय । मनमुमो चापि नाव शशिसमहति ॥ ३२ ॥ अश्यायागा नद्ध. पितुर्थमनुस्मान् ! ताला सदायस्थो यस्मात्माविकी वित्तमः ॥ ३३ ॥ हत्या सहसा बोथामा मितिः शो. न्यस्तशस्त्रो मम पिता अमोन पारित ॥ ३. हनिला सर्माण १ २६ । में रात्रि समयानमा पदमें माने पिताके मारनपाले पांचालोलो मारकर जन्मपाकर चाहे कीर पतभी होगाऊं । १७ । और में इमोतुसे शीनता करता हूं कि जो यह मेरे कर्मकार की याद सतयुध शीघ्रया करनेपालको कहां निद्रा और मुखहै । १८ । यह पुरुभ में पैदा हुआहै न होगा नोकिन पांचाल देशियों के मारनेमें पद मति ऐका मुझको हो । २९ । संजय बोले हागम मतापवान् आत्मामामी इमार कहकर मार एकान्त में घोड़ों को मोड़कर शत्रुओं के सम्मुलगथे । । । पड़े साइती वर्मा और पापा भी रोमों उससे कहनेलगे कि किसनिमित रपको जोड़ाई और क्या कर्मकरला पार हो । हे नरोत्तम तेरे साथ हम दोनों यलेंगे एकसा दुलदुःसपा हमदोमापर तुमको सन्देहकरना उचित नहीं है । ३१ । पिताके मरणको स्मरण करते अत्यस क्रोश्युक्त अश्वत्थामाजी ने अपने मनका पर सत्य सस्प पिचार मनसे वर्णन किया जो उसके चित्ता करने की इच्छा ।।३. सेमराणोंसे बालों: पूरतीरोंको मारकर शौंका त्यागनेवाला मेरा पिता पदमें धृष्टद्युम्न के हाथमे मारागया । १४ । निश्चय करके od him in large numbers. The lamentations of the king, with brokos thighs reported to me by the informers, break my hearb IWhydo you not blame the Panobals who are so lau long and suful II shall avenge my father's death by slaying the Pitachals at pight, though I have to be born amoog reptiles, I am therefuro in a hurry to work and cau find au rust No earthborn man can turn mo from my 1030- lution of slaying the Panchals. "Sanjaya continued, " Havug said this, Ashwathama bgan putting his horses to the car, 30. Brava Ketrarna aad Kriptcharya said to him, " Why havo you preparod' your car and what will will you do? We must go along with you. Afavo su-picion of us who are your partners in wenl and worros 17277) Suptik Parv सौप्तिकपर्व (७२७) भय घे। पुत्र पाउबालराजस्य पापं पापेम कर्मणा ॥ ३५ ॥ कथाच निता पापः पाम्चाल्यः पशुधम्मया। शसंग विजिताल्लोकामाप्नुयाविति मे मतिः॥ ३६ : शिम सनदकाची सखड्गापासकामुको । मामास्थाय' प्रतीक्षेतां रथषयों परन्तपी II.२७ । इत्युस्या रयमास्याय मायादभिमुखः परान् । तमम्बगात कपो राजन केस धर्माच सास: ॥ ३८५ ते प्रपाता भरोचत परानभिमुखारयः। यमाना था परे समिया रस्यानाः ॥ १९ ॥ ययुश्च शिविर वेषां संप्रमुप्तजनं विमो द्वारदे शान्तु संप्राप्य द्रौनिस्तस्थौ महारथः ॥ ४०॥ शात सौप्तिकपाविद्रोणिपुहिडिवशिविरगमने पञ्चमोऽध्यायः ५॥ में इसीपकार इसपापी धर्मके त्यागनेवाळे राजा पांचाल के पुत्र धृष्टद्युम्नको पापकर्म से मारूंगा । ५५ । मेरे हाथसे पशुके समान माराहुआ धृष्टद्यम्न किसीपकार से भी शस्त्रोंसे विजय कियहुये कोकों को नहीं पायेगा यह मेरामतई । १६ । कवचधारी खड्ग और धनुपके उठानेवाले शत्रुविजयी उत्सम रय रखनेवाले तुम दोनों सबारहोकर मेरा मार्गदेखो । ३७ । हेराजा वह अश्वत्यामा | यह कहकर स्थपर सवारहोकर शत्रुओंके सम्मुखगये कपाचार्य और यादवकृतवर्मा उसके पछिचले । १८ । शत्रुओं के सम्मुख मानेगले वह तीनोंऐसे शोभायमानहुपे जैतीक यसमें भावाइनकोईई द्धिपक्त अग्निहोतीहै । ३९ । हेसमर्थ फिरवह उनके उनडे गये जिसके मनुष्य अच्छी रीविसे सोरहेथे भार महारथी अश्वत्थामा दार स्थानको पाकर नियतहुये ४० ॥ Remembering his father's death, Asliwathana, much enraged, disdosed to them the schouc that be bad formed in his mind, saying, Haring slain millions of warniors with his sharp arrows, my father laid as de lis ucajoto and war zlału by Dhrishtadyumn; 1 sball thertford slay tho sinful son of the king of Panchal, Durishtadyumn, with unfair ni'ans. 33, Slain by we like a brast, bo will no looger attain the regions open to those who do fighting. This is my opinion. Cased in armour and armed with swords and buwp, you will wait for my ro'urn, destroyers of foes! " Having said this, Ashwathoma mounted his car and proceeded to face the enemies. Kripacharya and Kritvar za tiio Yadıy followed biw. The three Warriors going towarıls the cuemier, looled glorious life fre. They weat to the casip of llu sleep.D warriors and asliwathawa etopped . at the entrance."10, . (७२७६) Mahnbharat (7278) धृतराष्ट्र उवाच । द्वारदेशे ततो द्रौणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ । अकुर्वतां मोजकपी कि सजय पद मे।। १ सय उपाच । कृतवर्माणमामय पञ्च महारथः द्रौणिमन्युपरीतात्मा शिपिरवारमासदत् ॥ २ ॥ तत्र भूत महाकायं चम्बार्कसाराा तिम् । सोऽपश्यत् द्वारमादित्य तिष्ठन्त लोमहर्षणम् ॥ ३ ॥षसानधर्म यानं महा सधिरधिनयम् । कृष्णाजिनोत्तरात नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ ४ ॥ पाहुभिः स्वायतैः पानामामारणोयस. पांगमहासर्प ज्यालामालाकुलाननम् ॥ ५ ॥ दंष्ट्राकराल वदनं न्यादितास्थ भयानरम । नयनानां सहन्ध विचित्रैरभिभूषितम् ॥ ६॥ मेघ तस्य वपुः शक्यं प्रवक्तुं पेश एव च । सर्यथा तु तदालय स्फुटयुरपि पर्वता ॥ ७ ॥ तस्यास्पनासिकाभ्यान्तु श्रवणापाञ्च सर्वयः। प्रश्वाक्षिसहयः प्रादुरासीम्म हाचिः ॥ ८॥ तथा तेजोमरीचियः शंखचक्रगदाधराः । प्रादुरासन हषीकेशाः अध्याय ६॥ धृतराष्ट्र बोले हे संमय इसकेपीछे उनवानों कृतवर्मा और कृपाचार्य ने द्वार स्थानपर अश्वत्थापाको नियत देखकर क्या किया उसको मुझमे वर्णनकरो।।। संजयबोले कि वह महारथी अश्वत्थामा कुनबर्मा और कृपाचार्य को पूछकर क्रोध से पूर्णशरीर हेरे के द्वारपरगया । २ ! उसने वहां जाकर एक त्रीवको देखा जो कि बड़े शरीर वाला चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान द्वारपर निपत रोम दर्पण करनेवाला । ३ । व्याघ्र चर्मधारी बड़े रुधेिरको गिरानेवाले कृष्ण मृगचर्म का भोदनेवाला नागोंका यज्ञोपवीत रखेनवाला । ४ । बहुतलम्बी स्थूल और नानाप्रकारके शस्त्रों के धारण करनेवाले भुनाओं से बड़े सर्पका बाजूधन्द पांधने पाला वाल समूहों से व्यास मुख । ५ । दंष्ट्रामों से भयानक महा भयकारी फैले हुमेहजारों विचित्र नयोंसे शोभायमानथा । ६ । उसका शरीर और पोशाकरर्णन के योग्य नहीं जिसको फि देखकर सब दशा में पर्वतभी फउजाय । । । उसके मुख नाक कान और हजारों नेत्रोंसे बड़ी २ माला निकलतीथीं । ८ । उन बालाशों OHAPTER VI Dhritrashtro gaid, " What did Krpacharya and Kr tvarmı do on Reeing Ashwathama atand at the entrancel" Sanjaya said, “ Hak. ing talked with them he went at the entrance vf the camp and age there a being glorious like the sun and tho moon. Ho was duqdful to look at, with a tiger's hide, blood thirsty, clothed with the skin of a black antelope, sorments fur cacred thread, with long and mịscular arms, with a huge su peat tied at 1118 arme attended by luminous bodies, with dreadful mouth and troth and thousands of dreadful and wonderful eye. His Ludy and attire Foro drcsadful beyond the power of speoch, Sparks of fire came out from his mouth, bcse, ears and thousands of big ayah and thousands of Janardans, adorned with conch discua and Danco, vou to be seen and those sparka Seeing that drcadlul being thus stationed, Altsathaiga fearlessly luid bin with (1279%3 Sauptik Parv सौप्तिकपर्व (७२७९) शतशोध सहनशः ॥ ९॥ तदत्यशतमालोक्य भूतं लोकमयंडुरम् । द्रौणिरव्ययितो विपरनपरधाफिरत् । द्रौणिमुक्ताम्छरास्तास्तु तबूत महाप्रसव ॥ १० ॥ उदधैरिव पार्योधान पापको वामुखः । अनसत्तास्तदा भूत ट्रणिना प्रष्ठिताग्छन् ॥ ११॥ 'अश्वत्थामातु संप्रदय रोघांताधिरर्थकान् । रथशक्ति मुमोचार दातामग्निशिखा मिव ॥ १२ ॥ सा तम्माहत्य दीप्तामा रयशक्तिरदीर्यवे। युगाग्री सूर्यमाहत्य महो लकेच दिवश्च्युना ॥ १३ ॥ मय हेमत्सरं दिय बहामीफाशंपन्य सम् । कोपात् समु यहाश पिलादीप्तमिधारगम् ॥ १४ ॥ ततः सहायरे धीमान भूताय प्रोहिणोत्तदा । सतवासाय भूतं वै पित नकुलवद्ययौ ॥ १५ ॥ ततः स फुपितो ट्रोणिरिन्द्रतुनिभा गदाम ज्वलन्ती शाहिणोत्तस्मै भूवं तामपि धाप्रसर ॥ १६ ॥ ततः सर्वायुधामाये' वाक्ष्यमाणस्ततस्ततः । अपश्यत् कृतमाकाशमनाकाशं अनार्दनः ॥ १७ ॥ सहसततमे के प्रकाश से शङ्ख चक्र गदाचारी हजारों श्रीकृष्ण प्रकट थे। ९ । उसर्व अपूर्व सब मप्टिके मयंकारीको देखकर पीड़ासे रहित अश्वत्थामाने उसको दिव्य प्रस्नो की वर्षासे ढकदिया उस बड़े तेजपने अखत्यामाके छोड़हुये पाणोंको निगला ।१०जैसे कि वहनामुखनाम अग्नि समुद्रके जनसमूहों को निगलना उसी प्रकार उस तेजरूपने मनायामाके चलायेहुये बाहोंको निंगला । ११ । फिर अश्वत्थामा. में उन अपने पाणसमूहों को निष्फल देखकर ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित शक्तिको छोड़ा । १२ । वह प्रकाशमान रथ शक्ती उसको घायल करके ऐसे फैट गई जैसे कि प्रलय के समय माकाश से गिरीहुई बड़ी उल्का मूर्यको घायलंकरके फटजाती है । १३ । इसके पीछे सुवर्णकी मूठ भाकाशवर्ण दिग्य खड्ग को ऐसेशीघ्रतापूर्वक मियानसे निकाला जैसे कि विलसं प्रकाशित सर्पकोनिकालत । १४ । इसके पीछे बुद्धिमान्ने उत्तम खड्गको उस तेजरूपके ऊपर पलाया यह उस तेनरूपको पाकर उसके शरीरमें ऐसे चलागया जसेकि नीला विवरमें घुसजाता है। १५ । इसके पोछ उस क्रोधयुक्त अश्वत्थामाने इन्द्रध्वजाके समान उसज्यान रूप गदाको ऊपर चलाया उस तेजरूपने उमको भी निगला । १६ । इसके पाएं *urs clestial Weupous, but he swallowed uli hils uni 01. 10. Ho rece vied all the arrows within himself as the ocean firo soahs the waters of the ocsan. Seeiog his arrows fruitless, Ashwathama discharged at him # Javelin bright að fire. Bat tho Javelio brobo upon him Irke the meteor of pralaya alter atrıkiog the sun. Then he drust oat lis goldhandled snord from the scabbard, like a scrpnt from its bole, u. throw the sword at the wonderful being and it er tereci lis body liko 15, Then Ashwathama hurled at hindihis imace, bub,that tho, disappeared. Phen all his weapons were thum erbaastod, he looked all round and saw tho wholo sky-full of Shri. Krisho. Distituto of arms, Ashwathama, roning that thiroole; A mungoon in hole ७२८०] Mahabharat (7280) धम्दवा द्रोणपुत्रो निरायुधः । भनवादतितन्ततः पवाक्यमनुस्मरन् || १८॥ वन मपिय पथ्यं सदा न शृणोति यः । स शोरयापदं प्राप्य पथाहमातवयं तौ ॥ १९॥ शास्सरपालविद्वान यासमतीय मिति स पथ प्रच्युतो धर्मात कुपये प्रतिदन्यते ॥ २० ॥ गोब्राह्मणनृपनीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा । हानप्राणजबान्धेषु सुनमातोत्थि तेषु च ॥ २१ ॥ मम्मतप्रमःपुन शस्राणि निपातये । इत्येवं गुणभिः पूर्वमुपदिए नां सदा ॥ २२ ॥ सोहमुकम्प पत्यानं शाखाएं सनातनम् । भमानेंगे धमार घोरामारदमागतः ॥ २३ ॥ तापापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिणः । यदुचम्प माद कर भयापि निवर्तते ॥ २२ ॥ मशक्यञ्षता कर्नु कम शक्किालादिर। नहि देवाहरीयो मानुष कर्म कम्पते ॥३५४ मानुष्यं कुर्व कर्म यदि देवाम सिध्यति । सप प्रच्युतो धर्माविवर्ष प्रतिपयते । प्रतिघावं विज्ञान प्रवदन्ति मनीषिणः । यदों रस्य क्रिया काश्चिद्याविह निश्ते ॥ २७॥ विदं टुप्पणीतेन भयं मां समुपस्थि सन शनाके नाशवान होने पर जहां तहां देखनेवाले अश्वत्थामाने आकाशको भी. कणसे पूर्णदेखा । १७ । शस्त्रोंसे रहित अश्वत्थामा उम बड़े चमत्कारको देखकर अत्यन्त दुःखी और कृपाचार्य के वचन को स्मरण करते वोले। १८ । कि ओ पुरुष अमिय और परिणाम में शुभदायक मित्रों के वचनोंको नहीं सुनताहै वह आप तिको पाकर ऐसे शोचता है जैसे कि मैं दोनोंको उल्लंघनकर अर्थात् उनके विद्ध कर्म करके जो मज्ञानी शास्त्रज्ञों को उल्लंघन करके मारना चाहता वा धर्म से युत होनेवाला है इसहेतुसे कुमार्गमें माराजाता है । २० ।गौ प्रामण राजा स्त्री मित्र माता गुरु निर्मल विक्षिप्त अन्धे सोनेवाले भयभीत उठेहुपे मदमें उन्माद रो गादिकों से प्रचेत और भूनादिकके भावेशसे मतवाले मनुष्यपर शस्त्र नहीं चलाये । २२। इसमकार पूर्वमें बड़े २ लोगों के उपदेश होतेथे सो मैने शास्त्रके बताये हुये सनातन मार्गको उल्लंघन करके कुमार्ग से कमका प्रारम्भ करके घोर भापतिको पाया ।२. बुद्धिमान लेग उस भापत्तको घोग्कहत जोवढे कर्मको मारम्भकरके, भपसे मुखको फेरताहै । २४ । यहाँ वह कर्म सामर्थ्य और बलसे करने के योग्य माही मनुष्य का कर्म देवसे घड़ा नहीं काजाताहै। २५ । कर्म करनेवालेका जो remembued tho wards of Brişaahurya and said to himself, " He who does not give ear to the unpleasant but salutsry advice of his friends, fulle into mirery and feeli remorse like anyself and 18 dentroyed by falling into bad ways. Let no ona lay hand va the cosy, brahman, king, uporian, friend, wother, [v-captor, f«uble, mind, blind, alep, intoxicated sick and ghost-riden. 22. Thus I havt set at nought the precepts of old mon aud have fallen into difficulty by acting against the teachings of scriptures. A calamity is termed the worst by wise men, whero une beginning a great work has to recodo from it Hare the work I have to do is not to by accomplished by p'ıysical power, for humaa | (7281) सौप्तिकपर्व Bruptik lar (७२८१) ममणिमतः संस्य नियत कथचन ॥ २८ ॥ इञ्च समाहत देवयामि FOR न तरमिजानामि विरायानपि सर्वथा । १९ ॥ध्रुव यमधERT कल्पामतिः। तस्याः फलमिद घोर प्रतिघातापश्यते || ३. ४ तविक्ष देवधीत मम संम् विपन पत्र देशानुपन्तुमिह शक्य कयणन ॥ ३१ ॥ मोमध महादेव अपपे शरण प्रभम् । देवदारीमद पोरंसहि मे नाशयिष्यति । १२॥ कपादन देक देवमुमातिनावपम् । कपालमालिनं उदं मगनेवारं परम ॥ ३३ ॥ स हि देवोत्य गावातपसा विक्रमेण च । तस्माउरणमध्येमि गिरिश एलपाणिनम् ॥ ३४ ॥ इति सौप्तिकपर्वणि महाभूतदर्शने द्रोणीचन्तायां पर्याध्यायः ।। मनुष्य की देवसे सिद्ध नहीं होगी यह धर्ममार्ग से युक्त होकर भापति को मारोताह । १६ । हानी पुरुष भाविज्ञानको अविज्ञान कहते है की इसलोक में सीकार्य को प्रारम्भ करके फिर भयो ोड़ देता सो भन्यापसे यह भय मेरे समझमें निपत मा द्रोणाचार्यका पुत्र युद्धमें किसी दशाभी मुख फेरनेवाला नहीं आ १८ । और यह मा जाप उत्पा देवदण्ड के समान सन्नद में सर प्रकारसे विचारता हुभाभी इसको नहीं मानताहूं।२९।निश्चयकरके जोमेरी यह पाप बुदि मधर्ममें मापी उसका यह महाभयकारी फल मार केलिये प्रकट ३० । वा मेरा युर में मुखका फेग्ना देवका रवाहुआ यह किसी दशामें या कोई गात उपाय करने के योग्य नहीं ! ३१ । सो मैं भवप्तमर्थ भार शरणयोग्य महादेवजी की शरणागन होताई वहीं मेरे इप्स योर देव दयाका नाश करेगा । ३३ । जो कि कपन देवताओं केभी देवना, उमापति, उपाधि से सहित कपात्रों की माला रस. वाले रुद्र, मगर्नेत्र के मारनेवाले हर । ३३ । उस देवताने तप और पराक्रम से देवनामों को उलंघन किया इसोतुसे मैं उस गिरीश और शूल गारी की गरणा गत दोबाई॥३४॥ work cannot araper sede a divide ona 25 Ho whose work 19 not blested by Ched, falls from the path of virtao into misery. It is a fully so the opinion of women. I am dost in the danger of giving up my enter prie. Doarci.arya's son derer turobd fuce in any battle. This glow rious fursa la standing before me an embodiment of divide wrath, and I cannot gargo if in spite of my efforts. Surely tlsus is tho fout of my own owl intention. 30. This defeat za ordained by ged for me, and I can devies no remody for it I shall now reek refuge of almighty Blahaday and bo will record t is divin. chastirement He is the god of gods and Hus, be surpaneed all the gods in receticium and I ball therefore scek réfuge of Ginish the bearer of trideat, 34 prORCA (७२८३ Jfahabharat 17282 सीय उवाच स चिन्तयित्वा तु द्रोणपुत्रो विशाम्पते । अवतीर्य एपोपस्था हेवेशं प्रणतः स्थित ॥१। द्राणिमाघ । उम्र स्थाणु शिव रुद्र समीशानमीश्वरम् ! गिरिश धन व मध भाषनमीश्वरमा २॥ शितिफण्ट पदक्षतहर। विश्वरूपं विरूपाक्ष बहुम्पनुमापतिम् ॥ ३॥ शानयासिन रप्त महागणपति विभुमा खट्यागधारिण रुद्रं जटिले ब्रह्मचारिणम् ॥ ४॥ स्तुतं स्तुत्यं स्तूयमानममो हसिया ससम् । विलोरित नीलकण्ठमसह्य दुर्निवारणम ॥ शुभ्र प्रामप्र प्रसारि णमेवरः । नतान्तं तपोनि मनन्त तपतांगतिम् ।।७ पहुरूपं गणाध्याय पारिए प्रियः । धनागशेक्षितमुख गौरीहवयवल्लभम् । ८ ।कुमारपितरं पिंग गोरोसममा इन । सनुवाससमत्युनमुमाभूषपातपरम् ॥ ९॥ पर परश्या परम पर यस्मानवियते वोत्तमभत्तारं दिगन्त देशरक्षिणम् ॥ १॥ हिरण्यकार देके पति अध्याय ७॥ संजय बोले हे राजा वह अश्वत्थामा इसमकार अरोपकार सिर करके रस के बैठने के स्थानमा उतरकर नम्रता पूर्वक देवेशके सम्मुल नियत मा ।।। अत्यामा बोले कि मैं अत्यन्त शुद्धचित्त से अशानियों के कठिन की भेदमे शिवमीको पूजन करताहूं जोकि उग्र, स्थाणु, शिनः सदा शर्व, ईशान, सिमा गिरीश. परद, देवमभावन, ईशार.। २ । शितिकण्ठ, अज, सुशार इस विश्वरूप, विस्मात, बहुरूप, उमापति । ३ । इमशानवासी. A महामति, विसु खसाङ्गारी, रुद्र, नटिन, ब्रह्मचारी । ४ । स्तुन स्तुत्य स्तूपमानासोबत कृत्तिवासस, विलोहित, नीलकण्ठ, असा, दुर्निवारण । ५ । इन्द्र बमसमबम, ग्रह्मचारी, व्रतव-त, तपोनिष्ठः अनन्त, तपांगति। बहुरूप, गणाध्यक्ष नेत्र परिपदमिय, पनाध्यक्ष हिनिमुख, गौरीहृदयारलभ । ८ । कुमारपेतर, किंग नन्दामाइन, तनुपासम, शत्पन. उमाभूषणतत्पर । ९ । परसेपरे जिससे कि सचम भष्ठ नहीं है उत्तमयाण मन्त्रोंके स्वामी दिगन्त देशरक्षण । १. । CHAPTER VII Sanjaya said, " Having reflected well, Ashwathama came down fron lipa car and stood humbly before the god of gola He said "With a pure and concentrated mind, with a work difficolt to be donen by the lignorant, I worship tho great sthanu, Shiv, Rudra, Sharv, Ishan, Ishwar, Girish, Buad, Darbhav.bhavan, Ishwar, Smititants, Aj, Shabra. Daksbkritular, Bar, Vishwarup Virupakok, Umepati, Sumaghan v.191, Dript, Blahaganpati, Vibhu, Khatwangdhari. Rúdra; Jut!, Brahmchari, Stut, 'Stutzn. Strogamaa, Amogli, Krativassa Blolut, Nilkanth, Asahya, Duraivaran, Indra, Hrabm, Bratraht, Taponishtb, Anant, Taptargit, Vaborogs Gansdbyaksbi, Triastra Perishsd-priga, Dharadhyaksh, Kshitimukh, Gaurimiridayavallá Bkt, Kno riputar, Pung, Na divahan, Tanuyagar, Atyugra, Vcabhodou.
7283) ७२८१ Sauptik Parv.सौतिकपर्व Rewar एक देव परमेण समाधिना ॥ १६ ॥ इमादारद घोर तपमा मुखराम । समतोमवारण यहाँ किना शुधिः ॥ १२ ॥ इतितस्य व्यक्ति योगात स्वयः पुरस्तात् काश्चमी धेटी मादुरासीन्महात्मन. ॥ १३ ॥ वातदारासिनमामरजायतामदिशो विदिश पचवालमिरमिपूरथन् । ४। शतावनामा नेकपाशिरोभुमा । रलचित्रागद्धा. समुयतकासया ॥१५॥ विपशेलमताशा प्रादुरासन्महागणाः वराहोद्यानाम इपमोमायुगोमुखा TRE मामाक्षादिसिनाधरितारकुष्टगानित । समादयन्तस्ते विRESTATALA मापः ॥ १८ ॥ संस्तुवन्तो महादेव मा, कर्शणा मुवसःविवाणि | महिमा मामः | मिसमास्तमः संशिषच विरसा ॥ १८ मोन परिपामा शूलपीकपाण५. घोररूपा समाजग्मुभूतसधा समन्तत ॥ १९ । मन हरयाप, गृष्टिरक्षक, देव चन्द्रमौधि विभूषण ऐने देवताके उत्तम समापि से शरणागत होताई । १।। अब नो इमघोर कठिन आपाची उत्तीर्ण होना उस बारे उन शिवजी का में सर्वभूतं वाले मे पूजन करूंगा। १२ । उस शुभकभी मात्मा के नियको योगसे भानकर भागे से वर्णमयी वेदी मकटाई ! १।। रामात उस बेदी में अग्नि देवता प्रकट हुए उसने दिशा विशाओं को और आकाशको अपनी ज्यालामोसे पूर्णकिया उस स्थानपर प्रकाशित मुख और नेर रखपाल बारसे परण शिर और सुनाव ले रत्नजदित बाजुरन्दधारी ऊंना हाय करनेवाले । २५ । द्वीप और पर्वतके स्वरूप बड़गण मकटहुये जोकि कुचा वाराह मार ऊंटकी सूरत घोड़े बैल भौर शृगाल के समान मुख रखनेवाले । १६ । स मस्किो भयभीत करने बड़े प्रकाशको उत्पन्नकरते महादेवजी की स्तुति करते पड़े सेगसी उस ममत्थामाके सम्मुलगये । १७ । महात्मा अश्वत्थामाकी महिमा के पाने भारतापी और उसके को मानना चाहते रात्रिपद देखने के उरकटित ।१८ ऐसे भयानक भौर का प्रभाववाले शूल पटिश शलाको हायमें रखनेवाल घोरप भूतगण पारिसे मापहुँचे । १९ । जोकि अपने दर्शनसे तीनों लोकों के talpar, abovo all and best fail, posallisor of goud weapons, Diger te Deabuakshio, 10. Hiranyakuvach, Brisklasskålak, Dev, Chendoumaah I bow to you with all my heart. I shall workhp Shr arith the cobrein gof my wholo body, to get rid of this trouble." Will these thought in the mind of that virtuous man, a gold rltan shod before him. Then god Agar, appearing on that alter, illumind !16 Bry and tha directions Thorasain appeared gonus facts and eyers Fitn many feot, heade, Jewelled arus upraised, Ishuge bodiee it bills and we having the appaances of dogs, kogs, camels, horser, aren and jackan terrifying all the world, a fasing th_ht kud Training Habador. Thoy all cams Cxfure Ashwathiarps, lo glorify huns noci #tolgow his streagth and desirous of slling the battle at night - 17284) Mahabi wrat मपुर पे मास्सासिएशनता मान पक्षमा पार सकारमाबल १२.॥ सौम्पन मात्रण म. प्रतापशन् । उपर मामयुरयामाना रख ॥ २१ ॥ गैरकर्माण रो निरगुप्त । मभिपुष मारमानमित्युवाच. कृताम्जक ॥ १२॥ द्रौनिस्वाप ममाम मघा नाममांगास कुळे । ममी भगार डोन म बालेम् ॥ २३ ॥ मारमा महाव परमेम समाधिमा मामादि विसामानुपामि तवामतः ॥ १४॥ स्वपि सणि मानि सर्वभूतेषु चासि । गुणाना रिमानानामा स्वयि सिधति । २. ॥ सर्वभूताप निमो हपिभूतापस्थितम् । प्रतिगृहाण मां देव पचशया परे मया ॥ २६ पुरयाद्रिाणि सस्थाका पद दीपाशाम सपाचाराममाया म्युपाशित ॥२७ भयको उत्पन्न करें उनको देखकर महानी मात्रामाजी ने भी पास नहीं की २. । इसके पीछे बड़े क्रोधपृक्त प्रतापवान मायामाने सोमदेवता से सम्पन्न रखनाले मन्त्र के द्वारा शरीररूप भेंटको अखि किया । २१ । प्राय जोहो प्रश्नत्यामा उप छद्र कर्मवाळे अनेप पहारमा डनी को उनके कर्मों में स्तुाते करके या पचन बोले । २१ । हे भगवन् भा में भगिराश में उत्सन्न होनेगाने, इस शरीरको मात्मसी अग्निमें इवन कर गई मुझ बलिप को आप अंगीकार करिये । २३ । हे विशासन महादेवजी मैं इस भापति भपकी भक्ति और परम समाधि से भापके भागे अर्पण करताई । २४ । मजीव भाप में है और निश्चय करके समीरों में भारी हैं और भाप में प्रधान गुणों को ऐक्षताभी नियतहै । १५ । हे सर जीगोंके रक्षास्थान समर्थ देवता मुझ नियत व्य स्पको स्वीकारकरो जो शनु मुमो अजेय हैं । २६ । अश्वत्थामाणी या गाकर मोर शरीरकी प्रीतिको पाग करके उम वेदपा मिसपा अग्नि प्रकाशितया चक्कर अग्निमें प्रवेश करगये । १७ । साक्षात भगवान महादेवजी हगत नाऊचे दाय Thoy bore d-ca iful arme and weapons and gathered the a froin all aider. They could t scily the three worlds with their appearances but ashwathama rumanad firm there. Then glorious Ashwathama in great tage, with incantations of hymne relating to Sa, oflorid his own boiy. 21 Having praised Rudra of dreadful prowess, wh clasped hende, he eard, " I, born in the family of Angna, offer a sacrt fico of my own body. Pray accspt ma at auch. I offer, tayaalf, with full devotion, at this time of distress. All beings lay. in you and aro curely wit na all balogs You are the seat of all virtue 35.1 Rofage of all beings Accept que as a victim of sacrifce, if I canut conquor my face" A*vi0g 8314 tlid, Seliwathama gtvo np all love five huwn body and uscaded iba altar of bucoing fro Bowing hiro than enter ble with upraised arms, suv said to him with a saud, V you (7285, Sauptik Parv alitha (७२८५) समाना निवेष्ट पदमा रविरुपस्थितम् । मनमोहगवान साक्षामादेश इसभिष २८॥ सत्यशौचापागलपसा नियमेनकाक्षात्या मक्त्या व प्रत्याय पुश्या वसाहरा २९ ॥ यादमारार हमेनापिलरकर्मगा। स्मादिए तमः कामादम्यो ममम पिछने • ३० । कुर्थता सस्थ सम्मान स्थचमिहासमा भयायाधाला. सहसा गुप्त म गावपाशा कृता. ॥ ३१: कृतस्तरीय सम्मान. पाशालाप्रक्षता मा अमिभूतास्तु कालेन नरामवाप्ति जोषितम् ॥३२८ मुक्त महात्मान भगवानमनमा मारिवेश ददो बास्त्र विमल बगनुत्तमम ॥३१ माविष्टो भगवता भूपो अज्वाल जसा । पलवश्विामा देवस्पेन तेजप्ता तमाश्यानि भूतानि रासि समादपर । अमित. शशिविर या साक्षा विषेशरम ३५ इति सौप्तिकपणे द्रोण शिपिरमरशे शप्तमा अध्यापः . ॥ पध्याहित हय रूपको नियत देखकर मोसे । २८ । मैं जिामकार पुगमकर्मा श्रीकृष्णजी की सस्पता- पवित्रता सरसना त्याग नए नियम शान्ति भक्ति धैर्य शुदि और पचन से भाराधन कियागया और उस श्रीकृप्य से अधिकतम मेरा कोई निप नहीं है । ३० । हे तान तुतको माननेके भभिन्नापी भाजी का मान करनेवाले मैंने अकस्माद पांचालदेशियों की रक्षाकरी और बहुबसी माया प्रकटकी। पांरालदेशियों के रखाकरनेशले मैंने उन श्रीकृष्णजी का माया परन्तु मन यह पांचालदेशी काल से पराजय हुये हैं इससे भर इना जीवन नहीं है।३२ । गवानने उस महात्मा से ऐमा कहकर अपने शरीरको रस प्रवेश किया और उसको बहुत निर्मल और उत्तम खड्ग दिया। फिर भगवान के प्रवेशित शरीसे अश्वत्थामाजी देनसे ज्वलित अग्निरूप हुगे और देवताके दिपप तेजसे युदमें वेगवानदुपे ३४ साक्षात् ईयरामान शत्रुके डेरे में जाननेवाले उन अश्वत्थामाजीके पीछे रष्टिने गुप्त जीर और राक्षस चारों ओरसे चळे ॥ ३५ ॥ W88 worshipped with t o truth, boliless, straight forwardness Ttsig. nation, tap, vous devotion, patienco aod 11 ledun of Sha Krisho, who does thoga with the greatest ea-p, and surely I hold nono dearer than him Desirous of kaowing there and withing to keep in prestige of Shri Krislin, 1 protostod the Paachals and praluced tuany illus'ouis I had regard to the prestige of Shri Krishna in pr. tertu, lho Pan. chale. But the Panchals are conquered by Tudio and thur days are ouwbered. * Hiong Bard the Bhagwan onlarcat 116 bily and wide him the prescit of a gund sword, Tlcn Ash at slna Morama glorious like fire and endued with diving carrgy was really to 6 bt. Going like Istwar himself into the enemy 'a camp. Aslıwatham, Fas fo'lowed by sarwible being and rakshases 35.
(७२८६) Mahablarat (72861 धृतराष्ट्र उवाच । तथा प्रयाते शिीवर द्रोणपुत्रे महारथे । कचित् कृपश्चमाजम मयानी न पत्तनाम् ॥ १॥ कश्चिन्न थारिता क्षुद्ररक्षिीभोपलक्षित । असह्यामिति मन्यानो त निवृत्तीमहारयो । २४ कञ्चिदुमय शिविर हत्वा सोमपाहार । दुण्योधनस्य पदधी गती परमिकारणे ॥३॥ पालनिहतौ चोरी कथित पता क्षितीकश्चित्ताच्या कलम ताममाचक्ष सञ्जय ॥ ४ ॥ सन्जय उवाच तस्मिन प्रयाते शिविर द्रोणपुत्रे महात्मनि । कृपश्च कृतवर्मा च शिविरद्वारयतिष्ठताम् ॥ ५ ॥ मेश्वरयामातु तो दवा यत्यन्ती महारयो । प्रहष्ट शन राजनिद धधनमधीत ॥ ६॥ यत्तौ भयन्ती पथ्याप्ती सर्वक्षत्रस नालने । किं पुनर्योधशेषस्य प्रसुप्तस्य विश पत ॥ ७॥ मह प्रवेक्षा शिविर वरिष्यामि च कालपत् । यथा न कश्चिदपि वा जीवन्मुध्यत मानध । तत्रा मवयभ्य कार्य स्यादिति में निश्चिता मति । इत्युक्रवा अध्याय ८॥ धृतराष्ट्र बोले डेरे में महारथीं मश्वत्थामा के जानेपर भयसे पीड़ामान कृपा चार्य और कृतवर्मा तो लोट कर नहीं चलेभाये । । ।कहीं नीच रक्षकों से तो नहीं रोकेगपे और पा उनलोगों ने उनको नहीं देखा दोनों महारथी रात्रिके युद्ध को असह्य जानकर तो नहीं लौटे २ डरेको मथकर और युद्ध में सोमा पाडवों को मारकर दुर्योधन की उत्तम पदवी को प्राप्तकिया । क्या वह दोनोवार पांचाल देशियों के हाथ से मृतक होकर पृथ्वीपर शयन करनेवाले तो नहीं हुगे अथवा कोई उनदोनों ने कर्म भी किया हे सजय वह सब मुझसे कहो ।४ सय धोले कि डेर में उस महात्मा अत्यामा के जानेपर कृपाचार्य और कनकमा डेरे के द्वारपर नियतरहे । ५ । हे राजा फिर अश्वत्थामाजी उनदोनों महाथियों को उपाय करनेवाला देखकर बडे पसा होकरयह पचन वोले १६ । उपाय करनेवाले आप सब क्षत्रियों के नाश करने को समर्थ है मुख्यकर शेष बचे और सोते हुये शूरवीरों के मारनेको फिर क्यों नहीं सपथहोगे । ७ । मै हेरेमें प्रवेश करूगा और कालकैसमान धूमूगा इस द्वारएर भानेवाला कोईमनुष्य भी जैसे प्रकार जीवता न जानेपावे पैसाही आपको करना योग्यहै यह मेरा रद विचारहै । ८ । अनस्यामा CHAPTER III Dhrtrashtra said," DI Kripacharca and Britvarma turu brok out of fear, when Ashwathams had sntered the cinp: Vers they afs and of the night attack and es turned buen! Did tl wy obay Duiyi laj by destroying the Somnis and tlo P ndn as in chur fun! Word the two narriors sisy by the Panchals? Did they perform any thing? If so tll it to w, Sanjaya " ! Sinjayà xud," Kripacharya and Kritvarma bopt standig at the entrane", whila Akhwarbama onte ed the ca ap. Seeing teu thu113 stapding, dobwthana was much pleased and salt and sta vill the warnous by your prowe s (7287 Samptih Parv सीप्तिकार्य (२८७) प्राविशत् द्रोण पार्थाना शिवि महत् । अद्वारणा वसघ विहाय भयमात्मन || स प्रविश्य महापाहरुद्द शाश्च तस्य ।। धृष्टद्युम्नस्य निलप शनरायुपागमन् ॥१०॥ ते तु मला महत् कर्म श्रान्तास वळपदणे प्रसुप्तावैष विश्वस्ता समेत्य परिचारिताः ॥ १९ ॥ मय प्रविश्य तरेश्म धृष्टद्युम्नस्य भारत । पाञ्चाल्प शयने द्रौणिरपश्यत् सप्तमन्तिकात् ॥ १२ ॥ क्षामावदति मइति स्पर्द्धशास्तरणसेवृत । मत्यिषर युक्त पश्चर्णश्च पासिते ५ १३॥ त शयान महा मान विश्राधमताभयम् । प्राधियत् पादेवशयनस्थ महीपते ॥ १४ ॥ बुध्य चरणस्पर्श मुत्थाय रणदुर्मद । मध्यान मेयात्मा द्रोणपुत्र महारयम् ॥ १५ । तमुत्पतम् शयनादरशमा महावलः । केशवा लम्ब्य पाणिभ्या निपिपेप महीनले ॥ १६ ॥ स वलात्तन निस्पिष्ट साध्वसेन च भारत निद्रया वैध पाञ्चाल्यो नाशकच्चीष्टतु तदा ॥ १७ ॥ तमाक्रम्य पदा राजन जी शरीरके भयको त्यागार अन्यद्वारमें घुसकर पाण्डवोंके बड़े डेरे में पहुंचे ।। उसके स्थानों के जाननेवाले ने सुगमता से धृष्टद्युम्नके डेरेको पाया । १० । वह लौट सम्मुख होकर युद्धों चागेंओर,दौड़नेवाले युद्धमें महाकठन कम्मों को करके बहुत श्रमित होकर सोगये थे हे भरतपशी इसके पीछे अश्वत्थामानी ने उस धृष्ट पुम्न के उस स्थान में परेशकरके शयनपर सोतेहुपे धृष्टद्युम्न को समीपसे देखा । ११ । हे राजा स्वच्छ अत्यन्त अलसी से तैयार बहुमूल्य विस्तरोंसे युक्त बड़ी उत्तम मालाओं से अलकृतधूप चन्दन चूरेआदिरे सुगन्धित बड़े शयनरर सोनवाले | विश्वासी और निर्गय उस महात्मा धृष्टद्युम्न को घरणघात से जगाया । १४ । युद्धमें दुम्पद धृष्टद्युम्न ने चरणके घातसे नागकर बड़े बुद्धिमानने महारथी अन्न त्यामा को पहचाना । १५ । बड़े पराक्रमी अश्वत्थामाने उस शयनसे उछलनेवाले धृष्टयान को हाथोंसे बालों के द्वारा पकड़ कर पृथ्वी पर रगड़ा । १६ । हेभरत वथा तय बल से उम धृष्टद्युम्नका रगड़ाहुआ वह धृष्टद्युम्न भय और निद्रासे घटा करने को समर्थ नहीं हुआ । १७ । हे गजा पैरोंसे प्रतका कराठ और छातीपर you be not able to play there releaming fu who are sleepmg I am about to onter the camp and to roam there like Douth and I charge you unt to ler any or o piss a ivo out of this entrance,'' dphwathama foorleebly entered ihe canıp by or other woy, and well acqugotd noth all its parts, he easily found the tent of Dhrishta. dyunp. 10. All the warriors norousleep after the toils of the day Apuwothama intered tlo lept of Dhrislatadyumn and pieyed bum from a short distance. With a hick ho awakened Dhrish tadyunin Fho yas elecping a slurd aud fearless sleep on a cupacious bed, soft and preciones, well decked with garlands nud sandal powder, Aya. enotent iliq blow of tbo kiche rise and valiant Dhrughted yumn recognised ástwathama. Ho jumped up for his lol sud Asus why shat (७२८)- Dlahabliaiat [7288 काढ़े चौरास चोभयो । नदन्त विस्फुरलाच पशुमारममारयत । १८.1 तुम्नसंस्तु पद्रौगि मातिध्यक्तमुदारत । आचार्यपुत्र शत्रेण जति मामा चिरं था। पर कृते मुनालोकान गण्डेय विपदाम्बर ॥ १२॥ १बसुपरपातु वषन विरराम परतपा मन पाचालराजस्थ माकान्तो पसिना शम् ॥ १० || तस्याकान्तु यावं सत्य द्रौणिरप्रवीम् । माथार्यधातिना लोकान सन्ति कुलपासन । तामायण निधन न स्वमर्हसि दुर्मते ॥ २१ ॥ पथं वाणवीर सिंहो मतमिग द्विपम् । मर्म स्वयमीत कमपादापाले मुदायण ॥ २२ ॥ तस्य वीर शम्देन मार्यमाणस्य पंश्मनि । भूतमेवायवस्थम्तो न सम प्रयाहरन् भपात ॥ २३ ॥ तन्तु ते नान्युपाये गमयिस्वा ममयम् । मध्यतित तेजस्वीरथ प्राप्य सुदर्शनम् ॥ २४ ॥ स तस्य मधमाशाजम् निफम्प मादयन्दिश रिमशिविर प्रायाvिatमपितो बली २५|| दवाकर पुकारते और चेप्शकरने को पशुकी भांति मारा । १८। फिर नलों से पौडवान करते उस पृष्टद्युम्पने धारे अश्यत्यामासे कहा है भाचार्य के पुत्र मुझसे शससे पारो विलम्म मत करो हे द्विपादों में श्रेष्ठ मैं मापके कारण से पवित्र लोको को पाऊं । १९ । शत्रुमाका तपानेवाला क्लबान से कठिन दवायाहुमा राजा पाञ्चलका पुत्र इस प्रकार के वचन को बहकर मानहो गया । २० ।इम के पास भनयामा उपके उस धीरे से कहेहुये वचन को सुनकर वोले हे कुतकलंकी गुरूके मारनेवाले के मांकनहीं है इसहेतुसे तुम शस्त्रने परने के योग्य नहीही हेदुदी।२।। से किसिमकाले हाथी की भोरको गवाह उमीमकार उस नीरसे इसप्रकार कहतेथे कोषयुक्त भात्यामाने कठिन एडियों मर्मस्थकोंपर चापल किया । उम मरनेवाले करके शनों से गहलमें यह त्रियां भूतको निश्चय करनेवानी होकर भयमे नहीं वाली । २२ । वह तेमनी म उपायसे उस बारको यमनोको पहुँचा का और सुन्दर दर्शन रथका पाकर नियतमा । ३४ । हे रामा र समर्थ और बलात् प्रात्यमा उपके डेसे निक्कर दिशामों कोशम्दायमान करते शत्रुमों के मारने के अपनपी स्थल सवार के द्वारा टरेको गये । २५ । इसके पास tbama caught him by the hair of bis heud and brought him down on sunil. D shel ti the ground Dhiralıtadyudu was unable to mio out of fear and sleep He cruxbed the neck and breast of the struckling had rrying princa with liis foot and wanted him to kill lihen least, Sratelung with bia nails, Dhiruhtadyonun sard to him Saatls," kill two with a weapa no son of acuarja, and make no delag so that I my attain goud re, ons by your gros best of 201}" Hard prossed by the enemy, tbe valiant Panchal prince became slont. 20. Having beard the slowly aitorped words of tho panc, NULL, "Luer. are no gaul regies for despicablo preceptorcides and the cfure you donot deser po to die paths weapod. Having said with a leap.ge the (7289) सौनिकपEBAmptik lar बपका तननदिन वाणवमहारष सहित रक्षिभिः सः प्रणेदुयोषितालदा.२६।। रामानं निरतं समा भृशं शोकरायगाः। ब्याक्रोशन क्षत्रिया. स. अष्टद्युम्नस्य भारत ॥१७॥ तासात तेन शमेन समीपे क्षत्रियर्षमाः। सिपञ्च समनहारत किम मापति शायन् ॥ २८ ॥ मियंस्तु राजन पियस्ता मारमा निरीयताः । अघुवन दान महिप्रमादयतेति ॥ २९ ॥ राक्षसो घा मनुष्यो पा नेनं जानमिरे वयम्। हरषा पाळराजानं स्पारण तिष्ठति ॥ ३० । ततस्ते पोधमुरुषाश्च सरसा परपंधारपत्र स वामतः सर्वान रुद्रसेम व्यपोथात् ॥ ३१ ॥ धृगुम्नच हसास तावास्य पासुगार मायने सुप्तमुत्तमोजसमस्तिके ॥ १२॥ तमप्याफम्य पादन कराठे राने जसा तयुष मारयामास बनतमरिन्दमम ॥ ३३ ॥ युधामन्युश्च संप्राप्तो महारषी अश्वत्थामाके हटनानेपर सब स्त्रियां अपने रक्षकों समेत पुकारी हे भरत. बंशी रामाको मामा देखकर अत्यातदुख सबमोकिधृष्टद्युम्नेक नौकरथे पुकारे । २७ । फिर उन्हों के पदों से सम्मुखही उचम क्षत्रिय संपारह मौर पोळे किया क्या बात है। २८ । राजा पा भयभीतखियां मपस्यामा को देखकर इसी कंठ से बोली कि शीघमारो। २९ । यह राक्षसहोय अथवा मनुष्य महम इसको न जानती है वह राजा पांचाल को मारकर रयपर नियती ।१०। उसके पीछे उन उत्तम गूरोंने अकस्मात् बागेओरसे घेलिया उसमे उन मंगवाई करनालों को छ भख से मारा । ११ । फिर उसने सर साथियों समेत धृष्टद्युम्नको मारकर समीपी शनपर सोनेवाले उत्तमजिसको देखा। हमको भी पराक्रमले कण्ठ और गती को खाकर उस पुकारनेवाले शत्रु पनपी को रमी प्रकार से मारा । १५ । और युधामन्यु उसको roar.enragind Ahwathana wounded this tnl parte with his hard feet. the womiu of the househuld heard the cries of tbe prince, but topt quiet for fear of a goblin. Having slain the brave prince bo approsuhed his car and drove in is to slay the other min of the camp. 25. At tho d parture of Ashwathama the women and the attendants um Dbrishtsdyamn slain and cried out for grief. The warriors a woho at their crice and asked the reason of it. The terrified women who had seen A-hrathama, said in grief," We donot know whether bo was u rakshns or man, but aurely he has slaic the Panchal princo And got upon his ca. Mako baste to play hin. " Tbsn the warri. ors surrounded Ashwathami on all sides op'i he slew them all with the weapon of Rudra. 31. Haring slain Dhrishtidyumn and hua followers bo baw liltapaujas slocpiog bard by and slos liim in the mmeway by bu foot.Thinking that he was slair by a rakshas, Yudhar maayu cime there and woucded Ashwathamı on the breast with [७०) Mal KULurat. (229011 मला त रक्षमा हनम् । गदामुद्यम्य यगेन दि द्रोशिमतादयतु ३५ ॥ तमभिव्य जग्राह क्षिती चामताडयत् । यिस्फुरन्तम् पशुधवाममारयत् ॥ ३५ ॥ वयास वाणे वा त ततोयान समगादत् । सरप्तानेव राजेद्र तत्र तत्र महारयान ॥३६॥ स्फुरतो पमानांश्च शमितेष शम्म । ततो निखिमादाय जघाना यान पृथाननाम् ॥३७॥ भागगो विचरमानिसिथद्धविशारद तथैव गुरे समेघा पान्मध्यम कान् । भान्ता यस्तायुधान् सर्वान क्ष गेनैव पोषयत् ॥ ३८५ बोध नचान द्विगाधक प्रारिनन् मयासिना । रुधिरक्षितमोग कालछा मान्तक ३९॥ विस्फुरनिस ताणिनिशिस्योधन व माणन चैवासेसिधा रक्तीक्षितोभक्त ॥ ४ ॥ तस्य लोहितमितस्य दोलखडास्य युध्यत अमानुष इयाबारोपनी परमभीषश । राक्षा के हाथो मृतक म नकर आया और वेगसे गदा को उठाकर अश्वत्थामा,को हृदय पर घायल किया । ३४३ गदाके आघात से घायल होकर भी अश्वत्थामा युद्ध में कम्पायमान नहीं हुआ और उस के सम्मुख जाकर उसको भी के समान मास ।। पावार उसको उसमकार से मारकर जां तहां सोनेगले दूसरे महारथियों की ओरगया । १६ । क्रोधयुक्त ने समीपही पांचाल देशी वीरोंको दबाकर फडकने और कांपहुओं रो रोमारा जलेका यज्ञममारने बाना पशुमोको मारताहै । ३ । इसके पीछे भागक्रमसे मागोंको घूमते खड्ग युद्धमें कुशल प्रश्नत्यामाने खड्गको लेकर पृयकर अन्य लोगों को मारा इस प्रकार गुल्म नाम सेनाके पागमें मांगेवाळे भशन और थकेहुये उन सब गुल्ममें वर्चमान लोगों को एक क्षण भरमें मारा। ८ । रुबिर से लिप्त सत्र शरीर काल मृष्टि में अन्तक के समान अश्वत्थामा ने शूरवीर घोडे और हाधियों को मारा वह भलत्यामा वानप्रकार से घिर में लिप्त हुए उन चेष्टा करनेवालों से खड्ग चामेबालों से और खड्ग के कम्पायमान होनेसे । ४०। उस रूधिर से रक्त वर्ण प्रकाशित खड्ग भारी युद्ध करनेवाले वहे भयके उत्पन्न करनेवाले अश्वत्थ मा का रूप अमानुष दिखाई पडा । ४१ । हे कोरस जो ज ग उठे वह भी शन्द से असहुये और h 8 inace, The latter did not slimhe with the blow of the noape and slkw his adverary like : brart 37 Having slain bum ip iby wat ner ho predd to cards other wars 2018 who wero alupiog Ho slevy the sleeping Panchal. I do b ists at a sacrilico Theo ho enter ed other division and slow he warriors with 1119 w rd He extirpat ed the wr wluss and sleeping vatri is 10 an instant Wada 1119 body urrac'ıc in blodan! Lukio: dreal ful liko dostli birsult, he slew hrous anl liphunts alon Bleeding from had to foot with the bunud of t. blain, lus oxu Fouadi pad thu dre Ppin... of tis esford, Lis was dreadful to behold with hy drawn axord aad vni suporlu mau 1a Appaa rana. Those ho avoko with tho nour, bucando ivankaba at the dreadin saht limbing hinbi baa rakshas tho warrior.
17291 । - Suprik Parv सौप्तिकपर्व पे खजाप्रत कारग्य तपिशवन मोहिताः । निरीक्ष्यमाणा भन्यो-यदी प्रदान ४२॥ तस्य ते दृष्टग क्षत्रिया शत्रुकर्षिण । राक्षसं मनमाना गया नानि यमीकपन् । ४३॥ स घोररूपो व्यचरत कालपाछघिरे तत । अपपदोपदी पुत्रानशिव सोमकान् ॥४४॥ तेन शब्देन वित्रता धनुस्ता महारथा- धृष्टद्युम्नं हत या द्रौपदेश दिशामते । गरिमामारद्वाजाभानात ॥ ॥ ततस्तान निनादेन संप्रवुद्धः प्रभद्रका शिलीन पै.शिम च होगपुर मगाईयत् ॥११॥ भारद्वाजःस तरहट्या शरमाणिवत । ननाइ लिग्नान जित्रामुला-महारयन ॥४८ जना पानकुभ तियिानुसार अक्षय TTARNग्माणमदुदेव.. प्रचन्द्र विमल गृहीत्या धम्म संयुगे ! मगच विपु दिव्यं ज्ञानरुपातम। द्रौपदेयानमित्य घडगन व्यधमला । ५० न. स नरवाल प्रीिवियमहा। एक दूसरे को देखकर पीडायान् हुये । ४२ । उस शत्रु विजयी के उस रूपको देखकर उस को राक्षस मानते उन क्षत्रियों ने अपने नेत्रों को सन्द कर लिया । । इसके पीछ दमे काट के समान घूमते हुये उस घोररूपने शेष बचे हुये द्रौपदी के पुत्र और मोमकों को देखा.। ४४ 1. हे राजा उम शम्मी भयभीत धनुप हाथ लिये द्रौपदी के पुत्रों ने धृष्टयुम्नको मराहुआ सुनकर निर्भर के समान बाणों के समूहोस अवमामाको ढक दिया । ४६ । इसके पीछ उस शब्दस प्रभद्रक नाम क्षत्रिय जागउठे शिखण्डीने शिलीमुख वागासे अश्वत्थामा को पीडावान किया ।।५७ । वह अगस्यामा पागों की वर्षा करनेवाले अनारों को देखकर उन महारथयों को मारनेका अभिलापी बड़ा क्लवान् शब्दको ग फिर पिनाक मारण को स्मरणाकरता अत्यन्त झोपयुक्त रथमे उतर कर शीघही सम्मुवगया । ४९ और युद्धमें इबार चन्द्रमामों के चित्रोंते चित्रित निल ढालको कर सवर्ण से निमम दियखड्गको पकड़कर द्रौपदी के पुत्रोंके सम्मुख नाकर बलवान्ने सबको खासे वायळ किया १५०। हे राजा इसके पीछे उस नरोत्तमने वयुद्धगे प्रात abut thair epos Roaning in the camp, he saw the sons of D. aupudi 100 tbs Samaks, Terrified at the oitcry and hearing that Dinish.' tadyuma was alnın, the souls of Diauph cane i ut with tl tr Wen; ons: and learlessly coveret Ashwathama with their ar1018. 46. Thus tha Prabbadraks anoko at the nplua an' Sukliande rounded. Axbna. tbacca with bs al ai poarsows breus 11 EC 1811 2018 El cSer their arrows und dusruu8 ef slayng them, he rared with all his might, and remembering the death of his lutier, lo at once came dos ao from bis car aud facud them. He took up 3114 bads-asuned held and bright gold-handlel swod pul, wounded all than kons of Dranpadu. 50 Tuen ti atbust of wen youndcl Fratıyindlıya ou the mide and he foll dersyu dend on be groud, G':r10u« Salam (०२९२१] Malıbı Arst रक्षिदेऽधोरस को एकवि सबसे Ariana प्रतापए। पुनश्वासि समुपम्प मानपुत्रमुगाच ॥ ५९ मतकोमल जिया नरर्षभ । पुमायाहना पाइर्व नियोऽ ana शतानीको रसमा मुरिक्षर RTERRArrot . मतारपानीक भुक्ताकद्विजन्तुमालशिलामा सामान #.५४ तकनु परिध गृहीत्वा ममतास्यत् । भाभदुत्व यो होसिस भुशम १६ ॥ स तु न भुतकर्माणमा अग्ने प्रतिमा सलोपनमोनिका विमानमः ५७ ॥ तेन राम्हन वारस्तु नीतिमारप । मायामानासाल शाररवारितु ॥५८ सम्मापि शनाप या प्रतिमा सहित कायााजमानमपाहता९. तो मोमनिहामार मास प्रमाकानी किपको मिसानपर पाक किया वह मरकर पृषी पर गिराया। मनापरान मृतसोम प्रारम भात्यामाको दकर खाको बठाके असर सम्मुख गया ५२ । नोम प्राथामा सुतसोम को भूभाको सम समेत र कर दुषिपर पायम किया भी साहृदय होकर पृार मिपा र नकुलके पुत्र पर कमी शतानीकनें रख करको दोनों समा0 से पुकर बमो उसको छातीपर मायलोकयानाकर उस प्रामणने पकड़ने वाले शतानीक का पापल किया व्याकुल का पध्वीपर गिरा इसके पछि उसपर को काटा । ५। फिर शुभकर्मा परिषको लेकर भार दोहकर त्यामा सम्ख गया और दारसे युक्तधाम कृतिपर कदिन घामकिपा । ५. कि प्रशत्यामाने उधम समसे सस श्रुतकर्माको मुखपर पापडिया पार मौर अचेत होकर पृथ्वीपर गिरपड़ा । ५७ । फिर ससदमे महारथी श्रुतकी ने आरत्यामा को पाकर गानोंकी से रकदिया । ६८ | समात्यामाने उस की पीपष्टीको सलपर रोकार कुशलपारी प्रकाशित शिको शरीरसेला plurcau Ashwathuma with prays and fn od him with the drawn Aword. But he cut dowa bis swordo i arra and woundecidir onth ribe making bim fall down with the found. I hen Nobal, spiller glorious Shataark. Luiled a cor wbeel nitu buth liaud, and uit bira en tha breast, but the brahmaa blow Shatanik also.55. Then Bhuut barua faced bint with a club and hit him hani vo tho lell aidd. Agh DA thama wounded him ou the fact and he fell down o1 Barth d alignet mod coeliak & irutharn, thon suot forth & alioxor of ariows Ashwathama; but the latter took it on thuahield and co-crni lug adversary's glorrusel oud, docked in the carriage, foai tvit bundy, Thou with an ut weapons ho privals 80ch vadı ond thu Prahlulist acd parood tha furaier betroea tbe.cweje brows with sharp arior.
41293) सौतिकपर्दSauptil Tarv ७२९१) भारमानापरवली शिलीम बन बाप्यन भ्रषोर्मध्ये समापयत् ॥ ६ ॥ स माध समावियो दोषपुत्रो महाबलः । शिखटिन समासारा द्विधा चिच्छेद सोऽसिना ॥६१। शिवडिन ततो त्या प्राधाषिष्ट परन्तप । प्रभद्रकगणान् सर्वानमिदा पवेगवान् । यचशिष्ट विरारस्य पळ तुभृशमादयत् ॥ ६२ ॥ दुपदस्य व पुत्राणा पौत्राणा पुष्टदामपि । खकार कदा घार हट्वा दृष्टया महापल ॥ ६३ ॥ अन्धान म्याच पुरुषानभिस्त्याभिहत्य व । यह नदसिता द्रौणिरसिमाविशारद ॥ ६४॥ काली रक्कास्यनपमा रकमावानुलपनाम् । रक्ताम्बरधरामेका पाशहस्ताकुटुमिनीम् 1.६५ ॥ दरशु कालरात्रिन्ते गायमानामस्थिताम् । नराश्वकुजरान पाशिवाघोर प्रतस्थुषीम् ॥ १६ ॥ हरन्तीधिविधान प्रेतात् पाशमान विदजान् । तथैव च सदा राजन्न्पसशस्तन मसरयान् ॥ ६७। स्वप्ने सुतानपती ता रात्रिश्रपामु मारिए । । ५९ । उसके पीछे उस पराक्रमाने सर ओरसे नानाप्रकार के शस्त्रों के द्वारा वार शिखण्डीको सब प्रभप्रकों समेत घायल किया उस शिखगडी ने दूसरे शिलीमुख से दोनों भ्रमुटियों क मध्यमें घायलीकया। ६० । फिर क्रायसेपूर्ण उस बडेवळवान् अश्वत्य मा ने शिखण्डी को पाकर सद्गते दाखण्ड करदिया । ६० फेर क्रोधसे पूर्ण माशुओंका तानेवाला उग वडे वेगवान शिखण्डी का मारकर मभद्रकों के सानमूहों के सन्नुपापा और राजा विराटकी जो सेना शेप या उसपर भी चढाई करोगाला मा । १२ । पहे बलवान् ने देख देखकर द्रुपदके पुत्र पौत्र और पित्रों काभी पोर नाशकिया । ६३ । खड्ग मार्ग में कुशल भश्वत्थामाने अन्य लोगों केभी मम्मुख जाजाकर उनको खड्ग से काटा । १४ । उनलोगों ने रक्तनेत्र रकमाला चन्द्रनसे अलकन लाय पोशाकधारी पाशहाथमे लडके भौदिक रखनेवाली अळीकाली । ६५ । गाती ई नियत कालरात्रिको देखा हे राना मनुष्प घोटे और हाविमाको पाशो नारकर गाने के भमिलापी घोररूप । १६ । पालों के पृथक् पाशों में बँधे हुये बहुतपकारले मृतकों के लेजानेवाले भार इसी प्रकार अन्य राधियों में । ६७ । सप्नावस्था में सदर सलाह सोतेषुये महारथियों 60. Then in bis reb bo cut Silau ii into two with his sword Having Blain him, bio faced the Prabhadraks and attached the rempant of the Panchal wartlire Ho selected this song and grand sons of Drupad fiumi hiva, theiu ani destroyed tiemn with grent force. Clover in swordsmanship ho cut tl op diva with 1118 sword They saw the black Douth with red eyer se ga laods ado al with sandal and red d err, news in herd and . con pred by ter otlsprog sthiging son_s. The warnors had oltels en her mthir dr an, Larry. Ing thadead wirri rs and beasts in hr no as and newrapsuled by Ariwatisur Ingy 11a 1 tro a tlie banin; w do mar se hur .com puuled by Asl nataaws in the With le ning dies us. ruts [ ७२९४) Mababliaiat (7294) दरशुयोधमुख्यास्त पन्तं दोणिव सर्वदा ॥ ६८ ॥ यतः प्रति संप्रामः कुरुपाण्डप सेनपोः । ततः प्रभृति तां फन्मामपश्यन् द्रौणिमेव च ॥ ३९ ॥ तांस्तु देवरतान पूर्व पवाददौणिपातयत् । त्रासमान संभूतानि बिनदर भैरवान्यान् । ७. १ तदन- स्मृत्य ते धोरा दर्शन पूर्वकालिफम । इदं तदित्यनन्यन्त देवेनोपानिपीडिताः ॥ ७१ ॥ ततस्तंन मिनादन प्रत्यबुध्यन्त धन्विनः शिविरे पाण्डवेयानां शतशोऽध साशा ।। ७२ ॥ सोऽच्छिनत फस्पषित पादौ अधनश्चय कस्थविद । कामिनिमद पार्वेषु कालमथान्तकः ॥ ७॥ त्युमपातीपष्ठ मानव भूगातुरः। गमाघमायत चारधर्मी कीर्णाभवत् प्रभो । ७४ । कोसतो किमि कोऽयं क सन्द किन्नु हतम् । एवं तेषां तदा दौणिरन्तकः समपद्यत ।। ७५ ॥ मपेत यनशान समदान | पाण्डसम्पान् । प्राहिणोन्मृत्युलोकायगौर्णिः प्रदरतामरस ७६सस्तच्छदावत्रानो उपतन्ती भयानुगः । निद्राधा नष्टसंहाच तत्र तत्र निलिबिरे ॥ ७॥ लेजानेवाली उस कालीको और उस मारनेवाले अश्वत्थामाको उत्तम शूरवारों ने सदैव देखा ॥ १८ ॥ जसे कि कौरवीय और पाण्डवीय सेनाका पद नारीहमा से लेकर धम कन्याको औरममत्यामा को स्वप्न में देखा । ६९ । पुदमें सब बावधारियों को हराने और भपान शब्दोंको गर्जते अन्नस्थामा ने प्रथम देव से हते हुये उन लोगोंको पीछमे गिराया । ७० । देवसे पीड़ित उन चारोंने उसपूर्व समयके देखेहुये स्वप्नको मरणकरके माना कि यह वही बात है । ०१ । इसके पीछे पाण्डवोंके डेरे, यह सैकड़ों और हजारों धनुपधारी उस शन्दसे नागउठे ७२ काळसे प्रवृत्त मृत्यु के समान उस प्रसत्यामाने किसीके पराको काटा किसी के जयन को और कितने ही को कक्षिपर छेदा १७३ हे मस कठिन मन कियापे शम्द करनेवाले मताले हायी और हाथी घोड़ों से मयेहुये मन्प मनुष्यों से वह Year माच्छादित होगई । ७४ । जो लोग कि इसमकार से पुकारते थे कि पह क्याई कौनो सासद होरहाई उन सफ लोगोंको प्रहार करनेवालों में भष्ठ अत्यामाने पाण्डवोंके नातेदार और सूजीलोग जो किशन भार करों से गीत में उनकामी यमलोको भेना । ७ । इस के पीछे उतशत से भयभीत उछलते और पसे पीडावान निद्रासे मंधे अचनकर बहलोग जहां तहां गुप्त होगये ५७७ । और अरुस्तम्भ मूसि निर्मल भयभीत कठोर शब्द करने Aslwutbawa slow this warriors whose daya ucru nunbuef. 70. Tho acriore, au cred by Fate, rememtond their drown and rcal.sed Then bundreds and thousands of archers awoke in the with that poiwe, but Ashwathiwa, live an embudineat of Death, cut their ſtot, kigha Indobe. The grouod was covered with lo akriekin; bird elephants and copies of oven curbed by chphartfard burning Aslimothama slew the Britijis and other alling olihu Panxlavas who were taking in couit, " Who is it? What is this norts s!"Thh alhajilufth REATRE and blius with sleep, thom. Patdar camp (7295 - । Sauptik Pary atigima (७२९५ ऊहसम्म गृहोताध कस्मलाभितौजसः । विनदमो मुशंत्रस्ता:समासीदन परस्परम ॥ ७८ ॥ ततो रथं पुनद्रीणि रास्थितो भीमनिस्वनम् । धनुष्पाणिः शरैरन्यार प्रेषयर समक्षयम् ॥ ७९ ॥ पुनरुत्पततश्चापि रादपि नरोसमा । शूरान संपततवान्यात कालरात्र्यै म्यषेदयत् ॥ ८. । तथैव स्यन्दनाप्रेण प्रमथन स विधावति वर्ष विविधरवर्ष छात्रवांस्तत । ८१ : पुनश्च मुधिचित्रेण शतचन्द्रेण धर्मणा । तेन घाकाशवर्षेन तरापरत सोसिना ॥ ८२ ॥ तथा स शिविरं तेषां द्रौणिराहपदुमंदः । व्यक्षोभयत राजेन्द्र महादीमवद्विपः॥ ८३॥ उत्तुस्तेन शन्दन योघां राजन विष तसः । निद्रानाश्च भयाश्च यधावन्त ततस्ततः ॥ ८॥ विस्परं चुकशुधान्ये धाराएं व्यापदन् । न च स्म प्रत्यपधन्त शस्त्राणि वसनानि च ॥ ५ ॥ विमुक्तकेशा चान्ये नाभ्यानन् परसारम। उत्पनन्तोपतान्ताः कधिचत्रास्तयों ॥८६॥ हम पाडारान हुप ।७८ । इस के पीछे धनुप हायमें लिये अश्वत्थामा ने भयकारी रथपर सवार होकर बाणों से अन्य मनुष्यों को भी यमलोक में पहुंचाया। ७९ । फिर दूर से उछरते नरोत्तम तिहुये दूसरे शूरोंकोभी कालरात्रि के आधीनकिया उसी प्रकार स्थकी नौकसे मयता हुआ पह दौड़तार्थी इस के पीछे बहुत मकार की वाणाष्टियों से शत्रुओं के मनुष्योंपर वर्षा करने लगा। ८१ । फिर बड़ी विचित्र मूर्य चन्द्रमा रखनेवाली ढाल और उस भाकाशवर्ण खड्ग के द्वारा भ्रमण करनेगा। 1 हे राजेन्द्र उस युद्ध में दुर्मद अश्वत्थामाने उन्हीं के डेरेको भी ऐसे छिन पिन किया जैसे कि हाथी वड़े हूदको करदता है। ८ । हेराना उस शब्दसे अपेत शूरवीर उठे और निद्रा भोर भयस पीड़ान होकर इधरउधर को दौड़े । ८४। इसीप्रकार असभ्य वचन कहहुये अन्ग्लोग बड़े शब्दसे पुकारे और शास्त्र और वनोंको नहीं पाया 1८५। बहुत से सुलहुये वाचनाले मनुष्योंने पररपर नहीं पहचाना तब वहां उछलतेहुये कितनेही मनुष्य यार गिरपड़े को और कितनही आनण करनेलगे । ६६ । कितनही लोगोंने विष्टकांगड़ा people lid themselves here and there. We to, were tarrified and rivoted to the spot shero tre stood Then Ashwathama slew other warriors with the arrows shot from his car. Ho blow those whom he san coming near. 80. He ran his car among them, showering arrows and crushing them ander wheels. Then he roamed with his abiela studded with sans apd moons, carrying the bright sword in his bund. Ho upset their camp as an elopbant does a like. The warriors avoka with the noise and ran away here and there in their sleep and fear. Others uttered ob-ceno words, but coull not get their arma and armoar in the barry of the momente 85. Odbera with disberel. led hair did aut LAUT one another. Sono fell down with azhaustion, while others ran here and there Somo dropped aride Elopbanta - (७२९६) Mahabharat [72961 पुरीपवसूजन फेचित् केचिन्मूत्र प्रमुधु । पन्धनानि च राजेन्द्र सछिद्य तुरगा विपाः ॥ ८७॥ सम पर्यपतंश्चान्ये कुर्वतो महदाकुलम् । तत्र चिधरा भीता व्यली यात महीतले । तथैव ताधिपतितानपिन गजवाजिन ॥ ८८ ॥ तमिस्नथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ । सृष्टानि उपनदन्नुचैर्मुदा भरतसत्तम ॥८९॥ स शब्दः परितो राजन भूतसंधैर्मुदायुतैः । अपूरयोदश सर्ग दिवशतिमहास्वनः ।। ९० । तेषामानस्वरं श्रुत्या वित्रता गजवाजिन । मुक्ता पर्यप्रतवाजन् मृइनन्तार्शविरे जनाम् ॥ ९१ ॥ तैतन्त्र परिधापद्रिचरणोदीरितं रजः । अकरोच्छिविर तेषां रअन्या द्विगुण तमः ॥ ९२ ॥ तस्मिस्तमसि समाते प्रदाः शिीवरेजना । नाजानम् पितरः पुत्रान मातृन भ्रातर पच ॥ १३॥ गा गजानतिक्रम्य निर्मनुम्यान या हयान् । भताय स्तथाभजस्त थामुनश्च भारत ॥ १४॥ ते भग्ना. प्रपतन्निस्म निमन्तथ परस्परम् न्यपातयंस्तथा चान्यान पातयिरया तदापिषन् । ९५॥ विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चामतान। कितनोंही मूत्रका करदिया हे राजेन्द्र हायाघाड़े बन्धनोंको तोड़कर । ८७ । चारों ओरको दौड़े और कोई महाव्याकुलता उत्पन्न करनेवालड्ये वहांकितनेही भयभीत भादमी पृथ्वीपर सोगये उसीपकार उन पड़ेहुओं को हाथी और घोडों ने मर्दन किया। १८ । हे भरतर्पः पुरुषोत्तम इसमकार उस नाशके वर्तमान होनेपर राक्षस लोग प्रसन्न होकर बड़े शब्दगे गर्ने । ८९१ हे राजा मान्नीचत्त जीवोंके समूहों से किया वह शब्द सर्वत्र व्याप्त होगया उमबड़े शब्दने सबादेशा और भाकाशको पूर्णकिया । ९० । उन्होंके पीड़ित शब्दोंको सुनकर भगभीत और वन्धनों से जुदे हाथीपो, टेरेमें मनुष्यों को खूदते मर्दन करते चारोंभोर को दौड़े । ९१ । वहाँउन चारों ओर दौडनेवालों के चरणों से उठीहुई धूलैन रात्रिकसमय उनोंके डेरों में दुनें अन्धकारको उत्पक्ष किया । ९२ । उस अन्धकार के उत्पन्न होनेपर मनुष्य सव ओरसे शज्ञान हुये पितानि पुनों को नहीं जाना भाइयों ने भाइयों को नहींनाना हाथियों ने हाथियोंको सवारों से रहित घाड़ान घोड़ोंकोदवाकर घायल और टूटे भगाकया उसीमकार मदन करते परस्पपर मारतेहुये बहसब पापल गिर पहे इमीकार जन्योंको भी गिराकर मर्दन किया । १५ । अचेत निद्रासे युक and horsos bioke their rep03 and ran in ) directions. Some men Tuy on ou tu out of fair ad very crisshed down by elepants and hoigos. Dur ny that destruction the rakshasos roared dreadfully, There was a hulbuball round md the noure spread through all direction! 90. At the rounds of then wilings, elephant and horscs Uroke their res und on away rusing and trimplipg the wen in their way. Thw dust 11 sed by then feet made the night doubly darl Po plo lost this in that darkness fitbus did det kuor der sons and insethers did nt rezigniso brothers, Llepaapts wounded eksplints auch thu nierl sbor 103 Foutkled and crushed liorer 95 In zowsills with slzep and Jarkness, thoy slew ouo 17297 Sruptik Parv सौ. पासपर्च (७२१.७ अनुः स्वानेव तनाथ कालेनामिप्रत्रोदिताः ।।९६ ॥ स्यात्याद्वाराणि च द्वास्थानथा गुलमानि गीदिमकाः। प्रादयन्त यथाशा काग्दिशीफा विचेतसः ॥ १७ ॥ विप्रनष्टा बगोन्यं नाजानन्तो तथा विभो । क्रोशन्तलात पुति घोपहातचेतसः ॥ ९८ ॥पला पता दिशस्तेषां तानप्युत्सृज्प पान्क्वान् । गोत्रनामभिरन्योन्यमान्वन्त तो जनाः ॥ ९९ ॥ हाहाकारञ्च कुर्वाणाः पृथिन्यां शेरले परे। तान् वुध्या रणमध्येसो द्रोणपुत्रो म्यपातयत् ॥ १० ॥ तत्रापरे अभ्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः । शिवरानिपतन्ति स्म क्षत्रिया भयपीडिताः ।। १.१॥ ताश्च निष्पततमताधिविराज्जीवितैषिणः। कृतवर्मा रूपवैध द्वारदेशे निजन्नतुः ॥ १.२ । विशनयन्प्रकरवान्मुक केशान् कृतांजलीन् । पमानान क्षिती भीताव कांश्चिदमुच्यतान । १०३ ॥ नामुच्यत तयो कश्चिधि क्रांत:शिीषरामीः । रुपस्य घ महाराज हार्दिक्पस्यच दुर्मतः ॥ १.४॥ भूयश्चैध अन्धकारसे घिरे और कालमे मेरित लोगोने वहां उनको मारा । ९ । इसीपकार धारपान द्वारोंको और गुल्मपाले लोग गुल्मोंको त्यागकर के भयभीत और अचेत होकर सामर्थ के अनुसार भागे । ९७। और परसार नाश होगये इसीमकार एक ने को नहीं पाँचाना आने वालों को छोड़कर दिशामों को भागते उन लोगों के मध्यमें से दैवमे व्यथित चित्त मनुष्य पुकारे हे पिता हे पुत्र इसके पीछे लोगोंने गोत्र मार नामोसे परस्पर पुकारा । ९९:। और कितने हैं। हाहाकार कर के पृथ्वोपर गिरपद इस असस्थापाने युद्ध में उनको जानकर रोका । १००। और बहुत से क्षत्रिय वारंवार घायल और अवेत और भय से पीडवान् होकर रे वाहरगपे । १०१। उन भयभीत जीवन के इच्छावान डेरे से निकलने वालों को कुतधर्मा कपाचार्य ने द्वारस्थानपर मारा -1 १०२। जिनके पत्र भोर कवच गिर पड़े वह खुप वाल हाथ जोड़े वृथीपर कम्पापमान और भाभीत थे। १०।। उनमें से किसीकोभी नहीं छोड़ा ढोसे वादरनिकलनेवाला कोईभी मनुष्य उनदोनोंके हाथमे बचकर नहीं गया है पाराम भवत्थामा मिय करने के प्राभेलापी उन another. The door keepers anxl camp soldiers doserted their posts and ran away with all their might They distroyed one another without seeing. Leaving their k1,8mun, they disperseil in all directions and called out fur fathers and sons in confusion. They announced their clans uod names, Some fell down on earth with crius of dismay and Ashwathama cho ked them in their flight, 100, Many warriors, wounded aud insensible with fear tried to go out of tho camp to save their livor; but they wole lun by lirisvarma and Rripacharys who were slationed at the entranco. The warriors, destitute of arnis and ard our, with dishuvelled hair n d clasped tands, Iny on caith, trembling with lear. None of those who tried to capo frong the camp for their liver, nere ablu to scape froun Kripacharya and Erity4cm To please Ashwathams, they set fre to camp from - ।" Mahabharat (7298) चिकापन्ना द्रोणपुरानापम् । त्रिदेशगु दवतुः शिविरस्य हुताशनम् ॥ १०५॥ तत. प्रकाशे शिविरं बगेत पितृनन्दनः । मध्यस्थामा हागस ध्यपकानात । १०६ काश्विदापततो धामनपर बाप्त । व्ययं बपत् खगम प्रजिष रोचम ॥ १०७ । कांश्चिद्याधन स अगेन मध्ये साछपारधान् । अपातयद्रोण पुत्रः सम्मास्तिलकाण्डर ॥ ॥ विन मिशास्त नराम्बाईरदांत्तमैः । पतितरमवत् कीर्ण मेदिनी भरतर्षभ । मानुपाणा सहनेषु तेषु पतितेपु च ।'उदातिष्ठिर काधानि बाधाप सापतन् ॥ ११० । सायुधान सादान घाइन्धिमत्त शिशिच । हल्लिास्तो पमानकर हस्तान् पादाच भारत ॥.१११ ॥ पृष्ठछिनान शिरिश्छिलान् पावलिया परान समामाकरोद्राण. कोचिश्चापि पांमुशान् ॥ ११२॥मदेश मरानम्पश्चिन्छ कृपाचार्य और दुद्धिी कृतवर्माने डेरोंके तीनों ओर अग्नलगादी। १०६ । फिर बरों के प्रालित भार प्रकाशित होनेपर पिताको प्रसन्न करनेवाला अपत्यामा इस्तलाघवीक समान खड्गको लेकर घूमने लगा । १.६ कितनेही आने और दौड़नेवाल चारोंको सद्गद्वारा प्रणोंसे रहितकिया और बामणों में भेष्ठ परा- कमी पाश्वत्थाम ने कितनही शूरवीरों को खड्गके द्वारा मध्य से काटकर क्रोष युक्तने तिलकाण्ड के समान गिराया । १०८ । हे भरतर्षभ अत्यन्त घायल मर्जते गिरते मनुष्य घोहे और हाथियों से पनी आच्छ दितईई ।१०९१ हजारों मनुष्यों के मरने और गिरने पर बहुत रुण्ड के और उठकर गिरपडे । । १० । शख मौर वाजूान्द रखनेवाली भुजाओं समेत शिरको काय भौर हाथीकी इंडके समान जंघानों को और हाथ पैरों को काटा । १११६ हे भातशी दूटो पाठकुक्षि और शिरवाले अब लोगों को गिराया उस महात्मा असत्यापा ने कितने ही मनुष्यों को मुखफेरनेसला किया । १११ । किपीको कान से स्थानपर मौसी को कटिस्थानपर काटा किसी को कन्धे के स्थान पर घायल करके शिरको शरीर में प्रवेश किया । ११३ । इसमकार उम के घूमते और बहुत भादियों को मारते wl silom, 65 Whan the came way thrzewing A.J.xewna, vua jny of his father roamed dexturou.ly with his sword. He killed the coming sod running warriors with bis swind, He cut sono in the middle and others into pifcouieal The ground was corored with mwn and benets, wounded, crying Rod falling down. At the fall of thousands of men, beedless ludhes rose and fell down again. 110. lo cut down the jewell-d hands and heads as well as thighs like tho trarle of elephants ont fiands and foot. Ile cat asuder the backs, kulcs and licade of others Anny Warriors turned luck form Ashxatlamı, He cut the cars and tsuaks of ROTO aud wounded others on tho shoulders making their besds enter their Lodica. Whilo he was thug roading oud killing, the night became dreadful to behold. The (72५५ . Supmk rarv सोप्तकपर्ष राम्यांर कर्णतः मियदेशे नि हावापान कायप्रावेशयछिरः॥११३ एष विधास्तस्य मिना स्वाभरार तमसा रबी घोरा भी दारुणदर्शना ॥ ११४१ किशित् प्राणे पुरुषोईतबाम्प; मश: । धन जाधन भूगईमा । १.५॥ पक्षरण सम की स्थाश्वद्विपदाकणे । द्धन द्रोणपुत्रेण सच्छिनाः प्रापतन भुवि .११६ ॥ प्रातमन्ये पितृमम्मे पुत्रानन्ः चिद चुन तत् को धातिगप्दैः हतरणे।।११४॥ पत्फसनप्रमुतानांरक्षा िफरफर्माम असाध्या पायानामिद न कदनं तम: १५८ ॥ नशामुरगन्वयन गझमः । शामो वितुं कौन्तेयो गीता पस्म बनाईनः ॥ ११९ । झण: सत्यवान्दतिः सर्व भूतानुफमाकः । स सुप्तप्रमतं का न्यस्तशस्त्रं ताहिम धिम्त मुक्तपेशाम्पा शक्ति पार्थो धनाय. ९२० : सदि मारुतं बोर रसोभिः समभिः । इति लालध्यमानाः म्म शेरते परपो जनाः।१११॥ स्तनताश मनुष्माणामारेषाष्प जताम । ततो महत्तात् प्राश ग्यास शाम्दस्तुमलो पे अन्रकार से बारात्रि घोर कप महाभयानक दशन देखनेम आई । ११४ । भगव पाणपाले कुछ मृतक हमारों मनुष्य हाथी और पाडोसे पृथ्वी भया भक देखने भाई । ११५ । यक्ष राक्षसों से संयुक्त ग्य घोड़े. और हाधियोंसे भयानक प पृथ्वीके होनेपर क्रोधयुक्त.प्रश्वत्थामांक हायसे घायलोकर पृथ्यापर गिरप? । ११६ । कोई माइयोको . कोई पिताओं को और पुत्रोंको पुकारत था भोर वन हो पाक यमन कोपयुक्त धतराप्टके पुत्रोंने भी वह कर्म कियाय जो लिए रासाने हम सोनेवालों के साय किया पांडवों के वर्तमान न होने से यह हमारा माशकिया। १५८ वह अर्जुन अमर गन्धर्व यन और रासस से भी सिमप करके योग्य नहीं है जिसके कि रक्षक श्रीकृष्णाजीहैं । ११९ । वह भल बेद प्रामणों का रक्षक मितन्द्रिम और सब जीवधारियोंपर कृपाकर पाप अर्जुन गानेवाले मतवाले प्रश्न हाथ जोड़नेवाले खुले केश और मागमा भनुप्पोको नहीं मारताहै । १२० । निर्दपी राक्षसों ने हमारा यह नाशकिया इसमकार विलाप करतेहुये बहुतसे मनुष्य पृथ्वीपर सोगये । १२ । ground looked dreadful with the dying and duai men and beasts, 115 Full of pakshes, rakabases, cars, borxes and elephants, cut dosen by Ashwathama the groand was dreadful to behold. Some called out their brothors, Inthers and sons, whils others said, " The rakahanea have done the same with tho sloopers as the song of Dhritrashtra did in daylight in the presence of the Produvas, Huvias Sliri Krishn for his ruteelor, Arjun is invincibly by asurs, gandharvas, yahshes and rokahases. Arjun is the protector of tho Vedne and brahmvs las control over his organs and is morcilul to all bringe. He does not y lay tło sleeping, mad ard wespur.less, nor those who seek refuge witli dishevelled hair and jointd haids. 120. The cruel करनेवाला (७३०) Mahabhaint (TOP महान् । १२२ ॥ शोषित तिपिकाया चमुधायाच भूमिप। तदजस्तुमुलं घोरं कणे नातरधीयत ।। १५३ । सपेष्टमानानुदिनालिसाहान्महमशः पातयनराण अद्धः पशून् पशुपतिपंथा।। १२४ । अन्योन्य संपरियज्य यानान प्रवतोऽपरान् । संलीनान मुभमानाश्च सर्वान् द्रागिराधेपन । १२५ ॥ जपानान नाशेन वा नाश्च तन ते । परस्पर ना योधामनवमसादनम् ।। १२६. ॥ तस्यान्तास्वन पाण्याना मादलम् । गमयामाम राजेन्द्र-द्राणिमानिनेशनम् ॥ १२७ मिशाच राणा सत्यानां रात्रि सादामी । नासीनागजाश्यानो राम्री,क्षयरी मधम ॥१२८ तारश्यन्त रक्षासि पिशाधारण पृथगिधाः । साइनो नरमासानिमिरलय शोणितानि च ।। १२९ । कराला पिङ्गला रोडा. शैलता रजस्वला । अटिल दाम सस्थाश्च पवादामोदरा. । १३० ॥ पश्चागुलयो रुक्षा विसपा मेरपस्सना। इसकेपछि एक मुहत ही पकारते और गोदुगे जन्य मनुष्षों का वह बहुतबहा शाब्द बन्दहोगया । १२२ । हे रागा कपिरसे पृथ्वीके भच्छेप्रकार तरहोनेहर वह घोर भौर कठिनधून एकसणी दा होगई । १२ । उमक्रोषपुतने चेष्टाकरनेवाले व्याकुल और उत्साहमे रहित हमारों मनुष्यों को ऐसे गिराया जैसे कि पशुओं को रुद्रजी गिराते हैं । १२४ : उस अवस्थामाने पृथ्वीपर गिोडसे मनुष्योंको परमार मिलकर भागनेवालों को भोर कितनेही पुप्त पद्ध करनेपाकों को अत्यन्त मारसाला । १२५ । तव भाग्निसे जलनेवासे और उस अश्वत्थामाके हाथ से घायल उन शूरवीरों ने परस्सर यपलो में महुँ बापा । १२३॥ राजा अश्वत्थमाने बससाभि के भद्रभागळं पाण्डवा की बड़ी सेनाका यमलोक में पहुँचाया । १२७ । वह राशि राक्षसों की प्रसन्नता बढ़ानेवाली मनुष्य घोड़े और हाथियों का भय उत्पन्न करने चालाहीकर महाकठिन नाशकारी हुई। .२८ । यहाँ पृथक र प्रकार के पिशाप गतस मनुष्यों के मामलो खाने और रुधिर को पातहुये दिखाई पड़े ।, १२९ । जोकि कराल पिङ्गल वर्ण पर्वताकार दांत रखनेघाळे धूलसे लिस जटाधारी लम्बे शङ्ख पांच पैर और बड़ा उदर रखनेवाले । ११० पीछकी भोर उँगलियां रखने rakslases have destroyed us. " Thus crying and lauenting, many warriors lay on earth. Aftei some tiwe, the noise of men and beasts subsided and the ground being well drenched with blood, tho storm of dust had disappeared Euraged Aslivyothawa had slain thousands of warriors as Rudia does beasts. He extirpated the men follen on the ground as well as those who were running away or fighting from a blumny play 125, Harning by fire and wound d by Ashwathaman, tleb ave wirriors slow one in ther. Ashwathan destroyed the great l'andav army during that midnight which gave pleasure to rakshases and fear and d structuu tr mon and, bgasts, Pishacles and ralshuses were seen eating the flush of men and drih.
.७३०१ - 20537 (7301) bilaris uploh l'ary पाटाजासायवनाथ मीलकण्ठा विभीषणा ॥ ११ ॥ सपुत्रदारा "मग मुशा मुनिपुणा विविधानि च रूपाण धारयन्त रक्षसाम् ॥ १३॥ पाया व शोणितं हटा प्रावस्यन गणश परे। मिद स्यादिति बानुवन् ॥ १३ ॥ मेदो मजास्विरमान बसाना भृशता परमासानि खातात. कव्यादा मांसजीविन १३४ ॥ वसाषापरे पौत्य पधापन विकुक्षिका । नानाय स्वात्तथा रोड़ा व्यादा पिशिताशिनः। १३५ ॥ अयुतानि च तत्रासाप्रयुत पदानि पा रक्षप्ता पोरकरण महत करकरणाम ।। १५६ ॥ मुदिताना वितृप्तान तस्मिन्महानि पेशसे । समेतानि पान्यासन मूनानि च जनाधिप:१३७ ॥ प्रत्यूषा शिविरान् प्रतिगन्तु मियरस .३८॥ शोणितासिकस्य दोगरासीदप्तित्सक । पाणिना स सीर एकीरत इस प्रभो ॥ १३९॥ दुर्गा पदरीं गत्या निराजनक्षेप । युगान भूतानि 'पाले कोष कुरूप भयानक शन्दनाले घण्टागाल से युक्त नलकण्ठ भाउत्पन्न कर नेवाले पुत्र वियोंको साथ रखनेवाले निर्दयी दुर्दर्शन और दया स रहित थे वह रासमों के सभी अनेक प्रकारके देखनमें आये । ११२ । केाई हारको पान करके प्रसन्न निच होकर नृत करने में और कहते थे कि यह उत्तगह यहपवित्र है यह स्यादु । भेगा मज्जा भस्पि और रुधिरको अहीरीति से भक्षण करने वाले रुपिरसें अच्छे प्रकार तृप्त हुये मांससे जीवमेव ले वह गतस अन्यलोगोंके मांस खानेसे तृसहय। १३४ाइप्सीमकार नानासकारके मुखरखनेर ले कोई गलका मांसभक्षी बड़ा उदर रवनकाले राक्षस मना को पान करके चारों ओर को दोहे । १३५ । वहां निर्दय की भयानकरूप बडे राक्षसों की संख्या हजारों किरोड़ों और प्रर्वदों थी। ११६ हे रामा उमबड़ेश मान्न वित्त अत्यन्त तस राक्षसोंकी यासंख्या थी भार बहुतो भूतगण भी इकलहुये । १३७ । उमने मात:काल के समय उसहरे से निकलनाचाहा । १३८ । मनुष्यों के होघरों से लिए असत्यामा का खड़ा हाथ चिपटा हुआ एकरूप होगया हे मनु वह अशत्यामा दुःखसे मिलनेवाले मार्गमें नाकर मनुष्योंक नाया ऐमा शोभायमागहुआ जैसे कि मलयकाल में सवनीयों को ing their blooi I beg lad dreadful furcus, jelfie colou , liuge teeth dust stained hiali, long coniche five fee, lu ge bolly, t es turned backward, die dful vienge, srith bells an: nut , blue th oals, dieadiul women, accompuued by women and cons, cruol, bid looking anmerciful and of various fim Sog felt jog at dumking blood and dancad, kdywg: “ It 1“ go de loly and deliciouIlicy ate fleste, tat and bones and wrie satishred with a blod sine drendeur canaLalu, with lng bullies, fedin lat any 20 th rathither 135 Tru ertel and dreadful Jakeliases were muliwns in npinter, which was augmented by g blons With his arm and sword of the same buo, Ashwatbawa wonded to goout of the camp in tho nierung aus 132 (७३०२) Mahabharat (7302) भस्म काष पावकः॥ १०॥ पयाप्रति ताक या होणावनिः प्रमो । दुर्गमा पदीं गच्छन् पितुरातीहतधरः ॥ १४१। यथैव समुप्तजरे शिविर प्रविशनिशि तथैव इत्या निःशब्दे निमफाम नरभ ॥ १४२ ॥ निकम्य शिबिरासमाचाभ्यां सङ्गम्य वीर्षयान् । आवख्यो कम तत सर्व दृष्टः सहर्षयन विभो । १४३॥ तापाया घस्पतुस्तस्मै प्रिय प्रियकरी सदा । पाञ्चालान सज्जयांव विनिकत्ता सामशः। मास्पा बोच्चदकोशस्तयघास्फोठयतका ।। १५४ ॥ एवं विधा हमारात्रि सीम कानो जनक्षपे। प्रमुप्तानो प्रमत्तानामासीव सुभृशदारुणा१५५॥मसंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिश: ताशा निहवा यत्र त्यास्माकं अनझयम।। १४६ । राष्ट्र उवाच । प्रामे सुमहरकर्म द्रौगिरतन्मधारयःनाकरोदोहरा कस्माग्मत्पुत्रविक्रयेभृता ॥१४७ ॥ मर करमारते क्षमद कृतवानसी। द्रोणपत्रो महेवातस्तम्मे संशित मरसि।१५८ सय उधाषा नूनं भवाबासी तपान करुनन्दन सानि भस्मकरके भग्नि शोभायपानहोताहै । १४० । हे प्रमुवा भश्वत्थामा प्रतिक्षा के भनुसार उस कर्मको करके पिता के दुष्पाप्य मार्गको मातकरता वापसे रहितहुमा ११४३॥ वह नरोत्तम असक रात्रिमें सोनेवाले लोगों के समान देरेमें पहुँचा सीमकार मारकर डेरेके निशब्द होनेपर ढरेसे पाहानिकला।१४।उस पुरेसे निकल उनदोनों से मिलकर मसन्न और प्रसन्न करत उस पराक्रमीने उनसन कर्मको वर्णन किया। सपर्थ तबउन विनय करनेवालों ने उस प्रिय वचन को रससे वर्णन किया कि हमने से निप्लेनराले हजारोंपांचाल और सञ्जियोंको मारा वह मसन्नता समेत बड़े उच्चस्तरसे पुकार और हायकी तालियोंको बनाया । १४४ । सोवे और भचम सोपकों के नाशमें बहरमने इसपकारकी कठिन भौर भयकारी । १४५ । निस्सन्देह समपकी लौट पौर चुसमे उल्लंघनकरने के योग्यो हो कि उस महार के हमारे मनुष्यों का नाश करके मारेगये । १४ । पृतराष्ट्र बोले कि मेरे पुत्रकी विनयमें प्रवृत्तचित्त महारथी प्रशत्यामाने प्रथमही इस मकारके कठिन कर्म को कैत नहीं किया । १४ । उमनीच दुर्योधनके मरनेपर उसमरामा मश्वत्थामा ने किसईतुम उस कर्मको किया यह सब मुझसे कहने को योग्बहो । १४८ । संपन looked glorious like the fire at pravayn 140. Itsving dons tho deed to avenge hja father's death, ho felt choorſul. He left the camp as nouclusa ma it was ssbon fio ontered it at midnight. H, mot his tin Trivada and cheored them by reliting his exploits. They also told him the charished news of tveir own victory and slaughter of thoa. Banda of Paachals and Srnjwyre. They shoutod fur joy and clapped their bauda Tbe sleeping Somska bad been slaughtered during ibat dreadiul ugbt. lis. Surely tha thunges of Ture are hard to be YaReadoror; in thoso who had elain our men wers thonrelveaslain " Dhritrashtrasant, " }}hy dul ashwathama not dna dood like this thougla bo was stint or nyw i'erictory! Why dad lo do it at the 17303 Sauptik Parv सौप्तिकपर्व (७३०३) ध्या पानां शयस्य च धीमतः । सात्यापि कर्मदै द्रोणपुत्रेण सावितम ॥ १४९. कोदितेषां समझ जाण्यापि ममपतिः । एतदीडशक वृत्तं राजन मुक्त भने विभा ॥ १५॥ ततो जनझ या पाण्यामां महापयम दिया दिष्ट्रयोति साम्पोन्य समस्योषमहारथाः ॥ १५१ ॥ पाजत द्रोणिस्ताभ्यो संप्रतिमन्वितः। पातु ममादावरे पापमुममम ॥ १५२ ॥ पाउसाला निहताः स द्रोपद्रपाल सर्वशःसोमको मरस्पशेषास पिनिहना मया ॥ १४३ ॥ इदानी कृतकरया स्म याम तय मा बिरम्। यदि जीवति मा राजा तस्मै संशामई मिषम् ॥ १५ ॥ इति साप्तिकपर्वणि पायासादिषेप्टमायाप ॥ चोले कुरुनंदन निस्संदेह उस अश्वत्थामाने उन पाण्डवों के भयसे इस कर्मको नहीं किया पाण्डव केशवनी और सात्या के वर्चमान नहानेपर अन्नत्यामाने इस कर्म का साधन किया । १४९ । उन्हों के समक्ष कोई मनुष्य तो क्या इन्दभी नहीं मारसकाया रे रामा राधिक समय मनुप्पों के सोने पर ऐसा वृत्तान्त हुमा । १५० । फिर पापडों के लोगोंका कठिन नाश करके वह महारथी परस्पर मिलकर बोले कि दिष्ट्या दिष्ट्या अर्थाद मुवारक मुवारकहोप । १५१ । इसके पीछे प्रसम कियाहुआ भवत्यामा उन दोनोंसे स्नेह पूर्वक मिला और प्रसन्नतासे इस उत्तम मौर बड़े पचनको वोला कि सब पाञ्चाल थोर द्रौपदी के पांचो पुत्र मारेगये शेष बचापे सव सोमक और मत्स्य देशभिी मेरे गयसे मारेगये । १५।। आहम कल्प कस्य हैं वहाही चलें विलम्ब मतकरी जो हमारा रामा जीवताहे हम उस घटकर वर्णन करें। ९५४ । fall of Duryodbant Pray telline a'l thir," Sunjayo paid," Burely, ho did not do it before for fear of the Pandavas. He was able to perform it in the absence of the Paodayar, Keshav And Satyaki. Not even Indra cao cope with those personages. He did it when the warriors were asleep 150. Having destroyed the Pandar wrriory, the three beroes congratolated one another. Ashwathama embraced the two men joyfully and said, "The Panchals and the five sona of. Druvpdı are plain hike t' e Smaka and Matayas We are now happy Latus go and inform the ling without delay, if he be yet alive. "154 . [७३०४) Mahabcatut (7.04) समय उवाच । ते हत्वा सर्वपाञ्चालान द्रौपदेयाथ सर्वश । आगच्छर सहि वास्तत्र यत्र दुर्योधनो हत.॥ १॥ गवा चनमपश्यन्त चिश्चिाप्राणं अनाधिपम् । ततो रथेश्य प्रस्काय परिववृत्तवारमजम् ॥ २॥ त भन्नसपथं राजेन्द्र कृच्छ्प्राणम वेतनम् । घमन्तं रुधिर यादाश्य वसुधातले । ३॥धृत समन्तामिः मापदे घदर्शने. । शालाकाणैव भक्षाविष्पगितिकात् ॥ ४॥ निधारयन्त कष्छाचार वापदाश्च विवादिषन् । विषयमान मदान्ध मुभृशं गाढयटनम ५१ त शयान तथा तथा दृष्टवा भूमौ स्वरुधिरोक्षितम् । हनशिष्टास्त्रमा चौरा: नफाप्ता पर्यवारयन् । अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वत.।। ६ ॥ तलिमि शोणितदिग्वैनिशसद्रि महार। शुशुभे शवृतो राजा घेदी त्रिभिरिव मिमि. ॥ ७ ॥ ते तं शयान संप्रेक्ष्य राजानमनधोचितम् । मविहान दुःखेन ततस्ते करुनुस्ख ॥ ८॥ नतस्तु रुधिरं हस्त प्र-पाग९॥ संगण केले कि वह नीनो मन माल और पांचो द्रौपदी के पुत्रों कोमार कर एकमाथी वहां गये जो कि घायल दुर्गापन था । १। और जाका कुछ शेप पाणवाले रागाको दखा इसके पीछे रथोंने उतरकर आपके पुत्रको मध्वी किया । २ । हे राजेन्द्र उन्होंने उस टूटी जंघ और माणों से पीड़ावान अवतार मुमे रुपिा डालना रानाका पृथ्वीपर देखा । ३ । भयानक दीननाने बहुतसे हिंसमीनों युक्त भार समीप से भतण करने के अभिनापी भूगाअदिक समूहोंसे घिरहये । ५ । खाने अमिळापी भेड़िया आदिकको दाख से राकनेवाले पृथ्वी पर चेष्टा, करनेवाले कठिन पाडावान् । ५ । रुधिर से लिा जम प्रकार पृथीपर सोनपाले राजादुधनको देखकर मरनेमे शेपावे शोकसे पाडावान तीनवीस ने चारोंसे उसको ब्याकिया मर्याद अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा । ६ । रुधिरसे लिप्त वासलेनेवाले तीनों गहारार्थियों में संयुक्त वह राजा ऐसे शोभायमान हुभा मेकि तीनों अग्नियोंमे वेदी शोभायमान होताहै । ७ । इस के पीछ बहतीनों उमदशाके भयोग्य पृष्वापर पढेहुये राजाको देख कर महा दुस समेत रोदन करनेलगे। फिर युद्धभुमि में सोनेवाले उस रानाके मुखसे रुधिर CHHAPTER IX Sanjayı sad," playing slun the five Ofe of Draupadi, the thien worsors went to the plich whese D'urşidlan Tas lying Wonded They saw himn at the point of d ath and went to him from thuir cars Thoy tound luni lying on ens thi, with hus thigli brolan, 19409 b'e in tlis anos of death pud blood crnung out from lus wouth many adio dul tyrat of prey and jaci ai, washingtod ipur kis body.. Firanuled lun. 'Sir Iny bursadhan incapibls of krpng olvas other Amma's aluclistance, the curpe warrioca, Ashwathama, knipaharya and Kruuvains came roaudh po, Accompanied by the threa bloody nd K7300 TH Sauptik Parvatiani ममारिमाप सहारणे गम शया पण यग्यन् ॥९॥ कप उपाय ।। देवस्मातिभारित यक्ष्य धिगीक्षित । एकादशचममा शो दुर्योधनोहन, ॥१०॥ पाप पामीराम धामीकरविभूषिताम् । गद गदाप्रियस्पेस समीमे पतिता मुषि ॥ ११॥ इयमेने गदा शूरत जहाति रो रणे । स्वर्गाषापि प्रजन्नाह न नहाति यश सिनम १२॥ पश्येमा सहधारण जा-यूनदविभूषिताम् । शयाना शयने हा भायों प्रतिममिव ॥ ११॥ योय पदामिपितानागने यान. पा.तप । स हतो प्रसते पाशन पक्ष कालस्य पर्पयम् ॥ १४॥ येनाशी निहो मलायशेत हत्तीद्वार, । स ममी मिहतः रोते कुरुर्राज गरेरयम् ॥ १५ ॥ भयानमन्ति राजानी यस्य स्म शतसघश | सीरश यमे शेते कामादि परिवारित. १६ ॥ उपासन्त द्विजा, पूवमहतोगमीश्वरम् । उपा सते व तचक्रव्यादामासदेतय. ॥ १७ ॥ सम्जय उगव । त शयानं कुरुश्रेष्ठको को अपने हाथों से सफाकरके करणापूर्वक विलाप किया ।९ कृपाचार्य बोले देवका बड़ामार नहीं है जो यह ग्यारह भक्षौहिणी सेनाका स्वामी राना दुरिन धिा से लिप्त घायल हुआ पृथ्वीपर सोताहै । १० । इस सुवर्णके समान प्रकाशमान स्वर्ण जटित गजाकी गदाको पृथीपा सम्मुख पड़ी देखो।।।। | यहगदा प्रत्येक युद्धमें इम शूरको त्याग नहीं करती अर्थातू वर्ग जानेवाल यश मानको नहीं त्यागकरती । १२ । सुवर्ण से अलंकृत वारकेसाथ सोनेवाली इस गदाको ऐसे देखो जैसे कि महलमें सोमवाली प्रातिमान् भाउको देखते हैं। जो यह मौका तपानेवाला मुर्दाभिषिकों के भागे प्रधानहुमा वह घायल होकर पृथ्वी की धूलिको सर्स करताह समपकी विपरीतता को देखो। १५ । जिसके हापसे युद्धभूमिमें मारेडुये शत्रु पृथ्वीपर सोनेवाळे हुये वह मृतकशत्रुताला ग्रह कोरतराज शनुभों के हाथ से माराहुआ स्रोताहै। १५ । इनारों रामाभों के समूह जिसके भतारे झुकने थे. वह मांसभक्षी जीरों से घिरामा वीर पृथ्वीपर सोमा बामणों ने धननिमित्त निम ईश्वरकी उपासनाकी अब उमको मारमती मसिखानेकलिये प्रशंसाकरते हैं ।१७। सञ्जयब ले कि हे भरतर्ष उसकेपछि Wartors ,the hing loobud libe acaltar o per sbieh the three firea prende 7 They rept to see theklliglyrog in that deplorable conditin. T qy wiped blood from his mouth with their bands and wept Krpacharya sard, • We base not mu b to thank Fato fu Pinca Duryodhan, tho, Jord of elegen akahaybines of army lies bl eling here on earth. 10 Here 11e- fps golden mara which bevor left the dying priser. with him like an affect wnałe wile This leader of kinge lies here on earth Look at the changes of Time. Having ela n 1:18 foes the Kau rax Prince lies bero stiucl Ly the enemy 15, He to whoan thou. sands of the kings bowed, sleeps on earth surrounded by beasts of prey He who was praised by Brofinans for the sake of his pealth 18 uote attended by flesh eating animals for the sake of hha flesh u-17: It is lying (७.६ Malıbilaret (7306) भरतसत्तम । सइबरयामा समालोक्य करुण पर्यदेवयत् । १८ । माहुरषो गजशा ल मुख्य सबंधनुताम् झोप शिर्ष नस्य ९ ॥ पिरमाझिीमसेनस्तानघ । बलिन कृतिनं मिर्ष स. पापा.मानुप॥ २०॥ कालो नन महाराज मंम्मिन बलवचरा पक्ष्यामो नितमाम समे पुणे ॥२१. सधसभुवः पापो कोदः निकृस्या हसवा मादी नर्म कालो पुरत्ययः ॥ २१॥ धर्मयुरोप समायोजसा मृधे । गदया मिसेमेम मिमग्ने सचिनी ता.२३ अधणेण इतररानी मुघमाने पदा शिरः। उपेक्षितमान पिक्समस पुरम ॥ २५ ॥ युरोपदिष्यम्ति योषा मनं नकोदरमा वापत स्थापति मानि निरया ह्यास पातितः ॥२५॥ मनु रामासीद्राक्ष सदा मनमः। धनबमोनालि गदया इति वीर्यवान् ॥२६॥ इलायते पारिवाजेपी अस्थायाने उस कारणों में रेड सोतेहुये दुर्योधन को देखकर खासे करुणा बिलाप किया। १८ राजामों में श्रेष्ठ हमको सर धनुषधारियों में प्रथम बल. देवीका शिष्य और युद्ध में कुबेरकेममान वर्णन किया । ११ । पापोंसे गीत भीमसेनने कसे तेरे छिद्रको देखा राना उस पापात्माने तुझ बनवान् भार सदैव कर्म करनेवाले को मारा । २० ।हे महाराज निश्चय करके इस लोकमें कास बड़ा पराक्रमी है कि हम तुमको युद्धमें भीमसेनके हाथ से पराया देखते हैं । २१ क्रोषयुक्त महानी पापी भीमसेनने किसमकार से तुम सबों के माताको सबसे मारा निश्चय काल दुःखसे उल्लंघनके योग्य है। २२ । धर्मयुद्ध में बुगकर फिर पुदमें अधर्मसे साथ भीमसेनकीगदा भार पराक्रम से तेग दोनों घाटी । ११ । जसने युबाम में प्रयर्म से घायल शिरपार से नन बुक्तको देखकर पान नहीं किया उस क्रोधपुक्त युधिष्ठिरको विकारहे । २४ । निश्चषकरके एर वारखोग युदोंमें जातक भी पर्चमानी ताना बामसेन की निन्दाकरेंगे क्योंकि मुम पलसे मारेगयेहो । २५।रामा निश्चयकरके यदुनन्दन पराक्रमी बलंदरनी ने सदैव सुझसे कहा गदायुदकी विधा दुस्योगनक समान कोई नहे Banjaya continual, * dshxathawa fet pity in the Kausar prince and wept for grief, mayin ;, "You wers the foremost of Baldeva's disciples and were a famous warrior kka Kurer, How was Bujm able to dis. ourn a weakness in you ! How did he shy you! surely Timsin very powerful in this world as na ev you slain by Bhim. How did ourage ed, kolialı aad sinful Bhina slay you by deceit ! Surely Tiws is hard to be operet-pped. 22. Challenged to a fair fight, he unfairly broke your thighę Fio na Yudhieltbir, who saw you unjustly slruck down And looked on the jodiguity when your head was being touched by lott. Surely brape nea will always speak ill of Bhim for alaying you udjastly. 25, Baldey always spoke of you that you had no (73071 Sauptik Parv Riley, राजन संपास भारसा शिष्यो मम कोरो गापुम पति प्रमोबान सविपश्याप्रशस्त पारतस्वाभिमुखत्याजी प्राप्तस्मासि तां गतम् ॥ २८॥ दुख्योधा शोधामि स्वामा पुरुषर्षभ । नपुत्रौतु शोचामि गाग्वारा तिरंगते २९ ॥ भिकी विधीठे शोपिचीमिमाम् । विगाह कणं पाया मायापि दुस्मठिम ॥३०॥ धर्मशमानिनी यो साम्यमानमुपक्षमा पानि तेस कि वयन्ति मराधिक गुरमरिनोस्पामिन RIX ३२॥ चय समसि गान्धारे पस्समापोधो इतः प्रपातोऽभिमुखपून धर्मेण पुटीम ३३॥ पुत्रादिगाधारी निहतातिधाम्रा प्रारमध दुधको प्रतिपास्यो ॥ ३४ ॥ विगस्तु कनर्माण मापा मारमा पेन गताः म यो परस्करप पाधिसम् । ३१ दातारं सर्पकामाना रमितारं प्रजाहितमा या मागासपा हेमा भरतांशी राजादुम्मोपन का पलदेवनी सभामों में तुम्हारी प्रशंसा करते। कर औरर गदायुद्ध में मरा शिष्यो । २७ । महर्षियों में युदमि में सम्मुख करनेपाल सत्रीकी मितिको उत्तम कहा तुम उमीगति को प्राप्तो । २८ हे पुरुषोचम दुर्योधन में तुझको नहीं शोचताई तरोपेताको और गागरीको शोधता जिनके कि सपुत्र मारेंगपे । २१ । इन पाको शोतो वह भिमप होकर इस पृथ्वीपर पियरेंगे पादत्र श्रीकृष्णानी को मार दुईदी अर्जुनकोभी धिकारहोय । १० । मापको धर्ममा जानते जिनदोनों ने तेरे घायल होनेको ध्यान नहीं किया हे रामा १ लानाशीत मार स पागवनी करेंगे कि हमारे हाथ से दुय्योपन लिपपकार से मारागया । पुरुषोचर दुरगेधन सुम धन्यवाद के योग भो तुम बहुधा धर्म से शनुमों के सम्मुख होकर युद्धभूमि में मारेगये । २१ । निसके जाति वाधव और पुत्र मारेगगे वा गापारी और सानपतु रसनवाला अंजप धृतराष्ट्र दोनों किस गतिको पावंगे | १४ तार्मा को मुझको और महारथी कृपाचार्य को धिकारसोय मो हम तुम रात्रा को मामेकर स्वर्गको नहीं गये । ३५ । ओ हम हम सब भी देने equal in macs fighting. He praised you in courts and wis proud of baving you for his disciple. You have died fighting and this sort of death is reoonip.onded by wise men for a kshatrya I donot regret your death, Duryodhan, but I wourn for your father and Gandhari who have lost all their kingdom and will rean like boygare. Fie on Brisbn and Arjun who call themselves virtugas ugd yet disregarded the injury done to you, Hos cas the shapitless Pandata: boant of wlaying yos; ? I cougratujais jou, Duryodhau for your Bocuring a parrici's end. 33. To wlint state will Gurdlarirr.d bliud Dbritrasbtra bo reduard who have lost all their kinamen! Fie on Kritvardas, on ne and on Kiipucharya, for we did not follow you to - - - Malhalisa [-303] गिमान राजमार ३६ कास्य व बीयण गम च पितुभो । समयाना ना नाध्यान रनवत गृहागिय । ३७ । भवसादादस्माभि समित्र सह बायः। अगवा को मुख्याधड़गे भरिदक्षिमा ॥ ३४ ॥ कुनचापीहश पाय प्रतिष्पा घयम् । यदशन परिपथ गत मयंगपिशार ५३९३यमेव त्रयोराजन गवछ परमा गतिमा यानानुगच्यामस्ते न परामहे षयम॥४०॥ त्यासगहीगाहामापी स्मरन मुतस्य ते । किन्नाम तनाव की येन त्या न ग्राम ॥ ४१ दुकान कुरुनष्ठ बरिष्याम तहानिमाम् । होनाना नस्य कुतशालि कुत मुघम ॥ ४२ गल्तस्तु महाराज ममेव महारथान् । यथाभेषु यथाज्य पूजचनाम् मम ।४३ आचार्य पूजायवान फेनु सर्वधनुष्मनाम् । हन मयाध शसेखाष्ट्रघुम्न नराधिप । ४४ परिजया राजान बाहलेक समहारथा । मेधा सोमरस वाले रक्षक भार समारके पियकर्ता के पीउ नहीं जाते है हम नाच मनुष्याको धिक्कार है । ३३ हे नरोनम नौकरों समेत कृपाचार्य के मेरे और मेरे पिता के रतनटिश स्थान भापही के पराक्रम हुये है । ३७ । मित्र और वान्धवों समेत हम लोगों ने आपकी कपामे बहन दक्षिणावाल भतिउत्तम हम यईप्राप्तकिये ३८ इस पापी कही से ऐने मार्गपर कर्मकर्म हागे निग मार्गमे कि तुम सब जीओं को आगेकरके गये । १९ । हे राना जोहमतीनों तुझ परमगति पानवाल के पीछे नहीं जात. उस हेतु हम भस्म होते है। ४० । सर्ग और अभीष्टोंमें रहिव इमोग उन राजामोंको और तेरे शुभकर्म को स्मरण करते जिसहेतुसे भापक पीछे नहीं जावे है यह हमारा केन महोगा । ४१ । हे कौरवों में श्रेष्ठ राजा दोन निश्चम करके इस सत्र महादुकी होकर इन पृथीपर विच रेंगे तुझम पृथक् होकर हमलोगों को कमे शान्ती और सघ माप्त होमका है। १२ । हे महाराज तुप जाकर और महारथियों से मिलकर मेरे वनप्ते वृद्धता और उत्तपताके विचारसे पूजन करना। 1४१ हे राना सब धनुपधारियों के ध्वजारूप आचार्य जी को पुन कर अब मेरे हायसे परे हुगे धृष्टयुम्नको वर्गन करना । ४।। और बड़े महारयी राजा haaven. Fie od us who dinot aocompiny jel, our benefactor and protectns) Ny fathel, Atipacharya and I ove our greatnera te yıu iyo and our friends were able to perforin richi sacrifices hy your giace How can sinful men like us follow the path that you have traddunt We burn with grnef bonuse we donor fulls you to heaven. 40. Des. titute of haven nol cherished desire, we are undone bocause ve donot follow you Duryoulian, best of hauravasl surely yoonre resurved to kalalfurf misery ind can bave po po ice sithwat gout Pay iny sorpect to this depant d warrtors when you web. tiem, bados Inform Donacharya tac by st of a chura t I have slalu Drhta. dyumn Curvey my &recto, t, Valilik Jayadrat', 8,udatta, Bours 09) silgatisnuptih l'art मसच ॥ ४ ॥ तथा पूर्वगतानम्यान स्वर्ग पारिसनमान् । अस्मद्वास्यात् बज्य पच्छेधास्वमनामयम् । ४६ । सञ्जय उवाच । इस्पेवमुक्त्वा राबान मग्न यमवेतनम | अश्वत्थामा समुद्वा पुगरवचनमब्रवीत् । ४७॥ दुय्यन जीवसि बाम मोरान धृण । सास पाहवत शेषधार्तराष्ट्रास्त्रयो धयम ॥:४८ ते प्रातर मामुदेषोष सारक अहश्च कृतवर्माच कृप शारखतस्तर ४९ ॥ पदेया बता सर्व दृष्युम्नस्त, चात्मजा । पाञ्चाला निहता सर्वे मस्यशेषश्च रित । ५. 15 माइत परंश सपुत्राहि पाण्द्धवा । सौनिके शिविर तेशहत बाहनम् ॥५१॥ मया व पापकर्मासा धृष्टद्युम्नो महीपते । प्रविश्य शिविर रात्री शुमारेण भारित । ५२॥ दुर वनस्तु तो पाच निशम्य मनस मियाम्। प्रतिलभ्य मधेत र पवन मावीत् ॥५३॥न मेऽकरातद्गागयो न की न व ते पिता। यत्वया वाइलीक, जयदर, सोमेदच और भूरिश्रवासे मिलना । ४५ । उसी प्रकार स्वर्ग में प्रथम मानेपाले अन्य २ उत्तम रानामों को मेरे पचनसे मिलकर कुशल मङ्गल को पूछना । ४६ । समग बोले कि अत्यामानी उत्त अचेत और ट्री जपावाले. राजाको इसप्रकार कहकर और सम्मुख देखकर फिर वचन को बोले ।। हे दुरगोंधन तुम जीवतेहो कानोंके खदायी वचनोंको मुनो कि पाण्डवों के सात और दग्र्योधनके हमतीन वेषवहैं । ४८ । वह पाभिई केशरजी और सात्यकि | उसीमकार मैं कृतवर्मा और तीमर शारद्वन कृपाचार्यजी शेषहै। ४९ । हे भरत घशी द्रौपदी के सब पुत्र धृष्टद्युम्नके मत्र पुत्र पांचाल और शेष बचेहेष सब मत्स्य देशी मारेगये । ५० । बदलेके कर्म को देखो और पाण्डव असन्तान हैं रात्रि के युद्धमें मैंने उन्होंका डेरा सब मनुष्योसमत नाश करोदगा । ५१ । हे राजा मैंने रात्रि में रेमे मोश करके यह पापकता धृष्टद्युम्न पशु के समान मारा । ५२ । दुर्योधन उन पिच के निचाको नहर पार समेत होकर यहवचन बोला ५१ shrava and other warrio s when you me t th m in heaven 'Absn Jaya continued, — Having thus talked with the wounded king n thy atrail, Ashwathama again said, ' H ar ulat is plearing to the rar o king, if you are yıt olive Suven on tl e ride of the Pardayas and thies of us an the only men alivem- the five brothers, Keshav and Satyalı on their e de, and Kritvams, ar paci arga and I on yours PA1the +008 of Dreupdi, wil Dhri bt dya and his sons, all the Panch us aud tbe rest of the Mutayaº we a3n 50 Sve the work of rave ge The Pandavas aro ch dle 4 tot l du ta d »l] ller camp ut die lot I ontered the can pretigit id si Fful Dhrii t dy, mn like a Least » Having heard this cliers I cal news ardcou o, to u nacious ness, Duryodhya ad, " Neither Bhishm nor Kiran nor your father did for me the thing which was d nt by sou with the help of K'r pa charya avd Kritvarme. The d prable_general and ikl aodi base Mahabsurat (7310) उपभोलायो सहितनाय ने कृतम् ॥ ५४॥ स च सेनापतिः धुमो हतःसा शिष पिद्धता । तेन मन्ये मघवता समगामानमधये ॥ ५५ ॥ स्वति प्रानुत भई यः स्वमें म. सगमः पुनः । इत्येवमुस्त्यातूणीस फुरुराजमहामनाः ॥ १६ ॥राणानदसजना मुहवादु ग्ममुतुप तन् । आगामत विच पुण्यां शरीर क्षितिमाविशत् ॥ ५७ ॥ ते निधनं यात पुत्रो दुर्योधनो नृप । अग्ने यात्यारण २. पश्चाधिनिहतः पर.१ ५८ ॥ तथा परिका परिपच तेनामा पुनः पुन प्रेक्षमाणाःस्फफानरुडू रथाम्॥५॥ इत्यहं द्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणा गिरम् । प्रत्यूगकाले शोकाः प्राइवर प्रति ॥ ६ ॥ एग्मेप क्षयो घृत कुलपाण्डवसायाः। घोगे विशमनो गो गजग धुर्म त्रिने तव । ६१ ॥ तव पुन मते सगै शोकातस्य ममानघ । विक्षत प्रष्ट तदिन्मय शिषमय ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच । इति श्रुत्या स नृपति पुत्रस्य निभने तथा निघस्य दोघमुष्णञ्च तनश्चिन्तापरोभवत् ॥६५॥ति र्दुर्योधनप्राणत्यागेनवमोध्यायः कि मेरावहकर्म न मनी ने न कर्णने और न आपके पिताने किया, जा अब कृपाचार्य और कानासमेन तुमने किया । ५४ । वहीच सेनापति, शिखण्डी समेत मारागया जगहेतु से मात्र आपको इन्द्र के समान मानताहूं । ५५ । कल्याण को पायो तुम्हाग भलाहोय मार्ग में हमारा तुम्हारा फिर मिलापहोगा पाड़ा साहसी कौरवराज इसप्रकार कहकर मौनहुगा । १६ । और मित्रोंकेदाखको उत्पम करते उसमीर ने अपने माणों सागकर पवित्र सर्गको गया और शरीरपृथ्वीपर रहा । ५७ । हेरामा इसमभार आपकेषुध दुपाँधगने मरणको पाया पहशूर वुद्धमें प्रथमाकर फिर शत्रुओं के हाथो मारागया । ५८ । उसीमकार उनसेमिनेसे वह लोग फिर मिलकर राजा को बारम्बार देयते अपने अपने स्योंपर सगरहुये । ५३ । इसप्रकार असत्यामा करुणाम वचनोंको सुनकर शोकसे पीड़ित पहतीनों मात काल के समय नगरी और घिसांग चाले । ६० । राजा मापके कुमन्त्र नेपर | इसप्रकार कौरव और पाडयों का यवोर और भयकारी मारनपाला नाश वर्षमान हुआ। ६१ । इनिष्पाप गोकमतीहिन आपके पुत्रोसंगमानेपर भवपासऋषिका दियाभा व दिगदर्शन और दिपनेच विनाशमान हुये । १२ । वैशम्पायनबोले कि तावह राजाधृतराष्ट्र पुरके मरर को सुनकरलम्पी और उपयशासाओंकोलेकर महाचिनायुक्तहुआ ६॥ been slain and therefore I am ng happy as Indra. May you be blessed wa shall moet wgain in bearen " Having sud this the brave krurat prince resulved silence. 56 Cuusing grief to his fiteads, he lets this world for heaven and lf, lust loudly lying thoie. Thug Oking Thy thirco warrus 1 ft lum there and ro la their care, Havlead the p tiabl, talk of Arlivruthiana, they rode towards the city at day brial: 60 All that destruction was brought about by your own esrl poluy, tig, de lo deith or your ann, oyes, giren nou by Wymi, pod tlur power disappeared "s Payan said that on lieung of haron't deah, king, Dhritrashtra Heaved long ana that rigina ind has plangel in the catam ol grief, 6s. Jour son died ing the divina Vashnem- - 17311 Sauptik Parv सीप्तिकपर्व ॥ अथ ऐपिकपारम्भः॥ वैशम्पायन उवाच । तस्यां राव्या नीतायां इष्टद्युम्नस्य सारथिः। शशंस र्धा राजाय सौप्तिके कदनं कृतम् ॥ १ . सूत उवाच । ग्रौपदेया इता राजन् द्रुपदस्यात्म सहा ममता निशि विश्वाता: स्वपात: शिपिर स्वके ॥ २ ॥ कृतवाणा नृशंसन गौत मेन वेष ध । अश्वत्थाम्ना च पापेन ह व शिविर निशि ॥ ३ ॥ पतेन रगजाश्वाना प्रासाजिपरश्वधैः । सहमागि निहस्तन्दिनिःशपते पर इतम ॥ ४ जियमानस्य महतो धनस्यय परभ्यः । शुचये स महान शब्दो पलस्य तय भारत ॥ ५ ॥ अहमको पशिएस्तु सस्मात् ले यामहोपते । मुक्तः कश्चिद्धात्मन् यग्रस्य कृतवर्मणः ॥ ६ ॥ रसाया वाक्यमशिव कुन्तीपुत्री युधिष्ठिर । पपात मां दुर्भः पुत्रशोकसमन्वितः ॥ ७॥ तं सम्तममिक्रम्य परिजग्राह सात्यतिः। भीगसमोर्जुनश्वैर माद्रीपुत्री च पाण्डा लटपर्धेत फौन्तेय. शोकविहगलपा गिरा। जिस राखून जितः अध्याय ॥ १० ॥ वैशम्पायनपोले कि उस रात्रिके व्यतीम धोनेपर धृष्टद्युम्नके सारीने युद्ध में होनेवाल नाशको धर्मग सम्मुख योगकिया। १ । सारथी बोला हे रानागात्रे के अपने ढरे में सोनेवाले विधात युक्त अचन सोतेहुये द्रौपदी के पुत्र ग्रुपद के पुत्रों समेत मारेगये । २ । निर्दयी कृतवर्मा गौतम कृपाचार्य पार पापी असत्यामाके हायते राधिके समय भापका डेरा नाशहमा । ३ । मास शक्ति और फरमोंसे हजारों मनुष्य घोड़े और हाथियों को मारनेवाले इस तनों से भापकी सेना मारीगई। ४ हे भरताशी फरसोंने कटोनुये बड़ेवनको समान मापक सेना कपडेशन सुनेगरे । ५ । ई.पहेशानी केवल मैंभी मला उस सेनामे यचा # हे धर्मात्मा मैं उस दुष्ट कार्मा से किसीप्रकार करने वाला । ६ । कुन्ताका पुत्र अजेय पहिर उस दुखशोक के वचनको सुनकर पुत्रशोक से युक्त होकर पृथ्वीपर गिरएडा । ७ । सत्यकी भीमसेन अर्जुन नकुल भारसहदेव ने उस गिरने हो राजाको पकड़ लिया ।। फिर सचेत रोकर शत्रुओं का विजय करनेवाला CHAPTER X Vaishamapuyan said, at thetlors of thur night, Dhrishtadyuinna's cor driver brought the rews of the great destructinto Yudhishthir. Ko Said, "Seeping reundly in their trats Just night, the suns of Drupad and Draupadi vera all s'ajn by a uel Kripacha rya and Kritvor a, who destroyed your camp by right. The thirdo #air cre alru your seca aud L-as e with their weapons, Yonr army was cut with battlo axes htoslarge forest. 5. I managed tom, how to scape fiona Kritvarms and am the only manslite out of that girat force" Yud. bishibu the son of Kunti bocano intelitab lo with grief on lcanos that asi doirs, Bhin, Arjaa, Yakui and Sabaday Bated the king from . .
Mahaljharat FF312] पश्चात् पयंदेवयदायित् ॥९॥ दुर्विदा गतिर्थानामपि ये विव्यनमः । जीपमाना. जयन्यन्ये जयकाना धयं जिताः ॥ १० ॥ हत्या मातन पयल्यांच पितृन पुत्रा मुद्दा पान् । बन्धून्मात्मान् पौत्रांच जित्या सर्वान जिना वरम् ॥ ११ ॥ मनधी हायसवश म्तयानयोऽर्थदर्शनः । अयोऽयमजयकारो जयस्तमाल पराजयः १२॥ यस्जिया तप्यात पश्चादापन इव दुर्मनि । कप मन्येत विजनतो जिततर परैः॥ १३ ॥ येषामर्याय पापं स्थाविजयस्य मुहद्धः . निजितरममा पिजिना जिनकाशिनः ॥ १४ ॥ कर्णि नालीकंददस्य बड़गाजधस्य संयुगे। घायातायशैद्रस्य ज्यासहस्समनादिनः ॥ १५ ॥ क्रुधस्य नसिंहस्थ संग्रामेष्यपलायिनः । ये व्यमुच्चन कर्णस्य प्रमास इमे रताः ॥ १६ । रथइदं शरवोम्मिमन्त रत्नावित चाहनयाभियुक्तम् । सप्तिमानपत्र नागन शरासनावर्तमहेषुफेनम् ॥१७ ॥ संग्रामचन्द्रोदयधावल माणाम ज्यावसाने युधिष्ठिर शोकसे व्याकुल दुःखसे पीडायान के समा विलाप करनेलगा। प्रर्थों की गात दुःखसे जानने के योग है जो दिव्यचक्षु रखनेवालहैं उनको भी मन्यलोग पराजित होकर विनय करते हैं विजय करनेवाले हमलोग विजय किये गये ।। भाई समान प्रवाधावाले पिता पुत्र पित्रवर्ग वाधक मन्त्री और पोतों समेत सबको मारकर भी हम दूसरों से विजय कियेगये । ११ । निश्पकरके अनर्थ अर्थरूप है उसीमकार अनर्थ भयको दिखलाने का है यहविजय पराजयरूपहै इसोत से विजयही पराजय है । १२॥ जो दुर्बुद्वी विनयकरके पीछ भापतिमें बंधे हुये के समान दुखी होता है न किस प्रकार जय को माने उम हेतु से शत्रु के हायसे अत्यन्त पराजित । १३ । मित्रोंक नाशपे विनयका पाप जिनके निमित होय पराजितहुपे चतुर मावधान मनुष्योंकर विजयोत शोभायमान आदमी विजय कियेगये । १४ । युद्धमें कर्णिनालीक नाम वाण के समान दाद रखनेवाले खाकी समान जिव्हा धनुपके समान चौहामुख रुद्ररूप मर'चा और तर के समान शब्द. चाले । १५ । बोधयुक्त युद्धों में मुख न फेरनेवाले नरोत्तपण हायसे जो बये वहमबारबीर अचेततासे मारेगमे । १६ "स्थरूप इद वाण कृष्टिरूप तरङ्ग बाले वृक्षोंसे पूर्ण घोड़े और सवारियों से युक्र शक्ति वा दुधारे खड्गरूप पली धमा रूप मी मोर नक धनुष भंवर बड़े वाणरूपी फण रखनकाले । १७ । बुद्धकम To began to lamerthograt lusson coming to lunsself "The ways of the world oro d fficult to understand : the conquerors &r conquered by the congueral. 10 Having stsin parkinoises, friends and adviresa, 14 ore at last conquered by the enemy. Surely our success is ſo lwto and victory is turned it to diftat, The fnnliah con. querer who mourns like a miserabilo wan, 18 scally not a corquerer but one conquered by the enemy. Ile wite_conquerrd the conquorera who bad sinned in playing their frion lp. To warriors having hard arrows for fings, swords for tonguer, bowa for wide mouthe, soundsot 6 florn .
(7313, Sautik PV हाप्तिकपर्न भियोगमा पे तेरुरुच्चावचशमनौमिस्ते गजपुत्रा निहता. प्रमादात ॥ नहि प्रमा दात् परमोस्ति कश्चिद्वघो नराणामिह जीचळांके । प्रम नमा.हि ना समन्तात् त्यज पनाच समाविशन्नि १९ । शले समातिम्रको गम्चिय कोपमहास भीरम । महाधनुानलनेमियोपं तनुअनानाविधशस्त्रनामम् ॥२०॥ महाचमूकक्षदया भिपन्न महाये भीमभयाग्निदादमाये सेमुरायुतायतीक्ष्णोग तेगजपुत्रा निहताः प्रमा दात् । २१ । नहि प्रपत्तेन नरेण शक्य विधा तप धीपुिल यशोधा । पश्यामादेन निहत्य शत्रून सन्महेन्द्रं मुस्वमेधमानम ॥२ इन्द्रोपान पार्थिः पुत्राशन पश्या रिशंषेण रतान् प्रमादात् । ती समुद्रं वणिजममृताः समा कुनधामिव हैलमाना ॥ २३ ॥ माता शणना नि:संशयं तपिदि प्रपत्राः। कृष्णान्तु सोचम कनु साची शोकायं साध विशक्ष्यतीति ।। ४ अतुंश्च पुत्रांश्च तानिराम्य चन्द्रोदय तीव्रता रूप किनारेवाले ज्यातल और नेमियोंक शब्दवाले द्रोणाचार्यरूपी समुद्रको जिनराजकुमारों ने नानामकारके शहरूपी नौकाओं के द्वारातरा वह प्रमाद से मारेगये । १८ । इस जीवलोक में मनुष्यों के भरसका कारण ममत्ततास अधिक कोईनहीं है ममस मनुष्य को पनादिक चारोंओर से त्याग करते हैं और निर्धनता प अनर्थ प्रवेश होते हैं । ९। उत्तवनाकी नौकसूरत उँचाई रखनेवाली वाणरूप- मालावाली क्रोधरूप वायुकी तीवता रखनेवाली बड़े धनुष की ज्यानल और नेमी के शब्द से युक्त कवच और नानाप्रकार के दानरूप हवन खनेमली बड़ी सेना रूप दावानल से संयुक्त खड़े हुए शखरूप कठिन तीवतावाली भीष्मरूप मानिकी भस्मताको जिन राजकुमारोंने कई युद्ध में 1 ह सब अचेत तासे मागये । २१ । ममत्त मनुष्यको विद्या तप धन और उत्तमकत्ति नहीं प्राप्त होमती है सावधानी से सव शत्रुओं को मारकर एस्त्रमे शाद्ध पानेवाने महान्द्रको देखो। १३ । इन्द्र के समान राजाओं पत्र पौत्रादिकों को अत्यन्त प्रचेततासे ऐसे मराहमा देखो भने कि पनकी दिवाला व्यापारी समुद्र को तरकर छोटी नदी में खनाय १२३ क्रोधयुक्त पुरुषों ने जो सोते वीरों को मारा वह निसन्देहे स्वर्गको गये bowstrings and cingonlifor voie, wh.nir r tur iol brokirna bitelo ad whecageu d'enth row Kara, á' ard-laut leer centro saib, mint of wact.tulna Heringiars for lates.stowers of arrowsitur nares, torrector trees'jarelina androidale fishlbur. Od 18 ſur sirpertrand erecotiler, buws for oddiwr, arrows for ho du, battle fic for moongliina, dexterity for budhaand loni wounding with clape and buwatring, the warriors who conted tic reun «f Drona ath the butts of their weapons, have been slaia by runt of wakervilneng, Insensibility Lilli most of the people in this world. Wealth luntos sa inazasible min and porury overinleg him. Having tall studerdt, arrows liko flames, dczterous lilo a storm of wind, noisy with tha sounds of botstrings armed with , (७४ Jlal abnaras 178141 परवा तिच वृद्ध माधुरिमसा पतिता पृयिनश सा शयने शोकहांग यतिः ॥ २५॥ तच्छांकज दुस्समपारयन्ती कथं भविष्यात्युचिता खानाम् । पुरश्य भ्रातृवाणुनाप्रदायगाव ताशनेन २६ । इत्ये गात परिदेययन स राजा कुरूणां नकुल पमये । गच्छानयनाम्हि मन्दमायो समातृपक्षामिनि राजपुत्रीम् ॥ २७॥शादी मुस्तत् परिशृख पाण धर्म प्रतिगस्य राम. । यो रथेषालयमाशु देव्याः पाशालरामस्थ च यत्र दार ॥ २८ ॥ प्रस्थाप्य माद्रीखतमाजमीदा शोकादितस्तः सहित. सुहनः । रोस माणः प्रगयो मुतानामायोधन भूतगामुकीर्णम् ॥१९॥ स तत् प्रविश्याशिमुअम्पददशं पुनान सुहम स्पीश्च । ममी सानाधिगईगावान में द्रौपदी को शोचताहूं मत्र कह पतिव्रता निर्णयहोकर किसमकार से शोचरूपी ममुद्रमें डूपर्गई । २४ । भाई वेटे और वृद्ध पिता राजा पांचाल को मृतक मुनकर निश्चय करके नामोहित हाकर पृथ्वापर गिरेगी शोकशे कृधाम यष्टीशरीर बह | द्रौपदी शुष्क होरही हैं । २५ । मुखौंके योग्य वह द्रौपदी पुत्र और भाइयों के मरनेसे पाकुल अग्गिस जलतीहुइके समान उस शोकजन्य दुखसमुद्र से पारन होकर कैसी दशावाली होगी । २६ । इसप्रकार विलाप करता यह कै स्वराज युधिष्ठिर नकुल सं बोला जाओ उन मन्दागिनी राजपुत्री को उसके मातृपतियों समेत यहाँ लाओ । २७ । नकुल धर्म जाके वचनको धरे अङ्गीकार करके स्वकी सबारी से देवी द्रौपदी के उस स्थान कोगया जहपर राजा पांचाल कीभी खियां धीं।२८। नमुलका भेजकर शोकसे पीडावान् रोदनकरते युधिष्ठिर उन मुहृदोसमेत पत्रोको युद्ध भूमिको गा जाकि भूतागाशे युक्तथा । २९ । उसने उम कल्पाण a in mu ar in ar an 1 billing etie mies as fiie docsa folost, the warriors wilo scapad deuth fon Bhishm have Leon da-troyed by sliep. 91. As so ess main cuask a qure knowledg:, asceticodin, wealth urd fame. Look at ludra who destroyelil his foss by bis carefulne-s. India, like princes and wars iors have brou destroyed by want ofvigilanco liko an aracious ma.chant who erosses the ocean bat sin's own inssmall river T. o slusping warriors slag by angry niea huyusu.oly gone to heaven; bat I am ajuts for Draupadi who has fallen into the ocean of grief. So will lose her seases on liearing of the d at's of her brothors and sons. Her body w eady loin with gref will b201102e dry25, Uuworlag of busplay sorro Vu, she will burn with the Gre of griet on hearing of the death of ger brothers and suns " Thus lamenting, Yudhishthin ordered Nakul to fetch taploss Draupndi and the women of hier w thei's housl'ull, Nakul toda a car and went to tho place whers Draupadi and the women of Punchal speri. Having seat Nakul way, Yudhishthir rith tears in bis ogen, wuot to visit tho place that 1810 Siup ik i arv Bita ७.१५) विभिप्रदेहान् महोत्तमागान । ३०॥ स तास्तु हट्य . भृशमात्तको युनीमराणे मतां वरिष्ठ. । उच्च, प्रचुमाश ध कौरयापय पपात चौगों सगगो पिन ||३१ । इति सौमिपाणि ऐपेिपर्माण युधिरानुनापदेवपो माा १० ॥ शम्पायन उवाच । स दृष्टगोइतान मस्ये पुरना नवान् सखी तथा महादुः वपरीतारमा बभूध जनमेजय॥ १ । ततप्तस्य महान् शोक प्रादुरासांगहासन । स्मरत पुषोत्राण प्राणां स्वागस्य च ।२॥ तमा र गोक्ष सवार । सुभृशतस्विग्ना सास्पाञ्चकिरे तदा । ॥ तत्तस्मिन् को पाल मे रथेनादि रपयसा । नरू. कृष्णपासाद्धमुपायात वरमापा । ४ 1 उपालम्यं गता सातु रूप और उग्ररूप बुद्धभूमि में श्वेशकरके पुत्र मुहद और मित्रों को पृथ्वीपर सोते अविरम लिष्ठ भग टूटे शरीर और टूटे शिर देगा । ३ । वह धर्म पारियों में गौर कोरयोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनको देखार अपन्न पीडारान सूरन उच्चस्तरसे पुकार और साथियों समेत अघत होकर पृथीतिपर गरपहा । ३९ ॥ प्राय १॥ वैशम्पायन वॉले हे राजा जनमेजर हि युधिष्ठिर पदमें माहुये उन पुरमात्र भौर मित्रों को देखकर घडे दुःखने पूचित्त हुआ १ । इसके पीछ वेटे पोतेभई और अपने मनुष्यों का स्परण करतेहुये उममहात्मा को बढ़ाशाक उत्पन्न हुमा ।। तब अत्यन्त वाकुछ मुहदोंने उम अश्रुओंर पूर्ण कम्पायमान और अचेत राजा को पिपास कराया । ३ । उसके पछि समर्थ नकुल वही पाडावान् द्रौपदी समेत सूर्यके समान प्रकाशमान स्थकी सपारी एकतणमें सम्मुख भाया । ४ ! ता where luis sons and hinalen lag dead. He found the h slosplt on earth with bodies and heads younded all ble dmx Yudhistlur the best of Kauravas and n;lteous tren gave a loud cry and fril Jowa souscless with his companious "31 CHAPTER 1 Vaisbampujan rad to Jat in 3*3*, " Srong the cons, graldacos and friende slalu in battle, Idult fult n sich Grof Heron bered the departirore, grandronr cousitis end tther peutrahe mind as full of sorrow, His surrowful från ls cur roled bin Wakul - (७३१६) Mahabhaist (7316) श्रता मुराहमियम । नदा बिना पुत्राणां मना व्यथिताभपत ॥ ५ ॥ फम्पमानेर फदली बातेनाभिसरिता । कृ.प्णाराजानमालाय शोकासी न्यपद्धति ६॥षभूष पदनं तस्य : सहला शोफकर्षितम् । फूलपमप्रकाशाक्ष्यास्तगोप्रस्त :वांशुमान् । ततस्तां पनितां हवा साम्मी सत्यविक्रमः । पाहुण्यां परिजना मुल्पाय को दर ॥ ८॥ सा समाश्वासिना सेन गीगसेतेन भाविनी। रुदती पाण्डवं कृष्णा सहन्ना तामनीत । ९. दिष्ट्या गजममाप्येमामखिलां मोक्ष्यसे महाम | भामजान क्षेत्र घण श्रुत्वा रानिपातितान् ॥ १०॥ दिष्ट्या व पार्थ कुशाली मत्तमातगामिनम् । अबार पृथि छत्स्ना सौगग समरिष्यसि ।। ११॥ मात्मजान् धर्मेण त्या शनिपातितान् । उगलय गया सर्स दिया वं यस्मरिष्यसि । १२ ॥ प्रससामा बघ श्रुत्या दौणिना पाणा सोकरानि मा पाहुन शन र अगम । १३ ॥ उपयुवी स्थानार वत्तमान व द्रौपदी सत्र पुत्रों के प्रषियन शको मुनकर बड़ी पाडावानदुई । ५ । वामे चापमान केले के समान पापान वह द्रौपदी रामा को पाकर शोकम शोको पाड़िा हाकर पृथ्वीपर गिरगड़ी का उस मफुल्लिन पद्म पलाश के समान नेपाली द्रौपदी का गुख स्नात् शोक मे ऐसे पीडासन हुआ जैसे कि अरे से टकाइमा भूर्ग होताई । ७ । इसके पीछे कोपयुक्त सत्य पराक्रमी भाममनने दौड़कर उस गिरी हुई द्रौपदीको पाडीलपा । ८ । भीमसेन से विशित उम राती जावनी द्रौपदीने भाइयों मपे। युनिष्ट से यह वचन कहा 1 ९। हे राजा र निश्पकरके सनी मने पुत्रों को यपरान के लिये देकर पारब्धसे इस सम्पूर्ण पृथीको भेगोगे । १० । हे रामा तुप मारपसे कुशकहो भौर सत्र पृथीको पाकर मतवाले हाथी के समान चलनेवाले अभिमन्यु को स्मरण नहीं करोगे . ११ । तुम क्षत्रीधर्मने गिरायेहुये शरपुओं को पुनकर मार से मुझ समेत तुम उनको उपलरी स्थानपर स्मरण नहीं करेंगे। १२ । राना पापकर्मी अश्वत्थामाके हारे मोजानों के मारने से शोक मुझको ऐसे तानाद जैसे कि स्थानको भाग्न संवप्त करना ।।। भर नो पदमें तेरे हाया जम पापकर्मी bruaght korrowful Draupnija thoor. She was Indeat distress to ficarsug of the death ot lie8 hogy 5, Sothing liko paotain trec moved by the wind, sbo fell down thrth and WIL Haloxible with grul. lcr tolus like fase bicistno sudjcaly changed like to sun covered with dark no:4. Enraged Ali rusen at oricu rnn and snok op fallea Draupsuli, Col.aol.nd lige him, ale male to Yuulwlithir and hi, bother. " Ilaving Launloit on both olain in thathi, Mou are sure to rulsila lingilon. 10 It sh, gond luck thityou ardsafe Will you out tutulur Allumauyu, who u olto rekliks ass olus phant, whou jou wil suo we the wild! Will you at nourrenter to tall of your brava nona at Unsplays! Atbwalhaila'dontruction of the drops burnt to like fino I shall I no tlis irry pilars and - (7317, Sauptik PRIV सप्तिकपर्व तस्य पापतो द्रोणन चेदय स्वषामृधे । हियते सानुरुषस्य शुधि विकम्य जीवितम् ॥१४॥रायमाशिणे तानणेषत पाण्डवाः । चेत् फलमवामोति होमि पापस्य कर्मणः ।। १५ ।। एवमुक्रा ता भ्णा पाण्डपं प्रत्युपाधिस् । युधिष्ठिर पानसेनी धर्मराजं तपस्विनी १६ ॥टयोपविष्टा समर्षिः पाण्डवा महिपनियाम प्रत्युवा स धर्मारमा द्रौपदीग्धादर्शनाम ॥ १७ ॥धयं धर्मेण घाझे प्रमाने निधन झुमे । पुत्रास्ते भ्रातरचष तान्न शोपितु भईसि ॥ १८ ॥ स करूपाणि धनं दुर्ग रे द्रोणारतो गतःतस्य र पातन सो कास्यसि सोभने ११९५ द्रौपापाचा द्रोणपुत्रस्प सहजो मणिः शिरसि मे श्रुतः निहत्य संमेत पापं पश्येवं मणिमादृतम्। राबर शिरसि ते करपा बादेयमिति मे मतिः ॥ २० युक्ता पाण्डपं कृष्णा राजा बारादर्जना । भीमसेनमणम्पत्य परमं धाश्यमप्रवीत् ॥ २१ ॥ प्रातुमईसि मां भीम मनस्यार का उसके साथियों समेत नीरन हरण नहीं किया जाता है तो इसी स्थानपर शरीर सामने के निमित्त मासन विछाकर बैठेगी हेपायडर जोमस्यामा इस दुष्टकर्म के फलको नहीं पाता तो निश्वप इसी मेवात को जानों । १५ । इसके पीछे पर ग्रुपदकी पुत्री यशवन्त्री कृष्णा धर्मराज घिष्ठिर से ऐमा कहकर भासन पर बैठगई । १६ । उस धर्मात्मा राजर्षि पाण्डवेने उप्स इन्दर दर्शन प्यारी पटरानी पदी को शरीर त्यागने के निमिद आसन पर बैठाहुमा देखकर पह उत्तर दिया । १७ । कि धोकी जाननेपाली शुभ द्रौपदी बह वेरे पुत्र पौर माई धर्मरूप मरणको मावापे उनका शोचकरना तुमको योग्य नहीं है ।१८। हे कल्याणी पर असत्यामा पहाँस दुर्गम्य दूर बनको गया हे शोभायमान तुम युद्ध में उस के मरने को कैसे जानोगी । १९ । द्रौपदी बोली कि मैंने शरीर के साथ उत्तम होनेवाला माण अवस्थामा के शिर पर पुनाद युद्ध में उस पापीको मारकर लायडुये उस मणिको देंगी । २० । हे राजा उसको भापके शिर पर धारण कर के जीऊंगी पह मेरा मतहै वह सुन्दर दर्शन द्रौपदी राजा से इसमकार कह कर । २१ । फिर भीममेन के पास आकर उचम यचनको रोली हे समर्थ तुमत्तत्री do, if sioful Asuwat avia and his acriuplices .rs util in I shall provo my words true, of Asuwathama 18 not pinished, 13. Having said this to Yudhishtluir, Dra ipadi took her sent thero. Sjellig his beautiful and dearest quoen ready trive up hur life, lo sa'd, " Your Bons and brothers baso died a glormur vleath and you must not d. ploio their lese, Ashwathalua has putol ou lar away juroan utpregunbl. forest : how will you know that leas dead." D aupra111 8.5 d, "heaç there is a guin on Aslıwathaica's livsd, born with his body and i wish to ses It is a proof of his deati. I shall life to suc it put on your head." Having sexd this to the king, shu turned towards Bhim and aekod his bolp in her emergency. saying, You must slay - - Mahabharat क्षत्रधर्ममनुस्मरन् । जहित पाएकर्माण सम्बर मनिष २२ ॥ न हि ते विक्रमे तुस्स पुमानस्तीह कश्चन । श्रुतं तत् सर्यलोकेषु परमव्यसने यथा ॥ २३ ॥ द्वीपोऽit पार्थानां नगरे वारणावताहिडिम्वदर्शनचन तथा त्वमभयो गतिः॥२४॥तपाविराटनगरे, कीय केन भूशादि साम् !माशुद्धतशाच्छापालामी मघवानिव॥२५॥यताकपा पार्य:महाकाण पुरा । तथा द्रौणिममित्रन विनिहत्य मुसोमव॥२६॥ताया दुविध दुःख निशम्य परिदेवितम । न चामर्षत कौन्तेयो मीमसेनी सहावलः ॥ २७॥ स का नपिवित्रामारोह महारयम् । मादाय रुधिरं चित्रं' समागणगुणं धनुः॥ २८॥ नकुल सारथि कृत्या द्रोणपुत्रवधंधतः । विस्फार्य समचा तूर्णमान चोदव ॥ २१ ते. व्याः पुरुषव्याघ्र घोदिता यात हसः । पंगेन धरिता जग्मुरका शीघगमन ||३०॥ शिघिरात स्वाद्गृहीत्वा स रथस्य परमव्युतः । द्रोणपुत्ररपस्या पयोग पीयान् ॥ ३१॥ ऐविकपर्वणि दोणियता भीमगमने एकादशोगा: धर्मको स्मरण करते हुये मेरी रक्षाकरने के योग्यहो । २२ । उस पापकर्मी को ऐसे मारो जैसे कि इन्द्रो शम्बर को माराया यहाँ कोई दूसरा पुरुष भापके पराक्रमले समान नहीं है । २३ । सव लोकों में सुना गपाहै कि जिसमकार धारणावत नगर मध्य पहामापाचे में तुम पाण्डवोंके रक्षक हुये । २४ । उसीप्रकार हिडम्ब राक्षस के देखने में तुम गतिहुपे इसीप्रकार विराटनगर में कीयक के भयो पीडापान छ कोभी तुमने दु:खसे ऐसे लुटाया । २५ । जैसे कि पुलोमकीपुत्री इन्द्राणी को दास से छुटापाया। पागदप जैसीक पूर्वसमपमें तुमने इनकों को किया है । २६ । सी. प्रकार उस मारनेवाले अपने शत्रु अश्वत्थामाको-मारकर मुखीहो उसके पिणप किये हुये वहुत प्रकारके दुःखको मुनकर । २७ । बड़े वलवान पाण्डव भामसन ने न सहा भार स्वर्णमयी बड़े उत्तम स्थपर सवार हुआ । २८ । वाण मा पचासमेत सुन्दर भड़ाऊ धनुपको लेकर नकुलको सारथी करके अश्वत्थामा मारने में पर होनेनालेगे । २९ । वाणतपेत धनुपको टकारकरशीघ्रही पौडोंको चलापमान किया है पुरुषोत्तम यह सहुये वायुके समान पेगवान् । २० । शीघ्रगामी हरिमायके घोड़े तात्रतासे जल्द नलदिगे या भोय महापराक्रमी भीमसन अपने से रपके विन। लकर सातासे भश्मत्यामाके रयकी मोर विचक्षा ३१ ॥ the great sunor as India low dono Snauisar. Thues 18 q0 Dati apua! to you in prosols. I have heari how you prowcted all the l'aodavak at Barnovat. You protscted to from Bilimli. Yull reliarad mo from the far al. Kichak at Baruavat. 23. Slay Ashwathaman blow olbers and pako waliappy like the quurn of Indra" Balas "Bot bear to luar ber lacuntaliraz and rollis gold csr, amul bimself with jewellul»ww And Tow¢ Axl linvin, uado Natul tho driver of his cur, fie prow.ulci co niny AulinallianTto swift hors,s of lſari brodrua lis nur as fast at wmd raid Brigma follow. al tha narkomad hy Ariwathiana'. cir.* 31.
(7819) सौप्तिकपESxuptak Pary बैशम्पारन उवाच । तस्मिन् प्रपाते दुई वधूनामृमस्तनः अर्यात् पुण्डरीकाक्ष: कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिाम् ॥ १॥ एष पाण्डव ते भ्राता पुत्रशोकपरायण. जिघांमद्रीण माग्ने एक पयाभिधापति ॥ २ ॥ भीमः प्रियस्ते सर्वेश्या भ्रातृभ्या भरतपमान कन्छूगतमद्य स्वं फरमान्नाभ्युपधसे ॥ ३ ॥ यत्तदाचष्ट पुत्राय दीनः परपुरब्जयम माशिरो नाम दरेत पृथिधीमपि ॥ ४ ॥ तन्महात्मा महाभाग. फेतुः सर्वधनुष्मताम पादाचार्य प्रीयमाणो.धनन्जयम् ॥ ५॥ तं पुत्रोप्येफ एचैनमन्वयादमर्पणः । मतः प्रोवाच पुत्राय नातिकृष्टयना इव ॥६॥ शिदित चाप घासीदासानारूप महात्मनः। सदाचार. सोग्वशात् सुते ततः ॥ ७ परमापन्नतेनापि न स्म तात त्या रणे । इदमन प्रयोकव्यं मानुषेषु विशेषत ॥ ८ ॥ इत्युक्तवान् गुरुः पुत्र द्रोणा पश्चा दयाँकयाम् । म स्वं जातु सता मागें स्थाति पुरुषर्षभ । ९ ॥ स सदानाय शुष्टरमा अध्याय १२॥ बैशम्पायन बोले कि उस अजेय भीममनके प्रस्थान करनेपर यादवों में श्रेष्ठ श्रीकृष्णजी कुन्नीपुत्र युधिष्ठिर से बोले ।। हे पाडा पुत्रो शोकसे पूर्ण यह तेरा भाई पुदमें अस्वस्थामा के मारनेका अभिलापी अकेलाही दौड़ता है।२ । हे भरतर्षभ पद मीमसेन सबभाइयों से अधिक तुमफोप्याराहै अतुम उस आपाच में फंसहुये की क्यों नहीं रक्षाकरतहो । भव सत्रुमों के पुरके विजय करनेवाले दोणाचार्य ने ब्रह्मशर अखका पुत्रको उपदेश किया, जो पृथ्वीको भी भस्मकरसक्ता है । सब धनुपधारियों के ध्वजा रूप महात्मा महाभाग प्रसन्नवित्त आषा- र्यजी ने वह अस्त्र अर्जुनको बतलाया कोरयुक्त अकेश पुत्रने भी इसअस्त्र | को चाहा जो कि उससे अत्यन्त प्रसन्नचित्त नहीं थे इसहेतु से उन्हों ने उस दुईदी पुप्रकी चपलमा जानकर निखलातो दिया परन्नु सर्व धर्मश आचार्य जी ने उस पुत्र को शिक्षापूर्वक आज्ञादी । ७। कि हे पुत्र युद्ध में बड़ी आपारी में फंसने परभी तुझको भी यह अस्त्र छोड़ने के योग्यनहीं हे पार विशेषकर मनुष्यों के ऊपर तो कभी नशेड़ना । ८ । यह कहकर फिर पुत्रमे यह वचन कहा कितुम बी.सत्पुरुषों के मार्ग में नियत नहीं होगे।९। हे पुरुषोत्तम युधिष्ठिर तव दुष्ट CHAPTLR XII Va shaupayan said " Al the d-purtun of invincible Bhim, Shine Krisho the best of Yudavas said to Yudhist tbn, " Full of griflo his sou's death, Jour brother is going alonu to play Ashwathama.' Why do you not protect Bhim who is drarer to you than all othar brothers? Anhuathama hne learnt froin his father Dropacharya the uw of Brahmslar weapoa which is capable of instrusing all the world. Vyben tho acharya taught that weapont Aigun, Aslwa. thama the only son of the scharya, vai much earsged, and wished to learn it, He vas dot pleased with this corduct of his son Ho (७३२०) Malablarat 7320) पितुर्वधनमप्रियम् निराशः सर्वकल्याणः शोकात पयंवरमहीम् ॥ १० ॥ सतसादा कुरुधेष्ठ घमस्थ त्वयि मारत अवसद्वारशामेत्य वृष्णिणिः परमाति, ११.स कदाचित् समुद्राते पतन द्वारपतीमनु । एक एक समागम्य मामबापासमिया पत्तमं तपः छष्ण चरन् सत्यपराक्रमः । भगरपाद्वारताचाय. प्रत्यपचते मे पिना ॥ १३ ॥ भसं ब्रह्मशिरो नाम देषगन्धर्वपूजितम् । तइ मपि दाशाई यथा पितीर में तथा ॥ १४॥ भस्मतस्तदुपादाय दिपम यसमा सचाप्या प्रयत्वं वरिष हरणे ॥ १५॥ स राजन् प्रीयमाणेन मयाप्युक्तः कृताञ्जलि । पासमानः प्रपलेस मसोसं भरतर्षभ ॥ १६ ॥ देवदामषगन्धर्ष मनुष्यपतगारगाः । समा मा वार्यस्य शतांशेनापि पिसिना.॥ १७॥ इदं धनुरियं शक्तिरिद चक्रमियं गा पदिच्छति चरब मसस्तचददानि ते ॥ १८ ॥ वच्छपमोपि समुग्न्तुं प्रपोकमपि कारणे सदर अन्य करणवाला पिताके पिय पचन को जानकर सब कल्यामों से निरास होकर शोकसे पृथ्वीपर घुमा ।.. द्वारका में भाकर पाद से परमपूजित होकर वसा वह एकसमय द्वारकाके सम्मुख समुद्र पार निवास करसाहुमा अकेण ही इसकर मुझ से वोला । १२ । कि हे श्रीकृष्णनी वहे तपको करते भरतवंशिगे के आचार्य सत्यपराक्रमी मेरे पिताने जो उम ब्रह्मशरनाम अखको जो कि देवता और गन्यनों से पूजिन । भगात्पजीसे पाया है भीष्मी पर वह वैसेही मेरे भी पास जो कि पिताके पासहै। १४ । हे यादवों में श्रेष्ठ हम उस दिव्य मत को मुझसे लेकर मुझको भी वह पक्रनसको जो कि युद्ध में शत्रुओं का मारनेवाला है। १५ । हे भरतर्षभ राजा युधिष्ठिर वह हाथ जोड़कर बड़े उपाय पूर्वक मुझ से अस मांगनेगाला हुआता मुझ प्रमयचित्त ने उससे कहा कि देवता दानव, गंधर्ष मनुष्य, पती, सप यह सब मिलकर भी मेरे पराक्रम के सालहवें भाग के समान नहीं है। १७१ धनुष है यह शक्ति है यह चक्र है यह गदा है इनमें से जिस प्रस्त्र को तुम मुझ से चाहते हो उसको में तुपको देताहूं 11८1 जिसको तुमटा taught him the asa nt it, but warpel him never to aw it, specially ayxinat human beings, even at the time of great emergency, Heslag foretold at the aRmna time that his eonwoald Dever be firm on tho path of the right ones. Ill.natured As'satirama, fiodiag that his father W#A Dot well-edisposed towards him, roumed rustlessly through out the world. 30. He staid at Dwarka and was respected by the Yadares. One day he niet ine alone near the ca shore in the vicinity of Owanuka aud said to me with a smile Dly glorious father foarnt from. Agastya the use of Brahmshar which is respected by gods and yanılharyas, and I haso sharol the knowledya of it with my father. I slull teach you all about it, if you will give me your for-destroying direls. " 15. With joined palms no asked me to 1(7321 Sauptih l'any aliam ७३२१ शाण विमान मम्मे वाममोप्ससि ॥ १९॥ स सुनाम सहसार वजनामपमस्मयम । पोपा महामागो मचः रुपमया सह २० गृहाण चक्रमित्युको मया तु तर नन्तरम् । अपाहतपस्य सहसापकं सम्पेन पाणिना ॥ २१ ॥ मनमक स्थानात सम्चालयितुमप्यता भने पहिणनापि गृहीतुमुपचक्रमे ॥ २२ ॥ सर्वपले नाव मामामि ततः सपिलमापि यदेने में शा॥ २३ • उग्तुं वाचाल विद्रोणि परमदुर्ममाः । करपा यानं परिमारता सम्पारत भारत ॥२४॥ निम माभिमायाद्रिचेतसमानामामा सम्बिनमायानानमनयम । २५॥पः सरंचनाम्येषु प्रमाणं परमं गतः। गावधवा श्वताविपरकेतमः ॥ २९ ॥ व सामादेवदेवशं शितिकण्ठमुमापतिम् । इन्वयुद्ध पराजिष्णुस्तोषयामास शरम 1२७ । यस्मात् प्रियतरो मास्ति ममान पुरुषो मुवि । नापं पप मे फिी चदीप सत्ते हो और पुद में चाभी सक्त से आप जिस अखको मुम देना चाहते हो उसके रिना दियेही इनमें से जो चाहो सो लो । १९ तर मुझ मे ई करनेवाले उम महाभाग ने एन्दर नाभि और हजार आरा रखने वाले वतनाम मोहमपी चक्र को मुन्ध में मांगा । २० । तर मैंने भी उमी समय कह दिया कि पक्रको गेता उस ने उठकर अकस्मात् वायें हाथ से पक को पकड़ लिया । २१। परन्तु उसको स्थानपर से हटाने को समर्त्य नहीं हुआ फिर दतिय हाय से भी उस को पकड़ना प्रारम्भ किया । २१ । इसके पीछे अनेक उपायासे मीउसको वठा न सका । २१ । फिर बड़ा दुःखीचित्त अश्वत्थामा जर कि सब पराक्रम करने से म उसके उठाने और हटानेको भी समर्थ नहीं आ और वह उपायोंको काके यककर भाग होगया तब मैंने उस अभिशाप से चित्त उठानेवाले बिमन और पाकुल भवत्यामासे यह वचन कहा । २५ । कि जिस गांव धनुष मेव पोहे भार हनुमाननीकी धना रखनेवाले अर्जुनने देवता और मनुष्यों के मध्यमें बड़े प्रमाणको पाया और रामसने पूर्वममयमें साबाद प्रधान देवताओं के give him my weapon, I was pleased with bim and said, "Gods, gandharvas, men, birdr and serpents, all put together, are notequal to even the sixtoontlı purt of my prowess. Here are my bow, Shakti diseus and mace. Select whichever of those you like and I shall give it to yon. Take whichever of these you can bear and wield, without giving me anything in retura, Bearing nalice against me, he asked of me my disous with a good nave and a thousand opokes, entirely mnds of iron. which I call my vajra. 20. Of coun. I at once gave him permission to take it away. Ho held it by tbo Lia lelt band, but could not move it from its placr. Then he used 1118 right hrod alio but fur all his efforts could not lift it up. He was wucli troubled in b14 out when he could wut liſt and move at Being tired, ho stood aloof. Soelog that he was bopeless, heartless and ७३२२) Ma'vablitat (7322) शरा मुनानघा ॥ २८॥ तेनापि महदा ब्राह्मन् पार्थनाक्लिष्टकर्मणा । भोसपूर्णमिदं घाक्यं यत्र मामिमापसे ।२९ ॥ ग्रहाचर्य महधोरं जीद्वादशवाकिम हिम चत पामत्व यो मया तपसाजित ॥ ३० । मभानवतचा सकियो योऽमजायत । सनतकुमारस्तेजस्वी प्रगुम्नो नाम मे सुता ॥३१॥ तेनापरिप चक्रमप्रतिम मम नमामिभन्दयादी प्रार्थित त्वया ३२ रामेणाविषयमतको कपूर्व कदावमा नगदेन न शासन यदिदगान बगा । ३३ ॥ द्वारकावासभिया येण्यन्धकाहायै नोक्तबीमद भातु यदिद पाति रपया । ३४! भारतापाव पुषस्य मानित. सयादये. 1 चक्रेण रविना श्रेष्ठ फस्नु नात युयुत ससे ॥ ३५ ॥५॥ मुको मया द्रोगिमामिद प्रत्युशवाह । प्रयुज्न पोपूना यात्स्यायवायु ईशर शितिकगठ उमापति शंकरजी को द्वन्दनाम युद्ध में प्रसन्न किया जिससे अधिक इसपृथ्वीपर मेरा दूसरा के ई मिय नही है। बाबा और पुत्रादिकभी उसको देनेके अयांग नहीं है हे ब्राह्मण उस सुगमकर्मी मेरोमित्र अर्जुन मेभी प्रथम मुझसे यह वचन नहीं कहा जो तुमने मुझसकराह । २१ । मैंने हिमालयकी कुसिमें नियम होकर बारहवर्प व घोर ब्रह्मचर्य को करके जपकेबारा जिसको मातक्रिया और जो सदैव करनेवाली विमणी में उत्पन्नहुमा तेजस्वी सनत्कुमार प्रपुम्न नाम मेरेपुत्र नेभी इस बड़े दिव्य और युद्ध में अनुपम चककी इरसा नहींकी रे अज्ञान.निको ने मांगाहे । । । । उसको कभी हमारे बड़े बलदेवजी ने भी नहीं | मगाया जो तो मांगा है वह गद और सामन भी नहीं मामा | भौर अन्य वृष्णो अन्धकांश द्वारकारामी मारीधयोंने भी पू में इस को कभी नहीं मांगा । १४ । तुम भरतवंशियों के प्राचार्य के पुत्रहो और सब गादों से प्रशमनीगहो हे रथियों में श्रेष्ठ तात तुम चकसे किसके साथ युद | करोगे । १५ । मेरे इस वचनको मुनकर भवत्यामा ने मुझको या उत्तरदियाकि धोकमनी में आपका पूजनकरके आपही के साथ रहूंगा । ३१॥ मैंने देवता diutised, I said to lini Ile willder of Godir bow and post btwr of phite horses and ape lanser, Arjun, who is of wall ined prawo of a 6 60dx arril de v, ke e do fileased Swakarta Lubland vf Uninud ju of himwfans duo!, thou shioin I hold none dearse in thu *vllaud wluin I svuld bird 5 ay iny wifo audaca, ureu Liac ostinorm ijmanse till mothecain: thst you daxe. II. what I got afwr a 63rTO HY E cian a 4 Ilcoalayan #10 ** Zavru al utvr you olorun; klukmını, oven that 41014900 of in no. Pradyu11n Olmer had ary desireti Tuesda puutellen dwub wlicht jou weru fuolish on rgli to nuk ufis. 32* 2 121 Pitts arguated to part with it by Bilder, Goda, Saur or noy otter war.gia of Dwarka Yuu, thu son of tho acharya respucted by (७३२३) (7323 Siuplik Pary Hitacia प्रार्थीि ते मया पक देवदानवपूजितम् । अजेय स्वामिति विमो सत्यमेतद्रवीमि ते ॥३७ ॥ पत्तो दुर्लभ काममनवाप्येव केशर । प्रगिगास्यामि गोविन्द शिवनाभि बदस्यमाम् ॥ ३८ ॥ एतत् सभीम भीमान मृषण दिया धृतम् । चप्रमप्रतिचक्रण भविनान्योभिपद्य ३९एमाघदुत्या द्रौणिर्मा युग्णामधान् धन नि साहायोपयण काले रत्नानि विधिधानि च । ४० ॥ स सरम्मी उगमा घ चपळ जर एव च। बेपाल प्रहशिरस्तस्माक्ष्यों पुत्रोदर ॥४१॥ इति सौतिकीग ऐषिक वाग कृष्ण धिष्टिरसंवादे श याय । १२ । भोर दानयोंमे पूनित मापक ची पापनाकरीहै और हेसमथ मैं भापसे सत्य २ कहताह किम भनेपह।१७ हेकेशवनी आपमे दुप्पाप मनोरथको न पाकर चला माऊंगा हे गोषिदजी आपमुझको कल्माण के साथ नमस्कारका ३८ मुझउत्तम और भनुपम चक्रमाले ने यह भपनक रूपों का भी भयानक चक्रधारण किया ए वीपर इसराइसको नहीं पासताहै ।।९ अपत्थामा इमकार मुझसे कहकर और समयपर मुझमे घोड़ेधन और अनेकप्रकार के रत्नोको लेकर हस्तिनापुरको चला- गया ४० यह क्रोषयुक्त वुद्धी चालाक और नियोहै और ब्रह्मशरअस्त्रको जान तार भीमसेन सो रक्षाके योग ।।.॥ - all the Youlavas, whom would youvelle fenpon to fight w th? " 35 To thia quustion of m no he ma le the follo viog reily, • I would witship and fight with yn Krishn It was tbere foro that I asked if you the weapon. I way truly that I am invincible 1 canie to you on a bootlig mission Bless me frovind, and bid me 520d hye. You powess a dreadful and watchless Weapon such as none else world bad, " Having said this to me, Ashwathama accepted from me 8 pr. gont of horses and wealth in preosons stines and went away to (Husthinapora Hp 19 rash, ill nature I, Eivongful anul cruel and kaawa thouse of Brahmaliar, and therefura Blum is tortly of Loung protectod from him, " 41. 10 the . Mahabivart (73241 शम्पायन उवा पक्षमुक्तता युधों सेष्ठ वासनम्न । साबुनपरोपेनमा रोड रयोत्तमम् ॥ १ ॥ युक्त परमकाम्बोजेस्तुरंगमनालिमिः । भाविकोपारस पुरेरयपरस्प तु ॥२५ दलिणाम: समीर: सम्यतेऽमवत् । पाण: तस्पस्ता मेप का . ३॥ विश्व का दिग रलपातुनिभूषिता । ति तेर रमापा पहिरन ॥ वैनतपःस्तितपा प्रमामाहलरमियाम् । तर सरवतः केतु नगारिरहशत ॥ ५॥ भम्पारोहदशा केतुः सानुमतम मग पांच राजो युधिष्ठिर ॥६॥ मंसी मममी का मामत त प शाबा नमविताविक मास | तापाप्य दाशाई स्पन्दनाकपूजितम् प्रतिदिन जवापेतान परमापानचोदयात सातपाः सहमत्पित सिवाहानतोत्तमम् । भारिपतं पापाभ्यां यदनाएपमेष ॥९rat शा तेरावा अध्याय १०॥ वैशम्पायम पोले कि पुदकामोंमें श्रेष्ठ और सपपादों प्रसन्न करमे पाये श्रीकृष्णमो इसमार कहकर उस उत्तम रथपर सवार मोकि म माशों से युक्त वर्णमयः माल पारी कामोमदेशी घोड़ो जुहारभावा और जिसके उचमधुर उदपासे पूर्ण के सरपये शेन्यनाम घोड़ने दक्षिणचक्रको मठापा और पीप नाम घोरा पाईभोर भा और बस रसके पार्शगार मेघपुष्परसाहक नामयोपे ३ विश्वकर्मा के पनाई हरिन भोर धातु से अलंकत दिनौर खा पट्टी रखकी पानापर मायाके समान दिख ईपडी। मकाश मालकिरण रस बाले गहनी धस या नियमाये उस सस्थलका ममागहरू दिईपड़ी ५ सीसर पनुपपारंगोंकी पना केशवमी सत्यकर्मीभर्धन और कोम्पराम गुष्ठिररसपर साप ।। सपीप पर्वमान दोनों महात्माओंने स्थपर सवार बाई धनुषारी श्रीकृष्ण को ऐसे शोभायमान किया जो किदोनों अभिनीकुमारोंने इन्द्रको घोषित किया भी मीने उन दोनोंको उस पूस्त रसपर बैठाकर पीप्रमासे संकर घोडाको चाबुक से वाटिव किया पाखर और पायो CUAPTER XI Vaishampaysand, " Sari Krishn tho best of ieriiore and joy of the Yadaray Arving op een ar above, rodo the good car ſuminbed witta arai and weuper, decked with yoki chiaplats and drawn by oxcellent horics of Camboj brood. It shuao liko to rising Sun 8:saivya. Bagrur, Vegbossiysild Valihik word tha four horesthat drvo the car. The standard, wala by Vushwaharira himself, was company of metals and preda u stat4, and the figurs of farur Adorno od to banner. 3. Such werthu cur in which 16 Kobar, Yudhialı. thir And Arjur. Tso to Lorude gilliug by the windor o Sharal& box, looked liko to .Aulivisibulu465 w.th India in the raildi. When the trio wwe woulul ia uliocar, Shri Krishn druro the borne fut se रक 173258 Sauntik Parv सौप्तिकपर्ण (३२५ धम्मानमवानां शीघ्रगामिनाम् । प्रादुरासोन्महान् शब्द, पक्षिणा पततामिय । १.H समाईनरव्याघ्रा सणेन भरतर्षभ । भीमसनं महेप्यासं समनुदाय वेगिता ॥११॥ क्रोधहीन्सु कौन्तयं द्विपदर्थे समुदतम् । नाशक्नुष वारपितु समेत्यापि महारथाः ॥ १२ ॥ स तेषा प्रेक्षतामय श्रीमन दधन्धिनाम् । यो भागीरथीकच्छ परिभिश गित । य म भूयत दीणि पत्रहन्तामहात्मनाम ॥ १३ ॥ स ददर्श महात्मानमुर कान्ते यशस्विमम्। कृष्णद्वपायम व्यासमासोनमृपिमिः सह ॥ १४ ॥ तम्या नर्माण घृतात शचीरिणाम् । जसा ध्वस्तगासीन ददर्श नौणिमन्ति॥.५। समय घावत् कौन्तेय प्रगृह्य सशर धनु । भीमसेनो महावास्ति तिष्ठति घाबवीत ११६॥ सप्ट्वा भीमधन्धान प्रगृहीतशरासनम् । भ्रातरी पृष्ठतश्चास्य अनाईनरस्थिती । १७॥ शापितात्मामघद्रौणि प्राप्मम्वेदमन्यत । स तहिव्यमदीनात्मा परमाखमा आम श्रीकृष्णानी से सपारी पुक्क उत्तम स्यको वह घोड़ेलेकर अकस्माद उड़ो। भीमपणनीको चलनेवाले शीघ्रगामीघोड़ोंके ऐसे बड़ेशब्दहुपे भलाक उड़तेहुये पक्षियों शन्दहोतेहैं ।१. हेमरतर्षभजन पेगवान् नरोचमानेगड़े धनुषधारीभीमसेन की ओर चलकर क्षणभरही उसकोपापा ११०वा महारथी मिलकरभी उसकोधते प्रकाशितौर शमुसे युद्ध करने को सन्नद भामसेनके रोकनेको समर्थनहाहुये ।१२। पर भामसन उन दनुषधारी श्रीमान भाइयों और श्रीकप्पाजी के देखतेहुये अत्य तशीघ्रगामी घोड़ोंके द्वाराधीगंगाजी के तटपर गये महांकि महात्मामोंके पुत्रोंके मारनेवाले प्रश्नयामा सुनेगयेथे । सभीमसेनने जलके समीप महात्मा यशान् ध्यासनी को पियों समेत बैगामा देखा । १४ । और उस निईयकर्मी तसे मान शरीर बड़े चीरधारी धूलसे लिप्स शरीर अश्वत्थामाको भी समीप बैठाहुआ देखा । १५ । वह कुन्तीकापुन पहाबाहु भीमसेन पनुपाण को लेकर उसके सम्मुख दौड़ा मौर तिष्ठर पचन कहा । १६ । वह प्रश्वत्थामा धनुपधारी भीममेनको देख कर और पछि श्रीकृष्णजी के रथपर निगत दोनों भाइयों को देखकर चिच से the wind. Thu noisu of the swift lorses It Semuvled that of a flight of of birds, 10 TI ey town overtonk Bhim, but could not stop or ke-p him back frotu lus purpo-c of fighting with the treay. Hacontau. od moving on within eight of his slo100g brothers and Sin Kristin till ho reached avar the bank of the Guoges where Ashwathama thie alayor of the sons if the Pandavas u as reported to be, Blumea sat Vyas and other nisluus scated near water, Ashisuthamn 'w, with his body rubbed over with glace and Just, at I ear theo 15. Valiant Bhim the son of Kuuti, tahing up his low and Artov ran to sarda hinm, saying,"Suy, stay 'Being Bhimarned with bow and arrow and followed by Shri arslan and the two bjuthara, Aliwatha16 # 14 tauch distreused and lost all hope for hve lifet Tan brivomaan roma n' rul 1७३२६। Mahabharat ( 7326) तयत १८ ॥ अमाह च स धेशीको द्रौणिः सम्येन पाणिनास तामापदमासापादिम्य मन मुदैरपत् ॥ १९ ॥ समृष्य माणस्तान्छरान् दिव्यायुधधरान स्थिताम् । भपापा वति रुषाव्यस्जदारुणं वचः ॥ २० ॥ इत्युक्त्या राजशाईल द्रोणपुत्रः प्रतापकार । सर्वलोकप्रमोहार्य तदनं प्रमुमोच ह ॥ ११॥ ततस्तस्यामिषीकायां पापकः समबापता प्रवक्ष्यषिव लोकांस्खान कालान्तकपमोपमः ।। २२ ॥ इति सौप्तिकपर्वणि ऐपिकपर्वणि ब्रह्मशिरोनत्यागे त्रयोदशीध्यापा १५ ॥ . पीडितहुपे मार मृत्युको वर्तमानमाना उस महासाहसीने उस दिप महा आम अस्त्रको स्मरण किया । १८ । भौर वाहायसे एक सीकको पकड़ा और एस भापीत्त को प्राप्त कर दिव्य अस्त्रको पढ़ा। १० । और दिव्य शस्त्रधारन करनेवाले वाले उन शूरों को न सहकर उस अश्वस्थामा ने क्रोधसे भयकारी वचन को का कि यह भख मैं पाण्डवोंके नाश के निमित्त छोड़ताहूँ । २० । हे राजेन्द्र प्रतापमान अश्वत्थामा ने यह कहकर सब लोक के बड़े मोहके निमित्त उप्स भसको गेड़ा 1 २१ । इसके पाये उस सींकमें काल और यमरानके समान वानोलोकों की भस्मारनेवाली अग्नि उपभईई ॥ २२ ॥ thio divine weapın. He took up a pioco ef broom and pronuncert over it tho aphorism. Unablo to bear the sight of those warriors, ho uttered dreadful words in livs rage, saying, "I discharge this weapon for the destruction of the Pandavae," Having said, this glorious Ashwa thema discharged who weapon to skepny tho world. Then tradly sparks bagaa tu cons out of that broon."21. .
(1327 Supmk Farv सोच पर्व ।७३२७ शम्पायन उवाच । इङ्गितनव दासातमाभमायादित. द्रोणवुवा महावाहुर अम यमायत १॥ अर्जुनार्जुन पद्दिव्यमलते हदिधर्तते । द्रोणोपविष्टं तस्या बाल साति पाण्डव ॥२ भानृणामा मनश्चैव परित्राणाय भारत । विसृजैतस्यमप्या आपसमलनिधारणम् ॥ ३ : केशवनेपमुक्तस्तु पाण्डपः परपीरदा । धारयातर्ण प्रगृह्य सशरं धनः। ४. पूर्वमाचार्यपुत्राय ततोऽनन्तरमात्मने । मातृभ्यश्चैव सर्वेश्य स्वस्तीत्युक्त्वा परम्तपः॥ ५॥ देवताभ्यो नमस्कार गुरुज्यत्र सर्वशः। उत्ससर्ज शिवायनलमत्रेण शाम्यताम । ६ ॥ ततस्तदन सत्ता सृष्टं गाण्शवधन्वना । प्रजबाल महाश्चिमयुगान्तानलसग्निभम् ॥ ७ ॥ तथैव द्रोणपुषस्य सवलं तिग्मते जसः। प्रज्वाल राज्यालं तेजोमण्डलसवृतम् निर्णता परश्वासनन पेतुरुल्का भध्याय ११॥ वैशम्पायन वाले कि महावाहु श्रीकृष्णजी ने प्रथमही से उस अश्वत्थामा के उस मनके विचारको जानकर अर्जुन से कहा । १ । कि हे पाण्डव भर्जुन जो द्रोणाचार्य का उपदेश किया हुआ वा दिव्य अन वर्षमान उसका यह समय वर्तमान हुआ है। २ । हे भरतवंशी तुमभी इस युद्धभूमि में अपनी और अपने भाइयोंकी रक्षा के लिये अनके रोकनेपाले उस अखको छोड़ो। ।। इसके पीछे मोके वारोंका मारनेवाला और केशवजीसे इसमकार कहाहुआ पाण्डव अर्जुन अनुषण को लेकर शीघही रथसे उत्तग।।। वह शभुभों का तपानेवाला मथम | गुरुपुत्र के लिये फिर अपने और सब भाइयों के अर्थ भलादोय यह कहकर ।५। देखता और सब गुरुत्रों के म नमस्कार करके शिवजीको ध्यान करते हुये अर्जुन ने उत्त अखको छोड़ा और कहा कि अख से मन शान्त होय । ६ । इसके पीछे अकस्मात गांडीव धनुषधारी से छोड़ाहुपा और मलयकालकी अग्नि के समान बामकाशित भन्न पालतरूप हुआ। ७ । और उसीप्रकार बड़े तेजस्वी अश्वत्थामा काभी वह बस्न उपस्ति रूपमा जो कि तेममण्डल से युक्त वड़ी जाला रखने वाला था । ८ । परस्सर वायुके संपट्टनों के बड़े शहये हजारों उल्कापातहुसे CHAPTER XIV Vaishampnyan said, " Knoring already tho evil intentions of Ashwatbama, Bin Krislin said to Arjan, " This is the time to deste sharge the reapa giren you by Dronachary Diaharge it to chock your adversary in crder to protect yourself and your brothers "Thus urgeul by Keshne, Arjun tho destroyer of foes came down at once from the car with his bow and "S.foty to the son of acharya and the Panday brothers" bowed down to his preceptor and mediataling on Shiv, he disclıbrged his ea pon, saying, 'To mitigate the effect of the weapon, 1" Discharged #uddenly by tho wielder of Gandiy, the weapoa Ahone like fire. 4.54* sexsepna ot arrow. 4 Buying, ३२८) Mahabharat [73281 सहस्रशः । महन्द्रयञ्च भूतानां सर्वेषां समजायत ॥ ९ ॥ शादमदम्याम ज्याला मालाकुलं भृशम | पचाल व मही छत्स्ना सपर्वतवनमा । १७ ॥ ते पहनतेजसी लोकांस्तापयन्ती व्यवस्थिते । महर्षी माहिती तत्र दर्शयामासतुस्सदा ॥ ११ ॥ नारद 'सर्पभूतात्मा भारताना पितामहः । उभौ शमयि तुं धारी माणERESTो ॥१२॥ठी मुनी सर्वधर्मशी सर्वभूतहिजेषिणी। दीप्तमारनामध्ये या परमजसी ॥ १३ ॥ सदन्तरमाधृष्यायुपागम्य पस्विनी । भातामृवियत्तत्र पलिताविक पायको ॥ १४ ॥ प्राणद्भिग्नाधृष्यो देवयानय सम्मती । ममतेज शर्मावतुं लोकानां हिसका म्यया ॥ १५ ॥ ऋषा ऊचतुः । नामार खाप पूर्व पेऽव्यतीता महाराः । तदर मनुष्यते प्रमुक कथन । किमिदं सारखं कितपती महात्यम् ॥ १६ ॥ सौप्तिकपर्वणि ऐपिकपर्वणि अर्जुनास्त्रत्यागे चतुर्दशोध्यायः १४ ॥ और जयजीवों को बढ़ाभय उत्पन्नहुभा । ९ । शन्दायमान भाकाश ज्वाला मालाओं मे बहुतव्याप्त हुआ पर्वत वन और स्तों समेत पृथ्वी कम्पायमानहई । १०। इसमकार वादोनों प्रकाया लोगों को तपातेहुयेनियतहुये तववहाँ उनदोनों महर्षियोंने एकमाथ दर्शन किया। ११ । सयभीवों के आत्मारूप मारदजी और भरतवंशियों के पितामह व्यासनी यहदोनों महात्मा वार अश्वत्थामा और अर्जुन के शान्त करनेको उपस्थितहये । १२ । सवयों के ज्ञाता और सबजीवों के हितकारी बड़े तेजस्वी वह दोनों मुनि बरमकाशित उनदोनों भोंके मध्य में नियतहुये । १३ । उमसमय पर मजा यशान और अग्निके समान प्रकाशित दोनों उतनापे वानाकर नियत हुये । १४ । वह नीनमात्रोंसे अनेय देवता और दानों के भाकित दोनों ऋषि लोकों की वृद्धि की इच्छामलोंका तेजशान्त करते हुपे मध्यमें निपाइये । १५ । भार बोली नानाप्रकार असोजाना सत्र महारथी जो पूतिपयमेभी उत्पभडुप उन्होंने भी इाभयको कोकिसी मनुष्यपर नहीं छोड़ा हेबी'लोगो तुमने इसप? विनाशकारी माहमको कोकिया १६ ।। Inked lika i ce fics. 8. vero storm of wool an 1 multeuse fel! Liu with a cruiala, cuusing foak to life. Tlin shy » 49 cyvered with flumes of fire and the Earth with her trees shook. Thus the two lightsotrod side by side beat ng the world. The two great ris vis Narnd and Vyas came thoro to appeass the wrath of Ashwathama and Arjun. Kowing ull dharm And wishing good to the world, the two glorinat rishis atrod in the midst of the two waapras, glorioarnad insincible, bright as fire. Cool ing the fury of both the weapons, invincible by all b.ing, tbe two rithis roinciel by yods and gandhortat, stood thoio and said, " Tho former warrior who new tid uw charged laia weapon:agrinst human longs. Why bard you commit tsd thia raslocsa bravo mea!"16. thama's woopn to Tiers was B 10. all sorts of weapots, never dis.
- 17920) File qidauptik l'ary वैशम्पायन उवाया हटा नरशाईल तापग्निसमजमा । संजाार शरं दिव्य स्परमाणो धनम्जपः॥ ॥ उवाच मरतश्रेष्ठ लार्ग प्राञ्जलिम्ला प्रयुक्तमत्रमंत्रण शाम्पतामिति वै मया ॥ २॥ संहत परमात्रेस्मिन् सनिस्मानशंपतः । पापकर्मा धुर्व द्रौणिः प्रत्यरवस्त्रतेजसा ।। यदा हिममस्माकं लोकानाचक सरंथा । जयन्ती देवस काशौ तथा सम्मन्तु यः ॥ ४॥ युक्त्वा संजदारानं पुनरेव घमजयः । तहाग दुकररतस्य देवैरपि हियुमे ॥ ५ ॥विसष्टस्य रण तस्य पम्मास्त्राव संगरे। भशतः पासवादम्यः साक्षादपि शतक्रतुः॥ ३ ॥ प्रखतंजोद्भवं तरि विसरामकृतात मना । - शक्यमानर्तयितुं ब्रह्मचारिप्रताहते ॥ ७ ॥ मचीर्णब्रह्मचयों व सदावर्स सोमः । तसं नवग्यस्य मीन तस्स अन्तनि ब्रह्मचारीप्रती चापि दुराचा अध्याय १५ ॥ वैशम्पायन वोले हे नरोतम शीघ्रता करनेवाले अर्जुन ने भाग्न के समान प्रभाविव उन ऋपियों को देखकर दिन्याण को संहार कलिया अर्थद लादा लिया । । । भरतर्षभ वा अर्जुन हायनोरकर उनञ्चपियों से पोलाकि मैंने यह समझार अस्त्रको प्रकटकिया है कि यह प्रस्त्र इससस्त्र से शांतहोय । । । इस उत्तम भरत्र सट भानेपर निषयकरके पापकर्मी मनस्यामा इसतेज अस्त्रसे इस सबको भस्पकरेगा 1 1 यहांपरसर हमारा और मेलोंका जोहित है उसको देयतारूप मापलोग उसीपार से भङ्गीकार करने के योग्पहो । ४ । भर्जुनने इस मकारसे फिा अस्त्रको लौटाया युद्ध में देवताओं सेभी उसका फिरलौटाना कठिन है। पांडव अजुनके सिवाय युद्ध में साक्षात् इन्द्रभी उस छोडेहुये परम प्रपत्र के लौटानेको समर्थ नहीं है । ६ ।। ब्रह्मचारीका प्रारखेनवाले पुरुषके सिवाय ब्रह्म तेजी उत्पन्न छोडामा जल भनितेन्द्रिय मे कभी लौटाने के योग्य नहीं है। ब्रह्मचर्य न करनेवाला जो पुरुष प्रनको छोड़कर फिर लौटाता है यह अत्र साथियों समेतउस छोड़नेवासके मस्तकको कारताहै। ८ । ब्रह्मगरी व्रत करनेवाला CHAPTER XV Vaishampayan said, " Susing the two rishis glorions like fire, Arjua Tacalled his diving arrows. And with joined palous he said to then," 1 discharged my weapon to appease the other. Surely Ashwathama will bura us with hue 1 bare rocalled Lina own. You will do what is good to us aod tw the world, divina sages." Thus arjun recalled the weapon and did a deod which was dificult to be achioved by gode. 5. Nono except Arjun, dat oven lodra himself, could recall that weapon when voce discharged. None except a Brah mohori could do thoglorious dood; for the weapa kilis the man who recall, it, if he is not a Beslunchuri. Arjun the Brahmsbari recalled the woppg in spita of baving so much to revenge for. For Arjun weapons for was the ७.३०) Mahabharat (7830) ग्मयाप्य तार । परमव्यसनामीपि नार्जुनोऽयं व्यमुचना ॥ ९ ॥ मत्यनमघर पूरो प्राचार्गच पाण्डवः । गुरुबत्ती व तेनास्त्र सजहागर्जुनः पुन ॥ १० ॥ दौणिरत्यय संप्रक्ष्य ता पुरतः स्थिता ।ग शशांक पुनघोंग्गर सहनुमोनमा ॥ ११ ॥ भरातः प्रतिसंहारे परमात्रस्य संयुगे ट्रोणि नमना राजन् गारममावत ॥१२॥ उत्तमम्प समान मात्राणाभीप्सुना । मयतदाएं भीमसनभवान्मने ॥ १३ ॥ अधर्म कृतोन ताष्ट्र जिघांसता । मिथ्याचारेण भगवन् भीमसेनेन संयुगे ॥१४॥ मतः सृष्टंमिदं ब्रह्म मयायामकृतात्मना । तस्य भूपोऽद्य सारे फत्त नाहमिहोत्सः ॥ १५॥ विष्वं हि मया दिव्य मे तदखं दुरासदम् । अपाण्डवाति मुने बहिनतेजोऽनुगन्य वे ॥ १६॥ तार्दिनं पापमयानामन्तकायाभिसंहिताम | अध पाण्डुसनान् सर्णन जीविता संशयिष्यति । १७ ॥ कृत पापमिद अहाम्रोपाविष्टेन चेतसा । बधमाशाम पार्यानो आरबड़े दुःखपे पाडावान् अर्जुन नेभी उस दुष्टाचारको पाकर उस शस्त्रको नहीं छोड़ा । ९ । पाण्डव अर्जुन सञ्चायत करनेवाला शर ब्रह्मचारी और गुरु भक्त था इमोतमे उसने म अस्त्रको फिर लौटालिया। १० । इसके पीछे असत्यामा | भी अपने आगे नियनहुये दोनों पियोंको देखकर अपने बलसे उसघोर अख के फिर लौटानको समय नहीं हुमा । ११ युद्धमें उसपरमभम्रके लौटानेमैं असमय रहे दुःखीचित्र अश्वत्थामान न्यासजीसे कहा । १२ । कि हेमुनि वढी भापनिसे पाडावान और प्राणों की रक्षाका अभिलाषी होकर मैंने भामोनके भय से उस प्रल को छोड़ा । १३ । हे भगवन के मारनेके अभिलाषी और दुराचारी इस भीमसेन युद्ध में अधर्मकिया: १४ 1 में ब्राह्मण महेतु रे मुझ अज्ञानी ने इस अस्त्रको छोड़ाई भव फिर उसके लौटानेको उत्साह नहीं करताहूं । १५ । हे मुनि मेने पांडवों के नाशके अर्थ ब्रह्मतेजको धारगाकरके इसकठिनता से सहने के योग्य अस्त्र को छोड़ा । १६ । यह अन्न पाण्डवों के नाशके लिये बहुतह अब यह अब सब पांडवों को जीवन मे रहित करेगा । १७ । हेब्राह्मण कोषसे पूर्णचित्त और पदमें पाण्डवों के | मारने के मामिलापी पुन भन्न छोडनेवाले ने यह पाप किया १८ व्यासजी कोले observer of truy YoW, Inve And duruted tu hii preceptor, and thors fore thu could ucall tne worp.in. 10. For the sakoofthors rishis.Ashra. il.ama too, tried his but to recall his repm, bat was nor success. fulin liis attempt. Fuiling in his attempt, be said to Vyus distressJ mind, " Bang hard pussort and afraid of bhim, discharged the weapon to fare my life. thus fiad sinned Against Duryodhan uud lain him unfairly. i thitreſoro discharged this wonpin, now unable to rersill its 15. I dischargid it to way all the Pandavas in tay anger. It is sufficient in slay the landav is and will surely des tive tw.w of life, Surly 1 buvo matted this sin to slay the Pandavas " Vyas said, "Arjun discharged the Brabmshar by way retuliation and not to slay you Ho discharged it to witigata ho sſloch with butam of (7831 Sauptik laiv सौप्तिका ७३३२१ मयांत्र पता रणे ॥ ८ व्यास उवाच । मस्त्रं प्रशिरस्तात विद्वान् पार्थो पन जयः । गत्सएपान रोपेण न नाशायतधाइये ॥ १९ ॥ सनमरेण तु रणे तष संशम विपता विषष्टमर्जुनेद पुन प्रतिसंहतम् ॥२०॥ ब्रह्मासमप्पयाप्येतपदेशात पितु स्तष । घामहावाहुर्माकम्पत धनन्जयः ॥ ११ ॥ एवं धृतिमतः साधो सर्यास्त्र विदुषः सतः । सनात्यायोः फस्मा यमस्य निकीत ॥ २२ ॥ भवं प्रशिगे यत्र परमात्रेण वायसे । समासादश पन्यस्तवाष्ट्र नाभिवति ॥ २३ ॥ पाद महाबाहुः शकिमानीप पाण्ड:1.न बिहन्यातदनन्तु प्रजाहितचिफोर्षया ॥ २४ ॥ पाण्डवास्त्वच गश्च सदा संस्थमेव हि। तस्मात् सहर दिव्य स्वासमेत महा भुज ॥२५॥ मरोपस्तव वास्तु पार्था: सन्तु निरामया । म बर्मेण राजर्षि पायो जैतुमिच्छति ॥ २६ ॥ मणिवेष प्रपच्छै यो पहले शिसि विधनि! पतमापाप से प्राणान् प्रति दास्यन्ति पाण्डपा २७ । दौणिरुवाच पाण्र्यानि रत्नन पश्चा हतात बुद्धिमान् पाण्डव अर्जुनने युदमें जो ब्रह्मारनाम अस्त्र छोड़ा वह क्रोधसे छोदा सेरे नाशकैलिये नहीं छोड़ा । १९ । युद्ध में तो मम्मको अपने मन से शान्न करने अभिलापी प्रजनने यहअस छोड़करभी फिर गैटालिया । २० । या मा वार भर्जुन तेरे पिताके उपदेशस मममस्त्रको भी पाकर क्षत्रियधर्म मे कम्पायमान नहीं हुआ । ३१ । इस प्रकार धैर्यवान् गाधु सब भनों के ज्ञाता सत्पुरुप इस अर्जुनका मारना भाई बंधुभों समेत किसलिये तुमकरना चाहते हो । ११ । निम | देशमें प्रसार अब परमअनके द्वारा कियाजाताहै उन देशमें वागदपतक इन्द्र जलको नहीं परसाप्ताहै । २३ । महाप हु समय पांडव संसार के जीवमात्रों की वृद्धिको अभिलापासे इसी निमिन उस अबको अपने अनसे दुग्नहीं करता ।२४॥ पाटन देश और तुमभी सदैव रक्षा के योग्यहो हे महाराहु इप्सहेनुपे तुम इस दिव्य अाको लौटामा तेराकोष दूरदोय और पाण्डवोंकी कुशल होप यह राजापे पांरप अधर्मसें विजपकरना नहीं चाहता है । २६ । अवतुम उस मागको दो जो वेरे शिरपर नियतह पाध्य उसको लेकर तुझको मागादान देंगे । २७ । अश्वत्थामा बोले कि पाण्डमों ने जो रल और कौरवोंने जो अन्यधन इसलोक में माप्त किया ofyour weapoa and has recalled it 30 Having got tho knowledge of Bralmelor from your father, Arjun did not doviate frozu his duty Why do you desire to slay lin and his brothers. Igdr. does not briog forth rain for twelve years when one Brahmsliar ia destroyed by another. Voliant Arjuo does not uso his wenpon for that purpore, though he has two power to do so, The Poudrvas, the country and you are worthy of protection and you m ist recall your weapon 15 Subduo your sath and let the Par da vas live, They do not like to gain violory by Qufair means Give tho Panduras jour le jewel and they will spare Jour lifo ianturn." Ashwathamanil, " My - + Maliablaat 17332) म्यत् कारपद्धनम् । मपातयिा भ्याय मणिर्मम विशिष्यते ॥ २८ ॥ ५मार नास्ति शसस्याधिमाधयम् दिपो दानधेभ्यो वामांगम्यो पा Purni २.॥ नप रोगममपंमतकरमपस्तथा । पौरों मणिर नमेस्पाय.RAN पा मे गाना तो कानमन्तम पियं मपिरयामापकात पतिपति ॥ ३गपु पाण्यपानाममोघं वेतपतम्। न च शपोस्मि भगवन् सह पुरा पताम् ॥ ३२॥ एतदनमतः गर्भप सिमाम्यहम्। म वाक्य भगवतोम फरिभ महामुने । ३३॥ पास उपाच । एवं कुरु ना तु दक्षिः कायां स्पयानघ । गर्ने पाण्यानां पिसरपैरगारम । ३॥ देशमापन उपवन: परममRIT द्रोनिपतमारणे । पानरः श्रुत्वा गमेषु प्रमुमोच र ३॥ इति सौप्तिकपर्वणि नाशिराम पाण्डवगमर्मयशेागदपायायः ११ । उन्होंसे यह मेरामणि पृथक है । ८ । जिसको पविकर किमी दशा मेंभाशस्त्ररोग और शुसासम्बन्धी सोई भयनहीं होता इस संपवाले को देवता दान और मपसिभी भगनहीं है । २९ । न रादों के समूहों का गौरन चोरों का मवई हम प्रकार से पह उत्तम माण है धार किमी दशाभी मुझ से त्याग करने के कोष नहीं है। ३० । और जो भगवान ने मुझको आशा करी वा शीघही मुझको कर्स न्य या मणि है पह में हं पान्तु वह सांक । । । पांडवों के ग पर गिरेगी क्योंकि यह उचम मन्त्र सफल । हे भगवन् इस प्रकट होनेराले मनको मैं फिर नहीं लौटा सका हूं।१२। मैं इसहेतु से इस अस्त्र को पांवों के गोंपर छोड़ वा ९ हे महामुनि आपके पचनों को अपश्य करूंगा । १ । कासनी चोले निष्पाप इसी प्रकार करो तुमको दूसरी बुद्धि न करना चाहिये इस अस्त्रको पासडरों के गर्भापर छोड़कर युदसे निवृत्तहो । १४ । वैशम्पाएन बोले इसके पीछे अपत्यामानी के पचन मासनी के पचन को सुनकर युद्ध में समद परम अन्नको गोपर जोदा ३५॥ j-wal forms ao pa tuf the worlth of tbm Kauravas and Panda vas. The posaousor of it is never opprossed by weapons, sickness or hunger. Hots never in fear of gods, dSUNVAS and ser[Fonts The powsessor of it has no fear of raksbases or thieves and I donot wish to part with it under any condition 30 l as however bound to do My jewel and myself aro at your dispeal. But this piece of broom abull fall on the pregnant women of the Pandavas; for this woapon can not fail to do its work nor I have power to recall it Isbal do your bidding great rishia My weapin shall fall on pregnant women of the Pandavas, " Then Vyas said, " Do it as you have said Let your weapon full on the pregnant women and cease fighting. " Vai. sbampayan said, " Thus ordered by Vyas, Ashwathama, let bis weapon fallon pregnant wouen " 35. your bidding.
167333) सौतिपBauptik Parv (७३३३ रामायन उवाचा तद नाय दृशीके शो पिसृष्टं पापकर्मणा । हम्पमाण पाय द्रौगि प्रस्पप्रभीत्तदा ॥ १ । विराटस्य मना पूर्ण स्तुपां गाण्डीवधन्वनः । उपप्लम्यगत रमा ग्रनधान् बामणोप्रति ॥ २ ॥ परिक्षीणेषु कुरुशु पुत्रस्तष भविष्यति । पतवस्य परिक्षियं गर्भस्थस्य भविष्यति । ३. तस्य तवचनं साघोः सत्यनेतद्भविष्यति । परिसिद्भविता शेषां पुनरः सनेः ॥ ४ ॥ एवं वाणं गोविन्द सावां प्रतिक्षा। दीणिः परमसंरथः प्रत्युवाचरनाम् ॥ ५। नेतदेवं ययाय त्वं पक्षपातेन केशप । धच पुण्ठरोकात न च मद्वाफ्यमन्यथा । ६ । पतिष्यति तदलंहि गर्ने, तस्था मो घनम । विराट हितुः कृष्य य य रक्षितमिच्छसि ॥ ७ । भगवानुवाच । अमोमः परमानसा पातस्तस्य भविष्यति । स तु ग! मृतो जातो दीर्घमायुरयाप्स्यति ।। ८. अध्याय १६ ॥ वैशम्पायन बोळे ता श्री कगनी पापकर्म करनेवाले अश्वत्थामा के छोड़े हुये उस अखको जागकर प्रसन्न होकर अश्वत्थामा .से पह वचनयोले १ । कि पूर्व समप नियमान ब्राह्मणने विराटकी पुत्री मर्जुनकी पुत्रवधू उत्तराको जोकि उपलनी स्थानपर वर्चमानथी उसो यह कहा । २ । कि कौरवों के नाशवान होने पर तेरापुत्रहोगा इस गर्भस्थ वालकका इसीहेतु परीतितनाम होगा । ३ । उस साधु का यहवचन सत्य होगा परीक्षितपुत्र फिर उन्हों के वंशका चलानेवाला होगा । ४ । तब अत्यन्त कोषयुक्त अश्वत्थामा ने यादवों में . अत्यन्त श्रेष्ठ इमप्रकार कहनेवाले गोविंदनीको यह उचर दिया ।५१ हेकमललोचन फेशरनी पहइसप्रकार. नहीं है जैसे कि तुमने पक्षपाताहोफर यावचन कहा मेरा वचन मिथ्या नहीं।६। हे श्रीकृष्णजी मेरा चलाया हुआ वह अस उस उत्तरके गर्भपर गिरेगा जिसको कि तुम रक्षा किया चाहतेहो 19 श्रीभगवान बोले कि उस परम अस्त्रका गिरना सफलहोगा और मगहमा गर्भ जीपर बड़ी अवस्णको पावेया सब ऋपिलोग तुझको नीचपुरुप पापी और बारम्बार पापकर्मशाला और यालकके जीवन कानाश CHAPTER XVI Vaishampayan sail, " Snri Krishn was pleased when he knew the fate of Ashwathamt's ve tp on, and the ward to him, " Formerly, a yow observing Brahmin sailt, Uttara the wife to Ajin's son, "Try son vill ba bon after the destruction of the Kauravas and will be named Parikshit. The words of ths ig will ye ke true for Parikshit will ba the pie potuator of the line of tho Pandaças." Ashwathama was much earayed at this awark and said " This can not be, lotus_yed Kallav! tour words are bia-sed. It sball be as I here dicted: my weapo slı xil fall eo be spomb of Uttara ylion you wish to prote.t" Shri Krishn said, "Itis true that the weapon shall do* its work, but the dead child wul be bronght back to - ७३३४॥ Mahabharat ( 7384) स्वान्तु कापुरुषं पापं पिदुःसय मनीषिणः। भरपापकर्माणं चालजीवितघातकम् । तस्मारवस्य पापस्य कर्मणः फलमाप्नुहि ॥ ९ ॥ त्रीणि वर्षसानानि चरिष्यसि मही मिमाम् । अप्राप्नुवर श्रीचन् । काचित् सम्बिई भातु केनचित् ॥ १०॥ निर्भमामल हायस्त्वंदेशान् प्रविचरिष्यसि । मयित्री न हि ते क्षुन जनमध्येषु सस्थितिः ॥ ११ ॥ पूरशोणितगन्धी च दुर्गकान्तारसंश्रयः विचियासि पापात्मन् सर्वव्याधिसमपितः ॥ १२ ॥षयः प्राप्य परिक्षितु वेदवतमापच । कृपाच्छारताच्छ्रः सर्भस्त्रायल स्पते ॥ १३ ॥ विदित्या परमात्रानिकमर्मियतेस्थितः । वर्षाणि धारमा बमुषां पालयिष्यति॥१४॥इतबो महावा कुराको भविष्यतिपसिना नृपतिषित दुर्मते ॥१५॥ महत जोश्यस्यामि दग्ध शम्नीनितेजसा पश्यमे तपसोबार सस्यस्पच नराधम ।। १६ ॥ध्यास उशच । यस्मादनाहत्व कसं घयास्मान् फर्म दारुणम प्रम स्प सतवैध यस्माचे वृतमीहशम् ॥ १७ ॥ तस्माद्यदेवकीपुत्र उक्तवानुत्तम परः । करनेवाला जानेंगे उम कारणमे तुम इस पापकर्म के फलको पाकर तीनहजार दिव्प वर्षतक इस पृथ्वीपर घूमोगे तुम एकाकी कहीं कुछ न पाते और कभी किसी के साथ परस्पर पात्तालाप न करते निर्मन देशों में धूमोगे हे नाच तेरा निवास मनुष्यों में नहीं होगा ! ११ ॥ ६प और रुधिरकी गन्धि से युक्त दुर्गम्य मझायनों में निवास कोगा हे पापात्मा सप वीमारियों से संयुक्त होकर घूमेगा । १२ । भूरपरीक्षित अवस्था और वेश्वतको पाकर कृपाचार्य से सब अत्रों को | पांवगा । १३ । फिर परमानों को पाकर क्षत्रिय व्रतमें निपत धर्मात्मा साठर्पतक सृष्टिानि रक्षा करेगा । १४. इसके पीछे यह महापाहु कौरवरानहोगा हे दुईदी तेरे देखते परीक्षितनाम राना होगा । १५ मे उस शखकी भग्नि से भस्म इये को अपने तंज मे गिलाऊंगा नाच मेरे सत्य और आपके पलको देखो व्यास जी बोले जो तुमने इसको भनादा करके यह भपकारी कर्म किया भौर तुम सत्युरुप प्रामणका ऐमा चलनामा इनदोनो कारणों से श्रीकृष्णजी ने गो भेट life and will l190 long 311 the rishie will call you tisíul and slayer of infants, and as a punislawent of your wickedness you will roam for throo thousand diumo yeurf. You will lo sjunted lig all tren and will pass your days iu dedikes places out of the reach of nian, 11. Yuur wound will give forth a bed spell and you will Le 1erct with all sor te of diseases Valiant Piesliit will livo lung aud will learn thou's of weapons frunu Krigualary. Hu sill rulo tho earth for •sixtylvesrans king of tho Kuraks and you will be lim. 15. ! sball Tuumitato the burnt chilt big ng glory and you shall so the power of my uuth id Rectin.sm. 16. Vyas said, * Bemua you dil this dres biji dielna wito of ux, and boria opalack likoti, minently in cottattiun fhrs tol " 17335 - Sillpiik Pary Acai अशधम्ने दावि क्षत्रधर्मरस्याथितः ॥ २८॥ अवाधामाधाच ।, सर ममता प्रान स्वास्यानि पुरुम्बिह ! सत्ययत्गस्तु भगवानपत्र पुरुषोत्तमः॥ १९ । पेश म्पायन उवाच । प्रादायाय मणि द्रणिः पाण्डवानां महात्मनाम् । जगाम बिमनारोपण सौगो पश्यता दामू " २०. पाण्डआश्चापि गोविन्दं पुरस्कस्य एतद्विषः कृष्णं देपा पाश्चय नारदश्च महामुनिम ॥ २२ ॥ द्रोणपुत्रस्य सहज मणिमादाय सायराः। द्रौपदमाधान प्रायोपैतां मनस्विनीम ॥ २२ ॥ वैशम्पायन उवाच । ततस्ते पुरुष ग्गामा शश्वरनिसोपः । अभ्ययुः सहद शाई शिघर पुगरेय हि ॥ २३॥ अवतो रया पान्तु घरयाणा महारथाः दोपदी कृष्णामाीमातरा स्वयम् ॥ya शामुपेत्य मिरानन्दा दु.खशोकसमन्विताः । परियार्थ प्यतिएन्त पारडया सहक शवा ॥ २५ । ततो राशगुनातो मीमसेगो महाबलः । प्रददौ त मणि दिवस मदनप्रवीत् ॥ २६ ॥ अयं भव तथ मणि पुघहला जितः स ते। संघ शोकमत वचन कहा है निस्सन्देह वहीदशा तेरी होगेव ली है हम क्षत्रिय नियतहो अश्रत्यामा वोले हे ब्राह्मण में इसलोकके मनुष्यों में आपके साथ नियत हंगा यह भगवान पुरुषोत्तम सत्यवका । ११ । पैराममापनयोले कि फिर उदासमन होकर भश्वत्थामा महात्मा पाण्डवों को माण देकर उन सबके देखते हुये वनको गये । २० । और जिनकेशनु मारंगरे वह पाण्डव गोपिंदनी और व्यासजी महामुनि नारदगीको आगे करके । २१ । और अश्वत्थामा के शरीरके साथ उत्पन्न होने वाली मणिको शीघ्रही उस मनस्विनी और शरीर त्यागनेके निमित्त नियम पानवायी द्रौपदीकी और दांड़े । २२ । वैशम्पायन यौलीक इसके अनन्तर वा पुरेपोचम पांडा श्रीकृष्णनी समेत वायु समा: शान तम घोडके द्वारा फिर हरे को गये 1 ।। भाप पाडावान् और शीघ्रता करनेवाले महारथियों ने रथों से उतर कर मान्न मनवाली द्रौपदीको पीडावान् देखा । २४ । वह पाण्डय केशव नी समेत उस अममन्न और दुःखशोकसे युक्त प्रौपदी के पान नाकर उसको पाकर वैटगये । २५ ! इसके पछि राजाकी माशानुसार महावली भीमसेन ने उस दिव्य मणिको दिया भोर मार्गदकर यह वचन कहा । २६ । हे कल्याणी नायह तेरा माणहै और वह तेरेपुत्रों का पारनेवाला विजय किया गया शोकको छोड़ by : lirialin. You have become a balatoga "Ashwathawa haid, I would stny in the world with you lut Ehr Prab, is rathlal, Vaishampagan anid that with a dejected mind, a hwalhaina hiyo he Pandoras his jovel and went away to the forest in the presence of all. The Pasdaras being rid of the renomirs, gan forrarla Draupadi, led by Govind, Vy'us an'l Nund, and with the jsvol gut from Ashra than. They said their swift cars and went to their camp. They Sound Draupadi in great distres and at round her. 25. Then by tbo pomisie o of ike bis 6, bare Bibiro Pelatih bojewol do Droupe Mahabharat (7336) सज्य अधर्ममनुस्मर ॥२७ ॥ प्रयाणे वासुदेवस्य समायमसितेक्षणे । यान्युक्कानि सपा भीक घाक्यानि मधुपातिनि ॥ २८ ॥ नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा भ्रातरो मच नैय स्थमिति गोविन्द शामिच्छति राजनि ॥ २९ ॥ उक्तवत्यसि तामाणि वाक्यानि पुरुषोत्तमम् । क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि त्यस्मतुम हसि ॥ ३० ॥ तो दुर्योधनः पापी राज्यस्य परिपन्यिक. । दुःशासनस्य रुधिर पति विस्फुरतो मया ॥३१॥ वैरस्य गत मानण्यं न स्मधाच्या विवशताम् । जित्या मुक्को द्रोणपुत्रो वाहण्यागौरक्षेण ॥३२॥ यशोऽस्प पातितं वि शरीरत्वपशेषितम् धियोजितश्च मणिना भ्रप्तितधायुधं भुषि ॥ ३३ ॥ द्रोपावाच । केपलानृण्यमाप्तास्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम । शिरस्येतं माण रामा प्रीतवनात भारत ॥ ३४ ॥ तं गृहीत्वा ततो राजा शिररयेशकरोतदा । गुगेरुच्छिष्ट मित्येव द्रौपद्या पचनादपि ॥ ३५ ॥ ततो दिव्यं मणिवरं शिरसा धारयन् प्रभुः। करउठो आर क्षत्रियमको स्मापकर । २७ । हे श्यामलोचन मायके अर्थ वाय. देवजी के यात्रा करनेएर नुमनेनो यश्चन उनश्रीकृष्णाजीसे कईथे कि गोविन्दजी राजाको सन्धिका अभिलाषी होनेपर मेरेपति पुत्र भाई और तुम चारोंमें से कोई नहींहो । २९ · तुमने क्षत्रियधर्मके योग्य वीरताके वचन पुरुषोत्तमसे कडेथे उनके | स्मरण करनेको योग्यो । १० । राज्यका शत्रुपापी दुर्योधन मारागया मैंने उस | कटेहुये दुश्शासनका रुधिर पिया । ३१ । शत्रुताकी अमृणताको पाया इमवार्ता- लापकरने अभिलापी पुरुषोंकी निन्दाके योग्य नहीं अश्वत्थामा पराजितहोकर बामणवर्ग,की रद्धनाते छोड़ागया । ३२ । हेदेवी उसको वह पतिनहुमा शरीरशेषहै | उसकोमणिसे जुदाकिया और उसके सशस्त्रभी पृथ्वोपर गिरपड़े । ३३ । द्रौपदी बोली हेनिर्दोपमैंने अणुताको पायागुरूका पुत्रमेरागुरुदै भरतवंशी राजाधिष्ठिर इस मणि को शिरपर बांधा । ३४ । तराना युधिष्टिरन यह ममझकर कि गुरुपुत्र की धारण कीई यह वस्तु है और द्रौपदीका यधनहै ऐसाजानकर उसमणिको Mi, saying, " This is your jewel, gori The singer of your zens has been conquered. Give up your sorrow and rise up, remem bering the kohutrga duty. Woen Yasudov Has going to the mission of peacs, you said,to him, " Don't make peare with thom as long as you and my husbands, sons and brothers are alive." You spoke then like akshatrya womats and must remeumber it. 30. Our enemy Duryodhan bas been slain and I have drunk Dashasan's blood. We baya' made an end of the enemy and are not to blame Ashwathama has been defeated and is no longer a brabnan. He has b en excommu. picated, Tho jewel hał boen taken away from his person and his woa. pous have fallet " D anadi said, " 1 have had my revenge. The yuru'a so:, is ins 4:4 Tie thi+ jove on your head, king." Yud hishtbir, kaowing that it wils a thing ubed by his procuptor's son und woman. .
173372 Sauptık Parv blittig ( ७३३३ शुशुभे स सदा राजा सबन्द्र झा पर्वत ॥ ३६ ॥ उत्तस्थौ पुत्रशोकात्तांतत कृष्णा मनस्विनी कृष्णधापि महावाहुं परिपप्रच्छधर्मराट् ॥ ३७ ॥ हात सौप्तिकपर्वणि ऐपिकपणे टौपदी सान्त्वने शोडपोध्यायः १६ ॥ वैशम्पायन उवाच । हतेयु ससैन्येषु सौनिके तै रयस्त्रिभि । शोचन युधिष्ठिगे राजा दाशाहमियममधीत् ॥ १॥ फथ नु कृष्ण पापेन क्षुद्राकृतकर्मणा। द्रौणिना निहताः सर्वे मम पुत्रा महारथा ॥ २ तथा कृताना विक्रान्ना सहन रातोधिन। दुपरस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिता. ॥ ३ ॥ यस्य द्रोणो महासो न प्रादादाहवे मुखम् । निजको रथिनां श्रेठ घरगुन मयं न स । ४० किं नु तेन को कर्म तथायुक्त लेकरशिरपर धारणकिया। १५ । इसपीछे दिव्यमणिको धारण करताहमा प्रमु राजा युधिष्ठिर चन्द्रमा सेयुक्त पतफेसमान शोभायमानःप्रा । १६ । फिर पुत्रों के शोकसे पीडित मनस्विनी द्रौपदी उठखडाहुई और महाराज धर्मराजनेभी श्रीकृष्ण जीसे पूछा ३७ ।। अध्याय ॥ १७॥ वैशंपायनबोले कि जो रात्रिके युद्ध में उनतीनों रधिषों के हाथसे सबसेना के लोगों के मरने पर शोच करतेहुये रामा युधिष्ठिरने श्रीकृष्णजी से यह वचनकहा ।। कि हे श्रीकृष्णजी इमपापी नीच और निष्फळ कर्मचाने अश्वत्थामा के हाथ से मेरे सर महारथी पुत्र कने मारेगगे। २ । उसीमकार अवज्ञ महापराक्रमी लाखों से युद्ध करनेवाले दुपदके पुत्र अश्वत्थामाके हाथ से गिराये गगे । ३ । बड़े धनुषधारी प्रोणाचार्य ने जिसके युद्धमें मुख नहीं किया उस रथियों में श्रेष्ठ धृपयुम्नको उसने कैस पारा । ४ । हे नरोत्तम उमने इसप्रकारका कौनसा योग्य that Draupadi requosted boom to wear it, put the jewel on his bead Having worn it on bis head, Yudhishthir looked glorious like a bill over which the moon sbines, Full of so, tow for her sons' grief, Drau. pada stood up and Yudhishtbır thus addressed Shri Krisbn.” 37, CHAPTER XVII Vaishampayan gard, " At the slaughter of all the Warriors by the three beroor, Prince Yudhishtbir, ju grtat grief, said to Shri Krishn, " How were all my brave sons slain by despicable Asbsvatbama the unful wretch who did that useless dred? Similarly, the sons of Dru.
with long tor him and then created Prajapati from his thought Alth buat 5338] न। यदे मगर सनय चोमो गुरो मनः ॥ ५ : भगवानुवाच । नूनं स देघदे घानानीसरे समस्या जगाम शरण द्रौणिरेकत्तेनावघीवार ॥ ६ । प्रमादि महादेगे पद्यामरतामपि । र्यन गिरिशोवद्याद्यन्नमपि शातयेत् ॥ ७ ॥ वेदार हि मह देज भरतर्षभ । यानि घास्य पुराणानि फर्माणि विविधानि ॥ ८ भादिरेपछि भूताना मध्यमान भारु । विचरते जगवेद सर्वस कोणा। ९. पर सिशुभूतानि ईदर्श प्रथम विभु. पितामहो प्रधान भूनामि सृजमा विरम् ॥ १० ॥ हरिके स्तथत्युक्या भूताना दोषर्षियान् । दाधकाल स्तेपे मनोऽमिसि महातपा ॥११ समहात नत का प्रती न पितामह । स्रष्टार सर्वभूतामा सस मपम साऽग्नयोत्तर इष्टागि सप्तमम्म सि पदि में नामको कर्म किया जो अकले गुरुपुषो हमारे मन पुनादिकों को युद्ध में मारा ५ श्रीभगवान बोल कि निश्रय करके असस्थामा उस अविनाशी शिवजी के शरण में गया जोकि बड़े दे तामां के ईश्वरों काभी इसाद उम हेतुमे ओलेने बहुतों को मारा । ६ । मादेवी मममहोकर देवभाग को भी देमक्ते हैं और उसपराक्रमकोमी वह गिरीश देमक्काहे जिनके द्वारा इन्द्रकोभी नाशको । ७। भरतर्षभ मैं महादेवनी को मूलममा जाना है और उनके जो नानाप्रकार के प्राचीन कर्म हैं उनको भी श्रेष्ठ रीति जाननाडूं। ८ । भरतवंशी यह शिव सर जीवमात्रोंका आदि मध्य और अन्त और सब मंभार इमी के प्रताप से चेष्टा करता है । ९ । इस प्रकार मृष्टिकी उत्पत्ति करने के आभेनापी समर्थ निगुणात्मक ईश्वरने सबके माद तमोगुण रूप रुदनी को देखकर कहक जीवोंकी उत्पत्ति में विलम्ब न करो 10 ता बड़े तपस्नीजीवॉक दोष जाननेवाले शिवनीने मङ्गीकार करके जलमें दूषकर बहुतकालतक तपकिया इसोपीछे ईभरने बहुतकाल पय्यन उनकी मनीताकरके सब जीवोफस्वामी रमोगरूप मन पतिको मनंत उत्पन्न किया । १२ । बह जसमें pod who could Klay hundreds of thousands, were destroyed by bun How could be slay Dhr stadyuinn whom cren Diono could not opp net By shut died he hnd piwr aver my sors and others." Sino Blugiran (Kui lın) said, " Surely, Ashwathnme sought the protection of immortal Suv the lord of gols, and was tborefore alle in slay so many. Mahadev, when plensed, can give godhood. He CAN GIVO prowess capabk of destroyig Indra. I know Malador and his dude dni in rlio days of yoro H: 1 the lezioning, the quid Ily and tool ofn I cruit All t'a ir lives by his glory. Durirour of cr at ng the world the almighly Isla war asked Rudra tu inato all beings without belny. 10. Sarv took the work on himself till remained lõng morged 10 water to purlow asceticism, lshwar A (7339 Sauptik Par सौप्तिकपर्व ७.३० स्थापनतः सयाम्यह प्रजाः ॥ १३ ॥ समप्रदीत पिशानास्ति ववन्य पुषिप्रा । स्थापुरेष अले मनो विमम्म कुरु कृतम् ॥ १४ ॥ स भूनार सृजत् सप्त दक्षादीन प्रजापतीम् । यैरिम व्यकरीत स मतमाम चतुर्विधम .१५ तासष्टमात्रा अधिता प्रबासः प्रजापतिम । विमक्षयिपको राजन् सहसा प्रादयस्तदा ॥ १६ ॥ स मध्य माणामाणार्थ पितामहमुपाद्रपात् । भाज्यो म भगवास्त्रातु पृत्तिरासा विधीयताम * १७ ॥ वताभ्यो दवावधमोपधी स्थाणि च । जनमानि च भूतानि दुर्घलानि पापसाम् ॥१८॥ विहिताना प्रजास्तास्तु जम्मु सप्टा पयागतम् । ततो वृधिर राजन प्रतिमस्य स्वपोनिषु ॥ १९ ॥ भूनमामे विवे तु तुम्टे लोगुरापि। उदति इंजवारपेः प्रजाधमा पर्श स ॥ २० । बहुरूपा. प्रजा सृष्टा विशाध स्यते (गेहुगे शिजीको देखकर अपने पितामे पाला जा मुझसे प्रथम उत्पन्न होने पाला दूसरा नहीं हैं इमहेतुमे में मृष्टिको उत्पन्न करताहूं। १३ । ब्रह्मानी ने कहा वेरे सिवाय दूबरा पुरुष प्रयममृष्टि नहीं है यह शिवजी जल हूबहुये है विश्वास करनेवालीष्टिको उत्पन्न करो।१४ाउतने दक्षादिमात पनापतियों को उत्पन्न किया और सबनीषाकोभी उत्पन्नाकया जिनकद्वारा इमचारस के रकी खानवाचे जीव समूहोंको सत्पन्न किया । १५ । हे राना तरवह समृष्टि उत्पन्नहारोही क्षुधा महाआर्स कोकर प्रजापति के भक्षण करने की इच्छामे दौड़े। १६ । वह प्रजापति | अपनी रक्षाकै निमिच पितामह के पागया और कहा कि हे भगवन् उनलोगों मेरी रक्षाक किये उनकी जीविका विचारकरो।७। इसके पीछे पितामहनेउनकी जीविका के लिये अन्न औषधी और स्थावर जीदिये ओर बयान लोगों के अर्थ चिटाकरनेवाले और निर्बल जीवदिये १८ायह उत्पन्न होनेवाली सृष्टि गिनक भत्र्य बन्न विचार कियागयाथा अपने स्थानों को गई हे राजा इसकेपीचे अपने उत्पति स्थान माता और पिता आदिक में माति करनवाले पद प्रभापति लोग द्धिपुक्त हुपे फिर जीवसमूहों के दृधिपाने और लोकगुरुके भी प्रसन्नहोनेपर यह महापुरुष जलसेठठे और उन मुष्टियों को देखा । २० । महुत रूपवाली मुष्टिके लोग उत्पन Seeing Bliv merged in water, he said to his father, " Because I am the first-created being, I shall bring forth all creatures. 'Brahma sard, "Really there is no other being Iorn before you, kr 8 119 18 moiged in water; pour may bring forth all creaturer So he brought forth the seveu Prajapatia, Dukeb and others, who ur ought forth creatures of ſoor sorts 15, All the creaturer, as they were born, became oppresseel with budger and ran towards the Prajapati to eat him up lle maglit protection of Brahma and asked lum to provide tbew food Then the grendfather created food, medicines and other plants as we't an werker creatures for the use of the stronger Hari & got food, they went to mult pred 192 their own places. The fiajapitis loving then p reots, ।
७.४०) Malabharat (730" असा । युफ्रोध भगवान दो लिङ्गं स्वचाविध्यत ॥ २१ ॥ तत प्रतिया भूमी तथैव प्रत्यतिष्ठन । तमुवाचाययो ग्रह्मा वधोमिः शमयनिय ॥ २२ ॥ कृत सरि सचिरकालस्थितेन ते । किनर्थञ्चदमुत्पाद्य लिग भूनी प्रवेरितम् ॥ २७ ॥ सोऽत्र धात मातरम्भस्तथा लोकगुरुर्गुरुम । प्रज्ञा पृष्टाः परेणेमा: किरियाम्यमेन ॥ २४ ॥ तपसाधिगन चान्न प्रजार्थ मे पितामह। आपध्य परिवर्तेरन् पयेष सात प्रजा, ॥ २ ॥ एकमुक्त्वा स सक्रोधी जगाम घिमना मत्र. । गिरजवता पाई सप ब] महातपाः ॥२६॥ इतिभी सौप्तिकपोण ऐषिकपर्वणि कृष्णपुधिष्ठिर संवादे सप्तदशोऽध्यायः॥ १७ ॥ होकर अपने तेजी द्रियुक्तथे तब भगवान रुदनी क्रोधयुहये और अपने लिंगको भीकाटकर पृथ्वापर इसनिमित्त गिराया । २१ । वह जैसेटा उसीप्रकार पृथ्वीपर निगतामा वचनोंसे शान्त करते अविनाशी ब्रह्माजी वोळे । २२ । हे रुदनीबहुन काल पर्यना मापने जल निवाम करके क्याकिया और किसनिमित्त इसलिंगको उखाड़कर पृथ्वी में नियत किया है । २३ । वह लोकगुरू महाक्रोधित होकर गुण से बोले कि यह सब मिट उत्पन्न होगई है अब मैं इसलिंगी क्याकरूंगा। २४ । रे पितामह मेरे सपने प्रजाफे निमिच अन्न प्राप्तहुआ और भोपी सदैव पने रूपान्तरको करती हैं गी जिमसे कि सृष्टि सदैव, होतीरहै । १५ । वह रिमन और कोपयुक्त वडे तपसी रुजी इभप्रकारसे कहकर मुंजवत पहाड़ के समीप तपकरने को गये १६॥ - It stood up large nurobers. When the cratu ga vera thug in sreasing and Brahma was pleased in luis mund,, Sh v came out of water and saw the creaticn 20 He saw tie world loll of craatures and hung mucha enraged ont &sunder this walu trgun ard dropped it on the earth. erect as soon as it was cut Jown. Then kisling to appease his wrath Brah res said, "What thave you done thy staying so long under water and why havo you cut and excited this orgau of yours! * Phon Sliv gave bina the fulowing raply 10 anger, " Tha world har boja created (la spno ot m ). What shall I do with this thing ? The food has been created by my own asceticism and medicusal boils will contiue to cliengo forma and give nourishimuut to the worid " Haring said this, i ho great asctic, dojocud ma wind, veut ts perdusin asculicium nur dunjwat (1141) (७५४१ भगवानुषाप । ततो देवयुगेतीते देवापे समकल्पयन् । यह घेवामान विधिव पदमप्सपः ॥ १ ॥ फापपामासुरथ ते साधनानि रवींषि च । मागाही देवताश्वेष पहियद्रग्यमेव च ॥ २॥ ता घे दद्रममानम्त्यो याथातथ्येन देयताः । नाफम्पयन्त देवस्य स्थाणोर्मा नराधिप ।। ३ ॥ सोऽकम्प्यमानेमागे तु कृतियामा ममः। तता साधनमाविष्छन् धनुरादी सतह ॥ ४ ॥ लोकयच क्रियायशो गृपया सनावनापनम्तमयोयो नृवषपञ्चमः॥५॥लोकपछयश्व कपर्दी विधेधनुः। धनुम्यष्टममत्स्य पकिकुप्रमाणतः। घपटकारो भयपासुधनुपस्तस्य भारताया नानि च पारि तस्प सत्रहनेऽभघम् ।। ७ ॥ ततः कुरो महादेवस्तदुपादाय काम कमामाजगामाप तत्रैव यत्र देयाः समीजिरे ॥ ८॥ मतात्तकामुंफ रप्ट्वा ध्रसया रिणमम्ययम् ।विष्य पृथिवी देवी पर्वसाध घरिपरे ॥९॥ न बधी पपन घ नाग्नि अध्याय १८॥ श्रीभगवान घोने कि सतपुगके अन्द होनेपर विधिक पूजनकरनेके अभिलापी देवतामों ने वेदके प्रयाणसे पक्षको विचार किया। १। फिर उन्हों ने सब साधनों को धनेशों को भागके योग्य देवताओं को मौर पग्यकी द्रन्योंको कल्पना किया ।। हे राजा मूलसमेत रुद्रजी को न जाननेगले उन देवताओं ने देववा रुदनी के भागको विचार नहीं किया है। यायें देवताओंसे मागका विचार न करने पर पत्रके नायको चाहनेपाले उन रुद्रजीने प्रथम धनुपको उत्पन्न किया । ४ : लोक यज्ञ, क्रियापमा एश्यह, पञ्चभूत नरपड़, इन चारप्रकार के यज्ञों में यहसब जगद नियत है । ५ । रुद्रनीने लोकया और नरयों से घनुपको तैयार किया उनका उत्पन्न कियाहुमा धनुष मार्गमें पांच हाथहुआ ।६। हे भरतवंशी उसघनुष की प्रत्यंचा चषदकार प्रत्येक वासनारूपमा यज्ञोंके चारों अंग उसकी दृढ़तापपा। उसके पीछे क्रोधयुक्त महादेवजी उसपनुपको लेकर वहां गये नहापर कि देवता लोग यज्ञ कररहेथे । ८ । उस धनुष उठगनेवाले अविनाशी ब्रह्मचारी को देखकर पृथ्वी देवी पीडित हुई और पर्वत कम्पायमान हुये ।९। वायु नहीं बली और CHAPTER XVIII Shree Bhagwan said, ' At the end of Salyug the gods intended to perform a sacrifice according to the Vedic rites in bonour of Brabma They collected all materials and set apart gods' portions, Not knowing Rudia well, tbey dedicated nothing to bim. At this, Rudra created the bow to destroy the sacrifice of gods. The world erists by four sorts of Sacrifices known as lok-yagya, kiya-yagya, griha-yagya and Panchbhut nar-yogya. 5. Rudra prepared the bor fiom lok and nar yagyas. It was five cubits in lengtb. 1ts striag was made of Vashatkar and we exceedingly strong. Armed with that bow Rudra went to the place of sacrifice. The earth and mountains shook at the sight of that in mortal Bıahm chari armed ७३४२ Mahabarat (7349) पाल धितः । ध्यन्नगच्चापि सीधग्न दिनिक्षत्रमण्डलम नवमी भास्कर आपि सोमः श्रीमुक्तमपटलः तिमिरे नाकुलं सर्वमाकाशश्वामधद्वतम् ॥१९॥ मामि भूतास्ततो देवा विषयान प्रजाघरे । न प्रत्यमाच्च यतः १ देघतास्नेतिरे तदा ॥१२॥ ततः स पक्षं विव्याप रौद्रेण हदि पत्रिणा । प्राकारततो यन्नो मृगो भावा सपा पकः ॥ १३॥ स तु तेनैव रूपेण दिय प्राप्य ध्यराजत ! अन्वीयमानी रुद्रेण युधि टिनमस्तले ॥ १४ ॥ अपकाम्सेनतो . सशा. प्रत्यभाव पुराना नएस देवेषुन पामायत किचन १५ अन्नः सवितुपाह भगस्य नयने तथा पुरा दशनान गुमो धनुष्फोटपा यशातयत् ॥ १६ ॥ Rara at देवा यintry सर्वशः। वित्तत्रैव घूर्णन्तो गतालच श्याभयन् ॥ १७॥ स तु विद्राव्य तय शिति फण्डो पस्यथ । मवरभ्य धनुष्कोर्टि रुरोध विवुधास्ततः ॥ १८ ॥ ततो वामरीका वृदियुक्त अग्नि व्वलित नहीं हुई और स्वर्गमें व्याकुल नक्षत्रमण्डल भ्रमण करने गे। 101 सूर्य और शोभायमान पन्त्रमण्डल भी मकाशमान नहीं हुये सब माकाश अन्धकार से व्याप्त हुभा । ११ । इसके पीछे माफुल देवचामाने विषयों को भी जानी सब वह यज्ञ गुप्ताह का औरदेवता भयभीत हुये १.१२.६इसके पीछे उन्होंने यसको कद्रवाणसे हृद५पर घायलीक्या इसके पछि बहयज्ञ मृगरूप होकरग्निसमेत भागगया । १३ । हेयुधिष्ठिर फिरपह बसीरूपसे स्वर्गको पाकर आकाशमें शोभाय मान हुआ फिर कालामा रुद्रजीसे पीछा किया हुआ वह यन्न फलके भोग पीक स्वर्गस पतित हुआ १४ इसके पीछयझके. भागनेपर देवताओंका ज्ञान मलटी हुमा और देवताओंके अचेत होनेपर कुधनहीं जानागया १५ ३२वक परमेश्वरने सविता अर्थात् यज्ञ करनेवाले के शारीर की सभाओं को और भगके नेत्रोंको पूषाके दाँताको पूष्ाक्त धनुपक्षी कोटि से गिराया १६ । इसके पीछेदयता और शोक सब अङ्गभागे और कितनेही वहां घूमतेहुगनिर्मायके समान हुपे । १७। उन द्रमी ने उस सब याको मोसमेत भगाकर इसकर धनुपकी कोटिको निष्कर्म करके देवताओंको का भर्यात् लोक और शरीरकी मालिसे प्रधकाछिया । १८ । इसके with box. The sind did wat blow, fire ceased to burn and stala began to turn round Testlessly. 10. The sun and the moon Jost their splendour and tle sky becurre dark. The gods did not know what to do in their terror-bilen state and the sacrifice panis).cd. Pudra pitried the sacrifica with lit arrow and it fied Biay with Agni in the likeness of a do r. It stcod in tho sky in that slippe, chased by Radia it fell down again at the lanes of its metite. The goda 1044 their gensea and did not know what to do. Puimesuar cut the arms 01 88112, tha egis of Blag and the teeth of Poczba with 1), a point of lia buw. 16. The goda tampered is tenor, wlullo supe because notionlesa like instruiate thime, Bliv with a smile checked the gods and rewared lis b.wattos Supuruted from the strug thue brim 17843 ७३५३ पप तस्य धनुसंच्छिनत । सय तत् सहसा राजन छिन्नज्यं व्यस्फुरखनुः॥१९॥ ततो विधनुष देवा दवमुपागमन । शरणं सह यजन प्रसादसाकरोत्तमः ॥२०॥ ममत्रो भगवान स्थाप्य कोप जलाशये । स चलंपायको म् वा शोषयत्यनिशं प्रमो १२१॥ मगस्य नयने वैय वा च सपितुलया । प्रादात् णा दशनान पुनयंहांच पाण्डः ॥ २२ ॥ ततः मुस्थमिदं स यभव पुनरेष हि । सर्वाणि च दाप्यस्य देमा भागमपल्पयन् ॥ १३॥ तस्मिन मुद्धमवत् समस्वस्त्वं भुपन प्रभो || सच पुनः स्वामस्य च वीर्यवान् । २४ ॥ ततस्ते निहताः सर्वं तव पुत्रा'महारयः । मन्धे च बहवः शर पाञ्चालाः सपदानुगाः ॥ २५ ॥ ग तम्मनसि कम्ध नय दीणिमा तम् । महादेवासास कुग कार्यामनन्तरम् ॥ २६ ॥ हात सौप्तिकपर्वणि ऐषिकपर्वाण कृष्णयुधिष्ठिरसंवादे अष्टादशोध्यायः १८ ॥ पाछे देवतााकी कहाँहुई वाणीने उनकेधनुपकी प्रत्यञ्चाको जुदाकिया राजा फिर मत्पञ्चासे जुदा वह धनप अकरमात् कुछ चलायमानहुआ । १९ । इसके पछि यजसमेव मय देवता उत्त देवताओं में श्रेष्ठ और धनुपसे रहित ईश्वरकाशरण में गये और प्रभुने कृपाकरी । २० । इसकेपीछे भगवानकोष त्रिगुणरूपको समुद्र मजानचित्त नियतकरके प्रसन्नहुये हेसमर्थ वहकोष अकस्माद अग्निहोकर जसको पान करताहे । २१। हे पाण्डव फिर भग देवताके मन्त्रों को और सविताकी भुनाओं को पूपा के दांतोंको और यज्ञोंको दिया अर्थात सात्विकयज्ञ जारीहुमा ।२१।उसके पीछे यह सब जगत फिर स्थिरचित हुआ और देवताओं ने सत्र हव्यों को उसका भाग नियत किया अर्थात् सब कर्म ईशरार्णण किये गये । २।। हे प्रभु युधिष्ठिर उसके क्रोधयुक्त होनेपर सव संसार व्याकुळहुआ और मसम होनेपर स्थिर हुआ वह पराक्रमी शिवजी उमेक ऊपर प्रसन्नहुये । २४ । उस कारण से भापके वह सब महारथी पुत्र और धृष्टद्युम्न के पीछे चलनेवाले बहुत से अन्यर शूरवीर मारेगये ! २५ । वह चित्तौ नहींधारण करना चाहये उसको अश्वत्थामाने नहीं किया अर्थात् सब ईश्वर के आधीन है शोक न करना चाहिये महादेवजी की प्रसन्नत से निस्सन्देह शीघ्रतापूर्वक करने के योग्य कर्माको करो। २६ ।। suddenly jumpad a lištio Cuou all the gols with the sacrifice sought refuge of Shiv and he was merciful. 20. Then le placed tis anger in the ocean of ignorant minds. It cats the mind us fire doea water. Thon bo restored the limbs of gods and the sacrifice began. Then the world bocawe satisfied and the gods set apart he shaa Tie world was agitated with lig anger and was restored to quilibrium at bia pleasure. Suv waa pleased with Ashwathama and therefore he could slay Dhrisbtadyum and your &ODA, It 988 3of the work of Ashwathama but that of Shiy add therefore you abould not be # sorry. 26.
महाभारत ॥ अथ जलपादानिकपर्व ॥ নাথ নময় সলোম देवी सरस्वतीम्ष ततो जयमुदीरयेत ।। जनमेजय रघाबरते दुर्योधमे चैप इते सैन्ये च सर्वशः । धृतराट्री महाराज भ्रत्याकिमकरोगुने १५ तथैव कौरवो राजा धर्मपुत्रो महामनाः । रुपमभृतपय किमकुमंत ते अप ॥१॥ मश्वत्थाम्नः श्रुतं कर्म शापादन्योन्यकारिताद । वृतान्त मुरारं हि पदभापत सब्जयः ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच । हते पुत्रशते वाम चित्र अथ सीपर्व। अध्याय ॥१॥ श्रीनारायण और नरोत्तम नर को आर सरस्वती देवीको नमस्कार कर के फिर नयनाम इतिहास को वर्णन करता हूं जनेमजय बोले कि हे मुनि दुर्योधन के मरने और सब सेनाके नाश होजाने पर महारान धृतराष्ट्र ने सुनकर क्या किया । १ । उसीमकार धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने और उन कृपाचार्यादिक तीनों में क्या किया । ३। आपके कहने से अश्वस्थामा का कर्म मुना परस्पर शाप देनेसे पोछका मो बुचान्त संभय ने कहाई उसको आप मुझसे वर्णन कीजिये वैशम्पायन घोले कि सौ पुत्रों के मरने पर ट्टी शाखाओं के वृक्ष समान STRIPART CHAPTERI * Having bowed down to Narayan, Nar the best of male beings and godilesa Saraswati, let us uudertake the history of the great victory, Janmejaga said, " What did Dhritrashtra do at the death of Duryodhan and the destruction of all the army! What did Yndbishtbir und the three Warriors, Kripacharya and others do I i have heard of the dood of Ashwalbama; what was the state of things after he was oursedt" Yaishampayan sud " At tha death of his hundred Bons, 11 [७३४६] Mahabharat :316 शास्त्रमिष दुमम् । पुत्रशोकाभिसार धनराष्ट्र महीपनिम् । ध्यानमूकत्वमाप चित्तमा साभिप्लुतम ४ । भभिगम्य महा प्रायो वाक्यम प्रधीत् । कि शोबास महाराज मास्ति शोके सहायता ॥ ५। मक्षा हिप्पो नाबाट दश व विशाम्पते । निर्जनेयं वसुमती शून्या संगी केवला in मानादिग्रस नानादेगा नराधिपः । साहितास्तव पुत्रेण सर्वे के निधनं गताः ॥७॥पितापुत्रगोत्राणां ज्ञातीनां सुहात्तयागरुमाचानुप्चेंगोत कार्याणि कारया! धेशम्पायन पाच 'इतपुत्रो तात्यो हतसमुहमनसभुधि दुर्धर्षी वाताहराइच म १९॥राट उयाचा इतपुप्रो इतामात्यो हतबर्वमहलमा दुःस्सी नून भविष्यामि विवरर पृथिमिमाम् ॥ १० ॥ किन्नु बन्धुविहीनस्थ जरितन ममाघ । लूनपक्षस्य १५ मे जगजी Her पक्षिणः ॥ ११ ॥ हुनराज्यो हनन्धतियक्षुश्व पै तना। नमाज दुखी और पुत्रशोक मे पाडापान जान मौनता युक्त चिन्तामें हुबेहये पृथ्वी के स्वामी महाराज धृतराष्ट्र के पास जाकर संजयने यह वचन कहा हे महाराज क्या शोचते हो शोकमें सहायता नहीं होमक्ती है । ५। हे राना अठारह अहिणी सेना मारीगई मा' यह पृथी सेना के लोगों से और राजामों से रहित होकर मित्रों से विहन है । ६. क्योंकि नानादेश सकागों ने बहुत दिशाओं से भाकर सपने माप के पुत्र के साथ नाशको पाया । ७। भा भाप अपने पुत्र पौत्र मानि स मोर सब कौरवोंके किया फर्मको कराइये ८ वैशम्पायनबोले कि पुर पंचारिकों के मरने से पाडावान् बड़ा भनेष धतराद उस शोक कारी पचन को गुनकर पृथीपर एो गिराड़ा जोपासे ताहिन वृक्ष गिरपड़ना । । धृतराष्ट्रपालेकि निएके पुत्र मंत्री और सब महज्जनमारेगये ऐना में होकर सम्पूर्ण पृषीपर विचरूंगा १० आरो पक्षले पक्षा के समान मुम्बद दशामे दु: बांधयोंस गहेत के जीवन से क्या योजनई हे महाभाग राज्य पुरजन प्रार नेत्रों से हित में ऐमा शोभित नदीहंगा जोकि बिना किरण बाला मूर्य प्रशभित Shntramva, full oful.hhu a nudestitats ufall brancher, war nitting in dupimeditation and alws. Injuyacumstu thinnasi swal, "What are you thinking about, Euper or to let can ts of no tuolts. 5. Lighten ahsbauliinis lare boun destroyed and tho tarth has become dhazituto of warriors, princes and friends Prince of duferent lands camo horo and were, destroyed with your 2001. You hayo 'now :) perform the funeral ritos of your bolls, grandsous and attier liau. Arr. " Dhritualitra tel durn on the tanth like a tua urusted ths windaadurid," lahall ur roaman thecarth dictititvoluns, friends and advisers. 10. What is the us of living lious tathurikar bird in ay old got Deatitutnel kingdoru, friends and eyes.lt.nil Jook in glorious libe the axa without bis 1858. I did not act upua thu adviso (73471 । ७३४० महापार क्षीणरश्मिरितांशुमान् ॥ १.न तं महदा शश्य जामदम्यस्य जल्यतः । नारदस्य च देवः कृष्णद्वपायनस्य च ॥१३॥ सभामध्ये घ कृष्णेन यत् धेयाभिहित ममा पलं घरेण वे राजन पुत्र संगृह्यतामिति । तब बाक्यमकृत्वा भशं तीम दुर्मतिः ॥१४५ न हि श्रोतास्मि भीष्मस्य धीयुक्त प्रभावितम् । दुर्योधनस्य च तथा असमस्येप नईः ।। १५ । दुःशासमवघं भुगा कर्णस्य च धिपव्ययम् । द्राण मय पपगम्य इदयं मे विदोर्यते ॥ १६ ॥ न स्मर म्यात्मनः किश्चित् पुरा सञ्जय दुष्क तम् । यस्यद फलमयह मया मूढेन मुज्यते ॥ १७ ॥ ननं व्याकृत कियिचन्मया पूर्व जन्ममु । येन मां दुःखमागेपु पासा कर्मस युकवान् ॥ १८ ॥ परिगामश्च पयसा सर्व धाधुक्षपश्च मे । महन्मित्राधिनाश देवयोगानुपागत । कोन्यस्ति दुःखिततोगतोयो हिमा भुधि ॥ १९॥ तन्मामयेर पश्यन्तु पाण्डवासंशितवतम् । विवृत्तं ब्रह्मलोकरूप विमानमास्थितम् ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच ! तस्य 'लाप्यमानस्य पहुशांक होताई १२ परशुरामनी देवपिनारदजी और न्यासजी इन शुभचिन्तकों के कहे हुऐ रचनाको नहींकिया । १३ । सभाके मध्यमें गा कृष्णजीने मेरेकल्याणका कर ने वाला यह वचन कहाया कि राजा शताकोत्यागे। और अपने पुत्रको बन्धन मेवारो उनके वचनोंको भी न करके में दुर्युद्धी भय कठिन दुःखको पाताहूं और धर्ममे रापुक्क भीष्मनी भी वचनको मुखभभागे ने नहीमुना समाओं में दुर्यो धनका नाश दु:शासन का मरण कर्णका विपरीत मरण और द्रोणाचार्यरूप सूर्य के मरणको एनकर मेरा हुदय फटता है । १६.। इसंजय पूर्वसमयके कियेहये अपने पापों को नहींजानताएं निमके किफलको अअ मैं दुर्भागी भोग रहाई । १० । निश्चय कर के मैंने पूर्व जन्मों में बड़े पाप किये हैं जिसके कारण से ईघर मे मुझको दुःख उत्पन करनेवाले कम्मों में प्रत किया । १८ । मेरो अवस्याको अन्तिम भाग पुत्र पौत्रादिकों का नाश और सुहृद बंधुओं का मरना देवयोग में है इमरी रीलिसे नहीं है इस ले कमें मुझमे अधिक दुखी दूसरा कौन पुरुष है । १९ । हे तेजवस वह सा पाण्डर लोग मुझको उस ब्रह्मलोक के मिलने भौर को मार्गमे नियनहुये को देखेंगे । २० । वैशम्पायन बोले सजयने उम of Parashuram, Narad and Vyas, my woll wishess. Kekin told me to give up onnity and to casta my sou in prison, but I did not act up on big advice and have fallen into this trouble, I did not give ear oven to the advice of Bbiehm. My heart br.aks to hear of the death of Duryodhan, Dushasan, Haran and Diona, 16 I donot know for what sins of my previous life I am being punished, Surely 1 bave comiuitted grierous sing for which I have fallen into this misery. The grat destruction of hinsnen and frier.ds in my old age could not be caused but by Pate- Vbo can bu morcfull of ulisery thai nie Pardavas will now sce me preparing for the next world. " 20 Vai. । The ४८) Mahabharat (78481 वितन्यतः । शोकापर नरेनस सब्जयो पात्रमातीत. २५ ॥ यो के राजन म्पपनुद भुतास्ते घेदनिधपाः। शानागमा निमिधा वृदेपा नृपसत्तम । सजषे पुत्रशाकाच पर्नुनयः पुग।। २२ ॥ यथा पोषना दर्पमास्थिते वे मुझे नप । स्वया सादा पाप ताम पधारितम् । साधन त कचिल्लुग्धेन फल गमिना ॥ २३ ॥ यसिमकवारेण षबुद्धपातु विशितम् । प्रापशोत्तसम्पमा सततं पर्युपासिनाः । २४॥ यस्प दुःशासमो मन्त्री गधेपन दुरारमधान् । शनि श्रय दुधामा पित्रवेन तुर्मतिः । अधम भर्य शल्यभत छतं जगत् ॥ २५ ॥ कुपरस्म भीमस गाम्बा विदुरस्य या द्रोणस्पच महाराज रुपस्य पशयः ॥ २६॥ कृष्णा महापाशे नारदस्थ धीमतः । श्रपीपा थाम्येषा ग्यास स्या मिततेजसः । मन वचन तव पुत्रेण भारत ॥ २७ ॥ जश्वविकाश विलाप करनेवाले मौर भनेक प्रकारसे प्रोकके विस्तार करनेवाले रानाधृतराष्ट्र के शोकका दूर करनेवाला वचन कहा कि । २१। हेराना शोकका दूरकरो तुमने बहुतसे धर्मके निश्प मुन राजाओं में अब तुमने वृद्धों से भी अनेक प्रकारके शास्त्र मुने हैं कि पूर्वसमपर्ने पुत्र के शोकसे रामानुजय के पाडापान होनेपर मुनि योने जो कहा । १३ । और जिसमकार तरुणता के महंकारमें आपके पुत्रदुर्योधन के निपत होनेपर ऋषियों ने जोका उसको भी धना । २१ । जोतुमने वार्तालाप करनेवाले अपने शुभचिन्तकों के वचनोंको नी भगीकार किवारोगा और हतबुद्धी होकर तुमने कोई अपना प्रयोमन नहीं किया । २३॥ मापने केवल एकधाररखनेवाली वळवार के समान अपनी ही बुदिसे सब फकिये और पापा दुराचारी लोगोंको मलाइकार करने के निचि समीप रेगमा २४ दुश्शासन दुवुदी कर्ग पहा दुष्टा स्मा शकुनी दुर्मति चित्रसेनभौर शस्प किसके मन्धी, मिस पपने सब जगतको भालरूप किया । १५ । हे पापा माराम भरतवंशी भृतराप्त मापके बस पुप्रने कारकि सभीष्म पितामा, मान्धारी, विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, श्रीकृष्णभी बुद्धिमान् नादिनी भौर पनपी पासभी मादिमन्प २. ऋषियोंका भविचार नहीलिया जोकि निवुदी महंकारी मदेव पुदको कप्ता निया मेयपराक्रमी sharpayan said, that S anjay, consoled the monarch in the following words: Curso your grief, king You havo hard many religious proæepts from old mon as well as that which tho muvis said to Srinjay who wsi oppressad with grid for his son. You also heend tho talk of the cages about your son Duryodban's pride. You did not attend to thu mul vice of your well wishers and haro thcrofora tbrown yourboll in lo suitory. Like an olged sword you were sell-willed and lupt company with wicked nea lifo Duhasan, Karan, Shnkuni, Chitrate and Shalsa the thorn of the world. Your son gavo no car to the ndrau of old Dhislim, Qindlari Droga, kirija, Shri Krislır, y los Narad glorinar Vimal othorsages. Ko was unwiss, prosil war.
বৰ Etui Pany (7349) नित्यं युद्धीमति घुवर । करो यो नियमसन्तुष्टश्च पायवान् ॥२८॥ असमानसि, मेधायी सत्यषांधेय निस्पक्षान मुधन्तीहशा तो भयाशाः ॥ ११ ॥ धर्म सत् कृत. कविनिरपं युमिति पण । सपिनायाः सर्षे राणा गर्वित बच । ३०॥ मर्यस्यो हि षमप्यासीनक्षम शिपियु कयान् । दुईरेम स्वया मारस्तुल्याम समे धृतः ॥ ३१ ॥ आदापेष मनुषेण पातिव्य ययाक्षमम । यथा मानीसमय ,पशाचा पेन युज्यते ॥ ३१ । पुषपदा पवारासम् प्रिय तस्व धिकोर्णितम् । पश्चातापमिम प्रा तीन स्वं शोचितुमर्हसि ॥३॥ मधुका केवलं हप्दा प्रपात मानुपश्यति । स भयो मनोमेम शोधयं यथा मपान ॥ ३४ ॥ अर्थात शोचन माप्नेति न शोष बिन्दले फलम् । शोचन दिएमाप्नोति न शौचर विन्दते परम् ॥ ३५॥ स्वपनुत्पाद पित्याग्नि पण परियष्टयन् । दमामो मनस्तापं भजते न स परिस: ॥३६. । स्वयेष और सदैव अशान्ततासे असंतुष्टथा । २८ । तुम सदैव शास्त्रज्ञ और शास्त्र के स्मरण रखनेवालेवुदि के स्वामी और सत्यवक्ताहो ऐसे आप सरीखे बुद्धिमान सन्तलोग मोह को नींपाते हैं । २९ । सदैव युद्धको कहनेवालेने कोई उत्तम और शुभकर्म नहीं किया सब क्षत्रियोंका नाशकिया और शत्रुओका यशवढ़ाया ।१०। तुमभी सबके मध्यस्पहये परन्तु कोई जतिपात नहींकही हेअमेय तुमने स्नेह और नीतिकी तुला कोसमान नहीं रखा । १११ प्रारम्भही मनुष्यको उचितकर्म करना इसनिमित्त योग्य है जिससे किश्तकालका प्रयोजन पश्चातापसे युक्त नहो। । ३२ । हेराना तुमने पुचकी मीत से पुत्रका हित और पिप करना चाहताया फिर पीछेसे इस |दुःखकोपाया तुम शोचने के पोग्य नहींहो ३३॥ जोपुरूप केवल शहदको देखकर | अपने गिरनेको नर्स देखता है वह साहदके लोभसे गिराहुभा ऐसे शोचता है जैसे किमाप शोषित। । ३४ । शोपताहुआ पुरुष न मनास्थको पाताहैन फलको पाता है न कल्यागकोपाता है और न ब्रह्मको पाताहै । ३५ जोपुरुष अपने आप अग्निको उत्पन्न करके रखसे ढकता और जलता हुआ चित्त के दुःखको धारण करतार वर परिहत नहीं । १६ पुरफेसाथ सुम्हारे वचनरूपायुमे प्रेरित लोगरूपी तसेतीचा Towing, inviasible, b'ave and unsatisfied. You aro learned, 18 and truthful. People like you need not be faluous. He loved fighting and nover did any good, Ho caused the destructiou of warriors and increased the fame of enemies 30. You predided the councils, but nover said what was propor. Your words were always based on account of fondnerg One should always do what is propor from tho outset in ordo to asid the pass of n morso. You have fallen into Four woro go fond of your son and are there ore not worth pitying An avaricious man, who climbs op a brce for fle wako cf honoy and falls down from a great tight, feela remorse like you. Such aone reaps no secular or religious bonefit. 35 Ho i. misery becausa 7350) Mahabbarat समतेनायं धाक्थयापुसमरित । लोमाध्येन च ससिको ज्वलिता पार्यपाधकः॥३७॥ तस्मिन् समिद्धे पतिता. शलमा इच ते मुता । ताम् ये शराग्निनिर्दब्धाध व सोधि तुमर्हसि ॥ ३८॥ यया पानात् कलि बदन पहसे नृप । अशास्त्रातद्धिम प्रसं सन्ति पण्डितर ॥ ३९ ॥ विस्फुमिता इव घेतान दन्ति फिलमानघार नहीदिमन्यु बुद्धया घारयात्मानमात्मना, ४० ॥ एषमाश्यासितस्तेन सजा महामना । षितुरो भूय एषाह युविध परन्तप ॥ ४२१ इति स्त्रीपणि जलपादानिपर्वणि धृतराष्ट्राश्नाप्सने प्रथमोध्याया॥१॥ भायह पाण्डवरूप आग्नरूप मज्वलित हुआहे ।। ३७ । उत्त अत्यन्त वृद्धियुक्त अग्निमें भापके पुत्र शलभनाम पक्षियों के समानगिरे तुम वाणोंकी भग्नि भस्महा कर उनपुत्रों के शोचकनकी योग्य नहींहो । ३८ । हेमभु जोडम मश्रुपातास जिप्त मुखको धारण करते यशास्त्र के विपरीत पाण्डसनाग इसकीप्रशमान करंसह।३९॥ निधयकरके यह मामू अग्निके फुलिङ्गो के समान मनुष्योंको भस्मकरतेयहांतुम बुद्धिमे शोकको त्यागकरके अपने चित्तको स्वाधीन करो । ४० ! वैशम्पायम बोले किस्म महात्मा संजप से इसप्रकार विश्वास दियागया इसके पाछे बुद्धिसे युक्त विदुरमी रह वचन योले ।। ४१ ॥ Rot wie man who himselt makes fre and is burno by it as he hides it with his cloth. The vind of your affectionate words to your son fred by tho ghee of your avarice, caused the inflamation of the fire of Pandavas. Your sons fell down in its rising fames like moths and were bornt. You need sot feel any sorrow for them. Your Tashing the face with tears w it religious and unpraisuworthy. Surely these teara burn people like faces of firo. Carb your grief by your wisdom and control yourself." Vaishampayan sand, “ Thus consoled by San. Waya, the king was thus addicssed by Vidur in the following words.
। (७३५१ Stri Partaga 7351 वैशम्पायन उवाच !! तंहोऽमृतमयधापहलादयन् पुरुषभमा वचित्रवीर्य विदुरो यदुपाच निवोध तत ॥१॥विदुर वाया पत्तिष्ठ राजन् कि शेषे धारयात्मा भमारममा । एषाधे सर्पसत्याना लोफेश्वर परा गतिः ।। २ ।। सर्वेक्षयाम्ता निषयाः पतमान्ताः समुच्छया। संयोगाविप्रयोगान्ता मरणान्ताच जीविधम् । ३सयदा घरच भोरञ्च पमः कपति भारत । तत्४ किं न योत्स्यन्तिः हि ते क्षत्रिया क्षत्रियम अयुध्यमानो म्रियते युध्यमान जीवति । कालं प्राप्य महाराज न कश्चिदातवर्तते ॥ अमावादीनि भूतानि भाषमध्यानि भारत । मभाषनिधनान्येष तत्र का परिदे धमा ॥ ६॥ न शोधकृतमधेति न शोचन म्रियतें गः । एव ससिद्धि के लोक किमर्य मनुशोथास ॥ ७ । कालः कपति तानि सर्वाणि.लिपिघायुस । न कालस्य प्रियः अध्याय ॥२॥ मैशम्पायम बोले अमृतरुपी वचनों से पुरुषोत्तम धृतराट्रको मसलकर पिदु रजी ने भोकहा उसको सुनो। १ । विदुरजीघोले हेरामा उठो क्यों सोतो बुद्धिसे मनकोपीन करो सब जड़ चैतन्य जीवोंका यही निश्चयई ।२। किसक सृष्टिसमूह अन्तमें नामाहोनेवालई सब उदय होनेवाले ऐश्वर्य अना में पतनहानेवालेहैं मिलने बाले भन्तमें जुदेहानेवाले हैं और जीवनभी अन्तमें मरण रखनेवालाई । ३ । हे भरत बंशी अब यमराज शूरवीर और भयभीतों को आकर्पण करताहै तो हेचात्रियों मेश्रेष्ट फिर वह क्षत्रिय क्या नहींयुद्धकरते हैं । ४ । युद्धको न करता मरताहे और लडसा हुआ जीवता रहता हे महाराज कालको पाकर कोई उमको उल्लंघन नहीं करता १५ भरतवंशी सबजीव प्रारम्भमें ही अमाररूप हैं मध्य में भावरूपहै और मरनेपर प्रभावरूप हैं ऐसे स्थानपर कौन पिलाप है । ६ । शोचतामा मृतक के पीछे नहीं जाता है शोचताहुमा मनुष्य नहीं मरता है इस प्रकार लोकमें किस निमिच शौच करतहो । । हेकौरवोंमें श्रेष्ट यहकाव नाना कारके सपनोवाको आकर्षण करता है कालका कोई प्याई न शत्रुहै। हे CHAPTER II Vaishia mpayan raid, " Couzoling Dh.1*3feltia with his nectarlik o Weyde, V dui said, " Rise un, hing aby do you werp? Control yoor. Bell, for this is be goal of all leige. Every csakd beng dios and overy rise ban a fall. Those wbo meet bare lo suffer separation, and lifo ends in death. Why thould kshatlya thun war when death orcrlakes the told ard the coward ! Anonfighting mon dies, while figl.ting man hver; ne can estore death 5. Blicell tbe Leings Junot ex'et in tbe beginning and end, and only exit in tho middlo, *hy theo sbu uld coe wetp for them? Ivby do you Irmeot when you Loc w tbat 200 stolsrents dies rot follow the deed. Leath over- - 78521 Mahabharat (७३५२) फदिम कुरुवातम ॥ ८॥ यथा यायुस्खणायाणि सपति सर्वशः । या फालयश यान्ति भूतानि भरतपम ॥ ९॥ एकसार्थप्रयासाना सपा तत्र गामिनाम । यस्व काळाप्रपात्यने तत्र का परिदेवना। १० न चापेतान हसान युद्ध राजन शाषि तुमसे प्रमाण थपिशाखाणि गणास्ते परमां गतिर ॥११॥ सः स्वाभ्यामवन्तो हि सर्वे च परिसवता. सय चाभिनुस्खा क्षीणास्तत्र का परिदेवना १२ । भदर्शनादा पतिता पुनश्चादशंन गता. । म ते सघन तेषी व तत्र का परिदेवना। १३॥ तोपि ममते श्यो हत्या च लभते पशः । उभय नो पागुण नास्ति मिष्फबसारणे ॥१४॥तेषां कामदुधा कानिन्द्र सङ्कल्पयिष्यति । इन्द्रख्यातिथयो ोते भवन्ति पुरुपर्पम१५)। नपदीक्षपादिन तगोभिन विधया । वो यान्ति तमा म यथा सूरा रहता ॥ १६ ॥ शरीराग्निप शूराणा जुनुस्ते शराहुती । हूयमानाञ्चश्चैिष सेहस्तेजस्विनी भरतर्षभ जसेशिया सक्तृणकी नोकॉको उलटपलटकरता है उसी प्रकार समीर कालके आधीन होते हैं । ९ । एकसाथ गानेवाले भार वहाँ जानेवाले समजीवों के मध्यमें जिसके आगे कालजाताहे उसमें कौन विलाप करताहै। १० । इगमा युद्ध में मृतकपे इनपीरोंके शोचकरने कोभी भोपनहींही इसमें शास्त्रका प्रमाण किउन्होंने परममतिकोपापा सब वेदपढ़नेवाले और सब अच्छे मकारसे व्रतकरनेवाले यहसव सम्मुखहोकर पिनाशवान्हुपे इसमें किसवातका विलाप करनाहै । १२ । हाष्टिमे कि आनेवाले ग्रह्मते पन्नहुष और फिर उत्ती दृष्टिमें न भानेवालेको पाया यह न आपके हैं न आप उनके तब कैसा दिलाए । १३ । मृतकमी स्वर्गको पाबाहे और | मरफरभी जिसको पादाद हमलोगोंको पदोनों बहुतगुगावामहै युद्धमें निष्फलका नहीं है ।१५ ५ इन्ट देवता उनके मनोस्यों के प्राप्तकरनेशले लोकोंको विनार करों गे इपुरुषोसम यह सब शूरवीर लोग इन्द्र के अनियीहोने है । १५ । मनुष्य दक्षिणा वाल्पज्ञ तप और विद्या से उम मकार स्वर्गको नहीं पातहैं जो किपद में मृतक उन गूरवीर तेजस्वियों में पागाहै जिन्होंने शारीररूपी आनियों आप श्रादति- takea all. Ho has no friends or enemica All beings are upect by deaths like the blackes of grass by the proud, Why do you greropphen all m n have to diei 19. You Leed not la nert those who died a war, fuc according to our religioa lonka thay liave gone to heaven, Thoss who read tlie Vedas and observe yow, have to dio, that is thor foro to lament fori They came from tte Dity and were merg ed in Brahru Thcy and did not belong to one anither, why do you weep then? Butls thioso s ho dio or are sun in war arc oliko to us, there wrothing disalvantage us 13 Eghting Idri will d cude the tite of thu rarriors, they ara to by his greats 10. Not orn tore rho prfirm scr th JHI u lit ins, itch regions as are vis stand big blies who do lighting Akshatrya has no edercr way to Jou Sil PITीपष ( 72531 मिशः । १७ प राजस्तवाचक्षे स्वर्गपन्यानमुनमम । युद्धादा किश्चित क्षत्रिय स्पेह विद्यते ॥१८1 क्षत्रियास्ते महामा: शराः समितिशोमनाः । आशिपं परमाप्राप्ता मशाच्या सर्व परि१९॥ मारमानमात्मनाश्वास्य माशुच. पुरुषर्षम । माघ लोका भिमतस्त्वं कार्यमुत्न तुमईसि ॥ २० ॥ माता पितसम्राणि पुत्रदारशतानि च । संसा रेषाभूताति कस्य ते कस्प था वयम् ॥ २१ ॥ शोकस्थानसहमाणि मयस्थानशतानि सविसे दिवसे दमाविशन्ति न पण्डिम ॥ २२ ॥ न कालस्प प्रियः फश्चिान पाकुरुसत्तम । न मध्यस्थः पचित कालः सर्वे काल प्रकर्षति ॥ २३ ॥ काल. पति भूतन कालः संहरो प्रजाः । कालः मुखेषु जागर्सि कालोहि दुरतिफमः ॥ १४॥ भनिए यौबने रूपं जीवितं द्रव्यसम्यः । भागेग्यं जियसम्पासो गृध्येदेषु न पन्टिा२५व बामपदिकं दुःखमेका शोचितुरसि । अप्यमान युज्येत तस्मात्य गोंको होमा और परस्पर होमेहुये बाणोंको सहा । १७ मा प्रकार से स्वर्गके उसम मार्गको तुमसे कहताहूं इसलोक क्षत्रियका कुछ कर्म युद्धसे अधि क नहीं वर्तमान ! १८ । युद्ध में शोभायमान उन महात्मा शुर क्षत्रियोंने बड़े अभीष्ट कलको पापा सही शोरके अयोग्य हैं। १९ । हे रुपाचम हुम शानसे अपनेको विज्ञासदेकर शोचमत करो शोकसे विजय कियेहुये तुम करनेके पोग्पकर्मके छोड़ने को योग्य नहींहो । २० । हजारों माता पिता और सैकडॉन स्त्री संसारमें प्रातकिये मह किसके और हम किसके । २१ । प्रति दिन शोकके हजारों स्थान और भानन्द के कॉस्थान अज्ञान में प्रवेश करतेहैं ।२२ हेकौरवोत्तम कालका कोई भागी न शत्रुहै वह कास किसी स्थानपरभी मध्यस्थ नहीं है काल सबको बैंचता है । २३ । काल भीवमात्रों को पकाताहै और कालही मृष्टिको मारताहै कानही सोमवालोंके मध्य में जागता और कालही दाखसे उल्लघनके योग्य है | Reणाईरूप वृद्धता पनसमूह और मारोगतापूर्वक निवास यहसव विनाश पानौं परिहत इनमें प्रटच नहीं होताहै । २५ 1 अकेळे तुम सब दुनियाभर के दुःख heaven tban dying in battle all thy warrit te slain llave git good region, and are not worth lamenting for. Donot give yourself up to grict, but do what is necessary. Wo make thonsands of fathers, mothors, sobe and wives in tbis world and tben sover our conncotion from thom. A foolish man is beset with thousands of plessures and pains every day. Death obser vos nether (rondship dur unmity, but opertahog al. Tiwe nakes all beings ripe and then Lills theni, Ha is awalo when all beings are sleep and it difficult to be overcome. Youth, age, nealth and health are all perishable; * nise man dces not sct his mind on any one of them. ou nocd not feel sorrow for all the world, for one who dies Isrer counar back tour. WY Lould Out fotl surry for those who bare dred vrarely; it is better pot to १७३५ 73545 Tahabharat म निवत्तते ॥ २६ ॥ नशोधन प्रतिकुर्षीत यदि पश्येत् पराक्रमम् । भैपज्यभस्म भदैतमानुधिन्नगेन् ॥ २७ ॥ चिन्त्यमानं हि व व्यनि भयवापि प्रपदंते। अनिष्टसंप्रयो गच्च विप्रयागात प्रियस्य च ॥ २८॥ मनुष्या मानमैटुवंयुज्यने येऽल्पवुद्धयःार्यो ग धर्मो न मुखं पदंतदनुशाबासार९॥ न व नापति कार्याातत्रिषगांच्यते अभ्यामन्यां धनावस्था प्राप्य पेशापकी नराः३०॥ असन्तुष्टा प्रमुखन्ति संताप शान्ति पण्डिताः । प्रतया मानलं दुख हम्याहारीरमौषधः। एतज्ज्ञानस्प सामई म पनि सातामियातू॥३॥शयानञ्चानुशत हि तिष्ठन्ने चानुतिष्ठतिबनधाषि पायात पूर्व कृतनाम्॥३२यस्पस्यमय स्थायायत्फगतिशुभाशुभमातस्पांतस्यामरस्थावातत्फले समुगाश्नुते ॥३३ । पेन येन शर्मग्ण यात फर्म करोति यः। तेन तेन शरीरेण तसत फलमुपास्तुन ॥ ३४ ॥ मारमेष ह्यात्मनो मित्रभारम्व रिसरममः। भारद्वारमा के शोचनेके योग्य नहीं होमो अभाव से मिलताहै उसका वह फिर लौटकर नही प्राताहै । २६ । जोपराक्रम से नाशको पाने उसको शोचतामा मनुष्य उसकी चिकित्साको नहीं करता है दुःखका यह इलाज है जो उसको र विचार करे ।२७। चिन्ता कियाहुमा दूर नहीं होताई और फिर फिर आधेक बढ़ता है मामय के मिलने मौर प्रियके वियोगमे । २८ । वह प्रादमी बड़े र चित्त के दःखस संयुक्तहोतों नोक निर्बुद्धी है यह न अपंहे नधर्महे न खो जोतुम शांच करसहो । २९ । यह करने के योग्य प्रयोजन जुराहोता है और धर्मअर्थ काम इनतीनों गोंसे गुम होता है मनुष्य अन्य २ मुख्य धनादिक दशाको पाकर । १० । इस में असंतुष्ट लोग मोहको पाते हैं पण्डित सन्तोपको पास, चित्तके दुःखको शानसे और शरीरके दु.खको भोपोंसे दूरकरना चाहिये या जानकी सामर्ष है और किसीप्रकार की कोई सामर्थ्य नहीं .३१ पूर्वजन्ममें कियाहुमा कर्म सोते ये मनुष्य केसाथसोताई और वैरनेवाले के पामनियत वैठाहोताहै और दौड़तेपेकपीछेदौड़ता है। निरा निम दशामें जिम शुभाशुभ कर्मको करता है उसी सी दशा में उस फरको पाता।। ३३ । जो जीव मिस शरीर से निस ३ कर्मको करता उसी शरीर से उस उस को फलको भोगवा । १४ । मात्मामें भरमाही उसका बन्धु think of them. Grief does not abata by brooding,orerit;it increases of we think of our dear ones. The fool is besot with many sorrows; your sorrow is neclips and irreligiour. Il doters us in our dutios and di prives us of all onde a dissatisfiod man ja staricious, whilo & luased mau is satisfie I. We should remoro mental griefs with wisdom an maladies with mediciod. 31. An act done in a loralor lifowleepa, site and runs with the dver. We reap the fruitol ou ded, in thu sómo conditions as whita no did ther. Yo gutfor the punisbpisats of our deeds in bodica liko those in which we did thoix.
Stii Parvami (7855 साक्षी कृतस्थापत्तस्य च ॥ ३५ : शुगेन कर्मणा सौख्दु स पापेम कर्मणा । कृत बमति सर्वत्र नातं भुज्यत श्वचित् ॥३६॥ न दि पानविरुद्धषु बहुपापु कर्मम् । भूलवातिए सजावे युझिसको भयद्वितः । ३७॥ इति श्रीपनि जलमादानिकपणि इतरराष्ट्राध्यासने दितीयोध्यागः ॥२॥ - चुतगादू सदा । सुभाषितमामा शोकोयं पिगतो मम । भय पयतु पाक्यानि भातुमिच्छामि सस्थत ॥ १ : अनिशानाय संसादिष्टानाच विनात् । कहि मानसे. प्रमुख्यातेतु पहिताः २ विदुर रवाच। यतो यतो ममो दुपात मुथाहा विप्रमुपो । ततस्ततो नियम्पेतच्छान्ति विदेत वे घुषः ॥ ३ ॥ मशाश्त्रमिदं सर्प है और बारमाही मारमाका शव प्रात्माही आत्माके शुभ शुभ कर्मोका साक्षी है । ३५ । शुभकर्मसे मुखको और भशुभकम्म से दुःखको सर्वत्र पाताहै किसी स्थान में मी विनाकिये हुये को नहीं भोगताहै । ३६ । आपकी समान बुद्धिमान मनुष्प उनका भट्टच नहीं होते हैं जोकि मानके विपरीतनहुत पापरखने वाले आरमोक्ष के नाशकरनेषा ३७॥ अध्याय ३॥ वृतराठगोले हे षड़े ज्ञानी बुम्हारे इन उत्तम रचनों से मेराशोक निवृत्तहुआ परन्तु इनिष्पाप मैं मूलममेत इनवचनों को फिर मुना चाहताहूं। १ । पंडितलोगसे भामियक योग और प्यारों के वियोगसे उत्पन होनेवाले चित्तके दुःखों से कैसे छूटते । २ । विदुरी बोले कि जिम जिस सपायरो दुःख अपवा मुखतेभी निष्टत होताहै थुद्धिमान मनुष्य उसीउपायसे इस चित्तको स्वाधीन करके शान्ती को पाने ।३। हेनरोचन पर सब जो ध्यानमें आवाई विनाशवान यह संसार केलके समानी इसका सार पदार्थ वर्तमान नहीं है । ४ । जव ज्ञानी और मूर्ख धनी ओर Tbo boulis ite own friend, enemy and witnuss. 35. It geta happr Decu RS A resalo of good deeds and solrow for wicked ones. One cannot suffer without doing. Wiso men hko you dooot engage in doing foolish, sinful and wicked deeds that debar tho duor from heaven, CHAPTER 111 Döritraubtra said, "My grief is gone away by your good words, wise man. I wish to hear your words onco mora in detail. How can wigo wea got rid of the uppleasant feeling arising out of the necting of enemies and separation of ftiondet " Vidur sad, " A wise nea should aliopata kis mind from the things ubich cause pleasure or pain. The world te 50rund us is suortal; it has no Lerval loko " 37.
-- 117356) Malhsbiinnet *(१) पिस्यमा नरर्षमा कदलीसजिमो लोकः सारोद्यस्य न विद्यते ॥ ४ ॥वदा प्रामा मुदाय पनपन्तांप निद्धना। स प्रिवृषने प्राय स्पन्ति विगतज्वरा निखिरस्थि मयिष्ठात्र स्नायुनियन्दनः ।। के विशेष प्रारम्ति तत्र तेषां परेजमा । येन प्रापर गच्छेपुः कुलपपिशेषणम् । स्माइन्योन्यमिच्छन्ति विप्रतन्धोधमा नगः ॥७ नीम कि मातामाहुरेवानि पापडताः। कालेन निदियुज्यन्ते सरसमेकम्त बातम् बथानीमजीर्ण पावलं स्यपातु पूरषः । अन्पद्रोपपते प्रस्नमेवं देवाः शरीरिणाम ॥ ९॥ धितीय साध्य हि दुखं पा याद या मुसम । प्राप्नुवन्तीहि भूतानि पर नेय कर्मणा ॥ १०॥ कर्मणा प्राप्यते स्वगः सुख दुःअम्घभारत । वसोवाति संभार मशः स्वषोऽपि पा ॥१॥ मृण्मयं भाण्ड घमास विपक्षसे किया प्रक्रियमाण पात्रमात्रमधापि पा ॥ १२ ॥ छिन्नं पाप्षयरोप्यन्तमपती मयापिका निंदनी कालसे मरणको पाकर तापसे रहित सोतई उम स्थानपर दूसरे मनुष निर्माम अशा रहत प्राधासनेशले भानाड़ो और कानों में अधिभित को देखते हैं जो उसममय कुल और रूप विशेषणको नहीं पा रहा करनेशलेमनुष्य किसहेतुसे परस्पर इच्छाकरते हैं ।। ७ परिहनोंने शरीर पारियोंक देहको ब्रहों के सपान कहाहै पदकालसे मिलने अर्थात् नाशकोपातो केवल एक जीवात्माही भाविना शीहे । ८ । निसाकार मनुष्य पुराने कपड़ेको त्यागकरके नवीन कपड़ेको भनी कार करता है इसी प्रकार शरीरबारियों पर ।।। धृतराष्ट्रप्तर मनुष्प-अपने कियहुपे कर्मसे मिलने के योग्य दुःख अथवा मुखको पातहै ।१० हे भरवा सन मुख और दुल अपने कर्म से प्राप्त होते हैं उसोतुसे यह इतन्त्र अथवा असतस्त्र भी उस भारको उठाना । ११ और जोमटीकापार रूपको पाकर टूटता है कोई वनता कोई वाहमा ।१२। भवेपर पखाईमा वा भोसे गिरकर टूटनेवाला भाष शुष्क वा पाताहुआ {१३॥ भसे उताराहमा उठापाढा वा काममें छापाहुभाभी टूटनाताई इसी मकार शरीर धारियों के शरीर गर्भ नियत जन्म लेनवाला plantuline wuntum nount 100l, Yeultuy and poor nou restra death, wo find nulliiay luft of them usapit a loip of bonus. Fusuily graslaust and beauty aroui no n'ail after death; why should people desire to gain their object by doceit. Piso mien say that ibo bodies of quod aro lilo cou-tollations which come toguthor at times and then diuaplar; the soul alopois in glortal. Budics ara like clothes which tro cast off weg old and and put on ocw onts. Our pleasures and paina aro tbe soulls of our actionk 10. dlan is out indepent wben bo hos to suffer pleasure or pain as a result of his foriner deodsOur butics are like cortion its wbichosiuala alap aad break down in the cours of prugarstivo, after preparation and at all other ylaget. Thisy bnak dowa oftes being burnt in a kilo, in lapsit or in uw .
8tri Parvatपर्द (73571 माई बाप्पथ का शक पवमानमधापिका ॥१॥ मयतार्यमाणमापाकायुद्धतम्यापि भारत । मथी परिभुपातमेव देहाः शरीरिणाम् ॥ १४॥ मर्मस्थो का प्रस्तो मा ज्यभ पादिषसाम्तरः । मईमासगतो वापि मालमात्रगतोपिया ।। १५ ।। संवत्सांगतो वापि विसंवत्सर पव पा। मोदमस्योऽय मरस्यो मोवापि विपपते ॥ १६ ॥ प्रारकर्म भिस्तु भूतानि भवन्तिम भवान्तवार सासिरिफे लोके किमर्थमनुतप्यते ॥१७॥यथातु सलिलेराजन क्रीसायमन्सन्नरमाउन्मजेदन निमजेच किञ्चित् सत्यनाधिप।१८। एवं संसारगहने बन्मजननिमन्जने । कर्म भोगेन ध्यन्ते क्लिश्यन्ते येऽस्पबुसः ॥ १९ ॥ ये तु भाक्षाःस्थिता. सत्वे संसारानुगतैषिणः। समागमना भूतानां ते फन्ति परम गतिम् ॥ २०॥ इति श्रीपणि वरूपादानिकपणि धृतराष्ट्र.मोकानोदने तृतीयोध्यायः॥३ - पा यो अवस्थामाली भर्दमास एकमास ।१५। एकप का दोपर्पकी अपस्था रत नेवाला तरुण मध्यस्थ और शुद्धभी नाशको -पाना ।१६। सजीव अपनेपिछले जन्मों के कर्मोसे उत्पन्न होवे और नाशको पातहैं इसगति के स्वाभाविक धर्मरख नेशले लोकमें किसहेतुसे दुःखी होतेई ।१॥ देराजा जैसेकिकोई श्रीव क्रीड़ाके निमिच जलमें पुमताहुआ हूवता और उछलताहै।१८। उसी प्रकार मालोग अपने बड़े ज्ञानकेदारा उत्तमकार के दुर्गम सप्तार से पारडुपे नोकिड्दना गलना नदी गुणोंका रखनेवालाई ।१९। जोजावों की उत्पत्तिक जाननेपाल संसार के अन्तके खोजनेसाले सब शानी नियत वह परम गतिको पातेहैं ॥ २० ॥ So our bodies die in wombs, after but'), at the age of a fortnight, a month, a yoor, two years in youth, middle, or old age 16, People dro and are born again as a result of their own deeds; why should we be sorry for those who are paturally mortal Sages and rishis crosa tho ocean of the world like an animal which Aluats or sinks down in water at pleasure, Thoso 172-3 men rho srek to know the bazianing and end of the world, reach thosublime goal. " 20.
7358) Mahabharat (७३५८) धृतराष्ट्र उवाच । कृय ससारगहनं विशेयं वदतांवर । एतदिच्छाम्यहं भातु तत्व मायाहि पृच्छतः ॥ १॥ विदुर उपाच । जन्मप्रभ्रति भूतानां क्रियासर्वोपलधयत । पूर्वमेघेह फलते घसो फिीचदन्तरम् । ततः स पञ्चमेतीते मासे पा समकल्पात ॥२॥ ततः सर्वोगसंपूर्णो गर्भो ,स्त तु जायते । अमेध्यमध्ये घसति मांसशोणिसले पने ॥३॥ ततस्तु धायुचेगेन ऊर्ध्वपादो शव शिरा योनिद्वारमुपानम्य पहन कलेशान समृच्छति ॥ ४। योनिसंपीडनाव पर्वकर्मभिरन्वितः। तस्मान्मुक्तः स ससागर न्यानं पश्यत्युपद्रयान् । गृहातमुपगच्छन्ति सारमेया इचारियम् ।। ६ ॥ ततः प्राप्तोत्तों काले उपाधयश्चापितं तथा । उपसन्ति जीवन्तं वध्यमानं स्वकर्मभिः ॥ ७॥ मिन्द्रियः पाशः सङ्गस्वाभिरावृतम् । व्यसनान्यपि वर्तन्ते विविधानि नराधिप ॥८॥ पाध्यमानश्च भयो नैय'लादेशमुपैति सः । तशा नावैति या प्रकुर्वन् साध्यसाधु घा अध्याय ॥४॥ धृतराष्ट्र वोळे हेमकाओं में श्रेष्ठ किस रीति से यह संसाररूपी वन जानने के योग्य है मैं इसको सुना चाहता हूँ भाप मुझम वर्णन कीजिये । १ । विदुरजी बोले कि जन्मसे लेकर जीवधारियोंकी सब क्रिया दिखाई देती हैं इसलोक में प्रथम कलल अर्थात् एकरात्रि निवास करनेवाले गर्भमें जीवात्मा निवाप्त करता है परन्तु कुछ अन्तर है । २ । इसके पीछे पांच मास व्यतीत होनेपर उस चैतन्यका प्रादुर्भाव विचार किया अर्थात एकरावि निनासमें चैतन्यकी संसामात्र होतीहै परन्तु पांचवें महीने में उसका पूर्ण प्रादुर्भाव होभातार मांस कधिरसेलित अपवित्र स्थानमें निरासकरता है। ३। फिर वह अपानरूप वाकी तीव्रतास ऊंचपैर नीचे शिरवाला योनिके द्वारको पाकर बड़े कष्टों को पाताहै । ४ योनाकी पीड़ा और पिछलेकर्मों से युक्त उस द्वारसे छूट कर संसारके दूसरे उपद्रनों को देखताहै । । । और ग्रह उसके पास ऐसे मातहैं जैसे कि मासकेपास कुचे आते हैं। ६ । देशमुसंतापी इसके पाछे उसी समय रोगभी उसकेपास माते हैं इसीसे जीवसाहुआ अपनेकसि पाडावान होताहै । ७ । हेराजा इन्द्रियों के पास बन्धनों में बंधेहुये संग और स्वाद से संयुक्त उसार धारीके पाम नानामकारके व्यसन भाव भापतियो वर्ष मानहो हैं । ८ । फिर उन सबसेपीडित होकर यह जीवतृप्तिको नहीं पायाहै इसीसे CHAPTER IV Daritrashtra said, " How cou vo know the wilderness of the world! Pray tell me all about it, " Vidur taid, " From the beginning we dis. cro thu work of living beings. Thoy live for sometimu in to you sad oru thon suriounded by surpuritius of flesls und blood. They liyo there will thcir hunds downwards and their fict and aro in A misscablu plight till they come out of the roail. Cuning out of 006 Lifficulty. they have to encounter others in the world, Fils Press. on liu ardeo do a piscut llosla. Dikens cu ao to bu during his up ७३५१) Siri Pary स्त्रीपर्व 173591 तव परिरक्षन्ति ये ध्यानपरिनिष्ठिता. ॥ ९॥ मयं न वुध्यो ताव धमलोकमयागतम्। यमन्तर्विष्यंध मृत्यु कालेन गच्छति ॥ १० वाग्धीनस्शच यग्मात्रमिष्टानिष्टुं कृतं मुख । सूय एवात्मनात्मानं वध्यमानमुपेक्षते॥११॥ अहो विनिकृतों लोको लोभेन च वशीकृतः। लोभमोधभयोन्मत्तो नात्मानमयबुध्यते ॥ १२ ॥ कुलीनत्वे च रमते दुग्छु लीनान् विकुरसयन् । धनदण हप्तश्च दरिदान परिकुरसयन ।। १३ ॥ मूर्खानिति परा नाहमामान सपवेक्षन दे पान क्षिाति चान्धेषां नात्मानं शास्तुमिच्छति ।। १४॥ यदा प्राच मोक्ष धनवन्तीय गिद्धनाः । कुलीनामाकुलानाश्च मानिनोचाप्यमानिनः 1 १५॥ स पितृचन प्राप्ता स्वपन्ति विगतज्य: निम्मंसिरीस्थीयतः नायु निबन्यनैः ।। १६ ॥ कामशेर प्रपश्यन्ति तत्र तेषो परे जनायेने प्रत्यवगच्छेयु कुलरूप विशेषणम् ॥ १७॥ यदा सर्पसम न्यस्ताः स्मपन्ति धरणातले । कस्मादन्यान्यमिच्छन्ति शुभाशुभ कर्मों को करताहै और उनका त्यागनेवाला नहीं होताहै इसी प्रकार जो पुरुष ईश्वरकेध्यानमें महत्तहै वह अपने को तबतक चारोंमोरसे रक्षा करत जबतक यह जीव मिलनेवाले यमलोक को नहीं जानताई यमदूमों से आकर्षित कालते मृत्युको पाता है। १० । उस मौनका जो पाप पुण्य है वह दूसरे के द्वारा मुखमें किया था होता है फिरमी विषयोंमें आसतहोकर अपनको पतनहुआ नहीं ध्यानकरतो।११।भाधर्यहै कि संसार नाच लोभके आधीनतामें वर्तमानकोष मोह और धनकमदसे अचेतहोकर आत्माको नहीं जानताहै । १२ । दुष्ट कुलवालोंकी निन्दाकरता अपने कुलकी प्रशसा करता हुभा रमता है दरिद्रयोंकी निन्दा करता धनके गर्वसे मईकारीहै । १३ । नरों को मूर्ख कहता है और अपनेको अच्छीरीति से नहीं देखतौह दूसरोंको शिक्षा करता है परन्तु अपनेको शिक्षा करना नहींचाह साहै । १४ । जव ज्ञानी और मूर्ख धनी और निर्दनी कुलीन अकुलीन महंकारी और निरंकारीमा सव पितृपन ( यमलोक ) में वर्तमान विगत ज्वर होकर सोतह और वापर दूसरे मनुष्य उन्होंके निर्मास बहुत से भस्थिकाले अंग और नाड़ीवन्ध नौसे अधिक कुछ नहीं देखतेहै औरनो कुल भार रूपकी मुख्यताको नहीं पात, 1१७ जर वह सभी शरीरत्याग लियय पृथ्वीपर सोते हैं तब दुद्धी मनुष्य इस lifetims. Then he is iv danger of evil desires and other calamities. Beset with so many difficnities, he is not satisfied svitb anything and doer good and oril deeds, Bal thod who meditate on God, protect thon-olves from all sides As loog as they are not summoned by death, 10. Ons fallen lov on account of evil desires, door not see his fall.. It in a wonder that pxple firge thidm8-1609 un accorint of avarica pridie, anger and other passions. They give tlum ejvi& praiso and blamo others, these sperk ill.ftno pri tisoprulu of their wealth. They call othera fools and donot look towards themselv0s; thog proach. othora and themselves remain in the dark, Groat and lowly, proud and bumbla all go to tho region of Yam and nothing is left of them but a (7260) Mahabharat प्रलयमिह दुर्घषा||१८प्रत्यक्ष परो योनिशम्म श्रुति विमामा अधुघे जीवलोके रिसन यो धर्ममनुपालयन् । जन्मप्रति यत्तंत माप्नुयात् परमां गतिम् ॥ १९ ॥ सर्व विदित्वाधै यस्तस्वमनुवर्तते । स प्रनाक्षयते सर्वान पन्यानो गनुजाधिप ॥ १० ॥ भवराष्ट्र उपाचा दिदं भांगहनं बुद्धमा समतुगारते । एतविस्तरयः सबै बुद्धि इते श्रीपर्वणि जलपादानिकपण तराशीकोपनापने चतुर्थोध्यायः ॥ ४॥ मार्ग प्रशस मे ॥ १। विदुर उयाच अन ते पर्सयिष्यामि नमस्करवा स्वयम्मुरे । यथा संसारगद पदन्ति परमर्षयः ॥ २ ॥ कन्मिहति सारे पर्समालो दिजः फिलः या वर्गानु गो मारकम्प दखलम् ॥ ३॥सिकार रतिघार लोक में किस देतु से परस्पर उळकिया चाहतहे । १४ । यहचान देवभिीर पनाह जो इस श्रुतिको सुनकर इस विनाशवान् जीवलोकन धर्मका पालन करताहुमा मन्मस लेकर मत कम करता है वह परमगतिको पाता है जोकिइसमकार सक्कोजानस कर ही सामना करता है। १०॥ अध्याय ५॥ धृतराष्ट्रना किजो यह दुष्पाप्य धर्मबुदिकद्वारा अच्छेप्रकार प्राप्त होताह) इसहेतुने र बुद्धिमार्गको व्योरे समेत मुझसे कहो । १। विदुरनी बोले किस स्थानपर प्रह्माजी के अर्थनमस्कार करकेयह विषय तुमसे कहनाई जैसे कि महर्षि गोग इस संसाररूपी घन वनको तरसे हैं। २ निश्चयकरके इस बड़े संसार में कोई दिन मांसभक्षी जीवों में पूर्ण उस दुर्गम्य वनमें पहुँचाजो किवदे शब्दवाले भयानक समासमती महाभयकारी सिंह व्याघ्र हाथी औररीछोकसमूहोंसे चारोंभोरको म्यास hop af long. Why should fooli-l men practiso decuit with their faller cranturo, when Litery 800 this. Bu mnuy men endowed witb sealth and buit; bodo un carth, y.see and hear thatha who lezlon votione lif:in this mortal world, gnina tho bighest goul. Ho who hnurs all this is a worshipper of Brahm." 20, OILAPTEK V Writto 1,141 * il," B.5. w thie difficult chart can be known by int in autu, punya toll ile the way to wisdom." Vidur inid, "Hay inglund cusntu rnbunariall tell you horsgratanga crits rant :cst of the worl:- mun ntured afcrust tull of ..
StnPIV लापत (72611 समन्बात् संपरिक्षिप्तं पद स्म वा संघमः ॥ ४॥ तदस्य एन्वा हृदयमुछेगमग मत् परम भरघुपापच रोड व पिक्रिया परन्तप ॥ ५॥ स तदनं व्यनुसरन संग भावनितस्ततःवीक्षमाणो दिशः सर्वाः शरणं व गवेदिति ॥ ६॥ स तेषां छिदमन्ति छन् प्रदतो मीडितः । न च नियोति थे दूर न च तैप्रियुज्यते ॥ ७ ॥ अथापग्य अन पोरं समन्तावागुरावृतम् । वाश्यां सपरिक्षि खिम परमधोरया। ८॥ पक्ष पाधिमांग शेलारय समुवतैः । नमस्यशेमहाधोरेः परिक्षिप्त, महाधनम् । ९० धन मध्ये तत्रामदुलपान सम्मः । वली भिस्तृणउन्नाभिस्वामिरामिसतः ॥१०॥ पपात करिजस्त निगूढे सलिला । पिलग्ननामधीस्मन् लतासन्तानसंकुले ॥ ११ ॥ पास या मातं हन्तवं माफलम् । स तथा लम्वते तत्र अध्वंपादो अहिरा १२॥ मप तत्रापि नाम्बोस्य भयो जात उपद्रव कपमध्ये गहानागम मत्युकाभी भपका रीवा उसको देखकर इसका हृदय महापाकुल हुकम्प भार रोमांवोंसे शरीर व्याप्त हुआ। ५ । वह उस वन में अच्छेपकार धूमनाहुआ इधर उधर की दौड़ा और सब दिशाओं को देखनाश कि मेरा रास्थान कहाँ गंगा ।। । इसमकार वा भपेप्स पाडावान् छिद्रों को देखता भागावह नतो दूर माता मनसे पचता थाइसके पछि उसनेचारोंभोरको पाश युक घोर वनको देखा बह पाच वडीघोररूप श्रीकीजामों से पकड़ा हुआया ८ । और यहवन पांच शिर रखनवास पर्वतों के समान उंचे सोसे और आकाशको स्पर्श करनेवाले वदेवचों से चारों ओरको संयुक्तथा । ९ । उस वन के मध्य में एक कूप अन्धकार से पूर्ण हणसे की हुई दवाल्लियोंसे संयुक्तया वह द्विज उस गुप्त कूपमें गिरपड़ा और लनाभोंक फैलारसे पूर्ण उस कूपमें छिपगपा । ११ । जैसे फिटन वंशमें उत्पन रोगाला बड़ा फल आखा में गामा होताहै उसी प्रकार वह दिन ऊंचपैर नाच राना होकर उसमे लरका । १२ । फिर उमी प्रकारसे उसका दमरा उपद्रव beasts of prey, where liony, tigers, clephants and bears wore present in large numbers sufficient to ternly oveu death. His heart was much troubled at the sight of them and the hair of Ins body stood on end 5 Le rar in all directions to seek a place of refuge in the forest. He ran on much terrified looking for holds. He did not go far out of the pluce, for he saw a dreadful net sprosd all round nod held by a dicadful woman, The place was full of five headed serpents huge as moun. lang and tall troes touching the aby. There was a dark well in the niidlo of the forest auyercd with grass and ciceperg, 11). Ao fel! down in that well ued was hid under creuper8 like a fourt among the bi aaches of a troa He lay suspendos trere he don nwarde Ho met another calamity there, for at the buttum ni it thoro was a power 362] Mahalila at पश्यत महाबलम् । कृपधीनाहलायामपश्यतमहागजम् । १३ ॥ पवन कृष्णय णच द्विषटकपदयारिणम् । फ्रमेण परिसपन्त बालीवृक्षसमावृता ॥१४॥ तस्य चापि प्रशाम्बासु वृक्षशामावलम्बित ! नानाला मधु करा घोररूपा भयावहा.। आसते मधु मस्य पूर्वमेव का मिजा ॥ १५॥ भूयो भूय समीहन्ते मनि भरतर्षभ । स्वादनी याति भूताना वैयको विप्रकुष्यते । १६ ॥ तेरा मधूना बहुधा धारा. प्रसवतांतदा । आलम्मान समान धारां पियोत सद॥१७॥ न चास्य तृष्णा पिरता पिवमानस्य सङ्कटे । अमीप्लान तदा नियमन ल पुन पुन. - १८ ॥ न चास्य जीवित राजन निवेद सपज यत । नत्रय च मनुष्यस्य जीविताशा प्रतिष्ठिता | कृष्णा श्वेताश्वत वृक्ष कुन्निध भूमिका १९॥ व्यालैश्च वनदुर्गान्तेत्रिया च परमोरया । कपाध भी उत्पन्नहुमा किकृपके माम बड़ बलवान सर्पको देखा और मुखवंधनकप के किनारेपर पबिड़े हाथीको देखा। जोकिछ मुखवाना और बारह चरण सेचलने वाला सामवर्ण क्रमसेचलनेवाला सेकड़ा रनौर वल्लियोंसे ढकामाथा १४॥ इस के पीछे कही भासामों पर लटकनेवाले नाना प्रकार का परखेनवाजे श्रेयवर्ण घोर और बड़ेमयके उत्पन्न करनेवाले और प्रथमही घ(वनाकर सन्तानके द्वारा वृद्धि पानेपाले भौरे शहदको इकट्ठा करके निवास करते हैं । १५ । भरतर्षभ वह भारे बारम्बार जीरभारियों के स्वादिष्टरसों की इच्छाकरतेहैं जिन्होंसे पालक आकर्षण कियेजातेहैं । १६ । उन रसोंकी बड़ी धारा सदैव गिरतीई तब कटकताहुमावद नीव सदैव धाराओं को पान करता है ।१७ संकटमें भी इस पानकरनेवाले की इच्छापूर्णनहींहुई वह अतृप्तहोकर सदैव वारम्बार उमका चाहताइ । १८॥ राजा जीवन में उसकी अप्रीति नहीं उत्सन्नईई उसमें मनुष्य के जीवनकी भाशा नियतह मा कृष्ण रंगवाले नो (रात्रि दिन उस वृक्षरूपी मायुको काटते हैं । दुर्गम्य बनकेपाम बहुवसे सर्प और बड़ी उग्रसी (वृद्धावस्या ) और कूपके नीचे सर्प ( मृत्यु ) और कृपके मुखपर हाथी ( पूर्णful s-rpent, wlule at the mouth of it ho saw a hugo clephant with six no ruthn, twelvų fest, black and wiuto colour and coverıd with t ces und ercopers 14, Thon ho 87 hanging on a largo low a bive of numming bers which gathurad in Inrge numbers and multipited, mokung honey 15. Th-jit on titlu things such as pleass chillton. A strerin of swett matter dropped (rom tho hrve and the punded there dronk of it allen in such trouble bu ronising ungat afiod, not tiral of Info and 18 yet hopeful, Whito und back nice day and mght, rograwing uway tho roots of the tree of its itte, there are numssksipanta la tim faros , nith the dreadful womaa, thu serpent below at the bottom of the well, and the elephant at the mouth 20, Thero si s grest laar of the full of tho mans49. trco OD 7363 Valiabharat REE मांगन घोनाह कुजरंण ब ॥ २० ॥ वृक्षप्राताच्च मयं मर्पिवयव पश्च मम् । मधुलोमान्मधुर. पठमाहुरगया २१ । एवं स यसते तक्षिप्तः ससार सागरे । नव जीविताशाया नियंदमुपगच्छति ॥ २२ ॥ इति खापवाणे जलमादानिकपीणि धृतराष्ट्र शाकापनापने पं.मोध्यायः ॥ ५॥ प्रतराष्ट्र उवाच । सहो थलु मरदुखं कृपासधरस्य ह । कप तस्य तित्र तुरियां पदताम्पर ॥१॥स देश ५५ नु यत्रासी पसते धर्मसट । कप पा स घिमु येत नरस्तस्मान्महाभयात् ॥ २॥ एत मे समाय साधु घाम तदा । पामे माती जाता तस्यायुद्धरनहि ॥ ३॥ उपाच । उपमानमिद राजन मोक्षावि गिरदारमतं विन्दते येन पालो मानव.४॥ उच्यते 48 फ वारं महास वर्ष) और वृक्ष के गिरने से भयहे और चूहोंसे पानो भयई भौर शहदके लोभसे छटेभयका कहा । २१ । इसमकार संसार सागरमें पड़ाहुआ यह जीव वर्तमान होताहै और जीवनकी भाशामें वैराग्यको नहीं पाताहै ॥ २१ ॥ अध्याप॥ धृतराष्ट्र बोले कि वहाआश्चर्य है कि निश्चय बड़ा दुःखदै और उसकी स्थिति भी दल रूपी हेवक्तामोंमें श्रेष्ठ उसमें उसकी प्राति और वाप्ति फिसप्रकार से है ? वादेश कहांई जिसमें यह जीव धर्मसंकटमें निवास करता है और वह मनुष्य उस बड़े भयेस केसे छूटैगा । २। यह सब मुझमे कही यह बहुत अच्छाहै तब हमकाम में लायेंगे निश्चय उत्तम छुटाने के लिये मेरे ऊपर बड़ी कृपा उत्पन्न हुई है। ३ । विदुरजी वोले हे गजा मोक्ष चाहनेवाले पुरुषों ने यह दृष्टांत वर्णन किया निस से कि मनुष्य परलोक में मुन्दर गतिको पाता है।४ । जो वह महावन कहाजाता account of the mice and the consequent loss of the stream of boney. Thus les man in the ocean of the world and yet ho does not dever 2114 sind from the hope of life 22. CHAPTER VI Dhritrasbtin said, " I am touch amazed to bear that man, alıbough |he s beset with so many troubles does not like to sever his connection from the world Pray explain this. Where is the place the soul lives ja and bow can man gend of the fearl Priy toil me all. It is Stri Parvस्त्रीपर्व 736 सार एव सःमि दुर्गवि पते ससारगहनं हि पर कविता पाला पापस्त प्रकीर्तिताः वासा नारी बहकाया अधितिष्ठति तत्र तामाइनु जामा सविनाशिनीम् । यता पो नृपते स देहः शरीरिणामला घसतेऽस्तान्महाहि. काल एर सामन्तकः सर्वभूतानां देहिनां सहासी ॥८॥ कामध्ये तु या जाता परली पाप माना प्रत्ता लम्पते नमो बीषिताशा शरीर गाम ।९॥ स पस्त काबीनाहे तो परिवति । पहरा कुम्बरों गमन सा संवत्सरः स्मृतः १०॥ मुबारापी मासा पाराद्वारश कीर्तिता पनि तान्ति भूपिका पाया । ११ । राजमहाल मुबातामा परिचित है थे मधुकरात कामाने परिकीर्तिताः ॥१५रास्तु बाबा धारान्ति मन है वही महा समारी और नो पह दुर्गम्पयन है वही सतारयन है।५ ।मो सर्प तुमसे बहारोग है वहां पीरवाली जो भी मिपास करती है । । । रसको शानियोंने पाप नाश करनेपाली सुधारस्पा का हे रामा हामी कूपी वा शरीरपारियोंका शरीरहे । । और जो पासर्प उप्स पके भावर मिषास करताह यहींकाल है यह सब भूनोंका नाश करनेपाला और मायामानोंका रमे बालाह। और रूपकमध्य में जीवहा प्रसन्न र पप्प उसके विस्तार में चकता की शरीरधारियोंके नौवनकी आशा है।९। और कूपके मुअपर बोशा मुखाला साथी पक्ष की शाखाओं के चारोंमोर चेष्टा करताहै पीपूर्ण गरे 1१०। उस के छ। मुखऋतु और बारह चरण महीने काँहैं उसी महार को पूरे एतको काया । ११ । उनको विचारवान् शुरुषों ने दिन रात्रि का मो भारे या नानाश कही। १२ और जोबह शादकी पतसी धारा gral to hear and beneficial Vidur said, “This prrcept is giren 'ly those who with lo guia salvation and a gond atato in the next world. Tho Culcst meationed above is the world, 5. The serpents aro discamus, the large-sized woman is the old ago which reinovas beauty of [wrap; t'o will is the body and thu largo dorpent at tho boltom is Death which dostroyer all. Tno c'esper to the middle of the roll, supportia. tho man, is tlio liops of life. The in-headed elephant waving round the trea is the scar. 10. Ila six woutlis and the sasine; the twelve foutaro the meathr; tho mico which eat Away to rol of thy true aro diy. And aichte and the black bean art tho xxlilly desins This strcans of buAcp it thorp of dosirci in (१६० Stri Parvasins (7315, घवम् । तांस्तुकामरसान विधायन तज्ज्ञन्दि मानमा ॥ १३ ॥ एवं संसारचक्रस्य परि वृत्तं विदुव॒धाः । येन संसारचसापाशारिउन्दन्ति वुधाः ॥१४॥ इति त्रीपर्वणि जलपादानिकपीगि धनसाशोकापनोपने पष्ठोध्यायः ॥ ६॥ -28- धृतराष्ट्र उपाच ! अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तस्यदर्शिना। सूयः पय तु मे हर्षः श्रुत्वा वागमृत तय ॥ विदुर उवाच शृग भय प्रवक्ष्यामि मार्गस्येतस्य विस्ताम्। पच्छ्रुत्वा रिप्रमुच्यन्ते संसारेभ्यो विचक्षणा. । २ । यथा तु पुराण राजन दीर्घमध्वान मास्थितः। क्वचित् पचविच्छ्रमाच्छान्नः कुरुते धामनव च ॥३॥ एवं संसारपाये गर्भधासेसु भारत । कुर्वन्ति दुर्घधा घास मुच्यन्ते तत्र पण्डिता ||४|| तस्मादध्यानमेवे गिरती है उनको काम रमजानो जिसमें मनुष्य ह्वत हैं। जिन्होंने इसमकार संसार चक्रकी गतिकोजाना निधय करके वहमनुष्य संसार चक के पाशको काटते हैं १४॥ अध्याय ७॥ घृतराष्ट्र वोले हे महात्मातत्वदर्शी आपने मोक्ष देनेवाली कथा कही उसको आप फिर मुप्या समेत कहो मैं मुनना चाहता हूं । १ । विदुरजी बोले सुनो में फिर उस मार्ग के क्रमको कहताहूं जिसको मुनकर ज्ञानीलोग संसारसे छूटते हैं ।२। हे राजा जैसे कि बड़े मागमें नियत मनुष्य जहां तहां थककर निवास करता है ३। हे भरतवंशी इसीप्रकार अज्ञानी मनुष्य संसारमें मष्टिरूप गर्भ में वारम्बार निवास को करताहै । ४ । भौर ज्ञानी लोग शीघ्र जातेहैं इस हेतुसे शास्त्रज्ञ लोगों which men are drowned Those who know the course of the wheel of the world, cut away the bonds" 14 Vidur sad, CHAPTER VII Dhritrashtia said, " You bave pointed out the way to salvation. Pray explain it once mre. I misb to hear of it." “ Hear once more the account of the way leading to salvation, A foolish man stays in various births like one staying at different stages whep (ned in a journey. One endowed with gyan crosses this dens forest of the world soon er. Wise men lave 79. dusie to move with [[7356] Maliabharat (७३६६) तमाशास्त्रविदो जनाः । तत्तत् संसारगइन बनयामनीषिणः ॥ ५ ॥ सोऽयं लोके समाबोवन भरतर्षभ। बराणां स्थावरणाणाद नमृध्पत्तध पपिटतः ॥ ३ ॥ शारी मानसाचर मार्माना ये तु यायः । प्रत्यक्षाच परोक्षाच ते ज्याला कवितावुधैः ॥ ७ क्लिस्यगानाध तधि पार्यमाण भारत । स्वकीम महापालेनोविजयरपयुश्यः ॥ ८॥पयापि तापमुच्येत व्याधिभिः पुरुषानुप । मार पोत्येष तं पश्चाजरा रुपतिनाशिनी ।। ९ ॥ शब्दरूपासस्पर्शग धेश्च विविधरपि । मन्जमान महापडं निराळम्ये समन्ततः । १.. ॥ संवत्सरर्तवो मासाः पक्षाहोरात्र कपः ऋणास्थोपयुजन्ति रूपमायुस्तफ्ष व ॥ ११ ॥ पते कालस्य निधनो नैतान जानन्ति दुर्बुधः । पात्राभिलखितान्याहु सर्व भूतानि कर्मणा । १९ । रथ. शरीर भूतानां यमाहुस्तु सारथिम् । इन्द्रियाणि हपानाः कर्म घुविध रश्मयः ॥ १३॥ ने इतको मार्ग कहा? और जित ज्ञानियों ने जिन संसारको पनपन कहाँहे हे पुरुषोत्तम पा र स्थावर और नामजीवोंका चलायमान चक्र है पण्डित उसकी इच्छा नहीं करताहै।६। शरीरधारियों के शरीर और चिचसे सम्मन्ध रखने वाले जो रोग उनको ज्ञानी लोग गुप्त और प्रकट रूप सर्प कहते हैं. 1 । हे परतांशी निर्बुद्धी मनुष्य उन्होंने दुःखसरकार और पायल होकरभी अपने कर्म पासपीसे व्याकुलताको नीपाये है हे रामा जव मनुष्प उन रोगोभी घटना है | तब उस पुरुषको रूपकी विनाश करनेवाली रामवस्या देवालेती है। ९ । जोकि पदा रूप, रस, स्पर्श मौर नानाप्रकार की गन्धियों से भी निराधार बढ़ी की चमें चारों ओरसे दूवाहमा है पूर्ण पर्व छातु पारह महीने दोनों पत दिनरात और उनकी सन्धियां यह सब नगपूर्वक उसके रूप और अवस्थाको नाम करते हैं ।११॥ या काळकी निधि है दुईदी लोग उनको नहीं मानते हैं सब जीवोंको उनके कर्म से चिरका लिसाहमा कहा है । १२ । शरीरधारियोंका देहाथ चिन्ता सारा इन्दिप घोड़े हैं और कर्मयुदी उत्त रथको वागोर है । १३ । जो पुरुष उन काल घोड़कि पीछे दौड़शाह या इस संसारच कमें चाके समान घूमता है।१४ ॥ the wbice which moves tho living and lifelues crostorle Tho díscasca which allock living bringe bave Leen called ecrpents by the witc. Tiu fool, though attacked by tliem is not disticseed in his inind, and vben ho is fad from such dict, old ogo overtalen bin, Ho in atuok is a deep miso, and dogs, bigbts, fortnights, iphone and years dochua tho pariod of his life. 10, Foolish neh dnnot know tha. treasure of time. It is said that God givos being the roward of their deoda. Tlu body of beings is a cor; anziety is its driver; organs of LOGE o its bereits and #udoin in its tra&. o wlio rugs after the Shouki, turtarount win the wheel. Howho curla thear withwin. ।
- (७३६७ Stri Parten 7367 तेषां हयानां यो वेग धावतामनुधावति । स तु संसारचक्रीस्मन् ववव परिपते ॥ १५ ॥ यताद संयमते वुझ्या लयतो न निवर्तने । स तु संसारचक्रस्मिन यायत परिवर्तित ॥ १५ ॥ छ त संसारचक्रेऽस्मिन् वक्रत परिपते । भ्रममाणा न !मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते । संसारे भ्रमता राजन कुल मताकि आपते ॥ १६ ॥ तस्मादस्प निवृत्त्यर्थ पलमेव घरेद्बुधः। उपेक्षा नाम कम्य शतशाखः प्रवर्तते ॥ १७ ॥ यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोमनिगकृतः । सन्तुष्टः सत्यवादो यः सोशान्तिमधिगच्छति ॥ १८॥ याम्यमाई रथं छन मुह्यन्ते येन दुधा अनुतघुलमेतदुख भघति मारत ॥ १९ ॥ साधुः परमदुस्थानां खुमिगेषज्यमाचरेत् जानौषधमवाप्या उपार महीप धम् ॥ २० ॥ न विक्रमो न चाप्यों न मिधं न मुह भना तथोन्मोच यते दुखायथास्मा स्थिरसंघमः ॥ २९ ॥ तस्मान्मत्रं महास्थाय शील गो जितन्द्रिय उनको बुद्धिसे प्राधीन करताहै पहचक्रके समान प्रमनेवाले इस संसार चक्रमें लौटकर नहीं पाता ।१५। वह संसार में भी घूमते हैं परन्तु घूमतेपे मोहको नहीं पाते हैं वही दुख संसार के घूमनेवालों के लिये भी उत्पन्न होनाद । १६ । इस हेतुसे बानीको उचितहै कि इम सप्तार से छूटनेका उपायकरे इसमें कभूिक और देर नकर नी चाईये नहींतो सैकड़ों शाखावाला वृक्ष वृद्धिको राताहै। १७॥ हे रामा जो पुरुप जितेन्द्रिय क्रोध लोभसेरहित सन्तोपी और सत्यवक्ताहै यहशांती को पाता । १८ । हे भरतवंशी यहभी कहा कि पश्चात्ताप करनेमे दुखहोताहै ज्ञानी वड़े दुखोंकी औपधी ज्ञानको ही समझे । १९ । इसलोकमें. जितन्द्रिय गनुप्म बड़ी दुप्माप्य ज्ञानरूपी महाऔषधीको पाकर वुःखरूपी चड़ेरोगको उसमे काटे । २० । घोर दुःखसे वैसे ननो पराक्रम छुड़ानाहै नधन मित्रऔर मुहृद्गण बुहाते हैं जमे कि जितेन्द्रियात्मा छुडानाहै ! २१ । हे भरतवंशी इसकारण से सवभावाको भीतिमें निपय होकर मुन्दर प्रकृतिको पाकर नितीन्द्रियपनात्याग और सावधानीको प्राप्तकर यह वनवमके घोडे । २१ राजाजीपुरुष मृत्यु के भयको त्यागकरके domi, dves not conne back. 15. Hs torms with the Rheel, but does But lube scases with it. à wise man should try to release himself from the world without idlo ness and mistako ar thore shall be raised from it a, treo baving hundreds of branches He who has control over sensuswho is free fiom ararice, and who is satisfied and truthful, gata peace of mind. Remorse gites pain and gjan in the medicinc of all paina. Ond having control over organe, haritg got the great medicine ol giyan, should cut away all disease with it, 20. Neither praw@A, LIOC Kalth or fi ends giro atlief fiem ir ble ng dues the contulurer senses. Let ono theilfore love all the world with contrclo: leve(P, resignatia and carefuluers nbich ae tho Lucca of Bi alm. Heplo girib up all fear 7368) Mababharat (७३६८) माप भारत । दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्राह्मणो हया. ॥ २२ ॥ शीलरश्मिसमा युक्त स्थितो यो मानसे रथे । त्यक्त्वा मृत्युभय राजन ग्रहलाक स गच्छति ॥ २३ ॥ समय सर्वभूतेभ्यो यो ददाति महोपते । स गच्छति पर स्थान विष्णो. पदमनामषम ॥ २४ ॥ न तत् सहस्र नोपवाशश्च नित्यश । अमयस्य हि दानेन यत् फल प्राप्त पानर' ॥ २५ ॥ नधात्मन प्रियतर किञ्चित् भूतेषु निश्चितम् । अनिष्ट सर्वभूतानां मरण नाम भारत । नस्मात् सर्वेषु भूतेषु दया कार्या विपश्चिता ॥ २६ ॥ नानामोहस मायुक्ता बुद्धिजालेन सहता । असक्षेमदृष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्र तत्र ह । समुहमा एष धीराबजन्ति ब्रह्मसात्मताम ॥२७॥ इति स्त्रीपर्वाण जलमादानिकपर्वणि धृतराष्ट्रकोकापनोदने सक्षमोध्यायः ॥ ७ शीतल किरणों से युक्त चित्तरूपी स्थपर नियतहै वह ब्रह्मलोकको पाताहै। २३॥ और ना पुरुप सबजीयों को निर्भयता देताहै वह सर्वव्यापी परमेश्वर के उस उत्तम स्थानको मत है जोकिमायाकी उपाधियों से रहित है । २४ । मनुष्यजो निर्भयता देने से फलपानाहै वहहजारॉयज्ञ और सदैव व्रतोंके भीकरने से नहीं पासक्ताहार५। जीवोंमें मामास प्राधिक कोई प्यारा नहीं हेभरतपशी सरजीवोंका अप्रिय मरण नामहे इसई तुसे ज्ञानीको सयजीवोंपर दयाकाना चाहिये । २६॥ नानाप्रकारके मोहसे युक्त प्रज्ञान के जालसे ढकेहुये अल्पदृष्टो निबुद्धी मनुष्य जहाँ घूमत है हेराजा मूक्ष्मदृष्टिवाले ज्ञानी सनातनमको पातेहै ॥ २७ । -- of dcath and stands on the car of mind with cold rays gets the region of Brahim. He wlio relievoz others from fear, goes to the region of tho Omnipresent who 1 free from all blemisies A merit wbich such min gots 18 not obtainable by thousands of sacrificices and vows. Nothing 13 dearur thaa self, and nothing is moro alverse thaa death therefore 0 16 shoull b: mercifal to all Folish mont, in the Moshes of igu iance Tous hors and there, wluila Syanis obtain tho region of Brabus" 27 -- . ७३६९) Stri Paj v स्राव 17369" शम्पायन उवाच । विदुरस्य तु तवाय निशन्य कुरुसत्तमापुत्रशोकाभिसप्तन्तः पपात भुश मूर्छितः ॥ १॥ तं तथापतित भूमी निःसंज्ञ प्रेक्ष्य वाम्बाः । कृष्णद्वैपाय मश्चैव क्षता च विदुरस्तथा । समयः मुहदश्चान्ये वास्था ये चास सम्मता: ॥२॥ जलेन सुखशीतेन तालवृतश्च भारत । पस्पश्च करेगांत्र राज्यमानाश्च यत्नतः । आश्वास्तुविरं फालं धृतराष्ट्र तथागतम् ॥ ॥ अथ दोधस्य कालस्य सम्यसंशो महीपतिः । विललाप चिरं कालं पुत्राधिभरपिप्लुतः ॥ ५ ॥ धिगस्तु खलु मानुष्य मानुष्यंच परिग्रहम् । यतो मूलानि दुःखानि सन्ति मुहुर्मुहु ॥ ६ ॥ पुत्रनाशेऽर्थ नाशे व झातिसम्बन्धिनामय । प्राप्यते मुमहदु विधाग्निप्रतिम चिमो ॥ ७॥ येन बान्ति गात्राणि येन प्रज्ञा विनश्यति । येनाभिभून रु मरण पहु मन्यते ॥ ८ ॥ तदिदं व्यसन प्राप्तं मया माग्यविपर्ययात् । यस्यान्त नाविगच्छामि ऋते प्राणविप श्रध्याप।८॥ वैशम्पायन बोले किरानाधृतराष्ट्र विदुरजी के इसवचनकोंमुनकर पुत्रशोक से दुखी और मूविान होकर पृथ्वी पर गिरपड़ा । । । सब वान्या ज्यामजी विदुरजी समय अन्य सहद द्वारसाल और जोर उसके अङ्गीकृत थे उन सवते उस प्रकार पृथ्वीपर पड़ेदुये अचन उस धृतराष्ट्र को देखकर सुखदाई शीतल जलसे छिड़का और पंखोंसे हवाकरी और उपायों से चैतन्य करतेहुये उन लोगोंने हाथों से शरीर को,स्पर्श किया इसके पीछे उसदशायाले धृतराष्ट्रको बहुत देरतक विज्ञासकराया । ४ । फिर बहुत देरके पीछे सचेतताको पानेवाले वह पुत्रशोक से युक्त गजा धृतराष्ट्र बहुत देरतक विलाप करनेवाला हुआ। ५ । निश्चय करके मनुष्योंमें जन्म को और नरलोकों में परिग्रहको धिक्कारहे जिससे कि दुखकामूल बारम्बार उत्पन्न होताहै । ६ । हे समर्थ पुत्र धन ज्ञानवाले और नातेदारों का भी नाश होताहै 101 जिसस सर्वभग भस्महोकर वृद्धिकाभी नाशहोताहै और जिससे भयभीत-मनुष्य मरणको बहुत मानताहै । ८ । सोयह दुख मारब्धके विपरीततासे मैंने पायाहै प्राण स्पागके सिवाय उप्तके अन्तको अन्य किसी प्रकारसे नहींपागहूं ।९। मैं उसी प्रकारकरूंगा हे बाह्मणाम श्रेष्ठ व्यासजी देखो उसधृतराष्ट्र ने बड़े ब्रह्मशानी महात्मा CHAPTIR VIII Vaisbaw payan said, "Having heard the words of Vidur, Dhritrashtra fell down on earth senseless for the grief of his song. All the kinsmen with Vyas, Vidur, Sanjaya and other friends sprinkled cold water ovor him and fanned him. They tried their leat to bring him to consciousn033 and touched bis body with their banda, consoling him all the while. Theu coming to consciousness, ha lamented long the death of his sons * Fio on me and op my manhood, 'tried be, " for al; this is A Buurca of trouble. The destruction of sons, wealth and biasmen is liko poison or fire. Limbs of the body burn with . 5.
370 dlalabharat .(७३७० यात् ॥९॥ तच्चवाई करपालि अबै र द्वितमानम । इत्युक्त्वा तु महात्मान पितरं प्रवाविचमम् ॥ १० ॥ धृतराष्ट्रोऽमम्मदः शोश परमं गतः । अभूच ताणी राजामौ यापयानो महीपा । ११॥ तस्य तद्वचनं च या कृष्णदापनः प्रभुः । पुत्र शोकाभिसनन्तप्त पुत्रं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥ व्याम उवाच । श्राराष्ट्र महावाही यस्वा पाीि तशृणु । मभनास मेधावी धर्मार्थकुशलः प्रभो ॥ १३ वषि दित किविद्वेदितव्य परन्तप । अनि त्यताहि मधान विजानासि न संभ्यः ॥ १४ ॥ अधुचे जीवलोके, स्याने पाश इतने सति । जीविने मरणान्तर करमारोपसि भारत ॥ १५ ॥ प्रत्यक्ष तव राजेन्द्र पैरस्यास्य समुद्यः । पुत्रं ते कारण करवा काल पोगेन कारितः ॥ १६ ॥ अवश्यं भवितव्ये च कुरुणा पेशसे नृप । करमाटोचति तान शरान गतान् परमिकां गतिम ॥ १७ ॥ जानताच मशायाहो विदुरेण महामना! पितासे यह कहकर अचेतनाको पाकेवड़े शाकको पाया मर्याद वह राणा तराष्ट्र ध्यानकरताहुआ मौन होगया ।११। प्रभु व्यासजी उसके उसाचनको सुनकर पुत्रशोकसे दुखी अपने.पुत्रसे यह वचन शेले । १३ । हेमहावाहु इतराष्ट्र जोकर उसको मुनी तुम शाम्रज्ञ और शास्त्रों के स्मरण रखनेवाले बुदिके स्वामी औरधर्म अर्थमें भी कुशलहो । १३ । हे शत्रुओंके तपानेवाले तुझम काई वात भात नहीं है। बड़े ज्ञानी तुम जीवधारियों की अनित्यनाको जानते हो हे भरतयंत्री इस विनाशवान् जीवलोकमें विनाशवान निवास स्थान के होनेपर जीवन और सत्युमें किस निमिच शोचते हो । १५ । हे रोजन्द्र इस शत्रुता की प्रत्यक्षता आपके रष्टिगोचर है कालयोगसे चापके पुत्रका कारण बनाउर समारेकये ।१६॥ गाजा कौरवोंको अवश्य भावी नाश होनेपर उनपरपमान पानेसाले वीरों को किस हेतुसे शोचतेहो । १७ । हेमहावाहु राजाधृतराष्ट्र मैंने और बुद्धिमान पिपुरने भी समकार से सन्धि उपाय किया । १८ । बहुतकासक उद्योग करनेवाले किसी नीरसेभी देवका रचाहुमा मार्ग मेरेमामे बन्दकरने के सम्पनी है । १९ । मन अपने नेत्रों के समक्षमें देवताओंका मोकार्य सुना मैं उसको उसी प्रकास कहलाई जिससे कि तेरी स्थिर बुद्धिहोय । २० । यहावट मे रहित में एकममय वही जीव griel asi wisduiu is destroyed, causing ono tu desire for death. I have got through all this truallu by tho viocissitulu of Titdu and 103 110 relict oxcept in death. I shall die, Vyas, " 10. Having said big to Vy, Dhritrashtra again fainted and became eilanl. Vyas was much atriated with his sorrow and stil, Jlrar inDhritroshtra, for your ars learood and wiso and liavo oxporions of the world. Vulling is hidden from you, destroyer of fous. You know the mortalcaturu of beings. Why dogou griuvo at duath? 15. You know of the Comity. All men wcroslain GD Amount of your scr. But thodeslletion of Stra Pur नाग 172711 पनि सयमन शमं ति जनेश्वर ॥ १८५न च देवहतो मार्गः शया भूतन केन विटापिदिर कासं मियन्तुमीत में मतिः । ॥ देवतमा हि यत् कार्य मया पहला चुतम | Bए संप्रवरपामि कथं स्णय भसय ॥ १० ॥ पुरा त्यति वोसमागेन्द्र जितपटमः | अपश्यं तत्र च तदा समयतान दिपसः १ नारद प्रभावापि सर्व देशपषोनम । तत्रापि मया एण्ट्वा पृथिवी पूर्थिवापत ॥ २२ ॥ काबधिमुपसमाया देताना समीपत: उपगम्य दा यात्री देवामाARITA ॥२३॥पर काम्बममयुप्मामिब्रह्मणः सरने तदा प्रतिज्ञात मामागास्नानं संविधीय हार २६: स्वातने श्रुत्या विष्णुलोकनमाकृतः । उपाध पाल्य प्रहसन पृथिवी देवरसदि ॥२५॥तगष्ट्रस्य पुनर्णा यस्तु ध्यतः शालय ये । दुर्योधन दतियातास कामरिमनि ॥२६॥ य मसीपाल समस्या भविष्यात पाय पृथि सारे ता में मपा और सप ठेदेशाका देखा । ११ । राजा बहार न पारददिक साक्ष देवऋषियों को और पृथ्वीकोमी देवा । १२ । यह समिर परमकार्य निमिन्दादिरू देवधानों के सम्मुख वर्षमानहुये तर पृथ्वी सनीपार एन इकठे देवतांभोंसे करा । २१ कि महाभाग देवता जोगीपार लोगोंने प्रससोफमें गिस मेरेकार्य करने की प्रतिज्ञाकी है उसको शीघ्र करो । १४ । छोफपूजित पिनुनी ऐसभा उसके उसवचनको, एनकर सतेहुये इस बार परन पोले । २६ । धृतरार के सौ पेटाम घड़ा वेदादुर्योधन नामसे पसिया देवस कार्म करना । १६ । इस रामाने पाकर अभीष्ट माप्तकरेगी एक परिपसेजमें इकठहोपाल भार इसमोरो महार करनेवाले राजालोग पर सा मारेकरी इतम पद में रे भारकानाशहोगा। १८ । हे शोभा वान श्री भानपानको भायो और पुष्टिको धारण करो । १९ । हेरानाओं the Kauravas was unayoidable; way do you grieve for those who have gut god regions ? las pell as Vidur tried our best to make poaco. Pho decrees of Fate cannot be angulted by ang buwan etort. For your satiafuation I tell you what I myself saw in the assemb:y of goda. 20. Once I went to the conrt of Indra without being tired. Thero I saw Namd and other risbia as fyell as our Laith. All the gods wero assombled there for their respective businesses She then Approached the gods and thus addressed them," dlake haate, O gods, to fulfil the promise you made regardı.g main the region of Brabu. Visbea, respected by the world, said to lier with a smie, Duryo. dhan the eldest son of Dbritrashtra will do thy work. 26. You will gain your abject through bim : the assen: bled: kings will fight at Kurukshetra and siiall relieve you of your burden. Go to your placer and keep on «upporting the world. Your soa Duryndhau was bura [(7372) Mahabharat (७३३२ चौपालाः कुरुक्षेत्रे सरगतः ॥२७। अन्योन्य घानायमान हाशले प्रहारिणः । ततस्ते विदिद देघि भारस्पयुधे नाशनम् ॥ २८ ॥ गच्छ शीघ्र स्व स्थान लोक धारय शोभंग ॥२९॥ य एप ते सुतो राजन लोकसहारकारणात । कलेरंश, समुपको गान्धार्या जठरे नूप ॥ ३०॥ भमर्पा चपलश्चापि शोधनो तुप्रसादनः । दैवयोगात समुत्पना भ्रातरश्चास्य तारशाः ॥ ३१ शकुनिर्मातुलश्चैर फर्णश्च परमः सखा । समुत्पना नीशार्थ पृयिव्यां सहिता नेताः ॥ ३२ ॥ यादृशो जोयत राजा ताशस्य जना भवेत् । मधमा घर्मतांयाति स्वामी शामिफो भवेत् ॥ ३३॥ धामगा गुणे दोपाभ्यां भृत्याः स्युनात्र संशयः । दुष्ट राजनमासाघ गतास्ते तनयाय ३४ । एत म हावाहो नारदो घेद तत्ववित् । आत्मापराधात पुत्रास्ते विनष्टाः पृथिवीगते । मा तान शोचस्व राजेन्द्र नहि शोकेऽस्ति कारणम् ॥ ३५॥न नि ते पाण्डवाः स्पलाम पराध्यन्ति भारत । पुत्रास्तवदुरात्मानो वरिपं घातिता म६॥ ३६।। नारदेन च भद्रन्ते श्रेष्ठ राना धृतगटू संसारक नाशके कारण से वह तेरापुत्र कलियुग अंश गान्धारी में उत्पन्न हुआथा। १० । जोकि प्रशान्त चपल क्रोधका अभ्यासी और दुम्बसे पराजय होनेवालाधा देवगोगने उसकमाईगी उप्ती प्रकारके उत्पन्न हुपे । ३१ । मौर मामा शकुनी और बड़ामित्रकर्ण और बहुतो राजालोग संसारके नाशके नि. मिप उत्पन्नहुये । ३२ जैसा राना उत्पन्न होताहै उसीप्रकार के उलेकभादमी भी उत्पन्नहोते जास्वामी धर्मका अभ्यासी होताईउस दशाम अधर्म भी धर्मताको पाता है। मामयों के गुण दोपों से निस्सन्देह उत्तीप्रकार के नौकर चाकर होंगे हेराजा तेरे पुत्र दुष्टाना को पाकर इस संसार सेगये हे महावाहु नारदजी इसमयोजनको मुख्ता समेत जानते भरतवंशी मेरे पुत्र भएन अपराधसे नष्टहुए उनका शोचमवार । ३५ । पाण्डव योदामी अपराध नहीं करते जिन्होंके हाथसेया सब संसार मारागपा । ३६ ( तेरा भलाहोय प्रथमही राजमूल्यसमें नारदजीने य. पिटिरको सभामें वर्णन कियाथा ३७ । कि हे कुन्तीके पुत्र याधष्ठिर कुछकाल पीय कौरव और पाएडय पास्पर सम्मुख होकर नाशको पायेंगे जो तो करने के योग्य of Kali and Gandhari'lo destroy the world. 30. Ho way dissatissed, rash and invincible. His brothers too, wers of his mind. is uncle Shubuni, bis friend Karan and other princes too were born to destroy tuo world. Tbo dubjiets uro bike hius, while, they speedily like to his Lad habits, Tby sons departed from the world for the fault of tby son who was thier king Narad knows this well. Thy vis woro destroyed by b.er faults. No not grired for them, 35, Tio Pandavas havo couuitled to fault in destroying the world Narail haul (pro. told it at the Rajsusa tacritic of Y'vulubitlir that the Kuusassi and । Btra Parvत्रीय (1873, पूर्वमेष म संशयः । युधिारिस्म समिती राजम्ये निवेदितम् ॥ ३७ ॥ पाषा' कौरवार मसमासाद्य परस्परम् । न मषिप्रन्ति कौन्तेय यो कृत्यं तदाधर ॥ ३८॥ नारदस्य वधः भुत्वा तदाशोधन्त पारा एवं ते सर्यमाख्यानं घेवगृह्य सनातनम ।। ३९॥ कप ते शोकनाशा स्पा मापाचपा प्रभो। स्नदेव पाण्डपनेषु शास्ता दैवहत विधिम् ॥४० ॥ एष वा महालाहो पूर्वमेव मया श्रुतः । कथितो धर्मराक्षस राजसूये क्रतूतमे ॥४१॥ पतित पासपुरेण मया गुह्ये निवेदिते । अविग्रहे कारयाणा देवन्तु घलयातरम ॥ ४२ ॥ मनसि कमनीपो हि विधी राजन् कथाधन । रुसान्तस्य तु भूतेन स्थावरेण प्रसेन च ॥ ४३१ भयान् धर्मपरो पत्र पुचिश्रेष्ठश्च भारत । मुद्यते प्राणिनां भात्या गतिश्चागतिमेष प॥४४॥ यान्तु शोकेन सन्तप्त मुद्यमान मुइ । भात्या युधिष्ठिरो राजा प्राधानपि परित्यजेत् ॥ ४५ ॥ कृपालुनित्यशो धीरस्तिग्योनि गतेपपि स क स्वपि रामेन्ट पेन करिम्पति १ ४६॥ मग धेय नियोगेन विध याप्यनिषनात् । पाण्डवाना कारुण्यात प्राणान्धारय भारत । ४ा एवं संवर्गमा है उसको कर । १८ । तव पांडवोंने नारदजी के पवनको सुनकर शोच कियाया देवताओंकी गुप्त मौर सनातन पातें मैंने तुमसे कहीं। १९ । भवतू अपने माणों पर दया और पाण्डशेपर प्रीतिकर जिससे किदेवके कर्मको मानकर तेरा शोक दरहोय । ४० । हेमहावाहू पहात मैंने प्रपमरी सुनीथी जो किधर्मराजके उत्तम राजसूय में कही गईथी ।।१एझमे गुप्त बातके कहनेपर धर्मके पुअनेकौरयों के युद्ध नहीने में उपाय किये परन्तु देव बड़ा प्रबलहै । १२ । हेराजा कालकी रची हुई जो सनासन विधिहै यह इमलोकमें किसी जीवधारी से चलंघन करने के योग्य नहीं है । ४३ । हेभरतवंशी धर्मात्मा थाप प्राणियों की गति और भगतियाँको भी जानकर इन अचेत होतेही धर्मात्मा । ४४ । राजा युधिष्ठिर तुमको शोक से दुखी और वारवार अचेन होनपाला मानकर अपने माणोंको भान्याग करसक्ता है। ४५ । वह धैर्यवान सदैव पशु पक्षियोंपरभी दयाका करनेवालाहै हेरागेन्द्र वह तुझपर कैसकपानहीं करेमा । १५ । हे भरतवंशी मेरी माज्ञा देवके उल्लंघन न होने से और पाराहाकी दयासे माषों को धारण करो। ४७ । इसप्रकार लोक में the Pandayan would be destroyed by the hand of each other, and the Pandavas wero sorry for it. I have kuld you that secret of gods Now feel mercy ou your own life and love the Pundavus so that your grief inay abate by the knowledge that it was the work of God 40. I was already awaro of the words told at the Rajsuya sacrifice of Yudhishthir. Kuowing this secret from me, Yudhialıtır working of Fate is powerful., It can not be annulled by any one. You lose your senses, though you know the course of living beings. Knowing yoa in such distrers of muod, Yudbishthir may losy his life 45, He w-moreful th beasts tried to •mal peace, but tho and 14374) Baliabharat (७३७४) नस्य लोके हीतिमविश्पति घायः सुमहांस्तात तप्त स्याच तपश्चिात् । ४८ ॥ पुत्रशोक समुपात हुताशंज्वलित यथा । प्रशाम्भसा महाराज विर्वापय सदा सदा ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच। तत् श्रुत्वा तम्प पचन व्यासस्यामिततेजसः । मुहूर्त समनुध्याय राष्ट्रोऽध्यम रन ॥ ५० ॥ महता शोकजालेन प्रमोसन दिलोत्तम | नारमानमवबुध्यामि मुह्य नानो मुहुनेहः ॥५. ॥ इदन्तु वचनं श्रुत्ता तब देवगियोग जम् । धारयिष्याम्यह प्राधान् घटियेन तु शोचितम् ॥ ५३॥ एतत् शुत्या व पवन व्यास प्रत्यरतोयुत । धतराष्ट्रस्य राजेन्द्र तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५३ ॥ - शनि स्त्रीपर्वणि जलमादानिकग का ट्रशोकापन पनेअष्टमोध्यायः ॥ ८ ॥ तुझ वत्तपान रहनेवाले की कीर्ति होगी भोर हेतात बड़ा धर्म और बहुकालतक वपाहुमा तप पास होगा। १८ । हेमहागज ज्वलितरूप अग्निके समान उत्पम रोने वाले पुत्रशोकको ज्ञानरूपी जलसे शान्त करने के योन्यहो । ४९ वैशम्पायन बोके किधृतराष्ट्र उन बड़ेतेनी वासना के इस वचनको सुनकर एक मुर्च बच्चे मकार ध्यानकरके कहा ॥२०॥ किहे द्विजोत्तम मैं बड़े शोक जालसे कठिन कामा वारम्बार अचेत होता सचेतता में मही आगाहूं। ५१ । देवकी माज्ञासे उत्तम होनेवाले आपके इसयचनको सुनकर मैं प्राण को धारण करूगा और शोध करने मटत्त नहीं हूंगा । ५१ । हेरानन्द सर १५ती के पुत्र गासजी धृतराष्ट्र के इसवचनको मनार स्थानमें पन्तान होगये । ५३ ।। birily, why should lio not bo kind to gnu ! living rogard to iny words, the power of l'utz aud p ty tynurds the Pandavas, you should Bustaia 1.fo. You will thus be famous in the world and will Atturo geas na 3rit. You should quunch tho firs of your grof by tho wator of wisdom." Vaislamıpıyan said that having heard the words of glorious VysR, Dhritrashura thought lor annu time and said. 30" 1 an tog puch pressed by grief and again and agaio loro my sonsca, iut I sliall live to obey you and shall not plunge in griel" Haring heard there words Vyas disappoand trea and there. " 53. your ७३७५] Stri Paty स्त्राव (7275) जनमेजय उवाच । गते भगवति गास धृतराष्ट्रो महीपतिः। किमचेष्टत विर्ष तमे पाण्यातुमर्हसि ॥ १॥ तथैव कौरवो राजा धम्मात्रा महामनाः । कृपप्रस्तय बघ किमकुवत ते त्रयः ॥ २॥ मायाग्नः श्रुतं कर्म शापा-योन्यकारितः वा तमुमरं माह यदभापत सञ्जयः॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच । हते दुर्योधनेष हते सैन्ये व संवंश सिजयो भिगतप्रज्ञो धतराष्ट्रपस्थितः ॥ ४ ॥ सम्जप उपाय। मागम्य नानादेभ्यो नानाजनपदेश्वराः। पितृलोक गता गजन सधै तब सुः सह ॥५॥ पुत्राणामय पौत्राणां पितृणाञ्च महीपत मानुपग सर्वेषो प्रेतकापाणि कारय ॥ वैशमायन उवाच । तच्या पचन घोरं सञ्जयस्य महीपतिः। गता मुरिव निधष्टो न्यपतत् पृषिधीनले । तं शमानमुपागम्य पृथिव्यां पृथिवीपतिमा विदुः सर्पधांत इदं वचनमब्रवीत् ॥८॥ उत्तिष्ठ राजन् कि शेपे मा शुचो भातमः। अध्याय ९॥ जनमे जरा घोले हे ब्रह्माप भगवान् व्यासजी के जानेपर राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया वह मुझने कहनेको पोग्यहो । १ । उतापकार धर्मपुत्र बड़े साहसी रामा पोधष्ठिर और कृपाचार्यादिक तीनोंने क्या किया रामश्वत्थामा का कर्ममुना और परस्पर दियाहुभा शाप सना अब आप उस पूर्व वृत्तान्तको कहिय निसगे सज्जयने कहाहै ।।। वैशम्पायन वाले कि दुर्योधन के और सब सेनाके मरनेपर अवत सजय धृतराष्ट्र केपास माये ।।। हे राजा सव राजा नाना देशोंमे आकर अ.पके पुत्रों समेत पितृलोकोंको गये ५ । हेराना पुत्र पौत्र भार पिता आदिक जो रणभूमि में मरहें उनसव के कोंको क्रमपूर्वक करावो । ६ । वैशम्पायन बोले रामाधृतराष्ट्र सञ्जयके उपचार वचनको सुनकर निजीवके समानानश्चष्टहोकर पृथ्वीपर गिगपड़ा । ७ सत्र धोके शाता दुरनो उम पृथ्वीपर मानेवाले राजाके पास पाकर इस वचनको बोले । ८ । हे मरतर्षभ लोकेश्वर रानाधृतराष्ट्र उगंशोच CHAPTER IX Janmojaya sid, • Wint vid Dhiritrashtra do at the departure of Vyas ! Pray till 100 All that ha as well as brave Yu Shishthir and tho thrwe warrio.8, Kripache.rya and others did. I have heard the exploidi of Asliwatham. and the mutual curbs, pray tell mo what happenod muxt ng you burd it from Sinnya," Vaishampayan Baid, " At the de#truction of Duryodhan and his ariny Sanjaya came ta Dhritraulilia and said, "All the p inces who had.come here from rurious countries gone to the train of Yamu; perlroin the best qui:3 vf your evar, grand-ons and eders whoded in the war." Vashainpopan says that on lucario: tholieart runding words of Sinjaja, Dnritrashira fell down on tbobosth like and imagjiate thing. 7 Vuur the virtuous camo to him and ma'd." Riso np Dhritmashtra anillo dot grior. This is the - HATO [1374) Maliabbarat (७३७४) नस्य लोक नीतिविपनि घायः सुमहाँस्तात तप्तं स्यानच तपश्चिरात् ॥ ८॥ पुत्रशोक समुत्पन्न हुताशं ज्यलिन यथा । प्रशाम्भसा महाराज विर्धापय सदा सदा ॥ ४९ ॥ वैशम्पायन उवाच। तत् श्रुत्वा तम्प पचन व्यासस्यामिततेजसः । मुहर्स समनुध्याय राष्ट्रोऽध्यम पन ॥ ५० ॥ महता शोकजालेन प्रणुमोसम दिनोत्त। नात्मानमवबुध्यामि मुह्यमानो मुहुनेहुः ॥५. ॥ इदन्तु वचनं श्रुत्या तब देवनियोग जम् । धारयिष्याम्यह प्राधान् घटियेन तु शौचितम् ॥ ५९॥ एतत् शुध्धा व पचन व्यासः सत्यवतोयुत । धृतराष्ट्रस्य राजेन्द्र तत्रवान्तरधीयत ॥ ५३ ॥ इव स्त्रीपणि जलमादानिकग धृतरा टोकापन पनेअष्टमोध्यायः ॥ ८ ॥ तुझ वर्तमान रहनेवाले की कीर्ति होगी भोर हेतात बड़ा धर्म और बहुकालतक सपाहुभा वप मातहोगा। महाराज ज्वलितम्प अग्निके समान उत्पनरोने वाले पुत्रशोकको ज्ञानरूपी जलसे शान्त करने के योग्यो । ४९ वैशम्पायन बोके किधृतराष्ट्र उन बड़ेतेजसी गासनी के इस वचनको मुनकर एक मुहूर्त अच्छे मकार ध्यान करके कहा ॥२०॥ कि द्विजोत्तम मैं बड़े शोक जालसे कठिन ढकाहुआ बारम्बार अचेत होता सचेतता में महीं आगाहूं । ५१ । दैवकी आज्ञासे उत्तम होनेवाले आपके इसवचन को सुनकर मैं प्राणों को धारण करूगा और शोध करनेमें मटत नहीं हूंगा । १२ । हेरानेन्द्र सहवती के पुत्र गासनी धृतराष्ट्र के इसवचनको धनकर स्थानमें अन्तर्दान होगये । ५३ ।। birils, why should be out bo kind to you ! Having regard to any words, the power of Tate aud p ty turls thu Pandavas, you should sustain your life. You will thus by famous in tho world and will scal murit. You should quonch the firs of your grief by the wator of wisdom. " Vaishampayan said that having heard the words of glorious Yysa, Dhritrashura thought for some tims and aaid. 50 " ] am too much pressed by grief and again nad agaio loro my soner, but I shall liva to obey you and shall not plunge in grief." Having heard those words, Vyas disappoared user and there." 53. attaig - Stri Puस्त्राग (7275) जनमेजय उवाच । गते भगवति गास धृतराष्ट्रो महीपतिः। किमचेष्टत धिप तामे पाण्यातुमर्हसि ॥ १॥ तथैव गैरवो राजा धर्मत्रो महागनाः । कृपप्रमृतप किमकुर्वत ते त्रयः ॥ २ ॥ अमादाग्न. श्रुतं कर्म शापमान्योन्यकारितः । वो तमुमरं हि यदभाषत समयः ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच । हते दुर्योधनेचेषाहते सैन्ये च सवंश । सञ्जयो विगतप्रज्ञो धृतराष्ट्रमुपस्थितः ॥ ॥ सम्जय उवाच । आमम्प नानादेशेभ्यो नानाजनपदेश्नराः । पितृलोकं गता राजन् सर्वे तब मुरैः सह ॥५॥ पुत्राणामय पोत्राणां पितृणाञ्च महीपत ।मानुपूण सर्वेषां प्रेतकारीणि कारय ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच । तच्छ्न्वा पचन घोरं सञ्जयस महीपतिः। गता सुरिव निश्चयपतत् पृथिवीनले ॥ ७ ते शथानमुपागम्य पृथिव्यां पृथिवीपतिमा विदुर सर्वधर्म इदं वचनमबधीत ॥८॥ उत्तिष्ठ राजन मिशेष मा शुचो भरतर्षभः। 4 अध्याय ९॥ जनमे जर घोले हे ब्रह्मा भगवान् व्यासजी के जानेपर राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया वह मुझने कहनेको पोग्यहो । १ । उसीमकार धर्मपुत्र बड़े साहसी राजा पोष्ठिर और कपाचार्यादिक तानोंने क्या किया राप्रश्वत्थामा का कर्ममुना और परस्सर दियाहुआ शाप सुना अब आप उस पूर्व वृत्तान्तको काहय निसगे मजयने कहाहै । । । वैशम्पायन वाले के दुर्योधन के और सब सेनाके मरनेपर अनंत सजय धृतराष्ट्र केपास पाये। । हे राजा सव राजा नाना देशोंमे आकर अ.पके पुत्रों समेत पितृलोकाको गये ५ । राजा पुत्र पौत्र और पिता आदिक जा रणभूमि में मरहें उनसव के कर्मोको क्रमपूर्वक करण्यो । ६ । वैशम्पायन बोले कि रानाधृतराष्ट्र सञ्जयके उमघार वचनको सुनकर निषक समानानश्चष्टहोकर पृथ्वीपर गिरगड़ा । ७ सर धपोंके माता बिदुरजो र पृथीपर सानेवाले राजाके पास पाकर इस वचनको घोले । ८ । हे मरतर्षभ लोकेश्वर रानाधृतराष्ट्र उगेशोच CHAPTERIX Jarmojnys snid. “ Wlint did Dhritrashtra do at tho departure of Vynt. Pny sumnal.tiyas. baag well.ashrava dulhislutsuxantar three Warriors, Kripacherya and others did I have heard this exploits of Ashwathams and the mutual currez, pray tell mo what happened Dext as you hart it from Sinjaya. " Vaishampayan said, " At the destruction of Duryodhan and his army Sanjays came to Dhritrasatia and said, "All tho pincos wlio had come liere from various countries haso, vne to tho reulon of Yam; perlroin the ubaquita of your 2008, grand-ons and elders who ded in the war." Vastampipali says that ou learing the heart runding words of Sanjaya, Dhuitragh tra fell down on iho barth like and inanimata thing. 7. Vidur rhe virtdous came to him ardaad." Riso np Dhritmaht an be dot grioval. This is the 1 17376 Alahabharat (७३७६] एषा ये सबससानां लोफेश्वर परा गति ॥९॥क्षत्रियास्ते महात्मान शराः समितिशो भगा । आशिप परमां माता न शोध्याः सर्व एव हि ॥१०॥सारमनात्मानमावास्य मा शुषः पुरुषर्षभ ! नाथ शोकाभिभूतस्त्वं कार्यमुत्सृष्टु' इति ॥ ११॥ इति स्त्रीपर्वणि जलपादानिकपर्वणि धृतराष्ट्र शोकापनोदने नवमोध्यायः ॥ १ पैशम्पायन उवाच । विदुरस्य तु तवाक्यं शुत्वा तु भरतपम । युज्यतां वानमि त्युक्त्या पुनर्घचनमीत् ॥ ॥ विप्रमानप गाम्या सर्वाश्च भरतस्त्रिय.। बधू कुन्ती सुपादाय याचान्यास्तत्र पोपितः ॥ २॥ एपमुक्त्या स धर्मात्मा विधुर धर्मवितमम्। शोकविप्रातिलानो यानमेवान्यपद्यत ॥ ३ ॥ गान्धारी पुप्रयोका मसिनोदिता। सद छन्त्या यसो राजा सह निरुपाद्रधर ॥ ४ ॥ ता समाप्ताध राजानं भृश मककगे सब जीवधारियों की यही परमगतिहे । २। उन महात्मा शूर और युद्धको शोभा देगाले प्रतियों ने परमगति को पापा वह सब शोषके योग्य नहीं । १० हे पुस्तम च मे चित्तको विश्वास देकर चोच मतकरी भव शोमें दूबेहयेतुम करना योग्य जम्दानादिक क्रियाके त्यागने के योग्य नहींहो । ११ । अध्याय १०॥ वैशम्पायन बोले कि पुरुषोत्तम धुतरायू विदुरजी के उस पचन को सुनकर | सवारी तैयार करो यह कहकर फिर वचनको वोला । १ । धू कुन्ता आदि अन्य । रात्रियों को लेकर गापारी समेत हर भरतशियों की नियों को शविता । २ । ह धर्मात्मा शोकस इतचित्त बुद्धिमान धृतगष्ठ रहे धर्मवान् विदुरजी से इस प्रकार कहकर समारीपर सवार हुये।।। पति के वचनम चलायमान शोकसे पशि भान्धरी कुन्नी और अन्य सर स्त्रियों समे। वहां गयी जहा राजाधून राष्ट्र! 1१। अत्यन्त शाकयुक्त वह सिषा राजाको पाकर परस्पर सार्तालाप करकेचा- end of all the livin lining. The great warrion, ka huve gone to heaven, ary not northsorry Curly yourself with wisdom and ba 110t grieveil. Dynit luase this ulser plus undon on account of your gr.." 11 --- CII IPTIR X Vislan py in as it lost on m ing spord; of YiJur, Dorst-soliti i urletel on mind to sole cursus ruly and to bring huuli ind otlaus oun mes Gandhari and the workco of tho family.
(१७७] Stri PARTीपर्व 7377 शोबिताः आयशाम्बोजवीयु. सा भृशमुच्चस्तात. ५ | ताः समाधा सबद क्षण साभ्यश्चातरः स्वयम् । अश्रुमन्ठी: समागत्य नतोऽसौ निप्पो पुरात ॥ ॥ प्रणादास्नई सवेषु कुरुधेश्मषु । माकुमारं पुरे सभमच्छौफर्षितम MIN या नायः पुरा देवगणरपि। पृथग्जनेन हरपन्ते तास्तदा निहोस्वराः ॥ ८॥ प्रक्षीय केशान् मुशुमान भूषणान्यामध्यच एकवनपरा नार्थः परिपेतुर यात् ॥९॥शेतपर्वतस्पेनो गुरेभ्यस्तास्त्वपाक्रमन् । गुदाय इस रोजाना पृषत्यो हतस्याः १० तान्युनीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यने. शोकारिष नाज फिशोरीणामिवाङ्गो । ११। प्रगृह्य बाहुन क्रोशरयः पुत्रान भ्रातृन पितुननि। पशयातीय तार स्म युगान्ते लोकसंक्षयम् ।। १२ ॥ विलपन्पो सदस्यश्च धापमाना और बड़े उच्चस्वर से पुकारी । ५। उन नियमि अधिक पाइवान उन विदुरमी ने आंसुओं से पूर्ण उन स्त्रियों को अच्छी रीति से विश्वास कराया और पागक यों में बैठाकर बाहरचले । ५। इसके पीछे कौरवों के सब स्थानों में वड़ाशब्द उत्पन्न हुआ और सत्र नगर लाकों से उद्धोंतक शोकसे पाडावानहुमा । ७ । पूर्व समयमें जो त्रिण देक्समूहों से भी नहीं देखागई थी वह सब विधवा श्री अन्यर. मनुष्यों से भी देसीगई । ४ । शिरके वालोंको फैलाकर और सुन्दर भूषणों को उतार कर एक वस रखनेवाली स्त्रियां अनाथ के समान वाहर निकलों बह नियां श्वत पर्वतों के समान यों से ऐसे निकली जैसे कि पहाड़ों की गुफाओं मे ऐसी हिरणी निकलें जिनके कि यूथप हिरण मारेगये हो । १० । हे राजा तब उन स्त्रियों के बड़े समू शोकसे पाहातान पेमे चले जमे कि घोहियों के बच्चे मैदान में निकलेत हैं । ११ । भुनामों को पकड़ कर पिता भाई और पुत्रों को भीपुकारती हुई प्रलयकालीन संसार के नाशकी दिखलानेवाली हूई । १२ । विलाप करते रोते जहां तहां दौड़ते शोकसे हत्तझान उन वियोंन करने के योग्य कर्मको After this hy mounted his car, Summoned by Dbritrashtra, Grodhari, Kurti and other women came there. Tbo naruwful women went on talking and cryig. 5. Mole full of grief thao the women and with tears in his eyes, le consoled them and made them ride op palanquin. There were great lamenta tiong in the hjuscs of th Kiuruvas and th: city people, young and old, showed signs of grief. The women, who were not vinble even to goda, came out in the presence of all men in their widows' we.ds, Thoy went on with dishelloved hnir, destituto of Ornament, with only ono sloth on the body, like thore having no guardians, They came out of their white houses lile a berd of fi maledeer u ho-e slag is slain. 30 They Weut on cryior has foals Calling out the names of fathers, bruthura And sona, they made a great noise. Crying out and runniog hitlior 1:378] Valahhutat (७३७८] स्त तस्तत. शोफेनाशाहनज्ञानाः कत्तयन प्रजबिरे १३। वे डॉ जग्मु पुरा था: स्म सखीनामपि गोषित । एकरनाञ्च निर्लज्जा सधूणा पुरतोऽभवन् ॥ १५ ॥ पापर मुगु भोगासंयनद ना शोकपिला गजन्न क्षन्त परम्पाम् ॥ १५॥ ताभि घृता राजा रदतामि सहनश नियमो नगरादानस्तूर्णमायोधन प्रति।१६॥ शिीपनो निजी वा स कपिजीविन ते पार्थिव पुरस्कृत्य नियंयनगराद्वहि ।१॥ नासा विक्रोशमानानानाना सक्षय । प्रादुगसी-महान शब्दो यथयन भुवनान्युन । १८ ॥ युगान्तकाले संपाप्ने भूनानांदयनामिव । अभावः स्यादयं प्राप्त इति भूतानि भौगरे । १९ ॥ भशमुद्विग्नमनसस्ते पारा कुरुक्षये माक्रोयन्त महा स्मनुरक्ताम्मदा भूशम्।। २० । इति पांगी माद निरूपाणि नत्र कधृतराष्ट्रस्त पुरान्निाणेदशमोध्यायः१. नहीं जाना । १३ । पूनमय में गिन स्त्रिोंने सखियों की भी लज्जाको पायावा वह एक वस्त्र रखनेवाली बिना परदेवाली स्त्रिया सासों के आगे चली। १४ । राजा जिन्होंने बहुत थोड़े शोकों में परस्पर विश्वाप्त कराया तब उन शोकसे व्याकुल स्त्रियोंने परस्परदेखा । १५ । उन रोनाली हजागें स्त्रियों से घिगहुआ महा दुषी धृतराष्ट् नगरसे चलकर शीघही मैदानमॅगया । १६ । शिली व्यापारी वैश्य और सन कम्मों से निर्वाह करनेवाल यह सप राजाको भागे करके नगरसे बाहर निकले । १७ कोरवोंके नाश उन पाडावान् मोरकारनेवालों के बड़ेशन्द सब भवनोको पाडावान करते पाटहुपे । १८ । जैसे किालयकाल वर्तमान होने पर भानहोनेगले नाराका नाश होना उनीप्रकार इस नाशका भीहोना जीवान माना । १९ । हेपहागन इस कारों के नाशोनारान्तन्याकुल चिद बड़े प्रतिमान वा पुरवासी कठिनतासे पुकारे ॥ २० ॥ and th thor, thy did not kuow what to do Thow yord? who wers alashed ovca before th ric playmintes, now went on unveiled bofu'o thuir myth r- r-'w. They who wore cumpauinni ja tlir grief now Junoutono anthri 15 Stroundri by thousandr of weeping woru n, Dharashtrrt went out in open air. Artrane, merchants, traders and others followed lipir biog Landsting the deatruct on ifth, Khuratar, their nuse was hard fai and wide. They thought thus thu gust destruction of the warriors had boolikothint of pralay*. Tlw atız as lawented ibu gruat distraction of the Kauravas apd cried with a grcat noite. 20.
[७३४९) 8 Pary खापर्व 17379 पैशम्पायन उवाच मांशमा ततो गस्वादशना महारथान् । शारतं जप द्रौणि इतधर्माण मेवचः॥१॥ ते तु हवेव राजा प्रजाचक्षुरमीश्वराम । भचकाटा विनिश्वाप रुदन्तमिदममुवन् ।। २ । सुतस्तत्र महाराज करवा फर्म सुदुष्करम् । गत सानुचरो राजधालोके महीपतिः ॥ ३ ॥ दुर्योधनयनान्मुक्ता बामेय त्रयो रथाः । समन्यत् परिक्षीण सैन्यं ते मरतभ ४॥ इस्ममुवा गजानं कृप शाम हुन । गान्धारी पुत्रशोकामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥ अमी.युध्यमानास्ते घ्नन्त. शनुग भान् इन् । पारकर्माणि कुर्वाना: पुत्रास्ते निधनं गताः ॥ ६॥ ध्रुचं सय लोकास्त निर्मलान् शशनिन्जितान् । भास्वर देवमास्था विधरन्त्यमा इप" 01 नहि की दिशूराणा युध्यमान पामुखः। शर्तण निधन प्राप्को नच कश्चित् काजलि. ॥ ८॥ut पिपरा पुराणाः परमां गतिमा । रामेण निधन संख्ये तन्न थोचि अध्याय । १ वैशम्पायन वाले कि फिर एककोश नाकर उन कपाचार्य अश्वत्थामा और कृतरमो महाराधियोंकोदेखा । १ वह शोकक अश्रुनोमे पूणकराठ से रोदन करतेज्ञान रूप नेत्र रखनेवाले अपनेसामी राजाको देख ही बहुत सास लेकर यहचान बोले ।२। हेमहाराज रानाधृतराष्ट्र आपका पुत्र बड़े कठिन फर्मको करके साथियों समेत इन्द्रलोकको गया।भरतर्षभ दुर्योधनकी सना से हम तीन स्थीवच हैं पिन आपकी सेना नाशहोगई। ४ इसके पीछे शारदन कृपाचार्ग राजासे यह कहकर पुत्र शोकसे पाहावान गान्धारी से यह वचन बोले कि निभर युद्ध करने वाले शामों के बहुत समूहों को मारने वाले चार लोगों के कर्मों को करके पुषोंने परणकोपाया।शनियम करकेवहस्रोंसे विजयीकोदुगे निमल लोकोको पाकर और प्रकाशमान शरीरमें निय तहोकर देवनाओवे समान शिरकरत मनशूरोग कोईशूर धीर मुखफरनेवाला नहीं हुमा किन्तु शस्त्रों से मरणको पाया और हाथ जोड़कर किमीने भी नाश को नहींपाया । ८ । माचीन यूनों ने CHAPTER XL Vaislampapan raid." After going away smile, Kriſzacharsa. Ashwathama and Kritsarma met ons Another, choled with teara, they saw the d'ind king and said to him withi sikha " Yeur son, o ling. has gone to the region uf Indra along with 1119 companions. Qut of that largo at my so three are only oliv, ilin rest are destroyel." Then Kripa haryn stillo Forrowful Gandhary, "Thy sons died after doing brire desis and slaying many foes. G. Surely they live gat puse irgins and roam ile in lupinous bodies liko guds. None of totus turned back from glate Thi-y all dred by teapons and suno sus plicated lis life Suck liad of death lias bera called the lat by die wise and therefore you should cot bo priesed With their voice [73800 Idahub n'at (७१८० तुमईसि १९॥ न चा शालेशमारने राशि पापा । शृणु बम कामस्माभि एषधामपुरोगमः ॥ १०॥ अधर्मेण हत भीमसनम ते भुनम् । मतविरमा विश्य पाइदनं कृतम् । ११ ॥ पादाला मिहनाः स पटपम्मपुगेगमाप दस्थामाष द्रौपदपाश्च परिar १३ ॥ तथा वितसम का पशगजब प्रावधान रणे पातुं नदि शकसामोधः ।। १३ तहिन भोपासा पनि पाण्डवाः । ममपंचशमापना र प्रतिजिरीयः स्वानुजानादि मसिष्ठ बोराममठिा वा शापित Nirahaw १५॥ त्वेष मुफ्या राजानं हत्या भाभिप्रदक्षिणम् । पम् तमीप द्रोगात्रय भारत मक्षमाणा राजाने वृता मनीषिणम् गलाम नमहात्मानस्वर्णभश्यामदोदपत्॥१७॥ ने इसप्रकार युद्धमें प्रस्त्रों से क्षत्रिय के मणको परमपि हेतुमे वह मोषकरके योग्य नहीं हैं।९। राना पन्दोंके पाव पाटभी रदियुक न जपत्यामा जादिक हमलोगों ने जो किया उमको हुमो। १० । धर्म साथ भीमसनके हाथ से तेरे पुत्रको परामा नकर हमलोगों में सोनेहपे लोगों से पुक्क हेरेको पाकर प रहवीय शूरवीरों का नाश किया । ११. सब पांचार जिनका भावी धृष्टद्युम्नया उन सबको मारा रामानुपद के पौर द्रौपदी के सब पुत्रोंको भी मारा । १५ । इसीन से हम बुद्ध में सेरेपुत्र के शत्रुममूहों का नाश करके मामे हैं इस हेतुमे हम तनिों यहां नियत होने को समय नहीं है। । १३ । वह शूरवीर पांडव महापनुपधारी क्रोधके आधीन पात्रुनाका पदला सेने के भमिलापी मार्ग खोज में सीमा से पाये हैं। १४ राणा तुम भामादो और पड़े धेर्य में नियत हो प्रारब्ध के अन्नपर होनेपाकी मृत्युको और पद तीय धर्मको । विचारो। १५१ हे भरतवंशी पाचार्य कृतवर्मा और पर- सापा इन तीनों ने इस प्रकार राना से कहकर मौर मदक्षिणा करके।। for them. TIoir enerates the Pandavas too, are not incrossing. Hear | what wo did to them. 10. Icaring that your son way urjustly sluip by Bhim, wo destroyed the camp of the sleep.rs. All the Pancials headed by Dhruhtadyumn, all the sons of Drupad nnd Draupadi waro slaig by 14 llaving sloin tlie chemies of your son, Wohara fled from before them and therefore can stay hero with you no longer. This Pandavas ecuk rengu and are coming after all Latus go, king. Bo comforted, thinking of death and the holy duties of shatigas 15 faring erill lbia, the throwaision vent round the king and they murrd thuir hotees towards thu Gang, looking gain and again at the king. 17. Going far antay fronu that .
पिव Stri Pary 173811 भपक्रम्य तु तराजन् स एव महारण: । मन्न्यान्योन्यमुद्विग्नासिधा से प्रययुस्ता ११८ बगाम हास्सिनपुरं रूपः शाग्रस्तदा । स्वमेव राष्टं हाईियो द्रौणियाखा श्रमं पा । १९ ॥ ५ ते प्रययुगपक्षमाणाः परस्परम् । ममार्ताः पाण्डुपुत्रापामा गस्कृत्वा महात्मनाम् ॥ २० ॥ समय धीरा राजानं सदावनुदिने रयो । निरजग्मुर्महा राजपपेकमान्दिमाः ॥ २१ ॥ समासाद्य के, द्राणि पण्डुिपुत्रा महारपा म्पजयन्त रणे राजन विकार सदनातरम् ॥ २२ ॥ इति स्त्रीपगि जलमादानिकपणि की दशाध्यापा.॥११॥ बुद्धिमाने रामामृतराष्ट्र को देखते अपने बॉडी को गंगाजो को और पकायमान किया । १७ । हे राजा का महारथी दूर जाकर परसर विदाहोकर व्याकुल विच सोनों तीन ओरको चलदिये । १८ । उनमें से शारदत कृपाचार्य हसिना पुरको और कतरा अपने देशको भौरं असत्यामान्यासजी के भाभम को गये । १९ । इसरीतिमे वह वीर सन महात्मा पांचोंका अपराध करके भपसे पाडावान परस्सर देखते हुने चलदिये । २० । पह शत्रुविजयी महात्मा वीर सूर्योदयते पूर्वही इच्छानुसार चलदिये । ११! हे राजा कृतवर्या और कृपाचार्य से अश्व स्थामा के जुदेशोनेपर उनमहारथी पारयों ने प्रोणाचार्य के पुत्रको पाकर और पराक्रन करके युद्ध में विश्प लिया १९ ॥ place, the thite warriors took leavu of ono another, Kripacharya going towarda Hasthinapur, Kriivarpa to his osa country and Ashwathama to the bermitage of Vyas. Thus they went *way in different directions for fear of the Pandavus whom they had so ofend. d. They went on their ways before duy break. On the separation of Kripacharya and Kritvarkua from Ashwathalus, We l'andavas bad met the son of Drona acd conquered him."
17382) Mahabharat (७३८२ शम्पायन उवाच । हनेषु तेषु सैन्येषु धर्मराजो युधिष्ठिरः । शुश्रुधे पितरं गं निर्याने नागसारवयात् ॥ १॥ साऽऽपयात पुत्रशोका, पुत्रशोकारिष्टमम् । शौच मान महाराज प्रातमा सहिनस्तदा ॥२॥ अन्यायमानो पारेण दाशाहण महात्ममा । युयुधानेन च तथा तथा वैव पुयुमुना ॥ ३ ॥ तमन्धयात् सुधुखाची पदी शोकक पिता । सहपाश्चालयोपिद्भिर्यास्तकासन समागता. ॥ ४॥ स गहामनुवृन्दानि ग्राणां भरतसत्तम ।कुररीणानिधानां कोलीनां ददर्श घ॥५॥ तामिः परिवृतो रामा कोशन्दोमः सहस्रश । ऊध्र्ववाहमरा भी मदतीभि प्रियाध्येि ॥ ६॥ न धर्म शता राज क्व नु सामानृशंसता पदावधीत पितृन नाहन गुरूनपुत्रान सीनपि । घातपिश फर्य द्रोण ine पि पितामह मनलेऽभून्महावाहो हत्या चापि अप प्रथम् ॥ ८ ॥ किं नु गल्षे ते कार्य गित भ्रातून पश्पत। अभिमन्युध दुर्व अध्याय १२ ॥ वैशम्पापन बोले कि सब सेनामों के परनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने हस्तिना पुरसे निकले हुये अपने दापिताको सना ।। हे महाराज तव पुनशोको पाड़ानान वह युधिष्ठिर भाइयों समेत उम पुत्रशोक से पूर्ण वड़ी चिन्तावाले पूत राष्ट्र की औरचला । २। महात्मावोर श्रीकृष्णाजी सात्यकी और युयुत्म इनतीनों समेत चम्ला । और बढ़े दाखोपड़ित शेकमें इरादुई द्रौपदी पाचादीलोंकी उनत्रियों समेत जो वहां भातीय उपके पीछे चनी । ।। ६ भरतपय समने गंगाजी के समीप कुरी पक्षी के समान पनिहोकर पुकारती हुई खिपों के समूहों को देखा ॥ ५ ॥ उन पुकारनेवालो ऊपरको हाध महापीड़ित इनमिय भाषिय वचनों समेत रोनेवाली | हमारों स्त्रियों से बह रामाधृतराष्ट्र पिराहु भा था कि अय राजा युधिष्ठिरकी यह दया और धर्मज्ञता कहां है जो पिता भाई मित्र और गुरुओं के पुत्रोंको भीपारा ।। हे महाबाहु द्रोणाचार्य गभिपितामह और जयद्रयको भी मरवाकर तेराचिच कैसाहुआ । ८। हे भरतवंशी पिता भाई और द्रौपदी के पुत्र और अजेय अभि. CHAPTER Xil Vuinbadanayan sa d," At tlla destruction of the armies Yudhisli. the heard that old Dlustrasktra bad come out, and himself distroeb.d with grief, ho went towards hust!!, with Shree Krisbn, Satyaks and Ynyutsu. Brzed in excessive grief, Draupadi followod tho Pandbal Aho saw the group of wonen crying liko n fual near the Galgie Duritasutra pas surrouoded with the women who werd thus lumenting - "Yudhishthir has flaim fnthera, brother, freinds and proeptur's gone; whoro 18 lus justics on? 7. How dua ha feel altor kutting Drina, Blaisliu and Jayasir 2tk kıllud. Enw will lo rulo xhon futhorr, brothiesa, an I the eons of D aupai and Abhios apyu are so uin!" Yabis-latur unt rol thy bory of tho-o fanenting । women । ७३८३) Stu Parytina 17383, दोपदेयांश भारत। ९ । तीत्य का महाबाहु मोशन्ती कुारीरिव । बयादे पितर ज्येष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिर ॥ १०॥ तताऽभिवाच पिता धर्मेणामिनकर्षणा' न्यवेदयन्त गामानि पाण्यापि सर्वश ॥ ११ ॥ तदात्मजातकरण पिता पुनषधाति । अप्रीय माण शोका पाण्डव परिपस्या ॥ १२ ॥ धर्मराज परिपज्य सान्त्वयित्वा च भारत । दुष्टात्मा मोममा-बच्छन् विधक्षुरिव पाधफ ॥१३॥सापप पिकस्तस्य शोक वायुसमीरितः । भीमसेनमम दाब दियक्ष रिघ दृश्यते॥१४ तस्त्र सकल्पमानाय भीम प्रत्यराम हरि । भीमाक्षिप्य पाणिभ्या प्रददी भीममायसम् ॥ १५ ॥ प्रागय तु महा दुरधुना तस्येङ्गित हरि सम्विधान महाप्राजस्ताप चके जनाईन ॥ १६॥ गृही स्वैव पाणिभ्या भीमसनरायस्मयम् । घमण्ज पलयाजा मन्यमानो वृतांदरम् ॥१७॥ नागायुतवलप्राण सराआ भोममायसग । भरत्या घिथितोरस्क मुस्राव धेर मन्युको न देखनेवाले तुझको राज्य से कौनमयोजन है । ९ ! हे महावाहु धर्मराज युधिष्ठिर ने कुररी पक्षी के समान पुकारनेवालीउन निगोंको उल्लघन करके ताऊ जीको दण्डवतकरी। १० । इसके पीछे शत्रुओं के विजयकग्ने वाले ने नमस्कार करके अपने नामको कहा और उनाव पांडवोंने भी अपना२ नाय वर्णन किया । ११ । पिता और पुत्रों के मानेसे पीडावान ओर अप्रसन शोकदुःखी धृतराष्ट्र अपने पुगेके नाश करनेवाले उमयुधिष्टिर से स्नेह पूर्वक मिला । १२ । है भरत पशी धर्मराजते मिलकर और विश्वास देकर फिर जलानेवाले भोग्न के समान दुष्टत्मा ने भीमसेनको चाहा । १३ । शोफरूप वायुसे चलायान उसके क्रोधकी वह अग्नि भीमसेनरूपी वनको जलाने की अभिलापिणी दिर्खाई पड़ी । १४। हे राजा हरिने भीमसेनके विषय में उप्तके अशुभ सकल्पको मानकरायमही सुगमकर्मी भीकृष्णजी ने वह पूर्ति मँगालीथी । १५ । बड़े बुदिमान श्रीकृष्णजीने मधमही उसकीचष्टासे माहौनेपाल वृत्तान को जानकर और भीममेनको हाथोंसे रोककर लोरेका भीमसेन धृतरापू के हाथ में देदिया । १६ । म लोहे के भीमसेन को हाथोंसे पकड़ कर उसको भीममेन मान कर बलवान राजा ने तोडडाला । १७ । साठ हमार हाथी के वल समान उस वलवान् राजान लोहे के भीमसेन को तोड़ ladies and prostrated himself bsore Dhritrashta He announce ed his own Dam and so did tho other landayas. Greted for thu dentlı of bis 8008 puhappy Dhritra htri received Yudhishthir the destroyer of his Bot affect onately. After entrucing him, the on. ragal prince desired to einbrau Bhini Tanned by ibo wind of grief, the fito ct his fage scomed to consuino the forest of Bhiw's Indy Being aware of his sril intention", wiso and ersy-norking Krawlin ind alı cady sent for an Irco atitue. hnowing what was bopg to happen, Wiso Shri Kritho hold Bhim back with his hands and gare ths uron Dhim into the arms of Dhntreehtra Thinking the status to be 10 15 7381) Mahablarat (७३८४) मुखात् ॥ १८॥ ततः पपात मेदिन्यां तयर रुधिरोक्षितः। प्रपिताप्रशिखर पारिजात इष गुमः : १९ ॥ प्रत्यगृहलाच तं विद्वान मतो गावगाणिस्तदा । मैवमित्यनधीस ने समवन सान्त्वयविध ॥ २० ॥ स तु गो समुत्पूज्य गतमन्युमहात्मना भीमे तिघुकोश नुपः शोफसन्मितः ॥ २१ ॥ तं विदित्वा गतक्रोधं भीमसेनेपादितम। वासुदेवो धरः पुंसामिद वचनमवधीत ॥ २२॥ मा शुषो धृतराष्ट्रं त्वं नैष भीमस्त्वषा हंतः। मायसीप्रतिमा धेषा त्वया राजनिपातिता ॥ २३॥ रवा कोपरामापनं विदिया भरतर्षमा मापक कौन्तेया मृत्योर्दष्ट्रान्तरं गतः ॥२४॥ न हि ते राजशादल घले तुल्पोऽस्ति कश्चन । कः सईत महापाहो पाइपिग्रहणं नरः ॥ २५ ॥ध्यान्तकम प्राप्य जीवन कमिन मुच्यते । एवं बावन्तरं प्राप्य तय जीवन कश्चन ॥ २५॥तस्मात पुत्रेण यां सौ प्रतिमा कारितापसी भीमस्प संप कौरम्प तपोपहता मया ॥ २७ ॥ कर पाया छातीने मुख से रुधिको गिराया । १० । इस के पीछे इसी प्रकार रुधिरसे भराहमा पृथवीपर ऐसे गिरपड़ा जैसे कि प्रफुलितनोक शाखा बाला पारिजातनाम वृन गिरता है । १९ । तव इद्धिमान संजय ने उसको पकडीलया और शानपकि विश्वास कराताहुआ उससे बोला कि इस प्रकार मतकरी । २० । फिर का वडा साहमी कोषसे पृथक् और रहितहोकर शोकसे युक्त रात्रा हाथ भीममन यह शब्द कहकै पुकारा । २१॥ उसको भीमसेनके मारनेसे पाहावान और क्रोधो रहिन जानकर पुरुषोत्तम वासुदेवनी इम वचनको बोले।२।हे समधे धृतराष्ट्र शोचमत करो यह भीमसेन तुम्हारे हायसे नहीं मारागपा तुमने वा गोरकी माचिगिराई है। २३ भरतपम तुमको को वशीभूत देखकर मृत्यु की दाद में गयाहुा भीममेन मैंने बैंचा । २४ । हे रानामों में श्रेष्ठ कोई तेरे समान घलान नहीं है हेमहावाहु कौन मनुष्य तेरी भुनामों के पकड़ने को सा मलाई । २५ । भेग कि मृत्युको माग होकर कोई भीवता नहीं छूटवाई इसीपकार मेरी भुनामों के मध्यको पाकर कोई जीवता नहीं रहसता है . २६ ॥ हे कारण निस हेतुमे आपके पुग्ने भीमगेन की जो यह लोहे की मूर्ति बनाई यही मूर्ति ने तेरे मास वनपान करी। २७ । हे राजेन्द्र पुत्रशोक से दुखी तेरा चित्तधर्म से Blair, thu powerful blog biomu i de prccus, though in doing so ha cut liia breast and drupp üllund froin the mouth, H.: full down on Cartha Leddenslibe a bluuiog tror WY149 Şanjiya bole liim, maying yently, * You should not do ko. 20. The brave ting.when this unter wargow, was blled with 14:31%80 fur slaging Bhines. Sncios that lio was no longer in an nngry mond Lot feit griof for Bhim, Samdev and, "B, not grievel, Dhritrashtra. You haro rotelarn Bhim and lyrics Haie, kistu S-ing you in wry mod, 1 dharel Bluront of thy jius of death. Yat are un qualed in sterentLoweonid eine out oilsiranthograp , your arms Btri Par नाव (72831 पुषशोकाभिसन्तापायमांदगात मानः । उदाराजेन्द्र तन भमिसन जिसिसि २८॥ न रखेत क्षमं राजन् इन्यास्त्वं यावृकोदरम । न हिपुत्रा महाराज जीवेयुस्ते पावन । २९ ॥ तमापर करमस्मभिर्मण्यमानः राम प्रति । मम तवस मारा मनःपाः ॥ ३०॥ इति गोपीये जलपादानिकपीम आयसभीमभंगद्वादशा ध्यायः१२ सम्मान मावा तत पयमुपातिछन शौचाई परिचारिका नशा पुनधन प्रोवाच मधुमरमः ॥ १॥ राजनधीता येदाते शाखाणि विविधानि च । श्रुनानि प पुराणानिराधमांश रलाः॥२. एवं विद्वान् महाप्रातः समर्ष सन् बलापले। मात्मापरास पास कोकोपहर ३ ॥ उक्तगर तदेवार भीमदोणी पृथक हुभाया उस हेतुसे तुम भीममेन को मारना चाहते थे ।२८। राजा यह आप बोम्य नहीं है जो तुम भीमसेन को मारा चाहतो क्योंकि आपके पुत्र मायुपूर्ण होनान के कारण से किसी दशा में भी जीवते नहीं रामक्ते ये ।२९) इस हेतु सन्धिको अंगीकार करने वाले हम लोगों ने सन्धि के विषय में जो कर्म लिमा ससपको ध्यान करो शोकमें चित्तमें मतको ३०॥ अध्याय १३॥ शंपायन बोले कि इस के मनन्तर नौकरलोग स्नान कराने के निमित्त इस के पास जाकर पर्चमान हो मधुसूदननी इस स्नानसे नित्त होनेवाले राजा से बोले कि हे राजा तुम ने वेद और नाना प्रकार के शास्त्र पढ़े पुराणों समेत शुद्ध राजधों कोएन।। २ इस प्रकार पाहत और बड़े ज्ञानी बलाबल में ममर्थ Non e can scape asth life from your dea lly clutches. I made use of the iron statue of Bhim made by Daryodhar, Grioved for your son you had deviated from the path of right and wished to slay Bbim. This was not worthy of you, for your son bad his days numbered aud coald lire no longer. Thiok of our exertions, which we did in brirging about peace, und grieve po more. " 30. CHAPTER XIII Vaiskampayan said, "Then servants came to Dhritrsahtra to help hita in Sathing, and when he had done bathing, Shri Krishn thus addressed Izurty, " You hay lasint religiotts books and learnt the duties of kinga [386 Vahabharat (७३८६] च भारत । विदुर. सज्जयतु राजन तत् कथाः ॥ ४॥ स धार्यमाणो नामा कमकार्षचन तदा । पाण्डवानधिकं जानन् वले शौथ्य फौरव ॥ ५ । राजा हि या स्थितः स्यं । दापानवेक्षने । देश लरिमार्ग पर सविन्दति ॥ ३ ॥ उच्यमानस्तु य यो गृणांने न हिताहिने आपदः समनुप्राध्य सोचत्याये स्थिः ॥ ७॥ ततानापार निं समयक्षम्व भारत । राजस्व झथि घयामा दुय्योधनको स्थः ॥ ८॥ प्रा-पापाचारापास्यत् । भीम जियोससि । तस्मात् सबकावं समनुस्मृत दुनम । ९ ॥ यस्तु तासाई या शुरः पाया ळीमानपत् सभाम सहनो भीमसेनेन र निजि हपिता । १० ॥ मारमनोतिक्रम पश्य पुत्रस्य च दुरात्मन । यदनाममि पाण्डूमा परित्याग परत ११ ॥ वैशम्पा पन याच । एवमुक्त. स कृष्णेन सर्व सत्यं जन धिर। उवाध देवकीपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः ॥१२॥ एमेतन्महामहोपथ बदाय नायव ! एप्रस्नेहश्च धर्मात्मन् धेयाग्मा होकर तुम अपो अपराधमे एने क्रोधकोकिम निमित्त करतो हे भरतवंशी तभी मैंने भीमने द्रोणाचार्यने भौर संजयने भी तुमसे कहाया परन् राजा तुममे उस वचनको नहीं किया ।४। हे कौरव उससमय पांडवोंको बल और भारतामें माधिक ज नंत और बारम्बार निध कियेहुये भी तुमने इभार वनको महीं किया। जो नियत बुद्धि राजा आप दोपों समत देशकालके विभाग को विचारता है वह परम कल्याण को पाता है ।वाहित मनहित में समाया हुआ जो पुरुष करयाग वचनको अंगीकार नहीं करता है यह भनीत नियम आपत्तिका पाकर अंचता है। ७१ हे गना इस हेतुमे विपरीत चननेवाले अपने को देखो ढोके वचनों मे विपरीत चिनवाले तुम दुर्योधन को भाधीनता में नियत हुयेदा और अपनेही आराधमे आपत्ति में मो तुम भीममेनको क्यों मारना चाहतेहो इम, हेतुमे | तुम अपने क्रोधको दूस्करो और भाने दुष्ट कोको स्मरण करो।९। जिस नाच ने ईपी से उस द्रौपदी को सभा में बुरागा यह शत्रुता को बदला लेने के भाभ लापी भीमसेन के हापस मारागया। १० । अपनी आभपने दुरात्मा की मम गादगी को देखो जो तुपने निरपराधी पांडयों को साग किया। ११ । शम्पा पन योले जनमेजर श्रीप्णी इमप्रकार के सस वचनों गुनकर उस रामा गृतराष्ट्र ने देवकी नन्दनसे कहा । १२ कि हे महाबाहु माधानी नो माप कहते हैं Huing to learned and powerful, you should not h rindulyst in anger You did not ne upon thyadri ogiven you by shabn, Drona, Sanjaya and injeult. You kusr thgant stength of thy Paaliyn antyer you weru ullurnto. 5. ll uppy is hy king Syllo Acto according to This requisition vi tirou and ulice, but he who dox 4 but wind tho ndrico wiluta fajlul irouds, falls into trouli', You astel wrondly in at bazh.... yuu Juusogarded this ouunsard of old mun and more controlled by Duraodhan. You brought univery on yourelf. Why do you wish to 7387 (७३८०] Stri PVT. समत्रालय ॥ १३॥ विष्टयातु पुरुषम्पानोपान सत्यविक्रम । स्पगृप्तो नागमत् कण भीमाबाब-हरम ॥ १५ ॥ हमेकागो गहमन्युaver. मम्मी पारदार स्मन्टुनिस्सामि माधव ॥ १५॥ इतेषु पारिन्द्रषु पुषु। पु धै। पापड पुमेश तथाप्यस्ति । २६ ॥ रत' समीर धनखरच माद्याश्च पुत्री दुधारी | RT गान प्रदान सुगतानाशाम कल्यायमुवाच नान् ॥ १॥ इवि स्त्रीपणि नठमादानिकपण कृतगटकोपनिम धने प्रयादगाध्यापः ।। ३ । या सरधा है परन्तु यदा इलयान पुक्की भीति ने मुझको धर्यमे पृथक् कर रिपा । हेलीकामी प्रारम्पकी पातहै कि तुममे रक्षित बलवान् सत्य पराक्रमी भीमसेन मेमरी मुजाके मध्यको नहीं आया । १५ । हे माधवजी अब रावपाल पते रहित विनतम्घर में मझले धार पाण्डरको देखा चाहत हू महा रामानों के और पुत्रों क मग्नेपर मेरे मुख और प्रीते पांडों म नियत सने है |१६ पछि पछुत रोतहुये उस राजा ने न दर अंगवाने भीममेन बहुल और पुरुषों में पड़ यार नकुल और सहदेव को भी अगों से स्पर्श किया और उन्होको विश्वात देकर कल्याण के वचन को १७॥ Blay Blum 1 Remove your anger and recall your wicked deja Thim only revenged the wrong done to Drupada m by court by that ds picable son of yours. 10 Lush at your transgrexperD8 and (linse of your son sa ousting the Pan is the larhampugan says that du h ur. Ing the words of Shri Krisha, Dhritra-htrath is addressed him,"101 are right, Madhav, but it was th: patarnal luvu yh ch tools away my constancy. It was by good luck that you guarded Bin and stred him frora coping within the grasp of myaring I am now quita fruth fron anger and wiah to see him At the fall of the kings and song my lore ts concentrated in the Pandavas " Then with tears in his eyes, the king touched toe bodies of Bhun, Arjun Nikul and Sahadev. Hospoke to them kindly anl blessed them "17 17381] Mahablisa (७३८८ বাথান গুখে। মূনাৰাবৰ ৰা। বীমঃ । गान्धारा सरकंशधाः ॥ १ नतो हासा शामिन वर्मराज पुििशरम । गापारी पुत्रशोफार्मा श तुमछदमिम्मिता । • साः पापमाममाय विदित्वा पवार प्रति । ऋषि: सस्पषीपुत्रः समास गनायामुपस्सप पुषगकिय. शा। यमुपसेपरे पनि मानियेत या पइसा मसानको। च । सर्व प्राणभृतां मावं तर समानुपात ५ । सस्नुगमीत काजे कलावादी महासाः । शाकालमाशिप्प मामालमारियन् ॥ ६ । नको. १ कायों गावाति शममानदि। ये मिरवसामेतत् प्रा में पयो मम । ७ ।। उकास्पटामशाहानि पुत्रेण जमिच्छता विनास मातंयुध्यमाय गाभिः अध्याय ।१४। पैशमापन पोछे कि इसके पछि राष्ट्र से माता लेकरवा करप पांडर भाई शानी समेत गान्धारी के पासगगे ।२। इसके पीछे पुत्रों के शोकसे पीड़ा चान निर्दी गापारी में 37 पृतक शत्रुराले युधिष्ठिर को पाम बापामा जानकर साप देना पारा । २१ व्यास ऋषि प्रथमही पांखों के पिप इसके पार रूप चिनो विचारको भानकर सावधानहये ।। और विच के समान शीमगामी होकर ग मी श्रोगात्री के पवित्र और सगास जलमें स्नान माचपनकरके उस स्थानपर भा पहुंचे मार दिय नेत्रयु क भाये विषसे देखसे उस पि ने वहां सत्र श्रीवा के पिचके तान्तको पाना । सापके समयको निरादर करके कासीमान्तिको बर्खन करते वह महातपस्वी करपवादी अपि पुष से दोस।६।कि गामारी पारख के कार क्रोध न करना पारिये अपने भाष वनको रोककर इस मेरे पचनको मुनो। । अठाइदिनाक विषय मभिप्तानी पुत्रने का किरमावा शुओं के साथ पुष पुर करनेवाले को शुभ भाभीर CHAPTER XIY Vaishampayan taid, " Then by Dhritrashtra's porinutiu tho Pan. dar brotlecia wtu Lushay, woat to Gandhari. Dutiesmal with grief for her coun, who iatuadal w curo Yudhishthir. Kuuwing uthiec ovil intootion wwards thio Panderas, Vyas Dialo lanto, alho bathing in sod sipping the walor ur tho Gaagiz, his came thors. With . dition yolasaw through the mindsoltion who were present there.s.Speak all of chis iad raculumendis Phaco of uiod, bowid to Grodhari, Dwont let your niger fill on the l'andar, Dorot curwdim, but hear we;during the cighteenlaya or was, sour exa d siroul of victory anded you to bleus lim, Lot on all versijas you wil that vict wy aliould fall on the axle of dlarm. I sad peyer didik that your muscle to his ܛܘܪ .
- १७३८९) Siri Parv श्रीपंच (7381 ॥८॥सा तथा वाच्यमाना त्वं काले काले जयैषिणा। उक्तवत्यसि गावारिसो धर्मस्ततोअयः॥९॥ बाप्यतीनी गान गरि वा वितधामहमा स्मरामि माघमाणा बास्तथा प्राणिहिता हासि ॥१०१ विदे तुमुले राय गत्या पामसंशयम् ।जित पापg मुने युवे नूनं धर्मस्ततोऽधिक ॥ २१ । क्षमाशीला पुरा भूत्वासाय न झमसे कथम् । भधर्मजलि व यतो धर्मस्ततो जय ।। १२॥ स्पञ्च धर्म परिस्मृस्य वाचाचीका मन स्विनि । कोप संयन्छ गाग्धारि# म सत्यवादिनि ॥ १३ ॥ गाघार्युवाच । भगव ग्नाश्यस्यामि नैतानिछामि नइयतः पुत्रशोकन तु वान्मनो विवलतीच मे ॥१४॥ ययैव कुना कोया रक्षितव्यासपा मया। तथैव धृतराण रक्षितया पथा मया ॥ १५ ॥ दुरयाँधनापरापेन शकुने. सोलस्य पाकर्ण दुःशासनाम्याध वृत्तोऽयं कुरुक्षयः ।।१६ ॥ नाराध्यति धीभत्सु च पाणे वृकोदरस। नकुलः सालेवी वा दो। ८ । गान्धारी उम् विजया मिलापा से समय पर मार्थनाकरी हुई तुमने कहा कि नियर धर्म है उपरही विजय है । ९ । हे गान्धारी मैं पूर्व समय में तुम दुर्योधन के शुभ आशीर्वाद से प्रसन्न करनेवाळे के कहेहुये वचन को मिथ्या स्मरण नहीं करता हूं तुम बस प्रकारकी समाधि धारण करनेवाली हो ।१०। इसी से राजामों के कठिन युद्ध में पारको पाकर पांढयों ने युद्ध में निस्मन्नेर विजयको पाया निश्चय करके उधरही धर्म आधेक है। १५ । पूर्वसमय में ऐसी क्षमावान होकर अब किस हेतुसे तू क्षमा नहीं करती है हे धर्मकी नाननेपाली मधर्म को त्यागो जिधर धर्म है उधरही पिनय है ।१२। है मनस्विनी सत्यपका गान्धारी | अपने धर्मको और कहेड्यं वचनको स्मरण करके क्रोधकोरोको और इस दशा पाली मतहो । ११ । गान्धारी ने कहा हे भगवन मैं गुणमें दोपनहीं लगातीहूं और उनका नाशवान होना नहीं चाहती हूँ । १४ । परन्तु पुत्रशोकसे मेरा चित्त प्रान्त म्याकुल होताई । जिपप्रकार पांडव कुन्तीसे रक्षा के योगों उसीमकार पुश से भी हैं मार से मुझमे रक्षा के योग्य हैं उमीप्रकार धृतराष्ट्र से हैं ।१५।हयोधन शानी कर्ण और दुशासन के भारापसे या कौरवों का नाश हुआ । १६ । इस were wrong. 10. Tha Pandavas were victorious, no doubt, accord. ing to thy predictiuns and dharu must be on thar side. Bring cper Derciful, why du you withihuld your pardon i Giro up injustice, Victory lias taller on the side of justue. Regenler.ng your own words you should not hehara thus, truthful Gandhari,"shisa.d " I donot find fault, whicro theru is nune, and dunctuant their deftruction. My mind laun eser is distressed with griut for my son. They duserta as much probertion from tuon frow Kunte, Tbs Padayat oqually dcsorva probation from Dinitrush'it 15 Tuo gruat destruction of the Kauravas was brouzbt aly uc by Duryodhan, bhakuni, Karma And Dushasana Ti Piudaias hirodons to wrong. Tu Kaurary 17390] Mahabharat (७३९० देव जातु युधिष्ठिर १२७ युपमान कौरव्याः कृतमानापरस्परम निहता सहि ताश्यास्तत्र नात्यप्रिय मम ॥ १८ ॥ शिन्तु कर्माकरोनोमो वासुदेवस्य पश्यतः । पुयोधनं समाय गदाधुढे महापना. ११ ॥ शिक्षयास्यधिक बारया बरन्तं बहुधा रणे । अघो नाश नया नन्मे कोपमवयत् ।। २० ।। कथं उधम वर्महे समु दिट महात्मनि । त्यो पुरानो द्वारा मानो कपम्चन ॥ ११ ॥ इति स्त्रीपण जलपादानितपणि गान्धगिसान्तमायां चतुर्दशोध्याप.१४॥ में अर्जुन भीमसेन नकुल महदेव और युधिष्ठिरका भी कुछ अपराध नहीं है ।१॥ पर परस्पर युद्ध करनेवाले अहंकाती कारख एकसाथ मन्य. २ लोगों के राय से मारेगमे वह मेरा अमिय नहीं है। १८ परन्तु पादेवजी के देखत हुये भीमसेन ने कैसा कपका कि बड़े साइम ने गदायुद्धमें दुर्योधनको बुलाकरके और शिक्षा अधिक मानकर पुल में अनेक शीतते घूमनेवाले को । २० । नाभिकेलीये पापन किया इस बात को सुनकर मेने को को बढ़ापा । २१ । वह भूरवीर युद्ध में मानों के पर्थ किती दश में भी धर्मको नहीं सागमा नाके धर्म पहात्मालोगों से देश किया गया है ।। २२ ।। fell down (ghting in tho peida of their power. But why did Bhim do such a deed in the printaro of l'auder I He challenged Duryodhan to figlit with the mace and then stjuck him below the pavel. MAn the cause of my anger. A well-edvised warrior nover sets asido justice under any circumstancol." 21. This (७३९२] St Pursari (7391 पैशम्पायन उवाच । तरक्षा पातम्या मागशेगाध मीतबद । गान्धारी पर वाचदंघवः सानुनयं तदा ॥ १॥ अशा यदि वा धर्ममासात्तत्र मथा सः I MIRE आतुकामेन तन्मे त्वं सन्तुमहीम ॥ ३॥ न हि वर्मण पुत्रप्ने पातितोसो महायलन श: फेनचिन्नुमतो विकामावरम ३ ॥ अवर्गणजित पूर्व तेन चापि युधिधिर ताभ सदेव सरनता विपामाचरम् ॥ + । सन्यस्पैको पशिष्टोयं गदायुरेनवार्य, पान् । मां हत्वा न हरदास्यापि ॥ मया । ५॥ जीमच पाशालीमेक पना रजस्सलाम । भरत्या विदि सामानयत् एतत ६ ॥ गोधनमसं गृह्यन शक्या भूः सागः । यला भानुभस्माभिरवितर मया। तथाप्य प्रियमस्माकं पत्रले समुदाचरत् । द्रौपद्या यत समाम सायमूरुमदर्शयत् ॥ ८॥ तदेव यभ्य:सोस्माकं दुराचारोम्य ते मुतः । पराजाशया चैन स्थिता ससमयता अध्याय १५। वैशम्पायन बोकि तब भीमसेन उसके उसयसनकानुनकर भरमीतके समान नम्रता के साथ गांधारी से यह भवनोला । १।हे माता धर्महोय वा अधर्मीय अपने शरीरकी रक्षा मामिलापी मैंने भय से मारा ऐसा किया भापास मेरे अपराध को तपाकरने के योग्यहो । ५ । यह बड़ा क्लवान भापका पुत्र धर्म युद केशारा किमी के साथ लड़ने के योग्य नहींथा इस हेतुसे मैंने विपरीत कर्म किया। पूर्व समयमें उस दुर्योधन ने अपर्य के बारा युधिष्ठिर को विजय किया और इस संदेय ठगेगये इस कारण से मैंने विपरीत ककिया । गेना के मध्यों अकेला शेष पचादुआ यह पराक्रमी कदाचिद गदा युद्धसे मुझको मारकर राज्यको नलेले इस हेतुमे मैंने यह कर्मकिया । ५। भापको सब विदिन है कि आपके पुत्रने एका वना र मसला रानपुत्री द्रौपदीसे जो वचन कहाघा इममे दुयोधनको विनामारे हुये सागरों समेत निकण्टक पृथ्वी इमसे भागने के योग्य नयी इस बातोंको यार कर मैंने यह कर्मकिया ।५ उतीयकार आपके पुत्र ने हमारे अभिपका भी किरा भो मभाके मध्य द्रौपदीको वामगांधा दिखलाई 16 रावही वह CHAPTER XV Vaisbampayan said, that on leaving the words of Gandiari, Bhim humbly spoke to her, angivg." Whether it be justice or injustice, I did it in self-defencs, and I ask quoir parts out, putlor, Your powerfui Bon cou'd not bo OY-CC100 in a just night and therefure I did an unjust deed. Formerly Da-yohno conqueros Pudiebthir orjustly aod wo woro cheated again and ngan: this was the Hating against rule, I did it last hu a.ight slug Herni talo ou.king. dom, ia spite of the dealeuctive of a'I bis army Now Duryudban dragged Draupadi at wo did not think it worth lor while to enjoy the biogdom without slayion Lim. Ho Laul dis rearoof या 5. You know well . 17392) Mahabharat ॥ ९॥ ३रमुद्दीपित राशि पुत्रग तब तामहत् । फ्लोरीक्षाच बने मियं तप्त एतत् कृतं मया ॥ १०॥ वैरस्पास्य गतः पार हत्या दुग्योधनं रणे। राज्यं युधिष्ठिरः प्राप्तो पत्र मतमपधः ॥ ११॥ गावाप्युवाच । न तस्यैष यस्तात् यत् प्रशंसास मे मुतम् । कस घांश्चापि तत्सर्वं यदिद मापसे माये ॥ १२ ॥ हताश्वे नकले पत्सवृषसेनन भारत अपिषः शोणितं सस्य शासनशरीरजम् ॥१५५ सद्भिवति घोरमनाजसेवि तम् । र कांफरोस्तदस्मानदयुक गुफोदर ॥ १४ ॥ भीम उवाच । अस्पस्थाविम पातव्यं धिोपुनः स्वकम् । यधात्मा तथा भ्राता विशयो नास्ति कश्चन ॥१५॥ मधिीन व्यतिकामहन्तोमादम्ब मा शुरु । वैवस्वतस्तु तर रस्ता में रुधिरोमिती ॥ १६॥ हताश्य नकुलं राष्ट्रवा बगसेनेन संयुगे। माता संग्रहष्टानां त्रास सजनिती मया ॥ १७॥ केशातपरामोपचा धूतकारिने । कोषायद चारं तच्च मे आपका दुराचारी पुत्र इमारे हायसे मारालने के योग्यथा परन्तु उस समय लोग धर्मरानकी आज्ञासे नियम, नियत हुये।९। हे रानी आपके पुत्र ने का पड़ी शत्रुगा प्रकट की मौर सदैव वनमें दुखी किये इस हेतुसे मैंने यह किया १० युद्ध दुईवन को मारकर भव उग शत्रुता के भन्तको पाया युधिष्ठिर ने को गागा और क्रोधने रहित हुये । ११ गान्धारी वोली हे तात जो मेरेपुत्र लिप करनाहै यह केवल उसकोही नहीं मारा किन्तु इसकोभी किया जो सब मुझो कहताहै। । १२ । हे भातशे भीमसेन वृपमेनके हाथ ने नकुल के मरनेपर युद्धमें तुमने दुश्शासन के शरीरसे उप होनेवाले रुधिरको पिया । १५ यह तुपने सत्पुरुषों से निन्दित निर्दय कर्म किया वह अयोग्यथा । १४॥ घालाकि जब दुताका भी रुधिर न पाना चाहिये फिर से पानकरम का हैसा अपना प्रात्माहे वैसाही भाई है कोई मुत्यता नहीं है । १५ । हे मावा रुधिर ओठी मे मीच नहीं गया यमरान उसको जानते है केवल अधिरसे भरे दोनों हाय रे माना शोच मतकर । १३ । युदो अपमेनके हायसे मृतक नकुल को देखकर मैंने प्रचित्त भाइयों का भय उत्पन्न किया ।१७। पूत rplensed unuyellowing is thigin to unupndi. We should sla'll linn thurg (110 thing, but wu lind no Yuudisl thir's I did it because your euns gave us inuch trouble by bodiag 19 exJ.. 10 Whats amido an end of the enmity by slaying L dhan Yathishthu lhar got the kingdom and we are free from anger, Dindlitinu." You have twt only Hlalu wy 8011 uſ when you muy muli, kit duns nuro: waNilul's 1984* were elsin by V,' yuu trank Dashi au's bloud, nirel of cruelty unworthy of b. imen, " Ban on, " llow entha drink thisawa blend, when he unttiat ol v' field, a bratjies airs If Ard the wwlup, of Hue lyulit wy , 1 cull l'auraj to witav. Sy hands . - . The !
- (७३९३) S:11 Parvana 17393, वर्तते ॥ १८ ॥ सर्मव्युतो राशि भयं शाइनी सग । प्रतिज्ञानामनिस्तीर्ण ततस्तत् कृतवानहम् ॥१९॥ न मामईमि गान्धारि दोगेण परिशङ्कितम् । मनिगृय पुरा पुत्रानस्मास्वनपराधियु ! मधुना किं नु दोषेण परिशानुमहमि । । २० । गान्धा र्युवाच । पदस्यास्य शतं पुत्राभिनं स्त्वमपराजित । कस्मान्म शेषयः कविधेना-प मपराधितम् । सन्तानमावयोस्तात खगोह तराज्ययोः ॥ २१ ॥ कयमन्ध यस्यास्य पष्टिरेका नजिता ॥ १२ ॥ शेरे घरस्थिते तात, पुत्राणामन्त के स्वयि । न मे दुःख भवेदेनत यदि धर्ममाचरेः २३ ॥ वैशम्पायन उवाच । एवमुक्त्वा तु गान्धारी युधिष्ठिरमपृच्छ।। क स गजीत सकोमा पुत्रपौत्रवधादिना ॥ २४ ॥ तामभ्यगच्छ द्वाजेन्द्रो वेपमानः कृताञ्चील- । युधिष्ठिर इञ्जैनां मधुर वाक्यमद्रवीत् ॥ २५ ॥ पुत्र कारण द्रौपदी के शिरके बाल पकडे जाने पर मैंने क्रोधमे जो कहा वह मेरे हृदय में समान है। १८।रानी में उप प्रतिज्ञा को पूग न करके वरावर तर्पोतक क्षत्रिय धर्म से च्युत होजाता इम हेतुसे मैंने उसकमको किया ! १९॥ हे गान्धारी पूर्व समसमें हमारे निरपराधी होनेपर पुत्रों को शासन न कर के भव मुसको दोषों से काकरने के योग्य नहीं हो जो अब हमारे ऊपर दोषों की शंकाकरती हो । २० । गान्धारी बोली कि इम वृद्धके सौ पुत्रों के मारनेवाले तुझ अजेय ने किस हेतुसे एक कोभी वाकी नहीं छोड़ा जिमने कि घोड़ा अपराध किया था हे शत्रनो कि राज्य से हीन और हद हम दोनोंकी सन्तान रूप कहलाता । २१। इस की एक लाठीभी तैने कैसे नहीं छोड़ी । ११ । हे पुत्र पुत्रों में किसी के भी बाकी रहनेपर तुम पुत्रों के नाशकत्ता में मेरा यह दुःख नहीं होता जो तुम धर्मको करते । २३ । वे शम्पायन वोले क्रोधयुक्त और पुत्र पत्रों के मरने से पाडावान गान्धारी ने इस प्रकार कहकर युधिष्ठिर के विषय में पूछा कि धर्मराज कहां है १२४ । कम्पायमान हाथ जोड़कर गोष्ठिर उसके पास गये और वहां इम मधुर वचन को वाले । २५ । हे देवी में युधिष्ठिर तेरे पुत्र का पारनेवाला और संसारक were stained with blood and therefore you should not be angry. 19. Seeing Nakul's lorees elain by Vrishasen, I excited fear among bro. thers, I lennembered 1914 words I spoke in anger, when Draupadi Was dragged by the hair of her head on account of gamb ling. With out lulfilling u y von, I should have lot ay bshatryahoud and thereturo I did it. Nut baying rebuked your sons for persecut og us without lault, jou should not now find fault "Gandhari sand, " You dd not lonve even one sor, out of a hundied, that might have been the statf of our old age and that was lesa sinful. Wo are now destitute of our bingdom and sons. I should not be so unhappy, if you had •pared enly one sum of mire " llaving said this to Bhim, Gandbari seked where Yudhishthir war, At this, Yudhishthir with - with us.
[73940 Jabablistat (Gul हल्ला नसोऽहं तब देबि युधिष्ठिरस शापाईः पृयिना हेनुभ: शाम् नहिमे जीनोमान राजन का या साहशामागे हा मासास मुर इहः ।। 291 तमेव यादेनं मीत सनिकगत तदा। नोकिम्वद्रावारी निश्वा सारमशम ॥२८॥ तस्याश्नतदेहस्य पाइयो पतिभ्यतः । युधिरि नृपतेधर्मशा दघिदशिनी ॥ २९॥ मनुष्यप्राणि दरले देश पहान्तरण सा । तर सकुनी मूतो दर्शनीयमको भुपः॥ ३० ॥ तहटा पातोडगउवामुवस्य पृष्ठतः। एवं सम्वेट मानस्तानिनतम भारत माग्घागि विगतकोपा सापामा आवृषत् ॥ ३१ ॥ तया ते सपनुशाला मातरवारमातरम । मागउन्ह सहित पृथा पृथुलपणा ॥ ३१॥ चिरस एप्पना सा पुषान पुत्राविनिभिसा पाससमादारयहेवी बसेका वृत्र पे नवन ।। ३३ । ननो वा मम सन सागवे प्रशा। माता शो नाशका मूल निर्दी होकर शाप योग्य है मुझको शाप दे । १६ । उस प्रकार के सुदृज्जनों को मारकर मुझ प्रशानी मुट्टदों से शत्रुता करनेवाले को जीवन और राउसमे कोन प्रयोजन के तब कठिन पापा लेनेवानी गापारी उम इस प्रकार बोलने वाले भाभीत सीप पहुंचनेशले से कुछ नहीं बोली । १८ । उस धर्म दूरदर्शी देवीने उम मुके शरीर चरणों में गिरने के अभिलाषी रामा घिधिर की हाथ की उंगलियों की नोक को पट्टान्तर के भीतर से देखा उस से दर्शन के योग्य नख बाला वह रामा युधिष्ठिर कुनखी होगया । ३० अर्जुन उसको देवार वामदेवजी के पीछे चलागा हे भरतांशी इस प्रकार इधर उपर सच करनेवाले उन पांडवों को क्रोधोरहित गान्धारी ने माता के समान विशास कराया । ११ । उसोतुसे आशा पायेहये वा रहे वक्षरस्यसवाले परिव एक साथही उम वीरों को उत्पन करनेवाली कुन्नीयाना के पास गरे । ३१ पुत्रों के विषपमें चित्तो खेदपुक्त उम देवी ने बहुत कालके पीछे अपने पुत्रोंको देखकर वन से मुखको टककर अश्रुपान किये ३३। इसपीछे कुन्तीने पुषसमेत a trembling boily went to her and said in a sweet voice," Here I am, Yudhislı hit the destroyer of sur 890) and the root of the deetructe 101 of thy yo id Curst ae, fur I deserve it. 26. Bøving destinged friends, why should 1 live to rula the kingdom, Heaving deep sigbs, Candhari gare do reply to Yudhishthir wboliad appriacbed her in grout fuar. She looked from behind her vel at the tiuger la uf Yudhishthir, who was ancelmg at her feet, and the beautiful muila were destroyed. 20. At the Aijun crept Lehind Shree Krishna Gandhari curhed her angar and consold i de terrified Pandara like a mothor, They took leave of her and wart to Kiint. String her sons after a long time, distraesed Kunti covered her face under cloth And wecke. With eyes fall of tears, she say then covered with seats of Stri Parv खाप (72951 पालापरिविक्षतान् ॥ ३४ ॥ सा तानेकशः पुत्रान संस्पृशन्ती पुनः पुनः । भम्पको बस दुजारी द्रौपडीतारमगाम । गन्तीमय पाचाली ददर्श पतितां भुवि । ३५॥ द्रौपपुवामा माय पीमाः कते.सरे सौभद्रसहिंता गता। न स्यां तेऽचाभिगच्छन्ति निषा तपस्विनीम । किनु गज्येन का विहीनायाः सुतमम ॥ ३६ . । त समामास पूषा पृपुतलोचनाम् । उत्थाष यासमी-तु रुदीं शोकार्षिताम .१७॥षकरिता.पि पुग्नुगता नृप । मध्याछत गान्धारी मार्गमातंतरा समत तामाधाय गम्भारी सह अध्या पम्विनाम । मेवं पुत्रीति दुःखाता पश्च मामपि दु:खिताम् ॥ ३९ ॥ मये लोकविनाशोऽयं कालपर्यायचोदितः । अवश्य म्भावी संप्राप्तः स्वभावालोमहर्षण. ॥४०॥ तत् समनुप्राप्त विदुरस्य बचो महत् । भमिकामनये कृष्णेयघाच हीपनि तस्मिन्नगरिहायसीतेन विशेषन मा अश्रुपावों को करके उनको शस्त्रनमूहा से बहुत प्रकार करके घायन देखा ।।। सन पुत्रों को पृथक र स्पर्श करने दुःखने पीडाबान उस कुन्तीने मृतक पुत्र वाली द्रौपदी को शोचा भौर पृथ्वीपर पड़ी रोवतीहुई प्रौपदीको देखा । १५ । द्रौपदी बोलीमायें तेरे सब अभिमन्यु समेत पौत्र कहाँगगे भव वह बहुन काल से बम पस्विनी को देखकर तेरे पास नहीं भाते हैं मुझ पुत्रों से रहित को राज्य से कौनता प्रयोजन है। ३६ । द्रौपदी के इस वचन को सुनकर बड़े नेत्र वाली कुन्ती ने उसको विपास करापा अर्थात् उस शोक पाहत रोदन ,करनाली प्रोपदी को उठाएर उसको और सय पुत्रों को साथकर रही पाडावान् कुन्ती गान्धारी के पास गई । १८ । वैशम्पायन बोले कि तब गान्धारी तप यह समेत मामेवाली कुन्ती से बोली हे पेटी इस प्रकार न करना चाहिये तू मुम दुखीको भी देख में मानती कि यह संसारका नाशपपपकी विपरीततासे प्रकटदुभा है ।।.। और रोमांच खड़ा करनेवाली अश्य नहार स्वभाव से वर्तमान हुई यह विदुरजी का कपड़ा वचन सम्मुख आया । ४१ । जिसको कि उस बड़े बुरिमानने भीकृप्यकी शिता से निष्फल होनेपर कहाथा इस भपरिहाय्यार्थमें wounds. Sto touched them one by one and was grieved for Draupadi -whom she 'Eaw lying ou earth. 35. Draupadi said, “ Where are Abhimanyu and other grandsons of yours! Thyhole come lo 880 you. What shall I do with the kingdom without my sons! "Haring heard the words of Draupadi, large-eyert Kunti consoltd her. Bha took her sons and Draupadi to Gandhari. Vaisha mpayan saye lliut Gandbari thus spoke to Annti and her daughter-in-law:-"fru should not do 8n daughter, Lot at 10. I think this great det. tructioa was brought about by the viccircitude of time. 10. All 11118 was sure to happen as Vidur lau foretold when he saw Siri Krishna's go for nothing. Dooct bo sorry for that which was iuurit. . counsol [73961 Mbali nrat (७११॥ शुचीन हि शोच्या समामे निधांगता । ॥ पत्र ta\धा को भामा सयियति । ममेव रान कुलमन पिनाशिनम् ॥ ४३ ॥ इति स्व.पण मलमादानिकपनीण पृयापुत्रदर्शने पनदशोध्याग, १५ ॥ समतंच जलप्रादानिकपर्व ॥ ॥ अथस्त्रीविलापपर्व ॥ वैशम्पायन उवाच । परमुकाया तु गान्धारी दुरूणामयकर्तनम । अपरतत्र घिन्तारादिन्येन च ॥ १ । पतिव्रता महाभागा समाचारिणी । उमेण सपशा युक्ता सतत सत्यवादिनी । २ । घरदानेन कृष्णष्ण महर्षे पुरकर्मणः । दिव्य जानमलोपेता विविध पयंदेवपत् ॥ ३ ॥ सा बुद्धिमती दर पयानि । अर्थात् निरुपाय अ र रतीत होनेवाली बातमें शौच मत कर ॥४२॥ युद्ध में मरने वाले वा वीर बोचके योग्य नहीं हैं जैसी मैई वैगोडी तू है हमदोनोंको कोन Iralस करावेगा मेरेही अपराध से इम उचम कुलका नाशहुआ ४३ ।। वैशम्पायन बोके किइसप्रकार वापर बैठीहुई गांधारी ने दिव्यनेत्रों से फौरवों के सब बड़े भारी नाशको देखा । १ । उस पतिव्रता महाभाग एकसा व्रत करनेवाली | बड़े वपसे सयुक्त सदैव सत्यवक्ता । ३ । पवित्रकर्मी ब्यास प्रहपी के बरदान के दाग दियशानवाल से संयुक्त ने बहुत प्रकारका थिलाप किया। उस वृद्धि मतीने रसे ही समीपके समान नरवीरों की उसे रणभूमि को जाके शरीर के पूर्व able. The wainos who were slain na battle are no lawentable. I am like you Who will console both of us The great destruction was brougbt about by my own fault." 43. CHAPTER XVI Yaishompayan said, "Having said this, Gandhari raw with he divino oges the great destruction. She saw all by the divine wiadom granted her luy lgas and was inuck grioped, She say before he ७ि३२) $lriPart स्त्रीव 4307) रणाजिनराणाम[तं लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥ अस्थिकशपरिस्तीर्ण शोणितीघपरिप्लु तम् । शरीरैर्वहुसाहनर्बिनिकीर्ण समन्ततः ॥ ५ ॥ गजाश्वरथयोधानामावृतं रुधिरा विशरीर शिरस्कशायदे व शिरोमणः ।। ६ ।।गमाभ्यनरनारीणां निस्सनरनि संवृतम् । भृगालयसकाफोलका लाफनिवेवितम् ॥७॥ रससा पुरुपादानां मोदन पुर राकुलम् । भविधाभिः शिवाभिश्च नादिदं गृध्रसेवितम् ॥ ८ ॥ ततो व्यासाश्वनुज्ञातो धृतराष्ट्रो महीपतिः । पाण्डुपुत्राश से सर्वं युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ ९ ॥ वासुदेवं पुरस्कृत्य इतबन्धु पार्थिवम् । कुरनिया समासाध जग्मुरामायोधन प्रति॥ १० ॥ समासाथ कुरुक्षेत्र तानियो निहतेश्वरः । सपश्यन्त हस्तर भ्रातून पुत्रान पिनान' पतीन ॥१६॥ म्याभिषमाणान् चै गोमायुपलवायसैः । भूतैः पिशाचे रक्षोभाविधेश्च निशाचर । १२। रुद्राक्रीसनिभ या तदा विशसनं खियः। महाभ्योय यानेभ्यो रोमहर्पण करनेवालाधी देखाप्राव भस्थिकेश प नासे युक्त रुधिर समूहसे पूर्ण हजारों शरीरों से चारोंभोरको आध्यादित । ५। हाथी घोड़े रथ और सवारों के रुधिर समूह से युक्त शरीरों से गृया शिरों के समूहोस पूर्ण । ६। हाथी घोडेमनुष्य और त्रियों के शब्दों से व्याप्त भृगाळ, पक, काकोला फेंक और कानों से सेषित । ७ । मनुष्य के स्थानेवाले राक्षसोंकी मतम्भ करनेवाली कुरस्नान पनियों से सेवित भूपालों के अशुभ शब्दों से शन्दायमान और गिद्धों से सेवित्तथी । ८॥ इसके पीछे गासनी से आज्ञा पापा हमा राजा धृतराष्ट्र और वह सब पाण्डव मिनका भावी युधिष्ठिरया । ९ । वामदेवजी को और जिसके वन्धु मारेगये उस राजा को भागेकर सर कौरवीय स्त्रियों को साथ लेकर युद्धभूमि में गये १०वहां विधवा वियों ने कुरुक्षेत्रको पाकर उन मतक भाई पुत्रपिता और मुहदोको देखा । ११ । जोकि कषे मार खानेवाले शृगाल, काग भूत, पिशाच, राक्षस और नानामकार के निशाचरों से सापेक्षेप थे। १२ । रुदनी के श्रीदास्थान के समान mind's eyo the fatal field of battl: lying fur froni that placo. Saesar ardied svith borte, hair, fat, blood and shousands of corpser, with elephants, horees, curr ind the bloud of horsemen afthose berd , nuru cut asunder. Fulldf the crics of elephants, horses, mou and mowent abounding in jackals, crows and vultures, pleasing to the manenting raksbases, resoundig with tly tourds of the birds of prey and jachals. Then by the order of lyne, king Dhritra.tra and the Paudaray led by Yudhishthir, with Vngudov and the women wint to ile fiuid of battle. 10, The widowwel wuen saw tu.ro thu slain biothor-, 2014, fathers and friends catul by jackals, cons, rukslascS and night-rovera. Sacing the plaws like the pleudure ground of Rudra, the crylog women came downlrom their cals. Tlie such of thu family of Blis at, (७३९८ 17398) Dababharat विक्रोशयो रिपेतिर ॥ १३ ॥ गइट पश्यन्त्यो दुःस्वार्धा मरतानिय शरण स्खलनग्या यत्तचापरामुनि १५ । धान्तानास्वाप्यथाधासा नासीत् कापन चतना पाध्चा करपापणा पग सदभन्महत् ॥ १०॥ दु खोपहतचित्ताभि सम न्सादनुमादितम् । इप्यायोधनमत्युमधा मुवनात्मजा ।। १६ ॥ तत सा पुण्डरी काक्षमामाइप पुरपासमम् । इरुणा शस इप्टया दुसादचनमवीत्। १७॥ पश्यैता पुण्डरीकाक्ष स्तुपा मे निहतेदया। । प्रकीर्णकेश्य क्रोशन्त्य कुरा माधप॥१८॥ अमुस्त्वभिसमागम्य स्मा त्या भरतर्षभान् । यूथशो सम्बधापतिमान चालून पितन पतीन् ॥ १९ ॥ वीरमभिर्मदा माहो हनपुत्राभिरावृतम् । विचार पत्नीहितधाराभिरावृतम् ॥ २० ॥ शोनित पुरुष यांग्रीष्मकाभिमन्युभि द्रोण पदशल्यैध बल दिग्वि पायके ॥ २१ । काचन कवचदिव्यर्माणमिव महात्मनामा निवास स्थानको देखकर पुकारती हुई स्त्रिया बहुमूल्य सबारेया से जनरी । ११ भरतवंशियों की खपा द ख से पाडामान पूर्व में कभी न देखे हुये उसनाशको देखकर कोई शारीरों पर गिरी और कोई पृथ्वीपर गिरनेवालीहुई। १।। पांचाल और कौरोंकी उन आथ और थकीईई त्रियों को कुछ चेतनहीं रहा यह वा दुःख हुभा । १५ । वह धर्मज्ञ गान्धारी दुखितचित स्त्रियों से चारोंओरको शब्दायमान ही भयानकरूप युद्धभूमिको देखकर । १६ । फिर पुरुषोत्तम भी कृष्णजी को समझ में फरक इस वचन को योली १७।। कमललोचन माधष जी इन विधवा शिरके वालों को फैलानवाली कुररी के समान पुकारनेवाली मेरी पुत्राधुओं को देखो । १८ । यह स्त्रियां पृथक् २ पुत्र भाई पिता भौर मुहदोको मिलनी पत्तियों के गुणों को याद करती पृथक ? दौडनेवाली हैं । १९ ।। महाराज यह सभूमि वीरोंके उत्पन्न करने वाली और मृतक पुत्रसाली स्त्रियों से सयुक्त है कहीं उनवीरों की खियों से सयुक्त है जिनके कि वीर भी मारेगये । २० । कहीं ज्वलित अग्नि के समान पुरुषोचम कर्ण, भीष्म अभिमन्यु द्रोपा चाप, दुपद शोर शस्य से शोभागमान है। २१ । महात्मामा के स्वर्णमयी काय निष्कमाणे वापन्द केयूर और मालाओं से भलत । २३ । much distressed at the unwaite ocene of destruction fell down on the corpses or bare earth lli helpless women of the Pauchals and haurarna lost their sensay with the excess of grief Virtuous Gandhuri acung the groued mide di cadful by thopresence of the cry ing women thus addresd Slui Krishn - "Lonk at any widowed daughters-in-21 crving 'oud with dishovellid hair lamenting for their sons, Liotho 8, fathers, kinsmen and busbanda The field of batilo lall of yout-01 WAOO song and husbands arc oluad Hera and thero ar lying glorions Karan, Bbishiin, Abhimanyu, Droda, Drupad and Bhula 1 hu golden armoure, ornaments, diadems and 15 They are - Stri Parvana (7399 प्रादेईस्तकेयरैः सम्मिश्च समलंकृतम् ॥ २२ ॥ वीरबाहु निमाभिः शक्तिभिः परिधे पिसहगश्च विविधतीक्ष्णैः सशरैस शरामनः ॥ २३ ॥ व्यासंघः सहितैस्तिष्ठनि विविध क्वचित् । क्वचिदाकोडमानश्च शयानरपरैः क्वचित् ॥ २४ ॥ पदेवम्विध वर संपश्यायोधन धिमो । पश्यमाना हि दह्यामि शोकेनार जनाईन ॥२५॥ पाश्या लामा कुरुणाश धिना मधुमदन । पञ्चानामिव भूनानामहं वधमचिन्तयम् ॥ २६ ॥ तान सुपीच गृध्राश्च विकायममुक्षितान् । निगृह्य कवचेपमा क्षयन्ति सहनश "२७॥ जयद्रयस्य कर्णस्य तपैघ द्रोणमीमयोः । अभिमन्याविनाशश्च कश्चिन्तयि दुईति ॥ २८ ॥ शत्रनान्युचिताः सनि विमानानि च। विपनास्तेद्य-यसुधा त्रियु सामधिशेरते ॥२९॥ इति दुःखतरं किं नु लाव प्रतिमाति मे । नूनमाचरितं पापं मया पूर्वेषु जामम् ॥ ३० ॥ या पश्यामि हतार पुत्रान् पाधान मातृध फेशव । एपमार्ग विलपती ददशं निहनं मुखम् ॥३१॥ इति स्नापर्वणि स्त्रीविलापपर्वाण स्त्रीण इददिशेने यो शोध्यायः १६ ॥ बारीकी सुनामों से छोड़ी हुई शक्ति परिव और नानाप्रकार के तीक्ष्ण खड्ग योणों समेत धनुपों से सुशोभित हैं । २१ • मसमचित्त कहीं साथ निवास करनेवाले कहाँक्रीड़ा करनेवाले कहीं सोनेवाले और कहीं मांसभक्षी राक्षसों से संयुक्त है। २४ । हे समर्थ वार श्रीकृष्णजी इसमकार की रणभूमि को देखोंमें इसको देखकर शोकमे भस्महुई जाती हूं । २५ । हे मधुसूदननी मैने पाञ्चाल और कौसों के नाश पाचो तत्वोंके भी नाशझो ध्यान किया । २६ । रुधिरसे मरे गरुड़ और गिद्ध उनको बँचने हैं और हजारों गिद्ध चरणोंसे पकडकर उनको भक्षण करते हैं । २७ । कौन मनुष्य जयदध, वर्ण, द्रोणाचार्य, भीष्म और अभिमन्यु से नाशकी चिन्ताकरने के योग्य है । २८ । जो सय पूर्वसमय में कोमल शयनों पर सोते थे अब वह मृतकहोकर इमविस्तृत भूमि पर सोते हैं । २९ । | इससे अधिक कौनसा दुःख मुझको दिखाई देता निश्चय करके विदित होता है कि मैन पूर्व जन्ममें पाप कियाथा। 10 ! हे माधवजी जो मै पुष भाई और पिता भोंको मृतक देखतीहूं इसमकार पीडावान् विलाप करने वालीने मृतकपुत्रकोदेखा ३१ garlands of the warriors are lyırg pell mell with 'ho ap4818, clubs, sworsr arrors and bors. 23. Those who 1 red, played and slept together are not surrouodel by birds of prey. I am turning with grief at the sight of this battlo' field. 27 Teus the destruction of tit. Give elements with that of the lia 11 av 13 and I'anchals Vultures garurs are druoding tho blond sta nel bod es and enting their feale Whucould think of the slumeht-rnt Joyndiath K.rav, Drons, Bluobtu and Abhimanyul 13r tymo slept rn sns leda noo now ly. ing dead on bare earth. Want treuble cu bu to me than thuisf Surely I coumitted a sin in my lorruer buruh hat I £0g 8908, brotbers and fatheis lying dead here. "Thue lamentug sho saw the dead body of hor son. Bud 31.
17400) Mahabharat (७४.. वैशम्पायन उपाय । ततो दुर्योधन हम्या गान्धारी शोकमर्शिता । सहसा न्य तद्भमी शिव कदली वने ॥१० सातु लध्या पुनः सनां विक्रुश्य व पुन. पुनः दयों धनममिश्य शयान रविरोशितम् ॥ २॥ परिष्वज्य घ गान्धारी कृपर्ण पर्यषयत। हा हा पुत्रेति शोकार्ता विललापाकुलीन्द्रया ॥ ३ ॥ वारिणा नेप्रजेनोरः सिग्मती शोकतापिता। समीपस्थ दृषीकेशीम वचनमब्रवीत् ॥ ४॥ उपस्थिोऽस्मिन् संग्राम शातीनां संक्षये विभो । मामयं प्राह वार्णय प्राजालनपसत्तमः । अस्मिन् शुतिसमु वर्षे जयममा वषीतु मे ॥ ५॥ इत्युक्ते जानवी समझ सव्यसमागममं । अव पुरुष भ्याघ्र पतो धर्मस्ततो जयः ॥६॥ इत्येवमनुवं नैनं पूर्व शोचाम्यई मुताम् । धृतराष्ट्रात सोम कृपणहतवान्धवम् ।। ७६ अमर्षणं युधां श्रेष्ठ समालं युबर्मदमा पाया धीरशपने पश्य माघय मे मुतम् ॥ ८ ॥ माऽयं मर्धाभिषिकानाम पाति परतपः । अध्याय १७ ॥ वैशम्पायन वाले के शोकर पीडावान गांधारी दुर्योधनकोपरा हुमा देखकर अकस्मात् ऐमे पृथ्वीपर गिरपड़ी जैसे कि उनमें वाहमा केलेका वृक्षहोता है । १॥ फिर उसने सोलाको पाकर पुकारकर और विद्याप करके उस पृथ्वीपर पहुये कपिला दुयोधनको देखकर 121 हृदयसे लगाया और दुखका विसाए किता शोकसे पीडायान महाव्याकुल चिंच हायपुत्र हायपुत्र इसीनिसे विलाप करें नेलगी । ३ । अपनी छातीको नेत्रोंके जनसे सींचती महादुःखी उस गान्धारीने मपीप वर्तमान श्रीमपणजी से यह वचन कहा । ४ । कि हे समर्थ इस युद्धके और जातवालों के नाशके वर्तमान होनेपर इस हाथ जोड़नेवाले महाराज दुर्योधनने मुझग यह कहा कि हे माता जातघालों के युद्ध में मेरी विनयको कहो।। पुरुषोत्तम उसके ऐसा कहनार मैं अपने सब दु ख के आगमन को जानतीहुई बोकी कर धर्म के उबरदी विजप है।६। हे प्रभु मैंने पूर्व समय में इस प्रकार कदापा मैं इसको नहीं शोचती हूं मैं धृतराष्ट्रका शोच करती हूं जो दान और बांधा रहित है । ७। हे माधाजी इस अशान्त भार प्रस्त्रज्ञ युद्ध दुर्मद और सूर वारों में श्रेष्ठ मेरे पुत्रको पारों के शपनपर सोता देखो। ८ । जो यह शत्रुरापी CHAPTER Xvil Vnisharepayan svil, " Soring the cops of Duryodhuin, Gandhari full down on earth with grioſ liko a plantain trea cut down in a forost, When the rainod conciousness, she wopt bitterly and embraced.tho hlwol stuined cornse of Duryodhan, lying in great griol and saying " AlAs son! " Washing ler breast with tears of grief, she said to. raho, "at the commencement of the grust war, Diryodha asked my Wening with juinod hands to gain victury over he kinemen. 5. 1 lleis the great grief which you in store for mo and replied that (७४.१] Stri Partene (7401 सोपं पाशुषु शेतेऽय पक्ष कालस्य पय्ययम् ॥ ९ ॥ दुरुषाधनो पारो गति न मुझ भांगतः। तथा ह्यविमुखः शेते शय वारसविते ॥ १० । पप शेते महाबाहुलवान सत्यधिकमः। सिंहनेव द्विषः संख्ये मामसेनेन पातितः । १॥ विदुर खयमभ्येषित न्य मादमाक । बालो वृद्धाधमानेन मन्दो मृत्युपशं गतः । १२ । कच्छार पश्य पुनस्यापि वध ग्मम । यदिमा. पर्युपासतान शूरान रणे स्त्रियः ॥ १३ ॥ कथं नु शधा न हदयं मम दीयते । पश्यत्या निहतं पुत्र पुत्रेण सातनं रणे ॥१॥ परि चापामा. सन्ति यदि वा श्रावस्तदा । धुवं गोहानघालोऽयं नप याद बलाधिताम् ॥ १॥ इति स्त्रीपणि श्रीविलापपाणि गान्धार्या दुर्योधनदर्शने सप्तदशाध्यायः १७ ॥ मारामामों के भी अमवी होकर चलताथा अब वह इस पृथ्वीको रममें सोता है समयकी विपरीतताको देलो ।९ । निश्चय करके वीर दुर्योधनने दुष्पाप्यगतिको पाया इस प्रकार सम्मुख वीरों से सेविन शयनपर सोता है । १० । युद्धमें भीम सेनके दाय मिरायाहुमा या सत्य पराकमी क्लान् महावार ऐसे सोताहै जैसे कि सिंहके हाथने मागमा हाथी सोताहै। । । यह अभागा प्रभान निर्बुद्धी बिदुरजी समेत पिताकोभी अपमानकरके वृद्धोंकी भवासे मृत्यु के माधीनहुआ।१२। ।। पुत्रके मरने भी अधिक इम मेरै दुःखको देखा जो या स्त्रियां यद्धभूमि चारोंभोर से मतकशूरोंके पास नियत हैं । १३ । युद्ध पौत्र समेत मरेहुये अपने पुत्रको मुफ देखनेवाली का या हुदप कैसे सौटुकड़े नहीं होताहै। १४१ ओ शास्त्र और अतिया सत्य हैं तो निश्चय करके इस राजाने अपने सुनवलों से पास लोगों को पाया। १५॥ victory should fall vo thu kudu of Dhx: ). I sad this befo, and therefora 1 donat greve for bim, 1 grove fur Dhritrashtra Mbo.i. helpless and has lost all his kinainen. This dissatisfied prince, bravo tin tar and best of warcius, my son lies here in the field of battle, This groat destroyer of frer, who used to lead kings, vow sleeps on dust. Look at the change of time. Suroly brave Duryodhan has ACCUIDd regiona unattainable by oth-se, nd how lies here beforo me on the bed of war inra 10. Blain by Bhim, this great warrior of truo prowess slorps like an elepliant slain by a lion. This unfortunata and uuwise fool disregarded the advio ni Vidur nnd his father, and met his death for disabeying his elders. A griti greater than that of ny fron's dearl vorwhelmas nie, when I reo those women roond tho Lidies of the derd warriors. Why does my heart pot break into a bundnud peces at the argbt of my sun and grape'on lying desd to- Suther? Surely the prince has gut geed regions with the strength of a aams, it our nligious books and the Vedas as right " 15.
- Mahabharat (७४०१॥ गन्याय गाव । पश्य माधव पुनानो शवसंगान शिलान् । गया मामसे मेन भूपि निहाये ॥ १॥ इदं पार भेद्य यदि मुत्तमूना । इतपुभारणे धाव परिघालि मे स्तुगः। '२. प्रासादनलचा वरचषणान्वितः मारा पास्पृशनीमा कशिदो पसुम्बाम् । ३ . गृध्रान सारय स्यश्च तथा गोमाबुवाय सान् । शोमा विपूर्णमयी मचा इव चारयुत ॥ ४ ॥ रवा में पार्थिय vaal लकमणमानाम राजयको महाशाहो . मनोन पुगसापति ॥ ५ । मस्या चाहते कापागारुफुदनमुशतं । सारा बन्यो: शिस कृष्ण गृहीत्वा पश्य तिष्ठताम् ॥६॥ पूर्वजातिका मोनाल्पमिगनय एताभिरलवद्यानिया वालमेधया। उल्लसमजाशानि पुण्डरीकाक्ष योपिताम् । अनयद्यानि यत्राणि तापयत्यय रहिम धान् ॥ ८॥ पर दुःशासाशेरेगामिप्रधतिना। पतिशोणिसाको भीमेन युधि पातितः ॥ ९॥ गदगा भी सनन पश्श माधव में मुनम् ।नक्लेशाननुस्मस्य द्रोपण अशा १८॥ गापासनली मायनी द्रा परियो रहित मेरे सौ पुत्रों को भीमसे की गदा कठिन घायल य देखो । १६ भव यह मेरा वहा दुःख है जो सुले केश मृतक पुबाली मेरी पुरा आग पद भमि मेरे चारों ओर दौड़ती है। । २ । यूएगों से अनेकर नर से महलों में फिरनेताली खिमा अपनी भापविमें फैसकर इस घिर से आई पृथीको स्पर्श करती हैं यह कठिनतासे उनके अपर बैठपे गिद्ध श्रृगाल और काकोंको उड़ाती हैं और दुःखसे पाडावान मायामों में मपान घूमती हैं। ४ । ई महाबाहु इस राजपुत्री लक्ष्मण को माता को देखकरमेरा चिन शाताको नहीं पाता। ५ । हे श्रीकृष्ण जी शारीर से जुद मुन्दर कुमालार वेणी रसनेवाले अपने बांस शिरको पकड़कर निपत धोनेपाली अन्य खिशको देखा । ६ । दे निष्पाप इन निर्दोग विगाँस बार मुझ निधी से पिछले सामने या आपाप छोदा नहीं है । ७१ कमललोपन त्रियों के मुस जोकिळे कपस के समान और निहाप हैं उनको दुव रूप मूर्य संस करयाओं के मारनेराले भीमसेन के हाथ से पदमें सपाहुना गरि मेलिस सर्मा CUPTER IVIL Gandhari continued," Look at wy hundred song duatroyed by Bhun's O Majher, My youthful daughters-in-law running on tbu fiohl at battly with dishorel'edhair colano y gri£ Thoy who und totradthmanlion struund with their ori armenteditket, touch the icondy nail of iha till of tatil, and unablo 14 kep away tho jackal HacTown, biry statusin 3 Tart. Hy and is depuisved of puut the right of Laksimal'e 110 fier, 5. Other Wiinei sie wold uguntheisxeited herla afthtir kinstast. Thiso innocent women But I Lart cuto mitini na mail aia in vor forwur ldo, Tholulu like (७४०३] Stri Paryana 174033 बोदितेन च ॥ १०॥ उकाशनेन पाम्चाली सभाया पतनिजिता विधिषिता प्रातुः कर्णश्य च जनाईन । ११ । सदेव सहदेन नकुठेनार्जुनेन च । दासमारपासि पास्यालिसिं प्रविश नो गृहम॥ १२॥ सोऽहममा कृष्ण तदा युथ्यांधनं नृप । मम्युगाशपरिक्षिप्त शनि पुत्र जय ॥ १३॥ एक दु शासन शेते विक्षिप्य विपुती भुमिरतो सीमसेन सिंहलेर महागल । १४ ॥ अत्यर्थमकराद्रौद्रं भीम सनात्य मर्षण । दु.शासनस्य पत् योगवन्डोणितमाहये । १५ ॥ पति स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारी विलाऐ अष्टादशोध्यायः १८ ॥ यह दुश्शाशन तोकाई । ९ हे माधयमी घृतके दु ख को स्मरण करके द्रौपदी की प्रेरणापूर्वक भीमसेन की गदा से मृतक हुथे मेरे को देखा। १० । हे जनार्दननी कका और भाई दुर्योधन क प्रिय करनेका अभिलापी इस दुशमन ने सभाके पाप में पूत में पराजित द्रौपदी से यह वचन कहे ११ । कि हे द्रौपदी तू सह देव नकुल और अर्जुन समेव दासीहुई शीघ्र हमारे घरों में प्रवेश करो । १२ । हे भीषणभी उस समय मैंने राजा दुर्योग्न में कहा कि हे पुत्र मृत्युकी फांमी में बंध हुने पकनिको निषष करी। ११ । मेर कि बडादायी सिंहसे माराजाताहै उनी प्रकार भीमसेनके हापसे मृतक या दुशासन मुनामों को फैलाकर सोताहै ।। अत्यन्त कोमयुक भीभमेन ने वहा भपकारी कर्म किण जो कोपयुक्तने युद्ध में दुशासन के कधिर को पान किया १५। faces.end eyes of i hose innocent women are being burnt by the un of grief. Slap by Bhim the destroyer of fres and bleeding in all tle parts of his body. Duskog in dies lielc. HO was billed by the inaco of Bhim who remembered the wrong done to Draupadi at the occ1e1on of gambling. Desirous of pleasing Karan and Duryol Iau lo sasu (o Draupadi who was won in gambling, • You as well as Bahadev, Nakni and arjun aro mudo slovas Nakehasta to go in to ur houec, 12. I then. warned Duryodhanto Leop buk Shakun; u bo yas tuo l in death's string. Dushagan lies here with outstretchol orinaldo a huge elephant alain by a lion. Blum did a very cruel deesdos los anger as ha drauks Dashasan's blood in tho ield of batte".5 (7404 Mahabhara गान्धार्युषाय ! 7 माघन पुत्रो मे विकर्ण प्रानसम्मतः । मूमौ निहतात भीमेन शतधा कल ॥१. गजमाहय शेने विकों मधुसूदन नीलमेघ परिक्षित भारतीय निशाफरः॥१. भस्म भायोमिषरूम् गध्रानेतास्तपस्विनी । बारगम्य निश घाला न च शफ्ननिमामय ॥ ३ ॥ युधा इन्दारकः शोषिकर्णः पुरुषर्षम। समर्पित मुखाश शेत पांच माभव ॥ ४ ॥ कर्णिमासीकमावनिम्नमाणमाइये। भयापि न मारणेनं लक्ष्मगिरतसत्तमम् ॥ ५। पर संग्रामपूरेण प्रतिक्षां पालयिष्यता दुर्ममि मुख: शेते समषिगण हा रणे ५ ६५ स्याहय मुम्बे सौम्य स्थानाकोपरयते। सगं खामित्रहंतो विपुषलोकनित् ॥ ७ ॥ चित्रसेन । भूमी नाममा घाराष्ट्रामा पदप प्रतितानं धनुष्मता ८॥ चित्रमान्यामरणं पुषस्था शोकक तिक्रम्यादसंधै सहि सत्यः पर्युपासते । १. युधा हारको नि पर अध्पाप १९ ॥ मान्धारी होती हे माधवजी गह पानियोंका भीकत मीमसेनके हापोसैको खण्डकिया हुआ परापुत्र विकर्ण त पृथ्वी पर सोताहै . १।। मधुसूदनमी वह विकर्ण परेहुये झाधियों के मध्य में ऐमे तोता है जैसे कि नीले बादलों से घिरा हुभा शरदऋतुमा चन्द्रमा होताहै । २ हेमाश्वती उसकी तपस्विनी वाला भार्या मांसके भभिलापी गिद और कागोंको हटाती है परन्तु हटाने को सम ना होती है।।। हेपुरुषोतम माधव भी तरुण देवनारूप शूरवीर मुखपूर्वक निवास करने वाला विकर्ण पृथ्वीको घूसपर सोताई । ४ । युद्धर्मे करणी नालीक मोरनाराय नाम बाणोंसे टूरे मर्मस्थलोंवाले मरतपम इस विकणको अबभी शोभानहीं छोड़ना १५ । युद्ध में शत्रुओंके समूहोंका मारनेपाला सम्मुख रहनेवाला यह दुर्मख सयुद्ध भीममें वीरमतिमा पूर्णकरने के अभिमापी भीमसेन के हायसे मृत होकरसोताहै ।। हे स्वामी युद्ध के मुखपर जिमकी सम्मुखता करनवाला कोईनहीं यह देव CHAPTER XIX Gandhari coutinues, " Hero lies, O Mnullakin, wise Vikara out into. hundrels of patis by Bhim. He lius olan amung slephants like the the wintir moon surrounded by clouds. Hus good yout.ful wifo is trying to kcep away crows and vultures from his biely, but finde it a hillicult task to perforos, llc youthful godlika warrior Vilarn, who lived o klo of enso, sloopa on dush. The wealth of beauty doca not luavu bim, althougti hu hua raivid arrow wounds is all his vital parla. 5, Vuliant Durmukh tho dustroyer of lors foll's proz;to tho brasa row of Alim Ilu wn4 inyiucible Durolukli, the winnor of diviso regiona, sla. Sy fuest link at the doad figure of the great archer: Chitraser lying on the ground. The laureating woman and a trop of ileal catara aro alauding by lain boily dicked with garlanda .
७४०५) StriPars গ্লান্ত 17405) स्त्रीनिषेधितः । विर्षिशतिरसी शेने यस्त' पांशुषु माधप । -१० ॥ शरतसत्तधर्माण घार विशसने इतम । परिवारसिते गृध्राः परिविशधिविशतिम् ॥ १९ ॥ प्रविश्य समरे चारः पाण्डवानामनीकिनीम् । स वारशयने शेते पुनः सत्पुरुषोचित ।। १२ ।। दु:सस्यतदाभाति शरीरं संत शाः । गिरिरामवहः फुल्लैः फर्णिकारिवावृतः ॥१३॥शातकौमाया बसा भात कयचेन मास्थता । भनिनेर गिरि शेतो गगा सुरपि दुम्सहः ॥ १४ ॥ इति श्रीपर्वाण श्रीविलापपॉणि गान्धारीविलापे एकोनविंशीध्यायः १९ ॥ लोकका विजय करनेवाला दुर्मुख किसमकार शत्रुनोंके हादसे मारागया । ७।हे मधुसूदनजी इस धृतरा ट्रके पुत्र अनुपधारी पृथ्वीपर सोनेवाले चित्रसेनकी मृतक मूर्चिको देखो। ८ । शोकप्से पड़ित रोनेवाली स्त्रियों मांसभक्षयों के ममूहों समेत उसनहाऊ माला और भूपण रखनेवाले चित्रसेनके पास नियतहैं । ९ । माधवनी यह तरुण सदैव उत्तम त्रिपोंसे सवित देवतारूप विविंशती धूनमें पड़ासोताहै ।१०। हे श्रीकृष्णनी देखो कि गिद्ध इम पाणों से टूटेकवच वीर विविंशति को बड़ी रणभूमि में घेरकर बैठे हैं। ११ । वहशूर युद्धमें पाण्डवा की सेनामें प्रवेश कर के सत्पुरुषों के योग्य बीरसय्या परसोताहे । १२ । दुस्सहका यह शरीर बाणोंयुक्त ऐसा शोभायमान मैस कि अपने ऊपर वर्तमान कणिकार के पुष्पोंसे व्यास परंत होताहै । १३ । यह पृतकभी दुःखसे सहन के योग्य स्वर्णमाला और प्रकाशित करचसमेत ऐसे प्रकाश मानहै जैसे कि भग्निसेवेतपर्वत प्रकाशित होता है। १४॥ and other ornaments. Tuo youthtu) Yjvinshati of god liho form, alio always enjoyed the society of good womes, tel here on durt. 10, Vultures are standing round his body of which the ormour is broken agunder by arrow, Having entered the Pandav aray, that great fortior lies dead on the warlıko led. The body of Dussal, p.erced through by Arrowe, looh& glorioiss liko a bili urugrown with the bivom ing Karnikarke With his gold garland and bright atv.vur bia buly Icoks glorious liko a ulica dili illumiied by tiles " 14, Stri Parvोप (7497) विना विगैपिटमसितेक्षणाः शामिक्षिका विपनीयतमातुराः ॥९॥ उत्सावाभिमन्युञ्चकाम्बोजश्च मदक्षिणम् । शिनगद इसान पश्य सक्षमण सुदर्शनम् । मायोधनशिरोमध्ये शयानं पश्य माधव ॥ १२॥ , हाव स्वीपर्वाण खीविनापति गान्धारीवास्ये विंशोध्यायः २० ॥ गान्धायुयाचा पप कनः दो मदेवासो महायल: । अमितानलवत् संख्ये संशाम्तः पार्थतेजसा ॥ १ ॥ पश्य देकर्सने फणे निहत्यतिरगान वान् । शोणितीय ताशयान पतिरा भुवि । २। समर्षी दोघच महेमाप्तो महारथः। रमेसिन घायल होने विराटको देखकर पक्षियों के इटानको समर्थ नहीं होती। उत्तर, अभिमन्यु काम्नान, दक्षिण और सुन्दर दर्शन लक्ष्मण इन सर मृतक पालकोंकी देखो रे माधानी इन सब को युद्धभूमि में सोता हुआ देखो १० ॥ - अध्याय २१ ॥ गान्धारी बोली यह हा धनुषधारी महारथी कर्ण सोनाई पर अजुम तीन से पदमें घलिन भाग्निक समान शान्त होगया । १ । बहुतने थियोंको मारकर पाएर पहा मोताद और सपिराजित शरीर मूर्यके पुत्र रणको, देखो । २ । यह अजास्तचित मह.मोधी बड़ा धनुषधारी माशुर युद्ध में अर्जुन के राय हुआ सोता है। मेरे हारथी पुत्र पांडके मरो मिसको प्रवर्दी करके women try to scaro them away, but thici attempt in ſut in Look at Uttar. Abhimanyu, Cumbrý, Sindakelin and Lquutiful Lakelmad. All then youthful boys are lying dead, O Madhur." 19. मारा - CHAPTER XII Gandhari sail, " Horo lies the fint archer Karan, quenşhed into Grp. lain in Lattle by Arjun Look at tho bloid stripod body of 'Fran tha son of Surga who ites dual co earth after slaying many warriorr. 19:10 lia plain by djon hs to led the atrava. Bghtliko su chi phaut (Les Isading his berd. Hy was s'ain by Arjua 17403) Blahabharat इतः शेते शरोगाण्डीवधन्धना ॥३॥ यं स्म पाण्डयमन्त्रासान्मा पुत्रा महारथाः। प्रायु ध्यन्त पुरस्कृत्य मातङ्गा इव यूयपम् ॥ ४ ॥ बालमिव सिंहन समर सम्यसाचिना। मातङ्गमित्र मन मातले निपातितम् ॥ ५ ॥ समेताः पुरुषव्याघ्र मिहतं शरमाहये । प्रकीर्णबजा. पहायो रुदम्या पर्युपासते ॥ ६ ॥ उद्विग्न सततं परमात धर्मराजो युधिष्ठिर त्रयोदशसम्म निद्रा चिन्तयनापगच्छत ||७सभूषा शरणं धारो धारा प्ट्रस्य माघ । भूमी विनिहवा ते घातरुग्न इव दुमः ॥ ८ ॥ पश्य कर्णस्य पत्नीत्व वृपसेपस्य मातरम । लालप्यमानां करुणं रुदतीं पतितां भुवि ॥ ९माचार्यशापोनु गतो ध्रुवं त्यो यदनसम्वमियं धरा ते । ततः शरे णापहतं शिरस्ते घमजयेनाहय शत्रुमध्ये ॥ १०॥ हा हा घिगेषा पतिता विसंता सर्वाश्य जाम्वन्दपकक्षयमा कर्ण महावाहुमदीनतत्व सुपेपामाता रखती भशार्ग १११ साबमाना पतिता पृथिव्या मुत्थाय दाना पुनरेव चैषाकीय पक्वं परिजिघ्रमाणारोस्यते पुत्रवधाभितप्ता १२५ इती स्त्रीपणि स्त्रीविलापपणि गान्धारी पाक्ये एकत्रिंशाध्यायः २१ ॥ अच्छे प्रकार ऐसे युद्ध करनेवाले हुये जैसे कि हाथी अपने प्रधान हाथी को अग्र वर्ती करके उत्तम युद्ध करते हैं। ४ । वह युद्ध में अर्जुन के हाथ से ऐसे गिरायगमा जोकि सिंहप्ते शार्दूल और मतवाले हाथी से मतवालाहाथी गिराया जाता है। । हे पुरुषोता यह विखरेहुयेयाल रोदन करती किल्ली स्त्रियां इस युद्ध में परहुये शूरके चारोंमोर नियत हैं। ६। सदैव जिससे व्याकल भयभीत्। और चिंता करके धर्मराज युधिष्ठिाने तेरह वर्षत क निद्रा को नहीं पाया । ७४ वहीर दुर्योधनका रक्षाश्रयहोकर ऐसेमराहुआ पृथ्वीपासोता है वेमाधवनै सकि वायुसे टूटानुभावृत्त होताहै । ८। तुम कर्णकी खी वृपसनकीमाता पृथीपर गिरी रोदन करनी ई और शोककीवार्ता करनेवाली को देखो ९ निश्चय करके. शुरुका शाप तुझगो पामहुआ जो पृथ्वी ने इस तेरे पचक्रको दवालिया इससे पीछे युद्धको शोभा देनेवाले अर्जुन के बाण से तेशशिर काटागया !१। हायरधिकार पहरोदर करती अत्यन्त पाहावान् शूरसेनकी माता इस सुवर्ण के बाजूबन्द से अलंकृत बड़े पराक्रमी मारावाहु कर्णको देखकर अचत पड़ी है। १९ । पर पृथ्वीपर पढ़ाई महादुःखी उठकर कर्णके मुखको भूपती पुत्रके मरण मोकसे दुःखी रोती है ॥२॥ like a tiger elain by a lion or an elephan b slain by an elephant. Inmoating women, with dishevelled hair, erround him. 6. He by whnee fear Yudhishthir found no repose by day or night for thirteen years, lion here like a tree struck down by the wind. Look at Karan's Wifs, Vrishason's mother, lamenting, crying and lying down on ear.lu Barely it was the preceptor's curse which made the eattb grasp thy car wheel and Arjan's simus tn cat of thy head, 10, Alas! Shursen's mother lias insensible at the sight of Karan, She suclls Karan's nauth audweeps for the death of her son. 12.
(7409 Bhi Purrखोपर्व गाग्मायुधाय । भावनय भीमसेनन भक्षणन्ति निपातितं। गृध्रगामायया शर बाधुमधुवत् ॥ १॥तं भृगालाध कडुनच यादाश्च पृथग्विधा । तेन तेन विकर्षन्ति पश्य कालस्य पर्य्ययम १ शयाने वारशयने परमादकारिणम् । माधम सहिता नार्यो कदन्त्य. पर्युपासते ॥ ३ ॥ मातिवं मोवासं इतं भल्लेन पाहिलकामा प्रसुप्तामिव शाडूलं पश्य कृष्ण मनस्थिनम् ।। ४ । अतीघ मुसवर्णोऽस्य निरतस्थापि शोभते । सोमस्वाभिपूर्णस्य पौर्णमास्या समुद्यतः ५॥ पुत्रशोकामि तप्तेन प्रतिक्षा परिरक्षता । वाफशासनिना संरये वाक्षित्रिनिपातितः॥६॥ एकादश पर्मिस्वारस्पमाणं महात्मना । सत्यं रिकोर्षतापश्य हनमेनं जयद्रयम् ॥७॥ सिन्धु सौधारमा पूर्ण मनस्विनम् । अक्षयन्यशिषा. गृध्रा जनाईन जयद्रयम् ॥ ८ ॥ पदा कामुपादाय प्राद्र यत् केकः ला । तदेय पच पावनां जनार्दन जयद्रयः मध्याय २२ । गान्धारापोली कि गिद और भगाल भीमसेनके गिराये हुये राजा अन्तीको जोकि शूरवीर और बहुत वान्धा रखनेवाले भाइयों से रहित सपान खातेई । १ । श्रृगाल कंक और काकादिक अनेक मांसभक्षी उसको बँचतेई समयकी विपरीत ताको देखो।२ । युद्ध करनेवाले शूरवीर शयापर सोनेवाले रामा भवन्तीके पास रोनेवाली मियां नियत हैं। ३. श्रीकृष्ण नी इस बड़े धनुषधारी और भरल से मृतकपतीपवंशी वाइलीक को. शार्दूलके समान सोताहुआ देखो । ।। इस मरेहुये काभी मुखका वर्ण ऐसा शोभादताहै जैसे कि पूर्णमासीका पूर्ण चन्द्रमागताहै ।। पुत्रशोकसे दुःखी और प्रतिज्ञाको पूरा करनेवाले इन्दके पुत्र अर्जुन से युद्धमें जय द्रय गिरायागया। प्रतिमाको सत्य करने के अभिलापी अर्जुनने ग्यारह अती. हिणी सेनाको हटाकर पाात्मासे रक्षित इस जपदयको मारा | हे मनाईनजी देखो इस सिन्धुसोशर देशके स्वामी महंकारी साहसी जयद्रयको अगाल और गिद सारें। 21 मनार्दनजी जब यह नपदप केकय देशियों समेत द्रौपदीको CHAPTER XX11 Gandhari cont'auel, " Vulturos and jackals aro eating the dead body of the prince of Avanti. Jackals and birds of prey drag bia body. This is the change ol tim ! Women aro weeping by the dead budy of the princa. The great sruher Vulilik of the family of Pratip sleeps like a tiger.!His face looks like the full moon. 5. Jayadrata lies slain vs Arjun, whorlew him to fulsl his Tow while he was pro. touted by oleren abthauhiais. Look at Jayadratl's body which in buing dragged by jackals and Tultures. He deserved dealh at tho hands of the Pancras, when bo, in company with the people of Txikaye, sois.d Draupadi. They spared his life then out of their । F410] Mahabharat (७४१. ॥ ९॥ युःशला मानयझिस्तु तदा मुको जयद्रथः । कथमय न तो रूप मानवाधिस्म ने पुनः ॥ १० ॥ सपा मम मुता बाला दिलान्ती मदुःखिता । मापयति चारमातमा कोतिष पाण्डवान ।। ११. फिन दुःपतरं कृष्ण परम भविष्यति । परसुवा विधया घाला स्नुपात नितेश्वराः ॥१२॥ इति खोपाणिनीविज्ञापपीण गान्धारीवाक्य द्वाविंशेध्यायः ११ ॥: पकड़ कर भागातनी पाएगाके हायसे मारने के योग्यथा । १ | उस समप दुशला के माननेवाले पाएगों जयद्रथ पचाधा हे श्रीकृष्ण अब उन पाण्डवों ने उस वनाई को कैसे नहीं माना। १० । वह मेरी पुत्री वाला दुखी विलाप करती भार-पांडवांको पुकारती आप अपने शरीरको घायल करती है । ११ । श्रीकृष्ण जी इससे अधिक मेरा और कौनमा दुःख होगा जो बालक पुत्री विधवा मृतक पति पाली है। १२ ॥ regard for Dughala [Gandhvi's daughtor married to Jayadralbil. Why did they not apara bim this time? My pocog danghter, is oop: ing for him and wounding herself. What grief can be greater temper than thesight of my widowed daughtert 13.
(7411 ShrPurखापर गान्धार्दुवाच । एष शब्यो हत शेते स क्षाकुलमातुल । थर्मासा तार धनराजेन संयुगे॥ १॥ रस्त्यया शीत नित्य सर्वध पुरुपर्वम । सानियत होने मदरासो महारथ ॥ २॥ येन समृहनता तान रयमाधिायु के जमा पाण्युपुत्रामा तथा तेजोषध कृत " हा हाधिकाश्य शत्यस्य पूर्णचन्द्र सुदर्शनम । मुख पम पलाशाक्ष का राइट व्रणाम ४ ॥ युधिष्ठिरोग निहतं शर्म सनिशोभनम । रुपय पर्युपासन्ते मद्रराज ले लिय ॥ ५॥ एप सैलानयो राजा भगदतः प्रतापवान् । गमा कुशधर. श्रेष्ठ श्रेत भारनिपातित ॥ ६॥ मग पिल पायस्य पुरमासीत् मुदार मम । लोमहर्षणमा क्रस्येपाना यथायदा महामारय मार्य धम नक्षमा सय गमवित्वाच सुन्नीपुत्रेण पावित । ८ ।स्य मानिसमा लाफ थमाय २॥ गामगि घोली हे ताग पुरम धर्मज्ञ धर्मराजमे मारामा मामात् नकुलका मामा यह शल्न सोताहै । १५ हे पुरुपे सप भो कि सदेव सर्वत्र तेरेमाय कर ताथा वह वडा वलनान पराक्रमी सकाराजा सोताहै ।।। युद्ध में कर्णके रथको पकड़नेपाले निम शल्पने पांडगों की विजय के निच कर्मके तेजको जीणकिया 1 । । दुवमा स्थान भार विकार है कि शल्य के मुखको काकोस काटा हुआ देखो जोकि पूर्ण चन्द्रमा समान सुन्दर दर्शन कपल पनाम के समान नेपारी और सच्या। ४ । राजा मन्त्र के कुलको रोदन करनेवाली जियां इस युधिष्ठिर के हायसे मरेडये युद्ध के शोभादेनेवाले शस्यके चारोंऔर नियत । ५ । यह पहाडी श्रीमान प्रापवान भगदत्त हायीका अनुश हाथमे रखोवाला और पृथ्वीपर पड़ा हुमा सोता है। निषष करके इसके साथ पाडलोंका युद्ध हुआ नो पिडा भवकारी अत्यात फठिन रोमांचोंका खड़ा करने घालाया और इन्द्र औरटमासुरके पक्ष के समान था । । यह महाबाह पांच अर्जुन से युद्ध कर के और संशयको उत्पन्न करके पुन्तीके पुत्र युधिष्ठिरसे गिरायागया। ८ । लोकमें जिसकी CIAPIER XXIII Gandleri sad,“ Sun by Yudh su lur, hore lius Shalya tho mater nal uncle of Nakul. Thy v Jiant king of Malra ho always tora enunty towards you, is dead. He why diora Kand cir and diunish edits glory for the take f the Pandavia, has been sluru Its mutur of great grief that crows are eatug stryb a benutıfulfile Tba women of his family are lamentin; his d atlı, 5. Bha_dottu the glorsqus tull bulgule posith elephant's livuk sa hus hand Is battle with the Pindavas vas libe that of Idra and Yritrasur Hating fought with Arjuu, lie fils slain by Yudlul thir. Here Jina Blushman 1741" Malıblarat (७४१२) शोर धारच काषन । स एस मिहतः शेने मीमो भी मारवे १९ " पर हात यनं कृष्ण शवानं यच सम गुणान्त च कालेन पतितं मूम्बाम्बरा ॥ १०॥ एप तयारणे शमतापेन वार्यान् ! नरमयोंतमयोति योस्तमित्र केशव ॥ ११ ॥ शरतल्पगत वीर धो देशाना समम | पान पारसयने पर भूरनिषेविते ॥ १२॥ मतूलपूर्णगांगेयनिमिषाः समन्वितम्। उपचापोपधानामय र गापरीष धन्वना । २३ गालपानः पितुः शासमबरेता महायशाः एष शान्तनका येते माधाप्रतिमा युधि ॥ १४॥ धर्मामा तब धर्मशः पारायन निये। जमवंश मर्प सप प्रवामधारपद म १५॥ स्वयमेन रेण पुज्यमानेन पारार्मर नाह मृत्युरास्थातः सरपचारिला ॥ १६॥ धर्मधु कामु परिमस्यन्ति माधष। मूरता मार पनपराक्रम के समान गेई नहीं युद्ध में भयकारी कर्म करनेवाले पर भाष्पनी मासन्नमृत्यु होकर सोतेहै। हे श्रीकृष्णभी इसमूर्य के समान तेजस्वी सोनवाले भीष्मनी को ऐसे देखो जैसे कि प्रलयकाल में कालसे प्रेरित भाकामा गिराहमा मूर्य होताहै । १. केशवसा यह पराक्रमी नररूप सूर्य पद में शनों के तापसे शत्रुमको सन्तसकरके ऐसा प्रस्तंगत होनाई जैसे कि अस्ताच नपर वर्चनान सूर्य होता है । ११ । इस वीषिको व्युत न करनेवाले अमेष शरशय्यापर वर्चमान सूखाग से सेवित वीरशय्यापर सोनेवाले भीम को देखो । १५ ! यह नद्रानी के पुत्र इन राति तीनवाणों से पने मजुन के दियेहसे तकियको शिरके नाचे परकर । १५ । पिताके भाशानुसारी प्राचारी महातपस्सी मुद में मनुपम भापजी सोते हैं । १४ । हे सान सातों के माननवा नररूप होकर इस धमात्माने मानेक पल देवताभोसमान मागों को भारतकियाहै पापडवोंसे पूरे हुपे इस धर्मवान् सत्पका ने भाप अपनी मृत्युको पुदमें बतलादिया। १६ माधीस देवता के तमान नरोत्तम देवव्रत भीम के पाती होनेपर कौरव रोग भी वेरिएप किसरो पूर्वगे । १० । मोकि मर्नुनका रिना और सात्यकी the coatelloss warrior of the world. Ho ir lying loro lilo the sun follen dowaat Pralaya, Haring alain numorous warnors, he declines Joku a rolling sun. 11. Ilois lying on the field of bottla slain by Arjao. Ho obscrvod a Tuw of culilacy and Ascoticiıın for his father's Boke. This wine and virtuoas being is surtunia, his life by the puxor dthrknowledgsot Bralim, liks agod. 15. Asholby ths Pindaraat this truthful waa patsithein out the inagner of his slenth. Toda will tho Kaurava. cault in the walket if Jhartu, wlien Dorabia! Burhindsast Lokst Drotikcharya, the picaptur of Aijun. Satyaki af all the Kauravas, Iging 4n earth. I was master at thuknuardro ७४१३) Stri Parv. Sing !7413) गते देषनो स्वर्ग देषकरपे मरी ॥ १७ ॥ बनिय पिरोवारमापार सात्ववेत्तथा तपश्य पतित द्रोणं कुरूणां जिनसमा ॥ १८ ॥ मस्तं चतुर्विध घेद षय त्रिदशे रः । मावोवा महावीरपालथा मोगोपि मापन | १९ ॥ ५ पुरोधाय फरक पाइप बन्ते स्म पाण्डवार ! सो शो दोग राख परिक्षा; ॥ २० ॥ ननुधिर शीलाषा माषष । द्रोपण मिहतस्यापि श्यत जीवितो वश २ घेदा माग्य पवार सामाफेिराया ममपेतानि वे शापवादौ प्रजापत।२२॥ पदनाहौषिमा तस्य पदिमिवदिगो शुभो। गोमावो विकर्षन्ति पादी शिष्यगणा रिपती॥ २३ ॥ द्रोण पदम मिरत मधुसूदन । कपी रुपणमन्यास्ते दुःसोपहत देतना ॥ २४ ता पश्य पतितामाती मुकफेशीमधोमुखीम् । हतं पतिमुगासन्ती द्रो शताम्वरम | १५ मग्निमारस्व.पिविलितां मस्याम्प सर्वशः। दोप का गुरु? उसकौरवों के उत्तममुरु द्रोणाचार्य को पृथीपर पड़ाहमा देखो। १८ । माधवजी जैसे कि देवताजों के पर इन्द्र और बड़े पराक्रमी भार्गर परशराम भी चारोंकारसे के माताये उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी जानतेथे । ११ । कौर- पौने जिप्तको भारी करके पांडवों को बुलावा वह पृथ्वीपर मराटुआ ऐसे सोता जिम किनिलित अग्नि होती है ।१०। हे माधाजी मृतक द्रोणाचार्य की पनुपकी मुष्टि भोर युद्ध के हस्ताण मिना उदेहुये रणभूमि में ऐसे दिखाई पड़ने जैसे कि नीवडेगे के होते हैं । २१ । हेकेशरजी चारों वेद और सव अन गित भरसे ऐने पृथक नहीं ये जैसे कि भादिमें प्रजापति नीसे जुदेनहीं हुयेधे । २२ । उनके उन दोनों परणोंको श्रृगाल बैंचते हैं जोकि दंढवद के योग्य और वन्दी- मनोसे स्तूपमान भतिशुभ होकर सैकड़ों शिप्पोंसे पूजितथे । २३ । हे मधुसूदननी पर दुःखस पातितदि कपी इस एम्न के हाथ से मृतन द्रोणाचार्य के पास बहादुसी विपत रे २४ । उसरोदन करनेवाली पाडापान मुलेश नीचा शिमिय प्रखधारियों में श्रेष्ठ अपने पति प्रोणाचार्य के समीप नियनको देखो। २५ । सामम वाास सिविक अग्नियों को धारण करके सर ओरमे चिताको अग्निसे प्रचालित करके द्रोणाचार्यको उममें रखकर मागोद नानमन्त्रों को गाते नहाइमरे of weapons lika Indra or Paraybursis. II, unler obuodead-sahip tho Kauravas challeaged thra Pradesh, hon on gurthi 11 q leached firo. 10. Holding his bow ulha guirdini hoti huiia liso ons living. The four Votes and the weapjas did not learom is they did not loato Prajapati. His fat, ventalet by huultor's of d xciples and praised by bonude, aru being dragg 1 jnza sl-, kip, muda di tresord latacats tho denth of Druna elsa by Dhiriilituyuinn. Sky is standing by bim with downcast load ana diakril Jint. Haris put tiie benly ofipronrcharya on ths funeral auto the Broli san ti thi rith 17414) Mahablarat (७४१४ माघापगापन्तित्रीणि सामागि सामगाः ॥२६॥ सामभिरिभिरत्नस्थैरनुशंसन्ति चापरे। मानावग्निमिवावाय द्रोण गुरया हुताशने ॥ २७ ॥ गाउयभिमुखा गगां द्रोणाशिण द्विभातयः । भरसम्यां चिति करथा पुरस्कृत्य कपी सदा ॥ २८ ॥ इते स्त्रीपणि स्त्रीविलापपर्माण मापारी बार भगोविंशोध्यापः २३ ।। पायाच सोमदत्तमः पश्य युयुधानेन पातितम् । विद्युतमान धिहर मिर्मावधान्तिक १६ पुषशोकाभिसन्तप्त सोमदत्तो भनाईन । युयुधान महेषात गोपनिय श्यते ॥ २ . मी हि भरिचयसो माता परमवुःखिता। भाश्यासीव शिष्प अनिमें अमिको धारण करके और द्रोणाचार्यको अग्निमें हवनकरके भन्तमें निपत होकर तीन साममन्त्रों को गाई । १.। द्रोणाचायके शिष्य यामाह्मण चिताको दामिण करके भौर ऊपीको आग करके श्रीगंगाजी के सम्मुखजाते, २४॥ अध्याय २४॥ गान्पति बोसी हे मापयजी सम्मुखही सात्यकी के गध से गिरायेहुपे और बहुत से पतियों से घिरेहुये सोमदच के पुत्रको देखो। । । हेजनार्दनजी पुत्रशोक से दाती सोमदत्त मानों बड़े धनुपधारी सात्यकी की निन्दाकरता हुमा देखताहै । २ । यह भूरिश्माकी मात निदोष दुःखते अपने पति सोमदत्त को मान। विश्वास करातीरे । ३ । क हे महाराज पारस से इस भरतवंशियों के भयानक tbolymus of the Sam ved Other diyoiplus pour libations into firo ao! sing thic throa hyun of inSamved in the end. Having burnt him body. his disciplea tollow Kapi to ths aragss."28. CHATTER XXIV Gaudhari contingod, "Yonder lica Somilatta's Bna slain by Satyabi and surro inde) by numiruus birds Tho gruut areler fondatta ja Inokig us if in ontempt of Satyasi. hurishrava's mother is lamento 24 tlısmala slie wors consoling Soudatta her husband la $9e9t warten" It walucky, lopt that you donnt eco tho greut une (०४१५) Stri Parvind (7415 भर्धारं सोमदत्तमनिन्दिता ॥ ३॥दिष्ट्या मेनं महाराज दारुण भरतक्षयम् । कुरु सक्रन्दन घोर युगान्तमनुपश्यासि ॥ ४ ॥ दिष्ट्या यूपयज पार पुम भरिसहमदन। अनेकक्रतुयज्यान निहत नाथ पपास । ५॥ दिया स्नुराणामानन्दे घोरं विलापत बहु । न अणोपि.महाराज सारमीनामिधार्णवे ॥ ६ ॥ शल दिनित संख्ये भूरिभवस मेष ध । स्नुपाश्च विधवाः सी दिष्टपा नाघह पश्यांस॥ ७ ॥ पता पिलम बहुल मतः शोकेन कर्पिताः। प्रतन्त्यभिमुया भूमो कृपणं तम केशव ॥ ८ ॥ धाभल्लुरतिकी मत्स कदमकरोत् फयम् । प्रमत्तस्य यदन्डेसादाहुशरस्य पवन ॥९॥ तत पापवरं कर्म कृतवानपि सात्याकि । यस्मात् प्रायोपविष्टस्प प्राहा त ससिसास्मनः ॥ १०॥ किं नु वक्ष्यसि संसत्म कथामु च जनार्दन । भर्जुनस्य महर फर्भ या सकिरी टवान् ॥ ११ ॥ गान्धाररा शकुनिलवान सत्यविक्रमः । निहतः सहदेवेन भागिने येन मातुल' ॥ १२॥ य पुरा मदण्डाभ्यो व्यजगाया स्म घाज्यते । स पप पक्षितिः पक्ष यान उपवीज्यते ॥१३॥ मायया निकृतिप्रज्ञा जितवान् यो युधिष्ठिरम सभायां नाशको और कौरवों के घोर मलयकाल के समान रोदन करने की तुग नहीं देखतेहो । ४ । और मारब्धमे इस हजारों दक्षिया देनेवाले पहुआ यज्ञोंसे पूजन करनेवाले यूर वनाधारी मृतक पुत्रको नहीं देखते हो।५। हे महाराच भारब से रणभूमि में इन पुत्रवधुओं के घोर विलापको ऐसे नहीं देखतेहो जैसे कि समुद्रपर सारसियों के शम्द होते हैं। ५ । अब यहां युद्धमें मृतक भूरिभवा और शारगको और पुत्रवधुओं को नहीं देखतहो । ७। हे केशवजी दुःखकी वातहै कि पतिशोक मे पाडावान या स्त्रियां दुःखका विलाप करके सम्मुख पृथ्वीपर गिरती है।८। हे अर्जुन तुमने बीभत्सुनामहो यह निन्दितकर्म कैसे किया जो यज्ञकरनेवाले अचेत शूरकी भुभाको काटा ।। ९। सात्यकिने भी उससे अधिक पापकर्म किया कि शरीर त्यागने के निमित्त नियप करनेवाले ताल्बुदिका शिरकाटा । १० । हे जनानिनी सत्पुरुषों के मध्य में और कथाओं में अर्जुन के इस बड़े कर्मको क्या कहोग अथवा भाप अर्जुनही क्या कहेगा । ११ । यह वलयान और सत्यपराक्रमी शकुनी गान्धारदेशका राजा मामा अपने भानने सहदेव के हायमे मारागया ।१२ । मोकि पूर्मशमप में सवर्ण दण्डीवाले पंखोसे वायुकियाजाताया वह मा सोता truction of the Exaravas and a weeping and orying like that of prsleys. 1t was by good luck that you did rat mo tho death if your BOR who bad performed many facrificts with large dorations is by good luck that you donot hear the lamentatioo8 o: your daught: 1. in-law crying) le cranes. You donik see the dead bolson of Bhuri shuara and Bhalzh and the won en weeping 1945 tl so. It is very iherd totce that witowed stner fall np eartli with grut. dhyan a called Bitlatiu and felle cuinmitled the gretche bin of cultog the ar tot so insensibla ucd.ron.olserving Warrior, Satyaki dw a greater warrior 5 lr 117418) - Mahabharat (७४१६) विपुलं राज्य पुनर्जीयित जितः ॥ १४ ॥ ययैव मम पुत्रानो लोकाः शनजिता विभो । एवमश्यापि दुयुद्धे लोकाः शनणय जिताः ॥ १५ । कचनापं तत्रापि पुत्राम्मे मातृभिः सह । घिरोघयेहधज्ञानमृग्मधुसूदन ॥ १६ ॥ इति वीपीय चौविसापरीह गान्धारापास्य चतुर्विशाध्यायः २४ ॥ हुआ पक्षियों के परों से वायु कियाजाताहै । १३ । जिस छलीने सभा में माया मे जीवते युधिष्ठिर को और बड़े राज्यको निजप किया अन्त में वह पराजित हुपा ।१४। हेमच जैसे कि मेरे पुत्रों के लोकशनों से विजयहुये उसीमकार इस दुर्बुद्वी भी लोकशस्त्रों में लिजप होगये । १५ । हे मधुमुनजी यह कुटिलबुद्धी यहां भी मेरे सत्य बुदिराले पुधोंको कहीं भाइयों समेत विरोधी न करे १६ ।। fnult in a much as he beheaded the wise warrior who had resigned umrelt to death. 10. What will you say, Vasudex, about this deed of Arjin't in the denstablies of gooi naen 1 This p»se:ful Shakuni of true por 19 s, ihuking of Gandliar was slain by Sihaday the son of his siat r 19-law. Ho who was so red with gold hundled fang, is not being fanned by the wings of birds. He who deceitfully won Yado Hi htle aj bis great kingdom, wu3 al last coi quered. Be wox od rogione by in aux of Br 118 like my sons. I fear he will spread quarrel Awung may well-meaning sous to the other world tog "oi.
१७३१७] Stri Paryत्रीपर्व 17417" भाग्धावाम काम्बो पश्व दुर्ष काम्बोजास्तरणाचितम शियानमृष भरकाचं हतं पशुपु माघ । १॥ यस्य क्षतजसीदग्धी बाहूचन्दनरूपिती । अत्य पण भार्या विलपत्पतिदुःलिता ॥ शयानमभितः कालिंगं मधुम्मन । पश्य वारसांगवयुगलतिषमहाभुजम् ॥ ३॥ मागधानां मधिपति जयरसंग अनाईन । परि सर्प प्रमदिता मागध्या पश्य योषितः ।। ४ ॥ अस्य नाप्रगतान वाणान् कार्णिया Laपितान । उपमुसाविष्टा मच्छमानाः पुनः नः ॥ ५॥ मासां समवद्या मामातपेन परिश्रमात् । म्लाननलिमामानि भान्ति वक्त्राणि माषष ॥ ६॥ द्रोगेन मिसा शाशरसे रुचिरांगदा । धृष्टपुम्नस्तासर्व शिशवो हेम मासिनः ॥ तमिता गराः शेरले रुधिरोगदाः। द्रोणेनाभिमुखाः सर्वे भ्रातरः पञ्च कयाः १८॥द्रोधेन दुबई संम्पे पाप माधव पातिनम् । महाद्विपमिवाये सिरन महता अध्याय २५॥ गान्धारी योगी के माधयमी इप्त मृतक और पृथ्वीको धूलपर सोनेवाले काग्मोम के राजा को देतो जोकि अमेर उत्तम कन्पयुक्त होकर काम्लोन देशी सम पुषों के योग्पो । १ । वह भाटयां जिसकी पिर मरी चन्दन से लिप्त धुमा को देखकर महादुखी होकर दुःखका विलाप करती है । २ । हेमघमदनजी इस सोनेवाले शूरवीर राना कलि को चारोंमोर से देखो निसकी पड़ी भुजा प्रकाशित पाजून्दों के जोड़े से अलंकत है । । । हे जनार्दनजी स्त्रियां सब ओरसे इस जयसेन राजा मगधको घेरकर अत्य त रोदन करती हुई न्याकुलहैं ।। यह वारम्बार अचेत और दुःससे पूर्ण स्त्रियां अभिमन्यु के भुजवलसे मारे और रस मंगों में लगे हुये वागोंको निकालती हैं । ५। इमाधवजी इन सब निदोष स्त्रियोंके मुख धूप और परिश्रम से ऐसे दिखाई पड़ते हैं जैसे कि कुम्हलाये हुये कमल होते हैं ।। धृष्टद्युम्न के सा पुर वालक सुवर्णकी पाछा और मुन्दर बाजूमन्द रखनेवाले शूरवीर द्रोणाचार्य के हायसे मरे हुये सोतेहैं। ७ ।उसापकार मुन्दर वानूबन्द रखनवाले कैकपदेशी पाचों शूर भाई सम्मुतवा , द्रोणाचार्य के हाय मरेहुये सोते हैं। ८ । हे माधयमी युद्धमें द्रोणाचार्य के हायसे गिराये हुये CUAPTER XXY Gandhari maid, Look at the king of Camboj who is lying dead on dust O Vadiay. How is an ezreilent warriors of brond shouldera {ike tha gowdarlleurs f Oidhsj. H' Wit is veoping at his bleeda ing Arm pusted with sindal Luoh O H. dhusudap, at the dead warrior king of Xoling whoso long arms are decked with a briliant pair of rulets. Woron are weeping round Jayatren, tha king of Magadh and extract the arrows slint by the piwurful arins of Abhimanyn nu through his body. 5. The faces of all these yowrn look like with.
[7418) Mahabharat (७४१८ इतम ॥ ९ ॥ पालरामे विमलं पुण्डरीकाक्ष पाण्डरम । मतपत्रं समाभाति शरदी निगाकर ॥ १० ॥ हतास्तु दु पदं एवं स्नुषा भार्या सुदु खिता। वगवा गछरित पाश्चात्यं राजानमसातः ॥ ११ ॥ धृष्टकेतुं महेवासं बीपुंगधमंगना । द्रोणेन निहतं र हरामिहनतस ॥ १२. दाशाहपुत्रधार शयाम सत्यविक्रमन ।मगे प्याके रुदन्त्येनादिराज बरंगनाः . १३ ॥ विन्दानुविन्दायावत्यो पतितो पाय केशव हिमान्ने पुषिती शालो मरुता गलिनाविध ॥ १४ मण्या:पाण्डवाः कण सर्व एव स्पया सद। ये मुक्ता द्रोणमीमायो कर्णात् धैकर्शनात कपाद ॥१५॥ दुखों धात दोणमान सैन्धवाच्च महारयात् । सोमदत्याद्विकर्णाच्च शराब छतपर्मणः ॥ १६॥ ये हन्युः शनवेगेन देवानीप नरर्षभा. त इमे निहताः सर्वे पश्य कालस्य पम्मे यम् ॥ १७ ॥ तवनिहता कृष्ण मम पुत्रास्तरस्थिन । परवाइतकामपनुपालुब्ध द पद को ऐसे देखो जैसे कि बनमें वडे सिंहसे मारेहुये पड़े हाथी को देखते हैं।९। राजा द्रुपद का वेन निर्मल छत्र ऐसे प्रकाशमानहै जैसे कि शरदऋतु चन्द्रमा होताहै । १० । या दुःखी भार्या भौर पुत्रवधू पांचालके वृद्ध राजा द्रुपदकोदार देकर दाहिनी भोरमै नातीहैं । ११ । अचेत खिया द्रोणाचार्य के हायसे पारेहुये इम महात्मा शूर चंदेर राजा धृष्टद्युम्नको उठाती हैं । १२ । हे भीकरणजी राजा चंदेरी की यह उत्तम खियां इस सत्य पराक्रमी वार मैदान में सोनेवाले अपने पांत्र को पाठ में लेकर रोनी हैं । १३ । श्रीकृष्णजी इन अवान्त देशके राना चिन्दानुपिन्दको ऐसेदेवो जो कि हिममृतुके भन्तपर वायुमै गिरायेहुपे दोपुष्पित शालसोंको देखते हैं १४। हे श्रीकृष्णजी सत्र पांडप आपके साथ मारनेके मपोग्य मोकि द्रोणाचार्य भीष्म, कर्ण भौर कपाचार्ग से भी बचेहुये हैं दुयों पन ममत्यामा, सिन्धु फा गजा जगद्रय, विकर्ण, सामदत्त और शर कृतवर्मास भी रचे । १६ । सो नराचम रखों की तीक्ष्णता से देवताभाभों कोभी मारसक्त prod lotus flowers on a scouot of tol and the heat of the Sun. All the youthful sons of Dhrulladyuinn, alusp by Drosa barys, are sloep ng here on unrth, Smilarly, the five thaskaya brothori, shna by Drons, sloop in death. Drupad, olas by Drini in battle, looks liko a great clephant slnın by a liou in a forest. His white umbrolla rhinus liko the wu wn iR wiator. 10. Hu distrus 19] wf, ail daughter-in-law hava turnt Orupıl the s'd king of i'an halaul acs going nyay. tho Ilid. mblo noroc life up tho kng of Chanderi who was slain by Drona Ths in men of Chrudur hits titanuy thir br sp1 ands an 19 armas anu nu werp om hicu Look at Vind nad Anusind tku two pritioca of A sautilyang jowa liko t* fluworni; al trous uprostod by The Wild at the end of midler, Tts Paodayat be well 14 you, 0 Kruin, their (७४१९) Stu Pair âge (7419/ ग: पुनः ॥ १८॥ शान्नमाधेष पुषेण प्रान्नेन विरेण च। तदवोकास्मि मा स्नेह कुरु स्वारमसुतेविति ॥ १९ ॥ तपोर्न दर्शन तात मिथ्या भविम इति । भनिरणैर पुत्रा में भस्मीभता जनाईन ॥२० । पेशमापन उपाच । इत्युक्त्या म्यपतहमा गान्धारी शोक मूर्षियता । दु.खोपातधिशाना धैर्यमुत्सन्प भारत ॥ २९ ॥ ततः कोपपरीतांनी पुत्र शोकपरिप्लुता । अगाम चौरि दोन गान्धारी व्यपितेन्द्रिया २२ ॥ गान्धार्युनाया। पासवाधाराष्ट्राश हवा. कृष्ण परस्परम् । उपेक्षिता विनश्यम्यस्त्वषा फरमान माईन ॥२३॥ इच्छतोपझिनो पास कुरुणां मधुमदन । पस्मारवया महाराहो फल तस्मानाप्नहि ॥ २४ ॥ गतिशुभषया वन्मे तपः शिवाजिनम् । तेन स्वो दुरयां पहसर इस युद्धम मारग इस विपरीत समयका दखा।. र माहमानी मेरे पेगमान पुत्र तभी माोग जब कि तुम अपने भभीष्ट प्राप्ती से रहिव उपप्ती स्थानको छोकरपये । १८ ! ती साय मुकको भीष्म पितामह और ज्ञानी विदुरभी भे समनापामा कि अपने पुत्रों पर प्रीति मतकरो। १८ । उन दोनोंकी पाहवया विध्यारोमेके योगनहीं थी इसीसे हे जनाईनजी मेरे पुत्र थोडेही दिना नाप होगये । २० । वैशम्पायन वोले हे भरतवंशी वह गान्धारी यह सब कार मोफसे पूर्वापार दुल से घायल पुदि धैर्यको त्यागकर पृथीपर गिर पड़ी। फिर कोषसे पूर्ण शरीर पुत्रशोक में डूबी असावधान इन्द्रिय गाया रीन मीणजी को दोपलगाना । १५ । गान्धारी पोली हे श्रीकृष्णभी पांडवों के और धृष्युम्नके पुत्रादिक सर परस्पर भसहुपे हे जनार्दन तुमने किसहेतु से इन विनाशाहोनेवालों को त्याग किया। २।। हे महावाहु मधुमदनजी जिप्तकारण aro indestructiblo as you scap d derth from the hands Drona charya, Bhishm, Kuran, Krip.charya, Duryodhan, Jayadratb, Vikain Somdar and valiant K itvarma. The heroes, who could slay aven gods with their sharp and powerful #rapons, bave died in this war; the times are so changed. 17. I hold my sons as doad from the time you returned front your useles& mission of place to Upap'arya. Bhishon the grandfather and wife Vidur told me then that I should lovo my sons no muro. Their foresight ould act to wrong, O Janardan, and thorefore my sons wero Blain." Vaistismpayan says that having talked at shove, Gandhari Jost her seness and patience with grief and fell down on carth. Theo with his body full of rago and her organs out of control, she blanned Shri Krishn, saying, " Tha Sons of the Pandavas and Dlırishtadyumn were all slain at onco. Why did you learo them in the larch! You will be punished for your wilfully looking at the distinction of the Knurayak By the victue of the arcticisin sbich I have performed in on my husband 20 [74 20] Mahabharat (७४२० न शो पकगायः ॥२५॥ यस्मात् परस्परं मम्तो प्रातयः कुरुपाण्डः। उपे क्षितास्ते गोविद तहमाक्षातीन परियति ॥ २६ ॥ त्वमप्युपस्थिते वर्ष पत्रिंश मधु मामा हतातिहतामात्यो हतएवो धनेत्ररास्सिमाप्युपारेन निधन पनवासि ॥ २०॥ सायद तभुता निसातिवावानिः परितपिष्मस्ति पथैव मात बिर। २८ ॥ वैशम्पायन उवाष । एमाला तु पचन वासुदेवो महामनाः। उवाच देवी गापारीमीपयनमिए । १९ सहा वृश्मिास्य मदग्यो मेर वियते । जागहमेतदप्ये चीर्ण चरसि नये । माला रैस्पतिवादेन से तुझाइमपान ने जान बूझकर कौरवों का नाम दोनदिया इसोनु तुमनी उसके फको पाागे । २४ । पति की सेवा करनेवाली मी गो कुछ तपपात किया उस दुष्पाप्प तपके द्वारा तुमना गदापारी को वापदेतीहूं । २५ । रे मोरिन्दनी भो कि तुमने परस्पर प्रातबालेको मारनेवाले कौष और पाडौंको नहीं रोका इनहेतुसे तुम भी अपनी प्रातालों को मारोगे ।१६ निघुमाननी तुपनी चीमवर्षपर्व वर्तमान होनेपर परेपे मंत्री पुनशालिमामे पन फिरनेराले प्रशातरूप लोकोमेशन मनाप के समान निन्दित उपायसे मरणको पापोगे । २७ । इसीप्रकार तेरीत्रिया भी जिनके पुनम और हातिवाले मारेगरे रेमे चारोमोरको दोगी जैसे कि पद भरतीशयों की त्रिपां दौड़ता हैं । २८ । वैशम्पायनोले वड़े साहसी वापदेशनी मगर रचनको मुनहर मंदमुममान करतहो उस देवी गौमारास पोसे सत्रिगामी में जानता कि तू मेरे कप के मपान कपको भी अपने तपके मायक लिये करती पावलोग देवतेही नाशको पारेंगे इसमें सदेह नहे। ३. तुम सी पारसग मन्य मनुप देता और दामोभी भार परसार विनाशको I curso you. Because you did not stop tuo iuatunica nazas of the Kauravas and tho Pendarah, you will destroy your own bammen After thirty six years your waist ra, x 118 and kio«uron buing klain, and you hiding in a forest will du en igcominong dirth. Thio women of your famuly will run livro and thero liku thon Karar Wrien. " Vaishumpayan says that brav. Vasilov km'ul slowly at the words of Gandharn, anil ani, " I Lnow, Kihatrya roman What you have dne lood life was to destroy the murit of four Acution The l'alaras are suro lo dia of Civi's will. Thuy Arn indenfructiblo by then R Hart Hararamand thstitro thry oth-ildia 1 .४२१] Stri Parvata (7421) एनः परसपरत माशं यतः प्राप्सस्ति यादवाः।३१॥ इबुरूयात दाशा पार बालस्तषेतसपियुशसं वाना निगशाश्चापि मौविते ॥३२॥ इति खोपर्वसि बीविलापर्पणि गन्धारीवाक्य पंचविंशोध्याष. १५ ॥ भगवानुपात्र । उत्तियत्तिष्ठ मान्दारिमा र शोके मन. कयाःतव पराधन परषो निधन मताः॥१॥ यत्त्वं पुत्रं दुरात्मानमीघुमत्पम्तमानिनम् । दुर्योधने पुर स्कृत्य दुष्कृत साध मासे ॥२॥ निष्ठुर धैरपुरुष वृशाना शासनातनम् । कयमा सतं दोव मराधातुमिच्छसि ॥ ३॥ मृत पा यदि या नष्टं पातीतमनुसोचति । दुखेन लभते दुख द्वाचनया प्रपद्यते ॥ ४ ॥ तयि माझमधत्ते गर्भ गांवादार पागे १। श्रीकृष्ण जी के इस प्रकार कहने पर पाएटपलोग भयभीत चिच अत्यन्त व्याकुल और नीवनमें निराशा युक्तहये । ३२ । अध्याय २६॥ श्रीभगवान बोले हे मान्धारी उठो उठो शोकमें चित्तको मतको रेअपराध से कोसोंने नाशको पापा । १ । जो उस दुर्बुद्धी अत्यन्त लागा करनेवाले दुर्योधनको भर्ती करके अपने दुष्ट कर्मको असमानता । जोकि कठोर वचन शत्रुताको मिय जाननवाले मनुष्य और रद्धोंकी प्राज्ञाके विपरीत विरुद्धकर्म करनेवाला था पहा तू अपने किपहप दोपको कैमें मुझमें लाना चाहती १३ । जो सतक अपना विनाशयुक व्यतीत समय को शचती है और दुःखो दुःखकोपाती अर्थात् मादि अतके दोनों दुखोंको पाती है। ब्राह्मणी वपके निमित्त उत्सम tighting with one another," words of Shri Krisha au I lost all hope of life in their distr883. " 32. Thu Paucivus vet terreted at those CHAPTER XIVI Shri Krisha said to Gaudh iri, “ Rise up and dmnot gro your self up to grief. Tho Kauravits were destroyed by sour own fault, You made proud and ourious Duiyedban leads trong vid yot call your wicked doed good. He loved enoudy ann densed the adricu of old and set you work to lay your own fault ua my shouleurs, Yua gnoto at this great destruction and are doubly distressal, 4 B-show12 men, ished of Yudhisthir the wise the number of tho Warriors alain, and Tud'thithur Baid that the dend warriors amocated to ten crore pod twenty thousands and that twinty tour thousande, ono hundred od ssly five were in sixible, Dhritmehta then questioned about (UR - . वैशम्पायन बोले कि शोकसे व्याकुल ने गान्धारी वासुदेवजी के उस अभियोर दुवारा कहेहुये ववनको मुनकर मानहोगई। ६ । फिर राजऋषि धृतराष्ट्रने भाव संख्याको जानते हो तो मुझेस कहो। ८ । युधिष्ठिर वोले हे रामा' इस युबम दक्ष करोर वीसहजार शूरवार मारेग। ९ । हे राजेंद दृष्टि न आनेवाने बारों कीसंख्या चोवीस हजार एकसौ पैंतठ है । १० । धृतराष्ट्रवाले हे पुरुषोत्तम महाबाहु युधिष्ठिर नाश किया वह सत्य पराक्रमी इन्द्रलोकके समान लोकोंको गये ।१२ । हेभरवच Words of Vasudev, respeital again and again and unpleasant to hear Gundbari distressed frith gricf, becamo silent. Thon Dhritrashtra the suyal say, chiecking his persions, which were thoutcomoof ignorance 17422) Malinbharat धावितारं तुरंगी । शदादास पशुपालम्ब पैदया षघार्थी विधा रामपुत्री । ५५ पैशम्पायन उवाच । तच्छुत्या वासुदेवस्य पुनरुकं पचौप्रियम् । तष्णीषभूष गाया शोकव्याकुलचेतना ॥ ६ ॥ धतराष्ट्रस्तु गजपिनिगृह्यारिज तमः । पर्यपृष् धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरम् । जोधता परिमाणन म्यानानपि पाहब । रताना जानोपेपरिमाणं पदस्प मे ॥ ८ ॥ युधि टर उपाय पशायुतानमपुतं सामाणि विंशतिः । कोट्यः पष्टिश्च पदव येसिन राजन् म हताः ॥ ९ ॥ अलस्या वीरावां साम्राणि चतुर्दशा दश धान्यानि रानंन्द्र शतं पशिश्न पत्र व ॥ १० धृतराष्ट्र उवाच । युधिष्ठिर गति कान्ते गताः पुरुषसत्तमाः । माचस्प मे महापा सर्व धसि मे मतः ॥ ११॥ युधिहिर उयाच । पहुँतानि शरीगाणि दृष्टः परमसंयो | देवराजममालोकान् गतास्त सायिक हटेन मनसा मसी होनेवाले गर्भको धारण करती है गो भार लेचलने वालको घोड़ी दौड़ानेवाले को शूद्रा दास को वैश्या शपालको राजपुत्री प्रिया युद्धके अभिलापी गर्भको । ५ से उत्पन्न होनेवाले मोहको रोककर धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर से पूछा । ७ कि. पांडव तुमनीवतीहुई सेनाकी संख्या के जाननेवाले हो और जोमृतक शूरवीरों की उन्होंने किस गतिको पाग वह मुझसे कहो मेरे विचारसे तुम सब बातों के काम घोलहो । ११ । युधिष्ठिर वाले जिन प्रसन्न चित्तों ने बहे पद्धमे अपने शरीरक जो अप्रसन्न चित्तसे युद्धमें बहतेहुये मारेगये वद गन्धर्व लोकको गये। १।। और woman produces oltspring for neceticiani, a vow to carry load, a mari to produce a runner, or shudra woman produces a slave, a Vaishy woman produces one who rears byauta; bui a kabatrja woman pre duces fighting men. Vaiahawpayan says that on hearing the .
StriPary खापव 17423) मारत । युध्यागना हनाः' संस्थे ते गन्धर्वः समागताः ॥ १३ ॥ ये च संग्राममूयिष्ठा गपमानाः परांमुखाः । अव निधन प्राप्त गतास्ते गुह्य कानमति ॥ १४ ॥ पापमाना वितु हायमाना निरायुधाः हनिया महात्मान पगनभिमुस्सारण । १५॥ छिद्य पामा:शितैः शरैः सवधर्मरायणा: । narस्त ब्रह्मसदन हना पातः सुपरस. । १६॥ ये तत्र निहता राजन्नन्तरायोधनं प्रति । ययाकश्चित्से राजन समाधास्तु रान कुछन् ॥ १७ ॥ धृतराष्ट्र उवाच । फेन शान बलेन पुत्र पश्यासि सिधवत् । ग्मे धद महाबाहो थातथ्य यदि मन्यसे ॥ १८ ॥ युधिष्ठिर उवाच देशात बने विचरता मया। तीर्थयात्राप्रसङ्गेन समातोऽयमनुभवः ॥ १९ ॥ देवर्पिोमशो स्टस्ततः प्राप्ताम्यनुस्मृतिम् । दिव्य चक्षुरनुमाप्त झानयोगेन पै पुरा ॥ २० ॥ धृत उवाच । पेधानाथा जनस्यास्य सनाथा ये च भारत । कचि शरीराणि रणभूमि में नियत याचना करवं परांमुख होकर उस्त्रोंसे मारगये वत गाकों के कोंको गये । १४ । जो पात्यमान अशस्त्र लज्जासे युक्त और बड़े साहसी युद्ध त्रुओं के सम्मुखं शत्रुओं के हाथ से गिरवे नत्रिय धर्मको उत्तम माननेवाले नेत्र स्त्रिों से मारेगये वह निस्संदेह ब्रह्मलोकको गये । १६ । हे रामा जोमनुष्य यहाँ गभूमि के मध्य में जिस किसी प्रकारसे मारेगये वह उधर कौरवदेशको गर्थे । १७॥ तराष्ट्र गेले हे पुत्र तुम सिद्धोंके समान बिस जानवल से इस प्रकार देखते हो हे विबाहु वह मुझसे को जो मेरे सुनने के योग्य है । युधिष्ठिर पोले कि समर में आपकी आज्ञानुसार वनमें धूपनवाने मैंने तीर्थयात्रा के पोगस इस भ. प्राको माम किया । १९ । देवीप लोमसमाप देख उनसे इस मनुस्मृतिको गया. गौर निशयकरके पूर्वसमयमें ज्ञान योगसे दिव्य नेत्रों को पापा । २० । तराष्ट्र वोल मरनवंशी क्या तुम नाथ और पनाथ लोगों के शरीरोंकोशिश अनुसार दाह करोगे । २१ । जिन्हों का संस्कार करने के योग्य नहीं है Loir late lertalter, and Yudhurbilur anid, " Tixoso who died cherially Töre gone to lho rigion of India; thuse Flo nero chterlina, joinod tlov Gandharvas; thu o who beliei for merey and turned back, Ware luided into Guliyahpt thorendo were deprived of their wespons and yet faced the eneasy and cio Blas, Lavu sunily gone to the rigins of Brahm, All thrise iho died in illa field of batlls, ander any circumtaves, Hisre gone to the country of Utar-Kurns. Dhritroehtra then asked hiin how he could go all that libo eiddhar, ind Indlalithi said, * Roadilis by yior order sufinits, so this feculls by rotirg!oly placca Tran borardi, le dire pipe and sol so l. n thu 120 licet es nellskd.s!le righet. ja bitta then 10 d." Tul suu kuin ilce bodies akich karo sopo to Icok miten Toshcu! sasa tlo lcdica frias to ng diffed ord rates १८। 9 20. Line 174243 Mahabharat घश्यन्ति पिधिपूर्पकम ॥ २९ ॥ न ये साति कत्तारोनच वाताग्नयः पश्य कस्य फीम पहुरदासात् कर्ममः ॥२२॥ यार सुपाच ग्रनाथ विकान्ति तस्ततः तेपान्तु कर्मिणा लोका भविष्यन्ति युधिष्ठिर ॥ २३ ॥ वैशम्पायन उपाय } एकमुक्को महादुन्तीपुत्रोयुधिष्ठिरः । मादिदेश मुधर्माण धौम्य स्तम्च सञ्जयम् ॥ २४, विधानमामि युथुरसञ्चैध कौरवमा इन्द्रसेनमुखांव मृत्यान सू स. २५० मन्तः कारयन्येषां तकार्याण्यनशा यथा बानायव किचियरी न विनश्यति ॥ २६ शासनासर्मरात्रस्य क्षत्ता मतम्च समयः । मुशर्मा पौरपस रित इन्दसेनाहयस्तथा ॥२७॥ चन्दगागुरुकाधानि तथा कालीपायुतायत तलब गांव सीमावि वसनानि च ५२८ ॥ समारय महादणि दाम्माङ्गक साया । स्थांश मदितास्तत्र.नानाप्रकरणानि च ॥ २९॥ चिता त्या प्रयत्नेन यथामुख्याधरा विपशपामामुरब्धमा विपिरष्टेन कममा ३० ॥ दुर्योधन राजानं माधारण और यहोमिनती अग्निनियन नहीं रोकत कर्मों की अधिकता से हम सिमा क्रिया कर्मकरें जिन्होंको मुवर्ण अवि गरड और गिर इधर उमा से संगो युधिहिर क्रिपाकर्म से उन्हों के लोकहोंगे । २३ । बैशम्पाकम बामे माराज इस पचनको सुनकर कुन्नकि पुत्र थपिष्टिरने दुपौधन के पुरोदिर सुधर्मा पौषि मूत संनय रहे बुद्धिमान विदरजी, कौरव युयुत्सु इन्द्रसेनादिन मृत्य और सर सन् । २५ । इन सबलोगोंको मामाकरी कि भाप सबलोग के व सायों को करो निससे कि कोई शरीर अनाप के समान नाको पाये । २६ । परामकी आशा से विदुर मूतसंजय मुधी और पाम्य पुरोहित समेत इन्द्रसेन भौर नपं । २७ । चन्दन, मगुरु, काष्ट और कालीयक मृत वेल, गुगन्धिकारमन्य ज्ञान । २८ । लकड़ियों के देर और यहां पर टूटेट्ये रय मोर नानामंकार के भोंकोइसा कामे । २९ सावपानी ने रहे उपायों से पितामोंको पनाहर मुन्य १ राजाओंको नाम सिदित कयों के बारा ! किया। राजा दुर्गाधन उम मी भाई शल्य निःशल भूरिभंगा । ३१ #way by ti Sudut 1 fry and should burn them in accordanco with the roliglo. rita Paieftain mayai PIU cliat oa hearing Dlustabliks Winde, Yuuhintus Hd 8 lobula tbu pruut ol Daryo iliun, Dand, Sjays, Wro Vilar, Ynyut.u ibu haurav nod Inlisenar i oder testants and deprera 34 pullore the funeral Internud it to up by dontroyed for wout of cere. 20. By Yulatba's leder Vidur, Saajasa, Sidla tila, Ilusung the prion Islama addayi nullantasanger roain gher, all partners lillas, Lespot fuel, liceu sore Ariel trirjen, Thry thonizm Nawalparinitionisten th-shresthiafkinge with relrgery, Toint 2. P. *.. Vuiziniau vill his heute brolliers, Stalin . Stri PAIसापर्व (7423 नाधिकार । शनश्च राजाने भरममय च ॥ ३१ ॥ जगद्रास राजाम भाभिमायुश्च भारत दौ-शासनि म धृष्टकेतुन पवित्र । ३२ वृहतं सोमरस च शताधिकान् । गाने क्षमधन्धाम शिरादौ तथा ॥ ३३ ॥ शिdिura पाय धुपगुम्नग्ध पार्वतम' युधामा स्वविक्रान्तमुनमांजसमेषण Man कौशस्य होपदेयांश शकुनियत कालम् । अचल कृषकम मगदग पार्षि बम का कत्व सहएप्रममणम् । मायांच महेमामालिंगाश्च महास्थान up ME रामसेन्द्र वकमातरमेव च । असम्दुर राक्षमेदं जलसन्धम पाद पम् ॥३७॥ भन्म पार्थिधार जन शतशोऽध सावश प्रितधागनदीतः रात्रके समदायर ॥ ३८ ॥ ये बाप्यमायास्तत्रासमानादेशसमागताः। तत्र सर्वान् समा मारय राशीन का सामशः ॥ ३९ ॥ विस्वा दाहीरपणे प्रभुनः स्लेडगावत बाहनामास विरोधमंगजस्य शासनात् ॥ ४० ॥ कारपित्या क्रियास्वेषां कुरुरानो युधिष्ठिरोधृतराष्ट्र पुरस्कृत्य गङ्गाममिमुखोऽगमत | Uh इति सीपणि श्रादपर्वाण युदमतानामावदोहके पशिध्यायः २६ ॥ राजाजयद्रय, अभिमन्यु'दुश्शाशन के पुत्र लक्ष्मण राना धृष्टकेत । ३२ इन्त सोम दर सैकड़ों मृजयदेशी, राजा क्षेमधमा, विराट मुपद । ३३ । शिखण्डी धृष्टद्युम्न पराक्रमी युधामन्यु उत्तमोपस कौशल्य दोपदीके पुत्र सांवलका शकुनी, भचम हपक गमा भगदच । १५ । क्रोधयुक्त मूर्य का १ का पुत्रों समेत बड़े धनुषधारी केयदेवी महारथी विगतदेशी । ३६ । राक्षमाधिप घरोत्कच चक्रका 'भाई गवसोंकाराजा अलम्पुप राजा मलसिन्ध इनको और अन्यानारों राना॥३७॥ मोंको घृत की पारामों से होमीहई मकाशमान भग्निपों से अच्छे प्रकारसे दाई किया। १८पर्यापर नानामकार के देशोस आनेवाले जोमनाथ भी ये उन सकको इकट्ठा कर:३९सीधे दियुक्त तेल से संयुक्तं लकड़ियों की चितामों से विदुरमीने रानाकी 'माशानुसार उन सपको दाइ किया कौरतराज युधिष्ठिर उन्होंकी क्रियाओंको कराके धृतराष्ट्रको भागे करके श्रीगङ्गाजी के सम्मुख गये ४१ Sba!, Bhurishrays, I nyadruth, Abhim myu, Dixhiasan's sun., Laksh. man, Dhrishtaketu.Vrihant, Somdatta, the Srinjayas, Kshewdhanwe, Virat, Drepaid, Shikhandi, Dhrshindyumn, valiant Yudhimanya, Uttamaujar, Susale, the sons of Drupad, Shakoni the son dural. Achak, Vriehak. king Bhagdatts, 35. Tabh Karan the son of Surya tho Kaikaga warrior* and their are the Ghatntkach the prince of 12kslasor, Vol's brother Alomturb, Prince Jalsandb aad other nat warriure by thousands were furnt with libation of ghee. Other warriors from different countries, laring 20 freedo, were collected targetbor and burnt witla Isla tons of oil by Vidur. llavia prouided tlacir funeral cremosion, Yudhishwar -end Dlicrashtra went to the Ganges narsion of Tricarlo 17426] Mahabharat नाम्पायन उपाय । ते सासाथ गंगणन्तु शिवां पुंज्यालोचिताम । इदिनों पर सम्पन्न महान्पा महाक्लाम ॥१॥ मूषणाण्युत्तरीयाणि बेनाम्यवमुख्यत: पितृणां पौत्राणां मातृणां सजनस्पच॥२॥ पुत्राणामायंकाणाय पतीमांच कृत्रिया। उदकंपकिरे सर्वा रुदन्त्यो मुशामिना सुदानावि धर्मशाः प्रधनुः सलिलकिला ६॥ ततः कृमी महाराज सहसा शोककाता! उपती मम्दया वाचा पूधार पर माप्रपात ॥४॥ पसरो महेन्यालोरथपथपम् । मर्जुनम ता सम्पबालस पलभितः । ५॥ मत मन्पच राधेयमिति पाण्डवा योगराजपमध्ये दिया कर व प्रभुः ॥ ६॥ ययुध्यत यः सर्वान् पुरा यः सपदानुगाम् । बुस्योपाय सर्व याप्रकपन परोचत ।। ७॥ यस्य नास्ति समाधीय पृथिव्यामपि कनन । कोणीत पर प्रारपि सदा मुषि ८ सयसम्धस्य शरस्य संग्रामेबपक्षाविमः । अध्याय २७॥ मायन वाले कि उन्होंने कल्याणरूप पवित्र बसों से पूर्ण श्रीवानी को और बड़ी रूपवान् स्वच्छ जल रखनेवाली हदिनीको पाकर : १ । उमरीयवस और पगड़ी मादि को उतारकर पिता भाई पात्र सानपुत्र और नानामों के मलदानोंको किंगा । २१ अत्यन्त दुखी रोनेवाली सब कोरीय खियोंने अपने पतियोंको जम्दान किगा। शोकात कुन्ती अकस्मात अपने पुत्रोंसे यह वपन चोली ५ । किम का बड़ा धनुपधागे महारथी वारों चिहनों से चिहिनत युद्ध में अर्जुनक हाथ मे समय हुआ। ५। हे पाहम तुम निमको भूत और राधाका पुत्र मानो हो भौर जो ममर्थ सूर्य के समान सेनाके मध्य में विराजमान हुआ प्रथम निपने तुम सब समेत तुम्हारे साथियों से युद्ध किया और मो दुर्योधनकी गव सेनाको खचा शोभामान हुमा निसके बलके समान सम्पूर्ण पृथ्वीपर कोई | रामा नगई और जिस घूरने सदैव इस पृथ्वीपर एम कति को प्राणोंसे भी अधिक चारा उम सत्यमानि पुद में परास्मुख न होनेवाले 18गमकमी अपने भाई CRPTERXXIII Vairl suspenyass rail," Gore on this Gang", tha bort of ritera and waits, they put itt their clothes and olfered walor to the manca ol their eldo motor, bineren and friends. The lapi-aling Kuray notrwa utleol water tetin marns of thir hu.tandn Than Kunti. Nitro.ol with grief, said to her sons, Thu grosł Archor deleated by Arjun, kedua di you at the wo al Sut Aud Railr, lo shoot hta.in.un is the list of bit is the foreanet • f your proncoth, waalhdthe Asurarthan wlo was the syntat the grirkesat the world win lotunu lewe Lolli, *** pturirullel and iqtinilla Inilt ild ir raler i liv (०४२७) Stri Parvana *77427 पदक तस्य प्रातुरक्लिष्टकर्मणः ॥९ । सहि घ पूर्वजो माता मास्कगन्मयशा यत । कुण्डकी कषधी भूगेदिषाकरसमप्रभः॥ १०॥ घरघा तु पाण्डषाः सर्वे मातुर्य चनमप्रियम्मेवाम्बशोधन्त पश्चातगमयन् ॥ ११ ॥ ततः स पुरुषम्यान कुन्तीपुत्रायुधिष्ठिरः । उवाच मातरं धीरी निश्यसनिष पन्नगः॥१॥ यस्यषुपातमासाय नान्यस्तिनापात् । मवायास कथं धो देषगर्भः पुगभषत् ॥१३॥ मो भवस्या मन्द्रस्य प्राणेन व हता. • निधमेन हि फर्णस्य पारितास्म सवाघधाः ॥ १४॥ भाभि मायोर्विनाशेन द्रौपदेयषधेन । पांचालानांच गाशेन कुरुपा पततेन च । १५७ तहः Maगुण कु.लमिदं मामस्पशनृशम् । कर्णमेघानुशोचन हि सन्दऽग्नाधिधारित. ॥ १६॥ एवं विळप बहलं धर्मराजो युधिडिर।पिनदन. दु घिरी राजा धकारास्ता पप्रमः ॥ १७ मत आनाययामास फर्गस्य सपरिषदा ।त्रिय पंरपीतमान कर्ण का बलदान करो ।९। यह तुम्हारा पदाभाई मर्यरेषना से मुझमें उत्सान हुआ थामा भूर कुरटल कवचधारी और सूर्य के समान वेजसी था। १० । सत्र पारस माता के उस अश्यि वचनको सुनकर कर्णको शोचते हुये फिर पाडावान हुये । ११ । इसकेपीछे सर्प के समान सासलेता वह कुन्तीका पुत्र पुरुषोत्तम वीर युधिष्ठिर अपनी मातासे वोला । १२ । अर्जुन के सिवाय दूसरा मनुष्प जिसकी वाणी को पार सम्मुख नियत नहीं हुमा वह देयकुमार पूर्वसमय कैसे आपका | पुन हुआ। १३ । दुःखकी पात है कि मापके भेद गप्त करने से हम वालों समेत कर्ण के मरनेऐ हम बान्धवों समेत कर्ण के मरने से पाहावान हुये। १४ । भाभ मन्यु द्रोपदी के पुत्र पापाकों के नाल और कौररों के गिरने से भी हम पीड़ापान हुये परन्तु उगसबसेमी सौगुने इस दुःसने बस मुसको दवाया है मैं कर्णकाही शोच वाभा माल्य अभि में लियत होकर जलता ई.। १६ हे राना इममकार धर्मगन युधिहिरने पाव विलाप करके धीरे २ वहुतरोदन किया इसके पीछे उसमभुने उसका मलशाम किया।१७। इसके पछे उसे बुद्धिमान कारखपति युधिष्ठिरने भाई के मेमसे offsp ing of Surya and mysell, born rith armour and ear-rings and gloriouslk the Sun." 10. Hearing these unwelcome words of th-ir mother all the brothers pero much grioved for Karaa, Yudhishthir thon said to his mothur," How could be, whose shower of arrows nono bot Arjun | could opposs, be your Bon ! Alast we ars undono by your keeping the mattor Aducrat and have to suffer tho pange of Karad's death. WY® are distroored for the death of Draupadi's sons and Panchale; but hundred timos greator has been Karan's death. I luru for Karan's death." 19 Thu Yudhishthir wept much for Karan': d-ath and offered water to his manot. Then for fraternal lore bu reneforall the He manes. KAS the women of
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Hahabarat
मातु प्रेग्ना युधिष्ठिर । १८ सतानि Rधारमा प्रेतरयमतरमावोस
तागाया सदरादाकुलन्द्रिय
शव स्त्रोपदाणे भादप व कर्मस्य गृहयुनत्वकथने सप्पविशाषा: १७॥
॥ समाप्तंच भादा समय त्रीपर्व ।
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कर्णकी सब निषों को परिवारसमेत पुलानिया १८। उपपर्यात्मा बुबिधान
धर्मराज युधिधेिरने उन्दों के साथ निस्सन्देह विधिपूक प्रेतीकयाको किवा । १५।
इति ली पर्व ममात्र॥
Khat's family and gandwth thaur
p forwaghs funeral
cer1016
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14 " -- 2 सौप्तिक व स्रोपर्वका सूचीपत्र INDEX TO STRI AND SA UPTIK PARY सौप्तिकपर्व Sauptık Tary मध्याय विषय पृष्ठ Chepler Subject Page { অথখানার্জী,মলা ७२५३ 1 Ashwathama's resolution 7253 २कप अश्वत्थामा सवाद 2, Brip and Ashwathamn 61 65 रुपाचाय सम्पाद ६९ 14 Kilpachary's talk 64 ५वश्वाधामाकापाडवोकेशिविरमजाना७३ 5Goes to the Panday camp मस्थानाकी वाण घर्षा ७८] GShowers arrows ७ शिवजी से खड्गकी प्राप्ति ८२17 Obtars amod from Shir 82 না করা 8 Night battle दुर्योधन का प्राण त्याग ७३.४ .. Duryodhan's death १० युधिष्ठिर काबिलाप 10, Yudhishthu's grrof 11 ११ वाणिषधार्थ गीART जागा Bhim ch1989 Ashwathixmn 13 १२ युधिष्ठिरण सम्वाद 12 Yudhishthur and Krisha 19 २३ ब्रह्मशिरारत्याग २४ 13. Bribmshir weapon २५ मर्जुनालयाग 27 १५प्रशिराखफा गमापर स्वाग 15 २६ अश्वत्थामा की मणि 18 Ashrathama's jowel १७शिव महिमा 17 Bluya't greataess 37 -१८ युधिष्ठिरमौर काम का मयाब 18, Yudhiaht) ir an! Krishn. 41 STRI PARY स्त्रीपर्व 1, Dhtitrashtra's grief 7340 86 7304 24 " , तराष्ट्रका विलाप " 51 ૨ ." " " " " " 1 " " .. . . " " " 3 55 4. 53 60 6. P 63 7. GS 8. 9 73 10 Ile goca out fruen tho city, 76 11 Ash vatasina inants hin 73 121he tron Bin 82 13 Piratraestra's frief 14. Gandhari's inf* 88 15 Gi Ulari ad Bh in 16 luura' lanıcat ting 44 १०पुरसे निकलना समवरयामा मानिसेमिना १२ लोरकामीम १३ धृतराष्ट्रककोप की गाग्नि १५ गा.पशि क काधकी शान्ति १५ गाम्पारी भीमका सम्पार १६बीवियप १०सीसिप ८८ H . 710) ७४..