Sanmati Library, Jaipur

Patribhagpradipika

Sharma, Shrinivas · 2009/10

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मुद्रक और प्रकाशक- উহু গুল্লুঙ্ক, मालिक-"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, बम्बई. पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" सुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षाधीन है। . FE - भूमिका। पाठक महाशयो!जिस सर्वमान्य वेदचक्षु ज्योतिषशास्त्र के द्वारा मनुष्योंका भूत, भविष्य, वर्तमान शुभाशुभ फलज्ञान, जन्मपत्र द्वारा होता है, उसी जन्मपत्रके गणितके प्राचीन तथा अर्वाचीन अनेक ग्रन्थ प्रस्तुत हैं परन्तु विशेष परिश्रम व परिज्ञान विना उन अन्योल सर्व साधारण तथा विशेषकर बालकोंसे भलीभांति सुगमतापूर्वक गणित नहीं हो सकता, यही सोचकर मेरे परमपूज्यपाद पिताजी श्री श्री ६ श्रीदेवज्ञवर्य, श्रीमहादेवजी महाराज अनेक प्राचीन ग्रन्थोंका सारांश लेके थोड़े ही परिश्रमसे भलीभांति जन्मपत्रका गणित पनाने के योग्य हो जाय ऐसा यह "पत्रीमार्गप्रदीपिका' नामक छोटासा ग्रन्थ निर्माण कर अपने द्रव्यसे मुद्रित कराकर विना मूल्य विदजनोंकी सेवामें समर्पण किया था किंतु ईश्वर- की कृपासे थोड़े ही दिनोंमें इसका इतना आदर जनसमुदायमें हुआ कि कई यन्त्राधीश उपयोगी समझ छापनेके लिये आग्रह करने लगे परंतु मेरे पूज्यपाद पिताजीने श्रीमान् खेमराजजी सेठसे अधिक स्नेह होनेके कारण उन्हींको छापनेका स्वत्व दिया, जिसकी आजतक कई आवृत्तियां छप चुकी हैं सो पाठकोंको विदित ही है. इस ग्रंथकी भाषारीका करने बारत मेरे कई मित्रोंका कितने ही दिनोंसे इस प्रकारका आग्रह था कि यदि ऐसे उप- योगी ग्रन्थकी पूर्ण रीतिसे भाषाटीका बनायी जाकर इसमें अन्यान्य आवश्यक विजयोंका समावेश भी किया जाय तो यह ग्रंथ वालकों को विशेष उपयोगी होगा,एसी २ कई प्रकार- ही उत्तम उत्तेजनाओंसे उत्तेजित हो आज मैं ( अल्पज्ञ) इसीकी सरल हिन्दीभाषाटीका तथा उदाहरण तथा आवश्यक आवश्यक स्थानोंकी टिप्पणी, और भी जिन जो उपयोगी विशेष कोष्ठकोंकी इसमें आवश्यकता थी उनका भी समावेश करके आप लोगोंके हष्टिगो- घर करानेको उद्यत हुआ हूं। सो, इसमें कहीं दृष्टिदोषसे वा लेख प्रमादसे किसी प्रकारकी त्रुटि रही हो तो विद्वज्जन कृपादृष्टिसे सुधारके अशुद्धियोंमें हास्य न करते शुद्धार्थसे संतुष्ट हो मेरे परिश्रमको सफल करेंगे यही सविनय निवेदन है। इस ग्रन्थका समग्र अधिकार मैं प्रसन्नतापूर्वक श्रीमान् मान्यवर सेठ श्रीकृष्ण- दासात्मज-खेमराजजी "श्रीवेङ्कटेश्वर''स्टीम् प्रेसाध्यक्षको देता हूं कि जिन्होंने इस ग्रन्थको परम प्रसन्नतासे सुन्दर छापनेका आग्रह दिखाके मेरा उत्साह बढ़ानेकी उदारता दिखायी, इसका मैं उन्हें धन्यवाद भी देता हूं। भवदीय-- ज्यौ० श्रीनिवास मदादेवजी शर्मा रतलाम.

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श्रीगणेशाय नमः।
अथ पत्रीमार्गप्रदीपिका।
सोदाहरणभापाटीकासहिता ।
अथ मंगलाचरणम्.
नत्वा श्रीशिवशारदागणपतिब्रलार्कमुख्यग्रहान
पत्रीमार्गप्रदीपिकां स्फुटतरां कुर्वे महादेव विद ।
यत्पक्षे हि घटन्ति शुद्धखचराः कार्यास्तु तत्पक्षकाः
स्वव्यक्षोदययोः खरामविहृती प्राप्ताः पलादिधुवाः॥१॥
नत्वां श्रीगुरुपत्कजं गजमुखं साम्यं शिवं चाच्युतं
पत्रीमार्गप्रदीपिकासुविवृति कुर्वे सतां प्रीतये ।
पाराशर्यकुलाभिजातगणकोऽहं श्रीनिवासाभिधो
विद्वन्मण्डितरत्नपूर्वसतिकच्छ्रीपाठकोपाह्वयः ॥ १ ॥
निर्विघ्नतासे ग्रन्थ समाप्त होनेके अर्थ ग्रंथकर्ता प्रथम गुरु गणेशादिदेवोंको
नमस्काररूप मंगलाचरण शार्दूलविक्रीडितवृत्तके पूर्वार्द्धसे करके ग्रन्थारम्भ
करते हैं-
श्रीशिवजीको, सरस्वतीजीको, गणपविजीको, ब्रह्माजी और सूर्यको आदि ले
नवग्रहोंको नमस्कार करके महादेव ज्योतिर्विद अत्यंत सरल पत्रीमार्गप्रदीपिका
(जन्मपत्रीके मार्गको प्रकाशित करनेकी प्रदीपिका) नाम ग्रन्थको करता है,
आर्यब्रह्मसौरादिपक्षों से अपने देशमें जिस पक्षके स्पष्ट ग्रह वेध करनेसे दृक्-
तुल्य होते हों उसी पक्षके स्पष्ट ग्रह करना, स्वदेशोदेय और लंकोदयोंके ३०
१ भाषाकार विघ्नविच्छेदार्थ मंगलाचरणरूप गुरु गणपतिको प्रणामपूर्वक मापारचनाका प्रयोजन तथा
अपना गोत्र और निवासस्थान कहता है-
श्री ( शोभायुक्त ) निजगुरु ( महादेवजी) के चरणकमल और गजमुख (गणपति) पार्वतीसहित
शङ्कर और लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्को नमस्कार करके पराशरकुलमें उत्पन्न हुआ (पराशरगोत्र) पाठक
एस उपनामसे प्रसिद्ध विद्वन्मंडलीकरके सुशोभित रत्नपुर (रतलामशहर ) में निवास करनेवाला ने
श्रीनिवासगणक ( ज्योतिर्विद् ) सज्जनोंके प्रसन्न होनेके अर्थ पत्रीमार्गप्रदीपिका ग्रंथकी नापाटीका
करता हूँ॥१॥
२ गणेशदैवज्ञ:-"लकोदया विघटिका गजमानि गोङ्कदनास्त्रिपक्षदहनाः क्रमगोत्क्रमस्थाः । हीन-
विताश्चरदलैः कमगोत्क्रमस्थैर्मपादितो घटत उत्क्रमतस्त्विमे स्युः ॥ १ ॥

(६) पत्रीमार्गप्रदीपिका । तीसका भाग देना, लब्ध आवे वह पलादिक ध्रुव जानना ( स्वदेशोदयको ३० तीसका भाग देनेसे स्वदेशोदयका पलादि ध्रुव और लंकोदयको ३० का भाग देनेसे लंकोदयका पलादि ध्रुव हो) उदाहरण। मंकोदयाः रतलामशहरके मेपराशिके खदशो- दयपल २२७ के ३० तीसका भाग दिया लब्ध ७ । ३४ आया यह मेन राशिका स्वदेशोदयका पलादि ध्रुव हुआ इसी प्रकार मेषराशिके लंकोदयपल २७८ के ३०तीसका भाग दिया,लब्ध९।१६ आये, यह मेषराशिका लंकोदयका पलादिक ध्रुव हुआ, इसीतरह स्वदेशोदय और लंकोदयको बारह ही राशियोंके पलादिक ध्रुव जानना ।। १ ॥ रतलामके घरखंडाः रनपुररयदयोदगः मि.२७८ मी, म.२३७.मी. इ.२९९ कु. ४१ ./२५८६. मि. ३२३ म. १ मि.३०६ म. क.३४० घ. ४१ सिं..३४०. क २७८ तु. ५१ क.३२९ तु. कमसे उत्पमसे मे . ..मि. १ २ मो. क.. ३ म. ई. ५ ८ २. २. ५८ ५८२. २. १२ सहशोदय ३६ | ३४ पलादिसुब लंकोदय ५८ १६ पलास्टिव + । अथ लन्नदशमपत्रसाधनमाह- स्थापयेत्वं क्रियारंभे ततः स्वध्रुवकान्वितम् । निरयनं भवेत्पत्रं लग्नस्य दशमस्य च ॥२॥ अब लगपत्र दशमपत्र बनानेकी रीति कहते हैं-मेषराशिके आरंभमें (मेषरा- शिके० शून्य अंशके नीचे ) तीन शून्य लिखना,अनंतर स्वदेशोदय और लंकी- दयकी मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, आदिक राशियोंके पलादिक ध्रुव क्रमसे युक्त करना सो निरयनलग्नपत्र दशमपत्र हो (स्वदेशोदयकी मेषादिक राशियोंके पला- दिक ध्रुव युक्त करनेसे लगपत्र और लंकोदयकी मेषादिक राशियोंके पलादिक ध्रुव युक्त करनेसे दशमपत्र होता है ) ॥२॥ उदाहरण। नीचे लिखे हुए चक्रमें मेषराशिके आरंभमें तीन शून्य लिखके रत्नपुर (रत- भाषाटीकास हिता। (७) लाम) के स्वदेशोदयका मेषादिक राशियोंका पलादिक ध्रुव क्रमसे युक्त किया इसलिये यह रतलामका लगपत्र हुआ, इसी प्रकार जिस ग्रामका लग्नपत्र करना हो उस ग्रामके स्वदेशोदयके पलादि ध्रुवके युक्त करनेसे उस ग्रामका लग्नपत्र हो जायगा और लकोदयका पलादिक ध्रुव युक्त करनेसे सर्वदेशका दशमपत्र हुआ। इयं रनपुरे लग्नपत्रनिरयनपलभा ५१८ चरखंडा ५१।४१।१७ 6७ ०१२/१३१४ ३७१८,१९/२०/२१/२२/२३२४.१५/२०,२७,३८२७ F मे. 0/0/10/२/२/२/२/२/२/२/२/३३ १५२/०८१५२ ५३६२ ४६, ९/१३२४ ५० २८३६//// २२५६ ४६२०५४२८२३६१०४४/०७५२२६/३४ २४ ७७७७७७७ . m. दृ. १ १२१२१३०३४७५५४३१३०३०५६ ३२१३०१७३,२२३०३:०५६/८ ०३६२५३६/२८२/० ३१/१२४६२२४८२१०३१,१२४८ ०३६१२,४८४२४१३६ ९/९/8/8//20180102010009,११,११,१११११२,१२१२१२१२१३ मि. ना ४७ ४८/१९२४३axe/१२ २ १२२० ०१२,२5350000२४३४८.१२/२४३६xe. -ना क. ३/३१४४/१४/१४/७५,१५१५१५२५११/98939005/25/१७१५३७०90/909690/900 108:३४१५३३०/४९४२२३३५४६५७९/२० ३५४/५/१७२८३९" २०/४०.२०/४००/२०/30/20/४० ०.२०४०/०२० २०४०/२०४०२० ૨૪ ર૦રરરરરર રરર રરરરરર રરરરરર ./२/२५३६/४७५३/१०/२५४५५७१३४५२३/७५ ०/१५,२३३४५५७/८/१९/११ ०२०/४०/०२०/४ ०/२०४०/०२१००/२०४ ०२०४०/०३/४/२०१०/२० सिं. HI:51..1 २४ श क २०२५२८२१२९/२९२९/२९/० ३२३५४/५/१६३७३८४९५० १६४१२/901018//३/५८ ર૬રરરર રરરરરર ४०५० २०३७५२४३१४१०५२६ ४४४२४० MS २२१० ८ . -- Boo तु. ६ वृ. ०३३ ३४३५१५. .१०२७ ४३५४/५/०६/२५३८४९/०७२२३३,१५५/६/१७॥ १५०/१/१२२३३४५५/५६/७/१०/१० ५२,५०/xcirst ०६४ २०१२६/२४२२२०३८६४७२/१०/०४/१५८ 058614६३७३७३७३०३०.३dacacaca asarasas/rojrorojtojx0/1010 २५/30/0८/५९,१२२.१५३७/१९३०५/५५ads/9/२२५४ 192 ०.२० 010/2010/0/10/४०/०२०/४०,०/२०४० ०/२०/४०२०००/20/10/02/४०२० ५४२२/२.२.२३३/४ w/sv५/०५/४५/०५/६६) ३१ ४३५४/५ ५१/२३,२५३६,४०५१/२०१२ ७/८२२४३५२२५२६३७० २0/30/२०४०२० ०२०४0/01२०४०/०/२०४०/० ०.२०/४०/. . -' . . 01. BHAIRY ४९ 13६,४६४४080xsimorc४०/४०४/४/९/९ १९५९/९/११/२९,४०५०. २०३५४४५०/११ २४२५२३३ १२ ४२. २४ ०१३२४ ५८/०/२२४३६४/०१२ ३५३/१४२४३४४४. ४८1१२२४ ४०१२ . --- ७ ४८ . ५५ દરર રરરર રરર રકમ ૪૧૨૭ રકર -]Rાર કરાર २० oR ५९९३ R ४.११ मी. ११ ५१५६५६५६ ५१ 10५७५५५८ ५२५२३५५६४२२९१३४ २५०/s/resire२५६१६.२०५:२८०२५.x -

(८)
पत्रीमार्गप्रदीपिका।
अथ निरयनदशमपनचक्रम् ।
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तत्र दशमेण्टसाधनमाह-
उदयादिष्टकालेषु युदलं हि प्रपातयेत्
दशमस्य भवेदिष्टं सारी खागौ सुखांगने ॥ ३ ॥

भाषाटीकासहिता। (९) अब लन दशमसाधन कहते हैं-जिसमें प्रथम दशमका इष्टसाधन कहते हैं । सूर्योदयसे-घट्यादिक इष्टमेंसे दिनाई हीन करना (निकालना) शेष बचे वह दशमभावका इष्ट हो । दशमभाव और लममें छः राशि युक्त करनेसे सुखभाव और सप्तमभाव होते हैं (दशमभावमें छः राशि युक्त करनेसे चतुर्थभाव और लग्नमें छः राशि युक्त करनेसे सप्तमनाव हो) ॥ ३ ॥ भांशजौ सायनार्कस्य खानाको स्वेष्टयुक्कृतौ । कलाद्यास्त वनाः स्युर्विपलाद्यास्तु संयुताः ॥४॥ तदल्पकोष्ठजी भांशी ग्राह्यौ लिप्तादिका वियत् । अल्पेष्टविवरात्पार्थान्तराप्तांशादिसंयुतौ ॥६॥ अयनांशादिवियुतालग्नं मध्यं स्फुटं भवेत् । सायनसूर्यकी राशिअंशके समान दशमपत्र और लग्नपत्रके कोष्ठकमें अपना अपना घटयादिक इष्ट युक्त करना ( दशमपत्रके कोष्ठकमें दशमका इष्ट लमपत्रके कोष्ठकमें जन्मसमयका इष्ट मिलाना ) तदनन्तर सूर्यकी कलाविक- लाको सायन सूर्यकी राशिके ध्रुवसे गुणा करना,गुणन करके आये हुए अर्कोको इष्टयुक्त किये हुए कोष्ठकके विपलमें युक्त करना ॥ ४ ॥ उस इष्टयुक्त किये हुए कोष्ठकसे अल्प (न्यून ) कोष्ठक जिस राशिअंशमें हो वह राशि- अंश लेना, उसके नीचे कला विकला शून्य शून्य लिखना, तदनंतर इष्टयुक्त कोष्ठक और अल्पकोष्ठकका अंतर करना, शेष अंतरमें अल्पकोष्ठक और उसके आगेके ( ऐष्य ) कोष्ठकके अंतरका भाग देना, लब्ध आवे वह अंश जानना शेष बचे उनको साठ गुणा करना फिर अंतरका भाग देना, लब्ध कला आवे फिर शेषको ६० साठगुणा करके अंतरका भाग देना, लब्ध विकला आवे, ऐसे आये हुए अंशादि तीन फलोंको इष्टयुक्त कोष्ठकसे अल्पकोष्ठकके आये हुए राशि अंशादिक युक्त करना ॥ ५ ॥ अयनांश हीन करना सो लग्न और दशमभाव स्पष्ट हो । उदाहरण। श्रीगणेशाय नमः ॥ स्वस्ति श्रीसंवत् १९२८ शके १७९३ प्रवर्तमाने अमांत-माघकृष्ण,पूर्णिमांव-फाल्गुनकृष्णस्तृतीयायां भौमवासरे घ. २५५४९ " - १ शकमेंसे ४,१४ चारसे चुम्मालीस हीन करनेसे अयनांश होते हैं । अयनांशोंको स्पष्टसूर्यमें मिला- नेसे सायन सूर्य होता है।

(१०) पत्रीमार्गप्रदीपिका । परं ४ चतुर्थी हस्तनक्षत्रे घ. २९ । ९ परं चित्रानक्षत्रे गण्डयोगे, घ.४४३९ बालवकरणे एवं पञ्चाङ्गशुद्धावत्र दिवसे श्रीमन्मार्तण्डमण्डलादियादिष्टवटी ५६ पल ४८ विपल १८ स्पष्टार्क १०।१६।५३२३९ लग्न ९/२३ समये ज्यो० श्रीनिवासशर्मणो जन्मसमयः। दिनमानम् २८1५10 अयनांशाः २२।२९/० रतलाममें तथा रतलामके समीपके ग्रामाम सौर पक्षके स्पष्टयह ग्रहवेधसे दृक्तुल्य मिलते हैं इसवास्ते सौर पक्षके स्पष्टग्रह ग्रहलाघवाख्य करणग्रंथसे किये ग्रंथगताब्दाः ३५१ चक्र ३१ अधिकमास ६ मास- गण १३६ ऊनाइ ६४ अहण ४०३९. A अयसन्माट्रम्. १२ ३ . बसालेटाः .......... गु...रा.कि. ३ ८ १ १२१२४.२५/२५ ३।५९/८४०३/१०/२४५३१११४४४३/२६/४८/४०४. २१३४.३१/४८, ९ १४१४६३९४९५४ १८१ ८२३३१३१ ५५/०४८/६३२९/१७६/४/३५/३.८.५/४०१.०२४/४/५/३४३४ ५८.२३ 18. ४२.५३९ १०।२६ ४४।२६८ लग्नसाधनका उदाहरण । स्पष्टसूर्य १०।१६।५३।३९ में अयनांश २२।२९/० युक्त किया १३ । ९।२२।३९ यह सायनसूर्य हुआ,इसकी राशि ११ अंश ९ के समानलग्नपत्रका कोष्ठक ५७।२१।६ में जन्मसमयका घट्यादिक इष्ट ५६।४८१८ युक्त किया ५४।९।२४ हुए इसकी विपलके २४ अंकमें सूर्यकी कला विकला २२।३९ को सायनसूर्यकी ११ राशिके ध्रुव ७३४ से गुणन करके आये हुए १७१ अंक युक्त किये ५४।९।१९५ हुए विपल ६०साठसे अधिक हैं इसलिये साठका भाग दिया लब्ध ३ आये ये ऊपरकी पलके अंक ९ में युक्त किये ५४ । १२१ १५॥ यह इष्टकोष्ठक हुआ । इससे अल्पकोष्ठक लप्रपत्रमें ५४४० दश(१०) राशि १५ अंशके कोष्ठकमें मिलता है इसवास्ते १० राशि १५ अंश लिये इसके नीचे कलाविकला 0 शून्य शून्य लिखनेसे १०१५ ०१. हुए तदनंवर अल्पकोष्ठक ५४४. और इष्टयुक्त कोष्ठक ५४।१२।१५ के अंतर किया ०1८1१५शेष बचे इसमें अल्पकोष्ठक ५४१४१० और इसके आगेका (ऐष्य) भाषारीकासहिता। (११) कोष्ठक ५४।१२।३६को अंतर ८३६ का भाग दिया परंतु भाज्य ८1१५ भाजक ८३६ हैं इसलिये इनको सवर्णित करके भाग दिया भाज्य पिंड४९५. भाजकपिंड ५१६ हुए भाज्यपिंड ४९५ में भाजकपिंड ५१६ का भाग दिया लब्ध अंश आया शेष ४९५ को ६० साठगुणा किये २९७०० हुए इनमें भाजक ५१६ का भाग दिया लब्ध५७कला आयी शेष२८८ बचे इनको ६० साठ गुणे किये १७२८० हुए इनमें भाजक ५९६ का भाग दिया लब्ध ३५ विकला आयी ऐसे अंशादिक फल वीन ०५७।३५ आये इनको १०1१५.०० में युक्त किये १०१५॥५७।३५ हुए इसमेंसे अयनांश २२२२९/० होन किये शेप९/२३२२८१३५ बचे यह स्पष्टलग्न हुआ इसमेंसेछःराशि मिलानेसे३३२३॥ २८१३५ सप्तमभाव हुआ इसीप्रकार १० दशम भावका साधन किया. उसका उदाहरण भी नीचे लिखा है-प्रथम दशमभावके इष्टका उदाहरण-सूर्यो- दयसे घट्यादिक इष्ट ५६।४८१८ दिनार्ध १४॥२५० दिनार्थको सूर्योदयसे इष्टमेंसे हीन किया शेष ४२।२३।१८ बचे, यह दशमका इष्ट आया-तदनंतर सायनसूर्य ११।९।२२।३९ की राशि ११ अंश ९ के समान दशमपत्रका कोष्ठक ५६०४५।२४ में दशमका इष्ट ४२।२३।१८ युक्त किया ३९।८।४२. हुए इसकी विपलके अंक ४२ में सूर्यको कला २२ विकला ३९ को सूर्यको राशि ११ के ध्रुव ९।१६ से गुणन करके आये हुए २०९ अंकको युक्त किये ३९।८।२५१ विपलमें ६० का भाग दिया लब्ध ४ को पलके अंक ८ में मिलाये ३९।१२।११ वह इष्टयुक्त कोष्ठक हुआ इससे अल्पकोष्ठक ३९।७।६ राशि ७ अंश २७ के कोष्ठकमें मिलते हैं इसलिये राशि २७ अंश लिये, नीचे कला. विकला० शून्य लिखी ७।२७/०1० हुए-तदनंवर अल्पकोष्ठक ३९। ६ और इष्ट कोष्ठक ३९।१२।१३ का अंवर किया ०५५ शेष बचे इनसे अल्पकोष्ठक ३९/७१६ और इसके आगेका (ऐष्य ) कोष्ठक ३९।१७१४ के अंतर ९।५८ का भाग दिया परंतु भाज्य भाजक दोनो पलादिक अंकके है इसलिये भाज्य भाजकको सवर्णित करके भाज्यपिंड ३०५ में भाजक, ५९८ का भाग दिया लब्ध० अंश आयरा शेष ३०५ को ६० साठ गुणा किया १८३०० हुए इनमें भाजकपिंड ५९८ का भाग दिया लब्ध ३० कला आयी (३२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। शेष ३६० बचे इनको ६० साठ गुणे किये ३३६०० हुए इनमें भाजक ७९८ का भाग दिया लब्ध ३६ विकला आयी ऐसे अंशादिक फल०३०३६ आये इनको ७२७/०1० में मिलाये ७२७३०३६ हुए इसमझ अयनांश २२।२९/० घटाये ७१९॥३॥३६ शेष बचे, यह दशमभाव स्पष्ट हुआ इसकी राशिमें ६ छः राशि युक्त करनेसे ३।५।१॥३६ चतुर्थभाव हुआ । अथ भावसंधितचक्रसाधनमाह- लग्नं तुर्यात्सप्तमार्यभावं शोध्यं राशिः पञ्चभिस्ताडितोंऽशाः। अंशाद्याश्चेदिग्धताः स्युः कलाद्या लग्ने तुर्ये पञ्चवारं प्रदयात् ॥६॥ तन्वाद्याः संधिसहिता भावाः षट्पड्युताः परे । यदत्यारंभयोः संध्योरन्तस्थस्तगतो ग्रहः ॥ ७ ॥ अव भावसंधि और चलिवचक्रका साधन कहते हैं-लग्नको चतुर्थ भावमेंसे चतुर्थ भावको सप्तमभावमेंसे शोधना (हीन करना ) शेष राशिको ५ पांच गुणी करना अंश होचे और जो अंश कला विकलाको दशगुणा कर मो कलादिक हो, ऐसे अंशादिकको लममें और चतुर्थभावमें (चतुर्थभावमेंसे लमको हीन किया हो तो लग्नमें, सप्तमभावमेंसे चतुर्थभाव हीन किया हो वो चतुर्थभावमें) पांचवार युक्त करना ॥६॥ सो लनको आदि ले संधिसहितछः भाव हो । इन ६ छःभावोंमें छः छः राशि युक्त करनेसे शेष छःभाव हो। जिस भावकी अंत्य (आगेकी) और आरंभ (पीछेकी ) संधियोंके मध्यमें (बीचमें ) ग्रह हो । उसी भाबमें स्थित जानना । अर्थात् यह जिस भावमें स्थित हो उन भावकी आरंभ (पीछकी ) संघिसे न्यून हो तो गतभाव स्थित हो और अंत्य (आगेकी ) संघिसे अधिक हो वो आगेके भावमें स्थित होगा ॥ यदि इन दोनों संथियोंके बीचमें हो (आरंभसंधिसे अधिक और विरामसधिसे न्यून हो) तो उसी भावमें ग्रह स्थित जानना ॥ ७ ॥ उदाहरण। लम ९ । २३ । २८।३५ को चतुर्थभाव ३ । ५१ । ३६ मेसे हीन किया शेष३।११।३३३ बचे इसकी राशिके अंक ३ को ५ गुणे करनेसे १५ हुए ये अंश हुए । अंशादिक ३१३३३१ को दशगुणे किये ११०१३३०१० ये कला विकला प्रविविकलादिक हुए परंतु ये कला- भाषाटीकासहिता। (१३) दिक ६० साठसे अधिक हैं इसलिये साठका भाग विकला ३३० में दिया शेष ३० विकला रही, लब्ध ५ कलाके ११० अंकों युक्त किया ११५ कला हुई इसमें भाग ६० साठका दिया शेष ५५ कला रही लब्ध १ अंश १५ में युक्त किया अंश १६ हुए इस प्रकार राशिको ५ गुणी अंशादिकोंको १० दशगुणे करनेसे अंश १६ कला ९५ विकला ३० प्रतिविकला १० आयी इनको लना ९ । २३ । २८ । ३५ में युक्त किये १० । १० । २४ । ५। १० ये दूसरे भावकी आरंभसंधि हुई इसमें फिर १६ । ५५ ॥३० । १० अंशादिक युक्त किये १०१ २७ । १९ । ३५। २० यह धनभाव हुआ धन- भावमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० युक्त किये ११ । १४ । १५। ५। ३० यह तृतीयभावकी आरंभसंधि हुई. इसमें अंशादिक १६ । ५५ । ३० । १० मिलाये ।। १० । ३५ । ४० यह तृतीयभाव हुआ. तृतीय भावमें १६ । ५५ । ३०।१० युक्त किये । १८।६।५। ५० यह चतुर्थ भावकी आरंभसंधि हुई. इसमें अंशादिक १६ । ५५।३०।१० मिलाये १।५।१ । ३६ । • यह चतुर्थभाव हुआ-इसी प्रकार चतुर्थ भाव ॥५१॥ ३६ को सप्तमभाव ३॥ २३१२८१३५ मेसे हीन किया २।१८।२६।५९ शेष बचं.इसकी राशि २ को ५ पांचगुणी और अंशादिक १८।२६।५९ को १० दशगुणे करनेस १३ । ४ । २९।५० अंशादिक हुए. इनको चतुर्थ भावमें पांच बार युक्त किये सो चतुर्थको आदि ले सप्तमभावपर्यंत संधिसहित भाव हुए, ऐसे लमादिक संधिसहित ६ छः भाव हुए, इन संधिसहित ६ छही भावोंकी राशि छः छः राशि युक्त करनेसे शेष सप्तमभावको आदिले संधिसहित ६ भाव हुए- अथ ससंधयःटापामावाः । सं सं स १ २ स ३ सं ६ सं १० ११ . . १ २ १ २ २७ ५ १ १८ ६ २ १ १० २३ २८ ३५ २४ १९ १५ ६ १ १५ ३ १० २४ ५ सं १० ३५ ९ ३५ ५ सं 4.16 सं ८ सं सं ११ १२ ४ ४ ८ ७ ३ ८ ६ ८ १४ २ १ २७ १९ १४ १५ १८ ६ ૨૦ १९ २४ ५ ६ ५ AD न ३५ - . -- ११म इ ९श २० पंह (१४). पत्रीमार्गप्रदीपिका । जन्मकुंडलीमें सूर्य २ द्वितीयभावमें स्थित है ,दिवीयभावकी आरंभसंधि ३०१० से सूर्य १०१६ अधिक है और द्वितीयभावकी विराम (आगेकी) संधि १३ ॥ १४ से न्यून है इसलिये यह सूर्य अंत्य आरंभसंधिक बीचमें हुआ, इससे द्वितीय भावमें ही स्थित रहा. मंगल १११६ यह तृतीयभावकी आरंभ- : संधि ११ । १४से न्यून है इससे मंगल द्वितीयभावमें स्थित जानना; ऐसे ही गुरु ३। ० है यह सप्तमभावकी आरंभसंधि ३१९ से अल्प है इसकारण ६ छठे भावमें स्थित हुआ, इसीप्रकार शेष सई ग्रह भावोद्भव (चलिव)चक्रमें जानना । अथ चलितचक्रम् । अथ क्षय-चय-फल-विश्वानयनमाह- भावतुल्ये अहे रूपं संधितुल्ये तु निष्फलम् । भावसंध्यतरेणात खेटसंध्यंतरं च यत् ॥ ८॥ भावान्न्यूनाधिके खेटे फलं वृद्धिक्षयाभिधम् । फलस्यान्यंशको विश्वा यदा विंशहतं फलम् ९॥ अव क्षय चय फल विश्वाआनयनकी रीति कहते हैं-भावके अंश कला विकलाके समान (बरोबर ) ग्रह हो तो पूर्णफल होता है, उस प्रहका (11010 फल जानना) और संधिक अंश कला दिकलाके तुल्य (बरोवर) पहले ही वो निष्फल होता है ( उस महका ०1०1० फल जानना ) न्यूनाधिक हो तो भावसंधिके अंदरका भाग देना महसंधिके अंतरमें (यह जिस भावन स्थित हो उस भावसे न्यून हो तो उस भावकी आरंभसंघिसे ग्रह भावका अंतर करना और भावसे ग्रह आधिक हो तो विराम (आगेकी ) संधिके साथ ग्रहभावका अंतर करना ) जो फल लब्ध आवे वह ॥ ८ ॥ भावसे ग्रह न्यून हो तो वृद्धि (चय) और भावसे ग्रह अधिक हो तो क्षयसंज्ञक फल जानना, फलका तृतीयांश (फलके वीनका भाग देना) विश्वा जानना अथवा आये हुए फलको बीस गुणा करना सो विश्वा हो ॥ ९ ॥ उदाहरण । सूर्य १० । ६।५३ । ३९ यह द्वितीय भावसे न्यून है अतएव द्वितीय १ धरणीवरः-" न्यूनसंविग्रहाद्भावाच्छोध्यो भावाल्पके खगे ॥ तदग्निमाच संशोध्यो ग्रहो मावस्तथाधिो ॥” इति ।।

भाषाटीकासहिता । (१५) भावकी आरंभसंधि १०।१०। २४ । ५ से अंतर किया ०।६।२९ । ३४ यह ग्रहसंध्यंतर हुआ, इसमें इसी आरंभसंधि ३० । १० । २४ । ५ के साथ द्वितीयभाव १० । २७ १९ । ३४ का अंतर किश • । १६ । ५५। ३० वह भावसंध्यंतर हुआ इसका भाग दिया-भाज्य ग्रहसंध्यंतर, भाजक भावसंध्यंतर दोनों अंशादिक हैं इसलिए इनको सवर्णित किये भाज्यपिंड २३३७४ में भाजक पिंड ६०९३० का भाग दिया लब्ध० शेष २३३७४ को ६० साठ गुणे किये १४०२४४ . हुये भाग ६०९३० का दिया लब्ध २३ कला आयी शेष १०५० पचे इनको ६० गुणित किया ६३००० हुए इनमें फिर भाजक भावसंध्यंतर ६०९३३० का भाग दिया लब्ध विकला आयी ऐसे फल ३ तीन आये०।२३।३ ये भावसे ग्रह न्यून अतएव चयसंज्ञक सूर्यके फल हुए इसी प्रकार चंद्रादि ग्रहोंके फल जानना- अब विश्वा-आनयन कहते हैं-सूर्यके फल २३ । १ को ३ तीनका भाग दिया लब्ध ७४० ये विश्वा हुए अथवा फल २३।१ को२०वीसगुणाकिया ४६० २० साठ ६० का भाग दिया लब्ध ७ शेष १० बचे थे विश्वा आये, इसी- कार चंद्रादिकके विश्वा जालना, हैं . . अपक्षयचक्रमलपिशाचनमः वं. मं. मं.". IP.IN. पा. २० २३.३३२८ १ ४८ २२ ११ पय-य चय चय ४५ चय क्षयचय. १३ २३ ४० ६ विधा. अथ ग्रहाणामवस्थानयनमाह व्यङ्कटेशः । बालाघवस्थाः क्रमशो ग्रहाणामोजे समे तद्विपरीतमाहुः। बालः कुमारोऽथ युवा च वृद्धो मृतो लवानामृतुभिः क्रमेण॥ १० ॥ अब ग्रहोंकी अवस्था लानेकी रीति व्यंकटेश कहते हैं-ग्रहोंकी बालादिक अवस्था क्रमसे विषम (एकी)राशिमें छाछः अंशोंके क्रमसे बाल १ कुमार २ (१६) पत्रीमार्गप्रदीपिका। युवा ३ वृद्ध ४ मृत ५ कही है और सम (बेकी ) राशिमें वह बालादि अवस्था विपरीवक्रमसे (मृत १ वृद्ध २ युवा ३ कुमार ४ बाल ५) कही है ॥१०॥ उदाहरण। सर्य १०1१६५३१३९ यह विषमराशिका है और छः छः अंशके क्रमसे तीसरे विभागमें है अतएव तीसरी युवा अवस्था में हुआ.इसी प्रकार शंष चंद्रादि ग्रहकी अवस्था जानना ।। बालाघवस्थासारणीचक्रम्. १८ १० अंशः बाल कुमार युवा । वृद्ध मृत | विषम राशी मृत वृद्ध युवा कुमार पाल समरा राशी सू. चं. युवा वाल अथ वालाववस्थाचक्रम् म.बु. गु, | शु. | श. रा. वृद्ध कुमार मृत युवा मृतवाल अथ दृष्टिसाधनमाह धरणीधरः । द्रष्टा विहीनदृश्यस्य क्रमादेकादिभे दशः। भागाई तिथियुग्भागा भागादौनशराब्धयः ॥११॥ भोग्यभागाद्विनिनांशाः क्रमात्षड्झाधिके अहे । दिग्भ्यः शुद्धे लवाई च ज्ञेया लिप्तादिका हशः ॥ १२ ॥ अब धरणीधर दृष्टिसाधन कहते हैं-बेष्टाग्रहको हीन करना दृश्य ग्रहमेंसे क्रमसे एकको आदि ले शेष राशियोंकी दृष्टि जानना। एक राशि शेष बचे वो राशि विना अंशोको अई (आधे) करना,यदिग्दो राशि शेष रहें तो राशि बिना अंशोंमें १५ पंद्रह युक्त करना और तीन राशि शेष बचे तो अंशीको अई ( आधे ) करना और ४५ पैतालीसमेसे शोधना ॥ ११॥ चार ४ राशि शेष बचे तो भोग्यांश (राशि विना अंशोको ३० तीसमेंसे हीन करना) यदि ५ पांच राशि शेष बचे तो राशि विना अंशोंको द्विगुण करना और क्रमसे छः ६ साव ७ आठ ८ नव ९ राशि शेष बचे तो शेष राश्यादिकोंको १० दव राशिमसे शोधना-शेष बचे उसके अंश करके अर्थ (आधे ) करना, जो आधे वह कलादिक दृष्टि जाननी ॥ १२॥ १ यस्य ग्रहस्य दृष्टिरानीयते असौ द्या-जिस ग्रहको दृष्टि लाना हो वह द्रष्टा । २ यं ग्रहं प्रत्यानीयते असौ दृश्यः-जिस ग्रहपर दृष्टि लाना हो वह दृश्य होता है।

-- भाषाटीकासहिता। (१७) अथ भौमस्य विशषदृष्टिमाह- पञ्चेन्दुयुक्ताः खलु साईभागा द्विभेगमे षष्टिकलास्तथैव । भागोनषष्टिर्भवतीह दृष्टिसिमेऽद्रिभे भूमिसुतो न दृश्ये ॥ १३ ॥ अब मंगलकी विशेष दृष्टि कहते हैं-मंगलको हीन करे दृश्यमेंसे और यदि दो२ राशि शेष बचे तो राशि विना अंशोको डेढे ( अंशादिकके २ का भाग देके जो आवे वह उन्ही अंशादिमें युक्त करना) करना और १५ पदर युक्त करना कलादिक दृष्टि हो और छः राशि शेष बचे तो ६० साठ कला दृष्टि जानना वैसे ही यदि वीन राशि ७ साव राशि शेष बचे तो राशि विना अंशादिकोंको ६० साठमेंसे शोधना सो कलादिक भौमकी विशेष दृष्टि होवे उक्तराशियों के अतिरिक्त राशि शेष बचे उसकी श्लोक १३ । १२ के अनुसार दृष्टि करना ॥१३॥ अथ जीवस्य विशेषदृष्टिमाह- जीवोनदृश्यस्य तु वेदभे स्याद्विन्नांशकोना खलु षष्टिरेव ॥ साशिकोना गजभे तु षष्टिस्त्रिभेऽष्टिभेशायुतेषुवेदाः॥ १४ ॥ अब गुरुकी विशेष दृष्टि कहते हैं-गुरुको हीन करे दृश्योंसे और यदि ४ चार राशि शेष बचे तो राशि विना अंशादिकोंको २ द्विगुण करके ६० साठमेंसे हीन करना दृष्टि होवे और ८ आठ राशि शेष बचे तो अंशोंको डेढे (अंशोंको आधे करके उन्ही अंशोंमें मिला.) करके साठ ६० मेसे शोधना. (हीन करना) शेष बचे वह दृष्टि जानना इसी प्रकार यदि वीन ३ राशि या सात ७ राशि शेष बचे वो अंशोंको अर्ध (आधे) करके ४५ पैंतालीस युक्त करना सो कलादिक गुरुकी विशेष दृष्टि होवे ॥ १४ ॥ अथ मंदस्य विशेषदृष्टिमाह- द्विनिघ्नभागा विधुभेन्तरे स्याद्धिभे तु भागार्धविहीनषष्टिः॥ दिनांशकोना नवभे. तु पष्टिस्त्रिंशद्युतातद्जभेऽर्कजस्य ॥ १५ ॥ अब शनिकी विशेष दृष्टि कहते है:-शनिको हीन करे दृश्यमेंसे यदि एक राशि शेष बचे तो राशि विना अंशादिकको द्विगुण करनेसे कलादिक । २ 1 १ (१८) पत्रीमार्गप्रदीपिका ! बष्टि होती है और यदि २ दो राशि शेष बचे तो अंशाको अर्थ (आध) करके साठमसे हीन करना इसी प्रकार ९ नव राशि शेष बचे तो राशिविना अंशाको द्विगुण करके साठमें शोधनेस दृष्टि होती है और ८ आठ राशी शेष बचे दो राशी विना अंशोंमें ३० वीस युक्त करना शानिकी विशेष अष्टि होत्र ॥ १५॥ । . १ . ४ . apan- ई स्पांसारसायनकोरफ. मामविशेषाीि. गुरविशेषदृष्टिकोशक ७ ८ ९ ३ ८ का अंशा अंबा अशा अंया मशा अशा अंगा अंश भज्ञा अंसा विना विभा बाजेश अग्न अधीडिया 'अद्ध देव अद्ध, १६ : ४५/३०:२६०/४५३०,१५/१५/६०६०/६०/४५/६०:४५१६० ४ गुणा!x ४४ यु.४ कला . * शु. मु.सु.र. पु. सनिविशेषचष्टे. -- -- युमा ४ x पशा अंशा अंशा अंश अर्दा दिया गुणा ४ यु .. उदाहरण। सूर्य १० १ १६३५३ । ३९ मैसे द्रष्टा चंद्र ५।२९।१९१४९ हीन क्रिया १७१३३१५० हुए शेप चार राशि बची हैं इसकारण इसके अंशादिक ३७३३। ५० को ३० तीस से हीन किये १२।२६ शेप बचे ये सर्यपर चन्द्रको दृष्टिहुए इसीप्रकार दृश्य सूर्यमंसे भौम १३ ॥ ६॥ १४१५४ को हीन किया १३३० ३८ । ४५ हुए शेप ग्यारा राशि हैं इसकी दृष्टि नहीं है इसकारण सूर्यपर भौम की दृष्टी ०1० सूर्य दृश्यमेंस न्टा बुध १०१३०४४।१८को हीन किया शेप ६।९।२३ वचे शून्यराशिकी दृष्टि उक्त नहीं है इसलिये सूर्यपर बुधकी दृष्टि oto हुई सूर्यमसे द्रष्टा गुरु ३ । ०४३॥ १ हीन किया शेप ७।३६।३०३८ बचे सात राशि शप हैं इसलिये गुरुको विशष दृष्टि श्लोकमें कहे अनुसार अंशाको आधे किय ८॥ ५॥हुए इनमें ४५ युक्त किये ५३ । ५ ये मूर्यपर गुरुची विशेष दृष्टि हुँई- र. ब व. . . . . . ३८ ४६ ३२ २२ a . ३८ १२ -२६ १३ ५ १८ ३५ १४ १८ पं. ४० २८ १ ३५ १२ . . . ४३ भाषाटीकासहिता । (१९) महापरिगहाणांदृष्टिचक्र दृश्य सूर्यमेंसे शुक्र ९॥ १२॥ २६ ॥ मं. ८ को हीन किया शेष १।४। २७ । ३१ बचे शेष एक राशि है इसलिये अंश ४।२७१३२ को आधे किये २। १३ ये सूर्यपर शुक्रकी पं. | दृष्टि आयो फिर दृश्य सूर्यमसे द्रष्टा शनि ८२४४८२३ हीन किया १॥२२॥५॥१६शेष एक राशि बची इसवास्ते शनीकी विशेष दृष्टि श्लोक १५ में कहे अनुसार अंशादिक २२॥ ५ को द्विगुण किये ४४ । ३० ये सूर्यपर शनीकी दृष्टि हुई इसीप्रकार था. शेष ग्रहोंपर ग्रहोंकी दृष्टि वथा भाव श्यपर ग्रह द्रष्टाकी दृष्टि जानना-इति ॥ भावोपरिग्रहाणांदृष्टिचक्रं. . . ३५ २४ बु. . २ . . ५३ ४३ ५४ ४८ गु. . ८ . . . . २ २२ ११ . . . ३ि२ . . ४४ . १० ५८११७५० २ w ६ ३ ११ १२ भावाः . ३३ १९ . १३ मू. ५४ ३७२० ४७ ५२, ५६ . . . ० . . २ ४२ २८ २ २ १६ ३२ ५६ चं. १६ १ .. . . १० . . . . ० *. . . ५२ । ३८ o . १२ ४६ ma . १३ ૩૨ २७ २३ / २४ . . . . . R . हा ३४ ४७ २५ २८ ३९ । ३४ | ३३ १७ . . 15a . . . . . . . . . ३१ १४ २४६ गु. ४५ | ५१ २४ १३ १८ १२ . . m' . . . ३३ ३ ३३ ११ . २९ ५४ | ३७ / २० . . . ... . . . . . ५८ ५८ . ४५ ३२ - ३१ ४९ .

(२०), पुत्रीमार्गप्रदीपिका। अथ राशीनां स्वामिनः । उक्तं च व्यंकटेशेन । भीमाच्छविचन्द्ररविज्ञशुक्रवज्यमंदार्कसुतामरेज्याः। मेधादिभानामधिपाः क्रमेण तदंशकानामपि ते भवेयुः ॥ १६ ॥ अब राशियोंके स्वामी व्यंकटेश कहते हैं-भौम ( मंगल १) अच्छ (शुक्र २) विद (बुध ३) चंद्र (चंद्र ४) रदि (सूर्य ५)ज्ञ (बुध ६) शुक्र ( शुक्र ७) वक्र (भौम ८) इज्य (गुरु ९ ) मंद (शनि १०) अईसुत (शनि ११ ) अमरेज्य गुरु १२ क्रमसे मेपादिक राशियों के स्वामी जानना और मेषादिक राशियों के अंशादिकोंके (देकाण सप्तमांश नवमांश द्वादशांश आदिके ) भी क्रमसे येही स्वामी होते हैं ।। १६ ॥ अथ नैसर्गमैत्रीमाह विश्वनाथः। इन्द्रीज्यक्षितिजारवीन्दुतनयौ सूयेन्डुजीवाः क्रमाद् भृग्वौं शशिसूर्यभूमितनया ज्ञार्की ज्ञशुक्रौ मताः॥ सूर्यादेः सुहृदः समाः शशिसुताः सर्वेऽपि मंदास्फुजि- न्मंदाचार्यकुजाः शनिः कुजगुरू जीवः परे वैरिणः ।। १७ ।। अब स्थिरमैत्री विश्वनाथ कहते हैं-चंद्र गुरु भौष १, सूर्य बुध २, सूर्य चंद्र गुरु ३, शुक्र सूर्य ४, चंद्र सूर्य भौम ५, बुध शनि ६,दुध शुक्र ७,मते सूर्यादिक ग्रहोंके मित्र कहे हैं और बुध १, सर्व बह२ (मंगुशुश०) शनि शुक्र ३, शनि गुरु भौम ४, शनि ५,मौम गुरु ६. गुरु७, कमसे सूर्यादिक ग्रहोंके सम बहे हैं शेष (मित्रसमसे वाशी रहे वह ) शत्रु जानना ॥ १७ ॥ . नैसगनेत्री, ६. मं. वं.ग. में. र.बु.र..गु.सू.गु.र. मं. दु .. ररबु.ए. मिन. दु. म.गु.अ.क. भ. शु..गु. म. . गु. सम. चं. . मं.गु. व . अथ तात्कालिकांचधामैत्रीसाधननाह-सोमदेवज्ञः। महतोऽर्थरतृतीय तोय खा१०ऽऽय व्यय १२ संस्थः सुहृदो नभचराः। इतरालयमा बिषो सुनीन्द्रेरिति तत्कालजनित्रशत्रवः स्युः ॥ १८ ॥ - भाषाटीकासहिवा। (२१.) अब तात्कालिक पंचधा मैत्री ज्ञान सोमदैवज्ञ कहते हैं-जिस प्रहरी २३१४। १० । १३ । १२ वें स्थानमें जो यह स्थित हो वह मित्र जानना; शेष ॥५६।७।८।९ स्थानमें गये हुए ग्रह शत्रु जानना इसप्रकार मुनिलोगोंने तात्कालिक मित्र शत्रु कहे हैं ॥ १८॥ 1 उदाहरण । तात्कालिकमैत्रीचक्रम्। चं म. बु. ग. श. म. र.कु.र... मित्रा शु.श.श. म.श. म. चं. चं.अ./र.म. च..रच. र.मं.. चं. गु. रा. ग. ग..श. म. र.. म शु .. -- सूर्यसे २ भौम ११ शनि १२ शुरु स्थित हैं इस कारण ये सूर्यके मित्र हुए और १ बुध ६ गुरु ८ गु. शिवचंद्रमा स्थित हैं ये सूर्यकें शत्रु हुए इसीप्रकार चंद्रादि सर्व ग्रहोंके तात्कालिक मित्र शत्रु जानना इति । अधिमित्रसमत्वमेति मित्रं समखेटस्तु सुद्रिपुत्वमेति । रिपुरेति समाधिशत्रुभावं खलु तत्कालजमित्रशाभावात् ॥१९॥ नैसर्गमैत्रीका मित्र ग्रह तात्कालिक मैत्रीमें मित्र हो तो अधिमित्र और शत्रु हो तो समत्वभावको प्राप्त होता है ( मित्रमित्र-अधिमित्र, मिनशत्रु- सम होता है) और नैसर्गमैत्रीका समग्रह तात्कालिक मैत्रीमें मित्र हो तो मित्र, शत्रु हो तो शत्रुभावको प्राप्त होता है ( सममित्र--मित्र, समशत्रु-शत्रु होता है, एवं नैसर्गमैत्रीका शत्रुग्रह तात्कालिकमैत्रीमें मित्र हो वो सम और शत्रु हो दो आपिरात्रभावको प्राप्त होता है (शत्रुमित्र-सम,सम शत्रु-अधिशत्रु होता है।। १९॥ उदाहरण । यहाँ नैसर्गमैत्रीमें सूर्यके चंद्र गुरु मित्र हैं ये चंद्र गुरु तात्कालिक श. मु. इ.यु. ऽधि.मि मैत्रीमें सूर्यके शत्रु हैं अतः. चंद्र गुरु पंचधामैत्रीमें सूर्यके सम. हुए एवं नैसर्गमैत्रीमें भौम सूर्यका मित्र है ६. प.धु... धितात्कालिक मैत्रीमें भी मित्र है इस लिये भौम सूर्यके अधिमित्र हुआ, पंचधामैत्रीमें और नैसर्गमैत्रीमें सूर्यके बुध सम यह बुध वात्कालिक मैत्रीमें सूर्यके शत्रु है अतः शत्रुभावको बुध प्राप्त हुआ, श. र. मं. अथ पञ्चधा मैत्रीचक्रम्। च. मं. .गु. । शु. अ. चं. स.गु...श.मं. में. Con- मित्र A. चं.गु. चं.गु. सम. र.. २. र.मं. र. अ.स. बु. म. : गु. गु. शशु - ( २२) पत्रीमार्गपदीपिका । इत्तीप्रकार नैसर्गमैत्री में सूर्यके शुक्र, शनि शत्रु हैं ये वात्कालिक मैत्रीमें मित्र है इसलिये सूर्यके शनि, शुक्र पंचधा मैत्रीमें सम हुए ऐसेही शेप ग्रहोंको अधिमि- त्रादि जानना इति. अथ पसाधनमाह केशवः। भेशोऽथाकेंन्दुहोरे अयुजि युजि शशिध्नयोः स्वात्मजांक- खैशाख्यंशा नवांशा अजमकरतुलाशक्तिोकांशकाः स्यात् । भौमार्कीज्यज्ञशुक्रा अयुजि शरःशरा ५ धाद्रिपंचांशनाथा- स्त्रिंशायुग्मे विलोमाः क्रमबलिन इमे षट् शुभैः सद्युगोयः२०॥ अब केशवदैवज्ञका कहा हुआ पवर्गसाधन कहते हैं-राशियोंक स्वामी प्रथम श्लोक १६ में कहे हैं वे जानना। तदनंतर विषमराशिमें प्रथम विभागमें सूर्यकी, द्वितीयविभागमें चंद्रकी होरा जानना और सम राशिके प्रथम १५ ३० । अन्न विभागमें चंद्रकी, दूसरे विभागमें सूर्यकी होरा जानना, प्रथम चं. सू. | सम पंचपनवम९ राशिके स्वामी द्रेष्काणके स्वामी होते हैं (यह प्रथम विभागमें १० अंशमें) हो वो अपनी राशिका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी जानना--और ग्रह दूसरे विभागों ( १० अंशसे अधिक २० अंशपर्यंत--) हो वो ग्रह जिस राशिका हो उस राशिसे पांचवीं राशिका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी होता है एवं ग्रह तृतीय द्रेष्काणमें (२० अंशसे अधिक ३० अंशपर्यंत) हो तो वह जिस राशिका हो उस राशिसे ९ नवमराशिका स्वामी द्रेष्काणका स्वामी जानना। मेघमकर १० तुला और कर्क से नवांश जानना अर्थात् ग्रह मेपका हो तो भेषराशिसे, वृषभराशिका हो वो मकरराशिसे मिथुन राशिका हो. तो तुलाराशिसे,कर्कराशिका हो तो कर्कराशिसे इसी प्रकार सिंहादि सर्व राशियोंमें जितनी संख्या नवांशविभागमें ग्रह होवें उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो चं. विषन १ होराका एक विभाग १५ पंद्रह अंशका होता है। २ एक द्रेष्काणका विभाग दश १० अंशका होता है। ३ तीस अशके ९ नवमें हिरको नवांश कहते हैं, एक नवांश विमाग ३ अंश २० कलाका होता है।

४ 2 ६ ८ ९ ११ भापाटीकासहिता। (२३) राशि आवे उसका स्वामी नवांशका स्वामी होता है। मेष (मकर तुला | | कर्क द्वादशांशके स्वामी लपनी राशिसे जानना(यह जिस राशि- का हो उसी राशिसे जितनी संख्याके द्वादशीश- विभागमें ग्रह हो उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशि आवे उसका स्वामी द्वादशांशका स्वामी होता है) ॥ और विषमराशिमें ५। ५।८।५ इन अंशांके मंगल, शनी, गुरु, बुध, शुक्र, क्रमसे त्रिंशांशके स्वामी कहे हैं अर्थात् विषम राशिम ५ अंशपर्यंत भौम त्रिंशांशका स्वामी जानना ऐसे ही इन ५ अंशोंके आगेके ५ अंशका स्वामी शनी इसके आगके ८ अंश- नयांशयिभाग। दारशाशविभाग। 11३/३/४१५/६/२/३/४/५/६/14/8/2013 ३/६/२०१३/१६/२०२३/२६/३०२/५/0/१०/२२/१५/१७/२०/२२२५/२०३० २.४०/०२०४०/०२०४०) . का स्वामी गुरु फिर इसके आगेके ८ अंशका स्वामी बुध इसके आगेक ५ अंशका स्वामी शुक्र त्रिंशांशका स्वामी जानना,और समराशिमें उक्त त्रिंशांशके स्वामी विलोम (उलटे) कहे हैं (५शु० ७ बु०८ गु० ५ श ० ५०) वर्ग क्रमसे उत्तरोत्तर बलवान् जानना (ग्रहसे होरा बलवान् होरासे देष्काण द्रेष्काणसे नवांश नवांशसे द्वादशांश, द्वादशांशसे त्रिशांश अधिक बलवान् जानना) चार ४ से आधिक वर्ग शुभग्रहके आवे तो शुभ समझना ॥ २० ॥ ५1५1८1७५ अवाः म.अ.गु./बु. शु. विषमराशी. शु..(गु.च.म. समराशीम ५/७१८/५/५ अंशाः शिशाशकोष्ठक अथ सप्तवर्गसाधनमाह- नगांशपास्त्वोजगृहे तदीशायुग्मे गृहे सप्तमराशिपातु ॥ पूर्वोक्तवगैः सहितो नगांशः स्युः सप्तवर्गा मुनिभिः प्रदिष्टाः॥२१॥ अब सप्तवर्गसाधन कहते हैं-विपमराशिमें अपनी राशिके स्वामीसे सप्तमांश के स्वामी जानना और समराशिमें अपनी राशिसे सप्तम राशि ( सातवी १ तीस अंशके १२ भांगको द्वादशांश कहते हैं एक द्वादशांशविभाग अढाई औडका होता है।

( -- (२४) पत्रीमार्गप्रदीपिका । राशि)के स्वामीसे सप्तमांशके स्वामी जानना ॥ (ग्रह विपन राशिका हो तो जिस राशिका है उसी राशिसे और समराशिका हो तो जिस राशिका ग्रह हो उस राशिसे जो सावमी राशि है उससे जितनी संख्याके सप्तमांशविभागमें ग्रह स्थित हो उतनी संख्यापर्यंत गिरनेसे जो राशि आवे उसका स्वामी सप्तमांशका स्वामी समझना) पूर्वोक्तपद!में ये सप्तमांश युक्त करनेसे सप्तवर्ग होते हैं ऐसा मुनि लोगोंने कहा है ॥ २१ ॥ . उदाहरणं। सूर्य१०।१६।५३।३९ यह कुंभराशिका है इसका स्वामी शनिगृहके स्वामी स्वामी हुआ-होरा, सूर्य होराके दूसरे विभाममें है और विषमराशिका है इस कारण सूर्यकी होराका स्वामी चंद्र हुआ, द्रेष्काण सूर्य दूसरे द्रेष्काणविभागमें है इसलिये सूर्यकी राशि ११ कुंभसे पांचमी राशि ३ मिथुनका स्वामी बुध आया यह द्रेष्काणका स्वामी हुआ सप्तमांश सूर्य विषम राशिका है और सप्तमांश विभागमें ये चार ४ संख्या के विभागमें है अतः सूर्यकी राशि २१ कुंभसे चार- पर्यंत गिननेसे चौथी राशिश्वृषभ आयी इसका स्वामी शुक्र सप्तमांशका स्वामी हुआ नवांश-सूर्य ६ छः संख्याके नवांशविभागमें है और कुंभराशिका है अतः तुलाराशीसे ६ छह संख्यावक गिननेसे १२ मीन राशि आयी इसका स्वामी गुरु है यह सूर्यके नवांशका स्वामी हुआ, द्वादशांश-सूर्य ७ सातसंख्याके द्वादशांश विभागमें है इसलिये अपनी राशि कुंभसे गिननेसे सावमी ७ राशिपसिंह आयी इसका स्वामी सूर्य द्वादशांशका स्वामी हुआ त्रिंशांश-सूर्य विषमराशिका है और १६ अंशका है इस लिये त्रिंशांश-विभागमें तीसरे टअंशक मांगविमाम, विभागमें है इसकारण विषमराशिके तीसरे विभागका स्वामी २२०२५/३० गुरु सूर्यके त्रिंशांशका स्वामी हुआ,इसीप्रकार शेष चंद्रादि । सर्वग्रहोंके सप्तवर्ग:जानना: इति. १२.३४५.६ ८१५४२ १एक सप्तमांश विमाग ४ अंश १७ कलाका होता है।

भाषाटीकासहिता। (२५) चं. ५२ होग ट्रेप्याण अथ प्रहाणां सम्पर्गरम्य म. बु. गु. | शु. २१२६बु १२ गु/११/४ च २००९ स स मिमि मि ४५/५४५। ५र ४।४।४ स स स स मि S श ३७/२ १२ गु३।४ २१/५र स्वमि | स्व २ शु६ व ७ | १ १०२ ६ बु| २ शु स मि मि भमि | मि १२ गु|६ बु, ५२१०३/४ च १ मा ८ स ऽमि | मि } ऽमि भि स ५र५२ शु३/४ चे|२| ६७ स ऽमि स्व ऽमि ९गु ८ मं ६ नु | ९ गु२ शु १२ गु३५ S अमि म सफामांध नवांश मि दादशांश विध میں ur ३ ४ शुभयोग एश्योष ३ or १ २ विना परिश्रम शीघ्र सुगमरीतिसे सप्तवर्गज्ञान होने के लिये आगे सप्तवर्गसा- रणीचक्र मेषादि राशियोंके लिखे हैं- उनमें ग्रह जिस राशिका हो उस राशिके कोष्ठकमें जितने अंशका हो उतने अंशके नीचे पंक्तिमें जो सप्तवर्गके स्वामी राशिसहित लिखे हैं वे उस ग्रहके सप्तवर्गके स्वामी होंगे और षष्ठवंशका स्वामी भी उसीके नीचे पंक्तिमें लिखा है वह जानना ॥ उदाहरण । . . जैसे यहां सूर्य १०१६॥५३॥३९है इसलिये कुंभराशिके कोष्ठकमें १७ अंशके नीचे पंक्तिमें लिखे सप्तवर्गके स्वामी और षष्ठवंशका स्वामी आये। गृ. प. हो. प. ३. प. स. प. न. प. दा. प. त्रि. प. . प. ११श ४ चं ३ बु २ शु १२ गु ५ र ९ गु ८ मं. + (२६) पत्रीमार्गप्रदीपिका। पष्टयोपेतमेषराशिसप्तवर्गपतिवाम् । ७ ४ १ . . ३. . ३. भष में में म ग्रह १ र र ₹ JAR होरा *** ५ में में ट्रेका. १ •.62426 मं ४ मा ........ सप्त. में ३ नव. .......... २०१ myser 4b064064 2Mmmm Mit: NROn - "art woul-41.4. CERING 4,6A 2014/064 0 गुम पश्य ran ८ मेषराशि सप्तवर्गपतिचक्रन् । ८ ११.१. १२ १२ १३ AN अंश . . मं में र ९ र में १०मर EET wolt or the onlar arloto » " 4.IM6464 river mar Y P mrimmy . Imp KAIGANGA 40.4 ६ mamta १ 146964 WG410GAJMGAN ११ to Gaj.40 bal . म.ग ८. 'गु पश्यं - भाषाटीकासहिवा। (:२७) अंश १७ १८ १९ १९ २०२० . . d.0641 664.64 याmA F" KANGA प्रा641664 ५.av GAnd 4-064 09/GL/GE 4.d.10GRL ट्रेका, -Pr G4 ११. १९७१ ११११ मं में ८ ८ सध. 2v Ivy w ...मा नवमां. ११ A/. 2017DjRem army दाद. ... 64160400661 04641964 ANGA:40. ११ 640 त्रियां m611-064 mar9 4064 गु १०/११/ २२ २३ । २४ २४/२५/२५ २६ २६ ७ २८ २८ २९२९ अंश . . . . CalN Mar marite प्रह. 24/0ka 44.10Gautam 4.GL/ . - 2 . . २ श का ११११११११ ११ मं में में मंग,२५मगु ८e में २३ मं: 10 1098 2/GENENING mar.21 164/164.64 - GL/610604 ग १२१ १२ १२ ३ १ 11 mNGA 64Gथ m १० ११ - امام اطة الساهر 2. | ع .و . ا ا :الم » | v4. قم ر ته م و ته ग्रह . 1 معامه له h ht) { ? A1 لا من KH مې محمد 43 43 } {4} } ہ Fs و IT } FR | HD اس و ۶ • k n د ان مر { {۶} {{ } 33 41 42 43 مها لا . ) و و و عام و به یه : م . و F و 2 | لي و ر . 8 9 و try w r « • ! . . » | نده تراشه ماوه .ه مقاله i'at ا 1 و 2 | 19 مر ج-1 1 12 इमरासिसप्तवर्गपतिचक्रम। ج : 113 * 10 ios ه «ke | F | مه • py | لا • م 9 و 1 و [ 8 9 | 110 9 مه ر . E ) N k n | ھ ا ا ر ا مم . و ا م (a) N • M لم و مو ام) v 648 ستم م عمل ، و در بر ۳- { N 2 مم • وتن و سه . Ir | k ( ۸ .۳ . و **If aqsa 1 her) no 139 ~ 1.7 V पनीमार्गप्रदीपका। ۰ ۰۹۰ ۹۹ ا و ا و ا مه . ه م ) و و top ne | Img me | و | لا و ا ا وم ن و] مد . و ا } و { ر tr. م و و عطا محمد و عدد و » « | | ۰ ۰ » در ا ا و ا ا م و7} | و | les ا م • N عم ، و وجامد :Re م م م . م د) لم م 19 جا | NF ( را - 3 0 لاء is 1 و ما | r « . » 9 Taf%. مدة لا ه » م . م 52 مه ۱۳ و ب ا ر ا مه 5 و ا ر ، و 9 و و " و أ : { مم (h I n )r و اع م م امه امه ام و F و k | 9 | م | 8 IR9 | ه ا 4 | اودي س ر . Im2 N 2 . میل ! ( 3 مرا مد | مو 9 | 10 ه { لا fr. م 2 د पश्च ی | k AR. anal, होरा मंस ( 3 ) مل भाषाटीकासहिता। (२९) १६ १७ २७ १८ १८ १९ १९ अंश २०२० २१ २१ ३० . . . . . ON ग्रह N होरा 40ASAINA ५64.4 L606464049 64164640 AGASA 69/0641]SAN Homur twa द्रका. na १० १० १० १७ | गु सप्त. ८ १२ १२ १२ 00004/6164-064 नव. K मा. variomar "0" गु १२ १२ | १२ .641964 षष्टय MY २८ २७/२७ २९/२९ ३० २६/२६ २४/२५/२५ Y AY अंश . AV . . . . . . . ग्रह Iman ASANA PARoming 46AINA दे. १०१० १०१०१० स. म १ नव. 1COM OWS 6464 454 ५ ...lm64|NGE १२ मं विं. म GRAM.304 ८ १०१० 64 र ? च or मंत्र होरा द्रेष्का. द्वाद. Phy 2 امن ہے -VOne. 11. " । 017 G64.441641 rau ke ११ में 7 MU064 19NNON-"Tv 1064 by T, 9 MA GON.GAIN. . 1090 PrivNIPPIN ११ .044 . v9maln999ur tra ur - ३० to) nr 64 2IPMTV १३ शश १०२०१० १२ ११ -t0 . fromimar . ". ON Tv -CAnta . १२२ tr هي 0 १r For m - Avin64] G60: *२ 09 Primar-2 पत्रीमार्गप्रदीपिका। पष्टयंशोपेतमिथुनराशिसप्तवर्गरतिचक्रम् । tumn/92 "371229 Hamarpar श- ३. १२/१२ मियुनराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । ११ PIP Pr MY . vernm2 ४. Parma1P » ME . . A/C AG04/Aven M -064/10 Pyar NON22 v2MOF 529 2 try matry 29 re/2/21 . 19- to 9 nr tog nr 99 109 arTow Immummyr1590 vpur श १ ३० var 61.40GANGA Albul MantA Ourk . vnrTH tvpranyavra-t" • " . WALL64/064 FONmule मं LORU 09 tvNJUparma|MIT Mama MP SImpure 22 (३०) ----- क होरा ट्रेष्का. भव. विज्ञा पश्यं vommarwarop" mame.

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(४३) FAwel|SAGE मह भन. MINSAR 1.PD0 Mrlmmar • arrier दिया २० २१ २१ ១ Lava4J.vdmSA . sari 91.2 PWWSE में म२५ SHG २९/२९/३० 604 4.4 G41 Gथा...64TANGALIA PE चं NE 100 mory -10 toon ६ • F २८ . MP Parmarsonary for wrotom २८ . 9. ९ P0E ~ tortioraipur मम Mitr"R ५ Parlimmsmar भाषाटीकासहिता। Popur ~ Altmur/Pw on २७.२७ . Huyiwn.. मं२६ मे ग h, Impan 78 ३० F- I8 orrow •p 7 0 7 ANN ९ PHirror N - ५. . RAIP म on hwar janwar म ८ २५/२६ १२६ 10. •FN02891 १२ . . PRE 21041 tomurvarEND ८ 4GG66A . RAJU -rimne Nmmar TIPS loom! 12 w २४ २५ y 616A/NA].nu4 Por V PR/064|SH 4/064/SH गगगुगु सप्त १२/१२/१२/ १२ द्रका एस M . अंश १५/२६१६ "Inyanrimary 164 Alcal 70 Humor/tortomar AU 3 ग्रह होरा नवमा दाद. त्रिंशा. पष्टपंश, २३ MIT" wr -- (४४) पत्रीमार्गप्रदीपिका । पष्टचंशोपेतं मकरराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । . १ २ २ ३ संश ३ ३० ३० . ३० . . . ३० २ 4 है ध भ म प्रह श १ चं। चं । १० च। च वं चं चं चं चं वं वं च च होरा चं ४ श ६ द्रेष्का, ध १० १० १० . च च चं चं १० १० १०/१०/१० चंचर र ८४ . र रत. 4 या ( ५ ४ ४ नवां, श श १० १० १०२०२०११ भ श ११ १० १२ ११।११ ११४०११/१२ धगुगु गु गु गु ११/१२/१२/ १२ १२।१२ बुदु २ ६ ६ ६ शु में गु गु अ श thy नियां बु शु २ शु २ शु २ २ में शु पएच बु चं र AGA २ ६ षष्टयंशोपेतमकरराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । ८ ० ११ १२ १२ १३ १० अंध . ६० . . . ३० . ३० . श श ग्रह १० च चं चं १०.१०१० चं चंच च च च च चचंचं च होरा ४ ४ श शुश se १० १० २ २ का MOBIte linerwariam|PM 06.0GE ५ na ६ ke tarww.rrmarwmurti में ६ ६ गुम १२।१२! १२ १ म में मं मं More झु १ नवां. १२ १२ मं मं છે शु शु २ चु है ३ दास. on lit vltra w tra ar बु है बु ६ hinni by to wo गु १२ १२ गु ६ गुनगुनियां १२।१२१२ में श दुचे गु में घुदु १०।११ पष्टय.

भाषाटीकासहिता। (४५) १५, १६ मंश १७ | १८१८ | १९ १९२० ३० २०/२१ २१ . . . गृह १० २०१० krer १०] १० होरा र र दुष्का श Written WG41064 .lmbAISA E.INGAGANGA समां ७ A6Anta.nambaram 44662 mur1590017" ८ गधमां, । 09. في سم و هه م v Murar निशां. 14 -6264ma १२.१२ पश्य. Cel १२ -- १८ २८ २९/२९/३० २४ ॥२४॥ २५ ॥२५॥२६ २६ ३० 2. मंश . . . . . म श LE १०१०१० .64mARA MGASA MAM 206444 t-mur ट्रेका. 460 क .ywwwurna १०१०१० 4IGAlm6216 चं र २६ र बु ४.२०४५ 6641A wlarly दाद मं 14 शिं. 6914 & गु ११ १२ .64 बए.

(४६) पत्रीमार्गप्रदीपिका । षष्टयशोपेतकुंभराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । १ १ २ ३ ५ ६ भंत्र ० ३० . ३. . ३. 4 ग्रह प ११० ११ प ११ ११ शा भ ११।११।११ र र र ११ ११ -- र र २ र र र र होरा र ५ ५ ५ ५ श श- श का विष्का. ६ ११ 6641524A24 ११ शा नवा. गु शु ...SIN64 श प श गुगु ११. 599 १२/१२/१२/ २२ १२ । १२ म म मंम म मं गु ७ ८ ८ ८ ८ ८ ८.८ गु गु गु गु म में मं में १२ १२ १२ १२ १२ १२ १ १ म में में मं १ १ १ १ ११ ब ₹ प में ४ ३ गु दाद. - में में में विशा. में १ में बु पष्टय. m गु १३ ३ . पष्टचशोपेतं कुभराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । १० १२ । १२ १३ १३/१४/१४/१५ ३० अंश. ३० . ३० . / प्र श ११ 4 १११११११ ११ ११ 4 ११/११ ११ र e o bo w go too mre र र र र र SAI र ६ होरा प व दु बु ३ में देका ११ म ३ --10GAI गु गु १२ १२ में १२ शु में १ सम. -- २ गु श प 6424124/0RAGAN 164.100GL/0641 नव. १० .44/0b014-201.wha १० २०१०११।११ च चे च भु २ बु ArkmritSmar च २ ३ ३ ३ द्वाद. ४ ग . गु गु गु गु त्रिं. ९ व भ ६ म १ पर १२ ३ भाषाटीकासहिता। (08.) अंश . १५ १६१६ १७११७११८१ १८ १९१९ २० २० २१ २२२॥ २२ ३०/०३० ३० Bolo शशाश शशशशशशशशश ११ ११/११ ११ ११/११/ ११ ११११ ११ ११ ११ चंच चं 406/cdi. 06/. द्रेष्का. ها سهیم س Alway/ca. 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A प प श२५श गु गु गु ४२ ११ १२ १२ १२ १२ १२ शश २६ शगु गु ११११४०११ १२ १२ गु श ध श सप्त. १२/१२/१२ नुगु नयां. १३ १२ १२ १२ २३ २०१०/११ गु ११ 064 दाद. ११११११ मम निंयां, ८ ८ में में में में भ में म में ८ में। ८ चं ८ ८ में गु गु चु गु म पह. में १ शु २ AWGAN ६ ११।१२ (५०) पत्रीमार्गप्रदीपिका । दशांशलारणीचाम् । ९ ११। सकी। स. २ ६ AP ४ २ ४ ६ ट १ ११ १ २ १ १२ ६ ८ ३ १० ३ १२ ३ 4 २ २ १ ६ ३ ८ ७ ४ ९ ३ ६ ६ ८ ३ ५ १२ १८ ९ १ २ ४ ९ ६ १ २१ २ ८ ३ १२ १२ ८ - ९ २ २१ १ ६ ३ ९ ६ ११ १ ३ २ २७ ७ १२ . २ ४ १ ६ ८ ३ चरराशि मेष राशिको आदि ले,स्थिरमें सिंहको आदि ले, द्विस्वभावमें धन राशिको आदि ले जितनी संख्याक विभागमें हो उतनी संख्यापर्यव गिननेस जो राशि आवे उस राशिका स्वामी षोडशांशका स्वामी होता है। पोडशांशविभाग (पाये.) ७ १ ३ १ ६ १०/११/१२/१३/१४/१५/१६ ९/१३१५/१६/२०२२ २४/२६/२८/३०. ५२४५३७३०/१२/१५ १२४५/३७/३०२२ १५ ३० ३० ३० ७ . . . D . वि अब दशवर्ग बनानेकी रीति कहते हैं:- सप्तवर्गमें दशांश पोडशांश षष्टयंश मिलानेसे दशवर्ग होते हैं। अथाष्टवर्गनयनमाह टुंडिराजः । स्वान्मंदात्कुजतो रवि तितपोलाभार्थकेंद्रस्थितः शुक्रादत्तरिघुव्ययेषु च गुरोर्धारिपुत्राप्तिक्षु ॥ चन्द्रामाप्तिरिपुनिखेषुशशिनात्पचत्रिनन्द- व्ययारिप्राप्त्यप्रगतस्तनोत्रिखसुखोपांत्यारिरिस्फे शुभः ॥ २२ ॥ अब अष्टवर्ग बनानेकी रीति हुंडिराज कहते हैं:- प्रथम सूर्याष्टवर्ग कहते हैं:-सूर्य अपने स्थानसे और भौमसे और शनिलेबा९। .११॥२॥१॥४७॥३० में स्थानमें शुभ फल देता है और शुक्से ७।६।१२, गुरुसे भापाटीकासहिवा। (५१) ९।६।५।११, चंद्रसे ११।६।३।१०, बुधसे ५।३।९।१२।६।११।१०,लमसे ३॥ १०१४।११।६।१२ स्थानमें शुभफल देता है। इन शुभफलपदस्थानोंमें रेखा दे और शेष स्थानोंमें बिंदु (शून्य ) देनेपर सूर्यका अष्टवर्ग होता है ॥२२॥ , अपवरष्टवर्गाकाः १८. २/मगु/शुशिल. ११३१/३/५/६१ १६/९/१२/४६ ७/११/७/९/१श ७.१० ८ ८/१० ८ ९/११ १२ १० १०/१२ ) १० २श 0.00 - . अथ चंद्रस्याष्टवर्गः। भौमाद्ग्लौनवधीधनोपचयगः पछ्याप्तिधीस्थोऽर्कजा- लग्राच्चोपचये वेरुपचयातास्तेषु शस्तो धात् । धीरंधेशचतुष्टयं त्रिषु गुरोः केंद्राष्टलामव्यये स्वादेकोपचयास्तगस्त्रिखभवास्तांबुत्रिकोणे भृगोः ॥२३ ॥ चंद्राष्टवर्ग कहते हैं:-चंद्रमा भौमसे ९।५।२।३।६।१०।११, शनिस ६।३।११।५, लग्नसे ३।६।१०।११,सूर्यसे ३।६।१०।११।८ ७, बुधसे ५। ८।११।१।४।७।१०।३, गुरुसे १ । ४ । ७ । १० । १११ १२, चंद्रसे १।३।६।१०।१३ । ७, भृगुसे ३ । १०।११।७४। ९.५ में स्थानमें शुभफल देता है। इन स्थानों में रेखा दे और शेष स्थानों में शून्य देनेसे चंद्रका अष्टवर्ग होता है ॥ २३ ॥ अथ भौमस्याष्टवर्गमाह । स्वाद्रीमोऽष्टचतुष्टयायधनगो जीवात्पडायांत्यखे चन्द्रादायरिपुत्रिगो भृगुसुतादष्टांत्यलाभारिंगः। ज्ञापंचायरिपुत्रिगोऽर्कतनयात्केंद्राष्टधर्मायगः सूर्याचोपचयात्मजेषु तनुतस्त्र्यायारिखाये शुभः ॥ २४ ॥ अब भौमका अष्टवर्ग कहते हैं:-भौम अपने स्थानसे ८।१।४। ७।३०।११।२, गुरुसे ६।१३ । १२ । १०, चंद्रसे ११।६।३, शुक्से ८ - .. (५२) पत्रीमार्गप्रदीपिका । १२ । ११ । ६, बुधसे ५।११।६।३, शनिले ११४।७.1१०1८।९।११, सूर्यसे ३।६।१०।११।५,लग्नस३।११।६।१०।१स्थानमें शुफल देता है,इन शुभ फलप्रदस्थानमें रेखा देना और शेष स्थानमें शून्य देनसे भौमका अष्टवर्ग होता है२४ " अथ चंद्रस्याष्टवर्गाकाः ४९. अब भौमस्याटवर्गाकाः३२ रचं मं बु गु शु श रच में तु गु शु श ल. ३।१२।११३ ६/३/३/३४४/५/६/५.६२/५/१०८४ ६ ८/७/६/५/८/७१११११० १०/१०/९/१०९ १११११०८/११/१० ११/१०/१२/११॥ ७.१११२/१२/८२ ८ १० १० ११ ११ अथ बुधस्याष्टवर्गमाह । शुक्रादासुतधर्मलाभमृतिगः सौम्यः कुजार्केस्तपः- केंद्रायाष्टधने स्वतोऽप्युपचयान्त्येकत्रिकोणे शुभः। कोणान्त्यारिभवे खे रिपुभवाष्टान्त्ये गुरोरिन्दुतः खायाष्टारिसुखार्थगः स्वखभवाष्टकांबुषट्सूदयात् ॥ २५ ॥ अब बुधका अष्टवर्ग कहते हैं:-- शुक्रसे बुध १।२।३। ४ । ५।९। ११८ वें स्थानमें शुभ फल देता है और मंगल शानसे ९:३४७/१०११ ८।२, बुधसे ३ । ६ । १० । ११ । १२ । ११९ । ५,सूर्यसे ९।५।१२।६। ११, गुरुसे ६।११।८।१२, चंद्रसे १० । ११ । ८।६।४।२ लग्नस २ । १० । ११ । ८।१।४।६ स्थानमें शुभफल देता है । इन उक्त स्थानोंमें रेखा देना और शेषस्थानमें बिंदु देनेसे बुधका अष्टवर्ग होता है ॥२५॥ अथ जीवस्याष्टवर्गमाह। स्वात्स्वायाधषिकेंद्रे स्वनवदशभवारातिधीस्थश्च शुक्रा- लग्नात्केन्द्रायधीषट्स्वनवसु च कुजात्स्वाष्टकेंद्राय इज्यः । इन्दोर्चुनार्थकोणाप्तिषु सहजनवाटायकेन्द्रार्थगोऽर्का- ज्ज्ञात्कोणत्यायखायाम्बुधिरिपुषु शनेख्यंत्यधीषट् शस्त:२६ १ - - भाषाटीकासाहिता। (५३) अब गुरुका अष्टवर्ग कहते हैं:-गुरु अपने स्थानसे २।११।८।३।१ ४७ । १० वें स्थानमें, शुक्रसे २ । ९ । १० । ११ । ६ । ५, लग्नसे १ । ४। ७ । १०।११।५।६।२।९, भौमसे २। ८।१।४।७। १०१११, चंद्रसे ७।२।९।५।११, सर्वस ३।९। ८।११ | १।४।७।१०।२, बुधसे ९ । ५ । २।११।१०।१।४। ६, शनिसे ३ । १२ ५। ६ स्थानमें शुभफल देता है । इन स्थानों में रेखा देनेसे गुरुका अष्टवर्ग होता है ॥२६॥ - अय वुधल्याटवाका: ५४० अवगुरष्टाका ५६. सच मं बु गशल./रच में बुश ल. ३/८/२ ८/२/२/३२/५/३/२/३१५/५/३ ९६४५/११/३४३/७/४/४/३/६/६ ११/८७६१२/४७/६४/९/७/५/४/९/१२/५ १३/१०/८/९ ५1८1८७/११/८ ७/११/८/६/७/१० ११/९/१० ८.९.१०५८ १०/९/८/११ ७ १०/११ ०/१०/११९ ११ १२ १२२१) १० ११/१२/ १० ११ अथ शुक्रस्याष्टवर्गमाह । खास्तान्त्याऽहितवर्जितेषु तनुतः शुको विनास्तारिखं चन्द्रात्स्वान्मदनव्ययारिरहितेष्वाद्ययाष्टाप्तिषु । मन्दाव्यकारपुव्ययास्तरहितेष्वीज्यानवायाष्टधी- खे ज्ञात्कोणभवत्रिषद्सु अवधीच्यन्त्यारिधर्मे कुजात् ॥ २७ ॥ अन शुक्रका अष्टवर्ग कहते हैं:-शुक्र-लग्नस १० । ७ । १२ । ६ स्थान विना और स्थान ( १।२।३।४।५। ८।९।११।)में शुभफल देवा है और शुक्रसे ७।६।१० वें स्थान विना अन्य स्थानमें (१।२।३। ४ । ५।८।९।१३।१२),चंद्रले ७ । १२ । ६ । स्थान विना अन्य स्थानमें ( १ ।२।३।४ । ५। ८।९।१०।११), सूर्यसे १२॥ ८ ॥ ३३ स्थानमें, शनिसे २।३।६। १२ । ७ वें स्थान बिना शेष स्थानमें (३।४।५।८।९।१०।११), गुरुसे ९ । ११ । ८।५। १० - (५४) धनीमार्गप्रदीपिका। में, बुधसे ९।५।११।३।६, मंगलसे ११॥ ५।३। १२॥ ६॥९ स्थानमें शुभफल देता है । इन शुभफलद स्थानों में रेखा देनेसे शुक्रका अष्ट- वर्ग होता है ॥ २७ ॥ १ अथ मन्दस्याष्टवर्गमाह । स्वान्संदरिषडायधीषु रवितोऽष्टायद्विकेन्द्रे शुभो भौमात्खायषडन्त्यधीत्रिषु तनोः खायाम्बुपदव्येकगः। ज्ञादायारिनवांत्यखाटसु भृगोरन्त्यायपट्संस्थित- श्चन्द्रादायरिपुनिगः सुरगुरोरन्त्यायधीशत्रुगः ॥२८॥ अब शनिका अष्टवर्ग कहते हैं:-शनि अपनी राशिसे ३।६।११।५ स्थानमें, सूर्यसे ८ । ११ ।२ । १। ४ । ७१ १० में, भौमसे १० । ११ । ६ । १२ । ५। ३, लग्नसे १० । १३ । ४।६।३। १, बुधसे ११ ॥६॥ ९ । १२ । १० । ८, शक्रसे १२ । ११ । ६, चन्द्रसे ११ । ६। ३,गुरुसे १२॥ ११॥ ५॥ ६ स्थानमें शुभफल देता है । इन स्थानोंमें रेखा देना और अन्यत्र बिंदु देनेसे शनिका अष्टवर्ग होता है ॥ २८ ॥ अथ शुक्रस्याष्टवर्गाका.५२ अथ शनेरष्टवर्गाका: ३९ ९ रम मदु शुगल रची में गुरु शल ८१३३५ १११३ ११. ४९.९१०,५५४७ १०१००१२ १११६ ५/११/११/१२/५/८/५/८ ११२ ८.३३ ९ ८/९/८/१० १ .. १श -

आपाटीकासहिता । (५५)
शम्भुहोरामकाशादिग्रन्थों में लग्नाष्टवर्ग भी विशेष कहा है।
খ কংকা ৪২.
a.
मं बु गु शु
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११
स्थानानि यान्युक्तानि तेषु रेखा अन्यत्र बिन्दुः ॥२९॥
इति रेखाष्टकम् ।
प्रथमं जिस ग्रहका अष्टवर्ग करना हो वह यह जिस राशिमें स्थित हो उस
राशिको आदि ले जन्मकुंडली ग्रहसहित लिखना, तदनंतर अपने अपने अष्ट-
वर्ग जो जो स्थान शुभफलाद कहे हैं उन उन स्थानों में रेखा लिखना और अन्य
स्थानों में बिंदु ( शून्य ) लिखना । इस प्रकार सूर्यसे लग्नपर्यंत आठ ही ग्रहोंके
अष्टवर्ग बनाना, फिर बारहों राशियोंकी अष्टवर्गकी रेखाका योग पृथक् पृथक्
करके अपनी अपनी रेखाका योग कुण्डलीमें लिखनेस समुदायाष्टवर्ग होगा। तदनं-
वर इस समुदायाष्टवर्ग मीन मेष वृषभ मिथुन राशिमें जितनी जितनी रेखा हो
उन सब रेखाओंका योग करना। ये योग १२० एक सौ बीससे अधिक आवे
तो प्रथम वयमें सौख्यार्थ विशेष प्राप्त होगा। एवं कर्क सिंह कन्या तुला राशिकी
सब रेखाका योग १२० एक सौ बीससे अधिक आवे दो वरुण अवस्थामें सुख
अर्थप्राठि आदि विशेष होगा । इसीप्रकार दृश्चिक धन मकर कुंभ राशियोंकी
सब रेखाका योग १२० एकसौ बीससे अधिक आये तो उत्तर वयमें सुख अर्थ
प्राप्ति आदि शुभफल विशेष होगा और१२० एक सौ बीससे अल्परेखैस्य जिस
अवस्थामें आवे उस अवस्थामें मध्यम फल होगा ऐसा जानना ॥ २९ ।।
१ शमुहोराप्रकाशे-“मोनाद्य मिथुनांतकं प्रथमकं प्रोक्तं वयः प्राक्तनैः कावं वणिजांतकं तरुणता
संज्ञञ्च मध्यं बुधैः । कुंभान्तं स्थविरांतकं च बहुभिर्यत्सत्फलैः संयुतं तत्सौख्यार्थविशेषदं बलयुते
नेदं विशेपाच्छुभम् ॥ ११ ॥

पत्रीमार्गप्रदीपिका। उदाहरण। - सूर्यरेखाटक करना है-यहाँ सूर्य कुंभराशिका है, अतएव कुंभराशिको आदि ले जन्म कुंडली ग्रहसहित लिखके श्लोक २२ के अनुसार शुभफलप्रद स्थानों- म रेखा, अन्यस्थानोंमें शून्य लिखी सब रेखाका योग किया तो ४८ हुआ । यह सूर्यका अष्टवर्ग हुआ । इसी प्रकार शेष ग्रहोंके अष्टवर्ग जानना। गु रेखाटकचक्रम् शशुलार बुमि १/२/३/४/५/६/७/८/९/१०/११/१२ स ૨૨ી ૨ી ૨હી ૭/૩/૨/૧૮ सूर्याष्टवगैक्य ४८ H ४९ III ४१/७४/२/२/३४६/३/१/३/३० 0000 गर 100000/ mill ७४/३/३/६४६ ०००००० null .. 1000000 ५/७/१]४/२/५७/५/३४६४५६ श. ००० Te4 R + २ ) श. ५४३१४२ ५४४६/४९ ३४३३२५३१३२२७३४/४२३९३९/३१/३० योगा समुदायाष्टवर्ग-उदाहरण। जैसे मेपराशिके सूर्याष्टवर्ग, रेसा ३, चंद्राष्टवर्गमें ६, भौमाष्टवर्गमें ४, बुधाष्टवर्गमें ५, गुरुके अष्टवर्गमें ५, शुक्राष्टवर्गमें ६, शनिके अष्टवर्गमें २, लनाप्टवर्ग, रेखा ३ है। इन आठ ही वगाकी मेषराशिकी रेखाका योग किया वो ३४ हुए, इसी प्रकार बारहों राशियों के अष्टवर्गकी रेखाका योग किया, इसको समुदायाप्टवर्ग जानना । इस समुदायाप्टवर्गमें मीनराशिमें रेखा ३०, मेपमें ३४, वृपभमें ३२, मिथुन, ३५ रेखा हैं, इनका योग किया १३१ आये। ये १२० से अधिक हैं, अतः प्रथमवयमें सुखार्थ वृद्धयादि श्रेष्ठ फल होगा । एवं कम ३३, सिंहमें २२, कन्या २७, तुलामे ३४ रेखा .

- . भाषाटीकासहिता। (५७) हैं, इनका योग किया तो ११४ आये, ये १२० से अल्प हैं, इस- लिये मध्यवयमें मध्यम फल होगा। इसी प्रकार वृश्चिक ३८,धन३२,मकर २९कुंभ ३५ राशियोंकी रेखाका योग किया तो १४१ आये, ये१२० से अधिक हैं,इस- लिये अन्त्य वयमें सौख्यार्थमाप्त्यादि श्रेष्ठ फल होगा, ऐसे ही सबमें जान लेना । इति रेखाटकम् । समुदायाष्टवर्गकुंडली. ११वा श९ Poल ܦ ४ ३४ tu. ३५ २२. शुभाशुभफलचक्रम् । आद्यावस्था । मध्यावस्था अन्त्यावस्य ११४ १४१ मध्यम श्रेष्ट. . अथ राश्मिसाधनमाह। सत्रिमं सायनार्क सूर्यस्य व्यकेंन्दु चन्द्रस्य मध्यस्पष्टयोयोंगाई चलोच्चे हीन भौमादिकानां चेष्टाकेंद्रम् ॥ तद्रसोर्वमिनमा च्छुदं शेषर्श सैकम् अंशाचा दिन्ना चेष्टारश्मिः ॥ ३० ॥ अब रश्मिसाधन कहते हैं:-अयनांशयुक्त किये हुए स्पष्ट सूर्य, वीन राशि युक्त करे तो सूर्यका चेष्टाकेंद्र होता है और स्पष्टचंद्रमते स्पष्ट सूर्य हीन करनेसे चंद्रका चेष्टाकेन्द्र होता है और भौमादिक (भौम, दुध,गुरु,शुक्र, शनि ) मध्यम ग्रहका और स्पष्टमहका योग करके अर्ध(आधे) करना और अपने अपने चलो- च (शीघोच) में हीन करना (सोधना), सो भौमादि पंचताराग्रहांका चेष्टा- १ सोमदैवज्ञ'-" मध्यमार्कसहितं चलकेन्द्र स्याब्रुधस्य च सितस्य चलोगन् । मेदिनीतनयजीवशनीनां मध्यमार्क उदितं च चलोचम् ॥ " अर्थात् बुध शुक्रके मध्यम शाम केंद्र मध्यमालू को मिलानेने बुध शुक्रका शीघ्रोच होता है और मंगल गुरु शनिका गध्यम सूर्य शीनोग होता है। ܫܚܝ

(५८) पत्रीमार्गप्रदीपिका।
केन्द्र होता है वह चेष्टाकेन्द्र ६ राशिसे अधिक हो तो १२ बारा राशियों से
शोधना (निकालना), शेष बचे उसकी राशिमें एक मिलाना और अंशादिकको
द्विगुण करे तो चेष्टारश्मि होती है ।। ३० ॥
अथ ग्रहाणामुच्चनीचराशीनाह ।
सूर्यात्स्युरुच्चाः क्रियगोर भृग१०स्त्रीका ४ ऽन्त्य १२ जुका ७
दशमि १० हुँताशैः । गजाश्वि-२८ भिणिकुमिः १६शरै २७'
नखै-२० लवैरस्तगतास्तु नीचाः ॥ ३१ ॥
अब ग्रहोंकी उच्चनीच राशिय कहते हैं:-मेष १ राशिके १० अंश पर्यंत
(सूर्य), वृषभ २ राशिके ३ अंशपर्यंत (चन्द्र), मकर १० राशिके २८
अंशपर्यंत (भौम), कन्या ६ राशिके १५ अंशपर्यंत (बुध), कई ४ राशिके ५
अंशपर्यंत (गुरु), मीन १२ राशिके २७ अंशपर्यंत (शुक्र), तुला ७ राशिके
२० अंशपर्यंत (शनि)। सूर्यको आदिले यह क्रमले उच्चराशियोंके होते हैं और
अपनी उच्चराशिसे सातमी राशिमें गये हुए नीचके होते हैं ॥ ३१॥
অনাদি,
A
मु
चं १
मं बु गु
श
९ ३ ११६
२७
१०३
उन्चराशि
परमोचअंश.
नीचराशि.
परमनीचअंश.
६
३
५
अथ उच्चरश्मिसाधनमाह ।
हनीचांतरं कार्य षड्भावून यथा तथा ।
विनोशादिः सरूपं माचरश्मिरयं स्मृतः ॥ ३२ ॥
अब उच्चरश्मि करनेकी रीति कहते हैं:-जैसे छह राशि अल्पशेष रहते हो
वैसे ही ग्रह और नीच के अंतर करना(ग्रहमेस नीच हीन करनेसे ६ से अल्प रहे
वो ग्रहमेसे नीच (हीन)करना और यदि नीचसे नहीन करनेसे ३ राशिसे अल्प-
शेष रहते हो तो नीच से ग्रहको हीन करना) शेष दचे राश्यादिककी राशिके
अंक १ मिलाना और अंशादिको द्विगुण करनेपर उच्चरमि होती है ॥ ३२॥

1 भाषाटीकासहिता । (५९) अथ स्पष्टरश्मिसाधनमाह । चष्टोच्चरश्मियोगाई स्फुटरश्मिः प्रकीर्त्यते। नखोनैक्ये दरिद्री स्यादिशोर्वे सम्पदन्वितः ॥३३॥ अब स्पष्टरश्मिसाधन कहते हैं:-चेष्टारश्मि और उच्चरश्मिका योग करके अर्थ (आधा)करना,जो आवे वह स्पष्टरश्मि कहावी है। उस स्पष्टरश्मिका ऐक्य २०बीससे अल्प आये तो दरिद्री होता है और२०बीससे अधिक आवे तो सम्पदावान होता है ॥ ३३ ॥ इति रश्मिसाधनम्। उदाहरण । सूर्य स्पष्ट १० । १६ । ५३ । ३९ में अयनांश २२।२९।० युक्त करनेसे ११।९।२२।३९ सायन सूर्य हुआ। इसकी राशिमें ३ तीन युक्त किये तो २। ९ । २२ । ३९ ये सूर्यका चेप्टाकेन्द्र हुआ। एवं चंद्रस्पष्ट ५। २९ । १९ । ९ मेसे स्पष्ट सूर्य १०।१६। ५३ ॥ ३९ हीन किया तो ७।१२।२६।१०ये चं- द्रका चेष्टाकेंद्र हुआ भौममध्यम ११।१२।३९।४८ भौमस्पष्ट ११।६।१४॥ ५४ का योग किया तो२२।१८।५४।४२हुआ,इसको अर्थ किया तो१३।९।२७। २१ हुआ इसको भौमके चलोच (मध्यमस्र्य) १०१५।३०२१मेंसे हीन किया दो शेप १११५॥३६॥ भीमका चेष्टाकेंद्र हुआ। एवं बुधके मध्यमस्पष्टके योगके अर्ध १०१ १२१५३।४९ को बुधके चलोच्च (बुधशीकेंद्र ११ ॥ २३ ॥३१॥ ९ में मध्यम सूर्य १० ॥१५॥३२१ को मिलाया वो १०८।३४.३० यह बुध- का शीघ्रोच्च हुआ ) १०८।३४। ३० मेंसे हीन किया वो ११।२५।४०।४१ बुधका चेष्टाकेंद्र हुआ,इसी प्रकार शेष ग्रहोंका चेष्टाकेंद्र जानना । सूर्यके चेष्टाकेंदर , ९॥२२॥३९ में राशि युक्त करके अंशादिकोंको द्विगुण किये तो३।३।४५।१८ सूर्यकी चेष्टाराशि हुई । चंद्रका चेष्टाकेंद्र ७।१२।२६।१० छः राशिसे अधिक अतएव १२ बारह राशिमेसे शोधा शेष ४।१७।३३।५० हुए, इसी राशि ४ में मिलाया और अंशादिकोंको द्विगुण किये वो ५॥३५॥७॥४० चंद्रकी चेष्टारश्मि हुई । एवं भौमादिक ग्रहोंकी चेष्टारश्मि समझ लेना ।।

(६०) पत्रीमार्गमदीपिका। उच्चराश्मिसाधन उदाहरण. अथ चेष्टारश्मिचक्रम् । सूर्य १० । १६ । ५३ ।३९ सूर्य- सू. चं.मं.बु. गु. शु. श. की नीचराशि ६।१०।। ११/१०३/१०८ सूर्यमेंसे नीचको हीन करनेसे ६ १२/१५. ३ १५/२३ मध्यम ३९/३/४०३४४ ग्रहाः | छःराशिसे अल्पशेष बचता है, इसवास्ते ४८/२१/१/२१/४६ सूर्यमसे नीचको हीन किया ४।६। ११/१०/३९८ ५३ । ३९ इसकी राशि ४ में एक ६.१००/१२/२४/ स्पष्ट १४/४४४३/२६/४८] ग्रह. मिलाया और अंशादिक्षाको दोगुणे किये ५४|१८१८.२३ वो ५१३२४७।१८ मूर्यकी उच्चरश्मि २२/२०/६/१९/१७ (१८/२५/३/२७/१८ मध्य | हुई। इसी प्रकार शेषग्रहोंकी उच्चरश्मि स्पष्ट ५४/४७/२३/२९/३३ जाननी चाहिये। योग. ४२/३९/२/२९/९ ११/१०/३/९/८ मध्य ९/१२/१/२८/२४ स्पष्ट २७/५३/४१/४४|१६ योगार्ध. २१/४९/३१/४४/३४ १०|१०|१०७/१० १५/८११५/२१/१५ चलोच्च. २ २१/३०/२१ २२१ २|७|११/११/७९ १ ९ १२५/२५/१२/२२/२० चेष्टा २२/२६/३६/४०२१/२१/४६ केन्द्र. ३९/१० ०४१३५०/१८४७ १८/३५/४८, ८/३३/१५/४१ चेष्टा ४५/७४८३८९१६/१७/३३/ रश्मि. १८/४०/०३८/२०२४ ३४ , भाषाटीकासहिता। (६१) 일 उच्चश्मिचक्रम् । स्पष्टरमि-उदाहरण। र.चं. मं. बु.गु. शु. श.ऐ. सूर्यकी चेष्टारश्मि ३॥ १८॥४५॥ १८, सूर्यकी उच्चरश्मि ५1१३। ४७ १३/७/४३८५१/३०/५० १८ का योग किया वो ८३२॥ ३२॥ ४७/२०३०/३१/२६/५२/२३ , १८/२२/१२/२४, २१६/१४ ३६ हुए, इसको आधा किया तो॥१६॥ १६।१८ आये । यह सूर्यकी स्पष्टरमि हुई । इसीप्रकार शेष ग्रहोंकी स्पष्टरश्मि जानना । स्पष्टरश्मिका योग २० से अधिक है इस कारण संपदावान् होगा ऐसा फल समझना ॥ इति रश्मिसाधनम् ।। চাঙ্গ সঙাহিনঞ্জ। र.च.मं. बु. गु. शु.श.. १६/५१/४६/३८/१२/५३१५५/२३ १९/१४/९/३५/३१॥ ४५८/३८ १८/१४६ १/११/५०/२५५१ अथायुयानयनमाह। कलीकृत्य ग्रहं तत्र द्विशताप्तेऽर्कशेषकाः। समाः शेषात्तु मासाद्याद्वादशादिहतैः क्रमात् ॥३४॥ अब आयुर्दाय आनयनकी रीति कहते हैं। यहकी कला करके उसमें २०० दोसौका भाग देना, जो लब्ध आवे उसमें १२ बारहका भाग देना,शेष बचे वह वर्ष जानना । तदनंतर कलाके दोसौका भाग देनेसे जो शेष बचे उनको क्रमसे १२ । ३० । ६० से गुणा करके २०० दोसौका भाग देनसे जो लब्ध आवे उसे मासादिक जानना अर्थात् शेषको प्रथम १२ बारहगुणां करना, २००का भाग देना जो लब्ध आवे उसे ही मास जानना और जो शेष बचे उनको ३०वीससे गुणा करना,२००का भाग देनेसे जो लब्ध आवे वही दिन होता है। फिर जो शेष बचें उनको ६० साढसे गुणा करना, २०० का भाग देने पर जो लब्ध आवे वही घटी होती है। फिर शेषको ६० साठसे गुणा करना और २०० का भाग देना जो लब्ध आवे उसे पल जानना चाहिये । ऐसे क्रमसे जो वर्षमासादिक १-राशिको३०तीसगुणी करके अंश मिलाना फिर उसको६०साठ गुणा करके कला मिलानेसे होती ।

(६२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। आवे वह ग्रहकी वर्ष मास दिन घटी पल विपलात्मक मध्यायु समझना॥३४॥ इसप्रकार लमसहित सूर्यादिग्रहोंकी मध्यायुसाधन करके पटायुसाधनके संस्कार आगे कहते हैं- स्थिरारिभे हरेश्यशं वक्रचारं विना ग्रहः। शुक्रार्कजान्यस्त्वस्तस्य राई नीचर्कगे दलम् ॥ ३५ ॥ वक्रगति ग्रहके विना जो ग्रह स्थिरमैत्रीमें (नैसर्ग-मैत्रीमें ) शत्रु राशिका हो उस ग्रहकी आयी हुई वर्षादि आयुमसे तृतीयांश ( अपना तीसरा हिस्सा) हीन करना और शुक्र शनिके विना अन्य (दूसरा ) ग्रह अस्तका हो तो उसकी आयुको आधा करना; नीच राशिका ग्रह हो वो उसकी आयी हुई आयुका दल (अई) करना ।। ३५॥ वक्रोच्चगे तत्रिगुणं द्विनिघ्नं वर्गोत्तमस्वांशकभनिभागे। द्वित्रिन्नतायां त्रिगुणं सकृद्ध द्विव्यंशकोने दिलवोनमायुः ॥३६॥ वक्रगति ग्रह हो वा उच्चराशिका हो वो उस ग्रहकी वर्षादि आयुको त्रिगुण (३ तीनगुणी) करना और वर्गोचमी हो वा स्वनवांशका हो वा स्वराशिका हो वा स्वद्रेष्काणका ग्रह हो तो आयी हुई वर्षादि आयुको द्विगुण (दोगुणी) करना और यदि जिस ग्रहकी वर्षादि आयुको द्विगुण करनेका और त्रिगुण करनेका दोनों योग आवे तो उस ग्रहकी आयुको पृकुक् पृथक् २ दोगुणी और ३तीनगुणी नहीं करना केवल १ एक ही बार त्रिगुण (तीनगुणी) करना । एवं ग्रहकी वर्षादि आयुमेंसे द्वितीयांश और तृतीयांश दोनों घटाने के योग आवें तो वर्षादिक आयुमेंसे केवल एक ही बार द्वितीयांश ( अपना अर्धभाग) हीन करना ॥ ३६॥ - - वामं व्ययाव सर्वदलत्रिपादं पंचाङ्गभागानशुभा हरन्ति । संतोऽईमई सबलम्बहूनामेकक्षगानामिति सत्यवाक्यम्॥३७॥ उनसे बारहमें १२ स्थानको आदि ले सप्तम स्थानपर्यंत उलटे १-आगे श्लोक ३९ में कहा है कि जिस राशिका मह हो उसी राशिके नवांशमें आवे तो उसे वोत्तमी जानना।

भापाटीकासहिता। . (६३) (१२।११।१०।९।८।७) स्थानों में अशुभ (पाप)वह स्थित हो तो यथा- क्रम आयी हुई आयुर्दायमसे १२ सर्व (पूरी आयु) ११ आधी १० तृतीयांश९ चतुर्थांश ८ पंचमांश ७ षष्ठांश हीन करना। अर्थात् लग्नसे बारहमें स्थानमें जो अशुभ (पाप) मह स्थित हो उसकी जो वर्षादिक आयु आयी है वह सर्व हीन करना (उस ग्रहकी आयु०१०शून्य शून्य लिखाना) और ११ एकादश स्थानमें जो पापग्रह स्थित हो उसकी आयु जो वर्षादिक आयी है उसको आधी करना, एवं दशम १० स्थानमें जो पापग्रह स्थित हो उस ग्रहको वर्षादि आयुमेंसे तृतीयांश (अपना तीसरा भाग) हीन करना और ९ नवम स्थानमें पापग्रह स्थित हो तो उसकी वर्षादि आयुमसे चतुर्थांश(अपनी वर्षादि आयुको चारका भाग देके जो आवे वह) हीन करना, एवं ८ अष्टम स्थान जो पापग्रह स्थित हो उस महकी वर्षादि आयुमेंसे पंचमांश ( अपनी वर्षादि आयुके पांचका भाग देनसे आया हुआ जो पांचवा हिस्सा वह) हीन करना । इसी प्रकार सप्तम स्थानमें जो पापग्रह स्थित हो उसकी आयुमेंसे पष्ठांश ( अपना छठा हिस्सा ) हीन करना और: इन व्ययादि १२ । ११ ।१०।९। ८ । ७ । स्थानोंमें शुभ ग्रह स्थित हो तो जो जो भाग अशुभ ग्रहकी आयुमेंसे हीन करनेको कहा है उसका आधा आधा भाग हीन करना अर्थात् बारहवें स्थानमें शुभ ग्रह स्थित हो तो उसकी वर्षादि आयुको आधी करना और ११ ग्यारहमें स्थानमें स्थित हो तो उसकी वर्षादि आयुमेंसे चतुर्थांश (चौथा हिस्सा) हीन करना । एवं १० दशम स्थानमें स्थित हो तो उसकी आयुमैस्से पष्ठांश (छठा हिस्सा) हीन करना और ९ नवम स्थानमें स्थित हो तो उसकी आयुमसे अष्टमांश (आठवा हिस्सा) हीन करना। इसी प्रकार ८ अष्टम स्थानमें जो शुभ ग्रह स्थित हो उसकी वर्षादि आयुमेंसे दशम भाग (वर्षादि आयुके १० दशका भाग देके जो दशांश आवे वह ) हीन करना । एवं सप्तम स्थानमें जो स्थित हो उसकी वर्षादि आयुमेंसे हादशांश(अपना बारहवां हिस्सा ) हीन करना और इन्हीं व्ययादिक उक्त स्थानोंमें यदि एक राशिभे दो ग्रह स्थित हो वा बहुत ग्रह स्थित हों तो उनमेंसे जो यह अधिक बलवान् हो उसी एक ग्रहकी वर्षादि आयुमेंसे जिस स्थान में स्थितका जो भाग हीन करनेको पूर्व कहा है वह हीन करना, शेष ग्रहाँकी आयुमेंसे उस स्थानका भाग हीन नहीं करना, ऐसा सत्याचार्यका वचन है ॥ ३७ ।। है . (६४) एत्रीमार्गप्रदीपिका । लग्ने बलाढये सहितं च वर्षंस्तुल्यैविलग्नस्य गृहविधेयम् । भागादिना भास्करसंगुणेन युक्तं दिनाचं भवति स्फुटं तत् ॥३८॥ लग्न बलवान हो तो लग्नकी वर्षादि अध्यायुके वर्षके अंकमें लगकी राशिकी संख्याक समान (लग्न • राशिका हो तो ० शून्य ९ राशिका हो वो ९ नव ऐसे जिस राशिका हो उतने ही) वर्ष युक्त करना और लग्नके अंशादिक ( अंश कला विकला ) को १२ बारहसे गुणा करके उसी वर्षादि मध्यायुके दिनादिकमें युक्त करना, वह लग्नकी स्पष्टायु होगी और लग्न बलवान् नहीं हो तो जो मध्यायु आये वही स्पष्टायु समझना ॥ ३८॥ चरभवनेष्वाधशा स्थिरेषु मध्या द्विस्वभावेष्वन्त्याः वर्गोत्तमाः॥३९॥ अब वर्गोत्तमराशि कहते हैं:-चर(१।४।७।३०)राशियोंमें आय (प्रथम ३ ।२०) नवांशके अंश स्थिर (२।५।८ । ११) राशियोंमें मध्य (पांचवां१६॥ ४०) नवांशके अंश द्विस्वभाव (३ । ६ । ९ । १२) राशियोंमें अंत्य ( नवदां ३० । ०) नवमांशके अंश वर्गोत्तमांश होते हैं, अर्थात् चरराशिका अह प्रथम नवांशमें हो तो वर्गोत्तमी होता है । एवं स्थिर राशिका ग्रह पांचवे नवांश १६६४० में हो तो दर्गोत्तमांशमें होता है और द्विस्वभाव राशिका ग्रह अंत्य नवांशमें ( २६।४० के उपरान्त ३०० पर्यंत नवम नवांश ) हो तो वह वर्गोत्तमांशमें होता है ॥ ३९॥ स्वकेिंद्रोत्तमांशस्थाः स्वाशमित्रांशकान्विताः। परिपूर्णबलयुक्ताः स्वोच्चमूलत्रिकोणगाः ॥ ४० ॥ अब ग्रहोंका बल कहते हैं:-स्वराशिमें स्थित केंद्र (१।४।७।१०) स्थानमें स्थित, शुभग्रहोंके नवांशमे स्थित, स्वनवांशमें स्थित, मित्रनवांशयुक्त और अपनी उच्चराशि (शोक ३१ में कही है) स्थित और मूलत्रिकोणराशि- में स्थित ग्रह परिपूर्ण वलवान होता है ॥४०॥ में . १-आगे श्लोक ४१ में कहा है। २-मारावल्याम्-"विंशतिरंशाः सिंहे त्रिकोणमपरे स्वभवनमर्कस्य । उच्चं भागत्रितयं वृष इन्दोः स्थानिकोगमपरेंऽशाः ॥१॥ द्वादशभागा मेषे त्रिकोणमपरे स्वमं तु भौमस्य । उनमयो कन्यायां बुधस्य- भाषाटीकासाहिता । (६५) स्वामिगुरुज्ञवीक्षितयुता होरा बलोत्कटा भवति ॥ ११ ॥ अब लग्नका बल कहते हैं-लम अपने स्वामीसे अथवा बुधगुरुसे युक्त हो वा दृष्ट हो तो बलवान होता है ॥ ४१ ॥ लोमशोक्त सप्तवर्गबल सारणी चक्र समाप्तिमें दिया है उसस भी ग्रहोंका सप्तवर्ग बल जानना ॥ इत्यायुयः ॥ उदाहरण । सर्य १०।१६। ५३ । ३९ की कला १९०१३ । ३९ में २०० दी सौका भाग दिया लब्ध ९५ आये, इनमें १२ बारहका भाग दिया शेष११रहे ये वर्ष हुए कलाके २०० का भाग देनेसे शेप १३ । ३९ बचे इनको १२ बारहगुणे किये १६३६.४८ हुए इनमें २०० का भाग दिया लब्धशून्य मास आये शेप १६३ । ४८ को तीसगुणे किये ४९१४ । • फिर २०० का भाग दिया लब्ध २४ दिन आय शेष ११४० बचे इनको ६० साठ- गुणे किये ५८४० १० हुए इनमें २०० का भाग दिया लब्ध ३४ घटी आयी में पु गु शु श . क. -A राशयः १० उ.१५) भू २०४३ मू. १३ मंशाः स्व १० २७स्वस्व ३० स्व २० स्व१५ स्व१० म.५मू १०/१५ मु२० -तुंगांशकैः सदा चिन्त्यम् ॥ २॥ परतत्रिकोणजातं पञ्चभिरंशैः स्वराशिजं परतः । दशभिर्मागर्जीवस्य त्रिकोणं धनुषि तत्परं स्वगृहम् ॥ ३ ॥ शुक्रस्य च तिथयोंऽशास्त्रिकोणमपरं स्वमं तुलायां तु । कुम्भे त्रिकोणं स्वगृहे रविजस्य वेर्यथा सिंहे ॥ ४ ॥” अर्यात सूर्य सिंहराशिके २० वीस अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका २० अंशके उपरांत शेप १० अंशमें स्वगृही होता है । चन्द्र वृषमके तीन ३ अंश पर्यंत उच्चफा ३ तीन अंशके अनन्तर शेष अंशमें मूलत्रिकोणका होता है,भौम मेषराशिके १२ अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका १२ के अनन्तर शेष अश्में स्वराशिका होता है, बुध कन्याराशिके १५ पंदरह अंशपर्यंत उच्चका १५ पंदरह अंशके अनंतर ५ पांच अंशपर्यंत मूलत्रिकोणका ९ पांच अंशके अनंतर शेष अंशमें (२० अंशके अनंतर)स्वराशिका होता है, गुरु धनराशिके १० अंश- पर्यंत मूलत्रिकोणका १० दश अंशके अनंतर शेष अंशमें स्वराशिका होता है, एवं शुक्र तुला राशिक १५ अंशपर्यत मूलत्रिकोणका१५ पंदरह अंशके अनंतर शेष अंशमें स्वराशिका होता है, शनि कुंम- प्रशिके २० बीस अंशपर्यत मूलनिकोणराशिका २० अझके अनन्तर शेष १० अंशमें स्वराशिफा न जागना । ति ..

- म बु श ल ११ Imrr ५ ७ ५. २ ध्या- २४ ३४ २५ २ ३७ शत्रु रा.३ भा. अस्त- अर्थ ० ३५ धक स्वन्द्र (६६) एनीमार्गप्रदीपिका। शेष ४०।०. बचे इनको फिर ६० गुणे किये २४०० ० हुए, इनमें २०० का भाग दिया लब्ध :१२ पल आये ऐसे ऋससे १३।२४ । ३४ १२ वर्षादि सूर्यको मध्यायु आयी। इसी प्रकार शेष चंद्रादि ग्रहकी और लग्नकी वर्षादि आयु जानना-अब इसमें श्लोक३५के अनुसार सूर्य स्थिरमैत्रीमें शत्रुकी राशिका है इसकारण सूर्यको वर्षादि १३। ० । २४ । ३४ । १२ आयु- मेसे अपना तृतीयां (तीन- मध्यायुचक्रम्। का भाग देके) ३१८ म- ११ ।२४। घटाया ७४ १५ यु १६ । २२ । ४८ सूर्यकी स्पष्टायु हुई। चंद्रमा वर्गोत्तमी संस्का है इसकारण श्लोक ३६ के अनुसार इसकी आयु ५। . वर्गात स्वद्र- काण वौत्तकाण ।। १७ । ४० । १२ को द्विगुण की ११ । ७ ५॥ २०॥ २४ । हुए इनमेंसे वारमे सो. श्लोक ३७ के अनुसार ० ० सर्वही चंद्र ९ नवम स्थानमें स्थित हैं इसलिये ४ चतुर्थांश हीन करना परंतु ये शुभ ग्रह हैं इस कारण वर्षादि आयुके आठका भाग देके १॥ ५॥११ । ५५ । ३ आये हुए अष्टमांशको हीन किया १०।१ । २३ । २५ । २१ :: ये वर्षादि चंद्रकी स्पष्टायु आयी । भौमके श्लोक ३५। ३६ । ३७ के अनुसार कोई संस्कारका योग नहीं है इसकारण जो मध्यायु ३०१०१४।४९।१२ है यही स्पष्टायु जानना ।बुध अस्तका है इसलिये बुधकी आयु ९। २। १९ । ४४ । २४ को आधी करके श्लोक ३६ के अनुसार ये स्वद्रेष्काणका है इसवास्ते दोगुणी की ९ । २।१९। ४४ । २४ ये बुधकी स्पष्टायु आयी. ० श्लो ३५ ३ गुगु २गु नवमे सप्तमे ९ ३ १ १० १३ स्प टा- . १० ३ ५ १६ ४ ५८ २७ यु. ४२ ४८ ३१ ३४ o :

भाषाटीकासहिती। (६७) एवं गुरु वक्रगति है इसकी आयुको श्लोक ३६ के अनुसार ३ तीनगुणी कर- नेका और उच्चराशिका है इस कारण फिर ३ तीनगुणी करनेका और यही गुरु वर्गोतमांशका है इसलिये फिर२ गुणी करनेका योग३ तीनप्राप्त हुए, हैं अतएव "द्वित्रिनवायां त्रिगुणं सकदै " इसके अनुसार गुरुकी वर्षादि आयु ३।२।१७ । २५॥ ४८ को एक ही बार ३ गुणी की ९ । ७ । २२॥ १७ ॥ २४ हुई परंतु गुरु शुभग्रह है और ७ सप्तम स्थानमें स्थित है इसकारण इसमेंसे अपना बारहवाँ हिस्सा०।९। १९ । २१ । २७ हीन किया ८।१०।२। ५५॥ ५७ ये गुरुकी स्पष्टायु हुई और शुक्र स्वद्रेष्काणका है इसलिये शुक्रकी आयु० ८। २३ । २।२४ को श्लोक ३६ के अनुसार द्विगुण करनेसे १।५। १६ । ३।४८ आये ये शुक्रकी स्पष्टायु हुई। एवं शनि बारहमें स्थानमें स्थित है और यह अशुभ ग्रह है इसलिये इसकी आयु ५।९। ५१ २४ । मेसे सर्व (पूरी ) आयु हीन की शेष ० । । । । ० यह शनिकी स्पष्टायु हुई। वा लम बलवान् है इसलिये लग्नकी वर्षादि आयु ४ । ०।१५। २७ । के वर्षके ४ अंकमें लग्नकी राशिके समान वर्ष ९ युक्त किये १३ वर्ष हुए, शेषमासादिक ०।१५। २७ । ० में लग्नके अंशादिक २३ । २८ । ३५। को बारह गुणाकरके आये हुए मासादि ९ । ११ । ४३ । ० युक्त किये १३॥ ९ । २७ । १० । • ये वर्षादिक लग्नकी स्पष्टायु हुई ॥ इत्यायुयः ॥ स्पष्टायुयोग ६१।९। ०।३२॥ ३० ॥ अथ स्पष्टांशायुचक्रम् । र. |चं. मं.. गु. शु. श. | ल. ए. ७/१०/१०/९/८/१ .|१३६१ ४१/१०/१/१०/५ १६/२३/१४/१९/३/१६/०/२७/० २२/२५/४९४४/५५/४ .१०/३२ ४८/२१/१२/२४/५७/४८/० ०३० . दशासाधनमाह- तत्रादौ ६विंशोतरी दशा। खेः षडिन्दोर्दश १० सप्त ७ भभुवो गजेंदवो-१८ऽगोधिषणस्य षोडश १६॥

(६८) पत्रीमार्गप्रदीपिका। शनर्नवाब्जा १९ नगभूमिता १७ विदो नगा ७ स्तु केतोरनलानखाः २० कवेः॥४२॥ अब दशासाधन कहते हैं, जिसमें प्रथम विंशोचरी कहते हैं: कृत्तिका नक्षत्रको आदिले क्रमसे प्रथम सूर्यकी ६ छह वर्षकी दशा, फिर चंद्रकी १० वर्षकी, मंगलकी ७ वर्षकी, राहुकी १८वर्षकी,गुरुकी १६वर्षकी, शनिकी १९ वर्षकी,बुधकी १७वर्षकी,केतुकीवर्षकी, शुक्रकी,२०वर्षकी दशा जानना॥४२॥ विंशोत्तरीदशाचक्रम् । के' Wsts चं मं. . १० १८ रोह पुन पुष्य आ ह विस्थावि अ ध पू रे 25 २० पू ज्ये भूपू अ अष्टोत्तरीदशा। खेः ६षडिन्दोस्तिथयो १५ Sष्ट भूभुवो नगेन्दवो १७ ज्ञस्य शनेर्दिशो १०गुरोः । नवेन्दवो १९ ऽगो रवयः १२ समाः सिते धराश्विनो २१ वेदहुताशभे शिवात् ॥ १३ ॥ अधोतरीदशाके वर्षादि मान कहते हैं-आनक्षत्रको आदि ले कमसे प्रथम चार नक्षत्र (आ० पु० पु० आ.)की, सूर्यकी ६वर्षकी दशा, फिर तीन नक्षत्र (म. पू. उ.) की चंद्रकी १५ वर्षकी, फिर चार नक्षत्र (ह.चि.स्वा. वि.) की भौमकी ८ वर्षकी, फिर तीन नक्षत्र (अ. ज्ये. मू.) बुधकी १७ वर्षकी, फिर चार नक्षत्र (पू. उ. मि.अ.) की शनिकी १० वर्षकी, फिर तीन नक्षत्र (ध. श.पू.) की गुरुकी १९ वर्षकी, तदनंतर चार नक्षत्र (उ. रे. अ. म.) की राहुकी १२ वर्षकी, वदनंतर वीन नक्षत्र (क.रो. म.) की शुक्रकी १६पर्षकी भष्टोत्तरी दशा जानना॥ १३ ॥ -

भाषाटीकासहिता।
(६९)
६
अष्टोत्तरीदशा.
र. चं. मं बु. श. | गु. | रा. शु.
१७/१०/१९/१२/ २१
आ. म. ह. म. पू. |घ. कृ.
श.
उ. स्वा. भू. भि. पू. म. मु.
आ. वि. श्र. भ.
ट.
पू.
ज्ये.| उ.
अथ योगिनी दशा।
जनमें त्रियुक्तेऽष्टतष्टे दशा मंगला पिंगला धान्यका भ्रामरी च ।
ततोभद्रिकोल्का च सिद्धा कमात्संकटासन्निषिद्धाःसमैकैकवृद्धाः४४॥
अब योगिनी दशा कहते हैं-जन्म नक्षत्रकी संख्या में तीन मिलाना
आठका भाग देना एकको आदि ले शेष बचे सो क्रमसे १ मंगल
२ पिंगला ३ धान्याट चामरीभद्रिका ६ उल्का ७ सिद्धा संकटा दशा एक
एक वर्ष बढ़ती हुई एक श्रेष्ठ एक नेष्ट इस क्रमसे जानना । अर्थात् मंगला एक
१ वर्षकी श्रेष्ठ, पिंगला २ वर्षकी नेष्ट, धान्या ३ वर्षकी श्रेष्ठ, भामरी ४ वर्षकी
नेष्ट, भद्रिका ५ वर्षकी श्रेष्ठ, उल्का ६ वर्षकी नेष्ट, सिद्धा ७ वर्षकी श्रेष्ठ,
संकटा ८ वर्षकी नेष्ट जानना ॥ ४४ ॥
-
८
योगिनीदशा.
मं. | पिं. (घा..| भ्रा. भ. | उ.सि. | सं.
चं.र.गु. म. वु. श. शु. रा.
२
आ.पु.पु.
अ. भ. कृ. रोम.
चि. स्वा. वि. नु. म. पू. उ. ह.
घ. श. पू.भा. ज्ये. मू. पू.षा. उ.षा
उ.भा.रे.
ar
शुक्लेगेऽस्य होरायां दिवा विंशोत्तरी दशा।
कृष्णे चन्द्रस्य होरायां रात्रावष्टोत्तरी मता ॥ ४५ ॥

(७०) पत्रीमार्गप्रदीपिका। अन्यथा योगिनी कायां सदा कार्या महादशा। अब दशाके योग कहते हैं-शुक्लपक्षका जन्म हो और लग्नमें सूर्यकी होरा दिनमें जन्म हो तो विंशोचरी दशा करना. एवं कृष्णपक्षमें जन्म और लग्नमें चंद्रकी होरा हो रात्रिसमयमें जन्म हुआ हो तो अष्टोत्तरी दशा करना ॥ ४५ ॥ इन दोनों योगोंका संभव नहीं हो तो योगिनी दशा करना और महादशा सदा ( सर्वदा ) करना । अथ दशाभुक्तभोग्यानयनमाह । चन्द्रस्य लिप्ताः खानेभै ८०० लब्धाः स्युर्गततारकाः॥ ४६॥ शेषा हताः स्वपाकाब्दैर्हारेणाप्ताः समादिकाः। गता दशा सा पाकाब्दे अनिता भोग्यसंज्ञिता ॥१७॥ अब दशाके भुक्त भोग्य लानेकी रीति कहते हैं-चंद्रमाकी कला करना आठसौका ८०० भाग देना, जो लब्ध आवे वह गतनक्षत्र जानना, शेष रहे कला उसको अपनी दशाके वर्षसे ( विंशोत्तरीके भुक्तभोग्य करना हो तो श्लोक ४२ के अनुसार कत्तिकाको आदि ले गिननेसे जन्मनक्षत्र जिस ग्रहकी दशामें आया हो उस दशामें जन्म हुआ ऐसा जानना, जिस ग्रहकी दशामें जन्म हुआ उसके दशाके वर्ष जितने हो उतने वर्षसे और योगिनीके भुक्त भोग्य करना हो तो श्लोक ४४ के अनुसार जिस दशामें जन्म हुआ हो उसके वर्षसे, अष्टोत्तरी करना हो तो श्लोक ४३ के अनुसार जिस ग्रहकी दशामें जन्म हो उसकी जितने वर्षकी दशा हो उतने वर्षसे ) गुणी करना. हार ८०० का भाग देना, जोलब्ध आवे वह वर्ष जानना शेष बचे उनको१२वारह गुणे करना और८०० आठसौका भाग देना लब्ध मासआवे शेषको३० वीस गुणे करना ८०० आठ- सौका भाग देना लब्ध दिन आवे.शेष बचे उनको६० साठ गुणे करना फिर८०० आठसौका भाग देनाजो लब्ध आवे वह घटी जाननाशेष बचे उसको फिर६०साठ गुणा करना८००का भाग देना लब्ध आवे वह दल जानना। ऐसे आवे जो वर्षा- दिक वह गतदशा ( भुक्तदशा) हो उस भुक्तदशाको दशाके वर्षसे हीन करना (सोधना) शेष बचे वह भोग्य दशा समझना ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ १-विंशोत्तरी और योगिनीसे कुछ भिन्न रीति है इस कारण अष्टोत्तरीके भुक्तभोग्य लानेकी रीति अलग आगे लिखी है।

भाषाटीकासहिता। (७१) विशोत्तरी दशाका उदाहरण । स्पष्ट चन्द्रमा ५॥ २९ ॥ १९॥ ४९ इसकी कला १०७५९ । ४९ इसके ८०० आठसौका भाग दिया लब्धः१३ आये यह गतनक्षत्रहस्त हुआ शेषकला ३५ । १९वची इसको श्लोक ४२ के अनुसार कत्तिकाको आदि ले गिननेसे जन्मनक्षत्र चित्रा भौमकी दशामें आया इसलिये भौमके दशाके वर्ष ७ सातसे गुणे किये २५१८ । ४३ हुए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध ३ वर्ष आये, शेष ११८१४३ बचे इनको १२ वारह गुणे किये १४२४। ३६ हुए, इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध एक मास आया शेष ६२४॥३६ को ३० वीसगुणे किये १८७३८ । ० हुए८०० आठसौका भाग दिया लब्ध२३ दिन आय शेप ३३८ । ० बचे इनको ६० साठगुणे किये २०२८० । । हुए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २५ घटी आयी शेष २८०० को ६० साठगुणे किये १६८००१ ० हुए, फिर इनमें८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २३ पल आयी शेष० शून्य बची। इसप्रकार वर्षादि३।१।२३।२५।२१ भौमकी भुक्त दशा आयी,इसको दशाके वर्ष ७ मेंसे घटायी शेष३।१०।६।३४॥ ३९ बची यह भौमकी भोग्य दशा हुई । विंशोत्तरीदशायन्त्रम. कु. १७ - ३ ror पयोग- ६ तवर्षादि भो भु.भी मो. रा. गु. १८ १६ २१ १० १० १० १० ६ ६ २५ ३४ ३४ ३४ २१ ३९ ३९ १९२८/१९३२/१९५० १९६६ १९८५ १७९३ १७२७१८१५/१८३१/१८५० ८ ८ ८ १६ । २३ २३ २३ २३ २८ २८ २८ ३९ १८ १८ १८ १८ संवत् उत्तीर्णाक.

१ (७२) पत्रीमार्गप्रदीपिका । योगिनी दशाका उदाहरण। जन्म नक्षत्रकी संख्या १४ में तीन मिलाये १७ हुए आठका भाग दिया शेष १ चा इसलिये १ पहली मंगला दशा वर्षकी में जन्म हुआ, इसके वर्ष १ एकसे चंद्रमाकी कला १०७५९ । ४९ के आठमौका भाग देनेसे शेष बचे ३५९ । ४९ इनको गुणे किये ३५९ । ४९ हुए, इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध • शून्य वर्ष आया, शेष ३५९ । ४९ को क्रमसे १२ । ३० ६० । ६०गुणे करके ८००का भाग देके विंशोत्तरीवत् मासादिक लाये यह योगिनी मंगलाकी मुक्त दशा हुई ० ॥५॥ ११ ॥ ५५ । ३ इसको मंगलाके वर्ष १ मेसे हीन किया शेष ०।६।१८।४। ५७ यह भोग्य दशा हुई। योगिनीदशाचक्रम. धा. मं.भु. । .भो. पि. चं. चं. मं. सि.सं. शु. रा. ८ १ २ 9 Fulswar Filmrur- ३ ६ ९ ३५ ६ w ur २७ ६ १८ १८ ६ १८ ११ १० १८ १८ १८ धयो. गत- वर्षा. ५ ~~Smr Mk ५८ कार्क. श्रे. ने. | फलम् १९२८/१९२९/१९३१ १९३४ १९३८/१९४३ १९४९ /१९५६ १९६४ संवत् १७९३ १७९४,१७९६ १७९९/१८०३ १८०८/१८१४/१८२१ १८२९ शक. १० ५ ५ ५ ४ उत्ती- ५८ ५८ ३६ ३६ ३६ ३६ VA श्रे. ने. श्रे. ने. श्रे. ने. अष्टोत्तरीदशा बनानकी रीति कहते हैं- प्रथम चंद्रमाकी कला करना उसमें८००आठसौका भाग देना, जो लब्ध आवे वह गत नक्षत्र जानना, शेष कला बचे उसको श्लो० ४३ के अनुसार जिम ग्रहकी दशामें जन्म हुआ हो उस ग्रहके दशाके वर्षों से गुणन करके आठ- सौ ८०० का भाग देके विंशोत्तरी दशावत् वदभुक्त दशा लाना । तदनंतर उस भुक्त दशामें जितने नक्षत्रकी दशा हो उतनेका (चार नक्षत्रकी हो तो ४ चारका दीन ३ की हो तो ३ तीनका ) भाग देके वर्षादिक ५ फल लाना. " .

भाषाटीकासहिता। (७३) जो आवे वह एक नक्षत्रकी भुक्तदशा समझना फिर जितने नक्षत्रकी दशा हो उसमेंसे जितनी संख्याके नक्षत्र गत हो उतनी संख्यासे (१एकगत हो तो १ से दोहो वोर दोसे होतो३तीनसे) जितंन वर्षकी दशा हो उन वर्षोंको गुणे करना और उसमें चार नक्षत्रकी दशा हो तो ४ का, तीनकी हो ३ तीनका भाग देना जो आवे वह वर्ष मास ऊपर आयी हुई एक नक्षत्रको भुक्तदशाके वर्षमासमें मिलाना सो सष्ट मुक्त दशा होवे उस भुक्तदशाको दशाके वर्षमैसे हीन करना भोग्य दशा हावे परंतु चन्द्रमाकी कला १५२०० पंदरा हजार दोसौसे आधिक हो तो चंद्रमाको कलामेंसे १५२००पदरा हजार दोसो घटादेना शेष कला बचे । शनिदशानक्षत्रध्रुवखटाचक्र | उसमेंसे क्रमसे नीचे लिखे हुए कोष्ठकमें जो नक्षत्रों के पाड.या. भ. श्रवन, धुवके खंड हैं वे शोधना ( हीन करना) जितने खंड ८०० ६०० (३५३७५६ धुवच निकले उतने निकालना, जो खंड नहीं निकले वह अशुद्ध खण्ड समझना शेषवचे कला उसको ३० ती. मा.मा. मा.मा. मा. सगुणी करना और अशुद्ध खण्डका भाग देके मास दिन घड़ी पलात्मक चारफल लाना । यदि मास १२ बारासे अधिक हो तो मासमें १२वाराका भाग देना लब्ध आवे वह वर्ष शेष मासादि समझना।ऐसे आये हुए वर्षादिकम जितनी संख्याके खण्ड निकले हो उतनी ही प्रत्येक संख्याकरवर्ष ६ मास मिलाना(अर्थात एक खण्ड निकला हो वोरवर्षमास,दो खण्ड निकला हो वो ५ वर्ष,तीन खण्ड निकले हो तोवर्ष६मास.)आवे वह शनिकी भुक्तदशा सम- झना, उसको अपने दशाके वर्ष १० मेंसे घटानेसे भोग्यदशा होवेगी, यह रीति केवल चन्द्रमाकी कला१५२००पन्दरा हजार दोसौसे१७६००सतरा हजार छ: सौ पर्यंत हो वहांतक ही करना शेषमें नहीं करना, अष्टोत्तरीदशाके मुक्त भोग्य होंगे इति। १०दांका २. अष्टोत्तरीदशा-उदाहरण. स्पष्ट चंद्रमा ५॥ २९, १९ । ४९ इसकी कला १०७५९ ॥ ४९ हुई इसमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध १३ गव नक्षत्र आया शेष ३५९।४९ बचे इनको श्लोक ४३के अनुसार हस्तको आदि ले चार नक्षत्रकी भौमकी दशामें जन्म नक्षत्र चित्रा मिलता है इसलिये भौमकी दशाके वर्ष८आठसे गुणे किये२८१७८ .

d - है (७४) पत्रीमार्गप्रदीपिका। ३२ हुए। इनमें ८०० आठसौका भाग देके विंशोत्तरीदशावत् वर्षादि ३३७५ २५।२४ लाये इनमें भौमदशा ४ नक्षत्रकी है इसलिये चारका भाग दिया लब्ध वर्षादि०१०२३।११।२१आये यह एक नक्षत्रकी मुक्त दशा हुई, तदनंतर यह चार नक्षत्रकी दशा है इसमेंखे १ हस्त नक्षत्र गत है इसकारण १ एकसे दशाके वर्ष ८ को गुणे किये ८ हुए इनमें चारका भाग दिया लब्ध २ वर्ष आये ये एक नक्षत्रकी ऊपरकी आयी हुई भुक्तदशा०।१०२३३५१॥२१॥के वर्ष में युक्त किया सो वर्षादिक २।१०।२३।५१।२१ मौमको स्पष्ट भुक्त दशा हुई । इसको भौमके दशाके वर्ष ८ मेंसे घटाये शेष ५।११६।८।३९ भोग्यदशा हुई। शनिकी दशाका कल्पित उदाहरण, शनिकी अष्टोत्तरीदशासाधन आभजिन्नक्षत्र होने के कारण भिन्नरीविसे किया जाता है उसके बनानेकी युक्ति प्रथम कही ही है परंतु बालकोंके सुबोधार्थ उसका एक कल्पित उदाहरण कहते हैं. स्पष्टचन्द्र ९।१६।४० ० इसकी कला- १७२०० सवरह हजार दो सौ है यह कला पन्दरा हजार दोसौ १५२००० से अधिक है इसकारण चंद्रकी कला १७२०० से १५२००।०पन्दराहजार दोसौ घटा दियेशेष२०००।० कला बची इसमेंसे पूर्वाषाढाकेध्रुवके खंडके अंक८००० आठसौ घटाये शेष१२००००बचे इसमेंसे फेर उत्तराषाढाके खंडके अंक६०० छसौ घंटाये शेष ६०००बचे इसमेंसे फेर अभिजितके खंडक अंक२५३३२० घटाये३४६ । ४० शेष बचे इसमेंसे ४ चतुर्थ खंड श्रवणके अंक७४६ । ४० नहीं निकलते हैं, इसलिये ये अशुद्धखंड हुआ शेष कला३४६।४०को३०वीस गुणा करनेसे १०४००० हुए इनमें अशुद्ध खंड ७४६।४० काभाग देके मा- सादि चार फल लाना है परंतु ये दोनूं भाज्य भाजक है कलादिक है इसलिये सवर्णित किये भाज्य ६२४००० भाजक ४४८०० सवर्णित हुए भाज्य ६२४००० में भाजक ४४८०० का भाग देके मास दिन घटी पलात्मक चार फलं लाये १३ । २७ । ५१ । २५ आये-मास १३ बारासे आधिक हैं इत्तकारण १३ में, वारांका भाग दिया लब्ध १ वर्ष शेष १ मास हुआ। ऐसे वर्षादिक १११॥ २७ ॥ ५१ ॥ २५ आये इनमें पूर्वापाढा उत्तराषाढा - भाषाटीकासहिता। (७५), और अभिजित् इन तीन नक्षत्रोंके ध्रुवखंड कलामेंसे सुधे हैं इसलिये ७ सातवर्ष ६छ:मास मिलाये सो वर्षादि ८।७।२७१५१।२५। शनिको भुक्तदशा.आयी इसको दशाके वर्ष १० मेंसे हीन की शेष १।४।२।८।३५वर्षादि भोग्य दशा हुई ॥ इति अष्टोत्तरीदशोदाहरणम् ॥ 44 अष्टोत्तरीदशाचक्रम. . - १ वयोगw wr मं.भु.म.मो.। . गु. रा. ८ ८ १२ २ २२ ३२ ५१ ६३ १० ६ ६ ८ ८ ८ ८ ८ २१ ३९ ३९ ३९ ३९ १९२८/१९३३१९५० १९६०/१९७९/१९९१ २७२३/१७२८१८१५/१८२५/१८४४/१८५६ १० १६ ११ ११ ११ २३ २ २ २ २ १८ १८ १८ १८ w ~ur Nor तपादि संवत् शक. २३ २३ उत्तीर्णाक २ अथान्तर्दशासाधनमाह। दशा दशाहता कार्या स्वस्वमानेन भाजिता । लब्धमन्तर्दशा ज्ञेया वर्षायाः क्रमशो वुधैः ॥४८॥ अब अंतर्दशा बनानेकी युक्ति कहते हैं-दशाके वर्षको दशाके वर्षसे गुणन करना और अपनी अपनी दशाके मानका भाग देना लब्ध वर्षमासादिक आवे वह क्रमसे अपनी अपनी दशामें पंडित लोगोंने अंतर्दशा जानना, अर्थात् विंशोत्तरी महादशामें जिस ग्रहमें अंतर्दशाचक्र बनाना हो उस ग्रहके दशाके वर्पको विंशोत्तरीके ९ नव ही ग्रहोंके दशाके. वर्षसे क्रमसे गुणन करना और विंशोत्तरी महादशाके मानका ( १२० एकसौ वीसका) भाग देना । एवं अष्टोत्तरीमें जिस ग्रहमें अन्तर्दशाचंक बनाना हो उस ग्रहके दशाके वर्षको अष्टोत्तरीके आठ ही ग्रहोंके दशाके वर्षसे क्रमसे गुणन करना और अष्टोत्तरीके मानका ( १०८ एकसौ आठका ) भाग ६ 0101 वर्षादिक सूर्यमें गुरुको तथा शनिके वर्ष १९.से दशाके वर्ष ६ को गुण- (७६) पत्रीमार्गप्रदीपिका देना । ऐसे ही योगिनी दशामें जिस दशामें अंतर्दशाचक्र बनाना हो उस दशाके वर्षको योगिनीके आठ ही दशाके वर्षके क्रमसे गुणन करना और योगिनी दशाके मानका (३६ छत्तीसका) भाग देना । ऐसे जिस दशा में अंतर्दशा करना हो उसका जो मान हो उसीका भाग देके क्रमसे वर्ष मासादि लाना जो आवे वह अपनी अपनी दशामें अपनी अपनी अंतर्दशा जानना ॥४८॥ उदाहरण। जैसे विंशोचरी सूर्यमहादशामें अंतर्दशाचक्र बनाना है सूर्यमहादशाके वर्षद है इस महादशाके वर्ष ६ को सूर्य दशाके वर्ष ६ से गुणन किये ३६ हुए, इनमें विंशोचरी दशाके मान १२० का भाग दिया लब्ध ० वर्ष शेष ३६ को १२ बारागुणे किये ४३२ हुए १२० का भाग दिया लब्ध ३ मास आये शेष ७२ बचे इनको ३० तीस गुणे किये २१६० हुए, इनमें फिर १२० का भागादिया लब्ध १८ दिन आये शेष बची इसको ६० गुणा करके १२० का भाग दिया लब्ध 10 घटी पल आये, ऐसे वर्षादिक ०१३ । १८1०1० सूर्य महा- दशामें सूर्यकी अंतर्दशा आयी। फिर सूर्य दशाके वर्ष ६ को चंद्रमहादशाके वर्ष- १० से गुणे किये ६० हुए इनमें १२० एकसौ बीसका भाग देके वर्षादिक क्रमसे लाये ।६।।।ये सर्य महादशा में चंद्रकी अंतर्दशा आयो-एवं दशाके वर्ष ६ को भौमदशाके वर्ष ७.सातसे गुणे किये०२ हुए १२० एकसौ बीसका भाग देके वर्षादिक लाये। ४।६।। • सूर्यमें भौमकी अंत- दंशा आयी । ऐसे ही फिर सूर्य महादशाके वर्ष ६ को राहुदशाके वर्ष १८ अठरासे गुणन करनेसे १२८ आये इनमें दशाके मान १२० का भाग दिया. लब्ध १०। २४ । । । । सूर्य महादशामें राहुको अंतर्दशा में आयो । इसीप्रकार दशाके वर्ष ६ को गुरुदशाके वर्ष १६ से गुणके १२०का भाग देनेसे०९।०८। न करके दशाके मान १२० का भाग देनेसे वर्षादिः । ११ । १२ शनिकी अंतर्दशा तथा बुधके वर्ष १७ से दशाके वर्षे ६ को गुणन करके १२ का भाग देनसे। ३०।६। । ० सूर्यमें बुधको अंतर्दशा तथा दशाके वर ६ को केतुकी दशाक वर्ष ७ से गुणके १२० का भाग देनेसें.० ॥४।६।। 1 • केतुकी ऐसे ही दशाके वर्षको शुक्र महादशाके वर्ष२०. से गुणन करके भाषाटीकासहिवा। (७७.) दशाके मान १२० का भाग देनेसे १ । ०। । । । वर्षीदिक सूर्यमहा- दशामें शुक्रकी अंतर्दशा आयी । इसीप्रकार विंशोत्तरीमें चंद्रादि शेष ग्रहोंकी तथा अष्टोत्तरीयोगिनी आदि दशामें अंतर्दशा जानना ॥ इति ॥ (अथ विंशोत्तरीमध्ये अंतर्दशावक्राणि:) सूर्यमध्येंतर्दशा. चंद्रमध्यतर्दशा. चं| मरागुशवाकेशुचं मरागुशबु के शुर। .१ १० |१०७६/४७ ६|२४|१८१२/६ र 0 १ ५] ७ ६ . . . . . ० ० . . . . . भीममध्यवर्दशा. राहमध्यवर्दशा चंरागुशबुकेशरचं में . . . १ मेरा रागुशबुकाश १ ०११ ११११/५ ३७/१८ ९/२७/२७ ०१० me ६ ०॥३४॥२४१.६/१८.१८ ०१८ . . . . . . . । . गुरुमध्येतर्दशा. शनिमध्यतर्दशा. गुशबु के शुर के शुर में राशके शुरमरागु ३ .१ १६३/११] ८.९४१२११ १०.३६११ १८.१२ १८ २४॥३. ९९. '0'|१३: २ . '६ . . . सुधमध्यतर्दशा केतुमध्येसर्दशा. तुकारचं मारा गुशक शुच में राशा २ .२ २.३२ १ ३.८ ३ २७/:: ०६ ९२७ ६/०/२७/१८/६/ ९/२७ . '.. शुक्रमध्येन्तर्दशा. ७ . , ३ नाम ३३.३३१ ८] २०१०३ " (७८) पत्रीमार्गप्रदीपिका। ( अष्टोत्तरीमहादशामध्येतर्दशाचक्राणि) सूर्यमध्यंतर्दशा. चंद्रमध्येतर्दशा. कुश गुराशु र रचं में वुश . ८ २ ७ १०.१०२०/२० २ ८।११। १० मा. दि. १०१०/२०२० ० . 0 0 . . . . ९ . भौममध्यतर्दशा. मं बुश गुरा चं १ ३।८।४।१०।६ ५ १ ३ ३२६/२६/२०/२०१००१० २०/२०४०४० बुधमध्यतर्दशा. बुश गुराशु राशुर में २ १ व. १ . १ ० ३ ७ ३/२६/२६ २०५०१० २०/२०/१०/१०/३ दि. ०२० घ. . ० ० ० . शनिमध्येतर्दशा. गुरुमध्यंतर्दशा. शागु राशु रचं | में गुराशु मंश ३ १२॥ ९ १ ११ ६४ १ ४।११। ९ मा. ३ १०/१०/२० २०२६/२६/३/१०/१०२०/२०/२६/२६ ३ दि. २०२० ४०४०१२० ४०४०२० घ. १ ८ ७ 0 . . . . . ० . ० ० . . . . राहुमध्येतर्दशा. शुक्रमध्येतर्दशा. च। मंबुश गुशुर में बुश गुरा १ २ २ व. ४ ८ ८१० १० ११ १ ३११८ ४ मा. २०२०/१०/१० ०२०२०/१०/१० ० दि. घ. प. योगिनी महादशामध्येतर्दशाचाणि, मंगलामध्येतदशा. पिंगलामध्येतर्दशा. उसिसापिंधाना भाउ लि।संमि ३ २ १०१२० १०२० १०/२०१० ०२०१० २०१०/२० दि. ० घ. . . ० . म पिधा भ्राम . . . ० ० . . . . . . ० . . . धान्यामयदशा. भ्रामरीमध्ये शा. धाभ्रा भ] उलि।सं। मं । पि भाभ उ सि|समं पिधा ८ २ ८ ९ १० १२ ४ मा. १०३० १०.२०/१०/२० दि. ० घ. ३ १ . . . . ० ० . . . . . .. . . . . .

भाषाटीकासहिता । (७९) भद्रिकामध्येंतर्दशा. उल्कामध्येतर्दशा. भ... सि.सं. म.पि.धा.प्रा.उ. जि.सं. म. पि.धा.प्रा.भ. ८/१०/११/१३ | १ | ३ ! ५/६/१२/१४/१६/३/४ ६८१० मा. १०/०२०/१०/२०/१०/०३०० . दि. . . . . . . . . . . प. सिद्धामध्येतर्दशा. * संकटामध्येतर्दशा. सि.म.पि.धा./भ्रा. भ. उ.सं.म.पि.धा.धा. भ. उ. सि. १६/१८२४ ९१११४२१०२५८१०/१३ १६/१८/मा. १०२०/१०/२० ०१०/२००१ .|१०/२०/१० १०/० २०१०/०२० दि. ० घ. . अथांतर्दशामध्ये विदशानयनप्रकारमाह । अन्तर्दशाया दिवसाः स्वस्ववर्षेः क्रमाद्धताः। स्वमानान्दैहताः प्राप्ता विदशा दिवसादिकाः ॥ १९ ॥ अब विंशोचर्यादि दशाकी अंतर्दशामें दिदशा करनेका प्रकार कहते हैं। अंतर्दशाके दिनोंको अपने २ वर्षोंसे (विंशोचरीकी अंतर्दशाके दिनोंकी विंशो- चरीके सूर्यादि ग्रहोंके वर्षसे अष्टोत्तरीकी अंतर्दशाके दिनोंको अष्टोत्तरीके सूर्यादिग्रहोंके वर्षसे योगिनीकी अंतर्दशाके दिनोंको योगिनीकी मंगलादिदशाके वाँसे) क्रमसे गुणन करना और अपने अपने दशामानके वर्षोंका(विंशोत्तरीकी अंतर्दशामें विदशासाधनमें विंशोत्तरीके मानके १२० एकसौ बीसका, एवं अष्टो- तरी १०८का योगिनीमें ३६ का) भाग देना, जो लब्ध आबे वह दिवसादिक (दिनादिक) विदशा जानना ॥ ४९ ॥ -

(८०)
पत्रीमार्गप्रदीपिका ।
उदाहरण।
से
जैसे विंशोत्तरी सूर्य महादशामें सूर्यकी अंतर्दशा मास ३ दिन १८ की है
इसमें विदशा करना है इसलिये इसके दिन किये १०८ हुए इनको विंशोत्तरी
दशाके सूर्य के वर्ष ६ से गुणन किये ६४८ हुए इनमें विंशोत्तरी दशाके मानके
वर्ष १२० एकसौ बीसका भाग दिया लब्ध५ दिन आये शेष ४८ बचे इनको
६० साठगुणे किये २८८० हुप इनमें १२० एकसौ बीसका भागं दिया
लब्ध २४ घटी आयी शेष बची ६० साठ गुणा करके १२० का भाग देनेसे
१ पल आयी यह सूर्यको अन्तर्दशामें ५ दिन २४ घटीकी सूर्यकी विदशा हुई।
ऐसे ही सूर्यकी अंतर्दशाके दिन १०८ को चंद्रादिकके वासे क्रमसे गुणन करके
१२० दशामानका भाग देनेसे दिनादिक सूर्यकी अन्तर्दशामें विदशा हुई । इसी
प्रकार विंशोत्तरी दशाकी शेष चंद्रादि ग्रहोंकी अंतर्दशामें तथा अशेचरी योगि-
नौकी अंतर्दशामें विदशा दिनादिक जानना ।।
सूर्यमध्येसूर्यातरतन्मध्येविदशा सूर्यमध्येचंद्रातरतन्मध्येविदशा.
र.सं. म.रा.गु.श. बु.के. शु. म.र.गु.श.पु. के.शु.र
५९
१८/१५/१०/२७/२४.२८/२५/१००/९ दि.
०/१८/१२/२४६११८१८/० ०1३०
३०/३०३०००.
0

भाषाटीकासहिता। (८१) awan. १ १ १ ছুখনই ঐ এ শুষ্ট হয় खूपमन्ये राइंतरं तन्मध्ये विदशा. र रागु|| T| केशर में। ०००११ मा. ७.६/१७७/११/१०/१०/१३/२१ / १५/१८/२४/१६/२७/२८/दि १८/३०३६/१२/१८/५४/५४/०१२/०५४/घ. I বাদ যুব মিয়া, सूर्यमध्ये शन्यंतरं चन्मध्ये विदशा. ए. स के शु! मेरा शपु के शुर में राजु १ १ । १ ३ ०११मा. ८ १५/१०/३६/२८१४/२४/१६१४३४१८/१९/२७/१७/२८/१९/२१/१५/दि. २५३६/१८४८ ०२४/०४८ ४८/१३॥ ९/२७/५७ ६।३०५७/१८३६च. ५. --- ३ १ १ १ . १ . ० सूर्यमध्ये जुधातरं तन्मध्ये विदशा. सूर्यमध्ये केत्वंतरं तन्मध्ये विदशा, सगुश केश रचं|रागुशबु १. ११ १३ १७/११/१५/२५/१७/१५/१०/२८७/२१/६ १७.१५/१०/२८४७/२१/६/२०१७/१८१६/१९/१७ /दि २१/५१/०१८/३०/५११५४४८.२७२१ ०/१८/३०/२१/५४४८५७/५/4. 010/प. सूर्यमध्ये भृग्वंतरं तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये चंद्रांतरं तन्मध्ये विदशा. 5 मंरा गुशबु के चं में | रा गु श || के शु/र २ ०/१०मा ०५१८०३१/११/१८/२७/२१/२१/२५/१७ २१ २२ २५/१७/१५/१०/१७ / १२ / १७/२० /दि .३० ३०/३०/३०००घ. भृग्वंवरं . १ १ ३ 0 मंग . १ . . इसय भीमावरं तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये रातरं वन्मध्ये विदशा. शुका के र चरा गुश | दु. के | शुचाम १ १/१/मा. १२ १२८३२९/१२/५/१०/१७४२१ १३/५/१०/१७१२१/१२/३५/१६/ १ २७/१५/१ दि. .१५१५/१५ १५/१५/०/३०३०. ०३० ३०/३०३० ०/३० घ. .प. चंद्रमध्ये पुर्वतरं तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विदशा. के। शुर। में राश चं| मंग २ ३ १ ११/२/२ मा. ८/२८/२०/२४१०/२८/१२४० २०३ [५/२८/१७३ ५/२८/१७/३५/१६/दि. ३०/३०/१५/३०/०/घ. 10.पि. केशर , . . .

(८२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। चंद्रमध्ये वुधांतरं तन्मध्ये विदशा। चंद्रमध्ये केत्तरं नमध्ये विदशा। . १ १ दु के शुर| चं| मैं रा गु शके शुर चं मं; राग २ २ १ ३ ११. मा. १२/२९/२५/२५/१२/२२/१६८२० १२५/१०/१७/१२] १२८ १७/१२/१/२८/९/दि. १५/४५ ०४५१५ ०३०३०/१५/३० ० १५४५घ. . . . . - . वंद्रमध्ये शुक्रांतरं तन्मध्ये विदशा. चंद्रमध्ये सूर्यावरं तन्मध्ये विदशा. श में रा|गुश र || मरा| गुश छु के शु १ ०१/मा. १० ०२० २०५/२५/ ५/९/१५/१०/२७/२४/२८/२५/१०० दि. ३०/३०/३०० घ. ००.प. भौममध्ये भौमांतरं तन्मध्ये विदशा।। भीममध्ये राइंतरं तन्मध्ये विदशा । में रा|गुश छु । के | शु। र चं रा| गुशबु के शुरचं १ २ १/०मा. ८२२|१९|२३|२० २३/२०८२४७ ८/२४/७/१२/२६२०/२९/२३/२२ १८ १ २३दि. ३४/३३६/१६/११/३४/१०/११/१५/१२/२४/५१/३३३ .५४२०/३घ. २४॥ ३० ३०/३०/३० .प. भीममध्ये गुर्वतरं वन्मध्ये विदशा। भीममध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विदशा। गु|शशु के शुर| मराश बुके || र १।२१ २ १४२३|१७|१९/२६/१५/२८/१९/२०३/२६/१३/६/१९/३/३३/१२२३/दि. ४८.१२ ४८३६/२४/१०/३१/१६/३०/५५७/६५ १६.५१२/घ. ३०/३०/३०/० ३०/0/0 प. भौममध्ये दुधातरं तन्मध्ये विदशा। भीममध्ये केत्वंदर बनमध्ये विदशा दु के शुरचं मं] रा गुश के शुर १ १ मा. २०/२०/२९/१७] १९/२०/२३/१७२६८२४/७१२/८/२१/१९/२३/२० दि. ३४ ||३०/५१/४५/४९३३/३६/३१ ३४३०१११५/३४३३६१६४९/घ. ३०० ०३०३० ०/३० ०।०३०३०|प. भीममध्ये शुक्रांतर तन्मध्ये विदशा।- भीममध्ये सांतर तन्मध्य विदशा। शाब में राशुशबु के वु| कारचं मंरा शुश दुकेश २ १ ३ मा. १०/११/५/२४३ २६६२९/३४६१०७ १८ १६/१९१७/७२१ दि. ३० ३०/३० ३०१८/२०२११५१/१८५७/५१२११० घ. ०/०५. रा १ ० १ १ 064 १ , १ . 4.

भाषाटीकासहिता। (८३) V - १ भीममध्ये चंद्रातरं वन्मध्ये विदशा। राहमध्ये राईवरं तन्मध्ये विदशा। नाशके शुगर सुश। | के|| रची में। १ १ १७/१२१२८/३/२९/१२] ५१०२५/९३ | १७/३६/१२/१८२१२६ दि. ३०/१५/३००/१५/४५/१५/ ०/३०४८/३६/५४४२४२ 01.प. गामध्ये गुर्वतरं यन्मध्ये विदशा। राहुमध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विदशा! श्रा चं||राश के के शुर | रायु १ ४ ४ ५ १ ५ ३१५४ ला. २५/१६२२०/२४ २०/२४/१३/१२/२०१९ ११२ /२५/३९/२१/०१/२५,२९/३/१६/दि. १२ १८.२४/२४/० १२ १८:०५१/५/४८ घ. २४६२२७/२१ ५१ 01.पि. १ ३ ० ७ ००० रामध्ये बुधोतरं तन्मध्ये विदशा । राहुमध्ये केत्वंसरं मध्ये विदशा। दु के ए चं | मंगु शके केर । म सगुनातु ४ १२ । १४ २ १ १/१/१/मा. १०/२३] ३ |१५/१६/२३/१७/२/२५/२२ १८/१२२ २६/२० २९२३ दि. ०/५५/३०/३३/१२/२४/२११३ ०५४/३०३ ४२२४५१३३/घ, 0/0/0/0/प. गहुमध्ये शुक्रांदरं वनाप्ये विदक्षा. रामध्ये सूर्यावरं वन्मध्ये विदशा. चं| मैं | सT|||2 में | रा गु||Y के शु ११/०१/मा. १ २४० ३२२ २४/२१/३/२/११/२०१८/१८/१३ ३१/१५/१८/३४ दि. ०५/०५/३६/१२/१८/५४५४/० घ. s ५ राहमध्ये मातरं सन्मध्ये विदया. रामध्ये भौमांतरं तन्मध्ये विदशा. पं में | ग युग के | | | केशुर २०१शमा. १ १ २ १५/१/२१/१२/२५/१६/ १ २७/२५/२६/२०/२९/२३/२२/३ २८/१ दि. ०५४३० घ. ३० ३ प. ६. गुरुमध्ये गुर्वतरं तम्मध्ये विदशा.. गुरुमध्ये शन्यंतरं तन्मध्ये विशा. गु | शबू के | शु | रच में राश| तु | केशर में ३ २ १२ १/१८/१४/८. ८ ४१४/२५/३४ ९/२३/३/१५/१६/२३/१/१ दि. २४३६/१८/४८/०२४ ४८/१२/२४/१२/१२/०३६/० ३६/०१२ १२८/घ. १ ४ १ (८४) पत्रीमार्गप्रदीपिका ३ . १ . ० ०० . (१९/२१/१५.२४॥ १८१९२७) शुरुमध्ये सुधांतरं तन्मध्ये विदशा. | गुरुमध्ये त्विंतरं चन्मध्ये विदशा. दुश रा| गुग के शुर ४ १ २५ २७/१६/१०/८१७ १०/८/१७/२/१८/९ १९/२६/१६/२८/११/२०१६/२३२७. दि. ४८ ३६/२४/१८/१२/३६ . १८/०३६२४४८/१२/२६८ गुरुमध्ये भृग्दंतर सन्मध्ये विदशा. गुरुमध्ये रव्यंबरं तन्मध्ये विश्शा. अचं मरा गुश राश हुलाश २ ४ ४ १ १०/१८/२०/२६/२४८ २१६/२६/११/२१/१६/१३८ २४ ५८/१२/२१/३६५८४८/० गुरुमध्ये चंद्रांतर सन्मध्ये विदशा गुरुमध्ये भौमांतरं पन्मध्ये निमः रा गुश | | केशर मंरागु |शत्रुके।शुरचं १ २ १ १०/२८/१२/४१६/८/२८/२०/२४३१९/२०१४ २३/१७/१९/२६ १६२८ दि. ३६/२४१८/१२/३६/३६/०८/०५. गुरुमध्ये राहतर तन्मध्ये विदशा शनिमध्येशन्यंतरं तन्मध्ये दिशा के शुर/ शाकेश ३ १/५मा. ९ (२५ १६/४/२०२४१३ २०/३४|१३/१२/२०१३१/३/३ २४ ३ १२२६, दि. ३६.१३ १८/२४ २४ १२ / ० २४१८/२५/१०/३० ९.१५/१०/२७२४, ध, शनिमध्ये सुधांतरं तन्मध्ये विदशा शनिमध्ये केवत तन्मध्ये विदशा शुक शुर चमरा गु शकशु र में रागा २ १ १।२१ मा. १७/२६/११/१०/२०२६/२५/९३/२३ ६.१९/ ३ /२३ /२९/२३/३ २६ दि. १६/३१/३०/२७/४५/३१/२१/१२/२५/१६/३०/५७/१५/१६] ५१/१२/१०/३१ घ. ३० २०० ३० ०३०३० प. शनिमध्ये शुभांवरं तन्मध्ये विदशा. शनिमध्ये सूर्यावर्तन्मध्ये विदशा. चंरागुशाकार में राहुशबुकेश १ १३ १/०१/मा. ३०/३०/३०.६/३०/५७/१८/६/ ९२७५७० घ. प. ० ० १ १ १ ००२ O . . १ Raml . . . में १ १ ३० . o 0 भाषादीकासहिता। (८५) शनिमय शतरं मध्य विदशा. शनिमध्ये भौमांवरं सन्मध्ये विदशा. वं|मरा|गु | केशर मंरागुg रा|श के के शुरचं २ २०१मा. २० ५/२८६२३/३९/२३] ३ /२६/२३ ६ २९/३ दि. ३०/१५/३० १५/७५/१५/ ०/२०११६/५१ / १२ /१०/३१/१६/३०/५७१५/घ ३०/३०/३० 10. शनिमध्य रावरं तन्मध्ये विदशा. | शनिमध्ये गुर्वतरं तन्मध्दे विदशा. राकेश र गु| श) धुकं शरचं मंश १ ३ /१६/१२/२५/२९/२१/२१,२५,२९.१२४ / ९/२३/३/१५ १६ १३/१६ दि. ५४/१८/२७/२१५१ १८/३०/५११३६/२४/१२/१२/०३६ ० १२/८/घ. . । ० १ १ ३८.३० इधमध्ये बुधालरं तन्मध्ये विदशा। बुधमध्ये केत्वंतरं सन्मध्ये विदशा! कार में सराश शुरचं | मं | रा| गुम १ १३११मा. २/२०/२४/१३/१२/२०/१०/२५/१७१२०/३९/२७/२९/२०/२३, १७२६/२०/दि. ४९/४३०४२११५३४/३/३६/३६४९,३०(५१४५/४९/३३/३६३१/३/घ. ०३०३० प. पुधमध्ये शुक्रांतर सन्मध्ये विदशा. बुधमध्ये सूर्यावर वन्मध्ये विदश रसगु| शाके में राशु श | पु के शु २ १/०१/मा. २०३१२५/२९/३/११/११/२४/२९१५/२५, १७/१५/१०/२८/१३/१७२१ दि. .३०/३०/३०१८/३०/५१५४४८/२७/२१५१/०/५. ३ १ थुधारण्ये यहांदर रामध्ये विदा | शुमल सोमांतर तन्मध्ये विदशा। . १ १100मा. २ २ १२/३९/१६/८/२०/२४/२५:३५, २०/२३५७/२६२०/२०/२९/२७/०९/दि. ३०/११/२00५५०१०१६९३३६/३१/३४/४९ ३०/५१४५, ७०/३००1३०० प. ० খে ন কক্ষ বিষয়। राशुभ ट १ मा. १७/३/३५०१०/२३/३/१५/१६/२३ दि. 4 . Smiversikiyon .

पत्रीमार्गप्रदीपिका। दुधामध्ये सुर्ववरं धनाध्ये विदशा. बुधमय गन्यंतरतन्मध्ये विदशा. सुश | बुके शुर नं में राशके | शुर| चं| मंरागु - - १ १ IFE १८१९२५/१७/१६/१०/८.१७३३ १७/२६/११/१८/२०/२६/२५/९ दि. १८/१२/२६/३६. ४८०३६२५/२५/२६/३१/३०/२७४५/३१२२/१२/ घ. ०1०1३०/३० प ० . - 0 . कैलमध्ये पावंतस्तन्मध्ये विदशा. केतुमध्ये शुभांवतन्मध्ये विदशा. केशु मं| रा|गु शचु शुर मेरा गुशाके १ ३ १ ८२४/७/१२/८/१२/१९/२३ २०६१०/२१/५/२४/३/२६/६/२९२४ दि. ३४/३०२१११५/३८] ३३६/१६४९० ०/३०० ३०/३०/३० घ. ०३०० ०३०३०० केतुमध्ये रब्यंतरं तन्मध्ये विदशा. केतुमध्ये चंद्रातरंतन्मध्ये विदशा. रचमं राश रागुशबु | केशुचं मं रागुशबु के शुर १० मा. ६ १०७ १८ १६ १९.१७/७२१११७/१२] १/२८३/२९/१२/५/२० दि. १८/३०/११/५४|४८/५७ [५१/२१०/३०/१५/३० १५/४५१५ ०३० घ. १ 0 . . ० १ १ केतुमध्ये भौमांतरंतन्मध्ये विदशा. केतुमध्ये राहतरंतन्मध्ये विदशा. में रा| गुशके शुरचंरा गुश | बु | के शुर में १ | १ २ १.मा. ८/२३/१९/२३/३०/८/२४७ १२/२६/२०/२९ /२३/२२/३/१८/१ २२/दि. ३४ ३३६/१६४९/३४३०|२१ १५/४२/२४/५१/३३ ३ ५४३०३ घ. ३०/३०/३०/० कैतुमध्ये गुर्वतरतन्मध्ये विदशा. केतुमध्ये शन्यंतरंतन्मध्ये विदशा. चं मराश | के शुर चंपरागु १ ११० २ १११/मा. १४/२३] १७/११/२६/१६/२८/१९२० ३२६/२३/६/१९/३/२३२९/२३ दि. ४८ १३३६/३१/०२८ ०३६३४१०३१ १६३०५७/१५/१६/५/१२ घ. ०.३०/३०/३० ३००.०.प. केमध्ये सौम्यांवरतन्मध्ये विदशा. शुक्रमध्ये शुभांवतन्मध्ये विदशा. शुर| मैं रा गुश शुर गायुका १ १ २०/३०२९/१७/२९/२०/२३/१७/२६१० १०१० १०/१०/२०/१०/दि २४४९३०५१/४५/४९/३३३६३१ ० ३०/३० . १ . १ ० ट .. . . . . . .

भाषाटीकासहिता। (८७) शुरुमध्ये रष्यतरं वन्मध्ये विदशा। शुक्रमध्ये चंद्रांवरं चन्मध्ये विदशा। रचं में रागुशबु के ||चं मं] रा गुशबु | केशर २१३१मा. २८/०२१|२४|१८/२७/११/२१/ ० २०/५/२५५१० दि. घ. 010 .प. र ३ . . . . . . . . . . शुमानध्य भौनांतरं तन्मध्ये विदशा। शुमान राइंतरं तन्मध्ये विदशा। * भदु के शुरचरा | गु श दु| के शुरच २ २ ५५/२६/१/३/२/मा. २०३/२६/६/२९/२४/१०/२१/५/१०/२४/२१३/३ ०२४/०1३ दि. १० घ. १ . . . . . शुक्रमध्य गुर्वतरं तन्मध्ये विदशा। शुक्रमध्येशन्यंतरं तन्मध्ये विदशा। गु शके शुर में रा शबु के शुर चंराग १५/५:मा. २ १६२६/१०/१८/२०/२६/२४ ११/३१०२७/५ ६२११२ दि. ३०३०/३० घ. olo प. शुक्रामध्ये सौम्यांतरं तम विदशा। शुक्रमध्यं कृत्वा तन्मध्ये विद्या छ । कर भरा गु शके शुर। मेरा य श यु ४ ३ २ १।२/१/मा. २४/२९ २०/२१/२५/२९/३/१६/११/२४/२०/२१/५/२४/३/२६/६/२९/दि. ३० ३०३० ३०/३० घ. . . . इति विंशोत्तरीमध्ये सर्वेषां ग्रहाणामतर्दशामध्ये विदशा-एवमष्टोत्तयादीनामपिज्ञया। ऊर्ध्व स्थाप्यो जन्मशाकः शकाधो जन्मोत्पन्नः पचिनीप्राणनाथः तद्वर्षाद्यतर्दशाब्दादियुक्तं तस्मिञ्शाके स्पष्टसूर्यो दशांते ॥५०॥ अब भुक्त भोग्यदशा अंतर्दशा विदशामें जन्मका शक और स्पष्टसूर्य जोड़- नेकी रीवि कहते हैं:-ऊपर जन्मका शक-लिखना और शकके नीचे जन्मसम- यका स्पष्टसूर्य लिखना, उसमें वर्षादिक भोग्यदशा युक्त करनेसे भोग्यदशाके उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होता है। ऐसे ही. दशाके आरंभका शक और सूर्य (८८) पत्रीमार्गप्रदीपिका। अंतर्दशामें युक्त करनेसे अंतर्दशाके उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होता है और अन्तर्दशाके आरम्भका शक और सूर्य विदशामें युक्त करनेसे विदशाके उत्तीर्ण समयका शक और सूर्य होता है ॥ ५० ॥ उदाहरण। स्पष्ट है, विंशोचरी योगिनी अष्टोतरी दशाके चक्रमे शक और सूर्य युक्त किया है उन चक्रोंसे समझना। इति दशावर्दशाविदशानयनप्रकारः। अथागास्यन्दसाधनम् । सौरवर्षदिलायेन तेताव्दाः कतुल्यजः । जन्मोत्थयुगणेनाच्या इज्यावर्षमुखे गणः ॥५१॥ अब आगामि वर्प साधन कहते हैं:-दिनादिक सौरवर्ष ३६५।१५।३१।३० से गतवर्षों को गुणन करना और उसमें जन्मसमयका ब्रह्मतुल्यका सायद अहर्गण युक्त करना, गुरुवारका आदि ले वर्ष आरम्भसमयका सावरव(वर्षप्रवे- शकी इष्टवटी पल विपल सहित ) अहर्गण होगा । विश्वनाथः। गणोधनियुछ स्वाक्षिगोंगांशयुक्तनिषदभक्त आतावमैर्युक्त- ऊर्ध्वाखरामेहता सैकशेष तिथिः स्यात्फलं मासवृन्द ततोऽधो द्विनिनाद ॥५२॥ रसागान्वितस्वेभनेत्रांक ९२८ लब्धा विही- नादगाङ्गा ६७ प्तभागोन ऊर्वः ।। हतो भातुभिः १२. शेषक यातमासा गताब्दाः फलं सेषुखेशः ११०६ शकः स्यात् ।। ५३ ॥ अहर्गणको नीचे लिखके उसमें ३ तीन मिलाना और २ दो जगे लिखना, एक जगे स्थापन किये उसमें ६९२ छः सौ बानवेका भाग देना,लब्ध १ ब्रह्मतुल्यका महर्नण बनानेकी युक्ति आगे श्लोक ५४ में कही है। २ जन्मसमयकी इष्टवटी पल विपल सहित । ३ अहर्गणके सातका माग देना शेष बचे तो गुरुवार १ वचे तो शुक्रवार २ बचे तो शनिवार इसक्रमसे गुरुवारको आदिले शेष बचे उसपर्यंत गिननेसे वर्षप्रवेशका बार होता है।

भाषादीयसहिता। (८९) आवे वह दूसरी जगे लिखे हैं उसमें युक्त करना और उसके ६३ विरघठका भाग देना लब्ध आवे वह ऊनाह जानना । अनाहको ऊपर लिखे हुए अहर्गणने युक्त करना और ३० तीसका भाग देना शेष बचे उनमें १ एक मिलाना सो शुक्ल प्रतिपदाको आदि ले वर्षप्रवेशकी तिथि हो और लब्ध आवे बह आस- गण जानना-फिर मासगणको नीचे लिखना। और उसको दोरगुणा करना, फिर उसमें ६६ छासठ मिलाके दो जगे लिखना एक जगे ९२८ चौसो अहा- ईसका भाग देना लब्ध आवे वह दूसरी जगे लिखे हुएमेसे हीन करना शेष बचे उसके ६७ सवसठका भाग देना लब्ध आवे वह ऊपर लिखे हुए मासगणमेसे निकालना और उसमें १२ बारहका भाग देना शेष बचे वह चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको आदि ले गतमास जानना और लब्ध आवे वह गताब्द समूह जानना । उन गताब्द समूहमें ११०५ ग्यारहसौ पांच गिलानेसे वर्ष प्रवेशका शालिवाहन शक होता है ।। ५२ ॥ ५३ ॥ गणेशदैवज्ञः। विश्वंद्वग्न्यरुणैर्युक्तो १२३११३ ग्रहलाघवजो गणः। चक्रघ्नं नृपखान्ध्याब्ब ४०१६ ब्रह्मतुल्यो गणो भवेत् ॥ ५ ॥ इत्यागाम्यब्दभवेशः। अव ग्रहलाघवके अहर्गणपर ब्रह्मतुल्यका अहर्गणं साधन करनेकी युक्ति गणेशदैवज्ञ करते हैं:-ग्रहलाघवके अहर्गणमें १२३११३ मिलाके फिर उसमें चनसे ४०१६ को गुणन करके मिलाना सो ब्रह्मतुल्यका अहर्गण होगा॥५४॥ उदाहरण। ग्रहलाघवका अहर्गण ४०३९ में १२३११३ मिलाये १२७१५२ हुए, इनमें ४०१६ को चक्र ३१ से गुणन करनेसे १२४४९६ आये इन- को युक्त किये २५१६४८ हुए यह ब्रह्मतुल्यका अहर्गण हुआ । इसके नीचे जन्मसमयकी इष्टघटी ५६ पल ४८ विपल १८ लिखनेसे २५१६४८॥५६ १८१८सावयवब्रह्मतुल्यका अहर्पण हुआ।ऐसे प्रथम ब्रह्मतुल्यका अहमण साधन किया। अब आगामि वर्ष३१मा साधन करना है उसका उदाहरण यह है दिना- -- , (२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। दिक सौर वर्ष ३६५।१५।३१।३० प्ले गवाब्दसंख्या ३० को मुणन किये १०९५७ । ४.५४५।० हुए इनमें जन्मसमयका साक्यवं ब्रह्मतुल्यका अहर्गण २५१६४८१५६१४८१८ युक्त किया २६२६०६।४।३३।१७ ये वर्षा- रम्भसमयका सावयव अहर्गण हुआ। अहर्गण २६२६०६ में ७ सातका भाग हिया शेष १ एक बचा, गुरुवारको आदिले गिननेने शुक्रवार आया, इसलिये शुक्रवारके दिन इष्ट घटी ४२ पल ३३ विपल १८ से वर्ष ३१ इकतीसवां प्रवेश होगा परन्तु किस शकके कौनसे मासकी कौन तिथिमें प्रवेश होगा इसका निश्चय होनेके वास्ते आगे उदाहरण श्लोक ५२॥५३ का लिखते हैं- अहर्गण २६२६०६ को नीचे लिखा २६२६०६ इसमें ३ वीन मिलावे २६२६०९ हुए इनको दो जगे लिखें २६२६०९ इसमें ६९२ छःसौ ब्या- नवेका भाग दिया लब्ध ३७९ आये इनको दूसरी जगे लिखे हुए२६२६०९में युक्त किये २६२९८८ हुए इनमें ६३ तिरसठका भाग दिया लब्ध ४१.७४ ऊनाह आये । इनको अहर्गण२६२६०६में युक्त किये तो२६६७८० हुए इसमें ३० तीसका भाग दिया शेष २० बचे इनमें १ एक युक्त किया २१ हुए यह वर्षप्रवेशकी विथी हुई अर्थात् २१ इकईसमी तिथिके दिन वर्षप्रवेश होगा २१ इकईसषी तिथि शुक्ल प्रतिपदाको आदिछे गिननेसे कृष्णपक्षकी ६ पष्ठीको आती है इसलिये छष्णपक्षकी छठके दिन वर्षप्रवेश होगा । और ३० का भाग देनेसे लब्ध ८८९२ आये ये मासगण हुआ इस नीचे लिखा ८८९२को दो गुणा किया १७७८४ इसमें छाछठ मिलाये १७८५६ हुए इनको दो जगे लिखे १७८५० इसमें ९२८नौ सो अहाईवका भाम दिया लब्ध १९आये ये दूसरी जगे लिखे १७८५० मेंसे हील किये शेष १७८३१ बचे इनको ६७ सतसठका भाग दिया लब्ध २६६ आये इनको मासगण ८८९२ में से घटाये शेष ८६२६ बचे, इसमें १२ बारहका भाग दिया शेष १० बचे इसलिये चैन शुल १ प्रतिपदाको आदिले मिननेसे माघ शुक्ल प्रतिपदातक गत १० मास हुए और माघशुक्ल १ प्रतिपदाके आगे ११ माघमास वर्षप्रवेशका माझ हुआ और लब्ध बारहका भाग देनेसे आये ७१८ उनमें ११०५ युक्त किये १८२३ यह वर्षप्रवेशका शालिवाहनशक हुआ-अर्थात शक्क १८२३ में अमांत माघ ५ , भापोटीकासहिवा। (९१) छष्ण ६ षष्ठी शुक्रवारको श्रीस्योदयसे इष्टपरषादि ४२ । ३३ । १८ से ३१ इकतीसमा वर्षप्रवेश होगा. ऐसे ही अभीष्ट गताब्दके सर्व आगामिवर्ष साधन करना । इत्यागाम्यब्दप्रवेशः॥ , अथ लोमशोतं सतवर्गबलचक्रम्, स्व./ मित्र | मित्र शत्रु शत्रु १५ सम १० ५ ५ ३ २ ३० १ ३० ४५ १५ गृह. २ १ ४५ १ ३० ३ १५ ४२ ३० होरा. ३ ~ ~ . ३० ३ ट्रेप्का. ४५ २ ४२ २ १५ २ ३० १२ १५ खप्त. ॥ ॥ ३ १ १ २२ २ १५ ३४ H नपर. ॥ । १ ४२ ३० बाद. १ ४ त्रिंशा. ५४ ४५ २१ १ दशवर्गसंज्ञा. ८ २ ३ ९ १० पारिजात उत्तम | गोपुर सिंहासन पारावांश देवलोकांश देवलोकांश ऐरावत वैशिषीका , पारावाश चरकारकाः। आम अमात्य भातामा पिता पुष ज्ञादि श्री श्वर्व ग्रहोंमें अधिक अंदाका हो वह मान्प्रकायत उसले अल्पसंल्प संदले कम्वकारक जानना (९२) पत्रीमार्गप्रदीपिका। विद्यालये मालवसंहदेश रत्नावतीरष्यनिवासवासी। औदुंबरः पाठकवंशजातः सुपूज्यविद्यान्वितनंदरामः ॥ ५५ ॥ तत्पौत्रमन्त्रशास्त्रज्ञरेवाशंकरसूतुना ॥ महादेवेन रचिता पनीमार्गप्रदीपिका ॥ १६ ॥ मावस्य शुक्लपञ्चम्यां शाके माझछकौर्मिते ।। संपूर्णा भार्गवे वारे पनीमार्गप्रदीपिका ॥ १७ ॥ इति श्रीमहादेवकृतपत्रीमार्गप्रदीपिका संपूर्णा । विद्याका स्थान ऐसे मालवसंज्ञक देशमें अविरमणीय रत्नावती नगरी ( रतलाम शहर)में निवास करनेवाले औदुम्बर ज्ञातीय पाठकवंशमें उत्पन्न उत्तम विधायुक्त नन्दरामजी हुए ॥ ५५ ॥ उनके पौत्र मोतीरामजीके पुत्र मंत्र- शास्त्रके जाननेवाले रेवाशंकरजी हुए, उनके पुत्र महादेव ज्योतिर्विदने पनीमार्ग- प्रदीपिका नाम ग्रन्थ बनाया ।। ५६ ॥ वह पनीमार्गप्रदीपिका शालिवाहन शक १७९५ सतरासौ पंचानमें माघ शुक्ल पंचमी भृगुवारके दिन संपूर्ण हुई ॥५०॥ मार्गशीर्षसिते पक्षे द्वादश्यां गुरुवासरे ॥ वक्ष्यष्टभूमिते शाके कवेऽयं विवृविर्मया ॥१॥ इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकतपत्रीमार्गप्रदीपिकायां तदात्मज- श्रीनिवासज्योतिर्विद्विरचिता सोदाहरणभापाटीका समाप्तिमयमत् ॥ इति पत्रीमार्गप्रदीपिका समाता । १ "कटपयवर्गमवैरिहपिण्डात्यैरभैररकाः ॥ नत्रि च ज्ञवं शून्यं तथा स्वरे केवले कथितम् ॥ १ ॥" इस प्राचीन कारिकाके वचनानुत्तार म-के ५ शके ९ छ-के ७ क-के १ ऐसे मा इछ क के अंकोंका अकानां वामतो गतिः इस क्रमले १७९५ सतरालो पञ्चानवे होते हैं।

श्रीगणेशाय नमः। श्रीमन्महादेवदैवज्ञविरचितं वर्षदीपकमा भाषाटीकासहितम्। 5 नत्वा गुरुपदाम्भोजं हेरम्बं शिवशारदाम् ॥ . वर्षदीपकग्रन्थस्य नृभाषाविवृति लघुम् ॥ १॥ कुर्वे वै श्रीनिवासोऽहं बालानां सुखहेतवे । यत्रोनं ममाज्ञानादिनुधाश्च क्षमन्तु तत् ॥ २ ॥ भाषाकार विघ्नविनाशार्थ गुरु गणपतिको नमस्काररूप मंगलाचरण करके भाषारचनाके प्रयोजनपूर्वक क्षमापन मांगता है। श्रीगुरु (महादेवजी) के चरणकमलको, हेरम्ब (गजानन) को, शंकर और शारदा (सरस्वती) को नमस्कार करके मैं श्रीनिवासशर्मा वर्षदीपकथकी बालकोंको सुखसे बोध होनेके लिये लघु (छोटीसी) भाषाटीका करता हूँ, इसमें यदि मेरे अज्ञानसे जो कुछ क्षति रही हो उसे पंडितलोग वारंवार क्षमा करें यह प्रार्थना है॥१॥२॥ प्रथम शिष्टाचारपरिपालनार्थ और निर्विघ्नतासे ग्रन्थपरिसमाप्त्यर्थ ग्रन्थकर्ता स्वष्टदेवको नमस्काररूप मंगलाचरण करते हैं । श्रीगणेश गुरुं नत्वा शुद्धां श्रीभुवनेश्वरीम् ।। महादेवं महादेवः कुरुते वर्षदीपकम् ॥१॥ श्रीगणेशजीको, गुरुजीको, शुद्धस्फटिकसदृश निर्मलस्वरूपा श्रीभुवनेश्वरी- जीको और शंकरको नमस्कार करके महादेव ज्योतिर्विद वर्षदीपक (वर्षके गणितमार्गका प्रकाश करनेवाला दीपक ) नाम ग्रंथ करते हैं ॥ १ ॥ प्रतिवर्ष जन्मत्रहोदयात्पूर्व जानीयात् ॥२॥ • वर्षवर्षमें जन्मके इष्ट वार वह उगादि प्रथम जानना (हरवर्ष बनानेके समय जन्माक्षरमें लिखे हुए जन्मका बार इष्टवटी स्पष्टसूर्य लग्न आदि पहले जानके वर्षके गणितका आरम्भ करना) ॥२॥ .

१ (९४) वर्षदीपकम् । सौरवर्षारंभाच्छकप्रवृत्तिवेदितव्या ॥३॥ सौरवर्षके आरम्भसे ( मेषसंक्रांति जिस दिन प्रवेश हो उस दिनसे) शककी प्रवृत्ति जानना ॥ वात्पर्य यह है कि चैत्रशुद्ध प्रतिपदासे "मधोः सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्तिः” इत्यादि वचनोंसे जो भी संवत् शककी प्रवृत्ति होती है तथापि “ वर्षायनर्तुयुगपूर्वकमत्र सौरात " इस वचनसे जबतक मेषसंक्रांति प्रवेश न हो तबतक शकप्रदेश नहीं होता, इस कारण मेषसंक्रांतिके प्रवेशके प्रथम और चैत्रशुद्ध १ प्रतिपदाके अनंतरका वर्ष करना हो तो पिछाड़ीके शकसे करना ॥ जैसे संवत् १९५५ में मेपसंक्रांति वैशाखकष्ण ६ षष्ठी भौमवार के दिन प्रवेश हुई है उसी दिनसे १८२० का शक प्रवेश हुआ इसलिये वर्षसाधनमें वैशाखकष्ण ६ षष्ठीके पहिले शक १८१९ ही मानके वर्ष करना ॥ ३ ॥ इष्टशके जनुःशकहीने गताब्दाः॥४॥ अभीष्टशकमेंसे (जिस शकका वर्ष करना हो उस शकमेंसे) जन्म- समयका शक हीन करनेसे शेष बचे वह गवान्द (गतवर्ष ) हो ॥ ४ ॥ जन्मार्कतुल्योऽकों यत्समये वर्षप्रवेशस्तत्रैव ॥ ५ ॥ जन्मसमयके सूर्यके समान ( बराबर ) सूर्य जिस दिन जिस समय आवे उस होता है ॥५॥ याताब्दाः सप्ताधिकसहस्रहताः खानेभाता जन्मवारादियुता वर्षप्रवेशवारादिबोधकाः॥६॥ गताब्दीको ( गतवर्षोंको) १००७ एकहजार सातसे गुणे करना ८०० आठसौका भाग देना लब्ध आये हुए वार घटी पल विपलात्मक चार फलमें जन्म समयके वारादिक (वार इष्ट घटी पल विपल ) युक्त करना वर्षप्रवेशके वारादिक ( बार इष्ट घटी पल विपल ) का बोध हो अर्थात् (गत वाँको १००७एकहजार सात गुणे करके८००आठसौका भाग देना लब्ध आवे वह वार जानना शेष बचे उनको६० साठ गुणे करना और८००का भाग देना छब्ध घटी आवे शेष बचे उनको६० साठ गुणे करना ८००का भाग देना, १ सिद्धान्तशिरोमगौ-खेश्वभौगोऽकवर्ष प्रदिष्टामात ॥ ॥ जन्मसमयके सर्यके समान ( बराबर) सुर्य जिस दिन जिस समय आबे भाषाटीसहितम् । (९५) लब्ध पर आवें शेष बचे उसको ६० साठ गुणे करना और ८०० आठसौका भाग देना लब्य विपल आवे एसे ८००का भाग देके वार घटी पलविपलात्मक चार फल लाना उनमें जन्मसमयके वार इष्टघटी पल विपलादिक युक्त करना वर्ष प्रवेशके वारादिक हो)॥६॥ शिवना गताब्दाः स्वखाहीन्दुलवान्या जन्मतिथ्यन्वि- तास्तेषु खाग्निशेषेऽन्दवेशतिथिः ॥७॥ ग्यारह गुणे किये हुए गताब्दोंमें अपना १७० एकसो सत्सरवां भाग युक्त करना और जन्मतिथि मिलामा वीस ३० का भाग देना शेप बचे बह वर्षप्रवेशकी तिथि जानना ( मसान्दोको ११ गुणे करके २ जगे लिखना एक जगे १७० का भाग देना लब्ध भावे वह दूसरी जगे युक्त करना उसमें शुक्लपति- पदाको आदि ले जन्मतिथिकी संख्या मिलाना ३० वीसका भाग देना शेष बचे वह शुक्ल प्रतिपदाको आदि ले वर्ष प्रवेशकी तिथि हो)॥ ७ ॥ कचिद्भूने भूयुते वा ॥ ८॥ कोई समय गणितसे लायी हुई वर्षप्रवेशको विथिके दिन वर्ष प्रवेशका वार नहीं मिले तो आयी हुई तिथिमें एक घटा देना वा एक युक्त कर देना (विथिसे वर्षप्रवेशका वार पछि हो तो १ घटा देना आगे हो वो १ मिला देना)॥८॥ जन्माकांशादियुग्वारतोऽन्दप्रवेशनिर्णयः ॥ ९॥ इत्यन्दप्रवेशाध्यायः ॥२॥ . जन्मसमयके स्पष्टसूर्य की राशि अंशके समान राशि और अंश और वर्षप्रवेशके वारसे वर्षप्रवेशका निर्णय जानना ( जन्मके सूर्यके राशि अंश और वर्षप्रवेशका वार ये वीनों जिस दिन मिलें उस दिन वर्षप्रवेश होगा) ॥९॥ उदाहरण। स्वस्तिश्रीसंवत् १९२८ शके १७९३ प्रवर्तमाने अमांतमाघकृष्ण ई तृतीया परं ४ चतुर्थी भौमवासरे चित्रानक्षत्रे श्रीसूर्योदयादिष्टघट्यादि ५६ । १८ । १८ स्पष्टार्क १० । १६ । ५३ । ३९ । २० ९ । २३ । २८.१२ . (९६) वर्षदीपकम् । अथ सन्मानम् रार/ श९ ८ १३.१० १ Ins: ६च ३० चंद्र ५ । २९ । १९ । ४९ । समये ज्योतिर्विच्छीनिवासशर्मणो जन्म। इस जन्मपत्रकावर्षपत्र अभीष्ट शक १८२१ का करना है इसलिये शके १८२१ मेसे जन्मशक १७९३ घटाया २८ शेष बचे गताब्द हुए इनको १००७ से गुणे किये २८१९६ हुए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध ३५ वार आये शेष १९६ वचे इनको ६० साठ गुणे किये ११७६० हुए ! फिर इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध१४ घटी आयी शेप ५५० बचे इनको फिर ६० साठ गुणे किये ३३६००हुए ८०० का भाग दिरा लब्ध पल ४२ आयी शेष ० बची इसको ६० गुणी करनेसे ० हुई ८०० का भाग दिया लब्ध ० शून्य विपल आयी । ऐसे आठसौका भाग देके लब्ध बार ३५ घटी३४पल४२ विपलात्मक चार फल आयें इनमें जन्म समयके भौमवारके ३ इष्टवटी:५६पल ४८ विपल १८ मिलाये ३९।११ । ३० । १८ हुए वार ७ सातसे अधिक है अतः बार ३९ में सावका भाग दिया शेष ४।११। ३० । १८ ये वर्ष- प्रवेशके वार घटी पल विपल हुए, तिथिसाधन। गताब्द२८को ११ गुणे किये ३०८ हुए इनको दो जगे लिखे ३०८ एक जगे १७० का भाग दिया लब्ध १ एक आया यह ३०८ में युक्त किया३०९ हुए इनमें कृष्णपक्षकी ४ चतुर्थीका जन्म है इससे शुक्ल प्रतिपदासे ४ पर्यंत गिननेसे जन्मतिथि १९ हुई ये मिलाये ३२८ हुए. इनमें ३० वीसका भाग दिया शेष२८वचे यह वर्षप्रवेशकी तिथि हुई शुक्ल प्रतिपदाको आदि ले गिननेसे अहाइसवीं कृष्णपक्षकी १३त्रयोदशीले आयी परंतु त्रयोदशीके दिन वर्षप्रवेशका बार बुध नहीं मिलता है इस कारण इसमें १ एक तिथि युक्त करनेसे १४ चतु- र्दशी हुई। एवं तिथि निश्चय होनेके अनन्तर जन्य समयके स्पष्ट सूर्यकी १० राशि १ रविवारने वार गिने जति हैं।

भापाटीकासहितम् । ( ९७) १६ अंशके समान अंश और वर्ष प्रवेशका वार बुध, अमांव माधछष्ण १४ के दिन मिलता है, इसलिये संवद १९५६ शके १८२१ प्रवर्तमानमें अमांत माघकृष्ण १४ चतुर्दशी बुधवारके दिन सूर्योदयसे इष्ट घट्यादि १३ । ३० । १८ समयमें वर्ष २९ प्रवेश हुआ, गताब्द २८ ॥ इति श्रीज्योतिर्विदृरश्रीमन्महादेवकृतवर्पप्रदीपिकाख्यताजिकग्रंथ तदङ्गजश्रीनिवासविरचितायां सोदाहरणभाषाव्याख्यायामन्दप्रवेशाध्यायः प्रथमः ॥ १॥ इटवारादिषु पातितगतपंक्तिवारादिषु शेषो दिनायो धनम् ॥ १॥ अपने इष्ट वारादिकमेसे पिछाड़ीकी गयी हुई समीपकी पंक्ति (अवधि ) के वारादिक (वार इष्ट घटी पल ) हीन करनेसे जो शेष बचे वह दिनादिक धन चालन होता है ॥ १॥ आगामिपंक्तिवारादिषु पातितेष्वारादिषु शेषो दिनाघमृणम् ॥२॥ आगेकी पंक्तिके वारादिक (वार इट घटी पल ) मेंसे पिछाडीके अपने इष्ट- वारादिक हीन करनेसे जो शेष बचे बइ दिनादिक ऋण चालन होता है। अर्थात् अवाधिके वारादिकमेंसे अपने वारादिक हीन करनेसे ऋणऔर अपने वारादि- कमेंसे अवधिके वारादिक घटानेसे धन चालन होता है ॥२॥ दिनाये गति षष्टयाप्तेऽशादिस्तेन पंक्तिस्थग्रहे संस्कृते स्पष्टः खगो वने तु वैपरीत्यं संस्कृतौ ॥३॥ दिनादिक चालनको गतिसे गुणन करके ६० साठका भाग देना, जो अंशादिकफल (अंश कला विकलात्मक ३ तीन फल ) आधे उनकी पंक्ति (अवधि) के ग्रहमें संस्कार करनेसे (चालक धन हो तो युक्त और ऋण हो तो हीन करनेसे ) स्पष्ट ग्रह होता है और ग्रह वक्रगति हो तो उन्हीं अंशादिक फलोंका विपरीत संस्कार करना अर्थात् चालक धन हो तो ऋण और ऋण हो तो धन करना ॥ ३॥ गतक्षनाड्यः षष्टिशुद्धाः पृथक् स्थाप्याः॥१॥ गत नक्षत्र(जिस नक्षत्रमें वर्षप्रवेश हो वह इष्ट नक्षत्र,उसके पहले बीते हुए नक्षत्र ) की घटी पलोंको साठमेंसे शोधकर दो जगे लिखना ॥ ४॥ १ साठका भाग देके अंशादिक फल लानेकी रीति उदाहरणमें स्पष्ट लिखी है।

(९८) पप्रदीपकम् । ( है एकवेष्टघट्याढया भयातम् ॥ ५॥ एक जगह इष्ट घटी पल युक्त करनेसे भयाव होता है ॥ ५॥ इतरत्रेष्टसंघट्याव्या अभोगः ॥६॥ दूसरी जगे इष्टनक्षत्र (इष्ट समयमें वर्तमान नक्षन) की घटी पल युक्त कर- नेसे भभोग होता है ॥ ६ पष्टिनं भयात सभोगेनाप्तं स्पष्ट भयातम् ॥ ७ ॥ भयातको साठ६० से गुणा करना और भभोगका भाग देनेपर लब्ध घट्यादिक स्पष्ट भयात होता है । भयातको साठ गुणा करके भभोगका भाग देनेपर जो लब्ध घटी आवे, शेष बचे उसको६० गुणा करके फिर भभोगका भाग देना जो लब्ध पल आवे शेष बचे उनको साठगुणे करना, फिर भभोगका भाग देना लब्ध विपल आवे एसे घट्यादिक फल तीन आता है उसे स्पष्ट भयात जानना चाहिये गतसिंख्याषष्टिना भयातान्विता विना नवाप्तांऽशादिरिंदोः॥ ८॥ साठगुणी की हुई गव नक्षत्रको संख्यामें स्पष्ट भयाव युक्त करके द्विगुण ( दोगुणी) करना और नवका भाग देना, जो अंशादिक फल ३ लब्ध आवे वह अंशादिक स्पष्टचंद्र होता है । गत नक्षत्रकी संख्याको६०गुणी करके उसमें स्पष्ट भयात मिलाना और उसको दोगुणी करना, उसमें नव ९ का भाग देना, लब्ध अंश आवे शेष बचे उनको साठगणे करना और नीचेकी पल मिलाना. फिर ९ नवका भाग देना, लब्ध कला होती है और जो शेष बचे उनको फिर साठगुणे करना, नीचे लिखी विपल मिलाना और नवका भाग देना लब्ध आवे वह विकला जानना, ऐसे अंश कला विकलात्मक फल वीन लाये वह स्पष्ट अंशादि चंद्र हो अंशमें तीसका भाग देना लब्ध राशि शेष अंश समझना ॥ ८॥ खखाटमभोगेन भक्ता अंशात्मिका गतिः ॥ ९ ॥ आठसौ ८०० के भभोगका भाग देना जो लब्ध आवे फल तीन वह अंशा- दिक चन्द्रकी स्पष्ट गति होती है ( अंशको ६० गुणे करके कला मिलानेसे कलादिक गति होती है)॥९॥ है १ . १ अधिनीनक्षत्रको आदि ले गत नक्षत्रपर्यंत गिननेसे जो संख्या हो उसको ।

भापाटीकासहितम् । (९९) जनुरुदयमादिषु मांकमात्र गताब्दांकयोगेऽभक्त झुन्था ॥३०॥ राश्यादिक (राशि अंश कला विकलात्मक) जन्म लयकी केवल राशिके अंकमें ही गताब्दसंख्याका अंक युक्त करके १२ बारहका भाग देना जो शेष बचे उसे मुन्था जानना ॥ १०॥ सूर्येकांशभोगकाले सुन्था पंचकला झुनक्ति ॥ ११ ॥ सूर्यके एक अंशके भोगसमयमें मुन्था पांच कला भोगती है, अर्थात् प्रतिदिन मुन्था पांच कला चलती है ॥ १३ ॥ उदाहरण। अमांत माघ कृष्ण १४ चतुर्दशी बुधवारके दिन इष्ट ११।३०।१८ से वर्षप्रवेश हुआ, इसके समीपकी पंक्ति (अवधि) पंचागमें उसी दिन इष्ट२२।१की । यह वर्षप्रवेश समयसे आगेकी है, इसलिये सूत्रके अनुसार अवधिके वारादिक ४१२२।१मेसे वर्षप्रवेशके इष्ट वारादिक४।११।३० पटाये शेष०११०३१बचे यह दिनादिक ऋण चालक हुआ-इस दिनादिक चालक०।१०।३१को सूर्यकी गति ६० / १९ ६० ११९ से गोमूत्रिका लिखके गुणन किया तो ये अंक आये नम्बर १-०नं०-४ इनमें नम्बर के अंक,६०साठका भाग देनेपर लब्ध९आये२-६०० /१९०-५ उनको नंबर पांचके अंकोंमें युक्त करके नम्बर पांचके ३-१८६० / ५८९-६ अंकोंको नम्बर ३तीनके अंकों और नम्बर४चारके अर्कोको नम्बरश्दोके ६० । १९ २-६० अर्कोमें मिलाये वो इस प्रकार हुए,फिर नम्बर३तीनके अंकमें६० नम्बर० साठका भाग दिया लब्ध ३४ आये, इनको नम्बर दोके अंकोंमें मिलाये तो ६३४ हुए इनमें साठका भाग दिया लब्ध १० ३--२०५९ कला आयी, शेष ३४ विकलारही, फिर कला १० में ६०साठ का भाग दिया लब्ध० अंश आया, ऐसे साठका भाग देनेसे अंशादिक०।१०। ३४ फल आये । इनको अवधिमें स्थित सूर्य १० । १७ । ४ । ७ में ऋण किये १० । १६५३ । ३३ शेष बचे यह स्पष्ट सूर्य हुआ । इसी प्रकार शेष १८] ११ इष्ट. (१००) वर्षपदीपकम् । सर्व प्रह किये परन्तु राहु वक्रगति है इस कारण राहुकी गति ३॥ ११ से चालक ०।१०।३३ को उक्त रीतिसे गुणन करके ६० साठका भाग देके आये हुए . । ।३४ अंशादिक फोकी अवधिमें स्थित राहु ७ । २३ । ४०। ४० विपरीत संस्कार किया अर्थात् चालक जण है, इस कारण धन किया ७ । २३ । ४१ । १४ । राहु स्पष्ट हुआ। स्पष्ट चंद्र साधन । वर्षप्रवेशके दिन धनिष्ठा घट्यादिक ३७ ॥ ५६ है, वर्षप्रवेश धनिष्ठा नक्षत्र- में हुआ है अतएव धनिष्ठा इष्ट नक्षत्र और श्रवण गतनक्षत्र हुआ। गतनक्षत्र श्रवणकी घटी ४१ पल ५१ को सूत्र ४ के अनुसार ६० साठ घटीमेंसे हीन किया १८१९ शेष बचे, इनको दो जगे लिखे १८१९ एक जगे. इष्टघटी १११३० २९ भया- युक्त की२९ । ३९ भयाव हुआ, दूसरी जगे इष्ट ९ ३० घटी. | ३९ व. नक्षत्र धनिष्ठाकी घटी ३७ पल ५६ मिलायी तो५६। १८ ३७इष्टनक्षत्र. ५६ भभो, ५ भभोग हुआ। भयातको ६० साठ गुणा करके ९५६ घटी. भभोगका भाग देना है, परंतु भयाव भभोग दोनों घट्यादिक हैं, अतःप्रथम इनको सवर्णित किये भयाव १७७९ मभोग ३३६.५ हुए, तदनंतर भयात १७७९को साठगुणा किया १०६७४० हुए। इनमें भभोग ३३६५ का आग दिया लब्ध ३१ घटी आयी शेष २४२५ बचे, इनको साठ गुणे किये १४५५०० हुए, भभोप ३३६५ का भाग दिया,लब्ध ४३ पल हुए, शेष८०५ बचे उनको ६० गुणे किये तो ४८३०० हुए इनमें फिर ३३६५ का भाग दिया लब्धं १४ विपल आयी । ऐसे घट्यादिक ३३ ॥४३॥ १४ स्पष्ट भयात हुआ।तदनन्तर अश्विनीसे गत नक्षत्र श्रवण पर्यंत गिननेसे२२संख्या आयी यह गत नक्षत्रकी संख्या हुई, इसको ६० साठगुणी की तो १३२० हुई, इसमें स्पष्टः भयात ३५ । ४३ । १४ युक्त किया १३५३ । ४३ । १४ हुए । इनको २, द्विगुण किये २७०३ । २६ । २८ हुए, इनमें ९ नवका भाग दिया लब्ध३०० अंश आये, शेष. ३ बचे, इनको ६० गुणे किये १८० हुए इनमें नचिके पलके अंक २६ मिलाये. २०६ हुए इनमें नवका भाग दिया लब्ध २२ कला आयो शेष ८. बचे इनको ६० साठगुणे किये तो ४८० हुए; विपलके अंक २८ .

१५ाम मापाटीकासहितम् । (१०१) मिलाये तो५०८हुए, फिर९का माग दिया५६विकला हुई, शेप९का भाग देकर उक्त रीतिस अंशादिक फल ३लाये३००।२२।५६यह अंशादिक स्पष्ट चन्द हुआ। अंशमै ३० तीराला भाग दिया लन्ध १० राशि शेष अंश बचे इस प्रकार स्पष्ट- चन्द्र १० १ ० १ २२॥ ५६ । राश्यादिक हुए। गतिसाधन। आठसौ ८०००में भभोग ५६।५ का भाग दिया परन्तु दोनों घटयादिक हैं, इस लिये दोनाको प्रथम सर्णित किये भाज्य४८०००भाजक३३६५हुए,भाज्यमें भाजकका भाग दिया लब्ध अंशादिक १४३५१५२चन्द्रकी स्पष्टगति हुई अंश १४को ६० साठगुणे करक १५ मिलानेते ८५५ । ५२ कलादिक गति हुई। मुंथासाधन। जन्मलम ९ । २३ । २८ । २९ की राशि ९ के अंको गताब्द संख्या २८ युक्त किये वो३७।२३।२८।२९हुए, फिर १२वारहका भाग दिया शेष।२३।२८॥ २९ मुन्था हुई, गति ५। ॥ अथ स्पष्टाः महा: सजवाः। - (१६/० तु. चं. मं. बु. गु. शु. श. | रा. के. मुं. १०/१०/१०/११/७/११/८/७ १/१८/२५/९/२३/२३ २३ ५३/२२ ३१/३५/५६/२/५४/४११४१२८ ३९/५६ ३६,८५५/४८/५९/१३/१३/२९) ६०८५५/४८/७५/५/७१/४/३४/३४/५ १९/५२ ५०/३२/३२/३२/९/११/११/० नागक्षागोऽदनानिदन्ताःक्रमोत्क्रमा मेषादीनां लंकोदयापलानि१२॥ नाग ८ ऋक्ष २७ लिखनेसे२७८ हुए फिर गो ९ अंक ९ दख२ लिखनेसे २९९ हुए, पुनः नितीन ३, दन्त ३२ मिलाकर ३२३ हुए । इसप्रकार क्रम और उत्कम ( उलटे)करनेसे मेपादिक राशियोंके लंकोदय पल जानना॥१२॥ chudae - +-- मं. २७८ २९९ ४१ वृ. मि म. हीन किये । युक्त किये. क. (३०२) वर्षप्रदीपकम् । स्वचराद्देन युताः स्वदेशोदयाः ॥ १३ ॥ अपने गायके चरखंडा उक्त लंकोदय पलमें क्रमसे हीन और युक्त करनेसे लकोदयाः चरखंडा स्वदेशोदया. स्वदेशोदय (अपने गामका उदय) मी. ६१।। २२७ होता है, जैसे रतलामके चरखंडा कुं. २५८/५१ । ४१ । १७ है इनको ३.३ ३०६ लंकोदयपलमें क्रमसे प्रथम हीन ३३३ १७ ३४० सिं. २९९ ३४० किये, फिर युक्त किये तो नीचे ५१ ३२९ कोष्ठकमें लिखे हुए स्वदेशोदय हुए ऐसे ही प्रत्येक अभीष्ट गामके स्वदेशोदय जानना चाहिये ॥ १३ ॥ उदयाधिशबुद्धता मेषादीनां पलाया गतयः॥ १४ ॥ उदयों (लंकोदय और स्वदेशोदय )की संख्या वीस ३०का भाग देनेपर जो आवे वह मेषादिक राशियोंकी पलादिक गवि होती है,अर्थात् स्वदेशोदयकी संख्या ३० तीसका भाग देनेसे स्वदेशके लनोंकी पलादिक गति, एवं लकोदयकी संख्या ३० तीसका भाग देनेसे लंकाके उदयोंकी पलादिक गति होती है ॥ १४ ॥ उदाहरण। २ ध. वृ. तु. क. २७८ मेष राशिके स्वदेशोदय २२७ में ३० तीसका भाग दिया लब्ध ७, शेष १७ बचे, इनको ६० साठगुणे किये १०२० हुए फिर ३० का भाग दिया, लब्ध ३४ हुए । यह मेष राशिके स्वदेशोदयकी पलादिक गति ७.३४ हुई। ऐसे ही बारह राशियों में जानना चाहिये ।। - १ गणेशदैवज्ञः 'मेपादिगे सायनभागसूर्ये दिनार्द्धजा मा पलमा भवेत्सा । त्रिष्ठा हताःस्युर्दशभिर्भुजंगैर्दि- भिश्चरार्दानि गुणोद्धृतान्त्या ॥ १ ॥" अर्थात् सायन मेषाके आरम्भ दिनमें मध्याह्न समयमें शंकुकी जो छाया हो वह पलमा होती है। जिस गामके चरखंड करना हो उस गामकी पलभाको तीन जगे लिखना, एक जगे १० दशगुणी, दूसरी जगे आठगुणी, तीसरी जगे १० दशगुणी करना, फिर ३ तीनका भाग देनेपर उस गामका चरखण्ड होता है।

भाषाटीकासहितम् । (१०३) लंकोदयोंकी पलादिकगतिका चक्र. मे.. मि.२ क.३ सिं.४ क.९ तु.६ वृ.७ प.८ म.९ वृ.७ | घ.८ | म.९.१० मी.१२ ० ० ० . 0 ९ ९ ९ ९ ९ १० १० १६५८ ४६ ४६ | ५८ | १६ | १६ | ५८ ४६ | ४६ ५८ १६ रतलामशहरकं स्वदेशोदयोंकी पलादिगतिका चक्र. म.०६.१ मि.२ क.३ | सिं.४) क.५ तु.६ | वृ.७ | ध.८ / म.९ कु.१०मी.११ . ० . . ७/८ १० / ११ / ११ / १० / १० ११ / ११ / १० ३४३६] १२ २० २० ५८ ५८ २० २० १२ शके वेदवेदान्ध्यूनेऽयनांशकलाः ॥ १९ ॥ शकमेंसे ४४४ चारसौ चौवालिस हीन करनेपर जो शेष बचे वह अयनां- शकला होती हैं (कलाके६० साठका भाग देना लब्ध अंश शेप कला समझना)१५ उदाहरण. जैसे शके १८२१ का अयनांश करना है अतः शके १८२१ असे ४४४ चारसो चौवालिस हीन किये तो १३७७हुए ये अयनांश कला हुई। इसमें ६० का भाग दिया लब्ध२२अंश शेप५७कला बची यह अंशादिक अयनांश हुआ। अयनांशहीने चक्रांशेऽवशिष्टांशाधस्ताच्छून्यत्रयं लेख्यम् ॥ १६ ॥ अयनांशको चक्रांश ( ३६० अंशों ) मॅसे हीन करना, शेष बचे हुए अंशके नीचे तीन शून्य लिखना ॥ १६॥ तलविंशत्रिंशदेशकोष्टकेषु मेषादिगतियोगे भावाङ्गपत्रे ॥ १७ ॥ तदनन्तर तीस वीस अंकोंके कोष्ठकोंमें लंकोदय और स्वदेशोदयकी मेषादिक राशियोंकी पलादिक गतिक्रमसे प्रथम मेपकी, तदनन्तर वृषभकी, फिर मिथुन, कई सिंह इस क्रम बारहों राशियोंकी पलादिकगाते युक्त करना, भावपत्र और लग्नपत्र हो अर्थात् लकोदोंकी मेपादिक राशियोंकी पलादिक गति युक्त करनेसे भावपत्र और स्वदेशोदयको मेषादिक राशियोंकी गति क्रमसे युक्त करनेसे लमपत्र होता है ॥ १७ ॥ उदाहरण। प्रथम तीन सौ साठ ३६० कोष्ठकके दो चक्र बनाना, उनके दक्षिण वरफ मेषादि १२ बारह राशि लिखना। ऊपर 0 शून्यको आदि ले २९ उनतीस- पर्यंत अंश लिखना,तदनन्तर अयनांश हीन करना३६० वीनसौ साठ अंशमैसे और जो शेष बचे उस कोष्ठकके अंकमें तीसका भाग देना, जो लब्धराशि . (३०४) वर्षपदीपदान शेष अंश बचेंगे उस राशिले अंशके नीचे तीन तीन शून्य लिखना, जैसे-अय- नांश २२॥ ५७ हैं यह २३ तेईसके समीप है इससे ३६० मेंसे २३ हीन किये ३३७ शेष बचे, इसमें वीस ३० का भाग दिया लव्ध १३ राशि शेप ७ अंश रहे । इससे दिना परिश्रम शीघ्र ज्ञाद हो गया कि ११ मीनराशिके ७ अंशके नीचे तीन शून्य लिखना ऐसे तीन शून्य लिखके फेर कमसे मेपा- दिक राशियोंकी पलादिक गति मिलायी हो भावपत्र और लग्नपत्र हुए। भावपनसर्वत्र अयनांश २३१०१० २१३१४१५३७14/530 PM.१.३६.१७ १८१९२० २३२४२५२६८३९ म. 01.vi.७:४८८ सं. 1 . ०1१०१९:२८३ ४० । '१२२८४० ५.xxx०३८२,२४२२२० 505 व९.९९.९१९:55020352299999.२०२२१२१११३23:53. 300Eoe. १२०३०४१२३३२४३०४ १११११०,८१६४२० lar ४०२६,२५८४४०२१४८.११.२०१६ ५२५८ १४.३४१५१५५१५३५५EE: १८.6ECE । १ . लि. - - . ३६२४.१०,५६४२२६० १३२.५० २६१२.९ POER०६५६४६ ३२४९१९१२ ११,२०२० २२०२२२२२२२२२ २०२२२४२५२.५१२२२३२, ५२२२२४२५२१२.१० २९.५०५४४२२८३४०५८ rajas४२४०३८ न दि. विवि२६२६६ २८१८२२०० 1: 08:४५६ 1७४१२९०८ ८४२०३३५२,५० २०२९ २९२५२१३०३०३-3050sSER२३३२३२१ ९.१९१८, ४ - ।" ३१०९ UPER om al ७७ ३८३८३९३९३९ cer:४२४०२३ay. sexrojroxexy HTTER२४२४ ४०५८१९२० EES०७७२० 9 RETER.RRENCE --- . ४.४८४४४४४५४५ ४५.rajestraEajessitycircrcisepecrs. 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Ram 01९/११/२८५५. १२८६११४४९४/२०१५ १ भाषाटीकासहितम् । (૧૦) , સ'' लग्नपत्ररत्नपुरेपलमा५८अयनांश २३।०१० चरखंड५११४१२१७ 13 ||22,299,999ર9રરરર રરક ૨૬,૨૮૨સ. / ૨||૨|૨|૩|૪||*****][૧]s[૬]5|:YRાદો]૨૬/૨૦ કિ85|૧|ર રર૭પ૪રરરર૪૪૪૧૩રર૮૪૪ ર૦રર SO Bolધરરર રરરર રરર રરરર રર ૨૦૧૪ so|૭||૭|૭૦૮૮૮૮૮૮/૧૧૧૧૧૧/૨૦૧૭/૩૦૧૦૨૦૧૦/૧૬,૩૨૩/૦ ૪૩. કાકા: કકકકકક ૨ || ર૮-ર૪ર૪ર૮ s૮ર૦ર૬૭ર૪રરરરર રરરરરર રરરરર IS • જિ. જ - - - - au 999853989999999999ણ999999999999995,99999999999 ૦ કિ૬/ર૦૦૪૦ 39રર8/99799 કર રર-૧૧૨૨૨૪૫૧૨૦3૦ રક્ત ૧૨૨૪-ર૦૦ ર૦ - રર૦૪ ર૦૦ર૦૦ ર૦૦) ૦ ૨૦૦૨ 999999૧૮૧૮૧૮૨૮૨૦૬૬૬૬રરરરર રરરર રરરરરરરરર ર૪૬૦૩૬ ર૦રર ૪૪પરકરણ 39 ૪૦ - ૨૦ -૨૦૪૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ ૦ર૦ રરરરરરર રરરરરર રકારક રહારરરરરરર૮રર. કરો 938389 39//759/૮પ૦૦ ર૦રર છે || - ૪ ૦ ૦ ૦૮કરકરરરરર રરરરરર ર૦ ૨૮ર૦રરર રરરર રરરર રરરર રરરરરર ક8 5999ક ર ૭૪૪૬૬૨૮૦/23રરર૪૪૪૨૯૬૫૭૧/, ૧/=૨૮૬૪ ૩૨ કકકર ૪૪૪ર૪૦ર૮ રરરરર૮ર૪રરર૮ R R I T B280 HIT * જ + કહ, ૪૪ I w ૭ ૪૦ %િ છે ૮ Bર રાપર દરર રરરરર ર૩ર ૩૬૨૨ ૦ ૧૨૩૪૫/૧૮૨૪૬૭૨૩૮૩ર ૧૫ ૨૦૧૪/૧૨૨૦૧e ૧૨/ક ૨૬/૪ રાજO| -ર૦૦ ર૦ ૪ ૦ ૨૪૦) ૦ર૭૪o ૦.૪૦ • ૨૦૮ Boo૪૦૪૦૪૦૪૦%99999૪૪૪ર૪રરરર૮૩૩૪૪૪૪૪૪૪૪૪૪૪૪ - ૪૨૧૩૨૩૪૬પ૧ર:૩૭રરરરરકારક ૬૬ ૧૦૨૪૪૪૭/૨૮૩, ૪૦) ૨૦૧૪ - ૨૦૪૦ ૦ર૭૪o ૦૪ - ૨૦૪૦ રિ૦o ૦ર૭૪૮ર૦૦|-૨) ૦ર/ર૦ #EE, ૬ ૪૭૪૭૪૭૪૪૭/૪૮૪૯૪૯૪૯૪૯૨૪૨૪૪૨૪૨૪૪kejક) ૦ ર૬૪૦૨ રર૭૪૪૬૧//૧૦ર ૦૧રરરર રરરરરર9) ૪૦ દિન ૪૦ ૦ ૦ ૦૨૬૪૮૦૦ % ૧૨ ક. ૩૨)રર૦ ૬િ૦ કકકકકકકકરકરકરકર કરકર પરંપ BERપર ૦ જરૂર કરજણ ૨૦ ર કિરપરરર૮૪રર૭ ૮૭૪૬૪૧૦ રદ કરો Bકર Bર કાર૪-ર૦ • B૩૨૨ ક ૦ કિકકકકકકકકકકકકક કકકકકક૭૭ ૧૨ રરર૮૪૭ ૪ વિરોધ/૨૦૧૬ ૬૬૪ર૭ર૬રકો જરા - ૧૨૪૨ ૦૪-રરરર ૬૪૦૪૪ર૬૦ * રરકારક ક ૦ |૧|૧૧|૧|૧૧|૧|૧|૧૨/૨ી૨/૨/૨/૨૦ રરર કર // રરરરર ૯ કરી ||રરિક #Rolઝર તકરાર કિલો પર શું ૧૦ 0 એ . R अथ लग्नस्पष्टरीतिः। भानुभांशज लशपत्रकोष्ठकमिष्टान्वितं तन्न्यूनकोष्टजं भांश भानुकलायन्वितं तत इष्टाल्पकोष्ठांतरेऽस्पैष्यकोष्ठांतरेणाप्त- मंशादिफलं पूर्वज योजितं लय भवेत् ॥ १८॥ { (१०६) वर्षप्रदीपकम् । सूर्यकी राशि अंश प्रमाण लग्नपत्रके कोष्ठकमें इष्ट घटी. पल विपल युक्त करना, उस ( इष्ट युक्त किये हुए कोष्ठक ) से अल्पकोष्ठकके राशि-अंश लेना, अर्थात् जिस कोष्ठको इष्ट युक्त किये हुए कोष्ठकसे किंचित् न्यून अंक मिले उसके सामने जो राशि और ऊपर जो अंश हो वह अंश लेना । राशि-अंशके नीचे स्पष्ट सूर्यकी कला विकला युक्त करना, तदनंतर इष्ट युक्त किये हुए कोष्ठक और अल्प कोष्ठकका अन्तर करना, जो शेष बचे उसमें अल्पकोष्ठक और उसके आगेका ऐज्य कोष्ठकका अन्तर करके भाग देना, जो अंशादिक फल ३ तीन लब्ध आवे वह प्रथम आये हुए राश्यादिको युक्त करे तो लग स्पष्ट होता है ॥ १८॥ लग्नपत्रस्थभानुभांशजकोष्टं स्वाधःस्थितसप्तमकोष्टकाद्धीनं दिनमानम् ॥ १९॥ सूर्यको राशि अंशप्रमाण लग्नपत्रमें जो कोष्ठक है उसको अपने नीचेके साव कोष्ठकमेंसे हीन करे, जो शेष बचे वह दिनमान जाने ॥ १९ ॥ तच्च पटिशुद्धं रात्रिमानम् ॥ २० ॥ दिनमानको ६० साठमेसे शोधनेपर रात्रिमान होता है ।। २० ॥ सूर्योदयादिष्टे राज्यव्युते तुर्यभावेष्टम् ॥ २१॥ सूर्योदयसे घट्यादिक इष्ट समयमें राज्यई ( रात्रिमानका अई) युक्त करे तो चतुर्थ भावका इष्ट होता है ॥ २१ ॥ एतदादाय भावपत्रतो लग्नवच्चतुर्थभावसाधनम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार चतुर्थ भावका इष्ट ले करके भावपत्रपर लग्नसाधनकी रीतिके अनु- सार ( जैसे लग्न लाये हैं उसी तरहसे ) चतुर्थ भावका साधन करना चाहिये ॥ २२॥ लग्नशोधिततुर्यषष्ठांशी लग्ने पञ्चवारं योज्यस्ततस्स षष्ठांशो रूपाच्छु- दस्तुयें पञ्चवारं योजितश्चेल्लग्नादयस्ससन्धयः षड्भावाः॥२३ ।। लग्न निकले हुए चतुर्थ भावके षष्ठांशको (चतुर्थ भावमेंसे लग्नको) हीन करना, जो राश्यादिक शेष बचे उसकी राशिके अंक ६ छका भाग देना, जो लब्ध राशि आवे और शेष बचे उनको तीस ३० गणे करके नीचेके अंश मिलाकर छाझा भाग दे, फिर जो लब्ध अंश ओक और शेष बचे उनको६० साठ- भाषाटीकासहितम् । (१०७) गुणे करके नीचकी कला मिलाना, फिर६ छःका भाग देना, एवं जो लब्ध कला आवे और शेष बचे उनको ६० गुणे करके विकला मिलाना, फिर ६ छका भाग देना, जो लब्ध विकला आवे तथा शेष बचे उनको फिर६०गुणे करके६ छाका भाग देनेपर जो लब्ध आवे वह प्रतिविकला जानना ऐसे ६ छःका भाग देनमे जो राश्यादिक फल आवे वह पष्ठांश होता है, उस षष्ठांशको लग्नमें पांचवार युक्त करना, तदनंतर फिर उस षष्ठांशको एकराशिमेंसे (१10101010) शोधके चतुर्थ भावमें पांच वार मिलावे वो लग्नको आदि ले संघिसहित ६ छठा भाव होता है ॥ २३ ॥ एते पड्भोनाः शेषाः षड्भावाः ॥ २४ ॥ इन छहों भावों से छः छः राशि हीन करनेसे शेष रहे हुए छहों भाव होते हैं ॥ २४ ॥ अहः स्वाधिष्टितभावारम्भसंधितो न्यूनो गतभावोत्थं ताग्विरामसंध्यधिक उत्तरभावोत्थं फलं प्रयच्छति ॥ २६ ॥ ग्रह जिस भावमें स्थित हो उस भावकी आरंभ (पहलेकी ) संधि न्यून (कमती ) हो तो गतभावजनित ( पीछेके भावका ) फल देता है। ऐसे ही विराम (आगेको ) सन्धिसे अधिक हो तो उत्तर ( आगेके ) भावजानित फलको देता है ॥२५॥ ग्रहसंध्यंतरं नखघ्नं भावसंध्यंतरेणाप्तं फलं विंशोपकाः ॥२६॥ ग्रहसन्धिके अन्तरको ग्रह जिस भावमें स्थित हो उस भावसे कमती हो तो आरम्भसन्धिके साथ और भावसे ग्रह अधिक हो तो विराम (आगेकी) सन्धिक साथ अन्तर करके बीसगुणा करना और भावसन्धिके अन्तरका जिस सन्धिके ग्रहका अन्तर किया है उसी सन्धिके भावके साथ अन्तर करके भाग देना, जो फल आवे वह विंशोपका जानना और यदि ग्रह आरम्भसन्धिसे न्यून हो वा विराम सन्धिसे अधिक हो वो जिस भाव और सन्धिके बीचमें ग्रह हो उस भाव और सन्धिका अन्तर करके ग्रह सन्धिके अन्तरमें भाग देना, अर्थात् आरम्भ सन्धिसे ग्रह न्यून हो वो पहले के भाव और सन्धिसे अन्तर करना और ग्रह आगेकी सन्धिसे अधिक हो वो आगेके भावसे सन्धिका अन्तर करके बीसगुणे किये हुए ग्रह सन्धिके अन्तरमें भाग देनेपर जो फल आवे वह विंशो- पका होता है ॥ २६ ॥ - (१०८) वर्षप्रदीपकम् । उदाहरण। स्पष्टसूर्य १०।१६। ५३ । ३९ है, इसकी राशि १० अंश १६ के प्रमाण लग्नपत्रमें कोष्ठक देखा ५७ । २१ । ६ है, इसमें इष्टवट्यादि ११ ॥ ३० । १८ मिलाया तो ६८ ॥ ५१। २४ हुए । घटीका अंक ६० साठसे अधिक है, अतः साठका भाग दिया शेप ८। ५१ ॥ २४ रहे, यह इष्ट युक्त किया हुआ लग्नपत्रका कोष्ठक हुआ । इस इष्टयुक्त कोष्ठकसे अल्पकोष्टक लग्नपत्रमें ८।१५। ४८ एक'१ राशि ११ ग्यारह अंशके कोष्ठकमें मिलता है, इसकारण १ वृषराशि ११ अंश लिये इसके नीचे सूर्यकी कला ५३ विकला ३९ युक्त किया तो १ । १३ । ५३ ॥ ३९ हुआ, तदनन्तर इष्टयुस्त कोष्ठक ८।११। २४ और अल्पकोष्ठक ८।४५ । ४८ का अन्तर किया तो ० । ५। ३६ हुआ, इसमें अल्म कोष्ठक ८॥ ४५ ॥ ४८ ! और ऐष्य कोष्ठक ८॥ ५६ । ० के अन्तर०। १० । १२ का भाग दिया परन्तु भाज्य भाजक दोनों कलादिक हैं अतएव इनको सवर्णित किये तो भाज्य३३६ भाजक ६१२ हुए, भाज्यमें भाजकका भाग दिया लब्ध • शून्य अंश आया शेष बचे ३३६ को ६० साठगुणे किये २०१६० हुए । इनमें फिर ६१२ भाजकका भाग दिया लब्ध ३२ कला आयी, शेष ५७६ बचे उनको ६० साठगुणे किये तो ३४५६० हुए। इनमें भाजक (६१२) का भाग दिया लब्ध ५६ विकला आयी। ऐखे अंशादिक । ३२ । ५६ फल तीन आये इनको प्रथम आये हुए राश्यादिक १ । ११ । ५३ । ३९ में युक्त किये तो ११ १२ । २६ । ३५ । हुए यह राश्यादिक लग्न हुआ । दिनमानसाधन। सूर्यकी राशि १० अंश १६ प्रमाण लग्नपत्रिका कोष्ठक ५७ । २१ । ६ को अपने नीचे के सातवे कोष्ठक २६ । ९ । ४२ मेले हीन किया तो २८ । ४८ । ३६ इतना दिनमान हुआ। रात्रिमानसाधन। दिनमान २८ । ४८॥३६ को ६० साठमसे शोधन किया तो ३३ ॥३१॥ २४ रानिमान हुआ, इसको आधा किया तो १५॥३५॥ ४२ राज्यई हुआ। चतुर्थभाव इष्टसाधन सूर्योदयसे इष्ट ११।३०। १८ । में राज्यई १५। ३५।४२ युक्त किया तो २७।६। ० इतना चतुर्थ भावका इष्ट हुभा ।

- भाषाटीकासहित। (१०९) चतुर्थभावसाधन । स्पष्टसूर्य १०॥१६॥५॥३९ की राशि १० अंश १६ प्रमाण भावपत्रका कोष्ठक ५६।४५।२४ में चतुर्थभावका इष्ट २७।६।० मिलाया ८३१५१।२४ हुए, घटी ६० साठसे अधिक है ६० साठका भाग दिया शेष २३१५१।२४ बचे, यह इष्टयुक्त कोष्ठक हुआ, इससे न्यून कोष्ठक भावपत्रमें २३॥ ४२१ २० तीन राशि २७ अंशमें मिलता है, इसलिये राशि ३ अंश २७ लिये इसके नीचे कला विकलाके स्थानमें सूर्यकी कला ५३ विकला ३९ युक्त की तो ३।२७।५३।३९ हुए, फिर इष्टयुक्त कोष्ठक २३।११।२४। और अल्प कोष्ठक २३२४२।२० का अंतर किया ०२।४ हुआ, इसमें अल्पकोष्ठक २३१४२।२० और उसके आगेका ऐप्प कोष्ठक २३॥ ५२।१८ का अंतर ०९।५८ का भाग दिया, परन्तु भाज्य भाजक दोनों कलादिक है अतएव दोनोंको प्रथम सवर्णित किये भाज्य ५४४ भाजक ५९८ हुआ, भाज्य ५४४ में भाजक ५९८ का भाग दिया तो लब्ध ० अंश आया, शेष ५४४ को ६० साठगुणे किये ३२५४ ० हुए। इनमें भाजक ५९८ का भाग दिया, लब्ध ५४ कला आयी, शेष ३४८ बचे इनको ६० साठगुणे किये तो२०८८० हुए, इनमें भाजक ५९८ का भाग दिया, लब्ध ३४ विकलां आयी ऐसे अंशादिक ०५४॥ ३४ फल तीन आये इनको प्रथम आये हुए राश्यादिक ३२२७॥५३॥ ३९ में युक्त किये तो ३२२८१४८।१३ हुए इस प्रकार चतुर्थ भाव स्पष्ट हुआ । भावसाधनका उदाहरण । लग्नस्पष्ट १।१२।२६।३५ को चतुर्थ भाव । २८१४८।१३ मेसे शोधा तो २०१६।२११३८ हुए, शेष बचे इसकी राशिके २ अंकमें ६ छका भाग दिया लब्ध ० राशि शेष २ को ३० तीस गुणे किये ६० हुए । इनमें नीचे- के १६ अंश मिलाये तो ७६ हुए। इनमें ६ छका भाग दिया लब्ध १२ अंश आये, शेष ४ बचे। इनको ६० साठगुणे किये वो २४० हुए फिर कलाके अंक २१ युक्त किये तो २६१ हुए, फिर ६ का भाग दिया लब्ध ४३ कला आयी, शेष ३ बचे, उनको ६० साठगुणे किये तो १८० हुए। इनमें विकलाके अंक ३८ मिलाये२१८ हुए फिर ६ का छका भाग दिया लब्ध३६ विकला आयी। शेष २ बचे, इनको फिर ६० साठगुणे किये तो १२० . हुए २ .

(११०) वर्षप्रदीपकम् । फिर ६ छाका भाग दिया लब्ध २० प्रतिविकला आयी। ऐसे छःका भाग देके ०१२।४३३३६।२० फल पांच लाये तो षष्ठांश हुआ, इसको लग्न ॥१२॥ २६।३५ में युक्त किये तो १।२५।१०।११।२० द्वितीय भावकी आरंभ संधि हुई । इसमें षष्ठांश०।१२।४३६३६।२०। युक्त किया वो २७॥५३॥४७१४० द्वितीय भाव हुआ। द्वितीय भावमें फिर षष्ठांश ०१२॥४३॥३६।२० मिलाया वो २।२०१३७१२४१० तृतीय भावकी आरम्भ और द्वितीय भावकी विराम संधि हुई । इसमें फिर षष्ठांश युक्त किया वो ३३२११०१२० तृतीय भाव हुआ। इसमें फिर षष्ठांश०१२॥४३॥३६।२० युक्त किया ३।१६।४।३६४० तृतीय भावकी विराम और चतुर्थ भावकी आरम्भ संधि हुई, ऐसे लग्नमें षष्ठांश पांचवार युक्त किया, फिर षष्ठांश ०१२३४३।३६।२०को एक राशिधा । 010 मेंसे शोधा ०1१७।१६।२३।४० शेष बचे इनको चतुर्थ भावमें पांचवार युक्त किया तो लग्नादिक संधिसहित ६ छः भाव हुए, इन छः भावों से ६ छः छः राशि घटायी वो शेषके ६ भाव हुए। लसंधांद्वादशभावा! २ -4 rr १ ३ ५ ६ w wr m30 ~ . २० ८ ८ ९ . ७ सं. सं. ३ सं. 1४ सं. सं. २ २ १२ २५/ ७ २०३ १६ २८] १६३ २५ २१ ३७ ५३, १० ३५ ११ ४७] २४ २४.४७ ११ ४० २० ४०२० सं. सं. ९ सं. १०/ सं. ११/ सं. १२/ सं. ९ ९ १० ११ ११ १२/ २५, ७ २०३ १६ २८, १६३ २५ २६ १० ५३ | ३७/ २१/ ४ ३५/ ११ / १७३४ १६/ १३] १६० २४/४७११ वर्षाङ्गचक्रम्. चलितचक्रम्, भावमें जो जो राशि आवे वे चलितमें लिसना फिर ग्रह लिखना । वहां सूर्य करे बु वर्षकुंडली में १० दशम भावमें स्थित है। दशम भावकी विरामसंधिसे १०।१६।४ १० से सूर्य अधिक है इसलिये यह ११ ग्यारहवें भावका फल देगा। एवं १ ३ मुश्कदुश् १ सूम चं मं११चे ६ १० ८ भापाटीकासहितम् । (१११) शुक्र ११ वें भावमें स्थित है, ११ ग्यारहमें भावकी विरामसंधि ११ १२० से शुक्र ११ । २५ अधिक है, अतएव शुक्र १२वें भावका फल देगा, ऐसे सर्व- यहाँको जानने। विंशोपकानयन-उदाहरण। सूर्य १० । १६ ॥५३॥३९ और दशम भावकी विराम संधि २०१६।४ । ३६ का अंतर किया तो ०।१९।३ हुआ, इसको बीस गुणा किया तो १६। २११० हुए। इनमें सूर्य दशम भावकी विरामसंधि और ग्यारहवें भावके बीचमें है, इसलिये दशमभावकी विरामसंधि १० ११६।४। ३६ और ग्यारहवां भाव ११। ३।२११० के अंतर १७।१६।२४ का भाग दिया--परंतु दोनों भाज्य भाजक अंशादिक हैं इसलिये इनको प्रथम सवर्णित किये, भाज्य ५८८६० भाजक ६२३८४ हुए । भाज्य ५८८६० में भाजक ६२१८४ का भाग दिया लब्ध • शून्य विश्वा आये, शेष ५८८६० को ६० साठगुणे किये तो ३५३ १६० हुए, भाजक भावसंध्यंतर ६२१८४ का भाग दिया तो लब्ध ५७ प्रति- विश्वा आये। यह सूर्यके विंशोपका हुए, इसी प्रकार सब ग्रहोंके विंशोपका जानना। विंशोपकाः। सू. | चं. मं. | बु. गु. शु. श. रा. | के. मुं. १८/ ९।१७९ ७/१६, २, २ ५७.१०५४ ५७ ४६ ७ ४९ / १९ १९| ३९, इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यताजिकग्रन्थे तदात्मजश्रीनिवासविर चिसायां सोदा- हरणभाषाव्याख्यायां प्रहमावसाधनाध्यायो द्वितीयः ॥ २ ॥ 0 १६ ३ .. वक्राच्छनचन्द्रार्कज्ञसितारेज्यर्किमन्देज्या मेषाद्यधिपाः ॥ १ ॥ वक्र (मंगल), अच्छ (शुक्र), ज्ञ (बुध), चंद्र, अर्क (सूर्य) व (बुध), सित (शुक्र), आर ( मंगल ), इज्य (गुरु), आर्क ( शनि), मंद (शनि), इज्य (गुरु), मेषादिक राशियोंके क्रमसे स्वामी जानना ॥ ३ ॥ मेषादिराशियोंके स्वामी. वृ. | मि. क. | सिं.! क. तु..घ.म. कुंमी. १ २ म. शु ...सू. ७. शु. म.गु.श.श. राशी. गु. स्वामी

(११२)
वर्षपदीपकम् ।
मेषगोनन्याकान्त्यतुला दिवाकराधुच्ची दशमतृतीयाष्टा-
विशपञ्चदशपञ्चमसप्तविंशविंशाः क्रमेण परमोचमागाः ॥२॥
मेष, गो (वृषभ ), नक ( मकर), कन्या, कर्क, अन्त्य (मीन ) और ·
तुला ये सूर्यादिक ग्रहोंकी क्रमसे उच्चराशि होती हैं,अर्थात् मेपका सूर्य, वृपभका
चन्द्र, मकरका मंगल, कन्याका बुध, कर्कका गुरु, मीना शुक्र, तुलाका
शनि उच्चका जानना और दशम, तृतीय, अष्टाविंश २८, पञ्चदश १५, पंचम
५, सतविंश २७, विंश २० क्रमसे परमच्चके अंश जानना अर्थात् ऊपर
कही हुई राशि और अंशोंके सूर्यादि श्रह हो तो परम उच्चके जानना, जैसे-सूर्य
मेषके दश अंशका है ये परम उच्चका हुआ । इसी प्रकार चंद्र वृषभके तीन
अंशका परम उच्चका, मंगल मकरके २८ अहाईस अंशका, बुध कन्याके १५
पंद्रह अंशका, गुरु कर्कके पांच ५ अंशका, शुक्र मीनके २७ सत्ताईस अंशका
और शनि तुलाके २० बीस अंशका परम उच्चका जानना ॥ २ ॥
स्वोच्चसप्तमस्तिांशाः क्रमशो नीचर्माः परमनीचभागाः ॥३॥
सूर्यादिनोंकी अपनी उच्चराशिसे सातवीं राशि और अंश क्रमसे नीच राशि
और परमनीचके अंश होते हैं ॥ ३ ॥
उचनीचराशिचक्रम् ।
उच्चराशयः
१०३ २८/१५/५३७३०
६७
१०३ २८/१५/५।२७/२०
०
नीचराशयः
मेषेऽङ्गाङ्गाष्टपंचेषवो गुरुशुक्रज्ञाराजानां हदांशाः॥४॥
मेषराशिम अंग ६, अंग ६, अष्ट ८, पंच ५, इषु ५, इन अंशांके क्रमसे
गुरु, शुक्र, बुध, मंगल और शनि हाके स्वामी जानना । अर्थात् मेषराशिके
६ छः अंशपर्यत हद्दाका स्वामी गुरु होता है, उसके आगेके ६ छः अंशका
स्वामी शुक्र, उसके आगेके ८ अंशका स्वामी बुध,उसके आगेके ५ पांच अंशका
स्वामी मङ्गल, उसके आगेक ५ अंशका स्वामी शनि, इसी प्रकार बारहों
राशियोंके हद्दांश के स्वामी समझना चाहिये ॥ ४ ॥

भाषाटीकासहितम् । (११३)
वृषेऽष्टांगेभशराग्नयः सितज्ञेज्यमन्दाराणाम् ॥ ६ ॥
वृषभराशिमें अष्ट ८ अंग ६ इम ८ शर ५ अचि ३ इन अंशोंमें यथाक्रम
शुक्र, बुध, गुरु, शनि, मंगल हद्दाके स्वामी जानना ॥५॥
द्वंद्वेऽङ्गांगाशराव्यगांशा ज्ञशुक्रेज्यारमन्दानाम् ॥ ६ ॥
मिथुन राशिमें अंग ६ अंग ६ शर ५ अदि ७ अंग ६ इन अंशोंके क्रमले
बुध, शुक्र, गुरु, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना॥६॥
कर्केऽयंगांगनगाब्ध्यंशा भौमाच्छञज्यार्कीणाम् ॥७॥
कर्कराशिमें अदि ७ अंग ६ अंग ६ नग ७ अब्धि ४ इन अंशोंके क्रमसे
भौम, शुक्र, बुध, गुरु, शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ७ ॥
सिंहऽगेष्वद्यगांगांशा इज्यसितार्किज्ञाराणाम् ॥ ८॥
सिंहराशिमें अंग ६ इषु ५ अदि ७ अंग ६ अंग ६ इन अंशोंके क्रमसे
गुरु, शुक्र, शनि, बुध, मंगल हदाके स्वामी जानना ॥८॥
कन्यायां नगाशाब्ध्यंगाक्ष्यशा ज्ञाच्छेज्यारार्कीणाम् ॥ ९ ॥
कन्याराशिमें नग ७ आशा २० अब्धि ४ अंग ६ अक्षि २ इन अंशोंके
क्रमसे बुध, शुक्र, गुरु, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥ ९ ॥
तुलेगाटनगाव्यक्ष्यंशा मन्दशेज्यसिताराणाम् ॥ १० ॥
तुलाराशिमें अंग ६ अष्ट ८ नग ७ अद्रि ७ अक्षि २ इन अंशोंके क्रमसे
शनि, बुध, गुरु, शुक, मंगल हदाके स्वामी जानना ॥ १० ॥
कीटे सप्ताब्ध्यष्टशरांगांशा वकाच्छज्यार्कीणाम् ॥११॥
वृश्चिक राशिमें सप्त ७ अब्धि ४ अष्ट ८ शर ९ अंग ६ इन अंशोंमें
यथाक्रम मंगल, शुक्र, बुध, गुरु, शनि हहाके स्वामी जानना ॥११॥
चापेऽर्केष्वन्धिशराब्ध्यंशा इज्यसितज्ञारमन्दानाम् ॥ १२ ॥
धनराशिमें अर्क १२ इषु ५ आधि ४ शर ५ अब्धि ४ इन अंशोंके क्रमसे
गुरु, शुक, बुध, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना ।। १२॥
नके नगनगाब्ध्यष्टवेदांशा शेज्याच्छावित्राणाम् ॥ १३ ॥
मकरराशिमें नग ७ नग ७ अब्धि ४ अष्ट ८ वेद४इन अंशोंके क्रमसे बुध,
गुरु, शुक्र, शनि, मंगल हद्दाके स्वामी जानना॥ १३ ॥

। (११४) वर्षप्रदीपकम् । घटे नगांगादिपञ्चेषवः शुक्रज्ञेज्यारमन्दानाम् ॥ १४ ॥ कुम्भराशिमें नग ७ अंग ६ अदि ७ पंच ५इपु ५ इन अंशोंमें यमाकम शुक्र, बुध, गुरु, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना ॥१४॥ झषेऽभियग्न्यंकाक्ष्यशाः सितेज्यज्ञारार्कीणाम् ॥ १५ ॥ मीनराशि में अर्क १२ अब्धि ४ अग्नि ३ अंक ९ अक्षि २ इन अंशोके क्रमसे शुक्र, गुरु, बुध, मंगल, शनि हद्दाके स्वामी जानना॥ १५॥ हाचक्रम् । .मी. . ३ मे. . नि ! 5. सि. . घ. म. १ २ ६ ११ ६ गु ८ पु ७ में | ६ ७७ ६७में | १२| | | १२ अंशवानी, ११ मंदस्वामी १६ ८३८गु] ५गु ६७० ४गु | ४ | गु३७ १२ वंशलामी १८ १९ ५मा ५३ | ७ में ७ गु ६७, ७ मं| शु. ५गु ५म ८०५ ९में २४ २८ २८ २६ २५ बंशसामी, २८ ५६) ४६ २श २ मा ४३ ४ मा ५/१२ यशस्वामी. ३० ३० अहे प्रथमद्रेष्काणगे तद्राशौ वहियोगे मध्यद्रेष्काणगे तदाशौ सैको- ऽन्त्यद्रेष्काणगे रसयोगेतहाशौ मुनिभक्त शेषेऽकांद्याम्पतयः॥१६॥ यह प्रथमदेष्काणमें हो वो उसकी राशिके अंक ३ वीन मिलाना और मध्यद्रेष्काणमें हो तो उसकी राशिमें (१) एक युक्त करना, एवं अन्त्य (तीसरे) द्रेष्काणमें हो तो उसकी राशि ६ छ युक्त करना, अनन्तर उस राशिमें ७ सावका भाग देना, शेष बचे दो सूर्य, २ बचे वो चन्द्र, ३ वीन बचे तो मंगल, ४ वचे तो वुध, ५ बचे दो गुरु, ६ बचे तो शुक्र, ७ बचे तो शनि द्रेष्काणका स्वामी होता है।॥ १६॥ द्रेष्काणन्दकम् । .मि.क. सिं.क. तु. 1 वृ.प. म. इं.मी. ४ ५ ६ ८ १०११ म. बु.गु. शु. श ...मं.बु.गु.श.श. १० अंश. र.च.मं. बु.गु. शु. श ...मं. बु.गु. २० स १ द्रेष्काण १० अंशका होता है, १० अंशपर्यन्त प्रथम द्रेष्काण, १० से २० अंशपर्यंत मन्य देष्माण, २० से ३० मंशपर्यंत संत्य द्रेष्काण होता है।

भाषाटीकासहितट। (११:१). मेषसिंहचापेषु मेषाद्या वृषकन्यानो मृगाया युग्मतुला- कुम्भेषु तुलाद्याः कर्कालिनीनेषु कर्काचा नवांशाः ॥ १७॥ ॥ मेष १ सिंह ५ धन ९ राशिमें मेपराशिको आदि ले, वृष २ कन्या ६ मकर १० राशि मकरराशिको आदि ले, मिथुन ३ तुला ७ कुम्भ ११ राशिमें तुला राशिको आदि ले और कर्क ४ वृश्चिक ८ मीन १२ राशि कर्क राशिको आदि ले नवांशविभागकी संख्यापर्यंत गिननेसे नवांश होता है, अर्थात-जिवनी संख्या नवांशविभागमें हो उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशि आवे उसका स्वामी नवांशका स्वामी होता है ।। १७ ॥ नर्वाशविभागचक्रम् । ८ ९ नवांश वि. ६.१० ३ १६/२०/ १३/ २६/३० अंश. २०१० २०४० कला. . नवांशसारिणीचकम् । ८ ९ ४ - मे. | वृ. | मि.क./सिं./क ... |ध. म./कुं. मी. अंश. | कला. १ २ ७ १ | १०/७ ४/१/१०/७ 5 २/११/८५/२/११/८५ /२/११/८/५ ६ ३/१२/९६३ (१२/९/६/३/१२/९/६ १० ४|११०७/४/१/१०/७ १/१०/७ १३ २० ५ /२/११/८ १६ ६/३ . १२/९/६/३/१०/९/६/३/१२/९ २० ४ /१/१०/७ ३० ८ (५१/२ ११/८/५/२ ११८५ |२/११/ २६ ९ ६३ ६ १३ । १२/९ /६/३ ३ । १२/ ३० M- 10 १ J- . . गृहोचहहाद्रेष्काणनवांशाः पञ्चवर्गाः॥ १८॥ १ एक राशिके ९ नव भागको नवांश कहते हैं, एक नवांशविभाग ३ तीन अंश २० कलाका ता है। .

. (३१६) वर्षप्रदीपकम् । गृह (राशिके ) स्वामी, उच्च, हदा, द्रेष्काण और नवांश पंचवर्ग होते हैं। अर्थात् प्रथम यहाँकी राशिके स्वामी, फिर उच्च, चदनन्तर हद्दा, एवं रोकाण नाश लिखनेसे पंचवर्ग होता है ॥ १८॥ यो ग्रहो यस्य ज्यायत्रिकोणान्यतमगा स सुहृत् ॥ १९ ॥ जो ग्रह जिस ग्रहसे तीसरे ३ ग्यारहमें ११ नवमें ९ पांचौ ५ स्थानोमैसे किसी स्थानमें स्थित हो वह उस महके मित्र होता है ॥ १९ ॥ केंद्रगस्तथा शत्रुः ॥ २० ॥ शेषस्थानस्थः समः ॥२१॥ और जो ग्रह जिस ग्रहसे केंद्र (१।४।७।१०) स्थानों से कोई भी स्थानमें स्थित हो वह उस ग्रहके शत्रु होता है ॥ २० ॥ शेष २।६।८। १२ दूसरे छठे आठवें बारहवें स्थानों से कोई भी स्थानमें जिस ग्रहसे जो अह स्थित हो वह उसके सम होता है ॥२१॥ स्वगृहे त्रिशल्लवाः सुहृद्रेसाईद्वाविंशतिः। समभे तिथयः शत्रुभे साईसप्तबलम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार मैत्रीचक्र बनाके उस (मैत्रीचक्र) के अनुसार पंचवर्गमें आये हुए ग्रहोंके नीचे मित्र सम शत्रु लिखना, तदनन्तर बल लिखना,उसकी रीति कहते हैं। ग्रह स्वगृही (स्वराशिका ) हो तो ३० तीस अंश, मित्र राशिका हो तो २२ । ३० साढेवाईस अंश, समराशिमें १५ पन्दरह अंश, शत्रुराशिमें हो तो ७ । ३० साढ़ेसात अंश बल जानना ॥ २२ ॥ यथा भवे षड्भाल्पं तथा नीचखेटांतरे द्भतागाभागस्वोच्चबलम२३ ग्रह और उसके नीचका अन्तर जैसे हो सके वैसे छः राशिसे अल्प करना (ग्रहमें नीचको हीन करनेसे ६ छः राशिसे अल्प शेष बचे तो ग्रह से नीचको हीन करना और अधिक बचते हों वो नीचर्मेसे ग्रहको हीन करना) शेष यदि अन्वरके अंश करके राशिको ३० गुणी करके अंश मिलाके उसमें ९ नवका भाग देना, लब्ध उच्चबल होता है ॥ २३ ॥ स्वहदायां तिथ्यंशा मित्रहदायां सपादैकादश समहदायां सादसत शहदायां पादोनवेदांशा बलम् ॥२४॥ ,

१
A-
भाषाटीकासहितम् ।
(११७)
यह स्वराशिकी हद्दामें हो तो १५ पंदरह अंश, मित्र बहकी हद्दा, १११
१५ सवाग्यारह अंश, समग्रहकी हद्दामें ७।३० साढ़ेसात अंश, शत्रु ग्रहको
हद्दामें हो तो ३२४५ (पौनेचार अंश) बल जानना ॥ २४ ॥
वद्वेष्काणे दश मित्रद्वेष्काणे साईनगाः समद्रेष्काणे ।
पञ्च शत्रुद्रेष्काणे साईयमा अंशाबलम् ॥ २६॥
ग्रह स्वराशिके द्रेष्काणमें हो तो १० अंश, मित्रग्रहके द्रेष्काणमें हो तो
७।३० साढ़ेसाव अंश, समग्रहके द्रेष्काणमें ५ पांच अंश, शत्रुग्रहके द्रेष्काणमें
हो तो २।३० अढ़ाई अंश बल जानना ॥ २५ ॥
स्वनवांशे पञ्च मित्रांशे पादोनवेदाः समांशे साधयमा
रिवंशे सपादेको बलम् ॥२६॥
ग्रह-स्वराशिके नवांशमें हो तो ५ पांच अंश, मित्रनवांशमें ३।४५ पौने-
चार अंश, समनवांशमें हो तो २।३० ढाई अंश, शत्रुनवांशमें हो तो ११५
(सवा ) अंश बल जानना ॥ २६ ॥
,
ঘশ্বাভঙ্গী।
स्व. मित्र | सम शत्रु
३०/१२/१५
स्व.
.
३
हदा.
.
१०
१५/३०४५
२
देष्काण
३० ३०
५
द्रेष्का.
५
नवां.
२
नवांश
४५/३०/१५
पंचवर्गबलैक्ये वेदोद्धृते लब्धं विंशोपकात्मकं बलम् ॥ २७ ॥
पंचवर्गके बलके ऐक्ये (योग) में ४ चारका भाग देना जो लब्ध आवे उसे
विश्वात्मक बल.जानना चाहिये ॥ २७ ॥
पडल्पोऽल्पबली व्यधिक पूर्णबली ॥२८॥

(११८) वर्षपदीपकम् । आया हुआ विश्वात्मक बल ६ छः से अल्प हो तो अल्पबली और बारहसे अधिक हो तो पूर्णनली, ६ छः से अधिक बारहसे न्यून हो वो मध्यबली होता है ॥२८॥ उदाहरण। सूर्य २०१६॥५३॥३९ कुम्भराशिका है, इसका स्वामी शनि है, सो गृहका स्वामी हुआ। एवं सूर्यका उच्च ०1३० हद्दा--सूर्य कुम्भ राशिके ३ हद्दा- शमें (प्रथम ७ अंश फिर ६ अंश मिलानेसे १३ होते हैं इससे अधिक अंश सूर्य है, इसलिये दो अंश गये और तीसरे ७ अंशमें हुआ ) है इसका स्वामी गुरु है वह सूर्यकी हद्दाका स्वामी हुआ। द्रेष्काण--सूर्य मध्यद्रेष्काणमें है इसकी राशिमें १० में १ एक युक्त किया १३ हुए, सातका माग दिया ४ शेष बचे, वो सूर्यको आदि ले कमसे ४ बुध द्रेष्काणका स्वामी हुआ। नवांश-सूर्य कुम्भराशिके छठे नवांशविभागमें है (१६। ४० से अधिक है अतएव तुलराशिसे नवांश विभागसंख्या ६ पर्यंत गिननेसे मीन राशि हुई. इसका स्वामी गुरु है सो सूर्यके नवांशका स्वामी हुआ, ऐसे ही सर्वप्रहले पंचवर्ग जानना। बृहत्पंचवर्गचक्रम्. श. सू. चं. | मं. तु. श श श गु मि मि मि | भि स्वगृह. १ २८ Saare बाम 2264/बख्या 464/0/जाम InceTENCER गु मि ११ २७ म शु श bir hom wwwml 44/564|acalmla र मं शद्रकाण श । स श नवांश में, दु . गु. म 16464 गु ए मं मैत्रीसाधन--उदाहरण। बैत्रीचक्रम्. सूर्यसे ११ स्थानमें शनि स्थित है वह सूर्यके मित्र हुमा, एवं सूर्य- से १ स्थानमें चन्द्र, मंगल १० स्थानमें गुरु स्थित है, ये सूर्यके राहु. शत्रु हुए और २ स्थानमें बुध, शुक्र स्थित है, वे सम हुए। इसी प्रकार सर्वग्रहोंके मित्र शत्रु समझना । मिय. बु रमें ar मा सम, शु मं च दु स मेरम गु IFE यु स मं ..

भाषाटीकासहितम् । (११९) बलसाधन-उदाहरण। सूर्यके गृहका स्वामी शनि सूर्यका मित्र है, इसलिये गृहमें सूर्यके नीचे २२॥ ३० अंश बल लिखा. उच्चबल सूर्य १० । १६।५३।३९ नीच ६३००० सूर्यमसे नीच हीन किया ४।६।५३।३९ शेष बचे इसके अंश किये १२६ । ५३॥ ३९ हुए, नवका भाग दिया लब्ध १४ आये शेष शून्य बचा, इसको साठसे गुणा किया,इसमें ५३ कला मिलायी ५३ हुए और नवका भाग दिया, लब्ध ५ आये, सो सूर्यका उच्चबल १४, ५ हुआ । हद्दा-बदाका स्वामी गुरु सूर्यका शत्रु है, अतः हृद्दाका शत्रु बल ३।४५ सूर्यके नीचे हद्दा, लिखा- द्रेष्काण, सूर्यके द्रेष्काणका स्वामी बुध सूर्यके सम है इसलिये द्रेष्काणमें समका वल ५० प्राप्त हुआ। '' नवांश सूर्यके नवांशका स्वामी गुरु सूर्यके शत्रु है, अतएव नवांशमें सूर्यके नीचे शत्रु नवांश बल ११३५ लिखा, यह पंचवर्ग बल हुआ। इन पांचोंका योग किया ४६।३५ पंचवर्ग बलैक्य हुआ, इसमें ४ चारका भाग दिया, लब्ध १३ १३८१४५ आये, यह सूर्यका विंशोपकाल्पक बल हुआ । ग्रहबल ६ से अधिक और १२ बारहले न्यून है,अतः मध्यमबल जानना । एवं शेष चन्द्रादि सर्वग्रहों का किया जाता है। पंचवर्गबलचक्रम् । र ...मं.बु.गु. शु.श. २२/१२/२२/२२/७/२२/१५ ३०/३०/३०/३०/३०/३०० गृह. १४/९/१८/३/५/१९/१४ ५४२/५६/२९/७ ४७/२७ ह . हदा. ४५/३०/३०/४५/१५/३०/३० द्रेष्का. ३०/३० ३० १/२/१२/५/११ नवां. १५/३०/१५३०० १५/१५ ४६/४७/५५/३२३११५६/४० योग. ३५/१२/११/३४/२२/२४२ (१२०) वर्षपदीपकम् । विंशोपकात्मकबलम् । र. चं. मं.बु.गु.शु.श. १२.११/१३८ ७|१४|१० ३८४८/४७/११/५००/१० ४५० ४५० ३०३०३० म.म.पू. म.म.यू. म. चन्द्राकारेज्याः परस्परं मित्राणि शेषाश्च ॥ २९ ॥ अव अन्य आचार्यले मतकी स्थिरमैत्री लिखते हैं:-चन्द्र, सूर्य, मङ्गल, गुरु ये परस्पर मित्र जानना और शेष रहे बुध, शुक्र, शनि, ये परस्पर मित्र जानना॥ २९ ॥ इतरथा रिश्वः ॥३०॥ ऊपर कहे हुए मित्रबहते जो शेष रहे वे शत्रु होते हैं ॥ ३० ॥ स्थिरमैत्रीचक्रम् । 5. शु . गु. ज्ञा. चं. म. र... चं. शु. र. चं. बु. । शु. गु. गु. श. म. श. मित्र. बु.गु..शु.बु.शु. २... शु. र. नं. २. चं. श. श. श. म. गु.] घ. चं. गु. मं. गु. स्वत्वाधिकारबलाई मिर्के बलं तदध शत्रुमे शेषं प्राग्वदित्येके३१॥ इस स्थिरमैत्रीके मित्रशत्रुके अनुसार पञ्चवर्गबल लानेकी रीति कहते हैं:- गृह ३० हद्दा १५द्रेष्काण १० नवांश ५ के कहे हुए अपने अपने राशिके बलको स्वराशिगत ग्रहमें यथावस्थित (गृहमें ३० हदा, १५ द्रेष्काणमें १० नवांश ५) ही जानना और अपने अपने स्त्रका आधा आधा बल मित्रराशिगत हमें और मित्रराशिगत ग्रहका आधा आधा बल शत्रुराशिगत यह जानना, अर्थात् स्वमें पूरा, मित्रमें स्वका आधा, शत्रुमें मित्रका आधा लिखना, जैसे-गृहमें स्वराशिका ३० अंश बल है, उसका आधा १५, मिन भापाटीकासहितम् । (१२३) राशिगतका बल और उसका आधा ७ । ३० शत्रुराशिगतका बल हुआ है शेष रीति प्रथम कहे समान करना । ऐसा अनेक आचार्योंका मत है ॥ ३१ ॥ स्व १५ १० उदाहरण। बलवक्रम्. गृहमें-सूर्यको राशिका स्वामी शनि ग्रह हदा ट्रेका नवां स्थिर मैत्रीमें सूर्यका शत्रु है इसकारण सूर्यके नीचे गृहमें स्वगृहके बल ३० के आधेका मिन आधा लिखा ७।३० उच्चवल पूर्वानीत लिखा १४॥ ५. हद्दाम-सूर्यकी हद्दाका स्वामी गुरु १५ | स्थिर मैत्रीमें सूर्यके मित्र है, अतएव हद्दाके स्वराशिके बल १५ का आधा । ३० लिखा । एवं सूर्यके द्रेष्काणका स्वामी १५ ३० ५ ३ ३ २ १ 98 ชน गृह. B0B0/20३००/B0B0 १८/१/१८ १५/१९१४ उन्च. |५/१२/५६२९/७/४७/२७| - स्थिरमैत्रीमित्रशत्रुवशेन | बुध स्थिरमैत्रीमें सूर्यके शत्रु हैं इसलिये पञ्चवर्गवलचक्रम्. द्रेष्काणके स्वराशिके बल १० का आधेका सू../म.पु.गु.श.श. आधा २ । ३० द्रेष्काणमें सूर्यके नीचे लिखा । नवांश--सूर्यके नवांशका स्वामी गुरु सूर्यके मित्र है, अतएव नवांशबल ५। ० का आधा २।३० नवांशमें सूर्यके नीचे लिखा। इन पांचोंका योग किया ३४॥ २/२/२/५/५/२/५ द्रेष्का. ५ आया यहां ४ चारका भाग दिया, नवां. लब्ध ८ । ३३ । १५ विंशोपकात्मक રેપર૦ ૦ર ३४२५/३५/२२३३३६/३२ योग. नववरच विशोप. मध्यमबल हुआ । ऐसे ही शेष ग्रहोंका ३१/१०/४७/४१२८० १८ कात्मक बल जानना । हद्दा. ३०/४५/४५/३०/४५/४५/४५ ३ .. - बल हुआ, यह ६ छहसे अधिक है, इसवास्ते ५४२११४४/५२/२/१२ १५३०४५० 01Bolo वलम्. म.म.म.मि. म.म.बल. -- . . बलका योग करना उसको चारका भाग देना आदि रीति ।

. . ( १२२) वर्षपदीपकम् । भादयोऽकौशांता द्वादश वर्गाः॥ ३२ ॥ स्वगृहको आदिले द्वादशांशपर्यंत (स्वगृह १ होरा २ द्रेष्काण ३ चतुर्थीश. ४ पंचमांश ५ षष्ठांश ६ सप्तमांश ७ अष्टमांश ८ नवमांश ९ दशमांश १० एकादशांश ११ वादशांश १२) द्वादशवर्ग होता है ॥ ३२ ।। माघधिपाः प्राग्वत् ॥ ३३॥ राशियों के स्वामी प्रथम कहे समान जानना ॥ ३३ ॥ विषमझे सूर्यशशिनोः समझे व्यत्ययेन होरा ॥ ३४ ॥ विषमराशिमें प्रथम सूर्य, दूसरे चन्द्रकी होरा होती है और समराशिमें विप- रीत अर्थात् प्रथम चन्द्र द्वितीय सूर्यको होरा होती है ॥ ३४ ॥ स्वेषु नवःशा श्रेष्काणपा ।। ३६ ॥ प्रथम द्रेष्काणमें अपनी राशिका स्वामी, दूसरे (मध्य) द्रेष्काणमें अपनी राशिसे पांचमी राशिका स्वामी, तृतीय (तीसरे) द्रेष्काणमें अपनी राशिसे नवमी राशिका स्वामी, द्रेष्काणका स्वामी जानना ॥ ३५॥ केचित्प्राग्वत् ॥३६॥ कोई आचार्य जो पंचवर्गमें प्रथम द्रेष्काण कहा है वही करना ऐसा कहते हैं ॥ ३६॥ स्वतंजकेन्देशा वेदांशपाः ॥३७॥ अपनी राशिसे प्रथम चतुर्थांशमें अपनी राशिका स्वामी, दूसरेमें ४ चौथी राशिका स्वामी, तीसरेमें सातवीं राशिका स्वामी चौथेमें १० दशमी राशिका स्वामी चतुर्थांशका स्वामी होता है ॥ ३७ ।। ओजः भौमार्कीज्यशसिताः समः प्रतिलोमतः शरांशपाः ॥३८॥ विषम (एक) रॉशिमें प्रथम पंचमांशमें भौम दूसरेमें शनि तीसरेमें E १ पंदरह १५ अंशकी एक १ होरा होती है ( ० अंशसे १५ अंशतक प्रथम होरा १ अंशसे । ३० अंशपर्यंत दूसरी होरा हो)। २ दशअंशका १ द्रेष्काण होता है। ३ एकराशिके ४ चार मागको कहते हैं, एक चतुर्थाशविभाग चतुर्थांश विभाग ७ अंश ३० कलाका होता है। ४ एकराशिके ९ पांचमें भागको कहते हैं- २२ ३० अंश. एक पंचमांश ६ छ अंशका होता है। कळा. १ २ ३ ७ .

- . . (११, १५/१८१२ अंश. भापाटीकासहितम् । (३२३) गुरु, चौथेमें बुध, पांचवेमें शुक्र, समरराशिमें विपरीव ( १ शुक्र २ बुध, ३ ' गरु, ४ शनि, ५ मंगल ) पंचमांश के स्वामी होते हैं ॥ ३८ ॥ विषमः मेषायाः समसे तुलायाः षष्टांशाः ॥ ३९ ॥ विपमराशिमें मेपराशिको आदि ले, समराशिमें तुलाराशिको आदि ले गिननेसे पंष्ठांशके स्वामी होते हैं ॥ ३९ ॥ ओज स्वभाद्या युग्मः तत्सतपायाः सप्तमांशाः ॥ ४० ॥ विएमराशिमें अपनी राशिको आदि ले,समराशिमें अपनी राशिसे जो सातवीं राशि हो उसको आदि ले सप्तयांश विभागकी संख्यापर्यंत गिननेस जो राशि भावे उसके स्वामी सप्तमांशका स्वामी होता है (यह जितनी संख्याके सप्तमां- शविभागमें ही उतनी संख्यापर्यन्त विषभराशिमें अपनी राशिसे, सममें सातही राशिसे गिननसे सप्तमांश होता है ) ॥४०॥ चरभेऽजायाःस्थिरमे चापाद्या उभयभे सिंहाचा अष्टमांशाः॥8॥ चर (१ । ४।७।१०) राशिमें मेषराशिको आदि ले, स्थिर (२। ५। ८1११) राशिमें धनराशिको आदि ले,द्विस्वभाव( ३ । ६ । २।१२) राशिम सिंहराशिको आदिले जिवनी संख्याके अष्टमाँशविभागमें ग्रह हो उतनी संख्यापर्यंत गिननेसे जो राशि आवी है उसका स्वामी अष्टमांशका स्वामी होता है ।। ४१॥ १ एक राशिके १ छठे भागको कहते हैं-एक षष्ठांश ५ पांच अंशका होता है । २ एक राशिके ७ हिस्सेको कहते हैं-एक सप्तमांश विमाग ४ अंश १७ कलाका होता है । ३ एक राशिके ८ मागको कहते हैं-एक अष्टमांश विभाग ३ अंश ४५ कलाका होता है। सतमाशविभाग. अष्टमांशविभाग. ३ २६ ४५ १ ८ २ ६ १ २३ ४ ७ ८/१२/१७/२१/२५/३० १७/३४/५१/८/२५/४२ ८.१७/२५/३४/४३४५२ ३ (१२४) वपनदीपकम्। नवांशाः प्राग्वत् ॥ १२॥ नवांशके स्वामी प्रथम कह चुके हैं उसके समान करना ॥ ४२ ॥ यस्य ग्रहस्य दशांशकादशांशी कर्तव्यौ तदीयभादौ दशैकादश- गुणिते तदशांशादिमादिस्फुटः ॥ १३ ॥ जिस ग्रहके दशांश तथा एकादशांश करना हो उस (ग्रह) की राशि अंश कला विकलाको दशांशमें १० दशगुणा, एकादशांशमै १३ इग्यारह गुणा करना, कमसे कलामें ६० साठका भाग देना, लब्ध ऊपरके अंशमें युक्त करना, अंशमें ३० वीसका भाग देना और लब्ध राशिमें मिलाना फिर राशिमें १२ बारहका भाग देना जो शेष बचे वह दशांश एकादशांशके राश्यादि स्पष्ट होता है, इस स्पष्टकी राशि स्वामी दशांश एकादशांशके स्वामी होते हैं ।। ४३॥ स्वभादांशाः ॥ १४ ॥ अपनी राशिसे जितनी संख्याके बादशांशमें ग्रह हो उतनी :संख्यापर्यन्त गिननेसे जो राशि आवे उसका स्वामी द्वादशांशका स्वामी होता है ॥४४॥ स्वमित्रोच्चशुभवर्गाः शुभा अन्येऽधमाः ॥ ४५ ॥ स्व, मित्र, उच्च और शुभग्रहके वर्ग शुभ अन्य (शत्रु सम ) नीच और पाप आदिकके वर्ग अधम (नेष्ट) होते हैं-अर्थात् जिस ग्रहके बादशवर्गमें शुभ ग्रहाँका स्वराशिस्थ, मित्रराशिस्थ उच्चराशिस्थ ग्रहोंका वर्ग अधिक हो वह ग्रह शुभफल देगा और जिसके द्वादशवर्गमें पापग्रहोंका शत्रुराशिस्थ ग्रहोंका नीच- गवग्रहोंका वर्ग अधिक हो वह ग्रह श्रेष्ठ हो तो भी नेष्ट फल देगा ॥ ४५ ॥ १ एक राशिके १२ भागको कहते हैं एक द्वादशांश २ अंश ३० कला ( ढाई अंशका होता है । द्वादशांशविभाग. ८ ९/१०/११/२२ विभागसंख्या. ३ 3o ७.१० १२ १५/१७/१०/२३]२५.२७/३० ३० ३० ३० ०३० अंश. कला. .

1 गामापाताप १२९५). वर्गेशे स्वसंगे विंशतिर्मित्रः तिथयः समः दश रिपुमे पंच बलम् ॥ १६ ॥ द्वादशवर्गके वर्गका स्वामी स्वराशिका हो तो बीस २० अंश, मित्रराशिका हो वो १५ पन्दरह अंश, समराशिका हो तो ३० दश अंश, शत्रुराशिका हो वो ५पांच अंश बल जानना ॥४६ ॥ स्व.म.स.श २०१५/१०/५ . . द्वादशवर्गजबलैक्येऽभक्ते विंशोपकाः ॥ १७॥ दादशवर्गके बलके योगमें बारह १२ का भाग देना जो लब्ध आवे वह विंशोपकात्मक बल होता है ।। ४७॥ उदाहरण। सूर्य १० । १६ । ५३ ॥३९ । की राशि कुंभका स्वामी शनि सूर्यके गृहका स्वामी हुआ।होरा सूर्य विषमराशिकी दूसरी होरामें है, इसका स्वामी चन्द्र होराका स्वामी हुआ। द्रेष्काण-सूर्य मध्यदेष्काणमें है,इस कारण अपनी राशि ११ कुंभसे पांचवीं राशि मिथुनका स्वामी बुध द्रेष्काणका स्वामी आया । एवं सूर्य तृतीय चतुर्थांश विभागमें है, इसलिये अपनी राशि ११ से सावीं राशि ५ सिंहका स्वामी सूर्य, सूर्यके चतुर्थांशका स्वामी हुआ। पंचमांश-विषम- राशिस्थित सूर्य तीसरे पंचमांशविभागमें है, अतएव विषमराशिमें तीसरे पंचमां- शका स्वामी गुरु सूर्यके पंचमांशका स्वामी हुआ । एवं सूर्य ४ चौथे षष्ठांशमें है और विषमराशिका है, इसलिये मेघराशिसे षष्ठांशविभागकी संख्या ४ चार पर्यंत गिना तो कर्कराशि हुई, इसका स्वामी चन्द्र सूर्यके पष्ठांशका स्वामी हुआ, एवं सप्तमांशविभागमें सूर्य४चतुर्थ संख्याक विभागमें स्थित है यह विषम- राशिगत है इसवास्ते अपनी राशि ३३ कुम्भसे ४ चार पर्यंत गिननेसे ४ चौथी वृषभ राशि हुई, इसका स्वामी शुक्र सूर्यके सप्तमांशका स्वामी हुआ, ऐसे ही अष्टमांश विभागमें सूर्य ५ पांचवे अष्टमांशमें स्थित है और स्थिर राशि ११का है, अतः धनराशिको आदि ले ५ पांच संख्यापर्यन्व गिननेसे मेष राशि हुई, इसका स्वामी भौम सूर्य के अष्टमांशका स्वामी हुआ। नवांशके स्वामी लानेकी युक्ति प्रथम कही है, उसी रीतिके समान नवांश विभाग ६ छठे नवांशमै सूर्य स्थित है, इस कारण तुलाराशि (३।४।११के नवांश ७ तुलासे गिनना) (१२६) वर्षप्रदीपकम् । से ६ संख्यापर्यन्त गिननेसें १२ मीनराशि हुई, इसका स्वामी गुरु सूर्यके नवां- शका स्वामी हुआ, सूर्य १० । १६ । ५३ । ३९ को दशांश करना है, इस कारण १० दशगुणा किया १०० । १६० । ५३० । ३९० हुआ-विकला कला साठसे अधिक हैं इससे विकला ( ३९०.) में साठका भाग दिया. लब्ध ६ कलामें मिलाके (५३६ ) साठका भाग देंलब्ध ८ अंशमें युक्त किये, अंश वीससे अधिक हैं इस लिये अंश ( १६८) में ३० वीसका भाग दिया लब्ध ५ पांच राशिके अंक १०० में युक्त किया: १०५ हुए राशि (१०५) में१२ बारहका भाग दिया, शेष ९ । १८ । ५६ । ३० राश्यादिक बचा, यह सूर्यका दशांश हुआ। इसकी राशि १० का स्वामी शनि सूर्यके दशांशका. स्वामी हुआ। एवं एकादशांशमें सूर्य १० । १६ । ५३ ॥३९ को ११ ग्यारहसे गुणा किया ११०॥ १७६ १.५८३ । ४२९ हुआ । विकलाकलासाठके अंशमें तीसकी राशिम १२ बारहका कमसे भाग देनेसे शेष बचे ८।५। ५०९ यह सूर्यका एकादशांश स्पष्ट हुआ। इसकी राशि ९ धनका स्वामी गुरु सूर्यके एकादशांशका स्वामी हुआ-एवं अपनी राशि ११ कुम्भसे सूर्य. ७ सातवें दाद- शांशमें है, इसलिये ७ संख्यापर्यन्त गिननेसे ५ सिंह राशि हुई, इसका स्वामी सूर्य सूर्यके द्वादशांशका स्वामी हुआ । इस प्रकार सूर्यके द्वादशवर्ग हुए ऐसे ही शेष ग्रहोंके तथा भावोंके और सहमादिकोंके द्वादशवर्ग जानना । सूर्यके बादश वर्गमें स्वराशिके वर्ग २ मित्रके २ शुभग्रहके ७ वर्ग हैं इनका योग किया ३३ ग्यारह हुए, इस कारण सूर्य शुभफल देगा। ऐसे ही सर्वग्रहोंके शुभाशुभफल समझना चाहिये। द्वादशवर्गवलठदाहरण। सूर्यके-गृह ( राशि) का स्वामी शनि सूर्यके मित्र है, इस कारण ३५।। पन्दरहका बल गृहमें प्राप्त हुआ । एवं होरामें सूर्यकी होराका स्वामी चन्द्रसूर्यका शत्रु है, अतः५० बल प्राप्त हुआ एवं द्रेष्काणमें द्रेष्काणपति बुधका समराशिका बल १०० चतुर्थांशमें चतुर्थांशपति सूर्यका स्वका २०१०बल पंचमांशमें पंच- मांशके स्वामी गुरुका शत्रुका ५० बल षष्ठीशमें षष्ठांशके स्वामी चन्द्रका शत्रु राशिका बल ५५० सप्तमांशमें, सप्तमांशके स्वामी शुक्रका समराशिका ३०० । -- . भाषादीकासहितम् । (१२७) बल अष्टमांशमें अष्टमांशपति भौमका शत्रराशिका ५० बल नवांशमें नवां- शका स्वामी गुरुका शत्रुका ५। ० बल-दशांशमें दशांशके स्वामी शनिका मित्र बल १५। . एकादशांशमें एकादशांशके स्वामी गुरुका शत्रुका बल ५० द्वादशांशमें द्वादशांशका स्वामी सूर्य स्वराशिका है, इसलिये स्वका २० । . बल प्राप्त हुआ, यह सूर्यके द्वादशवर्गका बल हुआ, इसका योग किया १२०० आया इसमें १२ बारहका भाग दिया, लब्ध १०० सूर्यका विंशोपकात्मक द्वादश वर्ग बल हुआ। ऐसे ही शेष ग्रहोंका जानना ॥ ग्रहाणांद्वादशवर्गचक्रम्. द्वादशवर्गनलचक्रम्. . र. च. मं.) बु. गु...! १५/१५] १५/१५ ५ १५/१० गृह. . . . . य . . . . . ५ १०५ | १०१५ होरा. १०/१५/१५/१५/२०/१०/१० द्रेष्काण. . . . . . . २० २०१५/१०/१५/१५/११/१० चतुर्थाश. . . . . . . . - ५.१५ ५1१०/१०२० पंचमांश. । . . . . १०।१५/ ५ षष्ठांश र. चं. मं. बु.गु. शु. श. 20 ११ श११ १२गुट में १२ गु९ गु गु. मिमि मि मिश निस ४, ५ र ५ र ४५र५र | ५र हो. का श स श स ३ बु ११ १२ १२गु १२८ में ९ गु दे. स मिमि | मि| स्व स स ५२ ११२ १२गु २ ९ गु १२गु रव मि| स! मि मि| मि। स ९गु १ मे ११ शार शु १००८ में |११ पं. पा मि || स ४१ में शुश १० शगु २शु प. शा स नि । श २ शु/97/१२ गुदबु ६ बु १५ शश स. मिश स्व मिश२० १९ गु१,५र२ शु ११ स, ७शु श श मिस मिश १२गु शु ९ गु४ च ९ गु ११ २ ३७ न. स का श (१०४/५ र शु३५ र ११ १२गु है. मि श श स ८ ग ३ व ५ र २.१२ गु११ शाम शस श मि स्व ५र१२ शु १२ गु३७०, स्व मिस | मि मिा मिश ० . . . . १०।१५। ५/२०१५। ५ ।२० सवमांश. . . . . . स ५ ५ १५/१०1१५ ५ भ, अष्टमांश. . . . ५ १०/२०१५ नवमांश. ० . १५/५/१०/२०/५ ०० दरांश. . . . स ५ २०/५/१५ एकावा. 0 . . २०१५/१०/१५]:५/ ५ १० बादांच. . . . . . . १२०/१२०/१२०/१४५/१५५/१०५/१३५/ योग. ११८ १०/११/७३।११ शुभ. 0 . . . १ १०/१०/१०/१२/१२ ८/११ विंशोपका- ५५५/४५/ १५त्मक बळ, १ ४ १ १ पाप, १ ९ . . C म. म. म.पू.पू.म.मि. म. म.

(१२८) वर्षप्रदीपकम् । स्वभे शतं कलानां मित्रमे पंचाशत् शत्रुभे पञ्चविंशतिः॥४८॥ स्वराशिमें १०० सौ कला, मित्रराशिमें ५० कला, शत्रुराशिम २५ पच्चीस कला, स्थिर-मैत्रीके मित्र शत्रुवशसे द्वादशवर्ग बल जानना ॥ ४८॥ - मि. श. १०० ५० ०कला. ० " तदैक्ये षष्टिभक्ते विंशोपका इत्येके ॥ १९ ॥ स्थिरमैत्रीके मित्रशत्रुक्शसे लाये हुए द्वादशवर्गके बलके ऐक्य (योग) में ६० साठका भाग देना, जो लब्ध आता है वह विंशोपकात्मक बल होता है, ऐसा अनेक आचार्योंका मत है ॥ ४९ ॥ उदाहरण द्वादशवर्गमें सूर्यकी राशिका स्वामी शनि स्थिर मैत्रीमें सूर्यका शत्रु है, इस- लिये सूर्यके गृहमें नीचे २५० कला बल लिखा, एवं होराका स्वामी चन्द्र मित्र है सूर्य के इस कारण ५० कला बल होरामें लिखा, द्रेष्काणका स्वामी बुध शत्रु इससे शत्रुका३५ कला बल द्रेष्काणमें, चतुर्थांशमें सूर्य स्वराशिका है, अतः स्वका १०० कला बल, एवं पंचमांशमें-पंचमांशका स्वामी गुरु मित्र है, अतएव मित्रका ५० कला बल और षष्ठांशका स्वामी चन्द्र भी मित्र है, इसलिये षष्ठांशमें भी५० कला बल लिसा और सप्तमांशका स्वामी शत्रु है अतः सप्तमांशमें शत्रुका भी२५ कला बल, अष्टमांशका स्वामी भौम मित्र है इसलिये अष्टमांशमें मित्रका ५० कला बल। नवांशका स्वामी गुरु मित्र है इससे नवांशमें मित्रका बल ५०कला और दशांशका स्वामी शनि सूर्यके शत्रु है इसवास्ते दशांशमें शत्रुका २५ कला बल लिखा और एकादशांशुका स्वामी गुरु मित्र तथा द्वादशांशका स्वामी सूर्य स्वका है, इसलिये एकादशांशमें मित्रका ५० कला बल और द्वादशांशमें स्वका १०० कला बल लिखा । यह द्वादशवर्ग बल हुआ,इसकायोग किया ६०० आये ६० साठका भाग दिया लब्ध १०० विंशोपकात्मक सूर्यका द्वादशवर्ग बल हुआ। ऐसे ही शेष चन्द्रादियहाँका द्वादशवर्गवल जानना ।

। भाषाटीकासहित । ( १२९) स्थिरमैत्रीवशात् द्वादशवर्गवलचक्रम्, र. चं. | मं. | . ૨e २५ २५ ६५ Ce गृह. . 0 . . १० २५ २५ २ होरा. . . 01 ... २५ २५ २५५०० २५ २५ ३ BY द्रेष्काण. . 2012 . . १०० ३५ २५ १५ २५ २५ चतुर्थाश. . . . ००० २५ २५ | १०० पंचमांश. २५ १.९० २५ २५ ६ पष्ठांश. 0 . २५ २५ १०० १०० 2. सतमांश. . . . . ५० ५० २५ २५ ८ अष्टमांश. . . १० १०० 2. ९ नवमांश, . . 0 . 2018 - २५ १००। ५० २५ दशमांश. . . . ० २५ ५० १००। ५० २५ ११ / एकादशक्षि. . . . १००] २५ २५ २५ २५ ૨૬ १२ दादशांश. . . . . . ६००/४२५/४००/५२५,६००/४५०/५२५ योग. . . . . . ८ ७ ८ ६ ४० विशोपका- त्मकवलम्. . ३० . म. म. म. म. म. म. म. चल. स्वभस्वोच्चान्यतरस्थितौ ग्रहस्य प्रथम हर्षपदम् ॥ ६०॥ स्वराशि वा अपनी उच्चराशिमेंसे कोई भी राशिका जो ग्रह हो (ग्रह स्वराशिका हो वा अपनी उच्चराशिका हो) वो उस ग्रहका प्रथम हर्ष-पद होता है ॥ ५० ॥ गोत्रिषट्क्वीशबाणांत्यगेषु सूर्यादिषु द्वितीयम् ॥५१॥ सूर्यको आदि ले गौ ९, त्रि ३, षट् ६, कु ३, ईश ११, वाण ५, अन्त्य १२ बारहवें स्थानमें यथाक्रम मह स्थित हो तो द्वितीय हर्षपद होता है,

वर्षपदीपक
अर्थात सूर्य ९, चन्द्र ३, मङ्गल ६, बुधः ३, गुरु ३३,शुक्र ५, शनि ३२
स्थानमें हो तो दूसरा हर्षपद होता है ।। ५३ ॥
सूर्यारेज्या नराः शेषाः स्त्रियः॥५२॥
सूर्य, मङ्गल, गुरु पुरुषग्रह, शेष (चन्द्र, बुध, शुक्र, शनि) स्त्रीग्रह
जानना ॥ १२ ॥
दिने घुमान् रात्रौ स्त्री तृतीयम् ॥ ५३॥
दिनमें वर्ष प्रवेश
हो वो पुरुषग्रह, रात्रिमें स्त्रीग्रह बलवान् जानना और
तृतीय (वीसरा) हर्षपद होता है ॥ ५३॥
तुर्यमतस्त्रिषु त्रिशु नृस्त्रियो तुर्यम् ॥ १४ ॥
चतुर्थभावसे तीन तीन स्थानमें पुरुषग्रह और स्त्रीमह स्थित हो तो चतुर्थ.
हर्षपद होता है, अर्थात् ४ । ५। ६। पुरुषयह, ७।८। ९ स्त्रीग्रह, १० ।
१३ । १२ पुरुषग्रह, ३।२।३ स्त्रीग्रह स्थित हो तो ४ हर्षपद जानना
चाहिये ॥ ५४॥
चतुर्वेषु प्रत्येकं पंचविंशोपका बलम् ॥५५॥
इति बलाध्यायस्तृतीयः ॥ ३॥
इन चार ही हर्षपदोंमें प्रत्येक (एक एकके प्रति) के पांच पांच विंशोपका
बल जानना चाहिये ॥ ५५॥
हर्षपदचक्रम
ए
चं
मं
foy
ग
०/धा
५.
.
Sy
प्रथम.
द्वितीय.
तृतीय.
५ चतुर्थ.
योग.
.
.
५
उदाहरण ।
यहां शुक्र उच्चराशिका है, इसलिये प्रथम हर्षपदमें यह बलवान् हुआ।
सूर्यको आदि ले कोई ग्रह द्वितीय हर्षपद स्थानों में नहीं है, अतः द्वितीय हर्षपद
किसीका नहीं आया । दिनमें वर्षप्रवेश हुआ है इससे पुरुषग्रह (सूर्य मंगल गुरु)
तृतीयहर्ष बलदाता हुए । एवं चतुर्थस्थानसे वीन तीनमें पुरुष स्त्री ग्रह देखनेसे
६.आठमें शनि स्त्री यह और१० । ११ में सूर्य मंगल पुरुषग्रह स्थित हैं, ये
चतुर्थ हर्षपदमें बली हुए ॥
इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षप्रदीपिकाख्यताजिकान्थे तदङ्गजश्रीनिवासविरचितायां
सोदाहरणभाषान्याख्यायां बलसाधनाध्यापस्वतीयः ॥ ३॥

. भाषाटीकासहितम् । -- अथ दृष्टिसाधनमाह। पश्योनदृश्ये द्विदिग्भशेषे तदिनांशा अर्धास्तिथिशुद्धा- स्तथा व्यंकशेष भोग्यांशा एव वेदाष्टशेषे च सार्दा अंशाः पञ्च वेदतः शुद्धास्तथैव तनिशेषेऽशा द्विग्नाः षष्टिशुद्धाः कलाद्या दृष्टिरन्यः तदभावः ॥३॥ पश्यग्रहको हीन करना, दृश्यग्रहमेंसे दो २ राशि १० दशराशि शेष बचे तो राशिके विना अंशाको आधे करना और १५ पंदरहमेंसे शोधना। ऐसे ही वीन ३ राशि,९नवराशि शेष बचे वो अंशांको वीसमेंसे शोधना, एवं ४ राशि, ८ आठराशि शेष बचे तो राशि विना अंशोंको ड्योढ़ा ( अंशोंको आधे करके उन्ही अंशोंमें मिलाना ) करना और ४५ पैंतालीसमेंसे शोधना। इसी प्रकार ६ छः राशि अथवा शून्यराशि शेष बचे तो राशि विना अंशोंको दोगुणे कर ६० साठमेंसे शोधनेसे कलादिक दृष्टि होती है और इन उक्त राशियोंसे ' अन्य राशि शेष बचे तो दृष्टिका अभाव (वष्टि नहीं ) जानना ॥१॥ ४ दृष्टिचक्रम्। १० २ ३ ९ ६ अशा अंशा-भशा- | अंशा- | अंशा-! अंशा- अशा अशा- ऽर्धा | द्धी ३० डेढा डेढा द्विगुणा द्विगुणा १५ शु. १५शु. ४५ शु/४५ शु.।६० शु./६०शु. १ जिस प्रहपर ही करना हो वह दृश्य, जो देखता हो वह पश्य कहलाता है।

वर्षपदीपक उदाहरण शु शु श र. . ९ . . ५ ८ ४४ ग्रहोपरिग्रहाणां दृष्टिचक्रम् ॥ दृश्य सूर्य १० । १६ । ५३ र चं! मं बु गु ३९ मेसे पश्य चन्द्र १०।०॥ २६] ४१ १ २२ ॥ ५६ को हीन किया, शेष . १६ ३१ १६ । ३० । ४३ वचे, इसके राशि विना अंशादिक १६ । ३६ २७३० ३० । ४३ को द्विगुण किये तो मं. ३३॥ ३ ॥ २६ हुए, इनको ६० मेसे सोधे तो २६ । ५९ कलादिका ३० बु. ३८ सूर्यपर चन्द्रकी दृष्टि हुई । इसी वरह क्रमसे सर्व ग्रहोंपर ग्रहोंकी २७/११/१८/१८ .. गु. ५७१२७३५ ५९ दृष्टि जानना और भावपर दृष्टि करना हो वो भावदृश्य ग्रहपश्य १३ ३५ १४. शु. समझके दृष्टि करे तो भावोपरि . ग्रहोंकी दृष्टि होती है। ६ । १० १३ २१, १८ २२ ५९/१४४८.४१ इति दृष्टिसाधनाध्यायश्चतुर्थः ॥ ४॥ . . ५ २२ ० . . ० . . ६ श. अथ सहमाऽध्यायः। सर्वत्र सहमसाधने शुद्धयाश्रयतः शोध्यहीने क्षेपकयुक्त सहमसिद्धिः॥१॥ सर्व सहमसाधनेमें शुझ्याश्रयमेंसे शोध्यको हीन करके क्षेपक युक्त करे तो सहम सिद्ध होता है ॥३॥ शोध्यभादेरारभ्य शुद्धयाश्रयभादितोऽवाक् क्षेपाभावे सिद्धसहममें सैकं कार्यम् ॥ २ ॥ शोध्यकी राशि अंशको आदि ले शुझ्याश्रयकी राशि-अंशके पहले क्षेपककी १ जिसमें हीन करना कहा हो वह शुद्धयाश्चय और जिसको हीन करनेका कहा है वह शोच्य । .

भाषाटीकासहितम् ।
(१३३)
राशि नहीं आवे तो सिद्धसहमकी राशिभं एक युक्त करना, अर्थात्
शुद्धयाश्रय और शोध्यके बीचमें क्षेपक नहीं आवे तो एक निलाना ॥२॥
क्षेपकानुक्तौ लश योज्यम् ॥ ३॥
जिस सहमसाधनमें क्षेपक नहीं कहा हो उसमें लम युक्त करना ( लमको
क्षेपक समझना) ॥ ३॥
समयानुक्तौ रात्रौ शोध्यशोधको व्यस्तो कार्यों ॥४॥
जिस सहमसाधनमें समय नहीं कहा हो उस सहमके साधनमें रात्रिमें वर्षप्रवेश
हो तो शोध्यशोधकको व्यस्त ( उलटे ) करना अर्थात् शोध्यको शुद्धया-
श्रय और शुद्ध्याश्रयको शोध्य मानके सहम करना ॥ ४॥
सूर्योले चन्द्रे पुण्यसहमः॥६॥
चन्द्र से सूर्यको हीन करनेसे पुण्यसहम होता है ॥ ५ ॥
चन्द्रोना शुरुज्ञानज्ञातिसहमालि ॥६॥
चंद्रमाको सूर्यमैसे हीन करनेखे गुरू, ज्ञान, ज्ञाति सहम होवे हैं ॥ ६ ॥
पुण्योनेज्ये यशोदेहसैन्यघातम् ॥७॥
गुरुमेंसे पुण्यसहमको हीन करनेसे यश, देह, सैन्य और घावसहम
होते हैं ॥ ७॥
पुण्योनज्ञाले शुक्रान्विते मित्रम् ॥ ८॥
पुण्यसहमको ज्ञानसहममेंले हीन करके शुक्र मिलानेसे मित्र सहम
होता है ॥ ८॥
अजोनपुण्ये माहात्म्यधैर्यशौर्यम् ॥ ९ ॥
पुण्यसहममेसे मंगलको हीन करनेसे माहात्म्य, धैर्य, शौर्य सहम
होते हैं ॥ ९ ॥
शुक्रोनमन्दे इच्छा ॥ १०॥
शुक्रको शनिमें से हीन करनेसे इच्छा सहम होता है ॥ १० ॥
लग्गशोनारे सामर्थ्य चेदंगेशो भौमस्तदा जीवाच्छोधनीयः॥११॥
लग्नके स्वामीको भौमसे हीन करनेसे सामर्थ्य सहम होता है,यदि लग्नेश्वर
भौम ही हो तो गुरुमेंसे लग्नेश्वरको हीन करना चाहिये ॥ ११ ॥

वर्पप्रदीपकम् । सदा मदोनजीवे भ्राता ॥ १२ ॥ सदा अर्थात् दिनरानिमें गुरुमसे शनिको हीन करना चावा सहम होता है ॥ १२॥ दिने चन्द्रोलेज्ये सार्के रात्रावानजीवे सेन्दौ गौरवम् ॥१३॥ दिनका इष्ट हो वो गुरुमेंसे चन्द्रको हीन करना और सूर्ययुक्त करना, रात्रिका इष्ट हो तो गुरुभेसे सूर्यको हीन करना और चन्द्र युक्त करनेसे गौरव- सहम होता है ॥ १३॥ भावनार्कजे राजतातौ ॥ १४ ॥ शनिमेसे सूर्यको हीन करने (निकालने ) से राज और वात (पिता) सहम होते हैं ।। १४॥ शुकोनेन्दौ माता कान्तिश्च ॥ १५ ॥ म्चन्द्रोसे शुक्रको निकालनेसे मावा और कान्ति सहम होते हैं ॥ १५ ॥ इज्योनसन्दे जीवितोपायौ ॥१६॥ शनिमेंसे गुरुको हीन करनेसे जीवित और उपाय सहम होते हैं ॥ १६॥ ज्ञोनारे कर्म ॥ १७॥ भौममें से बुधको घटानेसे कर्मसहम होता है ।। १७ ॥ सदा चन्द्रोनांगे रोगः ॥ १८॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा ही लग्नमेंसे चन्द्रको हीन करनेसे रोग- सहम होता है ॥ ३८॥ लोपोनेन्दौ कामः कांगे तु सदा लग्नेशोना ॥ १९ ॥ चन्द्रमेंसे लग्नके स्वामीको हीन करनेसे कामसहम होता है और कर्क लग्न हो तो सदा (दिन रात्रिमें ) सूर्यमैसे लग्नेशको हीन करनेसे कामसहम होता है ॥ १९ ॥ वोनेज्ये कलिक्षमे ॥२०॥ गुरुमेंसे मंगलको हीन करनेसे कलि और क्षमा सहम होते हैं ॥२०॥ ..

आपाटीकासहितम् । (१३५) मन्दोनेज्ये ज्ञान्विते शास्त्रम् ॥२१ गुरुमेंसे शनिको हीन करना बुध मिलानेसे शास्त्रसहम होता है ॥ २१ ॥ सदा चन्द्रोनशे बंधुः ॥२२॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा ही बुधर्मेसे चन्द्रको हीन करे तो बन्धु सहम होता है ॥२२॥ ज्ञोनेन्दौ पराश्रयः ॥२३॥ चन्द्र से बुधको हीन करनेपर पराश्रय सहम होता है ॥ २३ ॥ सदा चन्द्रोनाष्टमे मन्दान्विते मृतिः ॥२४॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा चन्द्रको हीन करना और अष्टम भाव से शनियुक्त करनेपर मृत्यु सहम होता है ॥ २४ ॥ सदा धर्मेशोनधर्मे धनेशोनधने लाभेशोनलामे देशान्तरधनलामाः २६ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा ही नवम भावमेसे नवम भावके स्वामीको हीन करना, धनभावमेंसे धन भावके स्वामीको हीन करना, लाभभावमेंसे लाभभावके स्वामीको हीन करना देशान्तर १ धन २ लाभ ३ सहम होते हैं ॥ २५ ॥ सदा सूर्योनभृगौ परांगना ॥२६॥ दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा ही शुक्रमेंसे सूर्यको हीन करनेते परांगना (परस्त्री) सहम होता है ।। २६ ॥ मन्दोनेन्दौं दास्यम् ॥२७॥ चन्द्रमेंसे शनिको हीन करना दास्य सहम होता है ॥ २७ ॥ सदा बुधोनचन्द्रे वाणिज्यम् ॥ २८ ॥ सदा (दिनरानमें)चन्द्र से बुधको हीन करना वाणिज्यसहम होता है ॥२८॥ दिवाकर्कोनमन्दे सूर्यभपयोगे रात्रौं चन्द्रोनमन्दे चन्द्रद्देशयोगे कार्य- सिद्धिः॥२९॥ दिनका इष्ट हो वो शनिमें से सूर्यको हीन करना और उसमें सूर्यको राशिका स्वामी मिलाना, रात्रिसमयका इष्ट हो तो शनिमेसे चन्द्रको हीन करना और उसमें चन्द्रकी राशिका स्वामी मिलानेपर कार्यसिद्धि सहम होता है ॥ २९ ॥ १ १ जिस राशिमें स्थित हो उस राशिका स्वामी।

(३३६ ॥
वर्षपदीपकम् ।
कोणोलशुके विवाहभायें ॥ ३०॥
शुक्रमेंसे शनिको हीन करनेपर विवाह और भार्या (स्त्री ) सहम
होते हैं ॥ ३०॥
ज्ञोनेज्य आधानम् ॥ ३१॥
गुरुमेंसे बुधको हीन करनेसे आधान (गर्भ ) सहम होता है ॥ ३३ ॥
सदा चन्द्रोलमन्दे षष्ठान्विते सन्तापः॥ ३२ ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा शनिमसे चन्द्रको हीन करना और उनमें
६ छठा भाव मिलानेसे सन्ताप सहम होता है ॥ ३२ ॥
सदा भौमोलसिते श्रद्धा ॥ ३३ ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा शुक्रमेंसे भौमको हीन करनेसे श्रद्धासहम
होता है॥३३॥
सदा पुण्योनज्ञाने प्रीतिः ॥ ३४॥
सदा दिनका इष्टं हो वा रात्रिका ज्ञान सहमोमेंसे पुण्य सहमको हीन करना
प्रीति सहम होता है ॥ ३४ ॥
अन्दोनारे ज्ञान्विते जाव्यम् ॥३५॥
मंगलमेंसे शनिको हीन करना और उसमें बुध युक्त करे तो जाड्य सहम
होता है॥३५॥
शश्वज्ज्ञोनारे व्यापारः ॥ ३६॥
सदा (दिनरात्रिके इष्टमें) भौमसे बुधको हीन करे तो व्यापार सहम
होता है ॥ ३६॥
चन्द्रोनार्कजे जलपातः ॥ ३७॥
शनिमेसे चन्द्रको हीन करे वो जलपात सहम होता है॥ ३७॥
अर्कजोनभौमे शत्रुः ॥ ३८॥
भौममेंसे शनिको हीन करे वो शत्रु सहम होता है ॥ ३८॥
बुधोनपुण्ये ज्ञान्विते दारिद्रयम् ॥ ३९ ॥
पुण्य सहममेंसे बुधको निकालने और उसमें बुध युक्त करनेपर दारिद्रय
सहम होता है ॥ ३९ ॥

भाषाटीकासहितम् ।
( १३७)
शवचन्द्रोनजीवशुक्रयोः पुत्रौ ॥ १० ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका अदा चन्द्रको हीन करना, गुरु और शुक्र से
पुत्र पुत्री सहम होते हैं अर्थात् गुरुमेंसे चन्द्रको हीन करे तो पुत्रसहम और
शुक्रमेंसे चन्द्रको घटाने दो पुत्रीसहम होता है ॥ ४० ॥
दिनेऽकोनस्वोच्चे रात्रौ चन्द्रोनस्वोच्चे मंडलेशः॥४१॥
दिनका इष्ट हो तो सूर्यको हीन करना अपने उच्च ( ० रा. १० अं०)
में से रात्रिसमयका इष्ट हो तो चन्द्रको हीन करना अपने उच्च (१ रा०३ अं०)
मेंसे मंडलेशसहम होता है ॥ ४ ॥
मन्दोनसाईत्रिमे जलपथः॥१२॥
शनिको हीन करना साढे तीन राशि ( ३ राशि १५ अंश) मेंसे जल-
पथसहम होता है ॥४३॥
मन्दोलपुण्ये बन्धनम् ॥ ४३ ॥
पुण्यसहममेंसे शनिको हीन करे तो,बन्धन सहम होता है ॥ ४३ ॥
अकौनपुण्ये लाभान्वितेश्वः॥ १४ ॥
पुण्यसहममें से सूर्यको हीन करने और उसमें लाम ११ वां भाव मिलाना
अश्वसहम होगा ॥४४॥
सदा जीवोनेन्दौ गजः॥ ४५ ॥
सदा (दिनका इष्ट हो वा रात्रिका.) चन्द्र से गुरुको हीन करे वो गज-
सहम होता है ॥४५॥
रिपुसहमोनांत्ये पशुः॥४६॥
१२ बारहवें भावमेंसे शत्रुसहमको हीन करे तो पशुसहम होता है ॥४६॥
शश्वत्कोणोनाङ्गारयोर्व्यसनकृषी ॥४७॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा शनिको लग्न और मंगलमेंसे हीन करने-
से व्यसन और कृषिसहम होता है अर्थात् लग्नमेंसे शनि हीन करनेसे व्यसन
और भौमसे शनि हीन करनेसे कपिसहम होता है ॥ ४७ ॥
सदा घुण्योनार्कजे मंदयुते बन्धमोक्षः ॥४८॥
सदा (दिनरात्रिमें ) पुण्य सहमको शनिसेसे हीन करना और उसमें
शनि युक्त करनेसे बन्ध और मोक्ष सहप होता है ॥४८॥
सदेज्योनपुण्ये सारे दुःखम् ॥१९॥

•
(१३८)
वर्षपदीपकम् ।
सदा (दिनरात्रिके इष्टमें) पुण्यसहममेंसे गुरुको हीन करने और भौम
मिलानेसे दुःख सहन होता है ॥ ४९ ।।
कुजोनमंदे उष्ट्रः ॥१०॥
शनिमेंसे मंगलको निकालनेसे उष्ट्रसहम होता है ॥ ५० ॥
मंदोना पितृव्यः ॥ ६ ॥
सूर्यमेंसे शनिको हीन करनेसे पितृव्यसहम होता है । ५१ ॥
षष्ठेशोनषष्टे सान्त्ये आखेटः ॥ १२ ॥
छठे भावमेंसे छठे भावके स्वामीको हीन करके बारहवां भाव मिलानेसे
आखेट (शिकार ) सहम होता है ॥ ५२ ॥
ज्ञानेन्दौ भृत्यः ॥ १६ ॥
बुधको चन्द्र से हीन करनेसे भृत्य सहम होता है ॥ ५३ ॥
अोंनेज्ये बुद्धिः ॥१४॥
सूर्यको गुरुमसे हील करनेसे बुद्धिसहम होता है ।। ५४ ॥
सदा तुर्येशोनलग्ने निधिः ॥ १५ ॥
दिनका इष्ट हो वा रात्रिका सदा चतुर्थ भावके स्वामीको लग्न से हीन
करनेसे निधि सहम होता है ॥ ५५ ॥
सदा शुक्रोनकोणे ऋणम् ॥६६॥
सदा दिनरातके इष्टमें शनी से शुक्रको हीन करनेसे ऋणसहम
होता है ॥५६॥
सदा बुधोनेन्दौ सत्यम् ॥१७॥
सदा (दिनरात्रिमें) बुधको चन्द्रमेंसे हीन करनेसे सत्यसहम होता है ॥५७॥
स्वेशेन शुभेन वाऽब्देशेन वा युतं दृष्टं वा सहम
स्वेशपाके वृद्धिमन्यथा विपरीतम् ॥१८॥
जो सहम अपने स्वामीसे अथवा शुभग्रहसे या वर्षेश्वरसे युक्त हो वा दृष्ट हो
तो वह अपने स्वामीकी दशामें फलवृद्धि करता है और विपरीत हो तो विप-
रीत फलकी वृद्धि करता है, अर्थात् अपने स्वामीसे शुभग्रहसे वा वर्षेश्वरसे
युक्तका इष्ट नहीं हो तो वह विपरीत (उलटाः) फलकी वृद्धि अपने स्वामीकी
दशामें करता है ॥ ५८॥

भाषाटीकासहितम् । (१३९ ) प्रथमं जन्मकालिकं समबलाबलं जानीयात् ॥ ६९ ॥ प्रथम जन्मसमयमें सहमोंका बल निर्बल जानना ( जन्मसमयमें सब सहम करना, अनंवर जन्मकुंडलीमें देखना जो सहम अपने स्वामीसे, लग्नेश्वरसे और शुभग्रहसे युक्त हो वा दृष्ट हो ६। ८ । १२ वांआदि दुष्टस्थानके सिवाय शुभस्थानमें स्थित हो वह बलवान् जानना और इससे विपरीव हो वह निर्बल जानना)॥ ५९॥ तत्र यानि बलीयांसि तेषामेव संभवाः॥६०॥ जन्मसमयमें जो जो सहम बलवान हों उन्हीं सहमोका संभव जानना ॥६॥ प्रतिवर्ष सम्भवतापन्नान्येव कार्याणि नेतराणि, नैष्फल्यात् ॥६॥ प्रतिवर्ष ( हरवर्ष ) जिन जिन सहमका जन्म समयमें सम्भव आया हो वे ही सहम करना, जिनका सम्भव नहीं है वे सहम निष्फलदावा हैं इस- लिये नहीं करना ॥ ६॥ प्रश्ने प्रच्छकेटकार्यसहम कार्यम् ॥ ६२ ॥ इति सहमाऽध्यायः पंचमः ॥ ५ ॥ प्रश्नसमयमें पूछनेवालेका जो अभीष्टकार्य हो वह सहम करना ॥ ६२ ॥ उदाहरण। यहां दिनमें वर्षप्रवेश हुआ है इस कारण सूत्रमें कहे हुए शोध्य सूर्य ३० । १६ । ५३ । ३९ को शुद्धयाश्रय चन्द्र १० । ० । २२ । ५६ मेसे घटाया वो ११ । १३ । २९ । १७ शेष बचे, इसमें क्षेपक नहीं कहा है इसलिये लम ११.१२॥२६ । ३५ युक्त किया तो ०।२५। ५५ । ५२ यह पुण्य सहम सिद्ध हुआ। शोध्य सूर्यकी राशि १० अंश १६ को आदि ले शुद्ध्याश्रय चन्द्रकी राशि १० अंश ० पर्यंत गिननेसे क्षेपक (लम ) की राशि १ वृषभ बीचमें आ गयी है इसलिये सिद्ध सहमकी राशिमें १ एक युक्त नहीं किया, इसी प्रकार शेष सहम जानना. अथ कतिचित्सहमा गुरु इच्छा पुत्र राज्य धन लाभ शव रोग जीवि पुण्य - or २ ११ ३ ३५२८३७ ५ १८ । २७ । १०।२४ ५५/ ५७ २७ ३ ३०२४ ५२ १८१४६३४/७५/ १४/१०/१२ / १४/३९ १७ २० संख्या ८ देशा- काले धामा भास गंधु पराश्रय | मृत्ति राहगनाम. नामहरूषफलम् --- अथ सहमसारणीकोष्टकम् । २ ३।४ ५ ६ ११० १२ गुरु यश - माहा पुण्ण ज्ञान र सैन्य मिग त्म्यधैर्य इच्छा सामय माता | गौरग माता जीवित कर्म रोग काम तात कांति उपाय शाति घात शाय वं पुण्य पुण्य म शु ल.प. श च ग गु 3 स दान पुण्य मx गु च घा म गु भनि | पुण्य में मा या श में चं चं रा. पुण्य पुण्य म गु ग स गु चु ल.प. যু छ गु च चं तु , दिवा गु RJAWANIN गु ग M HD "24TRayam "f-MASUTRA. A석 च च शोध्य अएम. ९ मा शुध्गाश्रय। माध्य अष्टम. ९ मा अध्याय शानि क्षेपक Potato यु --- AN- राशी सदा - . ल ल ल ल -- ल ल सुध ल वर्षमदीपकम् । SHI लग्नेशगंज होतो सदा गुरूसे हीन करना. + कलाहीलो सदा लशको सूर्यभेसे हीन करना. २२ २४ २५ २६ । २७ २८ | २९ २२ ३२ | ३४ । २५ । ३६ २७ | २८ । ६९ ४१ । ४२ संख्या. वाणि-कार्य विवाह भाना- समनाम धन लाग. दारय. रांताप. श्रद्धा. लि. जा. ज्य सिद्धि गार्या. शनु. क्षारक पुन. मी. जना. पारपात. . तुल्याकलन. २५.११. सू. श. पु. स. श. . च. मं.पुण्य. चु.. चं. दा. सू. श. शाय. २ भा. ११भा. शु. | च. रा.३ रा. चे भु. गु. दा. मं. शशान. गं. गु. शुध्या- शु. पथ. N - Anna दिया. मं. पुण, २०.१५. पुण्य. RE . Prerrarwiremerrernimurtersex www. य72 चं. पु. च . गु. पं. में पुष्ण. में. . में, पुष्य. चं. . . पुण्य. शाध्य. - -- रात्री. २ मा.२२मा. शु. या. च. . शुध्या- पा. मं. मान... चं .. गु. . भय. mame--- J4 G. ल. ल. स.प.रा. ल. चि.रा.प. ल. ६भा, ल . गुध. ल. . शुभ. ल. ल . . क्षेपक Pabpma-..

17 भाषाटीकासहितम् । (१४१) अथ सहयसारणीकोष्टकाः ४३/४/४५४६/४७/४८४९/५०५१/५२/५३/५४५५/५६/५७/ संख्या ५१ व्यस बंध मन्ध | गज पशु. कृषि पितृ भाखे भृत्या बुद्धि निधि ऋण, सत्य सहमनाम च्याट तुल्यफलं मोक्ष/दुःख उष्ट्र सू. गु.सस श. श. पुण्य गु. म. श. पष्ठेश वु.. सू. मा ४स्वा शु./ बु. शोध्य दिवा पुण्य चं. १२मा ल. मं. श. पुण्य श.. सू. भा. चं. गु. ल.श. चं. ६मा. . चंअध्याश्रय पुण्य. २मा श.श.पुण्य गु. श. सू. ६भा. चं. गु. च.श. शु.बु. भोध्य स.चं. शत्रुस ल. म. श. पुण्य | मं. श. षष्ठेश वु.सू. ल. श. चं. शुध्याश्रय रानी ११म्प ल.ल.ल.ल. श. मं. ल. ल. १२मा, ल.ल.ल.ल.ल. क्षेपक . सदा । इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यताजिकग्रन्थे .तदात्मजश्रीनिवासविरचितायां सौदा- हरणभाषाव्याख्यायां सहमसाधनाध्यायः पञ्चमः ॥५॥ अथाब्देशनिर्णयः। दिनेऽर्कशुकार्किसितेज्यचन्द्रज्ञारार्किभीमेज्यचन्द्रा रात्रौ जीवेन्दु- ज्ञाराकसितार्किशुक्रमन्दारेज्यचन्द्रा भेषादित्रिराशिपाः ॥ १॥ अब वर्षेश्वरका निर्णय कहते हैं-दिनमें सूर्य, शुक्र, शनि, शुक्र, गुरु, चन्द्र, बुध, मंगल, शनि, मंगल, गुरु, चन्द्र, रात्रि में गुरु, चन्द्र, बुध, मंगल, सूर्य, शुक्र, शनि, शुक्र, शनि, मंगल, गुरु, चन्द्र, मेषराशिको आदि ले कमसे त्रिराशिपति जानना॥१॥ কথ নিহণ JamwMAN. मे..| मि.क./सिं./क.तु./वृ.ध./म./कुं.मी. १/२/३/४/५/६ ८.९/१०/११ शशुगु च में मंचं दिवा. गचं मंसू | शु| शशगरानि बु जन्मांगेशो वर्षोंगेशस्तत्रिराशिपो सुन्थेशो दिनेऽभेशो निशीन्दु- भेशश्चेति पंचाधिकारिणः ॥२॥ जन्मलनका स्वामी १, वर्षलग्नका स्वामी २, वर्षलनका त्रिराशिपति ३, मुंथाका स्वामी ४, दिनमें सूर्यको राशिका स्वामी और रात्रिमें चन्द्रकी राशिका स्वामी ५ ये पांच अधिकारी जानना ॥२॥ १ वर्षलग्न जिस राशिका हो उसका दिनमें वर्ष प्रवेश हो तो दिनका, रात्रिमें रात्रिका : त्रिराशिपति देखना।

वर्षपदीपकम् ।
एषां बलाधिकोऽद्रष्टा वर्षेशः॥३॥
इन पञ्चाधिकारियोंमें जो यह अधिक बलवान् होके वर्षलनको. देखता हो.
वह वर्षेश्वर होता है ॥ ३॥
बलसाम्ये तु दृष्टयाधिकः ॥४॥
अनेक ग्रहका बल समान (बरोवर ) हो वो जिसकी लग्नपर दृष्टिं अधिक
हो वही वर्षेश्वर होगा ॥४॥
उलयसाम्येऽधिकाधिकारी॥६॥
अनेक ग्रहों का बल और लमपर दृष्टि दोनों समान ( बरोबर ) हो तो
जिस ग्रहका अधिकार ज्यादा आया हो वह वर्षेश्वर होगा ।। ५॥
त्रितयसाम्ये सुन्थेशः ॥६॥
बल दृष्टि अधिकार यह वीनों समान हों तो मुन्थेश ही वर्षेश होगा ॥६॥
पञ्चानामपि मध्ये कोऽपि नांगं पश्येत्तदा शुन्थेशवर्षलग्नेशौ
यश्चोक्ताधिकार्यतःपाती तदितरोऽपि जनुस्लमये
वर्षागराशिद्रष्टा भवेत्तदैतेषां योऽधिकबलः स वर्षेशः॥ ७ ॥
पांचों अधिकारियों से कोई भी वर्षलनको नहीं देखते हो, वो मुन्थेश,
वर्षलग्नेश और दोनोंसे अन्यग्रह जो वर्षमें अधिकारी होकर जन्मकुंडलीमें वर्ष-
उनकी राशिको देखता हो तो इन तीनों से जो अधिक बली हो वही वर्षेश
होगा ॥ ७ ॥
त्रयाणां बलसाम्ये सुन्थेशः॥ ८॥
तीनों अधिकारियोंका बल समान ( बरोबर ) हो तो मुन्थेश ही वर्षेश
होगा ॥ ८॥
उक्तरीत्या चन्द्रस्याब्दपतित्वप्राप्तौ तदित्थशालिनोऽब्दपत्वमन्यथा
तदेशस्येत्येके ॥९॥
उक्त रीविसे चन्द्रको वर्षेशत्वं प्राप्त हो तो ( चन्द्र वर्षेश होवा हो तो)
चन्द्रसे जो ग्रह इत्थशाल करवा हो तो वही वर्षेश होगा, और कोई ग्रह इत्थ-
शाल नहीं करता हो वो चन्द्रकी राशिका स्वामी वर्षेश होगा, यह किन्हीं
भाषायाँका मन हैं ॥९॥

(१४३)
भाषाटीकासहितम् ।
वर्षांगेशो राजा समयेशः सेनापतिर्मुन्थेशो मन्त्री जन्मांगेशः पुरेश-
स्त्रिराशिपो रससस्यधात्वधिप इत्येके ॥१०॥
इत्यब्देशनिर्णयाऽध्यायः ॥ ६॥
वर्षलग्नेश राजा समयपति सेनाधिप मुन्थेश । मन्त्री जन्मलग्येश पुराधिप
त्रिराशिपति रस धान्य धातु इनका अधिपति होता है यह किन्हीं आचार्योंका
मत है ॥१०॥
-
८
म.
८
उदाहरण ।
इन पांचों अधिकारियोंमें शुक्र अधिक
पंचाधिकारी.
बली है और वर्षलग्नको मित्रदृष्टिसे देखता है,
इसलिये वर्षेश्वर शुक्र पूर्ण बली हुआ.
जन्मल. रा.पं. श.
वर्षल. रा.प. शु. | ११ | पू.
इति श्रीज्योतिर्विद्वर-श्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपके तदंगज-
श्रीनिवासविरचितायां सोदाहरणभाषाव्याख्याया त्रि. रा.प. शु. | ११ | पू.
मन्देशनिर्णयाध्यायः षष्ठः ॥ ६ ॥
मुन्या. रा.प. शुः । ११. पू.
अथ दशाविचारः।
सूर्य | रा.प. श. पू.
सलग्नखेटानां मध्ये यो न्यूनांशो भवेत्तस्यांशादयः प्रथम लेख्याः
अब दशाविचार कहते हैं:-उमसहित सूर्यादि सात ही ग्रहोंमें जो ग्रह न्यून
(अल्प) अंशका हो उसके अंशादि (अंश कला विकला) प्रथम लिखना ॥१॥
ततस्तदधिकांशानामंशादयः क्रमशो लेख्या ॥२॥
फिर उस ( अल्प अंश) के ग्रहसे अधिक अधिक अंशके ग्रहोंके अंशा-
दिक क्रमसे लिखना (अल्प अंशके ग्रहसे अधिक अंशके ग्रहोंके अंशादिक
लिखना, तदनंतर उससे अधिक अंशके ग्रहके अंशादिक, फिर उससे अधिकके
अंशादिक लिखना, इस क्रमसे सबसे अधिक अंशके ग्रहके अंशपर्यंत लिखना
चाहिये)॥२॥
इमे हीनांशसंज्ञकाः ॥३॥
उक्त प्रकार लिखे हुए ग्रहोंके जो अंशादिक हैं उनको हीनांशसंज्ञक जानना
चाहिये ॥३॥

(१४४)
वर्षप्रदीपकम् ।
इयोरेशादिसाम्ये बलाधिकस्य पूर्वा दशा ॥ ४ ॥
दो ग्रहोंके अंशादिक (अंश कला विकला ) समान (बरोबर ) हो तो
उनमेंसे जो अधिक बलवान हो उसकी प्रथम दशा जाननी चाहिये (प्रथम
उसके अंशादिक लिखना) ॥४॥
बलसाम्येऽल्पगतिकस्य ॥ ५ ॥
दो ग्रहोंका बल समान हो तो जो अल्पगतिवाला ग्रह हो उसकी प्रथम
दशा जानना ॥ ५॥
उदाहरण।
यहां लग्नसहित सूर्यादि ग्रहोंमें सर्वसे न्यून अंश चन्द्रके हैं, अतएव चन्द्रके
अंश० कला २२ विकला ५६ पहले लिखे ! चन्द्रसे अधिक अंशका बुध
इसलिये चन्द्र के अनंतर बुधके अंशादिक ३॥ ३५॥ ८लिसे, एवं बुधसे
अधिक भौम, भौमसे अधिक अंशादि शनिके इस क्रमसे अधिक अधिक अंशके
मह क्रमसे सर्वाधिकांश ग्रहपर्यंत लिखनेसे इस प्रकार हीनांश हुए।
हीनांशाः।
चं.बु.म.श. ल. र. गु.श.
०१७/९/१२/१६/१८/२५
५६८३६५९/२५/३९/५५४८
पात्यकृतौ प्रथमखेटस्य यथास्थितांशाः॥६॥
पात्यांश करनेके समयं प्रथम ग्रहके (जो सर्व ग्रहसे अल्प अंशादिकका ग्रह
हीनांशमें प्रथम लिखा है उसके) अंशादिक यथा स्थित (जो अंशादिक हो
वे ही प्रथम ) लिखना ॥ ६ ॥
ततः प्रथम द्वितीयाद् द्वितीयं च तृतीयादित्यादि
क्रमेण शोधयेत् ॥७॥ इमे पात्याः॥८॥
तदनंतर प्रथम लिखे ग्रहके अंशादिकको दूसरे ग्रहके अंशादिकमेंसे, दूसरेके
अंशादिकको तीसरेमेसे, तीसरेके अंशादिकको चौथेमसे इस क्रमसे शोधते जाना
॥७॥ ये पात्यांश. कहलाते हैं ॥ ८॥

। भाषाटीकासहितम् । (१४५) उदाहरण। हीनांशमें सबसे न्यून अंशका चन्द्र प्रथम लिखा है उसके अंशादि प्रथम वे ही ०।२२ । ५६ लिखे इनको आगे जो दूसरा यह बुधके अंशादिक । ३५। ८ हैं उनमेंसे हीन किये वो १ । १२ । १२ शेष बचे, यह बुधक अंशादि हुए । वदनन्तर बुधके अंशादिक १ । ३५१८ को तीसरे भौमके अंशादिक ७ । ३१ । ३६ मेसे घटाये तो ५ । ५६ । २८ शेष बचे, ये मंगलके हुए; फिर भौमके अंशादिकको चौथे शनिके अंशादिकर्मेसे घटाये, ऐसे कमसे घटानेसे ये पात्यांश हुए, पात्यांशका ऐक्य सबसे अधिक अंशके महके अंशके समान आता है। पत्यांशाः। MPORPOS ३१ चं. ५.म.श. ल. र.गु. यो। ०११/५/२/२/४/२/६/२५ २५१२५६२३३१२७३/५/२ १६ १२/०८२३३६ ४१६५३०४८ वर्षदिनानि पात्यैक्येन भजेल्लब्धं दिनायं ध्रुवम् ॥ ९॥ वर्षके दिनोंको-( ३६० को वा ३६५ । १५ । ३१ । ३० को) पात्यां- शके ऐक्य (योग)का भाग देना जो लब्ध आवे वह दिनादिकं ध्रव जानना॥९॥ उदाहरण। वर्षदिनादि ३६० । । ० के पात्यांशयोग २५ । २। ४८ का भाग दिया परन्तु भाज्य भाजक दोनों दिनादिक हैं,इस कारण इनको सवर्णित किये भाज्य १२९६००० में भाजक पात्यांश योग ९०१६८ का भाग दिया लब्ध १४ दिन आये, शेष ३३६४८ बचे, इनको ६० साठ गुणे किये तो २०१८ ८८० हुए । इनमें ९०१६८ का भाग दिया लब्ध २२ घटी हुई, शष ३५ २०४ बचे, इनको ६० साठ गुणे किये तो २११२२४० हुए, इनमें भाग ९०१६८ का दिया लब्ध २३ पल आये शेष ३८३७६ बचे, इनको ६० साठ गुणे किये तो २३०२५६० हुए इनमें ९०१६८ का भाग दिया लब्ध २५ विपल आया, इस प्रकार पात्यैक्यका भाग देनेसे दिनादिक १४ । २२ २३ । २५ ध्रुव आया । .

(१४६) वर्षपदीपक शुवेण स्वरूपात्यांशा हता दिनाया दशा ।। १० । दिनादिक ध्रुवसे अपने अपने पात्यांशको गुणन करनेसे दिनादिक दशा होती है ।। १० ॥ उदाहरण । जैसे-दिनादिका ध्रुव १४ । २२ २३ । २५ से चन्द्रकी पात्यांश ०।२२ । ५६ को गुणन किये तो ५ । २९ । ३७ । हुए, यह दिनादिक चन्द्रकी दशा हुई । इसी प्रकार सब अहोंके पात्यांशको गुणन करके लानेपर नीचे चक्रके अनुसार दिनादिक दशा आयीं । इसका योग वर्षदिनके समान (बरोबर ) ३६० । । ० आया है, इसलिये दशा शुद्ध समझना। दिनादिदशा स्पष्टाः। चं. बु . मं. श. गु. शु. ons १ ६ ३ ५ २९ ३७ ३ २ १७ २५ १७ | २३ । २० ४५ ५२ ५८ ३६ २ मास २९ २७ दिन ३८ | घटी ४४५४ पल १९५६१९५६/१९५७१९५७१९५७१९५७/१९५७/१९५७,१९५७ संवत ३ ६ ५ १० १० ११ १६ ५३ २३ ४१ ३९ १६ १ or ४ १५ १९ ४३ | १४ ५३ १९ / १६/उत्ती- २५ ४४ यस्य दशामानं पात्यांशष्येन भक्तं तल्लन्धदिनान स्वस्व- पात्यांशा हताः पाकेशतोऽन्तर्दशा दिनायाः॥११॥ जिस ग्रहमें अन्तर्दशा करना हो उसके दशामानमें (जितने दिनकी दशा हो उतने दिनकी संख्याको दशामान कहते हैं ) पात्यांशके ऐक्यका भाग देना, जो दिनादिक ध्रुव लब्ध आवे उससे अपने अपने पात्यांशको गुणन करना। दशाके स्वामीको आदि ले (जिसमें अन्तर्दशा करना हो उस ग्रहकी प्रथम दशा उसके आगे जो ग्रह हो उसकी दूसरी दशा इस रीतिले क्रमस ) दिनादिक अन्तर्दशा जाननी चाहिये ॥ ११ ॥ ܕ ܐ १ह सष्ट करनेके उदाहरणसे जो गोमुनिका गुणसकी रीति लिखी है उस रीतिते। :

भाषाटीकासहित ।
(१४७)
उदाहरण।
यहां मंगलकी दशामें अन्तर्दशा करना है-मंगलकी दशा ८५दिन २३घटी
३३ पलकी है यह दशाका मान है, इसमें पात्यांशके ऐक्य २५।२।४८
का भाग दिया, भाज्य भाजक सवर्णित किये और भाज्य ३०७४ १३ में भाजक
९०१६८ का भाग देनेसे लब्ध दिनादिक ३ । २४ । ३३ ध्रुव हुआ, इससे
प्रथम मंगलका पात्यांशगुणन किया तो २०१५।१५ आये, यह मंगलमें मंग-
लकी दिनादिक अन्तर्दशा हुई । इसी प्रकार फिर कमसे शनि लग रवि गुरु
आदिकरके पात्यांश गुणे किये भौममें अन्तर्दशा हुई ।
भौममध्येऽतर्दशा।
मं.
का
ल.
.
गु. शु.
पु.
.
१
२०
१५
१५
८ ३६ १०
१७ । ५१ । ५० ३०
२०
४७
१५ / २६ / १२
६
दिन
घाटे
पल
१९५६/१९५६/१९५७१९५७/१९५७/१९५७१९५७१९५७१९५७ संवत
.
०
१
१
८
१
९
११ । १६
२९
४१ । ५६
१६
२९
१६
४१५२ ५३
५९ । २९
उत्ती-
४ |
३२
5
१०
२२
अथ मुग्धादशामाह ।
जन्मभसंख्यायां गताब्दान्योजयेत् इराना नवोद्धृताः शेषे सूर्य-
न्द्वारराह्विज्यमन्दज्ञकेतुशुक्राणामेकादिक्रमतो दशायाः ॥ १२॥
अब मुग्धा दशा कहते हैं-जन्मनक्षत्रकी संख्या गताब्द संख्या मिलाना
और उसमें २ दो घटाकर नवका भाग देना, जो शेष बचे सो क्रमसे १ सूर्य
२ चन्द्र ३ भौम ४ राहु ५ गुरु. ६ शनि ७ बुध ८ केतु ९ शुक्रकी आय दशा
जानना, अर्थाद एक बचे तो सूर्यकी, २ बचे वो चन्द्रकी, ३ वीन बचे तो
भौमकी, इत्यादि क्रमसे आय दशा जानना ॥ १२॥

वर्षपदीपकम् । 1 (१४८) धृतित्रिंशदेकविंशतिचतुःपञ्चाशदष्टचत्वारिंशधूनमध्येकपंचा- शदेकविंशतिषष्टिसंख्यातानि सूर्यादीनां सुग्धादशादिनानि ॥१३॥ धृति कहिये १८, त्रिंशत् ३०, एकविंशति ११, चतुःपञ्चाशत् ५४, अष्ट- चत्वारिंशत् ४८, यूनपष्टि ९७, एकपंचाशत् ५१, एकविंशति २१, एष्टि ६० संख्यादिन सूर्यादिग्रहों के मुग्धादशाके दिन जानना अर्थात् सूर्यर्क १८, चन्द्रके ३०, मंगलके २१, राहुके ९४, गुरुके ४८, शनिके ७, बुधके ५३, केतुके २१, शुक्रके ६० दिन मुग्धा दशाके दिन जानना ॥ १३ ॥ उदाहरण। जन्मनक्षत्र चित्राकी संख्या १४ में गताब्दसंख्या २८ युक्त किये तो ४२ हुए, इनमें से २ दो हीन किये शेप ४० बचे इनमें ९ नवका भाग दिया शेप ४ बचे एकको आदि ले क्रमसे गिननेसे ४ चौथी राहुकी ५४ दिनकी आय दशा हुई, अर्थात् राहुदशामें वर्षप्रवेश हुआ ॥ भगणीनजन्मेन्दुलिप्ताः खखाष्टशपिता आधदशादिनहताः खाने भाता दिनादिरोग्यदशा ॥ १४॥ बारह १२ राशिमें से हीन किये हुए जन्मकं चन्द्रकी कलाको ८०० आठ- सौ भाग देना, शेष बचे कलाको आय दशा ( सूत्र १२ के अनुसार आयी हुई दशा) के दिनोंसे गुणन करना और ८०० आठसौका भाग देना ब्ध फल ४ आवे वह दिनादिक भोग्यदशा जानना ॥ १४॥ दशा दशाहताः पश्यधिकत्रिशतेनाता अन्तर्दशा दिनाचा मुग्धायाम् ॥ १५॥ इति दशाध्यायः॥ दशाके दिनको दशाके दिनसे गुणन करना और तीनसौ साठ ३६० का भाग देना, जो लब्ध आवे वह मुग्धादशामें दिनादिक अन्तर्दशा होती है ॥१५॥ उदाहरण जन्म समयका चन्द्रस्पष्ट ५। २९ । १९ । ४९ इसको बारह राशि- । १ राशिको ३० गुणी करके अंश मिलानेसे अंश होता है और अंशको साठ गुणे करके मिलानेसे नालाहोती है। है मापाटीझासहितम् । (१४९) मेसे होन किया तो ६ । ० १ ४०.१ ११ हुए इसको कला १०८४० | ११ की, फिर इसमें ८०० आठसौका भाग दिया, शेप ४४०।११ बचे । इससे आय दशा राहुकी आयी । उसके दिन ५४ से गुणे किये तो २३७६९।५४ हुए इनमें ८०० आठसौका भाग दिया लब्ध २९ दिन आये । शेष ५६९ । ५४ को ६० साठ गुणे किये तो ३४२९४ हुए फिर ८०० का भाग दिया, लब्ध घटी ४२ आयी, शेष ९९४ को फिर साठ ६० गुणे किये तो ३५६४० हुए ८०० का भाग दिया, लब्ध ४४ पल आया ।शेष ४४० को फिर ६० साठ गुणे किये वो २६४०० हुए, ८०० का भाग दिया, लब्ध ३३ विपल आयी। ऐसे फल चार २९ । ४२ । ४४ । ३३ आये ये दिनादिक राहुकी स्पष्ट भोग्य दशा हुई। 1 . ও শুভূন্য। हा. सा.भा.गु. बु. के. शु. र. चं. मं. स.भु. . १ om १ ११८ . ० 0 . . a . . . ० . मास २ १ दिन २९ १८ २७ २१ २१ १८ २१ २४ घटि. ४२ पल. १५ विपल ३३ . २७ १९५६/१९५६/१९५७/१९५७१९५७१९५७१९५७/१९५७/१९५७१९५७/१९५७ ४ ८ १० ५ ११ ९ ९ १० १ १६ । १६ २२ १३ १३ | १ २२ । १ ३९ २३ २३ । २३ । २३ । २३ | २३ / २३, २३ ३३ ३३ ३३ ३३ इति श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षदीपकाख्यताजिकग्रन्थे तदात्मजश्रीनिवासविरचितायां सोदा- हरणभाषान्याख्यायां दशासाधनाध्यायः सप्तमः ॥ ७॥ अथ मासादिः। गतमाससंमितराशियुक्तजन्मार्कतुल्या मासप्रवेशः ॥ १॥ अब मासादिसाधन लिखते हैं:-गतमासकी संख्याले समान राशियुक्त किय (३५७) वर्षप्रदीपकम् । हुए जन्मसमयके सूर्यके समान (बराबर) सूर्य जिस दिन आवे उस दिन मास- प्रवेश होता है ॥ १॥ गतदिनसस्मितांशा मासाकें युतास्तत्सदृशेऽ दिनप्रवेशः ॥२॥ गतदिनकी संख्याक समान ( बराबर ) अंशमासके सूर्य में युक्त करनेसे जो सूर्य हो उसके समान सूर्य जिस दिन आवे उस दिन दिनप्रवेश होता है, अर्थात् जिस मासमें जितनी संख्याका दिन प्रवेश करना हो उसके गत दिनकी जो संख्या हो उतने ही अंश उस मासके सूर्यमें मिलाना, उसके समान सूर्य जिस दिन आवे उस दिन दिनप्रवेश होगा ।। २ ॥ उदाहरण । १ हुआ। जैसे--दूसरा मासप्रवेश करना है इसके पिछाड़ी गत मास १ एक हुआ। इस लिये जन्मले १० । १६ । ५३ । ३९ सूर्यकी राशिके अंको १ एक किया ११ । १६ । ५३ । ३९ यह २ द्वितीयमासप्रवेशका सूर्य इस सूर्यके बराबर सूर्यके दिन दूसरा मारप्रवेश होगा । इसी प्रकार जितने गतमास हो उतनी ही राशि जन्मार्कमें मिलाते जाना और १२ ही मासके सूर्य लाना। दिनप्रवेश। दूसरे मासका ११ ग्यारहवां दिन प्रवेश करना है, ग्यारह दिनप्रदेशमें १० दश दिन गत हुए हैं, इसलिये १० दश अंश मासके ११ । १६। ५३ ॥३९ सूर्यमें मिलाये ११ । २६ । ५३ । ३९ यह दिन ११ के प्रवेशका सूर्य हुआ, इस सूर्य के समान सूर्य आवेगा उस दिन १३ ग्यारहवां दिन प्रवेश होगा ॥ मासार्कासन्नपंत्यर्कयोरंतरस्य कलाः कृत्वाकभुक्तिभक्ताप्तदिना- दिपंक्तिवारादिमध्ये पङ्क्तयादधिकेऽके युक्तेऽन्यथा हीने मास- प्रवेशकालः ॥३॥ मासप्रवेश सूर्य और उसके समीपकी पंक्तिका ( अवधि) सूर्य इन दोनोंके अन्तरकी कलौ करना, सूर्यकी गतिका (पंक्तिक सूर्यकी गतिका) भाग देना, जो लन्ध आवे दिन घटी पलात्मक तीन फल, उनको पंक्तिके वारादिक १-मंशको ६० साठगुणा करके कला मिलानेसे होती है।

मापाटीकासहितम् । (१५१) (वार इष्ट घटी पल) में पंक्ति ( अवधि) के सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य अधिक हो तो युक्त करना और अवधि के सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य न्यून हो तो आये हुए दिनादि फलपंक्तिके वारादिकमेंसे हीन करनेपर सो मासप्रदेशका वारादिक समय होवा है ॥ ३॥ उदाहरण । द्वितीय मासप्रवेशका सूर्य ११ । १६ । ५३ । ३९ इसके समीपकी पंक्ति (अवधि ) का सूर्य ११ । १४ । ५९ । ३० इनका अन्तर किया १ । ५४ ९ हुए इसकी कला ११४।९ के अवाधिके सूर्यकी गति ५९ । २३ का भाग दिया-भाज्यभाजक कलादिक हैं, अतः इनको सवर्णित किये भाज्यपिंड ६८४९ भाजकपिंड ३५६३ हुआ। भाज्यमें भाजकका भाग दिया लब्ध १ दिन आया-शेप ३२८६ बचे इनको ६० साठ गुणे किये १९७१६० हुए, इनमें ३५६३ का भाग दिया लब्ध ५५ घटी आयी शेष ११९५ को ६० साठगुणे किये ७१७००हुए, इनमें फिर ३५६३ का भाग दिया लब्य २० पठ आये । ऐसे दिन,घटी,पलादिक फल १॥ ५५ ॥ २० लब्ध आये, इनको पंक्तिके सूर्यसे मासप्रवेशका सूर्य अधिक है इसलिये अवधिक बार इष्टघटी पल ४ । २२ । १ में युक्त किये तो ६ । १७॥ २१ हुए, यह द्वितीय मासप्रवेशका इष्टसमय हुआ-अर्थात् पूर्णिमांत चैत्रकृष्ण ३० अमावास्या शुक्रवार के दिन इष्टघटी १७ पल २१ से मास द्वितीय प्रवेश होगा। ऐसे ही दिनप्रवेशका उदा- हरण समझना। एवं दिनप्रवेशकालः ॥ ४॥ मासप्रवेशकालकी जो रीति कही है उसी प्रकार दिनप्रवेशकाल लाना अर्थात् दिनप्रवेशका सूर्य और उसकी समीपकी पंक्तिका सूर्य इन दोनोंके अन्तरकी कला करना पंक्तिके सूर्यको गतिका भाग- देके दिनादिक फल ३ लाना उनको पंक्तिके वारादिको पंक्तिके सूर्यसे दिनप्रवेशका सूर्य अधिक हो तो मिलाना, न्यून हो तो हीन करना, तब दिनप्रवेशकाल होगा ॥ ४ ॥ उभयत्र स्पष्टाः खगा भावादयश्च कार्याः ॥६॥ .

(१५२) वर्षप्रदीपकम् । मासप्रवेशममयमें और दिनप्रवेशसमयमें स्पष्टग्रह भाव, आदि शब्दसे चलित पंचवर्गीबल द्वादश पडेशा सप्तशा आदिक करना ॥ ५ ॥ पात्यैक्येन मासदिनानि भजेल्लब्धेन स्वस्वपात्यांशा हता दिनाचा मासदशाः॥६॥ पात्यांशके ऐक्यका मासके दिन ३० में भाग देना, जो लब्ध आवे ध्रुव, उससे अपने अपने पात्यांश गुणे करे तो दिनादिक मासदशा होती है ।। ६ ॥ भासप्रशः सतयुतेऽङ्कहते एकादिशेष आचंभौराजीशबुके- शुलामाया दशा॥ ७॥ सामप्रवेशनक्षत्र (जिस नक्षत्रमें मासप्रदेश हो उसकी ) संख्या सात मिलाकर ९ नदका भाग देना, एकको आदि ले जो शेष बचे सो क्रमसे आ (सूर्य), (चंद्र), भौ ( भौम ), रा ( राहु ), जी (गुरु), श (शनि) बु (बुध), के (केतु), शु (शुक्र) की आद (प्रथम) दशा जालना ॥७॥ मुग्धा भागमिता दिनाचा मासदशा ॥ ८ ॥ मुम्था दशाके १२ बारहवें भागके समान दिनादिक भासदशा जानना- अर्थात् मुग्धादशाक दिनमें १२ का माग देने से जो दिनादिक आवे उन्हें मास- दशाके दिनादिक जानना चाहिये ॥ ८॥ उदाहरण । जैसे-सूर्यकी सुग्धादशाके दिन १८ हैं, इसमें १२ का भाग देनेसे लब्ध दिन १ घटी ३० आयी, यह मासदशामें सूर्यके दिन हुए। इसी प्रकार सर्वमहके समझना चाहिये। १ मासप्रवेशमें पंडशा-जन्म लग्नपति १, वर्षलग्नपत्ति २,मासलग्नपति ३,मुंथापति ४,त्रिराशिपति ५, समयपति ६॥ २ दिनप्रवेशमें सप्तशा-जन्मपति १, वर्षयति २, मासलग्नपति ३, दिनलग्नपति ४, मुंथा- पति ५, त्रिराशिपति ६, समयपति ७ । ३ मातमें भी प्रथम नहीं रीतिके अनुसार हीनांश पात्यांश करके ऐक्य करना चाहिये।

भाषाटीकासहितम् ।
(१५३)
दिनादिक सुग्धा मासदशा.
गु.
बु.
के.
१
४
२ १
३० । ४५
१
३०
४५
.
उदाहरण।
जैसे-द्वितीय मासप्रवेश उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्रमें हुआ है, इसकी संख्या २६
में ७ मिलाये तो ३३ हुए, ९ नवका भाग दिया शेष ६ बचे, १ एकको आदि
ले क्रमसे आचंभौराजी आदि दशा गिननेसे ६ छठी शनि दशामें पासप्रवेश
हुआ । यह आय (प्रथमदशा ) हुई । इसके आगे क्रमसे प्रहादी मासदशा
आती है।
"
भासदशा.
Rc
पु.
के.
सु.
२.
.
तु.
"
५
૨
१
४
४
१
२५
४५
१५
.
S
.
दिनप्रवेशस्पटलमानक्षत्रे सप्तयुतेऽकहते एकादिशेष
प्रायुक्तानामाद्या दिनदशा॥९॥
दिनप्रवेशसमयके स्पष्टलय और नक्षत्रकी संख्या ७ सात मिलाना ९ नवका
भाग देना, एकको आदि ले शेष बचे वह प्रथम कहे हुए नाम र. १, चं.
२, पं. ३, रा. ४, गु. ५, श. ६, बु. ७, के. ८, शु. ९ की आय दिन
दशा होती है ॥ ९॥
भुग्धांगभागमिता घट्यादयः ॥ १० ॥
मुग्धा दशाके दिनके ६ छठे भागके समान (बराबर ) घट्यादिक मुग्धा
दिनदशा जानना-जैसे सूर्यकी दिन १८ की दशा है इसमें ६ का भाग दिया
लब्ध ३ घटी आयी, यह सूर्यकी दिनदशा हुई । ऐसे ही सर्व ग्रहोंकी जाननी,
चाहिये ॥ १० ॥

(१५४) वर्षपदीपकम् । सुग्धा दिनदशा पट्यादि. च. म. गु. के. शु . . سد - .npetween - HTTER: प्रश्नांगस्य भं विना लिप्ताः कृत्वा खतिथ्युद्धता लब्धो भादि- मध्येऽङ्गसंयुता मुथार्थे स्पष्टं लग्नम् ॥ १४॥ प्रश्नलग्नकी राशि विना अंशादिककी कला करना ख (०) तिथि (१५) ऐसे १५० डेडसौका भाग देना, लब्ध राश्यादिफल ( राशि-अंश-कला- विकला) चार आवे उसकी राशिके अंको प्रश्नलमकी राशि अंक मिलानेसे मुंथाके वास्ते स्पष्ट लग होती है ॥ ११ ॥ प्रश्नांगातुर्येशो जन्मेशो ज्ञेयः ॥ १२ ॥ प्रश्नलमसे चतुर्थराशिका स्वामी जन्मेश जानना-अर्थात् पंचाधिकारीमें जन्मलमपातिके स्थान प्रश्नलमसे चतुर्थराशिका स्वामी जो हो वह लिखना१२ प्रश्नपत्रतो वर्षकरणे इयान्विशेषः॥ १३ ॥ प्रश्नपत्रपर वर्ष बनानेमें इतना ही विशेष जानना ( और सर्व रीतिमें कुछ न्यूनाधिक नहीं है ) ॥ १३ ॥ पाराशरकुलोत्पनो महादेव उदुंबरः। पाठकाख्याचणो रत्नललामपुटभेदने ॥३॥ रेवाशंकरसंभूतिः कृतवान्वर्षदीपकम् । व्यङ्काद्रीन्दुमिते शाके कन्यार्कप्रथमे दिने ॥२॥ इति मासाद्यध्यायः॥८॥ इति महादेवकृतवर्षप्रदीपकं समाप्तम् ।। रतलाम शहरमें पाठक ऐसे उपनामसे प्रसिद्ध पराशर कुलमें उत्पन्न (पारा- शरगोत्र ) उदुंवरज्ञातीय रेवाशंकरजीके पुत्र महादेव ज्योतिर्विदने शालिवाहन ६७९३ सत्रहसौ विरानवेके शक कन्यासंक्रांतिके प्रवेशके प्रथम दिनमें वर्षदी- पक बनाया ॥१॥३॥ .- भाषाटीकासहित। (१५५) मासप्रवेशपत्रम् । . २ ७ मे, 1901999२/१३/१४१५३१६/999098/२०/२१/२२/२३,२४२५/२६ २७/२८/२१ ૨૨/૨/૨૨૨૨૨૨૨૨J૨ ૨૨૨૩૨૨ ૨૨૨૩૨/૨૨/૨/૨/૧૨/૨/૨/૨ RJરરરરરરર ३१३३३४३५३६३९/४०/४७/४२४३४५/४६/४७/४८/४९/५०/५२५५५५ २०३९५०४१४२७४४०५२/१४२८३५/४/१६२०४०/५२/३/१४२५ ५४१३५२१, m. - -- - वृ ५६ १ १/२/३/५/६/१० १०११,१२,१३,१४/१५/१६/१६/१७१८१९२०२११२१३२२३२४ ५९/२१/३१७ २२२२२२२२२१/१९१५४ (२०५७/५/५४४१२७७७ भ S 60 ३/५६४ - मि. U |२४२५/२/२६/२७/२८/२८/२९ROBOlamp३२RRIERRE.४३४३५३ ३५/३६३६३३७३७३७ ५४३६३८५९३९/०८/५८३५/३०/४५,९८५१२२/५३२१४१४४९३३/५५ M. २ A Cauale ७ १३१३०२९/२१/२०/ ३३६३५ ૪/૦૮/૪/૦ધિક૭૪૦રરરરર રરકરણ ૨૪ ] ૮ ३ or ३/७३६२,२०५१/१५/३८) -- सिं. m-26 ३/२ २०३७२६२५/२५ २३२३२२२१२०/१९१०३८/9098/१५/१४/३/१२/११/१०/8/६५ ૦ રર-૧ર/રૂર કઇ ર૬૪૬૪૪૮પર ४ . ४४ - -- -- का. ५ - -- to ug w ३/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/१२/२/२/२/२/२/२/२/३/२/२/२/२/२/२ क. १/०५९/५८,५७ ५१/५०/४९/४८४१४५.४४४३/४२/४/३/३३६३५३३३२३/३०२९/०७ ४०३८५ २१/११३५३४३३२९/११/ ८१५.४४३५२३/१२ १४९३५२३/१२/ ०/४७३५/२१/७ ४१ ૨૨ ૧/૨/૨૨ ૨૨ ૨ ૨ ૨ ૨ ૨૨/૧૨૨૨ ૨ ૨ ૨ ૨ ૨૨/૧૧/૧૧/૧ २६२५२४२२२१२०/११/१८७१५१४४१३/१२/११/201८10६/५४३ १९०५९ ३२१४५२४१२९/२०/५०० १५१४२३३|२४१४१६५०५०/४३३६३०२/१९५५/१२/९/०६६/५ १/99199191919/999/9/9191989/9/9/9999/9/19/9/9/9/19/१ वृ. ५३५२५१५०४९/४/४७/४६४५/४४४३३४२४१४०३९३३३३ ३४३४३३२३२३१ ०३० ७ ४१६/१०/१४/१७२३२९३/४/५४|४|१४|३४३७५०'3/03/५०/६/२३/89/9/२२/३/५/२८/५/१६ 19191919/१/११/११/१/9/9/1931919/9/9/1999/9/9/11111 घ. २१/२१/२८२२०२७,२६२६२५२५/०४२४२२२२२२२२२१२१२१२०२० २०२०२०१९/११/१२/१२/ ४४११३०१७३ ९ જિરાફ ४१२८४९३१/०४/५८/४४ osc/0५९/५३४५७३९/ -- ---- वृ. G - --- ध. न म. ९ वि९ कुं. १० १/9/199/१/११/९/१/१/9/9/9/9/95/9/9199199919/9/9/29/ १९/१९/१९/१९११९/१९/१९/१९/१९२०२०२०२०२०२१२१२०/२१/२२२२२२२२२२४२४२५२५/२५२६/२६ ३६३३३३२३४/go४६/५/२/१२/२४३/९/४/२०३०/५७१७३१/३/२/१०/१५/४०/५३२५९२७/५७ 9/9/9/9/9/9/9/9/9/1991999||१/9/9/29/9999/9/9/919/9 २७२७२२९/२१/०३३३REFER३३३५३५२६३७३८३३९४०:४१४२४४४५/४६/४७/४७/ २०५८३०३/१०/१६२१५६३३/२०४९/३०/१०,५३,३६ १० २/४७३३२०/७ 9/१/9/9/११/9/29/9/9/२/१२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/१२/१/२ मी. ४८/४९,५०/५७५२५३५४५५/५६५७५८५९/०१/२ ३018/00/९/१०/११,१२१३/०५/१६,990 ५/४६४२३५/३६ 33RT-07:९/४५,४९५३/५८४ २०१७२४३२/sofucts/o [१४२८३९५० ४४ २५१०९३५६ -- । मी. ११ चर्पप्रवेशके वारादिकमें अग्रिमसूर्यके राशि अंशके कोष्ठोंके वारादिक मिलाना और अग्रिमकोष्ठकके साथ अन्तर करके सूर्यकी कला विकलाको गुणन करना, जो फल आवे वह वर्षप्रवेशके वारादिक मिलाये हुए कोष्ठकमें अग्रिम कोष्ठक अधिक हो तो हो तो मिलाना, न्यून हो तो पलमेंसे हीन करनेसे द्वितीय मास प्रवेश वारादिक होगा, एवं उसके आगेके सूर्यके राशि अंशज कोष्टमें द्वितीयमासके वारादि मिलानेसे तृतीयादिक मास होगा ।

(१५६) PRMA स्थिरबलवत्राण। मेष. ० वृषभ. १ मिथुन. २ अंशाः |. वं. . बु.सु. शु. भा. रा. २. चं. मं..शु.सु. शरा. घु. शु.श. ८॥ - वृशिदीपरम्। -- GIN ६।२०१२/१||१६||४||2011८॥४॥ ७ ३२० ८ १७/८॥११॥ ३२०८ ६ १४॥ ९॥ १011 ८ १२ १२ १५४॥११॥१०॥४॥७॥६४० ८६ ११॥ ८ २७८॥१॥ ६० ८ ८॥६॥ १४॥ १०,०॥७॥१०॥ ६.४०१/१०॥ १४॥ ५॥ ८॥९॥५॥८॥ ८1० ८1/40/६/0/0C3401010/२२॥ ६४० ८ ८|||६|| १२॥१०॥१२॥७॥ १२ १०1०1१२||१०॥ २४॥६॥ १ ३३/५/ 01 101001 १३॥ ५॥ ८॥ १०1०1८1८11६1291 ८1१11/७|||१२॥ २०१० ८॥1६ १२||2011||११||७|| ८1 १२।०१२॥ २१॥ १५॥ ५॥ S13॥४in 01| १३१२०८10/20 ॥ २०८३३४ ७११ १२/०1७11] ७८ १३ |८11/2200९११ ॥ १३।२०१२ १२ १३/७|| १||१२||४||८|| १४१० ८/१०॥६॥ १०॥१८ | १५/७/01/१३१२०८॥ १/७॥ १२॥३१॥८॥ ८ १६१४०/३10/१२ १३७॥९॥ 11/५000१६१४०/११/१२/७१/७||2011 २४६18011/१६/४०८॥ ९ ७॥ १२199011८८ १०॥ २०1०१२॥११/१२॥८॥९॥ ५ ॥ २०१० ११/१३, ७, ८||२११३॥६॥90111] २७१९1410|९|| १२ १२॥८॥७॥ १०॥ २३३२०/११॥११॥१४॥॥५||||||४||८||२२|०1८1१० ८2011१३॥८॥२१२०1०1८1९|| ९|| १२ १२ ८ २५/०२१॥११॥ १५॥ ५/९/१२|४||4|| २३1०1७11 ९६ ८1१४॥ १२॥ १२।२३।२०९॥ ९॥ १२ । १01 41 18 २६/४०२०॥ १०॥ २२॥॥॥५॥ ८ ७९२६४०८॥14॥६ || 21/१४॥ ११॥ १२॥२४॥२०॥९॥ ९ ८ 1| Rato ३०/०१० ११ १२॥६॥511/2011/08 २७ ८ ५॥ १०॥ ७॥॥२४॥२१॥ १२॥२६॥४०॥८॥ ८ ५।। १३॥ १।१०१०॥ १०॥ 꽃이여 41 ६ ८ | S11८॥१३॥ ९ २१॥ ३०1०1८॥ ७॥ ५॥ १४॥ ९॥ १119011 १२ म GORA -- बृहत्पंचवर्गी बलग्रहकी राशि अंशके समान कोष्ठकम जोहो वह लिखना पांचसे अल्प हीनबली होता है. सिंह. ४ कर्क. ३ कन्या.५ च. म में. र . श. इ. जु. ए. सु-श. रा. रा . र.चं म. बु. गु. शु. श.रा. भाषाटीकासाहतम् । -- ar519199 A ३॥२०॥ ९॥ १४॥ ९॥ ९॥ ११॥ ८ ६॥२०॥ १२॥ ९॥ ७॥ ८॥ ८३॥२०॥६॥५३॥ १७ ॥७॥ ११॥ ९॥ ६५००११॥ १३॥९॥ ११॥ ७॥ ६॥ ८॥ ६० १२ १९६|| ८॥ १२॥६॥९८६४०६।६/५॥ १७॥ १॥ ९॥ १३॥९] ८॥ ७० ८1 ६.४०, ११८ ६॥ ८॥ ९॥ १७ ९|| N७/ ०६५।। १७८॥८॥ १०॥ ९॥ ૧૦ ८ १२॥६॥ ९॥ १०।११ १०० ११८ १०॥ ९॥ ९॥८॥ १०1०६६६] १५man १०॥pm २३.० ८ १२।।६१०॥ ११॥२२ ८ १।।१।१२९॥ ८॥ ११॥ ७॥ ७॥ ॥१३॥२०॥५॥६॥ १६७/७ १श । १३२० ८ १२॥६॥ १२॥ १०॥ १८॥ ८ १०॥ १३॥२०॥ १२ ९॥ ७ ८ ९॥१६॥४०॥५/५/१६ mm १॥९॥ १६।०८ १२॥७१२॥ १०॥ ७॥ ७।। १६५८ १३ , ७ ९ १॥ ५॥ ९॥ ७॥ १७/०४५/५१६॥1॥ १२॥ ९॥ २७१० ८॥ १२॥६, १२ ७॥ १७०१॥८६| ९||l १०1 m२०१०५५॥६||१५॥९॥९॥ १०॥९॥ २००९ ९.१३॥ ८ २०1०२२॥८६॥ १॥ ११॥ ८111२००५॥६॥ १६ mm १०॥ २३३० ॥ ७॥१३॥ ५ २३॥२०१२ ८. ८॥ ७॥२३॥२०५॥10॥ १६ ॥६/१०॥८ २६० १४७७७॥ २४.०१॥८॥ १० १०॥ ६॥ ८७॥२६४०६६/८॥ १६ ॥ १०॥८ २६४० ८॥ २४६१८ ९॥ १०॥ ८॥ २६० १२॥९॥ ૧૨ ८. धा ६.२८/०५५1८॥१६॥७॥६॥ १०॥८॥ ३०.८ ८॥ १४॥६॥ ८॥११॥६॥ ९॥ ८ 2010१२॥१1१|| ८1 | ११॥ ४॥ ६ ३०१०४॥१७॥६७॥ १३॥ ११०) (१५८) पांचसे अधिक मध्यकाबली. दझसे अधिक पूर्णवली होता है। तुला.६ वृश्चिक. ७ चं. मं.. शु.श.रा. र ..... शु.श.रा. -- वर्षप्रदीपकम् । 19 ३।२०४॥ ६॥ ६/ १२६॥॥१२॥ १३||८|| ३॥२०॥ 41/१७] ७॥ ९.५॥८॥४॥ ३।२० ८॥ ८ ११८॥ १३॥ दा ४ ६० ४॥।॥ ६॥७॥१२। ७।१०॥ १३|| ८ ६४०८॥७॥ ४|| ८४॥ ६.४० ८॥ ७॥ १०॥ ७॥ १३ ८॥411 ६४०४॥ ६॥७॥१२॥ ७२०॥ ११ ८ ७/० ७॥१६॥ ५८॥|४|| १०० ८॥७॥१०॥ ७१२॥ ८॥४॥ १०1०४॥ ६॥ ६॥॥१२॥ ७॥ 2011 ११॥ ८ १०० ६॥ १४ १२।०९।२०।। १२॥ ६॥ १२॥ ८1 १३२० ३॥ ४॥ ५॥१४॥ श॥१४॥८॥ १२१०८॥६॥ १६॥८॥ ७॥८॥९॥५॥१३॥२०1८1९॥ १०॥ ७॥ ११ ८॥ ५॥ १४१० ६/१४|| ११॥ १४||८||1| १३|२०|८||६॥ १३॥ २०॥ ७॥ ७५||१६४०१. ९ २०॥ ७) 190111८111 ५॥ १६२०४॥॥ ५। ७.१४॥ 201॥१३॥७॥ १६.४०८ ९ १२|||९६८ ६।। ९ ८॥१०॥ ८ १०॥ ८॥ २०/० ७॥ १३ ९॥ १०॥ २२॥७॥ १९/०९ ७१३॥९॥ ८॥ ६) ४॥ २०१० ८11८1॥२०॥ ९॥1901101 २१/०५॥ ६ ८॥१०॥.२०11/१०॥१०॥६॥ २०१० ९ ११॥ ६॥ ८ २१1०७॥ ९॥९॥ ८॥ १०॥ २३२० ५ ४॥ ॥१०॥ ८ २३॥ १२॥६॥२३०७॥ ७ /१३/१२ ॥ ६ ९॥४॥२६॥२०॥८॥ ८ १२॥ 1201 ७॥ २६१४०४॥ ४॥ ॥2011 ७॥ १४ 20||६॥ २४/०७॥ ७॥ २३॥७॥॥ ९॥ ५॥ ९||९||२६० ८1८1१६॥ ६॥ 2111 २८1०।४॥ ४॥ ६॥ १०॥ ७॥ १३॥११॥६॥॥॥२६४०७ ३२॥ ८॥ ६॥७॥ १२॥४॥२६॥४० ८ ७॥ १७॥ ७॥ ९॥ ७॥११॥ ६ ३०1०४॥ ४॥ १०॥ ८॥ १०॥20॥७॥१०० 199011 ८11 ७ [१२॥ ३०० 41/७॥ १७॥ ७॥ २०॥ ८ ॥११॥ ७॥ २३॥ ७॥ ९॥ ५i स्थिरमैत्रीतः पंचवर्गबलचक्रम् । मकर ९ कुंभ १०० भीन ११. मै. बु.सु. शु.श. रा. र.चे. मं.बु.सु. सु.श.रा. र.च.म. सु.रा.शि.श. शा. भाषाटीकासहित। ३।२०६1.4 ८५||९॥१४॥ ३।२०७६.८॥१०॥४॥४॥ १५॥ २०॥९॥ ९ ९।। १॥ १०॥ २२॥ ७॥ 4. ९॥ ५॥ ९॥ १४ ||६४० ७.६॥ ९॥ १०॥४॥२२|१३|८॥ ६.४०9011/९॥१०॥ ५॥१०॥ १२/७॥ ८ ६४०६॥५॥ २० ॥६॥ ९/१३॥ ८ ७० ७।६८11१०||५||१२|१३१८॥ १०||||| १०॥ ६॥ १३/१२/८ १०. ८६॥ २०॥ ७॥ ८॥6॥ १३॥ 4m 1010/७॥ ६ ॥ ॥ २४ | १३ || १०1०1९॥ १०॥ ९॥ ५८१३१ १२५॥ १२१२० ८1/७॥ ११७|| ७॥८॥१२॥१३१० ७॥६॥18॥४॥११॥८॥ १३/०99119011 ११ १६९।५ १४० २२॥८॥७॥3॥ १२॥ ७॥१३॥२०॥८॥७॥१०॥१२InJl १६२०2910|१२|9901 ६॥॥१६॥६॥४॥ ६॥ १६.४००६॥ 101000 १२॥ १३|| ८२६.४०/on 81] ८॥२०॥|२|| SIN२६४०२१ | २०1300 ६॥ १६११] १३॥९॥५॥ २०० ६॥ १०॥|९||1|| १३|| २००८॥ २०१०|4||||||10|2012900/an १९/०२११०॥ १०॥ ६॥ १४॥ १0५॥ ७॥ ०३२।०९॥७॥ ९॥ ||५॥ १॥ १२॥||८२३२०|| ९॥२२॥ ६॥ ७.९/११ २००० १२|११||१३| ३१५/८01४० २३1०1८॥ ९॥ ९॥ |८|५||२४|| १४| २५० |९||१२||६||६11/2010/११/१६३२०/११॥ ११॥10॥ Asim Malina Rai नाम का Ram N२३॥ २६.४०/१०॥ १२॥ १२॥७॥६॥ ८1८1010 ५||१२|१४|१||२८० १२॥११॥१४॥ १४||३४| शन.१९/१३॥ १३॥ Onl६ २०१०|११||१०||११|| | १३॥ ९॥ . ९ जना (१५९) ' (१६०) वर्षपदीएकर उचलतारणीयम्। ऽशा. 0 . ९/20/1512/E09८,१९,२०२१२२३, २४ २५ २६ २८२ 0101919121991991919२ २२२२२२२३ ०१६/२० ४०५३/ ०३/२०२E77180/४१५३१६५३,२०२८३.०४६,५३/०१६ 010030/0/10/20/018०/२००४01001030.10. 018०२०० . . - रा. • ४००० - ord ४०२० . ८ २ २ - २०२/23/xo४६५/०६/२०/२/३३softy:/018/३/२03310Eo ८३२०२६३३३ ००२०/०/80/२००४०२००४० ०४०२००४०२००४०२००४ ०२० ६६.६७१/७१/७/10/- ४०४/०६/३२०२६३३४०४६५२०६२०२६३३१8०६५/०१६ २६३४०६३ ०४०/२०/06/२००४०२०/0/1000000२०/०,४०२००० ४०२०० १०/१०/१०/३०/१०/१०/१०/१०/१०/39/95/9999999999/११/१२१२/१२,१२२१२१२१२१२ ०६/३/२०१२३४०४६,५३/०६/३/२०२८11०४६५२०१६,३२०२६/०४६,५३ 0१४०२०/०४/२००४० ०,२००/४०२०० १४०२०० २०२० १२०,०४०२००४०२००/४०.२० #/23/11/३/१४/१४/95/१४/७४/x/pigras/१५१५ १५७५१५१५,१५,१५ १६ १६90/98E २०/२/12/10/४६/५/०६/२०२३mr/ree/019२०२६३३१४०,४६५३६३२०२६। 0/80/२०/०४०२००४०२०/020200/४०२०/०४०२०/०४०२००/४०२०/०४०२००/४०२० 90/98/9/10/90/99,90/90/909sarjscisejsage/caoj90090/9९९९,१६,१९.१९१९ १९९९ | ४०/४५३/०६३/२०२३३४०४६५/०६/१२/२०२६३1180/४६५०/६१३२०२६३३४०/४ २३२ ग --- ७ • Koreal • Isola oisors) • RAM.OR००४.२० ० ०२०/० ०/० ०/४०२० .. मह नीचके अंतरकि राशि अंश कोष्टकरें उसाल स्पष्ट जानना. आसीत्नपुरे पराशरकुलोत्पन्नो हिजोदुम्बरः ख्यातःपाठकनामतो गुणनिधिः श्रीनन्दरामाभिधः । तत्सूनुर्गणितागमज्ञविलकः श्रीमोतिरामायो रेखाशंकर आगमेपु निपुणस्तस्मादभूधार्मिकः ॥ १ ॥ उदात्मज उदारधीगणकमौलिचूडामणि- रभूबरणिमण्डले गुणनिधिर्महादेववित् । वदंगजनुषा त्विदं विवरणं सतां पीवये सहस्यशुचिपक्षवौ कठजयोन्मितोऽगाच्छके ॥२॥ श्रीज्योतिर्विद्वरश्रीमन्महादेवकृतवर्षप्रदीपकाख्यताजिकग्रंथे तदंगजश्रीनिवासविरचिता सोदाहरणभाषाव्याख्या समाप्ता ! समाप्तश्चायं ग्रन्थः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, "भीवेङ्कटेश्वर" टीम-प्रेस, "लक्ष्मीवेङ्कटेबर" प्रेस-कल्याण, बंबई. वंधई.

Patribhagpradipika

Author
Sharma, Shrinivas
Title
Patribhagpradipika
File name
Patribhagpradipika
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2009/10
Publisher
Mumbai, Venkateshvar Press
Language
Sanskrit
Pages
159
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345635
Barcode
99999990233969.00
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Banasthali University
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