Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Pathyaswasti

Shrama, Madhusudan · 2010/08

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यतः अखिलभारतीय तथा विशेषत. राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन
सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी आदि भापानिवद्ध
विविधवाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्टग्रन्थावली
प्रधान सम्पादक
फतहसिंह, एम० ए०, डी० लिट०
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
ग्रन्थाङ्क १०६
विद्यावाचस्पति-श्रीमधुसूदनशर्म-प्रणीत
पथ्यास्वस्ति
प्रकाशक
राजस्थान-राज्याज्ञानुसार
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
वि० स० २.२५.
भारत राष्ट्रीय शकाव्द १८६०
।
मुद्रक : जगदीशचन्द्र स्वर्णकार, अजन्ता प्रिण्टर्स, जोधपुर.

प्रधान सम्पादकीय स्वर्गीय पं० मधुसूदनजी ओझा की यह अमूल्य कृति प्रकाशित करते हुए हमे अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है। जोधपुर विश्वविद्यालय में सस्कृत- विभाग के अध्यक्ष श्री सुरजनदास स्वामी के परम सौजन्य, अथक परिश्रम एव प्रकाण्ड पाण्डित्य के फलस्वरूप ही इसका अनुवाद सहित प्रकाशन सभव हो सका है। विद्वान् मंपादक ने हिन्दी-व्याख्या के साथ-साथ बहुमूल्य पादटिप्पणिया भी दी हैं और अन्य के प्राक्कथन में कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला है । अत संपादक महोदय के हम अत्यत आभारी हैं। जैसा कि संपादक महोदय ने प्राक्कथन मे सूचित किया है, प्रस्तुत ग्रंथ लेखक के 'वाक्पदिका' नामक ग्रन्थ के प्रकरणभूत 'वर्णसमीक्षा' का एक अवान्तर प्रकरण है। अतः यदि संपूर्ण मूल ग्रन्थ उपलब्ध होता, तो प्रस्तुत ग्रन्थ अधिक सुगम हो सकता था। फिर भी संपादक महोदय को ग्रन्थकार के शिष्य होने का गौरव प्राप्त होने से, उन्होने विषय को जिस सुन्दरता से स्पष्ट किया है वह अन्य के लिये असम्भव था। पुस्तक का नाम कुछ अटपटा-सा है। नि.सदेह ब्राह्मणो मे (को० ७, ६; श० ३, २, ३, ८, ४, ५, १, ४) 'वाक्' को पथ्यास्वस्ति कहा गया है। परन्तु शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वाक् किसी 'निदान' (३, २, ३, १५) के आधार पर यह नाम ग्रहण करती है। अन्यत्र 'पथ्या' अदिति (ऐ०१,७) और पूपा की पत्नी ( गो० उ० २,९) कही गई है तथा उसका सम्बन्ध उदोची (को०७, ६; श०६, २, ३, १५) तथा प्राची दिशा (ऐ० १, ७) से बतलाया गया है। इसी पथ्या से अग्नि का भी सम्बन्ध प्रतीत होता है, क्योकि अग्नि को पथिकृत् (को० ४, ३) तथा पथ कर्ता (ग० ११, १, ५, ६) कहा गया है। इस प्रसग में यह भी उल्लेखनीय है कि वेद मे पूषा का सम्बन्ध भी पथ से है और ब्राह्मण-ग्रन्थों मे पथ्या (गो० उ० २, ६) को पूषा की पत्नी बताया गया है । ऋग्वेद मे स्वस्ति शब्द शुद्ध प्राध्यात्मिक अर्थ मे परमानन्द का पर्यायवाची-सा प्रयुक्त' हुआ है और वहाँ 'पच्या' शब्द के साथ भी कई वार आया है। संभवतः १. देखिये लेखक कृत "भारतीय सौन्दर्य शाम की भूमिका"

इसी सदभ में ऐतरेय ब्राह्मण पथ्या-शब्द का प्रयोग अदिति के लिये करता है
और आदित्य को उसका अनुसचरण करने वाला कहता है:-
यत्पथ्यां (अदिति) यजति तस्मादसौ (आदित्य.) पुर उदेति पश्चाऽस्तमेति,
पथ्या ह्येषोऽनुसचरति ।
(ऐ० ब्रा० १, ७)
अत इस दिशा मे गवेषणा द्वारा अध्यात्म-तत्त्व पर पर्याप्त सामग्री मिल
सकती है।
यद्यपि इस मीमांसा से प्रस्तुत ग्रन्थ के विषय का कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नही
है, परन्तु इसके द्वारा वैदिक-वाड्मय के महत्वपूर्ण स्थलों पर प्रकाश पड़ सकता
है। अतः आशा है यह मीमासा हमारी 'त्रैमासिक स्वाहा' मे यथाशीघ्र प्रारंभ
की जायेगी और विद्वान् सपादक के अतिरिक्त स्वर्गीय मधुसूदनजी के अन्य
शिष्य भी उसमे भाग लेगे तो उनका स्वागत किया जायेगा।
अन्त मे विद्वान संपादक को मैं हार्दिक धन्यवाद अर्पित करता हूँ। हमारे
सपादन-विभाग के अध्यक्ष श्री लक्ष्मीनारायण गोस्वामी ने इस ग्रन्थ के लिए जो
श्रम किया है उसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।
फाल्गुन शुक्ला ८, सं० २०२५
जोधपुर.
-फतहसिंह

अनुक्रमणिका मूलग्रन्थ के हिन्दी व्याख्या पृष्ठाङ्क १-२२ १-२२ के पृष्ठाङ्क १. मातृकापरिष्कारः प्रथमः प्रपाठः वर्णसमाम्नायः प्रयोगवाहाः स्वरभक्तिः २-३ २- २ ३-४ ४-४ ५- ७ रङ्गः अनुस्वारः विसर्गः औरस्योप्मा जिह्वामूलीयोपध्मानीयौ ७-७ यमाः ८-& १०-१० १०-११ १२-१७ १७-२० २०-२० २०-२१ २२-२३ २३-२८ २६-५० साप्ताशीतिशतिको (द्वितीयः खण्डः) १०-१६ अथ ब्राह्मो वर्णसमाम्नाय. (तृतीय खण्ड ) १६-१८ अय माहेश्वरो वर्णसमाम्नायः (चतुर्थः खण्डः) १६-१६ साप्तत्रिशिक. (पञ्चमः खण्डः) १३-२१ वर्णनिर्देशादिपरिशिष्टविचारः (षष्ठः खण्डः) २१-२२ २. अथ यमपरिष्कारो नाम द्वितीयः प्रपाठः २३-२७ ३. अथ गुणपरिष्कारस्तृतीयः प्रपाठः २८-५२ प्रथमः खण्डः २८-३६ द्वितीयः खण्डः (प्रक्रमस्थानतो वर्णभेद ) ३६-४२ तृतीयः खण्डः (मुख्यस्थानतो वर्णभेदः) ४२-४५ चतुर्थः खण्डः (कालतो वर्णभेदः) ४५-४६ पञ्चमः खण्डः (प्राभ्यन्तरप्रयत्नतो वर्णभेदः) ४६-४६ षष्ठः खण्डः (बाह्यप्रयत्नतो वर्णभेदः) ४९-५० सप्तमः खण्डः (सन्ध्यक्षरारमा स्थानप्रयत्ना) ५०-५२ ४. अक्षरनिर्देशश्चतुर्थः प्रपाठः ५३-६८ ५३-५६ २६-३६ ३६-४२ ४२-४३ ४३-४४ ४५-४८ ४८-४९ ४९-५० ५१-६८ ५१-५५ प्रथमः खण्डः ( २ ) द्वितीयः खण्डः ५६-६१ ५५-६१ ६१-६७ ६७-६८ ६६-८० ६९-७० ६१-६७ ६७-६८ ६६-८६ ६९-७० तृतीयः खण्डः चतुर्थः खण्डः ५. सन्धिपरिष्कारः पञ्चमः प्रपाठः निरूपकभेदात् सन्धित्रैविध्यम् व्यंजनभेदात् संश्लेष-साप्तविध्यम् वोर्यभेदात् सम्परिष्वङ्गद्वैविध्यम् योगभेदात् सन्धिद्वैविध्यम् आश्रयभेदात् सन्धि विध्यम् बलभेदात् सन्धिद्वैविध्यम् ७०-७२ ७२-७३ ७०-७१, ७१-७१ ७२-७२ ७२-७३ ७३-७३ ७४-७५ ७५-७५ ७५-७७ प्रागमो यथा ७४-७६ ७७-७६ ७६-७७ ७९-८१ ७७-७८ अथ लोपः अथ विपर्ययः अथ प्रादेशः अथ प्रकृतिभावः ८१-८३ ८३-८५ ७८-८० ८५-८६ प्राक्कथन वेदविद्यौद्धारक, वेदरहस्यप्रकाशक, समीक्षा-चक्रवर्ती, विद्यावाचस्पति, स्वर्गीय, पूज्य गुरुवर्य पं० श्री मधुसूदनजो महाराज ने वैदिक ग्रन्थों का सम्यक् परिशीलन कर सहस्राब्दियो से विलुप्त वैदिक विज्ञान को प्रकाश मे लाने के लिए यावज्जीवन भागीरथ प्रयास किया। तत्तच्छास्त्रीय परिभाषाओं के ज्ञान के विना किसी भी शास्त्र के हृदय (मर्म) को हृदयङ्गम नही किया जा सकता, इसलिए इन्होने वेदो की व्याख्या आदि न लिख कर उनके रहस्यो का उद्घाटन करने वाली वैदिक, परिभाषाओं के परिज्ञानार्थ परिभाषासम्बन्धी ग्रन्थो का प्रणयन किया। एतदर्थ १५० से भी अधिक ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रन्थों को उन्होने ब्रह्मविज्ञान, यज्ञविज्ञान, पुराणसमीक्षा, वेदाङ्गसमीक्षा इन चार प्रधान विभागो मे विभक्त किया। यह पुस्तक वेदाङ्गसमीक्षा-विभाग के अन्तर्गत 'वाक्पदिका' ग्रन्थ के प्रकरणभूत 'वर्णसमीक्षा' ग्रन्थ का अवान्तर प्रकरण है । इसका नाम 'पथ्यास्वस्ति' रखा गया है, क्योकि 'वाग्वै पथ्यास्वस्तिः' इस श्रुति के अनुसार वाक् को पथ्यास्वस्ति कहते हैं और स्वरव्यजनादि-विभाग से विभक्त वाक् वर्णरूपा है । इस ग्रन्थ मे भी उन्ही वर्गों की विभिन्न रूप से समीक्षा प्रस्तुत की गई है, अत. उन वर्णों की प्रतिपादक पुस्तक के लिए वाग्वाचक पथ्यास्वस्ति शब्द सर्वथा उपयुक्त है। - दूसरी बात यह है कि जिस मार्ग पर सूर्य परिभ्रमण करता हुआ दृष्टि- गोचर होता है, वह मार्ग सूर्य के चौतरफ संवत्सर में भ्रमण करने वाली पृथिवी का मार्ग है। उस मार्ग को भी वेद मे पथ्यास्वस्ति कहा जाता है। वाक् आग्नेय अर्थात् अग्निदेवताक होने से पार्थिवी कहलाती है, क्योकि अग्नि पृथिवी का देवता है। इसीलिये श्रुति मे 'यथाग्निगर्भा पृथिवी' यह कहा गया है। निरुक्तकार यास्क ने भी 'अग्निर्वा भूस्थान' इस वचन से इसी रहस्य का स्पष्टीकरण किया है। पृथिवी अष्टावयवा है, इस कारण पार्थिव वाक् भी अष्टावयव है। इसी आधार पर 'ब्रह्म वै गायत्री वागनुष्टुप्' तथा 'वाचमष्टापदीमहम्' इत्यादि श्रुतियों में वाक् को अष्टावयवा तथा अनुष्टुप् बतलाया गया है। क्योकि जैसे वाक् अष्टावयवा है उसी प्रकार अनुष्टुप् छन्द भी अष्टाक्षरात्मक है। जिस २] प्राक्कथन प्रकार आकाशस्थ क्रान्तिवृत्त पृथिवी का परिभ्रमणमार्ग है, उसी प्रकार पार्थिव होने से पृथिवीरूप इस वाक् का मार्ग वर्ण या वर्णमातृका है। इन्ही वर्गों पर वाक् परिभ्रमण करती है। अतः जिस प्रकार पृथिवी का परिभ्रमणमार्ग पथ्यास्वस्ति कहलाता है, उसी प्रकार वाक् का मार्ग वर्णमातृका भी पथ्यास्वस्ति शब्द से व्यवहृत किया गया है। इस ग्रन्थ मे प्रतिपादित वर्णमातृका को पथ्यास्वस्ति शव्द से व्यपदिष्ट करने का यह भी रहस्य है । इस प्राक्कथन मे सक्षेप से इस पुस्तक मे निरूपित विषयों का तथा इसकी उपयोगिता व महत्ता का प्रतिपादन करने का तुच्छ प्रयास किया जा रहा है। इस पुस्तक मे मातृकानुवाक, यमानुवाक, गुरणानुवाक, अक्षरानुवाक तथा सन्ध्यनुवाक नामक पाँच खण्ड हैं। मातृकानुवाक नामक प्रथम प्रपाठ मे अवान्तर ६ खण्ड हैं। प्रथम खण्ड मे ६७ वर्णो की आयी वर्णमातृका का निरूपण है। इस खण्ड में आठ अयोगवाहों के अन्तर्गत स्वरभक्ति, रङ्ग, अनुस्वार, विसर्ग, ह ह्र आदि औरस्य उष्मवर्ण तथा यम के स्वरूप का सुस्पष्ट तथा प्रामाणिक निरूपण है। द्वितीय खण्ड मे औपपादिक १८७ वर्णों का प्रतिपादन है, जिनमे १७ वर्ण तो आर्षेयी वर्णमातृका वाले ही है, किन्तु इनसे अतिरिक्त ६० औपपादिक वर्णो का अधिक निरूपण है। तृतीय खण्ड मे ६३ या ६४ वर्णों वाले ब्राह्म वर्णसमाम्नाय का वर्णन है जिनका निर्देश- स्वरा विंशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशति.। यादयश्चं स्मृता ह्यष्टौ चत्वारश्च यमा. स्मृताः' प्रादि दो कारिकामो मे किया गया है। चतुर्थ खण्ड मे ५१ वर्णों वाले माहेश्वर वर्णसमाम्नाय का निरूपण किया गया हैं । पञ्चम खण्ड मे मयासुर-विभाग द्वारा परिचालित होढाचक्रनामक ३७ वर्णों वाली आमुरी वर्णमातृका का निरूपण है। 7 वर्णनिर्देशादि-परिशिष्ट-विचार नामक पष्ठ खण्ड में वर्णमाला को मातृका क्यो कहा जाता है इसका निरूपण किया गया है। अर्थात् अवयवपरिच्छेद को मात्रा कहते हैं और वर्ण ध्वनि के परिच्छेद हैं, अत इन वर्णो को 'मात्रा एव मात्रिका' इस व्युत्पत्ति से स्वार्थ मे क प्रत्यय के द्वारा मात्रिका कहा जाता है। मात्रिका-शव्द ही उच्चारण की समानता से मातृका कहलाता है। अथवा यह 1 प्राक्कथन [ ३ वर्णमाला माता की तरह भिन्न भिन्न देशभाषाओं की जननी है, इसलिये इसी साम्य से वर्णमाला को मातृका कहा जाता है। तत्पश्चात् यह बतलाया गया है कि व्यवहार भापा से ही निष्पन्न होता है। अतः सर्वप्रथम भाषा ही लोकव्यवहार में प्रवृत्त होती है। तदनन्तर शनै: शनै: उसमें वाक्य, पद व वर्गों के विभाग प्रचलित हुए हैं। प्रारम्भ में वर्णो की विशेषता के कारण ही भिन्न-भिन्न वर्गों की भिन्न-भिन्न सज्ञायें प्रवृत्त हुई। जैसे रेफ अधम का वाचक है इस विशेषता के कारण 'र' की रेफ- सज्ञा हुई । तदनन्तर शनै शन वर्गों के आगे कारशब्द, तथा इतिशब्द लगाकर वर्गों की साये प्रचलित हुई। जैसे-अकार ककार आदि 'अ' तथा 'क' की सजायें हैं। इसी प्रकार अ+इतिएति, अ को सज्ञा, विति व की सज्ञा बनी। इसी प्रकार व्यजनो मे स्वर के योग से भी वर्णसंज्ञाये बनती हैं। जैसे- क, ख, ग, घ आदि। किन्तु वर्णसज्ञा का यह नियम सभी भापायो मे है। जैसे इंग्लिश मे एच, एल, एफ, वी, सी डी आदि मे 'ए' तथा 'ई' स्वर जोड़कर वर्णो का बोध किया जाता है। पारसी भाषा मे भी बे, पे, ते, टे, से, मे यही नियम लागू होता है। यमानुवाकनामक द्वितीय प्रपाठ में यम के विषय में चार मतो का निरूपण किया गया है। इस प्रकरण मे सर्वप्रथम शुद्धजित्, सोमजित्, शुद्धघि, सोमधि भेद से चार भेद यम के बतलाये हैं और उनकी क्रमश कुं, खं, गुं, घु, संज्ञायो का निर्देश किया गया है। इसके पश्चात् यम के स्वरूप में चार प्रकार के मतो का प्रदर्शन किया गया है। प्रथम मत के अनुसार पञ्चम वर्ण के परे होने पर पूर्व वर्ण के द्वित्व होने पर द्वितीय वर्ण अनुनासिक परवर्ण के कारण नासिक्य हो जाता है। यही यम है। इस पक्ष मे यम पूर्व वर्ण के सदृश वर्णागम है। इसी मत को मण्डूक, वर्णरत्नप्रदीपिकाकार तथा प्रौदवजि मानते हैं। इस मत मे पञ्चम वर्णो के परे होने पर उनसे पूर्व वर्णो के प्रथमादि चार अक्षरो के' वर्गभेद से २० होने के कारण यम २० हैं। किन्तु शुद्धजित् आदि भेद से वे चार ही हैं । द्वितीय मत के अनुसार दो पदो के मध्य वर्तमान अर्धमात्राकालिक यति की तरह दो अक्षरो के वीच भी यति होती है। जैसे 'सक्रतु' इस पद में सकारो- त्तरवर्ती प्रकार तथा ककार के मध्य यति है। इस यति मे 'सक्रतु.' ऐसा 7 ] प्रावकथन उच्चारण होता है। किन्तु यह यति अ व क के मध्य में ही हो, यह नियम नही, क व रेफ के मध्य भी हो सकती है। उस समय 'सक् ऽ रतु. ऐसा उच्चारण होता है। पूर्वोत्तरवर्ती दो व्यजनो की तरह यह यतिरूप विच्छेद दो स्वरो के बीच भी होता है किन्तु दो स्वरो के मध्य का विच्छेद विवृति कहलाता है और दो व्यजनो के मध्य का विच्छेद यम । इस मत मे यम दो व्यजनो के मध्य का विच्छेद है, अतएव वह अशरीर है। इसी मत को अमोघ- नन्दिनोकार, प्रदोपकार आदि ने माना है। इस मत में अनुनासिक वर्णो के परे होने पर उनके तथा वर्गों के प्रथमोदि चार वर्णो के मध्य विच्छेदरूप यम २० हैं तथापि अनुनासिक वर्णो से पूर्व विद्यमान व्यजन अघोष अल्पप्राण, अघोप महाप्राण, सघोप अल्पप्रारण तथा सघोष महाप्राण भेद से चार ही प्रकार के हैं, अतः उनके तथा पचम वर्णो के मध्य विद्यमान विच्छेद रूप यम भी चार ही है। तृतीय मत यह है कि पदान्त की तरह पद के मध्य मे भी स्थानकरण- सयोगज वर्णो की तरह वेग से स्थान व करण के विभाग से विभागज वर्ण भी उत्पन्न होता है। पदमध्यस्थ यह विभागज वर्णरूप व्यजन ही उससे आगे वर्तमान अनुनासिक वर्ण के प्रभाव से जब नासिक्य हो जाता है तो यम कहलाता है। पलिक्कनी आदि मे यही स्थिति है। वर्गों के पञ्चम अनुनासिक वर्ण परे होने पर उससे पूर्व प्रत्येक वर्ग के चारो व्यंजन द्वित्व होकर यम होते हैं। इस प्रकार इस मत मे यमो की सख्या २० है। चतुर्थ मत के अनुसार यम २० नही है किन्तु चार ही हैं और वे कु, खु, गुं, घु हैं। वर्गों के पञ्चम अनुनासिक वर्ण के परे होने पर सभी वर्गो के चारों वर्णो को द्वित्व होने पर कु, खु गु घु, ये ही यम होते हैं। जैसे 'आतनच्मि' मे च को द्वित्व होने पर उसके स्थान मे कु यम होकर 'आतन क्मि' ऐसा ही उच्चारण होता है। इसी प्रकार समा मि मे 'ज' को द्वित्व होकर 'गु' यम होने से 'समा ग्मि' उच्चारण होता है । गुणपरिष्कार-नामक तृतीय प्रपाठ में वर्णाहित गुणो का विवेचन किया गया है। सर्वप्रथम वाक् के स्थानभेद से वेकुरा, सुब्रह्मण्या गौरिवीता तथा आम्मृणी ये चार भेद बतलाये है। इनमे स्वयमू-मण्डल की वाक् वेकुरा, परमेष्ठिमण्डल की सुब्रह्मण्या, सौरमण्डल की गौरिवीता तथा चन्द्रमण्डलयुक्त। पृथिवीमण्डल की वाक् आम्भृणी है। ये चारो वाक् ही स्वयभू आदि मण्डलों प्रावकथन [ ५ -- मे स्थित सर्वपदार्थों की जननी हैं। पृथिवीमण्डलस्य यह प्राम्भृणी वाक् भूमि में सर्वत्र व्याप्त है, इसी से मनुष्य उपजीवित हैं। प्रकारान्तर से इस वाक् के अमृता, दिव्या, वायव्या तथा ऐन्द्री ये चार भेद किये गये । हैं । इनमे ऋक्, साम, यजुरूप वेदत्रयी अमृता वाक् है । इसी से समस्त विश्व उत्पन्त होता है, इसी में प्रतिष्ठित रहता है तथा इसी में लीन होता है । यह वाक् आकाशरूप है। यह अग्नि से उत्पन्न होती है। अथर्ववेद पारमेष्ठदित्य ऋतवाक् है। इसी से भूत उत्पन्न होते हैं। यह वाक् दिक्सोम से उत्पन्न होती है। यह वाक् अथर्व-वेद-रूप है। दोनो वाक् ध्वनिरहित हैं। अत एव इनका श्रोत्रेन्द्रिय से ग्रहण नही होता। ध्वनिरूप वाक् श्रोत्र से गृहीत होता है । यह ध्वनि वाक् भो अनर्थक व अव्याकृत तथा सार्थक व व्याकृत भेद से दो प्रकार को है। वर्णपदवाक्यादि-विभाग-रहित अत एव अव्याकृत वाक् वायव्या है । वह वायु से उत्पन्न होती है। वर्णपदवाक्य-विभाग- युक्त व्याकृत वाक् ऐन्द्री है, वह सार्थक है, क्योकि उससे अर्यवोवनरूप प्रयोजन की सिद्धि होती है। इस वाक् मे वर्णपदवाक्यादिविभाग इन्द्र द्वारा किये जाते हैं, अतएव इसे ऐन्द्रो भी कहा जाता है। इसी प्रकरण मे उपर्युक्त चारो प्रकार की वाक् को लेकर तथा परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, वर्ण, अक्षर, पद, वाक्य, पशुवाक्, पक्षिवाक्, सरीसृपवाक् तथा मनुष्यवाक् रूप से वाक् के चार चार भेद मानकर 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि इत्यादि मन्त्र का समन्वय प्रदर्शित किया गया है। तत्पश्चात् वर्ण, अक्षर, पद वाक्य मे प्रत्येक के क्रमशः चार-चार भेद बतलाये गये है। इसके पश्चात् प्रक्रमस्थान, मुखस्थान, काल, करणप्रयत्न व अनुप्रदान- प्रयत्न भेद से वर्गों की व्याख्या की गई है। अर्थात् प्रक्रमस्थानादि के भेद से वर्गों का निरूपण किया गया है। इन्ही के कारण एक ही अकार नाना- वर्गों के रूप में परिणत हो जाता है। जैसा कि 'अकारो वै सर्वा वाक्, सैषा स्पर्शीष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वो नानारूपा भवति' इस ऐतरेयारण्यक श्रुति से सिद्ध हो रहा है। उपर्युक्त श्रुति मे स्पर्श और उष्म शब्द स्थानों और करणों के सन्निकर्ष तथा विप्रकर्ष के बोधक हैं। स्थान और करण वाह्य तथा आभ्यन्तर भेद से ६ ] प्राक्कथन दो दो प्रकार के हैं। मुखस्थान से बहिर्भूत उरस्, शिरस् अादि वाह्य स्थान हैं तथा मुखाभ्यन्तर-वर्तमान कण्ठादि आभ्यन्तर हैं। वाह्य स्थानो को प्रक्रम तथा बाह्य करणों को अनुप्रदान कहते हैं और मुख के अन्दर विद्यमान कण्ठादि स्थानों को मुखस्थान व करणो को ग्राभ्यन्तर प्रयत्न कहते हैं। इन उभयविघ स्थानो व करणों में प्रयत्नविशेष से स्थानो व करणो का सकोच व प्रसार होता है। और इस प्रकार प्रक्रम, अनुप्रदान, मुखस्थान तथा प्राभ्यन्तर प्रयत्न ये चारो गुण वर्णविशेष की उत्पत्ति मे कारण होते है । इसी प्रकार उपयुक्त श्रुति मे सर्श तथा उष्म शब्द दो स्वरो के सश्लेष व विश्लेष के भी बोधक हैं। स्वरो के विश्लिष्ट उच्चारण मे एक मात्रा का काल तथा संश्लिष्ट उच्चारण मे द्विमात्रकाल लगता है। विश्लेप तया सश्लेष से जन्य यह कालरूप गुण भी वर्णविशेप की उत्पत्ति मे कारण है। इस प्रकार प्रक्रम, अनुप्रदान, मुखस्थान, आभ्यन्तर-प्रयत्न व काल इन पांचो गुणों से किस प्रकार विभिन्न वर्गों की उत्पत्ति होती है, इसी रहस्य का विवेचन इस प्रकरण मे आगे क्रमश. किया गया है। अक्षरनिर्देशनामक चतुर्थ प्रपाठ मे परब्रह्मविद्या तथा शब्दब्रह्मविद्या की समानता प्रतिपादित करते हुए बतलाया गया है कि जिस प्रकार परब्रह्मविद्या में पर (अव्यय) अक्षर (प्राण) तथा क्षर (भूत) ये तीन तत्त्व है, उसी प्रकार शब्दब्रह्मविद्या मे भी स्फोट, अक्षर (स्वर) तथा क्षर (व्यजन) ये तीन तत्व हैं। जिस प्रकार परब्रह्मविद्या मे पृथिव्यादिभूतरूप क्षरों की सत्ता प्राणरूप अक्षर के अधीन है, उसी प्रकार शव्दब्रह्मविद्या मे क्षररूप व्यजनों की सत्ता अक्षररूप स्वरो के अधीन है। जिस तरह परब्रह्मविद्या मे ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि व सोम ये पाँच मौलिक अक्षर है, उसी प्रकार वागब्रह्मविद्या में भी अ, इ, उ, ऋ, लू, ये पाँच अक्षर हैं। जिस तरह परब्रह्मविद्या मे ब्रह्मादि अक्षरो से ही सारे भूतरूप क्षर उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार शब्दब्रह्मविद्या में अकारादि पाँच स्वरात्मक अक्षरो से ही सम्पूर्ण व्यंजनरूप क्षर उत्पन्न होते हैं। जैसे-परब्रह्मविद्या मे क्षर अक्षर मे आश्रित हैं और अक्षर अव्यय मे समन्वित रहते हैं वैसे ही शब्दब्रह्मविद्या मे व्यंजन स्वर मे आश्रित हैं तथा स्वर स्फोट रूप आलम्वन पर आश्रित रहते हैं। इसके पश्चात् वर्ण तथा अक्षर का पुरुषभेद, संख्याभेद, योनिभेद, प्राक्कथन [ ७ अतः व्यापारभेद, वीर्यभेद, प्रतिष्ठाभेद, अङ्गाङ्गिभावभेद, तथा प्रतिपत्तिभेद इन आठ कारणों से भेद सिद्ध किया है। पश्चात् द्वितीय खण्ड मे वर्णो के अङ्गाङ्गिभाव का प्रतिपादन किया है। अधिदैवत में वृहती इन्द्र का छन्द है। नवाक्षर छन्द की वृहती संज्ञा है। इन्द्र द्वारा व्याकृत अत एव ऐन्द्री स्वरवर्णरूप वाक् भी नव अवयवो या नव विन्दुप्रो वाली है। अर्थात् नौ विन्दु या ६ अर्धमात्राये, स्वर का व्याप्तिस्थान क्रान्तिमण्डल या महिमामण्डल है। स्वर एकमात्रिक होता है । अतः वह अर्घ- मात्रिक पञ्चम व पष्ठ इन दो विन्दुओं पर स्थित रहता है । क्योकि प्राण या आत्मा केन्द्र मे हो स्थित होता है, अत. स्वररूप प्राण भी इन नौ विन्दुरूप अर्धमात्रिक व्यञ्जनवर्गों के मध्य में रहता है। तथापि इसका व्याप्तिस्थान या क्रान्तिस्थान ६ विन्दु तक रहता है। अर्थात् इतने प्रदेश में वर्तमान व्यंजनों को यह स्वर आत्मसात् करने में समर्थ है। जहाँ कोई व्यजन नहीं होता, वहां केवल स्वर ही अक्षर कहलाता है तथा पूर्व या उत्तर मे जहाँ व्यजन होते हैं, वहाँ व्यंजनसहित स्वर ही अक्षर कहलाता है। यही वात 'स्वरोऽक्षरं सहाद्ययंजनरुत्तरैश्चाव- सितै.' इस सूत्र के द्वारा कात्यायन ने वतलाई है। जव कोई व्यजन दो स्वरों के व्याप्तिस्थान मे आ जाता है, तब दोनों स्वरो के वल का विचार कर जिस स्वर का वल उस व्यंजन पर अधिक होता है उसी का अग माना जाता है, दूसरे का नही। जैसे कुल शब्द मे 'ल' पर पूर्ववर्ती उकार स्वर की तथा परवर्ती अकार स्वर की व्याप्ति है तथापि वह उत्तर स्वर का ही अंग है स्वर का नहीं क्योंकि प्रत्येक स्वर में पृष्ठतः चार पाद तया पुरत. तीन पाद बल होता है। अत. लकार पर प्रकार का चार पाद वल है तथा उकार का तीन पाद वल है। अतः प्रकार का अधिक बल होने से वह उसी का अंग है। तृतीय खण्ड मे अक्षर मे देवता का ध्यान वतलाया गया है। 'तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत्' इस श्रुति के अनुसार वाक् पार्थिव और अग्निदेवताक है, क्योकि पृथिवी का अग्नि देवता है। तथापि यह वाक् इन्द्ररूप प्राण से अविष्ठित है अतः उसके साथ एक होने से ऐन्द्री (इन्द्रदेवताक) कहलाती है। यह इन्द्र प्राण आन्तरीक्ष्य व दिव्य भेद से द्विविध है। दिव्य इन्द्रप्राण प्रज्ञाप्राण है। वही इस ध्वनिरूप वाक् में स्वर-व्यंजनरूप विभाग करता है।

प्राक्कथन आन्तरिक्ष्य इन्द्र वायु से सयुक्त रहता है। इन्द्र-तुरीय वायु ही ऐन्द्रवायव ग्रह वन कर आग्नेयी इस ध्वनि वाक् पर अधिष्ठित रहता है। उपर्युक्त रीति से अग्नि व इन्द्र ये दो देवता इस वाक् के हैं। अग्नि अष्टावयव होती है, अतः एक स्वर तथा उसके अनुगत सात व्यंजन एक अक्षररूप वाक् हैं । इस वाक् का उक्थ (नाभि) रूप अश स्वर पञ्चम तथा षष्ठ विन्दु पर स्थित रहता है तथा उसका प्राणरूप इन्द्र वृहती रूप नौ विन्दुओ को व्याप्त करता है। इसी लिए 'यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक्' इस श्रुति में इन्द्र या आत्मरूप ब्रह्म की व्याप्ति वाक् मे बतलायी गयी है। यहाँ ब्रह्म इन्द्रप्रारण या आत्मा का वाचक है। इस प्रकार स्वरस्वरूप-निरूपक प्रज्ञाप्राणरूप इन्द्र भिन्न है तथा एक स्वर तथा सात व्यंजन, इस प्रकार मिला कर अर्धमात्रिक नौ विन्दुओ पर व्याप्त रहने वाला आन्तरीक्ष्य इन्द्र प्राण भिन्न है। इस आन्तरीक्ष्य इन्द्र को ही 'बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहु.' इत्यादि ऋङ्मन्त्र मे हंस पद से व्यवहृत किया गया है। क्योकि यही ६ बिन्दुओ पर व्याप्त इन्द्रप्राण अपने उच्चारण में दूसरे की अपेक्षा रखने वाले अत एव परतन्त्र व्यंजनो को आश्रय प्रदान करता है और अपने मे उन्हे वद्ध रखता है। वाक् अवरूप है क्योकि 'सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात्, वागेव साऽसृज्यत, सेद सर्वमाप्नोत् यदिद किञ्च' यह यजु:-श्रुति वाक् को अवरूप वतला रही है। तृतीय धुलोक मे अर्थात् परमेष्ठी लोक में इस अवरूप वाक्- तत्त्व के साथ यह ऐन्द्रवायव-ग्रहरूप हंस रहता है। अर्थात् ऐन्द्रवायवग्रहरूप इन्द्रप्राण तथा वाक् अविनाभूत हैं। नौ विन्दुओ को व्याप्त कर रहने वाले वाक् के अधिष्ठाता इस इन्द्र का विद्वानो ने विचारष्टि से साक्षात्कार किया। इस प्रकरण में यह भी बतलाया गया है कि इन्द्रप्राण का वाक्तत्त्व में दो प्रकार से विनियोग है-सत्यरूप से तथा प्रज्ञारूप से। प्रज्ञारूप इन्द्र इस वाक्तत्त्व में वर्ण, अक्षर, पद, वाक्य आदि विभाग करता है और इसकी सत्ता व्याकृत मनुष्य वाक् मे ही है। अतः वही वर्ग, पद, वाक्यादि विभाग हैं। सत्यप्राणरूप से यह इन्द्र व्याकृत व अव्याकृत सभी प्रकार की ध्वनियो मे रहता है। अर्थात् सभी प्रकार की ध्वनियों का वह इन्द्र सत्यरूप से अविष्ठता है। सभी प्रकार की वाक् मे इसकी सत्ता मानने की आवश्यकता यह है कि वाक्तत्त्व अस्प होने से ऋत अत एव निरात्मक है। वह विना आश्रय प्राक्पयन [ ६ के रह नहीं सकती है। अत. उसका आश्रय यह सत्यप्राणरूप इन्द्र है। इसी के कारण वह अपरिच्छिन्न ऋत-वाक् परिच्छिन होकर सत्यरूप वनती है । अन्त में इस प्रकरण के पञ्चम खण्ड में अक्षरों के गुरुभाव तथा लघुभाव के कारण का विवेचन है। " सविपरिप्कार-नामक पञ्चम खण्ड में स्वरसन्धि, व्यञ्जनसन्धि, विसर्गसन्धिभेद से विभिन्न सन्धियो की मौलिक उपपत्तियाँ वतलायी गयी है। पारिगन्यादिनिर्मित व्याकरणगास्त्रो में सन्धियो के नियममात्र बतलाये गये हैं, किन्तु उन सन्धियों के मूल कारण का दिग्दर्शन उन शास्त्रो में लेगत भी नहीं किया गया है। इस ग्रन्थ इस ग्रन्थ में उन सन्धियों के मूल कारण का दिग्दर्शन कराया गया है। सन्धियाँ वरों का परस्पर सम्बन्ध होने पर होती हैं। वर्णो का वह सम्वन्ध सर्वप्रथम विभूति तथा योगभेद से दो प्रकार का है। गव्द- ब्रह्म व अर्थब्रह्म का एक ही प्रकार है। अतः अर्थब्रह्मरूप परब्रह्म-विद्या मे जिस प्रकार पदार्थों के विभूति व योग दो प्रकार के सम्वन्व होते हैं, उसी प्रकार नन्दब्रह्म-विद्या में भी वर्णो के ये दो प्रकार के सम्बन्ध है। अर्थब्रह्म में व्यापक का व्याप्य में अनुग्रह विभूति कहलाता है। जिस प्रकार व्यापक ब्रह्म का व्याप्य भौतिक पदार्थों में, जल का लवण मे, आकाश का वायु मे, उसी प्रकार व्यापक स्वर का व्याप्य व्यञ्जनों के साथ सवन्ध विभूति सम्बन्ध है। क्योकि स्वर का व्यञ्जनो पर अनुग्रहमात्र है, वन्वन नहीं। स्वर व्यञ्जनो को व्याप्त करता है, स्वर के विना व्यञ्जन की स्थिति ही सम्भव नही। इसी प्रकार व्यञ्जनों का भी व्यञ्जनों के साथ अनुग्रहात्मक विभूति-सम्बन्ध होता है। जैसे-रामारणाम, वर्मणाम् इत्यादि मे रेफ व मूर्धन्य पकार का उत्तर- वर्ती नकार के साथ अनुग्रहात्मक विभूति-सम्बन्ध है। इसके कारण 'रामाणाम्' इत्यादि मे 'न' 'ण' 'मे' परिवर्तित हो जाता है। व्याप्य का व्यापक में सम्बन्ध संश्लेप कहलाता है। यह इकतरफा सम्बन्ध या वन्धयोग कहलाता है। जैसे -प्रकृति में, लवरण का जल के साथ, वायु का आकाग के साथ। इसी प्रकार व्याप्य व्यजनो का स्वर मे सम्बन्ध संश्लेष है। यहाँ व्यञ्जन का स्वर से सम्बन्ध है, स्वर का व्यञ्जन मे नही, अतः यह इक- तरफा वन्वयोग है। इसी तरह क्षररूप व्यंजनों का व्यंजन से सम्बन्ध भी संश्लेप होता है। इस संश्लेप-सम्बन्ध में एक वर्ण का दूसरे वर्ण से सम्बन्धमात्र १० ] प्रशयन होता है, एक वर्ग का दूसरे वर्ग मे अनुप्रवेश नहीं। इस सश्नेप-सम्बन्ध मे भी वर्गों का परस्पर अनुग्नवेश न होने से सम्बन्ध होने पर भी वर्णागमादि या वर्गपरिवर्तनल्प सन्धिफल नहीं होता। मम्परिवङ्गरूप तृतीय सम्बन्ध वर्णो का परस्परवन्धरूप, अत एव परम्परानुप्रवेशवप है। दो स्वरों का जब परस्पर सम्परिष्वङ्गल्प सम्बन्ध होता है, तब कही तो उनमे प्रसारणरूप परिवर्तन होता है जैसे-दीर्घ, गुण व वृद्रिसन्धि मे और कही अनुप्रवेश के कारण दवाव से स्वरो का गकोच होता है जैसे-यणसन्धि में। दिव्यस्ति, दिक्ष्वस्ति इत्यादि उदा- हरगो में आदि स्वर इकारादि का परस्पर अकारादि के साथ सम्बन्ध होने पर दबाव के कारण पूर्व एकमात्रिक इकारादि स्वर की उत्तर अर्धमात्रा नष्ट हो जाती है और इस कारण अवशिष्ट अर्धमात्रिक इकारादि तत्स्थानीय यकारादि स्पर्गों में परिवर्तित हो जाते हैं। में स्वरसन्धि मे एक स्वर की द्वितीय अर्धमात्रा दूसरे स्वर की पूर्व अर्थमात्रा से मिलकर एक हो जाती है। व्यञ्जन-सन्वि मे एक स्वर से निगृहीत व्यज्जन का दूसरे स्वर से निग्रहण होता है। जैसे-तत्+आगमनम्, द्वितीय तार या ग्रहा सन्धि से पूर्व उसके पूर्ववर्ती स्वर से होता है, और वह भीला अज्ञहै। शिन्तु जश्त्वसन्धि के बाद 'तदागमनम्' बन जाने पर 'द' का ग्रहण उन्नरवर्ती काररूप स्वर में होता है और वह उसी का अङ्ग होता है। उच्चारण के द्वारा उन दोनो भेटो को स्पष्ट अनुभव किया जा नकता है। यही स्थिति अन्य मानमन्धियों में है।

प्राक्कथन [ ११ विशेषाधानहेतु विशेपक वल का विनियोग होता है, तव विभिन्न सन्धिफल उत्पन्न होते हैं। क्योकि विषक वल उपजनक, उपवातक, विक्षेपक, विशेपा- धायक एव निरोधक भेद से पांच प्रकार का है। अत वांगम, वर्णलोप, वर्ण- विपर्यय, वर्णादेश तथा प्रगृह्य अर्थात् स्वरूप से स्थिति ये पाँच सन्विफल उत्पन्न होते हैं। उपजनक-रूप विगेषक बल वर्णागम का, उपवातक वर्णलोप का, विक्षेपक वर्णविपर्यय का, विशेषावायक वादेश का तया निरोधक प्रगृह्यरूप सन्धिफल का जनक है। निम्नाकित वचन मे अभियुक्तो के द्वारा इन्ही पाँच सविफलो का निरूपण किया गया है। वागमो वर्णविपर्ययस्तल्लोपस्तदादेग इमे विकारा.। स्थिति. प्रकृत्येति । पञ्च सन्वे फलानि वर्णद्वयमनिकर्षे ॥इति।। 'भयो होऽन्यतरस्याम्' 'ड: सि धुट्' 'शि तुक्', इणो कुक् टुक् गरि', 'छे च', 'दीर्धात्', 'अनचि च' इत्यादि सूत्रो से होने वाले द्वित्व वर्णागम के हो अन्तर्गत हैं। इसी प्रकार 'स्त्रादीरेरिणो', 'ऋते च तृतीयासमासे', प्रवत्सतर- कम्बलदसनार्णदशानामृणे', 'उपसर्गाति घातो' इत्यादि-से होने वाली बृद्धि- सन्धियां भी अकाररूप वर्णागम के ही उदाहरण हैं। गर्भ, उद्ग्राभ, निग्राभ, सजभार, विश्ववाट, मुड्, धुम्, इत्यादि भी इसी के उदाहरण है। गर्भादि मे 'ह' से पूर्व '' का आगम तथा विश्ववाड् व धुक् मे क्रमशः ड् व ग् का पागम है। 'उद. स्थास्तम्भो पूर्वस्य', 'लोप शाकल्यस्य' इत्यादि वर्णलोप के उदाहरण हैं। उप्णिक आदि मे उत् के त् का लोप तथा तृत्रम् मे र तथा य का लोप भी इसी के उदाहरण है। 'अक्षादहिन्यामुपसख्यानम्', 'प्रादहोढोढ्य- पैष्येसु' इत्यादि से होने वाली सन्धि वर्णविपर्यय का उदाहरण है जिसका स्पष्टीकरण मूल तथा हिन्दी-व्याख्या मे कर दिया गया है। 'पश्यक' गब्द से निप्पन्न 'कश्यप', 'कश्य' से निप्पन्न कच्छ, श्रथ व लय शब्द से निष्पन्न शिथिर व शिथिल शब्द, अत्र शब्द से निष्पन्न 'पात्', एक्शव्द से निष्पन्न वै शब्द, तु शब्द से निष्पन्न उत् शब्द भी इसी वर्णविपर्यय के उदाहरण हैं। इसी प्रकार ब्रहम, वम्, भूमा, भूयान्, निघण्टु आदि भी इसके उदाहरण है। प्रारम्भक बल में विशेपक बल उदय से जव लोप, आगम, विपर्यय वलो के समुच्चय के कारण वर्ण गुणो मे किसी का का नाश, किसी का १२ । प्राक्कथन आगम तथा किसी का विपर्यय एक साथ होता है, उसे वर्णादेश कहते है। जैसे-वर्णो के आरम्भक स्थानोपधायक बल मे द्रुति, सम व प्लुति-ये तीन गतिरूप बल है। इनमे द्रुति-गति के कारण वायु का प्रथम स्थान कण्ठ मे, समगति के कारण तालु, मूर्धा, दन्त इन तीन मध्यम स्थानों में से किसी एक मे तथा प्लुति-गति के कारण वायु का अन्तिम स्थान प्रोष्ठ मे पात होता है। 'शुष्क' शब्द मे द्रुति-गति के कारण कण्ठस्थान मे वायु का पात होने से 'त' के स्थान मे 'क' का उच्चारण होता है। 'पक्व.' मे प्लुति-गति के कारण वायु का ओष्ठस्थान मे पात होने से 'त्' का 'व्' उच्चारण होता है। इसी प्रकार 'कृष्ट.' आदि मे तकार का टकार उच्चारण होता है। इस प्रकार विभिन्न सन्धियो के कारण वर्णागमादि ही हैं। १-इस रीति से सक्षेप मे इस पुस्तक मे विभिन्न कतिपय वर्णमालायो का अत्यन्त स्पष्ट तथा प्रामाणिक निरूपण किया गया है। वैदिक भापा मे प्रचलित स्वरभक्ति, रङ्ग, अनुस्वार, विसर्ग, औरस्य, उष्मा, यम आदि का एकत्र इतना स्पष्ट निरूपण प्राचीन शिक्षाग्रन्थो मे भी उपलब्ध नहीं होता। भाषावैज्ञानिकों ने भी भाषाविज्ञान की पुस्तको मे केवल वैदिक भाषा मे इतनी ध्वनियाँ हैं, लौकिक सस्कृति मे इतनी, इतना सा निरूपण किया है, किन्तु इन ध्वनियो का इतना विस्तृत व स्पष्ट विवेचन लेशमात्र भो उन पुस्तको मे नहीं मिलता और न उनके उच्चारणभेद का प्रकार ही वहाँ मिलता है। जैसे विसर्ग के प्रोभाव, विवृत्ति, श, ष, स, रेफ, जिह्वामूल व उपध्मा ये ८ भेद भिन्न- भिन्न स्थानो मे हो जाते है तथा सर्वत्र भिन्न-भिन्न ही इसका उच्चारण होता है । इसी प्रकार अकारादि स्वरो से परे भी विसर्ग के उच्चारण मे अन्तर हो जाता है। २-ऐन्द्र चान्द्र काशकृत्स्नं शाकट पाणिनीयकम्' इत्यादि रूप से तथा इदमभर छन्दो वर्णशः समनुक्रान्तम् । ब्रह्मा बृहस्पतये प्रोवाच । बृहस्पतिरिन्द्राय । इन्द्रो भरद्वाजाय । भरद्वाज ऋपि भ्य.। ऋषयो ब्राह्मणेभ्यः । इस अक्षरसमाम्नाय की परम्परा मे इन्द्र के नाम का उल्लेख होने से अष्ट व्याकरण-निर्माताओ मे इन्द्र का नाम लिया जाता है। चान्द्रादि व्याकरण- ।

प्राक्कथन. [ १३ पद्य ने शास्त्रो की तरह इन्द्रनिर्मित व्याकरण-शास्त्र भी चाहे कभी कोई रहा हो, किन्तु अधिदैवत मे अर्थात् प्रकृति मे किस प्रकार ध्वनिरूप अव्याकृत वाके को इन्द्र प्राण ने स्वरव्यंजनरूप से व्याकृत किया, इसकी मौलिक उपपत्ति इस पुस्तक मे ग्रन्थकार ने वेदग्नन्थो के आधार पर सप्रमाण बतलाई है। जिसका निरूपण इस पुस्तक के गुणपरिष्कार-नामक तृतीय प्रपाठ मे किया गया है । ३-'अथो वागेवेद सर्वम्' 'वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता" इत्यादि श्रुतियाँ वाक् को ही सर्व विश्व का उपादान कारण बतला रही हैं। 'अनादिनिधनं नित्य शब्दतत्व यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत.' इस से वाक्यपदीयकार भर्तृहरि भी शब्दब्रह्मरूपी नित्यवाक् का अर्थभाव से अर्थात् जगदरूप से परिणाम बतलाया है। उस विश्व का उपादानकारण कौनसी वाक् है इसका विवेचन स्वायंभुवी, पारमेष्ट्या, सौरी तथा पार्थिवो भेद से वाक् के चार भेद बतलाकर स्वायभुवी, ऋग्यजु सामरूपा, अमृता वाक् को विश्व का कारण बतलाते हुए किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य पारमेष्ठ्या, सौरी तथा पार्थिवी वाक् का भी प्रतिपादन इस पुस्तक मे सुस्पष्ट रूप से किया गया है। इस चार प्रकार की वाक् मे हम लोग जिसके लिए वाक् का प्रयोग करते हैं, वह वाक् व्याकृता पृथिवी वाक् है। साथ ही 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि' इस श्रुति का भी अनेक प्रकार से श्रुतियो के आधार पर सप्रमाण समन्वय किया गया है । ४-'अकारो वै सर्ववाक् सैषा स्पर्शीष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति' इस ऐतरेयश्रुति के अनुसार एक ही अकाररूप वाक से प्रक्रमरूप वाह्य- स्थान, अनुप्रदानरूप बाह्यकरण, मुखस्थानरूप आभ्यन्तर-स्थान, प्रास्यन्तर- प्रयत्नरूप प्राभ्यन्तर करण एव स्वरो के विश्लेष-संश्लेषरूप काल इन पाचो गुणो के कारण समस्त वर्णों का प्रादुर्भाव है, इसका मौलिक विवेचन इसमे हुअा है। यद्यपि आधुनिक भाषाविज्ञान के ग्रन्थो मे इसका विवेचन है। किन्तु मुखवाह्य स्थानों मे नाभि, कण्ठ व शिर मे, नाभि से उत्थित वायु के प्रक्रम की समाप्ति मानने पर किस प्रकार उदात्त, अनुदात्त, स्वरित भेद हो जाते है इसका विवेचन प्राचीन ग्रन्थो के आधार पर इसी पुस्तक में मिलता है, अन्यत्र नही। ५-द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म पर च यत् । शाब्दे ब्रह्मरिण निष्णात परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

१४ ] प्रायकथन इस श्रुति के आधार पर गब्दब्रह्म व अर्थब्रह्म की समानता है और अर्थब्रह्म की तरह शब्दब्रह्म की प्रक्रिया है। जिस तरह- द्वाविमौ पुरुपौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षर सर्वाणि भूतानि कूट थोऽक्षर उच्यते ।। उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ।। इन गीतावचनो के अनुसार प्रकृति मे अर्थब्रह्म में अव्यय अक्षर व क्षर की सत्ता है, उसी प्रकार शब्दब्रह्म मे भी स्फोट (अव्यय), स्वर (अक्षर), व्यजन (क्षर) इन तीनो की सत्ता है। ६-स्वर के अक्षररूप होने से तथा व्यजनो के क्षररूप होने से वे एक नही है किन्तु उनमे मौलिक भेद है। अक्षर-गब्द एकाकी स्वर के लिए भी प्रयुक्त होता है तथा व्यञ्जनविशिष्ट स्वर के लिए भी। एक स्वर की व्याप्ति नौ विन्दुनो (अर्ध-मात्रानो) तक होती है। उनमे मध्य के दो विन्दुनो से स्वर के स्वरूप का निर्माण होता है तथा शेप पूर्वापर सात विन्दुनो पर उसकी व्याप्ति होती है। इत्यादि मौलिक विषयो का प्रतिपादन इसी पुस्तक मे सर्वप्रथम हुआ है। ७-दो स्वरो के, दो व्यजनो के तथा स्वर और व्यंजन के मिलने पर नाना सधियाँ होती है जिनका विवेचन व्याकरणशास्त्र मे मिलता है, किन्तु दो वर्णो के मिलने पर ये नाना प्रकार के सन्धिविकार क्यो हो जाते हैं, इसका वैज्ञानिक व मौलिक विवेचन इसी पुस्तक के सन्धिपरिष्कार-नामक पञ्चम प्रपाठ मे हुआ है। इस ग्रन्थ के अध्ययन की इसलिए भी आवश्यकता है कि इसके बिना स्वरों और व्यजनो के समीचीन स्वरूप का ज्ञान भाषाविज्ञान पर ग्रन्थ लिखने वालो को भी नही हो सकता। भापाविज्ञान पर पुस्तक लिखने वाले एक विद्वान् ने 'पतञ्जलि, १ (क) स्वय राजन्ते स्वराः, अन्तम् भवति व्यंजनम् । (ख) व्यजनानि पुनर्नटमार्यावद् भवन्ति । तद्यथा नटानां स्त्रियो रङ्ग गता यो न. पृच्छति कस्य यूयं कस्य यूयम् इति, त तं तवेत्याहुः। एव व्यञ्जनान्यपि यस्य यस्याच. कार्यमुच्यते त त मजन्ते । इति । (ग) य. स्वयं राजते तं तु स्वरमाह पतञ्जलिः । उपरिस्थायिना तेन व्यंग्य व्यञ्जनमुच्यते ॥ - प्राक्कथन [ १५ याज्ञवल्क्य आदि ग्रन्यो के आधार पर अपने उच्चारण मे अन्य की अपेक्षा न रखने वाले 'अकारादिवर्ण' 'स्वय राजन्ते इति स्वरा.' इस व्युत्पत्ति से स्वर कहलाते हैं तथा जो वर्ण अपने उच्चारण मे अपने से भिन्न प्रकारादि स्वरो की अपेक्षा रखते है, वे 'व्यज्यन्ते स्वररूपैरक्षरै' इस व्युत्पत्ति से व्यजन कहलाते हैं । जैसे-~क, ख आदि वर्ग । इस प्रकार वे स्वर और व्यञ्जन का भेद बतलाते हुए भी लिखते हैं कि 'कहना न होगा कि भारत और यूरोप द्वारा प्रस्तुत यह परिभाषा कि 'व्यजन वे हैं जिनका उच्चारण स्वर के बिना नहीं हो सकता और स्वर वे है जिनका हो सकता है', पूर्णतः गलत है। हिन्दी के तथाकथित अकारान्त शब्द यथार्थत. व्यञ्जनान्त हैं। अर्थात् उनके अन्त मे व्यञ्जन अकेले विना स्वर को सहायता से उच्चरित होता है। जैसे-राम, राख्, आप आदि। भाषाविज्ञान पर पुस्तक लिखने वाले उन महाशय को यह भी विदित नही कि एक स्वर अपने से पूर्व चार व्यंजनो तथा अपने उत्तरवर्ती तीन व्यजनों के उच्चारण मे समर्थ है। वहाँ तक उसका महिमामण्डल है। जैसे-सूर्य वृहती पर आरूढ रहता हुआ भी सम्पूर्ण सौरमण्डल का प्रकाशक है, उसी प्रकार ७ व्यजनो का मध्यवर्ती स्वर उन सातो व्यजनो को प्रकाशित करने अर्यात् उन व्यजनो को अपनी सहायता से उच्चारित करने की क्षमता रखता है। 'अतः राम् इत्यादि मे 'म्' का उच्चारण पूर्ववर्ती स्वर आकार की सहायता से होता है न कि विना स्वर की सहायता से । भापार्वजानिक उदात्त, अनुदात्त, स्वरित को केवल सुर (Tone) जन्य मानते हैं। किन्तु वस्तुत ऐसा नही। यह भेद नाभि से उत्थित वायु के प्रथम प्रक्रम की उरस्, कण्ठ व शिरस् मे समाप्ति होने से होता है । जव नाभि से उत्थित वायु के प्रक्रम को समाप्ति उरस् मे होती है तो अनुदात्त स्वर, कण्ठ मे होती है तो स्वरित और गिर मे होती है, तो उदात्त होता है । इसका स्पष्ट निरूपण गुणनिरू- पणरूप तृतीय प्रपाठ मे विस्तार से किया गया है। अत. भाषाविज्ञान के अध्ययन करने वालो को इसका अध्ययन करना चाहिये। नही तो पदे-पदे भ्रातियो की सम्भावना बनी ही रहेगी। अत उपर्युक्त दृष्टियो से यह ग्रन्य अत्यन्त मौलिक है। उपर्युक्त अनेक मौलिकतायो से इसकी उपादेयता स्वत -सिद्व है। यह पुस्तक सभी विश्व- १ दुर्बलस्य यया राष्ट्र हरते बलवाद् नृपः । दुर्वलं व्यजनं तद्वतु हरते वलवान स्वरः ।

१६ ] प्राक्कथन विद्यालयो मे सस्कृत एम० ए० तथा भापा-विज्ञान के अध्ययन के लिए संग्राह्य होनी चाहिए, ऐसी मेरी धारणा है। विद्वान् यदि ध्यान से इसका अध्ययन करेगे, तो मेरे इस कथन की उपयुक्तता अवश्य सिद्ध होगी। विषयों की नवीनता को ध्यान मे रखकर अन्त मे इसकी हिन्दी-व्याख्या भी दी गई है। इस विपय को हिन्दी में समझाकर प्रस्तुत करने का यह प्रयास तो किया गया है, किन्तु विषय की नवीनता तथा मेरी अनभिज्ञता से इसमे त्रुटियाँ अवश्य रही है। विद्वान् लोग उनकी तरफ ध्यान दिलायेगे, तो मुझ पर उनका अत्यन्त अनुग्रह होगा और द्वितीय सस्करण मे उनका परिमार्जन हो सकेगा। राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के निदेशक, महामनीषी वेदमूर्ति डॉ० फतहसिहजी ने इस ग्रन्थ को राजस्थान-पुरातन-ग्रन्थमाला से प्रकाशित करने का जो निर्णय लिया और इसके सम्पादन का दायित्व मुझे सौप कर जो अनुग्रह किया इसके लिये मैं और वेद-जगत् उनका सर्वदा ऋणी रहेगा। विद्वविधेय, सुरजनदास स्वामी श्री हरिः पथ्यास्वस्तिः श्र 5 य ल वेदभाषाया वर्णमातृका प्रदश्यते । परब्रह्माक्षरं ज्ञातुं शब्दब्रह्माक्षरस्थितिम् । विज्ञापयति विज्ञानप्रवणो मधुसूदनः ॥१॥ वर्णाक्षर-समाम्नायोऽनेकधा प्रतिपद्यते । छन्दोभाषानुगा तत्र पथ्यास्वस्तिनिरूप्यते ॥२॥ अोष्ठापिधाना नकुली दन्तः परिवृता पवि. । सर्वस्य वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत् ॥३॥ (ऐतरेयश्रुतिः) प्रों सिद्धो वर्णसमाम्नायः । २ तत्र समान-प्रयत्ना भिन्नस्थाना यथा- इ ऋ लू उ--इत्यस्पृष्टा. स्वरा । व-इतीषत्स्पृष्टा अन्त.स्थाः । ळ व-इतिदु. स्पृष्टा अन्त.स्था । ब-इति मृदुस्पृष्टा स्पर्शा । प-इति तीव्रस्पृष्टा. स्पर्माः ।। ह-इत्यर्द्धस्पृष्टा उष्माण ॥ ३ अथवा ममानस्थाना भिन्न प्रयत्ना यथा य न ग ह-इति कण्ठ्या । य य श-इति तालव्याः। न ड़ ष-इति मूर्द्धन्याः। ल द त स-इति दन्त्या.। ह-इति प्रोप्ठ्या। इत्थं विशुद्धास्त्रिशत् । हकारयोः स्थानभेदेन भिन्नत्वेऽप्युच्चारण- साम्यादैकवाभिमाने त्वेकोनत्रिंशत् ॥२६॥ य vt. 9 ग द क च त he श प स S क च र ट . व व व प २ ] पध्यास्वस्तिः -- Phor de 0 ४ अथ समानप्रयत्ना द्विस्थाना यथा- अं ऋ लू उँ-इत्यस्पृष्टानुनासिकाः । लँ व-इतोषत्स्पृष्टानुनासिका. । रण म-इति स्पृष्टानुनासिका. । इत्थमनुनासिकास्त्रयोदश ॥१३॥ तदित्थं प्राकृतिका निरूढा वर्णा द्वाचत्वारिंशत् ।।४२।। एषामेव ते- ऽन्ये वैकारिका भवन्ति ये यौगि का ये चायोगवाहाः । Cal ज न ५ तत्र समानप्रयत्ना. स्वरयौगिका यथा- प्रा अ३ । ई ३३ । ऋ ऋ३ । ऊ उ३ । इति दीर्घप्लुतानि । ए अय् । ऐ प्राइ । यो अव । औ ग्राउ ।-इतिसन्ध्यक्षराणि । इत्थ सयुक्तस्वरा शुद्धनासिक्यभेदाद् द्वात्रिशत् ॥३२॥ ६ अथ सोष्माणो व्यञ्जनयौगिका यथा- ब्ह -इति दुःस्पृष्टमहाप्राणौ। भ---इति घोषिमहाप्राणाः । फ-इति श्वासिमहाप्राणा:। इत्थ स्पां. सोप्माणो द्वादश ॥१२॥ तेनंते यौगिका- तुश्चत्वारिशत् ॥४४॥ O 64 घ झ 64 घ ख छ ठ थ ७ thes आ अथायोगवाहाः ऋ लू -इति स्वरभक्तिः। ई: -इति रङ्ग। -इत्यनुस्वारविसर्गौ। ह -इति औरस्योषमा । ~प? -इति जिह्वामूलीयोपध्मानीयौ । खु -इति यमाः। इत्थमयोगवाहा एकादश ॥११॥ प्रः भ. ( भ. क g A मधुसूदनशर्मप्रणीता [ ३ १. स्वरभक्तिः म्यते। - ८ ऋलुवर्णयोरन्तरतो रेफलकारी परित. स्वरभक्त्या नियम्येते । ऋलोर्मध्ये भवत्यर्द्धमात्रा रेफलकारयो । तस्मादस्पृष्टता न स्याद् ऋलकारनिरूपरणे-इति याज्ञवल्क्यः॥ अस्याश्च ऋकारलकारस्वरभक्तेश्चतुर्बोच्चारण सप्रदायभेदादवग- अकाराभास एकेपाम् । ऋषिरिति रपिवत् । इकाराभास: प्राच्यानाम । ऋपिरिति रिपिवत् । उकाराभास उदीच्यानाम् । ऋषि- रिति रुपिवत् । एकाराभासो माध्यन्दिनानाम् । ऋषिरिति रेषिवत् । तदुक्तं प्रतिज्ञासूत्र-"ऋकारस्य तु सयुक्तासयुक्तस्याविशेषण सर्वत्रवमिति।" । "ऋकारो हल्वियुग युक् च सकारश्छन्दसि स्मृतः ।" इति केशवी॥ कृणोसि, केगोसि । ऋत्विय , रेत्वियः । क्लुप्तं क्लेप्तमिति । एषां मते-इकारोकाराभासः प्रतिषिद्धः ।। अ इ उ ए-इत्येताश्चतस्रोऽर्धमात्रिकाः स्वरभक्तयो भवन्ति । तासामुच्चा- रणमात्रे सम्प्रदायभेदादिमे विगेपा आख्याताः। न तु लिपी तासा विगेपा क्रियन्ते । अर्द्धमात्रिकाणामेकमात्रिकस्वरलिपिभिरुलेखानव- क्लुप्ते । यत्तु लकारं विवक्षमाणा लकारमकारोदयमुच्चारयन्ति तद- जानात् । उभयोः स्वरभक्तेः समानन्यायेन प्रवर्त्तमानतया ऋकारस्य तत्रानवक्तृतत्वात् ।। है ई-इति रेफो लकारस्योपलक्षणं, हकारस्तूष्मवर्णानाम् । तेन रलाभ्यामुष्मप्रत्यये मध्ये यः स्वरसहगो ध्वनिरुत्पद्यते सा स्वरभक्तिः। रलाभ्यां पर उछमारणो यत्र तु स्यु. स्वरोदयाः । स्वरभक्तिरसौ ज्ञेया पूर्वमाक्रम्य पठ्यते ॥१॥ स्वरभक्ति प्रयुञ्जानस्त्रीन् दोषान परिवर्जयेत् । इकारं चाप्युकारश्च ग्रस्तदोषं तथैव च ॥२॥ इति याज्ञवल्क्यनारदादय. ॥ पशुः। वर्षम् । बर्हिः । बल्शा ॥ अत्र रेफोष्मणोरन्तरतोर्डा कारवदाभासो नैसगिक । माध्यन्दिनानां तु अत्यल्पमात्रकारवदाभास. - ४ ] पथ्यास्वस्ति: । सप्रदायसिद्धः। अथापरान्तस्थस्यायुक्तान्यहल: संयुक्तस्योष्मऋकारै- रेकारसहितोच्चारणमेवं तृतीयान्तस्थस्येति प्रतिज्ञासूत्रात् । अहल शल्यूलरेफस्य सैकारः प्राक्चेति नवाङ्कसूत्रम् । 'विहल्शल्यूर्ध्वरेफो यः सकार . प्राक् समुच्चरेद्'इ ति केशवो। रेफो रेकारमाप्नोति शषहेषु परेषु च'इति माध्यन्दिनीयाः । दर्शतं दरेशतं बल्शा बलेशा । परे तु 'रलावृलू वर्णाभ्यामूष्मरिण स्वरोदये सर्वत्रेति प्रातिशाख्योक्तेरल्पमात्राभ्यामृ- कारटुकाराभ्या क्रमेण रेफलकारौ व्यवधीयेते इत्याहुः । तेन द्विरुक्त- रेफलकारवत् तत्रोच्चारणाभासः संभाव्यः । अर्शः । अर्रशः । अहः । अर्रह । वल्शा । वल्लशा-इति । तदित्थमकारवद्वा, ऋकारलूकारवद्वा, एकारवद्वोच्चारितार्द्धमात्रा स्वरभक्तिरित्युच्चारणसंप्रदायभेदाद् भिन्नायाः स्वरभक्तेरिदमनु- शासनत्रय द्रष्टव्यम्-। स्वरोदयत्वाभावाद् वर्मशब्दे न स्वरभक्लि. . २. रङ्गः १० देवा ५ एह, महा असीत्यादौ आ ५-इति विशुद्धादकारात् परतः पृथगिव नासिकयोच्चार्यमाणी वर्णो रङ्गः। तालुमृदुस्पृष्टानुनासि- कस्य नस्य तालुमृदुस्पृष्टत्वगुणभ्र शादर्धमात्रस्थानेऽर्धमात्रिको विवृ- त्यकारीऽनुनासिकोऽवशिष्यते । व्यञ्जनस्य नकारस्य पूर्वस्वरेणानु- रञ्जनात् स्वरवदाभासो भवतोत्यस्य रङ्गशब्देन व्यपदेशः । नुस्वारः। स्वरानुस्वारयोरव्यवधानोपपत्त्याऽनुस्वारेण पूर्वस्वरस्य- ग्रस्तत्वमनुभूयते । इह तु दोर्घस्वरात् पृथक् तदुच्चारणात् स्वरग्रासो नास्तीति भेदोपपत्ते । तस्मादयमन्यो वर्णो रङ्ग । उक्त च- रङ्गवर्ण प्रयुञ्जीत नो ग्रसेत् पूर्वमक्षरम् । दीर्घ स्वरं प्रयुञ्जीयात् पश्चान्नासिक्यमाचरेत् ॥१॥ नायम मधुसूदनशर्मप्रणीता [ ५ ३. अनुस्वारः ११ अं-इत्यत्र स्वरादूवं नासिकयोचार्य्यमाणो वर्णोऽनुस्वारः । तस्यानुस्वारस्य नकारवदाभासो भवति। नकारो मृदुस्पृष्टः किन्त्वय- मनुस्वार ईपत्स्पृष्ट इति वर्णान्तरत्वम् । श ष स ह रेषु तु प्रत्ययेषु अनुस्वारस्योच्चारणत्रैविध्यमनुभावयन्ति । तत्र तावत् नकारसहश- ध्वनिर्ब चानाम् । अलाबुवीणानिर्घोषो दन्तमूल्यः स्वरानुग । अनुस्वारस्तु कर्त्तव्यो नित्य होः शषसेषु च ॥१॥ इति पाणिनिस्मरणात् । वन्श. । कंन्स. । दन्त्यानुनासिकत्वान्न- काराभासमात्रं, न त्वयं नकार एव । अनुस्वारस्त्विति तु शब्देन प्रत्ययान्तरवच्छषसहरेष्वपि अनुस्वारशब्देनैव व्यवहारोनतु मकारगुकारा- दिवत् सज्ञान्तरमपेक्षते-इत्याह ।। १२ अथ मकारसदृशध्वनिश्छन्दोगानाम् । तस्यानुस्वारस्य मकार इति संज्ञा कि यते व्यवहारार्थम् । प्रापद्यते सकारं रेफोष्मसु प्रत्ययेष्वनुस्वारः । यवलेषु परसवर्ण स्पर्शेषु चोत्तमापत्तिम् ॥१॥ इति नारदीयात् । अथवा अस्तु ताबद्- अनुस्वारं रोष्मसु मकारः इतिकात्यायनप्रातिशाख्यसूत्रैकवाक्यत्वादिहापि नारदीये मकारोऽ नुस्वारमित्येत्र निर्धारित पाठ , अस्तु वा मकारस्थानेऽनुस्वारस्यैव विधान तथापि तस्यानुस्वारस्य छन्दोगसंप्रदायानुरोधान्मकारसदृश- ध्वनिरेवास्थीयते । वंमशः । कम्स ॥ प्रोष्ठयानुनासिकत्वान्मकाराभा- समात्र न त्वयं मकार एव ॥ १३ अर्थतेष्वेव प्रदेशेष्वनुस्वारस्य-डकारसदृशध्वनिरध्वपूणाम् । तंङ् राम रावणारिम् । सिंह, वंश., कंड्सः,। कण्ठ्यानुनसिकत्वान ६ ] पथ्यास्वस्तिः डकाराभासमात्रं न त्वयं ङकार एव । उकारसदृशध्वनेस्तस्य गुंकार इति सज्ञा क्रियते व्यवहारार्थम् ॥ अद्यत्वे तु वेदोच्चारका गुं शब्दमेवोच्चारयन्ति, तदज्ञानात् । "कुं गुं धुं यमाः" इति सूत्रेण गुंकारस्यानुस्वारशब्दवत् संज्ञाशब्दतया स्वरूपपरत्वासंभवात् ॥ "स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा"-इत्याचार्याणां सिद्धान्तात् । यमप्रकरणे सज्ञाशब्दो नानुस्वारप्रकरणे इति तु न भ्रमितव्यम् । एकत्र निर्णीतः शास्त्रार्थोऽन्यत्राप्युपकारको भवतीति न्यायेन समानशास्त्रे संज्ञाशब्दस्य सर्वप्रकरणे साम्येन व्यवहारीचित्यात् ॥ गुंशब्दस्य द्विमात्रवर्णतया तदुच्चारणे नियताक्षरच्छन्दोव्याघातेन कर्मलोपप्रसङ्गाच्च ।। " मित्रः सर्छसृज्य पृथिवीं भूमि च ज्योतिषा सह । रुद्राः ससृज्य पृथिवीं बृहज्योति. समोधिरे ।। दृछहस्व देवि पृथिवि स्वस्तये। अर्थहसः, द ५ष्ट्राभ्याम्, मा हि सी . ॥" इत्यादिष्वभीष्टच्छन्दोभङ्गदोषस्यार्थप्रतिपत्तिक्लेशदोषस्य वा गुंशब्द. मुच्चारयतां गले पतितत्वात् । प्रकृतिसिद्धोच्चारणनैविध्ये व्यवस्थापक- शास्त्राणामन्यतमपक्षनिर्धारकतया चारितार्थ्ये संभवति गुंस्वरूपोच्चार- गाय शास्त्रानुज्ञाने तात्पर्य्यालाभात् तथोच्चारणस्याशास्त्रीयत्वाच्च ।। या तु- , "अनुस्वारस्य छ मित्यादेशः शषसहरेफेषु" इति प्रतिज्ञासूत्रे इतिशब्दोल्लेखाद् गुंशब्द. स्वरूपपरो न संज्ञाशब्द. इति वहूनामद्यतनाना वेदपाठिनां प्रतिपत्तिः । सेयं भ्रान्ति । तत्रे- तिशब्दस्य "कुं खु गुं धुं यमाः" -इत्येतदुक्तगुंकारस्मरणार्थतया अन्यार्थत्वात् । यमवचनोऽयं गुंकारो यादृशमुच्चारणं लक्षयति तथैवेहाप्यनुस्वारस्योच्चारणे जानीयादिति हि तदभिप्रायः॥ वंशः । वीपि । कंसः। सिंहः। तं रामम् - इत्येवमादिषु अनुस्वारस्य.

मधुसूदनशर्मप्रपीता
[ ७
नकारमकारङ-कारान्यतमप्रतिकृत्योच्चारणं प्रकृत्या सिद्ध तत्रेय वैदिकाना
वेदभेदाद् व्यवस्था बोध्या ॥
४. विसर्गः
उक्त च-
१४ अ.-इति विसर्गः । प्रकार
उपलक्षणं स्वरवर्णानाम् ।
स्वरादुत्तरो हकारवदाभासमानो हकारभिन्नो विक्षेपकध्वनिविसर्जनीयः।।
अग्निः । हकारवदाभाममानोऽप्ययं विसर्गो न हकारः । हकार-
स्यास्पृष्टत्वं सस्वरभक्तिकत्वं चोपपदयते। विसर्गस्त्वयमीषत्स्पृष्टः
स्वरभक्तिशून्यः। तस्माद्वर्णान्तरम् ।
यथा बालस्य सर्पस्य उच्छ्वासो लघुचेतसः ।
एवमुष्मा प्रयोक्तव्यो हकारं परिवर्जयेत् ॥१॥
हकार परिवर्जयेदित्यस्य स्वरभक्तिवैशिष्ट्यप्रतिषेधे तात्पर्य-
मुन्नेयम् । हकारभिन्नोऽप्यय विसों नूनमूष्मशब्देन व्यपदिश्यत एव ।
तथा चाह पाणिनि.-
प्रोभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च ।
जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः ।।२।।
-
५. औरस्योष्मा
१५ ह ह्र-इत्यौरस्य उष्मा । अत्र च नकार उष्मणा, रेफो यवला-
नामुपलक्षणम् ।
हकारं पञ्चमैर्युक्तमन्तस्थाभिश्च संयुतम् ।
मौरस्यं तं विजानीयात् कण्ठ्यमाहुरसंयुतम् ॥१॥

८ ] पथ्यास्वस्तिः इति ॥ पूर्वाह्नः । वह्निः । ब्रह्मा । मह्यम् । ह्रदः । ह्लादः । विह्वलः ॥ ६. जिह्वामूलीयोपध्मानीयो १६ ४ क ख-इति कखाभ्यां प्राग् हकारसदृशध्वनिजिह्वामूलीयः । फ-इति पफाम्यां प्रागुपध्मानीयः ।। खल । क पटु । क फली ।। म >< M क ७. यमाः १७ अनासिक्यस्पदुत्तरतो नासिक्यस्पर्श सति मध्ये पूर्वसदृशो वर्णो- विच्छेद जनयन्न च्चार्य माणो यम उच्यते । इमे स्पर्शाः स्थानकरण- स्पर्शजन्मानो भवन्तीति निसर्गः, किन्तु तदुत्तरे सति यमे स्पर्श- विच्छेदजन्मा पूर्वसदृश' कश्चिद्वर्णः प्रादुर्भवति स यमजनितत्वाद् यम इत्याख्यायते । इत्थ स्पर्शविच्छेदजन्यः प्रतिध्वनिर्यद्यप्यवसाने ऽन्तःस्थपञ्चमपरत्वे च सभवति - रामात्त-शुक्क्रः, अग्निरिति । तथापि पञ्चमपरत्वे नासिक्यतावैलक्षण्यादयमपूर्वः प्रतिध्वनि- र्यमोनाम वर्णान्त रत्वेनेष्यते ॥ वृक्णः। पलिक्नी । रुक्मम् । रत्रम् । प्रात्मा। द्वित्वसिद्धा प्रागमा वा अपञ्चमस्पर्शा बिशतिर्यमा इत्येकदेशीयमतम् ।। क ख ग घ इति चत्वार एव यमा इति केचित् । तते चत्वारो द्वित्वसिद्धा वर्णा एव यमा इत्येके । वर्णागमा इति तु तैत्तिरीयाः। पाक्नी। सक्थक्ना । यज्ञ इति वागमत्त्वात् कडो यमौ। अकारे यमे तन्निवन्धनं जस्य कुत्वमिति यज्ञराब्दे संयोगः ॥ आर्षोच्चारणप्रचारभूयस्त्वादिह यमसहितोच्चारण- संप्रदायप्रवृत्तिः । लोकमात्रप्रयुक्ते , तु शब्दविशेषे तथोच्चारण- स्वप्नः । पाप्मा । गकारडकारनकाराः

पथ्यास्वस्तिः
[९
सप्रदायो नास्ति । याचना । केचित्तु राज्ञ इत्यत्र जकार-अकार-
मध्यत्तिनो यमस्य जस्य नासिक्यत्वोपरखने प्राप्ते तालुस्पृष्टो नासिक्यः
प्रयत्नविरोधान्नास्तीति कृत्वा स्थानपरिवर्ते द्रुत्या गस्वरूपत्वम् । सतो
गकारपरत्वे पूर्वस्यापि जस्योपरञ्जनाद् गत्वमित्याहुः। अकारोऽयं
तालुस्सृष्टो नासिक्योऽस्तीति तु नागवयम् । तस्य नासिक्यान्त स्थतये-
पत्स्पृष्टत्वात् । स्पृष्टस्तालव्यो नासिक्यो नास्तीत्यत एव तत्स्थानेऽन्त
स्थोऽनुनासिक प्रातिनिध्येनोच्चार्य्यते इति विज्ञेयम् । केचित् त्वाहु-
नैते यमा विंशतिः । न वा चत्वारो नाप्येते वर्णाः सन्ति, किन्तु-
जकारी द्वो मकारश्च रेफस्तदुपरि स्थितः ।
प्रशरोरं यमं विद्यात् समाज मीति निदर्शनम् ॥१॥
इत्यमोघनन्दिन्याधुक्तर्यमस्याशरीरत्वसिद्धान्तान्तस्योच्चारणं
शक्यम् । तथा चाह कात्यायन
"अन्तःपदेऽपञ्चमाः पञ्चमेषु विच्छेदम् ।
-रुक्मेत्यादी कद्वित्वे तत उत्तरं पञ्चमात् प्राग् नासिक्या-
नासिक्यविरोधप्रभावान्मध्ये यतिरुत्पद्यते तदिद विच्छेदमात्रं यमो न
वर्ण इत्यभिप्राय । विभिन्नोच्चारणसप्रदायाधीना ह्यताश्चतस्रः
प्रतिपत्तयो भवन्तोति बोध्यम्। चतुर्वपि सप्रदायेषु पूर्वाक्षरे सत्येवाय
यमः स्थान लभते नान्यथा । तस्मात् सिद्धान्तकौमुद्या मन्तीति
यमोदाहरणं निम्नन्ति विघ्नन्तीत्याद्यमिप्राय द्रष्टव्यम् । ज्ञाने तु
यमो
नास्ति ।
ज्ञाधातोर्गकार - पूर्वकानुनासिकतालव्येषत्स्पृष्टा-
रव्यत्वावगमात् । तदित्यं सप्तनवति (६७) वर्णोऽयमाणेयोऽक्षर-
-
समाम्नायः ।
इति प्रथमः खण्डः ॥१॥

मातृकानुवाके साप्ताशीतिशतिको द्वितीयः खः । २॥ १ कश्चित्पुनरेभ्यो निरन-मोनिका-गोगवाहिन्योन्यपि नवतिरीप- पादिका वर्णा इप्यन्ते । नामपि संग्रहमा तु मागीतिगत सर्वे छन्दोभापाम्नायव (१८७) भवन्ति । ते यथा २ आ + इ ल ट३ ऊ इति ह्रस्वदीर्घप्लुतभेदाद् दी? नास्ति । भाविस्वराश्चतुर्दश । लकारस्य ३ ए ए ३ ऐ ऐ ३ नो ओ श्रो ३ " श्री इति सन्ध्यक्षरस्वरा अष्टी ॥ ८ ॥ ४ ते चोभये प्रत्येकमुदात्तानुदात्तस्वरितभेदाद्भिन्ना इति पद- पष्टिः ॥ तेषा शुद्धस्वरत्व विवृतत्वमस्पृष्टत्वं च साधर्म्यम् । लकारः प्लुतोऽस्तोति कृत्वा तद्भेदास्त्रयोऽधिका इह निदर्शिता । ५ रलपूर्वा उष्मवर्णा ऋलवर्णी च स्वरभक्तिस्थानानि। स्पर्शः। हर्प.। अर्हः। एषु रेफोष्मणोरन्तरतः स्वरभक्ति । ऋलवर्णयोस्तु स्वरभक्त्योरन्तरतो रेफलकारौ। यथोक्त कात्यायनेन 1 पध्यास्वस्तिः [११ "ऋलवणे रेफलकारौ संश्लिष्टावश्रुतिधरावेकवरणों इति (का. प्रा. ४ १४६) ६ 5 य र ल व इतोषत्स्कृष्टान्तस्थाः ईपन्नादा. पञ्च । तत्रादिवों विवृतिः । यथाह याज्ञवल्क्य.. द्वयोस्तु स्वरयोर्मध्ये सन्धिर्यत्र न दृश्यते विवृतिस्तत्र विज्ञेया यईशेति निदर्शनम्॥१॥ ७ अ य ह ळ व इति दुस्पृष्टान्तस्थाः पञ्च ॥५॥ तत्रादिवर्णः सवृतोऽकार । ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृत प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव । - यत्तु प्र उ ग- गव्दे यकारस्थानीयस्तद्विकारसिद्ध. संवृतोऽकारः। तेनोकारे विवृते तस्य सन्धिर्नास्ति इत्याहु. केचित् तन्न। यकारस्थानीय विवृत्त्यैव तत्रापि सन्ध्यभावसंभवात् । वस्तुतस्तु यकारस्येषत्स्पृष्टस्य प्लुतिप्रतिक्षेपाद् वकारत्वे मजातीयाभिभावकत्वा- दनभिव्यक्तया लोपः। च न यकारस्थाने विवृत्यकार. संवृताकारो वाऽऽदिश्यते । प्रशव्दाकारस्तु सवृतो विवक्षितः । तस्मान्न सन्धिः। तथा ८ यवयोर्दु स्पृष्टयोः पदादौ यरहानुस्वारपूर्वत्वे च स्थानम् । दु स्पृष्टयवोच्चारणे ईषत्स्पृष्टापेक्षया किंचिदधिकस्पर्शोपपत्त्या स्पृष्टापेक्षया त्वल्पस्पर्शोपपत्या तदुभयरूपाभास. ॥ प्रतिज्ञासूत्रे- उक्तं च "अथान्तस्थानामाद्यस्य पदादिस्थस्यान्यहल्संयुक्तासंयुक्तस्य रेफो- मान्त्याभ्यामृकारेण चाविशेषेणादिमध्यावसानेपूच्चारणे जकारो- च्चारण द्विर्भावेऽप्येवम् ।"

१२ ] मधुसूदनप्रणीता इति-यकारस्य लघुप्रयत्नतरस्य सतो जकारोच्चारणं ब्रुवता यकारजकारयोर्मध्यमवृत्योच्चारणमभिप्रेयते । तथा नारदोऽप्याह- पादादौ च पदादौ च संयोगावग्रहेषु च। ज. शब्द इति विज्ञेयो योऽन्यः स य इति स्मृतः ॥१॥ ज इति जकारवदाभासमाह । यदु.। यमः। शय्या। निकाय्यम् । सूर्य.। वीर्य्यम् । प्रान्तर्यामित्यत्र रेफयकारसंयोगयोभिन्नसंस्थयोरु- च्चारणक्रमे यो भेदो दृश्यते तत्र रेफस्य पराङ्गत्वपूर्वाङ्गत्वे, यकार- स्येषत्स्पृष्टत्वदुःस्पृष्टत्वे च हेतू भवतः। रेफस्य पूर्वाङ्गत्वे सत्येव यकारस्य दुःस्पृष्टत्वसिद्धान्तात् ॥ सह्यम् . वाह्यम् । अहंयुः । शंयुः । यकारस्येह दुःस्पृष्टत्वेऽनुस्वारोऽनुनासिकयकारो बा भाष्यते। येपां त्वीपत्स्पृष्टत्वं यकारस्येष्यते तेषामयं गम्युशब्द. स्मर्यते । वरः । वीरः। वाय्वो । सर्व. । विह्वल । शंबूकः । वकारस्य तु दुःस्पृष्टस्य पदादिवत् पदमध्यं सयोगादिश्च स्थानम् । देवः, गिवः, काव्यम्, भव्यम्,। यम्या यद्यपीत्यादौ, विश्वं विद्वानित्यादी च प्रथमौ यकारवकारौ गुरुप्रयत्नत्वाह :स्पृप्टौ भवतो द्वितीयौ तु लधु- प्रयत्नत्वादन्तस्थौ विज्ञायते ॥ ९ पदादी संयोगादौ च दुस्पृष्टस्य डस्य प्रतिषेधः । डमरुः, कुड्य , वड । कुड्मलादिषु संयोगादी क्वचित्स्पृष्टदुःस्पृष्टयोविकल्प.। स्वरद्वयमध्ये त्वस्य दुस्पृष्टस्य डस्योच्चारणस्थानम् ॥ निगड । 'छन्दसि स्वरमध्यस्थस्य डस्य ळत्वं वक्तव्यम्" । अग्निमीळ । माध्यन्दिनानामय नास्ति । 1 १० ह श ष स ह-इत्यूष्माण पञ्च ईपच्छ्वासा. अर्द्धस्पृष्टा । तत्रैतौ हकारौ जिह्वामूलीयोपध्मानीयौ नामाख्यायेते । जिह्वामूलीयकण्ठ्ययोः प्रभवमादेश्यात् कण्ठ्यस्याप्येतेनैवोपसंग्रह ॥ हकारोऽयं पञ्चस्थानो पप्यास्वस्ति: [ १३ भवति । कण्ठ्यतीव्रस्पृष्टप्रत्ययत्वे स जिह्वामूलीय. । एकपूख इति ॥१॥ ओष्ठ्यतीव्रस्पृष्टप्रत्ययत्वे स उपध्मानीयः। प फ इति ॥ २ ॥ जिह्वामूलीयोपध्मानीययोरुच्चारणसाम्येऽपि स्थानभेदाद्वर्णभेदाभिमानः । मुखमध्यस्थानीयाद्धस्पृष्टप्रत्ययत्वे स विसर्जनीयो नामोच्यते । का शमः । कः षडङ्गः । कः सुतः । अवसानेऽपि विसर्ग । कः । उभयत्रा- श्रयस्थानत्वाविशेषादैकवाभिमान. ॥ ३ ॥ नासिक्यान्तःस्थप्रत्ययत्वे स औरस्यः । ह्नः ह्र॥ "प्रयोगवाहा विज्ञेया पाश्रयस्थानभागिन." इति हि शैक्षिका. पश्यन्ति । आद् ऋकाराच्च कण्ठ्य. स्यादि ऐकारात्तु तालुजः। उौकारात् स औष्ट्य. स्यादेकारात् कण्ठतालुजः ।। ।। ओकारात्तु स कण्ठोष्ठयो विसर्ग इति निर्णयः। पूर्वस्वरस्थानभाक्त्वात् स्वरभनिस्तथोच्यते ॥२॥ देवः सह, मतिःसाहि सर्व साहि हुवत्पशुः ।। नौ सहुर्हेमते. साधो सहोवदिति भाव्यताम् ॥३॥ लघुमाध्यन्दिनीयाया शिक्षायां दर्शितस्तथा ।। विसर्गस्वरभक्तीना भेद उच्चारणक्रमे ॥४॥ अथ नासिक्यान्त.स्थप्रत्ययत्वे सहकार औरस्यः, ह ह ह ह्य ह्र ह्व ॥ ४ ॥ अथास्पृष्टप्रत्ययत्वे स कण्ठस्थान सह सहितो हुतो हृदि ।। नातोऽन्यत्र हकारः प्रयुज्यते। तेष्वेतेषु पञ्चसु हकारेपूच्चारणमर्द्धस्पृष्ट- प्रयत्नश्च साम्येनोपपद्यते ॥ ११ मुखे त्रीणि स्यानत्रयारिण-प्रथमानि मध्यमान्युत्तमानि चेति। उर. कण्ठ कर्णमूलमिति प्रथमानि। तालुमूल, मूर्द्धा दन्तमूल- मिति मध्यमानि । सृक्का, उपध्मा अोष्ठमित्युत्तमानि ।। तेषु प्रथमस्था- नत्रये उत्तमस्थानत्रये चार्द्धस्पृष्टत्वेऽनभिव्यक्तभेदं ह इति समानमिव रूप १४ ] मधुसूदनप्रणीता संभवति। मध्यमस्थानत्रये त्वर्द्धस्पृष्टत्वे हकाराद् भिन्नरूपत्वेऽपि त्रयाणामुष्मणामत्यल्पभेद समानमिव रूपं जायते शषस इति । तत्र मध्यमस्य मूर्धन्यवकारस्य कवर्ग द्वितीयवदुच्चारणं माध्यन्दिनीयाः कुर्वन्ति । यथोक्त केशवीसूत्रे "षः खष्टुमृते च" इति ।। सोऽयमज्ञाननिमित्तः संप्रदायविगेषो नत्वत्र प्रयत्नदोषादिकारण प्रतिपद्यते। उच्चारणमात्रमन्यथा क्रियते नतु लिपौ व्यत्यास इति बोध्यम् ॥ - १२ स्वरभक्तिरेका, दशान्त.स्थाः, अष्टोष्माण,-इत्येतेषां स्वरव्यञ्जनोभयसधर्मणामेकान्न (कोन) विशतिवर्णानामल्पस्पृष्टत्वमल्प- विवृतत्वं च साधर्म्यम् ॥ १३ ग. ज. ड द. व-इति घोपा. सवृता ईपन्नादा स्पृष्टाः पञ्च ।।५।। क च. ट. त. प-इत्यघोपा विवृता ईपच्छ्वासाः स्पृष्टा. पञ्च ॥५॥ एपा दगव्यञ्जनवरना पूर्णस्पृष्टत्वमल्पप्राणत्व निरनुनासिकत्व च साधर्म्यम् । १४ ढ़ ळ ह-इति दु.स्पृष्टौ द्वौ ॥२॥ तथा चाह कात्यायन "डढौ ळलहावेकेषाम् (का० प्राति० ४।१४४१) इति । एतच्च स्वर- मध्ये समानपदे द्रष्टव्यम् । अपाढा। अपाल हा । अत्र द्वितीयो वरणों माध्यन्दिनाना नास्ति ।। . १५ घ म. द. घ. अ-दति नादाः संवारा घोपाः पञ्च ।। ५ ।। स्व. छ. ठ. थ फ-इति स्वासा विवारा अवोपाः पञ्च ॥५॥ एपां द्वादशव्यञ्जनवर्णाना स्पृष्टत्व सोप्मत्वं महाप्राणत्व च साधर्म्यम् ।

पथ्यास्वस्तिः [ १५ र. ल ङ रण. न. मादोनामपि सोष्मत्व सभाव्यते, किन्तु छन्दोभाषाया तेषामनाम्नाना(या) दनादरः ।। १६ अँ ई ऋ. ल ॐ-इति नासिक्या भाविनः स्वरा ह्रस्व- दीर्घप्लुतभेदाच्चतुर्दश ॥१४॥ "लकारस्य दीर्घत्व नास्ति' ॥ विशुद्ध- विवृताकारस्य मूलप्रकृतितया भावित्वाभावेऽप्यनुनासिकस्य भावित्व नापोद(ह. ) यते । एँ ऐ.ओ.यौ इति नासिक्या सध्यक्षरस्वरा दीर्घ- प्लुतभेदादधौ ।।८।। ते चोभये प्रत्येकमुदात्तानुदात्तस्वरितभेदाद्भिन्ना इति पट्पष्टिः । (६६) तेपामनुनासिकत्वमस्पृष्टत्व विवृतत्व च साधर्म्यम् ।। १७ अ-इत्यत्र स्वरादुत्तरोऽनुस्वारवर्ण । आइति विशुद्धाद्दीर्घस्वरादुत्तरो रङ्गवर्णः ।। य. व ल-इति त्रयोऽन्तस्था. ॥ कुँ. खं. गुं. W-इति चत्वारो यमा. ॥ डबण न म-इति नादाः सवारा घोषा पञ्च ॥ एपां चतुर्दशाना नासिक्यत्व साधर्म्यम् । अत्र तालव्यानामल्पप्राणघोप- स्पृप्टदुःस्पृष्टेपत्स्पृष्टानामनुनासिकत्वे समानमुच्चारण भवतीत्यनुना- सिकेपत्स्पृष्टापेक्षया पृथक्त्वेन चवर्गपञ्चमनासिक्यस्य वर्णान्तरत्व- व्यवस्थापन नोपपद्यते । तथापि त्रिरतनलोकव्यवहारानुरोधादिह वर्णान्तरत्वमाख्यातमिति सन्तोष्टव्यम् ।। मुखमध्यस्थाना तालव्यमूर्द्धन्यदन्त्यानामनुनासिकानां मृदुतीव्रस्पृप्ट- परत्वेऽनुस्वारवत् समानमुच्चारणं नवति । “सञ्चारः। सञ्जय । कण्ठ. । काण्ड. । दन्तः । स्कन्द । इत्येवमेपामुच्चारणे विशेषानुपलब्धेः ॥ एवमपि-अस्पृप्टेषत्स्पृष्टपरत्वे गुणगुण्यादौ विशेषोपलब्धिरस्तोति णकारस्य वर्णान्तरत्व युक्तम् ॥ “अनुस्वारविसर्गजिह्वामूलीयोपध्मानीय- यमानामयोगवाहत्वं साधय॑म् ॥ तदित्यं छन्दोभापायां सप्ताशीतिशत १६ ] मपुसूदनप्रणीता - वर्णाः सिद्ध्यन्ति ।।१८७॥ येपां तु मते विंशतिर्यमा इप्यन्ते तेषा त्र्यधिक शतद्वयम् [२०३] वर्णानामुपपद्यते । तथाच सप्तनवतिर्वा, सप्ताशोतिशत वा, त्र्यधिके द्वशते वा वा यत्र मतभेदेनाम्नायन्ते, सैपाऽऽयो वर्णमातृका पथ्यास्वस्तिः प्रतिपत्तव्या ।।२।। ॥ इति द्वितीप्र. खण्डः ॥ मातृकानुवाके ॥ अथ वालो वसिमाम्नायः चातुःपष्टिकस्तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥ m १ सक्षेपतश्चतु.षष्टिरेवते व ग्राम्नायन्ते । तदुक्तं पाणिनिना- त्रिषष्टि चतु षष्टिवर्णाः संभवतो मताः । प्राकृते संस्कृते चापि स्वयं प्रोक्ताः स्वयंभुवा ॥१॥ स्वरा विशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः । यादयश्च स्मृता ह्यष्टौ चत्वारश्च यमाः स्मृताः ॥२॥ अनुस्वारो विसर्गश्च एक पौ चापि पराश्रयी। दु स्पृष्टश्चेति विज्ञेयो लुकारः प्लुत एव च ॥३॥ (इति) २ म ग्रा अ ३ ई इ ३ उ उ ३ ऋ ३ ऋ ऋ लू पम्यास्वस्ति: [ १७ ए ऐ ए३ ऐ ३ ओ ३ औ ३-इति स्वरा एकविराति ॥२१॥ ओ औ ३ ग ज ड द व क च ट त प घ मढ ध भ ख छठ थ फ ह भ ग न म-इति पञ्चविंशतिः स्पर्शा ॥२४॥ ४ य र ल व श प स ह-इत्यष्टी यादय. ॥६॥ ५ , क-इति जिह्वामूलीय. ॥ प-इति उपध्मानीयः ।। अं-इत्यनुस्वारः। अः-इति विसर्जनीयः । कुं खं गुं घु-इति यमाः। इति अयोगवाहा अष्टौ ।।६।। ळ-इति दु.स्पृष्ट एक. ॥१॥ ७ लकार प्लुत प्रयोगतो नास्तीति त्रिषष्टिः । सभवतोऽस्तीति चतु षष्टिः।

१८ ]
मधुसूदनप्रणीता
८ कात्यायनस्तु प्रातिशाख्ये हुमिति नासिक्यमधिकं मन्यमानः प्राह-
त्रयोविशतिरुच्यन्ते स्वराः शब्दार्थचिन्तकः ।।
द्विचत्वारिंशद् व्यञ्जनान्येतावान् वर्णसंग्रहः ॥१॥
एते पञ्चषष्टिव ब्रह्मराशिरात्मवाचः ।।
यत्किञ्चिद् वाङ्मयं लोके सर्वमत्र प्रतिष्ठितम् ॥२॥
६ स्वरमन्तरेणोच्चारयितुमशक्यत्वादनुस्वारविसर्गयोwञ्जनत्व-
सिद्धान्तः ॥
१० उदात्तानुदात्तस्वरितानामै कभाव्यविवक्षणान्न स्वरातिरेकः
स्वरभक्तः स्वरेऽन्तर्भावः । विवृत्तेः संवृताकारस्य चाकारेऽन्तर्भाव.
दुस्पृष्टान्तस्थानामीषत्स्पृष्टान्तस्थैरुपसंग्रहः । औरस्यहकारस्य
कण्ठ्यहकारेणोपसग्रहः । रङ्गस्यानुस्वारेऽन्तर्भावः ।।
११ अस्य चाक्षरसमाम्नायस्य ऋक्तन्त्रव्याकरणे सप्रदाय श्रूयते । यथा-
"इदमक्षरच्छन्दो वर्णशः समनुक्रान्तम् । ब्रह्मा बृहस्पतये
प्रोवाच । बृहस्पतिरिन्द्राय। इन्द्रो भरद्वाजाय । भरद्वाजः
ऋषिभ्यः । ऋषयो ब्राह्मणेभ्य । तं खल्विममक्षरसमाम्नायं
ब्रह्मराशिरित्याचक्षते । न भुक्त्वा न नक्तं प्रब्रूयात्" । इति ।
॥ इति तृतीयः खण्डः ॥३॥

पध्यास्वस्तिा [ १६ ऐकपंचाशिकश्चतुर्थः खण्डः ॥४॥ अथ माहेश्वरो वसिमाम्नायः OM तत्रैकपञ्चाशद्वर्णा आम्नायन्ते । अ इ उ ऋ लू ० ए ओ ऐ औ ह य व र ल न म ङ रा न म भ घ ढ ध ज ब ग ड द ख फ छ ठ थ च ट त क प श प स ह ३ अनुस्वार-विसर्ग-जिह्वामूलीयोपध्मानीय-यमानामकारोपरि शर्षु च पाठस्योपसंख्यानम्-इति महाभाष्यम् । एतैरेकपञ्चाशद्वर्णः सवेऽप्यन्ये वर्णा उपसंगृहीता भवन्ति ।। इति चतुर्थ. खण्ड. ॥४॥ साप्तत्रिशिकः पंचमखण्ड. ॥५॥ होडाचक्रनाम्नी आसुरी वर्णमातृका सप्तत्रिंशद्वर्णा । १ असुराणा पुरात्वे बहवोऽवान्तरभेदा आसन् । तेष्वेको मयासुर- विभागो विद्याशिल्पकलावीरतासभ्यतागुणविशेषाच्छ्रेष्ठ आसीत् एष एवासुरविभागः पुरात्वे यवन इत्याख्यायते स्म ।

२० ] मधुम्नयनप्रणीता तस्य च वर्णमातृका होडाचक्रनाम्नी पुरायुगे सप्तत्रिगिकाऽऽसीत् । सा यथा- अ व क है ड म ट प र त न य भ ज ख ग स द च ल-इति प्रस्तीर्या वा विशतिः ।।२०।। २ अ इ उ • ए · प्रो-इति मात्राव पञ्च ।।५।। घ नस 2946 घ ढ थ न-इति परिशिष्टा व द्वादश ॥१२॥ .. ४ प्रस्तीर्येष्वकारः सवृतो व्यञ्जनवत् । मात्रावर्णेषु स्वकारो विवृतः स्वर इति भेदः। प्रस्तीर्याणा मात्रायोगात् प्रस्तारे स्वरिता गतं वर्णाः स्युः । ते यथा- (१) (२) म. ट त मि. टि पि रि ति अ. ब. क ह ड इ बि. कि हि. डि उ. बु कु हु हु ए. बे. के. हे डे ओ. बो. को हो. डो मु टु पु. रु तु मे टे पे रे. ते मो टो. पो. रो तो

पप्यास्वस्ति:
[ २१
न. य. भ. ज ख
(४)
ग
स. द च. ल
नि.यि. भि. जि. खि
गि सि दि चि लि
नु. यु. भु. जु. खु
ने. ये मे जे. खे
नो. यो भो जो खो
गु. सु दु. चु. लु
गे. से. दे. चे. ले
गो सो. दो चो. लो
भवजद, हब्बज, हुत्ती, कलमन्-~-इत्येवमन्यापि काचिदबजद-
नाम्नी वर्णमातृकाऽऽसीत् । तस्या प्रार्यरपरिग्रहादिह त्याग. 11*11
इति पञ्चमः खण्डः ॥५॥
वर्णनिर्देशादिपरिशिष्टविवार : षष्ठः खण्डः ॥६॥
अवयवपरिच्छेदो मात्रा । ध्वनिपरिच्छेदाना वर्गात्वमिति वर्णात्मि-
का परिच्छित्तिर्मात्रिका भवति । उच्चारणसामान्यान्मातृका । अपि वा
जनन्या मातृशब्द प्रसिद्ध । जनयित्री हीय वर्णमाला तत्तद्देशभाषाणा-
मिति मातृकाख्यायते।
भापाया प्रथमत. प्रवृत्तायां कालेन तत्र वाक्यानि, वाक्ये च पदानि,
पदे च वर्णाः विभज्य परिगृहीता अभवन् । तत्र तत्तद्वदिपदविशेषेण
तत्तद्वर्णसज्ञा प्रथमयुगे प्रवृत्ताऽऽसीद् । यथा "रेफ" इत्यधमवचनेन
पदेन रस्य संज्ञाऽक्रियतेति प्रथम. कल्पः ॥१॥
तत इति शब्दो वर्णसजाकरण प्रवृत्तोऽभूदिति कात्यायनादय प्राहु ।
यथा-निर्देश इतिना"-(११३६) इति । एत्यकारस्य । विति वका-
रस्य । डिति डकारस्य । ईतीकारस्य । सोऽय द्वितीयः कल्प ॥२॥

२२ ]
मधुसूदनप्रणीता
तत. कारशब्दो वर्णसज्ञाकरणः समपद्यत । "कारेण च । श्रव्य-
वहितेन व्यञ्जनस्य"११३९। इति कात्यायनोक्त:। अकारः ककार' इत्यादि ।
सोऽय तृतीयः कल्प. सप्रति प्रचरति । "र एफेनच" इति सूत्रयन्तस्तु ते
रकारं रेफगन्देनापि व्यपदेष्टुमिच्छन्ति । पदेषु वर्णव्याकरणस्य
सर्वतः पूर्व रेफशब्देनवारम्भणात् । तत्स्मरणार्थ रवर्णाभिमानस्य माग-
लिकस्य रेफशब्देनैव विवक्षितत्वात् । यत्तु-"स्वरैरपि"--(का. प्रा.
११४०1) इति कात्यायनादयः प्राहुः । तत् सर्वभापासाधारणमनुशासनं
भवति । तथाहि नागरीभाषाया तावत्-क. ख. ग. घ. ङ-इत्यकारेण
वर्णा निद्दिश्यन्ते । इग्लिगभापायाम-ए वि सि डि इत्यादिप्विकारेण,
जे के-इत्येकारेण वर्णानां सना क्रियते ।। पृष्ठतोऽप्ययमेकारः कचिन्निहि-
श्यते । एफ् एल् एम् एन्. एस् एक्ष.-इति । आकारोऽपि क्वचिद्
यथा-ग्रार-इति ॥ पारस्थानमापायामेकारो यथा-वे. पे. ते.
टे से-इत्यादि । अलिफ-शव्दस्तु-"अलिपि इत्यस्यापदंशमात्रम् !
जीम् मीम् स्वाद सीन-इत्यादयस्तु सस्कृतरेफगब्दवत् प्राचीन-
सप्रदायसिद्धाः पदाभिज्ञानोपपन्ना वर्गसंज्ञा द्रष्टव्या. । ते च गन्दा रेफव-
न्माङ्गलिका इति भाव्यम् ॥
इति षष्ठः खण्डः ॥६॥
इति मधुसूदनविद्यावाचस्पतिप्रणीते पथ्यास्वस्तिग्रन्थे
मातृकापरिष्कार. प्रथम प्रपाठः समाप्तः ॥१॥

यमानुवाके विच्छेदप्रतिपत्ति आगमप्रतिपत्तिश्च ।।२।। अथ यमपरिष्कारो द्वितीय प्रपाठकः अथात प्रागुक्तो यम पुनरिह वैशयेन चिन्त्यते । शुद्ध जित्-सोष्म- जितौ द्वौ, शुद्ध धिसोप्मधी द्वाविति चत्वारो यमाः। ते च कु खु गुं घु नब्दैः सज्ञायन्ते । यमस्वरूपे चतुर्धा विप्रतिपद्यन्ते । १ एकस्मिन् वर्णे पूर्वाक्षरपराभयोर्युगपद्वलसप्रसक्ती बल- द्वयविप्रतिषेधाद् वर्णो द्विरुच्यते । तत्र द्वितीयस्यानुनासिकपरत्वे नासि- क्यत्वमतस्तत्र यमगब्द. । पूर्वस्य निरनुनासिकतयाऽनुनासिकस्यैतस्य प्रयत्नान्तरग्रहणार्थ मध्ये किञ्चिद्विच्छेदलाभात्। विच्छेदयमयोरैका- र्थ्यात् ।। प्रयत्नान्तरत्वं तु पूर्वस्पृष्टविलक्षणं सवृतत्वम् । तथा चाह मण्डूक वर्णानां तु प्रयोगेषु करण स्याच्चतुर्विधम् । संवृतं विवृतं चैव स्पृष्टमस्पृष्टमेव च ॥१॥ स्पर्शानां करण स्पृष्टमन्तःस्थानामतोऽन्यथा । यमानां सवृतं प्राहुविवृतं तु स्वरोष्मणाम् ॥२॥इति । अत्र पक्षे यमो वर्णागम. सगरीर पूर्वसदृशो वर्णविशेप | स्वरात् संयोगपूर्वस्य द्वित्वाज्जातो द्वितीयक. ॥ तस्यैव यमतज्ञा स्यात् पञ्चमैरन्वितो यदि ॥१॥ इति वर्गरत्नप्रदीपिकाशिक्षोक्ते । "अनन्त्यान्त्यसंयोगे मध्ये यम. पूर्वगुरग"-इत्यौदवजिसूत्राच्च । तस्य विंगतिसख्यत्वेऽपि शुद्धजित्व- मोष्म जित्व-शुद्धधित्व-सोष्मधित्वै. सग्रहणाच्चतुष्ट नोपहन्यते । इत्येका प्रतिपत्तिः ॥१॥ २ परे त्वाहु --पदद्वयमध्ये यतिर्विवृतिरर्द्धमात्राकालः। दशरा- मशरा इत्यत्र शमयोरुत्तरं विप्रकर्षविशेषानुभवात् । सदा स आयाती- २४ ] मधुसुदनप्रणीताः त्यत्र प्रथममद्विरतावन्योऽर्थः दाक्षरादन्योऽर्थः । काकाली कामधुरा काशीतलवाहिनी गङ्गा ॥ कस जघान कृष्णः कम्बलवन्त न वाधते शीतम् ।। इत्येतेषु तत्र तत्र यतिवैशेष्यादेवेतानि प्रश्नवाक्यान्युत्तरवाक्यरूपायोपक- त्पन्ते ।। नक्-क्तमिति । कागदही को पास मे बैठे निपट उदास कागदही पाये बिना मिटे न मन की प्यास ॥१॥ इह भापापद्ये पदान्तविरतित्रयभेदादर्थत्रयमुपपद्यते ॥ तथा च-'सक्रतु' रित्यत्र ककारपृष्ठे सा विरतिरुपपद्यते । सऽक्रतुः । अथ कदाचित् सा ककारात् पुरतो विक्षिप्यते । पराङ्गेऽपि ककारे पूर्वाक्षरबलाक्रमणे न पूर्वसन्निकर्षातिशयोपपत्तेः। परवलशैथिल्यात्तु- कस्य पराङ्गत्व व्याहन्यते । तेन सऽक्रतुरितिवक्तव्ये सक्रतुरि- त्युच्चार. । अथ बलट्टयविप्रतिषेधे कस्य द्वित्वमिति कद्वयान्तराले सा विरतिनिक्षिप्यते । सक्रतुरिति । नक्तमित्यादौ पदविर- त्यभावेऽप्यक्षरद्वयान्तरालविग्त्या त्रैविध्यमुपपद्यते--न-क्तम् । नक्-तम् अथानुनासिकपरत्वे तच्छायापत्या विरतेरस्या ना- सिक्यत्व प्रसज्यते । तस्याश्च यमसज्ञा। अत्र पक्षे यमः शरीरशून्यो विच्छेदात्मा ! जकारों द्वौ मकारश्च रेफस्तदुपरि स्थित ॥ अशरीर यमं विद्यात् संमार्मोति निदर्शनम् ॥१॥ इति अमोधनन्दिनीशिक्षोक्त।।। "अन्त पदेऽपञ्चमा पञ्चमेषु विच्छेदम्” (१३६) इति प्रातिशाख्यसूत्रं व्याचक्षारणे प्रदीपे विच्छेद इति यमसज्ञा इत्युक्तेश्च । स्वरयोविच्छेदे विवृतिशब्दः। व्यञ्जनयोविच्छेदे यमशब्द इति व्यावहारिकसमय । हरऽएहीति विवृतिः। पलिक्ऽक्नीति यम. । यमस्य विच्छेदमात्रत्वेऽपि पूर्वव्य जनचातुर्विध्यनिबन्धन चतुष्ट्वमुप- चर्यते । इत्यन्या प्रतिपत्ति ॥२॥ ३. अन्ये त्वाहुः। सयोगविभागशब्देभ्यः शब्दोत्पत्तिरिति भगवान् कणाद प्राह। दृश्यते च-ऊ-क,, हरित्-त्, फट-ट् इत्यादौ पथ्यास्वस्ति. [ २५ सद्यस्तरसा सभवति । A व्यञ्जनान्तपदविरामे पदान्तव्यञ्जनोच्चारणार्थ वेगात् क्रियमाणे स्थान- करणसंयोगे सयोगजो वर्ण सद्य प्रतिभासते। अथ शैथिल्येन तत्सयो- गोपरमे वर्णान्तरानुत्पत्तावपि तत्सयोगप्रत्याक विभागजस्तत्र पूर्वसदृशो वर्णः प्रादुर्भवति । पदविरामवत् पदमध्येऽ- पि सयोगादेविच्छिद्योच्चारणे सयोगजवर्णोत्तर स विभागजो वर्ण. एप एव तु सोमरहवर्ज सर्वत्र वर्णद्वित्वहेतुर्द्रष्टव्यः । स विभागज एवानुनासिकपरत्वे तत्प्रयत्नाकृष्टतया नासिक्यतां प्राप्तो यम उच्यते। पलिक्-क्नीति । सक्थ्-थ्नेत्यादौ ककारादप्यग्रे थकारे विराम इति तस्यैव विभागजत्वे यमसज्ञा ।। द्विरुक्ति वर्जयेन्नित्यं यमेऽपि परत: स्थिते ।। सक्थना देदिश्यते नारी ककारोऽत्रक एव हि ॥१॥ इति वर्णरत्नप्रदीपिकायां कहित्वनिषेधात् ।। "सर्वेषां व्यञ्जनानां द्विर्भावो- भवति द्वादशवर्जम्" । ते ख छ ठ थ फा घझ ढ ध भा रहौ चेति-" गौतमसूत्रमते तु-थ-घटकस्य द्विरुक्तिरिति "प्रथमैद्वितीयास्तृतीयश्चतुर्था" ||१३६॥ इति कात्यायनप्रातिशाख्य- सूत्रे तथोक्तेः । तदित्थं विंशतिर्यमा. ॥३॥ ।। इत्यन्या प्रतिपत्ति. ॥३॥ अपरे त्वाह :-न विशतिर्यमा किन्तु क. ख. ग. घ. सदृशध्वनयो नासिक्याश्चत्वार एव यमा कुं खु गु घु सज्ञा । प्रातनच्मीत्यत्रा- तनचुक्मीति । समाीत्यत्र समाज -ग्मीति । पाटोत्पत्र प्राट्, करणेति । रत्तमित्यत्र रत्-क्नमिति । सक्नेत्यत्र सक्थ्-ख्नेति । विद्म इत्यत्र विद्-ग्म इति । दध्म इत्यत्र दध्-घ्म इति । पाप्मेत्यत्र पाप-क्मेत्यु- चारणात् ॥ एतदुक्त पाणिनीयशिक्षाभाष्ये शिक्षाप्रकाशे "अन्तर्वत्क्नीति तकारयमककारनकारेकाराः ॥ यज्ञ इत्यत्र जकार-पूर्ववर्ण-वर्गसख्य- सवर्णयमगकार-अकारा इति । शिक्षाभाष्यानुमत्यंतदुच्चारणमाख्यातम् । वस्तुतस्तु कुकार-गुंकारयो. कवय॑तया तत्स्थानचवयंस्थानयोरानन्तर्यात् पूर्वप्रयत्नापकर्षेण यमे प्रत्यये चवर्यः कवय॑त्वमापद्यते। उक्त च भगवता तस्य विशेषः ॥ फार्म ४ २६ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता पाणिनिना--"चो: कुर्भलि पदान्ते चेति"॥ तेन आतनच्च्मीतिवक्तव्ये कुकारादातनचक्मीति, ककारयमककारमकाराः। समार्मीत्यत्र गुकारात् समाग्रीति; गकारयमगकारमकारा। यज्ञ इत्यत्र गुकारात् यग्ग्ज इति । विज्ञानमित्यत्र च विग्ग्नानमिति गकारयमगकारज काराः ।। इतीत्थमेव सर्वत्रोच्चारण सप्रदायसिद्धमवकल्पते ।। ज्ञानमित्यत्रापि मध्ये गुकारो नियम्यते । (१) : अनन्त्यान्त्यसंयोगे मध्ये यमः पूर्वगुणः"-इत्यौदवजिसूत्रात् ॥१॥ (२) अनन्त्यान्त्यसयोगेऽनन्त्यपूर्वेऽन्त्योत्तरे व्यवधानजिते तत्र यमा वर्तन्ते न सशयः ।" इति गौतमसूत्राच्च ॥२॥ (३) अनन्त्यश्च भवेत्पूर्वो ह्यन्त्यश्च परतो यदि । तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत् सवर्ण. पूर्ववर्णयो.। इति नारदोक्त श्च । (४) अपञ्चमैश्चैकपदे सयुक्त पञ्चमाक्षरम् ॥ उत्पद्यते यमस्तत्र सोऽङ्ग पूर्वाक्षरस्य हि ॥४॥ (५) पञ्चमाः शषसैर्युक्ताः अन्तस्थैर्वापि सयुताः ।। यमास्तत्र निवर्तन्ते श्मशानादिव बान्धवाः ॥५॥ इतियाज्ञवल्योक्तश्च (६) स्पर्शानामुत्तमः स्पर्शी संयोगाश्वे दनुक्रमात् ।। आनुपूर्व्या यमांस्तत्र जानीयाच्चतुरस्तथा ।।६।। इति मण्डूकोक्त श्च ॥६॥ तस्य गुंकारस्य झल्त्वाज्जकारो गत्वमा- पद्यते। तेन ज्ञानमिति गकारगुंकारनकारा इति उच्चारणसप्रदायो वैदि- कानुमोदितो लोकेऽपि प्रयुज्यते । घृधातो दिकस्य घृतादिष्ठ लोकेऽपि प्रयो- गवत् ॥ यत्तु ज्ञान विज्ञानमित्यादावेक एव गकार प्रतिभाति न तु गुकारः पृथक् प्रतीयते। अप्रतीतश्च नास्तीति शक्य वक्तुमिति कश्चिद् ब्रूयात् । तन्न । पूर्वस्पर्शयमयोः संयोगस्यायस्पिण्डतया घनबन्धात् पार्थक्येनाप्रतीताबपि प्रकृतिसिद्धार्थस्यापलापानहत्वात् । त्रिविधो हि पिण्ड: स्मर्य्यते भगवता गौतमेन- पथ्यास्वस्तिः [ २७ त्रिविध. सयोगपिण्डो भवति-अयस्पिण्डो दारुपिण्डस्तथोपि- ण्डश्चति । यमसहितमयपस्ण्डिम् । दारुपिण्डमन्तःस्थैर्युक्तम् । यमान्तःस्थ- वर्ज तूर्णापिण्डमिति ।। अन्त.स्थंयमसयोगे विशेषो नोपलभ्यते । "अशरीर यमं विद्यादन्त स्थ. पिण्डनायकः" इति अशरीरत्व पूर्वस्पर्गशरीरान्तःप्रविष्टत्वम्, अत एव च पूर्वस्पर्शय- मयोर्मध्ये विच्छेदो नोपलभ्यते ॥ तस्मात् पार्थक्येनाप्रतीतिरिति वोध्यम् ॥ इति प्रासङ्गिको यमविचारः ।।।। इति मधुसूदन--विद्यावाचस्पति--प्रणीते पथ्यास्वस्तिग्रन्थे यमपरिष्कारो द्वितीयःप्रपाठः समाप्त ॥२॥ .

तृतीये गुणानुवाके सप्तमखण्डे वाक्चातुविध्यखण्डः प्रथमः ॥१॥ ॥ अथ गुरापरिष्कारस्तृतीयः प्रपाठ, || धदिभ्युदयः सदाऽभ्युदयते धर्मस्तु साहित्यतो विज्ञेयोऽप्यविनाकृत तदपि वा वाक्यंश्च वाक्यं पुन:॥ सपद्येत पदैः पदं पुनरिदं वणः कृतं वर्ण्यते ते वर्णाश्च गुरणः कृता इति गुरगान वहितान् ब्रूमहे ॥११ (१) येयं वाग्वदति सा चतुर्विधा विज्ञायते । तथाच श्रूयते- "चत्वारि वापरिमिता पदानि तानि विदुर्ब्रह्मरगा ये मनीषिण" ॥ "गुहा बोरिण निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति"॥१इति।। वाचा परिच्छिन्नानि तावच्चत्वारि स्थानानि भवन्ति-वाचस्पत्यं, ब्राह्मणस्पत्यमैन्द्र भौम चेति। स्थानभेदाद्वाचश्चतुर्विधा उपपद्यन्ते- वेकुरा, सुब्रह्मण्या, गौरिवीता, आम्भृणी चेति । स्वायम्भुवमण्डले परमाकाशे वेकुरा वाक् ॥१॥ पारमेष्ठयमण्डले महासमुद्रे सुब्रह्मण्या वाक् ॥२॥ सौरमण्डले महाब्रह्माण्डे गौरिवीता वाक्।।३।। पार्थिवमण्डले भौमाण्डे चान्द्रमण्डलोपेते सोममयी आम्भृरणी वाक् ॥४॥ ता एता वाच- स्तत्तल्लोकस्थिताना सर्वेषा भावानामुपादानभूता इष्यन्ते । तत्रेयमा- म्भृणी वागस्यां भूमौ सर्वत्राभिव्याप्ता। तामेव वाचमिमे मनुष्या उपजीवन्ति । इतरास्तु तिस्रो ताचो गुहाया निहिताः । तदुक्तमृषिणा- बृहस्पते प्रथम वाचो अग्न यत् प्रैरत नामधेयं दधाना. ।। यदेषा श्रेष्ठ यदरिप्रमासोत् प्रेणा तदेषा निहितं गुहाविः"।।इति।। ऋक्सामयजुरात्मिका वैदिकी होय वाक् सर्वेषामाविरेव सती गुहाया निहिता न सम्यक्तया परिज्ञायते इत्यर्थ । ता ह्यताश्चतस्रो वाचो ब्रह्मविज्ञाने सुविशद व्याख्याता द्रष्टव्या. ॥१॥ अपि चान्यथा ब्रूमः- (२) वाजस्य हि प्रसवो वागिय श्रूयते । यथोक्त मैत्रायणीयश्रु तौ- - पथ्यास्वस्तिः [ २६ । "वागघि वाजस्य प्रसव । सा वै वाक् सृष्टा चतुर्धा व्यभवत् । एषु लोकेषु त्रोणि तुरीयाणि । पशुषु तुरीयम् । या पृथिव्यां, साग्नौ, सा रथन्तरे ॥१॥ याऽन्तरिक्षे, सा वाते, सा वामदेव्ये ॥२॥ या दिवि सा वृहति, सा स्तनयित्नौ ॥३॥ अथ पशुषु ॥४॥ ततो या वागत्यरिच्यत ता ब्राह्मणे न्यदधुः । तस्माद्ब्राह्मण उभयी वाचं वदतियश्च वेद, यश्च न । या बृहद्रथन्तरयोः-यज्ञादेनं (वाज) तया गच्छति ॥ या पशुषु तया ऋते यजम् ।। वाजस्येम प्रसव: सुषुवेऽग्ने सोम राजानमोषधोप्वप्सु ।। स विराज पर्येतु प्रजानन् प्रजा पुष्टि वर्धयमानो अस्मे ।।१।। वाजस्येमां प्रसव: शिश्रिये दिवं स ओषधीः समनक्तु घृतेन ।। वाजस्येदं प्रसव प्राबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वतः ॥२॥ मैत्रि वा १११११४-५) इति । अत्रेयं त्रिलोकीवाग् गुहानिहितेव नेगयते, पशुवागियमनुभूयते इति विद्यात् ॥२॥ अपि चान्यथा ब्रूम (३) अमृता, दिव्या, वायव्या, ऐन्द्री चेति सा चतुर्धा वाक् । तत्र मन प्राणभिता सत्या वागमृता । वेदा हि ऋक्सामयजूप्यमृता वाक् । ततः सर्वमिद प्रजायते, तत्र प्रतितिष्ठति, तत्र सतिष्ठते । सेय वागाकाशो नाम । अग्निरस्या ब्रह्म । अग्निरस्या उपनिषत् । तस्मा- दियमाग्नेयी। सेय मन्त्रे श्रूयते- "गौरीमिमाय सलिलानि तक्षती एकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।। अष्टापदो नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन।।१।।(१११६४।४१) अथ दिव्या वागृता, सोऽथर्ववेदः । तन्मयान्येवैतानि सर्वाणि दैव- तानि भूतानि चोत्पद्यन्ते- इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्मसंशिता ॥ येनैव ससृजे घोर तेनैव शान्तिरस्तु न ॥ ॥ (१९६३) इत्यथर्वसहितोक्तः।

३० ] मधुसूदनशर्मप्रणीता सेयं वाक् सरस्वानाम । दिक्सोमोऽस्या ब्रह्म । दिक्सोमोऽस्या उपनिषत् । तस्मादिय सौम्या । सेयमपि श्रूयते- "तस्या समुद्रा अधिविक्षरन्ति तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः ॥ तत. क्षरत्यक्षरं तद्विश्वमुपजीवति ॥२॥ (१।१६४।४२) वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभि: ॥ सा नो जुषाणो यज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मे अस्तु ॥इति।। अनयोर्ध्वनिर्नास्ति । तस्मान्न ते श्रोत्रण गृह्यते। ध्वनिः शब्दः । ध्वन्य- भावात्तु नैते वाचौ शब्दौ भवतः । "वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् सस्थाश्च निर्ममे ।" इति मनुस्मृति- वाक्ये शब्दपदमौपचारिक बोध्यम् । अशब्दात्मिकाया एव त्वमृताया वेदवाचः सृष्टिहेतुत्वसिद्धान्तात् ।। श्रोत्रग्राह्यो ध्वनिद्विविध. । शक्त्यभावादनर्थकः प्रथमः । वर्णपद- वाक्यादिविभाजित. सार्थको द्वितीयः । उक्तंच- वायव्या। ध्वनिर्वणः पदं वापयमित्यास्पदचतुष्टयम् ।। यस्याः सूक्ष्मादिभेदेन वाग्देवीं तामुपास्महे ॥शाइति तत्रार्थिकाया वाचो वायुर्ब्रह्म। वायुरुपनिपत् । तस्मादिय गतिविहीनापीय वाग् वाय्वारब्धा वायुप्रतिष्ठा वायु- नैवेतस्ततो नीयते । नादवासादयश्च तस्या विशेषा वायुनैवोपपद्यन्ते । सेय सरस्वती नाम तृतीया वाक् विश्वोपजीवनी भवति । सापि प्रथमाद्वितीयावदव्याकृतवासीत् अर्थनिवन्धनस्य वादि- विभागस्य तत्रादृष्टत्वात् । तस्या चेन्द्रोऽनुप्रविश्य विभक्तिभिस्ता विविधैराकारैर्व्याकरोति तेनेयमैन्द्री व्याकृता वाग् भवति । तथाच श्रूयते- "वाग् वै पराच्यव्याकृताऽवदत् तद् देवा इन्द्रमब्रुवन्-इमां नो वाचं व्याकुरु इति। सोऽब्रवीद-वरं वृणै-मह्य चंवैष वायवे च

पथ्यास्वस्तिः
[ ३१
-
सह गृह्याता इति । तस्मादैन्द्रवायवः सह गृह्यते । तामिन्द्रो
मध्यतोऽपक्रम्य व्याकरोत् । तस्यादियं ब्याकृता वागुद्यते” इति ।
सोऽयमर्थो मन्त्रसहितायामप्याम्नायते-
"बोभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम् ।।
अनुष्टुभमनु चर्च्र्यमारणमिन्द्र निचिक्युः कवयो मनोषा" ॥
(१० । १२४ । ६) इति ।
एष मन्त्रोऽक्षरप्रकरणे व्याख्यास्यते । सा हीन्द्रेण व्याकृतवेयं वागु-
पयुज्यते सर्वेभ्यो व्यवहारेभ्यो वैदिकेभ्यश्च लौकिकेभ्यश्च । तथा च
श्रूयते मन्त्रः-
"वाचं देवा उपजीवन्ति विश्व वाच गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।।
वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥१॥
इत्थं चैताश्चतुर्विधा वाचो व्याख्याताः। तत्रता: पूर्वास्ति-
स्रोऽर्थविज्ञानाननुकूलत्वाद् गुहा निहिता नेङ्गयन्ति न कचिदर्थं
सकेतयन्ति ॥ अथ या पुनरिमा वाच मनुष्या ब्रुवते, यस्या वाच्य-
कारककारादयो वर्णाः व्याकृता सविभक्ताः प्रज्ञाता दृश्यन्ते। सेय
चतुर्थी व्याकृता वागेन्द्री नाम प्रतिपत्तव्या । इन्द्रः प्रज्ञाप्राण. ।
प्रज्ञानयोगात्तु दाचो विभज्यमाना वर्णा भवन्ति । अउ इति मन
प्राणयोः सज्ञे वैज्ञानिकानाम् । तत्र मनः प्रज्ञानमृण प्राप्तो ध्व-
निरर्णः । अपि वा प्राणं च प्रज्ञानं चागतो ध्वनिवर्ण ॥ वर्णा
एवामी अर्णा इत्युच्यन्ते । प्रज्ञाप्रारण्योन्तिरीयकतया प्रज्ञयव
प्राणस्यापि सग्रहीतु शक्यत्वात् ॥ यास्तु वाचोऽनाहतनादे(१)
याश्च वाचो वाय्वग्निजलपार्थिवानाम् (२), या वा वाच. पशुपक्षि-
सरीसृपाणाम् (३)। या वा वाचः सद्योजाताशिक्षितशिशुरोदना-
दिषु ताः सर्वा इन्द्रेण अव्याकृतत्वादनिरुक्ता केवलवायव्या इष्यन्ते ॥
मनुष्याणामेव तु वागर्थभितत्वान्निरुक्त प्रज्ञातमुच्यते । तस्मादयमैन्द्र-
वायवो ग्रहो भवति ॥४॥

३२ ] मधुसूदनशर्मप्रणीताः तथा च मन्त्रः (४) सेयमैन्द्रो वागध्यात्म चतुर्धा विधीयते । श्रूयते- चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण ॥ गुहा त्रीणि निहिता नेगयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति॥१॥इति परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, इत्येता हि ता अध्यात्म चतुर्धा वाच । न सोस्ति प्रत्ययो लोके य. शब्दानुगमाहते ॥ अनुविद्धमिव ज्ञान सर्व शब्देन भासते ॥१॥ इत्याप्तोक्त वुद्धिस्था वाक् परा । मनसा ग्रन्थाक्षरानाकलयता- मुपाशु वाक् पश्यन्तो। विनैव नादध्वनि श्वासमात्रेण कर्णमनुच्चार्य- मारणा वाग मध्यमा । नादध्वनिशालिनी दूरतोऽपि श्रोत्रग्राह्या वैखरी ॥ तासु परा- पश्यन्तीमध्यमाः प्रच्छन्ना न विगिष्यावगम्यन्ते ॥ वैखरी तु मनुष्या ब्रुवते । उक्त चाभियुक्त:- वैखरो शब्दनिष्पत्तिमध्यमा श्रुतिगोचरा ॥ द्योतितार्था तु पश्यन्ती सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥१॥ इति ॥४॥ (५) सेय वैखरी पुनरध्यात्म चतुर्धा विधीयते तथा च श्रूयते- चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि बिदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा बोरिण निहिता नेङ्गायन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदंति ॥१॥इति तमेत मन्त्र वाजसनेयश्रु तिरित्थ व्याचष्टे - "इन्द्रो ह वा ईक्षांचके-'वायुर्वैनोऽस्य यज्ञस्य भूयिष्ठभाग। हन्तास्मि- न्नपि त्वमिच्छा" इति । स होवाच वायवा मास्मिन् ग्रहे भजेति । कि तत स्यादिति । निरुक्तमेव वाग् वदेदिति । निरुक्तं चेद् वाग वदेत् आ त्वा मजामीति । तत एष ऐन्द्र वायवो ग्रहोऽभवत् ।

पचास्वस्तिः [ ३३ तदेतत् तुरीयं वाचो निरुक्त यन्मनुष्या वदन्ति । अर्थतत् तुरीयं वाचोऽनिरुक्तं यत् पशवो वदन्ति । अथैतत् तुरीयं वाचोऽनिरुक्तं यद्व- यांसि वदन्ति। अथैतत् तुरीयं वाचोऽनिरुक्तं यदिदं क्षुद्रं सरीसृपं वदति ।। इति । न केवलमध्यात्म, किन्तु यदधिभूतं, यदधिदैवतं वा वाक् तत्रा- प्येते चत्वारो विभागा द्रष्टव्याः । परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरीति ॥ (६) सेयं या वैखरी वाग् मनुष्येण व्याह्रियते तत्रापीयं श्रुतिर्भवति "चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण.। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गायन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥१॥इति। प्राण स्वरः, वर्णः, ध्वनि.-इत्येवं तावमनुष्यवाचश्चत्वारि पदानि । तथा हि- प्रात्मा बुद्धया समान मनो युङ्क्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥ मारुतस्तुरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् । सोदीणों मूर्धन्यमिहतो वक्त्रमापद्य मारुतः । वर्णान् जनयते तेषां विभागः पञ्चधा स्मृतः ।। इति शिक्षास्मृत्युक्तमार्गेण नाभ्युस्थितो वायुः स्वरात्मतासिद्धे प्राक् प्राणो नामाभिसंधेय । अथ स एवैतन्मुखागमनात् प्राक् उर.कण्ठशिर:- स्थान स्वरः । स पुनः पञ्चरूपः पञ्चाशद्रूपैश्चतुःषष्टिरूपैरपि वा व्या- क्रियमाणो वर्णः। स पुन षड्जर्षभगान्धारमध्यमपञ्चमधवतनिषादास्यः सप्तभि स्वरैविभेदित श्रु त्या गृहीतो ध्वनि म जायते । तत्र प्राणोऽय- मेकस्तरमात्रा वाक् । अथान्यवाक्स्तरयोगाद् द्विस्तरा स्वरवाक् । तत्रान्यवाकस्तरयोगात् त्रिस्तरा वर्णवाक् । तत्र पुनरन्यवाफ्स्तरयोगा- चतुस्तरा ध्वनिवाक् । नानपेक्ष्य पूर्वामुत्तरारूपं धत्ते ।। अत्राहा शङ्करो भाष्यकारः। क. पुनरयं ध्वनि म । यो दूरादाक- ३४ ] ४ मधुसूदनशर्मप्रणीता र्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति। प्रत्यासीदतश्च मन्दत्वपटुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति । तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो विशेषा न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः । वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञाय- मानत्वात् ॥१॥ - अथैते वर्णा ध्वनिसहकारेण च कृतरूपा भवन्ति ध्वनिमन्तरेण च । यौ तावत् कर्णे प्रत्यासीदन्ती रहस्यमुपजल्पतस्तयोर्भाषायां वर्णा उपांशुकृतत्वाद् ध्वनिविनाकृता अपि लक्ष्यन्ते । उच्च कृतायामेव ध्वनेः सचारात् ॥२॥ अथ यदाहु.-"अकारो वै सर्वा वाक् । सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना वह्वी नानारूपा भवतीति" (ऐ. ब्रा · ) तत्रेय स्पर्शोष्मयोगप्रतियोगिनी वाक् स्वरो नाम । एष एव स्वरो लघुत्वगुरुत्वाभ्या द्वधा प्रतिपद्य- मानोऽक्षरो नाम कथ्यते ॥३॥ अथ यं पुनरेते शाब्दिका. स्फोट प्रतिपद्यन्ते स प्राणो वर्णानां मूलाधारो द्रष्टव्यः । तदवच्छेदादिमे वर्णाः परस्परतो नोपसृज्यन्ते ।।४।। अथ पुनर्देवताभिश्चैता वाचो विभक्ता द्रष्टव्याः । घ्वनिरयमग्नीषो- मीया वागाग्नेयी गायत्रीछन्दा इष्यते । वर्णात्मिका तु वाग वायव्या अनुष्टुप्छंदा भवति । "वाचमष्टापदीमहमिति श्रुतेः" ब्रह्म वै गायत्री वागनुष्टुप् इति श्र तेश्च"-||अष्टौ हि विन्दवस्तस्या व्याप्तिस्थानमित्यनु- प्टुप्त्वमुपपद्यते । या पुनः स्वरवाक् तामैन्द्री वृहतीछन्दसमाहुः । "वागिन्द्र" इति हि श्रु तिरेतामेवैन्द्री वाचमभिप्रेति । इयमेवेन्द्रपत्नीति श्रूयते । तस्या नव बिन्दवो व्याप्तिस्थानमिति वृहतीछन्दस्त्वमाहु ।। प्राणस्त्वयं स्फोटोऽव्ययभक्तिर्वाक् । स हि कोश सर्वासा वाचामिष्यते । तदित्यमेषा चतुष्टयी वाक् संहितोपचर्यते । तस्यास्तुरीयमेव पदमेतं ध्वनिमद्धा शृण्वन्ति ॥ अथैषा चतुष्टयी वाक् पुनरन्यथा चातुर्विध्यं भजते । तद्यथा वर्ण', अक्षरं, पदं, वाक्यम्-इति हि मनुष्यवाचश्चत्वारो विभागा भवन्ति ।

पय्यास्वस्तिः [ ३५ इदमेवैतस्या वाचश्चातुर्विध्यमिन्द्ररेण कृत व्याकरणमाख्यायते। तत्र वाक्यानि पदे, पदान्यक्षर, अक्षराणि वर्णः कृतरूपाणि भवन्तीत्यस्तानि वर्णाक्षरपदानि त्रीण्यन्तरत. प्रवेशक्रमाद् गुहानिहितानि न स्वातन्त्र्येण शाब्दबोधं जनयन्ति । वाक्यस्यैवार्थबोधने सामथ्र्थलाभात् । तस्मादर्थं प्रत्याययितुं वाक्यानि मनुष्या ब्रुवते ॥६॥ (७) अथ वर्णोऽक्षर, पदं, वाक्यमित्येतेषामपि चतुर्णा प्रत्येकस्य पुनश्चातुर्विध्यमिच्छन्ति । तत्र तावद्वर्णाश्चतुर्धा-अस्पृष्टः, ईपत्स्पृष्टः, स्पृष्टः, अर्द्धस्पृष्ट इति भेदात् ॥१॥ अक्षर चतुर्धा पूर्वापरोभयविधव्यापारशून्यं प्रथमम्-अ इति ॥ पृष्ठव्यापार- विशिष्टं, पुरतो व्यापारशून्य द्वितीयम्-स्म इति । पृष्ठव्यापार- शून्यं, पुरतो व्यापारविशिष्टं तृतीयम् उक्-इति ॥ उभयतो व्यापारविशिष्ट चतुर्थम्-वागिति ।।२।। अथ पदं चतुर्धा नामाख्यातोपसर्गनिपातभेदादिति भगवान् पतञ्जलिः ॥ परे त्वाहुः। नोपसर्ग. पृथक् पदम् । उपसर्गविशिष्ट- स्याख्यातत्वात्, तस्य तत्रैवान्तर्भावात् । येषु तु-''इन्द्रो देवान् प्रतिप्रतिः। "प्रतीनि ह कर्माणि सन्ति । यान्यन्यत् कारिण, तान्यतीनि" इदानीनि, एतौंरिग ॥ इत्यादिषु विभक्तयः प्रयुक्ता दृश्यन्ते तेषां नामत्वमेवोपपद्यते ।। तस्मान्नामाख्यातनिपातेभ्योऽतिरिक्तानां विभक्त्यर्थगभितत्वाद् विभक्त्ययोग्याना स्वरादिशब्दानां चतुर्थत्वं द्रष्टव्यम् । नैतानि नामानि विभक्त्यर्थाभिततया विभक्तियोगिनामेव नामत्वेन विवक्षितत्वात् ॥३॥ अथार्थवैशिष्टयात् प्रज्ञानोपपन्ना वाग् वाक्यम् ।। तच्चतुर्धा-नाभिस्थानं, प्रनमत्रयस्थान, मुखप्रदेशपञ्चकस्थान, श्रोत्रस्थानं चेति ॥ प्रज्ञानप्रेरिता सती नाभेरारभ्य परश्रोत्रमागता परस्मै प्रज्ञानं जनयतीति चतुर्षु पदेषूपस्थाय विलीयते ।। ॥

३६ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता 1 3 ४ (६) वाक्यमेवेदं महदुक्थप्रकारेण पुनश्चतुष्पदमैतरेयारण्यके श्रूयते । मितममितं स्वरः सत्यानृते इति । ऋग गाथा कुम्ब्या तन्मितम् ॥१॥ यजुनिगदो वृथा वाक् तदमितम् ॥२॥ सामायो यः कश्च गेष्णः स स्वर ॥३॥ ओमिति सत्यं नेत्यनृतम्" इति ॥४॥ सत्यानृतयोः पृथक्त्वाभिप्रायेण पञ्चविधत्वमपीच्छन्ति ।।५।। यत्तु यास्कनिरुक्त-"तस्माद् ब्राह्मणा उभयी वाचं वदन्ति या च मनुष्याणाम्"-( १३।१ ) इति वाचो द्वविध्यमाख्यातं तद्वदभाषा-संस्कृतभाषाभेदाभिप्रायं द्रष्टव्यम् । छन्दोभाषायाः स्वर्गभाषात्वसिद्धान्तात् ।। एषा च वाक्याना पदानामक्षराणां च वर्णा एवारम्भका सन्तीति सर्वमूलत्वादादौ वर्णा : शिक्षयितव्या :॥ ते च वर्णा. सप्तनवति- विधाश्छन्दोभापाया दृश्यन्ते-इत्येतेषामेष समाम्नायस्तावत् प्रदर्शित ः।। ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥ ( १ ) अथ ब्रूमः । अक्षराणामकारोऽस्मीति स्मरणादकार एवैको वर्ण. सर्वेषामेषां वर्णानां प्रतिपत् । अकारादेवैकस्मादक्षरादयमेतावान् वर्णसमाम्नायोऽन्यान्यगुणयोगेनोत्पद्यते । तथा चाह भगवानैतरेय.- " यो वै तां वाचं वेद यस्या एष विकारः स संप्रतिवित् ।। अकारो वै सर्वा वाक् । सैषा स्पर्शीष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति ॥ (ऐ० प्रा० २।३।६) इति ।। अत्र श्रुतौ स्पर्गोष्मशब्दौ स्थानकरणयोरन्योन्यं सन्निकर्षतारतम्यं विप्रकर्पतारतम्य च यथायथ लक्षयतः । ते च स्थानकरणे द्विविध बहिरङ्ग चान्तरङ्ग च । मुखप्रवेशात् प्राग्भाविनी बहिरङ्ग ।

पथ्यास्वस्तिः [ ३७ भवतः ॥ तब स्थानं प्रक्रमशब्देन, करणप्रयत्नस्त्वनुप्रदानशब्देनाख्यायते । मुखा- भ्यन्तरतस्तु ते अन्तरङ्ग भवतः । उभयत्र प्रयत्नविशेषात् स्थान- करणयोराकुम्चनसंप्रमारणे वर्णस्वरूपविशेषोत्पत्तये अथ स्पर्शोमगन्देन स्वरद्वयसंश्लेपविश्लेपावपि लक्ष्येते । तेन स्वराणां विश्लिष्टोच्चारणे एकमात्राकालः । सश्लिप्टोच्चारणे तु द्विमास्त्रि- मात्रो वा कालः॥ स्वराणामवयवसंकोचेन घनीभावे व्यञ्जनत्वोपपत्तिः। तत्रैतेषा- मर्द्ध मात्रा कालः। तदित्थ पञ्चैते गुणा एकस्याकारस्यानेका- कारतासंपादकतया वर्णसमाम्नायोल्पत्तिहेतवो भवन्ति । ताने- वैतान् पञ्चगुणानुपदर्शयितुमेतं वर्णसमाम्नाय प्रक्रमस्थानतः, कालतः, करणप्रयत्नतः अनुप्रदानप्रयत्नतश्च व्याख्यास्याम ।। तत्रादौ प्रक्रमस्थानतो वर्गामेदः प्रदर्श्यते ॥ चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्रह्मरगा ये मनीषिरण । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गायन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति।१।१६४१४५ इति भगवान् बेदमहर्षिः प्राह । तथाहि-प्रारणवायुर्वाग्भावाय प्रक्रममारणश्चत्वारि प्रक्रमपदान्यपेक्षते । नाभिस्, उर , शिरः,प्रास्यंचे ति। नाभिहिं प्राणवायोः प्रथमं पदम् । ततः प्रक्रम्य स उरसि, कण्ठे, शिरसि वा प्रत्याहन्यमानः प्रथमं प्रक्रम समाप्नोति । उरसि कण्ठे वा प्रथमप्रक्रम- पूर्ती ततः प्रक्रम्य शिरसि प्रत्याहन्यमानो द्वितीयं समाप्नोति । शिर. पदात्प्रक्रम्य स मुखे स्थानेष्वाहन्यमानस्तृतीय समाप्नोति । प्रास्यपदात् पुनश्चतुर्थे प्रक्रमे वर्णभावेन परिणममानो मुखान्निःसरति ।। तथा चाह भगवान् पाणिनि.- आत्मा बुद्धया समादि मनो युड ते विवक्षया । कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥१॥ मनः ३८ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता सारतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् । कण्ठे तु मध्यमं शोणि तारं जनयति स्वरम् ॥२॥ सोदीयों मूभिहितो वक्त्रमापद्य मारुत.। वर्णान् जनयते तेषां विभाग पञ्चधा स्मृतः ॥३॥ कालत: स्थानात् प्रयत्नानुप्रदानतः । वर्गविदः प्रानिपुरणं तं निबोधत ॥४॥(इति) स्वरतः इति तत्र नाभ्युर.शिरांसि त्रीणि पदानि गुहायां निहितानि नाद्धा प्रतीयन्ते । मुखं तु वर्णानामुच्चारणायोपयुक्त भाति । (१) नाभौ प्राणस्य वायुभावः । (२) उरसि वायोः स्वरभाव. । (३) शिरसि स्वरस्य ध्वनिभावः । (४) अथ मुखे ध्वनेर्वर्णभाव. । तेनादित- स्त्रिषु पदेषु वाच प्राग्रूपस्य प्राणवायोर्नास्ति वर्णत्वेनाभिव्यक्तिः। तुरीये त्वेव पदे वाचोऽद्धाभिव्यक्तिरिति प्रतीतिगम्योऽर्थः श्रु त्याभिधीयते। प्रथमं प्रक्रमसस्थानानामुरः, कण्ठः, शिर इत्येवं त्रैविध्यमाख्यातम् । तच्चेद बलतारतम्यादुपपद्यते । उच्चिचारयिषया 'प्रयुक्त प्राणवायुः कनीयसा बलेन प्रक्रममाण सन्नुर सि, सप्रतिवलेन कण्ठे, भूयसा तु बलेन शिरसि पतन प्रक्रम समाप्नोति । तेन यत्र शिरस्येवास्य प्रथमप्रक्रमपूर्ति- स्तत्र त्रीण्येव प्रक्रमपदान्युपपद्यन्ते-इत्यन्यत् । आस्याद् बाह्याना- ममीषा प्रक्रमस्थानाना सवनत्वमाह नारदः उर कण्ठः शिरश्चैव स्थानानि त्रीणि वाङमये ॥ सवनान्याहुरेतानि साग्नि चाप्यधरोत्तरे ॥१॥इति एभिरेव त्रिभिः सवनैस्त्रस्वर्यमुपपद्यते। तथाहि-नाभेरभ्युत्थितो वायुः करणभूतो यधुरःस्थाने निपत्योत्पतितः क्रमेण मुखमागत्य वर्ण- भावे परिणमते तर्हि तस्यैष प्रक्रमः प्रातः सवनम् । तत्रैष मन्द्र. स्वरः सपद्यते । स औरस्योऽनुदात्त. ॥१॥ यदि तु कण्ठे निपत्योत्पतितो मुख- मागत. स्यात् तहि मध्यन्दिनसवनम् । स मध्यम स्वरः। स कर्णमूलीयः स्वरित. ॥२॥ यदि वा शिरोऽन्त - एवास्य प्रथमः प्रक्रम स्यात् पथ्यास्वस्तिः [ ३६ तहि तृतीयसवनम् ।।३॥ स तारस्वरः । स शोर्षण्युदात्त । प्रातर्मन्द्रया वाचा प्रक्रमेत, मन्ध्यन्दिने मध्यमया । तृतीयसवने तारयेत्याह भगवान- तरेयः। यदा वा एष प्रातरुदेति-अथ मन्द्र तपति । तस्मान्मन्द्रया वाचा प्रातः सवने शंसेत् ॥१॥ अथ यदाऽभ्येति-अथ बलीयस्तपति । तस्माद् बलीयस्या वाचा मध्यन्दिने शंसेत् ॥२॥ अथ यदाऽमितरामेति-अथ बलिष्ठतमं तपति । तस्माद् बलिष्ठतमया वाचा तृतीयसवने शंसेत् ॥३॥ यदि वाच ईशीत। वाग्घि शस्त्रम् । यया तु वाचोत्तरोत्तरिण्यो- त्सहेत-समापनाय, तया प्रपद्येत। एतत् सुशस्ततममिव भवति ॥ इति (ऐ.बा. १४. प्र. ४४ कं.) पाणिनिरप्याह- प्रातः पठेन्नित्यमुरस्थितेन स्वरेण शार्दूलरुतोपमेन ।। मध्यन्दिने कण्ठगतेन चैवं चक्राह्वसकूजितसंनिभेन ॥१॥ तारं तु विद्यात् सवनं तृतीयं शिरोगत तच्च सदा प्रयोज्यम् ।। मयूरहंसान्यभृतस्वराणां तुल्येन नादेन शिर:स्थितेन ॥२॥(इति) विरुद्धसवनेनोच्चारयितरणामनुदात्तप्रायतायामुर क्षताच्छोरिणतोद्गारः स्वरितप्रायतायां स्वरभङ्गः, उदात्तप्रायतायां तु मूपित्तिः । अथ यथासवनं यथापदं च सर्वस्वरोच्चावचभावक्रमेणोच्चारण- प्रक्रमे तदुच्चारणसौष्ठवं प्रतिभाति । प्रक्रमभेदात् त्रिस्वरभेद. । त्रिस्वरभेदाच्चायमकारोऽन्ये च स्वरास्त्रेधा भिद्यन्ते । उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रयः । इति । परे तु प्रचयमप्यधिकमिच्छन्ति- ४० ] पथ्यास्वस्तिः "अनुदात्तो हृदि ज्ञेयो मूर्ध न्युदात्त उदाहृतः ।। स्वरितः कर्णमूलीयः सर्वास्ये प्रचयः स्मृतः॥१॥ उदात्तं प्रदेशिनी विद्यात् प्रचयं मध्यतोऽङ्ग लिम् ॥ कनिष्ठां निहतं विद्यात् स्वरितं चाप्यनामिकाम् ॥२॥ (इति पाणिन्युक्त:) उदात्तमाख्याति वृषोऽङगुलीनां प्रदेशिनीमूलनिविष्टमूर्धा । उपान्त्यमध्ये स्वरित धृतं च कनिष्ठिकायामनुदात्तमेव ॥१॥ इत्यत्र प्रचयानुल्ले खे ऽपि वाक्यान्तरतो मध्यमायां तनिर्देशलाभात् ।। (२) उच्चस्तरां वा वषट्कार इत्यादिषूपदिष्टोऽयमुदात्ततरोप्यन्यः स्वर । एव (३) सन्नतरोऽप्यन्यः स्वर । उदात्ततरवदनुदात्ततरस्या- पीष्टत्वात् ॥ अत एवाह भगवान्नारद उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितप्रचिते तथा । निघातश्चेति विज्ञेयः स्वरभेदस्तु पञ्चधा ॥१॥इति एकश्रुतिश्चान्य. स्वर । "एकश्रुति दूरात संबुद्धौ" "यज्ञकर्मण्यजपं न्यूंङ खसामसु" इत्यादिषु त्रैस्वपिवादेनकश्रुतेविधानात् । वस्तुतस्तु नैते स्वरा- स्त्रस्वर्याद्भिद्यन्ते। तथाहि-उदात्तस्यैव तारतम्येनोच्चारणात् त्रै- विध्यमुपपद्यते । उदात्ततरमुदात्त प्रचित चेति । तेन स्वरसूक्ष्मत्व- प्रदर्शनानुरोधात् त्रैविध्योपपत्तावपि-उदात्ततरप्रचितयोरुदात्तत्वं नोप- हन्यते । तथा चाह भगवान्नारदः- य एवोदात्त इत्युक्तः स एव स्वरितात् परः॥ प्रचय. प्रोच्यते तज्जैनचानान्यत् स्वरान्तरम् ॥१॥ । -

पच्यास्वस्तिः
[ ४१
उदात्तस्वरितयोर्मध्यवर्तितया प्रचितस्य यथोदात्तत्वं केचिदिच्छन्ति ।
तथैवान्ये प्रचितस्य तस्य स्वरितेऽन्तर्भाव मन्यन्ते ।
यथोक्त याज्ञवल्क्य न-
उच्चानुदात्तयोर्योगे स्वरितः स्वर उच्यते ।
ऐक्यं तत्प्रचय. प्रोक्तः सन्धिरेषां मिथोऽद्भुतः ॥ इति ।
एकश्रुतिस्तु स्वर्यव्यवस्थापवादो न स्वपिवाद । स्व-प-
वादे नैकस्याप्यक्षरस्योच्चारयितुमशक्यत्वात् । तस्मात् त्रय एव स्वराः
प्रतिपत्तव्या ॥ ये तु साममन्त्रे सप्तस्वरा आख्यायन्ते-षड्ज. ऋषभः
गान्धार. मध्यम पञ्चम धैवत निषाद. इति । तेऽपि न त्रैस्वा-
दतिरिच्यन्ते ।
उदात्ते निषादगान्धारावनुदात्त ऋषभधैवतौ ।
स्वरितप्रमवा ह्यते षड्जमध्यमपञ्चमाः ॥१॥
इति पारिगन्यादिभित्र स्वयें तदन्तर्भावोक्तः।
गान्धर्ववेदे ये प्रोक्ताः सप्त षड्जादय. स्वराः।
त एव वेदे विज्ञेयास्त्रय उच्चादयः स्वराः ॥१॥
उच्चौ निषादगान्धारौ नीचावृषभधैवतौ ।
शेषास्तु स्वरिता ज्ञेयाः षड्जमध्यमपञ्चमा: ॥२॥
इति याज्ञवल्क्यादिभिरभेदाभ्युपगमाच्च । वस्तुतस्तदात्तादयः
प्रक्रमोच्चत्वनीचत्वादिनिबन्धना भेदा इष्यन्ते । षड्जादयस्तु स्वरा
ध्वनिरागभेदनिबन्धना इति भेदः । तथा चाह नारद:-
षड्नं वदति मयूरो गावो रम्भन्ति चर्षभम् ।
प्रजाविके तु गान्धारं क्रौञ्चो वदति मध्यमम् ॥१॥

४२ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता पुष्पसाधारणे काले कोकिला वक्ति पञ्चमम् । अश्वस्तु धैवत वक्ति निषाद वक्ति कुञ्जर ॥२॥ एषामुच्चारणोपयुक्तस्थानानि नारदशिक्षाया विशिष्य द्रष्टव्यानि । एषा च सप्तस्वरभेदाना गानोपयोगित्वात् साधारणोच्चारणे विशेपतो- ऽनुपयोगादिह परित्याग. । सर्वसाधारण्येन तु त्रय एव स्वराः सिद्धास्तेपां त्रयाणां लिपिभेदाभावेऽपि अनुदात्तस्याधस्तात्तिरश्चीनरेखया (अ) स्वरितस्योपरिष्टात्तिरश्चीनरेखया (अ) उदात्तस्योपरिष्टाद्दण्डरेखया (अं) प्रचयस्य तु स्वरितोदात्तयोगरेखया (अ) लिप्यनुगम. क्रियते, तदित्थं स्वराणा त्रैविध्यमनुभवगम्य वायुप्रक्रमभेदादुन्न यम् ॥२॥ प्र al स्व प्र. अ अ प्र अ इति द्वितीयः खण्ड. ॥२॥ मुख्यस्थानतो वर्गभेदः ॥२॥ 'संयोगविभागशब्देभ्य शब्दः" - इति भगवान् कणाद प्राह । तत्र सयोगे यः स्थायीभाव स प्रतियोगी तत्स्थानम् । य संचारीभावः सोऽनुयोगी तत्करणम् । ते च स्थानकरणे द्विविधे वाह्य आभ्यन्तरे च । वायो. प्रक्रमे मुखागमनात् प्राग्भाविनी बाह्य। मुखप्रदेशान्तर्गते त्वाभ्यन्तरे । तत्र बाह्य स्थानमुर कण्ठः शिर इति त्रिविधं व्याख्यातम् । अथ मुखे कण्ठतालुमूर्द्धदन्तोष्ठभेदात्पञ्च स्थानानि । कण्ठो जिह्वा- मूलम् । मुखे दन्तोलूखलस्थानादभ्यन्तरतो दिशि योऽवनतो भागस्तस्य पूर्वपार्य तालुमूलस्थानम् । तस्यैव पश्चिमपाच तालुन एव मूर्द्धस्थानम् । ततोऽत्यासन्नः पश्चिमो भागो दन्तमूलस्थानम् । उत्तरोष्ठमोष्ठस्थानम्। एष्वेव पञ्चसु स्थानेषु क्रमेण जिह्वासम्बन्धिनां मूलमध्योपाग्राग्रभागाना- मधरोष्ठसहितानां करणाख्यानां संयोगतारतम्यात् सर्वे वर्णा उत्पद्यन्ते ।

पथ्यास्वस्तिः [ ४५ ' सक्षेपतस्तु पञ्चस्थानानोत्येनं विवक्षानुरोधान्यूनाधिकोपदेशानामवि- रोधो द्रष्टव्य । नासिकायाश्चेतरैः पञ्चभि. स्थानरविरोधान्मुखना- सिकाभ्यामुच्चरिताः पश्चान्ये स्वरा उपपदयन्ते अँ...ऋ.ल्उँ इति । त इमेऽनुनासिकाः पञ्च स्वरा.। ऋकारे लुकारे च स्वरभक्त - र्नासिक्यतयाऽनुनासिकत्वम् ।।*।। ॥ इति तृतीयः खण्डः ।। कालतो वर्णभेदः ॥३॥ अकारोच्चारणकालो मात्रा । "निमेषकालो मात्रा स्याद्" इत्यौदवजिः। "निमेषकालो मात्रा स्याद् विद्युत्कालेति चापरे"। इति नारद । तस्यास्तारतम्यादितरेषा वर्णाना मात्रा नियम्यन्ते । अकारोऽयमकारेण सन्धोयमानः परतो योगाद् द्विमात्रो दीर्घा भवति । अकारोऽयमाकारेण सम्धीयमान स्वभावाभिनिहितो भवति। अन्त- विलीयमानमभिनिधानं नाभिद्वयैकत्वम् । अधिकबले स्वल्पबलस्य विलयनं निसर्गः । तेनैतस्मिन्नाकारे द्विमात्रे- कारस्य प्रत्यस्तमितत्वाद् द्विमात्रमेवावतिष्ठते न त्रिमात्रत्वम् । आकारो यदयकारेण सन्धीयते आकारेण वा तत्रापि नाभिद्वययोगा- दभिनिहितत्वमिति द्विमात्रत्वमेव, न त्रिमात्रत्वं चतुर्मात्रत्वं वा। परतो योगमन्तरेण चतुर्मात्रत्वासम्भवात् । प्रयत्नविशेषेण परतो योगा- पेक्षाया तु त्रिमात्रत्वं चतुर्मात्रत्वं वा सम्भाव्यते तस्य प्लुतसंज्ञा । तथा मात्रातारतम्यादकारस्य भाव्यमुपपद्यते । अकारः स्वमात्रयो- चारितो ह्रस्वः । द्विगुणमात्रया दीर्घः । त्रिगुणमात्रया तदधिकमात्रया वा वितानितः स प्लुतः-इति मात्रात्रैविध्यम् । च ४४ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता सर्वमुखानुगता नासानाडो तु नासिका स्थानमिति । एवं दशस्थानानि वर्णानामाभ्यन्तराणि मन्यन्ते ।। २ ३ २३४ - ३ | मुखस्याद्ये भागे-उरोमूलम् जिह्वामूलम् कर्णमूलम् स्थानानि१ कण्ठः ३ | मुखस्य मध्ये भागे-तालुमूलम् मूर्दा दन्तमूलम् तालु.मू द. ३ | मुखस्यान्त्येभागे-सृक्का प्रोष्टम् ओष्ठम्।। १ मुखस्य सर्वेषु भागेषु-नासिका नासिका नासिका उपध्मा एषु सृक्कोपध्मयोरोष्ठोपपदयोरोष्ठ नैवोपसंग्रहं पश्यन् भगवान पाणिनिस्त्वाह- अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा । जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकौष्ठौ च तालु च ॥१॥ इति । तत्र निरुक्त भ्य. कण्ठतालुशिरोदन्तोष्ठस्थानेभ्यस्त्रीण्य तिरिच्यन्ते, उरो जिह्वामूलं नासिका चेति । तत्र- हकारं पञ्चमैर्युक्तमन्तस्थाभिश्च संयुतम् । औरस्यं तं विजानीयात् कण्ठ्यमाहुरसंयुतम् ॥१॥ इत्युक्तरीत्या-ल्ह्नम.ह्य ह ह ह्वषु हकारस्योरस्थानम् । "क"ख इति ककारात् खकाराद्वा प्रागुच्चरितस्यार्द्धविसर्गसशस्य हकारस्य जिह्वामूलं स्थानम् । ते उभे अधरोत्तरे कण्ठस्योपपदे भवतः। तथा चैकस्यैव कण्ठस्यावान्तरप्रदेशभेदविवक्षया कृकाटिकामूल-जिह्वामूल- कर्णमूलभेदैस्त्रविध्येनोपपत्तिरिति कण्ठेनैव तयोरप्युपसंग्रहणात् पञ्च व स्थानानि निष्कृष्यन्ते। नासिकाया अपि कण्ठेन तालुमूर्द्धदन्तरोष्ठन च सहोपेतत्वात् पञ्चानामपि मुखस्थानानामुपपदतया पश्चस्वेव तेषु स्थानेष्वन्तर्भावोपगमात् । तथाचेत्थं पृथक्त्वेनोपगमे दश स्थानानि, पथ्यास्वस्तिः [ ४५ संक्षेपतस्तु पञ्चस्थानानोत्येत्र विवक्षानुरोधानन्यूनाधिकोपदेशानामवि- रोघो द्रष्टव्य । नासिकायाश्चेतरः पञ्चभि. स्थानरविरोधान्मुखना- सिकाभ्यामुच्चरिताः पञ्चान्ये स्वरा उपपदयन्ते अँ...ऋ.तृ.उँ इति । त इमेऽनुनासिकाः पञ्च स्वरा.। ऋकारे लकारे च स्वरभक्त - सिक्यतयाऽनुनासिकत्वम् ।।४।। ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ कालतो वर्गामेदः ॥३॥ अकारोच्चारणकालो मात्रा । "निमेषकालो मात्रा स्याद" इत्यौदवजिः। "निमेषकालो मात्रा स्याद् विद्युत्कालेति चापरे" । इति नारद. । तस्यास्तारतम्यादितरेषा वर्णाना मात्रा नियम्यन्ते । अकारोऽयमकारेण सन्धोयमानः परतो योगाद् द्विमात्रो दी? भवति । अकारोऽयमाकारेण साधीयमान स्वभावादभिनिहितो भवति। अन्त- विलीयमानमभिनिधानं नाभिद्वयैकत्वम् । अधिकवले स्वल्पबलस्य विलयनं निसर्गः । तेनैतस्मिन्नाकारे द्विमात्रे- ऽकारस्य प्रत्यस्तमितत्वाद् द्विमात्रमेवावतिष्ठते न त्रिमात्रत्वम् । आकारो यदयकारेण सन्धीयते आकारेण वा तत्रापि नाभिद्वययोगा- दभिनिहितत्वमिति द्विमात्रत्वमेव, न त्रिमात्रत्वं चतुर्मात्रत्व वा। परतो योगमन्तरेण चतुर्मात्रत्वासम्भवात् । प्रयत्नविशेषेण परतो योगा- पेक्षायां तु त्रिमात्रत्वं चतुर्मात्रत्वं वा सम्भाव्यते तस्य प्लुतसंज्ञा । तथा मात्रातारतम्यादकारस्य त्रैभाव्यमुपपद्यते । अकारः स्वमात्रयो- चारितो ह्रस्वः । द्विगुणमात्रया दीर्घः। त्रिगुणमात्रया तदधिकमात्रया वा वितानितः स प्लुत.-इति मात्रात्रविष्यम् । च ४६ ] मधुसूदनशर्मप्ररणीता एवमिकारादीनामपि स्वराणां मात्राभेदात् त्रैविध्यमुन्नेयम् । लकारस्य तु दीर्घभावो नास्तीति तस्य दीर्घा उदात्तस्वरितानुदात्ता हीयन्ते । तदित्थं प्रक्रमभेदात् स्थानभेदान्मात्राभेदाच्चायमकारो द्वाचत्वारिशद्विधो विशुद्ध सम्पद्यते । तावानेव (४२) चानुनासिक इति चतुरगीतिभेदाः स्युः । ६४॥ ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥४ । 15 य र. प्राभ्यन्तरप्रयत्नतो वामेद. ॥४॥ मुखाभ्यन्तरतः पञ्चसु कण्ठतालुमूर्द्धदन्तोष्ठस्थानेषु सयोगाय करणानां यः प्रयत्नः स आभ्यन्तरप्रयत्नः । स द्विविध. स्पृष्टो विवृतश्च । येन स्थानेषु करणानां स्पर्शतारतम्य घटते स स्पृष्ट. । (१) अ. इ. ऋ. तृ उ -इत्यस्पृष्टा. स्वराः । (२) ल. व.-इतीपत्स्पृष्टा अन्त स्था । (३) अ. य ड ळ व-इति दु.स्पृष्टा अन्तस्थाः । (४) ड. द. ब.-इति मृदुस्पृष्टा. स्पर्शा । अथ विवरणं सप्रसारणम् । येन स्थानेषु संयोगकाले करणानि तारतम्याद्विवियन्ते स विवृतः स्पर्शप्रतिद्वन्द्वी धर्मः तेन विवृतप्रयत्ने स्पर्शाभावः । अतएव-अ, इ, ऋ, टु, उ- इति पूर्णविवृताः स्वरा. । अथ यावदेव स्पर्शाय प्रयत्नः क्रियते तावदेवाय विवृतः प्रयत्नोऽप चीयते । स्पर्शतारतम्याद्विवृततारतम्य घटते इति वोध्यम् । ग. ज. 1 अथ सम्प्रसारितस्थानकरणानामेषामेकैकस्य यावती मात्रा भवति सा तत्रार्धेनापचीयते । यत्र विवृतार्द्धप्रयत्नेनैषामाकुञ्चन क्रियते तेनाद्ध- मात्रिकाणि व्यञ्जनानि जायन्ते, पथ्यास्वस्तिः [ ४७ तत्राऽय यथा-15 य. र. ल. व. इत्यर्द्धविवृता अन्तस्थाः । प्रथमो वर्णो विवृतिः । सोऽर्द्ध मात्रो वर्ण । अभिनिधान सन्ध्यक्षराण्यु- प्मान्तस्थगतिश्च तस्य स्थानम् । हरेऽव, विष्णोऽवेत्यभिनिधानस्थानम् । ए. ओ इति सन्ध्यक्षरस्थानम् । इकाराकारयोः सन्धौ यथाऽयमिकारः परयाऽर्द्ध मात्रया विहीयते । तेनार्द्धमात्राऽवशेषाद् यकारो व्यञ्जन भवति तथैवाकारेकारयोः सन्धौ पूर्वोऽयमकार. परयार्द्धमात्रया विहीयते । तेनाद्ध मात्रोऽकारोऽवशिष्यते ॥ उक्तश्च पाणिनिना- "अर्द्ध मात्रा तु कण्ठ्यस्य एकारौकारयोर्भवेद्"। इति तस्यार्द्ध मात्रत्वाद् व्यञ्जनत्वम् । पूर्णस्पृष्टत्वाभावात् स्व- रत्वम् । तथा चोभयधर्मयोगादन्त स्थत्वमुपपद्यते ॥२॥ अथ तृतीयं स्थानमुष्मान्तःस्थगतिः । तद्यथा--सद्य इह, हर इह, विष्ण इहेति । सद्य इहेत्यत्रोष्मा हकारो विसर्गो वा विवृत्यकारोऽर्द्ध मात्रो जायते । प्रोभावश्च विवृतिश्च शषसा रेफ एव च ॥ जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोमरणः ॥१॥ इति पाणिनिस्मरणात् । तस्य व्यञ्जनत्वात् तेन विच्छेदात् स्वरसन्धिनास्ति । एवं हर इहेत्यादावन्तस्थो विवृतिमापद्यते । तस्य स्वरद्वयमध्यस्थो विच्छेद एव रूपम् । शाकल्यस्तु यवयोस्तत्र लोपं मन्यते, तदसत् । वर्णलोपे स्वरसन्धेरनिवार्यत्वापत्ते. । वैयाकरणोप- कल्पितं पूर्वत्रासिद्धः सन्ध्यभाववचनन्तु वालगिक्षौपयिक कल्पना- मात्रम् । शास्त्रीयप्रक्रियाविशेषस्य शब्दोच्चारणविशेषाधाने सामर्थ्या- लाभात् । शास्त्रस्य शब्दस्थितिज्ञापकत्वमुपपदयते न तु तजनकत्वम् । अत एव लोपप्रक्रियायामसन्तुष्यन् पाणिनिः लोप. शाकल्यस्येत्याह । तथा च पाणिनिमते विवृतिवर्णादेशो यवयोः स्थाने भवतीति तद्विच्छेदान् सन्ध्यभाव. स्वरसतोऽवकल्प्यते इति बोध्यम् ।

४८ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता एषु प्रथमो एषामन्तःस्थानां मुखनासिकाभ्यामुच्चारणे ये व लाँ अनुनासिकाः स्युः । रेफस्तु नासिक्यो नास्ति । विवृतिश्च नासिक्या न दृश्यते । अ य. ड. ळ. व.-इतीषद्विवृता अन्तस्थाः । वर्ण. सवृतोऽकारः। ऐ औ इत्यनयोर्योऽयमकारोबारणाभासः सोऽयं सवृतोऽकार । "श्रर्द्ध मात्रा तु कण्ठ्यस्य एकारौकारयोर्भवेत् । ऐकारौकारयोर्मात्रा तयोविवृतसंवृतम् ॥१॥ सवृतं मात्रिक ज्ञेयं विवृतं तु द्विमात्रिकम्"। इति पाणिनिस्मरणात् । यत्तु स्वराणामूष्मणां चैव विवृतं करणं स्मृतम् । तेभ्योऽपि विवृतावेडी ताभ्यामचौ तथैव च ॥१॥ इत्येवमेकारीकारयोविवृततरत्वम् । ऐकारौकारयोस्तु विवृततमत्व- मुपदिश्यते तत् सन्ध्यक्षरापेक्षम् । सवृतत्वाख्यान तु तत्प्रदेशापेक्षमित्य- विरोधः। संवृतान्तःस्थाकारगर्भिणां सन्ध्यक्षराणां स्वरत्व व्याहन्यते इति तु न भ्रमितव्यम् । विवृततरत्वविवृततमत्वाभ्या स्वरत्वोपगमस्या- बक्लप्तत्वात् । म्लेच्छभाषा लिपिविशेषेऽपीदमकार विध्य दृश्यते । यथा- पारस्यलिपी विवृताकारमलिपि (1) शब्देन, सवृताकारन्तु "अयन्" (६) शब्देनोल्लिखन्ति । "अ"-इति सूत्रयन् भगवान् पाणिनिश्चेदं द्वविध्यमुपदिशति । तत्र संवृताकारस्यान्त.स्थत्व प्रतिपत्तव्यम् । स्वराणामूष्मणां चैव विवृतं करणं स्मृतम् ।। इत्येवं स्वराणां विवृतत्वेनोपदिष्टत्वात् । ऐ औ इत्यादौ पृथगिवा- कारोच्चारणप्रतिबधार्थं तदुच्चारणे प्रयत्नविशेषस्यापेक्षणाच्चैतस्य दु.स्पृ- ष्टर विद्यात् । ईषत्स्पृष्टपूर्णस्पृष्टयोरन्तरतो मध्यमवृत्त्या स्पर्शसिद्ध्यर्थ प्रयत्नविशेषस्य तत्रापेक्षितत्वादिति बोध्यम् । .

पथ्यास्वस्तिः [ ४६ ग. ज. ड. द. ब-इत्यविवृताः स्पर्शा. । यदि त्वेते पञ्चस्पर्शा मुखनासिकाभ्यामुच्यन्ते तहि स्थानद्वययोगिनस्ते ड न. रण. न म. इत्येवं रूपाणि लभन्ते । शुद्धवन्नासिक्या अप्येते पूर्णस्पृष्टा अविवृता एव स्युः ॥*॥ इति पञ्चमः खण्डः ॥५॥ || बाह्यप्रयत्नतो वर्गभेदः ॥ वर्णोपादानभूतो वायुर्वर्णभावात् प्रागवस्थोऽनुप्रदानं नाम । मुखा- यतनाद् बहिर्भूतेषु उर कण्ठशिरःस्थानेषु सयोगायानुप्रदानानां यः प्रयत्नः सोऽनुप्रदानप्रयत्नो बाह्य प्रयत्नः । स द्विविध. • सवारो नादो घोष इत्येवं विधाकृत. प्रथम । विवारः श्वासोऽघोष इत्येव त्रिधाकृतो द्वितीय । यत्रोच्चारणेऽनुप्रदानं मृदुविग्रहत्वात् कण्ठनली न विवृणुते स संवारः । खरविग्रहत्वात् तां विवृणुते चेत् स विवारः ।। अथ यत्र वर्णस्वरूपारम्भायानुप्रदाने वायोभूयसी मात्रा सनिधत्ते कनीयसी तु प्राणस्य तेजमः स श्वासः। प्राणस्यैव तेजसो भूयसी मात्रा कनीयसो चेद् वायो. स नाद: । यस्मिन् प्रयत्ने दृढाङ्गबन्धादुच्चरितस्य वर्णस्य प्रतिध्वनियोग्यता कनीयसी संपद्यते सोऽघोषः। श्लथाङ्गबन्धात् तद्योग्यताभूयस्त्वे तु यथा सवारनादघोषाणामन्योन्यानुग्राहित्वादबिनाभूतत्व तथा विवारश्वासाघोषाणा चेति सत्यपि षट्त्वेऽनुप्रदानप्रयत्नद्व विध्य- मिष्यते । तथा च सवारनादघोषाऽनुप्रदानतया ये पूर्वे अ य र ल वा. अ य 3ळ वाः ग ज ड द बाः ङ य ग न माश्च क्रमेण ससिद्धा । त एव च विवारश्वासाधोषानुप्रदानताया के च ट त पा इति जायन्ते । विवारश्वासाघोषाणां नासानाडीप्रतिपन्थितया कचादीना नासिक्यत्वं नास्ति । तेनैतेषां ड ज ण न मानामपि श्वासानुप्रदा- नत्वेनोच्चारणे विशुद्धा एव क च ट त पा उच्चार्यन्ते नानुनासिकाः । घोषः ।

५० ] मधुसूदनशर्मप्रणीता इत्येव ब्रुवन् कचट त पा नादस्य ईषन्नादा यण जशो नादिनो हझषः स्मृताः ।। ईषच्छवासांश्चरो विद्याच्छ्वासिनस्तु खफादय ॥१॥ पाणिनिरन्त.स्थाना गजडदबाना चेषन्नादत्वं ना त्वीषच्छ्वासत्वमाचष्टे तत्तु सोष्मवर्णापेक्षया न्यूनत्वाभिप्रायं द्रष्टव्यम् । ग ज ड द बापेक्षया घ झ ढ ध भ हेष्वधिक- तथा क च ट त पापेक्षया ख छ ठ थ फ श ष सेष्वधिक- श्वासस्यानुभवसिद्धत्वात् ॥ अथैते पूर्णस्पृष्टाः क च ट त पा यद्याभ्यन्तरप्रयत्नभेदान्न मस्पृष्टाः कृत्वोच्चायन्ते तर्हि श ष स हा इति ऊष्माणो जायन्ते । क पयोर्नेमस्पृष्टतयोच्चारणे निविशेष हकारोदयाच्चत्वार एवो- ष्माणो निष्पद्यन्ते । शषसहा नासिक्या न सन्ति । विवारश्वासाघोषाणों नासानाडोप्रतिपन्थित्वात् । “अमोऽनुनासिका न ह्रौ"-इति पाणिन्यु- नादिनो रेफहकारयोः श्वासिना च सर्वेषामनुनासिकत्व- प्रत्याख्यानाच्च । तदित्थ प्रयत्नद्वयभेदाच्चतुस्त्रिंशद्वर्णा निष्पद्यन्ते । तत्रादितः पञ्च स्वरा. एकोनत्रिशद् व्यञ्जनानि ॥*।। क्त्या इति षष्ठः खण्डः ॥६॥ तालव्या ॥ अथ सन्ध्यवराणां स्थानप्रयत्नाः ॥ यौगिकेषु तु वर्णेषु सवर्णद्वययोगे स्थानभेदो नास्ति । तेन ह्रस्वदीर्घ- प्लुतानामविशेषात् सस्थानत्वम् ॥ अ आ अ ३ कण्ठ्याः। इ ई इ ३ इत्यदि । विभिन्नस्थानिनोस्तु संहितायां सन्ध्यक्षरस्य द्विस्थानत्वमनुभूयते ॥ आह च तथा- "ए ऐ तु कण्ठतालव्यावो ौ कण्ठोष्ठजो स्मृतौ" ॥इति हकारस्तूष्मा द्वेधा संयुज्यते- पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्च । पञ्चमान्त.स्थानां प्रत्ययत्वे पुरस्तात् सयुक्तो हकारो निगीणों भवतीत्युर. तत्र- पथ्यास्वस्तिः [ ५१ इति । स्थानं भजते । हृ. ह्न म. ह्य ह ह ह्व। इति ॥ कखयो. प्रत्ययत्वे हकारस्य जिह्वामूलं स्थानम् । पफयोः प्रत्ययत्वे हकारस्योपध्मान स्थानम्, इति गाकटायनो मन्यते । अथ क च ट त पेभ्यो ग ज ड द बेभ्यो ङन ण न मेभ्यो र ल ड़ ळे भ्यश्वोपरिष्टात् प्रयुक्तस्य हकारस्याश्रयस्थान- भाक्त्वं निष्पद्यते। तेन ख छ ठ थ फा क च ट त पै र्घ झ ढ ध भा ग ज ड द बै सस्थाना सिध्यन्ति । तथोक्तम्- "कण्ठ्यावहाविचुयशास्तालव्या प्रोष्ठजावुपू ।। स्युर्मूर्द्धन्या ऋटुरषा दन्त्या लुतुलसाः स्मृताः ॥१॥ जिह्वामूले तु कुः प्रोक्तो दन्त्योष्ठयो वः स्मृतो बुधः" इति।। ढस्य मूर्द्धा । ळ्हस्य दन्त । ङ ण न माना रलयोश्च सोष्मत्वं लोकभाषाया दृश्यते - साङ्हा, कान्हा, साह्मर, गेल्हा-इत्यादि । छन्दोभाषाया चैते प्रयुक्ता न दृश्यन्ते -इत्यतस्तानुपेक्ष्य कात्यायनः सोष्म- त्वेन दशवर्गानेवोपक्षिपति । " द्वितीयचतुर्था सोष्माण" हकारस्यार्द्धस्पृष्टत्वेऽपि आश्रयाणां कगादीना पूर्णस्पृष्टत्वात् सोष्मणा- मपि पूर्णस्पृष्टत्वमुन्नीयते ।। अचोऽस्पृष्टा यरणस्त्वीषन्न मस्पृष्टा शलः स्मृताः । शेषाः स्पृष्टा हलः प्रोक्ता निबोधानुप्रदानतः ॥"॥इति अनुप्रदाने त्वस्ति विशेषः । प्रथमास्तृतीयाश्वाल्पप्राणा:-क चट त पा, ग ज ड द बाश्चेति। द्वितीयचतुर्थास्तु महाप्राणा । ईषन्नादा यण जशो नादिनो हझषः स्मृता. ।। ईषच्छवामांश्वरो विद्याच्छवासिनस्तु खफादयः ॥१॥इत्युक्ते.॥ अस्य प्रकरणस्य लेखाचित्रद्वारा स्पष्टीकरणम्- परात्पर असङ्गः१ अध्ययः = अानन्द' २ अक्षर ब्रह्मा विज्ञानम् विष्णुः इन्द्रः प्राण अग्निः वाक् सोम. मनः

५२]
मधुसूबनशर्मप्रणीता
ससङ्ग ३ क्षर -प्राणः = आपः वाक् अन्नादः अन्नम्
प्रापः
वाक् अन्नाद अन्नम् प्राणः
वाक् -अन्नाद. अन्नम् प्राणः प्रापः
अन्नाद.3 अन्नम् प्रारण:
आपः वाक्
अन्नम्-प्राणः प्रापः वाक अन्नादः
= महावाक्यम् २ अक्षरम् -
वाक्यम्
इ
अक्षरम
ऋ
पदम्
ल
वर्णः
१ स्फोट:
३ वर्णः = अ
her
ग
क
य
य
ज
च
ड़
ड
ट
ल
द
त
व
ब
प
व
ईषत्स्पृष्ट
मृदुस्पृष्ट
खरस्पृष्ट
दुःस्पृष्ट
ख
घ
भ
छ
ज
ड
ग
ho to to a no
ध
थ
भ
म
सोष्ममृदुस्पृष्ट सोष्मखरस्पृष्ट नासिक्यस्पृष्ट अर्धपृष्ट
इति सप्तमः खण्डः ।
इतिमधुसूदन विद्यावाचस्पतिप्रणीते पथ्यास्वस्तिग्रन्थे गुरणपरिष्कार-
स्तृतीयः प्रपाठः समाप्तः ॥३॥

. पच्यास्वस्तिः [ ५३ II अथादरनिर्देशश्चतुर्थः प्रपाठः प्रारम्यते ॥ स्वरो वर्णोऽक्षरं मात्रा तत्प्रयोगोऽर्थ एव च ।। मन्त्रं जिज्ञासमानेन वेदितव्यं पदे पदे ॥१॥ वेदस्याऽध्ययनाद्धर्मः संप्रदानात् तथा श्रुतेः ।। वर्णशोऽक्षरशो ज्ञानाद् विभक्तिपदशोऽपि च ॥२॥ इति कात्यायनस्मरणाद् वर्णाक्षरज्ञानपूर्वकं वेदार्थजानं ब्राह्मणा- नामकारणं धर्म । तत्र वर्णजानं साधितम् । अक्षरज्ञान साधयि- तव्यमितीदं प्रकरणमारभ्यते ।। ब्रह्म जानानो ब्राह्मणो भवति । ब्रह्म च त्रेधा विवर्त्तमानमिदं विश्वं निष्पद्यते । परमक्षरं क्षर चेति । दिग्देशकालानवच्छिन्नमपि यत्- क्षराऽक्षरयोरालम्बनतया मनोवत् परिच्छिद्यमान भवति तन्मनोमय- मव्यय नाम रूप परम् । तच्चीयमान सन्मनश्च भवति प्राणश्च वाक् च । तत्रास्मिन् मनोमयेऽव्ययेऽवलम्बितं प्राणमयं भरसञ्चालक कूटस्थमक्षरम्। तदवलम्वितं वाडमयमशेषमिदं भूतजात भरम् । नैतेभ्योऽतिरिच्यते किञ्चित् । त्रयोऽप्येते पुरुषा एकः पुरुष. । स विशुद्ध आत्मा वा विग्रहवानात्मा वा, अनेक विग्रहवद्भिः कृत स्कन्धो वा, स पुरुष एवेद सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । स एकैकः पुरुषो मनोमयः प्राणमयो वाड मय.: प्रतिपद्यते । ता प्राप 1 सेयं पृथिव्यप्सु । "प्रथो वागेवेदं सर्व" मित्याह वेदपुरुष । वागाकागः । स वायु.। तत्तेजः । सा पृथिवी। प्रापस्तेजसि । तेजो वायौ । वायुराकाशे वाचि प्रतितिप्ठतीत्येव वाच एवैते विकारा वाचो न व्यतिरिच्यन्ते । तस्माद् वागेवेदं सर्व यदेतत् किञ्चित् क्वचिद् भूतजातमाकलयामः । अत एव च"वाचीमा विश्वा भुवनापिता"-इति च भगवान् वेदमहर्षिः प्राह। तानि ५४ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता त चैतानि सर्वाणि क्षराणि परतन्त्रत्वात् स्वत स्थातु न शक्नुवन्तीत्येतेपां सत्ताधायकमस्ति किश्चिदन्तरत. स्वतन्त्र तत्त्वमक्षर नाम । स प्राणः । तत्रानन्तगुणा उपपद्यन्न इति गुणभेदादनन्तविधानपि तान् प्राणान् स्थानपाश्चविध्यात् पश्चविधानाहुः । इमे पञ्चाक्षरा श्रूयन्ते ब्रह्म न्द्रविष्णवोऽग्निसोमी चेति । एभ्य एव तु पञ्चभ्योऽक्षरेभ्य सर्वाणि वाङमयान्येतानि क्षराणि भूतजातानि जायन्ते तदाधारण प्रतितिष्ठन्ति तत्रैव चान्ते विलीयन्ते। इति परब्रह्मविद्या भवति ॥१॥ तत्रेय वाक् त्रेधा विनियुज्यते-भूतभावेन,शब्दभावेनार्थभावेन चेति । वाच आकाशाद् वाय्वादिक्रमेणोत्पन्नानि भूतजातानि भूतमय प्रपञ्नः । स एको विनियोग ।। अथ "तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविगदि"ति नियमाद् वाय्वादिभूतेष्वनुप्रविष्टो वागाकाश एवाघातेन कम्पितः पृथग् भूत्वा वाय्वाधारेण वर्तुलवृत्त चतुर्दिक्षु वीचीतरङ्ग जनयति । स नादात्मना कम्पमानो धावन् श्रोत्रमागतः श्रोत्रेन्द्रियप्रजया समन्वयाच्छब्द- इत्युच्यते । स च शब्दमयप्रपञ्चार्थमयप्रपञ्चाभ्या ढधा विनियुज्यते । तदुक्त हरिणा- "अनादिनिधन ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत । इति।। उभयविधोऽयं वाडमयप्रपञ्च । स वाचोऽन्यो द्विविधो विनियोग । तत्रापि त एव प्रकारा अनुवर्तन्ते ये भूतमयप्रपञ्चे व्याख्याता । कनोयाश्चाय वाड्मयप्रपञ्चो भूतमयप्रपश्चात् । तस्य तदेकदेशत्वात् । तेन परब्रह्मविद्यामधिजिगासुरादौ शब्दब्रह मविद्या परिशीलयेत् । अल्पायासेनाधिगता हि सा शब्दविद्या महायाससाध्यायाः परविद्याया अधिगमायोपयुज्यते । तथा चाह भगवान् वेदपुरुषः । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शाब्दे ब्रह्मरिण निष्णात परं ब्रह्माधिगच्छति ॥१॥इति।। तत्र ब्रह मेति विज्ञानमाहुः । तद् द्विविधं शाब्द परं चेति । विज्ञानाभिनिवेशाभ्या ज्ञानसिद्धि भगवान् गौतमो मन्यते । शब्द- पथ्यास्वस्तिः [ ५५ श्रवणाधीनाऽर्थप्रतिपत्तिविज्ञान तच्छाब्द ब्रहम । अथ परीक्षाद्वारा साक्षाद्दर्शनाधीनाऽर्थप्रतिपत्तिः पर वह म । तत्र पूर्वेषां परीक्षकाणा द्रष्ट गामाप्तार्थविपयकोपदेशवाक्यार्थश्रवणे निष्णाता यदि परीक्षार्थ प्रवर्तेरन् तहि तेषामभिनिवेशज्ञान साधीय. स्यादित्ययमर्थ. प्रथम. । ६ अथवैतदन्यथा व्याख्यास्याम । शब्दस्तावत् प्रकारद्वयेन ज्ञान जनयति । अभिधानेन प्रतीकत्वेन चेति । ओशब्दवाच्य च ब्रह म । प्रोमिति शब्दश्च ब्रह्म । तथा च श्रूयते- "एतद्वै सत्यकामपरं चावरं च ब्रह्म यदोंकारः ॥इति॥ तत्रैतदभिधानपक्षणायमर्थो व्याख्यात । अथ खलु शब्दप्रतीकत्व- पक्षे गााप्यस्यार्थो द्रष्टव्य । द्व विद्य भवतः । परा चैवापरा च । परव्रह मविद्या परा। शब्दबह मविद्या स्वपरा, भूयसा साम्येनो- भयो प्रवृत्तिरिति शब्दसृष्टिज्ञानेन तत्सादृश्यवशादर्थसृष्टिज्ञान- मपि सिद्ध भवति इति पश्यन्ति । यथा च परविद्यायामव्ययमक्षरं क्षरमिति त्रिविधं प्राणब्रहम। एवमिहापरविद्यायामपि स्फोटो- ऽक्षर वर्ण इति विविध वागबह म । तत्र वर्णानामक्षराणां पदाना समस्तपदाना वाक्याना चैकत्वबुद्धिप्रयोजक स्फोटोऽव्ययमव्यय- रुषवदमीषामक्षरादीनामालम्बनं भवति, इत्यन्यत्र व्याख्यातम् । स्ते नित्यमन्वाभक्ता स्वरवर्णा पञ्चाक्षरशब्देन व्यपदिश्यन्ते- अ. इ उ. ऋ. तृ. इति । पञ्चभ्य एवैतेभ्योऽक्षरेभ्य क्षरा सर्वे व्यञ्जन- वर्णा उत्पद्यन्ते । अक्षरोपगृहीताः क्षरा अक्षरालम्बनेऽव्ययायतने प्रतितिष्ठन्ति । परतन्त्राणि क्षराणि व्यञ्जनान्यक्षर स्वरमालम्बन्ते । अक्षरं तन् स्वरजातमव्यये स्फोटेऽन्वाभक्त रूप धत्ते । त्रितयमिद- मेकीभूतमेका वाक् । - अथ वाक्य पदै पदमक्षरैरक्षरमपि क्षरवणेः कृतरूपं भवतीत्यत- इदमक्षरं वा पदं वा वाक्य वा सर्वापीय वाग्वर्णैरेवाडा कृतरूपाऽव- अक्षर तु वर्णानामात्मा भवतीति वर्णेभ्यो भिद्यते । धीयते ।

५६ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता अतएव-"स्वरो वर्णोऽक्षरं मात्रा विनियोगोऽर्थ एव च । मन्त्रं जिज्ञासमानेन वेदितव्यं पदे पदे पदे" इत्यादिवाक्ये वर्णाक्षरयोर्भेद स्मर्य्यते ।। यत्तु वर्णसमाम्नायोऽक्षरसमाम्नाय इत्यादावभेदेन व्यवहार- दर्शनाद् वर्ण एवाक्षरमिति बालका. पश्यन्ति तद् भ्रान्तम् । तयोरष्टधा प्रभेदोपलब्धेः । (१) वर्णाः क्षराः, अक्षराण्यक्षरा इति पुरुषतः ।। (२) वर्णाश्चतु षष्टि । अक्षरं तु गुरुलघुभेदाद् द्विविधमेवेति सख्यात । (३) एकबिन्दुर्वर्णः। नवबिन्दु त्वक्षरमिति योनित. ॥ (४) निर्व्यापारो वर्ण । पञ्चमबिन्दुस्थस्याक्षरस्य निर्व्यापरत्वे पृष्ठतो व्यापारत्वे वा लघुत्वम् । पुरतो व्यापारत्वे गुरुत्वमिति व्यापारत.।। (५) वर्णानामन्नत्वमक्षराणामन्नादत्वमिति । वीर्यंत. ॥ (६) अक्षरप्रतिष्ठया प्रतिष्ठिताः स्वतोऽप्रतिष्ठा एते वर्णाः स्वप्रतिष्ठानि त्वक्षरारिण-इति प्रतिष्ठात. ॥ (७) वर्णा अक्षरस्याङ्गानि । अक्षरं पुनरेषा वर्णानामङ्गीत्यात्मत ॥ (८) ओमिति त्रयो वर्णा एकमक्षर- मिति प्रतिपत्तिभेदतश्च । तदित्थमिदमर्थद्वयं सिद्धं भवति । वर्णेभ्योऽक्षरमन्योऽर्थ इत्येकम् ।। अर्थानां च शब्दाना च धातव्यसाम्यात् परब्रह मविद्या [-शब्दब्रह म. विद्ययोरन्योन्य सौसादृश्यमस्तीति द्वितोयम् ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥१॥ अक्षरस्य गुरुत्व-लघुत्वोपपत्यर्थ वर्णानामङ्गाङ्गिभावो व्याख्यायते । बृह- त्या वाच पतिः वृहस्पतिरित्यादी वाचो वृहतीत्व ब्रु वते। बृहती चेयमेन्द्र छन्दः । बृहतीसहस्रस्येन्द्रप्रियधामत्वेनैतरेयारण्यकश्रुतौ व्याख्यानात् । तस्मादियमंन्द्री वाग वृहती। वृहतीति नवभक्तिच्छन्दस. सजा । बृहतीत्व चोपदिश द्धिराचार्य्यरतस्याः स्वरवर्णात्मिकाया ऐन्द्रया वाचो नवभक्तिकत्वं विवध्यते । तथा चैतस्या वाचोनव बिन्दवो व्याप्तिस्थान- मित्येनावानय मक्षरस्फोटो द्रष्टव्यः । ३ पथ्यास्वस्तिः [ ५७ एकैकं व्यञ्जनमुच्चार्यमाण यावन्तं प्रदेशमवगाहते सोऽर्द्ध- मात्राकाल । तदुपलक्षणमयमेकैको विन्दुः। यद्यपि स्वर एवाक्षर- मुच्यते, स्वरश्च केवल द्वौ विन्दू अवगाहते न तु नव विन्दून् । स्वरस्यक- मात्रतया, द्वाभ्यामेव चार्धमात्रबिन्दुभ्यामेकमात्रत्वसम्पत्तेः। तथापि नवबिन्दुकमिदमायतन क्रान्तिस्थान भवति । एतावति प्रदेशेऽय स्वरो व्यञ्जनान्यात्मसात्कर्तु क्षमते । सव्यञ्जनोऽपि स्वरोऽक्षरं भवति । तथाचैवविधस्य क्षरस्याय नवविन्दुकः स्फोट आयतन विज्ञायते। तदव्ययम् । तस्य तत्राय २ 3 ४ अयमत्राभिसन्धिः। परब्रह्मणीवास्मिन् शब्दब्रह्मण्य प्यक्षरमात्मा उक्थाऽर्काऽशितिभेदात् त्रिभक्तिर्भवति । विन्दुद्वयावगाही स्वर आत्मा उक्थम्। तस्यैते सप्तविन्दवोऽर्कस्थानम् । उक्थादुत्थिता: प्राणा अर्काः। ते क्रान्तिमण्डले स्वे महिम्नि अशितिमाधातुमाक्रम- माणा: क्षरं व्यञ्जनमात्मसात्कुर्वन्ति। ततोऽरामुक्थ आत्मा क्रान्तिमण्ड- लाख्ये स्वे महिम्नि स्वेनार्केणाभिनिगृहीतान् व्यञ्जनवर्णानात्मन्विनः करोति। तेनैतस्य स्वरमात्रस्याऽक्षरत्वेऽपि तावता क्षराणा व्यञ्जना- नामक्षरसत्तयव सत्तावत्वात् तावद् व्यञ्जनविशिष्टस्यास्य स्वरस्या- क्षरत्वमुपपद्यते । यथा अ इत्येकमक्षरम् । एव य र्य त्र्य स्त्र्य, इत्येता- न्यप्येकैकान्यक्षराणि भवन्ति । तानि उपसर्गव्यञ्जनतारतम्येऽपि छन्दसि समान स्थानमवगाहन्ते । एवमुत्त रतोऽपि अ. अर्, अर्क . अर्ट, इत्येव चत्वार्यप्यक्षराणि उपधानव्यञ्जनतारतम्येऽपि छन्दसि समान स्थान भजन्ते । तत्र व्यञ्जनाऽभावे शुद्धस्यैव स्वरस्याक्षरत्वम् । पृष्ठत. पुरतो वा व्यञ्जनसत्वे तु तद्विगिष्टस्यैवाक्षरत्व न तु शुद्धस्येत्या- वेदयति भगवान् कात्यायन "स्वरोऽक्षर सहादयं य॑ञ्जनहत्तरश्चाव- स्वरो द्वधोपपद्यते अपृक्तो व्यञ्जनसपृक्तश्च । "प्रहम"। इत्यत्र प्रथमोऽकारोऽपृक्त । तस्य द्वधा प्रतिपतिः शक्या कर्तुम् । वर्णत्वेनाक्षरत्वेन चेत्याह- स्वरोऽक्षर" मिति । हवारा- दुत्तरस्त्वकारो हमाभ्यां सपृक्त । तत्र व्यन्जनविशिष्टस्य स्वरम्य ૨ 3 सितं."-इति ।

५८ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता व्यञ जनानि । व्यञ्जनोपहितत्वेन दृष्टौ वर्णत्वमेव नाक्षरत्वमित्याह- "सहाये" रित्यादि । तेन हम, इत्येतावतो व्यञ्जनविशिष्टस्वरस्याक्षरत्व विधीयते । "वागित्येकमक्षरम्-अक्षरमिति व्यक्षरम्" (ऐ.बा. २१ अ. इत्यैतरेयश्रुत्या तथैव प्रतिपत्ते । कतिभिर्व्यजनैरिति जिज्ञासायां पृष्ठतस्तावदादय रित्येकशेपादेकेन द्वाभ्या त्रिभिश्चतुभिर्वा व्यन्जन , उत्तरतस्तूत्तरेरित्येक शेषादेकेन, द्वभ्या त्रिभिरेव वा सपृक्तस्याक्षरत्व नियम्यते । तत्र पृष्ठाणाभिनिगृहीता अशितयश्चत्वार्युपसृष्टानि पुरतोऽर्केण त्वभिनिगृहीता अशितयस्त्रीण्युपहितानि व्यञ्जनानि । तान्युभयान्यस्यात्मन स्वरस्याङ्गानि भवन्ति। तत्रेयं वाक् पृथ्वीरस । स्वर सूर्य्यरसः। तथा च पृथिव्याः सूर्याङ्गत्व- मिवैतस्या वाच स्वरप्राणाङ्गत्व वेदितव्यम् ।।१।। अथाहु । अपृक्तस्य व्यञ्जनसपृक्तस्य वा स्वरस्यैतत्कात्यायनोक्त- मक्षरत्व स्वरान्त रासन्निधाने साधूपपद्यते। किन्तु यत्रानेकस्वरमेकं पद तत्र स्वरद्वयमध्यत्तिना व्यञ्जनानां पूर्वाङ्गत्व वा पराङ्गत्व यथा अपक्वस्त्यानमिति पञ्चाक्षरे पदे शुद्धोऽकारः । 'पयुताऽकार । कवयुताऽकार.। सतययुताऽकार । नपूर्वो मोत्तर- श्वाऽकार -इत्येव तानि -इत्येव तानि पञ्चाक्षराणि भवन्ति । तत्र पकार- ककारसकारादीना पूर्वाङ्गत्व कस्मानास्तीति शङ्कायामुच्यते । स्वरस्य पृष्ठतः पुरतो वा बलतारतम्य भवतीति स्वरद्वयसत्वे पूर्वस्य परस्य स्वरस्य · बाध्यबाधकभावेनैकत्र बलोपक्षयाद् व्यञ्जनविशेषे सक्रमणवलमेकस्य प्रतिरुध्यते । यथा कुलशब्दे लकारस्य परागतया पूर्वाङ्गत्वाऽनुत्पत्तिः । अधिकेन परबेलेनाल्पस्य प्रत्याहतत्वाद् । तच्चेदं बलतारतम्य स्वरदयसन्निकर्षे नियम्यते । नयाहि पन चमो विन्दुहूं दयत्वादुक्य. । तस्मिश्च पञ्चपादा बलम् । अथ पष्ठे विन्दी चत्वार. पादा बलम् । तदुभयविन्दुस्थे स्वरे नव पांदा वलस्योपपद्यन्ते । 'तैरेव नवपादैलैरय स्वरः पूर्वपरबिन्दुस्थेषु व्यंजनेषु विभवति। तथा च पञ्चमबिन्दुम्थे तावदुक्थे पूर्ण बल भवति। अथ उक्थविन्दो पृष्ठतश्चतुर्ष वेति सशय । वा .

पय्यास्वस्तिः [ ५६ पुरतश्च सप्तमादिषु त्रिषु विन्दुषु क्रमेग क्रिमणबल पादतो हसति इति निसर्ग.। स्वर अनुष्टुव वाक उपसर्ग-च्यअनानि वाक उपधानन्ध्यानानि वाक वाक मईमात्रादेशः १ २ ३ ६ प्राणो वृहती नवविन्दव | .. अक्षरो वृहतीन्द्रः | १ | २ | ३ ४ ५ ६ ७ वागनुष्टुप (वायु) स्वरवलानि वाचि स्वरस्याकर्षण J I | unu malini ॥ वलपादाः अर्घमायावच्छिन्नन्वभि प्राण रवच्छिन्न मनो वाड मय भवति॥१॥ मन प्राणवाङ्मयमेकमक्षरमव्ययकोशत्रयपातम् ॥२॥ सकारे तु त्रय पादाः । तेन हरि-गब्दस्य रेफे पूर्वस्वरबल त्रय पादा । परस्वरबल तु चत्वार पादास्तेन रेफ पराङ्गम् । [कात्य॑म्] इत्यत्र तकारे पूर्वस्वरवलं द्वौ पादौ, परस्वरवल त्वेक पाद । तेन तकार- पूर्वाङ्गम सकारे पूर्वस्वरबलमेक पाद. । परस्वरवलं हो पादौ । तेन सकारः पराङ्गम् । [ऊर्क स्त्र्यङ्ग] इत्यत्र, ककारे पूर्वस्वरवलं ह्रौं पादौ, परस्वरवल तु तत्र नास्तीति ककारः पूर्वाङ्गम् । पदान्तयत्या मात्रिकया विच्छेदात् पूर्वस्वरबल परस्वरवलं त्रय बलसाम्यादुभयतोऽयमाकृष्टस्तकारो द्विरुच्यते । तदित्थ बलवैपम्ये यस्य बलाधिक्य यत्र व्यञ्जने क्रमते तत् तस्याङ्गम् । तदेतन्निष्कृष्याह "सयोगा- दिः पूर्वस्य । यमश्च । क्रमजं च । तस्माच्चोत्तरं स्पर्शे। अवसितं चेति।" (१११०२।१०६) तर्कः। गुल्म, । व्यम् । इत्यादिषु मध्यवत्तिनो व्यञ्जनयोरेकं पूर्वाङ्ग द्वितीय पराङ्गम् । अन्तस्या- प्मभिन्नाना सयुक्तानामवसिताना च व्यञ्जनानामुच्चारगण द्वेषा पादाः । कात्यायन । पत्नी। सत्यम् ।

६० ] मधुसूदनशर्मप्रणीता अञ्जसा विक्रम्य चेति । “यथैवोपक्रमेद् वस्तिथैवैतान् समापये" दिति नियम्योच्चारयता पदमध्ये बलविशेषप्रयोगाभावोऽजसोच्चारणम् । सप्यमिति । अत्र स्पर्शस्य तकारस्य तर्कगुल्मादयन्त.स्थवन्मृदुग्रहः । तत्रेद तकारस्य पूर्वाङ्गत्वमुक्तम् । अथ विक्रम्योचारणे तु स्पर्श बल- विशेषोदयात् पूर्व. स्वरो विक्रमते । तेन स्पर्शान्ते विच्छिद्य पुनरुत्तर- वर्णोच्चारणाय प्रयत्नलाभ । तत्र "सयोगविभागशब्देश्यः शब्द" इत्यौलूक्यशास्त्रात् सयोगजस्पर्शानन्तर विभागज पुनरन्यः स्पर्श उदेतीति वर्णद्विरुक्तिर्भवति । तथा चैवं सयोगादेवस्य द्वित्वसिद्धं व्यञ्जन क्रमज तत्पूर्वाङ्गम् । सत्यमिति तद्वित्वे प्रथमः पूर्वस्य । तयौ परस्याङ्गम् । रुक्मइति कयमौ पूर्वस्य । मः परस्य । रहयोस्तु सयोगादित्वे पर. स्पर्शो द्विरुच्यते । यथा पाश्र्व्य मिति रात्परः श क्र मजः पूर्वस्य । शवया परस्य । वर्ष ष्यायेति रात् पः पूर्वस्य । पयौ परस्य । बाह्वोरिति हाद्वः पूर्वम्य । वः परस्य । क्रमजादुत्तर व्यञ्जन स्पर्शे परे पूर्वाङ्गम् । यथा पार्षष्ण्या इति रषषा पूर्वस्य, गयौ परस्य । वर्मन् इति रषषा पूर्वस्य म परस्येति ॥ "ङ गो कुक् टुक् शरि । शि तुगिति पाणिनीयः सूत्रविधीयमाना पूर्वस्पर्श द्विरुक्तिरूपा एवावधीयन्ते । ङणनाना ह्रस्वात्परेषां स्वरप्रत्यये द्विरुक्तिरिव स्वरभक्तिमदूष्मप्रत्यय- त्वेऽप्युच्चारणसप्रदायक्रमानुरोधात् क्वचित् स्वरमात्रात् परेषा द्विरुक्ति प्रवर्नते। किन्तुष्मग्गा नासिक्य प्रतिपन्थितया नासिक्यता निवर्तत- इति प्राक्षष्ठ , सन्त्स सञ्न् शम्भुरिति रूपाणि । सन गम्भुरित्यत्र तु प्रतिगृह्यत्वाद्विरत्योच्चारणाच्च नासिक्यताया अनिवृत्तिः । द्वित्वसिद्धस्य पूर्वाक्षराङ्गत्व नेयम् । कात्य॑मित्यद्वयान्तराले अ, र, त, स, न, या. षड्वर्णा. । तेष्वरता पूर्वमक्षर सनया. परमक्षर भजन्ते । पृष्ठतो बलेन तकारे परस्य पुरतो बलेन सकारे पूर्वस्याक्रमणेऽपि विप्रतिषेधे मूलबलात् सिद्धिरिति न्यायेन कृत्स्नशब्दव्य वस्थाऽनुरोधात् सामञ्जस्योपपत्तेः । तक्म्यमित्यत्र कमये पूर्वम्य, यमके परस्य बलप्रयोगाद् विप्रतिषेधे नश्च । कटधता एषु सर्वत्र पथ्यास्वस्ति [ ६१ सन्निकर्पातिगयात् कस्य पूर्वांगत्वेऽपि मययो पगड्गत्वमेव । विप्र- तिषेधे पर कार्य मिति न्यायेन पुरतो बर.पेक्षया पृष्ठतो बलमतिशेत इति मध्यमकारे पराङ्गत्वसिद्धेः । वैदिकानां तु समये पूर्वबला- वष्टब्धेऽपि ककारे परवल प्रसज्जत इति बलद्वयविरुद्धप्रत्याकर्षात् क- द्वयमिद्धिः तक्क्म्यमिति । तत्रोत्तरके मप्रयत्नाक्रमणान्नामिक्यत्व- मिति यमसंज्ञा क्रियते ।। [विश्वपस्न्या] प. पूर्वाङ्गम् । न पगड्गम् । [विष्वपाशः] इति बलसाम्येऽपि कः पूर्वाङ्ग न पराडुगम् । पदान्तयत्या विच्छेदात् । तदित्थ स्वागनेकत्वे बाध्यबाधकभावो व्याख्यातः ।।*॥ यथा उक्त पूर्वम् । अत , सति व्यञ्जने व्यञ्जन संपृक्त स्वरोऽक्षरं भवतीति । तत्र सप्त व्यञ्चनान्येकेन स्वरेण ग्रहीतुं शक्यन्ते। [स्त्र्यट ] इति । स. त. र य. अ र क. ट.-वगैरष्टवर्ण सप्त- व्यञ्जन नवविन्दुकमकारात्मकमेकमक्षर भवति । तत्राकारो वर्णमात्र 'न त्वक्षम् । सोऽय वर्णोऽकारः मात व्य नानि चाकारात्मकस्या- क्षरस्याड गानि । तदुच्चारगणाधीनोच्चारणत्वात् । नातोऽधिकमस्य स्वरस्य व्यञ्जनाभिनिग्रहणे सामर्थ्यम् । अत एव तु पृष्ठत. पञ्चम पुरतो वा चतुर्थ यदि व्यञ्जनमुपदध्याद्-प्रवन्य तहि तदुच्चिचारयिषा- वशाकृष्ट कश्चिदन्य स्वरस्तत्र प्रसज्येत । तदुच्चारणाय पूर्वस्वर- स्यालब्धबलत्वात् । यथा [न स्त्र्यदप्.] इत्यत्र नकारे तकारे च स्वरो हठादासज्जते ॥ इति द्वितीयः खण्डः।। अथातोऽस्मिन्नक्षरे देवतानुध्यानमाख्यास्याम निरवयवे मनमि तावत् समावतो नव प्राणखण्डा सनिविगन्ते । प्राणमयास्ते कोशा.। प्राणात्मकेषु च तेषु नवविन्दुषु पञ्चमो विन्दुर्नभ्यत्वा- दात्मा। इतरेऽष्टावड्गानि। पचमविन्दुस्थ. स्वरोऽक्षरम् । स चाय- मैन्द्रवायवो ग्रहो वाच आत्मा । स हि प्रारणो वाड मयत्वाद्रिन्दो नामोच्यते । अयमेव प्रागः सरस्वत्यधिष्ठाता सरस्वान्नामाभिधी- यते। यथोक्त बृहद्देवतायाम- "सरासि घृतवन्त्यस्य सन्नि लोकेषु यत् त्रिषु ।।

६२ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता सरस्वन्तमिति प्राहुच प्राहु सरस्वतीम् ।।,, इति केचिदाहुः ।। स - यद्यपीयं सर्वा वाक् पार्थिवत्वादाग्नेयी प्रतिपद्यते । "तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत्" इति श्रुते. ( १० । ३ प्र.। ५ ब्रा.) तथापीयमिन्द्रेगा प्रागोनाधिष्ठितत्वात् तेनैकोभावादन्द्रो भवति । स चायमिन्द्र. प्रागो द्विविध आन्तरीक्ष्यो दिव्यश्च । तत्राय द्विव्येन्द्रः प्रज्ञापारण. । च वितायमाना। ध्वनिरूपायां वाचि विवेचयन् स्वर व्यजन चैव सविभाजयति । अथान्तरीक्ष्यो वायुना सर्भवति । इन्द्रतुरीयो वायुरैन्द्रवायवो ग्रहो भवन्नाग्नेयीमिमा सर्वां ध्वनिवाचमध्यास्ते । गायत्रो ह्यग्नि । अग्निदेवतत्वाच्चेय वाग् गायत्री । अष्टभक्तिहि गायत्री । तेन स्वरमेकमनुगतानि सप्त व्यजनान्येकमक्षर वाक् । तस्या वाचोऽय मुक्थाशः स्वरो नामैतेषु नव- विन्दुषु पचम षष्ठ च विन्दुमधिष्ठिति । प्राणस्त्वयमिन्द्राशो बृहती- रूपत्वान्नव विन्दूनभिव्याप्यावतिष्ठते । तथा', च श्रूयते-“यांव ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक्'- इति । "यत्र ह क च ब्रह्म तद् वाक् । यत्र , वाक् तद्वा ब्रह्म ।" इति च ॥ (ऐ. प्रा. इन्द्रो ह वाचां ब्रह्म । इन्द्र पात्मा ब्रह्मत्येकार्थाः । यथाय शारीर प्रात्मा सर्वा शरीरयष्टिमभिव्याप्यावतिष्ठते-एवमयमिन्द्रो वागात्मा नव विन्दूनभिव्याप्नोति । एतावदेवास्य वाड मयस्येन्द्रस्य शरोरं प्रतिपद्यते । तस्य शरीरस्य भागे यावन्ति व्यजनानि सम्प्रविटानि भवन्ति तावतीय बाक् तस्मादिन्द्र।त् परिमोयते । अष्टवणर्नवविन्दु- भिश्च परिमिता हीयमेकाक्षरा वाक् सिद्धा भवति । तमेतमर्थ भगवान् कुरुसुति काण्वो वेदगुरुप प्राह- "वाचमष्टापदोमह नवस्त्रक्तिमृतस्पृशम् ।।" - - इन्द्रात् परितन्व ममे-इति ।। ऋ० स० ८ ७६ । १२ ।

पग्यास्वस्तिः [ ६३ ३२ A त्रिंगदक्षरो बृहतीरूप प्राण इन्द्र । तस्येन्द्राख्य- प्राणस्य तनू परि । इत्थभूताख्याने परिशब्दः । अप्टा- दी नवनक्तिम् । ऋतस्पृश वाचं ममे परिमापितवान् । अष्टी हि चतुरक्षरागि भवन्तीति द्वात्रिंगदक्षराऽनुष्टु- वियमष्टापदी वाक् । पुनरप्येके न चतुरक्षरेण पादेन वृहती सम्पद्यमाना नसक्ति । सक्तयः कोणा। सत्यमियमनुष्टुप् वाक् तमृत बृहतीप्रारणं स्पृशति । बृहत्यामनुष्टुभोऽन्तर्भावादिह वाच प्राणेनकीभावो विवक्षितः । इत्यारण्यकश्रुत्यनुसारिणी (ऐ० प्रा० २३६) ॥ ऋतस्मृश मित्यस्यानुष्टुव वाग् बृहत्या स्पृप्टेत्यर्थमाह सायण । ऐतरेयश्रुतिस्तु "सत्यं वै वागृचा स्पृष्टे" त्यर्थमाह । तथा चायं श्रोत्र ग्राह्य गव्द सत्य वाक्। महदयत्वात्। सा ऋतवाचा निर्ह दयया नित्य स्मृप्टा भवतीत्यर्थ प्रतिपत्तव्यः । २०.१२१ व्याख्या 8/28 नेत्र मूत्रम् । अयमत्राभिसंधि । ऋतं च सत्यं चेति द्वे नेत्रे भवतः । तत्र हृदयतोग्राहि नेत्र सत्य नाम । सर्वतोग्राहि तु नेत्रमृत 'नाम । तथा चाऽगरी- रमहृदयं सर्वमेव ऋतनेत्रगृहीतत्वाद् ऋतमुच्यते । हृदयेनाकृष्टत्वात्तु सहृदयं सगरीर सत्यम् । प्रापो वायु सोम इति ऋतानि, अशरीरत्वान् । अग्निर्यम आदित्य इति सत्यानि, सशरीरत्वात् । तत्राप इति पारमेष्ठ्यमण्डलस्था सुब्रह्मण्यानाम्नी वाचमाह् । यां त्वेतामष्टापदी गायत्रीनाम्नी वाचं ब्रूम , सा सर्वापि स्वयोनिरूपा तामृतवाच स्पृशन्त्येव रूप धत्ते । तत्प्रभवा, तत्प्रतिप्ठिता, तत्रैवान्ते विलोयते । तस्मादाह-ऋतस्पृगमिति । श्रापो हि सा वाक् । "सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेवास्य साऽसृज्यत । माप्नोट् यदिद किञ्च तस्मादापः इति श्रुते ( ) सा ऋतम् । यस्त्वयमत्र प्रारणः तत्सत्यम् । "आप एवेदमग्र प्रासुः। मष्टापदीवाना सेद सव- श०६।१।१।४ - ६४ ] मधुसूदनशर्मप्रणीता ता प्राप सत्यमसृजन्त (शत० १४ का० ६ प्र० ६ ब्रा०) इति श्रुते । प्राणस्तावदिन्द्र सोऽप्सु वाक्षु द्वेधा विनियुज्यते। सत्यात्मना प्रज्ञात्मना च। तत्र प्रज्ञाप्रारणेन वर्णाक्षरपदवाक्यादिविभागा भवन्ति । मानुषोष्वेव तु वाक्षु स प्रज्ञाप्राणोऽधिकुरुते न त्वव्याकृतासु वायुतेजोजलपृथिवीना वाक्षु। सत्यप्रागास्त्वयं मम्वेिव वावविशेषेणाधिकुरुते सत्येनाभितानामपां वाचामनात्मतया स्थातुमनहत्वात् । प्रासामेव ऋताख्याना वाचां समुद्र सरस्वान्नाम । सेयमशरीरा विभ्वी वाक् । अथ सत्यवैशिष्ट्ये न तदवच्छिन्नतया सा वाक् सशरोरा सती सरस्वती ॥ अपरिच्छिन्नत्वाद् ऋतं सरस्वान्। परिच्छन्नत्वात् सत्यवती सरस्वती । सोऽय सत्य- प्राण एव प्रज्ञाप्राणेन विभाजितोऽक्षर भवति । स आत्मा। स स्वरः! मोऽङ्गी । व्यञ्जनानि तु क्षराणि तान्यागनि । एकेन विन्दुना त्वेतमात्मानं ' बर्द्धयति । स पञ्चमविन्दुस्थ: षष्ठं बिन्दुमप्यवगाहमान सन्नेकमात्र सम्पद्यते । वीर्याधिक्या- द्ध्येक कश्चिदात्मा चाङ्गी च भूत्वा सर्वाण्यङ्गान्यधीष्टे इति हि न्यायो यजुःश्रुतौ षप्ठे काण्डे व्याख्यात.। (श०६।१प्र०।१ ब्रा०६० तेनार्द्ध मात्राणां व्यजनानामयमेकमात्रः स्वरो मात्राधिक्यादात्मा भवति। आत्मत्वाचाय स्वरस्तेषु व्यञ्जनेषु प्रभवति । सर्वाणि व्यजनान्यात्मसा- त्कुरुते । तथा चैकमात्रादात्मबिन्दो पृष्ठतश्चत्वारोऽर्द्ध मात्रा बिन्दव उपसर्गस्थानानि । पुरतस्तु त्रयोर्द्ध मात्राबिन्दव उपधानस्थानानीत्येव- मष्टौ विन्दवो निष्कृष्यन्ते । एतदभिप्रायेणैव श्रूयते- "ब्रह्म वै गायत्री वागनुष्ट प-(ऐ आ. १ । १४) २ ३ ४ ५ ६ ७ ६ बृहती | ० . | | ० . . प्राणा: ख्य व्य. व्य व्य स्वर व्य. व्य. व्य वाच: I II III IIII IIIII-IIII II II अक्षरबलानि - २ ar ६ ७ अनुष्टुप पथ्यास्वस्तिः [ ६५ "वागनुष्टुप्"- ( शत १।५।२।२७ ) इत्याचक्षाणा वैदिकम- हर्षयोऽक्षरस्यैतस्याष्टविन्दुत्वमभिप्रयन्ति। स्वरस्यैकस्य व्यञ्जनद्वय- समानावगाहितया नवव्यञ्जनसंनिवेशावकाशस्यैकस्वरकसप्तव्यञ्जन- सनिवेगावकाशेन तुल्यत्वाद् वृहतीप्राणावच्छिन्नस्याक्षरस्य वागवच्छेदेनाष्टभक्तिकत्वं सभवतीत्यक्षरा त्मिकाया वाचोऽनुष्टुप्त्व- मुपपद्यते । अष्टभक्तिकस्य छन्दसो गायत्रीत्ववदनुष्टुप्त्वेनापि व्यपदेशसभवात् । अथवैकैकमक्षरमष्ट भक्तिक भवतीति चतुरक्षर- च्छन्दसो द्वात्रिगद्भक्तिकत्वं संभवति। चतुरक्षराणि सर्वाणि च्छन्दासि श्रूयन्ते (शत० १।५।२।२७)। चतुर्विशत्यक्षरा गायत्री, अष्टाविशत्यक्षरा उष्णिगित्येवं विंशत्यक्षराया द्विपदाविराज ऊर्ध्वं चतुर्भिश्चतुर्भि- रक्षरैरनुबद्धितर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपङ्क्तित्रिष्टुब्जगतीनामुपपन्नतया छन्दोभिरुपलक्षितायाः सर्वस्या वाचो द्वात्रिशद्भक्तिकानुष्टुप्त्वमुप- पद्यत इति बोध्यम् । प्रत्यक्षरं नवविन्दुषु हृदयस्थस्वरस्थानतया पञ्चमषष्ठविन्द्वोरात्म- त्वम् । इतरे सप्त विन्दवस्त्वात्मनः क्रान्तिस्थानत्वात्महिमानो भवन्ति । पञ्चमपप्ठविन्दुस्थस्य स्वरस्वरूपनिरूपकस्य प्रज्ञाप्राणस्येन्द्रस्य संपरि- प्वक्तोऽयमक्षर-स्वरूप-निरूपक. प्रज्ञाप्राणोऽन्य इन्द्र सप्तव्यञ्जनवर्णान- प्टमं स्वरवर्णं चाभिव्याप्नोतीति प्रतीयते । अत एव च वृहती- च्छन्दसोऽप्यस्येन्द्रस्यानुष्टुपचारित्वमप्युपपद्यते । तथाचाहुर्वेदमहर्षय - बीभत्सूनां सयुज हंसमाहुरपा दिव्यानां सख्ये चरन्तम् । अनुष्टुभमनु चर्च्र्यमारगमिन्द्रं निचिक्युः कययो मनीषा ।। (ऋक् सं० मं० १०, मू० १२४, मन्त्र )॥इति।। त्रयस्तावदस्य मन्त्रस्यार्था भवन्ति । अधिदैवतमधिशब्द- मधिभूतं च । तत्राधिदैवतमर्थो ब्रह्मविज्ञाने सिद्धान्तवादे द्रष्टव्य । इहाधिशब्दं व्याख्यायते । बोभत्सूना बन्धनमिच्छता निराश्रय स्थातु- मसमर्थतया परावलम्बनमपेक्षमाणानां क्षराणां व्यञ्जनानां सयुजम आश्रयदानेन सहयोगिनं कंचिदर्थं हंस ब्रुवते। स्वातन्त्र्येण स्थातुम- ६६ ] मधुसूदनशमारणीता - त्मिका वागनुष्टुप् । शकुवानान् व्यञ्जनरूपान् क्षरानर्थानाश्रयो भूत्वा य स्वस्मिन्नु- पबध्नाति सोयमैन्द्रवायवग्रह. प्रकृते हम इति बेदितव्य । "ये अर्वाड उत वा पुराणे, वेद विद्वांसमभितो वदन्ति । प्रादित्यमेव ते परिवदन्ति सर्वे, अग्नि द्वितीयं तृतीयं च हस" इवि मन्त्रश्र तौ हसपदस्य वायुपरत्वावगमात् । प्राणो वायु- रिति श्रुतेः प्राण स हसो भवति । प्राण एव त्वक्षरसनः क्षरात् व्यञ्जनवर्णानात्मनि बध्नाति । अथेहाऽऽप इति वाच: प्रतिपत्तव्या.। सोपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वादाऽस्य माऽसृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोद् यदिद किञ्च तस्मादाप." इति यजु श्रुतेः [शत० कां० ६ प्र० १ ब्रा० १]तासां दिव्यानां तृतीयस्यामितो दिवि पवमानानां वाचा सख्ये समानभावेऽय हसश्चरति । ऐन्द्रवायवेन प्रारणेनेय वाग्, वाचा चायमैन्द्रवायवप्राणोऽव्यतिरिक्त रूपं धत्त इति भावः । अष्टवा- तामनु। इत्थभूताख्यानेऽयमनुशब्द कर्म- प्रवचनीयः । अनुष्टुप्छब्देनेहाष्टवर्ण-स निवेशस्थानरूपा नव बिन्दवो लक्ष्यन्ते । नवविन्दून भिव्याप्य कृतात्मानमिहाक्षरशब्देन प्रतिपन्न तावदिन्द्र प्रजाप्राणं वैज्ञानिका स्वमनीषया विचारदृष्टया निचिक्यु- निर्धारयामासु । यद्यपि वागेव श्रोत्रेण श्रूयते न प्राणस्तथाप्यक्षरात्मि- काया वाचोऽष्टवर्णावच्छिन्नतया वाचस्तावत्प्रदेशावगाहित्वासंभवाद् वाचोऽतिरिक्त वागालम्बनं कचिदिन्द्रं नाम प्राण विद्वास. स्वबुद्धि- भावनया ददृशुरित्यर्थ. ।। इत्थमिदमधिशब्द व्याख्यातम् । अथैतस्य भूतग्रामस्य वाड मयत्वादधिभूतपक्षेऽपि तुल्योऽर्थ । अतएव- "अप्रक्षितं वसु विष हस्तयोरषाढं सहस्तन्वि श्रुतो दधे । प्रावृतासोऽवतासो न कर्तृभिस्तनूषु ते तव इन्द्र भूरयः ।। (ऋ० स० मं० १ सू० ५५ मन्त्रः ८१) इति मन्त्रं व्याचक्षाणाऽऽरण्यकश्र तिः "सोयमाकाश: प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः । तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः, एवं पथ्यास्वस्तिः [ ६७ सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टन्धानीत्येव विद्याद"- (ऐ० प्रा० २।१६) इत्येवं शब्दोक्षरवद् भूताक्षरेष्वपि बृहतीप्रारणात्मकस्येन्द्रस्य तुल्यमभिव्याप्तिमाचष्टे। तदिद विस्तरतो ब्रह्मविज्ञाने व्याख्यातं द्रष्टव्यम् ।।*।। ॥इति तृतीय. खण्डः ॥३॥ एतच सप्तव्यञ्जन स्वरक्रान्तिमण्डल सति संभवे व्याख्यातम् । न त्वक्षरत्वप्रयोजकतया सप्ताना व्यञ्जनानामेकान्तत. सद्भावोऽपेक्ष्यते । नवानामर्द्धमात्राविन्दूना स्वरूपसद्योग्यतालक्षणतया व्यवस्थितत्येऽपि फलोपधायकतालक्षणतया सर्वत्रानुपलब्धे । तथा चोपपद्यते व्यञ्जना- त्यन्ताभावे स्वरस्यैव केवलस्याक्षरत्वम् । किन्तु यत्र व्यञ्जनसद्भाव- स्तत्र तद्विशिष्टस्यैवाक्षरत्वं न तु केवलस्येत्यपि प्रागुक्त न विस्मर्तव्यम् । तत्रापि चैकेनैव व्यजनेन द्वाभ्या त्रिभिश्चतुभिः पञ्चभिः षड्भि सप्त- भिर्वा वैशिष्टय स्वरस्याक्षरत्व द्रष्टव्यम् । न वाक्, प्रागित्यादि ॥ इदं पुनरत्रावधेयमीपत्स्पृष्टार्धस्पृष्टै स्वरच्छायापन्न रन्त.स्थोष्मभिरुप- सर्गोपधानयोः सगर्भत्वे सत्येवेद स्वरक्रान्तिमण्डलं सप्तविन्दुकमुप- पद्यते । अन्त स्थोष्मरणोरप्रत्यासत्तौ त्वाक्रमणवलं तदपचीयते । [क्तन ट् प्] इति पृष्ठतस्त्रिपु कतनेपु पुरतष्टपयोर्द्वयोरेव बिन्द्वोराक्रमण- बलोपपत्ते । तदित्थं वर्ण विशेषे क्रमणबलतारतम्यमन्वीक्ष्यम् । खल्वस्य क्रान्तिबल तारतम्येन घटते । एवमाभ्यन्तरस्था- नामपि कण्ठादीनामाभ्यन्तरप्रयत्नानां च स्पृष्टादीनामस्ति बले तार- तम्यम्, वाह्यस्थानाना वाह्यप्रयत्नानाञ्च । तेन षत्वणत्वकुत्वचुत्वा- दिका प्राभ्यन्तरस्थाननिबन्धना उदात्तस्वरितानुदात्तप्रचयादिका बाह्यस्थाननिवन्धनाश्च व्याकरणशास्त्रोक्ता. सर्वेऽपि सन्धिफलविशेषा भवन्तीति नरुक्तानां समय । राजसु, वित्सु, रामेषु, हरिपु, हवीषी- त्यादौ सकारस्योत्तरस्वराङ्गत्वेऽपि पूर्वस्वरबलाक्रमणतारतम्यानु- रोधेन स्थानापकर्षात् षत्वमुपपद्यते । [रामाणां पण्णाम] इति रषनिबन्धनं गत्वम्। वाक्, स्रक्, रक्तम्, निणि तमित्यादौ कुत्वम् । यथा मधुसूदनशर्मप्ररगीता सच्चरित-सञ्जनादिषु चुत्वमित्येवं स्थानप्रयत्नक्रान्तिबलतारतम्य- निबन्धना विशेषा भवन्तोत्यन्यत्र विस्तर ॥ ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥४॥ तदित्थमिदमक्षरस्वरूप व्याख्यातम् । व्याख्यातश्चास्मिन्नक्षरे स्वरव्यञ्जनयोरङ्गाङ्गिभाव । तत्रैतेष्वङ्गषु व्यञ्जनेषूपसर्गे सत्यसति वोपधानबलस्य कार्योपधायकत्वाभावेऽक्षरस्य लघुत्व वक्तव्यम् । यथा- अ, य, न्य, क्न्य इत्येवमादयः सत्यप्यधस्तात् व्यापारे अर्ध्वतो व्यापा- राभावाल्लघवः। उपधाने त्वाक्रमणव्यापारस्य बलोपधायकतायामक्षरस्य गुरुत्व भवतीति सिद्धान्त. । दीर्घस्वराणा सन्ध्यक्षरस्वराणामनु- स्वारविसर्गव्यञ्जनान्तस्वराणां व्यञ्जनद्वयसयोगपूर्ववत्तिस्वराणा चोप- हितवर्णोपेततया पुरोऽर्कव्यापारसत्वाद् गुरुत्वमुपपद्यते । आ, ए, ऐ, अं, अ, अत्र, इत्येवमादय पुरतो व्यापारवत्त्वाद् गुरव । तथा चेत्थ लघुगुरुभेदादक्षरद्वैविध्य व्यवतिष्ठते ॥ॐ॥ यथा- । ॥ इति पञ्चमः खण्डः ॥५॥ "इति श्रीमधुसूदनविद्यावाचस्पतिप्रणोते पथ्यास्वस्तिग्रन्ये प्रक्षरपरिष्कार.॥ (४) ॥ चतुर्थ. प्रपाठः समाप्तः॥

प्रथ सन्धिपरिष्कारः पञ्चमः प्रपाठः ||शा इदमेवाक्षरमक्षरान्तरेण सधियोगे परस्परेण वन्धनतो हृदयग्रन्थ्यु- त्पत्तौ क्षरोत्पत्तिहेतुर्भवति । परब्रह्मविद्यायां क्षरभूतानीव शब्दब्रह्म- विद्याया क्षरा व्यञ्जनवर्णाः । इन्द्रियग्राह्य . क्षरैरनिन्द्रियग्राह्यो वाक्- प्राणोऽभिव्यज्यते तस्मादेपा व्यञ्जनत्वम् ।। तत्र (१) निरूपकभेदात् सन्धित्रैविध्यम् तत्रायं सन्धियोग परब्रह्मणीव शब्दब्रह्मण्यपि निरूपकभेदादु द्विविध. ॥ विभूति योगश्च । तत्र योग. पुनद्विविध.। सश्लप संपरिप्वङ्गच ॥ यत्र युक्तयोरेकं योगाय व्यापारवत् स्याद्, बद्ध सत् परतन्त्रं स्यात्, अपरं तु निर्व्यापारमबद्धं स्वतन्त्रमवतिष्ठते । व्यापिनो व्याप्येऽनुग्रहो विभूति । यथाह- "अम्मो लवणे वायौ व्योम, मुखे दर्पणे यद्वत् ।। विभवति तद्वद् विरजा भूतनामेऽव्ययः परमः ॥१॥" इति क्षरेप्वक्षरो विभवतीति नियमादिह व्यञ्जनेषु स्वरो विभवति । यथा 'स्त्र्यर्क ट्' गन्देऽकारश्चतुर्यु पूर्वेषु त्रिषु चोत्तरेषु व्यञ्जनेष्वालम्ब- नतया विभवन् दृश्यते ।११ क्षरेषु चान्यतरस्यान्यतरस्मिन् विभूति । यथा रामारणा वर्मणामित्यत्र मूर्द्धन्ययो रषयोः प्रयत्नमहिम्ना दन्त्यो नकारो मूर्द्धन्यतामापद्यते ॥२॥ अथतेष्वेव स्थानेषु व्याप्यस्य व्यापिनि योग संश्लेषः । तमेकतो बन्धयोगमाचक्षते । "अम्भसि लवणं, वायुयॊम्नि मुखं दर्पणे यद्वत् ।। श्लिष्यति तद्वद् विरजसि भूतग्रामोऽव्यये परमे ॥१॥" एवमिह व्यजनान्यबद्धे स्वरे सश्लिष्टानि वद्धानि ॥३॥ क्षराणां चैकस्यान्येन संश्लेष ॥ तत्र सश्लेषणद्रव्ययोगादेकस्यान्येन बन्धनमात्र न त्वन्यस्मिन्नन्यस्यानुप्रवेश. ॥ एतदभिप्रायेणैवाह भगवद्गीतायाम्- ७० ० ] मधुसूदनशर्मप्रणीता "मया ततमिद सर्व जगदव्यक्तमूर्तिना ॥ मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः ॥१४॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभोवन: ।।६।५॥ यथाकाशस्थितो नित्य वायुः सर्वत्रगो महान् ।। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानोत्युपधारय ॥६॥इति।। मत्स्थानीति सश्लशात्मकमेकतो बन्धनमाह ।। नचाह तेष्विति परस्य तत्रावन्धनमाह । न च मत्स्थानीति- समन्वयलक्षणानुप्रवेशप्रतिषेधमभिप्रैतीति विवेत्त व्यम् ।।७।। (२) व्यञ्जनभेदात् सश्लष-साप्तविध्यम् ।। स हि सश्ल पो व्यञ्जनभेदात् सप्तविधो याज्ञवल्क्येन स्मर्य्यते । तु . अथ सप्तविधा. संयोगपिण्डा :- "यमान विद्यादयस्पिण्डान् सान्त स्थान दारुपिण्डवत् ।। अन्त.स्थयमवर्ज ऊर्णापिण्डं विनिदिशेत् ॥१॥ अन्तःस्थयमसंयोगे विशेषो नोपलभ्यते ॥ प्रशरीरं यमं विद्यादन्तःस्थं पिण्डनायकम् ॥२॥ ज्वालापिण्डान् सनासिक्यान् सानुस्वारॉस्तु मृन्मयान् ॥ सोपध्मान्वायुपिण्डांस्तु जिह्वामूले तु वजिरण. ॥३॥ अग्निः पत्नीत्ययस्पिण्ड ॥१॥ अत्र पञ्चमापञ्चमयोर्मध्यवर्तिनो विच्छेदस्याशरीरत्त्वाद्विशेषानुपलब्धि. ।। सत्यम् । अश्व । विल्मिने इति दारुपिण्ड ॥२॥ अत्रान्तःस्थाना लघुप्रयत्नतरत्वादात्यन्तिक- संनिकरण पिण्डनायकत्वाद्विशेषानुपलब्धि ॥ अश्मन् । कृष्णः । अस्मै-इत्यूर्णापिण्ड ।।३॥ ब्रह्म । वह्नि । गृह्णामीति ज्वालापिण्ड. ॥४॥ सस्थाम् । सछस्तुप् । सिंह्यसीति-मृत्पिण्ड ॥५॥ द्यौ पिता इति वायु- पिण्ड ॥६॥ इप्रकृति - इति वज्रपिण्डः ।।७।।

पथ्यास्वस्तिः [ ७१ (३) वीर्यभेदात् संपरिन्वङ्गवैविध्यम् । अथ वीर्यभेदात्संपरिष्वङ्ग स चान्योन्यतो वन्धनरूप । अक्षरस्या- क्षरेण योग संपरिप्वज । यथाय गारीरको विज्ञानात्मा प्राजनात्मना संपरिष्वक्तो भवति, एवमेक स्वरः स्वरेणान्येन सन्धीयते । यथा नदीय भानूदय इत्यादौ स्वरद्वयसपरिष्वङ्ग। दिव्य स्ति, दिक्ष्वस्ति दात्रस्ति, इत्यादिषु परस्वरेणेकारादीनां योग ।। तत्रेद त्रय संभाव्यते । दम्भनेन समञ्चनं भवतीत्येकमात्रस्याद्धमात्रत्व निष्पद्यते ॥१॥ अन्योदरेऽन्याङ्गप्रवेशो भवतीत्यत इकारस्य षष्ठे विन्दावकारपञ्चम- विन्दुसमावेशादिकारस्यार्द्धमात्रमवशिष्यते ।।२।। अथवा सहितयो- रुभयोरन्यतरस्य वाऽङ्गक्षत भवतीत्यत इकारस्याकारे युज्यमानस्य परमर्द्धमात्रमावृश्च्यते इति पूर्वार्द्धमात्रमवशिष्यते ॥३॥ एतेषु फलतो विशेपो नास्तीत्यस्तु यद्वा तदा ॥ अथवा "इग्यरणः संप्रसारणम्" इति त्रुबतो भगवत पाणिनेस्तु समनने पक्षपातः। समश्चितस्यैव संप्रसारणसंभवात् । अनुप्रविष्टस्य तूद्धरणमवध्यत् । क्षतस्य वाऽनुसंपत्तिमवक्ष्यतु । श्रुतिरपि समञ्चन- प्रसारणयोरेवानुजानीते। श्रूयते हि सार्वायुषाग्निविद्यायाम- "प्रथातः समञ्चनप्रसारणस्यैव। पशुरेष यदग्निः । यदा वै पशुरङ्गानि संचाञ्चति प्र च सारयति । अथ सतर्वीयं करोति । प्रारणो वै समञ्चनप्रसारणम् । यस्मिन्वा अङ्ग प्रारगो भवति तत् संचाञ्चति प्र च सारयति"|इति। [शत० ६।१।१४] एतेन परब्रह्मणीव शन्द्रब्रह्मण्यपि वाक्प्राणस्य समञ्चन- प्रसारणाभ्यामेव व्यञ्जनस्वरसिद्धिरवकल्पते । तथाहि-व्यञ्ज- नाना सप्रसारणात् स्वरत्वं संपद्यते । स्वराणा तु समञ्चनात् व्यञ्जनत्व भाव्यते ॥ तच्चेदं समञ्चन स्वरद्वयसंपरिप्वगादियोग- विशेषादेवोपपद्यते ॥

७२]
मधुसूदनशर्मप्रणीता
(४) योगभेदात् संधिद्वैदिध्यम्
अथ सनिकर्षभेदात् सन्धिद्विविधः । सक्रान्ति., संहिता चेति ।
तथाहि पूर्वोक्ता विभूति-सश्लेष-सपरिवङ्ग-लक्षणास्त्रिविधा योगाः
शाब्दिकनये सन्धिशब्देनाख्यायन्ते । अथ तत्र विभूतिरेका
व्यवायसहा भवति सा सक्रान्ति । सश्लेषसपरिष्वङ्गौ तु शब्द विद्याया
संहितानाम्नाख्यायेते। यथाह कात्यायनः प्रातिशाख्ये-
"वरनामेकप्रारगयोगः संहितेति ॥"
स चैक. प्रारण स्वरस्य क्रान्तिमण्डलमनुष्ट पछन्द ॥
"प्रारणा वै देवा वयोनाधाश्छन्दांसि वै देवा वयोनाधा:-इति श्रुतेः
(शत०६।१ प्र०।६ब्रा०)॥
प्राणविशेषस्यैवावच्छेदकतायां छन्दस्त्वसिद्धः एकप्राणयोगो
व्यवायेऽपि संभवतीति तत्प्रत्याख्यानाय पाणिनि -"पर: सन्निकर्षः
संहितेत्याह। कः परः सन्निकर्ष इति चेत् स्वारसिकाद्ध मात्राकाल-
मात्रव्यवायेनोच्चरण सहितेति केचिदाहुः । तदसत् । अवग्रहादौ पदद्वय-
योगेऽर्द्ध मात्राकालप्रतिपत्तावपि वर्णद्वययोगे तावद्विच्छेदानुभवा-
भावात् । तस्मादर्धमात्रातोऽप्यल्पकालोऽवकाश. सहिता । द्वयो-
वर्णयोर्वर्णान्तरेणाविच्छेदः सहिता। वर्णान्तरान्तरितयोस्तु वर्णयो.
सनिकर्षः संक्रान्तिः । सोऽयं सक्रान्ति-सहिताभेदाद् द्विविधः
सन्धिाख्यातः ।
(५) आश्रयभेदात् संधिद्वैविध्यम् ॥
अथ आश्रयभेदात् सन्धि पुद्विविधः । स्वरसन्धिर्व्यञ्जनसन्धिश्च ।
स्वरसन्धिः संहितायामेवोपपद्यते। न तु सक्रान्तिसन्निकर्षे व्यवायसहे।
तत्रैकमात्रिकस्वरस्य पूर्वार्द्धमात्रा पञ्चमबिन्दुः, परार्द्ध मात्रा षष्ठबिन्दुरिति
संज्ञायते ॥
तथा च पूर्वस्वरपष्ठविन्दोः प्रत्ययस्वरपञ्चमबिन्दुत्वापत्ति-
रक्षरयोः संहिता ।
स स्वरसन्धि ॥ अन्याक्षरनिगृहीतव्यञ्जना-
नामन्याक्षरेण निग्रहणं व्यञ्जनसन्धिः ॥७॥

मधुसूदनशर्मप्रणोता [ ७३ (६) अथ बलभेदात् सन्धिद्वैविध्यम स्वरव्यञ्जनसन्धिभ्यां वर्णगुणातिरेको भवति । अन्यथा सतो- ऽन्यथाभावोऽतिरेकः । वर्णोपादानभूते वायौ वर्णस्वरूपविशेषोत्पत्त्य- नुकूलं वल वर्णगुणः । बल द्विविधम् । प्रारम्भकं विशेषक च । वर्ण- स्वरूपोत्पत्तौ विनियुक्त बलमारम्भकम् । तत् पञ्चधा-स्वरोपधाय- कम् ॥१॥ अगोपधायकम् ।।२।। स्पर्शोपधायकम् ॥३॥ स्थानोपधाय- कम् ॥४|| नादोपधायक चेति ॥५॥ स्वरोपधानाद्-अ अ अ-इत्यनुदात्तस्वरितोदात्तभेदादकार- त्रैविध्यम् ।।१॥ अगोपधानाद्-अ आ आ ३ । इत्येतेषां ह्रस्वदीर्घ- प्लुतानामेकंकाक्षरत्वम् ।। व्यञ्जनानां च स्वराङ्गत्वं स्वरोच्चारणा- धीनोच्चारणत्वम् , सव्यञ्जनस्वरस्यकाक्षरत्वं च ॥२॥ स्पर्शोपधानाद्- अ अ ड ग क ह–इत्यादयो धाराः ॥३॥ स्थानोपधानात्-अ इ उ ऋ ल-इत्यादयो धारा.॥४॥ उपाशुवागरूपायां मध्यमायां वाचि नादोप- धानाद् ध्वनिप्रसङ्गाद् वैखरी वाक् प्रवर्तते ॥५॥ अर्थतेप्वेव पञ्चसु बलेषु विनियुक्त वलं विशेषकम् । तत् पञ्चधा- उपजनकम्।।१।। उपघातकम्।।२।। विक्षेपकम्।।३।। विशेपाघायकम्।।४।। निरोधकं चेति ॥५॥ प्रयत्नोपजनाद् वर्णागमः । प्रयत्नोपघाताद् वर्णलोप । प्रयत्नविश्ले- पाद् वर्ण विपर्यय. । विशेषाधानाद् वर्णादेशः । एषां चतुर्णा निरोधात् प्रगृह्यत्वम् । तच्च विकारप्रतिवन्धात् प्रकृतिभाव.-स्वरूपेणावस्थानम् ॥ इत्य चारम्भकवले विशेपकबलतारतम्यानुरोधाद् व्यवेतस्याव्यवे- तस्य वा बलवतो व्यञ्जनस्य गुणैः प्रतिवाधिता दुर्बलस्य गुणा निवर्तन्ते । आक्रममाणाश्च बलवद्गुणा स्थान लभन्ते । तेनैतानि पञ्चविधानि सन्धिफलानि जायन्ते । यथाहु "वर्णागमो वर्णविपर्ययस्तल्लोपस्तदादेश इमे विकाराः ।। स्थितिः प्रकृत्येति च पञ्च सन्धेः फलानि वर्गद्वयसंनिकर्षे ॥१॥"

७४ | पथ्यास्वस्ति -- १- भागमो यथा ॥ सयोगविमागशब्देश्य शब्दोत्पत्तिमाह भगवान् करणादः ।। तथाच-स्वरपूर्वो नासिक्येतर. स्पर्शः पदान्तोऽवसानेऽपदान्तश्च व्यञ्जनप्रत्यये पूर्वम्वरेणाक्रान्तो भवति ॥ तत्र पूर्वस्वरोऽभित्रमते ॥ तेन बलवत्संयोगजवर्णसदृश प्रतिध्वनिरूपो विभागजो वर्णः प्रादुर्भवति स क्रमजो नामोपजन पराङ्ग स्यात् ।। यत्या विच्छिद्योच्चारणहेतुभूत पूर्वस्वरेण निग्रहणं क्रमरणम् ।। रामात् । वत्त्सः । प्रात्त्मा । सत्त्यम् । शक्क्र । आतनच्च्मि । सज्मा ।। हकारपरत्वे क्रमजस्य पराङ्गत्वेन तद्योगात् सोमवर्ण सिद्धिः । वाग्धस्ती । पड्ढस्ती। तद्धस्ती। ककुभरती ।।२ ।। डणनाना तु ह्रस्वस्वरपूर्वाणां स्वरोदयत्वे स उपजनः पराङ्गम् ।। प्रत्यड डात्मा । सुगरण गीरा. । सन्नच्युत ॥३॥ स्वरभक्त्युदयत्वेऽप्यसति विरोधे स्वरोदयवत् सन्धिफलम् । अस्ति ा ष्मणां स्वरभक्त्यारब्धत्वम् | अर्श । आर्षम् । अर्हः । ह्रादः । ह्लादः। श्च्योतते । स्त्यानम् । स्त्री। ष्टेशन ! स्थितिः। इत्यादि- पूष्मोच्चारणात् प्राक् स्वरभक्त्या प्रकारेकाराद्यात्मन अाभासमान- त्वात् । तेन प्राड क्षष्ठः । सुगणषष्ठः । सन्त्सः । सञ्छम्भुरित्यादी क्रममाणानां डणनाना विभागजोपजना डणना एव जायन्ते । किन्तु तेषां परागतया तेभ्यो नासिक्यतापादकयत्नो निवर्तते । संनिकृष्टाना- मुष्मणां नासिक्यप्रतिपन्थिगुणशालितया तेन नासिक्यगुणस्य प्रति- रुद्धत्वात् ।४। सकारस्य नित्यदन्तस्थानत्वेन विवक्षया प्रगृह्यत्वम् ॥ तत्र दन्त्यता- गुणप्रावल्यात् तत्प्रत्ययत्वोपजातस्य टस्य दन्त्यत्वम् ॥ षट्त्सुखिनः । षट्त्सन्त १५ स्वरपूर्वाभ्या रहाभ्यां परस्मिन् हभिन्न ऽनुष्मान्तस्थोदये व्यञ्जने .

मधुसूदनशर्मप्रणीता [ ७५ पूर्वस्वर. क्रमते न क्रमते वा । तर्कः, स्वर्ग , गर्ज:, ब्रह्म, न ह्यस्ति । उच्चारणातिरेकोऽयमैच्छिकः साप्रदायिको वा द्रष्टव्यः । उष्मान्त स्थपरत्वे तु न क्रमते । कात्य॑म् । स्वय॑म् ।।६।। छकारेतरसोष्मस्पर्शे पराङ्गत्व प्रवलमिति नात्र पूर्व स्वर. क्रमते । मख । मघा । गठ. । अथ । वध । मभा। छकारे तु पराङ्ग- स्पर्श निसर्गात् पूर्वस्वरोऽपि क्रमते-इति क्रमजश्वकारोऽयमुष्मणा युज्यते । स्वच्छाया । शिवच्छाया । विच्छिद्यते । पदान्तदीर्घस्वरात्तु पदान्तयत्या विच्छेदादिद क्रमण निवर्तते, अनुवर्तते वा। सा च्छाया आच्छादयति । माच्छिददित्यादौ त्वैकपद्य विवक्षेति न विकल्प ७। यद्यपीदमुपजनवैचित्र्य व्यञ्जनद्वयसधाने व्यञ्जनगुरणप्रकृति- निबन्धनमेवोपपद्यते, तथापि तादृशप्रकृत्यनुकूलमुच्चारणमुच्चारयितृ- संप्रदायविशेषादेवोपकल्पते । आच्छादयति माच्छिददित्यादौ चकारो- पजनस्य सांप्रदायिकोचारणप्रकृत्यैवोपप्न्नत्वात् । क्वचित्पुनरेष क्रमजो- पजनो विवक्षाधीनो नैकान्तिक । क्रमणस्योचारणविशेषाधीनतया सांप्रदायिकत्वात् । अतएव दीर्घाद् द्वित्वं नास्तीत्याचार्य उपवर्षों मन्यते । इन्द्रः राष्ट्रमित्यादौ ह्यधिकव्यञ्जनयोगे द्वित्व नास्तीति गाकटायन । सर्वत्र- द्वित्व नास्तीति शाकल्यः । एते च क्रमजोपजनाः साप्रदायिका अपि वर्णप्रकृतिसापेक्षा सन्तीत्याख्याता ॥ केचित् पुनर्वर्णप्रकृतिनिरपेक्षा केवल भाषाव्यवहर्तृ प्रकृतिसापेक्ष- तया व्यवहारविशेषादागमा भवन्ति । यथा- "विश्ववाड्मुधुगित्यादौ हकारात् प्राग्डगागम ॥ गर्भ उद्ग्राभनिनाभौ संजभारेति वागमः ॥१॥ ईरेरिणौरादौ अकारागमः स्वैर स्वरी। तृतीयासमस्तस्याकारा- दुऋते, "प्रवत्सतरकम्बलवसनार्णदशानामृणे" उपसर्गाच्चाकारान्ताद ऋकारादिधातुवृत्तेष्वकारागम. ।

पथ्यास्वस्तिः . सुखेन ऋत. सुखार्त. ॥ प्रार्णम् । प्रार्च्छतीत्यादि । ते चैते पदनिव- न्धना उपजना इहोपेक्ष्यन्ते ॥१॥ २. अथ लोपः। प्रयुगमिति वक्तव्ये उच्चारणदोषाद् यलोपः । प्रउगम् ।।१।। उत् स्निगिति वक्तव्ये उदो दलोपः। उष्णिक् ।।२।। "उदः स्थास्तम्भोः प्रयत्नोपघातात् सलोपः।" उत्थानम् । उत्तम्भ- नम् ॥३॥ अवसाने "सयोगान्तस्य लोपः" । अथशब्दे थकाराकारस्य विपर्य- यात् पदादित्वे पदान्तस्य हस्य प्रयत्नप्रतिबाधाल्लोपः । आत् । स्वतन्त्र- निपातत्वे पर्यायपरिवृत्तिसहोऽयम् । "प्रादात्री वासस्तनुते"-इत्यत्र अथ रात्रोति वक्तु शक्यत्वात् । पञ्चमीविभक्तिनिपातत्वविवक्षायां त्वय पर्यायपरिवृत्यसहो भवति देवात् । स्मनिपातेन सयुक्त्वे यस्मात्तस्मादित्यादौ सर्वनामान्तस्तकारः प्रयत्नक्लेशाल्लुप्यते ॥४॥ व्यञ्जनादुत्तरेषां नासिक्यान्तःस्थानां नासिक्यान्त.स्थपरत्वे लोपः ॥ शय्या-इत्यत्र प्राकृतयोर्यकारयोरेक: क्रमजे तृतीये यकारे विलुप्यते।। अदितेरपत्यमादित्य इत्येको यकार स क्रमजे यकारे विलुप्यते। आदित्यदेवताकः स्थालीपाक आदित्य इति द्वौ यकारी, तौ क्रमजे तृतीये विलुप्यते ॥ संख्यातानुदेशान्न ह-तन्म्नानम ॥५॥ नासिक्यान्त स्थेतरेषा तु व्यञ्जनादुत्तरेपा सवर्णव्यञ्जनपरत्वे मरुत्त , प्रत्तमवत्तम् इतिद्वयोस्तकारयोरेकः क्रमजे तकारे लुप्यते । नेह संख्यातानुदेशः । तेन शिपिढ, पिण्डि-इति ढकारे डकारो लुप्यते। ग्रन्थ् धातोस्तुप्रत्यये तलोपादु ग्रन्थुरित्यादयोऽप्युन्न याः ॥६॥ इ ए परस्य यस्य, उ ओ परस्य वस्यानभिव्यक्तिः । नरयीश्वरो नर ईश्वरः । योन्यायीश्वर., योन्या ईश्वर. । भो एको, भोयेकः । हरयेकः हरएक. । त्वोतास: तोतासः । इत्येतेषु द्वयोर्द्व योः साम्येनोचारणम् । “पत्र "व्योलघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य" ॥१॥ "लोपः शाकल्यस्य ॥२॥" "प्रोतो गार्यस्य ॥३॥” इति त्रय. संप्रदायभेदाः ॥ भोयेको हरयेकः लोप ।

मधुसूदनशर्मप्रणीता [ ७७ इत्युभयत्र यकारस्य स्वरम्मितया श्रवणं शाकटायनो मन्यते । भोएको हरएक:-इत्युभयत्राश्रवणं शाकल्यो मन्यते ।। गाय॑स्तु भो एक इति लोप, हरयेकइति लघुप्रयत्नतरयकारं पश्यति ॥७॥ त्र्यचशब्दे रयानभिव्यक्तिर्लोके, छन्दसि तु लोप-तृचम् । व्यपि- रिति रयानभिव्यक्तिः ।।८।। ३- अथ विपर्ययः । अक्षवाहिनी, प्रवाह, प्रवाढ प्रवाढीति प्राप्ते वाऽक्षरविशकलनात् सिद्धानाम्-उ अ अ-इत्येतेपां विपर्यायेण सन्वी अक्षौहिणी-प्रौह- प्रौढ-प्रौढिसिद्धिः ॥१॥ स्थिरशब्दोष्मण: स्वरभक्त विपर्यायेण सकारादुत्तरत्वे प्रयत्नदो- षात् सस्वरभक्त्योस्तालव्यत्वे शिथिरशिथिलशब्दसिद्धिः। अथवा श्रथ- श्लथान्त स्थयोविपर्ययेण शथर-शथल सपत्तौ प्रयत्नदोपादिकारद्वयो- पनिपात । शिथिर. शिथिलः ॥२॥ पश्यकशब्दे पकयोविपर्ययेण कश्यपत्वम् ॥ शययोविपय्ययेण जाते प्रयत्नप्रतिबाधेन यकारस्य स्पर्शोत्कर्पाजत्वचत्वाभ्यां शस्य तु स्पर्शोत्कर्षा- च्छत्वे कच्छपशब्दो निर्वृत्तः।। कशामर्हति कश्योऽप्येव कच्छो- ऽभवत् ॥३॥ अथगन्दे पदान्ताकारस्य पदादित्वेन विपर्यये आच्छब्दो निपात ॥४॥ एवपदादेः सन्ध्यक्षरस्य पदान्तत्वविपर्यये वैगव्दसिद्धिः ॥५॥ अनश्व इति अन् शब्दो नविपर्ययसिद्ध ॥६॥ कृती छेदने इत्यस्मात् उप्रत्यये कर्तु रिति वक्तव्ये ककार- तकारयोविपर्यासे तर्कुरिति, तुशब्दे तकारोकारयोर्विपर्यासे उत् इति भृधातोर्मनिन्प्रत्ययान्निष्पन्ने भर्मन् शब्दे बकारोत्तरवर्तिनोः हकाररे- ७८ [ पथ्यास्वस्तिः फयो स्थान विपर्यासे ब्रह्मन् इति, प्रोम गन्दे अउ म् इत्येतेषु वर्णेषु अकारस्य उवारस्य च विपर्यासे वम् इति च निष्पद्यते । तदुक्तम्- "प्रोमोऽकारोकारयोर्वम् परस्परविपर्ययात् ।। भर्भरगो हरयोर्ब्रह्म परस्परविपथ्यंयात् ॥१६॥ बहोर उत्वमैत् सोऽभूद्धात्परो भूरभूदयम् ।। धातुस्ततोऽभूद् भूर्भूमिभूमा भूयान बहुं बुजन् ।।२।६।। निर्ग्रन्थुशब्दे रहयोनिघण्टुः स्याद् विपर्यायात् ।। विक्षेपात् तरयोरेकबिन्दुत्वे तरयोरेकबिन्दुत्वे स्पर्शनद्रुतेः ॥३॥१०॥ ४- प्रथ श्रादेशः । प्रारम्भके बले यत्र विशेषकबलोदयात् ॥ लोपागमविपर्यासबलानां स्युः समुच्चयात् ॥१॥ गुरगानां कस्यचिन्नाशः कस्यचिच्चागमः सह ।। कस्यचिद्वा विपर्यासस्तमादेश प्रचक्षते ॥२॥ विशेषकवल तावन्नानाविध भवति । तस्य प्रत्येकवलस्य तारतम्यात् पुनरत्र नानाविध्य प्रवर्तते । तद्यथा गतिरेकं बलम् । तत्र द्रुतिसमल तयो विशेषा. स्युः। उरः कण्ठ शिर इति त्रीणि सवनस्थानानि । तत्प्रापक बल स्वरोपधायक नाम । तत्र विशेपक्रवल- तारतम्याद् विशेषाः। यथा उदात्तस्वरितयोः प्रकृतत्वे द्रुतिगत्याऽनु- दात्तत्वम् । अनुदात्तोदात्तयो. समगत्या स्वरितत्वम् । अनुदात्तस्वरितयो. म तिगत्योदात्तत्वम् । अथ सन्धारणमन्यबलम् । तेन स्वरोपधाने प्रतिसवन द्वौ द्वौ विशेषौ-निगृहीतमुद्गृहीत च । तथा च सन्नतरानु- दात्तौ । स्वरितप्रचितौ । उदात्तोदात्ततराविति' षट् स्वराः स्युः । उरसि नोचैः सन्नतरो निघात.। उरस्येवोच्चैरनुदात्तः। कण्ठे नीचे. स्वरितः । तत्रवोच्चे प्रचित.। शिरसि नीचरुदात्त.। तत्रैवोच्चै- रुदात्ततर ॥ .

मधुसूदनशर्मप्रणीता
[ ७६
उदात्ततरः
शिरः
उदात्तः
प्रचितः
२
३
कण्ठः
४
स्वरितः
अनुदात्त:-
-५
उर:
निघातः (सन्नतरः)-६
नाभिः
तारतम्यकृतविशेपानपेक्षायां तु त्रय एव ते स्वरा उपपद्यन्ते ।
तथा चाह-
॥ उच्चाउच्चतर नास्ति नीचान्नीचतरं तथा ॥१॥
अथाङ्गोपधायके बलेऽभिव्याप्तिरेकं विशेपकबलम् । तत्रावच्छेद-
तारतम्यं मात्रा नामान्यद्वलमनुवर्तते । तथा चैकमात्रो ह्रस्व
द्विमात्रो दीर्घ. । त्रिमात्र म त । तदेकं छन्द.। स्वरमात्रमक्षरम् ।
अथवा व्यञ्जनेनैकेन, द्वाभ्या, त्रिभिः, चतुर्भिः, पञ्चभिः, षभि.
सप्तभिर्वाऽवच्छिन्नमक्षरमित्यन्यच्छन्दः ॥२॥
अथ स्पर्शोपधाने विवृत' मन्द दुर्योग विस्थानिक मृदु तीव्रा'-
ऽर्द्धसम भेदात् सप्त विशेषाः । समसांमुख्येनावस्थितयोः स्थान-
करणयोर्मध्येऽवगुण्ठितेन वर्णोपादानभूतप्राणवायुना स्पर्शप्रतिबन्धो
विवृतम् ।।१।। स्थानकरणयोरस्पृष्टयोरेव स्पर्शोन्मुखत्वप्रयत्नत. स्पर्श-
मान्द्यम् ॥२॥ तत्रैवात्यल्पमात्रया स्पर्गप्रसक्तौ दुर्योग. । स च करण-
वैषम्यात् स्पर्शाऽस्पर्शः ॥३॥ मुखस्थानस्पृष्टस्योपरिष्टान्नासानाडीस्पर्मो
द्विस्थानिकत्वम् ॥४॥ मृदुस्पर्शाद् गजडदवा. ||५तीव्रस्पर्शात् क च
ट त पा. ॥६॥ अर्द्धसमत्वं सस्वरभक्तिकत्वादंशतो विवृतमंशतः
स्पर्शः॥७॥ तदित्यमेषा विशेषकवलानां प्रत्यासत्या स्पर्शतारतम्यं
घटत इति वर्णान्तरादेशः । यथा ३ उ ऋ ल-इति नामिन:
स्वराः। तेषां विवृतप्रयत्नानां स्थानेऽन्तरतमा ईषत्स्पृष्टा अन्तस्था
असवर्णस्वरपरत्वे । दिव्यस्ति । मध्वस्ति । पित्रागमः ॥३॥

] पथ्यास्वस्तिः .. स्थानोपधायके च द्रुतिसमल तयो विशेषाः । द्रुतिगत्या प्रथम- स्थाने कण्ठे, समगत्या मध्यमस्थाने तालुमूर्द्धदन्तान्यतमे, म तिगत्यो- त्तमे स्याने अोष्ठ स्थानोपधायकबलस्यावपातः। मध्यमेऽपि सम- द्रुत्या तालुनि । मममाम्यान्मूर्द्धनि । समप्ल त्या दन्तेऽवपात. । द्रु त्या तस्य कः-शुष्क । ल त्या च तस्य व -पक्क । समसाम्यात् तस्य ट.. कृष्ट ॥ एकस्यानिकस्य द्विस्थानिकत्वसाधनात् तस्य नः-वृकरणः, हीन । म त्या द्विस्थानिकत्वसाधनाच क्षाम: ॥४॥ क्वचित्त, स्थान- वलस्पर्शबलयोरुभयोरपि विशेषाधानात् सिद्धिः ।। यथा-सरयो- रघोषपरत्वेऽवसाने च विसर्गः। उच्च : पुनः पुन. ॥१॥ अकारात्परः सो हत्वमापद्योत्वमापद्यते अकारघोषपरत्वे । देवोऽस्ति, देवो गत ॥२॥ आकारात्तु सस्य हत्वमापन्नस्य विवृत्ति स्वरघोषपरत्वे । यथा-देवा गच्छन्ति, देवा हमन्ति, देवा आयान्तीत्यादौ । इकारादिभ्य. स्वरेभ्यः परस्तु स रेफतामापद्यते स्वरघोपपरत्वे । यथा-हरिरय, हरिर्गतः । भानुरयं, भानुर्गत. । उच्च रय नीचैर्गतः ॥४॥ स्वरेभ्यो रसयोरघोष- परत्वे तदघोपस्थानीयोष्मा। शिव करोति । हरिश्चिनोति । भानु- ष्टीकते शनैस्तन्वते । उच्च-पठति ॥५॥ इत्येवंविधेष्वादेशविकारेषु वर्णगुणा लुप्यन्ते विपर्यायन्ते वा इत्यूह्यम् ।। अथ प्रकृतिभावः यस्य स्वरूपमेव दर्शयितुमिष्यते । स प्रकर्षण गृहीतत्वात् प्रगृह्यः । स हि सत्यपि विकारनिमित्तप्रत्यासत्तौ प्रगृहीतत्वादेव न स्वरूपाच्च्य- वते । न विकार गृह्वाति । ई ऊ ए-द्विवचन प्रगृह्यम् । हरी एतौ, विष्ण इमौ। द्रव्ये इमे। ईपदर्थमवध्यर्थमाकार त्वक्त्वा एक. स्वरो निपात. प्रगृह्य. । अ. इ. उ. ऋ. ल. ए. प्रो. ऐ. औ। ओकारान्तो निपात. प्रगृह्य. । अहो ईशा. विवक्षानिवन्धनोऽयं प्रकृतिभावो यथाविवक्ष द्रष्टव्यः ॥ इति श्रीमधुसूदन-विद्यावाचस्पतिप्रणीते पथ्यास्वस्तिग्रन्थे सन्धिप्रभेदपरिष्कार: पञ्चमः प्रपाठ ।

पश्यास्वस्ति हिन्दो व्याख्या १ वेद मे वर्णमातृका को पथ्यास्वस्ति कहा जाता है । अतः पथ्यास्वस्ति शब्द का अर्थ वर्णमातृका है। ग्रन्थकार कहते है कि शब्द-ब्रह्म के ज्ञान के विना परब्रह्म का ज्ञान नही हो सकता, अत: परब्रह्म-रूपी अक्षर (अविनाशी) तत्व के ज्ञान के लिए विज्ञानतत्पर श्रीमधुसूदन भा यहाँ शब्द-ब्रह्म का निरूपण कर रहे हैं । अनेक प्रकार का वर्णाक्षर-समाम्नाय लोक मे प्रसिद्ध है। उनमे से यहाँ वैदिक वर्णमातृका का प्रधानतया निरूपण किया जा रहा है । ओष्ठो से ढकी हुई, दांतो से परिवेष्टित सारे वर्णो को उच्चारण करने मे समर्थ वज्ररूपा यह नकुलाकारिणी जिह्वा मुझे सुन्दर शब्दो का उच्चारण करने के लिए प्रेरित करे। वर्णसमाम्नाय (वर्णमातृका) नित्य है। उसकी उत्पत्ति नही होती, स्थान-प्रयत्न-सयोग से उसकी अभिव्यक्तिमात्र होती है। इसीलिए महाभाष्य- कार पतञ्जलि ने 'सिद्धे शव्दार्थसम्बन्ध' इस उक्ति के द्वारा शब्दो को, अर्थों को, तथा उनके पारस्परिक सम्वन्ध को नित्य बतलाया है। २ (१) समान प्रयत्न वाले तथा भिन्न स्थान वाले वर्ण ऋ ल उ ड S य र ल व अ य ha ळ व ग ज ड to व क च ट त प ne श ष स ह १ टे ब्रह्मपी वेदितव्ये शब्दब्रह्म पर च यत् । शान्दे ब्रह्मणि निष्णात परं ब्रह्माधिगच्छति ।। मु उ.

२ ] पथ्यास्वस्ति ३ (२) समान स्थान वाले तथा भिन्न प्रयत्न वाले वर्ण:- है इ अ S अ ग क य य च ऋ र ty ट ष ज ड द व लु ल त स उ व व प how इस प्रकार वैदिक वर्णमातृका के अनुसार ३० शुद्ध वर्ण हैं। इनमे हकार का उच्चारण कही कण्ठ-स्थान से तथा कही अोष्ठ-स्थान से होता है। अत. स्थान-भेद से उसके दो भेद होने पर भी उच्चारण मे कोई भेद नहीं है। अत 'ह' वर्ण एक ही है इस दृष्टि से शुद्ध वर्ण २६ हैं । सनान प्रयत्न वाले तथा दो स्थानो वाले वर्ण ४ अँ ऋ लु उँ-अस्पृष्ट अनुनासिक वं-ईषत्स्पृष्ट अनुनासिक म-स्पृष्ट अनुनासिक इस प्रकार अनुनासिक वर्ग १३ हैं। इस प्रकार प्राकृतिक निरूढ (प्रसिद्ध। वर्ण ४२ हैं। इससे भिन्न वर्ण इन्ही वर्गों के विकार हैं जैसे यौगिक तथा अयोगवाह वर्ण। 46 Na . ल 5 외 ग न ६ ५ यौगिक वर्ण स्वर-व्यजन-भेद मे दो प्रकार के हैं। दीर्घ और प्लुत आ, ई, ऊ, ऋ, ए, अय्, ऐ, प्राइ, प्रो, अव्, औ, आउ ये १६ यौगिक स्वर है । ये प्रत्येक यौगिक स्वर शुद्ध तथा अनुनासिक-भेद से दो प्रकार के हैं । प्रत.३२ यौगिक स्वर होते हैं । वर्गों के द्वितीय वर्ण ख, छ, ठ, थ, फ तथा चतुर्थ वर्ण घ, झ, ढ, ध, भ तथा ढ और ळ ह-ये १२ सायौगिक व्यंजन है। जिनमे उष्म हकार तथा शुद्धस्पर्श- वर्णों का योग है। इस प्रकार मिला कर ३२ + १२ = ४४ यौगिक वर्ण हैं। ७ इनके अतिरिक्त कुछ अयोगवाह वर्ण और हैं। प्रयोगवाहो मे स्वरभक्ति, रङ्ग, अनुस्वार, विसर्ग, औरस्य उष्मा, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय तथा यमो की गणना है। इनमे ऋ, ल, इ-ये तीन स्वरभक्तिया है। आ ई ऊर ये तीन रग-वर्ण कहलाते है। - हिन्दी व्यात्या [ ३ अं अ ये दोनों क्रमश अनुस्वार व विसर्ग कहलाते हैं। १ ह ह्र-ये औरस्य उज्मा कहलाते हैं। -क- इनमे क और प से पूर्व अर्थविसर्गमा चिह्न क्रमश जिह्वा- मूलीय व उपध्मानीय कहलाता है । कुंखु गु घु ये चार यम कहलाते है । उपर्युक्त रोति से अयोगवाह ११ हैं । स्वरभक्ति - ऋऔर लूवर्णो मे क्रमश रेफ और लकार के चारो तरफ स्वरभक्ति है। याज्ञवल्क्य ने शिक्षा मे इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जैसे- "लोर्मध्ये भवत्य मात्रा रेफलकारयो.। तस्मादस्पृष्टता न स्याद् ऋतृकारनिरूपणे ।।" अर्थात् ऋऔर लवर्गों में क्रमश आधी मात्रा रेफ और लकार की है और ये ईचत्स्पृष्ट प्रयत्न वाले हैं। अत ऋ और लू को अकारादि वर्गों की तरह अस्पृष्ट नही माना जा सकता । ऋकार और लकार में विद्यमान स्वरभक्ति का सम्प्रदायभेद से चार प्रकार मे उच्चारण किया जाता है। कुछ व्यक्ति उस स्वरभक्ति का प्रकार के समान उच्चारण करते हैं, जैसे ऋषि का रषि । प्राच्य लोग इकार के समान जैसे ऋषि: रिषि। उदीच्य लोग उकार के समान जैसे ऋषि-रुषि । और माध्यन्दिन-शाखा वाले उसका एकार के समान उच्चारण करते हैं जैसे ऋषि-रेषि। इसीलिए "ऋकारस्य तु सयुक्तासयुक्तस्या- विगेपेण सर्वत्रैवम्” इस प्रतिज्ञा-सूत्र में तथा " - ऋकारो हल्वियुग्युक् च सैकार- श्छन्दमि स्मृतः" इस केशवी के वचन मे ऋकार की स्वरभक्ति का एकार के - १ तत्र द्वावीरसौ ह इति र इनि, इस प्रकार याज्ञवल्क्यशिक्षा मे ह तथा म को हो औरस्य उष्मा बतलाया है न कि हू बहू को किन्तु यहां भी 'ह्र' अन्तस्यो का तथा 'ह्म' पञ्चम वर्गों का बोधक है। अर्थात् य, र, ल, व, इन अन्त.स्य वर्गों के साथ वर्गों के पञ्चम वर्ण ड, ञ, ण, न, म, के परे होने पर उससे पूर्ववर्ती हकार उर स्थानीय होता है । इसीलिए टीकाकार श्रीअमरनाथ दीक्षित ने याज्ञवल्पयोक्त उपर्युक्त अन्य को व्याख्या करते हुए कहा है-वर्गपञ्चमैरन्तत्याभिश्च युतो द्विविधो हकारो बसहशो मसहशश्च प्रोन्सो ज्ञेय । या. शि. पृ. १५२ २ ऋवर्ण जैसे हल (व्यञ्जन) से संयुक्त हो या वियुक्त, वेद मे उसका उच्चारण एकार का होता है।

४ ] ४ पथ्यास्वस्ति - समान उच्चारण बतलाया है। जैसे कृष्ण-क्रष्ण, ऋत्विय = रेत्विय , क्लुप्त वलेप्त। इन सूत्रो मे इकार व उकार के समान उच्चारण का निषेध किया है। उपर्युक्त रीति से अ, इ, उ, ए ये चार अर्धमात्रिक स्वरभक्तिया सम्प्रदायभेद से है। इनके उच्चारणमात्र मे सम्प्रदायभेद से भेद हैं । लिपि सभी मतो मे समान है-ऋ, ल। क्योकि उच्चारण के अनुसार लिपि का भेद नही बन सकता। अकारादि उच्चारण के समान लिपि मे भेद करने पर ऋ के स्थान मे र, रि, रु या रे लिपिया होगी और इन लिपियो मे अकारादि स्वर एकमात्रिक है जब कि ऋकार और लकार मे विद्यमान स्वरभक्ति 'अर्धमात्रिक है। अर्धमात्रिक का उच्चारण तो बन सकता है पर लिपि मे अर्धमात्रिक अकारादि की पृथक् लिपि नही है। अत लिपि मे ऋ ल ही लिखे जाते हैं। लकार के उच्चारण मे प्राय लकार के वाद रेफ का उच्चारण और करते है। जैसे ललि । पर यह सगत नही है क्योकि ल मे केवल लकार और स्वरभवित ही है न कि रेफ । ६ ह भी स्वरभक्ति है। ह मे रेफ लकार का भी वोधक है और हकार उम वर्णों का वोधक है। अत यह सिद्ध होता है कि र और ल से उष्म-वर्ण के परे होने पर दोनो के बीच मे स्वर के समान एक ध्वनि उत्पन्न होती है उसे स्वर- भक्ति कहते है। इसीलिए याज्ञवल्क्य-शिक्षा मे लिखा है- ज्ञेया "रलाभ्यां पर उष्मारणो यत्र तु स्यु स्वरोदया । स्वरभक्तिरसौ पूर्वमाक्रम्य पठ्यते ।। १ ।। स्वरभक्ति प्रयुखानस्त्रीन दोपान्परिवर्जयेत् । चाप्युकारञ्च ग्रस्तदोप तथैव च ।। २ ।। इकार स्वर- अर्थात् र और ल से परे उष्म-वर्ण ग, प, म हो तथा उनसे परे कोई स्वर हो तो वहा दोनो के बीच अर्थ अकार की तरह एक ध्वनि उत्पन्न होती है उसे स्वरभक्ति कहते है। इस स्वरभक्ति का उच्चारण पूर्व वर्ण रेफ के साथ होता है। भक्ति का प्रयोग करने वाला इकार, उकार तथा स्थान-करणनिष्पीडनरूप सवृतता इन तीन दोपो का परित्याग करे। अर्थात् स्वरभक्ति का उच्चारण न पर्व इकार की तरह, न अर्घ उकार की तरह और न स्थान-व करण का निष्पीडन , १ 'स्वरमक्ति' शब्द का अर्थ ही स्वर का भाग है न कि पूर्णस्वर । ही होती है न कि अकारादि स्वरो की तरह एकमात्रिक । मत' वह अर्धमात्रिक हिन्दी व्याख्या [ ५ करते हुए करे अपि तु अर्घ अकार या एकार की तरह करे। इसीलिए- "'अथापरान्तस्थस्यायुक्तान्यहल सयुक्तस्योष्मऋकारैरेकारम हितोच्चारणमेव तृतीयान्तस्थस्य" इस कात्यायनीय प्रतिज्ञासूत्र में स्वरभक्ति का उच्चारण एकार की तरह बतलाया है। इसी प्रकार अहल गल्यूज़ रेफस्य सैकार प्राक् च' इस नवासूत्र , विहल गल्यूलरेफो य संकार प्राक् समुच्चरेत्' इस केगवी- वचन में '४रेको रेकारमाप्नोति शषसहेषु परेपु च' इस माध्यन्दिनीय वचन मे भी यही वात बतलायी गयी है। "रलावृल वर्णाभ्यामुष्मरिण स्वरोदये सर्वत्र” इस प्रातिशाख्य के अनुसार रेफ और लकार से परे उष्म-वर्णो के होने पर दोनो के मध्य अर्धमात्रिक ऋकार और लकाररूप स्वरभक्ति का व्यवधान है। रेफ और उष्मवर्गों के बीच विद्यमान उस स्वरभक्ति का उच्चारण रेफ और लकार की तरह होता है अर्थात् ऐसे स्थान मे द्विरुक्त रेफ और द्विरुक्त लकार का सा उच्चारण होता है। जमे-अर्ग -अर्रश , वल्गा-वल्लगा इत्यादि उदाहरणो मे स्पष्ट है । इस प्रकार रेफ, लकार और उप्म-वर्णो के मध्य स्वरभक्ति का उच्चारण अकार की तरह, एकार की तरह, और द्विरुक्त रेफ व द्विरुक्त लकार की तरह मतभेद से उच्चारण होता है। किन्तु अथर्ववेदीय इस स्वरभवित का उच्चारण इकार की तरह करते हैं। जैसा कि माण्डूकी शिक्षा मे कहा है--"सम्यगेना यदा पश्येत् गतवलिनेति निदर्शनम" । ऋग्वेदीय इसका उच्चारण उकार की तरह करते है जैसे धूर्पदम् = झापदम। जहाँ उष्म-वर्गों से परे स्वर होता है वही इस स्वरभक्ति का उच्चारण होता है और जहाँ व्यजन होता है वहाँ नही । जैसे वर्म शब्द मे उष्म मे परे 'म' व्यजन के होने से रेफ और 'प' के वीच स्वरभक्ति का उच्चारण नही होता । १ अन्य हल बों से असंयुक्त तथा श ष स ह ऋकार वर्गों से संयुक्त अपरातस्थ(र) तथा तृतीयान्तस्य(ल) वर्ण का एकार-महित उच्चारण होता है । २ हल् (व्यजन) रहित शल्प्रत्याहार (श, ष, स, ह.) परे होने पर उनसे पूर्व रेफ का एकार सहित उच्चारण होता है। ३ हल्-रहित शल् प्रत्याहार परे होने पर उससे पूर्व रेफ का एकारसहित उच्चारण होता है और वह एकार पूर्ववर्ती रेफ का अङ्ग होता है। श ष स ह इन दरों के परे होने पर रेफ का रेकार की तरह उञ्चारण होता है । ५ इस तथ्य का प्रतिपादन याज्ञवल्क्य-शिक्षा मे 'स्वरोदया.' पद से, प्रतिज्ञा-सूत्र मे।

६ ] पय्यास्वस्ति रङ्ग - १० 'देवा एह, महा ५ असि' इत्यादि मे विशुद्ध प्राकार से परे नासिका से उच्चार्यमाण वर्ण रङ्ग कहलाता है। तालुस्थानीय स्पृष्टप्रयत्नीय मृदु अनु. नासिक वर्ण नकार के तालु, मृदु व स्पृष्टत्व गुणका नाश होने से अर्धमात्र उस नकार वर्ण के स्थान मे अर्धमात्र अनुनासिक-विवृतिरूप अकार शेप रह जाता है। व्य जन नकार का पूर्व स्वर के द्वारा अनुरजन होने से नकार की स्वर की तरह प्रतीति होती है। अत पूर्वस्वररजन के कारण यह नकार रङ्ग कहलाता है। इसे अनुस्वार नही कह सकते क्योकि अनुस्वारस्थल मे स्वर और अनुस्वार का अव्यवधान होने से पूर्व स्वर अनुस्वार से ग्रस्त प्रतीत होता है। जैसे राम हरि, आदि मे अकार और इकार अनुस्वार से ग्रस्त प्रतीत हो रहे हैं और रङ्ग- स्थल मे रग का दीर्घ स्वर से पृथक् उच्चारण होने के कारण स्वर उससे ग्रस्त प्रतीत नही होता। अत यह रग दर्ण-अनुस्वार से भिन्न है। इसीलिए याज्ञवल्क्य-शिक्षा मे कहा है- "रङ्गवर्ण प्रयुञ्जीरन् नो ग्रसेत् पूर्वमक्षरम् । दीर्घ स्वर प्रयुञ्जीयात् पश्चान्नासिक्यमाचरेत् ।। रङ्ग वर्ण का प्रयोग करते समय पूर्व स्वर को रग से ग्रस्त न करे अर्थात् इस प्रकार शीघ्रता से रग-वर्ण का उच्चारण न करे जिससे रगवर्ण के कारण पूर्व स्वर मे ग्रस्तता आ जावे। उसके पहले दीर्घस्वर का प्रयोग करे, पश्चात् नासिक्य रगवर्ण का उच्चारण करे। अनुस्वार १३. अ, यहाँ पर स्वर के बाद नासिका से उच्चार्यमाण वर्णअनुस्वार है। 'अयुक्तान्यहल' पद से, नवादसूत्र ने 'अहल-शलि' मे 'पहल' पद से, "विहल्-शलि' इत्यादि केशवीवचन मे विहल पद से किया गया है। 'स्वरोदयाः' का अर्थ है-शकारादि उष्मवर्णों के बाद स्वर होना चाहिए न कि हल्-वर्ण । 'प्रयुक्तान्यहलः का अभिप्राय है कि शकारादि उष्मवर्ण हल (व्य जन) वर्णों से युक्त नहीं होने चाहिएँ। अहल तथा विहल पद का भी यही अभिप्राय है कि शकारादि वरणं हल्-रहित होने चाहिये, अर्थात् उनका संयोग किसी व्यंजन से नहीं होना चाहिए।

हिन्दी व्याल्या [ ७ ७ यहाँ अनुस्वार की नकार को तरह प्रतोति होता है। किन्तु नकार मृदुस्पृष्ट वर्ण है जब कि अनुस्वार ईवस्तृष्ट वर्ण है। अत यह नकार से भिन्न वर्ण है। श, ष, स, ह इन वर्गों के परे होने पर अनुस्वार का उच्चारगा तीन प्रकार का होता है। यहाँ अनुस्वार का नकार-ध्वनि के समान उच्चारण वह वृच (ऋग्वेद वाले) करते हैं जैसा कि पाणिनिशिक्षा मे कहा है-'श, ष, स, ह के परे होने पर तूवीवीरणा के गब्द के समान दन्तमूलमात्र से उच्चारित होने वाले स्वरपश्चाद- मावी अनुस्वार का उच्चारण करना चाहिए। जैसे-वन्शः, कन्स. इत्यादि में। यहाँ अनुस्वार के बाद जो 'न्' व्यजन लिखा गया है उसका तात्पर्य यह है कि अनुस्वार दन्त्य-अनुनासिक है, अत इसका उच्चारण नकार की तरह होता है पर यह नकार नही है। अन्य वर्गों के परे होने पर जैसे अनुस्वार का अनुस्वार शब्द से व्यवहार होता है वैसे ही श, प, स, ह इन वर्णो के परे होने पर अनुस्वार-व्यवहार ही होगा। प्रकार या गुवार आदि अन्य नाम इसका नहीं होगा। १२ छन्दोगशाखा वाले (सामवेदीय) इस अनुस्वार की मकार के समान ध्वनि मानते हैं और व्यवहार के लिए इसका नाम मकार रखते है। जैसा कि नारद- शिक्षा में कहा है : "पापद्यते मकार रेफोष्मसु प्रत्ययेष्वनुस्वार । यवलेषु परसवर्ण स्पर्गेषु चोत्तमापत्तिम् ॥ अर्थात् रेफ और म, प, म, ह के परे होने पर अनुस्वार को मकार होता है, य, र, ल, व परे होने पर परसवर्ण और स्पर्शवों के परे होने पर उसी स्पर्श का पञ्चम वर्ग होता है। अथवा "अनुस्वार रोष्मसु मकार इस कात्यायन-प्राति- शाख्यसूत्र की एकवाक्यता नारदशिक्षा के साथ मानने पर यहा नारदीयशिक्षा के वचन मे भी अनुस्वार को मकार हो जाता है इत्यर्थक "प्रापद्यते मकारो रेफो- प्मसु प्रत्ययेष्वनुस्वारम्” यह पाठ मानना होगा। अथवा नारदीय निक्षा के उत्तर पाठ के अनुसार मकार के स्थान में अनुस्वार का विधान मानने पर भी उसका अभिप्राय यही माना जायगा कि छन्दोग-सम्प्रदाय के अनुरोध से रेफ उष्म आदि १ मलावुवीरणानिर्घोषो दन्तमूल्य. स्वरानुग. । अनुस्वारस्तु कर्तव्यो नित्यं ह्रो शषसेषु च ॥ पा० शि.

८ ] पथ्यास्वस्ति वर्णो के परे होने पर अनुस्वार की मकार के सदृश ध्वनि होती है। अत छन्दोग- सम्प्रदाय के अनुसार 'वम्गः, कम्स ' ऐसा उच्चारण होता है अर्थात् यहाँ अनुस्वार की ध्वनि मकार के समान है न कि अनुस्वार को मकार ही हो जाता है-यह तात्पर्य है। १३ उपर्युक्त स्थानो मे अध्वयुं लोग अनुस्वार की ध्वनि मकारसदृश मानते है । जैसे- त (ड्) राम (ङ) रावणारिम् । सि (ड) ह । व (ड् ) श । क (इ) स । कण्ठ्य अनुनासिक होने से अनुस्वार के उच्चारण में डकार का आभासमात्र होता है न कि यह डकार हो जाता है। डकारमश ध्वनि की व्यवहार के लिए 'गु' मज्ञा की गई है । आज-कल तो वेद का उच्चारण करने वाले 'गु' शब्द का ही उच्चारण करते है किन्तु यह उनका अज्ञान है। क्योकि जिस प्रकार अनुस्वार सजागब्दमात्र है उसी प्रक' र 'कु खु गु घु' ये भी यमो की सजा- मात्र हैं स्वरूपपरक नहीं। 'स्वरूप शब्दस्याशब्दसज्ञा' इस सूत्र के द्वारा पाणिनि ने स्पा कर दिया है कि जहाँ जब्द सजा होती है वहाँ शब्द अपने स्वरूप का बोधक नही होता है । यमप्रकरण मे सज्ञाशब्द स्वरूप का बोधक होता है, अनुस्वारप्रकरण मे नही, ऐसा भ्रम करना असगत है, क्योकि जो अर्थ एक जगह माना जाता है वही अन्यत्र भी मानना चाहिए । एक शास्त्र मे जव निर्णय कर लिया गया कि शब्दसज्ञा अपने स्वरूप का बोधक नही तो उस शास्त्र मे सभी जगह यही सिद्धात मानना होगा और यदि यमस्थान में गुशब्द का उच्चारण किया जायगा तो गु शब्द के द्विमात्रिक वर्ण होने से नियता- क्षर छन्द का व्याधात होने से कर्मलोप होने लग जायगा। 'मित्र समृज्य पृथिवी भूमिं च ज्योतिपा सह । मसृज्य पृथिवी बृहज्ज्योति समेधिरे ।। दृहस्व देवि पृथिवि स्वस्तये। अहसः, द ष्ट्राम्याम, मा हिंसी ॥' इत्यादि मे गुंशब्द का उच्चारण करने वालो को अभीष्ट छन्द का भगरूप दोष तथा अर्थवोध मे क्लेशरूप दोष का भागी बनना पडेगा। प्रकृतिसिद्ध तीन प्रकार के उच्चारणो मे एक पक्ष मे व्यवस्थापक शास्त्रो का तात्पर्य मानने से वे शास्त्र चरितार्थ हो जाते हैं । अत. उन शास्त्रो का गुगब्द के उच्चारण मे तात्पर्य मानना असगत है और गुगब्द के उच्चारण मे तात्पर्य मानना शास्त्रानुसारी भी नहीं है। अतः रुद्रः हिन्दी-व्यात्या [६ 'अनुस्वारस्यगुमित्यादेश, गपसहरेफेषु' इस प्रतिज्ञासूत्र में इति शब्द के उल्लेख से गु-गब्द स्वल्पपरक है संज्ञापरक नहीं। ऐसा आजकल के वेदपाटियो का कयन भी अनानविजृम्भित है। क्योंकि प्रतिज्ञासूत्र मे इति शब्द 'कु खु ग घु यमा , मे उक्त गुकार का स्मारक है, अत उसका तात्पर्य स्वरूपपरता मे नही है। अर्थात् जैसे गु आदि शब्द यमया उच्चारण के वोधक है उसी प्रकार अनुस्वार-शब्द भी अनुस्वारसदृश उच्चारण का बोधक है । वश , हवीषि, कस , सिंह , त रामम् इत्यादि मे अनुस्वार का, नकार, मकार और डकार इनमे से किसी एक रूप से उच्चारण प्रकृतिसिद्ध है। किसी वेद मे नकार-रूप से किसी मे मकाररूप से तथा किसी मे डकाररूप से होता है। यह व्यवस्था वेद-भेद से समझनी चाहिए। ४. विसर्ग १४ अ-यह विसर्ग है। यहां अकार स्वरमात्र का बोधक है। स्वर के बाद हकार की तरह प्रतीयमान हकारभिन्न विक्षेपक ध्वनि विसर्जनीय या विसर्ग कहलाती है। जैसे-रामः, अग्नि आदि मे। विसर्ग में हकारसदृश ध्वनि है और यह हकार की तरह प्रतीत होता है, पर विसर्ग हकार नहीं है, क्योकि हकार अर्धस्पृष्ट प्रयत्न वाला है तथा स्वरभक्तिसहित होता है और विपर्ग ईषत्स्पृष्ट प्रयत्नवाला है तथा स्वरभक्ति से रहित है । अतः विसर्ग हकार से पृथक् वर्ण है। जैसा कि कहा है-'जैसे लघुचित्त वाले छोटे सर्प का उच्छ्वास होता है उस प्रकार की ध्वनि उष्मा मे करनी चाहिए और हकार का परित्याग करना चाहिए। यहां हकार-परित्याग का तात्पर्य स्वरभक्ति-परित्याग में है। यह विसर्ग हकार ने भिन्न है तयापि उष्म शब्द से इसका व्यवहार होता ही है। इसीलिए पाणिनि ने कहा है कि-२ अोभाव, विवृत्ति, श, ष, स, रेफ, जिला- मूलीय तथा उपध्मानीय, ये ८ गतियाँ उष्मा की होती हैं। ५. औरस्य उष्मा १५ ह्न ह्र-ये औरस्य उज्मा कहलाते हैं। यहाँ नकार-मकार और णकार का तथा रेफ-य, व, ल का भी बोधक है। इसीलिये अभियुक्तो ने कहा है कि-3 १. यथा बालस्य सर्पस्य उच्छवासो लघुचेतसः । एवमुष्मा प्रयोक्तव्यो हकारं परिवर्जयेत् ॥ २. प्रोमावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च । जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविघोष्मणः । ३. हकार पञ्चमर्युक्तमन्तःस्यामिश्च संयुतम् ।

१० ] पथ्यास्वस्ति वर्गों के पचम वर्णो से तथा अन्त स्थ य, र, ल, व से युक्त हकार औरस्य कहलाता है, तथा इनसे असयुक्त हकार करणठ्य कहलाता है। औरस्य हकार के उदाहरण-पूर्वाह्न , वह्नि , ब्रह्मा, मह्यम्, ह्रद , ह्लाद , विह्वल आदि है । ६. जिह्वामूलीय व उपध्मानीय १६ । क ख मे क व ख से पूर्व जो हकार सदृश ध्वनि है, उसे जिह्वामूलीय कहते है। पफ-इस प्रकार प और फ से पूर्व हकारसदृश ध्वनि को पध्मानीय कहते हैं। क्रमश क । कवि, क खल , क " पटु, क " फली इनके उदाहरण है। ७. यम १७ नासिक्यभिन्न स्पर्श से नासिक्यस्पर्श के परे होने पर मध्य में पूर्वसदृश वर्ण जो कि अनासिक्य व नासिक्य मे भेद करता हुया उच्चारित होता है, उसे यम कहते हैं। वे स्पर्शवर्ण स्थान व करण के स्पर्श से उत्पन्न होते हैं, ऐसा स्वभाव है। किन्तु स्पर्शवों के बाद जब यम-वर्ण होता है तो वह स्थान और करण के स्पर्श के विच्छेद से उत्पन्न होता है और पूर्वस्पर्गवर्ण के सदृश होता है। वह यम अर्थात् स्थान और करण के स्पर्श की विरति या विच्छेद से उत्पन्न होता है, अत इसे यम कहते हैं । इस प्रकार स्थान-करण के स्पर्श के विच्छेद से उत्पन्न प्रतिध्वनि यद्यपि पद के अन्त मे और अन्त स्थ वर्ण तथा पश्चम वर्गों के परे होने पर उत्पन्न होती है। जैसे- रामात्त्, शुक्र , अग्नि. इत्यादि मे । तथापि वर्गों के पंचम वर्ण के परे होने पर नासिक्यता के वैलक्षण्य के द्वारा यह प्रतिध्वनि यम-नामक पृथक् वर्ण मानी जाती है। जैसे वृक्कण , पलिक्नी, रुक्मम्, रत्त्नम्, प्रात्त्मा, स्वप्प्न , पाप्प्मा इत्यादि मे द्वितीय स्पर्शवर्ण जो कि अनुनासिक से पूर्व है, यम है। ये यम वर्गों के पञ्चम वर्ण से पूर्व-वर्गों के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ स्पर्शवर्ण हैं, ये सख्या मे २० हैं। प्रत २० यम कहलाते है ऐसा एकदेशी का मत है। कुछ का कहना है कि क, ख, ग, घ ये चार ही यम हैं। कतिपय आचार्यों का मत है कि द्वित्वसिद्ध चार वर्ण ही यम हैं, तैत्तिरीयों का मत है कि यम वर्ण का आगमरूप है। आक्नी सक्थ्क्ना, यज्ञ. में क और ङ जो कि वर्णागम है, यम हैं । 'ङ' रूप यम परे होने पर उसके प्रभाव से ज को ग हो जाता है। अत यज-शब्द मे गकार डकार व प्रकार का संयोग है। यज्ञ-शब्द में आर्ष उच्चारण के वाहुल्य से यमसहित उच्चारण करने वाला हिन्दी-व्याख्या [ ११ सम्प्रदाय ही चल गया है। केवल लोक में प्रयुक्त शब्दो मे यमसहित उच्चारण करने का सम्प्रदाय नही चला है। जैसे -'याज्ञा' शब्द का यमरहित ही उच्चारण होता है। इसलिए यहाँ डकार यम के अभाव से तत्प्रभावजन्य च को क नही हुआ है। कुछ की ऐसी मान्यता है कि 'राज्ञ' मे जकार व प्रकार के मध्यवर्ती यम जकार को न के प्रभाव से प्राप्त तालुस्पृष्ट नासिक्यता के प्रयत्नविरोध द्वारा न होने से उसके स्थान का परिवर्तन होकर द्रुति के कारण ग हो जाता है, और गकार के परे होने से पूर्व जकार को भी ग हो जाता है। यदि यह कहे कि अकार तालुम्पृष्ट नासिक्य वर्ण जव विद्यमान है तो प्रयत्न का विरोध न होने से ज को ञ होने मे क्या आपत्ति है तो यह भी सगत नही, क्योकि त्र के नासिक्य अन्तस्थ वर्ण होने से वह ईपत्स्पृष्टप्रयत्न वाला है और वर्णागम जकार-रूप यम स्पृथुप्रयत्न वाला है, इस प्रकार प्रयत्न-विरोध विद्यमान है। कुछ विद्वानो का कहना है कि न तो बीस यम हैं और न चार और न यम वर्ण ही हैं, किन्तु यम अशरीर है, अत: उसका उच्चारण नही होता। अत. 'अमोधनन्दिनीकार ने स्पष्ट कहा है कि 'समाज्ज्मि' मे दो जकार एक मकार और एक मकार के ऊपर विद्यमान रेफ है, अत यम को अशरीर मानना चाहिए। कात्यायन ने भी कहा है कि पञ्चम वर्गों के परे होने पर पश्चमेतर वर्ण विच्छेद को प्राप्त होते हैं। यह विच्छेद ही यम है। अत एव यह अशरीर है। 'रुक्क्म' इत्यादि मे क को द्वित्व होने पर उसके पश्चात् पञ्चम वर्ण से पूर्व नासिक्य तथा अनासिक्यवर्णों के विरोध के फलस्वरूप दोनो के मध्य यति (विरति, विच्छेद) उत्पन्न होता है। यह विच्छेद ही यम है। अत यम कोई वर्ण नही है। विभिन्न उच्चारण-सम्प्रदायो के कारण यम के विषय मे चार मत है। चारो ही मतो मे पूर्व अक्षर के होने पर यम होता है अन्यथा नहीं। सिद्धान्तकौमुदी में यम का जो उदाहरण 'घ्नन्ति' दिया है, उसे 'निघ्नन्ति' समझना चाहिए। अन्यथा पूर्व अक्षर के न होने से वह यम का उदाहरण नही बनेगा। ज्ञान-शब्द मे यम नहीं है। ज्ञा-धातु मे गकार तथा अनुनासिक एवं तामव्य ईषत्स्पृष्ट प्रयत्न वाला अकार है न कि यम। इस प्रकार १७ अक्षरो का यह आर्ष वर्णसमाम्नाय है। प्रत । ग्रत १. जकारो द्वो मकारश्च रेफस्तदुपरि स्थितः । प्रशरीरं यमं विद्यात संमाज मोति निदर्शनम् ।।

१२ । पथ्यास्वस्ति कितने हो निरूढ, यौगिक तथा अयोगवाहो से भिन्न १० श्रीपपादिक वर्ण और मानते हैं। उनको मिलाने मे १८७ वर्ण छादोभापा मे होते हैं। वे निम्नलिखित है। पा म ३ (२) अ इ ई ऊ उ ३ ऋ३ ऋ ऋ इस प्रकार ह्रस्व दीर्घ प्लुन भेद से भावो स्वर १४ हैं । लवर्ण दीर्घ नही होता। ए ३ ॥ ऐ ओ ओ ३ ॥ प्रो ऐ ३ औ ३ ३ (४) उपर्युक्त दोनो प्रकार के स्वर उदात्त, अनुदात्त व स्वरित भेद से तीन प्रकार के हैं अत ६६ स्वर हो जाते हैं। इन सबमे शुद्धस्वरत्व, विवृतत्व तथा अस्पृष्टत्व-साधर्म्य है। लकार प्लुत भी होता है अत इसके ३ भेद और इस मत मे बढ जाते हैं। (५) रल-पूर्वक उष्मवर्ण तथा ऋ, मे स्वरभक्ति भी होती है। जैसे-स्पर्श, हर्षः, अर्ह इनमे रेफ और उष्मवर्गों के बीच स्वरभक्ति है। ऋ और ल में दो स्वरभक्तियो के बीच रेफ और लकार है। जैसा कि कात्यायन ने कहा है- 'ऋवर्ण और लवर्ण मे क्रमश दो रेफ व दो लकार है वे मिले हुए हैं । (६) ऽ य र ल व-ये ५ ईपत्स्पृष्ट, अन्त स्थ, ईपन्नाद प्रयत्न वाले है । इन पाँ) में पहला वर्ण ऽ विवृत्ति है। जैसा कि याज्ञवल्क्य ने कहा है जहाँ दो स्वरो के मध्य सन्धि नहीं है वहाँ विवृत्ति समझनी चाहिए। य ऽ ईश इसका उदाहरण है। (७) अ, य, ड, ळ , व-ये पांच वर्ण दुस्पृष्ट अन्तस्थ है। इनमे प्रथम वर्ण 'अ' संवृत प्रकार है। ह्रस्व प्रकार का परिनिष्ठित (सिद्ध) अवस्था मे सवृत प्रयत्न तथा प्रक्रियादशा मे विवृत प्रयत्न होता है। किसी ने जो यह कहा है कि प्रउग शब्द में यकारस्थानीय, यकार के विकार से उत्पन्न सवृत अकार है और उकार १. ऋलवरों रेफलकारी संश्लिष्टावश्रुतिधरावेककी । का प्रा. ४/१४६ २ द्वयोस्तु स्वरयोर्मध्ये सन्धियंत्र न दृश्यते । विवृत्तिस्तत्र विशेया या ईशेति निदर्शनम् ॥

हिन्दी-व्यास्या यहाँ विवृत है। इसीलिये भिन्न प्रयत्न होने से यहाँ सन्धि नही हुई है वह असंगत है। क्योकि यकारस्यनीय विवृत्ति मानने पर भी सन्धि का अभाव सिद्ध हो सकता है। अत सन्ध्यभाव के लिए प्रयत्नभेद मानने की आवश्यकता नही। वस्तुतस्तु 'प्रउगम्' मे ईपत्स्पृष्ट यकार को प्लुति-प्रतिक्षेप के कारण वकार हो जाता है और सजातीय उकार से उसका अभिभव हो जाने से अभिव्यक्ति नहीं होती और उसका लोप हो जाता है। अत यकार के स्थान मे सवृत अकार व विवृत प्रकार का आदेश मानने की आवश्यकता नही है। प्र-शब्द का प्रकार यहाँ सवृत है और उकार विवृत है। अत प्रयत्नभेद के कारण सन्धि नहीं होती। (८) दुःस्पृष्ट य और व की स्थिति पद के आदि मे तथा य र ह और अनुस्वार से पूर्व होने पर होती है। दुस्पृप्ट य, व के उच्चारण मे ईपत्स्पृष्ट यकारादि की अपेक्षा अधिक स्पर्ग तथा स्पृष्ट वर्गों की अपेक्षा अल्प स्पर्श होता है, अत. इन दोनों प्रकार के वर्णो की प्रतीति यहाँ होती है। जैसा प्रतिज्ञासूत्र में कहा है.- 'अथान्तस्थानामाद्यस्य पदादिस्थस्यान्यहल्सयुक्तासयुक्तस्य रेफोमा न्त्याभ्यामृकारेण चाविशेपणादिमध्यावसानेषु उच्चारणे जकारोच्चारण द्विर्भावेऽप्येवम् ।' इति यहाँ लघु प्रयत्नतर यकार का जकार के समान उच्चारण बतलाते हुए कात्यायन को यकार व जकार का मध्यमवृत्ति से उच्चारण अभीष्ट है। ने भी कहा है- पाद के आदि में, पद के आदि में, संयोग मे, अवग्रह में, 'ज' शब्द का प्रयोग करना चाहिए तथा अन्यत्र य-शब्द का उच्चारण करना चाहिये। यहाँ ज-शब्द से-जिसमें जकार की सी प्रतीति होती है ऐसा उच्चारण अभिप्रेत है न कि जकार का उच्चारण ही अभिप्रेत है। यदु., यम. शय्या, निकाय्यम्, सूर्य , वीर्यम् आदि इसके क्रमश उदाहरण हैं। आन्तर्यम् में भिन्न स्थिति वाले रेफ और यकार के सयोगो के उच्चारणक्रम मे जो भेद दिखाई देता है, तव रेफ का पूर्वाङ्गत्व व पराङ्गत्व यकार के ईपत्स्पृष्ट व दुःस्पृष्ट होने मे कारण है। जहाँ नारद १ १. पादादौ च पदादौ च संयोगावग्रहेषु च । न. शन्द इति ज्ञेयो योऽन्यः स य इति स्मृतः। नारद-क्षिक्षा ।

१४ ] पथ्यास्वस्ति रेफ पूर्वाङ्ग है वही यकार दु स्पृष है। अर्थात् प्रान्तर्यम्' मे रेफ यकार का तथा यकार मकार का सयोग है। इनमे रेफ जब पूर्व अक्षर का अङ्ग होता है, तव दु स्पष्ट यकार का उच्चारण होता है और जब रेफ पर अक्षर का अंग होता है, तब ईषत्स्पृष्ट यकार का उच्चारण होता है । सह्य, वाह्यम, अहयु . गयु इन उदाहरणो मे यकार के दु स्पृष्ट होने पर अनुस्वार अथवा अनुनासिक यकार का उच्चारण होता है, और जो यहाँ यकार को ईपत्स्पृष्ट मानते हैं उनके मत मे 'शम्यु' इस प्रकार का उच्चारण होता है। वर , वीर , वाय्वो , सर्व विह्वल , गवूक आदि मे दु.स्पृष्ट वकार की स्थिति पदादि की तरह पदमध्य मे तथा सयोगादि में भी है। देव , गिव , काव्यं, भव्यम्, यम्या, यद्यपि इत्यादि मे तया विश्व, विद्वान् इत्यादि मे प्रथम यकार व वकार गुरु प्रयत्न वाले होने से दुस्पृष्ट होते है मौर द्वितीय यकार-वकार लघु प्रयत्न वाले होने से ईषत्स्पृश्ट है। (९) पद के आदि मे तथा सयोग के आदि मे दु स्पृष्ट डकार नहीं होता। डमरु कुड्य , वड आदि इसके उदाहरण हैं। कुड्मल आदि मे कही कही स्पृष्ट व दु स्पृष्ट डकार का विकल्प है। दो स्वरो के मध्य मे दुस्पृष्ट 'ड' का उच्चारण होता है। जैसे निगड मे। वेद मे दो स्वरो के मध्य मे ड को ळ हो जाता है। जैसे 'अग्निमीळे' आदि मे। माध्यन्दिन शाखा वालो के लिये यह नियम नही है। (१०) ह, श, ष, स, ह ये पाँच ऊष्म-वर्ण ईषच्छवास तथा अर्धस्पृष्ट प्रयत्न वाले है। इनमे आदि और अन्त के हकार क्रमश जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय है। जिह्वामूलीय तथा कण्ठ्य हकारो का उत्पत्तिस्थान देश समान है, अत. कण्ठ्य हकार का भी जिह्वामूलीय हकार से ग्रहण होता है। हकार के पाँच स्थान है-कण्ठस्थानीय तथा तीव्र स्पृष्ट प्रयत्न वाले वर्ण से पूर्व हकार जिह्वा- मूलीय कहलाता है। जैसे "क" ख मे क व ख से पूर्व हकार का कण्ठस्थान तथा तीव्र स्पृष्ट प्रयत्न है। वही हकार जब ओष्ठस्थानीय तीव्रस्पृष्टप्रयत्न वाले वर्ण से पूर्व होता है, तव उपध्मानीय कहलाता है। जैसे "प फ। इनमे प व फ से पूर्व हकार उपध्मानीय है क्योकि यहाँ हकार कण्ठस्थानीय क ख वर्ण से पूर्व न होकर प्रोष्ठस्थानीय प फ से पूर्व है। जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के उच्चारण मे समानता होने पर भी स्थानभेद के कारण उन्हे भिन्न वर्ण माना हिन्दी-व्यस्या [ १५ जाता है। जव हकार मुखमध्यभागस्थानीय एवं अर्द्धस्पृष्ट प्रयत्न वाले शकरादि वर्गों से पूर्व होता है, तब वह विसर्जनीय कहलाता है। जैसे 'क राम , क. षडङ्गः, क. मुतः आदि उदाहरणो मे । अन्त मे भी हकार विसर्ग ही कहलाता है। जैसे-'क' इस उदाहरण मे। नासिक्य अन्तस्थ वर्ण के परे होने पर हकार औरस्य कहलाता है। जैसे-ह्न, ह्र इन उदाहरणो में । शिक्षाकार 'अयोगवाहो को आश्रयस्थानभागी मानते हैं। अत प्रकार व ऋकार से परे विसर्ग कण्ठ्य, इकार ऐकार से परे तालव्य, उकार औकार से परे प्रोष्ठ्य, एकार से परे कण्ठतालव्य, ओकार से परे कण्ठोष्ठ्य माना जाता है । तया पूर्वस्वरस्थानभागी होने से स्वरभक्ति के भी पूर्व स्वर के स्थानभेद से विभिन्न स्थान होते हैं। अर्थात् पूर्वस्वर का जो स्थान होता है वही स्थान उसके बाद आने वाली स्वरभक्ति का होता है। अत विसर्ग की तरह विभिन्न स्वरों से परे आने वाली स्वरभक्ति के भी स्थान बदलते रहते हैं देवं सह, मति सा हि, सर्वः सा हि, पशु. स , नौ मह, मते. सावो, साधो सहोवत् इत्यादि क्रमशः उसके उदाहरण हैं। विसर्ग और स्वरभक्तियों के उच्चारणक्रम में इस भेद का निदर्शन लघुमाध्यन्दिनीय शिक्षा मे किया गया है। नासिक्य तथा अन्त स्थ वर्ण परे होने पर हकार औरस्य कहलाता है। जैसे हू, ह्न, ह्म, ह्य, ह्र, ल, ह्व आदि मे। अस्पृष्ट वर्ण परे होने पर हकार कण्ठस्थानीय माना जाता है। जैसे सह-सहितो हुतो हृदि । इन पाँचो प्रकार के हकारो मे उच्चारण की तथा अर्धस्पृष्ट प्रयत्न की समानता है । (११) मुख मे प्रथम, मध्यम, उत्तम भेद से तीन स्थान हैं। उर , कण्ठ. तथा कर्णमूल ये तीन स्थान प्रथम स्थानत्रय कहलाते हैं। तालुमूल, मूर्धा तथा दन्त- मूल ये तीन स्थान मध्यम स्थानत्रय हैं और सृक्का, उपमा तया प्रोष्ठ ये तोन स्थान उत्तम स्थानत्रय कहलाते है। उनमे प्रथम तीनो स्थानो (उर , कण्ठ, कर्ण- मूल) में और उत्तम तीन स्यानो (सृक्का, उपध्मा, प्रोष्ठ) मे ऊष्म-वर्णो का अर्धस्पृष्ट प्रयत्न होने पर भेदाभिव्यक्ति रहित 'ह' ऐसा समान ही रूप रहता है। तालुमूल, मूर्घा, दन्तमूल इन तीन मध्यम स्थानो मे अर्धस्पृष्ट प्रयत्न वाले ऊन्म- - १. अयोगवाहा विज्ञेया प्राश्रयस्थानमागिनः । इति । पा०शि०। २ प्रविद्यमानो योगः प्रत्याहारेषु सम्बन्यो येषां ते प्रयोगा अनुपदिष्टत्वात् उपदिष्ट- रगृहीतत्वाद प्रत्याहारसम्बन्धशून्या इत्यर्थः। सि. को. तत्त्वबोधिनी।

१६ ] पस्यास्वस्ति वर्णो का हकार से भेद होने पर भी अत्यल्प भेदयुक्त समान सा रूप रहता है। जसे-श, प, स। इन तीनो मे मध्यम मूर्धन्य पकार का कवर्ग द्वितीय वर्ग (ख) के समान उच्चारण माध्यन्दिनशाखा वाले करते है। जैसा कि केगवी- सूत्र मे कहा है-प खण्टुमृते च । प का ख के समान उच्चारण करने मे वे कोई प्रयत्नदोप आदि कारण नही मानते हैं। वे प का स की तरह उच्चारण करते है पर लिपि मे 'प' ही मानते है। उसमे कोई परिवर्तन नहीं करते। (१२) एकस्वरभक्ति, दश अन्तःस्थ, आठ ऊष्मवर्ण इन १६ वर्णों का, जिनमे स्वर और व्यजन दोनो के धर्म मिलते है, अल्पस्पृष्टत्त्व तथा अल्पविवृतत्त्व साधर्म्य है। कचट (१३) ग ज ड द ब ये पाच वर्ण घोष, संवृत, ईपन्नाद तथा स्पृष्ट हैं। त प ये पाँच वर्ण अघोप, विवृत, ईपच्छ्वास तथा स्पृष्ट हैं। इन दसों व्यस्खनो मे पूर्णस्पृष्टत्त्व, अल्पप्राणत्त्व तथा निरनुनासिकत्त्व-साधर्म्य (समान धर्म) है । (१४) ढ ळ्ह-ये दो वर्ण दु स्पृष्ट है। जैसा कि कात्यायन ने कहा है-ड ढ किन्ही के मत मे ळ, ळ्ह वन जाते हैं । किन्तु ड, ढ जव स्वरो के मध्य मे हो तथा समान पद मे हो तभी ळ. ळ्ह वनजाते है। जसे-अपाढा-अपाळ हा । माध्यन्दिनशाखा वाले ळ्ह को नही मानते है । (१५) घ, झ, ढ, ध, भ- ये पांच वर्ण नाद, सवार व घीष हैं। ख, छ, ठ, थ, फ- ये पाँच वर्ण श्वास, विवार व अघोष हैं। इन १२ वर्णो-ढ़, ळह, घ, झ, ढ, ध, भ, ख, छ, ठ थ, फ का स्पृष्टत्त्व, सोमत्त्व व महाप्राणत्त्व साधर्म्य है। र, ल ङ, ण, न, म आदि भी सोम वर्ण हैं, किन्तु छन्दोभाषा मे इन्हे सोष्म नही कहा है। अत उनका यहा निरूपण नही किया है। (१६) अं इँ ऋ लु उँ- ये ५ नासिक्यभावी स्वर ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत-भेद से चौदह हैं, क्योकि ल दीर्घ नही होता, नही तो १५ होते। विशुद्ध विवृत अकार मूल- प्रकृति होने से भावी नही है किन्तु अनुनासिक अकार के भावी होने मे कोई बाधा नही है। एँ ऐ ओ औं- ये चार नासिक्य संध्यक्षर स्वर, दीर्घ, प्लुत भेद से ८ हैं क्योकि ये कभी ह्रस्व नहीं होते। ये संध्यक्षर होने से द्विमात्रिक है और .

हिन्दी-व्याख्या [ १७ ह्रस्व एकमात्रिक होता है। १४ प्रकार के नासिक्य भावी स्वर तथा ८ प्रकार के नासिक्य सध्यक्षर सभी उदात्त अनुदात्त स्वरित भेद से तीन प्रकार के है अतः मिलाकर नासिक्य भावी स्वरो तथा नासिक्य सन्ध्यारो की संख्या २६ हो जाती है। इन सबका अनुनासिकत्व, अस्पृष्टत्व तथा विवृतत्व साधम्र्य है । (१६) अ-यह स्वर से उत्तर अनुस्वार वर्ण है। याः- यह विशुद्ध दीर्घ स्वर से उत्तर रङ्ग वर्ण है। ये व लँ-ये तीन अन्तस्थवर्ण हैं। कु खु गुंघु-ये चार यमवर्ण हैं । ड ञ ण न म-ये पाँच वर्ण नाद, सवार व घोप है। इन उपर्युक्त चौदह वर्गों का नासिक्यत्व-माधर्म्य है। यहाँ अत्पप्रारण, घोष, स्पृष्ट, दु.स्पृष्ट व ईपत्स्पृष्ट प्रयत्न वाले तालव्य वर्णो-ज य य का अनुनासिक होने पर समान ही उच्चारण होता है । अत अनुनासिक ईषत्स्पृष्ट से नासिक्य चवर्ग-पञ्चम अकार पृथक् वर्ण नहीं है तथापि चिरतन लोकव्यवहार के अनुरोध से उसे यहाँ वर्णान्तर कह दिया गया है। मुखमध्य-भागस्थ तालव्य, मूर्धन्य त्था दन्त्य अनुनासिक वर्णों (ञ, ण, न,) का मृदुस्पृष्ट वर्ण (ज, ड, द) तथा तीनस्पृष्ट वर्ण (च, ट, त) परे होने पर अनुस्वार की तरह समान ही उच्चारण होता है। जसे-तचारः सञ्जय कण्टकम्, काण्ड., दन्त , स्कन्द. मे । तथापि अस्पृष्ट व ईपत्स्पृष्ट वर्ण परे होने पर गुण, गुण्य आदि शब्दो मे विशेषता की उपलब्धि होने से कार को अलग वर्ण मानना उचित है। अनुस्वार, विसर्ग, जिवामूलीय, उपध्मानीय व यमवरणो में अयोगवाहत्व-साधर्म्य है। इस प्रकार छन्दोभापा में १८७ वर्ण हैं । जो यनो को २० मानते है उनके मन मे २०३ वर्ण हो जाते है। इस प्रकार ६७,१८७ अथवा २०३ वर्ण छन्दोभापा में मतभेद से हैं। यह पायी वर्णमातृका पथ्यास्वस्ति कहलाती है। . बाह्म वर्णसमाम्नाय ब्राह्म वर्णसमाम्नाय मे सक्षेपत ६४ वर्ण है। जैसा कि पाणिनीय शिक्षा कहा है- 'प्राकृत व सस्कृत मे ब्रह्मा के द्वारा स्वय प्रोक्त ६३ या ६४ वर्ण है। मे (१) त्रिपष्टिर्वा चतु पष्टिवर. संभवतो मताः । प्राकृते संस्कृते चापि स्वय प्रोक्ता. स्वयंभुवा ॥

१८ ] पथ्याम्वस्ति . 'इनमे २१ स्वर, २५ स्पर्श, यकारादि वर्ण पाठ, चार यम तथा अनुस्वार, विसर्ग जिह्वामूलीय व उपध्मानीय ये ग्राठ पराश्रित (अयोगवाह) दुरपृष्ट तथा 'लुत लकार इस प्रकार ६४ वर्ण हैं। उनका विवरण निम्नरीति से है (१) ग्रा इ ३ य 3 tha उ३ नह ३ न ल ये २१ स्वरवर्ण है। (२) ए ऐ यो श्री प्रो ३ श्री ३ (१) स्वरा विशतिरेकश्च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः। यादयश्च स्मृता घण्टौ चत्वारश्च यमा. स्मृता ॥ अनुस्वारो विसर्गश्च कपो चापि पराश्रयो। दु स्पृष्टश्चेति विशेयो लकार प्लुत एव च ॥ त्रविशतिरुच्यन्ते स्वरा शब्दार्थचिन्तक । द्विचत्वारिंशद् व्यंजनान्येतावान वर्णसंग्रहः ॥ एते पञ्चषष्टिवर्णा ब्रह्मराशिरात्मवाच. । यत् किंचिद् वाड्मय लोके सर्वमत्र प्रतिष्ठितम् ॥ अथायोगवाहानाह- (२) अवर्णाच्च ऋक राच्च विसर्गः कण्व्य एव सः। इवर्णाच्च तथोवर्णात्तथा चैकारपूर्वक ॥१६॥ प्रोकारपूर्वकश्चैव तालव्यो भवति ध्रुवम् ॥ एकाराच कण्ठतालुवसों भवति ध्रुवम् । कण्ठो उस्तयोकाराद् विसर्गो नवति ध्रुवम् ॥ देवो व सविता चात्र हकारसदृशो भवेत् । देवीस्तिस्त्रो विसर्गस्तु हिकारसदृशो भवेत् । पाखुस्ते पशुरित्यादी हुकारसदृशो भवेत् ॥ विसर्गश्चाग्नेरित्यादौ हेकारसदृशो भवेत् । विसर्गो वाह्वोरित्यादी होकारसदृशो भवेत् । अथ स्वर्दक्षरित्यादौ हिकारसदृशो भवेत् । विसर्गो द्यौष्पितेत्यादी हुकारसदृशो भवेत् ॥ हकारो नैव मन्तव्य इति शास्त्र-व्यवस्थितिः। फरिणनिःश्वाससदृशो विसर्गो भवति ध्रुवम् ॥

हिन्दी-व्यास्या [ १६ (३ ) ग ज द व क ट त प ख थ फ ये २५ स्पर्गवर्ण है। घ भ द ध भ ड ज ग न म र ल व (४) (५) प स )()( १ वर्ण है ये पाठ यादिवर्ण है। क-जिह्वामूलीय प-उपध्मानीय अं-अनुस्वार अ-विसर्जनीय कुँ खु गु घु-यम ये आठ अयोगवाह हैं। (६) ळ-दु स्पृष्टा (७) कोई लुकार को प्लुत नहीं मानते। उनके मत मे ६३ वर्ण है । और जो लकार को प्लुत मानते हैं उनके मत मे ६४ वर्ण है। (८) कात्यायन ने प्रातिशाख्य मे 'हुम्' यह नासिक्य वर्ण अधिक माना है। अतः उनके मतानुसार ब्राह्मवर्ण-समाम्नाय में ६५ वर्ण हैं। जैसा कि उन्होने कहा है कि २३ स्वरवर्ण हैं और ४२ व्यजनवर्ण है। ये ६५ वर्ण ही ब्रह्मराशि कहलाते है। इन्ही मे सारो वाङ्मय प्रतिष्ठित है । स्वर के बिना अनुस्वार तथा विसर्ग का उच्चारण नहीं होगा। अत वे व्यजन कहलाते है । (१०) उदात्त, अनुदात्त व स्वरित की एकत्वविवक्षा के कारण उदात्तादिभेद से स्वरसंख्या में वृद्धि नही है । स्वरभक्ति का स्वर मे अन्तर्भाव है । विवृत्ति तथा सवृत प्रकार का अकार मे अन्तर्भाव है। दुस्पृष्ट अन्तस्य वर्णो- अ य ड ल व का ईपत्स्पृष्ट अन्तस्थ वर्णों-5 य र ल व के द्वारा सग्रह है । औरस्य हकार का कण्ठ्य हकार के द्वारा ही ग्रहण हो जाता है तथा रङ्गवर्ण का अनुस्वार मे अन्तर्भाव है । इस प्रकार ६४ वर्ण ही हैं, अधिक नहीं। इस ब्राह्म-वर्णसमाम्नाय के सम्प्रदाय का ऋक्तन्त्र-व्याकरण मे निम्नरीति से उल्लेख है - २० ] पथ्यास्वस्ति 'इदमक्षर छन्दो वर्णश समनुक्रान्तम् । ब्रह्मा वृहस्पतये प्रोवाच । वृहस्पतिरिन्द्राय । इन्द्रो भरद्वाजाय । भरद्वाज ऋपिभ्यः । ऋपयो ब्राह्मणेभ्य । त खलियममक्षरसमाम्नाय ब्रह्मराशिरित्याचक्षते । न भुक्त्वा न नक्त प्रव्यात् ।' इति । माहेश्वर वर्णसमाम्नाय माहेश्वर वर्णसमाम्नाय मे ५१ वर्ण हैं । जिनका उल्लेख 'अ इ उण, ऋ ल क्, ए ओ ड्, ऐ ओ च्, ह य व र ट्, लण, म म ड ग न म्, भ भ ञ, घ ढ ध , ज ब ग ड द श्, ख फ छ ठ थ च ट त व्, क प य, श प स र्, हल' इन चौदह माहेश्वर सूत्रो मे है। ये वर्ण- अ hor उ ऋ लु प्रौ 1 ए ओ ऐ ha य व र ल य म ड न 644 भ भ घ ध ज ब ho ग छ ड ठ फ थ च त क प ट ष श स ho अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय एव यमो का अकार पर तथा शरो मे पाठ मानते है। ऐसा महाभाष्य मे कहा है । अत आठ वर्ण ये है। इस प्रकार ५१ वर्ण हैं । शेप वर्णो का इन्ही मे अन्तर्भाव है। प्राचीन काल मे असुरो के अनेक अवान्तर भेद थे। उनमे मयासुर-विभाग विद्या, शिल्प, कला, वीरता, सभ्यता आदि गुणो को विशेषता के कारण अन्यो से श्रेष्ठ था। यही विभाग प्रचीन समय मे यवन नाम से विख्यात था। उसको वर्णमातृका होढाचक्र नामक थी, उसमे ३७ वर्ण थे । वे निम्नाङ्कित हैं - हिन्दी-व्यारया [ २१ (१) अ व क ड ह र म ट प त न य ज ख ये २० प्रस्तीर्य वर्ण हैं। ग स द च ल अ इ al ए ओ ये ५ मात्रावर्ण हैं। (२) (३) घ ड छ य ग ठ घ फ ढ ये १२ परिशिष्ट वर्ण है थ ञ प्रस्तीर्य वर्णो मे संवृत प्रकार है वह व्यंजनतुल्य है । मात्रावर्गों मे विकृत अकार है वह स्वरवर्ण है । प्रस्तीर्य वर्गों में मात्रा के सम्बन्ध से प्रस्तार होने पर १०० वर्ण हो जाते हैं। वे निम्नाङ्कित हैं (१) म व क ह ड (२) म ट प र त इ वि कि हि डि मि टि पि रि ति उ तु कु hon Gol मु टु पु रु तु मे टे पे रे ते ए वे के हे डे यो बो को हो डो मो टो पो रो तो (३) न य य भ ज ख (४) ग स द च ल नि यि भि जि खि गि सि दि चि लि नु यु भु जु खु गु सु दु चु लु ने ये भे जे खे गे से दे चे ले नो यो भो जो खो गो सो दो चो लो २२ ] पथ्यास्वस्ति अवजद, हव्यज, हुत्तो, कलमन् इस प्रकार की एक अवजद नाम की अन्य वर्णमातृका भी थी। किन्तु आर्यों ने उसका ग्रहण नही किया अत उसका यहाँ निरूपण नही किया जा रहा है। अवयवपरिच्छेद को मात्रा कहते हैं। ध्वनिपरिच्छेद वर्ण कहलाते हैं। अत वर्णरूप परिच्छेद ही मातृका कहलाती है । मात्रिका को ही उच्चारण की समानता से मातृका कहते हैं । अथवा जननी को माता कहते है अर्थात् जननी मे मातृशब्द रूढ है। यह वर्णमाला भो तद्देशीय भापायो की जननी है । अत वर्ण- माला को वर्णमातृका कहा गया है। पहिले भाषा ही चालू हुई थी। पश्चात् उसमे वावय विभाग, वाक्यो मे पद- विभाग तथा पदो मे वर्णविभाग हुअा। प्रारम्भ मे तत्तवर्णो से प्रारम्भ होने वाले पदविशेप के द्वारा वर्गों की सज्ञा थी। जैसे-अधमवाची 'रेफ' पद रकार का बोधक था । पश्चात् वर्ण के आगे 'इति' शब्द जोड कर वर्ण की सज्ञा हुई। जैसे- डिति डकार वर्ण की सज्ञा हुई। कात्यायनादि आचार्यों ने 'निर्देश इतिना' इस सूत्र द्वारा स्पष्ट बतलाया है कि वर्णों का निर्देश वर्ण के आगे इतिशब्द लगा कर करना चाहिये। तदनन्तर वर्ण के आगे कार-शब्द जोड कर वर्ण की सज्ञा की जाने लगी। जैसे अकार 'अ' की तथा ककार 'क' की सज्ञा बनी। 'कारेण च अव्यवहितेन व्यजनस्य' इस सूत्र के द्वारा कात्यायन ने इसी तथ्य का निर्देश किया है। 'र एफेन च' इस सूत्र के द्वारा यह भी बतलाया है कि रकार का रेफ शब्द से भी व्यवहार होता है । पदो मे वर्णव्याकरण सर्वप्रथम रेफ शब्द से ही आरम्भ हुआ। अत उसके स्मरण के लिये माङ्गलिक रवर्णाभिज्ञान रेफ शब्द से हो कहा जाता है 'स्वैररपि' इस सूत्र के द्वारा कात्यायनादि ने यह बतलाया है कि स्वरो के द्वारा वर्णों का निर्देश होता है। और यह नियम सर्वभाषासाधारण है। जैसे क, ख, ग, घ, ड मे अकाररूप स्वर के द्वारा ही वर्णों का निर्देश हुआ है इसी प्रकार इगलिश भाषा मे कही ए, बि, सि, डि इस रूप से इकार के द्वारा, जे, के मे एकार के द्वारा, वर्गों की सज्ञा की गई है। कही आदि मे एकार लगा कर सजा की जाती है । जैसे-एफ, एल, एम, एन. एस, एक्ष मे। कही आदि मे आकार लगाकर । जैसे--प्रार। पारसी भापा मे भी एकार जोडकर वर्णसजा की जाती है। जैसे-वे, पे, ते, टे, से इत्यादि मे । अलिक शब्द अलिपि का अप्रभ्रश है । जीम्, सीम्, स्वाद, सीन इत्यादि सज्ञाये सस्कृत रेफ शब्द की तरह . ।

हिन्दी व्याख्या [ २३ प्राचोनसप्रदायसिद्ध है। जैसे-रेफ शब्द माङ्गलिक है इसी प्रकार जीम् इत्यादि गब्द भी माङ्गलिक है। श्री मधुश्दनविद्यावाचस्पतिप्रगीत पय्यास्वस्ति अन्य के मातृकापरिस्कार नामक प्रथम प्रपाठ की हिन्दी व्याख्या समाप्त । यमपरिष्कार द्वितीय प्रपाठ यमपरिष्कार नामक द्वितीय प्रपाठक में यम का विगद विवेचन किया गया है। शुद्धजित्, सोप्मजित्, शुधि, मोष्मवि भेद से यम के ४ प्रकार हैं। उनको क्रमगः कु बु गु घु साये है । यम के स्वरूप मे मतभेद है। १-एकवर्ण मे पूर्व तथा पर अमरो के बलो की एक साय सम्प्रसक्ति होने पर दोनों वलो के विरोव से वर्ण को द्वित्व हो जाता है। उन दो वर्गों मे द्वितीय वर्ण अनुनामिक पर वर्ण के कारण नासिक्य हो जाता है । वही नासिक्य वर्ण यम कहलाता है । द्विरुक्त वर्णो में प्रथम वर्ण निरनुनासिक है और द्वितीय वर्ण अनुनासिक परवर्ण के कारण नासिक्य हो गया है। इन दोनो का भिन्न प्रयत्नो से ग्रहण होता है। अत दोनो वर्णो मे कुछ विच्छेद होता है और यम एक ही वस्तु है । इस द्विरुक्त वर्ण मे पहिले का स्पृष्ट प्रयत्न है क्योकि वह निरनुनासिक है तथा द्वितीय स नुनासिक है, क्योकि पर अनुनासिक पचमवर्ण के प्रभाव के कारण उसमे नासिक्यत आ जाती है अत उस नामिक्य द्वितीयवर्ण का सवृत प्रयत्न है। यही इन दोनो वर्गों के प्रयत्न मे भेद है। मण्डूक ने इस अर्थ का स्पष्टीकरण विया है। जैसे- - वर्णाना तु प्रयोगेषु वरण स्याच्चतुर्विधम् । मवृत विवृत चंव स्पृष्टमस्पृष्टमेव च ।। स्पर्शाना करण स्पृष्टमन्त.स्यानामतोऽन्यथा । यमाना सवृत प्राहुविवृत तु स्वरोष्मणाम् ।। इस यहाँ स्पष्ट रूप से यम वर्णो का संवृत प्रयत्न बतलाया गया है। पक्ष मे यम वर्ण का आगम है। अतएव सगरोर है एव पूर्व वर्ण के सदृश वर्ण २४ ] पथ्यास्वस्ति है। केवल उन दोनो वर्गों मे निरनुनासिकता व सानुनामिकता तथा स्पृष्ट प्रयत्न व सवृत प्रयत्न का भेद है। वर्णप्रदीपिकाकार ने भी- 'स्वरात् सयोगपूर्वस्य द्वित्वाज्जातो द्वितीयकः । तस्येव यमसज्ञा स्यात् पचमरवितो यदि ।।' इस कारिका के द्वारा पचम अक्षर के परे होने पर उसके साथ सयुक्त पूर्व वर्ण के द्वित्व से उत्पन्न तत्समान द्वितीय वर्ण को ही यम बतलाया है। 'अनन्त्यान्त्यसयोगे मध्ये यम.' इस प्रौदवजि सूत्र में भी इमी तथ्य का स्पष्टीकरण है। ये यम संख्या मे बीस है, क्योकि प्रत्येक वर्ग के आदि के चारो वर्णो में पञ्चम वर्ण के परे होने पर द्वित्व के कारण उत्पन्न द्वितीयवर्ग यम कहलाते है । तथापि शुद्धजित्व. सोष्मजित्व, शुद्धवित्व व मोष्मधित्व इन धर्मों के प्रत्येक वर्ग के चारो यम वर्णो मे समानरूप से रहने के कारण इन चार धर्मो के कारण यम चार ही माने जाते है। दूसरा मत यह है कि दो पदो के मध्य मे अर्धमात्राकालिक यति (विच्छेद) होता है जिसे विवृति भी कहते है । जो-'दश रामशरा'। इस उदाहरण के बाद तथा राम के बाद अर्द्ध मात्राकालिक विच्छेद होता है। अर्थात् दश पद का उच्चारण करने के पश्चात् राम का उच्चारण करने से पूर्व कुछ समय रुकना पडता है। यह यति अर्यभेद मे भी कारण पड़ती है। जैसे—'सदास आयाति' मे प्रथम सकार के बाद यति करने पर इस वाक्य का अर्थ वह 'वह दास पाता है' यह होता है। और दा के बाद यति करने पर 'वह सदा अाता है' यह अर्थ होता है। इन दोनो अर्थो के भेद मे कारण यति ही है। इसी प्रकार- काकाली, कामधुरा काशोतलवाहिनी गङ्गा। कस जघान कृष्ण कम्वलवन्त न वाधते शीतम् ।। इस पद्य मे-'का काली का मधुरा, का शीतलवाहिनी गङ्गा। क सजधान कृष्णः कं बलवन्त न वाधते शीतस् ।' इस प्रकार का तथा क के बाद यति करने पर का काली इत्यादि प्रश्न- वाक्य बन जाते हैं। तथा- काकाली, कामधुरा, काशोतलवाहिनी गङ्गा । कस जघान कृष्ण कम्वलवन्त न बाधते शीतम् ।।

हिन्दी-व्याख्या [ २५ इस रूप मे 'काकाली' 'कामधुरा' व 'काशीतलवाहिनी' 'गङ्गा' मे का के वाद यति न करने से तथा 'कस जघान' मे कस के बाद यति करने से एवं 'कम्बलवन्त' मे क के बाद यति न करने से यही पय उत्तरवाक्य बन जाता है। इसी रीति से. कागदही की आस मे बैठे निपट उदास । कागदही पाये बिना मिटे न मन की प्यास ॥ इस भाषापद्य मे भी तीन जगह विरतिरूप यति के भेद से तीन अर्थ होते है। जैसे - का गदही की आस मे, काग दही की आस मे तथा कागद ही की आस मे। 'स ऋतु.' इस शब्द मे ककार से पूर्व विरति होने पर 'सक्रतु' ऐसा उच्चारण होता है। किन्तु ककार के उत्तर यति होने पर 'सक्ऽरतु. ऐसा उच्चारण होता है। यद्यपि 'सक्रतु' मे ककार परस्वर का अग है। किन्तु जब ककार के वाद यति होती है तो यति द्वारा ककार पर परस्वर का बल शिथिल हो जाता है और पूर्व अक्षर के बल का आक्रमण होने से पूर्व के साय अधिक सनिकर्प होता है। ककार पर, पूर्व तथा पर दोनो अक्षरो के बल के आक्रमण के कारण 'क' को जब द्वित्व हो जाता है तब यति पूर्व ककार के बाद तथा द्वितीय ककार के पूर्व होती है। और ‘स क्ऽक्रतु' ऐसा उच्चारण होता है। 'नक्तम्' मे एक हो पद होने से पदविरति के न होने से, दो अक्षरो के मध्य ही विरति होने से भिन्न स्थानो मे विरति होने के कारण तीन प्रकार का उच्चारण होता है। जसे- न-क्तम् । नक्-तम् । नक्क्तम् । पहिले मे 'क' से पूर्व विरति है। द्वितीय मे 'क' के बाद। तथा तृतीय मे पूर्वोत्तरो के बलो के आक्रमण के कारण 'क' को द्वित्व होता है, और दोनों कारो के मध्य विरति है। अनुनासिक वर्ण के परे होने पर उसके प्रभाव के कारण विरति नासिक्य बन जाती है उसी को यम कहते हैं। इस पक्ष मे विरति या अर्द्ध-मात्रा-कालिक विच्छेद का नाम यति है और विच्छेद या विरति शरीरशून्य है। अत. इस पक्ष मे यम भी शरीरशून्य है। इसीलिए अमोघनन्दिनी शिक्षा मे यम को अशरीर कहा है। 'जकारौ द्वौ मकारश्च रेफस्तदुपरि स्थित । अशरीर यम विद्यात् समाीति निदर्शनम् ।। 'अन्त पदेऽपञ्चमाः पश्चमे तु विच्छेदम्' इस प्रातिशाख्य सूत्र की व्याख्या करते हुए प्रदीपकार ने भी 'विच्छेद इति यमसज्ञा' इस उक्ति के द्वारा विच्छेद २६ ] पय्यास्वस्ति को यम बतलाया है। वस्तुत दो स्वरों के विच्छेद को विवृत्ति संजा तथा दो व्यजनो के विच्छेद को यम सज्ञा है। 'हरऽएहि' मे दो स्वरों के मध्य का विच्छेद विवृत्ति कहलाता है तथा 'पलिक्ऽक्नी' आदि मे दो जनो के मध्य का विच्छेद यम कहलाता है। इस पक्ष मे विच्छेद की यमसंज्ञा होने पर भी विच्छेद के पूर्ववर्ती व्यजन के चार प्रकार का होने से उसके अनन्तरवर्ती विच्छेदरूप यम को भी चार प्रकार का माना जाता है और इस प्रकार यमपूर्ववर्ती व्यजन के चातुर्विध्य का यम मे आरोप किया जाता है। तीसरा पक्ष यह है कि भगवान् कणाद ने 'सयोगविभागगन्देभ्यः गन्दो- त्पत्ति.' इस सूत्र के द्वारा सयोग, विभाग तया शब्द से शब्द की उत्पत्ति वतलाई है। जैसे-ऊ-क्, हरित्-त्, फट्-ट्, इत्यादि मे पदान्त के ककार, तकार, टकारो मे प्रथम ककारादि, स्थान-करणसयोगजन्य है तथा द्वितीय ककारादि, वेग से स्थान करण का विभाग होने से उत्पन्न होते हैं अत विभागज हैं। यद्यपि स्थान-करण-सयोग का गर्न उपराम होने पर अर्थात् विभाग होने पर कोई भी वर्ण उत्पन्न नही होता, किन्तु वेग के साथ स्थानकरण का विभाग होने पर, जिस प्रकार वेगपूर्वक स्थान-करण के संयोग से शब्द उत्पन्न होता है उसी प्रकार विभाग से भी गव्द उत्पन्न होता है। जैसे-पदविरामरूप पदान्त मे सयोगज व विभागज दोनो प्रकार के गब्द उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार पद के मध्य मे भी स्थान-करण के सयोगजन्य शब्द की तरह वेग से स्थान और करण का विभाग होने पर विभागज शब्द भी उत्पन्न होता है। सोष्मवर्ण (वर्गों के द्वितीय चतुर्थ वर्ण), रेफ तथा हकार को छोडकर गेष वर्गों मे द्वित्व का यही कारण है। यह विभागज वर्ण ही अनुनासिक वर्ण होने पर उसके प्रभाव से नासिक्यता को प्राप्त होकर यम कहलाता है। 'सक्थ्-थ्ना' इत्यादि मे ककार के आगे थकार पर विरति होती है। यह थकार सयोगज व विभागज दोनो प्रकार का है। इनमे विभागज थकार अनुनासिक 'न' के पूर्व होने से यम कहलाता हैं। यहां पर ककार को द्वित्व नहीं होता, क्योकि वर्णरत्न-प्रदीपिका मे यम के परे होने पर ककार के द्वित्व का निषेध किया है। 'द्विरुक्ति वर्जयेन्नित्य यमेऽपि परत. स्यिते । सक्थ्-थ्ना देदिश्यते नारी ककारोऽत्रक एव हि ।' यद्यपि 'सक्थ्-थ्ना' मे थकार को भी द्वित्व नही होता क्योकि 'सर्वेपां हिन्दी-व्यास्या [ २७ व्यंजनानां द्विर्भावो भवति द्वादशवर्जम् । ते ख छ ठ थ फा घ झ ढ ध भा रही चेति ।' इस गौतमसूत्र मे थ के द्वित्व का निषेध किया है, अत इस मत को मानने पर थकारान्तर्वर्ती तकार को द्वित्व मानना चाहिये। प्रयमद्वितीयास्तृ. तीयश्चतुर्था 'इस कात्यायन प्रातिशाख्य सूत्र मे भी यही तथ्य बतलाया गया है। इस प्रकार २० यम हैं। चतुर्थ मत यह है कि २० यम नही है किन्तु क, ख, ग, घ-सदृश ध्वनि वाले चार ही यम हैं जिनकी क्रमशः कु खु ग घु ये सज्ञायें है। अत आतनच्मि मे प्रातनच्-क्मि, समाज मि का समा ग्मि,पाटणा का आटाणा, रत्नम् का रत्क्नम्, सक्थ्ना का सक्थना, विद्म का विद्म , दध्म चा दध्-ध्म , पाप्मा का पाप-क्मा ऐसा उच्चारण होता है। इसलिए पाणिनीय शिक्षाभाष्य शिक्षाप्रकाश मे 'अन्तर्वत् क्नी मे तकार, यम ककार, नकार व ईकार ये चार वर्ण माने हैं। 'यज्ञ' मे जकार, यम गकार, तथा ञकार ये तीन वर्ण माने हैं। अर्थात् इन उदाहरणों मे च व ज के साथ भी ना ककार व गकार को ही यम माना है न कि च् या ज को । वस्तुत कुंव गुं इन यमो के कवर्ग-स्थानीय होने से चवर्ग-स्थानीय च तथा ज को भी कवर्ग होकर क्रमश क तथा ग हो जाता है। इसी तथ्य का निरूपण 'चो कु' सूत्र के द्वारा किया गया है। अत पातनच्मि के स्थान मे 'यातनक्क्मि' तथा समाज्मि के स्थान मे 'समार्ग ग्मि, यज्ञ' के रथान मे 'यगगन.' तथा विज्ञानम् के स्थान मे 'विग्ग्ज्ञानम्' उच्चारण सम्प्रदायसिद्ध माना जाता है। 'ज्ञानम्' मे भी मध्यमें 'गुं' यम होता है। क्योकि वर्गों के अन्त्य-भिन्न तथा अन्त्य वर्गों के सयोग मे मध्य मे यम होता है। ऐसा 'औदवजि ने, वर्गों के अन्त्यभिन्न तथा अन्त्य स्पर्शों का संयोग होने पर अन्त्यभिन्न वर्ण के पूर्व मे तथा, अन्त्य वर्णो के उत्तर मे होने पर यम का प्रयोग होता है, ऐसा गौतम ने १. मनन्त्यान्त्यसंयोगे मध्ये यम पूर्वगुणः । २. अनत्यानन्यसयोगेऽनन्स्यपूर्वेऽन्त्योत्तरे व्यवधानजिते तत्र यमा वर्तन्ते न संशय. । (गौतम) २८ ] पथ्यास्वस्ति अतः कहा है। इसी प्रकार नारद', याज्ञवल्क्य, एवं मण्डूक 3 ने भो अनन्त्य व अन्त्य वों का सयोग होने पर मध्य मे यम को सत्ता बतलाई है। अतः ज्ञानम् मध्य मे गुं संज्ञक यम के होने से और उसके झल् प्रत्याहारान्तर्गत होने से जकार को भी 'चो कु' से कुत्व होकर गकार का ही उच्चारण होता है, यही उच्चारण वेदसम्प्रदायसिद्ध है। लोक मे भी यही उच्चारण होता है। क्योकि कितने ही वैदिक शब्दो का व उच्चारणो का लोक मे भी प्रयोग देखा जाता है। जैसे वैदिक धृ धातु का लोक मे भी' घृतम्' आदि शब्दो मे प्रयोग देखा जाता है। 'ज्ञानम्' 'विज्ञानम्' इत्यादि मे एक ही गकार प्रतीत होता है। अप्रतीयमान द्वितीय 'गु' यम की सत्ता, प्रतीत न होने से कैसे मानी जायेगी, यह शका नही करनी चाहिये, क्योकि पूर्व स्पर्श और यम का संयोग अयस्पिण्ड के समान धन है, अत उसकी पृथक् प्रतीति न होने पर भी प्रकृतिसिद्ध · यम का अपलाप नही किया जा सकता। भगवान् गौतम ने तीन प्रकार के सयोग-पिण्ड माने हैं-अयस्पिण्ड, दारुपिण्ड तथा ऊर्णापिण्ड । यम के साथ वर्गों के सयोग को अयस्पिण्ड, अन्तस्थवर्णो के साथ वर्णो के सयोग को दारुपिण्ड, यम व अन्त स्थवर्णो से भिन्न वर्गों के सयोग को ऊपिण्ड माना है। अन्तस्य और यम वर्गों के संयोग मे कोई विशेषता नही है। अत. यम को अशरीर बतलाया गया है। अगरीर का तात्पर्य यह है कि यम पूर्ववर्ती स्पर्ग के शरीर मे अन्त. हो जाते हैं। इसीलिये पूर्वस्पर्शवर्ण तथा यम के मध्य मे कोई विच्छेद नही होता। इसीलिये पूर्ववर्ती स्पर्श से भिन्न यम की प्रतीति नही होती। जैसा कि 'ज्ञानम्', विज्ञानम्' इत्यादि उदाहरणो मे देखा जाता है । श्री मधुसूदनविद्यावाचस्पतिप्रणीत पथ्यास्वस्ति ग्रन्थ के मातृकाररिष्कार-नामक द्वितीय प्रपाठ की हिन्दी व्याख्या समाप्त । अन्त. प्रविष्ट १. अनन्त्यश्च भवेत्पूर्वो अन्त्यश्च परतो यदि। तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत् सवर्णः पूर्ववर्णयो.॥ (नारद) ૨ अपञ्चमश्चकपदे सयुक्तं पञ्चमाक्षरम् । उत्पद्यते यमरतत्र सोऽङ्ग पूर्वाक्षरस्य हि ॥ (याज्ञवाल्वय) ३. स्पानामुत्तम. स्पर्शः संयोगाश्चेदनुक्रमात् । प्रानुपूर्त्या यमास्तत्र जानीयाच्चतुरस्तथा ॥ (मण्डूक) हिन्दी-व्याख्या गुरणपरिष्कार-तृतीय प्रपाठ सप्त खण्डात्मक गुणानुवाक नामक तृतीय प्रपाठ मे वर्णो मे रहने वाले गुरणो का निरूपण किया गया है। "चत्वारि वाक् परिमिता पदानि' इत्यादि श्रुति में चार प्रकार की वाक् का निरूपण किया गया है। वाक् से परिच्छि-न चार स्थान होते हैं-वाचस्पत्य, ब्राह्मणस्पत्य, ऐन्द्र और भौम। इन चार प्रकार के स्थानो के कारण वाक् के भी चार भेद वन जाते हैं वेकुरा, सुब्रह्मण्या, गौग्विीता तथा प्राम्भृणी। स्वयम्भूमण्डलरूप परमाकाश मे विद्यमान वाक् वेकुरा, महासमुद्ररूप पारमेष्ठ्य मण्डल में विद्यमान वाक् सुब्रह्मण्या, महाब्रह्माडरूप सौरमण्डल मे विद्यमान वाक् गौरिवीता तया चन्द्रमण्डल से युक्त भौमाण्डरूप पार्थिव मण्डल में विद्यमान सोममयी वाक् प्राम्भृरणी कहलाती है। यह चारो प्रकार का वाक्तत्व तत्तल्लोको मे विद्यमान सभी पदार्थो का उपादान कारण है। उनमे यह प्राम्भृणो वाक् इस भूमि मे सर्वत्र व्याप्त है। इसी आम्भृगी वाक् से सब मनुप्य उपजीवित हैं। अन्य तोन प्रकार की वाक् गुहा मे निहित हैं अर्थात् अनात हैं, जसा कि वेदमत्र मे कहा गया है- "बृहस्पते प्रथम वाचो अग्र यत् प्रैरत नामवेय दधाना । यदेषा श्रेष्ठ यंदरिप्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहित गुहावि ॥" अर्थात् ऋक् , साम तथा यजुरूप वैदिको वाक् सवको प्रकट होती हुई भी गुहा मे निहित है अर्थात् मानव उसको सम्यक्तया नही जानते। उपर्युक्त चारो प्रकार की वाक् का निरूपण विशदरूप से ब्रह्मविज्ञान मे किया गया है। 'चत्वारि वाक्' इत्यादि मत्र का उपर्युक्त व्याख्यान एक प्रकार का है। अन्य प्रकार से इसका व्याख्यान मैत्रायणि श्रुति मे किया गया है। जैसे- - यह वाक् वाज (अन्न) का प्रसव है अर्थात् अन्न से उत्पन्न होती है ऐसा मैत्रायरिण श्रुति मे कहा है -“वाग् हि वाजस्य प्रसव । सा वै वाक् सृष्टा एषु लोकेषु। त्रीणि तुरीयारिण, पशुषु तुरीयम् । पृथिव्या साऽग्नौ सा रथन्तरे ।१। याऽन्तरिसे सा वाते सा वामदेव्ये ।२। या या १. चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्गाह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ - ३० ] पथ्यास्वस्ति या व्याख्यान दिवि सा वृहति सा स्तनयित्नौ ।३। अथ पशुषु ।४। ततो या वागत्यरिच्यत ता ब्राह्मणे न्यदधुः। तस्माद् ब्राहरण उभयी वाच वदति-यश्च वेद यश्च न । वृहद्रथन्तरयो -यज्ञादेन (वाज) तया गच्छति । या पशुषु तया ऋते यज्ञम् । वाजस्येम प्रसव सुषुवे अग्रे सोम राजानमोगधीष्वप्सु । स विराज पर्येतु प्रजानन् प्रजा पुष्टि वर्धयमानो अस्मे ॥१॥ | वाजस्येमा प्रसव मिश्रिये दिवस ओपधी समनक्तु धृतेन । वाजस्येदं प्रसव आबभूवेमा च विश्वा भुवनानि सर्वत ॥२॥ (मैत्रि० ब्रा० १ । ११ । ४ - ५) इति । उपर्युक्त मैत्रायणि श्रुति से यह सिद्ध है कि अन्न की प्रसवभूत वाक् के चार भेद है। इसके तीन चतुर्थांश, पृथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोक मे है तथा एक चतुर्थाग पशुप्रो मे है • तीनो लोको मे रहने वाली वाक् के तीन भेद गुहानिहित वस्तु की तरह प्रच्छन्न रहते है, अनुभूत नहीं होते। किन्तु पशुओ मे रहने वाली चतुर्थ वाक् अनुभूत होती है । इस प्रकार 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि' की यह दूसरी प्रकार की व्याख्या है। अन्य प्रकार से इस श्रुति का निम्नाकित है- अमृता, दिव्या, वायव्या तथा ऐन्द्री भेद से वाक् चार प्रकार की है। उनमे मन और प्राण से गर्भित सत्यावाक् अमृता कहलाती है। ऋक्, साम और यजु ये तीनो वेद ही अमृता वाक् हैं। इन्ही से सब पदार्थ उत्पन्न होते है। इन्ही मे सब पदार्थ स्थित रहते हैं, इन्ही मे सव पदार्थों की सस्थिति अर्थात् लय होता है। यह अमृता वाक् आकाश है। अग्नि इसका ब्रह्म है, अग्नि इसका उपनिपद है। इसलिये इसे आग्नेय कहते है। इसका निरूपण निम्न मत्र में किया गया है- "गौरीमिमाय सलिलानि तक्षती एकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी वुभूवुपी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥" (ऋ० १११६४।४१) दिव्या वाक् ऋत कहलाती है, यही अथर्ववेद है। सारे देवता और भूत दिव्यवाङ्मय ही हैं। निम्न मत्र मे इस तथ्य का निरूपण किया गया है- "इय सा परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्मतशिता । येनैव समृजे धोर तेनैव शान्तिरस्तु नः॥ - हिन्दी व्याख्या [ ३१ इस वार को सरस्वान् कहते हैं। दिक्सोम इसका ब्रह्म है, दिक्सोम इसका उपनिषद् है। इसलिए यह सोम्या कहलाती है। इस दिव्या वाक् का निरूपण निम्न मत्रो मे मिलता है- "तस्या समुद्रा अधिविक्षरन्ति तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्र । क्षरत्यक्षरं तद् विश्वमुपजीवति ॥ वागक्षर प्रथमजा ऋतस्य वेदाना माता अमृतस्य नाभि । सा नो जुपाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मे अस्तु ॥" h तत इन दोनो में ध्वनि नहीं होती। इसलिये श्रोत्रेन्द्रिय से इसका ज्ञान नही होता। ध्वनि ही शब्द है। इन दोनो में ध्वनि न होने से ये दोनों वाक् शब्द- रूप नहीं हैं। "वेदशव्देभ्य एवादी पृथक् सस्थाश्च निर्ममे ।" इस मनुस्मृतिवाक्य मे शब्दरहित इन वेदरूप वारिणयो के लिए जो 'जन्द' शब्द का प्रयोग किया गया है, उसे लाक्षणिक मानना चाहिए। क्योकि गदरहित अमृता देववाक् ही सृष्टि का कारण है। श्रोत्र द्वारा ग्रहण करने योग्य ध्वनि दो प्रकार की होती है। इनमें पहली ध्वनि शक्तिरहित होने से अनर्थक है और वर्ण, पद, वाक्य आदि मे विभक्त दूसरी ध्वनि सार्थक है। उनमे अनर्थक प्रथम ध्वनिरूप वाक् का वायु ब्रह्म है और वायु उपनिपद है। इसलिए इसे वायव्या कहते हैं। यह वाक् गतिहीन होते हुए भी वायु से प्रारब्ध-उत्पादित है, वयु मे प्रतिष्ठिन है तथा वायु द्वारा इधर-उधर ले जायी जाती है। इसमे नाद, श्वास आदि विशेषताएं वायु से बनती हैं। यही विश्व का उपजीवन करने वाली सरस्वतो नाम की तृतीया वाक् है। यह भी पहली अमृता तथा दूसरी दिव्या वाक् की तरह अव्याकृत अर्थात् व्याकृतिरहित है। क्योकि अर्थ क्योकि अर्थ के कारण होने वाला वर्णादिविभाग इसमे दृष्टिगोचर नही होता। इस सरस्वतो वाक् मे इन्द्र प्रविष्ट होकर विभिन्न आकारो मे उसे व्याकृत करता है। इसी का निरूपण निम्न श्रुति मे किया गया है- "वाग् वै पराची अव्याकृता अवदत् । तद् देवा इन्द्रमब्रुवन् इमा नो वाच व्याकुरु इति । सोऽब्रवीत् । वर वृण । मह्य चैवैप वायवे च सह गृह्याता इति ।

३२ ] पथ्यास्वस्ति . तस्मादैन्द्रवायव सह गृह्यते । तामिन्द्रो मध्यतोऽपक्रम्य व्याकरोत् । तस्मादिय व्याकृता वागुद्यते।" इति। उपर्युक्त विषय का विवेचन "बीभत्सूना सयुज हसमाहु" इत्यादि मत्र में किया गया है जिसकी व्याख्या 'अक्षर-प्रकरण' में की जायेगी। इन्द्र के द्वारा व्याकृत इस वाक् से ही सारे वैदिक तथा लौकिक व्यवहार सम्पन्न होते है, जैसा कि निम्नश्रुति मे बतलाया गया है- "वाच देवा उपजीवन्ति विश्वे वाच गन्धर्वा पशवो मनुष्या । वाचीमा विश्वा मुवनान्यपिता सा नो हव जुषतामिन्द्रपत्नी ।।" इस प्रकार वाक् मे प्रथम तीन प्रकार के वाक्-तत्त्व अर्थज्ञान के अनुकुल नहीं है, अत वे गुहा-निहित कहलाते है। वे किसी प्रकार के अर्थ को नही बतलाते, किन्तु जिम वाक् को मनुष्य बोलते हैं, जिस वाणी मे अकार ककार आदि व्याकृत वर्णो का विभाग है, यह चौथी प्रकार की अव्याकृत वाणी ऐन्द्री वाक् कहलाती है। प्रज्ञा-प्राण को इन्द्र कहते है। प्रज्ञान के सम्बन्ध से हो वाणी मे वर्ण विभाग होता है । 'अ' तथा 'उ' वैदिक विज्ञान मे क्रमशः मन और प्राण के वोधक हैं। वहाँ अकार अर्थात् प्रज्ञान मन को प्राप्त ध्वनि, अम् = प्रज्ञानं मन , ऋण = प्राप्त ध्वनि इस व्युत्पत्ति से अर्ण कहलाती है। अथवा उ अर्थात् प्राण, अ अर्थात् प्रज्ञान मन को प्राप्त ध्वनि 'उ-अ-ऋण = वर्ण' इस सन्धि से वर्ण कहलाती है। अत वर्ण ही अर्ण कहलाते है क्योकि प्रज्ञा और प्राण एक दूसरे के विना नही रह सकते। अत केवल प्रज्ञा से भी प्राण का संग्रह हो जाता है। अनाहत नाद मे, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी आदि मे; पशु-पक्षी, सरीसृप आदि मे तथा सद्योजात अशिक्षित शिशुरोदन आदि मे जो वाक् के स्वरूप है, वे सब इन्द्र के द्वारा व्याकृत न होने से अनिरुक्त तथा केवल वायव्य होते है । मनुष्य जिस वाणी का उच्चारण करते है, वह अर्थगभित होने से निरुक्त तथा प्रज्ञात कहलाती है। यही ऐन्द्रवायव ग्रह होता है क्योकि इसमे वायु के साथ इन्द्र का भी समावेश है। इस व्याकृत ऐन्द्री वाक् के पुन चार भेद है। वे चारों भेद परा, पश्यन्ती, मध्यमा तया वैखरी है। ससार मे ऐसा कोई भी ज्ञान नही है जिसमे शब्द का सम्बन्ध न हो। अत सभी ज्ञान शब्द से अनुविद्ध (सम्बद्ध) ही । अध्यात्म मे हिन्दी व्याख्या [ ३३ प्रतीत होते हैं। इस उक्ति के अनुसार बुद्धिस्थ वाक् ही परा वाक् कहलाती है। मन के द्वारा पुस्तक के अक्षरो का उच्चारण करने वाले पुरुषो को उपाशु वाक् पश्यन्ती कहलाती है। नाद-ध्वनि के विना श्वासमात्र से कान के पास उच्चार्य- माण वाक् मध्यमा कहलाती है। नाद-व्वनि से युक्त दूर से भी श्रोत्रेन्द्रिय से ग्राह्य वाक् वैखरी कहलाती है। इनमे परा, पश्यन्ती तथा मध्यमा प्रच्छन्न हैं अर्यात् उनका विशेषतया ज्ञान नहीं होता किन्तु चतुर्थ वैखरी वाणी का मनुप्य उच्चारण करते है। इसीलिये विद्वानो ने कहा है- "वैखरी शब्दनिष्पत्तिमध्यमा श्रुतिगोचरा । द्योतितार्था तु पश्यन्ती सूक्ष्मा वागनपायिनी ॥" इनमे वैखरी वाणी के अध्यात्म मे पुनः चार भेद हैं। जैसा कि "चत्वारि वाक् परिमिता पदानि" इस मत्र मे कहा गया है। वाजसनेय श्रुति मे इस मत्र की व्याख्या इस प्रकार की गई है : : "इन्द्र ने देखा कि वायु हम मे यज्ञ का अधिक हिस्सा ग्रहण करता है । हम भी इसमे हिस्सा लें। उसने कहा कि हे बायो! मुझे भी तुम इस ग्रह मे सम्मि- लित करो। वायु ने कहा-तव क्या होगा? इन्द्र ने कहा कि निरुक्त वाक् का उच्चारण होगा। वायु ने कहा - यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हे सम्मिलित करता हूँ। तबसे यह ग्रह ऐन्द्रवायव नाम से व्यवहृत होने लगा। वाणी का चौथा भाग निरक्त है जिसको मनुष्य बोलते हैं। वाणी का वह चौथा भाग जिसको पशु बोलते हैं, अनिरुक्त है। वाणी का वह चौथा भाग भी अनिरुक्त है जिसे पक्षी बोलते हैं। वाणी का वह चौथा भाग भी अनिरुक्त है जिसे क्षुद्र सरीसृप ( सर्प, विच्छू आदि) वोलते हैं।" वैखरी वाणी के ये चार विभाग केवल अध्यात्म मे ही नहीं है किन्तु अविभूत तथा अधिदैवत मे भी ये चार विभाग समझने चाहिये। जिस वैखरी वाक् का मनुष्य उच्चारण करते है, उसमे भी चार विभाग होते है। वे चार विभाग वर्ण, अक्षर, पद तथा वाक्य कहलाते है। मनुष्यो द्वारा उच्चर्यमारण वैखरी वाणी के ये चार विभाग ही इन्द्रकृत व्याकरण कहलाता है। इनमे वाक्य पदो से, पद अक्षरो से और अक्षर वर्गों से बनते है। इनमें वर्ण, अक्षर और पद गुहानिहित है अर्थात् स्वतन्त्रतया अर्थवोध उत्पन्न नही करते हैं अपितु वाक्य ही ३४ [ पथ्यास्वस्तिः अर्थ को बतलाने में समर्थ हैं, अत. अर्थबोध के लिए मनुष्य वाक्यो का ही उच्चारण करते हैं। वर्ण, अक्षर, पद और वाक्य-ये चारो विभाग भी पुनः चार प्रकार के है । इनमे वर्ण के चार विभाग अस्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, स्पृष्ट तथा अर्धस्पृए हैं। अक्षर के चार भेद निम्नलिखित हैं- १, पूर्व तथा पश्चात दोनो प्रकार के व्यापारो (व्यजनो) से शून्य अक्षर अक्षर का प्रथम भेद है। जैसे-अ। २. पृष्ठ (पश्चात्) व्यापार से युक्त तथा पूर्व व्यापार से शून्य अक्षर अक्षर का द्वितीय भेद है। जैसे-स्म । ३. पृष्ठ व्यापार से शून्य तथा पूर्व व्यापार से युक्त अक्षर अक्षर का तृतीय भेद है। जैसे-ऊ । ४. पूर्व तथा अपर दोनो प्रकार के व्यापारो से विशिष्ट अक्षर अक्षर का चौथा भेद है। जैसे - वाक् । पद के चार भेद नाम, आख्यात, उपसर्ग तथो निपात हैं, ऐसा भगवान् पतञ्जलि ने कहा है। कुछ उपसर्ग को पृथक् पद नही मानते क्योकि आख्यात उपसर्गविशिष्ट होता है, अत आख्यात मे ही उसका अन्तर्भाव है। जहाँ उप- सर्गों मे विभक्तियो का प्रयोग हुआ है, जैसे- "इन्द्रो देवान् प्रति प्रति.' "अतीनि ह कर्माणि सन्ति" इत्यादि मे, वहाँ उपसर्ग नाम बन जाते है। उनका वहाँ नाम मे अन्तर्भाव हो जाता है। उनके मत मे पद के चतुर्थ भेद मे स्वर, पुन आदि शब्द आते हैं जो नाम आख्यात तया निपात से भिन्न हैं और विभक्त्यर्थ भी जिनके गर्भ मे आ जाता है। अत वे विभक्तिप्रयोग के योग्य नहीं हैं। इनको नाम नही कह सकते क्योकि नाम की तरह इसमे विभिक्ति का प्रयोग नहीं होता। प्रत अर्थ के सम्बन्ध से प्रज्ञानयुक्त वाक् वाक्य कहलाती है। यह वाक्य भी नाभिस्थान, प्रक्रम-त्रय स्थान, मुखप्रदेश-पञ्चकस्थान तथा श्रोत्रस्थान भेद से चार प्रकार का है। यह वाक् प्रज्ञान (मन) से प्रेरित होकर, नाभि से प्रारम्भ होकर दूसरे व्यक्ति के कान तक पहुँच कर उसको अर्थज्ञान करा देती है और इस प्रकार चार पदो मे उपस्थित होकर विलीन हो जाती है। वाक् के इन चारो भेदो को हिन्दी-व्यस्या [ ३५ 1 लेकर भी 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि" इस मत्र का समन्वय किया जा सकता है। यह वाक्य ही प्रकारान्तर से पुन. चतुष्पद है। इसका निरूपण ऐतरेय- आरण्यक मे दिया गया है। वे चार पद मित, अमित, स्वर तथा सत्या- नृत है। इनमे ऋक्, गाथा, कुम्व्या मित कहलाते हैं। यजु, निगद तथा वृथा वाक् अमित कहलाते है, साम तथा गेष्ण स्वर कहलाते हैं, प्रोम् यह सत्य तथा 'न' यह अनृत कहलाता है। कतिपय विद्वान् सत्य और अनृत को पृथक् मानकर वाक्य के पाँच भेद भी मानते है। यास्क ने निरुक्त मे "तस्माद् ब्राह्मणा उभयी वाच वदन्ति या च मनुष्यारणा या च देवानाम्" इस प्रकार वाक् के जो दो भेद बतलाये हैं वे सस्कृत-भाषा तया वेदभापा के अभिप्राय से बतलाये हैं, क्योकि वेदभाषा को स्वर्गभापा कहा जाता था। इन वाक्यो, पदो और अक्षरों के प्रारम्भक वर्ण ही होते हैं । अत सबका मूल होने से प्रारम्भ में वर्ण ही सिखाये जाने चाहिएं। वे वर्ण वेदभापा मे ६७ प्रकार के हैं। वर्णो के समाम्नाय का इस ग्रन्थ के आदि मे निरूपण किया गया है। इन 'अक्षराणामकारोऽस्मि' इस गीतास्मृति के अनुसार एक प्रकार-वर्ण ही सव वर्णों का आदि मूल है। इस अकाररूप अक्षर से ही भिन्न-भिन्न गुणो के समन्वय से सारा वर्णसमाम्नाय उत्पन्न होता है। इसीलिए भगवान् ऐतरेय ने कहा है : 'जो यह वाक् है, यही अकाररूप वाक् स्पर्श तथा उष्मा (आकुंचन व प्रसारण ) से अभिव्यक्त होकर नाना प्रकार को हो जाती है। ऐ आ. २ । ३ । ६ । इस श्रुति मे स्पर्ग तथा ऊष्मशब्द, स्थान व करण के परस्पर सनिकीतारतम्य व विप्रकर्ष- तारतम्य के क्रमश बोवक हैं। ये स्थान और करण बहिरग तथा अन्तरग भेद से दो प्रकार के हैं। मुखप्रदेश से बहिर्भूत अर्थात् वायु के मुख में प्रविष्ट होने से पहिले जो वायु के आश्रयभूत स्थान और करण हैं वे बहिरंग कहलाते हैं। दोनो ही जगह अर्थात् वहिरग व अंतरग मे प्रयत्नविशेष से स्थान और करण का सकोच व प्रसारण होने से भिन्न-भिन्न वर्णो की उत्पत्ति होती है। यहाँ स्पर्श व ऊष्मशब्द से क्रमश. सश्लेष व विश्लेष का भी बोध है। इससे स्वरो के विश्लिष्ट (विश्लेपसहित) उच्चारण मे एक मात्रा का काल लगता है। और १. यो वैतां वाचं वेद यस्या एष विकार स सम्प्रतिवित् । अकारो वै सर्वा वाक् सैषा स्पर्शीष्मभिर्व्यज्यमाना वह्वी नानारूपा भवति । ऐ. प्रा २ । ३ । ६ ।

३६ ] पथ्यास्वस्ति or . सलिष्ट उच्चारण मे दो मात्रा तथा तीन मात्रा का काल लगता है। स्वरों का अवयवसकोच से घनीभाव होने पर स्वर व्यजन बन जाते हैं। वहां उनके उच्चारण मे अर्धमात्राकाल लगता है। इस प्रकार ये पांच गुण (प्रक्रमस्थान, मुखस्थान, काल, बाह्यप्रयत्न, आभ्यन्तर प्रयत्न) एक प्रकार के अनेकाकारतासम्पादक बनकर वर्णसमाम्नाय की उत्पत्ति मे कारण होते है। वर्णसमाम्नाय की उत्पत्ति के कारण इन पाँच गुणो को बतलाने के लिए इस वर्णसमाम्नाय की प्रक्रमस्थान, मुखस्यान, काल, करणप्रयत्न तथा अनुप्रदान प्रयत्न से व्याख्या करेगे । प्रक्रमस्थान से वर्णभेद- चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ।। ऋ १ । १६४ । ४५ । यह वेद मे कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि प्राणवायु वागरूप मे परिणत होने के लिए प्रक्रम करती हुई चार प्रक्रम-पदो की अपेक्षा करती है । वे चार प्रक्रमपद नाभि, उरस्, शिरस् और मुख हैं। नाभि प्राणवायु का प्रथम पद है। वहां से चल कर वह उर स्थल मे, कण्ठ मे या शिर स्थान मे टकरा कर प्रथम प्रक्रम को समाप्त कर लेती है। उर स्थल मे या कण्ठ मे प्रथम प्रक्रम की पूर्ति होने पर वहाँ से चल कर वह शिर स्थान मे टकरा कर द्वितीय प्रक्रम को समाप्त करती है। शिरःस्यान मे चलकर मुख-स्थानो मे आघात प्राप्त कर वह तृतीय प्रक्रम समाप्त करती है। मुखस्थान से फिर चतुर्थ प्रक्रम मे वह वर्ण- रूप में परिणत होकर मुख से निकलती है। जैसा कि भगवान् पारिणनि ने कहा है - 'आत्मा बुद्धि के द्वारा अर्थों को प्राप्त कर (जानकर) उनको दूसरे १. प्रात्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् मनो युक्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥१॥ मारतस्तूरसि चरन् मन्द्र जनयति स्वरम् । कण्ठे तु मध्यमं शोष्णि तारं जनयति स्वरम् ॥२॥ सोदीर्णो मूमिहतो वक्त्रामापदय मारुतः । वर्णान् जनयते तेषा पञ्चधा स्मृत ॥३॥ स्वरतः कालत. स्थानात प्रयत्नानुप्रदानतः। इति वर्गविद प्रानिपुरणं तं निवोधत ॥४॥ - विभागः हिन्दी व्याख्या [ ३७ को बतलाने की इच्छा से मन को प्रेरित करता है। मन कायाग्नि (जठराग्नि) पर आघात करता है। कायाग्नि प्राणवायु को प्रेरित करता है। प्राणवायु उर.स्थल मे पाहत होकर मन्द्रस्वर को उत्पन्न करता है। कण्ठ मे टकराने पर मध्यम-स्वर को तया शिर स्थान मे टकराने पर तारस्वर को उत्पन्न करता है। वह उदीर्ण प्राणवायु शिर.स्थान मे टकरा कर मुख मे पहुँचता है। और भिन्न-भिन्न स्थानों मे सयोग के कारण भिन्न-भिन्न वर्गों को उत्पन्न करता है। उन वर्गों का विभाग पांच प्रकार से होता है। स्वर से, काल से, स्थान से, प्रयत्न से व अनुप्रदान से ऐसा वर्णरहस्यवेत्ता कहते हैं, उनको सम्यक् प्रकार से जानना चाहिए। वहाँ नाभि, उर स्थान तथा गिर स्थान ये तोन पद गुहानिहित हैं अर्थात् स्पष्ट प्रतीत नहीं होते। और मुखस्यान वर्गों के उच्चारण मे उपयोगी हैं । नाभिस्थान मे प्राण वायु बनता है। उर रथान मे वायु स्वरस्प मे परिणत होती है। गिर स्थान में स्वर ध्वनिरूप मे तया मुखस्थानो मे ध्वनि वर्णरूप मे परिणत होती है । अत. प्रारंभ के तीन पदो (नाभि, उरस्, व शिरस्) में वाणी के वाग रूप प्राणवायु की वर्णरूप से अभिव्यक्ति नहीं होती। किन्तु चतुर्थ मुख-स्थान मे वाक् को स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। इस प्रतीतिगम्य अर्थ को उपर्युक्त श्रुति बतला रही है। पहले उरम्, कण्ठ, गिरस् भेद से तीन स्थान बतलाये गये हैं। इन तीन स्थानो की वलतारतम्य से उपपत्ति है। वर्णो को उच्चारण करने की इच्छा से प्रयुक्त प्राणवायु कम वल मे गति करता है तो उर स्थान मे उचित (मव्यम) वल से कण्ठस्यान में तथा वलाधिक्य से गिर स्थान में गमन करतो हुया प्रथम प्रक्रम को समाप्त कर देता है। अत. गिर स्थान मे ही जव इस प्राणवायु के प्रथम प्रक्रम की समाप्ति होती है तब तीन ही प्रक्रम-पद बनते है । मुख से बहिर्भूत इन प्रक्रमस्यानो को नारद ने सवन-नाम मे व्यवहृत किया है उर कण्ठ. शिरश्चैव स्थानानि त्रीणि वाड्मये । सवनान्याहुरेतानि साम्नि चाप्यवरोत्तरे ॥ अर्थात् वाड्मय मे उरस्, कण्ठ व गिरस् ये तीन स्थान हैं। इनको सवन कहते हैं । इन्ही तीन सवनों से स्वर्य की उपपत्ति होती है। अर्थात् नाभि प्रदेश से उत्थित वायु यदि उर स्थान में पहुँच कर तत्पश्चात् आगे चल कर मुख मे ३८ ] पथ्यास्वस्तिः आकर वर्णभाव मे परिणत होता है, तो उस वायु का यह प्रक्रम प्रात सवन कहलाता है। वहाँ मन्द्रस्वर उत्पन्न होता है। वह स्वर उर स्थानीय अनुदात्त है। यदि कण्ठ मे टकरा कर फिर मुख-प्रदेश मे पहुँच कर वर्ण-रूप मे परिणत होता है, तो मध्यन्दिन सवन होता है। वहाँ मध्यम स्वर उत्पन्न होता है । वह कर्णमूलीय स्वरित स्वर होता है। यदि उस वायु का प्रथम प्रक्रम शिर - समाप्त होता है तो वह तृतीय सवन कहलाता है। वहाँ तार स्वर उत्पन्न होता है वह स्वर शीर्षस्थानीय उदात्त है । (अनुदात्त) वाणी से पाठ करे, माध्यन्दिन सवन मे मध्यम वाणी से तथा तृतीय सवन में तार (उदात्त) वाणी से पठन करे। इसीलिए भगवान् ऐतरेय ने स्थान मे प्रात काल मन्द्र कहा है 'जब यह सूर्य प्रातः उदित होता है, तव प्रमन्द तपता है, अत प्रात सवन मे मन्द्र (अनुदात्त वाणी से) ऋड्मन्त्र का उच्चारण करे । जब सूर्य आगे बढता है तव तोव्रता से तपता है, अत मध्यन्दिन सवन मे तीव्र वाणी से शसन करे जब सूर्य और भी आगे बढता है तब और भी तीव्रता से तपता है, अत तृतीय सवन मे तीव्रतम (उदात्त) वाणी से शसन करे । पाणिनि ने भी कहा है कि प्रोत काल सिंह स्वर के सदृश उर स्थान स्थित स्वर से मन्त्रो का पाठ करे, मध्याह्न मे चकवे के शब्द के सदृश कण्ठस्थान- स्थित स्वर से पाठ करे और साय सवन मे मयूर, हस तथा कोकिल के स्वर के १. "यदा वा एष प्रातरुदेति-प्रय मन्द्रतपति । तस्मान्मन्द्रया वाचा प्रातःसवने शत् ॥१॥ अथ यदाऽभ्येति-प्रथ बलीयस्तपति । तस्माद् बलीयस्या वाचा मध्यन्दिने शंसेत् ॥२॥ अथ यदामितरामेति-अथ बलिष्ठतमं तपति । तस्मात् बलिष्ठतमया वाचा तृतीयसवने शसेत् ॥३॥ यदि वाच ईशीत । वाग् हि शस्त्रम् । यया तु वाचोत्तरोत्तरण्यिोत्सहेत समापनाय, तथा प्रपद्यत । एतत् सुशस्ततममिव भवति ।" (ऐ ना. १४ अ ४४) २. प्रात पठेन्नित्यमुर स्थितेन । स्वरेण शार्दूलरुतोपमेन । मध्यन्दिने कण्ठगतेन चैव चक्राह्वसंकूजितसैनिभेन ॥१॥ तार तु विधातू सवनं तृतीय शिरागते तच्च सदा प्रयोज्यम् । मयूरहसान्यतस्वराणा तुल्येन नादेन शिरःस्थितेन ॥२॥ - हिन्दी व्याख्या [ ३६ सदृश गिर स्थानस्थित नाद से पाठ करे, अर्थात् सायकाल तृतीय सवन मे गिर स्थित स्वर का प्रयोग करना चाहिए। उपरिवोधित सवनो में प्रतिपादित स्वर के या नाद के विरुद्ध मे उच्चारण करने वाले पुस्पो को उदात्तप्रधानता में उर क्षत, स्वरितप्रधानता में स्वरभङ्ग तथा अनुदात्तप्रधानता मे मूर्छा हो जाती है। सवनो के अनुसार तया पदानुसार सव स्वरो का उच्चावचभाव (निम्नोन्नतभाव) से उच्चारण करने पर उच्चारण मे सुन्दरता प्रतीत होती है। प्रक्रम भेद से तीन स्वरो का भेद होता है। तीन स्वरो के भेद से अकारादि अक्षरो के भी तीन भेद हो जाते हैं। वे तीन स्वर उदात्त, अनुदात्त व स्वरित है, जैसा कि ऊपर बतलाया जा चुका है। कोई तीन स्वरों से भिन्न एक प्रचयनामक स्वर की सत्ता ओर मानते हैं । इसीलिए पाणिनि ने कहा है 'हृदयस्थान मे अनुदात्त का, गिर स्यान मे उदात्त का, कर्णमूल स्वरित का तया अास्य (मुख) मे प्रत्रय स्वर का उच्चारण होता है ॥१॥ प्रदेगिनी को उदात्त, मध्याग लि को प्रत्रय, अनामिका को स्वरित तथा कनिष्ठिका को अनुदात्त समझना चाहिए ॥२॥ यद्यपि प्रदेगिनी के मूलभाग पर रखा हुआ अंगुष्ठ उदात्त को, अनामिका के मध्य में अंगुष्ठ स्वरित को तथा. कनिष्ठिका के अन्तिम भाग पर रखा हुआ अगुष्ठ अनुदात्त को वोषित करता है। इस वचन मे प्रचय-स्वर का उल्लेख नही किया है, तथापि पाणिन्यादि वाक्यो से मध्यमा अगुलि मे उसका निर्देश मिलता है। अतः उसे मानना ही चाहिए । "उच्चस्तरा वा वषट्कारः। इत्यादि वचनों मे उदात्ततर स्वर का भी १. अनुदातो हृदि शेयो मूयुदात्त उदाहुत । स्वरितः कर्णमूलीयः सर्वास्ये प्रचय. स्मृतः ॥१॥ उदात्तं प्रदेशिनी विद्यात् प्रचयं मव्यतोऽङ्ग,लिम् । कनिष्ठां निहत विदयात् स्वरित चाप्यनामिकाम् ॥२॥ २. उदात्तमायाति वृषोऽङ्ग लीनां प्रदेशिनीमूलनिविष्टमूर्धा । उपान्त्यमध्ये स्वरितं तं च कनिष्ठिकायामनुवात्तमेव ।।

४० ] पथ्यास्वस्ति उल्लेख मिलता है : इसी तरह अनुदात्ततर स्वर का भी। क्योंकि उदात्ततर स्वर की तरह अनुदात्ततर स्वर को मानना भी उचित है। इसीलिए भगवान् 'नारद ने कहा है-उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचय तथा निघात ये पाँच स्वर के भेद हैं। एक श्रुति भी भिन्न स्वर है। इसीलिए 'एकश्रु ति दूरात् सम्बुद्धी' यज्ञकर्मण्यजपन्यूड्खसामसु । इत्यादि सूत्रो मे त्रैस्वर्य को वोध कर एकश्रुति का विधान किया है। जाते है। वस्तुत ये उदात्ततरादि स्वर त्रैस्वर्य से भिन्न नही हैं। क्योकि उदात्त का तरतमभाव से उच्चारण करने पर उदात्ततर, उदात्त व प्रचित ये तीन भेद हो अत स्वर की सूक्ष्मता के प्रदर्शन के अनुरोध से तीन भेद होने पर भी उदात्ततर और प्रचित उदात्त मे पृथक् नही है। जैसा कि भगवान् नारद कहा है:--उदात्त ही स्वरित से परे होने पर प्रचय कहलाता है, वह पृथक स्वर नही हैं । ने उदात्त और स्वरित के मध्यवर्ती होने से प्रचित स्वर को कितने ही उदात्त मानते हैं। दूसरे प्रचित का स्वरित में अन्तर्भाव मानते है। जैसा कि याज्ञवल्क्य ने कहा है -3 उच्च (उदात्त) तथा अनुदात्त के योग होने पर स्वरित स्वर कहलाता है। उनकी एकता को प्रचय-स्वर कहते है। एकश्रुति भी स्वर्य व्यवस्था का अपवाद है, त्रैस्वर्य का नही। विना त्रैस्वयं के तो अक्षर का उच्चारण ही नही हो सकता। अत. स्वर उदात्त, अनुदात्त व स्वरित तीन ही हैं। शेष सभी स्वरो का इन्ही मे अन्तर्भाव हैं । साममन्त्र मे षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद भेद से जो सात स्वर बतलाये गये है वे भी उदात्तादि तीन स्वरो से अतिरिक्त नही है। १. उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितः प्रचितस्तथा निघातश्चेति विज्ञेय. स्वरभेदास्तु पञ्चधा ॥ २. य एवोदात्त इत्युक्तः स एव स्वरितात्परः । प्रचयः प्रोच्यते तज्ज्ञोर्न चात्रान्यत् स्वरान्तरम् ॥ ३. उच्चानुदात्तयोर्योगे स्वरित स्वर उच्यते । ऐक्यं ततप्रचयः प्रोक्तः सन्धिरेषां मियोऽद्भुतः ।।

हिन्दी-व्याख्या [ ४१ याज्ञवल्क्य क्योकि 'निपाद व गान्धार उदात्तप्रभव, ऋषभ व धंवत अनुदात्तप्रभव तथा षड्ज, मध्यम व पंचम स्वरितप्रभव माने गये हैं। इस प्रकार पारिगन्यादि ने उन सातो का उदात्तादि तीन स्वरो में ही अन्तर्भाव कर दिया है। आदि ने भी इसी तथ्य को स्वीकृत किया है। उन्होने कहा है कि गन्धर्व वेद मे जो षड्ज आदि सात स्वर वतलाये गये हैं, वे ही वेद के उदात्तादि तीन स्वर हैं। निपाद व गान्वार को उदात्त, ऋषभ तथा धैवत को अनुदात्त, पड्ज, मध्यम व पंचम को न्वरित जानना चाहिए। । वस्तुन. तो उदात्तादि स्वरो का कारण प्रक्रमगन उच्चत्व नीचत्वादि हैं तथा पड्जादि स्वर ध्वनिरागभेद-मूलक हैं। यही उदात्तादि तथा षड्जादि स्वरों में मौलिक भेद है। जैसा कि नारद ने कहा है- मयूर पड्ज स्वर मे बोलता है, गायें ऋषभ स्वर में रभाती है । और अवि गान्धार का उच्चारण करते है। क्रोच मध्यम स्वर तथा वसन्त मे कोविल पचम स्वर बोलती है। घोडा धैवत तथा हाथी निपाद स्वर का उच्चा- रण करता है। इन पड्जादि स्वरो के उच्चारणोपयोगी स्थानो का निर्दश विशेष रूप से नारदभिक्षा मे किया गया है। ये सातो स्वर संमीत मे उपयोगी साधारण उच्चारण मे इनका कोई विशेप उपयोग नही है । प्रत. इनका विशेप विवेचन यहां नहीं किया जा रहा है। सर्वसाधारण उदात्तादि तीन स्वर ही हैं। इन तानों म्वरो में लिपिभेद यद्यपि नहीं है, तथापि अनुदात्त को अक्षर के नोचे तिरछी रेखा (अ) के द्वारा, स्वरित को ऊपर तिरछी रेखा (अ) के द्वारा, inic ह्यते १ उदात्त निषादगान्धारावनुदात्त ऋषमघवतो। स्वरितप्रमवा षड्जमध्यमपञ्चमाः॥ २ गान्धर्ववेदे ये प्रोक्ताः सप्त पड़नादयः स्वराः। त एव मेदे विज्ञेयास्त्रय उच्चादयः स्वराः ।। उच्ची निधादगान्धारी नीचावृपमधवतो । शेषास्तु स्वरिता ज्ञेया. षड्जमध्यमपञ्चमाः ॥ ३. पड्जं वदति मयूरो गावं रम्नन्ति चपमम् । प्रजाविके तु गान्धारं क्रौञ्चो वदति मध्यमम् ॥ पुष्पसाधा से काले कोकिलो वक्ति पञ्चमम् । अश्वस्तु धैवतं वक्ति निपादं वक्ति पुजः।।

४२ ] पथ्यास्वस्ति उदात्त को ऊपर दण्डाकार रेखा (अ) के द्वारा तथा प्रचय को स्वरित व उदात्त की मिली हुई रेखायो (अ) के द्वारा व्यक्त किया जाता है। प्रकार स्वरो की यह अनुभवगम्य त्रिविधता प्रक्रमभेद के द्वारा मालूम करनी चाहिए। २ मुखस्थान से वर्णभेद - सयोग, विभाग व शब्द से शब्द को उत्पत्ति भगवान् कणाद बतलाते है । वहाँ सयोग में जो स्यायी भाव है वही सयोग का प्रतियोगी है। इसे ही स्थान कहते हैं। सयोग मे जो सचारी भाव है वही सयोग का अनुयोगी है । उसे करण कहते हैं। ये स्थान और करण बाह्य आभ्यन्तर भेद से दो प्रकार के हैं। वायु के प्रक्रम मे मुख मे आने से पहिले जो वायु के स्थान और करण है वे बाह्य हैं । और मुखप्रदेश के अन्दर वर्तमान स्थान और करण आभ्यन्तर कहलाते हैं। दाह्य स्थान उर , कण्ठ व शिरोभेद से तीन हैं। मुख मे कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त तया अोष्ठभेद से पाँच स्थान है। जिह्वा का मूलभाग कण्ठ है। मुख मे दन्त व उलूखल स्थान के पूर्व भीतरी प्रदेश मे झुका हुआ जो प्रदेश है उसका पूर्व पाव तालुमूलस्थान है। उसी का पश्चिमपार्श्व मूर्धा स्थान है। उसके अत्यन्त समीप का पश्चिम भाग दन्तमूल स्थान है । उत्तर (ऊपर का) ओष्ठ अोठ-स्थान हैं। इन पाँचो स्यानो मे क्रमश जिह्वामूल, जिह्वामध्यमभाग, जिह्वा का उपाय भाग, जिता का अग्रभाग तथा अधरोष्ठ इन पाँचो करणो का सयोग होने पर सब वर्ण उत्पन्न होते हैं । वायु जिस मात्रा में जिस प्रक्रम से प्रारम्भ होकर कण्ठ स्थान मे पहुँच कर अकार बनती है। उसी मात्रा मे उसो प्रक्रम से प्रारम्भ होकर तालुस्थान मे पहुँच कर वह इकार वनती है। इसी प्रकार मूर्धस्थान मे ऋकार, दन्तमूल मे लकार तथा प्रोष्ठ मे उकार बनतो है। एक ही प्राणवायु भिन्न-भिन्न स्थानो मे पहुँच कर अकार, इकार, ऋकार, लकार व उकार इन भिन्न-भिन्न स्वरूपो मे परिणत हो जाती है। अत एक ही प्रकार अक्षर के, स्थानभेद के कारण पंचविध रूप बन जाते है। यहा प्रक्रमभेद से भिन्न-उदात्त, अनुदात्त व स्वरित स्वरो का समान रूप से कण्ठादि स्यानो से सम्बन्ध है। अत इनके पाँच ही स्यान सिद्ध होते है। उदात्तादि भेदो के कारण स्थानादि का भेद नही होता।

हिन्दी-व्याख्या [ ४३ 'कितने ही ऐसा मानते है कि मुखादिकण्ठभाग में कृकाटिका, जिह्वामूल व कर्णमूल ये तीन स्थान है। मुखमध्यभाग मे तालु, मूर्या व दन्तमूल ये तीन स्थान है। मुखान्त्यभाग मे सृक्का, उपध्मा व अोष्ठ ये तीन स्थान है। सारे मुख मे अनुगत नासानाडी नासिका स्थान है। इस प्रकार वर्णो के दशाभ्यन्तर स्थान है। इनमे सृक्का व उपध्मा, जो कि अोष्ठ के पास हैं, का अोष्ठ मे ही अन्तर्भाव है। भगवान् पाणिनि ने उर', कण्ठ, शिरस्, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, अोष्ठ तथा तालु ये आठ वर्णस्थान वतलाये हैं। उनमें उपर्युक्त कण्ठ, तालु, शिरः, दन्त, ओष्ठ इन स्थानो से उरस, जिह्वामूल तथा नासिका ये तीन अधिक है। इनमे वर्गों के पचम वों तथा अन्तस्थ वर्णो से सयुक्त हकार का (उर.स्थान) है तथा असयुक्त कार का कण्ठस्थान है। इस नियम के अनुसार ब, ह्न, , ह्य, ह्र, ह. में हकार का उर स्थान है। एक ख मे ककार व खकार से पूर्व उच्चारित अर्ध-विसर्ग-सदृश हकार का जिह्वामूल स्थान है। ये दोनों स्थान कण्ठ के समीपस्थ अवान्तर प्रदेश होने से कण्ठ मे हो अन्तर्भूत है । इसी प्रकार कृकाटिकामूल, जिह्वामूल व कर्णमूल के कण्ठ के अवान्तरप्रदेश होने से कण्ठ स्थान से ही इनका ग्रहण हो जाता है । इस प्रकार पाँच ही स्थान अव- शिष्ट रहते हैं। नासिका का भी कण्ठादि पाँच स्थानो से युक्त होने के कारण कण्ठादि स्थानो के समीप होने से कण्ठादि स्थानो से ही उसका ग्रहण है और उन्ही मे उसका अन्तर्भाव है। इस प्रकार अवान्तर भेदों को पृथक् स्थान मानने पर दश और सक्षेप मे पाँच ही स्थान है। नासिकास्थान का इनर पाँच कण्ठादि स्थानो के साथ कोई विरोध न होने से मुख तथा नासिका से उच्चरित पाँच स्वर और वन जाते हैं ---ऋ-ल-उँ। ये पाँच अनुनासिक स्वर है। ऋकार व लकार मे स्वरभक्ति के नासिक्य होने से अनुनासिकता है। ३ काल से वर्णभेद प्रकार के उच्चारण मे जितना काल लगता है उस काल को मात्रा कहते १. अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठ. शिरस्तथा। जिह्वामूल च दन्ताश्च नगसिकोटौ च तालु च ॥ २ हकारं पञ्चमर्युक्तमन्तस्थाभिश्च संयुतम् । औरस्यं तं विनानीयात् कण्ज्यमाहुरसयुतम् ॥

४४ ] पथ्यास्वस्ति है। 'प्रौदवजि ने निमेपकाल को तया 'नारद ने निमेपकाल अथवा विश्य दुन्मेप काल को मात्रा कहा है। इस मात्रा के तारतम्य से वर्गों की मात्रायो का नियमन है। अकार जव प्रकार से मिलता है तब परतोयोग से वह द्विमात्रिक अर्थात् दीर्घ हो जाता है। द्विमात्रिक को ही दीर्घ कहते है। अकार का जब आकार से मेल होता है तब वह स्वभाव से अभिनिहित हो जाता है। दोनो स्वरों के नाभिद्वय की एकता ही अभिनिधान है। अधिक बलवाले मे स्वल्प बल वाले का विलयन स्वाभाविक है। अत. प्रकार की आकार से सन्धि (मेल) होने पर अधिक बल वाले द्विमात्रिक दीर्घ आकार मे एकमात्रिक ह्रस्व प्रकार का विलयन होकर आकारमात्र ही शेष रह जाता है वह बिमात्रिक नहीं होने पाता। आकार का प्रकार से या प्रकार से मेल होने पर दोनो वर्गों के नाभिद्वय के सम्बन्ध से अभिनिधान हो जाता है। अत: द्विमात्रिकता ही उसमें रहती है, त्रिमात्रता या चतुर्मात्रता नही आती । क्योकि परतोयोग के विना वर्ण मे त्रिमात्रता या चतुर्मात्रता नहीं पाती। प्रयत्नविशेप के द्वारा परतोयोगविवक्षा मे तो त्रिमात्रता या चतुर्मात्रता भी बन सकती है। त्रिमात्र या चतुर्मात्र अक्षर की प्लुतसज्ञा होती है। इस प्रकार मात्रा के तारतम्य से प्रकार के ह्रस्व, दीर्घ व प्लुत ये तीन भेद हो जाते है। (क मात्रा से उच्चारित अकार ह्रस्व, द्विगुण मात्रा से उच्चारित दीर्घ तथा त्रिगुण या उससे अधिक मात्रा से उच्चारित स्वर प्लुत कहलाता है । इस प्रकार इकारादि वर्णों मे मात्रातारतम्य के कारण यह त्रिविधता होती है। लकार मे द्विमात्रता नही होती। अतः जहाँ उदात्त, अनुदात्त, स्वरित भेद से त्रिविध प्रकारादि वर्गों के ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत भेद से प्रत्येक के तीन भेद होकर , ६ भेद हो जाते है, वहाँ लकार के ६ ही भेद होते हैं। तात्पर्य यह है कि एक ही प्रकार के प्रक्रम- भेद से उदात्त, अनुदात्त व स्वरित भेद, पांच स्थानो के भेद से अ, इ, ऋ, लु, उ ये भेद तथा मात्राभेद से ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत ये तीन भेद होते हैं। ये ४२ भेद विशुद्ध अर्थात् निरनुनासिक अकार के है। इतने ही भेद सानुनासिक के होते हैं। इस प्रकार ८४ भेद प्रकार के हो जाते है। - मात्रा १. निमेषकालो इत्यौदवजि । २ निमेषकालो मात्रा स्यात विद्युत्कालेति चापरे । नारदः । स्यात् । .

हिन्दी-व्याख्या [ ४५ ४. आभ्यन्तर प्रयत्न से वर्णभेद मुख के अन्दर कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, प्रोष्ठ इन पाँचो स्थानो मे जिह्वामूलभाग आदि करणो का सयोग के लिए जो प्रयत्न है, उसे पाम्यन्तर प्रयत्न कहते हैं। प्राभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट तथा वित्त भेद से दो पकार का है। जिस प्रयत्न से स्यानो मे करणो के स्पर्श का तारतम्य होता है, उमे स्पृष्ट प्रयत्न कहते हैं:- य र ल (१) अ, इ, ऋ, लु, उ-ये अस्पृष्ट स्वर हैं । (२) व- ये ईम्पृग अन्तस्थ वर्ण है। (३) अ - ये दुस्पृष्ट अन्त स्थ वर्ण है। (४) ग व -- ये मृदुस्पृष्ट स्पर्श वर्ण है। य ड द व ज ho द विवृत को विवरण या सप्रसारण कहते हैं। जिस प्रयत्न से स्थानो से सयोगकाल में करण तरतमभाव से (न्यूनाधिक भाव से) सम्प्रसारित होते हैं, वह स्पर्श विरोधी धर्म विवृत कहलाता है। अत विवृत प्रयत्न मे स्पर्श का अभाव होता है। इसीलिए अ, इ, ऋ, लु, उ ये पूर्ण विवृत स्वर है। इनमे स्थान व करण के स्पर्श का सर्वथा अभाव है। स्थानो मे करण स्पर्श लिए जितना प्रयत्न करते है, उतनी ही विवृत प्रयत्न मे कमी आती है। स्पर्श की न्यूनाधिकता से विवृत मे न्यूनाधिकता होती है । सम्प्रसारित स्थान करण वाले वर्गों मे एक-एक वर्ण की जितनी मात्रा होती है, उसके अर्वांश का ह्रास होने पर विवृतार्थ प्रयत्न द्वारा इनमे सकोच हो जाता है। और तव वे एकमात्रिकतारूप स्वर से च्युत होकर अर्धमात्रिक व्यजन हो जाते है। जैसे-~ऽ य र ल व ये अर्घविवृत अन्तस्थ वर्ण व्यजन इन पांचो अन्तस्थवर्णो मे प्रथम वर्ण विवृत्ति है। यह अर्धमात्रिक वर्ण है। अभिनिधान, सन्ध्यक्षर, उष्मान्त स्थ गति मे विवृत्ति होती है। जैसे- हरेऽव, विष्णोऽव यह अभिनिधान स्थान है। ए, ओ ये सन्ध्यक्षर स्थान है। इकार व प्रकार की मन्धि होने पर जैसे इकार, पर अर्थ मात्रा से च्युत हो जाता है । उसी प्रकार प्रकार व इकार की सन्धि होने पर पूर्व प्रकार, पर अर्धमात्रा से रहित होकर अर्धमात्र प्रकार शेष रह जाता है। जैसा कि पाणिनि ने कहा है - - ४६ ] पथ्यास्वस्ति - 'एकार, प्रोकार मे कण्ठस्थानीय प्रकार की अर्बमात्रा ही शेप रहती है। यह अकार अर्धमात्र होने से व्यजन है। और पूर्ण स्पृष्ट न होने से स्वर भी है । इस प्रकार स्वर व व्यजन दोनो के धर्मों के सम्बन्ध से यह अन्त स्थ कहलाता है। विवृत्ति का तीसरा स्थान उष्मान्त स्थगति है। जैसे-'सदय इह, हर इह, विपण इह' इन उदाहरणो मे है। 'सदय इह' मे ऊष्म हकार या विसर्ग अर्धमात्र विवृत्त्यकार हो जाता है। इसीलिये पाणिनि ने कहा है हकार की-प्रोभाव, विवृत्ति, ग, प, स, रेफ, जिह्वामूल और उपध्मा ये ८ गतियाँ है। वह विवृत्त्यकार व्यजन है। उसके कारण पूर्व प्रकार तथा इकार का विच्छेद हो जाने से उनमे स्वरसन्धि नहीं होती। इसी प्रकार हर इह, विष्ण इह, इन उदाहरणों मे अन्त स्थ य और व विवृत्त्यकार बन गये है । उस व्यजन से विच्छेद होने के कारण स्वरसन्धि नही होती है। यहाँ विवृत्ति का स्वरूप दोनो स्वरो के मध्य मे विच्छेद ही है। शाकल्य ने यहाँ य और व का लोप माना है, वह ठीक नहीं है। क्योकि वर्णलोप होने पर स्वरसन्धि अवश्य होती। वैयाकरणो द्वारा कल्पित 'पूर्वत्रासिद्धम्' सूत्र से यकार- लोपादि को प्रसिद्ध मानकर सन्ध्यभाव बतलाना बालशिक्षोपयोगो कल्पनामात्र है। क्योकि शास्त्रीय प्रक्रियाविशेष की शब्दोच्चारणविशेष के अाधान मे सामर्थ्य नही है। शास्त्र केवल शब्द की स्थिति का वोधक होता है न कि शब्द स्थिति का जनक । इसलिए 'हर इह' इत्यादि स्थलो मे यकारादि-लोप-प्रक्रिया से पाणिनि को सन्तोष नही हुआ और उन्होने 'लोप गाकल्यस्य' कहा। अर्थात् लोप द्वारा सन्ध्यभाव का प्रतिपादन शाकल्य का मत है न कि पाणिनि का। पाणिनि के मत मे तो य और व के स्थान मे विवृत्ति रूप वर्णादेग होता है । उस विवृत्त्यकार के द्वारा विच्छेद होने से प्रकार व इकार मे सन्धि नही होती। इन अन्तस्थ वर्गों को मुख व नासिका दोनो स्थानो से उच्चारण करने पर मैं व लँ ऐसे अनुनासिक वर्ण होते हैं। रेफ नासिक्य नही होता। और विवृत्ति भी नासिक्य नही होती। अ य ड ळ व ये ईषद्विवृत अन्तस्थ वर्ण हैं। इनमे पहिला वर्ण 'अ' सवृत प्रकार है। 'ऐ', और 'नौ' मे जो अकारोच्चारण की प्रतीति होती है वह सवृत प्रकार है। इसीलिए पाणिनि ने कहा है -- १ अर्घमाना तु कण्ठ्यस्य एकारीकारयोर्भवेत् । पा० शि० । २. प्रोभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च । जिह वामूलमुपध्मा च गतिरप्टविघोष्मणः ॥ पा. शि० हिन्दी-व्याख्या [ ४७ 'एकार व प्रोकार मे ग्रावी मात्रा कण्ठ्य वर्ण की तथा ऐकार व औकार मे भी आधी मात्रा कण्ठ्य वर्ण अकार की है। वे चारो वर्ण विवन व सवृत उभयात्मक हैं। सवृत एकमात्रिक होता है और विवृत द्विमात्रिक होता है। २पाणिनि ने स्वरो व ऊम्म वर्णो का विवृत करण माना है। ए और प्रो को विवृततर तथा ऐ औ को विवृततम बतलाया है। वह सन्ध्यक्षरता के कारण बतलाया है। और संवृतत्वकथन प्रोकार के एक प्रदेश (अकार) की अपेक्षा से किया है। एकारादि सन्ध्यक्षरों मे सवृत अन्त स्थ प्रकार मध्यम मे विद्यमान है अत इन मे स्वरत्व नहीं रहेगा यह भ्रम निराधार है। क्योकि विवृततरत्व व विवृततमत्व के कारण उनका स्वरत्व अक्षुण्ण है । म्लेच्छ भापा- लिपि मे भी दो प्रकार के प्रकार हैं। जैसे-पारसी लिपि में विवृत अकार का (।) अलिपि शव्द से तथा सवृत प्रकार का 'अयन' ' शब्द से उल्लेख किया है। 'अ' इस सूत्र का निर्माण करते हुए भगवान् पाणिनि ने भी प्रकार के इस द्वैविध्य का उपदेश किया है। उन दोनो अकारो मे संवृत अकार अन्तस्थ है क्योकि वह व्यजन है। और दूसरा अकार स्वर होने से विवृत है क्योकि 3स्वर और ऊष्म वर्णो का विवृत प्रयत्न पाणिनि ने बतलाया है। । 'ऐ औ' इत्यादि मे पृथक रूप से अकारोच्चारणप्रतिवन्ध के लिए उसके उच्चारण मे प्रयत्नविगेप को अपेक्षा होने से ऐकार औकार के अन्तर्गत प्रकार को दुस्पृष्ट अकार मानना चाहिये। ईपत्स्पृष्ट व पूर्ण स्पृष्ट वर्गों के बीच मध्यम वृत्ति से स्पर्गसिद्धि के लिए प्रयत्नविशेप की वहाँ अपेक्षा है। ग, ज, ड, द, व विवृत रहित स्पर्श हैं। यदि ये पाँचो स्पर्श वर्ण मुख व नासिका दोनो स्थानो से उच्चारित किये जाते हैं तो स्थान-व्य-योगी वनकर ड, ञ, ण, न, म ये वर्ण वन १ अर्धमात्रा तु कण्ठ्यस्य एकारीकारयोर्मवेत् । ऐकारीकारयोर्मात्रा तयोविवृतसंवृतम् ॥ सवृतं मात्रिक क्षेयं विवृत तु द्विमात्रिकम् । (पा० शि०) २ स्वराणामूप्मरणां चैव विवृतं करणं स्मृतम् । तेन्योऽपि विवृतावेडी तान्यामंचौ तथैव च ॥ पा शि. ३ स्वराणामूष्मणां चैव विवृतं करणं स्मृतम् । पा शि.।

४८ ] पथ्यास्वस्ति जाते है। शुद्ध स्पर्शो की तरह ये नासिक्य वर्ण भी पूर्ण स्पृष्ट व विवृतप्रयत्न- रहित ही है। ५ बाह्य-प्रयत्न से वर्णभेद वर्णरूप में परिणत होने से पूर्व की अवस्था में विद्यमान वर्णो का उपादानभूत वायु अनुप्रदान कहलाता है । मुख स्थान से वहिमूत उर., कण्ठ व शिर स्थान मे सयोग के लिए वर्णोपादानभूत वायुरूप अनुप्रदान का जो प्रयत्न है, वह बाह्य प्रयत्न है। यह बाह्य प्रयत्न दो प्रकार का है सवार, नाद, घोप भेद से तीन प्रकार का प्रथम है और विवार, श्वास, अघोप भेद से त्रिरूप द्वितीय है। जिस उच्चारण मे अनुप्रदान मृदु होने से वाह्य नली को फैलने नही देता वह सवार कहलाता है। और खर होने से जो अनुप्रदान कण्ठनली को फैला देता है वह विवार है। जिस उच्चारण मे वर्णस्वरूप का प्रारम्भ करने के लिए अनुप्रदान मे वायु को मात्रा अधिक होती है और प्राणरूप अग्नि की मात्रा कम होती है उसे श्वास प्रयत्न कहते है तथा प्राणरूप तेज की मात्रा जहाँ अधिक और वायु की मात्रा न्यून होती है, उसे नाद कहते है। जिस प्रयत्न मे दृढ अग- बन्धन से उच्चारित वर्ण में प्रतिध्वनियोग्यता कम होती है, वह अघोप कहलाता है तथा जिस प्रयत्न मे शिथिल अगवन्ध के कारण वर्ण मे प्रतिध्वनियोग्यता अधिक होती है उसे घोष कहते है। इनमे संवार, नाद व घोष परस्पर उपकारक होने से अविनाभूत है। अर्थात् जहाँ एक रहता है वहाँ शेष दो भी अवश्य रहते अत इन प्रयत्नो के सख्या मे ६ होने पर भी तीन-तीन के परस्पर अविनाभूत होने से वस्तुत: अनुप्रदान प्रयत्न के दो हो भेद हैं। इसलिए सवार, नाद, घोप रूप वाह्य प्रयत्न वाले अ, य, र, ल, व, अ, य, ड, ळ, व, ग, ज, ड, द, ब, ड, ञ, ण, न, म वर्ण सिद्ध हो जाते है। ये ही वर्ण जब विवार श्वास अघोर रूप अनुप्रदान से युक्त होते है तब क, च, ट, त, प हो जाते हैं। विवार, श्वास, अघोष प्रयत्नो का नासानाडो से विरोध है अतः क, च, ट, त, प, नासिक्य नहीं होते। अत ड, ञ, ण, न, म वर्ण भी जब श्वास प्रयत्न से युक्त होगे, तो विशुद्ध क च, ट, त, प में ही परिणत होगे न कि नासिक्य क, च, ट, त, प मे । पाणिनि ऽ य र ल व इन अन्तस्थ वर्णो तथा ग, ज, ड, द, व इन वर्गों the ईषन्नादा यण जशो नादिनो हझष स्मृताः । ईषच्छवासांश्चरो विद्यात् श्वासिनस्तु खफादयः ॥ (पा. शि०) - हिन्दी व्याख्या [ ४६ श्वास है। पूर्ण स्पृष्ट प्रयत्न वाले क, च, ट, त, ५ वर्ण यदि आभ्यन्तर प्रयत्न मे अर्द्धस्पृष्ट रूप से उच्चारित होते हैं तो वे श, ष, स, ह ये ऊष्म वर्ण हो जाते हैं। यद्यपि क, च, ट, त, प पाँच वर्ण हैं और ऊष्म वर्ण श, प, स, ह भेद से चार ही हैं, तथापि अर्थ स्पृटरूप से उच्चारण करने पर क ओर प दोनो वर्ण हकाररूप मे ही परिणत होते हैं, अत अज्म वर्ण चार ही हैं। श, प, स, ह ये नासिक्य नहीं होते। क्योकि विवार, श्वास व अवोर बाह्य प्रयत्न नासा नाडी के विरोधी है। पाणिनि ने भी 'अमोऽनुनासिका न ह्रौ' इस उक्ति के द्वारा नादप्रयत्न वाले रेफ व हकार की तथा श्वाम प्रयत्न वाले सभी वर्गों की अनुनासिकता का निषेध किया है। इस प्रकार विविध बाह्य प्रयत्नो से ३४ वर्ण निष्पन्न होते है । उनमे आदि के ५ स्वर (अ, इ, ऋ, लु, उ,) तथा २६ व्यजन (अ, य, र, ल, व, अ, य, र,ळ, व, ग, ज, ड, द, ब, ड, ञ, ण, न, म, क, च, ट, त, प, श, ष, स, ह) सम्मिलित हैं। - सन्ध्यक्षरो के स्थान व प्रयत्न यौगिक वर्गों मे दो सवरणों (समान स्थान व समान आभ्यन्तर प्रयत्न वालो) के योग मे स्थानभेद नहीं होता है। अतः ह्रस्व, दीर्घ व प्लुत वर्णो का स्थान समान ही होता है। अन अ, आ, अ ३ ये तीन कण्ठ्य है। इ, ई, इ३ ये तीनो तालव्य हैं। इसी प्रकार ऋकारादि वर्णो मे भी समझना चाहिए । विभिन्न स्थान वाले वर्गों की सहिता मे सध्यक्षर द्विस्थान वाले होते हैं। इसी- लये पाणिनि ने कहा है - 'ए ऐ तु कण्ठतालव्यावो श्री कण्ठोष्ठजौ स्मृतौ । इति । ल, ह्व मे। हकार का पूर्व तथा पर दोनो प्रकार से सयोग होता है। वर्गों के पञ्चम वर्णो एव अन्तस्थ वर्गों के परे होने पर हकार का पूर्व सयोग होता है और वहाँ हकार उर स्थानीय होता है। जैसे हू, ह्न, म, ह्य, ह्र, क और ख के होने पर हकार का जिह्वामूल स्थान तथा प और फ के परे होने पर उपध्मा स्थान होता है, ऐसा शाकटायन मानते हैं। क, च, ट, त प, ग, ज, ड, द, व, ड, ञ, ण, न, म तथा र, ल, डळ से परे जव हकार होता है तव उसका परसयोग होता है और उस समय हकार आश्रयस्थानभागी होता है। इससे क, च, ट, त, प से हकार का सयोग होने पर ख, छ, ठ, थ, - - ५० ] पथ्यास्वस्ति फ एव ग, ज, ड, द, व से पश्चात् हकार का सयोग होने पर घ, झ, ढ, ध, भ वर्ण निप्पन्न होते हैं। इसीलिये पाणिनि ने कहा है 'अ और ह कण्ठस्थानीय है। इकार, चवर्ग, य और ग तालव्य हैं। उ और पवर्ग अोष्ठ्य हैं। ऋ, टवर्ग, र, प मूर्धन्य है। ल, तवर्ग, ल, म दन्त्य है। कवर्ग जिह्वामूलस्थानीय है। ड, ण न, म तया र और ल लोकभाषा म सोष्म उपलब्ध होते हैं। जैसे साहा, कान्हा, साम्हर, गेल्हा श्रादि शब्दो मे । छन्दोभाषा मे सोष्म डकारादि का प्रयोग नहीं मिलता। अतः कात्यायन ने उन वर्गों को सोष्म वर्गों मे गणना न कर दश वर्गों को हो सोष्म बतलाया है। अर्थात् २वर्गों के द्वितीय तथा चतुर्थ वर्ण सोष्म है । स्पृष्ट है तथापि जिन ककारादि से इसका सयोग होता है वे पूर्ण स्पृष्ट है । द्वितीय तथा चतुर्थ सोम वर्गों को भी पूर्ण स्पृष्ट ही माना जाता है। इसीलिए पाणिनि ने स्वरो को अस्पृष्ट, य, र, ल, व को ईषत्स्पृष्ट, श, ष, स, ह को अर्ध- स्पृष्ट तथा शेष वर्णो को पूर्ण स्पृष्ट बतलाया है। इन सभी वर्गों के समान रूप से स्पृष्ट प्रयत्न वाले होने पर भी इनके वाह्य प्रयत्नो मे भेद है। वर्गों के प्रथम- क, च, ट, त, प तथा तृतीय-ग, ज, ड, द, व अल्पप्राण हैं एवं वर्गों के द्वितीय- ख, छ, ठ, थ, फ एव चतुर्थ-घ, झ, ढ, ध, भ महाप्राण हैं।" हकार यद्यपि अर्ध- अन श्री मधुसूदनविद्यावाचस्पति प्रणीत पय्यास्वस्ति ग्रन्थ मे गुणपरिष्कार नानक तृनीय प्रपाठ की हिन्दी-व्याख्या समाप्त ॥ ३ ॥ १. कण्ठ्यावहाविचुयशास्तालव्या नोष्ठजावुपू । स्युर्मूर्धन्या ऋटुरषा दन्त्या लुतुलसाः स्मृताः । जिह्वामूले तु कु. प्रोक्तो दन्त्योष्ठी व स्मृतो बुध । पा० शि० । २ 'द्वितीयचतुर्था सोमारणः । इति । ३ प्रचोऽस्पृष्टा यणस्त्वीषन्नेमस्पृष्टा. शलः स्मृता. । शेषाः स्पृष्टा हलः प्रोक्ता निबोधानुप्रदानतः ॥ पा० शि० ।। ४ ईषन्नादा यरण जशो नादिनो हझष स्मृताः। ईषच्छ्वासाश्चरोविद्यात् श्वासिनस्तु खफादयः ॥ पा शि.

हिन्दी-व्याख्या [ ५१ अक्षरनिर्देशात्मक चतुर्थ प्रपाठ मन्त्र को जानने की इच्छा वाला पुरुष प्रत्येक पद मे स्वर, वर्ण, अक्षर, मात्रा उनके प्रयोग तया अर्थ को जाने । (१) वेद के अध्ययन से, उसके दान से, उसके श्रवण से तथा वेद के वर्णो अक्षरो विभक्तियों व पदो के जान से धर्म होता है। (२) इस कात्यायनोक्ति से यह स्पष्ट सिद्ध है कि वर्णजानपूर्वक तथा अक्षरज्ञानपूर्वक वेदार्थज्ञान ब्राह्मणो का निष्कारण कर्त्तव्य है। वहाँ वर्णज्ञान का निरूपण हो चुका। अक्षरज्ञान सिद्धि के लिए इस प्रकरण का का आरभ किया जाता है । ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है। त्रिभेदभिन्न यह ब्रह्म विश्व बनता है। ब्रह्म के तीन भेद पर, अक्षर व क्षर है। दिग्, देश, काल से अनवच्छिन्न होता हुआ भी जो क्षर तथा अक्षर का पालम्बन (आधार) होने से मन की तरह परिच्छिन्न होता है वही अव्यय नामक परब्रह्म है। वही चिति के द्वारा मन, प्राण व वाग् बनता है। इस मनोमय अव्यय मे अवलम्बित प्राणमय तथा क्षरो का संचालक कूटस्थ तत्व अक्षर' कहलाता है। अक्षर मे अवलम्बित वाड्मय यह समग्र भूतनमूह क्षर' कहलाता है। इन अव्यय (पर) अक्षर व क्षर से भिन्न कोई कोई तत्व समार मे नहीं है। अव्यय, अक्षर व क्षर तीनो पुरुष मिलकर एक पुरुप है। जिसे वेद मे पोडशी कहा है। को विशुद्ध आत्मा भी कह सकते हैं, विग्रहवान् आत्मा भी, तथा अनेक विग्रहवानों ( शरीरधारियो ) से बना हुआ स्कन्ध ( भूतग्राम ) भी। जो कुछ भूत व भव्य जगत् मे दृष्टिगोचर होता है, वह पुरुष' हो है । वह पुरुष मनोमय, प्राणमय व वाड्मय है। वेद मे कहा है कि 'अथो वागेवेद सर्वम्'। अर्थात् सव कुछ वाक् ही है। वाग् आकाग को कहते हैं। वही वायु है, तेज है, जल है व पृथिवो है। यह पृथिवी जल पर प्रतिष्ठित है, जल तेज मे, तेज वायु मे, वायु आकाग रूप वाक्तत्व में। इसलिये ये सब विकार (काय) वाकतत्व से भिन्न नहीं है। उस पुरुष १ कूटस्योऽक्षर उच्यते । २. क्षर सर्वाणि भूतानि । ३. पुरुप एवेद सवं यद् नूत यच्च नाव्यम् ।

५२ ] पथ्यास्वस्ति इसलिये जगत् मे जो कोई भी भूनममूह दिखाई देता है, वह मव वाक् हो है। इसलिये वेद मे कहा है-'वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता' इति । वे सव क्षर, अक्षर के अधीन है, अतः स्वतन्त्र नहीं रह सकते। इसलिये इनको सत्ता का प्राधायक कोई स्वतन्त्र तत्व मानना होगा। वही तत्व अक्षर है। उसे ही प्राण कहते है । उम प्राण रूप अक्षर मे अनन्त गुण उत्पन्न होते है। इसलिये गुणभेद से प्राणो के अनन्तविध होने पर भी पाँच प्रकार के स्थानो मे रहने के कारण इस प्राण के पाँच भेद माने जाते है। ये ही पाँच प्रकार के प्राण पञ्च अक्षर कहलाते हैं। ये पञ्च अक्षर ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र, अग्नि तथा सोम हैं। इन्ही पाँच अक्षरो से वाड्मय तथा सभी क्षरात्मक भूत- समूह उत्पन्न होते हैं। इन्ही प्राणो के अाधार मे ये भूत प्रतिष्ठित रहते हैं तथा अन्त मे उन्ही प्राणो मे विलीन हो जाते हैं। यह परब्रह्मविद्या है अर्थात् यह स्थिति परब्रह्म मे है। मन, प्राण, वाक् इन तीनो तत्वो मे जिनको कि अव्यय, अक्षर, क्षर भी कहते है। यह वाक्तत्व भूतभाव, गव्दभाव व अर्थभाव रूप से तीन प्रकार से विनियुक्त होता है । ' वाग् रूप आकाश से वायु आदि क्रम से उत्पन्न भूतसमूह ही भूतमय प्रपञ्च है। यह वाक् का एक प्रकार का विनियोग है। 'तत्सृप्ट्वा तदेवानु प्राविशत्' इस श्रुति के अनुसार वायु आदि भूतो मे अनुप्रविष्ट वागरूप आकाश ही आघात से कम्पित होता हुआ, वायु से पृथक् होकर वायु के आधार से चारो दिशाओ मे गोल (वृत्ताकार) वीचीतरग को उत्पन्न करता है। वह नाद रूप से कम्पमान वागाकाश चलता हुआ श्रोता के श्रोत्रप्रदेश मे पहुँचता है और श्रोत्रेन्द्रिय के प्रज्ञाभोग से मिलकर शब्द कहलाता है। यही शब्द शब्दमय प्रपञ्च तथा अर्थमय प्रपच रूप से दो प्रकार से विनियुक्त होता है। यही बात वाक्यपदीय मे भर्तृहरि ने कही है- अनादिनिधन ब्रह्म शव्दतत्व यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यत. ॥ इति । यह शब्दमय तथा अर्थमय दोनो प्रकार का प्रपच वाड्मय प्रपंच ही । यही वाक्तत्व का शब्दरूप तथा अर्थरूप इन दो प्रकारो से विनियोग है। इस शब्दमय तथा अर्थमयरूप वाड्मय प्रपच मे वे ही प्रकार है जिन प्रकारो का - -- हिन्दी-व्याख्या [ ५३ भूतमय प्रपंच मे वर्णन किया है। वह वाड्मय प्रपच भूतमय प्रपच से छोटा है क्योकि यह भूतमय प्रपंच का एकदेश है। अत परब्रह्म विद्या को जानने की इच्छा वाला पहिले शब्दमय ब्रह्मविद्या का परिनीलन करे। अल्पश्रम से ज्ञात यह शब्दविद्या महायाससाध्य परविद्या के ज्ञान मे उपयोगो है इसीलिये मुण्डक श्रुति ने कहा है- द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म पर च यत् । शाव्दे ब्रह्मरिण निष्णात पर ब्रह्माधिगच्छति ।। इस श्रुति मे ब्रह्म शब्द का अर्थ विज्ञान है। वह विज्ञान शाव्दविज्ञान तथा परविज्ञान भेद से दो प्रकार का है। विज्ञान तथा अभिनिवेश के द्वारा ज्ञानप्राप्ति भगवान् गौतम मानते है। शब्दश्रवणाधीन अर्थज्ञान विज्ञान है। इसे ही शाब्द ब्रह्म कहते है । परीक्षा द्वारा साक्षात्काराधीन अर्थजान को परब्रह्म कहते है। पूर्व परीक्षको, पदार्थतत्व का साक्षात्कार करने वाले पुरुषो के अधिगतार्थविषयक उपदेशरूप वाक्यार्थश्रवण मे निष्णात पुरुप यदि परोक्षा के लिये प्रवृत्त होता है, तो उनका अभिनिवेशज्ञान समीचीन होता है। यह इस मत्र का प्रथम अर्थ है। अन्य प्रकार से भी इस मत्र की व्याख्या है- दो प्रकार से अर्थज्ञान कराता है - अभिधानरूप से तथा प्रतीकरूप से। प्रोम् शब्द का वाच्य ब्रह्म है तथा अोम शब्द भो ब्रह्म है जैसा कि श्रुति बतला रही है-'एतद्वै सत्यकाम पर चापर च ब्रह्म यदोङ्कार । वहाँ अभिधानपक्ष के अनुसार 'द ब्रह्मणी' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या ऊपर कर दी गई है। प्रतीक पक्ष मे इस मत्र का अर्थ निम्नलिखित हैं . - परा तथा अपरा ये दो विद्या है। परब्रह्म ही परा विद्या तथा शव्दब्रह्म ही अपरा विद्या है। दोनो विद्याओ मे अत्यधिक साम्य है। अत शब्दसृष्टि- ज्ञान से उसकी ममानता के कारण अर्थसृष्टिज्ञान सिद्ध हो जाता है, ऐसा विद्वान् मानते हैं। जिस प्रकार पर विद्या मे अव्यय, अक्षर, क्षर भेद से तीन प्रकार का प्राणब्रह्म है। उसी प्रकार अपर विद्या मे भी स्फोट, अक्षर, वर्ण भेद से तीन प्रकार का वाग्ब्रह्म है। अपरविद्या मे वर्गों, अक्षरो, पदो, समस्त- पदो, वाक्यो व महावाक्यो मे एकत्वबुद्धि का कारण स्फोटरूप अव्यय है। जिस प्रकार परविद्या मे क्षर, अक्षर आदि का पालम्बन अव्यय पुरुप है, उसो ५४ ] पथ्यास्वस्ति परतन्त्र क्षरात्मक व्यजन स्फोटरूप अव्यय मे नित्य सम्बध पाँच स्वरात्मक वर्ण अ, इ, उ, ऋल, अक्षर कहलाते है। इन्ही पांच अक्षरो से क्षरात्मक सारे व्यजनवर्ण उत्पन्न होते है। जिस प्रकार अक्षरो से उपगृहीत क्षर, अक्षरो के आलम्बन अव्यय मे प्रतिष्ठित रहते है, उसी प्रकार स्वररूप अक्षरो से उपगृहीत व्यजनरूप क्षर अक्षरा- लम्वन स्फोटरूप अव्यय मे प्रतिष्ठित रहते है। अक्षरात्मक स्वर के आश्रित रहते है और अक्षरात्मक स्वरसमूह अव्ययात्मक स्फोट मे सम्बद्ध होता हुआ अपना स्वरूप धारण करता है। ये व्यजन, स्वर और स्फोट तीनो एकीभूत एक वाक्तत्व है। वाक्य का स्वरूप पदो से, पदो का अक्षरो से तथा अक्षरो का वर्णों से निष्पन्न होता है। अत. वाक्य, पद व अक्षर सभी का स्वरूप वर्गों से ही बनता है। अक्षर वर्णों का आत्मा है, अत वर्षों से भिन्न है। अर्थात् वर्ण तथा अक्षर एक नही, भिन्न है। इसीलिये कात्यायन ने 'स्वरो वर्णोऽक्षर मात्रा' इस पद्य मे वर्ण तथा अक्षर दोनो का प्रयोग कर वर्ण और अक्षर का भेद बतलाया है। जो वर्णसमाम्नाय अक्षरसमाम्नाय है, इस रूप से वर्ण और अक्षर मे कही कही अभेदव्यवहार भो किया गया है वह भ्रान्तिमूलक है । क्योकि आठ प्रकार से वर्णो एव अक्षरो मे भेद सिद्ध है। जैसे- (१) वर्ण क्षरपुरुष है और अक्षर अक्षर पुरुप हैं, इस प्रकार दोनो मे पुरुषभेद है। (२) वर्ण ६४ हैं और अक्षर लघु, गुरु भेद से दो प्रकार का है, यह सख्याभेद है। (३) वर्ण एकविन्द्वात्मक है और अक्षर नवविन्द्वात्मक है, यह योनिभेद है। (४) वर्ण निर्व्यापार है अोर पञ्चम विन्दुस्थ अक्षर यदि निर्व्यापार है अथवा उसमे पृष्ठत व्यापार है, तो लघु होता है और पुरतो व्यापार होता है, तो गुरु होता है। जैसे- अ या प्र लघु है किन्तु आ या अत् गुरु है, यह व्यापारभेद है। (५) वर्ण अन्न है और अक्षर अन्नाद है, यह वीर्यभेद है। (६) वर्ण अक्षरप्रतिष्ठा मे प्रतिष्ठित है और स्वत अप्रतिष्ठित है, किन्तु अक्षर स्वत प्रतिष्ठित है, यह प्रतिष्ठाभेद है। - हिन्दी-व्याख्या [ ५५ (७) वर्ण अक्षर के अग है और अक्षर वर्गों का अगी है, यह अगागिभेद है। (८) 'प्रोम्' मे वर्ण तीन हैं-अ, उ, म्, किन्तु अोम् 'अक्षर एक है, यह प्रतिपत्ति (ज्ञान) भेद है। इस प्रकार उपर्युक्त सन्दर्भ से दो वाते सिद्ध होती हैं- (१) वर्णो से अक्षर भिन्न हैं। (२ तथा अर्थ और शब्द दोनो ही तीन प्रकार के हैं, इस समानता के कारण परब्रह्मविद्या व शब्दब्रह्मविद्या मे अत्यन्त मादृश्य है। अक्षरो को गुरुत्व तया लघुत्व की उपपत्ति के लिए वर्णों के अगाङ्गिभाव की व्याख्या की जा रही है। 'वृहत्या (वाच ) पति. वृहस्पति' इत्यादि निर्वचन से वाक् का वृहतीत्व सिद्ध हाता है। यह वृहती वाक् ऐन्द्र (इन्द्र सम्बन्धी) छन्द है। ऐतरेयारण्यकश्रुति मे वृहतोनहस्र को इन्द्र का प्रिय धाम बतलाया है। इसलिये ऐन्द्री वाक् वृहती कहलाता है। वृहती यह नौ भक्ति (भाग) वाले छन्द की सज्ञा है। ऐन्द्री वाक् को वृहती वतलाते हुए प्राचार्यों का ऐन्द्री वाक् नवभक्तिक (नौ भाग वाली) है, यह तात्पर्य है । अतः यह सिद्ध है कि ऐन्द्री वाक् का नौ विन्दुएँ व्याप्तिस्यान हैं। नौ विन्दु तक यह अक्षरस्फोट है। अर्थात् नौ बिन्दुनो तक अक्षरम्फोट की व्याप्ति है। उच्चार्यमाण व्यजन जितने प्रदेश को व्यान करते है वह अर्धमात्राकाल है। उसी अर्वमात्राकाल का उपलक्षण (बोधक) एक विन्दु है। यद्यपि स्वर को अमर कहते है और स्वर दो विन्दुओ को विषय बनाता है न कि नौ विन्दुओ को। क्योकि स्वर एकमात्रिक होता है और एक मात्रा दो अर्धमात्रिक विन्दुनो से बनती है तथापि नव विन्दु तक अक्षर की व्याप्ति होती है, यह नवविन्दुक का तात्पर्य है न कि नौ विन्दुप्रो मे स्वररूप अक्षर का स्वरूप बनता है। अर्थात् नवविद्वात्मक प्रदेश तक के व्यजनो को स्वर रूप अक्षर आत्मसात् करने मे समर्थ है। व्यानसहित स्वर भी अक्षर कहलाता है और सव्यजन स्वर का नवविन्दुक स्फोट अायतन होता है। यहो स्फोट अव्यय है। तात्पर्य यह है कि परब्रह्म की तरह शब्दब्रह्म भी अक्षर उक्थ, अर्क, अशिति भेद से तीन भागो से युक्त है। उन तीन भागो मे बिन्दुद्वयात्मक स्वर १ 'प्रोमित्येताक्षर ब्रह्म' (गीता श० ८) ५६ ] पथ्यास्वस्ति लेता है। गव्दब्रह्म का उक्थ या आत्मा है। सात विन्दुएँ इसका अर्कस्थान है। उक्थरूप प्रात्मा से उत्पन्न प्राण अर्क कहलाते है। वे अर्क क्रान्तिमण्डल रूप अपनी महिमा मे अमिति (अन्न) को प्राप्त करने के लिए आक्रमण (गमन) करते हुए क्षररूप व्यजन को आत्मसात् कर लेते है, उसे अपने स्वरूप मे समाविष्ट कर लेते हैं। इस प्रकार यह उक्य रूप आत्मा अपने क्रान्तिमण्डलस्प महिमा स्थान मे अकं द्वारा गृहीत व्यजनों को अपने स्वरूप में समाविष्ट कर अतः केवल स्वर के अक्षर होने पर भी ६ विन्दु तक वर्तमान भररूप व्यजन स्वररूप अक्षर की सत्ता से ही सत्तावान् होते हैं। अत. इन व्यजनों से युक्त स्वर अक्षर कहलाता है। जैसे 'अ' यह एक अक्षर ह। इसी प्रकार य, स्य, त्र्य, स्त्र्य भी एक-एक अक्षर ही हैं। वे अमर उपसर्ग (पूर्व मे विद्यमान) व्यंजन के (एक-दो-तीन-चार-भेद से) न्यूनाधिक होने पर भी आकार मे समान स्थान को ही रोकते हैं। इसी प्रकार अ, अर्, अर्क, अर्कट ये चारो अक्षर भी स्वर से उत्तरवर्ती व्यजनो के न्यूनाधिक होने पर भी छन्द (आकार) मे समान स्थान को ही रोकते है। अत ये एक अक्षर कहलाते है। इसीलिए जहाँ व्यंजन नही है, वहाँ शुद्ध स्वर ही अक्षर है। और स्वर के पूर्व या पश्चात् व्यंजनो के होने पर व्यजनविगिप्ट स्वर ही अक्षर कहलाता है। इसीलिये कात्यायन ने कहा है। 'स्वरोऽक्षर सहायर्व्यञ्जनरुत्तरश्चावसितं'। इति । स्वर दो प्रकार का होता है-अपृक्त तथा व्यजनसंपृक्त। जैसे- 'अहम्' मे प्रथम अकार व्यजन से असंपृक्त है। उसको हम वर्ण व अक्षर दोनों कह सकते हैं। क्योकि अकार वर्ण भी है और 'स्वरोऽक्षरम्' इस सिद्धात से अकार स्वरवर्ण होने से अक्षर भी है। हकारोत्तरवर्ती अकार पूर्व मे हकार व्यजन से तथा पश्चात् (उत्तर में) अकार व्यजन से सम्पृक्त है। अत यहाँ व्यंजनविशिष्ट स्वर है, न कि केवल, स्वर। यहाँ व्यंजनविशिष्ट स्वर का व्यजनोपहित दृष्टि से विचार करें तो अकार भी वर्ण ही है अक्षर नही, क्योकि उपाधि का उपहित मे अन्वय नहीं होता। अतः उस दृष्टि से विचार करने पर व्यजनो का अकार मे अन्वय न होने से प्रकार वर्ण ही है। और यदि विशिष्ट मान कर विशिष्ट दृष्टि से विचार किया जाय तो विशेषणो का विशिष्ट में अन्वय होने से अकार, पूर्व मे हकार तया उत्तर मे मकार व्यजन से युक्त होने के कारण 'सहाद्ययंजनरुत्तरश्चावसितं' इस कात्यायनवचन के अनुसार अक्षर है। इसीलिये 'वागित्येकमक्षरम्', अक्षरमिति त्र्यक्षरम्' यह ऐतरेयारण्यक श्रति [ ५७ हिन्दी-व्याख्या 'वाग्' को एक अक्षर तथा अक्षर को त्र्यक्षर (तीन अक्षरो का समुदाय) बतला रही है। क्योकि वाग्' मे क्, आ, ग् इन तीन वर्गों के होने पर भी आद्यन्त व्यजनो से विशिष्ट अकारस्वर एक अक्षर ही है तथा 'अक्षर' शब्द मे 'अ' यह एक अक्षर व्यजन से असंपृक्त होने के कारण 'स्वरोऽक्षरम्' इस सिद्धान्त के अनुसार अक्षर है। तथा 'क्ष' व 'र' ये दो व्यजनसपृक्त स्वर होने से 'महाद्ययंजनरुत्तरैश्चावसितैः' इस वचन के अनुसार अक्षर हैं, मिलकर तीन अक्षर हैं, अत 'अक्षर' शब्द को तीन अक्षरो का समुदाय बतलाया गया है। कितने त्यजनो से युक्त स्वर एक अक्षर कहला सकता है, इस जिज्ञासा मे यही उत्तर है कि आदि मे (पूर्व मे) चार व्यजनो से तथा उत्तर में तीन व्यजनो से विशिष्ट स्वर एक अक्षर कहला सकता है। अर्थात् एक स्वर आदि मे चार व्यजनो को तथा उत्तर मे तीन व्यंजनो को व्याप्त कर सकता है। यही उसका क्रान्तिमण्डलरूप महिमास्थान है, इससे अधिक नही । इस प्रकार एक स्वर- रूप आत्मा अपने अर्करूप प्रारणो से आदि मे चार तथा अन्त मे तीन व्यजनों को अशिति (अन्न) रूप मे प्राधान कर आत्मसात् करके अपने अंग बना सकता है। अतः इतने व्यजन उसके अग हैं तथा बिन्दुद्वयात्मक स्वर उन व्यंजनरूप अगो का आत्मा है। इसलिये जैसे पृथिवी सूर्य का अंग है उसी प्रकार पार्थिव वाग्रूप व्यंजन ऐन्द्रवागरूप स्वर के अग है । अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जहाँ ६ विन्द्वात्मक प्रदेश मे दूसरे स्वर का अभाव है, वहाँ तो 'सहाथै' इत्यादि कात्यायन-वचन के अनुसार पूर्व में चार तथा उत्तर मे तीन व्यजनो से युक्त स्वर अक्षर है, यह ज्ञान निर्वि- वाद तथा असन्दिग्धरूप से हो जाता है किन्तु जहाँ नवबिन्द्वात्मक परिधि मे दूसरा स्वर भी आ गया है वहाँ उसके पास के व्यंजनो को कौनसे स्वर का अंग माना जाय अर्थात् स्वरद्वयमध्यवर्ती व्यजनो को पूर्वस्वर का अग माना जाय या परस्वर का। जैसे-'अपक्वस्त्यानम्' इस पश्चाक्षर पद मे शुद्ध प्रकार, पकार- युक्त अकार, ककार व वकार से युक्त अकार, सकार, तकार तथा यकार से युक्त आकार एव पूर्व मे नकार तथा उत्तर मे मकार से युक्त अकार इस प्रकार पाँच अक्षर है। वहाँ पर पकार, ककार, सकार, तकार एव नकार अपने पूर्ववर्ती स्वर के अग क्यों नहीं हैं, उत्तरवर्ती स्वर के ही क्यो ? इसका समाधान यही है कि स्वर मे पृष्ठत. (आदि मे) तथा पुरतः (उत्तर में) वल मे न्यूनाधिकतारतम्य होता है। दो स्वरो के होने पर पूर्ववर्ती ५८ पथ्यास्वस्ति तथा परवर्ती स्वरो मे वाध्यवाधकभाव होने से एक स्वर मे बल का नाश होने से उस स्वर (बाधित स्वर) का व्यजनविशेष मे सक्रमण स्क जाता है। जैसे-'कुल' शब्द मे लकार व्याजन परस्वर का अङ्ग है अत पूर्व स्वर का अङ्ग नही होता। क्योकि यहा पर अधिक बल वाले, परस्वर के वल से अल्प वल वाले पूर्व स्वर के बल का वाध हो गया है। वलो का यह तारतम्य दो स्वरो का सनिकर्ष होने पर ही होता है। क्योकि नवविन्द्वात्मक आयतन मे स्वर की स्थिति पञ्चम व षष्ठ विन्दु पर आधारित है। उसमे पूर्व मे पञ्चम- विन्दु-सहित पाँच पाद बल हैं तथा उत्तर मे षष्ठ-विन्दु-सहित चार पाद वल है । नवबिन्द्वात्मक नौ पादवलो से युक्त यह स्वर पूर्व तथा परविन्दुस्थ व्यजनों पर व्याप्त होता है। पञ्चम -पष्ठ-विद्वात्मक आयतन पर आश्रित स्वर पूर्व में चार बिन्दुनो को तथा उत्तर मे तीन बिन्दुओं को व्याप्त करता है या उन बिन्दुओ पर क्रमण करता है। किन्तु पञ्चमषष्ठबिन्दुरूपी उक्थ का यह आक्रमण-वल पूर्व मे श्रादि की चार बिन्दुओ पर तथा पश्चात् सप्तमादि तीन बिन्दुओ पर पादश एक-एक (पाद) कम होता जाता है । जैसे-हरि शब्द मे रेफ मे पूर्व तथा पर दोनो स्वरो को अङ्गता प्राप्त है, किन्तु पूर्व स्वर का उत्तरत. बल तीन पाद है और उत्तर स्वर का पृष्ठत बल चार पाद है। अत उत्तर स्वर का बल अधिक होने से रेफ पूर्व स्वर का अङ्ग न होकर उत्तरस्वर का अङ्ग होता है । 'कात्य॑म्' शब्द मे तकार मे पूर्व स्वर का बल दो पाद है तथा उत्तर पाद का वल एक पाद है। प्रत न्यून वल वाले उत्तर स्वर के बल का अधिक बल वाले पूर्व स्वर के बल से वाध हो जाने के कारण तकार पूर्व स्वर का अङ्ग माना जाता है न कि उत्तर स्वर का। यही पर सकार में पूर्व स्वर का बल एक पाद है और उत्तर स्वर का बल दो पाद है। अत सकार पूर्वस्वर का अग न होकर परस्वर का अग होता है। 'ऊर्क स्त्र्यङ्गे' उदाहरण मे कबार मे पूर्वस्वर का बल दो पाद है और परस्वर का सर्वथा नहीं, अत: वह पूर्व स्वर का अग माना जाता है। इस प्रकार स्वरो मे परस्पर बलवैषम्य होने पर जिस व्यजन पर जिस स्वर का वल अधिक होता है, वह व्यजन उसी स्वर का अग होता है। यही निष्कर्ष भगवान् कात्यायन का है-'संयोगादि पूर्वस्य । यमश्च । क्रमज च।

हिन्दी-व्याख्या [ ५६ तस्माच्चोत्तर स्पर्श । ‘अवसित चेति' । अर्थात् संयोग का आदि व्यजन पूर्व स्वर का अङ्ग होता है। इसी प्रकार यम तथा क्रमज व्यजन भी पूर्व स्वर के अङ्ग होते हैं। तर्कः, गुल्म , हव्यम्, रुक्मम्, पत्नी सत्यम्, इत्यादि उदाहरणो मे दो स्वरो के मध्यवर्ती व्यजनो मे प्रथम व्यजन पूर्व स्वर का तथा दूसरा व्यंजन पर स्वर का अंग है। अन्तस्थ (य, र, ल, व) तथा श, ष, स, ह से भिन्न सयुक्त तथा अवसित (पदान्त) व्यजनो का उच्चारण दो प्रकार से होता है-सहजतया तथा वलप्रयोगपूर्वक । जिस रूप से वर्णों का प्रारभ किया जाता है उसी रूप से समाप्ति भी करनी चाहिए, इस नियम से उच्चारण करने वाले पुरुषो का पद के मध्य मे विशेष बल का प्रयोग नही होता, इस प्रकार का उच्चारण अञ्जसा उच्चारण कहलाता है। जैसे 'सत्य' शब्द मे स्पर्शवर्ण तकार का, तर्क, गुल्म आदि उदाहरणो मे अन्तस्थ वर्ण रेफ व लकार की तरह, मृदुग्रह है। ऐसे स्थलो मे तकार-वर्ण पूर्व स्वर का अग होता है किन्तु विक्रम्य उच्चारण करने मे तकार स्पर्श मे बलविगेप का उदय होने से पूर्व स्वर की विक्रान्ति होती है। इस विन्रम के कारण 'सत्य' शब्द मे स्पर्ग वर्ण के उच्चारण के बाद विच्छेद होकर पुन उत्तर वर्ण के उच्चारण के लिए प्रयत्नलाभ होता है। ऐसी स्थिति में 'सयोगविभागशव्देभ्य. शब्द' इस वैशेषिक सूत्र के अनुमार सयोगज स्पर्ग के बाद विभागज स्पर्श की और उत्पत्ति होती है। इस प्रकार तकार वर्ण का दो वार उच्चारण होता है। इन दोनो वर्णों मे सयोगादि वर्ग तकार के द्वित्व से उत्पन्न क्रमज पूर्व तकार वर्ण पूर्व स्वर का अग होता है तथा द्वितीय तकार वर्ण जो कि विभागज शब्द है, पर स्वर का अङ्ग होता है। 'रुक्म' शब्द मे क तया तत्समान यमवर्ण द्वितीय ककार पूर्व स्वर के अग है तथा मकार परस्वर का अग है। रेफ और हकार के सयोगादि वर्ण होने पर जहाँ उनसे परे विद्यमान स्पर्ण वर्ण को द्वित्व होता है, वहाँ 'पाश्र्व्यम्' आदि शब्दो में रेफ तथा क्रमज पूर्व शकार पूर्व स्वर के अग हैं एव श, व, य-ये परस्वर के अग होते हैं। 'वार्ष्याय' शब्द मे रेफ से परे प्रथम पकार पूर्व स्वर का तथा प और य पर ६० ] पथ्यास्वस्ति स्वर के अग है । 'बाह ह्वो' मे हकार से परे विद्यमान पूर्व 'व' पूर्व स्वर का तथा द्वितीय वकार पर स्वर का अग है। क्रमज वर्ण से उत्तर विद्यमान व्यजन से परे यदि स्पर्श वर्ण हो, तो पूर्व स्वर का अग होता है। 'पाया' इस उदाहरण मे र, ष, प पूर्व स्वर के अग है। यहाँ क्रमज के उत्तर विद्यमान द्वितीय'ष' भी पूर्व स्वर का अग है क्योकि उससे परे स्पर्श वर्ण 'रण' विद्यमान है । इसी प्रकार 'वष्म॑न्' मे र, ष, प पूर्व स्वर के तथा मकार पर स्वर का अग है। 'यो कुक् टुक् शरि' 'नश्च' 'शि तुक्, इन पाणिनीय सूत्रो के द्वारा विधीयमान क, ट, ध और त पूर्व स्पर्श डकार, णकार तथा नकार के द्विरुक्त रूप ही है। क्योकि ह्रस्व स्वर से परे विद्यमान ड, ण, न को जैसे स्वर परे होने पर 'प्रत्यड्डात्मा' इत्यादि मे द्विरुक्ति होती है, उसी प्रकार स्वर-भक्ति- युक्त शकारादि उष्म वर्गों के परे होने पर भी उच्चारण-सम्प्रदाय-क्रम के अनुरोध से किसी भी स्वर से परे विद्यमान डकारादि को द्वित्व हो जाता है । किन्तु उष्म वर्ण नासिक्य के विरोधी है अत द्विरुक्ति होने पर उन्म वर्णों के सनिकृष्ट डकारादि से नासिक्य का अपहरण होकर उनमे केवल स्पर्शमात्रता शेप रह जाने से वे डकारादि ककारादि मे परिवर्तित हो जाते है। प्राक् षष्ठ., सुगण ट् षष्ठ , सन्त्स सञ्च्छम्भु इत्यादि प्रयोगो की निष्पत्ति होती है। इन सब उदाहरणो मे द्वित्वसिद्ध ककारादि वर्ण पूर्व स्वर के अङ्ग हैं। प्रत 'कात्य॑म्' शब्द मे दो अकारो के बीच वर्तमान अ, र, त, स, न, य ये ६ वर्ण है। इनमे अ, र, त ये तीन पूर्व अक्षर के तथा स, न, य ये पर अक्षर के अग हैं। यहाँ पर तकार पर पृष्ठतोबल द्वारा पर अक्षर का तथा सकार पर पुरतोवल द्वारा पूर्व अक्षर का आक्रमण होने पर भी, विरोध होने पर मूल बल से सिद्धि मानी जाती है, इस न्याय से मूल कृत्स्न शब्द मे त पूर्व स्वर का अग होता है और सकार परस्वर का। अत कृत्स्न शब्द से निष्पन्न कार्य शब्द मे भी तकार पूर्व स्वर का तथा सकार परस्वर का ही अग माना जाता है । 'तक्म्यम्' शव्द मे क, म, य, पर पूर्व स्वर का तथा य, म, क, पर परस्वर का बल प्रयोग होने के कारण विरोध होने से और विरोध मे सामीप्याधिक्य के कारण ककार पूर्व स्वर का तथा यकार पर स्वर का अग होता है। मकार पर दोनो का समान अधिकार प्राप्त होने पर भी पृष्ठतोबल पुरतोबल का अतिक्रमण कर हिन्दी-व्याख्या [ ६१ लेता है, इस न्याय के अनुसार मकार परस्वर का अंग होता है, क्योकि मकार में पुरतोवलं के कारण पूर्व स्वर की तथा पृष्ठतो वल के कारण पर स्वर की अगता प्राप्त है । वैदिको के सिद्धान्तो मे तो पूर्व स्वर के वल से अवष्टव्य ककार पर भी परस्वर के वल की प्रसक्ति होने से दो विरुद्ध बलो के द्वारा आकृष्यमाण दो 'क' वर्गों की निष्पत्ति होकर 'तक्म्यम्' ऐसा वनता है। यहाँ उत्तर ककार पर 'म' के प्रयत्न का आक्रमण होने से वह नासिक्य माना जाता है, अत. पर ककार यम कहलाता है। 'विश्वप्स्न्या' इस उदाहरण मे पकार पूर्वाङ्ग है, सकार पराग है। 'विष्वक् पाश' मे ककार पर पूर्व स्वर तथा पर स्वर के वल का समान आक्रमण होने पर भी पदान्त यति से विच्छेद के कारण ककार पूर्व स्वर का ही अग है न कि पर स्वर का । इम प्रकार अनेक स्वरों के होने पर उनमे उपर्युक्त रीति से वाध्यवाधकभाव होता है। यह पहिले वतला दिया है कि व्यजनो से सर्वथा असंस्पृष्ट स्वर तथा ज्य जनो के होने पर व्यजनसंपृक्त स्वर अक्षर कहलाता है। जैसे 'स्त्र्यर्कट्' शब्द स, त, र, य, अ, र, क, ट इन आठ वर्णो मे युक्त, अकार को छोड कर गेप सात व्यजनो से युक्त तथा प्रकार स्वर में स्वर की दो विन्दु (मात्रा) एव सात व्यजनो की सात विन्दु (मात्रा) इस प्रकार मिलकर ६ विन्दुओ से युक्त एक अक्षर है। यहाँ प्रकार वर्णमात्र है अक्षर नही। क्योकि व्यजनो के होने पर व्यजनहित ही स्वर अक्षर कहलाता है असंपृक्त नही। इस प्रकार सात व्यंजन तथा प्रकार स्वर ये आठो वर्ण अकाररूप एक अक्षर के अग है। क्योकि इन सवका उच्चारण अकार अक्षर के अधीन ही है। यह अकार अक्षर सात व्यजनो से अधिक व्यंजनो को ग्रहण करने में समर्थ नही है। वह पृष्ठत ४ तया पुरत ३ व्यजनों को ग्रहण कर सकता है, अधिक नहीं। पृष्ठत पाँचवाँ व्यजन तथा पुरत. चौथे व्यजन का यदि उच्चारण किया जाय तो अगत्या कोई दूसरा स्वर वहाँ आयेगा। क्योकि पूर्व स्वर की उन व्यजनो के उच्चारण मे सामर्थ्य नही है। जैसे 'न स्त्र्यर्क ट्प' इस उदाहरण में नकार व टकार मे हठात् दूसरा स्वर आ जाता है। अक्षर में देवानुध्यान- निरवयव मन में नौ प्रारण-खण्डो का समावेश है। वे नौ खण्ड प्राणमय कोश हैं। उन प्राणात्मक नौ विन्दुओ मे पञ्चम विन्दु केन्द्ररूप होने से प्रात्मा ६२ ] पथ्यास्वस्ति कहलाती है। अन्य ८ बिन्दुएँ उसके अग है । पञ्चम विन्दु पर स्थित स्वर अक्षर कहलाता है। वही स्वर ऐन्द्रवायव ग्रह है और वाक् का प्रात्मा है। यह पञ्चम बिन्दुस्थ स्वररूप प्राण वाड्मय होने से इन्द्र कहलाता है। यही इन्द्र- प्राण सरस्वती का अधिष्ठाता सरस्वान् है। जैसा कि वृदेवता मे कहा है सरासि घृतवन्त्यस्य सन्ति लोकेपु यत् त्रिपु । सरस्वन्तमिति प्राहुर्वाचमाहु सरस्वतीम् ।। यद्यपि यह वाक् पार्थिव होने से आग्नेयी मानी जाती है। जैसा कि 'तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत्' इस शतपथ-श्रुति मे बतलाया गया है, तयापि यह पार्थिव वाक् इन्द्र प्राण द्वारा अधिष्ठित होने से उस इन्द्रप्राण के साथ वाक् का एकीभाव हो जाता है अत इसे ऐन्द्री कहा जाता है यह पार्थिव वागधिष्ठाता इन्द्र प्रारण आन्तरिक्ष्य तथा दिव्य भेद से दो प्रकार का है। इनमे दिव्येन्द्र प्राण ही प्रज्ञाप्रारण कहलाता है । यही दिव्येन्द्ररूपी प्रज्ञाप्राण वितायमान (प्रस्त्रियमाण) ध्वनिरूप वाक् मे स्वर-व्यजन-विभाग करता है और अान्त- रीक्ष्य इन्द्रप्राण वायु से युक्त रहता है। इन्द्रतुरीय (इन्द्र जिसमे चौथा भाग है ) वायु ऐन्द्रवायव ग्रह बनता हुआ आग्नेयी ध्वनिरूप वार को अधिष्ठित करता है। क्योकि अग्नि गायत्र है । इस वाक् का गायत्र अग्नि देवता है। अत. इस वाक् को गायत्री कहते है। गायत्री अष्टावयव है। इसलिए एक स्वर से अनुगत सातो व्यजन स्वरसहित एक अक्षररूप वाफ है । इस वाक का उक्थाश (आत्मांश) स्वर नौ विन्दुप्रो मे से पञ्चम व षष्ठ विन्दु पर अधिष्ठित होता है। किन्तु प्राणरूप इन्द्राश बृहतीरूप नौ बिन्दुनो को व्याप्त करना है। इसीलिये श्रुति मे कहा है - 'यावद् ब्रह्म विप्ठित तावती वाक् ' 'यत्र ह क्व च ब्रह्म तद्वाक्, यत्र वा वाक् तद्वा ब्रह्म' (ऐ० प्रा०) अर्थात् जहाँ तक ब्रह्म है वहाँ तक वाक् व्याप्त है, इन्द्र ही वाक्तत्त्वो का ब्रह्म कहलाता है क्योकि इन्द्र आत्मा व ब्रह्म समानार्थक शब्द हैं। जिस प्रकार शारीर आत्मा सारे शरीर को व्याप्त कर रहता है उसी प्रकार वागात्मा इन्द्र नौ विन्दुओ को व्याप्त कर रहता है। यह नवबिन्द्वात्मक वाक्तत्त्व ही वाड्मय इन्द्रप्राण का शरीर है प्राण के शरीरभूत वाग् मे जितने व्यजन प्रविष्ट है उतनी वाक् उस इन्द्र से परिमित होती है। इस प्रकार आठ वर्णों तथा नव विन्दुओ से परिमित यह एकाक्षर वाक् निष्पन्न होतो है । इसी रहस्य का उद्घाटन कुरुसुति काण्व ने निम्न ऋडमत्र मे किया है इन्द्र- हिन्दी-व्याख्या [ ६३ वाचमष्टापदीमह नवनक्तिमृतस्पृशम् । इन्द्रात् परितन्वं ममे। ऋ० स० ८७६।१२ इसी मत्र की व्याख्या ऐतरेय आरण्यक मे निम्न प्रकार से की है . वृहतीरूप इन्द्रप्रारण ३६ अक्षरात्मक है । इस इन्द्रप्राण ने आठ पदोवाली तथा नव विन्दुवाली वाक् को परिमित किया। इस वाक् मे चार अक्षरोवाले आठ पाद होते हैं, इस प्रकार वाक् मे ३२ अक्षर हो जाते हैं, अत ३२ अक्षरात्मक अनुष्टुप् ही अष्टापदी वाक् है। एक चतुरक्षरात्मक पद और मिलाने पर वही अष्टापदी अनुष्टुप् वाक् नवपदी वृहती बन जाती है। इसीलिये इस अष्टापदी वाक् को नवसक्ति कहा गया है। स्त्रक्ति-गब्द का अर्थ कोण है। इस प्रकार यह अष्टापदी अनुष्टुप् वाक् ऋतरूप वृहती प्राण का स्पर्श करती है, उससे अभिन्न हो जाती है। ३६ अक्षरात्मक वृहती मे ३२ अक्षरात्मक अनुष्टुप् वाक् का अन्तर्भाव हो जाता है। यही वाक् (अनुष्टुप्) का प्राणरूप वृहती के साथ एकीभाव है। 'ऋतस्पृशम्' शब्द का 'अनुष्टुप् वाक वृहती से स्पृष्ट है' ऐसा अर्थ सायण ने किया है। और ऐतरेय श्रुति मे 'सत्यवाक् ऋत वाक् से स्पृष्ट है' यह अर्थ किया है श्रोत्र द्वारा ग्राह्य शब्द ही सहृदय होने से 'सहृदय सत्यम्' इस परिभाषा के अनुसार सत्यवाक् है। वह हृदयरहित ऋतवाक् से नित्य स्पृष्ट होती है। हृदय का अर्थ यहाँ केन्द्र है। यहाँ यह रहस्य है कि ऋतु व सत्य नामक दो नेत्र होते हैं। नेत्र का अर्थ सूत्र है। अत ऋत व सत्य नामक दो सूत्र होते हैं। हृदयतोगाही अर्थात् केन्द्र से ग्रहण करने वाला सूत्र सत्य कहलाता है तथा सर्वतोग्राही नेत्र (सूत्र) ऋत कहलाता है। अत अगरीर तथा अहृदय (गरीररहित तथा हृदय- रहित) सभी पदार्थ ऋत नेत्र द्वारा गृहीत होने से ऋत कहलाते है और सहृदय व सशरीर सभी पदार्थ 'सत्य-नेत्र द्वारा गृहीत होने से सत्य कहलाते हैं। अप, वायु तथा सोम नगरीर होने से ऋत हैं। अग्नि, यम व आदित्य सशरीर होने से सत्य हैं। अप् शब्द से पारमेष्ठ्यमण्डलस्य सुब्रह्मण्या नामक वाक् का ग्रहण है। जिसे ऊपर अष्टापदी गायत्री वाक् कहा गया है। यह वाक् अपनी योनि (कारण)रूप ऋत वाक् से सम्बद्ध होती हुई ही स्वरूप धारण करती है। ऋत वाक् ही उसका प्रभव तया प्रतिष्ठा है। वह अष्टापदी गायत्री वाक् अन्त में ऋतरूप पारमेप्ठ्यमण्डलस्थ सुब्रह्मण्या वाक् मे ही लोन ६४ ] पथ्यास्वस्ति है होती है। इसीलिये इसे ऋतस्पृक् कहा गया है। वह ऋत वाक् अप्प जैसा कि शतपथ-श्रुति मे कहा है- सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत । सेद सर्वमाप्नोत् यदिद किञ्च, तस्मादापः। अर्थात् प्रजापति ने वाक् से अप्तत्त्व को उत्पन्न किया। इस प्रकार वाक् ही उसके द्वारा उत्पन्न की गई। उसने इन सवको व्याप्त किया। अत 'पाप' नाम से व्यपदिष्ट हुई (गत० ६।१।१।६)। यह वाक् ऋत है। इसमे जो प्राण है, वह सत्य है। जैसा कि 'आप एवेदमन ता आप सत्यमसृजन्त । ( शत० १४.६ प्र०६ वा० ) इस श्रुति मे कहा है। अर्थात् सृष्ट्य त्पत्ति से पूर्व अप्तत्त्व ही था। उसने सत्य (सूर्य) को उत्पन्न किया। आसुः। इस प्राणरूप इन्द्र का अप् रूप वाक् मे दो प्रकार से विनियोग होता है- सत्यरूप से तथा प्रज्ञारूप से । प्रज्ञारूप से वह वाक् मे वर्ण, अक्षर, पद, वाक्य इन विभागो को उत्पन्न करता है। यह प्रज्ञाप्राण मानुषी वाक् मे ही रहता है न कि अव्याकृत वायु, तेज, जल व पृथिवी को वाक् मे, और सत्यप्राण सभी प्रकार की वाक् मे रहता है। सत्यप्राण से रहित अप्-रूप वाक् की स्थिति ही नही होती। इस ऋतरूपी (अप्रूपी) वाक् का समुद्र ही सरस्वान् कहलाता है। यही शरीररहित व्यापक वाक् है। यही व्यापक ऋतवाक् सत्य- प्राण के सम्बन्ध से सत्यप्राणावच्छिन्न सशरीर बनकर सरस्वती कहलाती है। अपरिच्छन्न होने से सरस्वान् ऋत है। सत्यप्राण से परिच्छि-न होने के कारण सरस्वती सत्य है। यह सत्यप्राण ही प्रज्ञाप्राण से विभाजित होकर अक्षर बनता है। यही अक्षर वाक् का आत्मा है , यही स्वर है, यही अङ्गी है। जो कि क्षर हैं, इस अक्षर के अङ्ग है। वे व्यजन इस आत्मरूप अक्षर' को एक बिन्दु से बढाते हैं । अर्थात् व्यंजनो की अपेक्षा स्वर मे एक बिन्दु अधिक होती है। व्यजन एक बिन्दु पर स्थित रहता है किन्तु स्वररूप अक्षर बिन्दुद्वयात्मक प्रदेश को व्याप्त करता है। एक बिन्दु अर्धमात्रा-रूप होता है। अत एक- विन्द्वात्मक प्रदेश में व्याप्त व्यजन अर्धमात्रिक तथा बिन्दुद्वयात्मक प्रदेश में व्याप्त स्वर एकमात्रिक कहलाता है। वीर्याधिक्य के कारण मध्यवर्ती एक आत्मा अन्य प्राणो का आत्मा या अङ्गी बनकर अन्य सब प्राणो को व्याप्त करता है। व्यजन हिन्दी-व्याख्या [ ६५ इसका निरूपण शतपथ के षष्ठ' काण्ड मे किया गया है। इसी प्रकार साघ- मात्रिक व्यजनो का यह एकमात्रिक स्वर मात्राधिक्य के कारण आत्मा होता है । आत्मा होने से ही यह स्वर उन व्यजनो पर प्रभुत्व रखता है, सब व्यजनो को अपने अधीन रखता है। इस एकमात्रिक आत्मविन्दु के पृष्ठभाग में उपसर्ग- स्थानीय चार अर्धमात्रिक विन्दु तथा आगे की तरफ उपधानस्थानीय तीन अर्ध- मात्रिक विन्दु, इस प्रकार ७ विन्दुओ को यह स्वर अपने अधिकार मे रखता है। सात अर्धमात्रिक व्यंजन विन्दु तथा एकमात्रिक स्वरविन्दु मिलकर आठ होते हैं। इसी अभिप्राय से वाक् को 'ब्रह्म वै गायत्री अनुष्टुप्' इस ऐतरेयारण्यकश्रुति द्वारा अनुष्टुप् (अष्टसस्याक्षरा) कहा गया है। 'वाग् अनुष्टुप्' इस प्रकार से वाक् को अनुष्टुप् बतलाते हुए वैदिक महर्षि अक्षर को उपर्युक्त रीति से अष्टविन्द्वात्मक मानते हैं। नौ व्यजनो के सनिवेग में जितना स्थान लगता है उतना ही स्थान एक स्वर तथा सात व्यजनों के सनिवेश मे लगता है अत. स्थानतुल्यता के कारण वृहतीप्राणावच्छिन्न अक्षर ही वागवच्छेद से अष्ट अगो वाला हो सकता है। इसलिये अक्षरात्मक वाक् को अनुष्टुप् भी कह देते हैं । अथवा चतुरक्षरच्छद मे प्रत्येक अक्षर आठ अगो वाला है, इम सिद्धात से चार अक्षरो वाला छन्द ३२ अवयवो (अक्षरो) वाला बन जाता है। सभी छन्द चतुरक्षरात्मक होते हैं । २४ अक्षरो का गायत्री छन्द, २८ अक्षरो का उष्णिक इस प्रकार २० अक्षरो वाली द्विपदा विराट के ऊपर चार-चार अक्षरो की वृद्धि से क्रमश गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, वृहतो, पक्ति, त्रिष्टुप्, जगतो छन्द वनते है। अर्थात् प्रत्येक छन्द चतुरक्षरात्मक है, और चारो अक्षरो मे प्रत्येक अक्षर अष्टावयव है। इस तरह प्रत्येक छन्द ३२ अक्षरात्मक होने से सभी वाक् अनुष्टुप् बन जाती है। प्रत्येक अक्षर मे ६ बिन्दुओं मे केन्द्रस्थ पञ्चम व षष्ठ विन्दु स्वर के स्थान हैं, अत वे ही आत्मा है। अन्य सात बिन्दुएँ आत्मा का क्रान्तिस्थान होने से महिमा कहलाती है। पञ्चम व षष्ठ विन्दु मे स्थित स्वरस्वरूप के बोधक प्रज्ञा- प्राणरूप इन्द्र से सम्परिष्वक्त अक्षरस्वरूपनिरूपक प्रज्ञा प्राणरूप आन्तरीक्ष्य इन्द्र सात व्यजन वर्णों तथा एक स्वर वर्ण को व्याप्त करता है। अन्य १. 'सप्तपुरुषो ह्ययं पुरुषो यच्चत्वार प्रात्या, त्रयः पक्षपुच्छानि, अथ यदेकेन पुरुषेणात्मानं वर्धयति तेन वीर्य गायमात्मा पक्षपुच्छान्युद्यच्छति । शत०६।११।६।

६६ ] पथ्यारवस्ति इसीलिये बृहतीछन्दोरूप इस इन्द्र मे अनुष्टुपचारिता भी बन जाती है। इसीलिये मन्त्र में कहा है-- बीभत्सना सयुज हसमाहुरपा दिव्याना सस्ये चरन्तम् । अनुष्टुभमनुचर्चर्यमाणमिन्द्र निचिक्युः कवयो मनीपा ।। इस मन्त्र के अधिदैवत, अधिशब्द तथा अधिभूत भेद से तीन अर्थ है । वहाँ अधिशब्द-पक्षानुसारी इस मन्त्र की व्यारया उपस्थित की जाती है । बीभत्सूना=निराश्रय रूप से स्थित रहने में असमर्थ अतएव पराश्रयत्व की अपेक्षा रखने वाले क्षर व्यजनो के आश्रयप्रदान द्वारा सहयोगी अर्थ को हस कहते है । स्वतन्त्रतया (परानपेक्ष रूप से) स्थित रहने में असमर्थ व्यजनरूप क्षरो का आश्रय बन कर उन्हे जो अपने मे बांधता है, वह ऐन्द्रवायव ग्रह ही प्रकृत मे हस है। 'ये अर्वाड् उत वा पुराणे वेद विद्वांसमभितो वदन्ति । आदित्यमेव ते परिवदन्ति सर्वे अग्नि द्वितीय तृतीय च हसम् ।। वायु को हम कहा गया है। 'प्राणो वायु.' इस श्रुति से वह हंस प्राणरूप है। अक्षरसज्ञक प्राण ही क्षरसज्ञक व्यजनवर्गों को अपने मे बाँधता है। 'अपा दिव्याना' मे अप् शब्द वाक् का बोधक है।' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत । सेद मर्वमाप्नोत् यदिद किञ्च तस्मादाप' इस शतपथ श्रुति से यही सिद्ध हो रहा है। क्योकि वाक्तत्त्व हो अप- रूप मे परिणत होता है। तृतीय धुलोक मे वर्तमान वाक् तत्वो के समानभाव मे यह हस विचरण करता है। अर्थात् उनके साथ रहता है। अर्थात् ऐन्द्रवायवग्रहरूप प्राण तथा वाक् दोनो एक रूप हैं । अष्टवर्णात्मिका वाक् अनुष्टुप् कहलाती है। अनु शब्द की इत्थ- भूताख्यान अर्थ में 'लक्षणेत्थभूताख्यानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः।' इस सूत्र से कर्मप्रवचनीय सज्ञा है तथा उसके योग मे अनुष्टुप् शब्द मे द्वितीया विभक्ति है। अनुष्टुप् शब्द सात व्यजनों तथा उनके आत्मभूत स्वर के सनिवेशस्थानरूप नौ बिन्दुओ का बोधक है। नौ बिन्दुओ को व्याप्त कर अपना स्वरूपनिर्माण करने वाले अक्षर शब्द से गृहीत इन्द्र प्राण को वैज्ञानिको ने विचारदृष्टि से मालूम किया। यद्यपि श्रोत्रेन्द्रिय से वाक् का ही ज्ञान होता है न कि प्राण का, तथापि इस मत्र में हिन्दी-व्याख्या [ ६७ अक्षररूपा वाक् अष्टवर्णो से अवच्छिन्न है और वे पाठ वर्ण जितने प्रदेश मे आते हैं, उतने प्रदेश को वाक् अवरुद्ध नही कर सकती। अत वाक् के आलम्बन इन्द्र नामक प्रारण को विद्वानो ने अपनी बुद्धि के द्वारा मालूम किया। यह भूतसमूह वाड्मय है अत. अधिभूत पक्ष में इस मन्त्र का अधिशब्द के समान ही अर्थ है। इसीलिये 'अप्रक्षित वसु विर्षि' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या करते हुए ऐतरेयारण्यक श्रुति में कहा है-'सोऽयमाकाश. प्रारणेन बृहत्या विष्टब्ध.। तद्यथाऽयमाकागः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एव सर्वाणि भूतान्या- पिपीलिकाम्य. प्राणेन वृहत्या विष्टवानीत्येव विद्यात् 'अर्थात् यह आकाश वृहती प्राण से विधारित है। जिस प्रकार यह आकाश बृहतीप्राण से विधारित है उसी प्रकार पिपीलिकापर्यन्त सभी भूत बृहती प्राण से ही विवारित हैं।' यह ऐतरेय श्रुति गन्दाक्षरो की तरह भूताक्षरो में भी बृहती-प्राणरूप इन्द्र की समान अभिव्याप्ति वतला रही है। उपर्युक्त रीति से संभव होने पर स्वर का क्रान्तिमण्डल सात व्यजनो तक होता है। किन्तु यह नियम नहीं है कि सात व्यजनों से युक्त स्वर ही अक्षर हो । एक अक्षर मे नौ अर्धमात्रारूप बिन्दुओ की व्याप्ति की स्वरूपयोग्यता होते हुए भी सर्वत्र नौ विन्दुओ को व्याप्त ही करे यह नियम नही है। यदि व्यजनो का सर्वथा अभाव हो तो केवल स्वर भी 'स्वरोऽक्षरम्' इस परिभापा से अक्षर कहलाता है। किन्तु व्यजनो के होने पर व्यंजनसहित स्वर ही अक्षर कहलाता है, व्यजन- रहित नहीं । व्यजनसहित होने पर भी कही एक व्यंजन से, कही दो से, कही तीन से, कही चार से, कही पांच से, कही छ से, कही सात व्यजनों से युक्त स्वर अक्षर कहलाता है। जैसे 'न' शब्द मे नकाररूप एक व्यजन से युक्त 'वाक् में 'ब' तथा 'क' इन दो व्यंजनों से युक्त तथा 'प्राक्' मे प, र, क इन तीन व्यजनो से युक्त स्वर अक्षर है। यहाँ यह अवश्य विचारणीय है कि स्वरच्छायापन्न ईषत्स्पृष्ट प्रयत्न वाले अन्तस्थ ( य, र, ल, व ) तथा अर्धस्पृष्ट प्रयत्न वाले ऊष्मा ( श, ष, स, ह) वर्णो से युक्त होने पर ही स्वरक्रान्ति-मण्डल सात व्यंजनों वाला होता है। अन्त.स्थ और ऊष्म वर्णों के अभाव में स्वर का आक्रमण-बल घट जाता है। इसलिए 'क्त्नट्प्' इस उदाहरण मे स्वर पृष्टतः क, त, न इन तीन व्यंजनों को ६८ ] पथ्यास्वस्ति तथा पुरत ट, प इन दो व्यजनों को ही आक्रान्त करता है अधिक को नहीं । इस प्रकार वर्णविशेषो मे स्वरक्रान्तिमण्डल मे तारतम्य (न्यूनाधिकता) होता रहता है। इसी प्रकार प्राभ्यन्तर स्थान कण्ठादि का तथा प्राभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्टादि का एव बाह्यस्थानो व बाह्यप्रयत्नो का बल मे तारतम्य है। इसी कारण पत्व, गत्व, कुत्व, चुत्व आदि आभ्यन्तरस्थाननिवन्धन तथा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचय आदि बाह्यस्थाननिवन्धन, व्याकरणशास्त्रोक्त सभी सन्धिफल होते रहते हैं, यह निरुक्तकारो का सिद्धान्त है। जैसे-राजसु, वित्सु, रामेषु, हरिपु, हवीपि आदि उदाहरणो मे सकार के परस्वर का अग होने पर भी पूर्ववर्ती अकार, इकारादि स्वरो के बल का आक्रमण होने से स्थानापकर्षण के कारण मूर्धन्य षत्व इकारादि से परे हो जाता है। अतः 'रामाणाम्' 'षण णाम्' मे रेफ व ष के कारण न को ग हो जाता है। वाक्, नक्, रक्तम्, निरिंगक्तम् इत्यादि मे कुत्व तथा 'सच्चरितम्' इत्यादि मे चुत्व हो जाता है। इस प्रकार स्यान.व प्रयत्न के क्रान्तिबल के तारतम्य से विभिन्न सन्धिफल होते हैं। इस प्रकार अक्षरस्वरूप की तथा अक्षर मे स्वर और व्यजन के अङ्गाङ्गिभाव की व्याख्या की। वहाँ स्वर के अङ्गभूत इन व्यजनो मे उपसर्ग (पूर्वव्यजन) के होने या न होने पर उपधान (उत्तर व्याजन) बल के कार्योपधायक न होने से अक्षर लघु ही होता है। जैसे-अ, य, न्य, क्य आदि मे। यहाँ अधोव्यापार अर्थात् स्वर से पूर्व व्यजनव्यापार के होने पर भी ऊर्ध्व व्यापार (स्वर के पश्चात् व्यजनव्यापार) के न होने से अक्षर लघु ही रहता है। उपधान मे आक्रमण व्यापार के फलोपधायक होने से अक्षर गुरु हो जाता है। दीर्घ स्वरो (आ, ई, ऊ इत्यादि) सन्ध्यक्षर स्वरो (ए, ऐ, ओ, औ) अनुस्वारान्त स्वर (अ) विसर्गान्त स्वर (अ.) व्यजनान्त स्वर, अत् आदि तथा दो व्यजनो के सयोग से पूर्ववर्ती स्वरो (अर्क-अक्त आदि) के उपहित (पश्चाद्वर्ती) वर्ण से युक्त होने के कारण आगे अर्कव्यापार होने से अक्षर मे गुरुत्व उपपन्न हो जाता है । प्रकार लघुगुरुभेद से अक्षर का द्वैविध्य है। इस इतिश्रीमघुसूदनविद्यावाचस्पतिप्रणीत पथ्यास्वस्ति ग्रन्थ मे अक्षरपरिष्कारनामक चतुर्थ प्रपाठ को हिन्दी व्याख्या समास ।

हिन्दी-व्याख्या [ ६६ सन्धि-परिकार पश्चम प्रपाठ अक्षर का दूसरे अक्षर के साथ सम्बन्ध होने पर परस्पर बन्धन से हृदय- ग्रन्थि की उत्पत्ति होकर,क्षर की उत्पत्ति होती है। परब्रह्म विद्या मे जिस प्रकार भूत' क्षर कहलाते है उसी प्रकार शब्दब्रह्मविद्या मे व्यञ्जन क्षर कहलाते हैं। इन्द्रियग्राह्य क्षर व्यञ्जन वर्गों से इन्द्रियो द्वारा अग्राह्य प्राण की अभि- व्यक्ति होती है। अतः 'व्यज्यते प्राण. अनेन' इस व्युत्पत्ति से व्यजन वर्ण व्यजन कहलाते हैं। १ निरूपक मेद से सन्धिद्वविध्य जिस प्रकार परब्रह्मविद्या मे अक्षरो तथा क्षरों का सन्धियोग (मेल) निरूपक के भेद से दो प्रकार का है, उसी प्रकार गब्दब्रह्मविद्या मे भी अक्षरो व व्यजनो का सन्धियोग निरूपकभेद से दो प्रकार का है। वे दो प्रकार विभूति तथा योग हैं। इनमें योगसश्लेष तया सपरिवङ्ग भेद से दो प्रकार का है। विभूति जहाँ युक्त (मम्बद्ध) वस्तुओ मे एक वस्तु सम्बन्ध के लिए व्यापारशील हो, बद्ध तथा परतंत्र हो, तथा दूसरी व्यापाररहित अवद्ध' तथा स्वतत्र हो, वहाँ व्यापक का व्याप्य मे अनुग्रह विभूति कहलाता है। २जल की लवण, मे आकाश को वायु मे. दर्पण की मुख मे तथा अव्यय ब्रह्म की भूतसमूह मे व्याप्ति विभूति सम्बंध है। यहाँ जलादि व्यापक हैं तया लवणादि व्याप्य है। जिस प्रकार लोक मे क्षररूप भूतो मे अक्षर रूप प्राण की व्याप्ति होती है। उसी प्रकार अक्षररूप स्वर की क्षर रूप व्यजनो मे व्याप्ति होती है। जैसे- 'स्त्र्याट्' शब्द मे प्रकार रूप अक्षर (स्वर) की स् त् र् य इन चार पूर्ववर्ती तथा र्क, ट् इन तीन उत्तरवर्ती व्यजनरूप क्षरो मे व्याप्ति है । क्षरो मे भी एक क्षर की दूसरे क्षर मे व्याप्ति विभूति सम्बन्ध कहलाता है। जैसे 'रामाणाम्', 'वर्मणाम्' इन उदाहरणों मे मूर्धन्य र् और ष् वर्णो के प्रयत्न की महिमा से दन्त्य नकार मूर्धन्य 'ण' बन जाता है । अत यहा मूर्धन्य वर्णो की व्याप्ति दन्त्य नकार वर्ण मे है। 1 १ क्षरः सर्वाणि भूतानि। गीता० प्र० १५ । २. अम्मो लवणे, वायो व्योम, मुखे दर्पण यद्वत् । विभवति तदत विरजा भूतग्रामेऽव्ययः परमः ।

७० ]
पथ्यास्वस्ति
है
संश्लेष
उपर्युक्त उदाहरणो मे ही व्याप्य का व्यापक मे सम्बध सश्लेप कहलाता
है।
इस सम्बन्ध को एकत. (इकतरफा) बन्धयोग कहते है। जैसे- 'लवरण
का जल मे, वायु का आकाश मे, मुख का दर्पण मे तथा विरजा अव्यय ब्रह्म का
भूतसमूह मे सम्बन्ध तथा व्याप्य लवणादि का व्यापक जलादि में सम्बन्ध
सश्लेष कहलाता है।
इसी प्रकार व्याजन अबद्ध स्वतत्र स्वर मे सश्लिष्ट अर्थात् बद्ध हैं। व्याप्य
व्यजनो का व्यापक स्वर मे जो सम्बन्ध है वही सश्लेप है। क्षरो मे भी एक का
दूसरे के साथ सश्लेष होता है। वहाँ सश्लेषण द्रव्य के सम्बध से एक का दूसरे
के साथ सम्बन्धमात्र होता है एक का दूसरे में अनुप्रवेश नही। इसी अभिप्राय
से भगवद्गीता मे कहा है
अर्थात् "अव्यक्त स्वरूप वाले मैंने सारे जगत् को व्याप्त कर रखा है। सारे
भूत मेरे मे स्थित हैं किन्तु मै भूतो मे स्थित नही हूँ।" ८ गीता ६ अ ४. ।
मेरे इस ईश्वरीय सम्बन्ध को देखो कि भूत मेरे मे स्थित नही है। मैं भूतो को
धारण करने वाला हूँ पर भूतो मे स्थित नही हूँ। मैं भूतभावन हूँ । गीता ६॥५॥
जिस प्रकार सर्वत्र गतिशील महान् वायु आकाश मे स्थित है उसी प्रकार
सारे भूत मेरे मे स्थित है, यह समझो।' गीता अ.६६।
इन गीतापदयो में प्रथम श्लोक के पूर्वार्ध मे विभूति सम्बन्ध का निरूपण है।
'मत्स्थानि सर्वभूताति' इस तृतीय पाद मे एकतो बन्धनात्मक सश्लेष-
रूप योगसम्बन्ध का निरूपण है। 'न चाह तेष्वस्थित' 'इस चतुर्थपाद मे उस
सश्लेष मे दूसरे (अव्यय) का अबन्धन बतलाया गया है।' न च मत्स्थानि
भूतानि' इसके द्वारा भूतो का ब्रह्म से संश्लेष होने पर भी वह परस्पर समन्वयरूप
अनुप्रवेशात्मक नही है, इसका प्रतिपादन किया गया है।
२. व्यंजनभेद से संश्लेषसाप्तविध्य
इस सश्लेष सम्बन्ध को व्यजनभेद से सात प्रकार का याज्ञवल्क्य ने
माना है:-- अयस्पिण्ड, दारुपिण्ड, ऊर्णापिण्ड, ज्वालापिण्ड, मृत्पिण्ड, वायूपिण्ड
१. अम्मसि लवण, वायुम्नॊम्नि, मुखं दर्पणे यदत् ।
शिलष्यति तद्वत् विरजसि भूतग्रामोव्यये परमे ॥
२. प्रय सतविधाः सयोगपिण्टा:-
यमान विद्यादयस्पिण्डान् सान्तःस्थान् दारुपिण्डवत् ।
अन्तःस्थयमवर्ज तु ऊर्णापिण्ड विनिरिशेत् ॥१॥

हिन्दी-व्याख्या [७१ तथा वज्रपिण्ड। जब वर्णों (व्यजनो) का संयोग यम वर्गों के साथ होता है, तव उस सयोग को अय पिण्ड कहते है। अर्थात् यम वर्गों में इस प्रकार विच्छेद करना चाहिए जिससे जिस प्रकार परस्पर सश्लिष्ट अवयव वाले लोह- खण्डो का विच्छेद होता है ऐसा विच्छेद प्रतीत हो। जैसे 'अग्नि' पत्क्क्ती इत्यादि मे गकार के पूर्वाङ्ग होने से प्रकार के साथ उच्चारण होने से जब नकार से उसका विच्छेद होता है तव गकार तथा नकार का मध्यवर्ती नकारगुणक अनुनासिक द्वितीय गकार रूपी यम वर्ण भी साथ ही उच्छिन्न हो जाता है। ऐसी स्थिति मे यमवर्ण का उत्पत्तिकालिक पूर्व गकार से पृथक् श्रवण नहीं होता। अन्तःस्थ वर्ण.य, र, ल, व के साथ व्यंजनो के संयोग को दारुपिण्ड कहते है अर्थात् अन्त स्थसंयुक्त पिण्डो मे इस प्रकार वर्ण विच्छेद होता है जिस प्रकार काष्ठ के शिथिलरूप स सश्लिष्ट अवयवो का होता है। जैसे-मत्यम्, अश्व, विल्मिने, इत्यादि मे तकार यकारादि का विच्छेद। अन्त.स्थ तथा यम वर्गों को छोडकर ऊष्मवर्गों के साथ व्यजनो के संयोग को ऊर्णापिण्ड कहते हैं । अर्थात् उज्म वर्णो के साथ व्यंजनो का सयोग होने पर उनका इस प्रकार से विच्छेद करना चाहिए जिस प्रकार शिथिल अवयव वाले ऊर्णा (ऊन) के पिण्डावयवो का होता है। जैसे-अश्वः, अश्मन्, अस्मै इत्यादि मे। अत:- स्थवर्गों के साथ सयोग मे पञ्चम तथा अपञ्चम वर्गों के मध्यवर्ती विच्छेद के अशरीर होने से कोई विशेषता दृष्टिगोचर नही होती। इसी प्रकार अन्तस्थ वर्गों के साथ सयोग मे भी अन्तस्यवों के लघुप्रयत्नतर होने से आत्यन्तिक सन्निकर्ष के कारण पिण्डनायक होने से किसी विशेषता की उपलब्धि नहीं होती। नासिक्य पञ्चमवर्णो के साथ हकार के सयोगपिण्ड को ज्वालापिण्ड कहते हैं। जैसे वह्नि , ब्रह्म, गृह्णामि' इत्यादि मे । अनुस्वार तथा अनुनासिक- सहित सयोगपिण्डो को मृण्मय पिण्ड कहते हैं। जैसे-त्रिंगी, संस्तुप् इत्यादि मे। सोपध्मान ( उपध्मानयुक्त) सयोगपिण्डो को वायुपिण्ड कहते हैं। मन्तःस्थयमसंयोगे विशेषो नोपलभ्यते । प्रशरीर यमं विद्यादन्तःस्थ पिण्डनायकम् ॥२॥, ज्वालापिण्डान् सनासिक्यान् सानुस्वारांस्तु मृन्मयान् । सोपध्मान् वायुपिण्डोस्तु जिह्वामूले तु पत्रिणः ।।

७२ ] पथ्यास्वस्ति मे जैसे-धौ। पिता इत्यादि में। यहाँ पवर्ग से पूर्व ऊम उपध्मानीय के उच्चारण वायु की सी गम्भीर ध्वनि होती है, इस सयोग को वायुपिण्ड कहते है। जिह्वामूलसहित सयोगपिण्ड को वज्रपिण्ड कहते है क्योकि कवर्ग से पूर्व ऊप्म वर्णो का उच्चारण करने पर ऊज्मवर्ण का खकार के समान उच्चारण होने से षकार की ककार के साथ वज्र की तरह अत्यन्त सश्लिष्ट प्रतीति होती है, अत. इसे वज्रपिण्ड सयोग कहते है। सम्परिष्वङ्ग सपरिष्वङ्ग सम्बन्ध परस्पर वन्धनरूप होता है। अक्षर का अक्षर से सम्बन्ध सपरिवङ्ग (सम्बन्ध) होता है जैसे शारीरक विज्ञानात्मा का प्राज्ञ आत्मा के सम्परिप्वङ्ग सम्बन्ध हैं क्योकि दोनो ही आत्मा प्रारमरूप होने से अक्षर है। इसी प्रकार शब्दब्रह्मविद्या मे एक स्वर (प्राण) का दूसरे स्वर से मेल (सन्धि) होता है। जैसे-'नदीय, भानूदय' इत्यादि मे क्रमश ई+इ तथा उ-+उ इन दो-दो स्वरो का मेल है। दिव्यस्ति, दिक्ष्वस्ति, दात्रास्ति इन उदाहरणो मे क्रमश इ, उ, ऋ, इन स्वरो का परस्वर अकार से योग है दिव्यस्ति इत्यादि मे इकारादि का परस्वर से मेल होने पर तीन स्थितियो की । सभावना की जाती है।, दवाने से सकोच होता है और इस प्रकार एकमात्र स्वर की अर्धमात्रा शेष रह जाती है । अथवा अन्य स्वर के उदर मे दूसरे स्वर के अग का प्रवेश हो जाता है और इस नवविन्दुपर्यन्त व्याप्ति वाले स्वर मे पञ्चम व पष्ठ विन्दु जो कि स्वर के स्वरूप हैं, उनमे इकार की षष्ठ बिन्दु मे प्रकार की पञ्चम विन्दु का समावेश हो जाने से एकमात्रिक इकार की अर्धमात्रा ही शेष रह जाती है। अथवा दोनो स्वरो के अत्यन्त समीप अाकर मिलने पर स्वर का एक अग इकार नष्ट हो जाता है। इस प्रकार अकार मे सयुक्त इकार स्वर की अर्धमात्रा कट जाती है। अर्धमात्रा का छेद हो जाना ही इकार की अङ्गक्षति है। इन तीनो ही स्थितियो मे अर्थात् स्वर का सकोच मानने मे, इकार स्वर की षष्ठ बिन्दु मे प्रकार के पञ्चम बिन्दु का समावेश मानने मे तथा प्रकार से सयुक्त होने पर इकार के अर्धमात्रारूप अग की क्षति मानने मे फलत कोई अन्तर नही पड़ता है। तीनो ही स्थितियो मे इकार स्वर की पूर्व अर्धमात्रा शेष रहती है और उत्तर अर्धमात्रा नष्ट हो जाती है। अत वह स्वर अपने स्वरूप एक मात्रा से च्युत होने के कारण स्वर न रहकर अर्धमात्ररूप व्यजन मे परिणत हो जाता है। पर उसी स्थान के व्यजन मे उसका परिणाम .. [ ७३ हिन्दी-व्याख्या होता है जिस स्थान से उस स्वर का सम्बन्ध था। अर्थात् इकार का तालु- स्थान है। अत उसकी अर्धमात्रा का विच्छेद होकर अर्धमात्रा शेप रह जाने पर जब वह व्यजन रूप मे परिणत होता है तो तालुस्थानीय यकाररूप व्यजन मे ही परिणत होता है अन्य वकारादि व्य जनो मे नही । किन्तु उपर्युक्त तीनो प्रकारो मे भगवान् पाणिनि को स्वर का सकोच ही अभिप्रेत है। इसीलिये वे 'इग् यण सम्प्रसारणम्, इस सूत्र मे यकार का इकाररूप मे परिणाम होने पर उसकी सप्रसारणसज्ञा बतलाते है । क्योकि प्रसारण सकुचित का ही होता है। यदि दूसरे स्वर के उदर मे दूसरे स्वर का अनुप्रवेश उन्हे अभीप्ट होता तो वे उस अनुप्रवेश के हटने पर अनुप्रवेश- विरोधी उद्धरण शब्द का प्रयोग करते । तथा उन्हे अगक्षत अभीष्ट होता तो क्षत की पुन सम्पत्तिरूप अनुमम्पत्ति पद का वे प्रयोग करते । पर दोनो का ही प्रयोग न कर समचनविरोधी सम्प्रसारण का प्रयोग करने से उन्हे इन तीनो प्रकारो मे समचनपक्ष ही अभिप्रेत है। श्रुति ने भी 'सार्वायुषाग्निविद्या मे अधिदैवत (परब्रह्मविदया) मे समञ्चन व प्रसारण का ही प्रतिपादन किया है । अर्थात् यह अग्नि पशु है। जव पशु अगों को सकुचित करता है और उन्हे फैलाता है, तो उसमे इस क्रिया से सामर्थ्य उत्पन्न होती है। सकोचन व प्रसारण प्राण है। जिस अग मे प्राण की स्थिति है, उसी का सकोच व प्रसार होता है । उपर्युक्त रीति से परब्रह्म की तरह शब्दब्रह्म मे भी वाक्प्राण के सकोच व प्रसार से ही व्यजन व स्वर की सिद्धि होती है। अर्थात् व्यजनो मे प्रसार होने से वे अर्धमात्रा से बढकर एक मात्रा मे आ जाते है, और स्वर बन जाते है। जैसे—यकार प्रसारित होकर 'इ' स्वर बन जाता है। इसी प्रकार स्वर सकोचन के द्वारा अर्थात् एक मात्रा से अर्धमात्रा मे संकुचित होने पर व्यजन बन जाते हैं। जेमे-दिव्यस्ति, इत्यादि मे इकारस्वर सकुचित होकर यकार व्यजन बन जाता है। यह समञ्चन (सकोच) दो स्वरो के सम्परिष्वङ्गरूप सम्बन्ध- विशेप से ही होता है। १ 'प्रयात समञ्चनप्रसारणस्यव । पशुरेष यदग्निः । यदा वै पशुरङ्गानि संचाञ्चति प्रच सारयति । प्रय स तेर्वीयं करोति । प्राणो वै समञ्चनप्रसारणम्' यस्मिन् या अङ्ग प्राणो भवति तत् तं चाञ्चति प्र च सारयति" इति । शत० ८।१।१४॥

७४ ॥ पथ्यास्वस्ति सन्निकर्ष के भेद से सन्धिद्वैविध्य वर्णो के सनिकर्षभेद से सन्धि के दो भेद हो जाते हैं। मंनिकर्प के दो भेद सक्रान्ति तथा सहिता है। पूर्वोक्त विभूति, सश्लेष एव सपरिष्वङ्गरूप वों के तीनो योग ही व्याकरण सिद्धान्त मे सन्धिशब्द से व्यवहृत होते है । इनमे वर्णान्तर के विच्छेद से युक्त विभूतियोग ही सक्रान्ति-सम्बन्ध कह- लाता है। तथा शेप सश्लेष व सपरिष्वङ्गयोग सहिता कहलाते है। जैसा कि कात्यायन ने प्रातिशाख्य मे कहा है- 'वर्णानामेक प्राणयोग सहिता' । अर्थात् वर्णों का एक प्राण से सम्बन्ध हो सहिता है। वह एक प्राण, स्वर का क्रान्तिमण्डल (व्याहिमण्डल) अनुष्टुप् छन्द है।' 'प्राणा वै देवा वयोनाधा- शछन्दासि वै देवा वयोनाधाः' इस शतपथश्रुति से यह स्पष्ट सिद्ध है कि प्राणविशेप जव अवच्छेदक बनता है तब छन्द कहलाता है। वर्णो का एक प्राण से सम्बन्ध वर्णान्तर के व्यवधान या वर्णान्तर के विच्छेद मे भी बन जाता है। जैसे 'स्त्र्याट्' इस उदाहरण मे आदि मे स्, त् र् य् का अन्त मे र् ट् क् का अकार-रूप एक प्राण (स्वर) से सम्बन्ध है। क्योकि उन सब मे एक प्रकार स्वर का ही सम्बन्ध है किन्तु उसे सहिता नही कह सकते क्योकि उनका एक प्राण से सम्बन्ध वर्णान्तर के व्यवधान या विच्छेद से युक्त है वर्णान्तर के विच्छेद से रहित नहीं । इसी वर्णान्तर-विच्छेद-सहित एक-प्रारणसम्बन्ध का निराकरण करने के लिए पाणिनि ने सहिता की परिभाषा मे ‘परः सनिकर्षः स हिता' सूत्र मे 'सनिकर्ग' मे पर-विशेषण का प्रयोग किया है। यहाँ पर-गब्द का अर्थ वर्णान्तर- विच्छेद-राहित्य है। परस निकर्ष की व्याख्या करते हुए किसी ने जो यह कहा है कि 'एक वर्ण के बाद दूसरे वर्ण का उच्चारण करने मे जो स्वभावत अर्धमात्रा का काल लगता है उतने व्यवधान से भिन्न व्यवधान का न होना पर-सनिकर्ष है, यह उचित नहीं है क्योकि दो पदो का योग होने पर सुऽवचा' इत्यादि मे अवग्रहादि- स्थल मे एक पद के बाद दूसरे पद के उच्चारण मे अर्धमात्राकाल के व्यवधान की प्रतोति होने पर भी दो वर्णो का सम्वन्ध होने पर दोनो वर्णो के बीच अर्घमात्रा से भी अल्पकालिक अवकाश की ही प्रतीति होती है अर्धमात्राकाल की नही। दो वर्णों के बीच का वही अर्धमात्रा से भी स्वल्पकालिक अवकाश सहिता कहलाता है। अर्थात् दो वर्णो मे अन्यवर्णजनित विच्छेद का अभाव हिन्दी-व्याख्या [ ७५ सहिता है। अन्यवर्ण से व्यवहित दो वर्गों का सनिकर्ष सक्रान्ति कहलाता है । इस प्रकार सक्रान्ति तथा तहिताभेद से सन्धि दो प्रकार की होती है। ५. पाश्रयभेद से सन्धिद्वैविध्य आश्रयभेद से भी सत्वि के दो भेद हैं। वे दो भेद स्वरसन्धि व व्यजन- सन्धि हैं। स्वरसन्धि महिता (वन्तर के व्यवधान से रहित दो वर्णो के सनिकर्ष) मे ही होती है, वर्णान्तरव्यवधान वाले सक्रान्तिरूप सनिकर्प मे नही । एक स्वर की व्याप्ति नवविन्द्वात्मक प्रदेश मे मानी जाती है। एक बिन्दु 'व्यजन' अर्थात् अर्वमात्रा का प्रतीक है। उस नवविन्द्वात्मक प्रदेश मे पञ्चम व पाठविन्दुरूप एकमात्रारूप प्रदेश स्वर का स्वरूप है । पञ्चम-विन्दुरूप अर्धमात्रा-स्वर का पूर्वार्द्ध तथा षष्ठ विन्दुरुप अर्धमात्रा स्वर का उत्तरार्द्ध कहलाता है। दोनो से स्वर का रूप निष्पन्न होता है। वहाँ दो स्वरो की सहिता होने पर पूर्व स्वर की पष्ठ विन्दु अर्थात् उत्तरार्द्ध, परस्वर की पञ्चम विन्दु अर्थात् पूर्वार्द्ध वन जाता है । जिसका दिग्दर्शन 'दिव्यस्ति' इस उदाहरण मे पूर्व ही किया जा चुका है। वहाँ इकार-स्वर की पष्ठ विन्दु अर्थात् इकार का उत्तरार्द्ध उत्तर स्वर प्रकार की पञ्चम विन्दु अर्थात् पूर्वार्द्ध बन गया है और अपने उत्तरार्द्ध से वह इकार च्युत हो गया है। इसी से अर्धमात्रारूप मेष रहकर वह स्वर- सम्पत्ति से विहीन हो जाता है और तत्स्थानीय यकार में परिवर्तित हो जाता है। यह स्वरसन्धि है। अन्य अक्षर से निगृहीत व्यजन का दूसरे अक्षर से निगृहीत होना व्यजन- सन्धि है । जैसे-'तत्+आगमन' मे दूसरा तकार सन्धि से पूर्व पूर्वतकारोत्तरवर्ती अकार स्वर से गृहीत है किन्तु जश्त्वरूप व्यजनसन्धि के बाद तत्स्थानीय 'द' 'पागमनम्' पद के आदि स्वर आकार से गृहीत हो जाता है। उच्चारण से इसको स्पष्ट जाना जा सकता है। यही व्यजनसन्धि है । ६ बलभेद से सन्धिद्वैविध्य बलभेद से भी सन्धि दो प्रकार की है। स्वरसन्धि तथा व्यंजनसधि के द्वारा वर्ण के गुणो का अतिरेक होता है। अन्यरूप से विद्यमान का अन्यरूप हो जाना अतिरेक कहलाता है। वर्णो के उपादानकारण वायु मे वर्ण के स्वरूप तथा तहिशेप के उत्पत्त्यनुकूल बल को वर्णगुण कहते है। वल आरम्भक तथा विशेपक भेद से दो प्रकार का है। वर्णस्वरूप की उत्पत्ति ७६ ] पथ्यास्वस्ति 4 मे काम आने वाला वल प्रारम्भक कहलाता है। वह (१) स्वरोपधायक (२) अङ्गोपधायक (३) स्पर्शोपधायक (४) स्थानोपधायक तथा (५) नादोपधायक भेद से पाँच प्रकार का है। स्वरोपधायक बल के कारण एक ही प्रकार अ-अ,-अ इस प्रकार से उदात्त, अनुदात्त, स्वरित भेद से तीन प्रकार का बन जाता है। अङ्गोपधायक बल के कारण अकारादि एक-एक अक्षर मे अ-आ पा ३ इस प्रकार से ह्रस्व दीर्घ व प्लुत भेद 'वन जाते है। उच्चारणकृत ह्रस्वदीर्घादि भेद अकारादि अक्षरो मे ही है, ककारादि व्यजनो मे नहीं, क्योकि व्यजनो का उच्चारण अकारादि स्वरो के अधीन है अत वे स्वर के अग है, स्वतन्त्र नहीं । और व्यजन-सहित स्वर एक ही अक्षर कहलाता है भिन्न नही। स्पर्शोपधायक बल के भेद से अ, s, अ, ग, क, ह इत्यादि वर्णधारायें बनती है। जैसे- 'अ' अस्पृष्ट है। '5' ईषत्स्पृष्ट है। 'अ' दु स्पृष्ट है। 'ग' मृदुस्पृष्ट है। 'क' तीव्रस्पृष्ट है । 'ह' अर्द्धस्पृष्ट है । अत ये सब भेद स्पर्शोपधायक बल के भेद से होते हैं। स्थानोपधायक बल के भेद से एक ही वर्णोपादानभूत वायु अ, इ, ऋ, लू, उ, इन वर्णधारापो का स्वरूप धारण कर लेती है। 'न' कण्ठ्य है 'इ' तालव्य है। 'ऋ' मूर्धन्य है । '' दन्त्य है। तथा 'उ' ओष्ठ्य है। नादोपधायक बल के भेद से उपाशुवाक्प मध्यमा वाक् वैखरी वाक् मे परिणत हो जाती है। ७ विशेषक बल का पाञ्चविध्य उपर्युक्त पाचो बलो मे विनियुक्त बल विशेषक कहलाता है। वह भी (१) उपजनक (३) उपधातक (३) विक्षेपक (४) विशेषाधायक (५) निरोधक भेद से पाच प्रकार का है। प्रयत्नोपजनक बल से वर्णागम होता है। प्रयत्नो- पघातक बल से वर्णलोप होता है। प्रयत्नविक्षेपक बल से वर्ण-विपर्यय होता है। विशेषाधायक बल से वर्णादेश होता है। इन चारो बलो के निरोधक बल से प्रगृह्यता आती है। विकार के प्रतिबन्ध से स्वरूप मे स्थितिरूप प्रकृतिभाव ही प्रगृह्यता है। इस प्रकार प्रारम्भक बल मे विशेषक बल के तारतम्य के कारण दूसरे वर्ण के विच्छेद से सहित या रहित बलवान् व्यजन के गुणो से वाधित निर्वल व्यजन के गुण हट जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं। और उन निवृत्त गुणो का स्थान प्राक्रामक बलवान् व्यजन के गुण ले लेते है। इसलिए ये पाँच प्रकार के उपर्युक्त वांगमादि अनेक सन्धिफल उत्पन्न होते है। जैसा कि कहा गया है- - हिन्दी-व्याख्या [ ७७ २ 3 thc वर्णागमो वर्णविपर्ययस्तल्लोपस्तदादेश इमे विकारा । स्थिति.५ प्रकृत्येति च पञ्च सन्वे. फलानि वर्णद्वयसनिकर्षे ।। १. वर्णागम सयोग-विभाग तथा शब्द से शब्द की उत्पत्ति भगवान् कणाद ने वतलाई स्वर के उत्तर (वाद) नासिक्य भिन्न, पद के अन्त मे वर्तमान स्पर्ण वर्ण अवसान में तथा व्यजन से पूर्व अपदान्त स्पर्ग वर्ण पूर्व स्वर से आक्रान्त होते हैं। वहाँ बलवान् सयोग से उत्पन्न वर्ण के समान प्रतिध्वनिरूप एक विभागज वर्ण और उत्पन्न होता है वह क्रमज नामक उपजन (आगम) है। उस विभागज वर्ण का यति द्वारा विच्छिन्न होकर उच्चारण का कारण पूर्वस्वर से निग्रहण ही क्रमण है । अर्थात् उस विभागज वर्ण का यति द्वारा विच्छेद होने पर ही वह पूर्व स्वर से निगृहीत होकर उच्चारित होता है। क्योकि विना स्वर के व्यजन का उच्चारण सभव नहीं। जैसे-'रामात् त्' इस उदाहरण मे आकार के उत्तर अव्यवहित तकार वर्ण की उत्पत्ति स्थान और प्रयत्न के सयोग से होती है, किन्तु वेग के साथ स्थान और प्रयत्न का विभाग होते समय भी सयोगज वर्ण के समान ही उसकी प्रतिध्वनि के सहा एक तकार वर्ण की और उत्पत्ति होती है, वही वर्ण स्थान और प्रयत्न के विभाग से उत्पन्न होने के कारण विभागज वर्ण है। परन्तु उसके उच्चारण मे भी संयोगज वर्ण के समान पूर्व स्वर ही कारण है। यही स्थिति वत्त्स, प्रात्त्मा, सत्त्यम्, गक्र., आतनच्मि, सज्ज्मा, इन उदाहरणो मे है। इतना भेद अवश्य है कि 'रामात्त्' अवसान मे विद्यमान पदान्त स्पर्श का उदाहरण है और 'वत्त्स' आदि व्यंजन से पूर्व विद्यमान अपदान्त स्पर्श के उदाहरण हैं। यह वर्ण पराङ्ग होता है। हकार व्यजन के परे होने पर यह क्रमज विभागज वर्ण, सोमवर्ण वन जाता है क्योकि यह वर्ण पराग होता है और ऐसे स्थलो मे पर-व्यंजन उष्म हकार होता है अत. उसके सम्वन्ध से यह विभागज वर्ण भी सोष्म हो जाता है। जैसे- 'वाग् हस्ती' इस उदाहरण मे गकार के समान जिस नवीन विभागज वर्ण की उत्पत्ति होती है, वह पराङ्ग है । अत उसका हकार से योग होने के कारण 'ग्' 'ध्' बन जाता है और 'वाग् हस्ती' 'वाग्धस्ती' में परिवर्तित हो जाता है। ह्रस्व स्वर से परे विद्यमान ड, ण, न मे भी स्वर परे होने पर विभागज ड, ण, न वर्णो की उत्पत्ति होती है। वे भी पराग होते हैं। प्रत्यड्डात्मा, सुगण्णीग , सन्नच्युत इसके उदाहरण हैं। .

७८ ] पथ्यास्वस्ति ये जैसे स्वर के परे होने पर ट, ग, न मे तत्तमान विभागज उपजन (वर्णागम) होता है उसी प्रकार स्वरभक्ति के परे होने पर भी होता है। अर्ग, अह , श्च्योतते, स्त्यानम्, आदि मे गकारादि उप्म-वर्णी के उच्चारण से पूर्व अकार इकार आदि रूप स्वरभक्ति की प्रतीति होतो है। इस स्वरभक्ति के परे होने पर भी ड, ण न इन नाभिवय वर्गों के पश्चात् तत्समान विभागज ट, रण, न का उपजन होता है। जैसे –'प्राइक पष्ठ., सुगरण टु पष्ट 'सन्सः' सञ्च्छम्भु , इन उदाहरणो मे स्वरभक्ति के कारण' पकारादि से पूर्व इ, ण, न का आगम है। किन्तु वह उपजन (आगम) उन वर्गों से परे प्रकारादि से पूर्व विद्यमान अकारादि स्वरभक्ति के कारण है। यहा क्रमश ड, ण, न, विभागज उपजन परवर्ण के अङ्ग है। और परवर्ण पकारादि निरनुनासिक वर्ण है, अत उन उपजनो मे से भो नासिक्यतापादक यत्न की निवृत्ति हो जाती है अतः वे ड ण, न क्रमश तत्स्थानीय नासिक्यरहित क, ट, त में परिवर्तित हो जाते है। क्योकि उन उपजनो के सनिकृष्ट उष्म वर्ण नासिक्यविरोधी गुण से युक्त है। पटत् सुखिन , पट्त्सन्त , इत्यादि मे हकार के वाद होने वाले विभागज उपजन 'ट्'केपराग होने से और उत्तरवर्ती सकार मे दन्तस्थानत्व गुण की प्रबलता के कारण वह दन्त्य 'त' में परिवर्तित हो जाता है । स्वर से परे विद्यमान रेफ व हकार से परे जो ह, श, ष, स, य, र, ल, व, से भिन्न वर्ण हैं उन पर पूर्वस्वर का क्रमरण होता भी है और नही भी होता, अत वहाँ क्रमज, विभागज व्यजन विकल्प से उत्पन्न होता है। जैसे-तर्क , स्वर्गः, गर्ज , ब्रह्म, नास्ति आदि में । किन्तु जहाँ रेफ व हकार से परे उप्म या अन्तस्थ व्यजन होते हैं वहाँ क्रमज या विभागज व्यजन उत्पन्न नहीं होता। जैसे- स्वय॑म् आदि उदाहरणो मे। छकारभिन्न सोप्म स्पर्शवों मे पराङ्गता प्रबल होती है, प्रत वहाँ पूर्व स्वर का क्रमण नहीं होता और वहाँ तत्समान विभागज व्यजन उत्पन्न नही होता। जसे-मख , मघा, शठ, वध , सभा आदि उदाहरणो मे। किन्तु छकार वर्ण मे पराङ्गता का स्पर्श होने पर स्वभावत उस मे पूर्व स्वर का भो क्रमरण होता है ग्रत क्रमज चकार उत्पन्न होता है और वह उष्मवर्ण छकार से युक्त होता है। जैसे-स्वच्छाया, शिवच्छाया, चेच्छिद्यते आदि मे। किन्तु पद के श्रत मे देर्घ स्वर हो और उससे परे छकार ग्यजन हो तो वहाँ पदान्त यति के ३ हिन्दी व्याख्या [ ७६ द्वारा पूर्व स्वर तथा छकार का विच्छेद हो जाने से पूर्व स्वर का क्रमण छकार मे नही भी होता और कदाचित् होता भो है अत वहाँ क्रमज चकार वर्ण को उत्पत्ति विकल्प से होती है। जैसे-साच्छाया, सा छाया मे, माच्छिदत्, आच्छादयति इत्यादि मे पदात यति से विच्छेद हो जाने पर भी जो क्रमज चकार व्यजन दृष्टिगोचर होता है उसका कारण यहाँ एकपदत्व की विवक्षा ही है। अत. पदान्त यति से विच्छेद नहीं होता है और पूर्वस्वर के क्रमण से क्रमज चकार व्यजन उत्पन्न हो जाता है। यद्यपि यह वर्णोपजन (वांगम) का वैचित्र्य दो व्यंजनो की सन्धि होने पर व्यजनो की गुणप्रकृति पर निर्भर है तथापि यह वर्णगुणप्रकृत्यनुकूल उच्चारण करने वाले सम्प्रदायविशेप से ही बनता है। आच्छादयति इत्यादि मे दीर्घ स्वर से परे छकार से पूर्व चकार का उपजन साम्प्रदायिक उच्चारण की प्रकृति- विगेप के कारण ही है। यह क्रमज उपजन विवक्षा के अधीन होता है, ऐकान्तिक (अवश्यम्भावो) नही। क्योंकि पूर्वस्वर का क्रमण उच्चारणविगेप के अधीन होने से साम्प्रदायिक है। अर्थात् वह उच्चारयिता सम्प्रदायविगेण पर प्राश्रित है। इसलिए दीर्घ स्वर से परे द्वित्व नहीं होता, ऐसा आचार्य उपवर्प इन्द्र, राष्ट्रम्, इत्यादि मे दो से अधिक व्यजनो के योग मे द्वित्व नही होता ऐसा गाकटायन मानते हैं। कही भी द्वित्व नहीं होता, ऐसा शाकल्य मानते हैं । उपर्युक्त उपजन (वागम) सम्प्रदायविगेपाधीन होते हुए भी वर्णप्रकृति की अपेक्षा से होते हैं। इसीलिए इनका यहाँ कयन किया गया है । कुछ वर्णागम वर्णप्रकृति से निरपेक्ष होते है और केवल भापा-व्यवहर्ता की प्रकृति की अपेक्षा से ही होते हैं। जैसे-'विश्ववाड्, मुड्, धुक् इत्यादि मे हकार से पूर्व ड् व ग् का आगम। गर्भ, उद्ग्राभ, निग्राभ, सजभार आदि मे हकार से पूर्व व् का आगम होता है और ह के योग से व् सोष्म वनकर भ हो जाता है। स्वंर , स्वरी, सुखार्त. प्रार्णम्, प्रार्च्छति आदि मे क्रमग ईर, ईरिन्, ऋत, ऋण, ऋच्छति से पूर्व प्रकार का आगम होता है । २. वर्गलोप लोप (वर्णलोप)-उपघातक बल के कारण कही वर्णो का लोप हो जाता है। जैसे-'प्रयुगम्' इस शब्द मे उच्चारण के दोष से 'य' वर्ण का लोप हो जाता १. विश्ववाड़ मुड्-धुगित्यादी हकारात् प्राम् उगानमः। गर्भ उग्रामनिग्रानो सननारेति वागम ॥ मानते हैं। .

८० الا पथ्यास्वस्ति है और 'प्रउगम्' ऐसा उच्चारण किया जाता है। 'उद् स्निग्' मे उच्चारण-दोप से उद् के द् का लोप हो जाता है और उसे परे दन्त्य स को मूर्धन्य प होकर उसके प्रभाव से दन्त्य 'न' मूर्धन्य 'ण' मे परिणत हो जाता है और उष्णिक ऐसा उच्चारण किया जाता है। उद् उपसर्गपूर्वक स्था तथा स्तम्भ धातु में प्रयत्न के उपद्यात से म का लोप हो जाता है। जैसे-उत्थानम् व उत्तम्भनम् मे । अवसान मे सयोग के अन्तिम वर्ण का प्रयत्नोपघात से लोप हो जाता है। इसी प्रकार अथ शब्द मे थकार के उत्तरवर्ती प्रकार का स्थान विपर्यय होकर वह पद के आदि मे आ जाता है और दोनो के योग से या बन जाता है। पश्चात् अन्त मे स्वर के न रहने से त् +ह, इन सयुक्त व्यजनो मे संयोग के अन्तिम व्यजन 'ह. का लोप हो जाता है और आत् बन जाता है। जैसा कि 'याद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै' मे है। यह प्रात् जव स्वतत्र निपात होता है तब इसके स्थान मे इसके पर्यायवाची अथ शब्द का प्रयोग हो सकता है। जैसे-'याद्रात्री' मे प्रात् के स्यान मे अथ शब्द का प्रयोग । किन्तु जब यह 'यात्' पञ्चमी विभक्ति के निपात- रूप से विवक्षित होता है तब इसके स्थान मे पर्यायवाची अथ शब्द का प्रयोग नही हो सकता। जैसे - देवात् के स्थान मे 'देवप्रथ' ऐसा प्रयोग नही हो सकता। जब यह प्रात् 'स्म' निपात से सयुक्त होता है तब सर्वनाम यत्, तत् आदि गब्दो के अन्तिम तकार का प्रयत्नक्लेश के कारण लोप हो जाता है। जैसे—यस्मात्, आदि मे । व्यजन से परे वर्तमान नासिक्य अन्त स्थ व्यजनों का नासिक्य अन्त स्थ व्यजन परे होने पर लोप हो जाता है। व्यजन से परे विद्यमान नासिक्य वर्गों का नासिक्य वर्ण परे होने पर जो लोप होता है, वह जिस नासिक्य वर्ण का लोप होता है, वह तत्सजातीय नासिक्य वर्ण के परे होने पर ही होता है, भिन्न नासिक्य वर्ण परे होने पर नही। इस लिए 'तन्म्नाम्' इस उदाहरण मे 'न्' से परे 'म्' का लोप नही होता है, क्योकि उससे परे जो नासिक्य वर्ण है, बहु 'म्' न होकर तद् विजातीय 'न्' है। 'शय्या' इत्यादि मे प्राकृतिक दो यकार-वर्णों मे एक यकार का क्रमज अथति विभागज तृतीय यकार के परे होने पर लोप हो जाता है। अर अन्ततोगत्वा दो यकार ही शेष रह जाते है - एक प्राकृतिक और एक क्रमज । अदितेरपत्यम् आदित्य , मे एक यकार का क्रमज (विभागज) यकार परे होने पर लोप हो जाता है।

हिन्दी व्याख्या [ ८१ में आदित्यदेवताक स्थालोपाक आदित्यः गव्द मे दो यकार है। एक मूल आदित्यगब्द का तथा दूसरा ण्य प्रत्यय का। इन दोनो का ही क्रमज तृतीय यकार परे होने पर लोप हो जाता है । व्यजन से परे वर्तमान नासिक्य अन्त.स्थ वर्गों से भिन्न व्यजनो का सवर्ण व्यंजन परे होने पर लोप हो जाता है। जैसे-मरुत , प्रत्तम्, अवत्तम्, इत्यादि मे दो तकारो मे से एक तकार का क्रमज तकार परे होने पर लोप हो रहा है। व्यजन से परे वर्तमान नासिक्य तथा अन्तःस्थ वर्णो से भिन्न व्यसनो का सवर्ण व्यञ्जन परे होने पर जो लोप होता है, वहाँ जिस व्यञ्जन का लोप होता है, वही व्यञ्जन परे हो, यह नियम नही। अत 'शिण्डि' व पिण्डि, ढकार परे होने पर भी डकार का लोप हो जाता है। ग्रन्थु गव्द मे ग्रन्थ् धातु से 'तु' प्रत्यय करने पर तकार का लोप हो जाता है । इ या ए अथवा उ या प्रो के परे होने पर क्रमशः यकार व वकार की अभिव्यक्ति नही होती। जैसे-नरयीश्वर. नर ईश्वर , योन्यायीश्वर , योन्या ईश्वर , भोयेक , भो एक., हरयेक., हर एकः, त्वोतासः, तोतास उदाहरणो मे यकार व वकार की अभिव्यक्ति न होने से यकार-वकार-सहित तथा यकार-वकाररहित शब्दो का समान ही उच्चारण होता है। यकार व वकार की अभिव्यक्तिस्थल मे. तीन भिन्नभिन्न सम्प्रदाय हैं। इनमें शाकटायन भोयेको हरयेक मे यकार का स्वरर्धामरूप से श्रवण मानते हैं । शाकल्य भो एक , हर एक , इस प्रकार से दोनो जगह यकार का श्रवण नहीं मानते। गार्य 'भो एक.' मे यकार का लोप (अश्रवण) तथा 'हरयेक.' मे लघुप्रयत्नतर यकार का श्रवण मानते है । त्र्यच गव्द मे लोक में 'र' तथा 'य' की अनभिव्यक्ति है और छन्द मे उनका लोप हो जाता है। जैसे-तृचम् मे । 'त्र्यषिः' में र और य की अभिव्यक्ति है। ३ वर्णविपर्मय विपर्यय (वर्णविपर्यय) वर्गों का स्थान-परिवर्तन है। अक्षवाहिनी प्रवाह, प्रवाढ तथा प्रवाढि शब्दो में अक्षरो के विशकलन से सिद्ध उ अ अ इन वर्गों का स्थानपरिवर्तन होकर सन्धि होने पर अक्षौहिणी, प्रौह, प्रौढ, प्रौढि प्रयोग वन जाते है। अर्थात् वाहिनी आदि शब्दो में वा शब्द के विशकलन से सिद्ध उ अ अ इन वर्गों का स्थानपरिवर्तन हो जाने पर अ अ स्वर उ से पूर्व स्थान मे आ ८२ ] पस्यास्वस्ति जाते है तथा इनकी गुणसन्धि होकर ओ बन जाता है। प्रो का अक्ष के साथ तथा प्र के अ के साथ सन्धि होने पर अक्षौहिणी प्रौढ आदि शब्द बन जाते है। स्थिर शब्द मे सकार से पूर्व स्वरभक्ति प्रकार स्थानविपर्यय के द्वारा सकार के बाद आ जाती है तथा सथिर शब्द बन जाता है। पश्चात् आदि के सकार तथा तत्पश्चाद्वर्ती स्वरभक्ति अकार, दोनो के तालव्य हो जाने मे गिथिर शब्द बन जाता है । अथवा श्रथ व श्लथ शब्दो मे र और थ तथा ल और थ का स्थानविपर्यय हो जाने से श्थर व श्थल शब्द बन जाते हैं। पश्चात् प्रयत्नदोप से 'श' 'व' 'थ' मे दो इकार और आ जाते है। इस प्रकार शिथिर व शिथिल शब्द बन जाते है । 'पश्यक' शब्द मे प और क का परस्पर स्थानविपर्यय हो जाने से कश्यप बन जाता है। तथा श और य का स्थानविपर्यय हो जाने पर यकार मे प्रयत्न के प्रतिवाध से स्पर्श का उत्कर्ष होकर क्रमश वह ज और च मे परिवर्तित हो जाता हैं। और इसी प्रकार प्रयत्न-प्रतिबाध से स्पर्श का उत्कर्ष होकर 'श' 'छ' में परिवर्तित हो जाता है। कच्छप शब्द भी ऐसे ही बनता है। इसी प्रकार कश्य से कच्छ बन जाता है। इसी रीति से एव पद मे पद के आदि मे 'ए' का पदान्तविपर्यय हो जाने से 'वै' गब्द बन जाता है। 'अनश्व' मे अन् शब्द भी न के विपर्यय से बनता है। अर्थात् न = न्+अ मे न जो आदि मे था, अन्त में आ जाता है और इस प्रकार न का अन् बन जाता है। इसी प्रकार तु का स्थानविपर्यय से 'उत्' वन जाता है । 'कृती छेदने' से उ प्रत्यय द्वारा कर्तु गव्द ही स्थानविपर्यय से तर्कु बन जाता है । 'प्रोम् मे अउ का परस्पर स्थानविपर्यय हो जाने से ओम् का 'बम्' बन जाता है। भर्म शब्द मे ह और र का स्थानविपर्यय हो जाने पर ब्रह्म बन जाता है । जैसे- भर्म = 'व्ह., अ, र् म् अ' मे व के स्थान मे र और र के स्थान मे ह के आ जाने से व् र ह. अम् अ ब्रह्म बन जाता है । बहु गब्द मे अ का स्थान विपर्यय हो कर ह, के वाद आ जाने से तथा अ को उ हो जाने से भू बन जाता है । जैसे-बहु- १ प्रोमोऽकारोकारयोवं परस्परविपर्ययात् । भर्मणो हरयो ह्म परस्परविपर्ययात् ॥ वहोर उत्वम॑त् सोऽभूद्धात्परो भूरभूदयम् । धातुस्ततोऽभूद् भूभूमिभूमा भूयान् बहु ब्रुवन् ॥ निम्रन्थुशन्दे रहयोनिघण्टुः स्याद् विपर्ययात् । विक्षेपात् तरयोरेफबिन्दुत्वे स्पर्शनद्र तेः ॥ 1 हिन्दी-व्याख्या [ ८३ व् अह, उ मे अ के ह के पश्चात् आने से व् ह भ बन जाता है और अ को उ हो जामे से सन्धि होकर दीर्घ ऊ हो जाता है और भू बन जाता है। भूमि, भूमा, भूयान् आदि मे यही स्थिति है। निर्ग्रन्थु शब्द भी र तथा ह के विपर्यास से निघण्टु बन जाता है। जैसे-निर्गन्थुनि र् ग् र अन् त् ह, उ मे 'ह' और 'र' का परस्पर स्थानविपर्यय हो जाने से निर्घन्तु बन जाता है। पश्चात् निर् के र का भी विक्षेप के कारण स्थानविपर्यय हो जाता है और त् के विन्दु पर आ जाता है और स्पर्शनद्रुति से त् ट मे परिवर्तित हो जाता है । ४. वर्णादेश 'आरम्भक वल मे जहाँ विशेषक बल के उदय से लोप, आगम तथा विपर्यास एक साथ होते हैं अर्थात् किसी वर्ण के गुण का नाश, किसी का आगम, किसी का विपर्यास (स्थानपरिवर्तन) होता है, उसे आदेश कहते हैं। विशेषक बल नाना प्रकार का हो जाता है। प्रत्येक विशेषक-वल तारतम्य के कारण पुन. नाना प्रकार का हो जाता है। जैसे-ति एक विशेषक बल है। उसमे द्रुति, सम व प्लुति तीन विशेषतायें है। उरस्, कण्ठ व शिरस् ये तीन सवनस्थान हैं। इन स्थानो मे वायु को पहुंचाने वाला वल स्वरोपधायकसज्ञक है। इसमें विशेषक बल के तारतम्य से और भेद हो जाते हैं। जैसे- उदात्त और स्वरित द्रुत गति के कारण अनुदात्त हो जाते है। अनुदात्त व उदात्त समगति के कारण स्वरित बन जाते है। इसी प्रकार अनुदात्त और स्वरित प्लुतगति के कारण उदात्त हो जाते हैं। इसी तरह सधारण एक दूसरा वल है। उसके कारण प्रतिसवन अर्थात् उरः, कण्ठ व गिरस् इन तीनो सवन स्थानो मे स्वरोपधायक बल मे दो भेद हो जाते हैं। वे भेद निगृहीत तथा उद्गृहीत हैं। प्रत्येक सवनस्थान मे निम्न भाग मे गृहीत वायु निगृहीत तथा ऊर्ध्वभाग मे गृहीत उद्गृहीत कहलाता है। इसके कारण सन्नतर, अनुदात्त, स्वरित, प्रचित, उदात्त तथा उदात्ततर ये ६ भेद स्वर के हो जाते हैं। उरस् स्थान में निम्न भाग मे निप्पन्न स्वर सन्नतर ( निघान ) १ प्रारम्भके बले यत्र विशेषकवलोदयात् । लोपागमविपर्यासा बलानां स्युः समुच्चयात् ॥ गुणाना कस्यचिन्नाशः कस्यचिच्चागम. सह । कस्यचिद्वा विपर्यासस्तमावेशं प्रचक्षते ।।

८४ ] पथ्यास्वस्ति तथा ऊर्श्वभाग मे निष्पन्न स्वर अनुदात्त कहलाता है। कण्ठस्थान मे निम्न, भाग मे निप्पन्न स्वर स्वरित तथा ऊर्वभाग मे निष्पन्न प्रचित कहलाता है। गिर - स्थान मे निम्नभाग मे निष्पन्न स्वर उदात्त तथा ऊर्ध्व भाग मे निम्पन्न उदात्ततर कहलाता है। उपर्युक्त तारतम्यविशेप की अपेक्षा न करने पर उदात्त, अनुदात्त व स्वरित ये तीन ही स्वर होते है। इसीलिए कहा है- "उच्चादुच्चतर नास्ति नीचालीचतर तथा।" इसी प्रकार अगोपधायक बल मे अभिव्याप्ति नामक विशेपक वल होता है उस विशेषक बल मे अवच्छेदतारतम्य या मात्रा नामक अन्य बल रहता है। इसके कारण अक्षर मे ह्रस्व, दीर्घ व प्लुत ये विशेपताये हो जाती है। एक- मात्रिक ह्रस्व, द्विमात्रिक दीर्घ तथा त्रिमात्रिक प्लुत कहलाता है। यह एक छन्द है। स्वरमात्र को अथवा एक या दो या तीन या चार या पाँच या छ या सात व्यजनो से अवच्छिन्न स्वर को अक्षर कहते है। यह दूसरा छन्द है। - स्पर्शोपधायक बल मे विवृत,' मन्द, दुर्योग, द्विस्थानिक, मृदु, तीव्र अर्धसम' ये सात विशेष है। समसाम्मुख्य रूप से अवस्थित स्थानो व करणो के मध्य मे अवगुण्ठित वर्णो के उपादानकारण प्राणवायु से स्थानो व करणो के स्पर्श का प्रतिवन्ध या अभाव विवृत कहलाता है ।।१।। स्थानो व करणो मे प्राणवायु का स्पर्श न होने पर भी स्पर्शोन्मुग्व- प्रयत्नता मन्द कहलाता है ।।२।। अत्यल्पमात्रा मे स्थान व करण मे प्राणवायु का स्पर्श दुर्योग कहलाता है। वह करणविषमता के कारण स्पर्शास्पर्शी है ।।३।। मुख-स्थान मे स्पृष्ट प्राणवायु का उपरि विद्यमान नासानाडी से स्पर्श द्विस्थानिक कहलाता है ॥४॥ मृदुस्पर्श से ग, ज, ड, द, ब, वर्ण उच्चरित होते है ॥५॥ तीनस्पर्ग से क, च, 'ट, त, प वर्ण उत्पन्न होते है ॥६।। उष्म वर्णो के स्वरभक्ति सहित होने से अशत वे विवृत रहते है और अशत उनमे स्पर्श होता है। प्रकार इन विशेषक बलो के सम्बन्ध से स्पर्श मे तारतम्य होने से वर्णान्तर का आदेश हो जाता है। जैसे-इ, उ, ऋ, ल ये नामी स्वर हैं। इन विवृत प्रयत्न वाले स्वरो के स्थान मे असवर्ण स्वर होने पर क्रमश य, र, ल, व, ईपत्स्पृष्ट अन्त स्थ वर्ण हो जाते है। जैसे-दिव्यस्ति, मध्वस्ति, पित्रागम, लाकृति । इस ये - .

हिन्दी-व्याख्या [८५ स्थानोपधायक बल मे द्रुति, सम, प्लुति ये विगेपक बल होते हैं। द्रुति- गति के कारण प्रथम स्थान मे स्थानोपधायक बल का पात होता है। समगति के कारण तालु, मूर्धा, व दन्त इन मध्यमस्थानो मे तथा प्लुतगति के कारण प्रोष्ठरूप उत्तम (अन्तिम) स्थान मे स्थानोपधायक बल का पात होता है। मध्यम स्थान मे भी समद्रुति से तालुस्थान मे, सम साम्य से मूर्धा मे तथा समप्लुति से दन्तस्थान मे स्थानोपधायक बल का अवपात होता है। द्रुति के कारण 'त' को 'क' हो जाता है। जैसे-'शुष्क' मे। प्लुति के कारण 'त' को 'व' हो जाता है। जैसे-'पक्व' मे। समसाम्य के कारण 'त' को 'ट' हो जाता है। जैसे-'कृष्ट' मे। एकस्थानिक 'त' को द्विस्थानिकत्व बल के कारण 'न' हो जाता है। जैसे-वृत्रण , हीन आदि मे। प्लुति तथा द्विस्था- निकत्व के कारण 'त' को 'म' हो जाता है। जैसे-'क्षाम' मे। कही पर स्थानबल तथा स्पर्शवल दोनो की विशेषताओ के आधान से सिद्धि होती है। जैसे-सकार और रेफ को अघोष वर्ण परे होने पर तया अवसान मे विसर्ग हो जाता है। जैसे-'उच्चैः, 'पुनः पुन ' मे । अकार से परे विद्यमान 'स' 'ह' बनकर उवार मे परिणत हो जाता है, यदि उससे परे प्रकार या अघोषवर्ण हो। जैसे-'देवोऽस्ति, देवो गत.' आदि मे। आकार से परे सकार को हकार होकर विवृत्ति हो जाती है यदि उससे परे स्वर वर्ण या घोप हो। जैसे-'बाला आयान्ति, वाला गताः' ग्रादि में। इकारादि स्वरो से परे स को रेफ हो जाता है यदि उससे परे कोई स्वर या घोप वर्ण हो । जैसे-हरिरय, हरिर्गत , भानुरय, भानुर्गत , उच्चैरय, नीचैर्गत आदि मे। स्वर वर्णो से परे रेफ और सकार को अघोष वर्ण परे होने पर उस अघोप वर्ण के स्यानवाला उष्म वर्ण हो जाता है। जैसे-गिव करोति, हरिश्चिनोति, भानुष्टीकते, शनस्तन्वते, उच्च पठति आदि मे । इस प्रकार के आदेशविकारों मे वर्णगुण लुप्त हो जाते है, या उनका विपर्यय हो जाता है । ५ प्रकृतिभाव जिसका स्वरूप ही प्रदर्शित करना अभीष्ट है वह प्रकृष्टतया गृहीत होने से प्रगृह्य कहलाता है। वहाँ विकार के कारण के होने पर भी प्रगृहीत होने से उस स्वर की स्वरूप से प्रच्युति नही होती अर्थात् उसमे कोई विकार नही होता। जैसे ईकारान्त, ऊकारान्त व एकारान्त द्विवचन, ईपदर्थक व अवधिमर्थ वाले . ८६ ] पथ्यास्वस्ति आकार को छोडकर शेष स्वर, तथा ओकारान्त निपात प्रगृह्य होते है। इनके क्रमश -हरी एतौ, विष्णू इमी, द्रव्ये इमे, अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, अहो ईगा: उदाहरण हैं। प्रकृतिभाव विवक्षाधीन होता है। इति श्रीविद्यावाचस्पति-श्रीमधुसूदनशर्मप्रणीत पथ्यास्वस्तिग्नन्य मे सन्धिपरिष्कार- नामक पञ्चम प्रपाठ की हिन्दीव्याख्या समाप्त ।

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Pathyaswasti

Author
Shrama, Madhusudan
Title
Pathyaswasti
File name
Pathyaswasti
Text
OCR done
Citation
1969
Published
2010/08
Publisher
Jodhpur, The Rajasthan Oriental Research Institute
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
325921
Barcode
99999990002354.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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