Sanmati Library, Jaipur

Vaisheshikdarshnam

Swami, Tulsiram · 2009/09

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- ar जाम ओ३म् भूमिका देशोषकदशन कणाद मुनि का बनाया दर्शन है, जिम का शिषिक, नाम इस मन्वर्थ संज्ञा से पड़ा कि- अधिकृत्य कृते ग्रन्थे १।३ । ८३ सूत्रानुसार विशेषों का अधिकार करके जो ग्रन्थ बनाया गया, उम का वैशेषिक - रक्खा गया। अभेदवादी वा मायावादी अद्वैतियों का मत इस शास्त्र के सर्वथा प्रतिकूल है, क्योंकि भेद के विना गी और घोड़े में विशेष नहीं हो सकता । यह दर्शन विशेषों का व्याख्यान करता है, इस लिये अद्वैतवादियों ने इस का खगठनातास किया है। पतसिद्धि में वैशेषिकदर्शनोक्त विशेषवाद वा भेदवाद के विरुद्ध कैसे असभ्य और कर्ण- कटु शब्दों में कथन किया है सो श्रीमधु चूदनसरस्वती की पतसिद्धि लिखित नीचे के श्लोक से जाना जायगा- इह कुमतिरतत्त्वे तत्त्ववादी बराक: प्रलपति यदाकाण्डे खण्डनाभासमुच्चैः । प्रतिवचनममुष्मै तस्य को वक्तु विद्वान् नहि रुतमनुरौति ग्रामसिंहस्य सिंहः ॥ १ ॥ अर्थ-जो कि अवसर में अतत्व में तत्त्व बताने वाला बेचारा कुमति (वैशेषिकादि का अनुयायी) उच्च खानामास को बचाता है, यहां कौन विद्वान् उस का उत्तर देघे, क्योंकि कुत्ते के भौंकने पर सिंह उत्तर में नहीं भौंकता । धन्य हैं संसार को मिथ्या बताने वाले मिथ्यामायावादी विज्ञान जो पर मत की इतने कटु शब्दों में ईर्ष्या करते हैं । वेदान्त दर्शन का भाष्य मागे जारमा करने का विचार है, उस में जहां २ बैशेषिक वा अन्य शास्त्रों का तिरस्कार अद्वैतवादियों ने किया है, वहां उस का समाधान किया जायगा। इस वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद के पढ़ने वाले इस भ्रान्ति में नहीं पड़ेंगे कि षदर्शनों में परस्पर खण्डन । ईश्वर की कृपा से अब न्याय, वैशेपिक, सांख्य, योग-इन ४ दर्शनों का अनुवाद और भाष्य पूर्ण होगया । भाशा है कि पाठक इस से भी न्यायादि के समान रुचिपूर्वक लाभ उठायेंगे । तुलसीराम स्वामी ५ IFLR. सोम व्याख्याय न्यायशास्त्रं तदनु च सुधियोगशास्त्र मेण, तत्पशाताख्या रखें कपिल मुनिकृतं व्याकृतं व्याख्यया तत्। काणादे मूत्र जाते तदनु च विननाम्यार्यभाषानुवादं यं दृष्ट्वा भद्दामाजिकजनहृदये ज्ञान सूर्योदयःस्यात् ॥ १ ॥ अथ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवादः तत्र प्रथमोऽध्यायः गोक्ष के समाधारण हेतुभूत तत्त्वज्ञान फा नपरेश करने के लिये कणाद मुनि तस्य शान करेतु धर्ग के व्याख्यान की प्रतिता करते है:- १-अथाऽनीधर्म व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ ( प ) राय ( ातः ) म मे आगे ( धन ) धर्म को ( प्याख्यास्यामः) हा य्याम्यात करेंगे ॥ १॥ मागे धर्म का लक्षण करते हैं:- २-यनोऽभ्युदयनिःश्रेयमसिद्धिः स धर्म: ॥ २ ॥ ( यतः ) शिम ( सम्पदयनियनमितिः ) भोग गोक्ष फी सिद्धि हो (:),वाह ( धर्मः । धर्म है ॥ वजयदोक्त शुमानानटान पीर तस्वशानोपदेशक वेदादि शास्त्रास्यास का नाग धर्म है, जिन मे मामा रफ (पहिया : धिमक सय प्रकार के सुख भोग भोर अन्त में धर्मानुष्ठान ने अकारण शुद्ध होने पर उपतो प्रमशान में नियममुक्ति मिल को माफ ॥ २ ॥ ३-तद्वचनादान्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ ३ ॥ (तदयनात ) उम धर्म का वध होने से ( मानायस्य ) घेदादि शाय का ( प्रामाग्यम् ) प्रामागय है ।।

२ वैशेषिकदर्शन-भावानुवाद क्ष्योंकि धेदादि शास धर्म का वणग करते हैं, पुस कारण लोक तुन को प्रमाण जागता है। यदि वेदादि शादा में अभ्युदय नीर मोल को साधन धर्म का वर्णन स होता तो लोक उस को निरर्थक जान फर प्रमाण न वारता, परनादि शास में धर्म का निरूपण है और धर्म मनुष्य के ऐहिक सामुहिम काल्याण का साधन है, इस लिये लोक धंदादि शास्त्र में प्राचारयबुद्धि रखता है और रखनी चाहिये भी॥ यही बात मीमांसादर्शन १ । १ । २ में कही गई है कि-" घोदगाल. क्षणोऽयो धर्मः " जिस की प्रेरणा वेद पारि शास्त्र करना है, वह धर्म है। तथा मनु २।१३ में भी यही कहा है कि " धर्म निभानमानानां प्रमाणं परम श्रुतिः " धर्म को शिक्षालुओं को परम प्रगाश चंद है । ननु ४ . ६४ में भी - कहा है कि- वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादत्तन्दिनः । सद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोत्ति परमां गतिम् ॥ सर्थात् छेदप्रतिपादिम स्वधर्म का अनुष्ठान निगलव्य होकर मदा मारे प्योंकि यथाशक्ति उस का करने वाला परन गति नोक्ष) को प्राप्त हो जाता ॥३॥ घेदादि शास्त्रोक्त धर्म किस रीति वा भाग से मनुष्य की मुक्ति का हेतु है, सो वर्णन करते है:- ४-धर्मविशेषप्रसूबाद द्रव्यशुणकर्ममारमान्यविशेषसम- मायानां पदार्थानां तत्त्वज्ञानासियतम् ॥ ४ ॥ (धर्मयिशेपप्रभूताह ) पुयपविशेप से उत्पन्न हुने, (दुय्यगुण फरीकामान्य विशेषसमवायानाम् ) १-द्रव्य २ - गुगा ३ - फर्ग ४-गामान्य ५ विशेष गौर ६- समवाय ( पदार्थानाम् } ६ पदार्थों को ( नाधम्यंबैधाभ्याम् । साधर्म्य और बैधयं में होने वाले (तत्वज्ञानात् । नवप्रा से ( नियनम) मं' होता ॥ तरवशान से मोक्ष होता है, यह फलिताऽर्य है। तश्वमान वा १ विशे. पण 'धर्मविशेषप्रसूत' है अर्थात वह तत्त्वज्ञान जो सि पुरा विशेष में उत्पन्न छुवा है, -विशेषण-विशेज्य स्नान में शन्वित यह है कि द्रव्यगुण- वैधाभ्याम् तस्व० " द्रव्यादि ६ पदार्थों के साधय और वैधयं तब प्रपमाऽव्याय ५ ( याचार्य ) को जमना । पनी मे मुक्ति होती है। द्रव्याकि छहों पदार्थों को निदा गापूर्वक शागे स्वयं ५ धैं मूत्र से कहा है। व्यादि छहों के समान धर्म वा अनुगन धर्म या साधारण धर्म को माधम्यं समझो, भीर मा को विशेष धर्म शा व्यापत धर्म वा शसाधारमा धर्म को वैधम्यं कहते । मनमोग जिजामा पारेंगे सि पृथिव्यादि द्रव्य और गुण कर्मादि ली- कि पापी यो तत्यान से गोक्ष मिद्धि फा कथा ती पफ सनीखी बात :, मान्य ना मात्र ती दाजसाग ने मोक्ष मिलना मानते हैं। आम का उत्तर या है कि शाला बनारमा के भेदने पदार्थ दो प्रकार के हैं, जय तफ पृथि. यादि नाम पदायों का तत्व न काम पाड़े सव मफ इग ये बिलक्षा भती- न्द्रिय पालपदार्थ हा सत्वना दुधंट वा दुर्लभ है, हम लिये छम शास्त्र ने STIरमा और नारमा मसी पापोंक्षे तापान में मोक्षप्राप्ति होना वर्णित किया तव के शान होने पर परमातगतत्व का हान होता है, जिम को सीमा में गन्द का अनुभव किया जाता है । न्यायादि ५ दर्शनों में यष्टी प्रयनमा में विवाहात्मतत्त्वज्ञान का उपदेश करदी मुसुक्ष को फिर वेदान्त द्वारा नादात परमात्मतस्य फा उपमे होता है। योपिकाचार्य सणा गनिजी ने द्रध्यादि छः ही पदार्थ लिखे है, परन्तु नाग लोग दयनातायादि ने पाया पदार्थ असाव भी माना है। नर्क- नंग्रा में पारा करने वाले इपी 9 पदार्थ के विवाद में पड़कर न्याय धेशे. पिक के ताबी ग ममम मार षा याशाल में फंभे रह जाते है । सब प्रकार म वा योनिक के * प्रपत्य के अन्तर्गल है जीर मी में पायाय ने प्रधा नहीं गिने । एकत्यः आयोग लक्षणय भनेकता; इम गठमों का एसपी तात्पर्य है। इस लिये प्रागऽभावादि ३ पक्षाय ती भयोग भन्तर्गन हैं, पीपा सन्योन्यामाय लक्षण्य के अन्तर्गत है ॥ नवीन गाचायो यर्णित माय के भेदों को पाटफों के परिचयार्थ यहां लिखेले । यथा-माव ४ प्रकार का है । १ मागभाव, २-प्रध्वंसाऽभाव, ३ - पात्यन्तामाघ और भन्योन्याउलाय । १-प्रागभाव तम को कहते हैं जिजी कार्य की उत्पत्ति में पूर्ण सम ( कार्य ) का अभाव है, यह भभाव यद्यपि नारिहै तो भी गाणयान है, क्याफि पट की उत्पत्ति होने पर उस फा पागमान गट होगया, नहीं रहा। हम लिये फल यह हुया कि नाश- यान अमाव की प्रागलाय करते हैं । २ मध्वंसाता है जो कार्य के नाश नामक गुण है वशेषिकदर्शन-भाषानुवाद से पश्चात् उस का बसाव है। जैसे घट के नष्ट होने पर घट का समान है। यह अभाव सादि अनन्त है, क्योंकि घट के नाश ने पहले घट का प्रध्वंसा- भाव न पा, अतः सादि हुवा और घट के नाशक्षा में आरम्भ होकर जनन्तकाल के लिये अभाव हो गया। इन कारण याइ प्रमानाव यादि अजन्त सुवा। तब फलितार्थ यह निकला कि जन्य कार्य से नाशोत्पा अनाव को प्रध्वंसाताब कहते हैं । ३-लिली नरस्तु का एक देश को छोड़ कर अन्य देश में शालिक अभाव अत्यन्तामाब है। यह अगादि अनन्त है, क्योंकि यह अनाव तीनों सालों में एक सा रहता है, जो वस्तु जहां न पी नहै, न होगी, उस का वाहा अत्यन्ताताव वाहा जायगा । इम का मात्पर्य यह हुवा कि नित्यसंसर्ग यो अभाब को अत्यन्तामाब कहते हैं । ये तीनों साव अभाववादियों के नत में संसर्गाभाव कहाते हैं। ४ - एस वस्तु का अन्य वस्तु में जो अभाव है उस को न्योन्याउभाव पाहते हैं। जैसे घट ती पट नहीं, और पट घट नहीं। घट में पट और पट में घट के अभाव को अन्योन्यासाव कहेंगे। इसी को 'सादात्म्यसम्बन्धाऽवच्छिन्न प्रतियोगिताकाउमाव' भी काते हैं। कोई लोग एक ५ वे प्रकार का अभाव भी मानते हैं, वह यह है कि- सुद्धि और यवाला, समय विशेप में प्रतीत होने वाला 'सामयिकामाघ , कहाता है। उदयनाचार्य के मत में यह अत्यन्ताऽभाव के कान्तर्गन है, परन्तु इस की प्रतीति समयविशेष में इस प्रकार समझी जाती है कि घट वाले भूभाग घटसम्बन्ध के प्रागाभाव और प्रध्वंमाउनाव ती वमान नहीं हैं, और अत्यन्ताऽभाव नित्य पी है तो भी घट वाले भूभाग में वद्धिम्य नहीं होता, इस लिये मामयिकाउभाव एका पांचवां जान पड़ता है । नाय का अभाव तौ भाव ही है, अन्य कुछ नहीं, जना कि वाचस्पतिमिन तात्पर्य - टीका में कहते हैं शि- नो खल्वाभावाभावोनाम कशिवन्योभावात, नापि भावाझावोऽन्योऽभावात् । एस को नवीन लोग तीसरा अत्यन्ता. भाध बताते हैं । परन्तु नस को प्रागऽभाव स्वरूप होने से अनवस्था दोष नहीं । सामान्याभाव तो विशेषाऽभावसमुदाय से मिन ही है, पम में सब को समानता है । ममाव क्या है ? इस पो उत्तर में कोई ती फहते हैं कि भाव से भिन्न अभाव है। कोई कहते हैं कि निषेधात्मक प्रमीति का विषय होगा भाव है । तथा अन्य कहते हैं कि-द्रव्यादि छः पदार्थों में से एक में दूसरे का जमाव वाला ही अभाव है। किन्हीं का बाथन है कि समवाय से अन्य प्रथमाध्याय - R मममवायी या अनन्दित होना शताव है। और नवीन लोग इमको" तादात्म्य सम्यन्याच्छिा मावस्याऽवच्छिामावनिष्ठ प्रतियोगितानिरूपितानु योगिता विशेष यान्ता होना" कहते हैं। ऊपर लिखा नव्य मतमतान्तरबाद श्री स्वामी हरिप्रसाद जी कृत शे. पिकदर्शन वैदिक पत्ति के भाशय पर लिखा गया है ॥ ४ ॥ मम प्रपम गिमाये छः ६ पदार्थों में से पहिले गव्य पदार्थ के विभाग कहे जाते है- ५-पृथिव्यापरतेजोवायराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ॥ ५ ॥ (पृथिवी) पथिवी (आपः) चाल । तेजः) भग्नि ( घायुः) वायु (आकाशं) आकाश ( कालः ) ममय ( दिग् ) दिशा ( भास्मा ) मारमा ( मनः ) और मग (इति) ये ( द्रव्याणि ) ९ द्रव्य कहाते में ॥ येनी द्रध्य कुछ तत्ववाचक नहीं है, किन्तु पैशेषिक शाम में द्रष्य " संता इगह पदाथों की है। सांख्य, योग, वेदान्त की परिभाषा में पृथिवी, जल, तेज, वायु, माकाश, मन को प्रकृति का कार्य होने से प्रकृति के मन्तर्गत माना है। जिस को यहां न्याय और वैशेषिक में 'आस्मा' कहा है छमी जीवात्मा परनारमा ( भास्मद्वय ) को मांख्य में पुरुष कहा है। यहुत टीकाकारों ने इन द्रव्यों में नित्य, अनित्य द्रव्यों का विभाग किया है,कोई कहते हैं कि पाठयादि ४ भनित्य, शेष नित्य है, कोई ३ अनित्य शेष नित्य मानते हैं, परन्तु वैशेषिक शास्त्रकार ने स्वयं नित्य वा अनित्य कुछ नहीं कहा, सब यही समझना ठीक है कि सांख्यादि अन्यशास्त्रोक्तसिद्धान्तानुसार जिस को पैशेषिक, न्याय, मीमांसामें परमाणु और मांख्य, योग, घेदान्त में प्रकृति माना है, एफ वह नित्य है, दूसरा आस्मा नित्य है जिस को न्याय, वशेषिक में भास्मा, सांख्य में पुरुप, योग में चेतन वा घिति कहा है । आत्मा व पुरुषघा चिति में जीवात्मा परमात्मा दोनों का वा किमी एक का प्रकरणानुसार ग्रहण किया जाता है। शेष सब गनित्य अर्थात् प्रकृति का कार्य हैं ॥ ५ ॥ द्रव्यों का विभाग कहकर अय गुणों का विसाग कहा जाता है। यपा- ६-रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्या: परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वाऽपरत्वे बुद्धयः सुखदुःखे इच्छाद्रुपी प्रयत्नाश्च गुणाः ॥६॥ ।

w वैशेषिकदर्शन- भाषामुवाद (रूप-स्पर्शाः ) १-रूप २ रस ३ गन्ध ४ स्पर्श ( मंख्याः ) ५ मंगवायें ( परिमाणानि ) ६-नाप तोल सादि ( पृषकत्वम् ) 9 पृथक होना मनो. गविशागौ ) - संयोग भौर : वियोग ( परम्वाऽपरत्ये ) १० परे होना पीर १९ बरे होना ( बुद्धयः ) १२ बुद्धिये । इच्छाहपी ) १३ अच्छा और १४ इंच (घ ) और ( प्रयत्नाः ) १५ अनेक प्रयत्न ( गुणाः ) ये गुगा ६ ॥ पं० शङ्कर मिनकृत वैशेषिकसूत्रोपस्कार, पं० स्वामो हारप्रसाद जी ऋत वैशेषिकसूत्रवैदिफवृत्ति और पं० मार्यमुनिका वैशेषिकार्यभाप्यादि जचे गौर पुराने भी सब टीकाकारों ने सूत्रस्थ ( च ) शब्द ने १ गुरुत्वमारीपन २- इयत्व बहने वाला पतलापन ३ तेह चिकनापन ४-मंफार वेगादि ५ धर्म ६ अधर्म भोर ७ -शनाये ७ गुण और मानकार सूत्र में कहे १५ गुणों सहित २२ गुगा माने है॥ नीचे लिखी कारिकामों में जो पै०० क्ति में से उद्धृत है, कीन किस २ के गुण हैं, प्रकट होगा- स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्यः संस्कारोमरुतोगुणाः । स्पर्शासष्ठौ रूपवेगी द्रवत्वं तेजसोगुणाः ॥ १॥ स्पादयोऽष्टौ वंगश्च द्रवत्वं च गुरुत्वकम् । रूपं रसस्तथा स्नेहो वारिण्यते चतुर्दृश ॥ २ ॥ नेहहीना गन्धयुताः क्षिताईते चतुदंश । बुद्धवादिपटक संख्यादि-पञ्चकं भावना तथा ॥ ३ ॥ धर्माऽधौं गुणाएते आत्मनः स्युश्चतुर्दश । संख्यादिपजसं कालदिशोः शब्दश्च ते च खे ॥४॥ संख्यादिपजुझं बुद्धिरिच्छा यत्नोऽपि चवरे । परत्वाऽपरत्वे संख्यादि पञ्च बंगश्य मानसे ॥ ५ ॥ अर्थ-स्पर्शादि ८ ( स्पर्श १ मंख्या २ परिमाण ३ पृथक्त्व ४ संयोग ५ वियोग ६ परत्व9 अपरत्व ८) और ( वां घेगनामक सस्कार, ये वायु के गुण हैं । रूपर्शादि ८ और ह रूप, १० वेग मोर १६ गवत्व अग्नि के गुण है ॥१॥ रूपर्शादि ८ और बेग १० गवत्य ११ गुरुस्व १२ रूप १३ रस और १४ स्नेह; ये

प्रथमाध्याय
9
-
-
कुछ नहीं।
१५ गुणा हैं ॥ २ ॥ 38 १४ पाल के गुणों में से १ स्नेह को छोड घार
शेष १३ और १४
१५वां
गन्ध; ये १४ पृथिवी में गुण है । बुद्धि शादि,६ ( बुद्धि १
नख २ दुःख ३ इच्छा ४ प ५ और प्रयत्न ६) भोर संख्यादि ५ लय ११ तथा
१२ भावना ॥ ३ ॥ १३ धर्म १४ अधर्म; ये ९५ गुण आत्मा ( जीवात्मा )
६। मंख्या आदि ५ फाल और दिशा के गुण एं। मथा संख्यादि ५ और
६ शब्द, ये ६ आकाश के गुगा है ॥ ४ ॥ संख्यादि ५ घुद्धि ६ इच्छा 9 और यत्न
८ ये ईघर में गुण हैं। परत्व २ अपरत्व ३-9 तक संख्यादि पांच मीर ८ वां
येगा ये मन में गुण हैं ॥ ५ ॥
कोई लोग शक्ति को भी गुगा फहते हैं, कोई उत्त को एक प्रकार मा
दृश्य बाते है । परन्तु पेशेषिया के अपने नत में तो जिस पदार्थ पी जो शक्ति
है, यह उम का स्यम.प ही है, हिना
कोई लोग लघुत्व को एका पृथक गुण बताते हैं, याह ठीका भी जान पड़ता
है, पोंकि में मंयोग और विभाग एक दूसरे के विरोधी समझ जर पृथया २
गिने गये, इसी प्रकार गुमत्य का विरोधी लघुत्य (भारी पा विरोधी हलका)
भी
एगा
गिनाने योग्य जान पड़ता है, परन्तु और गहरी युति से विचार
पार नी लघुत्य ( मलकापन ) भी गुमत्व को अन्तर्गत है, घोंफि हलकी से
हलगी वस्तु में भी कोई बो (भारीपन वा गुरुत्व ) वश्य , तप गुरुत्व
ही ती सापेक्षाहन लधुन्ध भी हुबा, भिमा नहीं ।
तथा मदुत्वगर्मी, कठिगस्वनीापन, ये दोनों गुणा इस लिये
नहीं गिनाये गये फि अयययों मेो मंयोगविशे पाप हैं, पर नहीं ॥
शरता, उदारना, दगा, चातुर्य, उग्रता इत्यादि अन्य गुण भी प्रयनादि
बालगन होने मे पृथया नहीं गिनाये गये। एयोंकि यलवान् शत्रु के भी
पराजय करने यो यता करना शूरता है, जो यदा के अन्तर्गत हुई । सदा
मन्माग में रहने वाल वद्धि ही नदारता है । पराये दुःख दूर करने की इच्छा
ही दया है तत्व के भीतर प्रवेश करने वाली बुद्वि ही चातुर्य है। अपने में
उचता की बुद्धिही नग्रता है। इस प्रकार देखा जाये तो शूरतादि सय मय-
धादि में पृषक गिनान योग्य नहीं ॥ ६॥ भव कर्म के विभाग कहे जाते हैं-
७-उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारण
गमनमिति कर्माणि ॥ ७ ॥

शेषिकदर्शन - भाषानुवाद (उत्क्षेपणम् ) ऊपर को उठाना ( अवक्षेपणम् । नीचे को दबागा (आकु. चनम् । भिकोरगा ( प्रमार गाम् ) फैलाना और ( गमनम् ) घाना; ये ५ (कर्माणि ) कर्म है ॥ ७॥ द्रव्यों, गुगों और कमों पर विभाग काप कर आम द्रव्य गुण कर्म का साधय किन बातों में है, तो कहते है:- ८-सदनित्यं द्रव्यवत्कार्य कारणं सामान्यनिशेपवादिसि द्रव्यगुणकर्मणामऽविशेषः ॥ ८ ॥ ( सत् ) सत्ता वाला होना ( अनित्यम् ) होकर न रहने वाला होगा (द्रव्यवत् ) किसी समयायो द्रव्य वाला होना ( कार्यम् ) उत्पमा छोने वाला होना ( कारणम् ) किसी का उत्पादक होना (मामान्य विशेपवत) किपी में समामता और किसी से विशेषता वाला होना पति ) यह (द्रय गुगकर्मणाम् ) गायों, गुणों और कर्मों का ( अधिशेषः ) मामान्य वा साधर्म्य है। प्र० -मात्मा भी तो द्रश्य है, तब क्या वह भी इम मूत्र के अनुसार अगित्प है? ३० -पस सूत्र में सभी द्रव्यों वा सभी गुणों का नाघम्यं वा मानान्य नहीं कहा गया है, किन्तु जिन २ में मंभव है, उन २ का वियक्षित है। पोंकि यदि सूत्रकार अनित्य न कह कर नित्य कहते नी फर्म के नित्य न होने से उम से माधर्म्य कहमा अयुक्त होता । वारसव में न तो सब द्रव्य पनित्य है, न मय गुणा अनित्य है, कोई द्रव्य नित्य हैं, कोई अनित्य हैं जो नित्य है, उन के गुण भी नित्य हैं । जैसे भामा नित्य है, उम का बुद्धि ( चेतनाकान ) गुण भी उस का समवायी साथी नित्य है। जो मन शादि द्रथ्य नित्य हैं, उन के गुण भी अनित्य हैं। वस स सूत्र में शो अनित्य शब्द है, वह द्रव्यमान की अनित्यता का बोध नहीं कराता, किन्तु गो अनित्य में, उन का भनित्य गगों तथा शानित्य आवश्य गनित्य ) कर्मों से साधय है। जो नाहीं, उन का साधर्म्य भी नहीं। जिन २ द्रश्यों में अनित्यता है, उन का कामौ भोर गुणों ने साधर्म्य होता है, केवल इतना ही विवक्षित है । इसी पास को स्वामी श्री हरिप्रसाद जी ने चैदिकपत्ति में और मार्यमुनि जी ने आर्यमाप्य में तौ स्वीकार किया ही है, किन्तु इन से पुराने श्री शङ्कर मिन्न ने भी अपने वैशेषिकसूत्रीपस्कार में लिखा है कि- "अनित्यमिति ध्वंसप्रतियोगित्वं यदापिन परमाण्यादि साधारणं तथापि ध्वंस प्रतियोगिवृत्तिपदार्थविभाजकोपा- धिमत्त्वं विवक्षितम् ॥ ८ ॥ - प्रथमाध्याय अब केवल द्रव्य और गुण में कितना साधर्म्य हो जाता है, सी बताते हैं। ६-द्रव्यगुणयोः सुजातीयारम्भकात्वं साधय॑म् ॥ ६ ॥ (द्रव्यगुणयोः ) गव्यों और गुणों में ( सजातीयारम्मकत्वम् ) अपने सजातीयों को बनाने वाला होना ( साधय॑स् ) सामान्य है ॥ ९ ॥ अर्थात्- १०-द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारमन्ते गुणाश्च गुणान्तरम्म् ॥ १० ॥ ( द्रव्याणि ) द्रव्य (द्रव्यान्तरम् ) दूसरे द्रव्य को ( मारमन्ते ) अपने में से बनाते हैं (च) और (गुणाः) गुण (गुणान्तरम् ) अन्य गुण को [वमाते हैं] ॥ यद्यपि ८ वें सूत्र में कहे “अविशेष" शब्द की अनुवृत्ति से ही सून ह में साधर्म्य का अर्थ चल जाना, परन्तु अविशेप का और भी स्पष्ट करने के लिये तघा वाक्ष्य को लालित्य प्रकाशनार्थ दूसरे शब्द " साधर्म्य" का प्रयोग माचार्य ने किया जान पड़ता है, जैसा कि लाचार्य ने 6 वें सूत्र को भाप्यरूप इस १० में सूत्र को लिख दिया है ॥ १० ॥ तो जिस प्रकार द्रव्यों से द्रव्य बनते हैं, इसी प्रकार या कों से कर्म पती बनते है? उत्तर- ११-कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते ॥ ११ ॥ (कर्मसाध्यं ) शिस का कर्म साध्य हो वह ( कई ) कर्म ( न ) नहीं ( विद्यते ) है ॥ ऐमा कर्म कोई नहीं है जिस से फर्मान्तर बनता हो क्योंकि 'कर्म उत्पन्न होते ही 'विभाग' को उत्पन्न करता है, तो फिर वह स्वयं उत्पन्न फर्म किमी मान्य कई को या उत्पन्न करेगा ? प्रन्न-एक वार कन्दुक (गेंद) को पृथिवी पर गद्दा देते हैं, वह एक कर्म है, फिर गेंद उछन्न कर पृथिवी पर गिरती और फिर उछलती है, तब क्या उछन्नु ना कर्म, कर्म में ही उत्पन्न नहीं हुवा ? यदि हुवा तो कर्म साध्य कर्म क्यों नहीं? उत्तर-गेंद को गहा देकर उस में वेगाख्य संस्कार उत्पन्न किया गया था, संस्कार गुणों में है, कनों में गिना नहीं गया, वस वेग ने कर्म उत्पन्न किया, न कि कर्स ने कर्मान्तर ॥ १९ ॥ द्रव्यों, गुणों और कमों का साधर्म्य कह कर मव गुणों, कमाँ और द्रव्यों का वैधर्म्य कहते है- १० वैशेषिकदर्शन-भापानुवाद १२-न गव्यं कार्य कारणं च वधति ॥ १२ ॥ ( कार्य ) कार्य (च) और (कारणं) कारण (व्यं) द्रष्य को (न) नहीं (अधति ) नष्ट करता ॥ कोई कार्य कार्यद्रव्य का नाश नहीं करता, और कोई कारण, कारण द्रव्य का नाश नहीं करता । 'वधति' यह आर्घ प्रयोग 'हिनस्ति' के स्वाग में है ॥ १२॥ अब गुणों का प्रकार बताते हैं- १३-उभयथा गुणाः ॥१३॥ ( गुणाः ) गुण ( उभयथा ) दोनों प्रकार के हैं ॥ अर्थात् गुणों में दोनों प्रकार हैं, वे कार्य का नाश परी करते हैं, तथा कारण का भी । जस्ले शब्द एक गुण है; उस पा ले शब्द को उम का कार्य (दूसरा शब्द ) नष्ट कर देता है। और अन्त : शब्द को उस का कारण वही उपान्त्य (अन्त से पूर्वला ) शब्द नष्ट कर देता है ॥ १३ ॥ प्रश्न-और कर्म कैसा होता है ? उत्तर- १४-कार्यविरोधि कर्म ॥ १४ ॥ ( कार्यविरोधि ) जिस का विरोधी कार्य हो, ऐसा ( क ) फन है ॥ कोई कर्म ऐसा नहीं होता जिस का नाश उस के कार्य में न हो जाय । सभी कर्म अपने कार्य से नष्ट होजाते हैं। क्योंकि कर्म, विभाग को उत्पन्न करके और अगले संयोग को उत्पन्न करले अवश्य स्वयं नष्ट होजाता है ॥१४॥ प्रश्न-जिस द्रव्य का यह प्रकार कहा गया कि उस को न तो कार्य नष्ट करता, न कारण, उस (द्रव्य ) का लक्षण क्या है ? उत्तर- १५-क्रियागुणवत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम् ॥१५॥ जो ( क्रियागुणवत् ) क्रिया वाला और गुणों वाला हो, ( सनवायि कारणं ) संग रहने वाला कारण हो ( इति ) यह (द्रव्यलक्षणम् ) द्रव्य का लक्षण पहचान है॥ यदि-एकला क्रिया वाला कहते तो आकाश क्रिया वाला नहीं, तब उस में व्याप्ति दोष आता, इस लिये दूसरा लक्षण गुणों वाला कहा गया और नैयायिक कहते हैं कि " जायमानं हि द्व्यं क्षणमगुणं तिष्ठति कार्य द्रव्य - .

प्रथमाध्याय १९ जन उत्पदा होते हैं उन क्षण में गुणरहित होते हैं, तब उत्पद्यमान घटादि कार्य द्रव्यों में नम क्षण भर को गुण वाला न होने से लक्षण अव्याप्त रहता, इस कारण तीमरा विशेषण 'सनवायिज्ञारण ' लिखा गया । क्योंकि उत्प- धनान घटादि भी अपने उत्पत्स्यमान गुगों को प्रति सनवाधिकारण होते हैं। किसी एक लक्ष्य में लक्षण का न घटना अध्याप्ति दोष कहाता है। लक्ष्य से अन्यत्र भो लक्षण का घट जाना अतिव्याप्ति कहाला है तथा लक्ष्य मात्र में ही लक्षण फा सर्वथा न घटना असंभव कहाता है। ये तीनों दोप न हों, तब निर्दोष लक्षण होता है। द्रव्य का लक्षण गो इस सूत्र में कहा है, तीनों दोपों से रहित ठीक है ॥ १५ ॥ अव गुण का लक्षण करते हैं:- १६-द्रव्याश्ययऽगुणवान् संयोगविभागेष्वकारण मानपेक्ष इति गुणलक्षणम् ॥ १६ ॥ जो (द्रव्याशायी ) द्रव्य के आश्रय वाला हो, ( अगुणवान् ) अन्य गुणों. वाला न हो, (संयोगविज्ञानेपु) संयोगों और विभागों में (अनपेक्षः) अपेक्षा रहित (अकारगम् ) कारण न हो, (नति ) यह (गुणलक्षणम् ) गुण का लक्षण है । गुगा उन को कहते हैं जो किसी द्रष्य का गानय अवश्य करते हों, द्रव्य के विना कहीं न पाये जाते हों, तथा जैसे गुण किसी द्रव्य का गुण है, वैसे गुणा का गुण कोई न हो और जैसे फर्म, संयोग विभागों का सापेक्ष कारण होता है, वैसा न हो शर्यात् गुणा, संयोग विभागों को उत्पन्न नहीं करता है। यह गुण का लक्षण है। यद्यपि सामान्य दि भी गुणों में रहते हैं परन्तु सामान्य, विशेप को अाचार्य ने स्पष्ट भिन्न पदार्थ पाह कर छः पदार्थ गिनाये है, जिस में प्रतीत होता है कि आचार्य भी यह भाव रखते थे कि द्रव्यादि पदार्थ और सामान्यादि उपपदार्थ है ॥ १६ ॥ मागे कर्म का लक्षण करते है:- १७-एकद्रव्यमऽगुणं संयोगविमागेष्वन- पेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम् ॥ १७ ॥ जो (पन्द्रध्यम् ) एप द्रव्य वाला हो, अनेक द्रव्याश्रयी न हो, (अगुणम् ) जो गुगावान् न हो, ( मंयोगविभागेपु ) संयोगों और विभागों में ( अनपेक्ष कारणम् ) निरपेक्ष स्वतन्त्र कारण हो, (इति) यह ( कर्मलक्षणम् ) कर्म का लक्षण है॥

2. १२ वैशेषिकदर्मन-भापानुवाद कर्न जन स्वयं उत्पन्न होता है तब किमी न किमी संयोग और विभाग को उत्पन्न करता है, और संयोग विभागों के उत्पादन में यद्यपि जम, ना. वायि द्रव्य की और पूर्व संयोग नाश की अपेक्षा रखना है तथापि न ती वह द्रव्य, कर्म की उत्पत्ति के पश्चात् उत्पन्न होता, न पूर्व संयोगा गभाव है, इस कारण संयोग विभागों में निरपेन कारण ही है ॥ १७ ॥ खान इन द्रव्य गुण फलों का लाधम वतनाते :- १८-गव्यगुणकर्मणां द्रव्यं कारणं सामान्यम् ॥ १८ ॥ (द्रव्य-णाम् ) द्रव्यों, गुणों और बालों का ( व्यं कारणं ) द्व्य कारन होता है ( सामान्यम् ) यह समानता है ।। द्रव्य गुण कर्म तीनों एक द्रव्य के आश्रय रहते हैं, यही इन तीनों का साधर्म्य वा सामान्य है ॥ १८ ॥ १६-तथा गुणः ॥ १६ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( गुणः ) गुण है। जिस प्रकार द्रव्य गुण कनों का कारण एक द्रव्यं होता है, इमी प्रकार गुण भी उन तीनों का कारण होता है । यथा कारण द्रव्यों का संयोग गुण, कार्य गव्य का कारण हुवा, कार्य रु.पादि गुणों का कारण भी कारण रूपादि हुचे और गुरुत्वादि गुण, उत्क्षेपणादि कामों का कारण हुबे, इम प्रक्षार सब द्रव्य गुण कमाँ का कारण कोई न कोई गुण हुवा । यह जी द्रव्य- गुण कनों का गुण के साथ साधर्म्य है ॥ ८ ॥ अब और भी साधर्म्य कहते हैं:- २०-संयोगविभागवेगानां कर्म सम्मानम् ॥ २० ॥ ( संयो-नाम् ) संयोग, विभाग और वेगों का कारण ] ( कर्म ) कर्म है ( समानस् ) यह समान है ।। संयोगों का कारण कर्म है, विभागों का कारण भी फर्म है और वेगों का कारण भी की है। इस बात में संयोग, विसाग, वेग; तीनों ममान हैं कि उन तीनों का कारण एक कर्म है। यही इन तीनों का साधर्म्य है ॥ जैसे धाण आदि में संधानादि कर्न ही वाण से धनुप क्षे नंयोग का कारण हुवा, प्रत्यच्चा का खींचना (कर्म), वाण से धनुष के वियोग का कारण हुवा, तथा . - प्रथमाध्याय १६ बाण में बेग के इत्पादग पारने से वेग का सी कारण हुवा । इस प्रकार मं योग, विभाग और येग का कारण कर्म है ॥ २० ॥ पदि कारो कि संयोग, विज्ञान और वेग; इन तीन का ही पयों, द्रव्यों का कारण भी तो कर्म है, जो मूत्र में क्यों न कहा ? तो उत्तर- २१-न द्रव्याणां कर्म ॥ २१ ॥ (द्रव्याणां ) द्रव्यों का [ कारगा ] ( धार्म ) कर्म (न) नहीं होता ॥२१॥ ययोंकि- २२-व्यतिरेक्षात् ॥ २२ ॥ ( गतिरंगात् ) गाव होने मे ॥ द्रव्यों फी उत्ति के मनय कर्म व्यतिरिक्त (अभाव प्राप्त) होता है। क्यों कि कर्म की द्रव्य के आरम्भ करने वाले मंयोग को उत्पन्न करके स्वयं प्रध्यं- नाभाय को प्राप्त हो जाता है, फिर संयोग उन द्रव्य का फारण हो, पर कर्म नाक्षात गिमी कार्य द्रव्य का कारण नहीं कर सकता । यद्यपि फर्म संयोग का कारण और मंयोग कार्यद्रव्योत्पत्ति का कारण हो, इस प्रकार परम्परा से चाहे कार्ग कारण रहो, परन्तु नाक्षात् नहीं। यही मंत्रकार की विवक्षा है ॥२२॥ कारण फा मामान्य कह कर अब कार्य का मामान्य फाहते हैं: २३-द्रव्याणां द्रव्यं कार्य सामान्यम् ॥ २३ ॥ (ट्रव्यागां) द्रव्यों का (द्रव्यं) द्रव्य (काय) पायं होता है, यह (सामान्य) मगाना ॥ जिन प्रकार द्रव्यों का कारण दृश्य होते हैं, इसी प्रकार द्रव्यों का कार्य भी द्रव्य होते है, या मामान्य है । जमे घट दो कपालों का कार्य द्रव्य है, पट तन्तुओं का कार्य द्रव्य है ।। २३ ॥ प्रश्न-ती पपा जिन मकार गुग द्रव्यों का पाश्रय करते हैं, उमी प्रकार कर्म भी द्रव्यों का माश्रय करते हैं, तब जमे गुणों का कार्य गुण होना सामान्य यमे कमाँ का कार्य कर्म हो, यह मामान्य भी है ? उत्तर-नहीं ? क्योंकि- २४-गुणवैधान्न कर्मणां कर्म ॥ २४ ॥ ( गुणधम्यांत ) गुण की विरुद्धता मे (कर्मणां ) कमाँ का (कर्म) कर्म [कार्य हो, यह मामान्य ] ( न ) नहीं है ।। --

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१५
वैशेषिकदर्शन-शापानुवाद
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और इस
इस मूत्र
गुणों का साधर्म्य यह है कि वे सजातीय
गुगान्तर कार काररा)
होते हैं, जहां इसका विरोध हो, वह वैधम्यं होगा, अथवा दुगों का मा.
धर्म्य यह है कि वे हव्याश्रयी होते हैं, इन के विरुद्ध कर्मपन को धमई कहिंगे।
इस लिये कमाँ का कार्य कर्म नहीं है ते । अर्थात् यद्यपि द्रव्यानयाद में कर्म
फो फर्नान्तर से समानता है, तो भी जैसे कारगा गुगा सुपादिक, अपने कार्य
रूपादि का आरम्भ करते हैं, वैने अवयत्र कर्म अश्यत्री में कर्मात्यादक
नहीं होते। यह बात पूर्व सूत्र ११ ३ में कह भी आये थे, तथापि यहां पुन.
रुक्ति दोष इस कारण नहीं मानना चाहिये कि ११ वें नूत्र में कारण नामान्य
का निषेध किया था,
में कार्य नामान्य का निषेध करती हैं ॥२४॥
गव्यों का कार्य द्रव्य कह कर अव द्रव्यों का कार्य जो आई एक गुग है,
उन का कथन करते हैं:-
२५-द्वित्नप्रभृतयः संख्या: प्लयात्नसंयोगविभागाश्च ॥ २५ ॥
२३ वे सूत्र में से “ द्रव्याणां, कार्य " की अनुवृत्ति चलो ही मानी है
(द्वित्वप्रभृतयः ) द्वित्वादि ( संख्याः ) संस्थायें, ( पृयकत्व योगवितागाः )
पृथक्त्व, संयोग और विभाग (च) भी [दव्यों का कार्य है, यह नानाज्य है ] ॥
एकत्व संख्या तौ विसी द्रव्य का कार्य नहीं, क्योंकि एकत्व तो नसी
में अनुगत होने से किसी का कार्य नहीं हो सकती, हां हित्य नित्त्व शादि
संरुपाये अनेक द्रव्यों के मेल से उत्पन्न होती है, पातः के द्रव्यों का कार्य
होती हैं, तथा पृथक् होना, जुहना,और बिछुड़ना; ये भी द्रव्यों को कार्य हैं ॥ २५ ॥
तो क्या जिस प्रकार द्वित्वादि, द्रव्यों का कार्य हैं, वैमे कार्स भी हैं ?
उत्तर-नहीं, क्योंकि-
२६-असमवायात्सामान्यकार्य कर्म न विदाते ॥ २६ ॥
(असमवायात् ) समवाय सम्बन्ध न होने से ( कर्म ) कर्म ( सामान्य
कार्य) सामान्य कार्य ( न ) नहीं ( विद्यते ) है।
कों का द्रव्यों से सुनवाय सम्बन्ध नहीं, अर्थात नित्य संवन्ध नहीं,
इस लिये कर्म द्रव्यों के कार्य सामान्य में नहीं गिनाये ना सकते ॥ २६ ॥
२७-संयोगानां द्रव्यम् ॥ २७ ॥

प्रथगाध्याय १५ (योगानां) नंयोगों का ( द्रव्यम् ) द्थ्य [ फार्य सामान्य होता है ] ॥ संयोगों में कार्य द्रव्य बनते हैं। यह स्पष्ट ही है । २८-रूपाणां रूपम् ॥ २८ ॥ (पाणां ) रूपों का ( रूपं ) रूप [ कार्य सामान्य है ]n इसी में यह भी मम लेना चाहिये कि जिस प्रकार कारण रूपों का कार्य मांगान्य कार्य रूपों में है, उनी प्रकार रम, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांमि- हिश, नवत्य, एकत्त्व, पृयकत्व, परिमाण, घेग, स्थितिस्थापक, और गुरुत्व न कारणों का कार्य नागान्य अपने २ कार्य रसादि में है ॥ २८ ॥ या काह कर कि गुणों का गुण एक कार्य सामान्य है, अब यह कहते हैं कि गुगों या एक कर्म कार्य- सामान्य है। यथा- २९-गुरुत्वप्रयत्नसंयोगाना मुरक्षेपणम् ॥ २० ॥ ( गुम-मां ) गुरुत्व, प्रया और मंयोग, इन फा (उत्क्षेपणं) एक उत्क्षे. पण नामक प. [ कार्य सामान्य है ] ॥ नरक्षेपण-उलाग्न फो पाहते हैं, जो गुरुत्व- वज़न, प्रयनहरकत और संयोग से होता है। यह स्पष्ट ही देखा जाता है ॥ २९ ॥ गुणों का कार्य कह कर अब कमी का कार्य कहते है:- ३०-संयोगविभागान कर्मणाम् ॥ ३० ॥ (मंयोगविभागाः ) संयोग, विभाग (च) शीर वेग ( फर्मणां ) [शायं मानान्य है ॥ पशब्द में आचार्य ने वेग का समुच्चय किया जान पड़ता है क्योंकि कर्म में ही मंचोग विभाग और वेग उत्पन्न होते हैं ॥ ३० ॥ यदि यही शिव मंयोगविभागादिक ही कर्म का कार्य हैं, द्रव्य शीर फर्म नहीं, नव यही पयों न कह दिया कि • मंयोग और विभाग ती कमी के फाय, द्रव्य और कग नहीं", ३१-कारणगामान्ये द्रव्यकर्मणां कर्माऽकारणमुक्तम् ॥३१॥ (कारमानामान्ये ) फारण की समानता में ( क ) फर्न को (द्रव्यकर्म- णाम् ) द्रव्यों शीर कमाँ का (अकारणम्) कारण न होना (रक्तम् ) कहा है ॥ का का १. ती उत्तरhar भ वैशेषिकदर्शन-माधानुवाद पूर्व सूत्र २१ में -"न द्व्याणां कर्स" और ११ में -“कर्म कर्म माध्यं न विद्यते कह चुके हैं, जिन का तात्पर्य यही है कि न तो कर्म कमों का कारण कार्य- भाव होता, न द्रव्यों का कारण कर्म होता । इस लिये यहां उस के पुनर्वार कहने की आवश्यकता नहीं ॥ ३१ ॥ श्री स्वामी हरिप्रसाद जी का श्लोक इस मान्द्रिका का संक्षिप्त प्राशय नतान्दै और याद रखने में बड़ा उपयोगी है । इस लिये उस को ज्यों का त्यों उद्- धृत करता हूं कि पाठक लाभ उठावें- "मेयोद्देशो विभागोऽथ सामान्यं च विशेपकम् । अर्थस्य लक्षणं चास्मिन्नान्हिके संप्रकीर्तितम् ॥१॥ अर्थात् इस आन्हिक में प्रमेय पदार्थों के नाम और विभाग, सामान्य और विशेष और अर्थ का लक्षण वर्णन किया गया । इति प्रथमाऽध्यायस्य प्रथममान्हिकम् ॥ अथ प्रथमाऽध्याये द्वितीयमान्हिकम् पूर्व. आन्हिक में यह तो कहा गया कि द्रव्य गुण कर्म का कारण मामान्य यह है, कार्य सामान्य यह है, परन्तु कार्य कारण का स्वरूप नहीं बताया गया, इस कारण कारण कार्य सामान्य का समझना क्षठिन रहा, उस को सरल करने के लिये इस आन्हिक में कार्य कारण स्वरूपादि का ही वर्णन प्रारम्भ करते हैं:- ३२-कारणाऽभावात्कार्याऽभावः ॥ १॥ ( कारणानावात् ) कारण के अभाव से (कार्याभावः) कार्य का मनाव होता है । अन्य सामग्री के होते हुवे भी जिस के अभाव में जो न हो सके वह उस का कारण ( उपादान ) होता है तथा वह स्वयं कार्य पाहाता है, यह कार्यकारण का स्वरूप बताया गया अर्थात् यह निश्चल नियम है कि कारण के बिना कार्य नहीं हो सकता । कारण हो तभी कार्य हो सकता है। इस लिये जिस पूर्व वर्तमान पदार्थ के भाव से उत्तर भावी पदार्थ का भाव हो सके, वही पूर्ववृत्ति पदार्थ उस उत्तरवर्ती पदार्थ का कारण कहावेगा मौर १ अध्याय २ जान्हिक १७ उत्तरवर्ती कार्य कहावेगा । यह फार्य कारण का स्वरूप है। जैसे थीग कारण गौर शङ्कर कार्य है ॥ १॥ ३३-न तु कार्याऽभावात्कारणाऽभावः ॥ २ ॥ (तु ) परन्तु ( कार्याऽनावाप्त ) कार्य के जमाव से ( फारणाभावः ) फारस का अभाव (1) नहीं होता। शिम मकार पारण हे भाव में कार्य हो नहीं सकता, इसी प्रकार कार्य के मनाय में कारण मी नो, या नियम नही। मिट्टी के अभाव में घहाती भयश्पन होगा, परन्तु घरे के भाव में मिट्टी का अभाव आवश्यक नहीं। गिट्टी ( कारण ), घले ( कार्य ) मे विना भी होती हे ॥ २ ॥ ट्रम्प गुगा लगों के लक्षण और स्वाइप को समझने के लिये उग फा परस्पर भाधर्म्य, वैधम्यं भी कहा गया। कार्य यचा है, कारण पपा है, यह भी भठे प्रकार बताया गया। पाय अध्याय १ मूत्र ४ चतुर्थोक्त क्रम द्व्य गुण फर्म भगठे मागाय गीर विशेष के लक्षण और परीक्षा को भागे फहना चाहते हुये पाताय, म यिषय में अनेक वादियों की विप्रतिपत्तिय जानकर प्रथम मामान्य विशेष के होने में प्रमाण फाते ६:- ३४-सामान्यं विशेप इति बुझऽपेक्षम् ॥ ३ ॥ (पामान्यं ) मामान्य (विशेषः) विशेष (इति) यह दोनों (बुरपेक्षम् ) ममझ की पापेक्षा में हैं। ट्रव्यादि पदापों में एक दूसरे मे भेद होने पर जो हमारी समझ में मनामता पाती है, वही सामान्य पदार्थ है। जैसे द्रव्य मत् है, गुण भी मत की भी मत् है, तोगों में गत्ता ( होगा) मगान है, बस यही उन में सामान्य । भय दथ्य में गुग्ण में भेद करने वाले लक्षण असे ( अगुगावान् ) गुणान्तर रहिस होगा, यह द्रव्य में गुण का विशेष है, इसी में हम समझते हैं कि सिक २ दो पदायें। इसी प्रकार फर्म में सत्तामा के सागान्य रहते भी पाध्याय १ गृत्र १७ की विशेषता कि एक द्रव्य वाला, गुणरहित, भंयोग विभाग में गिरा फारम होगा पार्म की विशेषता (विशेष) हैं, जिन में हम कौ को द्रष्यादि से पृयफ नमकते हैं। यह जो हमारी सगझ है, गही पौर ३ । १८ वैशेषिकदर्शन-शापानुबाद सामान्य विशेष पदार्थ के होने में प्रमाण है ॥ जो ति व्यावहारिक नित्य समानता अनेक व्यक्तियों में चमवाय सम्बन्य वसान है, उसी को मोगिया दान का लाक्षणिला मामान्य ज्ञानिये, सो ति लिए घस्तुगों प सनान बुद्धि को उत्पात फरता है। इस पे नतिरिक्त जो एका पदार्थ से दूसरे ले लेद की बुद्धि फो उत्पा करता थे, या विशेष है। जैसे एक स्थान में धार मनुष्य भार मनुष्य बेठे हैं, उन पाओं में मनुष्यपना एकाला चा समान है, उस समानता की पहचान पाने वाला जो पदार्थ है, वही यहां वैशेषिकदर्शन में “ सामान्य" महाता है । सय उन्हीं चारों में एका पाया है, दूसरा युपा है, तीसरा पर है और धीया रोगी है। ती बाह पश्चाग जिस कि एषा फी वासक, दूसरे लो युघा, तीसरे पो बाद और पीये को रोगी सनभाते हैं, जिस से हम वाला पो युधा नहीं सनभाते, बुधा को बद्ध नहीं समझते, वा पो रोगी भी नदी समाते, इम पर धान का काराने वाला, पाला से युवा, युषा से वृद्ध जीर घद्ध से रोगी भेद को जताने पाखा जो लोई पदार्थ है, वही पैशेषिक दर्शन में विशेष पाहाया है। इस प्रकार विशेप में सामान्य व्यापक हुया पारता , परन्तु विशेष ध्याध्य छुवा करता है, जैसे बालक होने पर भी सौर युवा रे शिमा होने पर भी मध्यपना दोनों में पाया जाता है, पालक भी चुदा भी मनुष्य है शीर रोगी भी मनुष्य है, परन्तु वाल म, युवा मही, थुधा हद्ध नहीं, यह रोगी महीं, लप पालकत्व युवस्व बहत्व धीर रोगिल्व ती विशेष क्षहाधेगा, तथा मनुष्यत्व सामान्य है। इस सामान्य विशेष को मुख्यपेक्ष इस लिये कहा है कि जो पदार्थ एमा पुद्धि की अपेक्षा सामान्य पाहा है, वही दूसरी बुद्धि पी पेक्षा विशेप भी परमाता है । जैसे जो मनुष्यपना पाल युवा पा में नामान्य है, वही मा प्यपना, पशुपने वा पक्षिपने में विशेष भी है । बालक, युवा, बढ भोर रोगियों में हमारी बुद्धि सनुप्यत्व को समान मानती थी, परन्तु मनुष्य, पशु, पक्षियरों में, नाहां तीनों हों, वहां हमारी बुद्धि पशु और पक्षियों से. को सिमता से पहचानने केलिये व्यावर्तक विशेष निश्चित करती है। इन लिये सामान्य और विशेष प्रति नियत पदार्थ नहीं, किन्तु बुद्ध्यपेक्ष हैं। पपीकि जो कुछ एक वस्तु की दूसरे वस्तु के साथ समानता है, वही एक - मगुप्य , का भी मनुथ है, पद्ध १९ अध्याय २ भान्हिक तीसरे पातु से माप विषमता भी होती है, विषमता भीर विधेष एक ही बात १, जो मुद्विस्त पपेशा से है ।। इस विषय में "सनागप्रमवामिपा जाति: इस न्याय देशानुसार काया- चित् कोई लोग सामान्य या गर्थ सजातीयता संग, पस धारण हर ई- यापार्थ पी एफ फारिफा पेशेशिकदर्शन वैदिप्त सूत्रपति सठा पार रखते है,सिमपाई प्रकार का सामान्य भी शासि होने में मापा जात होताहै। यपा- ध्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सहरोऽथाऽनवस्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धोजातिबाधकसंग्रहः ॥१॥ सो कारण जाति के माधक संग्रहीत है। १- यह फि पति का द (शिमगयी ) गोगा। जैसे फाल, विशा, जाफाश, तीनों एक दूसरे पति में मितगही, इस लिये काल दिशा नाकारा एक जाति नहीं। - पद फि सपा तुल्य भोगा, जैसे घट शीर कलश एफ णाति नही, मारा एक ही थरा, केवल नाममात्र का शन्तर है । ३- यह कि एक धर्म का दूसरे धर्म में लत्पना गाय हो, परन्तु एका द्रव्य के ही पाय दोनों धर्म हों, इन फी गंगार फादरी है। यह भी जातियाधया है। जैसे सूरापना भीर पूर्व- पमा जाति हो । यद्यपि एप्त ही द्रवप ( पृषिधी वा जल मादि) में भाज्य मागे वाले योगी धर्म एथियो भूत भी है, पूर भी है, तथापि शूरास्य जोर पूर्तत्र एफ गाशि नहीं । प्योंकि भूतस्य से रहित सत्य ' मन में है। त्य में रहित सुगमय भाकाग में एंगीर पपिपी कारण अग्नि में स्तत्व महत्व दोनों शुम । ४. यह कि पानवस्या होगा, जेथे सामान्य, एफ दूसरा मागास्य पानने लगे मोर फिर उम में एक तीसरा मामान्य नागने लगती यह गया (रामगुप्ल)ोगी, जो जाति गाही । ५- यह फि रुप की हालि। जैसे विपदा में विशेषत्य कोई जाति नहीं, पपीफियह तो स्वरुप से व्यावतंपा घोहरा।६- यह कि मंगन्य होगा। जैसे समयाय योगा कोई जाति नहीं, योंकि एक गगधाय में कोई दूसरा मणयाय गागा नहीं गया । माहि पाहि पाई पर जोर व्यारयाग में आये लग पा से मत्ताय ते ६ । पित्य हीरो दुधे मोकी में सुधाय होगा सामान्य । अपने पराये भेदत स्यमाय वाला होगा विशेष । गित्य सम्बाधसमवाय । शब्द या समवापी कारण होगा=गायागत्य । व्यतीत लादिध्यवहार का ।

२० । वैशेषिकदर्शन-भावानुवाद होना=काल । पूर्व पश्चिमादि व्यवहार का हेतु होना दिशापन है ॥ नाम लेकर किसी पदार्थ का कथन करना उद्देश है । और विभाग भी एक प्रकार का उद्देश ही है, उस में भी नाम ही गिनाये जाते हैं। उद्दिष्ट पदार्थ के निजस्वरूप को बताने वाला असाधारण धर्म लक्षण है । लक्षित में लक्षण घटसा है वा नहीं, इस बात को प्रमाणों से परखना परीक्षा है । पृषिधी, जल, तेज, वायु, और आकाश, ये ५ भूत है। चक्षुरादि वायेन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य विषय वाला होना भूतत्व है। जैसे आंख से ग्राह्य रूप का भूत तेज । नाक से ग्राह्य गन्ध फा भूत= पृथिवी ।कान से ग्राह्य शब्द का भूस-माकाश । त्वचा से ग्राह्य स्पर्श का झूत वायु और रसना से नाश्य रस का भूत जल है॥३॥ ३५-भावोनुवृत्तेरेव हेतुत्वातसामान्यमेव ॥ ४ ॥ (भावः) सत्ता (अनुवृत्तः)अनुवृत्ति के (एव) ही ( हेतुत्वात्) हेतु होने से ( सामान्यम् ) सामान्य (एव) ही है ।। सब ही पदार्थ किसी की अपेक्षा से सामान्य हैं, तो दूसरे की अपेक्षा सेविशेष भी हैं, परन्तु भाव= सत्ता होना एक ऐसा पदार्थ है जिम को सामान्य ही कह सक्ते हैं, विशेष नहीं, क्योंकि वह अनुप्ति का ही हेतु है,व्यावृत्ति का नहीं। और विशेष कहते हैं व्यावर्तक हेतु को । सत्ता तौ अनुवृत्ति बुद्धि के अतिरिक्त कभी व्यावृत्ति की प्रतीति कराती ही नहीं। इसलिये सामान्य ही है, विशेष नहीं ॥४॥ ३६-द्रव्यतवं गुणत्वं कर्मत्वं च सामान्यानि विशेपाश्च ॥५॥ (द्रव्यत्वं) द्रव्यस्य (गुणत्वं) गुणत्व ( च ) और (कर्मत्वं ) कर्मत्व (सामा- म्यानि ) ये सामान्य हैं ( च ) और ( विशेषाः) विशेष भी ॥ द्रव्यत्व गुणत्व कर्मत्वादि, सत्ता की अपेक्षा विशेष हैं, परन्तु पषिवी- स्वादि की अपेक्षा से सामान्य हैं। क्योंकि सत्ता से अधिक देशवर्ती तो कोई है ही नहीं, इसलिये भाव वा सत्ता से सव विशेष हैं, परन्तु नो द्रव्यत्य द्रव्य सामान्य में है, वही द्रव्यत्व अपने एक विनाग पृथिवीत्वादि में भी है, इसलिये द्रव्यत्व सामान्य भी हुवा । इसी प्रकार गुणत्व भीर कर्मत्व को समझिये ॥ ५ ॥ ३७-अन्यत्राऽन्त्येभ्योविशेषेभ्यः ॥६॥ (अन्त्येभ्यः) अन्त में होने वाले (विशेषेभ्यः) विशेषों से (मन्यत्र ) अन्यत्र [ पूर्वसूत्रात नियम है ] ॥

पूर्व सूत्र -- १ अध्याय २ मामिहक २१ में जो द्रव्यत्वादि को मामान्य जोर विशेष दोनों प्रकार का होमा कहागया यह सार्वत्रिक नियम नहीं, किन्तु अन्त्य विशेष घटत्य पटत्वादि से भन्यन्न समझना चाहिये । अर्थात् नव्यत्वादि को अपने विभाग पृपिवीत्वादि से तो सामान्य है, और विशेष भी है, परन्तु पृथिवीत्व के भी भन्त में जो घटत्व पठत्वादि विशेप हैं, उन में सौ द्रव्यत्वादि से सामान्य नहीं, किन्तु विशेष ही है। जिस प्रकार सत्ता सदा सामान्य ही है, विशेष महीसी प्रकार अम्त्य विशेष जो कि घटत्वपठत्यादि भनन्त है, वे सामान्य मही, विशेष ही विशेष ॥६॥ काम सत्ता का लक्षण करते है:- ३८-सदिति यतोद्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता ॥ ७ ॥ ( यतः) सिम पदार्थ से ( द्रव्यगुणफर्म) द्रव्यों,गुगों और कमो में ( सत् है (इति) ऐसा माना जाता है (सा) यह (सप्ता) सत्ता या भाष कहता है ॥ द्रव्य है, गुग, कर्म है, इत्यादि प्रत्ययों में जो "होना" वस्तु है, यह सत्ता कदाती है ॥ ७ ॥ प्रश्न-पोंगी ! सौ सत्ता कोई पथक पदार्थ ती न हुवा, “द्रव्य है इस में द्रव्य ही ती सत्ता हुई, न कि कुछ भौर ? उत्तर- ३-द्रव्यगुणकर्मभ्योऽर्थान्तरं सत्ता ॥ ८ ॥ (द्रव्यगुणकर्मभ्यः ) द्रव्य, गुण भीर फर्म से ( सत्ता) भाव (पान्तरम् ) जन्य पदार्य है ।। ॥ पोंकि- ४०-गुणकर्मसु च भावाम कर्म न गुणः ॥ ६ ॥ ( गुणकर्मसु ) गुणों मोर फौ में ( 1 ) भीर द्रध्यों में भी ( भावात् ) होने से ( न ) म ती ( फर्म ) फर्म है, ( न ) मीर न ( गुणः ) गुण है । यदि सत्ता द्रव्यरूप ही होती ती गुण या कर्म में सत्ता न होती, परन्तु जिस प्रकार द्रव्य में सत्ता है, उसी प्रकार कर्म नीर गुण में भी है, इस से पाया जाताई कि सत्ता एक भिन्न पदार्थ थे, जो द्रम्य गुण कर्म रूप नही है ११-सामान्यविशेषाऽभायेन च ॥ १० ॥ (सागा-न ) सामान्य और विशेष को न होने से (2) भी। जिस प्रकार द्रव्य गुण और कर्म तीनों में सूत्र (३६) के अनुसार सामान्य -

वैशेषिकदर्शन- भापावाद
और विशेष दोनों है, इसी प्रकार यदि सत्ता इन चे शिन न होती तो बस
( सता ) में भी सामान्य विशेष होते, परन्तु सून (६५) छे अनुमार सत्ता
पोवन सामान्य ही है, विशेष नहीं, इस हेतु से पनी सत्ता को नपरन्तर ही
जानना चाहिये ॥ १० ॥
१२- अनेकद्रव्यबत्नेन द्रव्यत्वमुक्तस् ॥ ११ ॥
( बनेरुद्व्यवत्वेन ) अनेक द्रव्य वाला होने से (द्रव्वल्यम् ) द्रव्यत्व
( उत्तम् ) कहा गया ।
हर से द्रव्यत्व में प्या भेद है, सो बतासे विजो नुसाव्याप्य अपर
सामान्य व्यत्व (द्रव्य पन) है, वह जोया द्रव्यों घाला है, और द्रव्य (योन
एका ) द्रव्य ही है, इस से द्व्यत्व काहा गया ॥ ११ ॥ सौर
४३- सामान्य विशेषाऽभावेन च ॥ १२ ॥
(सा-बेन ) सामान्य विशेष म छोने से (च) भी ॥
दव्य तो मामान्य पौर विशेष वाले होते हैं परन्तु व्यत्य एकता है, उस में
सामान्य और विशेष नहीं, इस कारण जी द्रव्यत्व से दव्य निन्न कहागया ॥१३॥
मागे द्रव्यत्व के समान गुणत्व का भी निरूपण करते है फि:-
४४-गुणेषु माबाद गुणत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥
(गुणेषु ) गुणों में (शावात्) होने से (गुणत्यम्) गुणस्व (उक्तम्) कहागया।
जे भनेक द्रव्यों में व्यस्व एक है, वैसे मनेक दुखों में गुगस्व एक है,
यह कहा गया ॥ १३ ॥ ौर-
१५-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १४ ॥
( सा-खेन ) सामान्य और विशेष न होने से (घ) भी ।
सून्न १० और १२ के समान है ॥ १४ ॥
४६-कर्मसु भावात्कर्मत्वमुक्तम् ॥ १५ ॥
( कर्मसु ) कामों में ( भावात् ) होने से ( कर्मत्वम् ) कर्मत्व ( उक्त )
काहा गया।
अनेशकों में एक कर्मत्व होने से कम से कर्मस्व शिन्त कहागया है ॥१५॥
४७-सामान्यविशेषाऽभावेन च ॥ १६ ॥

१ अध्याय २ शान्हिक २६ सूत्र १० । १२ शीर १॥ के गमान घ्याख्यान है ॥ १६ ॥ छाया माता का एफ होना मिद्ध करते :- ३८-सदिति लिङ्गाऽभिशेषाद विशेपलिङ्गाभावाच्चैको सामः॥१०॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ ( त इति ) "इम में ( लियाविशेपास्) लिम के सामान्य से (च) भौर । विपलिजमावात् ) विशेष का मिस न होने से ( मायः ) सत्ता ( एकः ) एक है। जिम मपार सामाग्यविशेषक्षाघरहित सय द्रष्पों में द्रव्यत्व एक है, मम गनेश गुणों में गुणा एक है, सब यानों में कर्मत्व एक है, इसी प्रकार सब द्रव्यों, गुणों शीर कामों में भाय वा सत्ता एफ है, पोंकि " है । एतने में कोई विजोर पा चिन्ह नाही, । हुण्य है, गुण है, फर्म है, इन नन वाहणों में "आस्ति " एक सा है, उस विशेष का लिा कुछ नहीं ॥ १७ ॥ एम २ भालिया के विषय को बताने वाला यह नीचे लिखा झोका घेदिक एशिये दर किया जाता है गो मय पाठकों को उपयोगी होगा पिा- कार्यकारण योनि सामान्यार्थस्य लक्षणम् । परीक्षणं च संक्षेपाद्वितीयेऽस्मिन्प्रक्षोर्तितम् ॥ १ ॥ कार्य भीर पारण का पान, गामान्य अर्थ फा लक्षण और संक्षेप से परीशा हतीच ( भान्दिक ) में फदी गई ॥१॥ इघि प्रथमाऽध्याये ट्विनीयमान्हिकम् ॥ २॥ इति श्री तुलसीरामस्वामिकृते वैशेपिकदर्शन मापानुवादे प्रथमोऽध्यायः .

परश्य अथ द्वितीयोऽध्यायः प्रथममाहिकम् AC अव द्रव्यों का लक्षण भारम्भ करते हुवे, प्रथम द्रव्यों में से पहिली पृथिवी का लक्षण करते है:- ४६-रूपरसगन्धरूपर्शवसी पृथिवी ॥१॥ ( रु-ती ) रूप, रस, गन्ध, और स्पर्शवाली ( पृथिवी) पृथिवी है। पृथिवी में गन्ध गुणा अपना मीर सुपादि तीन गुण अपने से पहले तेज, जप, और वायु के मिलाकर ४ गुण हैं । गाकारा का पांचवां गुण शब्द यहां इस लिये पृथिवी में नहीं गिनाया कि प्रत्येक शास्त्रकार भपने सूत्रों में अपने अभिमत लाक्षणिक जयों के लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग करता है। यद्यपि न्यायशास्त्रादि में ५ वां नहाभूत गाकाश गिनाया है, सांख्य में उस को प्रकृति का कार्य कहा गया है, जिस का गुण शब्द है, परन्तु वैशेषिक दर्शन में भाकाश का गुण शब्द नहीं गिनाया, किन्तु शब्द को एक प्रकार से वायु गुण मान लिया हो, और उस माकाश को भी जिम को सांख्यादि ने प्रकृति का कार्य माना है, वैशेषिक ने वायु के अन्तर्गत समझा हो, ऐसा जान पड़ता है। क्योंकि वैशेषिक के माधार्य कणाद मुनि ने भागे चलकर इमो अध्याय और भान्हिक के सूत्र २० में "निष्क्रमणं प्र० केवल निकलना व प्रवेश करना नान आकाश का.चिन्ह कहा है, शब्द नहीं। इस से पाया जाता है कि वैशेषिक शास्त्र में माकाश कोई प्राकृत पदार्थ नहीं, किन्तु दिशा और काल के समान एक तीसरा द्रव्य भाकाश भी है, जो शून्यार्थक व्यावहारिक है । परन्तु न्याय सांख्यादि के अभिमत भाकाश ( महाभून ) का इस से खान नहीं समझना चाहिये, किन्तु जैसे सांख्य ने अपने मतानुसार एक प्रकृति को उपादान कारण माना है, भीर माकाशादि ५ महासूतों को तदन्तर्गत कार्य माना है, और न्याय में प्रकृति का नाम न लेकर केवल माकाशादि ५ महाभूतों से ही सब जगत् की. रचना मानते हुबे, उन्हीं को उपादान कारण माना है। इसी प्रकार वैशेषिक ने कुछ कार्य कारणपने की विवक्षा से नहीं, किन्तु व्यावहारिक संजा रखकर अपना व्यवहार चलाने को पृथिवी .

- ॥ द्वितीयाऽध्याय १ जानिलया २५ मादि पदायाँ की द्रव्य मंशा करली है, शेष नुगादि समवायान्त ५ पदार्थ अन्य गिना कर व्यवहार चलाया है । इतने से कोई वैशेषिक का सांख्यादि के साथ विरोध नहीं सुना । फिन्तु संता दमात्र हुवा ॥१॥ नव दुसरे अप द्रव्य का माण करते हैं: ५०-रूपरसस्पर्शवत्य आपोद्रवाः स्निग्धाः ॥ २ ॥ (.n-त्यः ) रूप, रम, स्पर्श वाले (द्रयाः ) वहने वाले ( स्निग्धाः ) और चिकने ( सापः ) आज है ॥ यादा भी गठन पो ाफाश फा गुण न मानते हुए व्यवहार है। ऐसे ही गे भी * परिशे पाजिनाकाशस्य २७ में आकाश की पहचान शब्द बताया है, न कि गुण ॥ २ ॥ ५१--तेजोरु पस्पर्शवत् ॥३॥ (रू.पस्पशंवत् ) मप और स्पर्श वाला (तेजः) तेज वा अगिग द्रव्य है ॥३॥ ५२-स्पर्शवान्यायुः ॥ १॥ ( स्पवान ) स्पर्ण वाला ( वायुः ) वायु है ॥ ४ ॥ ५३-त आकाश न मिदान्ते ॥५॥ ( ते ) ये गन्धादि पारों गुण ( भाका)) शाफाश पोल शून्य वा खडा द्रव्य में (न ) नाही ( विद्यते ॥ ५ ॥ श्रीर- ५?--गर्षि जनुमच्छिष्टालासग्निसंयोगाद द्वत्वमतिः सामान्यम् ॥६॥ (नपिन गाम ) पृत, गाग, गधु-द-गाक्षियादि का (भग्निमंयो- गात) अमिक मंयोग में (आदिः) जनी पी माप (नानात्यम् ) सामान्य है। पा, लाशा और शहद को गरमी पहुंचाने से इन में वत्व ( बहाव ) उत्पादोजाना है, ता य दवार जन के समान होगाते है॥६॥ तथा- ५५-पुमीगलोहरजनसुवर्णानामग्निसंयोगाद द्रवन्तमतिः सामान्यम् ॥ ७ ॥ (यु-नीम लोहरात-मुबगानाम् ) रांग, सीगा, लोहा, घान्दी और मोग का ( अग्निामयोगात ) अनि के नंयोग से (वस्वम् ) पिंघलापर ( गाशिः ) जग्गों में ( मामान्यम् ) भगानता है । . १ .

वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
जिसप्रकार घृतादि काष्ठ विकारों में अग्नि से द्रवत्व होजाता है, इसी
प्रकार रांगा, सीसा, लोहा, चान्दी, सोना और अन्य धातु भों का भी पिंघल
कर जल के समान द्रवत्त्व होजाता है ॥ ७ ॥
यदि कहो कि " रूपर्शवान्घायु: " यह वायु का लक्षणं इन लिये उचित
नहीं कि प्रथम तौ वायु का होना ही साध्य है, तब लक्षण से लक्ष्य जाना
जायगा । इस पर अदृष्ट चिन्ह (लिङ्ग) चे उसको सिद्ध करने के लिये प्रथम
दृष्ट (चाक्षुषप्रत्यक्ष ) लिङ्ग का उदाहरण देते हैं:
५६-विषाणी ककुद्वान् प्रान्तेबालधिः सास्नावान्
इति गोत्ने दृष्टं लिङ्गम् ॥ ८ ॥
(विषाणी ) मींग बाला, ( ककुद्वान् ) जंची ककुद् [ टाट ] वाला,
(प्रान्तेवालधिः) पुच्छ के अन्तिम भाग में बालों वाला और (सास्नादान् )
गले में लटक ने वाले मांस [ कमला ] वाला, यह ( गोत्वे ) बैलगोजाति
होने में (दृष्टम् ) दृष्ट (लिङ्गम् ) लिङ्ग-चिन्ह वा लक्षण है ॥८॥ इसी प्रकार-
५७-स्पर्शय वायोः ॥ ६ ॥
( वायोः ) वायु का ( स्पर्शः ) स्पर्श ( च ) भी [ लिङ्ग] है, जिसमें
लिङ्गी वायु पहचाना जाता और सिद्ध होता है ॥ ॥ तथा च-
५८-न च दृष्टानां स्पर्श इत्यऽदृष्टलिङ्गोवायुः ॥ १० ॥
( च ) और ( दृष्टानां ) दृष्टों-पृथिवी जल अग्नियों का (स्पर्शः) स्पर्श
गुण वा लिङ्ग ( न ) नहीं है (इति) इस कारण ( वायुः) वायु ( भदृष्टलिङ्गः )
अदृष्ट लिग वाला है ॥ १० ॥
यदि कहो कि स्पर्श लिङ्ग से सिद्ध वायु कोई होगा, परन्तु यह कैसे
जाने क्षि यह वैशेषिकोक्त द्रव्यों में का एक द्रव्य ही है ? उत्तर-
५६-अद्रव्यवत्वेन द्रव्यम् ॥ ११ ॥
( गढ़व्यवस्वेन ) द्रव्य वाला न होने से ( द्रव्यम् ) द्रव्य ही है ॥
वायु स्पर्श वाला है और स्पर्श द्रव्य नहीं, बस वायु द्रव्य वाला नहीं,
इस से वह स्वयं द्रव्य है ॥ ११ ॥

द्वितीयाध्याय १ पाहिक और भी हेतु हैं कि जिन से घायु का व्यत्व पाया जाता है । यथा- ६०-क्रियावत्त्वादु गुणवत्त्वाच ॥ १२ ॥ (क्रियावत्स्वास्) क्रियावान् होने(च) और (गुणवत्त्वात्) गुणवान होने से ।। सून १५ में द्रव्य का लक्षण कारते हुवे कह आये हैं कि क्रियावान् और गुणवान् द्रव्य होता है, तदनुसार वायु भी क्रियावान् गौर गुणवान् होने से गव्य ही है, कोई अन्य पदार्थ नहीं ॥ १२ ॥ यदि वायु द्रव्य भी है तो भी इस को नित्यत्व क्यों कहा है, पृथिवी. जलादि के समान अनित्यता क्यों नहीं ? उत्तर- ६१-अद्व्यत्वेन नित्यत्वमुक्तम् ॥ १३ ॥ (भद्रध्यत्वेन) द्रव्यबाला न होने से ( नित्यत्वम् ) नित्यता (नक्तम् ) कही गई ।। लोकव्यवहार में वायु को नित्य इस कारण से कहा गया है कि का कारण अन्य द्रव्य देखा नहीं जाता। यह नित्यता वास्तविक नित्यता ती नहीं है, किन्तु व्यवहार ऐमा है ॥ १३ ॥ वायु एक है वा अनेक ? उत्तर- ६२-वायोर्वायुसंमूर्छनं नानात्ने लिङ्गम् ॥ १४ ॥ ( बायोः ) वायु से ( वायुसंमूर्छ ) घायु की टक्कर ( नानात्वे ) अनेक होने में (लिङ्गम् ) पाहधान है। यदि वायु एक होता ती वायु से वायु की टक्कर न होती, वायु के बबूले न उटते । उठते हैं, इस ने माना जाता है कि वायु अनेक हैं । उन में एक ती मूक्ष्म तथा अल्प वायु पृथिवी के चारों ओर लिपटा है, जिस से पृथिवीस्थ मागी श्वास लेकर जीवित रहते हैं, दूमरे जो पूर्व में पश्चिम वा दक्षिण वा उत्तरादि दिशा विदिशाओं में घूमते फिरते ई । हम मदा एफसा स्पर्श (दयाव) अपने ऊपर होने से उस साधारण वायु का अनुभव नहीं कर पाते, जो हमारा जीवन है, केवल पूर्व पश्चिमस्थादि वायुवों को मापामर सब जानते हैं ॥१४॥ ६३-वायुसंनिक प्रत्यक्षाऽभावाद दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ १५ ॥ (यायुसंनिक । वायु मामीप्य में ( प्रत्यक्षाऽभावात् ) प्रत्यक्ष न होन्ः से ( दृष्टं ) दृष्ट (लिङ्गम् ) चिन्ह ( न ) नहीं ( विद्यते ) है ॥ - को वैशेषिकदर्शन-भापान बाद जिस प्रकार पृथिवी भादि ३ सूत चक्षुपिय हैं, हम प्रकार वायु समीप होने पर भी आंख से नहीं दीखता, सुन लिये इस के लिङ्ग ( स्पर्श) दृष्ट नहीं माना जाता । यहां प्रयोग किया प्रत्यक्ष पद न्यायदर्शनोक्त लाक्षणिक नहीं है, किन्तु वह आंखों देखे । अर्थ में प्रयुक्त " अर्थ में प्रयुक्त है। क्योंकि त्वचा अन्द्रिय का प्रत्यक्ष तो है ही है ॥ १५ ॥ ६४-सामान्यतोदृष्टाचाऽविशेषः ॥ १६ ॥ (सामान्यतोदृष्टात् ) सामान्यतोदृष्ट से (च) पी ( आदिशेपः ) सामान्य सिद्ध है। जिस प्रकार विषाण पुच्छ सारनादि को देख कर गौ बैग पहचाने जाते हैं, इस प्रकार स्पर्श से वायु नहीं पहचाना जाता है। किवाय स्पर्श होने पर भी गौ आदि ले समान दीखता नहीं, लयापि जहां २ हन क्रिया देखते हैं वहां ३ फिसी करण साधन को पाते हैं, भीर जहां कोई गुरु देखते हैं, वहां उसका मानबहूत कोई द्रव्य अवश्य पाते हैं, बत्त स्पर्श गुण को पाकर उस के आश्रय द्रव्य वायु को भी अनुनान करना चाहिये, परन्तु इम सामान्यतोदृष्ट अनुमान से इतना मिलु होता है कि स्पर्श का भी कोई द्रव्य है, बस इस सामान्य से अतिरिक्त विशेष वायु आदि संज्ञा नहीं मिद्ध होती, इस कारण अविशेष रहा ॥ हम देखते हैं कि रूपादि गुण अपने तेज बादि द्रव्यों के आनय रहते है, और स्पर्श भी गुण है, वह भी किसी द्रव्य को जात्रय रहना चाहिये क्योंकि १६ वें सूशनुसार गुण का लक्षण “ द्रव्याश्रयी " आवश्यक बता चुको हैं, बस स्पर्श गुण का आश्रय द्रव्य भी कोई होना चाहिये, वही वायु है । ताशे नंगारे बजते समय हन देखते ही हैं कि द्रव्यों की परस्पर चोट से शब्द उत्पन्न होता है, तब वृक्षों के पत्तों का हिलना और उस से शन्द होना देख कर अनुमान करते हैं कि वृक्षों को पत्तों का हिलाने वाला भी कोई द्रव्य है, जो रूप वाला नहीं, क्योंकि दीखता नहीं, परन्तु स्पर्श वाला और वेग वाला है जो पलता और पत्तों से रगड़ कर शब्द करता है। जिस २ पदार्थ का धारण हम देखते हैं, वह ३ धारण शिसी द्रव्य द्वारा हो रहा है, जैसे पृथिवी पर्वत क्लादि को, वृक्षादि फलादि को धारण करते हैं, नौका को जल धारण करता है, इसी प्रकार आकाश में वृणों, तूलों, मेघों, विमानों .

१ 1 A द्वितीयाऽध्याय १ जानिड़क जीर नहते पक्षियों को धारण करने वाला भी कोई द्रव्य होना चाहिये,पर जांस से कोई द्रव्य नहीं दोगता, प्योंकि मेघादि का धारक द्रव्य रूपवान् नहीं, जो दीव नको, परन्तु भवान् और वेगवान, क्योंकि उस या स्पर्श छूना अनुभव होता है, और वैग=टझर वा दबाव बा बहावन सी अनुमत्र होता है, वह को द्रव्य है, जो गानान्यनोदृष्ट होने से विशेष जात नहीं रहोता तिवद पणा है। गो- ६५-तरूमादागमिकम् ॥ १७ ॥ (तलारा दम लिये ( भागनिकम् ) शब्दप्रमाणनिह है ॥ मलाण वेदादि शास्त्र और तदनुमारी लोकव्यवहार में उस को वायु काते, न लिग वा द्रव्य दिशेप "वायु ६ ॥ १७ ॥ यदि कहो कि वायु ा गात्र से विशेष क्या सिद्ध हुवा ? तो उत्तर- ६६-संज्ञाकर्म स्वस्सविशिष्टानां लिङ्गम् ॥ १८ ॥ ( नंशा ) नागौर (वार्म ) कान ( तु ) ही तो ( अस्मद्विशिष्टानां ) हगारे यिनका ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ।। नाम सर यामही पती आप और हम विशिष्टों (विशेष वाले पदार्थों) को पाचनते हैं, तब गान (वायु में विशेष प्यों सिद्ध नहीं, अवश्य है। पोंकि- ६५-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ॥ १६ ॥ (सामागः) नाग और काम यी (प्रत्यक्ष प्रवृत्तत्वात्) प्रत्यक्ष प्रवृत्त होने से । संमार में वस्तुओं के नाम जोर काम देण्यार व नागवार प्रवृत्त हुवे हैं, वायु नंता भी विशेष कर उन के कामों से रक्सी गई है। मृत्र १६ और १९ पर पं स्वामी हरिप्रमाद जी ने और तदनु पार पं० मार्य- मुनि जी ने सामान्य ध्वनिमार्थयुक्त प्राप्य किया है, जो पाठकों के सामने रखने योग्य है । एन समानुदार के पाठक शायभाषा में ही देखना चाहेंगे क्योंकि पानवाद सायं पापा में है। एक गिये हा उक्त दोनों सूत्रों का पं० मार्यमुगि कृत्त हाय उद्त करते हैं जो प्रम प्रकार है शि:- *माप्य - 'म दाधार पृषिवी द्यामुलेमाम् ऋ० ८।४ । १७ परमेघर पृथिवी आदि नय लोकों का पालन करता है, इत्यादि मन्त्रों से जो भूमि मादि की - ३२ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद पृथिवी आदि संज्ञा 'सुममिद्धाय शोचिपे घृतं तीव्र जुहोतन' य०३ । २= प्रज्वलित अग्नि में हवि प्रदान करे, प्रत्यादि मन्त्रों में अग्निहोत्रादि इष्ट कमों का विधान तथा 'गां मा हि मीः' यजु० १३ । ४३=गी आदि पशुओं की हिंमा न करे, इत्यादि, गौ आदि पशुहिंसारुप अनिष्ट कामों का निषेध वेदों में किया है, वह हम के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ।। भाव यह है कि 'न हीदृशस्यदादिलक्षणशास्त्रस्य कई जगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति' शं० मा भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान आगों के प्रतिपादक ऋग्वेदादि चारों वेदों की उत्पत्ति विसी सर्वा के विना नहीं हो सकती, इस लिये भूतादि अथों के प्रतिपादनपूर्वक संज्ञा कर्मादि का विधान वेदों के ईश्वरोक्त होने में प्रमाण है ॥ यहां इतना विशेष स्मरण रहे कि सर्वविद्या तथा सर्व क्षयों के प्रति- पादक होने से वेदों को 'अस्न विशिष्ट कहते हैं और 'स्मत् शन के प्रयोग से सूचित किया है कि वेदों के पठन पाठनादि का अधिकार मनुष्यमान को लिये समान है । सं० अब उक्त मर्थ में हेतु कथन करते प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वातसंज्ञाकर्मणः ॥ १६ ॥ पद-प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात् । संज्ञाफर्मणः ॥ पदा०-( संज्ञाकर्मणः ) मंशा तथा फर्म का प्रवर्तक ईश्वर है ( प्रत्यक्ष- प्रवृत्तत्वात् ) क्योंकि उस को सव पदार्थ प्रत्यक्ष है॥ -जिस को जिस विषय का प्रत्यक्ष होता है वह उस विषय में संज्ञा तथा कर्म का विधान कर सकता है, अन्य नहीं। जैसा कि 'मयं चत्र: इस का नाम चैत्र है, इस प्रकार पिता आदि सम्बन्धी पुत्रादिकों में चैत्रादि संशा का विधान करते हैं, तथा पितरं मजस्व पिता की सेवा कर 'जननी मावजानीहि' माता की अवजा न कर, इस प्रकार शिष्य के प्रति भाचार्यादि इष्ट कर्मों का अनुष्ठान तथा अनिष्ट कर्मों का निषेध कथन करते हैं, क्योंकि पिता आदि को पुत्रादि का तथा माघार्यादि को उक्त विहित निषिद्ध को के विषय का प्रत्यक्ष है, वैसे वेदोक्त संज्ञा तथा कर्म के विषय का ईश्वर को प्रत्यक्ष है, इस लिये वह उन का प्रवर्तक है । भाव यह है कि अल्पज्ञ होने के कारण किसी उपदेशा के बिना जीवों को जगदन्तर्वर्ती पदार्थों की संज्ञा तया इटानिष्ट कमों का ज्ञान नहीं हो सकता और वह स्वयं उन की संज्ञा वांधने तपा टानिष्ट कर्म के जानने में साप- ।

द्वितीयाध्याय १ शान्हिक २ जनन है, परन्तु वेदों में उनकी नेता तथा टाउनिए कमां का उपदेश पाया जाता है वह गदी ईश्वर त हुये बिना नहीं बग मका, इस लिये यह अवश्य नानगा पड़ता है कि वेदद्वारा जिन संता आदि का उपदेश पाया जाता है उस का उपदेष्टा मर्वा, नमक्तिमान् घर है और उन के न पदेष्टा होने से गिद्ध कि वेद दंपरोक्त है और ईश्वरोक्त होने से वह स्वतः प्रमाण हैं और उन के प्रमाण होने से नस्शत वाय 'मादि मंसा के प्रामाणिवा होने में कोई मन्दह नहीं और सृष्टि के मादि में संज्ञा तथा फाँ की प्रवृत्ति वेदों द्वारा होती है, यह ममम्मत है। जमा कि:- पुर्वपां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एबादौ पृथक् संस्थाश्व निर्ममे ॥ मनु०१।१३ में कहा है कि सृष्टि के सादि में प्रजापति परमेश्वर ने घेद शब्दों द्वारा मब यो नान, कर्म तथा लोकमयांदा को नियमपूर्वक रचा । इमी पर्थ को वेदों में जी स्पष्ट किया है कि 'मूर्याचन्द्रममी धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' प्रा०८।। Ye Ig:परमात्मा ने मृर्य आदि लोक तथा उन के नाम, कर्म पूर्व फल्प के भनुमार निर्माण किये । निमांग किये। म मे स्पष्ट है शि वेदों में जो इस प्रकार का अपूर्व उपदेश पाया जाता है, उन का उपदेष्टा मर्धश, मर्वशक्ति- गान प्रवर है और ईश्वरोक होने से घेद स्वतः प्रगागा तपा तत्कृत वायु मंशा मी प्रामाणिकी है ॥ परन्तु छगने उक्त ध्वनियुक्त अनुवाद छोड़फर जो पृथक अनुवाद किया है, उस में मानसूनस्य पदों की घटना से बैंमा ही नर्थ निकलता जान कर किया है। जो जिम को मधिकर हो, ग्रहगा करे ॥ १९ ॥ चाय का वर्णन करके अब आकाश का वर्णन भारम्भ करते ई कि:- ६८-निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( गिक्रमणं ) निकलना और ( प्रवेशनं ) प्रवेश करना ( इति) यह (आकाशस्य ) आकाश का (लिङ्गम् ) लि चिह्न वा पहचान है ॥ शहां में निकलना व जिस में प्रवेश करना वन पड़े जानो कि वहां शाफाश है, पाकाश के विना निष्क्रमण और प्रवेश संभव नहीं। क्योंकि आकाश के मियाय पृषिव्यादि ती अपनी जगह में दृमरे को प्रवेश नहीं होने देते, या तो स्वयं ही वा दूमरे को प्रवेश करने से रोके ॥ २० ॥ - ॥

. - वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद व पूर्व सूत्र पर शङ्का करते है शि:- ६९-तदऽलिङ्गमेकद्व्यत्वारकर्मणः ॥ २१ ॥ ( कर्मणः ) कर्म को ( एकदव्यत्वात ) एक द्रव्य वारा होने में (तत्) वह निष्क्रमण और प्रवेश ( सालिङ्गम् ) लिङ्ग नहीं हो पाता ।। प्रत्येक कर्म, एक द्रव्य में होता है, इसी प्रकार प्रदेश की प्रविट द्रध्य वाला है और निष्क्रमण भी निकान्त द्रव्य वाला है। इन में सामान फा लिङ्ग मानगा वित्ती को उपपन्न नहीं होता ? ॥ २१ ॥ तया- ७०–कारणान्तरानुवल्टप्तिवैधम्याच ॥ २२ ॥ ( का-यात् ) अन्य कारण की कल्पना के वैधयं से (1) सी ॥ जिस कारण से जो कार्य होता पाया जावे, उमी को उम का कारण मानना चाहिये, 'अन्य कारण की पाल्पना में वैधय॑ है। घम निकलने बहने वाले द्रव्यों को जो निकलने वड़ने का स्वयं कारण- हो नकते हैं, लोट कर एक अन्य कारण ( आकाश ) की कल्पना करना टीक नहीं? ॥ २२ ॥ आगे समाधान करते हैं कि:- ७१-संयोगादमावः कर्मणः ॥ २३ ॥ ( संयोगात् ) संयोग से ( वार्मणः ) कर्म का ( भावः ) मसाव है। शाकाश में संयोग ने क्रिया नहीं, किन्तु फलमंनिधान है। कर्म क्रिया को कहते हैं और क्रिया किसी व्यापार और फल को कहते हैं, निकमण और प्रवेश दोनों व्यापार हैं, उन व्यापारों से उत्पन्न फणा यह है कि निक. ठने और प्रवेश करने वाले पदार्थ का संयोग विशेप होना । तब आकाश में फल के समवाय से व्यापार का समवाय नहीं, सो तो ठीक, परन्तु इतने से आकाश को अकारण तो नहीं कह सकते, हां उपादान कारण न सही, परन्तु निमित्त कारण तो है ही क्योंकि भाकाश के विना निष्क्रनण और प्रवेश हो नहीं सक्ते ॥ यदि कोई पाहे शि इस मे शाकाश का होना मात्र पाया गया, परन्तु निकलने बड़ने का कारण होना क्योंशर पाया गया ? उत्तर यह है कि नियत पूर्ववर्ती को कारण कहते हैं, मो प्रत्येमा प्रवेश और निष्क नण से माफाश अवश्य पूर्ववर्ती है, जो सर्वकालवर्ती और ईश्वर के मनान गिश्चिन किया जा सकता है। इस लिये सूत्र २२ का यह कहना कि. कारणान्तर की कल्पना द्वितीयाध्याय १ शामिक ६३ में वैधम्य है, ठीक नहीं । बम मवेश और निपल नण अवश्य पाकाश के बाफ निल हैं ॥ २३ ॥ आगे यह बताने को कि आकाश का ही गुगा शब्द है, भूमिका बांधते हैं कि ७२-कारण गुण पूर्वकः कार्यगुणोदृष्टः ॥ २१ ॥ (यागुणाः ) कायं का गुण ( कारण गुण पूरायः) कारण के गुणपूरक (दृष्टः) देखा जाता है। आधार कार्य में यही गुण होते हैं जो उस से कार मा में हो ॥ २१ ॥ पदि कही कि कम से पापा का गुण शब्द होना तीनही सिद्ध हुवा। ती उत्तर- ७३-कार्यान्तराऽप्रादुर्भावाच्छब्दः रपर्शवतामगुणः ॥२५॥ ( पायांतरामादीया ) शिमी अन्य कार्य प्रपट न होने से (स्पर्श पता ) स्पर्श धाडे पथियो में वायुपर्यन्हों का ( श) शब्द (अगुणः ) गुण नहीं है। स्पा याने पशिधादि ४ द्रव्यों का गुण शब्द नहीं हो साा, पयोंकि पपिठादि को कार्य घटपटादि से शब्द प्राट नहीं होता, पतः बाद को नाकार का ही गुण मानना होगा ॥ २५ ॥ यदि कहो कि परिशेप मे आकाश काही पषों जमणाले, गग वा आत्मा का गुगा गाउद को पोंग गानखें। तो जार- ७४-परत्र समग्रायात्प्रत्यक्षत्व चनात्मगुणो न गनोगुण: ॥२६॥ ( परत्र ) अन्य द्रव्यों में ( मगवाय त् । समवेत होगे (2) भीर (प्रय- पारयात् ) प्रत्यक्ष होने से (1) नती ( भास्मगुणः ) शाहमा का गुण है और (ग) ( मनोगुणः ) गग का गुण शहद को शन्य पदापों में समयाय सम्बन्ध युक्त पाते हैं और प्रत्यक्ष (प्रवणन्द्रियान मृत } पाते हैं, भामा गीर मग न मी यिासी से समयाय पंयन्त्र मते, मोर ग प्रत्यक्ष होते, अतएम २.०६ मामा वा गग का गुग गही पाहा जासयता ।। २६ । यिा-तु- ५-परिशेपालिङ्गमाकाशस्य ॥ २७ ॥ ५

२५
व
३४
वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
( परिशेषात् ) नत्र रहने मे ( आकाशस्य ) भामाश का (टिङ्गम् )
लिङ्ग घा चिन्ह [ शब्द है ॥
जव शब्द पृथिव्यादि धार भूतों का गुण नहीं, आत्मा भीर मन का
नहीं, तव वचा कोरल भाकाश, इस लिये शब्द को आकाश का गुण ही
समझा जाना बनता है।॥ २७ ॥
७६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २८ ॥
आकाश डे (द्रव्यत्वनित्यत्वे ) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुगा) वाय में
(व्याख्याते ) व्याख्यात किये गये ॥
सूत्र में से इस २८६ में "भाकाशस्य पद की अनुवृत्ति है । जिम
प्रकार वायु को स्पर्श गुण वाला होने से दव्यत्व और अन्य द्रथ्य का कार्य
न होने से नित्यत्व कहा गया था, घमी प्रकार आकाश को भी शद गुग्ण
वाला होने से द्रव्यत्व और अन्य द्रव्य कारणकता न होने से नित्यस्व समझ
लेना चाहिये।॥ २ ॥
क्यों जी ! भाकाश नित्य भीर द्रव्य ती सिद्ध हुया, परन्तु गाफाश कोई
तहव है, इस को कैसे माने ? पर-
७७-तत्त्वं भावेन ॥ २६ ॥
(भावेन) भाव सत्ता से (तत्वम् ) तत्त्व व्याख्यात समझना चाहिये ।
जिस प्रकार भाव एक है, इसी प्रकार भाकाश भी एफ तत्व है ॥२८॥
क्योंकि-
७८ :-शब्दलिङ्गाऽविशेपाद्विशेपलिङ्गाऽभावाच ॥ ३० ॥
( शवलिङ्गाऽविशेषात् ) शब्द लिङ्ग के सामान्य से (घ) मीर (विशेप
लिङ्गाभावात् ) विशेष लिङ्ग के न होने से [ आकाश एक तत्त्व है ॥
भाकाश का लिङ्ग शब्द है, सो याही विशेष नहीं, मवंत्र समान है, और
विशेष होने का कोई लिङ्ग पहचान नहीं, इस लिये जिस प्रकार नाव वा
सत्ता लिङ्गाऽविशेष से और विशेषलिङ्गाउमाव से सूत्र ४८ में एक काठी गई
थी, इसीप्रकार आकाश को भी उन्ही कारणों से एक मनझना चाहिये॥३॥
७६-तदनुविधानादेकपथक्त्वं चेति ॥ ३१ ॥

- द्वितीयाध्याय १ शान्हिक ( तदनुविधातात ) म [ एकस्य ] के साहचर्य से ( एकपृथक्त्वं ) एक पृषक होना ( च ) भी शाकाश का सिद्ध है ( पति ) आहिक समाप्ति के स में है ॥ को पदार्थ एफ होता है, वह सब से पृथक भी होता है, जय आकाश एक है, तत्व है, तब यह पपक भी है, एक द्रष्य में रहने वाले पृयक्त्व को एकपधफ समझिये ॥ ३१ ॥ इति द्विनीऽध्यायस्य प्रथममान्हिकम् अथ द्वितीयाऽध्याये द्वितीयमाहिकम् पूर्याहिक में पृचियी आदि के लक्षगा और आकाश सपा पद का वर्णन करके, इस द्विमीयाष्ट्रिक में उन की परीक्षा की जायगी । उस में प्रथम पपिवी के लक्षण की परीक्षा करने के लिये यह कहते है कि पृथिवी से भन्य किमी द्रथ्य का गन्ध गुण नहीं है । यपा- ८०-पुष्पवस्त्रयोः मति संनिक गुणान्तरा- प्रादुर्भावोवस्खे गन्धाऽभावलिङ्गम् ॥ १ ॥ ( पुष्पवयोः ) पुष्प भीर घस के ( संनिफर्ष ) समीप ( सति) होने पर ( गुगान्त राउप्रादुनयः ) अन्य गुण का प्रकट न होना ( घस्त्रे ) यत्र में ( गधामावलिङ्गम् ) गन्ध ग होने की पहचान है। "शर कमी गन्ध याठे पुष्प गौर गभरहित वर की एकत्र समीप रस देखें, सभी वरर में पुष्प के गुण ( गन्ध ) को प्रकट होता नहीं देखते, इस कारण समझना चाहिये कि बन में गन्ध नहीं। भीर जो वख को पुष्पसंसर्ग में कुछ गन्ध वरण में प्रतीत होने लगता है, यह गन्ध भागन्तुक है, अपना निज का नहीं। मी प्रकार पषियी के समीप होने से जिन अन्य याय गादि में गन्ध प्रतीत होता है वह भी लग वायु मादि का निज गुण नहीं समझना पाहिये, किन्तु पथिवी के कण न कर घायु में मिल कर गन्ध की प्रतीति कराते हैं, मेघाट वायु में ग मुगन्ध, न दुर्गन्ध है. ॥ १ ॥ ८१-व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः ॥२॥ - . .

वैशेषिक्षदर्शन-भाशावाद (पृथिव्यां पृथिवी में (गन्धः) गन्य गुण (ध्यवस्थितः) ठीक सिद्ध है ।।२।। ८२-एतेनोणता व्याख्याता॥ ३ ॥ (एतेन ) इस से ( उहणता ) गरमी ( व्याख्याता ) ध्याख्यात की गई। पृथिवी का खामाधिक गन्ध गुण जिम प्रकार अन्य जलादि में सांसर्गिक "प्रतीत होता है, इतने में जलादि में गन्ध निज का नहीं मिढ होता, इसी बात से उष्णता भी जो अग्नि का स्वाभाविक गुण है, जाल वायु में सासर्गिक रामनी चाहिये ॥ ३ ॥ आगे इसी को स्पष्ट कर को कहते हैं:- ८३-तेजस उष्णता ॥ ४ ॥ { तेजसः ) अग्नि तत्व की ( उष्णता ) गरनी है । हेपथिवी में गन्ध स्वाभाविक व्यवस्थित है, इसी प्रकार अग्नि में उष्णता व्यवस्थित है, अन्य जल वायु आदि भी उष्ण वा गर्म पाये जाते हैं तो वे छारिज के संसर्ग से गर्म होते हैं। अपने निजगुण से नहीं ॥ ४॥ सी प्रकार:- ८४ - अप्सु शीतता ॥ ५ ॥ ( अ ) जलों में ( शीतता ) ठंढा पन है ॥ जल में ठंडापन व्यवस्थित है। वाय भी ठंहा देखा जाता है, परन्तु वह . ठंड उस में जलसंन की होती है। निज की स्थानाविक नहीं ॥ ५ ॥ पृथिवी जल तेज धायु के लक्षगों की परीक्षा कह दो, मागे आकाश के लक्षण शब्द की परीक्षा फिर की जायगी। सभी काल की परीक्षा इस है ये पहले करते हैं कि नुस से आकाश को वा शब्द की परीक्षा सुगम हो जायगी। प्रथम तौ काल पदार्थ को होने में उस के चिह वा लिक वा पहचान बताते हैं:- ८५-अपरस्मिनपरं युगपच्चिर क्षिमिति काललिङ्गानि ॥ ६ ॥ -(परस्मिन् ) 'वरअल्पवयस्कादि में ( अपरम् ) मल्यायक होने का ज्ञान, (युगपत् ) एक साथ ( पिरम् ) देरी से (तिमम् ) शीघ्र ( इति) ये ( काल लिङ्गानि ) काल के चिहू हैं । एघर के में बुधर का शान, उधर के में घर का शाम, एक साथ में एक माघ का धान, देरी में देर का झन, जल्दी में बाल्की झा शान, इस प्रकार से - - .

३७ द्वितीयाध्याय ३ भाहिक ध्यावहारिक जान, काल के लिङ्ग है, अर्थात् हम से काल पहचाना जाता है । जिन की अपेक्षा में एक पुरुप को यालक, दूमरे को युवा. तीसरे को वृद्ध कहते हैं, सूर्य के उदय अम्त शिम को जन्म मे लेकर यून बीते हैं. वह याक, छम ने अधिक बार जिम के मागने मू य और सूर्यास हो चुके, या युया, उन मे मा शधि यार उदयाऽन्त याला वह कहाता है, पर जिस को ०.६ । करके या न्यूनाधिक व्यवस्था होती है, वह काल पदार्थ हैं। यदि कारतात अन्तर या फरफ न हो ती युवा को पद वा बहु को बालक क्यों नहीं मगझ निया जामा, काली है जो पन में अपने सम्मन्ध मे भातर कराता है। पधियी गादि ५ पराभूतों पे पृथक की काल पदार्थ हुवा । क्योंकि परले, पीने, एक माप, शीघ्र, देर से, यह व्यवहार पृथिवी में नहीं होता, ग अल में, न ते में, न अन्य फिमी द्रव्य में, इस लिये इन से पृथक काल एक द्रव्यान्तर है, सो पद ध पृथियो शादि मे भिन्न है, अधेतन होने में मारमा से भी सिरे, जो यूटे वा जवानों के देहों और सूर्य से संसर्ग करके अपनी सापो भंयक्त गीर मंयोग स्वरूप ममीपता से या अपने मे संयुक्त समवाय वरूप मगांवता में सूर्योदयास्तादि फो बूढ़े वा जवानों के देहों से संबद्ध करमा , यदी द्रव्य फदाता है । इमो से वरे परे देर मे वा शीघ्र, इत्यादि प्रतातियों को काल का लिङ्ग हा गया है ।। रेशम घरे, परे होना, इन फालरुत्त घरे परे इत्यादि प्रत्यय से विलक्षण है। देशकत अधिक परत्य को दर पाहते हैं। कालरुत अधिक पाव को * घिर या दे२ करते हैं। दूर और चिर के अर्थ में जो भन्तर है, यही देश भीर काल के लिङ्गों की लिलक्षणता है।॥ लोग देखते हैं कि कोर क्रिपा मेरठ में हो रही है, और उसी समय घही क्रिया कस्लफत्ते में हो रही है, तय फालरुत मंयन्ध ती दोनों स्थानों में युगपस ( एम माप), परन्तु देशात संबन्ध एक नहीं। मेरठ से कलकता दुर मगमा हो जाता है, परन्तु मेरठ में होने वाली क्रिया भीर कलकत्ते में होने यानी क्रिपा जिम एक द्रष्य से संबद्ध हुई वह काल है ।। ६६. यदि कहो कि अपर के मूत्रध्यारुयाग मे काल कोई पदार्थ होमा ती पायर गया, परन्तु उस का गित्य होना और द्रथ्य होना कैसे समझा जाये ? ती उत्तर- ८६-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ॥ . काल .. वैशेषिकदर्शन - भावानुवाद (द्रव्यत्व नित्यत्वे ) [काल को] द्रव्यत्व और नित्यत्व ( वायुमा ) वायु के साप (व्याख्याते ) व्याख्यात समभिये ॥ ७ ॥ यदि कहो कि द्रव्यत्व मौर नित्यत्व पी माना परन्तु एफरव कैसे ? ती उत्तर- ८७-तत्त्वं भावेन ॥८॥ (तत्त्वं ) तत्व एकत्व ( भावेन ) सत्ता से समझिये ।। जिस प्रकार * होना "=सत्ता में लिङ्ग की अविशेषता भीर विशेष लिङ्ग के न होने से सत्ता एक यताई गई, इनी प्रकार वरे परे आदि काल- लिङ्गों में विशेष चिन्ह न होने, और चिन्हों में विशेष न होने से फाल भी 'एफ ही पदार्थ सिद्ध है। किन्तु वास्तव में काल एक होने पर भी उपाधि में काल में अनेकता (क्षण, लव, गिमेप, काष्ठा, कला, मुहूर्त, प्रहर, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, वर्ष, युग, कल्पादि भेद व्यवहम होते है ॥ ॥ ६८-नित्येवभावादऽनित्येपु भावात्कारणे कालाख्येति ॥ ६ ॥ (नित्ये) नित्यों में ( अमावात् ) न होने से और (अनित्येषु । धामित्यों 'मैं ( भावात् ) होने से ( कारणे ) कारणा में ( कालाख्या ) काल संशा है (इति) यह काल परीक्षा प्रकरण समाप्त हुआ । नित्य पदार्थ मास्मा आकाश आदि में काल (वरला, परला, घिर, शीघ्र मादि प्रत्ययहेतुक) नहीं रहता, और गनित्य मनुष्य पशु पक्षी घट पट आदि पदार्थों में काल (सायं, प्रातः, दिन, रात्रि, मास, वर्ष मादि) रहता है, इस हेतु से कारण की काल संशा है अर्थात् काल को कारण और मनप्य पशुपक्षी भादि को कार्य कहा जाता है। जैसा कि अपर्व । ५३ में कहा है कि- कालोऽमूं दिवमऽजनयत् काल इमाः पृथिवीरुत । काले ह भूतं भव्यं चेपितं हे वितिष्ठते ॥ ५ ॥ कालः प्रजा असृजत कालो अंग्रे प्रजापतिम् ॥ १० ॥ कालादापः समभवन् ॥ १९ । ५४ । १॥ काल ने इस द्युलोक को उत्पन्न किया और काल ने इन पथिवियों को उत्पन्न किया। काल में भूत, भविष्यत् सव ही स्थित है ॥५काल ने भारम्म मैंग्रजापति और प्रभाओं को उत्पन्न किया ॥ १०॥ काल से भप उत्पन हुवे १९ । ५४।१।। . म ३९ . द्वितीयाध्याय आन्हिक इत्यादि में कान को भी भूयं पृधिश्री शादि की उत्पत्ति का कारण कहा गया है ॥ फाल की परीक्षा करके मागे दिशा की परीक्षा करते हैं:- ८६-इतइदमिति यतस्तद्दिश्यं लिङ्गम् ॥ १० ।। { इतः) भोर में (इदम् ) यह है ( इति ) यह व्यवहार ( चन: ) जिन कार में होता है ( तत) वही (दिश्यं ) दिशा का (लिङ्गम् ) लि || दिशा न होती तो इधर पूर्व, धर पश्चिम, इधर उत्तर वा दक्षिण में यह आता है, जाता है, रहता है, इत्यादि व्यवहार नहीं चलते। इन व्यवहारों फा होना जिम कारण में होता है, वही कारण पदार्थ दिशा कहाता है ॥ १० ॥ ०-द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ११ ॥ (द्रय्यत्व नित्यरये ) [ दिशा का भी ] द्रव्य होना और नित्य होना ( यायुना ) घायु के गित्यस्य भीर द्रष्यत्व फपन से ( व्याख्याते ) कहेगये ॥ शिक प्रकार वायु अपने स्पर्श लिङ्ग मे द्रव्य पार कार्य ग होने मे नित्य है, मी प्रकार दिशा की अपने इधर उधर पूर्व पश्रिमादि व्यवहार लिङ्गों में द्रव्य और कार्य न होने में नित्य है । यह नित्यता पावहारिक है ॥१९॥ ६१-तत्त्वं भावेन ॥ १२॥ (तर ) एकर ( भायेन ) भाव के माथ व्याख्यात है। शिम प्रकार मत्ता-भाव की एकता काही पी इमी प्रगार दिशा की एकता नगझगी चाहिये । यद्यपि पूर्वादि भेद मे दिशा ४ या कोणों को गिन फर ८ या अपर नीचे को गिनकर ६ मा १० दिशा भी कहाती हैं, परन्तुं दिशापा के मामान्य में एक ही है ॥ १२ ॥ तो फिर दिशा पने को कहाती ६ ? उत्तर- १२-कार्यविशेपेण नानातवम् ॥ १३ ॥ ( कार्यविशेषेण ) कार्यविशेष में (गामात्यम् ) दिशाभों को अमेकता है ॥ १३ ॥ ०-कार्य विशेष आपा है ? उत्तर- ३-आदित्यसंयोगाद भूतपूट्विवियतोभूताच्च प्राची ॥१४॥ .

वैशेषिकदर्शन-सापानुवाद ( भूतपूर्वात् ) पहले हो चुके (.५ ) और ( भूतात् ) अब होते कुवे ( भविष्यतः ) तया मागे होने वाले ( आदित्य मंयोगात् ) मू य के संयोग से ( प्राची ) पूर्व दिशा का नाम होगया ॥ शिम दिशा से पहले सूर्य उदय हुमा, अव उदय होता है, भागे उ दय होगा, उस दिग्विभाग को पूर्व दिशा कहते हैं । इम मूत्र में भूतदित उदय होकर वर्तमान अर्थ में भून शब्द है, क्योंकि भूतकालार्थक एक दुनरा शब्द सूतपूर्वात् पड़ा है ॥ १४ ॥ ८४-तथा दक्षिणा प्रतीच्यदीची च ॥ १५ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार ( दक्षिणा ) दक्षिण ( प्रतीयो ) पशिन (थ) भोर (उसीची ) उत्तर दिशा है । मिस प्रकार सूर्य के उदय काल की दिशा का गाम पूर्ण है, हमी प्रकार उदय की अपेक्षा से ठीक सामने की पश्चिम, दहिने को दक्षिण भोर यायें की उत्तर कहाती है ॥ १५॥ ६५-एतेन दिगन्तरालानि व्याख्यानानि ॥ १६ ॥ (एतेन) इसी मे (दिगन्तरालानि दिशामों के बीच के भाग ( ध्याख्यातानि) बहे गये समझने चाहिये । सूर्योदय से जो व्यावहारिक संता पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर नियत कर ली गई हैं, उसी से यह भी समझ लेना चाहिये कि पूर्व दक्षिण के मध्य में कोण वा अन्तराल का नाम अ.ग्नेय, दक्षिण पश्चिम के अन्त राग का नाम नैर्मत, पश्चिम उत्तर का वीच वायव्य और उत्तर पूर्व का अन्तर्वर्ती दिग्भाग ऐशान्य कहाता है ॥ १६ ॥ दिशा की परीक्षा समाप्त हुई । आगे शब्द की परीक्षा करेंगे, उस का भक समझा कर प्रथम कारण और लक्षग संशय शो उत्पन्न कसे हैं:- ६६-सामान्य प्रत्यक्षा विशेषाऽप्रत्यक्षाद विशेषस्मृतेश्च संशयः ॥ १७ ॥ ( सामान्यप्रत्यक्षात् ) सामान्य प्रत्यक्ष होने, (विशेषाप्रत्यक्ष त्) विशेष प्रत्यक्ष न होने (च) भोर (विशेपरमृतेः ) विशेष के सारख से ( संब) संशय होता है।

द्वितीयाउथ्यायं २ माहिक जाय कि समझगा चाहने घाला पुरुष, किसी वस्तु के सामान्य धर्म को तो जान लेता है, और विशेष धर्म को किसी निमित्त से नहीं जान पाता वा नहीं जान सक्षता और विशेष का स्मरण मात्र करता है, परन्तु विशेष को पाता नहीं, तव जो द्विविधायुक्त प्रत्यय होता है, वह संशय कहाता है । जैसे अपने सामने खड़े कित्ती पत्थर के वा काष्ठ के बने पुमन चित्र को देख कर सामान्य बातें गो पुरुष में होती हैं, वे चित्र में भी होती हैं, उन से यह निश्चय नहीं होता कि यह पुष है, वा स्थाणु, वा चिन्न, अव देखने वाला चाहता है कि कोई विशेष-श्वास लेना, पलक मारना, बोलना, चलना, फिरना, सुखदुःखादि का अनुभव करना इत्यादि चिन्ह पातं तव निश्चय करूं फि यह पुरुष है, स्याणु नहीं, परन्तु वह यह भी शोचता है कि कदाचित विशेष हों और मैंने असी पहचान न पाये हों, बस जव तक स्थाणु है वा पुरुष, इन दोनों में से एक का अवधारण (फै मला) बुद्धि में न आजावे, तब तक जो उभयपक्षचल जान रहता है, वह संशय काहाता है ॥ १७ ॥ १७-दृष्टं च दृष्टवत् ॥ १८ ॥ (च) और ( दृष्टं ) प्रत्यक्ष ( दृष्टवत् ) प्रत्यक्षों के तुल्य है ॥ अर्थात् संशय तव होता है, जब एक दृष्ट पदार्थ दूसरे दृष्ट पदार्थों के समान हो और विशेष स्मरगा माता हो, पर जाना जाता हो । २८-यधादृष्टमऽयथादृष्टत्वाच ॥ १६ ॥ (घ ) और ( यथादृष्टं ) जैसा देखा था, उस के ( अयथादृष्टत्यात ) अन्य प्रकार से देखने से ।। देवदत्त को एक काल में हमने जटा रखाये देखा, यज्ञदत्त को मुंह नुहाये देया, फिर डूमरे समय में शिर पर हुपट्टा बांधे हुवे देवदत्त वा या. दत को देखा तो हम को यह संशय होगा कि जटिल है, वा मुगड । क्योंकि पहले नत्र कि हमने देखा था तब खुले शिर देखा था, भव शिर पर वन वांधे देखते हैं, तो अयपादृष्ट होने से जटिलत्व वा मुगडत्व का संशय हुवा ॥ सह-विझाऽविझातश्च संशयः ॥ २० ॥ (च) तथा ( विद्याऽविद्याता) विद्या और अविद्या से ( संशयः ) भी संशय होता है। m bar 4 । वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद पूर्व जो संशय कहा था वह दृष्ट शदृष्ट यथादृष्ट अयथादृष्ट में था, वह दूसरा संशय क्षेवल जानने न जानने से वा विपरीत जानने से होता है । मागे संशय के उदाहरणार्थ शब्दविषयक संशय दिखाने को लक्षणपूर्वक शब्द का निरूपण करते हैं:- १००-नोत्रग्रहणीयोऽर्थः स शब्द: ॥ २१ ॥ ( यः ) जो ( अर्थः ) विषय ( श्रोत्रग्रहणः ) प्रवणेन्द्रिय मे ग्रहण किया जाधे ( सः ) वह ( शन्दः ) शब्द है आने इस शब्द में संशय दिखाते है:- १०१-तुल्यजातीयेच्वर्थान्तरभूतेषु विशेपस्योभयथादृष्टत्वात् ॥ २२ ॥ (तुल्य जातीयेषु ) शब्द के तुल्य जातिवाले रूपादि गुणों भीर (मर्थान्तर- भूतेषु ) अन्य गव्यादि अर्थों में (विशेषस्य ) विशेष के ( उभयचादृष्टत्वात् ) दोनों प्रकार देखे जाते होने से [ संशय होता है कि शब्द रुपादि गुणों में कोई गुण है, वा पृथिव्यादि द्रव्यों में कोई दथ्य है, वा उत्क्षेपणादि कमों में कोई कर्म है, क्या है? अर्थात् शब्द श्रवणेन्द्रिय से ग्रहण होता है, इतने में यह निश्चय नहीं होता कि शब्द गुण है, वा धर्म है, वा द्रश्य है, क्योंकि श्रवण से सुनाई पटना जो शब्द का विशेष धर्म है, वह गुणों द्रव्यों वा कर्मों में उभयत्र देखते हैं । मब संशय का निवारण करने को बाहते हैं कि- १०२-एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यम् ॥ २३ ॥ (एकाद्रव्यत्वात्) एक द्रव्य वाला होने से (द्रव्यम् न) शब्द द्रव्य नहीं है। जो कार्यद्रव्य होते हैं, वह एक द्व्य वाले नहीं होते, परन्तु शब्द-एक द्रव्य (माकाश ) वाला है, अतएव द्रव्य नहीं । शब्द के द्रष्यत्व का संशय दूर हुवा । मब कर्मत्य का संशय हटाते है:- १०३-नाऽपि कर्माऽचाक्षुषत्वात् ॥ २४ ॥ (भचाहूंषत्वात् ) आंख का विषय न होने से (नापि) न ही (कर्म) कर्म हो सकता है। + .

द्वितीयाध्याय २ आन्हिक शब्द कर्म भी नहीं है, क्योंकि मांस से नहीं दीख पड़ता। यदि कर्म होता तो मांख से दीसता॥ यदि कहो कि जैसे कर्म शीघ्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही शब्द भी शीघ्र गट हो जाता है, तब शब्द को करें यों न नान ? ती उत्तर:- १०४-गुणस्य सतोऽपवर्गः कर्मभिःसाधर्म्यम् ॥ २५ ॥ (गुणस्य ) गुण ( अतः) होते हुवे [शब्द ] का ( अपवर्गः ) नाश ( फर्मभिः) फामी मे ( साधर्म्यम् ) साधर्म्य है ।। पव फिशद द्रव्य नहीं, कर्म नहीं, इन दोनों बातों को पूर्व दो सूत्रों में फार मुके शौर परिणेप से शब्द का गुण होगा सिद्ध है, तब केवल पाशु मिनाशी होगा नात्र शब्द के फर्मत्य को निश्चय नहीं कराता, केवल शीघ्र बिनागीपना शब्द का, कमाँ से गांशिक साधर्म्य मात्र है। किन्तु यह नियम ती नहीं कि जो शो शीघ्रनाशवान् हो, वह २ फर्म ही हो। क्योंकि संख्या, सान, सुन्न, दुःन इत्यादि शी ती शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, क्या इतने मात्र माधय मेधे याने हो जाते है ? अब नहीं, ती शीघ्रविनाशित्व मान साधर्म्य से शरद को भी फर्म नहीं बाद मक्ते ॥ जीर १०५-सतोलिङ्गाऽभावात् ॥२६॥ (मतः ) शविनाशी का (लिङ्गाऽतायात) लिम न होने से [ नित्य नहीं माग गकते ॥ कोई लिक नहीं पाया जाता जिम में शन को अधिनाशी वा नित्य मान मर्के । तया- १०६-नित्यवैधात् ॥ २७ ॥ (मि-पास् ) नित्य धर्म्य ले [शब्द नित्य नहीं ] ॥ नित्य पदार्थ के धर्म है कि यह उत्पन्न और नष्ट न हो, परन्तु शब्द उत्पन्न और नष्ट भी होता है, हम लिये शब्द का गित्य पदार्थों से धर्म नहीं मिलता किन्तु वैधम्यं है, इस वैधz से शब्द मनित्य है । १०७-अनित्यश्वाऽयं कारणत: ॥ २८ ॥ (भयं) यह गठद (धारणतः) कारण से (च) भी (गनित्यः) अनित्य है ।

वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद शब्द अनित्य है, कारण वाला होने से, जैसे घट सनित्य है, कारण वाडा होने से ॥ यदि कहो कि शब्द का कारणवान् होना ही कहां मिड है? तो उत्तर १०८-लचाऽसिद्धं विकारात् ॥ २६ ॥ (विकारात् ) विकार से (अतिद्ध) शब्द का कारणवान होना अनिद्ध (घ ) भी (न) नहीं ॥ क्योंकि शब्द विकारयुक्त है, कार्य है, अतएव उम का कारणवत्त्व प्रसिद्ध नहीं। यदि कहो कि हम ती शब्द की अभिव्यक्ति मान्न मानते हैं, उत्पत्ति नहीं, तो उत्तरः- १०६-अभिव्यक्ती दोपात् ॥ ३० ॥ ( अभिव्यक्ती ) अभिव्यक्ति में ( दोघात् ) दोष से ॥ अभिव्यक्ति में दोप है इम लिये अभिव्यक्ति भागना ठीक नहीं । दोप यह है कि शब्द को अभिव्य मानें तो एक अक्षर के अभिव्यञ्चका कारण से समत्त अक्षर अभिव्यक्त ( प्रकट ) हो जाते, पर ऐसा है नहीं, इस लिये समझना चाहिये कि शब्द जिव्यक्त नहीं होता, किन्तु उत्पन्न होना है और उत्पत्ति अपने कारण आकाश से होती है। क्योंकि हम देखते है षि- ११०-संयोगाद्विभागाच्छब्दाच शब्दनिष्पत्तिः ॥ ३१ ॥ ( संयोगात ) संयोग से ( विभागात् ) विभाग से (घ) भोर (शदात) शब्द से ( शब्दनिष्पत्तिः ) शब्द उत्पन्न होता है । प्रथम शब्द संयोग वा विभाग ने उत्पन्न होता है, फिर शब्द से भी शब्द उत्पन्न होने लगता है । शब्द दो प्रकार का है, एक वर्णरूप, दूमरा ध्वनिरूप । वर्णरूप ा क प ट त प अथवा वर्ण जुड़ कर घट पट राम कृष्ण मादि शब्दरूप, अपवा मैं जाता हूं, तुम पढ़ते हो, इत्यादि बाक्यरूप, इसी प्रकार अध्यायरूप और ग्रन्धरूप भी। दूमरा ध्वनिरूप, जैसे लकड़ी टूटने, पत्ते हिलने, वा भेरी दुन्दुभि मादि वाजों में से निकलने वाला शब्द है। वर्णरूप शन संयोग और शब्द से निकलते हैं और ध्वनिरूप शद-संयोग, विभाग और शब्द, तीनों से निकलते हैं। वर्णात्मक शहद का कारण कपठादिल्यान से वायु का संयोग है । वायु से चोट खाये कपठादि का नाकाश से संयोग होना भर मवायी कारण है ॥ , द्वितीयाध्याय २ शान्हिक ४५ पूर्व अभ्यास किये वों की स्मृति की अपेक्षा से मान्मा और मन के संयोग से पहले वचारया की इच्छा होती है, फिर प्रयत. उस प्रयत्न की अपेक्षा करते हुवे मन और चाय के मंयोग ने उदरस्थ वायु में कर्म होता है, उस से जपर को चलता हुवा वाय फिर कराठादि में चोट करता है, उस चोट मे पागठादि आकाश से संयोग करते हैं, तब अक्षा (भाकाश कारण से) उत्पाद ! होते है। यह क्रन है । ध्वन्यारमया शब्द में प्रगम गारे और दगडे का संयोग होता है, वह निमित्त कारण है, नहारे और शाफाश का संयोग असमवायी कारण है । इसी प्रकार वंश को टूटने पर जो भब्द होता है, तुम का निमित्त कारण विताग है और वंश भीर मामा का विभाग अनमवायी कारण है। और जव एक स्थान का शब्द दूपरे दृर स्थान में सुनाई देता है, तव शब्द से गन्द नत्पन्न होता जाता है और परस्पर तार सा पुरता घस्ता जाता है । क्योंकि जब हम दूरस्य ० को सुनते हैं तो हमारे काग तो शब्दोत्पत्ति के स्थान तक जाते नहीं। शब्द स्वयं भी हम तक चलकर नहीं आसकता, क्योंकि शब्द गुण है और क्रियारहिन है और विना प्राप्त हुवे को ग्रहण करना भी हमारे कानों वा किन्हीं मन्य इन्द्रियों का मामर्थ्य नहीं, तब फिर दूरस्थ गठप क्यों मुगाई पड़ता है ? उत्तर में कहना पड़ेगा कि जहां शब्द हुपा, उस ने अपने ममीप दृमरा गछद उत्पन्न कर दिया, उस ने फिर और शब्द उत्पन्न कर दिया, चम जमे पानी की एक लहर भपने मे मागे लहर को उत्पन्न घरती है पीर वह फिर उस मे भागे एक अन्य लहर को उत्पन्न करती है। इसी प्रकार शद से शब्द उत्पन्न होता हुवा, दूररुप पुरुप के फानों को मुनाई पड़ता है पीर शिम प्रकार जलाशय में मृत्पिगड फेकने में जो ऊंची लहरी वा नरा नत्पन्न होती है, वह फिर मागे अधिक फैली हुई कुछ नीची तरङ्ग को उत्पन्न यारती है, उस से शोर भी नीची, और अन्त में कम होते२ तरा नहीं दीख पड़ती, इसी प्रकार नोपों तक के घोर भारी शब्द भी ज्यों२ दूर पहुंचते जाते हैं, कम होते जाते हैं । इस प्रकार शब्द से शब्दमन्तान में वायु मादि निमित्त कारण और पूर्व पूर्व शब्द अमनवायी कारण है। गौर जितनी २ दूर में शब्द तत्पन्न होता है, उतना २ वहां २ का आकाश उन शब्द का मर्मवायी कारण वा उपादान कारण होता है ।। यदि कहो कि शब्द की उत्पत्ति संयोगादि कारणों से हो, इतने से शहर की नित्यता क्या सिद्ध हुई तो उत्तर- ४६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १११-लिङ्गाच्चाऽनित्यः शब्दः ॥ ३२ ॥ (लिङ्गात् ) लिङ्ग से ( च ) भी ( शE ) शब्द (अनित्यः) अनित्य है। उत्पत्तिमान् होना शब्द का लिज है, उस से भी शब्द की भनित्यता सिद्ध है ॥ भागे पूर्व पक्ष करते हैं:- ११२-इयोस्तु प्रकृत्योरभावात् ॥ ३३ ॥ (इयोः ) दोनों (तु ) ही ( प्रवृत्त्योः ) प्रवृत्तियों के ( अभावात् ) अभाव से ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो दोनों (गुरु शिष्यों) की प्रवृत्तिये न होतीं। फ्योंकि अध्यापक जिस अनित्य शब्द को पढ़ाने में उच्चारण करता, वह तो उच्चारण करते ही नष्ट हो जाता, अतः फिर अध्येता शिष्य उमी शब्द की पुनरावृत्ति न कर सकता, क्यों कि गुरु का बताया तो उनी सनय न हो गया समझना चाहिये, परन्तु हम देखते हैं कि गुरु के उच्चारण किये शब्दों को शिष्य ज्यों का त्यों बोलते हैं, जिस से शब्द अनित्य नहीं, किन्तु नित्य जान पड़ता है ॥ अन्य हेतु मे सी शब्द अनित्य नहीं जान पड़ता कि- ११३-प्रथमाशब्दात् ॥ ३४ ॥ (प्र-ब्दात् ) प्रथमा शब्द से । ऐतरेय ब्रामण ३ । ३ में लिखा है कि-"निः प्रयमामन्याह, निरुत्तनाम् ऋग्वेद ३ । २७ । १ से ११ तक ऋचायें सामिधेनी संजक हैं, उन में से प्रथमा (. पहली ) ऋचा को तीन वार पढ़ा जाता है और अन्त की ऋचा को भी। यदि शब्द अनित्य होता तो एक ऋचा ३ वार कैसे पढ़ी जाती क्योंकि एक वार पढ़ी हुई अगले क्षण में शब्द की अनित्यता से नष्ट हो जाती, इस से पाया जाता है कि शब्द अनित्य वा उच्चरितप्रध्वंसी नहीं, किन्तु स्थिर वा नित्य है ॥ इसी पक्ष में तीसरा हेतु गौर भी देते हैं कि:- ११४-सम्प्रतिपत्तिभावाच्च ॥ ३५॥ (संप्र-भावात् ) ठीक २ पहचान रहने से (च) भी ॥ यदि शब्द अनित्य होता तो एक के शब्द को सुन कर दूसरा सम्प्रति पत्ति प्रत्यभिज्ञा-याद-पहचान कर ठीक २. उस का. अनुकरण न कर ।

६७ - द्वितीयाध्या याय २ आन्हिक सकाना करता है, जाना जाता है कि शब्द भनित्य नहीं,नित्य-सिरहे। भागे तर पक्ष करते हैं और तीगों पूर्वपक्षस्थ हेतुगों का साजन करते हैं: ११५-संदिग्धाः ॥ ३६॥ मुंदेछ बारले ॥ पूर्वपदा में दिये हुये तीनों हेतु मंदिग्ध हैं, इन लिये उन से शब्द फी अनित्यमा नहीं मिद्ध होती । देवदत्त ने यादत्त को गाना वा नाचना निाया। यादत्त शी यही नाच गाना है, जो देवदत्त ने स्वयं नाच फार बताया था। उस में यह निमय नहीं होता कि देवदत्त पो ही नृत्य को यादत्त पुनः करता है, किन्तु यह भी तो होना है कि जिस प्रकार देव- दश अपने नृत्य का न्वतन्त्र का है, उसी प्रकार एक उमी प्रकार के दूसरे नृना का स्वान कर्ता यादत्त हो । एक कुम्भकार ने एक घड़ा बनाया, नमे देख कर दृभर कुम्नकार ने दुमरा घड़ा बनाया, तब क्या यह कह सक्त शिघट अनित्य नहीं, पोंकि चट अनित्य होते ती एक घट के समान दूभरा घट बनता । बम शिम प्रकार या हेतु मंदिग्ध वा भनेकान्तिक है वैसे ही शब्द की नित्यता पर दिये हेतु भी संदिग्ध सौर मन कान्तिक एं। गुरू शिस शाम को बोलता है, शिष्य मुनता है, मुनकर जागता है, जान कर ना ही एक दृमरा शब्द बोलना है, इमी प्रकार मानिनी ऋचाओं में प्रथमा और मन्तिमा नाचा का त्रिमधारण का शतधार उच्चारण प्पों न हो, सब स्वतन्त्र पास ही प्रकार चरित शब्द एक नहीं होते किन्तु एकाकार भनेक होते है, पर नित्य॥ ११६-सति बहुत्वे संख्याभावः सामान्यतः ॥ ३७ ॥ ( बाल्ये ) बहुतायत (मति) होने पर भी ( संख्याशावः ) संख्या फा होना ( मानान्यतः ) मामान्य में है। यद्यपि शब्द के अनित्य होने से वर्णात्मक शब्द भी बहुत होने चाहिये, म केवल पागिनीय शिना ( त्रिष्टिः ) मूत्रानुमार ६३ ही वर्ग हो । परन्तु सामान्य में मंच्या (६३) होगी है नर्थात् ६३ से भिस अधिक वर्ण भी कोई बोलता है तो भी ये मानान्य मे अर्थात् इन्ही तरेमठ ६३ के कुछ समान होने से इन्हीं में गिन लिये जाते है। जो लोग ६३ न मानकर ३३ व्यञ्जन - मीर वैशेषिकदर्शन- भाषानुवाद 6 स्वर गिनते हैं, ये ४२ अक्षरों के सामान्य में ही सब विशेषों का प्रतीय कर लेते हैं। जो और अधिक भेद गिनने लगे तो एक अकार को ही १८ अद शाल्पित करते हैं॥ इति द्वितीयाऽध्यायस्य द्वितीयमान्हि कम् इति श्री तुलसीरामस्वामि कृते वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ ProGANA ओ३म् अथ तृतीयोऽध्यायः . पषियी पादि मात याव्यों की परीक्षा द्वितीयाऽध्याय में हो चुकी। साता नेपाल पार गग; न में उट्टे गक्रमानुमार प्रथम मात्मा की Hinा मरेंगे। उन में प्रथम भारमिद्धि गलिय हेतु दिखलाने को भूमिका सामने दि:- ११७-प्रमिद्धा इन्द्रियाऽर्थाः ॥ १॥ ( अभियानां) इन्द्रियों के विषय ( प्रमिलाः ) प्रसिद्ध हैं। Hairmani antt कि नाक में गन्ध, मिला ये रन, भांस से रूप, स्या में शं, और फागन मार्ग पर कर शाम होता ॥ १॥ तव- ११८-इन्द्रियार्थमिद्धिरिन्द्रियार्थभ्योऽर्थान्तरस्य हेतुः ॥२॥ (इष्ट्रि-हिः) नियों को गती मगिद्धि (तुः) माधग है (इन्द्रियार्थभ्यः) इन्द्रियानों में ( धातारम्य पापा का ॥ पन्द्रियाचों को तीनोग भागते ही, एपी में यात्र की प्रमाणित होता है कि कोई अन्य पदापं है गो गाफ मे मुंघर, मिष्टा में चाय बार, शाख में देख पार, त्वचा में गर भीर यान प सुन गार इन विषयों का ग्रहण दारता, पासा यदि कही दि इन्द्रियाणा में शिवगी पदार्थ होना तो चाहिये किन्तु या पदार्थ गरीरहीमों न गाम निपा आते ? तदिन शाला के मानने शी या शापमाना? मी मार:-- ११६-सोनपदेश: ॥३ (र: ) तु (भाग पदेश ) हेतु है। गर्गर को गाय मिल करने वाला वार हेतु पहेतु वा त्यामान होगा, गोंकि जो निम के शाश्रित हो यह म मा कार्य हो, यह गियन नहीं है। । 3 ५० -- वैशेषिकदर्शन-माधानुवाद हम देखते हैं कि घट पटादि पदार्थों के जानने में यद्यपि दीपक वा मृर्यादि का प्रकाश भी कारण है तथापि कोई नहीं कह सकता कि सूर्यादि का प्रकाश द्रष्टा है, किन्तु साधन मात्र है। इसी प्रकार रूपादि ज्ञान का भात्रय शरीर होने पर भी ज्ञान का समवायि कारण शरीर नहीं, किन्तु उत्त से भिन्न आत्मा है ।। ३ ॥ क्योंकि- १२०-कारणाऽज्ञानात् ॥ ४ ॥ (कारणाजानात् ) कारण में ज्ञान न होने से। शरीर ज्ञान का आश्रय (समवायी कारण ) इस लिये नहीं हो सकता 'कि शरीर के कारण पञ्च तत्वों में ही ज्ञान नहीं, जब कारण में ज्ञान नहीं तब कार्य में कहां से हो सकता है ॥ ४ ॥ यदि कहो कि हन तौ पञ्च भूतों में ज्ञान मानते हैं, तद्भिन्न मामा को क्यों मानें तो उत्तर- १२१-कार्येषु ज्ञानात् ॥ ५॥ (कार्येषु) घट पटादि पलतकार्यों में (ज्ञानात्) जान होना चाहिये था । यदि पञ्चतत्त्व चेतन होते तो उन का कार्य सनात घट पट मठ मन्दिर सव चेतन ज्ञानी होता, जड़ कोई होता ही नहीं, परन्तु ऐसा नहीं पाया जाता, इस से पच्च भूतों में ज्ञान मानना ठीक नहीं ॥ ५॥ प्रत्युत- १२२-अज्ञानाच॥६॥ ( अज्ञानात् ) Hान से (च) भी॥ पञ्चतत्त्वों में अज्ञान का प्रमाण यह है कि उनके कार्य घट पटादि में कोई मान नहीं पाया जाता, भज्ञान देखा जाता है, इस से भी सिद्ध है कि न पञ्चभूतों में ज्ञान है, न उन के कार्य घट पटादि में है, न शरीर में हो सकता है, किन्तु ज्ञान का आश्रय तौ आत्मा है, जो शरीरादि से व्यतिरिक्त है। इस विषय की पुष्टि समान तन्त्र न्यायदर्शन ३।१।१-१५ तक सूत्रों में किस प्रकार की गई है, सो पाठकों के अवलोशनार्थ नीचे लिखते है:- दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ न्यायद० ॥१॥ उत्तरपक्ष-दर्शन और स्पर्शन से एक ही गार्थ का ग्रहण होने से (मात्मा) देहादि से भिन्न है)। - .

घृतीयाsध्याय १मान्हिक ५९ जिम विषयं को हम अांख में देखते हैं, उसी को त्वचा से स्पर्श भी करते हैं । नींबू को देखकर रसना में पानी भर जाता है । यदि इन्द्गिय ही पेतन होते तो ऐमा कदापि नहीं हो सकता था, क्योंकि “ अन्यदृष्टमन्यो न स्मरति " देवदत्त के देखे हुचे अर्थ का यज्ञदत्त को कभी स्मरण नहीं होता। फिर मांस के देखें हुवे विपय का जिहर से वा त्वचा से क्योंकर अनुभव किया जाता। जो कि हम विना कित्ती सन्देह के एक इन्द्रिय के अर्थ को दूमरे इन्द्रिय से ग्रहण करते हैं, उस से सिद्ध है कि उस अर्थ के ग्रहण करने में इन्द्रिय स्वतन्त्र नहीं हैं, किन्तु इन के अतिरिक्त ग्रहीता कोई और है जो इन के द्वारा एककर्शक अनेक प्रत्ययों को ग्रहण करता है और वही घेतन प्रात्मा है ॥ अव इस पर शङ्का करते हैं:- न, विषयव्यवस्थानात् ॥ २॥ पूर-नुक्त कथन ठीक नहीं है, विषयों की व्यवस्थिति होने से ॥ देहादि संघात के अतिरिक्त और कोई भाला नहीं है, विषयों की व्यवस्था होने से । इन्द्रियों के विषय नियत हैं, मांस के होने पर रूप का ज्ञान होता है, न होने पर नहीं होता थीर यह नियम है कि जो जिस के होने पर होता और न होने पर नहीं होता, वह उसी का समझा जाता है । इस लिये रुपधान नेत्र का हे श्योंकि वही उम को देखता है। इसी प्रकार अन्य इन्द्रिय भी अपने २ अर्थज्ञान में स्वतन्त्र हैं । जय पन्द्रियों के होने ने ही विषयों की उपलब्धि होती है तब उम से भिन्न अन्य किसी चेतन की कल्पना क्यों फी जाय ? भय इस का समाधान करते है:- तव्यवस्थानादेवात्मसदावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥ १०-उक्त विषयव्यवस्थिति से ही भारमा की सिद्धि होने से निषेध नहीं हो सकता ॥ पन्द्रियों के विषयों की व्यवस्था होने से ही ( उन से भिन्न चेतन ) मात्मा की ससा माननी पड़ती है। यदि इन्द्रियों के विषय नियत न होते मात् एक रन्द्रिय से दूसरे इन्द्रिय के विषय का भी ग्रहण हो सकता, तब सी नन में स्वतन्त्रता की कल्पना की जासकती थी। परन्तु जिस दशा में कि उन के विषय नियत, मांत् सांख से सप का ही ग्रहण होता है, न कि गन्धादि अन्य विपयों का। इस से यह सिद्ध होता है कि सब विषयों का --- - - ५२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ज्ञाता चेतन आत्मा जो इन्द्रियों से अपने २ विषयों को ही ग्रहण कराता है, उन से भिन्न है। इन्द्रियचैतन्यवादियों के मत को खपछन कारके, अव देहात्मवादियों का खण्डन करते हैं:- शरीरदाहे पातकामामात् ॥ ४॥ उ०-शरीर को जलाने में पाप न होने से (मात्मा शरीर से पृथक है)। यदि शरीर से भिन्न कोई आत्मा नहीं है तो मृत शरीर को जलाने में पाप होना चाहिये, परन्तु पाप सजीव शरीर को जलाने में होता है, न कि मृत शरीर को॥ अव इस पर शङ्का करते हैं:- तदमावः सात्मकप्रदाहेऽपि तनित्यत्वात् ॥५॥ पू०-उस ( अात्मा ) के नित्य होने से सजीव शरीर के गलाने में भी पाप न होना चाहिये। सजीव शरीर के जलाने में भी पाप का भाव होना चादिये, अात्मा से नित्य होने से क्योंकि जो देह से भिन्न आत्मा को मानते हैं, वे उस को नित्य भी नानते हैं। यथा-" न बायते नियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ अर्थात् माला न कमी उत्पन्न होता और न मरता है, न पक्षी उत्पन्न हुवा न होगा, न नरा न मरेगा, वह आज, निल, सनातन और पुराण है, शरीर के नाश होने पर उस का नाश नहीं होता। तथा आगे चलकर उसी गीता में कहा है:-" नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावशः। न चैनलोदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ अर्थात् मात्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकता, जल गया नहीं सकते और पवन सुखा नहीं सकता है। जव ऐसा है तो फिर आत्मा सहित शरीर के जलाने में भी कुछ पाप नहीं होना चाहिये, क्योंकि नित्य मात्मा की कोई हिंसा नहीं कर सकता। यदि कहो कि हिंसा होती है तो मात्मा का नित्यत्व न रहेगा। इस प्रकार पहिले पक्ष में हिंसा निष्फल होती है और दूसरे पक्ष में उस की उपपत्ति नहीं होती। अब इस का समाधान करते हैं:- न, कार्यान्वयकर्तृवधात् ॥ ६॥ - .

५३
इन मूत्र
तृतीयाध्याय १ आन्हिया
३०-शरीर और इन्द्रियों के उपचात होने से ( पूर्व पक्ष ) ठीक नहीं ॥
में गोतम मुनि अपना अन्तिन निद्धान्त कहते हैं । हन नित्य
मात्मा के वध को हिंमा नहीं कहते किन्तु सार्याय शरीर और विषयोप-
सब्धि के कारण इन्द्रियों के उपचात (जिम ने आत्मा में विकलता उत्पन्न
होती है ) की हिंगा फहते हैं । सुख दुःखरूप कार्य हैं, उन का नंवेदन गरीर
के द्वारा किया जाता है, इन लिये वह कार्याश्रय कहाना है और इन्द्रियों से
विषयों का ग्रहण किया जाता है, इन लिये उन में कर्तृत्व का व्यपदेश किया
है तो बन शरीर और इन्द्रियों के प्रबन्ध का जो नुच्छेद करना है, इसी का
नान हिंना है, इन निये हमारे नत में जल दोष नहीं आता ॥
व आत्मा के देहादि संघात से भिन्न होने में दूसरा हेतु देते हैं:-
सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥
उ-बाई आंख ने देखी हुई वस्तु का दाहिनी मांख से प्रत्यभिज्ञान
होने से (मात्मा देहादि ने पृथक् है ) ॥
पूर्वापर ज्ञान के मेल को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। जैसे-यह वही यज्ञदत्त
है जिन को मैंने वाराणसी में देखा था। वाई झांस से देखी हुई वस्तु की जो
दाहिनी मांख से प्रत्यतिजा होती है इस से सिद्ध होता है कि उत्त प्रत्यभिज्ञा
का कसा इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है। यदि इन्द्रिय ही चेतन
होते तो वाई साख से देखी हुई वस्तु को दाई आंख कमी नही पहचान
सकती थी, क्योंकि देवदत्त के देखे हुवे को यज्ञदत्त नहीं जान सकता ॥
इन पर भाक्षेप करते हैं:-
नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ॥ ८ ॥
पू०-गाक की हड्डी का आवरण होने से एक में दो का असिमान होने
से ( यह कथन ) युक्त नहीं है ॥
वास्तव में चक्षु इन्द्रिय एक ही है, नाषा की हड्डी के बीच में गाजाने
में लोगों को दो को भ्रान्ति हो रही है । जैसे किसी तहाग में
पुल वान्य
देने मे दो तहाग नहीं हो जाते, ऐसे ही एक मस्तक में नाक फा व्यवधान
होने में पांख दो वस्तु नहीं हो सकतीं। मतएव प्रत्यभिज्ञा कैसी ?
अब इस माक्षेप का समाधान करते हैं:-
एकविनाशे द्वितीयाऽविनाशान्नकत्वम् ॥ ६ ॥

५४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १०-एक को नाश होने पर दूसरी का नाश न होने से एकता नहीं हो सकती। यदि चक्षु इन्द्रिय एक ही होता तो एक मांख के नष्ट होने पर दूसरी भी नहीं रहती, परन्तु यह प्रत्यक्ष मिड है कि एक आंब्द के फूट जाने पर दूसरी शेष रहती है और उस से आंख का काम लिया जाता है । इसलिये चक्षु एक नहीं ॥ पुनः पूर्व पक्षी इस पर भाक्षेप करता है। अवयवनाशेऽप्यऽवयव्युपलब्धेर हेतुः ॥ १० ॥ पू० -अवयव का नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि होने से ( उक्त हेतु ) अहेतु है ॥ उक्त हेतु ठीक नहीं है क्योंकि अवयव के नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि देखने में आती है। जैसे-वृक्ष की किन्हीं शाखाओं के कट जाने पर भी वृक्ष की उपलब्धि होती है, ऐसे ही अवयव रूप एक दक्ष से विनाश होने पर भी दूसरे चक्षु में अवयवी की उपलब्धि शेष रहती है इस लिये चक्षुहूँत मानना ठीक नहीं । अब मिद्धान्त सूत्र के द्वारा समाधान करते हैं:- दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥ उ०-दृष्टान्त के विरोध से निषेध नहीं हो सकता ॥ दृष्टान्त के विरोध से घrद्वैत का निषेध नहीं हो साता, क्यों कि जैसे शाखायें वृक्ष रूप अवयवी का अवयव हैं, तद्वत् एक चक्षु दूसरे पक्ष का, अय- यव नहीं अर्थात वे दोनों ही अवयव हैं । अवयवी उन का कोई और है । अतः दृष्टान्त में विरोध माने से निषेध युक्त नहीं । अथवा दृश्यमान अर्थ के विरोध को दृष्टान्तविरोध कहते हैं । मृत मनुष्य के कपाल नासाख्यि का व्यवधान होने पर भी दो छिद्र भिन्न २ रूप से स्पष्ट दीख पड़ते हैं। यों तो हृदय का व्यवधान होने से दोनों हाथों को भी कोई एक कह सकता है, परन्तु यह दृश्यमान अर्थ का साक्षाद्विरोध है इस लिये चक्षुरैक्य ठीक नहीं और जब चक्षु दो सिद्ध हो गये, तब एक के देखे हुवे अर्थ की दूसरे को प्रत्य- '. शिक्षा होना यह सिद्ध करता है कि उस प्रतिभिज्ञा का कर्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है और यही तन मात्मा है । फिर उसी की पुष्टि करते हैं:- इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥ ॥

तृतीयाध्याय १ आन्हिक 20-(किमी इन्द्रिय में उस को विषय को ग्रहगा करने पर) अन्य इन्द्रिय में विकार उत्पता होने में ( आत्मा देहादि से पृथक है ) ॥ किमी मा द्रव्य को पतु से देखने अथवा घ्राण से उस का गन्ध ग्रहण काने पर रममा में विकार उत्पादन होना है, शांत मांड में पानी भर आता है। यदि इन्द्रियों को को चेतन गाना जाये तो यह बात हो नहीं मफती फि मायदेशे की कोई और स्मरण करे। इस लिये इन्द्रियों से पृथक् कोई मात्मा है ॥ अब इन पर शा धारते हैं: न, स्मृनेः स्मर्त्तव्यविपयत्वात् ॥ १३ ॥ पू. मृति को स्नाध्यविषयिणी होने मे (पथक भात्मा को मानने की शोर भावयता) नहीं । सदर योग्य विषयों का अनुभव करना स्मृति का धर्म है, वह स्मृति समय बिरयों को योग ने उत्पन्न होती दे, उमी ने इन्द्रियान्तरविकार उत्पन्न होते हैं। जिन मनुष्य ने एक बार निंबू के रस को घाखा है, दूसरी धार म यो म्मरमा करने मे उम के मुंह में पानी भर जाता है, सो यह स्मृति का धर्म है, न कि तात्मा का || अब एम का समाधान करते हैं: तदात्मगुणसदावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ ~~~उन सात्मगुग होने में (मात्मा का) निषेध नहीं हो सकता। मृति कोई दूध नहीं है, किन्त वह आत्मा का एक गुगा है, हम लिये उक्तशाप या नहीं है। जव स्मृति आत्मा का गुगा है तभी तो अन्य के देखे का अन्य को स्मरण नहीं होता। यदि इन्द्रियों को चेतन गानोगे तो अनेक पाहोन ने विषयों का प्रतिमन्धान न होमकेगा, जिम में विषयों की कोई व्यवस्था नरहेगी पायांत कोई देखेगा और कोई स्मरण करेगा और यह हो का पता । या व्यवस्था ती तशी ठीक रह सकती है जब कि अनेक का एक द्रष्टा सि निमित्तों के योग से पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण फरता वा इन्द्रियान्तर विकारों को उत्पना करता है,पेमामाना जायगा। क्योंकि अनेक विषयों के द्रमा को ही दर्शा के प्रतिमन्धान से स्मृति का होना सिद्ध गमता, पान्यचा बिगा आधार के स्मृति फिम में रहे ? उस के अति- रित * मैं स्मरण करता हूं यह प्रत्यय ( जो बिना किसी भेद के प्रत्येक गनुप्य की होता है) भी स्मृति का भात्मगुण होना सिद्ध करता है। २

है
मैंने इस
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५६
वैशेषिकदर्शन भायानुवाद
पुनः उसी की पुष्टि करते हैं:
अपरिसंख्यानाच्च स्मृतिविषयस्य ॥ १५ ॥
उ०-स्मृतिविषय का परिगणन न करने से पी (यह शबा उत्पन्न हुई है)।
स्मृतिविषय के विस्तार और लत्व पर ध्यान न देकर प्रतिवादी ने
यह आक्षेप किया है शि "स्मर्तव्य विषयों को स्मरण करना स्मृति का काम
है। वास्तव में स्मृति का विषय वड़ा लम्बा और गहरा
अर्थ को जाना, मुझ से यह अर्थ जाना गया, इस विषय में मुफ ने जाना
गया, इस विषय का सुझ को ज्ञान हुआ, यह जो चार प्रकार का परोक्षजान
है, यही स्मृतिका मूल है, इस में सर्वत्र साता ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की
उपलब्धि होती है । अव प्रत्यक्ष अर्थ में जो स्मृति होती है, नप से
तीन प्रकार के ज्ञान एक ही अर्थ में उत्पन्न होते हैं । उदाहरगा शिस
को मैंने पहले देखा था, उसी को अब देख रहा हूं इन में दर्शन, ज्ञान
और प्रत्यय ये तीनों संयुक्त हैं । तो यह एक अर्थ तीन प्रकार के ज्ञानों
से युक्त हुवा न तो अकर्तृक है और न नानाकर्तृक किन्तु एकफर्तक है, क्योंकि
एक ही सव विषयों का ज्ञाता अपने सम्पूर्ण मानों का प्रतिसन्धान करता है।
इस अर्थ को जानूंगा, इस को जानता हूं, इसे जाना और अमुक अर्ष की
जिज्ञासा करते हुवे बहुत काल तक न जानकर फिर मैंने जाना" इत्यादि
'ज्ञानों का निश्चय करता है । यदि इस को दोवल संस्कारों का फैलाव मात्र
क्षी माना जाय तो हो नहीं सकता, क्ष्योंकि प्रथम तौ संस्कार उत्पन्न होकर
विलीन हो जाते हैं, इस के अतिरिक्त कोई संस्कार ऐसा नहीं है जो तीनों
काल के ज्ञान और स्मृति का अनुभव कर सको। विना अनुभव के "मैं और
मेरा" यह ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इस
से
अनुमान किया जाता है कि एक सन विषयों का पाता प्रत्येक देह में
अपने ज्ञान और स्मृति के प्रवन्ध को फेलाता है, देहान्तर में उस की प्राप्ति
न होने से उम ने ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान हो नहीं सकता" ॥५॥
यदि कहो कि शरीर को ज्ञानाश्रय होना सिद्ध न हो, न सही, परन्तु
आत्मा को ज्ञानानय होना भी तो सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि मात्मा
और ज्ञान में तादात्म्य सम्बन्ध नहीं ? तो उत्तर-
१२३-अन्यदेव हेतुरित्यनपदेशः ॥ ७ ॥

। तृतीयाऽध्याय शामिहर्फ (हेतुः) हेतु (न्यत् ) माध्य से सिम (एव) ही होता है (इति) इस से ( भगपदेशः ) याह हेतु नहीं । यद्यपि मोगतादि गत के लोग मानते हैं कि जिम का जिम से तादात्म्य मम्पन्ध हो, वा जिम की शिम से उत्पत्ति हो वही उम का हेतु होता है, परन्तु. हन ( बैशेषिकाचार्य ) सनी बात ती मानते हैं कि शिम यी जिस से रत्पत्ति हो वा उन का नाधक हेतु होता है, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि हेतु और साध्य में तादात्म्य मम्मन्ध भी हो ही हो । बहुत पाठों में मादात्म्य सम्बन्ध है, पर हेतुता नहीं, तथा तादात्म्य संवन्य नहीं और हेतुता है। जो शागे १३ चे सूत्र तक स्पष्ट होगी ॥७॥ यदि कहो कि माध्य मे भय की हेतु या पारता है जैसे अग्नि से मन्ये धूम भगि का हे देती हग कहते है कि यदि गन्य ही हेतु हुया फरता ही ती धूम को गिग का ही ऐतु प्यों माने, गधे फा हेतु भी पपों प माग दें, क्योंकि गधे में भी धूम न्य "ती है तो उत्तर- १२९-अर्थान्तरं ह्यान्तरस्याऽनपदेशः ॥ ८ ॥ (तरम् ) गन्य गर्ष (पर्यान्तरस्य ) अन्य गर्थ फा (Eि ) भी पानपदेशः ) हेतु नहीं हुवा करता ॥ मपात यह भी नियम नाही कि एक आर्य टूमरे भर्थ का हेतु छो ही हो, होता भी है, नहीं तो होता ॥८॥ १२५-संयोगि समवाश्येकार्थसमवायि विरोधि च ॥६॥ ( मंयोगि ) मंगोग वाला, ( मगधागि ) नित्यमम्दान्य घाला, ( एकार्थ मायायि) एफार्थमगवायी (घ ) फीर ( विरोधि ) विरोध रखने वाला [निन होता] auमागे पदाहरगा मृत्रकार स्वयं देते हैं । एकार्थमभयायी का उदाहरण:- १२६-कार्य कार्यान्तरस्य ॥ १० ॥ (कार्यम्) एक कार्य (पायर्यान्तरक्ष्य) अन्य कार्य का [लिग होता है ] ॥ एक कार्य रूप जो भग्य कायं 'स्पर्श का एकार्थममवायी लिङ्ग है। अमांत जिम गर्थ ( वस्तु ) में 'रूप । गुगा समवायसम्बन्ध से वर्तमान है, हुनरा कार्य वैशेषिकदर्शन-भापानुवाद उसी में 'स्पर्श भी वर्तमान देखा जाता है। सभी प्रकार गुण ' का लिङ्ग 'गन्ध '•सी होता है ॥ १० ॥ विरोधी लिन जैसे:- १२७-विरोध्यानूतं भूतस्य ॥ ११ ॥ (अभूतम् ) अवर्तमान [वर्षा] ( भूतस्य ) वर्षमान वर्षा का (विरोधि) विरोधी [ लिङ्ग है ॥ वर्षा का अभाव, हुई वर्षा का विरोधी लिङ्ग हि ॥ १९ ॥ पनी प्रकार:- १२८-मूलमनस्य ॥ १२ ॥ ( भूतम् ) जो है, वह ( अमृतस्य ) न हुबे का [ विरोधी लिङ्ग है ] 4 वर्तमान वर्षा, न वर्तमान वर्षा का लिहै ॥ ५२ ॥ तपा- १२९-भूतं भूतस्य ॥ १३ ॥ ( भूतम् ) जो है वह ( भूतस्य ) हुवे का [ घिरोधी लिङ्ग वर्तमान मगहलाता हुमा सर्प, वर्तमान कार के नीचे स्थित नकुल का लिङ्ग है। यह भी विरोधी लिङ्ग है ।। शेष संयोगी लिङ्ग का उदाहरण, जै-विलक्षण गति याठे रयों को देखफर तत्संयुक्त चतुर सारथियों का अनुमान फरना । विद्वान विद्याधियों को देखकर अनुसवी अध्यापकों को पहचामगा इत्यादि । सगवापी लिङ्ग, जैम-स्पर्श से वायु झा, रूप से तेज का, गन्ध से पृथिवी फा पहचानना लिज है इत्यादि ॥ १३ ॥ इस प्रकार सब प्रकार के लिहों को जान कर लिसी जीवात्मा का दे. हेन्द्रियसङ्घात से पृषक होना सिद्ध है । यही वात सांस्यदर्शन अध्याय ३ सूत्र २ जोर ३ में भी नीचे लिखे अनुसार वर्णित है। यघा- देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥ वह (मात्मा ) विचित्र होने से, देहादि से पिन्क्ष ( वस्तु ) है ॥ देह, इन्द्रियां, मन इत्यादिसंघात जड़ है, आत्मा इस चे विचित्र घेतन है, इसलिये देहादि का ही नामान्तर आत्मा नहीं है, किन्तु इस से शिका मारमा विचिन है ॥२॥ पष्ठीव्यपदेशादऽपि ॥३॥ षष्ठी (विभक्ति) को व्यपदेश से भी (मात्ना देहादि से भिन्न सिद्ध है) R - - नृतीयाध्याय १ आन्हिक सरकार की पष्ठी विभाक्त का अर्थ "का, के, क्री" होता है। उदाहरण- देवदत्त का भिर, यज्ञदत्त यो हाय, विष्णु मित्र की जडा इत्यादि । इस पाया जाता है कि देवदत्त मीर गिर एक ही होते ती 'देवदत्त का शिर' याद षष्टी ( फा ) प्रयोग में न गाती । भाती है, इम मे पाया जाता है क्ति गिर, हाथ, नहा नादि से देवदत्त याजदत्तादि मंज्ञा वाले आस्मा मिल ६ । मे देवदत्त फा घोहा । कहने से देवदा भीर घोडा एक नहीं हो सकते, इसी प्रकार देवदत्त फा शिर, हाथ, पांव कहने से देवदत्त ही शिर हाप पांच नहीं दो सपासे । प्रम से पाया जाता है कि आत्मा ही देहादि संाक नहीं है। १३०--प्रसिद्धिपूर्वकत्वादपदेशस्य ॥ १४ ॥ (पापदेशस्य) खिङ्ग के ( मसिद्धिपूर्वकत्वात् ) मसिद्धिपूर्वक होने से ॥ गुत्र २ में रूह भाये हैं कि इन्द्रियाओं की प्रगिति, इन्द्रियाओं से भिनाई का हेनु है । क्योंकि प्रिनिद्विपूर्वक हुमा करना है, इस पारगा प्रमिति में शिम यी जिम यो माथ व्याप्ति शात्त हो, उन को उस का लिह मनाहना चाहिये । में अग्नि फी धूम के साथ च्याप्ति है, इस लिये धूम पगि का लिया है॥ ध्याप्ति "पा पदार्थ है, हम के विषय में अगभग एक दृमरे से मिलते दुलते कई प्रकार के गत है । कोई नी कहते हैं गि-किमी वस्तु का स्व भाविक भीर रवभिचारी ( अटल ) सम्बन्ध तो साध्य और साधन में है, यह थ्याप्ति याहाता है । शमी को कोई अधिनागाव नम्वन्ध कहते हैं, इसका भी यही तात्पर्य किएमा का दुमरे के बिना न होगा, अर्थात् व्यभिचारराहित्य ने नित्य मम्यन्ध । कोई भी व्याप्ति फो माहचर्य नियम कहते है। नवीन लोग मी छाप्ति पदार्थ को यो जटिल शब्दों में कहते हैं कि- साध्यवत्प्रतियोगिकदाधिकरणनिरूपितवृत्तित्वाऽभाव ध्यातिी, आपया- हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावा- ऽप्रतियोगिसाध्य रामानाधिकरणता .

वैशेषिकदर्शन-भावानुवाद २ व्यापार व्याप्ति है। उस ध्याप्तिज्ञान को या ती व्यभिचाररहित वहुधा साहचर्य से हा एक वार साहचर्य से, गिस का जिस के साथ ग्रहण हो नुन को उस का अजुनान कराने वाला लिङ्ग समझना चाहिये । जैसा कि रसोई घर आदि बहुत स्थानों में साधन धर्म धूमादि को पाणि णादि से साहचर्य देखते हैं, इन से यह निषित ज्ञान होता है कि जहां २ धुवा है, वहां २ अग्नि का अनुमान करना चाहिये । यह तो निश्चित साध्यवाला सुपक्ष है। और जहां पर्वतादि में साध्य धर्म विषयका यह मंदेह हो कि यहां अग्नि आदि है वा नहीं? यह संदिग्ध साध्यवान् पक्ष है। अनुगान करने के साधन ( करण ) को “ अनमान " माहते हैं। क्रिया करने के असाधारण क्रियायुक्त साधन को " करण "कहते हैं। जो कारण से सत्पन्न होकर किसी कार्य को उत्पन्न करती है, वह " क्रिया : कहाती है, इसी को . "तो कहते हैं । जैसा कि छेदन एक क्रिया वा व्यापार है, इस क्रिया का क्रियायुक्त असाधारण साधन कुठार , यम कुठार को धारण' कहेंगे । और छिन्न होने वाले फाष्ट से छेदन उत्पन्न होकर धेयनामस्तर हुवे वैधीभाव का उत्पादक होने से छेदन ( फाष्ठ पर उठार के माधात ) का नाम साय यह है कि जो छे इन क्रिया में साधन रूप कुठार करण है, बिपाशान, बिना व्याप्ति सान को हो नहीं सकता। व्याप्ति जाम प्रसिद्धि से होता है, प्रसिहि टाछुतायत ने भनुभव द्वारा होती है । जव बहुत वार कुठार हे आघात करके काष्ठ का छेदन अनुभव में जाता है बस तव काष्ठ और कुठार के संयोग से छेदन क्रिया में धनुमान होने लगता है ॥ जैसे अग्नि का धुंधे से अविनासार सम्बन्ध-व्याप्ति है । इसी प्रकार रस से भी अधिनासाव सम्बन्ध है । पृथिवी जल तेज इन तीनों में रुप सदा रहता है, और पृधिवी तया जल में रस सदा रहता है । अर्थात् जहां पृथिवी है बड़ा गन्ध है, जहां तेज है वहां रूप है, जहां जल है वहां रस है, तथा जहां पृथिवी जल तेज हैं वहां रूप है, यह व्याप्ति पाई जाती है। इस प्रकार गन्ध पृथिवीत्व का व्यापक है, पृथिवीत्व गन्ध का भी व्यापक है, तथा पृथिवीय गन्ध का व्याज्य है और गन्ध पृथिवीत्व का भी व्याप्य है, अर्थात् दोनों में परस्पर पाप वारा सम्बन्ध है। इसी को समानव्याप्ति क्रिया हुआ -- तृतीयाध्याय १ आन्हिक ६१ वा मगव्याप्ति कहते हैं। जो वाय मय देशों और मय कानों में पाया जावे, घह 'व्यापपत्ति । फहाता है, तथा गो एक देश घा पन्त काल में पता है उन को 'काव्याप्यति' कहते हैं । मोश निशेष के धारण से हो म को .' देशकृताऽव्याप्यत्ति' और 'गो का विशेप को हारगा मे हो नम को ' फारकताऽव्यापयत्ति ' कहते ६। प्राधिस बात यह है कि अगायति पदार्थ की भी शधिकारमाना व्याप्य. शि होती है, वायवृत्ति नहीं हुआ पारती । जैसे-दगडी पुरुपःगह. घाला पुरुष । इम में यद्यपि पुरुप के एक देश ( हाथ ) में दरष्ट का संयोग है, सपापि मगमा पुरुष को दगड की आधिकरणता ( मात्रय ) कही जाती है, न कि पुमर के पपा देश ( हाय वा अलियों) को । म कारण वेशात व्याप्यतृप्ति हुई ॥ अन्वयपाप्ति भीर पनिरकव्याप्तिम प्रकार की व्याप्ति के दो भेद है। माध्य पाचन पी व्याप्ति अन्वयव्याप्ति पीर साध्याउभाव और साधनामाव की व्याप्ति व्यतिरेकम्पाप्ति कहाती है । जैसे-जहां धुंबां दे यहां अग्नि है। यह सध्यपव्याप्ति हुई, तथा जहां जाग्नि नहीं यहां धुंवां नहीं। यह वपतिरेक व्या मप्ति हुई । गीग ने यायिष्ण गदाधरादि लोग शन्ययव्याप्ति का लक्षण इम प्रकार करते ६ कि. हे तुमगागाधिकरणान्यताउतावाऽप्रतियोगिमाध्यखानानाघि. महारगयं व्याप्तिः। हेतु के मगागाधिरम्य अत्यन्तामाय को 'हेतुसमानाधिकर- मान्यता फाते हैं। जिम का अभाव हो उम को प्रतियोगी गौर गिम का पातायन हो (भाय) उमको प्रतियोगी करते हैं। माध्य के माथ समाग (एक) मधिकरण में रहना=माध्यमामानाधिकरगय फहाता है। अब नयीनों के लक्षणा का नर्थ यह हुवा कि “हेतु यो माय ममानाधिकरणस्य गत्यन्ताऽभाव के अप्रतियोगी गाध्य के माय तु फी समानाधिकरणताअन्वयव्याप्ति " । अपांत् गो माध्य के हेतु के अधिकर गाम्य अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी नहीं, जुम ने माय हेतु मी एकाधिशरणता वा मगानाधिकरणता होना हेतु में माध्य की व्याप्तिअन्वयव्याप्ति काढ़ाती है । जैसे-पर्वताग्नि वाला है, घृम मे, जमा-रसोई घर । एम अनुमाग में पयंत त्रो पक्ष है, अनि वाना सोना माध्य है, 'धूम हेतु है शीर रसोई घर दृष्टान्त है । हेतु के अधि- करम पर्वत या रसोई घर जादि में अग्निमाध्य के वर्तमान होने से अग्नि - - *- commons

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वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
का अत्यन्ताभाव नहीं हो सत्ता, किन्तु घट पटादि का अत्यन्ताऽभाव हो
सक्ता है, और उस धून हेतु के पर्वत अधिकरण में रहने से ( जिस में अग्नि
भी रहना है ) हेतुममानाधिकरण हुवा । उस अमाव के प्रतियोगी घट
पटादि और अप्रतियोगी अग्नि(साध्य के साथ धूम हेतु को नमानाधिकारणता
एक पर्वत अधिकरण में वर्तमान होना ही अग्नि साध्य में, धूम हेतु की व्याप्ति
अन्वपध्याप्ति हुई । इस के विरुद्ध व्याप्ति व्यतिरेकव्याप्ति कहाती है ॥ १४ ॥
१३१-अप्रसिद्धोऽनपदेशः ॥१५॥
( अप्रसिद्धः ) जिस में व्याप्ति न पाई जाधे, वह (जनपदेशः ) अहेतु
घा असद्धेतु वा हेत्वाभास भी कहाता है ॥
तौ या वैशेषिक में एक ही हेत्वाभास है ? नहीं, किन्तु-
१३२-असन् संदिग्धञ्चाउनपदेशः ॥ १६ ॥
( अरुन् ) असिद्ध ( च ) और ( संदिग्धः ) सन्देहयुक्त ( जमपदेशः)
हेत्वाभास होता है ॥
हेत्वाभास इस शाखा में दो प्रकार के हैं। एक-असत् असितु विरुद्ध,
दूसरा-संदिग्ध-सी को अनेकान्ति कहते हैं ॥ १६ ॥ जैसे-
१३३-यस्माद्विषाणी तस्मादश्वः ॥ १७ ॥
( यस्मात् ) एयोंकि (विषाणी ) सींगों वाला है, (तस्मात् ) इस कार
( अतः ) घोड़ा है।
यह असिद्ध हेत्वासास का उदाहरण है । क्योंकि जिस २ के सींग हों
वह २ अश्व ( घोड़ा ) कभी नहीं होता ॥ १७ ॥ और-
१३४-यस्माद्विपाणी तस्माङ्गोरित्यले कान्तिकस्योदाहरणम्॥१८॥
(यस्मात् ) क्योंकि (विषाणी ) सीम वाला है (तस्मात्) इस से ( गौः)
बैल है (पति) यह ( अनैकान्तिकस्य) अमेकान्तिक हेतु का ( उदाहरणम् )
उदाहरण है।
केवल बैल के ही सींग नहीं देखे जाते किन्तु भै से बकरे आदि के भी
देखे जाते हैं, इस लिये सींग वाला होना गौ वैल होने में हेतु तो है परन्तु
असाधारण हेतु नहीं, क्योंकि गौ बैल के अतिरिक्त अन्य बकरी मादि में भी
छातिव्याहि वाला है ॥ १८ ॥

तृतीयाध्याय १ शानिएक ६३ १६५-आत्मेन्द्रियार्थसंनिकांदरन्निप्पलते तदन्चत् ॥ १६ ॥ ( माद्रियानितिफपति ) साला इन्द्रिय और अर्थ-विपयों ने जगीप होने मे ( यत) गो ( निष्पधते ) सिद्ध होता है, (तत्) वह (रयत्) मान्य है। जीनामा निस्य है, नम का गुगा पान भी नित्य है, परन्तु इन्द्रियों और सानों को योग में गोपात उत्पन्न होता है, वह जन्य है, गित्य नहीं, इस शिये प्रारमा के स्थापगत गान मे इन्द्रियद्वाराऽनुभूत जान पृथक है । इन मृर पर यदि गरापायर्यादि ने उपहाम दिया है तो वह नन्हीं के (ोत पय । वेदान्ताद २ । ३ । १८ ) मृमाप्प का उपहानकारक है । जीवात्मा गममा प्रतिस्मृमि और दर्शन शास्त्रों ने चेतन शीर शनेक माने हैं । ग नियमा एमाम विषय में पं० धारेश्वर जी के संग्रह को देखिये जिसे हम यहां उद्धा करके पाठकों का नपकार होना मगमते है । यमा- अणुरेप वै जीयोऽपरिसंख्येयश्च सभेदः । तदेतद गम्यने-" वयं नमो भरन्त एमसि "." वयं स्याम पतयो रयीणाम् ", उद्वयं...अगन्म ज्योतिरुत्तमम् ", " अग्ने नय सुपथा राये अम्मान् ", " घनद्रं तन आसुब ", स न: पितर सूनवे...सुचस्वा नः स्वस्तये ", वयः सुपर्णा उपसेगुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋपयो नाथमानाः । अपध्वान्तमू- हि पूधिं चक्षुर्मुमुग्धि अस्मान् निधयेव बहान् ॥ ", नस्लवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि " " समानी व अनिः....यथा वः सुमहासत्ति ", " असुर्या नाम ते लोका अन्धन समसा वृताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनौजना: " इत्यादिपरःसहस्रबेदमन्त्रगतजीवात्म- परकबहुवचनप्रयोगगतिमत्त्ववचनतः । एतेषु खलु जीवानां , व वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद बहुत्वं गतिमत्त्वं च स्पष्टमुपदिष्टमनीशत्वं च ध्वनितमात्रै वेति । अणुत्वं नाम सोक्षम्यममहत्त्वं परिछिन्नत्वमेकदेश- वृत्तित्वं जीवानां बहुत्वादवगम्यते गतिमत्त्वादपि । ये खलु जीवा बहकोऽपरिसंख्ये या गतिमन्तश्च ते कथं न स्युः परिच्छिकदेशवृत्तयः ? तदिदमणुत्वं बहुत्वं गतिमत्त्वं च जीवग्रामस्य स्मृतमुपनिषत्स्वपि-" एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणेचित्तं सर्व- मोतं प्रजानां यस्मिन् घिशुद्धे विभवत्येप आत्मा ॥", बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पित्तस्य च । भागो जीव: सविज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ", “मित्योनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां योविदधाति कामान् । तमा- त्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेलरेषा- म्", “ योनिमन्ये प्रपदान्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणु- मन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ", सर्वगतं सुसूक्ष्मंसदव्ययं तद भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीरा: ", तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूता: साध्यामनुष्याः पशवो वयांसि ", तच्छु_ज्योतिषां ज्योतिस्तदादात्मविदोविदुः ", "संप्राप्यनमृषयोज्ञानतप्ताः कृतात्मानोवीसरागाः प्रशान्ताः। ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति", ततो तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापि यन्ति ", " आराग्रमाम्रोह्यवरो ऽपि दृष्टः ", " गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता। स विश्वरूपत्रिगुणस्त्रिवा' प्राणाधिपः " नित्यं विभुं यदुसरतरं , तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक सञ्चरति स्व कर्मभिः", "अङ्गुष्ठमानोरवितुल्यरूपः सङ्कल्पा- ऽहकारसमन्वितोयः”, “यो वा एतदक्षरं गार्गि अविदित्वा अस्माल्लोकात्प्रेति स कृपणः,अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अरमाल्लोकात्प्रेमि स ब्राह्मण: ", “ यथापि हिरण्यनिधि निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्यु परि सरन्तो न विन्दे युरेवमेवेमाः सर्वा: प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति अन्न- तेन हि प्रत्यूढाः", "अथ य एप संप्रसादः अस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरूपसंपदा स्वेन रूपेण अभिनिष्पदाते एप आत्मा इति ह उवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म इति", "तद् ये एव एतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येण अनुविन्दन्ति तेषामेव एप ब्रह्मलोक: ते पां सर्वेषु लोकेपु कामचारो भवति", "स यदा अस्मात् शरीरादुन्नामति सह एन एतैः सर्वैरुलकामति", "स य एबंबित् अस्माल्लोकात्मेत्य"कामरूपी अनुसञ्चरन्”, "तरमाल्लोकात्पुनरेति अस्मै लोकाय कर्मणे", "तेन प्रयोतेन एप आत्मा निक्रामति घक्षुपो वा सूनों वा अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः”, “समृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते" सोन्तरिक्षं यजुभिरुन्नीयते स सोमलोकं स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्त्तते "स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीन घनात्परात्परं पुरिशयं पुरुपमीक्षते”। दर्शनेप्वपि पुरुष- बहुत्वं प्रतिपादिनमस्ति, यथा “ पुरुपबहुत्वं व्यवस्थास:", "नाद्वैत श्रुतिविरोधी जातिपरत्वात् " इति सांख्ये; सुख- दुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेपादकात्मयम्”, “व्यवस्थानो नाना" इति वैशंपिके, "कृतार्थ प्रति नष्टमपि अनष्टं तदन्यसाधा- - वैशेषिकदर्शन-भापानुवाद रणत्वात्” इति योगदर्शने; "तदन्तरप्रतिपत्ती रंहलि संपरि- नक्तः”, “ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ", " नाणुरतच्छुतेरित्ति चेतराधिकाशल", "अंशो नानाव्यपदेशात्”, “असंततेश्व अव्यलिकर: " इत्यादिवेदान्तदर्शनसूत्रेषु । प्रशस्तपादभाष्ये ऽपि च "आत्मत्वाभिसंबन्धादात्मा, तस्य सौक्ष्मयादप्रत्यक्षवे सति करणैःशब्दादयुपलब्धयनुमितैःश्रोत्रादिभिः समधिगमः कियते" तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःख्नेच्छा द्वेषप्रयत्नधर्माऽधर्म- संस्कारसंख्यापरिमाणपृथत्वासंयोगविभागाः व्यवस्था- वचनात्संख्याप्पथक्त्वमप्यस एव । पृथिव्युदकज्वलनपत्र- नात्ममनसामनेकत्वाऽपरजातिमत्त्रे, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष प्रयत्नानां द्वयोराममनसोः संयोगादुपलब्धिः" इति । एवं श्रुतिस्मृतिशास्त्रप्रतिपादितमिदमाऽऽत्मबहुलवं लोकव्यवहारे- ऽपि प्रसिद्धम् ॥ है और अनेक तथा असंख्येय है। इस विषय में नमोभरन्त एमसि० " इत्यादि वेदवचन जपर संस्कृत में देखिये, जिन से जीवों क्षा अणुत्व परिच्छिन्नत्व और एकदेशीयपना तथा बहुत होना पाया जाता है । जो वस्तु संख्या में अनेक हों ये सर्वव्यापक नहीं हो सकते और जो जीव गमचशील हों अर्थात् एक देह से दूसरे देह में जावे, वे विसु नहीं हो सकते । यह बात “एषोणुरात्मा०" इत्यादि सैंकड़ों उपनिषद् वचनों में भी वर्णित है, जिन में से कुछ एक जपर संस्कृत में लिखे हैं। अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा का बहुत्व माना गया है जैसा कि सांख्यदर्शन में- पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः" ६ ॥ ४५ । और- नाद्वैनश्रुतिविरोधोजातिपरत्वात् ". १। १५४ इन सूत्रों में जींचों का बहुत्व और अद्वैत कहने वाली श्रुतियों का जातिपरक होना मानकर विरोधपरिहार किया गया है। इभी प्रकार योगदर्शन में भी जीवात्मा का अनेक होना और एकदेशीय होना कहा गया है । यथा-"कृतार्थ प्रति नष्टमध्यनष्टं तदन्यसाधारगास्वात् २। २२ इत्यादि । इसी प्रकार जीवाणु ឱត तृतीयाध्याय १ आन्हिक वेदान्त दर्शन में भी- तदन्तरप्रतिपत्ती रंहति संपरिष्वतः३।१।१ भीर- उहानि गत्यागतीमा २ । ३ । १९ तपा- नाणुरतच्युरिति चेन्नेतराधि- कारात् २२ । ३ । २९ श्रीर भी-" अंशोनामाव्यपदेशात् " २ । ३.१ ४३ तथा 4- समन्ततेचाव्यत्तियार: "२।३।१९ इत्यादि सूत्रों में जीवों या भागना दोहना जाना थाना अणु होगा पीर अणुत्वविरोधाभासप्रतिपादक वाघ्यों. का दायपरिहार गीर नानात्य तथा एफदेशीयस्व भीर अव्यापकत्व स्पष्ट प्रति- पादन किया है। प्रशस्तपाद शाप्य में भी जो ऊपर संस्कृत में उद्धृत है, जीव कार में कया-- छीना, सलग २ होना, संयोग और विन्नाग कारना कहा गया हैं। इसः प्रकार वेद, मपनिषद्, मांख्य योग घेदान्त इत्यादि दर्शन, प्रशस्तपाद भाग्य और जनेपा पनि पद जीवों को. अत्य. नानते हैं। इस पर काई लोग शङ्का हारेंगे फि जाप ने जीवों के याहुत्वप्रतिपादक घचन ती फट्टे कर दिये परन्तु जहां वचन जो येद, उपनिषद् और शास्त्रों में माला के एकत्व. फो. प्रति- पादन करते हैं उन की क्या गति होगी.? यथा -यस्तु सर्वाणि यस्मिन् सर्वाणिa पोमावादित्ये पुनपः० ईशोपनिषद् पौर- यदेवेह तदमुत्र० मनसैवेदप्राप्तव्यम्' फटीयनिपढ़ त्यादि. शनेका उपनिषदों, वेदों और दर्शनसूत्रों में कहे गये हैं.' उत्तर-प्रत्येक वचा के यहां नंग्रह करने और दीपपरिहार करने में तौ ग्रन्थः बात यढ़ जायेगा शिन्तु यदि वाचकवृन्द विचार करेंगे ती सर्वत्र ही नीचे लिले कारणों से संगति मिल जायगी और दीयपरिहार हो जायगा। १-फाहीं अपने नमान मुख दुःस का अनुभव जानकर किसी पर भी. अन्यायः न करने के लिये मामा भामा की एकता कहते हुवे एकत्व का भ्रम होता है। पाही २ जीवात्मा को परमारमा मे अनन्य भक्ति के समय. तन्मयता का वर्णनः करने को बधन, जिनमें जीय व्रत की एकता भ्रान्ति से प्रतीत होती है। कहीं २ परमात्मा का एकस्व. प्रतिपादित है जिमको भ्रमने कोई लोग जीवों का एकत्य मगह देते हैं परन्तु वास्तव में भेदप्रतिपादक या स्पष्ट भोर यथार्थ भीर मगस्त व्यवहार तम्हीं से चलता है, इस के विरुद्ध एकत्वमतिः पादक याक्य लक्षणा मे व्याख्या करने योग्य हैं ॥ १९ ॥ १६६-प्रवृत्तिनिवृत्ती च प्रत्यगात्मनि दृष्टे परत्र लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( प्रवृत्तिनिवृत्ती च ) प्रवृत्ति और निवृत्ति ( प्रत्यगात्मनि ) अपने अपने मात्मा में (दृष्टे ) देखी जाती हैं (प्ररत्र ) पराये में (लिङ्गम्) वही लिङ्ग, वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जिस प्रकार ,रागोत्पन्न प्रयत्न-प्रवृत्ति और द्वेपोत्पन्न प्रयत्न नियत्ति अपने आत्मर में देखी जाती हैं इसी प्रकार हितकारक कामों में प्रवृत्ति और अहित कामों में निवृत्ति देखकर दूसरों के मात्मा का लिङ्ग से अनुमाम करना चाहिये कि मेरे समान इन की भी प्रवृत्ति निवृत्ति गादि घटायें हैं इसलिये अवश्य मेरे समान इन में भी एक पृथक् २ आत्मा है ॥ २० ॥ इस प्रकार मात्मा की सिद्धि के प्रकरण से आत्मा के लिङ्ग और अनात्मा के लिङ्ग तथा अपने आत्मा के समान पराये मात्माओं का होना इस आन्हिक में वर्णन किया गया । इति तृतीयाध्याये प्रथममान्हिकम् -- अण द्वित्तीयमान्हिकम् आत्मा की पहचान पहचान में जिस प्रकार प्रथनाहिक में इन्द्रियार्थसिद्धि को लिङ्ग कहा गया, इसी प्रकार इस द्वितीय आन्हिक में मन की गति को आत्मा का लिङ्ग बतावेंगे, इम लिये प्रथम मन की परीक्षा मारम्भ करते हैं और उद्देश के क्रम को छोड़ कर भी आवश्यकतावश मन की परीक्षा करते हैं: १३७-आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावश्च मनसो लिङ्गम् ॥ १ ॥ (आत्मेन्द्रियार्थसन्निक) जाला, इन्द्रियों और विषयों के सामीप्य में मी ( ज्ञानस्य ) ज्ञान का ( भावः ) होना ( च ) और ( अभावः ) न होना ( मनसः ) मन का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ देखा जाता है कि इन्द्रियों के समीप विषय हों तब भी उन पा ज्ञान नहीं होता और होता भी है अर्थात् हमारी आंख के सामने से हाथी निकल जाता है और हमें ज्ञान नहीं होता। हमारे कानों को सुनाने के लिये कोई पुकार जाता है और हम नहीं सुनते, इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के विषयों को भी हम ग्रहण नहीं करते, जब तक कि इन्द्रियों के अतिरिक्त सन भी उस विषय में न लगे। यों तो एक ही काल में हमारी त्वचा स्पर्श करती रहती है, नासिका के सानने गन्ध उपस्थित रहता है, आंखों के भागे कोई न कोई रूप रहता है परन्तु क्या हम पाल्चों इन्द्रियों से पाञ्चों विषयों का ग्रहण एक - - तृतीयाध्याय २ आन्हिक साथ कर सकते हैं ? कभी नहीं, किन्तु जिम विषय में इन्द्रिय और मग दोनों लगे, उसी विषय का ग्रहण होता है और जिस विषय में इन्द्रिय लगे, परन्तु मन न लगे, उन का ग्रहण नहीं होता । इस लिये मन का होना सिद्ध है जो एक साथ अनेक विषयों का ग्रहण नहीं होने देता । ऐसा ही न्यायदर्शन में लिखा है कि:- युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् १ । १ । १६ ॥ अर्थात् एक माथ अनेक जानों का उत्पन्न न होना मन का लिङ्ग है । इस प्रकार न्याय और वैशेपिका का नत समान है ॥ १ ॥ यदि वाहो कि मन मिद्ध हुवा परन्तु मन का द्रव्य होना भोर.नित्य होना कैसे मिद्ध होंगे? तो उत्तर- १३८-तस्य द्रव्यत्व नित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २॥ (तस्य ) उन गन के (द्रव्यत्वनित्यत्वे ) द्रव्यपमा और नित्यपना (घायुना) वायु मे ( व्याख्याते ) व्य स्थान किये ॥ जिम प्रकार वायु द्रव्य और नित्य है उसी प्रकार मन भी द्रव्य और नित्य है । द्रव्य के लक्षण में कह चुके हैं कि जो क्रियावाला और गुगावाला तया समवायी कारण हो उस को द्श्य कहते हैं, जैसे वायु गति क्रिया वाला है येसे मन भी गति क्रिया वाला है, जैसे वायु स्पर्श गुण वाला है वैसे मन भी योध गुण वाला है भीर जैसे वायु अपने कार्यों का समवायी कारण है धेमे मन भी अपने कार्यों का सनवायी कारण है और जैसे वायु मोक्ष पर्यन्त स्थायी है पैसे मन भी नोक्ष पर्यन्त ठहरने वाला है। इस वायु के द्रध्यत्व पौर नित्यत्य के समान मन का भी द्रव्यत्व और नित्यत्व कहा गया सम- कना चाहिये ॥२॥ क्यों जी ? यह मन प्रत्येक शरीर में अनेक है वा एक ? उत्तर:- १३६-प्रयत्नायौगपद्माज्ज्ञानायोगपसाच्चैकम् ॥ ३ ॥ (प्रयवायोगपद्यात् ) प्रयत्न के एक साथ न होने से (च) और ( जाना- योगपद्यात् ) सान के एक साथ न होने से ( एकम् ) एक है ॥ यदि मन अनेक होते तो एक साथ भनेक प्रयत्न हो सकते क्योंकि एक मन से एक प्रपत्र भौर दूसरे मन से दूसरा प्रयत्न हो सकता । इसी प्रकार एक । इस लिये .

92 . वैशेषिकदर्शन-मापानुवाद मन से एक ज्ञान और दूभरे मन में दूमरा सान हो सकता, क्षार होता है नहीं, शुरू लिये मन एक है ॥ ३ ॥ उद्देश क्रन को छोड़ कर आवश्यकता से नल की परीक्षा काही नई अब फिर उद्देश क्रमानुसार आत्मा की परीक्षा करते हुने अन्न के माधया लिङ्गों का वर्णन करते हैं:- १४०-प्राणापाननिमेषोन्मेष जीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविक्षारा: सुखदुःखेच्छाद्वषप्रयत्नाश्यात्मनो लिङ्गानि ॥ ४ ॥ ( प्राणापा-विकाराः ) प्राण, अपान, निमेप, उन्मेष, जीवन, ननो- गति और इन्द्रियान्तरविकार, तथा ( सुखदुः-प्रयत्नाः ) लुध, दुख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न (मात्मनः ) भात्मा के ( लिङ्गानि ) लिक हैं । मुख और नासिका से बाहर निकलने वाला, ऊपर की घलने वाला, शरीरस्थ वायु प्राण पाहाता है; मूत्र पीर विष्ठा को नीचे निकालने वाला शरीरस्थ वायु अपान कहाला है; आंख की पलकों को मिलाना निमे. फहाता है, और मांख की पलकों को पृथक करना उन्मेप कहता है; गरीर फी वृद्धि और घाव का भर आना भादिक जं वन याहाता; अपने चाहे विषयों से ग्राहक इन्द्रियों से सम्बन्ध जोड़ने को उन २ विषय पर नन का लेजाना मनोगति कहाता है; एफ इन्द्रिय से ग्रहण किये हुवे विषय का दूसरे इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होजाना-जैसे आंख से सटाई यो देखकर जीत में पानी भर आना इन्द्रियान्तरविकार कहाता है; किसी विषय का मनुकूल प्रतीत होना सुख फहाता है; किनी विषय का प्रतिकूल प्रतीन होना दुःख कहाता है; अपने लिये वा पराये लिये मप्राप्त वस्तु की प्रार्थना करना इच्छा कहाता है और जिस से अपने आत्मा में जलन ती प्रतीत हो उम. अप्रियता के ज्ञान से उत्पन्न हुवा गुण द्वेष कहाता है; शीर कुछ करना प्रयत्न कहासा । यह सब मात्मा के होने में लिङ्ग अर्थात् जहां आत्मा होता है वहीं प्राणादि प्रयत्न पर्यन्त लिङ्ग पाये जाते हैं और जब मात्मा देह से निकल पाता है तब यह लिङ्ग नहीं पाये जाते । इस लिये यह आत्मा के लिङ्ग हैं । शरीर में प्राण और अपान दोनों रहते हैं जिन में से एक नीचे और दूसरा जपर जाने वाला है, इन दोनों परस्परविरोधियों को प्रयत्न मे अपने अधिकार में रखना अर्थात् जव चाहे तव अपान को नीचे निकाले और तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ११ जब चाहे तव प्राण को ऊपर फेंके। यह मन चेष्टा विना शरीराधिष्ठाता मात्मा के नहीं हो सकी। इन लिये प्राण और पान मात्मा के गिङ्ग है। इसी प्रकार मान्य मीचना और खोलना एक दूसरे के विरोधी दो कर्म विना किसी स्वतन्त्र प्रयत्न पारने वाले के हो नहीं मक्ते, इत्त लिये निमेप और उन्मेष श्री भारगा के लिक हैं । तपा प्रतिक्षण शरीर का बढ़ना और चोट लगने पर घाव का फिर से भरना भी, जो जीवन है, विना फिसी अधिष्ठाता मारना को को नही मता, न लिये जीवन प्रात्मा का लिङ्ग है। इसी प्रकार भिन्न विषयों की ग्राहम यानने वाली इन्द्रियों को मन की सहायता से किसी एक विषय में लगाना और दूसरे विषय से घटाना भी आत्मा के बिना नहीं हो माता, गलिये ननोगति आत्मा का लिङ्ग है और नारङ्गी को आंख मे देख कर उम को याद को याद करना और फिर दूसरी इद्रिय रसना से विकार अस्पतरना शात्मा के बिना कैसे हो सकता है, इस लिये इन्द्रियान्तर विकार आत्मा का लिङ्ग दें। जो गुण हे वह किसी द्रव्य के भाप रहता है मना किस.प तेज आश्रय रहता है। इमी प्रकार सुख दुःख इच्छा द्वेष और या की गुलजो किमी ट्रम्प के मात्रय रहने चाहिये और वह ट्रव्य मात्मा ही हो नाता है, इस लिये सुख,दुःख, च्छा, द्वेप पीर प्रयत्न भी माता के ४ि॥ त्वों जी ! मागापानादि लिङ्गों से आत्मा ती मिद्ध हुवा, परन्तु भात्मा काव्यत्व और गित्यत्य के में सिद्ध हो ? उत्तर- १४१-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ५ ॥ ( तस्य ) उम मारमा के (द्रध्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व जौर नित्यत्व (वायुना) दा म ( व्याख्याते ) कहे गये । वायु नो द्रव्यत्व बीर गित्यत्व के समान हेतु मे पात्मा का भी द्रव्यत्व पौर नित्यत्व कहा गया मगझना चाहिये शर्यात् डोमे वायु नित्य और द्रव्य है, वेनेही मात्मा भी नित्य और द्रव्य थे। इतगा विशेष समझना चाहिये कि बाप के ममान आरमा व्यावहारिक गित्य नहीं किन्तु वास्तविक नित्य है और वायु व्यावहारिक नित्य है कोंकि की सृष्टि के वायु अवधिवत नित्य है, परन्तु पाात्मा प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, इन लिये यास्तविक नित्य है, यहां उम को वायु के समान गित्य कहना फेवल नित्य शकत की ममानता को लेकर है ॥५॥ भारम्भ प्रलय

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वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
प्रश्न-ज्ञानादि गुणा तौ अदृष्ट हैं ? किमी दृष्ट लिगले मात्मा निह कीजिये?
उत्तर-सुनिये:-
१४२-यज्ञदत्त इति सनिकर्ष प्रत्यक्षामाबाद दृष्टं लिङ्गं
न विझते ॥६॥
( सन्निक ) समीप होने पर भी ( यस दत्तः इति ) यज्ञदत्त है, ऐमा
(प्रत्यक्षाभावात् ) प्रत्यक्ष न होने मे ( दृष्टम् ) दृष्ट (लिङ्गम् ) लिङ्ग ( 7 )
नहीं (विद्यते ) होता है ।
भाव यह है कि संसार में सामने खड़े हुवे देवदत्त यातादि वो देख
कर भी केवल शरीर का प्रत्यक्ष होता है, न कि इस बात का कि यह देवदत्त
है वा यज्ञदत्त है। तब फिर आत्मा के सिद्ध करने में यदि दृष्ट लिङ्ग न हो तो
क्या हानि वा माश्चर्य है ? ॥३॥
तब फिर आस्मा कैसा है ? उस को कैसे जाने ? सुनिये:-
१४३-सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ ७ ॥
( सामान्यतोदृष्टात् ) सामान्यतोदृष्ट से (घ ) गौर [जानादि गुणों से]
(अविशेषः ) विशंप नहीं कह सकते ॥
अर्थात् जो ज्ञानादि गुण चतुर्थ सूत्र में कहे गये हैं उन्हीं से समझलो
कि इन गुणों का मानय कोई द्रव्य है, विशेप कुछ नहीं कह सकते ॥ ७ ॥
तो फिर उस का नाम शात्मा है, यह कैसे जाने ? उत्तरः-
१४४-तस्मादागमिकः ॥८॥
( तस्मात् ) इस फारणा ( सागमिकः ) शास्त्रमिह है ।।
- अर्थात् जब सामान्यतोदृष्ट ज्ञानादि गुणों का आश्रय द्रव्य विशेष कोई
न कोई है और वह क्या है पात् उसका नाम क्या है यह बात शास्त्र में
देखकर इतनी ही निश्चित होती है कि उन का नाम आता है। जैसा कि
"मात्मैवाद्विजामतः यजुः ४०1७1"आत्मानं चेद्विशानीयात्" वृहदारण्यक
४।४ । १२ इत्यादि शास्त्र में सस का नाम आत्मा पाया जाता है ॥८॥
प्रश्न-पृथिव्यादि जाट द्रव्यों में से ही किसी को मात्मा क्यों न मान
लिया जाय ? उत्तर-
१४५-अहमित्ति शब्दस्य व्यतिरेकान्नागमिकम् ॥ ६ ॥

तृतीयाध्याय २ आन्हिक 9३ (मह मिति शब्दस्य ) 'महम्-मैं" इस शब्द के (व्यतिरेकात् ) शित होने से ( आगमिकम् ) शास्त्रानुकूल ( न.) नहीं होगा ।। प्रार्थात् मैं सौर मेरा का व्यवहार पृथिवी आदि जन्य द्रव्यों में नहीं पाया जाता इन कारण पृथिवी शादि अन्य माठ द्रव्यों में से किसी को आत्मा मागना शारखानुकूल नहीं ॥ ६ ॥ प्रन्न-हन ती प्रत्यक्षात्मवादी है, तब- १४६-यदि दृष्टमन्वक्षमऽहं देवदतोऽहं यज्ञदत्त इति ॥ १० ॥ ( यदि ) यदि ( आवद्यान् ) आंखों सामने (दृष्टं) देखे हुवे को ( अहम् देवदाः ) में देवदास हूं (पाम् यज्ञदत्तः ) मैं यादत्त हूं ( इति ) इस प्रकार [ भाला मानले ती पना हानि है? j॥ १० ॥ उत्तरः- १४७-दृष्ट आत्मनि लिङ्गे एकएक दूढत्वात् प्रत्यक्षवत् प्रत्ययः ॥ ११ ॥ ( आत्मगि ) [ पष्ठ्यर्थे सप्तनी ] आत्मा के (लिङ्गे ) लिङ्ग के ( हण्टे) दृष्ट होने पर ती (दृढत्यात् ) दृढ़ होने में (प्रकाः) एक (एव) ही (प्रत्ययः) मनीति होती ( प्रत्यक्षघत ) जैसा कि प्रत्यक्ष में होती है । यदि में देवदत्त हूं, मैं यमदत हूं, ऐमा पाहने वाले देवदत्त वा यज्ञदत्त को ही आत्मा गानले तर तो शरीरममुदाय में ही दृढ़ प्रतीति होजावेगी कि पड़ी शात्मा है तब फिर सानादि गुणों की और उन को लाश्रय द्रव्य भारमा की जिजामा जी व्यर्थ है परन्तु शरीर को देख कर भी शात्मा को प्रत्यक्ष नहीं देखा जाता जैमा फि इमी शास्त्र में आगे अध्याय ८ आन्हिक १ मृत्र २ में कहेंगे कि “ तत्रात्मा नगन्याप्रत्यक्षे शात्मा और मन प्रत्यक्ष नहीं। तब देवदत पीर याजदत्त मंत्रा वाले देशादि संघात को प्रत्यक्ष प्रात्मा कैसे गान लिपा गावे? ॥ ११ ॥ यदि कही कि हम तो घामादि लिङ्गों मे लिङ्गी मात्मा का प्रत्यक्ष नहीं कहते किन्तु टप तो यह कहते हैं कि मैं देवदत्त हूं, मैं यहादत्त हूं, ऐमा जो मन में निशय होता है, हम मानसिक प्रत्ययगोचर होने से आत्मा को. मत्यक्ष कहते हैं ? ती उत्तर- १० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १४८-देवदत्तो गच्छलि यज्ञदत्ती गच्छती- त्यु पचाराच्छरीरे प्रत्ययः ॥ १२ ॥ (देघदत्तो गच्छति) देवदत्त जाता है (यज्ञदत्तो गच्छति) यादत्त जाता है (इति) ऐसी (उपचारात्) बोलचाल होने से (शरीरे) देह में (मत्ययः) निश्चय होता है। देवदत्त और यज्ञदत्त को जाता हुवा देख कर जप कहते हैं कि देवदत्त वा यज्ञदत्तं जाता है, तब तो शरीर में हो गसि क्रिया देखकर यही निश्चय होगा कि जाने वाला शरीर ही देवदत्त वा यज्ञदत्त है, न कि ज्ञानादि गुणों वाला कोई पदार्थ आला है । परन्तु विना ज्ञानादि गुणों के भित्ति के समान देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को कोई आत्मा नहीं मान सहा ॥ १२ ॥ शङ्का- १४६-संदिग्धस्तूपचारः ॥ १३ ॥ ( उपचारः ) बोलचाल (तु) ती ( संदिग्धः ) संदेहयुक्त है । अर्थात् देवदत्त जाता है, पञ्चदत्त जाता है, इस उपचारबोलचाल से यह पूरा निश्चय नहीं होता फि बोलने वाला देवदत्त वा यज्ञदत्त के शरीर को जाता समझता है अथवा ज्ञानादि गुणों वाले भारत को जाता समझता है ॥१३॥ तथा च-यदि हमारा कहा उपचार संदिग्ध है तब मैं देवदत्त हूं, मैं यहा- दत्त हूं, इत्यादि प्रत्यक्ष प्रतीति शरीर में नहीं तो किस में है ? उत्तर- १५०-अहमिलि प्रत्यगात्मनि भावात्परत्रा- ऽभानादर्थान्तरप्रत्यक्षः ॥ १४ ॥ (अहम् इति ) मैं हूं, ऐमा व्यवहार (प्रत्यगात्मनि) छिपे हुवे आमा में (भावात्) होने से और (परत्र ) शरीर में (अन्नावात्) न होने से ( अर्था- न्तरप्रत्यक्षः) अन्य अर्थ का प्रत्यक्ष है। अर्थात् जब 'मैं हूं' इत्यादि प्रत्यक्ष अदृष्ट जात्मा में होता है और शरीर में नहीं होता तब मैं देवदत्त हूं, मैं यदत्त हूं, ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है उस को अन्तर ( आस्मा) को ही प्रत्यक्ष कह सकते हैं ॥ १४ ॥ आगे पूर्वपक्षी अपने पक्ष का समाधान करता है कि:- वतीयाध्याय २.आन्हिक 99 १५१-देवदत्तो गच्छतीत्युपचारादभिमा- नात्तावच्छरीरप्रत्यक्षोऽहकारः ॥१५॥ ( देवदत्तः) देवदत ( गच्छति ) जाता है (इति ) ऐमी ( उपचारात्) पोलचाल ने ( सिमानात ) और अभिमान वे ( तावत् ) प्रथम तौं (आह. सारः )" ऐसा कपन ( शरीरप्रत्यक्षः ) शरीरविषयक प्रत्यक्ष है। नर्यात देवदास जाता है, यजादत्त भाता है, विष्णु मित्र चलता है, चैत्र पढ़ता दि, मैन पढ़ाता है, इत्यादिक बोलचाल से, सौर में गोरा हूं, तू झाला है, बाद मोटा है, मैं पतला हूं, इत्यादि शमिमान से अहङ्कार का प्रत्यक्ष शारीरविषयक ही शान पड़ता है, इस लिये हमारे पक्ष में संदिग्ध नहीं किन्तु गरीरविषयक उपचार निश्चित है ॥१५॥ फिर शझा पारते हैं कि- १५२-संदिग्धस्तूपाचारः ॥ १६ ॥ (उपचारः ) बोलचाल या लक्षणा या उपचार (तु) ती (संदिग्धः) सन्देश युम ही रहा ॥ अवांत देवदत्त जाता है, यादस भासाह, इत्यादि प्रत्यक्ष में यह मन्देह ती ज्यों का त्यों ही रहा कि यका को शरीर या जाना माना विवक्षित है. या मात्मा का वा दोगों का ? ॥ १६ ॥ मागे उक्त महा का परिहार करते हैं कि- १५३-न तु, शरीरविशेषाद् यज्ञदत्तविष्णुमित्रयोनि विपयः ॥ १७ ॥ (शरीर विशेषाद) शरीर के विशेष से ( यत्तदत्तविष्णु मित्रयोः) यादत और विष्णु मित्र या पृयफ २ (मानम् ) जान ( विषयः) वक्ता का विषय है (ग) सन मन्देश नहीं रहता। गय यादत्त यो जाता जीर विष्णु मित्र को जाता देखते हैं, तब यपदक में विष्णुगिन का पृषक जो जान होता है वह ती शरीरविशेष से ही होता ६, शारमा ती दोनों पा एक माहोगा, शरबी सिमा २ प्रकार के देखफार एक फा दृमरे में विशेष शान होता है तन्त्र मा जाता है या आता है, यह ती सन्देह नहीं हो माता किन्तु शरीरविषयक ही शहकार का निश्चय होजाता है, फिर उपचार ( चोलघाल ) सन्देहयुक्त लहां रहा । ॥ १७ ॥ ? -- ७६ वैशेषिकदर्शन-मापानुवाद जब कि शरीर का ही प्रत्यक्ष अभिमान और पहङ्कार है, आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं, तब सामान्यतोदष्ट से विशेष सिद्ध न होने पर आमा केवल शास्वसिद्ध है, और उस के अनुमान से सिद्ध करने का परिश्रम वृथा है ? तो १५४-अहमिति मुख्ययोग्याभ्यां शब्दबद्ध व्यतिरेकाऽव्यभि- चाराद्विशेषसिद्धे गमिः ॥ १८॥ ( आइमिति ) 'मैं ऐसे ( मुख्ययोग्याम्याम् ) उपचाररहित और योग्य प्रत्ययों से ( शब्दवत् ) शब्द हे समान ( व्यतिरेकाऽव्यभिचारात ) पृथता को मध्यभिचार से ( विशेवसिद्धेः ) विशेष सिद्ध होने से ( भागनिकः ) दोवल मात्रसिद्ध ( न ) नहीं है ।। अर्थात् जामा कोवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं है किन्तु अनुमानमिद्ध भी है पयोंकि मैं हूं' ऐसी प्रतीति न तो औपचारिक है किन्तु उपचाररहित है और योग्य भी है क्योंकि केवल शरीर को कोई 'मैं नहीं फहता, प्रत्युत 'मेरा शरीर कहता है, तब आत्मा शरीर से नित्य मिन हुदा अर्थात् शरीर कक्षी की आत्मा नहीं हुवा, तब जैसे शब्द गुण, पृथिवी आदि पाठ द्रव्यों में से किसी द्रव्य का गुण न होने से किन्तु आठों से व्यतिरिक्त प्राकाश का गुण होने से भिन्न है । ऐने ही गात्मा भी पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से व्यतिरिक्त विशेष सिद्ध होने से केवल शास्त्र सिद्ध ही नहीं, किन्तु अनुमान- सिद्ध भी है। इस प्रकार आत्मा-शास्त्र और अनुमान दानों से सिद्ध है ॥१८॥ आत्मा की परीक्षा हो चुकी । अब आत्मा के नाना अर्थात् अनेक होने की परीक्षा करेंगे, इस लिये पहले पूर्व पक्ष करते हैं:- १५५-सुखदुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेपादकात्म्यम् ॥ १६ ॥ ( सुखदुःख-विशेषात् ) सुख दुःख भोर ज्ञान की सिद्धि में विशेष न होने से ( एकात्म्यम् ) आत्मा एक ही जान पहता है ।। जैसा सुख दुःख और ज्ञान एक शरीर में है, वैसा ही मव शरीरों में है, कुछ विशेष नहीं। इस कारण देवदत्त, यजदत्त, विष्णुमित्र, चैत्र, क्षेत्र सत्यादि के अनेक शरीरों में एक ही आत्मा प्रतीत होता है क्योंकि जैसे शब्द लिहसी विशेषता न होने से आकाश एक है और जैसे शीघ्र विलम्ब एकसाथ इत्यादि सामान्य से काउ एक है और जैसे पूर्व, पश्चिम आदि प्रत्यपलिङ्ग के अविशेष 99 पर भी एक काल में तृतीयाध्याय २ आन्हिक से दिशा एक है, ऐसे हो सुख, दुःख, जानादि लिङ्गों के विशेष (सामान्य) से माला भी अनेक शरीरों में एक ही है ॥ १९ ॥ भागे मिटान्त मूत्र में उत्तर देते हैं:- १५६-व्यवस्थातोनाना ॥ २० ॥ ( व्यवस्थातः ) व्यवस्था के पद से ( नाना ) आत्मा अनेक हैं। भार्यात सुख दुःख सानादि लिङ्ग यद्यपि मर शरीरों में पाये जाते हैं तथापि एका काल में एक ही प्रकार का सुख वा दुःग्य वा जान सब के शरीरों में नहीं पाया जाता । जिम समय में देवदत्त सुख का अनुभव करता है उसी ममय में याजदत्त दुःस फा जानुभव करना है, और विष्णुगिन दोनों के सुख और दुःग्नु को जानता है, इस लिये सुख दुःख और ज्ञान मघ । समान होने एक को मुख होने मे मन को सुख नहीं होता और एक को दुःप होने में नव की दुःरय भी नहीं होता तथा एक को ज्ञान होने से मन यो जान भी नहीं होता, यदि होता ती एक पाठशाला के अनेक विद्यार्थियों में मे एक पढ़कर ज्ञानी होने से सब विद्यार्थी ज्ञानी होजाते, परन्तु पेमा नहीं होता । इम लिये सुख दुःख और जान की व्यवस्था होने से मय शरीरों में एक मात्मा नहीं है किन्तु अनेक हैं ॥ २० ॥ अब दूमरा हेतु देते हैं-यदि कोई कहे कि फेवला युक्ति से आत्मा का नेफ होगा सिद्ध यिया, शास्त्र से नहीं, तो नत्तरः- १५७-शास्त्रसामर्थ्याच्च ॥ २१ ॥ ( शास्त्रमामात ) शास्त्र के सामर्थ्य से (च भी॥ शास्त्र के मामय से पी शात्मा अनेक सिद्ध होते हैं । जैसा कि यजुर्वेद अध्याय १८ मन्त्र ४६ में " जीवा जीवेषु मामकाः " और कठोपनिषद् वली ५ फगिष्ठका १३ में “ नित्योगित्यानाम् , चेतनश्चेतनानाम्, ऐको बहूनाम् इत्यादि चंद और उपनिषदादि शास्त्रों के सहस्रों प्रमाणों से जीवात्मा का अनेक छोना पाया जाता है । येदादि शास्त्रों के बहुत से प्रमाण इसी वैशेषिकदर्शन मापान वाद अध्याय ३ 'आन्हिक १ सूत्र १९ के पाप्य में पृष्ठ ६३ मे ६६ तक जीवों के अनेकल्य, अणुत्व और भिन्न भिन्नत्व में हम लिख आये १, वहां देख लीजिये ।। २ ।।.

१८
वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
वृतीयाध्याय के इस हितीय शान्हिक में मन की परीक्षा करके लेक
मात्मपरीक्षा भी पूर्ण रीति से की गई ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामि कृते
वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे
तृतीयाध्यायस्य
द्वितीयमान्हिकम् ॥ २॥
-
इति तृतीयोध्यायः ॥३॥

ओम् अथ चतुर्थोध्यायः प्रघममान्हिकम् पथिवी आदि द्रव्यों की चतुर्थ सूत्रोक्त उद्देशनमानुसार उद्देश लक्षण पौर परीक्षायें गत तीन अध्यायों में कार चुके । रब जीवात्मा और परमात्मा मात्मा द्रव्य को छोड़कर शेष पृथिवी आदि आठ द्रव्यों के मूल कारण प्रकृति की परीक्षा करना चाहते हुवे भाचार्य कणाद मुनि चतुर्थाध्याय का मारा फरते हुवे मूल कारण प्रकृति का स्वरूप वर्णन करते हैं:- १५:-सदऽकारणवन्नित्यम् ॥ १ ॥ ( नत् ) जो हो (अकारणवत्) जिस का अन्य कारण न हो (नित्यम्) यह नित्य है। जो पदार्थ मल्वरूप है, जिस का अन्य कोई कारण भी नहीं, वह नित्य पदार्थ पक्ष मूल प्रकृति है ॥ १॥ और- १५६-तस्य कार्य लिङ्गम् ॥२॥ ( तस्य ) उम का (लिङ्गम् ) लिङ्ग ( कार्यम् ) कार्य है ।। अर्थात् नन प्रपन सूत्रोक्त कारणरहित मत्वरूप प्रकृति का लिज उस के अनेक कार्य है जो पृथिवी प्रादि कार्यस्वरूप से प्रत्यक्ष हैं ॥ २ ॥ पनों जी ! कार्य को धारण का लिङ्ग क्यों माना जावे ? उत्तरः- १६०-कारणभावात् कार्यभावः ॥३॥ ( कारणभावात् ) कारण के भाव से ( कार्यभावः ) कार्य का भी भाव होगा है॥ यास् कारण हो तब उस से कोई कार्य उत्पन्न होता है, न हो तो महीं। सम लिये पार्य को देखकर अनुमान से कारण की सिद्धि होती है तब कार्य को कारण का लिङ्ग ( अनुमापक ) क्यों न माना जावे ॥ यह निश्चित नियम है कि जिस के होने में जो हो और न होने से न हो, वह उस का लिङ्ग ( अनुमान कराने वाला ) होता है । अर्थात् कार्य -

वैशेषिकदर्शन-भापानुबाद
-
.
का भाव विना कारणभाव को नहीं होगा, यह अटूट नियम है । संसार में
हम स्थूल पदार्थों को देखते हैं और फिर उन स्थूलों की बनावट में मृहन
अवयवों के जोड़ देखते हैं और फिर उन सूक्ष्मों में भी नूक्ष्मतर अवयवों के
जोड़ देते हैं तथा फिर सूक्ष्मतर पदाथों में भी अन्य सूक्ष्मतम अवयवों का
जोड़ देखते हैं, इस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म, जिन मे परे अन्य सूदन न हो उम
पदार्थ का नाम परमाणु है और ये परमाणु ऐसे अनन्त है कि मनुष्य नन
शो किसी प्रकार गिन नहीं सकता इस लिये वे किसी प्रकार संख्या में नहीं
आसकते । यद्यपि वे परमाणु अनन्त हैं तथापि उन को माल्य योग और
वेदान्त में सत्व रजस् तनम् भेद से तीन प्रकार का गुण बताया गया है जीर
न्याय, वैशेषिक और मीनांसा में परमाणु नाम से पुकारा गया है, इन्हीं
परमाणुओं को श्वेताश्वतर शाखा वाले श्वेत, रक्त और कृष्ण नाम से पुका.
रते हैं, इन्हीं को कहीं प्रकाश,
किया और शावरण शक्ति बताया गया है।
इन्हीं परमाणुओं की कोई दिव्य शक्ति है जिन को प्रनाराकुशल लोग भी
पहुंध नहीं सकते, जिस का योगी भी लक्षण नहीं कर सकते भीर मुमुक्षु
भी जिस का उल्लन नहीं कर सकते, वैमानिक जिम का लक्षणा नहीं कर
सकते यह अप्रज्ञात, लक्षण, अतयं, अविज्ञेय, अव्यक्त कोई पदार्थ है जो
इन सत्त्वादि गुणों की वा परमाणुओं की साम्पाचया है, उसी का नाम प्रकृति
है। अनेक ग्रन्थों में देवी, शक्ति, पराशक्ति, गाया, महामाया, प्रकृति,
अव्यक्त, मव्याकत, प्रधान इत्यादि इसी के अनेक नाम हैं। इसी मूल प्रकृति
में बाल मान से सौ वर्ष के अन्त में प्रलय अवस्था
में सम्पूर्ण जगत्
तोगा
हुवा सा अन्धकार से छिपा हुवा ना लोन हुवा रहता है, उसं ममय में इस
प्रकृति का नाम 'स्वधा' होता है। जैसा कि वेद में लिखा है:-
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न राव्या अह आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किचनास॥
ऋ० १० । १२६ । २
अर्थात् (प्रलय काल में) न मृत्यु था, न जीवन था, न रात्रि गौर दिन
का चिहू था ( किन्तु ) स्वधा-प्रकृति के सहित वह एक (ब्रल) चेतन था
जो निष्कम्प था और उस से परे कुछ न था ॥२॥

चतुर्षाध्याय १ माहिक ६१ इस में स्वधा का अर्थ यह है कि अपने धारण किये हुवे जीवग्रामसहित । तथा इस से अगले मन्त्र ये है कि:- तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् । तुचयेनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाऽजायतकम् ॥३॥ कामरतदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीच्या कवयो मनीपा ॥४॥ अर्थ-(भग्रे तमः मासीत् ) प्रलयकाल में मन्धियारा रहता है और ( इंद सर्वमप्रकेतं सलिलन् मा तमत्तां गूहम् ) यह संय चिहूरहित अदृश्य जल सा अन्धियारे से भाच्छादित रहता है। जैसे जल वापरूप होकर फिर आकाश में अदृश्य समयोत हो जाता है, वैसे जगत् भी सव्यक्तभाव में होता है। ( यत् भासू तुष्य न अपिहितमासीत्). जो जगत् तुच्छ अर्थात सूक्ष्म अव्यक्तसावा पान कम से भाच्छादित होता है (तस् एकं समसः महिना. मगायत ) वह एक अन्यकाराकृत अवस्था के पश्चात् महत्तस्वरूप से उत्पन्न होता है अर्थात् प्रकृति से महत्तत्व की उत्पत्ति सब से प्रथम हुवा करती है । इस मन्त्र में यह कहा है कि प्रथम प्रकृति रहती है, उममे महत्तस्व उत्पन्न होता है। अब इस से भगले मन्त्र में यह कहा जाता है कि महतश्व से काम अर्थात् महार की उत्पत्ति होती है ॥३॥ इम से पूर्वमन्त्र ३ . ( महिनाजायतकम् ) में महत्तरव की उत्पत्ति कह चुके हैं । ( तदने कामः समधिवत ) उस महत्तस्य के पश्चात् काम महार उत्पन्न होता है, उसी को मन कहते हैं ( मनसः रेतः प्रथमं यत् आसीत् ) उस मन का वीज जो पूर्व था ( कवयः मनीषा हवि प्रतीप्य ) विद्वान् लोग युद्धि से इदय में विधार फरके ( जसति सतो बन्धुं निरविन्द ) असत-अप्रतीयमान अवस्था में सत्-प्रतीयमान जगत् के वन्धुबान्ध ने वाले फर्म को जानते हैं अर्थात् प्राति से जगदुत्पत्ति में पूर्वकल्पकृत कार्य हेतु होते हैं । निष्प्रयोजन गद्रचना नहीं होती। इस सब से जीव ब्रह्म प्रकृति और जीवों ने कर्म प्रवाह से गादि सिद्ध होते हैं ॥४॥ इस प्रकार महत्तत्त्व और महङ्कार इन दोनों को सांख्य और योगशास्त्र में प्रकृति के परिणाम माना गया है तथा न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और ११ वैशेषिकदर्शन-मापानुवाद वेदान्त में क्षुब्ध प्रकृति के माग विशेष मागा गया है । इस प्रकार शाओं में कोई विरोध नहीं किन्तु संज्ञाझेद और प्रक्रियाभेद मान है । महङ्कार के सरयगुणमधाम भाग विशेष से ईश्वराजानुकूल प्रत्येक जीव को एक मा- भ्यन्तर इन्द्रिय मम दिया गया है। अहङ्कार के तमोगुणप्रपाम माग विशेष से व्यापक विशा और काल, व्यापक शब्द तन्मान, अणुरूपर्श तामात्र, रूप, तन्मान, रसतम्मान और गन्यतन्मात्र, यह चारों भी उत्पन्न होते हैं। इन चारों को न्याय, वैशेषिक शोर मीमांसा में घणुक कहते हैं । तिम्मान से जाफाश, स्यशंतन्मान से घायु, रूपतन्मात्र से तेज, रसतम्मान से जल. भोर गन्वतन्मात्र से पृथिवी; यह पांच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥५॥ शङ्का-कार्यलिङ्ग से फिसी कारण की सिद्धि ती गवश्य होती है पर पर कारण के नित्य होने में क्या लिङ्ग है ? समाधान- १६१-अनित्य इति विशेषत: प्रतिषेधभावः ॥४॥ ( अनित्यः इति ) नित्य इस शब्द में (विशेषतः ) विशेष का (प्रतिषेधावः ) निषेध होना पाया जाता है। यदि लित्य कोई पदार्थ नहीं होता ती "पित्य शद में ना कर भकार किम का मिषेध करता १ बस अनित्य कहना पी किमी के नित्य होने का लिा है ॥ ४॥ यदि कहो कि हम ती गित्य की अपेक्षा से नित्य नहीं कहते, तो उत्तर- १६२-अविद्या ॥५॥ (अविद्या) ती माप की प्राप्ति है। अर्थात् नित्य की भपेक्षा के धिना अनित्य मानना अविद्या वा भ्रान्ति है क्योंकि मनित्य शब्द में जो निषेधार्थक अफार है वह नित्य का ही ती निषेध कर सकता है ॥५॥ क्यों जी ! यदि पृथिवी भादि तत्वों का मूल कारण प्रकृति है, तो फिर वह मांख से क्यों नहीं दीखती? उत्तर- १६३-महत्यनेकद्रव्यवत्त्वादरूपाच्चोपलब्धिः ॥ ६ ॥ ( महति ) स्थूल दस्तु में गथवा महत्तत्त्व में ( अनेकद्रव्यवत्वात् ) भनेक द्रव्यशाला होने से ( ) मीर ( रूपात) रूप से ( उपलब्धिः) सपलब्धि होती है। A अतुयाय १माहिक को पनार्थ महान होते हैं वा स्थूल होते हैं, ये भनेक द्रव्यों के संयोग से बने होते और छप चाले होतेस लिये हा की गांख से उपलधि होती है, परन्तु प्ररुति ऐसी नहीं । अर्थात् प्रकृति में म ती अनेक द्रव्यों का संयोग है और न रूप है, इमलिये पम की उपलठिध मांस से नहीं होती॥६॥ मा-माहा तो प्रकृति की उपलब्धि ती मांए से इस लिये नहीं होती. कि यह मगेक द्रव्य वाली नहीं, परन्तु वायु ती भनेक द्रव्यों वाला है, फिर वह मास में पों नहीं दीखता, यह तो महान् है ! उत्तर- १६४-सत्यपि द्रव्यत्वे महत्त्वे रूपसंस्काराभावाद यायोरनुपलविधः ॥ ७ ॥ ( बायोः ) वाय फी ( अनुपलब्धिः ) उपलब्धि न होगा (द्रव्यत्वे ) खाने ( महो) हान होने (मति) पर ( अपि) भी (रूपसंस्कारा: यात् ) रुपमम्बन्ध के न होने मे है ॥ पद्यपि वायु दृष्य हे मोर महान है परन्तु उस में मप का सम्बन्ध नहीं म कारण उसकी उपाधि प्रांस से नही होशी ॥ ७ ॥ मन्न-जिम म.प मम्मन्य से प्रत्येक द्रष्य मांख में उपलब्ध होने लगता है, मपंचम रुप की उपाठठिय किम में होती है? उत्तर- १६५-अनेकद्रष्यसमवायाद रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ॥८॥ (गनेन्द्रध्यममयायात् ) अनेक द्रव्यों के साथ सम्बन्ध होने मे (घ ) भीर ( रुपयोपात ) रुप के विशेष से { रुपोपलब्धिः ) सप की उपलब्धि ती॥ जो पदार्थ भने स दृश्यों के प्रयोग से बनता है गीरी थ्यों के साथ अभधाय सम्बन्ध रग्यता है तगा गम्प रम गन्ध मादि में विशेष ( भिता) रममा यही गपशांन ने उपम्प होता है इसी प्रकार- १६६-तेन रसुगन्धस्पर्शपु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ ६ ॥ (ग) मी प्रकार मे ( रमगन्धस्पर्शपु ) रम, गन्ध भीर स्पर्श; एन सी सी (साग) IT को (व्याख्यातम्) कहा गया समझना चाहिये। जिम प्रकार अनेक द्रव्यों के संयोग से भीर रुप विशेष से रूप उपलब्ध जोसमी प्रकार मगझमा आहिये कि भनेक द्रव्यों के संयोग और रस वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद विशेष से रस उपलब्ध होता है, अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से नान्ध उपलब्ध होता है और नेश घ्यों के संयोग और गन्ध विशेष से बन्ध उपलब्ध होता है । शा-पाषाणादि में जो गन्ध है वह तो नासिका से उपलब्ध नहीं होता, तवं नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर- १६७-तस्याऽभावादऽव्यभिचारः ॥ १० ॥ ( तस्य ) उत गन्य विशेष के ( अभावात् ) उद्भूत न होने से ( अठय- भिचारः ) नियम का भ नहीं होता ॥ पापाणादि में गन्ध है तो सही परन्तु छिपा हुवा है इस लिये उपलब्ध नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान शङ्का के योग्य नहीं रहता । यदि चापाण में सर्वथा गन्ध न होता ती पाषाण के भस्म में गन्ध क्षों उपलङम होता । भेद केवल इतना है कि वही गन्ध जो पाषाणा में छिपा हुका है, पाषाण के भस्म में प्रकट वा उद्भूत होने में उपलब्ध होने लगता है ॥ १० ॥ क्यों जी ! जैसे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श इन मय गुणों की उपलठिध में एक एक. इन्द्रिय से. उपलब्ध होना कारण बताया गया, या इसी प्रकार संख्या परिमाण शादि गुणों की उपलब्धि में भी कोई कारण कहा जा सक्ता है ? उत्तर, हां- १६८-संख्या: परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागी परतवापरले कर्म च रूपिद्व्य समवायाचाक्षु- पाणि ॥ ११ ॥ ( संख्पाः ) संख्यायें, ( परिमायानि ) परिमाण, ( पृथक्त्वं ) पृथक होना, ( संयोगविभागो) संयोग और विभाग, (परवापरत्वे) परला होना और वरला होना, ( कर्म ) कर्म, ( 4 ) और स्नेह, गवता और वेग, ये तब भी (रूपिद्व्यसमवायास्) रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सन्यन्ध होने से ( चाक्षुषाणि ) अांख से उपलब्ध होने वाले हैं । जिस प्रकार रूप गुंण शांख से उपलब्ध होता है इसी प्रकार संख्यायें श्री भांख से उपलब्ध होती हैं घोंकि संख्यायें भी रूपवाले द्रव्यों के साथ 'समवाय सम्बन्ध रखती हैं, तथा जैसे रूप का मांख से ग्रह होता है चतुर्याध्याय १ भान्हिक ८५ थमे ही परिगाणों ( लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, नीचाई, गोटाई ) का भी पांच में ग्रहा होता है पोंकि लम्बाई चौडाई आदि परिमाण भी सपनाले द्रव्यों के माथ मगवाय सम्बन्ध रखते हैं। तपा पथदा होना गुण भी पांच से ग्राहगा किया जाता है और मयोग और विभाग भी आंख में ग्राम होते हैं क्योंकि एपकता, संयोग पीर विभाग पी रूपयाले दृश्यों के माप नगवाय मम्यन्ध रखते हैं। ऐसे ही परे होना वा वरे होना भी रूप वाले द्रव्यों में माथ समवाय सम्बन्ध रखने से चक्षु द्वारा ही उप- निश्ध होता है। ऐसे ही फर्म जी चक्षु द्वारा उपलब्ध होता है क्योंकि फर्म मी झपमा ठप के माप नभवाय सम्बन्ध रखता है। इस सूत्र में चफार से (स्नेह ) चिकनार (द्रवत्व ) गीलापन, गौर (वेग ) धक्का; इग का ब्रहण है पोंकि निकनार, तरी भीर धक्का; ये मय पी रूपवाले द्रयों के साथ मुमयाय मम्मन्ध रगते हैं ॥ ११ ॥ १६६-अरूपिप्वचाक्षुषाणि ॥ १२ ॥ ( महाविघु ) उपरहित ट्रयों में ( अचानुपाणि) [ संस्था मादि गुण ] मांग में ग्रहण नहीं किये जाते ॥ जो पदार्थ रुपरहित २ सांस् चक्षु का विषय नहीं है उन में संख्या, परिमाण, पयफत्व, मंयोग, यिपोग, परत्य, मपरत्व, फर्म, स्नेह, द्रवस्य और बैग; ये मय गुण चक्षु का विषय नहीं होते ॥ १२ ॥ १७-एतेन गुणत्वे भावे च सर्वेन्द्रिय ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १३ ॥ ( पतंग ) रमी से ( गुरात्वे ) गुणत्व जाति में (घ ) गीर ( भावे ) मा ( मस्ट्रिपम्) मम सन्द्रियों में होने वाला (जानम्) जाग (ध्याख्या- तम) कहा गया ममझना चाहिये ।। जिम प्रकार चाहा द्रष्यों में मरूपा आदि गुण गांख का विषय होते हैं तया सुपरष्ठित दृश्यों में मांग का विषय नहीं होते, इमी प्रकार गुणस्य जानि और माता में भी मन्द्रिय जाग की व्याख्या होगई ममानी चाहिये। २॥२३॥ इम माक में प्रषियी मादि मय भायों का मूल कारण तथा उन की परोक्षता और पपरोसता काममाधानपूर्वक परीक्षित की गई ॥ इति चतुर्थाध्याये प्रथममान्हिकम् पी M वैशेषिकदर्शग:-सपनुवद अथ द्वितीयमान्हिकम् प्रश्न-प्रकृति के होने में जो पुषियी मादि कार्य द्रव्यों को लिङ्ग बताया गया यह, के प्रकार का होता है ? सत्तर- १७१-तत्पुनः पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं त्रिविधं. शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ॥ १ ॥ (तस् ) वह ( पृषिव्यादि कार्यद्रव्यं ) पृथिवी शादि कार्यद्रव्य (पुनः) फिर (शरीरन्द्रियविषयसंतकम् ) गरीर, इन्द्रिप भीर विषय नाम वाला (त्रिविधम् ) तीन प्रकार का है। पृथिवी आदि कार्य पदार्थ, जो प्रकृति के होने में लिग १, तीन प्रकार के होते हैं:-१-शरीररूप २-इन्द्रियरूप३-विषयसप। इस दर्शन में जो पुषिवी गादि कार्य द्रष्य कहे गये हैं वे शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से तीम २ प्रकार के होते हैं, उन में में शरीर-भोक्ता भोग का स्थान कहाता है, इन्द्रिय-शरीर के माश्रय से रहता दुवा अपने से छूने वाले विषय में प्रत्यक्ष प्रतीति का साधन कहाता है गौर विषय- इन्द्रियों से भिन्न, आत्मा के उपभोग का साधन द्रव्य विषय कहाता है। इस मकार पृथिवी तीन प्रकार की है, जल तीन प्रकार का, तेज तीन प्रकार का, वायु तीन प्रकार का जोर आकाश दो प्रकार का होता है (क्योंकि भाकाश शरीर रूप नहीं होता ) । काल एक प्रकार का होता है (योंकि कालन शरीर रूप होता, न इन्द्रिय रूप होता, केवल विषय रूप होता)। दिशा भी एक प्रकार की होती है ॥ हम लोगों के शरीर-देह, नाक पन्द्रिय, मिट्टी पत्थर प्रादि विषय; यह 'तीन प्रकार की पृषिधी है। जालस्थ प्राणियों के शरीर, रसगा पन्द्रिय, नदी समुद्र हिमालय इत्यादि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का जल तेजोमण्डल में रहने वाले प्राणियों का शरीर, माख इन्द्रिय, पृथिवी भाकाश सदर गीर खानि में उत्पन्न अग्नि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का जमिन है। वायुमण्डलस्प प्राणियों का शरीर, सय शरीर में रहने वाली स्वचा इन्द्रिय, वृक्षादि को हिलाने वाला तथा शरीर के भीतर घूमने वाला बाई --

८७
सोक
भपाग, नाति में
चतुर्याध्याय २ आन्हिक
माख विषय, म रीति से तीग प्रकार फा घायु है । यद्यपि प्राण एक है
तथापि हृदय मादि भिन्न २ स्थानों में रहने से और नुख तपा नासिका
मादि द्वारों में होकर निकलने से प्राण दश प्रकार का फहाता है-
१-प्राण, २-अपाम ३-समाग ४-उदान ५-ध्यान-नाग-फूर्म ८-सकल
-देववत भीर १०-धनालय, ये सब १० माण के भेद हैं जैसा कि एक
में कहा गया है-
हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिसंस्थितः ।
उंदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥ १ ॥
समय
में
माण, गुदा
में नाभि में समान, फगठ में उदान भीर
मगस्त गरीर में ध्याग गाग से प्राण रहता है तथा उगलने का काम करने
वाडा घायु नाग कहासा है, पाफ मारने का फूर्म, भूख लगाने का सकल,
नम्मा लेने का देवदत्त गौर पुष्टि करने घाला प्राण वायु धनलप कहाता है ।
भाफाश के दो भेद ये है-कर्णपुट में रहनेवाला आकाश झोत्रान्द्रिय
१, तपा२-बाहर का समस्त भायाश विषय है। काल एक प्रकार का है
परन्तु म के भेद पण, गिमेष, काटा, कला, मुहूर्त, दिन, रात्रि, सप्ताह,
पत, गाम, घर्ष, युग भीर कल्पमेद से अनेक प्रकार के हैं, सो सब विषयसप
बम लिये काल एक प्रकार का है ।।
रिगामी पूर्व, भाग्नेप, दक्षिण, नात्य, पश्चिम, घायव्य, उत्तर और
गम भेद से यद्यपि भाट प्रकार फी ४ भौर किन्दी के मत में अपर पीर
नीचे की दो मिलाकर १० प्रकार की हैं परन्तु ये सब केवल एक विषय आप
परीररुप या इन्द्रियरुप महीं होती।
मन यल एक प्रकार का इन्द्रियरूप है,शरीररूप जोर विषयरूप नहीं ॥१॥
मन-पूर्व पूत्र में जो पृषिवी आदि कार्य द्रव्यों को शरीर इन्द्रिय विषय
भेद से तीन प्रकार का कहा गया है, वह वह पृषिधी आदि कार्य द्रष्य पाञ्च
नहाभूतों से एक एक बमतारे पयवा केवल एकला एकला ही है ? उत्तर-
१०२-प्रत्यक्षाऽप्रत्यक्षाणां संयोगस्याऽप्रत्य-
क्षत्वात् पञ्चात्मकं न विदाते ॥ २ ॥

. . वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ( प्रत्यक्षाउप्रत्यक्षाणाम् ) प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष द्रव्यों का ( संयोगस्प ) संयोग ( अप्रत्यक्षत्वात् ) प्रत्यक्ष न होने से ( पञ्चात्मकम् ) एक एक में पाच पाच का संयोग ( न ) नहीं ( विद्यते ) है ।। पृथिवी आदि एक एक कार्य द्रष्य में प्रत्यक्ष जीर, पाप्रत्यक्ष शन्य चार द्रव्यों का संयोग होता तो पृथिवी प्रत्यक्ष न होती, प्रत्यक्ष होती है इम लिये पृथिवी को पञ्चभूतात्मक नहीं कह सकते । इसी प्रकार जल और तेज को समझो । वायु और आपाश, ये दोनों अप्रत्यक्ष हें तय इन फा संयोग प्रत्यक्ष के मे हो सकता है और जब संयोग प्रत्यन नहीं सब किसी कार्य द्रष्य को पञ्चभूतात्मक का कहना नहीं बनता ॥२॥ पोंगी ! पृथिवी मादि फार्य द्रव्यों को संयोगस्वरूप न मागकर संयोग से बना हुवा मागले तष तो उन को एक २ में पाच पाच के संयोग याला माम सकते हैं, इस में क्या दोष है। सप्तर- १७३-गुणान्तराऽभावाच ॥३॥ ( गुणान्तराभावात् ) अन्य गुणों के भाव मे ( च ) भी पृथिवी आदि कार्य द्रव्य को पश्चात्मक नहीं मान सकते ॥ यदि पृथिवी आदि कार्य द्रध्य संयोग से बने होते तो अवश्य उन में अन्य नये गुण पाये जाते जैसा कि हलदी और चूमे के मिलाने से हलदी में रक्तवर्ण पाया जाता है, परन्तु हम नहीं देखते कि पथिधी आदि कार्य द्रव्यों में कोई नया गुण पाया जाता हो, इस लिये पृथिवी गादि कार्य द्रव्यों को पश्चात्मक नहीं मान सकते ॥ ३ ॥ मध्छा पञ्चास्मक ने सही, पास्म का तो मान सकते हो ? उत्तर नही, १७४-न च्यात्मकम् ॥ ४ ॥ (यात्मकम् ) तीन तीन के संयोग से बनावा गी (न) नहीं मान सक्ते, क्योंकि अन्य गुणों को नहीं पाते ॥ जैसे पृथिवी मादि कार्य द्रव्य को अन्य नये गुणों के न पाये जाने एक एक में पाञ्च पाञ्च का संयोग नहीं मानागासकता ऐसे ही अन्य गुणों में न पायेगाने से एक एक को तीन तीन के संयोग वाला भी नहीं मान सक्ते क्योंकि १-पृथिवी २-जल और ३-अग्नि, इन तीनों के गुण भी पृथिवी भादि किसी एक द्रव्य में नहीं पाये जाते, इस लिये ग्यात्मक मानना भी ठीक नहीं ॥४॥ ।

चतुपाध्याय २ जान्छिक दल यदि पृथिवी में गन्ध गुण के समान मन्य द्रव्यों के गुण रस और प्रकाश गादि नहीं होते भी पृषियी में गीलापन 'गल का, पफना अग्नि का, उड़ना वायु का भीर अवकाश माका फा गुणा बों देखा जाता है ? उत्तर- १७५-अणुसंयोगस्त्वप्रसिपिटुः ॥ ५ ॥ (अणुनं योगः ) गायों का मंयोग ( तु ) ती ( अप्रतिषिद्धः ) निषिद्ध नहीं किया गया । हमने पाले दोनों मृत्रों में जो एफ २ के पश्चात्मक होने का निषेध किया है उप में हमारा तात्पर्य अगुगम योग के निषेध का नहीं है अर्थात् पृथिवी आदि एक पक दय्य ने यने हुए पाघिन शरीरादि एक एक कार्य में अन्य द्रव्यों फो नग मायाँ हा वगाने वाला न मानने से यह तात्पर्य है कि 'मस- मयायी कारमा गप मंयोग हम नाहीं मानते, इतने में यह नहीं समझाना चाहिये किम निमित्त कारण म.प संयोग गोपी न मानते हों। इसलिये पाधि गरीर आदि कार्य दृश्यों में यदि जन का गीलापन, आणि फी गर्मी, वायु की क्रियाशीर शायण का अघकाश पाया भी जाता है तो भी हमारे मन में कोई दोष नाहीं पयोंशि हम अणुवों के मंपोग का निषेध नहीं करते ॥ ५ ॥ भागधारीरों का विजाग करते हैं कि शरीर के प्रकार के होते हैं- १५६-तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमऽयोनिजं च ॥ ६ । (त) उन में शरीरं ) शरीर : योनि) योनि में उत्पन्न होने घाला (न) और ( अयोनि ) बिना योनि को उत्पन्न होने वाला (विविध) दो प्रकार का है॥ पिछले पाच मृत्रों में जो एथिवी आदि द्रव्यों को १-शरीर २-इन्द्रिय गोर ३-विषय नाप मे तीग प्रकार का बताया गया है, उन सीनों में से १. शरीर दो प्रकार का होता है-१-योनिज, २-योनिया ॥ मरगति पर में मत्पन्न शरीर अयोनिन होते हैं तथा पृथिवी से उत्पान गरीर योनि तथा योनिज भी होते हैं, यह प्रशस्तपादाचार्य का गत है। फिर योगिता की दो प्रकार के होते हैं-१-जरायुज गीर २-हाराज । गर्न के लपेटने यानी मिली जरायु फाहाती है, उम से जन्म लेने वाले मनुष्य पशु भीर मृगों का शरीर जरायत पहाता है । एक प्रकार के गोले । १२

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वैशेषिकदर्शन-पाषानुवाद
को अगष्ठा कहते हैं जो भीतर से पीला होता है और नमी के भीतर गरीर
बनता है, उत्त के टूटने में जिन के शरीरों का जन्म होता है, उम पनियों
और सांपों का शरीर ,सरहज कहाता है । फिर अयोनिज गरीर भी धार
मकार के होते हैं-१-साहल्पिक, २-मांमिद्विक, ३-स्खे दान और अद्भिग्न ।
९-परमात्मा के सङ्कल्प से प्रत्येक सृष्टि के बारम्भ में मत्पन्न होने वाले अपि
मुनि महर्षि और साधारण मनुष्यों के और पशु आदि के शरीर साङ्कलिपक कहाते
है। २-योगियों को जो योग द्वारा मिद्धियें प्राप्त होती हैं, उन मिद्वियों के बाल
से योगी लोग जिस चाहे उस शरीर को धारण करते हैं, वे उनके शरीर
सांसिद्विक कहाते है । ३-डांस, मच्छर, ईत भार अनेक प्रकार के
नम्त
जो
सील Dempness से उत्पन्न होते हैं, उनके शरीर स्वदल कहाते हैं। ४-वत,
वनस्पति, गुल्म, वीरुध, लता, घास, फूम मादि जो पृथियो फो फोड़कर
उपनते हैं, उन के शरीर उद्भिज्न कहाते हैं ॥ ६ ॥
शङ्का-सष्टि के मादि में उत्पन्न होने वाले जीवों के शरीर परमात्मा
के सङ्कल्प मात्र से अयोनिज उत्पन्न हो जाते हैं, यह बात समझ में नहीं
आई, क्योंकि उस का कारण नहीं बताया गया ? भय समाधाम मुमझिये-
१७७-अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात् ॥ ७ ॥
[सर्गारम्भ के शरीर जिस कारण से उत्पन्न होवें, उस कारण की ]
(अनियतदिग्देशपूर्वकत्वात् ) दिशा और देश पूर्व नियत न होने से [उन को
अयोनिज ही माग सकते हैं ] ॥
सृष्टि के बारम्भ में किसी दिशा वा देश में किमीजीय की कोई योनि
शेष नहीं थी और प्रकृति जष्ट होने से इस धमत्कारचातुरीयुक्त सृष्टि को
उत्पन्न करले, यह सम्भव नहीं, इम लिये चेतन परमात्मा के मङ्कल्प से उपादान
कारण प्रकृति में से इस पाश्चर्यरूप जगत् का उत्पन्न होना माना जा मकता
है, इस लिये सर्गारमा में उत्पक्ष होने वाले मनुष्य पशु पक्षी कीट पतङ्ग मावि
सब प्राणियों के देहों को परमात्मा के सङ्कल्प से उत्पन्न होने से साङ्कल्पिक
कहा गया ॥७॥
प्रश्न-यदि ऐसा है ती समान कारण से उत्पन्न दुवे समस्त शरीर एक से
होते लिन २ गौर विलक्षण सृष्टि की उत्पत्ति का क्या कारण है ? उत्तर-
१७८-धर्मविशेषाच्च ॥ ८॥

चतुर्याध्याय २ आन्हिा
( धर्मविशेष:स् ) विशेष धर्म से (घ ) और विशेष अधर्म में ।
सुष्टि के शारमा में जो जीय पिपन्न २ देहों को धारण करते हैं, उन्होंने
पूर्व कप में भिन्न २ प्रकार के धर्म विशेष मीर धर्म विशेष किये थे, यस
उन्हीं धोऽयमों के विशेष ( पिन २ ) होने से गनुष्य पशु पक्षी भादि एक
दूमरे से विलक्षण गरीर उत्पन्न हुये ।।
परयात् माग मूत्र में कहा हुया ही एग हेतु नहीं है; जिम में दिशा
गौर देश का पूर्व फारण में भेद ग होने में सब के एकमे देह उत्पन्न होने
की शङ्का मन मयनी, किन्तु दूसरा हेतु भी जो इस माठा मृत्र में कहा गया
है, यह धर्म और धर्म विशेष है, कायि सब जीवों से धर्म धर्म मापन
में ममाग नहीं होते, म लिये धाऽधर्म के फल भोगने के लिये जो देह
उग को दिये जाते हैं, हे मप भी एफमे नहीं होते किन्तु अपने २ किये
धर्मविशेष गीर मधर्मविशेष मे सय को भिन्न २ प्रकार के देह मिलते हैं ॥ ८ ॥
मगारम्भ के शरीरों के भयोनिज होने में अन्य भी हेतु । यपा-
.
१७६-समाख्याभावाच ॥ ६ ॥
(समाम्पासायास् ) प्रमिद नाम पाये जाने से (घ ) पी ।।
मग्नि, वायु, रवि, मग, यशिष्ठ, गोराग, परद्वाज, अङ्गिरा, जमदग्नि
मादि कितने ही ऋषियों के भाग मदा में प्रमिद्ध फि जिग का कोई पिसर
या गाता परमात्मा के अतिरिक्त नहीं पा, हम ऐतिहामि प्रमाण से भी
मास्पिक पोगिन गरीर मिद्ध होते ६ ॥ ॥ क्यों फि-.
१८०-संज्ञाया आदित्वात् ॥ १० ॥
( मंशायाः ) मंसा के ( सादिस्यात् ) मग मे प्रपा होने में ।
भलि, याय, रवि जादि की संज्ञा (माम ) सय मे प्रथा पाये जाते है,
जग में पूर्व कप के पिता मादि का नाम नहीं पाया जाता, इस से आग को
भयोगिल मामला बनता है ॥ १० ॥
१८१-सन्त्यज्योनिजाः ॥ १९ ॥
(भयो निजाः ) विमा योगि में उत्पन्न हुवे ( मन्ति ) मिद्ध है ।
पटे मृत भे दर्षे पर्यन्त मुत्रों में वर्णित मीर प्रमाणित भपोमिज शरीर
नवाय होते हैं, यह सिद्ध हुना ॥ ११ ॥

१ सजावयः १२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद इसी पर्थ की पुष्टि में अनुमान प्रमाण और ऐतिहासिक प्रमागा तो कहे भये, जगले खून में वेद की साक्षी भी देते हैं- १८२-वेदलिङ्गाच ॥ १२ ॥ ( वेदलिजात् ) वेदों में चिन्ह पाये जाने से ( च ) शी ॥ मरवेद अरशद अध्याय ७ वर्ग १८ ऋचा ५“विश्वान् देघान् जगत्या विवेश । तेन चाक्लपे ऋषयो मनुष्याः " तथा ऋघेद अष्टक ८ अध्याय ४ वर्ग १८ ऋधा १० "तस्मादश्वाअजायन्त ये से चोसयादतः । गावो छ जतिरे तस्मात्तस्माज्जाता तथा यजुर्वेद अध्याय ३१ मन्त्र ८ मी अक्षरशः इमी ऋचा के समान है तथा अथर्व फाण्ड १० अनुवाफ ४ मन्त्र " प्रजापतिः मसजे विश्वरूपन् । इत्यादि अनेक वेदमन्त्रों में पाया जाता है कि परमात्मा ने उपादान कारण से विना योनिविशेष के अनेक ऋषि मुनि भादि मनुष्यों, पशुओं जोर पक्षी मादि की दृष्टि को अयोनिज उत्पन्न किया। जैमा कि सूत्र संख्या १६० में भी कुछ विस्तार से निरूपण किया गया है। वे वेदमन्त्र श्री अयोनिज सृष्टि में प्रमाण हैं ।। १२ ।। इस चतुर्थाध्याय के द्वितीय शान्हिक में पृथिवी आदि का शरीर इन्द्रिप विषयभेद चे विविध होगा तथा फिर योनिज योनिश भेद से शरीर कार द्विविध होना कहा गया । इति चतुर्थाध्याये द्वितीयमान्टिकम् । इति नी तुलसीराम स्वामि कृते वैशेषिक दर्शन भापानुवादे चतुर्योध्यायः ओ३म् अथ पञ्चमोध्यायः प्रथममान्हिकम् द्रव्यों की परीक्षा हो चुकी, आगे गुगों की परीक्षा करनी है, उस में गुगों की परीक्षा में पहले कर्मों की परीक्षा करना चाहते हुए पञ्चपाध्याय का प्रारम्भ करते हुये वैशेषिकाचायं मुनिवर कणाद ग्रन्थ पढ़ने वालों के उपकारार्थ प्रथम उरक्षेपण नाम फर्म के विषय में कहते है कि- १८३-आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म ॥ १ ॥ ( भाममयोगप्रयताभ्याम् ) मन सहित भास्मा के संयोग और प्रयन से (हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठाने या मछलने की क्रिया होती है । अब फि कोई पुरुष पात या घेदपाट मादि कर्मों में हाथ नठाना चाहता की त उभ के आत्मा में एक प्रकार का प्रयत्न उत्पन्न होता है, उस प्रयत्न से मग पीर शात्मा हाध में संयोग करते हैं और तव हाथ में उठाने या उछनने का फर्म प्रकट होता है। शाशय यह है कि यद्यपि प्रात्मा अणु भीर सूक्ष्म है तथा हृदय में रहना ई एम छिये आत्मा का मंयोग हाथ के माप साक्षात् नहीं हो सकता तपाधि मग जो कि भारमा मीर हाथ के बीच में है, वह एक मोर से आत्मा के प्रयत्न को ग्रहण करठेता है भीर दुमरी गोर हाथ छूकर लिये हुए मयन्त्र को पाप मे लगा देता है तब उन प्रयत से प्रेरा हुवा हाथ मुटने वा मछलने का काम धारने लगता है ॥ १ बाप का उठना कहकर गागे मूमल का उठना कहते है- १८४-तथा हस्तसंयोगाच्च मुशले कर्म ॥२॥ ( तथा ) मी प्रकार ( हस्तसंयोगात् । हाप के संयोग से (घ ) और भारी होने मे ( मुगाले) मूमल में ( फर्म ) क्रिया होती है । जिम प्रकार मात्मा की प्रेरणा मे गत में प्रपत होता है और मन के संयोग मे हाथ में, घमी प्रकार मुमठ के बोझ से मूमल में उत्क्षेपणकर्म होता है ॥२॥ माहमा J + १४ वैशेषिकदर्शन--भाषानुवाद क्यों जी ! जब ममा भोगुली में चोट खाकर फिर ऊपर को उछलता है, तब उसके ऊपर उठने में कारण क्या है? क्या हाय का संयोग ही नम का कारण है ? उत्तर, नहीं- १८५-अभिघातजे मुशलादो कर्मणि व्यतिरेका- दऽकारणं हस्तसंयोगः ॥ ३ ॥ ( अभिघात ) 'घोट देने में उत्पन्न हुए { मुशलादी ) ममल मादि में ( कर्मणि ) यो फ्रिया उत्पन्न होती है नस में (हस्त संयोगः ) हाथ का संयोग (मकारणम् ) कारण नहीं है ( व्यतिरेकात ) तदिन्न होने से ।। हाथ में पकड़ कर जब सूमल को शोखली में मारते हैं तब मूमल फिर अपर को उठता है उस के उठने में शेवल हाप का संपोग कारण नहीं है क्यों कि घोट खाया हुवा मूसल मादि विना हाथ लगाये अपने सापनी ऊपर को उछलता है इस लिये छाप का संयोग मूमल के उठने में कारण नहीं है किन्तु वेग कारण है ॥ ३ ॥ और भी- १८६-तथात्मसंयोगो हस्तकर्मणि ॥ ४ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार (मात्मसंयोगः ) आत्मा का संयोग (हस्तकर्मणि) हाथ के उठगे रुप फर्म में [ कारण नहीं है ]v४ ॥ प्रहम-ती फिर हाथ के उठने में कारण क्या है ? उत्तर- १८७-अभिघातान्मुशलसंयोगाद्धस्ते कर्म ॥ ५ ॥ (अभिघातात ) चोट मारने से (मुशलसंयोगात्) भूसल को पकड़े रहने से.(हस्ते ) हाथ में ( कर्म ) उठने की क्रिया होती है। मूसल को मोखली में मारने से मूमल में वेग उत्पन्न होता है मीर धेग- धान् मूसल के संयोग से हाथ में ऊपर को उठना रूप कर्म होता है, उस कर्म में मामा का संयोग वा मन का संयोग कारण नहीं, किन्तु मुसल में उत्पा हुवा बेग ही हाथ लगने से हाथ के उठने में कारण है ॥ ५ ॥ क्यों जी ! हाथ के उठने में सी मूसल का वेग कारण है परन्तु हाथ में साथ ३ मन्य शरीर के उHार में क्या कारण है ? उत्तर- १८८-आत्मकर्म हस्तसंयोगाच्च ॥६॥ ( हस्तसंयोगात् ) हाथ के संयोग से (घ) भौर वेग से (भास्मकर्म ) मापे[देह ] में कर्म होता है । १ पचमाध्याय १ शामिहक ५ भात नखारते हुए भूमान के माथ संयुक्त हुवा हाप जपर को उठता है और उठते हुए हाथ के माघ संयुक्त होगे से शरीर भी ऊपर को उठता है, सम शरीर के ऊपर उठने में भी आत्मा का यस कारण नहीं, फिन्तु हाप का संयोग भीर वेगही कारण है ॥ ६ ॥ प्रश्न-मच्छा. हाघ भौर ममल के नटने में तो वेग कारण हुवा परन्तु समान के फिर मीचे गिरने में पा फारश हे पोंकि हाप अलग करलेने पर भी मूमल नीचे गिरा करना है ? मत्तर- १८६-संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ७ ॥ ( संयोगासा) हाय का संयोग न रहने पर ( गुरुत्वात् ) भारी होने ( पतनम् ) गिरगा होता ॥ ७ ॥ कयों जी ! भारी होने में केवल नीचे ही को गिरना क्यों होता है नम फिटे हुए अमल के चारों भोर एकमा भाफाश है तब मूसल केवल नीचे ही को यों गिरता है ? पूर्व, पथिम, दक्षिण, उत्तर वा ऊपर को पों न गिरने लगे ? उत्तर- १९०-नोदनविशेषाऽभावान्नोज़ न तिर्यग् गमनम् ॥ ८ ॥ (नोदयिशेपायात) मेरणा विशेष के ग होने से (अर्ध्वम् ) ऊपर को (म) नहीं और ( सिर्यम् ) पूर्व पशिम दक्षिण उत्तर को तिरछा (गम. गम् ) गमन भी (ग) नहीं होता। अपर को सदा दुधा भूमा और भी ऊपर फो उठता अपवा पूर्व पश्चि. भाषि विभागों को निरखा जाता, यदि मात्मा में प्रेरणा विशेष होती, पर प्रेरणा यिशेष न होने से मुमन किमी मन्य दिशा को नहीं चलता किन्तु भूत्र में को गुमन्य कारण ये जिम में पृषियी और मूमल फा गुमत्वधर्म भाक है, केयाय गीचे को गिरता है। मन-प्रेरमा विशेष यों नहीं होती और क्यों होती है? उत्तर- १९१-प्रयत्नविशेषानोदनविशेपः ॥ ६ ॥ ( प्रयाविशेषात् ) विशेष प्रपत्र से ( मोदनविशेषः ) विशेष प्रेरणा होती है।

धैशेषिकदर्शन-मापानुवाद जब भात्मा में कोई विशेष प्रयत्न होता है तब उन प्रयत्न से मन में, गन मे हाथ में, और हाथ से मूसल में प्रेरणा उत्पन्न होती है तब मूपता तिरछा. वा ऊपर को चलता है और प्रेरणा नहीं होती तब नहीं चलता ९॥ प्रश्न-अच्छा, विशेष प्रयत्न से विशेष प्रेरणा होती है सही परन्तु भारी द्रव्य को ऊपर को वा तिरछा चलने में पया कहा गया? उत्तर-यह कहा गया है कि- १९२-नोदनविशेषादुदसनविशेषः ॥ १० ॥ ( नोदनविशेषात् ) विशेष प्रेरणा से ( उदमनविशेषः ) विशेष उछाल होता है । अर्थात् जैसी प्रेरणा होती है वैसा उछाल होता है । दूर फेंकने की प्रेरणा हो तो दूर तक उछाल होता है और अति दूर फेंफने की प्रेरणा हो तौ अति दूर तक उछाल होता है । उछाल में ही तिरला फेंकना भी अन्तर्गत समझना चाहिये ॥ १० ॥ प्रश्न-यदि. प्रेरणा विशेष से विशेष उछलना होता है तो फिर खेलते हुए बालक के हाथ पांव चलना न होना चाहिये क्योंकि बालक में कोई प्रेरणा विशेष नहीं होती तो भी इधर उधर हाथ पांव चलते हिलते देखे जाते हैं? उत्तर- १९३-हसतकर्मणा दारककर्म व्याख्यातम् ॥ ११ ॥ ( हस्तकर्मणा ) हाथ की क्रिया से ( दारककर्म ) बालकों की क्रिया ( ध्याख्यातम् ) व्याख्या की गयी । कन्दुक आदि फेंकने के समय आत्मा का संयोग शौर प्रयत्न मन की सहायना से हाथ में पहुंचता है, उस से हाथ चलता है, उस के साथ अन्य मङ्गों में भी क्रिया उत्पन्न हो जाती है ॥ ११ ॥ प्रश्न-क्या कोई और भी ऐसा कर्म है जो विशेष प्रेरणा के विना ही प्रेरणा मात्र से उत्पन्न हो जाता हो ? उत्तर, हां- १९४-तथा दग्धस्य विष्फोटने ॥ १२ ॥ (तथा ) इसी प्रकार (दग्धस्य ) फुकी हुई वस्तु के (विफोटने ) फोड़ने में। कन्दुक, आदि फेंकने में बालकों के हाथ आत्मा और मन के प्रयत्न से चलते हैं और उत्त से अन्य मङ्गों में क्रिया उत्पन्न हो जाती है। इसी *- जैसे 9 - पञ्चमाध्याय १मान्हिक प्रकार पग्नि के संयोग से थोड़े फुके हुए पत्थर या फल मादि से फोड़ने या फाइने में उम पत्थर या फल आदि के अवयवों का दायें बायें या अपर पो फटकर जाना इत्यादि क्रिया भी विशेष प्रेरणा के विना केवल साधारण प्रेरणा से होजाती है ॥ १२ ॥ प्रश्न गम कि मनुष्य मो जाता है या मर जाता है वा अन्य कारण से मचे होजाता है, तब भी कमी २ नम के हाथ पांव हिल जाते हैं, तब प्रयता के बिना भी हाथ पांव के हिनने में क्या कारण होता है ? उत्तर- १९५-यत्नाभावे प्रसुप्तस्य चलनम् ॥ १३ ॥ १९६-तृणे कर्म वायुसंयोगात् ॥ १४ ॥ (प्रसुप्तस्य ) गोये हुए या अचेत हुए के ( यन्नाभावे ) प्रयन न होने पर (घलगम् ) हाथ पांव का हिलना ( तृणे) तिनके में (कर्म) हिलने की क्रिया ( वायुमंयोगास् ) वायु के संयोग में होती है । प्रचेत अवस्था में पड़े हुए मनुष्य के छाप पांय हिलने में साथवा वृणा आदि को हिलने में जी क्रिया होती है, उसका कारण वायु का संयोग है ॥ १३-१४ ॥ मन-चुम्बक पत्पर मादि के साथ लोहे की सुई गादि के चलने में क्या कारण 2? नत्तर- १९७-मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणम् ॥ १५ ॥ ( गणिगमनम् ) कोई २ तृण विशेष जो लशकान्त मणि की जोर चलता है गीर (मूकंपनिमपंगाम् ) चुम्थकमणि की ओर मुई घणती है सो ( अदृष्ट कार गाय ) अदृष्ट कारण वाली है ।। इसी मूग के माध्य में शङ्कर मिश्रादिकों ने कैसी मोटी भूल की है कि जो अदृष्ट शब्द का अर्ध पाप पुगय कर दिया है। भला चुम्बक पत्थर के अभिमुख लोछ गावा वा सुई के चलने में सुई ने क्या पाप वा पुण्य किया है ? वास्तव में यहां अदृष्ट शब्द का अर्थ प्रारब्ध पाप पुण्य कर्म नहीं किन्तु वणकान्तमणि पीर धुम्भक मणि में स्थित अदृष्ट (विना देखी) आकर्षणशक्ति कारण है ॥१५॥ तया- १९८-इपाययुगपत् संयोगविशेपाः कर्मान्यत्वे हेतुः ॥ १६ ॥ (पी) धनुप को रोदे से भिन्न हुए वाण में ( युगपत् ) जनेश समयों में ( मंयोगविशेषाः) भिन्न २ संयोग ( कर्मान्यत्वे ) कर्म यो अन्य होने में (हेतुः) कारण यग जाते हैं । २३

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२४
बैशेषिकदर्शन
शंग-भावानुवाद
धनुष के रोदे से छूटे हुए वाण से उन बाण के गिरने सबा बीच में अनेक
कर्म होते हैं, उन का हेतु क्या है ? उत्तर-अनेक सनयों में होने वाले अनेक संयोग
उन जन्य अनेक कमरे का कारण होते हैं। पाल्पना फरो फिकिनी धनुर्धारी ने
धनुष में बाण लगाक्षर और बलपूर्वक भाकान्त खींच कर गश बागु चलाया
और वह वाण रोदे से छूटकर इतने जल से आगे बढ़ा कि राधे झोय पर भूमि
पर गिरेगा । बीच में कहीं वृक्षों की पत्तियों में को और वाही लघुकरय पक्षियों
में को होकर वाण निला चलागया तो वाणा के छोड़ने में प्रथम कारण धनुर्धारी
मात्मा, मन, छाध और धनुप की
प्रत्यञ्चा
ये चार कारण हैं, परन्तु बीच में
माने वाले वृक्षों की पत्तियों में छिद्र होगा और पक्षियों के देहां का विस्यना
इत्यादि अनेक कर्मों का कारण बीच में होने वाले भनेक संयोग है ॥ १६ ॥
प्रश्न-किस २ कारण से बाण के गिरने तक बाग में अनेक कर्म उत्पन्न
होते , ? उत्तर-
१९६-नोदनादादामिपोः कर्म, तत्कर्सकारिताच
संस्कारादुत्तरं तथोत्तरमुत्तरं च ॥ १७ ॥
(नौदनात् ) प्रेरणा से ( स्पोः ) वाण का ( आद्यम् ) पहला ( दार्म )
झान आरम्भ होता है (च) और ( तत्कर्म सारितात् ) नन कर्म के सा
पने से ( संस्कारात् ) संस्कार वश ( उत्तरम् ) अगला ( तथा ) इसी प्रकार
( उत्तरम् ) अगला ( च ) और ( उत्तरम् ) अगला [कर्म उत्पन्न होता है ] ॥
जब वाण को प्रेरणा से छोएते हैं तव वाण के चलने में प्रेरणा शार
होती है, फिर बाण का चलना जोर वृतादि की पत्तियों का संयोग उन के
विन्धने का कारण होता है, इसी प्रकार मागे २ होने वाले कर्मा का कारण
चन के पिछले २ कर्स होते हैं ॥ १७ ॥ परन्तु-
२००-संस्काराभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ १८ ॥
( संस्कारानावे ) संस्कार के न रहने पर ( गुरुत्वात् ) मारी होने ने
( पतनम् ) पतन हो जाना है ॥
लाव वास में धनुर्धारी की प्रेरणा का बलसंस्कार समाप्त हो जाता है
तब वाण अपने बोझ से आप गिर पड़ता है अर्थात् पृथिवी फी नाकर्षण
शक्ति से पृथिवी की ओर खिंच जाता है ॥ १८ ॥
जिस प्रकार लोक में हरएक कर्म फिसी प्रयत्न का परिणाम होता है वही
बात प्रसङ्गवश इस मान्हिक में अच्छे प्रकार से वर्णित की गई है।
इति पञ्चमाध्याये प्रथममान्हिकम् ॥ १॥

पचमाध्याय २ आन्हिक ओ३म् अथ द्वितीयमान्हिकम् । माला के अधिष्ठातृत्व में शरीर से अवयवों और उम से सम्बन्ध पायें हुए मूमल शादि माधन विशेषों में प्रयत्नादि कारण से उत्क्षेपण आदि कमों का लक्षमा और परीक्षा समाप्त हुई । इस अगले भान्हिक में पृथिवी मादि द्रव्यों में प्रेरणादि मे नत्पन्न होने वाले गमन आदि कर्म की परीक्षा के लिये प्रथम यह वर्णन करते है कि पृधिवी में अपने आप उत्पन्न होने वाला कर्म (तूकम्प मादि) किस प्रकार होता है- २०१-नोदनाभिघातात्संयुक्तसंयोगाच्च पृथिव्यां कर्म ॥१॥ ( नोदनाभिघातार ) प्रेरणा की चोट मे (च) और ( संयुक्तसंयोगात.) संयुक्त पदार्थों के साथ सयोग से ( पृथिव्याम् ) पृथिवी में ( कर्म.) गगन और भूकम्पादि क्रिया होती है। पृथिवी में ऐमे द्रव्यों का संयोग विशेप है, जिन से उम का सूर्य के साथ आकर्षण हो और वह गति क्रिया से युक्त होकर जागे को चले और भूर्य की ओर आकर्षण के बल में उस की गति स्वयं अपनी परिक्रमा का कारण माप ही बने और उस की गति से जो हिलोर और रगह उत्पन्न हो उम में पूर्व स्थानों में अपूर्व द्रव्यों का संयोग हो और उन संयुक्त द्थ्यों के मंयोग में नम का पटना का हिलना वा कांपना इत्यादि क्रिया उत्पन्न होवें॥१॥ पृथिवी के अपनी और सूर्य की परिक्रमा करने रूप क्रिया का कारमा बतलाते हैं:- २०२-तद्विशेषेणाऽदृष्टकारितम् ॥ २ ॥ ( सविशेषेण ) पृथिवीस्य पृथिवी की विशेषता से ( तत् ) वह गलि क्रिया ( अदृष्टकारितम् ) दृष्ट भावार्पणशक्ति से कराई हुई है ॥ २ ॥ पृथिवी की क्रिया परीक्षित हो चुकी। अब जल की क्रिया की परीक्षा कारेंगे, उस का प्रारम्भ करते हैं: २०३-अपां संयोगाभाने गुरुत्वात् पतनम् ॥ ३॥ (अपाम् ) जलों को ( गुरुत्वात् ) भारी होने से ( संयोगामाबे ) संयोग न रहने पर ( पतनम् ) गिरना होता है। - २०० वैशेषिकदर्शन-पाषानुवाद अर्थात जपर से छोड़ा हुवा जल, धारक पदार्थ के संयोग विना भारी होने से पृथिवी की आकर्षणशक्ति से पृथिवी पर गिर पड़ता है ॥ ३ ॥ २०४-द्वत्वात् स्यन्दनम् ॥१॥ (द्वत्वात् ) गीला और पतला होने से ( स्यन्दनम् ) नीचान में को 'बहाव होता है॥४॥ प्रश्न-यदि गीला और पतला होने में जल नीचे को वहता है तो फिर समुद्र का जल मेघ में पहुंचने के लिये ऊपर कैसे चढ़ता है ? वह तो सदा नीचे ही को बहना चाहिये ? उत्तर- २०१५-नाड्यवायुसंयोगादारोहणम् ॥ ५ ॥ ( नाड्यवायुसंयोगात् ) सूर्यकिरण और वायु के संयोग से [ गलों का] ( आरोहणम् ) ऊपर को चढ़ाव होता है । इस सूत्र से यह भी ध्वनि निकलती है कि यदि किसी नाड़ी (नली) में गर्मी भरी जाये और वह वायु को ऊपर को फेंके और फिर नीचे नली रिक होगादो तो.अपने से छुए हुए पानी को ऊपर को खींचेगी ॥ ५ ॥ प्रश्ना-सूर्य की किरण और वायु का संयोग के सिवाय कभी २ विना सूर्य की किरणों के भी पानी ऊपर को चटता देखा जाता है, जैसे फ़ौवारे में। सो क्यों ? उत्तर २०६-नोंदनापीडनाल संयुक्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥ (नोदनापीडनात् ) धक्के और दवाव से ( च.) और ( संयुक्तसंयोगात) 'संयुक्त पदार्थ हो संयोग से [ भी पानी जपर को उठता है ] ॥ २०७-वृक्षाभिसर्पणमित्यदृष्टकारितम् ॥ ७ ॥ (इति) यह ( अस्पकारितम् ) दृष्ट वृक्षस्थ जीव शक्ति का कराया सुवा काम है फि ( वृक्षाभिसर्पण ) वृक्ष की ओर पानी का खिंच जाना ॥ वृक्ष की पाड़ में दिया हुवा पानी जो ऊपर को वृक्ष के पत्र और शाखाओं में पहुंच जाता है, उस का कारण वह अदृष्ट शक्ति है जो जीवित वृक्ष में परमात्मा ने छिपी हुई रक्खी है ॥ 9 ॥ और-- २०-अपां संघातो विलयनञ्च तेजःसंयोगात् ॥ ८ ॥ (अपाम् ) जल का (संघातः ) जमाव ( च ) और (विलयनम्) गलकर पतला होजना ( तेजःसंयोगात् ) तेज के संयोग से होता है ।

. पश्चगाऽध्याय २ आन्हिक माकाश में जमे हुए पानी के ओडे वर्षने में अथवा यर्फ जमाने की कलों में पानी के जमाने में कारण दिव्य तेज का संयोग है और फिर बर्फ से वा ओले से गलफर पानी होगाने का कारण लौतिक गर्मी का संयोग है ॥८॥ २०६-तत्र विस्फूर्जथुर्लिङ्गम् ॥ ६ ॥ ( तत्र ) उस मेघमरहल में ठहरे हुए जलों के जमाव में ( विस्फूर्जथुः ) विजली की चमक और कड़क (लिङ्गम् ) तेन की पहचान है ॥ यदि मेघ में दिव्यतेम का संयोग न होता तो विशली की धमक और कडक न पाई जाती। पाई जाती है, इम में जाना जाना है कि मेघस्य जलों में दिव्यतेज विजली का संयोग है, जो जल के पतला रहने के कारण लौकिक गर्मी को वल से बाहर फेंक देता है और जल को जगा देता है, जिस से मचग जल के संयोग मे पापाणतुल्य कठिन शिला सी बन जाती हैं और ये ही टूट २ कर गोले के रूप में वर्षती हैं । यही कारण वर्फ की कठों में है। फिर जव बिजली का प्रभाव बर्फ में से निकलता गाता है और उस के स्थान में लौकिक गर्म वायु घुमता लाता है तब यर्फ पिघल कर फिर प्रतापानी हो जाता है ॥ ॥ तपा- २१०-वैदिकञ्च ॥ १०॥ 10877 (च) और ( वैदिकम् ) वेद का भी यही सिद्धाना है। "गर्भाऽस्योपधीनां गर्भावनस्पत्तीनाम ग विश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि ( यजुः १२-३७) पर्ष-मगि गोपधियों का गर्भ है, वनस्पतियों का गर्म है, सब भूत मात्र का गर्म है (भीर ) "जलों का गर्म-सीतर रहने वाला है ॥ रमी प्रकार- "गर्भीयो अपां गर्भावनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम् । अद्री चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधी: ॥ ( ऋ० १॥ ७० ॥२) मई-जो जलों के गर्भ में रहता है, चनस्य वनस्पतियों के गर्भ में रहता है मौर त्यावर जगम के गर्भ में रहता है और पहाड़ों के नीचे दुर्गम छिपे मा पुस्तकाम Acc. No. K... अयपुर 66 २ n १०२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद स्यान में रहता है, जैसे कि प्रजाणों में स्वतन्त्र मृत सर्वत्र वर्तमान है (वह पारित है) ॥ सी प्रकार- "गी अस्योपधीनां गभौहिमवतामुत । गमौलिम्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि ( अपर्व ६ । १० । ५।३ पार्थ-(अग्नि ) षोषधियों का गर्भ है और बर्फीले पर्वतों का गर्भ है सब भूतमात्र या गर्भ है, ( वह ) इस मेरे नरोग्य को करे ॥ तथा- अग्निद्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपां रेतांसि जिन्वति ॥ (साम उ०१।३।७) अर्थ - यह अग्नि जपर को जाने वाला द्युलोक की टाट है तया पृथिवी जोर जडों को कणों को जोड़ता और पिंघलाता है । इस प्रकार वेद में अन्य भी अनेक मन्त्र हैं जो जल के जमने गौर पिंघलने में दिव्य पौर लौकिक अग्नि को कारण बताते हैं । २० आगे बिजली की चमक का कारण बतलाते हैं- २११-अपां संयोगाद्विभागाच्च स्तनयित्नोः ॥ ११ ॥ ( अपाम् ) तेज को गर्भ में लिये हुए जलों के ( संयोगात् ) संयोग से (च) और ( विभागात् ) विभाग से ( स्तनयित्नोः ) विजली की उत्पत्ति चमक और कडक होती है । माकाश में बिजली की चभक और कड़क का कारण मेघस्थ जलों, विगलियों और वायुवों की मापस में रगड़ है ॥ १९ ॥ आगे अग्नि और वायु की क्रियाओं की परीक्षा को पृथिवी की क्रिया की परीक्षा में अन्तर्गत होना कहते हैं- २१२-पृथिवीकर्मणा तेजःकर्म वायुकर्म च व्याख्यातम् ॥१२॥ (पषिवीकर्मणा) पृथिधी की क्रिया के साथ (तेजाकर्म) तेज की क्रिया ( च ) और ( वायु कर्म ) वायु की क्रिया का ( व्याख्यातम् ) व्याख्यान हो ॥ चुका समझो।। . मजिस कार पृथिवी में प्रेरणा मादि से क्रिया उत्पन्न होती है इसी -A पचमाध्याय २ शान्हिक १०३ प्रकार आणि पीर वायु की क्रिया को नत्पन्न होती समझनी चाहिये ।। १२ ।। भागि वायु और मन की पलक्ष्प अदृष्ट कारित क्रिया क्या है ? उत्तर- २१३-अग्रुर्ध्व ज्वलनं वायोस्तिर्यक् पचनमणना मनसवाद्यं कर्मादृष्टकारितम् ॥ १३ ॥ (आग्नेः) अनिका (ज्वलनम् ) सपर को लपट निकलना (बायोः) चाय या ( गिर्यपक्षणम् ) आगे पीछे दायें वायें चलना ( अणूनाम् ) परं- मातुओं (घ ) और ( मनमः ) गन फा ( साद्यं ) पहला ( कर्म ) काम ( पादृष्मकारितम् ) अदृष्ट का कराया हुवा है । आपात हमारी आंखों मे अदृष्ट न देखा हुवा कोई कारगर है, शिम को हम बाय कहते हैं, नमी कारण मे अगि अपर पो उपट लेता है, वायु तिला पाता है, परमाणु और गल में पहली क्रिपा (हरकत) उत्पन्न होती ॥ १३ ॥ सपा- २१४-हस्तकर्मणा मनस: कर्म व्याख्यातम् ॥ १४ ॥ (स्नकर्मणा ) हाप की क्रिया मे ( मनमः ) मन की ( कर्म ) किया 12} { व्यासपातम् ) व्याख्यान मगझलो॥ अपांत हीमे गोमात्मा फी प्रेरणा मे हाथ क्रिया करता है वैसे ही जी. वात्मा की प्रेरणा में गग में भी क्रिया होती है ॥ १४ ॥ २१५-आत्मेन्द्रियमनोर्थसनिकर्पात् सुखदुःखे ॥ १५ ॥ (णात्मेन्द्रियमनोर्थमन्निकर्षात ) आत्मा जीवात्मा, सन्द्रिय-नात कान नादि, मग भीर विषयसपादि के परस्पर छूने से ( सुखदुःखे ) सुख और दुग पोत ॥ पायात वात्मा मा में छूता है, मन इन्द्रियों में छूना है और इन्द्रियां विषयों में रहती हैं। म प्रकार विषयों का सुप और दुःख पात्मा तक पहुं. यता है ॥ १५ ॥ य म मय कथन का फल निकालते हैं कि- २१६-तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि, शरीरस्य दुःखाभावः स योगः ॥ १६ ॥ (गनामि ) गग के (पासरस्थे ) अपने शापे ही में ठहर जाने पर (तद. नारमतः) इन्द्रियों द्वारा उन विषयों का विषयग्रहण भारम्भ नहीं होता २०४ वैशेषिकदर्शन-पाषानुवाद [तम ] ( शरीरस्य ) शरीर फो ( दुःखाभावः ) दुःख नहीं रहता ( सः ) यह ( योगः ) योग कहाता है । अर्थात् योग उन अवस्था का नाम है जव कि मन अपने शापे में ही ठहर जाये और इन्द्रियों को प्रेरणा न करे और इन्द्रिपां मन की महायना न पाकर विषयों को न छुवें तब आत्मा को दुःख नहीं पहुंच सकता । यद्यपि योगदशा में जैसे इन्द्रियों और विषयों का स्पर्श होने से मात्मा को विषयों का दुःख नहीं पहुंच सकता, इमी प्रकार विषयों का सुख भी तो नहीं पहुंच सकता ? तो भी सूत्रकार ने केवल दुःख का मताव कहा है, सुख का अभाव नहीं कहा, मो क्यों? उत्तर-सुख का असाव इस लिये नहीं कहा कि साधारण पुरुपों को दूसरे शब्दों में लौकिक पुरुषों को जिन रूपादि विषयों में सुख की प्रतीनि होती है, उन्हीं विषयों से योगी को दुःख की प्रतीति होती है क्योंकि योगी का मारमा योगसाधन की क्रिया करते २ ऐसा सुकुमार-नाजुक हो जाता है कि जो स्थल विषय अन्यों को सुखदायका प्रतीत होते हैं वे ही विषप योगी को दुःखदायक प्रतीत होते हैं । इस में दृष्टान्त यह है कि जैसे मकड़ी का जाला जो रेशम से भी नरम होता है, गङ्गुली से छूने में केमा सुखदायक प्रतीत होता है क्योंकि मङ्गुली का चमहा बड़ा मोटा और गंवार है । परन्तु वही माही का जाला यदि मांख से छू जाये ती गांख को सुखदायक होने के बदले दुःख पायक प्रतीत होता है क्योंकि गांख अगुली के चमड़े की नाईं गंवार नहीं है किन्तु नगरनिवासियों के समान सुझुमार है । बस ऐसे ही योगी को दृष्टि में सब विषयों के सुख भी अपनी सुकुमारता के कारण दुःखों ही की गिनती में हैं। इस लिये सूत्रकार ने स्थिरचित्त योगी को केवल दुःख का अभाव कहा, सुख का अभाव नहीं कहा ॥ १६ ॥ अब मन की अन्य क्रियाभों को वर्णित करते हैं जो अदृष्ट न देखेहुए प्रारब्धकर्मसंस्कार से होती हैं- २१७-अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगा: कार्यान्तरसंयोगाश्चेत्यदृष्टकारितानि ॥ १७ ॥ ( अपसर्पणम् ) बाहर तिकलगाना ( उपसर्पणम् ) समीप चलानाना ( अशितपीतसंयोगाः ) खाये पिये के संयोग (च) और ( कर्मान्तरसंयोगाः) अन्य कर्मों के साथ अनेक संयोग; [ ये सब ] ( मदृष्ट कारितानि ) विगा देखे पूर्व जन्मकत पाप पुरयों से बने मारब्ध संस्कार से कराये हुए होते हैं। -- १०५ - १ . यश्चमाध्याय २ भाम्हिक . अर्पत मग का, एक देह से निकलना, दुमरे देह में जाना, खाये, पिये से मन का नवीन नवीन उत्पन्न होना, बढ़ना घटना और मान्य कार्यों में मन का लगन, ये मय फल प्रारव्य कर्मानुमार होते हैं, जो अदृष्ट है ॥ १७ ॥ और जब ऐमा नहीं होता तब- २१८-तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्षः ॥ १८ ॥ ( तदमा ) म कर्मारम्स गाव में (संयोगाभावः) आत्मा का गन गादि के साथ संयोग नहीं होता ( च.) और ( अमादुर्भावः ) जन्न नहीं होता ( मोक्षः ) यही मोक्ष है ॥ १८ ॥ २१६-द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधाद्वाभावस्तम्मः ॥ १८ ॥ (द्रव्यगुण कर्म निष्पत्तिधार पृषिथ्यादि द्रव्यों, रूपादि गुणों और परक्षेपणा मादि कमों की मिद्धि से विरुद्ध धर्म होने से ( भानाव:) प्रकाश का न होना ( तमः ) अन्धकार होता है ।। अर्थात् प्रकाश कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है जिन्तु प्राश का अभाव ही मनकार कहाता है और प्रकाश के भान का कारण द्रव्यों, गुणों और कों की मिद्धि का विपरीत होना है । तेल, यत्ती शादि द्रव्यों के धर्य से दीपालाका के न रगहन रुप.कर्म में प्रकाश गुण का न होना ही गन्धकार है, अन्धकार कोई भाव पदार्थ नहीं ॥१९॥ २२०-तेजसो द्रव्यान्तरेणावरणाच्च ॥ २० ॥ ( तेजमः ) तेज के (ध्यान्तरेणावरणात ) शन्य द्रध्य का मावरण होजाने मे ( च ) मी [प्रकाश का भाव अन्धकार होता है ] ॥ २० ॥ २२१-दिक्कालाबाकाशं च क्रियावद्वैधानिष्क्रियाणि ॥२१॥ ( विकारती ) ,दिगा पर काल ( च ) और (आकाशम् ) भाक्षाश (नि- क्रियाणि । क्रियारहित पदार्थ हैं क्योंकि ( क्रियाववैधात ) क्रिया वाले पदार्थों में विधर्मी है ॥ जो पदार्थ मूर्तिमान होते हैं, न में किपा होती है, कम के विरुद्ध दिशा काल और आकाश पामूर्त है, इस वैधये से थे निष्क्रिय हैं । इस सूत्र में धकार में शङ्कर मिश्रादि टीकाकार आत्मा का ग्रहण करते हैं, आत्मा भी अमूर्त होने से निष्क्रिय है, यह दूसरी बात है कि आत्मा को मामीप्य से गान पीर इन्द्रियों में क्रिया उत्पन्न होती है ॥ २९ ॥ . १४ ! १०६ वैशेषिकदर्शन-पापामुवाद २२२-एतेन कर्माणि गुणाश्च व्याख्याताः ॥ २२ ॥ ( एतेन ) इसी से ( कर्माणि ) कर्म ( च ) और ( गुणाः ) गुणों की ( व्याख्याता ) व्याख्या की गयी। अर्थात् जिम प्रकार दिशा काल और प्रकाश अमूर्त होने में निष्क्रिय 0 और धात्मा भी निष्क्रिय है, इमी प्रकार फमों और गुणों का फी नि. विक्रय होना समझ लेना चाहिये बोंकि फर्म मोर गण भी अमृतं ॥२२॥ यदि फहो कि गुण और कर्म ती मृतिमान् द्रव्यों में भी समवाय मम्यस्थ से रहते हैं, फिर उन में क्रिया क्यों न मानी गाय, नब कि उनके मात्रय श्रमों में किया है ? उत्तर- २२३-निष्क्रियाणां समवायः कर्मभ्यो निपिद्धः ॥ १३ ॥ ( निष्क्रियाणाम् ) निष्क्रिय गुण कमाँ का ( ममवायः ) ममवाय मम्मन्ध ( कर्मभ्यः ) कमाँ से ( निषिद्धः ) निषिद्ध किया गया है । अर्थात् किया तो संयोग से होती है न कि ममवाय मे । ममवाय पर संयोग में भेद यह है कि एक पदार्थ का दृमरे पदार्थ में मनादिकाग ने मिलाव=ममवाय काहलाता है और भिन्न २ दो पदार्थों का एक दूमरे में नवीन मिलाप संयोग कहाता है ॥ २३ ॥ प्रश्न- यदि गुण और फर्म दोनों निष्क्रिय हैं तो उन में कमाँ की उत्पत्ति एमों होती है ? उत्तर- २२४-कारणं त्वऽसमवायिनो गुणाः ॥ २४ ॥ गुगाः ) मंयोगादि गुणा,, जो ( कारणम् ) कर्म का कारण होते हैं (तु) वे तो ( पासमवायिनः ) समदायी गुण नहीं होते ॥ २४ ॥ अच्छा ती गुण और कर्म निष्क्रिय मही, परन्तु दिशा और काल ती निष्क्रिय नहीं हो सकते क्योंकि उन में क्रिया देखी जाती है, जैसा कि पूर्व दिशा में सूर्य उदय हो रहा है, पश्चिम में अस्त हो रहा है, दक्षिण में ममुद्र उमण्ड रहा है और उत्तर में झरने यह रहे हैं इत्यादि । क्या ये दिशाओं में फर्म नहीं हुए ? इसी प्रकार-प्रातःकाल भ्रमण करता हूं. रात्रि में मोता हूं, दिन में अनेक काम करता हूं, इत्यादि। क्या इस से काल में क्रिया नहीं मिद्ध होती? उत्तर-नहीं, क्योंकि- २२५--गुणैर्दिग्न्याख्याता ॥ २५ ॥ .

१०७ पञ्चमाऽध्याय २ मानिहक (गुणः) गुणों मे (दिग् ) दिशा का (व्याख्याता ) व्याख्यान होघुका ॥ जिम प्रकार अमृतं होने से कमाँ का ममवापी कारण. गुण नहीं होते, इमी प्रकार अमूर्त होने में प्रवादि दिशाएँ भी मूर्योदयादि नियागों का मनवायी मारण की हैं किन्तु क्रियागों का आधार होने में उपचार की रीति पर उन में क्रिया काही जाती है, वास्तव में नहीं । जेमे 'चटाई पर गोगा करता हूं। इस फधान में यद्यपि घटाई भोजन क्रिया का आधार है, परन्तु ममवापी कारण नहीं ।। २५ ।। तपा- २२६-कारणेन काल: ॥ २६ ॥ ( कारणेग ) निमित्त कारण होने से ( कालः ) काल का कास्पान भी हो सका। गयांत शिम प्रकार वरर की त्वक्ति में मृत को डोरे ती सगवायी कारगा परन्तु तुरी बेमादि सयघा तन्तुयाय=जुलाहा समवायी कारण नहीं किन्तु निमित कारग है, इ.मी प्रकार यााल सी. किमी क्रिया का मादायी कारण नहीं किन्तु निमित्त कारण है, हम लिये नम को मक्रिय नहीं कह मक्ते ॥२६॥ पञ्च माध्याय के इस द्वितीय माहिक में पृथिवी नादि के कर्म और ममबग Ranार फा वर्णन किया गपा.॥ इनि पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २॥ इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते .... । वैशेषिकदर्शन भाषानुवादे पत्रुमः कर्माध्यायश्य समाप्तः . .

जोइम् अथ षष्ठोऽध्यायः : प्रथनमान्हिकम् इस वैशेषिकदर्शन में प्रथमाध्याय के तृतीय मूत्र में कहा गया था कि 'धर्म का प्रतिपादक होने ने वेद को प्रामाणिकता है । इम लिये कर्म की परीक्षा के पश्चात् वेद का प्रानागय मिद्ध करने के लिये कहते हैं कि- '२२७-बुद्धिपूर्वा * वाक्यकृतिदे ॥ १ ॥ ( वेदे ) वेद में (. वापरुतिः .) वाक्यरचना ( वुद्धिपूर्वा ) बुद्धिपूर्वक है अर्थात् वेदों में कोई वाक्य ऐमा नहीं है, जो बुद्धि के विपरीत हो, जैमा कि मनुष्यों को वापरचना में कमी २ हो जाता है ॥ १ ॥ २२८-ब्राह्मणे संज्ञाकर्म सिद्धिलिङ्गम् ॥ २ ॥ ( ब्राह्मणे ) ऐतरेय गादि ब्राह्मणाग्रन्थ में ( संजाकर्म ) मंजापूर्वक कर्मानुष्ठान ( मिद्धिलिङ्गम् ) प्रथम मूत्रोक्त विषय की मिद्धि का चिन्ह है । पार्यात ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थों में वेदोक्त पदार्थों की संज्ञा जानकर जो कर्मानुष्ठान बताया है वह फर्मानुष्ठान गोर उम का ठीक २ फल इम बात की सिद्धि में पहचान है कि वेदों की वाक्यरचना वुद्धिपूर्वक है ॥ २॥ गौर पी- २२६-बुद्धिपूर्वो ददातिः ॥ ३ ॥ ( ददातिः ) दानक्रिया (बुद्धिपूर्वः ) बुद्धिपूर्वक पाई जाती है । वेदों में जिम प्रसार दान का वर्णन है, अम से पाया जाता है कि वेदों की वाक्यरचना कुद्धिपूर्वक है । वेद के प्रकाशक ईश्वर ने उस को बुद्धिपूर्वक प्रकाशित किया है। जैसे:- दक्षिणावं दक्षिणा गां ददासि दक्षिणा चन्द्रमुन यदि- ३ण्यम्। दक्षिणान्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते विजानन् ॥ ० । १० । १०७ ॥ ७ ॥ * किसी २ पुरतक में वाक्प्रतति और किसी २ में वाकृति पाठ पाया जाता है, परन्तु भर्थ सब का एक है ।। - अष्टाध्याय १ आन्हिक २०६४ इम में वसुंग किया गया है कि दान करने से घोड़ा, गी, मादि पशु, चांदो मोना आदि रव और पत्र क्रिम में हमारा जीया है, मिलना है। इम लिये बुद्धिमान् मनुष्य दान-दक्षिणा को अपनी रक्षा के लिये कवचरूप में धारण करता है॥ यह ममम्त मृक्त दाग के माहात्म्य में कथन किया गया है, जिम के पढ़ने में वेदों के प्रकाशक ईश्वर की चमत्कारिणी बुद्धिपूर्वकरचना का पता लगता ॥३॥ और- २३०-तथा प्रतिग्रहः ॥ ४ ॥ ( तथा ) भूमी प्रकार ( प्रतिग्रहः ) किये हुए दाग को ग्रहण करने [शा. वर्णन गो युद्धिपूर्वक दे] ॥ ४ ॥ २३१-आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ॥ ५ ॥ ( गारमान्त गुणानाम ) अन्य पारमा के गुणों को ( आत्मान्तरे ) अन्न भारमा में (कार गास्यात् ) फारण न होने मे ।। धेद में दान का फल दाता को और प्रतिग्रह का फल लेने वाले को माटाया गया तो गौर यही युहिपूर्वक है क्योंकि एक मात्मा के अनुष्ठान किये हुये कर्म का फा'दृमरे भास्मा को नहीं मिलना चाहिये फिन्तु दाता को दाग का फल भीर प्रनिग्ररीता को ग्रहण का फरल गिलगा चाहिये क्योंशि दाना दानक्रिया का काहि पार ग्रहीता ग्रहण फ्रिपा फा की है ॥५॥ २३२-तद् दुष्टभोजने न विदते ॥६॥ (तत्) यह फल (दुष्टशोजने) दुटमोशन में (1) नहीं ( विद्यते ) है ॥ यदि दाता दुष्टमोग का दान करे और प्रतिग्रा लेने वाला दुष्ट आमा का मन करे ती बंद कहता है कि सम दोगों को शास्त्र में बताया पर नही होगा ॥ ६ ॥ प्रश्न-दुष्टभोजन किसे कहते हैं ? उत्तर- २३३- दुष्टं हिंसायांम् ।। ७ ॥ (हिंमायाम् ) हिंमा में ( दुष्टम् )गोशग दुध होता है। किमी प्राणी को दःप देकर वा गारपर जो भोजन मिद्ध किया जाधे वा जो भोजन दिया जाने यो दोगों भोजन दुष्ट है। चोरी से या अन्याय से अथवा मन में यरे भन्यायप्राण लेफर को.दाता दान करता है और जो प्रतिग्रहीता उस दशा को लेता से दोनों ही वेदोक पर नहीं पारो ॥ ...

. 3 - -- -- .११० वैशेषिकदर्शन-मायानुवाद २३४-तस्य समभिव्याहारतो दोपः ॥८॥ (तस्य) उस दुष्ट भोजन के ( ममभिष्याहारतः) खाने खिलाने से (दोषः) हिंसा का ] दोष लगता है । यद्यपि दाता ने स्वयं हिमा.न की हो और प्रतिग्रहीता ने की स्वपम् हिमा न की हो किन्तु जिम हिंमाजनित भोजन को उन्हीं ने, खिलाया और खाया है, उम के खाने खिलाने से भी खाने और खिलाने वाले को वेद में दोष बताया गया है ॥ ८॥ परन्तु २३५-तदऽदुष्टे न विदासे ॥ ६ ॥ (तत्) वह दोप ( दुष्टे ) निर्दोष भोजन में (न ) नहीं (विद्यते) है 1# जो भोजन हिंसादिदोषरहित है, उस में खाने सिलाने वालों को वेद में दोष नहीं बतलाया गया ॥ ९ ॥ '२३६-पुनर्विशिष्टे प्रवृत्तिः ॥ १० ॥ ( पुनः ) फिर ( विशिष्टे ) उत्तम सात्विक भोजन में ( प्रवृत्तिः) खाने खिलाने की प्रवृत्ति करनी विहित है ॥ दुष्ट भोजन को त्यांगकर श्रेष्ठ भोजन देना कहा है । २३७-समे हीने वा प्रवृत्तिः ।। ११॥ :: :: (वा) अथवा (समे) साधारण भोजन में (हीने) घृत दुग्चादि उत्तम गुण- कारक द्रव्यों से रहित भोजन में सी (प्रवृत्तिः) दान की प्रवृत्ति विहित] है॥११॥ २३८-एतेन हीनसमविशिष्टधार्मिकेभ्यः परस्वादानं व्याख्यातम् ।। १२ ।। ( एतेन ) इस से (व्याख्यातम् ) व्याख्यात समझना चाहिये कि (हीन, सम, विशिष्ट धार्मिकेभ्यः ) अधम, मध्यम गौर उत्तम धार्मिक पुरुषों से ( पर- खादानम् ) परधन का ग्रहण करना विहित है ॥ अर्थात् हिंसादि दुष्ट कर्मों से रहित धार्मिक पुरुषों से प्रतिग्रह लेना चाहिये, चाहे वे उत्तम, मध्यम, अधम किसी कक्षा के धार्मिक हों किन्तु हिंसक 'पापी न हों ॥ १२ ॥ श्रीर- २३९ तथा विरुद्धानां त्यागः ॥ १३ ॥ ॥.१०॥ -- zi ..

-*- ܫ ܫ -- . ; 4 पष्टाध्याय । आन्हिका, १११ { तपा) मी प्रकार ( विरुद्वानाम् ) धर्मविरोधियों या. (त्यागः ) प्रनिग्रह त्याग देगा कहा है ॥ १३ ॥ २४..-हीने परे त्यागः ॥ १४ ॥ (परे ) यदि दाता (हीने ) धर्मानुष्ठान में अधम हो तो ( त्यागः ) दान सेमा त्याग दें ॥ १४॥ २४१-समे आत्मत्यागः परत्यागो वा ॥ १५ ॥ ( ममे ) यदि दाता मध्यम धार्मिक हो तो (गात्मत्यागः । चाहे प्रति- ग्रहीता सपने याद्य पदार्थ का त्याग करदै ( वा ) अथवा ( परत्यागः ) दाता त्याग कर दे ॥ १५ ॥ ौर- २४२-विशिष्टे आत्मत्याग इति* ॥ १६ ॥ (विशि) यदि दाता अपने ने उत्तरी धार्मिक हो तो ( गात्मत्यागः ) प्रतिग्रहीता सपने भाप त्याग देवे ॥ गगो मा पाश्रयं होता है कि शहर मिश्रादि टीकाकारों ने और की देगा देसी वर्तमान काल के मंस्ता और भाषा के टीकाकारों ने १४ मे १६ तक मृत्रों के पार्थ में दान और प्रतिया के प्रकरण में विरुद्ध शत्रु के मारने मोर ग गाने का पार्थ अफारण क्यों अपना लिया ? ॥ १६ ॥ इति षष्टाध्यायस्य प्रथममान्हिकम् ॥ १॥ .......... अय द्वितीयमान्टिकम् २५३-दृष्टादृष्टप्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोजनमभ्युदयोय ॥६॥ (दृष्टादृष्टप्रयोजनानाम् । दृष्ट गीर पादृष्ट प्रयोजन वाले को दृष्टामाये) दृष्ट के अमाय में ( प्रयोजनम् ) प्रयोग अनुष्ठान ( पदयाय ).परलोया के मुम्प के लिये है ॥ पापात् वेद में दो प्रकार के फर्मानुशान हैं । मुछ कमों का फल दृष्ट है, जीप को जन्म में होगा देखा जाता है और दूमरे का का फल अदृष्ट हैं, जो आगामार में मिलता है, उमी के लिये ऐधिकाफल के अभाव में अनुष्ठान बनानाये गये ॥ अमे:- * कितनी ही 'पुमाकों में 'पति' शब्द नहीं है, परन्तु यह शब्द जाहिक की ममाप्ति में भीर मर्थ पी समाप्ति में होने में मार्थक सानं पड़ता है ॥ . - . १ ." .. वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद : . २४४-अभिषेचनोपवास, ब्रह्मचर्य, गुरुकुलबास, वानप्रस्थ, यज्ञ, दान, प्रोक्षण, दिङ, नक्षत्र, मन्त्र, काल, नियमांश्चादृष्टाय ॥२॥ (भि०-नियमाः) मन्त्रपूर्वक सिर पर जल छिटकना=अभिषेचन, भोजन, ज करना=उपवास, भूमिशपनादि ब्रह्मचारी के नियमों का पालनबलपर्य, सालोंपाङ्ग वेद पढ़ने के लिये गुम के ममीप रहना=गुरुकुलवास, गृहस्थ को त्यागकर वन में रहकर वेदोक्त फर्म. करना=बानप्रस्थ, मग्निहोत्रादि कर्म= यज्ञ, गी आदि पदार्थों का मत्पात्रों को देना दान, यज' के नुवादि पदायों को जल मे शुद्ध करना=प्रोक्षण, पूर्वादि दिशाओं में नियतरूप से यजमानादि का बैठना=दिक, पुष्य आदि विहित नक्षत्रों में संस्कारादि कर्म करना नक्षत्र, गोंभूर्भुवः स्वः द्यौग्वि भूम्ना० इत्यादि मन्त्र पढ़कर अग्न्याधानादिकर्म करना मन्त्र, उत्तरायण शादि ममय विशेष में कर्म करना=काल, ये नियम ( सादृष्टाय ) अदृष्ट फल के लिये ( च ) गौर ढुष्ट फल के लिये हैं ॥२॥ तथा- २४५-चातुरात्रम्यमुपधा अनुपधाश्च ॥ ३ ॥ ( चातुराश्रम्यम् ) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ' और 'संन्याम न चार धामनों में विहित कर्म का अनुष्ठान ( उपधाः.) उपधायें ( 1 ) और ( गनु. पघाः ) अनुपधायें भी विहित हैं । उपधा और अनुपधा का मर्ष अगले में आचार्य ने स्वयम् कहा है ॥ ॥ यथा- २४६-भावदोष उपधाग्दोषोऽनु पधा ॥ ४ ॥ ..... (. भावदोषः ) श्रद्धा का दोष ( उपधा.) उपधा कहाता है (जदोषः ) शहर में दोष न होना ( अनुपधा ) अनुप पधा कहाता है ॥४॥ २४७-यदिष्टरूपरसगन्धस्पर्श प्राक्षितमभ्युक्षितच तच्छुचि ।। यत् ) पो पदार्थ ( इष्टरूपरसगन्धस्पर्शम् ) मनभावने रूप, रस, गन्ध और स्पर्श वाला, (मोक्षितम् ) मन्त्रपूर्वक जल से शुद्ध किया जुवा (च) और (अल्युक्षिसम्) विना मन्त्र के धोया हुधा है (तत्) वह (शुचि) शुद्ध है।शाऔर- २४८-अशुचीति शुचिप्रतिषेधः ॥ ६ ॥ । .

. षष्ठ अध्याय आन्हिक ११३ (शुचि प्रतिषेधः ) जो शुद्ध न हो, उम को (अशुचि :) अशुद्ध ( इति ) ऐमा कहते हैं ॥६॥ और- २४६-अर्यान्तरच ॥ ७ ॥ ( शन्तिरम् ) विधान किये हुए पदार्थ मे भिन्न दूसरा पदार्थ ( च ) भी अशुद्ध है ॥ जे में जिस वर्ण को शिस सृत झा यज्ञोपवीत धारण करना कहा है, उसी के लिये वह शुद्ध है किन्तु एक के लिये दूसरे का अशुद्ध है ॥ 3 ॥. प्रश्न ती प्या शुचिमोजन मव किसी से लेशर पोज्य है ? उत्तर-नहीं, पयोंकि- २५०-अपलस्य शुचिभोजनादभ्युदयो न विझते नियमाभावात् ॥८॥ ( गियापावात् ) नियम के न रखने से ( अयतस्य ) महिमादि यमों को पालन न करने वाले का (शुधिशोजनात्) शुद्ध भोजन करने से (अभ्युदयः) लोक परलोक का कल्याण (ज) नहीं ( विद्यते ) होता ॥ जो पुरुप शहिंपादि व्रती का पालन नहीं करता मलेच्छादि का दिया हुवा शुद्ध भोजन मी संसर्गदीप ये दृपिन है, इस लिये वाल्याणकारी नहरे ॥ ८ ॥ २५१-विदाते. वार्थान्तरत्वाद यमस्य ॥ ६ ॥ ( वा ) अथवा ( यमस्य ) अहिंमादि यम का (अर्घात्तरत्वात ) अन्य धार्थ होने में (विद्यते) शुचिभोजन से लोक परलोक का कल्याण होता भी है । पूर्व मृत्र में हिमादि नियमों ने ,रहित लेच्छादि को दिये सब प्रकार के मर्ग का शुद्धोजन में भी बचाव कहा था, इम सूत्र में दूसरा पक्ष करते है कि अथवा यदि यह विचार किया जाय कि यम: अहिंमादि का पालन दृपली बात है और शुचि पोजन दूमरी बात है, इम खिये जन हिंमकादि का दिया भी शुधियोजन हिंसादिदोपदृषित न हो तो लोक परलोक के अभ्युदय का बाधा नहीं है ॥ ॥ गौर भी एक कारण है कि:- २५२--असति चाभावात् ॥ १० ॥ (भमति) शुद्ध सीजन में हिंसादि दोष के न होने पर (च) और (भभावात्) हिमादि दोप न होने से लोक परलोक के कल्याण में बाधा नहीं ॥ १० ॥ कर्म की परीक्षा हो चुकी । अब दोष की परीक्षा का प्रारम्भ करते हैं: १५ -- d .

ख ही का वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद २५३--सुखाद्गागः ॥ ११ ॥ ( सुखात ) मुख से ( रागः ) आसक्ति वा फांसना होता है ॥ इसी से यह भी समझना चाहिये कि दुःख से द्वेष होता है ॥ ११ ॥ २५४. तन्मयत्वाच्च ॥ १२ ॥ (तन्मयस्वात् ) तन्मय होजाने से ( च ) भी राग और द्वेष होते हैं। निरन्तर सुख ही सुख का ध्यान करते रहने में मग सुखिया होजाता है तब उस को सुख में राग होजाता है, इसी प्रकार निरन्तर दुःख दुःख ध्यान करते रहने से मन दुखिया हो जाता है तब उस से द्वेष होता है ॥१२॥ २५५--अदृष्टाच्च ॥ १३ ॥ (गद्वष्टात् ) पूर्व जन्म के प्रारब्ध कमी से () भी राग और द्वेष होते ॥ १३ ॥ २५६-जातिविशेषाच्च ॥ १४ ॥ ( जातिविशेषात् ) विशेष जाति (घ ) भी राग और द्वेप होते है। जैसे ननुष्य जाति का दुग्ध, फल, पुष्पादि से राग तथा नकुल का सर्प में और घोड़े का भैंसे से जातिकृत द्वेष होता है ॥ १४ ॥ २५७-इच्छाद्वेषपूर्विका धर्माधर्मप्रवृत्तिः ॥ १५ ॥ ( धर्माधर्मप्रवृत्तिः ) धर्म और धर्म में प्रवृत्ति (इच्छा पपूर्वि फा) राग पूर्वक मीर द्वेषपूर्वक होती है ॥ १५ ॥ २५८-तत्संयोगो विभागः ॥ १६ ॥ (तत) उस धर्माधर्म प्रवृत्ति से (संयोगः) जन्म (विभागः) और मृत्यु होते हैं॥१६॥ २५६-आत्मकर्मसु मोक्षो व्याख्यातः ॥ १७ ॥ (शात्म कर्म सु) माध्यामिकमाँ को करने पर (मोक्षः) मोक्ष (व्याख्यातः) वेद में कहा गया है ॥ १७ ॥ इति षष्टाध्यायस्य द्वितीयमाहिकम् ॥ २ ॥ इति श्री तुलसीरामस्वामीकृते वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे श्रौतधर्माध्यायः षष्ठः समानः ॥६

ओ३म्
अथ सप्तमोऽध्यायः
९
प्रथRमान्टिकम्
ट्रष्यों पीर कमों की परीक्षा हो चुकी तथा बीच में श्रीतधर्मों की भी
परीना की गई। भव क्रमानुमार ससमाध्याय में गुणों की परीक्षा करेंगे,
पम लिये गुण जो प्रथमाध्याय प्रथम शान्हिक के उटे मूत्र में कहे घे, वह
प्रकरण मम बहुत दूर हो गया है, इस लिये साधार्य उस दुररुप प्रकरण को
स्मरस कराते हैं कि-
२६०--उक्ता गुणाः ॥ १॥
( गुणाः ) गुग ( उका: ) ११६ में कहे गये थे
२२१-प्रथिव्यादिरूपरसगन्धस्पर्शा:
द्रव्यानित्यत्वादनित्याश्च ॥ २॥
( एशियादि-पीः ) पृषियी आदि ट्रष्यों पो रूप, रस, गन्य जीर
स्वगं, गुगा ( द्रव्यानित्यवाद ) द्रव्य की शनित्यता से ( शमित्याः ) नित्य
(च) भी॥
पास गगित्य पृथिवी का गुण गन्धादिफ भी भगित्य है, मी प्रकार
अनिता भगिन का गुण रुप सी मगित्य है । गनिल जाल का गुण रस भी
भगित्य है । गित्य वायु का गुण स्पर्श शो भनित्य है ॥२॥
पृथिवी शादि द्रव्य कार्य कारण - भेद मे नित्य शीर नित्य भी होरी
हैं। नग में में गित्य द्रव्यों के गुणों को सम मृम्र में अनित्य कहा गया !
मागे नित्य दथ्यों के गुंगों को नित्य समझना चाहिये मी पाहते हैं:-
२३२-एतन नित्येषु नित्यत्वमुक्तम् ॥ ३ ॥
( एतेन ) पूर्या कक्षा मे ही ( निस्येषु ) नित्य ट्रष्यों में (नित्यत्वम्)
गुणों की पी गित्यता ( गम् ) 'कही गई ॥ ३ ॥
२६३ - अप्सु तेजसि वायी च नित्या द्रव्यनित्यत्वात् ॥ ४ ॥

११६ बैशेषिकदर्शन-सापानुबाद (द्रव्यनित्यत्वात् ) द्रव्य के नित्य होने से ( अप्सु ) जन्म के परमाणु ओं (तेजसि ) अग्नि के परमाणुओं में (च) और (बायौ) व यु के परमाणुगों में ( नित्याः ) गुण भी नित्य हैं । जल के परमाणुगों में रम, रूप और स्पर्श गाग्नि के परमाणुगों में रूप गौर स्पर्श, वायु से परमाणुगों में स्पर्श गुण गित्य हैं, ऐमा शङ्कर मिनादि व्याख्यान करते हैं परन्तु परमाणु का नित्यद्रयों में धानित्यद्रव्यों के गुण संभव नहीं, इस लिये हमारे मत में सूत्र का यही पतिप्राय है गि जलपरमाणुओं में रम, शरिगपरमाणुओं में सु.प और वायुपरगाणुं में स्पर्श; चोवल यही नित्य गुण हैं. ॥ इस सूत्र में पृथिवी के परमाणु ओं का गन्ध गुण गित्त्य कहने में न जाने क्यों छोड़ दिया गया, इस विषय पर प्रायः सभी टीकाकार विना किसी तर्क के चुपचाप इस शङ्का की जोर ध्यान नहीं लाये ॥ ४ ॥ २६४-- अनित्ये ननित्या द्रव्याऽनित्यत्त्वात् ॥ ५ ॥ (गव्यानित्यत्वात् ) द्व्यों के नित्य होने से (शनित्येषु ) नित्य शार्य द्रव्यों से ( अनित्याः ) गुगा भी अनित्य हैं ॥ ५ ॥ , २६५-कारणगुणपूर्वकाः पृथिव्यां पाकजाः ॥ ६ ॥ ( पृथिव्यां ) कार्य रूप पृथिवी में (पाकजाः ) पुन्य दृष्यों के माप पकने से उत्पन्न हुए रस रुप और स्पर्श गुण (कारणगुणपूर्वयाः ) अपने २ पारणों से गुणों से गाये हुए होते हैं। पृथ्वी में केवल गन्ध गुण तो अपना है गौर रूपादि.गुण गम्ति भादि हान्य द्रव्यों को साथ पफने से उत्पन्न होजाते हैं ॥६॥ पोंकि- २६६--एकद्रव्यत्वात् ॥ ७ ॥ प्रत्येक गुण का केवल एक ही ,व्य होने मे ॥ ७ ॥ २६७-अणोर्महतश्चोपलव्यनुप- लब्धी नित्ये व्याख्याते ॥८॥ ( जणो: ) आणु की (घ) और ( महतः) महत् की (उपलब्ध्यनुपलब्धी) मनुपलब्धि भीर उपलब्धि (नित्ये) नित्य (व्याख्याते ) कहीं समझनी चाहिये। . 1 * ॥ सप्तमाऽध्याय १ आन्हिा प्रत्येक अणु अर्थात् सूक्ष्मपदार्थ की उपलब्धि नहीं होती और महत् पदार्थ की उपलब्धि होती है, यह उपलब्ध और अनुपलब्ध होना सार्व- कालिश नित्य है ॥८॥ २६८----कारणबहुत्वाच्च ॥ ६ ॥ ( कारणाहुत्वात् ) कहुत कारणों के होने से (घ ) भी महत् पदार्थ में गहत्त्व-वड़ापन होगाता है। 60 २६६-अतोविपरोतमणु ॥ ११ ॥ ( अतः ) इम से ( विपरीतम्.) विरुद्ध { गणु) परमाणु रूप आणुपदार्थ में महत्ववहा पन नहीं होता ॥ १० ॥ - २००-अणु महदिति तस्मित् विशेष. भावाविशेषाऽभावाच ॥ ११ ॥ ( भणु ) छोटा ( महत ) बढ़ा ( पति ) यह व्यवहार ( तलिन् ) उस पदार्थ में ('विशेषमायात) विशेष होने से (घ) जीर (विशेषाभावात् ) विशेष न होने से भी होता है। एक ही पदार्थ को दूमरे पदार्थ की अपेक्षा से छोटा साहसकते हैं और उमी को सीमरे पदार्थ की अपेक्षा से वहा भी कह सकते हैं। जैसे-एक ही आंवला (गागलकी फल) बिल्व में छोटा और गेहूं से अहा कहाता है ॥१९॥ २७१-एककालत्वात् ॥ १२ ॥ ( एककालत्वात् ) एक काल में होने से ., जिग काल में इस गांव को विस्य से छोटा कहते हैं, नसी एक काल में भी आंवले को गेहूं में बड़ा भी कहते है ।॥ १२ ॥ २७२-दृष्टान्ताच्च ॥ १३ ॥ ( च ) गौर ( दृष्टान्तात् ) दृष्टान्त से भी मिद्ध है ।। जैमा एक दृष्टान्त आंवले का पूर्व सूत्रों वें दिया गया, ऐसे ही अन्य अनेक दृष्टान्त पर्वत्र देखे जाते हैं। मे गौ हापी मे छोटी सी बकरी से बड़ी होती है, इत्यादि ॥ १३ ॥ प्रश्न-तीपा छोदेपन का छोदापन और बड़ेपन का बापन भी होता है ? नत्तर-नहीं, क्योंक्षि- al - . M ॥ सप्तमाऽध्याय १ आन्हिा प्रत्येक अणु अर्थात् सूक्ष्मपदार्थ की उपलब्धि नहीं होती और महत् पदार्थ की उपलब्धि होती है, यह उपलब्ध और अनुपलब्ध होना सार्व- कालिश नित्य है ॥८॥ २६८----कारणबहुत्वाच्च ॥ ६ ॥ ( कारणाहुत्वात् ) कहुत कारणों के होने से (घ ) भी महत् पदार्थ में गहत्त्व-वड़ापन होगाता है। 60 २६६-अतोविपरोतमणु ॥ ११ ॥ ( अतः ) इम से ( विपरीतम्.) विरुद्ध { गणु) परमाणु रूप आणुपदार्थ में महत्ववहा पन नहीं होता ॥ १० ॥ - २००-अणु महदिति तस्मित् विशेष. भावाविशेषाऽभावाच ॥ ११ ॥ ( भणु ) छोटा ( महत ) बढ़ा ( पति ) यह व्यवहार ( तलिन् ) उस पदार्थ में ('विशेषमायात) विशेष होने से (घ) जीर (विशेषाभावात् ) विशेष न होने से भी होता है। एक ही पदार्थ को दूमरे पदार्थ की अपेक्षा से छोटा साहसकते हैं और उमी को सीमरे पदार्थ की अपेक्षा से वहा भी कह सकते हैं। जैसे-एक ही आंवला (गागलकी फल) बिल्व में छोटा और गेहूं से अहा कहाता है ॥१९॥ २७१-एककालत्वात् ॥ १२ ॥ ( एककालत्वात् ) एक काल में होने से ., जिग काल में इस गांव को विस्य से छोटा कहते हैं, नसी एक काल में भी आंवले को गेहूं में बड़ा भी कहते है ।॥ १२ ॥ २७२-दृष्टान्ताच्च ॥ १३ ॥ ( च ) गौर ( दृष्टान्तात् ) दृष्टान्त से भी मिद्ध है ।। जैमा एक दृष्टान्त आंवले का पूर्व सूत्रों वें दिया गया, ऐसे ही अन्य अनेक दृष्टान्त पर्वत्र देखे जाते हैं। मे गौ हापी मे छोटी सी बकरी से बड़ी होती है, इत्यादि ॥ १३ ॥ प्रश्न-तीपा छोदेपन का छोदापन और बड़ेपन का बापन भी होता है ? नत्तर-नहीं, क्योंक्षि- al - . M A . मसमाध्याय १ मानिएक ११० २७७-अनित्येऽनित्यम् ॥ १८ ॥ ( भनित्ये .) अनित्य द्रव्य में (नित्यम् ) यह चारों परिमाणु जनित्य होते हैं ॥ १८ ॥ भोर-- २७८-नित्ये नित्यम् ॥ १९ ॥ ( नित्ये ) नित्य द्रष्य में ( नित्यम् ) परिमाण भी गित्य होते हैं ॥ १० ॥ उदाहरण- २७६-नित्यं परिमण्डलम् ॥ २० ॥ ( परिग राहतम् ) परमाणु पा परिमागा ( नित्यम् ) नित्य है ॥ परमाणु द्रव्य नित्य है, ये ने नन का परिमाण भी गित्य है ॥ २० ॥ प्रश्न-पम का कैमे निश्चय हो कि परमाणु में भी परिमाण है ? नत्तर- २८०. अविदा च विद्यालिङ्गम् ॥ २१ ॥ (अविद्या) अविद्या (च) भी ( विद्यालिङ्गम् ) विद्या की पहचान है ।। अघिद्या में विद्या पहचानी जाती है क्योंकि अविद्या में विद्या का गिषेध है । इसी प्रकार स्थूल पदार्थों के महत्त्व और दीर्घत्व परिमाण चे परमाणु या त्य गीर हुम्यत्य पी पहिचाना जाता है ॥ २१ ॥ परमाणु या नित्य परिमाण उदाहरण में दिया गया, अब आगे पर- मास्मा भीर आफाश का महत्व परिमाण गित्य है, गह हमरा उदाहरण देते हैं- २८१-विभवान्महानाकारास्तथा चात्मा ॥ २२ ॥.. (विभवास्) व्यापक होने से (आकाशः) पाकाश (च) और (जात्मा) परमात्मा ( महान् ) महत्वपरिगाणयुक्त है। व्यापक होने मे नित्य द्रष्य भाकाश और परमात्मा या महत्त्व परिमाण भी गित्य है ॥ २२ ॥ २८२- सदभावादणु मनः ॥ २३ ॥ ( तदसावास ) सर्वपापक न होने से ( मनः ) मन वाला माला- जीवात्मा ( गणु ) अणुत्य परिमाण वाला है। मदर मिश्रादि टीकाकार इम सूत्र का यह शर्थ करते है कि " ध्यापक न होने में मग अणु है " । यह कथन सर्वशालविरुद्ध है क्योंकि मग लिङ्ग शरीर का एक अवयव है, जैसा कि “सप्त शेक लिम् । सांख्य। इस । का शगुत्य - . - - । १२० वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद न १७ वा १८ तत्वों का लिङ्ग शरीर कहा है और वे सभी तत्व उत्पत्ति- नान् हैं और कोई उत्पत्ति वाला पदार्थ न अणु हो सकता, न महान हो सकता किन्तु परमाणु और जीवात्मा अणु हैं और परमात्मा महान् है; ये ही पदार्थ अजन्मा हैं । शेष सब जन्म हुए होने से मध्यम परिमाग है छान्दोग्य ६ । ५।४ में लिखा है कि शन्न मयं हि सोम्य मनः अर्थात् सन अन्न से बनता है, तब वह शाणु कैसे हो सकता है ? मुण्डक २ १ १ । ३ में भी लिखा है कि "एतस्मात् प्रजापन्ते मनः सर्वेन्द्रियाणि च" । इम में भी सन की उत्पत्ति लिखी है और उत्पत्ति वाला कोई पदार्थ न अणु हो ममता, न नित्य हो सकता । इस लिये इस सूत्र में 'मन' शब्द से मन का सहचारी जीवात्मा ही समझना चाहिये ॥ २३ ॥ २८३-गुणैर्दिव्याख्याता ॥ २४ ॥ (गुणैः) गुणों के साप (दिक) दिशा (व्याख्याता ) व्याख्यात हो चुकी ॥ पर व परत्व भादि गुणों के समान दिशा को भी व्याख्यान सनफगा चाहिये ॥२१॥ २८४-कारणेन काल: ॥ २५ ॥ (फारणेन ) पारण से ( कालः) काल का व्याख्यान होगया ॥ जितने पदार्थ उत्पत्तिमान् हैं सब की उत्पत्ति में फाल निमित्त कारण है, इस लिये समझना चाहिये कि काल सामान्य विभु पदार्थ है ॥ २५ ॥ इस Rथम पाहिक में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, चार प्रकार का परिमाण, गुणों का स्मरण काराकर परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया। इति सप्तमाध्यामस्थ प्रथममास्किम् . . । :00:-- अथ द्वितीयमाहिकम् परीमाण की परीक्षा कर चुके, अब संख्या की परीक्षा करना चाहते हैं। इस लिये प्रथम संरूपा को रूपादि गुणों से भिन्नवस्तुता सिद्ध करते हैं कि २८५-रूपरसगन्धस्पर्शव्यतिरेकादर्थान्तरमेकत्वम् ॥१॥ (रूपरसायस्पर्श व्यतिरेकात ) रूप, रस, गन्ध शीर स्पर्शादि से अति-, रिक्त होने से (एकत्वम्) एकत्व आदि संख्या (शान्तिरम् ) अन्य वस्तु. है ॥

- . म्समाध्याय २.शाहिक १५१. पादिक उपलक्षणमात्र हैं, उन से अन्य गुणों का पी नडगा करना चाहिये । पुत्व भी उपलक्षणमात्र है, उन मे द्वित्वा मिल्स शादि का भी ग्रहण करना चाहिये । एक घट, दो मठ, तीन वस्त्र, चार पुस्तका, पांच तत्त्व, छः ऋतु, पात छन्द, जिन पकार मंख्यावान् हैं, नमी प्रकार एक नया, एक अरश, चार दिशा, वहुत्त जीव, इत्यादि प्रकार से निर्गुगा पदायों में भी संख्या रहती है, हमी लिये मरूपा एक भिन्न गुण हैं,जो रूंपादि गुणों को गन्त. गंत नहीं हो ससत्ती ॥ १ ॥ गौरी- २८६-तथा पृथकम् ॥ २ ॥ ( तथा ) कमी प्रकार ( पृथक्तम् ) पृथक्क गुण भी रूपादि मे भिन्न है । जेमे एक घट दूसरे घट मे पृथक् है तब घट का एक होगा और दूसरे घट में पृथक होना स्पादि गुरखों के अन्तर्गन नहीं हो सकता ॥ २ ॥ २८७ - एकत्येक पथक्त्वयोरे कत्वैकपृथक्त्वा- भावोऽणुत्वामहत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ३ ॥ (एकत्वैकपृराक्षयोः ) एक त्व और एफपरक ( एकत्वैकपृयकामावः) इमरे एकात्व और दृमरे एकपृथक्क का अभाव है, जो ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् ) आणुन्न और महत्व के साथ व्याख्यातः वर्णन किया गया- एकत्व में दुमरा एकात्र और पृथक्क में दृमरा पृगक नहीं होता। जैमें अगा त्व में दूसरा अगुत्व और महत्त्व में दूमरा महत्व नहीं होता, जिन या व्याख्यान ७ ॥ १ ॥ १४ में हो चुका है ॥३॥ यदि बाहर कि उत्क्षेपणादि तगों और रूपादि गुणों में द्वित्वादि संख्या न मही परन्तु मन को मिलाकर एकत्व तो है ? तो उत्तर- सर-निःसंख्यत्वाकर्मगुणानां सर्वेकत्वं न विझते ॥ ४ ॥ ( कार्मगुगानाम् । काँ और गुणों के ( निःसंख्यत्वात् ) संख्यारहित होने से ( मधकत्तम् ) सब का एक होना (न) नहीं ( विद्यते ) होता ॥ कर्म और गुणों को मिला कर मन को एकत्व संख्या में भी अन्तर्गत नाहीं कर मकते क्योंकि कर्म और गुग संख्या में भिन्न पदार्थ हैं ॥ ४ ॥ यदि महो शि कमां और गुणों में संख्या का व्यवहार तो पाया जाता है, जैमा कि एक काग तुम करो, इपरा मैं करता हूं, एक रूप को तुम देखो, दूमर फो में देना हूं, इत्यादि ? ती उत्तर- १६ ?

वैशेषिकदर्शन-पाषानुवाद
-
२८६-भान्तं तत्॥ ५ ॥
( तत् ) वह ( भ्रान्तम् ) शान्तियुस है ।।
कने और गुण में रहने वाली संख्या को कमरुप बा गुणरूप मगमगा
शान्ति है किन्तु वास्तव में जैसे गव्यों में रहने पर भी गुण स्वयं द्रव्यमप्र
महीं किन्तु भिन्न पदार्थ हैं, ऐ मे ही संख्या को भी समझना चाहिये ॥ ५ म
२३०-एकत्वाभावाशक्तिस्तु न विदाते ॥ ६ ॥
( एकत्वाभावात् ) एकत्व न होने से ( तु ) तो ( भक्तिः ) ममान धने
(न) नहीं हो सकता ॥
अर्थात् यदि संख्या को सर्वत्र प्रान्त मानकर केवल माक माने तो भी
ठीक नहीं पोंकि यदि संख्या कोई मुरुप पदार्य न हो तो उस का भाक्तः
गौण प्रयोग भी र होसके परन्तु होता है, इस लिये संख्या रूपादि से भिन्न
एक गुण है ॥ ६॥
२९१-कार्यकारण योरेकत्वैक पृथक्त्वाभावा-
देवत्वैक पयत्वं न विदाते ॥ ७ ॥
( कार्यकारणयोः ) फार्य और कारण में ( एकत्वैर.पृथकाभावात्
एकात्म और एक पृथका न होने से ( एकत्वेकपृचकम् ) एकत्व पौर एकपृथक
(न) नहीं ( विद्यते ) है ॥
करत यह शावश्यक नहीं कि कार्य में एशत्व संख्या हो तो कारण
में भी एकत्व हो तथा यह भी शाया या नहीं कि कार्य में एक पुरता हो
तौ कारण में भी एकपृथक ही हो षयोंकि कार्य और कारण
एकश्व और
एका पृथक्त्व नियत नहीं।
हो सकता है कि कारणों में बहुत्व हो भौर कार्य में एकत्व हो तपा
यह भी हो सकता है कि कारण में एकत्व हो और कार्यों में बहुत्व हो ।
जैसे एक मृत्तिकारुप कारण से अनेक घटरूप कार्य होते हैं तथा अनेक धागे
रूप कारणों से एक वखरूप कार्य भी होता है । इसी प्रकार एकएक सी
समझो ॥ ७॥ तया-
२९२--एतदनित्ययोर्याख्यातम् ॥ ८ ॥

नित्य द्रव्य महामाध्याय २ आन्हिा १६३ ( एन ) यही नियम ( अनित्य चो:) :) अनित्य एकत्व प्रति एकप्रथम में ( व्याख्यानम् ) ध्याम्यात ममी में गुरुत्व और एनापरकत्व पती नित्य होते है और अनित्य दृटग अनित्य होते है ॥८॥ २९३-अन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजश्च संयोगः ॥६॥ प्राय मंयोग की परीक्षा करले ६ गो क्रमप्राप्त है-( अन्यतरकर्म दो में में फिमी एग के कर्म के उत्पन्न होने वाला ( नायकर्मजः ) दोनों के कर्म में उत्पता होने वाला (च) और (मंयोगजः ). संयोग से उत्पन्न होने वाना ( संयोगः ) संयोग होता है। भिन्न २दी पदार्थों का परस्पर मिल जागा-संयोग कहाता है। वह संयोग तीन प्रकार का होना है। मे:- १-दो पदार्थों में में एफ में क्रिया हो तो एक की क्रिया में दूमरे से माप मंयोग हो जायगा । २-दोनों पदापों में क्रिया होगे में दोनों का शापम में मंगोंग हो जायगा. 3-मयोग ये भी संयोग सत्यया होता है । जी से चल और गहुली से मं योग में गहुली की क्रिया कारण है, परन्तु पाप ही गङ्गुली भीर हाथ का मंयोग भी नल और हाप के संयोग का फारगा है ॥ ६ ॥ २४-एनन विभागोव्याख्यातः ॥ १० ॥ (तिन ) म मयोग के व्याख्यान से ( विभागः ) विभाग, का मी { पायातः ) व्यरुपान होगया ॥ शशांस ली में मंगोग तीन प्रकार का है, पेमे ही विभाग भी तीन प्रकार का मुनको ॥ १- मयुक्त दी पदार्थों में से किमी पफ की क्रिया से विभाग होजाता है। 2-mitोगों की क्रिया में विभाग हो जाता है ॥ और यामी यिशाग में भी विभाग हो जाता है ॥ १० ॥ ९५-संयोगविभागयोः संयोगविभागामावो पुणत्र महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ ११ ॥ . - उपांत् जैसे - ॥ - वैशेषिकदर्शन; ; भावानुवाद ( संयोगविभागयोः ) संयोग विभाग के ( संयोगविभागाावः ) संयोग और विभाग का माद ( अस्थमहत्त्वाभ्याम् ) गुत्व और महाय से समय (व्याल्पातः ) व्याख्यात हीच का । अणुत्व से आणत्व और महत्त्व में महत्व होगा फहा गया धा, ऐसे ही संयोग । संयोग और विभाग में विवाग नहीं होता मनको ॥११॥ १९६-कर्मभिः कर्माणि गुणश्च गुणा अणु त्वमहत्त्वाभ्यामिति ॥ १२ ॥ (प्रति ). ममा पूर्व याहा गया है कि ( कर्मभिः क्रमाण कमी के माय शाय () पीर ( गुणे :गुणा: ) गुणों के माय गुण ( अणुत्व महत्वाभ्याम् ) अणुत्व और महत्व में पायान समझो ॥ अध्याय 9 आन्हिक १ सूत्र १४ ने १६ तक तीन मुत्रों में जिम का विस्तार से करचुके हैं, उस बात को सूत्रकार इम मूत्र में स्मरण कराते हैं ॥१२॥ २९७-युतसिद्धरमानात्कार्यकारंणयो: . . . संयोगविभागौन विवेते ॥ १३ ॥ (युत्त नियमावात् ) जरा हुआ होगा सिद्ध न होने से कार्यकारण यो:) कार्य और कारण में: (संयोगविभागी) संयोग और विभाग ()लही (विद्येते ) होते ॥ कारण मृत्तिका में कार्य घट जुड़ा हुभा मिद्ध कहीं होमकता । लिये घर और मृत्तिका में जो कि कार्य और कारण हैं, संयोग भीर विभाग नहीं शान संफते ॥ १६ ॥ २९८-गुणत्वात् ॥ १४ ॥ गुणात्वात् ) गुण होने में द्रव्य और गुण मुंयोग और विराग नहीं शान सकते ] ॥ १४ ॥ दह-गुणोऽपि विभाव्यते ॥ १५ ॥ ( गुणः ) गुण ( अपि ) भी ( विसाव्यते ) [ शब्द से ? प्रतिपादन किया जाता है। जिम प्रकार घट पर धादि शब्दों से नन के यौँ वा ग्रहण होता है, जो दुव्य हैं; नमी-प्रकार गणवाचक शब्दों से गणों का भी ग्रहण होता है। दम ...

स - सप्तमाऽध्याय ३ आन्हिक "१२३ मे मे रू.प, रस, गन्ध आदि शब्दों से रू.प रम आदि गुणों का ग्रहण किया शास्ता है। इस कारण शब्द और अर्थ में शी संयोग मम्वन्ध नहीं है ॥१५॥ योंकि- ३००-निष्क्रियत्वात् ॥ १६ ॥ { निस्क्रियत्वात् ) क्रिधारहित होने से [शद वा पार्थ के माय संयोग मंबन्ध नहीं है, क्योंकि संयोग तो क्रिया से वत्पन्न होता है। ॥ १६ ॥ और- ३०१-जमति नास्तीति च प्रयोगात् ॥ १७ ॥ ( आमनि ) पासत् पदार्थ में (...) भी ( न अस्ति.) " नहीं है" (इति) ऐमा ( प्रयोगात ) प्रयोग होने में । जो पदार्थ प्राय गहीं है परन्तु आगे होगा, उम वर्तमान में वासंत और भविष्यत में होने वाले पदार्थ का बोध भी शब्द से किया जाता है। यदि श का अर्थ के माथ योग नम्बन्ध होता तो भविष्यत् में होने वाले पदार्थ का 'वर्तमान माद में बोध न होता क्योंकि दोनों मिकालीन है। जैसे जो चहा कल बनाया जायगा और आज वह घड़ा नहीं है तो भी कम को बनने याले घड़े का बोध भाग के उच्चारण थिये हुए प्रद शब्द से होता है । फल को होने वारे घट द्रव्य को बाँध न होता, यदि शब्द मीर में संयो सम्बन्ध होता ॥ २७ ॥ इम' में मिद हुवा कि- ३०२-शव्दार्थावसम्बन्धी ।॥ १८ ॥ ( शब्दार्थी ) शब्द और अर्थ ( अमम्बन्धी ) परस्पर प्रयोग मम्मा रहित हैं ॥ १८ ॥ यदि कहो शिगद और अर्थ में संयोग सम्बन्ध न ही किन्तु :समवाय सम्वय तो मान सकते हैं। ती उत्तर-.. ३०३-संयोगिनोदण्डःत्., समवायिनोविशेषाच्च ॥. १९. ।। (मंघोगिनः ) संयोगी. पुरुष का:( दाहाल ) दगष्ट से ( च.) और (सग. पायिनः ) ममयाय सम्बन्ध वाले का विशेषात् ) विशेष्ठ अवयव से .[ जैसे ग्रहण होता है जैसे शर्थ का ग्रहण शक्षा से नहीं होता.... यदि अर्थ के साथ शब्द का.मयोगसम्बन्ध अथवा समवायसम्बना होती तो अर्थ के साथ शब्द भी प्रतीत हुवा कारता । परन्तु ऐसा नहीं होता। इस वो जाना जाता है कि शिक्षा का पार्थ के साथ सम्बन्ध नहीं है। जैसे हाथी - पोनिक्रदर्शन- सामान बाद का मंड के साथ शव पर विशेष से सम्बन्ध है और दगडी पुरुष का दगड क. साथ संयोग सम्बन्ध है, तब दण्डी पुरुष के साथ २ दगड का शीर कापी के साथ २ उस की सूंड का ग्रह होता है, परन्तु घटदर्शन को माघ २ घट शकद का दर्शन नहीं होता। इन जिये शब्द और अर्थ में न. ती संयोन मम्मन्यः है, न समवाय सम्मन्य है ॥ १९ ॥ प्रश्न-यदि शब्द और अर्थ में दोनों प्रकार का सम्बन्ध नहीं तो शब्द से अर्थ का बोध पयों होता है ? उत्तर- ३१४-सामयिकः शब्दादर्थप्रत्ययः ॥ २० ॥ ( शब्दात् ) शब्द से (अर्थप्रत्ययः ) सार्थ की प्रतीन्ति ( सामपिका.) सांकेतिक है। दार्थात् भाप्त पुरुषों ने जिम शब्द से मिम अर्थ का ग्रहण करना नियत कर लिया, तमी शब्द से तुम अर्थ का ग्रहणा होने लगा है। जैसे फारम देश के लोग माहताब शब्द से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं और अगरेज. लोग मून से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं भोर भार्य. लोग शशी, चन्द्र, कला. निधि, गाङ्क, चन्द्रमा इत्यादि शब्दों से चन्द्रलोक का ग्रहण करते हैं। अस जब एक गाषा बोलने वाले अथवा भनेक भाषा बोलने वाले एक शब्द से अनेक अपों का गौर भनेका शब्दों से एक अर्थ का ग्रहण कर लेते हैं तप किसी शब्द का किसी शर्थ के साथ संयोग वा समवाय सम्बन्ध तो नहीं. रहा किन्तु केवल सांकेतिक सम्बन्ध है ॥ २० ॥ ३०५-एकदिक्काम्यामेककालाभ्यां सन्निकृष्ट विप्रकृष्ठाभ्यां परमपरञ्च ॥ २१ ॥ ( एकदिक्क भ्याम् ) एक ही दिशा में रहने वाले ( एककालाभ्याम् ) एक ही काल में रहने वाले ( सन्निकटविरुष्टाभ्याम् ) समीप और दूर मे. ( परम् ) परत्व ( च) और ( अपरत्वम् ) अपरत्व होता है ॥ यहां से क्रमागत परत्व और अपरत्व की परीक्षा करते हैं - किमी एक दिशा में ममीप पदार्थ को पर कहते हैं भीर सम फी गपेक्षा उसी दिशा में दूरस्थ पदार्थ को अपर कहते हैं। यह देशकून परत्वापरत्व हुवा । दूसरा फालकृत परत्वापरत्न वह है, जो समयको समीप गौर दूर होने से होता है॥२१॥ शब्द मारमाध्याय २ २२॥ ॥ a ३६-कारणपरत्वात्कारणापरत्वाच ॥ २२ (भारणपरत्वात् ) कारण के मरीप होच मे परस्व (घ) और (कारणा-' र त्यास) कारण के दूर होने में पापरत्व होता है । मात् देश भीर फाल यो ममीपना परत्व का कारण है तथा उनकी मी मुरम्यता पपरत्व का मार गाई ॥ २२ ।। ३०७-परवापरत्वयोः परत्वापरत्वाभावोऽणुरवा महत्त्वाभ्यां व्याख्यातः ॥ २३ ॥ { परत्यापरत्वयोः ) परत्व शीर परत्व का ( परत्वापरत्वामावः ) इनरा पात्य शोर परस्य न होना ( अणुत्वमहत्त्वाभ्याम् ) अणुत्व और महत्व माय ( व्याख्यानः ) व्याख्यान किया गया ममझना चाहिये । में गा चुके हैं फि भराव का अणुता और महत्व का महत्व न होता । मी प्रकार मगमगा चाहिये शिपरत्व का परस्य शीर परत्व पर भी नहीं होता ॥ २३ ॥ ३०८-कर्मभिः कर्माणि गुणगुणाः ॥ २४ ॥ ( प.मभिः ) माँ में ( कमांणि ) फर्म, ( गुणेः ) गुणों मे ( गुणाः ) गुण हे शा पके है पाघात २७१ मीर २१५ घे मृत्रों के गनुमार कर्मों में कर्म गौर गुणों से गुग की गारुया ही कुगी है ॥ २४ ॥ मन - मग याय या पदार्थ है? उत्तर- ३०६-इद्रामिति यत: कार्यकारणयोः सु समवायः ॥ २५ ॥ ( यतः ) जिग मे ( पार्यकारणयोः ) कायं और कारण में ( इति ) यह व्यवहार होता है कि ( इह-इदम् } रन में यह है । मः ) बाट ( समवायः) भगवाग कराता है। *में मृत्तिका रूप हारगा में घटम्प कार्य वा घटाप कार्य में मृत्तियार राप्रपारण जिम मम्मन्य में वर्तमान में, उम गम्बन्ध को ममवाय कहते है ॥२५॥ पश-ती ममवार को भिन्न पदार्थ पों माना जावे ? द्रव्य और गुण में ही गिरपी एस को समवाय कौन सगझलें ? उत्तर- ५ । १२२ गौर गुणा वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ३१०-व्यस्त्रगुणत्मप्रतिपंधोभावेन व्याख्यातः ॥ २६ ॥ (इयत्वगुगात्व प्रतिषेधः ) द्रव्यत्व और गुणत्व का प्रतिपेध ( भावेच ) भाव ले साथ ( व्याख्यातः ) व्याख्यात होगा । मार्थात् ३९ गोर ४० वै भूत्रों में जिन प्रकार सत्ता को गुग्ण गौर कर्म में भिन्न मिद्ध कर अरये हैं, इन प्रकार यही जी नमवाय को द्रव्य गौर मे मित समझना चाहिये ॥ २ ॥ प्रश्न-तौ क्या भगवाय में केवा द्रव्यत्व सौर गुणत्व पा निर्षध ही मत्ता से साप यहा गया ! अन्य कुछ नहीं ? उत्तर- ३११-तत्त्वज ॥ २० ॥ ( तत्वम् ) एकत्व और नित्यत्व (च) भी कहा गया है । अर्थात् जिस प्रकार मत्ता एक गौर नित्य है, इसी प्रकार ममवाय भी एक गौर नित्य है ॥ २७ ॥ इस भान्हि क में मरुयादि ५ गुणों और ममवाय मम्बव्य की तगा शब्द और अर्थ में क्या मम्बन्ध है, इम की परीक्षा की गयी ।। इति सप्तमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम् ॥ २॥ इति श्री तुलसीरामस्वामिते वैशेषिकदर्शनभापानवादे गुणसमवायाध्यायः सप्तमः ॥ ७ ॥ -- १ भोइन স্থানাঙ্ক: - प्रथलसान्हिकम् परत्व और पपरत्व की परीक्षा हो चुगी, मागे समानुनार बुद्धि की परीक्षा गारगी है । प्रत्यतादि पद से बुद्धियें पहुन है, जान ती बुद्धि ही का जाम है, पम लिये गम प्रत्यक्ष सात फी परीक्षा का उपग करते ४- ३१२-द्रव्येषु ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १ ॥ (ए) पृषिध्यादि द्रव्यों का विषय में (जालम् ) ज्ञान की ( व्याख्यातम्) प्यार या चुकी ॥ अध्याय ४ शाहिरा १ मृन ६ में कहचुके हैं कि "महत्यमेकद्ध्यवाद् मपाशीसब्धिः" म मृत्र में द्रव्ययिषपमा प्रत्यक्ष जान की व्याख्या की गई पी, जिम फी वहीं १६३ में देख लीशिये ॥ १॥ परन्तु- ३१३-तत्रात्मा सनश्वाप्रत्यक्षे ॥२॥ ( तत्र) लग पृषिठयादि द्रव्यों में ( आत्मा ) जीवात्मा और परमात्मा (१) और ( गतः ) गग ( पात्यो ) प्रत्यन नाही हैं । : ममी टीयाफार म मृत्र के ( प ) गद से वायु, आकाश, पाल, दिगा और परमाणुशों का ग्रहगा करते हैं । तब हम मूत्र या यह अर्थ होता गि " मन में में आत्मा, मग, वायु, शाकाश, काल, दिशा और परमाणु प्रत्यक्ष गदी", शेप पृथिवी भाग पागि प्रत्यक्ष ६ ॥ २ ॥ -प्रत्यक्ष शरन की विधि घतलागी ? उत्तर- ३१४-ज्ञाननिर्देशे ज्ञाननिष्पत्तिविधिरुक्तः ॥ ३ ॥ (माननिदेश) हां जान फानिर्देश दिया है वह (शानिप्पत्तिविधिः) माग प्राप्त की रीनि { ) बनलाई जा चुकी है ॥ १३५ में इन्द्रियार्थमणिकर्ष में प्रत्यक्षा साग यी उत्पति कह चुके हैं, वहीं देग मोशिये ॥६॥ ११ वैशेषिकदर्शन-माधानुवाद प्रश्न-जहां ज्ञान का निर्देश किया है वहां मामान्य में जाननाप्ति की रीति कही गई थी, कृपा करके सविशेप वर्णन कीनिये ? उत्तर- ३१५-गुणकर्मसु सक्षिकृष्टेषु ज्ञाननिप्पनेन्द्रव्यं कारणम् ॥ ४ ॥ ( सन्निकृष्टेषु ) इन्द्रियों के समीप भाये हुये ( गुगाकर्मम ) गुगों और कर्मों में ( ज्ञानिप्पत्तेः ) जान मिद्ध होने से (द्रव्यम् ) द्रश्य ( कारगम् ) ज्ञान का कारण है। यह रूप है, इत्यादि गुणों के प्रत्यक्ष और यह उछाउगा है. न्यादि वामों के प्रत्यक्ष में द्रव्य ही कारण है, प्योंकि द्रव्यों के मानय में ही कपादि गुण और उछलना आदि को प्रत्यक्ष होते हैं ॥ ४ ॥ शीर- ३१६-सामान्यविशेपेषु सामान्यविशेपा- मात्रात्ततएव ज्ञानम् ॥ ५ ॥ (सामान्य चविशेषेषु ) सामान्य और विशेषों में ( सामान्य विशेषातायात्) दूमरा नामान्य और दुनरा विशेष न होने मे ( ततः ) उस ने ( एव ) ही ( ज्ञानम् ) जान होता है । सामान्य सत्ता (होना) और उनके विशेष - द्रव्य होगा, गुगा होगा, कर्म होना, पृथिदी होगा, रूप होना, उछाल होना; इत्यादियों में लग के प्रत्यन पा कारण वे स्वयम् ही है अपोह उन फो नत्ता का भाग माक्षात् नहीं होता है ॥ ५॥ प्रश्न-फिरा की अपेक्षाचे द्रव्यगुणाकर्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है ? उत्तर- ३१७-सामान्यविशेषापेक्षं द्रव्य गुणकर्मसु ॥ ६ ॥ (द्व्यगुण कसु द्व्या, गुगों शीर कनों के विषय में ( नानान्यविशेषापेक्षम् ) सामान्य विशेष की अपेक्षा से [ज्ञान त्यात होता है | अर्थात् यह अनुक द्रव्य है, यह अमुक गुण है और यह शमुक कर्म है, ऐसा विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है॥६॥ उम में भी- ३१८-द्रव्ये द्रव्यगुणकर्मापेक्षम् ॥ ७ ॥ (द्रव्ये ) द्रव्य विषय में ( द्रष्यगुणाशर्मापेक्षम् ) द्रव्य गुण और आने की अपेक्षा वाला [ ज्ञान उत्पन्न होता है ]॥ ५॥ परन्तु- . एमाध्याय १ अनिलक ३१९ - गुणकर्मशु गुणकर्माऽभावादगुणकर्मापेक्षं न विद्यते ॥८॥ ( गुणन.मग ) गुणों और फगाँ ( गुगाफाऽभावात् ) दुनरे गुण फर्म करने में ( गुगागांपेज ) गुणों शीर फगाँ की अपेक्षा वाला [ जान ] ( 1 ) न ( विद्यते ) होना है ॥ ८ ॥ नदाहरण- ३२१-ममनायिनः त्याच्छ्वत्य बुद्धेश्वरनेते बुद्धिः, ते एने कार्यकारणभूते ॥ ६ ॥ { मायिनः ) मगवायी द्रष्य को (शोत्यात ) श्वेत होने से (घ) और { पीयर ) प्रोन पोशाग मे ( श्येत्ते ) श्वेन द्रव्य में (बद्धिः ) धाग PrTTATE, ( )घे दोगों (ने) ये ( कार्यकार गाते ) कार्यरूप पोर कर॥ मान चांदी बार शादि ग ग श्येता गुगा से नमवाय संबन्ध रगरी, मी येत होने में और ज्यता के सात से नग श्वेत द्रव्यो में पान मत होता गि, याद गर नांदी है। या यार त शम १ मा दाना-नता तारन मोर २-श्वेत चांदी शान्दि फा Earti र कारमय गति तना ( मोदी ) पारगजान है oft नादि का कार्य पर स्तु- ३१-द्रव्येननितरेतर कारणाः ॥ १० ॥ { दृश्य ) ने द्रों को अनेक माग रूपन्ना होते हैं वे ] (मिनरेनपारा: ) प गर म कारण नहीं होते ॥ २० ॥ पां कि- २-कारणाऽयोगपक्षात्कारमामाच घटपटादिबुद्धीनां क्रमी, न हेतुफलभावात् ॥११॥ { पार गगनात मी फार गायक नाथ उत्पात न होने से (च) जीर (मार क्रमात ) यारणों के ग्राम में ( चटपदादिगुदीनाम् ) घट पट गादिनों में { in ) मागापीछी है। () फि ( हेतुफलावात् ) nirm का पाने में न पदिगो प्रथम घर का साग हो, सात पद का ज्ञान हों, तो दागों जान मन धो कार्य कारण नहीं है, किन्तु जाग गो पारण ही f १३२ वैशेषिकदर्शन-मापानुवाद भिन्न २ एक दूसरे के पश्चात् होते है, इस लिये जान भी एका दृमरे के पद्यात होते हैं, न कि एका कारण शोर दृमरा उन का फायदाने से ॥ ११ ॥ इस मान्हिका में दव्य गुण कर्म और सामान्य में जो प्रत्यमा ज्ञान होता है, वह परीक्षापूर्वका वर्णन किया गया । इत्यष्टसाध्यायस्य प्रयममान्हिकम् अथ द्वितीयमाहिकम् व शान के प्रकार का उदाहरगा देते हैं ३२३-अयमेष त्वया कृतं भोजन मिति बुल्लापेक्षम ॥ १ ॥ ( शय ) यह है, (एपः ) वह है, ( त्वया कृतम् ) तूने कर्म किया, (एनं भोजय) इम को भोजन कराओ (इति) कम प्रकार का जान (युद्धापेक्षम् ) भिन्न २ बुद्धियों से होता है ॥ १ ॥ प्रश्न-यह है, तूने कर्म किया, एम को सोजम कारापो, इत्यादि भगक्ष- वर्ती पदापों से तो प्रत्यक्ष ज्ञान हो मझता है परन्तु “बह यहां है" इत्यादि परोक्षवर्ती पदाथों में प्रत्यक्ष जान मैंने हो मकाता है ? उत्तर- ३२४-दृष्टेषु भानादऽदृष्टेस्वभावात् ॥ २ ॥ ( दृष्टेषु ) जागे हुए विपयों में [ भावात् ) होने से ( दृष्टेषु ) विगा जाने विषयों में (नावात ) न होने में । शर्थात हम जिन परोक्ष विषयों का निर्देश पारते हैं कि वह वहां है, इत्यादि । सो पहिले देखे, जाने, विषयों में निदेशा करते हैं, इन लिये परोक्ष विषयों में भी " वह वहाँ है " इत्यादि निर्देश प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही मनझना चाहिये, पोंकि अदृष्ट अर्थात शिन के माथ हमारी ज्ञानेन्द्रियों का मम्बन्ध नहीं हुवा, चन को हम यह, वह, इत्यादि प्रकार से व्यवहार नहीं करते ॥२॥ " अर्थ " शब्द में किम शा.ग्रहण मारते हो ? उत्तर- ३२५-अर्थ इति द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ३ ॥ ( द्रव्यगुणकर्मसु ) द्रव्यों, गुणों और फलों में ( अर्थः ) (इति) ऐसा व्यवहार करते हैं ॥३॥ ३२३-द्रव्येषु पञ्जात्मकत्वम् ॥४॥ प्रश-तुन भई में । पाएमाऽध्याय २ आन्हिक १३३ (द्रव्येषु ) कार्य द्रव्यों में (पञ्चात्मकत्वम् ) पञ्चात्तत्त्वात्मक होना [ कहा गया है] यद्यपि २१२ भौर १७४ पञ्चात्मक पीर यात्मया का निषेध कर चुके परन्तु १९५ 19 में घुम है कि "संयोग का निषेध नहीं है" एम लिये मारा पता महमा पूर्या पर विरुद्ध नहीं है ॥ ४ ॥ जीमे- ३२७-नयाबाद गन्धकत्त्वाच पृथिवी गन्धज्ञाने प्रकृतिः ॥५॥ (यस्त्रात ) याहुन होने के (च) और ( गन्धवश्वात ) गन्यमी होने मे ! पुगियो ) पगिधीतस्त्र ( गन्धपाने ) गत्य के धान पाराने वाले गामिका पगिता में (प्रतिः ) नपादाम कारगा है ॥ ५॥ तमा- ३२८-तयापरनेजोत्रायुश्व स्मरूपम्पर्शज्ञानेऽविशे पाद ॥६॥ ( सपा ) रमी प्रकार (विशेषात ) मगाम होने में (रम, सप, स्पर्श, जाने ) २१, रा.प, और मार्ग के शान पाने वाले रगंगा, चक्षु और त्वचा इन्द्रियों में [ का ] ( पापः ) तत्व, (तेजः ) अग्नितत्व (च) और ( बायुः ) वायत्री उपादान मारण] ॥ तिम प्रकार गापिका सन्द्रिय में सृषिधी उपादान नारगा है, इमी प्रकार रममा इन्द्रिय में गला, चहा इन्द्रिप में शनि और त्वचा इन्द्रिय में वायु उपादा हारण हैं ॥६॥ इस द्विगीय मामि में शान, कान का प्रकार, पृन्द्रियों के कारण भीर अर्थ " म मा वर्णन दिया गया ॥ इति अष्ठमाध्यायस्य द्वितीयमान्हियाम् ॥ २ ॥ इति को तुलसीराम स्वामिते, बैशेषिकदर्शनमापानुवादे ज्ञानाऽध्यायोऽष्टमः ? अथ नवमोऽध्यायः तत्र ५ - प्रथनमान्हिक प्रश्न -ये प्रणिधी जादि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व मत् थे वा ममत् ? उत्तर- ३२--क्रियागुणव्यपदेशाऽभावात् प्रागऽसन् ॥ १ ॥ ( क्रियागुगाव्यपदेशाभावात् ) क्रिपा और गुण का व्यवहार न पाया जाने से ( प्राक् ) उत्पत्ति से पूर्व ( असत् ) अभावरूप थे ।। : यदि कार्य द्रव्य उत्पत्ति से पूर्व विद्यमान होता तो कोई क्रिया और कोई गुण उस का, पाया जाता, नहीं पाया जाता, इस लिये प्रागामात्र जालना- ठीक है:॥१॥ प्रश्न- यदि कार्य पदार्थ उत्पत्ति से पूर्व नत नहीं था तो कारण की क्रिया से उत्पन्त कैसे हो सोगा ? क्योंकि हम देखते हैं कि तिनों में तेल है, इम लिये उन से उत्पन्न होता है तथा बालू में तेल नहीं है, इस लिये उम से उत्पन्न नहीं होता ? उत्तर- ३३०-सदासत् ॥ २ ॥ ( सत् ) कारणरूप से भाव मौर ( असत् ) कार्य रूप से पसाब [उत्पत्ति के पूर्व होता है ॥ २॥ प्रश्न - यदि प्रत्येक कार्य उत्पत्ति से , पूर्व कार खरूप में वर्तमान पा तौ उस की उत्पत्ति मानने का क्या लाभ है ? उत्तर- ३३१---असतः क्रियागुणव्यपदेशाऽभावादर्थान्तरम् ॥३॥ ( असंतः) असत् के (क्रिघागुणाव्यपदेशासावात ) क्रिया और गुणों का व्यवहार न पाये जाने से [ सत् पदार्थ ] ( अर्थान्तरम् ) अन्य पदार्थ है ॥ शर्थात् सत् असत् एक नहीं होमक्ते, असत् कार्य विषय में कोई क्रिया बा कोई गुण नहीं पाहा देखा माना जाता और सत्कार्य किया पीर गुग्ध नवगाध्याय १ आशिक १३३ दे रहो और गाने नाते हैं । म लिगे अगत् (दत्पत्ति से पूर्व) की अपेक्षा Pा या मार्य पदार्थ nिt ॥ ३ ॥ २३२-~सच्चाऽमन् ॥ ४ ॥ ( मत्त ना हुदा [भी कार्य पदार्थ ] ( च ) फिर=नाग के पश्चात् समत ) मत नहीं माना ॥ ४ ॥ २३. अचाऽन्यदऽसदतस्तदाऽसत् ॥ ५॥ (1) गीर ( मा । जो पदार्थ ( शतः ) इम पूर्वोक्त ममत् आय- शिश में ( 1 ) विलक्षा=it तीनों साल में ( अमृत ) न होवे, वाह (भारत) मा मान् यांनी पदार्थ स्पोने से पूर्व मत् और नत्यन्न होकर मत् हैं,ये नीमा गति है और जो कभी भी नत्तात्मक नहीं,वे अमत् ॥५॥ ३३१-अलदिति भूतप्रत्यक्षाऽमाबाद भूतस्मृतेविरोधिप्रत्यक्षवत् ॥६॥ ( TET ) अवनी ( इति ) ऐमा शो जान है, वह ( भूतप्रत्यक्षा- गावात ) पदाचं या प्रताप ने मे [परन्तु] (भूनस्मृतेः) हुये पदार्थ कारयनिगी राम ( विरोधिप्रत्यक्ष यत् ) विरोधिप्रत्यक्ष के नगान है ॥ बीमे का विरोधी मत का प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही जो होकर घिर गई, ग में न रहने पर प्रत्यक्ष न होने पर भी, होते हुये नगर ती त यी पाने में साग राता है ॥६॥ - तयाऽभाने मात्र प्रत्यक्षत्वाच ॥ ७ ॥ (नया) मी प्रसार ( Rभाव ) शशाव-गमत् में, (च) भी ( भावruaran) गत को प्रत्यक्ष होने में [जान होता है ] ॥ पास मतिका घद वगा, फिर पूट दूर कर मृत्तिका होगया, तत्र शविर आपने झारण में लीन होगाने ( समाव होगाने) पर साव (मृतिमा) के प्रत्या होने में भी पूर्वप्रत्यक्षीकृत घट का मान होता है ॥ ३३६-एननाऽचटोऽगौरऽधर्म ग्राख्यातः ॥ ८ ॥ 4 , वैशेषिकदर्शन सापानुवाद । एतेग ) इस से ( अघटा) घट का अभाव अघट, ( आगीः ) गी या अनावअगी (घ ) और (अधर्मः) धर्म का विरोधी धर्म (व्याख्यातः) व्याख्यान किया गया ॥८॥ परिमापा- ३३७-अनूतं नास्तीत्यनर्थान्तरम् ॥ ६ ॥ ( भूतम् ) नहीं हुवा है, ( न अस्ति ) नहीं है, ( इति ) ये दोनों (अनन्तरम्) एक दुमरे से शिन्न नहीं है एक ही बात हैं । अर्थात् गभूत और नास्ति दोनों एकार्थी हैं ॥ ६ ॥ जैसे- ३३८-नास्ति घटोगह इति, सतो घटस्य गेहसंसर्गप्रतिषेधः ॥ १० ॥ (गेहे ) घर में ( घटः ) घट ( न अस्ति ) नहीं है ( इति ) इस बाथन में ( सतः ) होते हुये (घटस्य ) घड़े फा ( गेहम मर्गप्रतिपेपः ) घर में संसर्ग न होना अभिप्राय है ॥ १०॥ यहां तक वाह्य न्द्रियप्रत्यक्ष की परीक्षा फही, मागे मानसिक प्रत्यक्ष का वर्णन करते हैं:- ३३६-आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मप्रत्यक्षम् ॥११॥ ( सात्मनि ) जीवात्मा में (बालमानसोः ) जीवात्मा भीर गन के (संयोगविशेषात् ) योग की विधि से विशेष संयोग होने मे ( आत्मप्रत्य.. क्षम् ) मामा-अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है ॥ ११ ॥ ३४०-तथा द्रव्यान्तरेण प्रत्यक्षम् ॥ १२ ॥ ( तथा ) इसी प्रकार (द्रव्यान्तरेषु ) अन्य सूक्ष्य प्रकृतिपर्यन्त द्य्यों में ( प्रत्यक्षम् ) प्रत्यक्ष अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १२ ॥ प्रश्न-योगी दो प्रकार के हैं-१- जो सदा समाधि लगाये रहे, २- जो कमी २ समाधि लगावें, इन दोनों में किस को अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है ? उत्तर-- ३४१-असमाहितान्तः करणा उपसंहृतसमाधयस्तेषां च ॥१३॥ जो ( असमाहितान्तःकरणाः ) सदा अन्तःकरण का समाधान नहीं करते-कमी २ करते हैं ( 1 ) और ( उपसंहृतसमाधयः ) समाधि का उप. संहार आन्त कर चुके हैं (तेषाम्) उनको [मात्मा का प्रत्यक्ष होता है ] ॥१३॥ 4 .

नवगायाय २ आन्हिया ३४२-तत्समबायामागुणेषु ॥ १४ ॥ (स्मरणात ) [ जिन मृभगव्यों का प्रत्यक्ष होता है ] उनको सम- धागमस्या ( कामे गो) [ नग २ द्रव्यों के ] कागों और गुणों में भी प्रत्यनजाता ॥ २१ ॥ ३४३-अलसायादानगुणेषु ॥ १५ ॥ ( सागात ) जीवात्मा के साथ ममवाय मम्वन्ध से (शास्त गुणे) भारमा (गरवादि वा सुखदुःशादि] गुणों का [प्रत्यक्ष हो जाता है] ॥ के बारमा न यद्यपि गुरदुःणादि में भगवाय सम्बन्ध वा नित्य- म् न है, पर गनपति आत्मा को निय यहां आत्मा शब्द का व्यव. करो, या शामा त गुणों में सुख दुःखादि का ग्रहण न करको, सबा गाना का ग्रहण यारी बवचन को विवक्षित जानो ॥ १५ ॥ शिपूर्ण गार गा गत होगा, प्रत्यक्ष होना, शीर योगियों का REET, आग में वर्णित किया गया । इनि नत्रमाऽध्यायन्य प्रथमगाहिकम् ॥ १॥ १० ॥ र द्वितीयमान्टिकम् मत्ती परीक्षा का भार अब मार्ग निकाल यी परीक्षा का मारमा मारत 522-अमग काय, धारणं, संयोगि, विरोधि, समवाधि, वेति ले जिताम् ॥ १ ॥ (मा) का { अदम् ) यन (माय ) हार्य है, ( कारगम् ) चारण है( मंगागि ) मंगोगी है, ( बिरोधी ) विधी ( च ) और (मगवायि) दामा गिगारो वाला है। ( अनि ) इन सो ( लैङ्गिपाम् ) लिङ्गोल्पन्न सान पानी ॥ पायांना कार्याचार हार का, गारगा को देख पार मार्गमा, योग की देकर मयोगी का विरोध का नशा विरोधी मा और भगवाग को देगा गार पानी का मानता है, उगमा लेङ्गिक आनुमानिक धान कान १८ .

वैशेषिकदर्शन- भाषानुवाद
१३८
३४५-अस्येदं, कार्यकारणसम्बन्धशाऽवयवावति ॥ २ ॥
( णस्य ) इस लिङ्गी का ( इदम् ) यह लिङ्ग है, (घ ) और ( कार्य.
कारणसस्बन्धः ) कार्यकारणसम्बन्ध है, [ यह शान ] ( अवयवात् ) उदाह-
रण रूप एक देश से ( भवति ) होता है ॥ २ ॥
३४६-एतेन शाव्दं व्याख्यातम् ॥ ३ ॥
( एतेग ) यस व्याख्याग से (शान्दम् ) शाब्दछान शी ( व्याख्यातम् )
व्याख्यात होगया॥
जिस प्रकार लिङ्गलिङ्गिमम्बन्धज्ञानपूर्वक लिङ्गलानोत्पन लैङ्गिक जाग
की व्याख्या की गई है, घनी प्रकार शब्द और उस के अर्थ तथा मस्तन्य
हे ज्ञानपूर्वक-शब्द ज्ञान से उत्पछमानशान ज्ञान का भी व्याख्यान
समझ लेना चाहिये ॥३॥
३४७-हेतुर पदेशो लिङ्गप्रमाणं करममित्यनर्थान्तरम् ॥४॥
( हेतुः ) हेतु, (अपदेशः ) x पदेश, (लि ) लिक, ( प्रगाणं ) प्रमाण
और ( धारणं ) करण ( इति ) ये ( अनन्तरं ) एकाई हैं।
हेत्वादि शब्द इम श स्त्र में एकार्थक हैं ॥ ४ ॥
३४-असमेन्द्र निति बुरक्षितत्वात् ॥ ५ ॥
( अस्य ) इस लिङ्गी वा इन्न कार्य का ( इदं ) यह लिङ्ग वा कारण है,
( इति ) यह बात ( बुबो दिव तत्त्वात् ) बुद्धि की अपेक्षाकृत होने से [ हेतु
आदि एकार्थक है]५ ॥
प्रत्यक्षजात, लिङ्गनमान में जान और अतोपदिष्ट शब्द से ज्ञान,
यह ३ प्रकार का साग परीक्षपूर्वक बताया गया,आगे स्मृति ज्ञान की परीक्षा
करते हैं:-
३४६-आत्मसनसोः संयोगविशेषात् संस्काराच्च स्मृतिः ॥६॥
( आत्ममनसोः ) जात्सा और मन के ( संयोगविशेपात् ) विशेष संयोग
से (च ) और ( संस्कारात् ) संस्कार से (स्मृतिः) स्लरमा ज्ञान होता है ॥६॥
३५०-तथा वनप्लः ॥ ७ ॥
( तथा ) इमी प्रकार आत्मा और मन के संयोग विशेप तथा संस्कार
( स्वप्नः ) स्वप्नज्ञान होता है ॥ ७ ॥

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नवमाध्याय. शानिहका
१३
३५१-स्वप्तान्तिकम् ॥ ८ ॥
( मानन्तिकम् ) स्वप्नाऽयम्पाविषयक अन्य स्वप्नदृष्ट पदार्थों का ज्ञान
[ भी पाना और मन के.विशेष मुंयोग और संस्कार में होता है ] ॥८॥
Pा म्युतिमान और स्वतगई पोद पाया जाता है, और कारण
दोनों मार एक है, अथांत भात्या और गन के संयोग विशेप मे तथा संस्कार
या मुनिकती है, जीरही कारणों में स्वप्न होता है, तया स्मृति और
म्यान्न की दो पगों , सही पर नहीं ? उत्तर-
३५२-धर्माच ॥ ६॥
{ धर्मात ) से (घ) की सप्लाजान होता है ] ॥
धर्म शब्द के शालीमा धातु विकारादि विवक्षित है। कामी पुरुष सीता
है, ना न्वा में 11 मंजारवा येमा देखता है, परन्तु बहुत से मे स्वप्न भी
दो निता तात्कालिका सरकार नहीं होता। जैने आपला भामाश
में, में प्रवेश मारना, मुत्रर्ण, पर्वत, उदय होते सूर्य का दीखना,
गर्मी माह तागादिया गिरना, इत्यादि प्रचार को स्वप्न शरीर को धर्म
arnनिकादियोगों के प्राबल्य वन्य में होते हैं। हम लिये स्मृतिजा
है नारी स्वनाम के फारगा शन्य भी है, यही कारण है कि स्मृति
तथा स्वत नहीं है। मक्तं ॥ ६ ॥
गृति की परीक्षा मी, अब अविद्या की परीक्षा करते हैं:-
३५३-इन्द्रियदापार संगकारदीपाचाऽविधा ॥ १० ॥
(दिपकपात ) पांव मान शादि इन्द्रियों में कोई दोप होने से
( 1 ) गीर ( मंधकामदापात ) गंमशाररूप दोष में [ और धर्म अधर्म आदि
में ] ( पाविद्या ) विपरीत जान होता है ॥ १० ॥
३५४-तद् दुष्टज्ञानम् ॥ ११ ॥
( तत्त) का अविद्या ( दुष्टज्ञानम् ) दोपयुक्त ज्ञान है ॥ ११ ॥
३५५-अदुष्टं विदना ॥ १२ ॥
( पादुष्टम् ) निदान शाग ( विद्या ) विद्या कहती है ॥ १२ ॥
३५६-आप सिद्धदर्शनं च धर्मभ्यः ॥ १३ ॥

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नवमाध्याय. शानिहका
१३
३५१-स्वप्तान्तिकम् ॥ ८ ॥
( मानन्तिकम् ) स्वप्नाऽयम्पाविषयक अन्य स्वप्नदृष्ट पदार्थों का ज्ञान
[ भी पाना और मन के.विशेष मुंयोग और संस्कार में होता है ] ॥८॥
Pा म्युतिमान और स्वतगई पोद पाया जाता है, और कारण
दोनों मार एक है, अथांत भात्या और गन के संयोग विशेप मे तथा संस्कार
या मुनिकती है, जीरही कारणों में स्वप्न होता है, तया स्मृति और
म्यान्न की दो पगों , सही पर नहीं ? उत्तर-
३५२-धर्माच ॥ ६॥
{ धर्मात ) से (घ) की सप्लाजान होता है ] ॥
धर्म शब्द के शालीमा धातु विकारादि विवक्षित है। कामी पुरुष सीता
है, ना न्वा में 11 मंजारवा येमा देखता है, परन्तु बहुत से मे स्वप्न भी
दो निता तात्कालिका सरकार नहीं होता। जैने आपला भामाश
में, में प्रवेश मारना, मुत्रर्ण, पर्वत, उदय होते सूर्य का दीखना,
गर्मी माह तागादिया गिरना, इत्यादि प्रचार को स्वप्न शरीर को धर्म
arnनिकादियोगों के प्राबल्य वन्य में होते हैं। हम लिये स्मृतिजा
है नारी स्वनाम के फारगा शन्य भी है, यही कारण है कि स्मृति
तथा स्वत नहीं है। मक्तं ॥ ६ ॥
गृति की परीक्षा मी, अब अविद्या की परीक्षा करते हैं:-
३५३-इन्द्रियदापार संगकारदीपाचाऽविधा ॥ १० ॥
(दिपकपात ) पांव मान शादि इन्द्रियों में कोई दोप होने से
( 1 ) गीर ( मंधकामदापात ) गंमशाररूप दोष में [ और धर्म अधर्म आदि
में ] ( पाविद्या ) विपरीत जान होता है ॥ १० ॥
३५४-तद् दुष्टज्ञानम् ॥ ११ ॥
( तत्त) का अविद्या ( दुष्टज्ञानम् ) दोपयुक्त ज्ञान है ॥ ११ ॥
३५५-अदुष्टं विदना ॥ १२ ॥
( पादुष्टम् ) निदान शाग ( विद्या ) विद्या कहती है ॥ १२ ॥
३५६-आप सिद्धदर्शनं च धर्मभ्यः ॥ १३ ॥

rism
अथ दशमोऽध्यायः
।
प्रथयसाहिवार
३५-अष्टानिष्टकारा विशेषाद्विरोधाच मिथः
सुखदुख पोरान्तम्भावः ॥ १ ॥
(मानिकारणविशेषात) इट और हानिष्ट विशेष शारगा में (घ) ओर
( मिथः ) पारे में { विरोधात ) विशेष ने मि है शि] (सुखदुःपाः)
मुए पीर दुःr में ( भागांना ) म परे ग मिला है ॥ १ ॥
29-मायनिर्णयान्तराभाना ज्ञानान्तरले हेतुः ॥ २ ॥
() iit ( शनिवारा ) नाय शीर निर्णय को बीच में
पाय मग नहीं , [मुष या दुःन गिग में भगझे जार में यही (शाना
दुरद भिन्न मन में (तुः ) कारण है ॥ २ ॥
By:-नयोनिप्पत्ति: प्रत्यक्षलगिकाभ्याम् ॥३॥
(नगो:) उन मुन दायों की (निप्पत्तिः स्पति (प्रत्यक्षले शिक्षायाम् )
R: सीप वागार में होगी।
शिम मातार इन्द्रियार्थ मंगिक ये और लिगे प्रत्यक्ष नीर
सायमा, एमी प्रकार चाहे विषय दो नानीग से वा गर
मा मिसी प्राप्ति गी प्राधा विनाने वाले चिन्हों में उग्न दुःरा उत्पन्न
r
.
अनुमग
३३०-अनूदित्यपि ॥४॥
( ) मनताल में भरा था ( इति ) म से (अपि) और वियत
में होगा, कप में मुला और दुःस की वापति होनी है] ॥
गुयान मान गुरमाधों में सुप और दुःसमापनों में दुःख होता है सी
होना त्रिष्यत्तियों को उनकी माया होता है ॥ ४ ॥
३३१-सुदिप कार्यादर्शनात् ॥५॥

॥ . शैपिकदर्शन-पानुवाद (च) और ( सति ) सुख वा दुःख के होते हुवे ( कार्याऽर्शनात्. सुख' का दुःसह का कार्य न देखने में भी जाना जाता है. शि सुषु वा दुःख है]. . अर्थात् सुख से मुख बन्न होता है, दुःख से मलिन होता है, जब सुख. वर्तमान हो तब मुखमालिन्य नहीं देखा जाता और जब दुःख हो तव मुख की प्रसन्नता नहीं दीख पड़ती ॥ ५ .. ६६२-एकार्थलमनायिकारणान्तरेषु दृष्टत्वात् ॥६॥ ( एकार्थचमवाचिकारणान्तरेषु ) एक पदार्थ. में समवेत सिन्न २. कारणों ( दृष्टत्वात् ) देखा जाने से [ सुख और दुःख भिन्न २ हैं . शिस को एक अर्थ कहते हैं, उन में भी अपेक्षाकृत फिर विशेषक्षेद होता है। इस प्रकार सुख दुःख के एकार्थवत्तौ भी अनेक कारण होते हैं, एक नहीं,, उन में से कोई सुख का और कोई दुःख का कारण हो जाते हैं ॥ ६ ॥ ३६३-एकदेश इत्ये कस्मिञ्छिर: पृष्ठमुदरं मर्माणि, तद्विशेणस्तद्विशे पेभ्यः ॥ ७ ॥ ( एकस्सिन् ) एक शरीर में ( शिरः, पृष्ठम्, उदरम्., मर्गाणि ) शिर, कामर, पेट, मर्मस्थान ( इति ) ऐसा व्यवहार ( एकदेशे ) शरीर के अवयवों से है । (तविशेषः ) उन शिर जादि विशिष्ट कार्यों का विशेष (तविशेषेभ्यः) का के विशेष कारणों से होता है॥9॥ इस जान्हिक में अपने २ पारणों की विभिनता से सुख भौर दुःख. का. परस्परक्षेद और जान से भेद कहा गया ॥ इति दशमाऽध्यायस्य प्रथमपान्हि कम् ॥१॥ अथ द्वितीयमान्हिकम् ३६४-कारणमिति द्रव्ये, कार्य समवायात् ॥ १ ॥ ( कारणं ) कारण है, ( इति ) ऐना व्यवहार वा प्रतीति (द्रव्ये) द्रव्य में होती है, पयोंपिक ( कार्यसमवायात् ) कायौं या समवाय सम्बन्ध [ नव्यों में ही होता है ] इस कारण से । . A

दगमााध्याय १ आन्दिा
काश में भेद से मार्य में भेद होता है, और कारण तीन ३ प्रकार के
होते हैं, १. भगवागी, २ अमनलागी, ३-निमित्त । इन तीनों में से लगवायी
कारण ( नपादाग ) फी परीक्षा करते हुये आचार्य एम सूत्र में बतलाते हैं
शिकायं पदागों का मावाप-प्य में होता है, इस पारण द्रव्य में ही उपा.
दस गाता या व्यवहार होता है ॥ ॥
२६५-संयोगाढा ॥ २॥
(Ar} अपवा। मंयोगास ) मंगोग में भी पाया जाता है कि पा.
दास का दृश्य में ही ३ २ ॥
३२६-कारणे समवायारकर्माणि ॥३॥
(4) कारणउपादान में। मुगवायात ) समत होने से (कर्माणि)
का पी [हारगोशाते ६] ॥ ३ ॥
३६-तथा रु वारपणे कार्यसममायाच्च ॥ ४ ॥
( ARE ) मी मार (हार का नयाय त ) कारगौरूपदार्थ के सम.
वागमन में सो गादि गुग्गों में (च) भी पार गाता का व्यवहार है] ॥
यात हा पदार्थ को मसीपना से कर्म में कारणता का व्यवहार है,
मी प्रकार मार कार्य की समीपता से रूप और उपलक्षण में अन्य गुणों
हा हा व्यवहार होता है ॥ ४॥ उदाहरण-
२८-कारणासमवायासंयोगः पठस्य ॥ ५ ॥
( या गा गमवायात ) पादान फारणातुओं के समवाय से (संयोगः)
मंयोग { स्प) वन मा [सारण ] होता है। ५ ॥
३६९-कारणकारगासमवायाच ॥ ६ ॥
(2) भोर ( कारगा शारखममघायात ) धारण का कारण समवेत हाने
में [ मंयोग की कार गत्ता होती है ॥
में राम मई को गांठ दृमरी कई यी गांद में मिली जाते ती गहन
परिमाण सायं नत्पादना। हाब देखना होगा कि सो अवस-टुकड़ों
में मर गी गांठ बगी, फिर मई की गांठों के अघयत्र मिलने ( संयोग )
महत्यारापान बना, तत्र फारशा के कारगा या नगवाय दुबा अर्यात रुई को
सायनों में गांट, गांवों में मात्र यार्य उत्पन्न सुधार ॥ ६ ॥

म । १४४ शिविफदर्शग-पापायाद मगवामी जीर प्रमप्राप्त आमगामी मारगों की माला कद मुके आगे निमित्त कारगा की परीक्षा फारसे, समलिग उनका RITERT करते ३- ३७१-संयत्ता समाचादग्नीपिकम् ॥ ७ ॥ ( संयुक्तममवायात् ) संयोगमन्नतु मायाय में (गः ) अशिया (. शपिकाम् ) विशेप गुगा २ाना गारगा ] ॥ पाक से उत्पन्न रु.पादि रङ्गादि कागाँ में शशि निगिया मारण, पो अपने संयुक्त मगवाय में गरगी पहुंचा गार किमी वस्तु पर राम नत्पन्न कार देना है। अपना विशेष गुगा अग्नि में गरमी गाणी, नम गुण का माय द्रव्य शग्नि है, उम आणि या मंपोग पाने वाले फल पुयादि में है, वहां अनि और फलादि के मगवाय से पाने में उत्पन्न होने वाले रहो की, जो पायाज है, उत्पत्ति होती है। प्रम उत्पत्ति में समादिया उपादान गारण भगवायी हैं, तेज का संयोग पर मनवायी कारगा है, गरगी का और अन्य अदृष्ट कारण गिल कर मव निमित्त सारण ॥ ५ ॥ पदाथों का उद्देश शोर परीक्षा की जा चुन्ती, शिग के बयान में मुक्ति होती है । तत्त्वज्ञान धर्म विशेप मे होना है, विशेष वैदिक कमी के करने मे, वैदिसफर्मजन्य पुगय नम से वापर अत्यमा वादा में बनना है। तव माहीं वैदिक कर्मानुशानियों को दृष्ट पाल के न पाने में कामदा न हो जाचे, हम लिये कपालु वाणाद नुनि अत्यन्त मातुः इत्या मारते हुवे, विद्या. र्थियों को विधान दिलाते हैं कि- ३७१-दृष्टानां दृष्टप्रयोजनानां, दृष्टाऽमाने प्रयोगोऽभ्युदयाव८ ( दृष्टानाम् ) [वेद में] देसे हुये ( दृष्टमशेजनानाम् ) भिन पापोजन इम लोक में ही दीखता है, उन सा नपा (दृष्टामाव) व दृष्ट ऐहिश फर न मिले तब भी ( प्रयोगः ) अनुष्ठान करना ( अरयुदयाय } पारलोकिसफल यो लिये [गाननीय है] ॥ ८॥ ३७२-अदबुद्धिस्यो लिङ्गमः ॥ ६ ॥ (स्मद्बुद्धिभ्यः) हग मवमाधारगों में शानों में (पेः) वेद को प्रकाशक मानदाता ऋपि परमात्मा की ( लिगन् ) पहचान होती है । यदि परमात्मा ज्ञान न देता तो मनुष्यों को ज्ञान न होता। गनुप्पी फो ज्ञान है, यह परमात्मा के शानदान की पहचान है। lin दशमाऽध्याय २ आन्हिक १४५ - ३७६-तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ १० ॥ (तद्धनात् ) उस वेदप्रकाशक प्रपि ( एक मात्र ऋपि-परमात्मा ) के उपदिष्ट होने मे (जामायस्य ) वेद पगवान् का (मामाययम् ) स्वतः प्रामा- पथ६॥ १०॥ समदायी शमनवापी पौर निमित्त कारणों और कार्यों की परीक्षा जौर चंदों का मागागप इन द्वितीय शाहिक में कहा गया । इति दशसाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकाम् ॥ २॥ इति दशमाऽध्यायः ॥ १० ॥ समाप्तं वैशेषिकदशनम् इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते वैशेषिकदर्शनमापानुवादे सभाप्ये दशमोऽध्यायः ॥ १०॥ want १० ओ३म् স্বাত্বিল্পায়ামাহুলুধ্বঙ্কিা ९ २ १२ स-१ अ०आ०सू० २१३ अग्नेरुज्वलनं० २७३ आणुत्वमहत्त्वयोः० 9 १ ९४ २७५ अणुल्बमहत्वाभ्यां० ७ १ १६ .२१० अणु महदिति ७ १ १९ १३३ अणु संयोगस्त्वयति ४२५ २६७ रणोहितश्चोपल ७ १ १२२ अज्ञानाच २६ अलोविपरीतमणु । ७ १ १० १ अथातोधर्म व्याख्या० १ १ १ ३५५ अदुष्टं विद्या २५५ अदृष्टाच २ १३ ६१ अद्रव्यत्वेन नित्यत्व० २ १ १३ ५९ अद्रव्यवत्वेन द्रव्यं० २ १ १९ १६१ अनित्य इतिविशेषतः०४ १ ४ १०१ अनित्यश्चायं कारणतः २२ २८ २७७ डानित्ये नित्यं० र अनित्येष्वमित्याः० ७ १ ५ १७७ शनियतदिन्देश पूर्वक०४ २ ४२ नेशद्व्यवतन १ २ ११ १६५ अनेकद्रव्य समवायात् ४ १ २९३ अन्यतरफर्म ३७ अन्यत्रान्त्येभ्यो वि० १ २ ६ १२३ अन्यदेव हेतुरित्यनप० ३ १ ८५ अपरस्मिन्नपर २२ २१७ अपमर्पणमुपमर्पण ५ २ १७ २०८ अपांसंघातोविलयनं २८ २११ पापा संयोगाद्विभा० ५ २ ११ २०३ अपां संपोगासावे. ५ २३ १३१ अपमिदोउनपदेश: ३ १९५ २६३ साप्सु तेजनि वायी च 9 १४ ८४ नसुशीलता २ २५ १८५ अपिघातजे मुमला० ५ १३ १८७ अपिघातान्मुमल० ५ १ ५ १०९ अभिव्यक्तौ दोपात् २ २ ३० २४४ अभिपेचनोपवाम० ३३७ अभूतं नरस्ती त्य० ९.१ ३६० अनूदित्यपि० १० १४ २५० अयतस्य शुचिसो० ६ २८ ३२३ अयमेष त्वया कृतं. ८ २१ १६९ अरूपिण्वचाक्षुपाणि ४ १ १२ ३२५ अर्थ इति द्व्यगुणक०८ २ २३ २४९ अर्थान्तरं च ६ २७ १२४ अर्थान्तरं ह्यान्तर० ३ १८ १६२ अविद्या २८० विद्या व विद्यालि०७ १२१ २४८ अशुचीति शुचिप्रति०६ २६ ३३१ असतः क्रियागुग० र १३ २५२ असति चाभावात् ६ २ १० ३०१ असति नास्तीति च०७ २ २७ ३३४ जसदिति भूतमत्य० ८ १६ 9 १. १८ ७ ४ १ C 9 ७ ११ 8 १ १७ - ७ १ १२. १ १७. वैशेषिक सूत्र सूची २२ अमन संदिग्धश्चा० ३ १ १६ ३५७ सप्टानिष्टकारण विशे० १० ११ २६ मनमायामामार १२६ ३०९ इहेदमिति यतः० ७ २ २५ ३४१ अनमातिान्तः कर० ० १ १३. ३५२ पस्मद् द्विभ्योलिङ्ग १० २ ॥ २६० उक्ता गुगाः २४८ अस्येदागिति बुहार नरक्षेपणमवक्षेपां० ३४४ मस्येदं कार्य कारणं०८ २ १. १३ उभयथा गुणाः ३४५ अस्येदं पाार्य मारण. २२ १ ११३ १५४ साहमिति मुरुपयो० ३ २ १८ १५२ मह मिति प्रत्यगा० ३ २ १४ २११ एककालत्वास १४५ अहमिति सदस्य० ३ २ २०० एकत्वासावाद् २८७ एकत्वैकाप यकायोः ७ २३ आ-२ ३०५ एकदिक्कालाभ्यां १ २ २१ १८८ गात्मकर्म हस्तसं० ३६३ एकदेश इत्ये कस्मिन् १० ११ २५ शात्म गुग कार्मसु मो०६ २ १७ २६६ एकान्द्रध्यत्वात ३३९ गात्मन्यात्ममगसोः० ० १ १९ १०२ एकद्रव्यत्वान्न द्रव्यं २ २ २३ ३४० गात्मनसोः संयो० र २६. १७ एकद्व्यनगुणं० १ ११७ ३४३ शात्ममगवायादाल ६ १ १५ ३६२ एकार्थममवायिकार० १० १ ६ २९२ एतदनित्य योाख्या०५ २३१ शात्मन्तरगुगानां ६ ६ १५ २२२ एतेन कर्माणि गुणा० ५ २ २२. २१५ भात्मेन्द्रियगनो १५० एतेन गुणत्वे भावे च०.४ १ १३ १३५ शात्मेन्द्रियार्थसनि० ३ १ १० ९५ एतेन दिगन्तराला० २ २ १६ १३७ आस्मेन्द्रियार्थसंनि० ३ २ १. २७६ एतेन दीर्घत्वहस्वत्वे 9 १३ अादित्यसंयोगाद् २६२ एतेन नित्येषु नित्य० ७ १३ ३५६ मापं मिद्वानं च २ १३ ९४ एतेन विभागो व्या० ७ २ १. ३४६ एतेग शान्दं व्या० २३८ एतेन हीननमविशिष्ट ६ १ १२ २५१ इच्छाउपपूर्विकाधर्मा०६ २ १५ ८९ इत्त कदमपि २ २ १० ८२ एतेगोष्णता व्या० ३५३ इन्द्रिपदोपालसंस्कार २ १० क-६ ११८ इन्द्रियार्थप्रमितिः० ३ १२ १९८ इपावयुगपत्नयोग० ५ १ १६ १९ कर्म काठमाध्यं न विद्यते१ १ ११ १८३ गात्म योगाय० २८ १ १७ २ ३ ३३६ एतेनाउघदोगी:० २ *1 क वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १४८ ३०० कर्मशिः कर्माणि गुणै०७ २ २४ ग-७ २९६ कर्मभिः कर्माणिक ७२ १२ ३१ गुणं कर्मसु 'गुगामार्मा० ८.१ ८ २१४ कर्मतिः कर्माणिक ७ ११५ ४० गुणकर्ननु च सावन्न १ २ ४६ कर्म भावात् कर्म० १२ १५ ३१५ गुणकर्म संनिकृष्टेपु०८ १ ४ ३६० क्षारणकारणसमवा १० २६ २९८ गुत्वात् । ७२ १४ ७२ कारंणगुणपूर्वक कार्य०२. १ २४ २४ गुणवैधान्न कर्मणां० १ १ २५ २६५ कारण गुणपूर्वका 9 १६ १०४ गुणास्य मनोऽयवर्गः० २ २ २५ १०६ कारणपरत्वात्० ७२ २२ १५३ गुणान्तराभावाच्च ४ २ ३ २६८ कारणबहुत्वाच्च । ७ १ ४४ गुणेषु भावागुणत्व०१२ १३ १६० कारणभावात् कार्य० ४ १ ३ २२५ गुणैर्दिव्याख्याता । ५ २ २५ २२४ कारणं त्वं ममवायिरो०५ २ २४ २८३ गुणैर्दिव्याख्याता । १ १ २४ ३६४ कारणमिति द्रव्ये १० २ १ २८ गुगोऽपि धिभाव्यते। 9 २ १५ २६८ कारण नमवायात्० १०२ ५ २० गुरुत्वायद संयोगा० १ १ २९ ३१ कारणसामान्ये गच्य० १ १ ३१ १२० कारणाज्ञानात् । ३१ ४ ७० कारणान्तरानुक्लूप्ति २ १ २२ २४५ चातुंराश्रव्यमुपधा० १२ कारणाभावात्कार्या० १ २ १ ३२२ कारणांयोगपद्यात्० ८ १ ११ २५६ जातिविशेषाच्च। ६२ १४ २२६ कारणेन कालः। ३१४ सामनिर्देशे ज्ञाननिष्प ८१ ३ २४ कारणेन कालः । त-१० ३६६ कारणे समवायात्० १० २ ३ ५३ ताकाशे न विद्यन्ते २ १ ५ १२६ कार्य कार्यान्तरस्य । ३ १ १० ३११ तत्त्वं च । २९१ कार्यकारणयोरेका 9२ ७ 99 तत्त्वं सावन १४ कार्य विरोधि कर्म । १ १ १४ २ १ २९ 29 तत्त्वं भावेन ९२ कार्यविशेषेण नाना० २ २ १३ ११ तवं भावना २ २ १२ 5३ कार्यान्तराभादुर्भा० २ १ २५ १७१ तत्पुनः पृपिण्यादि० ४ २ १ १२१ कार्येषु ज्ञानात् । २०९ तत्र विस्फूर्जथर्लिङ्गन ५ २ १५ शियागुणवत्समवा ११ १५ १७६ तत्र शरीरं त्रिविधं ४ २ ३२० शियाणव्यपदेशा० १ १ ३१३ तत्रात्मा मनश्चाप्रत्यक्षेप ६० चियावत्यांद्गुणव० २१ १२ २५८ तत्संयोगोविमानः ६ २ १६ ७ १२५ २२ AD ar वैशेषिक सूत्र सूची ४२तत्समायायातकर्मगुणे पु०८ १ १४ १३८ तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे ३ १० तथा गुणः । ६१ १९ १४२ १६ तथालसंपोगोहस्त० ५ १ ४ २३४ तस्य समभिष्याहा० ६ १४ तथा दक्षिणा प्रतीची०२ २ १५ १६७ तस्यामावादव्य मि० ४ १४ तथा दग्धस्य विस्फो०५ १ १२ १०१ तुल्यजातीयेष्वर्था० २ २ २२ १५० तपा द्रव्यान्तरेयु प्र० ८ १ १२ १९६ तृणे कर्म वायुसंयो० ५ १ १४ ३२८ तथापस्तेजो घायु० ८२ ८३ तेजस उष्णता २६ तथा पृयक्त्वम् । २ २ २२० तेजमो पान्तरे० २३० तथा प्रतिग्रहः । ६ १४ ५१ तेजोरूपस्पर्शवस् २ १३ ३३५ तथाभावे भावप्रत्य० ० १७ १६६ तेन रभगन्धस्पर्शपु ४ १९ ३६७ तथा रुपे कारण० १० २ ४ ५५ त्रपुमीसलोहर शत० २ १७ २३९ तथा विद्वानान्त्या०६ १ १३ ३५० तथा स्वनः। २२१ दिक्क लावाकाशं च० ५ २ २१ १८५ तथा हस्तसंयोगाच. ५ १ २ २३३ दुष्टं हिंमायाम् १ २३५ तददुष्टे न विद्यते। ६ १ १४७ दृष्ट गात्मनि लिङ्गे० ३ २ १९ २१६ तदनारमा मात्र स्थ०५ २ १६ ७ दृष्टं च दृष्ट वत् २ २ १८ + तदनुविधानादे० २ १ ३१ २५३ दृष्टादृष्टप्रयोजनानां० ६ २१ २८२ तदभाबाद मनः । ७ १२३ ३११ दृष्टानां दृष्टप्रयोज० १० २८ २२० सदभावे नंयोगा० ५ २ १८ २७२ दृष्टान्ताच ७ ११३ ६० तलिमेकद्रव्य २ १ २१ ३२४ दृष्टेषु भावाददृष्टे - २३२ सदुष्ट भोजने न ६१६ १४. देवदत्तो गच्छति ३ २ १२ ३५५ तदादुरजानन्। १५१ देवदत्तो गच्छतो० ३. २ १५ ३ तहचनादानायस्य ११३ २०४ द्वत्वात् स्यन्दनम् ५ २४ ३३३ तवचनादानायस्य १० २ १० १८ द्रव्यगुण कर्मणां द्रव्यं०२ १ १८ २०२ तदिशेपेणादृष्ट पारि०५२ २ २१९ द्रव्यगुण कर्मनिष्पत्ति०५ २ १० २५४ तन्मयत्वाच । ६२ १२ ३० द्रव्यगुणकर्मभ्योर्या० १ २८ ३५८ तपोनिष्पत्तिः प्र० १० १ ३ ६ द्रव्यगुणयोः सजा० १ १ ६५ तलवादानमिवार २ ११७ ३९० द्रव्यत्वगुणत्वप्रति० १ २ २६ ७६ व्यत्व नित्यत्वे वायु.२ १२८ ८६ २ २७ ९ २ ११ १५५ तल्लादापनि १५ वश्य कार्य लिन . शषिकदर्शन माघानुवाद C र दाव्यत्यानित्यत्वे वायुः २: २ ११ २६ व्यत्यं गुणत्वं कर्म १ २.५ २३ द्रव्यागा द्रव्यं काय १ १ २३ १० द्रव्याणि द्यावा ० १ १ १० १६ नव्याश्रय गुणवान्. १ १ १६ ३१८ द्रव्ये द्रव्यागुमा भर्ना १७ ३१२ द्रव्येषु ज्ञान छ ११ ३२६ द्रव्येषु पञ्जात्म शत्वम् ८ २४. ३२१ द्रव्येष्वनितरेतरका० ८ १ १० ११२ इयोस्तु प्रवृत्त्योर० २ २ ३३ २५ द्वित्वप्रभृतयः :संख्या० १ १२५ ध--१२ ४ धर्मविशेषप्रसूताद्० १ १ १७८ धर्मविशेषात् 9 २ २३ २८ ३५२ धर्माच ल ६८. निकगणं प्रवेशन २ १.२२ ३.० निष्क्रियत्वात २२३ निष्क्रिपाणां मम ५ २ २३ः २८- निःसंख्यत्वात् नमः २१. १८२ गोदनविशेषादुदमन०५ १ १० १८ नोदनविशेगातावा० ५ १८. १६ नोदनादायमिपोः० ५ १ ११ २२६ नोदगापीहात्तंयुः ५. २.६ २२२ नोदनाभिघातात्० ५ २ ।' प--१४ 98. परत्र. समवायात २. १ २६. ३२१ परत्वापरत्वपों ७५ परिशेपालिङ्गमाफा० २. १ २१ २३६ पुगर्विशिष्ट प्रवृत्तिः ६ १. १० ८० पुष्यवस्त्रयोः सनि० २ २ १ १६१ पृषिपादिरूपरम० ७ १ २. २१२ पृथिवीकर्म गा तेजः०५ २ १२ ५ पृथिव्यापस्तेजोवा० १ १ ५ ६७ प्रत्यक्षप्रवचत्वात् २ १ १ १७२ प्रत्यक्षाप्रत्यक्षाणां० ११३ प्रथगाशव्दात. २३५ १९१ प्रयत्न विशेषान्तोदन० ५ १ १३९ प्रयत्नायोगपद्या० ३ २ ३. १३६ प्रवृत्तिनिवृत्ती घ० ३ १ २० ११७ प्रमिड्ढा इन्द्रियाः ३ १ १. १३० प्रसिद्धिपूर्वयात्वा० ३ १ १४ १४० प्राणापाननिमेपो० ३ २ ४. ब--१५ २२८ ब्राह्मणे संज्ञरफर्म० ६ १२ १ न--१३ ५८ न च दृष्टानां स्पर्शः० २ १ १० १०८ न चासिद्धं विकारात २.२ २९ ३३ न तु कार्याभावात् १ २ २ १५३ न तु शरीरविशे वाद्०३ २ १७ ११४ न च्यात्म काम् । ४ २४ १२ न द्रव्यं कार्य कारणं०१ १ १२ १ १२१ २०५ नाड्य वायु संयोगा० ५ २ ५ १०३नापि कर्माचाक्षुषत्वात २ २ २४ ३३८ नास्ति घटो गेहइत्तिए १ १० २७ गित्यं परिगण्डलम् ७ ५ २० १०६ नित्यवैधात २ '२०२७ २७८ नित्ये नित्यम्। ८८ नित्येवमावादनित्ये २ २ ह २ २१ न द्रव्याणां कर्म १ १९ शरिफ मुन्न सूची २२७ बुद्धिपूर्वा वापनि ६ ६१ २२९ जुद्धिपूर्वो ददातिः भ-१६ २७६ गावदीप उपधारो पो०६ २ ३५ पावोऽनुवृत्तेरेव हेतु०१२ । १२८ भूतमसूतस्य। ३ २ १२ १२९ सूतं भूतस्य । ३ १ १३ ३२७ भूयस्त्वाद्गन्धवत्वाच.८२ ५ २८६ भ्रान्तं तत् । 9२ ५ म-१७ १९७ मणिगमनं मूच्यभि० ५ १ १५ १६३ महत्यनेकद्रव्यवत्वाद् ४ १ ६ य-१८ ३३३ यच्चान्यदमदतस्तदमत् ६ १ ५ १४२ यात दत्तइति संनिक० ३२ २ यतोभ्युदय निःश्रेय० ११ १ १ २ १५ यत्नासावे प्रसुप्तस्य० ५ १ १३ Cc यथादृष्टमयथादृष्ए० २ २ १९ १४६ यदि दृष्टमन्वनमहं० ३ २ १० २४१ यदिएरुपरसगन्ध १३३ यस्माद्विपाणी तस्म'० ३ १ १७ १३४ यस्माद्विषाणी तस्मा० ३ १ १ २९७ युत्तसिद्ध्यभावात् 9 २ १३ २-१९ ४५ रुपरमगन्धस्पर्शवनी० २ १ १ २८५ रूपरसगन्धस्पर्श व्यति० १ २ १ ६ रुपरसगन्धरपः० १९ ५० रुपरसस्पर्गवत्यमापो०२ १ २ २८ रुपाणां रूपम् ल-२० १९९ ठिङ्गाचानित्यः शब्दः २ २ ३२ व-२१ ६२ वायोर्वायुसंमूर्द्धनम् २ १ १४ ६३ वायुनंनिकर्ष प्रत्यक्षा० २ १ १५ २५१ विद्यते वार्थान्तरत्या०६२ र ९० विद्याऽविद्यातश्च संशयः२ २ २० २८१ विसवान्महानाका० ७ १ २२ १२७ विरोध्यभूतं भूतस्य । ३ १ ११ २४२ विशिष्टभालत्याग इति६ १ १६ ५६ विवाणी ककुदान २०७ वक्षाभिसर्पणमिति० ५२७ १८२ वेद लिङ्गाच। ४ २ ११२ २२० वैदिकं च । ५२ १० २२ व्यतिरेकात्। १५६ व्यवस्थातोनाना। ३२ २० ६९ व्यवस्थित पृथिव्यां गन्धा२ २ २ श-२२ 9- शब्द लिङ्गाविशेषाद्र २ १ ३० ७२ १८ ३ २ २१ २२ २१ स-२३ ३३२ सच्चासत् । ३६१ सति च कार्यादर्श० १० १ ५ १९६ सति बहुत्वे संख्यामा०२ २ ३७ १०५ सतोलिङ्गाशावात् । २ २ २६ १६४ सत्यपि द्रव्यत्वे महत्त्वे०४ १ ७ १५८ सदकारणवन्नित्यम् ४ १ १ . ३२२ शब्दार्थावसंबन्धी। १५७ शास्त्र सामार्थ्याच्च । १०० नोनग्रहणोयोऽर्थः० १ १२८ a २ ४ २ 9 १५२ वैशेषिकदर्शन-मापानुवाद सदनित्यं द्रव्यवत्१ १ ६६ संजाकर्म त्वस्मद्विशि०२ १ १८ २३२ सदसल। १८० संमायामादित्वात् ४ २ १० ३८ सदिति गतोव्यगुणाः १ २ ७ १४६ संदिग्थस्सूपचारः ३ २ १३ ४८ सदिति लिङ्गाविशे० १ २ १७ १५२ संदिग्धस्तूपचारः १८१ सन्त्ययोनिगाः ४ २ ११ १९५ संदिग्धाः २४१ समभात्मत्यागः पर० ६ १ १५ ३५० संयुक्त ममवापा दरले १० २ 9 ३२० समवापिनावत्या० ८१ २० संयोगविभागबेगा० १.१ २० १७९ समाख्याभावाच । २०५ संयोगविभागयोः २ १२ २३७ सने होने वा प्रवृत्तिः६ १ ११ ३० संयोगविभागाच ११४ संप्रतिपतिभावाच्च । २ २ ३५ ११ संयोगादभावः कर्मणः२ १ २३ ५४ सर्पिर्जतुमधूछिछष्टानां०२ १६ ३६५ संयोगाद्वा ३०४ सामयिकःशब्दार्थः ७ २ २० १२० संयोगाविसागाच्छ. २ २ ३१ ६४ सामान्य तोदृष्ट्राच्च० २ १ १६ २७ संयोगानां द्रव्यम् १ १२५ १४३ सामान्यतोदृष्टाचा० ३२ १८९ संयोगाभावे गुरु० ५ १७ ६ सामान्य प्रत्यक्षाद ३०३ संयोगिनो दण्डात्० ७ ४१ सामान्य विशेषाभावे० १ २ १० १२५ संयोगिसमवाय्य ४३ सामान्य विशेषा १२ १२ ३५८ संशयनिर्णयान्तरा० १० १२ ४५ सामान्य विशेषा १ २ १४ २२० संस्कारामा गुरु० ५७ सामान्य विशेषासावेन १ २ १६ ५२ स्पर्शवा न्वायुः २ १४ ३१७ सामान्यविशेषापेक्ष ८ ५७ स्पर्शच वायोः ३१६ सामान्य विशेषेषु ३५१ स्वप्नान्तिकम् ३४ सामान्यविशेष प्रति०१ २ ३ ह-२३ १५५ सुखदुःखञ्चाननिध्यत्त्य३ २ १० १९३ हस्तकर्मणा दारक० ५ १ ११ २५३ सुखादागः । २१४ हस्त फर्मणा मनसः० ५ २ १४ ११९ सोउनपदेशः २४. हीने परे त्यागः ६ ११४ १६८ संख्या:परिमाणानि० ४ १ ११ ३४७ हेतुरपदेशो लिङ्गम् ८ २ ४ 9 १६ . १ ६२ १९ AM AC AC

सचाई
का बल
स्वामी प्रेस की आशातीत उन्नति केवल सचाई के बल
से हुई है। एक बार १ । २ पुस्तक मंगाकर देखिये, तब
सुचाई का पता चलेगा। फुटकर विक्नो फिर जारी होगई है ।
छुहलाल स्वामी
स्वामी मेशीन प्रेस ( मेरठ)

mo ego OM Waisheshika Darshan Ву KANADA MUNI WITH HINDI COMMENTARY BY P. TULSI RAM SWAMI Commentator on- Sama-Veda and Nyaya-Darshan, Sanklya-Darshan, Yoga-Darshan &c. Hindi Translator of Manu-Smriti and Editor Veda-Prakasha Montbly Paper Meerut Price As. 10, Paper bound 11 as. PRINTED AND PUBLISHED by P. Tulsiram Swami, at the Swami Machine Press Meerub. $8

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Vaisheshikdarshnam

Author
Swami, Tulsiram
Title
Vaisheshikdarshnam
File name
Vaisheshikdarshnam
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2009/09
Publisher
Merath, Swami Machine Yantralaya
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
344177
Barcode
99999990234057.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
BmDU7LxdM8q
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Vaisheshikdarshnam