Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Anutroop Paatik Dasha Sutram
Front matter
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।। णमो सुअस्स ॥
जैनशास्त्रमाला-द्वितीयं रत्नम्
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्
संस्कृतच्छाया-पदार्थान्वय-मूलार्थोपेतं
गणपतिगुणप्रकाशिका हिन्दी-भाषा-टीकासहितं च
अनुवादक
जैनधर्मदिवाकर, जैनागमरत्नाकर, साहित्यरत्न, जैनमुनि
श्री श्री श्री १००८ उपाध्याय श्री आत्माराम जी महाराज
पञ्जाची
प्रकाशक
खजानचीराम जैन
जैन शास्त्रमाला कार्यालय
सैदमिहा बाज़ार, लाहौर
प्रथमावृत्ति १०००]
[मूल्य लागतमान २)
महावीराब्द २४६२ विक्रमान्द १९९३ ईसवी सन् १९३६
प्रकाशक
लाला खज़ानचीराम जैन,
संयोजक तथा प्रबंधक,
जैनशास्त्रमाला कार्यालय,
सैदमिट्टा बाज़ार, लाहौर
पुनर्मुद्रणादि
काशकायत्ता:
All Rights Reserved.
मुदक
लाला खज़ानचीराम जैन,
मैनेजर,मनोहर इलैक्ट्रिक प्रेस,
सैदमिट्ठा याज़ार, लाहौर
प्रस्तावना अनादि संसार-चक्र में परिभ्रमण करती हुई आत्मा, अपने पुण्योदय से, सभी इच्छानुकूल पदार्थों की प्राप्ति कर सकती है । सांसारिक सुखों को उपलब्ध कराने वाले पदार्थ भी क्षणभंगुर होते हैं, अतः शास्त्रकारों ने उन पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुखों को भी क्षणभंगुर बताया है । क्योंकि जब पुद्गल द्रव्य ही क्षण-भंगुर हैं, तो उनसे उपलब्ध होने वाले सुख चिरस्थायी कैसे हो सकते हैं ! यही कारण है कि सांसारिक आत्माएँ, सांसारिक सुखों के मिल जाने पर भी, आत्मिक सुखों से वंचित होकर दुखी हो रही हैं। यदि आप संसार के विशाल चित्र-पट पर विवेक-पूर्ण एवं विशाल दृष्टि डालें, तो आपको विदित होजाएगा कि सांसारिक आत्माएँ किस प्रकार दुःखों से उत्पीड़ित होकर भयंकर आर्तनाद कर रही हैं। मिथ्यात्वोदय से इन आत्माओं में पुनः पुनः मिथ्या संकल्प उदय होते रहते हैं। वे वास्तविक सुखों के स्थान पर क्षणभंगुर सुखों की खोज में ही समय व्यतीत करती रहती हैं। फिर भी उन्हें शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसी लिए, वर्तमान युग में, जड़वाद की ओर विशेष प्रवृत्ति होने के कारण चारों ओर से अशांति की धनि सुनाई पड़ रही है । धर्म से पराङ्मुख हो जाने से मानसिक तथा शारीरिक दशा भी शोचनीय होती जारही है। बहुत सी आत्माएँ दुःखदायी घटनाओं के घट जाने के कारण अपने अमूल्य जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर रही हैं । संपूर्ण सामग्री के मिल जाने पर भी उनके चित्त को शांति नहीं। जब हम इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं, तो हम आगमों के उपदेशों एवं अनुभवों से इसी परिणाम पर पहुँचते हैं कि आत्मिक शांति के विना बाह्य पदार्थों से कभी भी शांति-लाभ नहीं कर सकते। इस समय प्रत्येक आत्मा आत्मिक शांति के विना पौवालिक पदार्थों से शांति प्राप्त करने की धुन में लगी हुई है। इसी बड़ी भारी भूल के कारण वह दुःख में फँसी हुई है। जब हम 'सिंहावलोकन न्याय' से अपने पूर्वजों के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं, तो हमें पता चलता है कि आज कल के सुख-साधनों के प्रायः न होने पर भी उनका जीवन सुखमय था । क्योंकि उनके हृदयों पर सदाचार की छाप बैठी हुई थी । वे अपने जीवन को सदाचार से विभूपित करते थे, न कि नाना प्रकार के श्रृंगारों से । वास्तव में वे आत्मिक शांति के ही इच्छुक थे । यही कारण था कि उनका जीवन सुखमय था। वे आज कल की भाँति आत्मिक शांति से रहित बाह्य शांति के अन्वेपक नहीं थे। अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आत्मिक शांति किस प्रकार उपलब्ध हो सकती है ? इसका उत्तर यही है कि सर्वज्ञोक्त शास्त्रों का स्वाध्याय एवं पवित्र आत्माओं का संसर्ग आत्मिक शांति की प्राप्ति के लिए परम आवश्यक है। स्वाध्याय से आत्म-विकास होने लगता है और जीव, अजीव का भली भाँति निर्णय होजाता है, जिससे कि आत्मा सम्यग-दर्शन एवं पवित्र चरित्र की आराधना में प्रयत्नशील होने लगती है। इसी आत्मिक शांति की प्राप्ति के लिए राजा, महाराजा, बड़े बड़े धनी, मानी पुरुप भी अपने पौद्गलिक सुखों का परि- त्याग कर आत्मिक शांति की खोज में लग गए । क्योंकि श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने, आत्मिक शांति की उपलब्धि के लिए, मुख्यतया दो ही साधन प्रतिपादन किए हैं-विद्या और चरित्र । पुरुष विद्या-ज्ञान के द्वारा प्रत्येक पदार्थ के स्वरूप को भली प्रकार जान सकता है और चरित्र के द्वारा अपने आत्मा को अलंकृत कर सकता है, जिससे कि वह निर्वाण के अक्षय सुखों का आस्वादन कर सकता है । जनता को उक्त दोनों अमूल्य रनों की प्राप्ति हो, इसी आशय से प्रेरित होकर यह नवाँ अंगशास्त्र हिंदी अनुवाद सहित आपके संमुख उपस्थित किया जा रहा है। द्वादशांग शास्त्रों में अनुत्तरोपपातिक शास्त्र नवाँ अंग है । इस शास्त्र में उन्हीं पवित्र आत्माओं की संक्षिप्त जीवनी का दिग्दर्शन कराया गया है, जिन्होंने सांसारिक सुखों को छोड़कर ज्ञानपूर्वक चारित्र (तप) की आराधना की है। किंतु आयु स्वल्प होने के कारण वे निर्वाण-पद तो न प्राप्त कर सके, किंतु अनुत्तर विमानों में जा उत्पन्न हुए । और विशिष्ट अवधि ज्ञान द्वारा उनका समय आत्मान्वेपण में ही व्यतीत हो रहा है। इसी कारण वे एक जन्म और ग्रहण करके निर्वाण-पद की प्राप्ति अवश्य करेंगे। पाठक गण ! प्रस्तुत शास्त्र के तृतीय वर्ग में वर्णन किए हुए धन्य अनगार के चरित्र को ध्यानपूर्वक पढ़िएगा, जिससे कि आपको यह भली भाँति विदित हो जाएगा कि धन्यकुमार ने, किस प्रकार, श्रमण भगवान महावीर स्वामी के वचनामृत का पान कर, सांसारिक सुखों को छोड़कर, केवल निर्वाण-पद को ही अपना ध्येय बना, तप-द्वारा अपने शरीर को अलंकृत किया था । पाठक गण, इस चरित्र के अध्ययन से तीन शिक्षाएँ प्राप्त कर सकते हैं। १-गुणी आत्माओं का गुणानुवाद करना, जैसे-धन्य अनगार के गुण श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने जनता में प्रकट किए । इस शिक्षा से प्रत्येक आत्मा को गुणी जनों का गुणानुवाद करने की शिक्षा मिलती है । २--महाराजा श्रेणिक ने जब धन्य अनगार के गुण श्री भगवान् के मुखारविंद से सुने, तब वह स्वयं उनके दर्शन कर उनकी स्तुति करने लगा। इस कथन से यह शिक्षा मिलती है कि यथार्थ गुणानुवाद ही होना चाहिए, न कि काल्पनिक । क्योंकि जो यथार्थ गुणानुवाद होता है, वह प्रत्येक आत्मा को गुणों की ओर आकृष्ट करता है। परंतु जो काल्पनिक गुणानुवाद होता है, वह उपहास्य हो जाता है। ३-जिस प्रकार धन्य अनगार ने अपनी प्रतिज्ञा का उत्साहपूर्वक पालन किया, जिससे कि वे अपने ध्येय की प्राप्ति में सफल हो सके, इसी .
प्रकार प्रत्येक आत्मा को अपने ध्येय की प्राप्ति में प्रयत्न करना चाहिए । ध्येय की प्राप्ति में चाहे कैसे भी कष्टों का सामना करना पड़ जाए, किंतु अपने प्रण से कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए। इस सूत्र के अध्ययन से भली भाँति उक्त तीन शिक्षाएँ मिल जाती हैं। अतः मुमुक्षु वर्ग को इस शास्त्र का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । यद्यपि अन्य अंग शास्त्रों की अपेक्षा वर्तमान काल में प्रस्तुत शास्त्र की श्लोक-संख्या स्वल्प है, किंतु इस शास्त्र का प्रत्येक पद शिक्षा से ओत-प्रोत है। अतः जब पाठक वर्ग उपयोगपूर्वक इसका स्वाध्याय करेंगे, तब वे स्वयं ही अनुलोम होने लगेंगे। इस समय बहुत-सी मूर्ख आत्माएँ स्वाध्याय से शून्य एवं सदाचारियों की संगति न होने के कारण आचार से भ्रष्ट हो रही हैं । जब वे इस प्रकार आगमों का स्वाध्याय करेंगी तथा सर्वज्ञ-प्रणीत शास्त्रों में आए हुए चरि- त्रानुवाद से संबंध रखने वाले पवित्र महर्षियों की जीवनियों पर दृष्टिपात करेंगी, तो आशा है कि वे आत्माएँ भी 'ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः' के सिद्धांत पर आरूढ़ होकर निर्वाण-पद की अधिकारी बन सकेंगी, जिससे कि सादि अनंत पद एवं अनंत और अक्षय सुख की प्राप्ति हो सकेगी। आत्माराम
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्
विषय-सूची
प्रथम वर्ग
...
विषय
पृष्ठ
उपक्रमणिका
३
दश अध्ययनों का नामाख्यान
प्रथम अध्ययन-जालि कुमार का वर्णन
१२
शेप -मयालि कुमार आदि का वर्णन २०
द्वितीय वर्ग
तेरह अध्ययनों का नामाख्यान
२४
" अध्ययन-दीर्घसेन कुमार आदि का संक्षिप्त वर्णन २६
तृतीय वर्ग
दश अध्ययनों का नामाख्यान
३२
प्रथम अध्ययन-धन्यकुमार का जन्म
३४
विवाह
३७
" दीक्षा ग्रहण
॥ अनगार की तपस्या
का एकादश अगों का स्वाध्याय ४९
....
(४) प्रकार प्रत्येक आत्मा को अपने ध्येय की प्राप्ति में प्रयत्न करना चाहिए | ध्येय की प्राप्ति में चाहे कैसे भी कष्टों का सामना करना पड़ जाए, किंतु अपने प्रण से कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए । इस सूत्र के अध्ययन से भली भाँति उक्त तीन शिक्षाएँ मिल जाती हैं। अतः मुमुक्षु वर्ग को इस शास्त्र का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । यद्यपि अन्य अंग शास्त्रों की अपेक्षा वर्तमान काल में प्रस्तुत शास्त्र की श्लोक-संख्या स्वल्प है, किंतु इस शास्त्र का प्रत्येक पद शिक्षा से ओत-प्रोत है। अतः जय पाठक वर्ग उपयोगपूर्वक इसका स्वाध्याय करेंगे, तब वे स्वयं ही अनुलोम होने लगेंगे। इस समय बहुत-सी मूर्ख आत्माएँ स्वाध्याय से शून्य एवं सदाचारियों की संगति न होने के कारण आचार से भ्रष्ट हो रही हैं । जब वे इस प्रकार आगमों का स्वाध्याय करेंगी तथा सर्वज्ञ-प्रणीत शास्त्रों में आए हुए चरि- त्रानुवाद से संबंध रखने वाले पवित्र महर्षियों की जीवनियों पर दृष्टिपात करेंगी, तो आशा है कि वे आत्माएँ भी 'ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः' के सिद्धांत पर आरूढ़ होकर निर्वाण-पद की अधिकारी बन सकेंगी, जिससे कि सादि अनंत पद एवं अनंत और अक्षय सुख की प्राप्ति हो सकेगी। आत्माराम
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्
विषय-सूची
प्रथम वर्ग
३
१२
विषय
उपक्रमणिका
दश अध्ययनों का नामाख्यान
प्रथम अध्ययन--जालि कुमार का वर्णन
शेप -~-मयालि कुमार आदि का वर्णन
द्वितीय वर्ग
तेरह अध्ययनों का नामाख्यान
,, अध्ययन-दीर्घसेन कुमार आदि का संक्षिप्त वर्णन
२४
तृतीय वर्ग
दश अध्ययनों का नामाख्यान
प्रथम अध्ययन-धन्यकुमार का जन्म
विवाह
३७
दीक्षा ग्रहण
अनगार की तपस्या
का एकादश अङ्गों का स्वाध्याय ४९
"
"
विषयसूची।
की जवा"
के पैर आदि का वर्णन ५१
५३
कटि
भुजा
ग्रीवा
नासिका
के सब अङ्गों का सङ्कलित वर्णन ६७
श्री श्रमण भगवान के द्वारा धन्य अनगार के
गुणों की प्रशंसा
धन्य अनगार का शरीर-त्याग और
सर्वार्थ-सिद्ध विमान में उत्पत्ति
द्वितीय अध्ययन सुनक्षत्र कुमार का वर्णन
शरीर-त्याग, सर्वार्थ-सिद्ध
विमान में उत्पत्ति और शेप आठ अध्ययनों,
ऋषिदास कुमार आदि का संक्षिप्त वर्णन ९०
उपसंहार
९४
सूत्र और सूत्रांशानुक्रमणिका प्रथम वर्ग ८ तेणं कालेणं "पएणते तते णं से सुहम्मे "कुमारे जडणं भंते "पएण एवं खलुजंबू"पएणत्ते एवं से सागवि"पएणत्ते ? ... ११ १२-१३ २० द्वितीय वर्ग २४ जति णं भंते.."अभायणे जति णं भंते "वग्गेमु २६-२७ तृतीय वर्ग ३४-३५ ३७-३८ ... ४२-४३ ४५-४६ ४६ ... जति णं भंते"श्राहिते जति णं भंते... होत्था तते णं सा भद्दा विहरति तेणं कालेणं वंभयारी तते णं से धन्ने विहरति तते णं से धरणे "विहरति ममणं भगवं चिट्ठति धनस्स णं "सोणियत्ताते धन्नरस जंघाणं सोणियत्ताते धन्नरस कडि-पत्तस्स एवामेव धन्नस्स याहाणं एवामेव० धन्नस्स गीवाए एवामेव० धन्नस्स नासाए भन्नति धन्ने णं अणगारे""चिट्ठति तेणं कालेणं"पडिगए तए णं तस्स"पन्नत्ते जति णं भंते जहा खदतो तेणं कालेणं "सिझणा एवं खलु जंबू...पएणत्ते ५५-५६ ५६ ६२ ६३-६४ ६७ ७१-७३ ८०-८१ ... ६०-६१ ६४-१५ ...
धन्यवाद । पाठकों के सम्मुख अब मुझे इस जैनशास्त्रमाला का द्वितीय अंक उपस्थित करते हुए बड़ा ही हर्प होता है । इसके पूर्व 'दशाश्रुतस्कन्धसूत्र' आपकी सेवा में उपस्थित किया जा चुका है। उसमें हमें कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है, उसका अनुभव हमारे पाठक हम से अधिक कर सकते हैं। श्री वीरप्रभु की परम कृपा से हमारा कार्य आगे भी उसी साहस और उत्साह के साथ चल रहा है। श्री श्री श्री १००८ श्री उपाध्याय आत्माराम जी महाराज ने जिस उदारता और धर्मस्नेह से इस महान कार्य को अपने हाथों में लिया था, उसी उदारता और धर्मस्नेह से उसे निभा रहे हैं । फलस्वरूप अब 'अनुत्तरोववाई दशास्त्र' आपकी सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है । इसमें भी जैसा कि हमारा पूर्व से ही निश्चय था, हमने दशाश्रुतस्कन्धमत्र के समान प्राकृतमूल, नीचे संस्कृतच्छाया, प्रत्येक शब्द का अर्थ, मूलार्थ और अन्त में विस्तृतार्थ दिया है । छपाई और शुद्धता की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। जहां तक मुझ से बन सका है, मैंने इसे सर्वाङ्गपूर्ण बनाने का यत्न किया है । अपनी ओर से कोई त्रुटि नहीं रक्खी । मैं अपने सहायकों का इतना कृतज्ञ हूँ कि मैं उन्हें धन्यवाद दिये विना नहीं रह सकता। सब से पहले मैं गुरुदेव श्री श्री श्री १००८ श्री जैनधर्मदिवाकर साहित्यरत्न जैनागमरत्नाकर उपाध्याय मुनि श्री आत्माराम जी महाराज का iyu kranty; Til I! || PHIE PAI!:ith} pm fill il: ki{ TALATHALALAI THAHATHI MARIJETHALFIEF धन्यवाद करता हूँ , जो महान् पवित्र शास्त्रोद्वार में हमें निरन्तर सहायता दे रहे हैं । ३२ शास्त्रों के अनुवाद का बड़ा भारी बोझ उठाना यह उन्हीं की वजमयी लेखिनी का काम है। उन्होंने मुझे इस काम में पूरी तरह से सहायता देने की कृपा की है। किसी भाग में भी त्रुटि नहीं रखी। जिस शीघ्रता और निपुणता से शास्त्रों के अनुवाद का कार्य चल रहा है, उसे समझने वाले ही समझते हैं। आप हमारी पंजाबी सम्प्रदाय की साधु समाज में विशेष प्रतिष्ठित हैं । बाल- ब्रह्मचारी और प्रसिद्ध शाखममन है, श्रीश्री श्री १००८ श्री उपाध्याय आदि उपाधियों से विभू- उपाध्याय श्री ग्रारमाराम जी महाराज पित और अपनी क्रिया में परम (चित्र परिचय के लिये है पूजन के लिए नहीं) प्रवीण हैं। हमारी प्रभु से यही प्रार्थना है कि आप चिरायु हों, जिससे कि यह पुनीत कार्य सफलतापूर्वक चलता रहे। अब मुझे अपने उन बन्धुओं का धन्यवाद करना है, जिन्होंने इस कार्य में पूर्ण सहयोग दिया है। यदि हमें धन न मिलता तो हमारे लिए इन शास्त्रों की गन्ध तक भी मिलनी सम्भव न होती । हमारा सारा परिश्रम स्वममात्र रह जाता । धन्य जन्म है इन पवित्रात्माओं का, जिन्होंने हमारे मनोरथों को कार्य- रूप में परिणत किया है । इन सब महानुभावों का परिचय मैं दशाश्रुतस्कन्धसूत्र अर्थात् इस शास्त्रमाला के प्रथम अंक में 'धन्यवाद' शीर्षक लेख में दे चुका हूँ । किन्तु इतने पर भी मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ। मेरा हृदय उनका इतना आभारी है कि वह बार बार उनका धन्यवाद करने के लिये उछल रहा है। उन सज्जनों का पुनः परिचय देना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ, ताकि हमारी समाज के अन्य महा- पुरुष भी उनका अनुकरण करके हमारी सहायता करने के लिये प्रोत्साहित हों।
धन्यवाद पाठकों के सम्मुख अब मुझे इस जैनशास्त्रमाला का द्वितीय अंक उपस्थित करते हुए बड़ा ही हर्ष होता है । इसके पूर्व 'दशाश्रुतस्कन्धसूत्र' आपकी सेवा में उपस्थित किया जा चुका है । उसमें हमें कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है, उसका अनुभव हमारे पाठक हम से अधिक कर सकते हैं। श्री वीरप्रभु की परम कृपा से हमारा कार्य आगे भी उसी साहस और उत्साह के साथ चल रहा है। श्री श्री श्री १००८ श्री उपाध्याय आत्माराम जी महाराज ने जिस उदारता और धर्मस्नेह से इस महान कार्य को अपने हाथों में लिया था, उसी उदारता और धर्मस्नेह से उसे निभा रहे हैं । फलस्वरूप अब 'अनुत्तरोववाई दशासन' आपकी सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है । इसमें भी जैसा कि हमारा पूर्व से ही निश्चय था, हमने दशाश्रुतस्कन्धसूत्र के समान प्राकृतमूल, नीचे संस्कृतच्छाया, प्रत्येक शब्द का अर्थ, मूलार्थ और अन्त में विस्तृतार्थ दिया है । छपाई और शुद्धता की ओर विशेष ध्यान दिया गया है । जहां तक मुझ से बन सका है, मैंने इसे सर्वाङ्गपूर्ण बनाने का यत्न किया है । अपनी ओर से कोई त्रुटि नहीं रक्खी । मैं अपने सहायकों का इतना कृतज्ञ हूँ कि मैं उन्हें धन्यवाद दिये विना नहीं रह सकता। सब से पहले मैं गुरुदेव श्री श्री श्री १००८ श्री जैनधर्मदिवाकर साहित्यरत्न जैनागमरत्नाकर उपाध्याय मुनि श्री आत्माराम जी महाराज का (४) । + सहायक विद्यमान है। एक श्रीमान् लाला सोहनलाल जी मैनेजिङ्ग अध्यक्ष फर्म लाला मिट्ठीमल वायू- रामजी जैन कर तथा क्लाथ मर्चेण्ट लुधियाना। आप बड़े उत्साही, धर्म- प्रेमी और दानवीर हैं। आपके हाथों धर्मान्नति के सैकड़ों काम चले और चल रहे हैं। आप जाति के अग्र- चाल हैं और नगर में विशेष प्रतिष्ठा रखते हैं। देशहित आपमें कूट कूट कर भरा हुआ है । समाज के बच्चे बचे से आपका विशेष प्रेम है। दूसरे लाला सन्तलाल जी जैन, रईस, मालिक फर्म लाला मल्हीमल धीमान माना मोहनलाल जी सुन्तलाल, लुधियाना । आप बड़े धर्मात्मा है । प्रकृति बड़ी सरल है । आप भी जाति के अग्रवाल हैं। साधु महात्माओं की संगति में ही आपका अधिक समय व्यतीत होता है । सादगी इतनी बढ़ी चढ़ी है कि कहते नहीं बनता। धनिक होने पर भी मान नाममात्र को नहीं। अत्र पांचवें स्थान पर मैं अपने पूज्य चचा श्रीयुत लाला गोपीराम जी, मालिक फर्म कन्हैयालाल बृज- लाल, फर्नीचर मर्चेण्ट वा बैंकर, होशियारपुर का अतीव धन्यवाद करता हूँ । आपके पूज्य पिता का MRIANRAIE VIPINSIrNIPL AURAVELER श्रीमान् लाला सन्तलाल जी THE]|||||||||||||||||Tikhildh|||||\\FIELU!! 181515171951 " सब से पहले मैं बयोवृद्ध श्रीमान् लाला आशाराम जी जैन, अर्जी- नवीस, बैंकर और मालिक फर्म लाला आशाराम जगन्नाथ, सराफ, कसूर का हृदय से धन्यवाद करता हूँ । आप बड़े ही धर्मग्रेमी और भगवद्भक्त हैं । अपने नगर में सुप्रसिद्ध और प्रतिष्ठित हैं। इसके पश्चात् कसरनिवासी धर्ममूर्ति स्वर्गीय श्रीमान् बाबू परमानन्द जी वकील की धर्मपत्नी श्रीमती दुर्गादेवी जी का धन्यवाद करना आवश्यक समझता हूँ, जिन्होंने अपने पूज्य 116112110111111111HITANTRIEWS111111111111 UTTPilitTHAHANHHI1111111111THIL TIMIRHATHERITRAPHERIATITIHINITIHHit श्रीमान् लाला आगाराम जी पतिदेव की स्मृति में यह दान देने की कृपा की। स्वर्गीय बाबू जी पंजाब की जैनसमाज के एक मुख्य नेता थे । पंजाब की जैन सभा के प्रसिद्ध कार्यकर्ता और बच्चे बच के हितैपी थे । लाहौर के श्री अमर जैन होस्टल की स्थापना का श्रेय आप ही को प्राप्त है। आपकी कसूर में बड़ी प्रतिष्ठा थी। राज्य दरबार में आपको यथेष्ट सम्मान प्राप्त था । वकीलों में आप चोटी के वकील थे। बड़े पवित्रात्मा और सच्चे समाजहितचिन्तक थे। लुधियाना में भी हमारे दो परम TAITINUTRITI ||ATHITAPIHUTNITIHtti||HT111111111111HHHILDIA,THTHTHER. Sil1111111111111111111 स्वर्गीय श्रीमान् बावृ.परमानन्द जी (४) सहायक विद्यमान हैं। एक श्रीमान् लाला सोहनलाल जी मैनेजिङ्ग अध्यक्ष फर्म लाला मिट्ठीमल वायू- रामजी जनयंकर तथा क्लाथ मर्चेण्ट लुधियाना आप बड़े उत्साही, धर्म- प्रेमी और दानवीर हैं। आपके हाथों धर्मान्नति के संकड़ों काम चले और चल रहे हैं। आप जाति के अग्र- बाल हैं और नगर में विशेष प्रतिष्ठा रखते हैं। देशहित आपमें कूट कूट कर भरा हुआ है | समाज के बच्चे बचे से आपका विशेष प्रेम है । दूसरे लाला सन्तलाल जी जैन, रईस, मालिक फर्म लाला मल्हीमल धीमान लाना मोहनलाल जी सन्तलाल, लुधियाना । आप बड़े tru!", T' " "rs":k prayrir-umar RIMIMPRILE धर्मात्मा हैं। प्रकृति बड़ी सरल है । आप भी जाति के अग्रवाल हैं। साधु महात्माओं की संगति में ही आपका अधिक समय व्यतीत होता है । सादगी इतनी बड़ी चढ़ी है कि कहते नहीं बनता। धनिक होने पर भी मान नाममात्र को नहीं। अब पांचवें स्थान पर मैं अपने पूज्य चचा श्रीयुत लाला गोपीराम जी, मालिक फर्म कन्हैयालाल ज. लाल, फर्नीचर मर्चेण्ट वा बैंकर, होशियारपुर का अतीव धन्यवाद करता हूँ । आपके पूज्य पिता का श्रीमान् लाला सन्तलाल जी Nell'any 1941 1940 nmnunumpantial debelelejbola len je U PAR nunchium min . ELPITHHTHHTHHATTERTILIHERMINATE HitHARTPHIDINATHPHHTHHTHPHitra
नाम लाला कन्हैयालाल जी था ।
आप मेरे पूज्य दादा स्वर्गीय लाला
मेहरचन्द्र जी के भतीजे हैं । आप
बालब्रह्मचारी हैं । बड़े ही उदार
और होशियारपुर की जैनजनता के
धनिक और प्रतिष्ठित सज्जनों में से
एक हैं । धर्म की बड़ी लगन है ।
सेवाभाव इतना उच्च है कि निर्धन से
निर्धन व्यक्ति के यहाँ भी कोई छोटे
से छोटा काम हो तो भाग कर जाते
हैं।
इसके अनन्तर हमारे धन्यवाद के
पात्र लाला रोचीशाह जी मालिक
फर्म लाला कन्हैयाशाह रोचीशाह जी
Narlical H.MA.T:HA.AMRPUR.I'...', . :: ... .........
श्रीमान् लाला गोपीराम जी
जैन, क्लाथ मर्चेण्ट, रावलपिण्डी, हैं।
मैं इनकी प्रशंसा में कहाँ तक लिरवू ।
आपकी शास्त्रश्रद्धा, साधुमहात्माओं
के प्रति अनन्य भक्ति और ज्ञान
प्रचार के लिए उदारहृदयता देखकर
मेरा हृदय गद्गद हो जाता है। आप
बड़े धनिक और अपनी विरादरी में
मुख्य स्थान रखते हैं । बड़े उच्च
विचारों के धनी हैं । सहानुभूति से
ओतप्रोत हैं।
गुरु महाराज की कृपा से हमें
रावलपिण्डी में एक और भी सहायक
मिले । आपका शुभ नाम लाला
श्रीमान् लामा रोचीगाह जी
PHOTTHRITHIPATHIHITHEIRTHAPHERITAITTHAHEERTHATAULIHILE LateATHSS1103500-1507555558131013-1011211001020327002 TAITAHATARNADA तेजेशाह जी है। आपको रावलपिण्डी जैन जाति में विशेष सम्मान प्राप्त है । आप वहां के प्रसिद्ध बैंकर हैं। इसके अतिरिक्त आपकी सराफी और बजाजी की दुकानें भी चलती हैं । आप मुख्य व्यापारी हैं। आप बड़े ही सुशील और कोमल प्रकृति हैं । गम्भीर और विचारशील हैं। परम उत्साही और शास्त्रप्रेमी हैं। दान में बड़ी रुचि है । आपका पुण्योदय देखिए, सन्तान भी बड़ी योग्य और पितृभक्त है । उपरिलिखित रावल- पिएडी-निवासी दोनों सजनों ने केवल श्रीमान् लाला तेजेशाह जी इसी धर्मकार्य में ही अपने हृदय की विशालता का परिचय नहीं दिया अपितु आपके यशस्वी हाथों से अनेक धर्मकार्य सम्पन्न हो चुके हैं। सात सहायकों का परिचय में ऊपर दे चुका हूँ । आठवें स्थान पर अब मेरी अपनी ही बारी आती है। अपने सम्बन्ध में मैं क्या लिवू । मैं सकल जैन समाज का एक तुच्छ दास और इस पवित्र कार्य में साहाय्य देने वाले उपरोक्त महापुरुषों का ऋणी हूँ, जिन्होंने मेरे इस उद्देश्य में मेरी हर प्रकार से सहायता की है। मेरे मन में ऐसी शास्त्रमाला के उद्घाटन MARRIEHATARPRAVARTINATAN HTER.vprak PI.A.P-PR 0 . इस शास्त्रमाला का सयोजक और प्रबन्धक समानचीराम जैन, मैनेजित प्रोप्राइटर फर्म-मेहरचन्द्र लक्ष्मणदास जैन, पुस्तक विक्रेता, लाहौर 1902 HTFITHHTHHTOTTHIHIFIE! IITCHE||ft|ltTA-RATRIEHERE
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गुर्वावली नायसुओ वद्धमाणो नायसुओ महामुणी । लोगेतित्थयरो आसी अपच्छिमो सिवंकरो ॥१॥ सतित्थे ठविओ तेण पढमो अणुसासगो। सुहम्मो गणहरो नाम तेअंसी समणच्चिओ ॥२॥ तत्तो पवडिओ गच्छो सोहम्मो नाम विस्सुओ । परंपराए तत्थासी सूरी चामरसिंघओ ॥३॥ तस्स संतस्स दंतस्स मोतीरामाभिहो मुणी । होत्थ सीसो महापन्नो गणिपयविभूसिओ ॥४॥ तस्स पट्टे महाथेरो गणावच्छेअगो गुणी । गणपति संनिओ साहू सामण्ण गुण्णसोहिओ ॥५॥ तस्स सीसो गुरुभत्तो सो जयरामदासओ । गणावच्छेअगो अस्थि समो मुत्तोव्व सासणे ॥६॥ तस्स सीसो सच्चसंधो पवगपयंकिओ सालिग्गामो महाभिक्खू पावयणी धुरंधरो ॥७॥ तस्संतेवासिणा एसा अप्पारामेण भिक्खुणा । उवज्झाय पयंकणं भासाटीका समथिआ ॥८॥ अणुत्तरोववाइएटीकेयं लोकभासासुवद्धिआ । पढ़ताणं गुणंताणं वायंताणं पमोइणी ॥९॥ इगूणवीसा नवासीइ विकमवासेसु निम्मिआ एसा लुधि- याणा नामयनयरे अणुत्तरोववाइएटीका समत्ता ।
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स्वाध्याय
-
आत्मा स्वाध्यायद्वारा आत्मविकास कर सकता है, परन्तु स्वाध्याय
विधिपूर्वक होना चाहिए। यदि विधिशून्य स्वाध्याय किया जायगा, तो वह
आत्मविकास करने में समर्थ नहीं हो सकेगा, क्योंकि विधिपूर्वक किया हुआ
स्वाध्याय ही वास्तविक स्वाध्याय है।
स्वाध्याय का फल
अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि स्वाध्याय करने से किस फल की
प्राप्ति होती है। इसका उत्तर यही है कि-
"सज्झाएणं भंते ! जीवे किं जणइ" "सज्झाएणं नाणा-
वरणिज कम्मं खबई"
उत्तराध्ययन अ० २९ सू० १८
अर्थात् हे भगवन् ! स्वाध्याय करने से किस फल की प्राप्ति होती है ?
भगवान कहते हैं कि हे शिष्य ! स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण
हो जाते हैं । जब ज्ञानावरणीय कर्म ही क्षीण हो गए, तो आत्मविकास स्वयमेव
हो जायगा, जिससे कि आत्मा अपने स्वरूप में प्रविष्ट हो जाने के कारण सब
दुःखों से छूट जायगा। क्योंकि-
"सज्झाएवा सव्वदुक्खविमोक्खणे" उत्त० अ० २६ गा० १०
अर्थात् स्वाध्याय सब दुःखों से विमुक्त करने वाला है।
+
शारीरिक और मानसिक दुःखों का उद्भव अज्ञानता से ही होता है । जब अज्ञानता नष्ट होगई, तब वे दुःख भी स्वयं नष्ट हो जाते हैं । क्योंकि- "दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो” उत्त० अ० ३२ का० ८ अर्थात् जिसको मोह नहीं होता, मानों उसने दुःखों का भी नाश कर दिया । अतः सब प्रकार के दुःखों से छूटने के लिए स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। स्वाध्याय किन किन ग्रन्थों का करना चाहिए? स्वाध्याय उन्हीं ग्रन्थों का करना चाहिए, जो सर्वज्ञप्रणीत, सत्य पदार्थों के प्रदर्शक, ऐहलौकिक और पारलौकिक शिक्षाओं से युक्त, उभयलोकों के हितोपदेष्टा और जिनके स्वाध्याय से तप, क्षमा और अहिंसा आदि तत्वों की प्राप्ति हो । तात्पर्य यह है कि जिनके स्वाध्याय से आत्मा ज्ञानी और चारित्रयुक्त एवं आदर्शरूप बन सके, वे ही आगम स्वाध्याय करने योग्य हैं। उन्हीं के स्वाध्याय से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। किंतु प्रत्येक मतावलम्बी अपने आगमों को सर्वज्ञप्रणीत मानता है। फिर इस बात का निर्णय कैसे हो कि अमुक आगम ही सर्वज्ञप्रणीत हैं, अन्य नहीं ? इसका उत्तर यही है कि आगमों की परीक्षा के लिए मध्यस्थ भाव से प्रमाण और नय के जानने की आवश्यकता है। जो आगम प्रमाण और नय से बाधित न हो सकें, वे ही प्रमाण-कोटि में माने जा सकते हैं । जैसे कि कुछ व्यक्तियों ने अपने अपने आगमों को अपौरुषेय (ईश्वरोक्त) माना है, उनका यह कथन प्रमाण-बाधित है । क्योंकि जब ईश्वर अकाय और अशरीरी हैं, तो भला फिर वह वर्णात्मकरूप छन्द किस प्रकार उच्चारण कर सकता है ! क्योंकि शरीर के बिना मुख नहीं होता और मुख के बिना वों का उच्चारण नहीं हो सकता । अतः उनका यह कथन प्रमाण-बाधित सिद्ध हो जाता है। किन्तु जैनागम इस विषय को इस प्रकार प्रमाणपूर्वक सिद्ध करते हैं, जिसे मानने में किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती और नाही किसी प्रकार की शंका ही उत्पन्न हो सकती है । उदाहरणार्थ-शब्द पौरुपेय है और अर्थ अपौरुषेय है।
( ३ ) अर्थात् शब्दद्वारा सर्वज्ञ आत्माओं ने उन अर्थों का वर्णन किया जो कि अपौरुपेय हैं। कल्पना कीजिए कि सर्वज्ञ आत्मा ने वर्णन किया कि 'आत्मा नित्य है सो यह शब्द तो पौरुषेय है, किन्तु शब्दों द्वारा जिस द्रव्य का वर्णन किया गया है, वह नित्य (अपौरुषेय ) है। इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य के विषय में समझ लेना चाहिए । अतः सिद्ध हुआ कि सर्वज्ञप्रणीत आगमों का ही स्वाध्याय करना चाहिए। सर्वज्ञप्रणीत आगम कौन कौन से हैं ? वर्तमान काल में सर्वज्ञप्रणीत और सत्य पदार्थों के उपदेश करने वाले ३२ आगम ही प्रमाण-कोटि में माने जाते हैं। इन आगमों में पदार्थों का वर्णन प्रमाण और नय के आधार पर ही किया गया है । इनके अध्ययन से इन आगमों की सत्यता और इनके प्रणेता सर्वज्ञ या सर्वज्ञ-कल्प स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं। वर्तमान काल में ३२ आगम इस प्रकार है- "से किं तं सम्मसुअं? जं इमं अरहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पण्ण नाणदसणधरेहिं तेलुक्क निरिक्खिअ महिअ पूइएहिं तीयपडुप्पण्ण मणागय जाणएहिं सव्वएणूहिं सबदरिसीहिं पणीअं दुवालसंगं गणिपिडगं तं जहा-आयारो १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवाओ ४ विवाहपपणत्ती ५ नायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अणुत्तरोववाइय- दसाओ ९ पण्हवागरणाई १० विवागसुअं ११ दिविवाओ १२ इच्चेअं दुबालसंगं गणिपिडगं चोद्दस पुट्विस्स सम्मसुअं अभिण्ण दस पुब्बिस्स सम्मसुअं तेणपरं भिण्णेसु भयणा सेतं.सम्मसुअं। नंदीसूत्र (सू०४०) १२ अंगशास्त्र, १२ उपांगशास्त्र, ४ मूलशास्त्र, ४ छेदशास्त्र और ( ४ ) १ आवश्यक सूत्र । किन्तु ये ३३ होते हैं। विचार करना चाहिए कि इस समय ११ अंगशास्त्र विद्यमान हैं; १२ वाँ दृष्टिवादाङ्ग-शास्त्र व्यवच्छेद हुआ माना जाता है । अंगशास्त्रों के नाम निम्नलिखित हैं-१ आचारांगशास्त्र, २ सूयग- डांगशास्त्र, ३ स्थानांगशास्त्र, ४ समवायांगशास्त्र, ५व्याख्याप्रज्ञप्ति (भगवतीशास्त्र), ६ ज्ञाताधर्मकथांगशास्त्र, ७ उपासकदशांगशास्त्र, ८ अंतकृद्दशांगशास्त्र, ९ अनुत्तरौ- पपातिकशास्त्र, १० प्रश्नव्याकरणशास्त्र, ११ विपाकशास्त्र, १२ दृष्टिवादांगशास्त्र (जो व्यवच्छेद होगया है)। उपांगशास्त्रों के नाम ये हैं-१ औपपातिकशास्त्र, २ राजप्रश्नीयशास्त्र, ३ जीवाभिगमशास्त्र, ४ प्रज्ञापनाशास्त्र, ५ जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिशास्त्र, ६ सूर्यप्रज्ञप्तिशास्त्र, . ७ चन्द्रप्रज्ञप्तिशास्त्र, ८ निरयावलिकाओ, ९ कप्पवडिंसियाओ, १० पुफ्फियाओं, ११ पुफ्फचूलियाओ, १२ वहिदसाओ । और चार मूल शास्त्र ये हैं-दशवै- कालिकशास्त्र १, उत्तराध्ययनशास्त्र २, नंदीशास्त्र ३, और अनुयोगद्वारशास्त्र ४ । चार छेदशास्त्र-व्यवहारशास्त्र १, बृहत्कल्पशास्त्र २, दशाश्रुतस्कन्धशास्त्र ३, निशीथ- शास्त्र ४, एवं ३१ और ३२ वाँ आवश्यकशास्त्र । इस प्रकार ३२ आगमों की संज्ञा वर्तमान काल में मानी जाती है। किन्तु यह संज्ञा अर्वाचीन प्रतीत होती है । कारण यह है कि नंदीसिद्धांत में सब सिद्धान्तों की चार प्रकार से निम्न- लिखित संज्ञाएँ वर्णन की गई हैं। जैसे--अंगशास्त्र, उत्कालिकशास्त्र, कालिक- शास्त्र, और आवश्यकशास्त्र । जो उपांगशास्त्र और मूल चार छेदशास्त्र हैं, वे सब कालिक और उत्कालिक शास्त्रों के ही अन्तर्गत लिए गये हैं । देखो- नदीसिद्धान्त-श्रुतज्ञानविषय । तथा औपपातिक आदि शास्त्रों में कहीं पर भी यह पाठ नहीं है कि-यह उपांगशास्त्र है । जैसे पाँचवें अंग के आगे के अंगशास्त्रों के आदि में यह पाठ आता है कि, भगवान् जंबूस्वामी जी कहते हैं-"हे भगवन् ! मैंने छठे अंगशास्त्र के अर्थ को तो सुन लिया है, किन्तु सातवें अंगशास्त्र का श्रीश्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने क्या अर्थ वर्णन किया है ?" इत्यादि । किन्तु उपांगशास्त्रों में यह शैली नहीं देखी जाती, और नाही शास्त्रकर्ता ने उनकी उपांग संज्ञा कही है । किन्तु केवल निरयावलिकासूत्र के आदि में यह सूत्र अवश्य विद्यमान है । तथा च पाठः- !
"तएणं से भगवं जंबूजातसड्ढे जावपज्जुवासमाणे एवं वयासि-उवंगाणं भंते !. समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? एवं खल्लु जंबू ! समणेणं भगवया जाव संपत्तेणं, एवं उवंगाणं पंचवग्गा पण्णत्ता ? तं जहा निरयावलियाओ १ कप्पवडिंसियाओ २ पुफियाओ ३ पुप्फचूलियाओ ४ वण्हिद- साओ ५”—इत्यादि। इस पाठ के आगे वर्गों के कतिपय अध्ययनों का वर्णन किया गया है । इस पाठ से यह स्फुट नहीं होसकता कि-ये उपांगों के पाँच वर्ग कौन कौन से अंगशास्त्र के उपांग हैं । यद्यपि पूर्वाचार्यों ने अंग और उपांगों की कल्पना करके अंगों के साथ उपांग जोड़ दिये हैं, किन्तु यह विषय विचार- णीय है । कालिक और उत्कालिक संज्ञा स्थानांगादि शास्त्रों में होने से बहुत प्राचीन प्रतीत होती है। किन्तु उपांगादि संज्ञा भी उपादेय ही है । अथवा यह विषय विद्वानों के लिये विचारणीय है । आचार्यवर्य हेमचन्द्र जी ने अपने बनाये 'अभिधानचिंतामणि' नामक कोप में अंगशास्त्रों का नामोल्लेख करते हुए 'केवल उपांगयुक्त अंगशास्त्र हैं। ऐसा कहकर विपय की पूर्ति कर दी है। किन्तु जिस प्रकार अंगशास्त्रों के नामोल्लेख किए हैं, ठीक उसी प्रकार किस किस अंग का कौन कौन सा उपांगशास्त्र है, ऐसा नहीं लिखा है । इससे भी यह कल्पना अर्वाचीन ही सिद्ध होती है । हाँ! यह अवश्य मानना पड़ेगा कि- यह कल्पना अभयदेव सरि या मलयगिरि आदि वृत्तिकारों से पूर्व की है। क्योंकि उपांगों के वृत्तिकार वृत्ति की भूमिका में उस उपांग का किस अंग से संबंध है, इस प्रकार का लेख स्फुट रूप से करते हैं । अतः वृत्तिकारों के समय से भी यह कल्पना पूर्व की है। इसलिए यह कल्पना श्वेताम्बर आम्नाय में सर्वत्र प्रमाणित मानी गई है। विधिविरुद्ध स्वाध्याय के दोष जिस प्रकार सातों स्वर और रागों के समय नियत है-जिस समय का जो राग होता है, यदि उसी समय पर गायन किया जाय, तो यह अवश्य आनन्दप्रद होता है, और यदि समयविरुद्ध राग अलापा गया, तब वह सुखदाई . नहीं होता। ठीक इसी प्रकार शास्त्रों के स्वाध्याय के विषय में भी जानना चाहिए। और जिस प्रकार विद्यारम्भ संस्कार के पूर्व ही विवाह संस्कार और भोजन के पश्चात् स्नानादि क्रियाएँ सुखप्रद नहीं होतीं, और जिस प्रकार समय का ध्यान न रखते हुए असंबद्ध भापण करना कलह का उत्पादक माना जाता है, ठीक उसी प्रकार बिना विधि के किया हुआ स्वाध्याय भी लाभदायक नहीं होता । और जिस प्रकार लोग शरीर पर यथास्थान वस्त्र धारण करते हैं- यदि वे विना विधि के तथा विपरीतांगों में धारण किए जाएँ, तो उपहास के योग्य बन जाते हैं। ठीक इसी प्रकार स्वाध्याय के विपय में भी जानना चाहिए। अतः सिद्ध हुआ कि विधिपूर्वक किया हुआ स्वाध्याय ही समाधिकारक माना जाता है। जिस प्रकार उक्त विषय विधिपूर्वक किए हुए ही 'प्रिय' होते हैं, ठीक उसी प्रकार स्वाध्याय भी विधिपूर्वक किया हुआ ही आत्मविकास का कारण होता है । प्रस्तुत शास्त्र की पहली दशा में उस विषय का स्फुट रूप से वर्णनं किया गया है। स्वाध्याय का समय स्वाध्याय के लिए जो समय आगमों में बताया गया है, उसी समयं स्वाध्याय करना चाहिए, किन्तु अनध्याय काल में स्वाध्याय वर्जित है। मनुस्मृति आदि स्मृतियों में भी स्वाध्याय के अनध्याय’ काल का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । क्योंकि वे लोग वेद के भी अनध्यायों का उल्लेख करते हैं । इसी प्रकार अन्य आर्प ग्रन्थों का भी अनध्याय काल माना जाता है। किन्तु जैनागमों के सर्वज्ञोक्त, देवाधिष्ठित तथा स्वरविद्यासंयुक्त होने के कारण इनका भी अनध्याय काल आगमों में वर्णित है । यथा -- "दसविधे अंतलिक्खिते असज्झाइए प. तं.-उक्कावाते दिसिदाग्घे, गजिते, विजुते, निग्धाते, जूयते, जक्खालित्ते, धूमिता महिता, रत उग्घाते ।दसविहे ओरालिते, असज्झातिते, (७) ८ प० तं० अट्ठिमंसं, सोणिते, असुतिसामंते, सुसाणसामंते, चंदोवराते, सूरोवराते, पडणे, रायवुग्गहे, उवसयस्स अंतो ओरालिए सरीरगे।" स्थानांगसूत्र स्थान १० सू० ७१४ । (छाया) दशविधं आन्तरीक्षकं अस्वाध्यायिक प्रज्ञप्त, तद्यथा-उल्का- पातः, दिग्दाहः, गर्जितं, विद्युत् , निर्धातः, यूपकः, यक्षादीप्ते, धूमिता, महिता, . रजउद्धातः । दशविधः औदारिकः अस्वाध्यायिकः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-अस्थिमांस- शोणितानि अशुचिसामन्तं श्मशानसामन्तं चन्द्रोपरागः सूरोपरागः पतनं राज- विग्रहः उपाश्रयस्यान्ते औदारिकं शरीरकं । तथा च पाठः- "नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चउहिं महा- पाडिवएहिं सज्झायं करित्तए, तं जहा आसाढ पाडिवए, इन्द- महपाडिवाते कत्तिएपाडिवए, सुगिम्ह पाडिवए, णो कप्पइ निग्गं- थाण वा निग्गंथीण वा चउहिं सज्झाहिं सज्झायं करेत्तए, तं पडिमाते पछिमाते, मज्झण्हे, अडरते, कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चाउकालं सज्झायं करेत्तए तं०-पुवण्हे अव- रहे पओसे पच्चुसे।" स्थानांगसूत्र स्थान ४ उद्देश २ सू. २८५ (छाया) नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा चतुर्भिः महापाति- पद्भिः स्वाध्यायं कर्तुम् । तद्यथा-आपाढीप्रतिपदः, इन्द्रप्रतिपदः, कार्तिकप्रति- पदः, सुग्रीष्मप्रतिपदः ? नो कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां चतुर्भिः सन्ध्याभिः स्वाध्यायं कर्तुम् । प्रथमायां पश्चिमायां मध्याह्ने अर्धरात्रौ । कल्पते निर्ग्रन्थानां निम्रन्थीनां चतुष्काले स्वाध्यायं कर्तुम् । तद्यथा-पूर्वाहे, अपराहे, प्रदोपे, प्रत्यूपे। भावार्थ-आकाश से संबंध रखने वाले कारणों से आकाश संबंधी दश प्रकार से अस्वाध्याय वर्णन किए गए हैं। जैसे उल्कापात (तारापतन); यदि महत् तारापतन हुआ हो, तो एक प्रहर पर्यन्त शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं करना चाहिए १ । जब तक दिशा रक्त वर्ण की दिखाई पड़ती रहे, तब भी शास्त्रीय , - स्वाध्याय नहीं करना चाहिए २ । इसी प्रकार आगे भी समझ लेना चाहिए । दो प्रहर पर्यन्त बादल गरजने पर ३ । एक प्रहर पर्यन्त विजली चमकने पर ४। दो प्रहर पर्यन्त कड़कने पर ५, अर्थात् वादल के होने या न होने पर आकाश में घोर गर्जना हो, शुक्लपक्ष में तीन दिन पर्यन्त, वालचन्द्र होने पर तीन दिन पर्यन्त । प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया की रात्रि को एक एक प्रहर ' पर्यन्त स्वाध्याय न करना चाहिए ६ । आकाश में जब तक यक्षाकार दीखता रहे ७ । धूमिका श्वेत ८ । धूमिका कृष्ण ९ । माघ आदि महीनों में धुंध जब तक रहे तब तक स्वाध्याय न करना चाहिए, विशेषतया वृष्टि होने पर १०॥ उक्त कारणों के उपस्थित होने पर शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं करना चाहिए । किन्तु गर्जना और विद्युत् का अस्वाध्याय चातुर्मास्य में न मानना चाहिए। क्योंकि वह गर्जित और विद्युत्-कार्य ऋतु स्वभाव से ही प्रायः होता है । अतः आर्कि और स्वाँति अर्क तक अस्वाध्याय नहीं माना जाता । दश प्रकार औदारिक शरीर से संबंध रखने वाले कारणों के उपस्थित हो जाने पर भी अस्वाध्याय हो जाता है । जैसे हड्डी के दिखाई देने पर १ । मांस के समीप होने पर २। रुधिर के समीप होने पर ३ । वृत्तिकारों ने ६० हाथ के आसपास उक्त चीजें पड़ी होने पर अस्वाध्याय माना है । अशुचि (मलमूत्रादि) के समीप होने पर ४ । श्मशान के पास होने पर ५। चन्द्रग्रहण के होने पर ८-१२-१६ प्रहर पर्यन्त ६ । सूर्यग्रहण होने पर ८-१२-१६ प्रहर पर्यन्त ७ । किसी बड़े राजा आदि अधिकारी की मृत्यु हो जाने पर उनके संस्कार पर्यन्त अथवा अधिकार प्राप्त होने तक शनैः शनैः पढ़ना चाहिए ८ । राजाओं के युद्ध स्थान पर ९ । उपाश्रयं के भीतर पंचेन्द्रिय जीव का वध हो जाने पर-जैसे किसी ने कबूतर या चूहे को मार दिया हो तथा १०० हाथ के आसपास मनुष्य आदि का शव पड़ा हो, तब भी स्वाध्याय न करना चाहिए १०। एवं २०॥ चार महाप्रतिपदाओं में भी स्वाध्याय न करना चाहिए । जैसे आपाढ़ शुक्ला पौर्णमासी और श्रावण प्रतिपदा २, आश्विन शुक्ला पौर्णमासी तथा कार्तिक प्रतिपदा ४, कार्तिक शुक्ला पौर्णमासी तथा मार्गशीर्ष प्रतिपदा ६, चैत्र शुक्ला पौर्णमासी और वैशाख प्रतिपदा ८ । और सूर्योदय से एक घड़ी पूर्व तथा एक घड़ी पश्चात् एवं सूर्यास्त से एक घड़ी पूर्व तथा एक घड़ी पश्चाद , मध्याह्न के समय तथा अर्धरात्रि के समय भी पूर्ववत् स्वाध्याय नहीं करना चाहिए । किन्तु दिन के प्रथम प्रहर और पश्चिम प्रहर तथा रात्रि के प्रथम प्रहर और पिछले प्रहर में अस्वाध्याय काल को छोड़कर अवश्य स्वाध्याय करना चाहिए । इस प्रकार ३२ प्रकार के अस्वाध्याय काल को छोड़कर स्वाध्याय करना चाहिए । तथा निशीथ सूत्र के १९ वें उद्देश में यह पाठ है-- "जे भिक्खू चउसु महापडिवएसु सज्झायं करेइ करतं वा साइज्जइ, तं जहा सुगिम्हिए पाडिवाए, आसाढी पाडिवए, भद्दवए पाडिवए, कत्तिए पाडिवए।" इनका अर्थ भी पूर्ववत् है, किन्तु इस पाठ में भाद्रपद भी ग्रहण किया गया है । सो भाद्रशुक्ला पौर्णमासी और आश्विन कृष्णा ‘प्रतिपदा, इस प्रकार दो दिनों की वृद्धि करने से ३४ अस्वाध्याय काल हो जाते हैं । अतः इनको छोड़कर ही स्वाध्याय करना चाहिए । व्यवहार सूत्र के सातवें उद्देश में स्वाध्याय और अस्वाध्याय काल के विषय में वर्णन करते हुए उत्सर्ग और अपवादमार्ग दोनों का ही अवलम्बन किया गया है । जैसे-- "नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा वितिकिट्ठाए काले सज्झायं उद्दिसित्तए वा करित्तए ॥१४॥ कप्पति निग्गं- थीणं वितिकिट्ठाए काले सज्झायं उद्दिसित्तए वा करित्तए वा निग्गंथणिस्साए ॥१५॥ नो कप्पति निग्गंथाण. वा निग्गंथीण वा असज्झायं सज्झायं करित्तए ॥१६॥ कप्पति निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा सज्झाइय सज्झायं करित्तए ॥१७॥ नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गथीण वा अप्पणों असज्झाइयं करित्तए कप्पति णं अण्णमन्नस्स वायणं दलित्तए ॥१८॥" इन सूत्रों का भावार्थ केवल इतना ही है कि--साधु या साध्वियों को अकाल में स्वाध्याय न करना चाहिए । किन्तु काल में ही स्वाध्याय करना ( १० ) " चाहिए। यदि परस्पर वाचना चलती हो, तो वाचना की क्रिया कर सकते हैं; अर्थात् वाचना अकाल में भी दे ले सकते हैं । और यदि अपने शरीर से रुधिर आदि बहता हो, तब भी स्वाध्याय नहीं कर सकते, परन्तु उस स्थान को ठीक चाँधकर यदि खून आदि बाहर न बहते हों, तो परस्पर वाचना दे ले सकते हैं। इस प्रकार शुद्धिपूर्वक स्वाध्याय करने में प्रयत्नशील होना चाहिए । अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि-अस्वाध्याय मूल सूत्र का होता है या अनुप्रेक्षादि का भी ? इसका उत्तर यही है कि-ठाणांग सूत्र के वृत्तिकार अभयदेव सूरि चार महा प्रतिपदाओं की वृत्ति करते समय प्रथम ही यह लिखते हैं:- "स्वाध्यायो नन्द्यादिसूत्रविषयो वाचनादिः अनुप्रेक्षा तु न निषिध्यते" इस कथन से सिद्ध हुआ कि केवल संहिता-मात्र का अस्वाध्याय है, अनुप्रेक्षा आदि का नहीं। अस्वाध्याय काल में स्वाध्याय करने से हानि अस्वाध्याय काल में स्वाध्याय करने से यही हानि है कि शास्त्र के । देवाधिष्ठित एवं देव-चाणी होने के कारण अशुद्धिपूर्वक पढ़ने से कोई क्षुद्र देव पढ़ने वाले को छल ले या उसे दुःख दे देवे ! (एतेषु स्वाध्यायं कुर्वतां क्षुद्रदेवता छलनं करोति इति वृत्तिकारः) जिससे कि लोकों में अत्यंत अपवाद हो जावे । तथा आत्मविराधना और संयमविराधना के होने की भी संभावना की जा सकती है । अथवा- "सुय णाणंमि अभत्ती लोगविरुद्धं पमत्त छलणाय । विज्जा साहणवे गुन्न धम्मया एव मा कुणसु ॥१॥". "श्रुतज्ञानेऽभक्तिः लोकविरुद्धता प्रमत्तछलना च । विद्यासाधनवैगुण्यधर्मता इति मा कुरु ॥" अर्थात्-विद्यासाधन में असफलता, इत्यादि कारण जानकर, हे शिष्य!
. । - - अकाल में स्वाध्याय न करना चाहिए । अत एव सिद्ध हुआ कि अकाल म स्वाध्याय न करना चाहिए । जैसे जो पृक्ष अपनी ऋतु आने पर ही फलते और फूलते हैं, वे जनता में समाधि के उत्पन्न करने वाले माने जाते हैं। किन्तु जो वृक्ष अकाल में फलते और फूलते हैं, वे देश में दुर्भिक्ष, मरी, और राज्य- विग्रह (कलह ) आदि के उत्पन्न करने वाले माने जाते हैं । इसी प्रकार स्वाध्याय के काल, अकाल विषय में भी जानना चाहिए । कारण यह है कि प्रत्येक कार्य विधिपूर्वक किया हुआ ही सफल होता है । जैसे समय पर सेक्न की हुई ओपधि रोग की निवृत्ति और बल की वृद्धि करती है, ठीक इसी प्रकार भक्तिपूर्वक और स्वाध्यायकाल में ही किया हुआ स्वाध्याय कर्मक्षय और शान्ति की प्राप्ति कराता है । अत:- "उद्देसोपासगस्सनत्थि" इस वाक्य का स्मरण कर इस विषय को यहीं पर समाप्त किया जाता है । अर्थात् घुद्धिमान् को उपदेश की आवश्यकता नहीं । वह स्वयं ही अपने कृत्यों को समझता है । इसलिए मुमुक्षु जनों को उचित है कि वे शास्त्रीय स्वाध्याय से अपने जीवन को पवित्र बनाकर मोक्ष के अधिकारी बनें । क्योंकि शास्त्र का वाक्य है:- "दोहि ठाणेहि अणगारे संपन्ने अणादीयं अणवयग्गं दीहमद्धं चाउरंतसंसारकंतारं वीतिवतेज्जा, तं जहा विजाए चेव चरणेण चेव ।" स्थानांगसूत्र, स्थान २ उद्देश १ सूत्र ६३ दो कारणों से संयुक्त भिक्षु अनादि अनन्त दीर्घ मार्ग वाले चतुर्गति रूप संसाररूपी कान्तार से पार हो जाते हैं, जैसे कि विद्या और आचरण से । इसलिए हमें चाहिए कि देश और धर्म का अभ्युदय करते हुए अनेक भव्य प्राणियों को मोक्ष का अधिकारी बनायें, जिससे जनता में सुख और शांति का संचार हो । इत्यलं विद्वद्वर्यपु ।
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श्रीः
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्
संस्कृतच्छाया-पदार्थान्वय-मूलार्थोपेतं
तपोगुणप्रकाशिकाहिन्दीभाषाटीकासहितं च
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नमो त्थु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स प्रथमो वर्गः ... तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे अज-सुह- म्मस्स समोसरणं। परिसा निग्गया जाव'"जंवू पज्जु- वासतिः"एवं वयासी जइ णं भंते ! समणेणं जाव" संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अयमढे पण्णत्ते नवमस्स णं भंते अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहे आर्य-सुधर्मस्य समवशरणम् । “परिषन्निर्गता यावज्जम्बूः पर्युपासति एव- मवादीत् “यदि भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनाष्टमस्याङ्गस्या- न्तकृद्दशानामयमर्थः प्रज्ञप्तः, नवमस्य नु भदन्त ! अङ्गस्यानु- त्तरोपपातिकदशानां यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः। पदार्थान्ययः-तेणं-उस कालेणं -काल और तेणं-उस समएणं- रायगिहे-राजगृह नगर में अज-सुहम्मस्स आर्य सुधा समोसरणं-विराजमान -समय में ४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः १ हुए परिसा-परिपद् निग्गया-उनकी धर्म-कथा सुनने के लिये नगर से निकली जाव-यावत्-और कथा सुनकर फिर नगर को वापिस चली गई। इस अनन्तर जंबू-जम्बू स्वामी पज्जुवासति-अच्छी तरह सेवा करता हुआ एवं-इस प्रकार वयासी-कहने लगा णं-वाक्यालङ्कार के लिये है भंते !-हे. भगवन् ! जइ-यदि संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए जाव-और अन्य सब गुणों से परिपूर्ण समणेणं-श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अहमस्स-आठवें अंगस्स-अङ्ग अंतगडदसाणं-अन्त- कृद्-दशा का अयम?-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है तो फिर भंते ! हे भगवन् ! नवमस्स-नौवें अंगस्स-अंग अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक' दशा का जाव-'नमो त्थु णं' के गुणों से युक्त और संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए श्री भगवान् ने के-कौन-सा अहे-अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है ? मूलार्थ-उस काल और उस समय में एक राजगृह नगर था । (उसके बाहर गुणशिलक नाम के चैत्य में) आर्य सुधर्मा विराजमान हुए। (यह सुनकर) नगर की परिषद् ( उनके पास धर्म-कथा सुनने के लिये) गई (और धर्म सुन- कर नगर को वापिस चली गई )। जम्बू स्वामी अच्छी प्रकार उनकी सेवा करते हुए इस प्रकार कहने लगे "हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने आठवें अङ्ग, अन्तकृद्-दशा का यह अर्थ प्रतिपादन किया है तो हे भगवन् ! नौवें अङ्ग, अनुत्तरोपपातिक-दशा का क्या अर्थ प्रति- पादन किया है। टीका-सूत्रों के संख्या-बद्ध क्रम में अङ्गकृत्-सूत्र आठवां और अनुत्त- रोपपातिकसूत्र नौवां अङ्ग है । अतः अङ्गकेत्-सूत्र के अनन्तर ही इसका आना सिद्ध है | आठवें अङ्ग, अङ्गकृत्-सूत्र में उन जीवों का वर्णन किया है, जो मूक केवली हुए हैं अर्थात् जिन्होंने स्वयं तो केवल-ज्ञान की प्राप्ति की किन्तु आयु के क्षीण होने के कारण दूसरी भव्य आत्माओं पर अपने उस ज्ञान को प्रकाश नहीं कर सके । जैसे गजसुकुमार आदि । इस नौवे अङ्ग में उन व्यक्तियों के जीवन का दिग्दर्शन कराया गया है, जो अपनी मनुष्य-जीवन की लीला को समाप्त कर पांच अनुत्तरोपपातिक विमानों में उत्पन्न हुए हैं। इस सूत्र की उत्थानिका श्री जम्बू स्वामी से वर्णन की गई है। जब श्री ..
श्रमण भगवान् महावीर स्वामी मोक्ष को प्राप्त हो चुके तब जम्बू स्वामी के चित्त में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने किस प्रकार उक्त सूत्र का अर्थ वर्णन किया है । उनकी इस जिज्ञासा को देखकर श्री सुधा स्वामी निम्न-लिखित रीति से इस सूत्र का विषय वर्णन करते हैं । इस समय जो एकादश अङ्ग-सूत्र हैं, वे सब श्री सुधा स्वामी की वाचना के ही कहे जाते हैं। ऐसा न मानने से कई एक आपत्तियां उपस्थित हो जाती हैं। जैसे-अङ्ग-सूत्र में इस प्रकार के पाठ मिलते हैं कि धन्ना अनगार ने एकादश अङ्गों का अध्ययन किया था । किन्तु इस समय जो अनुत्तरोपपातिक-सूत्र है, उस में मुख्य रूप से धन्ना अनगार का ही विशद अधिकार पाया जाता है । ऐसी अवस्था में यह शङ्का विना समाधान के ही रह जाती है कि उन्होंने नौवें कौन से अङ्ग का अध्ययन किया होगा। क्योंकि प्रस्तुत नौवें अङ्ग में तो धन्ना अनगार का पादोपगमन से अनशन पर्यन्त और अनुत्तर विमान में उत्पन्न होने तक का सब वर्णन दिया गया है । अतः यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है कि यह सब सुधा- चार्य की ही वाचना है और वह भी श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के निर्वाण- पद-प्राप्ति के अनन्तर ही की गई है। इस सूत्र की हस्त-लिखित प्रतियों में निम्नलिखित पाठ-भेद भी मिलते हैं:- "तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नगरे होत्था । तस्स णं रायगिहे नाम नयरस्स सेणिए नाम राया होत्था वण्णओ चेलणाए देवी । तत्थ गं रायगिहे नामं नयरे बहिया उत्तर-पुरस्थिमे दिसा-भाए गुणसेलए नाम चेइए होत्था । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे अज-सुहम्मे नाम थेरे जाव गुणसेलए नामं चेइए तेणेव समोसढे परिसा निग्गया धम्मो कहिओ परिसा पडिगया ।" "तेणं कालेणं तेणं समएणं जंबु जाव पज्जुवासमाणे एवं पयासी" इनमें से पहला पाठ किसी ग्रन्थ से ज्यों-का-त्यों उद्धृत किया हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि इस सूत्र की रचना तो श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के निर्वाण के अनन्तर ही हुई है और श्रेणिक महाराज श्री भगवान के विद्यमान होते ही पश्चत्व (मृत्यु) को प्राप्त हो चुके थे। इसलिए असगत होने के कारण यह पाठ निर्मूल है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए 'शानोद्धार समिति ने एक प्रायः अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः । शुद्ध प्रति मुद्रापित की है । इस प्रति में जो मूल सूत्र हैं, वे ठीक प्रतीत होते हैं । इस में सूत्रों के साथ-साथ श्री अभयदेव-सूरि-कृत संस्कृत-विवरण भी है, किन्तु यह . बहुत ही संक्षिप्त है। अनुत्तरोपपातिक-दशा शब्द की व्याख्या विवरणकार इस प्रकार करते हैं:- "अथानुत्तरोपपातिकदशासु किश्चिद्वयाख्यायते-तत्रानुत्तरेपु-सर्वोत्तमेपु विमानविशेपेषु, उपपातः-जन्म,अनुत्तरोपपातः,स विद्यते येषां तेऽनुत्तरोपपातिकास्तत्प्र- तिपादिका दशा:-दशाध्ययनप्रतिवद्धप्रथमवर्गयोगाद्दशा:-प्रन्थविशेपोऽनुत्तरोपपातिक- दशास्तासां च सम्बन्धसूत्रं तयाख्यानं च ज्ञाताधर्म -कथा-प्रथमाध्ययनादवसेयम । शेपं सूत्रमपि कण्ठ्यम्" । इसी प्रकार अन्य कुछ-एक स्थलों का ही विवरण किया गया है। उनमें धन्ना अनगार की उपमा के स्थल पर विशेप है। शेप सूत्रों को सरल जान कर विना किसी विवरण किये छोड़ दिया गया है । किन्तु ये सूत्र अर्थ की दृष्टि से सुगम होने पर भी ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्त्व के हैं। पाठकों की सुविधा के लिए इस सूत्र का स्पष्ट और सुगम अर्थ नीचे दिया जाता है:- चतुर्थ आरे के उस समय जय श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी निर्वाण- पद प्राप्त कर चुके थे, राजगृह नाम का एक नगर था । उस नगर के बाहर एक गुणशेलक नाम चैत्य (उद्यान) था । एक समय उस उद्यान में आर्य सुधा स्वामी. पधारे । यह सुनकर उस नगर के लोग उनके मनोहर व्याख्यान सुनने के लिए उन की सेवा में उपस्थित हुए । जब उनका व्याख्यान हो चुका, तव जनता प्रसन्न-चित्त से नगर को वापस चली गई। इसके अनन्तर आर्य जम्बू स्वामी ने भगवान सुधा स्वामी से प्रश्न किया "हे भगवन ! श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी मोक्ष को प्राप्त हो गये हैं। यह हम ने आप मुखारविन्द से सुन लिया है कि उन्होंने आठवें अङ्ग अङ्गकृत्-सूत्र' का अमुक अर्थ प्रतिपादन किया है । अब मेरी जिज्ञासा नौवें अङ्ग के अर्थ जानने की है । कृपा करके वह भी वर्णन कीजिए।" यह सुनकर श्री सुधा स्वामी जी ने इस से उक्त नौवें अङ्ग का अर्थ कहना प्रारम्भ किया है: इस सूत्र में "तेणं कालेणं तेणं समएणं" का "तस्मिन काले तस्मिन् समये" सप्तम्यन्त अनुवाद किया गया है । किन्तु यह दोपाधायक नहीं है । क्योंकि अर्द्ध- - प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । मागधी भाषा में सप्तमी के स्थान पर प्रायः तृतीया का प्रयोग देखा गया है । किसी किसी आचार्य का मत है कि यहां 'ण' याक्यालङ्कार अर्थ में है और 'वे' प्रथमा का बहुवचन है, जो यहां अधिकरण अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। किन्तु पहले पक्ष का बहुत से आचार्य समर्थन करते हैं। जैसे -सप्तम्या द्वितीया ॥८।३।१३७॥ इस सूत्र की वृत्ति में आचार्य हेमचन्द्र जी लिखते हैं: -"सप्तम्या स्थाने कचिद् द्वितीया भवति । विज्जु जोयं भरइ रतिं । आर्षे तृतीयापि दृश्यते । तेणं कालेणं, तेणं समएणं-तस्मिन् काले, तस्मिन् समये इत्यर्थः । प्रथमाया अपि द्वितीया दृश्यते । चउवीसं पि जिणघरा-चतुर्विंशतिरपि जिनवरा इत्यर्थः । जैन सिद्धान्तकौमुदी (अर्द्धमागधी) व्याकरण के कर्ता पण्डित शतावधानि रनचन्द्र जी लिखते हैं:-आधारेऽपि ॥२।२।१९।। कचिदधिकरणेऽपि वाच्ये तृतीया स्यात् । तेणं कालेणं तेणं समएणं । जेणामेव सेणिए राया तेणामेव-यस्मिन्नेव तस्मिन्नेवेत्यर्थः । “मज्झेणय गंभीरे" "रायवर कण्णाहिं सद्धिं एगदिवसेणं पाणिं गिण्हाविसु।" इत्यादि दृष्टान्त और व्याकरण के नियमों से सिद्ध हो जाता है कि सप्तमी के अर्थ में तृतीया का प्रयोग शास्त्र-विरुद्ध नहीं है, अपितु.शास्त्र-सम्मत ही है । इस सूत्र में राजगृह नगर का केवल नाम ही दिया गया है। इसका विशेष वर्णन औपपातिक-सूत्र में आता है । जो व्यक्ति इसके जानने की इच्छा रखते हों, उनको इसके लिये औपपातिक-सूत्र ही देखना चाहिए। यहां पर पाठकों को सुधा स्वामी के विषय में भी कुछ बता देना ठीक प्रतीत होता है । आप चतुर्दश पूर्वो के पाठी और चार ज्ञानों को धारण करने वाले थे। यद्यपि आप स्थविर-गुणों से पूर्ण 'जिन' तो नहीं थे तथापि 'जिन' के सदृश यथार्थ-वक्ता अवश्य थे। आप स्व-समय (अपने मत) और पर-समय (दूसरों के मत) के पूर्ण ज्ञाता थे । आप श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पट्ट को सुशोभित करते थे। यहां पर उनके विपय में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा। जो उनके विषय में विशेष जानना चाहते हों, उनको 'ज्ञाता-सूत्र' से जानना चाहिए । ज़म्बू स्वामी के उक्त . जिज्ञासा-रूप प्रश्न को सुन कर सुधा स्वामी इस प्रकार कहने लगे:- - अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः .. । शुद्ध प्रति मुद्रापित की है । इस प्रति में जो मूल सूत्र हैं, वे ठीक प्रतीत होते हैं । इस में सूत्रों के साथ-साथ श्री अभयदेव-सूरि-कृत संस्कृत-विवरण भी है, किन्तु यह बहुत ही संक्षिप्त है। अनुत्तरोपपातिक-दशा शब्द की व्याख्या विवरणकार इस प्रकार करते हैं:- "अथानुत्तरोपपातिकदशासु किश्चिद्वघाख्यायते--तत्रानुत्तरेपु-सर्वोत्तमेपु विमानविशेपेषु, उपपातः-जन्म,अनुत्तरोपपातः,स विद्यते येषां तेऽनुत्तरोपपातिकास्तत्प्र- तिपादिका दशा:-दशाध्ययनप्रतिवद्धप्रथमवर्गयोगाद्दशा:-प्रन्थविशेपोऽनुत्तरोपपातिक- दशास्तासां च सम्बन्धसूत्रं तद्वयाख्यानं च ज्ञाताधर्म-कथा-प्रथमाध्ययनादवसेयम् । शेपं सूत्रमपि कण्ठ्यम्"। इसी प्रकार अन्य कुछ-एक स्थलों का ही विवरण किया गया है। उनमें धन्ना अनगार की उपमा के स्थल पर विशेप है। शेप सूत्रों को सरल जान कर विना किसी विवरण किये छोड़ दिया गया है। किन्तु ये सूत्र अर्थ की दृष्टि से सुगम होने पर भी ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्त्व के हैं। पाठकों की सुविधा के लिए इस सूत्र का स्पष्ट और सुगम अर्थ नीचे दिया जाता है:- चतुर्थ आरे के उस समय जब श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी निर्वाण- पद प्राप्त कर चुके थे, राजगृह नाम का एक नगर था । उस नगर के बाहर एक गुणशेलक नाम चैत्य (उद्यान) था । एक समय उस उद्यान में आर्य सुधा स्वामी पधारे । यह सुनकर उस नगर के लोग उनके मनोहर व्याख्यान सुनने के लिए उन की सेवा में उपस्थित हुए । जब उनका व्याख्यान हो चुका, तव जनता प्रसन्न-चित्त से नगर को वापस चली गई। इसके अनन्तर आर्य जम्बू स्वामी ने भगवान् सुधा स्वामी से प्रश्न किया "हे भगवन् ! श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी मोक्ष को प्राप्त हो गये हैं । यह हम ने आप के मुखारविन्द से सुन लिया है कि उन्होंने आठवें अङ्ग 'अङ्गकृत्-सूत्र' का अमुक अर्थ प्रतिपादन किया है । अब मेरी जिज्ञासा नौ अङ्ग के अर्थ जानने की है । कृपा करके वह भी वर्णन कीजिए।" यह सुनकर श्री सुधा स्वामी जी ने इस से उक्त नौवें अङ्ग का अर्थ कहना प्रारम्भ किया है : इस सूत्र में "तेणं फालेणं तेणं समएणं" का "तस्मिन् काले तस्मिन् समये" सप्तम्यन्त अनुवाद किया गया है। किन्तु यह दोपाधायक नहीं है। क्योंकि अर्द्ध- प्रथमो वर्ग: भाषाटीकासहितम् । - । मागधी भाषा में सप्तमी के स्थान पर प्रायः तृतीया का प्रयोग देखा गया है । किसी किसी आचार्य का मत है कि यहां ण' वाक्यालझार अर्थ में है और 'ते' प्रथमा का बहुवचन है, जो यहां अधिकरण अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। किन्तु पहले पक्ष का बहुत से आचार्य समर्थन करते हैं। जैसे:-सप्तम्या द्वितीया ||८।३।१३७॥ इस सूत्र की वृत्ति में आचार्य हेमचन्द्र जी लिखते हैं:-"सतम्या स्थाने कचिद् द्वितीया भवति । विज्जु जोयं भरइ रत्ति । आ तृतीयापि दृश्यते । तेणं कालेणं, तेणं समएणं-तस्मिन् फाले, तस्मिन् समये इत्यर्थः । प्रथमाया अपि द्वितीया दृश्यते । चउवीसं पि जिणवरा-चतुर्विशतिरपि जिनवरा इत्यर्थः ।" जैन सिद्धान्तकौमुदी (अर्द्धमागधी) व्याकरण के कर्ता पण्डित शतावधानि रत्नचन्द्र जी लिखते हैं:-आधारेऽपि ॥२।२११९॥ कचिदधिकरणेऽपि वाच्ये तृतीया स्यात् । तेणं कालेणं तेणं समएणं । जेणामेव सेणिए राया तेणामेव-यस्मिन्नेव तस्मिन्नेवेत्यर्थः। “मज्झेणय गंभीरे" "रायवर कण्णाहिं सद्धिं एगदिवसेणं पाणिं गिहाविंसु।" इत्यादि दृष्टान्त और व्याकरण के नियमों से सिद्ध हो जाता है कि सप्तमी के अर्थ में तृतीया का प्रयोग शास्त्र-विरुद्ध नहीं है, अपितु शास्त्र-सम्मत ही है। इस सूत्र में राजगृह नगर का केवल नाम ही दिया गया है। इसका विशेष वर्णन औपपातिक-सूत्र में आता है । जो व्यक्ति इसके जानने की इच्छा रखते हों, उनको इसके लिये औपपातिक-सूत्र ही देखना चाहिए । यहां पर पाठकों को सुधा स्वामी के विषय में भी कुछ बता देना ठीक प्रतीत होता है । आप चतुर्दश पूर्वो के पाठी और चार ज्ञानों को धारण करने वाले थे । यद्यपि आप स्थविर-गुणों से पूर्ण 'जिन' तो नहीं थे तथापि 'जिन' के सदृश यथार्थ-वक्ता अवश्य थे। आप स्व-समय (अपने मत) और पर-समय (दूसरों के मत) के पूर्ण ज्ञाता थे । आप श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के पट्ट को सुशोभित करते थे। यहां पर उनके विषय में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा। जो उनके विषय में विशेष जानना चाहते हों, उनको 'ज्ञाता-सूत्र' से जानना चाहिए। जम्बू स्वामी के उक्त . जिज्ञासा-रूप प्रश्न को सुन कर सुधा स्वामी इस प्रकार कहने लगे:- , अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः तते णं से सुहम्मे अणगारे जंवू अणगारं एवं वयासी:-एवं खलु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तिण्णि वग्गा पण्णत्ता । जति गंभंते! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तओ वग्गा पण्णत्ता, पढ- मस्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं कइ अज्झयणा पण्णत्ता ? एवं खलु जंवू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा—(१) जालि (२) मयालि (३) उवयालि (४) पुरीससेणे य (५) वारिसेणेय (६) दीहदंते य (७) लट्ठदंतेय (८)वेहल्ले (९) वेहासे (१०) अभये ति य कुमारे। ततः स सुधर्मोऽनगारो जम्बुमनगारमेवमवादीत् “एवं खल्लु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन नवमस्याङ्गस्य, अनुत्तरोपपा- तिकदशानां, त्रयो वर्गाः प्रज्ञप्ताः” । “यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन नवमस्याङ्गस्य; अनुत्तरोपपातिक-दशानां, त्रयो वर्गाः प्रज्ञप्ताः, प्रथमस्य नु, भदन्त !, वर्गस्य, अनुत्तरोपपातिक- दशानां, कत्यध्ययनानि प्रज्ञप्तानि ?” “ एवं खलु जम्बु!श्रमणेन यावत्सम्प्राप्तेनानुत्तरोपपातिक-दशानां प्रथमस्य वर्गस्य दशाध्य- यनानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा-(१)जालिः (२) मयालिः (३) उप- जालिः (१) पुरुषषणः (५) वारिषेणः (६) दीर्घदान्तश्च (७) लप्ट- प्रथमो वर्ग: ] भागटीकासहितम् । वग्गा-वर्ग दान्तश्च (८) वेहल्लः (९) वेहायसः (१०) अभय इति च कुमाराः । पदार्धान्वयः-तते-तदनु णं-वाक्यालवार के लिए है से-वह सुहम्मे- मुधर्मा अणगारे-अनगार जंबुं प्रणगारं-जम्यूअनगार को एवं-इम प्रकार वयासी- कहने लगा जम्बू-हे जम्यू ! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से समणेणं-श्रमण भगवान महावीर ने जो जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं नवमस्स-नौवें अंगस्स-अङ्ग अणुत्तरोववाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तिण्णि-तीन वग्गा-वर्ग पएणत्ता-प्रतिपादन किये हैं। भंते-हे भगवन् ! जति णं- यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं -श्रमण भगवान् ने नवमस्स- नौवें अंगस्स-अङ्ग अणुत्तरोववाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तनो-तीन ।.पएणत्ता-प्रतिपादन किये हैं तो भंते-हे भगवन पढमस्स-प्रथम वग्गस्स-वर्ग अणुत्तरोववाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुग समणेणं-भ्रमण भगवान ने कइ-कितने अज्झयणा- अध्ययन पएणना-प्रतिपादन किये हैं ? जंबू-हे जम्बू! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए जाव-यावत् समणेणं -श्रमण भगवान् ने अणुत्तरो- ववाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के पढमस्स-प्रथम वग्गस- -वर्ग के दस-दश अज्झयणा-अध्ययन पएणता-प्रतिपादन किये हैं तं जहा-जैसे जालि-जालि कुमार मयालि-मयालि कुमार उवयालि-उपजालि कुमार य-और पुरिससेणे-पुरुषसेन कुमार य-और वीरसेणे-वीरसेन कुमार य-और दीहदंते-दीर्घदान्त कुमार य- और लट्ठदंते-लष्टदान्त कुमार य-और वेहल्ले-वेहल्ल कुमार वेहासे-वेहायस कुमार य-और अभये- |-अभय कुमार इति य-इस प्रकार कुमारे-उक्त दश कुमारों के नाम वर्णन किये हैं। मूलार्थ-इसके अनन्तर वह सुधर्मा अनगार जम्यू अनगार से कहने लगे “हे जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने नौवें अङ्ग, अनुत्तरोपपातिक-दशा, के तीन वर्ग प्रतिपादन किये हैं"। "हे भगवन् ! मुक्ति को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने यदि नौवें अङ्ग, अनुसरोपपातिक दशा, के तीन वर्ग प्रतिपादन किये हैं तो हे भगवन् ! प्रथम वर्ग, अनुत्तरोपपातिक दशा, के कितने अध्ययन प्रतिपादन किये हैं ?" श्री सुधा कहने लगे "हे १०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्। [ प्रथमो वर्गः जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री भगवान् ने प्रथम वर्ग, अनुत्तरोपपातिक- दशा, के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं, जैसे-जालि कुमार, मयालि कुमार, उपजालि कुमार, पुरुपसेन कुमार, वारिसेन कुमार, दीर्घदांत कुमार, लष्टदांत कुमार, वेहल्ल कुमार, वेहायस कुमार और अभय कुमार । यही प्रथम वर्ग के अध्ययनों के नाम हैं। टीका-इस सूत्र में इस ग्रन्थ का विषय संक्षेप में बताया गया है और साथ ही इसकी सप्रयोजनता भी सिद्ध की गई है । जम्बू स्वामी ने अत्यन्त उत्कट जिज्ञासा से सुधा स्वामी से पूछा कि हे भगवन् ! श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के कितने वर्ग प्रतिपादन किये हैं ? इस पर सुधर्मा अनगार ने बताया कि उक्त सूत्र के तीन वर्ग प्रतिपादन किये गए हैं। फिर जम्बू स्वामी ने प्रश्न किया कि उन तीन वर्गों में से पहले वर्ग के कितने अध्ययन प्रति- पादन किये गये हैं ? उत्तर में सुधा स्वामी ने कहा कि श्री श्रमण भगवान् ने पहले वर्ग के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं। इनके नाम क्रम से निम्नलिखित हैं:- १-जालि कुमार २-मयालि कुमार ३-उपजालि कुमार ४-पुरुपसेन कुमार ५-वारिसेन कुमार ६-दीर्घदान्त कुमार ७-लष्टदान्त कुमार ८-वेहल्ल कुमार ९- वेहायस कुमार और १०-अभय कुमार । यही इन दश अध्ययनों के नाम हैं। 'मयालि कुमार' शब्द के संस्कृत में कई प्रकार के अनुवाद हो सकते हैं। जैसे-मकालि कुमार, मगालि कुमार और मयालि कुमार आदि । क्योंकि "कगचजतदपयवां प्रायो लुक" ८।१।११७॥ इस सूत्र से सूत्रोक्त व्यञ्जनों का लोप हो जाता है और फिर अवशिष्ट अकार के स्थान में "अवर्णो य-श्रुतिः" ८।१०।१८०॥ इस सून यकार हो जाता है । किन्तु 'अर्द्ध-मागधी-कोप' में इसका मयालि कुमार' ही अनुवाद किया गया है । अतः यह नाम इसी तरह प्रसिद्ध हो गया है। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि प्रस्तुत ग्रन्थ की सार्थकता या सप्रयो- जनता किस प्रकार सिद्ध होती है ? उत्तर में कहा जाता है कि जो भव्य व्यक्ति अपने वर्तमान जन्म में सर्वथा कमों के क्षय करने में असमर्थ हों, वे इस जन्म के अनन्तर पांच अनुत्तर विमानों के परम-साता-वेदनीय-जनित सुखों का अनुभव प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [११ फरके निर्वाण-पद की प्राप्ति कर सकते हैं। किन्तु उनका पण्डित-चीर्य पुरुषार्थ किसी भी दशा में निरर्थक नहीं जाता । अतः इस 'सूत्र' की सार्थकता और सप्रयो- जनता भली भांति सिद्ध है। इस सूत्र से यह भी सिद्ध होता है कि गुरु-भक्ति से ही श्रुत-ज्ञान की अच्छी तरह से प्राप्ति हो सकती है। अब जम्बू अनगार सुधा स्वामी से फिर प्रश्न करते हैं:- जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स अणुत्तरोव० समणेणं जाव संपत्तेणं के अद्वे पण्णत्ते ? यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य दशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, प्रथमस्य नु भदन्त ! अध्ययनस्या- नुत्तरोपपातिक-दशानां श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः ? पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! जइ-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने पढमस्स-प्रथम वग्गस्स-वर्ग के दस-दश श्रज्झयणा-अध्ययन पएणता-प्रतिपादन किये हैं, तो भंते-हे भगवन ! पढमस्स- प्रथम अझयणस्स-अध्ययन अणुत्तरोव-अनुत्तरोपपातिक-दशा के जाव-यावत संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने के-क्या अद्वे-अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है। मूलार्थ हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने प्रथम वर्ग के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं तो हे भगवन् ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने.अनुत्तरोपपातिक-दशा के प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? टीका-पिछले सूत्रों का प्रश्नोत्तर-क्रम इस सूत्र में भी रखा गया है, १२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः क्योंकि यह शैली अत्यन्त रोचक है और इससे परिमित शब्दों में ही अभीष्ट अर्थ समझाया जा सकता है । तदनुसार ही श्री जम्बू स्वामी श्री सुधर्मा स्वामी से पूछते हैं कि हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने-जो 'नमो त्यु णं' में कहे हुए सब गुणों से परिपूर्ण हैं और मोक्ष को प्राप्त हो चुके है-प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? मुझको इसकी जिज्ञासा है कृपा करके यह मुझको सुनाइए। इस सूत्र . - से भी यही सिद्ध किया गया है कि विनय-पूर्वक अध्ययन किया हुआ ज्ञान ही सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं । जो शिष्य विनय-पूर्वक गुरु से ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसीको गुरु सम्यग्-ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं । तथा जिसका आत्मा उक्त ज्ञान से परिपूर्ण होता है, वह सहज ही में अन्य आत्माओं के उद्धार करने में समर्थ हो सकता है । अतः सिद्ध यह हुआ कि गुरु से विनयं-पूर्वक ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । यह सफल होता है। अब सुधा स्वामी जम्बू स्वामी के उक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए निम्नलिखित सूत्र में प्रथम अध्ययन का अर्थ वर्णन करते हैं:- एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे रिद्धिस्थिमियसमिद्धे, गुणसिलए चेतिते, सेणिए राया, धारिणी देवी, सीहो सुमिणे । जालीकुमारो जहा मेहो।अट्ठओ दाओ जाव उप्पि पासा० विहरति।सामी समोसढे सेणिओ णिग्गओ। जहा मेहो तहा जालींवि णिग्गतो। तहेव णिक्खंतो जहा मेहो । एक्कारस अंगाई अहिज्जति । गुणरयणं तवोकम्मं, एवं जा चेव खंदग- वत्तव्वया सा चेव चिंतणा आपुच्छणा थेरेहिं सद्धिं विपुलं तहेव दुरूहति, नवरं सोलस वासाइं सामन्न-परियागंपाउ- प्रथमो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [१३ णित्ता कालमासे कालं किच्चा उड्ढे चंदिम० सोहम्मी- साण जाव आरणच्चुए कप्पे नव य गेवेजे विमाणपत्थढे उड्ढं दूरं वीतीवत्तित्ता विजय-विमाणे देवत्ताए उववण्णे। तते णं ते थेरा भगवंता जालिं अणगारं कालगयंजाणेत्ता परिनिव्वाणवत्तियं काउस्सगं करेंति २ पत्त-चीवराई गेण्हति तहेव ओयरंति । जाव इमे से आयार-भंडए। भंते ! त्ति भगवं गोयमे जाव एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पियाणं अंतेवासी जालि-नाम अणगारे पगति- भद्दए।सेणं जाली अणगारे कालगते कहिं गते ? कहिं उववन्ने ? एवं खलु गोयमा ! ममं अंतेवासी तहेव जधा खंदयस्स जाव कालं० उड्ढं चंदिम जाव विजए विमाणं देवत्ताए उववन्ने। जालिस्सणं भंते! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णता ? गोयमा ! बत्तिसं सागरोवमाई ठिती पण्णत्ता।से णं भंते!ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं३ कहिं गञ्छिहिति ? गोयमा! महाविदेहे वासे सिज्झि- हिति, ता एवं जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोव- वाइयदसाणं पढम-वग्गस्स पढम-अज्झयणस्स अयमद्वे पण्णत्ते । पढम-वग्गस्स पढम अज्झयणं समत्तम् । एवं खलु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृह नगरमभूत् । ऋद्धिस्तिमितसमृद्धं गुणशैलकं चैत्यम् । श्रेणिको १४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः राजा, धारिणी देवी, सिंहः स्वप्ने, जालिकुमारो यथा मेघः। अष्टाष्ट दातानि । यावदुपरि प्रासादे विहरति ।स्वामी समवस्मृतःश्रेणिको निर्गतः। यथा मेघो तथा जालिरपि निर्गतः। तथैव निष्क्रान्तो यथा मेघः । एकादशाङ्गान्यधीते । गुणरत्नं तपः-कर्म, एवं या चैव स्कन्दक-वक्तव्यता सैव चिन्तनाऽऽपृच्छणा। स्थविरैः सार्द्ध विपुलं तथैव दू (आ) रोहति। नवरं पोडश वर्षाणि श्रामण्य-पर्याय पालयित्वा काल-मासे कालंकृत्योर्ध्वं चन्द्र० सौधर्मेशानयोः आरण्यच्युतयोः कल्पे च अवेयक-विमान-प्रस्तटादूर्ध्वं व्यति- वर्त्य विजय-विमाने देवतयोत्पन्नः । ततो नु स्थविरा भगवन्तो जालिमनगारं काल-गतं ज्ञात्वा परिनिर्वाणवर्तिनं कायोत्सर्ग कुर्वन्ति, कृत्वा च पात्र-चीवराणि गृह्णन्ति, तथैवावतरन्ति “याव- दिमान्यस्याचार-भाण्डकानि" "भगवन्!” इति भगवान् गोतमो यावदेवमवादीत् “एवं खलु देवानुप्रियाणामन्तेवासी जालि- नामाऽनगारः प्रकृति-भद्रकः । स नु जालिरनगारः काल-गतः कुत्र गतः? कुत्रोत्पन्नः ?” “एवं खल्लु गोतम! ममान्तेवासी तथैव यथा स्कन्दकस्य यावत् काल ऊर्ध्वं चन्द्रमसो यावद्विजय-वि- माने देवतयोत्पन्नः” “जालेर्नु भगवन् ! देवस्य कियान् कालः स्थितिः प्रज्ञप्ता?" "गोतम ! द्वात्रिंशत्सागरोपमा स्थितिः प्रज्ञप्ता" "स नु भगवन् ! ततो देवलोकादायुःक्षयेण (स्थिति- क्षयेण, भव-क्षयेण) कुत्र गमिष्यति ?” "गोतम ! महाविदेहेवर्षे सेत्स्यति।" तदेवं जम्बु!श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनाऽनुत्तरोपपातिक- दशानां प्रथम-वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । प्रथम- प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [२५ वर्गस्य प्रथमाध्ययनं समाप्तम् । पदार्थान्वयः-जंबू !-हे जम्बू! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से (प्रथमा- ध्ययन का अर्थ है।) तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय राय- गिहे-राजगृह णगरे-नगर था रिद्धि-ऋद्धि-ऊँचे २ भवन आदि तथा थिमिय- भय-रहित और समिद्धे-धन-धान्य से युक्त था। गुणसिलए-गुणशैल चेतिते- चैत्य, सेणिए-श्रेणिक राया-राजा धारिणी देवी-धारिणी देवी सीहो सुमिणे- सिंह का स्वप्न जालिकुमारो-जालिकुमार जहा मेहो-जैसे मेय कुमार अट्ठो- आठ २ दामो-दात (अर्थात् विवाह के साथ लड़की की ओर से आने वाला दहेज) जाव-यावत् उप्पिं पास-प्रासाद के ऊपर सुख-पूर्वक विहरति-विचरण करता है सामी-श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी समोसढे-सिंहासन के ऊपर विराजमान हो गये सेणियो-श्रेणिक राजा णिग्गयो-श्री भगवान् की वन्दना के लिए गया जहा-जैसे मेहो-मेघकुमार गया था जालीवि-जालिकुमार भी णिग्गतो- भगवान् की वन्दना के लिए गया तहेव-उसी प्रकार णिक्खंतो-निकला अर्थात् दीक्षित हुआ जहा मेहो-जिस प्रकार मेघकुमार की दीक्षा हुई थी एकारस-एकादश अंगाई-अङ्ग शास्त्रों का अहिजति :-अध्ययन किया गुणरयणं-गुणरन तवोकम्म- तप कर्म एवं-इसी प्रकार जा चेव-जो कुछ भी खंदग-वत्तवया स्कन्दक मुनि की वक्तव्यता है सा चेव-वही वक्तव्यता जालिकुमार की भी जाननी चाहिए। उसी तरह की चिंतणा-धर्म-चिन्तना आपुच्छणा-श्री भगवान् से अनशन व्रत के धारण करने की आज्ञा लेना । धेरेहिं-स्थविरों के सद्धिं-साथ तहेव-उसी प्रकार विपुलं- विपुलगिरि पर दुरूहति-चढ़ता है । उस पर चढ़ कर नवरं-इतना विशेष है कि सोलस वासाई-सोलह वर्ष तक सामन्न-परियाग-भामण्य-पर्याय का पाउणित्ता- पालन कर कालमासे मृत्यु के अवसर पर कालं किचा-फाल करके उड़े-ऊंचे चंदिम०-चन्द्र से यावत् सोहम्मीसाण-सौधर्म-देवलोक, ईशान-देवलोक जाव- यांवत् आरणच्चुए-आरण्य-देवलोक और अच्युत देवलोक अर्थात् कप्पे-यारह कल्प-देवलोक य-और गेवेग-वेगण विमाण-विमान पत्थडे-प्रस्तट उड्ढं-इनसे भी ऊंचे दूर-और दूर वीतिवत्तित्ता-ध्यसिमाग फरफ विजय-विमाणे-विजय-विमान में देवत्ताए-देव-रूप से उववएणे-उत्पाभा । तते-इसके अनन्तर णं- . -वाक्या- अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ प्रथमो वर्ग: गार . लङ्कार के लिए है ते-वे थेरा भगवंता-स्थविर भगवन्त जालिं-जालि अणगारं- अनगार को काल-गयं-काल-गत हुआ जाणेत्ता-जानकर परिनिवाण-वत्तिय- निर्वाण के निमित्त काउस्सगं-कायोत्सर्ग करेंति २-करते हैं और फिर कायोत्सर्ग करके पत्त-चीवराई-पात्र और वस्त्र गेहंति-ग्रहण करते हैं तहेव-उसी प्रकार शनैः शनैः उस पर्वत से ओयरंति-उतरते हैं । जाव-यावत् श्री श्रमण भगवान् महा- वीर स्वामी के सम्मुख आकर कहते हैं कि हे भगवन् ! इमे-ये से-उस जालि अन- आयार-भंडए-वर्पा-काल आदि में ज्ञान आदि आचार पालने के भण्डोप- करण है अर्थात् धर्म-साधन के उपयोगी उपकरण हैं। तब उसी समय भंते ! त्ति- हे भगवन् ! इस प्रकार कहकर भगवं-भगवान् गोयमे-गौतम स्वामी जाव-यावत् श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास इस प्रकार क्यासी-कहने लगे एवं खलु- इस प्रकार निश्चय से देवाणुप्पियाणं-देवानुप्रिय, आपका अंतेवासी-शिष्य जालि नाम-जालि नाम वाला अणगारे-अनगार पगति-भद्दए-प्रकृति से ही भद्र से णं-वह जाली अणगारे जालि अनगार काल-गते-काल को प्राप्त हो कर कहिं गते-कहां गया है ? कहिं-कहां उववने-उत्पन्न हुआ है ? गोयमा-हे गौतम ! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से ममं मेरा अंतेवासी-शिष्य तहेव-अर्थात् प्रकृति से भद्र जालि. कुमार जधा-जिस प्रकार खंदयस्स-स्कन्दक की वक्तव्यता है उसी प्रकार जाव- यावत् काल-काल करके उड्ढे-ऊंचे चंदिम-चन्द्र से जाव-यावत् विजए-विजय नाम वाले विमाणे-विमान में देवत्ताए-देव-रूप से उववन्ने-उत्पन्न हुआ है । अपने प्रश्न के उचित उत्तर मिलने पर फिर गौतम स्वामी ने श्री भगवान से पूछा भंते!- हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जालिस्स-जालि देवस्स-देव की केव- तियं-कितने कालं-काल तक ठिती-स्थिति पएणत्ता-प्रतिपादन की है ? फिर उत्तर में श्री भगवान् कहने लगे गोयमा !-हे गौतम ! बत्तीस-बत्तीस सागरोव- माई-सागरोपम की ठिती-स्थिति पएणत्ता प्रतिपादन की है। फिर गौतम स्वामी पूछते हैं भंते ! हे भगवन् ! से-वह जालिकुमार देव ताओ उस देवलोगायो- देव-लोक से आउक्खएणं ३-आयु, स्थिति और देव-भव-(लोक) के क्षय होने पर कहि-कहां गच्छिहिंति-जायगा अर्थात् किस स्थान पर उत्पन्न होगा। भगवान ने उत्तर दिया गोयमा!-हे गौतम ! महाविदेहे वासे-महाविदेह क्षेत्र में सिज्झिहिति- सिद्ध होगा अर्थात् यहां सिद्धि प्राप्त कर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त होगा और निर्वाण-पद प्रथमो धर्मः ] भाषाटीकासहितम् । [१७ प्राप्त कर सारे शारीरिक और मानसिक दुःखों का अन्त करेगा। ता-इसलिए एवं- इस प्रकार खलु-निश्चये से जंयु! हे जम्यूसमणेणं-श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने जा-यावत् संपत्तेणं-जिनको मोक्ष की प्राप्ति हो चुकी है अणुत्तरोववाइय- दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के पढमवग्गस्स-प्रथम वर्ग के पढम-अज्झयणस्स- प्रथम अध्ययन का अयमहे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है । पढम-वग्गस्स- प्रथम वर्ग का पढम-अज्झयणं -प्रथम अध्ययन समत्तं-समाप्त हुआ। मूलार्थ हे जम्बू ! इस प्रकार श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने प्रतिपादन किया है कि उस काल और उस समय में ऋद्धि, धन, धान्य से युक्त और भय रहित राजगृह नाम का नगर था । उसके बाहर एक गुणशील नामक चैत्य (उद्यान) था । वहां श्रेणिक राजा राज्य करता था। उसकी धारिणी नाम की देवी थी। धारिणी देवी ने स्वम में सिंह देखा । जिस प्रकार मेघकुमार का जन्म हुआ था, उसी प्रकार जालिकुमार का जन्म हुआ । (जालिकुमार का आठ कन्याओं के साथ विवाह हुआ।) पाठों के घर से उसको बहुत दात (दहेज) ाया । इस प्रकार सारे सुखों का अनुभव करता हुआ वह अपने राज- प्रासादों में विचरण करने लगा। इसी समय गुणशीलक चैत्य में श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी विराजमान हुए । वहां श्रेणिक राजा उनकी वन्दना के लिए गया। जिस प्रकार मेघकुमार (श्री श्रमण भगवान् के दर्शनों के लिए) गया था, उसी प्रकार जालिकुमार भी गया । इसके अनन्तर ठीक मेषकुमार के समान ही जालिकुमार भी दीक्षित हो गया। उसने एकादशाङ्ग शास्त्रों का अध्ययन किया। इसी तरह गुणरत्न नामक तप भी किया। शेप जिस प्रकार स्कन्दक संन्यासी की वक्तव्यता है, उसी प्रकार इसके विषय में भी जाननी चाहिए। उसी प्रकार धर्म-चिन्तना, श्री भगवान् से अनशन का विषय पूछना श्रादि । फिर वह उसी तरह स्थविरों के साथ विपुलगिरि पर्वत पर चढ़ गया । विशेषता केवल इतनी है कि वह सोलह वर्ष के श्रामण्य-पर्याय का पालन कर मृत्यु के समय के आने पर काल करके चन्द्र से ऊंचे सौधर्मेशान, आरण्याच्युत-कल्प देवलोक और ग्रैवेयक-विमान-प्रस्तटों से भी ऊंचे व्यतिक्रम करके विजय विमान में देव- रूप से उत्पन्न हुआ। तब वे स्थविर भगवान् जालि अनगार को काल-गत हुया जानकर परिनिर्वाण-प्रत्ययिक कायोत्सर्ग करके तथा जालि अनगार के अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्ग: .. वस्त्र और पात्र लेकर उसी प्रकार पर्वत से उतर आए और श्री श्रमण भगवान् महा- वीर की सेवा में उपस्थित होकर उन्होंने सविनय निवेदन किया कि हे भगवन् ! ये जालि अनगार के धर्म-प्राचार आदि साधन के उपकरण हैं । इसके अनन्तर भगवान् गोतम ने श्री भगवान से प्रश्न किया "हे भगवन् ! भद्र-प्रकृति और विनयी वह आप का शिष्य जालि अनगार मृत्यु के अनन्तर कहां गया ? कहां उत्पन्न हुआ?" श्री श्रमण भगवान् ने इसके उत्तर में प्रतिपादन किया "हे गोतम ! मेरा अन्तेवासी जालि अनगार चन्द्र से और चारह कल्प देवलोकों से नव ग्रैवेयक विमानों का उल्लङ्घन कर विजय-विमान में देव-रूप से उत्पन्न हुआ है।" गोतम ने फिर प्रश्न किया "हे भगवन् ! उस जालि देव की वहां कितनी स्थिति है ?" श्री भगवान् ने उत्तर दिया "हे गोतम ! जालि देव की वहाँ बत्तीस सागरोपम स्थिति प्रतिपादन की गई है" गोतम ने फिर पूछा "हे भगवन् ! वह जालिदेव उस देवलोक से आयु, भव और स्थिति क्षय होने पर कहां जायगा?" श्री भगवान् ने फिर उत्तर दिया "हे गोतम ! तदनन्तर वह महा- विदेह क्षेत्र में सिद्ध-गति प्राप्त करेगा अर्थात् यावत् मानसिक और शारीरिक दुःखों से सर्वथा मुक्त होकर निर्वाण-पद को प्राप्त करेगा" श्री सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक दशा के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है । प्रथम वर्ग का प्रथम अध्ययन समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र में जालिकुमार के विषय में प्रतिपादन किया गया है । यह ध्यान में रखने के योग्य है कि इस अध्ययन में कथित विषय 'ज्ञातासूत्र' के प्रथम अध्ययन के-जिसमें मेधकुमार के विपय में कहा गया है-विपय के समान ही है। अर्थात् 'ज्ञातासूत्र' के प्रथम अध्ययन में जिस प्रकार मेघकुमार के विषय में प्रतिपादन किया गया है, उसी प्रकार इस सूत्र के इस अध्ययन में जालिकुमार के विपय में भी प्रतिपादन किया गया है। इस सूत्र में सब वर्णन संक्षेप से ही कहा गया है। इसका कारण यही है कि 'ज्ञातासूत्र' में इस राजगृह नगर, श्रेणिक राजा और धारिणी देवी का विस्तृत वर्णन दिया जा चुका है। उस सूत्र की संख्या छठी है और इसकी नवीं । अतः प्रथमो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [१९ पहले आए हुए विषय का यहां केवल संकेतमात्र दिया गया है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सूत्रकार ने यहां संक्षिप्त वर्णन दिया है यह जान लेना चाहिए । अब शङ्का उपस्थित होती है कि जब मेघकुमार भी जालि अनगार के समान अनुत्तर विमान में ही उत्पन्न हुआ था तो मेघकुमार का वर्णन 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' में क्यों दिया गया ? उत्तर में कहा जाता है कि मेघकुमार का वर्णन छठे अङ्ग में इसलिए किया गया है कि उसमें धर्मयुक्त पुरुषों की शिक्षा-प्रद जीवन-घटनाओं का वर्णन है । उनमें से मेघकुमार के जीवन में भी कितनी ही ऐसी शिक्षाएं वर्णन की गई हैं, जिनके पढ़ने से प्रत्येक व्यक्ति को अत्यन्त लाभ हो सकता है । किन्तु अनुत्तरोपपातिकसूत्र में केवल सम्यक् चरित्र पालन करने का फल बताया गया है । अतः मेघकुमार के चरित्र में विशेपता दिखाने के लिए उसका चरित्र न अङ्ग में न देकर छठे ही अङ्ग में दे दिया गया है। जो व्यक्ति इस सूत्र के अध्ययन के इच्छुक हों, उनको इससे पूर्व 'ज्ञाताधर्म- कथाङ्गसूत्र' के प्रथम अध्ययन का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। यह सूत्र इतना सार-पूर्ण है कि इससे व्याकरण पढ़ने वालों को समासान्त पदों का भली भांति बोध हो सकता है, साहित्य के अध्ययन करने वालों को अलङ्कारों का, इतिहास के जिज्ञासुओं को पच्चीस सौ वर्ष पहले के भारतवर्ष का, धार्मिक पुरुषों को अनेक धार्मिक शिक्षाओं का, नीति के जिज्ञासुओं को साम दाम दण्ड और भेद चारों नीतियों का भली भांति बोध हो सकता है। न केवल इतना ही बल्कि शिल्पी व्यक्तियों को अनेक प्रकार के शिल्प और कलाओं का, काम-शास्त्र के जिज्ञासुओं को तरुणी-प्रति- क्रम और धार्मिक-दीक्षा आदि महोत्सव मनाने वालों को अनेक प्रकार के महोत्सव मनाने का पता लग जाता है । इसी प्रकार इस सूत्र से पुण्यात्माओं को पुण्य और पापात्माओं को पाप का फल भी ज्ञात हो जाता है । पुनर्जन्म न मानने वालों को उसकी सिद्धि के अत्युत्तम प्रमाण इसमें मिल सकते हैं। अध्यापक लोग भी इससे प्राचीन अध्यापन-शैली का एक अत्युत्तम चित्र प्राप्त कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई व्यक्ति जो इस सूत्र का स्वाध्याय करेगा, विना कुछ प्राप्त किये निराश नहीं जा सकता । अतः प्रत्येक को इसका स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। इसी बात को लक्ष्य में रखते हुए सूत्रकार ने यहां इस विषय का अधिक विस्तार नहीं किया । क्योंकि यदि आकांक्षा रहेगी तो पाठक अवश्य ही उसको पूर्ण करने के लिये उक्त २०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ प्रथमो वर्गः 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' का अध्ययन करेंगे और उससे उनके ज्ञान-भण्डार में अधिक से अधिक वृद्धि होगी । अतः जिस ग्रन्थ के पढ़ने से सूत्र-सम्बन्धी संब बातों के ज्ञान के साथ कुछ और भी उपलब्ध हो, उसको क्यों न पढ़ा जाय । बुद्धिमान लोग सदा ऐसे ही कार्य किया करते हैं, जिनमें एक ही क्रिया से दो कार्यों का साधन हो। सारांश यह है कि उपादेय वस्तु का सदा आदर होना चाहिए और उक्त शास्त्र सर्वथा उपादेय है । अतः उसका स्वाध्याय भी अवश्य करना चाहिए । यहां पर हस्त-लिखित प्रतियों में उपलब्ध पाठ-भेद भी नहीं दिखाये गये है, क्योंकि वे सब 'ज्ञाताधर्मकथाङ्ग' के ही पद है। अब सूत्रकार शेप अध्ययनों के विषय में कहते हैं :- एवं सेसाणवि अटण्हं भाणियव्वं, नवरं सत्त धारिणि-सुआ वेहल्ल-बेहासा चेल्लणाए। आइल्लाणं पंचण्हं सोलस वासातिं सामन्न-परियातो, तिण्हं बारस वासाति दोण्हं पंच वासातिं । आइल्लाणं पंचण्हं आणुपुव्वीए उव- वायो विजये, वेजयंते, जयंते, अपराजिते, सव्वट्ठ-सिद्दे । दीहदंते सव्वट्ठसिद्धे । उक्कमेणं सेसा। अभओ विजए। सेसं जहा पढमे । अभयस्स णाणत्तं, रायगिहे नगरे, सेणिए राया, नंदा देवी माया, सेसं तहेव । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइय-दसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । (सूत्र १) एवं शेपाणामप्यष्टानां भणितव्यम्, नवरं सप्त धारिणि- सुताः; वेहल्ल-बेहायसौ चेल्लणायाः आदिकानां पञ्चानां पोडश वर्षाणि श्रामण्य-पर्यायम्, त्रयाणां द्वादश वर्षाणि; द्वयोः पञ्च प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [२१ , । वर्षाणि । आदिकानां पञ्चानामानुपूर्योपपातो विजये, वैजयन्ते, जयन्ते, अपराजिते, सर्वार्थसिद्धे। दीर्घदन्तस्य सर्वार्थसिद्धे । उत्क्रमेण शेषाः। अभयो विजये। शेषं यथाप्रथमस्य। अभयस्य नानात्वं राजगृहं नगरम्, श्रेणिको राजा, नन्दादेवी माता, शेषं तथैव । एवं खलु जम्बु!श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां प्रथमस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । (सूत्र १) पदार्थान्वयः-एवं-इसी प्रकार सेसाणवि-शेप अट्ठएहं-आठ अध्ययनों का भी वर्णन भाणियव्वं-जानना चाहिए नवरं-विशेष इतना ही है कि सत्त-सात धारिणि-सुधा-धारिणी देवी के पुत्र थे और वेहल्ल-बेहासा-वेहल्ल और वेहायस कुमार चेल्लणादेवी के पुत्र थे । आइल्लाणं-आदि के पंचण्ह-पांचों ने सोलस वासाति-सोलह वर्प का सामन्न-परियातो-श्रामण्य-पर्याय पालन किया और तिण्हं- तीन ने वारस वासाति-बारह वर्षों का संयम-पर्याय पालन किया और दोएहं- दो ने पंच वासाति-पांच वर्ष का संयम-पर्याय पालन किया था, आइल्लाणं-आदि के पंचएहं-पांच की आणुपुवीए-अनुक्रम से विजय-विजय विमान वेजयंते- वैजयन्त विमान जयंते-जयन्तं विमान अपराजिते-अपराजित विमान और सबढ़- सिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमान में उववायो-उत्पत्ति हुई और उक्कमेणं-उत्कम से सेसा- अवशिष्ट कुमारों की उत्पत्ति हुई । किन्तु दीहदंते-दीर्घदन्त भी सव्वदृसिद्धे-सर्वार्थ- सिद्ध विमान में और अभनो-अभय कुमार विजए-विजय विमान में ही उत्पन्न हुए । सेसं-शेप अधिकार जहा-जैसे पढमे-प्रथम अर्थात् जालि कुमार के विषय में कहा गया है उसी प्रकार जानना चाहिए। अभयस्स-अभय कुमार की णाण- विशेषता इतनी ही है कि वह रायगिहे-राजगृह नगरे-न -नगर में उत्पन्न हुआ था और सेणिए-श्रेणिक राया-राजा (उसका पिता था) तथा नंदा देवी-नन्दादेवी 'माया-माता थी सेसं-शेप वर्णन तहेव-पूर्ववत् ही जानना चाहिए । जंबू-मुधर्मा स्वामी जी जम्बू स्वामी को सम्बोधित कर कहते हैं "हे जम्यू ! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए सणमणं -श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के पढमस्स-प्रथम २२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ प्रथमो वर्गः वग्गस्स-वर्ग का अयमहे-यह अर्थ पण्णते-प्रतिपादन किया है (सूत्र १-पहला सूत्र समाप्त हुआ।) मूलार्थ-इसी प्रकार शेप पाठ (नौ) अध्ययनों के विपय में भी जानना चाहिए । विशेषता केवल इतनी ही है कि अवशिर कुमारों में से सात धारिणी देवी के पुत्र थे, वेहल्ल और वेहायस कुमार चेल्लणा देवी के पुत्र थे। पहले पांच ने सोलह वर्ष तक, तीन ने बारह वर्प और दो ने पांच वर्ष तक संयम-पर्याय का पालन किया था । पहले पांच क्रम से विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्ध विमानों में, दीर्घदन्त सर्वार्थसिद्ध और अभयकुमार और विजय विमान में उत्पन्न हुए और शेप अधिकार जिस प्रकार प्रथम अध्ययन में वर्णन किया गया है उसी प्रकार जानना चाहिए। अभयकुमार के विषय में इतनी विशेषता है कि वह राजगृह नगर में उत्पन्न हुआ था और श्रेणिक राजा तथा नन्दादेवी उसके पिता-माता थे । शेष सब वर्णन पूर्ववत् ही है । श्री सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के प्रथम वर्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है। पहला वर्ग समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र में प्रथम वर्ग के शेप नौ अध्ययनों का वर्णन किया गया है । इनका विषय भी प्रायः पहले अध्ययन के साथ मिलता-जुलता है। विशे- पता केवल इतनी है कि इनमें से सात तो धारिणी देवी के पुत्र थे और वेहल्ल कुमार और चेहायस कुमार चेल्लणा देवी के तथा अभय कुमार नन्दा देवी के पेट से उत्पन्न हुआ था। पहले पांचों ने सोलह वर्ष संयम-पर्याय का पालन किया था, तीन ने बारह वर्ष तक और शेप दो ने पांच वर्ष तक । पहले पांच अनुक्रम से पांच अनुत्तर विमानों में उत्पन्न हुए और पिछले उत्क्रम से पांच अनुत्तर विमानों में । यह इन दश मुनियों के उत्कट संयम-पालन का फल है कि वे एकावतारी होकर उक्त विमानों में उत्पन्न हुए । सिद्ध यह हुआ कि सम्यक् चारित्र पालन करने का सदैव उत्तम फल होता है । उस फल का ही यहां सुचारु-रूप से वर्णन किया गया है । जो भी व्यक्ति सम्यक् चारित्र का आराधन करेगा, वह शुभ फल से कभी भी वश्चित नहीं रह सकता। अतः यह प्रत्येक व्यक्ति के लिये उपादेय है।
प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [२३ + । इन नौ अध्ययनों के विषय में हस्त-लिखित प्रतियों में निम्न लिखित पाठभेद मिलता है- "एवं सेसाणवि नवण्हं भाणियव्वं नवरं सत्तण्डं धारिणिसुया, विहल्ले विहायसे चेल्लणाअत्तए, अभय नंदाएअत्तइ । आइल्लाणं पंचण्हं सोलस वासाइं सा- मण्णं परियाओ पाउणित्ता, तिण्हं वारस वासाई दोण्हं पंच वासाई । आइल्लाणं पंचण्डं आणुपुवीए उववाओ विजए, विजयंते, जयंते, अपराजिए, सव्वट्ठसिद्धे दीदते, सब्वट्ठसिद्ध, लहदंते अपराजिए, विहल्ले जयंते, विहायसे विजयंते, अभय विजए । सेसं जहा पढमे तहेव । एवं खलु जंबु ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरो- ववाइय-दसाणं पढमस्स वग्गरस अयमढे पण्णत्ते । इति प्रथम-वर्गः समाप्तः।" हमने यहां पनाकार मुद्रित पुस्तक का ही पाठ मूल रूप में रखा है। मुद्रित पुस्तक में जैसे कि पाठकों को हमारे मुद्रित मूल से ज्ञात होगा शेप आठ अध्ययनों के विषय में ही पाठ दिया गया है। किन्तु लिखित प्रतियों में जैसा कि ऊपर दिया गया है पूरे नौ अध्ययनों के विषय में कहा गया है । किन्तु इस में कोई भेद नहीं पड़ता, क्योंकि मुद्रित पुस्तक में भी पहले आठ का वर्णन देकर अन्त में अभय कुमार का भी पृथक् वर्णन दे दिया गया है और लिखित प्रतियों में सब का संग्रह-रूप से ही दिया है । अतः इस में कोई विशेप आपत्ति न देखकर ही हमने मुद्रित पुस्तक का पाठ ही मूल में रखा है। इस सूत्र से पाठकों को शिक्षा लेनी चाहिए कि वे भी कर्म-विशुद्धि के उपायों का अन्वेषण करें । इस प्रकार श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनु- त्तरोपपातिक सूत्र के प्रथम-वर्ग का अर्थ प्रतिपादन किया है । श्री सुधा स्वामी के इस प्रकार कथन से उनकी गुरु-भक्ति प्रकट होती है। साथ ही आत्मोद्धतता का परिहार और शास्त्र की सप्रयोजनता भी सिद्ध होती है । जम्बू स्वामी ने उनके इस कथन को सहर्ष स्वीकार किया। इससे इस सूत्र की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। आप्त-वाक्य सर्वत्र ही प्रामाणिक होते हैं। अतः यह सूत्र भी आप्त-वाक्य होने से निःसन्देह ही प्रमाण-कोटि में है। प्रथमो वर्गः समाप्तः।
द्वितीयो वर्ग: जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरो- ववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते, दोच्च- स्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं समणेणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते?एवं खलु जंवू ! समणेणं जाव संपत्तेणं दोच्चस्स वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तेरस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-(१) दीहसेणे (२) महासेणे (३) लट्ठदंते य (४) गूढदंते य (५) सुद्धदंते (६) हल्ले(७) दुमे (८)दुमसेणे (९)महादुमसेणे (१०)आहिते सीहे य (११) सीहसेणे य (१२) महासीहसेणे य आहिते (१३) पुन्नसेणे य वोडव्वे तेरसमे होति अज्झयणे। यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक. दशानां प्रथमस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः, द्वितीयस्य नु भदन्त ! वर्गस्यानुचरोपपातिक दशानां श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः द्वितीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [२५ प्रज्ञप्तः ? एवं खलु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन द्वितीयस्य वर्गस्यानुत्तरोपपातिक-दशानां त्रयोदशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि । तद्यथा-(१) दीर्घसेनः (२)महासेनः (३) लष्टदन्तश्च (४) गूढ- दन्तश्च (५) शुद्धदन्तः (६) हल्लः (७) द्रुमः (८) द्रुमसेनः (९) महा- द्रुमसेनश्च (१०)आख्यातः सिंहश्च (११) सिंहसेनश्च (१२) महा- सिंहसेनश्चाख्यातः (१३) पुण्यसेनश्च वोद्धव्यः । त्रयोदश भव- न्त्यध्ययनानि । पदार्थान्वयः---णं-वाक्यालङ्कार के लिए है भंते-हे भगवन् ! जति-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने अणुत्तरोव- वाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के पढमस्स-प्रथम वग्गस्स -वर्ग का अयमढे- यह अर्थ पण्णत्ते-प्रतिपादन किया है तो फिर भंते-हे भगवन् ! दोचस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा का जाव-यावत् संप- तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने के अट्ठ-कौनसा अर्थ पण्णत्ते- प्रतिपादन किया है ? सुधा स्वामी कहते हैं कि जंबू-हे जम्बू ! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् दोचस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग अपुत्तरोवबाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिकदशा के तेरस-तेरह अज्झयणा-अध्ययन पण्णत्ता-प्रतिपादन किये हैं तं०-जैसे-दीहसेणे- दीर्घसेन कुमार महासेणे-महासेन कुमार य-और लट्ठदंते-लप्टदन्त कुमार य-और गूढदंते-गूढदन्त कुमार सुद्धदंते-शुद्धदन्त कुमार हल्ले-हल्ल कुमार दुमे-द्रुम कुमार दुमसेणे-द्रुमसेन कुमार य-और महादुमसेणे-महाद्रुमसेन कुमार आहिये-कथन किया गया है य-और सीहे-सिंह कुमार य-तथा सीहसेणे सिंहसेन कुमार महा- सीहसेणे-महासिंहसेन कुमार आहिते-प्रतिपादन किया गया है य-और पुन्नसेणे- पुण्यसेन बोद्धव्वे-तेरहवां पुण्यसेन जानना चाहिए । इस प्रकार तेरसमे-तेरह अज्म- यणे-अध्ययन होति-होते हैं। मूलार्थ हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनु- तरोपपातिक-दशा के प्रथम वर्ग का पूर्वोक्त अर्थ प्रतिपादन किया है तो मोक्ष २६] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । | द्वितीयो वर्ग: को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? श्री सुधा स्वामी ने उत्तर दिया कि हे जम्बू ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्य- यन प्रतिपादन किये हैं जैसे-दीर्घसेन कुमार, महासेन कुमार, लप्टदन्त कुमार, गूढदन्त कुमार, शुद्धदन्त कुमार, हल्ल कुमार, द्रुम कुमार, द्रुमसेन कुमार, महाद्रुम- सेन कुमार, सिंह कुमार, सिंहसेन कुमार, महासिंहसेन कुमार और पुण्यसेन कुमार । इस प्रकार द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन होते हैं। टीका-प्रथम वर्ग की समाप्ति के अनन्तर श्री जम्बू स्वामी जी ने श्री सुधर्मा स्वामी जी से सविनय निवेदन किया कि हे भगवन् ! अनुत्तरोपपातिक सूत्र के प्रथम वर्ग का अर्थ जिस प्रकार श्री श्रमण भगवान् ने प्रतिपादन किया था वह मैंने आपके मुखारविन्द से उपयोग-पूर्वक श्रवण कर लिया है । अब, हे भगवन् ! आप कृपया मुझको बताइए कि मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने अनुत्तरो- पपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? इस प्रश्न को सुन कर श्री सुधर्मा स्वामी अपने प्रिय शिष्य को सम्बोधित कर कहने लगे कि हे जम्यू! मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान ने उक्त सूत्र के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन प्रतिपादन किये हैं। पाठक उनका नाम मूलार्थ और पदार्थान्वय से जान लें । उक्त कथन से भली भांति सिद्ध होता है कि अपने से बड़ों से जो कुछ भी पूछना हो वह नम्रता से ही पूछना चाहिए । विनय-पूर्वक प्राप्त किया हुआ ज्ञान ही पूर्णरूप से सफल हो सकता है और सर्वथा विकाश को प्राप्त होता है । अतः प्रत्येक छात्र को से शास्त्राध्ययन करते हुए विनय से रहना चाहिए । अन्यथा उसका अध्ययन कभी भी सफल नहीं हो सकता । सामान्य रूप से द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययनों का नाम सुनकर श्री जम्बू स्वामी विशेष रूप से प्रत्येक अध्ययन के अर्थ जानने की इच्छा से फिर श्री सुधर्मा स्वामी से विनय-पूर्वक पूछते हैं:- जति णं भंते ! समणणे जाव संपत्तंणे अणुत्तरो- ववाइय-दसाणं दोच्चस्स वग्गस्स तेरस अझयणा पं० द्वितीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [२७ . दोच्च० भंते ! वग्गस्स पढमज्झयणस्स सम० ३ जाव सं० के अढे पं० ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे,गुणसिलते चेतिते, सेणिए राया, धारिणी देवी, सीहो सुमिणे, जहा जाली तहा जम्म वालत्तणं कलातो नवरं दीहसेणे कुमारे।सच्चेव वत्तव्वया जहा जालिस्स जाव अंतं काहिति। एवं तेरसवि रायगिहे सेणिओ पिता धारिणी माता । तेरसण्हवि सोलसवासा परियातो, आणुपुव्वीए विजए दोन्नि, वेजयंते दोन्नि, जयंते दोन्नि, अपराजिते दोन्नि, सेसा महादुमसेणमाती पंच सव्वट्ठसिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं० अनुत्तरो- ववाइय-दसाणं दोच्चस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते।मासि- याए संलेहणाए दोसुवि वग्गेसु । (सूत्र २) यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां द्वितीयस्य वर्गस्य त्रयोदशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, द्विती- यस्य, भदन्त ! वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्य श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः? एवं खल्लु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरंगुणशैलकं चैत्यम् , श्रेणिको राजा धारिणी देवी, सिंहः स्वप्ने, यथा जालेस्तथैव जन्म, वालत्वं, कला; नवरं दीर्घ- सेनः कुमारः।सा चैव वक्तव्यता यथा जालेर्यावदन्तं करिष्यति। एवं त्रयोदशापि । राजगृहम्, श्रेणिकः पिता, धारिणी माता, त्रयोदशानामपि पोडश वर्षाणि पर्यायः । आनुपा विजये २८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ द्वितीयो वर्गः , द्वौ, वैजयन्ते द्वौ, जयन्ते द्वौ, अपराजिते द्वौ, शेषा महाद्रुम- सेनादयः पञ्च सर्वार्थसिद्धे । एवं खलु जम्बु ! श्रमणेन० अनु- तरोपपातिक-दशानां द्वितीयस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । मासिक्या संलेखनया द्वयोरपि वर्गयोः (सूत्र २) पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं -श्रमण भगवान् ने दोच्चस्स- द्वितीय वग्गस्स-वर्ग अणुत्तरोववाइयदसायं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तेरस-तेरह अज्झयणा-अध्ययन पं०-प्रतिपादन किये हैं, तो भंते-हे भगवन् ! दोच-द्वितीय वग्गस्स -वर्ग के पढमज्झयणस्स-प्रथमाध्ययन का सं०-मोक्ष को प्राप्त हुए सम०३-- श्रमण भगवान महावीर ने के-क्या अट्ठ-अर्थ पं०-प्रतिपादन किया है जंबू- हे जम्बू! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं- उस समय रायगिहे-राजगृह णगरे-नगर गुणसिलते-गुणशैलक चेतिते-चैत्य सेणिए-श्रेणिक राया-राजा धारिणी देवी-और उसकी धारिणी देवी थी । सुमिणे- स्वप्न में सीहो-सिंह का दिखाई देना जहा-जिस प्रकार जाली-जालि कुमार के विषय में कहा गया है तहा-उसी प्रकार जम्म-जन्म हुआ, उसी प्रकार बालत्तणं- बाल-भाव रहा, उसी प्रकार कलातो-कलाओं का सीखना नवरं-विशेषता इतनी है कि दीहसेणे-दीर्घसेन कुमार इसका नाम रखा गया जहा- जैसी जालिस्स-जालि कुमार की वत्तव्वया-वक्तव्यता थी सच्चेव-दीर्घसेन कुमार की वैसी ही हुई। उसी प्रकार जाव-यावत् अंतं काहिति-अन्त करेगा, एवं इसी प्रकार तेरसवि-सब तेरह कुमारों के अध्ययनों के विषय में जानना चाहिए अर्थात् वे भी रायगिहे-राजगृह नगर में उत्पन्न हुए सेणियो-श्रेणिक राजा पिता -उनका पिता हुआ और धारिणी माता-धारिणी माता । तेरसण्हवि-तेरह के तेरह कुमारों ने सोलस-चासा-सोलह वर्ष तक परियातो-संयम-पर्याय का पालन किया आणुपुब्बीए-अनुक्रम से दोन्नि- दो विजए-विजय विमान में उत्पन्न हुए, दोन्नि-दो वेजयंते-वैजयन्त विमान में दोन्नि-दो जयंते-जयन्त विमान में और दोन्नि-दो अपराजिते-अपराजित विमान में गए । सेसा-शेय महामदुसेणमाती-महामद्रुसेन आदि पंच-पांच साधु सबसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । जंयू-हे जम्बू ! एवं खलु-इस द्वितीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [ २९ प्रकार समणेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने अणुत्तरोववाइय- दसाणं-अनुत्तरोपपातिक दशा के दोच्चस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग का अयमहे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है। दोसुवि-दोनों ही बग्गेसु-वर्गों में मासियाए- मासिक २ संलेहणाए-संलेखना से शरीर का त्याग किया । अर्थात् दोनों वर्गों के प्रत्येक साधु ने एक २ मास का पादोपगमन अनशन व्रत धारण किया था। मूलार्थ हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक दशा के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन प्रतिपादन किये हैं तो फिर हे भगवन् ! द्वितीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का श्रमण भगवान् महावीर ने क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? सुधर्मा स्वामी जी ने जम्बू स्वामी के इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि हे जम्बू ! उस काल और उस समय में राजगृह नाम नगर था । उसमें गुणशैलक चैत्य था। वहां श्रेणिक राजा था । उसकी धारिणी देवी थी। उसने सिंह का स्वम देखा । जिस प्रकार जालि कुमार का जन्म हुआ था, उसी प्रकार जन्म हुआ, उसी प्रकार बालकपन रहा और उसी प्रकार कलाएं सीखीं। विशेषता केवल इतनी है कि इसका नाम दीर्घसेन कुमार रखा गया । शेप वक्तव्यता जैसे जालि कुमार की है, उसी प्रकार जाननी चाहिए । यावत् महाविदेह क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त करेगा इत्यादि । इसी प्रकार तेरह अध्ययनों के तेरह कुमारों के विषय में जानना चाहिए। ये सब राजगृह नगर में उत्पन्न हुए और सब के सब महाराज श्रेणिक और महाराणी धारिणी देवी के पुत्र थे। इन तेरहों ने सोलह वर्ष तक संयम-पर्याय का पालन किया। इसके अनन्तर क्रम से दो विजय विमान, दो वैजयन्त विमान, दो जयन्त विमान और दो अपराजित विमान में उत्पन्न हुएं । शेप महाद्रुमसेन भादि पांच मुनि सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । हे जम्बू । इस प्रकार भगण भगवान् महावीर ने अनुत्तरोपपातिक- दशा के द्वितीय वर्ग का उक्त अर्थ प्रतिपादन किया है । उक्त दोनों वर्गों के मुनि एक २ मास के अनशन और संलेखना से काल-गत हुए थे । अर्थात् तेईस मुनियों ने एक २ मास का पादोपगमन और अनशन किया था। टीका-उक्त सूत्र में द्वितीय पर्ग के तेरह अध्ययनों का अर्थ वर्णन किया गया है। ये सब तेरह राजकुमार भेणिक राजा और धारिणी देवी के आत्मज अर्थात् तृतीयो वर्गः तं जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरो० दोच्चस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते तच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं सम० जाव सं० के अढे पं० ? एवं खलु जंवू ! समणेणं अणुत्तरोववाइय- दुसाणं तच्चस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पन्नत्ता, जहा- धण्णे य सुणक्खत्ते, इसिदासे अ आहिते । पेल्लए रामपुत्ते य, चंदिमा पिट्ठिमाइया ॥१॥ पेढालपुत्ते अणगारे, नवमे पुट्ठिले इ य। वेहल्ले दसमे वुत्ते, इमे ते दस आहिते ॥२॥ यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां द्वितीयस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः, तृतीयस्य नु भदन्त ! वर्गस्यानुत्तरोपपातिक-दशानां श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [३३ प्रज्ञप्तः ? एवं खल्लु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपा- तिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्य दशाध्ययनानि प्रज्ञतानि, तद्यथा :- धन्यश्च सुनक्षत्रः, ऋषिदासश्चाख्यातः । पेल्लको रामपुत्रश्च, चन्द्रिकः पृष्टिमातृकः ॥१॥ पेढालपुत्रोऽनगारः, नवमः पृष्टिमायी च । वेहल्लो दशम उक्तः, इमे ते दशाख्याताः ॥२॥ पदार्थान्ययः-भंते-हे भगवन् ! ण-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् महावीर ने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के दोच्चस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग का अयमढे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है तो भंते-हे भग- वन् ! अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तच्चस्स-तृतीय वग्गस्स- वर्ग का सम० जाव सं0-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने के क्या अट्टे अर्थ प०-प्रतिपादन किया है ? इस प्रश्न को सुनकर सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि जम्बू-हे जम्बू! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से समणेणं-श्रमण भगवान महावीर ने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिकदशा के तच्चस्स-तृतीय वग्गस्स-वर्ग के दस-दश अज्झयणा-अध्ययन पन्नत्ता-प्रतिपादन किये हैं, तं जहा-जैसे-धण्णे धन्य कुमार और सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र कुमार अ-और इसीदासे-ऋपिदास कुमार आहिते - कथन किया गया है पेल्लए-पेल्लक कुमार य-और रामपुत्ते-राम पुत्र कुमार, चंदिमा-चन्द्रिका कुमार, पिडिमाइया-पृष्टिमातृका कुमार पेढालपुत्ते- पेढालपुत्र अणगारे-अनगार य-और नवमे-नौवां पुट्टिले-पृष्टिमायी कुमार दसमे-दशवां वेहल्ले-वेहल्ल कुमार वुत्ते-कहा गया है, इमे-ये ते वे दस-दस अध्ययन आहिते-कहे गये हैं। मूलार्थ हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर ने अनुत्तरोपपातिक- दशा के द्वितीय वर्ग का उक्त अर्थ प्रतिपादन किया है, तो हे भगवन् ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् महावीर ने अनुत्तरोपपातिक दशा के तृतीय वर्ग काया अर्थ प्रतिपादन किया है ? इसके उत्तर में सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि हे जम्म !
। ३४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो चर्गः मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने अनुत्तरोपपातिक दशा के तृतीय वर्ग के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं, जैसे-१-धन्य कुमार २-सुनक्षत्र कुमार ३-ऋपिदास कुमार ४-पेल्लक कुमार ५-रामपुत्र कुमार ६-चन्द्रिका कुमार ७-पृष्टिमातृका कुमार ८-पेढालपुत्र कुमार 8-पृष्टिमायी कुमार और १०-वेहल्ल कुमार । ये तृतीय वर्ग के दश अध्ययन कहे गये हैं। टीका-द्वितीय वर्ग की समाप्ति होने पर जम्बू स्वामी ने फिर सुधर्मा खामी से प्रश्न किया कि हे भगवन् ! द्वितीय वर्ग का अर्थ तो मैंने श्रवण कर लिया है । अब मेरे ऊपर असीम कृपा करते हुए तृतीय वर्ग का अर्थ भी सुनाइए, जिस से मुझे उसका भी बोध हो जाय, इस प्रश्न के उत्तर में श्री सुधर्मा स्वामी ने प्रतिपादन किया कि है जन्यू ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान महावीर ने तृतीय वर्ग के दश अध्य- यन प्रतिपादन किये हैं। पाठकों को मूलार्थ में ही उनके नाम देख लेने चाहिएं । यह हम पहले भी कह चुके हैं कि विनय और भक्ति से ग्रहण किया हुआ ही ज्ञान फलीभूत हो सकता है, विना विनय के नहीं । यही शिक्षा इस सूत्र से भी मिलती है । अध्ययन का अर्थ ही शिक्षा ग्रहण है । अतः पाठकों को इन सूत्रों का स्वाध्याय करते हुए अवश्य शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । यह बात भी केवल दोह- रानी मात्र ही रह जाती है कि सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति के लिये सम्यक् चारित्र की आराधना की अत्यन्त आवश्यकता है, इन दोनों बातों की शिक्षा इस सून से प्राप्त होती है, अतः यह वर्ग अवश्य पठनीय है। अब जम्बू स्वामी तृतीय वर्ग के प्रथमाध्ययन के अर्थ के विषय में सुधर्मा स्वामी से प्रश्न करते हैं:- जति णं भंते ! सम० जाव सं० अणुत्तर० तच्च- स्स वग्गस्स दस अज्झयणा प०, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अट्टे पन्नत्ते ? एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं कागंदी णाम णगरी होत्था रिद्ध-स्थिमिय-समिद्धा सहसंबवणे उजाणे 1 तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [३५ सव्वोदुए, जिअसत्तू राया, तत्थ णं कागंदीए नगरीए भद्दा णामं सत्यवाही परिवसइ, अड्ढा जाव अपरिभूआ। तीसे णं भद्दाए सत्थवाहीए पुत्ते धन्नं नाम दारए होत्था, अहीण जाव सुरूवे पंच धाती-परिग्गहित, तं० खीर- धाती। जहा महव्वले जाव वावत्तरि कलातो अहीए जाव अलं भोग-समत्थे जाते यावि होत्था। यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां तृतीयस्य वर्गस्य दशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, प्रथमस्य नु भदन्त !अध्ययनस्य श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञसः? एवं खलु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये काकन्दी नाम नगरी वभूव, ऋद्धि-स्तिमित-समृद्धा, सहस्राम्रवनमुद्यानं संर्वर्तुषु, जितशत्रू राजा । तत्र नु काकन्दयां नगर्यां भद्रा नाम सार्थवाहिनी परिवसति, आढ्या यावदपरिभूता । तस्या नु भद्रायाः सार्थवाहिन्याः पुत्रो धन्यो नाम दारकोऽभूत्, अहीनो यावत्सुरूपः पञ्चधातृ-परिगृहीतः, तद्यथा-क्षीर-धात्री। यथा महा- वलो यावद् द्वि-सप्ततिः कला अधीता। यावदलंभोग-समर्थों जातश्चाप्यभूत् । पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि सम जाव सं०-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अणुत्तर- अनुत्तरोपपातिक-दशा के तच्चस्स-तृतीय वग्गस्स-वर्ग के दस-दश अज्झयणा- अध्ययन प०-प्रतिपादन किये हैं तो भंते-हे भगवन् ! पढमस्स-प्रथम अज्झयणस्स- अध्ययन का जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं- वीर ने के अद्वे-क्या अर्थ पन्नत्ते-प्रतिपादन किया है । सुधर्मा स्वामी इस प्रश्न -श्रमण भगयान् महा- ३६ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः के उत्तर में कहते हैं कि जंबू-हे जम्बू ! तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं- उस समय काकंदी काकन्दी णाम-नाम वाली णगरी-नगरी होत्था-थी और वह रिद्ध-स्थिमिय-समिद्धा-ऊँचे २ भवनों से युक्त, निर्भय तथा धन-धान्य से पूर्ण थी। उसके बाहर सहसंबवने-सहस्राम्रवन नाम वाला उजाणे-उद्यान था . सव्वो- दुए-सव ऋतुओं के पुष्प और फलों से युक्त था । उस नगरी में जितसत्तू-जित- शत्रु नाम वाला राया-राजा राज्य करता था तत्थ-उस काकंदीए-काकन्दी नाम नगरीए-नगरी में भद्दा णाम-भद्रा नाम वाली सत्थवाही-सार्थवाहिनी परिवसह- निवास करती थी । अढा-वह ऋद्धिमती थी और जाव-यावत् अपरिभूत्रा- अपनी जाति और बराबरी के लोगों में धन आदि से अपरिभूत अर्थात् किसी से कम न थी। तीसे-उस भद्दाए-भद्रा सत्थवाहीए-सार्थवाहिनी का पुत्ते-पुत्र धने- धन्य नाम-नाम वाला दारए-बालक होत्था-था जो अहीणे-किसी इन्द्रिय से भी हीन नहीं था अर्थात् जिसकी सब इन्द्रियां परिपूर्ण थीं और सुरूवे-सुरूप था पंच-धाती-परिगहिते-जो पांच धात्रियों (धाइयों) से परिगृहीत था तं-जैसे-खीर- धाई-एक धाई दूध पिलाने के लिए नियत थी और शेप जैसा महब्बले-'भगवती सूत्र' में महाबल कुमार का वर्णन है उसी के समान जानना चाहिए जाव-यावत् वावत्तरि-यहत्तर कलातो-कलाएं अहीए-अध्ययन की जाव-यावत् जाते-यह वालक धीरे धीरे अलंभोग-समत्थे यावि-सब तरह के भोगों का उपभोग करने में समर्थ होत्था हो गया। मूलार्थ-हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान महावीर ने, जो मुक्ति को प्राप्त हो चुके हैं, अनुत्तरोपपातिक-दशा के तृतीय वर्ग के दश अध्ययन प्रति- पादन किये हैं तो फिर हे भगवन् ! प्रथम अध्ययन का मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भग- वान् महावीर ने क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? इस प्रश्न के उत्तर में श्री सुधर्मा स्वामी जी कहते हैं कि हे जम्यू! उस काल और उस समय में काकन्दी नाम की एक नगरी थी । वह सब तरह के ऐश्वर्य और धन-धान्य से परिपूर्ण थी । उसमें किसी प्रकार के भी भय की शङ्का नहीं थी। उसके बाहर एक सहस्राम्रवन नाम का उद्यान था, जो सब ऋतुओं में फल और फूलों से भरा रहता था। उस नगरी में जितशत्रु नाम राजा राज्य करता था। वहां भद्रा नाम की एक सार्थवाहिनी निवास करती थी । वह अत्यन्त समृद्धिशालिनी और धन-धान्य में अपनी . - तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [३७ जाति और बराबरी के लोगों में किसी से किसी प्रकार भी परिभूत (तिरस्कृत) अर्थात् कम नहीं थी । उस भद्रा सार्थवाहिनी का धन्य नाम का एक सर्वाङ्ग-पूर्ण और रूपवान पुत्र था। उसके पालन-पोपण करने के लिए पांच धाइयां नियत थीं । जैसे-एक का काम केवल उसको दूध पिलाना ही रहता था । शेप वर्णन जिस प्रकार महावल कुमार का है उसी प्रकार से जानना चाहिए । इस प्रकार धन्य कुमार (धीरे २) सब भोगों को भोगने में समर्थ हो गया । टीका-इस सूत्र में श्री सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी के प्रश्न के उत्तर में तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का वर्णन करते हैं। यह अध्ययन धन्य कुमार के जीवन-वृत्तान्त के विषय में है । वही सुधा स्वामी ने जम्बू स्वामी को सुनाया है। इस अध्ययन के पढ़ने से हमें उस समय की स्त्री जाति की उन्नत अवस्था का पता लगता है । उस समय स्त्रियां आज-कल के समान पुरुषों के ऊपर ही निर्भर नहीं रहती थीं, किन्तु स्वयं उनकी बराबरी में व्यापार आदि बड़े २ कार्य करती थीं। उन्हें व्यापार आदि के विषय में सब तरह का पूरा ज्ञान होता था । देशान्तरों में भी उनका व्यापार-वाणिज्य आदि का कार्य चलता था। यहां भद्रा नाम की स्त्री सार्थवाही का काम स्वयं करती थी और इस पर भी विशेषता यह कि अपनी जाति के लोगों में वह किसी से कम न थी । यह बात उस उन्नति के शिखर पहुंची हुई स्त्री-समाज का चित्र हमारी आँखों के सामने खींचती है । इसके अतिरिक्त हमें अन्य जैन शास्त्रों के अध्ययन से निश्चय होता है कि उस समय स्त्रियों के अधिकार पुरुषों के अधिकारों से किसी अंश में भी कम न थे। उस समय की स्त्रियां वास्तव में अर्द्धाङ्गिनियां थीं । उन्होंने पुरुषों के समान ही मोक्ष- गमन भी किया । अतः शूद्र जाति और स्त्रियों को क्षुद्र मानने वालों को भ्रान्ति निवारण के लिए एक बार जैन शास्त्रों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । अब सूत्रकार पूर्व सूत्र से ही सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं:- तते णं सा भद्दा सत्थवाही धन्नं दारयं उम्मुक्क-वा- लभावं जाव भोग-समत्थं वावि जाणेत्ता वत्तीसं पासाय- वडिंसते कारेति अन्भुगत-मुस्सिते जावतेसिं मज्झेभवणं ३८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः अणेग-खंभ-सय-सन्निविटुं। जाव वत्तीसाए इब्भवर-कन्न- गाणं एगदिवसेणं पाणिं गेण्हावेति २ बत्तिसाओ दाओ। जाव उप्पि पासाय० फुटेंतेहि विहरति । ततो नु सा भद्रा सार्थवाहिनी धन्यं दारकमुन्मुक्त-वाल- भावं यावद्भोग-समर्थं वापि ज्ञात्वा द्वात्रिंशत्प्रासादावतंसकानि कारयत्यभ्युद्गतोच्छ्रितानि । तेषां मध्ये भवनमनेकस्तम्भशत- सन्निविष्टम् । यावद् द्वात्रिंशदिभ्यवर-कन्यकानामेकेन दिवसेन पाणिं ग्राह्यति । द्वात्रिंशद् दातानि । यावदुपरि प्रासादे स्फुट- द्भिर्विहरति । पदार्थान्वयः--तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिये है सां-वह भद्दा-भद्रा सस्थवाही-सार्थवाहिनी धन्न-धन्य दारयं-बालक को उम्मुक्कबालभावं- बालकपन से अतिक्रान्त और जाव-यावत् भोगसमत्थं-भोगों के उपभोग करने में समर्थ जाणेत्ता-जानकर बत्तीस-बत्तीस अंभुगतमुस्सिते-बहुत बड़े और ऊँचे पासायव- डिंसते-श्रेष्ठ प्रासाद (महल) कारेति-वनवाती है। जाव-यावत् तेसिं-उनके मझ- मध्य में अणेगखंभसयसनिविटुं-अनेक सैकड़ों स्तम्भों से युक्त भवणं-एक भवन बनवाया । जाव-यावत् उसने बत्तीसाए-बत्तीस इन्भवरकन्नगाणं-श्रेष्ठ श्रेप्टियों की कन्याओं के साथ एगदिवसेणं-एक ही दिन पाणिं गिण्हावेति-पाणि-ग्रहण करवाया इनके साथ बत्तीसारो-बत्तीस दामो-दास, दासी, धन और धान्य आदि दहेज आए । जाव-यावत् वह धन्य कुमार उप्पि-ऊपर पासाय-श्रेष्ठ महलों में फुट्टे- तेहि-जोर २ से बजते हुए मृदङ्ग आदि वाद्यों के नाद से युक्त उन महलों में जाव- यावत् पांच प्रकार के मनुष्य-सुखों का अनुभव करते हुए विहरति-विचरता है। मूलार्थ-इसके अनन्तर उस भद्रा सार्थवाहिनी ने धन्य कुमार . को बालकपन से मुक्त और सब तरह के भोगों को भोगने में समर्थ जानकर बत्तीस बड़े २ अत्यन्त ऊँचे और श्रेष्ठ भवन बनवाये । उनके मध्य में एक सैकड़ों स्तम्भों से युक्त भवन बनवाया। फिर बत्तीस श्रेष्ठं कुलों की कन्याओं से एक .
तृतीयो वर्ग:] भाटीकासहितम्। [३९ . ही दिन उसका पाणि-ग्रहण कराया। उनके साथ बत्तीस (दास, दासी और धन- धान्य से युक्त) दहेज आये । तदनन्तर धन्य कुमार अनेक प्रकार के मृदङ्ग आदि वाद्यों की ध्वनि से गुजित प्रासादों के ऊपर पश्च-विध सांसारिक सुखों का अनु- भव करते हुए विचरण करने लगा। टीका-उक्त सूत्र में धन्य कुमार के बालकपन, विद्याध्ययन, विवाह- संस्कार और सांसारिक सुखों के अनुभव के विषय में कथन किया गया है। यह सब वर्णन 'ज्ञातासूत्र' के प्रथम अथवा पांचवें अध्ययन के साथ मिलता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पाठकों को वहीं से इसका बोध करना चाहिए । अब सूत्रकार धन्य कुमार के पोध के विषय में कहते हैं:- तेणं कालेणं तेणं समएणं भगवं महावीरे समोसढे, परिसा निग्गया, जहा कोणितो तहा जियसत्तू निग्गतो तते णं तस्स धन्नस्स तं महता जहा जमाली तहा निग्गतो, नवरं पायचारेणं जाव जं नवरं अम्मयं भई सत्थवाहिं आपुच्छामि । तते णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिते जाव पव्वयामि । जाव जहा जमाली तहा आपु- च्छइ।मुच्छिया, वुत्त-पडिवुत्तया जहा महव्वले जाव जाहे णो संचाएति जहा थावच्चापुत्तो जियसत्तुं आपुच्छति। छत्त-चामरातो सयमेव जितसत्तू णिक्खमणं करेति। जहा थावच्चापुत्तस्स कण्हो जाव पव्वतिते. अणगारे जाते ईरियासमिते जाव बंभयारी । तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणो भगवान् महावीरः समवसृतः, परिपन्निर्गता, यथा कूणितस्तथा जितशत्रुर्निर्गतः ।
४० अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः , ततो नु स धन्यः(स्य) तन्महता यथा जमालिस्तथा निर्गतः, नवरं पादचारेण, यावन्नवरं यदम्बां भद्रांसार्थवाहिनीमापृच्छामि । ततो न्वहं देवानुप्रियाणामन्तिके यावत्प्रवजामि । यावद् यथा जमालिस्तथापृच्छति । मूञ्छितोक्ति-प्रत्युक्त्या यथा महावलो यावद् यदा न शक्नोति, यथा स्त्यावत्यापुत्रो जितशत्रुमापृच्छति। छत्र-चामरादिभिः स्वयमेव जितशत्रुनिष्क्रमणं करोति । यथा स्त्यावत्यापुत्रस्य कृष्णो यावत्प्रवजितोऽनगारो जात ईर्यासमितो यावद् ब्रह्मचारी। पदार्थान्वयः-तेणं कालेण-उस काल और तेणं समएणं-उस समय समणे-श्रमण भगवं-भगवान महावीरे-महावीर स्वामी समोसढे-सहस्राम्रवन उद्यान में विराजमान हुए । परिसा-नगर की परिपद् निग्गया-उनकी वन्दना करने के लिए गई जहा-जिस प्रकार कोणित-कूणित अथवा कोणिक राजा गया था तहा-उसी प्रकार जित्तसत्तू-जितशत्रु भी निग्गतो-गया तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिये है तस्स-वह धन्नस्स-धन्य कुमार तं-उस महता-बड़े भारी के ऐश्वर्य से जहा-जिस प्रकार जमाली-जमालि कुमार गया था तहा-उसी प्रकार निग्गतो-गया नवरं-विशेषता इतनी है धन्य कुमार पायचारेण-पैदल गया, जाव-यावत् जं नवरं-इतनी और विशेषता है कि उसने कहा कि मैं अम्मयं-माता भई-भद्रा सत्थवाहि-सार्थवाहिनी को आपुच्छामि-पूछता हूं णं-पूर्ववत् तते-इसके. अनन्तर अहं-मैं देवाणुप्पियाणं-आपके अंतिते-पास जाव-यावत् पव्वयामि- प्रवजित हो जाऊंगा अर्थात् दीक्षा ग्रहण कर लूंगा। जाव-यावत् जहा-जैसे जमाली- जमालि कुमार ने पूछा था तहा-उसी तरह अापुच्छइ-पूछता है । माता यह सुनकर मुच्छिया-मूर्छित हो गई वुत्तपडिवुत्तया-मूर्छा टूटने पर माता-पुत्र की इस विषय में बात-चीत हुई जहा-जैसे महब्बले- महायल कुमार की हुई थी जाव-यावत् जाहे-जब (माता) यो संचाएति-(पुत्र को रखने में) समर्थ न हो सकी तव जहा-जैसे थावच्चापुत्तो-स्त्यावत्या पुत्र की माता ने कृष्ण को पूछा था ठीक उसी प्रकार भद्रा सार्थवाहिनी ने जियसत्तुं-जित शत्रु राजा को श्रापुच्छइ-पूछा और दीक्षा के लिए तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [४१ छत्तचामरातो०-छत्र और चामर मांगा जितसत्तू-जितशत्रु राजा सयमेव-अपने आप ही निक्खमणं करेति-धन्य कुमार की दीक्षा के लिये उपस्थित होगया । जहा- -जैसे थावच्चापुत्तस्स-स्त्यावत्यापुत्र का कण्हो-कृष्ण वासुदेव ने किया था इसी प्रकार जाव-यावत् पव्वतिते-प्रव्रजित होकर अणगारे-अनगार (साधु) हुआ ईर्यासमिते-वह ईर्या-समिति वाला जाव-यावत् साधुओं के सब गुणों से युक्त भयारी-ब्रह्मचारी हुआ। मूलार्थ--उस काल और उस समय में श्रमण भगवान महावीर स्वामी वहां विराजमान हुए । नगर की परिपद् उनकी वन्दना के लिये गई । कोणिक राजा के समान जितशत्रु राजा भी गया । धन्य कुमार भी जमालि कुमार की तरह गया । विशेषता केवल यही है कि धन्य कुमार पैदल ही गया । दूसरी विशेषता यह है कि (भगवान् के उपदेश को सुनकर) उसने कहा कि हे भगवन् ! मैं अपनी माता भद्रा सार्थवाहिनी को पूछ कर पाता हूं। इसके अनन्तर मैं आपकी सेवा में उपस्थित होकर दीक्षित हो जाऊँगा । (वह घर आया) उसने अपनी माता से जिस प्रकार जमालि कुमार ने पूछा था, उसी प्रकार पूछा । माता यह सुनकर मूञ्छित हो गई। (मूर्छा से उठने के अनन्तर) माता-पुत्र में इस विषय में प्रश्नोत्तर हुए। जब वह भद्रा महाबल के समान पुत्र को रोकने के लिये समर्थ न हो सकी तो उसने स्त्यावत्यापुत्र के समान जितशत्रु राजा से पूछा और दीक्षा के लिए छत्र और चामर की याचना की। जितशत्रु राजा ने स्वयं उपस्थित होकर जिस प्रकार कृष्ण वासुदेव ने स्त्यावत्यापुत्र की दीक्षा की थी इसी प्रकार धन्य कुमार का दीक्षा-गहोत्सव किया। धन्य कुमार दीक्षित हो गया और ईर्या-समिति, ब्रह्मचर्य आदि सम्पूर्ण गुणों से युक्त होकर विचरने लगा। टीका-इस सूत्र में वर्णन किया गया है कि जब श्रमण भगवान महा. वीर स्वामी काफन्दी नगरी में विराजमान हुए तो नगर की परिपद् के साथ धन्य कुमार भी उनके दर्शन करने और उनसे उपदेशामृत पान करने के लिए उनकी सेवा में उपस्थित हुआ । उनके उपदेश का धन्य फुमार पर इतना प्रभाव पड़ा कि यह तत्काल ही सम्पूर्ण सांसारिक भोग-विलासों को ठोकर मार कर गृहस्य से साघु बन गया। IM
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ।
[ तृतीयों वर्गः
इस सूत्र में हमें चार उपमाएं मिलती हैं। उनमें से दो धन्य कुमार के
विषय में हैं और शेष दो में से एक जितशत्रु राजा की कोणिक राजा से स्था
चौथी दीक्षा-महोत्सव की कृष्ण वासुदेव के किये हुए दीक्षा-महोत्सव से है।
ये सब 'औपपातिकसूत्र', 'भगवतीसूत्र' और 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' से ली गई हैं।
इन सबका उक्त सूत्रों में विस्तृत वर्णन मिलता है । अतः पाठकों को इनका एक
वार अवश्य स्वाध्याय करना चाहिए । ये सव सूत्र ऐतिहासिक दृष्टि से भी
अत्यन्त उपयोगी है। क्योंकि इस सूत्र की क्रमसंख्या उक्त सूत्रों के अनन्तर ही
है । अतः यहां उक्त वर्णन के दोहराने की आवश्यकता न जान कर, इसका संक्षेप
कर दिया गया है।
अव सूत्रकार धन्य अनगार के अभिग्रह के विपय में कहते हैं :-
तते णं से धन्ने अणगारे जं चेव दिवसं मुंडे
भवित्ता जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं समणं भगवं
महावीरं वंदति णमंसति२ एवं व० इच्छामि णं भंते !
तुम्भेणं अब्भणुण्णाते समाणे जावजीवाए छटुं छटेणं
अणिक्खितेणं आयंबिल-परिग्गहिएणं तवोकम्मेणं
अप्पाणं भावेमाणे विहरित्तते छट्ठस्स वि य णं पारणयंसि
कप्पति आयंविलं पडिग्गहित्तते णो चेव णं अणायं-
बिलं, तं पि य संसटुं णो चेव णं असंसटुं, तं पि य णं
उज्झिय-धम्मियं नो चेव णं अणुज्झिय-धम्मियं, तं
पि य जं अन्ने बहवे समण-माहण-अतिहि-किवण-वणी-
मगा णावकंखति । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं
करेह । तते णं से धन्ने अणगारे समणेणं भगवता
तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [४३ महा० अब्भणुन्नाते समाणे हट्ट तुट्ठ जावजीवाए छटुं छटेणं अणिक्खितेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणे विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारो यस्मिन्नेव दिवसे मुण्डो भूत्वा यावत्प्रवजितस्तस्मिन्नेव दिवसे श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दति, नमस्यति, वन्दित्वा नमस्कृत्य चैवमवादीत् "इच्छामि नु भदन्त ! त्वयाभ्यनुज्ञातः सन् यावज्जीवं पष्ठ-षष्ठेनानिक्षिप्तेना- चाम्ल-परिगृहीतेन तपः कर्मणात्मानं भावयन् विहर्तुम् । पष्ठ- स्यापि च नु पारणके कल्प ऽआचाम्लं प्रतिग्रहीतुं नो चैव न्वनाचाम्लम् , तदपि च संसृष्टं नो चैव न्वसंसृष्टम् , तदपि च नूज्झित-धर्मिकं नो चैव न्वनुज्झित-धर्मिकम् , तदपि च यदन्नं बहवः श्रमण-ब्राह्मणातिथि-कृपण वनीपका नावकाङ्क्षन्ति" "यथा-सुखं देवानुप्रिय!मांप्रतिवन्धं कुरु ।” ततो नुस धन्योऽ- नगारः श्रमणेन भगवता महावीरेणाभ्यनुज्ञातः सन् हृष्टस्तुष्टो यावज्जीवं पष्ठ-पष्ठेनानिक्षिप्तेन तपःकर्मणात्मानं भावयन् विहरति । पदार्थान्वयः-तते-दीक्षा के अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिए है से- यह धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार जं चेव दिवस-जिसी दिन मंडे-मुण्डित भवित्ता-हो कर जाव-यावत् पव्वतिते-प्रवजित हुआ तंव-उसी दिवसं-दिन समणं-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरं-महावीर की वंदति-वन्दना करता है णमंसति २-नमस्कार करता है और वन्दना तथा नमस्कार करके एवं-इस प्रकार व०-कहने लगा भंते ! हे भगवन् ! णं-पूर्ववत् इच्छामि-मैं चाहता हूं तुम्भेणं-आप की अन्भणुएणाते समाणे-आक्षा प्राप्त हो जाने पर जावज्जीवाए-जीवन पर्यन्त छटुं छटेणं-पष्ठ-पष्ठ तप से अणिक्खितेणं-अनिक्षिप्त (निरन्तर भायंपिलपरिगा. ' ४४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्ग: । हिएणं-आचाम्ल ग्रहण-रूप तवोकम्मेणं-तपः-कर्म से अप्पाणं-अपनी आत्मा की मावेमाणे-भावना करते हुए विहरितते-विचरूं । य-और ण-पूर्ववत् छट्ठस्स वि- पष्ठ-तप के भी पारणयंसि-पारण करने में कप्पति-योग्य है प्रायक्लिं-शुद्धौद- नादि पडिग्गहित्तते-ग्रहण करना णो चेव णं-न कि अणायंनिलं-अनाचाम्ल ग्रहण करना य-और तं पि-वह भी संसटुं-संसृष्ट (खरडे) हाथों से दिया हुआ ही लेना चाहिए अर्थात् उसी से लेना चाहिये जिसके हाथ उस भोजन से लिप्त हो यो चेव-न कि असंसट्ठ-असंसृष्ट हाथों से य-और तं पिणं-यह भी उज्झिय- धम्मियं-परित्याग-रूप धर्म वाला हो णो चेव णं-न कि अणुज्झियधम्मियं- अपरित्याग रूप धर्म वाला य-और तं पि-वह भी ऐसा अन्ने-अन्न हो जं-जिसको वहवे-अनेक समण-क्षमण माहण-ब्राह्मण अतिहि-अतिथि किवण-कृपण-दरिद्र वणीमग-अन्य कई प्रकार के याचक णावकंक्सति-न चाहते हों । यह सुनकर श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने कहा कि देवाणुप्पिया हे देवानुप्रिय ! अहासुहं- जिस प्रकार तुम्हें सुख हो इस शुभ कार्य में पडिबंध-विलम्ब मा-मत करेह-करो । तते एं-इसके बाद से वह धने-धन्य अणगारे--अनगार समणेणं-श्रमण भगवता-भगवान महावीरेणं-महावीर की अम्भणुन्नाते-आज्ञा प्राप्त कर हवतुट्ट- आनन्दित और सन्तुष्ट हो कर जावज्जीवाए-जीवन भर छठं छठेणं-पष्ट-पष्ठ अणिक्खितेणं-निरन्तर तपोकम्मेणं-तप-कर्म से अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावेमाणे-भावना करते हुए विहरति-विचरण करता है। मूलार्थ-तत्पश्चात् वह धन्य अनगार जिस दिन मुण्डित हुआ, उसी दिन श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी की वन्दना और नमस्कार कर कहने लगा कि हे भगवन् ! आपकी आज्ञा से मैं जीवन-पर्यन्त निरन्तर पष्ठ-पष्ठ तप और आचाम्ल- ग्रहण-रूप तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरना चाहता हूं। और पष्ट (बेले) के पारण के दिन भीशुद्धौदनादि ग्रहण करना ही मुझ को योग्य है न कि अनाचाम्ल आदि । वह भी पूर्ण रूप से संसृष्ट अर्थात् भोजन में लिप्त हाथों से दिया हुआ ही न कि असंसृष्ट हाथों से भी, वह भी परित्याग-रूप धर्म वाला हो न कि अपरित्याग-रूप वाला भी। उसमें भी वह अन्न हो जिसको अनेक श्रमण, ग्रामण, कृपण, अतिथि और बनीपक नहीं चाहते हों। यह सुनकर श्री श्रमण भगवान् ने कहा कि हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख हो, करो। किन्तु इस पवित्र धर्म- तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [४५ ranv Ana ranArrn. कार्य में विलम्ब करना ठीक नहीं। इसके अनन्तर वह धन्य कुमार श्रमण भगवान् महावीर स्वामी की आज्ञा से प्रानन्दित और सन्तुष्ट होकर निरन्तर पष्ठ-पष्ट तप- कर्म से जीवन भर अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करने लगा। टीका-इस सूत्र में धन्य कुमार की धर्म-विपयक रुचि विशेष रूप से बताई गई है। वह दीक्षा प्राप्त कर इस प्रकार धर्म में तल्लीन हो गया कि दीक्षा के दिन से ही उसकी प्रवृत्ति बड़े २ तप ग्रहण करने की ओर हो गई। उसने उसी दिन भगवान से निवेदन किया कि हे भगवन् ! मैं आपकी आज्ञा से जीवन भर पष्ठ (वेले ) तप का आयंविल-पूर्वक पारण करूँ। उसकी इस तरह की धर्म- जिज्ञासा देख कर श्री भगवान ने प्रतिपादन किया कि हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख हों उसी प्रकार करो । यह सुन कर धन्य अनगार ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तप ग्रहण कर लिया। 'उज्झित-धर्मिक' उसे कहते हैं, जिस अन्न को विशेपतया कोई नहीं चाहता हो । जैसे-"उझिय-धम्मियं ति, उज्झितं-परित्यागः स एव धर्म:--पर्यायो यस्या- स्तीति उज्झित-धर्मः" अर्थात् जिस अन्न का सर्वथा त्याग कर दिया गया हो, वह 'उज्झित-धर्म' होता है । आयंबिल के पारण करने में ऐसा ही भोजन लेना चाहिए। 'समणेत्यादि-श्रमणो निर्मन्थादिः, ब्राह्मणः-प्रतीतः, अतिथि:-भोजनकालोपस्थितः प्राघूर्णकः, कृपणः-दरिद्रः, वनीपकः-याचकविशेपः। अब सूत्रकार पहले सूत्र से ही सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं :- ततेणं सेधण्णे अणगारे पढम-छ?-क्खमण-पारण- गंसि पढमाए पोरसाए सज्झायं करेंति । जहा गोतम- सामी तहेव आपुच्छति । जाव जेणेव कायंदी णगरी तेणेव उवागच्छति २ कायंदी णगरीए उच्च० जाव अड- माणे आयंबिलं जाव णावकंखति । तते णं से धन्ने अण- गारे ताए अब्भुजताए पयययाए पग्गहियाए एसणाए जति भत्तं लभति तो पाणं ण लभति, अह पाणं तो भत्तं .
४६] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः न लभति । तते णं से धन्ने अणगारे अदाणे, अविमणे, अकलुसे, अविसादी, अपरितंतजोगी, जयण-घडण-जोग- चरित्त अहापज्जत्तं समुदाणं पडिगाहेति२ कांकदीओ णगरीतो पडिणिक्खमति, जहा गोतमेजाव पडिदंसेति। तते णं से धन्ने अणगारे समणेणं भग० अब्भणुन्नाते समाणे अमुच्छिते जाव अणज्झोववन्ने बिलमिव पणग- भूतेणं अप्पाणेणं आहारं आहारेति२ संजमेण तवसा० विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारःप्रथम-षष्ठ-क्षमण-पारणके प्रथ- मायां पौरुष्यां स्वाध्यायं करोति । यथा गोतमस्वामी तथैवा- पृच्छति । यावद् येनैव काकन्दी नगरी तेनैवोपागच्छति, उपा- गत्य काकन्दीनगर्यामुच्च-नीचकुलेष्वटन्नाचाम्लं यावन्नावकाङ्- क्षन्ति ततो नु स धन्योऽनगारस्तयाभ्युद्यतया प्रयतया, प्रदत्तया, प्रगृहीतयैपणया यदि भक्तं लभते पानं न लभतेऽथ पानं भक्तं न लभते । ततो नु स धन्योऽनगारोऽदीनोऽविमनाऽकलुषोऽ- विपाद्यपरितन्तयोगी यतन-घटन-योग-चरित्रो. यथा-पर्याप्त समुदानं प्रतिगृह्णातिं, प्रतिगृह्य च काकन्दया नगरीतः प्रति- निष्कामति । यथा गोतमो यावत्प्रतिदर्शयति। ततो नु स धन्योऽ- नगारः श्रमणेन भगवताभ्यनुज्ञातः सन्नमूछितो यावदध्यु- पपन्नो विलमिव पन्नगभूतेनात्मनाहारमाहारयति, आहार्य संयमेन तपसात्मानं भावयन् विहरति ।
तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम्। [४७ -अन- पदार्थान्वयः-तते णं-तत्पश्चात् से-बह धने-धन्य अणगारे-अनगार पढम-पहले छट्टुक्खमणपारणगंसि-पष्ठ-व्रत (वेले ) के पारण में पढमाए-पहली पोरसीए-पौरुपी में सज्झायं-स्वाध्याय करेति-करता है जहा-जैसे गोतमसामी- गोतम स्वामी ने तहेव-उसी प्रकार धन्य अनगार ने आपुच्छति-पूछा । जाव-यावत आज्ञा प्राप्त कर जेणेव-जहां कायंदी-काकन्दी णगरी-नगरी है तेणेव-उसी स्थान पर उवा० २-आता है और आकर कायंदीणगरीए-काकन्दी नगरी में उच०- ऊंच, नीच और मध्यम कुलों में अडमाणे-भिक्षा के लिये फिरता हुआ आयविलं. आचाम्ल के लिये जाव-यावत् णावकसंति-जिस आहार को कोई नहीं चाहता उसी को ग्रहण करता है । तते णं-इसके बाद से वह धने-धन्य अणगारे- गार ताए-उस आहार की अन्भुज्जताए-उद्यम वाली पयययाए-प्रकृष्ट यत्न वाली पयत्ताए-गुरुओं से आज्ञप्त पग्गहियाए-उत्साह के साथ स्वीकार की हुई एसणाए- एपणा-समिति से गवेपणा करता हुआ जति-यदि भत्तं-भात लभति-मिलता है पाणं-पानी ण लभति-नहीं मिलता है अह-अथवा पाणं-पानी मिलता है तो भत्तं-भात न लभति-नहीं मिलता। तते-इसके अनन्तर णं-पूर्ववत से-वह धने- धन्य अणगारे-अनगार अदीणो-दीनता से रहित अविमणे अशून्य अर्थात् प्रसन्नचित्त से अकलुसे-क्रोध आदि कलुषों से रहित अविसादी-विपाद-रहित अपरितंतजोगी-अविश्रान्त अर्थात् निरन्तर समाधि-युक्त जयण-प्राप्त योगों में उद्यम करने वाला घडण-अप्राप्त योगों की प्राप्ति के लिये उद्यम करने वाला जोग- मन आदि इन्द्रियों का संयम करने वाला चरित्ते-जिसका चरित्र था अहापजत्तं- वह जो कुछ भी पर्याप्त समुदाणं-भिक्षा-वृत्ति से प्राप्त होता था उसको पडिगा- हेति २-ग्रहण करता है और ग्रहण कर काकंदीग्रो-काकन्दी णगरीतो-नगरी से पडिणिक्खमति २-निकलता है और फिर निकल कर जहा-जैसे गोतमे-गोतम स्वामी जाव-यावत् पडिदंसेति२-श्री भगवान महावीर स्वामी को भिक्षा-वृत्ति से एकत्रित आहार दिखाता है और दिखाकर तते-इसके बाद णं-पूर्ववत् से-पह धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार समणेणं- -श्रमण भग-भगवान् महावीर स्वामी की अम्भणुनाते समाणे-आज्ञा प्राप्त होने अमुच्छिने-मूच्छा से रहित जाव-यायन उस भिक्षा-वृत्ति से प्राम किये हुए भोजन को अणझोववएणे-राग और ट्रेप से रहित होकर अर्थात अनासक्त भाव से पएणगभूतेणं-सर्प के ममान मुग्र से ४८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो चर्गः निलमिव-बिल के समान अर्थात् जिस प्रकार सर्प केवल पार्श्व-भागों के संस्पर्श से विल में घुस जाता है इसी प्रकार धन्य अनगार भी आहार-आहार को विना आसक्ति के आहारेति २-मुंह में डाल देता है और आहार कर फिर संजमेण- संयम और तवसा-तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विहरति-विच- रण करता है। मूलार्थ-इसके अनन्तर वह धन्य अनगार प्रथम-पष्ठ-क्षमण के पारण के दिन पहली पौरुपी में स्वाध्याय करता है । फिर जिस प्रकार गोतम स्वामी आहार के लिये श्री श्रमण भगवान् की प्राज्ञा लेता था इसी प्रकार वह भी श्री भगवान् की प्राज्ञा प्राप्त कर काकन्दी नगरी में जाकर ऊंच, मध्य और नीच सब तरह के कुलों में आचाम्ल के लिए फिरता हुआ जहां दूसरों से उज्झित मिलता था वहीं से ग्रहण करता था । उसको बड़े उद्यम से प्राप्त होने वाली, गुरुत्रों से प्राज्ञप्त उत्साह के साथ स्वीकार की हुई एपणा-समिति से युक्त भिक्षा में जहां भात मिला, वहां पानी नहीं मिला, तथा जहां पानी मिला, वहां भात नहीं मिला । इस पर भी वह धन्य अनगार कभी दीनता, खेद, क्रोध आदि कलुपता और विपाद प्रकट नहीं करता था, प्रत्युत निरन्तर समाधि-युक्त हो कर, प्राप्त योगों में अभ्यास करता हुआ और अप्राप्त योगों की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हुए चरित्र से जो कुछ भी भिक्षावृत्ति से प्राप्त होता था उसको ग्रहण कर काकन्दी नगरी से बाहर आ जाता था और बाहर आकर जिस तरह गोतम स्वामी आहार श्री भगवान् को दिखाते थे उसी तरह दिखाता था । दिखाकर श्री भगवान् की आज्ञा से बिना आसक्ति के जिस प्रकार एक सर्प केवल पार्श्व भागों के स्पर्श से बिल में घुस जाता है इसी प्रकार वह भी बिना किसी विशेष इच्छा के ( केवल शरीर-रक्षा के लिये ) आहार ग्रहण करता था और आहार ग्रहण करने के अनन्तर फिर संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करता था। टीका- इस सूत्र में धन्य अनगार की प्रतिज्ञा-पालन करने की दृढ़ता का वर्णन किया गया है । प्रतिज्ञा ग्रहण करने के अनन्तर वह जब मिक्षा के लिये नगरों में गया तो उसको कहीं भात मिला तो पानी नहीं मिला, जहां भात मिला था वहां पानी नहीं । किन्तु इतना होने पर भी उसने धैर्य का त्याग कर तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [४९ दीनता नहीं दिखाई । वह अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ रहा और उसी के अनुसार आत्मा को दृढ और निश्चल बनाकर संयम-मार्ग में प्रसन्न-चित्त होकर विचरता रहा । भिक्षा से उसको जो कुछ भी आहार प्राप्त होता था उसको वह इतनी ऋजुता से खाता था जैसे एक सांप बिल में घुसता है अर्थात् वह भोजन को स्वाद के लिये न खाता था, प्रत्युत संयम के लिये शरीर-रक्षा ही उसको भोजन से अभीष्ट थी। 'बिलं पन्नगभूतेन' का वृत्तिकार यह अर्थ करते हैं :--" यथा विले पन्नगः पार्श्वसंस्पर्शनात्मानं प्रवेशयति तथायमाहारं मुखेन संस्पृशन्निय रागविरहितत्यादाहा- रयति" अर्थात् इस प्रकार विना किसी आसक्ति के आहार कर फिर संयम के योगों में अपनी आत्मा को दृढ़ करता था इतना ही नहीं बल्कि अप्राप्त ज्ञान आदि की प्राप्ति के लिये भी सदा प्रयत्नशील रहता था। अव सूत्रकार धन्य अनगार के पठन के विषय में कहते हैं:- समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइ काकंदीए णगरीतो सहसंववणातो उज्जाणातो पडिणिक्खमति २ बहिया जणवय-विहारं विहरति । तते णं से धन्ने अण- गारे समणस्स भ० महावीरस्स तहारूवाणं थेराणं अंतिते सामाइयमाझ्याई एक्कारस अंगाई अहिज्जति, संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । तते णं से धन्ने अणगारे तेणं ओरालेणं जहा खंदतो जाव सुहुय० चिट्ठति । श्रमणो भगवान् महावीरोऽन्यदा कदाचित् काकन्या नगरीतः सहस्राम्रवनादुद्यानात्प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य बहिर्जनपद-विहारं विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारः श्रम- णस्य भगवतो महावीरस्य तथारूपाणां स्थविराणामन्तिके ॥
५०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग सामायिकादिकान्येकादशाङ्गान्यधीते संयमेन तपसात्मान भावयन् विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारस्तेनोदारेण यथा स्कन्दको यावत्सुहुताशन इव तिष्ठति । पदार्थान्वयः-समणे-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरे-महावीर अण्णया- अन्यदा कयाइ-कदाचित् काकंदीए-काकन्दी गरीतो-नगरी से सहसंबवणातो- सहस्राम्रवन उजाणातो-उद्यान से पडिणिक्खमति२--निकलते हैं और निकल कर बहिया-बाहर जणवयविहारं-जनपद-विहार के लिये विहरति-विचरण करते हैं तते-इसके अनन्तर णं-याक्यालङ्कार के लिए है से-वह धन्ने-धन्य अणगारे- अनगार समणस्स भ-श्रमण भगवान महावीरस्स- महावीर के तहाख्वाणं-तथारूप थेराणं-स्थविरों के अंतिते-पास सामाइयमाइयाई-सामायिक आदि एकारस-एका- दश अंगाई-अङ्गों को अहिजति-पढ़ता है । संजमेणं-संयम और तवसा-तप से अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावमाणे-भावना करते हुए विहरति--विचरण करता है तते णं-तत्पश्चात् से-वह धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार तेणं-उस ओरालेणं- उदार तप से जहा-जैसे खंदतो-स्कन्दक जाव-यावत् सुहुय०-हवन की अग्नि के समान तप से जाज्वल्यमान होकर चिट्ठति-रहता है । मूलार्थ-श्रमण भगवान महावीर स्वामी अन्यदा किसी समय काकन्दी नगरी के सहस्राम्रवन उद्यान से निकल कर बाहर जनपद-विहार के लिए विचरने लगे। (इसी समय) वह धन्य अनगार भगवान् महावीर के तथारूप स्थविरों के पास सामायिकादि एकादश अङ्ग-शास्त्रों का अध्ययन करने लगा। वह संयम और तप. से अपने आत्मा की भावना करते हुए विचरता था । तदनु वह धन्य अनगार स्कन्दक संन्यासी के समान उस उदार तप के प्रभाव से हवन की अग्नि के समान प्रकाशमान मुख से विराजमान हुआ । टीका-यह सून स्पष्ट ही है । सब विपय सुगमतया मूलार्थ से ही ज्ञात हो सकता है। उल्लेखनीय केवल इतना है कि यद्यपि तप और संयम की कसौटी पर चढ़ कर धन्य अनगार का शरीर अवश्य कृश हो गया था, किन्तु उससे उसका आत्मा एक अलौकिक वल प्राप्त कर रहा था, जिसके कारण उसके मुख. का प्रतिदिन बढ़ता हुआ तेज हवन की अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहा था।
एतीयो यर्गः] भाषाटीकासहितम् । [५१ अय सूत्रकार धन्य अनगार के तप के साथ उनके शरीर का भी वर्णन करते हैं:- धन्नस्स णं अणगारस्स पादाणं अयमेयारूवे तव- रूव-लावन्ने होत्था, से जहाणामते सुक्क छल्लीति वा कट्ट- पाउयाति वा जरग्ग-ओवाहणाति वा, एवामेव धन्नस्स अणगारस्स पाया सुक्का णिम्मंसा अट्ठि-चम्म-छिरत्ताए पण्णायंति णो चेव णं मंस-सोणियत्ताए । धन्नस्स णं अणगारस्स पायंगुलियाणं अयमेयारूवे० से जहाणामते कल-संगलियाति वा मुग्ग-सं० वा मास-संगलियाति वा तरुणिया छिन्ना उण्हे दिन्ना सुक्का समाणी मिलाय- माणी२ चिट्ठति । एवामेव धन्नस्स पायंगुलियातो सुक्कातो जाव सोणियत्ताते । धन्यस्य न्वनगारस्य पादयोरिदमेतद्रूपं तपो-लावण्यम- भूदथ यथानामका शुप्क-छल्लीति वा काष्ठ-पादुकेति वा जरत्कोपानदिति वा, एवमेव धन्यस्यानगारस्य पादौ शुष्को निर्मासावस्थि-चर्म-शिरावत्तया प्रज्ञायते नो चैव नु मांस-शोणि- तवत्तया । धन्यस्य न्वनगारस्य पादाङ्गुलीनामिदमेतद्रूपं लावण्यमभूदथ यथानामका कलाय-संगलिकेति वा मुद्ग-संग- लिकेति वा माप-संगलिकेति वा तरुणा छिन्नोष्णे दत्ता शुष्का सती म्लायन्ती (म्लानिमुपगता) तिष्ठति, एवमेव धन्यस्यान- गारस्य पादाङ्गुलिकाः शुष्का यावत् शोणितवत्तया (प्रज्ञायन्ते)।
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य णं-पूर्ववत् अणगारस्स-अनगार के पादाणं- पैरों का अयमेयारूवे-इस प्रकार का तवरूवलावन्ने-तप-जनित सुन्दरता होत्था- हुई से-जैसे जहाणामते-यथानामक सुकछल्लीति वा-सूखी हुई वृक्ष की छाल अथवा कट्टपाउयाति वा-लकड़ी की खडाऊं अथवा जरग्गोवाहणाति वा-जीर्ण उपानत् (जूती) हो एवामेव-इसी तरह धन्नस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार के पाया-पैर सुका-सूखे हुए णिम्मंसा-मांस-रहित अद्विचम्मछिरत्ताए-अस्थि, चर्म और शिराओं के कारण पण्णायंति-पहचाने जाते हैं णो चेव-न कि मंससोणियत्ताए-मांस और रुधिर के कारण । धन्नस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार की पायांगुलियाणं-पैरों की अङ्गुलियों का अयमेयारूवे-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से-जैसे जहाणामते-यथानामक कलसंगलियाति वा-कलाय-धान्य विशेष की फलियां अथवा मुग्ग-सं०-मूंग की फलियां अथवा माससंगलियाति-माप की फलियां वा-समु- घय के लिए है तरुणिया-जो कोमल ही छिन्ना-तोड़कर उण्हे-गर्मी में दिना-दी हुई अर्थात् रखी हुई सुकासमाणी-सूख कर मिलायमाणी-ग्लान हो रही चिट्ठति- हो । एवामेव-इसी प्रकार धन्नस्स-धन्य की पायंगुलियातो-पैरों की अंगुलियां सुक्कातो-सूखी हुई जाव-यावत् सोणियत्ताते-मांस और रुधिर से नहीं पहचानी जाती प्रत्युत केवल अस्थि, मांस और शिराओं के कारण ही पहचानी जाती हैं। मूलार्थ-धन्य अनगार के पैरों का तप से ऐसा लावण्य हो गया, जैसे सूखी हुई वृक्ष की छाल, लकड़ी की खड़ाऊं या जीर्ण जूता हो । इसी प्रकार धन्य अनगार के पैर केवल हड्डी, चमड़ा और नसों से ही पहचाने जाते थे, न कि मांस और रुधिर से । धन्य अनगार की पैरों की अंगुलियों का ऐसा तप-जनित लावण्य हुआ जैसा कलाय धान्य की फलियां, मूंग की फलियां अथवा माप (उड़द) की फलियां कोमल ही तोड़ कर धूप में डाली हुई मुरझा जाती हैं । धन्य अनगार की अंगुलियां भी इतनी मुरझा गई थीं कि उन में केवल हट्वी, नस और चमड़ा ही नजर आता था, मांस और रुधिर नहीं। टीका-इस सूत्र में बताया गया है कि तप के कारण धन्य अनगार की शारीरिक दशा में कितना परिवर्तन हो गया । तप करने से उनके दोनों चरण इस प्रकार सूख गये थे जैसे सूखी हुई वृक्ष की छाल, लकड़ी की खड़ाऊं अथवा पुरानी .
तृतीयो धर्गः] भापाटीकासहितम् । [५३ सूखी हुई जूती हो । उनके पैरों में मांस और रुधिर नाममात्र के लिए भी अव- शिष्ट नहीं रह गया था, किन्तु केवल हड्डी, चमड़ा और नसें ही देखने में आते थे। पैरों की अंगुलियों की भी यही दशा थी। वे भी कलाय, मूंग या माप की उन फलियों के समान जो कोमल २ तोड़ कर धूप में डाल दी गई हों-मुरझा गई थीं। उन में भी मांस और रुधिर नहीं रह गया था। इस प्रकार इन उपमाओं से धन्य अनगार के शरीर का वर्णन इस सूत्र में दिया गया है। अब सूत्रकार इसी विषय से सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं:- धन्नस्स जंघाणं अयमेयारूवे० से जहा० काक- जंघाति वा कंक-जंघाति वा ढेणियालिया-जंघाति वा जाव णो सोणियत्ताए, धन्नस्स जाणूणं अयमेयारूवे० से जहा कालि-पोरेति वा मयूर-पोरेति वा ढेणियालिया- पोरेति वा, एवं जाव नो सोणियत्ताए। धण्णस्स ऊरुस्स० जहानामते साम-करील्लेति वा बोरी-करील्लेति वा सल्लति. सामली० तरुणिते उण्हे जाव चिट्ठति, एवामेव धन्नस्स ऊरू जाव सोणियत्ताए। धन्यस्य नु जयोरिदमेतद्रूपं तपो-लावण्यमभूदथ यथानामका काक-जडेति वा कङ्क-जङ्केति वा ढेणिकालिक-जडेति वा यावन्नो शोणितवत्तया । धन्यस्य जान्वोरिदमेतद्रूपं तपो-ला- वण्यमभूदथ यथानामकं कालि-पर्वेति वा · मयूर-पति वा ढेलिकालिका-पर्वेति वा, एवं यावच्छोणितवत्तया । धन्य- स्योर्वोरिदमेतद्रूपं तपो-लावण्यमभूदथ यथानामकं श्याम- करीरमिति वा बदरी-करीरमिति वा शल्यकी-करीरमिति वा ५४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः . शाल्मली-करीरमिति वा तरुणकमुष्णे यावत्तिष्ठति, एवमेव धन्य- स्योरू यावच्छोणितवत्तया । पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य अनगार की जंघाणं-जङ्घाओं का अयमेया: रूवे-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहा०-जैसे काकजंघाति वा-काक-जङ्घा हो कंकजंघाति वा-अथवा कङ्क पक्षी की जङ्घाएं हों देणियालियाजंघातिवा-टेणिक पक्षी की जङ्घाएं हों, इसी प्रकार धन्य अनगार की जवाएं भी जाव-यावत् सोणिय: ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचानी जाती थीं, धन्नस्स-धन्य अनगार के जाणूणं-जानुओं का अयमेयारूवेल-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहा- जैसे कालि-पोरेति वा-कालि-वनस्पति विशेष का पर्व (सन्धि-स्थान) हो मयूर-पोरेति वा-मयूर के पर्व होते हैं टेणियालिया-पोरेति वा-टेणिक (ढक्क) पक्षी के पर्व होते हैं वा-सर्वत्र समुच्चयार्थक है एवं-इसी प्रकार जाव-यावत् धन्य अनगार के जानु सोणियत्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते थे । अर्थात् उनमें मांस और लहू अवशिष्ट नहीं था धरणस्स-धन्य अनगार के ऊरुस्स-ऊरुओं का इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ जहानामते-जिस प्रकार सामकरील्लेति वा-प्रियंगु वृक्ष की कोंपल बोरीकरील्लेति वा-बदरी-बेर की कोंपल सल्लति-शल्य की वृक्ष की कोंपल सामली-शाल्मली वृक्ष की कोंपल तरुणिते-कोमल ही तोड़ कर उपहे-गर्मी में मुरझाई हुई जाव-यावत् चिट्ठति रहती है एवामेव-ठीक इसी प्रकार धन्नस्स-धन्य अनगार के ऊरू-ऊरु जाव-यावत् सोणियत्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते । मूलार्थ-धन्य अनगार की जाएं तप के कारण इस प्रकार निर्मास हो गई जैसे काक (कौवे) की, कङ्क पक्षी की और ढेणिक (ढंक) पक्षी की जवाएं होती हैं । वे सूख कर इस तरह की हो गई कि मांस और रुधिर देखने को भी नहीं रह गया । धन्य अनगार के जानु तप से इस प्रकार सुशोभित हुए जैसे कालि नामक वनस्पति, मयूर और ढेणिक पक्षी के पर्व (गांठ) होते हैं। वे भी मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते थे । धन्य अनगार के ऊरुयों की भी तप से इतनी सुंदरता हो गई जैसे प्रियंगु, बदरी, शल्यकी और शाल्मली वृक्षों की कोमल २ कोंपल तोड़ कर धूप में रखी हुई मुरझा जाती हैं। ठीक इस तरह धन्य अनगार के ऊरु भी मांस और रक्त से रहित हो कर मुरझा गये थे। - तृतीयो वर्गः भापाटीकासहितम् । - टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की जवा, जानु और ऊरुओं का वर्णन किया गया है । तप के प्रभाव से धन्य अनगार की जङ्घाएं मांस और रुधिर के अभाव से ऐसी प्रतीत होती थीं मानो काक-जसा नाम के वनस्पति की-जो स्वभावतः शुष्क होती है-नाल हों । अथवा यों कहिए कि वे कौवे की जङ्घाओं के समान ही निमांस हो गई थीं । अथवा उनकी उपमा हम कङ्क और ढंक पक्षियों की जवाओं से भी दे सकते हैं। इसी प्रकार उनके जानु भी उक्त काक-जङ्घा वन- स्पति की गांठ के समान अथवा मयूर और ढंक पक्षियों के सन्धि-स्थानों के समान शुष्क हो गये थे। दोनों ऊरु मांस और रुधिर के अभाव से सूख कर इस तरह मुरझा गये थे जैसे प्रियङगु, बदरी, कर्कन्धू, शल्यकी या शाल्मली वनस्पतियों के कोमल २ कोंपल तोड़कर धूप में रखने से मुरझा जाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि धन्य अनगार इस प्रकार धर्म की ओर आकर्पित हुए कि उन्होंने उसी पर अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। यहां तक कि उनको शरीर का मोह भी लेश मात्र नहीं रहा । उन्होंने कठोर से कठोर तप करने प्रारम्भ किये । जिसका फल यह हुआ कि उनके किसी अङ्ग में भी मांस और रुधिर अवशिष्ट नहीं रहा । सर्वत्र केवल अस्थि, चर्म और नसा-जाल ही देखने में आता था । अब सूत्रकार धन्य अनगार के कटि आदि अङ्गों का वर्णन करते हैं: धन्नस्स कडि-पत्तस्स इमेया-रूवे० से जहानामए उट्ट-पादेति वा जरग्ग-पादेति वा जाव सोणियत्ताए, धन्न- स्स उदर-भायणस्स इमे० से जहा० सुक्क-दिएति वा भन्ज- णय-कभल्लेति वा कट्ठ-कोलंबएति वा, एवामेव उदरं सुक्कं । धन्न० पांसुलिय-कडयाणं इमे० से जहा० थासया- वलीति वा पाणावलीति वा मुंडावलीति वा । धन्नस्स पिट्ठि-करंडयाणं अयमेयारूवे० से जहा. कन्नावलीति वा गोलावलीति वा वट्टयावलीति वा । एवामेवः धन्नस्स अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः उर-कडयस्स अय० से जहा० चित्तकटरेति वा वियण- पत्तेति वा तालियंट-पत्तेति वा, एवामेव० । धन्यस्य कटि-पत्रस्येदमेतद्रूपं तपो-लावण्यमभूदथ यथानामक उष्ट्र-पाद इति वा जरद्गव-पाद इति वा यावच्छोणित- वत्तया।धन्यस्योदर-भाजनस्येदम् । अथ यथानामकःशुष्क-दृति- रिति वा भर्जन-कभल्लमिति वा काष्ठ-कोलम्ब इति वा, एवमेवो- दरं शुष्कम् ० । धन्यस्य पांशुलिका-कटकयोरिदम् । अथ यथा- नामका स्थासिकावलीति वा पाणावलीति वा मुण्डावलीति वा धन्यस्य पृष्टि-करण्डाणामिदमेतद् अथ यथानामका कर्णावलीति वा गोलकावलीति वा वर्त्तकावलीति वा । एवमेव धन्यस्योरः- कटकस्येदम् ० अथ यथानामकं ? चित्तकटरमिति वा व्यजनक- पत्रमिति वा ताल-वृन्त-पत्रमिति वा, एवमेवः । पदार्थान्वयः-धनस्स-धन्य अनगार के कडिपत्तस्स-फटि-पट्ट का इमे- या रूवेल-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहानामए-जैसे-उट्टपादेति वा-उष्ट्र का पैर होता है अथवा जरग्गपादेति वा-बूढ़े बैल का पैर होता है इसी प्रकार जाव-यावत् सोणियत्ताए-मांस और रुधिर की सत्ता से नहीं पहचाने जाता था। धन्नस्स-धन्य अनगार के उदरभायणस्स-उदर-भाजन का इमे०-इस प्रकार का तप- जनित लावण्य हुआ से जहा०-जैसे सुक्कदिएति वा-सूखी हुई मशक होती है अथवा भजणयकभल्लेति वा-चने आदि भूनने का भाजन होता है अथवा कट्ठकोलंब- एति वा-काष्ठ का कोलम्ब (पान विशेप) होता है एवामेव-इसी प्रकार उदरं-उदर सुक्कं-सूख गया था, धन्न-धन्य अनगार के पांसुलियकडाणं-पार्श्व भाग की अस्थियों के कटकों का इमे-इस प्रकार की सुंदरता हुई से जहा०-जैसे थासया- वलीति-दर्पणों (आरसी) की पङ्क्ति होती है वा-अथवा पाणावलीति वा-पाण- भाजन विशेष की पङ्क्ति होती है अथवा मुंडावलीति वा-स्थाणुओं की पङ्क्ति होती है htal.
एतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम्। तप- इसी प्रकार धन्य अनगार की पांसुलिए भी हो गई थीं । धन्नस्स-धन्य अनगार के पिट्टिकरडयाणं-पीठ की हड्डी फे उन्नत प्रदेशों की अयमेयारूवे-इस प्रकार की प-जनित सुन्दरता हो गई से जहा-जैसे कन्नावलीति वा-कान के भूपणों की पङ्क्ति होती है गोलावलीति वा-गोलक-वर्तुलाकार पापाण विशेपों की पक्ति होती है वट्टयावलीति वा-वर्तक---लास आदि के बने हुए बच्चों के खिलौनों की पङ्क्ति होती है एवामेव०-इसी प्रकार तप के कारण धन्य अनगार के पृष्ठ-प्रदेशों की भी सुन्दरता हो गई थी । धनस्स-धन्य अनगार के उरकडयस्स-उर-(वक्ष- स्थल)कटक की अय०--इस प्रकार की सुन्दरता हो गई से जहा जैसे चित्तकट्ट- रेति वा-गौ के चरने के कुण्ड का अधोभाग होता है अथवा वियणपत्तेति वा- बांस आदि के पत्तों का पला होता है अथवा तालियंटपत्तेति वा-ताड़ के पत्तों का पड़ा होता है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार का वक्षःस्थल भी सूख गया था। मूलार्थ-धन्य अनगार के कटि-पत्र को इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ जैसे ऊँट का पैर हो, बढ़े चैल का पैर हो । उसमें मांस और रुधिर का सर्वथा अभाव था । धन्य अनगार का उदर-भाजन इतना सुन्दराकार हो गया था जैसे सूखी मशक हो, चने आदि भूनने का भाण्ड हो अथवा लकड़ी का, वीच में मुड़ा हुया, पात्र हो । उसका उदर भी ठीक इसी प्रकार सूख गया था । धन्य अनगार की पार्व की अस्थियां तप से इतनी सुन्दर हो गई थीं जैसे दर्पणों की पंक्ति हो, पाण नामक पात्रों की पंक्ति हो अथवा स्थाणुषों की पंक्ति हो । धन्य अनगार के पृष्ठ-प्रदेश के उन्नत भाग इतने सुन्दर हो गये थे जैसे कान के भूपणों की पंक्ति हो, गोलक-वर्तुलाकार पापाणों की पंक्ति हो अथवा वर्तक-लाख आदि के बने हुए बच्चों के खिलौनों की पंक्ति हो । इसी प्रकार धन्य अनगार के पृष्ठ- प्रदेश भी सूख कर निर्मास हो गये थे । धन्य अनगार के उर(वक्षःस्थल)-कटको की इतनी सुन्दरता हो गई थी जैसे गौ के चरने के कुएड का अधोभाग होता है, बांस आदि का पता होता है अथवा ताड़ के पत्तों का पला होता है । ठीक इसी प्रकार उसका वक्षःस्थल भी सूख कर मांस और रुधिर से रहित हो गया था। टीका -इस सूत्र में क्रम से धन्य अनगार के कटि, उदर, पांसुलिका, पृष्ठ-प्रदेश और वक्षःस्थल का उपमा द्वारा वर्णन किया गया है । उनका कदि-प्रदेश तप के कारण मांस और रुधिर से रहित हो कर ऐसा प्रतीत होता था जैसे ऊँट .
५८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्ग: या बूढ़े बैल का खुर हो । इसी प्रकार उनका उदर भी सूख गया था। उसकी सूख कर ऐसी हालत हो गई थी जैसी सूखी मशक, घने आदि भूनने के पात्र अथवा कोलम्ब नामक पात्र-विशेप की होती है । शुष्क आदि शब्दों की वृत्तिकार निम्न- लिखित व्याख्या करते हैं:- शुष्कः-शोपमुपगतो इतिः--चर्ममयजलभाजनविशेपः । चणकादीनां मर्जनम्-पाकविशेपापादानं तदर्थं यत्कभल्लम-कपालं घटादिकपरं तत्तथा । शाखि- शाखानामवनतमनं भाजनं वा कोलम्ब उच्यते काष्ठस्य कोलम्ब इव काष्ठकोलम्बः, परिदृश्यमानावनतहृदयास्थिकत्वात् । कहने का तात्पर्य यह है कि धन्य अनगार का उदर भी सूखकर उक्त वस्तुओं के समान बीच में खोखला जैसा प्रतीत होता था। इसी प्रकार उनकी पांसुलिएं भी सूखकर कांटा हो गई थी। उनको इस तरह गिना जा सकता था जैसे-दर्पण की पंक्ति हो या गाय आदि पशुओं के चरने के पात्रों की पंक्ति अथवा उनके बांधने के कीलों की पंक्ति हो । उनमें मांस और रुधिर देखने को भी न था। यही दशा पृष्ठ-प्रदेशों की भी थी। उनमें भी मांस और रुधिर नहीं रह गया था और ऐसे प्रतीत होते थे मानो मुकुटों की, पापाण के गोलकों की अथवा लाख आदि से बने हुए बच्चों के खिलौनों की पंक्ति खड़ी की हुई हो । उस तप के कारण धन्य अनगार के वक्षःस्थल (छाती) में भी परिवर्तन हो गया था। उससे भी मांस और रुधिर सूख गया था और पसलियों की पंक्ति ऐसी दिखाई दे रही थी मानो ये किलिञ्ज आदि के खण्ड हों अथवा यह बांस या ताड़ के पत्तों का बना हुआ पङ्खा हो। इन सब अवयवों का वर्णन, जैसा पहले कहा जा चुका है, उपमालङ्कार से किया गया है । इससे एक तो स्वभावतः वर्णन में चारुता आगई है, दूसरे में पढ़ने वालों को वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने में अत्यन्त सुगमता प्राप्त होती है। जो विपय उदाहरण दे कर शिष्यों के सामने रखा जाता है, उसको अत्यल्प-बुद्धि भी विना किसी विशेष परिश्रम के समझ जाता है। 'हां, यह ध्यान रखने योग्य है कि धन्य अनगार का शरीर यद्यपि सूख कर कांटा हो गया था किन्तु उनकी आत्मिक शक्ति दिन-दिन बढ़ती चली जा रही थी। 'अब सूत्रकार धन्य अनगार के शेप अवयवों का वर्णन करते हैं :- - तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [५९ धन्नस्स बाहाणं० से जहानामते समि-संगलियाति वा बाहाया-संगलियाति वा अगस्थिय-संगलियाति वा एवामेव० । धन्नस्स हत्थाणं० से जहा० सुक्क छगणियाति वा वड-पत्तेति वा पलास-पत्तेति वा एवामेव । धन्नस्स हत्थंगुलियाणं० से जहा० कलाय-संगलियाति वा मुग्ग० मास० तरुणिया छिन्ना आयवे दिन्ना सुक्का समाणी एवामेव० । धन्यस्य वाह्वोः० अथ यथानामका शमी-सङ्गलिकेति वा, वाहाया-सङ्गलिकेति वा अगस्तिक-सङ्गलिकेति वा, एवमेव० । धन्यस्य हस्तयोः० अथ यथानामका शुष्क-छगणिकेति वा वट- पत्रमिति वा पलाश-पत्रमिति वा, एवमेव० । धन्यस्य हस्तागु- लिकानाम् अथ यथानामका कलाय-सङ्गलिकेति वा मुद्ग० माप० तरुणिका छिन्नातपे दत्ता सती, एवमेव० । पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य अनगार की बाहाणं०-भुजाओं की तप से इतनी सुन्दरता हुई से जहानामते-जैसे समिसंगलियाति वा-शमी वृक्ष की फली अथवा वाहायासंगलियाति वा-वाहाया-एक वृक्ष विशेष फी फली अथवा अग- त्थियसंगलियाति वा-अगस्तिक नामक वृक्ष की फली सूखकर हो जाती है एवामेव- इसी प्रकार उनकी भुजाएं भी मांस और रुधिर के अभाव से सूख गई थीं। धन्न- स्स-धन्य अनगार के हत्थाणं-हाथों की सुन्दरता इस प्रकार हो गई थी से जहा०- सुक छगणियाति वा-सूखा गोबर होता है अथवा वडपत्तेति वा-वट वृक्ष के सूखे हुए पत्ते होते हैं अथवा पलासपत्तेति वा-पलाश के सूखे हुए पत्ते होते हैं एवा- मेव-उनके हाथों से भी मांस और रुधिर सूख गया था । धनस्स-धन्य अनगार की हत्थंगुलियाणं०-हाथ की अंगुलियों का तप से ऐसा लावण्य हुआ से जहा- ६०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । I तृतीयो वर्गः जैसे कलायसंगलियाति वा-कलाय की फलियां अथवा मुग्ग०-मूंग की फलियां मास-मास की फलियां जो तरुणिया-कोमल २ छिन्ना-तोड़ कर प्रायवे-धूप में दिन्ना-रखी हुई सुक्का समाणी-सूख कर मुरझा जाती है एवामेव-इसी प्रकार धन्य अनगार की अंगुलियां भी रुधिर और मांस से रहित हो कर सूख गई थीं। उन में केवल अस्थि और चर्म ही अवशिष्ट रह गया था । मूलार्थ-मांस और रुधिर के अभाव से धन्य अनगार की भुजाएं इस प्रकार हो गई थीं जैसे शमी, बाहाय और अगस्तिक वृक्ष की सूखी हुई फलियां हो । धन्य अनगार के हाथ सूख कर इस प्रकार हो गये थे जैसे सूखा गोबर होता है अथवा वट और पलाश के सूखे पत्ते होते हैं। उस तप के प्रभाव से धन्य अनगार की अंगुलियां भी सूख गई थीं और ऐसी प्रतीत होती थीं मानो कलाय, मूंग अथवा माप (उड़द) की फलियां जो कोमल २ तोड़ कर धूप में रखी हुई हो । जिस प्रकार ये मुरझा जाती हैं इसी प्रकार उनकी अंगुलियां भी मांस और रुधिर के अभाव से मुरझा कर सूख गई थीं। टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की भुजा, हाथ और हाथ की अंगुलियों का उपमा अलङ्कार से वर्णन किया गया है । उनकी भुजाएं और अङ्गों के समान तप के कारण सूख गई थीं और ऐसी दिखाई देती थीं। जैसी शमी, अगस्तिक अथवा बाहाय वृक्षों की सूखी हुई फलियां होती है। अगस्तिक और बाहाय का ठीक २ निश्चय नहीं हो सका है कि ये किन वृक्षों की और किस देश में प्रचलित संज्ञा है । वृत्तिकार ने भी इनके लिए केवल वृक्ष विशेप ही लिखा है । सम्भवतः उस समय किसी प्रान्त में ये नाम प्रचलित रहे हों। यही दशा धन्य के हाथों की भी थी। उनसे भी मांस और रुधिर सूख गया था तथा वे इस तरह दिखाई देते थे जैसा सूखा गोबर होता है अथवा सूखे हुए वट और पलाश के पत्ते होते हैं । हाथ की अंगुलियों में भी विचित्र परिवर्तन हो गया था। जो अंगुलियां कभी रक्त और मांस से परिपूर्ण थीं, वे आज सूख कर एक निराली शोभा धारण कर रही थीं । सूख कर उनकी यह हालत हो गई थी जैसे एक कलाय, मूंग अथवा माप (उड़द) की फली की--जिसको कोमल ही तोड़ तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [६१ कर धूप में सुखा दिया हो-दशा होती है । वह पहले का मांस और रुधिर तो उनमें देखने को भी शेप नहीं रह गया था। यदि उनको कोई पहचान सकता था तो केवल अस्थि और चर्म से जो उनमें अवशिष्ट रह गये थे। बाहु शब्द यद्यपि उकारान्त है तथापि निम्नलिखित सूत्र से उसको आकारान्त आदेश हो जाता है। अतः सूत्र में आया हुआ 'बाहाणं' पद प्राकृत व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है । किसी को अन्यथा भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए। सूत्र यह है :- बाहोरात् ।।८।१।३६॥ बाहुशब्दस्य स्त्रियामाकारान्तादेशो भवति । याहाए जेण धरिओ एकाए । स्त्रियामित्येव । वामे अरो याहू ।। इस प्रकरण में तप की ही महिमा विशेष रूप से वर्णन की गई है। साथ ही उपमा अलङ्कार से शरीर के सौन्दर्य का भी वर्णन किया गया है । यद्यपि सामान्यतः ज्ञान, दर्शन और चारित्र तीनों को मोक्ष के प्रति कारणता है तथापि चारित्र की प्रधानता दिखाने के लिये उसका पृथक् वर्णन किया गया है । अब सूत्रकार धन्य अनगार की ग्रीवा, हनु, ओष्ठ और जिह्वा का वर्णन करते हैं:- -फलेति वा धन्नस्स गीवाए० से जहा० करग-गीवाति वा कुंडि- या-गीवाति वा उच्चट्ठवणतेति वा एवामेव० । धन्नस्सणं हणुआए से जहा० लाउय-फलेति वा हकुव- अंव-गट्ठियाति वा एवामेव० । धन्नस्स उट्ठाणं से जहा० सुक्क-जलोयाति वा सिलेस-गुलियाति वा अलत्तग-गुलिया- ति वा एवामेव ।धन्नस्स जिव्भाए० से जहा० वड-पत्तेति वा पलास-पत्तेति वा साग-पत्तेति वा एवामेव० । धन्यस्य ग्रीवायाः अथ यथानामका करक-ग्रीवति वा कुण्डिका-ग्रीवेति वोच्चस्थापनक इति वा, एवमेव० । धन्यस्य ६२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयों चंगः हनोः अथ यथानामकमलाबु-फलमिति वा हकुव-फलमिति वा आम्रगुटिकेति वा, एवमेव० । धन्यस्योष्ठयोः अथ यथानामका शुष्क-जलौकेति वा, श्लेष्म-गुटिकेति वाक्तक-गुटिकेति वा, एव- मेव । धन्यस्य जिह्वायाः० अथ यथानामकं वटपत्रमिति वा पलाश-पत्रमिति वा शाक-पत्रमिति वा, एवमेव० । पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य (अनमार) की गीवाए-ग्रीवा की ऐसी आकृति हो गई थी से जहा०-जैसी करगगीवाति वा-करवे ( मिट्टी का छोटा सा पात्र ) की ग्रीवा होती है अथवा कुंडियागीवाति वा-कुण्डिका ( कमण्डलु) की ग्रीवा होती है उच्चट्ठवणतेति वा-अथवा उच्चस्थापनक- ऊँचे मुंह वाला वर्तन होता है एवामेव०-इसी प्रकार उनकी ग्रीवा भी सूखकर लम्बी दिखाई देती थी । धन्नस्स-धन्य अनगार का हणुाए-चिबुक-ठोडी ऐसी सुन्दर हो गई थी से जहा-जैसे लाउयफलेति वा-तुम्वे का फल होता है हकुव-' फलेति वा-हकुव-वनस्पति विशेष का फल होता है अथवा अंगट्ठियाति वा-आम की गुठली होती है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार का चिवुक भी मांस और रुधिर से रहित हो कर सूख गया था । धन्नस्स-धन्य अनगार के उट्ठाणं-ओंठ ऐसे हो गये थे से जहाथ-जैसे सुक्कजलोयाति वा-सूखी हुई जोंक होती है अथवा सिलेसगुलियाति वा श्लेश्म की गुटिका होती है अथवा अलत्तगगुलियाति वा- अलक्तक-मेंहदी की गुटिका होती है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार के ओंठ भी मुरझा गये थे। धनस्स-धन्य अनगार की जिभाए-जिह्वा ऐसी हो गई थी से जहा०-जैसे वडपत्तेति वा-वट वृक्ष का पत्ता होता है अथवा पलासपत्तेति वा- पलाश वृक्ष का पत्ता होता है अथवा साकपत्तेति वा-शाक के पत्ते होते हैं एवामेव०. इसी प्रकार धन्य अनगार की जिहा भी सूख गई थी। मूलार्थ-धन्य अनगार की ग्रीवा मांस और रुधिर के प्रभाव से सूख कर इस तरह दिखाई देती थी जैसी सुराई, कुण्डिका (कमण्डलु). और किसी ऊंचे मुख वाले पात्र की ग्रीवा होती है । उनका चिबुक (ठोडी) भी इसी प्रकार सूख गया था और ऐसा दिखाई देता था जैसा तुम्बे या हकुन तृतीयो यर्गः] भापाटीकासहितम् । [६३ का फल अथवा श्राम की गुठली होती है । अोठों की भी यही दशा थी। वे भी सूख कर ऐसे हो गये थे जैसे सूखी हुई जोंक होती है अथवा श्लेष्म या मेंहदी की गुटिका होती है । उनमें रक्त का बिलकुल अभाव हो गया था। जिह्वा में भी बिलकुल रक्त का अभाव हो गया था, वह ऐसी दिखाई देती थी जैसा वट वृक्ष का अथवा पलाश (ढाक) का पत्ता हो या सूखे हुए शाक का पत्ता हो । टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की ग्रीवा, चिचुक, ओंठ और जिह्वा का उपमा अलङ्कार से वर्णन किया गया है । ग्रीवा में भी अन्य अवयवों के समान मांस और रुधिर का बिलकुल अभाव हो गया था । अतः वह स्वभावतः लम्बी दिखाई देती थी। सूत्रकार ने उसकी उपमा लम्चे मुख वाले सुराई आदि पात्रों से दी है। इसके लिए सूत्र में एक 'उच्चस्थापनक' पद आया है, जो इसी प्रकार का एक पात्र होता है। जो चियुक कभी मांस और रुधिर से परिपूर्ण था उसकी आज यह दशा हो गई थी जैसी एक सूखे हुए तुम्वे के या हकुब (एक प्रकार का वनस्पति ) के फल की होती है अथवा वह ऐसी दिखाई देती थी जैसे एक आम की गुठली हो । जो ओंठ कभी विम्यफल के समान रक्त थे वे तप के कारण सूखकर विलकुल विवर्ण हो गये थे। उनकी आकृति अब इस प्रकार हो गई थी जैसी श्लेष्म और सूखी हुई मेंहदी की गुटिका होती है । जिह्वा भी सूख कर वट वृक्ष के पत्ते के समान अथवा पलाश (ढाक) के पत्ते के समान नीरस और रूखी हो गई थी। यह सब तप आत्म-शुद्धि के ही लिये होता है। यह भी इस वर्णन से सिद्ध होता है कि उत्कृष्ट तप ही आत्म-शुद्धि की सामर्थ्य रखता है और इसीके द्वारा कों की निर्जरा भी हो सकती है। यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि तप सदा सम्यक् ज्ञान और सम्यग् दर्शन पूर्वक ही सिद्ध हो सकता है । जब तक सम्यक् ज्ञान और सम्यग् दर्शन न हो तब तक केवल तप से कोई भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता। अब सूत्रकार धन्य अनगार के नाक आदि अङ्गों के विषय में कहते हैं :-- धन्नस्स नासाए से जहा अंवग-पेसियाति वा अंबा- डग-पेसियाति वा मातुलंग-पेसियाति वा तरुणिया० एवा- .
६४] अनुत्तरांपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयों वर्ग: मेव० । धन्नस्स अच्छीण० से जहा० वीणा-छिड्डेति वा बद्धीसग-छिड्डेति वा पाभातिय-तारिगा इ वा एवामेव० । धन्नस्स कण्णाणं० से जहा० मूला-छल्लियाति वा वालुक० कारल्लय-छल्लियाति वा एवामेव० । धन्नस्स सीसस्स से जहा० तरुणग-लाउएति वा तरुणग-एलालुयत्ति वा सिण्हालएति वा तरुणए जाव चिट्ठति एवामेव धन्नस्स अणगारस्स सीसं सुकंलुक्खं णिम्मंसं अट्ठि-चम्म-च्छिर- ताए पन्नायति णो चेव णं मंस-सोणियत्ताए, एवं सव्वत्थ, णवरं उदरभायण-कण्ण-जीहा-उठ्ठा एएंसि अट्ठीण भन्नति चम्मच्छिरत्ताए पण्णाय इति भन्नति । धन्यस्य नासिकायाः० अथ यथानामकाम्रक-पेशिकेति वाम्रातक-पेशिकेति वा मातुल्लङ्ग-पेशिकेति वा तरुणिका० एव- मेव० । धन्यस्याक्ष्णोः० अथ यथानामकं वीणा-छिद्रमिति वा बद्धीसक-छिद्रमिति वा प्राभातिक-तारकेति वा, एवमेव० । धन्य- स्य कर्णयोः अथ यथानामका मूल-छल्लिकेति वा वालुक-छल्लि- कारेलक-छल्लिकेति वा, एवमेव० । धन्यस्य शीर्षकस्य० अथ यथानामकं तरुणकालाचुरिति वा तरुणकालुकमिति वा सिहालकमिति वा तरुणकं यावत्तिष्ठति, एवमेव० धन्यस्यान- गारस्य शीर्प शुष्कं रूक्षं निर्मासमस्थि-चर्म-शिरावत्तया प्रज्ञायते नो चैव नुमांस-शोणितवत्तया। एवं सर्वत्र नवरमुदरभाजन-कर्ण- जिह्वौष्ठेषु (एतेषु). अस्थीति (पदं) न भण्यते, चर्म:शिरावतया कति वा तृतीयो घर्गः भापाटीकासहितम् । प्रज्ञायन्त इति भण्यते। पदार्थान्वय:-धनस्स-धन्य अनगार की नासाए-नासिका तप-तेज से ऐसी हो गई थी से जहा०-जैसी अंचगपेसियाति वा-आम की फांक होती है. अथवा अंबाडगपेमियाति वा-अम्रातक-अम्बाडा की फांक होती है अथवा मातुलुंगपेसियाति वा-मातुलुङ्ग-धीजपूरक फल की फांक होती है जो तरुणिया- कोमल ही काट कर धूप में मुसा दी गई हो एवामेव०-यही दशा धन्य अनगार की नासिका की भी हो गई थी । धन्नस्स-धन्य अनगार की अच्छीणं-आंखों की यह दशा हो गई थी से जहा०-जैसे वीणाछिड्डेति-वीणा के छिद्र की होती है अथवा बद्धीसगछिट्वेति वा-प्रद्धीसक नाम वाले वाद्य विशेष के छिद्र की होती है अथवा पाभातियतारगा इ वा-प्रभात समय का तारा होता है एवामेव-इसी प्रकार धन्य अनगार की आंखें भीतर धंस गई थीं । धन्नस्स-धन्य अनगार के करणाणं-कानों की यह दशा हो गई थी से जहा०-जैसे मूला-छल्लियाति वा-मूली का छिल्का होता है अथवा वालुक०-चिर्भटी की छाल होती है अथवा कारेलय-छल्लियाति वा- करेले का छिल्का होता है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार के कान भी सूख गये थे। धनस्स--धन्य अनगार के सीसस्स-शिर ऐसा हो गया था से जहा०-जैसे तरुणगलाउएति वा-कोमल तुम्बक अथवा तरुणगएलालुएति वा-कोमल आलू अथवा सिण्हालएति वा-सिस्तालक-सेफालक नामक फल विशेप जो तरुणए-कोमल जाव-यावत्-तोड़फर धूप में कुम्हलाया हुआ चिट्ठति-रहता है एवामेव०-इसी प्रकार धन्नस्स-धन्य अनगार का सीसं-शिर सुक्कं-शुष्क हो गया लुक्खं-रूक्ष हो गया णिम्मंस-मांस रहित हो गया और केवल अट्टिचम्मच्छिरत्ताए-अस्थि, चर्म और नासा-जाल के कारण पन्नायति पहचाना जाता था नो चेव णं-न कि मंससो- णियत्ताए-मांस और रुधिर के कारण एवं-इसी प्रकार सम्वत्थ-सब अङ्गों के विषय में जानना चाहिए णवरं-विशेषता इतनी है कि उदरभायण-उदर-भाजन कन-कान जीहा-जिह्वा उट्ठा-ओंठ एएसि-इनके विषय में अट्ठी-'अस्थि' यह पद ण भन्नति नहीं कहा जाता, क्योंकि इनमें अस्थि नहीं होती अतः केवल चम्मच्छि- रत्ताए-चर्म और नासा जाल से पएणाय इति-जाने जाते थे इस प्रकार भन्नति- कहना चाहिए । अर्थात् जिन स्थानों में अस्थि नहीं होती उनके विषय में केवल चर्म अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग और शिरा वाले होने से इतना ही कहना चाहिए । मूलार्थ-धन्य अनगार की नासिका तप के कारण सूख कर ऐसी हो गई थी जैसी एक आम, आम्रातक या मातुलुंग फल की फांक कोमल २ काट कर धूप में सुखा देने से हो जाती है। धन्य अनगार की आंखें इस प्रकार दिखाई देती थीं जैसा वीणा या बद्धीसग (वाद्य विशेष) का छिद्र हो अथवा प्रभात काल का टिमटिमाता हुआ तारा हो । इसी तरह उनकी आंखें भी भीतर धंस गई थीं । धन्य अनगार के कान ऐसे हो गये थे जैसे मूली का छिल्का होता है अथवा चिर्भटी की छाल होती है या करेले का छिल्का होता है। जिस प्रकार ये सूख कर मुरझा जाते हैं इसी प्रकार उनके कान भी मुरझा गये थे । धन्य अनगार का शिर ऐसा हो गया था जैसा कोमल तुम्बक, कोमल आलू और सेफालक धूप में रखे हुए सूख जाते हैं इसी प्रकार उनका शिर सूख गया था, रूखा हो गया था और उसमें केवल अस्थि, चर्म और नासा-जाल ही दिखाई देता था किन्तु मांस और रुधिर नाममात्र के लिये भी शेष नहीं रह गया था। इसी प्रकार सब अङ्गों के विपय में जानना चाहिए। विशेषता केवल इतनी है कि उदर-भाजन, कान, जिह्वा और ओंठ इनके विपय में 'अस्थि नहीं कहना चाहिए, किन्तु केवल चर्म और नासा जाल से ही ये पहचाने जाते थे ऐसा कहना चाहिए, क्योंकि इन अङ्गों में अस्थि नहीं होती। टीका -इस सूत्र में धन्य अनगार की नासिका, कान, आंखें और शिर का वर्णन पूर्वोक्त अङ्गों के समान ही उपमा अलङ्कार के द्वारा किया गया है। शेप सब अर्थ मूलार्थ में ही स्पष्ट कर दिया गया है। इस सूत्र में अनेक प्रकार के कन्द, मूल और फलों से उपमा दी गई है। उनमें से आम्रातक, मूलक, वालुंकी और कारेल्लक ये कन्द और फल विशेपों के नाम हैं। तथा 'आलुक-कन्द-विशेषस्तच्चानेकप्रकारकं भवति । परिग्रहार्थमेलालुक- मित्युक्तम् ।' अर्थात् आलुक एक प्रकार का कन्द होता है, जो आजकल आलू के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार सूत्रकार ने धन्य अनगार के पैर से लेकर शिर तक सब अङ्गों का वर्णन कर दिया है। इसमें विशेषता केवल इतनी ही है कि उपर-भाजन, तृतीयो वर्ग:] भापाटीकासहितम् । जिहा, कान और ओठों के साथ 'अस्थि' शब्द का अन्वय नहीं करना चाहिए। शेप सब अगों के साथ "सुस्कं लुक्सं णिम्मसं-" इत्यादि सब विशेषण लगाने चाहिएं। अय सूत्रकार प्रकारान्तर से धन्य अनगार के शरीर का वर्णन करते हैं:- धन्ने णं अणगारे णं सुक्केणं भुक्खेणं पात-जंघोरुणा विगत-तडिकरालेणं कडि-कडाहेणं, पिट्ठमवस्सिएणं उदर- भायणेणं, जोइजमाणेहिं पांसुलि-कडएहिं, अक्ख-सुत्त- मालाति वागणिज-मालाति वा गणेजमाणेहिं, पिट्ठि-कर- डग-संधीहि, गंगा-तरंग-भूएणं उर-कडग-देस-भाएणं सुक्क-सप्प-समाणाहिं वाहाहिं, सिढिल-कडालीविव चलं- तेहिं यअग्ग-हत्थेहि, कंपणवातिओविव वेवमाणीए सीस- घडीए, पव्वाय-वदण-कमले, उन्भड-घडामुहे, उव्वुड्ड- णयणकोसे, जीवं जीवेणं गच्छति, जीवं जीवेणं चिट्ठति, भासं भासिस्सामीति गिलाति३ । से जहाणामते इंगाल- सगडियाति वा जहा खंदओ तहा जाव हुयासगे इव भास-रासि-पलिच्छन्ने तवेणं, तेएणं, तवतेयसिरीए उव- सोभेमाणे २ चिट्ठति । (सूत्रम् ३) धन्यो न्वनगारो नु शुष्केण (बुभुक्षायोगात् रूक्षेण), पाद-जोरुणा, विकृत-तटिकरालेन कटि-कटाहेन, पृष्ठमवधि- तेनोदर-भाजनेन, (निर्मासतया) दृश्यमानैः पार्श्वस्थि-कटकै रक्षसूत्र-मालेति वा गणित-मालेति वा गण्यमानैः पृष्ठ-करण्डक- , , ६८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग सन्धिभिगङ्गा-तरङ्गभूतेनोरः-कटकदेश-भागेन,शुष्क-सर्प-समाना- भ्यां वाहुभ्याम् , शिथिल-कटालिकेव चलद्भ्यामग्र-हस्ताभ्याम् , कम्पन-वातिक इव वेपमानया शीर्ष-घट्या (लक्षितः), अम्लान- वदन-कमलः, उद्भट-घट-मुखः, उदृत्त-नयनकोशः, जीवं जीवेन गच्छति, जीवं जीवेन तिष्ठति, भाषां भापिष्य इति ग्लायति३ । अथ यथानामकेगाल-शकटिकेति वा यथा स्कन्दकस्तथा यावद् हुताशन इव भस्म-राशि-प्रतिच्छन्नस्तपसा, तेजसा, तपस्तेजः- श्रियोपशोभमानस्तिष्ठति । (सूत्रम् ३) पदार्थान्वयः-धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार णं-दोनों वाक्यालङ्कार के लिए हैं सुक्केणं-मांस आदि के अभाव से सूखे हुए भुक्खेणं-भूख के कारण रूखे पड़े हुए पादजंघोरुणा-पैर, जङ्घा और ऊरु से विगततडिकरालेणं-मांस के क्षीण होने से पार्श्व भागों की अस्थियां नदी के तट के समान भयङ्कर रूप से जिसमें उन्नत हो रही थीं ऐसे कडिकडाहेण-कटिरूप कटाह-कच्छप-पृष्ठ या भाजन विशेष से, पिट्ठमवस्सिएणं-यकृत् , प्लीहा आदि के क्षीण होने से पीठ के साथ मिले हुए उदरभायणेणं-उदर-भाजन से, जोइजमाणेहि-निर्मास होने से दिखाई देते हुए पांसुलिकडएहि-पार्वस्थि-कटक से, अक्खसुत्तमालाति वा-रुद्राक्ष के दानों की माला अथवा गणिजमालाति वा-गिनती की माला के दाने जिस प्रकार गणेजमा- णेहि-पृथक् २ गिने जा सकते हैं इसी प्रकार मांस के अभाव से पृथक् २ गिने जाने वाले पिट्टिकरंडगसंधीहिं-पृष्ठ-करण्डक की सन्धियों से, गंगातरङ्गभूएणं- गङ्गा नदी की तरङ्गों के समान उरकडगदेसभाएणं-वक्षःस्थल रूपी कटक-वंशदलमय- चदाई के विभाग से सुक्कसप्पसमाणहि-सूखे हुए सर्प के समान बाहाहि-भुजाओं से सिढिलकडालीविव-शिथिल लगाम के समान चलंतेहिं-काँपते हुए अग्गहत्थेहिं- अम-हस्त-हाथों से कंपणवातिनो विव -कम्पन-वातिक रोग वाले पुरुष के समान वेवमाणीए-कम्पायमान सीसघडीए-शिर रूपी घटी से युक्त वह धन्य अनगार पव्वायवदणकमले-मुरझाए हुए मुख वाला उन्भडघडामुहे-ओंठों के क्षीण होने से भयङ्कर घट के मुख के समान मुख-कमल वाला उबुडणयणकोसे-जिसके नयन- .
तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम्। कोश भीतर घुस गये थे जीव-जीवन को जीवेणं-जीव की शक्ति से गच्छति-चलाता था न कि शरीर की शक्ति से जीवं जीवेणं चिट्ठति-जीव की ही शक्ति से खड़ा होता था भासं-भापा भासिस्सामि-कहूंगा इति-विचार मात्र से भी गिलाति-ग्लान हो जाता था से-अथ जहा-जैसे खंदनो-स्कन्धक जाव-यावत् भासरासिपलिच्छने- भस्म की राशि से ढके हुए हुयासणे-हुताशन-अग्नि के इव-समान तवेणं- तेएणं-तेज और तवतेयसिरीए-तप और तेज की शोभा से उवसोभेमाणे-शोभा- यमान होता हुआ चिट्ठति-विराजता है । सूत्रं ३-तीसरा सूत्र समाप्त हुआ। मूलार्थ-धन्य अनगार मांस आदि के प्रभाव से सूखे हुए, भृख के कारण रूखे पैर, जङ्घा और ऊरु से, भयङ्कर रूप से प्रान्त भागों में उन्नत हुए कटि-कटाह से, पीठ के साथ मिले हुए उदर-भाजन से, पृथक् २ दिखाई देती हुई पसलियों से, रुद्राक्ष-माला के समान स्पट गिनी जाने वाली पृष्ठ-करण्डक (पीठ के उन्नत-प्रदेशों) की सन्धियों से, गङ्गा की तरंगों के समान उदर-कटक के प्रान्त भागों से, सूखे हुए सांप के समान भुजाओं से, घोड़े की ढीली लगाम के समान चलते हुए हाथों से, कम्पनवायु रोग वाले पुरुष के शरीर के समान कांपती हुई शीर्ष-घटी से, मुरझाए हुए मुख-कमल से क्षीण अोष्ठ होने के कारण घड़े के मुख के समान विकराल मुख से और आंखों के भीतर धंस जाने के कारण इतना कृश हो गया था कि उसमें शारीरिक बल विलकुल भी बाकी नहीं रह गया था । वह केवल जीव के बल से ही चलता, फिरता और खड़ा होता था। थोड़ा सा कहने के लिये भी वह स्वयं खेद मानता था। जिस प्रकार एक कोयलों की गाड़ी चलते हुए शन्द करती है, इसी प्रकार उसकी अस्थियां भी चलते हुए शब्द करती थीं । वह स्कन्दक के समान हो गया था। भस्म से ढकी हुई आग के समान वह भीतर से दीप्त हो रहा था। वह तेज से, तप से और तप-तेज की शोभा से शोभायमान होता हुआ विचरता था । टीका-इस एक ही सूत्र में प्रकारान्तर से धन्य अनगार के सव अवयवों का वर्णन किया गया है । धन्य अनगार के पैर जङ्घा और ऊरु मांस आदि के अभाव से बिलकुल सूख गये थे और निरन्तर भूखे रहने के कारण विलकुल रूक्ष हो गये थे। चिकनाहट उनमें नाम-मात्र के लिये भी शेप नहीं थी । कटि मानो कटाह (कच्छप की पीठ अथवा भाजन विशेष-हलवाई आदियों की बड़ी २ कढाई) , ७० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः था । वह मांस के क्षीण होने से तथा अस्थियों के ऊपर उठ जाने से इतना भयङ्कर प्रतीत होता था जैसे ऊंचे २ नदी के तट हो । पेट बिलकुल सूख गया । उसमें से यकृत् और प्लीहा भी क्षीण हो गये थे । अतः वह स्वभावतः पीठ के साथ मिल गया था । पसलियों पर का भी मांस विलकुल सूख गया था और एक २ साफ २ गिनी जा सकती थी । यही हाल पीठ के उन्नत प्रदेशों का भी था। वे भी रुद्राक्ष-माला के दानों के समान सूत्र में पिरोए हुए जैसे अलग २ गिने जा सकते थे । उर के प्रदेश ऐसे दिखाई देते थे, जैसी गङ्गा की तरङ्गे हों । भुजाएँ सूख कर सूखे हुए साँप के समान हो गई थीं । हाथ अपने वश में नहीं थे और घोड़े की ढीली लगाम के समान अपने आप ही इधर-उधर हिलते रहते थे। शिर की स्थिरता भी लुप्त हो गई थी । वह शक्ति से हीन हो कर कम्पन-वायु रोग वाले पुरुष के शरीर के समान कांपता ही रहता था । इस अत्युग्र तप के कारण से जो मुख कभी खिले हुए कमल के समान लहलहाता था अब मुरझा गया था । ओंठ सूखने के कारण नहीं के समान हो गये थे। इससे मुख फूटे हुए घड़े के मुख के समान विकराल हो गया था। उनकी दोनों आंखें विलकुल भीतर धंस गई थीं । शारीरिक बल विलकुल शिथिल हो गया था और केवल जीव-शक्ति से ही चलते थे अथवा खड़े होते थे। इस प्रकार सर्वथा दुर्बल होने के कारण उनकी यह दशा हो गई थी कि किसी प्रकार की बात-चीत करने में में भी उनको स्वयं खेद प्रतीत होता था और जव कुछ कहते भी थे तो अत्यन्त कष्ट के साथ । शरीर साधारणतः इस प्रकार खचपचा गया था कि जब वे चलते थे तो अस्थियों में परस्पर रगड़ लगने के कारण चलती हुई कोयलों की गाड़ी के समान शब्द उत्पन्न होने लगता था । कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्कन्दक का शरीर तप के कारण क्षीण हो गया था। इसी प्रकार धन्य अनगार का शरीर भी हो गया था। किन्तु शरीर क्षीण होने पर भी उनकी आत्मिक-दीप्ति चढ़ रही थी और वे इस प्रकार दिखाई देते थे जैसे भस्म से आच्छादित अग्नि होती है। उनका आत्मा तप से, तेज से और इनसे उत्पन्न कान्ति से अलौकिक सुन्दरता धारण कर रहा था। इस सूत्र में कुछ एक पदों की व्याख्या हमें आवश्यक प्रतीत होती है । अतः पाठकों की मुविधा के लिए हम उनकी वृत्तिकार ने जो व्याख्या की है उसको यहां दे देते हैं:- ..
तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [७१ मुख पर 'उदरकडगदेसभाएणं' इति-उदर एव कटकस्य-वंशदलमयस्य देशभागो विभागः । 'सिढिलकडालीविव' इति शिथिला कटालिका-अश्वानां मुखसंयमनोपकरण- विशेपो लोहमयस्तद्वत् । 'उन्भडघडामुहे त्ति' उद्भदं-विकरालं क्षीणप्रायदशनच्छदवाद् घटकस्येव मुखं यस्य स तथा ।' यहां यह शङ्का उपस्थित होती है कि 'उद्भटघटमुखः' इस कथन से मुख-पत्ती बंधी हुई तो सिद्ध नहीं होती ? समाधान में कहा जाता है कि यहां पर सूत्रकार का तात्पर्य केवल तप के कारण क्षीण शरीर के वर्णन से ही है, धर्मोपकरणों के वर्णन से नहीं । यदि वे शरीर के अन्य धर्मोपकरणों का वर्णन करते और इस का न करते तो यह शङ्का उपस्थित हो सकती थी । किन्तु यहां तो किसी का भी वर्णन नहीं मिलता । उपकरणों का वर्णन जब वे अनशन के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गये, तय किया गया है। वहां उनके वस्त्र और पात्रों का उल्लेख मिलता है। अतः सिद्ध यह हुआ कि यहां सूत्रकार को उनका केवल शारीरिक वर्णन ही अभिप्रेत था। यदि इस प्रकार न माना जाय तो उनके कटि-पट्ट आदि अङ्गों के वर्णन के साथ चौलपट्ट आदि का भी वर्णन अवश्य मिलता। इस प्रकार तो उपस्थ इन्द्रिय के वर्णन न करने से लोग यह भी कहने लगेंगे कि धन्य अनगार की जननेन्द्रिय भी नहीं थी । अतः इसमें कोई सन्देह नहीं रहा कि धन्य अनगार के मुख पर धर्म-ध्वज (मुखपत्ती) सदैव बंधी रहती थी। कुछ एक हस्त-लिखित प्रतियों में कुछ पाठ-भेद भी मिलता है। यहां उनका देना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि किसी में मेषकुमार का और किसी में स्कन्धक का उदाहरण दिया गया है। जो इस विषय में विशेष जानना चाहें, उनको उक्त कुमारों का वर्णन पढ़ना चाहिए । अब सूत्रकार धन्य अनगार की उस समय के अन्य मुनियों में प्रधानता दिखाते हुए कहते हैं:- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे, गुण- सिलए चेतिते, सेणिए राया। तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे परिसा णिग्गया सेणिते ७२] [तृतीयो वर्ग: अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । नि० धम्मकहा। परिसा पडिगया। तते णं से सेणिए राया समणस्स० ३ अंतिए धम्मं सोचा निसम्म समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसति २ एवं वयासी इमंसि णं भंते ! इंदभूति-पामोक्खाणं चोदसण्हं समण-साह- स्सीणं कतरे अणगारे महा-दुक्कर-कारए चेव महा-णिज्जर- तराए चेव ? एवं खलु सेणिया ! इमासिं इंदभूति-पामो- क्खाणं चोदसण्हं समण-साहस्सीणं धन्ने अणगारे महा- दुक्कर-कारए चेव महा-णिजरतराए चेव । से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चतिइमासिं जाव साहस्सीणं धन्ने अणगारे महा-दुक्कर-कारए चेव,महा-णिजर० ? एवं खलु सेणिया! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदी नामनगरी होत्था। उप्पि पासायवडिसए विहरति । तते णं अहं अन्नया कदाति पुव्वाणुपुव्वीए चरमाणे गामानुगामं दुतिजमाणे जेणेव काकंदी णगरी जेणेव सहसंबवणे उजाणे तेणेव उवागते। अहापडिरूवं उग्गहं उ० संजमे जाव विह- रामि । परिसा निग्गता। तहेव जाव पव्वइते जाव बिल- मिव जाव आहरति । धन्नस्स अणगारस्स पादाणं सरीर-वन्नओ सव्वो जाव उवसोभेमाणे २ चिट्ठति । से तेणद्वेणं सेणिया ! एवं बुच्चति इमासिं चउदसण्हं साहस्सीणं धन्ने अणगारे महा-दुक्कर-कारए महा-निजरताए ॥
तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [ ७३ चेव । तते णं सेणिए राया समणस्स भगवतो महावीर- स्स अंतिए एयमढें सोचा णिसम्म हट्टतुट्ठ० समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिण-पयाहिणं करेति २ वंदति णमंसति २ जेणेव धन्ने अणगारे तेणेव उवा- गच्छति २ धन्नं अणगारं तिक्खुत्तो आयाहिणं करेति २ वंदति णमंसति एवं वयासी धण्णेऽसि णं तुमं देवाणु० सुपुण्णे सुकयत्थे कय-लक्खणे सुलद्धे णं देवाणु- प्पिया! तव माणुस्सए जम्म-जीविय-फले तिकटु वंदति णमंसति २ जेणेव समणे० तेणेव उवागच्छति २ समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो वंदति णमंसति २ जा- मेव दिसं पाउन्भूते तामेव दिसं पडिगए । (सूत्रम् ४) तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरम् , गुण- शैलकं चैत्यम् ,श्रेणिको राजा । तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणो भगवान् महावीरः समवसृतः । परिपन्निर्गता, श्रेणिको निर्गतः । धर्मः कथितः परिपत्प्रतिगताः । ततो नु स श्रेणिको राजा श्रमणस्य भगवतो महावीरस्यान्तिके धर्म श्रुत्वा निशम्य श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वा चैवमवादीत् “एषां भदन्त ! इन्द्रभूति-प्रमुखानांश्चतुर्दशानां श्रमण-सहस्राणां कतरोऽनगारो महा-दुष्कर-कारकश्चैव महा- निर्जरतरकश्चैव " "एवं खलु श्रेणिक! एपामिन्द्रभूति-प्रमुखाना- श्चतुर्दशानां श्रमण-सहस्राणां धन्योऽनगारोमहादुष्कर कारकश्चैव ७४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग महानिर्जरतरकश्चैव” “अथ केनार्थेन भदन्त ! एवमुच्यते एतेषा यावत् सहस्राणां महादुष्कर-कारकश्चैव महा-निर्जरतरकश्चैव ! एवं खल्लु श्रेणिक ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये काकन्दी नाम नगर्यभूत् । उपरि प्रासादावतंसके विहरति । ततो न्वहमन्यदा कदाचित् पूर्वानुपूर्व्या चरन् ग्रामानुग्राम द्रुतन् यत्रैव काकन्दी नगरी यत्रैव सहस्राम्रवनमुद्यानं तत्रैवोपागतः । यथाप्रतिरूपक- मवग्रहमवगृह्य संयमेन यावद् विहरामि । परिपन्निर्गता । तथैव यावत्प्रव्रजितः। यावद् विलमिव यावदाहारयति । धन्यस्य न्वन- गारस्य पादयोः, शरीरवर्णनं सर्व यावदुपशोभमानस्तिष्ठति अथ तेनार्थेन श्रेणिक ! एवमुच्यते-एतेषांश्चतुर्दशानां श्रमण- सहस्राणां धन्योऽनगारो महादुष्कर-कारको महा-निर्जरतरकश्चैव । ततो नु स श्रेणिको राजा श्रमणस्य भगवतो महावीरस्यान्तिके एतमर्थं श्रुत्वा निशम्य हृष्टस्तुष्टो यावत् श्रमणस्य भगवतो महा- वीरस्य त्रिकृत्व आदक्षिण-प्रदक्षिणां करोति, कृत्वा वन्दति नम- स्यति च, वन्दित्वा नत्वा च यत्रैव धन्योऽनगारस्तत्रैवोपाग- च्छति, उपागत्य धन्यस्यानगारस्य त्रिकृत्व आदक्षिण-प्रदक्षिणां करोति, कृत्वा (तं) वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वैवमवा- दीत्-धन्योऽसि त्वं देवानुप्रिय ! सुपुण्यः सुकृतार्थः कृत-लक्षणः सुलब्धन्नु देवानुप्रिय ! त्वया मानुपकं जन्मजीवित-फलमिति- कृत्वा वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वा यत्रैव श्रमणः तत्रै- वोपागच्छति, उपागत्य श्रमणं भगवन्तं महावीरं त्रिकृत्वो वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वा च यस्य दिशः प्रादुर्भूत- तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [७५ स्तामेव दिशं प्रतिगतः । ( सूत्रम् ४) पदार्थान्वयः-तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय रायगिहे-राजगृह नाम का णगरे-नगर था और उसके बाहर गुणसिलए-गुण- शैलक चेतिते-चैत्य । सेणिए-श्रेणिक नाम का राया-राजा राज्य करता था । तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय समणे-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरे-महावीर स्वामी समोसढे-उस गुणशैलक चैत्य में विराजमान हो गये यह समाचार पाकर परिसा-नगर की जनता णिग्गया-धर्म-कथा सुनने के लिए श्री भगवान् के पास गई सेणिते- श्रेणिक राजा भी नि०-गया धम्मकहा-श्री भगवान् ने धर्म-कथा की और परिसा-परिपद् पडिगया-अपने २ घर वापिस चली गई । तते णं-इसके अनन्तर से-वह सेणिए-श्रेणिक राया-राजा समणस्स-श्रमण भगवान महावीर स्वामी के अंतिए-पास धम्म-धर्म को सोचा-सुनकर और उसका निसम्म-मनन कर समणं-श्रमण भगवं-भगवान महावीर-महावीर की वंदति-वन्दना करता है उनको णमंसति २-नमस्कार करता है, वन्दना और नमस्कार कर एवं-इस प्रकार वयासी कहने लगा भंते-हे भगवन् ! इमासिं-इन इंदभूतिपामोक्खाणं-इन्द्रभूति प्रमुख चोद्दसएहं-चौदह समणसाहस्सीणं-हजार श्रमणों में कतरे-कौनसा अण- गारे -अनगार महादुक्करकारए चेव-अति दुष्कर क्रिया करने वाला है और महा- णिजरतराएं चेव-महाकमों की निर्जरा करने वाला है ? यह सुनकर श्री भगवान् कहने लगे सेणिया-हे श्रेणिक एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से इमासि-इन इंदभूति- पामोक्खाणं-इन्द्रभूति-प्रमुख चोदसएहं-चौदह समणसाहस्सीणं-हजार श्रमणों में धने-धन्य अणगारे-अनगार महादुक्करकारए-अत्यन्त दुष्कर क्रिया करने वाला है और महाणिजरतराए चैव-बड़ा कमों की निर्जरा करने वाला है । यह सुनकर श्रेणिक राजा कहने लगा भंते-हे भगवन् !से-अथ केण्टेणं-किस कारण से एवं- इस प्रकार वुचति-आप ऐसा कहते हैं कि इमार्सि-इन जाव-यावत इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह साहस्सीणं-हजार अनगारों में धने-धन्य अणगारे- -अनगार ही महादुकर- कारए चैव-अत्यन्त दुप्कर तप करने वाला और महाणिजर०-यड़ा कर्मों की निर्जरा करने वाला है ? उत्तर में श्री भगवान् कहने लगे सेणिया-हे श्रेणिक! एवं खलु- ७६] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग: इस प्रकार निश्चय से तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय का- कंदी-काकन्दी नाम-नाम वाली नगरी-नगरी होत्था-थी और वहां धन्य कुमार उप्पि-ऊपर पासायवडिसए-श्रेष्ठ प्रासाद में विहरति-विचरण करता था तते णं- उसी समय अहं-मैं अन्नया-अन्यदा कदाति-कदाचित् पुवाणुपुबीए-अनुक्रम से चरेमाणे-विहार करता हुआ गामाणुगाम-एक ग्राम से दूसरे ग्राम में दूतिज- माणे-विहार करता हुआ जेणेव-जहां काकंदी-काकन्दी नाम की एगरी- नगरी थी जेणेव-जहां सहसंबवणे-सहस्राम्रवन उज्जाणे-उद्यान था तेणेव- वहीं उवागते-आया आहापडिरूवं-यथा-प्रतिरूप उग्गह-अवग्रह लिया और उ०२-अवग्रह लेकर संजमे-संयम और तप के द्वारा अपनी आत्मा की भावना करते हुए जाव-यावत् विहरामि-विचरण करने लगा तव परिसा-परिपद् निग्गता- धर्म-कथा सुनने के लिए नगर से सहस्राम्रवन में उपस्थित हुई तहेव-उसी प्रकार से धन्य अनगार भी आया और धर्म-कथा सुनकर पवइते-दीक्षित हो गया जाव- यावत् उसने कठिन से कठिन तप प्रारम्भ कर दिया और चिलमिव-जिस प्रकार सर्प आसानी से बिल में घुस जाता है इसी प्रकार वह बिना किसी लालसा के आहा- रेति-आहार करता है। फिर धन्नस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार के पादायं- पैर मांस और रुधिर से रहित होकर सूख गये इसी प्रकार सरीरवन्नो-सारे. शरीर का वर्णन कहना चाहिए । वह सव्वो जाव-सब अवयवों के तप-रूप लावण्य से उवसोभेमाणे--शोभायमान होता हुआ चिट्टति-विराजमान हो गया। से-अथ तेणदेणं-इस कारण सेणिया-हे श्रेणिक एवं-इस प्रकार बुच्चति-मैं कहता हूं कि इमासिं-इन चउदसण्हं-चौदह साहस्सीणं-हजार मुनियों में धने-धन्य अंणगारे- अनगार महादुकरकारए-अत्यन्त कठिन तप करने वाला और महानिजरतराए चेव- सब से श्रेष्ट कर्मों की निर्जरा करने वाला है तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार. के लिये है से-वह सेणिए-श्रेणिक राया-राजा समणस्स-श्रमण भगवतो-भगवान् महावीरस्स-महावीर के अंतिए--पास एयम8-इस बात को सोचा-सुनकर और उसका णिसम्म -मनन कर हहतुट्ट०-हृष्ट और तुष्ट होकर जाव-यावत समणं-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरं-महावीर को तिक्खुत्तो-तीन बार श्यायाहिणपयाहिणं- आदक्षिणा और प्रदक्षिणा करेति २-करता है और आदक्षिणा और प्रदक्षिणा कर उनकी वंदति-वन्दना करता है और णमंसति २-नमस्कार करता है और तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [७७ वन्दना और नमस्कार कर जेणेव-जहां धने-धन्य अणगारे-अनगार था तेणेव-वहीं उवागच्छति २-आता है और आकर धन्न-धन्य अणगारं-अनगार को तिक्खुत्तो- तीन बार आयाहिणपयाहिणं-आदक्षिणा और प्रदक्षिणा कर वंदति-उनकी वन्दना करता है और णमंसति-उनको नमस्कार करता है । वन्दना और नमस्कार कर एवं-इस प्रकार क्यासी-कहने लगा देवाणु०-हे देवानुप्रिय ! तुम-तुम धरणेसि-- धन्य हो सुपुरणे-तुम्हारे अच्छे पुण्य हैं सुकयत्थे-तुम कृतार्थ हुए कयलक्खणे- शुभ लक्षणों से युक्त हो देवाणुप्पिया-हे देवानुप्रिय! माणुसए-मानुप जम्मजीविय- फले -जन्म के जीवन का फल तुमने सुलद्धे-अच्छी तरह प्राप्त कर लिया है तिकटु-इस प्रकार स्तुति कर वंदति-उनकी वन्दना करता है और णमंसति-उनको नमस्कार करता है और वन्दना और नमस्कार करके जेणेव-जहां समणे०-श्रमण भगवान् महावीर स्वामी थे तेणेव- वहीं उबागच्छति २-आता है और आकर समणं-श्रमण भगवं-भगवान महावीरं-महावीर स्वामी की तिक्खुत्तो-तीन बार वंदति-वन्दना करता है और उनको णमंसति-नमस्कार करता है, वन्दना और नमस्कार कर जामेव-जिस दिसं-दिशा से पाउन्भूते -प्रकट हुआ था तामेव-उसी दिसं-दिशा को पडिगए-वापिस चला गया । सूत्रं ४-चौथा सूत्र समाप्त हुआ। मूलार्थ-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर था। उसके वाहिर गुणशैलक नाम का चैत्य या उद्यान था । वहां श्रेणिक राजा राज्य करता था। उसी काल और उसी समय में श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी उक्त चैत्य में विराजमान हो गये। नगर की जनता यह सुनकर नगर से बाहर निकली और श्री भगवान् की सेवा में उपस्थित हुई और साथ ही श्रेणिक राजा भी उपस्थित हुआ। श्री भगवान् ने धर्म-कथा सुनाकर सब को सन्तुष्ट किया और सब लोग नगर को वापिस चले गये । श्रेणिक राजा ने इस कथा को सुन कर और उसका मनन कर श्री भगवान की वन्दना की और उनको नमस्कार किया । फिर वन्दमा और नमस्कार कर बोला-"हे भगवन् ! इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में कौनसा श्रमण अत्यन्त कठोर तप का अनुष्ठान करने वाला और सब से बड़ा कर्मों की निर्जरा करने वाला है ?" यह सुनकर श्री भगवान् कहने लगे-“हे श्रेणिक ! इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार अत्यन्त कठोर तप का अनुष्ठान करने वाला और सबसे बड़ा ७८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्। [तृतीयो वर्गः करते हुए कमों की निर्जरा करने वाला है।" (श्री भगवान् के मुख से यह सुनकर फिर श्रेणिक राजा ने कहा) "हे भगवन् ! किस कारण से श्राप कहते हैं कि चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार ही कठोर तप करने वाला और सर से बड़ा को की निर्जरा करने वाला है।" (श्रेणिक राजा के इस प्रश्न को सुनकर समाधान श्री भगवान् कहने लगे) "हे श्रेणिक ! उस काल और उस समय में एक काकन्दी नाम वाली नगरी थी। उसके बाहर सहस्राम्रवन नाम का उद्यान था। (यह उद्यान सब ऋतुओं में हरा-भरा रहता था । काकन्दी नगरी म भद्रा नाम की एक सार्थवाहिनी रहती थी। वह धन-धान्य से परिपूर्ण थी। उसका धन्य नाम वाला एक पुत्र था, जो यौवनावस्था में विवाहित होकर) श्रेष्ठ प्रासादों में सुख का अनुभव करता हुआ विचरण करता था। इसी समय कमी पूर्वानुपूर्वी से विचरता हुश्रा, एक ग्राम से दूसरे ग्राम में विहार करता हुआ मैं जहां काकन्दी नगरी थी और जहां सहस्राम्रवन उद्यान था वहीं पहुंच गया और यथा प्रतिरूप अवग्रह लेकर संयम और तप के द्वारा अपनी आत्मा की भावना करते हुए वहीं पर विचरने लगा | नगरी की जनता यह सुनकर वहां आई और मैंने उनको धर्म-कथा सुनाई । धन्य अनगार के ऊपर इसका विशेष प्रभाव पड़ा और वह तत्काल ही गृहस्थ को छोड़ कर साधु-धर्म में दीक्षित हो गया । (उसने तमी से कठोर-व्रत धारण कर लिया और केवल आचाम्ल से पारण करने लगा । वह जब आहार और पानी भिक्षा से लाता था तो मुझको दिखाकर) जिस प्रकार सर्प बिल में बिना किसी परिश्रम के घुस जाता है इसी प्रकार विना किसी लालसा के आहार करता था । धन्य अनगार के पादों से लेकर सारे शरीर का वर्णन पूर्ववत् जानना चाहिए । उसके सब अङ्ग तप-रूप लावण्य से शोभित हो रहे थे । इसीलिए हे श्रेणिक ! मैंने कहा है कि चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार महातप और महा-कर्मों की निर्जरा करने वाला है । जब श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के मुख से श्रेणिक राजा ने यह सुना और इस पर विचार किया तो हृदय में अत्यन्त प्रसन्न और सन्तुष्ट हुआ और इस प्रकार प्रफुल्लित होकर उसने श्रमण भगवान महावीर स्वामी की तीन बार आदक्षिणा और प्रदक्षिणा की, उनकी वन्दना की और नमस्कार किया, वन्दना और नमस्कार कर जहां धन्य अनगार था वहां गया । वहां जाकर उसने धन्य अनगार तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [७९ की तीन बार आदक्षिणा और प्रदक्षिणा की । वन्दना और नमस्कार किया तथा वन्दना और नमस्कार कर कहने लगा कि हे देवानु- प्रिय ! तुम धन्य हो, श्रेष्ठ पुण्य वाले हो, श्रेष्ठ कार्य करने वाले हो, श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त हो और तुमने ही इस मनुष्य जीवन का श्रेष्ठ फल प्राप्त किया है । इस प्रकार स्तुति कर और फिर उनको नमस्कार कर वह जहां श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी थे वहीं श्रागया। वहां श्रमण भगवान को तीन बार नमस्कार किया और वन्दना की। फिर जिस दिशा से आया था उसी दिशा में चला गया। इस प्रकार चौथा सूत्र समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र का अर्थ मूलार्थ में ही स्पष्ट हो गया है। अतः इस विपय में कुछ भी वक्तव्य शेप नहीं है। हां, अव वक्तव्य इतना अवश्य है कि इस सूत्र से हमें तीन शिक्षाएं मिलती हैं। उनमें से पहली तो यह है कि जिसमें जो गुण हों उनका निःसङ्कोच-भाव से वर्णन करना चाहिए। और गुणवान् व्यक्ति का धन्यवाद आदि से उत्साह बढ़ाना चाहिए । जैसे यहां पर श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने किया। उन्होंने धन्य अनगार के कठोर तप का यथातथ्य वर्णन किया और उसको उसके लिये धन्य- वाद भी दिया। दूसरी शिक्षा हमें यह मिलती है कि एक बार जब संसार से ममत्व-भाव छोड़ दिया तो फिर सम्यक् तप के द्वारा आत्म-शुद्धि अवश्य कर लेनी चाहिए । यही संसार के इतने सुखों को त्यागने का फल है । जो व्यक्ति साधु चन कर भी ममत्व में ही फंसा रहे उसको उस त्याग से किसी प्रकार की भी सफ- लता की आशा नहीं करनी चाहिए । क्योंकि इस प्रकार करने से तो वह कहीं का नहीं रहता और उसका इह-लोक और पर-लोक दोनों ही विगड़ जाते हैं । यहां धन्य अनगार ने हमारे सामने कितना अच्छा उदाहरण रखा है कि उन्होंने जय एक बार गृहस्थ के सारे सुखों को त्याग साधु-वृत्ति ग्रहण कर ली तो उसको सफल बनाने के लिये उत्कृष्ट से उत्कृष्ट तप किया और लोगों को बता दिया कि किस प्रकार तप के द्वारा आत्म-शुद्धि होती है और कैसे उक्त तप से आत्मा सुशोभित किया जाता है । तीसरी, शिक्षा जो हमें इससे मिलती है वह यह है कि जब किसी व्यक्ति की स्तुति करनी हो तो उसमें वास्तव में जितने गुण हों उन सब का वर्णन करना ८०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः . चाहिये । कहने का अभिप्राय यह है कि जितने गुण उस व्यक्ति में विद्यमान हों उन्हीं को लक्ष्य में रख कर स्तुति करना उचित है न कि और असत्य गुणों का आरोपण करके भी क्योंकि ऐसी स्तुति प्रशंसनीय होने के बजाय हास्यास्पद बन जाती है । ऐसी स्तुति हास्यास्पद ही नहीं बल्कि इससे स्तुति करने वाले को दोष भी लगता है । अतः झूठी प्रशंसा कर निरर्थक ही किसी को चाँसों पर नहीं चढ़ाना चाहिए । यही तीन शिक्षाएं हैं, जो हमें इस सूत्र से मिलती हैं । इनके द्वारा उन्नति की ओर बढ़ता हुआ आत्मा सुशोभित होता है। अब सूत्रकार धन्य अनगार के तप के अनन्तर की दशा का वर्णन करते हैं:- तए णं तस्स धण्णस्स अणगारस्स अन्नया कयाति पुव्व-रत्तावरत्तकाले धम्मजागरियं० इमेयारूवे अन्भत्थिते ५एवंखलु अहं इमेणं ओरालेणं जहा खंदओ तहेव चिंता आपुच्छणं थेरेहिं सद्धि विउलं दुरूहंति मासिया संले- हणा नवमासपरियातो जाव कालमासे कालं किच्चा उड्ढे चंदिम जा णव य गेविज विमाणपत्थडे उड्ढं दुरं वीति- वत्तित्ता सव्वदृसिद्धे विमाणे देवत्ताए उववन्ने । थेरा तहेव उयरंति जाव इमे से आयारभंडए । भंते त्ति भगवं गोतमे तहेव पुच्छति जहा खंदयस्स । भगवं वागरेति जाव सव्वदृसिद्धे विमाणे उववण्णे । धन्नस्स णं भंते ! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णत्ता ? गोतमा! तेत्तीसं साग- रोवमाई ठिती पन्नत्ता । से णं भंते ! ततो देव-लोगाओ कहिं गच्छिहिंति ? कहिं उववज्जिहिंति ? गोयमा! महा- विदेहे वासे सिझिहिति ५। तं एवं खलु जंवू ! समणेणं तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [८१ जाव संपत्तेणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते । (सूत्रं ५) पढमं अज्झयणं समत्तं । ततो नु तस्य धन्यस्यानगारस्यान्यदा कदाचित् पूर्व- रात्रापरात्र-काले धर्म-जागरिकैतद्रूपाध्यात्मिका ५ । एवं खल्वह- मनेनौदारेण यथा स्कन्दकः, तथैव चिन्तापृच्छणा। स्थविरैः सार्धं विपुलमारोहति ।मासिकी संलेखना,नवमास-पर्यायः,यावत् काल- मासे कालं कृत्वोचं चन्द्र० यावन्नव च ग्रैवेयक-विमान-प्रस्तटा- दूर्व दूरंव्यतिक्रम्य सर्वार्थसिद्धे विमाने देवतयोत्पन्नः । स्थविरा- स्तथैवावतरन्ति। यावदिमान्याचारभण्डकानि । भदन्तेति गौतम- स्तथैव पृच्छति । यथा स्कन्धस्य भगवान् व्याकरोति यावत्सर्वार्थ- सिद्ध विमाने उत्पन्नः । “धन्यस्य नु भदन्त ! देवस्य कियन्तं कालं स्थितिःप्रज्ञप्ता?" "गौतम!त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा स्थितिः प्रज्ञप्ता ।” “स तु भदन्त ! ततो देवलोकात् कुत्र गमिष्यतीति ? कुत्रोत्पत्स्यतीति ?” “गौतम ! महाविदेहे वासे सेत्स्यतीति ।" तदेवं खलु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन प्रथमस्याध्य- यनस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । (सूत्रम् ५) प्रथमाध्ययनं समाप्तम् । पदार्थान्वयः–तए-इसके अनन्तरं -याक्यालङ्कार के लिए है तस्स- उस धनस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार को अन्नया-अन्यदा कयाति-किसी समय पुनरत्तावरत्तकाले-मध्य-रात्रि के समय धम्मजागरियं-धर्म-जागरण करते हुए इमेयारूवे-इस प्रकार के अन्भत्थिते-आध्यात्मिक विचार उत्पन्न हुए अहं-मैं एवं- इस प्रकार खलु-निश्चय से इमेणं-इस ओरालेणं-उदार तप के कारण से जहा- जैसा खंदनो-स्कन्दक हुआ उसी प्रकार हो जाऊं और तदनुसार ही उसको जैसी स्कन्दक को हुई थी तहेव-उसी प्रकार चिंता-अनशन करने की चिन्ता ८२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्ग उत्पन्न हुई उसी प्रकार आपुच्छणं-श्री भगवान से पूछा और पूछकर थेरेहि- स्थविरों के सद्धि-साथ विउले-विपुलगिरि पर दुरूहंति-चढ़ गया मासिया- मासिकी संलेहणा-संलेखना की नवमास-नौ महीने तक परियातो-संयम-पर्याय का पालन किया जाव-यावत् कालमासे-मृत्यु के समय कालं किचा-काल के द्वारा उड़े- ऊंचे चंदिम-चन्द्रमा से जाव-यावत् य-पुनः णव-नव गेविज्जविमाण-पत्थडे- प्रैवेयक विमानों के प्रस्तट से उड़े-ऊंचे दूर-दूर वीतिवत्तित्ता-व्यतिक्रम करके सबट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमाणे-विमान में देवत्ताए-देव-रूप से उववन्ने-उत्पन्न हो गया । थेरा-स्थविर तहेव-उसी प्रकार उयरंति-विपुलगिरि से उतर गये और जाव-यावत् श्री भगवान से कहने लगे कि हे भगवन से-उस धन्य अनगार के इमे- ये आयारभंडए-आचार-भण्डोपकरण हैं अर्थात ये उसके वस्त्र-पात्र आदि उपकरण है इसके अनन्तर भगवं-भगवान् गोतमे-गौतम तहेव-उसी प्रकार पुच्छति- श्री भगवान से पूछते हैं जहां-जैसे खंदयस्स-स्कन्दक के विषय में पूछा था भगवं- श्री भगवान् इसके उत्तर में वागरेति-प्रतिपादन करते हैं कि जाव-यावत् धन्य अनगार सव्वट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमाणे-विमान में उववरणे-देव-रूप से उत्पन्न हो गया। णं-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिये है भंते ! हे भगवन् ! इस प्रकार से फिर गौतम स्वामी जी ने श्री भगवान से पूछा धनस्स-धन्य देवस्स-देव की केवतियं-कितने कालं-काल की ठिती-स्थिति पएणता-प्रतिपादन की है ? उत्तर में श्री भगवान् कहते हैं कि गोयमा !-हे गौतम तेत्तीसं-तेतीस सागरोवमाई- सागरोपम की ठिती-स्थिति पन्नत्ता-प्रतिपादन की है। णं-पूर्ववत् भंते-हे भगवन् ! से-वह धन्य देव ततो-उस देवलोगानो-देवलोक से च्युत होकर कहिं-- कहां पर गच्छिहिंति-जायगा ? कहि-कहां उववज्जिहिंति-उत्पन्न होगा ? भग- वान् इसके उत्तर में कहते हैं गोयमा-हे गौतम ! महाविदेहे-महाविदेह वासे- क्षेत्र में सिज्झिहिति ५-सिद्ध होगा। तं-सो एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जंबू-हे जम्बू! समयेणं-श्रमण भगवान ने जाव-यावत् जो संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं पढमस्स-(तृतीय वर्ग के) प्रथम अज्झयणस्स-अध्ययन का अयमढे-यह अर्थ पन्नते-प्रतिपादन किया है। सूत्रं ५-पञ्चम सूत्र समाप्त हुआ । पडम-प्रथम अज्झ- यणं-अध्ययन समत्-समाप्त हुआ। मूलार्थ-तब उस धन्य अनगार को नम तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् [८३ धर्म-जागरण करते हुए इस प्रकार के आध्यात्मिक विचार उत्पन्न हुए कि मैं इस उत्कृष्ट तप से कृश हो गया हूं अतः प्रभात काल ही स्कन्दक के समान श्री भगवान् से पूछकर स्थविरों के साथ विपुलगिरि पर चढ़कर अनशन व्रत धारण कर लूं । उसने तदनुसार ही श्री भगवान की आज्ञा ली और विपुलगिरि पर अनशन व्रत धारण कर लिया । इस प्रकार एक मास तक इस अनशन व्रत को पूर्ण कर और नौ मास तक दीक्षा का पालन कर वह काल के समय काल करके चन्द्र से ऊंचे यावत् नव-ग्रैवेयक विमानों के प्रस्तटों को उल्लइन कर सर्वार्थसिद्ध विमान में देव-रूप से उत्पन्न हो गया । तब स्थविर विपुलगिरि से नीचे उतर आये और भगवान् से कहने लगे कि हे भगवन् ! ये उस धन्य अनगार के वस्त्र- पात्र आदि उपकरण हैं । तब भगवान् गौतम ने श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी से प्रश्न किया कि हे भगवन् ! धन्य अनगार समाधि से काल कर कहां उत्पन्न हुआ है । भगवान् ने इसके उत्तर में कहा कि हे गौतम ! धन्य अनगार समाधि-युक्त मृत्यु प्राप्त कर सर्वार्थसिद्ध विमान में देव-रूप से उत्पन्न हुआ । गौतम स्वामी ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! धन्य देव की वहां कितने काल की स्थिति है ? भगवान् ने उत्तर दिया कि तेतीस सागरोपम धन्य देव की वहां स्थिति है। गौतम ने प्रश्न किया कि देवलोक से च्युत होकर वह कहां जायगा और कहां पर उत्पन्न होगा ? भगवान् ने कहा कि वह महाविदेह क्षेत्र में सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो निर्वाण-पद प्राप्त कर सब दुःखों से विमुक्त हो जायगा । श्री सुधर्मा स्वामी जी कहते हैं कि हे जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है। पांचवां सूत्र समाप्त । प्रथमाध्ययन समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की अन्तिम समाधि का वर्णन किया गया है और उसके लिए सूत्रकार ने धन्य अनगार की स्कन्दक संन्यासी से उपमा दी है । इस प्रकार तप करते हुए धन्य अनगार को एक समय मध्य रात्रि में जाग- रण करते हुए विचार उत्पन्न हुआ कि मुझ में अभी तक उठने की शक्ति विद्यमान है और मेरे धर्माचार्य श्री भगवान महावीर स्वामी मी अभी तक विद्यमान हैं तो फिर ऐसी सुविधा होने पर भी मैं अनशन व्रत धारण क्यों न कर लूं । इस विचार ८४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः के आते ही उन्होंने प्रातः काल ही श्री भगवान् की आज्ञा ली और आत्म-विशुद्धि के लिये पञ्च महाव्रतों का पाठ पढ़ा तथा उपस्थित श्रमण और श्रमणियों से क्षमा प्रार्थना कर तथा-रूप स्थविरों के साथ शनैः २ विपुलगिरि पर चढ़ गये । वहां पहुंच कर उन्होंने कृष्ण-वर्णीय पृथिवी-शिला-पट्ट पर प्रतिलेखना कर दर्भ का संस्तारक विछाया और पद्मासन लगाकर बैठ गये। फिर दोनों हाथ जोड़े और उनसे शिर पर आवर्तन किया । इस प्रकार पूर्व दिशा की ओर मुख कर 'नमोत्थुणं' के द्वारा पहले सव सिद्धों को नमस्कार किया, फिर उसीसे श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी को भी नमस्कार किया और कहा कि हे भगवन् ! आप वहीं पर बैठ कर सब कुछ देख रहे हैं अतः मेरी वन्दना स्वीकार करें और मैंने पहले ही आपके समक्ष अष्टादश पापों का त्याग किया था अब मैं आपकी ही साक्षी देकर उनका फिर से जीवन भर के लिये परित्याग करता हूं। इनके साथ ही साथ अव अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य पदार्थों का भी परित्याग करता हूं । अपने परम प्रिय शरीर के ममत्व को भी छोड़ता हूं तथा आज से पादोपगमन नामक अनशन व्रत धारण करता हूं। इस प्रकार श्री भगवान् की वन्दना कर और उनको साक्षी कर उक्त प्रण किया और उसीके अनुसार विचरने लगे । उन्होंने सामायिक आदि से लेकर एकादश अगों का अध्ययन किया और एक मास तक अनशन व्रत धारण कर अन्त में समाधि-मरण प्राप्त किया। उनकी सब दीक्षा की अवधि केवल नौ मास हुई, जिस में साठ भक्त अशन छेदन कर आलोचना द्वारा सर्वोत्तम उक्त समाधि-मरण प्राप्त किया। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यहां कहा गया है कि उन्होंने साठ भक्तों का परित्याग किया तो प्रत्येक को जिज्ञासा हो सकती है कि भक्त किसे कहते है ? उत्तर में कहा जाता है कि प्रत्येक दिन के दो भक्त अर्थात् आहार या भोजन होते हैं । इस प्रकार एक मास के साठ भक्त हो जाते हैं। इसके विपय में वृत्तिकार भी यही लिखते हैं-"प्रतिदिनं भोजनद्वयस्य परित्यागात्रिंशता दिनैः पष्टिभक्तानां त्यक्ता भवन्ति” अर्थ स्पष्ट कर दिया गया है। इस प्रकार जय धन्य अनगार ने एक मास पर्यन्त अनशन धारण किया तो साठ भक्तों के परित्याग में कोई सन्देह ही नहीं रहता । उन भक्तों का परित्याग कर धन्य अनगार स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुए यह सव स्पष्ट ही है। ..
तृतीयो वर्गः1 भाषाटीकासहितम् । जब समीप रहने वालों ने देखा कि धन्य अनगार अपनी इह-लीला संवरण कर स्वर्ग को प्राप्त हो गये हैं तो उन्होंने परिनिर्वाण-प्रत्ययक कायोत्सर्ग किया अर्थात् 'परिनिर्वाणम् -मरणं यत्र, यच्छरीरस्य परिठापनं तदपि परिनिर्वाण- मेव, तदेव प्रत्ययो-हेतुर्यस्य स परिनिर्वाणप्रत्ययः' भाव यह है कि मृत्यु के अनन्तर जो ध्यान किया जाता है उसको परिनिर्वाण-प्रत्यय कहते हैं। यहां समीपस्थ स्थविरों ने धन्य अनगार की मृत्यु को देखकर कायोत्सर्ग (ध्यान) किया। फिर उनके वस्त्र-पात्र आदि उपकरण उठाकर लाये और श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के पास आकर और उनको धन्य अनगार के समाधि-मरण का समस्त वृत्तान्त सुना दिया और उनके गुणों का गान किया, उनके उपशम-भाव की प्रशंसा की तथा उनके उक्त वस्त्र आदि उपकरण श्री भगवान् को दिखा दिये । इतना सब हो जाने पर श्री गौतम स्वामी ने श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी की वन्दना की और उनसे प्रश्न किया कि हे भगवन् ! आपका विनयी शिष्य धन्य अनगार समाधि-मरण प्राप्त कर कहां गया, कहां उत्पन्न हुआ है, वहां कितने काल तक उसकी स्थिति होगी और तदनन्तर वह कहां उत्पन्न होगा ? इसके उत्तर में श्री भगवान ने कहा कि हे गौतम ! मेरा विनयी शिष्य धन्य अनगार समाधि- मरण प्राप्त कर सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुआ है, वहां उसकी तेतीस साग- रोपम स्थिति है और वहां से च्युत होकर वह महाविदेह क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त करेगा अर्थात् सिद्ध, बुद्ध और मुक्त होकर परिनिर्वाण-पद प्राप्त कर सय दुःखों का अन्त कर देगा। यह सुनकर श्री गौतम भगवान् परम प्रसन्न हुए । इस सूत्र से हमें शिक्षा प्राप्त होती है कि प्रत्येक व्यक्ति को आलोचना आदि क्रिया करके समाधि-पूर्वक मृत्यु प्राप्त करनी चाहिए जिससे वह सञ्चा आराधक होकर मोक्षाधिकारी बन सके । इस प्रकार श्री सुधर्मा स्वामी श्री जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू ! जिस प्रकार मैंने उक्त अध्ययन का अर्थ श्रवण किया है उसी प्रकार तुम्हारे प्रति कहा है अर्थात मेरा यह कथन केवल भगवान् के कथन का अनुवाद मात्र है। इसमें अपनी बुद्धि से कुछ भी नहीं कहा । तृतीय वर्ग का प्रथमाध्ययन समाप्त ।
८४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः । के आते ही उन्होंने प्रातः काल ही श्री भगवान् की आज्ञा ली और आत्म-विशुद्धि के लिये पञ्च महाव्रतों का पाठ पढ़ा तथा उपस्थित श्रमण और श्रमणियों से क्षमा प्रार्थना कर तथा-रूप स्थविरों के साथ शनैः २ विपुलगिरि पर चढ़ गये। वहां पहुंच कर उन्होंने कृष्ण-वर्णीय पृथिवी-शिला-पट्ट पर प्रतिलेखना कर दर्भ का संस्तारक बिछाया और पद्मासन लगाकर बैठ गये। फिर दोनों हाथ जोड़े और उनसे शिर पर आवर्तन किया । इस प्रकार पूर्व दिशा की ओर मुख कर 'नमोत्थुणं' के द्वारा पहले सब सिद्धों को नमस्कार किया, फिर उसीसे श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी को भी नमस्कार किया और कहा कि हे भगवन् ! आप वहीं पर बैठ कर सब कुछ देख रहे हैं अतः मेरी वन्दना स्वीकार करें और मैंने पहले ही आपके समक्ष अष्टादश पापों का त्याग किया था अब मैं आपकी ही साक्षी देकर उनका फिर से जीवन भर के लिये परित्याग करता हूं । इनके साथ ही साथ अव अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य पदार्थों का भी परित्याग करता हूं। अपने परम प्रिय शरीर के ममत्व को भी छोड़ता हूं तथा आज से पादोपगमन नामक अनशन व्रत धारण करता हूं। इस प्रकार श्री भगवान् की वन्दना कर और उनको साक्षी कर उक्त प्रण किया और उसीके अनुसार विचरने लगे । उन्होंने सामायिक आदि से लेकर एकादश अङ्गों का अध्ययन किया और एक मास तक अनशन व्रत धारण कर अन्त में समाधि-मरण प्राप्त किया। उनकी सव दीक्षा की अवधि केवल नौ मास हुई, जिस में साठ भक्त अशन छेदन कर आलोचना द्वारा सर्वोत्तम उक्त समाधि-मरण प्राप्त किया। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यहां कहा गया है कि उन्होंने साठ भक्तों का परित्याग किया तो प्रत्येक को जिज्ञासा हो सकती है कि भक्त किसे कहते हैं ? उत्तर में कहा जाता है कि प्रत्येक दिन के दो भक्त अर्थात् आहार या भोजन होते हैं । इस प्रकार एक मास के साठ भक्त हो जाते हैं। इसके विपय में वृत्तिकार भी यही लिखते हैं-"प्रतिदिनं भोजनद्वयस्य परित्यागास्त्रिशता दिनैः पष्टिर्भक्तानां त्यक्ता भवन्ति" अर्थ स्पष्ट कर दिया गया है। इस प्रकार जव धन्य अनगार ने एक मास पर्यन्त अनशन धारण किया तो साठ भक्तों के परित्याग में कोई सन्देह ही नहीं रहता । उन भक्तों का परित्याग कर धन्य अनगार स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुए यह सब स्पष्ट ही है।
वतीयो वर्गः1 भाषाटीकासहितम् । [८५ जब समीप रहने वालों ने देखा कि धन्य अनगार अपनी इह-लीला संवरण कर स्वर्ग को प्राप्त हो गये हैं तो उन्होंने परिनिर्वाण-प्रत्ययक कायोत्सर्ग किया अर्थात् 'परिनिर्वाणम् -मरणं यत्र, यच्छरीरस्य परिष्ठापनं तदपि परिनिर्वाण- मेव, तदेव प्रत्ययो-हेतुर्यस्य स परिनिर्वाणप्रत्ययः' भाव यह है कि मृत्यु के अनन्तर जो ध्यान किया जाता है उसको परिनिर्वाण-प्रत्यय कहते हैं। यहां समीपस्थ स्थविरों ने धन्य अनगार की मृत्यु को देखकर कायोत्सर्ग (ध्यान) किया । फिर उनके वस्त्र-पान आदि उपकरण उठाकर लाये और श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास आकर और उनको धन्य अनगार के समाधि-मरण का समस्त वृत्तान्त सुना दिया और उनके गुणों का गान किया, उनके उपशम-भाव की प्रशंसा की तथा उनके उक्त वस्त्र आदि उपकरण श्री भगवान को दिखा दिये। इतना सब हो जाने पर श्री गौतम स्वामी ने श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी की वन्दना की और उनसे प्रश्न किया कि हे भगवन् ! आपका विनयी शिष्य धन्य अनगार समाधि-मरण प्राप्त कर कहां गया, कहां उत्पन्न हुआ है, वहां कितने फाल तक उसकी स्थिति होगी और तदनन्तर वह कहां उत्पन्न होगा ? इसके उत्तर में श्री भगवान् ने कहा कि हे गौतम ! मेरा विनयी शिष्य धन्य अनगार समाधि- मरण प्राप्त कर सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुआ है, वहां उसकी तेतीस साग- रोपम स्थिति है और वहां से च्युत होकर वह महाविदेह क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त करेगा अर्थात् सिद्ध, बुद्ध और मुक्त होकर परिनिर्वाण-पद प्राप्त कर सव दुःखों का अन्त कर देगा। यह सुनकर श्री गौतम भगवान् परम प्रसन्न हुए । इस सूत्र से हमें शिक्षा प्राप्त होती है कि प्रत्येक व्यक्ति को आलोचना आदि क्रिया करके समाधि-पूर्वक मृत्यु प्राप्त करनी चाहिए जिससे वह सच्चा आराधक होकर मोक्षाधिकारी वन सके । इस प्रकार श्री सुधर्मा स्वामी श्री जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू ! मैंने उक्त अध्ययन का अर्थ श्रवण किया है उसी प्रकार तुम्हारे प्रति कहा है अर्थात मेरा यह कथन केवल भगवान् के कथन का अनुवाद मात्र है। इसमें अपनी बुद्धि से कुछ भी नहीं कहा । तृतीय वर्ग का प्रथमाध्ययन समाप्त । . जिस प्रकार ८६] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्ग: अब सूत्रकार उक्त वर्ग के शेप अध्ययनों का वर्णन करते हैं:- जति णं भंते ! उक्खेवओ। एवं खलु जंवू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदीए णगरीए भदाणामं सत्थ- वाही परिवसति अड्ढा तीसे णं भद्दाए सत्थवाहीए पुत्ते सुणक्खत्ते णामं दारए होत्था अहीण. जाव सुरूवे० पंचधाति-परिक्खिते जहा धण्णो तहा वत्तीस दाओ जाव उप्पि पासायवडेंसए विहरति । तेणं कालेणं२ समोसरणं जहा धन्नो तहा सुणक्खत्तेऽवि णिग्गते जहा थावच्चा- पुत्तस्स तहा णिक्खमणं जाव अणगारे जाते ईरिया- समिते जाव बंभयारी। तते णं सुणक्खत्ते अणगारे जं चेव दिवसं समणस्स भगवतो म० अंतिते मुंडे जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं अभिग्गह। तहेव जाव बिलमिव आहारेति संजमेण जाव विहरति । बहिया जणवय-विहार विहरति । एक्कारसं अंगाई अहिज्जति संजमेण तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । तते णं से सुण० ओरा- लेणं जहा खंदतो। यदि नु भदन्त ! उत्क्षेपः । एवं खल्लु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये काकन्यां नगर्यां भद्रा नाम सार्थवाहिनी परिवसति, आट्या० । तस्या नु भद्रायाः सार्थवाहिन्याः पुत्रः सुनक्षत्रो नाम दारकोऽभूत् । अहीनो यावत्सुरूपः पञ्च-धात- तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [८७ परिक्षिप्तो यथा धन्यस्तथा । द्वात्रिशद् दातानि यावदुपरि प्रासा- दावतंशके विहरति। तस्मिन् काले तस्मिन् समये समवशरणम् । यथा धन्यस्तथा सुनक्षत्रोऽपि निर्गतः । यथा स्त्यावत्यापुत्रस्य तथा निष्क्रमणम् । यावदनगारो जात ईर्या-समितो यावद् ब्रह्म- चारी । ततो नु स सुनक्षत्रोऽनगारो यस्मिन्नेव दिवसे श्रमणस्य भगवतो महावीरस्यान्तिके मुण्डो भूत्वा प्रबजितस्तस्मिन्नेव दिवसेऽभिग्रहम् । तथैव यावद् विलमिव आहारयति । वहिर्जन- पद-विहारं विहरति । एकादशाङ्गान्यधीते, संयमेन तपसात्मानं भावयन् विहरति । ततो नु स सुनक्षत्र औदारेण यथा स्कन्दकः। पदार्थान्वयः-जति-यदि णं-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिए है भंते !- हे भगवन् ! उक्खेवनो-आक्षेप से जान लेना चाहिए अर्थात् प्रथम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है तो द्वितीय आदि का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है इत्यादि पूर्व सूत्रों से आक्षेप कर लेना चाहिए । एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जंबू-हे जम्बू ! तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय काकंदीए- काकन्दी गरीए-नगरी में भद्दा-भद्रा णाम-नाम वाली सत्थवाही-सार्थवाहिनी परिवसति-रहती थी जो अड्डा० -सर्वसम्पन्ना थी । णं-पूर्ववत् तीसे- -उस भद्दाए- भद्रा सत्थवाहीए-सार्थवाहिनी का पुत्ते-पुत्र सुणक्खत्तं-सुनक्षत्र णाम-नाम याला दारए-बालक होत्था-हुआ जो अहीण-पांचों इन्द्रियों से परिपूर्ण था और जाव- यावत् सुरुवे-सुरूप था पंचधातिपरिक्खित्ते-वह पांच धायों के लालन-पालन में था जहा-जैसे धरणे-धन्यकुमार के हुए थे इसी प्रकार बत्तीसानो-बत्तीस दामो- कन्याओं से विवाह हुए और उनके पितृ-गृह से बत्तीस दहेज आये । जाव-यावत् उप्पि-ऊपर पासायवडेंसए सर्व-श्रेष्ठ प्रासाद में सुखों का अनुभव करता हुआ विहरति-विचरता था। तेणं कालेणं २-उस काल और उस समय में समोसरणं- श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी उस नगरी के बाहर सहस्रावन उद्यान में विरा- जमान हुए। जहा-जिस प्रकार धण्णो-धन्य कुमार निकला था तहा-उसी प्रकार ८८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः सुणक्खत्तेऽपि-सुनक्षत्र कुमार भी णिग्गते-श्री भगवान् के मुखारविन्द से धर्म-कथा सुनने के लिये निकला और धर्म-कथा सुनने के अनन्तर जहा-जिस प्रकार थावच्चा- पुत्तस्स-स्त्यावत्या पुत्र का हुआ था तहा-उसी प्रकार सुनक्षत्र कुमार का भी- निक्खमणं-निष्क्रमण (दीक्षामहोत्सव) हुआ जाव-यावत् वह भी सांसारिक सव सुख और सम्पत्ति को छोड़कर अणगारे-अनगार अर्थात् साधु जाते-हो गया और ईरियासमिते-ईर्या-समिति वाला जाव-यावत् अन्य साधु के गुणों से युक्त हो कर बंभयारी-ब्रह्मचारी हो गया। तते-इसके अनन्तर णं-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिये है से-वह सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र अणगारे-अनगार जं चेव दिवस-जिसी दिन समणस्स-श्रमण भगवतो म०-भगवान् महावीर के अंतिए-समीप मुंडे-मुण्डित हुआ जाव-यावत् तं चेव दिवसं-उसी दिन अभिग्गह-अभिग्रह धारण कर लिया तहेव-उसी प्रकार जाव-यावत् जो कुछ भी भिक्षा से प्राप्त करता था उसको विलमिव-सर्प जिस प्रकार विना प्रयास के बिल में घुस जाता है उसी प्रकार वह भी श्राहारेति-विना किसी लालसा और स्वाद के भोजन करता था और संजमेणं जाव-संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विहरति-विचरण करता था। इसी समय श्रमण भगवान महावीर स्वामी बहिया-बाहर जणवयविहारं- जनपद-विहार के लिए विहरति-गये और इस बीच में सुनक्षत्र अनगार ने एकारस- एकादश अंगाइ-अङ्गों का अहिज्जति-अध्ययन किया फिर संजमेणं-संयम और तवसा-तप से अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावमाणे-भावना करते हुए विहरति- विचरण करने लगा। तते णं-इसके अनन्तर से-वह सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र अनगार श्रोरालेणं-उदार तप से जहा-जैसा खंदतो-स्कन्दक था वैसा ही हो गया । मूलार्थ-हे भगवन् ! इत्यादि प्रश्न का पहले सूत्रों से आक्षेप कर लेना चाहिए । (उत्तर में सुधर्मा स्वामी कहते हैं) हे जम्बू ! उस काल और उस समय में काकन्दी नाम की नगरी थी। उसमें भद्रा नाम की एक सार्थवाहिनी निवास करती थी। वह धन-धान्य-सम्पन्ना थी। उस भद्रा सार्थवाहिनी का पुत्र सुनक्षत्र नाम वाला था । वह सर्वाङ्ग-सम्पन्न और सुरूप था। पांच धाइयां उसके लालन पालन के लिये नियत थीं। जिस प्रकार धन्य कुमार के लिए बत्तीस दहेज आये उसी प्रकार सुनक्षत्र कुमार के लिये भी आये और वह सर्व-श्रेष्ठ भवनों में सुख का अनुभव करता हुआ विचरण करने लगा। उसी समय श्री भगवान महावीर तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [ ८९ स्वामी काकन्दी नगरी के बाहर विराजमान हो गये। जिस प्रकार धन्य कुमार उनके मुखारविन्द से धर्म-कथा सुनने के लिए गया था उसी प्रकार सुनक्षत्र कुमार भी गया और जिस प्रकार स्त्यावत्यापुत्र दीक्षित हुआ था उसी प्रकार वह भी हो गया। अनगार होकर वह ईर्या-समिति वाला और साधु के सब गुणों से युक्त पूर्ण ब्रह्मचारी हो गया । इसके अनन्तर वह सुनक्षत्र अनगार जिसी दिन मुण्डित हो प्रवजित हुआ उसी दिन से उसने अभिग्रह धारण कर लिया । फिर जिस प्रकार सर्प विल में प्रवेश करता है उसी प्रकार वह भोजन करने लगा। संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करने लगा। इसी बीच श्री भगवान् महावीर स्वामी जनपद-विहार के लिये बाहर गये और सुनक्षत्र अनगार ने एकादशाङ्ग शास्त्र का अध्ययन किया । वह संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करने लगा। तदनु अत्यन्त कठोर तप के कारण जिस प्रकार स्कन्दक कृश हो गया था उसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार भी हो गया। टीका--इस सून में सुनक्षत्र अनगार का वर्णन किया गया है। सूत्र का अर्थ मूलार्थ में ही स्पष्ट कर दिया गया है। उदाहरण के लिये सूत्रकार ने स्त्या- वत्यापुत्र और धन्य अनगार को लिया है । पाठकों को स्त्यावत्यापुत्र के विषय में जानने के लिये 'ज्ञाताधर्म-कथाङ्गसूत्र' के पांचवें अध्ययन का विधि-पूर्वक अध्य- यन करना चाहिए और धन्य अनगार का वर्णन इसी वर्ग के प्रथम अध्ययन में आ चुका है। इस सूत्र में प्रारम्भ में ही "उपखेवओ-उत्क्षेपः" एक पद आया है। उसका तात्पर्य यह है कि इसके साथ के पाठ का पिछले सूत्रों से आक्षेप कर लेना चाहिए अर्थात् उसके स्थान पर निम्न-लिखित पाठ पढ़ना चाहिए :- "जति णं भंते ! समगेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं नयमस्स अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स पढमस्स अझयणस्स अयम? पण्णत्ते नवमस्स ण भंते ! अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तबस्स वग्गस्स वितियस्स अन्झयणस्स के अढे पण्णत्ते ? (यदि नु भदन्त ! श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत्संप्राप्तेन नवम- स्याङ्गस्यानुत्तरोपपातिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्य प्रथमस्याध्ययनस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः, अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः . नवमस्य नु भदन्त ! अनस्यानुत्तरोपपातिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्य द्वितीयस्याध्ययनस्य कोऽर्थः : प्रज्ञप्तः ?) यह पाठ प्रायः प्रत्येक अध्ययन के प्रारम्भ में आता है। अतः उसको संक्षिप्त करने के लिये यहां 'उत्क्षेप:' पद दे दिया गया है । दूसरे सूत्रों में भी इसी शैली का अनुसरण किया गया है। जिस प्रकार श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास दीक्षित होकर धन्य अनगार ने पारण के दिन ही आचाम्ल व्रत धारण किया था इसी प्रकार सुनक्षन. अनगार ने भी किया। जिस प्रकार व्याख्याप्रज्ञप्ति' के द्वितीय शतक में स्कन्दक सन्यासी ने श्री श्रमण भगवान् के पास ही दीक्षित हो कर तप द्वारा अपना शरीर कृश किया था ठीक उसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार का शरीर भी तप से कृश हो गया। इस सूत्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब कोई अपना लक्ष्य स्थिर कर ले तो उसकी प्राप्ति के लिये उसको सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये और दृढ संकल्प कर लेना चाहिए कि वह उस पद की प्राप्ति करने में बड़े से बड़े कष्ट को भी तुच्छ समझेगा और अपने प्रयत्न में कोई भी शिथिलता नहीं आने देगा। जब तक वह इतना दृढ संकल्प नहीं करता तब तक वह उस तक नहीं पहुंच सकता । किन्तु जो अपने ध्येय की प्राप्ति के लिये एकाप्र-चित्त से प्रयत्न करता है वह अवश्य और शीघ्र ही वहां तक पहुंच जाता है, इसमें लेश-मात्र भी सन्देह नहीं । ध्यान रहे कि इसके लिये गम्भीरता की अत्यन्त आवश्यकता है । अब सूत्रकार इसीसे सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं:- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे, गुण- सिलए चेतिए, सेणिए राया। सामी समोसढे परिसा णिग्गता, राया णिग्गतो। धम्म-कहा, राया पडिगओ, परिसा पडिगता । तते णं तस्स सुणक्खत्तस्स अन्नया कयाति पुव्वरत्तावरत्तकाल-समयंसि धम्मजा० जहा खंद- यस्स बहू वासा परियातो, गोतमपुच्छा, तहेव कहेति जाव - तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम्। सव्वद्वसिद्ध विमाणे देवे उववण्णे । तेतीसं सागरोवमाई ठिती पण्णत्ता । से णं भंते ! महाविदेहे सिज्झिहिति । एवं सुणक्खत-गमेणं सेसाबि अट्ठ भाणियव्वा, णवरं आणुपुव्वीए दोन्निरायगिहे, दोन्नि साएए, दोन्नि वाणिय- ग्गामे, नवमोहत्थिणपुरे, दसमोरायगिहे।नवण्हं भद्दाओ जणणीओनवण्हवि बत्तीसाओ दाओ। नवण्हं निक्खमणं थावच्चापुत्तस्स सरिसं, वेहल्लस्स पिया करेति । छम्मासा वेहल्लते, नव धण्णे, सेसाणं बहू वासा, मासं संलेहणा, सव्वट्ठसिद्धे महाविदेहे सिज्झणा । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरम् , गुणशिलकं चैत्यम्, श्रेणिको राजा । स्वामी समवस्मृतः परिषन्निर्गता, राजा निर्गतः । धर्म-कथा, राजा प्रतिगतः, परिषत्प्रतिगता । ततो नु तस्य सुनक्षत्रस्यान्यदा कदाचित् पूर्वरात्रावरात्रकाल-समये धर्म- जागरिका ....। यथा स्कन्दकस्य बहूनि वर्षाणि पर्यायः । गोतम- पृच्छा । तथैव कथयति यावत्सर्वार्थसिद्धे विमाने देव उत्पन्नः। त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा स्थितिः । स नु भदन्त ! महाविदेहे सेत्स्यति । एवं सुनक्षत्र-गमेन शेषा अप्यष्ट भणितव्याः, नवर- मानुपूर्व्या द्वौ राजगृहे नगरे, द्वौ साकेते, द्वौ वाणिजग्रामे, नवमो हस्तिनापुरे, दशमश्च राजगृहे । नवानां जनन्यो भद्रा नवानामपि द्वात्रिंशंद दातानि; नवानां निष्कमणं स्त्यावत्यापुत्रस्य सदृशम्। वेहल्लस्य पिता करोति । पण्मासा वेहल्लकः, नव धन्यः, शेषाणां . ।
५२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः. . बहूनि वर्षाणि । मासं संलेखना, सर्वार्थसिद्धे, महाविदेहे सिद्धता। पदार्थान्वयः-तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय रायगिहे- राजगृह णगरे-नगर में सेणिए-श्रेणिक नाम वाला राया-राजा राज्य करता था उस के बाहर गुणसिलए-गुणशिलक चेतिए-चैत्य था सामी-श्री श्रमण भगवान् महा- वीर स्वामी उस चैत्य में समोसढे-विराजमान हो गये । तव परिसा-नगर की जनता णिग्गता-उनके मुख से धर्म-कथा सुनने के लिये निकली राया-राजा श्रेणिक भी णिग्गतो-निकला धम्मकहा-धर्म-कथा हुई और राया-राजा पडिगो-चला गया परिसा-परिपद् पडिगता-चली गई। तते-इसके अनन्तरणं-वाक्यालंकार के लिये है तस्स-उस सुणक्खत्तस्स-सुनक्षत्र अनगार अन्नया-अन्यदा कयाति-किसी समय पुनरत्तावरत्तकालसमयसि-मध्यरात्रि के समय में धम्मजा०धर्म-जागरण करते हुए जहा-जैसा खंदयस्स-स्कन्दक के विषय में कहा गया उसी प्रकार बहू-बहुत से वासा- वर्षों तक परियातो-पर्याय पालन कर काल-गत हो गया। तब गोतमपुच्छा-- गोतम स्वामी ने प्रश्न किया तहेव-श्री भगवान् ने उसी प्रकार कहेति-प्रतिपादन किया कि जाव-यावत् सव्वट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमाणे-विमान में देवे-देव-रूप से उववरणे-उत्पन्न हुआ है तेत्तीसं-तेतीस सागरोवमाई-सागरोपम की ठिती- स्थिति पएणत्ता-प्रतिपादन की गई है। भंते-हे भगवन् ! से-वह वहां से च्युत होकर कहां उत्पन्न होगा ? हे गौतम! महाविदेहे-महाविदेह क्षेत्र में सिज्झिहिति- सिद्ध होगा। एवं-इसी प्रकार सुणक्खत्तगमेणं-सुनक्षत्र के (आलापक) आख्यान के समान सेसा-शेप अट्ठ-आठ के विषय में अवि-भी भाणियव्वा-कहना चाहिए । रणवर-विशेषता इतनी है कि आणुपुच्चीए-अनुक्रम से दोन्नि-दो रायगिहे- राजगृह नगर में दोन्नि-दो साएए-साकेतपुर में दोन्नि-दो वाणियग्गामे-वाणिज- ग्राम में नवमो-नौवां हत्थिणपुरे-हस्तिनापुर में और दसमो-दशवां रायगिहे- राजगृह नगर में उत्पन्न हुए नवएहं-नौ की भद्दायो-भद्रा नाम वाली जणणीयो- माताएं थीं नवएहवि-नौ की बत्तीसायो-बत्तीस दामो-दहेज आये नवण्हं-नौ का निक्समणं-निष्क्रमण थावचापुत्तस्स-स्त्यावत्यापुत्र के सरिसं-सदृश हुआ किन्तु वेहल्लस्स-बेहद कुमार का निष्क्रमण पिया-पिता ने करेति-किया। फिर छम्मासा- छः मास की दीक्षा वेहल्लते-वेहल्ल अनगार ने पालन की और धण्णे-धन्य अनगार तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [९३ ने नव-नौ महीने की दीक्षा पालन की सेसाणं-शेप आठों की दीक्षा यह वासा- यहुत वर्षों की थी । मासं-एक मास की संलेहणा-संलेखना सब ने की सव्वट्टसिद्धे- सर्वार्थसिद्ध विमान में सव उत्पन्न हुए महाविदेहे-महाविदेह क्षेत्र में सिझणा- सय सिद्ध गति प्राप्त करेंगे। मूलार्थ-उस काल और उस समय राजगृह नगर में श्रेणिक राजा राज्य करता था। नगर के बाहर गुणशैलक नाम चैत्य में श्रमण भगवान महावीर स्वामी विराजमान होगये । परिपद् धर्म-कथा सुनने को आई और राजा भी आया । धर्म-कथा सुनकर परिषद् और राजा चले गये । तदनु मध्यरात्रि के समय धर्म जागरण करते हुए सुनक्षत्र अनगार को स्कन्दक के समान भाव उत्पन्न हुए । वह बहुत वर्ष की दीक्षा पालन कर सर्वार्थसिद्ध विमान में देव रूप से उत्पन्न हो गया। उसकी वहां पर तेतीस सागरोपम की आयु है । वहां से च्युत होकर वह महाविदेह क्षेत्र में सिद्धि प्राप्त करेगा। इसी प्रकार शेप आठ अध्ययनों के विषय में भी जानना चाहिए। विशेषता केवल इतनी है कि अनुक्रम से दो राजगृह नगर में, दो साकेतपुर में, दो वाणिज-ग्राम में, नौवाँ हस्तिनापुर में और दशवां राजगृह नगर में उत्पन्न हुए। इनमें नौ की माताएं भद्रा नाम वाली थीं और नौ को बत्तीस २ दहेज मिले । नौ का निष्क्रमण स्त्यावत्यापुत्र के समान हुआ। केवल वेहल्लकुमार का निष्क्रमण उसके पिता के द्वारा हुआ। छः मास का दीक्षा-पर्याय वेहल्ल अनगार ने पालन किया, नौ मास का धन्य ने । शेप पाठों ने बहुत वर्ष तक दीक्षा-पर्याय पालन किया । दशों ने एक २ मास की संलेखना धारण की। सब के सब सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए और वहां से च्युत होकर सब महाविदेह क्षेत्र में सिद्ध-गति प्राप्त करेंगे। टीका:- इस सूत्र का विपय मूलार्थ और पदार्थान्वय में ही स्पष्ट है । अतः उसको यहां पर दोहराना ठीक प्रतीत नहीं होता। कहना केवल इतना है कि यहां चार-बार स्कन्दक को ही उदाहरण-रूप में रखा गया है, उसका ज्ञान हमें कहां से हो। इसी प्रकार त्यावत्यापुत्र के विषय में भी कहना आवश्यक जान पड़ता है। इनमें से पहले अर्थात् स्कन्दक स्वामी का वर्णन पञ्चम अङ्ग के द्वितीय शतक में आचुका है और दूसरे अर्थात् स्वावत्यापुन ९४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो घर्गः का वर्णन छठे अङ्ग के पश्चम अध्ययन में है । यह 'अनुत्तरोपपातिकसूत्र' नौवां अङ्ग है । अतः सूत्रकार ने उसी वर्णन को यहां पर दोहगना उचित न समझ कर केवल दोनों का उदाहरण देकर बात समाप्त कर दी है । पाठकों को इनके विषय में पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिये उक्त सूत्रों का अवश्य अध्ययन करना चाहिए । तब भी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए हम इतना बता देना आवश्यक समझते हैं कि उक्त कुमारों के जीवन में श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के पास धर्म-कथा सुनने को जाना, यहां वैराग्य की उत्पत्ति, दीक्षा-महोत्सव, परम उच्चकोटि का तपःकर्म, शरीर का कृश होना, उसी के कारण अर्ध रात्रि में धर्म-जागरण करते हुए अनशन व्रत के भावों का उत्पन्न होना, अनशन कर सर्वार्थ-सिद्ध विमान में उत्पन्न होना, जिससे महाविदेहादि क्षेत्रों में उत्पन्न होकर सिद्ध-गति प्राप्त कर सकें आदि ही मोटी बातें हैं, जिनके आधार से उक्त सूत्रों के स्वाध्याय में सहायता मिल सकती है, क्योंकि यही विषय है जिनके लिए स्कन्दक और स्त्यावत्यापुत्र को उदा- हरण में रखा है। इस सूत्र में 'पूर्वरात्रापरात्रकाल' शब्द आया है जिसका अर्थ मध्य रात्रि है । यही समय एक ऐसा है जब सारा संसार प्रायः सुनसान रहता है। अतः धर्म-जागरण करने वालों का चित्त इस समय एकाग्र हो जाता है और उसमें पूर्ण स्थिरता विद्यमान होती है । ऐसे ही समय में विचार-धारा बहुत स्वच्छ रहती है और मस्तिष्क में बहुत ऊंचे विचार उत्पन्न होते हैं । यही कारण है कि धन्य आदि अनगारों के उस समय के विचार उनको सन्मार्ग की ओर ले गये। सूत्र में द्विवचन के स्थान में 'दोन्नि' बहुवचन का प्रयोग हुआ है । इसका कारण यह है कि प्राकृत भापा में द्विवचन होता ही नहीं। अब सूत्रकार प्रस्तुत सूत्र का उपसंहार करते हुए कहते हैं :- एवं खलु जंवू ! समणेणं भगवता महावीरेणं आइग- रेणं तित्थगरेणं सयं-संबुद्धेणं लोग-नाहेणं लोग-प्पदीवेणं लोग-पज्जोयगरेणंअभय-दएणंसरण-दएणं चक्खु-दएणं मग-दएणं धम्म-दएणं धम्म-देसएणं-धम्मवर-चाउरंत- तृतीयो वर्ग:] भागटीकासहितम् । [९५ चक्क वट्टिणा अप्पडिहय-वरनाण-दसण-धरेणं जिणेणंजाण- एणंबुद्धणं बोहएणं मोक्केणं मोयएणं तिनेणं तारयेणं सि- वमयलमरुयमणंतमक्खयमव्वाबाहमपुणरावत्तयं सिद्धि- गतिनामधेयं ठाणंसंपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते। (सूत्रं ६) अणुत्तरोववाइयद- सातो समत्तातो ॥ अणुत्तरोववाइयदसा णामं सुत्तं नवम- मंगं समत्तं ॥ श्रीरस्तु ॥ ग्रं १९२। एवं खल्लु जम्बु ! श्रमणेन भगवता महावीरेणादिकरेण तीर्थकरेण स्वयं सम्बुद्धेन लोक-नाथेन लोक-प्रदीपेन लोक-प्रद्योत- करेणाभय-देन शरण-देन चक्षुर्देन मार्ग-देन धर्म-देन धर्म-देशकेन धर्मवर-चतुरत्त-चक्रवर्तिनाप्रतिहत-वरज्ञान-दर्शन-धरेण जिनेन ज्ञापकेन बुद्धेन वोधकेन मुक्तेन मोचकेन तीर्णेन तारकेण शिव चलमरुजमनन्तमक्षयमव्यावाधमपुनरावर्तनं सिद्ध-गति-नामधेयं स्थानं संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः। (सूत्रम् ६) अनुत्तरोपपातिकदशाः समाप्ताः॥ अनु- त्तरोपपातिकदशा नाम नवममङ्गं समाप्तम् ॥ श्रीरस्तु ॥ पदार्थान्वयः-एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जंबू-हे जम्बू ! समणेणं- श्री श्रमण भगवता-भगवान महावीरेणं-महावीर स्वामी ने जो आइगरेणं-धर्म के प्रवर्तक हैं तित्थगरेणं-चार तीथों को स्थापन करने वाले हैं सयं-संबुद्धेणं-अपने आप बोध प्राप्त करने वाले हैं लोगनाहेणं-तीनों लोकों के नाम हैं लोकप्पदीवेणं- लोक में प्रदीप के समान प्रकाश फरने वाले हैं लोगपज्जोयगरेण-लोकों को सूर्य के समान प्रदीप्त करने वाले हैं अभयदएणं-अभय प्रदान करने वाले हैं सरणदएणं- अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयों वर्गः शरण देने वाले हैं चक्खुदएणं-लोगों को ज्ञान-चक्षु देने वाले हैं धम्मदएणं- उनको श्रुत और चारित्र रूप धर्म देने वाले हैं मग्गदएणं-और अज्ञान रूपी अन्धकार से मुक्ति-मार्ग दिखाने वाले हैं धम्मदेसएणं-धर्मोपदेशक हैं धम्मवरचाउ- रंतचकवट्टिणा-श्रेष्ठ धर्म के एकमात्र चक्रवर्ती हैं अप्पडिहय-अप्रतिहत वर-श्रेष्ठ नाण-ज्ञान दंसण-दर्शन धरेणं-धारण करने वाले हैं जिणेणं-राग और द्वेप को. जीतने वाले हैं जाणएणं-छद्मस्थ ज्ञान-चतुष्टय को जानने वाले हैं युद्धेणं-बुद्ध हैं अर्थात जीव आदि पदार्थों को जानने वाले हैं चोहएणं-औरों को बोध कराने वाले हैं मोकेणं-बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह से मुक्त हैं मोयएणं-अन्य जीवों को इस परिग्रह से मुक्त कराने वाले हैं तिनेणं-संसार-रूपी सागर को पार करने वाले हैं तारयेण और उपदेश के द्वारा औरों को इससे पार कराने वाले हैं सिवं-सर्वथा कल्याण-रूप अयलं-नित्य स्थिर अरुयं-शारीरिक और मानसिक रोग और व्यथाओं से रहित अणंत-अन्त-रहित अक्खयं-कभी भी नाश न होने वाले अब्बावाहं-पीडा अर्थात् सब प्रकार के दुःखों से रहित अपुनरावत्तयं- सांसारिक जन्म-मरण के चक्र से रहित सिद्धिगति-सिद्ध-गति नामधेयं-नाम वाले ठाणं-स्थान को संपत्तेणं-प्राप्त हुए उन्होंने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोप-. पातिकदशा के तचस्स-तृतीय वग्गस्स-वर्ग का अयं-यह अहे-अर्थ पएणत्ते- प्रतिपादन किया है सूत्रं ६-छठा सूत्र समाप्त हुआ अंणुत्तरोववाइयदसातो-अनुत्तरो- पपातिकदशा समत्तातो-समाप्त हुई अणुत्तरोववाइयदसा णाम-अनुत्तरोपपातिक- दशा नाम का सुत्तं-सूत्र रूप नवममंग-नौवां अङ्ग समत्त-समाप्त हुआ। मूलार्थ-हे जम्यू! इस प्रकार धर्म-प्रवर्तक, चार तीर्थ स्थापन करने वाले, म्वयं बुद्ध, लोकनाथ, लोकों को प्रकाशित और प्रदीप्त करने वाले, अभय प्रदान करने वाले, शरण देने वाले, ज्ञानचक्षु प्रदान करने वाले, मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले, धर्म देने वाले, धर्मोपदेशक, धर्मवर-चतुरन्त-चक्रवर्ती, अनभिभूत श्रेष्ठ ज्ञान और दर्शन वाले, राग-द्वेप के जीतने वाले, ज्ञापक, युद्ध, बोधक, मुक्त, मोचक, स्वयं संमार-सागर से तैरने वाले और दूसरों को तराने वाले, कल्याण- रूप, नित्य स्थिर, अन्त-रहित, विनाश-रहित, शारीरिक और मानसिक आधि- व्याधि-रहित, पुनः-पुनः सांसारिक जन्म-मरण से रहित सिद्ध-गति नामक स्थान को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान रोपपातिकदशा के तृतीयों वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [९७ तृतीय वर्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है । छठा सूत्र समाप्त हुआ । अनुत्तरो- पपातिकदशा समाप्त हुई । अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र नामक नवमअङ्ग समाप्त हुआ। । . टीका-यह सून उपसंहार-रूप है । इससे सब से पहले हमें यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक शिष्य को पूर्ण रूप से गुरु-भक्त होना चाहिए और गुरु-भक्ति करते हुए गुरु के सद्गुणों को अवश्य प्रकट करना चाहिए। जैसे इस सूत्र में श्री सुधा स्वामी ने, उपसंहार करते हुए, श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के सद्- गुणों को जनता पर प्रकट किया है । वे अपने शिष्य जम्बू से कहते हैं कि हे जम्बू! इस सूत्र को उन भगवान ने प्रतिपादन किया है जो आदिकर हैं अर्थात (आदौ- प्राथम्येन श्रुतधर्माचारादि ग्रन्थात्मकं करोति तदर्थप्रणायकत्वे प्रणयतीत्येवंशीलस्तेना- दिकरेण ) श्रुत-धर्म-सम्बन्धी शास्त्रों के प्रणेता है, तीर्थङ्कर हैं अर्थात् (तरन्ति येन संसार-सागरमिति तीर्थम्-प्रवचनम् , तदव्यतिरेकादिह सङ्घः-तीर्थम् , तस्य करण- शीलत्वात्तीर्थकरस्तेन) जिसके द्वारा लोग संसार रूपी सागर से पार हो जाते हैं उसको तीर्थ कहते हैं । तीर्थ सङ्घ-रूपी चार हैं । उनके करने वाले महापुरुष ने ही इस सूत्र के अर्थ का प्रकाश किया है । इसी क्रम से श्री सुधा स्वामी श्री भगवान् के 'नमोत्थु ण' में प्रदर्शित सब गुणों का दिग्दर्शन यहां कराते हैं । जब कोई व्यक्ति सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाता है उस समय वह अनन्त और अनुपम गुणों का धारण करने वाला हो जाता है। उसके गुणों के अनुकरण करने वाला भी एक दिन उसी रूप में परिणत हो सकता है । अतः 'प्रत्येक व्यक्ति को उनका अनुकरण जहां तक हो अवश्य करना चाहिए । यही विशेषतः कारण है कि सुधा स्वामी ने लोगों की हित-बुद्धि से उन गुणों का यहां दिग्दर्शन कराया है, जिससे लोग भगवान के गुणों में अनुराग रखते हुए उनकी भक्ति में लीन हो जायं । भगवान हमें संसार-सागर में अभय प्रदान करने वाले हैं और शरण देने वाले हैं अर्थात् (शरणम्-त्राणम, अज्ञानोपहतानां सद्रक्षास्थानम्, तश्च परमार्थतो निर्याणम्, तददाति इति शरणदः) अज्ञान- न-विमूढ व्यक्तियों की एकमात्र रक्षा के स्थान निर्माण को देने वाले हैं, जिसको प्राप्त कर आत्मा सिद्ध-पद में अपने प्रदेश में स्थित भी अन्य सिद्ध-प्रदेशों में अलक्षित-रूप से लीन हो जाता है। जिन भगवान की भगि से ।
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग: इतना सर्वोत्तम लाभ होता है । उनकी भक्ति कोई क्यों न करे अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति उनकी भक्ति में लीन होकर उस अलभ्य पद की प्राप्ति करनी चाहिए । भगवान् को अप्रतिहत-ज्ञान-दर्शन-धर बताया गया है उसका अभिप्राय यह है । (अप्रतिहते- कटकुट्यपर्वतादिमिरस्खलितेऽविसंवादके वाक्षायिकत्वाद्, परे-प्रधाने ज्ञान-दर्शने केवललक्षणे धारयतीति-अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधरस्तेन) अर्थात् किसी प्रकार से भी स्खलित न होने वाले सर्वोत्तम सम्यग् ज्ञान अर्थात् केवल ज्ञान और केवल दर्शन धारण करने वाले सर्वज्ञ और सर्वदर्शी भगवान् की जब शुद्ध चित्त से भक्ति की जायगी तो आत्मा अवश्य ही निर्वाण-पद प्राप्त कर तन्मय हो जायगा । ध्यान रहे कि इस पद की प्राप्ति के लिये सम्यग् ज्ञान-दर्शन और सम्यक् चारित्र के सेवन की अत्यन्त आवश्यकता है। जब हम किसी व्यक्ति की भक्ति करते हैं तो हमारा ध्येय सदैव उसी के समान बनने का होना चाहिए । तभी हम उसमें सफल हो सकते हैं। पहले हम कह चुके हैं कि कर्म ही सांसारिक बन्ध और मोक्ष के कारण हैं । उनका क्षय करना मुमुक्षु का पहला ध्येय होना चाहिए। जब तक एक भी कर्म अवशिष्ट रहता है तब तक कोई भी निर्वाण-रूप अलौकिक पद की प्राप्ति नहीं कर सकता है। उनका क्षय या तो उपभोग से होता है या ज्ञानाग्नि के द्वारा। यदि भोग के ऊपर ही उनको छोड़ दिया जाय तो उनका नाश कभी नहीं हो सकता। क्योंकि उनके उपभोग के साथ २ नये कर्म सञ्चित होते जाते हैं, जो उसको फिर उसी बन्धन में डाल देते हैं। अतः ज्ञानाग्नि से शीघ्र उनका क्षय करना चाहिए । वह ज्ञान साधु आचरण के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इसी लिये कहा मी है 'ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः' अर्थात् ज्ञान और क्रिया के सहयोग से ही मोक्ष होता. है । सिद्ध यह हुआ कि भगवद्-भक्ति के साथ २ सम्यग् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का आसेवन भी आवश्यक है। इस प्रकार ज्ञान और चारित्र की सहायता से धन्य अनगार आदि और उनके समान अन्य महापुरुष अनुत्तर विमानों में देव-रूप से उत्पन्न होते हैं और जो इन विमानों में उत्पन्न होते हैं वे अवश्य ही मोक्ष-गामी होते हैं। अत एवं. प्रस्तुत सूत्र में उन्हीं व्यक्तियों का वर्णन किया गया है, जो उक्त विमानों में जाकर उत्पन्न हुए हैं। , ।
तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [९९ - " हमने जिस प्रति से यह हिन्दी अनुवाद किया है, वह 'आगमोदय-समिति' की ओर से प्रकाशित हुई है । कुछ एक हस्त-लिखित प्रतियों में पाठभेद भी मिलते हैं । हमने जिस प्रति का अनुसरण किया है, उसमें पाठ संक्षिप्त कर दिया गया है। क्योंकि उक्त समिति ने पहले अङ्गों अर्थात् 'भगवतीसूत्र' और 'ज्ञाताधर्म-कथाङ्ग सूत्र' का पाठ यहां दोहराना उचित नहीं समझा, नाही हमें ठीक प्रतीत हुआ अतः उदाहरण-स्वरूप स्त्यावत्यापुत्र आदि के नाम का उल्लेख ही स्थान-स्थान पर कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त मी पाठ-भेद हमें हस्त-लिखित प्रतियों में मिलते हैं, जैसे इस सूत्र की समाप्ति पर ही कुछ प्रतियों में निम्नलिखित पाठ है- "अणुत्तरोववाइयदसाणं एगोसुयखंधो तिण्णि बग्गा तिसु चेव दिवसेसु उद्दि सिझंति । तत्थ पढमे वग्गे दस उद्देसगा, बीए वग्गे तेरस उद्देसगा, ततीयवग्गे दस उद्देसगा । सेसं जहा नायाधम्मकहा तहा णेयव्या । अणुत्तरोववाइयदसाणं नवम अंगं समत्तं ॥ इस पाठ में प्रस्तुत सूत्र की संख्या का विषय वर्णन किया है। पाठ बिलकुल स्पष्ट है । इस पाठ को संग्रह पाठ भी कहा जाता है। इस सूत्र से अन्तिम शिक्षा हमें यह भी मिलती है कि उक्त महर्पियों ने महाघोर तप करते हुए भी एकादशाङ्ग सूत्रों का अध्ययन किया। अतः प्रत्येक व्यक्ति को योग्यतापूर्वक शास्त्राध्ययन में प्रयत्नशील होना चाहिए, जिससे यह अनुक्रम से निर्वाण-पद की प्राप्ति कर सके । अन्त में हम अपने धर्म-प्रिय पाठकों से विदा लेते हुए अभयदेव सूरि के ही शब्दों को नीचे उद्धृत किये देते हैं:- शब्दाः केचन नार्थतोऽत्र विदिताः फेचित्तु पर्यायतः, सूत्रार्थानुगतेः समुह्य भगतो यज्जातमागः-पदम् । 'भाप्ये ह्यनं' तकन्जिनेश्वरवचोभापाविधौ कोविदः, संशोध्यं विहितादरर्जिनमतोपेक्षा यतो न भगा ॥ श्रीरस्तु । भनुत्तरोपपातिकसून की तपोगुण-प्रकाशिका हिन्दी-भाषा-टीका समास । - ९८ ], अनुत्सरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः इतना सर्वोत्तम लाभ होता है । उनकी भक्ति कोई क्यों न करे अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति उनकी भक्ति में लीन होकर उस अलभ्य पद की प्राप्ति करनी चाहिए । भगवान को अप्रतिहत-ज्ञान-दर्शन-धर बताया गया है उसका अभिप्राय यह है । (अप्रतिहते- कटकुट्यपर्वतादिभिरस्खलितेऽविसंवादके वाक्षायिकत्वाद्, वरे-प्रधाने ज्ञान-दर्शने केवललक्षणे धारयतीति-अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधरस्तेन) अर्थात् किसी प्रकार से भी स्खलित न होने वाले सर्वोत्तम सम्यग् ज्ञान अर्थात् केवल ज्ञान और केवल दर्शन धारण करने वाले सर्वज्ञ और सर्वदर्शी भगवान् की जब शुद्ध चित्त से भक्ति की जायगी तो आत्मा अवश्य ही निर्वाण-पद प्राप्त कर तन्मय हो जायगा । ध्यान रहे कि इस पद की प्राप्ति के लिये सम्यग् ज्ञान-दर्शन और सम्यक् चारित्र के सेवन की अत्यन्त आवश्यकता है। जब हम किसी व्यक्ति की भक्ति करते हैं तो हमारा ध्येय सदैव उसी के समान बनने का होना चाहिए । तभी हम उसमें सफल हो सकते हैं। पहले हम कह चुके हैं कि कर्म ही सांसारिक बन्ध और मोक्ष के कारण हैं । उनका क्षय करना मुमुक्षु का पहला ध्येय होना चाहिए । जब तक एक भी कर्म अवशिष्ट रहता है तब तक कोई भी निर्वाण-रूप अलौकिक पद की प्राप्ति नहीं कर सकता है । उनका क्षय या तो उपभोग से होता है या ज्ञानानि के द्वारा । यदि भोग के ऊपर ही उनको छोड़ दिया जाय तो उनका नाश कभी नहीं हो सकता। क्योंकि उनके उपभोग के साथ २ नये कर्म सञ्चित होते जाते हैं, जो उसको फिर उसी वन्धन में डाल देते हैं। अतः ज्ञानाग्नि से शीघ्र उनका क्षय करना चाहिए । वह ज्ञान साधु आचरण के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । इसी लिये कहा भी. है 'ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः' अर्थात् ज्ञान और क्रिया के सहयोग से ही मोक्ष होता है । सिद्ध यह हुआ कि भगवद्-भक्ति के साथ २ सम्यग् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का आसेवन भी आवश्यक है। इस प्रकार ज्ञान और चारित्र की सहायता से धन्य अनगार आदि और उनके समान अन्य महापुरुप अनुत्तर विमानों में देव-रूप से उत्पन्न होते हैं और जो इन विमानों में उत्पन्न होते हैं वे अवश्य ही मोक्ष-गामी होते हैं । अत एवं. प्रस्तुत सूत्र में उन्हीं व्यक्तियों का वर्णन किया गया है, जो उक्त विमानों में जाकर उत्पन्न हुए हैं। .
तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । न पर " हमने जिस प्रति से यह हिन्दी अनुवाद किया है, वह 'आगमोदय-समिति की ओर से प्रकाशित हुई है । कुछ एक हस्त-लिखित प्रतियों में पाठभेद मी मिलते हैं। हमने जिस प्रति का अनुसरण किया है, उसमें पाठ संक्षिप्त कर दिया गया है । क्योंकि उक्त समिति ने पहले अङ्गों अर्थात् 'भगवतीसूत्र' और 'ज्ञाताधर्म-कथाङ्ग सूत्र' का पाठ यहां दोहराना उचित नहीं समझा, नाही हमें ठीक प्रतीत हुआ। अतः उदाहरण-स्वरूप स्त्यावत्यापुत्र आदि के नाम का उल्लेख ही स्थान- कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त मी पाठ-भेद हमें हस्त-लिखित प्रतियों में मिलते हैं, जैसे इस सूत्र की समाप्ति पर ही कुछ प्रतियों में निम्नलिखित पाठ है- "अणुत्तरोववाइयदसाणं एगोसुयक्संधो तिण्णि वग्गा तिसु चेव दिवसेसु उद्दि सिझंति । तत्थ पढमे वग्गे दस उद्देसगा, बीए वग्गे तेरस उद्देसगा, ततीयवग्गे दस उद्देसगा । सेसं जहा नायाधम्मकहा तहा णेयन्या । अणुत्तरोववाइयदसाणं नवमं अंगं समत्तं ।। इस पाठ में प्रस्तुत सूत्र की संख्या का विपय वर्णन किया है। पाठ बिलकुल स्पष्ट है । इस पाठ को संग्रह पाठ भी कहा जाता है। इस सूत्र से अन्तिम शिक्षा हमें यह भी मिलती है कि उक्त महर्पियों ने महाघोर तप करते हुए भी एकादशाङ्ग सूत्रों का अध्ययन किया। अतः प्रत्येक व्यक्ति को योग्यतापूर्वक शास्त्राध्ययन में प्रयत्न-शील होना चाहिए, जिससे वह अनुक्रम से निर्वाण-पद की प्राप्ति कर सके । अन्त में हम अपने धर्म-प्रिय पाठकों से विदा लेते हुए अभयदेव सूरि के ही शब्दों को नीचे उद्धृत किये देते हैं :- शब्दाः केचन नार्थतोऽत्र विदिताः केचित्तु पर्यायतः, सूत्रानुगतेः समुह्य भणतो यज्जातमागः-पदम् । 'भाष्ये ह्यत्र' तकजिनेश्वरवचोभाषाविधौ कोविदैः, संशोध्यं विहितादरैर्जिनमतोपेक्षा यतो न क्षमा ।। श्रीरस्तु । अनुत्तरोपपातिकसूत्र की तपोगुण-प्रकाशिका हिन्दी-भाषा-टीका समाप्त ।
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नमोत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् शब्दार्थ-कोप mr , अ-और ३२ । अज्झयणे-अध्ययन २४ अंगस्स-अङ्ग का ३२,८२अट्ठ-आठ अंगाई-अगों का १६,४६, ८६ / अटुट्ठओ-आठ-आठ १२ अंत-अन्त, देहावसान, मृत्यु २७ / अट्ठएहं-आठ के (विषय में) २० अंतिए, ते-समीप, पास, नजदीक ३६, ४६, | अट्ठमस्स आठवें का ७२, ७३, ८६ / अट्टि-चम्म-छिरत्ताए-हड्डी, चमड़ा और अंतेवासी-शिष्य नसों से ५१, ६४ अंय-गट्ठिया-आम की गुठली ६१ / भट्ठी-अस्थि, हड्डी अंव-पेसियां-आम की फाँक ६३ अटे-अर्थ ३२, ११, २०, २४, २७, ३२, अंबाडग-पेसिया-आम्रातक-अम्बाड़े की ३४,७३, ८१,६५ फाँक ६३ / अडमाणे-घूमता हुआ (भिक्षा के लिए) ४५ अकलुसे-क्रोध आदि कलुषों से रहित ४६ अड्डा-ऋद्धि अर्थात् ऐश्वर्य वाली ३५,८६ अक्खयं कभी नाश न होने वाला १५ अणंत-अन्त-रहित, कभी नाश न होने ६७ अक्खसुत्त-माला-रुद्राक्ष की माला अणगारं-अनगार को अगत्थिय-संगलिया अगस्तिक वृक्ष की अणगारस्स-अनगार-माया-ममता को . फली छोड़कर घर का त्याग करने वाले ६७ अग्ग-हत्थेहिं-हाथ के पजों से अच्छीण-आँखों का अज-आर्य अज्झयणस्स-अध्ययन का ६, ११, २४, २६, अणझोयवरणे गग-द्वेष से रहित, अज्झयणा-अध्ययन वाला ८,१३, ७३ ५६ . साधु का ६४ ३ ११, ३४,८१ ५१, ६४,७२,८० अरणगारे अनगार ८, १३, ३६, ४२२,४५, ४६,४६, ६७,७२,७३, ८६ . ३२, ३४ विपयों में अनासक्त शब्दार्थ-कोप . . अणायविलं-अनाचाम्ल,आयंबिल नामक अभय-दएणं-अभय देने वाले तप विशेप से रहित ४२ अभयस्स-अभय कुमार का अणिक्वित्तेणं अनिक्षिप्त (निरन्तर), अभये-अभय कुमार विना किसी बाधा के ४२, ४३ अभिग्गह-प्रतिज्ञा, आहार आदि ग्रहण अणुज्मिय-धम्मियं उपयोगी,रखने योग्य४२ करने की मर्यादा बाँधना अणुत्तरोववाइयदसाणं = अनुत्तरोपपा अमुच्छिते-बिना किसी लालसा के, तिकदशा नाम वाले नवे अङ्गशास्त्र का अनासक्त होकर केवल शरीर-धारण : ३, १, ११,२०, २४, २६, २७, के लिए ४६ ३२, ३४, १५ | अम्मयं-माता को ३६ अणग-संभ-सय सन्निविट्ठ-अनेक सैकड़ों अयं-यह ३, २०, २४, २७, ३२, स्तम्भों ( खंभों) से युक्त ३८ ५१२, ५३, ८१,६५ अण्ण्या-यन्यदा, किसी समय ४६, ७२, अयल-अचल, स्थिर ८०, ६० अख्याधि व्याधि से रहित अदीणे-दीनता से रहित ४६ । अलं-सब प्रकार के, पूर्णरूप से अनया देखो अएणया अलत्तग-गुलिया मेंहदी की गुटिका अग्ने अन्न ४२ अवकंसंति चाहते हैं। अपराजिते अपराजित विमान में २०, २७ / अवि-भी अपरितंतजोगी-अविश्रान्त अर्थात् निर. अविमणे-यिना दुःखित चित्त के न्तर समाधि-युक्त ४६ ! अविसादी-बिना विपाद (खेद ) के ४६ भपरिभूभा-अतिरस्कृत, नीचा न देखने अव्याया-पीड़ा से रहित ६५ पासी ३५ असंसर्ट माफ हाथों से अपुग्णरायत्तयंन्यार २ जन्म-गरण के असिन्ह ७३. यन्धन से रहित १५. अहम्मे सापडिय-वर नाण-दमण-धरेणं-अप्र अह-यय-पक्षान्तर या प्रारम्भ सूचक तिहत (विस-याघा मेरदित, श्रेष्ठ ज्ञान अव्यय और दर्शन धारण करने याले १५ गदा-पजत जितना कुछ भी, प्रायश्य- अयाण-अपने थामा फी ४२,४३,४६,८६ यतानुमार मिला हुश्रा अपाणण-मामा में ४६ : महापडियंन्यथायोग्य, उचित भामणुगातेम्पाता होने पर, पाया आहा मुई-मुखपूर्वक मिल जाने पर ४२, ४३, ४६ | अशिजति अध्ययन करता है, पढ़ता है सम्मधिग्राण्यामिक विचार ? भाग मुग्मिने और ये ३७ माहीए-अध्ययन की, सीखी नाएर पामी ४५, महीण-पूरा ३६, ७२, ६० १५ . ६४ अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् त्मक अव्यय ५३, Y . १६ / इमे-ये आइल्लाणं आदि के, पहले के तपस्वियों में ७२२ आउक्खएण-आयु के क्षय होने के इच्छामि मैं चाहता हूँ ४२ कारण १३ इति-समाप्ति-बोधक अव्यय, परिचया- आणुपुबीए-अनुक्रम से, नम्बर वार ५५ २०,२७,६१ | इभवर-कन्नगाण श्रेष्ठ श्रेष्ठियों की आपुच्छइ, ति=पूछता है, पूछती है ३६२, ४५ कन्याओं का आपुच्छण-पूछना ८० इमंसि इनमें ७२ आपुच्छणा-धर्म-जिज्ञासा, धर्म के विपय इमासिं-इनमें पूछना १३, ३२, ८० आपुच्छति-देखो आपुच्छइ इमेणं इससे आपुच्छामि-पूछता हूँ ३६ | इमेयारूवे इस प्रकार के आयंबिलं-'आयंबिल' नामक एक तप, इसिदासे ऋषिदास कुमार जिसमें रूखा भात या अन्य कोई ईर्या-समिते ईर्या-समिति वाला, यत्ना- प्रासुक धान्य केवल एक ही बार चारपूर्वक चलने वाला ३९,८६ खाया जाता है ४२, ४५ / उकमेणं-उत्क्रम से, उलटे क्रम से, नीचे आयंबिल-परिग्गहिएण= आयंविल' से ऊपर नामक तप की रीति से ग्रहण किया उक्खेवओ-आक्षेप, न कहे हुए वाक्यों हुआ ४२ का पीछे के वाक्यों से आक्षेप करना ८६ आयवेधूप में ५६ | उग्गह-अवग्रह, सम्मान, पूजा आदि आयार-भंडए-तप-साधन के उपकरण उच्च० (उच्च-मज्झम-नीच) उच, मध्यम १३,८० और नीच कुलों से आयाहिणं आदक्षिणा ७३ | उच्चट्ठवणते-ऊँचे गले का पात्र विरोष ६१ आयाहिणं-पयाहिणं-श्रादक्षिणा और उजाणातो-उद्यान से, पगीचे से प्रदक्षिणा ७३ / उजाणे-उद्यान, बगीचा ३४,७२ आरणच्चुए-आरण-ग्यारहवाँ देवलोक उझिय धम्मियं-निरुपयोगी, फेंक देने और अच्युत-बारहवाँ देवलोक १३ योग्य आहरति-भोजन करता है ७२ / उह-पाद ऊँट का पैर आहारं भोजन ४६ उट्ठाणं-ओंठों की आहारेति-भोजन करता है, खाता है ४६,८६, उर्दू-ऊँचे १३,० आहिते-पहा गया है २४, ३२ उरहे-गरमी में इ-इति, परिचय या समाप्रि-सूचक उदरं-पेट ६४/ उदर-भायण-दर-भाजन, पेटरूपी पाय ६४ ६७ / उदर-भायण-उदर-भाजन में इंगाल-संगडिया-कोयलों की गाड़ी इंदभूति-पामोक्साएं-इन्द्रभूति आदि उदर-मायणस्स-उदर-भाजन की ७२ ४६ पव्यय ४ शब्दार्थ-कोप के समान ५३ ८० . उप्पि-ऊपर १२, ३८, ७२, ८६ | ओयरंति-उतरते हैं १३ उन्भड-घटामुहे-घड़े के मुख ओरालेणं उदार-प्रधान (तप से) विकराल मुख वाला ६७ ४६, ८०, कइ-कितने उम्मुक-बालभावंबालकपन से अति- फ्रान्त, जिसने बचपन छोड़ दिया है ३७ / कंक-जंधा-कङ्क नाम पक्षी विशेप की उयरंति-उतरते हैं जङ्घा कंपण-वातिओ (विव)-कम्पन-वातिक . उर-कडग-देस-भाएणं वक्षस्थल (छाती) रोग वाले व्यक्ति के समान रूपी चटाई के विभागों से ६७ कट्ट कोलंबर-लकड़ी का कोलम्ब-पात्र उर-कडयस्सन्छाती की विशेप उवसोभेमाणे-शोभायमान होता हुआ ६७ उवयालि-उपजालि कुमार कट्ट-पाउया-लकड़ी की खड़ाऊँ कडि-कडाहेणं-कटि (कमर) रूपी कटाह से६७ उववजिहिंति उत्पन्न होगा कडि-पत्तस्स-कटि-पत्र की, कमर की उववरणे,न्ने उत्पन्न हुआ १३२,८०२, ६१ कण्ण-कान ६४ उयवायो-उपपात, उत्पत्ति २० कण्णाण-कानों की ६४ उपसोभेमाणे=शोभायमान होता हुआ ७२ कण्हो-कृष्ण वासुदेव ३६ उवागच्छतिम्आता है ४५, ७३ कतरे-कौनसा उवागते-आया कदाति-कभी ७२ उच्चुड-एयणकोसे-जिसकी आँखें भीतर कन्नावली-कान के भूपणों की पङ्क्ति ५५ धंस गई थीं फप्पति-उचित है, योग्य है ४२ ऊरुस्स-ऊरुओं का कम्पे-कल्प-सौधर्म श्रादि देवों के नाम ऊरू-दोनों ऊरु वाले द्वीप और समुद्र १३ एपसिं-इनके विषय में ६४ कय-लक्खग-शुभ लक्षण वाला ७३ पकारसम्ग्यारह १६, ४६,८६ कयाइ,ति-कदाचित् , कमी ४६,२०, ६० एग-दिवसेणं एक ही दिन में ३८ करग-गीवा-करवे (मिट्टी के छोटे से एयं इस ७३ एयासवे इस प्रकार का ५१,५३, ५५, पात्र ) की ग्रीवा अर्थात् गला ३,८२, १२२, १३२, २०, करेंति-करते हैं एवं-इस प्रकार १३ २४,३४, ४२, ५३, ६४, ७२, करेति करता है ३६, ४५, ७३',६१ ७३, ८०,८६, ६१,६४ करेह करो ૪૨ एवन्ही, निश्चया योधक अव्यय ३६ कल-संगलियाकलाय-धान्य विरोष की एवामेव-इसी प्रकार ५१,५३, ५५, ५६, फली ५६', ६१, ६३, ६४' | कलातो-कलाएँ २७, ३५ एसणाए-एपणा-समिति-उपयोगपूर्वक कलाय-संगलिया-फलाय की फली ५६ श्राहार प्रादि की गवेषणा करने से ४५ / काहिं-कहाँ ७२ F अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् m ६ ६ १ 10m कहेतिम्कहता है काउस्सग कायोत्सर्ग, धर्म-ध्यान १३ खलु-निश्चय से ८०, १२, १३, २४, २ काकंदी-काकन्दी नाम की नगरी ३२, ३४,७२,८०,८६, काकजंघा कौवे की जाँघ, काफ-जसा खीर-धातीदूध पिलाने वाली धाय नामक ओपघि विशेष ५३ / गंगा-तरंग-भूएणगङ्गा की तरहों के कागंदी-काकन्दी नाम की नगरी ३४ समान हुए कागंदीए काकन्दी नगरी में ३५, ४६, ८६ गच्छति-जाता है कागंदीओ काकन्दी नगरी से ४६ गच्छिहिंतिम्जायगा १३, कायंदी-काकन्दी नगरी ४५ गणिज-माला-गिनती की माला कायंदी-गरीए-काकन्दी नगरी में ४५ गणेज-माणेहि-गिने जाते ६ कारेति बनवाती है ३७ गते-गया कारेलय-छल्लिया करेले का छिलका ६४ / गामानुगाम-एक गाँव से दूसरे गाँव १ कालंकाल, समय १३, ८० गिलाति-खेद मानता है, दुःखित होता है ६ २ कालं-मृत्यु (से) १३, २० गीवाए-मीवा की, गर्दन की ६ काल-गते-मृत्यु को प्राप्त होने पर १३ | गुण-रयण-गुण-रत्न, तप काल-गयं-मृत्यु को प्राप्त हुआ १३ गुणसिलए,ते गुणशिल नामक चैत्य काल मासे-मृत्यु के समय १३, २० या उद्यान १२, २७,७१, ६८ कालि-पोरा कालि-वनस्पति विशेष का गूढदंतेन्गूढदन्त कुमार पर्व ( सन्धि-स्थान) ५३ / गेण्हृति-प्रहण करते हैं १३ कालेणं-काल से, समय से (में) ३, १२, २७, गेरहावेति-प्रहण कराती है ३८ ३४,३६, ७१,७२,८६,६०/ गेवेज-विमाण पत्थडे-अवेयक देवता के काहिति-अंत करेगा निवास स्थान के प्रान्त भाग से १३, ६० किया-करके १३,५० गोतम पुच्छा-गौतम का.पूछना कुंडिया-गीवा कमण्डलु का गला ६१ / गोतम-सामी-गणधर गौतम स्वामी, श्री कुमारे-कुमार महावीर स्वामी के मुख्य शिष्य के-कौनसा ३, ११, २४, २७, ३२, ३४ गोतमा हे गौतम ! केण्डेण-किस कारण ७२ गोतमेचौतम स्वामी केवतियं-कितने १३, ८० गोयमा हे गौतम ! १३',८० कोणितो-कोणिक राजा ३६ गोयमे-गौतम स्वामी खंदशो-स्कन्दफ रामासी ६७,८०/ गोलापली एक प्रकार के गोल पत्थरों खंदग-यत्तव्ययागो खुद फी पति सन्यासी फेnिt मा १६ उपसण्-पौवाह का खदतो मन्दमा रोपासी RE६ / दिग-पन्द्र विमान संदयस्सन्मारदाराभ्यासीका (41) मंदिगान्द्रिपा गुमार ३२ शब्दार्थ-कोप के कारण का फल २०, २७ " . १ चक्खु-दएणं-ज्ञान-चनु प्रदान करने वाले ६४ । जति-देखो जइ चम्म-च्छिरत्ताए-चमड़ा और शिरात्रों जधा-जैसे १३ ६४ जमाली जमालि कुमार चरेमाणे-चलते हुए, विहार करते हुए ७२] जम्म-जन्म चलंतेहि चलते हुए, हिलते हुए ६७ | जम्म-जीविय-फले जन्म और जीवन चिंतणा-धर्म-चिन्ता चिंता चिन्ता जयंतेन्जयन्त विमान में चिट्ठति-स्थित है, रहता है, रहती है ४६,५१, जयण-घडण-जोग चरित्ते-जयन ( प्राप्त ५३, ६४, ६७,७२ योगों में उद्यम ), घटन (अप्राप्त योगों चित्त-कटरे-गों के चरने के की प्राप्ति का उद्यम) और योग के कुण्ड नीचे का हिस्सा (मन आदि इन्द्रियों का संयम) से चेतिए,ते-चैत्य, उद्यान, बागीचा १२, २७, युक्त चरित्र वाला ४६ ७१,६० जरग्ग-ओवाणहा-सूखी जूती चेलणाए-चेल्लणा देवी के जरग्ग-पाद-बूढे चैल का पैर (खुर) चेव (चऽइव)-ठीक ही १६, ४२१, ५१, जहा जैसा, जैसे १२२,२०,२७, ३५, ३६६ ६४, ७२, ७३,८६२ ४५,४६, ४६, ६३, ६४२,६७,८० चोदसण्हं चौदह का ८६,६० जहा-णामए,तेभ्यथा-नामक, जैसी, जैसा ५१%, छटुं-ण्टेण-पाठ पष्ठ तप से, जिस तप में उपवास ६ भक्त या दो दिन के बाद ५३, ५५, ५६, ६१,६७ खोला जाता है ४२,४३ छट्टस्सवि छठे ( भक्त) पर भी जाणएणं ( छद्मस्थ ज्ञान-चतुट्रय को ) ४२ जानने वाले छत्त-चामरातो-छत्र और चामरों से ३६ जाणूण-जानुओं का छमासान्छः महीने जाणेत्ता-जानकर छिन्ना-तोड़ी हुई १जातेम्बालक जइ,ति-यदि ३, ८, ११, २४, २६, ३२, ३५ ३४,४५, ८६ २ जाते-हो गया ३६, ८६ जं-जिस जामेव-जिसी ७३ जंघाणं-जवाओं का जालिं-जालि अ गर को जंबुंजम्बू स्वामी को जालिम्जालि कुमार या अनगार जंबू-जम्बू स्वामी, सुधर्मा स्वामी के जालिस्सम्जालि की १३, २७ मुख्य शिष्य ३, ८, १२, २४, ३२, ३४, जालीकुमारो जालिकुमार “१२ १०,८६, ६४/ जालीपिन्जालिकुमार भी १२. जगणीओन्माताएँ ६१ जाव-यावत् , पहले कही हुई वात को ७२२ जा जैसी १३,३७ . .
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ७ , ६० ४५, ७२२,७३२ ८० उसका आक्षेप सर्वत्र किया गया है ३', णाणत नानात्व, माता-पिता आदि का ८,११, १२, १३, २०,२४, २६, २७, वर्णन २० ३२, ३४, ३५२, ३७, ३८, ३६, गाम-नाम वाली ३४ ४२, ४५, ४६, ४६, ५३, ५५, ६४, णाम-नाम वाला ६७, ७२,८०,८१,८६, णिस्खंतो-गृहस्थ छोड़कर दीक्षित होगया १६ जावजीचाए-जीवन पर्यन्त ४२,४३ णिक्खमण-निष्क्रमण, दीक्षित होना ३६, ८६ जाहे-जय ३६णिग्गओ-निकला जिणे राग-द्वेप को सर्वथा जीतने वाले णिग्गता-निकली 'जिन' भगवान् ने ६५ णिग्गते-निकला जियसत्तुंजितशत्रु राजा को ३६ मिगतो-निकला जियसत्तू-जितशत्रु नाम का राजा ३५, ३६ णिग्गया निकली जिभाए-जिह्वा की, जीभ की ६१, हिम्मंस-मांस-रहित ६४ जीवेण-जीव की शक्ति से ६७२ हिम्मंसा मांस-रहित जीहा-जिह्वा, जीभ ६४ । गो-नहीं, निषेधार्थक अव्यय ४२२,५१, जेणे-जिसी ओर ५३, ६४ जोइज्जमाणेहिं दिखाई देती हुई ६७ तए-इसके अनन्तर ठाणं-स्थान को तओन्तीन ठिती-स्थिति ४२७, ८०,८६ ढेणालिया-जंघा ढेणिक पक्षी की जङ्घा ५३ तंजहा-जैसे ८,२४, ३२, ३५ ढेणालिया-पोराणिक पक्षी के सन्धि- तच्चस्स-तीसरे ३२, ३४, ६५ ५३ | तते-इसके अनन्तर ८, १३, ३६, ४२, णं-वाक्यालङ्कार के लिए अन्यय है, ४५२, ४६, ४६, ७२, ७३,८६,६० जिसका इस ग्रन्थ में हमने नु' से ततो इसके अनन्तर संस्कृत अनुवाद किया है ३,८०, ११, तत्थत्यहाँ १३, २४, २६, ३२२, ३४, ३५, ३७, तरुणए-कोमल ६४ ३६, ४२६, ४५२, ४६, ४६,५१, तरुणग-एलालुए-कोमल आलू ६४, ६७,७२,७३,०१,८६,६०२ तरुणग-लाउए-कोमल तुम्बा नहीं, निषेधार्थक अव्यय ४२, ४५२, ६४ तरुणितेन्छोटी, कोमल गगरी-नगरी ३४, ४५ तरुणिया-छोटी, कोमल एगरीए-नगरी में ८६ / तवन्तेरा ७३ गरीतो-नगरी से ४६, ४६ / तव-तेय-सिरीए-तप और तेज की लक्ष्मी गरे नगर णमंसति-नमस्कार करता है ४२, ७२, ७३ तब-रूव-लायन्ने-तप के कारण उत्पन्न हुई एवरं-विशेषता-बोधक अव्यय ६४ सुन्दरता १३,८०, ६१ / तं-उस - स्थान ३५ . १२, २७,७१,६० ८ शब्दार्थ-कोष ८० ४६ तवसा तप से ४६, ४६, ८६ तेत्तीसं तेतीस २०६१ तवण-तप से ६७ / तेरस-तेरह तवो-कम्म-तप-कर्म १६ तेरसण्हवि तेरहों की तयो-कम्मेणं-तप-कर्म से ४२, ४३ | तेरसमे तेरहवाँ २४ तस्स-उसका ३६, २०, ६० तेरसवि-तेरह ही २७ तहा-उसी तरह १२, २७, ३६, ६७, ८६ तेसिं-उनके तहा-रूवाण-तथा-रूप, शास्त्रों में वर्णन तो तो किये हुए गुणों से युक्त साधुओं का ४६ त्ति इति तहेव-उसी प्रकार १२, १३, २०, ४५, ७२, थावच्चापुत्तस्स-स्थावत्या-पुत्र की, स्था- ८०,८६,६० वत्या गावापत्नी का पुत्र, जिसने एक ताए-उस सहस्र मनुष्यों के साथ दीक्षा ली थी तामो-उस १३ ३६, ८६ तामेव-इसी ७३ थापच्चापुत्तो-स्थावत्या-पुत्र ३६ तारपणं-दूसरों को संसार-सागर से पार थासयावली दर्पणों (प्रारसियों) की करने वाले पंक्ति तालियंट-पत्ते-ताड़ के पत्तों का पता ५६ थेरा-स्थविर भगवान् १३, ८० ति-इति, समाप्ति या परिचय वोधक थेराण स्थविर भगवन्तों का अव्यय ८, १३, ५१, ५३' थेरेहि स्थविरों के (से). १२,८० तिकट्टु इस प्रकार करके ७३ | दस-देश ८, ११, ३२, ३४ तिक्खुत्तो-तीन बार ७३ | दसमे दशवाँ, दशम तिरिण-तीन ८ दसमो-दशम, दशवाँ ६१ तिह-तीन का २० दामो-विवाह में कन्या-पक्ष से आने वाला तित्थगरेण चार तीर्थों की स्थापना दहेज १२, ३६, ८६ करने वाले ६१ दारए बालक ३५, ८६ तिनेणं संसार सागर से पार हुए ६५ | दारयंचालक को ३५ तीसे-उस ३५, ८६ दिन्ना-दी हुई तुम्मेणं आप से ४२ दिवसं-दिन ४२२,८६ तुमंन्तुम ७३ / दिसं-दिशा को १३, ३२ दीदते-दीर्घदन्त कुमार ८, तेएण-तेज से ६७ दीहसेणे-दीर्घसेन कुमार २४, २७ तेणं उस ३, १२, २७२, ३४२, ३६', दुतिजमाणे-विहार करते हुए ४६, ७१,७२१,८६,६० दुमसेगेन्दुमसेन कुमार तेण्डेणं इस कारण ७२ दुमेन्द्रुम कुमार २४ तेणेव-उसी पोर ४५, ७२, ७३' दुरूहति-मारोहण करते हैं, चढ़ते हैं ८० .
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् २ . दुरूहंति आरोहण करता है, चढ़ता है १२ / धारिणी-सुआ-धारिणी देवी के पुत्र १३, २० नंदादेवी-नन्दादेवी नाम वाली रानी देवस्स-देव की १३,८० नगरी नगरी देवत्ताए-देव-रूप से १३,८० नगरीए-नगरी में ३५ देव-लोगाओ-देवलोक से १३, ८० नगरे नगर देवाणुपियाणं-देवों के प्रिय (आप) नव-नौ ६१ का १३, ३६ नवराह-नौ की देवाणुप्पिया देवों के प्रिय (तुम) ४२, ७२२ नवराहविन्नौवों की ६१ देवी-राज-महिपी, पटरानी १२, २७ नवमस्स नौवें देवे-देव ६२ नव-मास-परियातो-नौ महीने की संयम- दोच्चस्सन्दूसरे २४, २६, २७, ३२ वृत्ति दोण्ह-दो का २० नवमे नौवाँ ३२ दोन्निन्दो का २७,६१ नवमो नौवाँ ६१ धण्णस्स-धन्य कुमार या अनगार का ८० नवरं-विशेपता-सूचक अव्यय १२, २०, १धणे,ने-धन्य कुमार या अनगार ३२,४२२, २७, ३६२ ४५, ४६, ४६, ६७, ७२२, ७३, ६१ नाम-नाम वाली ७२ २ धणे-धन्य है ७३ नासाए-नासिका की, नाक की धरणो,नो-धन्य अनगार ८६२ / निक्खमणं-निष्कमण, गृहत्याग धन-धन्य कुमार नाम का ३५, ३७ निग्गओ-निकला धन्नस्सम्धन्य कुमार या अनगार का ३६, निग्गता-निकली ५१, ५३, ५५, ५६, निम्गतो निकला ३६ ', ७२ / निग्गया-निकली धन्ने, धनो-देखो धरणे, धरणो निसम्भ-ध्यानपूर्वक सुनकर धम्म-धर्म पंच-पाँच २०, २७ धम्म-कहा-धर्म-कथा ७२, ६० पंचएह-पाँच का धम्म-जागरिय-धर्म-जागरण ८०, ६० पंच धाति-परिक्खित्ते-पाँच धाइयों की धम्म-दएण-श्रुत और चारित्र रूप धर्म रक्षा में रखा हुआ देने वाले ६४ / पंच-धाति-परिग्गहित-पाँच घाइयों का धम्म देसएणधर्म का उपदेश करने वाले ६४ ग्रहण किया हुआ धम्म-चर-चाउरंत-चक्रवट्टिणा-उत्तम पगति-भद्दए-प्रकृति से भद्र, सौम्य धर्मरूपी चार गति और चार अवयव स्वभाव वाला १३ युक्त संसार के चक्रवर्ती ६४,६५, पग्गहियाए-ग्रहण की हुई, स्वीकार की धारिणी-धारिणी नाम की श्रेणिक राजा की रानी १२ पज्जुवासति सेवा करता है ६४, २० ३५ ३ १० शब्दार्थ-कोप ७३ - पडिगए-चला गया की .७२ पडिगओ-चला गया ६० पव्यतिते-प्रवजित हुआ ३६,४२,८६ पडिगताचली गई ६० पचयामि-प्रत्रजित होता हूँ, दीक्षा ग्रहण पडिगया चली गई ७२ करता हूँ ३६ पडिगाहेति ग्रहण करता है ४६ पव्याय-बदण-कमले जिसका कमलरूपी पडिग्गहित्ततेन्ग्रहण करने के लिए मुख मुरझा गया था ६७ पडिणिक्खमतिन्याहर निकलता है ४६,४६ पाउणित्ता-पालन कर १२,१३ पडिदसेति दिखाता है ४६ / पाउन्भूते-प्रकट हुआ ७३ पडिबंध प्रतिबन्ध, विन, देरी ४२ / पांसुलिकडएहि पसलियों की पंक्ति से ६७ पढम-छ-पत्रमण-पारणगंसि-पहले पांसुलिय-कडाणं-पार्श्वभाग की अस्थियों पाठ व्रत (वेले) के पारण में (हड़ियों) के कटकों की पढमस्स-पहले ८, ११२,२०, २४,३४,८१ पाण-पानी पढमाए-पहली ४५ पाणावली-पाण-एक प्रकार के वर्तनों पढमेम्पहले (अध्ययन) में की पंक्ति पण्णग-भूतेणं-सर्प के समान ४६ पाणिं हाथ ३८ पएण(न)त्ता प्रतिपादन किये हैं ८, ११, पात-जंघोरुणा-पैर, जवा और ऊरुओं से ६७ १३, २६, ३२,८०,६१ पादाणं-पैरों की परण(न)त्ते-प्रतिपादन किया है, कहा है पामातिय-तारिगाप्रातःकाल का तारा ६४ ३२, ११, २०, २४, २७२, ३२२, पायंगुलियाणं-पैरों की अँगुलियों की ५१ ३४, ८१, ६५ पायंगुलियातो-पैरों की अँगुलियाँ पण्णा(ना)यति-पहचाने जाते हैं ५१, ६४' पाय-चारेणं-पैदल ३६ पत्त-चीवराई-पात्र और वस्रों को १३ / पाया-पैर पयययाए % अधिक यत्न वाली ४५ पारण्यंसि-पारण करने पर, पारण के परिनिव्वाण-वत्तियं-परिनिर्वाण प्रत्य- ४२ किसी की मृत्यु के उपलक्ष्य में पासायवडि(डे)सए, ते श्रेष्ठ-सर्वोत्तम किया जाने वाला १२, ३७,३८, ७२, ८६ परियातो-संयम-वृत्ति या साधु-वृत्ति का पि-भी २७, ६० पिटि-करंडग-संधीहि-पृष्ठ-करण्डक परिवसइरहती है (थी) (पीठ के उन्नत प्रदेशों) की सन्धियों परिवसतिम्रहता है से परिसा परिषद्, श्रोतृ-गण ३, ३६, ७१, | पिट्टि-करंडयाएं-पीठ की हड़ियों के उन्नत ७२२,६० प्रदेशों की पलास-पत्ते-पलाश (ढाक) का पत्ता ५६, ६१ पिट्टिमवस्सिएण-पीठ के साथ मिले हुए ६७ पबंइते-प्राजित हुआ, साधु-वृत्ति धारण पिट्टि-माइया पृष्ठिमातृक कुमार ३२ समय यिक, महल में 3 ४२ पालन अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् २ ८० . पिता-पिता २७ / वीणा छिड्डे-वीणा का छेद ६४ पिया पिता ६१ युद्धणं-युद्ध, ज्ञानवान् ६५ पुच्छति पूछता है ८० योद्धब्बे-जानना चाहिए पुट्ठिले पृष्टिमायी कुमार ३२ चोरी-करील्ल-घर की कोंपल पुसे-पुत्र ३५, ८६ | चोहएणं दूसरों को वोध करने वाले ६५ पुग्नसेणे-पुण्यसेन कुमार २४ / भंते हे भगवन् ! ३२,८२, ११, १३, पुरिससेणे-पुरुषसेन कुमार २४, २६, २७, ३२२, ३४२,४२, ७२२, पुबरत्तावरत्तकाल-समयसिम्मध्य रात्रि ८०,८६,६० के समय में ६० भगवं-भगवान् १३, ३६, ४२, ४६, ७१, पुब्बरतावरत्तकाले-मध्य रात्रि में ७२, ७३, ८० पुवायुपुयीए-क्रम से ७२ भगवंताभगवान् १३ पेढालपुत्ते पेढालपुत्र कुमार ३२ | भगवता भगवान् ने ४२, ६४ पेल्लए=पेल्लक कुमार ३२ भगवतो भगवान का ४६,७३, ८६ पोरिसीए-पौरुपी, प्रहर, दिन या रात भगवया भगवान ने के चौथे भाग में ४५ भजणयकभल्ले-चने आदि भूनने की फुट्टतेहि-बड़े जोर से बजते हुए (मृदङ्ग कढ़ाई आदि वाद्यों के नाद से युक्त) ३८ । भत्तं भात चंभयारीब्रह्मचारी ३६, १६ भद्द-भद्रा सार्थवाहिनी को ३६ वत्ती(ति?)संयत्तीस १३, ३७, २६ भद्दा-भद्रा नाम वाली ३५, ३७,८६ वत्तीसाए बत्तीस ३८ भद्दाए-भद्रा सार्थवाहिनी का ३५, ८६ बत्तीसाओबत्तीस ३८, ११ भद्दाओ-भद्रा नाम वाली ६२ बद्धीसग-छिडे-यद्धीसक नामक बाजे भन्नति कहा जाता है ६४ का छेद ६४ } भवणं भवन ३७ वहवे बहुत से ४२. भवित्तान्होकर ४२ वहिया बाहर ४६,८६ भाणियन्वं, व्वा-कहना चाहिए २०, ६१ चहूबहुत भावेमाणे-भावना करते हुए चारसम्बारह चालत्तणंबालकपन २७ भासं भाषा, बोल यावत्तरि बहत्तर ३५ भास-रासि-पलिच्छन्ने राख के ढेर से याहाणे-भुजाओं की ५६ ढकी हुई थाहाया-संगलिया बाहाय नाम वाले वृक्ष भासिस्सामि कहूँगा ६७ विरोप की फली ५६ / भुक्खेणं-भूख से याहाहि भुजाओं से ६७ भोग-समत्थं, त्ये-भोग भोगने में समर्थ विलमिव-बिल के समान ४६,५६ १२ शब्दार्थ-कोप ४२, ८६ मेघ कुमार . करने वाला करने वाला ७३, ६० मंस-सोणियत्ताए-मांस और रुधिर के मुंडावली-खम्भों की पंक्ति कारण ५१, ६४ | मुंडे-मुण्डित मग्ग-दएण-मुक्ति-मार्ग दिखाने वाले ६४ मुग्ग-संगलिया मूंग की फली मज्भे-बीच में ३७ मुच्छिया मूचित ३६ ममं मेरा १३ । मूला-छल्लियान्मूली का छिलका ६४ मयालि-मयालि कुमार ८ मेहो'शाता धर्मकथासूत्र' में वर्णित मयूर-पोरा मोर के पर्व (सन्धि-स्थान) ५३ १२ महताम्बड़े भारी (समारोह से) ३६ मोकण-स्वयं मुक्त हुए महव्यले महाबल कुमार, जिसका वर्णन मोयएण-दूसरों को संसार-सागर से 'भगवती सूत्र' में किया गया है ३५, ३६ मुक्ति दिलाने वाले महा-णिजरतराए यड़े कर्मों की निर्जरा य-और ८,३२, ४२, ८० ७२' रामपुत्ते-गमपुत्र कुमार महा-दुकर कारप-अत्यन्त दुष्कर तप रायगिहे-राजगृह नाम का नगर ३, १२, २०, २७,७१, ६०, ६१ महादुमसेणमाती-महाद्रुमसेन आदि २७ राया-राजा १२, २०, २७, ३५, ७१, ७२, महादुमसेणे-महाद्रुमसेन कुमार २४ महाविदेहे-महाविदेह (क्षेत्र) में १३,८०,६१ | रिद्ध(द्वि?)स्थिमिय-समिद्धे, द्धाधन महावीर-धर्म के प्रवर्तक श्री श्रमण भग धान्य से युक्त, भयरहित और सब वान् महावीर स्वामी को ४२, ७२,७३२ प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त १२, ३४ महावीरस्स-श्री महावीर स्वामी का ४६, लट्ठदंते लष्ठदन्त कुमार ८, २० ७३, ८६ | लभति प्राप्त करता है ४५२, ४६ महावीरे-श्री महावीर स्वामी ३६, ४६,७१ लाउय-फले-तुम्बे का फल महावीरेणं श्री महावीर से ६४ लुक्खन्रुक्ष ६४ महासीहसेणे-महासिंहसेन कुमार २४ । लोग-नाहेणं-तीनों लोकों के स्वामी ६४ महासेणे महासेन कुमार २४ लोग-पज्जोयगरेणं-लोक उद्योतकर मा-नहीं, निषेधार्थक अव्यय ४२ (प्रकाशित करने वाले) माणुस्सए-मनुष्य सम्बन्धी ७३ लोग-प्पदीवेणं-लोकों में दीपक के मातुलुंग-पेसियामातुलुग-बीजपूरक की समान प्रकाश करने वाले ६४ फॉक ६३ | चंदति-वन्दना करता है ४२, ७२, ७३ माया,ता-माता २०, २७ | वग्गस्सवर्ग का ८, ११, २०, २४*२७, मासं एक मास ३२२, ६५ माससंगलिया-माप-उड़द की फली ५१,५६ | चग्गा मासिया-एक मास की वट्टयावली-लाख आदि के बने हुए बच्चों मिलायमाणी मुरमाती हुई के खिलौनों की पंक्ति ६४ .
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ७२ ५५ ८ , . ८०,६१ वड-पत्ते-बड़ का पत्ता ५६, ६१ । वेहल्लस्सम्वेहलकुमार का ६१ वत्तव्यया-वक्तव्य, विपय २७ वेहल्लेब्वेहल्ल कुमार वयासी-कहने लगा, बोला ३, ८, १३, ४२, वेहायसेविहास कुमार वा=विकल्पार्थ-बोधक अव्यय संचाएति-समर्थ होती है ३६ वाणियग्गामे वाणिज ग्राम नगर में संजमे संयम में, साधु-वृत्ति में वागरेति कहते हैं संजमेणं संयम से ४६,४६, ८६ चारिसेणे वारिसेन कुमार संपत्तेणे-मोक्ष को प्राप्त हुए ३,८२, ११, २०, २४, २६, २७, ३२, ३४, चालुंक-छल्लिया-चिर्भटी की छाल ६४ ८१,६५ वावि (वाऽअवि)-भी ३७ संलेहणा-संलेखना, शारीरिक व मानसिक वासाम्वर्प ६०, ६१ तप-द्वारा कपादि का नाश करना, वासाई, तिवर्ष तक अनशन व्रत वासे छेत्र में १३, ८० संसर्ट भोजन आदि से लिप्त (हाथों से विउलं-विपुलगिरि पर्वत दिया हुआ) ४२ विगत-तडि-करालेणं-नदी के तट के सञ्चयवही समान भयङ्कर प्रान्त भागों से ६७ / सायं-स्वाध्याय विजए,ये-विजय विमान में २७ सत्त-सात २० विजय-विमाणे-विजय नामक विमान में १३ सत्थवाहि-सार्थवाहिनी को ३६ विपुलं-विपुलगिरि नामक पर्वत १२ | सत्यवाही-सार्थवाहिनी, व्यापार में विमाणे-विमान में ८०,६१ निपुण स्त्री ३५, ३७, ८६ वियण-पत्ते बाँस आदि का पङ्खा ५६ सद्धि-साथ १२,50 विहरति-विचरण करता है १२, ३८, ४३, समएण-समय से (में) ३, १२, २७, ४६, ४६, ७२,८६ ३४, ३६,७१,६,१० विहरामि-विचरण करता हूँ ७२ | समणं श्रमण भगवान् ४२, ७२,७३ विहरित्तते-विहार करने के लिए ४२ समण-माहण-अतिहि-किवण-वणीमगा- चीतिवत्तित्ता व्यतिक्रान्त कर, अतिक्रमण श्रमण, माहन (भावक), अतिथि, कर, उसको छोड़कर उससे आगे १३,८० कृपण और वनीपक (याचक विशेप) ४२ वुञ्चति यहा जाता है समण-साहस्सीणं-हजारों मुनियों में वुत्त पडिवुत्तया उक्ति प्रत्युक्ति से ३६ (श्रमण सहस्रों में) वुत्ते-कहा गया है ३२ समणस्स-श्रमण भगवान् का ४६, ७२, वेजयंते वैजयंत विमान में चवमाणीए-कॉपती हुई ६७ / समणे-श्रमण भगवान् ४६.७१ चहल-बेहायसा-वेहल्ल कुमार और समणेएं श्रमण भगवान ने ३, ८, ११, विहायस कुमार २० २०,२४,२६,२७,३२,३४,४२, २०, है २०, २७ , .
शब्दार्थ-कोप का भाव, . १२,६० के समान फल विशेप ४६,८०,६४ संयम-वृत्ति १२ समाणी होने पर ५१, ५६ सामन्न-परियातो-संयम-वृत्ति समाणे होने पर ४२२, ४६ सामली-करीले-शाल्मली वृक्ष की कोपल ५३ समि-संगलिया-शमी वृक्ष की फली ५६ | सामाइयमाइयाइं सामायिक आदि ४६ समुदाणं-घरों के समूह से प्राप्त भिक्षा सामी श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी समोसढे-पधारे, विराजमान हुए १२, ३६, ७१, ६० साहस्सीणं सहस्रों में-(सहस्रों का) ७२ समोसरण-पधारना, तीर्थङ्कर का प्रधारना सिज्मणा-सिद्धि ६१ ३,८६ सिज्झिहिति-सिद्ध होगा १३,८०,६१ सयं-अपने आप ३६ सिढिल-कडाली (विव)=ढीली लगाम सयं-संबुद्धेणं अपने आप बोध प्राप्त ६७ करने वाले ६४ सिण्हालए-सिंस्तालक-सेफालक नामक सरण-दएणं-शरण देने वाले सरिसं-समान ६१ सिद्धि-गति-नामधेयं-सिद्धि गति नाम सरीर-चन्नओ-शरीर का वर्णन वाले ६५ सल्लति-करिल्ले शल्य वृक्ष की कोंपल ५३ सिलेस-गुलिया श्रेष्म की गुटिका सम्वट्ठसिद्धेसवार्थसिद्ध विमान में २०, सिन्कल्याणरूप ६५ २७,८०,६१ सीस-शिर ६४ सवत्थ-सर्वत्र, सब के विषय में ६४ / सीस-घडीए-शिररूपी घट (घड़े) से सव्वो-सब ७२ सीसस्स-शिर की सब्योदुए सब ऋतुओं में हरा-भरा रहने सीहसेणे-सिंहसेन कुमार २४ ३५ | सीहे-सिंह कुमार २४ सहसंबवणेसहस्राम्रवन नाम वाला एक सीहो-सिंह, शेर १२, २७ बगीचा ३४, ७२ सुकयत्थे-सुकृतार्थ सहसंयवणातो सहस्राम्रवन उद्यान से ४६ सुकं सूखा हुआ सावह सुक्क छगणिया-सूखा हुआ गोबर, गोहा ५६ साएए-साकेत पुर में ६१ सुक छल्ली-सूखी हुई छाल साग-पत्ते-शाक के पत्ते ६१ | सुक-जलोया-सूखी हुई जोक सागरोचमाई-सागरोपम, दश कोडाकोडी सुक्कदिए-सूखी हुई मशक पल्योपम प्रमाण का, काल का एक सुक्क-सप्प-समाणाहि-सूखे हुए सर्प के विभाग जिसके द्वारा नारकी देवता ६७ की आयु मापी जाती है १३, ८०,६१ सुक्का-सूखी हुई, सूखे हुए ५१, ५६ साम-करील्ले-प्रियङ्गु वृक्ष की कोंपल ५३ सुकातो सूखी हुई सामन्न-परियाग-साधु का पर्याय, साधु सुक्केणं-सूखे हुए वाला cu समान , अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् २ ३ ६ ७२, ७ ५३, ८ ७३ सुणक्खत्त-गमेणं-सुनक्षत्र के समान ६१ / सेसं-शेप (वर्णन), वाकी सुक्खत्तस्स-सुनक्षत्र के ६० सेसा-शेप २०,२ सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र कुमार ३२,८६ | सेसाणं-शेप का सुपुराणे-अच्छे पुण्य वाला ७३ सेसाणविशेष का भी सुमिणे स्वप्न में १२, २७ / सेसावि-शेप भी सुरूवे-सुन्दर, अच्छे रूप वाला ३५, ८६ / सोचा- सुनकर सुलद्धे-अच्छी तरह प्राप्त कर लिया है ७३ / सोणियत्ताए,त्ते-रुधिर के कारण ५१ सुहम्मस्स-सुधर्म नाम वाले श्री महावीर स्वामी के पाँचवें गणधर और जम्बू सोलस-सोलह १२, २०, २५ स्वामी के गुरु का ३ सोहम्मीसाणसौधर्म और ईशान नामक सुहम्मे सुधर्मा स्वामी पहला और दूसरा देवलोक सुहुय० (सुहुय-हुयासण इच) अच्छी हकुय-फले हकुब वनस्पति विशेष का तरह से जली हुई अग्नि के समान ४६ फल ६१ सुद्धदंते शुद्धदन्त कुमार २४ | हट्ट-तुट्ट-प्रसन्न और सन्तुष्ट ४३, ७३ १से-वह, उसके ८, १३, ४२, ४५, ४६', । हणुपाए-चिबुक-ठोड़ी की ६१ ४६,५१,५३२, ५५, ५६, ६१५, हत्थंगुलियाणं हाथों की अँगुलियों की ५६ ६३, ६४, ६७, ७२, ८००, ८६,६० हत्थाणं-हाथों की रसे अथ, प्रारम्भ-योधक अव्यय ७२ | हस्थिणपुरे हस्तिनापुर में ६१ सेणिए श्रेणिक राजा १२, २०, २७,७१, हल्ले हल्ल कुमार २४ ७२, ७३, ६० हुयासणे (इव)-अग्नि के समान ६७ सेणिओ=श्रेणिक राजा १२, २७ । होति होते हैं २४ सेणिते श्रेणिक राजा ७१ ) होत्थान्था, थी ३४, ३५१, ५१, ७२, ८६ सेणिया-हे श्रेणिक . ७२
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