Tibetian Institute, Sarnath, Vns.

Jagadguruvaibhavam

Madhusudan Ojha · 2006

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* श्रीः * ममीक्षा चक्रवर्ति खर्गीय विद्वद्वर पं० श्रीमधुसूदन अोझा विद्यावाचस्पति विरचितम् ( ब्रह्मविज्ञान विभागे दिव्यविभूती ) * जगद्गुरुवैभवम् । -20C- तदिदम् तदात्मजेन पं. श्रीप्रद्यम्नशर्मणा सपादित प्रकाशितञ्च यत्र प्रदर्ध्या विषया पुरातना यत्र प्रकारोऽभिनवः प्रदर्शने । यत्र प्रमाण श्रुतय. मयुक्तयस्तद् ब्रह्मविज्ञानमिदं विमृश्यताम् ॥ प्रथमावृत्ति विक्रम सं० १६६६ मूल्यम् सर्वेऽधिकारा. प्रकाशकाधीना ।

EmalungunHELDHAMAA
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समीक्षाचक्रवर्ती
स्वर्गीय पं. मधुसूदनजी ओझा विद्यावाचस्पति ।
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MAHARI
"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-बम्बई.

॥श्रीः॥ * भूमिका * ( मानवजाति का प्राचीन इतिहास ) इतिहास शब्द 'इति' 'ह' 'पास' इन तीन सस्कृत शब्दों के भिन्न भिन्न अर्थ 'ये' ही था' से मिलकर बना है, अत पुरानी कथाओं का सूचक है । पुराने से पुराना पुस्तक ऋग्वेद है इस बात को सारे ससारने मानलिया है वेदों का अर्थ समझने के अनेक सावन होते हुए भी वास्तविक बातों का पता नहीं लगता । कारण इसका यह है कि कन्दमूल फल खाकर जीने वाले निस्वार्थी ऋषि महर्षियों के इस सग्रह की वह प्राचीन भाषा काल- क्रम से अब इतनी कठिन हो गई है कि उसका समझना साधारण बात नहीं । भारत के तथा अन्य देशों के विद्वानों ने वर्षों परिश्रम करके इस विषय में पूर्ण प्रयत्न किया है और कर भी रहे है किन्तु अब तक भी सचाई के तल तक पहुँच सके है कि नहीं, इसमें सन्देह ही है। वैदिक ( वेद से सम्बन्ध रखने वाले ) यज्ञ याग आदि का प्राय लोप हो चुका है। प्राज इन वेदों का अर्थ समझलेना और तदनुसार कर्म करना एक समस्या होगई है। किन्तु “जिन ढूंढा तिन पाइया" इस सिद्धान्त के अनुसार उच्चकोटि के विद्वान् लोग इस समय अधिक परिश्रम करने में लगे हुए है और उनने कुछ पाया भी है। यों तो महाभारत के युद्ध के बाद वैदिक साहित्य की एक खण्डहर की सी हालत हो चुकी है। खम्भा कहीं पडा है ता कृत का अश कहीं है अर्थात् क्या चीज कहा थी और अब कहा प्रापडी इस बात को जानकर फिर स वेसी की वैसी इमारत बनाने के तुल्य ही इस समय वेदों के अर्थ की समस्या होगई है तिम पर- 'बिभेत्यल्प श्रुता द्वदो मामयं प्रहरिष्यति ।' अर्थात् वेद भगवान् अल्पज्ञान वाले लोगों से डरते है कि ये कहीं मुझ पर प्रहार न करै वर्तमान काल मे ( विज्ञान युग में ) एक साधारण व्यक्ति भी अपने आप को हरएक विषय का ज्ञाता समझता है और अपनी २ सम्मति देने को तैयार हो जाता है परन्तु यह एक हेमी क याग्य -२- बात है । जब कि ऊँचे २ विद्वान् भी वेदों के अर्थ समझने में अब तक सफल नहीं हो सके तो कोई एक साधारण व्यक्ति का ऐसा प्रयत्न केवल साहस कहलाने के योग्य है। अस्तु प्रकृत में हम कहना यह चाहते है कि इस प्रकार के सत्य वेदार्थ आविष्कार के प्रयत्न में प्रातः स्मरणीय श्री १०५ श्रीपूज्य गुरुवर पडितजी महाराज विद्यावाचस्पति श्री मधुसूदनजी अोझा ने अपना सारा जीवन लगाया है और उन्हें इस कार्य में प्रच्छी सफलता मिली है उनने एक प्रकार से वैदिक साहित्य का जीर्णोद्धार कर डाला है । उसका ही फल यह है कि आज वेदों के सम्बन्ध में अपूर्व २ बात जो भूल में पड़ गई थी जानी जारही हैं। श्री पडित जी महाराज ने वेद को चार भागों में बाटा है, यज्ञ, विज्ञान, इतिहास और प्रकीर्णक | चारों ही विषयों में उनने वेद के आधार पर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे है उनमें से इतिहास विषय का यह “जगद्गुरु वैभव" एक सक्षिप्त किन्तु सार निदर्शक पन्थ है। इस ग्रन्थ में आज से १५००० वर्ष पहले का मानवजाति का इतिहास लिखा गया है यों तो लोकमान्य बालगगावर तिलक महोदयने अपने ग्रन्थ प्रोगयन ( Orin ) और Arctic home of the Vedas नाम के प्रथों में गणित की रीति से वेदों की कालगणना करके यह सिद्ध किया है कि वेदों का सग्रह प्राज से ८०००० वर्ष पहले का है चाहे इस से भी प्राचीन होसकता है किन्तु ८००० वर्ष से इधर का कथमपि नहीं होसकता । उनका यह भी मत है कि मानवजाति का प्रादि निवास उत्त ध्रव पर था क्योंकि वेदों में क्षितिज (Horizon ) पर चक्राकार भ्रमण करने वाली ३० उषाओं का वर्णन तथा बहुत लम्बी अँधेरी रात का वर्णन इस बात का प्रमाण है कि ऋषि लोगों का निवास उत्तरध्रव के पास पास कहीं था । और हिमकाल और हिमोत्तर काल आदि प्राधुनिक खोज के द्वारा जाने गये सिद्धान्तों क तथा भस्तरशास्त्र (Zoology) के प्राधारों पर यह निश्चय किया है कि 'मानवजाति की प्रादिम निवास भूमि ध्रव पर थी और इस वृत्तान्त का समय ८००० वर्ष से पहले का ही होसकता है साथ ही लोकमान्य तिलक ने प्रोफेसर के लेख के अनुसार यह एक उपयोगी बात बड़ी खोज से जानी गई लिखी है कि ज्यौतिष शास्त्र के आधार पर ध्रव के पास ६ महिने की रात और ६ महिने का दिन कहा जाता है परन्तु डाक्टर वाइन नाम के पश्चिम देशीय विद्वान् ने अपने "नन्दनबनोपलब्धि" नामक प्रथ में कैप्टिन पिभ के इस प्रत्यक्ष देखे वर्णन को जो कि ध्रव पर देखागया है यों लिखा है कि-पृथ्वी के ध्रव प्रदेश पर प्रतिवर्ष मार्च की १६ तारीख को सूर्य का उदय होता है इस ४७ दिन पहिले अर्थात् जनवरी माम की २६ तारीख को अरुण का प्रकाश ( सूर्य के उदय होने से पहले होने वाला उजाला ) दीखने लगता है भागे चलकर सितम्बर मास की २५ तारीख को ध्रव पर सूर्य का प्रस्त देखने में प्राता है और तिम पिछे ४८ दिन नक अर्थात् नवम्बर मास की १३ तारीख तक सायकाल को दीखने वाला प्रकाश रहता है इसके अनन्तर सूर्य का और अरुण का प्रकाश बिलकुल मिट जात है और इसी कारण से वहाँ अधकार होजाता है और ७६ दिन तक बिलकुल अधेरा रहता है और उसी तरह अरुण का -३- - प्रकाश होकर सूर्य ऊग आता है १६४ दिन तक ऊगा हुआ ही क्षितिज से ऊपर रहता है। १ वर्ष में इस प्रकार ध्रव पर १६४ दिन सूर्य का प्रकाश २८ दिन सध्या का प्रकाश और ८६ दिन तक बिलकुल अधेरा और ४७ दिन अरुण का प्रकाश रहता है यो ही ३६५ दिन के वर्ष का हिसाब है। इस विषय में कुछ विद्वान् पूर अंधेरे के ७६ दिनों को कम करके केवल ६० दिन ही ध्रव पर अधेरा रहना मानते है। इस बात का ठीक निश्चय तो ध्रव पर जाकर प्रत्यक्ष देखने से ही होसकता है। अनुमान से इस विषय मे इतना ही कहा जासकता है कि सूर्य के उदय तथा अस्त के पहले और पीछे रहने वाला अरुण प्रकाश ( उजाला) वायुमण्डल के प्राधार पर होता है और सूर्य की किरणों का वायुमण्डल से टकराकर दीखना कभी कभी कम ज्यादा होता है यही मतभेद का कारण होसकता है । अस्तु, इसमे जरा भी सन्देह नहीं कि ६ महिने की रात में ध्रव पर केवल दो ढाई महीने ही घना अवकार रहता है बाकी सब समय अरुण प्रकाश और सूर्य का प्रकाश रहता है यों १० माम तक उजाला और २ मास तक घना अधेरा रहता है। - इस अरुण प्रकाश का वेदों में उषा के नाम से वर्णन किया गया है वेदों में प्राप्त होने वाले उषा के वर्णन तथा घन अधकार के वर्णन के प्राधार पर तिलक प्रादि विद्वानों ने मानवजाति की प्रादि निवाम भूमि ध्रव क प्रासपास थी यह निश्चय किया है । इस प्रकार कलकत्ता निवासी स्वर्गीय उमेशचन्द्र विद्यालकार ने अपने प्रन्थ-"मानवदिगेरप्रादि जन्मभूमि" नाम के अपने बङ्गला अन्य म मनुष्यों का मादिम निवास मङ्गोलिया में माना है ये सब एक प्रकार की 'अटकल' है अभी कोई सिद्धान्त इस विषव में सर्वमान्य नहीं होसका । हमारे पडितजी महाराज ने इस विषय का निर्णय सक्षेपत. इस प्रथमें लिखा है और विस्तार सं स प्रमाण अपने 'इन्द्रविजय' और 'देवासुरख्याति प्रादि में किया है और उसका सारांश यह है कि त्रिलोकी' का विभाग वेदादि शास्त्रों में कई प्रकार से है उसमें एक 'भौमत्रिलोकी' भी है, अर्थात् इसी पृथ्वीमण्डल पर स्वर्ग, अन्तरिक्ष, भूमि तीनों लोकों की कल्पना है। हिमालय से उत्तर का प्रदेश स्वर्ग, हिमालय के दर्रे अन्तरिक्ष और हिमालय से दक्षिण का भाग इस विभाग में भूलोक माना गया है इसी क्रम से प्राचीन जातियों में मनुष्यों की भी तीन सस्था बनाई थी. उत्तर प्रदेश के रहने वाले देवता अन्तरिक्ष के रहने वाले गन्धर्व प्रादि और भूमि के निवासी मनुष्य कहलाते थे। सुदूर पश्चिम में असुर लोक की कल्पना थी, और वहाँ के निवासी असुर कहाते थे । पुराणादि वर्धित कई देवासुर सग्राम इनही देवता और असुरों के सम्राम है भारत के निवासी प्रार्यों का मनुष्य होते हुए भी इन भूमिष्ट देवताओंसे बहुत संपर्क था, न केवल इनका वहाँ जाना माना ही था, प्रत्युत विवाहादि सम्बन्ध भी होता था। उस समय का भारतवर्ष भी आज की तरह सकुचित नहीं था, किन्तु हिमालय और विन्ध्य के मध्य के प्रदेश की रेखा पूर्व और पश्चिम ले जाने से दोनों तरफ जहाँ समुद्र मिलता है-वह पार्यावर्त भारत कहाता था। इसलिये जहां से प्रार्यों का पाना आज कल के लोक सिद्ध करते है-वे प्रदेश भारत के अवान्तर प्रदेश थे, वा भारत से सम्बन्ध रखने वाले 'दिव्य' 'स्वर्ग' प्रदेश थे वहाँ भारतियों का गतागत था, किन्तु 'भारत' से पार्थक्य इनका कभी नहीं था । इन बातों का सीमा सहित विस्पष्ट और स प्रमाण निर्देश 'इन्द्रविजय' में है। तक फैले नवीन सभ्यता के लोगों का यह विचार कि यहाँ के प्रादि निवासी दम्यु प्रादि अनार्य और उत्तर प्रदेश से पाकर आर्य लोगों ने इन प्रार्यों को यहा से निकाला था और स्वय यहा निवास करने लगे, इन्द्रविजय काव्य को देखने से प्रतीत होजाता है कि ये बाते यों नहीं किन्तु यों है कि भारतवर्ष के आदि निवासी आर्यलोग यहाँ उत्तर की तरफ हिमालय से बहुत भागे फैले हुए थे किन्तु काल क्रम से सकुचित होते होते माज हिमालय से दक्षिण भाग में निवास कर रहें है। पहिल स ही यहाँ के निवासी हैं न कि उत्तर सपाकर यहाँ बसे है अन्तर इतना ही है कि जहाँ से प्रार्यों का पाना लोग मान बैठे है हम प्रार्य पहिले वहा तक निवास वा गतागत करते थे और धीरे धीरे फैलाव क्रम होकर अाज भारत की सीमा हिमालय तक मानली गई है । यहाँ पर इस विषय का सक्षेप इस कारण लिखा है कि श्री पडितजी महाराज के सिद्धान्तानुसार देवलोक की सीमा प्राड्मेरु ( पामीर ) तक थी। और इस श्री जगद्गुरु वैभव के मूल नायक जो कि उस समय ब्रह्मा कहलाते थे उनका निवासस्थान प्राङ्मेरु के समीप था वह स्थान पुष्कर कहलाता था जिस को प्राज ( बलख बुखारा) कहते है । पुष्कर शब्द काही अपभ्रश पुक्खर होकर बुक्खर और आगे बिगड़कर बुखारा होगया है। श्री जगद्गुरु वैभव इन्हीं ब्रह्माजी की जीवनी का ग्रन्थ है । इन ब्रह्माजी के समय मे जिसको प्राज करीब १५००० वर्ष हुए है, वर्तमान काल में उपलब्ध होने वाले ऋग्वेद सहिता भादि वेद ग्रन्थों का सकलन हुआ है जो आज भी पैसे का वैसा प्राप्त होरहा है। इस बात को कितना समय हुआ यह बात यदि ऋग्वेद सहिता के मत्रों से ही सिद्ध की जा सकै तो कितना अच्छा हो ऋग्वेद सहिता क मत्र के आधार पर इसी ग्रन्थ मे पृष्ठ न० २१ म "प्राग्ज्योतिष पुरे ब्राह्मणोऽवस्थानम्” हैडिग के श्लोक न० १ मे पण्डितजी महाराज लिखते है-- ध्रुवाधस्तात् पृथिवी प्रदेशः सुमेररित्थ प्रतिपत्ति लोका.। ब्रह्माभिजिद्भाधरः प्रदेशः सुमेरुरासीत्तु पुरायुगे स.॥ तात्पर्य यह है कि 'ध्रव' प्रदेश भी घूमता रहता है । अन्य स्थानों की अपेक्षा वह ध्रव है, किन्तु वास्तविक ध्रव तो ससार का कोई प्रदेश है ही नहीं । अस्तु जिस समय जो 'ध्रव' प्रदेश हो उस ध्रव के ठीक नीचे का प्रदेश सुमेरु कहाजाता है । इसके अनुसार जिस समय आकाश का अभिजित तारा 'ध्रव' प्रदेश मानाजाता था उस समय उसके नीचे का प्रदेश मेरु था, वहाँ ब्रह्माजी - . रहते थे। उसका नाम प्राज पामीर ( प्राड्मेरु ) ( पुगने समय का मेरु ) है। और उस समय इन्द्र नाम से जो प्रसिद्ध थे वे वैकुण्ठ इन्द्र थे। उनकी तरफ से जो भारत का शासक (एजेन्ट) था उसका नाम अग्नि था वह इन्द्रका प्रतिनिधि था । यहा पर स्मरण रहै कि प्राध्यात्मिक, प्राधिभौतिक प्राधि- दैविक श्रादि भेद से ये इन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा आदि शब्द भिन्न भिन्न अर्थों के बोधक है । जगत् के मूल- तत्व देवप्राण भी इन शब्दों से कहे जाते है। धु मण्डल के निवामी प्राणिगण भी इन नामो से व्यव- हृत है, तारामण्डल मे भी इन नामों के तारे है । शरीर क इन्द्रिय आदि प्राण भी इन शब्दों क बोध्य है और भूमि के देव सस्था के मनुष्य भी इन ही नामों से व्यवहृत हुए है इन सब प्रकार के इन्द्र, अग्नि प्रादि का परस्पर क्या सम्बन्ध है यह श्री पडितजी महाराज के ब्रह्मविज्ञान प्रादि ग्रन्थों में स्पष्ट निरूपित हुश्रा है यही वेद का मुख्य रहस्य हैं प्रस्तु-प्राकाश के ब्रह्मा के ( अभिजित् ) तारे की तरह सारे भूमण्डल पर जिनकी प्राज्ञा चलती थी उनका नास यहां भी ब्रह्मा रक्खा गया था। ब्रह्माजी विष्णु की नाभि में निकले हुए कमल से उत्पन्न हुए है यह दृश्य प्राज भी प्राकाश में प्रत्यक्ष देखने में प्राता है जिस समय ब्राह्म ( अभिजित् ) ध्रव था, किस २ समय कौन तारा ध्रव माना जाता था और अब जो ध्रव ( उत्तानपाद का तारा ) माना जाता है ये कब से और फिर अाकाश काल चक्र की गति के अनुसार इस समय जो ध्रव १॥ अश पश्चिम की तरफ हटा मालुम देता है फिर किननं दिन मे ठीक ध्रव के स्थान पर भाजायगा । और जिम धरातल मे पृथ्वा है उसक कन्द्रको ज्योतिष- शास्त्र मे कदम्ब कहते है । उसका नाम वेदों में नाक शब्द मिलता है वह ध्रव से २४ अश की दूरी पर है । कदम्ब विष्णु है, ध्रव प्रजापति अर्थात् ब्रह्मा है । इस बार के अन्तर को नाभि कमल की डण्डी कहा गया है । इस डण्डी का समाप्ति पर ध्रव जो हिसाब स आज स १३००० वर्ष पूर्व अगल नकशे मे दिखाई स्थिति के अनुसार था उसका नाम ब्रह्मा था उसको भाज A lyia या Vega का तारा कहत है वही ब्रह्मा था और हस का तारा जा अाज कहलाता है यही ब्रह्माजी का बाहन हस पुराणों में प्रसिद्ध है जिस ममय हस वाल ब्रह्माजी माज जहा ध्रव है वहा पर विराजमान थे उस समय को आज ज्योतिष क गणित से १३००० वर्ष व्यतीत हो चुक है। ठीक उमी समय मनुष्य दहधारी एक ब्रह्मा नाम क पुरुष प्राग्मरु (पामार ) क समीप कान्तिपुरी नाम की नगरी म विराजमान थे और सार भूमण्डल का प्रबन्ध उनन एसा कर रक्खा था कि भाज तक उसका अस्तित्व हे इन ब्रह्माजी क समय मानवजाति याम नाम स प्रसिद्ध थी। और इन ब्रह्माजी क समय म यह जाति मणिजा नाम स प्रसिद्ध हुई। मणिजा जाति भी आज कलके वणाश्रम की तरह चार वर्षों में विभक्त हुई। जिनमें प्रथम साध्य ( ब्राह्मण ) द्वितीय महाराजिक ( क्षत्रिय ) तृतीय प्राभास्वर (वणिक् चतुर्थ तुषित (शद्र ) नाम से प्रसिद्ध थे इनमें साध्यों क १२ भेद थे, महाराजको क १२० और आभास्वरों के ६. और तुषितों के ३६ भेद थे। इस साध्य युग मे बेदों का सकलन हुभा । ब्रह्माजी ने ४ लक्ष प्रन्थ ४ विषयों में सकलन किये । इन ब्रह्माजी ने विद्या ( ज्ञान ) विषय मे देवताओं को ।

- और शिल्प ( हस्तकोशल ) में असुरों को नियुक्त किया । इस दवयुग में विज्ञान विषय की साध्यों की जो गाथाये श्लोक रूप में थी उनका प्राय, लोप होगया। दूसरे द्रुघन, दवों का गजा इन्द्र कहलाता था ये इन्द्र सस्था में १४ है । सव से प्रथम जो इन्द्रामन परे इन्द्र थे उनका नाम वर्म या, तीसरे मर्वहरि चौथे मुष्कवान्, पाचवे वरु छठे स्वरू और मातवें वैकुण्ठ नाम के इन्द्र थे इन ब्रह्माजी के समय वाले इन्द्र बैकुण्ठ नाम क थे। वैकुण्ठ इन्द्रक ममय जो कुछ वृत्त था उस सब का सङ्कलन होकर ऋग्वेद आदि ग्रन्थों का सग्रह इस ही समय हुआ । इस समय को १३००० वर्ष व्यतीत होचुक है । ये समय वो था जब कि ब्रह्मा का तारा ध्रव था। यहा यह लिखना अत्यावश्यक प्रतीत होता है कि प्राकाश के ध्रव कास्थान जो नियत है वह तो ध्रव अर्थात् प्रचल है । किन्तु उस स्थान पर जो तारा रहता है वह चल है अर्थान-ध्रव की गद्दी पर कभी कोई तारा ( नक्षत्र ) रहता है कभी कोई । इसका कारण यह है कि पृथ्वी की भूमध्य रेखा ( विषुवत् रेखा ) Equator जिम सीध मे आकाश में रहती है उसकी सीध में जिस समय सूर्य दीखे उस दिन भारत मे रात दिन काटे तुले बराबर १२ घण्टे के होते है। सूर्य ज्यों २ उत्तर की तरफ बढता है त्यों त्यों दिन मान बढता जाता है । फिर सूर्य के उत्तर की हद पर पहुचने पर चौमामा शुरू होजाता है। फिर प्राश्विन के महीने में सूर्य फिर भूमध्यरेखा की सीध मे पाकर फिर एक बार १२ घटे का दिन और १२ घटे की गत या बगवर कर फिर दक्षिण की तरफ जाने लगता है । जाते २ दक्षिण में जान की हद पर पहुंच जाता है वहा सब दिनों से बडी रात और छोटे से छोटा दिन होता है। उत्तर की अवधिपर जान से सबस बड़ा दिन और सबसे बड़ी रात हुआ करती है। इम दक्षिण की हद की जगह किमी ममय मकरसक्रान्ति थी किन्तु भूमध्य रेखा का भूप्रदेश क्रम से ऊचा हाता जारहा है इस कारण आकाश में भूमध्य रेखा क सीध की जगह प्रति दिन बदल रही है बदलतं बदलते आज उसमें २३ दिन का अन्तर पड़ गया है उदाहरण की रीति पर यों मान लीजिये कि प्राज सूर्य की मकर सक्रान्ति १४ जनबरी को होती है। और प्रत्यक्ष उत्तरायण २२ दिस- म्बर का ही देखन में प्राजाता है । २२ दिसम्बर से १४ जनवरी तक २३ दिन होते है। जब कभी उत्तरायण मकर सक्रांन्ति पर होता था, उस समय मकर संक्रान्ति और उत्तरायण एक थे। वो समय महाभारत के युद्ध का समय था ये स्थान प्रति वर्ष पीछे हटता जारहा है ये ही प्राकाश के तारों की भिन्न २ समय का भिन्न २ स्थिति किस ममय क्या थी इसक भाधारपर प्राचीन ग्रन्थों के सङ्कलन का समय बतलाती है । जिस समय ब्रह्माजी का तारा अभिजित् (A lyra-Vega) ध्रव की गद्दी पर था उस समय में ब्रह्माजी की इच्छानुसार वेदों का सङ्कलन हुआ ये ही इन जगद्गुरु ब्रह्माजी क वैभव का वर्णन इस प्रथ मे है । गणित के द्वारा वह समय प्राज से १३००० वर्ष पूर्व यों सिद्ध होता है कि अभिजित का नक्षत्र जब ध्रव था उस समय भूमध्य रेखा पर हस्त नक्षत्र था । हस्त नक्षत्र अश्विनी स १३वी है भूमध्यरेखा की सीध प्राकाश क किसी एक नक्षत्र की सीध पर १००० वर्ष रहती है ये ज्योतिसशास्त्र का सिद्धान्त है क्योंकि एक नक्षत्र का ( जो कि कुल २७ है) १३ अश २० कला का परिमाण है। यों सारे प्रकाश के पूर्व पश्चिम ३६० अशों को २७ विभागों में विभाजित करने पर एक नक्षत्र १३ अश २० कला का होता है । मकर सक्रान्ति का बिन्दु प्रति वर्ष ५० सैकिण्ड पीछे हटता हेटता १ अश को ७२ वर्ष मे पूरा करता है। इस प्रकार १ नक्षत्र १३ अश को १००० वर्ष मे पूरा कर चुकता है । अश्विनी में हम्त तक १३ नक्षत्र होते है एक नक्षत्र के १००० वर्ष गणित सिद्ध होने से १३ नक्षत्रों का १३००० तेरा हजार वर्ष समय होता है। कला वर्तमान काल में ये भूमध्य रेखा की सीव उत्तराभाद्रपद नक्षत्र पर देखी जारही है। यों उलटी चाल से और भी नक्षत्र ये व्ययन विन्दु पीछे हट चुका है। अर्थात् उन १३००० वर्षों में रेवती के १००० और उत्तराभाद्रपद के १००० यों .... वर्ष और जोड़ देने पर अभिजित् क ध्रव की जगह होने का समय १५... वर्ष ठीक २ मानलिया जाता है । उस समय वाल ब्रह्माजी ने जो कुछ किया उस सबका वर्णन भा ऋक् सहिता में उपलब्ध है। ये हा कारण है कि इन वैदिक ग्रन्थों क सकलन का समय १५००० वर्ष बडी सरलता स समझ मे आजाता है । तिलक महोदय ने अयन विन्दु की स्थिति वेद संग्रह के समय मृगशिर नक्षत्र पर मानी है किन्तु वास्तव में उस समय जिस समय की Vega का तारा ध्रव पर था उस समय सपात विन्दु हस्त नक्षत्र पर था न कि मृगशीर्ष नक्षत्र पर यो ८००० वर्ष का काल तिलक महोदय ने वेद सग्रह का माना था वह श्रीमान् स्वर्गस्थ पण्डितजी महाराज ने आज स १५००० वर्ष पूर्व था ये इस ग्रन्थमें सप्रमाण सिद्ध कर दिखलादिया है इस सम्बन्ध के प्रमाण इस ही ग्रन्थ में तथा इन्द्र विजय मे प्राप्त है। तिलक के वेद काल निर्णय का हिन्दी अनुवाद करते समय मुझे श्रीमान् पडितजी महाराजने स्वय फर्माया था कि उस समयOrion मृगशीर्ष पर न होकर हस्त ( Bntg) पर था और इस प्राधार पर वेद संग्रह प्राज से १५००. वर्षों से पहले का है इस विषय का यहा विशेष निर्वचन करना व्यर्थ प्रतीत होता है इस कारण सरलता से कुछ विषय प्रवेश होजाय उतना ही लिखा है इस सम्बन्ध में स्वतन्त्रप्रथ लिखना उचित होगा इसका कारण इस समय कालमर्यादा के जानन में प्रकाश के तारों की स्थिति का यहाँ प्रकार वा काल निर्णय की युक्ति लिखी है । शतपथब्राह्मण के समय ये सपात विन्दु कृत्तिका-नक्षत्र पर था, क्योंकि कृत्तिका. प्राचीता न च्यवन्ति"ऐसा लिखा है । अर्थात उस समय भूमध्य रेखा की सीध कृत्तिका नक्षत्र पर थी जब ही कृत्तिका ठीक पूर्व में दीखती थी यह काल ३००० वर्ष पूर्व का सिद्ध होता है । इस ही तरह महाभारत के युद्ध के समय यह सपात विन्दु रोहिणी पर था उसका काल ५००० वर्ष सिद्ध होता है । इस ही आधार पर से हस्त नक्षत्र की स्थिति में ब्रह्माजी का होना तथा वैदिक साहित्य का सकलन होना श्राज से १५००० वर्ष पूर्व इस गणित से सिद्ध होजाता है यहां पर वेदों के विषय में यह प्रश्न हो सकता है कि वेद तो अपौरुषेय है उनका क्या समय वो तो अनादिकाल से चले आरहे है इसका समाधान ये है कि अध्यात्मिक प्राधिदैविक, प्राधिभौतिक इस प्रकार से ईश्चरे की सृष्टि ३ प्रकार की है। ये वेद मकलन प्राधि-भौतिक ब्रह्माजी के समय का है । प्राधिदै- विक प्राध्यात्मिक वेद अपौरुषेय है वो अनादि है उन विषयों का पर्यालोचन ऋषिमहर्षियोंने अपने समय किया इस कारण इन ग्रन्यों के सङ्कलन कर्ता ऋषि महर्षि अवश्य ही थे किन्तु जिन अपरुषेय विषयों का वर्णन इनमें प्राप्त होता है इस कारण वह भी अपौरुषेय कहे जाते है पौरुषेय अपौरुषेय का निर्णय इम ग्रन्थ में अच्छे प्रकार से किया गया है वह प्रयक निरीक्षण से ज्ञात होजायगा । इस विषय का विशेष वर्णन यहाँ अनावश्यक प्रतीत होता है केवल दिग्दर्शन मात्र मावश्यक हुमा प्रस्तु- श्री जगद्गुरुवैभवक पढने में इन्द्रविजय का बडा उपयोग है। इस कारण मर्मज्ञ लोग उस प्रन्थ का अवलोकन करके इस ग्रथ को देखेंगे तो बडा लाभ होगा । यद्यपि उसका भाषा मे अभी अनु- वाद नहीं हो पाया है किन्तु प्रमाण वगैरह सब उसमे लिख दिये गये है। उनको उसी ग्रन्थ में देखना चाहिये । यहाँ पर इस भूमिका को विशेष बढाने की आवश्यकता नहीं केवल इतना ही लिखना पर्याप्त होगा कि महाभारत क युद्ध के बाद यह ग्रन्थ ही उस प्राचीन देव युग के वृत्त को बतला रहा है। इस ग्रन्थ को आद्योपान्त पढकर विज्ञ पाठक स्वय अनुभव करेगे। जयपुर सिटी । ज्योतिविद् पं० केदारनाथ शर्मा साहित्यभूपण ता०१-६-४३ जयपुर राजकीय ज्योतिष यन्त्रालयाध्यक्ष ॥ श्रीः॥ दिव्यविभूतिग्रन्थे-जगद्गुरुवैभवस्य विषयतालिका प्रदर्श्यते। १-श्रात्मसृष्टिः, २-वेदसृष्टिः, ३-लोकसृष्टिः, ४-प्रजासृष्टिः ५-धर्मसृष्टिः। विषया १ ... -इतिवृत्तप्रसङ्गः ५-ऐतिह्यसमालोचना २-भारतवर्षीयसभ्यताया-अतिपुरातनत्वात् तद्देशप्रसिद्धेतिवृत्तानामति- प्राचीनत्वम् ३-इतिवृत्तानों पुराणेतिहासाभ्यां वैविध्यम् .. ... ... ३ ... ३ २-पुराणप्रसङ्गः ४ ... ४ .. ... १-सृष्टि विद्यायाः पञ्चधा विभक्तायाः पुराणसंज्ञा २-प्रचलितपुराणग्रन्थानामेकैकस्मिन् सर्वपुराणार्थानां सांकर्यम् ३-विश्वसंस्थाचतुष्टयम् ३–पौसणिकसृष्टिप्रसङ्गः ( वैज्ञानिकैतिहासिकभेदात् पौराणिकसृधिदैविध्यम् ) तत्र प्रथमम् पौराणिकसृष्टिक्रमाधारभूतं वैज्ञानिकसृष्टिप्रकरणम् १-वैज्ञानिकब्रह्मकृतं वैज्ञानिक दृष्टिवैविध्यम् २-वैज्ञानिकब्रह्मकृतं वैज्ञानिकसृष्टिपाञ्चविध्यम् १-ब्रह्मकृता अात्मसृष्टिः प्रथमा ... वेदसृष्टिर्द्वितीया लोकसृष्टिस्तृतीया प्रजासृष्टिश्चतुर्थी यजुषो वेदविशेषा सर्वा दैवतसृष्टयः ... - १२ (२) विषयाः ... ... १२ ... ... ... ब्रह्मत्रयसृष्टिः कुमाराग्नि-चित्राग्नि-पाशुकानिभिर्दशाक्षरविरासृष्टिः ५- ब्रह्मकृता धर्मसृष्टि पञ्चमी १३ वीर्य्यचतुष्टयनिबन्धन चातुर्वर्ण्यम् ३-पौराणिकसृष्टिप्रसङ्गे-ऐतिहासिकसृष्प्रिकरणम् । (ऐतिहासिकस्मृष्टिकाल- विभागप्रसङ्ग.) १-सृष्टयादितोऽद्यावधि वन्ययुग, प्रादित्रेतायुगं दैवतयुगं विद्यमानयुगमिति भेदाद् युगचतुष्टयात्मककालविभागः । २-असभ्ययुगम् (तत्रादियुगस्य असभ्ययुगत्वसंभावना ) ई-मणिजानाख्यानामार्याणां सभ्यतायुगम् १६ ' ( सभ्यतासृष्टिकालस्य प्राथमिकसभ्यतायुगस्य द्वितीययुगत्वम् ) ४-मणिजानां चातुर्विष्यम् (प्रथमसभ्यानां साध्य महाराजिकाऽऽभास्वर-तुषितभेदाद विभाग- चातुर्विध्यम्) (ज्ञानसञ्चयप्रवणाः साध्या द्वादश ॥ १२॥) ( शत्रुविध्वंसप्रवणा महाराजिकाः विशं शतम् ॥ १२० ॥) १७ ( अर्थसञ्चयप्रवणा आभास्वराश्चतुःषष्टि ॥ ६४॥) अपूर्व-प्रतिरूपो भयविध शिल्पप्रवणास्तुषिता षटत्रिंशत् ५-लोकव्यवस्था (प्रथमसम्यानामप्रत्यक्षविषयेषु प्रतिपत्त्यभावः) ६-साध्ययुगीयानि दश विज्ञानानि ॥ १० ॥ १८ ४-ऐतिहासिकसृष्टिकर्तप्रकरणम १-अथ युगान्तरपरिवर्तकस्य ब्रह्माख्यस्यालौकिकविदुषः प्रादुर्भावाद् ब्रह्म सृष्टयुपलक्षित तृतीययुगम् २० २-प्राग्ज्योतिषपुरे ब्रह्मणोऽवस्थानम् ३-कान्तिमत्यां पु• ब्रह्मणः शासनसभा ४-जीवेश्वर सम्बन्धभेदादाध्यात्मिको ब्रह्मा द्वेधा २२ ar ... १८ .. ... २० .. २१ (३) विषयाः पृष्ठः २३ २३ ५-अंक्षध्रुवतारध्रुवभेदादाधिदैविको ब्रह्मा द्वेधा तत्रातर्धवः पृथ्वीध्रवान्तरालवर्ती तारा,वो नाकध्रुवान्तरालवर्ती ६-आधिभौतिकब्रह्मणोऋत्विगब्रह्मा वरणसिद्ध. कृत्रिमः ७-प्रादिकविब्रह्मा प्राग्मेरुस्थः प्रकृतिसिद्धः स्वयंभूः -नरब्रह्मणो दिव्यब्रह्मावतारत्वम् ५-अथ ऐतिहासिकसृष्टिविभागः २५ २७ ... २० ३१ . १-अथ ब्रह्मकता वेदग्रन्थसृष्टि २-प्रचलितवेदप्रन्थस्थार्षेयत्वाद् ब्रह्मकृतवेदग्रन्थाद्भिन्नत्वम् ३-वेदशास्त्रप्रचारबाहुल्यात् साध्ययुगीयानां गाथाख्यानां श्लोकानां देवयुगे लुप्तप्रायता ४-प्रचलितवेदग्रन्थस्य स्वर्गस्थदेवेन्द्रसंगृहीतविल्मग्रन्थत्वम् २६ ५-मन्त्रविषयोल्लेख ६-देवेन्द्रसम्बन्धिप्रचलितवेदग्रन्थे तात्कालिकेतिवृत्त-विज्ञान-यज्ञ-स्तुतिभेदाद विषयचातुर्विध्यम् ७-इन्द्रजीवनचरितमिन्द्रानुनत्यपवतिचरितमित्यादीनि तात्कालिकेतिवृत्तानि ३२ ८-यज्ञस्वरूपं यज्ञसाधनं.यज्ञफलमित्यादयो यज्ञविषया ९-आध्यात्मिकमाधिदैविकमाधिभौतिक चेत्येवं विभक्ता ज्ञातव्यविषया विज्ञानानि १०-यज्ञ-विज्ञानयोः समुच्चयः ११-लोकवृत्त-विज्ञानयोः समुच्चयः १२-यज्ञ-लोकवृत्तयोः समुच्चयः १३-लोकवृत्त-विज्ञान-यज्ञानां समुच्चय' १४-ब्रह्म-विद्या-वेदशब्दानामैकार्थ्यं चानैकार्थ्य च १५-वेदस्य शास्त्ररूपतया विद्यात्वादपौरुषेयत्वं नित्यत्वं च १६-अमृत-मर्त्यभेदेनवाचोद्वैविध्यादमृतवाङ्मयस्य वेदस्याप्यपौरुषेयत्व नित्यत्वंच३८ १७-वाचां ग्रन्थस्य पुरुषप्रयत्नसाध्यत्वादनित्यत्वं पौरुषेयत्वं च ३८ .. . ३५ .. ३८ (४) - विषयाः १५-मनुष्यब्रह्मणा प्रणीतस्य वेदग्रन्थस्यापि पौरुषेयत्वापौरुषेयत्वाभ्यां व्यवस्था ३८ २६-चाचो नित्यापौरुषेयत्वेऽपि तद्ग्रन्थस्य पौरुषेयत्वमनित्यत्वं च ३३ २०-वैज्ञानिकवेदस्यापौरुषेयत्वं नित्यत्वं च २१-प्रकारान्तरेण पौरुषेयत्व विचारः (आध्यात्मिकवाचश्चतुः कक्षत्वे प्रतिपन्ने प्रथमाया अपौरुषेयत्वमन्यासां ... . पौरुषेयत्वं च ) ... अथ प्रजासृष्टिः ४२ ... ४२ . ४३ ४४ ४५ ४६ ... ४६ १-सूर्यसंवत्सरस्याखिलसृष्टिप्रवर्तकसर्वविधप्राणजनकत्वम् २-दशधा विभक्तानां ऋषिनिकायभेदानां क्षरसृष्टौ मौलिकधातुत्वम् २-ऋष्यादिस्वरूपपरीक्षार्था ब्रह्मपर्षभेदा अवरब्रह्मणां स्थानानि ४-सप्तधा विभक्तानां पितृनिकाय भेदानां क्षरसृष्टौ द्वितीयधातुत्वम् ५-पञ्चधा विभक्तानां देवनिकायभेदानां क्षरसृष्टौ तृतीयधातुत्वम् ६-त्रेधा भिन्नस्याग्नेदे॒धा भिन्नस्य सोमस्य च लोकपालदेवत्वम् ७-आवरक-संवरक-संकोचकादिप्राणविशेषाणां देवविरोधिनामसुरत्वम् ८-गन्धर्वादयो देवयोनयो नागादयस्तिर्यग्योनयः ६-देवा असुरा पितरो गन्धर्वा मनुष्या इति पञ्चविधा अनभस्या नभस्या वा संचारिदेवाः •-गवायुषोः प्रपञ्चस्येहानपेक्षितत्वादन्यत्रोपव्याख्यानम् ११-अधिदैवताध्यात्मसादृश्येनाधिभूतव्यवस्था क्लप्तिः १२-प्राणविधर्षिद्रष्ट्रणामपि प्राणसमानतया विद्वद्विशेषाणां महर्षित्वं भृग्वादित्व च १२-जन्मना विद्यया च वंशद्वैविध्याद् ऋषीणां भृग्वादीनां विद्यया वंशधरत्वाद ब्रह्मपुत्रत्वव्यवहारः १३-ऋषिभ्यो जातानां पितृनिकायभेदानां सप्तावान्तरभेदाः १४-पितृभ्यो जातानामसुरनिकायभेदानां बहवोऽवान्तरभेदाः १५-देवानां दशविधासु जघन्यजातिषु देवयोनिशब्दः १६-देवमनुष्ययोरन्तराभवसत्वविशेषाणां तिर्यगयोनित्वव्यवहारः १७-ऋषि-पितृनिरपेतं नरजातीनां पुनः प्रकारान्तरेण पञ्चकृष्टित्वव्यवस्था ... ४८ ... ४६ ४६ (५) विषयाः पृष्ठः १८-देवादिपञ्चकृष्टीनां मनुष्यत्वाविशेषेऽपि तेषामेकस्मिन् विशेषेऽपि वैवस्वत- मनुप्रजात्वनिबन्धनं पारिभाषिकं मनुष्यत्वम् १६-साध्यादिसभ्यसमाजस्य प्राग्धर्मत्यागपूर्वकं ब्रह्मदीक्षया चैदिकधर्मे प्रवेशः ५१ २०-प्राम्युगीयनरजातिषु देवासुरसमाजयोः प्राधान्यम् ... अथ लोकसृष्टिः - .. ... ... .. ... ... १-साध्ययुगीयलोकव्यवस्थात प्राम्भिन्ना ब्रह्मयुगीया लोकव्यवस्थाक्लप्तिः २-तत्रादौ जगत्यात्रेधा विभागाः ३-सौरी लोकव्यवस्था ४-प्रायी लोकव्यवस्था ५-मानसी लोकव्यवस्था ६-दिव्यत्रिलोकी ७-गुहात्रयी देहत्रिलोकी ८-त्रैधातची कूर्मत्रिलोकी ६-द्यावापृथिव्यात्मकस्य कूर्मशरीरस्य वसुधानकोशत्वम् १०-कूमत्रिलोक्यां द्यावापृथिव्योः श्रुत्युक्तं लक्षणम् ११-द्यावापृथिव्यो पुराणोक्तम्य प्रमाणसाम्यत्य प्रतिषेधः १२-भिन्नपिण्डत्रिलोकी उदूढत्रिलोकी १३-साहस्रत्रिलोकी १४-पिण्ड-भक्ति-त्रिलोकी १५-ध्रुव-त्रिलोकी नाक-त्रिलोक्यौ १६-(मानुषी लोकव्यवस्था ) भौमत्रिलोकी १७-मेरुमूला त्रिलोकी १८-पृथिव्यामुत्तराखण्डे द्यौ स्वर्गः (दिव्यत्रिलोकी-भौमत्रिलोक्यो साम्य वैषम्ये ) १६-ध्रुवभ्रमणात्-मेरुप्रदेशभेदः .... २०-कालभेदेन ध्रुवस्थितिभेदः २१-नाक-वयोर्विष्णु-ब्रह्मणोर्दूरत्वस्थान्यान्यत्वस् ... .. ... ... ... ... ... ५६ ... ... ६० ... ६ ६१ ६२ (६) विषयाः पृष्ठः ... ६२ ... ... ... . ... ... .. ६४ ६५ w w ६५ o w w ... ६७ ६७ ... २२-अभिजित्परिक्रामिणः सूर्यस्याभिजिद्भाद् दूरगतम् २३-सूर्य्यस्याभिजिद्भाद् दुराभिगमने विपत्तिपत्तिः २४-प्रागमेरु समीक्षा २५-पामीरशब्द समालोचना २६-अत्युच्चत्वात् पामीरे "तारतार" शब्दः २७-पुराणेतिहासादिषु मेरुशब्देन प्राग्मेरोरेव ग्रहणस् २८-प्रागमेरौ देवपुरीपरिवृता ब्रह्मपुरी २६-प्रागमेरौ गङ्गावतरणम् ३०-परमेष्ठिलोकादयां सौर ब्रह्माण्डअवतारक्रमात् मेरो चतुर्गङ्गभावः ३१-सीता पूर्ववाहिनी ३२-भद्रोत्तरवाहिनी ३३-यनु पश्चिमवाहिनी ३४-अलकनन्दा दक्षिण वाहिनी ३५-भागीरथ्या गङ्गया दिवि ब्रह्मणस्पते: संचार ३६-भूमौ बिन्दुसरसस्तत्प्रचार. ३७-आदिगङ्गायाः सप्तस्रोतस्त्वभावः ३८-भागीरथ्या गङ्गायाः सप्तस्रोतस्त्वभावः ३६-सप्त कुलपर्वताः ०-अष्टदिनु विततानि वर्षविभागेनाष्टौ पद्मपत्राणि ४१-प्रकारान्तरेण चत्वारि पद्मपत्राणि ४२-इलावृतसीमागिरयः ४३-उपसंहारः अथ धर्मसृष्टिः ... ... ६८ ... ... ... .. ... ७२ .. ७३ ... ७३ ७३ .. ... .... * इति शुभम् * * श्रीहरिः * जगद्गुरुवैभवम् १-इतिवृत्तप्रसङ्गः । ऐतिह्यसमालोचना। ये कोविदाः केचिदिहेतिहासप्रमार्गणे सम्प्रति सप्रयत्नाः। प्रवृत्तिरासन्नतरेतिहासेष्वेवानुसन्धानकृतेऽस्ति तेषाम् ॥१॥ अन्येषु देशेषु न चोन्नत्तिः प्राक् चतु सहस्रावधिवर्षगात् । आसीत् ततस्तेषु न चेतिहास ग्रन्थाः पुराणाः वचनोपलभ्या ॥२॥ अतस्त आसन्नतरस्य कालस्यैवेतिहासे कुशला भवन्ति । चतुःसहस्रावधिवर्षपूगात् प्रत्नेतिहास तु न ते विदन्ति ॥ ३॥ मुद्रा-शिला-लेखन-दान-पत्र-प्रशंसनग्रन्थकथादिरूपम् । प्रमाणसामान्यमिहोपलब्धं यत्किञ्चिदेतैरनुसन्दधद्भिः तत्सर्वमक्तिनमेव तेषां चतुःसहस्रावधिवर्षपूगात् पुरातनं त्वस्ति न चोपलभ्य कालेन तस्यातिशयेन नाशात् ॥ ५ ॥ तत्र स्वबुद्धया परितर्कयद्भिस्तर्कानुसन्धानविधासु दोषात् । भूयाननर्थ. प्रतिपाद्यते तैः क्वचिन्न मान्यं मतमस्ति तेषाम् ॥६॥ अद्यप्रभृत्याचरितं पुरस्ताश्चतुःसहस्रावधिवर्षपूगे यथा वभूवेह तदेव तेषामस्तीतिहास सुविमर्शयोग्यः ॥७॥ ततस्तु पूर्व यदभूचरित्रं न तत्र तेषामनुयाति दृष्टिः। ते षट्सहस्राब्दगणात् पुरस्ताद् विश्वस्थितिं हन्त न भावयन्ति ॥८॥ एतद्धयवैज्ञानिकमस्त्यमीषां मतं तु तद् बालकभाषितं नु । यदाहुरेतेऽन्दसहस्रषट्कादेवोदयं विश्वमिदं प्रयातम्

२
* जगद्गुरुवभवम् *
यच्चाहुरन्ये खलु भारतेऽस्मिन् पूर्व वसन्तिस्म चिरादनार्याः ।
अथोत्तरादेत्य तु केचिदार्या निहत्य तानत्र परं न्यवात्सुः॥१०॥
इत्युक्तमेतन्मतमस्त्यसारं प्रमाणमर्थेऽत्र न किंचिदस्ति।
इहोत्तराद्दम्यव ागतास्ते जिता अनार्या युधि भारतीयै ॥ ११ ॥
यदा तु युद्धं तदभूत् तदानीमासीदिदं भारतबर्षमग्र्यम् ।
विद्यासु वीर्येषु धनेषु नायः समा कचासनिह भारतीयैः ॥ १२॥
तत्रेन्द्रयुद्धे विजयो यथाऽभूदार्यस्य तद्वर्णितमत्र वेदे।
इहापि तहिव्यविभूतिचर्चाप्रसङ्गत स्यादनुवर्णनीयम् ॥ १३ ॥
भारतवर्षीयसभ्यताया अतिपुरातनत्वात् तद्देशप्रसिद्धेतिवृत्तानामतिपाचीनत्वम् ।
इयं तु सृष्टिबहुपूर्वकालात् प्रवर्त्तमानास्ति पुरापि लोकाः।
सभ्या भवन्तिस्म ततस्त्वमीषामपीतिहासाः सुविमर्शयोग्याः॥१॥
चतुःसहस्रावधिवर्षपूगात् पुरायुगेऽत्युन्नतवृत्तमासीत्
देवादिदं भारतवर्षमागादर्वाग्युगे चावनति क्रमेण
वाणिज्यमासीद् बलवीर्यमासीद् विद्या-कला-शिल्पविधानमासीत् ।
अत्युन्नता सत्यविचारपूर्णा तत्रेतिहासावलिरुन्नताऽऽसीत् ॥३॥
विज्ञायते भारतवर्षसभ्यता पुरातनी सर्वजगद्गुरुत्वतः ।
अत्रैव देशे प्रथमप्रवर्तित निर्वक्ति शास्त्रं मनुजस्य सभ्यताम् ॥ ४॥
यथोदितं तत्र च वेदशास्त्रे मनुष्यलोकस्य चरित्रमण्यम् ।
ततो विरुद्ध तु वदन्ति येऽन्ये तदस्ति हेयं नहि तत्र सत्यम् ॥ ५ ॥
अथापि विभ्रान्तधियोऽद्य धीरास्ते भारतीयादितिहासशास्त्रात् ।
पुरायुगीयार्यजगञ्चरित्रं न हन्त गृह्णत्यनृतं वदन्तः ॥६॥
आश्चर्यमाश्चर्यमिदं यदेते विचारशीला अपि विद्वदग्र्याः ।
क्षुद्रानृतप्रायचरित्रलेखेष्वास्थां दधाना निपतन्ति सत्यात् ॥७॥
हन्ताद्य पश्यामि पुराविदानां चतु.सहस्रावधिवर्षपूगात् ।
अर्वाञ्च एव त्वखिलेतिहासग्रन्था अमीषां प्रतना न सन्ति ॥ ८॥
किन्त्वीक्ष्यते भातवर्षभूमौ चतु सहस्रावधिवर्षपूगात् ।
पुरातनं वास्तवलोकवृत्तं श्रद्धाहमायश्चिररक्षितं तत् ॥ ६ ॥
तत्रापि दृष्टिः प्रणिधीयतां ज्योक् समीक्ष्यतां तत्समयव्यवस्था ।
वैज्ञानिक धार्मिकनैतिकाम्यं सामाजिक प्राक्तनलोकवृत्तम् ॥ १०॥

* जगद्गुरुवैभवम् ।
ब्रह्मा तु विज्ञानगुरु पुरासीन्मनुमहीशासनसूत्रधारः ।
राजा पृथुर्नीतिविधानदीक्षापालस्त एते महिमानमापुः॥ ११ ॥
अद्यापि विज्ञानमिह प्रवर्तते प्रवर्तित ब्रह्मधियैव वेदतः ।
धर्मस्वरूपं मनुना प्रवर्तितं प्रवर्तते सांप्रतमप्यशेषतः ॥ १२ ॥
अद्यापि भूशासननीतिपद्धतिम्तथा यथाऽऽसीत् पृथुना पुरा कृता ।
त्रयोऽप्यमी भारतवर्षसभ्यताप्रचारमूलप्रभवा इहाभवन् ॥ १३॥
सिन्धोर्नदात् पश्चिमदिश्यसौ पुरा ब्रह्माऽग्रहीजन्म तु पुष्करे पुरे ।
हिरण्यश्रृंगे स उवास पर्वते यमद्य पामीर इति ब्रवन्ति हि ॥ १४ ॥
मनुःस्वयम्भूरथ ब्रह्मविष्टपे न्युवास काकेशस नाम पर्वते ।
कृत्वा व्यवस्थांच पृथुः समाजगां प्रचारयामास तथाद्य वर्तते ॥ १५ ॥
नासीत् तदानीं स तुरुष्कदेशस्तवर्षयः स्मायंगणा वसन्ति ।
त्रिविष्टपस्वर्गगतः स आसीत् प्रान्तम्तदा ब्राह्मविभागभुक्तः ॥ १६ ॥
अथान्य आसीत्तु मनुर्द्वितीयकोऽयोध्यापुरीमध्यवसत् स भारते ।
कृत्त्वा व्यवस्थां च पृथुः समाजगां प्रचारयामास तथाद्य वत्तते ॥ १७॥
चतुःसहस्रावधिवर्षपूगात् पुरातनं चारु जगच्चरित्रम् ।
शुश्रूषवस्त्वाकलयन्तु यत्नाद् वेदान् पुराणोपचितेतिहासान् ॥ १८ ॥
यद्वै महाभारततः पुरातनं चरित्रमासीदपि दैवते युगे ।
तत्पञ्चसु ख्यातिषु वंशयोगतो निरूपितं तत्र हि तद् विमृश्यताम् ॥ १६ ॥
इतिवृत्तानां पुराणेतिहासाभ्यां वैविध्यम् ।
विज्ञानशास्त्रे प्रतिपादनीये लोकेतिवृत्तस्य भवत्यपेक्षा ।
तच्चेतिवृत्तं द्विविधं पुराणेतिहासभेदात् प्रवदन्ति वृद्धाः॥ १॥
यद् विश्वसृष्टेरितिवृत्तमासीत् पुरातनं तद्धि पुराणमाहुः ।
यच्चेतनानां तु नृणां चरित्रं पृथक् कृतं स्यात् स इहेतिहासः ॥२॥
विज्ञानशास्त्रे तु निरूपणीये तयोर्द्वयोरेव भवत्यपेक्षा ।
तस्मात् पुराणं प्रथम प्रदश्येतिहासमप्यत्र निदर्शयिष्ये ॥३॥
आसीत् पुरा देवयुगेऽमराणां विज्ञानदृष्टिर्जगतोऽस्यसृष्टौ ।
यथा तथा दर्शयितुं प्रवृत्तो वक्ष्यामिदैवीं स्थितिमत्र किञ्चित् ॥ ४॥
इतिवृत्तप्रसङ्गः ॥१॥

* जगद्गुरुवैभवम् । २-पुराणप्रसङ्गः। * सृष्टि विद्याया. पंचधा विभक्तायाः पुराणसंज्ञा । अनाद्यनन्तं यदिदं प्रदृश्यते विश्व विचित्र बहुरूपमद्भुतम् । कदा कथ वा तद्भूत् कुतः कुतस्तदित्थमने बहुभिर्विचारितम् ॥१॥ तद् विश्वसृष्टेबहुधा निरूपणं पुरातनं यत्कृतमादिसूरिभिः । सा सृष्टिविद्येह पुराणसंशया ख्याता विभक्ता बहुधा च पञ्चधा ॥२॥ ३ त्रैलोक्यविश्वविद्या ज्योतिश्चक्रं च भुवनकोशश्च २ ५ ॥३॥ चाखाताः। प्रासङ्गिकं च वंशावली, पुराणं तु पञ्चविधम् या विश्वसृष्टिविद्या साऽष्टादशधा परिच्छिन्ना सृष्टिपरिच्छेदानां पुराणसंज्ञा पुराणत्वात् ग्रहनक्षत्रज्ञानं ताराविज्ञान-गोलविज्ञाने स्मारकचरित्रक्लप्तिज्योतिश्चक्रं खगोलविद्याऽस्ति वर्षविभागो गिरि-चन-समुद्र-नद्यः सरांसि नगरस्थानावासा भूमितिरित्थं च भुवनकोशोऽस्ति ३ आख्यानोपाख्याने गाथा अथ कल्पशुद्धिश्च प्रासाङ्गिकं चतुर्धा प्रश्नसमाधिप्रसङ्गतोऽधीतम् श्रौतः स्मार्तः समयश्चाचारो धर्मभेदास्ते नानोपासनभेदा दर्शनभेदाश्च कल्पशुद्धिरिह स्वायंभुवादिषण्मनुवंशा वैवस्वतो वंशः सूर्याग्निचन्द्रवंशा उक्ता वंशावलिग्रन्थे १ २ ॥८॥ ६ ॥१०॥ ब्रह्मा पनं विष्णुर्वायुश्चापश्च नारदश्चेति षट्कं सृष्टेरुक्थं ब्रह्मादीनां परं परं तूक्थम् १० त्रैगुण्यमग्निसूर्यो ब्रह्मविवत्तोंऽन्य उक्थमतभेदाः प्रकृतेरनेः सूर्यात् सृष्टिरिय ब्रह्मणो विवों वा 8 * जगद्गुरुवैभवम् * १२ लिङ्ग वराह-वामन कुमार-काश्च मत्स्यश्च । एते षट् त्ववताराः सन्ति विराजोऽनु सृष्टिविधाः ॥ १२॥ संचरतः प्रतिसंचरकर्मार्थोत्क्रान्त्यनुत्क्रान्ती अपि संपराय विद्या गरुडपुराणे पुनर्जन्म विश्वस्य रूपमस्ति ब्रह्माण्डं, तस्य यादृशी संस्था ॥३॥ तत्र यथा ये लोकास्तदिदं सर्व पुराणेऽन्त्ये ॥१४॥ एवं पुराणमेकं कृष्णद्वैपायनेन संग्रथितम् वेदग्रन्थादुधृतमष्टादशखण्डतः परिच्छिन्नम् प्रचलितपुराणग्रंथानामेकैकस्मिन् सर्वपुराणार्थानां सांकर्यम् । पौराणसंहिता सा सूतेनासीत् प्रचारिता लोके तिस्रोऽन्यसंहिता अपि शिष्यैः सूतस्य निर्मिता अभवन् ॥ १॥ पौराणिकस्तु सूतः स रोमहर्षण इति श्रुतस्तेन सप्त पुराणग्रन्थाः षट्संवादिप्रकारतो रचिताः ॥२॥ उग्रश्रवास्तु सौति पुनर्द्वितीयं व्यधाच्चतुर्थ च अपि पञ्चमं स चक्रे शेषपुराणानि चाष्टमादीनि तस्मात् पद्मपुराणं द्विविधं द्विविध चतुर्थ च द्विविधं च पञ्चमं तच्छेषाणां ग्रन्थ एकैकः प्रश्नानुसारतस्तु ग्रन्थेष्वेषु प्रवर्त्तमानेषु अन्यपुराणार्था अपि सर्वे सर्वत्र सन्ति संकीर्णाः एतत् पुराणशास्त्र ह्युपजीव्यं सर्वशास्त्राणाम् वेदानामपि वेदं पुराणमितिहासमप्याहुः वेदः शास्त्रं तदिदं कदाऽभवत् कोऽत्र वा विषयः । केन च निम्मितमेतज्ज्ञानं शास्त्रस्य शास्त्रं स्यात् ॥७॥ प्रत्यर्थ या भातिा चास्तिः सोपलब्धिरपि वेदः स कदा कथमभवद्वा तज्ज्ञानं वेदवेदः स्यात् सन्ति पुराणसमीक्षाग्रन्थे विशदं प्रदर्शिता एते सर्वे विषयास्तस्मिन् दृश्यन्तामिह तु संक्षेपः - ॥४॥ - ॥५॥ ॥८॥ ॥8

* जगद्गुरुवभैवम् *
विश्वसंस्थाचतुष्टयम् ।
इह तावदाधिभौतिकमस्ति खलु ब्रह्मचरितमालोच्यम् ।
तदुपोदलकतयैवाधिदैविकं ब्रह्मचरितमाकलये
१ २३
यद् दृश्यते विश्वमिदं तदेतत् पिण्डाण्डभूमक्रमतस्त्रिधाऽस्ति ।
एथ्वी प्रतिष्ठात्र पशुद्रुजन्तुग्रामस्तदित्यं द्विविधोऽस्ति पिण्डः ॥२॥
ततश्चतुःसंस्थमिदं हि विश्व भूमाण्डभूपिण्डशरीरपिण्डैः ।
प्रात्मा चतुर्धाऽस्ति ततोऽनुपाख्यो हिरण्यगर्भोऽथचधिष्ण्यहृद्यौ॥३॥
यो दैहिकस्तेजस एष हृद्यो धिष्ण्यास पृथ्व्यादिषु योऽन्तरस्थः ।
हिरण्यगर्भोऽण्डगतोऽस्ति सूर्येऽव्ययोऽनुपाख्यो विरजो धुपृष्ठे ॥४॥
पिण्डे शरीरे हृदयस्थ प्रात्मा धातून सृजत्यस्थिपलासृगादीन् ।
एवं पृथिव्या अपि नभ्य प्रात्माधातून सृजत्यम्रकगन्धकादीन् ॥ ५ ॥
ब्रह्माण्डनभ्यो रविरेष प्रात्मा ज्योतिश्च गामायुरुताण्डघातून् ।
यथा सृजत्येवमसावनन्तः सूर्यक्षमेन्दुप्रभृतीन् ससर्ज
सृष्टिश्च तत्र प्रतिसृष्टिरेवं पुनः पुनः संभवति स्वभावात् ।
प्रत्यर्थभेदाद् प्रतिसूर्यभेदाद् व्यष्टया समष्टया प्रलयोदयौस्तः ॥७॥
इति पुराणप्रसङ्गः ॥२॥

* जगद्गुरुवैभवम् * ३-पौराणिकसृष्टिप्रसङ्गः। (वैज्ञानिकैतिहासिकभेदात् पौराणिकसृष्टिवैविध्यम्) तत्र प्रथमम् पौराणिकसृष्टिक्रमोधारभूतं वैज्ञानिकसृष्टिप्रकरणम् वैज्ञानिकब्रह्मकृत वैज्ञानिकसृष्टित्रैविध्यम् । संपद्यते ब्रह्मत एव सृष्टिोऽभूद् भवत्यद्य भविष्यतीति ब्रह्मास्त्यसौ प्राणविधोऽधिदैव भूमौ मनुष्यस्तु गुरुः स पासीत् ॥ १ ॥ १ २ ३ ब्रह्माऽधिदैवं सृजति त्रिधा पृथक् स मानसी स्थानवती च मैथुनीम् । ये होकविन्दौ बहवः सहस्थितास्ते मानसा भूत गुणादयो यथा ॥२॥ एकाश्रिते खे न यदा परस्थितिस्तस्यापसारेत्र परस्थितिर्भवेत् । स्थानाभिमानी स पदार्थ उच्यते यथा पृथिव्यम्बुसमीरणादयः ॥ ३ ॥ द्वयोस्तु योगादुपमृद्य तद्वय यदा तृतीयं किमपि प्रजायते सा मैथुनीसृष्टिरिमे यथा नरा ये योनिजाः केचिदयोनिजा अपि ॥४॥ तथा चोक्तं पुराणे- "अग्रे ससर्ज वै ब्रह्मा मानसानात्मनः समान् । सनन्दनं च सनक विद्वांसं च सनातनम् ॥ विज्ञानेन निवृत्तास्ते वैवर्तन महौजसः । सबुद्धाश्चैव नानात्वादपविद्धास्त्रयोऽपिते ॥ असृष्ट्वैव प्रजासर्ग प्रतिसर्ग गताः पुनः । तदा तेषु व्यतीतेषु तदान्यान् साधकांश्च तान् ॥ मानवानसृजद् ब्रह्मा पुनः स्थानाभिमानिनः । प्राभूतसंप्लवावस्थानामतस्तान्निबोधत आपोऽग्निः पृथिवीवायुरन्तरिक्ष दिशस्तथा । स्थानाभिमानिनः सर्वे स्थान्याख्याश्चैव ते स्मृताः ॥ ( वायु पु०१ पादे ६ अध्याय) %D * जगद्गुरुवैभवम् + "ततः सर्गे एवष्टब्धे सिसृक्षोर्ब्रह्मणस्तु वै । मिथुनानां सहस्रं तु सोऽसृजद्वै मुखात् तदा॥ ततः प्रभृतिकल्पेऽस्मिन् मिथुनोत्पत्तिरुच्यते" ॥ (वायु० ८ अध्याय) ॥ "शब्दादिविषया. शुद्धाः प्रत्येकं पञ्चलक्षणाः । इत्येवं मनसा पूर्व प्राक्सृष्टिर्या प्रजायते गन्धर्वाद्याः पिशाचान्ता मानुषा ब्राह्मणादयः। पशवः पक्षिणश्चैव स्थावराः ससरीसृपाः" ॥ (वायु० ७ अ० ४०श्लो० ) इत्युक्तेश्चतुर्दशयोनिषु मनुष्ययोनेरूर्ध्व गन्धर्वाख्यदेवयोनिरस्ति । ते देवयोनय- श्चन्द्रमसो रश्मिमाश्रित्याध ऊर्ध्व संचरन्ति । ते चाष्टाविंशेन्द्रिया भवन्ति । तुल्यं युगसहस्रस्य नैश कालमुपास्य सः शर्वर्य्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात् ॥ ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन् वायुर्भूत्वा तदाचरत् । स तु रूपं वराहस्य कृत्वाप प्राविशत् प्रभुः ॥ उद्धृत्योर्वीमथाद्भयस्तु अपस्तासु स विन्यसत् ॥ ( वा०पु० पूर्वा ८ अ. १ श्लोक) इति वैज्ञानिकष्टिवैविध्यम् । वैज्ञानिकब्रह्मकृतं वैज्ञानिकसृष्टिपांचविष्यम् । आत्म-वेद-लोक-प्रजा-धर्मविषयतया सृष्टि पञ्चधा। एकोऽस्त्यनन्तो यदि वा चतुर्धा ब्रह्माखिलो वेदचितः स भाति । तेष्वेषु वेदाः स्युरपौरुषेया निश्वासरूपाः परमेश्वरस्य ॥१॥ * मानसी सृष्टि-शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादय. । स्थानी सृष्टि-पृथ्वी-जल-तेजो-वाय्वाकाशादय । मैथुनी सृष्टि-चतुर्दशविधो भूतसर्ग. 1 (सत्वविशाला अष्टौ, रजोविशाल एक., तमोविशाला. पञ्च ) [देवा-ऊर्ध्वसर्ग], [मनुष्या मध्यसर्ग ], [तिर्यञ्च =मूलसर्ग.]

* जगदगुरुवभवम् । ** ब्रह्मा स्वयंभूश्च विराट् च सृष्टिं वैराज प्रात्मा च पृथग् विधत्ते । तत्रान्तरन्तः क्रमसिद्धसृष्टौ सृष्टिविषूची सह संनिधत्त ॥२॥ स आत्मसृष्टिं स च वेदसृष्टिं सहैव लोक-प्रजयोश्च सृष्टिम्। स धर्मसृष्टिं विदधे विधाता लोके प्रजावेदधृता सधर्मा ॥३॥ तत्रादौ ब्रह्मकृता आत्मसृष्टिः प्रथमा। एकैक वीर्योपचयात् पृथम्वत् तत्रस्तु सर्गाः प्रथमा बभूवुः । १ यो ब्रह्मचीर्योपचितस्वरूपो ब्रह्माद्य एषोऽव्ययसज्ञ प्रात्मा ॥१॥ + २ यः क्षत्रवीर्योपचितस्वरूपो ब्रह्मा द्वितीयोऽतर संज्ञ प्रात्मा । ३ विडाख्यवीर्योपचितस्वरूपो ब्रह्मा तृतीयः घर एष आत्मा ॥ त्रिपूरुषो जायत एक प्रात्मा स चाशरीरोऽथ ततःशरीरी । त्रिधास्ति जीवेशपरेशभेदात् पूर्वे परत्राङ्गतया निविष्टा. ॥३॥ स्वत. प्रकाशा. परतः प्रकाशा गतप्रकाशा अपि चेशदेहाः । ससंज्ञकावान्तरसंशका वा निःसंज्ञकाः सन्ति च जीवदेहा.॥४॥ आत्मचतुष्टये प्रत्येकमवान्तर सर्गाः । हृद्योऽथ धिष्ण्योऽथ हिरण्यगर्भः परोरजाश्चेत्यखिलोऽयमात्मा। त्रिपूरुषः स्यात् प्रतिपूरुषं च प्रजायतेऽवान्तरधातुसर्गः ॥१॥ x४ ३ २ १ * स्वयभू ब्रह्मा आधिदैविक., विराड्ब्रह्मा आध्यात्मिकः, वैराजोब्रह्मा आधिभौतिकः । १ २ ३ . + ब्रह्मवीर्यों ब्रह्मा अव्ययात्मा अशरीर , चत्रवीर्यो ब्रह्मा अक्षरात्मा, विड्वीर्यो ब्रह्मा क्षरात्मा ॥ १ परमेश्वर शरीरी। ईश्वर' शरीरी-स्वज्योति परज्योति,, अज्योति.। ३ जीवः शरीरी-ससज्ञ , अन्तसज्ञ, असज्ञ । - १-परोरजा ब्रह्मा लोकातिग, २-हिरण्यगर्भोऽण्डब्रह्मा सूर्ये, ३-धिष्ण्यो भूपिण्डब्रह्मा भूमौ, ४-हृद्य शरीरपिण्डब्रह्मा-इति ज्ञेयम् ।

१० * जगद्गुरुवैभवम् , आनन्द-विज्ञान-मनांसि वाक् च प्राणश्च तत्राव्ययधातवःस्युः। ब्रह्मा तथेन्द्रोऽथ च विष्णुसोमाग्नयश्च तत्राक्षरधातवःस्युः त्रयः क्षरास्तत्र शरीरभेदाः स्थूलश्च सूक्ष्मोऽपि च कारणं च । प्रजाश्च वित्तानि च तेषु भूयश्चतुर्विधा उत्तर सृष्टयः स्युः ॥३॥ य प्रात्मसर्गाश्च शरीरिसर्गाः शरीरसर्गाश्च बभूवुरेषाम् ब्रह्मैक प्रात्मा प्रभवः प्रतिष्ठा परायणं वेदमयस्वरूपः य एष प्राधः परमेश्वरोऽयं भूमैष नैको नियतोऽस्य देशः । परोरजास्त्वीश्वर एष तिष्ठत्येकत्रिलोकातिगतो धु पृष्ठे ॥५॥ अथ ब्रह्मकृता वेदसृष्टिद्वितीया । योऽपौरुषेयाँश्चतुरोऽपि वेदान् ब्रह्मा त्रिलोकाति गतो विभर्ति । स हण्डपिण्डेषु निधाय वेदं व्यधाश्चतुर्धा तमृगादिभेदैः ॥ १॥ यत्रस्थितां काञ्चनमूर्तिमीक्षे चक्षुर्न नस्तां स्पृशतीह देशे । किन्त्वागतां दृक्पटलेऽन्यमात्रां गृह्णाति तां, दिक्षु तता ऋचस्ताः ॥२॥ मूर्त्यङ्गपृष्ठात् परितोऽतिदूरे तन्मूर्तिदृक् क्षेत्रजवृत्तपृष्ठम् । समांशमस्त्यंशवितानतस्तत् पृष्ठानि सामानि वितानितानि ॥३॥ पृष्ठद्वयान्तः स्तृतयोः समन्तादृक्सामयोरच्युतयोरुपस्थे । नाभेः प्रधिं योऽग्निविधः, प्रधेर्यो नाभिं गत सोमविधो, यजुस्तत् ॥ ४॥ आपो हि भृग्वङ्गिरसो स्वरूपं भृग्वाङ्गिरोरूपमथर्ववेदः । वेदास्त्रयः सन्ति तदन्तरैते भृगूनिमाङ्गिरसः श्रितास्युः॥ ५ ॥ च च सामाग्निमथर्वरूपं सृष्ट्वा ससर्बोत्तरसृष्टि मग्नेः । भूतानि देवाश्च तदन्तरात्मा सैषा त्रिधाग्नेर्यजुषोऽस्ति सृष्टिः ॥ ६ ॥ अथ ब्रह्मकृता लोकसृष्टिस्तृतीया । वेदो मनः प्राणभृताऽमृता वाक्, तद् व्योम तत्रैव समस्तमस्ति । न शून्यमाकाशमपित्वशेष व्योमाश्रित लोक्यत एष लोकः ॥१॥ - अव्यय आनन्द , विज्ञान, मन, प्राणः, वाक् । अक्षर ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र, अग्नि, सोम । क्षर कारणशरीर, सूक्ष्मशरीर, स्थूलशरीर, प्रजा , वित्तानि ।

* जगद्गुरुवैभवम् । अग्नित्रयं यत् तदियं त्रिलोकी पृश्न्यन्तरिक्षधुरिति प्रभेदात् । वसन्ति देवा वसवोऽग्निलोके रुद्रादितेया परलोकयोःस्युः ॥२॥ आपश्चतुर्थो भवतीह लोको भृग्वङ्गिरोमय्य इमाः स्युरापः । अब्-चायु-सोमा भृगवो, यमान्यादित्या भवङ्गिरस सहस्था ॥३॥ अष्टौ च देवा वसवोऽथ रुद्रा एकादश द्वादश चादितेयाः स्यू रुद्रपुत्रा मरुतोऽपि रुद्रे विद्युद् भृगावतु समन्विताः स्यात् ।। ४ ।। एषां चतुर्णामपि दैवतानामिन्द्रोऽभवत् संसदि लोकपालः। निरीक्षणेऽनुग्रहनिग्रहादौ परीक्षणे चाधिकृतोऽयमासीत् ॥ ५ ॥ - अथ ब्रह्मकता प्रजासृष्टिश्चतुर्थी । (यजुषत्रिपुरुषसृष्टि) विड् ब्रह्म च क्षत्रमिति त्रिवीर्य्य यजुर्हि वाक्प्राणमनोरसत्वात् । इच्छा तपः श्रान्तिमयं त्रिवृत्तिनिक्रियार्थैर्भवति त्रिभावम् ॥१॥ विधाऽर्थसृष्टिः प्रथमोऽन्ययोऽर्थस्ततोऽक्षरोऽथ क्षरसृष्टिरन्ते । कार्य क्षरं कारणमक्षरं स्यादस्त्यव्ययं कारणकार्यभिन्नम् ॥२॥ ब्रह्मप्रधानाऽव्ययसृष्टिरादौ क्षत्रप्रधानाऽत्तरसृष्टिरन्या विट्कलतमूर्तिः क्षरसृष्टिरन्ते स्थानाभिमानित्वमिहास्ति विट्त्वम् ॥ ३ ॥ यन्मानसं मौलिकमेकतत्वं स्थानं च यन्नावरूणद्धयसङ्गम् । अशब्दमस्पर्शमरूपगन्धं यन्नीरसं निष्क्रियमस्त्यमात्रम् देशानवच्छिन्नमयोगजं यत् स्वयंभुविभ्वप्रतिहन्यमानम् तदव्ययं निर्विकृतं समस्ते समन्वित ज्ञानमिदं यथाऽस्ति ॥५॥ कर्मप्रधान तु यदेकमन्यत् संपद्यते रूपमिहाक्षरं तत् विड्मान्यधिष्ठातृविधं त्वशब्दं निस्वादमस्पर्शमरूपगन्धम् ॥६॥ आनन्दसंवित्कुलकामभेदा आविर्भवन्तीह यतोऽव्ययं तत् । आत्माऽव्ययं त्वक्षरमात्मभेदा ऋष्यादिदेवा अमृताश्च माः॥७॥ स्पर्शाश्च रूपाणि रसाश्च गन्धाः शब्दाश्च मात्राः क्षरलक्षणानि । स्थानाभिमानिप्रमितं विकारि क्षरं ससंख्यं परिणाहि विद्यात् ॥ ८ ॥ तर त्रिधा स्यादणवो महान्तस्त्रिविग्रहा भूतमया निकायाः। सर्वे महाभूतमया निकाया महान्ति भूतान्यणुभिः कृतानि ॥ ६ ॥ --

* जगद्गुरुवैभवम्
अणून्यपृक्तैकरसानि भूतान्येभिर्विशेषे त्रसरेणव स्यु.
योगान्महान्तोऽथ च तद्विकारर्जीवाश्च मूलानि च धातवश्च ॥१०॥
तत्र क्षरः सोऽक्षरतः कृतात्मा क्षरोऽक्षरं न व्यतिरिच्य तिष्ठत् ।
एषोऽक्षरोऽप्यव्ययतः कृतात्मा विनाऽव्ययं नाक्षर एष भायात् ॥ ११ ॥
आत्माऽव्ययस्तं वृणुतेऽभितोऽक्षरः स देवसंघस्तमनु क्षरः श्रितः ।
स भूतसंघः पुरुषा अमी त्रयो शानं क्रिया त्रिष्वपि तेष्वनन्यवत् ॥ १२ ॥
तत्रोत्तमो ज्ञानमयोऽव्ययात्मा क्रियाप्रधानोऽतर एष कर्ता ।
अर्थः क्षरो भूतमयोऽन्यतन्त्रः स झायते स क्रियते विकारी ॥१३॥
यजुषोवेदविशेषा सर्वा दैवतसृष्टयः ।
( यजु.सुप्रिपञ्च')
अग्नियः सोऽमवदव्ययोऽथाक्षरः क्षरश्च त्रिविधोऽपि सोयम् ।
ऋक्-सामयोरन्तरितः सदास्ते तदावृताः स्युः पुरुषास्त्रयोऽपि ॥ १॥
विड् ब्रह्म च क्षत्रमिति त्रिवीर्योऽव्ययः स वाक् प्राणमनोमयोऽर्थः ।
समन्वयात् तस्य सृजत्यशेषानिच्छा-तपः श्रान्तिभिरक्षरोऽयम् ॥२॥
ब्रह्मा यजुः, सोऽव्यय एष आत्मा, यजुरतथास्त्यक्षरदैवसंघः ।
यजुस्तथास्ति क्षरभूतसंघो द्विधा हि मामृतभेदतोऽग्निः ॥३॥
यज्जूर्यजुस्तद्धयचरे चरं तत् खे वायुरेतद्धयमृतं च मय॑म् ।
देवा ख इन्द्रेऽमृतमस्ति रूपं भूतानि खे वाचि तदस्ति मत्यम् ॥ ४ ॥
त्रयोऽग्नय सोमविधे तथा द्वे ते वायवः पञ्चविधा इहेन्द्रे ।
भूतानि शब्दो मरुदम्बुतेजो मृञ्चेति वाग् व्योमचराणि पञ्च ॥ ५ ॥
वायुर्यथाऽऽकाशपरिस्तृतोऽस्त्ययं शब्दोऽम्बुतेजो मृदपि स्तृतास्तथा ।
प्रादित्यवाय्वनय एवमङ्गिरा भृगुः प्रतिष्ठेन्द्रमनु प्रतिष्ठिता ॥ ६ ॥
ब्रह्मत्रयसृष्टिः ।
ब्रह्मास्ति वाक्-प्राण-मनोमयोऽव्ययः कश्चित्रिलोकातिगतस्त्रिवीर्यभृत् ।
ब्रह्मा परः सूर्य उदेत्यतोऽक्षरो गौर्कोतिरायुश्च रसा इह त्रयः ॥१॥
ब्रह्मा तृतीयः क्षरमूर्तिरप्यतः प्रादुर्भवत्यत्र च ते रसास्त्रयः ।
वाग्गौरथ द्यौरिति चाक्षरक्षरौ युक्तौ कुमारं सृजतोऽग्निमद्भुतम् ॥२॥

* जगदगुरुवैभवम् * १३ SENA ॥२॥ कुमाराग्नि-चित्राग्नि-पाशुकाग्निभिर्दशाक्षरविराटसृष्ठिः । संवत्सरस्तूषसि सिञ्चति स्वं रेतः कुमारोऽयमुदेति तस्मात् । ज्योतिश्च गौरायुरिति त्रिसंस्थं रेतः कुमारस्त्रिविधस्ततोऽभूत् ॥१॥ द्वे ज्योतिषी भूतविधास्त्वियं गोरायुस्तथात्मेति कुमारसृष्टिः । रेतःप्रभावादयमेक एव त्रेधा कुमारो विकसन् बभूव अग्नित्रयं सूर्यपदेन सोमद्वयं विदुश्चन्द्रपदेन पूर्वे भूतानि पञ्चाथ च विद्युदात्मा चित्रोऽष्टधाग्निर्नवमः कुमारः ॥३॥ एवं कुमारोग्निरिहाष्टमूर्तिर्भूत्वा चितोऽष्टाभिरभूदमीभिः चितः पशुस्तत्र चिते प्रविष्टो भूत्वा कुमारोऽयमभूदिहात्मा ॥४॥ चित्योऽग्निरेषोऽस्ति यदष्टमूर्तिः पशुस्थ प्रात्मा तु चितेनिधेयः । मत्यो हि चित्योऽस्त्यमृतं निधेयं मानि भूतान्यमृतास्तु देवाः ॥ ५ ॥ कुमार आद्योग्निरतोऽष्टमूर्तिश्चित्रोऽग्निरुत्पद्यत एष पश्चात् स्यात् पाशुकोऽग्निः पशुषु प्रविष्टो वैश्वानरस्तैर्दशभिविराट्स्यात् ॥ ६ ॥ अथ ब्रह्मकृता धर्मसृष्टिः पंचमी। धम्मो हि वीर्य ध्रियते हि धर्मों धृतो धारयते हि रूपम् । यद्धर्मयोगादिह योऽस्ति धर्माधर्मेहते हन्यत एष तस्मिन् ॥१॥ धर्मोऽस्ति सत्यं, नियतिर्हि सत्यं यदस्त्यसाधारण वस्तु धर्मम् । नानाविधो धर्मचितोऽस्ति धर्मा तद्धर्मनाशादिव धर्मिनाशः॥२॥ उष्णत्वधर्मेण हि योऽग्निरुक्तः स औष्णयहान्यैति हि शीतलत्वम् । तद्धर्मनाशाद् ध्रुवमग्निनाशः सोमः सधर्मी भवति क्षणेन ॥ ३॥ वीर्यचतुष्टयनिबन्धनं चातुर्वर्ण्यम् । अनन्तभेदा इह सन्ति धास्तजातयः सन्ति चतस्त्र एव । ब्रह्माथ च क्षत्रमथो विडेवं शूद्रश्च तैः सर्वजगत् प्रपन्नम् ॥१॥ ब्रह्मास्ति हि ज्ञानमयं प्रशान्तानन्दोदय, क्षत्रमिदं तु वीर्यम् । क्रियामयोत्साहमयं समृद्धानन्दोदयं श्रीमयवीर्यकं विट् ॥२॥ नाक्रम्यतेऽन्यैर्न च दभ्यतेऽन्यनिरुद्धसर्वप्रतिपन्थि वीर्यम् । न चापरानाक्रमते विहन्तुं तद्ब्रह्म शान्तं हितकारि वीर्यम् ॥ ३॥ स्वायत्तरक्षाप्रवणं परान् प्रत्याक्रम्य विक्षोभणमुनमग्र्यम् बुभुक्षितं चोन्नतिगामि सर्वसहं विदुः क्षत्रमितीह वीर्य्यम् ॥ ४॥ * कुमारामिरेक., चित्राग्नयोऽष्टौ, पाशुकाग्निश्चैकः-इत्येव दशाक्षराविराट्सृष्टि । ।

* जगद्गुरुवभैवम् । नानाविधानप्रचयस्य सर्वोपभोगयोग्यस्य विशेषयत्नैः संपादन प्रापणमस्ति वीर्य विड्नाम दग्धं च पराश्रितं तत् ॥ ५ ॥ इतोऽन्यथा यत्किमपीह वीर्य साधारण तत्रितयोपभोग्यम् । आश्वेतदुच्चैर्द्रवतीति शूद्राभिधं प्रसिद्धं भवतीह वीर्यम् ॥६॥ यद् दृश्यते नेह तदस्ति किश्चिद् यस्यैकमेषां न भवेत् स्वरूपम् । जीवेषु मूलेष्वपि धातुषु 'स्युर्ब्रह्मादिधर्मा प्रतिकल्पसिद्धाः ॥७॥ देवेषु धर्मास्त इमे पृथगवद् दृश्यन्त एषामधिकांशयोगात् । पृथ्व्यां नरा. पञ्चविधा अपीमे ब्रह्मादिवीर्य्याः प्रथिताश्चतुर्धा. ॥ ८॥ + अग्निविशेषा दिव ब्रह्मणस्पतिवृहस्पतिर्वा सविता सरस्वती । देवास्तथान्येऽपि च केचन श्रुतास्तद्ब्रह्मवी- रविरश्मिसंश्रिताः ॥६॥ यमेन्द्ररुद्रा अथ वायुसोमेशानाश्च मृत्युवरुणोऽष्ट देवाः क्षत्रस्ववीर्या, गणदेवतासु प्रभुत्वमेते दधते बलेन विश्वे च देवा वसवश्च रुद्रा अथादितेया मरुतश्च साध्याः। आभास्वरास्ते तुषिताश्च सर्वे विधर्मिमणोऽमी गणदेवताख्या ॥ ११ ॥ देवेषु पूषास्ति हि शूद्रधर्मा ब्रह्मादिधर्मत्रितयाञ्च हीना देवाश्च शूद्राः पशवश्च सर्वेऽप्यमीस्वधर्मप्रवणः प्रथन्ते ॥१२॥ यद् ब्रह्म, यत्तत्रमथो विडेतद्धर्मत्रयं तेषु सदैवतेषु ससर्ज देवत्रययोगभेदाद् ब्रह्मादिधर्मा इह जन्तुषु स्युः "ये देवा देवेष्वधि देवत्वमान्ये ये ब्रह्मणः पुर एतारो अस्य । येभ्यो न ते पवते धाम किञ्चन नते दिवो न पृथिव्या अधि स्नुषुः" । (यजु. स. १७१४) इति वैज्ञानिकं ब्रह्मकृतं सृष्टिप्रकरणम् । + मैत्रायणीयानामानुश्रविकः श्रूयते-पञ्चवै ब्राह्मणस्य देवता:-अग्नि , सोमः, सविता, बृहस्पति., सर- स्वती । तस्माद् ब्राह्मणमन्ये मनुष्या उपधावन्ति । एतस्य हि भूयिष्ठा देवताः । तासां तिस्रोऽवा- न्सर श्रोत्रियस्य-अग्नि, बृहस्पतिः, सरस्वती । तस्माच्छ्रोत्रियमश्रोत्रिया उपधावन्ति । एतस्य हि अवान्तर भूयिष्ठा देवताः । (मैत्रा०) - "एतानि देवत्रा क्षत्राणि-इन्द्रो वरुण सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति"। (शत. बा. १४।३।२)

* जगद्गुरुवैभवम् ।
पौराणिकसृष्टिप्रसङ्गे-ऐतिहासिकसृष्टिप्रकरणम् ।
ऐतिहासिकसृष्टिकालविभागप्रसङ्गः ।
१
२
३
सृष्टयादितोऽद्यावधि वन्ययुगम्, आदित्रेतायुगं, दैवतयुगं, विद्यमानयुगमिति-
भेदाद् युगचतुष्टयात्मककालविभागः ।
संक्षेपतो दर्शितमित्थमेतत् पुराणमादावथ चेतिहासः
प्रदर्शनीयोऽस्ति तदर्थमादौ चतुर्युगं संप्रति भावयामः
युद्धं महाभारतमुग्रमासीदाक् ततोऽर्वाग् युगमेतदस्ति ।
प्राग् युद्धतो ब्रह्मजनेश्च पश्चाद् यदन्तरं देवयुगं तदाहुः ॥२॥
प्राग्ब्रह्मत सभ्ययुगं त्विहादित्रेतायुगं नाम कदाचिदासीत् ।
स यज्ञकालोऽथ ततोऽपि पूर्व संभाव्यते वन्ययुगं त्वसभ्यम् ॥ ३ ॥
२
३
वन्याकालः प्राक्तनः, साध्यकालो देवःकालो विद्यमानश्चकालः।
१
२
३
१
पर्षद्ब्रह्मानुभवो यत्र तस्य प्रादुर्भावोऽतिप्रभावो निपातः ॥४॥
२
यत्राभावो यज्ञविज्ञानयोः प्राक् प्रादुर्भावोऽभ्युन्नतिर्यत्र पातः ।
१
३
स्वाराट् सम्राड् भूपतिर्यत्रनासीद् तस्योत्पत्ति प्रौढता यत्र पातः ॥५॥
२
असभ्ययुगम् ।
तत्रादियुगस्य असभ्ययुगत्वसंभावना।
पुरा त्वसभ्या मनुजा अशिक्षिताः कदाचिदासनिति तर्कयामहे ।
तेषां चरित्रं समयानुसारतोऽसभ्यं भवेत् तल्लिखितं न लभ्यते ॥१॥
न ब्राह्मण-तत्रिय-वैश्य-शूद्राः पृथगविभक्ता अभवस्तदात्वे ।
धर्मव्यवस्था न, न नीतिसंस्था, न राज राष्ट्रादिविधिस्तदासीत् ॥२॥

* जगद्गुरुवैभवम् * मणिजाख्योनामार्याणां सभ्यतायुगम् । सभ्यात्मसृष्टिकालस्य प्राथमिकसभ्यतायुगस्य द्वितीययुगत्वम् । x ततः परं ये प्रथमे सुशिक्षितास्ते यामनाम्ना प्रथिताः पुराऽभवन् । स्वायंभुवं नाम तदन्तरं विदुयस्मि तु काले त इमे भुवि स्थिता ॥ १ ॥ यामाश्च सृप्तिमन्तस्त्विषिमन्तो व्रजकुला इति त्रिविधाः तेषां च तृप्तिमन्तो द्वादशकात्रय इह प्रथिताः ॥२॥ अजिता जिदजितशब्दा जिताः पृथग् द्वादशासंस्ते शास्तारस्त्विषिमन्तो व्रजकुलशब्दा विशश्च दासाश्च इत्थं यामास्त्रिविधाः प्रागासंस्ते स्वकर्मनिष्ठाभिः ते च विलुप्ताः कालेऽतीते मणिजाप्रथोदिता अपरे ॥४॥ दिश्युत्तरस्यां प्रबभूव तस्थितिर्हिमालयादुत्तरसागरावधि । चीनप्रदेशे प्रथमस्तदुद्भवोऽभवत् ततस्ते प्रथिता इतस्ततः चीनादिमे चोत्तरपश्चिमां दिश विजित्य नाकावधि भूयसाऽवसम् । या हंस तारास्ति ततस्तु पश्चिमोत्तरे तुरीयांशसमे नभस्तले ॥ ६ ॥ कदाचिदासीद् ध्रुव एष, तादृशे बभूव काले मणिजोदयस्थितिः । आसीत् तदानीं द्विविधा जनस्थितिः कश्चिद्विभागो वनवासिनामभूत् ॥७॥ परो विभाग पुरवासिनां नवस्त एव लोके मणिजा इति स्तुता । प्रशिक्षिताः प्राकृतिका असभ्याः सर्वे निकाया वनवासिनस्ते ॥८॥ "त्रेतायुगमुखे पूर्वमासन् स्वायभुवेऽन्तरे । देवा यामा इति ख्याता पूर्व ये यज्ञसूनव' ।। अजिता ब्रह्मणः पुत्रा जिता जिदजिताश्च ये। पुत्राः स्वायंभुवस्यैते शुक्रनाम्ना तु विश्रुताः ।। तृप्तिमन्तो गणा ह्येते देवानांतु त्रय.स्मृता. । तुषिमन्तो गणा ह्येते वीर्यवन्तो महाबलाः ।। ये वै व्रजकुलाख्यास्तु आसन् स्वायभुवेऽन्तरे। कालेन बहुनाऽतीता अयनाब्दयुगक्रमै. ॥" (वायु पु० अ० ३१।३।२)

* जगद्गुरुवैभवम् ।
लुठच्चरा वा पशुवृत्तयो वा ख्याता अनार्या अपि बर्वराख्याः ।
सभ्यास्त्विमे ये मणिजास्त आर्या इति प्रसिद्धा अभवन् पुरात्वे ॥६॥
...
..
...
व्यवस्थितामाइधतात्मवृत्तिं मर्यादया कल्पितया त एते ॥१०॥
मणिजानां चातुर्विध्यम् ।
( प्रथमसभ्यानां साध्य-महाराजिकाऽऽभास्वर-तुषितभेदाद् विभागचातुर्विध्यम् )
आसीदमीषां समयोऽयमादित्रेतायुगाख्यो मणिजाभिधानाम् ।
प्रासंस्तदात्वे त इमे समस्ताश्चतुर्विधाः कर्मवशाद विभक्ताः॥१॥
साध्या महाराजिकसंज्ञका अथो आभास्वरा वा तुषिता इति क्रमात् ।
ते ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य-शूद्रवत् कर्माण प्रासन् मणिजाभिधा नराः ॥२॥
ज्ञानसंचयप्रवणाः साध्या द्वादश ॥१२॥
त्रेतासु यज्ञानुविधिः प्रक्लप्तो यैर्ये भृशं यक्षरता बभूवुः ।
साध्यानिमानाहुरमीहि नाके स्वर्गकदेशेऽप्रथयन्त यज्ञान् ॥१॥
यज्ञावृदुबोधकयज्ञवेदग्रन्था अनेके रचिता अमीभिः
सब्राह्मणाः सोपनिषदहस्याख्यानेतिहासा सपुराणकल्पाः॥२॥
साध्या बुधा इत्थमिह प्रधाना आसन् पुरा द्वादशवर्गभिन्नाः ।
त एव वीरान् व्यवसायिनोऽन्यान् कारूंश्च नीत्वा निजकर्म चक्रुः ॥३॥
शत्रुविध्वंसप्रवणा महाराजिकाः विशं शतम् ॥ १२० ॥
ये बर्बराः केचन यज्ञकर्मप्रध्वंसिनः शत्रव उद्बभूवुः
तेषां निरासाय तदा सशस्त्राः केचिन्महाराजिक संशयासन् ॥१॥
एषां महाराजिकसझंकानां प्रबन्धकानुविभागहेतोः
२२०
शतद्वय विशमशेषविश्वत्राणाश्रितश्रेणय आविरासन् ॥२॥

१८
* जगद्गुरुवैभवम् :
अर्थसंचयप्रवणा आभास्वराश्चतुषष्टिः ॥४॥
यज्ञार्थसंभारसमर्थका ये व्यापारिण संपदुपार्जकाः प्राक् ।
बभूवु रामास्वर संज्ञया तानाख्यापयन्तिस्म धनप्रधानान् ॥१॥
समुद्रयानात् परदेशयानात् पौरायणात् कर्षणपाशुपाल्यात् ।
आभास्वराणां व्यवसायमेदादासन् चतु षष्टिरिहप्रभेदाः ॥२॥
अपूर्व-प्रतिरूपोभयविधशिल्पप्रवणास्तुषिताः षट् त्रिशत् ॥३६॥
शिल्पप्रवीणाः कतिचिन्मनुष्या नानाविधा अद्भतशिल्पवृत्तीः।
कुर्वन्त आसन् प्रतिरूपशिल्पान्यपीह नाना तुषितास्त उक्ताः ॥ १॥
अपूर्वशिल्पप्रतिरूपशिल्पप्रभेदतोऽवान्तरभेदतश्च
आसन्नमीषां तुषिताभिधानां षत्रिशदग्र्या प्रथिताः प्रभेदाः ॥२॥
लोकव्यवस्था ।
प्रथमसभ्यानामप्रत्यक्षविषयेषु प्रतिपत्यभावः ।
चतुर्विधा इत्थममी सुसभ्याः प्राग् बर्बरेभ्यः प्रथगात्मसंस्थाम् ।
समाजबन्धन विधाय नाना लोकव्यवस्थां रचयन्त आसन् ॥१॥
ते लोकवृत्तप्रवणा अशेषा अहर्निशं कर्मपरायणत्वात्
सत्यश्रमाः स्वार्थपराः परोक्षे धर्मेऽनभिज्ञा मणिजाः पुरासन् ॥२॥
तेषां च यज्ञा अपि भौतिकानां वृष्टि-प्रजा-स्त्री-विभवादिकानाम् ।
सर्वेषणानामिह साधनार्थाः स्वर्गार्थकं कर्म न किञ्चिदेषाम् ॥ ३॥
साध्ययुगीयानि दश विज्ञानानि ॥१०॥
त एव साध्या मणिजा मनस्विनः स्त्रतो मनश्चक्रुरिदं जगत् प्रति ।
किमस्य मूल कथमुद्बभूव तत् कियजगत् कहिं गमिष्यति तयम् ॥ १॥

* जगद्गुरुवैभवम् + १६ विमर्शयन्तो बहवस्त इत्थं पृथक् पृथग् भिन्नगतिं प्रजग्मुः । का* ह्यन्यदन्यजगतोऽस्य मूलं निर्धारयन्तो विमता बभूवुः ॥२॥ २ ३ एके रजांस्याहुरथाम्भ एके वायुं च वा व्योम च वैक आहुः । १ तथाहुरन्येऽमृतमृत्युमन्येऽहोरात्रमन्ये सदसत्वपश्यन् ॥३॥ ५ 8 वयो वयोनाधमुशन्ति केचिद् दैवं परे संशयमेषु केचित् तदित्थमने दशधा प्रवादाः कालेषु जाता बहुषु प्रचारम् ॥ ४॥ इति ऐतिहासिकसृष्टिकालविभागप्रसंगः । १ ४ ३ ३ नासदासीनो सदासीत्तदानी नासीद्रजो नो व्योमाऽपरोयत् । ५ ६ किमावरीवः कुह कस्य शमन्नम्भ. किमासीद्गहन गभीरम् ॥ ७ न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह आसीत् प्रकेत । पानीदवात स्वधवा तदेक तस्माद्धान्यन्न पर. किञ्च नास ॥ है को श्रद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत प्राजाता कुत इथ विसृष्टि । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जने नाथा. को वेद यत प्राबभूव ॥ (ऋ. म.१०.सू. १२६) २० * जगद्गुरुवैभवम् * ऐतिहासिकसृष्टिकर्तृप्रकरणम् । अथ युगान्तरपरिवर्तकस्य ब्रह्माख्यस्यालौकिकविदुषः प्रादुर्भावाद् ब्रह्म- सृष्टयुपलक्षितं तृतीयं युगम् । भूयसु कालेषु गतेषु साध्येष्वेकोऽतिविद्वान् पृथगुद्धभूव । तस्य प्रभावादभवन्नवस्यारम्भो युगस्येह समस्तपृथ्व्याम् ॥१॥ स वेदसृष्टिं स च धर्मसृष्टिं स च प्रजासृष्टिमलं विधाय । स लोकसृष्टि विदधे विधाता स्रष्टेति विख्यातिमगात् ततःसः ॥२॥ ब्रह्मेति सोऽपश्यदशेषमूलं ब्रह्मेति विख्याति मगात् ततःसः । ब्रह्मोद्यमन्येषविधाय नानोक्थवादिसाध्यान् व्यजयद्विवादे ॥३॥ ब्रह्माऽग्रहीजन्म तु पुष्करे पुरेति चाश्रूयतगोपथश्रुतौ । x जम्बूसरित्संनिहितं हि पुष्करं तद् यद् बुखारेत्युदितं विधर्मिभिः ॥४॥ ब्रह्मास्त्यथर्वापि स पुष्करेऽस्मिन् जज्ञेऽतनोद्यज्ञपथांश्च तत्र। पाथर्वणे स्तूयत एष एव ब्रह्मा न चाद्यस्त्विति कश्चिदाह ॥ ५ ॥ "त्वामग्ने पुष्कराध्यथर्वा निरमन्थत मूनों विश्वस्य वाघतः। + तमु त्वादध्यडू ऋषि पुत्र ईधे अथर्वणः वृत्रहणं पुरन्दरम्” ॥ (ऋक् स० ६।१६।१३-१४) इत्यादिमन्त्रैर्जगतोऽस्य मूर्धस्वरूपतः पुष्करतोह्यथर्वा अग्निं वितेने हरणिं प्रमथ्य प्राग् यज्ञियाग्नेर्भवति स्म यज्ञः ॥ ६ ॥ एतान् नु मन्त्रानुपलक्ष्य पूर्वेऽथर्वोद्भवं पुष्करके यदाहुः । सत्यं नु तत्पुष्करपर्ण प्रासीदन्युद्भवोऽथर्व कृतोऽधिदैवम् ॥७॥ + न्यग्रोध पुष्करद्वीपे ब्रह्मण स्थानमुत्तमम् । तस्मिन्निवसति ब्रह्मा पूज्यमान सुरासुरैः । (ब्र ८८७) x ब्रह्म ह ब्रह्माण ससृजे । स खलु ब्रह्मा सृष्टश्चिन्तामापेदे। (गोपथ ब्रा १।१६ ) सर्वजगतो वाहकात् इत्यर्थ.। + पुष्करमिति असुरपुराणां दारयितारम् - । जगद्गुरुवैभवम् : तथाप्यथर्वा यदि पुष्करेऽभूत् स्याद् ब्रह्मणोऽपि स्थितिरत्र तर्हि । ब्रह्मा पिताऽथर्वण एष पासीद् गृहं च जन्मास्य च तत्र सिद्धम् ॥ ८ ॥ "ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माऽथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम" ॥ (मु० १११-२) प्राग्ज्योतिषपुरे ब्रह्मणोऽवस्थानम् । वादधस्तात् पृथिवीप्रदेशः सुमेरुरित्थं प्रतिपत्ति लोकाः । ब्रह्माभिजिद्भादधरः प्रदेशः सुमेरुरासीत्तु पुरायुगे सः॥१॥ तस्मिन् सुमेरौ विततप्रदेशे प्राग्ज्योतिष नाम पुरं यदासीत् । ब्रह्मेष तत्र न्यवसन् स कृत्वा लोकव्यवस्थामखिलानशासत् ॥ २॥ स वेदशास्त्राणि विरच्यतेषां द्विधा विभागान् निपुण व्यधत्त । विज्ञानहेतोरुपवेदभागान् शानाय वेदानकरोत् प्रधानान् धर्मार्थकामा इति हि त्रिवर्गा विज्ञानमेषां विषया विभक्ताः । झानं तु मोक्षाय तदात्मसारं साधारण तद्विषया हि वेदाः॥४॥ कान्तिमत्यां पुर्या ब्रह्मणः शासनसमा । प्राग्ज्योतिषे ब्रह्मपुरे पुरस्तात् स धर्मसंस्थां पुरि कान्तिमत्याम् । नियम्य तस्यां सह लोकपालैर्धर्मव्यवस्था स्वयमादि देश ॥ १ ॥ स धर्मसंस्थामथ नीतिसंस्थां विधाय ताभ्यां विदधे प्रबन्धान् । तत्रादितो धर्मसभां स कृत्वा न्ययुक्त तस्यां दश लोकपालान् ॥ २ एषां दशानामखिलान् भुवोऽर्थान् कृत्वाऽधिकारे पृथिवीं शशास । शशास सभ्यैः सह तैयथावद् दिक्पालकांश्च व्यदधात्पृथग्वत् ॥ इत्थं पुरामी दश लोकपालाः प्राग्ज्योतिषे ब्रह्मपुरे नियुक्ताः । स्थित्वा सभायामिह कान्तिमत्यां नयेन लोकानखिलानशासन् ॥ * वाराहे (अ० ७५ ) तु 'मनोवती' इत्युक्तम् ।

जगद्गुरुवैभवम् ब्रह्मा तु तेषां प्रथमः प्रधानः श्रेष्ठथं विशिष्वखिलेषु लेभे। यथेच्छमेषामधिकारतोऽसौ प्रच्यावकश्चात्र नियोजकश्च महा प्रभावोऽखिलविद्य एष ब्रह्मेत्यगृह्णाद्विरुदं स्वयं स्वाम् । भूमिस्थिताः सर्वविधाः प्रजास्ता वशे चकार स्वयमेकशास्ता ॥ ६ ॥ एको मनुष्योऽखिलभूमनुष्यान् विभिन्नजातीन् परिवर्त्य कात्स्या॑त् । सूर्यस्थितः प्राणकुलानुरूपै समाजबन्धैरकरोन्निबद्धान् सभ्यानशेषान् स्ववशे विधाय न्यवासयत्तान् परितस्त्रि लोक्याम् । यस्येहगासीत् प्रबलप्रभावस्तब्रह्मणा स्पर्धयितुं क ईष्टे प्रजापतिस्तेन कृतः प्रजानां प्रजापतित्त्वं च कृतं चतुर्धा राट्त्वं, च सम्राट्त्वमथ स्वराटत्त्वं विराट्त्वमेते च कृता विभेदाः ॥ ६ ॥ भोजो महाभोज इति द्विधाराट् यश्चक्रवर्ती स च सार्वभौमः। स्वाराट् द्विवेन्द्रश्च महेन्द्र इत्य, विराड् द्विधा ब्रह्मपदश्चविष्णुः ॥१०॥ प्रत्येकमेषां तु यथा स्वरूपं तत् पञ्चसु ख्यातिषु विस्तरेण । प्रदर्शितं ब्रह्मकृता व्यवस्था सर्वा च तत्रैव विशिष्य नेया ॥११॥ अष्टासु भूशास्तृपदेष्वमीषूत्तरोत्तरश्रेष्ठ यमधीश्वरत्त्वम् ययोविराजोरिह पारमेष्ठयं तयोर्न सैन्यं न पृथक् स्वराष्ट्रम् ॥ १२ ॥ न राष्ट्रमासीन्न बलं न दुर्ग न चास्य कोश' प्रचुरस्तथापि । सर्वे स्वराजः प्रणमन्ति मूर्ना ब्रह्माणमाराध्यगुरुं त्रिलोक्याः॥१३॥ अनेकसम्राट्परिपूज्यपादान् देवासुरेन्द्रानपि यः स्वराजः । X तद्धिष्ण्यतोऽच्यावयत स्वतन्त्रस्तद्ब्रह्मणा स्पर्धयितुं क ईष्टे ॥ १४ ॥ यद् ब्रह्मवीय तदिहोत्तरोत्तरोत्कर्षात् प्रतिष्ठां लभते चतुर्विधाम् । क्रमेण विप्रा ऋषयश्च देवता ब्रह्माण एषां परमाः परे परे ॥१५॥ परोपदेशश्रुतसर्ववेदा विप्रारततः सन्त्यूयो वरेण्याः द्रधार एते ह्यथ यज्ञसिद्धदैवात्मनाऽध्यात्ममयास्तु देवा. ॥१६॥ जीवेश्वरसम्बन्धभेदादाध्यात्मिको ब्रह्मा द्वेधा । ब्रह्मा प्रभुः षड्विध एष तत्र द्विधाऽयमाध्यात्मिक एष तावत् । दिव्यो द्विधाऽथैषनरो द्विधैते सर्वेऽपि साम्येन सृजन्ति विश्वम् ॥ १ ॥ x इतिहाम बद।

* जगद्गुरुवैभवम् : ॥२॥ जीवश्वराभ्यां द्विविधः स तेषामाध्यात्मिको यत्र यथास्ति देहे । यथा स सृष्टिं तनुते तदुक्तं परात्परस्योपनयानुवाके ईशानुवाके तु परः प्रदर्शितो ब्रह्मा स योऽस्तीश्वर विग्रहा श्रयः । यथा स सृष्टीरसृजच्च पञ्चधा तथैव तेऽन्येऽप्यसृजस्तदुच्यते ॥ ३ ॥ अक्षध्रुव ताराध्रुव भेदादोधिदैविको ब्रह्मा द्वेधा । तत्राक्षध्रुव :पृश्वीध्रुवान्तरालवर्ती । अष्टाविंशतिपर्याया वृत्तार्कभ्रममण्डलम् नागराज ऋषिप्रांद्यत् पारमेष्ठय समुद्रगः ॥१॥ नारदर्षिप्रजनिते सरस्वत्यस्ति नागराट् अनन्ताख्यो वायुमयस्तत्र विष्णुरयं रविः स्कम्भयशोऽस्त्ययं विष्णु. सूर्यो नारायणः प्रभुः तन्नाभौ पृथिवीपमं सुषुम्णानाडिदिग्दलम् अतः पृथिव्यां यः सोऽग्निब्रह्माऽत्र प्रतितिष्ठति मेरौ प्रादुर्भवन् सोऽक्षो ध्रुवविन्दौ प्रसज्जते पृथ्वी हि वेद्यत्र मतास्त्रयो नयो यज्ञाहुतिस्त्वाहवनीयमध्यतः । उच्छिएतोऽनन्तविधा हि सृष्टयो गर्भ पृथिव्या अनिशं भवन्त्यतः ॥५॥ स्याद् गार्हपत्योऽग्निरमुष्य पश्चिमे प्रदृश्यते नक्तमयं परिज्वलन् । काष्ठेषु सुप्तो मथनात्प्रबुभ्यते स पार्थिवोऽस्त्याहवनीयतः पृथक् ॥ ६ ॥ अपार्थिवा येऽन्तरतः पृथिव्यां धिषायानयोऽनन्त विधास्त एते । ॥३॥ x रोगादयोऽनन्तविधा विकारा भवन्त्यनात्मीयत येह तेभ्य अग्नित्रयान्नूनमत पृथग्यद् विभ्राजते कश्चिदिहाग्निरन्यः । स ब्रह्मलोकादुपपन्न आत्मा वेदाः पृथिव्या हि ततः प्रवृत्ताः ॥ ८ ॥ ब्रह्मा स पृथ्वी हृदये निबद्धो व्याप्नोति सर्वो पृथिवीं समन्तात् । तद् ब्रह्मणोऽक्षो बहिरेत्य पृथ्व्या आलम्बते यत्र दिवि भ्रवः सः ॥ ६ ॥ एष ब्रह्मा जगत् सर्व जगत्यां यत् प्रतिष्ठितम् वेद-धर्म-प्रजा-लोकभेदात् सृजति तत् सदा • 'यज्ञ इन्द्रम्वर्धयद्, यदभूमि व्यवर्तयत् । चक्राण ओपश दिवि" । ( ऋ०अ०, ६, अष्ट.१ वर्ग १४ ) ४-५३ रोगा । १०७ ओषधय । अयौषधिसूरय रोग प्रतीकारा । - ।

• जगद्गुरुवैभवम् । --- ताराध्रुवो नाकध्रुवान्तरालवर्ती । - - नागभोगासनो विष्णः पनं तन्नाभिसंभवम् ब्रह्मा पद्मासनः सृष्टिं सृजत्यत्रचतुर्विधाम् एतदेव तु विज्ञानं शिक्षितु वैदिकैः पुरा ताराविज्ञानविद्यायां तद्रूपं परिकल्पितम् व्याम्नि तारामयोऽनन्तो नागो भात्यस्य पृष्ठतः कदम्बमण्डल विष्णुस्तन्नाभिकमल ध्रवः ॥३॥ ध्रुवविन्दुः पृथिव्यतरूपो ब्रह्मा ध्रुवो स्थितः भिन्नो भिन्नान् वेद-धर्म-प्रजा-लोकान् सृजत्ययम् ॥ ४ ॥ पुरायुगेऽभिजिद् ब्रह्मा यः ख्यातो हंसवाहनः तेनैते वैदिका धर्मा देवलोकाः प्रवर्तिताः एषा विज्ञानशैल्यासीद् वैदिकानां पुरायुगे वैज्ञानिकार्थग्रथनं स्थेम्ने तारास्वकल्पत एतदेव तु विज्ञानं कृष्णो दर्शयितु क्रमात् ब्रह्म-पद्म विष्णु-चायू सरम्वन्नारदौ जगौ आधिभौतिकब्रह्मणो त्वगब्रह्मावरणसिद्धः कृत्रिमः । ब्रह्मा चतुर्विधां सृष्टिमातनोत्याधि दैविकः ततश्चतुर्विधां सृष्टिमातनो त्याधि भौतिकः ब्रह्माऽधियज्ञं प्रमुखः सऋत्विजां स सर्वविद्या मनसोपकारकः । स्रष्टुः सृजन् दैवतनुं स याज्ञकी धर्म च लोकं च तनोति तत्कृते ॥ २ ॥ यथा हविर्यज्ञविधानपूर्वकं प्रकुर्वतः सौमिकयज्ञमञ्जसा धर्माश्च लोकाश्च तनुश्च दर्शितं तद् यज्ञविद्यामधुसूदने मया ॥३॥ आदिकविब्रह्मा प्रारमेरुस्थः प्रकृतिसिद्धः स्वयमूः । यथैष ऋत्विक्प्रवरो द्विधा वा दिव्यो यथाऽध्यात्मिक एष जीवः । यथेश्वरस्तद्वदयं नरोऽपि ब्रह्मा व्यधात् पञ्चविधाः ससृष्टीः ॥ १ ॥ दिव्य ब्रह्मा पृथिव्यक्षो ध्रुवपने यथा स्थितः नर ब्रह्मा तथा मेरुपने देवान् शशासह

* जगद्गुरुवैभवम् ।
भूगर्भप्रभृतिमरुमध्यो ध्रुवपरायणः
पृथिव्यतमयो ब्रह्मा नृब्रह्मप्राणदोऽभवत् ॥३॥
भूभृद्धिरण्यङ्गाख्य इलावृत्तहृदि स्थितः
स मेरुपर्वतो नाम तत्र ब्रह्मा प्रतिष्ठितः ॥४॥
मेरुपद्मस्थितो ब्रह्मा चातु सर्म्य ससर्जह
वेद-प्रजा-लोक-धर्मभेदाद् सर्गाश्चतुर्विधाः
नरब्रह्मणो दिव्यब्रह्मावतारत्वम् ।
आकस्मिकोऽवतारोऽयं दैवयोगात् प्रवर्तते
गर्भे जन्मनि पश्चाद्वा दैवं तेजो विशेत् तनुम्
जायते स कृतप्राणो यस्य देवस्य तेजसा
तेजसोऽस्य प्रभावेण जायन्ते तस्य वृत्तयः
॥२॥
अर्चिः प्रदीपो न त्वन्यत् किन्तु सोपस्करेऽचिषि ।
सवर्तिकातैलपात्राधारे दीपत्वमिष्यते
सर्व देवमये देहे योऽन्यान् देवोऽतिवर्तते
सोऽङ्गी देवोऽवतीर्णोऽस्मिन् विशिष्योक्तोऽङ्गदेवभृत् ॥ ४॥
"यद्-यद् विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा"
उल्वणाव्ययतेजोऽशसंभवं तत्तदिष्यते
तेजोभ्यः सर्वभूतानां नरो यद्यपि जायते
तथापि तत्र यो देवोऽतिमात्रस्तत्प्रधानता
अद्यत्वे ब्रह्मणोऽक्षोऽयं समुद्रेऽन्तर्निषीदति
न तत्र मानुषं जन्म तस्मान्न ब्रह्मसंभव
॥७॥
अर्थ स्थलचरेऽप्यस्य मनुष्यप्राणतोऽन्वयः
यथा भवेत् स प्रकारो नाद्य यावत् परीक्षित
सर्वत्र दैवतेजांसि सन्ति सर्वत्र देहिनः
तेषां न लक्ष्यते योगे तारतम्ये च कारणम्
आकस्मिकमिदं दृष्टं तेजोऽवतरणं क्वचित्
क्व चावतरति ब्रह्मवीर्य्य क्षत्रं च तत् क्वचित् ॥१०॥
केचिद्देवा ब्रह्मवीर्याः क्षत्रवीर्याश्च केचन
तेषामपि प्रतिव्यक्ति लक्ष्यन्ते शक्तयोऽन्यथा
॥६॥

* जगद्गुरुवैभवम् ॥१२॥ अत एव मनुष्येषु भिन्नशक्तिप्रवेशत मान्या महाशया लोका दृश्यन्तेऽन्यान्यवृत्तयः ब्रह्मवीर्य-क्षत्रवीर्ये उभे यत्रातिमात्रया आरम्भणे आत्मनः स्तः स महापुरुषो भवेत् अग्निहि देवता. सर्वा भुवोऽक्षः सार्वदैविकः अतिमात्रं तत्प्रवेशाद् ब्रह्माऽभूदतिमानुषः ॥१३॥ ॥१४॥ इति ऐतिहासिकसृष्टि प्रकरणम् ।

! जगद्गुरुवैभवम् । अथ ऐतिहासिकसृष्टिविभागः । १-अथ ब्रह्मकृता वेदग्रन्थसृष्टिः । परीक्ष्य सूर्य तु स देवविद्याः, स प्राणविद्याः प्रकटीचकार । एकं तु स ब्रह्म समस्तमूलं समीक्ष्य देवानवशानपश्यत् ॥१॥ "को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति । भूम्या असुरसृगात्मा क्वस्वित् को विद्वांसमुपगात् प्रष्टुमेतत्" ॥ (ऋ० म० ११६४।४) मतानि सर्वाण्यभिवीक्ष्य सर्वा विद्या विदन साध्ययुगानुभूताः । प्राणेषु भूतेभ्य इतोऽपि चित्ते सामर्थ्य भूयस्त्वमयं विजज्ञे ॥२॥ श्रमाधिकत्वात्पुरुषाधिकत्वाद् बाह्यार्थसंभारबहूपयोगात् भौते विधाने स समीक्ष्य कष्ट मनोविधाने स मनश्चकार ॥ ३ ॥ भूतानि सर्वाणि मनोऽपितानि प्राणे मनस्त्वर्पितमस्ति तस्मात् । प्राणेऽर्पितं सर्वमिदं स एवाराध्यस्ततः सर्वमिदं प्रसिद्धयेत् ॥४॥ सूर्योऽस्ति हि प्राणघनो बहिर्धा प्राणोपपत्तिनिखिलेषु सूर्य्यात् । अध्यात्ममप्यस्ति न एषसूर्यः सूर्याश्रितः प्राणघनः स राध्यः ॥ ५ ॥ यथाऽधिदेवं तपनस्य नाड्यां प्राणा इमे सन्ति तथात्मनोऽपि । नाड्यामिहाध्यात्ममिमे समस्ताः प्राणा भवन्तीति स तान् ददर्श ॥ ६ ॥ तदित्थमध्यात्ममथाधिभूतं तथाधिदैवं प्रतिपद्य सूर्य्यम् । प्राणांश्च सूर्योपगतान् परीक्ष्य ग्रन्थ व्यधात् तं खलु वेदमाहुः ॥ ७॥ दृष्ट्वा तु लोकत्रयमत्र विष्टांस्त्रीनग्निदेवान् परिवारदेवान् । सोमद्वयं ब्रह्म च मूलमेषां ग्रन्थं व्यधात् तं खलु वेदमाहुः ॥ ८ ॥ तावग्नि सोमौ च परे च देवा लोकत्रये दिक्ष्वपि ये निविष्टाः। ब्रह्मैव तत्सर्वमभूदतस्तद्वेदं च तं ब्रह्मपदेन चष्टे * प्रथममिति सृष्टे पूर्वमव्याकृतावस्थायाम् इत्यर्थ ।

२८ • जगद्गुरुवैभवम् - धर्माः प्रजाः सर्वविधाश्च लोकाः सृष्टा यथा संप्रति ये यथावत् । यथा च पूर्वे मणिजा बभूवुरतथेतिहासानभत् स वेदे ॥ १० ॥ सूर्ये यथा ये प्रचरन्ति देवास्तेषां जगत्यत्र यथाविकाशाः। ब्रह्मण्यमीषां च यथोपपत्तिर्विज्ञानमेतद्धभत् स वेदे ॥११॥ साध्यैर्यथा यज्ञविधिः प्रदृष्टो यथा च यज्ञैः प्रभवन्ति कामाः। यज्ञप्रभेदा विधयश्च तेषां ते ब्रह्मणा तत्र हि वेद उक्ताः॥१३॥ अपूर्वशिल्प-प्रतिरूपशिल्पप्रकारवलप्ति बहुधा स कृत्वा । संक्षिप्य वेदे च निरूप्य देवान् विद्यासु शिल्पेष्वसुरान् न्ययुक्त॥१४॥ इत्थं चतुर्लक्षमितं स वेदग्रन्थं चतुर्मिविषयैर्व्यधत्त। स ब्रह्मवेदं व्यदधादपश्यद् ब्रह्मेत्यतो ब्रह्मपदात् प्रसिद्धः॥ १५ ॥ प्रचलितवेदग्रन्थस्यार्पयत्वाद् ब्रह्मकृतवेदग्रन्थाभिन्नत्यम् । इत्थविभक्तार्थविभक्तखण्ड़ यं ब्रह्मवेदं व्यदधान विधाता । कालेन सोऽलुप्यत किन्तु पश्चादन्योऽभवद वेदऋषिप्रः॥१॥ प्राग् ब्रह्मवेदोपगतार्थविज्ञैर्देवर्षिभिः स्वस्वमनीषयाऽन्ये । अर्था अदृश्यन्त यदा यथा ये तथा प्रणीता बहवोऽत्र मन्त्राः ॥२॥ 'ये समुद्रान्निरखनन् देवास्तीक्ष्णाभिरभ्रिभिः । सुदेवो अद्य तद्विद्याद् यत्र निर्वपणं दधुः" ॥ (शत० ७।४।२) श्लोकः श्रुतिः श्रूयत एतदर्थे व्याचष्ट चैतामृषियाज्ञवल्क्यः । वाचोदनैषुर्मनसस्तु देवा विद्यां त्रयीं निर्वपणं ततः सा ॥ ३॥ अनेकदेवर्षिकुलैः पृथग् ये मन्त्रा प्रणीता बहवः प्रकीर्णा । तेषां कृता याज्ञिकहोत्रकार्थे याः संहिताः संप्रति ता अधीमः॥४॥ * “यामृषयो मन्त्रकृतो मनीषिणः अन्वैच्छन् देवास्तपसा श्रमेण । तां दैवीं वाचं हविषा यजामहे सा नो दधातु सुकृतस्य लोके" ॥ ( तै०-ब्रा० २।८।८) mamare * “युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सतिहासान् महर्षय. । लभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयभुवा” ॥ ( सायणभाष्यम् ] तै०-ब्रा० ० २८८

* जगद्गुरुवैभवम् *
"अर्बुदः कागवेयः सर्पऋषिमन्त्रकृत्' ।
(ऐ० ब्रा० २६१)
"प्रजापतिः पित ऋभून् मान् सतोऽमान् कृत्वा तृतीयसक्न आभजत्"
(ऐ. ब्रा० २८४)
वेदशास्त्रप्रचारबाहुल्यात् साध्ययुगीयानां गाथाख्यानां श्लोकानां देवयुगे लुप्तप्रायता ।
देवेभ्य एभ्यस्तु पुरायुगेऽन्ये वैज्ञानिकाः श्लोकगणाश्च गाथा ।
साध्यै प्रणीता अभवन् पृथक्स्थाः प्रायेण ते देवयुगे विलुप्ताः ॥ १॥
श्लोकाश्च गाथा अपि साध्यकालाः पृथक् पृथक स्वस्वगृहस्थिताः प्राक् ।
आसन् विकीर्णास्त इमेऽद्य दैवयुगे विमादभवन् विलुप्ता. ॥२॥
तेषां तु केचिद् बहुधा जनश्रुतिश्रुताः प्रसिद्धा अभवन् पुरायुगे ।
श्लोकाः सगाथा इह तान् लभामहे वैकुण्ठदेवेन्द्रनिदेशतो धृतान् ॥ ३॥
प्रचलितवेदग्रन्थस्य स्वर्गस्थदेवेन्द्रसंगृहीतविल्मग्रन्थत्वम् ।
इन्द्रो धर्मों
द्रुधनः
सर्वहरिमुष्कवान् वरुर्नाम ।
स्वरुरथ वैकुण्ठोऽयं हरिवान हरिवाहनोऽन्ये च ॥
भू-द्युस्थितानां चरितोपपादकं काव्यं कृतं यत् कृतिभिः स्वयं च यत् ।
स्वाराट् स तत् स्वर्गपतिः स्वजीवने समग्रहीत् तत्खलु राजविल्मकम् ॥१॥
सामायिकं वा चरितं ज्ञानं वा दृष्टमन्यतो वाप्तम् ।
सर्व राजनियत्या संगृह्य धृतं तदिन्द्रेण
वैकुण्ठस्वाराज्ये यद् वृत्त किश्चिदुपपन्नम्
यत्रेन्द्रस्य कथञ्चित् सम्बन्धः साङ्ग्रहोऽस्ति तस्यायम् ॥ ३॥
ऋगवेदसंहिता सा ग्रन्थोऽयं स्वर्गराज सम्बन्धी ।
जीवनचरित्र संग्रह रूपो विज्ञान संपन्नः
श्राद्यस्तु धर्मो हरिवांश्चतुर्दशः स्वरुस्तु वैकुण्ठपिता स मध्यमः ।
अनौरसौष्पीन्द्रपदेऽधिरूढवान् यो वासवो यो नहुषः स भामते ॥५॥
चतुर्दशैवेन्द्रपदेऽधिरूढा धर्मादय. प्रागभवन् स्वराजः ।
तेषां यदैन्द्रे तु पदेऽधिरूढो वैकुण्ठ आसीत् परमः स कालः॥ ६ ॥
ये चोपलभ्यन्त इमेऽद्य वेदग्रन्था य एतेषु च वेदमन्त्राः ।
भूयांस एषामृषिभिः प्रणीता वैकुण्ठनाम्नः समये ह्यभूवन् ॥७॥

३ * जगद्गुरुवैभवम् । यस्याधिवं सह चाधिभूतं चाध्यात्ममर्थावगति. समानी । प्रायेण चेत्तर्हि स मन्त्रवर्गेऽधीतस्तु वैकुण्ठनिदेशतोऽभूत् ॥ ८ ॥ नानर्षिधी संग्रहण यथार्थनिरूपितैरिन्द्र निवेदन च इन्द्रेण तत् स्वीकरणं च सोऽष्टादंष्ट्रो हि वैरूप इहान्ववोचत् ॥ ६॥ "मनीषिणः प्रभरध्वं मनीषां यथा यथा मतयः सन्ति नृणाम् । इन्द्रं सत्यैरेरयामा कृतेभिः स हि वीरो गिर्वणस्युर्विदानः ॥" (ऋ० म० १०१११११) “इन्द्रः किल श्रुत्या अस्यवेद स हि जिष्णुः पथिकृत् सूर्याय । आत्मेनां कृण्वन्नच्युतो भुवद् गोम्पतिर्दिव सनजा अप्रतीत.॥" (ऋ० म० १०१११।३) महर्षिभिर्धन्यतमैः प्रणीते ब्रह्मप्रकाण्डे सहयोगमिन्द्रः । अस्मत्कृतब्रह्मण एष कुर्यात् तदर्थमभ्यर्थयते वसिष्ठः ॥१०॥ "ये च पूर्व ऋषयो ये च नूना इन्द्र ! ब्रह्माणि जनयन्त विप्राः । अस्मे ते सन्तु सख्या शिवानि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥" (ऋ० म० ७ अ० २ सू० २३) परस्परं ब्रह्मकृतो मनीषिणः प्रेम प्रकुर्वन्ति परस्परं स्तुतिम् । कुर्वन्त आसन सहयोगिनस्तथा स्तुत्यं विदुर्ब्रह्म कृदिन्द्रमप्यमी ॥११॥ “नमः सखिभ्यः पूर्वसद्भयोनमः साकं निषेभ्यः युञ्जे वाचं शतपदीम् । युञ्जे वाचं शत पदीं गाये सहस्रवर्तनि गायत्रं त्रैष्टुभजगत् "॥ (सामस०उत्त०६।२१७) "गायत्रं त्रैष्टुभं जगद्विश्वा रूपाणि संभृता दिवा भोकांसि चक्रिरे । इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥" (साम स० उत्त० ६।२७) सत्यां स्तुतिं कुर्वत इच्छतेऽयं ददाति कामानपि तुष्ट इन्द्रः। वसिष्ठ इन्द्राय ततः स्वकामं कदाचिदावेदयते परोक्षम् ॥ १२॥ + धेनु न त्वा सूयवसे दुदुक्षन्नुप ब्रह्माणि ससृजे वशिष्ठः । स्वामिन्मे गोपतिं विश्व प्राहा त इन्द्रः सुमतिं गन्त्वच्छ । (ऋ० म० ७, अ० २, सू० १८) * ब्रह्माणि-स्तोत्राणि + अत्र नकार इवार्थीयः * जगद्गुरुवैभवम् । धुव्याप्त सूर्यस्थितदेववर्णनं, दिवः पृथिव्यां प्रतिमानकल्पनम् । यज्ञप्रतानोऽसुरघात इन्द्रतो महत्त्वमैन्द्रं वितिवेदसंग्रहः ॥१३॥ । “इन्द्रो दिवः प्रतिमानं पृथिव्या विश्वावेद सवना हन्ति शुष्णम् । महींचिद् द्यामातनोत् सूर्येण चास्कम्भ चित् कम्भनेन स्कभीयान्" ॥ (ऋ० १०६।१११) विशिष्य वैकुण्ठसुरेन्द्रकालेतिहास एवोल्लिखितो बभूव । तात्कालिकाचारविचारसंस्थादिलोकवृत्तं च समाजसिद्धम् ॥१४॥ कद्रू-सुपर्णादिपुराणवार्तानुरोधिमन्त्रा अपि तत्र दृष्टा विज्ञानचर्चा बहुधा तदासीदतस्तदुल्लेख इहास्ति भूयान् ॥१५॥ ये साध्यकालादभवन् प्रवृत्ता यज्ञा अनेकान् विषयांश्च तेषाम् । आश्रित्य मन्त्रा अभवन् प्रणीतास्तथा प्रकीर्णानपि कांश्चिदर्थान् ॥१६॥ जगद्विधाने नियमा यथाविधा यथाजगञ्चक्रमिदं प्रवर्तते कात्स्न्येन तेषामपि वैकदेशतो बोधं न विज्ञानपदेन चक्षते ॥१७॥ प्रवर्तते यैनियमैरिदं जगत् तानेव चाश्रित्य नरैः सुबुद्धिभिः । कृता प्रयोगा अपि कामसिद्धये भवन्ति तान् यज्ञपदेन चक्षते ॥१८॥ मन्त्रविषयोल्लेखः। - देवेन्द्रसम्बन्धिप्रचलितवेदग्रन्थे तात्कालिकेतिवृत्त-विज्ञान-यज्ञ-स्तुतिभेदाद् विषय- चातुर्विध्यम् । यावन्त एव विह सन्ति लोके चारित्र्यसम्बन्धिनिबन्धलेखाः। तेभ्योऽयमुत्कर्ष इहास्ति वेदे विज्ञानयज्ञौ सहलोकवृत्तौ ॥१॥ अध्यात्मविज्ञानमथादिदैवं विज्ञानमेवं त्रिदिवेतिवृत्तम् यो याज्ञिकोऽर्थस्त इमे विशुद्धा कच कच श्लिष्टतया च मन्त्रे ॥२॥ * द्युलोकस्य पृथिव्याश्च प्रतिमान महत्वेन प्रतिनिधिरिन्द्र सर्वाणि सबनानि जानाति । शुष्णमेतनामक मसुर हन्ति ! अपि च महीचित् महतीमपि द्या सूर्येण प्रातनोन् , सर्वत्र प्रकाशयुक्तामकरोदित्यर्थः । स्कभयितणा मध्ये श्रेष्ठो निरोधनसाधनेन द्युलोकमवरुद्धमकरोत्-इति सामणसमतो मन्त्रार्थ ।

३२ * जगद्गुरुवैभवम् - इन्द्रजीवनचरितमिन्द्रानुव्रत्यपव्रतिचरितमित्यादीनि तात्कालिकेतिवृत्तानि । X ऋक् संहितान्त्यभागे सूक्तद्वयमैन्द्रमानातम् । वैकुण्ठेन्द्रस्तस्मिन् जीवनचरितं स्वमादिशत् सर्वम् ॥ १॥ कक्षीवानृषि रोशिकपुत्रो यो दैर्घतमस आसीत् प्राक् । नासत्य-दस्रयोः स हि जीवनचरितं प्रदर्शयामास ॥२॥ "प्रावदिन्द्रं यमुना तृत्सवश्च प्रात्र भेदं सर्वताता मुषायत् । प्रजासश्च शिरवो यतवश्च बलिं शीर्षाणि जभ्ररश्व्यानि ” ॥ (ऋ० म० ७।२।१८) पञ्चापगालक्षितपञ्चराष्ट्राधीशेष्वजाद्यास्त्रय प्रापयन्ति । पुंशीर्षवाह्यान् हयपृष्ठवाह्यान करान् महेन्द्राय करप्रदास्ते ॥३॥ करप्रदावप्यपरावभूतां करप्रदानात् कृपयाऽपवृक्तौ इन्द्राङ्गरक्षाविनियुक्तिहेतोस्ताभ्यां किमप्यन्तरमस्य नासीत् ॥ ४ ॥ पYषनामा नृपतिस्तिरिन्दिरः प्राग यादवानां जगृहे वि यत् । सर्वस्ववित्तं तत प्रार्पयत् पुरा वत्साय काण्वाय शतं संहस्रकम् ॥ ५ ॥ ददो च पज्राय तंतः स वैरिणे राज्ञे बलिष्टाय च सामहेतवे । अश्वत्रिशत्या सह चायुतं गवां ता. स्वर्णमुद्रा वृषधेनवोऽपि वा ॥ ६ ॥ चतुर्भिरुष्ट्रान् सह हैमभारैश्चतुर्मनुष्यानथ वोपहारम् । तं यादवं दासकृतं च दत्वा दिवस्पतेरेष दिवं जगाम ॥७॥ "शतमहं तिरिन्दिरे सहस्र पर्शावा ददे राधांसि याद्वानाम्" (ऋ० म० ८ ० २ सू०६) "त्रीणि शतान्यर्वतां सहस्रा दश गोनाम् । ददुष्पज्राय साम्ने "॥ (ऋ० म०८, अ० २, सू० ६ ) उदानट् ककुहो दिवमुष्ट्रान् चतुर्युजो ददत् । श्रवसा यावं जनम्॥ (ऋ० म० ८,०२, सू० ६) x ऋक् सहिता म० १०,१० ४. सू० ४८-४९ * ऋ० स० म० १, प्र. १७ सू० ११६-११७ द्रष्टव्यम् ।

* जगदगुरुवैभवम् * ३३ क्लप्तं न विज्ञानमिहास्ति मन्त्रे संभाव्यते कोऽपि न याज्ञिकोऽर्थः । यथेन्द्रराज्ये लघुराजभेदा प्रासन्नियुक्तास्तदिहोपदिष्टम् ॥ ८॥ "हिमेनाग्निं घंसमवारयेथां पितुमतीमूर्जमस्मा अधत्तम् । बीसे अत्रिमश्विनावनीतमुन्निन्यथुः सर्वगणं स्वस्ति ॥" (ऋ० म० १, अ० १७, सू० ११६) ऋषि नरावंहसः पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन । मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्व वृषणा चोदयन्ता ॥" (ऋ० म० १, अ० १७, सू० ११७) पुराऽसुरा अत्रिमृबीससंशके निगृह्य पीडानिलये तमोमये। अवाड्मुखं सर्वगणं तुषाग्निना बबाधिरे तर्हि तमग्निमश्विनौ ॥६॥ द्रागम्भसाऽशीशमतामृबीसतः कृत्वा बहिर्धाऽऽनयतां तदाश्रमम् । अन्नं बलाधायि विधाय चात्रये मायाश्च दस्योरखिला अविध्यताम् ॥ १० ॥ यज्ञस्वरूपं यज्ञसाधनं यज्ञफलमित्यादयो यज्ञविषयाः। चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मा पा विवेश ॥ (ऋ० म० ४, प्र. , सू० ५८) - हे अश्विनौ । हिमेन 'हिमसमशीतोदकेन घ्रस दीप्यमानममिम् . अत्रे धनार्थमसुरै प्रक्षिप्त तुषाग्नि- मित्यर्थः । अवारयेथा युवा निवारितवन्तौ । अपि चास्मै अत्रये पितुमतीमूर्ज बलप्रदमन्न क्षीरादिक वा अधत्त पुष्टयर्थ प्रायच्छतम् , ऋबीसे तमोमये कारागारेऽवनीतमवाङ्मुखमत्रि सर्वगण सर्वगणसमेत- मित्यर्थ , स्वस्ति सुखपूर्वकमुनिन्यथु । तस्मय्य युवा स्वगृह प्रापितवन्तौ इति भाव, । * उपर्युक्तमन्त्रार्थ एवात्र प्रकारान्तरेण व्याख्यात. । अक्षरार्थस्तु यथा वृषणा, कामाना वर्षितारौ हे नरा- वश्विनौ । पाञ्चजन्य, निषादपञ्चमाश्चत्वारो वर्णा पञ्चजनास्तेषु भव स्वर्भानुना गृहीतममु सूर्य मोचय- नत्रिः सर्वेषां हिताचरणात् तत्र भव इत्युच्यते । एतादृशमृषिमहस. पापरूपाद् ऋबीसात् कारागारात गणेन सह मुञ्चथ.-अमोचयतम् । किं कुर्वन्तौ मिनन्ता शत्रून् हिसन्तौ दस्यो अशिवस्य सम्बन्धिनी मायाश्चानुपूर्व चोदयन्ता, आनुपूर्येण निवारयन्तौ इति सायणः । - ३४ * जगद्गुरुवैभवम् । + शृङ्गाणि वेदाः, सवनानि पादाः प्रवर्गा-ब्रह्मौदनयोः शिरस्त्वम् । छन्दांसि हस्ता अथ मन्त्र-कल्प-स्वब्राह्मणैर्बद्ध इहास्ति यज्ञः ॥१॥ आध्यात्मिकमाधिदैविकमाधिभौतिकं चेत्येवं विभक्ता ज्ञातव्यविषया विज्ञानानि । "मनसा संकल्पयति यत् तद्वातमभिगच्छति । वातो देवेभ्य प्राचष्टे यथा पुरुष ते मनः ॥" (शत० ३।४।२७) मनोवशात् प्राणगतिबहिः स्यात् तदाहतेर्वातविकारचारः । बहिस्तनोतिगतिं तु दृष्ट्वा देवा मनुष्यस्य मनो विदन्ति ॥१॥ "कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति । त भाववृत्रन सदनादृतस्यादिघृतेन पृथिवीं व्युद्यते" ॥ (ऋ० म० १। अ० २२॥सू० १६४) या दक्षिणस्यां दिशि धूममार्गेणापः समुद्राद् दिवमुत्पतन्ति । सप्ताधगर्भाः प्रपतन्ति पृथ्व्यामावतने ह्युत्तरतो रवेस्ताः ॥२॥ x "प्रजा ह तिस्रो प्रत्यायमीयुन्यन्या अर्कमभितो विविश्रे। बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेश" ॥ (ऋ० ६४८) + अत्र श्लोकप्रतिपादितो मन्त्रार्थ सायणसमत , यास्कस्त्वन्यथैवार्थ मनुते । तद्यथा-अस्यादित्यस्य चत्वारि शृङ्गाणि, चतस्रो दिश, एताः श्रयणार्हत्वाच्छृङ्गाणीत्युपचर्यन्ते। त्रयोऽस्य पादास्त्रयो वेदाः सूर्यपक्षे पादस्थानीया भवन्ति गमनसाधनत्वात् । द्वे शीर्षे-अहश्च रात्रिश्चेति द्वे शिरसी । सप्तरश्मयो- ऽस्य सप्त हस्ताः । त्रिधाबद्धो ग्रीष्मवर्षा हेमन्ताख्यैत्रिभित्रेधा बद्धो वा वृषभो वर्षिता रोरवीति शब्द करोति एष महान् देवो मान् प्राविवेश । : कृष्णवर्ण नियमेन गच्छन्त सेव्य हरयो (जलस्य)हतारो रश्मयोऽद्भिर्मेघान् पूरयन्तो दिवमुद्दिश्योर्ध्व गच्छन्ति । ते रश्मय उदक्स्थानादादित्यमण्डलर्वाञ्च आगच्छन्ति, अनन्तरमेव यदा अर्वागा- गच्छन्ति तदानीमवोदकेन पृथ्वी क्लिद्यते इति सरलार्थः । x अत्र वाजसनेयिनोऽप्येवमामनन्ति-"स तपोऽतप्यत, स प्रजा असृजत, ता अस्य प्रजा. सृष्टा परा- * जगद्गुरुवैभवम् + ३५ वाग्-वायु-तेजांस्यगमन् समन्तादापः पृथिव्योऽग्निमुपेत्य तस्थुः । सूर्याग्निरन्तःस्थित एति बाह्यान् सोमोन्तदिक्स्थः पततीह नाभौ ॥ ३॥ आरण्यकेऽन्यार्थमिहैतरेयोऽन्यार्थ पुनः पश्यति याज्ञवल्क्यः । विज्ञानमाहात्म्यमिदं तु भूयानर्थोऽस्य मन्त्रस्य यतो विभाति ॥ ४॥ यज्ञ-विज्ञानयोः समुच्चयः । "अयं ते योनित्वियो यतो जातो अरोचथाः। लं जाननग्न प्रासीदाथा नो वर्द्धया गिरः॥" (ऋ० म० ३। अ० २। सू० २६) ॥ “यत्ते सोम दिविज्योतिर्यत् -पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्ष । तेनास्मै यजमानायोरुराये कृध्यधिदात्रे वोचः", विज्ञानमेवंविधमस्त्यनेकं यज्ञानुगं मर्त्यविधेययज्ञे । अग्न्यादिवैज्ञानिकदेवधा यज्ञं प्रपुष्यन्ति निरूप्यमाणाः ॥ १ ॥ लोकवृत्त-विज्ञानयोः समुच्चयः । ऋक्संहितायामधिदैवमुक्ता विज्ञानतः सूर्यगता यथार्थाः । तथाधिभूतं पृथिवीस्थजीवान् प्रायेण , विद्यादितिहासतश्च ॥१॥ बभूवु तानीमानि वयासीत्युपक्रम्य प्रजाह तिस्रो अत्यायमीयुरिति या अमू प्रजा अत्यायन् , न्यन्या अर्कमभितो विवित्रे इति अतिर्वा अर्कस्तमिमा: प्रजा अभितो निविष्टास्ता इमा, पराभूता, बृहद्धतस्थौ भुवनेष्वन्तरिति प्रजापतिमेवैतदभ्यनूक्त, पवमानो हरित प्राविवेश इति दिशो वै हरित स्ता अय पवमान आविष्ट इति । * प्रारोहाथा - नो वर्द्धया रयिम् ( यजु स० अ० ३। म० १४। तथा अ० १२ म० ५२ ) इति यजुःपाठः। -- + यज्ञपक्षे-हे सोम ! लोकत्रये, यत्त्वदीय सोमज्योतिरस्ति, तेनास्मै यजमानाय धनेन विस्तीर्ण स्थान कुरु, किञ्च फलप्रदायेन्द्राय ब्रहि-यदधिकोऽय यजमानो भवत्विति । विज्ञानपक्षे शातपथी श्रुतियथा-यत्र वा एषोऽग्रे देवाना हविर्बभूव तक्षिांचक्रे मैव सर्वेणेवात्मना देवानां हविर्बभूवमिति । स एतास्तिस्रस्तनूरेषु लोकेषु विन्यक्षत्त । ( श० ब्रा० ३६४) + जगद्गुरुवैभवम् * भूतानि पृथ्व्यामिह यद्वदर्था देवा इमे सूर्यगतास्तथार्थाः । व्याप्तं तु तैः स्थावरजङ्गम स्यात् समानमेभिः प्रचितोऽर्थवर्गः ॥२॥ भूतेषु देवाः सह सन्निविष्टाः कर्माणि कुर्वन्ति यथा यथैते । तथोपदेशान् प्रवदन्ति मन्त्रान् ये चेतिहासा इह तेऽनुषङ्गात् ॥ ३॥ "ये देवा देवेष्वधि देवत्वमायन ये ब्रह्मणः पुर एतारो अस्य । येभ्यो न ऋते पवते धाम किञ्चन न ते दिवो न पृथिव्या अधि स्नुषु।" (यजु ० अ० १७, म० १४) वैज्ञानिकाः प्राणमया हि देवाः सूर्याग्नितोऽन्तः पुरतश्चरन्तः । मनुष्यदेवेष्वधिदेवभूतास्ते प्राणभृत्सु प्रथिता ध्रियन्ते ॥ ४ ॥ प्राणेषु देवत्वमिदं निरूढं किन्त्वीदृशं प्राणचयातिरेकात् । यज्ञार्जितात् केऽपि नराः पुरात्वे देवाः प्रसिद्धा इति लोकवृत्तम् ॥ ५ ॥ यज्ञ-लोकवृत्तयोः समुच्चयः । + "यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ (यजुः स० अ० ३१ म० १६ ) लोकवृत्त-विज्ञान-यज्ञानां समुच्चयः । "पृथिव्या अहमुदन्तरिक्षमारुहमन्तरिक्षाद् दिवमारुहम् । दिवो नाकस्य पृष्ठात् स्वोतिरगामहम् (यजुः स०अ० १७ म०६७) ॥" * अत्र विज्ञान पक्षे ब्रह्मशब्दतोऽग्निह्य. यथा च श्रुति.-अग्नि ब्रह्म,तस्यैते पुर एतारः। इति(शबा.६।३।१५) + देवा. प्रजापतिप्राणरूपाः, यज्ञेन यथोक्तेन मानसेन सकल्पेन यज्ञेन, यज्ञ यज्ञस्वरूप प्रजापतिमयजन्त पूजितवन्त । तस्मात् पूजनात् तानि प्रसिद्धानि धर्माणि जगद्रपविकाराणां धारकाणि प्रथमानि मुख्यानि भूतानि आसन् । यत्र जाले पूर्व साध्या. पुरातनदेवा सन्ति तिष्ठन्ति, त नाक ह तमेव स्गर्व ते महिमानस्तदुपासका महात्मान. सचन्ते प्राप्नुवन्ति इति लोकवृनपक्षे महीधर. ।

* जगद्गुरुवैभवम् * ३७ विधेययज्ञे खलु गार्हपत्यादाग्नीध्रमेत्याहवनीयमेति वाजिश्रुतौ वै नवमद्वितीयाध्याये तथाऽवोचत याज्ञवल्क्यः ॥ १॥ भौमत्रिलोक्यामपि पूर्वकालेऽवाग्भारतीया हिमशैलमेत्य । प्रारमेरुतोऽप्युत्तरनाकदेशं गत्वा ततो यात्यमरावती स्वः ॥२॥ उत्क्रान्त प्रात्मा यदि देवयानादूर्ध्व चरत्यग्नित पति वायुम् । आदित्यमागत्य ततः स विद्युत्सहायवान् ब्रह्मपथेन याति ॥ ३ ॥ इत्थं विचित्रा इह सन्ति मन्त्रा वैज्ञानिका वैव च याशिका वा ।' भूतानुगा द्वयर्थपरा अपीमे अर्थाश्रिता केऽपि त ऊहनीयाः॥४॥ ब्रह्म-विद्या-वेदशब्दानामैकार्य चानैकार्थं च । शब्दास्त्रयो यद्यपि वेदविद्याब्रह्मेत्यमी ज्ञानपरास्तथापि । प्रवृत्तिहेतुर्भवति व्यपेक्षाभेदस्त्रयाणां पृथगेव तेषाम् ॥१॥ शब्दश्रुतौ ज्ञानमुदेति तच्च ज्ञान विभागैत्रिभिरेति रूपम् बाग् भात्यतो वस्तु च भाति भात्या भानं सहानुव्ययसायतस्तत् ॥२॥ सम्बन्ध औत्पत्तिक एव वागर्थयोरयं तेन तयोरभेदः प्रभातमानेन न वस्तु भायात् तद्वस्तुभानं खलु भानभानम् ॥ ३॥ ऐकात्म्यमित्थं भवति त्रयाणां भेदेऽपि तज्ज्ञानमभेदमाहुः । शब्दास्त्रयस्तेन भवन्ति तत्र ज्ञाने प्रवृत्ता अचिशेषतस्ते ॥४॥ ब्रह्मेति शब्दस्त्विह वस्तुसत्तापेक्षोऽथ विद्येति तु भात्यपेक्षः। संस्कारसापेक्षतयाऽप्ययं स्यात् स वेदशब्दस्त्विह चागपेक्षः॥५॥ इत्य निमित्तप्रतिपत्तिभेदेऽप्येकं हि तज्ज्ञानमिदं त्रिभिस्तैः । शब्दैर्यतो लक्ष्यत प्राहुरेतानेकार्थकानेव ततः प्रवीणाः ॥६॥ यद् ऋग् यजुः साम च यत् त्रयस्ते वेदात्रयं ब्रह्म तदेव तद्वत् । विद्यात्रयी सातदिति त्रिधा स्युर्वागर्थसंस्कारविभक्तिभेदात् ॥ ७॥ यत् किञ्च पश्यामि यदस्ति किञ्चित् सर्वं तदृक्-साम-यजुःस्वरूपम् । ततो नु विद्यैव च वेद एव ब्रह्मैव सर्व जगदित्यवेयात् ॥८॥ हिमवान् हेमकूटश्च निषधो मेरुपर्वतः। रोहितो माल्यवांश्चैव सूर्यकान्तिश्च पर्वता. । (हेमाद्रिव्रत २३,अ०)

* जगद्गुरुवैभवम् *
ऋक्-सामयोर्यद्यजुषश्च रूपं तद्ब्रह्मविज्ञान इहैव पश्चात् ।
शुक्लत्रिसत्ये विशद निरुक्तं वेदस्वरूपं च ततः प्रविद्यात् ॥ ६ ॥
वेदस्य शास्त्ररूपतया विद्यात्वादपौरुषेयत्वं नित्यत्वं च ।
ब्रह्मास्ति वेदोऽखिलमेव विश्व ब्रह्मास्ति विश्व हिन पौरुषेयम् ।
यत् पौरुषेयं नु घटादि तत्र ब्रह्मर्ग यजुः साम न पौरुषेयम् ॥ १ ॥
वेदाश्च विद्या इह नित्यसिद्धा दृश्यन्त एता न च ताः क्रियन्ते ।
शास्त्रं हि तन्नित्यमपौरुषेयं ग्रन्थास्तु शास्त्रार्थविचारवाचः॥२॥
ग्रन्था यथा व्याकरणे हि पूर्वं कृताः सहस्राण्यपरैः क्रियन्ते ।
शास्त्रं तु तद् व्याकरणं विचाराद् दृष्टं तदेकं तदपौरुषेयम् ॥३॥
अमृत-मर्त्यभेदेन वाचो द्वैविध्यादमृतवाङ्मयस्य वेदस्याप्यपौरुषेयत्वं नित्यत्वं च ।
यो वेदशब्दः खलु वागपेक्षः प्रोक्तो द्विधा ते पुनरत्र विद्यात् ।
अस्ति द्विधा वागिति वाड्मयत्वादपौरुषेयः स सपौरुषेयः ॥ १॥
सूर्यादिपिण्डानुगतानि यावन्त्येतानि ऋक्साम-यजूंषि सन्ति ।
यद्वेदशब्देभ्य इदं समस्तं जज्ञे जगत् सोऽयमपौरुषेयः
योऽपौरुषेयो स हि वेद एवेश्वरोऽथवा निःश्वसितं तदस्य ।
भूतात्मकः सर्वजगन्मयोऽयं ब्रह्माऽथ खण्डात्मक एष तजः ॥३॥
वाचां ग्रन्थस्य पुरुषप्रयत्नसाध्यत्वादनित्यत्वं पौरुषेयत्वं च ।
मीमांसकः प्राक्छवरस्तु वेदग्रन्थञ्चतुःसंहितमेतमेव
अपौरुषेयं निजगाद मन्ये स प्रौढिवादोऽस्य च साहसं तत् ॥१॥
पद्य च गद्यं च यदस्ति गेयं प्रयत्नसाध्यं पुरुषस्य तत् स्यात् ।
घटादिवत्तेन तदस्त्यनित्यं स पौरुषेयो हि निबन्धवेदः ॥२॥
यदेव किञ्चित् पुरुषो मनुष्यो वैज्ञानिकी वाचमुवाच दृष्ट्वा ।
अन्य विधत्ते स तदात्मभूतो जीवोक्तवेदोऽस्ति स पौरुषेय ॥३॥
मनुष्यब्रह्मणा प्रणीतस्य वेदग्रन्थस्यापि पौरुषेयत्वापौरुषेयत्वाभ्यां व्यवस्था ।
यद्वा स नित्यं प्रतिपद्य वेदं ब्रह्मा मनुष्योपि चकार वेदम् ।
तस्यैष प्रात्मैव परो यथाऽभूदुबुद्ध एवं स उवाच वाचम् ॥ १॥

* जगद्गुरुवैभवम् । यदस्य विज्ञानमथास्य या वागात्मानुरूप्यात् तदुदेति सा च । या वैखरी वाग नु तया सदृष्ट विज्ञानमाहैष निबन्धवेद ॥२॥ ब्रह्मैष जीवो हि तदुक्तवेदग्रन्थोऽपि तन्निश्वसितं स वेदः । ब्रह्मैतदात्मैव तु वाङ्मयत्वाद् वाचा बहिर्भूय विभाति लोके ॥३॥ ब्रह्मैव चान्योऽप्यवरो मनुष्यो य कं च बुद्धया व्यद्धान्निबन्धम् । अपौरुषेयः सकल स वाजिश्रुतेः प्रतिज्ञात इति प्रतीमः ॥ ४॥ आत्मा द्विधास्तीश्वर-जीवभेदात् तत्रेश्वरोद्भूतमपौरुषेयम् । जीवप्रयत्ने सति पौरुषेयं चेत् संहितास्तहि तु पौरुषेयः ॥ ५ ॥ वाचो नित्यापौरुषेयत्वेऽपि तद्ग्रन्थस्य पौरुषेयत्वमनित्यत्वं च । त्रीण्यत्र वाक्-प्राण-मनांसि तत्त्वान्युक्तानि सिद्धान्तविदां निकाये । वाक् सर्वमित्यादिशदैतरेयः प्राणो मनोवाचि सदानुषते ॥ १॥ सा वाग् द्विमेदाऽस्त्यमृता च मृत्युस्तत्रामृता देवकुलस्य योनिः । मृत्युस्तु भूतप्रचयप्रसूतिर्मृत्युद्धिधा साऽस्त्यमृता च मृत्युः ॥ २॥ आकाशनाम्ना प्रथिता त्रिलोक्यां वायुश्च तेजोऽम्बु-मृदो यतः स्यु । आघाततो यत्र भवन्ति वीच्यो वाक् साऽमृता न श्रवणक्षणा सा ॥३॥ वीच्योऽमृतायामिह या प्लवन्ते ताः श्रोत्रमानन्त्यथ कम्पितस्य । १ २ श्रोत्रस्य धीर्वाचि समेत्य वर्णध्वन्यात्मवाचं सृजतीति मृत्यु.॥ ४ ॥ ३ यथा क्रिया बुद्धिरियं च तद्वद् वाक् त्रिक्षणा भति हि साऽतनित्या । सा यौगिकी योगविनाशनाश्या मृत्यु ततस्तां प्रवदामि वाचम् ॥ ५ ॥ वाचोऽमृतायाः प्रभवन्ति देवा भूतानि वै मृत्य्वमृतोत्थितानि । यथा तथा सन्ति हि मृत्युवाचो वर्णात्मवागग्रन्थमया निबन्धाः॥६॥ ते देवसङ्घा अपि भूतसङ्घा अपौरुषेया ह्युदिताः प्रकृत्या । ग्रन्थास्तु वाचां पुरुषप्रयत्नापेक्षा अतस्ते खलु * हृदयादुत्थाय कर्णशष्कुलीमार्गेणानवरत बहिर्भवन् प्रज्ञासज्ञ श्रोत्रस्य श्रोत्रत्वसमर्पकः कश्चिन् प्राणरसोऽत्र धीशब्देन विवक्षित । न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके य. शब्दानुगमाइते । अनुविद्धमिव ज्ञान सर्व शब्देन भासते” ॥ इति वाक्यपदीये भर्तृहरि । पौरुषेयाः ॥७॥ " ४० * जगदगुरुवैभवम् - वैज्ञानिकवेदस्यापौरुषेयत्वं नित्यत्वं च । देवा प्रथन्ते वसवोऽथ रुद्रा अथादितेया इति हि त्रिवर्गाः । अग्निश्च वायुश्च रविश्च तेषां विभाजका स्युस्त्रय एव देवाः ॥१॥ अगग्निक्लप्ताऽथ च साम सौरं, यजुस्तु वायव्यमिति त्रयं सत् । समस्तविश्वोद्भवकृत् तमा वैज्ञानिकं वेदमपौरुषेयम् ॥२॥ अग्नित्रयाद् देवकुलप्रसूतिः सोमात्तु भूतानि भवन्त्यमुष्मिन् । सोऽप्यग्निमेवाश्रयते ततस्तान्यपौरुषेयात् प्रभवन्ति वेदात् ॥३॥ 'अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागार तमयं सोम प्राह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः" ॥ (ऋ० म० ५, अ० ४, सू. ४५) अग्नियजुर्मुख्यतमः स वेदस्तमाश्रयेते अपि साम ऋक् च । श्रात्मानिरस्यैव ,तनुः स सोमस्तद्भूतवर्गोऽयमपौरुषेयः ॥४॥ अग्नेश्च वायोश्च रवेश्च वेदा ऋची यजूंष्यप्यथ सामभेदा. । सोमस्य चापां च तथा तुरीयोऽथर्वाङ्गिरावेद इति श्रुतं नः ॥५॥ याः सांप्रतं काश्चन वेदसंहिता दृश्यन्त एतासु निरूपिता इमे । अर्थाः समस्ता अपि दैवतादिकाः स्युर्ब्रह्मवेदानुमताः प्रश्चिताः॥ ६ ॥ तदित्थमेते खलु वैदिकार्था ये साम्प्रतं भान्ति स एक आसीत् । ब्रह्मैव तेषां प्रथमः प्रवक्ता द्रष्टोपदेष्टेति ममास्ति दृष्टिः ॥७॥ प्रकारान्तरेण पौरुषेयत्वापौरुषेयत्वविचारः । आध्यात्मिकवाचश्चतुःकक्षत्वे प्रतिपन्ने प्रथमाया अपौरुषेयत्वमन्यासां पौरुषेयत्वं च । पराथ पश्यन्त्यथ मध्यमाथान्या वैखरीत्येवमिमाश्चतस्त्रः स्युग्विधास्तत्र परास्ति नित्या तदुद्भवा सन्त्यपरा अनित्याः ॥१॥ * एकैकनादात्मिका वाक् मूलाधारादुत्थिता सती “परा” इत्युच्यते। नादस्य सूक्ष्मत्वेन दुर्निरूपत्वात् सव हृदय नाकिये । मिती 'पश्यन्ती' इत्युच्यते । योगिभिर्द्रष्टु शक्यत्वात् सैव बुद्धि गता विवक्षा प्राप्ता "मध्यमा” इत्युच्यते, मध्ये हृदयाख्ये उदीयमानत्वान्मध्यमा । अथ यदा सैव मुखमागता ताल्बोष्टादि- त्यापरिण बहिनिगच्छति तदा "वैखरी” इत्युच्यते ।

* जगद्गुरुवैभवम् * यद्वेत्ति यच्छोचति किञ्चिदात्मा वागेव तज्ज्ञानशरीरमस्ति । शानं हि वाचास्तिकयापि विद्धं वाचं परां तां विदुरत्र विभ्वीम् ॥ २॥ स्थानानि वायुः करणानि वाचेन्न चालयेत् प्राण इहान्तरेकः । स्थानेषु योगं करणैर्विधत्ते लेखं मनः पश्यति सा द्वितीया ॥ ३ ॥ स्थानेषु वायुः करणैर्विधत्ते योग बहिर्धा तत एति शब्दः । कर्णे यतो मन्त्रयते सुगुप्तं सा मध्यमा वाक् स्वरभङ्गरूपा ॥४॥ यां वाचमुश्चैब्रुवते समस्ता नराश्चतुष्पाद्विहगादयोऽद्धा । सा वैखरीत्येवमिमाश्चतुर्धा वाचः प्रदृष्टा इह जीवलोके ॥५॥ "चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहता नेङ्गायन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति" ॥ (ऋ० म०प्र० २२ सू० १६४) प्रासां परास्तीयमपौरुषेयी त्रैलोक्यविभ्वी पुरुषेऽपि नित्या । अन्यास्तु यत्वात् पुरुषस्य साध्यास्तिस्रस्ततस्ता इह पौरुषेय्यः ॥ ६ ॥ आत्मा धियाऽर्थान् कलयन् विवक्षया मनो नियुङ्क्तेऽग्निमिदं तु कायिकम् । आहन्ति नाभेस्तत उत्थितोऽनिलश्चरत्युरस्कण्ठशिरम्सु चाहतः ॥७॥ स्थानं मुखेऽसौ करणेन युक्ते प्रवर्तयत्याहतवाचि वीचिम् । सा श्रोत्रमाहन्ति ततोऽक्षधीर्वागयोगेन रूपं लभते स वर्णः ॥ ८॥ इच्छावशाद वायुग्रतः प्रयत्नो या पुरुषस्यासनि वा पुरीवा। वर्णात्मवीचिः श्रुतिमेत्य तस्माच्छाब्दी भवेद्धीरिति पौरुषेयी ॥ ६ ॥ + वाक्यस्य तद्वद् रचनापि नूनं स्याद् बुद्धिपूर्वैव न तु स्वतः सा। तस्मानिबन्धा अपि वाड्मया ये भवेयुरेतेऽपि च पौरुषेयाः ॥ १०॥ इति वेदसृष्टिः। * अत्र चत्वारीतिपद बहवो बहुधा वर्णयन्ति । तत्र सर्ववैदिकवाग्जालस्य समहरूपा भूरादयस्तिस्रो व्याहृतय. प्रणवश्चैक इत्येके वैदिकाः । मन्त्र, कल्पो ब्राह्मण चतुर्थी व्यावहारिकीति याज्ञिकाः । ऋक्- यजु: सामानि चतुर्थी व्यावहारिकीति नैरुक्ताः (नि०१३।६ वैयाकरणास्तु नामाख्यातोपसर्गनिपात- भेदेन वर्णयन्ति । अपरे च मान्त्रिका. परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरीति चत्वारि मन्यन्ते । मन्त्रस्यास्य विस्तृत व्याख्यान ग्रन्थकर्तृप्रणीते “पथ्यास्वस्ति" प्रन्थे। + "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिदे” इति वैशेषिकसूत्रम् ।

* जगद्गुरुवभवम् * * अथ प्रजासाष्टिः - सूर्य्यसंवत्सरस्याखिलसृष्टिप्रवर्तकसर्वविधप्राणजनकत्वम् । सूर्यो हि दैवं परमं जनित्रं संवत्सरे सर्वविधा हि देवाः । भूतातिरिक्तान् प्रतिभूतसक्तान प्राणान् विदुर्देवपदेन देवाः ॥ १ ॥ अथैष सूर्य्यस्य मयूखमादौ त्रेधा विभक्तं निपुणं ददर्श ज्योतिश्च गामायुरिमान विभागान् पुनश्च सौदम्याद विभजन्नपश्यत् ॥ २॥ ऋषीन् पितॄन देवगणान् मनुष्यान् गन्धर्वकान् प्राणचयप्रभेदात् । ज्योतिर्विभागानिति पञ्च दृष्ट्वा पुनश्च सौदम्याद्विभजन्नपश्यत् ॥ ३ ॥ दशधा विभक्तानां ऋषिनिकायभेदानां क्षरसृष्टौ मौलिकधातुत्वम् । उत्पत्तिरर्थस्य यतोऽथ यत्र स्थितिर्गतिर्यत्र तदुक्थमुक्तम् । स प्राणवागेव मतं तदुक्थं प्राणेन वाक् सा विकृतार्थसृष्टिः ॥ १ ॥ उक्थं द्विधा स्यादमृतं च मृत्युस्तन्मौलिकं यौगिकमित्यवेयात् । यत् केवल यत्र च नान्ययोगोऽमृतं तदेषां युतितस्तु मृत्युः ॥ २ ॥ "मानासा:-कृष्टयाख्दा ऋषयः पितरस्तु योगरूढाःस्युः । अग्रे ससर्ज भगवान् मानसानात्मनः समान " ॥ (ब्रह्म पु. ६६७) अनन्ययोगप्रभवेऽमृतेथै यो मौलिकः प्राणऋषि तमाहुः । ते वर्षयोऽनन्तविधा भवन्ति प्रायः श्रुता द्वादश सन्ति तेषाम् ॥ ३ ॥ भृग्वाङ्गिरोऽगस्त्यमरीचयोऽत्रिः क्रतुश्च दक्षः पुलहः पुलस्त्यः । स विश्वकर्माऽथ वसिष्ठविश्वामित्रावमी सृष्टिविधौ समर्थाः ॥ ४ ॥ ऋषिभ्य एभ्यो विविधप्रयोगादन्यान्यरूपाः पितरो बभूवुः । ते यौगिकास्तैर्मिलितैस्तु भूयो देवासुराद्या विविधाः स्युरुक्थाः ॥ ५ ॥ देवासुराणां युतिभेदतोऽभवत् सर्व जगत् स्थावरजङ्गमात्मना । पित्राद्यशेषार्थविशेषसृष्टयोऽभवन भविष्यन्ति भवन्ति चर्षितः ॥ ६ ॥ "देवानां ह्येतत् परम जनित्र यत् सूर्य.” इति हि श्रुति. ।

* जगद्गुरुवैभवम् * ४३ ये चर्षयो ये पितरोऽसुरा ये देवा इमाः प्राणविधाः समस्ताः। किन्त्वासु ये सन्ति न योगजास्ते प्राणा विशुद्धा ऋषिशब्दभाजः ॥७॥ ते द्वादशेहर्षय एव मौलिका अर्थास्ततः सर्वमिदं बभूव ह । एकैकमेषां बहुधा परीक्षितुं दशैव क्लप्ताः पृथगत्र पर्षद. ॥ ८ ॥ तासां कतिचित् स्वर्ग कतिचिद्धा सारते वर्षे तास्त्रेकैको ब्रह्माऽनुशास्ति नानापरीक्षकान् विदुषः अवरब्रह्मा स पृथकत्तत्पर्षदि य इष्यतेऽध्यक्षः यमृषि परीक्षते यस्तन्नामा तत्र स ब्रह्मा ऋष्यादिस्वरूपपरीक्षार्थी ब्रह्मपर्षभेदा अवरब्रह्मणां स्थानानि । बाह्नीके पुष्करके ब्रह्मावर्तेऽथ यावनप्रान्ते पोलहखण्डे चैताः परिषद प्रासन सरस्वतीकूले अन्यान्यदेशेऽपि च पर्षदोऽभवन् ब्रह्मप्रचाराय च धर्मगुप्तये । ब्रह्मा नियुक्तः प्रतिपर्षदेकको वेदे स धर्मे व्यनयजनान् गुरुः ॥२॥ बालीके भृगुपर्षत् साङ्गिरसी, पुष्करे त्वथर्वपरा ब्रह्मावर्ते घोराङ्गिरसी, याम्ये तु साऽऽगस्ती सिन्धुनदोपगसरितं सरस्वतीमनु सरस्वती नगरी तस्त्रां प्रतिष्ठिताऽऽसीद् वासिष्ठी नाम परिषत् प्राक् पुलह-पुलस्त्य-क्रत्वादीतां तु स्वर्गभूमिस्थाः परिषद आसन क्वचिदपि साऽत्रेरासीत् तु यावने देशे भारतवर्षे पश्चादुपले देविकासरितः या ब्रह्मपर्षदभवत् तस्यामुद्दालको ब्रह्मा चेलकपौत्रो जीवलपुत्रो विद्वान् प्रवाहणो द्रष्टा बबरपिता राजन्यो गतिसागतिमात्मनोऽपश्यत् पञ्चालानां पर्षदि सोऽभूदु ब्रह्मा प्रवाहणोऽध्यक्षः अपि पिप्पलादपर्षत् पञ्चनदे चैवमन्यान्या अपास्य घोरौ जमदग्निदक्षौ बृहस्पतिर्गौतमकण्वपूर्वाः प्रचेतसो नारदपर्वताद्याः पर्षत्स्वनन्ता ऋषयः परीक्ष्याः ऋषयः प्राणा एते प्राणैरितरैरपृक्तरूपाः स्युः द्वाभ्यां बहुभिर्वा तैरन्यान्यैरन्वयात् पितरः ॥४॥ - ॥७॥ ।

* जगद्गुरुवैभवम् * ॥२॥ ॥४॥ ॥५॥ सप्तधा विभक्तानां पितृनिकायभेदानां क्षरसृष्टौ द्वितीयधातुत्वम् । सोमसदो बर्हिषदोऽप्यग्निष्वात्ता हविर्भुजस्त्वितरे श्राज्यप-सोमपसहिताः सुकालिनश्चेति सप्तधा पितरः सोमसदः सोमेऽस्थुबहिषदोऽस्थुर्यमे शुष्के अग्निष्वात्ता अग्नौ तस्थुरुद्गमध्यदक्षिणास्वेते सोमोऽत्रिमत्वात् पितृमान् स सोमसद् यमोऽङ्गिरस्वानिह बहिषन्मतः । भृगुः कविस्तद्रसवांस्तु कव्यवाडग्निस्तृतीयः पितृष्पपद्यते ॥३॥ सोमोऽत्रीणामग्निः पतिर्भूगूणां यमस्तथाऽङ्गिरसाम् भूत्वा लेभे पितृतां सोमसदादिष्वमी गणिताः अध्यात्म तु महानयमात्मा चान्द्रः स चन्द्रमप्येति सोमसदादय एतन्निहिता नान्दीमुखात्रयः ख्याताः एते मुख्याः पितरश्चत्वारोऽन्ये ततोऽवरा. ख्याताः वसवस्तेषां रुद्रा आदित्याश्चाधिपतयः स्युः ते च हविष्मन्तोऽवाथ सुस्वधा वाऽथ काव्या वा अपि च सुकाला इति वा ख्याताः संज्ञाभिरितराभिः शुष्कं त्वन्नं हविरिति तद्भोक्तारो हविर्भुजः पितरः सोमाज्यद्रवपानाद् द्विविधा अन्ये सुकालिनोऽनन्ताः पूर्वे भुक्ता पितरत्रयस्त्रयोऽन्ये तु सन्ति भोक्तारः ये तु सुकाला नैते भुज्यन्ते नापि भुञ्जते किञ्चित् एते तु मध्यमा स्युस्तेभ्योऽप्यवरा भवन्ति ये प्रेताः अश्रुमुखाः प्रपितामहतस्ते नान्दीमुखाःम्युरुपरिष्टात् ॥१०॥ प्रेता इमेऽपि क्रमतो धुलोक गच्छन्ति देवैः सह यन्ति सङ्गम् । इतः प्रदानं त इमे भजन्ते यज्ञात् तथा च श्रुतिषु श्रुतं नः ॥ ११ ॥ * ये अग्निदग्धा येऽनग्निदग्धा येऽमुं लोकं पितरः क्षियन्ति । यांश्च विद्म यो उ च न मघासु यज्ञं सुकृतं जुषन्ताम्" ॥ ॥ ॥ ॥८॥ । * ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्येदिवः स्वधया मादयन्ते । तेभि स्वराट् सुनीतिमेतां यथावश तन्व कल्पयस्व ॥ (ऋ० म० १०, अ०१, सू० १५म०१४) एष पाठ,।

* जगद्गुरुवैभवम् * ४५ "उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः। असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु" ॥ (ऋ०म० १०, १०१, सू० १५, म. १) उक्तास्त्रयोऽन्ये पितरः श्रुतौ येऽवमास्त्वथर्वा अथ काव्यसंज्ञाः । तेषां च पूर्वप्रतिपादितेभ्यो नान्यत्वमस्तीति विशिष्य विद्यात् ॥ १२ ॥ पञ्चधा विभक्तानां देवनिकायभेदानां क्षरसृष्टौ तृतीयधातुत्वम् । लोकेशा असुरा वा तैर्यगयौनाश्च देवयोनिश्च पशवश्चेति विभागाद् देवगणाः पञ्चधा ख्याताः त्रेधा भिन्नस्याग्नेदे॒धा भिन्नस्य सोमस्य च लोकपालदेवत्वम् । अग्निं च वायुं च रविं च सोऽग्नीनाख्यापयत्तान् व्यभजत् पृथग्वत् । बृहस्पति विद्युतमाह सोमद्वयं द्विधा दैवतजातयः स्युः ज्योतिर्मया. पञ्च तु लोकदेवा अग्नौ च वायौ च रवौ च भकाः। बृहस्पतिर्विद्युदिमौ च लोमौ ते लोकपाः पञ्च भवन्ति देवा.॥२॥ वसूंश्च रुद्रान् सह रुद्रपुत्रानथादितेयान भुवि चान्तरिक्षे । दिवि क्रमालोकपतीनपश्यत् प्रजापतीन् ब्रह्म च यज्ञसंक्षम् ॥३॥ बृहस्पतिर्वाच्यथ विद्युदप्सु प्राहुस्तु वाचोऽपि तदप्त्वमन्ये । भृङ्गिोमय्य इमाः किलापस्तासामपां दैवतमस्ति सोमः ॥४॥ यमोऽग्निरादित्य इति त्रयं यत् तदङ्गिरोरूपमिहाप्नुवानम् । प्रापश्च वायुश्च स चन्द्रमाश्चेत्याप्यायकं तद् भृगुरूपमस्ति ॥५॥ इत्थं प्रजाः पञ्चविधा निरूप्य ब्रह्मत्वमेष स्वयमाससाद यज्ञस्तु विष्णु प्रबभूव ताभ्यां प्रजापतिभ्यां विधृताः प्रजास्ताः ॥ ६ ॥ आवरक-संवरक-संकोचकादिप्राणविशेषाणां देवविरोधिनामसुरत्वम् । ज्ञानज्योतिर्यस्मात् प्राणात् समुदेति देव सः बलमपि तमोऽपि यरमात् प्राणादसुरःस देवविद्रोही ॥१॥ * बृहस्पतिर्दैधा-वाचस्पतिब्रह्मणस्पतिब्ध । तत्रेह ब्रह्मणस्पतिर्विवक्षितो ज्ञेय । विश्वेदेवा एतस्य गणदेवताः गोपथे व्याख्याता, * जयद्गुरुवैभवम् * ॥२॥ २॥ अज्योतिषां ज्योतिरपाकृतानां ज्योति प्रचारप्रतिबन्धकानाम् । तमोमयानामसुरत्वमाहुर्दिवोऽपि केचित्त्वसुरत्वमैच्छन् ये सैंहिकेया अथ कालिकेया मौर्यास्तथा कालकदौहृदाद्याः । नानाप्रभेदा असुरा अपीमे चन्द्रे च भूमौ च पृथक् पृथक् स्युः ॥३॥ गन्धर्वादयो देवयोनयो नागादयस्तियंग्योनयः । गन्धर्व-विधाधर-यक्षरक्षः-पिशाच-सिद्धा मय गुह्यकाश्च । भूताः स्त्रियश्चाप्सरसोऽत्र क्लप्तास्ते देवयोनीतिपदप्रसिद्धाः ॥ १ ॥ अष्टौ विशेषादिह सन्ति नागा प्रथाप्यनन्ता बहवः सुपर्णाः । दैवेऽनुषक्ता. प्रचये हि तैर्यग्योनाः पशुष्वश्वगवाव्यज्ञाद्याः देवा असुराः पितरो गन्धर्वा मनुष्या इति पञ्चविधा अम्नस्या नभस्या वा संचारिदेवाः । अमी तु सूर्ये परिवारदेवा ज्योतिर्मया पञ्चविधाः पृथक् स्युः । चन्द्रे पृथिव्यामपि पञ्च देवाः संचारिसंज्ञा उदयन्ति गोजाः ॥ १॥ चन्द्रे प्रभायां पितरः प्रकाशा पृष्ठेऽसुराः सन्ति तमोमयास्ते । ज्योतिस्तमःसन्धिगता द्विसंस्था गन्धर्वसंज्ञा इति ते त्रयोऽस्मिन् ॥२॥ पृथ्व्यां प्रभायामहनीह देवाः पृष्ठेऽसुराः सन्ति तमोमयास्ते । ज्योतिस्तम सन्धिगता मनुष्या इत्थं पृथिव्यामपि ते त्रयोऽस्थुः॥ ३॥ चन्द्रे पृथिव्यामपि चासुरेषु प्रायः प्रभेदोऽस्ति न तामसेषु । धर्मा विभिन्ना इतरेषु तस्मात् पञ्चैव ता. संचरदेवताः स्युः॥४॥ ऋषीन् पितॄन् देवगणानशेषान् संसृज्य यद्रूपमुदेति देहे स पुरुषो मानुष एष प्रात्मा गन्धर्व उत्कान्त इतः शरीरात् ॥५॥ गवायुषोः प्रपञ्चस्येहानपेक्षितत्वादन्यत्रोपव्याख्यानम् । ज्योतिश्च गौरायुरितिप्रभेदात् त्रयो रसाः सूर्यकरे निरुक्ताः। तेषां त्रयाणां सविशेषमत्र ज्योतिःप्रपञ्चः परिदर्शितोऽयम् ॥१॥ * अहर्देवानामासीद रात्रिरसुराणाम् । तेऽसुरा यद्देवाना वित्त वेद्यमासीत् तेन रात्रि प्राविशन् ते देवा हीना अमन्वन्त ( तै० स० ) "ग्रह. देवा प्रश्रयन्त, रात्रिमसुरा. ( ऐ० ब्रा० ) इति च ।

* जगद्गुरुवैभवम् ५ गवां विभागा बहवस्तथायुषामन्यत्र चान्यत्र विशिष्य दर्शिताः । म लोकवृत्तप्रतिपादनक्रमे तेषामपेक्षास्ति ततो विरम्यते ॥२॥ अधिदैवताध्यात्मसादृश्येनाधिभूतव्यवस्थाकटप्तिः । अध्यात्ममेतानधिदैवमेतान् देवान् प्रकृत्या निचितान् विलोक्य । तथाधिभूतं च समाजबन्धं स प्राणिवर्गेऽपि विधातुमैच्छत् ॥ १॥ ददर्श देवान् दिवि पञ्चभक्तांन्तान् लोकिनो लोकपतींश्च यद्वत् । तद्वत् पृथिव्यामपि कर्तुमैच्छत् समाजबन्धं स हि जीववर्गे ॥२॥ साध्यादयस्तस्य मतं ग्रहीतुं समाजबन्धेऽपि च तेन क्लप्ते । प्रवेष्टुमैच्छन् न यदा तदानीं ब्रह्मा व्यनैषीत् तुषितान् पुरस्तात् ॥ ३॥ स प्राक्तनं तन्मणिजानुक्लप्तं समाजबन्धं शिथिल्लीचकार । कांश्चित् पुरस्तात् तुषितान् गृहीत्वा पित श्च देवांश्च स तान् व्यधत्त ॥ क्रमेण पूर्वाश्चतुरो विभागानुच्छिद्य पञ्च व्यधाद विभागान् । ऋषीन् पितृन् देवकुलानि तिर्यग्योनीस्तथा दैवतयोनिभेदात् ॥ ५ ॥ द्युस्थेषु देवेषु यथाविधानास्ते प्राणदेवा हि यथा य आसन् । जैबे समाजेऽपि तथा पृथिव्यां मनुष्यदेवानपि तांस्तथाहुः ॥ ६ ॥ धम्मै ऋषीणामृषयोऽन्य प्रासन् धम्मैः पितॄणां पितरो बभूवुः । देवा अभूवन्नपि देवधम्मैस्तथेतरेऽपि द्विविधा. प्रजाताः ॥७॥ प्राणाः क्रमतः स्थूला भूत्वा ते पञ्चधा विभक्ता स्युः ऋषयः पितरो देवास्तथा मनुष्याश्च गन्धर्वाः मानससृष्टचारूढा ऋषयः पितरस्तु योगरूढाः स्युः यौगिकरूढा देवाः पञ्चविधा युक्तयोगतो जाताः ऋषि-पितृ-संप्रचिताभिर्देवासुरदेवयोनीनाम् तिर्यगयोनिपशूनां मात्राभिर्मानुषो भवेत् प्राण मानुष एव प्राणः स्थूलशरीराद् बहिर्भवन् वायौ धृतयातनाशरीरो गन्धर्वश्चन्द्रमण्डलादर्वाक् या प्राणोऽत्र मनुष्येऽधिकतरमाविशति तेन वैशेष्यात् तन्नानाऽसौ प्रथते ब्रह्मकृता सेयमनुसृष्टिः ॥८॥ ३ -

* जगद्गुरुवैभवम् *
४८
.
॥४॥
प्राणविधर्षिद्रष्टैणामपि प्राणसमानतया विद्वद्विशेषाणां महर्षित्वं भृग्वादित्व च ।
भृङ्गिरोऽत्रि त्रिकुलं मरीचिम्तथा पुलस्त्यः पुलह क्रतुश्च ।
प्रचेतसो नारद-पर्वतौ चेत्येवं यथाप्राणमहर्षयोऽस्थुः
ऋषयः प्राणा दृष्टा यैस्ते द्रष्टार एकतानधियः
ऋषिद्रष्तृत्वाद् ऋषयः प्रथिता. प्राणैः समाननामान. ॥२॥
प्राणानां प्राग् नाम क्लप्तं यथा यन्नाम्ना तेनाभूत् प्रसिद्धोऽम्य विद्वान् ।
सर्वत्रैवं कुत्रचिद् द्रष्ट्रनाम्ना दृष्टः प्राणोऽप्येष लेभे प्रसिद्धिम् ॥ ३॥
भृगुरङ्गिरा अथर्वा कश्यप इत्यादयोऽखिलाः कृतिनः
प्राणैः कृतनामान शौनक-कौशिकमुखास्तु भिन्नविधा
ऋषिभिः कृतात्मभिस्तैर्विद्वद्भि प्राणशिक्षणार्था या
प्रत्यष्ठाप्यन्त पृथक् समितय एतास्तु पर्षद कथिता.
यस्यां ऋषिः पर्षदि यः परीक्षितुं क्लप्तस्तदध्यक्षतया नियोजितः।
द्रष्टाऽप्यभेदाद् ऋषिरंतदाख्यया ख्यातस्तथा गोत्रममुष्य च श्रुतम् ॥ ६ ॥
यस्यां भृगुप्राणविचित्रशक्तयोऽदृश्यन्त यस्यां भृगुणा प्रसाधिताः।
अर्था अशेषा भृगुशब्द इष्यते तद्ब्रह्मणि द्रष्टरि तत्प्रचारके ॥७॥
भृग्वर्थद्रष्टुत्वनिबन्धनोऽयं भृगुद्रष्टरि गौणदृष्टः
यद्वा प्रतिव्यक्तिसमं प्रयुक्तो गोत्रे भृगुस्तेन स जातिशब्दः ॥ ८ ॥
स भृगुप्राणद्रष्टा भृगुरुक्तोऽथास्य वंशजव्यक्ती
भार्गव-भूगुशब्दौ स्तः साधारणास्तु भृगव एव स्युः
जन्मना विद्यया च वंशद्वैविध्याद् ऋषीणां भृग्वादीनां विद्यया वशधरत्वाद् ब्रह्म-
पुत्रत्वव्यवहारः।
वंशो द्विधा पूर्वयुगे प्रक्लप्तः स जन्मनाऽन्योऽथ च विद्ययाऽन्यः ।
ब्रह्मा पुरा लोकगुरुः प्रसिद्धस्तस्यापि वंशो द्विविधः स आसीत् ॥ १॥
वंशक्रमो जन्मकृतोऽस्य योऽभूत् तेनैष लोकप्रगतिं पुपोष
वंशक्रमो योस्य तु विद्ययाऽऽसीत् तेनैष वेद प्रगतिं पुपोष ॥२॥
या जन्मना वंशपरम्परासीत् साऽस्यौरसी सृष्टिरिति प्रविद्यात् ।
या विद्यया वंशपरम्पराऽभूत् सा मानसी सृष्टिरिति प्रसिद्धा ॥३॥
येऽस्यौरसा वशधराः पुराऽऽसंस्ते पुष्करे तजनिधाम्नि तस्थुः ।
ये मानसा वंशधरास्त श्रासन् ब्रह्माण एतत्परिषन्नियुक्ताः ॥४॥
॥६॥

* जगद्गुरुवैभवम् ।
ओंकारनामौरसपुत्र आसीजेष्ठोऽस्य कश्चित् प्रवणो प्रवीणः ।
ऐन्द्रे वसोर्धारपुरे स वीरोऽसुरान्निगृह्य प्रतिवाहमाप
येऽन्यौरसा एव तु केऽपि भृग्वादयः पुरा पुत्रतया गृहीताः।
ते मानसा ब्रह्मसुताः प्रसिद्धा ब्रह्माण प्रासन परिषत्प्रबर्हाः ॥ ६ ॥
मनीषिणः केचन ये विशेषात् प्राणानिमान साध्वविदन् यथावत् ।
तत्प्राणनाम्नैव तु ते प्रसिद्धा बभूवुरेते पितरः पितृणाम् ॥ ७ ॥
ऋषिभ्यो जातानां पितृनिकायभेदानां सप्तावान्तरभेदाः ।
सोमसदो बहिषदोऽप्यग्निष्वात्ता हविर्भुजस्त्वितरे
प्राज्यप-सोमपसहिताः सुकालिनश्चेति सप्तधा पितरः
प्राणा दिवीत्थं पितरो निरुक्ताः साम्येन तेषामधिभूमि केचित् ।
नरा धुलोके पितर' प्रसिद्धाः सप्तैव ते प्रेतगणा न तत्र
नामानि तु प्राणगुणानुसारादन्वर्थमुक्तानि दिवि स्थितानाम् ।
अथैरयोगेऽपि तथैव नामान्येषां नृणामप्युदितानि भक्या
पितृलोके त्रिविभक्ते सोमसद उदक सनातने लोके
वैभ्राजेऽग्निष्वात्ता याम्येऽन्येन्तस्तु सोमपथलोके
प्राद्या इत्थं त्रिविधाः पितरोऽन्ये ये चतुर्विधास्तेषाम्
मारीचस्तेजस्वी ज्योतिर्भासश्च मानसो लोकः
॥४॥
-
पितृभ्यो जातानामसुरनिकायभेदानां बहवोऽवान्तरभेदाः।
ये सैहिकेया अथ कालकेया मौर्यास्तथा कालकदौर्खदाद्याः ।
मनुष्यजातावसुरप्रभेदा वीरा बलिष्ठा-बहबो बभूवुः
देवानां दशविधासु जघन्यजातिषु देवयोनिशब्दः ।
गन्धर्व-विद्याधर-यक्ष-रक्ष-पिशाच-सिद्धा-मय-गुह्यकाश्च ।
भूता. स्त्रियश्चाप्सरसस्त एते स्यु वयोनीतिपदप्रसिद्धाः ॥१॥
उत्सवसंकेताख्याः सप्त गणा भूतजातयः प्रोक्ताः
गुह्यकसन्निधिदेशा क्रौञ्चगिरिप्रान्तवासिनस्ते स्युः
भूतेषु ये दैवतसैनिकास्ते गणा इतोऽन्येऽपगणाः स्वतन्त्रम् ।
गणेषु मुख्याः प्रथमादयः स्युर्यक्षास्त्विमे भैरववीरभद्राः
॥३॥
।
॥२॥

* जगद्गुरुवंभवम् * देवमनुष्ययोरन्तराभवसत्वविशेषाणां तिर्यग्योनित्वव्यवहारः । नागादितिर्यविधजीवयोनिप्राणा उपास्या अभवस्तु तेषाम् । नागादिलक्ष्माण इमे पृथग्वद् विषादिविद्याः कतिचिद् बभूवुः ॥ १ ॥ त्रिधा च नागास्त्रिविधा सुपर्णा इमे तिरश्चः प्रथितास्तदात्वे । कालेन नागा अभवन् प्रवीरा राज्याधिकारानलभन्त लोके ॥२॥ ऋषि-पितृनिरपेक्षं नरजातीनां पुनः प्रकारान्तरेण पञ्चकृष्टित्वव्यवस्था । इत्थं नरान् पूर्वमसौ विभज्यान्यथाऽपि तान् पञ्चविधानपश्यत् । तथा हि देवा असुरा मनुष्या इमेऽथ गन्धर्वकुलानि नागाः देवान् क्षितेरुत्तरमेरुपाय कुमेरुपार्श्वे त्वसुरानकार्षीत् । अग्नौ पितून दक्षिणतो मनुष्यान् गन्धर्वकान्नैतितोऽब्धिकूले ॥२॥ देवादिपञ्चष्टीनां मनुष्यत्वाविशेषेऽपि तेषामेकस्मिन् विशेषे वैवस्वतमनुप्रजात्व- निबन्धनं पारिभाषिकं मनुष्वंत्वम् । पञ्च त्विमा कृष्टय प्रासु सौराः सौम्या इतीत्थं विविधा मनुष्या । वैवस्वता सौरकुला अथासन्नैलेयसंज्ञा अपरे तु सौम्याः ॥१॥ पेलेयसंज्ञानपि पञ्च पश्चादग्निप्रभेदा व्यभजंस्तु देवाः ते पूरवस्तुर्वसवोऽनवोऽन्ये द्रावोऽन्ये यदवो बभूवुः ॥२॥ पेलेयकाः पञ्चजना मनुष्या इति प्रसिद्धा अभवन् पुरात्वे वैवस्वताः सौरकुलास्तु देवाः पुरायुगे ख्यातिमगुर्मनुष्याः ॥३॥ यद्यपि मनुसन्तानो मनुष्य उक्तः स्वयंभुवस्तु मनोः संतानत्वाद्देवा असुरा अपि.ते मनुष्याः स्युः किन्त्वत्र पञ्चकृष्टिसु मनुष्य उक्तो मनुष्यलोकस्थः धर्मविशेषगृहीतो वैवस्वतमनुविशेषसन्तानः श्रद्धादेवः कश्चिदेवेष्वासीद्विवस्वतः पुत्रः ब्रह्मा तस्य मनुत्वं तस्य विशां च व्यधान्मनुष्यत्वम् त्रैलोक्यकल्पनायामिरावतीनिर्गमादधोदेशम् पृथ्वी प्रकल्प्य तत्र न्यवासयत् तान् मनुष्यान् सः ॥७॥ परिप्लक्काख्याने मनुराजविशामिदं मनुष्यत्वम् उक्तो वाचा श्रोत्रियगृहमेधित्वं तु लक्षणं तेषाम् ।

* जगद्गुरुवैभवम्
१
ये गृहकर्मव्यग्रा विश्वपरिस्थितिपरीक्षणे विमुखाः
वैज्ञानिका न येस्युस्तेहि वृथाजीवना मनुष्याः स्युः
॥8॥
साध्यादिसभ्यसमाजस्य प्रारधर्मत्यागपूर्वकं ब्रह्मदीक्षया वैदिकधर्मे प्रवेशः ।
श्रद्धादेवस्य मनोः पञ्चजना दुहितसंततयः
देवाभिधा मनुष्यास्त्वपरे तस्यैव पुत्रसंतानाः
ऋषीन् पितन देवगणांश्च तैर्यग्योनांस्तथा दैवतयोनिजीवान् ।
दैवे युगे ब्रह्मकृतव्यवस्थान् स्वदृष्टधर्मेष्वनयद् विधाता ॥ १ ॥
साध्यादयस्तस्य मतं ग्रहीतुं समाजबन्धेऽपि च तेन क्लप्ते ।
प्रवेष्टुमैच्छन्न यदा तदानीं ब्रह्मा व्यनैषीत तुषितान् पुरस्तात् ॥२॥
स्वल्पेन कालेन ततः क्रमेण स्वयं व्यवस्था मणिजानुक्लत्ता।
शैथिल्यमैद् विश्वगुरोर्व्यवस्था त्वह्नाय विश्वप्रथिता बभूव ॥३॥
निःसार एषोऽस्ति य एष धम्मों मत्यनिजेच्छापरिकल्पितः स्यात् ।
यया तु रीत्येश्वर एष विश्व निर्वाहयत्येष परोऽस्ति धर्मः ॥४॥
या हीश्वरी पद्धतिरस्ति तस्यां देवाश्चतुवीर्यविभक्तधाः ।
तयाऽनुकृत्या विहितो हि धर्मः स्यादीश्वराज्ञानुविधोऽत्युदारः॥५॥
या पद्धतिः कर्मणि देवजुष्टा विज्ञानमस्या इह वेदमाहुः
स आर्यधर्मः सुदृढोऽविनाशी यतोऽस्य मूले सविताऽयमार्यः ॥ ६ ॥
इत्थं प्रजाः पूर्वयुगे व्यवस्थिताः सभ्या अभूवन्नखिलक्षितौ स्थिताः ।
नित्या च धर्मेण च संप्रयुक्तया मर्यादया ता इह कर्म चक्रिरे ॥७॥
ऋक्संहितायामधिदैवमुक्ता विज्ञानतः सूर्यगता यथार्थाः
तथाधिभूतं पृथिवीस्थजीवान् प्रायेण विद्यादितिहासतश्च ॥ ८ ॥
प्राग्युगीयनरजातिषु देवासुरसमाजयोः प्राधान्यम् ।
इत्थं तदात्वे समयप्रभावादनेकजातिष्वधरोत्तरासु
स्थितास्वपि द्वे प्रबले अभूतां देवाः प्रधाना असुराः प्रधानाः ॥ १ ॥
देवेन्द्र पासीदसुरेन्द्र पासीत् तयो प्रशास्त्रोरखिलाः स्वराजोः ।
प्राधीन्यमन्यान्यसमग्रजातीश्वराश्च सम्राज इहोपजग्मुः ॥२॥

* जगद्गुरुवैभवम् -* देवा हि शान्ताः सुधियोऽनुशंसा विद्याप्रधाना व्यवसायशीला. । कलाप्रधानव्यवसायशीलास्त्वन्ये बलिष्ठोद्धतधातुकास्ते ॥३॥ भूम्यर्थवादे सुचिरं प्रसक्ते देवेभ्य आधाद् द्रुहिणास्त्रिलोकीम् । अन्यास्तु सर्वा तितयोऽसुरेभ्योऽनेन प्रदत्ता भुवि विप्रकीर्णाः ॥ ४॥ ॥ इति प्रजासृष्टिः ॥

* जगद्गुरुवैभवम् -
* अथ लोकसृष्टिः-
साध्ययुगीयलोकव्यवस्थातः प्रभिन्ना ब्रह्मयुगीया लोकव्ययस्थाक्टप्तिः ।
॥२॥
दिव्यब्रह्मावतारोऽयं नरब्रह्मा महाशयः
दिव्यब्रह्मप्रेरितया शक्त्या लोकान् व्यचालयत्
पृथ्व्या उच्चस्थानं यज्ञार्थ वेदिरूपतः क्लप्तम्
ब्राह्मे युगे तु पश्चात् सर्वा पृथ्वी व्यभज्यत त्रेधा
लौकालोको दिक् चेत्यथ लोकेस्मिन् पुनः कृता भागाः
पूर्व कृता त्रिलोकी स्वर्गे लोके च सप्त लोकाः स्यु.
लोकानां वर्षाणां द्वीपानां चेत्थमेतेषाम्
व्याचक्ष्महे विभागान् क्रमतस्तत्रास्ति मुख्यतो लोकः
तत्रादौ जगत्यास्त्रेधा विभागाः।
॥३॥
विशिष्ट-साधारणवासभेदात् वासव्यवस्था द्विविधा कृताऽऽसीत् ।
देशोऽस्ति यः सभ्यनिवासहेतोयंत्र व्यवस्था नियता स लोकः ॥ १॥
देशो निवासाय कृतो विभज्यते लोकोऽप्यलोको दिगिति त्रिभेदत ।
लोकः स यत्र स्थितिरस्ति सम्पदा दैव्याऽस्त्यलोकत्वमितोऽपसव्यता ॥२॥
प्रान्ते तयोदिग्व्यवहार इष्यते प्रत्यन्तदेश दिगिति प्रचक्षते ।
लोके समर्यादजना अलोकतः स्वैराशया दिनु तु हीनवृत्तयः ॥ ३ ॥
प्रकाशभागे भुवने जने च प्रवर्तते खल्वपि लोकशब्दः
यावान् प्रकाशोस्ति रवेः स लोकः प्रकाशशून्यः पुनरस्त्यलोकः ॥ ४॥
लोकव्यवस्था त्रिविधा विवक्ष्यते सौरी तथाऽग्नेय्यपि मानसीतरा।
ब्रह्मा हि सूर्योऽग्निरथो जगद्गुरुर्लोकव्यवस्थां तनुते पृथक् पृथक् ॥ ५॥
सौरी लोकव्यवस्था ।
यावद् वियद् भासयते स्वरश्मिभिस्तन्वन् समन्ताद् द्युतिमण्डल रविः।
लोकसऊर्ध्व तमसोऽस्त्यलोकता लोकोऽप्यलोकोऽपिदिगत्र सन्धितः॥२॥

* जगद्गुरुवैभवम् *
लोको यस्मादन्तरेऽस्ति प्रकाशो यस्माद् ध्वान्तं वाह्यभागेऽस्त्यलोकः ।
तस्मात् सन्धिस्थानमाहुः पुराणा लोकालोकं तत्र लोकः समाप्त ॥२॥
भूतान्याहुदैवतानप्यमुष्मिन् लोके लोकान् लोकिलोकाविभेदात् ।
लोके तस्मिन् लोकिनांभक्तिभेदात् सिध्यन्त्यन्येऽप्यान्तराः केऽपि भेदा ॥३॥
भूतानुरोधेन तु सप्त लोका मृद्वारितेजोऽनिलखासुचित्तै ।
पूर्व परेणावृतमस्ति पृथ्वीन्द्धाश्च सप्तावरणाः पृथक् स्युः॥४॥
देवानुरोधेन च भूभुवः स्वमहर्जनश्चापि तपश्च सत्यम्
एभ्यः परस्तात्तु परोरजा यः सोऽलोक पाहुस्तमलोकलोकम् ॥ ५ ॥
पानन्द सज्ज्योतिषां ज्योतिरेतत् सूर्याद यस्यां दिश्यलोकेस्ति लोकः।
तस्यां जीव प्रेति यस्तरय मुक्तिर्दिश्यन्यस्यामन्धकारेऽस्य पातः ॥ ६ ॥
आग्नेयी लोकव्यवस्था ।
पृथ्व्यां परज्योतिषि यत्र चाद्वैः सूर्योशवो यान्ति दिवं स लोकः।
ततो विपर्यास्तदिशि त्वलोको भूच्छाययाऽद्युतिमान्द्यतश्च ॥ १॥
दैवी संपद् यस्थ जीवात्मनि म्यादू_ोकै स त्रिभिर्याति सूर्यम् ।
प्रासुर्याऽन्य संपदा यात्यधस्ताद् भूच्छायां वा मन्दगं वा तमोन्धम् ॥ २॥
मानसी लोकव्यवस्था।
इत्याग्नेयी लोकसंस्था यथाऽऽसीत् तद्वद् भूमौ मानसी कल्पिताऽभूत् ।
अर्द्ध भूम्या दैवतार्थ स लोकोऽधस्तादर्ध त्वासुरं दिक् त्वनार्या ॥१॥
नाभौ मेरुस्तूत्तरो यावतः स्याद् भूभागस्य प्रान्ततो वैषुवं स्यात् ।
तावान् भागो देवलोकोऽपसव्यस्त्वस्यालोकः सोऽसुरेभ्यः प्रदिष्ट ॥२॥
लोके त्रैलोक्यविभागाः।
लोकोऽलोको दिक् च पूर्व त्रयो ये भागाः क्लप्तास्तत्र लोकस्त्रिभागः।
अग्नेयोरादितेयस्य भक्त्या लोके भेदास्त्रीन् पुनः कल्पयन्ते ॥१॥
यद्वा त्रेधा कल्पनाया निमित्तं भिन्न भिन्नं दृश्यते तत्र तत्र
भक्तिवेधं केनचिद्धेतुना चेत् त्रैलोक्यं स्यात् कल्पितं तावतैव ॥२॥
दिश्या देही कौयुदूढा सहस्त्री पैण्डी ध्रौवी मेरुज नाकजे द्वे ।
इत्थ सिद्धा वेदतो लोकतो वा नानासंस्थास्ता दशैव त्रिलोक्यः॥३॥

। जगद्गुरुवैभवम् । दिश्य त्रिलोकी । पादो यस्यां दिश्यमुख्यास्ति जन्तोःसा दिक् पृथ्वी द्यौस्तु यस्यां शिरोऽस्य । द्यौरु; दिग् भूमिरेषाऽधरा दिग् द्यावा-भूम्योरन्तरं त्वन्तरिक्षम् ॥ १ ॥ गुहात्रयी देहत्रिलोकी। जन्तोदेहे या गुहा भान्ति तिस्त्रस्ताभिदेहे कल्पिता स्यात् त्रिलोकी । अग्नेर्लोकस्त्वौदरीहौरसीयं वायोरेन्द्री सा गुहा या शिरम्या ॥ १ ॥ त्रैधातवी कूर्मत्रिलोकी । कूर्मत्रिलोकी तु दृशैव कल्प्या द्यौर्नीलमूर्ध्व तु कटाहवत् खम् । अधस्तनाऽदर्शसमा तु पृथ्वी तदन्तरिक्ष वियदन्तरिक्षम् ॥ १ ॥ द्यौरेव स्यादुत्तरं तत्कपालं पृथ्व्या ऊर्ध्व संगृहीतोदरं यत् पृथ्वी पृष्ठं चाधरं तत् कपाल स्थाल्याकारा बन्धुरं भाति दृष्टया ॥२॥ अन्तयत् स्यादेतयोरन्तरिक्षं तत्तैरेवं भासतेऽन्या त्रिलोकी । आविद्धाया अप्सु तस्या रसो यो विस्रस्त. स्यात्तस्य कूर्मत्वमाहुः ॥३॥ दैवी त्रिलोक्याप्सु हि या प्रबिद्धा प्रत्यक्षरत् कोऽपि पराइरसोऽस्या । स एष कूम्र्मो रस एव यावान् रसः स तावानिह कौम आत्मा ॥४॥ पृथ्व्या रूपं दध्यमुण्या मधु द्यौराज्यं रूपं त्वन्तरिक्षस्य कल्प्यम् । आत्मा तावानस्ति यावान् रसोऽयं लोकाकारः कूर्मवत् संनिविष्ट ॥५॥ कूर्माकारो दृष्टित कल्प्यतेऽसौ द्रष्टा भूमेः पश्यकस्तेन क्लप्त । एतं प्राणं कश्यपं प्राहुरित्थं रूपं कृत्वा सृष्टिमस्यां करोति ॥ ६ ॥ सृष्टेः कर्त्ता प्राण एवास्ति कूर्म कश्यात् पाता कश्यपः स्यात् पशुस्तु । अन्योन्यस्याकारसाम्यात्तु शब्दावन्योन्यन्यस्मिन् संप्रवृत्ता भवेताम् ॥७॥ एकैकस्मिन् भूप्रदेशस्य विन्दौ कूर्माकार प्राण एतान् रसान् स्वान् । सिञ्चत्यूळ मातृगर्भे पितेव स्रष्टा तस्मात् द्यौ पिता,भूस्तु माता ॥८॥ यस्मादेवं कश्यपात् सर्वसृष्टिः काश्यप्यस्तास्तेन सर्वाः प्रजाः स्युः । सूर्यश्चायं काश्यपः काश्यपीयं पृथ्वीपिण्डा येऽखिलाः कश्यपात् ते ॥ ६ ॥ द्यावापृथिव्यात्मकस्य कूर्मशरीरस्य वसुधानकोशत्वम् । वसुधानकोश एषोऽस्त्यस्मिन् निहितं हि विश्ववसु ताण्डव्यश्रुतौ तथा चोपनिषदि तच्छूयते रूपम्

५६
* जगद्गुरुवभवम् +
"अन्तरिक्षोदर कोशो भूमिबुनो न जीर्यति ।
दिशो ह्यस्य सक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलम् ॥
स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् विश्वमिदं श्रितम् ॥
(छा० उ० ख १५)
""
कूर्मत्रिलोक्यां द्यावापृथिव्योः श्रुत्युक्तं लक्षणम् ।
लक्ष्मावस्तादस्त्यमुष्या दिवो वै नक्षत्राणीमानि चन्द्रश्च सूर्यः ।
अस्या पृथ्व्यास्तूपरिष्टाच्च लक्ष्मौषध्यो वृता अग्निरापः प्रजाश्च ॥
(शत० १।५।५)
बाहुल्यं वै दृश्यतेऽस्यां पृथिव्यां संभाव्येते ते दिवौ लेलयेव ।
श्रादित्योऽसावस्त्यवस्ताद दिवोऽस्या इत्थं श्रुत्या सूर्य्यतो द्यौः पृथक् स्यात्॥१॥
द्यावापृथिव्योः पुराणोक्तस्य प्रमाणसाम्यस्य प्रतिषेधः ।
यावद् व्योम्नो मण्डलं दृश्यतेऽदः स्यातां छेदौ तस्य पृथ्वीप्रक्लप्तौ ।
यस्मिन्नर्द्व भाति सूर्योऽस्ति सा द्यौः पृथ्व्यारब्धं त्वन्यदर्द्ध हि पृथ्वी ॥१॥
"रवि चन्द्रमसोर्यावन् मयूखैरवभासते ।
ससमुद्रसरिच्छैला तावती पृथिवी स्मृता ॥
यावत्प्रमाणा पृथिवीविस्तारपरिमण्डलम् ।
नभस्तावत्प्रमाणं हि विस्तारपरिमण्डलम् ॥"
( पुराणे वाक्यम् )
इत्थं यद्यप्यस्य सूर्य्यस्य भासा स्पृष्ट पृथ्व्या अर्द्धमेवात्र पृथ्वी ।
द्यौरप्येवं दृश्यखण्डं दिवोर्द्ध द्यावाभूम्योरित्थमुक्तं समत्वम् ॥ २॥
किन्तु ब्रुमो नास्ति पृथ्व्यास्तदर्द्ध दृश्यं दृष्टया दृश्यते यावदस्याः।
तावान् म्वल्पोऽनुन्नतो भाग एव प्रान्ते श्लिष्टौ दृश्यतेऽर्द्धाभागे ॥३॥
भिन्नपिण्डत्रिलोकी उढत्रिलोकी ।
स्वतःप्रकाशः परत प्रकाशो रूपप्रकाशस्त्रिविधा हि पिण्डाः ।
देवश्च भूतैश्च कृतास्त पते तांस्तेन लोकान् प्रवदन्त्यमीषाम् ॥१॥
पिण्डः स्वयंज्योतिरिहोच्यते द्यौः परज्योतिरिहान्तरिक्षम् ।
पृथ्वीत्वमज्योतिषि वच्मि पिण्डे वाय्वाद्यपिण्डं च तथान्तरिक्षम् ॥२॥

* जगद्गुरुवैभवम् * ५७ पृथ्वी तु पृथ्वी रविस्त्ययं द्यौश्चन्द्रश्च वायुश्च नभोऽन्तरिक्षम् । अत्राद्यभावेन रवेः पृथिव्याः परस्परं व्युद्वहनं प्रतीमः साहस्री त्रिलोकी । स्वतःप्रकाशः परतःप्रकाशो रूपप्रकाशस्त्रिविधा हि पिण्डा । देवैश्च भूतैश्च कृतास्त एते ताम्तेन लोकान् प्रवदन्त्यमीषाम् ॥१॥ देवानुरोधादिह तु त्रिलोकी तथा चतुर्लोकगतिश्च क्लप्ता । अग्निश्च वायुश्च रविश्च सोमश्चैते स्थिता यत्र त एव लोका ॥२॥ अग्निः पृथिव्यस्ति तथाऽन्तरिक्षं वायुस्ततो द्यौरयमादितेयः । आपस्तु सोमस्त इमे पृथिव्यां चन्द्रे च सूर्ये च भवन्ति भागाः॥३॥ यथाऽस्य सूर्य य समन्ततोऽशवस्तथा पृथिव्या अपि सन्ति सर्वतः। कृष्णास्तु ते संप्रचरन्ति तन्मयी रात्रिर्दिवा भान्तिन सूर्यभावृताः॥ ४॥ दिवा पृथिव्यामिह सूर्य्यरश्मयः प्रत्याहता यान्ति रवि विपर्ययात् । रथन्तरे सामनि ते च निष्ठितास्तत्र त्रिलोकी क्रमतो विविच्यते ॥ ५ ॥ अग्नेनिवेशादिह सा त्रिलोकी सोमाञ्चतुर्लोकगतिश्च क्लुप्ता । अग्निश्च वायुश्च रविश्व सोमश्चैते स्थिता यत्र त एव लोकाः ॥ ६ ॥ भूगर्भतोऽग्नेः परितोऽस्ति विक्रमो भूपिण्डतो यावति खे बहिबहिः । आलम्बते तत्परतो दिगागतः सोम समन्ताद् वसुधाऽक्षरस्थित ॥७॥ सोमावधिः सा पृथिवी विवक्ष्यते तम्यास्त्रयस्त्रिंशदहविभक्तयः । अन्तस्त्रिकं पञ्च तु षट्कभक्तय स्तत्र त्रिलोकी प्रथमास्त्रिभक्तय ॥ ८ ॥ पृथ्वी त्रिवृत् पञ्चदशो विहाया द्यौरेकविंशोऽग्निमयी त्रिलोकी । स्तोमद्वयं सोमि चतुर्थलोकश्चतुर्विभक्तोऽस्त्यथवा दिगेषा ॥ ६ ॥ + अद्भिश्चतुर्लोकगतिद्वितीये पाठे श्रुता गोपथषोडशेऽङ्गे कौषीतकाष्टादशकेऽपि पश्याम्यापश्चतुर्थोऽस्ति हि देवलोकः ॥१०॥ + पिण्डसामत्रिलोकी, एकपिण्डत्रिलोकी चेति नामान्तरम् । + गोपथब्रा० पू०२।१६ कौषी० ० १८२

* जगद्गुरुवैभवम् -
लोकत्रयादाप इमा परस्ताद दिव्याच्च भौमाञ्च समुद्रियाः स्यु ।
भृङ्गिोमय्य इमा किलाप सोमं तु तल्लोकपतिं शृणोमि ॥ ११ ॥
यमोऽग्निरादित्य इति त्रयं यत्तदङ्गिरोरूपमिहाप्नुवानम्
आपश्च वायुश्च स चन्द्रमाश्चेत्याप्यायकं वै भृगुरूपमस्ति ॥१२॥
दिव्या त्रिलोकी त्रिविधास्ति, साहस्येषोदिताऽन्या तु भवत्युदूढा ।
पृथ्वी तु पृथ्वी, रविरस्त्ययं द्यौर्यदन्तरं व्योम तदन्तरिक्षम् ॥ १३ ॥
पिण्ड-भक्ति-त्रिलोकी।
स्वज्योतिषोऽस्मादितरत्र पिण्डे त्रैलोक्यमिष्ट दिनरात्रिसन्ध्यैः ।
जोत्स्ना पितृणामसुरत्य पृष्ठच्छायाऽथ गन्धर्वजनस्य सन्धिः ॥ १ ॥
देवा दिवा नक्तमिहासुराः म्युः सन्धौ मनुष्या इति भूत्रिलोकी ।
गन्धर्वदेवासुरमानुषाणामग्भस्त्वमाहुः खलु तैत्तिरीयाः ॥२॥
इति त्रिलोकी विविधास्ति दिव्योदूढाऽपि साहस्रचपि पैड्यपीयम् ।
पृथ्वी तु पृथ्वी रविरस्त्ययं द्यौयदन्तरं व्योम तदन्तरिक्षम् ॥ ३ ॥
ध्रुवत्रिलोकी-नाक-त्रिलोक्यौ ।
यदग्निसोमद्वयमूलभूतं ब्रह्मास्ति तस्मात् प्रथिता त्रिलोकी ।
दिव्यापि तामेव विलोक्य मयब्रह्माऽपि भूमौ ब्यद्धात् त्रिलोकीम् ॥ १ ॥
यथा दिवीमे ध्रुवनाकमूले द्यावापृथिव्यौ प्रथिते ह्यभूताम् ।
तथैव भूमौ ध्रुवनाकमूले द्यावापृथिव्यावितरे प्रक्लुप्ते ॥२॥
ध्रुवाञ्चतुर्विंशमितांशतुल्यव्यासार्द्धवृत्तान्तरमिष्यते द्यौः
ततोऽन्तरिक्ष परितो द्विचत्वारिंशचतुर्विशतिरस्ति पृथ्वी ॥३॥
नाकाच्चतुर्विंशतिसंमितांशव्यासार्द्धवृत्तान्तरतः स्वरुक्तम्
व्यासा तो विंशकलाढ्यसप्तत्रिशमिताद् वृत्तकृतं भुवः स्यात् ॥ ४ ॥
स्यात् सप्तपञ्चांशमितांशतुल्यव्यासार्द्धवृत्तेन तु भूः परस्तात् ।
इत्थं द्वितीया विहिता त्रिलोकी नाकात् तयोश्च व्यवहारसाम्यम् ॥ ५ ॥
लोका भुवः सूर्य्यत एव तेन
ध्रुवाच्च नाकाच्च पृथक् त्रिलोकी ।
सिद्धाथ तामेव विलोक्य मर्त्यब्रह्मापि भूमौ व्यधात् त्रिलोकीम् ॥ ६ ॥

* जगद्गुरुवैभवम् । ५ ( मानुषी लोकव्यवस्था ) भौमत्रिलोकी । स पञ्चकृष्ठीविभजन विधाता तेषां निवासानकरोत् स लोकान् । पृथ्व्यामुदड्मेरुविभाग एकः परस्त्ववाड्मेरुविभाग आसीत् ॥१॥ सूर्य्यः पृथिव्या ध्रवमर्द्धपार्श्वे तपन सदा वासयतेऽत्र देवान् । अर्द्धऽसुरान् तद्वदयं न्ययच्छद्देवासुराभ्यां च भुवोर्द्धमर्द्धम् ॥२॥ य उत्तरो मेरुरनेन भक्ता भूमे प्रदेशा इह देवतानाम् ततो विदिक्पार्श्वगता कुमेरो प्रान्तस्थदेशा असुरेभ्य आसन् ॥३॥ देवी त्रिलोकी त्वधराऽऽसुरीया भूमिस्तयो सन्धिगते प्रदेशे । गन्धर्ववर्गाश्च तथा मनुष्यान् ब्रह्माऽयमावासयदत्र पृथ्व्याम् ॥ ४॥ कृतव्यवस्थोऽन्तरत प्रदेशो लोक कृत सभ्यनिवासहेतोः । तत्प्रान्तदेशास्तु दिशोऽत्र नीचा वसन्त्वमर्यादधियोऽप्यसभ्याः ॥ ५ ॥ द्यौरन्तरिक्ष पृथिवीति लोकास्तत्प्रान्तदेशास्तु दिश सबाह्याः । द्यौरूवतो मध्यममन्तरिक्षं पृथ्वी त्वधस्तान्नु दिशोऽन्ततः स्युः ॥ ६ ॥ मेरुमूला त्रिलोकी । ध्रुवादधो यः पृथिवीप्रदेशः स मेरुरित्थ प्रतियन्ति लोकाः । ब्राह्माऽभिजिद्भाधर प्रदेश सुमेरुरासीत्तु पुरायुगे सः ॥१॥ प्राग्मेरुतोऽस्मात् प्रभृति प्रक्लप्त लोकत्रयं दिव्यवदेव भूमौ । धुवात् प्रभृत्यस्ति हि या त्रिलोकी ततो विशेषस्त्विह कश्चिदस्ति ॥२॥ ध्रुवाच्चतुर्विंशमितांशतुल्यव्यासार्द्धवृक्तान्तरमिष्यते द्यौः ततोऽन्तरिक्षं परितो द्विचत्वारिंशचतुर्विशतिरस्ति पृथ्वी ॥ ३ ॥ मेरोस्त्रयस्त्रिंशपरांशतुल्यव्यासार्द्धसंसाधितमण्डलान्त. ये सन्ति देशास्त इमे त्रिभक्ता लोकास्त्रयः पूर्वयुगे नियुक्ताः॥४॥ मेरोस्त्रयस्त्रिंशदिहोत्तरांशा द्यौर्मेरुतो दक्षिणमन्तरितम् । त्रयोदशांशा अपि सत्रिभागा पृथ्वी ततो दक्षिणतोऽवशेषाः॥ ५ ॥ - * भारद्वाज उवाच- 'प्रस्माल्लोकात् परो लोक श्रूयते नोपलभ्यते । तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥' (अस्योत्तर मग्निमपृष्ठ टिप्पण्याम् ) * जगद्गुरुवभवम् । प्राग्मेरुतस्तूत्तरमुत्तरोदधि यावन् मही द्यौरिति निश्चिताऽभवत् । इरावतीनिर्गमनाद्यदुत्तरं प्राग्मेरुपर्यन्तमिहान्तरिक्षकम् इरावतीनिर्गमनात्तु दक्षिणा पृथ्व्यस्ति लङ्कावधि तत्र मानुषाः । इत्थं त्रिलोकी परिकल्पिताऽभवत् पुरायुगे सभ्यनिवासहेतवे॥ ७ ॥ पृास्त लङ्काहिमशैलमध्ये द्रोण्यो हिमाद्रेरिदमन्तरिक्षम् । हिमालयादुत्तरतः प्रदेशो द्यौः सागरं यावदथो दिशोऽन्ताः ॥ ८ ॥ उदक्समुद्रोऽयमवाक्समुद्रः प्रत्यक्समुद्रावपि रक्तकृष्णौ । प्राक् पीतसिन्धुर्यमकोटिसिन्धुत्रलोक्यसीमास्ति परा दिशः स्यु ॥ ६ ॥ त्रैलोक्यमिन्द्राय ददौ विधाता गुरुमहामान्यवरोऽखिलानाम् । शेषास्तु सर्वाः तितयोऽसुरेभ्योऽनुल्लङ्घनीय विधिशासनं तत् ॥ १०॥ पृथ्वीसमोऽर्वाग्धि मनुष्यलोकः प्रागुत्तरे चन्द्रवदस्ति पित्र्यः । दैवस्तु लोको रविवन्मरुद्धत् सुविप्रकीर्णाश्रितमन्तरिक्षम् ॥ ११ ॥ पृथिव्यामुत्तराखण्डे द्यौः स्वर्गः। ( दिव्यत्रिलोकी-भौमत्रिलोक्योः साम्य-बैषम्ये ) य. सूर्यलक्ष्मापरतः प्रदेशो भूयान् यथा द्यौर्बहुधा विभिन्ना । प्राग्मेरुलक्ष्मापरत प्रदेशो भूयान् तथा द्यौर्बहुधा विभिन्ना ॥ १ ॥ द्यौर्वा दिवो वा नु पृथक्त्वमिच्छन्त्येके भवेद्वा क्व च तत्तथादौ । श्रुतौ स्मृतौ वा तु तयोरिदानी सर्वत्र दृष्टं व्यवहारसाम्यम् ॥ २॥ भृगुरुवाच- 'उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते । पुण्यः क्षेभ्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥ स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र युक्ता शुभा गुणा । काल मृत्यु प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ इह प्रजापति. पूर्व देवाः सर्षिगणास्तथा। इष्ट्वेष्टतपस पूता ब्रह्मलोकमुपाश्रिताः ॥ उत्तरः पृथिवीभाग. सर्वपुण्यतम शुभः । इहस्थास्तत्र जायन्ते ये वै पुण्यकृतो जना.।' (महाभा० शा०प०, मोक्षधर्मे अ० १९२ * जगद्गुरुवैभवम् र यथैवं सूर्यद्यवि सन्ति देवा मेरुद्यवीमे च तथा नृदेवाः । न सर्वथा संभवतीह साम्यं छायैव साम्ये तु सदा धृता स्यात् ॥ ३॥ ध्रुवभ्रमणात्-मेरुप्रदेशभेदः । यत् कान्तिवृत्तं रविवर्त्म तस्मात् पृष्ठीयकेन्द्रं यदुदकस्थमस्ति । तद्विष्णुधामात्य जिनांशतुल्यव्यासाद्धतो विष्णुपदाख्यवृत्तम् ॥ १॥ तत्रैव वृत्त चरति ध्रवं तद् यत्पृष्ठकेन्द्रं विषुवाख्यनाडया । ब्रह्माऽभिजित्संनिहितोऽत्र वृत्ते कश्चित् प्रदेशो ध्रुवबिन्दुरासीत् ॥ २ ॥ अक्षः पृथिव्यग्नित उत्थितः खे पृणक्ति यत्र ध्रुव एष बिन्दु.। सोऽक्षः पृथिव्या गतिमाननेकैः संवत्सरैः क्राम्यति सर्वदितु ॥३॥ अक्ष. पृथिव्याः क्रमशः परिभ्रमंस्तद्विष्णुधाम्नस्तु जिनांशतोऽन्तरे । दृष्टोऽभिजिगाधरभूतले पुरा पग्ध्रुवाधस्तनभूतलेऽद्य तु ॥ ४ ॥ यौव सोऽक्षः प्रतितिष्ठति क्षितौ देशः स मेरुः प्रथते नु तत्क्षणे । तन्मेरुखस्वस्तिकमेव च ध्रुवं वदन्ति शब्दास्तदिमे विचालिनः ॥ ५ ॥ कालभेदेन ध्रुवस्थितिभेदः । या हंसताराऽस्ति ततस्तु पश्चिमोत्तरे तुरीयांशसमे नभस्तले । कदाचिंदासी धंव एष तादृशे काले बभूवुर्मणिजा. कृतोदयाः॥१॥ चक्रेऽभवद्विष्णुपदेथ कालतो ब्रह्माऽभिजित्संनिहितो हि स ध्रुवः ब्राह्मी स्थितिस्तीभवत् क्रमात्तदा विभ्रंशमापुमणिजा.इमेखिलाः ॥२॥ ब्राह्मी स्थितिर्देवयुगं नु कथ्यते विद्याश्च शिल्पानि च वीर्य्यसंपद् । सभ्यत्वसामाजिकसंस्क्रिया परोन्नति तदागुर्न पुनस्तथाऽभवत् ॥ ३ ॥ युग्मं वशिष्ठाङ्गिरसोश्च युग्मं विधातृधातोश्च तदन्तराभस् । तत्र ध्रुवेऽभ्रश्यत यशविद्या तदोदयो रोमकपत्तनानाम् ॥४॥ अद्य ध्रुवश्चाभिजितो ह्यमुष्माद् ध्रुवाद्विरुद्धां दिशमागतोऽस्ति । ब्राम्याः स्थितेर्दैवयुगाद्विरुद्धास्ततो नराणां प्रतिमाः प्रजाताः ॥५॥ * जिनशब्देन चतुर्विशतिसख्या गृह्यते ।

६२ * जगद्गुरुवैभवम् * इत्थं ध्रुवश्चक्रमणं प्रकुर्वन् शानेषु वीर्येषु च संपदासु । बलात् परावर्तयते स लोकस्थितिग्रह दिगतेविभेदात् ॥ ६ ॥ नाक-धूवयोर्विष्णु-ब्रह्मणोर्दूरत्वस्यान्यान्यत्वम् । अत्राभिजिद्भात् त्रिमितोत्तरांशे भ्रवः पुरा देवयुगेऽयमुक्तः । यतश्चतुर्विंशतिरन्तरांशा भवन्ति नाक ध्रुवयो प्रसिद्धाः ॥१॥ यद्वा ह्रसन्त्येव तु विष्णुधाम्नो नाकात् सदा विष्णुपदान्तरांशाः । क्रान्तिः कदाचित् परमास्य भानोः सप्ताधिका विशतिरास्थिताऽभूत् ॥ २॥ + नाकाच्च सप्तोत्तरविंशकांशेऽभिजिद्भदेशे ध्रुवबिन्दुरासीत् । स एष वैकुण्ठमहेन्द्रकालः स ब्रह्मणो वाऽभ्युदयस्य कालः ॥३॥ सार्द्ध त्रयोविंशतिरल्पकोनाद्यत्वे तु नाक ध्रुवदरतांशाः कालेन मन्येऽन्तरशून्यतायां ध्रुवो ध्रुवं स्यादयमेव नाक इदं मतं यद्यपि निश्चितं धृतं तथापि सौकर्यधिया जिनांशतः । सर्व व्यवस्थापितमत्र तन्मया मतान्तरं तत्र यतोऽनुवर्तते ॥ ५ ॥ ॥२॥ अभिजित्परिक्रामिणः सूर्य्यस्याभिजिद्भादरगमतम् । विष्णुपद-विष्णुधाम्नोर्दूरत्वं सप्तविंशति. कथितम् किन्तु चतुर्विंशतिरिति परमा क्रान्तिः श्रुता तर्हि तस्मात्ततो विरोधान्नाक-वयोस्तदन्तरं मन्ये प्रासीदेवयुगान्ते क्वापि चतुर्विशतिः काले नाकस्तु विष्णुधाम प्रदृश्यते यत्र चैतहि तस्मादक्षिणतस्तु त्र्यंशे स पुरायुगे नेय सूर्य परमेष्ठिनमनु परिभ्रमन्नग्रतो याति तेनाभिजितः सूर्यस्त्र्यंशेनोत्तरमगाद् दूरे खस्वस्तिकं हि सूर्यस्यैवायं कथ्यते नाका स यथायथेष सूर्योऽपसरतिं नाकोऽपि कल्पते भिन्नः - ॥३॥ + सप्तविशतितमेंऽशे।

- जगद्गुरुवैभवम् + ६३ KALY ॥६॥ अभिजिब्रह्मा हंसारूढ. सोऽभूद् ध्रुवस्तत्र तस्माद्भवन्नाको जिनांशकलितान्तरे पूर्वम् सूर्य्यस्यामिजिद्भाद् दूराभिगमने विप्रतिपत्तिः । अद्यत्वेऽर्वाचीनाः पाश्चात्या केऽपि विद्वांसः अभिजितमभिसूर्य्यस्यानुदिनं समीपां गति ब्रुवते अपि वा स रेवतीतश्चित्रामन्वहरहर्गच्छन् अभिजित्समीपमहरहरायातीत्येवमप्याहुः पृष्णो रैवतमस्य हि पूर्वयुगापेक्षयांशुमालिन्यम् चित्रा-स्वात्योरंशोरभिवृद्धिश्चात्र हेतु स्यात् ॥३॥ बूमो वयन्तु सूर्ये शक्तिः परभाऽपकर्षिणी चास्ति रविसांनिध्यात् पूर्व चित्रास्वात्यभिजितां प्रभामान्यम् अद्य खलु यावरं सूर्योपसरत्यमीषु तावदिव भवति प्रभाभिवृद्धिस्तद्रविरभ्येति नाभिजितम् स्वस्वस्तिकं तु पृथ्व्या अक्षम्याहुधूवं च विष्णुपदम् नाकसमीपं सोऽक्षोऽभ्येति यथा स ध्रुवस्तथा भिन्नः ॥६॥ पूर्व तु चतुविंशत्यंशा नाकधुवान्तरं जातु अद्यत्वतभ्रमतस्तद् द्वात्रिशत्कलाहीनम् व्योम्नि तारामयोऽनन्तो नागो भात्यस्य पृष्ठतः कदम्बो नाम यज्ञात्मा विष्णुर्नारायण स्थितः एवं भूमौ नागवंशिक्षत्रिया यत्र संतताः तत्पृष्ठे नाकदेशस्थो विष्णुयशं तनोति हि प्राग्मेरुसमीक्षा। + ब्रह्माभिजिद्भादिह पाश्चिमेंशेऽष्टमे द्वितीये तु तथोत्तरांशे । अक्षांशके सांप्रतिके द्विचत्वारिशे ध्रुवः पूर्वयुगेऽयमासीत् ॥ १॥ ॥७॥ ॥८॥ - + मध्यरेखात पश्चिने भावेऽष्टभिते द्राघिमाशे ( देशान्तराशे ) अभिजित्तारातोंऽशन्वयेनोत्तरे । * उत्तरेऽद्यतनाताशे (४२) + जगद्गुरुवभवम् । सोऽयं ध्रुवो दैवयुगे य पासीद् ब्रह्माभिजित्संनिहितोऽत्र चक्रे । स एष खस्वस्तिकगस्तदासीद् यद्भप्रदेशस्य स तर्हि मेरुः ॥ २॥ पामीरशब्दसमालोचना । मूर्ये युगे मेरुरयं यतोऽभूत् प्रागमेरुमेतं प्रवदामि तस्मात् । तुरुष्कराज्योत्तरमेष देश पामीरनाम्ना व्यपदिश्यतेऽद्य ॥१॥ प्राग्मेरुशब्दस्य विकारतोऽयं पामीरशब्दोऽस्त्यथवोपमेरु. । पामीर इत्यत्र परोऽस्ति पक्षः साधुयतो विस्तृत एष देशः ॥ २ ॥ मेरुधुवाधस्तनबिन्दुमात्रो भवेद्गतिस्तस्य न विद्यतेऽह्ना । पामीरदेशः शतयोजनात्मा निरुच्यते तेन तयोहि नैक्यम् ॥ ३॥ ग्रंथापि वा नास्ति तयोर्विशेषः प्राग्मेरुशब्दोऽयमिलावृतेऽपि । तद्योजनैर्विस्तृतमुक्तमाद्यैः पुरा सहस्त्राणि जिनोन्मितानि ॥ ४॥ विस्तार उक्तोऽपि च मूटैि मेरोत्रिंशता योजनत सहस्त्रैः । तेनोपमेरावपि मेरुशब्दः सर्वाधिकोच्चो भुवि याबदशः ॥ ५ ॥ यत्र च महातरूणामिलावृतप्रान्तसूचकाः शृङ्गे । उच्च वजा निविष्टा वृक्षाङ्काः केतुपादपास्ते स्युः ॥ ६ ॥ अत्युच्चत्वात् पामीरे “तारतर" शब्दः । पामीरदेशोऽस्ति समुद्रपृष्ठाद्धस्तायुतेनोच्चतरों क्वचित्तु । न्यूनोऽपि किन्त्वष्टसहस्रतोऽयं न न्यून एषोऽद्रिमयःप्रदेश ॥ १ ॥ सर्वाधिकोच्चोऽस्ति यत' पृथिव्यां तस्मादय तारतरः श्रुतोऽभूत् । तस्यास्त्यपभ्रंशतया प्रयुक्तस्तातारशब्दः सह टारट- ॥ २॥ पामीर एवास्ति तथा तथापि प्रोकं स शब्दोऽन्वितदेशभेदे। पामीरजिन्म्लेच्छतुरुष्कराज्यप्रसारतस्तत्र स शब्दयोगः॥ ३ पञ्चत्रिशादशादशं यावत् किलकपञ्चाशम् । पश्चात् तृतीयतोंऽशात् षड्विशान्तो मतस्तु सोऽद्यत्वे ॥ ४॥ -- + + ३५ प्रशत ५१ प्रशान्तम् । -३ अशत• २६ प्रशान्त. । • तरतारदेश ।

* जगद्गुरुवैभवम् * ॥५॥ नाय सर्वो देशस्तथाविधोच्चो यथाऽस्ति पामीर किन्त्वनभिज्ञतुरुष्कव्यवहारात् स विचलितः शब्दः पश्चिमसप्तदशांशैरष्टादशभिस्तु पूर्वतोऽप्यशैः भारतमध्यमरेखावलम्बितं विद्धि तातारम् पामीरप्रान्तोऽसावत्युच्चोऽस्तीति तारतरनाम्ना प्रथितस्तमद्य लोका पाहुस्तातारमशानात् पुराणेतिहासादिषु मेरुशब्देन प्रारमेरोरेव ग्रहणम् । पामीरनाम्ना प्रथित स मेरुप्रदेश एवास्ति पुराणशास्त्रे भूयस्तुतो न त्वयमद्य दृष्टो मेरु पुराणेषु निरूपितोऽस्ति प्राग्मेरुदेशस्तु पुरा य आसीद् “यमद्य" पामीर इति ब्रवन्ति । तात्कालिकान्मुख्यसुमेरुतोऽयं त्र्यंशांशयाम्येऽस्ति स पूर्वपश्चात् ॥२॥ ब्राह्माऽभिजिद्भाधरभूप्रदेशे स्थितो नवज्यशमिताक्षभागे स पश्चिमे भारतमध्यरेखारब्धे तु षष्ठेश उपाश्रितोऽस्ति ॥३॥ प्राच्यां सितो, दक्षिणतस्तु पीतो, रक्तोऽम्त्युदक् पश्चिमतस्तु नीलः । इत्थं स चित्रोऽद्रिमयोपमेरुस्तन्मध्यतोऽत्युच्चतमः सुमेरुः॥४॥ अधिः शतात्रिं हि भृगुः सहस्राधि भागुरिस्तं चतुरस्रमाह । सावर्णिरष्टाश्रिमथो समुद्रं वार्षायणिर्गालवकः शरावम् तमूर्ध्ववेणीकृतमाह गार्योऽद्राक् क्रौष्टुकिस्तं परिमण्डल वै। य स्तस्य यत् पार्श्वमुपैत् स ऊचे तथा विधाताऽस्य तु वेद काात् ॥६॥ प्राग्मेरौ देवपुरी परिवृता ब्रह्मपुरी । तदूर्ध्वदेशे न्यवसद् विधाता ब्रह्मा वरिष्ठस्त्रिदशालयानाम् । मनोवती ब्रह्मसमात्र क्लप्ता तस्यां स्थितं ब्रह्म महाविमानम् ॥१॥ ज्योतिष्मतीन्द्रम्य शुचेस्तु तेजोवती यमस्यात्र सुसंयमाऽऽसीत् । कृष्णाङ्गनाऽऽसीनिवृतोऽप्यतेः सा शोभावती, गन्धवती च वायोः ॥२॥ महोदया सोमसमेशितुः सा यशोवती नाम सभा पुराऽऽसीत् । महाविमानानि च तत्र तत्रै तेषां तदा ब्रह्मपुरे विरेजुः ॥३॥ * वराहपुराणे पञ्चसप्ततितमेऽध्याये द्रष्टव्यम् * जगदगुरुवैभवम् * यन्नाकपृष्ठं त्रिदिवं त्रिविष्टपं स्वर्ग च भूमौ प्रविदुर्विपश्चितः । ते देवलोका इत एव मेरुतः स्युरुत्तरस्यां दिशि धातृकल्पिताः॥४॥ प्राग्मेरौ गगावतरणम् दैवे युगे मेरुरयं य आसीत् प्राग्मेरुमेनं प्रवदा म नाम्ना यतश्चतुर्गङ्गमुदेति सोऽयं पामीरनाम्ना व्यपदिश्यतेऽद्य साऽत्युन्नता भूमिरितः प्रदेशादुद्भय सर्वासु वहन्ति दिनु । + नद्यः समुद्रांश्चतुरोऽभिदीर्घात्तद्वै चतुर्गङ्गमिति प्रसिद्धम् ॥ २॥ पञ्चविधा इह नद्यः कथिता गङ्गा महानदी शाखा चुद्रा कुल्या चासां गङ्गाः साक्षात् समुद्रगा दीर्घा ॥३॥ गङ्गामेवानुगताः शतयोजनतोऽधिका महानद्यः यास्तु सहायकनद्यस्ता उपनद्यश्च शाखाश्च तुद्रा नद्यो ग्रीष्मे शुष्काः स्युर्वृष्टिमातृका ह्येताः कुल्या कृत्रिमनद्यस्तासां गङ्गा इहोच्यन्ते परमेष्ठिलोकादयां सौरब्रह्माण्डेऽवतारक्रमान् मेरौ चतुर्गङ्गभावः । आकाशो हि समुद्रोऽपां लोको वरुण-सोम दैवत्यः तस्मात् सूर्ये सूर्याचन्द्रे मेरौ ततः पतन्त्याप ध्रुवगास्तु विष्णुपद्य सूर्यगतास्ता मरीचिनाम्न्यः स्युः चन्द्रे श्रद्धा आपो मेरौ पतितास्तु गङ्गास्ताः या हि चतुर्थाल्लोकादाकाशाद् गां गता हि ता गङ्गाः ॥२॥ ॥३॥ वाराहीयेऽध्याये द्वयशीतितम एतदाख्यातम् परमेष्ठितः प्रवृत्ता ध्रुवविन्दौ ताः प्रविशन्ति विष्णुपदे ता व्योमकेशकशे रौद्रे गत्वा पतन्ति मेरुपदे ॥४॥ Lemomen + नद्य समुद्राश्चतुरोऽभिसोऽय मेरुप्रदेशश्चतुरस्र इष्टः । इति क्रोडपत्रे पाठान्तरम् । वराहपुराणेऽगस्त्य प्रति रुद्र उवाच-आकाशसमुद्रो य. प्रोच्यते तस्मादाकाशगामिनी ( गङ्गा) नदी प्रवृत्ता सा चानवरतमिन्द्रगजेन क्षोभ्यते । इति (व० पु० अ० ८२) - जगद्गुरुवैभवम् * ये तु तुषारद्रवतो गङ्गां पश्यन्ति शिक्षणीयास्ते ब्रह्मद्रवणाद् धर्मद्रवणं पश्चात् तुषार श्राद्रवति मेरु प्रदेशतस्ता यान्ति चतुर्दितु सागरांश्चतुरः अस्या विष्णुपदीत्वं त्रिस्रोतस्त्वं समुद्रगामित्वम् गङ्गाया इति लक्षणमेता गङ्गाश्चतस्त्र स्युः सीता, चालकनन्दा चतुर्भद्रेति तच्चतुर्गङ्गम् शतयोजनविस्तीर्णः पामीरः कथ्यतेऽद्यतनैः उपमेरुः स हि तस्माद वहति चतुर्दितु तच्चतुर्गङ्गम् अष्टसहस्रकरोचः पामीरोपत्यकादेशः बहुभिह्रदैः स निचितस्तेभ्यो गङ्गा बहन्ति ता दिनु ॥७॥ ॥८॥ सीता पूर्ववाहिनी । सीताख्या त्रिस्नोता पूर्व समुद्रे पृथक् पृथग् विशति ता उच्यन्ते चीने ह्वांगहूर्याङ्गसी च मेकाङ्गः योजनशतत्रयं ते आये अन्त्या शतद्वयं वहति आये पीतसमुद्रे चीनसमुद्रे पराविशति भद्रोत्तरवाहिनी । भदैव भद्रसोमा त्रिस्रोता विशति सोत्तरे जलधौ संप्रति तासामाख्या ओवीलीना इनीसी च योजनचतुःशतागो बीनस्योः प्रवाह पाख्यातः योजनशतत्रयोर्ध्व लीनैशान्यां तु सौवीर्य ॥२॥ यतुः पश्चिमवाहिनी । पश्चिमतो या चतुःसा वेदे यत्तुराख्याता तदपभ्रंशात् संप्रति चनु पौराणिका ब्रुवते अद्यतना पाश्चात्या "अक् शस" शब्देन तामाहुः मन्ये यनुष एवापभ्रंश सोऽपि संप्रथितः ॥२॥ * हागहू २५०० मील, याङ्गसी २३०० मील, मेकाङ्ग १६०० मील ।

* जगद्गुरुवैभवम् * ॥३॥ इयमेव यत्तुरुक्ता "जम्बूरिति” भुवनकोशः तदपभ्रंशाद म्लेच्छै जैहू-अमू” इति च "जततेस" इतीयं शाखान्या यक्षुषः कथिता मन्ये सैव पुराणे "शैलोदा" स्याद् भुवनकोशे जम्बूर्वा यतुर्वा निर्गच्छति गन्धमादनतः + ॥५॥ इति भारतस्य भैष्मे पर्वणि कथितं परे त्वाहुः हिन्दूकुशत काचन काचन शाखा हृदात्तु पामीरात् सभेदतस्तयो सा पश्चिमत पतति काश्यपीयाब्धी यो गन्धमादनोऽद्रि सीम्नि स्वर्गस्य पश्चिमे कथितः तद्भिन्नोऽयं जम्बूप्रभवो मेरोस्तु दक्षिणतः ॥ ७॥ "हिन्दूकुश” इति कथित कुलाचलस्तस्य कोऽपि शाखाद्रिः। अपि गन्धमादनोऽन्यस्तत्प्रभवा कापि यतुषः शाखा उद्भय गन्धमादनगिरितो मेरुं प्रदक्षिणीकृत्य उत्तरकुरून् प्रधावति जम्बूसरिदिति च भारते कथितम् ॥॥ इति काश्यपीयसागर उत्तरकुरुभिश्च सीम्नि संबद्ध अस्तीति रूसदेशस्योत्तरकुरुता प्रतीयते बृहतः "श्रोबी"-"नीसी"-"लीना" उत्तर कुरु सरित एव ता भद्राः । जम्बूस्तु पश्चिमस्थाऽप्युदद्दमुखी याति काश्यपीयाब्धौ अलकनन्दा दक्षिणवाहिनी । दक्षिणतो या गङ्गा वहति ब्रवते तु तामलकनन्दाम् तस्याः सप्त सहायक नद्यो हिमगिठधित्यकायां स्युः वामेऽत्र वसोर्धारा-सरस्वतीविष्णुपाताल्यौ गरुडा नन्दा कर्णादक्षे मन्दाकिनी-भगीरथजे ॥२॥ + भीष्म पर्व * जगद्गुरुवैभवम् * Kw केशव विष्णुभ्यामथ पातालकगरुडनन्दकर्णैश्च ॥३॥ रुद्रेण च देवेन च लक्ष्म्या प्रासां प्रयागाः स्युः भागीरथ्या गमया दिवि ब्रह्मणस्पतेः संचारः । ॥१॥ अस्ति चतुर्थे लोके सूर्योर्ध्वं ब्रह्मणस्पतेः सोमः तत्किरणद्रवरूपा हीयं भागीरथी गङ्गा या प्रापः परमेष्ठीति प्रथितास्ताः परा गङ्गा भगीरथी तु गङ्गा सास्त्यन्या ब्राह्मणस्पत्या एषु तपः पवमानः सोमो दिवि राजते तृतीयस्याम् तस्य च पवित्रतमतामृषिः पवित्रो विशिष्याह - “पवित्र ते विततं ब्रह्मणस्पते ! प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । अतप्ततनूनतदामो प्रश्नुते शृतास इवहन्तस्तत् समाशत । ० सं० स० ६ ०४३ क. १) x तयोष्पवित्र वितते दिवस्पदे शोचन्ते अस्य तन्तवो व्यस्थिरन् । अवन्त्यस्य पवीतारमाशवो दिवस्पृष्ठमधितिष्ठन्ति चेतसा ॥ (ऋ० म० ६ प्र. ४ सू० ८३ क. २) * एते अष्टौ प्रयागा- १-भागीरथी-देवप्रयाग: २-मन्दाकिनी-कद्रप्रयाग ३-कर्णगङ्गा-कर्णप्रयागः। ४-नन्दनगड्डा-नन्दप्रयाग.. ५-गरुडगङ्गा-गरुडप्रयाग। ६-पातालगडर-पातालप्रयाग। ७-विष्णुगड्डा-विष्णुप्रयागः । ८-सरस्वतीगङ्गा-केशवप्रयाग ३ - "तृतीयस्यामितो दिवि सोम आसीत्" इ ( तै० ब्रा० ३।२११) । हे ब्रह्मणस्पते सोम | तब पवित्रमङ्ग सर्वत्र विस्तृत प्रभविता । त्व पातुरङ्गानि परिंगच्छसि । सर्वत्र ते तत् पवित्रमतप्ततनूर्वतादिमिरसंतप्तगात्र. परिपक्को च प्राप्नोति । ता: परिपक्का एव याय निर्वहन्तस्तत्पवित्रं समाशत । ४ तयो शत्रणा तापकस्यास्य सोमस्य पवित्रमङ्ग धुलोकस्योच्छृिते स्थाने विस्तृतमस्ति । अस्यांश- वो दीप्यमाना विविध तिष्ठन्ति । आशवो रसाश्चास्य पावयिताररक्षन्ति । ततश्च धुलोकस्य पृष्ठभाग- मर्थादुन्नत देश चेतसाऽऽश्रयन्ते ।

* जगद्गुरुवैभवम् *
भूमौ बिन्दुसरसस्तत्प्रचारः।
योऽद्रिर्हिरण्यशृङ्गः काञ्चनबालकसरोऽस्ति तत्पादे
रुदजटाख्यैः पतितैर्विष्णुपदात् क्लप्तमम्भोभिः
बिन्दुसरस्तत् तस्माद् भागीरथ्यवतरत्यसौ गङ्गा
अन्तर्भूमौ चलिता क्रौञ्चगिरेःप्रागिरौ बहिर्भवति
विष्णुपदोदकहेतोविष्णुसरस्तत् पुराण प्राख्यातम्
अत्यन्तसूक्ष्मबिन्दुभिरुद्भतं तेन बिन्दुसर आहुः
अद्य तु बिन्दुसरस्तत् पामीरकुलं सरीकुलं वोक्तम्
स हृदः समुद्रपृष्ठादुच्च्यांशे ननगलोपमिते
(१३३०० फीट)
(हस्तशतैः पादोनितसप्ताशीत्युन्मितै. स उचोऽधे: ८६७६ हस्ता.)
साड्यौ सप्तत्रिंशेऽक्षांशे (३७१४)स हदोऽस्ति पामीरे ।
प्रथमे तु पश्चिमांशे देशान्तर इति वदन्ति विद्वांसः
जलमस्ति सर्वसरिताममृतरसं मेध्यमतिपवित्रं च
किन्त्वत्र भूमिवाय्वादित्यरसानां विकारिणां विकृतिः
यत्त्वम्बु बिन्दुसरसस्तदलौकिकमस्ति पुण्यतमम्
तत् कर्मबन्धवर्द्धकहृद्ग्रन्थ्युद्घाटनप्रवणम्
राजा भगीरथोऽस्मात् सरसो देवप्रयागपर्यन्तम्,
निर्माय खातमेतजलमानयदलकनन्दायाम
नोत्पद्यन्ते जस्मिन्नुदके क्रमयः शताधिकेऽप्यब्दे
भागीरथीप्रविष्टाः सरिदापः स्वमुणतो विहीयन्ते
अपि परमेष्ठिसमुद्रात सोमपदादागतं पुण्यम
भागीरथ्या एतजलमन्यैर्दूष्यते न जलैः
भागीरथ्या एतजलमाहात्म्य पुरा प्रबलमासीत्
कलिवर्षेभ्यस्तूवं पञ्चसहस्रेभ्य एष नास्ति गुणः
म्लेच्छानां सहवासाद् भू-रसपरिणामवैशेष्यात
विकृत-दुष्ट रसाधिकवेधादपि तद्गुणो नष्टः

* जगद्गुरुवैभवम् * ७१ आदिगङ्गायाः सप्तस्रोतस्त्वम् । सा सोमपादसूता पुण्या भागीरथी गङ्गा स्वरसं सप्तस्रोतस्वाधाय प्रवहतीत्याहुः नलिनी हादिन्यन्या पावन्यन्येति पूर्वतस्तिस्त्रः अद्यत्वेऽमी नामा इरावती ब्रह्मपुत्रा च हादिन्येव सरस्वत्युक्ता वस्वोकसारा च तत्कूले प्रागासीनगरी वस्वोकसाराऽन्या ॥२॥ ॥३॥ कोशपधनदाधिकृता धनकोशपुरी हि सा महेन्द्रस्य सौन्दर्ये तत्सदृशी नगरी नासीत् पुरा काचित् योजनसार्द्धद्विशतं नलिनी हादिन्युपैति सार्द्धशतम् योजनशतद्वयादष्यधिकगतिब्रह्मपुत्रैषा शीता (सीता) चतुः सिन्धु-तिस्रोऽप्येताम्तु पश्चिमा धाराः । शीता (सीता) सैहूत यस्याः कूले कोकन्द-तासकन्दौ स्तः ॥६॥ योजनशतं तु सार्द्ध चनुः सीता विशत्यरालाब्धौ ॥५॥ जम्बूनद्यां क्वचिदपि जाम्बूनदनाम लभ्यते स्वर्णम् योजनशतद्वयादप्यधिकगतिः सिन्धुरप्येषः स ब्रह्मपुत्रतुल्यो भारतदक्षिणसमुद्रमायाति प्राच्यामुक्ता 'सीता' दन्त्यसकारेण गद्यते साऽज्या एषा तु या प्रतीच्यां तत्र शकारोऽस्ति तालव्यः यतुर्जम्बूर्यद्यपि कथिता धारा चतुर्गङ्गे किन्त्वन्या शाखाऽम्या जनतेस् सैव शैलोदाः : “यथा च महाभारते द्रोण पर्वणि संजयं प्रति नारद. नैतादृश दृष्टपूर्व कुवेरसदनेष्वपि । धन च पूर्यमाण न: किपुनर्मनुजेष्वपि, व्यक्त वस्वोकसारेग्नमित्यूचुस्तत्र विस्मिता.॥" (महा भा० द्रो० प० ६७।१५) + “रसेन तेन विख्याता तत्र जाम्बूनदीति वै । सरित् प्रवर्तते सा च पीयते तमिवासिभिः ॥ न स्वेदोनच दौगन्ध्य नजरानेन्द्रियक्षयः । तत्पानस्वस्थमनसा जनाना तत्र जायते ॥ तीरभृत तद्रस प्राप्य सुखवायुविशोषिता । जम्बूनदाख्य भवति सुवर्ण सिद्धिभूषणम् ॥" (पुराणक्चनम् ) * जगद्गुरुवैभवम् र एवं सिन्धोः शाखे द्वे मिलिते सिन्धुरेकाऽभूत् ॥११॥ मानसतः पश्चिमगा पामीराहतिणभिमुखी भागीरथी तु सप्तम्येषा दक्षिणमुखी वहति + ॥१२॥ बिन्दुसरस्तः सप्ताप्येता दक्षिणसमुद्रमुपयन्ति भागीरथ्या गङ्गायाः सप्तस्रोतस्त्वभावः । ॥२॥ - अन्ये त्वाहुः केवलमेका भागीरथी गङ्गा बिन्दुसरस्तः प्रसृतालकनन्दायां समन्वेति अन्ये तु सप्तगङ्गं ब्रवते मेरोः प्रवाहितं पादात् प्राच्यां तिस्रो नलिनी हादिन्यथ पावनी चेति तिनः पश्चिमदिकस्थाः शीता चतुश्च सिन्धुश्च भागीरथी तु सप्तम्येषा भारतगताऽवाच्याम् अपरे त्वाहुनॆषा भागीरथ्यस्ति सप्तगङ्गेऽस्मिन् तद्धयादिसृष्टिकाल मन्दाकिन्यत्र सप्तमी नेया भागीरथी तु कुल्या काले राज्ञा भगीरथेनैषा बिन्दुसरग्तो नीत्वाऽलकनन्दायां प्रवर्तिता प्राण्या सप्त कुलपर्वताः। ॥४॥ ॥१॥ सप्तविधोऽद्रिौरुमहाकुलाद्रिश्च खण्डकुलशैलः शाखाद्रिः पादाद्रिः स्तूपाद्रिभूतलाद्रिश्च योऽद्रि शृङ्गविहीनोऽनुच्चविधो भूसमानतलः सोऽन्तर्भूमिनिगूढो भूमिसमो भूतलाद्रिः स्यात् यस्त्वन्नराशिवत् स्यात् प्रोत्तुबॅकप्रगाढकूटात्मा शाखापादविहीनः स स्तूपाद्रिर्विदूरतो दृष्टः धवलगिरि. कैलासो गौरीशङ्करगिरिश्च हेमाद्री अन्येऽप्येवं बहवः सन्ति स्तूपादयस्तुङ्गाः ॥२॥ ॥४॥ + गिलगिटप्रदेशस्था। नलिनी, हादिनी, पावनी, शीता, चक्षु. सिन्धुः, भागीरथी चेति पूर्वोक्ता सप्त नद्यः । -

* जगद्गुरुवैभवम् *
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॥५॥
ये तु कुलाद्रिश्रेण्यां क्षुद्राः शैला इतस्ततो व्यस्ताः
ते पादाद्रय उक्तास्तेषां नामानि न प्रायः
ये तु कुलाद्रे गा दीर्घाः शैलाः पृथक्-पृथग् दृष्टाः
शाखाद्रयस्त उक्तास्तेषां व्यूहं कुलाचलं ब्रुवते
अष्टदितु विततानि वर्षविभागेनाष्टौ पद्मपत्राणि ।
॥१॥
॥२॥
॥३॥
विष्णवाश्रिते यशदेशे नाक पासीत् तदाश्रिते
क्लप्ते स्वमण्डले लोकप- प्राग्मेरुकर्णिकम्
वामनपुराण उक्तं मध्यमिलावृतमतोऽष्टदित्तु
अष्टौ समा विभागा विषुवान्तास्तानि पद्मपत्राणि
भारतवर्ष दक्षिणमाग्नेय्यामस्ति कैन्नरं वर्षम्
पौरस्त्यं भद्राश्वं हिरण्यक वर्षमैशान्याम्
उदगुत्तरकुरुवर्ष वायव्यामस्ति रम्यकं वर्षम्
पश्चात्तु केतुमालं नैऋत्यामस्ति हरिवर्षम्
अथ कालेन वर्षाणि संवेश्य तु भिन्नवत्
प्राच्यां प्रतीच्यामेकैकं त्रीण्यवाच्यां तथोत्तरे
भारतकिन्नरहरयोऽवाच्यां मेरोरुदीच्यां तु
रम्यहिरण्यककुरवो मेरुस्थानं त्विलावृतं वर्षम्
एवं वर्षविभागे चतुर्दलं लोकपद्मं तत्
क्लप्तं भवति बहिर्धा स्वर्गाद्वर्षाणि पत्राणि
॥४॥
॥७॥
प्रकारान्तरेण चत्वारि पद्मपत्राणि ।
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा ।
पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादा शैलबाह्यतः॥"
(ब्रह्म पु० अ० १६.श्लो० ४५ )
इत्लावृतसीमागिरयः ।
मेरुहिमालयः शृङ्गी, माल्यवान्, गन्धमादनः
हेमकूटश्च ऋषभो, नीलः श्वतश्च पर्वताः
पार्थिवस्वर्गसीमानो नवते कुलपर्वताः
पर्वताः श्रेणिरूपास्ते पादपर्वतसंकुलाः
॥२॥

* जगद्गुरुवैभवम् * ॥३॥ ॥४॥ हिमवान् दक्षिणी सीमा, शृङ्गवानुत्तरे स्थितः माल्यवान् पूर्वसीमाऽस्ति, पश्चिमे गन्धमादनः तेषां बहिर्धा भूभागो वर्ष तद् पद्मपत्रवत् मेरुस्तु मण्डलं ब्रह्मसदनं मध्यकर्णिका कदम्बमण्डलं विष्णुस्तन्नाभिकमले ध्रुवः सूर्यो यशः स वै विष्णुस्तन्नाभौ पद्ममस्ति भूः दिव्यब्रह्मा पृथिव्यक्षो ध्रुवपद्मे यथास्थितः नरब्रह्मा यथा मेरुपने देवान् शशास ह - ॥५॥ उपसंहारः। इत्थं जगद्गुरुब्रह्मा लोकसृष्टिं विधाय वै अलं विस्तारयामास मध्येलोकं स्ववैभवम् ॥ इति लोकसृष्टिप्रकरणम् ॥ अथ धर्मसृष्टिः। उत्पत्तिशिष्टं पृथगस्ति धर्म यजन्मसिद्ध सहज स्वरूपम् । उत्पत्तिशिष्टं पृथगस्य धर्म संस्कारसिद्धं यदिहोपजातम् ॥१॥ धम्मो हतो हन्ति स एष धर्मः संरक्षितो रक्षति चाश्रयं स्वम् । दुग्धे द्रवत्वं विहतं विहन्याद् दुग्धं तदर्थान्तरवद् दधि स्यात् ॥२॥ मनुष्यरूपं खलु जन्मसिद्ध मनुष्यधर्माः सहजाः प्रक्लप्ता.। राजत्वरूप त्विह कर्म सिद्धं संस्कारधान्वित एव राजा ॥३॥ स क्षात्रधर्मो विहतो विहन्याद् राजानमेषोऽस्ति न तर्हि राजा । मनुष्यधर्मो विहतो विहन्यान् मनुष्यतां नैष तदा मनुष्यः ॥४॥ समातश्चायं श्रीमधुसूदनविद्यावाचस्पतिविरचित जगद्गुरुवैभवग्रन्थः । Wats- * शुद्धि-पत्रम् * अशुद्ध पृष्ठ पंक्ति २ १२ २ २ २७ 6 am ६ ur वभूवेह पूर्व बर्ष गृह्णत्यनृतं भातवर्षभूमौ पृथ्वी तद्वय तत्रस्तु अन्तसंज्ञ विभर्ति भृग्वङ्गिरसो समन्विताः सोऽमवद पुरुषा सृष्टिः दम्भते वृहस्पतिर्वा बभूवेह पूर्व वर्ष गृहन्त्यनृतं भारतवर्षभूमौ पृथ्वी तद्वयं त्रयस्तु अन्तः संज्ञ बिभर्ति भृग्वङ्गिरसोः समन्विता सोऽभवद पुरुषा सृष्टिः दम्यते बृहस्पतिर्वा यस्मिस्तु स्थिताः १० wo ११ १२ १२ १२ १३ १३ १ २६ १४ यस्मि तु १६ १६ ऽवसन् १३ स्थिता ऽवसम् संज्ञ श्चतुषष्टिः २१ १ श्चतुःषष्टिः षट्त्रिंशद प्रतिपत्त्य १८ १८ षट् त्रिशद प्रतिपत्य १८ (२) স্মঃ पृष्ठ पंक्ति प्रथगात्म १८ १३ १६ ४ w २२ १५ ऽअङ्गिरेसे त्वम् कोश सन्त्यो पृथगात्म सत्त्व ऽङ्गिरसे त्वम् कोश सन्त्यूषयो ध्रुवे याज्ञिकी भेदात् २२ २२ ध्रवो २४ २० याज्ञी भेदाद् ध्यात्म w २५ ध्यात्म १८ मन्त्रा मन्त्रा: २८ २६ २६ २० ३ ३० ५ द्रुधनु साङ्ग्रहो निवेदन नृणाम् पूर्व कृदिन्द्र पूर्व धेनु द्रुधनः सङ्ग्रहो निवेदनं नृणाम् पूर्व कृ दिन्द्र पूर्व धेनुं ३० १३ ३० १८ २५ ३० २६ २३ सवनानि महींचित् ३१ २४ ३२ २ ददौ ३२ सबनानि महीचित् द्वय दो मण्डलाञ्च नाकं सार्व छवर विवक्षा २३ ३६ २४ मण्डलादर्वाञ्च नाके स्वर्ग छबर विवक्षा २४ २४ १८ ४० (३) ঘুষ্ট शुद्ध पृष्ठ पंक्ति २६ ४४ ૨૨ त्यापरिण धुलोक अनम्या जैबे व्यापारण धुलोक अनभस्या जैवे ४६ १० अथर प्रथ २३ स्यु वयोनी मनुष्वत्वम् स्युर्देवयोनी मनुष्यत्वम् श्रद्धा ४ क्लत्ता क्लप्ता मम्या मस्या ऽस्य तयो २५ तयोः द्रुहिण बाह्य ५२ द्रुहिणा ३ वाह्य यस्तस्य २६ २१ २२ १ यस्तरय मेरुज प्रबिद्धा संप्रवृत्ता विन्दौ रविस्त्यय सूर्याय पैड्यपीयम व्यदधात् प्रतिमाः ध्रुवश्चक्रमणं सूर्यस्यामिजिद् भाद् स्वम्वस्तिक द्विचत्वारिशे प्रमिते मेरुजा प्रविद्धा संप्रवृत्ती बिन्दौ रविरम्त्यय सूर्य्यस्य पैण्ड्यमपीयम् व्यधात् प्रतिभा ध्रुवश्चक्रमण सूर्यस्याभिजिगाद् खम्वस्तिक द्विचत्वारिंशे ऽमिते २४ ६२ ६३ ३ ६३ २४ (४" স্বর पृष्ठ पंक्ति ऽसद्धयेनोत्तरे शद्वयेनोंत्तरे ६३ २ सहस्राणि सहस्त्रै. त्रिविष्टप १२ यद्भ सहस्त्राणि सहस्त्रैः त्रिविष्टपं प्रवदामि लोकादपां भितोऽयं भागीरथी ६४ ६६ ६६ ६६ प्रवदाम लोकादयां भिसोऽयं भगीरथी to w w 47 ६६ ६६ ७१ ३ स्पृष्ठ स्रोतस्वा सिन्धु-तिस्रो तीरभृत बहिर्धा ७१ १२ स्रोतःस्वा सिन्धुस्तिस्रो तीरभृत् बहिर्धा ७१ ७३ पद्म ७३ * इति शुभम् * M समीक्षाचक्रवर्ती स्वर्गीय पं० मधुसूदनोझा विद्यावाचस्पति के मुद्रित ग्रन्थों का * सूचीपत्र - - , नाम विवरण मून्य १ - जगद्गुरुवैभवम्- मे कई हजार वर्ष पहिल के वैदिक प्रादि ब्रह्मा का ऐतिहासिक हिन्दीभाषानुवाद) और वैज्ञानिक दोनों प्रकारका वर्णन है, ब्रह्मा कौन थे, कवर्थ, कहा थे, इत्यादि बातों का विस्तार विवेचन है। प्रकरणा- गत पुराणों की उत्पत्ति भी समझाई गई है। बहुतही प्राचीन इतिहास तथा भौगोलिक विषय का यह अपूर्व प्रन्थ है। ३) २.-इन्द्रविजय- मे भौम, दिव्य और शरीर इन त्रैलोक्यों का विवेचन, भारत- वर्ष तथा हिन्दुस्थान दोनों नामों का विवरण, पूर्व कालिक भारतवर्ष की सीमा, नदी, पर्वतादिकों के प्राचीन नाम और स्थान, भारतवर्ष की प्राक्तन विद्या, बुद्धि और समृद्धि वर्णन तथा लवेद्वीप, मालयद्वीप का लङ्का का एक अश होना और सिहलद्वीप का लङ्का न होना इत्यादि बाते अनेक प्रमाणों स सिद्ध की गई है। प्रार्य-लोग बाहर से आये इस कल्पना को भी युक्ति प्रमाण से निमूल सिद्ध किया गया है। देव युगीय मार्यों और दस्युओं के द्वादश महासंग्रामों का भी वर्णन है और अनेक प्रकार के दिव्यशस्त्रों तथा औषधियों का विज्ञान बतलाया है । सक्षेप मे वैदिक इतिहास और भूगोल का अत्यन्त विमर्श पूर्ण विवरण है। ३) ३-महसद्वाद- मे सत् , असत् , और सदमत इन तीन तत्वोंको सृष्टि का मूल मानकर उनका वैज्ञानिक विवेचन किया गया है और प्रसगवश जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मोह, मूर्छा, मृत्यु और मोक्ष इस प्रकार जीवात्मा की ७ अवस्थाओं के वर्णन है। ४.-व्योमवाद- मे प्राकाश ही सृष्टिका प्रभव प्रतिष्ठा और प्रलयस्थान है - ॥) इसका विवेचन है - - नाम विवरण मूल्य ५-अपरवाद- मे काल, स्वभाव, निर्यात, यदृच्छा, भूत, यो'न और पुरुष इन सात तत्त्वों के पारस्परिक सयोंग में विश्व की उत्पत्ति का ममर्थन किया गया है ६-श्रावरणवाद मे वय, वयुन और वयोनाध नामक तीन तत्वो से सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है। वस्तु के उपादान रूप प्राण को वय, वस्तु को वयुन और परिच्छेद को वयोनाध कहते है इन तत्वों का दार्शनिक विवेचन किया गया है । अम्भोवाद- में जलको जगत् के उत्पत्ति और प्रलय का कारण बताकर, जलकी घन तरल और विरल अवस्थाओं को समझाकर उसकी मूल कारणता सिद्ध की गई है। ॥) -- अहोगत्रवाद- मे प्रकाश ( प्रह) और तम ( रात्रि ) इन दोनों तत्वों के ज्ञान, अज्ञान मादि १० भेदों का और उनसे सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन है । प्रसङ्गात सूर्य, पृथ्वी के स्थिरत्व, चलत्व का भी वेदानुकूल विमर्श किया गया है और मूलात्मा, हसात्मा शिवात्मा इन तीन भेदों में विभक्त तीनों मात्मानों का सुविशद निरूपण है। ॥) है -संशयतदुच्छेदवाद- मे सृष्टि के विषय मे जितने मत भेद है उनका निरूपण करके किया गया है । परमेश्वर, ईश्वर, जीव, प्रात्मा, सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु, उपासना, मोक्ष आदि अनेक दुरुह विषयों का निरुपण करके वैज्ञानिक रिति से उत्तर दिया गया है । यह ग्रन्थ यथार्थ मे ब्रह्मविज्ञान के विषयों के सशय का उच्छेद करने वाला उत्तम विवेचन पूर्ण बड़ा उपयोगी है । १) १०-दशवादरहस्य- में जैसे आज कल षड्दर्शन है वैस ही वैदिककाल मे दशवाद प्रचलित थे उसी दूशवादों का संक्षिप्त विवरण है। गीताविज्ञानभाष्य- ११-प्रथम रहस्यकाएड-मे गीता के प्राचार्य श्रीकृष्ण, गीता के नामरहस्य, शास्त्ररहस्य और विषय रहस्य इनके वैज्ञानिक विवेचन किये गये है। १२-द्वितीय मूलकाण्ड- मूलकाण्ड- में ४ विद्या, २४उपनिषद्१६० उपदेशोंका विभाग दिखायाहै २) निराकरण ।

३ - -- नाम विवरण मूल्य शारीरकविज्ञानभाष्य १३-प्रथम भाग में ब्रह्मसूत्रों के श्रीशङ्कर, श्रीरामानुज और श्रीवल्लभादि प्रसिद्ध प्राचार्यों के भाष्यों का सक्षिप्त विवेचन करते हुए कहीं कहीं १॥) १४-द्वितीयभाग वैज्ञानिक रीत्या अपने सिद्धान्तका भी निरुपण किया है १) १५-शारीरक विमर्श- मे प्रकृत प्रन्थ मे स्वतन्त्ररूप से शारीरक दर्शन के विषयों पर मालोचनात्मक प्रकाश डाला है उसका सार सकलन वैज्ञानिक ढग से किया है और सरलतासे समझने के लिये कई चित्र भी दिये गये है। यह ग्रन्थ बहुत महत्वका है। १६-विज्ञान विद्युत मे वैदिक विज्ञान मे प्रविष्ट होने वालों के बोध सौकर्य के लिये वैदिक परिभाषाये सरलता से समझाई गई हैं। १७-ब्रह्मविज्ञान प्रवेशिका में ब्रह्मविज्ञानका प्रारम्भिक परिभाषा हिन्दी मे समझायो गयाहै।) (हिन्दी भाषा ) - १८-ब्रह्मविज्ञान- "" ( हिन्दीभाषा) मे ब्रह्मविज्ञान के विषय मे अनेक सशयों को दूर करते हुये सृष्टिके विषय मे मतभेदों का निरूपण तथा निराकरण किया गया है । परमेश्वर, ईश्वर, जीवका परस्पर सम्बन्ध सुख, दुख जन्म, मृत्युके कारण । प्रात्मा, मुक्ति के भेद । यज्ञ, तप, दान उपासना का रहस्य प्रादि तथा अनेक विषयों के शङ्का समा- धान पूर्वक बहुत विशदरूप से वैज्ञानिक विवेचन किया गया है जिससे ब्रह्मविज्ञान का विषय भली प्रकार समझा जा सके। यह प्रथ हिन्दीभाषा में होनेके कारण बड़ा उपयोगी है । जो विषय अनेक शास्त्रों के अवलोकन से वर्षों में अच्छी तरह समझ में नहीं पाता है वह इसके अवलोकन से बहुत सरलता से जाना जा सकता है। ३॥) १६-ब्रह्मचतुष्पदी- में १-प्रजापति, २-विराट, ३-प्रात्मा और ४-प्रात्मगति इन चार पदार्थों का सुविशद वैज्ञानिक विवेचन है। इसके यथाविधि अध्ययन से वैदिक विज्ञान की अनेक प्रथियां सुलझाई जा सकती है। १४) -- में १) नाम विवरण मूल्य २० ब्रह्मसंसन्बय में निर्विशेष, परात्पर, अव्यय, अक्षर, क्षर इत्यादि प्रात्मतत्वों का और उनस सृष्टि प्रादिका बडा मुन्दर वैज्ञानिक विवरण सिद्धान्त दृष्टि से किया गया है । यह ग्रन्थ वेदोके वैज्ञानिक स्वरूप समझने के लिये विशेष उपयोगी है। १॥) २१-देवतानि वित्- में याज्ञिक देवताओं का वर्णनात्मक वैज्ञानिक संग्रह है प्रमगत. प्राणविद्या, यज्ञविद्या, प्रात्मगति विद्या आदि आवश्यक विषयों का वर्णन है। शरीर में कितने प्रात्मा है उनका तत्व सम- झाया गया है। १) यज्ञमधुसुदन- २२स्मातकुण्डममीक्षाध्याय में स्मार्त सम्बन्धी कुण्डोंका सचित्र निरूपण कियागया है । १) २३-यज्ञोपकरणाध्याय- यज्ञ सामग्री का सचित्र वर्णन है। यज्ञविटपाध्याय- में यज्ञों के भेद समझाये गये हैं। कमानुक्रमणीकाध्याय- में याज्ञिक कर्मों की क्रमवद्ध सूची है २४-अत्रिख्याति में अत्रिऋषि और उसके वंशका वैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक दोनों प्रकार का वर्णन विशदरूप से किया गया है। प्रसङ्गात 'प्रतिष्ठानपुर" किस जगह है इसका भी विमर्श किया गया है। १) २५-वैदिककाष- में अमरकोष के ढग से कठिन वैदिक शब्दों का बडा सुन्दर सग्रह है। इसके उत्तरार्द्ध में बृहद्देवता का दैवत प्रकरण भी सगृहीत करदिया गया है। ॥) २६-कादम्बिनी- में वर्षा सम्बन्धी सभी विषय हिन्दी भाषानुवाद सहित बहुत (हिन्दीभाषानुवाद) ही स्पष्ट और सरलता से बताये गये हैं। वर्षा के गर्भ बारण, १२ महिनों के प्रत्येक दिन के लक्षण तथा योग, गर्भ मादि अच्छे शकुन होते हुए भी वर्षा न होनेका कारण और अनेक प्रकार के प्रश्नों तथा परिक्षाओं से शीघ्र वर्षा होना न होना जाना जाय ऐसी बहुतसी बाते लिखी गई है। भिन्न २ देशोंक सुभिक्ष, दुर्भिक्ष आदि के विषय में भी लिखा गया है। प्रस- शात भूकम्प, उल्कापात आदि कई विषयों का भी कारण बताया गया है। ४) - -- नाम विवरण मून्य में पितृत्व का वैज्ञानिक विवेचन किया गया है। २६-पितृसमीक्षा- ३०-कौषीतकोपनिषद् ३१-ऐतरेयोपनिषद्- ये प्राचीनग्रन्थ उत्तम रूपसे सम्पादित किये गये है, जिससे इसका अर्थ भली प्रकार समझा जा सके। 1) १ प्रत्यन्त प्रस्थानमीमांसा २ आशौचपश्चिका ३ वेदधर्मव्याख्यान इनकी प्रथमावृत्ति खतम होचुकी है अब द्वितीयावृत्ति होंगी। अमुद्रित ग्रन्थों की सूची। २४ पञ्चभूत समीक्षा २५ शारीरक साइन्सबद्रीप २६ स्वर्ग सन्देश ( यज्ञ मधुसूदन) १ ब्रह्महृदय २ ब्राह्मणहृदय ३ उपनिषदहृदय ४ गीता तृतीय प्राचार्यकांड ५ गीता चतुर्थ हृदयकांड ६ दर्शनह्रदय ७ निगमबोध ८ रजोवाद ६ अमृतमृत्युवाद दैववाद ११ सिद्धान्तवाद १२ वैश्वरूपनिक्ति १३ सत्यनिवित् १४ आत्मनिक्ति १५ वेदनिवित् १६ ऋषिनिवित् ( महर्षिकुल वैभव) १७ भूनिवित् १८ वेदार्थभ्रमनिवारण १६ अधियज्ञविज्ञान २. ब्रह्मगिरि २१ ब्रह्मदवी २२ ब्रह्मविनय २३ साइन्सप्रदीप २७ यविहारीध्याय २८ मन्त्रप्रचरणाध्याय २६ आध्यात्मिकाध्याय ३० प्राधिदैविकाध्याय ३१ यज्ञोपपादनाध्याय ३२ यज्ञसरस्वती ३३ कन्दोभ्यस्ता ३४ शुल्वसूत्र २५ स्थालीपाक ३६ प्राधान ३७ अग्निहोत्रपद्धति ३८ दर्शपूर्णमासपद्धति ३६ प्रामायण ४० चातुर्मास्यपद्धति ४१ निरूढ पशुबन्ध ४२ ग्रहीनद्वादशाहपद्धति ४३ ज्योतिष्टोम ४४ चयनपद्धति

Jagadguruvaibhavam

Author
Madhusudan Ojha
Title
Jagadguruvaibhavam
File name
Jagadguruvaibhavam
Text
OCR done
Citation
1999
Published
2006
Publisher
Pradyumna Sharma
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Tibetian Institute, Sarnath, Vns.
Classification
Sanskrit Literature
DLI number
487385
Barcode
1990010087855.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
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