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Nrxtta San'grng-aha
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक - पुरातत्त्वाचार्य जिनविजय मुनि
[सम्मान्य संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ]
-ग्रन्थाङ्क १७-
अज्ञातकटकः
नृत्तसङ्ग्रहः
प्रकाशक
-
राजस्थान राज्य संस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( Rajasthan Oriental Research Institute )
जयपुर (राजस्थान)
वि० सं० २०१३ ]
प्रति ७५०
[ मूल्य १०
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक - पुरातत्त्वाचार्य जिनविजय मुनि
[ सम्मान्य संचालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ]
-ग्रन्थाङ्क १७-
अज्ञातकर्तृकः
नृत्तसङ्ग्रहः
प्रकाशक
-
राजस्थान-राज्य-संस्थापित
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( Rajasthan Oriental Research Institute )
जयपुर (राजस्थान)
वि० सं० २०१३]
प्रति ७५०
[ मूल्य रू०
RĀJASTHĀNA PURĀTANA GRANTHAMĀLĀ
Published by the Government of Rajasthan
A Series devoted to the Publication of Sanskrit, Prakrit, Apabhramsa,
Old Rajasthani-Gujarati and Old Hindi works pertaining to
India in general and Rajasthan in particular.
General Editor
Acharya JINA VIJAYA MUNI, Puratattvacharya
Honorary Member of the German Oriental Society, Bhandarkar Oriental
Research Institute, Poona and Gujarat Sahitya Sabha, Ahmedabad.
Honarary Director, Rajasthan Oriental Research Institute.
No. 17
NRTTA SAMGRAHA
(A small treatise on the art of dancing )
edited by
Prof. Dr. PRIYABALA SHAH
M. A. Ph. D. (Bombay) D. Litt (Paris)
( Head of the Department of Ancient Indian
Culture : Ramanand Arts College, Ahmedabad. )
Rajasthan Oriental Research Institute
Jaipur
1956
अज्ञातकर्तृकः
नृत्तसङ्ग्रहः
सम्पादिका
डॉ. प्रियवाला शाह. एम्. ए पीएच. डी. (बंबई )
डि. लिट् ( पेरिस)
( प्राध्यापक, रामानन्द आर्टस् कॉलेज, अहमदाबाद )
-: प्रकाशनकर्ता:-
राजस्थान-राज्याज्ञानुसार
संचालक-राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
( Rajasthan Oriental Research Institute )
जयपुर (राजस्थान)
विक्रमाब्द २०१३ ]
प्रथमावृत्ति * मूल्य रू०
खिस्ताब्द १९५६
- प्रकाशक- संचालक - राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर, के आदेशानुसार – गोपालनारायण बोहरा । मुद्रक- जयन्ति दलाल, वसंत प्रिण्टींग प्रेस, घीकांटा रोड, अहमदाबाद । और मुकुन्द के. शास्त्री, इला प्रिण्टरी ( वल्लभ मुद्रणालय) पानकोर नाका, अहमदाबाद । .
प्रधान संपादकीय वक्तव्य राजस्थान और गुजरात, मालवा आदि प्रदेशोंमें प्राचीन हस्तलिखित प्रन्थोंके बिखरे हुए एवं जीर्णशीर्ण दशामें जो संग्रह प्राप्त होते हैं उनमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं प्राचीन राजस्थानी-गुजराती भाषामें रचित छोटी बडी ऐसी सेंकडो ही साहित्यिक कृतियां उपलब्ध होती हैं जो अभीतक प्रायः अज्ञात और अप्रसिद्ध है । विद्वानोंका लक्ष्य प्रायः अभीतक उन्हीं सुप्रसिद्ध और सुशात ग्रन्थोंके अन्वेषण एवं संशोधनकी तरफ रहा है जो यत्रतत्र यथेष्ट प्रमाणमें उपलब्ध होते हैं । ग्रन्थोंके संपादन और प्रकाशन के विषयमें भी प्रायः यही प्रथा चली आ रही है। सुप्रसिद्ध और सुशात ग्रन्थोंके सिवा छोटी छोटी एवं प्रकीर्ण रचनाओंके विषयमं विद्वानोंका विशेष लक्ष्य नहीं जाता है और इसलिये अभीतक सो रचनाओंके संपादन-प्रकाशनका मुख्य प्रयत्न प्रायः नहींसा हुआ है। हमारे प्राचीन इतिहास एवं सांस्कृतिक सामग्रीकी दृष्टिसे इन फुटकर रचनाओं में जो ज्ञातव्य छिपे पडे हैं उनकी तरफ हमारा लक्ष्य बिल्कुल नहीं गया है-ऐसा कहा जाय तो कोई अत्युक्तिकी बात नहीं होगी। राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिरका कार्य प्रारंभ करते समय, हमारा मुख्य लक्ष्य इस प्रकारके प्रकीर्ण साहित्यका अन्वेषण, संग्रह, संरक्षण, संशोधन एवं प्रकाशन आदि करनेका रहा है और तदनुसार, राजस्थान पुरातन ग्रन्थ- माला द्वारा सी अनेकानेक साहित्यिक रचनाओंको, सुयोग्य विद्वानों द्वारा शोधित-संपादित कराकर प्रकाशमें रखनेका आयोजन हमने किया है । इसी उद्देश्यके आधारानुसार, नृत्तसंग्रह नामक प्रस्तुत लघुकृति राज- स्थान पुरातन ग्रन्थमालाके १७ वें मणिके रूपमें प्रकाशित की जा रही है। इस कृतिकी १३ पत्रात्मक एक जीर्ण शीर्ण और अपूर्ण प्रति गुजरात विद्यासभाके संग्रहमें सुरक्षित है जो अहमदावादके 'गुजरी' नामसे पहचाने जानेवाले - सप्ताहमें एक दफह बजारके फुटपाथ पर लगनेवाले-हटवाडे में, रद्दी कागज बेचनेवाले कबाडीके पाससे उपलब्ध हुई है । जैसा कि संपादिका विदुषीने अपनी संक्षिप्त प्रस्तावनामें सूचित किया है-इस रचनामें नृत्य-नाटय विषयक कुछ मुख्य बातोंका वर्णन किया गया है अतः इसका नाम 'नृत्तसंग्रह' रखना समुचित समझा गया है। इस छोटेसे ग्रन्थमें विशेष लोकप्रिय कतिपय नृत्योंके स्वरूप और प्रकारका वर्णन किया गया है जिनमें भारतके दक्षिण और उत्तर दोनों प्रदेशोंके नृत्यप्रकारों का समावेश है । दक्षिणके मुख्य द्राविड, तैलंग और कर्णाट देश प्रचलित लोकii] - नृत्तोंका, जिनमें मुख्य करके उन उन देशोंकी भाषाके गीतोंके साथ अभिनय किया जाता है, वर्णन किया गया है और उत्तर प्रदेशमें प्रचलित उन नृत्तोंका उल्लेख है जिनमें संस्कृत, मध्यदेशीय ( आधुनिक हिन्दी) और पारसीक अर्थात् फारसी भाषाके गीतोंका व्यवहार होता है । यवनलोकोमें बहुप्रिय जक्कडी नामक नृत्तका भी स्वरूप बताया गया है । ग्रन्थान्तमें पश्चिम एवं उत्तर भार- तमें सुप्रसिद्ध दण्डरास (जिसको गुजरातीमें दाण्डिया रास कहते हैं। का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार इस छोटेसे निबन्धम नृत्यकलाके विशेष लोकप्रिय और लोक- प्रसिद्ध प्रकारोंका सुगम और सरल संस्कृतमे जो वर्णन दिया गया है वह इस कलाके अभ्यासियोंको अवश्य मनोरंजक और ज्ञानप्रद सिद्ध होगा। गुजरात विद्यासभाके प्राचीन ग्रन्थ संग्रहमें अज्ञात एवं उपेक्षित रूपमें पडी हुई प्रस्तुत कृतिके अवलोकनद्वारा इसके महत्त्वको अवगत करके विदुषी डॉ. प्रियबाला शाहने इसका इस प्रकार संशोधन-संपादन कर प्रकाशमें लानेका जो प्रयत्न किया है वह अभिनन्दनीय है । मुनि जिनविजय सम्मान्य संचालक अनेकान्त विहार अहमदाबाद. आषाढशुक्ल ८. वि. सं. २०१३ ( १५-७-५६) राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर जयपुर PREFACE OF THE GENERAL EDITOR There are still hundreds of old manuscripts big and small in Sanskrit, Prakrit, Apabhramśa and old Rājasthāni-Gujarāti lying scattered over Rājasthāna, Gujarāta, Mālawā and other regions of our country. Many of these are still unknown and unpublished. Up till now scholars have generally devoted themselves to works which are comparatively bulky, well known and available in great number. The same outlook prevails also amongst publishers of oriental series. But in addition to those big and well-known works, there are many small ones on a variety of subjects which have not attracted the attention that they deserve. In fact, no major attempt has been made to edit and publish these small works on important subjects. It would be no exaggeration to say that these works which contain important material for the history and culture of our country and which embody not a negligible part of our ancient learning have been mostly neglected, probably because they are in small manuscripts and rare to find. It has been our endeavour from the very inception of Rājasthāna Oriental Research Institute to search for, collect and preserve mss. of such small works on various subjects and also to edit and publish them. Accordingly we have arranged for critical cditions of such works at the hands of competent scholars and their publication in the Rājasthāna Purātana Granthamālā. In persuance of this object, this small but important work Nștta- Samgraha is being published in the Rājasthāna-Purātana-Granthamālā as number: 17. The ms. of this work which consists of thirteen folios is preserved in the mss. collection of Gujarāta Vidya Sabhā, Ahmedabad. It would be interesting to know that this and many similar important works were rescued by the Gujarāta Vidya Sabhā from the vendors of old things in the weekly market of Ahmedabad, called Gujari. The title of this work is missing. But as the learned editor has shown, this work treats of dancing and therefore it is appropriately named Nștta-Samgraha. In this small work different varieties of old Indian dancing are described. It includes both the Northern and Southern types. In the Southern types are mentioned dances prevalent in Drāvida, Telanga and
iv ]
Karņāțaka with the Abhinayas accompanying the songs in their languages.
In the Northern, are included those dances which accompany songs in
Sanskrit, Madhyadesiya (modern Hindi) and Pärsika or Persian. The
Jakkaļi dance - so popular amongst the Yavanas - is also described. At
the end of the work is mentioned the well-known Danda-Rāsa ( known
in Gujarati as Dandiya Räsa ).
Thus this small work in a concise form gives information about the
art of dancing which, it is hoped, will be interesting and useful to
students of that art and Indian culture.
Dr. Priyabālā Shah deserves our thanks for discovering this
unknown and neglected work from the mss. collection of Gujarāta Vidyā
Sabbā and realizing its importance from its perusal for undertaking to
edit it for this series.
Anekanta Vihar
Muni Jinavijaya
Hon. Director,
Rajasthan Oricntal Resoarch Institute,
JAIPUR.
Ahmedabad.
15-7-56
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पष्ट सांधदायकाः पाधानांनादसाम्यंचकवावदितमानसामेलापकंवादयेयुःबंधंगजरंतता डुकस्यांततश्चाताई नौरीतेसति। नर्तको नर्तकीवाय दिक्यानां विधिविमाकामुनिनामांश्चयक्ष गंधर्वकिंनरातागणांचरतंतंडुलक्ष्मीवाणीमुमानुषाज्याधये गुर्विष्ठेनवात इंगमाविशतावत मंडपमध्यान मंगलाकृति मानतः सप्तसप्तकराक्रांतलानतमुच्यताइनिरंगधरा तत्रकार धन नानिधकागन्यादिनियतैर्युक्तंबंधकंन्टनभुच्यता निबंधत्वनियमादयो देशमोग या नवनालचारुयाणिधुवाडाविडुलागवःततःपरेशचानि नावांबधबंधकाःो स्वरमदायो जीतबंधमाश्चंदुज्ञातव्याधरुणज्ञातय यश्चा कतिक्रवयदानेवारत्युदिएबंधकस्थलक्षणंबधुनो। यता गुरखंतुष्तरंगस्थाचालिस्तदनुगागतिशमुखचालिरिनिधातावःपूर्वहरिविशत्रने वाराष्ट्यहाशदिक्षवा स्वसयक्रमतानामध्येऽध्यानलिक्षियेत अयतःक्षेपणानापाड़ाते दक्षिणेसनाहटेगुरुःस्वयंदामे रंग या-गंतरदिपेनारंगपीतस्थमध्यतुब्रह्मास्वयमधिष्टितःच्या हिाइतिरासन्त्याच्या जन्म हो गजस्थान पुगतन माला । [ ननसंग्रह द्वितीय तथा अन्य पत्रकी प्रतिकृति Introduction The text edited in the present work is based upon a single Ms. in the possession of Gujarat Vidysabha, Ahmedabad. Ms. No. 868 Name--not given at the end. I have named it Nyila-sangraha as it describes various kinds of NȚttas. Author-? Material--Paper Script-Devanagari Extent of the Ms.-2 to 13, i. e. 12 folios (incomplete ) Size of leaves--9.25x4.25 inches Area of writing—7.5x3.75 inches Number of lines--10 lines per page Number of letters-36 to 40 in each line Writing--fairly uniform and legible Age-not mentioned. From its appearance, nearly two to three hundred years old. Begins-Folio No. 1 is missing. The second folio begins- * ष्ठन्तः सांप्रदायकाः । बाथाना नादसाम्यं च कृत्वावहितमानसाः ॥ Eads दण्डैविना कृतं मृत्यं रासनत्यं तदेव हि । इति रामनृत्यम् । त्यनिवन्धनृत्तम् ॥ On comparing this work with the Samgita-ratnākara ( Vol. 2, Page 800, slo. 1271-72 Anandáśrama edition ), I found that the verses referred to above are a part of the section on 89714. The verses that precede are nearly 9 in number. If our Ms. began on the second side of the first folio, it would provide space for this number. I have quoted these verses in the foonote, page 1. The name and the author of this work are not known. I was tempted to edit it, because it has some noteworthy information to give regarding dancing as it was practised in India in ancient and medieval times. A part of its subject matter agrees with the usual information given in Nitya works like haare. However, while explaining technical terms like vi ) for ITHE, 3*** etc., it traces them to the regions of their origin. This in itself is very interesting. In addition to this, its refefrences to 947 and oral types of dance give this work special importance. As far as the language is concerned, the author does not, himself, seem to have written pure Sanskrit. So I have not tried to emend the text from the point of view of Påņinian grammar. In the case of non-Sanskrit words like fers, AD) and such others, I have left them as they are without attempting any uniformity in them. Before concluding, I must not omit to tender my most sincere thanks to revered Achārya Sri Muni Jinavijayaji, the Honorary Director of Rajasthan Puratattva Mandir, Jaipur, who is known for the encouragement he gives to young workers in the field of researh. I am greatly indebted to him for not only accepting this work for publication in Rajasthan Puratattva Series, but also for helping me in learning the craft of editing old manuscripts. I am much indebted to my teacher Prof. R. C. Parikh, for giving much of his valuable time for discussing with me several problems connected with the preparation of the present text. As Director of the institution in which I am working, he was kind enough to get permission to undertake this work from the authorities concerned. Ahmedabad Priyabala Shala 18-1952.
[ नृत्त संग्रहः ] . **ष्ठन्तः 'सांप्रदायिकाः॥ १२६३ १२६४ १२६५ * यत्रैको मुखरी श्रेष्ठस्तथा प्रतिमुखयपि । द्वावडावजिनौ स्कन्धावजिनौ करटाधरौ (?) ॥ द्वात्रिंशन्मदलधरा वरास्तालधरद्वयम् । कांस्यतालधरास्वष्टाविष्टाः काहलिकद्वयम् ॥ वांशिको रसिकौ व्यक्तसुरक्तप्रचुरध्वनी । चत्वारो मधुरध्वाना भवन्त्येते करास्तयोः । द्वौ मुख्यगायनौ सार्धमष्टभिः सह गायनैः । मुख्यगायनिके चाष्टौ सहगायनिकास्तयोः । संप्रदायसमुल्लासि पात्रमेक 'गुणान्वितम् । सर्वेऽमी रूपवन्तः स्युश्चित्रालंकरणान्विताः ॥ गीतादिसाम्यनिपुणाः 'प्रहर्षोत्फुल्लचेतसः । उत्तमः संप्रदायोऽसौ लोके कुटिलमुच्यते । तदर्धं मध्यमो न्यनोऽस्मात्कनिष्ठो निगद्यते ।। १२६६ १२६७ १२६८ इति संप्रदायलक्षणम् ॥ अनुवृत्तिर्मुखरिण स्तलयोयूँनपूरणम् तालानुवृत्तिरित्येते चत्वारः कुटिले गुणाः ।। १२६९ संप्रदायस्य दोषः स्यादेतद्गुणविपर्ययः ।। १२७० इति संप्रदायगुणदोषाः ।। संगीतर्बुधैः साधं नायके प्रेक्षके स्थिते । प्रविश्य रङ्गभूमि ते तिष्ठन्तः सांप्रदाधिकाः॥ १२७१ संगीतरत्नाकर' अ. ७ (आ. सं. सिरीझ) 1 Ms दायकाः 2 ग. श्रेष्ठः सूच्या प्र । 3 च. "पि । द्वौ चामजठरा- बढ़ावजितौ करटाधरौ (१)। 4 ख. ग. धराद्वयम् । 5. 'वन्त्यो नरकास्त। 67. णामयम् । ग. प्रकर्षों. 8 णरत्ताल.
२ 5 ३ ४ 10 15 २ नृत्तसंग्रहः वाद्यानां नादसाम्यं च कृत्वाऽवहित'मानसाः। मेलापकं वादयेयुः प्रबन्धं गजरं ततः॥ कुडुकस्यां ततश्चान्तर्वनौ दूरीकृते सति । नर्तको नर्तकी वापि दिक्पालांश्च विधिं विभुम् ॥ मातृकामुनिनागांश्च यक्षगन्धर्व किन्नरान् । गणेश भरतं तण्डं लक्ष्मी वाणीमुमामुषाम् । ज्येष्ठाश्च ये गुणैर्विष्णुं नत्वा तद्रङ्गमाविशेत् ॥ नृत्तमण्डपमध्यात् तु मङ्गलाकृति मानतः । सप्तसप्तकराक्रान्तस्थानं तद् रङ्गमुच्यते ॥ इति रङ्गप्रवेशः॥ तत्र कार्य द्विधा नृत्तं बन्धकं चानिबन्धकम् । मत्यादिनियमैयुक्तं बन्धकं नृत्तमुच्यते ॥ 'अनिबन्धं त्वनियमादथोद्देशक्रमो यथा । मुखचालिश्वोरुपाणि धुवाडा बिडुलागवः ॥ ततः परं शब्दचालि नाशब्दप्रबन्धकाः। स्वरमन्द्रादयो गीतप्रबन्धाश्चिन्दुजातयः॥ धरूणां ज्ञातयः पश्चात् कति ध्रुवपदानि च । इत्युद्दिष्टं बन्धकस्य लक्षणं 'वधुनोच्यते ॥ मुखं तु पूर्वरङ्गः स्याचालिस्तदनुगा गतिः। मुखचालिरिति प्रोक्ता नृत्तज्ञैः पूर्वसूरिभिः ॥ चन्द्रत्रिनेत्रवाराष्टवेदाङ्गशरदिक्षु च । स्वसव्यक्रमतो नृत्वा मध्ये पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ॥ अग्रतः क्षेपणाद् राजा पीडथते दक्षिणे सभा। पृष्ठे गुरुः स्वयं वामे रङ्गपीटान्तरे क्षिपेत् ॥ रङ्गपीठस्य मध्ये तु ब्रह्मा स्वयमधिष्ठितः । इष्टार्थ क्रियते पुष्पमोक्षणं रङ्गमध्यतः ॥ यतः पादस्ततो हस्तो यतो हस्तस्ततस्त्रिकम् । पादस्य निर्गमं ज्ञात्वा शेषाङ्गानि नियोजयेत् ॥ इतस्ततोऽर्थपर्याय इङ्गने अङ्गने इति । रञ्जकाय वदेत् तत्र यथाताललयोचितम् ॥ १० 1 Ms'पस्थित 2 Ms 'रात. 3 Ms 'ब.4 Ms 'न्य'. 5 Ms 'योजि ३ ४ 20 ६ 25 ७ ८ ९ 30 ३ ११ 35 १२ १३ 40 १४ १५ नृत्तसंग्रहः आविद्धवक्तहस्ताभ्यां चार्या च समपादया। पुरतत्रिपदीं गच्छेन्नटवर्यों विलासतः ॥ ततश्चन्द्रे लीनकं च कृत्वा समनखं ततः। सविलासं मन्दमन्दं तिर्यक् चालनसुन्दरम् ॥ पार्श्वद्वन्द्वं सुलूनामा चालयेत् तु मुहुर्मुहुः । मन्दानिलचलद्दीपशिखेवाङ्गस्य चालनम् ।। अथवा ऽ हिफणाकारां सुलूमाहुर्मनीपिणः । व्यावर्तितौ लजाहस्तौ युगपत् क्रमतो यदि ॥ भवेद् द्विशिवरत्वं च पादौ संयुक्तकुश्चितौ । गात्रं तदनुसारेण नीचं नीचं व्रजेत् तदा ॥ तलसञ्चमनुप्राप्य मूलूवर्तनमाचरेत् । भूमेरूद्ध स्थितिः 'कट्यास्तालद्वित्रिचतुष्टयात् । तलमध्योर्ध्वसञ्चाख्याः क्रमेण कथिता बुधैः । अङ्गुष्ठमध्यमाङ्गुल्यौ ये हस्तस्य प्रसारित । तदग्रयोरन्तरालं तालमाहुर्मनीषिणः ॥ रागालापानुगां व्यक्तशब्दालापानुसारिणीम् । गतिं च सर्वदा कुर्यात् सभाजनमनोहराम् । चार्या साऱ्या सव्यसूची पादोऽग्रतलसञ्चरः ॥ अधस्तलपताकश्च बाहुस्तत्र प्रसारितः । शिरोदृक्करपादानां युगपद् रेचनं वदेत् ॥ ततस्तु मध्यसञ्चेन सोत्संद्या करिहस्ततः । दक्षिणश्चरणस्तस्मानिष्क्रम्य स्वस्तिकं भजेत् ॥ सूलूचालनकं तत्र तथा नू पुरविधिकाम् । ततस्तु तलसञ्चेन चतुरस्रं समाश्रयेत् ॥ चतुरस्रौ करौ तत्र सूलू तत्रापि चालयेत् । ततस्तलमुखाभ्यां च चार्या स्वस्तिकया तथा ॥ १६ 45 १८ 50 १९ २० 55 '२१ २२ 1 Ms का. 2 Ms येत.
नृत्तरमा 60 65 70 २८ तृतीयां दिशमासाथ 'तू सञ्वेन सम्पतः। 'समां कृत्वा समनखं पूर्ववच्चाङ्गचालनम् । वैशाखरेचितं तत्र पाहू तिर्यक्प्रसारितौ ॥ २३ ततः कुलीरिका चार्या द्वितीय स्थानमाचरेत् । मण्डलं स्थानकं तत्र मूलूवर्तनकं तथा ॥ २४ करिहस्तकया चार्या सव्यहस्तिकरेण च । उद्वेष्टितेन वामेन रङ्गमध्यं समाश्रयेत् ।। २५ सभासंमुखतो हस्तौ तौ च तक्रियया पुटौ। पार्श्वरेचितकं तत्र जानुकुश्चितकं तथा ॥ २६ मण्डलस्थानकं कृत्वा लताहस्तौ सुलू तथा । वामो यथास्थितः कार्यों दक्षिणस्तु लताकरः ऊोर्चाङ्ग यथा तत्र तदूर्व' सारयेत् करः ॥ २७ ततस्तलमुखाभ्यां च चार्या स्वस्तिकया तथा । सप्तमी दिशमासाद्य सभां कुर्यात् तु वामतः ॥ द्वितीयायां तृतीयायां रङ्गमध्ये च यत्क्रमम् । तत्क्रम नृत्ततत्वज्ञश्चार्वाद्यङ्गविशेषतः॥ २९ यथाक्रमेण सप्तम्यामष्टम्यां रङ्गमध्यतः । नृत्वा चाविद्धवक्त्राभ्यां चार्या चैव मरालया। ३० चतुर्थी दिशमासाद्य तत्र स्थानं च मण्डलम् । जनितं करणं तत्र सुलू चापि प्रचालयेत् ॥ ३१ दक्षिणः खटकः कर्णे वामो मुष्टिः स्वपार्श्वतः। धनुःकर्ष स्थितावर्त्तचायी तिर्यमुखाख्यया ॥ षष्ठी दिशं समागत्य प्रत्यालीढाङ्गचालनम् । तत्रैव चतुरस्रं च विप्रकीर्णो सुलूं तथा ॥ ३३ ततोऽधरेचिताभ्यां च चार्या तिर्यमुखाख्यया । पञ्चमी दिशमासाद्य सुलू समनख नयेत् ॥ ३४ शुद्धचालिं च तत्रैव कौक्कुटीमिति पाटतः। ततोऊजलिकरं कृत्वा शिरोक्दनहत्क्रमात् ॥ ३५ 75 80- ३२ 85 1 Ms . 2 Ms समां. 3 Ms दुग्यो..4 Ms 'कीणों. 5 MIकुर नृत्तसंग्रहः 90 100 देवं गुरुम् ऋषि' नत्वा चार्या कातरया गया। रङ्गमध्यमनुप्राप्य चार्याऽध्यकिया समे ॥ ३६ तलपुष्पपुटं कृत्वा पुष्पाण्यापूर्य तत्र च । सव्यापसव्यतः पश्चादग्रादूर्ध्वात् क्रमादिति । ३७ पुष्पाञ्जलिं दर्शयित्वा रङ्गपीठान्तरे क्षिपेत् । तत्रैवाभिनयेन्नान्दीश्लोकं तद्रागयोजितम् ॥ ३८ यथा-भवतां भूतये भूयाद् भवानी भववल्लभा । अङ्गीकृतसुसङ्गीतभृङ्गी" मुदितमानसा ॥ ३९ भवतां-पुरोदेशगतेन पताकेन, भूतये-पुरोदेशोोत्थिताभ्यामलपल्लवाभ्यां, 95 भूयात्-उद्वेष्टिताधोमुखगतेन पताकेन, भवानी चामवक्षोरुहतटगतस्वसंमुखगो- मुखेन, भव-ललाटगतसूच्यास्येन । वल्लभा-हृदयगतचतुरेण । अङ्गीकृत-मुखस्थकपोतेन । सुसङ्गीत-मुखदेशगतहंसास्येन । भृङ्गी-कम्पितपुरोदेशगतेन त्रिपताकेन । मुदित पुरोधस्तदूोत्थितेन' वामेनालपल्लवेन । मानसा-हृदयगतेन व्यावर्तितपरिवर्तित- दक्षिणसंदंशेन ॥ ततस्तत्रैव शीघ्रण पार्श्वयोरग्रतः क्रमात् । कमलवर्तनिकामादौ मकरवर्तनिकां ततः ॥ मायूरी भानवीं मैनी हयलीलां मृगी तथा । हंसी च कुक्कुटों पश्चात् खजनी गजगामिनीम् । दर्शयेयुः क्रमात् 'तज्ज्ञाः संप्रदायानुसारतः॥ ४१ पताको मणिबन्धस्थौ शिथिलौ स्वस्तिको मण्डलभ्रमितौ श्लिष्टौ ख्याती कमलवर्तनौ ॥ ४२ यदा तु मकरो हस्तपुरस्तात् पार्श्वयोरपि । व्यावर्तनाद् बहिश्चान्तस्तदा मकरवर्तना ॥ बर्हिबर्हकलाकारौ करौ कृत्वोर्ध्वतः क्रमात् । शनैरुचालितौ पादौ मायूरीस्फुरणं ततः ॥ भानोतिरिवालक्ष्ये हस्ताभ्यां मण्डलाकृतिः। सव्यापसव्ययोरूर्व क्रियया भानवीगतिः ॥ ४५ ४० 5 पुनः। ४३ 10 ४४ 1 Ms ऋषि. 2 Ms(भंगी.) 3 Ms:स्थितेन. 4 Ms 'माः नृत्तसंग्रहः 15 ४७ ४८ 20 ४९ 25. हृदान्तःस्थितपाठीनो यथा वसति वीचिषु । पार्श्वयोरुभयोस्तद्वत्क्रियया मैनवीगतिः ॥ ४६ पादपार्श्वयुगे स्थित्वा धरण्यां सञ्चरेद् द्रुतम् । मध्ये च स्थीयते तत्र गतिरुक्तानुरङ्गिणी। चकिताक्षी कुरङ्गी च पश्यन्ती गीतपद्धतिम् । आकर्णयन्ती यदि सा हारिणीगतिरीरिता ॥ मराली च पुरस्कृत्वा भावहावादिपूर्वकम् । मन्मथोद्दीपना दृष्टिः कथिता हंसिनीगतिः॥ युगपत् स्फुरणात् पक्षपादयोः साचिमण्डले । मत्तकुक्कुटवद् यत्र कौक्कुटीगतिरीरिता ॥ ५० त्रिपताको करौ कृत्वा 'जानू सङ्कुच्य शीघ्रतः। पादाग्रतश्चरित्वा तु स्थीयते खजनीगतिः ॥ ५१ समपादेन च स्थित्वा मन्दं मन्दं चरेत् ततः । गम्भीरश्चाङ्गदृष्टिश्चेद् गजलीलागतिर्मता ॥ ५२ गतीनां सानुकूलत्वं भजेयुश्चरणादयः। ततोऽग्रे सव्यहस्ताछी युगपत् क्रियया क्रमात् ॥ ५३ वैष्णवं च हयक्रान्तं प्रत्यालीढं' च मोक्षणम् । कुर्यात् तदा वामहस्तशिखरो हृदि संस्थितः ॥ ५४ पताकोऽधस्तलश्चान्यः स्वपार्वे च प्रसारितः। चित्रकलासकं तत्र मोक्षे सम्यक् प्रयोजनम् ॥ इति मुखचालिः ।। यतिताललयस्थानचारीहस्तात्मकं तु यत् । तन्नृत्तमुरुपं प्रोक्तं बुधैदिशधोदितम् ॥ नेरिः करणनेरिश्च भित्रं चित्रं च नत्रकम् । अदृष्टपृष्ठतुलं च तोलरूपं च- सीलुकम् ।। तुल्लं च प्रसर चैव कर्तरी होलुनामकम् । द्वादशेति समाख्याता, अथ लक्षणमुच्यते ॥ 1 Ms जानु. 2 Ms त° 3 Ms °ली. 30 ५५ 35 २ 40 mm नृत्तसंग्रहः 45 50 २ चतुरस्र स्थितियंत्र रासतालश्चिरो लयः । रथचक्रैकपादेन परेण च यथोचितम् ।। गतिः पताकहस्तश्च प्रत्याशं तलसञ्चतः । नीवीवद्गतिसञ्चारः क्रमात् सव्यापसव्ययोः ॥ रेखासौष्ठवसंपन्नः स शुद्धो नेरिरुच्यते । उरुपेष्वपि सर्वेषु विना दृष्टकपृष्ठकम् ॥ ब्राह्यभ्रमरिकां बद्ध्वा मुक्तिः स्याच्चतुरस्रके । छत्रभ्रमरिका किन्तु भवेत् करणनेरितः ॥ इति नेरिः ॥ झंपातालः सगोपुच्छो' हस्तकोप्पलपल्लवः । पावोर्ध्वजानुनी दण्डपक्षं तलविलासितम् ॥ विद्युद्धान्तं ततश्चन्द्रवर्तनामनि शुभितम् । ललाटतिलकं पश्चात् लतावृश्चिकसंज्ञकम् ॥ नवभिः करणैरेभिः क्रमात् सव्यापसव्यतः। कृत्वालीढे स्थितियंत्र नेरिः करणपूर्वकः ॥ इति करणनेरिः ॥ यत्रानेकस्थितिः क्रीडा गोपुग्छाद्य ततः समा । सवालमकरा लास्यश्चारी नू पुरपादिका । त्रिसञ्चं 'सौष्ठवं रेखा प्रत्याशं भित्रमुच्युते ॥ इति भित्रम् ॥ तिर्यङ्मुखा प्रधानेन मध्ये काचिद् यथोचिता । गतिः सबालककरस्बिपताकः ससौष्ठवम् ॥ त्रिसञ्चेन पिपील्या च मल्लिकामोदतालतः। शोभितं यत्र दिग्भावैश्चित्रं तत्स्थितिरीप्सिता ॥ इति चित्रम् ॥ मरालगतिका यत्र मध्ये गत्यान्ययान्विता । समतालप्रयोगेण यतिभेदेन राजितम् ॥ ३ 55 १ 60 २ 65 1 Ms पुछो. 2 Ms सौष्ठवं. 3 Ms 'तु.
२ 70 नृत्तसंग्रहः विचित्रभ्रमरो बालक्रीडासाधनचक्रवत् । स्थितियथेप्सिता तदिग्रअकं नत्रमुच्यते ॥ इति नत्रम् ॥ करिहस्तागतियंत्र काचिन्मध्ये यथेप्सिता । रच्चातालः सुयतिवान् 'मध्यमानेनावस्थितिः ।। विचित्रचतुरों हस्तो दिक्षु सज्जनमोहनम् । अदृष्टपृष्ठपूर्व तत् तुल्लं सद्भिनिगद्यते ॥ इत्यष्टपृष्ठतुल्लम् ॥ काश्चित् तालानुपक्रम्य प्रयोगे बहुलद्रतान् । संकीर्णानेकगतिभिः प्रवृत्तं सुमनोहरम् । 'ध्रुवाडाख्यं च तज्ज्ञेयं तालरूपं विचक्षणैः ।। २ 75 १ तद् यथा। 80 २ 85 हस्तबाह्रधिभिः सव्यैर्वामयाहुहस्तकैः । षड्भिरङ्गश्चतुर्भिर्वा तालैस्तत्तन्मितोऽङ्गकैः ।। समानमात्रलान्तैश्च द्रुतलघ्वादिकैर्यदि । पूर्व पूर्व परित्यज्य त्वग्रिमाग्रिममाश्रितः॥ एकदा वान्यतालेन नृत्तं कुर्यान्नटाग्रणीः। चक्रबन्धं तदाख्यातं नृत्तविद्याविशारदैः॥ इति चक्रबन्धः ॥ तालानां तुल्यमात्राणां षण्णां* दलघुरूपिणाम् । समद्विभागलान्तानां प्रत्येकं द्विदलं समम् ॥ कृत्वा तत्पूर्वपूर्वार्द्ध षट्सु स्थानेषु योजयेत् । चरमं चरमं पार्द्ध तत् तत् पूर्व ततः क्रमात् ॥ प्रयोजिते तदा ताला द्वादश प्रभवन्ति हि । चक्रबन्धवदन्यत् तु रविचक्रं भवेदिति ॥ इति रविचक्रम् ॥ चतुर्णामेव तालानां रविचक्रोक्तलक्षणम् । चतुःषु हस्तपादेषु पूर्वपूर्वदलं न्यसेत् ॥ 1 Ms 'नेनव. 2 Ms कुवाडा. 3 Ms तोय'. 4 Ms पणा. २ 90 ३ १ 95 २ 200 २ ur .. 10 तत् तत् पादलं हस्तपादयोलवेन्मियः । सव्यापसव्यसोखनः वसुताला भवन्ति हि । पनबन्धमिति ख्यातं शेष स्यात् रविचक्रवत् । इति पत्नबन्धमू॥ चतुणां तुल्यमात्राणां तालानां दलरूपिणाम् । समत्रिभागलान्तानां प्रत्येकं तु पृथक् पृथक् ।। त्रिविभागान् क्रमात् कृत्वा करानिष्वथ योजयेत् । स्वस्थाने च तृतीये च द्वितीये तालखण्डकान् ॥ प्रतितालं क्रमान्न्यस्य नटो नृत्तं समाचरेत् । नागबन्धं तदा 'प्रोक्तमन्यत् स्यात् पनवन्धवत् ॥ इति- मामबन्धम्। चतुर्णामेव तालानां पढ़योक्तलक्षणाम् । स्थापयेत् पूर्वपूर्वाध पराध चास्यन्मियः ।। हस्तयोः पादयोस्तद्वद्धस्ताघ्योरुभयोस्तथा। सव्यापसव्ययोर्हस्तपादयोः स्वाग्रतः क्रमात् । अन्यतालकृतं नृत्तं वृक्षवन्धं तदोदितम् ।। इति वृक्षवन्धतालरूपकम् ।। हंसपक्षकरो यत्र हंसलीलः कुलीरिका । अन्या तदगिनी काचित् प्रतिदिक्षु प्रसारणम् ।। वानरक्रीडिताकारं तलसञ्वेन सीलुकम् । तदेव जारमानाख्यं निमदन्त्यगरे जनाः ॥ इति सीलुकम् ॥ अश्लिष्टाख्या गतिर्यत्र काचिदन्तमनोहरा । सक्षिप्रगजलीलाश्च वर्तना पनकोशयोः। प्रतिदिकस्थानकं तुल्ल तत् क्रमं जलकीटवत् । इति तुलम् ॥ विलम्बितकताली च हस्तााविद्धवक्रको । पाणिरेचितिका चारी काचिन्मध्ये यथेप्सिता। यत्र तत् प्रसरं प्रोक्तं स्थित्यादिकमनोहरम् ।। इति प्रसरम् ॥ 1.Ms प्रोफ.2Msक्ष्मणाम् २ 15 २ १ 20 - 25 १. नृत्तसंग्रहः १ 30 २ 35 २ उरुवेणीगतियंत्र मध्येऽप्यन्या तदीप्सिता। उरोवर्तितको हस्तौ सुलयो लघुशेखरः। स्थितिदिग्भेदतो विद्युद्गतिवत् कर्तरी मता॥ इति कर्तरी॥ पश्चाक्षिप्तावुर क्षेत्राद् यत्र स्यातां लताकरौ। स्तम्भकीडनिका चारी मध्ये काचिद् यथोचिता ॥ यतिलग्नः समुत्पाद्यः प्रत्याशं गतिचित्रितम् । पलाशिगृध्रक्रीडा'यास्तद्बोल्लुमिति कीर्तितम् ॥ इति होल्लु । इति द्वादश उरूपाणि ॥ आद्यन्ते भ्रमरी यत्र सुलूनां त्रितयं हृदि । भुजंगत्रासितामोक्षे त वाडः समीरितम् । अन्ते सर्वधुवाडानामन्तभ्रमरिका मता । कलविंकविनोदाख्यं 'ताक्ष्य यक्षविलासितम् ।। विद्युद्विलासितं वात्यावर्तितं रविसञ्चरम् । नर्तनाभरणं तिर्यक ताण्डवं रङ्गभूषणम् ॥ वादीशगजभैरूडं रोलंबांगविलासितम् । पक्षिशार्दूलकं सिंहप्लुतकं द्वादशेति च । इत्युझ्धःकृतं पूर्व वक्ष्ये तल्लक्षणं क्रमात् ॥ [ लक्षणानि ] चक्रभ्रमरिनिःशङ्को डांदुहोरमयी क्रमात् । यदोत्प्लुत्योक्तमोक्षश्चेत् कलविकविनोदकम् ॥ चक्रभ्रमरिका यत्र होर्मयीडांटुको मतौ । निःशङ्क उक्तन्यासः ‘स्यात् तार्क्ष्यपक्षविलासिते ॥ २ चक्रभ्रमरिकाडांटू निःशको होमयी ततः । यदा प्रागुक्तमोक्षः स्यात् तदा विद्युद्विला चक्रभ्रमरिहोमय्यौ ततो निःशङ्कडांटुको । उक्तमुक्तिः क्रमाद् यत्र वात्यावर्तितकं च तत् ॥ 1 Ma ' तपो' 2 Ms ताl. 3 Ms 'का. 4 Ms स्यः ता 40 ४ १ 45 50 ४ नृत्तसंग्रहः ६ 56 ८ 60 65 बाह्यभ्रमरिका पवाद् डांटुको होर्मयी ततः। निःशङ्कचोक्तमोक्षोऽपि यत्र स्याद् रविसञ्चरः। बाह्यभ्रमरिनिःशकौ होर्मयीडाण्टुको ततः। पूर्वोक्तमोक्षणं यत्र नर्तनाभरणं च तत् ॥ बाह्यभ्रमरिका यत्र त्वडालुहोमयी ततः । रायरङ्गालुरुक्तांत्यस्तत् तिर्यक् ताण्डवे भवेत् ॥ बाह्यभ्रमरिकांरायरंगालु.मयी ततः। अडालुरुक्तमोक्षश्च यत्र तद्रङ्गभूषणम्॥ तिरपादिभ्रमयंत्र डांटुचाडंतरस्ततः। वादीशगजभैरूडे होर्मयी चोक्तमोक्षकः ॥ तिरपाद्या भ्रमयंत्र क्रमाद्धोमयिडांटुकी' । रायरंगालुरुक्तान्त्यो रोलंबांगविलासिते ॥ १० तिरपभ्रमरी चादौ त्वडालुर्डाण्टुको ततः। निःशङ्क उक्तमोक्षोऽपि पक्षिशार्दूलकं हि तत् ।। ११ तिरपभ्रमरी यत्र रायरंगालुडाण्टुको । होमयी चोक्तमुक्तिः स्यात् तदा सिंहप्लुतं हि तत् ॥ १२ इति द्वादश धुवाडानि ॥ इत्युक्ता लागवोऽन्येऽपि सुलूपूर्व पृथक् पृथक् । एकावृत्त्या द्विरावृत्त्या क्वचिदन्येन वा सह । उत्प्लवन्ति नटा यत्र ते सर्वे बिडुलागवः॥ अडालू रायरंगालुनिःशंको होमयी तथा । डांटु थाडंतरोदिंडू रायादिः पक्षिसालुवः ।। अलगडे किकाबीसुस्तथासुगरणं ततः। कर्त्तर्यलागपूौं द्वौ दिडिको वाथ लक्षणम् ।। सुलूं बवा यदोत्प्लुत्य चरणौ पक्षिपक्षवत् । भ्रामयित्वा पतेद् भूमौ तदा डालुरितीरितः ।। सुल्लू बद्ध्वैकपादेन सहैवानुपतेद् दिवि । द्वितीयोऽपि तदा रायरंगालं तद्विदो विदुः।। 1 Ms 'राटुको. 70 २ 75 ३ 80 ur ८ 85 ९ १० 90 नृत्तसंग्रहः सुलूपूर्व यदोत्प्लुत्य मिलितौ चरणौ समौ । दूरं भूमौ निपततः स निःशंकः प्रकीर्तितः ।। यत्र स्वस्तिकमावर्त्य पादः पृष्ठगतो यदा । लवयेदधिणान्येन प्रोक्ता सा होर्मयी तदा । पुरः प्रसार्य चरणं लचयेदपराधिणा । सुलूपूर्वं तदा सद्भि'डौंटुरित्यभिधीयते ॥ पुरतोऽपिहिती पादौ डांटुरेवाप्यनन्तरः । उत्प्लुत्य चरणद्वन्दं वस्त्रनिःपीडनोपमम् ।। परिभ्राम्यावनीं याति तदिदं दिडुमुच्यते ॥ व्योम्नि निःशंकदिंडुभ्यां रायादिः पक्षिसालुवः ।। अधोमुखः समुत्प्लत्य निपत्य पुरतो यदि। कुक्कुटासनमाबध्य स्थिरश्वेदलगं तदा ॥ ११ समी पादौ यदान्यस्मिन्पार्वे वपरपाव॑तः । उत्प्लुत्य पातयेच्चित्रं तदा ढेंकीति कथ्यते ॥ १२ भूमावेकं समास्थाय द्वितीयं पूर्ववद् यदा । पातयेच्चरणौ व्योम्नि तं बीसं मुनिरब्रवीत् ॥ १३ संहतात्पुरमुत्प्लुत्य तनुवृत्या पराङ्मुखः । महीतले यदासीनो मुंगरणं कुकुटासने ॥ १४ तमेव विपरीतेन हिंगरण केचिदूचिरे । होमयीकर्तरीपूर्व कार्तरी डिंदुमूचिरे ॥ १५ गगने लगदिंडुभ्यामुच्यते लगदिंडुकः ॥ इत्यादि बहवो भेदा सन्ति ते बिडुलागवः । लोकवृत्यानुसारेण ज्ञातव्यास्ते यथोचिताः ॥ १७ इति बिदुलागवः। बाह्यान्तस्तिरपच्छनचक्राचा भ्रमरिका यथा । दक्षिणेणाधिणा स्थित्वा वाममधिं च कुञ्चयेत् । वामावर्त भ्रमेद् यत्र सा बाधा भ्रमरी मता। 1 Ms दाटु. 2 Ms °पिलितो. 3 Ms 'प्लुत्य. 4 Ms पार्व. 65 १६ 300 5 १ नृत्तसंग्रहः २ 10 mr ४ १ 15 २ سد 20 एतस्यास्तु विपर्यासादन्तभ्रमरिका भवेत् । तिरपभ्रमरी तियक द्वावधी स्वस्तिकात् परम् ।। त्रिविक्रमाकारधारि स्थानमास्थाय यत्र तु । वामावर्त भ्रमेदाहुस्तां छत्रभ्रमरी बुधाः॥ चक्रभ्रमरिकास्वण्डसूच्यर्द्ध चक्रवद्रमात् । अन्याश्च काश्चिद् विज्ञेया श्रमयों लोकवृत्तितः ॥ इति भ्रमर्यः । तालधारिण्यभिव्यक्त तादिकं वर्णसञ्चयम् । समुच्चरति षड्गादिमगणादिगणान्वितम् ॥ चतुरस्रं समाधाय विधाय शिखरं करम् । नाभावेकमुसेदेशादपरं पुरतः परम् ॥ पताकहस्तकाद्यन्यतमं कुर्यात् प्रयत्नतः। आद्यशब्दाक्षरोत्पत्तिहेतुकं सुभगं ततः ॥ एकपादं पुरासूचीपरं चरणमञ्चितम् । पश्चात्याथ तं हस्तं तत्तत्करसमं यदा।। व्यावर्त्तयेत् तमेवोधिं नयेत् पश्चात् तथापरम् । गात्रमात्रस्वरानङ्गैर्भावलोचनचेष्टितैः॥ पादाभ्यां दर्शयेत् तालं लयाच्छब्दाक्षराण्यलम् । नृत्येत तदा शब्दनृत्तं नृत्तवद्भिरुदीरितम् ॥ इति शब्दनृत्तम् ॥ यस्य गीतस्य यो रागस्तस्य यः स्याद् ग्रहस्वरः। षड्गादन्यतमः सोऽत्राभिनेयो हस्तकेन तु ॥ दक्षिणेनालपमेन वामेन चतुरेण च । परिमण्डलितेनाथ मयूरललितेन च । एवं विनिर्दिशेत् षड्गं लक्ष्यलक्षणकोविदः॥ हंसास्याभिधहस्तेन दक्षिणेनेतरेण तु । कटिस्थेनार्द्धचन्द्रेण समेन शिरसा तथा। ब्रह्माख्यस्थानकेनापि धीमान मिनादिशेत् ॥ ४ 25 wr 30 २ १४ नृत्तसंग्रहः 35 ५ 40 ७ 45 ८ शुकतुण्डेन हस्तेन दृष्टया करुणया तथा । अधोमुखेन शिरसा 'त्वश्वक्रान्ताभिधेन च । चार्याप्युचितया धीमान् गान्धारं स्वरमादिशेत् ।। 'पताको स्वस्तिको कृत्वा शिरसा विधुतेन च । शैवाख्यस्थानकेनापि कटीच्छिन्नेन चापुनः। दृष्टया च हास्यया धीरोऽभिनेयो मध्यमस्वरः ।। कृत्वालपल्लवौ हस्तौ धुतेन शिरसा तथा । एवं विनिदिशेद्धीमान् स्वरं पञ्चमसंज्ञकम् ।। काङ्गलहस्तकौ कृत्वा दृष्टया बीभत्सया तथा । परावृत्तेन मूर्जा च प्रत्यालीढाभिधेन च । स्थानकेन विनिर्दिष्टो धैवतो निपुणे टैः ॥ [ . . . . . ] हस्तेन करिहस्तेन लीलया दृष्टया विधूतशिरसा निषादं संनिरूपयेत् ।। इति स्वराभिनयः॥ इहोदितस्य दिक्स्थानकरणैश्च निरूपितैः। समस्तै रथवा व्यस्तैस्तत्तत्कारानुरोधतः ॥ यत्र तालयुजा यत्या तन्नृत्यं सुमनोहरम् । ततः शब्देन तदनुद्ग्रहेण च ततः पुनः ॥ शब्देन तेनकैशब्दखण्डेन ध्रुवकेन च । पुनः शब्देन तदनु यतिगीतेन नर्त्तनम् ॥ हावभावादिसुलयतालादिगतिसङ्गतम् । यदोल्लासलसद्गात्रं पात्रमारचयेत् तदा । स्वरमञ्चकनृत्यं स्याल्लक्ष्यवेदिमनोहरम् ।। इति स्वरमञ्चनृत्यम॥ गीततानग्रहसमं समुच्चरति तादिकम् । पूर्ववद्वर्गसंघात तालधारिणि हारिणि ॥ येन येनेह गीतेन नृत्येत् पात्रं ससौष्ठवम् । तत्तन्नृत्यं बुधैर्देश्यं तत्तन्नामपुरःसरम् ।। 1 Ms 'न्ध. 2 Ms पाताकौ. 3 Ms ° छु १ 50 55 १ 60 २ नृत्तसंग्रहः १५ mr 65 ४ ५ 70 २ 75 स्थाप्यादिवर्णानङ्गेन भावान् नेत्रादिरागतः। हस्तैरभिनयेदर्थान्' "तत्तद्वाक्यसमुद्भवान्॥ तालग्रहानध्रिपदैः समादिश्च यथोचितम् । अनेनैव प्रकारेण गीतनृत्तं समाचरेत् ॥ एलादयः शुद्धसूडावर्णाद्यालिक्रमास्तथा। श्रीरङ्गाद्या विप्रकीर्णास्तथा सालगसूडकाः॥ तथान्येऽपि प्रसिद्धाश्च त्वप्रसिद्धा यथोचिताः। सार्थानं नृत्यवन्नृत्येन्निरर्थानं तु नृत्तवत् ॥ इति गीतनृत्यम् ।। देशी द्राविडदेशस्य चिंदुरित्यभिधीयते । तत्वोढा दृश्यते शुद्धचिन्दुश्च बिन्दुचिन्दुकः॥ तिरुवणी चिन्दुको माला चिन्दुकः कोलचारिकः । गीतमुद्रादिकश्चिन्दुरिति तल्लक्षणं यथा ॥ यत्रोद्ग्राहध्रुवपदो बद्धो द्राविडभाषया। तच्छुद्धचिन्दुकः प्रोक्तो मेलापाभोगवन्जितः॥ इति शुद्धचिन्दुः ॥ यत्रोद्ग्राहं च मेलापं सकृद् गीत्वा ततो ध्रुवम् । प्रभुनामाङ्कितं द्वित्रिविरामाढ्यं मुहुर्मुहुः । गीत्वा ध्रुवेषु मोक्षः स्याच्चेत् तदा बिन्दुचिन्दुकः । इति बिन्दुचिन्दुः ॥ नेतनामाङ्कितोद्ग्राहस्तन्मानात् सार्धकध्रुवः । एतद् द्वयं मुहुर्गायेत तदा तिरुवणिं विदुः ॥ इति तिरुवणिचिन्दुः॥ अनियतपादभागे माला मालादिचिन्दुकः ॥ इति मालाचिन्दुः ॥ यत्र पाटाक्षरालापस्ततो वाफ्यमतात्मकम् । पदरागसमुद्दीप्तं तत्कथाबीजसूचकम् ॥ 1 Ms नयेन. 2 Ms यहा. 3 Ms धा. سر 80 १ 85 १६ नृत्तसंग्रहः 90 २ 95 १ २ 400 १ ततश्च चिन्दवः पञ्च सप्त वा मध्यमध्यतः । पिल्मिस्कैमिरूरम्यकलासैरिति चित्रितम् ॥ शास्त्रसङ्गकथावृत्तिश्चेत् तदा कोलचारिका । अन्यत्कथाप्रवृत्तिश्चेत् तदा कद्वेण चिन्दुकः॥ इति कोलचारीचिन्दुः॥ गीतवद्गीतमुद्रादिचिन्दुको ऽष्टविधः स्मृतः। मेलापकान्तराभोगसमस्तव्यस्तहीनतः । द्वित्रि चतुःपञ्चधा तु चिन्दवः परिकीर्तिताः ।। यदि प्रयोगो मेलापे कचित् प्रयोगको ध्रुवे । तदीग्राहे च मुक्तिः स्याद् यदि प्रयोगकोऽन्तरे । तदा तु ध्रुवके मोक्ष एवं न्यासस्तु सर्वदा ॥ इति गीतमुत्राचिन्दुः ।। स्यन्धपस्यन्दिताध्यधिस्थितावादिमुख्यतः । वैशाखमण्डलालीढप्रत्यालीढादिभिस्तथा ॥ रेखा'सौष्ठवलास्याङ्गैः शिरोऽधिकररेचकैः । भावहावविलासैश्च सुलूचित्रकलासतः ॥ चारुपाटानुग चचत्किङ्किणीध्वनिपेशलम् । तत्तज्जातियुतं वेषभाषासाहित्यशोभितम् । संप्रदायानुसरणं चिन्दुनृत्यं समाचरेत् ॥ यत्र किकिणिकावाद्यैराहतिर्घर्घरो मतः। पिडिवाटः शिरिपिडी पटवो लगपाटकः । शिरितिरः खलुखलुश्चेति घर्षरः षड्विधो मतः ॥ दिशानयापरेऽप्यूह्या घर्घराः शोभयान्विताः। सर्वे धर्वरभेदास्ते कार्यास्तालानुगामिनः ॥ इति चिन्दुनृत्यम् ॥ तैलङ्गभाषया बद्धा तद्ग्राहाभोगवर्जिता । सा धरू कथिता धीरः सा द्विधा परिकीर्तिता। मुख्या तु कडिधरू तथा मुक्तधरू परा। कडिर्बन्धपर्यायस्त्वादौ तत्क्रममुच्यते ॥ 1 Ms सौष्ठुव. 2 Ms °र्थधरो. २ 5 10 ५ 15 २ नृत्तसंग्रहः 20 २ سع 25 ४ ५ 30 ur अदिके वाद्यमानेऽपि यत्र पात्रं धृताञ्चलम् । रङ्गं प्रविश्य तत्रादावालापेन तु नर्तनम् ॥ तत्तत्करादिभिः पाटर्लयतालसमन्वितम् । धात्वादिरहितं गीतमालापः परिकीर्तितम् ॥ ततः स्यात् ससुलूतुङ्गलास्याङ्गैच समन्वितम् । विचित्रचरणं साक्षाद्रागमूर्तिरिवाङ्गकैः ।। दर्शयन् पिल्मुरूकैमुर्वादिभिर्मध्यमध्यतः । त्रिचतुःपञ्चषट्सप्तधरूभिः सह पट्टिभिः । भावहावसुलास्याङ्गनर्त्तनं तनुयान नटी । विलम्बितोच्चारमानं यदेकयतिसुन्दरम् । अतालं पदमेकं चेद् बद्धः कर्णाटभाषया । सा पट्टिः कथिता "तज्ज्ञै रसिकानन्ददायिनी ॥ ततः कलासतो रम्यैर्द्रतमानस्वरैः पुनः । कैमुरूशब्दतः पश्चाच्चित्रं नर्तनमाचरेत् ।। तालं तन्त्रीमृदङ्गानां समन्तान्मेलनं यदा । नर्माङ्ग नर्त्तनं यत्र सुलुपं तन्निगद्यते । तालतुल्यसुलू तुङ्गघर्घरध्वनिपेशलम् । पुनः कलासशब्देन द्विरावृत्तिपदेन च ॥ विधाय नर्तनं त्वर्दिनाम्नि न्यासं समाचरेत् । तदा कडि नृत्यं स्याद् देशी तैलङ्गदेशजा।। नमनोन्नमनं जुङ्गमूर्धाधः सौष्ठवस्य च । चतुर्विरामकै? ः पदैरुद्ग्राहनिर्मितम् ॥ तालेन येन केनापि युतं तत्पदसंज्ञकम् । एतदुक्के विपर्यासाद्वा धरूकडिर्मता ॥ इति करडिधरू। धरूपूर्वार्धके यत्र पिल्मिरूं संप्रयुज्य च । पुनः पूर्वार्धकं पश्चाच्चरमं नृत्यमाचरेत् ॥ 4.2Meaf 42 Mc साथ ७ 35 ८ १० 40 ११ १ 45 नृत्तसंग्रहः २ 50 २ ३ 55 60 तालस्य लयभेदेन कतिवारं तु नर्तयेत् । अथवान्यधरूपूर्वपूर्वाः डुंनतरा परा । तालद्रुतलयोऽप्यत्र सा प्रोक्ता मुक्तिकाधरू । इति मुक्तिकाधरू । धरूनृत्यम् । गीर्वाणमध्यदेशीयभाषासाहित्यराजितम् । त्रिचतुर्वाक्यसंपन्नं नरनारीकथाश्रयम् ॥ शृङ्गाररसभावाढ्यं रागतालपदात्मकम् । पादान्तानुप्रासयुतं पादान्तयमकं तथा ॥ प्रतिपादं यत्र बद्धमेवं पादचतुष्टयम् । उद्ग्राहध्रुवकाभोगान्तरध्रुवपदं स्मृतम् ॥ गीयमाने ध्रुवपदे हावभावमनोहरे । नर्तनं तनुयात् पात्रं कान्तादृष्टयादिसन्मुखम् ॥ नानागतिलसद्भावं लसल्लास्याङ्गसुन्दरम् । पदान्तरान्तरागा यद् दन्लोद्योतितरङ्गकम् ॥ खण्डमानेन रचितं मध्ये मध्ये च कम्पनम् । सर्वाभिनयसंपन्नं रेखालावण्यशोभितम् ॥ तदा ध्रुवपदं नृत्यं मुखरागविभूपितम् । म्यादक्षिभूविकारादिशृङ्गाराकृतिसूचकः । सग्रीवरेचको हावो भावश्चित्तसमुद्भवः॥ इति ध्रुवपदम् ॥ इति निबन्धनृत्यम् ॥ अथानिबन्धनृत्यस्य क्रमं वक्ष्यामि लोकतः । नामावली यतिरिनेरिः सालङ्गपूर्वकः ॥ सङ्कीर्णनेरिर्भावादिर्नेरिश्च नडनेरिकः । कैवर्तन मुरूरट्टे मुरू च तालरूपकम् । गुण्डालं कमलं मण्डी मुडुपं च पुरण्डरी ॥ कुडुपं तियकरणं लावणी चटुकं ततः । नानादेशोद्भवा देशी तत्तद्दिक्शास्त्रता इति ॥ [लक्षणानि] यथाभिनयसंपन्न विचित्रगतिसुन्दरम् । 44 Ms. ° कृथा ७ 65 70 ro mm नृत्तसंग्रहः 75 १ १ 80 १ 85 तीवटिग्रहभेदेन लयतालसमन्वितम् । नामावली नृत्तमिदं नृत्येजनमनोहरम् ॥ इति नामावली ॥ विरामसाम्यगतिभिर्लागैर्नानामनोहरैः । लयतालविचित्राङ्गैर्यतिनृत्तं समाचरेत् ॥ इति यतिः ॥ आदितालानुगं यत्र विलम्बितलयान्वितम् । विचित्रगतिसंपन्नं सामान्या नेरिरिष्यते ॥ [इति नेरिः] सा एवायुतसंयुक्तहस्तैः सालङ्गनेरिका ॥ [इति सालङ्गनेरिः] युक्तायुक्तैर्नृत्तहस्तैः सङ्कीर्णा नेरिरुच्यते [इति संकीर्णनेरिः] रसभावाङ्गदृष्टयाद्यैर्भावनेरिः प्रकथ्यते ॥ [इति भावनेरिः] स एव द्रुतमानेन नडनेरिरिति स्मृता ॥ [इति नडनेरि.] मणिबन्धयुतौ हस्तौ भ्रामयेत् सविलासकम् । सव्यापसव्ययोर्यत्र तद्योग्यगतिसुन्दरम् । विदध्यान्नर्त्तनं सम्यक् तदा कैवर्तनाभिधम् ।। [इति कैवर्तनम् ] यत्राङ्गं मोटयेत् तिर्यग विक्षिप्ताक्षिप्तको मुहुः । त्रिपताको पुरा पात्रं सा मुरू कथ्यते बुधैः ॥ [इति मुरू] उत्कटस्थो नटो गात्रं मोटयेद् द्रुतमानतः । वपुः पुनः पुनर्यत्र मुरूकं रट्टपूर्वकम् ॥ [इति रट्टमुरू] 90 95 १ 500 २० 5 १ १ 10 १ नृत्तसंग्रहः किञ्चित्तालमुपक्रम्य प्रयोगे बहुलद्रुतम् । संकीर्णानेकगतिभिः प्रवृत्तं तालरूपकम् ॥ [इति तालरूपकम् ] जवाया बाह्यमन्तर्यद्विदधद्भमण द्रुतम् । तालानुगति नृत्तं चेद् गुण्डालं कथितं तदा ॥ [इति गुण्डालम् ] बहुभिर्बाहुमेदैश्च सालपल्लववर्त्तनैः । कटीपा वशिरोरेख पूर्वकं कमलं तदा ॥ [इति कमलम् ] पृष्ठाग्रसारिताभ्यां चेत् पादाभ्यां नतजानुकम् ।। [इति नतजानुकम्] पर्यायान्नर्तनं कुर्यात् तदा मण्डीति कीर्तिता ॥ [इति मण्डी] यदा मुडुपचारीभि नृत्येत् तालानुरोधतः । तदा मुडुपमित्युक्तं विचित्रगतिरञ्जितम् ॥ [इति मुडुपम् ] मुडुपस्थो नटो यत्र विधाय भ्रमरी पुनः । पुनर्मुडुपमानृत्य नृत्येच्चेत् सा मुरण्डरी ॥ [इति मुरण्डरी] कुश्चिताङ्गुलिना यत्र प्रसृताङ्गुष्ठकेन चेत् । प्रसार्य जविका कम्पं विचित्रगुतमाचरेत् ॥ घरीभिः समायुक्तं तदैतत् कुडुपं मतम् ॥ [इति कुडुपम् ] कश्चित्करणमास्थाय विदध्याद्भमरी यदी। अवसाने पुनः कश्चित्करण समुपाश्रयेत् । एवं मुहुर्मुहुयत्र करणं तिर्यपूर्वकम् ॥ [इति तिर्यकरणम् ] 15 20 १ 25 45 Ms. रेष 46 Ms. नृत्ये' नृत्तसंग्रहः २१ 30 35 १ २ 40 समपादे स्थित पात्रं कटिन्यस्तार्धचन्द्रकम् । कटेरुपरि तत्कायं भ्रामयेल्लावणी तदा। [ इति लावणी ] जानुभ्यां भूमिलग्नाभ्यां पद्भ्यां वा मण्डलाकृतिः । नम्रपृष्ठं लताहस्तौ पात्रं भ्रमणमाचरेत् । तदासौ चदुरित्युक्तः सूर्यमण्डलवद्गतिः ॥ [इति चदुः ] इत्य निबद्धोरूपाणि ॥ यावनीभाषया युक्तं यत्र गीतं धृताञ्चलम् । कल्लादिगजरायुक्तं कृत्याहगेन भूषितम् ॥ विदध्यान्नर्तनं नानालयत्रयविचित्रितम् । कोमलाङ्गैर्यदा नृत्यं भ्रमर्यादिविराजितम् ॥ सशब्दा च क्रिया यत्र ध्रुवशम्यादिभेदतः । यत्र चेष्टाविरहितं तन्नृत्तं जक्कडी मतम् ॥ पारसीकैः पण्डितैस्तूद्ग्रहादिस्वरभाषया । तद् गीतं जकडीसंज्ञं यवनानामतिप्रियम् ॥ [इति जकडी ॥ मुरजादिषु वाद्येषु वाद्यमानेषु वादकैः । कुतूहलाय भूपानां वसन्ताद्युत्सवेषु चेत् ॥ क्रमाच्चत्वारि पात्राणि यद्वाष्टौ षोडशाथ वा। द्वात्रिंशद्वा चतुःषष्टिः सन्धीभूय वियुज्य च ॥ प्रनृत्यन्ति समादाय दण्डको पाणिपङ्कजैः । अङ्गुष्ठसम्मितौ स्थौल्ये दैर्ये च षोडशाङ्गुलैः ॥ स्वर्णादिधातुबद्धान्तौ सरलौ वर्तुलौ दृढौ । चित्रितौ वर्णकैन्थिवर्जितौ मसृणौ तथा॥ ३ 45 १ २ 50 ४
२२
नृत्तसंग्रहः
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तत्तद्देशानुसारेण धृत्वा वा दण्डचामरे ।
दण्डक्षौमाञ्चले यद्वा दण्डकाछुरिकेऽथवा ॥
चतुर्भिः प्रश्चभिर्यात यद्वा षभिः प्रहारकैः ।
सशब्दघातभेदैश्च पुरतः पृष्ठतोऽपि च ॥
पार्श्वयोरुभयोस्तद्वद् घातभेदैस्ततः परम् ।
चारीभिर्धमरीभिश्च चित्रस्तर्वामसव्यतः ॥
असकृन्मण्डलीभूय गीतताललयानुगम् ।
तदोदितं बुधैर्दण्डरासं जनमनोहरम् ॥
दण्डैविना कृतं नृत्यं रासनृत्यं तदेव हि ॥
७
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इति रासनृत्यम् । इत्यनिबन्धनृत्तम् ।
२० २ २० श्लोकपाक्त-अनुक्रमाणका ( The first figure indicates the page number and the secon} figure the line number.) अग्रतः क्षेपणाद २ २५ इत्युक्ता लागवेऽन्येऽपि अङ्गीकृतसुसङ्गीतभृङ्गी ९४ इत्युद्दिष्टं बन्धकस्य २ अगुष्ठमध्यमामुल्यौ ३ ४६ इत्युदधिःकृतं पूर्व १० २४३ अङ्गुष्ठसम्मितौ स्थौल्ये २१ ५५१ इत्यादि बहवो भेदा १२ ३०१ अडालुरुक्तमोक्षश्च यत्र ११. २५९ इतस्ततोऽर्थपर्याय इङ्गने अडालू रायरंगालुनिःशंको ११ २७२ इष्टार्थ क्रियते अथवाऽहिफणाकारां ४० इहोदितस्य दिक्स्थान अथवान्यधरूपूर्वपूर्वाः २८ ४४७ उत्कटस्था नटो अथानिबन्धनृत्यस्य १८ ४६६ उक्तमुक्तिः क्रमाद यत्र अष्टपृष्ठतुल्लं च तोलरूपं ६ १३८ उत्प्लवन्ति नटा यत्र १६ २७१ अष्टपृष्ठपूर्व तत ८ १७४ उत्प्लुत्य चरणद्वन्द्व अधस्तलपताकश्च बाहुस्तत्र ३ उत्प्लुत्य पालयेच्चि अधोमुखेन शिरसा २९ ३३६ उदग्राहध्रुबका भोगान्तर अधोमुखः समुत्प्लुत्य उद वितन वामेन अन्ते सर्वधुवाडानामन्तभ्रमरि १० २३७ उरुपेवेपि सर्वेषु ७ १४६ अन्यत्कथाप्रवृत्तिश्चेत तदा १६ ३९३ उरोवर्तितको हस्ती १० २२७ अन्यतालकृतं नृत्तं ९ २११ ऊर्ध्वा यथा अन्याश्च काश्चिद विज्ञेया १३ ३१२ उरुवेणी गतिर्यत्र मध्येऽप्य १० २२६ अन्या तदङ्गिनी काचित् एकदा वान्यतालेन ८ १८४ अनिबन्धं त्वनियमाद् २ १५ एकपादं पुरासूचीपरं १३ ३२० अनियतपादभागे माला १५ ३८६ एकावृत्त्या द्विरावृत्त्या ११ २७० अनेनैव प्रकारेण गीतनृत्त १५ ३६६ एतद् द्वयं मुहुर्गायेत् १५ ३८४ अतालं पदमेकं चेद १७ ४२९ एतदुक्ते विपर्यासाद्वा १७ ४४२ अदिक वाद्यमानेऽपि यत्र १७ ४१९ एतस्यास्तु विपर्यासादन्त १३ ३०७ अलगंडे किकाबीसुस्तथा ११ २७४ एलादयः शुद्धमृडावर्णा १५ ३६७ २० ५२६ एवं मुहुर्मुहर्यत्र २० अश्लिष्टाख्या गतिर्यत्र ९ २१८ एवं विनिर्दिशेतीमान् असकृन्मण्डलीभूयगीतताल २२ ५६० एवं विनिर्दिशेत् आकर्णयन्ती यदि ६ ११९ कटिस्थेनार्धचन्द्रेण समेन १३ ३३३ आदितालानुगं यत्र १९ ४८१ कटीपार्श्वशिरोदेशपूर्वक आद्यन्ते भ्रमरी यत्र १० २३५ कटेरुपरि तत्कायं २१ ५३० आद्यशब्दाक्षरोत्पत्तिहेतुकं १३ ३१९ कहडिर्बन्धपर्यायस्त्वादौ आविद्धवक्तहस्ताभ्यां चार्या ३ ३३ कञ्चित्करणमास्थाय २० ५२५ ट अवसाने पुनः १४ ३४२ २४ कुतहलाय भूपानां कमलपतनिकामादौ ५ १०२ गीतमुद्रादिकश्चिन्दुरिति १५ ३७५ कतर्यलागपूवौं द्वौ ११ २७५ गीततानग्रहसम समुच्चरति १४ ३५९ करिहस्तकया चार्या ६४ गीतवद्गीतमुद्रादिचिन्दुको १६ ३९५ करिहस्तागतिर्यत्र काचिन्मध्ये ८ १७१ गीयमाने ध्रुवपदे कलविंकविनोदाख्यं १० २३८ गीर्वाणमध्यदेशीयभाषा कल्लादिगजरायुक्तं कृत्य २१ ५३८ गुण्डालं कमलं मण्डी कागृलहस्तकौ कृत्वा १४ ३४३ घर्घरीभिः समायुक्त २० ५२३ काश्चित् तालानुपक्रम्य ८ १७६ चकिताक्षो कुरङ्गी किश्चित्तालमुपक्रम्य प्रयोगे २० ५०२ चक्रबन्धं तदाख्यातं कुक्कुटासनमाबध्य स्थिरः १२ २९१ चक्रबन्धवदन्यत् ८ १९२ कुडुकस्यां ततश्चा २ ५ चक्रभ्रमरिकाखण्डसूच्यः १३ ३११ कुडपं तियकरणं लावणी १८ ४७१ चक्रभ्रमरिकाडांट निःशङ्को १० २४८ २१ ५४७ चक्रभ्रमरिका यत्र १० २४६ कुञ्चिातागुलिना यत्र २० ५२१ चक्रभ्रमरिनिःशङ्को डांटु १० २४४ कुर्यात् तदा वामहस्तशिखरो ६ १३१ चक्रभ्रमरिहोमय्यौ ततो १० २५० कैमुरुशब्दतः पश्चाच्चित्रं १७ ४३२ चतुणी तुल्यमात्राणां तालानां ९ २०० कोमलाङ्गायदा नृत्य २१ ५४० चतुर्णामेव तालानां पद्मबन्धो ९ २०७ ८ १८९ चतुर्णामेव तालानां रविचको ८ १९४ कृत्वालपल्लवी हस्तौ १४ ३४१ चतुर्थी दिशमासाद्य कृत्वालीटे स्थितिर्यत्र ७ १५५ चन्द्रत्रिनेत्रवाराष्ट कैवर्तनमुरूरट्टे १८ ४६९ चतुर्भिः पञ्चभिर्घातैयद्वा कमाच्चत्वारि पात्राणि २१ ५४८ चतुर्विरामकैर्वद्वैः पदैरुग्राह १७ ४४० खण्डमानेन रचितं मध्ये चरमं चरमं वार्द्ध गगने लगदिंडुभ्यामुच्यते १२ ३०० चतुरस्र स्थितिर्यत्र ७ १४१ गणेशं भरतं ८ चतुरस्रौ करो गत्यादिनियमैर्युक्तं १४ चतुरस्रं समाधाय १३ ३१६ गतिं च सर्वदा ३ ४९ चतु षु हस्तपादेषु गतिः : पताकहस्तश्च ७ १४३ चार्याप्युचितया धीमान् गतिः मबालककरबिपताकः ७ १६२ चार्या सार्या सव्यसूची ३ गतीनां सानुकूलत्वं ६ १२८ चारीभिभ्रमरीभिश्च गम्भीरश्चाङ्गदृष्टिश्वेद ६ १२७ चारुपाटानुगं चंचत् १६ ४०६ गात्रं तदनुसारेण ४२ चित्रकलासकं तत्र मोक्षे ६ १३३ गात्रमात्रस्वरानङ्गर्भावलोचन १३ ३२३ चित्रितौ वर्णकैन्थितिौ २१ ५५३ गीत्वा ध्रुवेषु मोक्षः १५ ३८१ छत्रभ्रभरिका किन्तु ७ १४८ कृत्वा तत्वपूर्वाद्ध ७७ ર २ ३ २ १४ ३३७ ५० ३ तत्क्रम नृत्ततत्त्वज्ञः ततोऽञ्जलिकरं कृत्वा जवाया बाह्यमस्त २० ५०३ तदासौ चटुरित्युक्तः २१ ५३४ जनितं करणं तत्र ४ ७८ तदा तु ध्रुवके १६ ४०० जानुभ्यां भूमिलग्नाभ्यां २१ ५३२ तदा ध्रुवपदं नृत्य १८४६२ ज्येष्ठाश्च ये २ ९ तदा मुडुपमित्युक्तं २० ५१६ झंपातालः सगोपुच्छो ७ १५० तदेव जारमानाख्यं ९२२६ डांटुश्वाडंतरोदिंडू ११ २७३ तदोद्ग्राहे च मुक्तिः तच्छुद्धचिन्दुकः प्रोक्तो १५ ३७७ तदोदितं बुधैर्दण्डरासं २२ ५६१ तत्तज्जातियुतं वेषभाषा १६ ४०७ तन्नृत्तमुरुपं प्रोक्तं ६ १३६ तत्तन्नृत्यं बुधैर्देश्य १४ ३६२ तमेव विपरीतेन १२ २९८ ४ ७४ तलपुष्पपुटं कृत्वा तत्पोढा दृश्यते शुद्धचिन्दुश्च १५ ३७३ तलमध्योर्ध्वसञ्चाख्याः क्रमेण ३ ४५ तत् तत् परदलं ९१९६ तलसचमनुप्राप्य तत्तत्करादिभिः पालयताल १७ ४२१ तालग्रहानङ्घ्रिपदैः समादिश्च १५ ३६५ ततोऽर्धरेचिताभ्यां ४ ८३ तालतुल्यसुलूतुङ्गधरध्वनि १७४३५ ४ ८६ तालटुनलयोऽप्यत्र सा १८४४८ ततोऽग्रे सव्यहस्ताङ्ग्री ६ १२९ तालधारिण्यभिव्यक्तं तादिकं १३ ३१४ तत्तद्देशानुसारेण धृत्वा २२ ५५४ तालस्य लयभेदेन ततस्तत्रैव शीघ्रण ५ १०१ तालानां तुल्यमात्राणां ८१८७ ३ ५६ तालानुगतिनृत्तं चेद् २०५०६ ततस्तु मध्यसञ्चेन ३ ५३ तालेन येन केनापि ततस्तलमुखाभ्यां च ४ ७१ तालं तन्त्रीमृदङ्गानां २७ ४३३ ततस्तलमुखाभ्यां च ३ ५८ तीवटिग्रहमेदेन लयताल १२ ४७५ ततः कलासतो १७ ४३१ तिर्यमुखा प्रधानेन ७१६१ ततः कुलीरिका चार्या ४ ६२ तिरपभ्रमरी तिर्यक् १३ ३०८ ततश्च चिन्दवः पञ्च सप्त १९ ३९० तिरपभ्रमरी यत्र ११ २६६ ततश्चन्द्र लीन ३ ३५ तिरपादिभ्रमर्यत्र ११२६० ततः परं शब्दचालि २ १७ तिरपाद्या भ्रमर्यत्र ११ २६२ तत शब्देन तदनुग्रहेण १४ ३५२ तिरुवणी चिन्दुको १५३७४ ततः स्यात् ससुलू १७ ४२३ तुलं च प्रसरं ६१३९ तत्र कार्य द्विधा २ १३ तैलङ्गभाषया बद्धा १६४१५ तत्रैव चतुरस्त्रं ४ ८२ त्रिचतुःपञ्चषट १७ ४२६ तत्रैवाभिनयेन्नान्दी प्रलोकं ५ ९२ त्रिचतुर्वाक्यसंपन्न १८४५१ तथान्येऽपि प्रसिद्धाश्च १५ ३६९ त्रिपताको करौ तद् गीतं जकडीसंशं २१ ५४४ त्रिपताको पुरा पात्रं तदग्रयोरन्तरालं ३ ४७ त्रिविक्रमाकारधारि १३३०९ तदा कडिनृत्यं १७ ४३८ त्रिविभागान् क्रमात् ९२०२ ततस्तु तलसचेन ६ १२४ २६ त्रिसञ्च सौष्ठवं ७ १५९ नानादेशोदभवा देशी १८४७२ त्रिसञ्चेन पिपोल्या ७ १६३ नाभावेकमुरोदेशादपरं पुरतः १३ ३१७ तृतीयां दिशमासाद्य ४ ५९ नामावली नृतमिदं १९ ४७६ दण्डक्षोमाञ्चले यद्वा २२ ५५५ नामावली तिर्नेरिरिः १८४६७ दण्डविना कृतं नृत्यं २२ ५६२ · नीवीवद् गतिसञ्चारः क्रमात् दर्शयन् पिल्मुरूकैमु १७ ४२५ निःशङ्क उक्तन्यासः १०२४७ दर्शयेयुः क्रमात् ५ १०५ निःशङ्क उक्तमोक्षोऽपि ११२६५ दक्षिणश्चरणस्तस्मान्निष्क्रम्य ३ ५४ निःशङ्कश्चोक्त मोक्षोऽपि यत्र दक्षिणेनालपद्मन वामेन १३ ३२९ नृत्तमण्डपमध्यात् तु २ १० दक्षिणेणाङघ्रिणा स्थित्वा १२ ३०५ नृत्येत् तदा शब्दनृत्तं १३३२५ दक्षिणः खटकः ४ ७९ नृत्त्वा चाविद्धवस्त्राभ्यां दिशानयापरेऽप्यूह्या घर्घराः १६ ४१२ नेतृनामाविनोदग्राहस्तन्मानात् १५ २८३ दूरं भूमौ निपतंतः १२ २८१ नेरिः करणनेरिश्च ६१३७ देवं गुरुम ऋषि पताकहस्तकाद्यन्यतमं १३३१८ देशी द्राविडदेशस्य १५ ३७२ पताकोऽधस्तलश्चान्यः ६१३२ द्वितीयायां तृतीयायां ४ ७३ पताको मणिवन्धस्थी द्वितीयोऽपि तदा ११ २७९, पताको स्वस्तिको १४३३८ द्वित्रिश्चतुःपञ्चधा तु १६ ३९७ पद्मवन्धमिति ख्यातं ९१९८ द्वादशेति समाख्याता ६१४० पदगगममुद्दीप्तं तत्कथा १५३८९ द्वात्रिंशद्वा चतुःपष्टिः २१ ५४९ पदान्तगन्तरागा यद् दृष्ट्या च हास्यया १४ ३४० पञ्चमी दिशमासाद्य दृष्ट्या विधृतशिरसा १४ ३४७ पर्यायान्नतन कुर्यात् २० ५१३ धनुःकर्ष स्थितावर्तचायी ४ ८० पगवृत्तन मूर्धा घरूणां ज्ञातयः १७ ४२२ परिभ्राम्यावनीं याति १२२८८ धरूपूर्वार्धके यत्र १७ ४४४ परिमण्डलितेनाथ १३ ३३० धात्वादिरहितं गीतमालाप १७ ४२२ पलाशिगृध्रक्रीडाया १० २३३ ध्रुवाडाख्यं च तज्ञेयं ८ १७८ पश्चारिक्षप्तावुर क्षेत्राद् यत्र १० २३० नमनोन्नमनं तुङ्गमुधिः १७ ४३९ पश्चाद्गत्याथ तं हस्तं १३३२१ नम्रपृष्ठ लताहस्तौ २१ ५३३ पक्षिशाईलकं सिंहप्लुतकं १०२४२ नर्तको नर्तकी २ ६ पातयेच्चरणौ व्योनि १२ २९५ नर्तन तनुयात पात्रं १८ ४५७ पादपार्श्वयुगे स्थित्वा नर्तनाभरणं तिर्यक्ताण्डवं १०२४० २ ३० नर्माङ्गं नत्तनं १७ ४३४ पादान्तानुप्रासयुतं १८४५३ नवभिः करणरेभिः ७ १५४ पादाग्रतश्चरित्वा तु नागबन्धं तदा प्रोक्तमन्यत् ९ २०५ पादाभ्यां दर्शयेत् १३ ३२४ नानागतिलसद्भाचं लसल्लास्याङ्ग १८ ४५८ पारसीकैः पण्डितैस्तूद २१ ५४ पादस्य निर्गम पार्श्वद्वन्द्व सुलुनामा पार्श्वरेचितकं तत्र पुनः पूर्वार्धक पुरः प्रसार्य चरणं ३ ३७ बाह्यान्तस्तिरपच्छत्रयकाद्या १२ ३०४ ४ ६७ भवतां भूतये पार्श्वयोरुभयोस्तद्वद्घातभेदै २२५ ५६ भवेद् द्विशिखरत्वं पाश्चोर्ध्वजानुनी दण्डपझं ७ १५१ भानोतिरिवालक्ष्ये हस्ताभ्यां ५ ११२ पार्श्वयोरुभयोस्तद्वक्रियया ६ ११५ भावहावविलासैश्च १६ ४०५ पार्श्वयोरुभयोस्तद्वद् २२ ५५६. भावहावसुलास्याङ्गनर्तनं १७४२७ पाणिरेचितिका चारी ९ २२३ भुजंगत्रासितामोक्षे तद् धुवाडः १० २३६ पिडिवाटः शिरिपिडी १६ ४१० भूमावेकं समास्थाय १२२९४ पिल्मिकैमिरूरम्यकलासैरिति १६ ३९१ भूमेरूद्धस्थितिः पुनर्मुडुपमानृत्येञ्चेत् २० ५२७ भ्रामयित्वा पतेद ११२७७ पुनः कलासशब्देन १७ ४३६ मण्डलभ्रमितौ लियो १७ ४४५ मण्डलं स्थानकं तत्र पुनः शब्देन तदनु १४ ३५४ मणिबन्धयुतौ हस्तौ १९४९२ पुरतत्रिपदी गच्छेन्नटवयों ३ ३४ मत्तकुक्कुटवद् यत्र ६१२३ पुरतोऽपिहितौ पादौ १२ २८६ मध्ये च स्थीयते १२ २८४ मंडलस्थानकं कृत्वा पुष्पाञ्जलिं दर्शयित्वा ५ ९१ मन्दानिलचलद्दीपशिखेवाङ्गस्य ३ ३८ पूर्व पूर्व परित्यज्य ८ १८३ मन्मथोद्दीपना दृष्टिः पूर्ववद्वर्णसंघातं तालधारिणि १४ ३६० मुरजादिषु वाद्येषु २१ ५४६ पूर्वोक्तमोक्षणं यत्र १३ २५५ मरालगतिका यत्र मध्ये ७१६६ प्रतितालं कमान्यस्य नटो ९ २०४ मराली च पुरस्कृत्वा ६१२० प्रतिदिवस्थानकं तुर्ले तत् ९२२० महीतले यदासीनो १२ २९७ प्रतिपादं यत्र बद्धमेवं १८ ४५४ मातृकामुनिनागांश्च २ प्रनृत्यन्ति समादाय २१ ५४८ मायूरी भानवीं ५१०३ प्रभुनामा वितं द्वित्रिविरामाढयं १५ ३८० मुख्या तु कद्दडिधरु १६४१७ प्रयोजिते तदा ताला ८ १९१ मुखचालिरिति प्रोक्ता २ २२ प्रसार्य जधिकां २० ५२० मुखचालिश्चोरुपाणि धुवाडा २ १६ पृष्ठाग्रसारिताभ्यां चेत् २० ५०९ मुखं तु पूर्वरङ्गः २ २१ पृष्ठ गुरुः २ २६ मुडुपस्थो नटो यत्र २०५१६ बहिबहकलाकारो करो ५ ११० मेलापकान्तराभोगसमस्त १६ ३९६ बहुभिर्बाहुभेदैश्च सालपल्लव २० ५०६ मेलापकं वादयेयुः ब्रह्माख्यस्थानकेनापि धीमान् १३ ३३४ बाह्यभ्रमरिका पश्चाद् यतिताललयस्थानचारीहस्तात्मकं ६ १३५ ११ २५२ यतिलग्नः समुत्पाद्यः १०२३२ वाह्यभ्रमरिका यत्र ११२५६ बाह्यभ्रमरिकां वद्ध्वा ७ १४७ यतः पादस्ततो २ २९ १६४०९ बाह्यभ्रमरिकांरायरंगालुहोर्मयी ११ २५८ यत्र किङ्किणिकावाचैराहति बाह्यम्रमरिनिःशङ्को ११२५४ यत्र चेष्टाविरहितं २१ ५४२ ७ २८ यत्र तत् प्रसरं प्रोक्तं यत्र तालयुजा २ ३ यत्र पाटक्षरालापस्ततो यत्र स्वस्तिकमावर्त्य यत्राङ्ग मोटयेत् तिरंग यत्रानेकस्थितिः क्रीडा यत्रोद्ग्राहध्रुवपदो बद्धो यत्रोद्ग्राहं च मेलापं सकृद् यथाक्रमेण सप्तभ्यामष्टभ्यां यथाभिनयसंपन्नं विचित्र यदा तु मकरो यदा प्रागुक्तमोक्षः स्यात् यदा मुदुपचारीभिर्नृत्ये यदि प्रयोगो मेलापे यदोत्प्लुत्योक्तमोक्षश्चेत् यदोल्लासलसद्गात्र यस्य गीतस्य यो यावनीभाषया युक्तं युक्तायुक्तैर्नत्तहस्तैः युगपत् स्फुरणात येन येनेह गोतेन रश्चातालः सुयतिवान रङ्गं प्रविश्य रजापीठस्य मध्ये रङ्गमध्यमनुप्राप्य चार्या रअकाय वदेत् रथचकपादेन परेण रसभावाङ्गप्रयायैर्भावनेरिः गगालापानुगां रायरङ्गालुरुक्तान्त्यस्तत् रायरङ्गालुरुक्तान्यो रेखा सौष्ठवलास्याङ्गैः रेखा सौष्ठवसंपन्नः स लधयेदधिणान्येन प्रोक्ता लयतालविचित्राङ्गैर्यतिनृतं ९ २२४ लोकवृत्यानुसारेण शातव्यास्ते १२ ३०२ १४ ३५१ वपुः पुनः पुनयंत्र १९ ५०० १५ ३८८ वादीशगजभैरूडे होर्मयी १२ २८२ वादीशगजभैरूड १९ ४९६ . वाद्यानां नादसाम्यं ७ १५७ वानग्क्रीडिताकारं तलसञ्चेन ९२१५ १५ ३७७ वामावर्त भ्रमेद् १२ ३०६ १५ ३७२ वामावर्त्त भ्रमेदाहुस्तां १३३१० ४ ७५ वामो यथास्थितः १८ ४७४ विचित्रगतिसंपन्नं १९४८२ ५ १०८ विचित्रचरणं साक्षादाग १० २४९ विचित्रचतुरो हस्तो ८१७३ २० ५१३ विचित्रभ्रमरो बालक्रीडासाधन ८ १६८ १६ ३९८ विधाय नर्तनं २७४३७ १० २४५ विदध्यानर्तनं नानालयत्रय १४ ३५६ विदध्यान्नर्तनं सम्यक १३ ३२७ विद्युद्धान्तं ततश्चन्द्रवर्तनामनि ७ १५२ २१ ५३७ विद्युद्विलासितं :वात्यावर्तितं २०२३९ १९ ४८६ विरामसाम्यगतिभिलागे ना १९ ४७६ ५ १२२ विलम्बितोचारमान १७४२८ १४ ३६१ विलम्वितकताली च ९२२२ ८ १७२ वैष्णवं च हयक्रान्तं १७ ४२० वैशाखमण्डलालीढप्रत्यालीढ १६ ४०३ २ २७ वैशाखरेचितं तत्र बाहू ५ ८८ व्यावर्तनाद् बहिश्चान्तस्तदा २ ३२ व्यावर्त्तयेत् तमेवाघ्रि १३३२२ ७ १४२ व्यावतितो लताहस्ती १९ ४८८ व्योग्नि निःशंकादिंदुभ्यां १२ २८९ ३ ४८ शनैरुच्चालितो पादौ ११ २५७ शब्देन तेनकैशब्दखण्डेन १४ ३५३ ११२६३ शिरोडकरपादानां युगपद १६ ४०४ शास्त्रसङ्गकथावृत्तिश्चेत् १६३९२ ७ १४५ शिरितिरः खलुखलुश्चेति १२ २८३ शुकतुण्डेन हस्तेन १९ ४७९ शुद्धचालिं च तव शैवाख्यस्थानकेनापि १४३३९ ललाटतिलकं पश्चात् शोभितं यत्र दिग्भावैश्चित्रं ७ १६४ सूलुपूर्व यदोत्प्लुत्य १२ २८० शृङ्गाररसभावाढयं रागताल १८ ४५२ सूखें बद्ध्वा ११२७६ श्रीरङ्गाद्या विप्रकीर्णास्तथा १५ ३६८ सल बद्ध्यैकपादेन ११२७८ षड्गादन्यतमः सोऽत्राभिनेयो १३ ३२८ सूलुचालनकं तत्र षड्भिरङ्गैश्चतुर्भिर्वा ८ १८१ सूलुपूर्व तदा ११ २८५ षष्ठो दिशं ४ ८१ संकीर्णानेकगतिभिः प्रवृत्तं स एव द्रुतमानेन १९ ४८८ संकीर्णानेकगतिभिः प्रवृत्तं २०५०३ सङ्कीर्णनेरिर्भावादिनॆरिश्च १८ ४६७ संप्रदायानुसरणं चिन्दुनृत्य १६ ४०८ सप्तसप्तकराक्रान्तस्थानं २ ११ संहतात्पुरमुत्प्लुत्य १२२९६ सप्तमी दिशमासाद्य ४ ७२ स्तम्भकोडनिका चारी मध्ये १० २३१ समतालप्रयोगेण यतिभेदेन ७ १६७ स्थितियथेप्सिता तद्दिनाकं ८१६९ सबालमकरा लास्यश्चारी ७ १५८ स्थितिदिग्भेदनो विद्यद्गतिवत् १० २२८ सभासंमुख तो हस्तो ४ ६६ स्थानकेन विनिर्दिष्टो समत्रिभागलान्तानां प्रत्येक ९ २०१ स्थापयेत् पूर्वपूर्वाध समद्विभागलान्तानां प्रत्येक ८ १८८ स्थाप्यादिवर्णानङ्गेन भावान् १५३६३ समपादेन च स्थित्वा ६ १२६ स्यन्द्यपस्यन्दिताध्यधिस्थिता १६ ४०२ समपादे स्थित २१ ५२९ स्यादक्षिभूविकारादि ९८४६३ समस्तैरथवा व्यस्तैस्तत् १४ ३५० स्वरमन्द्रादयो गीतप्रवन्धा समानमात्रलान्तैश्च ८ १८२ स्वरमञ्चकनृत्य १४३५७ समां कृत्वा समनखं स्वस्थाने च तृतीयेच ९२०३ समुच्चरति षड्गादिमगणादि १३ ३१५ समी पादौ यदायास्मन् स्वमध्यक्रमतो नृत्या २ २४ १२ २९२ सर्वे घरमेदास्ते १६ ४१३ स्वर्णादिधातुबद्धान्तौ सरलौ २१ ५५२ सविलासं मन्दमन्दं ३ ३६ हस्तबाघ्रिभिः ८१८० सव्यापसव्यतः पश्चाद् ५ ९० हस्तेन करिहस्तेन १४ ३४६ सव्यापसव्ययोरूर्ध्वक्रियया ५११३ हस्तयोः पादयोस्त सव्यापसव्ययोस्तत्र वसुताला हस्तैरभिनयेदर्थान् १५३६४ सण्यापसव्ययोर्यत्र १९४९३ सव्यापसम्ययोर्हस्तपादयोः ९ २१० हंसपक्षकरो यत्र ९२१३ सशब्दघातभेदैश्च पुरतः २२ ५५७ हसास्याभिधहस्तेन १३३३२ २१ ५४१ हंसों च कुरकुटी सक्षिप्रगजलीलाश्च वर्तना हावभावादिसुलयतालादिगति १४ ३५५ सा एवायुतसंयुक्तहस्तैः होर्मयीकर्तरीपूर्व कातरी १२ २९९ सा पट्टिः कथिता १७४३० ११ २६७ सा धरू कथिता धीर सार्थाङ्गं नृत्यवन्नृत्येन्निराङ्ग १५ ३७० ह्रदान्तःस्थितपाठीनो सशब्दा च किया १६ ४१६ होर्मयी चोक्तमुक्तिः पारिभाषिकाणां शब्दानामनुकमणी। अग्रतलसश्वर अङ्गन अङ्गीकृत अअलिकर अडालु , १७ उरुपाणि अदृटपृष्ठतुल्ल अहिक अधस्तल अधोमुख ६ अनिवद्ध अनिबन्ध अनिबन्धवृत्त अपस्थन्दित अभिनेय अर्धचन्द्र अर्धरेचित अलगंढ पक्रयङ्क पृष्ठाङ्क पवत्यङ्क पृष्ठाङ्क ५० ३१ २ २ उक्तमुक्तिः २५१ उत्कटस्थ १९ ८६ उत्सव २१ २५७, २५९, ११ उद्ग्राह ४४०,४५५, १७, १८ २६४, २७२, ५४३ २१ २७७ उद्वेष्टित १३८, १७४, १७५ उरुप १३६, १४६ ६.७ १६, २३४ २,१० १३२ उरुवेणी २२६ ९६ ३३६ ५,१४ उरोवर्तित २२७ १० ५३६ २१ उर्ध्वसञ्च ४९, ५९ ३.४ १३ २ ऋषि २२ कटिस्थ ३३३ १३ ४०२ १६ कटीच्छिन्न ३३९ ३२८ १३ कमल ४७० १८ ३३३, ५२९ १३, २१ कमलवत्तनि १०२, १०७ कर ७० २७४ ११ करण ७८, १५४, ४,७, ३२९ १७ ५२५, ५२६ २० ९५, ९९, १५०, ५,७, करणनेरि १३७.१४८,१५६ ३४१, ५०८ १४, २० करणपूर्वक नेरि) १४ कराधि २०२ ९ ३ करिहस्तक ६४, १७१, ४,८, ४२० ३४६ १५५, ४०३ ७, १६ करुणा(दृष्टि १३ ४ कर्णाट भाषा) ४२९ ३३, ७६ ३.४ कर्तरी १३९, २२८, ६, १० २२२, २२९ २ २२९ ४०९ १६ कट्टडि अलपन अलपल्लव ४० अश्वकान्ता अहिफणाकार आलाप आलीढ आवर्तचारी आविद्ध भारति गीत १५, ६ ६ घर्घर १६ कट्टाडधरू ४१७,४१८. १६, ग्रहस्वर ३२७ ४४३ १७ गान्धार ३३७ १४ कलविक २३८,२४५ १० १८, ३२७, ३५९, २, १३, कलास ३९१ १६ ३६१,४२२, ५३७, १४.१७, कलासत ४३१ ५४४,५६० २१.२२ कलासशब्द ४३६ १७ गीतनृत्त ३६६,३७१ १५ कल्लादि २१ गीतपद्धति ६ काङ्ग्रल ३४३ १४ गीतमुद्रा चिन्दु) ३७५,३९५, कातरा ४०१ किङ्किणिकावाद्य १६ गीर्वाण (भाषा) ४५० १८ कुक्कुटासन १२ गुण्डाल ४७०, ५०६, कुक्कुटी ५०७ २० कुडक २ गुरु कुटुप ४७१ १८ गोपुच्छ १५७ कुरङ्गी ३०९,४११, ४१२, कुलीरिका ६२, २१३ ४१३, ४३५ १७ केमिरू ३९१ घघरी ५२३ २० कैमुरू ४२५,४३२ १७ चक्र ३०४,३११ १२ कैवर्तन ४६९,४९४,४९५ १८.१९ चक्रबन्ध १८६, १९२ ८,९ कोलचारिक? ३७४, ३९३ १५, १६ चक्रभ्रमरि (का) २४४, २४६, कोलचारीचिन्दु ३९५ १६ २४८, २५०, ३११ १३ कौक्कुटी ५३४,५३५ २१ क्रम २२०,४१८ ९.६ चटुक ४७१ १८ क्रीडा १५७ ७ चतुर ३२९ खञ्जनी गति) १०४, १२५ ५,६ चतुरन ५६,५७, ८२, १४१. ३,४ खटका ७९ १४७, ३१६ ७,१३ गज २४१,२६१ १०,११ चन्द्र २३, ३५ गजगामिनी १०४ ५ चन्द्रवर्त १५२ गजर २ चरण ३२० गजलीला १२७ ६ चामर २१ गणेश २ चारी ३३,५०.५८,७१, ३,४,५, गति ४९, १२८, १४३, ३,६,७, ७६, ८३, ८७, ८८, ६,९, १७१, २२६, २३२. ८,१०, १३५, २२३,२३१, १४, २२ २३५, ४७८,४८२, १४१९, ३३७, ५५९ ४९३, ५०३, ५१६, २०, चारुपाट ४०६ ५३४ २१ बालन ३६,३९,६०,८१ ३,४ २,३ ३२ २० वालि १७ २ ताल ३२,४७,१३५, १४१, २,३,६, चित्र १३७, १६४, १६५, ६,७,१२, १६३. १७६, १७८,१८१, ९, १३, २९३, ४३२,५५९ १७, २२ १८४, १८७, १९१, १९४, १४,१७, चित्रकलास क) ६ २००, २११ ३२४, ३५५. १८,१९, चित्रित ३६०, ४२१,४३३,४३५, २०२२ चिन्दुक) १८,३७२, ३७४ २,१५, ४४६,४४८, ४५२,४७५, ३७५, ३९०, ३९३, ४७९,४८१,५०६ ५६० ३९५, ३९७,४०८, तालग्रह ३६५ तालधारिणी ३१४ १३ उपभ्रमरि (का) १४८ ३०४, ७,१२, तालयुजा ३५१ ३१० १३ तालरूपक ५०३,५०४ छुरिका २१ तिरप १२ जकडी ५४२, ५४४. २१ तिरपभ्रमरी २६०,२६२, २६४, ११,१३ २६६, ३०८ जलकीट २२० ९ तिरुणि ३७४३८४ जानुकुश्चितक ६७ ४ तिरुवणिचिन्दु जारमान २१५ ९ तिर्यकरण ५२८ झंपाताल १५० ७ तिर्यमुखा ८३.१६१ ४,७ डांटु(क) २४४,२६६, त्रिपताक ९८,१२४,१६२ ५,६,७ २४८,२५०,२५२, ११. त्रिविक्रम ३०९ १३ १५९, १६३ २६४,२६६,२७३, तीवटि १०. २८५, २८६ १३९ ६ २९९ १२ तुर्ल २१८, २२१ लैंकि २९३ १२ तैलस देश ४३८ तण्ड २ तैलङ्ग भाषा) १६ तन्त्री ४३३ १७ तोलरूप १३८, ६ तलपुष्पपुट ५५०, ५५४, २१,२२ तलमध्य ३ तलमुख दण्डपक्ष तलविलासित दण्डरास २२ तलसञ्च २१५ ९ दलरूपि २०० ९ ताण्डव १० द्राविड देश) ३७२ तान ३५९ १४ द्राविड भाषा) ३७६ ताऱ्या २३८ १० दिक्स्थान तार्यपक्ष २४७ १० दिडिक २७५, २८८,२८९ ११,१२ १०, १२ त्रिसञ्च डिटु दण्डक) ३३ ३ ३ ३ ४२ १४६ द्विशिखर रष्टकपृष्ठक देव द्रुत निषाद ७ निःशङ्क १८२, ४३१,४४८, ८,१७, ४९०, ४९९ ५०२, १८,१९, नेरि २० ३४७ २४७, २४८,२५०, १०, २५३,२५४,२६५, ११, २७२,२८१, २८९ १३७,१४५, १४९, ६, ७, १५५,४६७,४६८, १८, ४८२, ४८३,४८६ १३, ४७६, ५४२ २,१९, २१ ४८६ धनुःकर्ष घरू धरूकट्टडि घरूनृत्य धीर धुत धुवाड(डा) १९, ४१६, २, १६, नृत्त ४२६, ४४४ १७ ४४२, ४३ नृत्तहस्त नृत्ततत्त्वज्ञ ३४० नृत्तज्ञ ३४१ नृत्य १६, १७९, २३६, २,१०, २३७, २६८ ११, ८ न्यास ३५३, ३९८,४०० १६, १४ पटव १९,४६५,४७६, २,१५, पट्टि ४५५, ४५६,४६२ १८ पण्डित ५४१ २१ पताक ४१० ध्रुव(क) ध्रुषपद २२ २ ३२६, ३५१,३६२, १३,१४, ४३८, ४४५ ४३७ १६ ४२६, ४३० ५४३ २१ ९५, १०६, १३२, ५, ६, ३१८, ३३८ १३, १४ १४३ ७ धृवशम्य धैवत ध्वनिपेशल नटी नडनेरि नतजानु नत्रक ९ १९८, ९९, २०५, २०७ ८ परावृत्त नर्तन नर्तनाभरण नम्रपृष्ठ नाग नागबन्ध नान्दी नामावली निबन्धक निवन्धनृत्य १७ पताकहस्त ४२७ १७ पद्मकोश ४६८,४९०,४९१ १८, १९ पद्मबन्ध ५११, ५१२ २० १३७, १६८, १६९, १७० ४२०,४२७,४३२, १७, परिमण्डलित ४३४, ५३९ २१ पलाशिगृध्र २४०, २५५ १०,११ पल्लव ५३३ २१ पक्षिशार्दूल २ पक्षिसालु २०५, २०६ पाट(तः) ९२ ५ पारसीक ४६७, ४७६,४७७ १८, १९ पाणिरेचित २ पार्श्वरचित १८ पिडिवाट ३४४ ३३० १३ २३३ १० १४ २४२, २६५ १०, ११ २७३, २८९ ११, १२ ८५, ४२१ ४,१७ २१ २२३ ९ ६७ ४ १६ पिल्मिरु-रू भ्रमरिका ३९१,४४४,४२५ १६, १७ २८६ १२ १२, पिहित पुरण्डरी प्रतिताल प्रतिपाद प्रत्यालीढ २३७,२४८,२५२, १०,११, २५८,३०४,३०६, ३०७ १३ १०८ ५ प्रबन्ध प्रसर १०६, ४९२ ५, १९ ४४०, ५१३, ५१४ १८,२० २ ६३,७७,४०३ ४,१६ १०७ ६८ ४ पृष्ठतुल्ल बद्ध बन्धक ११२, ५३२ ५,२१ ५६० २२. १२२ ६ बाह्यभ्रमरि बिडुलागव १५ मयूरललित बिन्दुचिन्दु बीभत्स बीसं ३४० ३३० ७६ ब्रह्मा २०४ ९ मकर १८ . मकरवर्तन ८१, १३०, ४०३, ४, ६, मणिबन्ध ३४४ १६ मण्डी ४ २ मण्डप १३९,२२४,२२५ ६,९ मण्डल १३८ ६ मण्डलभ्रमित ३७६ १५ मण्डलस्थान १३, १४, २. २ मण्डलाकृति १५८ ७ मण्डली ११ मत्तकुकुट १६, २७१, ३०१, २, ११, मध्यदेशी ३०३ मध्यमस्वर ३७३, ३८१,३८२ ३४३ १४ मराल १२ मरालगति ३३४ १३ मराली २ मसूण ११३ मातृका ३१७, ३२३, ३५५, १३,१४, मान ३६३, ४०५, ४२७, १५,१६, मायूरी ४५६,४६४,४६८, १७,१८, माला ४८८ १९ मालाचिन्दु ४८८, ४८९ १८ मुक्तधरू १५७, १५९ ७ मुक्तिकाधरू २३६ १० मुक्ति २६१ १०,११ मुखचालि ५३३ २१ मुंगर २३५, २५०, २५६, १०,११, मुंगरणं २६०, २६२,३०६, १२,१३, मुहु ३१२,३१३,५१८, २०,२१, मुडुप ५२५, ५४०,५५९ २२ भरत भानवीगति भाव १९ मित्र भावनेरि भावाढय भित्र भुजङ्ग भैरुड भ्रमण भ्रमरी १२० ६ ५५३ २१ २ ४३१ ५ ३७४ १५ ३८६, ३७ १५ १३७, १५९, १६० ४१७ ४४८, ४९१ २६७,३९९ ११,१६ १६,२२, १३४ २,६ २९७ १२ २७४ ११ २० ४७०,५१५,५१६, १८, ५१७, ५१९ २०.
मुद्रा मुनि मुरण्डरी मुरु मुरूक मुरूर मुष्टि मेलन मेलाप १५, रिषभ १६ रेखा ३ २ मेलापक मैनवीगति मोक्ष ६ रोलंबांग मोक्षक मोक्षण १७ लताहस्त ३७५ ३९५,४०१ १५,१६ रविचक १९८, १९२, १९३. १९४ ८,९ ७ २ रविसञ्चर २५३ ११ ५४६ ४८८ १९ ४१९, ४२० २० ४८, ९२ ३,५ ४९७, ४९८ १९ रागमूर्ति ४२४ १७ ५०० १९ राय २७३, २८९ ११, १२ १८ रायरङ्गालु २५७, २५८,२६३, ७९ २६६, २७२ ४३३ १७ रास १४१ ३७७, ३७९, ३३४ ३९६,३९८ ४०४,४६१ १६,१८ रेचन २४१,२६३ १०,१२ २४९, २५३, २५९, १०,११, लगदिंडुक ३०० १२ २६५, ४०० १६ लगपाटक २६१ ११ लताकर ६९, २३ ४,१० १५३ ७ १३०, २५५ ६, ११ लतावृश्चिक ४३३ ४०,६८,५३३ ३,४,२१ १३५,१६७,१७२, ६, ७, ३२१३५,१४१, २,६,७, २३२,३५१,३५४, ८,१०, ३२४, ३५५,४२१, १३,१४, ४२८,४६७,४७९, १४,१७, ४४६, ४४८,४७५, १७,१८, ४८० १८, १९ ४७९,४८१,५३९, १९,२१, ४५३ १८ ५६० २२ २१ ललाटतिलक १५३ ७, २३८ २,१० लक्ष्मी ૨ ५३७ ५३०, ५३१, ४७१ १८, २१ ११, १२, १५८,४२३, ४२७ ७,१७ २१, ४२० ४०४,४५९ १६,१८ ९,२६, २७ २,५ वक्त्र २४०, २५९ १०, ११ वक्त्रहस्त .३३ ३ २८,६५,७५,८८ २,४,५, वर्णक २७९ ११ वर्तना २१९ ९ १९ बसन्त २१ ५०१ १९७ १४२ ७ पाणी ८ २ २३९ २१ यति यमक यवन बक्ष यापनीभाषा २१ लावणी २, लास्य १७ लास्याङ्ग रङ्गपीठ रङ्गभूषण रङ्गमध्य १९ वसुताला ९ रोचक १० वादक ३६ वादी ११ सञ्च ५९,१५९,१६३ वादीश २४१ सम १५७,२८०,३२१, ७, १२, वाद्य २१ ३३३, ३५९,३६५ १३,१४, वानरक्रीडिता २१५ १५ विचित्रगति ४८२ १९ समताल १३७ विद्युत् २२८, २३९ १० समपाद ३३ ३ विधूत ३३८,३४७ १४ सन्धी ५४९ २१ विप्रकीर्ण ४ सव्यसूची ३ विराम ४७८ १९ सव्यहस्तिकर ६४ विलम्बित ४२८, ४८१ १७, १९ सक्षिप्रगजलीला २१९ ९ विलास ४०५ १६ संप्रदाय १०५,४०८ ५,१६ विष्णु २ साचिमण्डल १२१ ६ विक्षिप्त ४९६ १९ सालगसूडक ३६८ १५ वैशाख ६१, ४०३ ४,१६ सालङ्गनेरि ४८४,४८५ वैष्णव १३० ६ सालङ्गपूर्वक ४६७ वृक्षबन्ध २११ ९ सालपल्लववर्तन ५०८ २० वृक्षवन्धताल २१२ ९ सांप्रदायिक २ शब्द ३५२, ३५३, ५४१ १४,२१ सिंहप्लुत २४२,२६७ १०,११ शब्दचालि २ सीलुक १३८, २१५, २१७ ६, ९ शब्दनृत्य ३२५, ३२६ ३७,३९,५७, ६८, २,३,४, शास्त्र ३९२ १६ ७८, ८२, ८४, २२७, १०,११, शिखर ३१६ १३ २३५, २६९, २७६, १२,१६, शिखरहस्त १३१ ६ २७८, २८०,४०५, १७ शिरितिर १६ ४२३, ४३५ शिरिपिडी ४१० १६ शुकतुण्ड ३३५ २८५ १२ शुद्धचालि ४ सुलूवर्तन शुद्धचिन्दु(क) ३७३, ३७७, ३७८८ १५ सुलचाल ३ शैवाख्य सूची १४ ३३९ ३२० १३ सूच्यर्द्ध १३ श्रीरङ्ग ३६८ सूच्यास्य लिष्ट १०७ सहा ३६७ ४५२,४६३ १८ सूर्यमण्डल ५३४ २१ सङ्कीर्ण ४६८, ४८६, ५०३ १८,१९, सौष्ठव ४०४ २० स्तम्भकोडनिका २३१ १० सङ्कीर्णनेरि ४८७ १९ स्थान ६२, ६३,७७,१३५ ४, ६ १४ सुलूपूर्व ३७ स्यन्दि ४०२ १६ हाव स्यन्दिता ४०२ ३२३, ३३७, ३४२, १३,१४, हास्य ३४८,४३१ १७ हिंगर खरभाषा ५४३ २१ होर्मयी स्वरमञ्चक ३५७ स्वरमश्चनृत्य ३५८ स्वराभिनय ३४९ स्वस्तिक ५४,५८,७१, ३, ४, १०६, २८२, ३०८, ५,१२, होलुनाम ३३८ १३, १४ होल्लु हयक्रान्त १३० ६ हंसलील हस्त १३५, १५०, १७३, ६, ७, हंसपक्ष २२२ ८, ९ हंसास्य हारिणीगति ११९ ६ हंसिनीगति ३५५,४०५,४२७, १४,१६, ४५६ ४६४ १७,१८ ३४० १४ २९८ १२ २४६, २४८, २५०, २५२, २५४, २५६, ११. २५८,२६१,२६२, १२ २६७, २७२, २८३, २९९ १३०. ६ २३३,२३४ २१३ ९ २१३ ९८,३३२ ५.१३ १२१ ६ GLOSSARY N. B. As said in the introduction, only one Ms. was available for the edition of this text, and so many obscurities have remained in :it. Some of the terms which are probably Non-Indo-Aryan were discussed by me with my friend, Shri Ramanujacharya, who is a good scholar of the Southern dancing traditions. He was kind enough to explain some of these terms for which I express my thanks to him ). Toqatfo - Cāri movement with Sabdas ( sounds ). fagatta – One type of utplavana ( jumping ). farg-a - a type of dance in South India. ST - Sabdam. afe - a kind of dance. gra- a particular position in Dance, FTCT - Lāsya type of Kathakali. at - a fundamental dance of Tändava type. fig - a fundamental dance of Lāsya type. fer-a dance pose with Bhāya gita. 7770-Gatibhedam-a kind of dance. TS-Talasancara Sthānakam. Hits - Vānarakriţitam-an angahāra pose. SIE - Grdhralinaka-an añgahāra pose. WETET – pose in Bhramaņas. hart - Bandhana used in the abhinaya of Srngāra. fafcha - flute ( musical instrument). faf54- an instrument दिड - a sound from Dindika. ferg - Dravidan dance ascribed to gods or goddesses in Dasarā. शुद्धबिन्दु - a dance without melapāni. fact fare - Dance with melapāni. faequifarrg - Dravidian sabdas ascribed to some king. TOT - the last tāla in the series of Tälas.
३१ ॥ Some parallel verses occuring in Bharatārņavam*-an unpublished work attributed to Nandikes'vara.. अ. ३. नृत्याध्याय-- सशब्दा च क्रिया यत्र ध्रुवशं यादि मेक्तः। यत्र चेष्टा विरहितं तकृत्यं जक्कडी मतम् ॥ ( Compare नृत्तसंग्रह Page: 21, v. 3) तालग्रहानध्रिपदैः समादिश्च यथोचितम् । अनेनैव प्रकरण गीतनृत्यं समाचरेत् ॥ ( Compare नृत्तसंग्रह Page 15 v. 4 ) पादाभ्यां दर्शयेत् तालं लयाच्छब्दाक्षराण्यलम् । नृत्येत् तदा शब्दनृत्तं नृत्तवद्भिरुदीरितम् ॥ ( Compare नृत्तसंग्रह Page 13 V. 6 ) समपादे स्थितं पात्रं कटिन्यस्तार्धचन्द्रकम् । कटेरुपरि तत्कायं भ्रामयेल्लावणी तदा ॥ ( Compare नृत्तसंग्रह Page 21. V. 1 ) मुरजादिषु वाद्येषु वाद्यमानेषु वादकैः । कुतूहलाय भूपानां वसन्तायुस्सवेषु चेत् ॥ ( Compare नृत्तसंग्रह Page 21. V. 1) Comparable verses from the Bharatakośa* अडालहरुमयी - स्थललागनृत्तम्-- अडालाद्या हुरुमयी वामपादेन भूतले । यदा तिष्ठेनिगदिता गणने तण्डुना तदा ॥ वेदः ( See Bharatakośa P. 9. and Nrttasamgraha अडालुहोमयी P. 11 ) करणनेरिः - देशीनृत्तम्-- सिंहाकर्ष चावहित्थं निवेशं चैलकादिके । क्रीडितं च तुरीयं स्याजनितं पञ्चमं तथा । षष्ठं चोपसृतं प्रोक्तं तलसंघट्टितं ततः । उद्वृत्तं चाष्टमं प्रोक्तं विष्णुकान्तं च लोलितम् । मदस्खलितसंभ्रान्ते विनम्भोद्घट्टिते ततः। प्रान्ते तलविलासं च प्रोक्तं पञ्चदशाभिधम् । रासतालेन मानेन मध्यमेन मनोरमः । घेदः । . . I am indebted to Sri Rámānujāchārya for finding out these verses from the manuscript in his possession. * Ramakrishna Kavi, M.A. T. T. D. Press, Tirupati, 1951.
४० पतदन्यथोक्त देवेन्द्रण, यथा-- करणैः पञ्चदशभिर्युक्तः करणनेरिकः । सिंहाकर्षितमादौ स्यात्ततस्तलविलासितम् । वृश्चिकं च ततः प्रोक्तमन्यवृश्चिककुट्टितम् । लतावृश्चिकसंहं स्याहण्डरेचितकं ततः । दण्डपक्षं चोर्ध्वजानु तलसंस्फोटिताभिधम् । विद्युभ्रान्तं दण्डपादं ललाटतिलकाभिधम् । पतानि द्वादशोक्तानि पूर्वेषां मततो यथा । जानुवेष्टनसंशं च कराधिस्वस्तिकं तथा । अन्तश्च्छायाभिधं प्राहुस्त्रीणि पद्धतिकोविदाः । देवेन्द्रः। ( See Bharatakosa P. 112 and Nrattasamgraha P. 7 Lines 150-155) कलासा-देशीनृत्ताङ्गम्-- विविधैः पाटशब्दैश्वालङ्कृतं यतिमिश्रितम् । मध्ये पिल्लमुरुयुक्तं ग्रहश्चापि मनोहरम् । कलासरूपकं प्रोक्तं सङ्गीतज्ञैः पुरातनैः । वेदः । ( See Bharatakosa P. 112 and Nrttasamgraha P. 16 Line 391 ) कातरा-देशीचारी- नन्द्यावर्तस्थितौ पादौ पश्चाच्चेदपसर्पतः । सा चारी कातरा प्रोक्ता देशीनृत्तविचक्षणैः । ( See Bharatakosa P. 126 Nrttasamgraha P. 5 Line 87) कुलीरिका- देशीचारी- नन्द्यावर्ताभिधे स्थाने स्थितौ तिर्यक् प्रसपितौ । चरणौ यत्र तां चारों कथयन्ति कुलीरिकाम् । ( See Bharatakosa P. 144 and Nrttasamgraha P. 4 Line 62 ) चक्रवन्ध-काडनृत्तम्-- पिण्डः स्याश्चतुर्दशभिविन्दुभिरथ ऊर्ध्वतः । दसहस्ते ब्रह्मतालो ईडावान् वामहस्तके ॥ साधो सिंहलीलश्च वामानौ यतिशेखरः । सकृद्रूपं ब्रह्मताले स्यादीडावान् द्विवारतः ॥ सिंहलीलो द्विवारं स्यादेकधा यतिशेखरः । अधचोर्ध्व पिण्डबिन्धौ स्यात्समाङ्गेन योजनम् ॥ धेमः। वेमः ।
४१ एवं प्रथमखण्डः स्याद् द्वितीयमधुना ब्रुवे । इडावान् दक्षहस्ते च दक्षानौ ब्रह्मतालकः ॥ वामाङघ्रौ सिंहलीलश्च तत्पाणौ यतिशेखरः । पूर्ववद्योजनं पिण्डं तृतीयं खण्डमुच्यते ॥ . यतिशेखरतालस्तु दक्षपाणावलङ्कृतः । ईडावान् दक्षपादे च वामाझौ ब्रह्मतालतः ॥ वामहस्ते सिंहलीलः चतुर्थ रूपमुच्यते । दक्षपाणौ सिंहलीलो दक्षा ो यतिशेखरः ॥ ईडावान् वामपादे च तत्पाणौ ब्रह्मतालकः । एवं चतुर्धा तालानां पिण्डे भवति योजनम् । चक्रबन्धेति विज्ञेयः क्वाडस्तालविचक्षणः ॥ वेदः । ( See Bharatakosa P. 195 and Nrttasamgraha P. 8 Lines 180-185) चित्रम् - करणम्- पादेन भ्रमरी कुर्वन् भ्रामयेच्चापि मध्यमम् । हस्तौ च भ्रामितौ स्यातां करणं चित्रसंशकम् ॥ देवणः । बित्रम् - देशीनृत्तम् ( उडुपाङ्गम् ) - चित्रं तत्साद्वर्धमानस्थानकेन गतिस्तथा । तिर्यमुखा त्रिपताको मल्लिकामोदतालतः ॥ दक्षिणे च तथा वामे मकरौ हृदि चञ्चला । पूर्वमुक्ता गतिश्चान्ते तिरिपभ्रमरी भवेत् । तत्कराणं चमत्काराच्चित्रमित्यभिधीयते ॥ वेदः । ( See Bharatakosa Pages 207-208 and Nrttasamgraha P. 7, Nines 160-165) छत्रभ्रमरी-भ्रमरी- स्थितैकेनामिणा भूमौ दण्डवञ्चोत्क्षिपेत् परम् । सव्यावर्त भवेद्यत्र सा छत्रभ्रमरी मता ॥ कुम्भः। ( See Bharatakosa Page 217 and Nrttasamgraha Page 12-13, Lines 304-310) जकरी-देशीनृत्तम्- यवन्या भाषया युक्तं यत्र गीतं सुनिश्चलम् । कौलादिगजरायुक्तं महाङ्गेन विभूषितम् ॥ विदध्यानर्तनं नानालयत्रयविचित्रितम् । कोमलाङ्गैर्यदा नृत्यं भ्रमर्यादिविराजितम् ॥
सशब्दादिकिया यत्र ध्रुवझम्पादिभेदतः । यत्र चेष्टाविरहितं तवृत्तं जकरी मतम् ॥ पारसीकैः पण्डितैस्तु उद्ग्राहः स्वस्वभाषया । यद्गीतं जकरीसंज्ञं यवनानामतिप्रियम् ॥ वेदः। ( See Bharatakosa P. 222 and Nrttasamgraha P. 21) जारमान - देशीनृत्तम् (उडुपाङ्गम् )- उत्कटस्थानके तत्स्यात् खण्डसूच्यावर्नीव्रजेत् । आदितालेन वामोर्ध्वत्रिपताकोऽथ दक्षिणः ॥ हस्तपार्श्वगतस्तिर्यक् त्रिपताकस्तथा त्विदम् । दक्षिणाङ्गे द्विवारं स्याश्चतुरश्रं ततः श्रयेत् ॥ सव्यवामपताको:च स्वे स्वे पार्श्वे प्रसारयेत् । गृहीत्वा तिरिपं पश्चादेवमङ्गान्तरेण भवत्येवं सम्मुखं च सव्यास्यो दक्षिणां गतः । गृहीत्वा पूर्ववद्दक्षपादं वामस्तु संस्थितः ॥ तेनैवाङ्गेन तिरिपस्ततो वाममुखो भवेत् । ततः सम्मुखमास्थाय समसूच्यां पताकयोः ॥ प्रसारणं तु हृदये शिखरद्वयमाचरेत् । एवं द्विवारं कृत्वा च दक्षपादं निवेशयेत् ॥ उपरिष्टाद्वामजानोर्दक्षिणावर्ततो भ्रमेत् । मण्डिभ्रमरिका सा स्यादेवमङ्गान्तरे भवेत् ॥ ततो वामाज्रिसूची च वामपार्श्व प्रसारयेत् । अलपद्मद्वयं दक्षपार्श्वतश्च प्रसारयेत् ॥ ततः सव्यपदे सूची सव्यपार्श्व प्रसारयेत् । परिवृत्यालपद्मौ च वामपार्श्व प्रसारयेत् ॥ अलपद्मस्वस्तिकं तद्विधाय वामपार्श्वतः । अलपद्मद्वयं दक्षपादसूच्या सहैव तु ॥ भ्रामयन्मण्डलाकारमुल्वो चामपार्श्वतः । कृत्वा दक्षिणसूच्याश्च वलनत्रयमाचरेत् ॥ ततः पताकप्रसरं सव्यं कृत्वा तकारणम् । हृदि वामं च शिखरं तदा स्याजारमानकम् ॥ वेदः। ( See Bharatakośa P. 229 and Nrttasamgraha P. 9, Nine 115) .
ढेकी-धावनलागनृत्तम्- वामः पुरोऽपरः पार्श्व पादौ तालद्वयान्तरे । पताको प्रसृतौ तिर्यक् स्थित्वा स्थित्वा तु धावनम् ॥ कुट्टनं वामपादस्योत्पलुतिं कृत्वा पदद्वये । विरलावूर्ध्वगौ पादौ दक्षिणेन पदा पतेत् । भूमौ यदा तदा ढेकी कथिता पूर्वसूरिभिः ॥ वेदः। ( See Bharatakosa P. 238 and Nrttasamgraha P. 12, Line 293) ताण्डवं - नृत्तम्- आसारितादिभिर्गोतेरुद्धतप्रायवर्तितः । करणैरङ्गहारैश्च निवृत्तं विषमैरिह । ताण्डवं तण्डुना प्रोक्तं नृत्तं नृत्तविदो विदुः । (See Bharatakośa P. 213 and Nrttasamgraha P. 10, Line 240) कुम्भः। -- तिरिपभ्रमरी-भ्रमरी-- अम्रिस्वस्तिकमादाय तिर्यग्भ्रमणतो भवेत् । कुम्भः। कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य पार्श्वनाक्षिप्य पृष्ठतः । अन्याङ्ग्रेः स्वस्तिकं कृत्वा शरोरं भ्रामयेद्यदा ॥ तिर्यग्यद्दण्डपक्षाभ्यां यथा स्यात् स्वस्तिकच्युतिः । तिरिपभ्रमरीत्येषा तदा तज्ज्ञैनिगद्यते ॥ ज्यायन:। ( See Bharatakośa P. 251 and Nrttasamgraha P. 13 Line 308) तिर्यमुखा - देशीवारी-- स्थानके वर्धमानाख्ये स्थित्वा पादौ प्रसर्पतः । सव्यापसव्ययोस्तूर्ण यत्र तिर्यङ् मुखा तु सा ॥ वेमः। ( See Bharatakośa P. 251 and Nsttasamgraha P. 4-7, Lines 83-161) तिवटम् -देशीनृत्तम् -- नवर्जिततवर्गेण क्वचित्वचित् । निर्मितं बिन्दुना वय॑मिति तादिग्रहोत्तमम् ॥ तालावृत्तानुगम्भीरैः तिवटं परिकीर्तितम् । वेदः। ( See Bharatakośa P. 251-252 and Nrttasamgraha P. 19, P. 475) तुल्लम्-- सपादेनादितालेन धृत्या सव्यापसव्ययोः । स्वस्तिकीकृत्य जंघे चेद् भ्राम्येतां कर्तरी जगुः । राजतालेन तालेन नर्तनं सर्वदिङ्मुखम् । सौष्ठवाधिष्ठितं यत्र तत्तुल्लमभिधीयते ॥ ( See Bharatakosa P. 847) तुल्लम् - देशीनृत्तम् ('उडुपाङ्गम् )-- हृदये शिखरद्वन्द्वं कुञ्चिते स्थानके ततः । चतुरश्रे स्थानके च पर्यायेण पताकको । अधः प्रसार्य वामोऽध्रिः स्थाप्यस्तेन सहैव तु । वामोऽलपद्मः पुरतः प्रसार्याधः पताककः ॥ हृदये वामशिखरं प्रसृतं च पताककम् । दक्षिणे तुल्लमुद्दिष्टं आदितालेन सूरिभिः ॥ वेदः। ( See Bharatakośa P. 255 and Nrttasamgraha P. 9, Lines 218-221 ) ध्रुवपदनृत्तम् – देशीनृत्तम्- गीयमाने ध्रुवपदे गीते भावमनोहरे । नर्तनं तनुयात् पात्रं कान्ताहास्यादिदृष्टिजम् ॥ नानागतिलसद्भावमुखरागादिसंयुतम् । सुकुमाराङ्गविन्यासं दन्तोद्योतितहावकम् ॥ खण्डमानेन रचितं मध्ये मध्ये च कम्पनम् । यत्र नृत्यं भवेदेवं ध्रुपदाख्यं तदा भवेत् ॥ प्रायशो मध्यदेशीयभाषया यत्र धातवः । उद्ग्राहध्रुवकाभोगास्त्रय एते भवन्ति ते ॥ उद्ग्राहरहितं केचित् परे त्वाभोगवर्जितम् । उद्ग्राहाभोगरहितमन्वर्थमपरे जगुः । स्यादक्षिश्रुविकारादिङ्गाराकृतिसूचके ॥ वेदः । ( See Bharatakasa P. 299 and Nrttasamgraha P. 15, Line 376) नडनेरिः-देशीनृत्तम्- द्रुतमानादादितालाद् भूयो भूयो विवर्तनम् । लोलितं भ्रमरं यत्र नडनेरिः स उच्यते ॥ दामोदरः। संहतस्थानके सूनुं गृहीत्वा शिखरं हृदि । कृत्वा तत्तत्सौष्ठवेन कुर्यात्तु तलदर्शिनी ॥
पताको पार्श्वयोः पश्चाच्छनकैश्च प्रसारयेत् । पुनः शनैः पताकौ च तावानीय शिरो हृदि ॥ कृत्वा ततो दक्षवामपर्यायेण द्विवारकम् । ततः पताकः प्रसरः कुर्याश्च तदनन्तरम् ॥ चतुर्दिक्षु प्रसरणं पताकस्य ततः परम् । पर्यायेण पञ्चपदी सूलू ग्राह्या पुनस्ततः ॥ पर्यायेण भ्रमिद्वन्द्वात्मकस्तु कृतकालतः । वामदक्षिणयोः पश्चात् पार्श्वयोस्तिरिपं भवेत् । ततस्तु मलकं कृत्वा विधेयं तु तकारणम् ॥ वेदः । ( See Bharatakasa P. 306 and Nrttasamgraha P. 19, Line 490) नत्रम् - देशीनृत्तम् (उडुपाङ्गम् )- नन्द्यावर्त स्थानकं स्यान्मराला चारिका तथा । ललितो भ्रमरो हस्तो नत्रं स्यात् समतालतः ॥ ( See Bharatakosa P. 306 and Nrttasamgraha P. 8, Lines 168-169) वेमः। नागबन्धः-नृत्तबन्धः- योऽस्मिस्तृतीयपङ्क्तेस्तु द्वितीय स्थानमाश्रिता । नर्तकी तु द्वितीयस्याः प्रथम स्थानमाश्रयेत् ॥ ततः प्रथमपङ्क्तेस्तु क्रमात् स्थानचतुष्टयम् । प्राप्य तुर्य द्वितीयायाः तृतीयस्यास्तृतीयकम् ॥ क्रमाद् व्रजेदेवमन्या चरेद्विनिमयेन च । नागबन्धं समाचष्ट तं सङग्रामधनञ्जयः ॥ ( See Bharatakosa P. 313 and Nrttasamgraha P. 9) नामावली-देशीनृत्तम्- समे स्थित्वा स्थाने यदि भवति सूलू सुललिता, करौ स्वान्ते कृत्वा रुधिरशिखरौ योगसहितौ । ततः पार्थे सव्ये प्रसरति लताख्ये यदि भवेत्, करौ व्यावृत्यासौ हदि शिखरतामेति सपदि । पुरः पार्श्वतो दक्षवामौ पताको, यदा प्रसृतौ तद्यक्षवामेऽलपनौ । कृतो हंसवक्त्रो पुरस्तौ विधेयो, करौ बालपनो इदिस्थौ पुनस्तौ ॥
भवेदादितालेन तत्कारपूर्वक्रमोयं सदा देवनामावलीनाम् । विनोदास्तु तासां सदा संप्रयुक्तश्चतुःपञ्चषट्खण्डकैः कोहलेन ॥ वेदः। ( See Bharatakośa P. 327 and Nrttasamgraha P. 19, Lines 475-476) नेरिः-देशीनृत्तम्- आदितालानुगं यत्र विलम्बितलयान्वितम् । रेखामुद्राप्रमाणाचं नानाकरविभूषितम् । द्विचत्रगभिमुखं नृत्तं नेरिरित्यभिधीयते ॥ दामोदरः। ( See Bharatakosa P. 341 and Nrttasamgraha P. 19, Lines 481-482) पट्टिनृत्तम् - देशीनृत्तम्- पदमेकं तालहीनं बद्ध लिङ्गभाषया । पूर्वस्वरोचार्यमाणं यदेकयतिसंयुतम् । पट्टिः सा कथिता तज्जैविदग्धानां मनोहरा ॥ दामोदरः । ( See Bharatakośa P. 348 and Nrttasamgraha P. 17, Lines 426-430) - पभवन्धः-नृत्तबन्धः स्थाने स्थिता द्वितीयस्यास्तृतीयं पदमाश्रयेत् । तृतीयायाश्चतुर्थ च चतुर्थ्याश्च द्वितीयकम् ॥ स्थानक्रमाद् बजेदेवं द्वितीया पङ्क्तिरिष्यते । तृतीयपक्तेराद्यस्था द्वितीयाया द्वितीयकम् ॥ आधायाश्च तृतीयं च चतुर्थ च क्रमाद् व्रजेत् । एवं तृतीयपङ्क्तिः स्यादथ तुर्याद्यमाश्रिता ॥ तद्वितीयं पदं प्राप्य तृतीयायास्तृतीयकम् । द्वितीयायाश्चतुर्थ च क्रमाद्गच्छेदियं पुनः ॥ चतुर्थी पङ्क्तिरेवं तु चतस्रः पात्रपङ्क्तयः । मिथचरन्ति मिलिता एवं विनिमयात् पृथक् । तं पनबन्धमावष्ट रूपनारायणो नृपः ॥ वेमः। (See Bharatakośa P. 354 and Nrttasamgraha P. 9, Lines 196-199) .
पिल्लमूरू- देशीनृत्तम्- गीततालानुगो यत्र नानावाद्यविनिर्मितः । अल्पो यः शब्द खण्डो हि थां-तो-धि-दिग-णान्तकः ॥ वेदः । (See Bharatakośa P. 370 and Nrttasamgraha P. 17, Line 425) - प्रबन्धनृत्तम्- षडङ्गादिप्रमाणेन प्रबन्धाध्यायसंमताः । कृता वाग्गेयकारैस्तु तेषां खण्डानुसारतः ॥ स्वराणां पाटशब्दानां तेनकानां लयेन च । संगीतोतक्रमेणैव पदानां भावदर्शनम् । ये प्रबन्धाः पुरा प्रोक्ताः तेषां नर्तनमाचरेत् ॥ वेदः। ( See Bharatakosa P. 390 and Nrttasamgraha P. 2, Line 4) प्रसरम् - देशीनृत्तम् (उडुपाङ्गम् )- चतुरश्रस्थानके च शिखरद्वितयं हृदि । आविद्धवकहस्ताभ्यां पाणिरेचितयान्वितम् ।। मध्यसञ्चेन प्रसरमादितालाच यद्भवेत् । सव्यः पताकः प्रसृतः पार्श्व वामः पुरो गतः ॥ पताकः स्याद्विपर्यासादङ्गानां प्रसरे भवेत् । मण्डलस्थानके पार्श्व पताको प्रसृतौ यदि ॥ तत्तत्स्थाने कुश्चितके शिखरद्वितयं हृदि । समसूच्या भुवं गत्वा सौष्ठवेन यदा भवेत् ॥ पुनः पश्चात्प्रचलनमाविद्धप्रसृतौ करौ । व्यावृत्य पुरतः पश्चात् परिवर्तनतो भवेत् ॥ संहृत्स्थानके स्थित्वा भ्रमरीमाचरेत्ततः । प्रान्ते च चतुरनं स्यात् प्रसरोडपमुच्यते ॥ ( See Bharatakosa P. 396 and Nrttasamgraha P..9, Lines 222-225) बाह्यभ्रमरी-भ्रमरी- दक्षिणेनाघ्रिणा स्थित्वा वाममधिं तु कुञ्चयन् । वामावर्त भवेद्यत्र सा बाह्यभ्रमरी मता ॥ वेदः। सव्येतरेण पादेन स्थित्वा सव्यानिकुञ्चनात् । सव्यावर्त भ्रमेयत्र सा बाह्यभ्रमरी मता ॥ ( See Bharatakośa P. 419 and Nrttasamgraha P. 11, Line 254) मित्रम् - देशीनृत्तम् ( उडुपाङ्गम् )- कुञ्चिते स्थानके स्थित्वा यदा नूपुरपादिका । वामोऽधोमुखमंसास्यः अलपद्मः प्रकम्पितः ॥ पादः प्रसारिताग्रस्थः त्रिपताकः शिरः स्थितः । दक्षिणे प्राग्गतिर्नीत्वा तथा वामे च चारिवत् ॥ नूपुराङ्गविपर्यासाद्भमरी रचिता यदा । क्रीडातालेन विहितं तद्भित्रमभिधीयते ॥ वेदः । ( See Bharatakosa P. 438 and Nrttasamgraha P. 7, Lines 157-159) मूक-देशीनृत्ताङ्गम्- हृदये वामशिखरं स्थाप्य सव्यपताककम् । दक्षपार्श्व प्रसार्याथ दक्षिणावर्ततस्ततः ॥ भ्रमरीमाचरेत् पश्चादेकपादोपरि स्थितः । नम्रोभूत्वा पिताकं पुरतश्च प्रसारयेत् ॥ हृदि वामं च शिखरं न्यस्य स्कन्धानतं शिरः । वलनद्वितयं कुर्यादन्ते स्याञ्च तकारणम् । मूरूलक्षणमित्युक्तं सङ्गीतज्ञैः पुरातनः ।। वेदः। ( See Bharatakosa P. 500 and Nrttasamgraha P. 19, Lines 497-498) रथचक्रा-देशीचारी- स्थाने तु चतुरस्राख्ये स्थित्वा श्लिष्टौ परस्परम् । पुरतः पृष्ठतो वापि चरणौ चेत् प्रसर्पतः । यत्रैषा रथचक्राख्या चारी तु परिकीर्तिता ॥ ( See Bharatakośa P. 524 and Nrttasamgraha P. 7, Line 142) वेमः । रायबङ्गालः -देशीनृत्तम् । सलूं बवैकपादेन दक्षपादेन कुट्टनम् । तत उत्पलुत्य चरणावू च विरलीकृतौ ॥ अन्तराले भ्रामयित्वा निपतेद्धरणीतले । रायबङ्गालध्वाडोऽयं कथितः पूर्वसूरिभिः ॥ वेदः। (See Bharatakosa P. 550 and Nrttasamgraha P. 11, Lines 266-272) शब्दचाली(लिः) - देशीनृत्तम्- प्राग्वत् कृत्वा स्थानहस्तौ मध्यसम्चेन नर्तकः । यत्र स्थित्वैकपादेन शब्दवर्णानुगामिनीम् ॥ गतिं नयेद् द्वितीयेन दक्षिणाध्वनि शोभनम् । तद्वत्पादान्तरेणाथ क्रमेणैतद्वयोर्यदा ॥ पर्यायेण गतिं कुर्याद्वातिकादिषु पञ्चसु । मार्गेम्वसौ शब्दचाली पण्डितैश्च निरूपिता ॥ अथवा मार्गतालक्रमेणैव रासतालेन नर्तनम् । शब्दचालिस्तथा प्रोक्ता लक्ष्यदृष्टया विचक्षणैः ॥ दामोदरः । ( See Bharatakosa P. 656 and Nrttasamgraha P. 2, Line 17) सङ्कीर्णनेरिः - देशीनृत्तम्- स्थानः संहतकादिषोडशमुखैश्चारीभिरासप्तभिः, त्रिंशत्सप्तमितैर्युतैरमिलितैरन्यैस्त्रिभिहस्तकैः । दृग्मेदैः करणैर्वरैरथशिरोमेदाङ्गहारैः स्फुटा, सङ्कीर्णा गदिता बुधैर्नटमुदे नेरिर्मनोहारिणी ॥ वेदः। ( Sec Bharatakośa P. 691 and Nrttasamgraha P. 19, Line 487) सालङ्गनेरिः- देशीनृत्तम्- सालङ्गनेरिः स शेयो युतायुतकरैः कृतः । वेदः। ( See Bharatkośa P. 723 and Nrttasamgraha P. 19, Line 484-85) सूलू - देशीनृत्तम्- एकः समस्थितः पृष्ठे द्विवितस्तिः पुरः पुरः । सूलूस्थानकमेतत् स्यादेवं चरणरक्षणा ॥ पुरतः परितो वामः पताकोऽन्यस्तु पार्श्वतः । दक्षिणाभ्रमणात् सूलू द्वित्रिवारं चरेत्ततः ॥ इति ध्वाडनत्ते सूडुलक्षणम् । देवेन्द्रः। ( See Bharatakosa P. 737-38 and Nrttasamgraha P. 17, Line 436) सूलूपम् - देशीनृत्तम्- किन्नरीतालसंयुक्तं तेन शब्देन नर्तनम् । मृदङ्गादियुतं यत् स्यात् सूलूपं तन्निगद्यते ॥ दामोदरः । ( See Bharatakośa P. 738 and Nrttasamgraha P. 17, Line 434) शुद्धिपत्रक Line Page Read as मध्यमो $10.1268 (footnote) 1 मन्यमो १३, ४० चायी १५, 40 40 3 चार्या 80 4 47 7 ब्राह्म कोप्पल बाह्य कोत्पल 50 7 62 7 सबालककर पक्षिसालुवः 56 सबालमकर पशिसुलवः 55 73 11 । 55 11 77 11 90 12 तदाडालु समुत्लत्य 65 क्वचित् उरुपेवेपि तदाऽालु समुत्पलुत्य 95 कचित् उरुपेष्वपि 95 12 399 16 16 23 * Omit at the end 24
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला प्रकाशित ग्रन्थ १ प्रमाणमअरी - तार्किकचूड़ामणि सर्वदेव । २ यन्त्रराजरचना - महा- राजाधिराज जयसिंहदेव कारिता। ३ कान्हडदे प्रबन्ध - महाकवि पद्मनाम । ४ क्यामखांरासा - नवाब अलफखां (कविवर जान)। ५ लावारासा- चारण कविया गोपालदान । ६ महर्षिकुलवैभवम् - विद्यावाचस्पति स्व. श्री मधुसूदनजी ओझा । ७ वृत्तिदीपिका- मौनि कृष्णभट्ट । ८ राजविनोद काव्य - कवि उदयराज । ९ तर्कसंग्रहफक्किका- क्षमाकल्याणगणी। १० नृत्तसंग्रह - अज्ञातकर्तक । प्रेस में १ त्रिपुराभारतीलघुस्तव - सिद्धसारस्वत लघुपण्डित । २ बालशिक्षा व्याकरण- ठक्कुर संग्रामसिंह । ३ करुणामृतप्रपा- महाकवि ठक्कुर सोमेश्वरदेव । ४ पदार्थरत्नमञ्जूषा-पं. कृष्णमिश्र। ५ शकुनमदीप - पं. लावण्यशर्मा । ६ उक्ति- रत्नाकर - पं. साधुसुन्दर गणी । ७ प्राकृतानन्द - पं. रघुनाथ कवि । ८ ईश्वर- विलासकाव्य - पं. कृष्णभट्ट । ९ चक्रपाणिविजयकाव्य - पं. लक्ष्मीधर भट्ट । १० काव्यप्रकाश – भट्ट सोमेश्वर । ११ कारकसंबन्धोद्योत - पं. रभसनन्दी। १२ शृंगारहारावलि - हर्षकवि । १३ कृष्णगीतिकाव्यानि - कवि सोमनाथ । १४ नृत्यरत्न कोश - महाराजाधिराज कुंभकर्णदेव । १५ नन्दोपाख्यान - अज्ञात- कर्तृक । १६ चान्द्रव्याकरण - चन्द्रगोमी। १७ शब्दरत्नप्रदीप - अज्ञातकर्तृक । १८ रत्नकोश - अज्ञातकर्तृक । १९ कविकौस्तुभ - पं. रघुनाथ मनोहर । २० एकाक्षरकोशसंग्रह - विविधकविकर्तृक । २१ शतकत्रयम् - भर्तृहरि, धन- सारकृत व्याख्यायुक्त । २२ वसन्तविलास - अज्ञातकर्तृक । २३ दुर्गापुष्पाञ्जलि:- म. म. पं. दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी। २४ दशकण्ठवधम् - म. म. पं. दुर्गाप्रसादजी द्विवेदी । २५ गोरा बादल पदमिणी चऊपइ - कवि हेमरतन । २६ बांकोदासरी ख्यात - महाकवि बांकीदास । २७ मुंहता नैणसीरी ख्यात - मुंहता नेणसी इत्यादि। प्राप्तिस्थान - सञ्चालक, राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ।