Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Padhey Prabha
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पद्य-प्रभा
सम्पादक
पं० हरिशङ्कर शर्मा
प्रकाशक
रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स, आगरा
,
COPYRIGIT नम्र निवेदन 'पद्य-प्रभा' में हिन्दी के बीस सुप्रसिद्ध कवियों की चुनी हुई, कुछ कविताओं का सम्रह किया गया है। प्राचीन और अर्वा- चीन दोनों प्रकार की कविताओं के नमूने, पाठक, इस छोटी सी पुस्तक में देखेंगे। यह किताब विशेष कर कविता-प्रेमी विद्यार्थियो के लिये तय्यार की गई है, इसी से इसके अन्त में, समझने की सुगमता के विचार से, कविताओं में आये पौराणिक कथा- प्रसगों का भी स्पष्टीकरण कर दिया है। प्रत्येक कवि की कविता के पूर्व उसका सक्षिप्त परिचय भी दे दिया है। हम उन श्रादरणीय कवि महानुभावों के परम कृतज्ञ हैं जिन्होंने हमारी विनम्र विनती पर अपनी कविताओं को इस 'सग्रह' में सम्मि- लित करने के लिये सहर्ष श्राज्ञा प्रदान की है। हम समस्त कवि महोदयों को, इस अनल्प अनुग्रह के लिये, कृतज्ञता पूर्वक हार्दिक धन्यवाद देते हैं। श्रागरा, श्रावणी, १९८६ वि० and
...
-फचीर
१
-तुलसीदास
-फेशनदाम
-रहीम
-रसपान
-विहारीलाल
६०
६३
...
...
-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
-प्रतापनारायण मिश्र
नाथूराम शकर शर्मा
१-श्रीधर पाठक
1-महावीरप्रसाद द्विवेदी
-अयोध्यासिंह उपाध्याय
1-जगन्नाथदास रत्नाकर
६-देवीप्रसाद पूर्ण
७-रामचरित उपाध्याय
-कामताप्रसाद गुरु
-सत्यनारायण (कविरत्न)
-०-मैथिलीशरण गुप्त
२१-कथा-प्रसग
८२
..
••
...
६८
पद्य-प्रमा
कबीर
[ कनीरसाहब का जन्म और मरण क्रमश सवत् १४५५ और
१५७५ वि० में हुआ बताया जाता है । इस विषय में और भी कई मत
है। कहते हैं, कबीरसाहय एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे,
परन्तु उनका पालन-पोपण एक जुलाहे ने किया । कबीरमाहब ने कई
जगह अपनी जाति जुलाहा प्रकट की है । वह पालम्पन से ही पडे
सच्चे और धर्मात्मा थे । कपीर पढ़े-लिखे न थे, परन्तु साधु-सन्तों की
संगति से उन्होंने धर्म के गृढ रहस्यों को भली भाँति समझ लिया था।
कबीर साखी और भजन पनाकर मुनाया करते थे, जिन्हें इनके चेले
याद कर लेते थे। पीछे से यही सब सामग्री एकत्र कर ली गई, और
'अब पुस्तकाकार में उपन्थित है। कवीरसाहब के घोजक घड़े भादर के
माय देखे जाते हैं। इनके नाम से 'कबीर-पंथ' नामक एक मत भी
प्रचलित
हुमा
है। कबीर की कविता बडी ही भावपूर्ण और सहयों को
मस्त कर देने वाली है। उसमें अधिकतर अध्यात्मवाद का वर्णन है।]
.
कबीर के दोहे
सील हिमा जब अपजे, अलस दृष्टि तब होय ।
विना सील पहुँचे नही, लाख कथै जो कोय ॥१॥
पद्य-प्रमा सीलवन्त सबने बड़ा, सर्व रतन की खानि । तीन लोक की सम्पदा, रही सील मे आनि ॥२॥ ज्ञानी, ध्यानी, संजमी, दाता, सूर, अनेक । जपिया, तपिया, बहुत हैं, सीलवन्त कोई एक ॥३॥ छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात । कहा विष्णु को घटि गयो, जो भृगु मारी लाव ॥४॥ जहाँ दया वहाँ धर्म है, जहाँ लोम तह पाप । जहाँ क्रोध तह काल है, जहाँ छिमा तहें आप ॥ ५ ॥ जो जल बादै नाव में, घर में बाढ़ दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यहि सजन को काम ॥ ६ ॥ हाड बड़ा हर भजन कर, द्रव्य बड़ा कछु देहु । अकल बड़ा उपकार कर, जीवन का फल येहु ॥ ७ ॥ देह घरे का गुन यही, देह देह कछु देहु । बहुरि न देही पाइये, अबकी देहु सो देहु ॥८॥ चाह गई चिन्ता मिटी, मनुवा बेपरवाह । जिनको करू न चाहिये, सोई साहसाह ॥६॥ माँगन गये सो मरि रहे. मरे सो माँगन जाहिं । तिनसे पहिले वे मरे, होत करत जो नाहिं ।।१०।। गोधन, गजधन, बाजिधन, और रतन धन सान ! जब श्रावै सन्तोष-धन, सब धन धूरि समान ॥ ११ ॥ रूखा सूखा खाइ के, ठडा पानी पीव ।
- कषोर मरि जाऊँ मायूँ नहीं, अपने सन के काज। परमारथ के कारने, मोहिन सा पान १३ ॥ धीरे धीरे रे मना, धीरे सब का होय । माली सींच सौ पक्षा, एतु बाये फसदीय ॥१४॥ कविरा धीरज के धरे, हाथी मन भर साय। टूक एक के कारने, स्वान घरे पर जाय ॥ १५ ॥ काल कर सो भान पर, भाग पर सो । पल में परलै होयगी, पारि करेगो का ॥ १६ ॥ या दुनियाँ में आय के, छाँदि ६ र ऐट। लेना होय सो लेइ ले, उठी जाति है पैठ ॥१७॥ कविरा आप ठगाइये, और न ठगिये फोय । थाप ठगे सुग्व अपजै, और ठगे दुग होय ॥१८॥ जो तोकों काँटा घुये, वाहि पोय तू फल। वोहि फूल को फूल है, पाको है चिरसूत ॥ १॥ दुर्षल को न सताइये, जाकी मोटी जाय । विना जीव की स्वास मे, लोट ममम हो जाय ॥२०॥ ऐसी पानी बोलिये, मन का थापा योय। औरन को सीतल करे, श्राप? मीना होय ॥२१॥ साँच घरावर तप नहीं, मट घरावर, पाप। जाके किरदे साँच है,तारि श्राप ॥२॥ राबो देवन में चला, रान मिलिया कोय। -
माँगन ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ २५॥
पद्य-प्रमा
दाया दिल में राखिये, तू क्यों निरदय होय ।
साई के सब जीव हैं, कीरी फुञ्जर दोय ॥ २४ ॥
माँगन मरन समान है, मत कोई माँगो भीख ।
दोप पराये देख कै, चले हसन्त हसन्त ।
आपन याद न आवई , जिनका आदि न अन्त ॥ २६ ॥
औगुन कहीं सराब का, ज्ञानवन्त सुन लेय ।
मानुष ते पसुश्रा करै, द्रव्य गाँठि का देय ॥ २७ ॥
निन्दक नियरे राखिये, ऑगन कुटी छवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय ॥ २८ ॥
जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ ।
जो यौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ॥ २६ ॥
साध, सती श्री सूरमा, ज्ञानी औ गजदन्त । ,
एते निकसि न बाहुरें, जो जुग जाहिं अनन्त ॥ ३०॥
चलन चलन सब कोई कहै, मोहि अंदेसा और
साहब से परिचय नहीं, पहुँचोगे किहि ठौर ॥ ३१ ॥
कबिरा सगत साधु की, हरे और की व्याधि ।
बोली सगति क्रूर की, आठो पहर उपाधि ॥ ३२ ॥
जाट वैद घर आपने, तेरा किया न होय ।
जिन या वेदन निरमई, भला करेगा सोय ॥ ३३ ॥
लगी लगन छूटै नहीं, जीभ चौच जरि जाय ।
मीठो कहा अँगार को, जाहि चकोर चबाय ॥ ३४॥
कबीर
कवीर के पद
करम-गति टारे नाहिं टरी।
मुनि वसिष्ठ से परिडत मानी सोध के लगन धरी।
सीता-हरन, मरन दसरथ को वन में विपति परी।।
कह वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहँ वह मिरगचरी।
सीया को हरि लै गो रावन सुबरन लक जरी ।।
नीच हाथ हरिचन्द विकाने बलि पाताल धरी।
कोटि गाय नित पुन्न करत नृग गिरगिट जोन परी।।
पाढव जिनके श्राप सारथी तिन पर विपति परी।
दुरजोधन को गरम घटायो जदुकुल नास करी ।।
राहु-केतु औ भानु-चन्द्रमा विधि सजोग परी।
कहत 'कबीर' सुनो भाई साधो होनी होके रही ॥१॥
माया महा ठगिनि हम जानी।
विरगुन फाँस लिये फर डोलै घोले मधुरी पानी ॥
केसव के कमला है बैठी सिव के भवन भवानी।
पढा के मूरत है बैठी तीरथ में भई पानी
योगी के योगिन है बैठी राजा के घर रानी ।
काहू के हीरा है बैठी काहू के कौदी कानी ।
भकन के भक्तिनि झे बैठी ब्रह्मा के प्रासानी।
कहै 'कबीर' सुनो हो सन्तो यह सब अकथ फहानी ॥२॥
पध-प्रमा
नाम सुमिर, पछतायगा।
पापी जियरा लोभ करत है श्राज काल उठि जायगा ।
लालच लागी जनम गवाया माया भरम भुलायगा।
धन लोबन का गरब न कीजै कागद ज्यों गलि जायगा।
जब जम धाय केस गहि पटक वा दिन कछु न बसायगा।
सुमिरन भजन दया नहिं कीन्हीं तो मुख चौटा खायगा ।।
धरमराय जब लेखा माँगे क्या मुख लेके जायगा।
कहत 'कबीर' सुनो भाई साधो साध संग तरि जायगा ॥३॥
- , सूरदास [सूरदास का जन्म मरण काल क्रमश. १५४० और १९२० वि० के लगभग प्रताया जाता है । इनका जन्म आगरा और मथुरा के मध्य, रुनकता के समीप सीही नामक ग्राम में, एक सारस्वत प्राहाण के घर हुमा था। पे गऊ घाट पर रहते थे और जन्मान्ध न थे। इनकी भनाई 'सूर- सारावली, 'सूरसागर', 'साहित्यलहरी' आदि पुस्तकें प्रसिद्ध है। सूरदास की कविता में भक्ति भाव की प्रधानता है। इन्होंने कृष्णलीला पढी ही सरलता और सुन्दरता के साथ वणन की है । सूरदास की गणना 'अष्ट- साप के कवियों में है। सूरदासनी काव्य-शास्त्र के पढित और पुराणों के सरकृष्ट ज्ञाता थे। ८० वर्ष की अवस्था में इन्होंने गोकुल में शरीर छोना] सूरदास के पद जसोदा हरि पालने भुलावै। इलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ सोइ फछु गावै ॥ मेरे लाल को आउ निदरिया काहै न आनि सुरावै। तू काहे न बेगि सों आवै तोकों कान्ह बुलावै ।। काहुँ पलक हरि मू द लेत हैं कबहुँ अघर फरकावै । सोवत जानि मौन ह ह रहि कर करि सैन बतावै । यहि अन्तर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरै गावै । जो सुस 'सूर' अमर मुनि दुर्लम सो नद भामिनि पावै॥१॥ मैया करहिं वटैगी चोटी। फिती चार मोहिं दूध पियत भई यह अजर है छोटी।
पद्य-प्रभा तू जो कहति बल की बेनी ज्यो है है लॉबी मोटी ।। काढ़त गुहत न्हबावत ओछत नागिन सी बैं लोटी। काचो दूध पिधावत पचि पचि देत न माखन रोटी ॥२॥ जसोदा कह लौ कीजै कानि? दिन प्रति कैसे सही परत है, दूध-दही की हानि ।। अपने या बालक की करनी जो तुम देखो आनि । गोरस खाय खबावै 'लरिकन भाजन भाजन भानि ॥ मैं अपने मन्दिर के कोने माखन राख्यो जानि । सोई जाइ तुम्हारे ढोटा लीनो है पहिचानि ।। बूझी ग्वालिन घर में आयो नेक न सका मानी । सूरस्याम तब उतर बनायो चींटी काढत पानी ॥ ३ ॥ (प्रभाती)
सूरदास
बोलत नंद बार बार, देखें मुख तुव कुमार।
गायन भई बड़ी वार, वृन्दावन जैवे ॥
जननी कहति उठो स्याम, जानत जिय रजनि जाम ।
'सूरदास' प्रभु कृपालु, तुम को कलु खैबे ॥४॥
कहा लौ बरनों सुन्दरताई।
सेलत कुँवर कनक आँगन में नैन निरखि छवि छाई ।
कुलहि लसत सिर स्याम सुभग अति बहु विधि सुरंग बनाई।
मानो नव घन ऊपर राजत मघवा धनुष चढाई ॥
अति सुदेस मृदु हरत चिकुर मन मोहन मुख बगराई ।
मानों प्रगट कज पर मजुल अलि अबली घिरि आई ॥
नील स्वेत पर पीत लाल मनि लटकनि भाल राई ।
सनि गुरु असुर देव गुरु मिलि भनु भौम सहित समुदाई॥
दूधदत दुति कहि न जाति अति अद्भुत इक उपमाई।
किलकत हँसत दुरत प्रगटत मनु धन में बिजु छटाई ।।
सडित बचन देत पूरन सुख अल्प अल्प जलपाई।
धुटुरन चलत रेनु तनु मडित 'सूरदास' बलि जाई ॥२॥
सिसवत चलन जसोदा मैया ।
अरवराय करि पानि गहावति डगमगाय धरै पैया ।
कबहुँक सुन्दर बदन बिलोकति र अानन्द भरि लेति बलैया।
कबहुँक बलि को टेरि बुलावति इहि आँगन सेलो दोउ भैया ।।
कबहुँक कुल-देवता मनावति चिरजीवी मेरो चाल कन्हैया ।
'सूरदास' प्रमु सब सुखदायक अति प्रताप बालक नँदरैया ॥६॥
१० पद्य प्रमा (सारंग) मेरो मन अनत कहाँ सुख पाये। जैसे उडि जहाज को पछी फिरि जहाज पर भावे । कमलनैन को छाँहि महातम और देव को धावै ।। परम गग को छाँड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै । जिन मधुकर अबुज रस चाख्यो क्यों करील फल खावै॥ 'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै ॥७॥ (सोहनी) प्रोति करि काहू सुख न लह्यो। प्रीति पतंग करी दीपक सों आप प्रान दह्यौ । अलि सुत प्रीति करी जल सुत सों सम्पति हाथगहो। सारंग प्रीति करी जो नाद सों संमुख बान सहो ।। हम जो प्रीति करी माधौ सो चलत न कळू कह्यो । 'सूरदास' प्रभु बिन दुख दूनो नैननि नीर बह्यो ||८|| (गौरी) जादिन मन पछी उदि जै हैं। वादिन तेरे वन-तरुवर के सबै पात झरि हैं। घर के कहैं वेगि हो काढ़ो भूत भये कोऊ से हैं। जा प्रीतम सों प्रीति घनेरी सोऊ देखि डर हैं। । 1 सूरदास कह वह ताल कहां वह सोमा देखत धरि उड़े हैं। भाइ बंधु अरु कुटुम कबीला सुमिरि सुमिरि पछिौ हैं। बिन गोपाल कोउ नहिं अपनो जस अपजस रहि जै हैं। जो 'सूरज' दुर्लभ देवन को सतसंगति में पै हैं॥६॥ (बिलावल). ऊधो मन माने की बात । दाख छोहारा छाडि अमृत फल विपकीरा विप स्वात। जो चकोर को देइ कपूर कोइ तजि अगार अघात । मधुप करत घर कोरे काठ में धुंधत कमल के पात ॥ ज्यों पतंग हित जानि आपनो दीपक सों लपिटात । 'सूरदास जा को मन जासो सोई ताहि सुहाव ॥ १० ॥ (भैरवी) कहाँ लौं कहिये ब्रज की बात । सुनहु स्याम तुम यिन उन लोगान जैसे दिवस बिहात ॥ गोपी माल गाइ गोसुत वै मलिन बदन इस गात । परम दीन जनु सिसिर 'हिमीहत अबुजगन पिन पात ।। जो कहुँ श्रावत देसि दूरतें सब पूछति कुसलात ॥ चलन न देत प्रेम पातुर उर फर चरनन लपटात ॥ पिक घातक बन घसन न पावहि, पायस पलिहिन सात। सूरस्याम सदेसन के डर, पयिक न हि मग जात ॥११॥ ।
१२
पद्य-प्रभा
मेरे नैन निरखि सुख पावत ।
सध्या समै गोप गोधन सँग बनतें बने लाल ब्रज आवत ।
बलि बलि जाऊँ मुखारविंद की मंद मंद सुन्दर गति धावत ।।
नटवर रूप अनूप छबीलो सबही के मन भावत ।
गुजा उर बनमाल मुकट सिर बेनु रसाल बजावत ॥
कोटि किरनि मनि मुख परकासत उडपति कोटि लजावत ।
चन्दन खौरि कालनी की छबि सबके मनहिं चुरावत ।
सूरस्याम नागर नारिन को बासर बिरह बसावत ॥१२॥
छाँडु मन हरि बिमुखन को सग।
जाके सग कुबुद्धी उपजै परत भजन में मग ।
कागहि कहा कपूर खबाये स्वान न्हवाये गग ।।
खर को कहा अरगजा लेपन मरकट भूपन अग।
पाहन पतित बान नहिं वेधत रीतो करत निपंग ॥
'सूरदास' खल कारी कामरि चढत न दूजो रंग ॥१३॥
प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो।
समदरसी है नाम तिहारो चाहो तो पार करो ॥
इक नदिया इक नार कहावत मैलोहि नीर भरो।
जब दोनों मिलि एक बरन भये सुरसरि नाम परो॥
इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परो।
पारस गुन अवगुन नहिं चितवै कचन करत खरो।
यह माया भ्रम जाल कहावै 'सूरदास' सगरो।
अबकी बार नाय मोहि तारो नहिं प्रन जात टरो ॥१४॥
बिहागड़ा
माधो जू मन माया बस कोनो ।
लाभ हानि कछु समुझत नाही ज्यों पतग तनु दीनो।
गृह दीपक छन तेल तूल विय सुत ज्वाला अति जोर ।
मैं मतिहीन मर्म नहिं जान्यो पस्यो अधिक करि दौर ॥
विवस भयो नलिनी के अलि ज्यों बिनु गुन मोहि गह्यो ।
मैं अज्ञान कळू नहि सममो पर दुख पुञ्ज सह्यो ।
बहुतक दिवस भये या जग में भ्रमत फिलो मतिहीन ।
सूरस्याम सुन्दर जो सुमरै क्यो होवे गति दीन ॥१शा
I
तुलसीदास
।
[तुलसीदासजी का जन्म १५८९ वि० में, राजापुर में हुआ था मे
सरयूपारीण ब्राह्मण थे और उनका पहिला नाम रामवाला था । कहते हैं
कि, इन्हें अपनी स्त्री के तास भरे वाक्यों को सुनकर विरकि हो गई थी।
विरक होकर तुलसीदासजी काशी में रहने लगे और वहीं अन्य लिखने
का कार्य प्रारम्भ किया । इनके लिखे २, अन्य बताये जाते है।
इनका 'रामचरित मानस' सबसे बड़ा और सबसे अधिक लोकप्रिय
अन्य है । इनकी कविता में लालित्य, माधुर्य भौर प्रसादगुण की
भरमार रहती है। जितना प्रवार रामचरित मानस' का हुभा, उतना
कदाचित् किसी और अन्य का नहीं हुआ । तुलसीदासजी ने स.
१६८० वि० में, श्रावण शुक्ला सप्तमी को असी और गगा के संगम
पर शरीर छोडा। 1]
तुलसीदास के पद
ऐसी मूढता या मन की।
परिहरि राम-भगति-सुर-सरिता श्रास करत श्रोसन की।
धूम-समूह निरखि चातक ज्यों तृपित्त जानि मति घन की ।
नहिं तहँ सीतलवा, न बारि पुनि हानि होत लोचन की ।।
ज्यों गज कांच विलोकि सेन जड़ छाह आपने तन की।
टूटत अति आतुर अहार बस छति बिसारि आनन की।
कहलों कहीं कुचालु कृपानिधि जानव हौ गति जन की।
'तुलसिदास' प्रभु हरहु दुसह दुख करहु लाज निज पन की ।।१।।
-
१५ तुलसीदास जिनके प्रिय न राम बैदेही। तजिए तिन्हे कोदि बैरी सम जद्यपि परम सनेही ।। तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बन्धु, भरत महतारी । गुरु बलि तज्यो कन्त ब्रज बनितन भे सब मगलकारी॥ नातो नेह राम को मानिय सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं । अञ्जन कौन ऑखि जौ फूटै बहुतै कहाँ कहाँ लौं । 'तुलसी' सो सब भाँति आपनो पूज्य प्रानतें प्यारो । जातें होइ सनेह राम सौं सोई मतो हमारो ॥२॥ केसव कहि न जाय का कहिये । देखत तव रचना विचित्र अति समुझि मनहि मन रहिये ।। सून्य भीति पर चिन्न रग नहिं तनु बिन लिखा चितेरे धोए मिटै न मरै भौति दुख पाइय यहि तनु हेरे।। रविकर नीर घसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं । बदनहीन सो प्रसै चराचर पान करन जे जाहीं ॥ कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ जुगल प्रवल रि माने । 'तुलसिदास' परिहरै तीनि भ्रम सो श्रापन पहिचाने ॥३॥ ममता तू न गई मेरे मन तें। पाके केस जनम के साथी लाज गई लोकन तें ॥ तन थाके कर कम्पन लागे जोति गई नैनन । सरबन पचन न सुनत काहु के बल गए सम इन्द्रिन तें। टूटे दसन पचन नहिं पावत सोभा गई मुसन कफ पित पाव कठ पर बैठे सुतहिं घुलावव करतें।
पद्य-प्रमा भाई-बन्धु सब परम पियारे नारि निकारत घर तें ॥ जैसे ससि मण्डल बिच स्याही छुटै न कोटि जतन तें । 'तुलसिदास' बलि जाउँ चरनतें लोभ पराये बन तें ॥४॥ राम-विवाह (रामचरित-मानस से) सतानन्द पद बन्दि प्रभु, बैठे गुरु पहं जाइ । चलहु तात मुनि कहेउ तब, पठएउ जनक बुलाइ ।। सीय स्वयवर देखिय जाई । ईस काहि धौ देड बडाई ।। लषन कहा जस भाजन सोई। नाथ कृपा तव जापर होई । हरपे मुनि सव सुनि वर बानी । दीन्ह असीस सबहि सुखमानी । पुनि मुनिवृन्द समेत कृपाला । देसन चले धनुष मखसाला ॥ रंगभूमि आये दोऊ भाई । अस सुधि सब पुरवासिन पाई ॥ चले सकल गृहकाज बिसारी। बालक युवा जरठ नरनारी ॥ देखी जनक भीर मइ भारी । सुचि सेवक सब लिये हकारी । तुरत सकल लोगन पहं जाहू । आसन उचित देहु सब काहू ॥ सब मंचन ते मंच इक, सुन्दर प्रिसद विसाल । मुनि समेत दोउ बंधु नहुँ, बैठारे महिपाल ॥ प्रमुहिं देखि सब नृप हिय हारे । जनु राकेस उदय भय तारे ॥ अस प्रतीत सब के मन माहीं। राम चाप तोरच सक नाहीं ॥ विन भंजेहु भव-धनुप विसाला । मेलिहि सीय राम उर माला ॥ अस विचारि गवनहु घर भाई । जस प्रताप चल तेज गॅवाई ॥ विहसे अपर भूप सुनि घानी । जे अविवेक अन्ध अभिमानी ॥ चोरेहु धनुप च्याहु अवगाहा । विन तोरे को कुंअरि बियाहा ॥
तुलसीदास
एक बार कालहु किन होऊ । सियहित समर जितब हम सोज।।
यह सुनि अपर भूप मुसुकाने। धरमसील हरिभगत सयाने ॥
जानि सुअवसर सीय तब पठई जनक बोलाइ ।
चतुर ससी सुन्दर सकल सादर चली लिबाइ ।।
चली सग लइ सखी सयानी। गावति गीत मनोहर बानी।।
सोह नवलत्तनु सुन्दर सारी। जगत जननि अतुलित छवि भारी।।
भूपन सफल सुदेस सुहाये । अग अग रचि सखिन्ह बनाये ॥
रंगभूमि जब सिय पगु धारी । देसि रूप मोहे नर नारी ॥
हरपि सुरन्ह दुन्दुभी बजाई । बरपि प्रसून अपछरा गाई ।।
पानिसरोज सोह जयमाला । अवचट चितये सकल भुआला ।।
सीय चकितचित रामहि चाहा । भये मोहबस सब नरनाहा ।
मुनि समीप देसे दोऊ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।
गुरुजन लाज समाज बड देखि सीय सकुचानि ।
लागि बिलोकन ससिन तन रघुवीरहि उर आनि ।।
रामरूप अरु सिय छनि देसी। नर नारिन परिहरी निमेसी।।
सोचाहिं सकल कहत सकुचाहीं । विधिसन विनय करहिमनमाहीं।।
हरु विधि थेगि जनक जताई । मति हमार असि देहु सुहाई।।
यिन विचारि पन तजि नरनाहू । सीय राम कर करइ वियाहू ॥
जग मल कहहि भाव सब काहू । हठ कीन्हे अन्तहु उर दाहू ।।
गहि लालसा मगन सब लोगू। बर साँवरी जानकी जोगू ।।
वष बदीजन जनक बुलाये । विरदापली कहत चलि आये ॥
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा । पले भाट हिय हरप न थोरा।।
१८
पद्य-प्रभा
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल ।
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाय बिसाल ॥
नृपभुजबल विधु सिवधनु राहू । गरुअ कठोर बिदित सब काहू ।।
रावन बान महा भट भारे । देखि सरासन गवहिं सिधारे ।।
सोइ पुरारि कोदण्ड कठोरा । राजसमाज आजु जेइ तोरा ॥
त्रिभुवन जय समेत वैदेही । बिनहि बिचार बरइ हठ तेही ॥
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भट मानी अतिसय मन माखे ॥
परिकर बॉघि उठे अकुलाई । चले इष्टदेवन्ह सिर नाई ॥
तमकि ताक तकि सिवधनु घरहीं। उठइ न कोटि भाँति बल करहीं।
जिनके कछु बिचार मन माहीं। चाप समीप महीप न जाही॥
तमकि धरहिं धनु मूढ नृप उठहि न चलहि लजाइ ।
मनहुँ पाइ भट बाहुबल अधिक अधिक गरुआइ ।।
भूप सहस दस एकहिं वारा । लगे उठावन टरइ न टारा॥
डगइ न सम्भु सरासन कैसे । कामी बचन सतीमन जैसे ।।
सब नृप भये जोग उपहासी । जैसे, बिनु बिराग संन्यासी ।।
कीरति विजय बीरता' भारी। चले चाप कर बरबस हारी ॥
श्रीहत भये हारि हिय राजा । वैठे निज निज जाइ समाजा।।
नृपन्ह बिलोकि जनक अकुलाने । बोले बचन रोप जनु साने ।।
दीप दीप के भूपति नाना । आये सुनि हम जो पन ठाना ।।
देव दनुज धरि मनुज सरीरा । बिपुल बीर आये रनधीरा ।।
कॅवरि मनोहर विजय बड़ि कीरति अति कमनीय ।
पावनहार विरचि जनु रचेउ न धनुदमनीय ।।
।
तुलसीदास
कहहु काहि यह लाम न भावा । काहु न शकर चाप चढावा ।।
रहउ चढाव तोरव भाई । विल भरि भूमि न सके छुड़ाई।
अब जन कोउ मासइ भट मानी। वीर विहीन मही मैं जानी।।
तजहु पास निज निज गृह जाहू । लिखा न विधि वैदेहि बिवाहू ॥
सुकृत जाइ जो पन परिहरऊँ । कुँअरि कुँआरि रहउ का फरऊँ ।
जौ जनतेउ विनु भट भुवि भाई। तो पन करि होतेउँ न हँसाई ।।
जनक वचन सुनि सब नरनारी । देसि जानकिहि भये दुखारी ।।
माखे लपन कुटिल मई भौहैं । रदपट फरकत नयन रिसौंहैं।
कहि न सकत रघुवीर डर लगे बचन जनु वान ।
नाइ रामपदकमल सिर बोले गिरा प्रमान ॥
रघुबसिन मह जहँ को होई । तेहि समाज अस कहइ न कोई।।
कही जनक जसि अनुचित बानी। विद्यमान रघुकुल-मनि जानी।।
सुनहु भानुकुल-पकज-भानू । कहउँ सुभाव न फछु अभिमानू ।।
जो तुम्हार अनुसासन पावउँ । कदुक इव ब्रह्माड उठावउँ ।
कॉचे घट जिमि डारउँ फोरी । सकउँ मेरु भूलक इव तोरी ।।
तब प्रताप महिमा भगवाना । का बापुरो पिनाक पुराना ।।
नाथ जानि अस पायसु होऊ । कौतुक करउँ बिलोकिय सोऊ ॥
कमल नाल जिमि चाप चदावउँ । जोजन सत प्रमान लेइ धावउँ ।
तोरउँ छत्रकदण्ड जिमि तब प्रतापबल नाय ।
जो न करउँ प्रभुपद सपथ कर न घरउँ धनु भाथ ।।
लपन सकोप बचन जय बोले । डगमगानि महि दिग्गज टोले ॥
गाने । सिय हिय हरषजनक .
सकल लोक
पद्य-प्रमा
गुरु रघुपति सब मुनि मनमाहीं । मुदित भये पुनि पुनि पुलकाहीं॥
सैनहिं रघुपति लपन निवारे । प्रेम समेत निकट । बैठारे ।।
बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी ।।
उठहु राम भंजहु भव चापा । भेटहु तात जनक परितापा।
सुनि गुरु बचन चरन सिर नावा। हरप विषाद न कछु उर आवा ॥
ठाढ़ भये उठि सहज सुहाये । ठवनि जुवा मृगराज लजाये ॥
राम विलोके लोग सब चित्र लिसे से देखि ।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेखि ॥
देखी विपुल बिकल बैदेही । निमिप बिहात कलपसम तेही ॥
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा । मुए करइ का सुधा तड़ागा ॥
का बरषा जब कृपी सुखाने । समय चूकि पुनि का पछिताने ॥
अस जिय जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति विसेखी ।।
गुरुहिं प्रनाम मनहिं मन कीन्हा । अति लाधव उठाइ धनु लीन्हा ।।
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि धनु नभ मंडल सम भयऊ ।।
'लेत चढ़ावत बँचत गाढ़े। काहु न लखा देख सब ठाढे ॥
वेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरेउ भुवन धुनि घोर कठोरा ।।
छन्द
भरे
भुवन घोर फठोर व रवि बाजि तजि मारग चले।
चिकरहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरम कलमले ।
सर असुर मुनि कर कान दीन्हे सकल विकल विचारही ।
कोदंड खंडेड राम तुलसी जयवि बचन उचारहीं।
२१
तुलसीदास
सोरठा
शंकर चाप जहाज सागर रघुपर बाहुवल ।
बूडसु सकल समाज चढ़े जो प्रथमहिं मोहवस ।।
प्रभाती
जागिये कृपानिधान जानिराय रामचन्द्र
जननि कहै चार बार भोर भयो प्यारे ।
राजिव लोचन बिसाल प्रीति बापिका मराल
ललित बदन कमल उपर मदन कोटि पारे ।
अरून उदित विगत सर्वरी ससाक किरनि हीन
दीन दीप जोति मलिन दुति समूह सारे ।।
मनहु ज्ञान घन प्रकास बीते सब भौ विलास
यास त्रास तिमिरतोम तरनि तेज जारे।।
बोलत खग निकर मुखर मधुर करि प्रवीव सुनह
अवन प्रान जीवन धन मेरे सुत प्यारे॥
मनहु, वेद चन्दी मुनिवृन्द सूत्र मागधादि
विरुद बदत जय जय जय जयत कैदमारे।
सुनत वचन प्रिय रसाल जागे अतिसय दयाल
मागे जंजाल नियुल दुख कदम्ब टारे।
तुलसिदास अति अनन्द देख के मुरगरविन्द
छटे भ्रम फन्द परम मन्द चन्द्र भारे ।।
पद्य प्रमा
२२
पद
मदेहों।
बैठी सगुन मनावति मात.
कब अइहैं मेरे लाल कुसल घर
कहहु काग फुरि बाता ॥
दूध भात की दौनी देहों
सोने
जब सिय सहित बिलोकि नयन भरि
राम लखन उर लैहों।
अवधि समीप जानि जननी जिय
अति भातुर बकुलानी ।
गनक दुलाइ पाइ परि पूछति
मगन मृदुबानी।
वेहि अवसर कोउ भरत निकट ते
समाचार
प्रभुभागमन सुनत तुलसी मनु
मरत
प्रेम
भायो।
. - केशवदास [केशवदास का जन्म सं. १५९४ के गमग मोडछा के एक माग (साव्य ) परिवार में हुआ था। ये संस्कृत के बडे विद्वान थे। इनकी कविता पहुत क्लिष्ट भोर गूड हैं। इनके लिसे ग्रन्थों में से 'राम- चन्द्रिका', 'कवि प्रिया', 'रसिक प्रिया' और 'विज्ञान-गीता' बहुत प्रसिद्ध हैं। इनकी कविता की गूढता के विषय में प्रसिद्ध है-"कविका दीन न च विदाई। पूछ केसव की कविताई ।" महाकवि केशव पृधावस्था में भी रसिक बने रहे थे। अपने भापने वालों की सफेदी देख कर पढ़े पश्चाताप पूर्वक कहा था- फेसव केसनि अस करी, जस भरित न कराहि । चन्द्रवदनि मृगलोचनी, याया कहि कहि जाहिं । केशवदास की कविता में अर्थ-गाम्भीर्य और काव्य सम्बन्धी पापिटत्य को प्रचुरता है।] अयोध्याकाण्ड राम-वनगमन (रामचन्द्रिका से) (दोहा) रामचन्द्र लक्ष्मण सहित, घर राखे दशरत्य। विदा कियो ननसार- को, सँग शत्रुन्न भरत्य ॥ १॥ (तोटक छन्द) दशरत्य महा मन मोद रये । तिन बोलि वशिष्ठहि मन लये। दिन एक कहो शुभ शोभरयो। हम चाहत रामहिं राज दयो ।॥२॥ -ननसारमनहाक।
पद्य-प्रभा . यह बात भरत्य की मातु सुनी । पठॐ बन रामहि बुद्धि गुनी । तेहि मदिर मे नृप सों विनयो । वर देहु हतो हमको जुदयौ ॥३|| नृप बात कही हँसि हेरि हियो। दशरथ-वर मागि सुलोचनि मैं जु दियो । कैकेयी-नृपता सुविशेष भरत्थ लहैं। बरषै बन चौदह राम रहैं ॥ ४ ॥ (पद्धटिका छंद) यह बात लगी उर' बज्रतूल । हिय फाट्यो ज्यों जीरण दुकूल ॥ उठि चले विपिन कहूँ सुनत राम । तजि तात मात तिय बधु धाम ।। ५। कौशल्या और राम (मौक्तिकदाम छद) गये तहँ राम जहाँ निज मात । राम-कही यह बात कि है , बन जात ।। कचू जनि जी दुस पावहु माइ । सु देहु अशीष मिलौं फिरि आइ ॥६॥ कौशल्या-रहो चुप है सुत क्यो बन जाहु । न देसि सके तिनके' उर दाहु।। लगी अब बाप तुम्हारेहि वाइ । करें उलटी विधि क्यों कहि जाइ ।।७।।
केशवदास २५ (ब्रह्म रूपक छद) राम-अन्न देइ सीख देइ राखि लेइ प्राण जात । राज बाप मोल लै करै जोदीह पोपि गात ॥ दास होइ पुत्र होइ शिष्य होइ कोइ माइ। शासना' न मानई तो कोटि जन्मनर्क जाइ॥६॥ (हरनी छन्द) कौशल्या-मोहि चली बन सग लियै । पुत्र तुम्है, हम देखि जियें । औधपुरी मह गाज परै। के अब राज भरत्य करै ।।६।। (वोमर छन्द) देव। राम-तुम क्या चलो बन आजु । जिन शीश राजत राज। जिय जानिये पति करि सर्व माविन सेव ॥ १० ॥ पति देइ लो अति दुख । मन मानि लीजै सुख ॥ सब जकर जानि अमित्र । पति जानि केवल मिन ।।११।। - 1-शासना-माना।२-जत-जगत, ससार ।
पद्य-प्रभा
।
(अमृत गति छन्द)
नित पति पंथहिं चलिये । दुख सुख को दलु दलिये ॥
तन मन सेवहु पति को । तव लहिये शुम गति को ॥१२॥
(दोहा)
मनसा वाचा कर्मणा, हम सों छॉडो नेहु ।
राजा को विपदा परी, तुम तिन की सुधि लेहु ॥ १३॥
सीता-प्रति राम का उपदेश
(पद्धटिका छन्द)
उठि रामचन्द्र लक्ष्मण समेत ।
तब गये जनकतनया निकेत।
राम-सुनु राजपुत्रिके एक
हम बन पठये हैं नृपति तात ॥१४॥
तुम जननि सेव कह रहहु वाम ।
कै जाहु आजु ही जनकधाम ।।
सुनु चन्द्रबदनि गजगमनि ऐनि ।
मन रुचे सो कीजे जलजनैनि ॥१५॥
(नाराच छन्द)
सीता-न हो रहौं न जाहुँजू विदेहधाम को अबै ।
कहीजु पात मातु पै सो आजु मैं सुनी सवै।।
लगे सुधाहिमा मली विपत्ति मॉम नारिये।
• पियास त्रास नीर वीर युद्ध में सम्हारिये ॥१६॥
फेशवदास (सुप्रिया छन्द) लक्ष्मण-वन महँ विकट विविध दुस सुनिये। गिरि गहवर मग अगमहि गुनिये। कहुँ अहि हरि कहुँ निशिचर चरहीं। कहुँ दव दहन दुसह दुख दहही ॥१७॥ (दएडक) सीता-केशोदास नींद भूख प्यास उपहास त्रास दुख को निवास विप मुसहू गहो पर। वायु को वहन दिन दावा को दहन बड़ी चाइवा अनल ज्वाल जाल में रयो परै।। जीरन जनम जात जोर जुर' घोर पीर पूरन प्रकट परिताप क्यों करो परे। सहि हों तपन ताप पति के प्रवाप रघु- पीर को विरह धीर मोसों न सहो परै ॥१८॥ लक्ष्मण-प्रति राम का उपदेश (विशेषक छन्द) राम-धाम रहो तुम लक्ष्मण राज की सेव करौ। मातनि के सुनि वात सुदीरघ दुस हरौ ॥ आइ मरत्य फहा धौ करे जिय माय गुनौ । जो दुख देई तो ले उरगौर यह बात सुनों ॥१६॥ 1-=P-रगी-गीकार को, हो।
पद्य-प्रभा . (दोहा) लक्ष्मण-शासन मेटो जाय क्यो, जीवन मेरे हाथ । ऐसी कैसे बूमिये, घर सेवक बन नाथ ॥ २० ॥ बन-यात्रा (द्रुतविलम्बित छन्द) विपिन मारग राम विराजहीं। सुसद सुन्दरि सोदर भ्राजही ।। विविध श्रीफल सिद्धि मनों फल्यो। सकल साधन सिद्धिहि लै चल्यो ॥ २१ ॥ (दोहा) राम चलत सब पुर चल्यो, जह वह सहित उछाह । मनो भगीरथ पथ चल्यो, भागीरथी (चचला छन्द) रामचन्द्र धाम ते चले सुने जवै नृपाल । बात को फहै सुनै सुहगये महा विहाल । ब्रह्मरन्ध फोरिजीव यो मिल्यो धुलोक जाइ। गेह' चूरि ज्यों चकोर चन्द्र में मिलै उड़ाइ ॥२३॥ (चंचरी छन्द) कौन हौ कितते चले कित जात हो किहि कामजु । फौन की दुहिता बहू कहि कौन की यह वाम जू॥ । प्रवाह ॥२२॥ . १-ह-पिनया।
केशवदास एक गाउँ रहौ कि साजन मित्र बन्धु बखानिये । देश के परदेश के किधों पथ की पहिचानिये ॥२४॥ (सुन्दरी छन्द) घाम को राम समीप महावल । सीतहि लागत है अति सीतल ॥ ज्यों धनसयुत दामिनि के तन । होत हैं पूपन' के कर भूपन ॥२५॥ मारग की रज तापित है अति । केशव सीतहि सीतल लागति ।। ज्यो पद-पंकज ऊपर पायनि । दै जो चले तेहिते सुखदायिनि ।।२६॥ (दोहा) प्रति औ प्रति ग्राम की, प्रति नगरन की नारि। सीताजू को देखि के, वर्णत हैं सुसकारि ॥२७॥ x x x x ४ मारग यो रघुनाथ जू, दुस सुख सब ही देत । चित्रकूट पर्वत गये, सोदर सिया समेव ॥२८॥ भरत का श्राना (दोधक छन्द) आनि भरत्थ पुरी अवलोकी। स्थावर जगम जीव सशोकी॥ -पूपन के कर-सूर्य की किरण ।
३०
पद्य-प्रमा
। r
भाट नहीं विरदावलि साजें
कुंजर गाजे न दुन्दुमि बाजै ॥२६॥
राजसभा न विलोकिय कोऊ।
शोक गहे तय सोदर दोऊ॥
मंदिर मातु विलोकि अकेली।
ज्यों बिन वृत्त विराजति वेली ॥३०॥
(तोटक छन्द)
तब दीरघ देखि प्रणाम कियो।
उठि के उन कंठ लगाइलियो ।
न पियो जल सम्भ्रम भूलि रहे।
तब मातु सो वैन भरत्थ कहे ॥३१॥
भरत
केकई का प्रश्नोत्तर
(विजया छन्द)
मातु कहाँ नृप तात गये सुर लोकहि क्यों सुत शोक लये।
सुव कौन सुराम कहाँ हैं अवै बन लक्ष्मण सीय समेत गये ।।
चन काज कहा कहि केवल मो सुख तोकों कहाँ सुख यामें भए।
तुमको प्रभुवाधिक तोकों कहा अपराध विना सिगरेई हये ॥३२॥
(दोहा)
भर्ता सुत विद्वेपिनी, सब ही को दुखदाइ ।
यह कहि देखे भरत वन, कौशल्या के पाइ॥३३॥
३
केशवदास
भरत-कौशल्या वार्ता
(तोटक छन्द)
तब पायन जाइ भरत्य परे
उन भेटि उठाइ के अक भरे ।
सिर सूवि बिलोकि बलाइ लई।
सुत तो बिन या विपरीत भई ॥३४॥
(तारक छन्द)
भरत-सुनु मातु भई यह बात अनैसी।
जु करी सुतम विनाशिनि जैसी।
यह बात भई अब जानत जाके।
द्विज दोप परै सिगरे सिर ताके ॥३॥
जिनके रघुनाथ बिरोध बसै जू।
मठधारिन के तिन पाप ग्रसै
रस राम रस्यो मन नाहिं न जाको।
रण में नित होइ पराजय ताको ॥६॥
कौशल्या-जनि सोह करौ तुम पुत्र सयाने ।
अति साधु चरित्र तुम्हे हम जाने ।।
सब को सब काल सदा सुसदाई ।
जिय जानति हो सुत ज्यों रघुराई ॥३७॥
३४ पा-ममा - लक्ष्मण का कोष (दण्डक छन्द) लक्ष्मण-मारि डारों अनुज समेत याहि खेत आजु मेटि पारों दीरघ वचन निज गुरु को। सीतानाथ सीता साथ दैठे देखि छत्रतर यहि सुख शोपौ शोक सब ही के उर को। केशोदास सविलास बीस बिसे बास होय कैकेयी के अंग अग शोक पुत्रजुर को रघुराजजू को साज सकल चिड़ाइ लेउँ भरतहिं आजु राज देउँ प्रेवपुर को ॥४७॥ राम-भरत मिलन (कुसुमविचित्रा छन्द) तब सवै सेना वहि थल राखी । मुनि जन लीन्हे सँग अभिलाषी। रघुपति के चरणन सिर नाये। उन हँसि कै गहि कंठ लगाये ॥४॥ (दोधक छन्द) भरत-मातु सबै मिलिवे कहँ थाई। ज्यों सुत को सुरभी सुनवाई॥ लक्ष्मण स्यों उठि के रघुराई। पायन जाय परे दोउ भाई ugen
३५
केशवदास
मावनि कंठ अठार अगाये।
प्राण मनो मृत देहनि पाये ।।
आइ मिनी तव सीप समागी।
देवर सासुन के पग लागी ॥५०॥
(तोमर छन्द)
तर पूछियो रघुराइ । सुख है पिता तन माइ ।।
तब पुत्र को मुख जोइ । म ते उठीं सब रोइ ॥५१॥
(दोधक छन्द)
आँसुन सों सब पर्वत धोये।
जगम को जदजीवहु रोये ॥
मिद्धवधू सिगरी सुनि आई।
राजयधू सबई समुझाई ॥५२॥
(मोहन छन्द)
धरि चित्त धीर । गये गगतीर ।।
शुचि है शरीर । पितु सर्प नीर ॥५३॥
(वारक बन्द)
भरत-घर को चलिये अब श्रीरघुराई ।
जन हौं तुमराज सदा सुखदाई ।
यह बात कही जलसोंगल भीन्यो।
गठि सोदर पाई परे सब तीन्यो ॥५४॥
पब-प्रमा
-
-
कमला थिर न रक्षीम' फह, यह जानत सप कोइ ।
पुरुष पुरातन
के
घ,
क्यों न पचला होइ ॥ ५॥
'रहिमन' मनहिं लगाइ के, देखि लेहु किन कोइ ।
नर का बस फरिषो कहा, नारायन घस होइ ॥ ६॥
सो रहीम' तनु हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं ।
जल में ज्यों छाया परे, फाया भीजति नाहि ॥ ७ ॥
'रहिमन' रहिता के भली, सो परसै चित लाइ ।
परसत मन मैला फरै, सो मैदा जरि जाइ ॥८॥
रहिमन' पानी राखिये, विनु पानी सप सून ।
पानी गये न अमरे, मोवी मानुप चून ॥४॥
'रहिमन' रहिवो वां भलो, लौ लों सील समूष ।
सील ढील जय देखिये, तुरत कीजिये कूप ॥१०॥
सम्पति भरम गॅवाद फै, पसे रहे कछु नाहिं ।
ज्यों 'रहीम' ससि रहत है, दिवस अकासहि माहि ॥११॥
केहि फै प्रभुना नहिं घटी, पर घर गये 'रहीम' ।
कौन बड़ाई जलमि मिलि, गग नाम मा धीम ॥१२॥
'रहिमन' सुवा नैन दरि, जिय दुख प्रगट करेइ ।
जाकौ घरवे कादिये, क्यों न भेद कहि दे ॥१॥
चेहि प्रमान लियो भलो. जो सब दिन ठहराइ ।
उमदि चले क्षच पार वे, वो रहीम' पदि भाइ ॥१४॥
'रहिमन' पवि मत कीधिये, गहि रहिये निवानि ।
अतिसै फूलै सानो, हारपान के हानि ॥१५॥
.
-
रहीम
धनि रहीम जलपक फह, लघु जिय पियत अघाइ।
उदधि चढ़ाई कौन है, नगत 'पियासो जाइ ॥१६॥
खीरा सिर घरि फाटिये, मलिये लौन लगाइ।
करुये मुख कह चाहिये, 'रहिनन' यही सजाइ ॥१७॥
'रहिमन' राज सराहिये, ससि सम सुखद जो होइ ।
कहा चापुरी भानु है, तपै तरैयनि खोइ ॥१८॥
'रहिमन' धागा प्रेम कर, मत तोरउ चटफाइ ।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठि परि लाइ ॥१६॥
'रहिमन' प्रीति न कीजिये, जस खीराने कीन ।
ऊपर से तो रिक्ष मिला, भीतर फाँकै तीन ॥२०॥
रहिमन खोजो ख में, कहाँ न रस के खानि ।
जहाँ गाँठ वह रस नहीं, यही प्रीति के हानि ॥२१॥
जहाँ गोठ वह रस नहीं, यह जानत सब कोय ।
मइये घर के गॉठि में, आठ गाँठि रस होय ॥२२॥
पावस देखि 'रहीम' मन, कोयल साधी मौन ।
अब दादुर वका भये, हम फहें पूछत कौन ॥२३॥
'रहिमन' लाख भसी करो, अगुनी अगुन न जाइ ।
राग सुनत पय पिषतहू, साँप सहिज धरि खाइ ॥२४॥
'रहिमन चाफ कुम्हार कर मांगे दिया न देह ।
छेद में डडा हारि फै, चाहै नाँद सा लेह ॥२५॥
'रहिमन' पेटे सों महत, पयों न भये तुम पीठि।
मुखे मान पिपारहू, भरे विगार? दीठि ॥२६॥
४० पद्य-प्रमा । - 1 बढे पेट के भरन में, है 'रहीम' दुख धादि। याते हाथी इहरिफ, दये दाँत दुइ काढ़ि ॥२७॥ काज परे कुछ और है, काज सरे कुछ और। 'रहिमन' भवरिन के भये, नदी सिरावत मौर ॥२८॥ रहिमन कठिन चिताहुते, चिन्ता कह चित चेत । चिता दहति निर्जीव कह, चिन्ता जीव समेत ॥२६॥ जो 'रहीम' गति दीप कै, कुल कपूत के सोइ । बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होइ ॥३०॥ छार उछारत सीस पर, कहु 'रहीम' किहि काज । जिहि रज मुनिपतनी तरी, तिहि खोजत गजराज ||३१|| सर सूखे पछी उड़े, और सरन समाहि । मीन दीन पिनु पछ के, कहु 'रहीम' कह जाहि ॥३२॥ कहु 'रहीम' कैसे बने, अनहोनी हुइ जाइ । मिली रहै अरु ना मिलै, वासों कहा बसाइ ॥३३॥ 'रहिमन' विद्या धुधि नहीं, नहीं धरम जम दान । जन्म वृथा भू पर धरेउ, पसु दिनु पूछ विषान ॥३४॥ 'रहिमन' वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं । उन ते पहिले वे मरे, जिन मुख निकसत नाहि ॥३५॥ 'रहिमन' याचकता गहे, बड़े छोट हुइ जात । नारायनहू को भयो, बावन आँगुर गात ॥३६॥ माँगे घटत 'रहीम' पद, किती करी बड़ा काम । वीन पैग बसुधा करी, तऊ बावने नाम ॥३७॥ है रहीम मयत मथव माखन रहै, दही मही बिलगाय । ''रहिमन' सोई मीत है, भीर परे ठहराय ॥३८॥ कह रहीम' सपति सगे, बनत बहुत बहु रीव । विपति कसौटी जे कसे, सोई साँचे मीत ॥३|| जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन कर मोह । 'रहिमन' मबरी नीर कर, तऊ न छॉडति छोह ॥४०॥ कदली सीप मुजग मुख, स्वाँति एक गुन तीन । जैसी सगति बैठिये, तैसोई फल दीन ॥४॥ 'रहिमन' नीचन सग बसि, लगत कलक न काहि । दूध कलारी कर गहे, मदहि कहैं सब ताहि ॥४२॥ चसि कुसग चाहत कुसल, यह रहीम अपसोस । महिमा घटी समुद्र के, रावन बसा परोस ॥४॥ जो 'रहीम' उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसग। चन्दन विप व्यापत नहीं, लपिटे रहत भुजग ॥४४॥ कहु रहीम कैसे निमै, केर वेर कर सग । वे डोलत रस श्रापुने, उनके फाटव अंग ॥१५॥ 'रहिमन' जिता बारी, कहि गई,सरग पताल । आपु तो कहि भीतर भई, जूती खात कपाल १४६॥ रहिमन' विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय । हित धनहित या जगत में, जानि परत सव कोय || दुरदिन परे 'रहीम' कहि, भूलत मब पहिचानि । सोध नहीं पित हानि फर, नोन होय दिव हानि ॥४८॥ - - ४२ पद्य-प्रभा जैसी परै सो सहि रहै, कह रहीम' यह देह । घरती ही पर परत हैं, सीत घाम औ मेह ।।४।। जे गरीब पर हित फरें, ते 'रहीम' घड़ लोग । कहा सुदामा चापुगे, कृष्ण मिताई जोग ॥५०॥ बडे दीन के दुख सुने, लेत दया उर पानि । हरि हाथी सों कच हुती, कहु 'रहीम' पहिचान ॥५१॥ होय न जाकर छाँह ढिंग, फल 'रहीम' अति दूर । माढ़ेहु सो बिनु काम ही, जैसे तार खजूर ॥५२।। 'रहिमन' छोटे नरन सों, होत घडे नहि काम । मढ़ी दमामा जात है, कह चूहे के चाम ॥५३॥ 'रहिमन' देखि बड़ेन कह, लघु न दीजिये डारि । नहाँ काम आवै सुई, फहा फरै तरवारि ॥५४|| विगरी बात धनै नहीं, लास फरै किन फोय । 'रहिमन' विगरे दूध फह, मथे न माखन होय ॥५३॥ 'रहिमन' निज मन फै विथा, मन ही राखहु गोइ । सुनि अठिलेहैं लोग सब, घाँटि न हैं कोड ॥५६॥ जो 'रहीम' योछो घढे, तो अति ही इत्तराई । प्यादे सों फरजी भयो, टेढो टेढो जाइ १५७३ 'रहिमन' वित्त अधर्म फर, नाव न लागै धार । पोरी फरि होरी रथी, भई छिनक में छार पर 'रहिमन'' पोछे नरव वे, वजहु घेर श्री प्रीति । काटे घाटे खान से, दुई भावि विपरीवि Hell , रहाम एकै साधे सप सधै, सत्र साघे सब नाइ । 'रहिमन' सीचे मूल कों, फूला फलइ अघाइ n६०n खैर खून खासी, खुसी, घर प्रीति मदपान । "रहिमन' दाचे ना दवे, जानत सकल महान ॥१॥ 'रहिमन' चीन प्रकार से, हित अनहित पहिचान । परवस परे परोस बसि, परे मामिला मानि ॥१२॥ सोरठा 'रहिमन' मोहिं न सुहाइ, पमो पियावर मान पिनु । जो विष देइ सुनाइ, भान सहित भरिपो भलो ॥
(८)
द्रोपदिश्री गनिकागज गीघ, अजामिल सो वियो सोन निहारो।
गोवम-गेहिनी कैसे तरी प्रहलाद को फैसे हलो सुत भारोम
काहे को सोच करै रसखानि, कहा फरि है रविनन्द विचारो।
वासन जाखन राखिये माखन चाखन हारो सो राखन हारो ।।
बैद की औषधि खाइ कछू, न करै कछु संजम री सुनि मोसें।
तो जलपानि फियो रसखानि, सजीवन जानि लियो सुख तोसें।
एरी सुधामई भागीरथी, सा पथ्य कुपथ्य पर्ने तुहि पोसें।
श्राफ धतूर चबात फिर, विष खात फिरै सिव तेरे भरोसें ।।
( १० )
बैन वही उनको गुन गाइ, औ कान वही उन चैन सों सानी ।
हाथ वही उन गात सरै, अरु पाइ वही जु वही अनुजानी ॥
जान वही उन प्रान के सग औ, मान वही जु करै मन मानी।
त्यो रसखानि वही रसखानि, जु है रसखानि सो है रसखानी।
20 "कौन की संक परी है जु मासन, पाखन हारो है राखन हारो"
मह भी पास है।
-
विहारीलाल
[पिधारीलाल का जन्म १३५० वि० के जगमग, ग्वालियर राज्मा-
न्सर्गत, बसुभा गोविन्यपुर नामक प्राम में हुमाया।ये चतुर्वेदी क्षण
थे, इनका मापन देखनए में बीता गोर तरण होने पर ये अपनी
ससुराल मथुरा में चले गये। मथुरा से जयपुर गये और यहाँ जयपुर के
महाराज सिंह के यहाँ रहोगे। वहीं इन्होंने अपनी प्रसिद्ध 'समसई'
रचना की थी। 'विहारीमतसारनस का अनुपम अन्न समक्षा
पाता है। इसकी भय तक तीम से अधिक टीकाएं हो चुकी हैं । विहारी-
लारजी की कविता में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी प्रतिमा
शक्ति के प्रभाव से थोरे शब्दों में पहुत सा भाव कह जाते हैं। सिन्ध
को मिन्दु में मर देते हैं । विहारीलालजी का मरण-सवत् १७२० मग
यताया माना है।
विहारी-संग्रह
मेरी भव बाधा हरी, राधा नागरि सोय ।
जा तनकी मॉई परे, स्याम हरित दुति होय ॥१॥
सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
यह बानिक मो मन बसौ, सदा विहारीलाल ॥२॥
चिरजीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि यै वृषभानुजा, वै हलघर के बीर ॥३॥
नेह न नैनन को कछू, उपजी पसी बलाय ।
नीर भरे नित प्रति रहें, तऊ न प्यास बुझाय ॥४॥
या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहि कोय ।
ज्यों ज्यों ने स्याम रंग, त्यो त्यों उज्ज्वल होय ॥ ५॥
१० पद्यमा 1 चले जाहु हाँ को करत, हाथिन को व्यापार । नहि जानत या पुर बसत, धोबी और कुम्हार ॥२८॥ पोछे बड़े न है सके, लगि सतरॊहै बैन । दीरघ होहिं न नेकहू, फारि निहारे नैन ॥२६॥ सगति सुमति न पावई, परे कुमति के धध । राखौ मेलि कपूर में, हींग न होय सुगन्ध ॥३०॥ समै समै सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोय । मनकी रुचि जेती जिते, तित तेती रुचि होय ॥३१॥ जगत जनायो जेहि सकल, सो हरि जान्यो नाहिं। ज्यों थाखिन सब देसिये, आखि न देखी जाहि ॥३२॥ तौ लगि या मन-सदन में, हरि आवै किहि बाट । विकट जरे जौ लगि निपट, खुलें न कपट कपाट ॥३३॥ भजन कह्यो तासों भज्यो, भज्यो न एकौ बार। दूर भजन जासों कह्यो, सो तू भज्यो गँवार ॥३४॥ दीरघ सास न लेहि दुख, सुख साई नहिं भूल । दई दुई क्यों करत है, दई दई सु कबूल ॥३५॥ घर घर डोलत दीन हे,, जन जन जॉचत जाय। दिये लोम-चसमा चखन, लघुहू बड़ो लसाय ॥३६॥ हरि कीजव तुमसों यहै, बिनती बार जेहि वेहि भाँति डरो रहौं, परो रहौं । दरबार ॥३७॥ हजार ।
।
.
वृन्द
[इन्दकवि की 'पृन्दसतसई बहुत प्रसिद्ध है। इनका जन्म
सवत् १७४२ के लगभग हुआ बताया जाता है। पृन्द के दाहों में मीति
तथा उपदेश की बातें यहुत हैं। इनकी उपमाएँगी मुन्दर और स्वामा-
विक हैं। दोहों में प्रसादगुण अधिक पाया जाता है। पृन्दनी के बहुत से
दोहे तो कहावतों में कहे जाते हैं। विना पडे-
लिखे लोगों तक को वृन्दकवि
के दो घार दोहे याद निकलगे।]
के
मधुर बचन तें जात मिटि, उत्तम जन अमिमान ।
तनफ सीत जलसों मिटे, जैसे दूध उफान ॥१॥
कछु बसाय नहि सपल सों, करे निवल सों जोर ।
चले न अचल उसारि तरु, डारत पचन झकोर ॥२॥
पर-घर कबहुँ न जाइये, गये घटत है जोति ।
रवि-मण्डल में जात शशि, छीन कला छवि होत ॥३॥
निकट अबुध समझे कहा, बुधजन बधन बिलास ।
कबहू मेक न जानही, अमल कमल की बास ॥४॥
दापहि सों उमहे गहे, गुण न गहे खल लोक ।
पिये रुधिर पय ना पिये, लगी पयोधर जोक ॥५॥
क्यों कीजे ऐसो जतन, बातें काज न होय ।
पर्वत पै सोदे फुओं, कैसे निकसै चोय ॥६॥
पद्य-प्रमा . धन पाढ़े मन पद गयो, नाहिन मन घट होय । ज्यों जल सँग वाढ़े जलज, जल घट घटै न सोय ॥७॥ सब ते लघु है मांगधो, यामें फेर न फार । बलि पै जाँचत ही भये, पामन तन फरतार ।। ८॥ वीर पराक्रम ना करे, वासों डरत न कोय । चालकहू के चित्र को, पाथ खिलौना होय ।। ।। भली करत लागे विलॅब, विलय न बुरे विचार । भवन बनापत दिन लगें, ढाहत लगै न घार ॥१०॥ सुखसम्जन के मिलन को, दुर्जन मिलै जनाय ।' जाने अख मिठास कों, जव मुख निम्ब चबाय ॥११॥ जाहि मिले सुख होत है, विहि बिछुरे दुख होय । सूर उदै फूले कमल, ता दिन सकुचे सोय ॥१२॥ कछु कह नीच न छेड़िये भलो न वाको सङ्ग । पाथर डारे कीच में, उछरि विगारे अङ्ग ॥१३॥ वचन पारखी होहु तू, पहले आप न भाख । अनपूछे नहिं भाखिये, यही सीख जिय राख ॥१४॥ सन श्रवण मुख नासिका, सब ही के इक ठौर । फहयो सुनवौ देखबौ, चतुरन को कछु और ॥१०॥ श्रमही सों सब मिलत है, बिन श्रम मिले न काहि । सीधी अगुरी घी जम्यो, क्यों हूँ निकसे नाहिं ॥१६॥ जो जाको गुन जानही, सो विहिं पादर देव । कोकिल अमहि लेत है, काग निवौरी ' हेत ' ॥१७॥ .
वृन्द
नाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस ।
रीते सरवर पै गये, कैसे वुमत पियास ॥१८॥
कैसे निषहै निबल जन, कर सबक्षन सों गैर ।
जैसे बस सागर बिसै करत मगर सों बैर ॥१६॥
दीयो अवसर को भलो, जासों सुधरै काम ।
सेतो सूखे वरसयौ, धन को कौने काम ॥२०॥
अपनी पहुँच बिचारि के, करतब करिये दौर ।
पात्र पसारिये, जेती लम्बी सौर ॥२१॥
विद्या धन उद्यम विना, कही जु पावै कौन ।
बिना डुलाये ना मिले, ज्यों पखा की पौन ॥२२॥
बुरे लगत सिख के वचन, हिये विचारो श्राप ।
करुवी भेषज विन पिये, मिटै न तन की ताप ॥२३॥
फेरे न है है कपट सों, जो कीजै व्यौपार ।
जैसे होंडी काठ को, पढ न दूजी पार ॥२४॥
नयना देत वताय सब, हिय को देत आहेत।
जैसे निर्मल भारसी, मली बुरी कहि देव ॥२५॥
अति परिच ते होत है, अरुचि अनादर भाय ।
मलयागिरि की भीलनी, चदन देति अराय ॥२६॥
भले बुरे सम एक से, जौ लौ बोलत नाहिं।
जानि परत हैं काक पिक, ऋतु बसत के माहि ॥२७॥
हितहू की कहिये नहीं, जो नर होय अयोध ।
ज्यों नकटे को आरसी, होत दिखाये कोष ॥२८॥
पद्य-प्रमा भोये हू। , सबै सहायक सबल के, कोऊन निबल सहाय । पवन जगावत भाग को, दीपहि देत बुमाय ॥२६॥ दुष्ट न छोड़े दुष्टता, कैसे हू सुख देत । सौ बेर फे, काजर होय न सेत ॥३०॥ जे वेतन ते क्यों तजें, नाफो नासों मोह । चुम्बक के पीछे लग्यो, फिरत-अचेतन लोह ॥३१॥ जो पावै अति उच्च पद, ताको पतन निदान । ज्यों तपि तपि मध्यान्ह लों, अस्त होतु है भान ॥३२॥ मूरख गुन समुझे नहीं, तौ न गुनी में चूक । कहा भयौ दिन को निभौ, देखै जौ न उलूक ॥३३॥ फरै बुराई सुख चहै, कैसे पावै कोइ । रोपे बिरवा याक को, ऑब कहाँ ते होइ ।।३४|| बहुत निवल मिल बन करें, करें जु चाहै सोय । तिनकन की रसरी फरी, करी निवन्धन होय १३५॥ साँच झूठ निर्णय कर, नीति निपुण जो होय । रानइस चिन को कर, क्षीर नीर को दोय ॥३६॥ चुरी करें तेई बुरे, नाहिं चुरौ कोऊ और। घनिज करै सो पानियो, चोरी करे सो घोर ॥३७॥ ऊपर दरसै मुमिन सी, अन्तर अनमिल आँक । कपटी जन की प्रीति है, खीरा की सी फॉक ॥३॥ क्षमा खग लीने रहे,' सलको कहा बसाय । अगिन परी तृन रहिव थन, श्रापदिते घुमिजाय ॥३६॥ --
५५
पृन्द
श्रो नर के पेट में, रहै न मोटी बात।
आध सेर के पात्र में, कैसे सेर समात ||
सरस्वति के भडार की, बड़ी अपूरब बात।
यासरच त्यौ त्यो घदै, बिन सरचे घटि ज्ञात ॥४॥
भारतेन्दु हरिश्चंद्र
[भारतेन्दुजी का जन्म सवत् १९०७ वि० में हुआ था। ये पांच-छ
वर्ष की भायु से ही कविता करने लगे थे, वातों ही पात्रों में कविता बना
लेते थे। इहोंने गय-गयारमा १७५ ग्रन्थ लिखे है । भारतेन्दुनी
घढे रसिक, प्रेमी और उदार थे। इन्होंने अपनी पैतृक सम्पत्ति का लाखों
रुपया, साहित्य-सेवा के नाम पर, पानी की तरह बहा दिया । भारतेन्दुनी
में देश-भक्ति भी कूट-कूट कर भरी थी। ये हास्य मे घडी चुटीली बात
कह जाते थे। मारतेन्दुजी के रचे प्राय सय अथ मिलते हैं, जिनसे उनकी
प्रतिमाशक्ति का अद्भुत परिचय प्राप्त हो जाता है। १८८५ ई० को ६
जनवरी को इनका देहान्त हुभा।]
गंगा-वर्णन
or
नव उज्ज्वल जलधार हार-हीरक-सी सोहति ।
बिच विच छहरति बूंद मध्य मुक्ता-मनि पोहति ।।
लोल लहर लहि पवन एक पै इक इमि आवत।
जिमि नर गन मन विविध मनोरथ करत मिटावत॥
२
सुभग वर्ग-सोपान-मरिस सब के मन भावत।
दरसन मजन पान निविध भम दूरि मिटावत ।
श्रीहरि-पद-नस-चन्द्रकान्तमति द्रवित सुधारस ।
ब्रह्म कमण्डल मण्डन भव खण्डन सुर सरवस ।।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ५७ ३ शिव-सिर-मालवि-माल भगीरथ नृपतिपुण्य फल । ऐरावत-गज-गिरि-पति-हिम-नग-फएठहार फल ॥ सगर-सुवन सठसहस परस जल मात्र उघारन । रूप धारि सागर सवारन ॥ अगिनित धारा A कासी कह प्रिय जानि ललकि भेट्यो जगधाई । सपनेहू नहि तजी रहो अहम लपटाई ॥ कहूँ बंधे नव घाट उच्च गिरिवर सम सीहत । कहुँ छवरी कहुँ मढ़ी यढी मन मोहत जोहत ॥ धवल धाम चहुँ ओर फरहरत धुजा पताका । घहरव घटा धुनि धमकत धौसा करि साका ॥ ॥ मधुरी नौबत पजत कहूँ नारी नर गावत । वेद पढ़त कहुँ द्विज कहुँ जोगी ध्यान लगावत ॥ ६ क? सुन्दरी नहात नोर करजुगल उछारत । जुग अम्युज मिलि मुफ-गुच्छ मनु मुच्छ निकास ॥ धोवत सुन्दरि यदन करन यति हो पनि पावत । वारिधि नाते ससिपलक मनु कमल मिटायन । सुन्दर मसि-मुख नीर मध्य इमि सुन्दर सोहत । कमल येलि लिही नवता सुमन मन मोड्न । JasuA .
अ
पद्य-प्रमा
दीठि जहीं जहँ जात रहत तितही ठहराई ।
गगा छबि हरिचन्द फजू परनी नहिं जाई ।
(प्रभाती)
प्रगटहु रवि-कुल रवि निसि बीती प्रजा कमल गन फूले ।
मन्द परे रिपुगन तारासम जन-भय तम उनमूले ।।
६ बसे चोर लम्पट खल लसि सब तुव प्रताप प्रगटायो ।
मागध बन्दी सूत चिरैयन मिलि कल रोर मचायो ।
तुव जस सीतल पौन परसि घटकी गुलाब की फलियाँ ।
अति सुखपाइ असीस देत फोई फरिअँगुरिन घट अलियाँ।
भये धरम में थित सघ द्विजजन प्रजा काज निजलागे।
रिपु-जुवती-मुख कुमुद मन्द जन-चक्रवाक अनुरागे ॥
अरग सरिस उपहार लिये नृप ठाढे तिनकहें तोखौ।
न्याय कृपा सौं ऊँच नीच सम समुझि परसि कर पोखौ ।।
(श्मशान)
करुया चहुँदिसि रस्त डरत सुनि के नरनारी ।
फटफटाइ दोउ पख उलूकहु रटत पुकारी ॥
अन्धकारवस गिरत फाफ अ चील फरत रव ।
गिद्ध गरुड हड़गिल्ल भजत लखि निकट भयद रव ॥
रोअत सियार, गरजत नदी, स्वान भूकि डरपावई।
सग दादुरमींगुर रुदनधुनि मिलि स्वर तुमुल मचावई।
(दुखिया अँखियाँ)
इन दुखियान को न सुख सपने हूँ मिल्यो
यों ही सदा ब्याफुल विकल अकुलायेंगी।
।
५६
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्यारे हरिचन्दजू की बीती जानि औध जोपै
जै हैं प्रान तऊ ये तो साथ न समायेंगी।
देख्यौ एफ चार हू न नैन भरि तोहि याते
जौन लौन लोक जैहैं वहीं पछितायेंगी ।
बिना प्रान प्यारे भये दरस तिहारे हाय
देखि लीलो आँखें ये खुलीही रहि जायंगी।
(लोरी)
सोओ सुखनिदिया, प्यारे ललन ।
नैनन के तारे दुलारे मेरे वारे,
सोयो सुखनिदिपा, प्यारे ललन ।
भई आधीरात बन सनसनात,
पथ पछी कोउ बावत न लात ।
जग प्रकृति भई मनु थिर लखात,
पातहु नहिं पामत्त तरुन हलन ।
मलमलत दीप सिर धुनत आय,
मनु प्रिय पतग हिव करत हाय ।
सतरात अग प्रालस बनाय,
सनसन लगा सीरी पवन चलन ।
सोये अग के सप नींद घोर,
सागत फामी चिंतित चकोर ।
चिरहिन विरही पाहरू पोर,
इन फहँ छन रैनहुँ हाय कलन ॥
६२
पध-प्रभा
जागो भाई जागो रात अब थोरी।
काला चोर नहिं करत चहत है जीवन धन की चोरी ॥2
श्रोसर चूके फिर पछितैहौ हाथ मीजि सिर फोरी।
काम करो नहिं काम न ऐहैं बातें कोरी कोरी ॥
जो कछु बीती बीत चुकी सो चिन्ता ते मुख मोरी।
आगे जामें बनै सो कीजै करि तन मन इक ठोरी॥
कोज काहू को नहि साथी मात पिता सुत गोरी ।
अपने करम आपने सगी और भावना भोरी ।।
सत्य सहायक स्वामि सुखद से लेहु प्रीति जिय जोरी ।
नाहिं तु फिर 'परतापहरी" कोक बात न पूछहि तोरी॥
नाथूरामशंकर शर्मा - [शकरजी का जन्म स० १९९६ वि० की चै० शु० ५ को हरदुमा- गंज (अलीगढ़) में हुआ । भाप तेरह साल की उम्र से ही कविता करते हैं। शकरजी अपनी कविता में काव्यसम्बन्धी एक बढे कडे नियम का निर्वाह कर रहे है । वह यह कि वर्ण-वृत्त की तरह मात्रिक और मुक्तक छन्दों में भी वर्गों की समानसख्या रखते हैं, जो बिल्कुल अपूर्व धात है। समस्या-पूर्ति करने में भाप बडे प्रवीण है । काम्य के रसों पर आपका पूरा अधिकार है । शकरनी की रचनाओं में 'शकरसरोज', 'अनुरागरत्न', 'वायसविनय' भादि मुख्य पुस्तक हैं । भावगाम्भीर्य, अनुप्रास गौर शब्द- लालित्य भापकी कविता के विशेष गुण है।] प्रशस्त पाठ शुभ सत्य सनातनधर्म वही जिसमें मत पन्थ अनेक नहीं। बल वर्द्धक वेद वही जिसमें उपदेश अनर्थक एक नहीं । सुख-मूल समाधि वही जिसमें व्रत बन्धन की कुछ टेक नही । कवि शकर बुद्धि विशुद्ध वही जिसके मन में अविवेक नहीं ॥१॥ गुरु गौरव होन कुचाल चलें मत-भेद प्रसार प्रपच रचें। 1
६४
पद्य-प्रमा
दिन रात मनोमुख मूढ लड़ें
चहुँ ओर घने घमसान मचे ॥
व्रत साधन के मिस पाप करें
हठ छोड न हाय ! लवार लचें।
कवि शकर मोह महासुर से
विरले जन पाय विवेक बचे ॥२॥
तन सुन्दर रोग विहीन रहे
मन त्याग उमग उदास न हो।
रसुवा पर धर्म-प्रसंग बसें
नर-मण्डल में उपहास न हो।
धन की महिमा भरपूर मिले
रस रह वियुक्त विलास न हो।
कवि शंकर ये सब सफट हैं
सुखदा प्रतिभा यदि पास न हो ॥ ३॥
निशि वासर भोग-विलास किये
रसग भरे सब साज बने।
सिर धार किरीट कृपाण गही
अवनी भर के अधिराज बने ।
अनुकूल असण्ड प्रताप रहा
अविरुद्ध अनेक समाज बने ।
कवि शंकर वैभव ज्ञान विना
भवसागर के न जहाज वने ॥४॥
नाथूराम शकर शर्मा कब कौन अगाध पयोनिधि के उस पार गया जलयान विना। मिल प्राण अपान उदान रहैं न समान विमिश्रित व्यान विना। कहिये ध्रुव ध्येय मिला किस को अविकल्प अचञ्चल ध्यान विना। जवि शंकर मुक्ति मिली न कहीं सुस मूल विवेकज ज्ञान विना ॥५॥ धर्म-जिज्ञासा हे जगदीश देव । मन मेरा, सत्य सनातनधर्म न छोडे । सुस में तुमको भूल न जावे, नेक न सकट में घबरावे । धीर कहाय अधीर न होवे, तमक न तार क्षमा का तोडे ॥१॥ त्याग जीव के जीवन पथ को, टेढा हॉक न दे तन रथ को । अति चचल इद्रिय घोड़ों की,भ्रम से उलटी बाग न मोड़े ॥२॥ हो कर शुद्ध महाव्रत धारे, मलिन किसी का माल न मारे। धार घमण्ड क्रोध पाहन से, हा । न प्रेम-रस का घट फोड़े॥३॥ ऊँचे विमल विचार घढावे, तप से प्रातिम-ज्ञान बढावे । हठ तज मान करे विद्या का, शकर श्रुति का सार निचोडे ॥४॥ १०प्र०-५
६६
पद्य-प्रमा
.
--
ब्रह्मचर्य-महिमा
(महावीर हनुमान)
सुग्रीव का सुमित्र बड़े काम का रहा।
प्यारा अनन्य भक्त सदा राम का रहा ।।
लंका जलाय काल खलों को सुझा दिया ।
मारे प्रचड दुष्ट दिया भी बुझा दिया ।
हनुमान बली वीर-वरों में प्रधान है।
महिमा अखड ब्रह्मचर्य को महान है ।।
(राजर्षि भीष्म पितामह)
भूला न किसी भाति कड़ी टेक टिकाना ।
माना मनोज का न कहीं ठीक ठिकाना ॥
जीते असंख्य शत्रु रहा दर्प दिखाता ।
शय्या शरो की पाय मरा धर्म सिखाता।
श्रच एक भी न भीष्म वली सा सुजान है।
महिमा अखड ब्रह्मचर्य की महान है।
4
-
श्रीधर पाठक [पाठकजी का जन्म १९१६ वि० में भागरा जिले के जोधरी गाव में हुआ था। यह प्राकृतिक सौन्दय के घडे प्रेमी थे। यह बात इनकी करिताओं से भी अच्छी तरह सलकती है। पाठकली खढी योली और प्रज- मापा दोनों में पढी अच्छी कविता करते थे। इनके लिखे तेरह अन्य प्रका- शित हो चुके हैं । आपकी लिखी 'एकान्त वासी 'योगी' 'प्रान्त पथिक', 'उनद प्राम', मादि कितायें बहुत प्रसिद्ध है । पाठकजी की कविता- शैली निराली थी। कमी कभी वे अपने मित्रों को कविता में ही पत्र लिखा करते थे । बडी बोली की कविता करने में उन्हें अच्छी सफलता प्राप्त हुई । खेद है कि तीन साल हुए, आपका देहान्त हो गया।] हिमालय . उत्तर दिसि नगराज अटल छबि सहित विराजत, लसत स्वेव सिर मुकुट, मलक हिम सोभा भ्राजत । वदन देस सविसेष, कनक आभा आभासत, अधोभाग की स्याम वरन छवि हृदय हुलासत ॥ स्वेत पीत सँग स्याम घार अनुगत सम अन्तर, सोहत त्रिगुन, त्रिदेव, त्रिजग, प्रतिभास निरन्तर । विलसत सो तिहुँ काल त्रिविध सुठि रेस अनूपम, भारतवर्ष विशाल भाल भूपित त्रिपुए सम ॥
६८
पद्य-प्रभा
देवदारु की
उज्ज्वल ऊँचे शिखर दूर देसन लों चमकत,
परत भानु नव किरन भाव सुवरनसम दमकत ।
लता पुहुप बनराजि, सदा ऋतुराज सुहावत,
हरी भरी डहडही वृच्छ माला मन भावत ।
कोकिल कीर कदम्ब, अम्ब चढ़ि गान सुनावत,
स्यामा चारु सुगीत मधुर सुर पुनि पुनि गावत ।
कहुँ हारीत कपोत फहूं मैना लखि परियत,
कहुँ कहुँ खेचर-वर चकोर के दरसन करियत ॥ ,
(डार कहूँ लंगूर हिलावत,
कहुँ मर्कट को कटक वेग सौ तर तरु धावत ।
विकसित नित नव कुसुम तरुन तरु मुकुलित बौरत,
अलबेले अलिवृन्द कलिन के ढिग ढिग अौरत ।।
झरना जहँ तह, भरत करत कल छर छर जल रव,
पियत जीभ सों अम्बु अमृत उपमा हिम सम्भव ।
पवन सीत अति सुखद, बुमावत बहु बिधि तापा,
चादर दरसत, परसत, वरसत आपहि आपा ॥
गंगा गोमुख स्रवत, कहै को सोमा ताका,
बरनै जन्मस्थली, वह कि अथवा जमुना की।
सतलज, व्यास, चिनाव प्रभृति पजाब पच जल,
सरजू आदि अनेकन नदियन को निसरत थल ।।
पृष्ठ भाग रमनीक, रुचिर राजव रावन हद,
प्रहन करत निज देह, सिन्धु अरु ब्रह्मपुत्र नद ।
श्रीधर पाठक
६६
हरिद्वार केदार वदरिकाश्रम
की सोभा,
लखि ऐसो को मनुज जासु मन कबहुँ न लोमा ?
पुनि देखिय कसमीर देस नेपाल तराई,
सिकम और भूटान राज्य
आसाम लगाई।
दच्छिन भुज अफगान राज मस्तक सों भेटत,
वाम बाहु सों बरमा के कच-भार समेटत ॥
ज्यों समर्थ बलवान सुभावहि सों उदार मन,
देत श्रमय बरदान मानयुत निज आश्रित गन ।
आर्यावर्त पुनीत ललकि हिय भरि आलिमुत,
गंगा जमुना अश्रु प्रेम प्रगटत हृदयगत ।।
रूरे रे गाम अधिक अन्तर सों सोहत,
रूपवती. पर्वती, सती, जुवती मन मोहत ।
अगनित पर्वत खण्ड चहूँ दिस देत दिसाई,
सिर परसत आकास, चरन पाताल छुआई ॥
सेत पाति तर
मानहुँ विधि पट हरित स्वर्ग सोपान पिलाई।
गहरे गहरे गत सड
दीरघ गहराई,
शब्द करतही घोर प्रतिध्वनि देय सुनाई ॥
तहाँ निपट निश्शक, वन्य पशु सुख सौं विचरत,
करत केलि कल्लोल, मुदित आनन्दित निहरत ।
कहुँ इंधन को ढेर सिद्ध-आवास जनावत,
कहूँ समाधिस्थित जोगी की गुहा सुहावत ॥
सोहत सुन्दर
ऊपर छाई,
पद्य-प्रमा
,
विविध विलच्छन दृश्य, सृष्टि सुखमा सुस मंडल,
नन्दनवन अनुरूप भूमि अभिनय रंगस्थल ।
प्रकृति परम चातुर्य, अनूपम अचरज प्रालय,
'श्रीधर'गछकि रहत अटल छवि निरसि हिमालय ॥
प्रेम
प्रेम मय है, सारा संसार ।
प्रेमहि का सारा प्रसार है मत कह इसे असार ।।
प्रेम वार है, प्रेम पार है, प्रेमहि है मझधार ।
बेड़ा पड़ा प्रेम सागर में प्रेम से होगा पार ॥
प्रेमहि है स्वारथ परमारथ, सकल पदारथ सार ।
प्रेम विलग जो तेरे मन में वो है प्रेम विकार ।।
होजा निडर, छोड़दे गड़बड़, पकड़ प्रेम की धार ।
प्रेम के बल से केवल होगा निघल तेरा निस्तार ।।
.
महावरिप्रसाद द्विवेदी [द्विवेदीजी का जन्म स० १९२१ वि० में रायमरेली के दौलतपुर गाँव में हुआ । कविता की भोर आपकी लडक्पन ही से रचि है। भाप सस्कृत और हिन्दी दोनों में पविता करते है। भापकी गद्य लिखने की शैली निराली है। जब से द्विवेदीनी सरस्वती' का सम्पादन किया, हिन्दी में नया जीरन भागया है । आप अगरेज़ी, सस्कृत, उर्दू, पारसी, बैंगलो, गुजराती, मराठी भादि भाषाओं के भी अच्छे विद्वान हैं । आपके मौलिक तथा अनुवादित ग्रन्थों की साया दो दर्जन से अधिक है । द्विवेदीली समालोचना करने में घडे निष्पक्ष और दक्ष हैं । भाप हिन्दी के आचार्य को जाते हैं, जो सर्वथा समुचित है। भापकी कविता पड़ी सुन्दर और सरस होती है आर्य-भूमि जहाँ हुए व्यास मुनि-प्रधान, रामादि राजा अति कीर्तिमान, जो थी जगत्पूजित धन्य भूमि, यही हमारी यह पायं भूमि ॥१॥ जहाँ हुए साधु महा महान, थे लोग सारे धन, धर्मवान, जो थी जगत्पूजित धर्म-भूमि, वही हमारी यह आर्य भूमि ॥२॥ ।
७२ पद्य-प्रमा । - जहां सभी थे निन-धर्मधारी, खदेश का भी अभिमान भारी, जो थी जगत्पूजित पूज्य-भूमि, वही हमारी यह आर्य भूमि ॥३॥ हुए प्रजापाल नरेश नाना, प्रजा जिन्होने सुत-तुल्य जाना, जो थी जगत्पूजित सौख्य भूमि; वही हमारी यह आर्य भूमि ॥४॥ वीराङ्गना भारत-भामिनी थीं, वीर असू भी कुल-कामिनी थीं, जो थी जगत्पूजित वीर-भूमि, चही हमारी यह आर्य-भूमि ॥५॥ स्वदेश सेवी जन लक्ष लक्ष, हुए जहाँ हैं निज-कार्य दक्ष, जो थी जगत्पूजित कार्य-भूमि, वही हमारी यह आर्य भूमि ॥६|| स्वदेश-कल्याण सु-पुण्य जान, जहाँ हुए यन सदा महान, जो थी जगत्पूजित पूण्य भूमि, वही हमारी यह आर्य-भूमि ॥७॥ न स्वार्थ का लेश जरा कहीं था, देशार्थ का त्याग कही नहीं या, ७३ महावीरप्रसाद द्विवेदी जो थी जगत्पूजित श्रेष्ठ भूमि, वही हमारी यह पार्य-भूमि ॥८॥ कोई कमी धीर न छोड़ता था, न मृत्यु से भी मुंह मोडता था, जो थी जगत्पूजित धैर्य-भूमि, वही हमारी यह आर्य भूमि ॥६॥ स्वदेश के शत्रु खशत्रु माने, जहाँ सभी ने शर-चाप ताने, जो थी जगत्पूजित शौर्य भूमि, वही हमारी यह आर्य-भूमि ॥१०॥ अनेक थे वर्ण तथापि सारे, थे एकताबद्ध जहाँ हमारे, जो थी जगत्पूजित ऐक्य-भूमि, वही हमारी यह आर्य भूमि ॥११॥ थी मातृ भूमि व्रत-भक्ति मारी, जहाँ हुए शूर यशोऽधिकारी, जो थी उगत्पूजित कीर्ति भूमि, वही हमारी यह ार्य भूमि ॥१२॥ दिव्यास्त्र विद्या-जल दिव्य यान, छाया जहाँ था अति दिव्य दान, जो थी जगत्पूजित दिव्यभूमि, वही हमारी यह आर्य भूमि ॥१३॥ 1
पद्य प्रभा
।
नये नये देश अहाँ अनेक,
जीते गये थे नित एक एक,
जो थी जगत्पूस्ति भाग्य-भूमि,
वही हमारी यह आर्य-भूमि ॥१४॥
विचार ऐसे जब चित्त आते,
विपाद पैदा करते. सतासे,
क्या कभी देव दया करेंगे?
न क्या हमारे दिन भी फिरेगे ॥१२॥
.
अयोध्यासिंह उपाध्याय
[ उपाध्यायजी का जन्म सवत् १९२२ वि० में, आजमगढ जिले में
हुमा । भाप उर्दू, हिन्दी, फारसी और सस्कृत के अच्छे विद्वान हैं। छोटी
आयु से ही इन्हें हिदी-साहित्य से बहा अनुराग है । इन्होंने गध पद्यात्मक
कितनी ही पुस्तकें लिखी हैं । इनका लिखा 'ठेठ हिन्दी का पाठ' "सिविल
सर्विस परीक्षा के मोस में पढाया जाता है। उपाध्यायजी का 'प्रिय प्रवास'
नामक अतुकान्त महाकाव्य पहा अद्भुत अन्य है। बाद में एक पड़ी
विशेषता यह है कि हिन्दी गय भौर पथ में कठिन से कठिन और सरल से
सरल रचना कर सकते हैं। इनके 'चुमते चौपदे' और 'चोले-चौपदे अच्छी
ख्याति प्राप्त कर चुके हैं।
कृष्ण-वियोग
१
प्रिय पति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है।
दुख-जलनिधि दूवी का सहारा कहाँ है।
लख मुख जिसका मैं आज लौ जी सकी हूँ।
यह हृदय हमारा नैन तारा कहां है।
२
पल पल जिसके मैं पथ को देखती थी।
निश दिन जिसके ही ध्यान में थी बिताती॥
उर पर जिसके है सोहती मुफमाला।
वह नष नलिनी से नैन वाला कहाँ है।
७६
पद्य-प्रमा
-
३'
मुम विजिव-जरा का एक भाधार जो है।
वह परम अनूठा रत्न सर्वख मेरा ॥
धन मुझ निधनी का लोचनों का उजाला।
सजल जलद की सी कान्ति वाला कहाँ है ।
४
प्रति दिन जिसको मैं अंक में नाथ ले के।
निज सकल कुअंकों की क्रिया कीलती थी ।।
अति प्रिय जिसको है वस्त्र पीला निराला ।
वह किशलय के से अंग वाला कहाँ है।
।
वर बदन विलोके फुल्ल अभोज ऐसा ।
करतल गत होता व्योम का चन्द्रमा था।
मृदुरव जिसका है रक्त सुखी नसों का।
वह मधुमयकारी मानसो का कहाँ है ॥
६
रसमय वचनों से नाथ जो सर्वदा ही ।
मम सदन बहाता स्वर्ग-मन्दाकिनी था।
श्रुत-पुट टपकाता यूँद जो था सुधा का ॥
वह नव-सनि न्यारी मजुता की कहाँ है ॥
स्वकुल जलज का है तो समुत्फुल्लकारी ।
मम परम-निराशायामिनी का विनाशी ।।
अयोध्यासिंह उपाध्याय
व्रज जन विहँगों के वृन्द का मोद-दाता।
वह दिनकर शोभी राम भ्राता कहाँ है।
मुख पर है जिसके सौम्यता खेलती सी।
अनुपम जिसका हूँ शील-सौजन्य पाती।
पर दुस लख के है जो समुद्विग्न होता।
वह सरलपने का स्वच्छ सोता कहाँ है ॥
है
गृहतिमिर निराशा का समाकीर्ण जो था।
निज मुस-शुति से है जो उसे ध्वसकारी।
सुसकर जिससे है कामिनी जन्म मेरा।
वह रुचिकर चित्रों का चितेरा कहाँ है ।।
सहकर कितने ही कष्ट औ सकटों को।
बहु यजन करा के पूज के निर्जरों को ।।
यफ सुअन मिला है जो मुझे यन द्वारा।
प्रियतम वह मेरा कृष्ण प्यारा कहाँ है ।
.
.
मुखरित करता जो सन को था शुकों-सा।
फल रव फरता था जो खगों सा बनों में।
सुध्वनित पिक लौ जो वाटिका था धनादा।
वह बहु विधि कण्ठों का विधाता कहाँ है।
७६
पद्य-प्रमा
३
मुझ विजिव-जरा का एक प्राधार जो है।
वह परम अनूठा रन सर्वख मेरा ।।
धन मुम् निधनी का लोचनों का उजाला।
सजल जलद की सी कान्ति वाला कहाँ है।
प्रति दिन जिसको मैं अंक में नाथ ले के।
निज सकल कुअंकों की क्रिया कीलती थी ।।
अति प्रिय जिसको है वन पीला निराला ।
वह किशलय के से 'अंग वाला कहाँ है ।।
वर बदन विलोके फुल्ल अभोज ऐसा ।
करतल गत होता व्योम का चन्द्रमा था।।
मृदुरव जिसका है रक्त सूखी नसों का ।
वह मधुमयकारी मानसों का कहाँ है ॥
६
रसमय वचनों से नाथ जो सर्वदा ही ।
मम सदन बहाता स्वर्ग-मन्दाकिनी था।
श्रुत-पुट टपकाता यूँद जो था सुधा का ॥
वह नव-सनि न्यारी मजुता की कहाँ है ।।
44
स्वकुल जलज का है जो समुत्फुलकारी।
मम परम-निराशायामिनी का विनाशी ॥
वह बहु विधि कराठो का विधावा कहा है।
६
सहकर कितने ही कष्ट भी सकटी को।
प्रियतम । वह मेरा कृष्ण प्यारा कहाँ है।
मुखरित करता जो सन को या शुकों-सा।
सुध्वनित पिक लो जो वाटिका था बनाना।
अयोध्यासिंह उपाध्याय
ब्रज जन पिहँगों के वृन्द का मोद-दाता।
वह दिनकर शोभी राम भ्राता कहाँ है।
मुख पर है जिसके सौम्यता खेलती सी।
अनुपम जिसका हूँ शील-सौजन्य पाती।
पर दुस लख के है जो समुद्विग्न होता।
वह सरलपने का स्वच्छ सोता कहाँ है ॥
गृहतिमिर निराशा का समाकीर्ण जो था।
निज मुख-द्युति से है जो उसे ध्वसकारी।
सुखकर जिससे है कामिनी जन्म मेरा।
वह रुचिकर चित्रों का चितेरा कहाँ है ।।
१०
घहु यजन करा के पूज के निर्जरों को।
यक सुअन मिला है जो मुझे यत्न द्वारा।
कल रख फरता था जो सगों सा पनों में।
पद्य-प्रमा
।
हँसी-खेल जाना समुन्दर थहाना।
पड़े काम आकाश पाताल छाना ।।
कठिन से कठिन काम भी जो सकें कर।
उन्हों ने मुहिम कौन सी की नहीं सर ।।
उन्हें काठ उकठे हुए का फलाना।
उन्हें दूब का पत्थरों पर जमाना ।
उन्हें गगधारा उलट कर बहाना ।
उन्हें ऊसरों बीच बीये उगाना ॥
बहुत ही सहल काम सा है जनाता।
भला साहसी क्या नहीं कर दिखाता ।।
अड़गे लगाना न कुछ काम आया।
वही गिर गया पाव जिसने अड़ाया।
दिया डाल बल झंझटों को बढाया।
न तब भी उन्हें बैरियों ने डिगाया।
जिन्हें काम कर डालने की लगी धुन ।
सदा ही सके फूल कॉटों में वे चुन ।
जिन्होंने न औसान अपना गवाया।
जिन्होंने कभी जी न छोटा बनाया ।।
हिचकना जिन्हें भूल कर भी न भाया ।
जिन्होंने छिडा काम कर ही दिसाया।
न माना उन्होंने बखेड़ों का टोना।
न जाना कि कहते किसे हैं न होना ।।
।
१
अयोध्यासिंह उपाध्याय
चले पाल गहरी नहीं वे विचलते।
नहीं ये कतरब्योंत से हैं दहलते ।।
किये लास चतुराइयाँ हैं न टलते।
फैसे फन्द में हाथ वे हैं न मलते॥
उन्हें तंगियाँ हैं नहीं तान पाती।
न लाचार लाचारियाँ हैं बनाती ।।
पिछड़ना उन्हें है न पीछे हटाता ।
फिसलना उन्हें है न नीचे गिराता ।।
विचलना उन्हें है सेभलना सिखाता ।
गया दॉव है और हिम्मत बँधाता ।।
उलझ गुत्थियाँ हैं उमगे बढ़ाती ।
धडेबन्दियाँ हैं धड़क खोल जाती।
बढ़ा जी रसा काम का ढग जाना।
बखेड़ों, दुसों उलझनों को न माना ।।
जिन्होंने हवा देख कर पाल ताना।
जिन्हें आ गया बात बिगड़ी बनाना ।।
उन्होंने बड़े काम कर हो दिखाये।
भला कब तरैया न वे "तोड लाये ॥
. जगन्नाथदास 'रत्नाकर' [रलाकरजी का जन्म १९२३ वि० में, काशी में हुभा । यह अप्र- बाल वैश्य हैं । १८९१ ई० में इन्होंने फ़ारसी लेकर बी० ए० पास किया। पहले इन्होंने उर्दू में शायरी शुरू की, फिर धीरे-धीरे हिन्दी के मक बन गये । भय ये हिन्दी-साहित्य के उत्कृष्ट ज्ञाता और ब्रजभापा के भेष्ट कवि समझे नाते हैं । रत्नाकरजी की सरम रचनाओं में पुराने कवियों की कविता का सा आनन्द भाता है । इनके लिखे 'साहित्यरत्नाकर','समालोचनादर्श', 'गगावतरणकान्य' मादि अन्य प्रसिद्ध हैं। इन्होंने कितने ही ग्रन्थों का सुयोग्यता पूर्वक सम्पादन भी किया है। हाल ही में आपने 'विहारी- सतसई' पर 'विहारी-स्नाकर' नामक एक सुन्दर टीका लिसी है। ] गंगा-गौरव जाय जमराज सो पुकारे जमदूत सबै, साहियी तिहारी अब लाजतै रहन है। पापिन की मण्डली उमडि मोदमडित, अखडल के मण्डल लो राजतै रहित है ।। सापी, परतापी श्री सुरापी हूँ न आवै हाथ, तिनहू प छम-छन छाजतै रहति है। दगा करें हमसों हमेस हठि भृङ्गीगन, गगा भुस सीस चढ़ी गाजतै रहति है ।।
जगन्नाथदास 'रत्नाकर ८३ गजेन्द्र-मोक्ष सुड गहि थातुर उपारि धरनी पै धारि, विवस बिसारि काज सुर के समाज को। कहै "रतनाकर" निहारि करुना की कोर, वचन उचारि, जो हरैया दुससाज कौ ।। अबु पूरि गनि बिलय आपनोंई लेखि, देखि देखि दीन्ह छत दन्तनि दराज को। पीतपट लै लै के अगोछत सरीर, कर- कानि सों पोंछत भुसुड गजराज कौ ।। श्मशान का दृश्य कहुँ सुलगति कोउ चिता हूँ कोड जाति बुझाई । एक लगाई जाति एक को रास वहाई ॥ विविध रग की उठति माल दुरगधनि महकति । कहुँ चरवी सो चटचटाति कहुँ दहदह दहकति ॥ कहुँ फूकन हित घरयो मृतक तुरतहि तह थायो । परयो अग अधजरयो कहूँ कोऊ करसायो । कहूँ स्वान इक अस्यि खड लै चाटि घचोरत । कहुँ कारो महिकाक ठोर सों ठोकि टटोरत ॥ कहुँ शृगाल कोउ मृतक अग पर ताक लगावत । कहुँ कोउ शव पर वैठि गिद्ध पट चोंच चलावत ।। जहें तहँ मजा मास रुधिर लखि परत घगारे । जिव तित छिटके हाड़ स्वेत कहुँ कहुँ रवनारे।।
८४
पद्य-प्रमा
हरहरात इक दिसि पीपल को पेड़ पुरातन
लटकत जामें घंटः धने माटी के बासन ।।
वर्षातु के काज और हू लगत भयानक ।
सरिता बहत सबेग करारे गिरत अचानक ।।
ररत कहूँ मण्डूक कहूँ झिल्ली झनकारें ।
काक-मण्डली कहूँ अमंगल मन्त्र उचारें ।
भई आनि तब साँझ घटा आई धिरि कारी ।
सनै सनै सब ओर लगी बाढ़न अँधियारी ॥
भये इकट्ठ आनि तहाँ डाकिनि पिसाचगन ।
कूदत करत कलोल किलकि दौड़त तोड़त तन ॥
भाकृति अति विकराल धरे कुइला से कारे।
बन घदन लघु लाल नयन जुत जीभ निकारे ।।
कोऊ कड़ाकड़ हाड़ चाबि नाचत दै ताली ।
कोऊ पीवत रुधिर सोपरी की करि प्याली।।
कोठ ॲतड़ी की पहिरि माल इतराइ दिखावत ।
कोउ चरबी ले चोप सहित निज अगनि लावत ।।
कोउ मुण्डनि लै मानि मोद कन्दुक लों डारत ।
कोड रुएडनि पे बैठि करेजो फारि निकारत ॥
राय देवीप्रसाद 'पूर्ण [पूर्णजी का जन्म स. १९२५ वि० में जबलपुर के एक प्रतिष्ठित कायस्थकुश में हुआ था। यी० ए०, बी० एल०' पाम करके मापने कान- पुर में बड़ी सफलता पूर्वक वकालत की थी। धर्म सम्पन्धी और सार्वजनिक कार्यों में आप सदैव योग देते रहते थे। भापकी कविता पहुतही सरल और स्वाभाविक होती थी । आप बहुत शीघ्र कविता करते थे। रायसाहब की लिखी कितनी ही पुस्तके हैं, जिनमें 'चन्द्रकला-भानु-कुमार नाटक' और 'धाराधर-पारन' मुख्य हैं। सेद है, ३० जून सन् १९१५ ई० को इन प्रसिद्ध कवि महोदय का देहान्त होगया।] 1 भारत-वाक्य सभ्य लक्ष्मी दीजै लोक में मान दीजै । विद्या दीजै सन्तान दीजै ॥ हे हे स्वामी। प्रार्थना कान कीजै । को कीजे देशकल्याण कीजै ॥ सुमति सुखद दीजै फुट को लोग त्यागे । फुमति हरन कीजै द्वप के भाव भागें ॥ तजि कुसमय निद्रा चित्त सों चित्त जागें । विपम कुपय त्यागें नीति के पथ लागे ।
पद्य-प्रमा
३
तन्द्रा त्यागै लहि कुशलता होहिं व्यापार-नेमी ।
सीसें नीकी नव-नव कला होहिं उद्योग प्रेमी ।।
पूरे रूरे नियम विधि सों स्वस्थता के नियाहैं।
उत्कण्ठा सों दिवस-निसि हूँ देशकी वृद्धि चाहैं ।
पावै पूरी प्रतिष्ठा कविवर नग के शुद्ध साहित्य-ज्ञानी ।
होवें आसीन ऊचे सुजन विदित जे देश-सेवाभिमानी ॥
पीड़ा दुर्भिक्ष पारी जुग जुग कहूँ प्रान्त कोऊ न पाएँ ।
दीर्घायू लोग होवे तिन ढिंग फवहूँ रोग फोऊ न भावे ।।
५
सत्संग, सन्त-सुर-पूजन धेनु-प्रेम ।
श्रीराम-कृष्ण-चरितामृत-पान नेम
सौजन्य-भाव गुरु-सेवन भादि प्यारे ।
सम्पूर्ण शील शुभ पाबहिं देशवारे ।।
६
अन्याय को श्रक कहूँ -रहैना ।
दुर्नीति की शक कहूँ रहेना ॥
मोद विनोदकारी ।
राजापना
में अनुराग भारी ॥
।
होवै सदा
-
समस्तु वर्णाश्रम धर्म मानें
सदा हि फर्तव्य प्रधान जानें ।
८७
रायदेवीप्रसाद 'पूर्ण
जसी तपस्वी बुध वीर हो ।
बली प्रतापी रणधीर होवें ॥
लक्ष्मी दीजै लोक में मान दीजै ।
विद्या दीजै सभ्य सन्तान दीजै ।।
हे हे स्वामी ! प्रार्थना कान कीजै ।
फीजै कीजै देश कल्याण कीजै ॥
वर्षा-श्रागमन
१
सुसद सीतल सुचि सुगन्धित पवन लागी बहन ।
सलिल बरसन लगो बसुपा लगी सुसमा लहन ॥
लहलही लहरान लागी सुमन
बेली
मृदुल ।
हरित कुसुमित लगे झूमन बृच्छ मजुल विपुल ॥
२
हरित मनि के रग लागी भूमि मन को हरन ।
लसत इन्द्रवधून अवलो छटा मानिक वरन ।।
विमल बगुलन पाति मनहुँ पिसाल मुक्तापलो ।
चन्द्रहास समान चमकति पश्चला त्यों भली ॥
३
नील नीरद सुभग सुर-धनु-वलित सोभाधाम ।
लसत मनु धनमाल धारे ललित श्रीघनश्याम ॥
कूप कुएड गभीर सरवर नीर लाग्यो मरन ।
नदी नद उफनान लागे लगे मरना मरन ॥
m
८८
पद्य-प्रमा
-
४
रटन दादुर त्रिविध लागे रुचन चातक बचन ।
कूक छावत मुदित कॉनन लगे केकी नचन ॥
मेघ गरजत मनहुँ पावस-भूप को दल सबल ।
विजयदुन्दुभि हनत जग में छीनि ग्रीसम अमल ॥
उद्बोधन
माता के समान पर पतनी बिचारी नहीं,
रहे सदा परधन लेन हो के ध्यानन में ।
गुरुजन पूजा नहीं कीनी सुचि भावन सों,
गीधे रहे नाना विधि विपय विधानन में।
आयुस गवाई सब स्वारथ सवारन में,
खोज्यो परमारथ न वेदन-पुरानन में ।
जिन सों बनी न कछु करत मकानन में
तिन सों बनेगी करतून कौन कानन मे ।।
-
रामचरित उपाध्याय
[ उपाध्यायजी का जन्म १९२९ वि. में, गाजीपुर के एक सरयू-
पारीण पाहाण-वंश में हुआ । ये सस्कृत के घच्छे विद्वान् हैं । इनकी
खडीयोली की पविताएं बहुत अच्छी होती हैं । 'राम चरित-चिन्तामणि',
'उपदेश-रत्नमाला', 'सत्यहरिश्चन्द्र', 'विचित्र विवाह' भादि इन की पुस्तकें
प्रसिद्ध हैं।]
अंगद का रावण को समझाना
.
१
मम निवेदन है फुछ अापसे,
सुन उसे उर में धर लीजिये।
पहण है करता जिस युक्ति से.
मधुप सारस-सार सहर्प हो।
२
जनकजा रघुनायक हाथ में,
तुरत जाकर अर्पण कीजिये।
पर बधूनन से रहते सदा,
अलग सन्तत सन्त तमीचर ।
३
कुशल से रहना यदि है तुम्हे,
दनुजतोफिर गर्वन कीजिये।
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रामचरित उपाध्याय
६१
समय है अनमोल, कुकर्म मे,
तुम पिनष्ट करो उसको नहीं।
दनुज । है जग में सुखदायिनी,
नियमहीन महीन महीप को।
६
परम वीर चढे रघुवीर हैं,
तब पुरी पर वारिधि बाँध के।
तिविप भाकर के रिपु राज्य में,
तनिक भीरु कभी रुकते नहीं।
कवि, गुणी,बुध,वीर, नयज्ञ भी,
सममिने मन में निज को स्वयम् ।
पर, विना कुछ कार्य किये कभी,
न मन-मोदक मोद कलाप है।
सत्र सुरासुर हैं घश आपके
फरगता यदि हों सथ सिद्धियाँ।
तदपि हे दनुजेश्वर ! जानना.
निज विनाशकनाशक राम को।
पद्य-प्रभा
-
शरण में गिरिये रघुनाथ के,
नियल के बल केवल राम हैं।
दुखद है तुमको जनकात्मजा,
तुरत दूर उसे कर दीजिये।
सुखद हो सकती न उलूक को,
नय विशारद शारद चन्द्रिका ।।
बहुत बार हुए विजयी सही.
पर नहीं रहते दिन एक से ।
सम्हल के रहिये अव भापकी,
ग्रह दशान दशानन ! है मली।
६
स्वकुल की करिये शुभ कामना,
सपदि युक्तिवही नप सोचिये।
न अब भी जिसमें करना पडे,
कठिन संगर सग रमेश के॥
स्व-मन को वश में रखिये सना,
अनय से पर घस्तु न लीजिये।
नृप । कभी सुखदायक हैं नहीं, .
सुत,रसा, धन साधन के विना।
रामचरित उपाध्याय
-
समय है अनमोल, फुकर्म मे,
तुम विनष्ट करो उसको नहीं।
दनुज । है जग में सुखदायिनी,
नियमहीन महीन महीप को ।
६
परम वीर चढे रघुवीर हैं,
तब पुरी पर वारिधि बाँध के।
तितिपमाकर के रिपु राज्य में,
तनिक भीरु कभी रुकते नहीं।
कवि,गुणी,बुध,पीर, नयज्ञ भी,
सममिवे मन में निज को स्वयम् ।
पर, बिना कुछ कार्य किये कभी,
न मन मोदक मोर कलाप है।
सब सुरासुर हैं वश आपके
फरगता यदि हों सय सिद्धियाँ।
तदपि हे दनुजेश्वर | जानना.
निज विनाशक नाशक राम को।
पद्य-प्रमा
है
-
अखिल लोक नृपेश्वर राम को,
समझ के उनसे मिलिये अभी।
यह पुरी रघुनाथ रणानि में,
दनुज! होम न हो,मन में डरो॥
दर्शनीय दोहे
।
-
-
उपजे यदपि सुवंस में, खल तऽ दुखद कराल ।
चन्दन हूँ की श्राग ले जरे देह तत्काल ||
( २ )
मानी दीन न सके, बरुक प्रान दे खोय ।
बिना बुझे सपनेहुँ नहिं, पावक सीतल होय ॥
( ३ )
अपने ते जो छुद्र अति, तिहि पै करिउ न क्रोध ।
किहूँ भाँति सोहत नहीं, फेहरि-ससक विरोध ।।
( ४ )
धीरज, उद्यम, बुद्धि, चन, साहस, शक्ति, सुनीत ।
ये दस सुखदायक सदा, सुतिय, सुपूत, सुमीत ।।
( ५ )
चिन्ता जननी चाह है, ताको पति अविवेक ।
जो विवेक की थाइ तो, राम-नाम जपु एक
रामचरित उपाध्याय
१३
(६)
जलचर, थलचर, सासाचर, नमचर,निसिचर तारि।
जौ न हरज इक नरहु की, सुनवी गरज मुरारि ।।
(७)
चकई हग ज्यों रवि घसै, ज्यों कुलतिय दृगलाज ।
-त्योंही तुम मेरे हिये, नित निषसाहु रघुराज ॥
२
पद्य-प्रमा
अखिल लोक नृपेश्वर राम को,
समम के उनसे मिलिये अभी
यह पुरी रघुनाथ रणानि में,
दनुज' होम न हो,मन मे डरो।।
दर्शनीय दोहे
उपजे यदपि सुवंस में, मल तऽ दुखद कराल ।
चन्दन हूँ की आग लै. जरे देह तत्काल ।
( २ )
मानी दीन न है सके, बरुक पान दे खोय ।
बिना बुझे सपनेहुँ नहि, पावक सीतल होय ।।
अपने ते जो छुद्र अति, तिहि पै करिउ न क्रोध ।
किहूँ भाँति सोहत नहीं, हरि ससक विरोध ।।
धीरज, उद्यम, बुद्धि, चल, साहस, शकि, सुनीत ।
ये दस सुखदायक सदा, सुतिय, सुपूत, सुमीत ॥
चिन्ता जननी चाह है, ताको पति अविवेक ।
जो विवेक की चाह तो, राम-नाम जपु एक ।।
रामचरित उपाध्याय
४३
जलचर, थलचर, सासाचर, नमघर,निसिचर तारि।
जौ न हरज इक नरहु फी, सुनवी गरज मुरारि ।।
(७)
चकई हग ज्यों रवि धस, ज्यों कुलतिय गलाज ।
न्त्योंही तुम मेरे हिये, नित निवसह रघुराज ।
। कामताप्रसाद 'गुरु' - [गुरुजी का जन्म स० १९३२ वि. में, सागर (मध्यप्रदेश) के एक कान्यकुब्स माह्मण-परिवार में हुमा । ये उर्दू, फारसी, हिन्दी, भंगरेजी, सस्कृत, पङ्गला, उदिया और मराठी के अच्छे शाता हैं। इनकी भाषा व्याकरण सम्मत और सहज होती है। इनकी कविताएँ प्रसादगुण- भावुकतामय होती हैं । हिन्दी व्याकरण के ये विशेषज्ञ समझे जाते है । इन्होंने कितनी ही पुस्तकें लिखी हैं। हिन्दी का व्याकरण' इनकी बहुत प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण पुस्तक है। 'सुदर्शन नाटक' और 'हिन्दुस्तानी शिष्टाचार' नामक पुस्तके मापने हाल ही में लिखी हैं। ] सम्पन और शील ( १ ) सग्रह करो करोड़, लुटालो धन अनगिन्ती । ऊँचे आसन बैठि सुनो दासों की विन्ती ।। निज प्रभुता के हेनु करो तुम सब कुछ नीका । किन्तु शील के विना सभी है जग में फीका ॥ ( २ ) कहते हैं कविलोग शील भारी भूपण है । शील-हीन नर भूमिभार निजकुल-दूपण है ।। दान, मान, यश, रूप, शूरता, साहस, बाने । मोती सम हैं, सगुण शील-माला के दाने ।
५
-
.
कामताप्रसाद 'गुरु'
( ३ )
शब्द-कोप में 'शील' शब्द व्यापक है इतना ।
गीता में भी धर्म नहीं है व्यापक जिवना ।।
आगे रसकर शील, धर्म निज गुण दरसावै ।
गुणवाचक सब नाम अकेला शील बनावै।।
( ४ )
शील, नम्रता, सवल सत्यता है अति प्यारो
न्याय सहित है दया प्रेम पूरण अविकारी ॥
सदाचार है शील, शील विद्या पढना है।
तन-मन धन से सदा शील आगे बढना है।
( ५ )
शील सत्य, वैराग्य दण्ड यति का धारण है।
यही यज्ञ, व्रत, र्म परमपद का कारण है ।।
यही ज्ञान, विज्ञान, यही है गुण चतुराई ।
ऊँचे कुल का चिन्ह, देह मन की रुचिराई ।।
सर यो का एक शील है छिपा सजाना ।
अगुण झाले नाग जानते नहीं ठिकाना ।।
धर्मशील के विना यथारथ धर्म नहीं है।
शीलवान को सफल स्वर्ग आनन्द यही है।
पद्य-प्रमा
( ७)
शील त्याग नर वृथा धर्म का अमिलापी है।
अपना अन्त करण सत्य इसका साखी है ।।
कपट, क्रोध, अभिमान हिये से जिनके छूटा।
पुण्य उन्होंने कौन जगत में आकर लूटा ।।.
(८)
जिसने आदर सहित गुणी को नहीं बिठाया ।
दीन प्रणाम विलोकि हाथ कुछ भी न उठाया।
मधुर वचन सुन, मधुरवचन जो कभी न बोला।
विधि ने किया अनर्थ, दिया उसको नर-चोला।।
(६)
विद्या बढ़ती नहीं जिन्हे दीनों की भाती ।
जिनकी इच्छा कुटिल आप-सुख में है माती ।।
करैं न जो स्वीकार दया अपने छोटे की।
धर्म करेंगे भला कौन ये लोग कुटेको ।
(१०)
"
अपने चारों ओर देख दुख दारुण छाया।
एक विपल भी जिन्हें दुखी का ध्यान न पाया।
जिन्हें परोदय देख कष्ट होता है भारी ।
क्या है जग को लाभ, हुए जो वे अधिकारी ॥
कामताप्रसाद 'गुरु'
६७
निज भाषा का प्रेम, धर्म-रति, देश भलाई।
होकर सब सम्पन्न जगत में जिन्हें न भाई ।।
जीम दबा कर बात जिन्होंने सदा उचारी।
ऐसे ही नर बने हुए हैं, धर्माचारी ॥
(१२)
सब धर्मा को छोड़, शील-व्रत ही अब धारो।
शील धर्म है, गिरा हुआ है इसे उबारो ॥
वीज कपट का बोय, सत्य फल कहाँ मिलेगा?
अहो । शिला पर, कहो कमल किस भाँति खिलेगा?
,
सत्यनारायण (कविरत्न )
[सत्यनारायणजी का जन्म स० १९४१ वि० में एक ब्राह्मण कुर मे हुआ
था। धाँधूपुरा(भागरा) में ब्रह्मचारी याना रघुवरदासजी ने इनका भरण पोषण
किया और इनको पढाया-लिखाया । इन्दोंने पी० ए० तक अंग्रेजी पढी थी।
कविता का शोक इन्हें छोटेरन से हीथा।ये घडे सीधे-सादे थे । नजमापा पर
इनका घडा अधिकार था। इस भाषा में इन्होंने वो कविताएँ की हैं वे बड़ी
महत्वपूर्ण हैं । भाप सडी बोली में भी अच्छी कविता कर लेते थे । 'देशभक्त
होरेशस्', 'उत्तर-रामचरित नाटक' तथा 'मालती माधव' इनके रचे मुख्य
अन्यों में से है । सत्यनारायणनी ने फुटकर कविताएँ भी बहुत लिखी हैं।
आपका कविता पढने का ढग यहुत ही उत्तम था। श्रोवा चित्र लिखे से रह
जाते थे। सेद , १६ अप्रैल सन् १६१८ ई. को सत्यनारायणजी का
देहान्त होगया।]
अपार महिमा
तिहारो को पावै प्रमु पार।
बिपुल सृष्टि नित नव विचित्र के चित्रकार आधार ॥
मकरी के सम जगत-जाल यहि,
सृजत
और विस्तारत ।
कौतुक ही में हरत ताहि पुति वेद पुरान उचारत ।।
जग में तुम श्रो, तुम में सब जग 'वासुदेव' अभिराम ।
सकल रग तन बसत आपके, याही सों घनश्याम ॥
परम-पुरुष तुम प्रकृति नटी सग, लीला रचत अपार ।
जग व्यापन सों विष्णु कहावत, श्रचरल तर अविकार ।।
.
सत्यनारायण (कविरन)
१६
जितने जात समीप, दूर अति होत जात तब ज्ञान ।
'सत्य' क्षितिज सम तरसावत नित विश्वरूप भगवान ॥
अगम थाह
को गुन अगम थाह तय पावै ।
विश्वरूप अद्भुत श्रगाध अति, अनुपम किमि कहि जावै ।।
रोम रोम ब्रह्माण्ड प्रथित रवि, अनगिन ग्रह ससि तारे
भ्रमत धुरी अपनी अपनी पै, निसि दिन न्यारे न्यारे ।।
घूमत सकल चक मण्डल में, करत निरन्तर
जोती।
इक श्राकरसन शक्ति डोरि में, मनहुँ पिरोये मोती।।
फूलभरी, मनहरी, हरी सिर, सारी रसा बिराजै ।
उडुगन रुचिर नभस्थल प्रतिकृति, प्रिय तिह मधि जनु भ्राजै ।।
काहुँ सघन घन नित नूतन तन, धावत द्रुत दरसावत ।
विद्युत दमकत तिन ललाट सों, श्रम सीकर बरसावत ॥
मदमाती रमवतो सरित कहुँ, रसनिधि अक मिलाई ।
प्रकृति रम्य पुनि तु परिवर्तन, चहुँ दिसि छवि छिटकाई ।।
होत विज्ञ बाचाल मूक लसि गति रहस्य-रस रॉची।
भगवन् । 'नेति नेति' तव कीरति, लसै अखिल जग साँची ।।
प्रार्थना
जयति जयति जननी-
श्रमल कमल दल-वासिनि, वैभवविपुल विलासिनि ।
नित नव-क्ला विकासिनि, मुद महल करनी ।।
भुवन विदित गुन रासिनि सुमधुर मञ्जुल भासिनि ।
नज जन इदयोलासिनि, श्रुति पुरान वरनी ॥
पद्य-प्रभा
1
दारिद-दुख-दल नासिनि, उर उत्साह प्रकासिनि ।
शान्ति सतत अभिलासिनि, त्रिभुवन मनहरनी ॥
उपालम्भ
माधव अब न अधिक तरसैये।
जैसी करत सदों सों आये, बुही दया दरसैये ।।
मानि लेउ, हम कूर कुढगी कपटी कुटिल गॅवार ।
कैसे असरन सरन कहो तुम जन के तारनहार ॥
तुम्हरे पछत तीन-तेरह यह देस दसा दरसावै ।
पै तुमको यहि जनम धरे की तनकहु लाज न आवै ।।
भारत तुमहिं पुकारत हमसब सुनत न त्रिभुवन राई ।
अंगुरी डारि कान में बैठे धरि ऐसी निठराई ।
अजहुँ प्रार्थना यही आप सो अपनो विरुद सँवारों ।
'सत्य'दीन दुखियन की विपता आतुर आइ निवारो॥
वसन्त
१
सौख्य-सुधा सरसाइये, सुभग, सुलभ, रसवन्त ।
वर-विनोद घरसाइये, वसुधा विपिन वसन्त ॥
दसदिसि दुति दरसाइये, सजि सुरभित सुठि साज ।
जगप्रिय हिय हरसाइये, रति रसाल ऋतुराज ॥
अमित अनारन अम्बन,
तक अपार।
परिवार ॥
वकुल कदम्ब-कदम्बन,
सत्यनारायण (कविरल )
१०१
जह कोकिल फल योलत, ठौर ठौर स्वच्छन्द ।
गुञ्जन पट्पद डोलत, पद पद पी मकरन्द ॥
५
जयति मधुर मनमोहन, अयति प्रकृति शृङ्गार ।
सुन्दर सब विधि सोहन, कीजिय विपुल विहार ।।
६
नित नव निरमल निरसौ, रमि सुरम्यता कुञ्ज ।
पुनि पुनि प्रमुदित परखौ, पूरन प्रियता पुञ्ज ।
नवयुवक-चेतावनी
देश के कोमल हृदय कुमार,
सरल सहश्यता के अवतार ।
तुम्ही हो ऋपियो की सन्तान,
आर्यनन जीवन, धन अरु प्रान,
भारती गुण गौरव अभिमान,
कीजिये मातृभूमि उद्धार |॥ १॥ देश०
प्रपल पुनि सज्जनता के सा,
प्रेम पद्माकर के प्रिय पद्म,
सदय सुन्दर मन भाँति छन,
कीजिये नवजीवन सञ्चार ॥२॥ देश०
सभ्यता के शुचि आदि स्वरूप,
मनोरञ्जन प्रतिमा के भूप,
१०२
पद्य प्रभा
।
विमल मति पावन परम अनूप,
कीजिये भ्रातृ प्रेम विस्तार ॥ ३॥ देश
लीजिये ब्रह्मचर्य का नेम,
पालिये अखिल विश्व का प्रेम,
परस्पर होवे जिस से क्षेम,
कीजिये हिन्दी सत्य' प्रचार॥४॥ देश०
→
करुणानिधि से विनती
झूमत ज्यों मतवारो मतग.
सो प्रेमकी बेलि को होय न चेरो।
शान को ऑकुम मानत ना,
मन मोह कुपथ सों जात न फेरो
'सत्य' जित ही तितै चलि जात है,
ठीक न ठाक कछू यहि केरो ।
कै करुणा करि बाँह गहो,
कि कहोकरुणानिधि नाम न मेरो।
-
मैथिलीशरण गुप्त
[ गुप्तनी का जन्म स० १९४३ वि० में चिरगाव के एक प्रतिष्ठित
चैश्य परिवार में हुमा । आपके पिता सेठ श्रीरामचरण जी भी कवि थे।
गुप्तजी ने बहुत सी कविताएँ लिखी है। हिन्दीजगत् में जितना आपका
न म प्रसिद्ध है उतना कदाचित् और किसी कवि का नही । गुप्तजी द्वारा
रचित 'भारत-भारती' ने नवयुवकों को स्वदेशमक्ति की भोर भाइष्ट करने
में बडी सहायता दी है । ऐतिहासिक विपयो पर गुप्तजी घडी सफलता
'पूर्वक काव्य-रचना करते हैं । 'नयन्द्रय-बध', 'रंग में भग', 'मेघनाद वध',
'शकुन्तला', 'स्वदेश-सगीत', 'पञ्चवटी', 'परासी का युद्ध', 'वीराङ्गना'
भादि आपकी प्रसिद्ध काव्य पुस्तकें हैं।]
स्वर्गीय संगीत
नर हो न निराश करो मनको ।
कुछ काम करो कुछ काम करो,
जग में रह के कुछ नाम करो।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को,
नर हो, न निराश करो मन को |
(२)
सँभलो कि सुयोग न जाय चला,
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला ?
१०४
पद्य-प्रभा
L
समझो जग को न निरा सपना,
पथ श्राप प्रशस्त करो अपना ।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो, न निराश करो मन को।
(३)
जल तुल्य निरन्तर शुद्ध रहो,
प्रबलानल ब्यों अनिरुद्ध रहो ।
पवनोपम सत्कृतिशील रहो,
अवनीतलवद् धृतिशील रहो ॥
कर लो नभ-सा शुचि जीवन को,
नर हो, न निराश करो मनको ।
(४)
जब है तुम मे सब तत्व यहाँ,
फिर जा सकता वह सत्व कहाँ।
तुम स्वत्व-सुधारस पान करो,
उठ के अमरत्व विधान करो ।
दव-रूप रहो भव कानन को,
नर हो, न निराश करो मन को ।।
निज गौरव का निव शान रहे,
"हम मी कुछ हैं। यह ध्यान रहे।
सप जाय अभी, पर, मान रहे,
मरणोत्तर गुजित
गान रहे
मैथिलीशरण गुप्त
१०५
कुछ हो, न तजो निज साधन को,
नर हो, न निराश करो मन को।
(६)
प्रभु ने तुम को कर दान किये,
सब वान्छित वस्तु-विधान किये।
तुम प्राप्त करो उनको न अहो ।
फिर है किसका यह दोप कहो?
समझो न अलभ्य किसी धन को,
नर हो, न निराश करो मन को ।
(७)
किस गौरव के तुम योग्य नहीं ?
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं ?
जन हो तुम भी जगदीश्वर के,
सब हैं जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को?
नर हो, न निराश करो मन को ।
(८)
करफे विधिवाद न रोद करो,
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो ।
बनता घस उद्यम ही विधि है,
मिलता जिससे सुख फा निधि है।
सममो धिक निष्क्रिय जीवन को,
नर हो, न निराश करो मन को ।
,
पद्य प्रभा
ग्राम्य जीवन
अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन बाहै।
थोड़े में निर्वाह यहाँ है, ऐसी सुविधा और कहाँ है ? ।
यहाँ शहर की बात नहीं है, अपनी अपनी बात नहीं है ।
आडम्बर का नाम नहीं है, अनाचार का काम नहीं है ।।
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भोगों में वह भक्ति नहीं है, अधिक इन्द्रियासक्ति नहीं है।
श्रालस में अनुरक्ति नहीं है, रुपयों में ही शक्ति नहीं है ।।
वह अदालती रोग नहीं है, अभियोगों का योग नहीं है।
मरे फौजदारी की नानी, दीवाना करती दीवानी ?
यहाँ गॅठकटे चोर नहीं है, तरह तरह के शोर नहीं हैं।
गुण्डों की न यहाँ घन आती, इज्जत नहीं किसी की जाती ॥
सीधे सादे भोले भाले, हैं ग्रामीण मनुष्य निराले ।
एक दूसरे की ममता है, सब में प्रेममयी समता है ।
यद्यपि वे काले हैं तन से, पर अति दी उज्ज्वल हैं मनसे ।
अपना या ईश्वर का चल है, अन्त करण अतीव सरल है ।
प्राय सम को सब विभूति है, पारस्परिक सहानुभूति है।
कुछ भी ईर्ष्या द्वेष नहा है, कहीं कपट का लेश नहीं है ।।
सब कामों में हिस्से लेकर, पति को अति सहायता देकर ।
प्राणों से भी अधिक प्यारियाँ, हैं अनी ठीक नारियाँ ।
गुदने गुदे हुए हैं वन में, भरी सरनता है चितवन में ।
थोड़े से गहने पहने हैं, क्या सब आपस में बहनें हैं ?
--
1
मैथिलीशरण गुप्त
१०७
बात भाव में पड़ने वाली, गहनों के हित लड़ने वाली।
दिखलाने वाली दुर्गतियाँ, हैं न यहाँ ऐसी श्रीमवियाँ ।
छोटे से मिट्टी के पर हैं, सिपे-पुते हैं, स्वच्छ, सुघर हैं।
गोपद चिन्दित माँगन तट हैं, रक्खे एक ओर जलमट हैं ।
स्वपरनों पर बेलें भाई, फूली फली इरी मनमाई ।
काशीफन कुष्माण्ड कहीं है, कहीं लौकिया लटक रही हैं।
है जैसा गुण यहाँ हवा में, प्राप्त नहीं डाक्टरी दवा में।
सध्या समय गाँव के बाहर, होता नन्दन-विपिन निछावर ।।
श्रमसहिष्णु सव जन होते हैं, आलस में न पडे सोते हैं।
दिन दिन भर खेतों पर रहकर, करते रहते काम निरन्तर ।।
अतिथि कहीं जब आजाता है, वह आतिथ्य यहाँ पाता है।
ठहराया जाता है ऐसे, कोई सम्बन्धी हो जैसे ॥
हुआ अभी कोई फरयादी, तो न उसे आती बरवादी।
देती याद उन्हें चौपालें, फिर क्यों वे से घर घालें ?
जगती कहीं ज्ञान की ज्योती, शिक्षा की यदि कमी न होती।
तो ये ग्राम स्वर्ग बन जाने, पूर्व शान्ति रस में सन नावे ।
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कथा-प्रसंग 'पद्य प्रमा' के अनेक पों में, कवि-महोदयों ने पौराणिक कपा-मसरें की ओर सकेत किये हैं। इन प्रसगों का यहाँ कुछ विस्तारपूर्वक स्पष्टीकरण किया जाता है। पुराणों में जो कया जिस प्रकार वर्णन की गई है, हमने उसी का सार मात्र नीचे दे दिया है। कवीर पृष्ठ २, पक्ति 'कहा विष्णु को घटि गयो, जो भृगु मारी लात' पुराणों में लिखा है कि एक बार देवताओं ने यह जानना चाहा कि प्रमा, विष्णु और महेश (महादेव) इन तीनों में सब से बड़ा कौन है। भृगुजी तीनों की परीक्षा के लिए नियुक्त किये गये। सब से प्रथम भृगुजी ब्रह्मा के पास पहुंचे और उन्हें भएड-बएड सुनाने लगे । ब्रह्माजी को भृगुजी की ऐसी बेढगी बातों से पता क्रोध आया । यहा तक कि वह उन्हें शाप देने के लिए तय्यार हो गये, परन्तु भृगुजी ने 'येन केन प्रकारेण' ब्रह्माजी को सन्तुष्ट कर लिया। इसके बाद वह महादेव के पास पहुंचे और लगे उनकी निन्दा फरने । भृगु की घातें सुन कर महादेवजी को भी पदा गुस्सा आया, उन्होंने तो उन्हें मारने के लिए उएडा तक ठा लियायस्त, भृगुजी यहाँ से पीछा छुड़ा कर विष्णु के दरबार में पहुँचे । विष्णुजी लेट रहे थे, पहले तो भृगुजी ने उन्हें गालियां दी, फिर उनके हृदय पर जोर से एक लात मारी । लात
पध-प्रमा
--
खाकर विष्णु भगवान् उठ खड़े हुए और भृगुजी से बड़े विनय
पूर्वक पूछने लगे-'भगवन् । मेरे कठोर हृदय पर प्रहार करने
के कारण आपके कोमल चरण में पोट तो नहीं लगी ?' विष्णु
भगवान् फी ऐसी सहनशीलता देखकर समस्त देवगण दग रह गये
और उन्हें ही सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। 'कहा विष्णु को घटि
गयो .... दोहे में इसीकथा-प्रसंग की भोर सकेत किया गया है।
पृष्ठ ३, पंक्ति १६
'विना वीव की स्वास से.........। मृतक की खाल से
बनाई हुई धौंकनी में हो कर निकलने वाली भाह (वायु) से
बादमी तो क्या लोहा तक भस्म हो जाता है।
पृष्ठ ४, पक्ति २२
'मीठो कहा अगार को" चकोर पक्षी के अँगार
खाने की बात प्रसिद्ध है। अंगारा नला देने वाली चीज है।न
उसमें किसी प्रकार का साद है और न पौष्टिक तत्त्व । परन्तु
चकोर उस पर इतना मुग्ध होता है कि वह उसे खाये विना
रह नहीं सकता।
पृष्ठ ५, पंक्ति ५
'कहाँ वह फद कहाँ वह पारधि: पारधि' छिपे हुए शिकारी
को कहते हैं । यहा इन पंक्तियों से कवि का श्राशय माया-मृग
मारोच के कपटपूर्ण व्यवहार से है। मारीच के कपट-मृग बनने
के कारण सीताहरण हुश्रा यह कथा प्रसिद्ध है।
पृष्ट ५ पक्ति ७
'नीच हाथ हरिचन्द बिकाने....... .., राजा हरिश्चन्द्र
ने अपने अटल सत्य के कारण प्रथम तो रानी और राजकुमार
को वेषा फिर खय आप भंगी के हाथ बिके । ये सब तो मजूर
कथा-प्रसग
किया परन्तु सत्य से कदापि विचलित न हुए । यह कथा
प्रसिद्ध है।
पृष्ठ ५, पंक्ति
'बलि पाताल घरी राजा बलि यज्ञ कर चुकने के बाद
जब १०० पॉ यज्ञ फरने लगा तो विष्णु भगवान् ने पावन
अँगुल का ब्राह्मण-शरीर धारण कर उससे तीन 'ड' जमीन
दान में माँगी । बलि ने यह दान देना मजूर कर लिया । विष्णु
भगवान् ने तीन 'पदों में तीनों लोक ले "लिए और पलि को
पावाल भेज दिया, यह प्रसिद्ध कथा है।
पृष्ठ५,
पकिन
...
राजा नृग
'कोटि गाय नित पुन्न करत नृग
बडा दानी तथा प्राह्मण भक्त था। वह प्राह्मणों को करोड़ों गौएँ
दान दे चुका था। दान मे व्यतिक्रम होने के कारण उसे प्रहाा ने
शाप दिया। जिसके कारण नृगजी को 'गिरगिट' की योनि मिली
और अन्धकूप में रहना पड़ा।
कितनी ही पुस्तकों में 'नृग' के स्थान में 'नृप पाठ
मिलता है, जो अशुद्ध है।
पृष्ठ ५, पक्ति ११
'राहु-केतु श्री मानु-चन्द्रमा" "पुराणों में लिखा
कि देववाथों के मथन करने पर जब समुद्र से अमृत निकला
और वह देवताओं में घाटा गया तो उमे राहु राक्षस भी देवता
का स्वरूप धारण कर पी गया । जय सूर्य और चन्द्रमा द्वारा यह
बात भगवान को मालूम हुई तो उन्होंने अपने घर से राहु फे
.
११२
पद्य प्रभा
।
दो टुकड़े कर दिये, जो राहु और केतु कहलाये । तप से राहु
चन्द्रमा के पीछे पडा और केतु ने सूर्य के विरुद्ध युद्ध किया।
यही भाव इन पंक्तियों में दिखाया गया है।
पृष्ठ ५, पक्ति १४
तिरगुन=सत् , रज, तम ।
सूरदास
पृष्ठ ७, पक्ति
'अष्टछाप-ब्रज के आठ महाकवि अर्थात् सूरदास,
कुंभनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविन्द
स्वामी, चतुर्भुजदास, और नन्ददास ।
पृष्ट ६, पक्ति ११-२२
'नील, स्वेत पर पीत लाल
'सनि, गुरु असुर, देवगुरुः
इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण के शरीर, वन और श्राभूपणो के
नील, स्वेत, पीत और लाल रंग की उपमा 'शनि, शुक्र (असुर
गुरु ), वृहस्पति ( देवगुरु ) और मंगल (भौम ) से दी गई है।
इन चारों का रग क्रमश नीला, सफेद पीला और लाल माना
गया है।
पृष्ठ १०-११
'अलिसुत प्रीतिकरी
'सारग प्रीतिकरी
प्रसिद्ध है कि भौंरा (अलि ) कमल से इतना अधिक प्रेम
करता है कि सन्ध्या को सूर्यास्त के समय जय कमल सकुचित
होता है तो वह स्वयम् भी उसमें मुंद जाता है।
.
कथा-प्रसंग ११३ - .. । .. को पतग इसी प्रकार हरिण (सारंग ) का गाने पर मुग्ध होना प्रसिद्ध है। यहा तक कि वह अपने शिकारी के पाणों की कुछ भी परवा न कर उसके मनोमोहक गाने-बजाने पर सारी चौकड़ी भूल जाता है। पृष्ठ ११, पक्ति १० 'ज्यों पतग हेत" "पतग के प्रेमवश दीप शिसा पर प्राण देने की वात प्रसिद्ध है। पृष्ठ १३, पति४ 'यह दपिक छन तेल इसमें मनुष्य मान कर उसके गृह की दीपक से, समय की तेल से, रुई की ली से, और वेटे की अग्नि से उपमा दी गई है। अर्थात् मनुष्य रूपी पतगे को उपर्युक्त पालकारिक दीपशिखा पर प्राण देने वाला बताया है। तुलसीदास पृष्ठ १४, पक्ति १८ 'ज्यों गच काच विलोकि सेन कई पुस्तकों में नीचे लिखा पाठ भी है-- 'ज्या गज काँच विलोकि स्वान" 'गज काँच' पाठ मानने से घडा शीशा श्रर्थ करना ठीक होगा, और 'गचकॉच' का अर्थ होगा गच अर्थात् दीवार पर लगा हुआ काँच । स्वान का अर्थ कुत्ता तथा सेन (श्येन) का अर्थ बाज है। हमारी समझ में 'ज्यों गच' वाला पाठही अधिक उचम जान पड़ता है, शेप पक्ति का अर्थ स्पष्ट है। - , M '- , ११४ पद्य-प्रमा पृष्ठ १५, पंक्ति ३ 'तजो पिता प्रहाद' भगवद्भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकशिपु का इसलिये वहिष्कार कर दिया था कि वह देवताओ को मारनेवाला तथा दुष्ट था। प्रसाद सदैव 'राम राम' जपता रहता था, भला यह बात उसके देवताद्रोही पिता को कब पसन्द आ सकती थी। पिता पुत्र की यह घोर अनबन पार- स्परिक दो विपरीत भावों की विद्यमानता के कारण थी। पुत्र हरिभक्त और पिता हरिद्रोही। 'विभीपन' के 'वन्धु' तजने और 'भरत' द्वारा 'माता' के वहिष्कृत होने की कथा प्रसिद्ध है। पृष्ठ १५, पक्ति ४ 'बाल गुरु तज्यो .." जिस समय विष्णुभगवान बावन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन पैड जमीन मांगने गये उस समय गुरु शुक्राचार्य ने उनका वास्तविक रहस्य समझ- कर अपने शिष्य बलि से कहा कि-'तू इस ब्रामण को दान मत दे, नहीं तो पीछे पछतायगा। परन्तु राजा बलि ने अपने गुरू का यह आदेश स्वीकार न किया। पृष्ट १५, पक्ति १३ 'रावकर नीर वस ..'मृगमरीचिका ( रविकर नोर ) में माया (काल) रूपी दारुण मगर छिपा हुआ है । उसके मुँह नहीं है परन्तु यह विना मुंह के हो उन मघको घट कर जाता है जो इस मृगमराचिका को जल समझ कर उससे अपनी प्याम घुमाने का प्रयत्न करते हैं। .
कथा-प्रसग
रहीम
पृष्ठ ३८, पक्कि २
'पुरुष पुरातन....' पुरुषपुरातन अर्थात् विष्णु की
खी लक्ष्मी पपला है। वह कभी कहीं और कभी कहीं रहती है।
वृद्ध की (युवती) पत्नी का इस प्रकार अस्थिर होना खामा.
विक ही है।
पृष्ठ ३६, पक्ति १४
'महये तर के गॉठि. .." विवाह मण्डप के नीचे
(मष्डयातर) वर वधू के वखों को मिला कर जो गाँठ लगाई
जाती है, उसमें सपूर्ण रूप से (आठ गाँठ) रस होता है।
'पाठ गाँठ' मुहावरा है, यथा-'आठ गाँठ कुमैत ।'
पृष्ट ४०, पक्कि १२
'जिहि रज मुनिपतनी तरी' इन्द्र के साथ व्यभिचार
करने के कारण अहल्या अपने पति गोतमजी के शाप से जगल
में पाषाण हुई पडी थी। जनकपुर जाते समय राम ने इस
पापाण-मूर्ति से कौतुक-वश अपनी लात लगादी, जिससे वह
जीती जागती फिर क्यों की त्यों अहल्या घन गई और अपने
पति गोतम के पास चली गई । रहीमजी कहते हैं, जिस रज के
स्पर्श से वह पापाण-प्रतिमा तर गई थी उसी को 'गजराज' भी
तलाश फरता फिरता है।
पृष्ठ ४०, पक्ति २०
नारायण हू को मयो " पहले कथा आ चुकी है कि
राजा बलि से तीन पैड़ जमीन माँगने के लिए विष्णु भगवान्
को वाचन श्रगुल का रूप धारण करना पड़ा था। रहीमजी
-
1 ११४ पद्य-प्रभा । - पृष्ठ १५, पंक्ति ३ 'तो पिता प्रहाद" भगवद्भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता हिरण्यकशिपु का इसलिये वहिष्कार कर दिया था कि वह देवताओं को मारनेवाला तथा दुष्ट था । प्रह्लाद सदैव 'राम राम' जपता रहता था, भला यह बात उसके देवताद्रोही पिता को कब पसन्द आ सकती थी। पिता पुत्र की यह घोर अनबन पार- सरिक दो विपरीत भावों को विद्यमानता के कारण थी। पुत्र हरिभक्त और पिता हरिद्रोही। 'विभीपन' के 'बन्धु' तजने और 'भरत' द्वारा 'माता' के वहिष्कृत होने की कथा प्रसिद्ध है। पृष्ठ १५, पक्ति ४ 'घलि तज्यो ....... जिस समय विष्णुभगवान बावन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन पैड जमीन मांगने गये उस समय गुरु शुक्राचार्य ने उनका वास्तविक रहस्य समझ कर अपने शिष्य बलि से कहा कि-'तू इस बामण को दान मत दे, नहीं तो पीछे पछतायगा।' परन्तु राजा बलि ने अपने गुरू का यह आदेश स्वीकार न किया। पृष्ट १५, पंक्ति १३ ...' मृगमरीचिका ( रविकर नोर ) में माया (फाल) रूपी दारुण मगर छिपा हुआ है । उसके मुँह नहीं है परन्तु यह विना मुँह के ही उन सबको घट फर जाता है जो इस मृगमराचिका को जल समझ कर उससे अपनी प्याम घुमाने का प्रयत्न करते हैं। 'राविकर नीर बस'
कथा प्रसग
रहीम
पृष्ठ ३८, पकि २
11
।
'पुरुष पुरातन पुरुषपुरातन अर्थात् विष्णु की
स्त्री लक्ष्मी चचला है। वह कभी कहीं और कभी कही रहती है।
वृद्ध की (युवती) पनी का इस प्रकार अस्थिर होना लाभा.
विक ही है।
पृष्ठ ३६, पक्कि १४
'मडये तर के गॉठि... ...
.." विवाह मण्डप के नीचे
(मडयातर) वर-वधू के पत्रों को मिला कर जो गाँठ लगाई
जाती है, उसमें सपूर्ण रूप से (आठ गाँठ) रस होता है ।
'पाठ गाँठ' मुहावरा है, यथा-पाठ गाँठ कुमैत ।'
पृष्ट ४०, पक्ति १२
'जिहि रज मुनिपतनी तरी' इन्द्र के साथ व्यभिचार
करने के कारण प्रहल्या अपने पति गोतमजी के शाप से जगल
में पाषाण हुई पड़ी थी। जनकपुर जाते समय राम ने इस
पापाण-मूर्ति से कौतुक-वश अपनी लात लगादी, जिससे वा
जीती जागती फिर ज्यों की त्यों अहल्या बन गई और अपने
पति गोतम के पास चली गई । रहीमजी कहते हैं, जिस रज
स्पर्श से वह पापाण-प्रतिमा तर गई थी उसी को 'गजराज'
तलाश करता फिरता है।
पृष्ठ ४०, पक्ति २०
'नारायणहू को भयो
... पहले कथा आधुकी है।
राजा बलि से तीन पेंड़ जमीन मांगने के लिए विष्णु भगवा
को पावन अगुल का रूप धारण करना पड़ा था। रहीम
. --- भगवद्भक्त प्रह्लाद ने अपने उसके मुंह नहीं है परन्तु यह विना मह के हो उन मषको चट ११४ पद्य-प्रभा पृष्ठ १५, पंक्ति ३ 'तजो पिता महाद पिता हिरण्यकशिपु का इसलिये वहिष्कार कर दिया था कि वह देवताओं को मारनेवाला तथा दुष्ट था। प्रहाद सदैव 'राम राम' जपता रहता था, भला यह बात उसके देवताद्रोही पिता को कब पसन्द था सकती थी। पिता पुत्र की यह घोर अनबन पार- सरिक दो विपरीत भावों की विद्यमानता के कारण थी। पुत्र हरिभक्त और पिता हरिद्रोही । 'विभीषन' के 'बन्धु' तजने और 'भरत' द्वारा 'माता' के वहिष्कृत होने को कथा प्रसिद्ध है। पृष्ठ १५, पक्ति४ 'चलि तज्यो ...........जिस समय विष्णुभगवान बावन का रूप धारण कर राजा बलि से तीन पैड जमीन माँगने गये उस समय गुरु शुक्राचार्य ने उनका वास्तविक रहस्य समझ कर अपने शिष्य बलि से कहा कि-'तू इस बामण को दान मव दे नहीं तो पीछे पछतायगा।' परन्तु राजा बलि ने अपने गुरू का यह आदेश स्वीकार न किया। पृष्ठ १५, पक्ति १३ .... मृगमरीचिका ( रविकर नौर ) में माया (काल) रूपी दारुण मगर छिपा हुआ है । फर जाता है जो इस मृगमराचिका को जल समझ कर उससे अपनी प्याम घुमाने का प्रश्न फरते हैं। - 'रावकर नीर यस
फथा-प्रसंग
११७
पृष्ठ ४२, पक्ति १८
'प्यादे से फरजी भयो.. ....'शतरज के खेलने वाले
जानते हैं कि प्यादे और फरजी ( वजीर) शतरज के मुहरे होते
हैं। प्यादा सदैव सीधा चलता है और फरजी उल्टा-सीधा सब
तरफ को कुलाचे मारता है। रहीमजी कहते हैं कि अगर प्यादा
फरजी बनजाता है तो वह अपनी सीधी चाल छोड़ कर, क्षुद्रता
वश, इतराता हुआ टेढा-टेढा चलने लगता है अर्थात् वह
दुरभिमान से पूर्ण हो जाता है।
रसखान
पृष्ठ ४४, पक्ति १०
'पाहन हों तो वहीं गिरिको 'पुराणों में लिखा
है कि पहले समय में ब्रज में वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद
के श्रारम्भ में इन्द्र की पूजा हुआ करती थी, परन्तु श्रीकृष्ण ने
इस पूजा को व्यर्थ कह कर वन्द करा दिया और गोपियों तथा
ग्वालों से कहा कि गोवर्धन पर्वत की पूजा किया करो, सब ने
ऐसा ही किया । इससे इन्द्रजी बडे अप्रसन्न हुए और ब्रज पर
मूसलाधार वृष्टि करने लगे। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपने
हाथ से उठा कर ब्रज पर उसे छतरी की तरह तान लिया, जिससे
इन्द्र की मूसलाधार वृष्टि से रक्षा हो सकी। इस पक्ति मेरससान
जी ने इसी पर्वत का 'पाहन' बनने की ओर सकेत किया है।
....
:
पृष्ठ ४४ पक्कि १४
'आठों सिदि-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा,
प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ।
'नवानिषि'-महापद्म, पा, शहा, मकर,कच्छप, मुकुन्द,
कुन्द, नील और खर्व।
११६
पद्य-प्रमा
कहते हैं कि माँगना इतना बुरा काम है कि उसमें बड़ो को भी,
छोटा पन कर ही सफलता प्राप्त होती है अर्थात् उन्हें भी लघुता।
या क्षुद्रता धारण करनी पड़ती है।
पृष्ठ ४१, पंक्ति ७-१०
'फदली सीप
भुजग' "
'जैसी सगति वैठिये......' जैसी सोहबत होती है वैसा
ही असर होता है। कहते हैं कि एक ही खाँति की बूंद केले में
पड़कर फपूर, सीपी में मोती और सर्प-मुख में पड कर विष
चन जाती है।
पृष्ठ ४२, पक्ति४
'कहा सुदामा वापुरो'. ...' कृष्ण-सखा सुदामा की कथा
प्रसिद्ध है कि वह अपनी दीनावस्था में किस प्रकार द्वारकापुरी
गये और वहाँ उनका श्रीकृष्णचन्द्र ने कैसा स्वागत-सत्कार
किया तथा किस प्रकार उन्हें सम्पन्न बनाया।
पृष्ठ ४२, पक्ति
'हरि हाथी सा कब हती......किसी समय एक हाथी
समुद्र में किलोल कर रहा था कि इतने ही में उसे एक भयकर
मगर ने आ घाया । श्रप मृत्यून्मुख हाथी ने सर्वथा असहाय
होकर भगवान् का स्मरण किया । भगवान् उसी समय वहाँ
प्रकट हुए और उन्होंने उस ग्राह से गज का उद्धार किया ।
रहीमजी पूछते हैं कि क्या कमी हरि और हाथी का पूर्व परिचय
था ? नहीं, भगवान् तो स्वभावत ही अपने भक्तों का कष्ट-मोचन
किया करते हैं।
1
क्या-प्रसग
११७
पृष्ठ ४२, पंक्ति १८
'प्यादे से फरजी भयो
शतरज के खेलने वाले
जानते हैं कि प्यादे और फरजी ( वजीर) शतरज के मुहरे होवे
हैं। प्यादा सदैव सीधा चलता है और फरजो उल्टा-सीधा सब
तरफ को कुलाचें मारता है । रहीमजी कहते हैं कि अगर प्यादा
करजी बनजाता है तो वह अपनी सीधी चाल छोड़ कर, जुद्रता
वश, इतराता हुआ टेढा-टेदा चलने लगता है अर्थात् वह
दुरभिमान से पूर्ण हो जाता है।
रसखान
पृष्ठ ४४, पक्ति १०
'पाहन हों तो वहीं गिरिको ........ पुराणों में लिसा
है कि पहले समय में ब्रज में वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद
के प्रारम्भ में इन्द्र की पूजा हुआ करती थी, परन्तु श्रीकृष्ण ने
इस पूजा को व्यर्थ कह कर वन्द करा दिया और गोपियों तथा
ग्वालों से कहा कि गोवद्धन पर्वत की पूजा किया करो, सब ने
ऐमा ही किया। इससे इन्द्रजी बडे अप्रसन्न हुए और ब्रज पर
मूसलाधार वृष्टि करने लगे। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपने
हाथ से उठा कर व्रज पर उसे छतरी की तरह तान लिया, जिससे
इन्द्र की मूसलाधार वृष्टि से रक्षा हो सकी। इस पकि मेरसखान
जी ने इसी पर्वत का 'पाहन' पनने की ओर सकेत किया है।
पृष्ठ ४४ पक्ति १४
'आठों सिद्धि'-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा,
प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ।
'नवौनिधि -महापा, पद्म, शद्ध, मकर,कच्छप, मुकुन्द,
कुन्द, नील और सर्व।
,
११६
पद्य-प्रमा
कहते हैं कि माँगना इसना धुरा काम है कि उसमें बड़ों को भीड
छोटा पन कर ही सफलता प्राप्त होती है अर्थात् उन्हें भी लघुता।
या क्षुद्रता धारण करनी पड़ती है।
पृष्ठ ४१, पक्ति ७-१०
...
'कदली सीप भुजग"
'जैसी सगति बैठिये...... जैसी सोहबत होती है वैसा
ही असर होता है। कहते हैं कि एक ही स्वाति की बूंद केले में
पडकर फपूर, सीपी में मोती और सर्प-मुख में पड़ कर विष
बन जाती है।
पृष्ठ ४२, पक्ति४
'कहा सुदामा वापुरो...' कृष्ण-सखा सुदामा की कथा
प्रसिद्ध है कि वह अपनी दीनावस्था में किस प्रकार द्वारकापुरी
गये और वहाँ उनका श्रीकृष्णचन्द्र ने कैसा स्वागत-सत्कार
किया तथा किस प्रकार उन्हें सम्पन्न बनाया।
पृष्ठ ४२, पक्ति६
'हरि हार्थी सो कब हती... • ' किसी समय एक हाथी
समुद्र में किलोल कर रहा था कि इतने ही में उसे एक भयकर
मगर ने था दवाया | अघ मृत्यून्मुस हाथी ने सर्वथा असहाय
होकर भगवान् का स्मरण किया । भगवान् उसी समय वहाँ
प्रकट हुए और उन्होंने उस माह से गज का उद्धार किया।
रहीमजी पूछते हैं कि क्या कमी हरि और हाथी का पूर्व परिचय
था? नहीं, भगवान तो स्वभावत ही अपने भक्तों का कष्ट-मोचन
किया करते हैं।
कथा प्रसंग
११७
पृष्ठ ४२, पंक्कि १८
'प्यादे से फरजी भयो.......... शतरंज के खेलने वाले
जानते हैं कि प्यादे और फरजी (घजीर) शतरज के मुहरे होते
हैं। प्यादा सदैव सीधा चलता है और फरजी उल्टा-सीधा सब
तरफ को कुलाचें मारता है। रहीमजी कहते हैं कि अगर प्यादा
फरजी बनजाता है तो वह अपनी सीधी चाल छोड़ कर, क्षुद्रता
वश, इतराता हुआ टेढा टेढा चलने लगता है अर्थात् वह
दुरभिमान से पूर्ण हो जाता है।
रसखान
पृष्ठ ४४, पक्ति १०
'पाहन हों तो वहीं गिरिको......
पुराणों में लिखा
है कि पहले समय में ब्रज में वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद
के प्रारम्भ में इन्द्र की पूजा हुश्रा करती थी, परन्तु श्रीकृष्ण ने
इस पूजा को व्यर्थ कह कर बन्द करा दिया और गोपियों तथा
ग्वालों से कहा कि गोवर्धन पर्वत की पूजा किया करो, सब ने
ऐसा ही किया। इससे इन्द्रजी बडे अप्रसन्न हुए और ब्रज पर
मूसलाधार वृष्टि करने लगे। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपने
हाथ से उठा कर ब्रज पर उसे छतरी की तरह तान लिया, जिससे
इन्द्र की मूसलाधार वृष्टि से रक्षा हो सकी। इस पक्ति में रससान
जी ने इसी पर्वत का 'पाहन' बनने की ओर सकेत किया है।
पृष्ठ ४४ पक्ति १४
'आठों सिदि'-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा,
प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ।
'नवनिधि
-महापद्म, पद्म, शक, मकर,कच्छप, मुकुन्द,
कुन्द, नील और खर्व।
।
पद्य-प्रमा
पृष्ठ ४५, पंक्ति २
'ताहि अहीर की छोहरिमा-इस पद में गोपियों की
ओर सकेत विना गया है।
पृष्ठ ४६, पंक्ति १-२
'द्रोपदी को गनिका गज गाँध.............
'गोतम गेडिनी कैसी तरी............' इन पक्तियों में पुरा-
णोक्त जिन कमानों की ओर सकेत है उनका साराश नीचे
दिया जाता है-
'द्रौपदी-युधिष्ठिर ने जुए में राजपाट हार कर द्रौपदी
को भी दाव पर लगा दिया था। दुर्योधन ने द्रौपदी को भी जीत
लिया और सभा में बुलाकर उसे नगा करना चाहा । दुष्ट दुःशाः
सन जब द्रौपदी की साड़ी खींचने लगा और पानों पाण्डव देखते
रहे तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को पुकारा । फिर क्या था, श्रीकृष्ण
के प्रताप से साडी इतनी बढ़ गई कि दुःशासन उसे खींचते-
खींचते थक गया, परन्तु उसका अन्त न आया।
'गनिका'-काशी में एक वेश्या रहती थी, वह अपने
पालतू तोते को 'राम-राम' रटामा करती थी। जन वह मरी वो
उसे यमदूत और स्वर्गदूत दोनों लेने आये। स्वर्गदूतो ने कहा
कि यह वेश्या जन्म भर 'रामराम रटती रही है अतएव स्वर्ग
जानी चाहिये। बस वह 'राम-नाम के प्रभाव से स्वर्ग:
वासिनी हुई।
'गज'-विष्णु भगवान द्वारा गज के उद्धार की बात
पढ़ते ही लिखी जा चुकी है।
कथा प्रसंग 'गी'-श्रीरामचन्द्र द्वारा गृध्रराज जटायु के उद्धार की कथा प्रसिद्ध है, गमायण पढने वाले सब लोग उसे जानते हैं। 'अजामिल'---अजामिल नामक एक दुष्ट ब्राहाण था, उसने अपने जीवन में कभी कोई अच्छा काम नहीं किया। अजामिन का नारायणा नामक एक लडका भी था । मरते समय अजामिन की सारी वासना अपने पुत्र में ही रही और वह अन्तिम श्वास तक 'नारायण' 'नारायण' पुकारता रहा । परि- णाम यह हुआ कि अन्त समय में 'नारायण' का नाम लेने के कारण उसे नारायण लोक में स्थान मिला। 'गोतम-गेहिनी' =अहल्या--यह कथा पहिले ही लिखी जा चुकी है। 'प्रहाद'हिरण्यकशिपु का भगवद्गत पुत्र था। राव- दिन राम की रटना लगाये रहता था। हिरण्यकशिपु को राम का नाम बहुत चुरा लगता था। उसने अपने बेटे को बहुतेरा समझाया धुमाया परन्तु वह न माना और बराबर राम का जाप करता रहा । एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को सम्भे से चाँध दिया और नगी तलवार दिखाकर कहा-'ले, अब तेरा काम तमाम करता हूँ ॥ कहाँ है तेरा राम ? चुनाले उसे रक्षा के लिये प्रहाद के स्मरण करते ही नृसिंहावतार के रूप में भगवान् प्रकट हुए और उन्होंने हिरण्यकशिपु का पेट फाड़कर उसका काम तमाम किया। विहारीलाल पृष्ठ ४७, पंक्ति १० "विहारीलालजी मे यहा व्यग्यमयी भाग में मीठा मजाक किया है। राधा और कृष्णा की को घटि ये वृषभानुजा" ..
१२० पद्य प्रमा ओर सकेत फरके श्राप कहते हैं कि इन दोनों में धनिष्ठता होनी ही चाहिये । क्योंकि राधिका वृपभ+ अनुजा अर्थात् वैल की बहिन हैं । और वे (कृष्णजी) हलघर (बैल) के वीर (भाई) है। यहाँ विहारीलालजी ने वृपभानुजा और हलधर के अयों को अपने काव्यचातुर्य से बिल्कुल घदल दिया है। वास्तव में वृष मानु+जा से वृषभानु की पुत्री राधा और हलधर से कृष्ण के भाई बलराम से अभिप्राय है। यह कविता का अद्भुत चम- स्कार है। वृन्द पृष्ठ ५४, पक्ति १६ 'राजहस दिन को करै........ प्रसिद्ध है कि राजहंस अपनी चोच द्वारा, मिले हुए दूध और पानी को, अलग अलग कर देता है। यही क्षीर नीर न्याय' कहलाता है। Printed by Satya Vrat Sharma at the Shanti Press, 'Agra.
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