Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Shatpath Vaidik Vigyansambndhi Traimasik Patra
Front matter
विषयसूची- (१) स मामण (दृष्टिविमानात्मक) (२) प्रयामामण (धषितानास्मक) प्रारम्भिक निवेदन माननीय महोदय जगमग ३ वर्ष भनम्तर 'शवपथ-पिठानमाप्य' (त्रैमासिक ) सेवा में उपस्थित हो साहजैसाधि, 'शवपनपनापत्र' में निपवन कर दिया गया था- 'शतपय क पप्रमबर्ष का प्रारम्म भापस पूर्णिमा, यि सं १८ से हुभा था। पसमय उस प्रथम त्रैमासिक पा के प्रमन्तर फार्षिक पूर्णिमा १ को कम प्राप्त पालमपीय र मह मफाशिव हुमा। मनन्तर एक समस्याओं के कारण पद प्रकारान अवस्य रोगया। अब परिगरिपत नबीम सहयोगियों की प्रेरणा म भारिवमशुषल पूणिमा वि० सं० २००३ स सतपय का पुन' प्रकाशन प्रारम्भ हुभा वापिक-मबम्पा अनुरूपता हित प्रस्तुत मह वप का ३ अ मान लिया गया । यो महानुमाव पूर्वप्रकाशित पत्रमयपीय दोनों (१,०) पोंक साप पारस पमना पाहग, उनै प्रस्तुत उन दामों महकमाव प्रस्तुत १३ वर्षक २पर चार प्राप्त हो मी | पंजा प्रस्तुत पद मदी प्राइफ पर्नेग, मोइम मर माप प्रगम दीम म प्राप्त दासग। जैसा पारा प्राप्त होगा, म्यबाद जापगी। मारी अपनी भारया स प्रारक बनन वालों को पनमवीय पनों पूर्व- भन मी गंगान पाहिए, जिन का मूल्य ४) र । गत घट, प्यं परमवीय दोनों पहले का पापिगुम्क),दाम्पय एयफ। हमें विश्वामा अनुपादक महोदय पपना सहयोग प्रदान कर भापरिनि फगरण में प्रयानशीन बनन का अनुमान करेंग- पिन:- माम शतपथ जयपुर, पारिवमगुक्त-पूर्णिमा २००७ [ माग Z वेदसूक्तिसंस्मरणाम 'अपिफिस्पाणिकितपश्चिात्र कपीन् पामि विभने न विद्वान् । वि यासातम्म परिमा रमाम्यवस्पकप किमपि स्पिदेफम " -अफ्संहिता म० । १६४ सू०।। मन "भचिकित्साम (भाई), पत्र, पित, पिकिनुपः, चीन, विपन, पप्यामि न, विधान । य प्रपद्इमा (नि) रजोसि बि, वस्तम्भ, अमम्प पि, दिम, अपि, स्विम् पथम" (इत्पन्बया) सर्प इस पिपप में मार बानकारी न रमता हुमा (मैं । इस विषय में मानकारी रमन पाम (मानकारों) पियों स (इसपिपप में ) मानकारी प्राप्त परने पतिप ( मस्तुन भिति में पूछया हूँ। (बमें कि मैं स्वयं इस स्थिति का) माता नी । (प्रश्न मेरा यह कि) जिस ने इन रिमों (मोने) को (अपने नियन्त्रणपारा में पावर कर यमाधान ) म्तम्भ कर रस्या, (ग्म) प्रम (अपि मारी तस्व) के पाप क सम्पम्भ में ( उसक उम) विमी (दुर्विजय ) एक (माय) का (से में मानना पाहना है) ।(इनि मूमानुपा) उर्ममूल प्रवाशा मनातन परपन्यायमूर्ति, मामापापरिछप मारी मापर ६ म म्परारीररूप अभयार की पर मदन (१.०) पाशा (शनियों) मानी गा। प्रस्पर पम्शा पर पड समन्त्र विधिमकामपा- नामदावर स मम्पर पता हुमा 'उपरवर' प्रलापा है। उपवर शासन म मनुशामिन प्रत्येक माणा में स्वयम्भू परमष्ठा, पूर्य, पन्द्रमा, प्रपिषी, प .
म पाच पोर पुरीर (पर्व-पोर)। भवएष विश्वात्मिका यह एक मासा (क यमी) विज्ञानमापा में ~ 'पत्रपुण्डोरामभापत्यपरक्षा' नाम में बात हुई है। पाच पुण्डीरवाली इस बल्ला में भा, भवा, स्वः,माः,महः, जनम्,सपा,सत्यम्'ये मात लोक है। सुप्रसिद्ध पिवी 'भूलोक है। सूर्यास्मक गोल स्वर्णोच है, एवं प्रथिवी और सूर्य के मम्प का चाम् अन्तरित 'मुवो। परमेष्ठीयुक्त भापोम- पलोक 'अनमोक' है, एवं सूर्य और परमेष्ठी के मध्य का लोक 'महो । म्य- म्म युक्त प्रासमप लोक 'सस्पोक' है, वं परमठी और स्वयम्भू : मप्य फा लोक 'तपोतोक' है। जैसा कि परिक्षा स स्प- १-मायम्भू (.)-मत्पम (६)-प 3-स्वयम्भू (१) -नमन्बामसमुद्र ३--परमप्टी- (५)प्रनत -परमठी (३) 3-पुापन्द्रमसौ ( ३ ) -सरस्वानसमुर (५) मा --सूप्प ३)-स ६-प्रणेवसमुद्र -प्रपदी- (१)-म्' पिवी (५) Tसातों में भू-मुग-स-मा-अमन नप, सभा गविसील दान म एमाभावात्मक है। भवएप में रजासि का गला। माता माम सपम्म स्पिनिमारक कारण गोधर्म म अमर राना दुप्रा 'पराग्गा नाम म प्रसिर इमी मावरे सत्पम्वयम्भूरूप परारमा प्रमावि र मूत्र-निविप पारा गा गौ सम्मम्प है। सामन्य न मी पराग्यातस्व की भीर माग भ्यान पापित पियानम अपिणारेशानिमाम्या यबाबमा श्री मारगी।
। - न म मानाया है। मतिफलिताइस गामन वेत्र में पार्थिव पति,पान्तरित्यपायु, पार्थिव ममात्रा, पीनों मविस्ति दोधाताह भएपमा प्राप्तकवादकि, पार्मिपाणि- मुफ पामुसयोग से रश्मिरूम मादीमार्गद्वारा पार्थिवावलमात्रा पुलोक की भोर था पहा । इसीरटिस रश्मि की चपेपमा माविल्याबाप!पुष्टि 'या जासकता पार्यिबाम्पपेच्या प्रति वो पिमुदीरपति' मा बा सकवार।एवं प्रान्तरिय वाप्वपत्तया 'पायुर्वे पापा श' यह कहा जा सकता है। दोनों ही वचन सत्तरपेक्ष्या सुसमन्वित । मादी (ररिम) अभिप्राणमुक्त वायु से सम्पर इसी- पष्टिविज्ञान का स्पष्टीकरण करते हुए मारा मौविक विधानशाम कहता है- "नाध्यो पायुसंवोगावरोहणम् (भपाम् )। नोदनापीडनात् संयुक्तसपोगा" (रोपिकरान-म)। 'नायो मायुसंयोगात् गरोहित पारि गल स सम्बन्ध रमन बाली प्रिविणा के गमन, स्थिति पण, प दीन अभिकरण माने मा सकते है। पार्टी से पानी आकर यहाँ पापा, यही पहिला गमन अधिकरण है, जिसे 'गर्माभानकान' कहा जामश्वा है। यहां पहुंच पर पानी निपत ममय पर्यन्त पुलोकस्य वायुपरा वक्ष पर टयर गया, पही दूसरा स्पिस्यपिकरण र निमे वोहरकामा बासमता है। नियस समयानन्तर पानी पुन' बरस पड़ता है, यही पीसरा वर्पयापिकरण है, शिस 'प्रमवकास' या मासस्या है। इस प्रकार गर्म, दोदर, प्रसर्व, मेद से यह पृष्टिकम्म त्रिपवा बन रहा है। पूर्वोत्ता शमन्त्रायी सएिकम्म फनी वीनों पों का पीकरण हुआ है, जिसकताविक समय के लिये पगात से समन्म रम्यने वाली य एक बामपरिमापाभों का सटीकरण अपेक्षित होगा। स्मा सपना ही पार्थिवामि-रश्मियाँ ऊपर की भोरवासी एती है। वायु भी सादी प्रवाहित है । फलस्वरूप पार्थिवरम मात्रामों का भी सहारी मर्चगमन सिद्ध राभार इसीपि से यह मीसा भासम्हाधिमे जनमात्रा का गमन नि- फ्सर होता रहता . यमर गुल से उसका पागमन मी निरन्मदीदाता रहता दस मिस्प गमनागमन पण प्रिया सही पायर्या' नामक मैपम्पपा का खाप निम्माण हुमा । प्रात में हमें विपार स रष्टि कर्मकारना, जिसका मारतोर पिपरस्त,RA, भविमन, मेरो मायाम मि समय सतरण, सय तिर पो मा रिमाला प्रो. मम या बाणिसावम्मिम ६व्य m. पप गा. मार लिया। - पापथ परमातुमूर्ति सम्बस्सर (वर्ष) के एक प्रत विरोपः (भारत) में भोग हुभा पखा है। वर्षात्र में पुरोकरम मेषों से मो अस परमवा है, उसी के सम्बन्ध में पा बानना है कि कप पो या पानी मूपिस सेम्पर.गया ?, कमविष्टिवाभा ।, फसवक प्रतिष्ठित या!, एवं च परस पक्षावात्पर्य पारदकि, हमें सुप्रसिद्ध वर्षों पतु से सम्बन्ध रखने वाले बाबा केही गर्म-पोहर-प्रसबमाषों की मीमांसा भिपेचित है। - . - -- - । चतुर्मासात्मक शीवकास गर्माया, पतुमासात्मक, प्रीप्मकाल दोहरकाश, पर्व पसुम्मासात्मक पकात प्रसबकास माना गया है। मार्गशीर्ष से पारम्म पर फाल्गुन पर्भम्त पारि अलमात्रा का पुशोक में गर्भाधान होता है। पत्र से प्रारम्म करमापार पर्यन्त गम का पोपण होता है, एवं भाषण स पारम्म र कार्तिक पर्यन्त वर्षा की प्रस्ति होती है । खगोलीय अवरोहिणी, मामी 'निश्चति, आरि नामों से प्रसिद्ध, मिकराशि में मुक्त म्येष्ठा नहर मार्गशीर्ष की अमावास्या से सम्पर है। पेष्ठानपत्रानुगवा मागशीर्ष कृष्णामावास्या की गर्भकाल का उपक्रम माना गमा । एवमेव म्पोम्मास की पूर्णिमा क साब मी म्पे-नात्र का सम्पम्प । यही पूर्णिमा प्रसवकाल का उपक्रम माना गया है। इस सम्बन्ध में इष्टिविणा- पाप्पोको परीषण हुप, मानिक रितिक वारसम्म सर समी प्रामाणिक ६। मूल मा तराय म मा सूर्य का मोग होता है, तो गर्मकान भारम्म होता है। एवं भावानाप्रमुख सूर्य प्रसपकाका उपम बनता है। सूर्य की म्बनपत्रमुल पोप मास में, एवं पादमिकत्रमुठिापार मास में वा । इस रमिकोण स पाप गम का भापार पम्प का उपाध्म बन मावा । एक पम्प एरिकोस रे भनुमार सूपापिहायनामुगत पात गम का एवं सूपाचरायणानुगत पाव प्रसब उपक्रम । मूल, पूषापार, उत्तरापार, पभिविन्, भवन, पनिष्ठा, वभिपर, पूर्वमा पर ग्तरभाद्रपर, रेवती अश्विनी, भरणी पे मन थाम माम के सहयोगी बनत हुए गम सन्त्रक बनत । पार्दा, पुनर्भस, पुष्प, पत्नपा, मपा पूर्वफम्गुनी उत्तरफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, बासी, पिशासा, ५ ११मात्र सीर भनि , महयोगी मन हुए प्रसव के प्रपचक बनन । पम्रपार जहां गम श्री मूमप्रतिष्ठा पा सूप्यपार प्रसव की मूलप्रविष्ठा मामा गया रामागुणक मधेच धम्मा पासोम पानि समात्रा का बह-संबरण कर उस बिविमाप प्रदान परता, बोगुणक विकासपम्मा सौर मि मात्रा का पनाता है। निम्न लिखित पातबचन इसी सिद्धान्त का स्पष्टीकरण करणा- 1 TET प पोपे मूसमरपन्त पन्द्रपारण गर्मति । मादितो विशाखाले अध्यधारेण वर्षति । मोगुम्मणीव कादम्विनी (पष्टिविया) 11 । नियत मावधिक काम में प्रदेश से शिस दिन बलमात्रा सूर्यरश्मि, पाम, । अम्नि, मोग से उवहान्त हाती है, उस दिन से प्रारम्भ कर ठीक ६ महीना १५ । दिन (इन १५ दिन ) पर्यन्त पर यममात्रा पुलोर्क में प्रतिष्ठित राधी है। ठीक १६६ दिन उस प्रसव रोगवा है, पानी बरस पाया है। भवएप इस १४५ रिनास्मक गर्मस्थितिकात लिए सप्तादेगा' मा बासकवा है । सात महीने का भाषा, भोंद १५ दिन, भौर पूरे ६ मास, स १६६ दिन, सप्ताय गर्मा का यही निष्कर्ष है। इस समय में अब विशेपवर्म और भान मेन पाहिए। जिस दिन गमापान रोपा, उम दिन यदि पूर्वरिशा में गमापान,वो १६५ दिन पमिम दिशा स मप सपि करतापदि पमिम में गर्माधान रोगा दो पूर्व की भार से पष्टि होगी । पप्रमेव पपिपदिशामें गर्म है, वो रत्तर से, उघरमें गम में, वो पणिसे पूणि होम । बदि दिन में गर्मापाम है, वो पत्रि में यदि रात्रि में गमापान , वोरिन में गति होगी । सप्रकार गर्मायामानुगवा रिकाल से सर्वना विपरीत विसालमें गर्म का प्रसव दागा । इस पर्पका कारण स्प है। माम रे मनन्तर एस- स्थिति र अनुसार प्राकाराप्रपरा में विपप्प पाजावा है। निप्प यही है कि जिस दिन, मिम पच,निम दिशा में गमापान होता है । मास: मनन्तर भी पाकाराक सी पररा-कालमें गर्मस्पिति यती । समापि पाविपरिभ्रमणानुगत उत्तर- दक्षिणामन मेरस विमिम बनी इमारी शिविपर्यय का कारण बन गावी । पो सममिपति, शुक्सपर में गर्भाधान एमा! रीका मामानन्तर पानी को सी पाकारामाश में रहगा प्रिम परेरा में ॥ मास पूर्व मिषी स गापा । परन्तु अपन-मव स प्राकारा का ही प्रय, जो !! मास पूष शुक्मपप का अनुगामा पा || मामानम्मर कृष्णपक्षानुगामी बन गायगा । पाहीम्पयस्मा महाराज, पर-पधिमादि रिशापा मम्मम्ध में सममिस । प्रारा विषमी (पिभित) मही । परिश्रमणामुगता का विमर रिककान के मेद का पारण निम दिन गमागम होता है, म दिन गुजोक में चिराप परिस्थिति उत्पम, रोमामो निमित्त गमागना परिपापा पनवार शीतया पोपभ्र वित गाम, मारिरी गमापान के परिपापमान परिषर-पिता परियान पिया पनि अमुक विशा में अमुक माप्त कीमिए, विष्-शताल-भावि को ठीक-ठीक लाइस बना बीथिए । अमुक रिन से ठीक १६६ ३ दिन अमुक पक्ष, भयुफ दिन,, मात्रा से पानी परसेगा । इस सम्मम्म' में परम्मान रखिए कि, यदि गर्मपावक, निरोभर, शनि मंगल पाम्पादि-प्रतिवमा सूर्य और चन्द्रमाके मम्पमें प्रामागे, वो परिस्मिति मनुसार कालान्तरमें (जोकि कास गमिसानुसार सर्वमा म्मपस्थित आमा वा गर्मपान रोपापगा, मावा तो पर चल मम कर-पापा बन गागा । फलतः १५६२ दिन,ष्टि न होगी। यदि गमपात होगमा, वस्ती फोडापाव शेप यही नहीं बाठी । पवि गमपात,महीं है, गर्मनिरोप है, ता-कान्तर में करकापाव होगा। परीणमा हुमा पानी परका(मोमे) पावहै । इम मकार,गर्मामानमा, गभपात, गर्म निरोम, भावि निमिचों का सम्पमणिान पास परफापति का बोसमप बनाया जायगावा प्रति का भरस विधान माना बागा, मिस श्रीपारामयों में अपना सर्वस सोरिमा है। पापपर्पा समाप्त हुई, अब मन्त्रार्थ की भोर पाठकों पप्पान मार्पित किया जाता है। सागगर्मा इस्पापि मात्र का मारा है- सोकसर्ग के रेवोमूत गम मताय गर्मा अप से विषा भाडाय) विमिन्म दिए मरा मे प्रतिष्ठित होते हैं। मगर्भ धीमावों, या मानसमारों से विभिभाष से सर्वत्र म्याप्त होगा। पर'लोकपपम्म, इम पार पाधत सर्गों की प्राचि'मरा प्रामुख पापोमु, पारमन्य प्रमगर्मित पम्नारमुख, 'इम 'पार मुन्नों स मानी गई है। प्राणादि प्रतिमा अमरपार मुप । मासे मुष्टिचतुपुयी विकासमा है। 'लोकामु प्रतिष्ठिता-'सबमापोमब अंगत्' इत्यारि" अमुसार अपात्र हो कामपि का मूलप्रवर्तक माना गया है। यही लोकसग'को भारम्मका अक्षम्य पीन मुक्न बनम रुपम भाप को मुंबन (मोर) नाम स मी म्पपात किया माता । अपृतस्य भुवन का पारम्भर है, प्रतण्य इस अवरमा 'भुवनस्य रत' या 'मासम्मा ६। पाभिव भुवन की रसामूना उत्तमात्रा अम्निायुसहयोगिनी सूप्परिमपी सारा पारोदिच हाती । भागदेवा जगता समाप्रा सौरश्मियों में || गदीना गीमूना राती गर्मीमूना जलमात्रा में प्रतिक्षित सती ६। पापरा परमी परमही विषणु प्रामरी पन्तिम सीमा 'म्योम' पलाइ, यदी 'विष्णुपर नाम सम्पमाल हुमा। अम्तिम मीमा, भ्रममारा पही नाम्प विशुमान है। उत्तर बानुगत माम्प विष्णुपर ही भाफारा का पतम ग्मान माना गया।मी विष्णुपर लिए या गावा- - - म.म्मान 141 - तहिष्णाः परम पद सदा पम्पन्ति सूरयः । दिवाष पारततम् । प्रारम० १२२२२२० । विस प्रकार पन्द्रमा प्रकार के प्रापार पर मपिरा के चारों भोर पूमता ६, भूपिणकान्तिपृच माधार पर सूप के चारों भोर, सूप्यपिना स्वास्मात्त के पापार पर परमष्ठी पायें मोर, परमेष्ठी प्राणवृत प्रापार पर म्वपम्म के पायें पोर परिक्रमा लगाता यता, पवमेव उच्चराप माकस विष्णुपद के चारों भोर परिक्रमा लगाया करता है। ध्रुबकी पर परिक्रमा २५००० वर्षों में समाप्त होती है। जिस प्रकार विप्वचीय पृष्ठीकेन्द्र सुप है, पवमेव कान्तिपूचीय पटीनेन्द्र पाही कर म्य (विष्णुपद) । व विश्वयुच्च का फल है, वो काम कान्तिच का पेन्द्र है। विच, और क्रान्तिश्च में २५ अंश का अन्तर है। वही अन्तर भुष, भौर फारम्पत्ति नाफम्प विष्णु का है। २५ अंशक व्यासास के परिसर का यो ज्वराकाशानुगत प्रदेश र पही विष्णुपद है। इसकम में प्रसिटिव पार- मष्ठ्य प्राण ही-यो अपने प्राणधर्म से सर्वया प्रमूच है -विष्णु है। इस विष्णु का प्राश ही उपराकारा प्रदाह । यहीं सक्रान्त अममात्रा गर्मीमूत गती है। वैसा कि यसलाया गया है, भूपरिभ्रमण के कारण सप्ताद गर्मा रश्मियों, किंवा वर पा पाप-गीमान-स्थिति के टीक विपर्णय से परसती है। इसी विपर्यायमाव का- 'प्रदिशा विचम्मरिस' वाक्य से स्पष्टीकरण हुमा है। गम्प्रधान होता है पाद्रमा के सहयोग से, प्रसव होता है सूर्य के सहयोग से, जैसा कि-धमधारण गर्भति, सूर्यपारेण वर्पति' रूप से पूर्व में स्पष्ट किया वायुका है। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिये कि, पत्रमा क द्वारा गमापान झवा एक ही दिन में, परम्सु सम्मानुगत प्रमबकाल १५ दिवमों में विभक है । मन्त्रोपाच 'मनसा' शर पनपारानुगत गर्मागान का मुपक है, एवं पीविमि' सूर्यमापनुगत प्रमयाम्म का सूपम् । कारण म्पा । पानमोम मनोमय मोर पनि पीस- पम है। मनका पन्द्रमा म पुरिफा प्य से सम्पन्प है। मनमा (पादसामेन)पा पमाण गर्म पीवियों (माररश्मियों ) पार मेहता प्रमूत रोता है। मुवि का 'पिपधित रहद पतिरापरपण एम्म पूर्ण है। विपरीन पिया विशिपिति दी इस सम्म म मूपित हो। 'विपरीत -विदिग्भाग नपनम्-चित्-पेशव गमा' पिपभित का इम्पा'वि' पूर्वक पग दो 'विपभित मौलिक मापार ३। मश-मन-विमानानुमार प कार मेमया का मुगा 'श' फार ५मरूपा 1८४ द का सूचक है। परा का अर्थ होता है-१५ संस्मा । 'मशाना पामतो गतिके अनुसार १-५ (१५) की बामस्थिति के क्रमसे ५-१ (५१) निफ निकलता है। यहाँ भभिपते ई नहीं। अमिप्रवरे १५ही। यही है मा वि स सूचित होरहा है। 'पर-माई-१ सम्पा) विन्द (१५) कुर्योत्, ५१ स्पाने १५ विणव' यही ग्रस्सा 'विपर' म सुपित हुआ है। तात्पर्य यह-निकलता है कि, मिस नपत्र में माता- प्रदेश में गर्भाधान होता है, जलमात्रा की षिति (समय) दोषी है, 'स नपत्रके १५ मपत्र में उस गर्मीमा जन् की पूष्टि होती है । इसप्रकार १५ नत्रमाप से ही पत्र की पिति होती है। प्रतएव गर्भीमूना पापोमयी रश्मियों को अवश्य ही विपश्चित" कमा मासकता है। यदि मूल मन्त्र में मनसा (चम्पारेण) गर्मापान है, वो पार्दा मपत्रमें (जो कि मूलम १५ पाना है)-पीतिमि (सूर्पपारेण ) सस गर्म की प्रसूति दो भापगी, जैसा कि 'पापे मूलमरपसम्तम्' इत्पादिरूप से पूर्व में स्पष्ट किया आधुका है। इस प्रकार 'ममागमा इसादि मन्त्र गर्भप्रिति कामरूप पतलावा एमा पन्द्रपारानुगत गमापान, सूर्यरारानुगत प्रसवमर्म, मोनों का भी स्पष्टीकरण कर रहा है। अब कमप्रान कई नियान हरप' मुपमा इस्पादि मम्म्र की भोर पाठकों का पान पापित किया जाता है। मन्त्राप मम्बन्ध में विगप बलम्प नहीं है। पापिप सम हिमधारा दिम मार्ग मे माता मका, पिसारा परमा! इस्पादि प्रश्नों क ोट समाधानों का ही-हर्ष नियानमः इत्यादि मन्य म म्पीकरण दुमा है। शुक्लमार्ग उनरायण पदलाया है, रुप्पमार्ग दक्षिणापन कालापा है। रुपामागका पार्थिव पप्पवर्ण मरामि मे सम्पन्न २, शुक्नमार्ग का मार शक्त- वर्ण मारिवानि म ममम्मर । 'ऊपर' का पर्य। 'तर' मीचे का परिण। रसिणरिया भूपिएको मात्रामममि उत्तरदिशा मध्य की भाषासमगि है। भव नसीर एमका उत्तर म मम्बग्प माना गया पनिणमाग एपिता पपना ग्यान पद पाशिव पानि कममन्य सपा है। यही प्रप' प्रपाबही- सपा-याममा निम्म मार का ही 'नि' मे मा हुभा है। फलत + नि-पानम सभ दाता-पिग्गुरपा-मापम्बिता प्रविधीको लय पनार (पत निपानभिलरप)। उत्तर मागग्ध रिपाशुषशपयानुगामिनी म्रप की गरमयों भपन मामालपण भारान पम्मे में मारप' (दरन्नि, प्रादरन्ति) पारा चानन गाण मुरणपिनि ममपम ने 'मुपणा'मागया। मपर में नमाग गरि माग्न मापान माग्नेश माविधी, पिएमपरा मपत्राप्रम 14 पर प्रतिफलित होने पाना सौर पेश गायत्री है। यह गायत्रवेजही सुपर्ण है जिसके गम में 'नाम्पो वायुसंपोगापारोग्यम्' सिद्धान्तानुसार पार्पिप जसमात्रा प्रतिष्ठित रहती है। पति पति बावारी इस गायत्र सुपर्णका वास्विक इविषच है विसका पूर्व के सामिप्रेमी-बापम' में विरार महानिक विरपर किया जा पुका। मागमनापस्मा में सूर्यरश्मियों केवल रश्मियों है, गमनपशा (गायत्रीदशा) में ही ये माहरण करती है, तभी इनकी सुपर्णवा सम्बर्ष पनती है। अतएव गमनावस्था- पमा गायत्रवेमामयी सूर्यरश्मियों को ही हरव' सुपो' मा आयगा । ये रमियाँ निम्न-(पिण) मागस्थ कप्णयान (भूपिरा) को तत्प बनाकर (भूपिएर से- संस्तिष्ट होकर) मत्रस्या यहमात्रा को अपने गर्म में पारण करती हुई पुलोक की भोर प्रतिफलित होजाती हैं। 'कप्पं नियान दरप सुपर्णा भपो षसाना रिवमुत्पत- म्ति' यह मन्यपूर्ण पार्थिव बलमात्रा फी इम गर्मापानावस्या काही विरतपेण कर या। अप, पाम, सोम, वीनों मार्गव तस्व'त' लाये हैं। 'शवमेव परमेष्ठी' इस पावर्षणसिद्धान्त के अनुसार प्रापोमय परमेष्ठी ही श्रत है इसी को पूर्वमन्त्र- परस में 'विष्णुपद' कहा गया है। यह पारमेप्थ्य भपतत्व फन-परत-बिरल-मेर से माप पायु-सोमः, इन तीन अषम्पामों में परिणत यवाहै। पनावस्मापन भपतस्व का पासुर बामणप्राण स, वरलापस्थापन वायुतत्व का सोमरस गन्यप्राण से, एवं पिरतावस्थापन सोमतत्व का सौम्प पितृमास से सम्बन्ध माना गया है। यही सोमतस्य विष्णुका स्वरूप समर्पक माना गया है, भवएव इनका पत्र पत्र 'सोम- पंशी रूप से उपपर्णन उपसम्म होता है। सोमसम्पम्प से ग्चर स्पान विष्णपर अप्सम्बम्प से यही उच्चररमान बामण भी है। शत प्रप् पत सोमास्मकवादी उत्तर म्मान की अवसदनवारिसका निम्न लिखित रूप से विरमेपण हुमारे- परमरपोचम्मनमसि परुणस्परकम्मसर्जनीस्यो वरुणस्प ऋवसदन्पसि । परणस्य ऋतसदनमसि स्वस्प सतसदनमासीद ॥ —यामः ॥३६॥ रविणम्प मूपिट मे सूपरश्मिरों पारा गुलोक में गर्ममत मलमात्रा का पापम मुसोफ में परमती ११ इमी प्रश्न का समापान परवी भुमि प्रती फि,वभगममप मुपण (रिमयों ) जब सरन स ( उत्तररिया से परावर्तित दोती (रविणायन । धनुगमन परती ) भादित्-सम्पादिवोत्तरकात में दी . - - पुत ( जस) से भिषी कारबासीकत हो जाती है, अतमयी बन जाती है। यही गर्म की प्रसूति है। क्रमप्राप्त -समानमतदुवमा इत्यादि तृतीय मन्त्र का विश्लपण पूर्व में किया ही माबुका है। इस प्रकार पर शस्म त्रयी वृष्टिविया का अंरात स्पष्टी- करण करने में सफल हो नी है। यह तो हुए मुविषपा । मन दो शलों में पुरागर्मा का भी समन्वय इस- लिम कर लना चाहिये कि, तयाफवित भ्रान्तों की दृष्टि में पुराण पफ निरयंक- शाम पन याबिन तस्वविमानों का पास में प्रकीयक मप से विरसपण हुमार पुराण न बड़ी दी प्रसादमापा में कर उनका समन्वय कर पाता है। घमी वा-"तिहासपुराणाम्या पा समुपपइमेत्' पपन परिवाय हो याह । अभिक पिस्तार में न साफर पष्टिविधा से सम्मम्म रतन पाले म एक वचन मात्र ही पहा उबस फर दिय नाव है- १-अष्टमासपत गर्म माकरस्प गमस्तिमिः । रस सर्वसमद्राणां पी प्रयते रसापनम् ।।-पा०रा० । २-विपस्सानएमिसिरादापापो रसात्मिका: । पर्पत्पम्मु बताधान्न-मन्नादमसिल मगद ।। ५-भारत रम्मिमिपंच षिविसस्य रस रविः । मुसमावि मसाना पृष्य सस्पाये ।। ५-सरिस्-सपा-पापा प्राणिमम्मा पा प्रकारा मगानादच सविसांगुमिः ॥ ५-विवस्वान मिस्तीक्ष्णरादाप सगतोमलम् । माम पुष्णाति सोमस्तु वायुनाडीमदिषम् ।। ५-प्रविधिप्यतेऽम पु माग्न्यनिम्धिप । अप्रत्याः प्रपतन्स्पापी यापुना समीरिवा: स्पादि मपुराएम - पुद्धिगम्पमाग म मगधनाने पूर्व निपारित मितिमाम तिम हिता में भी (कारी विप्रा म)दिपान गया गा मिसा निकर मTAR , -- । यही है कि, पम्नि-सोम-सूर्य-मित्र-वरुण-मम्ममा-पन्यादि प्राकतिकारवयामों समन्वय म पृष्टिसम्म सिमाहित है। यदि राष्ट्र में अनादृष्टि-समित हुप्काम की सम्माषना हा, वो वैधानिकतापणों को उस कारोरी इष्टिका अनुष्ठान करना पदिर, मिस में सम्यनिष्ठावा उक्त प्रापदेवतामा मानिमीषिक प्रमों के माध्यम सपनुग्रहप्राति का विरसपस हुमा है। प्रकरण मावर एकमा से अधिक विस्तृत होता वाहा । तरख सं० का वह स्पन यहां उमतमात्र कर दिया धावा है। भवरस ही उसुत निम्नप्रकरण मानिकों का पान पृष्धिविधा मास्यपूस विरले पण की भोर पापित करेगा। प्रापङ्गम्-)-"मारुतमसि महतामोजोस घारां मिघि (0 रमयत मा स्पेनमायिन ननावास अपम सकिं । येन सषे उसमवसृष्ट मति सदजिना परिषध स्वस्ति (२) । पुरोषातो मपन् मिनराव स्वाहा (३) ॥ चनाइपन्नुपरान् स्वाहा । पनपन् पर्पन मामराय स्वाहा (३) ॥ अनक्षन्पास्मन् दिए इपेन्। स्वेपरावृत् स्वाहा (६) । मदिरा वर्पन पतिराव सास (बहु हापमपादिवि मृवरान् सारा(८) । बासपति पर्पन बिरामद साहा (६) || अस्फर्मन विपर्सन माराम स्वाहो (१०) ॥ मान्दा पासा शुन्यनिरा पाविभवीस्तमसरीरु- न्दती मुफेना, मित्रस्वामका सुरामा ६ मा ११ ॥ पृष्णो समस्प सन्दानमसि, पप्य स्वोपनमामि (ARYn द्वादशमन्यात्मका सर्पः । प्रपाठ, सप्तमाऽनुवाकर। ३०० ।- पाच्या माध्यामपानम्-(1)-"मारुतमसि मरुतामाप्र-पति,-कण बामा कामता परिधाचे । एता पत्र पम् । सरूप एस मरमा पर्जन्य पर्पपति (') | रमपत मरुन मनमापिनम्-इति, -परमादा प्रविमी पति । परोसमेर पनपति पम्पानकाय (२) ॥ पातनामानि जुहोति। "पापु प्या शे"। वायुपेव स्वेन मागधेयेनोरखामति । स एवास्मै पम्प वर्षपति॥ माटो सुहाति । पामा दे दिश, पससामान्वर- दिसः । दिगम्प ए. वर्षि समापारयति (४) रुमामिन सपौति हविरेगा मजदिसपीठि पद (1)|| पतीनामवमानाना शीपामि परापन् । ते वज्रा समान । वर्षा ग्म उपित वानि - १८. वाम . . - परीरापमपन् । सौम्पानि करीरोनि । सौम्पा बल बा बाहुविदियो वृष्टिं प्योगपति (६) ॥ यत् सरीरागि मन्ति-सौम्पपैगाइस्पा रिसों प्रप्टिमवरुधे । मधुपा सपौवि। अाँ वा एप बोपपीना रसः पन्मषु । अम्प एपोपपीम्पो वदि । मपो अम्म एपौरपोम्पा मष्टि निनपति । मान्दा पाचार-दवि सपौति । नामपनो मछति । यो पमा बात् -अमावसति, एसमेना नामष पराम्पत्रपति (७) । पो अस्प सन्दानमनिरपे वोपनमामि, पापा बन,पा पर्जन्यः । कृष्ण इस साल भत्ता पति । रूपेनं समर्षपति-पर्पस्पात रूपं ()-तेसं० राधा। स्वयम्-(२)देवा बसम्मा बग्ने सम पूर्य (१)देश वर्म प्पा मित्रानामन् (२) देवा:-सपोवयोऽपानपारामाहेमन् (३)। उदो दसदपि मिन्त, दिव पनगारियाद पुषिम्पास्तवा नो प्या पत (४) | दिरा पिचम उपन्ति पर्मगमेहमान पविती यत् म्यु दम्ति (५) मा य नरः सुदानवो दरले दिवा कायमपुम्मा, पि पमेन्पा सूत्रन्त रेयसी मनु पवना पन्ति नपा (6) उदीरया मरुतः समदतो पूपं पर्टि परंपराः परीपिना, न पो बसा उपदस्पन्ति पेनमा, म यावामनु वा मास्सव (७) । सो बहिं दिन, मामिा समय पण, जम्मा मसि प्रपममा, बसमसि सद्रियम् (८)उन्नम्मप प्रचितों मिदीदं रिम्प नप, दो दिमस्य नो/ देशानो विस्मा रविम् (E) | ये देवा दिषिमागा मे अन्तरिक्षमागा ये पपिलीमापाः इम बामवन्तु र इद क्षेत्रमाविव हद क्षेत्रमनु विशन्तु (१०)। दशमन्त्रारमझापा प्रपाठक, मटमोऽनुवाका । सं० २४८ | उपराष्ट्रमन्त्रम्पाल्यानम्-(३) "देवा बसम्पा, देवा धर्मग्पा, देवाः सपीठप इस्पापनाति । देवतामिरेवाला टिमिन्छाति । यदि पत्- तोरस्पेर हेवम्पम् । पदि न पद सोमवे हापनिपेत् । मोराने गै मित्रानो मात्राम्पो चल पर्जन्यो वर्षति । नकालिदिरा मारपति । मित्रावरुयादेश स्पेन मागपपेनोपधावति । सातारमै महारा चाम्पा पप पयत । प्राय पामछरे पराडासमराकपाल निपिन, मान्त सप्तकापाव, सीर्यमेकम्मालम् । अधिळ इतो वृष्टिगुदीरपति मस्त सष्टय नपन्ति, पदा बलु का असावादिलो पर रमिमिः परिचते, अप पर्पति । धामप्छवि खल भूस्वा पर्पति । एता नै देशका प्या सवे । वा एष सेन मागधेमेनोपपापति वो एवास्मै पन्य पर्पयन्ति उता पविष्यन् वर्पस्येव । सभापपिलिा, मामिा समुद्र पृण, स्वाद । इमाषणामषाप समई पनि। मपो आमिरेलामन्छे ति । धम्जा मसि प्रपममा, बसमसि समद्रिय, इत्याह । पपा यमुरेगेवत् । उन्नम्मप प्रपिरी इति पाहां जाति। एपा पा ओपधीनां पष्टिबनि। वयव प्टिमापापति । ये देवा दिवि मागप्रति कृष्णामिनमध्नाति । इम एवास्मै सोल प्रीता यमीरा मन्ति" । २० . राम । चिरीय सहिता रे पार पनुपाने से सम्बन्ध रतन पाने मन्त्र माग से सुप्रसिद्ध कारीरो-ष्टि की इविकसम्मता का स्पग्रीकरण हुआ है। सम्मै विश्लेम्पसा साप साय उक्त इष्टि प्रकरण में वृष्टि से सम्मान रखने पाले भावि रैविक विज्ञान सभी रात निरोपण हुभा है। 'मास्वमसि' यहाँ से इसका पाम १ नभमीरा भवन्ति' पर अवसान है। उपक्रम पास्प पर सचित कर या किमान्तरित्य महावता (पायुरेबवा) ही पप्टिकर्म के प्रधान निमित्त है। पचाप भनि, सूर्प, रिपुर, स्वनपिन, सोम, मेप, मादि समी निमिरा बनव ६ परन्तु इन सा प्राणों का समनप एकमात्र गतिधर्मा पापुरे समार पर निर्भर । अव पायु को हरी प्रपान निमित्त माना जा सकता है। प्रवरण प्राध्यागमन्त्रम्यासपान मति में पापु या शे' इस्पादिरूप से घायु को ही पटि का प्रभाम प्रवकपलाया गया। इसी त सिदाम्प मापार पर निम्म लिखित पपन प्रतिष्ठित हुए- सूर्य दक्षिणगोतस्प सप्तादम्परपुस्थितिः । उधोय पापना विसं रखे देशे प्ररपति ।।। न म न पनपत्र न पन्द्रातयकारणम् ।। पापनेवोतं दोप बापुरेव प्ररपति ॥ २॥ -~भीगुरमीत फारबिना ऊण वास कहलाया - - 1 परष्टि भौतिक यो पर,मनोयोग -भाभिषिक प्राण-पतामों के साथ, यही सम्पूर्णमन्त्रमाग का वास्किक निष्कर्ष कारीरी इष्टि में काला पब पहिना जाता है, मिसके चारों कोने गहरे कासे होते हैं । यही पम-'हप्पतूप है। या छप्पन पामधर मेप, प्णिजन एवं पप्पमात् , इस्पादि का प्रतिनिधि माना गया है। यही पुष्टि का सरूप है। मेप इसी रूप में परिणित होकर परमता है। इसी प्रकार कारीर सौम्पप्राण का संपादक है। बावहोम भष्टविध मातविक सर्प-पायु का समाहक है। पार्मिषा पनि पाम पर है। बसु सम्बन्धन यद असष्टावयव ।। पान्दरिषय ममस् पक्षापा , सूर्य 'रकत व म्याग । किम्म में तीनों का सहयोग भपरित है। अतएव कारीरी इपि में पामगार प्रति, मनलाम मामु, सौर इन्त्र, तीनों के लिए हमरा मराज- पान-मसकपोल-एककपाल-पुरोडारा का निवाप दोग, । वीनों देवधामों का उपयोग स्पष्ठ है। पार्थिव पनि अक्षमात्र अपर फैसवा', पातरिय महत्वान से अपने गर्भ में रम्यता है, सूप रश्मियों से बरसा देते हैं। अग्नि इचो पति- मुरीरमति इम्पादिस इमी उपयोग का स्पष्टीकरण हुआ है। ये देना विवि मागा' (पेन्द्रा), येवरिभागा (वायम्पा'), ये प्रथिवीमागा (माम्नेया) के अनुसार तीनों ही इस बर्षिया (कारीरीशि) : स्वरुप मम्पादक। अवश्य दीव प्राणश्ववानुरूप हप्वाम परोप, पुरोगावि वचत् भाविक द्रम्मों का माप्पमस वचपप्राणापतामों सारा अमीष्ट सिसि ( बर्ष) पाती है। 'म प्लास्मै कोश प्रीता प्रमोटा मबन्ति इस उपसदार पाय से इसी फम्मसिदि का समबन मा ६ । यमप्रक्रियाओं स स्पा सम्भव नहीं । भावरपकना है-स्प सानपूर्वक उनके प्रमुगमम की । प्रारतिक प्राण-देवताओं के प्रतिषियोजन सदी भमाइपि, ममिनि-जनित दुष्पाल, सनपर-विम्बमिनी, फरफापाव, सम्भा पात भाग्नेय-पाण-पत्र-पारम्पारि भूकम्प, मावि विज नपग्यित हुमा करते हैं। मानप ममार प्रारति विश्व का प्रायर । इस प्रतिविम्यू-मन स पवस्वीप मानिक निधो प्रावि विधानों में सम्पवस्वता का समावश ससत मि। इस प्रकार प्राविषिष्य प्रापरण करल गुण हम पदी उफ विप्नों प्रपता बनन। बत्तमान युग मानब ममाज की इसी रिकृति म प्राय पर पर मि इन विप्नों का प्राध्मण माना पा याद। पि विविस्मिामार्ग (प) प्रास. शिशिन ममार लिमहाँ उपहास पी पम्नु पन हा प्रानि का अधिकाधिक पनि पान वास समार पर-दिम-गुरु-गुभूषापरिरमाग, मपन भगम्यागमन. प्रगश्य म्पशन, ममानिन्दा, मसिनीकरण-संकरीकरण-जातिभ्रंशकर, भावि पातक-मति पावक महापातक निन्य भसकर्मों में प्रकृति, मादोरपन, कस्मित साम्प- पार पोपळा, सोपरि दुरामहमादि मादि पपर्मपय प्राय पने हुए हैं। स्म रण रखिए, पब तक प्रकृति का अनुमा प्राप्त महीपक्षिया आपगा, तब तक एक दो बार-स नहीं, साम्रो भानोमनों से मी, मिनके मूल में पावक व्यक्ति-प्रतिष्ठा का मोह प्रविस्ति है-मानब समाज मुस्मिर न बन सकेगा। इसके लिए वो प्राकृतिक विश्व की मुस्थिरता ही प्रधान सापन होगा । एवं इस साफ्न के लिए प्राविक- निमम संपावशारण शावत सनासनयम पम ही एकमात्र मेमपन्या माना भायगा। धाम्म मानबममात्र कम्पास के लिए सी प्रशस्त पथ की भावना करते हुए पुभिगम्या भाषा से सम्म प रखने पाला प्रिविज्ञान-प्रकरण परत होता है एवं सदसमापानुगामी प्रकरण का संक्षिप्त निरुपण प्रारम्म होता है। एक वर्ष में पो तो पसम्तादि । प्रतु (मौसम) मानी गई ६, परन्तु 'मीप्म-चपा-शीत' इन पीन स्यूस शुतुओं का वो सर्वसाधारण को भी बोप है। दहीं पीनों को लव बनाकर मा बावा है-त्रयों पर प्रतम सम्मत्सरम्प' (शव महास१७)। सहसमापा में ये ही तीनों प्रमरा गर्मी, वरसाव, सर्दी, इन नामों से प्रसिद। इन तीन मौसमों के प्रस्पेक के ४४ महीने बाये हैं। इस पोर चतुर्मासारिमका गर्मा ३, म्स भोर पतुर्मासास्मिका सी है, मप्पमें चतुर्मासा मिका परसात है। बरसाद दोनों के मध्य में है। और पेसा एक मोरिन्पाप (म्पबहार) ६ कि, मप्परम पार्य का इमर-बर यने पामे दोनों पावर्ती पदार्थों स प्राण दो गाता है। प्रताप का मासकता है कि, पकअप में केवल गर्मी, एवं सी, ययो ही मीसम है। परमात का प्रहण इन दोनों प्राण मे ही परिवार्य है। इसी म्पबहार के प्राधार पर पूरे कर में पोम्म मतशोवकास, पो ही मौसम मान लिए जाते हैं। भीष्मकाल अप्सकात है, इसी का अपश 'यहा। शीतकाल का अपरा पाखापर में से दो की फसल होती है। परि और भी सूरम विपार किया जाता है, वो इमें श्म दप्प पर पापना पहलाकि बनुन गर्मी मम्पूण वर्ष की मूल प्रतिमा है। फारम स्पर छ । प्रधिषी पर रहन पासो लिए पाभिर अनुओं को ही प्रगमना री गायगी । एवं 'भग्निम्म्मान'-'पयाम्निगा प्रविषा-स्पादि सपनों रेअनुमार प्रविधी में पम्निवस्व की प्रधानता है। प्रवण मामना पड़ेगा कि पार्थिव प्रमा म सम्पन्न रयने वाली शनुमों में पार्थिप अग्नि की श्री प्रधानता है। अम्निास-दिम ही पार्थिव ३५. पारि विभिन्न पभों की प्रवृत्ति होती है। जिसे हम शीत' दवे, वही वैमानिक सोम' वत्स है। इस मोमवस्म के माम्बरमोम, विसोम मेद से वो विवर्ष माने गए है। प्रस्पच र प्रान्तरिय मा मास्वग्नोम है। यही 'सहस्र्य सशरीर-सत्यम्' परिमापानुसार केन्द्रानुगवपिसावश्विम पामारकर (मोतिर्मय चमकीला) सोम अवश्य ही 'सस्पसोम' माना जामसारे। विशाल अन्तरिप में पामुसमुद्र म्पाप्त है। इस पाप्पापस्थापन वायुसमुद्र में व्याप्त मीरूप-प्राणायक सोमतत्व ही दूसरा 'चिसोम' रामायमरारी 'प्रतम्' इस परिमापा क अनुसार केन्द्र-पिरखमाष से पश्चिम प्राणात्मक इस माम्तरिक्स दिसोम को अवश्यमेष 'भूत सोम' कहा गासम्साह। माम्मरमोम (चम्ममा) दो भान समपिस मान से परम विकसोम अपने प्रफेन प्रशरीर माव मे अप्रस्पा है। सम्पूर्व खगोल में एकरूप से यह प्रससोम' मात है, जिसका 'मास पानी' से मशीभांति अनुमान लगाया जासस्ता है। सूर्पसत्तास्मक दिन में, सूर्यामावास्मिका रात्रि में सदासर्वमा स्पपि पान्तरिक्षम अवसोम प्रमलतप से मूपिया की पोर प्रम्पाविस वा साद। पापि पपिपी में इस की मुक्ति राशि में ही होवी है। दिन में मौररिमगत सोमप्रिय इन्द्रमाण इसे प्रपमा प्रम पना मेवा है। रात्रि में जो पोसका पानी यत्र तत्र सर्वत्र पक्षण होता है, पर मोरप से पूर्व पूष दी अपनी सचा प्रविधी पर रखता है। उरित सूप इसे रश्मियों से अपना गम बना मता। प्रस्प हठ या मोस का पानी पान्तशिप प्रामास्मक दिक्सोम फा दी पार्षिय मौतिक मामिमित भौतिकप है। वात्पर्य-करने का पदी कि पान्तरिम वायु में धनसोममात्रा प्रतिहिन रखती है। भूपिपल, सूप्पेपिरस, दोनों मेंदी भम्निमाप्रा प्रवरूप से निम्मर भाम्तरिय वायुपरावन में उसी अवमान म रहती है। पापारा में परि घममा समसोम पिरा, वो पूर्वलासानुसार सूपर्प सरपाम्मिपिरह है। मत्याम्निमम मूपिम म म सानपा-महिमान' सहनम् रूप में पारी मोर, सप पोर पिनि सव रश्मियों में मे मतिहण पम्निमात्रा प्रयारूप म निकलती रहती है। पदो गर्मी दो स्पास्त होगाने पर मी वायु में प्रवाहित को दमें उपलर होती ६१ पद पारमाग्नि मी पूषमपणानुसार 'अनाम्नि पदमाया है। पया प्रातरिय मापमामारमा पापिया मे मी बम्पहारा सोममात्रा निमार वायु में NIA नहीं पाती 1, दोती और भवस होती है। पन्द्रमा से निरन र प्रगति म म्याम दान वानी माममात्रा ही तो पापिय मुधिकारा सुपरमन भीपतियों का पोपण करती है। पत्रमब सूप्य से निकलकर अन्तरित में व्याप्त गने वाली अम्निमात्रा दी वो पार्थिवमुहिधारा पनसवियों का पोपण करती है। क्या भोपभियों में भम्निमात्रा, क्या बनसतियों में सोममात्रा नहीं एपी १, रहती है और अवश्य गती है। दोनों में दोनों की मुक्ति है। वन स्थिति में वारतम्प है। अम्निमात्रागर्मिता सोमामात्रा यहाँ मोपनियों निम्माण करती है, यहाँ सोममात्रागमिता अनिमात्रा मे बनस्पतियों का स्वरूप निम्माण होवा है । पूसर शगों में मोपपियों में पान्सौम्यप्राण की, वनस्पतियों में सौर- मामयप्राण को प्रधानता है। परमा, सूर्य, दोनों कमरा सत्यसोम-सस्पाम्निपिरा है। सस्पसोमपिण्डारमा पनमा से विनिर्गत बापम्प प्रतसोम की सजातीय भाषा नुबन्ध से सौम्म उत्तराफाश में प्रमानवा इसी ह । सस्पाम्निपिण्डात्मक सूर्य से विनिर्गत वायम्म मानि की भाग्नव रशिणाकारा में प्रभानता रही है । ऋवाम्नि रसिक से चर की घोर निरन्तर साया करता है, तो प्रत्तसोम रघर से दक्षिण की भोर निरन्तर पाया परखा। रविण से उत्तर की भोर जाने पार भवानि में ग्घर मे दक्षिण की भोर पोर पाने वाले प्रतसोम की पाहुति होना भनिषाप्प ।इसी माहुति से अवानि सतमोम के रासापनिक सम्मिमणामक पाग- सम्पन्म से, मितिसमम्म से अन्तम सम्मान से उन उममारमा पूर्वमाष का अम्म होता है, जिसे प्रताम्निमोम के सम्पन्न मे ही 'प्रतु' या जाता है। इस प्रकार पपपि ऋतु में पम्नि-मोम दीनों का ही समन्वय समापिएक विशेपरष्टिकोण रे अनुरोध स हम "स अग्निप्रपान होगे। सौरप्रवाग्नि से पुछ पार्षिक प्रग्नि की मासादिदोती है। सोम की दास-नि अस्वाभाविक है। प्रतिसपर (प)मस्या में अग्नि अवश्य शन (मोम) रूप में परिणत होगा. मगा परएणु-याकारागमो निस्पं वायु सरंगो महान्' सिद्धाम्नानुसार निया काशानुगत निस्पवायम्य नसाम माम माणस्प मे मा मरण पना देगा। मोम इसी निम्प पर्म का लप में रपवे तुप दान में इस की टास-खि नहीं मानी है। जन मात्पति मिन-शन भूमिरिक मिता' इस्पारि भयपसमिरा म्वानुमार मापक, सरपपिरागारमूत शतनाम से प्रतोपमान दास-गदि बरमुत पारिवानि कीदो लास-विहै। मोम सस्परपस करमदीदा भक्षण पमम्तादि पदपभो निवपन में-मनिष्णा मम्मो मपनि, प्रतिरापन पदा भार ग्रहादि प्रदिरापन , निम्या शीमा भवन्ति, न गया ममि, पुन पुनरावरापेन ग्रीया मरन्ति इस्पानिय निम्सही उपाम निपाम (प सवाप - हाव-वार) पतलाया आता है। तस्षत', भवाम्नि ही स्वोदमाम निपाम से पर धतुरूप में परिणत होता है। इसी पापार पर मुति का सिद्धान्त म्पपस्थित मा कि-अन्नयो का अलव"-"गयो देते यदेवाचितम भन्दिकितव"-- (शET३६)। प्रहवमनुमगम' | पार्थिवनि मी सौर भम्निवत् सस्प, प्रव, मेद से दो मागो में पिमक है। मूकन्यू से बय पार्थिव पर भनिरोऽग्नि, मो नियतपब से सम्मा अनुमाव से भयो म देववाहन इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार प्रश्वस्वरूप में परिणत होता हुआ गुलोक की मोर जाया करता है, सस्पानि है। इस फस्याम्नि से पार्थिव वर्षा का कोई सपकार नहीं होता, प्रत्युम प्रपफार होता है। माता हुमा यह सत्पानि सो हव्यपाहन है, पार्थिव रसमात्राओं को वगर्म में प्रतिष्ठित घर पुलोकस्य सावित्रमाणाग्निमय सौर वेवसामों में माहुवि बने पाता है, प्रविधी के पानी में कोक में बरसाने पाता है। इसी सत्पाम्नि के लिए-अनि इतो इष्टिमुदीरपति, इत्यादि का गग है। दूसरा ई-मण पार्विव भनि । भूप्रदेश से सर्वत्र अम्मा ( गर्मी ) निकलती नती है। रूपाणि गो' (गहों ) में इस अम्मा का प्रत्यक्ष किया गा सकता । इसका कोई जितापम नहीं है। मपितु मनिपमिवरूप से (इतरूप से) यह सड़ मोर से निकला करती है। प्रवनमा अमात्मक या पार्थिव श्वानि ही भान्तरित पानी के भाकर्षण का कारण पनवा है। अबतक यह ऊम्मा परमसीमा पर महीं पहुँच जाती, वपटक-पानी नहीं बरस T T सकता। T भूषिय से सस्याम्नि द्वारा पुमोक में पहुँचने पाली जातमात्रा पररम्परा चिन्न पायुधरासन पर प्रविधित राती है। इस माम्तरिय मतमात्रा में पान्तरित सात-रिक्सोम का समायरा होता है। मदा रूपान्तर पह सोम ही उस अक्षमात्रा का पोपण करता है। मान्तरिय पर्यम्य पार, पार्थिव प्रतानिहाल अम्मा से उत्पम भूमात्मक पाप्म, सौर समोमम प्रवृक ग्योतिर्भाव अन्तरिक्षमुच पावित सपमात्रा इन सब (पापु, घूम ग्योमि, सचिन ) तत्वों के समन्वय से अन्तरिष में यो अपूर्व भौतिक पदार्थ उत्पन्न होता है, वही 'मम' लामा है। अप्-(जल) ने अपने गर्भ में रखने के कारण ही 'धूम-म्पोति-सशित-मस्ता'-समन्वय सपस पा पूर्वमाव-' कहलाया है।'म यस मन है, जलमारण करने वाला मात्र है। इस से मपि नाही म्मी। पि होती है-मेप' से। अनकोशात्मक परस प्रभ है जलवर्पक बरस अपने मेइन धर्म से मेप है। अब तकपाल में भरमासो पमाणमा १९. भाता है। सामर्स (क) का कारण एकमात्र दे० स्पररिमा १ मिन प्रति फहन म वायुगर्मित पापोमप पनुपधरातल मतपर्णात्मक मन बावा है। बीघ्र परा दल मे मैसा रश्मियों का उसी प्रकार पकोमाव हो जाता है, जैसे--पानी में सीपी भी प्रविष्ट लकही भगर्म में पकित प्रतीत होने लगती है, गिमका विमुमाकार- पसमा में मी प्रत्यार किया जासकता है। पही पम्प्रक्रिया सम्पन' नाम से म्पबात सम्बन म रश्मिमुक सप्तपर्णपत्रसष्टिम्म स्वेतवर्ण का विरामलन हो वाता है, एक स-सात पर्व शेजात है। नही सप्नवर्ण प्रवीति का मूलकारण है। पनम्य-पाप-वायुपरापत इसी रश्मि-सम्मान से सप्तपणारमक धनुपा बनक बनता है। गरममुक्त प्राण ही इन।'इसी सम्बन्ध से यह पनुप पन्नाम से म्यद व भा है। पर्यम्पात्मक गनुप बुरित-रिममावारमक पनवा हुमा प्रास्मगि रोपी है। भवण्व उपन्व-अम्बयाम्त-पाणि सूर्यों की भांति इन्द्रधनुपदर्शन का भी निरेप हमारे मनुफक पम्पात्मक मी हास्तिक स्वरूप का विश्लेषण करन हुए मति मे कहा- माया पो मित्रावरुमा दिवि पिता सर्या मातिापरति चित्रमायुधम् । तमग पप्या गापो दिपि पर्जन्य द्रप्सा मधुमन्स ईरते ॥ अस० ५।४ पृष्टि स पहिल यो भाप्प पायु प्रवाहित होता रबरी 'पुरोपाव वायु पमन्त्र पही प्रवीय मापा में 'मान्सून' पलाया है। यही पर्मन्यवायु-बायुर्व प्रपा श्यक भनुमार मलवप माना गया है। पर्यम्पबायु करवाया है, इस प्रश्न फा रत्तर-मपत्री की प्रवृत्ति । पामुमेरमा स पार्पियाम्नि स विनिर्गत धूम (बाप्प) माम्तरिय सनिसमात्रा-मिगत तमोमात्रा-सार पनमाष में परिणव हो जाता रास पन-म यब तक विम्तरारमक नहीं पन साव, तब तक टि नही दोसम्वी. साम पर कामपावरण पातरिय तिषम्मा सोमागमन का निरोपक बनता - • पिपाम्यनुगत समरिमाप्रपाबमा मासिकाम are मा पारधानमन-मिसन हमारे पास विरानिय स्पून मेmnt Rawat -मापने की कामानित Rate पौeeमा, किशोर मी Fatोस सी एमपु-य हमे पर।
। 1 म है। मध्यका स्वर सपरिम्ब स्तर की सम्मनी पन्ना है। सापा र (मा.) बिस में वरमा मरी हुई है, पार्मिन एप्मा के सम्पर्क से मुक्त होता हसा पुर्वन्न मोदना से बरस पड़ता है। पर्जस का सधार होता है-पाहामि के पास मति पम्मापार्षिय अनियनित पम दी यो पर्वम्यात्मक पका जनक बदला इसी लिए दो पमम् गुरुप से मी उपस्तुत है (देखिए-महाभारत-=॥५॥ ४४) । पहानिद्वारा उत्पन्न इसी पर्यम्पविजात को बस ना कर मुति करती है- "तपाबा' इति । भग्ने धूमा बायते, मादन , बाप्टिः । अम्मे पता पायन्ते । तस्मादाह सपाया' तपासा' इति" ॥ नाव मा०३१० उके पाम्प-विधाम को सत्य में रखते हुए ही मामय की १८ नी कणिका का समन्वय कीथिए । पर्मन्यद्वारा पम्न मेघस्तरों से सोम का नियम होगाणा है। फलस्वरूप पार्थिव छम्मा को प्रख दोने का अवसर मिन यावा है। परम-अनु निशापामक मरकामानमह स मी पार्पियामि अपेक्षाकृत प्रबल यता है। पाप विपेन उपमावापना मा (मस) ही वो पो की बननी बनती है, जिसका मेय परम्परया पम्प को ही प्राप्त है। भोभाष' स्याकार रेषप्राण (पाने प्रास) के सम्बन्परूप भावान से पुरोगाव (पन्य) का प्रादुर्भाव होगगा। ' स्तुमीपट्' सत्रण देशपायसम्पम्प से मम्प म्यापारसारा-धमनित भमसरों से भाकाश मागया । अब भागे पाकर वर्षा से पहिले लिपुत्, खानपिन्न, पे धर्म और सम्न दीवाना पुरोवाव के द्वारा भाकाश में समक्षावित प्रों के पारस्परिक संपर्प से ही विपत् (म्पोति), और स्वननितु (रामपनि ) रूपन्न होती है। भुवि मे प्रथम स्थान विपुत् का रस्खा है, द्वितीय स्थान स्वमपिस्नु का माना है। इस का एकमात्र कारण एरपस्थिति ही है। हमें परिश-विद्युत् प्रतीति होमी है, भान्तर सम्म पनि सुनाई पाठी है। बवत' स्थिति परकि, परिमापान खनमिल्लु (मान) का दूसरा स्वाम विद्युत् का है। मस्या में देखिए । एक रसक सपेपर के इस मोर पर महा हुमा शिक्षा पर बम फटकारता है। हम इस विमान सरोवर के उस बोर पर लो हुपा साक्षात्कारा कर रहे हैं। फटकार रेसाब ही ध्वनि का मा विर्भाव होता है। बनि संपर्पसहजम्मा है। परन्तु प्रवीति पनि की होती है, संघर्ष (फटकार) के म काल पीछे। वापुरे सहयोग से संबनित पम्निम्मापार द्वारा ११ T " + चुम्बीन मात्मक मनपाण के सहयोगी पृष्टपवरोधक 'नमुधि' (म मुम्पति सक्षम् ) प्राण का प्राधाम्प यता है, का वक वह बदक्ष भम्र' कहलाता है। पल्परावर्तित सूर्य्यर रिमा सौर इन्द्रतस्थ के दम है। इस दिव्य इन्द्र के पत्रमहार से (ररिमगत पानेपप्राण के समावेरा स ), तथा पार्षिय अमानुगत पासप इन्द्र के म्पापार से (पार्थिव उप्मा समापेरा से) उप अपरोधक 'नमुषि' प्राण का प्रन्विन्धन दूट जाता है, सभी का मन 'मेघ' रूप में परिणत होकर पुष्टि करता है। इस प्रकार गुसोकरप मपवेग, भूगोकम्य वासबेन के वनप्रहार से नमुपि भमर का मन विर-हर दो लाता है, तभी पुष्टि होती है। निम्न सिन्धित मन्त्र इसी रहस्य का विसोपा कर मार- (1)-"भपा फेनेन नमो शिर इन्द्रोदवर्चयः । विला यदमपः पधा।" अम्म८।१४॥ श (२)-"इन्द्राय प नाघिमासुर समवसावन्न नौ नतान्न दिपाइनन्नाद्रेण न गुप्फेयेति । तरप म्युष्टापामनुदित भादिस्पेऽपा फेनेन विरोऽसिनद - सापमहाना० १२८ पावि सम्मा मीपे से ऊपर मा रही है। ऊपर अन्तरिम में पायुषरावल में अप्रास्मफ पारिइलों (परलों ) में उल भरा हमार ! जप पार्थिव ममा पा पहुँच रही है, सो इस वारमक-कावण धम्म मे प्रभस्थ जस परम क्यों नहीं पाता? यह एक प्रश्न । मानिक समाधान फरत, कि, पा टीक कि- पार्थिव अग्नि (मामा) ऊपर गाया है। परन्तु साप साप पाम्परिदय सिमोम प्रथिवी की पोर मा भी तोया। मितनी मात्रा में अप्मा (गर्मा) म्पर माती, इतनी ही माया स सोम (सी) नीच मारहा। सममात्रा स प्रान यास सोम क सम्पन्ध म तम्मात्रासमतुलित पार्थिव पनि का बण-पम्म शाम्स हा लावा हरफनम्बर प्रान्सरिश्प मन मपसरूप में परिणत नही पान पान पताप वृधि मही दानी। मावश्यक यह है कि भाव हुए शीनगुणक पान्तरिय शसोम बना भाव हुए पार्थिव चम्नि माप में किसी ऐम मप्पारण का ममावरा दोना पारित यो माम्तरिय मोमबल का अपने ऊपर प्रपात का है । उस अपम्पा - .
- - " - - में पार्षिक-ऊप्मापन फर वो सामावरोध स प्रथम हो जायगा, दूसर मम्पावरम बनित संकोच से मी मे पल मिमगा । परिणाम स्वरूप उभयवस के समावेश से 'भपन परम छकर्ष पर पहुँचती हुइ वह मा अवस्य ही सौर इन्द्र के सहयोग से धन को मप रूप में पग्गिाव कर बगी, 'अनेराप' सिद्धान्त परिसार्यो आवगा, पानी परम पड़ेगा। समामान सामविका। परन्तु यस मन्यावरण का जन्मदावा कौन बने !, प्रश्न का स्तर एकमात्र पाठकों का सुपरिचित 'पर्मम्म' मायु दी। पाक्षन-पूर्वा पक'ए' पातु ('Z' पासनपूर्ण मो-जु०प० स०) से, अब वो सेपनाक 'पु' भातु ('एप' सपने-मा०प० से) से (वमा० ॥१३ मारा-'पति' निर्मपन स) 'पमन्य' राम्ब निष्पन्न हुआ है। पम्प उस पफ वामविरोप का माम . जिस का स्वरूप प्राप्यमाणारमा सौरररिमगर्मित इन स सम्पन्न हुभा है। अतएव इम को भी पर्यन्य भाजासना पसिमसामति-मपसनयारा परि राति से । मसिनपारा व परसाने पाला माणगर्मित पुरोषात मान-मापिशेप दी 'पमेन्पा । 'पर्जन्यो मेपमापेऽपि, अनाम्पुर-राप्पयो", (विश्वकोश)-'पगम्पो रसरणनी' (अमर) इत्यादि कोशवपन भी सा निषेपन का सगर्भन कर रहे। धसहितामगलाम्बर्गत रामन्त्रात्मक प्रभार' सूत में पर्जम्बासी शानिक स्वरूप का विरोपण मा है। बाबतलाया गया कि पुरवाई दवा का पनमा अर्पणानुकूल गम-चमन, राष्टिपात, भारि समी सृष्टिफम्म इसी पमन्य पर अवलम्बित है। जिस समय अपने गान-तन के साथ परम्मरवता नमाम सस में मपरुप सम्पाप्त होत हुए इण्यम्मुम्प बनत है, उम ममय सम्पूण पार्थिव पर-अपर प्रसापर्ग में एक प्रकार का उत्सास पा गावा पम्पिप- पद पन्य कनिमदद म्तनपन ईसि फतः । प्रमोद विष मारवे पकिन पूपिम्पामपि । शुष्म५।८।। यस्प प्रते पापी नन्नमाति पस्य प्रसे पपपत्रमरीति । पाप त प्रोपपीरियरूपा म न पनप महि पम्म पाए । समे MRI गुपसिनुप सी पनि का प्रधान कारण मी पही पार पाए । रिमरिल, मपणा तो पीहे पाश में मनायामा धनुप का प्ररपत किया खुमबालम उत्पन्न शप-सरोबर प्रदेश में म्याप्त पाप्यमायु-वीचियों (नहरी) आभरपर प्रति ठित होकर ही भोरेमिय पर भाता है। यही इसके प्रागमन-विनम्म का कारण है। मम्ममिमित मायु से पम्निमयी शामपनि अवस्वीया पन माती है। एप मेव मुशुण्डी (दोप) छूटने पर पदिल चमक दिखलाई पाती है, अनन्तर सत्य मुना जाता है। विपुत् में तीब्रगति है, राप पायु-स्तरार्पण स मनगवि है। भव पब पहिले मी उत्पन्न शमविलम् से मुनाइ पाता है पीधे मी उत्पन्न, किंवा साब ही उत्पन्न विपुत् तत्कार प्रदीप जाती है। ठीक यही स्थिति यहाँ सममिए । एमबिति एम भी हो, वस्तुम्भिात पही कि पहिल संपर्ष स शम, (म्वनपिन), अनवर भोति (विपुत् ) उम्पन्न होती है। 1 पूर्व में मप सीन स्तर बताए गए हैं। यह निस्व स्थूल मान है। वस्तुत पाकारास्त्र सामान्-स्वरों के कारण मप क भी साव ही स्वर होव है । माप-मप्प स्व वायुस्त -निर्गमन से दी मेपस्तरों का परस्पर संपर्प होवाइसी संपप स विपुत् मत्पन्न होती है, इसी संघर्ष से-'वायु मात्, रामस्वत्' इस्मारि प्रातिशाम्प सिहान्तानुमार स्तनपिस्नु (शप-मम ) उत्पन्न होती है। मपम्न का उपायप जैसा भाकार हाता है, पत्मपर्ण स श्पन्न विपुत्-वनकिनु की भी वत्सराही सभाप मातियाँ एती है। मवस्तरसपर्प से उत्पन्न वित्-म्वनपिस्नु भपो- अम्बित मपम्नराबरण मे चरि-भूति का विषय मही वनवी। इन का प्रप' स्तर प्राणों में दो सप होगाता है। प्रपोषस्थित तीन स्वरों, पारस्परिक संपर्प से उत्पन्न वि० स्तनदी प्ररपए, मई भबस हुमा करता है। सर्वोपरिस्म मपस्वर, o द्वितीय ( मप्परब) मपस्तर क मप्पम्प वायु निम्म जान स सर्वोपरिस्प स्वर माम्य स्तर पर गिर पाता। सर्पो पाण। इस मपम मप से उत्सम्न वि० स्व० की प्राय पफमाय प्रतीति होती। साप ही सधि पित मृदीय मप- म्तरापरण कारण इम विगुत् सा भूपष्ट पर पाठ भी नहीं रोता। मरि संपर्प भास्पम्तिक हाता है वो पर भी गिर पानी। परन्तु सबार स्थित मपम्वरक संप मा विणत उत्पन्न होती. या प्रवरपमा भूगमे में मा टाना। मैपप म उत्पन्न म्पोतिभाग संपप तारसम्म मतमी प्रकार म्मी कमी पर ला पादिदी भी अपत्तिा जाया करती महिमाम्नरिएप कोन- पपारात् (NE) मम्ने पारम्परिक संपर म गम्, स्का पिया, तारा १ पार प्रकार : पानि पुत्पमतम गत है। रगागनमितान य अनुमार जैस - भूगर्भ में पूर्व-पश्रिम-उत्तर-पषिम-शान ने-मानेप-पापम्पादि रिक्-प्रति रिसे धार-मपुर-विवादि मलस्रोत प्रवाहित यते हैं, एवमेव भाकाश में रि- प्रतिविक भेव से तीव्रवेग के साम वायुस्वर प्रवाहित हैं। कल्पना प्रीजिए, एक वायु स्तर तीन पेग से पूर्व से पश्चिम की भोर आया है, दूसरा उसी वेग स परिश्रम से पूर्व की भोर । यदि दोनों का गमनागमन माग विमिन्न है, जो शान्ति है। यदि पोनों के प्रान्समागों का मी सर्श हाजायगा, यो संपर्प से मोवि व्त्पान सेवायगी। पकिमि-सम्पकमात्र से उत्पन्न नही दम्योति वारा' है। यदि संप में बना विश्य है, जो म्पोति प्रवृख। यही सामाम्पम्याति विष्रया' है। यदि दोनों के प्राव भाग एक दूसरे से भाकान्त (ब) होजाते हैं, वो अविरापरूपेण महर बाबा सत्पन्न हो जाती है। साथ ही प्रान्समागाकान्ति के अनुपात से पड़ी दूरवकया प्रकारापुण बाता हुमा प्रतीत होता है, जिसका प्राकार पुसम माना गया है। यही उसका' । यदि दुर्भाम्म से दोनों वायुस्तरों के माग अमिन हो जाये १ दोनों का सस्मिना सपप से पड़ता है। इस संघर्ष से भयानक प्रविबामि के साथ वो ग्योवि पुत्र प्रपोकर अपने भास्पन्तिक बेग से स्पष्ट पर पाकर टारवा, बही 'व' मनाया है। सापही अधमराव पायुस्तर मामाघरोष दोन से भूपिगकी मोर भनुगत होता [भा पम्परा, भूगावि में प्रविष्ट होकर बनाया भूप्रदेश को कम्पिक कर बवाहै। यही सुप्रसिद्ध भाम्मेव प्राण (प्राय) पेन्द्र (मह), नासम्म, पतुरि भूकम्पों में से पीना पागम्य भूष्प पतापा है। पुरोवात, मन, विद्युत् स्तनपिनु, पपा इम म स वृष्टिफम्म में (जमवर्षक मपों में ) इन पांचों का राना पनिवार्य है। विपरीस पाचापपर मप सत्ता का कारण है। ऐसा मप निरपन कष्णवर्ण होता है। क्योंकि उर्च- स्तरेभावरख से सौर प्रकारा भास्पन्तिकहप म अचलदो पाता है। इसी भाभार पर मुति मे मा -धाम परिव समुदै भूत्वा वति (३० २०१०) यो भवति । सम्"-(ते में १८)! पारमापि भाप प्राण अमरामप पाप्प पापम्प प्राण गम है । अतएव बायतु ममात्र की प्रतिमा मानी गई है। सम्पर्य माण पगार मे मगीन की मी मूलप्रतिण पी। चर्पादि-सब चर' अनुमार पी सम्बत्सर की भी प्रतिया है। भारतीय लोक गम में भीगा -मापो गर पा रुत । (प.)। मो ( 3 ) स्पट कान्ति नरेस (क) अम्माधर नग प्रमस कामी बन सबसत । चमकत दामिनी पवास रमा मपा मशनी ख। रुण परन मपुर मेप गगन मरथा समन्तात (आपा०)।
प्रमाण पपही स्वरूप उपवर्णित है, विस का प्णपर्यन्य, विद्युत्, स्वनयिल, भादि रूप से भप एफ विश्पण हुमाहे। पही पद प्रासङ्गिक पतिविज्ञान है, जिसका प्रात मामा बह-प्रस्पाभाषण कम्म के साथ निम्न लिखितरूप से समन्वय किया जाना है। पवाखाया गया है कि मप्रसमाप्तापन के अनन्तर 'यम'-ये यजामहे इस्पाकाराकरिता यजनानुमति, यमनप्रचियरों में क्रमशः मिपुत्-स्वनपिलु सत्पम हो जाती है। सर्वान्त में पीपट्' इस्पाकारफ पजनकम्मारम्भ के साप सार पानी परसने लगता है। इस प्रकार प्राकृतिक यश के प्राणविध स्पिों (प्रासरेवताभों) के पम्पल्याहत्यारसक पन कर्मों से पृष्टिकम सवालिव है। जिस पबमान को पृष्टि अपपित हो, वह संम्या-सम्पत् से समतुलित 'नोभाषय' 'मस्तु भौफ्ट्'-'यस'-पजामहे'-चौफ्ट्' इन पांच माहसियों के प्रयोग पास में ऋस्विमों को क्रमशः 'पुरोगाव-भभा-विद्युत्'-'स्तनपिस्नु –'पपाकर्मा इन पाच अपिदविक प्रिकम्मावयवों मानस एंफरप के लिए प्रेरित करे। निश्पमेन इस मावनामात्र से ष्टि शेगी-वपति ष, पत्र-पत्रैपरस्विज संविधाना मन परम्ति'। और यमाववि पजम्प' वपन परिवार्य होगा। प्रामण की १८, १५ न दो कमिकामों में काम्पकर्मलक्षण सृष्टि के धारा मलिप्त मापा में इसी वृष्टिविधा न दिग्दर्शन कराया गया ॥१८,१६॥ इति-प्टिविधानम् पाभाषप-प्रत्याभावरण कर्म वर महत्पूण कर्म है, जिस म भापिपिक- माधिभौतिक-माभ्यात्मिक, तीनों मनामों को परिपूर्ण किया जा सम्या। समस्वरयममम्पधि भाभिविष्य है। इस समष्टि, म्पाटपात्मको विषय । पाराव-पत-अतु-पपन सम्बम, य पांच एफ सम्बत्सर की पार पष्टिपा है। स्वयं सम्पन्स, पीर उमकी मूत्रप्रमिष्ठाप समयभापति, रोनों समष्ठपात्मक मम्बन्सर पम्पानियों में स्पष्टयामिफा मम्पत्मरसम्पति का, पभ्रम्पानियों मगर अपरों सम्पम्पामि सम्बत्सर-सम्पतिका संमह करन गुप एस्पिष लोग पसयाम्पास्मा मा०प्र० कर्म म यममान मानुपपक्ष को माधिरिक मम्मति स युवकर त है, निसान दो परिणामों में विश्लपण एभा १ । पदभूत नवम्पारस्पास्मा गाापन कर्म म वास्मा में नव माप्यात्मिक प्राणापान ारा प्राप्याग्मि-सम्पति का संपर पर लिया जाता भूगर्म में पूर्व-पश्रिम-पर- र-दक्षिण-इशान-ने-मानेस-पापम्मावि वि-प्रति विक्से'सार-मपुर-विकारि पलनात प्रवाहित यते है, एवमेव भाकाश में दिए प्रतिदिक भेद से तीप्रवेग के साथ पायुस्वर प्रवाहित हैं। कल्पना कीथिए, एक पार स्वर तीन वेग से पूर्व से पग्रिम की भोर आरहा है, दूसरा म्सी पेग से पश्चिम से पूर्व की भोर । यदि पोनों का गमनागमन माग विमिन्न है, वो शान्ति है। पदि पोनों के प्रान्तमाों का मी सर्ग होजायगा, वो संपर्प से स्पोति सत्पन्न क्षेबापी। पकिमित्-सम्पर्कमात्र से उत्पन्न यही मुद्रम्पोसितारा है। यदि संभ में पता चिप है, वो म्योति प्रपत्र है। यही सामाम्पज्योति निष्रया है। परियोनों के प्रान्त माग एक दूसरे से माक्रान्त (ब)ोजाते हैं, वो प्रतिराम्हपेण प्रवर मासा उत्तम रो जाती है। सामही प्रान्समागाकानि के अनुपात से बड़ी दूरवक पर प्रकारापुरज बाताभा प्रतीत होता है, जिसका प्राकार पुच्चसम माना गया है। पही 'लका' । यदि दुर्भाम्म से दोनों वायुस्वरों के माग अमिनो जाये। दोनों का सर्वात्मना सप हो पाता है। इस संपर्प से मयामक प्रतिमामि के साम को ग्योति पुज प्रबहोर अपने मात्पन्तिक पेग से भूपठ पर भार बरता है, वही 'वजू' करवाया है। साथ ही समाप्रशस्त पायुस्वर मार्माबरोध होने से भूपिग की पोर अनुगत होता मा कदरा, मृगावि में प्रविष्ट होकर रश्मिा भूप्रदेशको कम्पित कर देता है। सही सुप्रसिर भाम्नेय अरुण (पाप्म ), पेम (मा), पागम चतुर्विध भूकम्पों में से पोपा बापम्प भूकम्प कालागाई। पुगेवाव, मन, विद्युत्, स्तनविस्नु, वर्षा इमाम से प्रष्टिकर्म में (बसवर्षफ मों में ) इन पांचों कायमा पनिवार्य है। विस्वर ही श्य पाचावया मेम-सत्ता का कारस। ऐसा मप मिरचयन कप्पवर्म होता है। क्यों कि उर्म-स्व के पामरण से सौर प्रकारा भास्पन्तिकरूप से अवम्म हो जाता है। इसी भापार पर भुवि ने कहा द-भामणदिव खनुवै भूत्वा वर्पवि' ( सं. २।४।१०) प्यो मति । पोष्टरूपम्" ( सं २०८)। पारमेष्टय पाप प्राण प्रामम है, पाप्प पासम्म प्राण गन्धर्व है। प्रसएष वर्षातु काममात्र की प्रतिष्ठा मानी गई है। गन्धर्व प्राण के सम्बन्ध से सगीत की मी मूलप्रतिष्ठा पही है। 'पहि-सर्व शतब' भनुसार पदी सम्वत्सर की भी प्रतिष्ठा है। भारतीय लोक संगीत में मी वर्षा .-मापो भर परपा रुव । (घ२०)। यो (3)सट कान्ति नरेस (8) मम्मोपर नग प्रमत्त कामी बन सब दरपत। पमस्त दामिनी पटाफ एका मयो मनी रप । रुष्ण परन मपुर मेप गगन मरपा समन्वात (आपा०)।
प्रपामा --- ६. बिसे जानकर तद्भावनापूर्वक प्रामावण-प्रस्यामावह कर्म करने वालों के लिए यह पार्षिन कामनाएं पूरी हो जाती है ॥२०॥ इति-विवेचनाप्रकरणम् (छ) समामम्पेर्द मुगवामयम् । । II TL . " 11 •स-प्रकृष्णपाठः ( अर्याषपोषानुगता)- । (भव प्रपमका पत्रमा पाये तवीर्य, पतुर्मप्रपाठोप पतुप प्रापणम् ) प्रय विमानणास्मफे प्रयाजनापण प्रथम प्रामयम् ॥ 1 - 1 १-प्रयाजवन्धुः ऋतयो ह वै प्रयाजा । तस्मात् पञ्च भवन्ति, पञ्च हि ऋतवः ॥ (१)॥ देवाश्च वो अमुराश्व उमये प्राजापत्याः पस्पृधिरे-एतस्मिन् यज्ञे प्रजापतो पितरि' सम्वत्सरे-'यस्मा- कमयं भविष्यति, श्रस्माकमयं भविष्यति' इति ।। (२)॥ ततो देवा मर्चन्त ग्राम्यन्तश्चेरु, त एतान् प्रयाजान ददृशु , नैरयजन्त। तैईतून सम्वत्सर प्राजयन्, ऋतुम्य मम्वत्सरात् सपत्नानन्तरायन, तस्मात् प्रजपाः। 'प्रजया.' ह वै नामैतत्-यत् प्रयाजा' इति । तया एवेष एतैर्ऋतून प्रस्तुत शतपप-विवानभाष्य में प्रारम्भ म 'निमुन 'प्रतरण पाठ भर म रा प्रकार के मूलपाटों का ममावरा दुमा रामम्बर-पारापग्णपाटी निर्मुल पाठ। भविपाशाम्म अम्बर पाठ 'प्रतम पाट । 'पर' पिर अभी हमें प्राम नहीं ले सक। अतन पम्नुन मा में सम प्रताप पार जादी ममावरा मार।द, भगन माम अवश्य नेमु उपाठ का मी पपापूष ममापरारातार गा। मम्पारस- है, रिसफा ५ काशिका में उम्लेख हुमा है। शेप यमाता है-माधितिक . माधिमौखिक ए फल की प्राप्ति पी. (माकाश), भौर एपिणी, इन हो विषः से होती है। भामाशोपललित पर्भयपना समय पर पति करने में (निकामे निकामे न पाम्पो वर्षतु), यही भागात्मक भाभिमौसिक अभी का अनुमा। मामय की १८, १५, इन दो कािभों में इसी अनुमा म स्पष्टीकरण हुआ है। प्रभुत २० वी कणिका में पविग्मनुगत भाभिभौविक मम पर्व *फस का दिगदशन करावी ही विनती है कि जिस प्रकार भोनापर' भारि पाच व्यातियों से प्राणदेवता पुरोगातादि पाय टिकामें का समासान कर स है, एवमेव ही पाहनियों से (म्मात्यात्मक देवाहान-बान-मापान भाषण पर से) बिरागौरूपपरा प्रथिवी का दोहन किरते हैं। दोहन कम्मे में गौ का सामीप्य परे मत्स (पाबसने के लिए) खोलना, पत्ममुसा का मान के सा सम्मम्म राना परचेको इटोते हुए पानपात्र लेकर गोदने के लिए समय हो जाना, एवं पोइना, 4 पांच पर्ष पनि ममापियों का जमरा इम पांचों पोहनकर्म-पर्षों से अमिक सम्पम्प) पानि पनि ही विराद् ग है। इसी से पार्मिक प्रमियान सम्मानित है, जैसा कि, रितीमकारा स्वर्गत 'अग्निहोत्र माविमान में विस्तार से बताया जान पामा पार्षिय प्राणामि १-१५-०१ मे से तीन विष हो जाते हैं, जैसा कि पूर्व प्रकरणों में विस्तार से पनामा पुा है। त्रिरत् स्तोमामुगव पार्थिव भन्नि गाईपल है यह एक कम है। फलदायोमानुगत मान्धरिश्य ( पार्मिक ही) पनि मिष्य है। भविप मापत्रिक सर्पमाण सम्म से मामला है। विशस्वोमानुगत दिन (पाधि हो) पनि मापनीय है, यह एक कला है। इस प्रकार स्वोमामिका माभिवी के प्रविधी अन्तरिक-पौलप तीनो स्वोमसोको रे मेर से पार्मिक गौरूप भनि १८ १ मे से १० व दो गाते हैं। यही रास विरार पनि है। पशार विराट् क्व से समावित होने से ही गौसप पार्पिन भनि बिरा' बवामा है। इसी के सम्बन से चित्त ( मूत) भनिभय भूपिया वियर गौ जनामा है। विराट् गौ - बस्स है-मावसिषा मामा र भूवा, दो भपने साति, एवं सबरमपम से पम्पबरा' नाम से प्रसिद्र होया है। इसी वत्स (बापु) मम्बन्ध से पुनर्वापरत पायवा विरागी का बोइन भने में घर। वायुराही पार्मिक रसमानामोकारान झवा है। अहो विरागी का प्राममा विसे ,गानार तदभावनापूर्वक भाभाषण-प्रस्याभावण मर्म करने वालों के लिए यह पार्थिव कामनाएं पूरी हो जाती है।॥ २० ॥ - इति-विवेचनाप्रकरणम् (६) 718 समाप्तम्मे भगवामयम् । - प 11 1 1 •स-तृष्णपाठः ( अपित्रोधानुगतः)-॥ (भग प्रयमकारो पनमाम्माये तृतीय, चतुर्गमपाठकेर पतुर्व प्रापणम् ) प्रय विबामणास्मफे प्रयासमाम प्रधर्म प्रामणम् 11 । । 1 १-प्रयाजवन्धुः ऋतवो ह वै प्रयाजा । तस्मात् पञ्च भवन्ति, पञ्च हि मृतवः ॥ (१)॥ देवाश्च वो मसुराश्च उभये प्राजापत्या पस्मृधिरे-एतस्मिन् यत्ने प्रजापतो पितरि' सम्वत्सरे-'यस्मा- कमय भविष्यति, भस्माकमयं भविष्यति' इति ।। (२)। ततो देवा अर्चन्त ग्राम्यन्तश्चेरु, त एतीन् प्रयाजान ददृशुः, नैरयजन्त। तेतून सम्वत्सरं प्राजयन्, ऋतुम्य मम्वत्सरात् मपत्नानन्तरायन् तस्मात् प्रजाः। 'प्रजया.' ह वै नामैतत्-यत् 'प्रयाजा ' इति । तया एवेष एतेतून प्रमनुन रातरध-विधानमाप में प्रारम्म म निभुमा एवं 'प्रतुएष पाठ मद सरो प्रकार के मूलपार्टी का ममावरा मादा मम्पर-पारायाणपाठ दी 'निर्भुज पाठ।। पपर्यावयापारमा अम्बर पाठ 'मतृपण पाठ । 'बर' प्रिमी में प्राप्न मस। पतम्ब प्रस्तुन मह में पस 'प्राण' पाठ कादी समावरा हमारा ६ प्रगत मासे प्रवरब नेनु यपाठ का भी पधापूष समापराधातासगा। मम्पार-
सम्वत्सर प्रजयति, ऋतुभ्य सम्वत्सरात् सपत्नानन्तरेति,
तस्मात् प्रयाजेर्यजते ॥ (३) ॥ ।
ते वा भाज्यहविपो भवन्ति । 'वजो वा भाज्यम् । एतेन
वे देवा व णाज्येन ऋतून सम्वत्सर प्रजयति, ऋतुभ्य सम्व
सराव सपत्नान भन्तरेति । तस्मादाज्यहविषो मवन्ति ॥
(४)॥ एतद्वे सम्वत्सरस्य स्व पय -यत् 'भाज्यम्' । तत्
स्वेनेवेनमेतत् पयसा देवा व्यकुर्वत । तथो एवेनमेष एतत्
स्वेनेव पयसा स्वीकृरते । तम्मादास्पदवियो भवन्ति ।।(५)।
स यत्रैव तिष्ठन् प्रयाजेभ्य याश्रावयेत् तत एव नाप
कामेत् । समामो वा एवं सन्निधीयते-य प्रयाजेर्यजते ।
पतरो वे सपत्नयाः पराजयते, या वेस कामति, अमित
रामु जयन्तामति । तस्मादमितराममितरामेव कामेत,,
अभितरामभितरामाहुतीर्जुहुयात् ॥ (६) ॥ तदु तथा, न कु-
योत । सत्रैव तिष्ठन् प्रयाजम्य मानावयेत-तत एवानाएका
मेत् । यत्रा एव समिद्धतम-मन्येत, तदाहुतीर्जुहुयात् । समि
दहोमेत वेव समिद्धा माहुतय ।। (७) i).
.
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FUL
।
11 २-उत्तरः प्रैष ।"
स प्राधान्य माह-"समिधो यज" इति । तद्
वसन्त समिद्धे । स वसन्त ममिद्धो अन्यान् ऋतून समि
न्धे । ऋतव समिद्धाः प्रजाश्च प्रजनयन्ति, भोपधीश्च
पचन्ति । तद्वव खलु सर्वान्तून निराह । श्रय “यज, यज"
प्पामधाम
इत्येव उत्तरानाह-भजामिताये जामि ह कुर्यात्-यत्। "त
नुनपतिं यज, इडो यज" इति ब-यात् । तस्मात्-'यज,
त्यजा इत्येवोत्तराना(८)॥
.
।
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--
।
३-प्रयाजिब्राह्मणाम
! I स वै 'समिधो' (१) यजति । वप्तन्तो वे समित् ।
वसन्तमेव तदेवो भवृञ्जत, समन्तात् सपत्नान अन्तरायन् ।
चमन्तमु एवैपा एतद् वृत, वसन्तात् सपत्नान अन्तरेति।
तस्मात् समिषो यजति ।। (६) ॥ अथ तनूनपात' (२)
यजति । ग्रीष्मो वै तनुनपात्-प्रीष्मो हिाथासां प्रजाना त
नूस्तपति । ग्रीष्ममेव तदेवा अवृक्षत, भीष्मात् सपनान् भ.
न्तरायन् । ग्रीष्मम एवेप एतद् वृत, प्रीष्मात् सपलान
अन्तरेति। दस्मात्तनुनपात यजति ।। (१०) || श्रय
'इडो (३) यजति । वर्षा या इह.। इनि हि वर्षा,इह -
यदिदं क्षुद्र सरीसृप ग्रीष्महेमन्ताभ्या नित्यक्त भवति-तद्
वर्षा ईडितमिवानमिच्छमान वरति,,तस्माद वर्षा इड , वर्षा
एव तद् देवा अवृञ्जत, वर्षाभ्य सपनान् अन्तरायन ।- वर्षा
व एवेप एतद् वृद्के, वपाम्य सपत्नान् यन्तरेति । तस्मा
दिहो यजति ।। (११) ॥ थथ 'वर्हि । (४) यजति । श
रदै वाई । इति हि शरद् वहि -या इमा थापधयो ग्रीष्म
हेमन्ताभ्यां नित्यक्ता भवन्ति, ता वर्षा वर्दन्ते, ता शरदि
वहिपा रूप प्रस्तीर्ण शेरे-तस्मात् शरत् वईि । शरदमेव
.
दा
--
तदेवा प्रवृक्षत, शरदः सपत्लान् भन्तरायनशरदमु एता
एतद् वृक्र, शरद सपत्नीन अन्तरेति। तस्मादपहिर्म
जति ॥ (१२) ।। अथ 'स्वाही-स्वाहा(५) इति बज
ति । अन्तो वे यज्ञस्य स्वाहाकारः। अन्त ऋतूना हेमन्तः
वसन्ताद्धि परादर्प,। , अन्तेनैव तदन्तं देवो भवृक्षत, भ
न्तेन अन्तात् सपत्नान् अन्तरायन् । अन्तेनो एवेष एतद
थन्त वृक्र, शन्तेन अन्तात् सपत्लान अन्तरेति । तस्माद
स्वाहा,स्वाइति यजति ।। (१३)ता एतद वसन्तन एव
हेमन्तात् पुनरसु एतस्मादयप पुनर्भवतिगपुनह योम
स्मिन् लोके भवति, य एवमेतद् वेदा (१४) F TH
I Fम वैयन्तु, वेतु इति यजतिम्घजामिताये । जामि
हैं कुर्यात्-पद पन्तु, न्यन्तु इति वैवं यजेत्, "वेतु, वेतु'
'इति वा । ध्यन्तु'-इति चे योपा, "तुति वृपा, मिथुन
मेवेतत् प्रजननं क्रियते । तिस्माद् व्यन्तु,' वैतु' इति
यजति (१५) ।।
। यि चतुर्थे प्रयाजे समानयति यहिपि । मजा वे वर्हि ,
रेत भाज्यम् । तत् प्रजास्वैवैतद् रेत सिध्यत । तेन रेतसा
सिक्तेन इमा 'प्रजाः पुनरम्याव प्रजायते । तस्मात् चतुर्थे
प्रयाज 'समानत वर्हिषि ।। (१६) । सहग्रामो वा एप
सन्निधीयत-य प्रयाजेर्यजत । 'यतरं वे 'संयत्तयोमिनमाग
स्वति म जयति । तदतत्-उपमृतोऽधि जुहू मित्रमाग
पद्धति, तन प्रजयति । तस्मात् चतुर्ये प्रयाजे 'समानयति
चर्दिपि ॥ (१७) । यजमान एव जुहूमनु, योऽस्मा थराती
।
प्रयास
यति-स उपमृतमनु । यजमानायैवैतद् छिपन्त भ्रातृव्य पर्लि
हारयति । अव जहमनु श्राद्य उपमृतमनु । अत्र एवेतन
श्राद्य वलि हारयति । तस्मात् चतुर्थे प्रयाजे समानपति॥
(१८) ।। स वा अनवमृशन् समानर्यात । स यद्ध श्रवमृ
शेत-यजम्मन द्विपता भ्रातृव्येन अवमृशेत्, प्रचारमाधन
अवमृशेत् । तस्मादनवमृशन् समानयति ॥ (१६) ॥ श्रय
उत्तरा जुडूमध्यूहति । यजमानमेवैतद् द्विपति भ्रातृव्येऽप्यू-
इति, प्रचारमाद्येऽप्यूहति। तस्मादुचरां जुडूमध्यूहति।।(२०)।
देवा ह वा ऊचुः-हन्त विजितमेवानु सर्व यज्ञ संस्थाप
याम , यदि नोऽसुरर चसन्यामजेयु -'संस्थिते एव नो यज्ञः
स्यात्' इति ॥ (२१)॥ त उत्तमे प्रयाज स्वाहाकारेणैव
सर्व यज्ञ समस्यापयन् । 'स्वाहाग्निम्' इति तदाग्नयमाज्य
भाग समस्थापयन् । 'स्वाहा सोमम्' इति तत् सोम्यमाज्य
भाग समस्यापयन् । 'स्वाहाग्निम्' इति-तध एप उभयत्रा
च्युत भाग्नेय पुराढागा भवति-त समस्यापयन् ॥(२२)।
अथ यथादवतम्। 'स्वाहा देवा थाज्यपा ' इति-तत् प्रयाजानु
याजान् समस्थापयन् । प्रयाजानुशाजा वे देवा थाज्यपा ।
"जुषाणो अग्निराज्यस्य वेतु" (ते. वा० ३।५।६।२)
इति तदग्नि स्विष्टकृन समस्यापयन् । अग्निहि स्विकृत् ।
स एपोऽपतर्हि तथैव यज्ञ सतिष्ठत-यथेन दवा समस्याप
यन्। तस्मादुत्तमे प्रयाजे स्वाहा स्वाहेति यजति-यावन्ति ।
वीपि भवन्ति । विजितमेव तत्-थनु मर्व गन्न संस्थापयति ।
तस्माट यदत ऊर्व विलोम यज्ञ मियत-न तदाद्रियेत,
।
पथ - 'संस्थितो मे यज्ञ ' इति ह विद्यात् । स ह एष यज्ञो यातयामे- वोस-यथा वपटकृतम् हुतम्, स्वाहाकृतम् ।। (२३) ॥ ते देवा भकामयन्त-'कथ विम यनं पुनराप्याययेम, अर्यात यामानं कुर्याम, तेन ययातयाम्नो प्रचरेम' इति ॥ (२४)॥ स यद् जुहामाज्यं परिशिष्टमासीत्-तेन यज्ञ समस्थापयन,- तेनेव यापूर्व हवींष्यभ्यधारयन्, पुनरेवेनानि तदाप्यापयन, अयातयामान्यकुर्वन् । अयातयाम पाज्यम् । तस्मादुचम प्रयाज इष्ट्वा ययापूर्व इवींष्यभिधारयति, पुनरेवेनानि तदा प्पोययति, भयातयामानि करोति । यातयाम खाज्यम् । तस्माद् यत्य कस्य च हविषोऽव पति-पुनरेव तदभिधारयति, स्विष्टकृत एव तत् पुनराप्याययति, अयातयाम करोति । भय यदा स्विष्टकृतेऽवद्यति-न तत पुनरभिधारयति । नो हि तत कांचन हविषोऽग्नावाहुर्ति होष्यन् भवति ॥(२५)। पति पञ्चमायावे ववीय चतुषप्रपाठकेप पतुर्माणम (UN) (१४) इविविवाभणात्मके प्रयाबामणे प्रथम प्रापषम (भब प्रबमकापडे पछमाम्माम चतुर्थ, चतुर्थप्रपाठके प पधर्म प्रामणम् ) पप विधामणात्मके प्रयाममामये विवीर्य प्रामणम् ४-प्रयाजावृत् ( पद्धतिः) स व 'समिधो' (१) यजति । पाणावै समिष प्राणानेवे तत् समिन्धे । प्राणैर्खयं पुरुषः समिद्ध । तस्माद-
प्रयाबा
भिमृशेति यात्-यापतापी स्यात् । स यद्युष्ण. स्यात्-
'ऐव तावत् शंसेत, ममिद्धो हि तावद् भवति । या शीत
स्पोत्-नाशसेत । तत् प्राणानेव पस्मिन् एतद् दधाति ।
तस्मात् ममिधो यजति ॥ (१) ॥ अथ 'तनूनपात' (२)
यजति । रेतो वै तनूनपात् । रेत एवैतत् सिञ्चति । तस्मात्
तनुनपात यजति ।।(२॥ अथ 'इडो (३) यजति । प्रजा वा
इह । यदावे रेत सिक्न प्रजायते-यथ तत् ईडितमिव
अन्न इच्छमान चरति, तत् प्रेव एतत् जनयति-तस्मादिडो
यजति ॥(३)॥ अथ 'पर्हि । (१) यजति । भूमा वै वर्हिः ।
भूमानमे तत् प्रजनयति । तस्माद् वर्हिर्यजति ॥(४)॥ अथ
'स्वाहा, स्वाहा' (५) इति यजति । हेमन्तो वा ऋतूनां
स्वाहाकारः । हेमन्तो हीमा प्रजा स्व वशमुपनयते ।
तस्माद्ध मन् म्लायन्त्योपधय , प्र वनस्पतीनां पलाशानि
मुच्यन्ते, प्रतितरामिव वयांसि भवन्ति, अधस्तरामिव वासि
पतन्ति । विपतितलोमेव पाप पुरुषो भवति-हेमन्तो होमा
प्रजा स्व वशमुपनयते। स्त्री ह वै तमद्धं कुरुते श्रियेऽन्नाद्याय
यस्मिन्नद्रे मर्गत-य एवमेतद (4)।
५-प्रयाजानुमन्त्रणम्
दवाथ वा श्रसुराम उभये प्राजापत्या पस्पृधिरे । ते
दण्डेर्धनुभिर्न व्यजयन्त । त ह अविजयमाना ऊचु -'इन्त
वाच्येव ब्रह्मन् विजिगीपामहे, स या नो वा व्याहता
मिथुनन न अनुनिनामात्-स सर्व पराजपाते, थय सर्वमि-
तरे जथान्' इति । तथा' इति देवा भवन् । ते देवा इन्द्रमन
वन् 'व्योहर' इति॥(६)॥स इन्द्रोऽनवात्-‘एको मम' इति ।
अथ 'अस्माकमेका' इति इतरेऽब्रुवन् । तदु तन्मिधुनेन
अविन्दन् । मिथुन हि-एकम, एका च ॥(७) 'दो मम'
इति इन्द्रोऽब्रवीत् । अय 'अस्माकं द्वे' इति इतरेऽब्रुवन् ।
तदु तन्मिथुनमेव अविन्दन् । मिथुनं हि-दो च, द्वे च ॥(८)ll
'त्रयो मम' इति इन्द्रोऽब्रवीत् । भय 'स्माकं तिस्र ' इति
इतरेऽब्रुवन् । तदु तन्मिथुनमेगविन्दन् । मिथुन हि-त्रयम,
तिसच (E) 'चत्वारो मम' इति इन्द्रोजीर । यय
'अस्मार्क चतस्र' इति इतरेऽब्रुवन् । तदु तन्मियुनमेवाव
न्दन् । मिथुन हि-चत्त्वारभ, चतसभ (१०)। 'पञ्च मम'
इतीन्द्राऽब्रवीत् । तत इतरे मिथुनं नाविन्दन् । नो खत
ऊर्च मिथुनमस्ति । पञ्च-पञ्च इति होवैतदुभय भवति ।
तताऽसुराँ सर्व पराजयन्त, मर्वस्माद् दवा श्रमरानजयन,
सर्वस्मात् सपलानसुरान् निरभजन (१)
तस्मात् प्रथम प्रयाजे इष्टे चूयात्-एको मम' इति ।
ए तस्य, यमह द्वेष्मि' इति । यधु न द्विष्यात् -'योऽस्मान
दृष्टि, य च वय द्विष्म ' इति व्यात् ॥(१२)॥ 'टो मम'
डात द्विनीय प्रयाज-टू तम्य-पोऽस्मान् द्वेष्टि,
य व वयं द्विप्म' इति ।।(१३)।। 'यो मम' इति तृतीये
प्रयाज-'तिमस्तस्य- याऽस्मान् हेष्टि, य च वय द्विष्मः'
इति ॥ ४॥ चत्वारो मम' इति चतुर्थे प्रयाज 'चतवस्तस्य
पाऽस्मान् टि, यं च वयं द्विप्म' इति ॥(१५)। 'पर
प्रयायम्म्मम
मम इति पञ्चमे प्रयाजे-'न तस्य किम्वन-योऽस्मान् दोष्टि,
यं च वय द्विष्म.' इति । स पञ्च पवेत्येव भवन् पराभवति ।
तथास्य सर्व सवृक्त-सर्वस्मात् सपत्नान निर्मजति-य
एवमेतछेद (१६)॥
इति पनमाम्पाये पतुर्य, पतुषप्रपाठक र पप्रम मापदम्
'-(१०) (ar)-
(पनमाम्यापर समाम)
इति-त्रिनामसारमा प्रमाणे डिसीय
-
प्रामसम्
.
7
-
।
(भप प्रथमकारो पष्ठाभ्यामे प्रथम, पसुर्यप्रपाठके प प प्रायम् )
प्रय त्रिप्रापणास्म मपामापणे तृतीय मामएम
(पष्ठाम्याप' प्रारम्म)
६-प्रयाजानामिष्टौ प्राथम्यम्
तवो है वे देवेषु यज्ञे मागमीपिरे-या नो, यज्ञे भजत,
मा नो यज्ञादन्तर्गत,अस्त्वेव नोऽपि यज्ञे भ ग -इति |
तद देवा न जझु । त ऋतवो देवेवजानत्सु असुरानुपाव
तन्त-अप्रिय न् देवानां द्विपतो मान्यान '() ते
हेतामेधतुमेधाविरे-यामेपामेतामनुशृगवन्ति । ,कृपन्तो ह
स्मैव पूर्वे वपन्तो यन्ति, 'लुनन्तोऽपरे मृगन्त , शश्वद्धम्याड
कृष्ट्रपच्या एवोपर्षय पेचिरे ॥३॥ तं देवानामांग बाम।
कनीय ईन्चती द्विषन्, दिपते रातोयति किमु एतावन्मान
मुपजानीत-यथेद-पिताऽन्ययाऽसदिति ॥(४)। तै होचु -
'मृतूनेवानुमन्त्रयामहै'-इति । 'फैन' इति । 'प्रथमाननान
२१२ - - यज्ञे यजाम' इति ॥(५)॥ स हाग्निस्वाच-'अथ यन्मां पुरा प्रथमं यजय, काह भवानि' इति । 'न त्वामायतनाद न्यावाम' इति । ते यतूनभितयमाना याग्निमायतनाद नाच्यावयन् , तस्मादग्निरच्युत । नह वा भायतनाच्यवत यस्मिन्नायतने भवति-य एवमेतममिमच्युतं वेद ॥(६) ते देवा अग्निमनुवन्-‘परेहि, एनॉस्वमेवानुमन्त्रयस्व' इति । स हेत्याग्निरुवाच-ऋतव । श्रविद वे वो देवेषु यज्ञ भाग' मिति । 'क्थ नाऽविद ' इति । 'प्रयमानेव वो यज्ञ यक्ष्पन्ति' हति (9)॥ त ऋतबोऽमिमब्रुवन्-'भा वय त्वामस्मासु भजाम -यो ना देवपु यज्ञे भागमविद' इति । स एपोऽमिळ. तुप्वामत:-"समिधोऽग्ने"--"तनूनपादग्न-"इहोऽ. अग्ने" "वर्हिरग्न"-'स्वाहाग्निम्' (ते. वा० ३१५५१) इति । भाभक्तो हवे तस्यां पुण्यकृत्यायां भवति, यामस्प समानो ब्रुगणः करोति, थमिमते ह वा भस्मा थामिमन्त ऋतव भोपधी पचन्तीद सवय-य एव मतममिमृतुप्वाभन वेद (क) तदाहु -'यद् उत्तमान प्रयाज नावाहन्ति पय स्मा दनान प्रयमान यजन्ति' इति । 'उत्तमान घेनान यज्ञवाक- ल्पयन्-अयमान् वा यनाम-इत्ययुरन् । तस्मादुत्तमाना वाहपन्ति, प्रयमान यजन्ति' KESH चतुर्थेन वे प्रयाजन देवा यक्षमाप्नुवन्, त पचमेन समस्यापयन् । श्रय यदूर्वमसस्थितं यनस्प-स्वर्गमेव तेन लोई समारनुवत (१०)। ते स्वर्ग लोकं यन्तोऽसुररचसेम्य भासद विभयामनुः । तमं पुरस्तादकुर्वत चोहर्ष
प्रमापाव
रक्षसामपहन्तारम् । अनि मध्यतोऽकुर्वत-रचोहणं रचसाम
पइन्तारम् । भमि पभादकुर्वत-वाइण रचसामपहन्तारम्
॥(११)॥ स यद्येनोन् पुरस्तादसुररक्षसान्यासिसचन्-
थमिरेव तान्यपाहर--रचोहा रक्षसामपहन्ता । यदि पश्चादा
सिसकतन्-घमिरेव तान्यपाइन्-रचोहा रक्षसामपहन्ता। यदि
पभादासिझन्-अग्निरेव तान्यपाहन-रचोहा रक्षसामपह
न्ता । अत एवं सर्वतोऽग्निभिगुप्यमाना स्वर्ग लोक
समाश्नुवत ॥(१२)। तथो एवेप एतचतुर्थेन प्रयाजेन यज्ञ
माप्नोति, त पञ्चमेन सस्थापयति । अथ यदत ऊर्ध्वमस
स्थितं यज्ञस्य-स्वर्गमेव तेन लाक समश्नुते ॥(१३)। स
पदाग्नेयमान्यभागं यजति अग्निमेवैतत् पुरस्तात् कुस्ते
रक्षोहण रक्षसामपहन्तारम् । थय यदाग्नेय पुराडाशो
भवति अमिमेवेतन्मध्यत कुरुते रचाहणं रक्षसामपहन्तारम् ।
अथ यदग्नि स्विष्टकृतं यजति भग्निमेवैतत् पश्चात् कुरुते
रचोहण रक्षसामपहन्तारम् ॥(१४)॥ स यद्येन पुरस्तादसु
ररक्षसान्यासिसङ्कन्ति-अग्निरेव तान्यपहन्ति-रचौहा
रक्षसामपहन्ता। यदि मध्यत थासिसचन्ति अग्निरेव
तान्पपहन्ति रक्षोहा रचसामपहन्ता । यदि पवादासिस
सन्ति थग्निरेव तान्यपहन्ति-रक्षोहा रवासामपहता । स
एवं सर्वतोऽग्निभिपमान स्वर्ग लोक समश्नुते १५॥
७-अभिचार
स यो पुरस्ताद् यन्नस्य अनुव्याहरेत्-त पनि याद
'मुख्पामाचिमारिष्यति अन्धोवा,वधिरो वा भविष्यास' इति ।
-
एता वै मुख्या भातयः । तथा हैव स्यात् ।। (१६)। पर्दि
मध्यतो यन्नस्य अनुव्याहरेत्-तं प्रति यात् 'श्रमजी, अप
शुभविष्यसि' इति । प्रजा के पशवो मध्यम् । तया हेव स्यात्
।।(१७)। यधन्ततो राज्ञस्प अनुव्याहरेत्-तः मैति याद
'प्रेमतिष्ठितो दरिद्रः चिप्रेऽमु लोकमेष्यसि' इति । तथा हैव
स्यात् । तस्मादु ह नानुन्याहारीव स्यात् । उत होवित्परो
भवति ॥(१८)॥
८-फलश्रुतिः
सम्वत्सर ह वे प्रयाजेर्जयन जयति । स ह न्वनेनं
जयति-याऽस्य द्वाराणि वेद। किं हि स ते है फर्याद
यानन्तरतो न व्यवविद्यात् यथा ययास्य ते भवन्ति । तस्य
वमत एव द्वारं, हेम तो द्वारम् । तं वा एत सम्बत्तर
स्वर्ग लोक प्रपद्यते । सर्व वे सम्वत्सर , सर्व वा यक्षग्यम् ।
एसनो हास्याचग्यं सुकृतं भवति यक्षग्यो लोकः (१)
परिशिष्टप्रश्नोत्तरविमर्श
तदाहुः--'विदेवत्यान्याज्यानि' इति । प्राजापत्यानि'
इति इ अ.यात् । श्रनिरुका ये प्रजापति , थनिरुताया-
ज्यानि । नानि देतानि यजमानदेवत्याग्यैव । पजमानी व
स्त्र यज्ञे प्रजापति -एतेन घुस्य ऋत्विजस्तन्वते त जनयन्ति
॥(२०)स थाज्यस्य उपस्तीर्य, दिईविपोऽवदाय, श्रया
परिष्टा भाज्यस्य भमिधारयति । सेपा भाज्यन मित्राहु-
तिह यत । यनमानेन इवेपतम्मिा हयते । यदि ह या भपि
प्रयागमन
२१५
दरे सन् यजते, यद्यन्तिके यथा देवान्ते सत इष्ट 'स्यात्,
एव हेवेव विदुष 'इष्ट भवति । यधु हापि वहिव पाप
करोति-नो हैव वहिर्दा यहाद्भवति य एवमेतदेद ॥(२१)।
इति पप्ठाभ्याये प्रबर्म, चतुर्पप्रपाठके प पष्ठ माणसम्
-(१) (a)
(चतुर्पप्रपाठक समाप्त)
इवि-विनापणास्मो प्रयासबामणे पतीय प्रामणम
--३-
समाप्तम्पई त्रिनामसात्मक प्रयामामणम्
इति-प्रतरणपाठ (स)
-
--
क-मयमत्र-मूलानुवादे प्रासनिकसमहा- - -- , प्रस्तुस ‘प्रमान' कर्म का प्राममान्य के वीन प्रामों में सापपतिक निरू पण हा है।-भतएष समानप्रकरणानुबन्ध स हमने तीन बामणों का कत्र सम- वित रूप से समावेश करमा मावश्यक माना है। सीनों प्राणों में प्रयास-में का विश्लेपण हुमा, प्रतएव तीनों की समपि को एक मामम मानते हुए हममें प्रयाबमापन' इस एक नाम से म्पपात करना अपमान लिया। उस- त्रिपामयात्मक प्रयामग्राम प्रथम, द्वितीय, तीय, ग्रामों में कमरा ३, २, ४, इवन भवाम्तर प्रकरणों का समावश हुमा। तीनों प्रामणों की करिसका संस्था प्रमशः (१)–२५, (२)-१६, (२)-२१, हैं। सम्मम त्रिनामया स्मक इस प्रणाम प्रापय में। भवाम्तर प्रकरण, वमा ६२ कविका दाबाती है। इस प्रासङ्गिक संग्रहका सस्व में रखते हुए ही प्रस्तुत मूलानुसार का समन्वय करना चाहिए। . त्रिप्रकरणात्मा २५ कपिएकात्म प्रथम प्रयात्राम सम । हिमकरसात्मई १ कवितकात्मदितीय प्रपाबमापणम् २ (१)-1-प्रयाजबन्धु -१०,५०(५०) (२)-२-पचरम पर .६६०, ०। (१०) (३) -प्रसारमामयम्-०, २५ 201(१०)) (१)-४-प्रपामात्---१०,५ । (५) (२)-५-प्रानुमन्त्रसम्-०१६।१). (प्रपागनामिष्टी प्रापम्पम १०,१०(१००) (२)---मिनार -१६० १८.। (३०) (३)--फमभुति १६० (10) (४)-परिशिप्रानात्तरपिमरा'-२०२१०(20) निवारणात्मक भपान्तरप्रकरणात्मक, १२ विष्ण स्मा-"प्रपामामणम्' - पतुपकरणास्मई २१पिकास्म तृतीयं प्रयागमाम गगम३ स-मूलानुपादा- (१)-पाचरें अपाय में तीसरा (३), पीये प्रपाठक में पीया (४)-(१९२३)(IM)- (क)-पाच अभ्यार में पौपा (१) बोये प्रपाठक में पाँचवों (५)-(११४)(m)- (३)-पठे सम्पाय में पहिला (१), पीये प्रपाठक में बठा (क)(१।६१)-(६)- वीन प्राममों की समष्टिरूप-"प्रयासमापन" (प्रथमकरिडकानुगत कम से २२, २३, प्रामण) प्रथमकाता में पान अम्पाय में तीसरा, चौमे प्रपाठक में बोया मामण (१-५-३)-(१-४-४) (१-त्रिप्रामणात्मक प्रयाजमामण में मप्रान प्रपम ग्रामस) -प्रयासन्यु (उपपति) (पूर्व क न गादाफ्नप्रामण में ल गावापन-निगदमन्त्र के पाठानम्वरविसमा भाषण, प्रत्याभावसकर्म की उपपत्ति बनवाई गर उस का पत्राप्रपाम' पाग स समाम्म है। भावापफम्म से पहिल पायाम' नामक कर्मविरोप पिहित है, जैसा कि, स्वानुगत-परविप्रकरण में स्पष्ट किया जाने वाला है। 'भो भावप' इत्यादि म्पादियों के पारसरिक सम्मानपूर्वक विहित-पप्रपा बिमल पाम्पाहुतिकर्म ही 'पसायामकर्म है। भा० प्र० पर्मेविकम्पवा पतकाते हुए पूर्वबामणाम्यान सूरगाहगत-परविसमा परिपेर में यह स्पष्ट किया गया मा किरातका पम्नि- ऐना वेस्पनहोत्रम्' इत्यादि नवम्यास्पास्मक मुगावापननिगरपाठ के अवसर पर होवा के मुख से विस समय-मृतवती' मपर्यो चमास्पस्व' इस पापी म्या विकारपार होता है, उसके पुतबतीम्' पदोच्चारण के साथ साथ ही म भाइ-पमृत् का प्रण कर हता है। मगादापन-कर्म समाप्स्वनन्तर मध्ययु 'पानीमा प्रति भो भाषा म्याइतिका, पानी भम्प प्रति 'मस्तु भापद' मासिका, सम्पर्षदोवारे प्रति यजम्यारतिका, वसावा पाक प्रति यि यमामह' म्यादवि का उचारण फरखा है। सपाम्स में होता मुसस 'चौपद' इस पापी पाइति का उरचारण हात ही प्रत्ययु' सुदू-पित माम्यमाग की समिर पाहवनीयाम्नि में भादतिर बसा है, पहो मा०प्र० कर्म है"-पिए ५ १८ गारापन प्रामसन बस्तुत प्रा०प्र०म्म का वापर-पर- 1 म्पादतियों का पारम्परिक सम्प्रदानपूर्वक सरपारण करना । पाहुति देना वो प्रर पफर्म है, जो इन्दी पचिम्पारतियों के पावन से पार बार होता है, जिस । मोमपतिक विकत्तपता प्रस्ट के वित्रामणात्मक प्रयामहामण में प्रतिपारित । है। पूर्वमायण में पस्तुप घुगारापनकम्मे की सोपधिक विकम्पिक्षा का रूपण हुन। अतएव वा प्राममाप्य इसी नाम मे ('गारापनमायण' न म)ीप्यपाव किया गया है। पुलिस कर्म का पृतवतीम्' इस्पारिको माइति के साय ही 'भो भाषयः' इत्यादिलपणयाविरूप (पप्रप्रयाग कर्मक उपम रो सातापवण्य वहीं मुष्टि ने इस पसम्मानि स सम्बन्ध रखन या उपपत्ति का म्पष्टीकरण कर दिया है।-तलव भा०प्र० कर्मोपपति मे सम्म गम्पन पाले भुगापापमयामरस में.प्रतिपारित पर प्रकरण प्राव के प्रयाजमाप मी मम्प प रमवा। भीर इस दृष्टिकोण से महमा जामवारे कि, प्रामण की-'निर्दोता पसनोत्रम्-१-५-२-१" इस प्रभम शिका मे, गम्मकर-ता वा पता ना पाहतयो भवन्ति। १-५---"इम पोपी कति पपन्त पप्राधिकारमक प्रामणभागही वस्तुत 'मुगारापनमायण है। भाग। ' पापोऽपकाम-१-५-24" इसी परेका मदी प्रपामनाम भारम्म हाशावास पर्दा म टी पिएका म-भारम्भ कर ग्रिनामसात्मक मह प्रयागनापण के तृतीय भाषण की 'म भाम्पर पोपस्तीर्य-1-1-1-1-२१ इमर मरी गरिएका पर्व सम्पूर्ण प्रामय माग 'प्रपामग्रामण ६ । प्रयास मि 'भोभाषय' इस्पारि भाभाषण-प्रत्याभावसास्मिका म्यारतियों से सम्पन्न होता। न म्पानियों में मम्मम्प रपन बाम पारम्परिक मापवान की, माइदियो पाकी, ममारा अपरों की, शम्य जो भी पपनिमाण पूरमामा प्रनिगलि राम मध्य प्रकरण में 'भोभाषय माहिम सम्पन्न ऐन पार प्रयागरम बीरी सपत्ति बतलाइ गावी। भतण प्रमा प्रकरण-प्रयाग माम म परान एमा। मी पर सङ्गति का बाप में रखते हुए अपवर्ष ममदप पाना पाहिए। (मगारापन सम्मानम्वर-प्रो माया' इत्यारि पारनियों साराभा परम्म म परमपोप प्रपात्र होते है। प्रपात पाप ने दोन है, मी प्रान मापनि ममापान पानी पनि पानी पिपि) मपान निषपर (पाच) प (अपात पसार पर चोर r) मी लिप (पत) प्रण: ME(लिमाले) निरमपन स पापा। नात्यय 1 - 1 - पडी हुमा कि, प्रयानरम्म अनुकर्म है । धना कि पांच है, प्रताप का. प्रनामों का पाच होना मामाविकी) ॥१॥ (दूसरा प्रश्न प्रपाय कम्म सम्पम्प में यह उपस्थित होवाकि, प्रहल पिकर्म में अतुलपस प्रमाओं का पान रियायों जावा, इमी प्रस्म का पैमानिक पाम्पानद्वारा समा पान करती हुभुति प्रती है) (कदी प्रसापति की सन्तान होने मे) 'माया पन्या (नाम स प्रसिस) ब (परवा) और असुर (मसुरदेवता), दोनों (ही) पिता प्रयापतिस्प यास्मक मम्वस्मर को सम बनाकर (निमिच बनाकर)-'यह मारा दी दागा, पर मारा ही होगा' इस प्रकार म्पपरने लगे। (वात्पर्य सम्बस्मरप्रयापविल्प पममम्पन् के लिए दोनों में प्रसिम्पा चलने लगी, दोनों स पर भफ्ना बाल प्रतिष्ठित करने लिए परमर मगान लग)।। ()॥ (अमि मानी भमु मे अवश्य की प्रामापत्य पममम्पत्ति के भोग कीयो मना भारप की परम्तु मिस प्राण-पाग म्यापारलपण पर्पन-तप-अम से या फामना सफल हुमा करती, स का अनुगमन उनि म किया । पर ) देने में (अपनी म्वामायिक कर्म -प्रचणवा स ) अर्चन ( लतप तपोम्प माणम्पापा, मम्तापार बं) प्रम (लक्षण मागण्यापार-पदिापार, तस्वत' पास्मपळ, एवं गरीबरण) का अनुगमन करत हुए (यामम्पन् प्रामि के उपाय का सम्वेपण कर पहु) विपरने लगे। (कालान्तर में इस प्रर्चन, बम रे फल बाप) मोने (रेषतामों ने ) (पमसम्पन्-अपमापनमूत ) गन (भागे पवनाए जाने पाले) प्रयासों को इन्च खिया (प्राप्त कर लिया ) इन (प्राम प्रयामों) स (पवरोषना मों ने सम्मस्मरयमप्रमापति) पाम किया (पाक साप प्रगान कर्म का सम्बन्ध करा दिया ) इन (पॉर प्रया) स (बरवताभों ने ममत्मरापपर- भूत पाच प्रतुओं को, (एवं पाँच अतुमारे द्वारा पाममष्टिरूप) प्रवत्सर को मीत लिया। (इम प्रयामकर्मस मी) देवतामों न ( सम्बात्सर भरपर मत पाच) तुओं म (गर्व ममष्टपात्मक) मम्बन्मर (रूप पममसल) मे (कि प्रश्न मास ) रानों (भमुर्ग) को निकाल बाहिर रिया प्रकार (पमु ग्पराउपपूरक पलामक कारणी)प (पाप कम्म) 'भनय' (सपमामि मापन ) पाला। या 'प्रसपा ही नाम (परोचपियाबदामों की परातमाग में मममम्प्राप में ) प्रयामा नाम म ममिय हुआ। (नात्पर्य प्रापपान का पही पाकिसता और प्रमुप पाना सम्बत्मायन-सम्पचि प्राम करना यात ५। समाधान एगा कि बिना चपन मम्पत्ति प्रानि बी-मम्मति प्राम मी . + पम्पप की-मा समनी । फलस्वरूप उमाने पहिले भयर-सरूपा सम्पत्ति प्राप्त थे। इसी के पास भाग पाकर सम्पूर्ण सम्बस्सर पर ग्न का अभिवार होगा। इस प्रकार धतुपमन ही पेषतामो जय का कारण मना। भवम्ब अतुकाम भरण 'प्रया का नामकता है। प्रायहप ऋतुहम्म ही परोभापा में 'प्रमान'म बाया)। (घरम में प्राच पक्षमान के लिए मी परमावश्यक है कि यह भी सो प्रारतिक नियमानुसार पहिस पबयषसम्पति ही प्राप्त करे, इसी प्रमिप्राय से भाग जाकर भुवि पती) उसी प्रकार (मे प्राविक मामलाम पेषोपवाओं में किया पा) या पबमान ( भी अपने इन) १) प्रमाणे से (याविराममाय मात्मा कवि) सभी को, र (रा ऋतुसमणिरूप) सम्बत्सर को अपने भपिकार में करता है, (इम प्रासाभिकार पर पर) अतुमो और सम्मत्सर से अपने राभों को पारि निकाल देता है। इसीलिए (अतुसम्पत्पिपूतक सम्बस्मर सम्पत्ति प्राप्ति के लिए यह प्रमाओं से (तुओं का) गमन सा(प्रभास कम्म करता है। प्रमामयों किया जाता है, इस प्रश्न का वही पु- (वात्सर्य-उपपति- समामान) (पाप-प्रधान- वेषवा लिए सो पुरोगाति मिीवर या मम प्रयाग वामों के लिए भामहमि-पताइवि-विदित है। प्रमाजों के लिए भारबहारि क्यों होती है , इसी मासिक परत ही उपपति बनाने के अभिप्राय से मुवि बहवी )-- ( पनि प्रभाग) निश्चयेन मापदवि मासे दोष ? (पानी सिम पृवाहति का विधान हुभा कारण मा पही)(पर) भाम नियन ब (राघुनाराक मापन ) । भामाप मी पन म निरपयन वरण भाों न (मसुरों का संहार करन हुम)-पांची पो (नारा) ममस्मर को मीत सिया (था; (इमी जपनाम पर मोमे) तुओं, और मम्म स्मर से ग्रामों का निकाह वादिर दिला (पा)। मी प्रकार (मासिक पक्षन) पर पम्मान (भी) पारपरप इसी बम म पनु, और मम्बरमा ओत सता. (HR), तु चार मम्बस्सरस शाहको निधन {m)(कि आप शत्रुपिनारा पमा बही वर्म-शनारापूर्वक सपनाम-दी पहा मीमित है।)अक्षण (पप्रपाम) भाम्पहविणाम होत ।। (प्रमाक लिममा मा ग्पाहुन पानी ? प्रश्न पीपही पवि)॥२॥ (भारपरका कारण तो शवपरागर है। घरब मरा कारण और पतलाती ः भुति पासीर)- परमापारप बदनिापयन मन- माप्रपना ग्म-मार-माग(प्रापि पागात सिक रेव-न-)। (प्रणामों के लिए पान्तरिय भाम्पवस्व को पाहुति दत हुप) ऐरदेशवानों न उस सम्बत्सर प्रजापति का अपने 'पापके सारमाग सरी मुक्त बनाया । वमन ( भाम्महवि करता हुमा ) पर यजमान (भी) समस्सर अपने सारमाग से ही उसे अपनाता है। इसलिण ( भी ये ) प्रयाज पाम्पापि पामे होते हैं। (वात्पर्य, शत्रुपिनारा परिसा फल है, सम्बस्सर को अपने ही सार माग म युक कर उमै ममय करना, वद्वारा म्बयान को मम करना भाम्पदविकरण का बिलीव फल है। यही प्रपामामुगता भाम्पावि का बन्धु-पपत्ति-2)॥था . - (प्रपारकर्म प्राभाषणपूर्वक पारम्म होता है पाया जा चुका है। इम मुम्बन्ध में यह नियम है कि जिस पन भूमिप्रवरा पर बड़ा इमा अपयु पानीप्र प्रति-प्रयाजकर्म क लिए 'भो भावप' इम म्पादि का उपारस परता है, हम पीछे मरीना चाहिए। ऐमा भादरा पो दिया गया !, मी प्रश्न को उपपति बनमाने में प्रमिप्राप मे पारेरा-विरसपण पूबा मुवि एवी १)- अन्नयुलिस (निपत ) पाश में दी बनाकर प्रयासों के लिए भाभाषम्म कर, उस प्राश म पीछे नहटे । (कारण पीक)मो अध्ययु प्रमाणे म (अनुमों का) पमन करता है, यह (पबमान यवों के माप) पुख ठानवा है। दो पोदामों में मेजो पोशा पराजित से गावापर मिमपेन मैदान बोर मागता है। दूसरा जीवने वाला योगा भाग पाता जाता है। (प्रपासम्म ममाम कर्म , अप्प पोसा जपलाम करना है। भागे पदमा की अपर मूषकर) प्रतण्ड (अप्प को चाहिए कि) पा पागे भागे । वा भागे भाग ही पाति प्रदान करे। (प्रपाकर्म मे सम्बम्प रपन पास पाहमापनिषध, अमिश्मण विमान का पही बन्धु । यही प्रयासपर्म का पम्पु-पति- प्रिमका प्राकामों में विम्मपन्न हुमा ) ॥६॥ (परम ज्ञानिक भगवान पामसापीछि में पीई न हटना वो को। परम्नु पाहुति साप माय भाग भागे बदना अनुषित रामवय-'तम्माभि पराममिलयमर कामन' पर उनकी रपि में विमान निम्र । इसी पनका परान परत र पासमा महतक)मा अषमा मकर (भाग भाग पापा र पाहुनि न द)। प्रिम प्रारा में नहा र म प्रयाओं के लिए प्राभाषण Hd म पोरेन (वमा अंग ना पिलानमम्मत ६ परन्तु-पाडा पोहा भाग परना हमा पानि र पारा प्रमानिक है। शत्रुनारा ता अभिप्रेत है। पापा एम पाहात पर निर्भर है जापानि ममिद अग्नि में न होकर सलव ममि बनती है। परि भागे-भागे पड़ना अनिवार्य मान लिया भागा, और पुन भभप्रदेशों में अम्नि समिर म मिलेगा, तो उस प्रसमिन (अप्रचलित ) भनि में दुव भाति मी प्रसमिस रहती हुई निरर्थक बन जायगी । भवन उपराकमत का भामह निरर्थक, माय ही अभीप्रफल का विपासक भी होगा। प्रताप होना पाहिए कि वह अपमु (भाश्वनीयानि के) जिम प्रदेश में भनि को ममिय पल पी पाहुति से (पाहे उस ममियाम्निमदेश के खिम मोदी गे प्राममण म करना पड़े। पों कि) समियोम (समिदाम्नि में भाहुवित्रम्स डालन से) ही पाहुतियाँ ममिद मानी गइ है॥७॥ इति-प्रयागः (१) H - . २-उत्तर - (मप्रथम अवयु पाम्नीम के प्रति-भाषय' पर मैप करता है। इस प्रपम भाम्नी मयुर प्रवि 'अस्तु भौपद् यह करता है। मनम्तर पुम माता के प्रति 'पत्र'-पाम्यामन्त्र का अनुपचन करो पर प्रप करता है। जिम बिम प्रयास का मन होता है, उम उम प्रणाम के लिए अपयुको मो भाषण भो मापन, स्पादि रूप म माम्नीप्रसि, ई-'एस'-'या इस्पादि रूप में होता के प्रति प्रचारमा पहला है।म पि में पानी प्रति हान बाले 'मा भाषय नप प्रपों का पूर्वप्रप' का बामगा एवं उत्तरभारी होना के प्रति दोन पास-पप प्रपों का पत्ताप्रपा जायगा । प्रस्तुत माती करिता में 'यम' नसण उम उत्तरमै पो पा ही विरसपा हुआ है। मति प्रती है)- बार (मणमाम्नीचर प्रति 'भाभाषप इमरूप मे) भामाषण कर (पाम्नीभ स प्रानु भोपट' इस्पाकारक प्रस्युचर प्राप्त करने के पमन्तर दोवा मामक गरिब प्रति उत्तर प करता दुभा) कहता है-'ममियो पज' (२ और ममिहती दवता पागनिय याग पाठरा)। ('ममिपो वम इम) उत्तर प ग मध्यप् पमम्न ऋतु काही ममिद्ध-प्रममितरता (उत्तर काम म रातु प्रीता पाती। यही तात्पर्य है। अमन उत्तर पारमा- ममिया र म ममिन्धनकम्म म म कपल बमत पाटी, अपितु बहाग मापूप- पोपा-तुपा राममियाना (पोधि वमन्नीशप अनुमों की मूलमननी यामक है, जैसा कि विवेचना प्रकरण में स्पष्ट किया जाने वाला है। इसी तासाय का प्रतिपादन करती हुइ भूमि करती है)-(प्रवकत उचर प्रप से) समिर या पसन्त पम्प (पायें) ऋतुओं को ममिट कर देता है। (वसन्तसमिन्मन परा परम्परपा प्रमरा । समिर पांचों ऋतुएं प्रजा उत्पन्न करतोयोपधि (वनस्पतियों से भी) परिपक करती है। (वसन्तसमिन्धनरूप जिम कारण से बस्न सय समिन होवा हुमा परम्परया अम्प पसमिन्मन का मी कारण मन बावा १) प्रतापता ही (वन पसम्त समिन्मन ही) अन्य मब धतुओं (के समिन्धन पा स्पष्टीकरण पर)या है। (वात्सम्मे, केवल पसन्त समिम्पन ही शेप ऋतु समिन्पन लिए पाम है)। (मिस प्रकार बसन्त पागारमक समिपाग में-समियो पम' स्पादि रूप से पसु माम का उन्मल होता है, वत् स्वर प्रीष्मादि यागात्मक तन्नपात् पागादि में-'कनूनपा पम'-इत्यादि रूप से नामनि स्वव प्राप्त है। उसी का एक विशेप तु से निराकरण रवी हुए भुवि मती) पर अप्पमु (पसम्म क भाग की--प्रीष्मादि) तुओं को (अनूनपा पर- यम-इत्यादि रूप मे नाम निःश न कर केबल) 'यजया इस प्रकार माम निःश के बिना ही पता है। (बप मप्राप्त नामनिएँग होना म्याय प्राप्त देवो मामबरण पूर्वक उत्तर ऋतुओं के लिए उत्तरप्रप क्यों नही किया जाता !, मन प समाधान करती हुई भुति कहती है कि) भजामिता के लिए (दी यम पर रूप से री ) उत्तर अनुमों को पाता है (चतुओं के लिए उत्तरप करता है। गामि (पुनरठयोप) करेगा, यदि वह अप-वनूनपा प'–ो यम' परेगा यो। सासर्प, जब समिद् नाम निश से रीवर शुतुमों का ममिन्धन दो गावा है, वो दुबारा अनुमों का माम निशाना पुनरुति होगी, या बदमापा में शामि' दोप कालापा) इसलिए पर (नाम शफिय- बिना केवल ) पह-प' इसी ल से उत्तर ऋतुओं को प्रवाहै।। ८ ।। इदि-चरपा (२) ३-प्रपाबामग धनुपागात्मक पत्र प्रयामों मे मम्पन्ध रपने पाली उपपचिरा शिका मे शिरापर्यवसानों के शरामग्री र रात मे २१ - -- 1 की परिकापम्मेन्त प्रामणसमाप्ति पस्यन्त- खिकामों के मारा प्रयाप्रमागे विकतम्मना मारणा पति का प्रयाजयागानुमान कम से निरूपण करती हुई पुति कहती है- १ वा अम्बनाम परिवर्फ दोता नामक शविर के 'समियो अम्न भावम्प पम्तु, पोपट्' इस समिरवता याग्यामन्त्र के बोलने पर उस -पोचद्' पारण साप पाइपनीपानि के समिट प्रदेश में मुस्सिव भाम्प की भाति प्राग) समियाग ( वमत्तम ) करता है। समिम निरपमेन वसन्त है। (प्राक लिक समिपाग से) देवतामों ने बसम्ठ कोशी (भमरापिकार से) प्रथा किपा (पा), एवं वसन्त से (अपने शत्रु अमर) सपनों को निकाल मादिर किमा (वा)। "सी प्रकार ( माकृतिक समियाग की विषा पर प्रतिष्ठित पाम्पामचा- जियुत उम अपने पैप समिद्याग के वस्त्र पर) मा भयमु' (यजमान के लिए) पसन्त को ही (पसमान के शत्रुओं कभभिकार से) एमक करता है, एवं ( यजमान *) शत्रुभों को निकाल पादिर करता है। (पमन मे उत्पन्न समातिराम-काय पबमान के मास्मा स्वर्गात्मक सम्वत्सरयाफमा प्रथम पसम्त पद पर पममान के शत्रु का अधिकार न रहे, कवन देवात्मा दी म्सका अन्यतम भोच्च बने) मीलिए (अ) समिप्राग करता है। (२) समिणाग करने से धनम्तर पर (अप्प होता -'वभूमपादन मा म्सम्म पेतु पौपद' इस सन्नपारवताक पाम्पामय बोलन पर सरे चौपद प्रसारण साप पारपनीयाम्नि : समिट प्रदश में जस्थित प्राम्माहुति द्वारा) तनूनपाचाग (बीमपवन ) करता। समूनपात् निरपयन प्रीम ६ । पीप्म दीन (पार्मिक ) प्रजापों शरीरों को दपावा है (अतएव तनूनपात अवश्य ही पीप्म र)।(प्रारतिकतनूनपापाग म) परवतानाने पीप्म को ही (अमुराधिकार म) प्रपा किया (या) वं पीप्म मे (असुर) मपरनों का निकास पाहिर किया भा-(गेप ए अतिरकारन) ॥१०॥ (३) ननूनपापागानन्तर बह (अम्ममु दोता -- भग्न पाम्पस पोपद् इम इट्सवाच्याम्या-मत्राचारण करने पर मरे पीपद' या रण फ माप ममिड पारसनीबाम्नि में पाम्पातिारा) इ-पाग (पर्यायान) करता है। निरपयन वर्ण है। इसलिए पपादक, पित्री पर रंगते हुए मोपमोटे बाट बाम-गोपा परें- प्रारि पन्तु गर्मी, धीर सी के माध्मण - - प्राणायक से प्रतिपरूप मे पीणकाम होगाते हैं, वे सब कुद्र सरीसप वर्षा के पाते ही ओपन पारस करते हुए से-पुष्ट से होते हुए भन्नादान की इच्छा करम हुए (पा एमास के साम) स्वस्वत विचरने लगता है। (इस प्रस्पत-ए इसन्न भाष मे अवश्य ही पपा से ग्ट अन्नास्मा मासकवा।(शेष । शिकावत् ) ||१|| (४) घर-पागानम्तर बह (अवयु तारे-बहिरम्न भावस्प पेतु पोपट्' इस पहिवताक याम्माम पोचारण के अनन्तर उमरे बौफ्ट्' उपारण भाष समिद् भाइपनीयाम्नि में भाम्पावि मरा) बाईपाग (शरपश्न) करता है। निश्चयेन शरम् है। पहिं इसलिए शरण है कि, जो ये भोपपियाँ गर्मी-सर्वी स मु गाती है भोपषिों वर्षों के भागमन पर (पुन ) प्रपर दोबासी है। (वर्ग में प्रपुर) व (0) भोपपियों शरावतु में फैले हुए-नित्मरे हुए धर्मवों की वि शीण रोगाती है। इस स्वरण- -शीर्ण -भाव साधर्म्य मे शरत् (भवग्यमेष) पहि। (शेप कशिपावत् ) |१|| - (१) परिर्पोगानम्तर पा (भव होता है-"स्वाहानि मामा सोम, बादाग्नि, स्वाहा देवा भाम्पपाम्, स्वाहानि होत्रा जुपाणा, अम्न पाम्पस्प म्पन्न चौपद्' इस स्वारानमन्त-वक याम्पामत्रोचारमा धमतर उस + बीपद भारस के साथ समिद भावनीयाग्नि में पाम्माहुवि द्वारा) स्वाहा-सागपाग- (म- वजन ) करता ।। सारा कार पल का अन्त (अन्तिम पर्व) है। (उपर पांच) शो देन्ती भन्त (अम्तिम पर्व) है । हेमन्त बसन्स से परामण- पास माग-प्रम्तिममाग पर है। इसीलिए इस प्रमों का अन्त सा जासकता है। (भपन प्राविक मायाग से) पसदेवसानों में ( पन क) पन्त (अन्तिम पर्व पमादा) म ही देवदेववाभों न उस (ऋतुओं के) अम्त (अन्तिमपर्व कप मिन) को (अमुराधिकार स) प्रयकर लिया (पा), अन्तद्वारा (स्वासपाग- गरा ) अम्त म (मिम्त म) सपना को निकाल पाटिर फिमा (मा)। (तप- रामम)| (रमन्म भाभों का अन्तिम पर्व पर म्याहा भी पा का पम्तिम पर्ष है। म माहात मे असु-अम्त मन्त-पर अधिकार तो हो साता है, पामु म समावना सामान के दशौरिफ सीवन के लिए प्रराम्द मी मामी सामग्री । इस पम्नाग-मायालय मन्तयन म माम्तमपण गावामि दी सम्मा है। अपधित - परमान पानायुभोगप्पम्त लकिस मुग्न का भोग फरसा हुमा भनम्तर देवात्माकर्षण मे स्वर्ग प्राप्त करे । मनम्वर पुन पुरष पोनि में अन्मपारण करे। क्या स्वाहायाग म ऐसा मी सम्भव है।। प्रस्पर में दो अपने मन्तमाष स हेमन्तमाग जन सात्वणिक स्वर्गावाप्ति का समर्षक बना हुभा है। इसी विप्रतिपसि का निराकरण करती हुई मसि पसी है कि ययपि यह ठीक है कि हेमन्त अन्तिमांच का प्रवकले। यापि यह भी सिख विपक)मम्त से ही पसन्त पुन प्राण पारस करता है, मम्म से ही वसन्त पुन' मुत्पन्न होता है। जो 'याहिक हेमन्त के इस पुन माणाधान के रस्म को वानवा वह अवश्यमेव (याबदायुर्भोग पर्ण्यम्त जीवित या मा ऐइलौकिक सुख का भी मोग कर मेला है, एवं स्वर्गफल मोगानन्तर) इस बोक में मी (पुरणपोनि में) जम्म सेवा है (जैसे कि, हेमन्त के अनम्वर वसन्त सम्म लिया करता है)। (वात्पर्य यही है कि, हेमन्त पपसानात्मक पन्ता मा भी जीवनोपयिक पसन्दोपाम का निमिच है। इस भाषना स अन्तमावनात्मक मन्तयाग अनित भनिट भावना की निर्वाच होमाधी)॥१४॥ - अपमत्रसग्रह 1 1-समिपाग -समिस (बसन्त) । २-नूनपापाग'-उन्नपात (प्रीम') पयाग (वर्ग) महिपाग--- ५-सादायागरात (देमन्व) पथप्रवासाः, पम्मनः (“सबै ममियो यति. इत्पारि कपिरका मे प्रारम्भ कर "ध ग्वादा माग यमति' स्पादि १४ वीं परिकापम्यन्त प्रापणमाग से परमानों पी इतिकर्सम्यता का विरोपण किया गया। अब पागे के शप प्रामसमाग में प्रयासकर्म म सम्पम्प रस पाली पक इन विशेपतामों का स्पष्टीकरण किया माता :मिन सम्बन्ध मे प्रयासयाग परोस-परम-फलों का मन बनता है। होताद्वारा प्रयुक्त पाम्पा-मग्नों रेमन्त में-1-1-1-५-५-दन पनि मत्रों अन्तमें कमरा १-सन्तु, पेतु, ३-स्पस्तु, १-4, ५-उपन्तु' इस प्रकार तु- बेतु परों का सन्निवरा यता। यह विपर्पप क्यो, मावि पनत्त मागास्मक पाप्रयामाग अनुसमामधन-एव प्रपामसमानस्वन-समाम है। पातो पापों या ग्यामन्त्रों में चितु-तुकीसमावरा होना चाणि मारा तो पागों में 'परतु- प्रबारकाप उम मश्गुरूप प्रयासम्म दमा इन्दोरुप भनुमानकम्म, दामोपी इतिजम्यता व्यन्तु' का ही समावेश यमा पाहिए। स्पिति-प्रदर्शनपूर्वक इसी विप्रतिपति का निराकरण करती हुई अति प्रती १) (अभ्वयु सेवा के द्वारा नाम्पा मन्त्रों के प्रमिक) 'भ्यन्सु, षेषु' इस (कम से उम्परित होने पर ही) समि पागारिता (पमन करता है) प्रवामिता के लिए ही। सिर-को पुन सिट परना, उक को पुन' कहना ही मामि दोप है। इस पुनरत दाप की निपत्ति के लिए प्यन्तु-पन्त, अथवा बेतु-पेतु रूप से पजन न कर व्यस्तु-केतु, इसरूप से यमन किया जाता है, पही सात्पर्य है। इसी तात्पर्य को स्पष्ट करती हुई मति कहती है कि) या अवयु (अपने इस पक्ष में ) गामि (पुनरुतदोप का समाषश) करेगा, पदि यह व्यन्मु-ध्यम्सु-रूप से यजन करेगा, भयया तो बेतु-वेत रूप से पचन फरेगा। (गामि योपनिचि के साप साप इस मन्तु-पेतु विपर्यय का एक प्रासहिक फल भोर भी है। यह से देवास्मा का प्रधनम अपेक्षित है। प्रजनन पम्म मोपात्मक-स्त्री- मूण, अपास्मक-पुभ्रूण, दोनों के दाम्पत्यमाष पर निमर है । म्यन्तु इस बहुवर नान्य पर से, पसु इस एकवचनाम्त पद से प्रसननसापक-योपाधणस्मक बह मिथुममार भी प्राप्त हो चावा है । 'तस्माकस्प पुरुपस्प बायो जापा भवन्ति' इत्यारि मुनिक मनु सार पोपास्मिका स्त्री बदवपर्म से, पुपास्मक पुरुप एकस्वसे युक है । फसव म्यन्तु स सम्पानिदान-सम्पत्तनागपोपान, तया वतु से पुपान मा हो जाता है । इसी पासनिक पल का दिग्दर्शन करावी हुई मति करती है)–म्पन्तु, यह (बहुच मान्दपर अपने बहुमपर्म म) निरपरेन योपा (की प्रतिकृति बनता हुमा पोपा माण का संघारक), पंतु पह (एकपचनाम्त पर अपने एकस्वधर्म स) नि- रपयन सपा (की मतिमति बनता हुमा पृपाप्राण का सप्राइक) । (म्पन्तु-पतु रूम से विमान पात प्रयापाग से योपा-पा) मिथुनभाव सही प्रजनन किया शाता (प्रजननसम्पत्ति प्राप्त की पाती है। इसलिए (भशामिता के लिए, एवं मिधुनमाव माप्ति के लिए, दूसरे शयों में पुनरकोप निति के लिए, एवं प्रसनन सम्पनिक सह लिप बामपा ) 'म्पन्न-पतु इस (विपथ्यप :म ) म (1) मन परवा (रना चाहिए)||१॥ (पप्रमेह से पांच प्रयाव पलाए गए हैं। इन में से शरणागात्मक पनिमा पोय प्रयास पिता में करोिप धर्म का प्रमुगमन किया माना है। 'पदुपरवि, प्रयाजानुयामेभ्यस्त है. मा० ३॥३५६ इस्पादि सप्णभुति । हमार मुहमी भाभारमूवा उपमा नाम की मु.में जो पाम्प लिया यावा पर - पूरी की जाती है। पूर्व २२ प्रपाठमाण में मी भह सा किया गया है कि, भाम्पमइस शत, और बन्योल्प प्रमाणानुमा जिप ही होता है-"भग म्पाम्पानि गृपन्त, ऋतुभ्यरपैय तानि, पन्दोम्मरप गप"-शव १२ प्र० । १ मा०100 1वहीं मामी स्पष्ट किया गया है कि, 'भुषा' पात्र में पाठपार करके उपरत् में पार मार कर उर में भाम्पमाण होता है। पतुर गीत जुस्थित पाम्म प्रयासम्म का, एवं प्रचार गृहीव उपस्व-स्प भाम्प प्रमुगावकर्म का सम्पादक पनता है। मुरिबत पाप से मश' समिरा वनूनपाम् द्-वाण- सम्व-भीम-चनिन चीन ऋतुदेवतामों का पान वो बिना उपरदाम्प से मम्मम्म पराप केरा स्थित पाम मे ही र लिया माता है। पौरपलिषण शरणाग के समय जुका पसन् से सम्पन्य कराना पावरपक माना गया है। तीसरे प्रयाग सिमाम होने पर मुह में उपाप से मर ही पीमा प्रसार होता है। मेसा क्यों किया जाता है इसी प्रश्न का रिमधि-प्रदर्शनपूर्ण समाधान करती हुई भूति कासी) तृतीय प्रभावमाग ममापनमा पर अपीच परि मामक प्रयाय कर्म में (मुह में ग्पसत् से) भाग्य प्राण करता है। कई निरमपन (उचरोचर पणपर्म म) प्रमा, माम्म रेत (बी) है। (परिर्वाग में सुर में उपत् सभाग्म संसाहुपा) प्रपा पनि प्रजामों में ही पामरूप रत का सिमन परता (पीपधान रखा)। इस सिक्कल मे (0) प्रवाई पुन पुन जन्म लिपा परती है। इसो लिए पीये अदि नामक प्रभाव में (जर में उपत् से ) पाप लता । (वापर्य पम्तुत पाकि, प्रयास निर मुह से पाप पाहुतियों ही गाती हैं। प्रारमी पाप पाहुणों के सिप गाम्पित प्राममाया अपमाप्त है। प्रतव प्रयासम्म मध में पस बार उपसत् मे पाम्म मना भाषराहो भावाना 1, पर प्रश्न है। माधो प्रमा, पपा, देवा धन- 'शरल-दमम्म-शिशित, पितर'IT AARA मारि भवि के अनुमार अम्निमासप्रशाना भवएप खरेववारिमा वसन्व-मीम पर्या, इन दीन प्रमों का मन्त्र पारनेर दिमाग। मामप्राणप्रमाला प्रवण पितरेषतारिम का-रारम्-मा-शिर-, इन सीन भतुप्रोमास मौन विनाग है। ऐमी रिपनि में पमतीम पागा ममिग-उनून गत्-सद्लन सोम प्रपा न हो अपिचिम्न म गिना पर मदुपारा प्रालिदीपान पाना प्रतिम मनाता है। पावे अशा महिमानीय बर्हि माम को सौम्पराका पत्रम प्रयासमा होता है। प्रवपर इसी में भाम्पप्राइस करना मुसक्त बनता है। इसके साथ ही निदान मापसे प्रगानों में रेत सेक मी होजाता है, जोकि देवात्मप्रजनन में अपनी प्रधानता रख या है। इसीलिए पसुर्वप्रयास में ही पाम्पसमानयन किया गया है, जैसा कि विवेचना प्रकरण में विस्तार से पतलाया जाने मामा )॥१६॥ (चतुर्वप्रमाज में भाम्पमहल करना अनुसरूपानुगत एनसामा प्रत्य- नुगव , प्रमानों में रेत का पापान करता है, इन दो भविशयों के प्रविरित इस के गहां प्राइस का एक फम भोर मी म्वत सिम है। उसी का विरक्षेपण करती हुई भुति प्राप्ती है)-बो मन्वयु इन पनि प्रयाजों से (शतुओं का) पचन करता है, पर (पूर्वापानानुसार सम्वत्सरमएल में प्रविष्ट शत्रुओं को परामित करने के विए) स्पाम ही ठान या है। दो दलों के सप्रामामिमुख होने पर मिस एक दम को मित्रसेना का सहयोग प्राप्त हो जाता है, वह जाँत चाता है। (टीक इसी के अनु- रूपमा भाम्य-प्राणकम है) इस माम्पमाण कम्म से सरको उपसुदाम्परूप मित्र मिल मावा है। (इस्पित भाम्य वह सेनादल है, मिसे असुरपराभव करना है। परन् स्थित भाम्पमा मित्रसेना है, जिसके सहयोग मिलने पर असुरपरामब निमित है ) इसी मित्रसेना-सहयोग प्राप्ति के लिए (मी) भौषे चर्दि' नामक प्रयास मेंही पाम्पममानपन रवाई॥१५॥ (प्रभावकम्म वा समाम कर्म (, जिस के द्वारा यजमान के स्वगफलभोका देवारमा के भोग्य सम्बत्सर में से मसुरों को पराजित करमा है। शत्रु को निर्वल बनाना ही शत्रुपगमष फा मूलकारण है। मित्रसेना की सहयोगप्राप्ति, स्वस्थानम्पिति, पापि मन्नान्य कारणों में स शनुपराभव का एक या मी अम्पतम कारण माना ममा दकि, शत्रुसना में भरनीति गमत हुए उस अपनी सना में मिला लना । रस पन को अपमा माम्य पमा मन स भवाय ही पर निम शेजायगा। इसी एक भार प्रपोवन का पात्रीकरण करती हुइ भुति प्रती १)-पममान गुरु को लाप बना पाई। पजमान के लिए यो शत्रुता करता , वह ( यजमान क शत्रुपत ) पर को नाम पना राहा (माम् जाम्भित भाम्प निदानन यजमाम का सैन्य एन . ( उपत् स मुह में पाम्प लेता मा (अप्वयु परनेवाले शत्रु (सना- एस) को पवमान के लिए ही पलिरूप से भावर्पित करता है (शत्रुबल का परमान त म ममावरा कराता हुमा यममान को साल बना गा)। अपिप (क समीर कि) मुह सामाव को, उपमन पाम्पमाष को लक्ष्य बना यी है । ( उपमन म मुह में भाग्य का भय भोता पवमान : प्रयोगन सतपय लिए मोग्य सामग्री पहुंचाया है। (इस प्रकार प्रात्पनुगत ऋतुमाष, प्रजार्ग में धीऱ्यांगन, मित्रसेनाप्राप्ति, शत्रुगन की मित्ररूप में परिणति, मोम्पसम्पतमाति, इत्यादि भनेक रष्टियों से पोधे प्रयाज में ही प्राम्यमहण करना अवर्ष बनता है। 'तम्मापतुः प्रपा समानयति' ॥१८॥ 1 (उपभूत, और सत्रस्य भाग्य मिशनेन शत्रुसैन्यदला है, यह पा गया है। साप ही इस माम्य के समानपम का यह भी फस बनाया गया कि शत्रुमैन्यास को मेवनीचिद्वारा यह अपना पति बना देता है। मेवनीति स सम्मम्म रखने वाला या प्रकार भी सफल होता है, किन्पपल मम्पर्क में न जाकर तसम्प गते हुए, अपने स्थान में रहते हुप, पूष यत हुए ही परोपहप से उसे अपने इसमें मि- पाया बाप । निष्टसम्पक में मन्ना रावल में पसना है । और सम्भवत प्सा कर ना कभी कमी पराजय का कारण मी म बाधा है। इसलिए) पर भम्पर्य (महमें पस्त से भाम्पसहरण करने की कामना रखवा हुमा) मुरको रुपमृत् से प्रष रस्ता दुभा ही भाम्पसमानयन करता है। परि पासप्प जुरको उपरत्म मिका देगा, (म्पर्शकराता हुमा पाम्पम्हण करगा) तो (अपन इस प्रथमरान से) पर रानु के साथ पजमान को मिला पंगा (शनुसना में अपनी सेना तापस गक पने वाला बनता पा इसापन के स्थान में भनिष्ट कर बैठेगा)। (इस प्रति रिक इसी अवार्शन में) यह अप मचा ( मोका) का मापसे मिलागा (मो. का को मोम्प फ भाधीन करवगा, अपरि भोम्य का मोम भापीम पना सखि का कारण माना गरा। सा मो) मणि भमषम्यम् (छाका पमृत् स पाम फरवा हुमायाम्य प्रहार, फरवाई (करमा पारिप) In (उपरत माघम्पर्श न राव तुम मुहू में अब पस्त से पाम्पस लिया माता सामुहका पिम स्पिति में रपण आप?, यह सिमासा इसलिए क्षती है पि, सुर-पमृत्, पाना म सामाम्पपवन सापोगिनी मामी गई है। पपाडा. का पन् म भरपरा में प्रयु-हाय में सिप | भूत परती नहीं। अपितु) भाग्यमानम्तर (भय) परमायु पीताम्या उम जर का पण पर (२५ म न featul) म यताt (पत् स मध्ये प्राश में मुसाय में लिए गदना पाहिए)। (माको उत्तरा रुप म पता हुमा) पाएं पम्मानगा परी ममुपस्थिति में सममान को पानी राता। प्रथा फा पायममुपम्पिति म पाहीरता है। तात्सरप, मुहू निदानन पनगान , भातागपत् परमानश भाग मी मिति में एका उपभव समीप पागाम- दुशोभनिराम्पस्य तु इममे विरान् अम्नि को पूरा कर लिया। पम्निी रमना-परमान को, मोला'को पढमानरानुके, मोम्प के नीचे रखना होगा, जो महा भनिष्टकर है। ऐसा न हो, अपितु यजमान अपने शत्रु से अपा रहे, मोका भोम्पा के ऊपर )-तस्मावुर्ग जुट्रमप्यूहति' IPoll (१५वीं परिसफा से भारम्भकर व शिका पर्म्यम्त ६ कशिकारमक मामस भाग में प्रयागर्म से सम्बन्ध रखने वाली भ्यन्तु-तु, पतुर्वप्रयाग में भाम्पसमानयन, मनवमर्गपूर्वक समानयम, पाम्पमारणानन्तर छह का उत्तर पप्पू प्रापि विरोफ्तामों का सोपपत्तिक निरूपण किया गया। अब स्वादापागा स्मक मन्वयाग नामक पापचे प्रयास से सम्बन्ध रखने वाली विशेपता का एक विशासिक भास्यान के द्वारा विश्लेषण करती हुई भूति कहती है)-"(मौमस्व- पंनिवासी मनुप्पविध मोमवसानों में प्रयाओं से सम्पत्तरमहल-प्रतिकविरूपा मौम-त्रिखोकी पर अपना अधिकार कर लिया। देवता सीत गए, अमुर पराजित होगए । इस विजय प्राप्तिक सम्पपरितोसर काल में ही) म्न देवरेषतामों में पर सरकी मन्त्रणा से निश्चय कर अपना पा मम्सध्य प्रकट किया कि, या ही प्रया से (इन्व), यदि अपन (प्रयाजयागारा) विजित (अपने अधिकार में पाए र पर) को पाप बनाकर (इस प्रयासयाग साबही) सम्पूर्ण यसकर्म पूरा राने । (प्सा करने से, पहीं यज्ञ को सर्वात्मनापूर्ण करने से, फला पह होगा फि) पशि इस के अनन्तर ( पझपूर्णातासिरपनन्तर) असुर-रास अपने ( यस ) पर भागमस करेंगे (विन गर्नेगे), तबभी अपना यह यक्ष पूर्ण ही बना एमा बगा । इसी निश्चय क अनुसार IPil- न बदबवाभाने पाच प्रमाणानुपान में 'माहा', कार से ही सम्पूस या पूरा र सिपा । 'स्वारा प्रम्निम् इस स धाम्नेय भाम्पभाग को पूरा कर लिया। मारा मोमम्' इस स सौम्म पाम्पमाग को पूरा कर लिया। स्वादा अग्निम्' इस स, मोगा कि उभयत्र भजपुत प्राम्नेय पुरोगरा होता है-(विहित है) उसे पूरा ( पीलमामे, पिया दर्शधि, * अनुप जो यजनीयाबवा विदित है, ना मी) दताम्मानुमार यमन कर लिया। सादाचा भाम्पपा' इस मे नगमानुपाउमाताओं को पूरा कर लिया। प्रयामानुयाज पवा । (ऋतु- सील (भाम्पाहुति के कारण ) पापा (पूतणन करने पाल)। रसिया ri- स्विकार है-"चम्निादि विष्टक' ।। (भास्पान का विरामीकरण तो विवेषम मकरण से ही सम्बन्ध रखता है। प्रकरपसासि रेशिए प्राव में इस सम्बन्ध में यही का बना पाप्त होगा कि, प्राकृतिक निस्य या भाभार पर विधायमान पषम का अनुगमन सर्वप्रथम मौमस्वर्ग निवासी मौम-मनुष्यनिष-रेववाोंने किया था। न मझकर्म पर मनुष्यपि भार समय समय पर माम्मम किया परते थे। कमी कमी इन प्रसुरामणों से मौमदेवतामों का पा यहकर्म अभूरा दी ह मान पा । इस विप्रतिपति के निराकरण के लिए देववान जिस वार फाक्षिक प्रमाती का भाषिष्कार किया, उसी का भाम्पान द्वारा सष्टीकरणमा है। प्रभाजनागान्त में उस प्रणाली के भनुगमम से उन का पन एक प्रकार से इसलिए पूछे-हो गया हिसन या में मिन जिन देवताओं का पचन अपेपित ६, उन सबका स्वाहाभरास्मक परमप्रपार कर्म में अनुपम्प है। मवरष सान्त पत्रामप्रमाण पूर्णपा का प्रतिनिधि पम हारे। मान लीसिप, कोई ऐसा पपस्मा रिव विप्न उपस्थित हो गया, बिमस प्रयापानम्तर यसमाम अन्य पविकम्पका पूरी न कर सका। क्या ऐसी मवि में उसका प्रमाणात कर्मभ्यर्थ पक्षा आयगा , पूर्णपन्न द्वारा जो अविराम इम मिलने वाला मा, मा उस से मा सर्वमा पचित रह जागा ? | मुति करती है-मही । पनामप्रमाग में जिस पति- पर्चव्यता का अनुगमन किया जाता है, उसी म शत इसे पर पमातिराम प्राप्त मेसावा है, जिस सिम इसे प्रपाबानन्तर भम्पाम्प शप कर्म और रने पाये है। ममुर बिम्नी से संबम्त मीमरवता मी तो इसी प्रणाली स प्रमाजान्त कम्म सदी यासिकाव्यता पूर्ण पना समे)- ठीक उसी प्रकार (प्रवाजात में विडित, भीमस्वर्गीय मनुष्यविध देवताओं के द्वारा पाविष्फत उघी प्रणाली पति-के अपने प्रयासान्त में अनुगमन से) पाम भी (सपमान का) यह (इटितपशप ) या, उसी प्रकार (क्ष) पूर्ण हो जाता है, जैसे कि (निस पपि भनुगमन मे ) इस पर को (भपूर्ण मी पर फो) मामश्ववाणीने पूर्णर लिया पा।(यही मादाकाराम्त अन्तिम- पाप-प्रपाम से मम्मम्प रपन पानी पूर्व प्रतिक्षात पिरोपमा है। स्वादास्मिका पठति में सम्पम्प स्यन वाली उस हि विशेषता अनुगमन मे पपासान्त में दी यजमान का यह प्रस्तान भी या नमन जाता) मी लिप (मास्त भी पल पी मय में दी-यनामान्त में कम्नता सम्पारन लिप) वा मरपोप प्रपात्र में 'मामा-स्थादा' पूर्वक निवती मी इनि रोती है, उन सब प्रयामा पारमप-यागम्निमय-पारस पम्पूषवा-समाप्ति-अमवर पुन यजमानारगा में बन गप इस प्रयोगमशिप एक ' बिगाग' नाम कामविशेष विदिव। कामबन करताहै। (पर्णपाप्रवचक सम्याम्प सभी समाय देववानों के लिए महुति दवा हुमा, तद् द्वारा सवसंग्रह करताामाहेमन्तयाग का यवन करवा )। इस (म्बादा-पाहास्मिका सर्वदेवयजनात्मिका पत्रम प्रयाणाहुति के प्रमाव) से हमपयु (पर-प्रयाजयाग से) बिजिस या सम्पत्ति को लक्ष्य बनाता हुमा सम्पूर्ण या पूरा कर सता ह-तनु सर्ष पर्श संस्थापयति' (यह नियमांकि, जबतक यतिकम्यवा पूर्ण नहीं होगाठी, तमवक गम- नागमन-मापण सर्ग-प्रादि के सम्बन्ध में विशेप नियमों का अनुगमन रमा पावा है, जैसा कि-'मनवमरान्समानपति'-'नवे सर्वेण संवेवत्' इस्पादि पारे यों से स्पष्ट है। यह पूर्ण होजाने पर इन नियम बन्धनों की कोई प्रावश्यकता नहीं पही। स्वासकारात्मक पम्तिम प्रयाश यागानम्तर या पूर्ण होजाता है। प्रतएप इस स भागे सो मी शेप कम्म पच यते हैं, उनके सम्बन्ध में नियम-पन्धन का विशप महत्त्व नहीं ए माता । उस अवस्था में पदि किसी किसी नियम का उम्म भन होगापगा, वप मी कोइ पनिष्ट न होगा यही पात्पर्य है। इसी का विश्लेपण पानी टुर भुवि प्रती है) (प्रपागात कर्म समपूर्यताप्रपा है, नियमानुगमन वनपणवापर्यन्त ही अपेक्षित ६) इसलिए इस मे पागे (प्रपासकम्मानम्तर होने मात्र कम्मों में ) स्विम् ( किंवा रखमान) यदि (प्रपन सामाषिक अनुवभाव स) व विनाम (असावमामी) र ठे, तो उस विशप महत्व नहीं देना पा हिए। इस बो ( प्रभावानन्तर ) यह समझ मना पाहिए फि, मरा पह पन कम्म (वा प्रयाप्रयाग सही) पूरा होगया-"संस्थितो यम इति ६ विपान्" । (मागस्य वं पटात यश जैस पावणाम-गवरस-चन माता मान् भवायतत्तण या इम्किर्म, किंवा इपिसावमुक प्रयासम्म भी पौषट् स्वाहा- माप स पातयाम पन माता । बौपदकार पास्मान अवसान काम्बर । म माहाकार मी चापमा निर्वचनानुमार पामय या क अपसान पही सूचक बन रहार जैसा कि बिना प्रकरण में विस्तार मे बतबापा जान माता है। पास का वाम पपद्कार, पामय स्वाहाकार से निर्गमन होजाता एसपी मामय गम का रमशम्प बन जाना है। एसा मीरस या ही गनरम बन- का का पातयाम खाया है। वपद-बारा-म अप्रपाम्ल-पुस्लोफ की मोर गत- भविष्ट हाशय, इस पुन रमवश से मायाम या पुन प्रयातयाम-बागमपरिपूर्ण- पतपय पागनि ही रोपाहुवि से बस होकर पाको 'खिg-रसगुल-बनाते हैं। भारत के 'स्विष्टक' मा मावा रामवएष सदाहुविकर्म 'स्विरूपाग' कराया है। - प्रयाजकर्म स सम्बन रखने वाली बौफ्ट-सादा ध्यारवियों से बाज प्रस्तुत कर मी पावपाम पन या विष्टक्षणग होता है -यशाम्त में । ऐसी दशा में इसकी पमान मायाममा के निराकरण का पा उपाय , इसी प्ररन स ऐतिय कार- णानुगत स्पिति-प्रदर्शनपूर्वक समाधान करती हुई मुति पती)- जिस प्रकार पपदहत हुस, स्वादशात दुत (बोफ्द् म्याहा पूर्णक वी माने पाली माहुति से युक्त कर्म पातायाम बन जाता है इसी प्रकार बोपत्-साहापूर्वक भाम्पाहुति होने से प्रभावान्त स सस्थित होने वाला) यह मायावयाम दीय गया (बम का पाग्रस पुलोक की भोर चला गया ) ॥२३|| (इस प्रकार प्रयामान्त में संस्थित-पूर्व-होने पाक्षे यह को चौपट् स्वाहा कार के सम्बन्ध से यातयाम बना देवर) मन भौम पवाभोंने मह कामना प्रकट की (विचार विमर्श किया) कि अपन से इस (मीरम ) यज्ञ को पुनः भाषा पित (रस से परिपूर्ण), (रस समावेशद्वारा कैसे-किस पतति में इस म- पातयाम बनावें ?, एवं प्रवावयाम बने हुप यान से कैसे सीवमरात्रा का निवाई करें। ॥ ४॥ - (अपनी उस काममानों को काप्यरूप में परिणत करने के लिए, मायाम मझ को भयावयाम बनाने के लिए, उन देवतामों ने पार किया कि) सो प्रयामा इति कभनन्तर यो भाममात्रा जुर में वपीए गरमी, मिस गम्पित भाम्म (माम्माठि) स बवाभोंने (प्रपामयाग द्वारा) पन्न पूर्ण किया था, उसी (भाहत्पनन्तर पाकी च हुए समप) पाम्प स ही यमापूर्व-(अन्तिम प्रयास मित माहातको की मांति वचवानों के लिए) भाम्प इपियों का मापार करत उप ( यातयाम बन इम म्न पाइमम एनों का पुन मायाबित कर दिया, प्रमा तयाम बमा रिका पाम्प (पार्गाम्म रसास्मक निस) भवानी प्रपातयाम रसपूणे दान म मनमपि मपातपाम, मम्प पाव गा में मी रसप्रदान करता था में भी प्रभावाम पनाने पाका)। इस प्रकार मोम बतायी ने परिशिष्ट प्रया तमाम माम्पाति म पाठयाम पाने पुनः प्रभावपाम बना लिया। समापत् समान 7 प्रस्तुत प्रपाबाम्त यस मी बीपद्-मादा-बारा हुत होने स पात्र पाक पाग पन गा) इसीलिए (इम पुन प्रयातयाम बनाने के लिए दी) उपम (पाँची) सामान १३. पमिग्यम-पसमाग्नि 5 लिए (भी) यह समिपागधरता है ॥१॥ वि। इसी प्राससमिन्मन फर्म का प्रपने रामों में स्पष्टीकरण करते हुए भुति ने माई) समिपाएँ नाप्रयेन प्राण है। (इस समिपाकर्म से-अपमप्रयास से) एमप (देवास्मा पाम्पात्मिक नी) प्रासों को ही हित जीवमीपरस स पुल-परता है। (समिट ) प्राणों से ही पा पुरुप ( शरीरपुरामिष्ठावा भालो मम्मा, भानलागेम्प, सागरीर में म्याप्त शरीरामिमानी तनिष्पाम्निमृर्षि प्रा मात्मा-परमात्मा ) समिट है। (योकि समियाग से पवमानारमा के प्राणों का समिपम होताई, प्रहपन इस समिधाग स पाम्नेयताप मी एक विशेप प्रक्रिया से इटापा गासमता है, यही इस समियाग का काम्पफल माना गया है। प्रायसमि- धन की कमी से ही प्राणाम्नि न्यू से विमुत होगाता है । प्रासान्निक फेन से विच्युत होकर शरीरामिमुख बन जाने का ही नाम पताप , उपचाप की अमावस्वासप्णता-वाचण सम्वाप-पर-पार है। मरिससमय यजमान उपवापी २. परमानको नारद को समियागबारा पाहटाया गासकता है। इसी प्रमिप्राप से भूविकाती) (मेकि पुरुषाम्नि प्राणों स समिययतापरसमियागप्राण समिन्य- १) इसलिए वह अप्वयु (ोताके द्वारा प्रयुक्त समिपिनाकपामामन्त्रसापोन पासे अपने समिपाग कर्मानुष्ठान काल में ) पवमान स पह प्रप पर (41) विधमान तुम (समिद्वारा अपने प्राण-समिन्धम का ध्यान करत हुए) अपने रारिम स्पर्श करो, पदि पक्षमान उपनापी दो तव । (मद तपातपशा में 2 परमान श्रे स्पर्श करना चाहिए)। (साय ही वर्ष अपयु भी यही भावना करे, इसी भावयु व मावना को स्पष्ट करती हुई भुवि पाती) यद वह यजमान नपर्व हो, तो आप भी यही भारांसन ( ध्यान कर (वयकि, इस मरे स.म- पाग स प्रायसमिम्पनशारा यसमान का वाप शान्त से)।(मुक इस प्रा एसन से, साथ ही अपमी मी मावना समापसमान(प्रबरपम्प)समिस होगाता है। (मापसमित होते हुए स्माभिमुख बनते हुए बापवापरान्ति के कारण बन माठे हैं )। परिवयमानीत (तापरहित,स्वस्य देबो (सपशा मेंनता पत्रमान अपना सरी ही थे एवं न भवयु मानीस सेमीहम इसी निष्कर्ष पर मुना पाता कि समिप मारय माध्यामिक प्राणों को सामर रही ) प्रदाय (मामा सम्वाल) अपने इस समिपाग स (मभ्ययु यामानास्मा ३ (स्थित ) प्राणों का ही समिम्मन रसा!( पूर्णमामण में प्रतिपादित प्राधिरे मा सम्पम्सर के प्रथम साबसाय ) पाप्यात्मिक प्राण (२)-पा (भमा समिपाग के) भनम्तर (सेवा समुनमारम मापस पीपद' इस वन्नपारमताक माम्मामन्त्र के प्रसारण करने पर मजे 'बीप' उपारण के साथ प्राइवनीयाम्नि के समिर प्रदेश में भाम्पाहुतिहारा समप्राप्त दूसरे) नूनपात् (माम प्रयान) का पजन करता है। वभूमपात निमा से रेत (बीप्प-गा)(पोंकि सप्तम पासुमूत रेत ही शरीर को न गिरने एका हुमा तनूनपात्()। (इस तनूनपापाग से) पर मप्प (मात्मा में प्रथम पर्म समावेश के लिए) रेस सेक ही करता है। (पूर्व ग्राम में प्रतिपादिव पारि पिक सम्बस्सर के द्वितीय प्रीप्म पर्वसमिन्धन साप साब) माम्मास्मिक रेव' संक प्राप्ति क लिए (मी) यह उनूनपापाग का अनुमान पता ! (३)यह (अम्पायु सनूनपापाग) अनन्तर (तारे-हो मम्म माम्पम्प पम्तु बीपद' इस इवता पाम्मामन्त्र के मारण करने अनन्तर इस चौपट्' अरपारण साम भाइवनीपाम्नि के समिर प्रदेश में प्राम्मातिरे द्वारा क्रमप्राप तीसरे) इद् (भामक प्रभाव ) का पजम करता है। इद निरपन प्रमा। जिस ममब-(नरमासानम्तर 'एक्यापन' मामक प्रसवमासु की नोरना मे, मामास पूर्व पोपाम्नि में पूपा द्वारा) सिक रेत (प्रमाहप से) पत्पन्न होता १(भूमिठ पनवा ),त्पत्ति के अम्पपरितोचरपण से होगा (उत्पम्म प्रजा) (अन्नकामना से )पामग्री-(अम्तमपी) सी बन कर मम्न की इण्या करती हुई विचरने कगठी २ (उस्मनन्तर ही अन्न की पोर प्राचशेशाती (स्नूपापागारे ारा सित रेत का प्रयारूप से प्रजनन अपेपित प्रजनन उत्तरमापी, साथ ही द-मन-ममिमुक्त है। प्रवएप मम्नेघारमफ इम पचरमापी प्रवमनकर्म के लिप दी तन्नपापागानन्तर इस्पाग भावरपरापूर्वप्रामण में प्रतिपारित भामि रविक सम्पस्सर नवीय बपाप समिन्धन के साम साप उत्तरमाबी)माप्पा स्मिक इम प्रजनन फल को ही लाइस बना कर मुति प्रती है कि) इम (साग स) पर पपयु(रिम्प प्रमा) ही उत्पन्न करता है। इसी लिए (प्रमोत्पत्ति के लिए) पपाग परता है।॥३४ (१)(आयु, पाग) धनम्तर (ोवा-बहिरन प्रा. म्परप पतु पोपट्' इस परिवार वाग्या मना उम्पारण रमे पर सरे 'बीप' स्पारण फ साप मापनीषाम्नि के समिा प्रदरा में माम्माहुतिहारा म माम पोये) (मामा प्रयाम) का पमन करता है। परि निरषयेन भूमा T पयामपाग के (करने के अनन्तर हुवशेष भाम्य से ) ययापूर्व इवियों का मा पार करता है। इस भापार कम्मे से यह देवतामों को पुनः पाप्यायित, अयात पाम मरता है। पाम्म (पूर्व कयनानुसार ) भमश्य ही प्रयापयाम है-'पाव पाम माम्पम् ॥ (रोप भाग्यापार से पावपाम पा प्राप्पायित होवा हुमा प्रया दमाम बन बावा है) भवएप ( यमपति में यह नियम बन गया है कि) मिस किसी मी देवता के लिए (वेवास्मक पक्षकर्म के लिए) स्विक हवि का विमान वाद प्रदान करता है), उस सम्बन्ध से पप के पुन' विरहन (पतन्ना मक अम्निविरोप) बिए अमिपार करता है। (इस पमिपार से ) पर उस पर पुन' भाप्यायित, भयावयाम पनाता है। यदि स्विटकरम्नि के लिए (भपाक- पामसम्पत् मारपर्य) इविन विमानन पहिले से ही पर देवा, (वो उस मक- स्था में) पुनरमिपार भनाबश्यक है। (वात्पर्य इस कमन का यही है कि-करस्न इष्टि कर्म म वो पहिने से दो स्पिरुपनि के लिऐ माग नियव दवा है। मत भसकी समाप्ति पर पुनरमिपार महीं होता। अभिभार तो वहां भविश्यक है, जो परिसे से विपकम्नि के लिए अपदान विहिव नहीं है । प्राय स्पन पेसा ही है। प्रत पहा पवरपदी प्रमिपार अपेक्षित है। जहाँ पहिले मे अबराम निपपईमा इतिकर्म ममाप्स्पनन्तर) अग्नि में भोर किसी इवि की माहुवि की अपेक्षा मी रम्पदा है। (अपेक्षा नहीं पगाठी)-"नो दिवस कान इरिपोऽमागवि दोप्पर मावि" ॥२॥ इति-प्रयासमानणम् (२) पांचवें सम्माय में दीमरा, पीये प्रपाठक में पीया माण मयात ()(i) (१-रिमामयात्मक प्रचारप्रामण में प्रथम मामण समाम ) 11 ~ प्रथमकार में पांच प्रभाव में पौवा, पौषे प्रपा मैं पालामार (११)-(१४) (२-त्रिप्रापसात्मक प्रमाजमामय में म प्राप्त नितीन ग्राम ४-प्रयागार ( परति माय मायण में प्रभावात् (पति), और प्रमाजानमन्त्रण, इन यो प्रक रयों का समावेश हुमा है, जिसे पूर्णपणोज तीन प्रकरणों (१-अपामबन्ध, २. उपर पअपाजवाण, इन वीम प्रकरणों) एप्ति से-४-५ में प्रकरण मान मामला है। इन में पौने प्रस्ताव प्रमाणात प्रकरण में प्रकारान्तर से उस अमित पति का ही निरूपण इमा, जिस का पूर्णमापस प्रमाणबामण' नामक सीय प्रकरण की पीकसिका से १४ी गिरवापरयन्त कणिकाणे में निमि टिकोण से मविपादन हुमा है। उस पूर्वपति प्रकरण में बदलाई गह पपरि का प्रधान सम भाभिवैविक सम्वत्सरममतामा। एवं प्रात प्रकरया में परमा बाने पाती उपपविका प्रधान पाम्यात्मिक प्रफ से सम्बन्ध है। परत्वयम बापमान वल स्पपचिमरान में विमिन्नता है। इस विमिन्नवाला पनाकर निम्म लिखित मुति-प्रकरण का समाप करना चाहिए--(पेक्षा प्रकरणसवि)। (१)-(मन माम प्रतिदोवा-समियो भन्न भाम्पस्यम मन पौषट् इस समिपवार याम्मामन्त्र धारण करने पर सरे चौपद' साधारण + साथ मारपनीयाम्नि समिय-प्रबलित-माग में आइस्क्ति भा म्यादि पप ममप्राप्त पहिल (समिया समित् नामक प्रथम प्रयाग) करता है (समिपाग सम्पादन मना)(समित्याग दो किमा मामा, मरम की भाप्यात्मिक पपपपि बतलाती हुई भूति करती है कि, सगाापनकम्मे से देवा स्मा में गिम । माम्मास्मिक प्राणों का भागम हुमा वामप्रतिदिन उस प्रायो समिम्भन के लिए ही, मागात्मक-पापसमिसन तिरपा समिघाग गि • तमिरोमेन मेरे मिरा (मराग)मामा'--BAS VARI +" वामा मलमासपो (मगाराम्भनियरमन्नत) मात । योमे पुगे पाना । एकानेगास्मिन् (मातिने सामान) सत् (मुगारानार्मना) पादित -पत (पास्वसम्मति से युक्त) है। (वर्हि-वर्म-का भूमाभाव इस के संन्या पास्त्र पर बहरणपर्म पर ही अवलम्बित है) । (उत्पम्न प्रखा का भूमा प्रजापति रूप से मी प्रभी है, वं प्रत्येक प्रजा के बहुमशो माव से भी अपेचिस है। इमाग मे ममा सत्पन्न की गई है। अब अपेपित रमपविध मूमा-भाष का भी उत्पन्न प्रजा में मापान होना चाहिम । परि भूमापर्म से युक्त है। पूर्वप्रामण में प्रतिपादित मा पिदैविक सम्वत्सर चतुर्थ शरत्-पर्व समिधन के साथ साप) भाभ्यास्मिक इस भूमामाप-फल प्रामि के लिए ( मी) यह मप्पयु पहिका यजन करता है (9)ह (अध्ययु, पहिचांग के) भनम्तर (दोता -"स्वाहाम्निम, खारा सोमम्, स्वाहाम्निम् स्वाहा देवा भाम्पपाम्, स्वाहानि होत्रा सुपाणा- पम्न पाम्यस्प व्यन्तु पीपी इस स्वाहा वषवाक याम्मा मन्त्र फ उम्पारण करन पर उसक 'चीफ्ट् एच्चारण के साप पाहबनीयानि के समिट प्रदेश में माम्मा इति केरा प्रमप्राप्त पाँच) सात-स्वाहा (नामक प्रयास) का पमन करवाई। (सन्त-ग्रीष्म-जपा-शरत्-मन्त, इन ) पाप प्राभों का निश्चयेन हेमन्त साहा कार (मन्तिमपत्र) । (अपने स्वामाविक कटु स्पो से ) हेमन्त ही इस (पार्पिप प्रवावर्गको अपने वश में करमता है। इसीलिए हो (हेमन्तामण से सविकाम सपण स्वातमप सोने से हो) हेमन्त ऋतु में भोपपियाँ म्मान (मुकुलित) होगाती २, पनस्पतियों के पचे मह जाते हैं, पपिगम प्रविशयरूपेण तीणकाप बम मात, (पीणकाय पनवे हुप निब से बमकर भाकारा से, नपा अपने पोसलों स)प (पक्षी) पट-पट मीचे गिरने लगते हैं, पुरुप समुदाय मुविकरापुरुप फी मांति एवमी बन गावा--(प्रतीत होने लगता है)। इस प्रकार (इन प्रस्पषष्ट स्थि तियों के माधार पर यह कहा जासकता है कि) इमन्त सम्पूर्ण पार्थिव प्रमावर्ग को अपने प्रपिकार में कर देता (किए हैं)।(निसप्रकार एक समर्प-दत पान-पोप म्पलिभपने दम पर अधिकार करता दुमा बलमरा भी-विस म्पति, सम्माप-अम्नमम्पति का अन्पदम मोका पन मावाद, परमेप इमन्न पागमचा मी प्रपन ममाम कामता पमता हुमा श्री-पीर पन्नाथ का भम्पटम भोला बन पाता है।हमन्तयाग क इसी फल का प्रपन रामों में अमिनप करती हुर मुनि पती) पर यम्माम जिस भई (समार ) में राता स भई गोभी, और भन्नाप लिए स्वीत र लता (उम ममाग को अपन पग में पर तारा प्रमी मी-प्रमाण प्राप्त करन में समर्थ रोजाना १) माफि मामान (मापदरी परमानदत्त रतिया म परिशदीत प्रगमा पर्प मी) मम्मर , राधपप (पण) सर्गशिप योजान सताद। (मनायाग फा पापामा सभिपरमा पिपीता पर्व है ) ॥६॥ इति प्रयामन । पद्धति ।- ४ ५- श्याधानमन्त्रण মন মান কম # ক ‘যাথায় নামক মশা বসু को करना पाता है। पोप प्रयासों के सिरहाका पाप माया मन्त्र , जिन पूष के प्रयाया प्रकरण में सटीररण किया जापका। पोप पाम्पान 'मयानगर । चिरा समय १-२-२-कम रोदोता पोप पाग्या मधों का स्पारण फरना , उस समय प्रबेस पापामकी समाप्ति पर यजमान भीर एकमिन्यापारण करतापपमान राम पाठ से प्रयास का मरने देपामा सप सप कराया है। भवएप पगमानसको मन्त्र 'भवामान मपण करता है। नको म्यारानुमन्या-मम्मी का पहप लिन शिषित:- (1) --"समिसो मा भाग्परप गुपीपट समियो म मम। एको मम, एका वरा यमर म योरमान प्रति पर म लिपिमान भूपाराम् (समिगत्रणम्-१)। ()-"तमगर भागार पाण्ट पाते, म मम । कीमम रेतर पर। भीगा भूपाराम् (तापर गमन्त्रण-) (10ोला-'गेपमा भाप प प -मा-मि- एषा, म मम । अपामम विगगरप-प. परती भूमार (प. (1)---हिमा भाग पीप "-यामान-परमति म मम । पारो मम पार-1 | महती भूपागम् ' (बार मग-1)।
प्रयाणाम '-यजमान- (५)ोवा-"स्वाहानि, स्वाहा सोम, स्वा ऽयन्तु वापद" मम्नये, सोमाय, अम्नये, न मम । पन मम, वस्थ किन-पपर्य। मम्नादो भूयासम्" (स्वाश मन्त्रम्-५)। भावक के मामपमाग में हारकर के प्रयाबमन्त्रों का, व अपयुका माहुति-कर्म से सम्पव रसने पानी अम्याम्प पिरोपतामों का पति-सरान पुरस्सर निरूपण हो चुका है। परन्तु अबतक यजमानका क-प्रयागनुमन्त्रण' मन्त्रों की उपपत्ति नहीं बनाई गई है। प्रात शेप मामा माग में इस प्रपामानु मन्त्रण को दी परविप्रपशेन-भूवर उपपत्ति पतलाइ मारही। इस उपपत्ति स सम्बन्ध रखने पाता एक भाम्यान सर्वप्रथम स्मृत करती हुई मुति कहती है- देवदेवता, और असुर, दोनों प्राजापत्य (प्रमापति की सन्तान) परस्पर स्पर्श (युस) करने लगे। (दोनों ही) पण, या भनुपों से ( एक दूमरे पर) विजय प्राप्त न कर सके ( भौतिक शमवल स पुर का निरिक्षत परिणाम म निफान सका)। (अपने भापुरयुत युद्धकर्म से ) विमप झाम न करते हुए दोनों में यह निश्चय किया कि, भरे मात्र (इन्त ! मना, पच्या सो) भपन पागूरूप मम माम्पम में ही बीतने की इच्चा करें (शामाहारा युद्ध का निर्णय करें)। (इस मास्मिका पार के युद्ध में, बाधिक युर में ) प्रपन दोमों में स मो भी-(एक दूसरे द्वारा ) प्रयुक्त वामा मिथुनमाव से अनुक्रमण द्वारा (मुम्मारा) मनु गव न करेगा पह हार जावगा, दूसरा ( मिटुनमाषानुगत एल) पिसवा माना गापगा। दोनों ने संथा () मान ली (पति)। (प्रस्तुत पागमूस ने इनको की पोम्प परिकारी मान फर) देवोषतामों में इस से कहा कि (हमा । भोर मे समयली की भोर से ) पाप हो भारतमात्र का प्रयोग करे ॥६॥ (रकम रणानुमत ) म (ही माग मुर का प्रारम्म रस द मुरीका उस पना कर) पोले-'एको मम (इमारा एफ ६)। आमाफमेफा (हमारी एक ) यर (प्रस्तुतर में ) असुर मोस । इस प्रयम (पामय ) पक्षा फर्म स ( प्रविशात सन्धानुमार ) वववठा अमुर, दोना में मिथुन सम्पति प्राम रमी। यह मियुन ही वोजो एक और 'एका । (पोण पात्मक गम्भाष समन्वित लपही मियुमभाप र पुम्मापफ एफ म पास्मा पुम्भार पा र भोगायफ 'एका' में पोपाम्मा सीमार का समा रानो पदम मिथुनमाप गवाप पन या, पोनारपद)मा (प्रभम मियुनापाप्पनन्तर) गौ मम यह इन योले, एवं प्रयुर में 'अस्माकरे यह प्रमुर पोले । इस गर्म स ( मी दोनों में ) मिथुनसम्पचि प्राप्त करती। यह मिथुन ही सो, '' (पुमापक श), (बीमार शर)ता द्वितीय मिथुनावारपनन्तर ) 'श्रयो मम' या इन्त्र पोले, एवं प्रमुत्तर म 'अमाफ सिनः' या प्रमुर बोस । इस काम मे ( मी वानों ने) मिथुन सम्पति प्राप्त कर ली। यह मिथुन ही तो है, जो कि अया, और विम||ll (हनीय मियुनावास्यनम्सर ) "चयाग मम' या पोजे, पं प्रत्युत्तर में 'अम्माक पतन' पर भसुर मोश। इस काम से ( भी दोनों में ) मिस म्पचि प्रामर की। पर मिथुम ही तो है, जो कि-पस्मार, और पठम'१॥ (चतुर्य मिपुनावाप्त्पनन्तर) पच मम' यह न बोले । (इन इस मामय 'पर' पर प्रत्युत्तर लिए) अमुर कोइ सापन प्रान न कर सके। (म किपरबार पतम्र' म भागे-स्त्री-पक्षिा मेफ सिम काही प्रमाण है। भतएब ) इस म भागे मिथुन का प्रमार है। पागे तो- श्री-पुम्माष दोनों के लिप) 'पत्र-ग' म ममान राम का ही प्रमोग होता है। (पस पहा पार पूर्व प्रतिमात संपाक भनुमार प्रमुख पम के मिपुन की पूर्ति करने में पस मर्य रइत दुप) असुर अपना मर्मस्व (पहिले पार मिथुम माव मी) हार गए। उपर वोवताओं में (मिभुन मयादानुगमन स) असु का भी सर्वस्य जीत लिया मम्पूर्व मिथुनों में (सदस्प प्रयागकम्मो मे) सफ्रम प्रमुगो मागरस्ति पना रिया ।।। (स्योंकि प्राविक प्राणपस में पपासुर-स्पया में मिथुममाषकारास रस्ता असुपरामा में सम , मतपय इस पप्रपपागम्म में भी प्रपागानु- मत्र-मन्त्रों में प्रमा' -डा' इत्यादि मिथुन-मापारमा पाँच मारा कराना दुभा मिभुममम्पत्ति-अनुपग्रामिका पार पान सम्पषि-पर अपना परम्प अधिकार पमा सना है। यही अनुमन्यण-मन्यों की, या पटिन पारि मिपनमा रो मौलिक उपपत्ति धिमका वैमानिक विश्लपण सन्मकरणानुगत विष पना पारण में किया प्रापगा। प्रातिश मिमुनमात्र प्रापार पर प्रतिक्षित मी भपानानुमात्रण सम्म पी इनिध्यता पनजानी र मुनि काली)- प्रयाबाब इसलिए (पूर्वोक मिथुनमावावाप्ति के लिए) इस यजमान को प्रथम प्रया- माग समाप्त दान पर पा(प्रयाजानुमन्त्रणमत्र) चोचना चाहिए कि-एको ममेस्पेका वस्य, यमई रेमि' (एफ मेरा एक सनकी है, जिससे में ट्रेप करता हूँ 01 सरि यजमान किसी को अपना पहिगाव शत्रु नहीं मानवा है, म्पचिगत ट्रेप नहीं करता है, वो उस अवस्था में ('समई रेमि' न पोक्ष कर) 'योऽस्माम टेष्टि, ये प बर्य दिप्म' (जो हम से ट्रेप रमसा है, जिसके प्रति हम साप पैर रखते हैं) पर बोलना चाहिए (इस १२वीं करािका अनुसार से ही १३, १४, १५, कणिकाओं का, एवं सोलहवीं कपिरका के पूषसमतुलित भाग का अनुपाद गवार्य पन या पर यजमानशत्रु (पाप प्रयाब पलमान के द्वारा प्रयुक–पन मम-न चस्प विमन, पोऽम्माम् देष्टि, पंचपर्य विप्म' इस प्रयाजानुमन्त्रण-मन्त्र के द्वारा) पान पत्र-पा करता हुमा ही रह जाता है इस मिथुनसम्पचि उपलम्प ही नहीं दोवी)। परिणाम स्वरूप मा यममान अपने शत्रुवर्ग का सब कुछ बीन खसा सर्वसम्पत्ति से सपनों को मागरदित (पबिठ) कर देता है, वो पबमान प्रपामा नुमन्वय से सम्बन्ध रखने वाले मिपुम पिमान रे मानता दुभा वनप्रयोग परवा ॥१६॥ इति-प्रयासानुमन्त्रण (५) पाप अभ्याप में पौया, पीपे प्रपाठक में पापर्वा प्रामण समाम (१४)(१४) (-त्रिप्रापणास्मक प्रयासमामण में मम प्राम द्वितीय मामस ममान (पाचर्षों मप्पाय समान) विरताप रत का-म-मेष-कोमा गोपापा षु पारा से सपनाम मम्मिए परेमा गरिए (मठा भम्पाय प्रारम्म) प्रथमकार में छठे प्रमाय में पहिला, पौने पाठा में छठा प्रामा (६१)-(शा) (३-विद्यापणात्मक प्रयाजनामरण में ममाप्त तृतीय पक) ६-प्रयामों का इष्टि में प्राथम्य त्रिभाषणात्मक प्रभावापण के पूर्पोपात्त प्रथम प्रापण में (१।४३) 'प्रतमोरचे प्रयाणा' स्पादिरूप फा-पप्रकशिफात्मकभाग के द्वारा मन्यु' (प्रगावकर्मोपपति) का प्रतिपादन हुभा है। वही या स्पष्ट किया ग या पत्र-प्रमावयाग सम्बस्सर में मुक्त बसम्पादि पाप चतुओं पर यजमाना भपिकार प्रविधितरने के लिए ही किया आता है। वही यह भी स्पष्ट किन कि, पेवता और अमरों की पारस्परिक प्रतिसा में देवताओं में भपने कि सापन पाप प्रवागों को ही पनाया। इन पांच प्रमाजों से ( पचप्रमामयाग पाकी समष्टिरूप सम्वत्सर सम्पत् पर अपना भपिकार करने में समर्म हो उक्त उपपत्ति से पह निष्कर्ष निकलता है कि प्रयावकर्मा पम्त भतुकम्म तुओं का यमन ही प्रभासयजम है। अब इस सम्बन्ध में यह विज्ञासा होती सम्पत्सरपन में,-मिस में साम्बत्सरिक प्राणपिप बगवानों माग निमर धतुओं का (प्रदरतामों का) मा भाग है। दूसरी जिसासा का भी सम्बन्ध है। समिन पाइपमीयाम्नि में इन चतुरूप प्रयाग-देवताओं के लिए पाहुति पिहित है। पर समिय अम्नि साम्वत्सरिक विम्मानि का प्रतिरूप है। एव सिमरोमाता है कि, प्रातिक परमों का भी (अन्य पेपरेवताओं की म भनिदेष सामअवश्य ही कोहमार्ग पनिष्ठ सम्बनमा परमम्निसम्बर प्राव में मिसिमास्य वम या। इस म्निसम्बन्ध-विज्ञासा का यों भी पी किया सासवा कि, असुरुप प प्रभावों के लिए होता की भोर से वो पाप भ्यामन्त्र प्रयुक्त होते हैं, धन पायो ही मन्त्रों में सामेसो अम्न भाम्पस पस्तु. 'वनूमपावन पाम्पस्म पतु इस्पादिरूप से पम्नि' का समायरा है। मकिपा मन्त्रों से सम्बप रसन पाती पानों प्रयावावियाँ जमश समित, क्नुनपात, बर्दि, स्वारा, न पाप प्रपान-चतुनोपतामों के लिए ही निविदा सपना पाम्पामन्त्रों में भमि' परका समामेरा क्यों हुमा ।, यो प्रयासपागात्मक पार म भन्नि का मी मागहर माना गया वीमरी शिक्षासाफा प्रवान्यापम्प स सम
नरे। प्रपामदेवतायाग ही टिका है। इस इनिहर्म में अतुओं की पति के
विर को मात्र कर्म विदित है, एवं अन्यों की तमि लिए अनुमाज धर्म विहित
राहन पोनये में प्रयाश कर्म प्रानवता-यागमण इटिकर्म से पहिस होता है,
अनुपातमा इपिफम्म से पीछे। यह विज्ञासा भी स्वामाविक है कि, प्रमाज कर्म
भाविकर्म में प्राथम्प क्यों है । इन तीनों जिशासामों का प्राकृतिक प्राधिदैविक
जा से ही सम्बन्ध है, पतिमान ही इस विज्ञासात्रयी का सास्तिक समाधान
॥
प्रस्तुत-बामण की प्रथम करिशका से प्रारम्भ कर १५ कणिका पर्यन्त
इसी विपासा-नगा सोपपाचक विश्लपण हुआ है। अतएम पराकक्षिका
महसमापस भाग का एक स्वतन्त्र प्रकरण माना मासकता है, जिस इमर्ने-
प्रभागों का इष्टि में प्राथम्य' नामकरण अन्वर्य माना पाकगिता से मा
स्मारकशिका पर्यन्त तीन शिकानों में मिपार कर्म का निरू
सहुमाई, पही प्रवास का शिकारपास्मक द्वितीप्रकरण है। १५ वी
शिका में समुति का विश्लेषण हुआ है, पही एक कशिफास्मक मृतीय प्रकरण
नाना गया है। १८, २०, इन दो करिशकानों में प्रपात कम से मम्मम्प रखने
पास परिशिप पाम्प-देवतादि प्रश्नों का विमर्श हुआ है, यही पस्तुत प्रापण का-
'परिशिष्ट प्रश्नोत्तर विमर्श' नामक अन्तिम प्रकरण है। सम्भूप २१ शिकात्मक
मारतीय मयाजमाण में ४ ममास्तर प्रकरण हो जाते हैं कि पूर्वाभण-पी
में प्रतिपादिस ५ प्रकरणों की छमिक संमया के अनुरोप मे कमरा ६
पारण माना मामला है। इस प्रकरण साति को तरप बना कर ही मत प्राप
जानुशार का समन्वय करना चाहिए-(सेपा प्रकरणम दि)।
(प्रपाजयाग अनुपाग इसका प्राकृतिक सम्पत्सानियत में क विरोप-
भवमानसी भाभिकिपा एक मानिक भारपान के द्वारा पिरस
स करती भुति करती) (बसन्तादि पांचों पाशिक) तुमो ने (माए
विप ) रेषतामों सा प (मम्बत्सरामिपण मोमगर्भिन पानि पद) में
(अपना मी) माग पादा (भर्यान्-जिस प्रकार रेवरेवनामो बानि में माग
मेष भोंने भी उम मागीदार बनने की देवरेषताओं मे कामना प्रकट
की। अपनी इमी कामना को प्रकार करते हुए पीने परेवताओं से अनुरोप
सिक) पाप होग इस पक्ष में इमें मी मागी (हिम्मेदार) पनाप , हमें इम
माग) म निमोविए', (म परम, भार माग की भांति )
पस पात्र में मागे मी भाग ॥१॥
पिब (जिस प्रकार किसी भागन्तुक सपति-भोका, सम्पविभाग-कामुक माने से, सरे दिमाग मांगने पर स्वामाविक विचमोम भाकपंख से सो सम्पत्ति का प्रथमपोका पागम्सुफ की उस म्पाय प्राप्त मांग की उपेचा पर देव मुमी मनमुनी फर देता है, ठीक इसी बौकिक विस स्थिति अनुसार अतुओं के पदमाग मांगने पर) दवतामों ने ऋतुओं की उस (मामप्राप्त भाग कामना को पहिचाना-मनार मी ऐसी उपेपाधि दिसलाई, जैसे व्यहोंने कम मुना-बान महो)। (बषसामों की उपेक्षाटिका, प्रमों की म्पामप्राप्त मांग करा का वही परिणाम हुमा, यो भाब भी प्रत्यच में देखा सुना जाता है। यदि । को अपना पायप्राप्त अधिकार मांगने से भी नहीं मिलता, यो वस्तुव' रिना भी मिन्न जाना पाहिम, वा उस अवस्था में मांगन पाने का प्रामा विद्रोही उस पित्तमोगी-माग रोगी के प्रतिशम्श्री-रानुपत में जा मिलता है। मही ऋतु किया। इसी प्राकृतिक पर्म का विरोपण करती हुई भुवि कहती है) प्राण वयदेवतामों के इस प्रकार (भपनी मांग २) न मानने पर (उपेक्षा करने पर प्रसुएँ ( उत्पन्न स्वामाविक भास्मविद्रोह कारण) देवदेवताओं के साहब प्रातूम्प असुरों की भोर लौट भाई अमुरथल में समाविष्ट गई ) IRI (अपने शत्रु की प्रसद्धि सुन मन कर विपक्षीवन को सम्वदना का व विक अनुमा हुम करता है। यदि किसी से पदक्षा सेना से, तो उसे पाहिप पर हम के रावत में मिल जाय। और स मिलकर उस के उस समरिकर अपना सारोग रेकर उस समृद्धि को भोर मी भपिक समृय पनाब, बिसस को सुनने मात्र से विपदीदल की पेदना सविंगत गोमावी है। अनुमान इसी पा भाग लिया। भमरमरान की भोर भागव) अतुमाने (भमुखिए) सदिको (भोर मी अधिक) समय करना प्रारम्भ किया, मिस (भमरसम को देवता सुना करते है (सुन मुन कर व्यमिव हुमा फरसे है)। (धातुओं के। असुरों की पूर्वसमसि में पा विरोपता उत्पन्न होगई ?, प्रश्न का समामान । मुति करती है कि)-मिम पुरामुग में इम असुरों के पूर्वज (तुपों के। जून सहयोग न मिक्षन म) मिस समय (मोसम में) इस जोष थे, (हल झोत बीम गलत ये (इस प्रकार इक जोतकर बीम गल कर बो परिमम स पोना। पन्न म्पन्न कर पेनमेनस्पेण परे कम से अपमा मिर्जाद करते ही वश (प्रपरे) (श्न अनुमों के भनुमाह से पारसी मोसम में) कुम पान कार का पटे हुन पानों को प्रमादि से मुसा रहे हैं। इस प्रय प्रयामा . (ों के भनुमा से भाज) उन-असुर प्रदेशों में पिना ही हल जोव पुनः पुन भोपनियों पर दी है। (तात्पर्य, ऋतु अनुप्राह मे पदिमे जिन इन अमुके पूर्वनों फोबिस मौसम में इस बोतकर पड़े कष्ट से अन्न उत्पन्न करना पड़ता था, भाम सन पराब असर ऋतुओं के अनुग्रह से उस मौसम में सो धान का संग्रह पर मवे। साथ ही इहें इस खोदने का भी कम नहीं ठाना पाणा । शुतु-अनुपा से बिना एक मोत ही इनके देश में पर्याप्त अन्नसम्पचि उत्पन्न होती यती है। यही या प्रमूख समृद्धि, बिसे सुन सुन कर रेषता घ्पपित हो सकते हैं) (रेवदेवताओं के समीप मी कर्णाकर्णी पे समाचार पहुंचे। वही हुआ, जो पाना चाहिए थे।) सुरसमरि सुन कर देवदेवतामों को बड़ा परपात्ताप (भाग) एमा।(पनि अपने प्रतापराप-सनित इस परपातापान रामों में प्रकट किया कि)-मारे इस (अतुओं को उनके भ्यायप्राप्त माग म पन के) कारण (6) भाग राम-(प्रमुरलोग) अपने शत्रुदन (देवरत) मति (स्पापूर्वक) नुवा करना चाहता है (प्रपात हम से उपेपित सभा क बल से ही समूटपम र भार व ममुर पहा व समर्थ होगए है कि, रे-सुनम मुमा रम से पुट करने +लिए सन्न है। भाग असुरों का पह साहस होगया है कि, -प्रस्पच में हम मे राबुवा रसाते हुप मी नहीं रह। वास्तव में ) पसा रोगाना बहुत ही कमी है- (फनीय इन्नु-सना की पात)। (चतुओं अनुप्रा में पास असुर पलाम पन गर। मतपय प्रस्पप में इन स मुटमारना तो भोर मी परमात्ताप का पारप राग । मतपय अप तो) पाप सब (मिलकर) साकोर (भप्रपत्र महब ) पाप निकालिप मिस स प्रमुर मोग अपनी प्रम (वर्तमान मपद म्पिति म विपरीत (अमर-मिषन) अवस्था में (सत पप) पप गाय सा पह भानवे पेशिनुभों को हम जम्पायप्राम माग न मिलन में यमुरों में गा मिनी परिणामस्वरूप प्रमुर ममाग पग पपरपस रूप मे निर्मल बनान का भी यही उपाप होमवालि म पन नैस अनुमों को बापम लाटा ली जॉप । परामर्शद्वारा यह निरपपर) परपता (अपना मन्तम्प प्रफर परत हु)मने लग पि, प्रपन इस संघमपनशिप सुररस म पर मान पाही) प्रमों को तो निमत्रिन (भाररपूर को रापम पुभाना पादित । उपाय निम्न प्रापा परन्तु ) पिम मापन म (INA प्रलोभन म लापा माप । या ममम्या पापणी। ममागरा कारण नदीमा पि. मनु स्वनामा मसिगनलगा पी। प्रपन प्रिय गान में माग (मभी नहीं मिला था। भार भी वे लौट सकती है। परन्तु मलामन ऐसा होना चाहिए, यो पूर्वप्रक्षोमन स मी विशिष्ट हो । पर यही होसकता है, जिस या मागको उन्हें कामना थी, सामाविक प्रलोभन था, उस का प्रथम मागहर प्रभावी बनाया माय । प्रवश्वमप इस विरिण प्रमोमनाकर्षण से वापस पोट भाएंगी। इसी तात्पर्य का दिग्दर्शन कराती हुई मुति करती है कि)मपन इन अतुओं का इस याद में सवप्रथम ही यवन करें (अर्थात् पहिला भाग सीरिया गाव- पाप को प्रथम माग मिमगा, मही सम्वेश शुओं के पास भेजा माप। विश्वास इस मापन से अवश्य ने मारी भोर भाजायेंगी ) | (रेबमास में र अम्निाप मी समुपस्थित थे, मिया में देवतालोग सा से पहिला भागहर मानते भार। धतुपाग से मी पहिले पनि कारी प्रथम पवन होता पापारासर भम्नि में यह निर्णय सुना कि, प्रतुसप प्रमानों का ये मोग प्रपम मन करने वाले है, तो अपने-अपमापिकार की किसा हुई। सी पिता को पत करते हुए) अग्निदेव बोस पो कि--(रे देवरेवाभो!) भाप ने मो कि पहिले (प्रमाणपाग से मी पहिले ) मेरा पवन किया है, (परिमा मागहर बनाया है) पर मैं (कक्ष में) मा प्रतिष्ठित दंगा (अम्नि को मम पर हुमा कि, मुझे शहर्षि पत्र का प्रथमभाग पहिम मेरे दिया है। भाजय तुओं को मी प्रथम मा बात है। पी एसा मरो कि, मरा भागहीन कर शवों का दिया गाय । यदि कही पमा होगा, तो मरी प्रविष्टा रचिम्न हो जायगी। देवतामों में अनिलकी रम पिता को हटाव हुए भाशसम रिंग कि) अमि- देव (पाप चिन्ता न करें) म पाप को अपन भारतन (परममाग सरण प्रतिस्थान)स कमी न गिराग। (सतानों का यह भाभासम भाव ही मुर सित रहा। अम्निाव का प्रयममाग भएण ही बना सका। इसी स्थिति का विगवान कगवी इति प्रती कि) उन वरदवाभों ने (प्रथमभाग प्रका- मन मापन म) शापों का गुलाम हुए (मी उमा प्रथम माग दन हुए भी) क्योंकि भनिसको अपन नाभापान स ( प्रथममाग म) गुव नही किया पता (तप स, सी मम्युनभाष म) भनिरव 'अम्मुत माम सही प्रसिब होगए (दिन के लिए ग्मपत्राप्युत धाम्नय पुरशश विहित)। पर पामिक भी अपने रस भागवन म कभी प्युत नही जाता है, जिस पापवन में पर प्रतिष्ठित या गोकिइम अप्युत पनि को (मनि कम भयुत पर्म) मानता L प्रयामा (पपापनि मम्नि का-नतामायतनाच्यावयाम" इत्याविरूप स वाषिक सम्वोप तो करा दिया, परन्तु इस म समस्या अधिक क्लिष्ट पन गई । 'प्रथमपजन' धर्म मार ही सम्भव है। असुओं का प्रथमयजन कर लिया भाय, भषया तो भनि का प्रथम मदन रनिया माय । पम्नियजन होनुकाहै। यदि इसी स्पान पर प्रविष्ठित रमना है, तब तो चतुओं का प्रबमयजन असम्भव हो जाता है। परि अनुमों का प्रपमान किया माता है, तो अग्नि के प्रथम भाग के अपहरण के अतिरिक्त अन्य ग्पार का प्रमाब, फलम्बाप अम्निष के साथ की गई प्रतिमा का निर्वाह प्रसम्भव हो जाता है। इस अरिक्षावस्या के निराकरण के लिए देव नतामों के प्यान में एक उपाय भाया। फोंने यह निरचय किया कि, प्रममपजन का प्रबोमन प्रयम भागदर अनि बाराही ऋतुओं के समीप पहुँचाना पाहिए । परिणाम यह होगा कि, अतुदेवता अम्निवता को प्रथम पचन रूप प्रिय माग का साने वाला समम कर इन से अपाय हो या कहेंगे कि, अब भाप अपना प्रथम बबन उपेत्य मान कर इमें प्रथम माग्दर बनाने का त्याग कर रहे हैं, वो हमारा यह मत्तम्प हो पाता किम अपने इस प्रपमपान मे भाप को पपक म करें, भक्ति भापका भी अपने प्रथम पवन कर्म में हरा समापश घरले । इस प्रकार प्रदेवतामों का भी प्रयम पनम हो जायगा, पाप ही प्रतुपाग में समाविष्ट होने से भनिएप का प्रपम यमन मी सुरक्षित रमायगा। इसी माप का निष्पण करती । भुवि कहती है- (ग्त मन्वयारे द्वारा उक्त निरपय कर) दबदबनानि पनिाब मेमा कि.(हे अग्निरेब' ) जादा (और) पाप ही उन (भमुरप्रषि प्रमों का निमन्त्रित कीजिए। (प्ररणानुमार अपने पाभाविक मादामनग दोप-पम्म की अपेमा म ) अम्निदेव (पहा प?प वर्त) पप कर (उन प्राओं मे) अग्नि पपने हग कि अनुषतामा 'मैंने पवनाचोक यमक प्रति प्रापका भाग मान लिया है (अर्यात देवताओं कइम निरपर की मैं पाप को भूपना दमे मापा कि, वे अपन पत्र में भाप को प्रथम मागार बनान के लिए मन्नर)। (अनुदेषता श्रोत पहिम अपमाम से पुका ।। मतपय तसा सा नहीं रान राम प अप कमरे मामन परिम पमभाग मपरका प्रिय मापन समानों कीबोर मे इन का निरपय नहीं हा बाय। गहोंन माता पि, परिमल भाग होपमा पERE REा अपम सारंगे महीं। त, दिल प्रथम सागरनामा निमित पर पऐ.२ ना अपना माम मुरधिन ए ममा, मन मानपकहा पतपय पहा लौटना मी भेषकर बन पकता है। साथ ही मागविमफिसमय मामी देख पुरवे कि, प्रयममाग अम्निदेव को मिक्ष पुका है। वेदी भनिदेन भफ्ना माग बोरकर उसे हमें देने भाप होंगे, इसकी कोई सम्माषमा नहीं। और पिना प्रथममाग के अपन जौटगे नहीं। इसी भाराधा के स्पष्टीकरण के लिए अम्निवरे प्राय निमन्त्रित शुदेवसा अम्निम से पूछने लगे कि भम्निदेव देववानों के गा के प्रति) मापन कैसे (हमारा माग) बाम शिया (अर्थात् रेवदामोने में परिसे समान केवल भागहर पनाना ही मिस्थित किया है, भयमा इमें प्रम-मभागार बनाने के लिए सम्न ? । अनुदेवसानों की मानुसार ऐवसकम्प का स्पष्टी- करण करते हुए भनिदेव पने बगे कि असुदेववाभो । परेषता अपने) मा में पाप का सर्वप्रथम ही पवन करेंगे (भाप को प्रथमभागहर बनाने का रीमेवाओं मे निश्चय किया है)ोणा (सप भनिदेष केनरा सावधानों को वा पिरित होगमा कि, भपने को देवदेवता एस प्रपममाग का अधिकारी पनाना चाहता है, यो पार्म में चल उममत्राच्युत प्रपाममूत भनिदेव के लिए ही विदित है, और वही प्रयममागहर मा. निदेव-पाजानते हुए भी कि, यो प्रथम माग मेरा प्राविस्तिक रन है, उसे देवम्- मरखोपकार के लिए मुझे प्रतुदेवताभों को बिना किसी संकोच के सौंप देना चाहिम ता-उन पतुदेवसानों का पर अग्निदव के इस अपूर्णस्याग के प्रति कृतमा स पाप्मानित होगया। प्रत्युपकार की भावना से हाने मी पा मिश्चय कर लिया कि, जिसने अपने लिए अपमा स्वस्व दोरिया, उसे कमी प्रम प्रपत्र मारेंगे। फलत अपने निया, पूर्वमा प्रभम माग म युक्त यत हुए अनिरेप प्रसन्न हो जायेंगे, प्रत्यु पकार भी हो जायगा, साथ ही जिम गमवाोंने संकटापन्न स्थिति जानते हुए भपममाग अपने लिए निपत कर दिया, उन की भग्निदेव क प्रति की गई-'म सा मापननाचावणाम' इस प्रतिमा की मी रवा दो आयगी । यह निरषय पर प्रतुभोंमें अपन प्रथम भाग में अग्निदेव का भी ममावरा कर लिया। इसी स्थिति का, यु. भोक साप पनि का पनि सम्बो इम स्मिति का उपपारम परती हुई अनि करती ) (मिम नगरन पाल, मपम भागार, अनिदेव का स्माग मे ममापित मोर, प्रत्युपकार में पम्निाव र प्राविस्तिक प्रपम-मागाधिकार को मुरपित रपने की सामना सन आतुभाने भनाव मेदा कि(अनिषापापम परक पदम) म पापोमारे में (स्मार प्रथममाग में ) मागदर बनात प्रम-मAM २५1 यो कि पापने वताभा क यज्ञ के प्रति हमारे लिए (अपना अधिकार माइस हुए) माग (प्रथममाग) जाना (भपने प्रथम माग को हमारे शिप स्वीकार कर अपनी भारता का, स्पाग का परिचय दिया)। (घोंकि स्वदेवताभों समारसमक्ष में प्रबममाग पाने वाले शसुदेववाभों की भोर मे भग्निदेव भी समाविष्ट हुप प प्रव म पमी से ) ये अनिदेष (दिव्यप्राणाम्नि ) शभों में समाविष्ट है (मों स पम्निप्रास्म का समन्बय मारुतिकरे, मी सहज सम्मको समय में रखकर प्रवास विवार मावि कम्म में प्रत्येक प्रयासमाग क साप अम्नि का मी पान होता है। पावरब र प्रयागदेषवाक याम्पा मन्त्रों में )-समियोऽम्ने वनूनपावन, होने परिने, स्वाहाम्निम् (इत्यादि रूप में अग्निपर का समापरा हुमा है)। पर (माविरायरून फनभोका यजमाम प्रयाजकर्ते विकम्मतापूरफ घरपा) उम पुरसम्मे में निरचयन मागइर बन जाता है, जिस पुष्पकम्म में पर (पुण्यकम्म सूपक के पति, प्रवर्तक के प्रति मपायक के प्रति ) समान हवा हुमा ( उसे मी ममुत करता हुआ ) सत् पुण्यकर्मानुष्ठान करता ।। (मयाजकर्मानुगत पनि समावेश से ) पम्निप्राणयुक्त बने हुए उस ( पुरया) शिप अग्निप्राणयुफा (ो भवरष समय ही ) चतुर ग्न सम्पूर्ण भोपभियों का परिपाक करती हैं, सो कि (क विधाम परिपब के माधार पर) प्रमों में अग्नि को समाविष्ट मानना है । . (पूर्वप्रकरण में या निकर्ष निकलता है कि, प्रपामयनामों का पान परित होता है । म मि सम्पम्प में- पूर्वपत्त उपस्थित किया मासमता है। पूर्व प्रवरण प्रामण में (२) परणार्यक मयों की पारमा करन हुए मुक्ति ने रेपाहानम्म्म का मिफ विरसपण किया है। पहाँ पादान का म पनाया गयाम में प्रयासरवतानों का प्रतिम स्याम पड़तामा कि निम्न लिग्नित पपन म स्पष्ट है- "माया दवान् पममानापति, सदमे पमाप दबानाराबाउमाद । अग्निमाआरोति वदानेपाम्पमागापानिमाबोटबाऽपोर। सोममाय हेठि तमोप्पा पमागाप माममाया वाऽमा । अग्निमाति, वय पपउपपप्रान्स्व माम प पूरा भरति समाप्रविमादामा।
वाय पहा लौटना मी श्रेयस्कर बन सकता है। सामरी मागविभक्ति के समय येडमी रेल पुके थे कि, प्रबममाग भनिदेव को मिल पुष है। हो भनिवेष सम्य माग भोगकर से हमें पन पाए होंगे, इस की कोई सम्माषना है महीं। और पिता प्रथमभाग मान लौटेंगे मही। इसी भाशा सष्टीकरण के लिए भनितो पारा निमश्रित प्रतुदेवता भम्निदेन से पू बने लगे कि अग्निदेव देवताओं रेखा के मति) मापने डेसे (हमारा माग ) बान लिया (अर्थात् देवताप्रति हमें पीसो कसमाम केवल भागार बनाना ही मिस्चिस किपा अपवा ये हमें प्रम-ममाहर बनाने के लिए सम्न । अवताओं की इमानुसार देवसकस्प का सकी करण करते हुए मम्निष कान सगे कि,तुबमाभो । देवदेषता अपने) में भाप का सर्वप्रथम ही पलम करेंगे (भाप को प्रपममागहर बनाने काही रेषताओं ने निरषय किया है) (जब पम्निदेव नारा भाववानों को पर विदित शेगमा कि, भने को देवपेषवा उस प्रयममाग का अधिकारी बनाना पाहव है, जो बालम में का उममत्राच्युत प्रधानमूत भनिदेव के लिए ही पिहित है, और यही प्रयममार, ग्निदेव-पामानव हुए भी कि, यो प्रथम माग मरा प्रातिस्विकपन है उसे परम- खोपकार के लिए मुझे भतुवेतामों को बिना किसी संकोच सौंप देना चाहिए तो उन सतुवताओं का रस्म अग्निदेव के इस भपूषस्थाग के प्रति स्वमता स प्राप्तापित होगया । प्रस्युपकार की भाषमा से होने मी पा मिरचयर लिग कि, निमने अपने लिए अपना स्वस्व दोर दिया, [से कमी मान करेंगे । फसल अपने निया, पूर्वप्राम प्रथम माग से युक्त रात हुप भनिवेष प्रसन्न हो जायगे, प्रत्यु पकार भी हो जायगा माप ही मिन पार्कोने संकटापन्न स्थिति जाए मी प्रपमभाग अपने लिए नियत र दिसा ग्न की अग्निदव के प्रति की गई-न वा माममनारचावयाम' म प्रतिमा की मी रहा हआयगी । यह निरपर तुओं भफर प्रथम भाग में पम्निदेष का भी ममावेश कर लिया। इमी स्पिनिका, पण मोर साप अनि मा पनि सम्ममइम म्पिनि का उपपादन करती हुई क्षति करती १) (निमन्त्रस रने पाल प्रथम मागार अग्निरेवा त्याग से प्रभाषित रोर, प्रत्युपकार में पनिषक प्रातिस्तिक प्रपम-मागापिकार ने सुरपित रहने सोकामना सन सनुप्रॉन प्रमाव मे मा कि, (म्निदेव पापम पर मम) हम भापकोटमार में (स्मार प्रथममाग में ) मागदर पनाग में .
प्रम २५1 वो कि आपने षवामों क यज्ञ के प्रति इमार लिए (अपना अधिकार घोरत हुए) माग (प्रथममाग) जाना (भपने प्रयम माग को हमारे लिए स्वीकार कर अपनी मारवा का, त्याग का परिचय दिया)। (क्योंकि दयवेवताओं के सम्बस्मरमा म प्रयममाग मने पाले चतुदेवताओं की भोर मे अग्निदेव भी ममामिल हुए थे, मत पवमी से ) पे अनिदेव (विष्यप्राणाम्नि) ऋतुओं में समाविष्ट है (अनुमों से मग्निप्राय का समय प्राकृतिक, इमी सात समर का लक्ष्य में रखकर प्रयास सवा माहुवि कम्म में प्रस्पेक प्रयागमाग के साप पनि का भी पजन होता है। भवरण र प्रयागपताक याम्या मन्त्रों में )-'ममियोऽने बनूनपावम्ने, पोऽग्न, परम्ने, स्पाराम्निम् (इत्यादि रूप में अग्निपर का समावश हुमा)। पर (माविशयहा फझमोका पपमान प्रयाजनैतिकचम्यसापूरफ पारपा) उस रकमें में निश्पयेन भागार बन जाता है, जिस पुण्यकम्म में मह (पुण्यकर्म सूत्रा के प्रति, प्रवक के प्रति, संयोपक के प्रति ) समान कहता हुभा (से भी मेयुत रखा हुभा) वत पुरयफम्मानुष्ठान करता ह। (प्रमायकानुगत पम्नि- समावरा से ) अम्निप्राणयुक बने हुए पुस ( पुरयका) *लिए भम्निमाणमुजा (हरी भवएव समय हो) असुपं उन सम्पूर्ण मोपपियों का परिपाक करती हैं जो कि (7 विमान परिषय मागर पर) तुषों में अग्नि का समाविष्ट पानता है। (पूर्वप्रकरण म यह नि निकलता है कि प्रपामबनामों का मान पदित होता है । इस मिकसम्मान में-76 प्यपद उपरियन किया मासस्या । पूर्व टोपबरण प्रामण में (AP) परणार्यक मनों की पाम्पा करम हुए पति ने देवादानकर्म अमिफ विरतपण किया है। पd पापान का जा अम पतझाया गया उस में प्रपादेबतानो समन्तिम म्याम पता जैमा निम्न लिखित वपन मे राघt- "भारत दषान् परमानायति, तदर्भ पनार पानागाउमा । मग्निमयमापति बनानगरपमागापानिमोबोट राउमा। साममाप देवि सन्मी पापाम्पमालाप माममाराच्या मार । अग्निमा वय पएउमपया-पुत माम य पुराnt परति तस्माऽपिमाटामा।
स्वय मम ग्यारेषतम् । देना २॥ जन्पिा २॥ बागोवि, व्द प्रयोगानुमान मानाचोदवाऽमाइ । प्रयामुनाणाशा वैदेगऽमान्यपा"- रास्त शा१६,१७। ( वता-भाषाहमतिस सट है कि प्रामपा-माम पवाओं का भाषाहन सबके मन में विदित है। मौत पनति में पा भी नियम विदित है कि, जिस रेषवा का रिस कम से भावाइन विदित है, उसी कम से करवा का समन विदित है। सर्वत्र देवावाइन क्रम से ही वेषमाग विदित है । देखते हैं, मात प्रयास कर्म में इस समान पद्धति-नियम-का इस लिए सपन हमारे कि, प्रमागे का पाषाहन दो विदित हैसा के अन्त में, किन्तु सम्म हुभाई सर से पदिमे । प्रयाप्रयाग के सम्बन्ध में यह व्यक्तिकम में ?, क्यों मही इनका भी पहन निममानुसार भावान कम से अन्त में ही किया चावा १, इसी पूर्वपर का अपने रामों में निरूपण करती हुई, भागे जाकर उन्धित पूर्वपर का सामापान करती हुई भुवि कासी है) प्रयागयाग + विहिस पागाइनकम में विपरीव ने बाजे प्रथम राजन फर्म २ सम्मम्प में (वानिक) करते हैं (पा पूर्वपरा उठाते है, विधिपधि उपस्थित करत–वदा" कि) मा कि प्रमाओं को विर्षिमागानुसार विदित नियम के पापार पर ) राम रूप म (पम्न में रेपश्यना ) पाहूत करने है (मा पाइन अब कि इन का सन्ति में दा है) वो ऐसी स्थिति में ( भागाइन कम से विपरीत ) किम भरण (पयों) इनका प्रथम रूप से (देवदेवता ) पान करते। (यजन सर्वप्रम परिया माता)। (स्तर स्पष्ट र-मफ्ने प्राकृतिक सम्म स्सर ) पक्ष में (माणविष) रेवावतामों में इन (प्रमा) को उत्तमरुप से ही (पम्तिमरुप मदरी यपपि) स्थापित विपा (पा)(पापि उसी समय उन) देव ऐरतामों में (अग्निदेषवारा इन के लिए यह भी निरस कर दिया था कि हम तुम्हारा यमन तुमें प्रथम मान करीरेंगे। (इस पिरोप विधानभाषार पर मामाम्प विपान की सेवा करत ए संपवता में भावाइन किया इनका गपगि पन में दी, परस्नु पान किया सरमपम । प्राकृतिक पक्ष में प्रचार-कापना पनिमयान प्रम। उसो माहति मनिषा पर प्रस्तुत बमानुप पनका वितान हुमार। मन परत मी मी प्रातिक नियम का अनुगमन करना भार पर रामना)मनस (मासिक नियमानुरेनर) परिबर जोग (अपने इस पिपम्म में भी इन प्रयागेका रमाप से तो पाषाहन करते हैं, पर्ष प्रपम- म्म से मनाया - (प्रपामयाग के सम्पप में एक विषय और पिमिशास्प र गावा। ममिन्, तमूनपान, इद, परि, स्वाहा, ये परि म्मातिया नाम-समय बसन्त, मीष्म, वर्मा, मन, हेमन्त इन पांच प्रतुओं से सम्बन्ध रखती है। सवत्सरयन की पम्सा बसम्तादि पांचों अतुओं का सम्वत्सराम्नि से सम्बम्पर डेमा कि RTE- बारम्भ की कथिकानों से सट कर दिया गया है। इसी आधार पर यह मान मा पविप्रतिपम्न बन जाता है कि, चमों का पइन भनिपूणेकडी रोता है। परन्तु-सासवरण पम प्रयाअपाग के सम्मस्य में एक महीन रिमविधि रफ- वित होती है। भारम्म के पार प्रयासों में यहाँ चतुषण प्रयाओ साप 'स- मिो भग्न भाग्यस्य म्पन्'-'नूनपाइन भावस्म चतु' हो भन्न माम्पस्म प्यन्तु'पहिरन प्राजस्य बत-इस रूप से केवल पम्नि का सम्बन्ध विदित र म पनि इमन्वश्चतुलवण स्वारायाग में पल अग्नि का ही सम्बन्ध विहित मीरा भापतु पृषप्रयासपतुटपी की मावि पनि मम्पर प्रविरिनस प्रयाव पाग में-पाम्पमाग, प्रधान, विष्ठान, इन तीन अम्नियागों का सम्पब और किया भाता है। दूसर रामों में भाम्पमाग मा भनि, प्रधानमाग प्रारम्नि, स्विरकमागमारक अनि, नवीन प्निया 7 भारि-मप-प्रसाम में पवन और किया साता। यार-मामाम्प सम्बस्सराम्निवत् इस पिरोपाम्नित्रयीका भी भासाय सम्पन्ध पदोनुतपण पापों ही प्रपायों में प्रस्पेक में- हम तीनों विरोपाम्निवाग का अनुष्ठान होना चाहिए। परि अनुभौ साप सम्पम्प मही वो किसी मी मपानकम्म म इन का पजन मही हाना चाहिए। स्थिति पदक, भारम्भ पार प्रदामों में तो परत घामाम्प प्रनिती पसन किया जाता है। पिसम प्रयास में मामाम्प भम्निपान अतिरिकबिरी पानिपीत पान और किया जाता है, फि अनुमामाम्पत्पन पत्रम प्रभार में इन पान विप्रतिपम्स बना हुआ है। एमालपण देमम्त प्रयासपा मे सम्मम्प रुन पास मात्र में प्रपाम, तपा मामाम्प अनि, रानों पर भी रिजमीन विरोपानि पान का मी ममापरा पारे। समाग निम्न विम्पित- - "स्वाहाग्नि, स्वाहा सोम स्याग्नि, साहा रेषा वापपान् स्वाहाम्नि हामी अपाणा, भग्न मान्यस्य मन्स बोपट" -राक्ष १२,१३) उक्त पाम्पामत्र के पांच विभाग सुट हैं। (१) स्वादाभि, स्वाहा सो मम् -पा एक विभाग है। इस पेभाम्नेय भाम्पमाग, तथा सौम्य भाम्पमाग, पोपाम्पमागों का सम्पन्म है। सोमगर्मित पनि दी भाम्पमाग देवता है। इस का प्रथम यजन होता है। (२) 'स्वाहानिम-पद वितीय विभाग है। समयका मुत धाम्नेय पुरोगशानुगत प्रपान देषता ही इम विमाग से गृहीत है यही दूसर मपामयाग है। (३) 'स्वाहा देवा भाम्पपाम्' पर सीसरा दिमाग है। भाम्प स्माहानत्तण प्रपाम (मन्व) पता के लिए दो यह पतीय विभाग नियत (४) 'सादानि होगा उपाण' पदीया विमाग है। स्विष्टकम्नि का ही इस र यमन होता है। (५) 'म भाजस्म पन्तु पौपद' यह परियो दिमाग है। पू पतु सामान्य सम्वत्सराम्नि का ही इस से पवन एवा है। पाम्पमागयागानुग्न विशेष पनि भादि में निहित है, प्रधानभागमागानुगत विशेष अग्नि (उभयत्राप्यु भम्मि) मध्य में विहित र विष्टकपागानुगत विशेप पनि अन्त में निहित है इस प्रकार स्वादास्मक पबम प्रयासमाग क भादि-मप-अवसान में प्रमशः प्राम भागमाग, प्रधानयाग, स्विरुपाग ये तीन विरोपाम्नियाग पूरी पार प्रवासापेक विशेषरूपण विदित है। इम भी उसी पूर्योपात्त पैमानिक प्राभ्यान द्वारा पा मततावी हुई मुति कादमी है)- (अपने प्राकृतिक इष्टिकर्म में होन पास पवाजयोग भौम (सरप शुरूप पनि मफ) प्रपाय म देवयवानों ने निरसन से या (पहाविरामरूप मरसम्पत्) प्राR R लिा-(of पीये प्रयाव से प्राम) स .पार ) को पत्रि (मन्त अनुरूप बारामक ) प्रयाज से प्रतिष्ठित कर लिया। इस प्रभाव कर्म ) ममम्वर दाने पाना भाग्यभागादिरूप मा पन्स कारोप (तिकतरवा पपया उस (के भनुमान) मरेपरेवता सम्मोर को प्राप्त होगप ॥१०॥ प्रमानार्माधिरित भाममागादि क्षण राप यमामुधान बल से स्वर्ग लोक (की भोर) मान हुए परेवालोग (मम्तरिक्ष में अमूम-मपर परि पिएन स्प मे विपरन पार्स प्राप्यमाणात्मक याविरोधी ) प्रमुर पतमों। निराश ( मंकम्प) मे हर गम (ो भय हुमा कि, ये पुण्ही हमारे स्वर्गगमन पापा ममदी करदें। इस मय से पास पाने के लिए) नपरेषताओं ने असुर पल्सों को मारने वाले, एवं मार भगाने वाले पनि को (ही स्वर्गप्राप्तिसापक- भाम्पमागाविराप) पूर्व में (पहिले) प्रतिष्ठित किया, उसी को मम्प में, उसी प्रेमन्त में प्रतिक्षित किया (अर्थात् प्रावरिय अनुगमण से अपने स्वर्गसा पार यहाविराय को निर्विघ्न स्वर्गप्राप्ति का हेतु बनाने के लिए पनि पहाविशय भावि-सम्म-अवसान, मीनों स्थानों में प्राप्यमाणोपर पानेपप्राण प्रतिहित पर रिया) ॥१९॥ (रेपरेपवानों द्वारा त्रिस्थानों में नियुक अम्नि के प्रमाण से इनकास गमन निर्विन पूर्ण होगया। क्यों कि) यदि इन देवदेववानों का पन असुर रापसों ने पूर्व की भोर से मियेषरना पारा, विन गबना पाहा, वो वत्रस्प भनिन वसा अनुयें को मार भगापा। परि मभ्य की भोर से मिरोर करना पाबा पत्रस्व पम्निने तत्प असुरों को मार भगाया। यदि पीने की भोर से निरोप मना पारा, तोपत्रस्य भनि ने पत्रस्व असुरों को मार भगाया। इस प्रकार पीन स्पाना में सफ रूम से नियुक्त टीमो) भनियों से सस्मिना सुरक्षित यते हुए परेषता में निर्विप्न वर्गलोक प्राप्त कर लिया ॥१२॥ (पाठविक पल में एपित्री से पुलोकी भोर गावे हुए पार्पिय प्राणरक्तामो प्रमागविराय पर भाम्तरिस्प भसुरोंज माझमण दोवा पता है। परन्तु कि- स्थान स्थित माम्नेयप्राण सम्बन्ध से पन का परमारमणम्पर्य मिरशेबाना इसी मारूविक पविया मापार पर मीमपतामोंने अपने पयन के पमप्र । पावसम्म मे-पाच प्रयास में-सी प्राकृतिक निषयी सम्पत्-श्री प्रामि लिए चीन विशेपानिकम्मों का समावेश किया था, वद्वारा अपने स्वास्मरूप म निरापद स्वर्ग पहुंचने में मम हुए थे। इसी मौमरवानगता परिपार पापारपर इस पबमान का पद पटकम्म विदित हुमा है। इमे भी अपने सामान्य पारा वर्ग में पानावा समय भाम्सरिस्य प्रमुग्रामों का पारमण यात अनिवार्पाइस मामणग्रे रोना मी पापारक।मी भाषमा-निराश रेसिप, निरापद सगावाति लिए मौमापानुगर कमवत् प्रपनाम में भी पापरे पास मो-पारि-सम्प-अपमान में सिपाम्नित्रयी का पान परला है। इस परन स रह-नित्रीका अनुषह पाम संगता पर भोसल मिपाल मे वर्गफलमोना गा पा प्रसार मा- मप्प-अबसान-में अम्नित्रयी का यजन को किया जाना , विप्रतिपत्ति का यही समाधान है, जिसका मुनि के महरों में यो विरसेपण हुमा है) (जिसप्रकार प्राकृतिक नित्य यज्ञ में अग्नित्रयी का सहयोग होता है, तदनु मिसप्रकार मौम मनुष्य देवताओं में अपने चतुर्थ प्रयाध समाप्स्यनावर पबिवें प्रबर भादि-मध्य-अपसान में अम्नित्रयी का पमम किया था, पदधारा निरापद रूप से स्वर्ग प्राप्त किया था, ठीक इसी प्रकार (स्योऽपय ) पह यजमान भी अपने इस चौपे प्रयास से (दो स्वर्गवाक) यज्ञ प्राप्त करता है, उमे पाप प्रयाग स प्रविस्ति करता है, इसके अनन्तर गो पाम्पमागाविरूप यत्रका रोष पर रहता है म्स से स्वम्पोकही प्राप्त करता है॥१०॥ सो दो कि (पाम प्रराम कमावि में सामाम्नि'-रूप से यजमान पति- नधिरूप) अन्वये भाग्नेय-माम्ममाग का यजन करता है, (इस से अपने बर्ग- भाव ए. पहाविराय ) पूर्वभाग की भोर से रासों के मारने पासे, मार मगान पाले भनि कोही (निपुत) रखा है। (भाम्नेय-पाम्पमाग ) अमन्चर (इमी पाम सपान कर्म के मध्य में) मो ( उभमभामुत प्रमान भनि के लिए) मो मानेप पुरोगरा (का भागहर) बन जाता है (स का स्वाहाम्निम्' रूप मे पान करखा)।इस कामे से (इस याविशय के) मनमाग की पोर में ही पनि को नियत करता है। (मध्यम भनि पवन ) ममन्तर ओ कि मन्यु (प्रमा बान्त में स्वाहानि होत्रा जुपाख' इत्यादि तप से) स्विष्टका अम्नि का बम (स्वरुपाग) रवास कम से (इस यातिराम) परितमभाग की गैर मे ही अम्नि को निपुत करता है, (मो कि) अम्मि रचादण'-(राससौको नि- र्वीच कमाने पाता, मारने वाला) एवं रचमामपहन्ता' (राजमों को मार मगाने पाता, पामरासीमा से महिपास करमे बाबा)kal (प्रवाबकर्म से स्वर्गलोक की भोर वाव हुप) इस मामक (स्वगता पा) पाविरोप पूर्षमाग से मवि अमर यास माध्मय करते हैं, वो र रोता रसायपहम्ता पनि प्रस्सन प्रमुर पथ को मार भगाते हैं। यदि मन माग से भाम्मर मरते हैं, वत्रत पनि तपस्यों को मार भगाते हैं। पदि परिचममाग से मामले को तत्रत भनि त्रलोको भा मगाये है। इस प्रकार थर (माविरामहप-सगसापक) वास्मा तीनों भनियों से बड़े भोर प्रयागा में सुरक्षित-निरापद पनता हुआ स्वर्गलोक प्राप्त कर सता है। प्राप्त करने में ममय होमाता है ||१५}} . इति-प्रयाबानामि प्रापम्पम् -६ -अमिवार (स्यास्पाग) (प्रवास कम दारा पक्षावियप पम्न भी भागीदोभायगा, बहू सात शतर्गस्थान में भी भार ही प्रतिष्ठित हो गायगा। परन्तु पाका पजमान का भामानुपात्मा-मृतास्मा, जो स्वर्गगत पहाविरायरूप देवात्मार्पण मे भाकर्पिन अपने पेलौकिक प्रारमसम्यानम्तर ( मिस प्रारप कम्म से इस पर्व मान शरीर मिका) ही (मस्के प्रमन्तर ही) रेवास्माकणारा वर्गकल का म्मेका पनेगा, स्वग पाँचेगा। इसी लिए तो सगरमा प्रामुमिक-(पारशीकिर) माना गया है मनस्व सो पर परफन' (परोपफर) कालापा । बिकापणा मक प्रयासमापण स परिख प्रतिपादित 'म गाभणक प्रामारण-अस्पामावण सम्म-विधान में पर स्पा किया जाता है कि, मानपीय मन परोहफनापेपया पदिक प्रस्मा फहोकी भोर पिरोपरूप से भावर्षित रहता-दिलिप-१०.१५ परिषिशान प्रकरण)। भवानी मम्व भनित्रप-पवन का भी परोप-स्वर्गफमा निरिककोई प्रस्पर भी पास होना चाहिए । इस प्रस्वत फम को वात्कासिक, काका नरमावी भेर से रो भागों में विभक्त डिया वासनामोजन किया और गति दार्गा, यह पहलीकिक वाम्कालिक फल माना जावगा। मोचन किया, मुकम्म कमरा रस भरमांस-मर-अस्मि-मामा-गुश-मोर-मनोरूप में परिणय इमा। यही मदतौफिक कालान्तरमाची पाना भारगा। प्रापक्ष की प्रश्न १६,१७ 1- इन तीन फशिफार्थों में दो साताहिक कापिरोपण हुमा २ जिस हस्पाएपप से अभिवारात्मक फल मानते हुए पारिषक कालान्तरमापी करने एम एपफ कर रियापही ममिवार मामाजाप्रमएवं १बीर बिना में साम्वरमाची, अतएव सिर धम्मात्मक प्रतीकिर फरका लिएपण हुमा मतपप सत्कणिकात्मक पण 'फलमति' मामा बामकरण मान सिवाइम रोमों ऐतौफिक पड़ो में में मूवीस्टारगान पनि पमिपाग सिर स्मक-सात्कासिक-अपम ऐलौकिक फस का सीकरण करती हुई (विस समय भाम्पमागनुगत प्रपम पनि का मन होगा, और समय पवि कोई यममान का शत्रु सनमान के प्रति निषामाष प्रकट करे, भगा (पोन मिन्य वचन बोस परे, इसके अतिरिक पबमान को अपने किसी शत्रु {हारा पहिले सेमे गए निम्मापनों का प्रतिशोप सेना हो, बोरसे पाहिए कि मह उस शत्रु को सव बनाकर उसके मामप्राण पूर्वक-'मुस्मामास्मिारिसि,- भन्यो मा बपिरोपा भविप्पसि-रेरा तू मुग पीला प्राप्त करेगा, पातो भन्या हो जायगा, पा पहिरा हो जायगा, यह पचन बोलणे। इसी प्रकार वूसरे, तीसरे भनिवजन में भी यह अमिनारवापपरा अपने रानु भनिष्ट कर सकता है। ही तीनों अमिनारों का अपने शम्मों में दिग्दर्शन कराती हुई भुवि करती २) (इस प्रगावकर्म में) परि इस (बबमान) के प्रति पर (क्बमानस भवबा और कोई मां-निषक) पहारम्म में (भाम्पमागानुगत प्रथमानि- पागकाम में) निवारचम का प्रयोग करे, पो (पचमाम) स (निस) प्रवि (पए) बोले कि तू मुख्य पीपा प्राप्त करेगा, अचाऐगापगा, भगवा हो पहिरा पम बाबगा । वास्तव में (शारीरिक त्रों में ) येही (पोनों ) मुख पीक (पलमान के रुकम्पम मात्र से) पैसा ही अवश्य हो वावगा (निषा पा वो मारो बारगा, अवमा पहिरा हो जायगा, यी प्रथम अभिचारात्मकना काक्षिक प)॥१६॥ यदि इस के प्रति पर परमम्प में (उमयमामुत दितीयाम्नियागकास में) अनुचित करे, पो ( पबमान) उस के प्रति (पा) बोने ल, न प्रजाराम्य, पर पदो गागा । प्रवाएँ, और पए निरमयाम से मन्य (प) है। (जमाम चयन से ) रेसा ही मिरपन हो बामगा (निना की प्रमा पशुमम्पनि न रोवामगी। वही ठितीव अमिरात्मक मानसिक फल ) ॥१७॥ परि इसके प्रतिमा पान्त में (विषम पम्निरूप स्वीयाम्निमागास में ) अनुपित करे, तो ( पबमान ) स के प्रति ( पा) पोस किन पति रक्षित, एवं निम बनवा पा रम ही म्स (बम) मोकने प्राप्त होगा (मर गावगा)। (पवमान मे ऐसा मने से) पर (निरक) पैसा ही प्रकरण सेवामगा (मा परापूर्वक पाखिी बनता हुमा नीम मर माग । नही दीन अभिवारास्मा वात प्रयासमा अलिक पर माना नायगा। इस प्रकार भाम्पमागयाग, प्रधानयाग, स्विाकयाग, मानों मे सम्बन्ध रखन माल प्रथम-मम्पम-अन्तिम-अम्नियों फ यमन म शत्रुपि मपराउप र अन्यत्र-तात्कालिक-ग्रेनौकिक पल भी प्राम किया जासकता है। इति न तानुकालिक पन तो पक्षमा दिपा । परन्तु पर या नहीं चाहती कि, यमर दम्प प्रे न जानफर पमी मूने करन बाल अज अन भी यों अपना नारा करालें । न करताप को लक्ष्य में रखत हुए ग्न को साबधान परली हु भुरि प्रती कि रन पनयम्पानमिनों को यह बान मना चाहिए कि, यह कोई सामान्य सी किए कम्म नहीं है। अपितु यह प्राकृतिक ममिद उस प्राणानि का अपनी मतिष्ठा पनाना, जिम के प्रति मापी म यमाम्नियुक्त यममान के प्रति जान-मनमान में मोसरी मी पेका, निन्दा, उपहास करने मे मर्षनाग निश्चित ।।) अनण न निरकों का पाहिए कि मुलकर भी (राम परिहास में मी यम, सपा यमानु- धानकर्ता ) पजमान के प्रति भनुम्पाहारी (भमुचित बन पाल ) न बनें--'ना मुम्पाहारीय पात् । (अभिपार कम्म-को उनम कर्म नही । लोकमप्रहारक, मर्पकल्याण कारक, पदप भेनम पन म मात्तिक मम्मे में अपन म्पत्तिगत पर बल श्री मापना ग्न्यना भी पालम्पप में नमागुण का भापान करना है। मतपय उत्तम पन ता पहा रिपकना मी प्रम अभिवारा अनुगमन न कर । यो पाव- पपीम मम्मम्म में यही तर पप्पान दागा कि, समकता मामान्य मनुष्य मनुपचाप परम्न श्रीमापात् प्रनिमा । भिम प्रकार प्रकृति स पिग्म जान वाला प्रपन ही पाप म पारलानायब पामाम म शत्रुता गग्ग्न पास भी स्वद व महनियागी पनि माव। ममयानिक्रम भबरपा मना। परन्तु पम्प माप मिम खानालम्पसम्भानियापनाता मारि जा पत्रमान मा अपितु ध्यान पगम्य को पाना भर याद उम करम पर्णविन प्रतिमा पर राना मना नाव मी नए मान। बालमा ग्म फल प्राप्त र मना फिर मानकोनापा चाशा गाना तो महीपादित । कम उम पर मार प्राति पारी पारदना पाहिए। यत निम्तमामादनानुम्पादारी म्पान म मामयिक भाग-पतानी- माप माप पतन पनि भा र माम्पिा मापान बन गन लिन भिपापमपनि म प गन मि में पानी पनि पानी दकि- (पाना दीपा ) म जाननाला भी पा (ए गपगमारना) - स्मक-साकाक्षिक-अपम ऐसौकिक पल का सष्ठीपरम परती काती है) (मिस समय माम्ममागनुगत प्रथम अनि का बबन होरहा हो, और समय पदि कोई यममान का शत्रु पबमान के प्रति निन्दामाव प्रकट करे, मा (ो निन्ध पचन मोल पो, इसके अतिरिक यबमान को अपने किमी रान बारा पहिले से करे गए निवाषचनों का प्रतिशोध लेना हो, वो उसे पारिए या उस राठ को साक्ष्य बनाकर उसके नामपारण पूर्वक-'मुस्मामालिमारियमि अन्पोपा बरिरो पा मविप्यसि'-देश तू मुम्प पीडा प्राप्त करेगा, पाता रोबारगा, या पहिरा रोजायगा, पर वपन बोसो। इसी प्रकार दूसरे, ती भनियमन में मी यह अमिषारणाबारा अपने रातु का अनिष्ट कर सकता। वहीं तीनों भमिपा का अपने शम्यों में दिग्दर्शन कराती हुई मुवि करती है) (इस प्रयासफर्म में) पदि इस ( पबमान) के प्रति पर (पवमान भया और कोई मोलु-निरक) समारम्म में (पाम्पमागानुगत प्रथमामि पाग कास में) निवारचन का प्रयोग करे, दो (पवमान) स (निना) प्रति (पर) बोले कि तू मुम्प पीरा प्राप्त करेगा, भम्पा ऐकामगा, अपरा। मदिरा पम नायगा । वास्तव में (शारीरिकल्हों में ) येही (पोमों ) मुम्प पीर (पजमान के पक कपन मात्र से) पैसा ही परप दो गायगा (निमकर तो भन्या रोजापगा, अपना बहिरा हो जायगा, पही प्रथम अमिषाराममा कालिक फल)॥१६॥ पदि इसके प्रति पर पसमय में (उभयत्राप्युत दिनीपानिपागकार में मनुषित है, तो (परमान) म्म प्रति (पा) मोने कि नजारम्प, प] राज्य से मापगा। प्रमा, भौर पर निश्चपाप से मम्प (प) RI (पमान 4 मापन मे ) रेसा ही निरषयेन दो मापगा (मिनक की ममा पशुमम्पनि मा हो जायगी। यही वित्तीय ममिपारारमा वानकामिक )|१|| परि सरे प्रतिभा पाय में (विमल अम्निमय तृतीयाग्निसागस में) मनुपित करतो (पम्मान ) इमरे प्रति (पर) पाम रिप्रतिया xe वं निर्धम बनता हुमा शीमरी स ( यम) मासे माम दागा (मर नापणा )। (परमान म मा पने मे) वा (निना) पैगा ही पपरस हा पावणा (प. परापूर्वक रिसीमनता एम पी मर गार गली पनीष भिषारात्मक मार मालिक फम माना पायगा । इस प्रकार पाम्पमागयाग, प्रधानपाग, बिष्टरुपाग, मानों से सम्पन्न रखने वाले प्रथम-मध्यम-अन्तिम-मनियों के यजन से शत्रुवि माप र स्पा-तात्कालिक मेइसौकिक फल भी माम किया जासकता । मुनि ने सातगानिक फसल पवना टिपा । परम्तु पर यह नहीं चाहती कि, यसर दस्थ प्रे न वानकर पमी मूळे करने बाल मन जन भी यों अपना नाश करालें । उन के करपाण का लक्ष्य में रखते हुए टन को सावधान करती हुई मुरि हसी र कि उन यमरहस्पानमिझों को यह मान लेना पाहिए कि, यह कोई सामान्य लो किसम्म महीं है। अपितु यह प्राविक समिर उस प्राणान्नि को भरनी मतिष्ठा पनानाह, जिम के प्रति माप ही इस पनाम्नियुक्त यजमान के प्रति जान-पनवान में मोदी भी उपेना, निन्दा, उपहास करने म मनाग निश्चित ।) प्रतएव उन निमकों का पाहिए कि, मूलकर भी (राम पदिाम में मी यम, तथा यमानु मानकर्ता ) पजमान के प्रति भनुम्पाहारी (अनुचित दरोसने वाल) न बर्ने-'ना नुवादारीव स्वात्। (अमिपार कम्म-फार उत्तम कर्म नहीं है। लोकमपहाइफ, सर्वकरपागा गरफ, भतण्य भेनम पक्ष मे मास्मिक परमे में अपन म्पचित पर पाल सीमापना रम्पना भी पमम्बरूप में तमोगुण का प्रापान करना है। पवष उत्तम पर तो यही है कि पत्ता मी स अभिगार अनुगमन मकर । यो पाव-ना फरकी । म मम्पब में पही चर पप्यार होगा कि, याचा सामाम्प मनुप्य ममुप्प नहीं है, अपितु प्राण की मापात् प्रतिमा है। जिस प्रकार प्राति स पिम्य जान पासा अपनी नाप म पनि का गाना व्यर पञमान माता रम्न वास भी स्वत rप प्रविशारा दो परिवार। समपानिध्म अपश्य। माना । परन्तु पापपरय मिप माना है। रामबम्पा की अनिवाप्यता का rमादकता यसमान नामपिनुरूपल पम्प का मामा भर पदि म कपल म्परिन् । प्रति माया राना सपना र नाप मी भए गान गति भी उम फल का प्राम र मता। पिप समान 11 मारा गदमी दो मा गादि । फनन म पा मार मानि पानी पाना चाहिए । पात निन् 'स्मा र नानुम्यापारीष म्मान म मामरिफ प्राग-पतानी-- माप माप तफ्नामनिमी मान्पिा मावामान गनरनिरा भिपारपामनि म पपन गनन मंन करती हानि कती कि (पाना ) म गाया मनगला भी पर ( पगमारना) पसरप . किदेवस है ? (इन का कौनसा पता है? )-(प्रश्न हुमा की क्यों, चतुवा परिने सही स्पष्ट किए जा चुके हैं, आणि प्रतिप्रश्न प्रस्न ६ प्रश्न-और उपस्थित होता है। इस प्रतिप्रश्न का उपर वही होगा , यो मति 'भोट है। मा कहै कि, भाग्माहुति होती है शमुवाओं - हिरहो 'मतपय यह थममना मी अनुचित नहीं है कि, भाग्य के देवता धतुरेषता । परन्तु मा समाना, जल समझना ही है। माम्ममइसपरति में किसी भी रबर के नाम का उल्लेख नहीं हुमा है। नामोम्सम सम्मन भी रेस हो, अर्धा प्रणमाम्म का उदय शारा सम्वत्सर प्रजापति से सम्बन्ध रम्बने बार सम्वत्सरामिका स्वगसम्पत है। यदि धतुमा का नाम लिया जाता है। समस्पास्मक सम्ममर का माण नरों होता। यरि सम्वत्सर का गम । दिया जाता है, तो श्रमों का परिलय से सजन नहीं हाता । अपेक्षित म किमाम्पारा तुओं का भी यमन हो जाय मात्र ही इसी काम मे धतुसमा रूपा सम्बस्सरसम्पत्ति मी प्राप्त हो जाय । इस का उपाय है-माम्प-का प्रास पारारुप से, बिना किसी देषता का माम लिए ज्याम्माहुति दो अनुनामपूर्वक उपौरामरण से भाम्पशारा प्रामापत्य सम्पचि सशिप मिल जायगी कि मम्पस्म माग में प्रतिष्ठित प्रजापति अनिरुक्त है। भनिरुतमाष ही उपांशुमाप । इस उपाशुमावाारा पतसमतुलक्षित भनिसका प्रापापम्पसम्पत प्राप्त हो जाती। यमनकम्मानुगत याम्याम न्यो में 'समिनो अम्न मामम्प पन्तु ' यदि रूप प्रतुनामोपारणपूर्वक पाहुति इन स परपमत अतुओं का यशन मफल । आया। इसीलिए भाम्रयास उपोश अप से , व भाग्गाहुति नामम पूर्षिका से निहित हुई है। पिना नाम प्रहण पपाप हुपरत में भाम्पमा करना ही इस प्रश्न का भी समम न बाकि भाम्प का पता कौन किस पता करेप सभाम्पमण हुभा र ?-मारही नामाणमापात्म तणीमाष अनिरुकमाव-उस प्रश्न का TIR भी र सलिना भार प्रशापनियताकहूँ। इसी म्पिनि का मंसविषा से पीकरण करती हुइ मलिक गी(प्राम) प्रागपत मही मना पारि। पर्यात भामर स्वस्म । प्रश्न का 'भाभापत्य । यही पर से मना)। क्योरिप्रमा रथया निमत है। गया माम्म भी (तत्तानादियाम्पाप ग्रहानि पम भनिन-- भनिएको ति प्रमापनि पनिस्तापामानि । भय नाम्मामानि परमे-शामावाद, नापने नाAMITRषावि (मत ।
मालव -सहमान कसर्ग- हुए) येथे (पाम्प प्रापापस्व एवापता ही ये-मकी भाति- प्राप्ति के सापक से पन गए १, यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसी का समाधान पसी भुति कहती है)(अपने अमिरकमाष स प्राजापत्य मने मम परमानदेवत्य ही है। (अर्थात पदकर्वा पबमाम भी 'प्रजापति सम्बन्ध स पर पाम्पों का देवता बन जाता है। क्योंकि, मैसे मात्सरपक्षमता का प्रपिष्टा वा नम्पमार (अपवत-सम्वत्ससरमराक्षापेवा प्रजापति है। पवमेष) पर यन मान मी निप्रयेन अपने इस पर में (स्वयज्ञापेक्ष्या पसका प्रवर्तक बनने स) प्रयापति? (मिस प्रकार सम्बत्सर प्रयापति की पिकाममा म पम्नि-बाया- मित्यादि प्रषिक् प्राकृतिक नित्य पन का विधान करते हैं, पवमेव इस यस में भी इस पबमान से पक (प्रेरित) रोकर ही दोवा-अप्पयु भादि शत्तिक-(प्रा-रा- भ-वोत्रादि सकों के द्वारा) पर विवत करते हैं (इस विताम मे पममान के) प्स (देवास्मा ) को उपम करते हैं। (इसप्रकार बिन भरणामों पम्मो मे पर अपने पक्ष में प्रयापति बम या, सब प्रेरणा-पों का प्रपतक बनता हुमा पममाम भी अपने यस में अपरयाही प्रमापति माना जा सकता है। सोलिग प्रामस्प पाम्पों को परमानदेपस्प माना जा सकता है)॥२०॥ मायापत्य भाग्प क्यों पजमान के स्वर्गगमन का कारण बम मावार, प्रान का परोपरूप से पद्यपि पूर्वशिका से समाधान हो जाता है। तथापि, जैसा पारिप, पैसा सीकरण भभी नहीं हुमा । इसी पत् मिश्रित प्रस्थारस्प का परी- परम करती हुई परस्पंरा-प्रदर्शन पूर्वक समापान करती हुई भुति पाती है) पर अवयु माम्प कारपस्तरसर (पुणेशस्मापनपरा को भाम्प मे पहिला माम्म से पुकम्प प्रनम्तर नियत) एपिरो अवपान र (प्रात पाव पर विरवदान रम्प, पनवर पुन ऊपर से उस दिरपत्त )इपि पर पाम्पामिपार परता (उपर से पूर्व सरवा.)(स प्रकार रमपन पाम्यममा म पुका) पद मादुति भाम्प से (सारमना-च पर दानों और म) लिए रोकर (मिलकर ही) अपयुडारा (पाबनीयानिक समिस-पायनित-प्रवरा- में ) भात होती. (यह है भाम्पादति का महल जिमम दानों पार म पापा मम्पम्प नेपा। •ानुपा-रिवार-
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बेक पुटियाँ करता है (कर), परम्तु निश्चयेन (त्रुटि का हुमा भी) ९ पसीमा से पादिर नहीं माला, जो कि भाग्य के इस प्राध्यापस्यानुगत स्वस्वरूप वावा ॥२१॥ इति-परिशिष्टमनोचर विमर्शः पठे पप्पाप में पहिला, पौमे प्रपाठक में छठा प्रामा (१।६२।)-(१।४।। चतुपप्रपाठक समाप्त निद्रामधारमा प्रयापदामण में हमपाप्त हनीय नामा ममात्र (मूलानुवाद समामा) विद्रासपास्मक 'प्रपामप्रबग' ममाR कमप्रास-२३-२४ मापा ममाप्त चोदवसमामणे नमः पापा प्रप्यु के द्वारा भाज्यमित माहात, पबमानमिमिवा पन करती (मम्नि में) ग्राहुत होती है । (नापर्य यही हुमा कि, प्राग्याति प्राजाप स्या बती हर वर्गाधिष्ठाता प्रजापति स युक्त होती है। भाग्य पजमानात्मक है, पजमान का प्राण भाम्प में समाविष्ट । साथ ही यजमान अपने पक्ष की अपेक्षा से प्रजापति मी है। भाम्म एक प्रकार से यममानात्माई। इस प्रकार भाम्य परम्परया मजमानस्मा भी प्रमापविसे युक्त होता हुमा स्वर्गापाप्ति का अनुगामी बन जाता। और भामा प्रति फेधारा कैसे यजमान स्वग पहुँच जाता है ? विषाणाम्याहुति कम स्वर्ग प्राफिक 'पन जाती है, किंवा प्रसार मे स्पष-प्रश कम्मे से स्वर्गप्राप्ति से सम्भव । स्मादि परिशिए प्रश्नों का सम्मान ए विमर्श हो माता)। (भत्र इसी भाम्पाहुति के सम्बन्ध में एक प्राथमिक फसा मलाकर बुद्धि इस प्रयजप्रकरण को समाप्त कर रही है। ग्राम्य सापात यममान है। भाम कारपि के सान युक्त हो जाना यममान का इमि के साप, किंवा पान के साम मुको माना है। भवन इम अपन पाम्प स्वहानुगत प्रामापस्मस्वता को मानने वाले यजमान संक्षिा यह पावरपक नहीं होता कि, पर भाविकाश में वियों के पास रही। क्योंकि भाग्यसामिभ्य से ही मनमानसान्निम्म गवाय पनगा। इसके अतिरिक्ष अवि स्वायत् पबमान से स्वामाषिक मानुप- भाष द्वारा कोई असत्कम्म मी हा गावा वो मी पर यमसीमा से माहिर नहीं होता । क्योंकि अपने भाम्परुप म उसकी पक्षसोमानुगति भएण है। इसी भाष का-मामहिम फर क-अपने शब्दों में भमिनप रखी हुई मुवि कासी है) परि सम पममाम के दूर चले जाने पर स्पिक पवन करता है, अथवा समीप राने पर अमन करता है, रे, भन्पर नहीं होता, कोई हानि नही होती । अपितु जिस प्रकार पवमान के ममोप यने पर (सामिप सेलिको सरा पममान के लिए पर कम्म) -प्रमनक-सफन-बमवाद परमेज - चित-(भाम्यरास्पेषित ) सम यजमान पिकूर याने पर भी चरितम्-धारा फत पह मन इष्ट ही बन जाता । माय ही मजे ही पा (सामायिक मानुपयोपारा ) ६६७ " " " पुक्ति-स-आर्पप्रमाण-से युक्त, मान-पिझान-समन्धित प्राच्यसाहित्य को थपूर्व कप 'र एशियारिफ वैदिक रिसर्च सोसायटी' के वस्वावधान में प्रकाशित ग्रन्थ-सूची। ल. घेदवीपीपथिक, मातीलालसम्मा मारमाम १-गीवापिज्ञानमाप्पभूमिका मण (पहिरणपरीतात्मक) सपरक (प्रास्मपरीवात्मक) 'ख' (मसम्मपरीपात्मक) 'ग (कम्मयोगपरीतात्मक) -रातपयमापणविज्ञानमाप्य - थप (वैमासिक पा) ५वप ( +-रावरयमापवैवापिकविषयसूची ८-पनिपरिमानभाप्पभूमिका १ बल t-माएसयोपनिपतितानमाप्य १०-शोपनिपरिज्ञानभाष्य १ सपा ६९- १२-दमारी ममस्या (सामयिक निबन्ध) १३-मारतीप हिम्मू माना पार उस की भावुकता ( सा नि ) १४-५ धम्मभेद (सप्तनिध) ॥) १५-म नवामम पाक्षिक (२१ प प्रापज पों का अपूर्ममा) ६) १६ भादपिमानपरतापना (पापमुटपामर मा वि का परिचय ) स्पया " प्रदान भारपिशान-भारमविज्ञानापनिरम नामक प्राम या ३ विज्ञानिक पित्रों म युक-मून्य १५)
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