Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Jagatguru Shrichandra Digvijayam Mahakavya

Sharma,khilanand · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

समर्पण. सनकादिसमादिष्टमुनिमार्गनिदर्शकः । -क श्रीचन्द्रमहाभागः काहं परिमिताशयः ॥ १॥. तथापि हृदयोद्धतप्रेरणाविवशात्मना । सुबुद्धिगर्भसम्भूतसुबोधस्याग्रजन्मना ॥२॥ शान्तिदेवीसगभ्र्येण मालतीसहचारिणा । मुनीश्वरादिपुत्राणां जनकेन यथोत्तरम् ॥ ३ ॥ अनेकरससम्बद्धनानापदमनोहरः। ललितक्रमविन्यस्तमृदीका मधुराक्षरः॥ ४ ॥ भावाभिरामसद्धावसौगन्ध्याकृष्टसज्जनः । समयते नवग्रन्थः पुष्पाञ्जलिरिवोज्वलः ॥ ५ ॥ तेनानेन जगन्मान्यः सर्वभूतहिते रतः। श्रीचन्द्रो भगवानद्य प्रीयतां जगतां गुरुः ॥ ६॥ एवं निवेद्य भगवत्पादयोर्मनसि स्थितम् । निवर्ततेखिलानन्दष्टीकाराममुनेः सुतः ॥ ७॥ तस्मै ददातु भगवान्सर्वमेव हृदि स्थितम् । लोकलोकान्तरपाप्यं भोगमोक्षफलप्रदः ॥ ८॥ समर्पक:- अखिलानन्द शर्मा।

ग्रन्थकार के अन्य अमुद्रित ग्रन्थ ?
।
---
हनुमद्विजय, arima
इस निबन्ध में महायला मिदूत श्रीहनुमान जी का समस्त जीवन धृत्तान्त लिखा
गया है। हनुमजयन्ती के अवसर पर प्राय इस निबन्ध को पानश्यकता पड़ती है ।
मन्थ ऐतिहासिक और समयोपयोगी है, इसके प्रकाशन के लिये ५००Jफी धावश्यकता है।
। “परशुराम दिग्विजय,
[ महाकाव्य ]
इस महाकाव्य में भगवदवतार श्रीपरशुराम जी का समस्त जीवन वृत्तान्त लिखा
गया है । प्रन्य ऐतिहासिक तथा समयोपयोगा है । इसके पढ़ने से मुर्दो म भी जीवन आ
जाता है, सजीवों को तो फिर कहना ही क्या है। पद्य रचना भावपूर्ण चित्ताकर्षक और
वीरता का स्मरण दिलाने वाली है भापानुगद प्रन्थ के साथ है। इसके प्रकाशन के लिये
सहायता 'आवश्यकता है। इन दोनों ग्रन्थों के प्रकारान से वर्तमान समय म हिन्दू
जनता का बड़ा उपकार होगा। हिन्दू हितों की रक्षा होगी, और दुर्वल आत्मामा मे यल
का सञ्चार होगा । सहायता देने वालों को नीचे लिखे पते पर पत्र-व्यवहार करना चाहिये।
की
-
निवेदक:-
अखिलानन्द शर्मा 'कविरत्न'
मु. पो० अनूपशहर, जि. धुलन्दशहर (यूपी)

शुद्धाशुद्धि पत्रम् लोक अशुद्धम् ७२ तौचा शुद्धम नौधा पुरस्ता धन्यायु गुरस्ता धन्यानु ४२ अशुद्धम् श्रोत्रेषु निधि म्वीयापि मूर्तीभ न्मदा चरित्राण बरम ८ ३० ३२ ४६ ३३ ६ शुद्धम् सर्गे श्लोक श्रोत्रेषु विधि ३४ स्वेनापि ३५ मूर्ती २६ ननन्ता परित्राण वसर १०८ महोत्सा यदर्थकोयं ९ ४ यदर्थकोयं समु २३ श्रये ४६ दितं नियोक्तुंस १० २५ निष्क्रिया योऽधुना मुनीनपि भारतीयाः २९ कस्तस्थ मुयशा प्राप्तुमुच्चैः मप्युप २९ ददृशु ऽद्यावदि ४९ निवेशिता ! १३ मारिति ३९ महारसा यदर्थमेपो यदर्थमेपो मुमु प्रिया दिदं नियोजितु निष्कृया योधना मुनीमपि भारतीयः कत्यस्व मुयशो शास्तुरुः मप्युय तहशु विधादि निरेशता यदि यद क्षया क्षता सन्जनात् सज्जनान् प्राज्ञं সপ্ন प्रथमां प्रथयां नानंम्य दानन्य रुपाय रुपाये ऋपयो मुनयो वीक्ष वीक्ष्य तावद्वि तावद्धि महोन्त महोन्न निवित विविक्त मवस्यांऋतु मवस्थामृतु विषपणा विषण तृणनिहित तृणविहित लोये लोये स्यद्धि स्पर्द्धि कर्णस कर्णन समीक्ष ममीक्ष्य जन्मनःपदम् सम्मदास्पदम् भिन्नापि भिन्नापि तयोनि तपोनि ४९ ६ ९ २६ मरिति समें श्लोके १३ २२९ २४४ २४५ २८८ ३४२ ३७३ अशुद्धम् शुद्धम् सर्गे श्लोक द्भगी भूमी १५ ३ स्वधर्म स्वधर्म एवा एवं भूभितो भूमितो मवला महाबलः स्त्यज्य १०७ त्यज वितिष्ठति वितिष्ठन्ते १६ ११ तिष्ठया निष्ठया यास्व यास्य ७१ ८४ नवन् नवम् १६५ महोत्पान महोत्पात शिवाम शिवम् स्तिदथ तटस्थि ५१ वीक्षता बीक्ष्यतां ६७ जिन निज ७१ मीक्ष मीक्ष्य ९९ दलघर हलधर १८ श्रयाति श्रयति २८ विरडिति विराडिति ८० अशुद्धम् शुद्धम् संदिश्यन्ते संदिश्यते तयोनि तयोनि मायते माद्रियते मीक्ष मीक्ष्य प्रपयो प्रययो मुदिर माक्षिप प्तऋ प भिता भिदा प्यवोचि प्यवाचि ऋपि मुनि तेप तेषु ममेयं ममेदं एप: आध: प्रति प्रवृत्ति स्मात श्रोत सङ्गताम् सङ्गतम् शिक्षणभोत प्रवाहकम गुरुवे गुरवे मचला मचले गीयतेस्य गीयतेऽत्र ३९० ४०० १७ ४३३ . ४५४ ४७६ १४ ११ २२ सूचना। १-प्रयोदशे सर्ग-प्रथम शतकानंतरं त्रिनवतितमं पद्यमैतिहापारवश्येनैवं पठनीयम्- मदनुग्रहतः प्राप्तं साधुमेकमुपैयति । काश्मीरदेशे मच्छिष्यैः सोय मैत्र्यमवाप्स्यति ॥१३॥१९३॥ २-अस्मिन्नेव सर्गे त्रिशतोत्तरे सप्ततितमे पद्ये चतुर्थपादः “यतस्तेन स संचित" इति पहनीयः ।। ३७० ॥ ३-पञ्चदशे सर्गे द्वात्रिंशत्तमं पद्य छान्दोग्यमतानुसारेणैवं पठनीयम्- दैवं पयं समधिगत्त्य कृतः प्रयाति पार्यक्यमत्र पथि पितृपथाद्गतः खम् ।। जोकः स्वकर्मपरिपाकवशेन.वेत्सि यद्यत्र किंचिदपि तद्वद मत्पुरस्त्वम् ॥१५॥३२॥ ४-पोरशे सर्गे-त्रिपञ्चाशत्तमे पद्य उत्तरार्धमेवं पठनीयम्- यजुषो विशस्तु ऋग्भ्यः पुरा न शूद्रस्य सम्भवो वेदात् ॥१६॥५३॥ ५-सप्तदशे सर्गे नवनवतितमे पद्ये द्वितीयपादः “शिक्षा सलिल निर्मः" इति पठनीयः ॥ १७॥९५ ॥ --

प्रशनिष्ट वेददर्शनाचार्य महामण्डलेश्वर श्री १०८ स्वामि गहरानन्द जी
जगद्गुरभीचन्द्रदिग्विजय
.

. भमिका . .. माननीय श्रोत मुनि मण्डल !! बहुत दिनों से जिस प्रन्थ के लिखने की अभि नापा मन में उठ रही थी वह जगदी- श्वर की असीम कृपा से आज मुनि मण्डल के समक्ष उपस्थित हो रहा है यह बड़े ही आनन्द की बात है। जिस “जगद्ग-श्रीचन्द्र दिग्विजय" को लेकर आज हम जनता के समक्ष उपस्थित हो रहे हैं उसका महत्व के हो महानुभाव समझ सकते हैं जो ऐतिहासिक साहित्य के महत्व को समझ कर अहर्निश उसके लिये स्वयं भी परिश्रम करते है। संसार में इतिहास यह घस्तु है जो मनुष्य को मामान्य परिस्थिति से उठाकर विशेष परिस्थिति में पहुंचा देता है। संसार में इसके अनेक निदर्शन हैं जो साहित्य- सेवियों से छिपे नहीं हैं। जिस सम्प्रदाय का कोई इतिहास नहीं है वह कुछ दिनों के अनन्वर अाकाश मै शब्द की तरह अपने आप छिप कर लय हो जाता है। इसीलिये प्राचीन समय के श्रापार्यों का इतिहास उनके अनुयायियों ने उनके ही समय में लिखकर अपने कर्तव्य पालन का पूरा २ परिचय जनताको दिया है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण माधवाचार्य प्रणीत "शङ्कर दिग्विजय" आपके समक्ष है. जिसने शङ्कराचार्य को सर्वदा कं लिये अजर अमर यना कर विद्वत्समाज मे चिर-स्मरणीय बना दिया है। आज भारतवर्ष के विभिन्न समाज अपने अपने पूर्वजों का छिपा हुत्रा इतिहास मे रखकर अपने जातीय जीवन का परिचय दे रहे हैं । यह भारतीय गौरव के अभ्युत्थान का केवल सूत्रपात मान समझना चाहिये । हमारा इमझी ओर म्वाभाविक प्रेम है जो जन्म से हमारे साथ है । हम प्रत्येक वस्तु- स्थिति को पहिले ऐतिहामिक दृष्टि से देख कर फिर उस पर विचार करते हैं जिम बस्तु की ऐतिहासिक परिस्थिति नहीं मिलनी है उसको सत्यता के विषय में शनायास भ्रम उत्पन्न हो जाता है इसीलिये हम सहमा किसो विषय में अपना मतामत प्रकट नहीं करते हैं। हमारी अनुमति में इतिहास से प्रेम रखने वाले प्रत्येक महानुभाव को ऐसा ही करना चाहिये जिससे भ्रम उत्पन्न होने का अवसर प्रान न हो, जगद्गुरु श्रीचन्दजी के विषय में अभी तक ऐतिहामिक दृष्टि से पूरा-पूग अन्वेपण नही हुभा है यदि होता तो वालहासादि शिष्यों से . जनता समक्ष -- 7. . प्रवृत्त धारावाहिक शिष्य परम्परा का वर्णन कसी नियन्ध में अवश्य मिलता? जो अभी तक श्रुति परम्परा पर ही अधिकांश में निर्भर है। हमने बहुत दिनो से भारत भ्रमण का अवसर पाकर इस विषय मे उदासीनों से मसाला एकत्र किया है जो किसी समय मे हम "पञ्चायतन परिचय" नामक निबन्ध में उपस्थित करेगे । हमारे पितृ चरण मुनिवर श्री पं० टीकाराम शास्त्री जी मुनिवृत्ति से बनो में रह कर अपना जीवन यापन करते थे ? यह यात वर्तमान मुनि मण्डल से छिपी नहीं है साधु समाज में अभी तक वे महात्मा विद्यमान हैं जो ऋषिकेश आदि पवित्र स्थलों में हमारे पितृचरणो से प्रायः मिला करते थे। उनके वार्तालाप से प्राप्त प्राचीन ऐतिहासिक कथा कदम्ब अभी तक हमारे कानों मे गूंज रहा है जिसको अवसर पाकर पिता जी हमको सुनाया करते थे। हमारे हृदय में वे भाव तभी से जमकर इस रूप में परिणत हो रहे है जिनका प्रत्यक्ष निदर्शन प्रस्तुत महाकाव्य है। इस अन्वेषण कार्य मे पहिला परिश्रम हमारे अभिन्नहृदय मित्र वेददर्शनाचार्य महामण्डलेश्वर श्री १०८ गङ्गेश्वरानन्दजी का है जिन्होंने अनेक वर्षों तक इस कार्य मे निरन्तर , परिश्रम करके ऐतिहासिक गवेषणापूर्ण एक अद्भुत "श्रौतमुनि-चरितामृत" नामक निबन्ध जनता में उपस्थित किया है । इसमें प्राचीन कालिक जो मौलिक इतिहास हिन्दू हित की दृष्टि से आपने चित्रित किया है उसका महत्व सर्व साधारण नहीं समझ सकते हैं । वीरवर सावरकर जैसे दो चार महानुभाव ही उसका अध्ययन करके वर्त- मान समय में समयोचित कार्य करने पर उतारू हुए हैं। वर्तमान समय में जिन बातों का हिन्दू जनता में उद्वोधनात्मक आवेश होना चाहिये उन बातों का उल्लेख श्राज से तीन सौ वर्ष पूर्व विक्रम की सत्रहवीं सदी में जगद्गुरु श्रीचन्द्रजी के जीवन काल में श्रीचन्द्रजी के द्वारा ही हो चुका था जिसके प्रतिफल में समर्थ रामदास, शिवाजी, प्रताप आदि भारत माता के सुपुत्रों ने उस समय के यवन शासन को उच्छिन कर हिन्दू जनता का मुख निष्कलङ्क करके अपने कर्तव्य का पालन किया। पौद्धो का सर्वनाश करने के लिये जिस प्रकार भगवान् शङ्कर शङ्कराचार्य जी के रूप में अवतीर्ण हुए उसी प्रकार यवनो का उच्छेद करने के लिये भगवान् शङ्कर श्रीचन्द्र जी के रूप में अवतीर्ण हुए। तुल्य वल होने के कारण यह दोनों घटनाएँ श्रापस में एक दूसरे के मुकायिले पर आमने-सामने खड़ी हुई हैं। जिनको देखना हो वे दोनों का कार्य मुकायिले पर रख कर देख सकते हैं। दुष्ट-शक्तियों का संहार करना केवल भगवान् शङ्कर का ही काम है। इसी कारण रोनी समय में उनको हो अवतार लेकर जाना पड़ा। जिस समय सिन्ध प्रान्त के [ग] यवनों ने नगर ठट्ठा की पवित्र भूमि में दूसरा मका यनाने का आयोजन किया या उस समय में चारों ओर हिन्दू सङ्गठन का शङ्खनाद बजाकर आपने ही उनके शासन को छिन्न-भिन्न कर दिया था। यदि आपका अवतार न होता तो आज उनके अत्याचारों के कारणाएक भी हिन्दू नामधारी देखने में न आता । यह सब श्रापकी ही अनुपम कृपा का फल है जो इस कराल कलिकाल में भी हिन्दू अपने धर्म की रक्षा पर तुले हुए है। हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिये आपने उस यवन शासन के समय किस प्रकार जनता को उद्बोधित किया । इसका उदाहरण इस महाकाव्य के १३ वे और १७३ सर्ग में आपको मिलेगा। आपने आपत्ति आने पर हिन्दू जनता को जो श्रादेश, जो उपदेश, जो सन्देश दिये हैं उनको देखकर मृत शरीर में भी एक बार जीवन बिना पाये मही रहता है। आपके उपदेशों में वह चमत्कार है जिसको देखकर शोणित पड पिच्छिल रणा- ऋण में कायर से कायर मनुष्य भी सर्व प्रथम फूदने के लिये तैयार हो जाता है, इसका उदाहरण गमरन नामक एक प्रामण कुमार है जिसका वर्णन इस महाकाव्य के १३ वें सर्ग में आया है। मृत को सजीव करना, असम्भव को सम्भव करना, दुर्बल को बलवान बनाना, बलवान अत्याचारी को दुर्बल बनाकर सर्वदा के लिये उसको यमालय भेजना, अत्या- पारी के समक्ष निर्भय होकर उत्तर देना, मनोबल से दूसरे के मनोभाव को समझना, आकाश मार्ग से चलकर युद्ध के मैदान में उतरना, हुंकारमात्र से शत्रु को नष्ट करना, विधर्मियों को भी हरिभक्त यनाकर उनके द्वारा हो उनका शासन कराना आदि-आदि अनेक अलौकिक बातें आपके योगबल के ताजे ताजे उदाहरण हैं जिनका विचित्र वर्णन आपको इस महाकाव्य में आदि से अन्त तक मिलेगा। जिन महानुभावों को इस वर्तमान विकट परिस्थिति में अपने देश की, अपनी जाति की, अपने धर्म की. अपनी मान-मर्यादा की रक्षा करने की इच्छा हो वे सब काम छोड़कर पहिले इस महाकाव्य का अवलोकन करें जिससे उनका क्षुद्र हृदय- दौर्बल्य नष्ट हो और वे हिन्दू जाति को रक्षा में अग्रसर हो सकें। हमारे हृदय मन्दिर में इस समय भगवान् की यह मूर्ति विराजमान है जिसका परम कर्तव्य प्राचीन कवियों ने- म्लेच्छान्मूर्षयते असावधार्मिक कुलम् । आदि पदों से स्मरण किया है। भारत माता का इस समय द्रौपदी की तरह चोराफर्पण हो रहा है, देश के अनाथ बालक और साध्वी पतिव्रताओं का विधर्मियों के .

- - द्वारा अपहरण हो रहा है, हिन्दुस्तान को पाकिस्तान बनाने का आयोजन, विधर्मों. कर रहे हैं, हमारे शासकों पर अत्याचारी नर-पिशाच निर्दयतापूर्वक आक्रमण कर रहे हैं। जन्मसिद्ध हमारा अधिकार हमारे हाथ से सर्वदा के लिये जा रहा है। भारत मे अन्न और तृण की महर्धना से आर्तनाद उठ रहा है, भारत का गोधन मर्वदा के लिये, उच्छिन्न हो रहा है, ऐसी विकराल परिस्थिति में हमारे प्रान्त के आसपास जो महानुभाव साधुवेश में अपनी दुर्वासनाओं को पूरा करने के लिये रासलीला में धन का दुरुपयोग कर रहे हैं भगवान् उनको मुबुद्धि दें, जिससे वे दुरुपयोग से धन बचाकर सदुपयोग में लगा सकें। वर्तमान समय मे हर एक साधु और गृहस्थ को जगद्गुरु श्रीचन्द्र भगवान् क. श्रादर्श अपने समक्ष मे रख कर काम करना चाहिये। जिसका कि उन्होने अपने जीव । मे पालन करके दिखाया है । भगवान् के आदेशो की सूची इस प्रकार है :- (१) जीवन को तपोमय बनाना । (२) त्यागं का आदर्श समक्ष में रखना। (३) श्रात्मा को स्वतन्त्र करना । (४) स्वयं प्रकाश मे पहुंच कर औरो को अन्धकार से बचाना। ... (4) अपने पूर्वजों का लक्ष्य कदापि न भूलना। (६) अहङ्कार छोड़ कर निष्काम कर्म करना । - (७) ईश्वर पर सर्वत्र विश्वास रखना । (८) सचाई के साथ सव काम करना । भगवान् के इन आठ श्रादर्शी को अपने सामने रख कर संसार में जा काम करेगा, उसको प्रत्येक कार्य मे सफलता प्राप्त होगी। आज कल गृहस्थों की , यात कौन कहे ? साधु-चेप-धर बहुत से महात्माभी अपना जीवन विलासमय बिता रहे हैं जिसका असर संसार पर बुरा पड़ रहा है। भगवान के जीवन में एक भी बात ऐसी नहीं पाई जाती है, जो उनके कथन के विरुद्ध प्राचरण में पाई हो । चित्र में उनका भव्य-भेप स्वयं अपने पादर्श का उदाहरण रूप हो रहा है. जिसको देख कर अपरिचित मनुष्य भी उनके श्रादर्श का अनुमान कर सकता है। भगवान् के जीवन में त्याग की मात्रा सब से बढ़ी हुई है, जिसका प्रत्यक्ष उदा- हरण पादशाह की दी हुई भेट का छोड़ना है, जिसमें दस अरय रुपया था। उनका तपो- जीवन चित्र से झलक रहा है । श्रात्मा की पतन्त्रता उनके उस फयन से प्रतीत होती/ .जो उन्होंने निर्भय होकर यादशाह के समक्ष कहा था। उनका जीवन स्वयं प्रकाशमय और उनके सदुपदेशों से हिन्दू उनना भी कम समय माश में आचुकी थी। यदि न . म .

" [ ल ] आई होती तो वह अपना जीवन नहीं रख सकती थी। भगवान ने अपने जीवन में अपने पूर्वज गुरु सनकादि मुनियो का जो लक्ष्य था उसको पूरा करके दिखलाया। रहा ईश्वर में विश्वास ? और सचाई से संसार में काम करना ? उसके लिये उनका कथन और कथना- नुकूल आचरण जनता के समक्ष मे है. इन बातो से भगवान के कथन और आचरण में कोई अन्तर नहीं मिलता है। एक धर्माचार्य में यही बात होनी चाहिये, जो उनमें मिलती है। जो महानुभाव आज कल स्वराज्य प्राप्ति के लिये "रामाय स्वस्ति" के साथ २ "राव- णाय स्वस्ति" का भी पदे पदे समर्थन कर रहे हैं उनके साथ हमारे विचारों का सर्वदा से विरोध चला आ रहा है । हम देखते हैं कि अग्नि और जल का एक देश में जीवन नहीं रह सकता है प्रकाश और अन्धकार मे कदापि मेल नहीं हो सकता है अधर्म और धर्म आपम में कभी नहीं मिल सकते हैं । इन बातों को जान कर भी जो स्वभावतः अशान्ति प्रिय कलहवर्धक देव गो द्विज द्रोहो यवनों को साथ लेकर भारत में शान्ति स्थापन करना पाहते हैं उनके लिये हम क्या कहें ? रक्षक ही जिनका भक्षक हो उसकी रक्षा ईश्वर के अतिरिक्त कौन कर सकता है ? इसलिये इस समय देश की रक्षा के लिये प्रत्येक हिन्दू को जगद्गुरु श्रीचन्द्र भगवान् फा अनुकरण करना चाहिये जिससे हिन्दु जाति का अभ्युत्थान हो, देश स्वावलम्बी हो और दारिद्रय दूर हो यही हमारा अपने मित्रों से बार बार अनुरोध है इतना लिख कर अव हम इस भूमिका को यहीं पर समाप्त करते हैं। . - अखिलानन्द ।

[छ ] सप्तम सर्ग . . . T . इसमें काशी निवासी दिग्विजयो सोमनाथ त्रिपाठी के साथ काश्मीर को राजधानी श्रीनगर में श्रीचन्द महाराज का शास्त्रार्थ और उसमें काशीस्थ सोमनाथ त्रिपाठी का परा- जय श्रादि अनेक विषय हैं। अष्टम सर्ग इसमें शास्त्रार्थ के दूसरे दिन फिर दुबारा शास्त्रार्थ और उसमें दुवारा पराजित सोमनाथ को श्रीविश्वनाथजी का स्वप्न में दर्शन और शारदा पीठाधीश्वरी जगद्वन्द्या सर; स्वती के आदेश से सोमनाथ का काशी को लौटना और शारदा का सर्वाङ्गीण वर्णन करना आदि विपय हैं। 1 " नवम सर्ग -- इसमें काश्मीर में रहकर श्रीचन्द्र जी के द्वारा वेदों पर चन्द्रभाष्य लिखना तथा वेदाङ्ग, दर्शन-शास्त्र, उपनिषद्, गृह्यसूत्र आदि पर विवेचन करना, और उस पर प्रसन्न हो कर सरस्वती देवी का प्रत्यक्ष होकर अनुमोदन देना यादि विषय हैं। . " दशम सर्ग . IA . इसमे भाष्य सम्पादन के अनन्तर श्रीचन्द्र भगवान का भारत भ्रमण के लिये प्रस्थान विचार, उस समय मेमन्त शकुनों का अनायास उपस्थित होना, भगवान् का हिमालय गमन और हिमालय की सुषमा का वर्णन किया गया है । [ यहां तक इस महाकाव्य को पूर्वार्द्ध है। एकादश सर्ग + 11 इसमे सर्व प्रथम योगसिद्धि का वर्णन, तदुत्तर नेपाल देश गमन, वहां पर राजकृत भगवान् का सम्मान, वहां से अनेक बनो मे भ्रमण कर पशुपतिनाथ के दर्शनार्थ कनकपुर गमन, घोच में आये हुए वनों में बनदेवी का प्रश्नोत्तर, वहां से अच्छोद सर की यात्रा करते हुए फैलाश पर जाकर श्रीशङ्कर जी का दर्शन, इसी प्रसङ्ग में अच्छोद सर का वर्णन, हेमफूट, क्रौञ्चादि आदि पर्वत वर्णन, मान सरोवर होकर गङ्गावतरण तीर्थ मे श्रीगङ्गास्तव, यहां से कालाद्रि होकर यमुनावतार गमन, बीच मे क्रम प्राप्त केदार, इदरीश, होकर नन्द प्रयागादि होते हुए हरद्वार श्राना आदि अनेक दर्शनीय विषय हैं। [ यहीं पर उत्तर दिग्विजय समाप्त किया गया है। दादश सर्ग: इसमें हरद्वार से चलकर इन्द्रप्रस्थ, मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, गोकुल होते हुए - - [2]. करना, वहां से मुद्दामापुरी होकर मार्ग में फच्छ और गुजरात में धर्मोपदेश करते-करते श्रावू पहुंचना वहां पर वेद मुनि के आश्रम में कुछ दिन रहकर मेवाड़ मे एकलिङ्ग महादेव के दर्शनार्थ पहुंचना, वहां पर कुछ दिन ठहरकर महाराणा प्रताप को वीरोचित उपदेशदेना, महाराणाके पँछने पर अपने वंशका परिचय देना, उसको सुनकर महाराणा का मुनि के चरणों पर गिरना, भगवान् का महाराणा के प्रति भविष्यवाणी कहना, उसको मुनकर महाराणा का घर जाना और भगवान् का हारीताश्रम में जाकर समाधिस्थ होना, यहीं पर कुछ दिन ठहर कर यहां से जोधपुर, बीकानेर होते हुए कश्मीर पहुंचकर श्रीनगर में ठहरने की इच्छा से (द्वितीय विश्राम १ ) यहां पर रहकर परिडत हरिदत्त के पुत्र कमलासन और बाल- कृष्ण को शिष्य बनाना, यहीं पर जयदेव के पुत्र गोविन्ददेव और पुष्पदेव को शिष्य पनाना और वरदान देना, यहां से फिर मिन्ध पहुंच कर अपने भक्तों को (उत्तेजनात्मक) उपदेश देना और उद्धत (मिरजा) को हुझारमात्र से नष्ट कर समाधिस्स होना, समाधि काल में अपने पास आते हुए महाराणा प्रताप को मार्ग में आता हुआ देखकर बीच में हो स्वप्न में दर्शन देकर रोकना, भामाशाह से स्वप्न में बात करके प्रताप को धन दिल- वाना, प्रताप को स्वप्न में दर्शन देकर युद्ध के लिये अपने देश को वापिस भेजना ( दोनों स्वप्नों का विस्पष्ट वर्णन ) भामाशाह के धन से अपना बल एकत्र कर प्रताप का युद्ध में प्रवृत्त होना, युद्ध में पत्तोस दुर्गो पर प्रताप का अधिकार, सिन्ध का उद्धार करके फिर श्रीनगर पहुंचकर विश्राम की इच्छा से भगवान् का (तृतीय विश्राम ?) यहां पर कुछ दिन ठहर कर विधवा माझणी के एक मृत पुष को जीवन देना इस पटना को गुन कर उत्तप्त हुए (याव) को चमत्कार दिग्गना अधजली लकड़ी को जमीन में गाद कर हरा भरा पृक्ष धनाना (याय) के पेट में शूल पैदा करके उसको शाप देकर मारना, इसके अनन्तर भीनगर से कादराबाद जाना, यहां से (जहांगीर) बादशाह का निमन्त्रण पाकर लाहोर जाना, वहां से थादशाह की सभा में चमत्कार दिसाकर यवनों के मन में भय उत्पन्न करना, अपनी गुदड़ी का प्रभाव दिखाकर बादशाह को प्रस्त करना, (गुदड़ी का विलक्षण चमत्कार ) यादशाह को अपनी शक्ति दिखाकर उसके (मूक प्रश्नों का) ययार्थ उत्तर देना, उत्तर को सही मानकर पाहशाह की ओर से भेट में भाये हुये पन का त्याग करना, लाहौर से कादाद माफर राजाराम के पुत्र फाराय को अपना निध्य पनाना, और काराय के शिष्य संगतदेय (मस्य रमनु) को अपना शिष्य बना कर वरदान के प्रभाव से उसको पफ शाम्रा का सबालक बनाना, और वहां से रामेश्वर के लिये प्रस्थित होकर मारारा मार्ग से दिल्ली पाना, यहां से मथुरा, आगरा, भरतपुर, करौली, धौलपुर, गालियर, ललितपुर, नागपुर होते हुए रामगिरि पहुंचना, यहां से पूना मदास प्रादि नगरों में होते हुये रामेश्वर पहुंचना, यहां से सेनुबन्ध देखकर (रविण सप्तम सर्ग इसमे काशी निगसी दिग्विजयो सोमनाथ त्रिपाठी के माथ काश्मीर की राजधानी भीनगर में श्रीचन्द्र महाराज का शास्त्रार्थ और उममे काशीस्थ सोमनाथ त्रिपाठी को परा- जय आदि अनेक विषय है। अष्टम सर्ग इसमें शास्त्रार्थ के दूसरे दिन फिर दुयारा शास्त्रार्थ और उसमें दुवारा पराजित सोमनाथ को श्रीविश्वनाथजी का स्वप्न में दर्शन और शारदा पीठाधीश्वरी जगद्वन्द्या सर स्वती के आदेश से सोमनाथ का काशी को लौटना और शारदा का सर्वागीण वर्णन करना आदि विपय हैं। M नवम सर्ग -- . इसमें काश्मीर में रहकर श्रीचन्द्र जी के द्वारा 'वेदों पर चन्द्रमाप्य लिखना तथा वेदाग, दर्शन शास्त्र, उपनिषद्, गृह्यसूत्र आदि पर विवेचन करना, और उस पर प्रसन्न हो कर सरस्वती देवी का प्रत्यक्ष होकर अनुमोदन देना प्रादि विषय हैं। दशम सर्ग है . इसमें भाष्य सम्पादन के अनन्तर श्रीचन्द्र भगवान का भारत भ्रमण के लिये प्रस्थान विचार, उम ममय- समस्त शकुनो का अनायास उपस्थित होना, भगवान् का हिमालय गमन और हिमालय सुपमा का वर्णन किया गया है। [ यहां तक इस महाकाव्य का पूर्वार्द्ध है। एकादश सर्ग . इसमे सर्व प्रथम योगसिद्धि का वर्णन, तदुत्तर नेपाल देश गमन, वहां पर राजकृत भगवान् का सम्मान, वहां से अनेक पनों में भ्रमण कर पशुपतिनाथ के दर्शनार्थ कनकपुर गमन, घीच में आये हुए वनो मे बनदेवी का प्रश्नोत्तर, वहां से अच्छोद सर की यात्रा करते हुए कैलाश पर जाकर श्रीशङ्कर जी का दर्शन, इसी प्रसङ्ग मे अच्छोद .सर का वर्णन, हेमकूट, क्रोचादि आदि पर्वत वर्णन, मान सरोवर होकर गङ्गावतरण , तीर्थ में श्रीगङ्गास्तव, वहां से कालाद्रि होकर यमुनावतार गमन, बीच में क्रम प्राप्त केदार, बदरीश, होकर नन्द प्रयागादि होते हुए हरद्वार आना आदि अनेक दर्शनीय विषय हैं। [यही पर उत्तर दिग्विजय समाप्त किया गया है । दादश सर्ग: इसमें हरद्वार से चलकर इन्द्रप्रस्थ, मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, गोकुल होते हुए . M - [ 9 ] करना, वहां से सुदामापुरी होकर मार्ग में कच्छ और गुजरात में धर्मापदेश करते-करते श्रावू पहुंचना वहां पर वेद मुनि के आश्रम में कुछ दिन रहकर मेवाड़ में एकलिङ्ग महादेव के दर्शनार्थ पहुंचनो, वहां पर कुछ दिन ठहरकर महाराणा प्रताप को वीरोचित उपदेशदेना, महाराणा के पूछने पर अपने वंश का परिचय देना, उसको सुनकर महाराणा का मुनि के चरणों पर गिरना, भगवान् का महाराणा के प्रति भविष्यवाणी कहना, उसको सुनकर महाराणा का घर जाना और भगवान का हारीताश्रम में जाकर समाधिस्य होना, यहीं पर कुछ दिन ठहर कर यहां से जोधपुर, बीकानेर होते हुए कश्मीर पहुंचकर श्रीनगर मे ठहरने की इच्छा. से (द्वितीय विश्राम १ ) ग्रहां पर रहकर पण्डित हरिदत्त के पुत्र कमलासन और याल- कृष्ण को शिष्य बनाना, यहीं पर जयदेव के पुत्र गोविन्ददेव और पुष्पदेव को शिष्य पनाना और वरदान देना, यहां से फिर सिन्ध पहुंच कर अपने भक्तो को (उत्तेजनात्मक) उपदेश देना और उद्धत (मिरजा ) को हुकारमात्र से नष्ट कर समाधिस्थ होना, समाधि काल में अपने पास पाते हुए महाराणा प्रताप को मार्ग में प्राता हुआ देखकर बीच में हो स्वप्न में दर्शन देकर रोकना, भामाशाह से स्वप्न में बात करके प्रताप को धन दिल- वाना, प्रताप को स्वप्न में दर्शन देकर युद्ध के लिये अपने देश को वापिस भेजना ( दोनों स्वप्नों का विस्पष्ट वर्णन ) भामाशाह के धन से अपना पल एकत्र कर प्रताप का युद्ध में प्रवृत्त होना, युद्ध में पत्तोस दुर्गा पा प्रताप का अधिकार, सिन्ध का उद्धार करके फिर भीनगर पहुंचकर विश्राम की इच्छा से भगवान् का (तृतीय विश्राम ?) यहां पर कुछ दिन ठहर कर विधवा ब्राह्मणी के एक मृत पुत्र को जीवन देना इस घटना को सुन कर उत्तप्त हुए (याव) को चमत्कार दिखाना अधजली लकड़ी को जमीन में गाद कर हरा भरा वृक्ष बनाना (याकूब) के पेट मे शूल पैदा करके उसको शाप देकर मारना, इसके अनन्तर श्रीनगर से कादराबाद जाना, वहां से (जहांगीर) पादशाह का निमन्त्रण पाकर लाहोर जाना, वहां से बादशाह की सभा में चमत्कार दिखाकर यवनों के मन मे भय उत्पन्न करना, अपनी गुदड़ी का प्रभाव दिखाकर बादशाह को प्रस्त करना, (गुदड़ो का विलक्षण चमत्कार) बादशाह को अपनी शक्ति दिखाकर उसके (मूक प्रश्नों का) यथार्थ उत्तर देना, उत्तर को सही मानकर पाहशाह की ओर से भेट मे आये हुये धन का त्याग करना, लाहौर से कादरावाद आकर राजाराम के पुत्र कर्ताराय को अपना शिष्य बनाना, और कर्ताराय के शिष्य संगतदेव ( सत्य श्मश्नु) को अपना शिष्य यना- कर वरदान के प्रभाव से उसको एक शाखा का सञ्चालक पनाना, और वहां से रामेश्वर के लिये प्रस्थित होकर आकाश मार्ग से दिल्ली आना, वहां से मथुरा, आगरा, भरतपुर, फरौली. घोलपुर, गवालियर, ललितपुर, नागपुर होते हुए रामगिरि पहुंचना, वहां से पूना मद्रास प्रादि नगरों में होते हुये रामेश्वर पहुंचना, यहां से सेतुबन्ध देखकर (दक्षिण [ 8 ] उसको देखकर वालहास का अपने गुरुभाइयों के प्रति कर्तव्य निर्देश, गुरुसंदिष्ट कार्यों का अनुगमन निश्चय, अपना अपना मण्डल बनाकर भगवान् के भादेशों का पालन क्रम, सर्व प्रथम भगवान के शिष्य घालहास का आदेश पालन करते करते समाधिस्थ होना, बालहास परिचय, देहरादून में यालहास की समाधि, यालहास मण्डल का प्रचार कार्य, बालहास की चौदहवीं पोदीमें महन्त सुन्दरदासजी कााहोना, उनकी शिष्य परम्परा में मुनि रामानन्दजी का परिचय और बालहास शाखा के कार्यक्रम की समाप्ति पर (प्रथम विश्राम?) भगवान् के द्वितीय शिष्य अलिमत्त मुनि की प्रशस्ति और उसका कार्यक्षेत्र कार्यक्रम कार्य करते-करते याराणसी में समाधिस्य होना, अलिमत्त मुनि शास्था द्वारा स्थापित काशी में तीन विद्यालय यतमान मुनि-मएहल के द्वारा उन तीनों का सञ्चालन, पूर्णानन्द मुनिस्थापित निमानी प्राम स्थित शारदा विद्यालय, उनको शिष्य प्रशिष्य परम्परा मे अनेक मुनि-मएडलों का कार्यक्रम पौर अलिमत्त शाखाके कार्यक्रम निर्देशानन्तर द्वितीय विश्राम (१) भगवान् तृतीय शिष्य गोविन्ददेवको प्रशस्ति, उनका कार्यक्षेत्र, कार्य परिचय, उनकी शाखा पश्चम स्थान पर राम- देव मुनि फाप्रादुर्भाव, रामदेवका कार्य परिचय, इनके शिष्य प्रशिष्योंमें महात्मा प्रियतमदास और संतोपदास जी का प्रादुर्भाय, प्रियतमदास जी के कार्यों का परिचय, दस लाख रुपया दक्षिण हैदरापाद से लाकर प्रयाग में नये और पुराने कार्यालयों का प्रियतमदास तथा सनके सहयोगी सन्तोपदाम जो के द्वारा स्थापन और सञ्चालन, वृन्दावन दरबार उजन आदि स्थानों में गोविन्ददेय के शिष्य प्रशिष्यों द्वारा अनेक शाखा कार्यालयों का स्थापन, इसी शाखा के अन्यतम महारमा घेतनदेव जी के द्वारा फनखल में मुनि मण्डल स्थापन, सनत्कुमाराभम का जीर्णोद्धार, इम तीसरी रUफं द्वारा अन्य अनेक कार्यों का निर्देश जिसफर शामा परिपय के अनन्तर तृतीय विश्राम (1) भगवान के पतुर्य शिन्य पुष्पदेव की प्रशाम्नि उनका कार्यक्षेत्र कार्यक्रम, इनकी शिष्य परम्परा में अनेक मदारमामा का प्रादुर्मा, उनका कार्यक्षेत्र और कार्यक्रम मगवान के पारों अन्तर शिष्यों की कार्य पद्धति का निर्देश करके पनुर्य विघाम (1) मन के अन्य शिय मागिरि मोमनाय प्रमकेनु मादि का कार्य परिचय, समाधिस्थल सदेव वर्तमान कायांसप, पसायनन को दस शायात्रों का विपन, अन्नत परिण शिष्य किये- चन, पूर्व जागा निर्देश, गापा मेद, ममय अतीनानागत मुनियों का विवरण कम, पेय गुमनापास ही के शिष्यों का निर्देश, वर्तमान महनों का निर्देश, अपनी मित्र मरहली का निश, वर्गमान समय में मरनी के अप्पशोडारा गनातन धर्म की रक्षा का आयोजन, भरपरपस का मर्तमान प्रधार कार्य, करियंश वर्णन मगयाम के श्रीचरणों में श्रद्धाललि समपं और निषध मगामि माने भारि मोरपिय है।

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय
श्रीमान योगिराज गुरु रामराय सिंहासनासीन शाहजादे गद्दो नशीन
श्री १०८ महन्त लक्ष्मणदास जी गुरुरामराय ( देहरादून)
बी० एन०प्रेस इटारा।

জালঙ্ক বিঘা जिस महाकाव्य को लेकर आज हम मुनि-मण्डन में उपस्थित होते हैं, उसका मूल 'पथ निर्माण हमने अनूपशहर में गङ्गातट पर किया। माषानुवाद इटावा में यमुना-तट पर लिखा गया और इसका प्रथम प्रयपन अब त्रिवेणी के तट पर प्रयागीय कुम्म महापर्व पर होने जारहा है, यह इसका अवसर प्राप्त माहाभाग्य है। समस्त प्रन्य तैयार होने पर हमने इसके प्रकाशनार्थ दो चार अपने भमिन हृदय मित्रों के समक्ष में इसकी चर्चा की, जिसको सुनकर उन मित्रों ने इसका मुद्रण-भार अपने अपर लेकर मुझे निश्चिन्त बना दिया। इसके लिये हम उनके कृतज्ञ हैं। हमारे मित्रों के अनुरोध से जिन महानुभानो ने इसके प्रकाशन का व्यय स्वीकृत करके इसके प्रकाशन के लिये जल्दी से जल्दी समस्त आयोजन एकत्र कर दिया, उनके नाम धन्यवाद के साथ सहो- यक सूची में प्रकाशित किये गये हैं। हमारी मातृ-भाषा संस्कृत होने के कारण इस मावानुबाद में प्रायः संस्कृत पदों फा समावेश हुआ है, इसके लिये हम मजदूर हैं। हम अपनी स्वाभाविक लेखन-शैली के बदलने में सर्वथा असमर्थ हैं। जिन भन्यों के भाधार पर यह महाकायलिला गया है. उन- का नाम निश अनुवाद में दिया गया है। इसका असलो रसास्वादन ये ही कर सकते हैं, जो संस्थत साहित्य पर अपना पूरा २ अधिकार रखते हों। इसमें जो क्रम निर्धारित किया गया है और जिन विषयों का इसमें समावेश किया गया है, उनका उच्चरवायित्व हमारे ऊपर निर्भर है। जिनको फुछ पंचना हो, वे हमसे-हमारे मकान पर पत्र भेज कर पूछ सकते हैं। पहिले काशी में इस प्रन्य के पाने का विचार हुआ था, परन्तु यहां काजल-यायु अनुकूल न होने फारण अन्त में यह पदल दिया गया । गीता के कारण इसके भ्रूफ देखने में सम्भवतः घटियां हुई है, परन्तु वे इतनी नहीं हैं, जिनके लिये शुद्धाशुद्धि पत्र छापाजावे, विद्वान प्रसेंग लगाकर उनको स्वयें ठीक कर सकते हैं। हमने कुछ दिनों से अपने मकान पर बैठ कर चित्ताकर्षण विद्या का भी अभ्याम किया है, जिससे हम मनोयोग द्वारा पुगतन महात्माओं को बुला कर उनसे प्रत्याश्वत पात करते हैं । इस विद्या के प्रभाव से हमने अनेक संदिग्ध विषयों में काम लिया है। इस रिया के अनने वाले दो चार हमारे मित्र मुनि मण्डल में अब भी विद्यमान हैं, जिनसे हमने इसका भभास किया है।

य [] इस महाकाव्य का निर्माण साहित्य-दर्पण में लिखे हुये महाकाव्य के लक्षण को लक्ष्य में रखकर किया गया है । लक्षण की कुछ मोटी २ बातें पाठको को जानकारी के लिये हम यहां पर लिखते हैं, उनमें पहिली यात सर्ग बन्ध है, जो प्रस्तुत अन्य में स्पष्ट है। दूसरो यात काव्य-नायक के विषय में है। काव्यं नायक देवता अथवा प्रसिद्ध क्षत्रिय-वंश प्रसूत होना चाहिये, यह दोनों पाते इस महाकाव्य के चरित्र-नायक में विद्यमान है। भग- धान श्रीचन्द्र शिवावतार होने के कारण देवतुल्य और क्षत्रियों के प्रसिद्ध वेदि वंश में उत्पन्न हुएं । तीसरी यात रसके विषय मे है । महाकाव्य में शृंगार वीर और शान्त इन तीन रसों में एक प्रधान रस अवश्य होना चाहिये। प्रस्तुत महाकाव्य में प्रधान रूप से वीर और उसका सहयोगी शान्त रस है। नायक के स्वरूप और स्वभाव में शान्त रस प्रत्यक्ष है, और युद्ध में वीर रस का पाना उसके लिये स्वाभाविक है । चौथी बात वृत्तपन्ध के विषय में है। महाकाव्य के सर्गों में एक छन्द रहना चाहिये और सर्ग के अन्तिम पद्य में प्रायः बन्द बदलना चाहिये । प्रस्तुत काव्य में दोनो यातें प्रायः विद्यमान है। पाचवों योत किसी सर्ग में अनेक छन्दों का होना है। प्रस्तुत महाकाव्य में कई सर्ग इस प्रकार के हैं। छठी पात-सर्ग के अन्त में भावी सर्ग की सूचना देने के विषय में है जो प्रस्तुत महाकाव्य में सय सर्गों के अन्त में है। सातवीं यात- -सर्ग संख्या के विषय में है। महाकाव्य में छोटे-मोटे सब मिलाकर साठ से अधिक सर्ग होने चाहिये । प्रस्तुत महा- काव्य में अठारह सर्ग हैं। आठवीं यात-सन्ध्या समय, रात्रि, अन्धकार, शैल, ऋतु, वन, सागर भादि के वर्णन के विषय में है। प्रस्तुत महाकाव्य में स्थल-स्थल पर इन बातों का वर्णन किया गया है । इसी प्रकार अन्य भी कुछ लक्षण हैं, जिनका प्रस्तुत महाकाव्य में समय-समय पर प्रसङ्गोपात्त समन्वय कियागया है। शब्द रचना के विषय में और रामार्थगत गुणदोप के विषय में हमको कुछ कहना नहीं है। इन पातों का अनुभव साहित्यज्ञों को स्वयं रहता है। अव रहा अभधार विषय ? उसका भी अनुभव रमश हो कर सकते हैं। इसलिये इस विषय में अधिक लिखना अच्छा प्रतीत नहीं होता है । इसके पढ़ने के समय पाठकों को इसमें अनेक महाकाव्यों की घटायें देखने को मिलेंगी, जो साहित्य मर्मज्ञों के लिये प्रामोद प्रमोद बढ़ाने में सहायक होगी। इतने पर भी यदि किसी को इसके पढ़ने के समय मात्सर्यवश अथवा ईर्ष्या के कारण कुर कष्ट का अनुभव करना पड़े तो इसके लिये हम उनसे साञ्जलि पन्ध अभी से क्षमा चाहते हैं। माशा है कि वे अपनी उदारता से अयश्य हमको क्षमा प्रदान करेंगे। निवेदफा-अखिलानन्द धर्मा पाठक मु० पो० अनूपशहर, विका पुलन्दशहर (१० पी०) - रमहंस परिव्राजकाचार्य श्री १०८ स्वामी हरिनामदासजी उदासीन, महन .... LILatinummerinariamindarius- ..irlsveendarline . न M [ 8 ] इस महाकाव्य का निर्माण साहित्य-दर्पण में लिखे हुये महाकाव्य के लक्षण को लक्ष्य में रखकर किया गया है। लक्षण की कुछ मोटी २ यातें पाठकों की जानकारी के लिये हम यहां पर लिखते हैं, उनमें पहिली बात सर्ग पन्ध है, जो प्रस्तुत प्रन्य में स्पष्ट है। दूसरो यात फाव्य-नायक के विषय में है। काव्यं नायक देवता अथवा प्रसिद्ध क्षत्रिय-यंश प्रसूत होना चाहिये, यह दोनों यातें इस महाकाव्य के चरित्र-नायक में विद्यमान है। भग- वान श्रीचन्द्र शिवावतार होने के कारण देवतुल्य और क्षत्रियों के प्रसिद्ध वेदि वंश में उत्पन्न हुएं । तीसरी पात रस के विषय मे है । महाकाव्य मे शृंगार वीर और शान्त इन तीन रसों में एक प्रधान रस अवश्य होना चाहिये। प्रस्तुत महाकाव्य में प्रधान रूप से वीर और उसका सहयोगी शान्त रस है। नायक के स्वरूप और स्वभाव में शान्त रस. प्रत्यक्ष है, और युद्ध में वीर रस का आना उसके लिये स्वाभाविक है । चौथी वात वृत्तबन्ध के विषय में है। महाकाव्य के सों में एक छन्द रहना चाहिये और सर्ग के अन्तिम पद्य में प्रायः चन्द बदलना चाहिये । प्रस्तुत काव्य में दोनों बातें प्रायः विद्यमान है । पाचवीं योत किसी सर्ग में अनेक छन्दों का होना है। प्रस्तुत महाकाव्य में कई सर्ग इस प्रकार के हैं। छठी घात--सर्ग के अन्त में भावी सर्ग की सूचना देने के विषय में है जो प्रस्तुत महाकाव्य में सम सर्गों के अन्त में है । सातवीं यात-सर्ग संख्या के विषय में है। महाकाव्य में छोटे-मोटे सव मिलाकर साठ से अधिक सर्ग होने चाहिये । प्रस्तुत महा- फाव्य में अठारह सर्ग हैं। आठवीं यात-सन्ध्या समय, रात्रि, अन्धकार, शैल, ऋतु, वन, सागर भादि के वर्णन के विषय में है। प्रस्तुत महाकाव्य में स्थल-स्थल पर इन बातों का वर्णन किया गया है । इसी प्रकार अन्य भी कुछ लक्षण हैं, जिनका प्रस्तुत महाकाव्य में समय-समय पर प्रसङ्गोपात्त समन्वय कियागया है। शब्द रचना के विषय में और शब्दार्थगत गुणदोष के विषय में हमको कुछ कहना नहीं है। इन बातों का अनुभव साहित्यज्ञों को स्वयं रहता है। अब रहा अलवार विषय ? उसका भी अनुभव रसज्ञ हो कर सकते हैं । इसलिये इस विषय में अधिक लिखना अच्छा प्रतीत नहीं होता है । इसके पढ़ने के समय पाठको को इसमें अनेक महाकाव्यों की छटायें देखने को मिलेंगी, जो साहित्य मर्मझो के लिये आमोद प्रमोद बढ़ाने में, सहायक होंगी। इतने पर भी यदि किसी को इसके पढ़ने के समय मात्सर्यवश अथवा ईर्ष्या के कारण कुछ कष्ट का अनुभव करना पड़े तो इसके लिये हम उनसे साञ्जलि बन्ध अभी से क्षमा चाहते हैं। आशा है कि वे अपनी उदारता से अवश्य हमको क्षमा प्रदान करेंगे। निवेदक:-अखिलानन्द शर्मा पाठक मु० पो० अनूपशहर, जिला युलन्दशहर (यू० पी०) 4 रमहंस परित्राजकाचार्य श्री १०८ स्वामी हरिनामदासजी उदासीन, महन -Amway- IMEPIRIZIRKE तिलिम Aur

सहायक सुची
प्रथम श्रेणी के सहायक
दास जी
---श्रीमान् योगिराज गुरु रामराय सिंहासनासीन शाहजादे गद्दी नशीन श्री १०८
महन्त लक्ष्मणदास जी गुरुरामराय दरबार ( देहरादून )
२-श्री १०८ योगिराज पनखण्डी सिंहासनासीन दानवीर महन्त श्री १०८ हरिनाग
साधु बेला तीर्थ (सक्खर सिन्ध)
३-- श्रीयुत सेठ हीरालाल जी बैंकर्स मिल मालिक की सुपुत्री श्रीमती देवी गजरा-
महिन एलिसब्रिज (अहमदाबाद)
४-सेठ भीखाभाई पटेल मिलमालिक की सुपुत्री श्रीमती देवो कमला- बहिन
(एलिस रिज अहमदावाद)
५-श्रीमती ललिता गौरीदेवी शामराय (नडियाद)
६–श्रीयुत वकील फूलशङ्कर सुन्दरलाल जी देसाई एलिस विज (अहमदाबाद)
द्वितीय श्रेणी के सहायक -
१०८ महन्त सन्तरामजी सङ्गलवाला अखाड़ा ( अमृतसर)
८-श्री १०८ महन्त गुरुमुखदास जी अवधूत चेतनदेव को कुटिया (कनखल)
९-श्री १०८ योगिराज निर्वाण, अर्जुनदास जी महाराज सगलबाला असाह
(अमृतसर
१०-श्रीयुत आयुर्वेदाचार्य शास्त्री रामदास जी भोपन्द्र औषधालय (मुलतान)

धन्यवाद
ऊपर लिखे हुए जिन महानुभावों ने इस पुण्य कार्य में सहयोग देकर हमारा
उत्साह बढ़ाया है भगवान उनके प्रत्येक कार्य में सहयोग देकर उनके उत्साह को पदावे
यही भगवान के श्रीचरणों में हमारी विनम्र प्रार्थना है और ऊपर लिखे हुये समस्त सजनों
को बार-बार धन्यवाद है।
-प्रत्यकार
Ammamreme----

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय FAS सनातनधर्म विजय, जगद्गुरु श्रीचन्द्र दिग्विजय, परशुराम दिग्विजय, जगद्गुरु श्री यल्लभदिग्विजय, हनुमद्विजय आदि पश्च महाकाव्य लेखक सनात्यवंशोद्भव ग्रन्थकार- EenamURRARITRNARANASAMARILARARIAKOIRA A8- PES SIXRXXXNRITRXXXRAKAXXXnxxxxxxxxxxxxxxxx अखिलानन्द शर्मा-पाठक मु० पो० अनूपशहर जिला बुलन्दशहर, यू० पी० । वी० एन० प्रेस इटावा ब्रह्मपेनम श्रीचन्द्रमौलिचरितम् महाकाव्यम् प्रथमः सर्गः दूरीकरोति दुरितानि शिवानि सूते विश्वानि यस्य नमनं निगमप्रदिष्टम् । देवन्तमेव गिरिजातनयं गणेश भावाभिराममनसा वचसा नमाम. ॥१॥ वेद मतिपादित जिनका नमन समस्त दुरितों को दूर कर के कल्याणों का उदय करता है-उन दिन्य गुण वाले श्रीगणेश जी को इम मन और वाणी से प्रणाम करते हैं ॥१॥ यो भारतोद्धरणकामनया समस्तै- देवैरभिष्टुतपदोऽवततार सद्यः । श्रीचन्द्रमौलिमिपतो निहितात्मशक्तिः श्रेय शियं म दिशादमतांशुगलिः २॥ समस्त देवगणों के द्वारा चन्दनीय जो भगवान् शकर भारत के उद्धार , की इच्छा से भारत में श्रीचन्द्र जी के रूप में प्रकट हुए वह हमको कल्याण और विभूतियों का प्रदान करें ॥२॥ यामन्तरा हरिहरावपि नैव लोके कतुं क्षमौ किमपि सा जगदेकवन्द्या ।

२ श्रीचन्द्रमौलिचरिते माया गुणत्रयवती जगदादिहेतुः सिद्धिं समादिशतु सादरमत्र शक्तिः ॥३॥ जिनके बिना इस विश्न में हरि और हर भी कुछ नहीं कर सकते-वा जगन्ध तीन गुण पाली - जगत् के उद्रव में आदि कारण-मायामय शक्ति हमारे इस कान्य में सिद्धि प्रदान करे ॥३॥ वर्णाः पदं ध्वनिरिति प्रथिताः समस्ते यस्याः कला निगमवाङ्मयमात्रनिष्ठाः । सा भारती भगवती हृदयेश्वरी मे काव्ये करोतु करुणारुणदृष्टिपातम् ॥४॥ ध्वनि-वर्ग-पद और वाक्य-इन चार भेदों से जिसने समस्त वाङ्मय व्याप्त किया है वह देवी, सरस्वती-इस काव्य में करुणारुण दृष्टि का प्रदान करे ॥४॥ देवाइवाप्रतिमशक्तिभृतः प्रसिद्धा ये.भारते निगमगीतगुणप्रतिष्ठाः । ते मय्यनुग्रहपरम्परया समृद्धि- सर्वे दिशन्तु कवयः प्रणते यथावत् ॥५॥ अनन्त-शक्ति-संपन्न देवगणों के समान जो भारत में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं-न्यासादि कविगण विनम्न भाव से उपस्थित हुए मुझपर अनुप्रा पूर्वक समृद्धिमद आशीर्वाद परम्परा का प्रदान करे ॥५॥ अस्ति प्रसिद्धमिदमत्र मनुष्यलोके. :: श्रीचन्द्रमौलिमिपतः-करुणावशेन । दाक्षायणीपतिरवातरदप्रमेय- स्तवृत्तमेतदधुना विवृणोमि हर्षात् ।।६।। जगत में या पात प्रसिद्ध है कि भगवान्-शंकर नगत का उद्धार करने के लिये श्रीचन्द्र जी के रूप में भारत में प्रकट हुए हम उनका सर्वोत्तम चरित्र . महाकाव्य में प्रस्तुत करते हैं ॥६॥ - - 1 ।'

प्रथमः सर्गः
.
यः श्रौतमार्गमनघं प्रतिपद्य सद्यः
'स्वात्मानमेव जनतोद्धरणप्रवीणः ।
आदर्शभूतमकरोद्गुणगौरवण-
लोके शिवं स वितनोतु शिवावतारः॥णा'
संसार के उद्धार में प्रवीण-पुण्यमय जीवन-जो भगवान् श्रीचन्द्र श्रौत
मुनियों द्वारा प्रस्तुत मार्ग का अवलम्बन कर आदर्श रूप अपने जीवन को जनता
में उपस्थित करचुकेचे शिवावतार-श्रीचन्द्र भगवान-लोक में कल्याण की
अभिवृद्धि फरें ॥ ७॥
श्रादर्शतामुपगतं भुवि यचरित्रं
नानादिगन्तरगता मुनयो निशम्य ।
आनन्दमुन्नतिपथं प्रगतं निरोधु
शेकुर्न कहिचिदगर्हितभावनिष्ठाः ।।
अनेक देश स्थित श्रीन मुनिगण, जिन का भादर्श भूत चरित्र सुन कर,
हृदयों में विद्यमान आनन्द परम्परा के रोकने में असमर्थ हुए ॥८॥
भारं भुवो विदलयन्नधुना धुनानः
पापानि पापमनसां मनसाप्यधृष्यः ।
श्रीचन्द्रएप भगवानिति यस्य गाथाः
पाथेयतामुपगता मदयांवभूवुः ॥६॥
पृथिवी का भार हलका करने वाले तया पापियों का मन दालाने वाले
श्रीचन्द्र भगवान् भवतार ले चुके "यह बात सुन कर" श्रौत मुनि गण जिन की
गापामों को अपनी जीवन यात्रा का पाथेय समझने लगे ॥९॥
यस्य प्रभावमभितः प्रसृतं निशम्य
धर्मदिषो यवनतन्त्रविधानदक्षाः।
स्वार्थप्रसोधनकथाः परिहाय दूरे
चिन्तावशेन मुमुहुर्दुधुवुः शिरांसि ॥१०॥

. H श्रीचन्द्रमौलिपरिते भारत में फैले हुए जिनके प्रभाव को सुन.फर धर्म द्वेपी पोर पैगम्बर अपने नाश का समय पाम, में पाया हुभा देख कर चिन्ता से मोह को प्राप्त हुए और अपना २ शिर पीटने लगे ॥१॥ नैसर्गिक्रीमधिकसिद्धिममुष्य वित्या. योगादिसांधनसमृद्धिजुपः प्रसिद्धाः। श्रीचन्द्रमेनमधिकं हृदये गृणन्तः सन्तोप्यसन्तइव सिद्धगणा बभूवुः ॥११॥ अल्पसाधन वाले बहुत से योगी निनको स्वभाव से ही अधिक योग सिद्धि पाला सुनकर ईा वश मन में चिन्तित होकर भी इनके चरित्र को, आदरणीय मानने लगे ।। ११.॥ आलोकिताखिलजंगद्धृदयं यमेनं श्रीचन्द्रमेकमनसा हृदि संस्मरन्तः । देवाः प्रसन्नमनसो मनसि स्थितानि संमेनिरे जगति पूर्तिमुपागतानि ॥१२॥ समस्त विश्व की व्यवस्था देखने वाले श्रीचन्द्र भगवान् को हृदय में जानकर इन्द्रादि देवगण भी अपने २ हृदयों में विद्यमान समस्त कार्यों को सम्पन्न समझने लगे ।। १२॥ नानाविधप्रणयनरुपबृंहितानि तन्त्राणि येन महता वहुशो विविच्य । बामायपि स्वबचनेनिगमेष्वेवामा: i. ... सम्पादिता इति वदन्त्यधुनापि वृद्धाः ॥१३॥ अनेक प्रकार की विचित्रं रचनामों से पूर्ण तान्त्रिक विद्याओं को जानकर जिन्होंने उलटा अर्थ समझने वाले तान्त्रिकों को अपने प्रभाव से वैदिक मार्ग का पथिक बनाया ॥ १३ ॥"..: . लब्ध्वागुरुं तमविनाशिनमादरेण: तद्रोधितानि भुवनोद्धरणक्षमाणिः।

प्रथमः सर्गः कर्माणि येन रभसागुवने विधायः सन्दर्शिता गुरुजनप्रवणातिभक्तिः ॥१४॥ अविनाशी गुरु को माप्त होकर जिन्होंने उनके रतलाए हुए समस्त कार्यों को जगत में समाप्त कर अपनी लोकोत्तर गुरु भक्ति का पूर्ण परिचय दिया ॥ १४ ॥ येनादे गिरिवरे विहितासनस्य लोकोत्तरस्य, गुरुवर्यगुरोः क्रमेण । कर्माणि पूर्तिमुपयापयता कृतानि सत्यानि किन्न भुवि वेदमुनेर्वचांसि ||१५|| अर्बुद गिरि र निशस करने वाले अविनाशी मुनि के परम गुरु श्री वेद मुनि की प्राज्ञामों का ययावत् पालन कर जिन्होंने समस्त गुरु जनों का आदेश यथासमय पूर्ण किया ॥ १५ ॥. यस्याद्भुताः प्रथितसुन्दरवाललीलाः कौतूहलोदहनगौरवमावहन्त्यः । कुर्वन्ति कौतुकमनल्पतया निविष्टाः श्रौत्रेषु दैशिकधियामपि किन वेगात् ॥१६॥ अनेक प्रकार को आश्चर्य मय घटनाओं का स्मरण दिलाने वाली निनकी बाल लीलायें चार २ श्रोत्र पथ में प्रविष्ट होकर विचारशील पुरुषों को भी फित करती हुई भान भी अपना चमत्कार दिखा रही हैं ॥ १६ ॥., अद्यापि यस्य महिमोन्नतशेशवस्य देवस्य दिव्यचरितामृतसागरस्य । आकर्णितानि चरितानि मनोहराणि चित्ते जवेन जनयन्ति-मुदं समन्तात् ॥१७॥ भनेक महिमा मय जिनके बाल्य चरित्र गुण गौरव युक्त होने के कारण समस्त जनता का मन अपनी ओर माकृष्ट कर विलक्षण ,भानन्द का अनुभव कराते हैं ॥१७॥.. " -- ४ 11 श्रीचन्द्रमौलिचरिते भारत में फैले हुए जिनके प्रभाव को सुन कर धर्म द्वेषी, पोर पैगम्बर अपने नाश का समय पाम में आया हुभा देख कर चिन्ता से मोह को माप्त हुए और अपना २ शिर पीटने लगे ॥१॥ नैसर्गिकीमधिकसिद्धिममुष्य विवा योगादिसांधनसमृद्धिंजुपः प्रसिद्धाः । श्रीचन्द्रमेनमधिकं हृदये गुणन्तः :: ..- सन्तोप्यसन्तइव सिद्धगणा बभूवुः ॥११॥ अल्पसाधन वाले बहुत से योगी जिनको स्वभाव से ही अधिक योग सिद्धि पाला सुनकर ईर्ष्या वश मन में चिन्तित होकर भी इनके चरित्र को श्रादरणीय मानने लगे ॥ ११॥ आलोकिताखिलजंगद्धृदयं यमेनं. . T श्रीचन्दमेकमनसा हदि संस्मरन्तः। देवाः प्रसन्नमनसो मनसि स्थितानि संमेनिरे जगति पूर्तिमुपागतानि ||१२|| समस्त विश्व की व्यवस्था देखने वाले श्रीचन्द्र भगवान् को हृदय में जानकर इन्द्रादि देवगण भी अपने २ हृदंगों में विद्यमान समस्त कार्यो को सम्पन्न समझने लगे ।। १२॥ नानाविधप्रणयनैरुपवृंहितानि तन्त्राणिः येन महता वहुशो विविच्य । 'वामायपि स्ववंचनेनिगमववामा FF... सम्पादिता इति वदन्त्यधुनापि वृद्धाः ॥१३॥ अनेक प्रकार की विचित्र रचनाओं से पूर्ण तान्त्रिक विद्याओं को जानकर जिन्होंने उत्ला अर्थ समझने वाले तान्त्रिकों को अपने प्रभाव से वैदिक मार्ग का पषिक बनाया ॥ १३ ॥ लब्ध्वागुरुं तमविनाशिनमादरेण । तदोधितानि भवनोद्धरणक्षमाणि ।। . : :

५
।
प्रथमः सर्गः--
कर्माणि येन रभसा वने विधाय
सन्दर्शिता गुरुजनमवणातिभक्तिः ॥१४॥
अविनाशी गुरु को प्राप्त होकर जिन्होंने उनके बतलाए हुए समस्त कार्यों को
जगत में समाप्त कर अपनी लोकोत्तर गुरु भक्ति का पूर्ण परिचय दिया ॥ १४ ॥
। येनावुदे गिरिवरे विहितासनस्य
लोकोत्तरस्य गुरुवर्यगुरोः क्रमेण ।
कर्माणि पूर्तिमुपयापयता कृतानि
सत्यानि किन्न भुवि वेदमुनेर्वचांसि ॥१५॥"
अर्बुद गिरि पर निवास करने वाले अविनाशी मुनि के परम गुरु श्री वेद
मुनि को श्राज्ञामों का यथावत् पालन कर जिन्होंने समस्त गुरु जनों का आदेश
यथासमय पूर्ण किया ॥ १५ ॥
यस्याद्भुताः प्रथितसुन्दरबाललीलाः
कौतूहलोदहनगौरवमावहन्त्यः ।
कुर्वन्ति कौतुकमनल्यतया निविष्टाः
श्रौत्रेषु दैशिकधियामपि किन्न वेगात् ॥१६॥
अनेक प्रकार की प्राश्चर्य मय घटनाओं का स्मरण दिलाने वाली जिनकी
बाल लीलायें पार २ श्रोत्र पथ में प्रविष्ट होकर विचारशील, पुरुषों को भी चकित
करती हुई आज भी अपना चमत्कार दिखा रही हैं ॥ १६ ॥
अद्यापि यस्य महिमोन्नतशेशवस्य
देवस्य दिव्यचरितामृतसागरस्य ।
आकर्णितानि चरितानि मनोहराणि
चित्ते जवेन जनयन्ति मुदं समन्तात् ॥१७॥
भनेक महिमा मय मिनकै पाल्य चरित्र गुण गौरव युक्त होने के कारण
समस्त जनता का मन अपनी ओर आकृष्ट कर विलक्षणं मानन्द का अनुभव
--
फराते है ॥१७॥

भीचन्द्रमौलिचरिते देवादनेन मुनिना शिशुनातिवाल्ये : .: दैन्योपपीडितजनाय गृहागताय । दत्ताः प्रसन्नमनसा बहुमूल्यमुक्ता मुक्तात्मनामपि मनो मदयन्ति हर्षात् ॥१८॥ देव योग से आपने एक बार अपने गृह द्वार पर भाए हुए अभ्यागत को बहुमूल्य मुक्तामों का प्रदान कर मुक्त पुरुषों के मन को भी अपने वश में कर लिया ॥ १८॥ यः शैशवे सवयसो विपिनोदरान्त- श्छायोसु नव्यतरुगह्वरसंगतासु । संवेश्य सुन्दरकथाभिरलञ्चकार तेषां मनांसि मुनिनायकतामुपेतः ॥१॥ एक वार आपने अपने साथी पालकों को रन में ले जाकर उन को वृक्षों को सघन छाया में पंक्ति वद खड़ा करके ऐसा ज्ञानोपदेश दिया जिस को सुन कर वे सब ज्ञानवान् हुए ॥ १९॥ देवालयेषु विविधेषु निजोपदेश- रेकान्तमुन्नतमना भुवि यः कुमारः। वेदोपवेदनिहितात्मकथोपरोधे- निर्वन्धनानिव चकार पदानुरक्तान् ॥२०॥ एक समय आप अपने सायो बालकों को मंदिर में ले जाकर भगवान् के भरतार सम्बन्धी अनेक चरित्र सुनाने लगे जिनको सुनकर वे सब भगवद्भक पन गए।॥२०॥ दैवादुपेत्य गहनं वनमेकदा यः पार्श्वस्थितं भुजगमुग्रमवेक्ष्य सद्यः । वेगोद्धतं प्रवलकेसरिणञ्च सिद्धः सामान्यजीवमिव सिद्धिवशेन मेने ||२१|| प्रथमः सर्गः - एक दिन आप अकस्मात् जंगल की ओर भाकर जिस समय समाधिस्य हुए उसी समय आपके पास एक शेर और एक सांप आकर उपस्थित हुआ जिसको तुरन्त आपने अपनी सिद्धि से पश में कर लिया ॥ २१ ॥ ध्यानस्थितं यमधिगत्य बने यथाव- दभ्येत्य तं विधिवशेन स विष्णुदासः ! प्रश्नोत्तरक्रमपरम्परया हृदिस्थ. मज्ञानमुन्नतमतिः प्रशमं निनाय ॥२२॥ एक समय आप समाधि में बैठे ही थे कि उसी समय आपके पास पंडित विष्णुदास भी पहुंचे आपने उनको दिव्य-दृष्टि से जिज्ञासु जान कर उनके अनेक मनों का उत्तर दिया जिसे सुन कर वह ज्ञानवान् हो गए ॥ २२ ॥ अत्युन्नतां जगति कैश्चिदहोभिरेव विद्यां विलोक्य स मुनेर्नितरां प्रसन्नः । सर्वेषु शिष्यनिवहेपु पुरः स्थितेपु श्रीचन्द्रमौलिरयमित्यवदद्गुरुस्तान् ॥२३॥ एक समय की बात है कि काश्मीर में जाकर पं० पुरुषोत्तम जी (कौल) से जिस समय माप विद्याध्ययन करते थे उसी समय गुरु जी ने समस्त सह- • पाठियों में भापको सर्वोत्तम मानकर "श्री चन्द्र मौलि" पद से सस्कृत किया॥२३॥ येनाद्भुत विशदभावमपास्तदोपं भाष्यं विधाय किल वेदचतुष्टयेपि । श्रीचन्द्रमौलिमुनिना निगमागमानां लोके निवेशितमुदारतया महत्त्वम् ॥२४॥ काश्मीर में सात वर्ष रह कर चारों वेदों पर "चंद्र भाष्य" लिखते हुए मापने जो वैदिक साहित्य का उद्धार किया वह श्रोत मुनि मण्डल में आज मानन्द ला रहा है ॥ २४ ॥ गान्धारदेशमधिगत्य जवेन येन वन्धस्थितो झटिति लक्ष्मणदत्तसूनुः ।

। श्रीचन्द्रमौलिचरिते दत्तस्वभस्मतिलकप्रभया निरस्तो- वन्धाच्चकार पुनरर्चनमीश्वरस्य ॥२५॥ एक समय आप काबुल में कंधार पहुचे वहाँ अापने लक्ष्मणदत्त नायक ब्राह्मण का रामरत्न नामक एक पुत्र अपने तपो बल से मृत्यु के मुख से बचाया ॥ २५॥ पुण्याश्रमे विधिवशात्प्रगतः कदाचि- देकोस्य कोपि मृगयुर्यवनः प्रमादी । शापं शशाक न मुनेविफलं विधातुं सूते फलानि महितेषु कृतः प्रमादः ॥२६॥ एक समय आपके आश्रम में कथार नरेश "कामरान" ने एक मृग को मार कर उसकी आखें निकाली थीं यह देख कर आपने उससे कहा कि जिस ने इस मृग की आखें निकाली हैं उसकी आँखेंभी इसी प्रकार निकाली जायेंगी" अन्त में आपका यह शाप उसके लिये सफल हुआ ॥ २६ ॥, सिन्धुप्रदेशमखिलं यवनः। प्रचण्डै- - राकान्तमीक्ष्य सहसैव तमुद्दिधीपुः । यः सत्वरं कनखलात्सह शिष्यवर्ग- रभ्याजगाम कविगीतवहुप्रशस्तिः ॥२७॥ एक समय पनाच प्रान्त में भ्रमण करते २ आप हरिद्वार पहुंचे वहां आपने कनखल में सनत्कुमार मुनि के आश्रम में रहकर अपने भक्तों से सिन्ध देश की बहुत बुरी अवस्था सुनी सुनते ही आप उसके उद्धार के लिये सीधे नगर उहा पहुंचे और वहाँ जाकर सिन्ध प्रान्त का उद्धार किया ॥ २७ ॥, सिन्धुस्थितेन किल येन महामहिम्ना मार्गस्थितस्य वत भक्तगिरेः प्रमोहः । तत्रैव साधु परिदर्शयता भवानी सद्यो निरस्तइव तान्त्रिकमन्त्रमार्गः ॥२८॥ नगर ठटा में रहते हुए आपने एक बार हिंगलाज देवी के दर्शनार्थ ३६० शिष्यों के साथ जाते हुए भक्त गिरि को अपने योग बल से निजाश्रम में हो - प्रथमः सर्गः। ." देवी जी का दर्शन कराकर उस समय के यवन तान्त्रिकों का. समस्त, इन्द्रनाल उछिन्न कर दिया ।। २८ ।। लोकोपकारमनसा निहितात्मशक्ति- यो द्वारिकामपि विहाय पुरी प्रसिद्धाम् । मेवाडदेशजनपं कृपया प्रताप युद्धाय सजमकरोदमितप्रतापम् ॥२६॥ लोकोपकार की इच्छा से आप एक बार द्वारिका के मार्ग में आये हुये कच्छ मान्तीय नगरों में उपदेश देते हुये उदयपुर पहुंचे, वहां मापने एकलिंग महादेव के समीप शरण में आये हुये महाराणा प्रताप को उपदेश देकर मेवाड़ ; प्रान्त का उद्धार किया ॥२९॥ काश्मीरदेशवसति हरिदत्तपुत्रं शिक्षावशेन शनकः कमलासनं यः । धर्मोपदेशकमनन्यगुरुं विधाय सद्यःप्रसादमलिमत्तमुनि व्यधत्त ।॥३०॥ एक बार आप राजस्थान का भ्रमण करते हुये पक्षाव के अनेक नगरों में उपदेश देते २ अन्त में काश्मीर पहुँचे वहां हरदत्त नामक एक ब्राह्मण के कमला- सन नामक पुत्र को शिष्य बनाकर आपने अन्त में "अलिमत्त" मुनि के नाम से उसे प्रतिष्ठित किया ॥३०॥ यो बालकृष्णमलिमत्तमुनेः सजातं प्रासादतः पतितमादरतो गतासुम् । सञ्जीवयनमृतसेकमयैर्वचोभि- श्चक्रे मुनि मननवानिह बालहासम्॥३१॥ एक दिन की बात है कि कमलासन का छोटा भाई और आपका सतीर्थ्य एक वालकृष्ण था जो अकस्मात् एक दिन प्रासाद से गिरकर गत माण होगा या आपने उसके शव को देखकर अपने आशीर्वाद से उसको पुनः जीवित कर दिया । यही अन्त में घालहाम के नाम से श्रीनमुनिमण्डल का अद्वितीय अधि- नायक हुआ ॥३१॥ २ प्रथमा सर्ग: : भूमौ निखातमकरोत्पुनरावृत्तं नैसर्गिकेण महसा महनीयकीर्तिः ॥३५॥ एक समय श्राप श्रीनगर से चम्बा की ओर जाते हुये मार्ग में (ममून ) गांव में ठहरे यहां पर एक पीपल का वृक्ष अग्नि ज्वालाओं से मुलसकर सूख गया था। मापने उसी के नीचे ठहर कर उसे हरा भरा कर दिया ||३५|| ऐरावतीमुपगतेन कदाचिदेका नव्या तरीव परतीरगतौनियुक्ता। दिव्या शिला स भगवानमृतांशुमौलिः केनात्र भूमिवलये कविनास्ति वयः ॥३६॥ एक दिन आप प्रातःकाल समाधि से उठकर ऐरावती नदी के तटपर पहुँचे । और दूसरे किनारे जाना चाहते थे फिर क्या था ? आपने एक शिला को नदी पं फैंककर उसपर आसन जमाया शिला धीरे २ जल में तैरती हुई दूसरे किनारे जा लगी । इस प्रकार की अनेक घटनायें आपके जीवन में हुई थीं ॥३६॥ गवं विहाय जनतोपकृती यतध्वं दिव्यं तपस्तपत योगपथं भजध्वम् । नित्यं प्रवर्धयत सद्गुरुदेवमार्ग यस्यायमेव चरमः परमोपदेशः ॥३७॥ अभिमान छोड़कर जनता का उपकार करो, तपश्चर्या के द्वारा अपने जीवन फो उन्नत बनाओ, योग साधन के द्वारा अपने गुरुजनों का मार्ग विस्तृत करो, यही मापने अपने शिष्यों को अन्तिम उपदेश दिया ॥३७॥ सन्देशमन्तिममिमं समुदीर्य येन सर्वत्र भूमिबलये निजशिष्यवर्गम् । धर्मप्रचारकरणे विनियोज्य पश्चा- दन्तहितेन विहितश्चरमः समाधिः ॥३८॥ इस अन्तिम उपदेश को देकर अापने समस्त भारत में सनावनधर्म के प्रचार । .

१२ 3 श्रीयन्द्रमौलिचरित के लिये अपने शिष्यों को लगाकर किम संवत् १७०० पौष कृष्ण पंचमी को १५० वर्ष की अवस्था में अन्तिम समाधि ग्रहण की ॥३८॥ , तस्यातिगौरवजुपोभुवनोदरश्री- - - सम्बर्धकस्य मुनिगएडलमएडनस्य । श्रीचन्दमौलिकलया प्रथितस्य लोके दिव्यं चरित्रमिह पश्यत सभ्यवर्याः ॥३॥ यहां तक जिनको अलौकिक घटनाओं का दिग्दर्शन-मात्र लिखा गया है, उन गौरवशाली मारत महिमामण्डन-मुनिमण्डलाग्रगण्य श्रीचन्द्र भगवान् का आमू- लचूद समस्त दिव्यचरित्र इस महाकाव्य में सभ्य पुरुषों को देखना चाहिये । मात्सर्यपूर्णमनसास्य मुनेश्चरित्रं. 2. केनापि भारतभुवा न विलोकनीयम् । i - यस्मात्तदेकमनसो निजदूपणाना ... " मुद्रेकतो जगदिदं विनिपातयन्ति ॥१०॥ महामहिम-स्वनाम धन्य श्रीचन्द्रमौलि का परमादरणीय यह पवित्रचरित्र मात्सर्य से किसी को नहीं देखना चाहिये क्योंकि मात्सर्य से देखने वाले पुरुष अपने दूषणों से-समस्त जगत् को ही दूपित किया करते हैं ॥४०॥ अन्योक्तिपणदृशां मनुजाधमानां :: : • यत्कार्यमत्र भुवने प्रतियाति वृद्धिम् । .. ::तित्रापि दोपकलनान्यजनेः क्रियेत निर्दोपमस्ति भुवने वत कस्य कृत्यम् ॥४१॥ जो पुरुष दूसरों की उक्ति में दोप देखा करते हैं उनकी कृतियों में फिर अन्य पुरुष भी दोप ही देखा करते हैं यह एक स्वाभाविक नियम है क्योंकि संसार में दोप शून्य कयन किसी का भी नहीं माना जाता है ॥४१॥ : अन्यैः कृता यदि विगर्हितकार्यवश्या- का: :: : निन्दा दुनोति हृदयं भुवि मानवानाम् । " ३ - द्वितीयः सर्गः अथ भारतवर्षीयदुर्दशां वक्तुमुत्त्वरः। देवपिर्नारदोनाम धातुर्धाम समाययो ॥१॥ एक समय की पात है कि भारतवर्ष की दुर्दशा देखकर दुःखित हुए देवर्षि नारद उसका उद्धार पूंछने के लिये श्रीब्रह्मा जी के समीप पहुंचे ॥१॥ तमुपागतमाकर्ण्य सनकाद्या महर्पयः। समाधिमपि सन्त्यज्य धाम्नि धातुरुपाययुः ॥२॥ ब्रह्मलोक में नारद जी का गाना सुनकर सनकादिक महर्षि भी अपनी २ समाधि छोड़ कर ब्रह्मदेन के पास पहुंचे ॥२॥ स्वागताचारसत्कारं विधाय भगवानजः। प्रीतस्तानाह मुनयः ! किमर्थमुपसङ्गताः ॥३॥ नारद भादि अनेक महर्पियों को अपने स्थान पर उपस्थित देखकर प्रथम तो ब्रमदेव ने स्वागतपूर्वक उन सबका सत्कार किया फिर उनसे आने का कारण पूछा ॥३॥ धातुरेवं विधां वाणीमाकर्ण्य सनकादयः। देवर्पिमेवपुरतश्चक्रिरे धृतकौतुकाः॥४॥ ब्रह्मदेव के प्रश्न करने पर सनकादिक मुनियों ने भी उत्तर देने के लिये अपनी ओर से देवर्षि नारद को ही अगादी किया ॥४॥ अर्थ देवर्पिरुचितां भारतस्यास्य दुर्दशाम् । सावधानेन मनसा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥५॥ देवर्षि नारद भी भारत की वर्तमान दुर्दशा को पूर्णरूप से कहने के लिये ब्रह्मदेव से इस प्रकार कहने लगे ॥ ५ ॥ जानात्येव भवान्सर्वं सर्वभूतविचेष्टितम् । तथापि भवतामाज्ञापालनाय वदाम्यहम् ॥६॥ . i 4

द्विनीयः सर्गः
भगवन् ! पद्यपि आप सब कुछ जानते हैं तयापि आपको आज्ञा शिरोधार्य
समझकर मैं जो कुछ कहता हूं उसे ध्यान पूर्वक सुनिये ॥६॥
विष्णोरंशावतारेण वासुदेवेन ये हताः।
पुरा तएव कालेन यवनाः पुनरुत्थिताः॥णा
भगवान् विष्णु के अंशावतार स्वरूप श्रीवासुदेव ने अपने समय में जिन फाल
यवन आदि असुरों को नष्ट फिया या-ये ही अत्र दुवारा जन्म लेकर उत्पात
मचा रहे हैं ।।७।।
संस्मृत्य ते पूर्ववैरं भारतीयजनवजम् ।
विनाशयन्ति वहवः साम्प्रतं यवनासुराः॥५॥
वे पहिले पैर का स्मरण करके भारत के अन्दर अनेक प्रकार का उपद्रव उठा-
कर हिन्द जनता का सर्वस्व नष्ट कर रहे हैं ॥८॥
केचिदुन्नतकूटानि मन्दिराणि पुरे पुरे ।
निपात्त्य तद्गतामूर्ती भञ्जयन्ति मदोद्धताः ॥६॥
उनमें कोई उन्नत शिखर वाले भनेक देवी देवताओं के मन्दिर गिराफर उनकी
भूतियों को नष्ट भ्रष्ट कर रहे हैं ॥९॥
निगमागमविज्ञानबोधकानृपिभिः कृतान् ।
ग्रन्थानमो विनिक्षिप्य केचिद्धृष्यन्ति दुर्मदाः ॥१०॥
कोई मनन्त शास वेद वृक्ष को नष्ट करने के लिये उनकी अनेक शाखायें
भमि में जलाकर वेदों का नाश कर रहे हैं ॥१०॥
तन्त्रसिद्धिमुपाश्रित्य यवनाः केपि वञ्चकाः ।
अनयन्ति समीपस्थान्महदाश्चर्यकर्मभिः ॥११॥
कोई यंचा वेषधारी ययन-तान्त्रिक सिदि को प्राप्त कर भास पास की
हिन्द जनता को धर्म भ्रष्ट कर रो है ॥११॥
परोपकारनिरतान्सजनान्वेदमार्गगान् ।
नानाविधः प्रहरणः प्रहरन्ति यथेच्छया ॥१२॥

. . श्रीयन्द्रमौलिपरिते 1. कोई परोपकार में लगे हुए वेद मार्ग प्रतिष्ठापक सजनों को भनेक प्रकार के त्रास देकर यमपुर का अतियि बना रहे हैं ॥१२॥ बौद्ध भिक्षुधृतं वेशं विधृत्य यवनाः परे । तीर्थभूतानि धामानि दूषयन्ति मदाश्रयात् ॥१३॥ कोई पौद्ध भिक्षुओं द्वारा प्रवृत्त कापाय वस्त्र पहिन कर भारत के प्रसिद्ध सीर्थ स्थानों को नष्ट कर रहे हैं ॥१३॥ विद्धपवीजमास्थाय वैष्णवाः शिवपूजकान् । शैवा अपि विनिन्दन्ति वैष्णवानुत्तरोत्तरम् ॥१४॥ जहां एक ओर यह अनर्थ होरहे हैं-वहां दूसरी ओर गृह कलह भी छिड़ रहा है, वैष्णव शेवों का निरादर कर रहे हैं और शैव वैष्णवों की निन्दा कर रहे हैं ॥१४॥ सीमाप्रान्तगते देशे सिन्धुतीरे तदुत्तरे । देशे पञ्चनदे तेपां वलमस्ति महत्तरम् ॥१५॥ गुर्जरेपु समद्रेषु काश्मीरधरणीतले । तेपामेवाधिकारोस्ति दुर्मदानां महत्तरः ॥१६॥ सीमा प्रान्त, सिन्ध, पञ्जाब गुजरात, काठियावाड़, मद्रास, कश्मीर , आदि अनेक प्रान्तों में उनका ही वल है- और उनका ही अधिकार है ॥१५-१६॥ कथं तेषां समुद्धारः कदा वा सम्भविष्यति । iइति प्रष्टुमहं तस्मादिहायातोस्मि दुःखितः ॥११॥ इन देशों का उद्धार किस प्रकार और कत्र होगा-यही पूछने के लिये मैं भारतवर्ष से आपके पास आया हूं ॥१७॥ तदुहाहर सर्वज्ञ ! जगदादिगुरो ! विधे! ' । उपायमुत्तमं तेपामुद्धाराय यथोचितम् ॥१८॥ १ .इसलिये हे सर्वज्ञ ! भाप उनके उद्धार का कोई उत्तम उपाय सोचकर इस समय हमको बताने की कृपा कीजिये ॥१८॥ इत्याकएर्य जगदन्द्यो धाता नारदभापितम् । जगदुद्धारमनसा तमाह निजमात्मजम् ॥१६॥ - 1- १७ । मैं -- . द्विनीयः सर्गः: इस प्रकार भारत की दुर्दशा सुनकर ब्रह्मदेव ने उसका उद्धार करने वाला एक उपाय-सोचकर नारदजी-से-कहा ॥१९॥ तमोगुणिप्रशमनं दमनं दण्डनन्तथा । भगवानेव शक्नोति कर्तुमन्यो न भूतले ॥२०॥ तमोगुण प्रधान सृष्टि का शमन तथा उसका दमन श्री.शंकर के अतिरिक्त संसार में अन्य कोई नहीं कर सकता है ।।२०॥ तस्मादह भवन्तश्च सर्वेपि सनकादयः। कैलासशिखरावासं बजामोद्य. महेश्वरम् ॥२१॥ इस कारण श्राप सब लोगों के साथ कैलास के शिखर पर रहने वाले महे. श्वर के समीप चलता हूँ ॥ २१ ॥ सएव जगतामीशो दुष्टानां दमनक्षमः। अस्मदुक्तं समाकर्य करिष्यति यथोचितम् ॥२२॥ दुष्टों' के दंड देने में समर्थ वे भगवान् शंकर ही आप लोगों की यह सब बातें सुन कर इनका यथोचित उत्तर देंगे ॥ २२ ॥ इत्यामन्त्र्य समं सर्वैविधाता भगवानजः । प्राप कैलासशिखरं दिव्यद्रुमविभूषितम् ।।२३।। . इस प्रकार सबके साथ मन्त्रण करके ब्रह्मदेव जी सुन्दर वृक्षों से अलंकृत कैलास शिखर पर पहुँचे ॥ २३ ॥ [ नवमिः कुलकम् । तत्रं दृष्ट्वा तमीशानं ध्यानस्तिमितलोचनम् । स्थूलकाष्ठसमिद्धामिपरिवेष्टितगह्वरम् ॥२४॥ प्रलयान्तमहानिद्रासुप्तसंसृतिविस्तरम् । सर्गारम्भसमारब्धसर्वकारणकारणम् ॥२५॥ करालकालकूटामिस्फुलिङ्गकृतकौतुकम् । फणामणिप्रभापंक्तिदुर्निरीक्ष्यमुखप्रभम् ॥२६॥ : - ३ १८ श्रीचन्द्रमोलिचरिते गङ्गातरङ्गसङ्गाप्तशीतवायुनिपेवितम् । शशिलेखापरिक्षिप्ततमःपटलसंहतिम् ॥२७॥ दिगन्तव्याप्तसच्छायजटामएडलमण्डितम् । चितारजःसमालेपपवित्रीकृतविग्रहम् ॥२८॥ देवदानवगन्धर्वयक्षरक्षोगणेश्वरैः। किरीटकोटिसंस्पृष्टविशोभिचरणद्वयम् ॥२६॥ ध्यानान्तकालसंदृष्टपार्वतीकृतसंस्तवम् । वराभयचरित्राणप्राणदानपरायणम् ||३०|| व्याघ्रचर्माम्बरधरं व्यालयज्ञोपवीतिनम् । निवृत्तविपयासङ्गं देवदानवदुःसहम् ॥३१॥ नन्दिनिर्दिष्टदेवेशदर्शनावरसस्थिरम् । नमाम दएडवलूमौ निपत्य भगवानजः ॥३२॥ वहां पहुंच कर ब्रह्मदेव ने ध्यानस्तिमितलोचन मलय और सर्ग के अद्वि- सीय कारण कालकूटाग्निकणमंजुल फणामणिप्रकाशदर्शनीय शीतल वायु से वीज्य- मानचन्द्रलेखामण्डितं जटामण्डत मण्डित चितारंजालितविग्रहदेवदानवादिसमस्तजग तित वराभयं वरमदं व्याघ्रचर्माम्बरधर व्यालयज्ञोपवीत निवृत्तविषयासंग शकरजी को देखकर सर्व प्रथम साष्टांग प्रणाम किया ।। २४-३२ ॥ तं तथाविधमालोक्य धातारं पुरतः स्थितम् । करुणारुणया दृष्ट्या प्रतिजग्राह धूर्जटिः ॥३३॥ साष्ट्राँग प्रणत ब्रह्मा जी को देख कर भगवान शंकर ने भी करुणा पूर्णभाव से उनका समयोचित स्वागत कर उनसे आगमन का कारण पूछा ।। ३६ ।। . ब्रह्मापि सर्वमावेद्य निजागमनकारणम् । शिवादेशप्रतीक्षोत्कमानसः समपद्यत ॥३४॥ ब्रह्माजी ने भी श्रागमन का कारण बनाकर उत्तर की प्रतीक्षा में कुछ समय यहां व्यतीत किया ॥ ३४ ॥ .

द्वितीयः सर्गः दृष्ट्वा सुतं वृपाकाङ्करवित्तं नानकोगुरुः ।। मोदेन महताविष्ट जातकर्माएयकारयत् ॥ १८॥ , गुरु नानकदेव जी ने जब अपने नवजात शिशु को भगवान शंकर के चिन्हों से अलंकृत देखा सब बहुत विस्मित होकर जात-कर्म संस्कार कराया ॥ ४८ ॥ वेदोदितेन विधिना शिशोर्जातस्य धैर्यतः । जातकर्मणि निवृत्ते महात्साहो व्यवर्धत ॥४॥ वैदिक विधि से जात फर्म संस्कार होने पर भापके जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में सर्वत्र उत्सव होने लगा ॥ ४९ ॥' नानादिगन्तरालस्थमहोदयपरम्परा । महोदयमिम देवमभितः पर्यवेष्ट यत् ॥५०॥ आपके अवतार समय में लोक में जो उत्सव परम्परा मवृत्त हुई उसने मार को सब भोर मसिद कर दिया ॥ ५० ॥ एकादशेन्हि सम्प्राप्ते नामस्थापनमङ्गलम् । वैदिकेन विधानेन तस्यास्य परिकल्पितम् ।।५१|| जन्म से ग्यारावं दिन आपके पिताजी ने चैदिक पद्धति से भापका नाम फरण संस्कार कराया ॥५१ ।। आहादकगुणोत्कर्प श्रिया सह विलोक्यन् । श्रीचन्द्र इति तन्नाम पण्डितः परिकल्पितम् ॥५२|| शोभा सम्पत्ति और आलाद इन तीनों गुणों का सामञ्जस्य देखकर उस समय के विद्वानों ने आप का नाम "श्रीचन्द्र" रख दिया ।। ५२ ।। अन्वर्थकं मुने म यस्यलोके गीयते । श्रीचन्दमोलिभंगवान्सएवायमवर्धत ॥५३॥ "यपा नाम तथा गुणः" इस लोकोक्ति के अनुसार जिनका नाम परा गया पावे भीषन्द्र मर क्रमशः वृद्धि की ओर बढ़ने लगे ।। ५३ ॥ दिने दिने यथोत्कर्ष कलाभिर्याति चन्द्रमाः। तथैवायमवाप स्वं श्रीचन्द्रः सर्वलक्षणः ॥५४] .

श्रीचन्द्रमौलिचरिते जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में, एक २ कला की अभिवृद्धि से चंदमा वृद्धि को प्राप्त होता है उसी प्रकार श्रीचन्द्र भी दैनंदिन अभिवृद्धि से वृद्धि की ओर अग्रसर हुए ॥५४॥ मुदितीवस्य जननात्पितरौ देवलक्षणी। नानाविधशिशुक्रीडारसमेकान्तमापतुः ।।५५|| आपके जन्म से अत्यन्त प्रसन्न मातापिता भी आपकी बाल लीलाका अनेक मकार से अनुभव करने लगे ॥ ५५ ॥ शिशुरप्ययमालादकारणत्वमुपागतः । चिक्रीड बहुभिः सार्द्ध, बालकैः सहजन्मभिः ॥५६॥ कुटुम्ब के श्रानन्द का कारण बनकर श्रीचन्द्र भी अपने अन्य कौटुम्विक चालकों के साथ २ क्रीडा में प्रवृत्त हुए ॥ ५६ ॥ कदापि वनमासाद्य बालकैः सह तद्गतान् । नागान्नगानिव प्रेम्णा पस्पर्श घृतकौतुकः ॥५॥ कचिद्वनोदव्याप्तभीमनादविनोदिनम् । नवं केसरिणः सूनु पप्रच्छ कुशलं मुनिः ॥५८॥. कदाचिद् गृहमागत्य याचन्तं कमपि दिजम् । मौक्तिकैः प्रीणयामास बालभावगतः शिवः ॥५६॥ 'मन्दिरोदरमाविश्य कदाचिद्वालकैः सह । भगवन्तमुमानाथमनाथं समपूजयत् ॥६॥ वनोदरमुपागत्य तरुच्छायासमाश्रितान् । कदाचिदालकानेप वालकोप्यन्वशिक्षयत् ॥६१॥ कभी बालकों के साथ बन जाफर अत्यन्त कुतूहल से बड़े २ फणिधर सो को पकड़ने लगे कभी गहर बन में जाकर शन्द करते हुए सिंह शावक से ही कुशल पूछने लगे कभी गृह द्वार पर पाए हुए याचक को मोती देकर हंसने लगे कभी बालकों के साथ साथ शिव मंदिर में जाकर शिव जी का पूजन करने लगे कमी वन में वृक्षों की छाया में अपने साथी चालकों को चिढ़ाकर उनको धार्मिक

.द्वितीयः सर्गः
--
। उपदेश देने लगे इसी प्रकार की अनेक अद्भुत बाल लीलायें करते हुए आपने
अपने शेशव को समाप्त किया ।.५७-६१ ।।
निवृत्ते शेशवे दैवाद्गर्भादेकादशे शुभे ।
13...: वत्सरे समनुप्राप्ते ब्रह्मचर्यमगादयम् ॥६२॥
श्रौतेन विधिना सर्वमुपवीतप्रसाधनम् । ...
तदा श्रीतमुनेरस्य समभून्मुनिभिः कृतम् ॥६३||3.
शैशन के समाप्त होने पर गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में आपका, उपनयन हुआ
जिसमें समस्त कार्य श्रोत विधि से ही मुनि जनों ने सम्पादित किया ।। ६२-६३॥
ब्रह्मसूत्रमुपादाय सशिखं सहमेखलम् ।.
धर्मतः क्षत्रियोप्येष पलाशं दएडमाहरत् ॥६४॥
क्षत्रियोचित मेखला और उपवीत के साथ शिखा धारण करते हुए आपने
विपर्यय से दंड धारण किया अर्थात् वर दंड के साथ २ आपने पलाश दण्ड का
भी ग्रहण किया इसका प्रयोजन अग्रिम दो पत्रों में देखिये ॥ ६४ ॥
पलं मांसमितिप्रोक्तं ये तदनन्ति राक्षसाः।
पलाशास्ते समाख्याता यवनाः पापकारिणः ॥६५॥
तेषु दण्डं समाधातुं यवनेष्वेप वालकः ।
पलाशदएडादरणे धृतोद्योगस्तदाऽभवत् ॥६६॥
पल नाम मांस का है उसका जो श्रशन करते हैं उनको "पलाश" कहते हैं उनको
दण्ड देना लक्ष्य रखकर आपने व्रतबन्ध के समय चट दंड के साय२ पलाश दंड
फा भी धारण किया यहाँ पर दंड में लिष्ट रूपक है ॥ ६५-६६ ॥
अक्षरारम्भतः पश्चादयं क्रमसमुन्नतः ।
गीतां भगवता गीतां दयालोरपठद्गुरोः ॥६॥
इसके भनन्तर कुछ ही दिनों में अक्षराभ्यास फरफे यापने अपने गुरुवर्य
श्री पं० हरदयालु जी से भगवद्गीता का अध्ययन भारम्भ किया ।। ६७॥
एकवारश्रुताधीतधारणाधिपणो वतीं।
सद्यः समापयत्पाठमयं गीतागतं गुरुः ॥६॥

,
.
श्रीचन्द्रमौलिचरिते
एक वार गुरु मुख से गीता सुनकर उसका यथोचित ग्रहण करके आपने
कुछ ही दिनों में समस्त भगवद्गीता का अध्ययन समाप्त किया । ६८ ॥
गुरोनिदेशतः पश्चादयं मातुरनुज्ञया । ...
शिवं श्रीनगरं श्रीमान् श्रीचन्द्रः प्राप सत्वरम् ॥६६॥
इसके अनन्तर अपने गुरुचर्य - तथा अपनी माता जी से आज्ञा लेकर आप
विद्याध्ययन के लिये श्रीनगर पहुँचे ॥ ६ ॥
काश्मीरं देशमासाद्य पुरुषोत्तमतो गुरोः ।
समस्तं वेदवेदाङ्गोपाङ्गपाठमपूरयत् ॥७०॥
काश्मीर देश की राजधानी श्रीनगर पहुँच कर आपने पण्डित पुरुषोत्तम जी
से समस्त वेद एवं वेदाङ्गों का अध्ययन किया ॥ ७॥
'लवे यथा स्वतःसिद्धं जृम्भकास्त्रमभूत्तथा ।
शिवावतारेव मुनी शास्त्रं स्वयमुपागमत् ॥७१॥
भगवान् रामचन्द्र जी के सुपुत्र लव के पास जिस प्रकार सरहस्य जृम्भकास
अपने आप उपस्थित हुए उसी प्रकार शिवावतार श्रीचन्द्र मुनि में समस्त शास्त्र
अनायास उपस्थित हुए।। ७१।।
पैशुन्यपूर्णमनसामयं स्वसहपाठिनाम् ।
लज्जयाऽवनतं चक्रे मुखं गुरुपरीक्षणे ॥७२॥.
मापके सहपाठी सहज पैशून्य के कारण जब गुरु जी के समक्ष आपकी चुग-
ली करते थे उस समय आप समस्त पाठ कंस्य सुनाकर उनका मस्तक नीचा
करते थे ॥७२॥
.
एवमादर्शचरितो ब्रह्मचारी दृढ़वतः ।
श्रीचन्द्रमौलिरेकान्ते ध्यानयोगपरोऽभवत् ।।७।।
: इस प्रकार आदर्श चरित पूर्ण ब्रह्मचारी दृढ़ व्रत श्रीचन्द्र भगवान् समस्त वेद
वेदाङ्गों को नियम पूर्वफ पदकर अन्त में ध्यान योग में तत्पर हुए ॥.७३ ।।
मयाप्येतस्य धीरस्य धीरोदात्तस्य धीमतः।-
एतावदन वृत्तान्तं विनिवेद्य विरम्यते ॥७॥

द्वितीयः सर्गः हमने भी यहां धीरोदात्तः श्रीचन्द्र भगवान् का इतना वृत्तान्त लिखकर सज्जनों के समक्ष उपस्थित किया है ।। ७४ ॥ एवंविधस्य जगदुद्धरणक्षमस्य लोकोपकारकमनोहरभव्यमूर्तेः । नानाविधैरुपचितं ललितैः सुवृत्तैः श्रीचन्द्रमौलिचरितं पठतादरेण १७५}} इस प्रकार के भारत हितैपो धर्मपरायण जगत् के उद्धार में समर्थ श्रीचन्द्र भगवान के चरित्र से अलंकृत यह महाकाव्य आपके समक्ष में प्रस्तुत है ।। ७५ ।। ये भावपूर्णमनसो मनसोपवद्धं भावाभिरामरमणीयपदं ममेदम् । काव्यं विलोक्य हृदये मुदिता भवेयु- स्ते चन्द्रमौलिकरुणामतुलां भजेयुः ॥७६।। जो महानुभाव भावपूर्ण मन से इस का अवलोकन कर अपने हृदय में भान. न्दिन होंगे उन पर श्रीचन्द्र भगवान् की कृपा अवश्य रहेगी ॥ ७६ ।। नातःपरं निजविनिर्मितकाव्यवन्धे वक्तव्यमस्त्यपरमादरतो निवेद्यम् । किन्त्वेकमस्ति भवतां पुरतस्तदेतद्- द्रष्टव्यमेतदधुना कृपया भवद्भिः ॥७७|| इससे अधिक इस महाकाव्य में हम कुछ नहीं कहना चाहते हैं सन्तों से केवल इतना ही कहते हैं कि आप इसका ध्यान पूर्वक अवलोकन करें ।। ७७ ॥ इविश्री सनाव्यवंशोद्भव कविवर श्रीमदसिलानन्दशर्मप्रणीते सतिलके श्रीचन्द्रमौलिचरिते महाकाव्ये शिवावतारोनाम-द्वितीयः सर्गः दु और : 1 मा ॥ ४

तृतीयः सर्गः
0-0-
.
अथातविद्यो विधिवद्गुरुभ्यः
स चन्द्रमोलिर्भगवानुदारः।
गुहोदरे,ध्यानपरोऽवतस्थे
विचारयन्भारतवर्षभावान् ॥१॥
विधिपूर्वक विद्याध्ययन के अनन्तर उदारचरित श्रीचन्द्र भगवान् पर्वत की
गहर कन्दरा में ध्यानावस्थित होकर भारतवर्ष की दशा पर विचार करने लगे ॥१॥
चतुर्दशादेन मयाऽधुना किं
भुवस्तले मुख्यमवश्यकार्यम् ।
विधेयमित्येव हृदन्तरेऽस्य
विचारपंक्तिः प्रससार सारा ॥२॥
में यह प्रश्न उठा कि विद्याध्ययन करते २ इमारी
अवस्था चौदहवर्ष की व्यतीत हुई, अब हमको फौनसा.कार्य करना चाहिये।
.
संबसे प्रथम
आपके हृदय
गृहानुबन्धेषु यदि प्रसक्तो
भवेयमन्यत्सकलं विहाय।
वृथैव जन्मेदमनेन भूयो'
भविष्यति प्रत्यवरुद्धशक्तः ॥३॥
यदि अन्य कार्य छोड़ कर मैं गृह के कार्यो में प्रवृत्त होता है, तो उसके
द्वारा शक्ति का हास होने पर मेरा यह जन्म ही व्यर्थ जाता है ।३।।
कृतेन किं तेन मया यदत्र
पुनर्भवेदन्धनहेतुभूतम् ।
विमुक्तिमार्ग बजतां जनानां
न बन्धनेषु स्खलनं शिवाय ॥४॥

तृतीयः सर्गः २७ जिस कार्य के करने से संसार में चार २ आवागमन का चकच्छिन्न नहीं होता है, उस कार्य में मुक्तिमार्ग के पथिकों का चलना उचित नहीं है ॥४॥ ममास्ति कश्चिन्न पिता न माता न पूर्वजन्मानुगकर्मबन्धः। निरञ्जनोहं भगवनिदेशा- दिहागतः कर्त्तमनन्यसाध्यम् ।।५।। मैं मुक्त पुरुष है, मेरे साथ पूर्व कर्म का कोई बन्धन नहीं है इसीलिये मेरी न कोई माता है और न कोई पिता है, मैं स्वभावतः निरञ्जन निर्विकार हूँ। केवल ईश्वरादेशसे अनन्य साध्य कार्य करने के लिये पृथिवी पर अवतीर्ण हुआ हूँ ॥५॥ योपदिष्टेन पथा जगत्यां जना गमिष्यन्ति ततो मयात्र। तदेव कर्तव्यमितो यथास्या- न्ममानुगानान्न कदापि बन्धः ॥६॥ मेरे चलाये हुये मार्ग पर ससार चलेगा-इसलिये मुझको वही कार्य करना पाहिये, जिससे मेरे मनुगामियों को संसार के बन्धनों में घार २ न पड़ना पड़े ॥६॥ मनुष्यकर्तव्यमिदं विधि - रुदीर्यते संसृतिचक्रगर्ते। परम्परातः पतितस्य जन्तो- निवारणं तत्कृतकर्मबन्धात् ॥७॥ संसार चक्र में पड़े हुये पुरुषों का उद्धार करना ही मुक्तननों का एकमात्र कर्तव्य है और यही वेद विद्वानों ने मनुष्य का परम-कव्य बतलाया है । सनत्कुमारः सनको मुनीन्द्रः सनन्दनोन्यः स सनातनोऽपि । गुरुर्मुनीनामभवद्रिदाय प्रवृत्तिमार्ग भववन्धमूलम् 150 - - भीगन्दगोलिपरिते हमारे मार्ग प्रदर्शक सनक सनन्दन सनातन और सनत्कुमार जो प्रवृधि मार्ग को शेरकर पहिले से ही निवृत्ति मार्ग परक मुनि मंडलके गुरु कहे नाते हैं ॥८ महानुभावा मुनयो महान्तः प्रवृत्तिमार्ग परिहाय कैरे। निवृत्तिमार्ग प्रगतास्ततोह तमेव मार्ग विधिवद्ग्रहीप्ये ॥६॥ संसार में सभी महा पुरुष प्रवृत्ति मार्ग को छोड़ कर निवृत्ति मार्ग में मवृत्त हुए. इस कारण मैं भी विधिपूर्वक निवृत्ति मार्ग पर ही चलूगा ॥ ९॥ इदं स्वचेतस्यवधार्य सद्यः स चन्द्रमोलेरवतारमाप्तः। गुरोः प्रतीक्षामकरोत्स्ववेशं निवृत्तिमार्गानुगत विधातुम् ॥१०॥ इस प्रकार अपने मन में दृढ़ निश्चय करके शिवावतार श्री चन्द्र भागन् निवृत्तिमार्ग के अनुकूल अपने वेप को बनाने के लिये सद्गुरुको प्रतीक्षा में रहे ॥१०॥ जटाधरो हस्तगृहीतमालः समाधिसंयोजितसर्वकालः। विसृष्टनानाविधकार्यजालः प्रभाविशेषप्रथमानभालः॥११॥ मनोविकारप्रधने करालi. स्तपोधनानां सविधे मरालः । बनान्तवासी वयसातिबालः समाधियोगानुगतस्तदासीत् ॥१२|| उस समय में भापका वेप बड़ा ही सुन्दर या आपके' शिर पर सुन्दर २ मटायें चमक रहीं यों राय में स्कटिक माला और मुख पर ममा मंडल चमक . • तृतीयः सर्गः रापाचन में निवास होने के कारण आपका ममस्त काल समाधि योग में व्यतीत होता.या मन के विकारों के साथ श्रापका युद्ध ठना हुआ था और अहर्निश सनकादि मुनियों के चरित्र पर ध्यान रहता था इस वेप के साय.आपका, समय वन में व्यतीत होता था ॥ ११-१२ ॥ निरोद्धुमेनं विरतिप्रसंगा- च्छशाक नो तत्र गतः पितापि । न बान्धवः कोपि नचास्यमाता निवृत्तिमार्गानुगतं मुनीन्द्रम् ।।१।। इसी अवसर में आपके पास कुटुम्ब के समस्त पारिवारिक जन भापकों परले जाने के लिये अनेक प्रयत्न करने लगे परन्तु अन्तमें ये सब विफल प्रयत्न रहे॥१३॥ गुरोः प्रतीक्षानिरतस्य तस्य दिनानि यावन्ति ययुर्वनान्ते । समोपमान्येव समाधियोगे स कल्पयामास विरक्तभावः ॥१४॥ गुरु की प्रतीक्षा में यन में रहते हुए आपको जितने दिन पतीत हुए वे सब एक २ वर्ष के परामर प्रतीत होने लगे ॥ १४ ॥ अथ प्रसङ्गादविनाशिनामा मुनिः प्रशस्तामरनाथयात्राम् ।। प्रकर्तुमागात्तमनुपदेश यदेकदेशे भगवानतिष्ठत् ||१५|| इसके अनन्तर प्रसंग से अविनाशी मुनि प्रसिद्ध अमरनाथ की यात्रा करने की इबा से उसी मोर भारहे थे जिस ओर आपका निवास या ॥१॥ मुनेरभूदस्य मनस्यलक्या भुवं समुद्धर्तुमलं मनीपा। तया तदानीमुपयातवत्या सहवः सम्पादितमत्र कार्यम् ॥१६॥ .. .

. ---- श्रीचन्द्रमौलिचरिते संसार के उदार करने की जो इच्छा अदृश्य रूप में भापके हृदय में विष- मान थी उसी ने समय पाफर यह सब आयोजन एकत्र कर दिया ॥ १६ ॥ मुनिर्गुरोरागमनप्रतीक्षो गुरुर्मुनेरागमनप्रतीक्षः। क्रमादुभौ देववशेन तत्र परस्परं सङ्गममापतुस्तम् ॥१७॥ आपके हृदय मे सद्गुरु प्राप्त करनेकी प्रबल इच्छा थी और अविनाशी मुनि के चित्त में सच्छिष्य प्राप्त करने की घड़ी इच्छा यो दैवयोग से दोनों की इच्छाओं के पूर्ण होने का अवसर उपस्थित हुआ ॥ १७ ॥ प्रसङ्गतः श्रीपुरुषोत्तमस्य गुरोः ममीपे गुरुभक्तिनिष्ठः। स्वतः समाकर्णयितुं जनेभ्यो गुरुप्रशस्तिं स मुनिः समागात् ॥१८॥ इसी अवसर में प्रसग से भाप अविनाशी मुनि की प्रशसा सुनने के लिये अपने गुरुवर्य श्री प० पुरुषोत्तम जी के स्थान पर आए ॥१८॥ समागतं श्रीपुरुषोत्तमस्तं मुनि प्रसङ्गादविनाशिनाम्नः । महामुनीन्द्रस्य गुरोः प्रशस्तिं निबोधयामास कथाक्रमेण ॥१६॥ पुरुषोत्तम जी ने भी अपने पास आए हुए श्रीचन्द्रमौलि को देखकर अवि- नाशी मुनि का समस्त वृत्तान्त यया क्रम कहना प्रारम्भ किया ॥ १९ ॥ गुरोर्मुखादुच्चतमां प्रशस्तिं महामुनेरस्य निपीय तुष्टः स चन्द्रमौलिनिभृतं दिनान्ते समाप तस्योटजधाम दिव्यम् ॥२०॥ -- -1 .

1. तृतीयः सर्गः अपने गुरु जी से अविनाशी मुनि की प्रशंसा सुनकर श्रीचन्द्र जी मन में बहुत प्रसन्न हुए और सायंकाल के समय अविनाशी मुनि के स्थान पर पहुंचे ॥२०॥ गतेषु सर्वेषु कथाप्रदेशा- ज्जनेप पश्चादवशिष्य तेभ्यः । रहस्यभूतं कमपि स्व-भावं गुरोः समीपे समपृच्छदेपः ॥ २१ ॥ वहां पर दर्शनार्थ आये हुए मनुष्यों के यथा क्रम उठ जाने पर सब से पीछे आपने अवसर पाकर अपना हृद्गत भाव उनसे कहना आरम्भ किया ।। २१ ॥ कथं मया वास्तविकी सुशान्ति- गुरो जगत्यामिह सा प्रलभ्या । यया भवोदन्धनजालभित्तिः स्वयं विनाशं समयेन यायात् ॥ २२ ॥ मापने कहा भगवन् इस संसार में भव बन्ध का उच्छेद करने वाली वास्त- विक शान्ति मनुष्य को किस प्रकार से प्राप्त हो सकती है ।। २२ ॥ अनन्यसाधारणमप्युपायं क्रमेण साधारणरीतिगत्या । गुरो भवानद्य दयोदयेन वदत्ववश्यं परमार्थदृष्टिः॥ २३ ॥ उसकी माप्ति का नो कठिन से कठिन उपाय हो वह भाप कृपा करके हम को सरल रीति से बतलाने की कृपा कोनिये ॥ २३॥ इदं निवेद्यात्मगतं रहस्यं मुनी निवृत्ते समयक्रमेण । गुरुः प्रसादादविनाशिनामा समुत्तरं वक्तुमनास्तमाह ॥ २४ ॥ इस प्रकार हृदगत.भाव के कहने पर मौन हुए श्रीचन्द्र नो के प्रति अविनाशी मुनि ने जो उत्तर दिया वह भी सुनिये ॥ २४ ॥ " ।

[.युग्मम् :: " . .. समस्तसच्छास्त्रकथानुरागः सुसङ्गतिः सत्पुरुषोत्तमानाम् । क्रमेण योगानुरतिः समाधौ निजाधिकारः परमार्थदृष्टिः ॥ २५॥ परोपकारव्यसनं विरागो निरोधनं सत्वरमिन्द्रियाणाम् । वनेष्वासः परमात्मनिष्ठा, ददाति शान्तिं नियमानुगेभ्यः ॥२६॥ आपने कहा-अच्छे शाखों का.श्रवण, उत्तम पुरुषों का सक, योगाभ्यास, समाधि पर अधिकार, परमार्थ दर्शन, परोपकार करने का व्यसन, वैराग्य इन्द्रियों का, निग्रह, वन में निवास यात्म-चिन्तन इन बातों पर ध्यान रखने से मनुष्य को वास्तविक शान्ति प्राप्त होती है ।। २५-२६ ।। इदं समाकएर्य वचः स योगी यथोचितं तत्पतिवक्तुकामः। पुनर्मुनीन्द्रं प्रणिपत्य हो- दुवाचयोगेक्षितसत्प्रभावः ॥२७॥ . इसप्रकार अविनाशी गुरु से प्रश्न का उत्तर मिलने पर आपने उसके विषय में और कुछ कहने के लिये अपनी इच्छा प्रकट की ।। २७ ।' [ युग्मम् ] मुने मयाधीतमलं गुरुभ्यः समस्तशास्त्रं विहितोस्ति योगः कृतोधिकारश्वरमः समाधी सुसङ्गमश्चापि महामुनीनाम् ॥२८॥ -- .

निरुद्धमेवास्ति मनो निसर्गा- दितस्ततो योगबलेन रुद्धम् । परं न शान्तिः समुदेति चित्ते भवत्कृपेच्छुस्तदहं प्रपन्नः-||२६|| आपने कहा मैंने गुरुजनों से वेदादिशात्रों का अध्ययन किया साथ हो यो का अभ्यास समाधि पर पूर्ण अधिकार मुनियों का सत्संग भी किया इस अनिरिक्त योगाभ्यास से मन भी वश में कर लिया परन्तु इतना करने पर भी चित्त में शान्ति न हुई इसलिये आपके समीप आया हूं ।। २८-२९ ॥ भवत्पदाम्भोरुहदर्शनेन हृदन्तरे शान्तिरुदेति सद्यः। प्रभो यथा सा स्थिरतामुपेया- तथा भवानद्य करोतु दृष्टिम् ॥३०॥ आपके चरणारविन्द के दर्शन से चित्त में शान्ति ता उत्पन्न होती है परन्तु स्थिर नहीं रहती इसलिये आप ऐसो दया दृष्टि करें जिससे वह शान्ति सर्वदा स्थिर बनी रहे ॥३०॥ इदं निशम्यार्थयुतं वचोऽस्य मुनेः सदैवादविनाशिनामा । समाहितान्तःकरणो बभूव तदेकदृष्टिविगतान्यचेप्टः ॥३१॥ इस प्रकार अपने कथन का प्रत्युचर सुन कर अविनाशी मुनि अपने विचार में निमग्न हुये और गम्भीर भाव से श्रीचन्द्रनो की ओर देखकर विस्मित हुये।३१॥ विलोक्य स ध्यानदृशा मुनीन्द्रं शिवावतारं शिवमेव साक्षात् । विहस्य पश्चादिदमाह शम्भो ! त्वमेव धन्योसि दवावतारः ॥३२॥ ५ i -- । ध्यान-योग के द्वारा कुछ विलम्ब के पश्चात् जब अविनाशी मुनि ने श्रीचन्द्र i को साक्षात् शिव स्वरूप में देखा, तब श्रीचन्द्रजी से आप कहने लगे कि आप । शिवावतार होने के कारण स्वयं धन्य हैं-आपके समक्ष मैं क्या कह किता हूं ॥ ३२ ॥ भवत्पदाम्भोरुहदास्यमाप्य समस्तभूतप्रशमोपयुक्ता। 'अनन्तशान्तिर्मनुजानुपैति यदर्थमेपो. भगवन्प्रयासः ॥३३॥ जिस शान्ति का आप अन्वेषण करते हैं, वह तो श्रापके चरणों की दासी निकर समस्त विश्व को वश में कर सकती है और आपकी कृपा से ही हम जैसे नुष्यों को वह प्राप्त होती है ॥ ३३ ॥ महत्वमस्मभ्यमिदं प्रदात यदस्ति चित्ते भवतस्तदाहम् । वदामि यादृक्-समयोधुनास्ते यदस्तिचास्मिन्समयेऽनुकूलम् ॥३४॥ यदि आप मुझे महत्व देने के लिये इस प्रकार की लीला कर रहे हैं तो दश कालानुरूप मापसे मैं कुछ निवेदन करता हूं ॥ ३४ ॥ भवानिदं वेत्ति समाधियोगा- न्मनो जनानामधुना विनष्टम् । हदि प्रवृत्ता विकृतिर्भविष्ये भयङ्करो यत्परिणामभागः ॥३५॥ समाधि-योग के द्वारा यह आप स्वयं जानते हैं कि वर्तमान समय में मनुष्यों को चित्त-वृत्ति धर्म से हट कर पाप में प्रवृत्त हुई है, जिसका परिणाम भविष्य में बदा भयङ्कर होने वाला है ।। ३५ ॥ भवत्प्रयासेन समस्तमेत- दिनाशमप्यत्यधर्म जनानाम् । ..

. तृतीयः सर्गः हृदिस्थितं पापमपास्तसौख्यं यदर्थमेपो मम दीर्घयत्नः ॥३६॥ मेरी अनुमति में अापके प्रयत्न से यह व्यतिक्रम दूर हो सकता है, इस लिये माप कपा कर के इस व्यतिक्रम के दूर करने का कोई उपाय सोचिये ? मैंने भी पहुत दिनों से इस पर विचार किया है ॥ ३६॥ इदं निवेद्यात्मगतं-प्रकाशं । शिवावतारस्य पुरो महात्मा । बभूव तूष्णीमनघप्रवृत्ते- जहास पश्चान्मुदितो यथावत् ॥३७॥ इस प्रकार अपने हृद्गत अभिप्रायको श्रीचन्द्र जीके समक्ष कहकर अविनाशी मुनि निवृत्त हुये, इन बातों का रहस्य तत्ववेत्ता मुनि ही समझ सकते हैं ॥३७॥ समस्तमेतद्धदये निधाय निजोचितं कार्यमसौ मुनीशः । मुनित्रतं पूर्णतयाधिगत्य गुरोरुदासीनपथं समागात् ॥३८॥ अविनाशी मुनि के द्वारा प्राप्त समयोचित सदुपदेश हृदय में धर कर श्रीचन्द्र भगवान् मुनित्रत प्राप्त करने के लिये उनसे प्रार्थना करने लगे ॥ ३७॥ अवाप्य दीक्षामविनाशिनाम्नो गुरोः सकाशादयमात्मनिष्ठः । कृतानि तान्येव चकार यानि मुनिः स्वदीक्षासमये जगाद ॥३६॥ इसी अवसर में भविनाशी मुनि से निवृत्ति मार्ग की दीसा लेकर मापने उस कार्य का भारम्भ किया जिसको मन्त्रणा दीक्षा के समय हुई थी ॥ ३९ ॥ विधिप्रदिष्टं मुनिभिः पुराणे- पासितं धर्मपथाऽविरुद्धम् । N . श्रीचन्द्रमौलिपरिते गुरोरुदासीनपथं प्रगृह्य निरस्तचिन्तो भगवान्त्रभुव ॥४॥ वेदों द्वारा समर्थित तया सनकादि मुनियों द्वारा सेवित परम्परा माप्त उदासीन व्रत को अविनाशी मुनि से प्राप्त कर श्रीचन्द्रमौलि सर्पदा के लिये निश्चिन्त हो गये ॥४०॥ हदिस्थितानां शुभवासनानां प्रसंगमभ्येत्य पुरःस्थितानाम् । शिवावतारश्चकमे समृद्धि यथा समयाभुवनं प्रमिद्धिम् ॥४१॥ अपने हृदय में उत्पन्न शुभ वासनाओं को समझमें उपस्थित देखकर भगवान् अपने कार्य में प्रवृत्त हुये ॥ ४१ ।। भुवस्तले या विकृतिः प्रवृत्ता बलान्निराकर्तमना मुनिस्ताम् । विचारमात्मन्यवरुद्धवेगं चिराय ववे वृतयोगमायः ॥४२॥ संसार में मनुष्यों के चित्त में अनेक प्रकार के जो विकार उत्पन्न हुये उनको इटाने के लिये मापने अपने हृदय में दृद-मतिता को और समयोचित आयोजन एकत्र करने में आप तत्पर हुये ॥ ४२ ॥ अतःपरं यत्परमं पवित्र चरित्रमस्याभवदत्र लोके। तदग्रिमे सर्वजनैर्विलोक्यं - सृतीयः सर्गः ३७ क समयपरिणामस्तादृशोभारतस्मि- न्क पुनरुपशमाय श्रीशिवस्यावतारः। उभयमिदमभूद्यत्प्रेरणापारवश्या- जयति स जगदीशो विश्ववन्द्यो महेशः॥४४॥ भारत में विप्लव मचाने वाला--कहाँ कलिकाल का विकाश १ और उसके उपशम करने के लिये कहाँ श्रीचन्द्रमौलि भगवानका अवतार ? यह दोनों घटनायें [ काकतालीय न्याय से ] निस शङ्कर भगवान् की प्रेरणा से एक साथ लोक में प्रवृत्त हुई, घर जगत् के एक मात्र अध्यक्ष भगवान् शङ्कर ही धन्दनीय है ॥४॥ इतिश्री सनाध्यवंशोगव फविघर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते सतिलके श्रीचन्द्रमौलिचरिते महाकाव्ये दीक्षाग्रहणं नाम-तृतीयः सर्गः चतुर्थः सर्गः अथ गुरुः समयोचितमादरा- 'न्मुनिवराय वरायतबुद्धये । विधिवशादुपदेष्टुमुपस्थितो द्रुतविलम्बितमेतदभापत ॥ १ ॥ गत सर्ग में संक्षिप्त रूपसे निस दीक्षा का दिग्दर्शन कराया गया था उसीका विस्तृत वर्णन इस सर्गमें किया जाता है । दीक्षा ग्रहणके भनन्तर अविनाशी मुनि ने श्रीचन्द्रजी के प्रति जो समयोचित सदुपदेश दिया था उसका यह उपक्रम है॥१ यदिदमद्य जगत्युपलभ्यते नियमनं भवता भवतापनम् । प्रकृतिस्त्र विकारमुपागता मम मते न भवानपुनर्भवः ॥ २ ॥ आप कहते हैं कि इस समय जगत में जो परिवर्तन दीख रहा है यह सर प्रकृति के विकार से ही उद्भूत है, अविनाशी ब्रह्म तो सर्वदा निर्विकार ही रहता है॥२॥ गुणसमुद्गतकर्मफलोदया न नियमे नियमेन निवेश्यते । यदि बलात्प्रकृतिर्विकृतिस्तदा जगदिदं विलयं स्वयमेष्यति ॥ ३ ॥ सात्विक, राजस, तामस भेद से अनेक विध कर्म-फलों की देने वाली प्रकृति-यदि बल-पूर्वक वश में नहीं की जायेगी तो जगत् का अवश्यम्भावी प्रलय उपस्थित होगा ॥३॥ प्रकृतिरात्मवर्श पुरुपं बला- नयति सेोपि च तामनुसङ्गतः।

३९ . - चतुर्यः सर्गः नियमितानि मितानि निपेवते गुणवशेन फलानि यथोत्तरम् ॥ ४ ॥ प्रकृति-पुरुष को बल-पूर्वक अपने वश में करती है और पुरुष प्रकृति को वश में करता है, यह दोनों भापस में एक दूसरे के वश में रहकर अनेक प्रकार के खेल खेला करते हैं।॥ ४ ॥ जगदिदं सुपथे विनिवेशय- नमरतामरतामपि तां भुवि । स्थिरपदां कुरु साधनसंग्रहै- रमरवन्दित! वन्दितसत्फलाम् ॥ ५ ॥ इस लिये जगत् को सन्मार्ग में लगाकर-हे अपरवन्दित ! साधनों के द्वारा अपने अमरत्व को सर्वदा के लिये स्थिर कीजिये ॥५॥ विलयमद्यगतो भुवि लक्ष्यते मुनिपरम्परया सुमुपागतः । श्रुतिपथः सुजनोपि च सङ्गतः स विपदं-विपदन्तक ! दृश्ताम् ॥६॥ आज संसार में मुनि परम्परा से प्रवृत्त श्रोत मार्ग सर्वया लुप्त दीख रहा है और इसके प्रचारक सज्जन भी अनेक विपत्ति में फंसे हुये हैं ॥ ६ ॥ इयमनुत्तमसल्फलदायिनी श्रुतिलता यदि नैव निपिच्यते । रसकला सकलापि तदालयं प्रतिगतैव वतेति विचास्य ॥णा उत्तम फलों की देने वाली यह श्रुति-बछरी यदि सजनों द्वारा इस समय नहीं सींची जायगी तो संसार का समस्त सुख विलुप्त माय हो जायगा ॥७॥ यदि जरा मयि नैव पदं क्रिया- दहह तर्हि कथंचिदहं. बलात् । y भीचन्द्रमौलिचरिते श्रुतिलतां तिलतामभितोगतां श्रमजलेरुचितां गतिमापयम् ।।८।। इस समय जरावस्था यदि मुझे न सताती, तो में पल पूर्वक शुष्क हुई। श्रुति-वल्लरी को अपने श्रम-जल से हरी-भरी करके दिखाता ॥८॥ परमहं जरया परिवेष्टितः श्रमवशादतिवृद्धपदंगत.। न वितनोमि तनोमि पदं यदि श्रमपदे गतएव तदा भवात् ॥६॥ । परन्तु मैं इस समय जरा नीर्ण तया अधिक श्रम के कारण अतिवृद्ध होगय है, इस कारण परिश्रम नहीं कर सकना-यदि करूं तो नीवन नष्ट होने के भय है ॥९॥ अहह किं भवता न विलोक्यते मदवशात्प्रहरन्ति हरन्ति ताम् । मुनिजनोपचितां श्रुतिवल्लरी- मुभयतो भयतोपि विरोधिनः ॥१०॥ पाप क्या नहीं देख रहे हैं ?, विराधीनन अपने गर्व से प्रश्न आक्रमण द्वारा मुनिनन परिपालित श्रुति-चलरी पर किस प्रकार निर्दयता पूर्वक महार फर रहे हैं ॥१०॥ हरहरेति वदन्नधुना बलात् प्रहर तेषु विरुद्धदलेवलम् । न दयिता दयिता विजनेषु ते विजयितामुपगच्छ यथोचिताम् ॥११॥ इस समय आप विरोधि-वर्ग पर प्रहार कीजिये, यह समय साधुजनोचित दया का नहीं है प्रत्युत विरोधियों पर विजय प्राप्त करने का है ॥ ११ ॥ प्रथमतो नय भेदपथं लयं न * भुवि बलेन नु येन कृतं पदम् ।

४१. - .. तुर्थः सर्गः । कुरु तदुत्तरमात्मविजृम्भणं शिव ! शिवेति शिवेति सदा वदन् ||१२|| हे शिवावतार ! सब से प्रथम तो आप हिन्दु जाति में साम्प्रदायिक विरोध को दूर करनेका यत्न कीनिये, जिसने भारतमें अपना निवास स्थान बनाया है। इसके मनन्तर अपने आत्मिक बल से धर्म का प्रसार कीजिये ॥ १२ ॥ प्रतिपदं विवदन्ति वृथा जना.... हरिपदानुरतान्हरभावनाः। हरपदानुरतानथ ते सदा. मम मते धिगिमान्धिगिमानपि ॥१३॥ इस समय जहाँ देखो वहां व्यर्थ ही शैव-वैष्णवों से और वैष्णव-शों से विवाद करते हैं, मेरी अनुमति में यह दोनों प्रशंसा के योग्य नहीं हैं ॥ १३ ॥ हरिरिति प्रवदन्यदि लभ्यते भुवि विमुक्तिपदं पदमाश्रितैः । हरहरेति वदन्नपि लभ्यते विवदनं वदनं कथमाविशत् ॥१४॥ हरि के स्मरण करने से यदि मुक्ति माप्त होती है तो हरहर कहने से भी मुक्ति अनायास मिलती है फिर दोनों सम्पदायों में विवाद कहां से भाया १ ॥ १४ ॥ अहह दुर्दिनमेतदुपस्थित विचदनाददनादिह किं ब्रुवे । प्रकृतिरेकतया समुपस्थिता तदुभयन मुधा जनवञ्चनाः ॥१५॥ दैव-दुर्विपाक से भान भारतमें वह दिन आगया जबकि हम्-धातु रूपप्रकृति के एक होने पर भी इरिहरात्मक रूप में मनुष्य व्यर्थ विवाद उठा रहे हैं ॥१शा हरिहरी रविशक्तिगणाधिपा निगममन्त्रपदैः प्रतिपादिताः। ६ ४२ है । है श्रीचन्द्रमोलिचरिते प्रथमतोऽथ-मतोऽयमनुग्रहः स निगमे निगमेक्षणकोविदैः ॥१६॥ वेदज्ञ विद्वानोंने वेदों में शक्ति, शिव, मूर्य, गणेश, हरि इन पाँचों देवताओंका पहिले ही से वर्णन किया है इसलिये इस विषय में विवाद उठाना व्यर्थ है ११६॥ निगममन्त्रशतैः प्रतिपादिते भुवि समर्चनमार्गमुपागते । विविधदेवसमादरसत्पथे न मनुजा मनुजादनरागिणः ॥१७॥ जब अनेक वेद मन्त्रों में भिन्न भिन्न उपासना का समर्थन मिलता है, तब उपासकों को अपने अपने इष्ट का पूजन करना चाहिये, उसको छोड़कर वे व्यर्य ही आपस में माण-सहार क्यों करते है ? ॥ १७॥ विविधमांसरसाशनतत्पराः प्रतिपुर सुरया-सुरयाजिनः । विधिविरुद्धपथेषु वितन्वते गतधियः स्वमति निरयाताम् ॥१८॥ आनकल जहा देखो वहा सुरा से सुरों का यजन करने वाले तामस-जन मग, माम के चक्र में पड़ कर वेद विरुद्ध मार्ग का अवलम्बन कर रह हैं ॥१८॥ निजविनिर्मितपुस्तककल्पने- जगति तन्त्रविदो निगमानपि । जनमते न मतेऽपि विडम्बय- त्यहह देवविपाकविमोहिताः ॥१६॥ वाम मार्ग प्रतिपादक नवीन नवीन ग्रन्य लिखकर बहुत से यवन तान्त्रिक वेदादि सद्ग्रन्या को निन्दा करके मनुष्यों को वैदिक सिद्धान्त से विचलित कर ढयमिदं यदि लोरमते स्थिर प्रभवता भवता निजगोरवात् । - -- , 14 1 प ४३ चतुर्थः सर्गः जनपदे विनिवेश्य विधीयते :: स्थिरतरं किमतःपरमीप्सिंतम् ॥२०॥ संसार में प्रचलित इन दो बातों को यदि आप अपने प्रबल : पुरुषार्थ से हटाकर श्रील-मार्ग का स्थिर प्रचार कर सकें तो इससे चढ़कर मेरे लिये अन्य फोई प्रसन्नता का स्थान नहीं है ।। २० ॥ चरमभागमुपेयुपि जीवने निगदितास्ति मया निजवासना शमरताऽमर.! तामुपजीवयं स्वसंमये निजपौरुपतः स्थिराम् ॥२१॥ हे अमर ! हमने अपने जीवन के अन्तिम भाग में आपके समक्ष यह. अपनी परल पासना उपस्थित की है, आप अपने पल से इसको पुनर्जीवनदे. कर पूर्ण कर दीजिये ॥ २१॥ जगति ते नवजीवनतः स्थिति : यदि गमिष्यति वेदपथः शिवः। प्रभवते भवते विबुधोजनः, स्तुतिपदानि पठिष्यति सर्वतः ॥२२॥ 'आपके जीवन में यह वैदिक मार्ग यदि आपके परिश्रम से स्थिरता को प्राप्त होगया तो सपस्त वेद विद्वान आपका यश-गान करेंगे ।। २२ ।। जनपरिस्थितिमत्र भवे भवा- न्यदि करिष्यति नैतिकजीवनाम् । अधमशासनमेष्यति सत्वरं प्रविलयं विलयन्त्रितभोगिवत् ॥२३॥ आपने अपने पुरुषार्थ से यदि जनता में नैतिक जीवन का-सनार कर दिया सो यवनों का समस्त उत्पात इस समय अन्तहित हो जायगा ॥ २२॥ शतशएव रघोः कुलसंभवा यदुपतेरपि, विस्मृतपौरुपाः : .

। श्रीचन्द्रमौलिचरिते अनुभवन्ति दशामतिदुःखदां परिभवेऽरिभवेत्र कुतः सुखम् ॥२४॥ 1 यवनों के अत्याचारों से पीड़ित सैकड़ों रघुवंशी और यदुवंशी क्षत्रिय इस समय दुर्दशा का अनुभव कर रहे हैं ।। २४ ॥ किमधिकं कथयामि भवानिदं समधिकं परिवेत्ति मदुक्ततः। कुरु तथा कृतिमत्र यथा भवे- दुपरता परतापसमुन्थितिः ॥२५॥ मैं कहां तक वर्तमान समय की दुर्दशा का वर्णन करू ? भाप स्वय मुझसे अधिक इस विषय में अनुभव प्राप्त कर चुके हैं, इस लिये ऐसा कार्य कीनिये जिससे इस दुःख का अन्त ॥ १॥२५॥ इदमुदीर्य मुनिम्प्रति सादरं स भगवानविनाशिमुनिस्तदा । विधिवशादनयत्कथनं निजं- 1 शमवतामवतां हृदये स्थितिम् ॥२६॥ श्रीचन्द्र भगवान् के प्रति इतना कहकर अविनाशी मुनि ने समयोचित अपना कयन ययावसर समाप्त कर दिया ।। २६ ।। अवसितिं गमयन्मकृतं विधि पुनरसावुपविश्य निजासने । अनमनो नमनोचितसत्प्रभ- स्तमिदमाह मुनि शिवसन्निभम् ॥२७॥ प्रस्तुत कथन का उपसहार कर अपने भासन पर बैठकर अविनाशी मुनि ने शिरूप श्रीचन्द्र जी से फिर कहा १ ।। २७ ।। समुपदिश्य भवन्तमवस्थित विकसितं मम हृत्कमल तथा )। . - - । चतुर्थः सर्गः सकमलं कमलं रविमएडलं. 11': समवलोक्य यथा नभसि स्थितम् ॥२८॥ हे भगवन् ! आपके.समक्ष अपना हद्गत अभिप्राय कहकर मेरा हृदय ऐसा प्रफुल्लित हुआ है जैसा आकाशात सूर्य को देखकर मलगत कमल का हृदय विकसित होता है ॥ २८ ॥ गुरुवरादधिगत्त्य यथोचित शमधनामधनार्थितभावनाम् । मुनिवरोपि निरस्तकुलक्रमो. व्रतमिदं समपूरयदादरात् ॥२६॥ इस प्रकार अविनाशी मुनि से समयोचित्र उपदेश पाफर श्रीचन्द्र भी अपने कुटुम्ब की समस्त चिन्ताओं को छोड़ अपने मुनिव्रत को पूरा करने के लिये मवृत्त हुये ॥ २९ ॥ उभयतो-भयतोपि जनस्थिति वह विलोक्य विपक्षविमर्दिनीम् । सुमनसो निजभक्तजनबजे सुमनसां निचयं वपुः शिवम् ॥३०॥ संसार.की विगढ़ी हुई परिस्थिति को सुधारने के लिये हद प्रत श्रीचन्द्रमुनि को प्रवृत्त देखफर देवगणों ने भी उस समय उनपर पुष्प वर्षा की ।। ३०॥ एतदसानिगदिदं बुधवन्दनीय- देवस्य भव्यचरितं पठताञ्जनानाम् । भक्तिर्भवे भवतु भूतपती भयैक- त्राणास्पदे हरिविरिञ्चिमहेन्द्रवन्धे ॥३१॥ हमने यहां तक मुधबन्ध श्रीचन्द्र नी का जो वर्णन किया है, उसके पढ़ने वाले सज्जनों का सर्वदा श्रीशङ्कर में अनुराग हो, यही इमारी अभिलाषा है ।३१) अभ्यागतां गुरुपरम्परया पुरस्ता- दाविष्कृतां सनसनन्दननारदाद्यैः।

पञ्चमः सर्गः २ -- . अथ वेदविदां भून्यै निगमागमसम्मतम् । अविनाशिमुनिः प्राह-मुनिशब्दार्थनिर्णयम् ॥१॥ इसके अनन्तर वेदज्ञ विद्वानों के लाभार्थ अविनाशी मुनि ने निगमागम सम्मत्त मुनि-शब्द का विवेचन प्रारम्भ किया ॥ १॥ मुनयो वातरशनाः पिशङ्गा वसतेऽमला । इति ऋग्वेदमन्त्रोत्र निदर्शनमुपस्थिनम् ||२|| आपने कहा-"मुनयो वातरशनाः पिशङ्गा वसवेऽमला" इस ऋग्वेद के [१०।१३६३२] मन्त्र में मुनियों का वर्णन प्रत्यक्ष में उपलब्ध होता है ।। २ ।। धुनिर्मुनिरिवेत्यत्रमन्त्रे ऋग्वेदसंगते । उपमानार्थकत्वेन मुनिशब्दो, व्यवस्थितः ॥३॥ "धुनिर्मुनिरिव शर्थस्य निष्णोः" इस ऋग्वेद के [ ६ । ५६।८ ] मन्त्र में उपपानार्थ में विद्यमान मुनि-शब्द प्रत्यक्ष में विद्यमान है ॥ ३ ॥ इन्दो मुनीनामभवत्सखेति परिदृश्यते । ऋग्वेदमन्त्रे प्रत्यक्षं तदाख्यानमुपागतम् ॥४॥ "इन्द्रो मुनीनां सखा" इस ऋग्वेद के (८।१७।१४) मन्त्र में इन्द्र मुनियों का मित्र या, या भी प्राचीन वैदिक पाख्यान मिलता है ॥ ४ ॥ मन्त्रवतेषु सर्वत्र मुनिशब्दव्यवस्थिती । मुनयो वैदिकाः सिद्धमेतदेव यथोचितम् ॥५॥ पूर्वोक्त तीन मन्यों में मुनि शब्द के मिलने पर चैदिक समय में मुनि ये या पात अनायास सिद्ध होती है ॥ ५ ॥ उपमानार्थके मन्त्रस्थिते मुनिपदे स्फुटम् । सज्ञा कस्यापि सुमुनेरियमस्तीति गम्यते ||६|| r श्रीचन्द्रमौलिचरिते दीक्षामिमां गुरुवरादधिगन्य मन्ये । श्रीचन्द्रमौलिरभवद्विजयी-जगत्याम् ॥३२॥ नारद आदि मुनियों द्वारा अनुमत तथा गुरुपरम्परा प्राप्त इस उदासीन दीक्षा को माप्त कर श्रीचन्द्र जी जगद्विनयी हुये ॥ ३२ ॥ अस्य दिग्विजयभावनावत पद्धति विजयवर्णनक्रमे। -- वर्णितां गुरुपरम्परानुगा r भावुका. पठत रम्यवर्णनाम् ।।३।। दिग्विजयोपयोगी साधनों द्वारा सम्पन्न श्रीचन्द्र भगवान् का दिग्विजय तथा उसमें सहयोग देने वाली गुरु-परम्परा फा दिव्य चरित्र जिनको देखना हो ये अग्रिम सर्गों का अवलोकन करें ।। ३३ ॥ अत्र यनिगदित मया रसा- दद्भुत यमक्सगते 'पदै.। तद्वत्वतिविनोदकारक काव्यनिर्मितिकलाहृतात्मनाम् ॥३॥ इस सर्ग में हमने यमकालङ्कार सहित गुरु शिप्प सवाद को लेकर जो वर्णन मस्तुत किया है यह साहित्य सेवी विद्वानों के लिये प्रानन्द मद से॥३४॥ इतिश्री मनाढायशोद्भव पविवर श्रीमदखिलानन्द शर्मप्रणीते मतिलक श्रीपद्रमौलिचरिते महाकाव्ये गुरूपदेशवर्णननाम-चतुर्थ सर्ग "

४८
--
"
जगदुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
मन्त्र में उपनामार्थक मुनिशन्द के आने पर मुनिशब्द किसी व्यक्ति विशेष
का वाचक अवश्य मानना होगा अन्यथा उपमान नहीं बन सकता ॥ ६ ॥
पिशंगवसनास्ते ते मुनयो मननक्षमाः।
कथ्यन्ते वातरशना येपामिन्द्रोभवत्सखा ॥णा
इन्द्र जिनका मित्र था वह मुनि वेद में पिशङ्ग (पीत ) वसन, मननशील
और वातरशन कहे जाते हैं ॥७॥
मुनिर्देवस्य देवस्य सौकृत्याय सखा हितः ।
इति ऋग्वेदमन्त्रपि सखित्वमुपलभ्यते ।।।।
"मुनिर्देवस्य देवस्य सौकृत्याय सखा हित." इस ऋग्वेद के (१०।१३६।४)
मन्त्र में भी मुनियों के साथ इन्द्र का सखिस्व मिलता है ॥ ८ ॥
परमेतत्सखित्वं यन्मघोन उपलभ्यते ।
मुनिष्वेवन तन्मन्ये यतिषु व्रतवैरिपु ॥६॥
परन्तु यह जो इन्द्र का सखित्व मन्त्रों में मिलता है वह केवल मुनियों के
लिये ही नियत है, पतियों के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं है ॥९॥
इन्द्रो जघान त वृत्रं यतीनिव सुदारुणान् ।
इत्याथर्वणमन्त्रोत्र प्रत्यक्ष भेदकल्पनः॥१०॥
"इन्द्रस्तुरापामित्रो वृत्र यो जपान यतीन" इस अथर्ववेद के ( २५३)
मन्त्र में शनि और पति का भेद विस्पष्ट है । निरक्त में (न) पद उपमानार्थक
लिखा है। इन्द्र ने वृत्र को सन्यासियों की तरह मारा यह मान्त्रिक पदों का
प्रत्यक्ष अर्थ है ॥१०॥
यतिभ्यो धनमादाय भृगुभ्यः समदात्पुरा।
इन्द्र इत्यपि ऋग्वेदे विस्पष्टमुपलभ्यते ॥११॥
"येना यतिभ्यो भृगवे धने हिने" इस ऋग्वेद के (२००९।३) मन्त्र में गह
भी भाख्यान मिलना है कि इन्द्र ने यतियों से धन छीन कर भृगु नामक ऋषि
को दिया है॥ ११ ॥

पञ्चमः सर्गः . कौपीतकोपनिपदि स्थिरमिन्द्रस्य तद्वचः। अरुन्मुखान्यतीन्यत्रसोदाच्छालाबृकबजे ॥१२॥ कोपोतकि ब्राह्मण के-"अरुन्मुखान् यतीन् सालान्केभ्यः प्रायच्छम्" (३:१) इस वाक्य में इन्द्र के द्वारा यतियों के मांस का शालार्थकों के लिये देना प्रत्यक्ष है ॥ १२॥ उभयत्रात्र विद्भिर्वेदमर्मानुवर्तिभिः । बलवत्कारणं मृग्यं येनायं भेद आंगतः ॥१३॥ . इसलिये मुनि और यदि इन दोनों शब्दों के इतिहास पर विद्वानों को विनार करना चाहिये कि यह भेद किस कारण से वैदिक साहित्य में ग्राफर प्रविष्ट हुभा है ? ॥१३॥ अतःपरमुदासीनशब्दार्थस्य व्यवस्थितिः । वेदादेवात्र विदुपामुपकाराय कथ्यते ॥१४॥ इसके अनन्तर अब उदासीन शब्द के अर्थ पर विचार किया जाता है जो . विद्वानों के लिये अत्यन्त मननीय है ।। १४ ॥ "तस्योदितीति" छान्दोग्यश्रुतौ समुपलभ्यते । "उदि" त्येतच्छिवं नाम ब्रह्मणोऽध्यक्तरूपिणः ॥१५॥ "तस्य उत् इति नाम" इस छान्दोग्य श्रुति में [ १ । ६ । ७ ] "उत्" यह नाम उस अध्यक्त ग्रह का है, जो सूर्य-मण्डल के अन्दर हिरण्मय रूप है ॥ १५ ॥ उपसंवेशनार्थस्य धातोरासेः प्रकल्पितः । आसीनशब्दो बहुधा लभ्यते वेदवाङ्मये ॥१६॥ उपरेशनार्थक (प्रास ) धातु से आसीन शब्द बनता है, जिसका अधिक , प्रयोग वैदिक साहित्य में मिलता है ॥ १६ ॥ (१) प्रथ य एपोन्तरादित्ये हिरएमयः पुम्यो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः प्राप्रमाबात्सर्वएव मुवर्णः। तस्य यथा कयास पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्य उदिति नाम स एप सर्वभ्यः पाप्मभ्य उदितः ( रहितः) उदेति ह ये सर्वभ्यः पाप्मभ्यः य एवं वेद । [छान्दोग्य प्रपाठक १ खएड २ मन्त्र ७ .] -- ७ ५० जगद्गुरुत्रीचन्द्रदिग्विजये उदित्येतत्परं ब्रह्म-तत्र ये सुप्रतिष्ठिताः । उदासीना निगदितास्तएव निगमागमः ॥११॥ "त्" शब्द से यहाँ पर परब्रह्म का ग्रहण है, उस ब्रह्म में जो प्रतिष्ठित रहते हैं उनका ही नाम उदासीन है ॥ १७ ॥ ब्रह्मसंस्थपदस्यार्थे यथा भवति धारणा। उदासीनपदे तद्वत्तस्यैवार्थस्य निश्चितिः॥१८॥ "ब्रह्मसस्योऽमृतत्वति" इस छान्दोग्य श्रुति में ब्रह्मसस्य पद का जो अर्थ है वही अर्थ उदासीन पद का भी है ॥ १८ ॥ एकार्थकाविमौशब्दावतोनास्त्यत्र संशयः । येपामस्ति यथाकालं ते पठन्तु ऋचाञ्चयम् ॥१६॥ ब्रह्म-सस्य और उदासीन यह दोनों शब्द एकार्थक होने के कारण समानार्थक हैं, इममें निनको सन्देह हो वे ऊपर कहे हुये वैदिक मन्त्रों का अवलोकन करें ॥ १९ ॥ प्रवृत्तिमार्गनिरताः केवलं ये भुवस्तले । निवृत्तिमार्गविमुखास्तएव मुनिविद्धिपः ॥ २० ॥ जो केवल प्रवृत्ति-मार्ग में रत होकर निवृत्ति मार्ग का सर्वथा विरोध करते हैं वे वास्तव में मुनियों के शत्रु हैं ॥ २० ॥ मिथ्या निवृत्तिगण-येऽलसाः कर्मविदिपः । देवकृत्यं विनिन्दन्ति शत्रवस्ते शचीपते. ॥२१॥ मालसी होने के कारण कर्म-मार्ग से विमुख जो मनुष्य दम्भ से निवृत्ति मार्ग का देग दिखाकर देवकृत्य की निन्दा करते हैं वे इन्द्र के शत्रु ॥२१॥ निवृत्तिमार्गनिरता अपि ये कर्मयोगिनः । मुनयस्ते मता लोके येपामिन्द्रोऽभवत्सखा ॥२२॥ निवृत्ति मार्ग में प्रवृत्त होने पर भी नो सजन कर्मयोग का विश्व रक्षा के लिये समर्थन करते हैं, और वन में रहते हुए भात्म साधन भी करते हैं, इन्द्र उनसे मित्रता रखता है ॥ २२॥ I ।

पञ्चमः सर्गः अरण्यसंस्थोथमुनिवुभूपेदिति वाक्यतः। . भारते मुनिशब्दोयमुदासीनार्थको मतः ॥२३॥ "भरण्यसंस्थोय मुनिर्वभूपेव" यह उद्योग परीय [ ३७,३९] महाभारत का वचन भरण्य-संस्थ होने के कारण उदासीनों को ही मुनि कहता है ॥ २३ ॥ बृहदारण्यकेप्येवं मुनिशब्दः प्रलभ्यते । - तमेवात्मानमित्यत्र वाक्ये विज्ञैर्विलोक्यताम् ॥२४॥ "तमेवात्मानं विदित्वा मुनिर्भवति" इस वृहदारण्यक (४४१२२) श्रुति में भी श्रात्म-ज्ञान के अनन्तर मुनित्व माप्त होना सिद्ध है ॥ २४ ॥ उदासीनवदासीनमिति वाक्ये व्यवस्थिते । सादृश्यार्थे वतिः सोपि व्यक्तिमाश्रित्य तिष्ठति ॥२५॥ "उदासीनवदासीनम्" इस भगवद्गीता वाक्य में (९ । ९) सादृश्यार्यक जो पतिप्रत्यय है वा व्यक्ति का अवलम्ब लेकर ही लोक में रहता है ।। २५॥ नास्तिचेत्कोप्युदासीनः कथं तददिति स्मृतिः। अस्तिचेत्सिद्धमेवात्र तस्य पूर्वत्वमादृतम् ॥२६॥ पदि उदासीन संशा कोई प्राचीन वैदिक मुनि न मामा जाने तो "तदत्" प्रयोग नहीं पन सकता. यदि उसका भस्तित प्राचीन है तो उसकी माचीनता स्वतः सिद्ध है ॥ २६ ॥ न केनाप्युच्यते लोके तवाकाशवदाननम् । चन्दवन्मुखमित्यादि वाक्यं सर्वेः प्रयुज्यते ॥२७॥ संसार में कोई भी बुद्धिमान् [ भाकाशवत्-मुखम् ] ऐसा नहीं करता है। मत्युत [चन्द्रमुखम ] ऐसा सब कहते हैं ॥ २७ ॥ उपमानोपमेयत्वभावो वस्तुनि तिष्ठति । नावस्तुनि ततः सिद्धमुदासीनपदं स्थिरम् ॥२८॥ संसार में उपमानोपमेय मार किसी वस्तु को लेकर ही ठहरता है, पिना वस्तु के नहीं इस लिये उदासीन पद माचीन मारय मानना होगा ।। २८ ॥

. जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये भगवदाक्यतः मिद्धमुदासीनपदं यदि। । का पुनस्तत्र सन्देहः स्थितोद्यापि मनस्विनाम् ॥२६॥ भगवद्गीता में भगवन्मुख से नव उदासीन पद की प्रतिष्ठा हो चुकी, नव उसके विषय में अब विवाद उठाना गर्थ है ॥ २९ ॥ अतः परमुदासीनपथस्यास्य प्रवर्तकान् । मुनीनहं प्रवक्ष्यामि महाभारतवाक्यतः ॥३०॥ भव यहां पर उदासीन पार्ग प्रवर्तक प्राचीन मुनियों का प्रसार महाभारत के भाधार पर कहा जाता है ॥ ३०॥ [ युग्मम् ] सनः सनत्सुजातश्च सनकः ससनन्दनः । सनत्कुमारः कपिलः सप्तमश्च सनातनः ॥३१॥ सप्तते मानसाः प्रोक्ता ऋपयो ब्रह्मणः सुताः । स्वयमागतविज्ञाना निवृत्तिं धर्ममास्थिताः ॥३२॥ पहाभारत के शान्ति पर्न में नित्यसिदज्ञान तथा निवृत्ति मार्ग का आश्रय लेने वाले--सन, सनत्सुजात, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, कपिल, सनातन यह सात ब्रह्मा के मानस पुत्र कहे हैं { ३४०७२।७३ } | ३१-३२ ।। वैधात्रोयं मुनिगणः स्वभावाविषयबजे । उदासीनः पुरा मार्गमुदासीनमकल्पयत् ॥३३॥ 1 खेलन्तोद्यापि ते वाला मुनयो नयवेदिनः । उदासीना इति जनरुच्यन्ते वेदमानिभिः ||३|| यह वैधात्र मुनिगण स्वभान ही से विषयों में उदासीन रहने के कारण माचीन समय में उदासीन पद्धति के प्रतिक हुए-जो आज भी बालखिल्य नाम से ऋग्वेद के अन्दर पालखिल्य सूक्त के, दृष्या माने जाते हैं ।।३३-३४॥ इमानुत्पाद्य तनयान्विधाता सृष्टिकल्पने । नियोजितुं प्रयवृते परं ते न तथा गताः ॥३५] ।

पञ्चमः सर्गः
सृष्टि के प्रारम्भ काल में सन यादि मात मानस पुत्रों को उत्पन्न कर
विगताने इनसे सृष्टि उत्पन्न करने को कहा, परन्तु इन्होंने पिता का यह प्रस्ताव
स्वीकार नहीं किया ।। ३५ ।।
उदासीनानिमान्वीक्ष्य विधाता सर्जने पुनः।।
सप्तपुत्रान्स्वमनसा सुपुर्व सर्जने रतान् ॥३६॥
मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।
वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥३७॥
सृष्टि कार्य में उदासीन इन पुत्रों को देखकर विधाता ने सृष्टि-क्रम चलाने
के लिये अन्य सात मानस पुत्रों को उत्पन्न किया. जो कि मरीचि, अगिरा, अत्रि
पुलस्त्प, पुलह, ऋतु, वसिष्ठ इन नामों से संसार में प्रसिद्ध हुए ॥३६-३७||
एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः।
प्रवृत्तिमिणश्चैव प्राजापत्ये व कल्पिताः ॥३८॥
यह सातों पुत्र आज भी वेदज्ञ, प्रवृत्ति मार्ग निरत, मुख्य वेदाचार्य और
प्राजापत्य सर्ग के प्रवर्तक माने जाते हैं ।। ३८ ।।
इति भारतपद्याभ्यां शान्तिपर्वणि वर्षिताः।
सप्तव मानसाः पुत्राः प्रवृत्तिपथमाश्रिताः ॥३६॥
ऊपर फहे हुये महाभारत के दो पद्यों में जो कि (शान्तिपर्व अध्याय ३४०
पर ६९-७०) में विद्यमान है; सात ही मानस पुत्र प्रवृत्ति मार्ग के पथिक
करे गये है ॥ ३९॥
दाविमो सुपथौ लोके प्रवृत्तौ सर्जनक्रमे ।
श्राद्यस्तेपामुदासीनः परो लोकप्रवर्तकः ॥१०॥
सृष्टि के बारम्भ काल से हो ससार में यह दोनों ही मार्ग प्रचलित हुए;
जिनमें परिला उदासीन मार्ग है और दूसरा प्रवृत्ति मार्ग है ॥ ४० ॥
त्रयोन्ये मानसाः पुत्रा मनुप्रोक्ताः पुरातनाः ।
लभ्यन्ते नारद गुणाचेतसमुखाः क्रमात् ॥११॥
पूर्वोक्त मानस पुत्रों के अतिरिक्त मनुस्मृति में सीन और मानस पुत्रों का
वर्णन मिलना मिनका नाम नारद, भगु और माचेतस है ॥४१॥

जगमोचन्द्रदिग्विजय एप्वेको नारदः सर्गादुदामीनतया स्थितः । उदामीनपर्थ भेजे तदन्यो सर्जनक्रमम् ।।४२॥ इन तीन पुत्रों में से देवर्षि नारद पहिले ही से विष्पों से उदासीन शेप दो सृष्टि मार्ग के प्रवर्तक हुए ॥ ४२ ॥ सनाद्याः सप्त मुनयो नारदश्चाष्टमः पुरा । उदामीनपथं लोके तेनुः सर्जनकालतः ॥१३॥ सन आदिक सात पहिले और अम नारद ये सृष्टि के प्रारम्भ काल से उदासीन धर्म के प्रचारक हुये ॥४३॥ एभ्यः प्रत्तो भुवने मार्ग एपः सनातनः । अद्यापि लभ्यते भूमावुदासीनतया स्थिरः ॥४॥ मसार में इन पाठ मुनियों से महत्व पर सनातन उदासीन धर्म भान भारत में उदासीन नाम से प्रचलित है ॥ १४ ॥ श्रीमद्भागवतेप्येप मार्गः समुपलभ्यते । तृतीयस्कन्धमध्यस्थवादशध्यायदर्शितः ॥१५॥ यह उदासीन मार्ग श्रीमद्भागवत के हत्तीप स्कन्ध में द्वादशाध्याय के मन मी करिल और देवहूति के सम्बाद मे विद्यमान है ॥४५॥ निवृत्तिमार्गपरतामनुसृत्य विनिर्मितम् । तत्रैतत्पद्ययुगलं यदधः परिलिख्यते ॥४॥ वहां पर निवृत्ति मार्ग का अवलम्ब लेकर श्री व्यास देव ने दो श्लो लिखे है, जो नीचे प्रस्तुत हैं ।। ४६ ॥ सनक सनन्दश्च सनातनमथात्मभूः । सनत्कुमारश्च मुनीनिष्कयानूर्ध्वरेतसः ॥४॥ तान्वभाषेस्वभूः पुत्रान्प्रजाः सृजत पुत्रकाः। ते नैच्चन्मोक्षधर्माणो वासुदेवपरायणाः ॥८॥ वहाँ पर लिखा है कि ब्रह्मा ने अर्धरेता, निक्रिय, सनक, सनन्दन सनातन भौर सनत्कुमार इन चार पुत्रों को उत्पन्न कर उनसे कहा कि तुम मन पञ्चमः सर्गः का सर्जन करो ? परन्तु, केरल वासुदेव-परायण उन पुत्रों ने मोक्ष-मार्गी होने के कारण अपने पिता को भाज्ञा का पालन नहीं किया ।। ४७-४८ ॥ पद्याभ्यामेवमुक्ताभ्यां व्यासदेवेन दर्शितः । उदासीनपथः पूर्वं योधना प्रसूतिङ्गतः ॥४ा ऊपर कहे दो पदों द्वारा व्यास देव ने पूर्व समय में ही उदासीन मार्ग का समर्थन कर दिया जो आनकल विस्तार को प्राप्त होगया है ।। ४९ ।। एतावेव पथौ लोके श्रेयः प्रेय इति स्मृतौ। कठोपनिपदिन्यस्तो ययोर्भेदः प्रलभ्यते ॥५०॥ प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग इन दो मार्गों का वर्णन ही फठोपनिपद् में श्रेय और प्रेय के नाम से उपलब्ध होता है ॥ ५० ॥ श्रेयो निवृत्तिमागोंस्ति य उदासीन उच्यते । प्रेयः प्रवृत्तिमागोंस्ति योयं बहुजनानुगः ॥५.१।। श्रेय निवृत्ति मार्ग है-जिमको उदाप्तीन मार्ग कहते हैं और प्रेय प्रवृत्ति मार्ग है जो सृष्टि क्रम का सचालन करता है ॥ ५१ ॥ निवृत्तिमार्गनिरता मुनयः सनकादयः । प्रवृत्तिमार्गनिरता वसिष्ठाद्या महर्षयः ॥५२॥ ससार में निवृत्ति मार्ग में निरत सनकादि मुनि हुये और मत्ति मार्ग निरत वासिष्टादि महर्षि हुये ॥५२॥ भेदोऽनयोर्महानेप लभ्यते मार्गभेदतः । तस्मादिमो मुनिऋपी भिन्नावेव निसर्गतः ॥५३॥ मार्ग भेद से इन दोनों में पड़ा मारो भेट विधमान है इसलिये मुनि और पापि स्वभाव से ही भिन्न है ये कटापि एक नहीं हो सकते हैं ।। ५३ ॥ एकरूपेण पश्यन्ति ये नरा भुवि तानृपोन् । मुनीगपि न ते विज्ञाः पण्डितम्मन्यमार्गगाः ॥५॥ भो मनुष्य इनमें भेद न मानकर इन दोनों को एक मानने है - पण्डितम्मन्य कदापि विश नहीं की जा सकते है ।। ५४॥

५६
क
जबद्गश्रीचन्द्रदिग्विजये
सनाव्यगौरवादर्श विस्तरेण मया कृतम् ।
सनकादिमुनिव्रातवर्णनं तत्र वीक्ष्यताम् ॥५५॥
हमने "सनाध्य गौरवादर्श" नामक निबन्ध में सनकादि मुनियों के विषय
मे बहुत कुछ विवेचन किया है वह वहीं पर देखना चाहिये ॥ ५५ ॥
उदासीना. स्वविपये सर्वेपीमे महोदयाः।
उदासीनपदं प्राप्य रमन्ते बालग्विल्यवत् ॥५६॥
उदासीन मार्ग प्रवर्तक सभी सनकादि मुनिगण विषयों से बहिर्मुख होने
के कारण आज भी बालखिल्यों के समान सर्वत्र विचरते हैं ।। ५६ ।।
बाल्यखिल्यपदं वेदे प्राणेष्वेव प्रतिष्ठितम् ।
आबालं तद्गतिर्यस्माल्लभ्यते जन्मभागिषु ॥५७॥
शतपथ ब्राह्मण में [ ८ । २ । ३१ । ] वालखिल्प शब्द सर्वत्र गति
होने के कारण प्राणवाचक भी लिखा है ॥ ५७ ।।
प्राणा यथा प्रियतमाः शरीरे देहमानिनाम् ।
उदासीनास्तथा लोके सर्वदा ब्रह्मवादिनाम् ॥५॥
देहाभिमानी पुरुषों को जिस प्रकार माण प्रियतम है उसी प्रकार ब्रह्मवादी
महात्माओं को उदासीन मुनि प्रिय हैं ॥ ५८ ॥
मनसा कल्पिता यस्मादिमे मुनिवरा. पुरा ।
विधात्रा तत एतेषु न विकारोस्ति योनिजः ॥५६॥
इन सनकादि मुनियों को ब्रह्मा ने मन से उत्पन्न किया इस कारण इनमे
योनिज विकार नहीं होता है । योनिन तया अयोनिन भेद से सृष्टि में वैविध्य
स्वभाव सिद्ध है ॥ ५९॥
विद्यावशमिमं सर्वे वर्धयन्ति पुरातनम् ।।
उदासीना मुनिवरा न वंशं योनिसम्भवम् ॥६॥
विषयों से उपरत उदासीन मुनिगण प्राचीन विद्या वश को ही अब तक
चलाते रहे हैं इनमें यौन वश नहीं चलता है ॥ ६ ॥

पञ्चमः सर्ग ५७ मुनिभ्यः प्रसृतो लोके नानाभेदमुपागतः । उदासीनपथः प्रायो लभ्यते मुनिमएडले ॥६१॥ सनकादि मुनियों से प्रवृत्त अनेक भेदों से विभिन्न यह उदासीन मार्ग प्रान कल मायः मुनि मण्डल में मिलता है ।। ६१ ।। अतोमुनिव्रतं धार्य वेदमार्गानुयायिभिः । श्रुतिसिद्धः पथो यस्य राजमार्गइव स्थितः ॥६३॥ इसलिये वैदिक मुनियों को इसो मुनि व्रत को धारण करना चाहिये जिस का श्रुति सिद्ध गार्ग घटापय की तरह सर्वत्र प्रसिद्ध है ।। ६२ ॥ सोयं तव प्रयत्नेन-नितरां परिवर्धितः । निवृत्तिमार्गो भुवने वर्धतामुत्तरोत्तरम् ॥६३।। हमारे परिश्रम से वृद्धि को प्राप्त हुया यह निवृत्ति मार्ग आपके प्रयत्न से अब बहुत वृद्धि को प्राप्त होगा ॥३॥ यस्योदयेन सर्वत्र भारते वैदिकः पथः । पुनरेष्यति वेगेन निरस्तेतरकापथः ॥६॥ और इसीके द्वारा समस्त भारत में अन्य कुत्सित मतों का नाश करने वाला वैदिक मार्ग फिर चमकेगा ॥१४॥ यस्यायं भुवनतले महानुदारः सन्मार्गः प्रसूतिमुपेत्य धर्मभावम् । अद्यापि प्रथयति भारतीयमाने सर्वज्ञः स जयति निर्भयो महेशः ॥६५॥ निसके द्वारा मवृत्त पड़ा उदार यह मार्ग प्रान भी भारतीय-जनों में धर्म मार्ग को विस्तृत कर रहा है, यह निर्भय भगवान् शकर ही पन्दनीय है ॥६५॥ इतिश्री सनाहरशोदर पवियर श्रीमदपिलानन्दशर्मग्रणीते मतिलक जगद्मश्रीचन्द्रदिग्विजय महाकाव्य मुनिमार्गनिरूपनाग-पग मा ।

, - पष्ठः सर्गः।' अथ प्रसङ्गादविनाशिनामा मुनिः स्वशिष्यं पुरतो निविष्टम् । परम्परां बोधयितुं प्रवृत्तो यथाक्रम सादरमेवमाह ॥१॥ गत सर्ग में मुनि मार्ग का विवेचन किया गया है, इसके अनन्तर अपने शिष्य के प्रति अविनाशी मुनि-मुनियों की परम्परा का वर्णन करते हुए अपने कयन का उपक्रम इस प्रकार करते हैं ॥१॥ सनातनं सदरुभिः प्रदिष्टं निवृत्तिमार्ग जगतीतलेत्र। पुनर्नवीकर्तुमनन्तवीर्यः सनत्कुमारः प्रथमो बभूव ॥२॥ गुरु परम्परा प्राप्त सनातन निवृत्ति मार्ग का इस भारतार्प में शैथिल्य दूरकर पुनः नवीन रूप से इसमें जोवन लाने वाले प्रथम सनत्कुमार मुनि हुए ।। २ ।। मुनिव्रतोयं-मुनिवेषधारी प्रवृत्तिमार्ग परिहाय दूरे। निवृत्तिमार्ग भुवने यथाव- त्ततान निर्वासितलोकमायः ॥३॥ विषयों से उदासीन रहकर आपने प्रवृत्ति मार्ग का निराकरण करते हुए सपस्त लोकों में निवृत्ति मार्ग का प्रसार किया ॥३॥ गुरुर्मुनीनामयमादिप्समें सनत्कुमारो निगृहीतमारः। सनातनेषु स्वमहोदरेपु ततान दीक्षां परमार्थवीक्षाम् ॥४॥ -

पष्टः सर्गः
भादि सर्ग में येही सनत्कुमार प्रवृत्ति मार्ग में प्रवृत्त अपने सहयोगियों को
निवृत्ति मार्ग में लगाकर अपने कर्तव्य का पालन करते थे ॥४॥
अथ नारदमीक्ष्य तादृशं
तमुदासीनपथे निवेशयन् ।
मुनिरेप यथार्थदर्शनः
प्रथयामास निजोचितं मतम् ॥५॥
आपने नारद मुनि को अपने सिद्धान्त का रहस्य समझाकरमपना अनुयायी
पनाया, जिससे सर्वत्र इसका प्रसार होगया ॥ ५ ॥
दीक्षामवाप्य सदृशीं मुनिवंशकेतुः
श्रीनारदो जगति धातृसुतात्सबन्धोः।
वीणानिनादमुखरीकृतसर्वलोकः
सर्वान्निवृत्तिपथमेव निनाय लोकान् ॥६॥
मुनि मण्डल मण्डन श्री नारद जी महारान अपने पूर्वज सनत्कुमार जी से
निवृत्ति मार्ग की दीक्षा पाकर घड़े प्रसन्न हुए और वीणा का मधुर निनाद सुनाते
हुए समस्त मुनि मण्डल में थपने सिद्धान्त का प्रसार करते रहे ॥६॥
हारीतगोत्रप्रथितो महात्मा
वाभ्रव्यनामा जगृहेभ्य दीनाम् ।
श्रीनारदादेव यथाक्रमण
सम्पर्धयामास निवृत्तिमार्गम् ॥७॥
इनके मनन्तर हारीत गोत्र में जन्म लेने वाले श्रीवानन्य मुनिने नारद जी से
उदासीन मार्ग की दीक्षा लेकर ससार में निवृत्ति मार्ग का मप्तार किया ॥७॥
वाभ्रव्यादधिगतभव्ययोगमार्गः
सम्प्राप्य क्रमवशतोत्र धर्मदीक्षाम् ।
श्रीदाम्योप्यनुपदमादरादुपेतं
लोकेस्मिन्मुनिपथमेकमेव तेने ॥1॥

६० जगद्गुरश्रीचन्द्रदिग्विजये वाघ्रव्य मुनिके अनन्तर उनसे ही योग प्राप्त करके महामुनि दारभ्य इस मार्ग के प्राचार्य हुए जिन्होंने समस्त भूमण्डलमें उदासीन मार्ग चलाफर इसका महत्व विस्तृत किया ॥८॥ अयमेव दाल्भ्यनामा मुनिः स्वयोगेन दर्शयामास । छान्दोग्योपनिषदि तां विद्यामन्नप्रवर्धिनी रम्याम् ॥६॥ इसी दालभ्य मुनि ने जिनका छान्दोग्य में दूसरा नाम बदालभ्य मिलता है अपने योग बल से अन्नविद्या का आविष्कार किया जिसका वर्णन छान्दोग्य के प्रथम प्रपाठक में शौवदीय के नाम से मिलता है ॥९॥ 'अयमेवपाणिपात्रो दिगम्बरोऽश्वेन सङ्गतं पाश्र्थे । अर्जुनमुत्तरदान- निरस्तवन्धञ्चकार मुनिवर्यः ॥१०॥ येही दिगम्बर दालभ्य मुनि अश्वमेधीय यज्ञाच की रक्षा में नियुक्त होकर अपने शरण में आए हुए अर्जुन के प्रति उपदेश देकर उसको निरस्तसमस्त बन्धन कर नुके ।। १०॥ अथ जयमुनिरस्मिन्भारते दाल्भ्यशिष्यः । स्वकृतिभिरुपकारं भारतस्यास्य चक्रे । तदुपकृतिमपीमे भारतीयः प्रमन्ना जयपदकथनेनाहर्निशं सस्मरुस्ताम् ॥११॥ आपके अनन्तर इस भारत भूमि में भागके शिष्य जयमुनि इस मार्गके प्रचा- रक हुए जिनका गुण गान आज भी यहां के सत्पुरप "जय" शब्द के साथ करते हुए मानन्दित होते हैं ॥ ११ ॥ भुवनविदितवृत्तां भारतीमेप वन्द्यो , जयमुनिरुपचाररर्चयन्वेदतत्त्वम् । 1.

३ पष्टः सर्गः ६१ तदुदितवरदानराप्य यद्यदिवत्रे तदिह मुनिचरित्रग्राहिणः ख्यापयन्ति ॥१२॥ आपने विधिपूर्वक सरस्वती माता की आराधना करके उनसे वर प्राप्त कर जिन गूढ वैदिक तत्वों को प्राप्त किया वे वैदिक गूढ़ रहस्य पान मुनि मण्डल में गाये जारहे हैं ॥ १२ ॥ अस्याभवजनपदप्रथितः स शिष्यः सञ्जीवनी जगति यः समवाप्य विद्याम् । मृत्योर्मुखाजगदिदं विनिवार्य मन्ये सञ्जीचनेति निजनाम चकार सार्थम् ॥१३॥ भाप अनन्तर इस सम्मदाय के प्रचारक मापके शिष्य सीवन मुनि हुए जिन्होंने अपने तपोबल से सञ्जीवनी विश को प्राप्त कर मृत्यु के मुख से ससार को पचाते हुए अपना नाम अन्वर्थक सिद्ध कर दिया ॥ १३ ॥ कश्यपाय मुनये निजविद्या- मेप शिष्यपदवीं प्रगताय । सम्प्रदाय मुनिराडुपकारं भारतीयमनुजेपु ततान ॥१॥ मापने शिष्य पदवी फो माप्त हुए मुनिवर कश्यप जी को अपनी मृत सी. वनी विधा देकर ससार का जो उपकार किया मह परिपित अक्षरों में नहीं लिखा जा सकता है ।। १४॥ दष्टुं परीक्षितनृपं रभसादजन्तं मागें विलोक्य मुनिरेप विचित्रवीर्यः। तं तक्षकं गुरुपरम्परयाऽनुलब्धां विद्यामिमां कृतिवशात्सफलीचकार ॥१५॥ एक समय को पात है कि राना परोसिन को उसने के लिये निम समय तभक मर्प गारदा पा उस समय पश्यप मुनि ने राजा को बनाने के लिये परत ६२ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये कुछ प्रयत्न किया जिसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में ४१ और ४२ अध्याय के अन्दर पाता है ॥ १५ ॥ सञ्जीवनानन्तरमन लोके श्रीपद्मनामा मुनिराविरासीत् । येनातियत्नेन महामहिम्ना वेगादुदासीनपथः प्रतेने ॥१६॥ सञ्जीवन मुनि के अनन्तर यहाँ पर श्रीपन नामक उदासीनाचार्य प्रकट हुए जिन्होंने बड़े पुरुषार्थ के साथ इस निवृत्ति मार्ग का प्रसार किया ॥ १६ ॥ अयमदान्मुनये नयपण्डितः प्रथितपाणिनये शिवतुष्टिदम् । वरमनुं यदनुग्रहतस्तदा स रचनामकरोदतिसुन्दरीम् ॥ १७ ॥ आपने ही मुनिवर पाणिनि जी को विनीत रूप में उपस्थित देखकर उनको शैव मत्र का उपदेश दिया जिसके प्रभाव से प्रभावित होकर पाणिनि ने भष्टा- ध्यायी जैसा उत्तम व्याकरण का ग्रन्य लिखा ।। १७ ॥ अस्मात्परं स विधिदेव इति प्रसिद्धः शिष्यो बभूव किल सत्यमुनेः समिद्धः । यो वेदमार्गमनघं स्वपरिश्रमेण तस्तार भूमिवलये बहुभिः प्रयासः ॥१८॥ पन मुनि के अनन्तर इस सम्पदाय के आचार्य विधिदेव हुए ये सत्य मुनिके शिष्य थे इन्होंने भपने परिश्रम से ससार में वैदिक तत्वों का बहुत प्रचार किया ॥१८॥ शौनकशिष्यो व्याडिः कथनादस्यैव सन्मुनेः पूर्वम् । संग्रहनामकमेकं दिव्यं ग्रन्थं विनिर्ममे यत्नात् ॥१६||

पाठः सर्गः
प्रापके कयन से ही शौनक शिष्य मुनिवर व्याडिने सग्रह नामक एक बड़ा
ग्रन्य निर्माण किया जो व्याकरण में ऊची श्रेणी का ग्रन्थ माना जाता है ॥१९॥
अस्यैव सन्मुनेराज्ञामुपेत्य धरणीतले ।
व्याडिश्चकार हर्षेण रम्यां विकृतिवल्लरीम् ॥२०॥
आप हो के कयन से उत्साहित होकर व्याडिने एक वेद विषयक विकृतिवल्ली
नामक उत्तम ग्रन्थ लिखा जो आज भी वैदिक साहित्य की शोभा बढ़ा रहा है ॥२०॥
गोदावरीतीरसमाश्रितोयं
स त्र्यम्बकेशं जगति प्रसिद्धम् ।
आराधयन्नेकमनाः स्वकालं
तत्रैव चिक्षेप समाधियोगः ॥२१॥
सत्य मुनि के शिष्य ये विधिदेव जो गोदावरी के तट पर त्र्यम्बकेश्वर महा-
देव के पास रह फर शिव जी की आराधना में ही अपना समस्त जीवन व्यतीत
फरते थे ॥ २१ ॥
अतःपरं प्रादुरभृद्धरित्र्यां
मुनिप्रकाएडः श्रुतिसिद्धनामा।
यमाप्य लोकेषु बभूव सिद्धा
श्रुतिः समस्तार्थनिबोधयित्री ॥२२||
मापके अनन्तर इस मार्ग के प्रचारक मुनिवर्य श्रुति सिद जो हुए मिनको
पाकर समस्तार्थ प्रकाशक श्रुति मार्ग सब प्रकार से सिद हुमा ।। २२ ॥
अयं मुनिर्वेदविवेचना
विनिर्ममे वैदिककोपमेकम् ।
निघण्टुनाम्ना निगमप्रवीणा
वदन्ति यं भूतलमात्रकोषम् ॥२३॥
मापने वैदिक शन्दों का प्रमग पतलाने वाला निघण्टु नामक एक कोप
लिखा जो भान कल वेदश विद्वानों को बहुत आश्रय देता है ॥ २३ ॥

६४ रक्षक माना जाता है जगद्गतीचन्द्रदिग्विजय एतत्सखित्वेन निवृत्तशको । यास्को मुनिस्तं रचयाम्बभूव । ग्रन्थं निरुक्ताभिधमादरेण यो वेदकोपस्य बभूव गुप्तिः ॥२४॥ मापके समकालीन निरक्तकार यास्फमुनि ने भी मित्र होने के कारण आपके बनाये हुए निघण्टु पर निरुक्त नामक भाष्य लिखा जो अाज भी वैदिफ शब्दों का ।। २४॥ अनेन मुनिना पुरा निगममार्गमातन्त्रता बहुत्र निजयत्नतो निगममन्दिरस्थापना । व्यधायि तदनु प्रथां निगमपूजनस्याग्व्यसौ. ततान भुवने यथा भवतु वेदसम्पूजनम् ॥२५॥ आपने अपने समय में वेदों का मान बढ़ाने के लिये भारत में बहुत से वैदिक मन्दिरों को स्थापना की जिनमे आपने वैदिक ग्रन्थों के पूजन की प्रथा प्रारम्भ कर अविद्या का उच्छेद कर दिया ॥ २५ ॥ यथा जगति पूज्यते गुरुरहर्निशं मानवै- स्तथा निगमपूजनं कुरुत वेदसंरक्षकाः। स्तवैः स्तुवत देववत्प्रणमत प्रपन्नार्तिह यथाविधि गुरोः पदं नयत साधुनीराजनम् ॥२६॥ आपने अपने शिष्यों से कहा कि जिस प्रकार मनुष्य अपने गुरु की पूना फरते हैं उसी प्रकार आप लोग वेदों को पूना करें उनकी स्तुति करें उनको प्रणाम और उनही को गुरु मानकर उनकी श्रार्ति करें ।। २६ ।। एवं समागतजनानुपदिश्य भूयः श्रौतम्पथं मुनिरयं निगमैकपक्षः। सर्वत्र भूमिवलये निगमोक्तधर्म विस्तार्य विस्तृतिमवाप गुणैरुदारैः ॥२७॥ - है पष्ठ संगै । इस प्रकार अपने समीप में आए हुए मनुष्यों को उपदेश देकर आपने समस्त भारत में वैदिक मार्ग का प्रचार करते २ वेदों की रक्षा में ही अपना समस्त जीवन व्यतीत किया ॥ २७ ॥ अतःपरं भारतभूमिभागे समाजगाम प्रथितस्वभावः। हिरण्यकेशस्य मुनेः स शिष्यो मुनिः सुवेशो भगवत्प्रमादात् ॥२८॥ मापके अनन्तर इस उदासीन मार्ग के प्रचारक हिरण्यकेश नापर्क मुनि के शिष्य सुवेश मुनि हुए इनका वेश ससार में सबसे निराला या ॥ २८ ॥ वेपं विलोकयितुमस्य विचित्रवेपं नानादिगन्तरगता बहवो मुनीशाः । अभ्याययुः समवलोक्य मुनि सुवेशं मोदेन पूर्णमनसो चचमाभ्यनन्दन् ।।२६ आपके विचित्र वेप को देखने के लिये भारत के समस्त मुनिजन अपने २ देशों से आपके पास पहुचे साय ही आपको देखकर अपने २ मन में प्रसन्न हुए भी आपकी प्रसशा करने लगे ।। २९ ॥ अस्यावदातचरितस्य मुनेर्वभूव काले क्रमान्मगधदेशभुवः स भूपः यः पुष्पमित्रतनयो मृतराज्यभारः श्रीविम्बसारइति नाम चकार सार्थम् ॥३०॥ मापके समय में मारतार्य का प्रधान राना मगध देशीय पुष्यमित्र का ज्येष्ठ पुत्र धिम्मसार हुमा निसने अच्छे प्रकार राज्य करते हुए अपने नाम को सर्वत्र मसिद किया ।। ३.॥ काले गते स मगधाधिपतिः ममुद्र- तीरादिमं मुनिवरं निजराजधानीम् । ९

६६
-
।
जगद्गुरुलीचन्द्रदिग्विजये
आनीय तस्य पदयोस्तमजातशत्रु
पुत्रं निजं प्रमुदितो विनयान्न्यधत्त ॥३१॥
कुछ दिनों के अनन्तर मगधेश्वर विम्बसार राजा ने समुद्रतट से सुवेश मुनि
को अपनी राजधानी में बुलाकर भपने पुत्र अजातशत्रु को उनके लिये भेंट
किया ॥ ३१ ॥
उदासीनदीक्षामयं सम्प्रदाय
प्रकण तस्मै भुवः शामकाय ।
निजं धर्मतत्वं पुनः सन्निबोध्य-
प्रकामं मुदाऽनन्दलीलामपश्यत् ॥३२॥
आपने भी भेट में आए हुए अजातशत्रु को अपना शिष्य बनाफर उसके
द्वारा सर्वत्र उदासीन धर्म का प्रचार कराया और आप ब्रह्मानन्द में सर्वदा मन
रहे ॥ ३२ ॥
लोकपालमुनेः शिष्यः सुयत्रो नाम तत्परः।
उदासीनपथं लोके वर्धयामास सत्वरः ॥३३॥
आपके अनन्तर इस अवधूत गद्दी पर लोकपाल मुनि के शिष्य सुयत्न मुनि
भासीन हुए जिन्होंने उदासीन धर्म का बहुत प्रचार किया ॥ ३३ ॥
अनेन मुनिना धर्मप्रचाराय निजेच्छया।
मएडलं मुनिसाधूनां यत्र तत्र प्रवर्तितम् ॥३४॥
मापने अपने सिद्धन्त का प्रचार करने के लिये बौद समय में मुनियों के
भनेक मण्डल पनाये मो इधर उधर जाकर वैदिक धर्म का प्रचार करते थे॥३४॥
अस्येव मुनिवर्यस्य समये मगधाधिपः ।
चन्द्रगुप्तो नरपतिः शशास पृथिवीमिमाम् ||३||
मापक ही समय में मगध देश का सम्राट चन्द्रगुप्त हुआ निसने समस्त पृथ्वी
पर माना भधिकार म्पापित करके उम समय का शासन चलाया || ३५॥
अस्मिन्नस्तमिते देवे सुपेणमुनिराप्तवान् ।
पदमस्य यतः सोमृदस्य शिष्यः प्रतापवान् ॥३६॥

पष्ठः सर्गः ६७ आपके अनन्तर इस मार्ग के अधिनायक आपके शिष्य सुषेण मुनि हुए जो उस समय के मुनि मण्डल में बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे ॥ ३६ ॥ शिष्यतामस्य सम्प्राप्तश्चन्द्रगुप्तो महीपतिः । वैदिक धर्ममातेने भारते भारतप्रियः ॥३७॥ आपने उस समय के सम्राट चन्द्रगुप्त को अपना शिष्य बनाकर उसके द्वारा भारत में वैदिक धर्म का प्रचार कराया ॥ ३७ ।। शिष्यः सुयत्नस्य मुनेः परस्ता- दभूव लोके सुनयो मुनीशः । यो ब्रह्मभूयं प्रगते सुपणे वृतो मुनीन्द्रनिजमएडलेशः ॥३॥ श्रापके अनन्तर सुयत्न मुनि के पियशिष्य सुनय मुनि-इस गद्दी के मधिनायक हुये जोकि सुपेण मुनि के ब्रह्मलीन होने पर अनेक मुनियों द्वारा मण्डलेश्वर चुने गये ॥३८॥ असो महोत्मा सुनयो जगत्त्या स्वमएडलैधर्मपथं प्रसार्य । समेत्य काश्मीरभुवं तदन्ते समाधिलीनोऽभवदात्मनिष्ठः ॥३६॥ मापने अपने पण्डलों के द्वारा भारत भूमि में निपत्ति मार्ग को फैलाकर मन्त में फाश्मीर में जाफर-मात्म चिन्तन करते २ समाधि प्राप्त की ॥३९॥ अस्मात्परं समभवन्मुनिमएडलेशः श्रीमाननन्तमहिमोऽभयनामधेयः। यो धर्मवर्धनसुतं शरणं प्रपन्न दृष्ट्वा तदीयजनकाय दृशं समादात् ॥४०॥ पापले मनन्तर उदासीन मार्ग के अध्यक्ष श्रीमान् अभप मुनि हुये-निनोंने भपने शरण में भाये हुये धर्मगर्दन के पुत्र को देखकर उसके पिता के लिये दृष्टि- दान दिया । धर्मवर्धन महारामा भशोफ का पुत्र था । इसोका दूसरा नाप कुनाव ६८ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये था। इसकी दोनों पाखें नष्ट हो गई यो । मलोक नामक इनके पुत्र ने अभय मुनि से अपने पिता को आंखें दिलवाई, यह घटना ऐतिहासिक है ॥४०॥ अन्धः कुनालनृपतिर्दृशमाप्य देवा- दस्मान्मुनेरभयतः परिहाय बौद्धम् । मार्ग दधार हृदये निगमोक्तमार्ग वीरस्ततान बलवद्धिपणः स्वधर्मम् ॥४१॥ महाराजा अशोक का अन्यपुत्र धर्मगर्द्धन अपने पुत्र जलोक की प्रार्थना से प्रसन्न हुये अभयमुनि से दुवारानेर माप्तकर बौदमत से अलग हो वैदिक सिद्धान्तों पर दृढ़ विश्वास करके सनातन धर्म का पालन करने वाला पन गया । यह घटना भी ऐतिहासिद्ध है ॥४१॥ एतस्मात्परतो मुनेः समभवल्लोके सतामग्रणी रोचिष्णुर्मुनिराडनन्तमहिमः शिष्योऽभयस्य क्रमात् । यः शुङ्गान्वयनं नृपं निजतपोयोगेन वश्यं बलात्- कृत्वा पाटलिपुत्रनाम्नि नगरे यज्ञं ततान द्रुतम् ॥४२॥ आपके अनन्तर आपके शिष्य रोचिष्णु मुनि इस गद्दी के अधिकारी हुए जिन्होंने शुङ्ग वशीय राजा पुष्पमित्र को अपने योगबल से वश में करके उनके पाटलिपुन में एक अश्वमेर यज्ञ कराया जिसका उल्लेख भाष्यकार ने [ इहपुष्प- मित्र याजयामः ] इन शब्दों में किया है ॥४२॥ अत.परं चन्द्रमुनिर्मनस्वी समेत्य दीक्षां सुतपोभिधानात् । मुनेः स्वधर्म गुरुणोपदिष्ट ततान लोके तपसः प्रभावात् ॥४३॥ भापके अनन्तर इस उदासीन मार्ग के सञ्चालक सुतपा मुनि के शिष्य चन्द्र मुनि हुये जिन्होंने अपने गुरुदेव से माप्त रहस्य को सर्वत्र फैलाकर अपने कर्तव्य का पालन किया ||४३|| - . 7 पटः सर्गः स विक्रमादित्यनृपं महात्मा तपोबलेन स्वरशे चकार। सचापि तस्मादुपलब्धदीक्षो द्रुतं प्रतेने निगमोक्तधर्मम् ॥४क्षा अापने अपने योगयल से उस समय के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को अप वशने में किया जिसके द्वारा समस्त भारत में चैदिक धर्म का प्रचार हुआ।॥४४॥ कालिदासकविरस्य भूपते- ... रन्तरङ्गसचिवोभवत्तदा । येन काव्यरचनावशात्कृतं विस्तृतं भुवि यशास्य भूपतेः ॥४५॥ राजाविक्रमादित्य के अन्तरङ्ग सचिव महाकवि कालिदास जी थे जिन्होंने उनके राज्य में रहकर अनेक फापों द्वारा राजा विक्रमादित्य का यश दिगन्त व्यापी कर दिया ॥४५॥ अतःपरमभूदन महेशमुनिरागतः । जितानन्दमुनेः शिष्यो दक्षिणापथतः क्रमात् ॥४६ इसके अनन्तर नितानन्द मुनि के शिष्प दाक्षिणात्य मदेश मुनि जी-इस अवधून सिंहासन के उत्तराधिकारी चुने गए, जो दक्षिण से उत्तर की और यात्रा करते हुये मगधदेश में पहुँचे ।।४६॥ स राजगृहमागत्य मगधान्तःप्रतिष्ठितम् । समुद्रगुप्मनामानं राजानं वशमानयत् ॥४७॥ आपने मगध देश में राजद के अन्दर कुछ दिन निरास कर समुद्र गुप्त नायक यहां के रानाको वश में करके उनके द्वारा अपना कार्य सम्पादन किया जा चन्द्रगुप्तसुतः सोयं नृपो मुनिवराज्ञया । अश्वमेधं महायज्ञ चकार मगधबजे ||४|| भाप मादेश से चन्द्रगुप्त के पुत्र समुद्रगुप्त ने-पगध प्रान्त में एफ अवमेष यम किया, जिसका प्रभाष दूर तक फैल गया ||४८]] ७० जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये एवमेघ महामान्यो मुनिर्लक्ष्यत्रयं गुरोः। उदासीनस्य विधिवत्पूरयामास हर्पितः ॥४॥ आपने अपने गुलर जितानन्द मुनि के तीन लक्ष्य पूरे किये जिनमें पहिला लक्ष्प नैतिक ऐकमत्य या दूसरा यज्ञों का प्रचार था तीसरा अयोध्या में रह कर उदासीन मार्ग का प्रचार करना या इन तीनों लक्ष्यों को मापने अपने परिश्रम से प्रा कर दिया ॥१९॥ अस्मादप्यपरः स शोभनमुनिर्देवेन गत्वा जवा- द्राजस्थानमनन्तपुण्यनिलयं तत्राप दिव्यं मुनिम् । हारीतं तमनुप्रबोध्य च निजं भावं यथावत्पुन- स्तेने योगविजृम्भितेन भुवने शार्दूलविक्रीडितम् ॥५०॥ आपके अनन्तर शोभन मुनि उदासीन मार्ग के प्रचारक हुये श्राप उत्तर भारत से राजस्थान की ओर चलकर हारीत मुनि के भाश्रम पर पहुँचे वहाँ माकर भापने अपना अभिमाय हारीत से कहकर समस्त रामस्थान अपने वश में किया ॥५०॥ अयं राजस्थानान्मुनिवर उपत्य द्विजवरो यथावद्गङ्गायास्तटभुवि समृद्ध पुरवरम् । उदासीनं धर्म निजसमुपदेशैः प्रतिदिन प्रतन्वन्नापेदे गतिमनुपमेयां शिवरिणीम् ॥५१॥ शोभन मुनि के ब्रह्म लोन होने पर हारीत मुनि राजस्थान से गगातट पर कन्नौन भाये । यहां आकर आपने उदासीन मार्ग का उपदेश देते हुए अपने मार्ग को बहुत उच्चशिखर पर पहुचा दिया ॥५१॥ अत.पर स दक्षिणामनुव्रजन्दिशं मुनि- महानदीतटस्थितं पुर समेत्य तद्भवम् । कुमारिलं महामति विलोक्य भव्यलक्षणं निबोधयाम्बभूव हृद्गतं सुपञ्चचामरम् ॥५२) पष्टः सर्गः वहां से हारीत मनि दक्षिण की ओर महानदी तट पर अवस्थित जयपङ्गल नायक ग्राम में पहुंचे और पहुंचकर आपने यहां पर कुमारितभट्ट को वैदिक मार्ग का रहस्य पताकर अपने धर्म का पञ्चचामर को तरह प्रातिशील बना दिया ॥५२॥ एवं लोके निजमतिबलादैदिकं भव्यमार्ग हारीतोयं मुनिजनवरो वर्धयन्नादरेण । देशे देशे भ्रमणवशतो मानवानां प्रवृत्ति मन्दाक्रान्तामपि गुणवतीं योगवेगाच्चकार ॥५३।। इस प्रकार हारीत मुनि ने अपने परिश्रम से लोफ में वैदिक धर्म का प्रचार कर मत्येक देश में भ्रमण करते हुये मनुष्यों को-धर्म मार्ग पर चलता देखकर अपना श्रम सफल माना ॥५३॥ अस्मात्परं जसलमेर भवः प्रतापी लोकप्रियो मुनिरभूटुवने वलक्षः। सामप्रियान्मुनिवरादधिगत्य दीक्षा यः पुष्करे जगति दुष्करमन्वतप्त ॥५४॥ आपके अनन्तर-इस सम्प्रदाय के प्रधान पुरुष लोकप्रिय मुनि हुये । आप का जन्म राजस्थान के अन्दर जेसलमेर में हुआ । आपने पुष्कर क्षेत्र में उदासीन दीक्षा प्राण की और वहीं घोर तप करने में तत्पर रहे ॥५४॥ अस्य प्रख्यातकीर्तेः प्रखरतरमतिःकः कविलॊकमध्ये विश्वत्राणे समर्थ विमलगुणगणं वक्तुमीहां विदध्यात् । वेदव्याख्यानदक्षः क्षपितकलिमलो योगमार्गप्रतिष्ठो यः सोजन्येक मूर्तिः प्रतिपुरमकरोत् स्रग्धरां वेदवीथीम् ॥५५ ख्यातनामा स्वनामधन्य लोकप्रिय मुनि का पूर्णरूप से वर्णन करना कवियों की शक्ति से बाहर है क्योंकि आपने कठिन समय में योगाभ्यास के द्वारा कलिमल को हटाकर वेदवीथी को 'घग्घर' अर्थात् पुष्प मालाओं से अलकृत कर दिया ॥५५ यत्कृपा भूतले मानदे मानवे भावनामुत्तमा सर्वदा शर्मदाम् ।

७२ जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये वर्धयत्याहता सत्वरं गत्वरी खग्विणी तत्कृते मत्कृतेयं नतिः ॥५६॥ निस लोकप्रिय मुनि का आदर्शचरित उत्तम मनुष्यों में उत्तम भावनाओं को उत्पनकर सर्वदा सुख देने वाली शान्ति को बढ़ाता है उस मुनिराज को पुष्पमाला के साथ हमारा प्रणाम है ।।५६।। अस्मिन्नेवान्तराले भुवनपरिवृढः सर्वराजन्यमान्यः पृथ्वीराजः प्रतापी मुनिवरपदयोरागतः शिष्यभावम् । यस्य ख्यातिः समस्ते जगति कविवरैः शूरवीरैकवेद्या भूयो भूयः प्रबन्धैर्बहुभिरभिसिता स्रग्धरेव क्रमेण ॥५७॥ भारत में लोकप्रिय मुनि का जो समय था, उसी समय में राजा पृथ्वीराज का शासन चलता था उममे उसने लोकप्रिय मुनि की प्रशसा सुनकर आपका शिष्य होना स्वीकार किया और आपने भी उसे दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया ॥५७।। एवमेप भुवोभागे लोकप्रियमुनिः कृती । विस्तार्यवेदिकं धर्म ब्रह्मभूयं गतोऽभवत् ॥५॥ इस प्रकार भारत में वैदिक धर्म का दृष्ट्वा बनाकर लोकप्रिय मुनि जी ब्रह्मी भाव को प्राप्त हुए ॥५८॥ अस्मात्परं प्रथितकीर्तिरनन्तवीर्यः स श्वेतकेतुरभवन्मुनिमण्डलस्य । संरक्षकः क्षपितपापकथाप्रपञ्चः सम्बर्द्धनो निगमगीतपथस्य पान्थः ॥५६|| आपके अनन्तर अनन्त पराक्रम मुनिवर श्वेतकेतु उदासीन मुनि मण्डल के अधिनायक पने जोकि वैदिक मार्ग के प्रचारक तथा योग विषय के अच्छे ज्ञाता हुये ॥५९॥ अस्य प्रचएडमुनिमए डलगीतकीः पापापनोदनपरस्य गुणेकसिन्धोः ।। * 1 जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये मोक्षमार्गमुपदिश्य भूतले नाम मार्थमकरोन्मखममः॥६॥ आपके अनन्तर इस मार्ग के प्रचारस मुनिराज बीतन्य हुए, जिन्होंने संसार में मांस-मार्ग का उपदेश देते हुये अपने नाम। यज्ञों के द्वारा सार्थर बनाया ॥६॥ बीतमप्यहह हव्यमादरा- देप देवनिलयेषु यापयन् । मोपसर्गमपि नाम तत्वतो चर्थकं विरचयाम्बभूव यः ॥६५॥ यज्ञ-प्रथा के उठ जाने से नष्ट हुये हव्य को पुनः देवगणों के पास यनों के द्वारा पहुचा कर आपने अपना नाम सार्थर दिया। [विशेषेण इत गीत वीतश्चतत् हव्य वीतहव्यम् ] ॥६५॥ अस्मात्परश्च्यवन इत्यभिधामवाप्तः सर्वोपकारकरणक्षमशालिशीलः। मान्यो बभूव जगतामधियो महात्मा यो वैदिकं पथमुदारतया ततान ॥६६॥ आपके अनन्तर इस उदासीन मञ्च पर च्यवनमुनि जी आकर विराजमान हुये जो हर प्रकार से वैदिम-धर्म का उद्धार करना अपना कर्त्तव्य समझते थे ॥६६॥ विश्ववास्तदपरः समभूदभूमिः पापस्य पापदलने बहुदत्तशक्तिः । यस्योत्तमं चरितमद्य महामहिम्नः पायो जनेयु निगदन्ति मुनिप्रधानाः १६णा आप अनन्तर इस उदासीन सम्भदाय को विश्वश्रवा नामर मुनिराज ने चलाया, जो नि अत्यन्त धर्मनिष्ठ तथा योग निया के आचार्य माने जाते थे ॥६७।। कम्यस्त वर्णनमलं विदधातु लोके देवस्य कीर्तिधवलीकृतदिड्मुखस्य ।

पष्टः सर्गः ७५ - * यो धर्मसेतुमवलम्ब्य निजं चरित्रं नामापि च स्वमजरं भुवने चकार ॥६८॥ आपके अनन्तर इस मुनि मार्ग के सरक्षक मुनिवर धर्मसेतु जो हुए जो धर्म का सेतु,पकड़ कर अपने को तथा अपने चरित्र को भी उज्वल बना गये ||६८|| आस्थां विहाय निजदेहगतां यथाव- दिव्यं यशोमयवपुः समवाप्य लोके । अद्यापि यो मुनिमनःसु वितिष्ठतेत्र । धन्यः मएव सुयशो मुनिरपधृप्यः ।।६।। आपके अनन्तर इस उदासीन सिद्धान्त को ससार में सुयश मुनि ने प्रसारित किया जो अपने शरीर को भी परवाह न कर अपने यश को ही अपना शरीर मानते थे ॥६॥ दानार्थकस्य किल रेत्यभिधस्य धातोः मार्थक्यमर्थनिचयस्य बहुप्रदानः । कुर्वनमन्दमतिरत्र ततान कीर्ति लक्ष्मीर इत्यभिधया प्रथितः मदेवः ॥७०|| आपके अनन्तर इस गद्दी पर लक्ष्मीर मुनि आकर आसीन हुये-नो दानार्थक रा-धातु को-लक्ष्मी के साथ लगाकर अपने नाम को अन्वर्यफ बना गये [ लक्ष्मी राति ददाति यः स लक्ष्मीरः ] |७०॥ धर्मादित्यं समन्तादुदयमुपनयन्नन्धकारं विधुन्व- नानाविधानुदस्यन्परहितनिरतान्बोधयन्नागमेन । रचोवक्षःसु बजे बलवदतिजवं पातयन्नव्यधर्मः सत्यं लोके सुमेरुर्जयति मुनिवरःखग्धरो मेरुरत्र ॥१॥ आप अनन्तर उदासीनों को इस गदी पर धर्म रूपी मूर्य उदयाचल- अशफार फे हटाने घाले, पिनों को दूर करने वाले, सन्ननों के जगाने वाले, राक्षसों फो छाती-दहलाने वाले सुमेह मुनि आसीन हुये ||१|| - जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये यस्यालोकः प्रकामं मुनिजनकमलवातमेकान्तरम्यं दिव्यालोकपदानैरवनिमुपगत. स्फोटयत्यप्रमेयः । शोक कोकबजेषु प्रकिरति महमा योलमस्तं प्रगच्छन् वन्द्यःमः प्रभाते जगति विजयते भास्करोभव्यमूर्तिः॥७२॥ आपके अनन्तर इस गद्दो पर भासर मुनि आरू हुये- जो अपने आलोक से मुनि-मण्डल रूप कमलों को खिलाफर-पोफमण्डल में शोर उत्पन्न करते हुये अपने नामको अन्वर्थक बना गये ॥७२॥ भूपाला यस्य नित्यं चरणनतिपराःशामनं शास्तुरुच्चैः सर्वस्मिन्नेवकाले मुकुटगतमणिश्रेणिभिर्धारयन्तः। नाम नाम प्रपन्नाश्चिरतरमनयन्कालमप्राप्तकालं सोनीतोनाम धन्योमुनिगदितकथ. सग्धरःसर्वमान्यः।।७३॥ आपके अनन्तर-उदासीन मार्ग प्रबर्द्धक अतीत मुनि इस गद्दी पर आसीन हुये जिनका कथन समस्त राजालोग बड़े आदर के साथ मानते थे ॥७३॥ भूतं भव्यं भविष्यत्रितयमपि तथा यत्र देवादिलीनं तिष्ठत्येकान्तमौनं जगदिदमखिलं यत्र कालानुपातात् । म यस्मिन्निलीनं हरिहरविधिभिकल्पितं धर्मतत्त्वं सोय वेदाभिधानो गुरुजनगदितो देववन्द्यो मुनीन्द्रः ॥७॥ आपके अनन्तर उठासीन सिद्धान्त के प्रचारक बेट मुनि इस धरातल पर भव- नीर्ण हुये, जो योगरल से निरालदी और पर अद्वैत ब्रह्म ये मानने वाले थे ।।७४॥ यम्मादीनामवाप्य श्रुतिपथमतनोदारते भारतेन्दु- यम्मिन्नस्तं प्रयात खलबलनिकरो धैर्यराशौ मुनीन्दे। यः श्रीचन्द्रं ममेत्य स्वमनमि निहितं पूरयामाम मर्व मोऽयं लोफेविनाशी जयति मुनिगुरुः मर्वदा मर्वमान्यः ॥७५. निनसे उटामीन धर्म को दीसा लेर श्रीचन्द्र भगवान् भारत में चैदिप मार्ग पाने में नपर पे-नया मिनरो देग्यार शत्रु वर्ग म्वग पराजित हुये, माय

पष्टः सर्गः
ही जो मुनिवर श्रीचन्द्र जैसे योग्य शिष्य को प्राप्त कर अपने मन की समस्त शुभ
कामनायें पूरी कर चुके, वे सर्वमान्य अग्निाशी मुनि धन्यवाद के योग्य हैं ॥७५||
इत्त्यं यस्य क्रमेण प्रमभमभिहिता पूर्वजानां मुनीनां .
सर्गारम्भात्प्रवृत्ता जगति बहुविधा सूचिरेपा यथावत् ।
मार्गः सायं पुराणः सकलजनमनोमोदको मोक्षभाजा-
मेकालम्बः समन्तात्पसरतु भुवने सज्जनानां हिताय ॥७॥
सर्ग के आरम्भ काल से लेकर अब तक यया क्रम जिनकी सूचो ऊपर कही
गई है, वे मुनिगण जिस मार्ग के प्रचारक हुये वह उदासीन सम्पदाय भारत में
सन का कल्याणकारक हो ||७६।।
यः श्रीचन्द्रो जगत्यां विविधमतकथाजालमेकान्तमस्तं ।
नीत्वा वेदोक्तधर्म मुनिजनगदितं वर्धयामास भूयः ।
यस्यालम्बेन मुक्ता मुनिमतगतयो वर्तमानेपि काले
धर्म तन्वन्ति सन्तःसभवतु भवतां भूतये चन्द्रमौलिः॥७॥
जिन्होंने भूतल में अनेक अवैदिक मतों को हटाकर मुनिगण मवर्तित एकमात्र
वैदिक धर्म को बढ़ाया, साथ ही जिनका आलम्ब लेकर आज भी सैकड़ों वैदिक
मुनि सनातनधर्म की रक्षा करते हुये नजर आते है वे श्रीचन्द्रमौलि भगान्-ससार
में सन के कल्याणकारफ हो ||७७||
कुन्दावदातमहनीयगुणोज्वलानि
लोकोत्तराणि भुवि यस्य मुनेर्मतानि |
लोके जनानुपदिशन्ति स भारतेन्दुः
श्रीचन्दमौलिरभयं दिशतु प्रजाभ्यः ||७||
कुन्द जैसे अक्टात गुणों से अलकृत लोकोत्तर जिस मुनिवर के सिद्धान्त-ससार में
सजनों को धर्म-पथ पर चला रहे हैं वह भारतेन्दु श्रीचन्द्र भगवान् सको अभप
भदान परें ॥७८॥

जगद्गुरभीचन्द्रदिग्विजये आकान्तमार्यविपयं यवनैर्यधाव- द्योदीधरत्करुणया करुणावतारः। वेदोपवेदपरिशीलनदत्तभाव. श्रीचन्द्रमौलिरमरः स शिवाय भूयात् ॥७॥ यवनों से आमान्त आर्यावर्त को जिन्होंने अपनी करणा से बचाकर, उसकी हर प्रकार से रक्षा की, वे वेदतत्वज्ञ श्रीचन्द्र भगवान् सरका कल्याण करते हुये अमर हों ।।७९॥ ' एतावदन विशदं चरितं मुनीना- मत्यादरेण विनिवेद्य यथाक्रमेण । सर्गान्तरे गतमति. कविरेप सर्ग पष्ठं समापयति तं मुनयः पठन्तु ।।८०॥ इस सर्ग में इतना मुनियों का परम्परागत विशदचरित्र लिखा गया है, इस से अगला वृत्तान्त देखने की जिनको इच्छा हो वे अग्रिमसर्ग देखें, इतनी सूचना देकर यह सर्ग समाप्त किया जाता है ॥८॥ इतिश्री सनाढ्यवशाद्भव कविवर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते सतिलक जगद्गुरश्रीचन्द्रदिग्विजय महाकाव्य मुनिपरम्परावर्णननाम पष्ठ सर्ग

वरुणघाट उत्तर दिशा
श्री साधुवेला तीर्थ, सक्खर सिन्धु
m
.
td
+
r
VARAN GHAT NORTHERN ELEVATION
OF
SHRI SADHUBELLA TIRATH SUKKUR (SIND)

- 1 सप्तमः सर्गः T अथ दिगन्तरवीक्षणमानसो मुनिरयं गमने कृतनिश्चयः। विधिवशादशृणोनिजवासभू- परिसरेऽधिगतं नवपण्डितम् ॥१॥ मुनि परम्परा का श्रवण करने के अनन्तर अनेक देशों के भ्रमण में दत्तचित्त भगवान श्रीचन्द्र जी ने यहा से चलने का जिस समय निश्चय किया उसी समय देवयोग से काश्मीर में दिग्विजय करने की इच्छा से आये हुये एक पण्डित का आपने नाम सुना ॥१॥ समधिगत्य तदागमनं पुन- विवदिपां हृदये पुरतः स्थिताम् । मुनिवरोऽयममुञ्चदुपस्थित- क्रमपथं गमनक्रमसङ्गतम् ॥२॥ नाम सुनते ही आपने चित्त में उसके साथ विचार करने को जो इच्छा प्रकट हुई इससे आपने देश भ्रमण की पहिली इच्छा को फूछ दिन के लिये स्थगित कर दिया ॥२॥ अयमतिप्रमदो विजयी महा- न्प्रतिदिशं चिदुपो बहु तर्जयन् । विजयकामनया समुपागतः स्वनगरादिह दिग्विजयक्रमे ॥३॥ इतने हो में पाशी ये प्रसिद्ध वैतण्डिा सोमनाय त्रिपाठी प्रत्येकमान्त में पण्डितों को विवाद में पराजित करते हुये कारमीर की राजधानी में यया-त्रम पहुंचे ॥३॥ अग्न्यागमं ममधिगत्य निजाधिवासे काश्मीरदेशामना बहवो मनुष्याः । 1 - - ८० जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये कौतूहलेन गणशः समयुः समन्ता- द्वाराणसेयवुधमएडलमण्डनं तम् ॥१॥ अपने नगर में आपका आगमन सुनकर काश्मीर के अनेर पण्डित व कुतूहल के साथ मण्डली चना बनार काशी निवासी सोमनाथ जी के पार पहुचने लगे ॥४॥ सोप्यत्र पण्डितदलं बलवत्समीक्ष्य । विज्ञापनेन, निजदिग्विजयप्रशस्तिम् । विज्ञाप्य तानवददाशु मयासहात्र कुर्वन्तु शास्त्रविपये विविधं विचारम् ॥५॥ पण्डित सोमनाथ जी ने भी यहा के पण्डित मण्डल को बढा हुआ देखा एक विज्ञापन पत्र के द्वारा अपनी दिग्विजय की प्रशस्ति प्रकाशित करके कहा। यहाँ के विद्वानों को चाहिये कि वे चाहे जिस विषय म मेरे साथ विचार कर का उचित प्रबन्ध करें ॥५॥ यः कोपि सर्वविवुधेषु महत्वमत्र- प्रख्यापयत्यतितरां पुरत. स एव । वादाय मप्युपगते प्रकरोतु वादं यद्यस्ति शक्तिरथवा विजितोस्तु मत्तः ॥६॥ यहा के पण्डितों म जो अपने को सबसे बड़ा पण्डित मानता हो वही हमा समक्ष में आकर हमसे शास्त्रार्थ करे या हमसे पराजय मानकर हमको विजय प लिख दे ॥६॥ इदमस्य निशम्य गर्जितं बहवः पण्डितमानिनो जनाः। IF दिवसे नभसि प्रतिष्ठितं तदृशुस्तारकमण्डलं भयात् ॥७॥ इस प्रकार सोमनाय त्रिपाठी ग गर्जन सुनकर बहुत से पण्डितम्मन्य भ से दिन में ही आकाश में तारा-मण्डल देखने लगे ॥७॥ .

मतमः सर्गः
नगर के
बहवो नगर प्रतिष्ठिताः
प्रथितं तं पुरुपोत्तमाभिधम् ।
जगदुर्वद कोधुना बुधः
श्रियमालिङ्गति वादसम्भवाम् ॥॥'
बहुत
से प्रतिष्ठित पण्डित प० पुस्पोत्तम (काल) के पास जाकर
कहने लगे कि इस शाखार्य में विजय-श्री किसका आलिङ्गन करेगी यह बताइये ।।८
अयमत्र समागतो वली
विजितानेव विधास्यति द्रुतम् ।
इदमद्य विनिश्चितं मतं
वद कस्को विवदिप्यति स्फुटम् ॥६॥
फाशी का यह सोमनाय त्रिपाठी बड़ा मखर पण्डित है उसके समक्ष में हमारा
अवश्य पराजय होगा, यह निश्चित गात है, इसलिये इसके साय विचार करने में
आप किसको उपयुक्त समझते हैं ।।९।।
अतिदुर्बलतामपिश्रितः
प्रतिवादी भयदः प्रतीयते।
यदवध्यभयो निजो भटो
विजयं नैति विवादमध्यगम् ॥१०॥
अपना पण्डित निर्भय होकर जब तक शाखार्य जीत कर नहीं आता तब
तक दूसरे पक्ष या पण्डित फितना ही दुर्बल क्यों न हो ? परन्तु डरावना मतीत
ना॥१०॥
इति चिन्तयति प्रतिष्ठिते
नगरस्ये पुरुषोत्तमे गुरी।
मुनिरेप ममागतः श्रिया
विमलं कर्तुमिदं भुवस्तलम् ॥११॥

m जगद्रश्रीचन्द्रदिमिजये इस प्रकार की चिन्ता में व्यस्त हुये अपने गुखर पण्डित पुरपोत्तम जी को देखकर-अपने आश्रम से भावान् श्रीचन्द्र जी पहुंचे ॥११॥ अमुमागतमीक्ष्य निर्भय मनिराज शिवसन्निभं तदा। गुरुरस्य जगाद संस्थिता- न्पुरतो यात शिवं भविष्यति ॥१२॥ शिवस्वरूप शिवावतार श्रीचन्द्रमौलि को देखकर पास में आए हुये पण्डितों के प्रति पुरपोत्तम जी ने कहा कि अब आप कोई चिन्ता न करें-भगवदिच्छा से सब काम ठीक होगा ॥१२॥ इदमस्त्य निपीय सूत्तरं गतवत्सु क्रमशो यदृच्छया । विबुधेवभिवाद्य सद्गुरु मुनिराडेवमुवाच सस्मितम् ॥१३॥ पुरपोत्तम जी का यह उत्तर सुनकर जर अन्य सब पण्डित चले गये तब अभिवादन करने के अनन्तर श्रीचन्द जी ने गुरु जी से कहा ।। १३ ।। भगवन् ! किमिदं भवदिध- विबुधैरेवमुदीर्यते भयम् । किमिहाद्य भयस्य कारणं न विजानाम्यहमागतो वनात् ॥१४॥ भगवन् । आप जैसे विद्वान् किसके भय से इस प्रकार की बात कर रहे है इस भय' का कारण क्या है ? मैं नहीं जानता है क्योंकि मैं अभी धन से यहा पर सीधा आरहा हूँ॥१४॥ स्वगतं यदि तन्न विद्यते भवतां तर्हि ममाग्रतोपि तत् ।। विवृतं क्रियतां यथोचितं प्रविधास्ये तदहं निजोचितम् ॥१५॥ r - FO सप्तमः सर्गः ८३ आपके विचार में यदि यह बात छिपाने योग्य न हो तो कृपया आप मुझे भी सुना दीजिये जिससे मैं भी इसके लिये कुछ उचित प्रबन्ध करूं.॥ १५ ॥ एतादृगस्य वचनं विनिपीय सर्वे पार्थस्थिताः समवदन्नधुना त्रिपाठी कश्चिद्धिवादविजयी किल सोमनाथो वाराणसेय इह तिष्ठति वादभिक्षुः ।।१६।। इस प्रकार श्रीचन्द्र जी की बात सुन कर गुरु जी ने तो कुछ नहीं कहा परन्तु वहां पर उपस्थित अन्य सजनों ने कहा कि आजकल यहाँपर एक काशी के वड़े विद्वान् शास्त्रार्थ के लिये ठहरे हुए हैं ॥ १६ ॥ अत्रागतेन किल तेन मदोद्धतेन काश्मीरपण्डितगणेषु निवेशताऽऽस्ते । भीतिर्यया सकलमेव कुलं बुधानां वैकल्यमापितमिति प्रथितं नगर्याम् ॥११॥ यहां आकर उन्होंने बड़े गर्व के साय शास्त्रार्थ की घोषणा निकाल कर यहां के पण्डितों में भय उपस्थित कर दिया है जिससे सर नगर में हलचल मची हुई है ।।१७ विद्यालये किल भविष्यति राजकीये शास्त्रार्थ इत्यपि विनिश्चितमेव सर्वेः। माध्यस्थ्यमत्र स करिष्यति यं वृणीयुः, सर्वे परस्परविनिश्चयतः प्रसिद्धाः ॥१८॥ यहां के पण्डितों ने राजकीय विद्यालय में उसके साथ शास्त्रार्य करना निथित किया है। जिसमें समस्त पण्डितों द्वारा चुने हुए कोई विद्वान् मन्यस्य बनेंगे ॥१८॥ प्रामाण्यमागमगतं निगमागतं वा सर्वं महर्पिमुनिकल्पितमङ्गजातम् । स्वीकार्यमित्यपि विनिश्चितकल्पमेव तेनाधुना निगदितं विजिगीपुणाद्य ||१६|| जगद्गुम्श्रीचन्द्रदिग्विजये प्रमाण रूप से इस शास्त्रार्थ में उसने वेद वेदाङ्ग शास्त्र तथा ऋषि मुनि प्रणीत अन्य अनेक ग्रन्य स्वीकृत किये है, जो राजपुस्तकालय में इस समय उपस्थित हैं ॥१९॥ अत्रत्यपण्डितगणाः किल तेन सार्द्ध वादाय ते गुरुवरं रभसादचिन्धत् । मानोन्नता गुरुवरा अपि निश्चयेन त्वय्यर्पिताखिलभरा इति निर्विवादम् ॥२०॥ यहाँ के विद्वानों ने आपके गुरवर श्रीपुरषोत्तम जी को इस शास्त्रार्थ के लिये नियुक्त किया । और महा-मान्य गुरुवर ने यह समस्त भार आपके ऊपर निर्भर कर दिया है ॥ २० ॥ एतन्निशम्य वचनं सहपाठियूनां मन्दस्मितेन मदयन्मुनिमण्डलानि । श्रीचन्द्रमौलिरिदमाह गुरुं प्रणम्य नेदं विचारसहमस्ति नवीनकार्यम् ॥२१॥ सहपाठियों के मुख से निग्ली हुई यह बात सुन कर श्रीचन्द्र जी कुछ देर मुसराकर मणाम पूर्वक अपने गुर जी से कहने लगे कि यह छोग सा कार्य इतना महत्व देने योग्य नहीं है ॥ २१ ॥ साधारणेत्र विपये यदिदं महत्वं विन्यस्तमस्ति तदिदं विफलं मते मे । भाति प्रपञ्चमपहाय ततोत्र कश्चि- संयोज्यतां निजपाविषयो भवेद्यः ॥२२॥ शास्त्रार्थ रूपी साधारण विपय यो लेपर यह जी इतना उसके लिये महत्त्व दिया जा रहा यह मेरे मन में सर्वथा व्यर्थ है। इसलिये समस्त आडम्बर हटा पर कोई अपना कृपा पात्र शिष्य उमरे लिये नियुक्त कर दीजिये ॥ २०॥ म तमुद्भतमिहागतमप्रमेये- स्तर्वियं भवदनुग्रस्तः प्रमय । P सामः सर्गः वादे विजित्त्य भवतः पदयोर्जयश्री- मालां प्रदातुमभयाः पुरतः स्थिताः स्मः ॥२३॥ आप की कृपा से हम सब आपके शिष्य उस आये हुए उद्दण्ड पण्डित को विराद में जीतकर विजय श्री को आपके चरणों में लाकर उपस्थित करेंगे ।। २३॥ एतन्निपीय निजशिष्यवचो गुरुस्तं श्रीचन्द्रमेव विनियोज्य विवादकृत्ये । मध्यस्थमत्र विपये नियतं चकार सद्यो दिवाकरगुरुं गुरुमेव साक्षात् ॥२४॥ इस प्रकार उत्साह भरी श्रीचन्द्र जी की बात सुन कर पण्डित पुरषोत्तम जी ने श्रीचन्द्र जी को ही शास्त्रार्य के लिये प्रस्तुत किया और मध्यस्य पद के लिये बृहस्पति तुल्य पण्डित दिवाकर जी को चुना ।। २४ ॥ आयोजनं सकलमेतदिह प्रकृत्य वादाय सजमतयः किल सर्व एव । तस्थुः प्रतीक्षणपरा नगरेकदेशे यत्रायमद्य भविता विबुधप्रवादः ॥२५॥ शास्त्रार्थ का इतना आयोनन एकत्र करके नगर के सब पण्डित सन्नद्ध होकर वहाँ पहुंच गये जहां पर आज का शास्त्रार्य होना निश्चित था ॥ २५ ॥ सज्जानिह प्रतिभटानवलोक्य सद्यः काश्मीरपण्डितदलेन समं त्रिपाठी। अभ्याययो झरिति तत्र समस्त गोष्ठी विद्यालये पुरतएव समागताऽभूत् ||२६|| अपने प्रतिवाद के लिये तुले हुए काश्मीर के समस्त पण्डितों को देखकर सोम- नाप त्रिपाठी भी यहां पहुंच गए जहां सा पण्डित पहिले हो से पहुंच चुके थे ॥२६॥ अभ्यागतान्बुधगणानवलोक्य तत्र सचे विशिष्टमतयो नियताः पुरस्तात् ।

जगदुरभीचन्द्रदिग्विजये
सत्कारपूर्वकमुपस्थितपण्डितौचा-
नुच्चासनेषु नियतेष्वनयन्यथावत् ॥२७॥
दोनों दल के विद्वानों को यथा समय आया हुआ देख कर उस समय के
प्रबन्धकों ने आदर पूर्वक उनको यथोचित स्थानों में बिठाने का प्रयत्न किया ॥२७॥
अत्यादरेण विनिवेश्य सभैकभागे
विद्वद्वरानिह परत्र च छात्रसवान् ।
मध्यासने कृतपदः पुरुपोत्तमोपि
तत्रेदमाह समयोचितमादरेण ॥२८॥
बड़े आदर के साथ सभा एक ओर विद्वानों को और दूसरी ओर छानों
को रिठाकर मध्य भाग में बने हुए उच्च मञ्च पर चढ़कर पण्डित पुरपोत्तम जी इस
भकार कहने लगे ॥ २८ ॥
भद्राः ! कृताञ्जलिरयं भवतां पुरस्ता-
देतनिवेदयति मूर्धनि सर्वमेतत् ।
संगृह्यतां विधिवशादुपनीतमस्ति
यद्यद्यथाविधि फलादिकमादराहम् ॥२६॥
महानुभावो ! मैं आप लोगों के समय बद्धाञ्जलि होरर यह निवेदन परता
है कि आप लोगों के सलारार्थ यहा की जनता ने जो वृद्ध पर पुष्प यहा पर
उपस्थित किया है उससे पहिले आप ग्रहण कीजिये ॥ २९ ॥
एतजुलं चरणयोरवनेजनाय
मालेयमुत्तमसुमा हरिचन्दनन्नत् ।
नानाविधोचितफलपर. समस्तं
पूजार्थमेव भवतामिदमस्ति सज्जम् ॥३०॥
लानिये या चरण पालन के लिये जल उपस्थित है यह माला और यह
चन्दन रे साथ ही यह भनेर मरार या फ्लाय आपरे अर्पण है यह सब आपो
लिये ही एसय रिया गपा ॥३०॥

सप्तमः सर्गः ८७ एवं निवेदनपरे पुरुपोत्तमे सा विद्यालये कृतपदा विदुपां समज्या । अत्यादरेण तदुपायनवस्तुजातं वने यदन विबुधैः कृतमागतानाम् ॥३१॥ इस प्रकार पुरपोत्तम जी के निवेदन करने पर विद्यालय में आई हुई समस्त विद्वन्मण्डली बड़े आदर के साथ भेट में उपस्थित हुए पदार्थों का ग्रहण करने लगी ।। ३१॥ अङ्गीकृते बुधजनैः सदुपायनेस्मि- नेकान्तमुन्नतमनाः पुरुषोत्तमः सः । कालोचितानि मधुराधरनिर्गतानि सद्यो निवेदयितुमाह बचांसि भूयः ॥३२॥ विद्वानों के द्वारा उपायन के अङ्गीकृत करने के अनन्तर प्रसन्न चित्त पण्डित पुरुषोत्तम जी ने कुछ समयोचित मधुर वचन कहने के लिये उपक्रम क्रिया॥३२॥ अद्याहमस्मि कृतकृत्यतमः प्रकामं भावत्कृपादजलमार्जनतः पवित्रः। सर्वोप्ययं नगरवासिजनोपि धन्यं- मन्यं समस्तमिह मे कुलमद्य दैवात् ॥३३॥ आपने कहा आज मैं आपके चरणोदक के मार्जन से कृत-कृत्य हो गया हूं और यह सारा नगर तथा नगरवासी नर नारी गण एव साय ही हमारा कुल पवित्र हो गया ॥३३॥ धन्यं दिनं नगरमेतदतीवधन्य धन्या सभा तदधिपो बहुधन्यवाद । धन्यस्तथाहमपि यद्भवतां गुरस्ता- दीदग्विधं सकलमद्य विलोक्यामि ॥ ३४ ॥ आन का दिन धन्य है आपके पधारने मे यह श्रीनगर घन्य होगया है आम जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये सत्कारपूर्वकमुपस्थितपण्डितीचा- नुच्चासनेषु नियतेप्वनयन्यथावत् ॥२७॥ दोनों दल के विद्वानों को यथा समय आया हुआ देख कर उस समय के पबन्धकों ने आदर पूर्वक उनको ययोचित स्थानों में विगने का प्रयत्न किया ॥२७|| अत्यादरेण विनिवेश्य सभैकमागे विद्वरानिह परत्र व छात्रसद्वान् । मध्यासने कृतपदः पुरुपोत्तमोपि तत्रेदमाह समयोचितमादरेण ॥२८॥ बड़े आदर के साथ सभा में एक ओर विद्वानों को और दूसरी ओर बानों को बिठाकर मध्य भाग में बने हुए उच्च मञ्च पर चढ़कर पण्डित पुरपोचम जी इस प्रकार कहने लगे ॥ २८ ॥ भद्राः! कृताञ्जलिरयं भवतां पुरस्ता- देतन्निवेदयति मूर्धनि सर्वमेतत् । संगृह्यतां विधिवशादुपनीतमस्ति यद्यद्यथाविधि फलादिकमादराहम् ॥२६॥ 'महानुभावो ! मैं आप लोगों के समक्ष वद्धाञ्जलि होकर यह निवेदन करता हूँ कि आप लोगों के सत्कारार्थ यहां की जनता ने जो कुछ पर पुष्प यहां पर उपस्थित किया है उसको पहिले आप ग्रहण कीजिये ॥ २९ ॥ एतज्जलं चरणयोरवनेजनाय मालेयमुत्तमसुमा हरिचन्दनन्तत् । नानाविधोचितफलप्रकरः समस्तं पूजार्थमेव भवतामिदमस्ति सज्जम् ॥३०॥ लोनिये यह चरण क्षालन के लिये जल उपस्थित है यह माला और यह चन्दन है साथ ही यह अनेक प्रकार का फलोचय आपके अर्पण है यह सब आपके लिये ही एकत्र किया गया है ॥ ३० ॥ - -- सप्तमः सर्गः ।' एवं निवेदनपरे पुरुपोत्तमे सा विद्यालये कृतपदा विदुपां समज्या । अत्यादरेण तदुपायनवस्तुजातं पत्रे यदत्र विबुधैः कृतमागतानाम् ॥३१॥ इस प्रकार पुरुषोत्तम जी के निवेदन करने पर विद्यालय में आई हुई समस्त विद्वन्मण्डली पढ़े आदर के साथ भेट में उपस्थित हुए पदार्थों का ग्रहण करने लगी॥३१॥ - अङ्गीकृते बुधजनैः सदुपायनेस्मि- न्नेकान्तमुन्नतमनाः पुरुपोत्तमः सः । कालोचितानि मधुराधरनिर्गतानि सद्यो निवेदयितुमाह वांसि भूयः॥३२॥ विद्वानों के द्वारा उपायन के अङ्गीकृत करने के अनन्तर प्रसन्न चित्त पण्डित पुरपोत्तम जी ने कुछ समयोचित मधुर वचन कहने के लिये उपक्रम किया।॥३२॥ अद्याहमस्मि कृतकृत्यतमः प्रकामं भावत्कपादजलमार्जनतः पवित्रः। सर्वोप्ययं नगरवासिजनोपि धन्यं- मन्यं समस्तमिह मे कुलमद्य दैवात् ॥३३॥ आपने कहा आन मैं आपके चरणोदक के मार्जन से कृत-कृत्य हो गया है और यह सारा नगर तथा नगरवासी नर नारी गण एव साय ही हमाराकुल पवित्र हो गया॥३३॥ धन्यं दिनं नगरमेतदतीवधन्यं धन्या सभा तदधिपो वहुधन्यवाद । धन्यस्तथाहमपि यद्भवतां गुरस्ता- दीदग्विधं सकलमद्य विलोकयामि ॥ ३४ ॥ आज का दिन धन्य है आपके पधारने से यह श्रीनगर धन्य होगया है आम ८८ जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये की यह सभा और सभा के यह मधान धन्य है साथ ही इस समस्त आयोजन के देखने से मैं भी अपने को धन्य मानता है ॥ ३४ ॥ धन्या जना निजनिजोचितकार्यदक्षा मध्यस्थतामुपगतो मनुजोतिधन्यः । धन्यानुभावपि सपक्षविपक्ष भूतो किं किं न धन्यमतिधन्यतमं समस्तम् ॥३५॥ अपने २ कार्य में लगे हुए सब प्रबन्धक धन्य है म यस्य होकर विवाद का. निर्णय करने वाले पण्डित दिवाकर जी धन्य हैं वादी और प्रतिवादी बनार उप- स्थित हुए दोनों पक्ष धन्य हैं मैं कहां तक कहू आज सब कुछ धन्यवाद के ही योग्य है ॥ ३५॥ नापूजि यैर्जनकपादयुगं यथाव- नाभाजि यैर्गुरुगृहे गुरुपादपद्मम् । नासेवि यैर्बुधजनः स्वगृहेषु तेद्य नैवात्र दृष्टिपथमभ्युपयान्ति लोकाः ॥३६॥ आज इस मण्डल में ऐसा मनुष्य कोई दृष्टि गत नहीं होता है जिसने अपने घर पर अपने पिता माता और गुर का विधिपूर्वक चरण वन्दन करके उनसे वर- दान प्राप्त न किया हो अर्याद सभी मनुष्य विनीत वेश और सौजन्य पूर्ण हैं ॥३६॥ पक्षद्धयेपि विलसन्ति मनोज्ञकायाः कायाच्छरूपपरितर्जितकामदेवाः । देवाधिदेवपरिपूजितचारुपादाः पादारविन्दनुतिमत्र करोमि केषाम् ॥३७॥ दोनों पक्षों में काम की सुन्दरता को नीचे करने वाले सुन्दर शरीर श्री शकर की उपासना करने वाले सज्जन गण पधारे हुए है मैं सर्व प्रथम किसको प्रसशा फरूं यह समझ में नहीं आता है ।। ३७॥ मान्या महोदयभुवो महित प्रभावा नानादिगन्तविशदीकृतवीर्यसाराः।

सप्तमः सर्गः
यस्मिन्विवादमहनीयमहे समेताः
सोयं दिशत्वविरतं शिवमागतेभ्यः ॥३८॥
जिस शास्त्रार्थ रूपी महोत्सव में आप जैसे महा-मान्य महोदय महा प्रभाव
अनेक देशों में दर्शित विपुल पराक्रम महा पुरप पधारे हुए हैं यह महोत्सव आगत
जनों के लिये कल्याण प्रट हो ॥ ३८॥
एवं निवेद्य चिरते पुरुषोत्तमेत्र
केचित्समागतबुधाः कथनं तदीयम् ।
दिव्यं शशंसुरपरे प्रशशंसुरुचे-
रन्ये नवागतबुधा मुमुहुर्निमर्गात् ॥३६॥
इस प्रकार मधुर स्वागत के समाप्त होने पर उपस्थित विद्वानों ने पुरुषोत्तम
जो को बहुत पसशा की जो कि.-"परस्परं भावयन्तः" वाली नीति का केवल
समर्थन मात्र थी॥ ३९॥
इत्थं परस्परकथोपगमे निवृत्ते
मध्यस्थतामुपगतो विनयेन सर्वान् ।
मत्यं दिवाकरइवात्र दिवाकरोयं
प्राह प्रसन्नमनसा परिपधुपेतान् ॥४०॥
दोनों पक्षों के स्वागताचार के अनन्तर मूर्यमभ पण्डित दिवाकर जी ने जो कि
सभा में मध्यस्थ चुने हुए थे, बड़ी नम्रता के साथ उभय पक्ष के विद्वानों से कहा ॥४०॥
पर्याप्तएव समयोऽभवदद्य तस्मा-
त्प्रस्तूयतां समयसम्मतमेव सर्वेः।
आधीयतां क्रमवशान्निजपूर्वपक्षः
पश्चात्तदुत्तरपरो भवतु स्वपक्षः॥४१॥
माननीय विद्गण ! समय पर्याप्त होगया है इस लिये कार्यारम्भ होना चाहिये
नियमानुसार पहिले पण्टिन मोयनाथ त्रिपाठी अपना पूर्व पक्ष उपस्थित करेंगे निस
का हमारी ओर से उत्तर दिया जायगा ॥४१॥

जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये वाक्यं दिवाकरगुरोरिदमानिपीय वाराणसेयविबुधः किल सोमनाथः । मम्मर्दयन्मुखजलोमचयं करेण गर्वोद्धतः स्वमतमेवमुदाजहार ॥४२॥ दिवाकर जी का यह आरम्भिर वक्तव्य सुनकर पण्डित सोमनाथ त्रिपाठी ने अपनी मूछ मरोड़ते हुए अपना पूर्व पक्ष इस प्रकार उपस्थित किया ॥ ४२ ॥ [पूर्व पक्ष ] भगवन्नमदेतदुच्यते जगदालम्बनमस्य किम्पुनः। सदिदं यदि नाशकल्पना कथमस्य प्रथिता जगत्त्रये ॥४॥ यह जो प्रतीयमान जगत् है, उसको आप यदि असत् मानते है तो वह किसके अवलम्ब से ठहरा हुआ है (?) यदि आपके मत में यह सत् है तो महामलय में इसका नाश क्यों होता है (१) इन दोनों विरुद्ध बातों का आप समन्वय लगाइये ।। ४३॥ असतः सत उदमः कथं श्रुतिवाक्ये गदितो मनीषिभिः । न कदापि सतोप्यमत्कथा ममुदेति श्रुतिवाक्यदर्शनात् ॥१४॥ भमत् स सत् का उद्भव श्रुतियों में पिम मकार निणात है (१) और सत्या अरागाव श्रुतियों ने क्सि मार माना है (?)॥४४|| मदमत्परमस्ति यत्स्वयं मदिदं ब्रह्म कथं तदा भवेत् ।। अमति क्षरणात्मकपुन- जगतीदं कथमाविशद्रद ॥४५॥ . गर जगद्गश्रीचन्द्रदिग्विजये मुनिरेप तदुत्तरक्रम प्रथयामाम रसेन मस्मितः ॥४॥ अपने गुरुपर से इस प्रकार का सर्वतोभद्र आदेश सुनार श्रीचन्द्र जी ने पूर्व पक्ष का जो उत्तर दिया, वह इस प्रकार है:- ॥१९॥ [उत्तर पक्ष ] बुधवर्य ! भवद्रचस्तति- न विचारक्षमतां विगाहते। निगमेषु यतः प्रलभ्यते सदमद्रस्तुविवेचनक्रमः ॥५०॥ विद्वन् ? आपने सभा में जो पूर्व पक्ष उपस्थित रिया है, यह मेरी अनुमति में विचार-सम नहीं है । क्योंकि वेदों में सदसद्वस्तुओं का विवेचन क्रम विस्पष्ट वर्णित है ॥५०॥ असदित्यभिधीयते बुधे- जगदव्यक्ततयोपलक्षितम् । निगमागमवाक्यदर्शना- त्सदिति व्यक्ततया व्यवस्थितम् ॥५१॥ विद्वान् अव्यक्त भाव से अवस्थित जगत् को असत् और व्यक्त भाव से अवस्थित जगत् को सत् कहते हैं। आपका पूर्व पक्ष व्यक्ताव्यक्त भार में समाप्त होता है, जगत् से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है । इस लिये भाव पर पहिले विचार कीजिये ॥५१॥ उभयात्मकमस्ति यन्मनः श्रुतिवाक्ये ततएव तद्विधा। उभयात्मतया व्यवस्थिता भगवानस्ति न मनचाप्यमत् ॥५२|| जगन् मन के द्वारा रल्पित है, मन को श्रुति वास्यों में उभयात्मक कहा है। इसी कारण जगत् भी उभयात्मक प्रतीत होता है, भगवान् सदसद्विलक्षण है। इसीलिये सर्वसासी है, उन जगत् से कोई सम्बन्ध नहीं है ।।५२।। ।

मप्तमा मर्ग असतो मनसः समुद्गतं जगदव्यक्ततयावतिष्ठते । मनमः मत उद्तं तथा भवति व्यक्तमिति व्यवस्थितिः॥५३॥ असद्भापापन्न मन से उत्पन्न जगत् असत् और सद्भावापन्न मन से उत्पन्न जगत् मत् कहा जाता है, जगत् के सदसद्विपय में यही व्यवस्थिति पर्याप्त है ॥५३|| मदसत्परमेकमव्ययं भगवन्तं समवेत्त्य सर्वदा। प्रकृतिर्गुणवत्यधीश्वरे प्रतिविम्बत्वमुपैति निर्गुणे ॥५॥ ब्रह्म सर्वदा सदसद्विलक्षण इस लिये है कि इसकी कल्पना सटमद्भावापन्न मन से नहीं होती है, अर्थात् वह मनःकल्पित नहीं है। उस ब्रह्म में गुणत्रयाती प्रक्रति प्रतिविम्ब भाव से प्रतिविम्बित है, वस्तुनः नहीं ॥४॥ विमलः स्फटिकोपलो यथा निजसान्निध्यगतम्य वन्तुनः। प्रतिविम्बवशेन भृतले प्रतिभाति भ्रमतोत्रतद्विधः ॥५५॥ निमल स्फटिकोपल में जिम मार मीप में विद्यमान रक्त पीतादि गुण सम्बद्ध द्रव्य का प्रतिविम्ब सम से प्रतीत होता है उसी प्रकार ब्रह्म में जगत् का प्रतिविम्ब भो केवल भ्रम मात्र है ||५|| इदमेव महनिदर्शनं सगुणायाः प्रलेः परात्परे । भगवत्यमले व्यवस्थितं १ जगदीशे जगदेक्माक्षिणि ॥५.६॥ उसी निदर्शन से परात्परब्रह्म में जो जगत् का सम्बन्ध दृष्टिगत होता है, उसकी व्यवस्था लगानी चाहिये यह उत्तर वेदान्त के मतसे आपके लिये उपस्थित है ।५६।

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये अथवा जगदेतदव्ययं जलधारावदिह प्रतिष्ठितम् । प्रकृतेर्गुणपारवश्यतो बहुधा भाति नभो यथाधनैः ॥५७॥ यदि आप सांख्य का मत लेकर चलते है तो यह जगन् जल धारा के ममान सर्वदा किसी न किसी रूप में अपश्य रहता है और प्रकृति की गुणपरवशता से मेघाच्छन्न आकाश की तरह विविध रूप से प्रतीत होता है ॥ ५७ ।। न लयः प्रकृतेः कदाप्यहो भवति व्यक्तमुपेत्यदृश्यताम् । तमिमं कथयन्ति सूरयो लयभावं प्रगतं न वस्तुतः ॥५८॥ प्रकृति का अत्यन्ताभाव किसी समय में नहीं होता है केवल उमका कार्य कारण में लीन होने के कारण अदृश्य हो जाता है इसीको कोई विद्वान् मलय मानते हैं, वस्तुतः जगत् का अत्यन्ताभाव कदापि नहीं होता है, उसके अत्यन्ताभाव होने पर ईश्वर का ईशन नहीं रहता है ॥ ५८ ॥ सत एव सतः समुद्भवो भवति व्यक्ततयात्र नाऽमतः । नहि कोपि विलोकयत्यहो वत शृङ्गं नरमूर्ध्नि निःसृतम् ॥५६॥ सद्भावापन ब्रह्म से सगावापन्न जगत् का आविर्भाव सत्कार्य वाट में परिणत होता है, असत्कार्य वाट में उसका अभ्युपगम नहीं है इसीलिये मनुष्य के शिर पर आजतक रिसी ने भी उगता हुआ शृङ्ग नहीं देखा है ॥ ५९ ॥ प्रकृती निवसन्ति ये गुणाः प्रकृतेः कार्यपथेपि ते तथा। न विरुद्धगुणोदयः श्रुती भुवि कुत्रापि चराचरक्रमे ॥६०॥ NU सप्तमः सर्गः है । जगद्रूप जो गुण प्रकृति में रहते हैं वे ही प्रकृति जन्य कार्य में पाये जाते हैं प्रकृति विरुद्ध कार्य कारण भाव चराचर जगत् में कभी भी देखने में नहीं आता है॥६०॥ प्रलये सदसद्विलक्षणो भगवानेव वितिष्ठतेचलः। न तदा सदिदं नचाप्यस- जगदाभाति विलीनमीश्वरे ॥६१॥ मलय काल में सदसद्विलक्षण एक भगवान् शङ्कर ही अपने रूप में अवस्थित रहते हैं सदसद्भावापन्न यह जगत् उन्हींके अन्दर छिप जाता कार्य का ईश्वर रूप कारण में छिप जाना ही यहां पर मलय शब्द से अभिप्रेत है अत्यन्ताभाव नहीं ॥ ६१॥ सकलोपि विवर्तसम्भवो यत आविर्भवति स्वयेच्छया। भज तं शिवमेकमद्रयं सदसद्भावमपास्य वस्तुजम् ॥६२॥ जिस भगवान् की इच्छा से यह समस्त विवर्तवाट अव्यक्त भाव से व्यक्त भाव में परिणत होता है उस अद्वितीय शङ्कर की आप उपासना कीजिये वस्तुगत सदसद्भाव की उपासना आपके योग्य नहीं है । ६२ ।। इदमत्र मया यथार्थतो विचूतं सर्वमतोपि यत्परम् । भवतां हृदये व्यवस्थित तदपार्थं वत पिष्टपेषवत् ॥६३।। आपके समस्त पूर्व पक्षों का शास्त्रानुगत यथार्थ उत्तर इन शब्दों में उपस्थित किया गया है इसके अनन्तर जो आपका और कयन होगा वह केवल पिष्टपेषण मात्र होगा ।। ६३॥ इदमस्य मुनेः ममुनरं निगमान्तर्गतभावगर्भितम् ।

- - जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय विनिपीय बुधवजो जयं जयघोपेरवदत्पुरोगतः ॥६॥ इस प्रकार श्रीचन्द्र जी का वेदानुगत उत्तर सुनार उपस्थित समस्त विद्व- मण्डली ने जयघोप के साथ आपरा जय स्वीकार किया ॥६४॥ प्रतिवादिनमेनमद्भुतं म विलोक्य प्रभया ममुन्नतम् । विजयी विबुधः पराजयं बहुमेने निजमद्य लज्जितः ॥६५॥ आप जैसे उद्भट प्रतिभा सम्पन्न प्रतिवादी को देखकर वादी पण्डित सोमनाथ निपाठी भी मन में लज्जित होकर अपना पराजय अनुभव करने लगे ॥ ६५ ।। गुरुरस्य मुनेः पुरः स्थितो नवहांश्रुविलोलवीक्षणः। यमवाप तदाऽतिसम्मदं न स शक्यो गदितुं पदक्रमैः ॥६६॥ हाच विलोल नेत्र आपके गुरु को आज जो अनिर्वचनीय आनन्द प्राप्त हो रहा था उसरा वर्णन करना शन्न शक्ति से वाहिर है ॥ ६६ ॥ सकलोपि बुधवजो मुनि नरभावं प्रगतं सदाशिवम् । हृदये मममस्त निवृतो विजयश्चास्य जगाद मर्वतः ॥७॥ समा में समुपस्थित सभ्य मानव समाज ने श्रीचन्द्र जी का अद्भुत प्रभाव देग्वार आपसे मनुष्य भावापन्न सदा शिर मानार सर्वत्र आपा विजय उद्यो- पित कर दिया ॥६७॥ क मुनिर्भुवनान्दलनितः क पुनर्भावगभीरमुत्तरम् ।

मप्रमःमर्गः १७ इदमेव मुहुर्मुहुर्वद- कमलाकान्तबुधो ययौ मुदम् ॥६॥ चौदह वर्ष की अवस्था वाले कहां श्री चन्द्रमौलि ! और कहाँ फिर इसी विचार धारा में प्रवृत्त उनकी उत्तर देने की शक्ति ! इन परस्पर विरुद्ध दोनों बातों को घार २दुहराते हुए पण्डित कमलाकान्त जी आनन्द में मन हो गए ॥६॥ अवसानमुपेयुपि क्रमा- समयेपि स्थगितान्यतत्कथः । परिपद्धवनादिनिर्ययो जयघोपैः सहितो जनवजः ॥६६॥ शास्त्रार्थ का नियत समय समाप्त होने पर शहर के अन्य गण्य मान्य सजन मो अन्य सर कार्यों को अगले दिन के लिये स्थगित कर सभा भवन से जय घोष करते हुए अपने २ घरों को गए ॥ ६९ ॥ मुनिरप्यनुशासनं गुरोरधिगत्य प्रभयाऽनुमङ्गतः । वनमाविशदाश्रमोचितं वनरम्यं वनजायतेक्षणः ॥७॥ इथर अपने गुरुदेव की आज्ञा लेकर भगवान् श्रीचन्द्र भी विशिष्ट प्रभामण्डल से प्रभावित होकर अपने आश्रम के उचित गहर बन में विश्रामोचित पर्णकुटी के अन्दर भविष्ट हुए ॥ ७० ॥ एवं निवेद्य विजयोचितभावगर्भ शास्त्रार्थनिर्णयपरं विविधान्यवृत्तम् । वृत्तं तदुत्तरकथामृतदत्तचित्तः सर्ग समापयदिमं कविरप्रमत्तः ॥७१|| शास्त्रार्य के सम्बन्ध में इतना सपक्ष विपक्ष सम्मन्नी वृत्तान्त निवेदन करके अग्रिम प्रसङ्ग में दत्त चित्त कवि ने भी यह सर्ग यही पर समाप्त कर दिया ॥७१।। इतिश्री सनाध्ययशोद्भर कविवर श्रीमदसिलानन्दशर्मप्रणीवे मनिला जगदमश्रीचन्द्रदिग्विजये महामान्य 'श्रीचन्द्रमौलिविनयो नाम-मप्तम सर्ग अष्टमः सर्गः अथानुरोधाद्विदुषः सोमनाथस्य धीमतः । निश्चितोभूद द्वितीयेन्हि शास्त्राथों हर्षवर्धनः ॥१॥ शास्त्रार्य के दूसरे दिन पण्डित सोमनाथ जी के अनुरोध से दूसरे शास्त्रार्थ का आयोजन भी बड़ी तय्यारी के साथ हुआ ॥१॥ प्रातरेवातिहण विद्वजुनपुरःसरः। त्रिपाठी नियतस्थानमाजगाम जयेच्छया ॥२॥ प्रातःकाल होते ही सोमनाय त्रिपाठी अपने पक्ष के समस्त पण्डितों को लेकर जहां पूर्व शास्त्रार्थ हुआ उसी स्थान पर पहुंचे ॥ २ ॥ गुरोरनुज्ञया तत्र समायातो वनोदरात् । श्रीचन्द्रमौलिः स्वगुरोर्ननाम पदपङ्कजम् ॥३॥ अन्यानपि सभास्थानमागतान्विबुधोत्तमान् । अभिवाद्य यथान्यायमाससाद भुवस्तले ॥१॥ गुरु जी की आज्ञा पाकर श्रीचन्द्र जी भी अपनी वनगत पर्णकुटी से आकर सर से पूर्व अपने गुरुदेव के चरण छूकर यथाक्रम अन्य उपस्थित विद्वानों को भी शास्त्र मर्यादानुसार प्रणाम कर पृथ्वी पर बैठ गए ।। ३-४ ।। ममागतमिमं वीक्ष्य श्रीचन्द्रं पुरतः स्थितम् । मोमनाथो विश्वनाथं मस्मार हृदयस्थितम् ॥५॥ सभा में श्रीचन्द्र जी को आया हुभा देखकर पण्डित सोमनाय त्रिपाठी ने छत विवनाय जी का स्मरण किया जिसका रहस्य आगे जाकर पुलेगा ॥५॥ [ गुलाम् । भम्मोद्धूलितमर्वाङ्गं जटामएडलशोभितम् । रुद्राक्षवलयावद्धजगयोतितकन्धरम् ॥६॥ .

अष्टमः मर्गः ९९ व्याघ्रचर्मस्थितं दिव्यप्रभाशोभितदिङ्मुखम् । समिद्धाग्निविनिक्षिप्तनानाहव्यममुचयम् ॥७॥ तपोवनसमासीनमतमालालसत्करम् । मेखलावद्धकौपीनं पीनवक्षाविशोभितम् ॥८॥ ब्रह्मचर्यव्रतधरं विषयेषु पराङ्मुखम् । प्रगल्भवचसं धीरं गम्भीरवचनक्रमम् ॥धा तृणीकृतजगत्सारं धीरोद्धतगतिक्रमम् । कुमारमपि गम्भीरं वीरं रसमिव स्थितम् ॥१०॥ स्मरण के समय भगवान् शकर का स्वरूप विभूति भूपित जामण्डल शोभित, मद्रास माला वेष्ठित कण्ठ, व्याघ्रचर्म पर आसीन, दिव्यमभ, समिद्धामि हुत हव्य, तपोवन स्थित, अक्ष माला लसत्कर, मेखलाबद्ध कौपीन, उन्नत वक्षःस्थल, ब्रह्मचर्य व्रतपर, विपयों से उदासीन, प्रगल्भ वचन, धीर वीर, गम्भीर भावापन, वणी कृत जगत्सार, धीरोद्धत गति क्रम, कुमारावस्था में भी गम्भीर, मृर्तिमान् वीर रस जैसे सन्नद्ध रूप में परिणत था ॥ ६-१० ॥ विजयाशंसया तस्य प्रणत्य पदपङ्कजम् । प्रत्यागम्य ददर्शाग्रे तमेव हृदयेशयम् ॥११॥ शास्त्रार्थ में विजय की कामना से इस प्रकार हगत शङ्कर जी को प्रणाम कर जैसे ही पण्डित सामनाय जी ने अपने नेत्र खोले वैसे ही उनको प्रत्या में भी श्रीचन्द्र जी के रूप में शङ्कर का दर्शन हुआ ॥ ११ ॥ उभयत्र समानेन रूपेण समवस्थितम् । विलोक्य विश्वनाथं तं विस्मयं ममुपागमत् ॥१२॥ भीतर और बाहर दोनों स्थलों में भगवान् का एकसा रूप देखकर सोमनाथ त्रिपाठी के मन में बड़ा आश्चर्य सा होगया ॥ १२ ॥ किमयं पुरतो मेऽद्य विश्वनाथः समागतः । श्रीचन्द्रमौलिः किमयं हृदये समधिष्ठितः ।।१३|| .

२००
जगदुरभीचन्द्रदिग्विजये
आपने अपने मन में सोचा क्या मेरे समक्ष में सचमुच श्री विश्वनाथ जी इस
रूप में आये हैं ? अथवा श्रीचन्द्र का ही मेरे मन में वार २ यान आता है ? कुछ
समझ में नहीं आता है ॥ १३ ॥
न रूपे नच लावण्ये न ममाधौ न संयमे ।
भेदः प्रतीयतेऽन्योन्यसदृशाकृतिवेपयो॥१॥
इन दोनों के रूप में लावण्य में समाधि में तथा सयम में कोई किसी प्रकार
का अन्तर प्रतीत नहीं होता है दोनों की आकृति आपस में बहुत अशों में मिलती
जुलती सी मालूम होती है ॥ १४ ॥
किमयं मोहसम्पातः किमयं मम सम्भ्रमः।
मायाविलसितं किंवा जगदम्बासमुद्भवम् ॥१५॥
क्या मुझे मोह ने आकर घेरा है ? या मुझे भ्रम हो गया है ? या जगदम्बा
सरस्वती जी ने यह कोई माया मेरे समक्ष में उपस्थित की है १ ।। १५॥
इति दोलायमानं तं सोमनाथमवस्थितम् ।
स्मितेन सूचयामास परं न ज्ञातवान्स तम् ॥१६॥
इस प्रकार चञ्चल चित्त सोमनाथ को देखकर श्रीचन्द्र जी ने अपने मन्दस्मित
से सोमनाय को अपना साकेतिक परिचय दिया परन्तु मोह के कारण पण्डित सोम-
नाय जी उस सङ्केत को समझ न सके ॥ १६ ॥
सामान्यमनुजभ्रान्त्या तमालोक्य पुरोगतम् ।
किर्तव्यविमूढोयमवतस्थे कृताञ्जलिः ॥१७॥
सामान्य मनुष्य के वेश में श्रीचन्द्र जी को देखकर पण्डित सोमनाथ जो कुछ
देर तक किर्तव्य विमूढ से रह गए ॥ १७ ॥
अत्रान्तरे गलदिनोपक्रमेण यथाक्रमम् ।
सत्कारः समभूदेपां विदुपामतिमञ्जुलः ॥१८॥
इसी अवसर में पूर्व दिन की तरह आज भी भागत विद्वानों का स्वागत करने
के लिये विद्यालय के प्रबन्धक उपस्थित हुए ॥१८॥

अप्रमः सर्गः
१०१
पाद्यार्थ्याचमनीयादि क्रमेण विधिवत्कृते ।
उपचारे सदाचारः समावृत्तइव स्थितः ॥१६॥
पाद्य अर्घ्य आचपनीय तीन प्रकार के जल लेकर उपस्थित सजनों ने सर्व
मयम सदाचार के साथ २ विद्वानों का उपचार किया ॥ १९ ॥
शिष्टाचारक्रमादन्ते फलोपायनपाणयः।
जनाः प्रसन्नमनसो देशवारमुपाययुः ॥२०॥
इसके अनन्तर अपने देश के उत्तम उत्तम फल हाथों में लेकर मसन चित्त
प्रवन्धकों ने विद्वानों को भेट किये क्योंकि यह यहां का देशाचार है ॥२०॥
लवङ्गावद्धहारिद्रपूगीफलदलोन्नतम् ।
प्रादाजनः समागत्य ताम्बूलं मुखभूपणम् ॥२१॥
फलों के अनन्तर सुन्दर लवङ्गादि सुगन्धित द्रव्यों से पूर्ण ताम्बूल दुल
शुद्धि के लिये विद्वानों को दिया गया ॥२१॥
एवमागन्तुकाचारविधाववसितिं गते ।
दिवाकरः समासीनानिदमाह कृताञ्जलिः ॥
मान्याः प्रस्तूयतां वादः पर्याप्तः समयो गतः
प्रतीक्षन्ते जनाः सर्वे शास्त्रार्थसरणिद्वयम् ॥२३॥
इस प्रकार स्वागत सत्कार के अनन्तर पण्डित दिवाकर जी ने सभा में उप-
स्थित होकर आए हुए विद्वानों से कहा भद्रपुरुषो! अब शास्त्रार्य का आरम्भ
होना चाहिये समय बहुत बीत गया है नगर के समस्त गण्यमान्य नर नारो गण
वादि भतिवादि रूप में दोनों को उक्ति प्रत्युक्ति सुनने की अभिलापा कर रहे
हैं ॥ २२-२३॥
इत्याकर्य वचस्तस्य दिवाकरगुरोस्तदा ।
वादी सिंहासनमगात्सोमनाथो यथोचितम् ॥२१॥
पण्डित दिवाकर जी की इस मकार की सूचना मिलने पर वादी पण्डित
सोमनाय जी निनोचित सिंहासन पर आमीन हो गए ॥ २४ ॥

१०२ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये वादिसिंहासनारूढं तमालोक्य ततःपरम् । श्रीचन्द्रमौलिरगमत्प्रतिवादिभटस्थलम् ॥२५॥ वादी के सिंहासन पर पण्डित सोमनाथ जी के पहुंचने पर प्रतिवादि भट के स्थान पर श्रीचन्द्र जी जाकर उपस्थित हुए ॥ २५ ॥ भटप्रतिभटद्वन्दमवलोक्य धुधवजाः। चित्रन्यस्ता इव तदा भेजिरे मध्यमां दशाम् ।।२६।। भट और प्रतिभट के रूप में दोनों ओर दोनों को तैयारी देवकर बाकी सब पण्डित चित्रलिग्वित जैसी दशा को पहुंच गए ॥ २६ ॥ अथ प्रसन्नवदनो दिवाकरगुरुः स्वयम् । निजप्रदत्तविपये विवादं समयोजयत् ॥२७॥ इतने ही में पण्डित दिवाकर जी ने प्रसन्न होकर कहा कि आज का शास्त्रार्थ टोनों पक्षों को हमारे दिये हुये विषय पर करना होगा ।। २७ ॥ ईश्वरोस्ति नवेत्त्यत्र विपये पुरतः स्थिते । नास्तीति पक्षमभजत्सोमनाथो मदोद्धतः ॥२८॥ ईश्वर है या नहीं इस विषय को लेकर आन विचार होगा ऐसी जव सभा में घन्टा घोप के साथ घोपणा उपस्थित हुई तब वादी सोमनाय ने नहीं का पक्ष लेकर बोलना स्वीकार किया ॥ २८ ॥ अथ प्रवृत्ते विधिवद्विवादे मध्यताङ्गतः । समस्तोपि बुधबातो ललम्बे गलगएडवत् ॥२६॥ इसके अनन्तर विधि पूर्वक विचार का आरम्भ होने के समय अन्य सब विद्वान् गलगण्ड की सी दशा में पहुंच गए ॥ २९ ।। बौद्धं मतमुपाश्रित्य धारावाहिकतां गतः । मोमनाथो विश्वनाथं विस्मृत्य पुनरब्रवीत् ॥३०॥ पण्डित सोमनाय जी ने इस समय भी विश्वनाथ को भूलकर बौद्धमत का आथप लेते हुए अपने पक्ष का स्थापन फिर इस प्रकार किया ॥ ३ ॥ .. 1

अष्टमः सर्गः
१०३
.
[ पूर्व पक्षः ]
प्रकृतेः क्रियमाणनि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥३१॥
आपने कहा प्रकृति के अन्दर विद्यमान सात्विक आदि गुणो के द्वारा उत्पन्न
कमों को अहंकार विमूढ पुरुष अपना किया हुआ मानते हैं । यह गीता में भग-
वान् का [ ३ । २७ । ] वचन है ॥ ३१ ॥
तत्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इतिमत्वा न सज्जते ॥३२॥
तन्ववेत्ता पुरुष तो गुण कर्म के विषय में गुण अपने सदृश गुण वाले द्रव्यों
से मिलते हैं ऐसा जानकर उनमें आसक्त नहीं होते हैं ऐसा गीता में [३ १२८]
भगवान कह चुके हैं ॥ ३२ ॥
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥३३॥
ससार में ज्ञानवान् पुरुप भी अपनी प्रकृति के अनुकूल ही चेष्टा करते हैं।
इसलिये यह वात सिद्ध होती है कि संसार प्रकृति के प्रवाह की ओर स्वभावतः
जारहा है उसके रोकने का प्रयत्न सर्वथा निष्फल है यह भी गीता में भगवान्
का ही [ ३ । ३३ ] कथन है ॥ ३३ ॥
इति गीतोक्तवचनैर्न कर्ता जगदीश्वरः ।
विकारः प्रकृतेः सर्वमुद्रावयति तद्वतः ॥३॥
भगवदगीतोक्त इन वचनों से यह बात अनायास सिद्ध होती है कि जगदीश्वर
जगत् का कर्ता नहीं है केवल प्रकृति के विकार से ही यह सब कुछ बन जाता
दधिगोमयसंयोगो वृश्चिकोद्गमकारणम् ।
लभ्यते जगति प्राज्ञः किमत्रेश्वरकर्तृकम् ॥३५॥
मसार में वैज्ञानिक पुरुप दधि और गोमय के संयोग को वृश्चिकोहम का
कारण मानते हैं इसमें ईश्वर-कई क्या कर्म है ? ॥ ३५ ॥

१०६ -- 1 : श्रम संगै IPEET: [उत्तर पक्ष. ] भगवन्भगवद्धीताविपये भवतेरितम् : --- : अतोमयापि तत्पद्यैः किचिदत्रेदमुच्यते ॥१२॥ आपने कहा, 'इस संभा में वादी ने भगवद्गीता के पद्यों से अपने पूर्व पक्ष का स्थापन किया इसलिये हमको भी भगवद्गीता के पयों से ही उत्तर पक्ष के रूप में कुछ कहना पड़ता है ॥ ४२.-: अनीश्वरमिदं सर्व ये वदन्ति महीतले । आसुरी योनिमापन्नास्त नरा. भगवन्मते ॥४ी, जो पुरुष इस जगत् को अनीश्वर मानते हैं वे भगवद्गीता के मत में आसुरभावा- पन्न कहे गए हैं ।। ४३ ॥... 11.मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। आम . भगवानिदमप्याह जगद्विपरिवर्तनम् ॥४था- भगवान् कहते हैं कि प्रकृति मेरी अध्यक्षता में रहकर चराचर जगन् का सर्जन : करती है यह उसका निर्माण कार्य स्वतन्त्र नहीं है ॥४४॥ यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमित्यपि) [ भगवानेव तेत्राह गीतायामर्जुनं प्रति ॥er: समस्त भूतों का वीज स्वरूप में हूं यह भी भगवान् का वचन है यह मो कृष्णार्जुन सम्बाद में आपने देखा ही होगा ? ॥ ४५ ॥ प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामीति यद्धवः । । तत्कथं तदधिष्ठानमन्तरा सफलीभवेत् ॥१६॥ मैं अपनी प्रकृति का अष्टम्मन करके समस्त भुवनों का सर्जन करता हूं यह भगवद्गीता वाक्य क्या आपने नहीं देखा है ? ४६॥ सर्वयोनिपु. कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः तासां ब्रह्म महद्योनिरहं वीजपदः पिता जी भिन्न २ आकार बानी नितनी मूर्तियां उत्पन्न होती है उन सबका धीन भूत मूल कारण मैं ही हूं यह भगवद्वाश्य क्या आपकी दृष्टि में नहीं आया ? ॥४७॥ .

H - गा जगद्रभीचन्द्रदिग्विजये मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥४८॥ महत्तत्वोपलक्षित यावन्मान प्रकृति है उसको योनि मानकर मैं उसमें गर्भ रूप से अवस्थित है इसी कारण उससे समस्त भूत आविर्भूत होते है ॥ ४८ ॥ यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यञ्चन्द्रमसि यचामो तत्तेजो विद्धि मामकम् ।।४६॥ सूर्य चन्द्रमा और अग्नि इन तीनों म प्रविष्ट होकर जो तेज समस्त जगत् को प्रकाशित करता है वह तेन मेरा ही है इस भगवद्वाक्य को आपने क्यों नहीं देखा ? ॥४९॥ समं सर्वेषु भूतेपु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य. पश्यति स पश्यति ॥५०॥ समस्त भूतों में एक रूप से अवस्थित एव पिनाशवान् पदार्थों में अविनाशी रूपासे रहने वाले मुझको तत्व-दृष्टिसे जो देखता है वही मुझको भी देखता है [ दृशिरत ज्ञानार्यकः ] ॥ ५० ॥ अनादित्वानिर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥५१॥ 1। अनादि और निर्गुण होने से यह अव्यय परमात्मा अनेक शरीरों में रहने पर भी अपने लिये कुछ नहीं करता है इसी लिये लिप्त भी नहीं होता है ॥५१॥ यस्मात्तरमतीतोहमनरादपि चोत्तमः । अतोस्मि लोके वेदे च प्रथित. पुरुषोत्तमः ॥५२॥ भगवान् सर और अक्षर इनका अतिक्रमण कर चुके है इसी कारण लोक और वैट में उनसे पुम्पोत्तम माना है ।। ५२ ॥ नाहं प्रकाश मर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥५३|| + योग मागा में आनन रहने के कारण वह ससे नजर में नहीं आते हैं उसी- लिये मृदलोग उसको अन और अव्यय होने पर भी नहीं पहिचानते हैं ॥ ५३ ।। k अष्टगः सर्ग १०७ -- 1 TER --- --- ? अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥५॥ बुद्धि हीन पुम्प मेरे अव्यय और सर्वोच्च भाव को न समझ कर कहीं पर तो अव्यक्तभाव में स्थित मुझरी व्यक्त मानते हैं और यहीं पर व्यक्त रूप में भव- स्थित मुझको अव्यक्त मानते हैं ।। ५४ ।। अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय मम्भवाम्यात्ममायया ॥५५॥ मैं अन और अव्ययात्मा तथा भूतों का ईश्वर होते हुए भी अपनी इच्छा कल्पित माया से प्रकट होता हूँ यह सब भगवान् का ही कथन है ॥५५॥ नतु मां शक्यसे द्रक्षुमनेनैव स्वचतुपा । दिव्यं ददामि ते चच. पश्य मे योगमेश्वरम् ॥५६॥ भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि तुम मुझको इस अपनी चर्म दृष्टि से नही देख सकते हो इसलिये हम अपनी कृपा से तुमको दिव्य-ज्ञान रूप नेत्र देते हैं उससे तुम मेरा ऐश्वर योग देखो ॥ ५६ ।। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्मर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥५॥ ईश्वर समस्त भूतों के हृदयात्राश में अथवा गर्भ में निवास,फरता है उसी को मेरणा से मायाचक्र पर चढ़े हुए सब भूत यन्त्रारूट पुम्प की तरह चलते फिरते हैं। [ ईश्वरः शर्व ईशानः ] इस अभिधान से यहा पर ईश्वर पट प्रसङ्गोचित महा- देव का वोधर है ।। ५७॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन सर्वदा।। तत्प्रसादात्परां शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ।५८ मनसा चाचा कर्मणा सर्व कालो में उस अद्वैत शङ्कर की रसा में रहो उसी की कृपा से परम शान्ति और शाश्वतपद प्राप्त होगा।। ५८ ॥ इति गीतोक्तवचनेर्भवत्प्रश्नपरम्परा । प्रायः समाप्तप्रायैव यथोचितममुत्तरः ॥५६|| - - "

१०८
-
-
-
-
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्मिजये
इन प्रसङ्गोचित गीता के बारह पद्यों से आपकी समस्त प्रश्न परम्परा का
समुचित उत्तर दिया गया है जो भगवान् के श्री मुख से स्वय निरला है ॥५९॥
गीतावचनसान्निध्यवशेन भंवताऽधुना। -
यदगादि न तत्प्राज्ञैरुररीक्रियते जनः ॥६॥
इसलिये आपने जो भगवद्गीता के तीन पयों का अवलम्ब लेकर अपने पक्ष
का स्थापन पिया है, वह प्राज्ञजनोचित नहीं है । ६० ॥
{"। परापरविभेदेन सर्वस्या. प्रकृते. प्रभुः। ,
। भगवानेव न विना तं किमप्यत्र जायते ॥६१॥
अब गीतोक्त पदों का विवरण देखिये । परापर भेद से व्यवस्थित प्रकृति के
अध्यक्ष एक मात्र भगवान हैं उनकी पिना इच्छा के प्रकृति में किसी प्रकार का
परिवर्तन नहीं होता है ।। ६१॥
अजोपि भगवानीशः स्वकीयां प्रकृति गतः।
अव्यक्तो व्यक्तनामेति व्यक्तश्चान्यक्ततां स्वतः॥६२॥
भगवान् अन होने पर भी अपनी प्रकृति के अध्यक्ष है वे उसको अधिष्ठान
बनाकर कभी व्यक्त से अव्यक्त और कहीं अव्यक्त से व्यक्त बन जाते हैं ।। ६२॥
। नाविना पुरुपं फिश्चित्प्रकृति. कर्तुमीहते । -
विना पुरुपसंयोगं यथा स्त्री सुतसम्भवम् ।।६३॥
जिस प्रकार स्त्री पिना पुरुष के सयोग के अपत्य उत्पन्न नहीं कर सकती
है उसी प्रकार प्रकृति भी विना ईश्वर के सम्बन्ध के अोली कुछ नहीं कर सक्ती
१॥ ६३॥
अतएव समासेन समुक्त भगवत्कृतौ।।।
प्रकृति. परमं क्षेत्र क्षेत्रज्ञ. पुरुपोत्तमः ॥६॥
इसीलिये भगवद्गीता में सक्षेप से प्रति का क्षेत्र और ईश्वर को क्षेत्रज्ञ कहा
गया निसरा वर्णन गीता के पूरे एक अन्याय में है ॥ ६४ ॥
प्रकृतो यत्समामक्तं तेजो भाति न तन्निजम् ।
पुरुपादेव तत्तस्यां ममाविष्टममृत्पुरा ॥६५॥

०१०९ "'' अष्टमः सर्गः- 'प्रकृति में व्यापक रूप से जो तेज झलकता है वह उसका अपना नहीं है पुरुप से ही वह तेज उसमें प्रविष्ट हुआ है ॥६५।। अव्ययः परमात्माऽयं शरीरस्थोपि निर्गुणः । स्वीयां गुणमयीं भुंक्ते प्रकृति केवलान्वयात् ॥६६॥ यह अव्यय परमात्मा केवलान्वयसे पृथिव्यादि रूप से अपस्थित प्रकृति में पविष्ट होकर भी निर्गण और उसका भोक्ता अर्थात् पालक रहता है। [ भूमिरत्र पालनार्थः ] ॥६६॥ [ युग्मम् ] - यदिगादि महाभाग ! भवता पूर्वमद्भुतम् । 'दधिगोमयसंयोगावृश्चिकस्य प्रवर्तनम् ॥६॥ तत्रापि तादृशी शक्तिरीश्वरेण निवेशिता । वृश्चिकं या जनयति न सर्प नैव कच्छपम् ॥६॥ आपने अपने पूर्व पक्ष में दधिगोमय योग से वृश्चिकोद्भव का जो निदर्शन उपस्थित किया है उसमें भी ईश्वर नियन्त्रित शक्ति का विचित्र नियन्त्रण है जिससे अन्य जीवों का उद्रव उससे नहीं होता है ॥ ६७-६८ एवमेव जगद्धात्रा कापिशक्तिनियन्त्रिता । अयस्कान्तेपि या लोहमाकर्पति न पित्तलम् ॥६॥ प्रकार जगदीश्वर ने अयस्कान्त प्रस्तर में भी कोई अपनी शक्ति नियन्त्रित की है जो लोह के अतिरिक्त काप्ठ लोछादि काआकर्षण नहीं कर सकती है ।। ६९ ॥ स्वभावमिद्धो यः प्रोक्तो गमनागमनक्रमः । जडवस्तुपु नेवास्ति तस्यास्तित्वमपि कचित् ॥७॥ चिदंशसङ्गमात्तस्यां प्रकृती गमनक्रमः । प्रतीयते चिदंशोपि स ब्रह्मएयवतिष्ठते ॥७१|| आपने जो अपने फयन में यह कहा कि प्रकृति में गमनागमन क्रम स्वभाव सिद्ध है (१) यह भी नड़ प्रकृति में सम्भव नहीं है क्योंकि उसमें ना विश + । .. " । - - ११० जगदुरभीचन्द्रदिग्विजय आपका उत्तर पक्ष सुनकर स्तम्धचेष्ट पण्डित सोमनाथ भी आपको प्रत्यक्ष रूप में दूसरों विश्वनीय समझकर सभा में निस्तेज हो गया ॥ ८३ ॥ समस्तशास्त्रविपयैः सम्मतं युक्तिसङ्गतम् । बालोयमुत्तरमदादिति सर्वेऽवदन्बुधाः ॥८॥ वालमावापन्न इस दिव्य विग्रह ने युक्ति प्रमाण सम्बद्ध जो उत्तर पक्ष सभा में उपस्थित किया है वह सर्वथा दुरूह और दुस्तर्य है यह चर्चा समस्त विद्वानों में कर्णाकर्णि प्रवृत्त हुई है ।। ८४ ॥ [युग्मम् ] . प्रौढपाण्डित्यविषयः कवादी कृतदिग्नयः ।, चतुर्दशाब्ददेशीयः बचायमकृतश्रमः॥८५॥ तथापि यद्यदवदत्प्रश्नानामुत्तरं क्रमात् ।। श्रीचन्द्रमौलिस्तत्सर्वमपूर्व न श्रुतं क्वचित् ॥८॥ एक ओर वेद शास्त्र सम्पन्न दिग्विजयी । कहा सोमनाथ ? और दूसरी ओर चौदहवर्ष की अवस्था वाला कहाँ यह वालक ? इतने पर भी जो इसने क्रमबद्ध सा प्रश्नों का सभा में उत्तर दिया वह आज तक कहीं सुनने में नहीं आया इस मकार का आश्चर्य सब विद्वान् सभा में करने लगे ॥ ८५-८६ ॥ पौर्वापर्यक्रमवशाहीतापद्यार्थसङ्गतिः । कथमेकन विपर्ये संगृहीतेति विस्मयः ॥८॥ गीता या पूर्वापर प्रसङ्ग देख कर किस प्रकार उसके पयों की एक वाक्यता इस शास्त्रार्थ में श्रीचन्द्र जी ,ने कर के दिखा दो यह आश्चर्य सभा स्थित सब विद्वानों को हुआ ॥ ८७ ॥ दर्शनेषु न यदृष्टं श्रुतावपि न यच्छु तम् । तत्सर्वमेव बालेन सद्यएव निवेदितम् ।।८|| निस बात यो हमने न दर्शनों में देखा और न श्रुतियों में अद्भुत वात आन के शास्त्रार्य में इस यालक श्रीचन्द्र ने तुरन्त सभा में प्रस्तुत करदी icer महतः पूर्वपक्षस्य दुरूहस्य यदुत्तरम् ।' समदोदयमेकाकी न तच्छायं शतैरपि ॥३ r M १ + सुना वह - अष्टमः मर्ग ११३ अनेक शास्त्रों से सम्बन्ध रखने वाले दुरह पूर्व पक्ष का जो उत्तर अकेले श्रीचन्द्र ने दिया वह सेकड़ों विद्वान् मिल कर के भी नहीं दे सकते थे ॥ ८९ ॥ सरसा सरला सारासारतत्वविमर्शिनी । वागस्य हृदयं वेगादाकर्पति मनस्विनाम् ॥६॥ देखने में सरल सुनने में सरस समझने में अतिगम्भीर ये श्रीचन्द्र की वाणी मनस्वी महापुरपों का मन भी एकवार अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है ॥ ९० ॥ अपूर्वः कोपि विद्यायाः कोपोयं मूर्तिमानिव । समायातोत्र विषये यो न दृष्टो न च श्रुतः ॥११॥ विद्या का यह कोई अपूर्व कोप मूर्तिमान् होकर श्रीचन्द्र के रूप में इस देश में आया है जो आज से पूर्व कभी न देखा और न सुना ।। ९१ ॥ सर्वथा कश्चिदमरः प्रतिभाति भुवं गतः । सरस्वतीमिहद्रष्टुमायातो निजदेवताम् ।।२।। निःसन्देह यह श्रीचन्द्र कोई देव है जो इस रूप में यहां पर श्रीमती मूर्तिमती सरस्वतीदेवी का दर्शन करने के लिये देवलोक से आया है ।। ९२ ।। अथवा भगवानेव शिवः सानादिहागतः । रक्षार्थमस्यदेशस्य मानवं वपुराश्रितः ॥३॥ अथवा इस देश को रक्षा करने के लिये मानव देह धारण कर इस रूप में साक्षात् शिव हो कैलाश से यहाँ पर पधारे हुए हैं ॥ ९३ ।। एवंविधा बुधगिरः समन्तादुपसङ्गताः। स निपीय गुरोः पार्थे विनयावनतोऽभवत् ।।६४॥ चारों ओर से इस प्रकार विद्वानों के मुख से निकली हुई बातें सुनते हुए भगवान श्रीचन्द्र जी अपने गुरुदेव के पास आकर नम्रता पूर्वक बेठ गए ।। १४ ।। गुरुस्तं विबुधबातमध्यगं निजपाणिना । परागृशन्निजगिरा धन्योसीति मुदाब्रवीत् ॥५॥ गुरु जी ने समस्त विद्वजनों के बीच में बैठे हुए श्रीचन्द्र को अपने कर कमल से छूते हुए चार २ धन्य हो २ इस प्रकार कद्द कर इनसाअभिनन्दन किया ||९५॥

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये इनको खोजने के लिये जो इनके बहुत से सायी घरों से निरल पर वन की और आने लगे थे उन्होंने इनको बन में बैठा हुआ देखकर जब इनसे यार २ घर जाने को कहा तब पण्डित सोमनाथ जी ने उनके प्रति एक दिव्य सन्देश सुनाया निसका उल्लेख नीचे किया जाता है ॥ १०७-१०८ ॥ [व्यि मन्देश ] श्रयतां मनुजैः सर्वै रिदमस्मदुदाहृतम् । यदद्यावधि न क्वापि मयोक्तं हृदयस्थितम् ॥१०॥ आपने कहा कि सजनो ! आप लोग यान पूर्वक एक मेरे सन्देश को सुन यह दिव्य सन्देश मैंने आज तक आपरी नहीं सुनाया प्रसङ्ग यश आज सुनाता दिग्जये कृतसन्धोहं वाराणस्यां महेश्वरम् । यदाप्राज्ञं तदा स्वप्ने स मामाह निजोचितम् ॥११॥ दिग्विजय को अपने मन में दृद प्रतिज्ञा करके मैने काशी में भगवान श्री शङ्कर से आज्ञा माप्त करने के लिये जब मार्थना की तब उन्होंने मुझे स्वम में यह आदेश दिया ॥ ११० ।। गच्छ त्वं मनिदेशेन विजयी भव सर्वतः। परं काश्मीरविषयं न गच्छनिदेशतः ॥१११॥ जाओ ! मेरे आदेश से सर्वत्र विजय प्राप्त करो परन्तु मेरे कयन से काश्मीर मण्डल में जाकर शास्त्रार्थ मत करना ।। १११ ॥ । मृर्ता भगवती तत्र शारदा मदनुज्ञया । * मन्दिरे तिष्ठति सदा सर्ववाङ्मयदेवता ॥११२॥ क्योंकि १ वहां पर मेरी आज्ञा से मूर्ति रूप से देवी भगवती शारदा सर्वदा मन्दिर में रहती हैं जो कि समस्त वाड्मय की अधिष्ठात् देवता है ॥ ११२ ।। सा मदीयरहस्यानि सर्वाणि जगदम्बिका । वेत्ति तच्चरणौ दृष्ट्वा न कुर्या बालचापलम् ॥११३॥ वह जगदम्बिका मेरे समस्त रहस्यों को पूर्ण रूप से जानती है उनके श्री चरणों में पहुंचकर बाल जनोचित चापल मत करना ॥ ११३ ॥ . ++ अष्टमः सर्गः ११७ तत्र यद्यवमन्तासि शारदां हृदयेश्वरीम् । तदा बालस्वरूपेण भविष्यामि तवाग्रतः ॥११॥ यदि वहां जाकर तुम पाण्डित्य के गर्व में आकर मेरी हृदयेश्वरी शारदा का अप- मान करोगे तो बालकरूप में आकर मैं तुम्हारे समस्त गर्व का विश्वंश करूंगा ।११४ यस्मात्पराभवं प्राप्य विलज्जेस्त्वं सभोदरे । तमेव मां विजानीया नीलकएठं महेश्वरम् ।।११५|| एवमादिश्य मां शम्भुानस्तिमितलोचनः । तत्रैवान्तर्दधे स्वप्ने यत्राहमवसं पुरा ॥११६॥ शास्त्रार्थ में जिस बालक के समक्ष में जाकर तुम सभा में लज्जित हो जाओगे उसी बालक को तुम साक्षात् शङ्कर समझना इतना मेरे से स्वम में कहकर भग- वान् शङ्कर वहीं पर अन्तर्हित हो गए जहां पर कि मैं रहता था ॥११५-११६॥ सर्वमेतदिहप्राप्तं मया शम्भोनिदेशतः । पराभवस्य करणं विस्मृतं तद्विभोर्वचः ॥११॥ मैं उस सम सन्दिष्ट वृत्तान्त को भूलकर यहांपर शास्त्रार्थ के लिये आया था निसका यह घोरतर परिणाम मेरे समक्ष में आकर उपस्थित हुआ ॥ १७ ॥ अतोहं बालरूपस्य शम्भोरस्य पदाम्बुजम् । अभिवाद्यव गन्तास्मि स्थानादस्मादिदं वृतम् ॥११॥ इसलिये अब मैं यहाँ से बाल रूप शङ्कर का दर्शन करके ही यहां से उठूगा अन्यया नहीं यह मैंने आज हृदय में दृढ़ प्रतिज्ञा को है ।। ११८ ॥ एवमादिश्य तान्सर्वानागतानिजमानवान् । त्रिपाठी ध्यानसम्ममो बभूव वटमूलगः ॥११॥ इस प्रकार आगत सजनों के प्रति अपना सन्देश कहकर पण्डित सोमनाय जी चट मूल में बैठकर समाधिस्य हुए ॥ ११९ ॥ [यलापरम्] जाते सूर्यास्तसमये समन्तात्तमसावृत्तम् । तदासीदिपिनं सर्वं कालायसमिव स्थितम् ।।१२०) १२८ .. अगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये नीरवं मृदुवातेन लुलितं गगनोन्मुखैः। वृक्षः समन्तादाकीर्ण मर्मरध्वनिमञ्जुलम् ॥१२१॥ कदाचित्कन्दरालीनसिंहगर्जनभीषणम् । कदाचिद्धनमातङ्गचीत्कृतैरनुनादितम् ॥१२२|| शरच्चन्द्रच्छटापातजातद्रुमतलप्रभम् । तिलतएडुलतान्नोतं वनदेव्या बनाङ्गणम् ॥१२॥ इतने ही में मूर्यास्त का समय हुआ बन में काला अन्धकार छा गया बन सर्वथा नीरव हो गया हलको हवा से वृक्ष हिलने लगे आकाश चुम्बी ऊचे वृक्षों से गिरे हुए सूखे पत्तों का शब्द प्रतीत होने लगा उस वन में किसी और से गुहा में छिपे सिंहों का भयङ्कर गर्जन सुनाई देने लगा किसी और से बनेले हाथियों की चिंघाद सुनने में आरही थी चन्द्रमा के सुन्दर किरण धने वृक्षों की पत्र माला भेद कर पृथ्वी पर आने लगे जिनको देखकर ऐसा मतीत होने लगा कि मानो धन देवी ने नृत्य करने के लिये वन का सुन्दर प्राङ्गण देखकर उसमें रङ्ग विरङ्गा फर्श शिवा दिया हो ।। १२०-१२३ ॥ { विशपरम् ) विलोक्य चित्रितं तादृग्वनमस्यान्तरे गतः । श्रीचन्द्रमौलिभगवान्निर्जगाम गुहामुखात् ।।१२४|| प्रत्यागमनमार्गस्थवटच्छायाकृतासनम् । हृदये कृतविश्वेशभावनं सदुपायनम् ॥१२५॥ विलोक्य भगवानत्र सोमनाथमनाथवत् । निमीलिताक्षमस्याग्रे तदाऽतिष्ठत्कृपावशात् ।।१२६॥ ऐसा सुहागना बन देखकर श्रीचन्द्रमौलि जी इसके अन्दर से निम्ल कर अपनी गुहा के परिसर में शहर की ओर लाग्ने वाले मार्ग में अवस्थित चट के मूल में पमासन लगाकर बैठे हुए हृदय में श्री विश्वनाथ जी का स्मरण कर हाथों में पुष्प लिये हुए पण्डित सोमनाय जी के समक्ष में आगर अपनी कृपा के कारण उपस्थित हुए ॥ १२४-१२६ ॥

अष्टमः सर्गः ११९ . . हृदयेन्तर्हितं वाह्यदेशे तत्र व्यवस्थितम् । - विलोक्य दएडवभूमौ प्रणिपत्येदमब्रवीत् ॥१२७॥ आपके समर्श में आते ही हृदय से गायर होते हुए विश्वनाथ को देखने के लिये सोमनाथ जी ने जैसे ही आंखें खोलों से हो समक्ष में अवस्थित आपका देखकर आपके लिये साष्टाङ्ग प्रणाम कर सोमनाथ ने कहा ॥ १२७॥ मदागः क्षम्यतां देव ! मानवोचितचापलम् ।. यदिदं समभूदत्र सर्व तन्नानुचिन्त्यताम् ॥१२८॥ भगवन् ! आप कृपया मेरे अपराधों को क्षमा करें और स्वाभाविक भूल के कारण मेरे से जो कुछ अनुचित व्यवहार हुआ हो उसको अपने हृदय में स्थान न दें ॥ १२८ ।। [युग्मम् ) वदन्तमेवं भगवान्सोमनाथं कृताञ्जलिम् । जगाद यत्वयाकिंचिदपराद्धं ममाग्रतः ॥१२६॥ न तन्मया हृदिकृतं व्यावहारिकसत्तया । भवत्येवंविधं लोके प्रायशो वालचापलम् ॥१३०॥ इस प्रकार अपने किये अपराधों की क्षमा मांगते हुए सोमनाथ को देखकर भगवान् श्रीचन्द्रमौलि जी ने कहा कि जो भी तुमने मेरे समक्ष में आकर अपराध किया वह सब मैंने भुला दिया उसके दुहराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि व्यवहार में कोई न कोई भूल मनुष्यों से हो हो जाया करती है ॥१२९-१३०॥ मन्दस्मितेन बहुशो मया त्वं वत सूचितः । नास्मरः पूर्ववृत्तान्तं तदा स्वप्ने यदीरितम् ॥१३१॥ शास्त्रार्थ के आरम्भ में अपने मन्दस्मित के द्वारा मैंने तुमको स्वम में कही हुई बात का स्मरण दिलाया परन्तु उस पर तुमने कुछ ध्यान नहीं दिया ।१३।। अतएव पराभूति प्राप्तवानसि वस्तुतः । प्रियोसि मम भक्तोसि जहि मोहमुपागतम् ।।१३२॥ इसी कारण काश्मीर में आकर तुम्हारा पराजय हुआ वास्तव में तुम मेरे प्यारे भक्त हो अब इस मोह को छोड़कर मेरे आदेश का पालन करो ।। १३२ ॥

१३० जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये भक्त्या पदाम्बुजं देव्याः प्रणम्य विविधस्तवः। सन्तोष्य तां प्रसादेन गच्छ वाराणसी प्रियाम् ॥१३३ परम भक्ति के साथ वागीवरी के मन्दिर में जाकर तुम शारदा को प्रण करो फिर पूर्ण विधि से अर्चन करने के बाद स्तरन करो फिर उनकी भी आ लेकर काशो जाओ !! ॥ १३३॥ [युग्मम् ] एवं मृदुपदैर्भावमादिशन्तं महेश्वरम् । ; जगाद मनसा तुष्टः सोमनाथो विदाम्बरः॥१३॥ यदि प्रीतोसि भगवन्मय्यनुग्रहवानसि । तर्हि दर्शय तद्रूपं हृदये मम यद्गतम् ॥१३५।। इस प्रकार आदेश देते हुए भगवान् श्रीचन्द्र जी को अपने समक्ष में देखक पण्डित सोमनाय ने कहा कि यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो अनुग्रह करके मुः उस रूप में दर्शन दीजिये जो मेरे हृदय में विद्यमान है ॥ १३४-१३५ ॥ [ युग्मम् ] निशम्य भक्तहृदयादुत्थितं तादृशं वचः । दर्शयामास तदपं यदस्य हृदये स्थितम् ॥१३६॥ पञ्चाननं त्रिनयनं धृतगङ्गं सताएडवम् । तुपारधवलं भस्मभूपणं गतदूपणम् ।।१३७॥ इस भक्त की ऐमी प्रार्थना मुनकर श्रीचन्द्र जी ने पश्चानन, त्रिलोचन, धृतगङ्ग तुपार घरल, भस्म भूपण अपना रूप ताण्डव नृत्य के साथ दिखा दिया जो मि सोमनाय के हृदय में इस समय विद्यमान या ॥ १३६-१३७ ॥ विलोक्य भगवद्वपमीदृशं स विदाम्बरः । प्रणम्य दएडवलूमौ जगाद समयोचितम् ॥१३॥ नाहं गमिष्याम्यधुना विहाय भगवत्पदम् । वाराणमी भवत्मेवामहमिच्छामि वस्तुतः ॥१३॥ भगवान श्रीचन्द्र जी का ऐसा शङ्कर से अभिन्न स्प देखार सोमनाय ने १२१ . का समय है mot ८ अष्टम सर्ग दण्डवत् प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहने लगा कि मैं आपके घरों की सेवा करना चाहता हू, आपको छोड़कर काशी जाने की मेरी सर्वथा इच्छा नहीं है ॥१३८-१३९ ".आवेदयति भावं स्वमेवं तत्र महोदये। श्रीचन्द्रमौलिस्तमिदं प्राह तत्र वनोदरे ॥१४०॥ . गच्छेदानीमितः शीघ्र बहुकर्तव्यमस्ति मे । न रोचते विलम्बो मे समयेत्र समांगते ॥१४१॥ पण्डित सोमनाथ जी की ऐसी हार्दिक इच्छा सुनकर श्रीचन्द्र जी ने उनसे कहा कि मेरी आज्ञा से इस समय तुम काशी जाओ !! हमको बहुत काम करना वाकी है उसमें विलम्ब लगाना हमको अभीष्ट नहीं है क्योंकि यही उसके करने ॥१४०-१४१॥ दिशामि यदहं प्रीत्या तदेव भवताऽधुना । । -कर्तव्यमत्र न स्थेयं क्षणमात्रमपि त्वया ॥१४२॥ इस समय जो आपको हम आज्ञा देते हैं आप उसी का पालन करें यहां पर अधिक काल तक ठहरने का हठ न करे ॥ १४२ ॥ h० विगते समये पश्चात्तीर्थयात्राप्रसङ्गत्तः । - यदाहमागमिष्यामि पुरी वाराणसी प्रियाम् ॥१४॥ तदा गतश्रममहं भवन्तं निजसन्निधौ । स्थापयिष्यामि विधिवद्दत्तदीक्षं यथायथम् ॥१४॥ तावत्त्वमपि तत्रत्यं कौटुम्बिकमरं लयम् । नयेति निगदन्नेव स तत्रान्तरधीयते ॥१४॥ कुछ काल बीत जाने पर जब हम तीर्थ यात्रा के प्रसङ्ग से काशी आयेंगे उस समय आपको उदासीन धर्म की दीक्षा देकर अपने पास रहने की अनुमति देंगे उस समय तक आप भी समयोचित कुटुम्ब भार से हलके हो जाओगे इतना कद फर श्रीचन्द्र जी अन्तर्हित हो गए ॥ १४३-१४५ ॥ अदृश्यतां गते तत्र सहसैव बनोदरे । श्रीचन्द्रमौलौ नितरां विलक्षः समभूदुधः ॥१६॥ T m - . १६ १२२ wi- - . जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये करौ विमर्दयन्दन्तैर्दन्तानपि विचूर्णयन् । सोमनाथस्तदा तत्र गतप्राण इवाभवत् ॥१४७|| श्रीचन्द्र जी के अकस्मात् अन्तर्हित होने पर पण्डित सोमनाय 'उस बन में वेहोश हो गए और कुछ देर के बाद होश आने पर हाथ मलते हुए और दात पीसते हुए कुछ समय तक मृतक जैसे पड़े रहे ॥ १४६-१४७॥ ।मूहूर्त्तमात्रं निःसंज्ञे तदा तस्मिन्नवस्थिते । । आकाशवाणी समभूत्तवर्णमुपसङ्गता ॥१४॥ एक मुहूर्त तक निश्चेष्ट रहने पर जब कुछ २ सोमनाथ जी को होश हुआ उस समय एक आकाशवाणी आपके श्रवण गोचर हुई ॥ १४८॥ मात्रतिष्ठ बने घोरे देवीं पश्य पुरःस्थिताम् । सरस्पती जगद्वन्द्यां कृपया समुपागताम् ॥१४॥ उसके शब्द इस प्रकार के ये ? इस घोर यन में अधिक काल तक मत रहो समक्ष में उपस्थित हुई जगद्वन्द सरस्वती का दर्शन करो ॥१४९ ॥ श्रीचन्द्रमौलेः कृपया समायातां वने स ताम् । विलोक्य विस्मयाविष्टस्तुप्टाव मधुरैः पदैः ॥१५॥ इस आगाणी को मुनकर पण्डित सोमनाय जी ने श्रीचन्द्र जी की कृपा से उपस्थित हुई शारता को देखकर मधुर पटों में उसकी स्तुति आरम्भ की।१५०। . [युम्मम् ] चरांचरजगढन्ये विमानमवासिनि । परापरजगत्मर्गस्थितिप्रलयसाक्षिणि ॥१५१॥ समस्तमपि ते गात्रं वाङ्मयेन प्राल्पितम् ।' विलोक्यते जगद्धात्रि शरणागतवत्मले ॥१५॥ आपन कहा, हे भगति ! आप चराचर जगत् के द्वारा चन्दनीय हैं फरियों के एप में आपका सर्वदा निवास है, परापर भेद से विद्यमान दो प्रकार के जगत् का जो उदा स्थिति और प्रलय काल है उसी एक मात्र आपटी साक्षिणी है, हे जग- दात्रि ! रेशरणागत समन्ने आपरा ममस्त गर्गर मुझयो ममस्त वाड्मय दारा बना हुभी तीत होता है ।। १५११५२ ॥ . . T - M -- अष्टम सर्ग । - १२३ [ घागीश्वरी वर्णनम् ] गन्धर्वविद्या ते कण्ठस्त्रयी तव वलित्रयी । अथर्वाङ्गिरसो वेदो रोमराजिः शुभास्ति ते ॥१५३॥ आपका फण्ठ गन्धर्व विद्या से बना हुआहै और आपकी निवली वेदत्रयोंसेवनी हुई है तथा आपको रोमपक्ति अथर्वाङ्गिरस वेद से निर्मित है ॥ १५३ ।। गद्यपद्यविभेदेन काव्यं ते नयनव्यम् । शिक्षात्मकं ते चरितं कल्पः सर्वाङ्गमएडनम् ॥१५था नवधा भिद्यमानो यो रसः सर्वत्र विस्तृतः ।' सएव ते महामाये शरीरमतिसुन्दरम् ॥१५५।। निरुक्तमेव लावण्यं तव गाने प्रतिष्ठितम् । भुजद्रयं वर्णमात्रावृत्तभेदेन संस्थितम् ॥१५॥ कूपरो यतिरूपस्ते वृत्तमात्रे व्यवस्थित.।। नांनाछन्दांसि ते मात. करशाखा व्यवस्थिताः ।१५७) गय पत्र के भेद से दो प्रकार का काव्य हो आपका नयन युगल है शिक्षात्मक आपका समस्त चरित है और कल्प ग्रन्य ही आपका सर्वाङ्ग मण्डन है सर्वत्र विस्तृत नवधा विद्यमान शृङ्गारादि रस समुच्चय ही आपका सुन्दर विग्रह है निरक्त आपका 'लावण्य है और माना वर्ण भेट से द्विविध छन्दः शास्त्र ही आपका भुन युगल है और उसमें भी जो मध्य २ में यति ( अर्थात् रुकने का जो नियम) है वही आपके अङ्ग का कूपर भाग है नाना वृत्तों का जो भेट है वही आपकी कर शाखाए है ।१५४-१५७। परस्परगुणावद्धसमासव्यासमञ्जुला। व्याकृतिस्ते महादेवि रशना मध्यमास्थिता ॥१५८॥ । नक्षत्रविद्या ते हारः पक्षी पूर्वापरौद्धयोः । विवादविपये मातस्तवोष्ठौ रसवर्पिणी ॥१५॥ परस्पर गुणों से आवद्ध समास और व्यास से मञ्जुल जो व्याकरण है वही शब्द परम्परा प्रवर्तक आपकी रशना ( तगड़ी ) है । नान विधा आपका मुक्ता हार है तथा विवाद में पूर्वोत्तर रूप से विद्यमान दो पक्ष ही भापक ओष्ठ बनार चमफाहे ॥१५८-१५९ ॥ -- " जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये पूर्वोत्तरविभेदेन कर्मब्रह्मपरायणे.। मीमांसे, बहुमीमांसे तवोरुयुगलं महत् ।।१६०॥ VIE, PILE कणभक्षमते ये ये पदार्थाः पोडशस्थिताः। त एवं ते सुवदने द्विभूय रदतां गताः ॥१६॥ कर्म एवं ब्रह्म का प्रतिपादन करने वालो पूर्वापर भेद से व्यवस्थित दो मीमांसा शास्त्र हो आपके विग्रह में ऊर युगल बने हुए हैं । कणादमुनि के मत में जो सोलह पदार्थ, उपलब्ध होते हैं वे ही द्विगुणित होकर आपकी दन्त पक्ति की शोभा बदा रहे हैं ।। १६०-१६१॥ 'मत्स्यादिलक्षणयुतं पुराणं ते पदद्वयम् ।। श्रुतेर्थानुगं धर्मशास्त्रमेव शिरस्तव ॥१६२॥ भ्रुवोर्युगं प्रणवजं विसर्गः कुण्डलद्वयम् । Fe :: सोमसिद्धान्तमापन्नं मुखं ते मातरम्बिके ।।१६३॥ मत्स्य. आदि अनेक शुभ लक्षणयुक्त जो अठारह पुराण है वे ही आपके शरीर में दो चरण हैं, वेदों के पीछे चलने वाले स्मृति ग्रन्थ आपके शिरःस्थानीय हैं । दो भागों में विभक्त प्रणव ही आपके विग्रह में 5 युगल हैं और दो विसर्ग ही आपके शरीर में कुण्डल,स्थानीय हैं और सोम सिद्धान्त वाद आपका मुख मण्डल - बन गया है ॥ १६२-१६३ ॥ शून्यात्मवादतामाप्तमुदरं ते महेश्वरि । TITTER विज्ञानमन्तरॉयत्तदेवकुचयायुगम् ॥१६॥ 1) समस्तवस्तुसम्विष्टस्तवाय बहुसुन्दर सदाकारो जगन्मातः सर्वत्र समवस्थितः॥१६५।। आपके शरीर में शून्यवाद उंदर स्थानीय मतोत होता है और अन्तरङ्ग विज्ञान भाग ही आपके विग्रह में कुच युगल है इस प्रकार समस्त जगत् में व्याप्त यह आपका आकार सद्रूप वनकर सर्वत्र दृष्टि गोचर हो रहा है ।। १६४:१६५ ।। -तदिदं बहुरूपेण विस्तृतं-भुवनस्थिरम् । प्रणमामि जगन्मान्ये वपुस्तवः मनोहरम् ।।१६६|| गा A अष्टम A सर्ग प्रसीद मय्यवनते प्रसन्नाननपङ्कजे । अनन्यपरतन्त्रस्ते प्रसादः कथ्यते बुधैः ॥१६७॥ हे जगन्मान्ये । अनेक भाषा भेद से भिन्न २ भाव बोधक इस आपके विश्व- व्यापक सुन्दर विग्रह को मैं वार २ प्रणाम करता हु मेरे ऊपर आप प्रसन्न हूजिये आपका प्रसाद सर्वदा अनन्य परतन्त्र कहा जाता है ॥ १६६-१६७ ॥ एवं प्रणम्य विधिवद्धारती परितोपयन् । म ब्राह्म मुहूर्ते स ततः प्रतस्थे नगरी निजाम् ॥१६॥ * इस प्रकार भारती का स्तवन करके पण्डित सोमनाथ जी ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर, उस बन से काशी के लिये मस्थित हुए ॥ १६८ ॥ मयाप्येतद्विविच्यात्र यथाविधि यथामति । श्रीचन्द्रमौलेश्वरितं प्रसङ्गोयं समाप्यते ॥१६॥ हम भी वहा पर यया बुद्धि वलोदय इस शास्त्रार्थ के प्रसङ्ग को समाप्त कर ओचन्द्रमौलि का इतना चरित्र मुनिमण्डल की भेंट करते हैं।॥ १६९ ।। शास्त्रार्थप्रक्रियावद्धः सर्गोयं वादिभिर्जनः। । सर्वदा हृदये धार्य. समाधानपरायणे. ॥१७०॥ शास्त्रार्थ की प्रक्रिया बतलाने वाला यह सर्ग वादी और प्रतिवादी दोनों प्रकार के विद्वानों को सर्वदा अपने हृदय में स्मरण रखना चाहिये ।। १७०॥ येचन्दमौलेविजयं विवादेजना. पठिप्यन्तिसमादरेण । ते चन्द्रमौले कृपया सदैव जयं समेष्यन्ति निरस्तशङ्का ।१७१। जो महानुभाव इस विचार प्रसङ्ग में सर्वदा अपने हृदय में भगवान् श्रीचन्द्र- मौलि का विजय आदर के साथ पढ़ेंगे ले श्रीचन्द्रमौलि की कृपा से सर्वत्र विजयी होंगे यही हमारा सर्ग के अन्त में मङ्गलाशसन है ॥ १७१॥ इतिश्री सनाच्ययशोद्भव कविवर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते सतिलके जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विनये महाकाव्ये सोमनाथपरायो नामाष्टम सर्ग 11 Tips . -- 1 + नवमः सर्गः- है r श्रीमानतःपरमुदारतया मनस्वी 1. वेदान्तवेद्यपरमात्मविचारनिष्ठः। लोकोपकारमनसा निगमोदितथी-।। - राविश्वकार निगमेषु नवीनभाष्यम् ॥१॥ शाखार्थ में विजय प्राप्ति के अनन्तर आत्म विचार निरत मनस्वी भगवान् श्रीचन्द्र जी ने ससार के उपकारार्थ वैदिक साहित्य पर चन्द्र भाष्य लिखने का आरम्भ किया ॥१॥ नालोकितं जगति य. परमादरेण श्रीचन्द्रभाष्यमतिमञ्जुलभावगर्भम् । मन्ये प्रसह्य विधिना परिवञ्चितास्ते । 1 वामन वाममतयो गतिपारवश्यात् || जिन महानुभावों ने वेदों पर आपका लिखा हुआ घेद भाष्य नहीं देखा वे सजन विधाता ने हठ पूर्वक आत्मिक उन्नति के मार्ग से बञ्चित किए, ऐसा जानना अस्मिन्नितान्तरमणीयपदार्थनद्ध भाग्ये निरस्य विविधानि मतानि देवः । मन्त्रस्थितैर्बहुपदैः स्वमतं विवितुः 1 श्रीचन्द्रमौलिरकरोढुवनं विलक्षम् ॥३॥ इस सुन्दर चन्द्र भाग्य में आधुनिक मतों का निराकरण करफे, श्रीचन्द्र, जी ने मुनि जनोचित सिद्धान्त का जो प्रतिपादन किया है उससे ससार में एक अद्भुत चमत्कार उपस्थित हुआ ॥३॥ ध्यानस्थितः स भगवानमृतांशुमौलिः श्रीचन्द्रमौलिगदितं निगमस्य भावम् । चाहिये ॥२॥ - । - । -- 1 नवमः सर्ग " -- पश्यन्ननुत्तमपदै. प्रथमाम्बभूव सद्य. समागतमहर्पिगणेषु तुष्ट. ||४|| 17 आपके लिखे हुए चन्द्र भाष्य को ध्यानावस्थित भगवान् शङ्कर ।ने उत्तम समझकर उसका समर्थन सप्तर्षि मण्डल के अन्दर जाकर किया ऐसा प्रतीत होता है ॥४॥ भावाभिराममनसा जगदम्बिकाया.'- पादाभिवन्दनपरो यमिनामधीशः।- यानुत्तमानधिजगे तदनुग्रहेण भावान्कयन्तदपरः किलतान्समेयात् ॥५॥ अपने मनमें भगवती जगदम्बिका के चरणों का स्मरण करके जिन उत्तम भावा का आफ्ने प्राप्त किया उनको सामान्य पुरुष किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ।।५।। वागीश्वरी भगवती हृदये निविष्टा श्रीचन्द्रमौलिमिपत स्वयमेव वेदम् । गूढार्थमञ्जुलपदं विवरीतुकामा सान्निध्यमाप पदवाक्यभिदाभिरस्य ॥६॥ आपके हृदय में बैठकर भगवती शारदा ने वेदों का उत्तम भाष्य लिखने के लिये,स्वप प्रयत्न किया ऐसा इसको अनुपम शैली देखने से अवगत होता है।॥६॥ देवानयं मुनिवर शिरसा समन्ता- नानम्य तं गणपतिं सशिवं सविष्णुम् ।। सूक्तकमेण पुरत परमेष्ठिदृष्टं ऋग्वेदमेव निजभाष्यपथे चकार || आपने भाष्य, लिखने के समय समस्त दव गणों को हृदय से प्रणाम कर सूक्त क्रम से सर्व प्रथम ब्रह्मदेव दृष्ट ऋग्वेद को ही अपने हाथ में लिया ॥७॥ मूर्त्यष्टक भगवतो निगमप्रदिष्टं शम्भोरय मुनिवरो विवरीतुकामः । , +- १२८ जगद्गुरुवीयन्द्रदिग्विजये वैश्वानरीयगुणवर्णनमात्रनिष्ठा-PTET मन्त्राननुक्रमवशेन पुरो ददर्श ॥ of वेद में भगवान् शङ्कर को अष्टमूर्ति कहां है पृथ्वी आदि पांच तत्व तथा यजमानादि अन्य तीन इन आठों को शङ्कर का रूप समझ कर आपने सर्व प्रथम आग्नेय सूक्तों पर भाष्य लिखना आरम्भ किया ॥ ८ ॥ आमेयमूक्तगणममिगुणोपपन्न ।। IITTLE व्याख्याय पूर्वमयमत्र ऋचा समूहे. सूक्तकमात्तदनु बारणमन्त्रपूर्ण माना । तत्राचिनोद्भगवतो वेपुपि.द्वितीयम् ||६|| , “अनि गुण वर्णन परके ऋग्वेद गतं समस्त आग्नेय सूक्तों पर भाष्य लिखकर आपने शङ्कर के द्वितीय जल तत्व का गुण वर्णन करने के लिये सूक्त क्रम से वारण सूक्तों पर भाष्य लिखा ॥ ९, मा. तं विस्तरेण शिवभावंगतेन तस्मिता न्वेदे विविच्य मुनिराडयमादरेणार सावित्रमन्त्रचयमप्यपरंपरस्तानमा दभ्याजगाम मनसा निगमस्थितेन ||१|| वारुण सूतों का भाष्य समाप्त कर उसके अनन्तर आपने ऋग्वेद गत सौर मुक्तों पर भाष्य लिखा जिनमें सौर मण्डल का विवरण विद्यमान हैरगा व्याख्याय सौरमथ मन्त्रचयं मनस्वी वायव्यसूक्तगतमन्त्रंशतानि तत्र । तादृग्विधरनुभवैर्विमवैश्च तैस्तै- in 2. रात्मस्थितैरनुपदं विशदीचकारं ॥११|| ... सौर मुक्ताफा भाष्य लिखने के अनन्तर आपने ऋग्वेद गत आने वायव्य सक्तों का संग्रह फरफे उन पर भाष्य लिखा जिनमें वायु नल का वैज्ञानिक विव- रण है ॥ ११ .. 1 १२९ -- - " . नमः मग Tवायव्यासूक्तविवृतेः परतः क्रमेण श्रीचन्द्रएप भगवान्निगमागमज्ञः । मन्त्रेयु पार्थिवगुणोपगतेषु भाष्यं चक्रे विधिक्रमवशेन पुरोगतेन ॥१२॥ वायव्य मूतों पर विवरण लिखने के अनन्तर आपने पार्थिव तत्वक वर्णन करने चाले मन्त्रों का वर्गीकरण किया, जिसमें पृथिवी तत्व का विशद वर्णन है ।।१२।। एवं क्रमेण विवृतात्मतनोः शिवस्य । मूर्त्यष्टकानुगतया विवृति विधार्य । ऋग्वेदमएडलगतानि समाप्य हर्पा- त्सूक्तानुवाकगहनानि तुतोप धीरः ॥१३॥ आग्नेय, वारण, सौर, वायव्य, पार्थिव सूक्तों का भाष्य लिखकर आपने इनके अतिरिक्त आकाश, चन्द्र, जीव वर्णन परक गूक्तों का विवरण करते हुये अष्टमूर्ति शङ्कर का वाड्मय समर्थन किया ॥१३॥ ऋग्वेदमित्त्यमवगाह्य यथाक्रमण देवस्तुतौ व्यवसितं यजुपां विभागम् । यज्ञोपयुक्तकरणैर्विवरीतुमस्मि- न्भाप्यं व्यधत्त मुनिदर्शितसत्पथेन ॥१॥ ऋग्वेद का इस प्रकार अरगाहन करके आपने टैच-स्तुति में प्रयुक्त यजुर्वेद का यज्ञ समर्थनपरक चन्द्रभाष्य लिखा, जिसमें सनातन मार्ग का पूरा-२ अनु- गमन ह ॥१४॥ यज्ञो यजुभिरिति यनिजगाद यास्क- स्तत्सत्यमेव यदयं तदनुक्रमेण । मन्त्रानुपस्थितफलान्निजकल्पनाभि- रायोजिताभिरकरोद्यजनं समृद्धम् ॥१५॥ "यनीयजुर्भि" इस मन्त्र का अनुसन्धान करफे यास्कानुमोदित यन्नमारण - 1 -- ॥ जगद्गरुश्रीचन्द्रदिग्विजये का अलग २ विवरण लिखते हुये आपने प्रत्यक्षा में फल देने वाले यज्ञपरक मन्त्रों को सत्य सिद्ध कर दिया ॥१५॥ स्तुत्यर्थका मुनिवर. किल ये यथाच- दृग्वेदमण्डलपथे मनवो विभक्ताः। तानर्थवादविधिभेदवशेन सर्वा- । नाध्वर्यवे सफलतामयमानिनाय ॥१६॥ ऋग्वेद में केवल द्रव्यों का गुण वर्णन मात्र है उन द्रव्यों का उपयोग यज्ञ म हाता है । मिना यज्ञों के ऋग्वेद की सफलता नहा होती, इसलिये ऋग्वेद को सफल बनान के लिये ही आपने यजुर्वेद का भाष्य लिखा ॥१६॥ नानाविधाध्वरवितानविवेचनाभि- । नानाभिदाभिरुपयुक्तसमर्थनाभिः । हौत्रादिकर्मविनियुक्तमनुप्रसङ्गा- 'दाध्वर्यवं क्रममपूरयदेप, दैवम् ॥१॥ कामनाओं के अनेक विष हान के कारण वाजपेय, राजसूय, अश्वमेय आदि अनेक यज्ञ किये जाते हैं उनमें हौत्र आदि अनेक विभाग हाते हैं जिनका निरूपण आंत सूत्रों में विद्यमान है उनको अलग २ दिखाने के लिये आपने इस वेद में अद्भुत भाष्य लिखा ॥१७॥ काण्डत्रयात्मकभिदां निगमेषु पश्य- । कर्मात्मक निगमकाण्डमसी मनस्वी। द्वाभ्यां निरूप्य निगमक्रमतो द्वितीयं काएडं तृतीयनिगमेन दिदेश दिव्यम् ॥१८॥ पेट त्रिकाण्ड है, उसम ऋग्वेद और यजुवद कर्म प्रशान है इसलिये'कर्म परक दो वेदों का माध्य लिखकर आपने उपासना परक साम वेद का भाष्य लोक में उपस्थित किया ॥१०॥ मामेति यं मुनिवरा. प्रादन्ति वेदं , व्यासादय. स्वरभिदाभिरनन्तभेदम् । 1 1 T ॥ 1 - ॥ THI - म ॥ . ॥ - नरम सर्ग १३१ 7 तस्मिन्नयं मुनिवरो मुनिमार्गजुष्टं भाष्यं समारभत यत्प्रथितं जगत्याम् ॥१६॥ 'प्राचीन व्यासादि मुनियों ने जिसको साम के नाम से व्यवहृत किया, उस वेद का मुख्य भाग आरण्यक है, जिसमे धैवत निपाद आदि स्वरों का आरोह तया अवरोह निर्दिष्ट है उसका पूरा २ विवेचन आपने इस साम वेद के भाष्य में किया ॥१९॥ अत्रापि पड्जऋषभादिविभेदभिन्न मन्त्रक्रमं ततमभिन्नतया प्रतीतम् । श्रीचन्द एव भगवान्भरतोक्तमार्ग- माश्रित्य तत्क्रमवशेन पृथक् चकार ॥२०॥ साम वेद में मायः समस्त स्वरों का वर्गीकरण मिलता है, परन्तु उसमें स्वरानुक्रम से मन्त्रानुक्रम नहीं है आपने इस अपने भाष्य मे स्वरानुक्रम से मन्त्रानु- क्रम अलगअलग करके भरतमुनि प्रतिपादित पद्धति को जनता म उपस्थित किया।२०1 विश्वावसुप्रभतिभिर्गतिभेदविज्ञ- र्गान्धर्ववेदपथमाश्रितवद्भिरादौ । यः सामगानविपयो दिवि रनितोऽभू- तं योगतः समवलोक्य भुवं निनाय ॥२१॥ विवावसु तुम्पुर आदि देव गायकों ने सृष्टि के आरम्भ में निम गान्धर्व वेदको अनेरु गतियों के साथ देवलोक में सुरक्षित रूप में रक्खा था, आपने उसको साम- वेद के साथ इस भूमि पर उतारकर जनता का पढ़ा उपकार किया ॥२१॥ नादानुनादनदनैर्दिविपत्पुरोगै- नन्दीश्वरादिगणमध्यगतैर्महद्धिः। तौर्यत्रिण विधिनानुमतः स वेदः श्रीचन्द्रमेनमधिगत्य बभूव सार्थः ॥२२॥ तत, आनद, सुपिर, धन, यह चार नाम शब्द को गति विधि को देखकर कल्पित किये गये हैं नाद, अनुनाद नदन, इन तीन नन्दि मोक्त भेदों से उनका - " १३० - जगद्गश्रीचन्द्रदिग्विजय समन्वय करके देव गायकों ने ग्राम कल्पित किये, जो पड्ज ग्राम, मध्यम ग्राम, और गान्धार ग्राम नाम से प्रसिद्ध है, इनको पूर्णरूप से दवगण ही निकाल सकते हैं, मनुष्य नहीं, इन सबके एकीकरण से जा तार्यत्रिक होता है , उसका अनुगमन करना अति कठिन है, नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने इन वातों का चित्रण किया है, जिसकी झलक आपके चन्द्रभाष्य में चमकती है ॥२२॥ वीणानिनादरसिको भुवनप्रसिद्ध. श्रीनारदो मुनिवरो महतीमुपेत्त्य । । । यं सामवेदगदितैर्विविधैरुपाय- रादिष्टवान्क्रममसौ,मुवि तं वितेने ॥२३॥ देवर्षि नारद महती नामफ अपनी वीणा को हाथ में लेकर जिन स्वरों का , अनुनाद करते थे उनका नारद पद्धति के अनुसार जनता में उपस्थित करके आपने भूलाक में स्वर्लोक का दृश्य उपस्थित किया है ॥२३॥ व्याख्याय सामविधिमेवमसौ मुनीन्द्र काएडं द्वितीयमपि वेदविधौ समाप्य ।। विज्ञानकाएडविपयं विवरीतुकाम- स्तुर्य विवेश निगम भगवन्निदेशात् ॥२४॥ इस अद्भुत क्रम से सामवेद द्वारा वेद का दूसरा उपासना काण्ड विस्तृत करके आपने अथर्व वेद का भाष्य लिखना आरम्भ किया जिसम सामान्य रूप में ज्ञान तथा विशेष रूप में विनान वर्णित है ॥२४॥ अस्मिन्विचित्रतरमागिरसे विभागे भाव विलोक्य भुवनत्रयसंविभक्तम् । "TM मन्त्रक्रम प्रकरणक्रमयोजनेन । भिन्नकम प्रतिनिधाय चकार भाष्यम् ॥२५॥ वेद में इस चतुर्य वेद का नाम अथर्वागिरो वर है, इसम फुछ मन्त्र अथर्व हए और कुछ मन्त्र अङ्गिरोदृष्ध है | अंगिराष्ट्र मन्त्र भाग केवल स्त्रियों के उप- योग में आने याग्य है, अर्थ दृष्ट मन्त्र भाग में अन्य अनेक व्यावहारिक विषय , नो आपने अपने भाष्य में विस्तत रूप से निवाए हैं ॥२५॥ *7 2 .- । T - ।

१३३ नवमा सर्ग :: मि. सूक्तानि भिन्नविपयाणि विलोक्य तत्र : SET वेदे लघूनि पुरतः परतों महान्ति । सूत्रानुमोदितसमस्तमनुप्रसङ्गा- FRHIVITIES देकत्र सम्यगयमर्थवशाचकारः॥२६॥ इस चतुर्थ वेद में प्रायः सब-विषय-आपस में मिले हुए हैं। आपने उनको विपय क्रम से अलग.२ करके मन्त्रों को जो विभाजन किया है. वह कौशिक सूत्र के अनुसार है। रिह ""वर्णव्यवस्थितिपराणि पुरस्तदने ... ' HTTEE,गोदेववन्धुविपयाणि तदन्तभागे। सूक्तानि सम्यगनुगृह्य यथाक्रमेण ।। भाष्यप्रसङ्गमयमात्मपरः प्रपेदे ॥श्वर सर्व प्रथम आपने इस वेद में वर्ण क्रम से क्रमशः ब्राह्मण सूक्त, क्षत्रिय सूक्त, और वैश्य सूक्तों पर भाष्य लिखा, उसके अनन्तर गोमुक्त,शोदना सूक्त, पर विवेचन करते हुये अन्त में देव विषयक सूक्तों का यथाक्रम: विवरण लिखा है ॥२७॥ माये येऽभिचारविपया मनुभिः प्रदिष्टा-:, स्ते तेऽमुना मुनिवरेणपृथग्विभक्ताः। 7 !! .. प्रत्यक्षमस्यं निगमस्य महत्त्वमत्र 1773 ... सन्तेनिरे जयपराजयभावगर्भाः ॥२८॥'. इस घेदमें जो मन्त्र अभिचार परक है उनको एकत्र कर आपने जयपराजय भाव को लक्ष्य में रखकर अलौकिक प्रयोगों का जो अनुक्रम उपस्थित किया है वह ध्यान से देखने योग्य है ॥२८॥ सेनानिवेशविषयं पृथगप्रमेय- विद्या विधायं विधिना तदनुवजेन । ..: प्राचीनयुद्धकरणप्रत्रयं जनेषु: विज्ञानविक्रमवलं प्रथयाम्बभूव ।।२६]]. FT.. 6 N . - १३२ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये समन्वय करके देव गायकों ने ग्राम कल्पित किये। जो पड्ज नाम, मध्यम ग्राम, और गान्धार ग्राम नाम से, प्रसिद्ध है। इनको पूर्णरूप से देवगण ही निकाल सकते हैं, मनुष्य नहीं, इन सबके एकीकरण से जो तौर्यत्रिक होता है. उसका अनुगमन करना अति कठिन है, नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने इन बातों का चित्रण किया है, जिसकी झलक आपके चन्द्रभाष्य में चमकती है ॥२२॥ वीणानिनादरसिको भुवनप्रसिद्धः श्रीनारदो मुनिवरो महतीमुपेत्य । AT यं सामवेदगदितेर्विविधैरुपाय- रादिष्टवान्क्रममसौ भुवि तं वितेने ॥२३॥ देवर्षि नारद महती नामक अपनी वीणा को हाय में लेकर जिन स्वरों का , अनुनाद करते थे उनको नारद पद्धति के अनुसार जनता में उपस्थित करके आपने भूलोक में स्वर्लोक का दृश्य उपस्थित किया है ॥२३॥ 131, व्याख्याय सामविधिमेवमसौ मुनीन्द्रः काएडं द्वितीयमपि वेदविधी समाप्य 143 विज्ञानकाएडविपर्य विवरीतुकाम- स्तुर्य विवेश निगमं भगवन्निदेशात् ॥२४॥ इस अद्भुत क्रम से सामवेद द्वारा वेद का दूसरा उपासना काण्ड विस्तृत करके आपने अपर्व वेद का भाष्य लिखना आरम्भ किया जिसमें सामान्य रूप में .सान तथा विशेष रूप में विज्ञान वर्णित है ॥२४॥ 11 अस्मिन्विचित्रतरमाङ्गिरसे विभागे भावं विलोक्य भुवनत्रयमविभक्तम् ,, ENT मन्वक्रम प्रकरणक्रमयोजनेन भिन्नक्रमं प्रतिविधाय चकार भाप्यम् ॥२५॥ वेद में एम.चतुर्य पैट का नाम अपर्वाङ्गिरो वेट है, इसमें कुछ मन्त्र अथर्व इष्ट और फुद्र मन्त्र अहिरोप हैं। अशिगंदृष्ट मन्त्र भाग केवल स्त्रियों के उप- -योग में आने योग्य है, अर्थ दृष्ट मन्त्र भाग में अन्य अनेक व्यावहारिक विषय ", जो आपने अपने भाग्य में विस्तृत रूप से टिग्याप ॥२५|| fb : - J Tri नवमा सर्ग । T 7 आपने उनको -- - गा । M सूक्तानि भिन्नविपयाणि विलोक्य तत्र }F वेदे लघूनि पुरत. परतो महान्ति ।' सूत्रानुमोदितममस्तमनुप्रसङ्गा- T- देकत्र सम्यगयमर्थवांचकार ॥२६॥ इस चतुर्थ वेद में प्राय सब विषय आपस म मिले- हुए है, विपय क्रम से अलग २ करके मन्त्रों को जो विभाजन किया है वह कौशिक सूत्र के अनुसार है ॥२६॥ वर्णव्यवस्थितिपराणि पुरस्तदने 1! ,गोदेववन्धुविपयाणि तदन्तभागे।। सूक्तानि सम्यगनुगृह्य यथाक्रमेण भाष्यप्रसङ्गमयमात्मपरः प्रपेदे ॥२७॥ , सर्व प्रथम आपने इस घेद में वर्णे क्रम से क्रमशः ग्रामण सूक्त, सत्रिय सूक्त, और वैश्य मुक्तों पर भाप्य लिखा, उसके अनन्तर गो मूक्त, शौदना मूक्त, पर विवेचन करते हुये अन्त म देव विषयक सूक्तों का यथाक्रम विवरण लिखा है ॥२७॥ । ये येऽभिचारविपया मनुभि. प्रदिष्टा- स्ते तेऽमुना मुनिवरेणपृथग्विभक्ताः । - 17 प्रत्यक्षमस्य निगमस्य महत्त्वमत्र 'सन्तेनिरे जयपराजयभावगर्भाः ॥२८॥ इस वेदमें जो मन्त्र अभिचार परक है उनका एक्नपर आपने जयपराजय भाव को लक्ष्य में रखकर अलौकिक प्रयोगों का जो अनुक्रम उपस्थित किया है वह ध्यान से देखने योय है ॥२८॥ सेनानिवेशविपयं पृथगप्रमेय- विद्या विधायं विधिना तदनुजेन । प्राचीनयुद्धकरणप्रचयं जनेषु विज्ञानविक्रमवलं प्रययाम्बभूव ।।२६ } } ल । - । ।

T 7 जगद्रुश्रीचन्द्रदिग्विजये समन्वय करके देव गायकों ने ग्राम कल्पित किये, जो पड्ज ग्राम, मध्यम ग्राम, और गान्धार ग्राम नाम से प्रसिद्ध हैं, इनको पूर्णरूप से देवगण ही निकाल सकते है, मनुष्य नहीं, इन सबके एकीकरण से जो तौर्यत्रिक होता उसका अनुगमन करना अति कठिन है, नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने इन बातों का चित्रण किया है, जिसकी झलक आपके चन्द्रभाध्य में चमकती है ॥२२॥ वीणानिनादरसिको भुवनप्रसिद्धः श्रीनारदो मुनिवरो महतीमुपेत्य । यं सामवेदगदितैर्विविधैरुपाय- रादिष्टवान्क्रममसौ,भुवि तं वितेने ॥२३॥ देवर्षि नारद महती नामक अपनी, वीणा को हाथ में लेकर जिन स्वरों का अनुनाद करते थे उनको नारद पद्धति के अनुसार जनता में उपस्थित करके आपने भूलोक में स्वर्लोक का दृश्य उपस्थित किया है ॥२३॥ 1 । व्याख्याय सामविधिमेवमसौ मुनीन्द्रः काएडं द्वितीयमपि वेदविधौ समाप्य । विज्ञानकाएडविषयं विवरीतुकाम- स्तुर्य विवेश निगमं भगवन्निदेशात् ॥२४॥ इस अद्भुत प्रम से सामवेद द्वारा वेद का दूसरा उपासना काण्ड विस्तृत करके आपने अथर्व वेद का भाष्य लिखना आरम्भ किया जिसमे सामान्य रूप में ज्ञान तथा विशेष रूप में विज्ञान वर्णित है ॥२४॥ अस्मिन्विचित्रतरमाङ्गिरसे विभागे भावं विलोक्य भुवनत्रयमविभक्तम् गा मन्त्रक्रम प्रकरणामयोजनेन भिन्नकम प्रतिविधाय चकार भाष्यम् ॥२५॥ वेद में इस चतुर्य वेद का नाम अयर्वाझिरो पेट है, इसमें कुछ मन्त्र अथर्व और कुर मन्त्र अङ्गिरोदृष्ट हैं 1 अगिराष्ट्र मन्त्र भाग केवल त्रियों के उप- योग में आने योग्य है, अर्य हष्ट मन्त्र भाग में अन्य अनेक व्यावहारिक विषय 3, नो आपने अपने भाष्य में विस्तृत रूप से दिग्पाए है ॥२५॥ १ T ग " TA दृष्ट से 461 -- नवेमा सर्ग: सूक्तानि भिन्नविपयाणि विलोक्य तत्र 1:F वेदें लघूनि पुरतः परतो महान्ति ।' सूत्रानुमोदितसमंस्तमनुप्रसङ्गा- HTTET देकत्र सम्यगयमर्थवशाचकार ॥२६॥ इस चतुर्थ वेद में प्रायः सब-विषय आपस में मिले हुए हैं। आपने उनको विपय अलग.२. करके मन्त्रों को जो विभाजन किया है. वह कौशिक सूत्र के अनुसार है रिक्ष वर्णव्यवस्थितिपराणि पुरस्तदने, INER गोदेववन्धुविषयाणि-तदन्तभागे IA, In ! सूक्तानि सम्यगनुगृह्य यथाक्रमण भाप्यप्रसङ्गमयमात्मपरः प्रपेदे ॥२७ मार सर्व प्रथम आपने इस पद में वर्ण क्रम से क्रमशः पालण सूक्त, क्षत्रिय सूक्त, और वैश्य सूक्तों पर भाष्य लिखा, उसके अनन्तर गोमूत, शतौदना सूक्त,पर विवेचन करते हुये अन्त में देव विषयक सूक्तो का यथाक्रम विवरण लिखा है ॥२७॥ ये येऽभिचारविपया मनुभिः प्रदिष्टा-:, स्त तेऽमुना मुनिवरेणपृथग्विभक्ताः कर 'प्रत्यक्षमस्य निगमस्य महत्त्वमत्र - "सन्तेनिरे जयपराजयभावगर्भाः ॥२८॥ इस वेदमें जो मन्त्र अभिचार परक हैं उनको एकत्र कर आपने जयपराजय भाव को लक्ष्य में रखकर अलौकिक प्रयोगों का जो अनुक्रम उपस्थित किया है वह . अमाल से देखने योग्य है। सेनानिवेशविषयं पृथगप्रमेय-- विद्या विधायं विधिना तदनुबजेन । प्राचीनयुद्धकरणप्रचयं जनेषु: : विज्ञानविक्रमवलं.प्रथयाश्वभूव ।।२६]] r.

१३४ है - - जगद्गुरुनीचन्द्रदिग्विजवे अथर्व वेद में युद्ध का प्रसङ्ग अधिक मिलता है उसके साथ सेना का सङ्गठन करना भी वेद वतलाता है। उसमें आपने जो. धनुर्वेद का पुरातन चित्र खींचा है उससे भारती युद्ध कौशल का पूरा-पूरा परिचय मिल जाता ॥२९॥ आमेयपाशुपतवारुणवासवीय- पार्जन्यवैष्णवसुपर्णमहोरगानि । THE नानाविधास्त्रकरणानि मनुप्रदिष्टा- न्याविश्चकार निगमत्र मुनिर्महेच्छः ॥३०॥ आपने इस चन्द्र भाष्य में आग्नेयास्त्र पाशुपतास्त्र, वारुणास्त्र, ऐन्द्रास, पर्ने- न्यास, वैष्णवाल, गारुडास्त्र, नागाख, आदि अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग लिख- कर आथर्वण मन्त्रों का जो महत्व जनता में उपस्थित किया है वह अन्य भाष्यों में नहीं मिलता है ॥३०॥ कृत्याप्रयोगविषय विविधप्रयोगे- रस्मिन्विविच्य निगमे परलोकवृत्तम् । Friश्रीचन्द्रएपभगवानखिलार्थदृश्वा.:: : 1350 विश्वाभिरामचरितो विशदीचकार ॥३१॥ अथर्व घेद में बहुत से मुक्त ऐसे भी है, जिनमें कृत्या का विस्तृत विवरण है, कृत्या का सम्बन्ध मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्वापन आदि के साय रहता है, इसके अतिरिक्त उसमें कई सहस मन्त्र केवल परलोक रहस्य: प्रतिपातक भी हैं, जिनसे, मृतक श्राद्ध सिद्ध होता है, उन सब मन्त्रों को अलग २ करके आपने जो उन पर सुन्दर विवेचन लिखा है वह विद्वानों के लिये मननीय है ॥३१॥ : सम्मोहनानि विविधानि मदोद्धताना- 'मुचाटनानि सवशीकरणानि तत्रं ।। वेदे महाहवविमर्दमसौविलोक्य हस्तेगतां परमसिद्धिमयं समापतः ॥३शा इस वेद में मदाद्धत मनुष्यों का सम्माइन, शत्रुओं का वशीकरण, तथा अन्य अनेक युद विषयों का वर्गीकरण देखकर आपने जो यवनराज्य उच्छिन्न करने का अनुभव प्राप्त किया 'बई अनिर्वचनीय है ।।३२|| -- - T 17 --- स । नवमः सर्गः' आथर्वणेः परसमुत्कदनप्रयोगै-*: योगैरपि द्विपदगम्यसमृद्धलोकेः । श्रीचन्दएप यवनोत्कदनैकबुद्धिः सर्व दिपडलमनुन्नतमेव मेने ॥३३॥ इस वेद में आपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के अनेक उपाय तया सामान्य मनुष्यों पर प्रभाव जमाने वाले अनेक योगविद्या के चमत्कार देखकर, यवन साम्राज्य नष्ट करने का जो आयोजन हृदय में सोचा था उसका परिचय गाड़ी जाकर मिलेगा ॥३३॥ नानाविधौषधसमुद्धरणे नियुक्ता- न्मन्त्रानवेक्ष्य निगमे परतस्तदर्थान् । लोकोपकारमनसा सदुपायसाध्यं । सर्वं क्रमेण मुनिरेप वभार योगम् ॥३४॥ इस वेद में अनेक अलौकिक रासायनिक प्रयोग भी विद्यमान है, जिनसे जनता का बड़ा उपकार होता है आपने उन सबको मन्त्रों द्वारा एकत्र कर उनका प्रयोग करना भी मन्त्रों से ही निकाल लिया ॥३॥ अत्यादरेण चरमाश्रममन्त्रभागं भूयो विविच्य मुनिमार्गनिवोधकानि । तत्वानि तत्र निगमे बहुधाऽवलोक्य सिद्धान्तमन्तिममिमं विषयेत्र मेने ॥३५॥ अपने जीवन के अन्त भाग में मनुष्य को रिस मबार अपना समय ,वन में मुनि पृत्ति से व्यतीत करना चाहिये (?) इस विषय में मुनि मार्ग निरोधक अनेक मन्त्र देखकर आपने अपना ही सिद्धान्त सर्वोत्तम माना है ॥३५॥ वैधात्रवंशविभवः सनकादिसिद्धे- रस्मिन्भवे यदुदितं मतमादरेण । तनिर्विकल्पमिति वेदविलोमनेन लोकोत्तरो मुनिरयं मनसाऽत्वमस्त ॥३६॥ न - ITE F + । नवमः सर्गः आनन्त्यमस्य निगमस्य विवेकबुध्या वित्वा विदामधिपतिर्मुनिरेप तस्य । साङ्गत्यमध्यवसितुं परतो ददर्श सूत्राणि मन्त्रविनियोगपराणि हर्षात् ॥४॥ "अनन्ता वै वेदाः" इस प्रमाण से वेदों का अन्त नहीं है ऐसा समझ कर आपने इस विषय में अधिक न लिखकर उसकी सगति लगाने वाले अन्य वैदिक अन्यों पर भाष्य लिखना आरम्भ किया ॥४॥ कात्यायनेन मुनिना यजुपां समृध्ये यत्सूत्रमत्र भुवने गदितं तदेतत् । कर्माभिवृद्धिकरणं हृदये विचार्य तस्मिन्नयं मुनिवरो विवृति चकार ॥४१॥ मुनिवर कात्यायन प्रणीत श्रोत्रमूत्र यजुर्वेद की सङ्गति लगाने में सर्वोत्तम साधन है । इसके बिना यज्ञ परम्परा का परिचय प्राप्त नहीं होता है, ऐसा समझ कर आपने इस पर भाष्य लिखा ॥४१॥ सूत्रे व्यवस्थितिमिताः किल ये विभागा गृह्यादिनामभिरुपस्थितवेदभागाः। तानेप सर्वनिगमोचितभावगर्भा- नुद्रावयन्निजमतेन ततान वेदम् ॥४२॥ सूत्रों के विवरण प्रसङ्ग में धर्मसूत्र, गृधसून, श्रौतसून इन तीनों प्रकार के सूत्रों का ग्रहण अनिवार्य ठहरता है। कात्यायन, आपस्तम्ब, पारस्कर, आषला- यन, आदि मुनियों ने. ययाकाम, नीनों मूतों का प्रणयन किया है, इनके सहयोग के बिना मन्त्रों का विनियोग तया उद्देश्य नहीं जाना जा सकता है। इस कारण इन तीनों प्रकार के सूत्रों पर आपने भाष्य लिखते हुये वेट पुरुष को विस्तृत किया ॥४२॥ गोत्रानुवृत्तिपरमत्र यदुक्तमाप- स्तम्बेन वेदमुनिना बहुभेदभिन्नम् । 1 -- जगद्गुरुमीचन्द्रदिजिये सन-सनक-सनन्दन-सनातन सनत्कुमार आदि सात विधावा के मानस पुत्रों ने निस उदासीन मार्ग का वैदिक मन्त्रों से निरूपण किया है सही मार्ग निर्विकल्प है यही आपने अपना अन्तिम निर्णय निश्चित किया.॥३६॥ एवं समस्त, निगमागमपारदशी मन्त्रषु भाष्यमधिकृत्यंतदर्धभागे । गद्यात्मके शतपयादिपदोपलभ्ये. ; REP T: भाष्यं व्यधत्त मुनिमण्डलहृत्प्रतिष्ठम् ॥३१TRIT इस प्रकार वेदमर्मज्ञ मनस्वी भगवान् श्री चन्द्र जी ने मन्त्र भाग पर अपना भाष्य लिखकर वेद के उत्तरार्द्ध स्वरूप शतपयादि ग्रन्थों पर भी मुनिमत सम्मत भाष्य लिखना आरम्भ किया ||३||p कीनना ध्यानप्रकल्पितमनोरमभावगर्भनलिन व्याख्यानमंत्रनिगदे कथादिसर्गः। संग पूर्वमहर्पिभिरुदाहृतमित्ययं द्रा- :: गस्याभव«दि महामहिमो विचारः ॥३८॥ TE आदि सृष्टि में जब कोई भी साधन विद्यमान नहीं या उस समय किस प्रकार वेदों के तत्वों का अन्वेषण हुआ यह प्रश्न वेदो को गम्भीरता देखकर आपके हृदय में अनायास ही उठा ॥३॥ अन्योन्यभागपरतामवलम्ब्य लोकोम "वेदं व्यवस्थितमवेक्ष्य विचारध्याना नानोपवेदगदितार्थमयं मनस्वी TETH FT. 'वेदानुरूपमिव तेषु विवेद तुष्ट ॥३९॥ Firror गय पय विभेद से आदि सर्ग में एक ही चेद अवस्थित या उसमें मुनियों ने भाग कल्पना करके दो विभाग बनाये जोआन मन्त्र ब्राह्मण रूप में अवस्थित हैं उसी में उपवेद तथा अङ्ग उपाङ्ग भी कल्पित हुए जो आज अलग २ दीखते हैं इन सबको समझकर अन्त में फिर एक हीविदे रह जाता है यही इस विषय में आपका मत है।॥३९॥ Mitrin, 1 नवमः सर्गः १३७ - आनन्त्यमस्य निगमस्य विवेकबुध्या । वित्वा विदामधिपतिर्मुनिरेप तस्य । साङ्गत्यमध्यवसितुं परतो ददर्श सूत्राणि मन्त्रविनियोगपराणि हर्षात् ॥४॥ "अनन्ता वै वेदाः" इस प्रमाण से वेदों का अन्त नहीं है ऐसा समझ कर आपने इस विषय में अधिक न लिखकर उसकी सङ्गति लगाने वाले अन्य वैदिक अन्यों पर भाष्य लिखना आरम्भ किया ॥४०॥ कात्यायनेन मुनिना यजुपां समृध्यै यत्सूत्रमत्र भुवने गदितं तदेतत् । । कर्माभिवृद्धिकरणं हृदये विचार्य तस्मिन्नय मुनिवरो विवृति चकार ॥१॥ मुनिवर कात्यायन प्रणीत औनमूत्र यजुर्वद की सङ्गति लगाने में सर्वोत्तम साधन है । इसके बिना यज्ञ परम्परा का परिचय प्राप्त नहीं होता है, ऐसा समझ फर आपने इस पर भाष्य लिखा ॥४१॥ सूत्र व्यवस्थितिमिताः किल ये विभागा गृह्यादिनामभिरुपस्थितवेदभागाः। तानेष सर्वनिगमोचितभावगर्भा- नुदावयन्निजमतेन ततान वेदम् ॥४२॥ सूत्रों के विवरण प्रसङ्ग में धर्मसून, गृह्यसून, प्रीतमून इन तीनों प्रकार के सूत्रों का ग्रहण अनिवार्य ठहरता है। फात्यायन, आपस्तम्ब, पारस्कर, आवला. यन आदि मुनियों ने यथाक्रम तीनों सूनों का मणयन किया है, इनके सहयोग के पिना मन्त्रों का विनियोग तया उद्देश्य नहीं जाना जा सकता है। इस कारण इन तीनों प्रकार के सूनों पर आपने भाष्प लिखते हुये वेढ पुरुष को विस्तृत किया || ४२॥ गोत्रानुवृत्तिपरमत्र यदुक्तमाप- स्तम्वेन वेदमुनिना बहुभेदभिन्नम् ।

* १ ए जगदमनीचन्द्रदिग्विजये तन्निर्विकल्पमतिरेप जगसमृद्धये सूत्रं निजोचितपथेन ततान तुप्टः ॥४३॥ गोत्र मवर विवेचन प्रसङ्ग में आपस्तम्ब ने अनेक भेद मानकर जो विवाहादि वैदिक कृत्यों में विधि निषेध रूप से अपना मतामत अभिव्यक्त किया है, आपने उसको जगद के फैल्याण के लिये पर्याप्त समझकर उस पर अधिक विवेचन नहीं किया । ४३ ॥ पारस्करप्रभृतिभिर्निगमागमज्ञै- रन्यैर्महर्षिभिरुदारविचारनिष्ठः । यद्दर्शितं निगमवर्त्म तदेव सोऽयं त्रोकत्रयाभ्युदयकारणमन्वमस्त ||४|| निगम और आगर्म इन दोनों में प्रवीण पारस्कर आदि आचायों ने जो वैदिक मार्ग जनता के समक्ष उपस्थित किया है, वही ससार के अभ्युदय का असाधारण कारण है। ऐसा समझ कर आपने उस पर भी अधिक विवेचन नहीं किया ॥४४॥ वन्द्याश्वलायनकृतां निगमप्रतिष्ठा- मेतत्कृतेषु मुनिरेप रसादिलोक्य ।। ग्रन्थेषु धर्मपरिखावदुपस्थितेषु। धर्म जगत्त्रयसमुत्थितयेऽनुमेने ॥१५॥ आपलायन मोतीर, गृह्य, धर्म-सूत्रों को धर्म-रक्षक परिखारूप' देखकर आपन सनातनधर्म का जो अलौफिक अभ्युदय अपने हृदय में प्रतिष्ठित किया था, वही आजकल हिन्द-जनता में माण-स्वरूप माना जाता है ॥४५॥ 'पूर्व परापरविदो ऋपयो यथाव- द्धर्म यमागमगतं पुपुषुः प्रसन्नाः । सोयं सनातनपदेन जनैः प्रदिप्टो । .. It gibi.. धर्मों विभर्ति भुवनं मुनिरेवमाहः॥४६॥ 1 - । - - . N ८ नवम सर्ग "धर्मो विश्वस्य जगत प्रतिष्ठा" ऐसा समझ कर जिन हमारे पूर्वजाऋषियों ने धर्म-रक्षा में अपने प्राण तक देने के लिये आना-कानी नहीं की, वही सनातन- धर्म आज समस्त विश्व को धारण कर रहा है। यह बात भगवान् श्रीचन्द्र भपने प्रिय शिष्यों के प्रति अन्तिम सर्ग में कहेंगे ॥ ४६॥ धर्मव्यवस्थितिपराणि विविच्य सूत्रा- एयेवं यथायथमयं तदुपान्तगेषु । ग्रन्थेषु योगमनसोपनिपत्पदेषु TR दिव्यामनुत्तमपदामतनोत्स्ववृत्तिम् ॥१७॥ धर्म व्यवस्थापक सूत्रों पर अपना विवरण लिखकर आपने ईशादि-उपनिषदों पर भी उत्तम भाष्य लिखा, जिसका उद्धरण हमने कई स्थानों,पर विद्वानों के मुख से सुना ॥४७॥ चन्द्राभिधामुपनिषदिवृति विधाय श्रीचन्द्रएप मुनिमण्डलमएडनश्रीः । छन्दोगवेदमुनिदर्शितदिव्यमार्गे निष्ठां दधो निगमदर्शितरम्यमार्गः ॥४॥ समस्त उपनिपदों पर चन्द्र-भाष्य लिखकर आपने जो माचीन वैटिक मुनि मदर्शिव मोक्ष मार्ग का महत्व दिखाया है, वह व्यवहारों में प्रवृत्त मनुष्यों के लिये समझना कठिन है ॥४८॥ धर्मार्थकामपरतां भुवने निविष्टां प्रत्यक्षमेप मुनिराडवलोक्य मुक्तो। --- चेतो निवेशयितुमादरतो जनानां वृत्ति बबन्ध मुनिदर्शितयोगमागें ॥४॥ ससार में मायः मनुष्यों की प्रवृत्ति धर्म, अर्थ, काम इन तीन विपयों में तो अधिकतर रहती है, मोस-मार्ग में पहुत कम मनुष्य जाते है । इसलिये मोठ-मार्ग को सरल करने के लिये आपका यह समस्त प्रयत्न मगवतिखा से मारन में हुभा ॥१९॥ ब + - ॥ अगदमश्रीचन्द्रदिग्विजये तनिर्विकल्पमतिरेप जगत्समृद्धचै - सूत्रं निजोचितपथेन ततान तुष्टः ॥४३॥ गोन भवर विवेचन प्रसङ्ग में आपस्तम्ब ने अनेक भेद मानकर जो विवाहादि वैदिक करयों में विधि निषेध रूप से अपना मतामत अभिव्यक्त किया है, आपने उसको जगत् के कल्याण के लिये पर्याप्त समझकर उस पर अधिक विवेचन नहीं किया ।। ४३ ॥ पारस्करप्रभृतिभिर्निगमागमज्ञै- रन्यमहर्षिभिरुदारविचारनिष्ठः यद्दर्शितं निगमवर्त्म तदेव सोऽयं त्रोकत्रयाभ्युदयकारणमन्वमस्त ॥१४॥ निगम और आगम इन दोनों में प्रवीण पारस्कर आदि आचाया ने जो वैदिक मार्ग जनता के समक्ष उपस्थित किया है, वही ससार के अभ्युदय का असाधारण कारण है। ऐसा समझ कर आपने उस पर भी अधिक विवेचन नही किया ॥४४॥ वन्द्याश्वलायनकृतां निगमप्रतिष्ठा- मेतत्कृतेषु मुनिरेप रसादिलोक्य ।। ग्रन्थेषु धर्मपरिखावदुपस्थितेषु धर्म जगत्त्रयसमुत्थितयेऽनुमेने।।॥४५॥ अभिलायन मणीत श्रोत्र, राय, धर्म-सूत्रों को धर्म-रक्षक परिखारूप' देखकर आपन सनातनधर्म का भी अलौकिक अभ्युदय अपने हृदय में प्रतिष्ठित किया था, वही भाजल हिन्द जनता में प्राण स्वरूप माना जाता है ॥ ४५ ॥ पूर्व परापरविदो ऋषयो यथाव- द्धर्म यमागमगतं पुपुपुः प्रसन्ना.। सोयं सनातनपदेन जनैः प्रदिष्टो धर्मो विमति भुवनं मनिरेक्माह॥४६॥ T T - + - M . - नवमः सर्गः "धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा" ऐसा समझ कर जिन हमारे पूर्वजानापियों ने धर्म-रक्षा में अपने माण तक देने के लिये आना-कानी नहीं की, वही सनातन- धर्म आज समस्त विश्व को धारण कर रहा है। यह बात भगवान् श्रीचन्द्र अपने प्रिय शिष्यों के प्रति अन्तिम सर्ग में कहेंगे ॥ ४६॥ धर्मव्यवस्थितिपराणि-विविच्य सूत्रा- एयेवं यथायथमयं तदुपान्तगेपु । ग्रन्थेषु योगमनसोपनिषत्पदेषु दिव्यामनुत्तमपदामतनोत्स्ववृत्तिम् ॥४ धर्म व्यवस्थापक सूत्रों पर अपना विवरण लिखकर आपने ईशादि-उपनिषदों पर भी उत्तम भाष्य,लिखा, जिसका उदरण हमने कई स्थानों पर विद्वानों के मुख से सुना ॥४७॥ चन्द्राभिधामुपनिपद्विवृति विधाय श्रीचन्दएष मुनिमएडलमएडनश्रीः छन्दोगवेदमुनिदर्शितदिव्यमार्गे निष्ठां दधौ निगमदर्शितरम्यमार्गः ॥४॥ समस्त उपनिपटों पर नन्द्र-भाष्य लिखकर आपने जो प्राचीन वैदिक मुनि पदर्शिव मोक्ष मार्ग का महत्व दिखाया है, वह व्यवहारों में प्रवृत्त, मनुष्यों के लिये समझना कठिन है।॥४८॥ धर्मार्थकामपरतां भुवने निविष्टां प्रत्यक्षमेप मुनिराडवलोक्य मुक्तौ ।। चेतो निवेशयितुमादरतो जनानां वृत्ति ववन्ध मुनिदर्शितयोगमार्गे संसार में मापः मनुष्यों को प्रवृत्ति धर्म, अर्थ, काम इन तीन विषयों में हो अधिकतर रहती है, मोक्ष-मार्ग में पहुत कम मनुष्य जाते हैं। इसलिये मोल मार्ग को सरल करने के लिये आपका या समस्त मयत्न भगवदिशा से भारत में इमा ॥ १९॥ T १४० - । 1 जगदुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये प्रापय्य तामुपनिपद्विवृति समाप्ति योगीश्वरैरधिकृतानि जगद्धिताय । न्यायादिदर्शनपदेन भुवि स्थितानि मोदेन सद्विवरणेरयमन्वयुंक्त ॥५०॥ भाष्य निर्माण प्रसङ्ग में उपनिपदों के अनन्तर आपने न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य इन चार दर्शनों पर विवेचन करना मारम्भ किया ॥ ५० ॥ योगानुरक्तमनसा मुनिरेप सद्यः । पातञ्जले मुनिजनोचितसूत्रभागे। योगव्यवस्थितिपरां विवृति विधाय मार्ग मनिप्रणिहितं रभसात्पुपोप ॥५१॥ पूर्वोक्त चार दर्शनों के विवेचन होने पर आपने पातञ्जल योग-दर्शन पर अपना भाष्य लिखा, जिसमें पढे २ मुनि मत का मण्डन मिलता है ।। ५१ ॥ वेदान्तदर्शनविनिर्मितमानसेन व्यासेन यन्निगदितें करुणामयेन । सर्व तदेष मनिराडधिगत्य तत्वं सत्यं पुपोप भुवि तत्वमसीति भावम् ॥५२॥ योग दर्शन पर विवरण लिखने के अनन्तर आपने व्यास प्रणीत वेदान्त सूत्र पर भाष्य लिखा, जिसमें "तत्वमसि" आदि महावाक्यों का पदे २ समर्थन मिल रहा है।॥५२॥ ब्रह्माहमस्मि यदिदं किल तत्प्रसूतं ब्रह्मैव तत्सकलमित्यधिगत्य सद्यः। प्रज्ञानरूपमचलं भुवनप्रतिष्ठ- मानन्दमाप भगवानयमात्मनिष्ठः ॥५३॥ . में ब्रह्म है और ब्रह्म से उद्भत यह सारा प्रपञ्च भी ब्रह्म ही है, ऐसा समझ कर इस अवसर में आपने जो ब्रह्मानन्द प्राप्त किया, उसका प्रभाव आपके भवि- भ्य जीवन पर बहुत पड़ा ।। ५३॥ म F- नवमा मर्गः १४१ F } 1 - .. ।। श्रीचन्द्रनिर्मितसमस्तनिवन्धनाना- मस्मिन्निवेद्य करणं भरणं बुधानाम् । मोदेन वेदमनिपद्धतिमप्रमेया- मस्मिन्न्यधत्त नवकाव्यकलासुधांशुः ॥५॥ भगवान् श्रीचन्द्र जी के द्वारा निर्मित समस्त भाष्यों का परिचय देते हुये हमने इस सर्ग में जो अपना हद्गत-भाव अभिव्यक्त किया है, वह मुनि-मण्डल के लिये सर्वदा स्मरण रखने योग्य है ॥ ५४॥ भावाभिराममनसा तदिदं यथाव- ये चन्द्रभाष्यममलं भुवि तत्वदृष्ट्या । द्रक्ष्यन्ति ते निगमतत्वविदः प्रपन्ना- मात्यन्तिकीं मुदमनन्तफलां महेच्छाः ।।५।। सात्विक दृष्टि से जो महानुभाव ससार में चन्द्रभाष्य का अवगाहन करेंगे, वे अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव करते हुये अपने जीवन को सफल करेंगे।।५५।। काश्मीरदेशमहिता जगदम्बिकापि यद्वाप्यमुत्तमतमं परिवीक्ष सद्यः । तुष्टा बभूव तदिदं भुवि केन भाष्यं भाप्यान्तरेण तुलनामुपयातु विज्ञाः ! ॥५६॥ काश्मीर देशस्थित भगवती शारदा भी जिस भाष्य को देखकर अनिर्वचनीय आनन्द को माप्त हुई, वह चन्द्रभाष्य अन्य किस भाष्य से उपमित हो सकता है।॥५६॥ सर्व तदीश्वरकृपावशतोऽवलोक्य नानादिगन्तरगतेन मया विनोदात् । विश्वोपकारमनसा विषये तदीये किचिन्निवेदितमिदं जगतां हिताय ॥५॥ जगदीश्वर की असीम कृपा से समस्त भारत में कई बार भ्रमण करने का भषसर मिलने पर हमने यह चन्द्रभाष्य खय की स्थानों में देखा है, जिसका १४० । । जगद्गुरभीषन्द्रदिग्विजये यहां पर प्रसङ्गवश इतना उल्लेख कियागया है। अवसर मिलने पर उसका प्रकाशन समयान्तर में हो सकेगा। ५७ ॥ वृत्तं तदेतदधुना सकलं यथाव- "च्छीचन्द्रमौलिविषयेऽवसिति प्रणीय । ।। सौन्तरस्थितधिया भगवनिदेशा- त्सर्गः समाप्यत अयं नवमोन्नवद्यः ॥५८॥ अन्य सम्पादन का मसङ्ग इससर्ग में जितना इमने उपस्थित ा किया है, उतना पर्याप्त समझ कर अब-इम -उसका समाप्त करते हुये भगवदाज्ञा से अगले सर्गों का उपक्रम करने के लिये इस नवम सर्ग को यही समाप्त करते हैं-॥५८।। । इतिश्री सनाढ्ययशोगय कवियर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते सतिलके जगद्गुरुश्रीचाद्रदिग्विजये महाकाव्ये चन्द्रमाध्यमम्पादन नाम नवम सर्ग AL r - । . - ---- श्री १००८ स्वामी (श्री साधुवेला तीर्थ सस्थापक) पूज्यपाद बनखगडीजी सिद्धेश्वर उदासीन श्री १०८ स्वामी हरिनारायणदासजी उदासीन श्री साध्वेला तीर्थ, सक्खर (सिन्धु ). LI h- SHRI 1009 SWAMI BANK HANDIJI MAHARAJ UDASIN SHRI 108 SWAMI HARNARAINDASJI UDASIN SRI SADHBELLA TIRATH SUKKUR (SIND) .0441 AMMONEsmonal . 104maram.00000000000000000000mmerc00000 - दशमः सर्गः , -- अथ धीरोदात्तगुणः श्रीचन्द्रोऽयं विधाय वेदानाम् ।। भाष्यं भारतभूमेः प्रदक्षिणाये निजं मनश्च ॥१॥ वेद भाष्य सम्पादन के अनन्तर धीरोदान गुण भगवान् श्रीचन्द्र जी ने भारत की परिक्रमा करने का अपने मन में सङ्कल्प किया ॥१॥. तीर्थानां पर्यटनं पूर्वजदेवर्षिपुण्यभूनमनम् । भारतदशानिरीक्षण- मुद्दिश्यायं तथामनश्चक्रे ॥२॥ तीर्यों का पर्यटन प्राचीन मुनि-स्थानों को निरीक्षण और भारत की वर्तमान परिस्थिति का अनुभव इन तीन उद्देश्यों को लक्ष्य में रख कर यह । सङ्कल्प किया गया:॥ २ ॥ प्रास्थानिकं पुरस्ता- त्कर्तुं सर्वे यथोचितं तस्य। स्वस्त्ययनं त्रिदिवेशा- स्तेनुः संकल्पसिद्धयो हर्षम् ॥३॥ साइल्पिक सिद्धि वाले देवगणों ने आपकी यह इच्छा देखकर प्रस्थान के समय में करने योग्य सस्त्पपन करते हुये हर्ष प्रकट किया ॥३॥ देवाङ्गना दिविस्थाः • सिद्धाः सर्वे विमानसजाराः गन्धर्वाअपि दिव्यः पुष्पैश्चक्रुः समन्ततो वर्षम् ॥४॥ प m -- + - जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये खर्ग में रहने वाली देवाङ्गनाओं ने तया आकाश-चारी सिद्धों और विमान गामी गन्यवों ने आपके प्रस्थान के समय नन्दन वन के पुष्पों की सप ओर से वर्षा की ॥४॥ माङ्गलिकीमस्य पुरः कर्तुं सिद्धिं पवित्रभावस्य । शाकुनिकैरपिसर्वे- रस्याकस्मादकारि माङ्गल्यम् ॥५॥ भूलोक में हाने वाले शकुनों ने भी आपका मास्थानिक मङ्गल करने के लिये आपके प्रस्थान के समय कार्य-सिद्धि सूचक समस्त माल एकत्र करने का प्रा २ आयोजन किया ॥५॥ दुर्वाकुरदधिचन्दन- हस्ता वध्व. प्रसन्नभावेन । पुरतोऽस्य दिव्यमूर्ते. प्रस्थानेस्मिन्नुपस्थिताः सद्यः ॥६॥ आपके प्रस्थान के समय प्रसन्न चित्त नयाधु-जनों ने हायों में किर, दधि, चन्दन, अक्षत और पुष्प-मालायें लेकर समक्ष में आना आरम्भ किया ॥६॥ नूपुरमधुरध्वनिभि- मांग काश्चित्समन्ततो व्याप्य । क्रोडीकृतघटघटिता मङ्गलमस्य प्रदर्शयाञ्चकुः ॥७॥ नूपुरों की मधुर-ध्वनि से मार्ग को रमणीय बनाती हुई कुलाङ्गनायें गोद में भरा हुआ घड़ा लेकर आपके समक्ष में उपस्थित हुई ॥७॥ काश्वित्परिचितपुण्याः पएयर्माल्यैः पदे पदे सिद्धिम् । कांक्षन्तोस्य पुरस्ता- मार्ग माङ्गल्यदर्शना. मापु.॥८॥ - T- + T -- दशम सग आपके कार्य की सफलता चाहने वाली कुछ खिर्या हायों में पायमाल्य लेकर जाने के समय आपका दर्शन प्राप्त करने के लिये मार्ग में उपस्थिति हुई ॥८॥ आशीर्षचोभिरन्या वृद्धाः सिद्धार्थमुष्टिभिर्मार्गम् । जय-जीवेति वदन्त्यः सत्यो दूरादवाकिरन्नस्य ॥६॥ जाने के समय कुछ बृद्ध मावायें जय, जीव आदि शब्दों द्वारा आशीर्वाद देती हुई नीराजन के मिप से गौर सर्पप उतार २ फर आपके ऊपर वरसाने लगी॥९॥ लाजाञ्जलिप्रवः- TTI. रन्याः कन्याः कुमारिकाश्चैनम् । वातायनप्रविष्टाः पार्श्वे यान्तं समाकिरन्देवम् ॥१०॥ बोटी २ कन्या और अविवाहित कुमारियां झरोखों से आपको देखकर पास से गुजरते हुयें आपके ऊपर अञ्जलियों में भर २ कर खोलें परसाने लगी ॥१०॥ हैयनवीनपिएडेः सहोपयातानयं मुनि!पान् । दर्शदर्शमनन्ता- नन्दाम्भोधौ ममज वात्सल्यात् ॥१२॥ हायों में ताना नवनीत लेकर मार्ग के सहारे खड़े हुये आभार जाति के शूद्र गणों को देखकर आपके मन में जो आनन्द हुआ, उसका वर्णन किन शब्दों से फिया जा सकता है ॥ ११ ॥ माङ्गल्यमन्त्रपाठ- प्रसक्तबालद्विजातिसन्दशैः ".s, सर्वोप्यमङ्गलानां ब्रजो 'विनाश ययावसन्तुष्टः ॥१गो 7 T" - 6 7 T 1 A जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये ...अथर्व-बेटीय स्वस्ति-वाचन तथा शान्ति पाठ के मन्त्रों का उच्चारण करते दुये ब्रामण कुमारों को समक्ष में देखकर अमङ्गलों का समस्त वृन्द नाराज होकर चला गया ॥ १२ ॥ दुष्टग्रहोपशान्त्यै प्रयुक्तशान्तिमपञ्चसम्भाराः।- आथर्षणप्रयोगाः मर्वेप्यस्मै तदाशिष वब्रुः ॥१३॥ -- दुष्ट ग्रहों के उपशमन के लिये अनेक प्रकार की शान्ति करने वाल मृत्त आयवंण प्रयोग प्रस्यान-काल म स्वय उपस्थित होकर आपके लिय, आशीर्वाद देने लगे ।। १३ ॥ of in frif गम्भीरमेघघोप--- प्रवृत्तवाद्ये नवाम्बुभिः पूर्णे। सिद्धार्थएष, सिद्धः-- सहान्यसिद्धैरतिष्ठदव्यग्रः ॥१:४॥ । । गम्भीर-मयावनि निनादित, नवजल धारा वर्षण मञ्जुल, ,उत्तम समय को पाकर आपका समस्त सहयोगी परिकर चलने के लिये सन्नद्ध होगया ॥ १४ ॥ निधिमेवमाप्य प्रशान्तवाधं प्रसन्नदिवातम् । T मौहूर्तिकानुमोदं समेत्य तस्मादयं ययौ हृष्टः ॥१५॥ समस्त वाधा रहित मसन, दिशाओं का वार २ अवलोकन करके ज्योतिर्विदों- फे बताये हुये शुभ मुहूर्त में आपने काश्मीर से गमन आरम्भ किया,॥ १५॥ 751 प्रागेप तं प्रपेदे महेन्द्रगुप्तं नगेन्द्रमौदीच्यम् ।। यम्मिन्महेन्द्रसूनो- र्यशांसि सर्मदेन गीयन्ते ॥ १६ 1 - TE ।

दराम मग " -- ग - काश्मीर से चलकर सर्व प्रथम आपने उत्तर भाग में अवस्थित इन्द्र रक्षित इन्द्रकील पर्वत पर नाकर विश्राम किया, जहा पर अर्जुन की महिमा का सब ओर वर्णन हो रहा या 'द्वैपायनोपदेशात् कुवेरदूतोपदिष्टसन्मार्गम् यं प्राप्य दिव्यशैलं तपांसि तेपे पुरार्जुनः प्रौढः ॥ १७॥ मुनिवर व्यासदेव के आदेश से समक्ष में उपस्थित गुपक निस भूपर का मार्ग देखकर पूर्व समय में अर्जुन को तपश्चर्या करने के लिये लायाया, यह वही प्रशस्त भूधर है ॥ १७॥ । - यस्यैकदेशमाप्य स्थितं 'तमोजालमंशुभिर्दीप्तः ।, शक्नोति नैव हतु महसभानुः कयैव काऽन्येषाम् ॥ १॥' जिस भूधर के एक देश में छिपे हुए अन्धकार को सास किरण भगवान् सूर्य भी अपने प्रखर प्रकाश से हटाने के लिये समर्थ नहीं हो सता है॥१८॥ गजचर्मणावनद्रं- कटौ सुधांशुप्रशस्तमूर्धानम् । अनुयाति यो महेश हिमांशुकूटैरवस्तमः पुजः ॥ १६ ॥ करि प्रदेश में गन चर्म लपेटे हुये तथा शिरोभाग में चन्द्रकला को पारण किये हुये भगवान् शङ्कर को भी नो पर्वत अपने भयोभाग में अन्धकार को तथा भपने शिर पर चन्द्र मण्डल को रखता हुआ परावरी में रखने का इरादा रखता है।॥ १९ ॥ यस्योन्नतेषु मानु- ववस्थितासु प्रशस्तसरसीषु । - - - - १९४८ । -- । .जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये । कुमुदानिःशम्भुशीर्ष- स्थितो हिमांशुर्विवोधयत्यल्पः ॥ २० ॥ जिसके गगन चुम्बो शिखरों पर विकसित कुमुद मण्डल को महादेव के शिर पर हरने वाला चन्द्रमा भी ऊपर की ओर जाने वाले किरणों से विकसित करता है।॥ २०॥ यस्मिन्निकुञ्जमाला ज्वलंच्छिखाग्रास्तथा महीपर्धयः । धीरा लसत्समीरा न नन्दनस्याहरन्ति किं शोभाम् ॥२१॥ जिस भूधर के ऊपर विद्यमान सुन्दर २ लता मण्डप तया रात्रि में चमकने वाले ओषधि वर्ग और धीरे, २ बहने वाले मन्द सुगन्ध शीतल पवन-नन्दन धन की शोभा को भी लज्जित करते हैं ॥२१॥ यस्योपरि स्थितानां महामुनीनां धनाधिपो नित्यम् । सन्दर्शनाय वेगा- द्विमानमार्गेण याति गहनायम् ॥२२॥ जिसके ऊपर रहने वाले मुनियों को देखने के लिये विमान पर बैठ कर आता हुआ कुचेर आकाश गामी सिद्धों के दृष्टि मार्ग में प्रति-दिन भ्रम उत्पन्न फरता॥२२॥ यस्मिन्महामहिम्नः' 1. सितांशुगोरो हरस्य संवाहः । वप्राभिघातमञ्ज. शशाङ्कशवां तनोति सिद्धानाम् ॥२३॥ जिसके एफ देश में चन्द्र धवल शङ्कर का नन्दीश्वर वमाभिघात से क्रीम करता हुआ सिदों के मन में प्रति-दिन चन्द्रोदयाको शङ्का उत्पन्न करता है ॥२३॥ - m 'दशम सर्ग. १४९ . यो मेघमएडलानां निजोच्चकूटेषु धारयन्भारम् । मार्ग सहस्रभानो- निरोद्धमाभाति नूतनो विन्ध्यः॥२४॥ अपने उन्नत कूटों पर मेघ मण्डल को धारण करता हुआ जो भूधर सूर्य के मार्ग को रोकने के लिये दूसरा विन्ध्य जैसा प्रतीत होता है ॥ २४ ॥ कूटः सहस्रसंख्यैः पदैश्च तावद्विरायतैयोंदिः । नेत्रीकृतार्कसोमो विभाति धातव सर्जनाऽऽसक्तः ॥२५॥ एक सहस्र उन्नत कूट और एक सहस्र गण्ड शैल वाला जो भूधर सूर्य और चन्द्रमा को दोनों ओर अपना नेत्र बनाकर नवीन सृष्टि रचने वाला दूसरा विधाता जैसा प्रतीत होता है ॥ २५ ॥ यस्मिन्वनैकगेहा- जलप्रपातेषु देहमुत्सृज्य । स्वर्गस्थिताप्सरोभि. समं विहाँ भवन्ति मनद्धाः ॥२६॥ जिसके ऊपर रहने वाले सिद्धगण जल प्रपातों में अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग नाओं के साथ विहार करने के लिये हर समय उघत रहते है ॥२६॥ यो गौरनीलभाभि. समं विभक्तं जलं वहन्तीभिः। नानानदीभिरारा- द्विभाति नव्यः प्रयाग उद्भूत ॥२७॥ गौर तथा नील प्रभा वाले अनेक मणियों की ममा से भिन्न २ जल वाली अनेक नदिया उगाता हुआ जो भूधर दूसरा प्रयाग जैसा मतीत होता है ॥२७॥ - ६ १५० . + .. orn जगदलीयन्द्रदिग्विजये पूर्वापरौ ममुद्रौ निजावमानेन दर्शयन्नन्ते योतिर्विमाति मातुं विधे. प्रमद्य प्रतिष्ठितो हस्तः ॥२८॥ दोनों ओर के समुद्रों को अपनी सीमा पर रखता हुआ जा भूधर पृथिवी की नाप तौल करने के लिये विधाता का हाय जैसा जान पड़ता है ॥२८॥ यो देवसुन्दरीणा- मकालभूपासमर्थनायैव। धत्ते दिनार्द्धभागे कदापि मिन्दुरसुन्दरं मेघम् ॥२६॥ देवाङ्गनाओं को असमय में अलकृत करने के लिये जो भूधर कभी २ दिन के मध्य भाग में भी सिन्दारण मेघ मण्डल को अपने ऊपर दिखाने लगता है ।। २९॥ भारं भुवो विभर्तुः समर्थमालोक्य यं महासारम् । शैलाधिपत्यभावे नियोजयामास पङ्कजोद्भूतः ॥३० निस में समस्त पृथिवी भार के धारण करने योग्य वल को देखकर ब्रह्मा ने अपनी ओर से समस्त पर्वतों का राजा "मान कर पृथिवी पर घसाया है॥३०॥ यो मानसीं पितृणां- कुलाभिवृद्धय कुलकमायाताम् ।। मेनां मुनीशमान्या- मुवाह कन्यां यशस्विनीमदिः ॥३१॥ अपने वश की वृद्धि के लिये जिसने पितरों के मन से उत्पन्न मुनि जन मान्य मेनका नामक कन्या से अपना परिणय स्वीकार किया ॥ ३१॥ - +- - . . देरामः सर्गः। यस्यात्मजः समुद्रे निलीनगात्रः प्रकल्पयाञ्चके। वायोः सुतस्य किञ्चि- निवासमिच्छावशेन देवानाम् ॥३२॥ समुद्र में छिपा हुआ मैनाक नामक जिसका पुत्र देवगणों की प्रेरणा से लङ्का को जाते हुये मारुत नन्दन के लिये विश्राम स्थान बना था ॥ ३२ ॥ यो गन्धमादनाख्यं कुवेरशैलोपकएठगं रागात् । F कीडोपयुक्तदेश विभर्ति कूटं समस्तसिद्धोनाम् ॥३३॥ कैलास की अधित्यका में विद्यमान गन्धमादन पर्वत को जिसने-सिद्धों का कोडा-स्थल मानकर अपने एक देश में उसका भी निवास स्वीकार किया है ॥३३॥ नानौपधिप्रकाशै- निशातमित्रं निवारयन्नुग्रम् यो रात्रिदीपयोगं गतार्थमेव प्रकल्पयत्यदिः ॥३॥ अनेक विधः दिव्योपथियों के प्रकाश से अन्धकार को हटा कर जिसने रात्रि- में दीपक जलाने का कार्य सर्वदा के लिये बन्द कर दिया ॥ ३४ ॥ यस्योन्नतात्प्रसूति समेत्य कूटादनन्तविस्तारा ।। . - IT गडा महर्पिदेश विभूषयत्यद्य,सेविता सिद्धैः ॥३५॥--, "निसके उचतम छूट से मस्ट होकर अनन्त विस्तार वाली 'मानः"म्मरणीयाः रिसरक्षिणी भगवती भागीरयी आज भी ब्रह्मर्षि देश को अलकृत कर रही है ॥३५- IF . . म - । है 17 १५२ T जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजय यत्पादसम्प्रसूता कलिन्दकन्या जगद्गुरुं कृष्णम् । वृन्दावने यथाव- दिलोकयामास गोपवेपस्थम् ॥३६॥ निसके एक गण्ड शैल से उत्पन्न कलिन्दगिरि नन्दिनी वृन्दावन म विहार करने वाले श्रीकृष्ण को गोपवेश में प्रत्यक्ष में देख चुकी ॥ ३६॥ । यस्योन्नतप्रदेशे जनिं समेता विमूर्छितं सद्यः । सञ्जीवनी लतका चकार सौमित्रिमातिभिः शून्यम् ॥३७॥ निसके एक देश में विद्यमान सञ्जीवनी-लता, युद्ध में मूछित लक्ष्मण को प्राणदान देकर सर्वदा के लिये कृतकृत्य होगई ॥ ३७॥ विद्याधरापदेश- IFT. र्व्यवस्थितानामनन्तदेवानाम् । योद्यापि कश्चिदंश विभर्ति गन्धर्वगीतसत्कीर्तिः ॥३८॥' विद्याधरों के रूप में निवास करने वाले देवगणों को अपने एक देश में रख कर जो भूधर आज भी देवालय होने का दावा विना किये नहीं रहता है ।॥३८॥ कूर्माचलेति नाम्ना भुवि प्रतिष्ठं प्रसिद्धसत्खातम् । यो मन्दराद्रिमादो | नियोजयामास मन्थने वाढ़ेंः ॥३||PTET निसने कर्माचल के नाम से प्रसिद्ध पष्ठिखात एक पर्वत की समुद्र-मन्यन के समय अपनी आर से प्रस्तुत करके उसको मन्दराचल के रूप में परिणत कर दिया ॥ ३९॥ - - दशमः सर्गः यस्मादनुप्रसूता सरित्प्रशस्ता महानदी सरयूः । साकेतभूप्रदेश विभूपयन्ती समुद्रमभ्येति ॥४०॥ जिसके एक गण्ड शैल से निकली हुई महानदी सरयू आज भी साकेत भूमि को अलंकृत करती हुई समुद्र की ओर जा रही है ॥ ४०॥ धात्रा पुरादिसृष्टी मनुष्यमात्रव्यवस्थितिमन्हम् । यं वीक्ष्य मानवानां प्रसूतिरारात्प्रकल्पिता सद्यः ॥४१॥ आदि सृष्टि में ब्रह्माजी ने जिसमें मानवोचित समस्त आयोजन देखकर इसी पर मनुष्यों का सर्जन आरम्भ किया ॥४१॥ उत्तानगोमासूति- प्रदत्तगोग्रासकल्पनो योऽदिः । अद्यापि कामधेनु- प्रवृत्तसन्तानमादराद्धत्ते ॥१२॥ उत्तान रूप में चरने वाली सौर गौओं-को-प्रतिदिन गो-ग्रास के रूप में तण देने वाला जो भूधर आज भी कामधेनु वश का आदर करना मनुष्यों को सिखा रहा है।॥४२॥ पञ्चापि देववृक्षान विभर्ति हर्पण कल्पवृक्षादीन् । यः सर्वदा विनिद्रः समस्तदेवर्पिमानवैः स्तुत्यः ॥४॥ देवगण प्रशंसनीय जो भूधर मन्दार आदि पांच देव तरूमों को सर्वदा अपने ऊपर रख कर आज भी अपने को कल्पवृक्ष याला मानता है ।। ४३ ॥

१५४ जगद्गुरुत्रीचन्द्रदिग्विजय चिन्तामणिप्रभावात् सुवर्णभावं प्रयाति वेगेन। यस्मिन्नयोविकारः ममस्तरत्नानुमोदितः सोयम् ॥ ४४ ॥ चिन्तामणि के प्रभाव से जिसमें मुवर्ण वनकर लाहा भी अपने लोहभाव को छोड़ देता है, उस भूधर की तुलना अन्य किस भूधर से की जा सकती है ॥४४|| सौगन्धिकानि हर्तु मुबर्णवर्णानि पङ्कजान्युग्रः । भीमो यदेकशृङ्गं प्रियाप्रसादाय मर्दयामास ॥ ४५ ।। द्रौपदी को प्रसन्न करने के लिये सुवर्ण वर्ण कमलों की खोज करने के लिए घर से चला हुआ भीमसेन भी जिसके एक शृङ्ग को पाकर सफल मनोरथ हुआ॥४५|| यस्यान्तरङ्गभूमी विवर्तमानं मनोरमाऽभोगम् । अच्छोदमस्ति रम्यं सरः समीचीनपङ्कजाकीर्णम् ॥ ४६॥ जिसके मध्य भाग में सुन्दर विस्तार वाला सुवर्ण कमलों से सुशोभित अच्छोद नायक सरोवर सिद्ध साश्य गन्धर्व किन्नर आदि अनेक देवताओं का आज भी क्रीडास्थल बना हुआ है ॥ ४६॥ योगपदग्धदेहा मती भवानी पुनः शिवं प्राप्तुम् । येनोपदिष्टमार्गा तपस्यमन्दं निजं मनश्चक्रे ॥४७॥ योगामि में अपने शरीर को भस्म करके सती पार्वती द्वितीयवार शंकर की पास करने के लिये निराकी आज्ञा प्राप्त कर घोर तपश्चर्या में प्रवृत्त हुई ॥ ४७ ।। .

दशमः सर्गः
यस्यामरमसूते-
रुपान्तभागे कुवेरदेवस्य.।
दिव्यालकाभिधाना
विशोभतेद्यापि राजधानी सा ॥ ४८ ॥
देवगणों को जन्म देने वाले जिस भूपर के एक शिखर पर अलका नाम की
कुवेर को राजधानी आज भी चमर रही है ॥ ४८ ॥
यन्मध्यभागभूमो
महोचकूटः सुमेरुनामाद्रिः ।
सूर्योदयं विधत्ते
जगत्प्रकाशाय सर्वदा सज्जः ॥ ४६॥
जिसके ठीक म य भाग में विद्यमान अत्यन्त उन्नत सुमेर पर्वत जगत को
प्रकाश देने के लिये प्रति दिन भगरान् सूर्य का उदय करता है ॥ ४९ ॥
नीलाश्मभूमिभागे
यदीयगर्भे नवांकुरास्वादम् ।
कर्तुं गता स्थावा
दिनस्य दैर्ध्य प्रकल्पयन्तिम्म ॥ ५० ॥
नील मणियों से अलकृत जिस भूघर के शिखर पर हरी हरी घास चरने के
लिए रुके हुए मूर्य भगवान् के घोड़े-उत्तरायण में दिन की वृद्धि के कारण
बन जाते है ॥५०॥
यः मलोकमाक्षी
महोन्ततत्वात्ममुद्रमाविश्य ।
पातालमप्यगम्य
विभर्ति रम्यरधोभवत्कूटः॥ ५१ ॥
उन्नत होने के कारण समस्त लोक का साक्षी जो भूमर अगंमाग में अपने
नीचे शिखरों से पाताल को भी धारण करने की शक्ति रखता है ॥५१॥

१५६
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
तस्यास्य दिव्यधाम्नो
हिमालयस्य प्रशान्तभूभागम् ।
सम्प्राप्य हृष्टचित्तो
बभूव सद्यो गतश्रमः शान्तः ॥ ५२ ॥
पूर्वोक्त प्रकार से यहां तक जिस हिमालय पर्वत का वर्णन किया जा चुका
है-उस हिमालय के एम सुन्दर प्रदेश को प्राप्त कर-भगवान् श्रीचन्द्र बहुत
प्रसन्न हुए। ५२॥
श्रीचन्द्रमौलिमाप्त
निशम्य सर्वे हिमालयावासाः।
नानाविधप्रमोदै-
रमन्दमानन्दमाधुर्देशे ॥ ५३॥
इस पर्वत प्रदेश में प्राप्त हुए श्रीचन्द्रजी को सुनकर हिमालय में तप करने
वाले समस्त मुनिगण अपने मन में अत्यन्त आनन्दित हुए ॥५३॥
शेलोप्ययं समन्ता-
त्प्रशस्तभूमिः समागतस्यास्य।
शीताम्बुभिः सपर्या
प्रकल्पयामास विद्रुमच्छायः॥ ५४ ॥
सब ओर से सुन्दर प्रदेशों वाला यह भूधर अपने घर पर आये हुये
भगवान् श्रीचन्द्र को देखकर सनातन सदाचार के अनुसार आपको शीतल जल
और शीतल वृक्ष-छाया देकर आपके स्वागत में प्रवृत्त हुआ॥ ५४ ॥
अस्योन्नतप्रदेशे
विरक्तवेशो निकुञ्जगेहेषु।
श्रीचन्द्रमौलिरेपः
प्रकल्पयामास कर्हिचिद्रासम् ।। ५५ ॥
इस भूघर के एक उन्नत प्रदेश में अकृत्रिम निकुञ्ज को देखकर भगवान्
भीचन्द्र का मन कुछ दिन यहां पर निवास करने के लिये इच्छुक हुआ ॥ ५५ ॥

दरामःमनः आधाय तत्र सद्यः समित्समिद्धं हुताशनं देवः। पद्मासनेन योगं निमीलिताक्षः प्रवर्धयामाम ।। ५६ ॥ मापने यहां पर समित्समिद्ध अग्नि का स्थापन फरफे पमासन में ध्यानावस्थित होकर अपनी योगशक्ति को बढ़ाना आरम्भ किया ॥ ५६ ॥ ध्यानस्थितं प्रशान्तं निविक्तवेशं विवर्जितदेपम् । श्रीचन्द्रमौलिमेनं विलोक्य सर्वे विलक्षितास्तस्थुः ।। ५७ ॥ ध्यानावस्थित मशान्त-उदासीन वेश विवनित द्वेप आपके स्वरूप को देख- कर इस प्रान्त में रहने वाले समस्त मुनिनन आश्चर्यान्वित हुए ।। ५७ ॥ एतावदन वृत्तं निवेदयित्वास्य योगिवर्यस्य । सगोप्ययं-निसर्गा- दनन्यवृत्तः समाप्यतेऽस्माभिः ॥ ५८ ।। भगवान् श्रीचन्द्रनी फा इतना वृतान्त इस मर्ग में लिखकर गणवृत्त में विषद या सर्ग यहीं पर समाप्त किया जाता है ॥ ५८॥ अस्मात्परं-प्रशस्तं यदम्य वृत्तं तदग्रिमे सर्गे। म विलोकनीयं निवेदयित्वेदमास्यतेऽस्माभिः ॥५॥ इससे अगादी पानी भरन वृत्तान्त इम मदा फाज्य में लिया गया। उमको देखने के लिये हमसे अग्रिम मर्ग देखने चाहिये । इतना ही निवंटन कर मरामास सर्ग से भलग होते हैं ।।५९॥ तिमी मनाशयशोदर पपियर भीमदग्लिानन्दरामप्रति मतिनो जगदम्भीपारिमिजये महारा हिमानपम्यान नाम दरामः मग एकादशः सर्गः अथ मुनिजन वन्द्यो योगिवर्यः समेत्य त्रिदशगणविहारस्थानमेकान्तरम्यम् । प्रतिपदमुदिताभियोगमार्गक्रियाभिः सकलमपि यथावत्साधयामास कृत्यम् ॥ १ ॥ हिमालय प्राप्ति के अनन्तर भगवान श्रीचन्द्र एकान्त देश में अपना आसन लगाकर उनरोत्तर वृद्धि देने वाले अपने कार्य में प्रवृत्त हुए ॥१॥ भुवि न किमपि साध्यं तादृशं लभ्यते य- न्मुनिजनविहिताभियोगमार्गक्रियाभिः । प्रतिदिनमुपयाति प्रक्रमान्नैव वृद्धि सुलभमसुलभंवा सर्वमेवैति सिद्धिम् ॥ २॥ संसार में ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो मुनिजनों द्वारा सिद्ध हुई योग क्रियाओं से सिद्ध न है। अर्थात् ससार के सभी कार्य सुलभ हो । अथवा दुर्लभ योगमार्ग से अनापास ही सिद्ध होजाते हैं ॥२॥ • कृतविविधविचारा योगिनो योगशक्त्या निजमनसि निविष्टं कार्यमल्पप्रयत्नैः । कृतमिव कलयन्ति प्रायशः सत्त्यमेत- स्कृतिषु समवलोक्यं व्यासदेवस्य सूनोः ॥ ३ ॥ योगीजन अपनी योग सिद्धि से मन में सोचे हुए बड़े से बड़े कार्य भी योड़े से प्रयत्न से कर लेते हैं यह वात व्यास मुनि के पुत्र श्री शुकदेवनी के कर्तव्यों से अनायास ही समझ में आ जाती है ॥ ३॥ निजवदनविसृष्टस्पष्टयोगोपदेशै- रमरपदनिविष्टं तक्षकामिप्रदग्धम् ।

एकादशः रागः १५९ नरपतिमिह लोके निर्भयं तन्वतां कि न किल समुपदिष्टं योगसिद्धर्महत्त्वम् ॥४॥ तक्षक के डसने से दग्ध हुए परीक्षित को अपने सदुपदेशों से सर्वदा के लिये अमर बनाकर शुकदेवजी ने अपनी योगसिद्धि का महत्त्व क्या जनता में उपस्थित नहीं किया ॥४॥ तृणनिचयनिवद्धे दीप्यमाने कुटीरे धृतजपबहुसिद्धिर्मानसो धातृसूनुः । न किमवदुपार्य योगसिध्या दिलीपं सुतसमुदयमिध्ये कामधेनोः सपर्याम् ॥५॥ तृण से बने हुए कुटीर में रहने वाले वशिष्ठ जी ने अपने पास आए हुए दिलीप के लिये योगदृष्टि से उसका प्राचीन नृत्तान्त देखकर क्या उसको पुत्र माप्ति का उपाय स्वरूप नन्दिनी का पूजन नहीं बताया ? ॥ ५ ॥ सकलभरतसेनासत्कृतिव्यस्तभावः । शरणनिहितवन्हिः श्रीसमिद्धो मुनीन्द्रः । यदकृत विधियोगातर्पणं योगसिध्या तदखिलमपि किन्न श्रीमताऽश्रावि वृत्तम् ॥६॥ अपने आश्रम में अभ्यागत रूप से आए हुए सेना सहित रामानुज भरत का यथोचितसत्कार करने वाले महर्षि भरद्वाज ने जो अपनी योगसिद्धि का परिचय दिया वह क्या आपने नहीं सुना ॥६॥ तिमिशतपरिवारैः सर्वतः सन्निरुद्धं प्रवलतरतरङ्गावद्धमुन्निद्रवेलम् । सकलमपि समुद्रं यत्पपी कुम्भजात- स्तदखिलमपि मन्ये साहसं योगसिद्धः ॥ ७॥ अनेक जल जन्तुओं से व्याप्त उत्तुड्ग तरङ्गमालालंकृत समुद्र को बात की यात में तीन अजलियों में भर कर पी जाना जिनका एक कौतूहल मात्र या उन कुम्भज अगम्न मुनि को क्या आपने अभी तक नहीं जाना ? ॥ ७ ॥ ful

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
यदिह विविधयत्नैः साध्यते कार्यजातं
जगति जनिमवाप्पैस्तन्मनः कल्पनेन ।
विदधति कृतकृत्या योगिनः सिद्धिमाप्ताः
प्रथितमिदमनल्पं दृश्यते दिव्यदृग्भिः॥८॥
जिस कार्य को साधारण पुरप अनेक प्रयत्नों द्वारा ससार में सिद्ध करते
है उसको योगीजन केवल अपने सकल्प-मार से सिद्ध करके जनता में उपस्थित
कर देते है यह वात ज्ञान दृष्टि वाले सज्जनों से प्रायः छिपी नही है ॥ ८॥
सकलभुवनभङ्गद्योतक कालकूटं
सपदि विबुधमुख्यैरर्पितं वामदेवः ।
यदपिवदतितुष्टस्तत्समस्तं महत्त्वं
प्रबलतरसमाधिस्पर्धियोगैकसिद्धेः ॥६॥
समस्त भुवनों का भग करने वाला कालकूट देवगणों द्वारा अर्पित किये
जाने पर वामदेव ने प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करके जो अपने कण्ठदेश का भूपण
बनाया, क्या यह योग का चमत्कार नहीं है ? ॥९॥
इति विविधविचारोगसिद्धिं प्रसिद्धां
मनसि बहु विविच्य प्रस्थितोयं मुनीन्द्रः ।
निज निवसितिकूटादस्य शैलस्य नीचैः
कृतमहितनिवासं पाप नेपालदेशम् ॥१०॥
इस प्रकार के अनेक विचारों से अपने मन में योगवल का महत्त्व निश्चित
कर, हिमालय के इस रम्य प्रदेश से श्रीचन्द्रजी ने नेपाल की और गमन
किया ॥१०॥
कृतविविधसपर्यस्तत्र नेपालभूपः
पदकमलममुष्य प्राप्यपुण्यैकलभ्यम् ।
निजविभवसमृद्धिं वर्धितां पूर्वभूपै-
मनसि सफलभोगां भाग्ययोगेन मेने ॥११॥

एकादशः सर्गाः आपके नैपाल पहुंचने पर उस के महाराजा ने पुण्यलभ्य आपके श्रीचरणों को प्राप्त कर पूर्व पुरुणे द्वारा उपार्जित राज्य-श्री को हर प्रकार से आपके सत्कार में लगाकर लक्ष्मी का सार्थक करना अपने कर्तव्य से बता दिया ॥११॥ अयमपि मुनिवर्यस्तत्र योगेकवेद्य भवविभवविभेदभ्राजि सद्धर्मतत्त्वम् । परिचरणपरेपु प्रायशः स्वोपदेशैः प्रतिदिनमुदितश्री पवन्द्यस्ततान ॥१२॥ इधर आपने भी कुछ दिन वहां पर धूनी लगा कर सेवकवर्ग में अपने उप- देर्शों द्वारा धर्म का तत्व विस्तृत कर योगिननोचित अपने कर्तव्य का पूर्णरूप से पालन किया ।। १२.॥ शिवचरितमलभ्यं भक्तिभावैकवेद्यं समधिगतविशिष्टज्ञाननिष्ठोऽयमत्र । नरपतिमुपयातं शिष्यतां भक्तिनिष्ठं मधुरतरविधानवोंधयामास सर्वम् ॥१३॥ यहां पर नैपाल नरेश की अधिक प्रार्थना करने पर आपने उनको उदासीन मार्ग की दीक्षा देकर शेवागम का समस्त रहस्य-राजा को बताया ॥ १३ ॥ अधिगतपरमार्थः शेवसिद्धान्ततत्त्वं निजहदि विनिवेश्य प्रत्नधात्रीमहेन्द्रः । यमतुलमुपलेभे सम्मदं तत्प्रदिष्टं कथमपि स न शक्यो वक्तुमत्र प्रयत्नैः ॥१४॥ आपसे शैवागम की अलभ्य दीक्षा लेकर इस देशकी प्राचीन राजधानी के एक मात्र अध्यक्ष नेपाल नरेश ने जो आनन्द प्राप्त किया उसका वर्णन कवियों की शक्ति से बाहर है ॥ १४ ॥ कृतमुनिजनकार्यस्तत्र मासाननेका- विविधगतिविनोदेर्यापयन्नादरेण । २१ जगनुरुप्रोचन्द्रदिविजये बुधजनगदिताभिः सिद्धिभिः सन्निविष्ट पशुपतिमुपतस्ये शइरं विश्ववन्धम् ॥१५॥ नेपाल नाश फी रामगनी में मुनिति से पई पास ठहर कर आपने अने' मिदों के मुख मे पशुपति नाय जी की प्रशंसा सुनकर वहां जाना निधि फिपा॥१५॥ इममुपगतमस्मिन्मृविभागे मुनीन्द्रं पशुपतिपरिचर्याबद्धचित्तं यथावत् । परिमरक्तामा योगिनो ज्ञानद्राः परिचयस्तवाञ्चाः मस्मरुः मम्मदेन ॥१६॥ भापको इस प्रान्त में भाया हुभा नानार, पनों में रहने वाले मान मृद योग जन सी भापसे मिलने की इच्छा पने हुए भापरा स्मरण करने लगे ॥ १६ ॥ अयमपि मुनियर्यस्तत्र नानामुनीनां परिचरणमवश्यकतुकामो बभूव । भवति हृदयमध्ये प्रायशः माम्यमाम:- मह विविधमपर्यावधिकः कोपि भावः ॥१७॥ पनाग मे मरण पाने गाले उन मिदों पी परिप से भरने फी सफर बनेर भाग्ने उन गहर गुराभों नार उनसे मिलना अपनः पाप न ममा, पपों मिमी भूमि गाने ने मानी में मापः एम हमा की परिपपा पानं पा गाई का नाता ॥ १७ ॥ कृतविविधविहारम्नत्र गीमान्नभाग- थितमयमधिगन्तुं मेरमृमिमदगम् । बनविदरणवानदाानिनः प्रतम्य कनापग्मगम्य मानरेग्मपण्यैः ॥१॥ aular malini Ranfrine relinaram mai matratika एकादशः सर्गः वनविहरणमार्गप्राप्तनानामनोज्ञ- प्रकृतिभिरुपतुष्टस्वान्तभावः स तत्र । शरदमुपसमेतां दैवयोगेन योगी विविधवनविहारैरर्थयुक्तां चकार ॥१६॥ मार्ग में आए हुए अनेक वनों के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर आपने भी अनेक बनों के विहारों से शरहतु का अनुभव किया ॥ १९ ॥ गहनविपिनमध्ये दिव्यतोयं समन्ता- द्विकसितबहुगन्धामोदि कल्हाररम्यम् । सपदि समवलोक्य व्यक्तमार्ग सरोऽयं मुनिरलमधिवस्तुं तत्र चेतश्चकार ॥२०॥ इसके अनन्तर एक गदर बनमें जाकर आपने यमलों से अलकृत सुन्दर अवतार वाले अच्छोद नामक सरोवर को देखकर यहा रहने का विचार किया ॥२०॥ विविधवनकुरङ्गैः सर्वतो रुद्धमार्गः फलभरनतनानादिव्यवृक्षावलीभिः । इह निवसतु कञ्चित्कालमित्यर्थितोयं शरदमधिकरम्यां योगमार्गेण भेजे ॥२१॥ चारों ओर से मृगादि जन्तुओं से आशीर्ण तया फलभार नत वृक्षारली से अत्यन्त मनोहर उस अच्छोद सर को देखकर सिद्ध पुरुपों के अनुरोध से भापने वहां पर कुछ समय व्यतीत किया ॥ २१॥ कृतविविधविचारं चेतसानिचिकारं मुनिमिममवलोक्य त्यक्तवेरानुबन्धाः । वनजनपदजाता जन्तवः प्रेमभावं તુમુ तस्थुरस्य प्रमन्नाः॥२२॥ नन्मनि वैरत्यागः' इस योग दर्शन के मूत्र को लिये आपके पास आर पुर वन्य जन्तुओं ने नो मेम का अग्रिम पचों में देखिये ।। २२॥

१६४
।
-
-
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
नकुलमनुलिलेह त्यक्तवैरो भुजङ्गः
सुरभितनयमारादालिलिङ्गातिसङ्गः ।
मृगपतिरपि भोग्यं चित्रकं नव्यकंडः ।
किमिहबहुभिरुक्तैर्नालिलिङ्गात्र कं-कः ॥२३॥
आपके आश्रम में सर्प ने स्वाभाविक वैर छोड़कर नकुल का तथा सर्वदा
अकेले रहने वाले सिंह ने गोवत्स का तरक्षु ने चित्रकमृग का, कहां तक कहें ? सभी
प्राणियों ने अपना२ वैर छोड़कर आपस में एक दूसरेंका आलिङ्गन किया ॥२३॥
भवति नहि विकारः कोपि चित्ते जनानां
जगति गतविकारं प्राप्यसत्वं प्रशान्तम् ।
प्रथितमिदमनल्पं दृश्यते योगसिद्धः-
फलमनुदिनमस्मिन्नेप दृष्टान्तभूमिः ॥२४॥
प्रशान्त योगी को प्राप्त होकर सरमाणी निर्विकार होनाते है यह प्राचीन लोकोक्ति
आपको योग सिद्धि से प्रत्यक्ष होकर दृष्टान्त के रूप से जनता में उपस्थित हुई ॥२४)
कृतविविधसपर्याः किन्नरा देवभेदाः
सहजमपि विहाय प्राणिविढे पभावम् ।
परिचरणसमर्चामत्र कर्तुं सदैव
प्रकटितनिजभावास्तस्थुरस्यैक देशे ॥२५॥
देवयोनि भेद किन्नरगण भी आपके प्रभाव से.आपकी अनेक विध सपर्या के
लिये आपके एक देश में आकर उपस्थित रहते थे।॥ २५॥
कथमधिगतदिव्यादिव्यवृत्तान्तसारः
प्रकटितमुनिमार्गध्वस्तनानान्धकारः।
बनमिदमतिघोरं प्राप्तवानस्यकस्मा-
दिति निशि वनदेवी तं वभाषे मुनीन्दम् ॥२६॥
निस वन में आप रहते थे उसरी अधिष्ठान एक यनदेवी थी जो आपको
इस मार के अध्न वेप में देखकर आपसे कहने लगी कि आप सर्वज्ञ होते हुए
भी भास्मात् इस धार यन में किम कारण से उपस्थित हुए १ ॥ २६ ॥

एकादशः सर्ग
१३५
अतिशयकमनीयं त्वादृशं पुत्ररत्नं
जगति विविधपुण्यैराप्य का पुत्रकामा
विपिनमिदगगम्यं प्रेपयामास गेहा-
दिति मनसि वितर्कः कस्य नोदेति पुंसः ॥२७॥
हे महात्मन् ! देखने में अत्यन्त सुन्दर आप जैसे पुररन को प्राप्त कर,
पुन चाहने वालो किस माता ने इस घोरतर वन में आपके भेजने का दुःसाहस
किया?॥ २७ ॥
कथय कथमलभ्यं सर्वथा देववन्द्यं
पतिमनुपमनानाभव्यभावैरुपेतम् ।
भुवि वत परिणीता का वधूरद्य धन्या
नयति शरदि दुःखैः कालमेतं विहाय ॥२८॥
अनेक लोकोत्तर भावों से विभूपित, देव वन्दित, मनुष्यों में सर्वया अलभ्य
आप जैसे पतिदेव को पाकर, आज भारत में कौन यहभागिनी मुग्ध वधू शरद
प्रयतु के इस सुहावने समय यो, घर में अकेली रहकर बिता रही है ? ॥ २८ ॥
मुनिवर वद सत्त्वं प्रापितः कोऽद्य देशो
विरहविधुरनानावन्धुवगैरुपेतः ।
अतिविपमपदस्थामव्यवस्थामवस्था
अतुविरहविषएगा श्रीरिवारण्यभागः ॥२६॥
हे मुनियर ! आप सत्य-सत्य कहिये आपने वियोगदन बन्धुवर्गों से अत्यन्त
दुर्घल, कौनसा भाग्यहीन देश वसन्त विहार से विधुर वन फी विपम अवस्पा
को अपने वियोग से पहुँचाया है । ॥ २९ ॥
विसमृदुलतलं यत्ते मुने पादपद्मं
बद जनपदभागं कं समुद्दिश्य धन्यम् ।
तददयमितिमत्त्वा मानसे त्वं निधत्से
भुवि वनभवनानाकएटकालंक्तायाम् ॥३०॥

जगदमीचन्द्रदिग्विजये
आपका यह कोमल चरण युगल किस भाग्यशाली देश को अलकृत करने
के लिए अपने घर से निकला है ? और वन्य कण्टकों से पदे-पदे आक्रान्त इस
भूतल में आप अढय होकर इसको किस उद्देश्य से घर रहे हैं १ ॥ ३० ॥
उदधितरणकल्पं साहसं ते प्रशस्यं
यदिह धनदगुप्ने निर्जनेऽरण्यभागे।
तव गमनमवश्यम्भावि कार्याय मन्ये
कथय कथमुपागास्त्वं मुने मार्गमेतम् ॥३१॥
हे मुने ! समुद्रतरणाचित आपका यह साहस धन्यवादाई है, जो कि कुवेर-
गुप्त इस निर्जन अरण्य में आपको लाया है ? आपका यह आगमन किसी
अत्यावश्यक कार्य के लिये प्रतीत होता है ? कहिये !! आप इस मार्ग में किस
कारण पधारे हैं १ ॥३१॥
अयमुदयगिरिस्ते दक्षिणेनाध्यनो यः
प्रथितविशदकूटस्तिष्ठति प्रान्तभागे ।
नयनपथमवश्यं यातएवेति मन्ये
विविधविहगपंक्तिश्रीभिरत्यन्तजुष्टः॥३२॥
अनेक पक्षिवृन्दों से अन्नकृत अपन्त उन्नत शिखर वाला यह उदयाचल
आपके दक्षिण भाग में स्थित है ? यदि आपने अब तक इस पर ध्यान नहीं
दिया तो मर दीजिये १ ॥ ३२ ॥
इह निवसति सातादुत्तरे भूविभागे
धनद इति न किन्ते वृत्तमेकान्तगुप्तम् ।
श्राणपथमुपेतं निर्भयं यत्तवेदं
गमनमतुलकीर्तेर्लभ्यते वृद्धमिद्धेः॥३३॥
इस मान्त के उत्तर भाग में भास्थित यह जो पालनर पर्वत है यही फैलास
है इसकी उपत्यका में मास्थित यह कुरेर की अलकापुरी है, निसमें कुवेर राते
है। या यह जान्न आपके श्ररण पय में नहीं आया ? जो आप इस मकार
निभंपकर इस या तिन प्रदेश में भ्रमण पर रो है ॥ ३३ ॥

एकादश. सगः
१६७
--
धवलतरमहोच्चमान्तसीमान्तभूमि-
गिरिरयमतुलश्रीशोभमानो विभाति ।
यदुदितवनभागे निर्भयोऽद्यापि मन्ये
विहरति हरवाहः पश्य साक्षादुपेतः ॥३४॥
अंत्यन्त धवल यह जो उदयाचल का प्रदेश है इसके एक देश में कनका-
चल और दूसरे प्रदेश में रजताचल चमक रहा है जिसमें निर्भय होकर शफर
का वाहन यह नन्दी रूप बदल-बदलकर विहार कर रहा है ॥ ३४ ॥
सकलभुवनरक्षादीक्षितः सर्वदेव- "
स्थितिकरणसमिद्धश्रीविरामकभूमिः।
प्रकृतिविकृतिलीलालम्बनस्यादि हेतु-
विलसति गिरिजायाः कोपि भव्यो भुजङ्गः ॥३५॥
देखिये । इस कैलाश के उच्चतम शिखर पर विश्व के एकमात्र रक्षक तथा
समस्त देवगणों को आश्रय देने वाली शक्ति के अद्वितीय अध्यक्ष समस्त माकृतिक
लीलाओं के एकमात्र अवलम्ब श्री गिरिजापति निवास करते है ॥ ३५ ॥
किमिह तमतिभूमि वासनानां महेशं
भवति तब दिदृक्षा मानसे यामुपेत्य ।
अतिविषममयासीनिर्जनं भूमिभागं
कथय वनविहारे कस्तवोद्देश्यभागः॥३६॥
क्या आपके हृदय में उनके दर्शनों की माल इच्छा है ? गिसकी प्रेरणा से
आप इस निर्जन भू-मदेश में पधारे है ? जरा कहिये तो सही ? इस बन-विहार
में आपका उद्देश्य क्या है ? ।। ३६ ।।
अहमिह निहितास्मि प्रष्टुमेवं विधानां
चरितमतिनिगूढं यक्षराजेन यत्वात् ।
वनमिदमधिगत्यानन्ददं माग्यभाजां
मुनिवर निवसामि त्वादृशां नर्म रोद्धम् ॥३॥

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय हे मुनिवर ! आप जैसे मनुष्यों की देखरेख के लिये ही मुझको यहां पर यक्षराज ने नियुक्त कर दिया है, मैं इस अच्छोद सरके घनमें रहकर आप जैसों का मार्ग रोकने के लिये इस रूप में रहती हूँ ।। ३७ ॥ कथय तर्धानात्वं कीदृशस्ते विचारः क तव हृदि सदिच्छा गन्तुमस्ति प्रसादात् । किमिह वननिवासे कारणं कोसि कस्मा- द्वनमिदमुपयातः कस्य वंशस्य रत्नम् ॥३८॥ इस लिये अब आप कहिये आपका कैसा विचार है ! कहा आप जाना चाहते है ? यहा पर रहने का क्या कारण है ? आप कौन है ? किस वश के आप रन हैं ? और इस बनमें क्यों पधारे हैं ? ॥३८॥ इति विविधवितरोगतां तत्र देशे वनभुवि वनदेवीं दिव्यशक्तिप्रभावाम् । विविधगतिविचार. साधु संक्षिप्तशब्दै- रयमतिमुदमास. सादरं तां वभापे ॥३६॥ इस प्रकार के अनेक तर्कवितर्कों को हृदय में रखकर उपस्थित हुई इस यनदेवी को यनमें दखकर यागिराज श्राचन्द्रनी ने उसके समस्त प्रश्नों का उत्तर देना इस प्रकार आरम्भ किया ॥३९॥ शृणु मखि वनदेवि त्वामहं वच्मि तत्त्वं मम हृदि नहि कश्चिद्रासनाया- प्ररोह. । सफलभुवनलीलादर्शनेच्छानिदेशा- दिदमहमुपयातस्ते वनं रम्यभागम् ॥४०॥ माभागे ! वनदरि !! सुनिये । मैं अपने हृदय का समस्त अभिमाय आपके समस रखता हूँ-~-मरे हृदय में किसी प्रकार की साई सासारिय वासना नहीं है में फेवल विश्व की लीला दग्पने लिप, अपने मान्त से चलभर आपके इस जयन्न रमणीय प्रान्तये उपस्थित हुमा है ।। ४० ॥

एकादशः सर्गः न किमपि वनवासे कारणं प्राप्तभागां शरदमिह यथावन्नीरतीरे निविष्टाम् । अनुभवितुमनेकैर्वन्यभोगैः प्रजुष्टां विधिविहितसपर्यो यापयामि प्रसङ्गात् ॥११॥ मेरे बनमें रहने का कोई विशेष कारण नहीं है क्रम प्राप्त शरदतु को यहीं पर विताने के लिये ही इस अच्छोद सरके तटपर मैं रह रहा हूं क्यों कि वनमें रहने योग्य सब साधन यहां मेरे लिये अनायास ही प्राप्त होरहे हैं ।। ४२ ।। जगति बहविधानां भोगभाग्योदयानां परिणतिभिरयं मे पूर्वकर्मार्जितानाम् । जननमरणबन्धो वर्तते नैव कश्चि- न्मनसि मम निविष्टस्तादृशो लोकभावः ॥१२॥ संसार में मनुष्य अपने पूर्वजन्मार्जित कर्मों के फल से उत्पन्न होता है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मेरा जन्मका कारण नहीं, और न कोई मेरे मनमें सांसारिफ भोग माप्त करने का ही भाव है ॥ ४२ ॥ जगदिदमनुदारैर्यावनैः क्रूरभावै- रधिकतरमुपेतं सद्य उद्धर्तुकामः । शमनदमनदक्षस्तादृशानां जनानां पशुपतिरिह लोके प्राहिणोन्मां यथावत् ॥४३॥ वर्तमान समय में इस धरातलपर यवनों का करतर अत्याचार प्रवृत्त हुआ है उसको नष्ट करने के लिये ही भगवान श्री शङ्कर ने मुझे यहां पर अपने प्रति निधि रूप से भेजा है ॥ ४३ ॥ तमतिशयितयोगं देववन्धं महेशं शरणमशरणानामेकमेवाद्वितीयम् । निजहदि विनिवेश्य ध्वस्तमायाप्रपञ्चः प्रतिदिशमनुयामि द्रष्टुमिच्छां तदीयाम् ॥४॥ : २२ १४० - जगद्गुरमीचन्द्रदिग्विजय उस अद्वितीय भशरण शरण श्री गकर को अपने हृदय में सदा रसभर ससार के अन्य सन मायिक मपश्च मिटा करके मैं आज कल ससार की वर्तमान परिस्थिति का अवलोकन करता हुआ यहां पर भाया हु ॥४४॥ स्मरसि यदि सखित्वं मानसे विश्ववन्द्यां भगवति सपदि द्राग्भारती सांऽद्य मर्वम् । विदितभुवनवृत्ता रम्यकाश्मीरवासा कथयितुमलमस्मादुत्तरं सर्ववृत्तम् ॥१५॥ वनदेवि ! इस समय यदि आप अपने मन में शारदा पीठ में रहने वाली भगवती शारदा का स्मरण करेंगी तो अन्य सब प्रश्नों का उचर देने के लिये ने यो पर आकर उपस्थित हो जायेंगी ॥४५॥ इति मधुमधुराभिर्वाङ्मयीभिः सुधाभिः मकलमपि निवेद्य स्वीयवृत्तं यर्थावत् । तदुदितशिवमार्गानुक्रमादक्षिणस्यां- दिशि किल रजताटेरेप देशानपश्यत् ॥४६॥ इस प्रकार मधुमधुर अपनी वाणी से वनदेवी के समक्ष अपना समस्त मनो- भाष रसार भगवान् श्रीचन्द्र उसी के बताए हुए, मार्ग की अनुक्रमणिका से कैलाश के दक्षिण भाग में अवस्थित देशों की मारे मस्थित दुएं ॥४६॥ विविधजनपदान्तःपाति लोकानवा 1 किमपि विशदवृत्तं सर्वदेशेषु पश्यन् । ननविहरणवाञ्छाएचित्तो मुनीन्दः 'पथि कमलमनोज्ञ रम्यमच्छोदमैक्षत् ॥१७॥ उार अनेक जनपदों के भ्रमण प्रसङ्ग में उत्तम-उत्तम भावों को, देखते हुए भाप अफ रमणीय बनो का विहार करते करते फिरसो सरोवर पर उपस्थित दुर ॥४७॥ जलविहरणलीलामत्तकारएडवानां १. कमलवनविहाराकृष्टभृङ्गालीनाम् ।। - . - एकादश सर्ग १५१ 1 - । . अरुणकिरणवर्णव्यक्तहेमाम्बुजानां नहि भवति कदाचिद्यत्र विच्छेदलेशः ॥४॥ जिसमें जल में विहार करने वाले इस कारण्टर आदि पक्षिगणों का कमलों पर गुजार करने वाले प्रमर गणों का आर सर्वदा एक रूप म अवस्थित सुषः कमलों का कटापि विच्छेद नहीं होता है ॥४८॥ कनककलशसस्पर्द्धि यस्मिन्मनोज्ञ कमलमुकुलजातं वीक्ष्य गन्धर्ववालाः । अहमहमिकयैव स्नातुमिच्छन्ति की- कृननवविसपुत्राः क्रीडनाय क्रमेण ॥४॥ कनक लाशों से स्पर्श रखने नाले कमल मुकुलों को देखकर जिसम मन्त्रों को ललनायें कानों पर विसपुञ्ज रखकर स्नान करने की त्वरा से समय समय पर माया करती हैं॥४९॥ किमिदमतिमनोझं हेमराजीववृन्दं पयसि वहु निविष्टं कि मुखाज बधूनाम् । इति मनमि वितर्को यत्र नित्यं जनानां जनयति बहुशङ्का रूपलावण्यमाम्यात् ॥५०॥ निसमें कमलों के सम्ा को देखकर मनुष्यों के मन में स्वभार हा से भ्रम हस्पन्न हता है कि क्या ये स्नानार्थ प्रविष्ट हुए बधू गणों के मुख है ? या जन में सर्वदा रहने वाले वास्तविक फमत है ? इस भ्रम का कारण इन दाना में म्प गौर गांवप्य का एफसा होना है, ॥५०॥ निभृतमनुचरीभिः सार्द्धमागत्य गौरी विविधकमलपुष्पैरर्चयामास यत्र । प्रतिदिनमुपलूनर्नित्यसंसिद्धगन्ध- स्तटभुवि विनिविष्टा शङ्करं प्राणनाथम् ॥५१॥ निस प्रति दिन आनो सहेलियों के साप नित नये कमल पुषों से अपने प्राणेशर भगवान् शङ्कर का मन करने के लिये गारीनी आया करती है ॥५१॥ :

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये अयमपि किल तस्याच्छोदनाम्नः प्रशस्तं सरस उपनिविष्टं शूलपाणेविशालम् । तटभुवि व दिव्यं मन्दिरं वीक्ष्य तुष्टः सुरनरमुनिबन्धं वामदेवं ददर्श ॥५२॥ उस अच्छोद सर के तट पर देव निर्मित श्री शङ्करजी का विशाल मन्दिर देखकर आपके मन में अत्यन्त प्रसन्नता हुई, जिससे मन्दिर में प्रवेश कर आपने सुर, नर, मुनि वन्दित वामदेवजी का दर्शन किया ॥५२॥ पशुपतिपरिचर्यावद्धभावानुपेता- नुचितवहुविचारानत्र संवीक्ष्य सिद्धान् । मुनिरयमधिवस्तुं देवयोगेन हृष्टः कमलवनमनोज्ञं गएडशैलं समागात् ॥५३॥ इस मन्दिर में प्रति दिन शङ्कर की पूजा के लिये आये हुपे सिद्ध पुरुषों को देखकर आपके मन में कुछ दिन यहां ठहरने की इच्छा हुई.इसी लिये आपने यहां पर अपने निवास योग्य एक गण्डशैल को देखा ॥ ५३॥ तृणनिहितकुटीरस्तत्र हेमन्तशोभां सपदि समभिवीक्ष्य ध्यानयोगेन कालम् । अनुदिनमधिक श्रीर्यापयन्मानसानि प्रथित्तमुनिजनानां मोदयामास मानः ॥५॥ उस गपडशैल पर एक तृण की कुटी बनाकर आपने हेमन्तऋतु की अनुपम छटा देखते हुये अपने समय को योग मार्ग में व्यतीत किया । ५४ ॥ अवसदिह मुनीन्दः श्वेतकेतुः प्रसिद्धः प्रथितमहितकर्मा पुण्डरीकः पुरेति । निजहदि स विचार्य श्रीसमालम्बितांत्रिः किमपि मनसि दध्यो भारतीयं महत्त्वम् ।।५५|| एकादश सर्ग १७३ सकलमपि यथावद्भूप इस मान्तमें पूर्व समय में मुनिवर श्वेतकेतु तथा महामहिम-हिमगौर पुण्डरीक निवास करते थे य, वृत्तान्त सुनकर आपने अपने मन में भारतवर्ष का प्राचीन गौरव अनुभव किया ॥ ५५॥ इह विहितनिवासा योगिनः पूर्वकाले हिमगिरिगतनानागह्वरान्तर्निविष्टाः । पवनजलफलौद्यर्जीवन यापयन्तः पयामासुराः ॥५६॥ पूर्वकाल में यहां पर निवास करते हुये प्राचीन मुनिगण गुहाओं के गहरों में केवल वायु के अवलम्ब से अथवा जल एव फल पर अपना समस्त जीवन व्यतीत करते थे, यह जानकर आपके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ ॥५६॥ विहितबहुसमाधिध्वस्तमोहान्धकाराः परमपुरुपमेकं चेतसा संस्मरन्तः । यमनियमकथाभिर्वर्धयन्तः स्वयोगं बनभुवि कृतवासाः किन्न चक्रुः सुकृत्यम् ॥५॥ समाधियोग के द्वारा नष्ट मोहान्धकार तथा हृदय में एकमात्र ब्रह्म का ध्यान करने वाले, यम नियमादि अध्यागयोग के द्वारा अपनी योगसिद्धि को बढ़ाते हुये माचीन समय के मुनिगण इस वन में निवासकर क्या क्या काम नहीं करते थे ? यह प्रश्न यहाँ पर आपके मन में उग ।। ५७ ।। रविस्यमुदितश्रीः सर्वदा योगमिद्धि दिशति गतिनियुक्तः शीतरश्मिः समन्तात् । हिमगिरिरपि येपामासनानि प्रसन्नः कथमिह नहि वन्द्या योगिनस्ते महान्तः॥५॥ जिनके योगाभ्यास का साक्षी यह सूर्य तया चन्द्रमा आज भी पार वार समक्ष में आफर गवाही दे रहा है और जिनको आसन स्थिति का परिचय देने के लिये यह रिमालय आज भी अपने गुहामुखों को अग्रसर कर रहा है उन । -- y जगद्गुरुमीच द्रदिग्विजये महामहिम स्वनाम धन्य-धन्यवादाई योगियों को कौन सजन अनाअलि अर्पित न करेगा? ॥ ५८॥ इति बहुविधवाग्भिर्वन्दनीयं चरित्रं मुनिरयमुपजातस्वान्तशान्तिर्मुनीनाम् । मनसि बहुविविच्य स्वाश्रमादप्रमेय प्रथितविविधवृत्तं हेमकूटं समागात् ।।५६॥ इस प्रकार अनेक भावों में अभिराम-पूर्वन मुनियों का चरित्र मन में चार वार स्मरण कर आप यहासे अति प्रशस्त हेमकर नामक पर्वत को भार पले ५९॥ इह बहुविधसिद्धेः सादरं स्तूयमान. कतिचिदरमहानिप्रार्थनाभि. सुराणाम् । विविधवननिकुजे यापयन्नागतानां हृदयनिहितशहा. प्रापयामाम नाशम् ।।६०॥ चलते चलते हेमकू को उपत्यका में पहुच फर आपने सिदों की प्रार्थना पर ध्यान दकर कुछ दिन यहा पर ठहरने का निश्चय किया और अपने पास आये हुये सजनों को अनेक विधि से शङ्काओं का समाधान करना आरम्भ फिया ६० अनुदिनकृतसेवस्तत्र गन्धर्वलोके- रपरममरलोक हेमकूटं विहाय । क्रमविहरणवाञ्छाकृष्टचित्तस्ततोऽयं हरसुतकृतभेदं क्रोश्चमदि जगाम ॥६॥ यहा पर देवयोनि माप्त गन्धर्वो के द्वारा अतिथि सत्कार प्राप्त कर आपने स्वर्गापम हमर पर्वत का भी भवशिष्ट भ्रमणेच्छा से शादफर यहा से मौञ्च पर्वत को आर प्रस्थान किया ॥६१॥ गिरिवरमिममुच्चैः कृटमभ्येत्य यत्ना- दृतुवदनविदीर्णद्वारगच्चदिइङ्गम् । नयनपथविनिर्यद्धंममालापदिष्ट सुरतरुनतशाख मानस सोध्यगच्छत् ॥६२॥', -- - .. एकादशः सर्गः १७५ १ गमनझम से यपाक्रम प्रौशाद्रि को प्राप्त कर भाप इमारवाण प्रयोग कल्पित छिद्र से निकल कर मानसरोवर की ओर जाने वाली इसमाला को ही अपना पयमदर्शक मानकर उसके पीछे पीछे मानस की भोर चले ॥ ६२ ।। कृतबहुदिनवासस्तन तेस्तैर्विनोदैः क्षपितसमयभागः कालमासाद्य कश्चित् । !! मुनिभिरुदितमार्गस्तत्सरः पुण्यलभ्यं सपदि वत विहाय प्राप गङ्गावतारम् ॥६३|| मानस पहुँच कर मुनिजनों के साथ अनेक प्रकार के विनोदी द्वारा कई समप विताकर भाप वहांसे भी मुनि मदिष्ट मार्ग का अनुसरण करते फरते अन्त में पुण्पपण्य प्राप्य गङ्गावतरण नामक गहातरी स्थान में पहुंचे ॥ ६३ ।। जननमरणचक्रच्छेदकं पुण्यभाजां नयनपथमुपेतं भेदकं पातकानाम् । 'मुनिजनवहुसेव्यं प्राप्य गङ्गावतारं स मुनिरमरवन्धस्तत्र विश्राममैच्छत् ॥६॥ ससार में पार वार आवागमन रूपी पक्रव्य फे ऐदन करने वाले समस्त पापं नाशक निजनों के सेवन करने योग्य इस गङ्गावतरण तीर्य को प्राप्त कर मापने यहा पर अफ दिन ठहरने का निश्चय किया और पूजनीय गङ्गामी के गुणगणों का निम्नलिखित पर्थो से वर्णन आरम्भ किया ॥ ६४ ॥ [गमाता सुरनरमुनिवन्धे देविगङ्गे प्रसीद त्वमसि नयनमार्ग प्रापिता पूर्वपुण्यैः । हरशिरमिनिवासस्ते मदा मानमुञ्चे- नयति भुविनिपातस्तारकः कर्मभाजाम् ॥१५॥ भापने का कि-सुर-नर-मुनि पन्दनीय ! भगवति ! गड़े !! भाप मुझ पर प्रसम हनिये, मैने भापको पूर्व जन्म के पुण्यों से मास किया, महादेव ।

7 - - Pe जगद्गुरभीचन्द्रदिग्विजये सरसमधुरपद्येस्तत्पदादेप योगी । । । किथमपि यमुनाया. शिश्रिये सम्पपतिम् ॥७२॥ इस प्रकार अपने हृदय में निविष्टं भाव को मालिनी वृत्तवद्ध पधों के द्वारा कहकर श्रीचन्द्र भगवान् उस गङ्गावतरण तीर्थ से चलकर धीरे धीरे कलिन्दगिरि "भन्दिना के पवित्र तट पर पहुचे ।। ७२ ॥ प्रभवमभवहेतुं भावुकानां भवेस्मि- 'नगमगमभवाब्धिव्यासविस्तीर्णसेतुम्।। अनुपदमवलोक्य स्पष्टकालाञ्जनाभं वनभुवि यमुनायाः सम्मदं प्राप देव. ॥७॥ इस भव में भावुक 'जनों के अभव का हेतु भूत तथा अगम भवाब्धि के व्यास का विस्तीर्ण सेतुरूप यह पर्वत आपके लिये अत्यन्त आनन्द का कारण वनगया, अर्यात इस काले, पहाड़ को देखकर आप अति प्रसन्न हुये॥ ७३ ॥ -तटमरमधिगत्य व्यक्तमव्यक्तरूप. क्षपितभुवनभार. श्रीनिवासावतारः। "सहजसुंभगरूपं प्राप्य" यत्साधुरेमे तमखिलमैपि मन्ये ते जलस्य प्रभावम् || यह कलिन्द पर्वत देखने में अत्यन्त काला है, "इसी कारण इसके जल में भी कालिमा प्रतीत होती है, उस कालिमा को देखकर आपके मन में यह भावना हुई कि अव्यक्त भगवान् भी जिसके तट को भाप्त हाकर कृष्ण होगये उस यमुना की कालिमा कुहा तक हायी जा सकती है ? ॥ ७४॥ . -इति विमलविनोदैनिस्तरङ्गामसङ्गो “वनभुवि यमुनामप्यादरेण प्रशंसन् । मुनिरयमनिमेषोंचनस्तां निपीय । क्रमविहितनिवास. साधु केदारमोगा : इस प्रकार अनेक विध विनोदों के साथ इस यमुना के निस्तरङ्ग प्रवाह को देखते हुये आप क्रमासे चलते चलते फॅारनाय पहुंचे गये।७५ ॥ 1 . - -- T - 1 -- एकादशः सर्ग कृतविहितकृतीनामेप केदारभागः । कथयति फलवन्धं वस्तुतः कर्मयोगः कथमपि न लभन्ते येत्र केदारनाथ पुनरपि मनुजास्ते यानि के दारभावम् ॥७॥ वहा पहुचकर आपने कहा कि यह केदार तर वास्तव में पूर्व जन्म के उत्तम कर्मों का प्रत्यक्ष में फल देने वाला है, यहा आकर जा केदारनाथ को नहीं देख पाते हैं वे फिर भी स्वर्ग में जाकर दारभाव को प्राप्त होनाते हैं ॥ ७६ ॥ अनुगतबहुपुण्या. प्राप्य केदारशेलं जगति वत जना. के दारसङ्ग लभन्ते । जननमरणचक्रावर्तिन. कर्मबन्धे- रिह विविधविधाभिर्यान्ति केदारभावम् ॥७॥ इस पुण्यक्षेत्र को प्राप्त करना पुण्यशाली पुरष-दारसग का परित्याग करते हैं वे मोक्ष भागी बनते हैं और जो यहा आकर भी दारमसङ्ग नहीं छाइते वे वार वार कर्म बन्धनों में पड़कर कर्म करने योग्य केदार रूप को प्राप्त करते हैं । यहा पर केदार शब्द [ केदार.पर्वत क्षेत्रेभव क्षेत्रालवालयोः ] इस विश्वकोप के प्रमाण से अनेकार्य है ।। ७७॥ इति बहुविधत. कर्मबन्धं प्रभेत्तुं कतनवविधयोगस्तत्र केदारदेशे। मुनिरयमधिगन्तुं तत्परं पुण्यदेशं. पथि बहु वदरीशं ध्यानयोगेन दथ्यौ॥७॥ इस प्रकार अनेक विध नकों से कर्म बन्धनका उच्छेद करने वाले योग साधन को नवीन रूप से सिद्ध कर यहाँ से श्रीचन्द्र जी महाराज बदरीनारायण की और मस्थित हुये ॥ ७८ ॥ अतपदिह महोग्रं माधव. पूर्वकाले तप इति निगदन्त. कोपि सिद्धा, प्रसिद्धा.! h १८० -- *" । T जगद्गुरुश्रीचन्ददिमिजये मुनिमिममधिगत्य प्रत्यहं तच्चरित्रं ।'! - 7 कठिनतरसमाधिव्यस्तभावाः शशंसुः ॥७॥ यहां पहुचकर आपने अनेक प्रसिद्ध प्रसिद्ध सिद्धों से सुना कि पूर्वकाल में यही पर आकर श्रीकृष्ण जी ने जो बड़ा घोर तप किया था उसीके प्रभाव से वे सर्वत्र अजेय होगये ।। ७९ ॥ नरमथ वनभागे तत्र नारायणं द्रा- गयमुभयमवेक्ष्य स्पष्टरूपेण सद्यः । कठिनतरतपोभिः साध्यमत्यन्त मिष्टं किमपि फलमवाप्य ध्याननिष्ठोऽवतस्थे ॥८॥ यहां पर आपको प्रत्यक्ष रूप में नर और नारायण दोनों का दर्शन हुआ जिससे आपने यही निश्चय किया कि-तप के प्रभाव से ससार में कोई कार्य पाकी नहीं रहता है, इसलिये तप करना ही मनुष्य के लिये श्रेयष्कर है ॥ ८ ॥ परिचरणपराणामत्र नानामुनीनां वनविहरणवाञ्छाकृष्टचित्तकमाणाम् । कथनमुरसिकृत्याधोवताराय तस्मा- दनुपदमयमागादाशु नन्दप्रयागम् ॥८॥ इस पुण्यक्षेत्र में आपकी परिचर्या के लिये जो मुनिजन रहते थे वे भी आपके साथ साय वनों में विचरना चाहते थे, -इस लिये उनकी आज्ञा को शिरोधार्य समझकर आप यहां से नन्दमयाग पहुचे ॥ ८१॥ कृतविविधविचारस्तत्र नानामुनीन्द्र- मुनिरयमतिपुण्यप्रापि दिव्यप्रवाहम् । भृगुमरमधिगत्य प्रस्थितं जन्हुकन्यां पथि मुहुरनुपश्यन्नाप कर्णप्रयागम् ॥२॥ यहां पर कुछ दिन ठहर कर अनेक मुनियों के साथ वार्तालाप करके अन्त में नाप मार्ग में आये हुये अनेक नदियों के प्रवाहों को गङ्गांनी में गिरता हुआ देखते देखते कर्णप्रयाग पहुचे ।।८।। T . - T । . . 1 'एकादशः सर्गः - . ग . - १८१ -अवतरणपथस्थं प्राप्य देवप्रयागं.-" क्रमगमनपरोयं वीक्ष्य विष्णुप्रयागम् । तदनु परमपुण्यं दिव्यरुद्रप्रयागं नयनफलमनल्पं भाग्ययोगादवापत् ॥८॥ यहां से उतरते समय आपने सब से पहिले देवप्रयागं, उसके अनन्तर गमन कम से क्रम प्राप्त विष्णु प्रयाग, उसके अनन्तर मार्गावस्थित रुद्रप्रयाग देखा । इन सबकी शोभा देखकर आपने अपना नयनयुगल सर्वांशमें सफल बनाया ॥८३ प्रथममलखनन्दां वीक्ष्य या तुष्टिरस्य 2; क्रमगमनजुपोभूज्जन्हुकन्यानुगस्य । - पथि विमलजलानां स्रोतसां प्राप्य सङ्गं प्रतिपदमधिका सा वृद्धिमेवाललम्बे ॥८॥.. 1 T' हिमालय से उतरने के समय आपने सर्व प्रथम अलकनन्दा और मन्दाकिनी का सङ्गम देखकर जो आनन्द प्राप्त किया था, वह क्रमशः उचरोत्तर अन्य नदियों के सङ्गम देखने से बढ़ता ही गया, जिससे दर्शनजन्य आनन्द चरम सीमा पर पहुच गया ॥ ८४ ॥ उदयगिरितटानामुचमारभ्य भागं । बहुविधगिरिमागैरेवमभ्यागतस्य । हिमगिरिनवकूटपस्थितेरस्य मन्ये तंदवसितमवाप्तं देवतो दिवप्रयाणम् ॥८५|| उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक समस्त पर्वतों के उच्च शिखरों को क्रमशः देख कर हिमालय की ओर प्रस्थान करने का जो भापका प्रयोजन था वह समाप्त होगया अर्थाद उत्तर दिग्विजय में आप सफल हुये ॥ ८५ ॥ अनुगतबहुसिद्धः कर्मयोगेष्वविद्धः कृतिभिरतिसमिद्धः सर्वदिक्षुप्रसिद्धः। 1 : विविधगुणसमृद्धः कर्मदक्षेपु वृद्धः । । । - 'स मुनिरधिकमिद्धः सम्बभूवात्रवद्धः ॥८६]. ITE r - " - - - १८२ जगद्गश्रीचन्द्रदिग्विजये सिद पुरषों में आसक्त कर्मयोग में, अनासक्त अपने उचित कर्मों से समिद समस्त दिशाओं में प्रसिद्ध अनेक गुणों से समृद्ध कार्य करने वालों में वृद्ध यागसाधनों से बद्ध भगवान् श्रीचन्द्र इस उत्तर देश में आकर बद्ध अर्थात् अनुरक्त हुये ॥८६ भवति गुणवशेन-प्रायशो दिव्यदेशे परमपदजुपामप्यादर सत्यमेतत् । । यदयमुपरतोपि प्राप्तभोगेषु देवा द्धिमगिरिमधिगत्य व्यक्तरागो बभूव ॥८॥ दिव्य देशों में गुणों की अधिकता से माय उच्चपद पर पहुंचे हुये महापुरुषों को भी अनुराग हो जाता है, यह बात अधिकाश में सत्य है क्योंकि समस्त सासारिक भोगो से उपरत श्रीचन्द्राजी दैवयोग से इस उत्तर दिशाम आ कर अनुराग सेविचित न रहे ॥१७॥ सकलमपि विभागं भाग्यवानुत्तराया दिश उचितविधानेरेवमभ्येत्त्य दिव्यम् । 'अवतरितुमभीप्सु. पुण्यदेशं यथाव- द्धरकृतिभिरुपेतं श्रीहरद्वारमामात ॥८॥ भाग्यवान् श्रीचन्द्र जी उत्तर दिशा का समस्त भाग इस यात्रा में देखकर नीचे उतरने की इच्छा से अन्त में भगवान शङ्कर की दिव्य कृतियों से सर्वता व्याप्त पुण्य प्राप्य हरिद्वार में आकर उपस्थित हुए जो कि आपके पूर्वन आचार्यों अकृत,मखविभङ्ग यत्र दक्षस्य रुद्र. सपदि समुपरुद्धश्रीविलासः शिवाया । तदिदमखिलभोगस्यद्धि गङ्गोपक्रएट पुरवरमधिगत्त्य स्वस्थचित्तो बभूव।।८।। जहां पर दक्षापमान से कुछ भावान् श्री वामदेव जी ने अपने निश्वास से उत्तम हुये वीरभद्र आदि भनेक गणों द्वारा दक्ष प्रजापति के मख का वात को T - A T का प्रधान स्थान है॥cen - -- A । + एकादशः सर्गः पात में सहार कर दिया, उस गङ्गातटवर्ति कनखल को प्राप्त कर भगवान् श्रीचन्द्र शान्त चिच हुये ॥ ८९॥ इति मुनिवरजुष्ट पञ्चवीयवृत्तं ननमयय-युताभिर्मालिनीभिविविच्य। कृतसमयविभागः काव्यिनिर्माणकाले ' ।। कविश्यमवसानं प्रॉपैयामास सर्गम् । इस सर्ग में हमने पांच वर्षों में समाप्त हुये उत्तर भ्रमण का समस्त वृत्तान्त मालिनी छन्द में 'उपस्थित कर दिया है। इससे अगला दिग्विजय क्रम जिनको "देवना हो वे सज्जन कृपया इस महाकाव्य के अग्रिम सर्गों का अवलोकन करें ! यह सूचना देकर अब हम इस सर्ग को यही पर समाप्त करते है ॥१४॥ इतिभी सनायरशोभून कविवर,श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते.... मतिलक जगद्गुरुनाचन्द्रदिग्विजय महाकाव्य " उत्तरदिग्विजया नीमैकादश मंगै

-
द्वादशः सर्गः
।
--
Are
५
अथ प्रसन्नो भगवाननुग्रहा-
'द्यथोत्तरं दिग्विजये कृतोद्यमः
महेन्द्रनामाङ्कितमुत्तमोत्तम
पुरं विवेश प्रथमानविक्रम ॥१॥
उत्तर दिग्विनय के भनन्तर अन्य तीन दिशाओं के विजय म कृतोद्यम भगवान्
श्रीचन्द्र हरिद्वार से प्रस्थित होकर अबकी यात्रा में सर्वप्रथम इन्द्रमस्थ पहुचे ॥१॥
जयोचितं तत्र विधाय सर्वत.
प्रसाधनं साधितसर्वसाधन. ।
क्रमादवाप प्रथितां मधो. पुरी
कलिन्दकन्यातटभूनिवेशिताम् ॥२॥
यहां पर दिग्विजय सम्बन्धी समस्त आयोजन एकर कर आपने यहा से
यमुना तट पर विद्यमान प्रसिद्ध मथुरापुरी के लिए गमन किया ॥२॥
शशाङ्कवस्वाशुगचन्द्रसम्मिते
स वैक्रमाब्दे यमुनातटं गतः।
यमद्वितीयामतिवाह्य सम्मदा-
जगाम वृन्दावनमागतक्रमम् ॥ ३॥
विक्रम सवत् १५८१ की कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मथुरा पहुचकर आपने
यम द्वितीया को यमुना स्नान किया, जिसका महत्त्व पुराणों में विस्तृत रूप से
क्रमेण तस्मिन्नपि देवकीसुत-
प्रसादितात्मीयजने गुणोन्नते ।
दिनानि चत्वारि सुखेन यापय-
नगात्स गोपर्धनशेलमद्भुतम् ॥ ४ ॥
कहा गया है ॥२॥

द्वादशः सर्गः ।
-
यहां से चलकर आप क्रम से वृन्दावन पहुँचे, वृन्दावन में पार दिन निवास
करके यहां से भी आपने गोवर्धन के लिये गमन किया ॥४॥
दिने दिने यस्तिलशो विलीयते
मुरारिपादाञ्जवियोगदुःखितः।
स एव गोवर्धनभूधरो मुनि
विलोक्य हर्षावृधे यथोत्तरम् ॥ ५॥
श्रीकृष्णजी के विरह में जो गोवर्धन प्रतिदिन तिलभर घटता है, वही आपा
दर्शन पाफर उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होने.लगा ॥ ५॥
तथाविधं तं समवेक्ष्य भूधरं
प्रशस्तनानाविधतीर्थमध्यगम् ।
प्रवर्पणं नाम गिरिं तदुत्तरं
मुनिः प्रसन्नीयमगादनुत्तमम् ॥ ६ ॥
अनेक तीर्थों के मध्य में विद्यमान इस गोवर्धन पर्वत को देखकर आप यहाँसे
प्रवर्पण की ओर चले ॥६॥
रुपाधिकं यत्र पुरा सुराधिपो
ववर्ष नागेन्द्रकरोपमैर्घनैः।
प्रवर्षणो नाम सएव भूधरः
पदं दृशोरस्य जगाम दैवतः ॥ ७॥
इन्द्र ने रुष्ट होकर जहां पर हायो के सूड के बराबर मोटी मोटी धाराओं से
वर्षा की यो, वही प्रबर्षण नामफ पर्वत दैवयोग से आपके दृष्टिगोचर हुआ ॥ ७ ॥
क्रमेण मासद्धयमत्र यापय-
नयं मुनीनामनुमोदनर्मुनिः।
प्रसङ्गसम्प्राप्तमुपागतक्रम
जगाम गोइन्दविशोभि गोकुलम् ॥ ८॥
इस प्रवर्पण गिरि पर आपने मुनियों के अनुमोदन से दो मास का समय
व्यतीत फिया, तदनन्तर आप यहां से गोसमूह समुल्लसित गोकुल के लिये प्रस्थित
हुपे जो कि नन्दगोपपुर के नाम से प्रसिद्ध है ॥८॥

M जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये यशोदया लालितमत्र माधवं विलोक्य सानादुपकएठमागतम् । प्रसन्नचित्तो मकरार्कचंक्रमे समाप तत्ततपुरं पथि स्थितम् ।। ६॥ यहां आकर आपने देखा कि यशोदोत्संगलालित श्री वालमुकुन्द जी आपके पास आकर खेल रहे हैं, भगवान् के इस अलौकिक चमत्कार को देखकर आप बहुत गद्गद हुये और उनको ध्यान में रखकर आप यहां से तप्तग्राम पहुंचे ॥९॥ दिनानि वस्तुं कतिचित्तदन्तिके कृतस्ववासो मुनिरेप मन्दिरे । पुरानुगीतां मुनिभिः प्रसङ्गत्तः पपाठ गीतां मधुसूदनोदिताम् ॥१०॥ इस ग्राम में जाफर आप एक मन्दिर में उतरे और कुछ दिन यहां पर ठहर कर भगवद्गीता पर ध्यान पूर्वक एक उत्तम विवेचन लिखा ॥१०॥ प्रसङ्गतस्तत्र समागतं पुरः कमप्यशङ्ख धनराजबालकम् । मुनिः प्रमोदेन तदान्वदर्शय- द्धठोपविष्टं मुदितं मुरदिपम् ॥११॥ इसी समय आपके पास गीतापाठ का प्रेमी एक धनराज नामक पालक आपा जिसपर मसभ होकर भापने उसको श्रीकृष्णजी का प्रत्यक्ष दर्शन करा दिया ॥११॥ मुरद्विषः सादरमत्र पूजनं विधाय योगेन तदर्गले पुरम् । निरर्गलं कर्तुमलं प्रपूजितो जनैः प्रतस्थे भगवानितः परम् ॥१२॥ परं पर ठहर कर आपने आदर पूर्वक भगवान का पूजन किया और मन्तमें आप यहाँसे चलकर आगरा शहर पहुँचे ॥१२॥ ३

द्वादशः सर्गः
विधाय तत्रोपगतानिरुत्तरा-
विवादमध्ये बहुशास्त्रसङ्गत्ते।
मुनिः प्रसङ्गादयमिष्टकैश्चित
पुरं विवेशातिवलः पथि स्थितम् ॥१३॥
आपने यहां आकर यमुना तट पर आसन लगाया और एक माप्त पर कर
यहां के समस्त परितों को अनेक शास्त्रीय विषयों में निरुत्तर कर यहाँ से आप
इटावा पहुंचे ॥१३॥
निबोध्य तत्रापि मनस्यवस्थितं
निगूढतत्त्वं मनुजानुपस्थितान् ।
मुनिर्मनस्वी गमनक्रमादलं
पुरीमयोध्यामविशत्प्रतिष्ठिताम् ॥१४॥
इटारा पहुँचकर आपने यमुना-तट पर एक शिव मन्दिर में विभाम किया
और मागत सजनों में, सागतपूर्वक धर्मोपदेश देकर पा से आप धीरे-धीरे
भोपा पहुंचे ॥१४॥
इहत्त्पविदद्दणदर्शितक्रम
जनिस्थलं वीक्ष्य दशाननदिपः ।
मुनिर्वभूवातितरां हदन्तरे
रसदयान्तर्गतकल्पनादशः ॥१५॥
पा माने पर बहुत से विमानों ने भापको भी रामचन्द्र नो का नन्म-स्पत
दिसापा निसको देसार भाप दो पिस्ट रसों से पने हुए श्लोक की बरा भत्पन
गम्भीर रोगर ॥१५॥
कसूर्यवंशपभवा महीभुजः
क तदिधानामिह माधुशासनम् ।
क दुर्दशेयं यवनासुरैः कृता
विपर्ययः कालरशादयं भुवः ॥१६॥

१८८ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय यवनवस्त श्रीराम जन्मस्थल को देखकर आपने अपने मन में कहा कि सूर्यवंशीय राजाओं का कर्हा. यह जन्मस्थल ? कहाँ उनका शासन ? और कहां यह वर्तमान दृश्य.१ यह सब काल की महिमा है ॥१६॥ विचारयन्नेवमयं महामति- मंदोद्धतानां दमने धृतव्रतः। सुरापगासूर्यसुतासमागम दिदृशुरुत्कः समवाप सङ्गमम् ॥११॥ यवनों द्वारा इसी. यह दुर्दशा देखकर आपने उनके सहार फरने का अपने मन में पूरा-पूरा प्रण किया और अपने पूर्वजों को चार-चार स्मरण कर अन्त में भाप यहां से प्रयाग के लिपे पस्थित हुए ॥१७॥ मुनिप्रशस्ते कतिचिदिनान्ययं शिवे भरद्वाजमुनेर्नुहोदरे। समाधियोगेन नयनवस्थित ददर्श तत्रैव वटं तटस्थितम् ॥१८॥ प्रयाग पहुंच फर आपने मुनि प्रशस्त भरद्वाज मुनि के आश्रम में अपना भासन लगाया और यहां की गुहा में समाधिस्थ होकर अक्षय यर का स्मरण किया ॥१८॥ महालये यइलमेकमाथितः सुखेन शेते भगवानधोक्षजः। वटः स एवायमिति स्वचेतमा विचार्य सद्यः स ननाम तत्पदम् ॥१६॥ मामलप में इसी यट के एक पर पुट में भगवान् पालमुलन्द जी अपने गूठों का अनूठा रस पीते हैं ऐसा अपने मनमें रिचार पर आपने इस तटापस्थित बटफे लिये प्रणाम किया ॥ १९ ॥ प्रमङ्गतोऽयं नयनाष्टवाणभृ- मिते क्रमादिकममपयत्मरे। . --- द्वादशः सर्गाः १८९ . ५. शिवावतारः शिवरात्रिसनिधौ जगाम काशी शिवदर्शनेच्छया ॥२०॥ विक्रम संवत् १८८२ में यहां से आप शिवरात्रि के समय पाराणसी पहुंचे जहाँ पर भगवान शङ्कर सर्वदा निवास करते हैं ॥ २० ॥ समेत्य काशीं मणिकर्णिकातटे कृताह्निको देवदिदृक्षया द्रुतम् । स विश्वनाथं भगवन्तमीक्षितुं । विवेश तन्मन्दिरमुच्चगोपुरम् ॥२१॥ यहां पहुंच कर आपने मणिकर्णिका पर अपना आसन लगाया और नित्य- फर्म से निवृत्त होकर आप श्री विश्वनाथ जी का दर्शन करने के लिपे मन्दिर में पहुँचे ॥२१॥ स तत्र नैवेद्यविधानतत्पर- निरुद्धमार्गः शिवमन्दिरोदरे। निवृत्त्य तस्मात्तदुपान्तभूतले जजाप सोऽहंपदमात्मदर्शनः ॥२२॥ जिस समय आप मन्दिर में पहुंचे वह समय वहां पर भोग लगाने का या जिसपे नियमानुसार अन्दर कोई नहीं जा सकता या इस कारण पुजारियों ने अन्दर जाने से आपको रोका, रोकने पर आप वहां से हटकर कुछ दूर पर एक ऊंचे स्थान में बैठकर (.सोहम् ) पदका जप करने लगे यह सोहंपद (योसा- चादित्ये पुरुषः सोसावहम् ) इस यजुर्वेद के अन्तिम मन्त्र में आता है इस लिये पैदिक है । (सः अहं सोहम् ) यह इसका निर्वचन है। मंत्र में "" पद सास है इस लिये " सः" पद का आना आवश्यक है। पस्त्वं सोएं या अद्वैत ही इस सोईपद का लक्ष्य है ॥२२॥ निवृत्तनानाविधपूजनक्रियः प्रविश्य भोगालयमीक्षितो यदा । स विश्वनाथो नियमानुवर्तिभि- स्तदा वभूवात्रविचित्रमद्भुतम् ॥२३॥ -

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
आपके वाहिर जाने पर विश्वनायजी के मन्दिर में जो विचित्र घटना हुई
आ आप उसको सुनिये । मन्दिर में भोग लगा कर कुछ समय के बाद पुजारी
जर घाहिर से मन्दिर के अन्दर घुसे तो उन्होंने देखा कि मन्दिर में सन्नाटा
छाया हुभा है ॥ २३ ॥
न विश्वनाथप्रियता न पूजक-
प्रवर्तिता कापि समर्चनक्रिया ।
न तत्र नैवेद्यविधी निवेदिता
विशिष्टनानाविधभोज्यविस्तृतिः ॥२४॥
श्री विश्वनाय जी अमसन्न हैं पुनारियों की पूजा को सर सामग्री गाया है
जिन पात्रों में भोग का सामान रखकर भोग लगाया गया था वह पात्र भी सपके
सब गायब हैं ॥२४॥
किमेतदाश्चर्यमिति स्वमानसे
विविच्य भूयः कृतपूजनक्रियः।
समर्चकैरत्र पुनः प्रकल्पिता
क्षणालयं तत्र ययो प्रतिक्रिया ॥२५॥
इस अद्भुत आधर्य को देखकर पुनारी पनमें बहुत विस्मित हुए और दुपारा
भोग लगाकर फिर रोन की तरह मन्दिर से कुछ देर पादिर पर कर भर
दुबारा फिर मन्दिर में प्रविष्ट हुए तो पटना पहिली जैसी ही नगर पड़ी । अत्रकी
मार पुनारियों के आचर्य का कद ठिकाना नहीं रहा ॥ २५॥
विलोक्य नष्टां पुनरर्चनक्रिया-
मितस्ततो पावनतत्परा जनाः।
मुनेरुपान्ते सकलामुपस्थिति
विलोक्य तस्थुर्जडतामुपागताः ॥२६॥
जा मन्दिर में दुबारा परी दुई भाग मामग्री मो भास्मान् गापर हो गई
तर पुमारियों के होस गुम हो गपे ये पर उपर मन्दिर के पारों भार भाग निकने
वारि मार दंग हा सर भोग सामग्री मापां समा में परी दुई पाई हम अप.
दिल पटना को पटी हुई दार पुनारी रिस लिथिन से गए ॥२६॥

द्वादशः सर्गः
--
१९१
निजापराधप्रतिनष्टबुद्धयो
यदास्य पादे लुलुठुनताननाः ।
मुनिस्तदायं भगवन्निवासतः
सुदूरमभ्येत्त्य ययावदर्शनम् ॥२७॥
आपके महत्त्व को न समझने वाले वे नष्टपुद्धि पुजारी लज्जित होकर अब
आपके समक्ष अपने अपराध की क्षमा प्रार्थना के लिये आपके चरणों की ओर
सपके तब आप मन्दिर से कुछ दूर चलकर अदृश्य होगए ।। २७ ॥
विचित्रवृत्तान्तगभीरगुम्फना
सुदुर्घटेयं घटना गृहे गृहे।
यदा ययौ विस्तृतिमुत्तरोत्तरं
तदा बभूव क्षुभितं नभस्तलम्॥२८॥
पर अद्भुत पटना जैसे २ काशी में फैलती गई तैसे २ मनुष्यों में घर २
भामर्यका ठिकाना न रहा सब मनुष्प घवदा कर इधर से उधर दौड़ने लगे ॥२८॥
इहत्यविद्वत्सु महानयं भ्रमः
परस्पराकर्षसजातसम्भ्रमः।
पुपोष वृद्धिं विविधाद्भुतक्रमो
मुनिर्वभूव प्रथमानविक्रमः ॥२६॥
यहां के पण्डितों में भी यह वृतान्त जब फर्णाकर्णि क्रम से फैलगया सब समस्त
काशी में आश्चर्य का ठिकाना न रहा और भगवान् श्रीचन्द्र इस घटना से सर्वत्र
प्रसिद हो गए ॥ २९ ॥
विनिर्गतोयं गगनाध्वना मुनि-
दशाश्वमेधेऽवतरन्नमस्तलात् ।
व्यलोकि सर्वैरधिकं धृतप्रभो
दिनोदये सूर्यइवाधिक प्रभः॥३०॥
विश्वनाथ के मन्दिर के पास अदृश्य होकर जब आप दशाश्वमेधपर आकाश
मार्ग से उतरते हुए दिखाई दिये तब ऐसा मतीत होता था कि मानो आकाशमार्ग
से दूसरा सूर्य उतर सा है ॥३०॥

१९२
जगदुरभीचन्द्रदिग्विजये
यथोचितं तस्य निशम्य विक्रम
स सोमनाथो धृतशर्वविग्रहम् ।
मुनि तमेवास्मरदात्मना भृशं
प्रशस्तकाश्मीरनिरीक्षितप्रभम् ॥३१॥
आपकी इस प्रकार की विचित्र घटना सुनकर पण्डित सोमनाय त्रिपाठी ने
अपने मनमें उसो मुनिवर का स्मरण किया जिसका अद्भुत पराक्रम वे कारमीर म
देख चुके थे ॥ ३१॥
समागतः कश्चिदलक्षितस्थितिः
शिवावतारो मुनिरित्यलं वदन् ।
समस्तकाशीस्थबुधब्रजस्तदा
सदएडपातं प्रणनाम तं मुनिम् ॥३२॥
यहां के विद्वान् आपको अचिन्त्य विक्रम सुनकर दूसरा शिव मानते हुए आपके
समक्ष में आकर साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए उपस्थित हुए ॥ ३२ ॥
सहागतं दर्शनविह्वलेक्षणं
स सोमनाथं मुनिरुत्कलोचनः।
समीत कएठग्रहपूर्वकं तदा
मुदाऽलिलिङ्ग स्मृतपूर्वकौतुकः ॥३३॥
अन्य विद्वानों के साथ आपके दर्शन के लिये आये हुए पण्डित सोमनाव
त्रिपाठी को देखकर मापने आलिङ्गन पूर्वक उनका स्वागत किया ॥ ३३ ॥
अनामयं कचिदिह स्थितस्य ते
वदेति पृष्टो मुनिना स कोविदः ।
भवत्पदाम्भोरुहदर्शनादिति
स्फुटं जगाद प्रणिपत्य तत्पदम् ॥३४॥
पास बैठने के अनन्तर आपने उनसे कुशल पूछ कर जैसे ही अपनी कृपा दृष्टि
का उनपर प्रप्तार किया वैसे ही त्रिपाठी जी ने प्रणाम पूर्वक अपना समस्त वृतान्त
'.
H
कहना आरम्भ फिया ॥ ३४ ॥

द्वादशा सः
-
-
भवद्दिदृक्षावशतो जिजीविपा
यथा धृताद्यावधि सा फलोन्मुखी ।
भवत्कृपात. समभूदिति ध्रुवं
"
मयाऽधुना निश्चितमस्ति सर्वशः ॥३५॥
आपने कहा कि आपका दर्शन प्राप्त करने के लिये जिस जीवन की आशा
को हमने आजतक स्थिर बनाया या वह आप की कृपा से सफल हुई ।। ३५ ॥
तदद्य विश्रम्य भवानुपस्थित
पदाश्रयं मां निजशिष्यपद्धतिम् ।
नयत्ववश्यं निजसन्धयाऽधुना,
सहप्रयाणेऽनुमति ददात्वलम् ॥३६॥
इसलिये आज यहा पर ठहर कर आप अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे अपना
शिष्य बनाकर अपने साथ चलने के लिये मुझे अनुमति दें॥ ३६ ॥
इति ब्रुवन्तं तमवेक्ष्य सादरं
सहप्रयाणाय कृतस्वनिश्चयम् ।
स सोमनाथं पदयोरुपस्थित
तदाऽन्वमस्त स्मितमात्रसूचनः ॥३॥
निपाठी जी की विनयावनत यह प्रार्थना सुनकर आपने अपने साथ रहनेको
तो उनको अनुमति देदी परन्तु शिष्य बनानेकी मार्थना पर अभी आपने
ध्यान नहीं दिया ॥ ३७॥
भनुग्रहं तादृशमस्य दैवतः
स सोमनाथः समवाप्य विस्मितः ।
यमप्रमेयं प्रमदं तदा दधो
सकेन वक्तुं भुवि शक्यतेऽधुना ॥३८॥
इस अवसर में त्रिपाठीजी ने आपसे यह अनुग्रह प्राप्त कर अपने मनमें निस
आनन्द का अनुभव किया उसका इस समय कहने के लिये कौन समर्थ हो
सकता है १ ॥३८॥

१९४ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये गृहेगृहे मङ्गलतूर्यनिःस्वनैः पदेपदे सत्कविगीतसंस्नवैः। समचितोयं मुनिनायकस्ततः प्रसन्नचित्तो गमने रुचिं व्यधात् ॥३६॥ यहां पर घर २ में मङ्गलगान और पद २ में स्वागत स्तव सुनकर आप यहां से अगादी जाने के लिये अपनी इच्छा प्रगट करने लगे ॥ ३९ ॥ विभूतिदानेन समस्तभूतिदः शिवावतारः स तदा सरित्तटे । निजामिकुएडादवचित्त्य यहदी तदेव सम्पत्तिकरं तदाऽभवत् ॥१०॥ चलने के समय आप के पास जिस २ कामना को लेकर जो २ सज्जन आये आपने उन सबको अपने अमिकुण्ड की विभूति देकर सबका मनोरथ पूर्ण कर दिया ॥४०॥ निजानुमत्या समुपस्थितं पदे स सोमनाथं बहुपण्डितानुगम् । सहानुगृह्य प्रतिपूजितो जन- स्तिः प्रतस्थे नगरं गयाभिधम् ||११|| अपनी अनुमति से अनुगृहीत पण्डित सोमनाथ त्रिपाठी को अन्य अनेक पडिण्तों साथ चलने के लिये उद्यत देखकर आप यहां से गया के लिये पस्थित हुए ॥४१॥ इहस्थितं वौद्धमठं विलोकय- नवस्थितं फल्गुनदीतटेश्वटम् । यदाऽलुलोके शतशस्तदाऽभव- विमुक्तबन्धाः समतीत्य फल्गुताम् ॥४२॥ गया में पहुचकर आपने सर्व प्रयम यहां के प्रसिद्ध बौद्ध मठ को देखा जिसमें अनेक वाद भिसु रहते थे। इसके अनन्तर फल्गु नदी के तट पर विद्यमान एक - *

द्वादशः सर्गः
-
अवट अर्थात् गर्त को देखा जिसमें पड़े हुए बहुत से माणी आपके दृष्टिपात में
मुक्त होकर अपने २ पदों को प्राप्त हुए ॥ ४२ ॥
शिवावतारस्य तदा विलोकना-
त्पिशाचभावं प्रगता गयोदरे ।
विहाय कर्मानुगतां पिशाचतां
न के बभूवुर्मनुजा गतव्यथाः ।।४।।
गया आपके पहुंचने पर पिशाच भाव को प्राप्त हुए बहुत अन्य प्राणी भी
आपका दर्शन प्राप्त कर पापों के फल में प्राप्त पिशाच भाष को छोड़ कर सद्यः
बन्धन से मुक्त हो गये ॥ ४३ ॥
विहारभूमौ समुपागतं मुनि
निपीय तत्मान्तगता महोदयाः।
मुनिव्रतं धारयितुं समुद्यता
बभूवुरावालमुदीर्णकीर्तयः॥४॥
विहार मान्त में आपका आगमन सुनकर उस प्रान्त के बहुत से सम्मम
आपसे मुनिव्रत लेने के लिये अपनी २ इच्छा प्रकट करने लगे ॥४४॥
असावपि प्रान्तगतानिहागता-
विलोक्य दैवेन पदं समागतान् ।
मुनिव्रते सादरमुद्दिधीर्षया
नियोजयामास नियन्त्रितक्रियः ॥४५॥
आपने उनकी प्रार्थना सुनकर उनके उद्धार की कामना से उनको उदासीन
मार्ग की दीक्षा देकर भव सम्बन्धी बन्धनों से सर्वदा के लिये उनको मुफ
किया॥४५॥
समाश्रितानां निजदीक्षयामुनि-
विधाय सर्वोन्नतिमुत्तरस्थितम् ।
विहारभूमएडलमएडनं जवा-
जगाम तत्पाटलिपुत्रमुन्नतम् ॥४॥

- .. जगद्गुरभीचन्द्रदिग्मिजये शरण में आए हुये समल मनुष्यों को अपनी दीक्षा से उन्नति की ओर लगा कर आप यहां से उत्तर भाग में वर्तमान पाटलिपुत्र पहुँच ॥ ४६॥ अवाप्य गङ्गातटभूमिनिर्मितं पुरं मनिर्देशदिदृक्षया ततः । द्रुतं समुत्तीर्य सुरापगामगा- दनुत्तमं शोणपुरं पुरः स्थितम् ॥४७॥ गगा तट पर अवस्थित इस पाटलिपुत्र में पहुच कर आप देश दर्शन की इच्छा से गगा के उस पार वर्तमान शोणपुर के लिये चले गये ।। ४७ ।। अवेक्ष्य तत्राद्रुतमेकविग्रहं हरं हरि भिन्नगुणाश्रयं समम् । व्यवस्थित भेदमपास्य कल्पितं परामयं निर्वृतिमाप हर्पितः ॥४८॥ वहां पहुच कर आपने भिन्न भिन्न गुणाश्रय हर और हरि को एक विग्रह में अपस्थित देख कर वर्तमान समय में विद्यमान कल्पित भेद भाव को सर्वया निर्मूल समझ कर अपने मन में एक विचित्र आनन्द का अनुभव किया ॥४८॥ प्रणम्य तत्रायमलं महेश्वरं रमेश्वरं विग्रहमेकमाश्रितम् । निवृत्य तस्मात्पुनराप सत्वरं । 'तदेव शौद्धोदनिजन्मनः पदम् ॥eel अन्त में आपने इस हरिहरक्षेत्र में रमेश्वर और महेश्वर को एक विग्रह में देख कर प्रणाम किया भार यहा से गङ्गा जी को उतर कर फिर पाटलिपुत्र में प्रवेश किया ॥४९॥ बलेन तत्रायमुदस्य वादिनां मतं विवादे बलवत्पुरोगतम् । जयाङ्कमचं निचखान मन्दिरे महद्धर्ज चौद्धविमर्दनक्षमम् ॥५०॥' PM द्वादश मर्गः १९७ यहां पर आकर आपने शास्त्रार्थ में वादियों द्वारा उपस्थापित बौद्ध मत का तिलशः खण्डन करके विजय सूचफ अपना वृहद्ध्यन गाद दिया जो कि आज भी बहुत दूर से दीख रहा है ॥ ५० ॥ विजित्य तत्पाटलिपुत्रसङ्गतुं क्रमेण कन्दिमहरलं ततः । समाप तद्राजगृहं प्रतिष्ठित विहारभूमेः कटकं यदुच्यते ॥५१॥ पाटलिपुत्र में एकत्र हुए कर्मन्दियों के बल को हटाकर आपने यहां से रान- गृह के लिये प्रस्थान किया जो कि विहार प्रान्त का दुर्ग समझा जाता है। [ कर्मन्दकशाश्वादिनिरिति पाणिनिः ] ॥५१॥ गिरिद्वयान्तर्गतगहराङ्कितं सततकुएडं सवनं सनिझरम् । विलोक्य तद्राजगृहं महोन्नतं निनाय तत्रैव दिनानि कानिचित् ॥५२॥ दो पर्वतों के बीच में अनेक गुहाओं द्वारा सब ओर से पिरे हुये तथा तप्त- कुण्ड, वन और नि:रों से अति सुन्दर इस रामगृह को देख कर आपने पहा छ दिन ठहरने का निश्चय किया ॥५२॥ इदं जरासन्धविनिर्मिताननं विहारभूमेः प्रथितं गुहागृहम् । विलोक्य बौद्धैरभितः समावृतं विवादयुद्धे मतिमादराददात् ॥५३|| प्राचीन समय में यहां पर जरासन्ध का एक बड़ा मारी दुर्ग था जिसमें गुफाओं के रूप में अनेक भूगर्भगृह बने हुये थे घोड़ों ने इस दुर्ग के आस पास बहुत से मठ नियत कर दिये इसी लिये आपने भी यहां पर उहरने का सङ्कल्प फिया ॥ ५३॥ इहत्यकापालिकसङ्घमागतं विजित्य वादे पुरतः प्रतिष्ठिनम् ।

जगद्गुरभीचन्द्रदिग्विजये स शाक्तसङ्घ क्षपणैः प्रणोदितं विमर्दयामास बलेन सद्धलः ॥५॥ सबसे प्रथम वहां पर आपसे शास्त्रार्य करने के लिये कापालिक आये इनके अनन्तर रुपणकों के भेजे हुये शाक्तगण आये आपने शास्त्रार्य में इन दोनों को परास्त कर विजय माप्त किया ॥ ५४॥ विनिर्गतानस्य भयेन वादिनो निशम्य पश्चाच्छमणास्तथागताः । प्रदुद्रुवुः केचन कान्दिशीकता- मुपेत्य सिंहारिणा इवागताः ॥५५॥ वादी जनों को.आपके भय से भागा हुआ सुनकर यहा के तयागत और श्रमण इस प्रकार मैदान छोड़ कर भागे जैसे सिंह से भीत होकर हरिण गण भागते हों ॥५५॥ इति क्रमेणात्र समागतानलं शिलालिनो नास्तिकतामुपागतान् । विमर्दयन्नुग्रवलेन जित्त्वरः स गृध्रकूटं नगमाप गत्त्वरः ॥५६॥ इस प्रकार क्रम क्रम से आये हुये नास्तिक शिलालियों को उन बल से विवाद युद्ध में परास्त कर आप यहां से गृध्रकूट पर्वत को चले ॥५६॥ इहापि शाक्तैर्यवनैरनारतं प्रबञ्चितान्भैरवभूतजीवनान् । निजोपदेशनिगमानुमोदका- विधाय पश्चादगमदनादनम् ॥१७॥ यहां पर भी शाक्त और यवनों द्वारा पश्चित किये हुये भैरव एव भूतों के उपासक किरात कोल तथा भिल्लों को अपने सदुपदेशों द्वारा अच्छे मार्ग में १ लगाकर आप यहां से अनेक गव्हर पनों में प्रविष्ट हुये ॥५७ ॥ - द्वादश सगः १९९ ६ परिभ्रमन्नेवमितस्ततो वनं: स भिल्लपल्लीः समतीत्य मार्गगाः। शिवावतारः शिवतातिरादरा- दशाननेनादृतमाप शङ्करम् ।।५८॥ गृध्रकूट के परिसर में वर्तमान वनगत अनेक भिल्ल पछियों को देखते हुये आप अन्त में रावण के द्वारा लाये हुये एक शिवजी के मन्दिर में पहुचे ॥ ५८ ॥ शिवोयमस्मिन्विजने महावने दशाननेनाप्रतिमेन दैवतः। क्षिताचकस्मान्निहितः क्षणादलं विवेश पातालतलं महाविलम् ॥५६॥ ये शिवजी महारली रावण ने किसी कारण घश कैलाश से लाफर यहां पर वन में लाकर रख दिये थे जो पाताल तक प्रविष्ट होकर दुवारा रावण से भी नहीं उठाये जा सके ।। ५९॥ ततः प्रभूत्यत्र शिवार्चने रतः स वैद्यनाथाभिधया समर्चितः। ददाति भुक्तिं कृपया तदुत्तरं विमुक्तिमप्यादरतः प्रतिष्ठितः ॥६॥ तब से अब तक आप इसी वन में विराजमान हैं शिव पूजक आपको वैद्य- नाय के नाम से अर्चित कर आपकी दी हुई मुक्ति और मुक्ति दोनों का उपभोग कर रहे हैं ।। ६०॥ समर्चयनत्र मुनिः क्रमागतं पथि स्थित श्रीमधुसूदनेश्वरम् । प्रणम्य तेनानुमतः पुरोगतं स मन्दरं भूधरमारुरोह तम् ॥६१॥ आपने भी यहां पर श्री वैद्यनाथ शिव का पूजन कर यहा से पूर्व भाग मे अवस्थित श्रीमधुसुदनेश्वर की दर्शनेच्छा से प्रस्थान किया जोकि वर्तमान समय में जिला भागलपुर के अन्दर है ॥६॥ -- २०० . जगद्गुणत्रीचन्द्रदिग्विजये अयं नगेन्द्रः समुपागतैर्जनै- नितान्तमद्यापि मुहुर्विलोकितः। सुरासुरैर्वासुकिवेष्टनाङ्कितो दिशत्यमन्दं कृतमब्धिमन्यनम् ॥६२॥ यहां पहुंचकर आपने मधुसूदनेश्वर जी का दर्शन कर, इसी के पास विद्य- मान मन्दराचल का निरीक्षण किया । जो वर्तमान समय में भी वासुकिवेष्टन का चिह्न रखता हुआ आज भी आगत सजनों को समुद्र मन्थन का स्मरण करा रहा है ॥२॥ प्रशस्तनानाविधविस्मयाकर विलोकयन्नप्रतिमं स मन्दरम् । जवाजयी तत्पुरमाप यजनैः क्षिती नवदीपपदेन गीयते ॥६॥ अनेक विस्मयों के आकारभूत इस मन्दराचल को देखकर आप यहां से नवद्वीप की ओर प्रस्थित हुए जो अङ्ग और वन के उत्तरकोण में विद्यमान है ॥६३॥ इहत्यविद्वद्भिरलं समर्चितः शिवावतारो मुनिरेप सत्वरम् । कलिङ्गबङ्गाङ्गजनैः प्रतिष्ठित प्रसिद्धमेकं नगरं समागमत् ॥६॥ नवद्वीप के विद्वानों से सत्कृत होकर आप नवद्वीप से कामरूप देशगत कामासी नगर के लिये प्रस्थित हुए जो उस प्रान्त का सर्वोत्तम स्थान है ॥६॥ अहर्निशं यत्र जनैः प्रगीयते शिवेतिवर्णद्वयमेव साधकैः। स कामरूपः प्रथितोस्य भूपतिः शिवावतारस्य समर्चनं व्यधात् ॥६५॥ 1 जिस नगर में मायः उपासक गण शिवा-शिवा कहते हुए दो अक्षर वाले इसी नाम को रटा करते है उस भान्त के राजा ने आपको शिवरूप मानकर आपका बड़ा सम्मान किया ॥६५॥ tha 1 - २०१ " . T " 1 द्वादशः सर्गः नतेन भक्त्या शिरसा मुनेः पदं शिरस्यवस्थाप्य महीभुजा कृतम् । यदहणं तन्न कदापि शक्यते ।।। प्रवक्तुमस्मद्विधकाव्यकोविदः ॥६॥ भक्ति से विनत उस कामरूपेश्वर ने आपका चरण कमल अपने शिर पर रखकर जो आपका पूजन किया उसका वर्णन वर्चमान समय के कविगण नहीं कर सकते ॥६६॥ इतो निवृत्य प्रणतार्तिहा मुनिः समुद्रतीरस्थितमुच्चगोपुरम् । ; .. नभोविभागादवतीर्य सत्वरं विवेश रम्योत्कलमण्डनं पुरम् ॥६॥ पूर्व दिशा के इस अन्तिम नगर से आप कामाक्षी का दर्शन करके समुद्र तट पर वर्तमान जगन्नाथपुरी के लिये प्रस्थित हुए ॥६७॥ हरिं जगन्नाथमिह प्रतिष्ठितं शिवावतारो मनिरेप सादरम् । प्रणम्य तत्रैव समुद्रसन्निधौ निजाधिवासं समकल्पयच्छिवम् ॥६॥ उत्कल देश के प्रधान केन्द्रभूत पुरी में पहुंचकर आपने नगमायनी का दर्शन कर समुद्र के तट पर अपना निवास स्थान नियत किया जो अब तक विद्य- मान है ॥६८॥ समागतं दिग्विजयप्रधर्पित- प्रकाएडविद्गणमएडनं मुनिम् । विलोक्य तत्तदिपयेषु विस्तृता विवादवाञ्छा समभूदिरोधिनाम् ॥६|| दिग्विजय मसद्ग से अनेक दिग्विनयी पण्डितों के साप यहां आये हुये आप को देख कर विरोधी पण्डितों के मन में शास्त्रार्थ करने की इच्छा हुई ॥ ६९ ॥ .

२०२ - " -- - जगदुरुमीचन्द्रदिग्विजये सहागतं केचिदुदनमुत्कलाः समीक्ष काशीस्थबुधवजं भयात् । प्रदुद्रुवुः पण्डितमानिनो जना दिशां मुखानि प्रसभं विनिर्जिताः ॥७॥ आपके साथ में दिग्विजयी पण्डित सोमनाय आदि भी उपस्थित थे उनको देखकर पण्डितम्मन्य यहां के वादीभट शास्त्रार्थ में हार कर इधर उधर भाग निकले ॥ ७० ॥ निराहताः केपि विनष्टबुद्धयो बुधवजेनानुगतेन सत्वरम् । विवादयुद्धे मनुजास्त्रपावशा- न्मनोदधुस्तत्र समुद्रमज्जने ॥७१॥ कुछ पण्डित शास्त्रार्थ में हार कर लजा और भय के कारण इधर उधर न जाकर सर्वदा के लिये समुद्र में छिपने के लिये उद्यत हुये ॥ ७१ ॥ विनिर्गतानस्य भयेन पण्डिता- निशम्य सर्वे मनुजाः पुरीगताः। मतं मुनेरस्य मुदा मनःपथे निवेश्य दास्यं प्रययुः समन्ततः ॥७२॥ आपके भय से इस प्रान्त के प्रधान प्रधान पण्डितों को भागा हुआ सुनकर जगनाथ पुरी के रहने वाले अन्य समस्त सज्जन आपका सिद्धान्त अनेय समझ कर आपका दास्य स्वीकार करने पर उद्यत हुये ।। ७२ ॥ युगाष्टवाणेन्दुमितेन वैक्रमे मधाचुपते सितपञ्चमीदिने । स सोमनाथं नियमेन शिप्यता-- निनाय पुयीं मुनिदीक्षया मुनिः ॥७३॥ इसी जगमाय पुरी में विक्रम सवत् १५८४ चैत्र शुरु पञ्चमी के दिन आपने - -० बादशः सर्गा २०३ - ॥ सोमनाथ त्रिपाठी को नियमानुसार उदासीन मत की दीक्षा देकर सोमदेष नाम से अपना शिष्य बनाया ।। ७३ ।। प्रसङ्गतोस्मिन्समये समागतः प्रसिद्धचैतन्यमहाप्रभुः प्रभोः। पदारविन्दानुरतः क्रमान्मुनेः प्रसादपात्रं समभूदिनिर्जितः ॥७॥ प्रसङ्ग से इसी समय आपके पास चैतन्य महाप्रभु भो आप से मिलने के लिए आये हुए थे जा विचार के समय आपके समक्ष निरचर होकर आपके दास बन गए ॥७४।। इह प्रतिष्ठाप्य मठं महोदयः स वालहासोदितपद्धतेः शिवम् । क्रमादुदासीनपथप्रवर्द्धनो मुनिर्वभूवातितरां कृतक्रियः ॥७॥ पुरी मे समुद्र-तट पर जहां आप ठहरे हुए थे वहां पालदास पद्धति के मगुदास उदासी ने एक स्थान बनाया था, जो अब मगु मठ के नाम से प्रसिद्ध है । यहा पर इतना काम करके आप कृतकृत्य हो गए ॥७५।। ' अनेकविदजनमण्डलाग्रणीः सासोमदेवोपि गुरोरनुज्ञया। सहैव तिष्ठन्विजये कृतोद्यमः प्रकम्पयामास मनांसि विद्विपाम् ॥७६|| इधर सोमदेव भी अब नियमानुसार उदासीन वनकर आपकी आशा से आपके साथ रहते हुए दिग्विजय के कार्य में सर्वदा दत्त चित्त होकर रिपतियों का मुखमर्दन करने के लिए सन्नद्ध होगए ७६॥ महेन्द्रगुप्तां दिशमेवमादरा- द्विजित्य वादे निगमानुमोदितम् ।

२०४ -- । जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये । “शिवावतारो मुनिरेष सत्वरं मतं मुनीनामनयन्महोदयम् ॥७७॥ भगवान् श्रीचन्द्र जी इस प्रकार महेन्द्रगुप्त पूर्व दिशा को धर्मयुद्ध में जीतकर इस प्रान्त में वेद प्रतिपादित उदासीन मत को अपने परिश्रम से उन्नति पर पहुँचा गए ॥७॥ प्रमगमेवं भगवत्कृपावशा- समाप्य हर्पण मयापि नीयते । दिनान्तभागेऽवसितिं क्रमागत- क्रमेण सर्गोपि निसर्गसुन्दरः ॥७॥ आपके दिग्विजय प्रसङ्ग में इतना ही कह कर अब हम भी दिन के अन्त भाग में इस सर्ग को इसी वृत्तान्त के साथ-साथ समाप्त करते है ॥७८॥ इतः परं दिग्विजयप्रसङ्गतो- ऽवशिष्टवृत्तं प्रमभं दिदृक्षुभिः। महोदयैरग्रिमसर्गदर्शने मनः प्रदेयं मुनिमएडलानुगैः ॥७॥ इससे अग्रिम दिग्विजय का प्रसङ्ग मिन महानुभावों को देखना हो वे इस महाकाव्य के अग्रिम सर्गों का अवलोकन करें ।।७९॥ इतिश्री सनाट्यवशोद्भव कविवर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते । सतिला जगद्गुरलाचन्द्रदिग्विजये महाराव्य पूर्वदिग्विजयो नाम द्वादश सर्ग 1 -

-
त्रयोदशः सर्गः
----
..
.
। अथ प्रतस्थे भगवान्मुनिमण्डलमएडनः ।
परीतो बहुभिः शिष्यैः पुरं जनकपालितम् ॥१॥
तन्त्र नानामुनिजनैः कृतनानाविधार्थनः ।
उदासीनपथं तेने सनकादिप्रवर्तितम् ॥२॥
दिनानि कतिचित्तत्र मुनिभिः सह संचसन् ।
दिव्यं हरिहरक्षेत्रं पुनराप मनोहरम् ॥३॥
एकमूर्तिनिविष्टाहो देवौ हरिहरौ नमन् ।
नैमिपारण्यमगमत्पुराणाचार्यसत्कृतम् ॥४॥
व्यासादिमुनिभिस्तत्र कृतवासे मनोरमे ।
बने दिनानि कतिचिन्निनाय नतशङ्करः ॥५॥
सुलक्षणाकृतध्यानः स्मृतमात्रो नभस्तलात् ।
सन्धामनुसरन्नेप देशं पञ्जनदं ययौ ॥६॥
तत्रावतीर्य नभसो मुनि रदवद्रुतम् ।
पुरं जलन्धरनाम प्रतिभामण्डितं व्यधात् ॥७॥
। समागतैरयन्तत्र वीरैः क्षत्रियपुङ्गवैः
सहायमगमत्सद्यः सुलतानपुरं महत् ॥८॥
भक्तः सुखदयालस्तत्पुरस्थं यवनेश्वरम् ।
मुनेरस्य प्रभावेण हर्पितः समसूचयत् ।।६।।
प्रभावितः स यवनो मुनेरस्य प्रभावतः।
विहाय हिंसामभजद्भगवन्तं महेश्वरम् ॥१०॥

२०६ जगदात्रीचन्द्रदिग्विजये नानाविधकथालापर्यवनं विनियोधयन् । .मुनिरेप दयादानतत्परं समकल्पयत् ॥११॥ पूर्व दिग्विजय के अनन्तर भगवान् श्रीचन्द्र जी अनेक शिष्यों के साय जग- माय पुरी से मस्थित होकर जनकपुर पहुंचे। यहां पर अनेक मुनिजनों की प्रार्थना से आपने सनकादि मुनि मवर्तित उदासीन मार्ग का प्रचार किया । कुछ दिन मुनियों के साथ यहां ठहर कर आप यहां से दुवारा हरिहरक्षेत्र पहुंचे। वहां पर एक विग्रह में अवस्थित हरि और हर को प्रणाम कर आप यहां से नैमिपा- रण्य पहुंचे, व्यास आदि अनेक मुनिगण से मिल इस वन में कुछ दिन निवास कर आप यहां से माता जी के स्मरण करने पर नभोमार्ग से पञ्चनद की ओर चले, वहां पर देवर्षि नारद की तरह आकाश से अवतीर्ण होकर आपने जालन्धर नामक नगर को अलंकृत किया यहां पर दर्शनार्य उपस्थित भक्त सुखदयालु आदि अनेक वीर क्षत्रियों के साथ आप यहां से सुलतानपुर पहुंचे। यहां के नवाव दौलतखां लोदी के पास जाकर भक्त सुखदयालु ने आप के प्रभावों की बहुत कुछ प्रशसा की जिससे प्रभावित होकर नवाव आपका भक्त वन गया और आपके सदुपदेशों से हिंसा आदि कुकर्मों को छोड़ कर दया और दान आदि उत्तम कामों में मवृत्त हुआ ॥ १-११॥ ? पुरादस्मादपि मुनिः करतारपुरं परम् । समेत्य नगरादूरमासनं समयोजयत् ॥१२॥ समागतं निजसुतं समाकर्य तदम्बिका । लक्ष्मीचन्द्रेण सहिता समायाता तदाश्रमम् ॥१३॥ पस्थितां निजामम्बां वीक्ष्य तस्याः पददयम् । मुनिरेप यथाशास्त्रमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥१॥ कञ्चिदम्ब वियोगेन मम दूनासि यद्भुतम् । दूरस्थितं निजप्रेम्णा मामुपस्थितमस्मरः ॥१५॥ एवं बहुविधप्रश्नः समाश्वास्य मुहुर्मुनिः । मातरं साश्रुनयनां ववन्दे पदयोः पतन ॥१६॥ A २०७ .. । त्रयोदशः सर्गः लक्ष्मीचन्द्राभिधं पश्चादनुजं मृदुपाणिना। . "परामृशन्नतपदं मुनिः पप्रच्छं तदगितम् ॥१७॥ मात्रा पुनः कृतान्प्रश्नानाकर्य विविधकमान । कापिलैरुत्तरः सम्यक् तोपयामास मातरम् ॥१८॥ निपीय सूत्तरं माता श्रीचन्द्रवदनोद्गतम् । , । परां निर्वृत्तिमापेदे गतमोहव्यथाऽभवत् ॥१६॥ अनुरोधादयं तत्र मातुः कर्तव्यगौरवात् । मासान्कतिचिदास्थाय धर्मचर्चामवर्धयत् ॥२०॥ इसके अन्तर आप यहां से करतारपुर पहुँचे और नगर के बाहर अपना आसन लगाया । आपको यहां पर आया हुआ सुनकर आपकी माता लक्ष्मीचन्द्र को साथ लेकर आपके पास पहुंची। माता जी को देखकर आप आसन से उठे और मर्यादानुसार उनको प्रणाम फर कहने लगे कि मेरे वियोग में आपको क्या कष्ट हुआ, जिसके लिये आपने मेरा स्मरण किया ? इस मकार अनेक प्रश्न करने पर आपने माता जी को बहुत सान्त्वना दी और अपने भाई लक्ष्मीचन्द्र को आशी- र्वाद देकर बहुत काल तक उनके साथ वार्तालाप किया इसके अनन्तर माता ने आपसे कुछ शास्त्रीय प्रश्न किये, जिनका उत्तर आपने सांख्यपद्धति से दिया, माता आपके उत्तर को सुनकर आनन्द में मग्न हुई और अज्ञान रूप मोह को छोड़ कर ज्ञानवती होगई । माता के अनुरोध से आप यहां पर कुछ दिन ठहर कर सनात- नधर्म की चर्चा से अपने समय को व्यतीत करते रहे ॥ १२-२० अस्मिन्नेवान्तरे तत्र लक्ष्मीचन्द्रोऽनुजो मुनेः। लोकान्तरं प्रतिगतो धर्मचन्द्रमिह त्यजन् ॥२१॥ तमयं भ्रातरि ते भ्रातृव्यं समुपस्थितम् । कुलतन्तुमनुस्मृत्त्य निजवंशप्रवर्धनम् ॥२२॥ उदासीनपथाभिन्नां ऋपिदीक्षामनुत्तमाम् । तस्मै प्रदाय विधिवच्छिष्यतामनयन्मुनिः ॥२३॥ ॥ - . . -- २०८ - जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिमिजये दीक्षामिमामनुपाप्य गृहस्थोपि यथोचिताम् । कर्तुमर्हति आणि यथापूर्व नृपः पृथुः ॥२४॥ भ्रातृव्यमेवं विधिवद्दीक्षितं प्रविधाय सः । पितुरप्यागतस्यात्र ननाम पदपङ्कजम् ॥२५॥ त्रिवार्षिकमिमं त्यक्त्वा गृहे पुत्रं पिता वनम् । ययौ तदुत्तरमयं नापश्यन्मुनिमात्मजम् ॥२६॥ द्वात्रिंशदर्पदेशीयमात्मजं नानको गुरुः । विलोक्य नयनद्वन्द्वमद्य दिव्यफलं व्यधात् ॥२७॥ एवमत्र गते काले मुनिर्बहुतिथे द्रुतम् । ययावितो गुरुपदं काश्मीरविपयस्थितम् ॥२८॥ दिनानि कतिचित्तत्र विश्रम्य गुरुसन्निधौ। ययौ ततोपि कर्तव्यपारवश्येन सत्वरम् ॥२६॥ - वाणाङ्कवाणेन्दुमिते विक्रमे वत्सरे मुनिः । सीमाप्रान्तगतं पेशावर पत्तनमभ्यगात् ॥३०॥ इसी अवसर में आपका अनुज लक्ष्मीचन्द्र परलोक सिधारा और धर्मचन्द्र नामक अपने पुत्र को आपके आश्रय में छोड़ गया। भाई के स्वर्ग सिधारने पर आपने अपने भतीजे को अपने भावी वश का एकमात्र मूल समझ कर उसके लिये उदासीन मत से अभिन्न पि दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। यह वह दीक्षा है जिसको प्राप्त होकर मनुष्य गृह में रहकर भी मोक्ष प्राप्ति के साधन कर सकता है, जिस प्रकार पूर्व समय में महाराजा पृथु ने किया था। अपने भ्रातृव्य'को इस प्रकार विधिपूर्वक अपना शिष्य बनाकर आपने अपने समीप आए हुए अपने पितृदेव को प्रणाम किया । आपके पिता आपको घर में तेन वर्ष का छोड़कर तीर्थाटन के लिये यर से चले गए थे तब से अब तक मिलने का कोई अवसर नहीं आया । आज दैवयोग से बत्तीस वर्ष के बाद यह अवसर प्राप्त हुआ जिसमें पिता ने पुत्र का देखकर अपना नयनयुगल सफल किया । इस प्रकार यहाँ पर बहुत समय वीतने पर आप यहा से काश्मीर चले गए । वहा H २०९ ग्रयोदशः सर्गः पर गुरुजी के पास कुछ दिन ठहर कर १५९५ विक्रम संवत् में आप अपना कर्तव्य करने के लिये पेशापर चले गए ॥२१--३०॥ अत्रागतं मनिवरं समाकार्यातिहर्पितः । कश्चित्सांयात्रिको भूरि द्रव्यमस्यपुरो न्यधात् ॥३१॥ असो पोतवणिक्पूर्व समुदे विपणीकृतम् । पोते निधाय विविधद्रव्यं देशान्तरादगात् ॥३२॥ मध्येसमुद्रमागत्य यदा पोतः प्रकम्पितः । झञ्झावातैस्तदा पोतवणिक सस्मार तं मुनिम् ॥३३॥ स्मृतमात्रेण मुनिना समुद्र स्थिरतागते । सांयात्रिको निजां यात्रां पूरयामास दैवतः ॥३४॥ सएवायमिहागत्य धनं भूरि न्यवेदयत् । मुनये मुनिरप्याशु तेनधर्मस्थलं व्यपात् ॥३५॥ श्रीचन्दधर्मशालेयमद्यापि बहुभिर्जनः । गीयते यत्र बहवः कुर्वन्ति हरिकीर्तनम् ॥३६॥ अहर्दिवमिह प्रेम्णा धृताक्ताः पञ्चदीपकाः। प्रज्वाल्यन्ते बहुजनैर्धर्ममार्गानुयायिभिः ॥३७॥ एवमत्र निजे धर्म व्यवस्थाप्य सनातनम् । प्रतस्थे यावनं देशं मुनिरेप महाबलः ॥३॥ आपको यहां पर आया हुआ सुनकर एक सायानिक बहुत सा धन लेकर आपको भेट करने के लिये आया यह सौदागर विदेश से माल भर कर अपने देश को लौट रहा था कि इतने ही में मार्ग में समुद्री तूफान आने से जहान दूबने लगा जिस समय यह घटना हुई उसी समय सौदागर ने आपका ध्यान फिया जिससे समुद्र स्थिर हो गया और सौदागर लाग्दों रुपयों का माल लेकर घर आ गया । घर भाते ही उसने इदते ददते आपको पेशावर में पाया। आपने भी उस द्रव्य से पेशावर में एक स्थान बनाया जो आज भी पीरन्द्र धर्मशाला २१० जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें पेशावर के सब हिन्दू आज भी एकत्र होकर हरि- कीर्तन और धर्म-चर्चा करते हैं । इस स्थान में अहर्निश पांच घृत के दीपक जलते हैं जिनको यहां के लोग ज्योति कहते हैं । इस प्रकार आप यहां पर अपने धर्म को व्यवस्था करके यहां से काबुल के लिये पस्थित हुए ॥३१-३८॥ अनागतमिमं वीक्ष्य बहवो यवना अपि । विहाय यावनं मागं हरिभक्तिमुपागमन् ॥३॥ एकोत्र यवनो हित्वा यावनं मतमादरात् । रामभक्तिपरो भूत्वा बभ्राम यवनबजे ॥१०॥ तथाविधं तमालोक्य यवनं हरिकीर्तनम् । चुनुभुर्बहवो धूर्ता यवना वेदविदिषः ॥११॥ अर्थकदा हरिपदं गायन्तं तमितस्ततः । समेता यवनाः पायाः पथि लोप्ठेरताडयन् ॥४२॥ भगवद्जनध्यानसमासक्तः स सत्वरम् । मुनेराश्रममागत्य हरिमेव सदाऽस्मरत् ॥४३॥ तथावस्थमिमं वीक्ष्य ये प्रहर्तुमुपागताः। यवनास्ते मुनेःशापाबभूवुर्गतचक्षुषः ॥४॥ पदात्यदमपि प्राणपरित्राणे कृतोद्यमाः। गन्तुं यदा न शेकुस्ते तदा मूर्खामुपागमन् ॥४५॥ अपराधक्षमाभिक्षां यदातेत्र ययाचिरे। तदा मुनिस्तानवददक्तोयं जानकीपतेः ॥४६॥ यदि जीवितुमिच्छास्ति भवतां भुवने तदा । प्रार्थनीयः सएवाद्य हतोयः पथि कङ्कणैः ॥१७॥ मुनेरिदं वचः श्रुत्वा वहवो यवना सुराः । तमेव भगवद्भक्तं क्षमाभिक्षां ययाचिरे ॥४॥ - ।

। प्रयोदशः सर्गः सोपि नैवं पुनःकार्यमित्युक्त्वा मुनिसन्निधौ । निपएणः प्राह भगवत्पदं भजत रेशठाः॥४६॥ एवं यबनसाम्राज्ये बहुदर्शित विक्रमः । मुनिरेप ततोप्यो गान्धारं देशमभ्यगात् ॥५०॥ काबुल में पहुंच कर आपने एक तृण कुटीर में विश्राम किया और अखण्ड धूनी लगाकर अपने कार्य का आरम्भ किया । यहां पर बहुत से यवन आपको आया हुआ सुनकर आपके दर्शनार्थ आने लगे और आपका उपदेशामृत पानकर हरि भक्ति में आसक्त हुए। बनोरखां नामक एक यवन आपके प्रभाव से प्रभा- वित होकर अपने मत में अश्रद्धा करके पूर्णरूप से रामभक्त होकर यवनों में घूमने लगा । उसको ऐसा देखकर बहुत से हिन्दूधर्म के द्वेषी ययन क्षुब्ध हो उठे । ऐसी परिस्थिति में एक दिन वह खड़तालों पर हरिकीर्तन करता करता यवन मन्दिर के पास होकर निकल रहा था कि उसके ऊपर यवनों ने देले फेंकने आरम्भ किये । वह उनको कुछ परवाह न करता हुआ कीर्तन करते-करते आपके आश्रम में पहुंच गया । उसका पीछा करते हुए कुछ यवन वहां पर भी पहुंचे जहां पर आप समाधिस्य थे। आपने जैसे ही उनकी आंख खोलकर देखा वैसे ही वे सब अन्धे हो गए और पृथिवी ने उनके पैर जकड़ दिये। आपके इस चमत्कार से जब वे एक कदम भी अगाड़ी न चल सके तर ये सबके सर मूर्षित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और अपने अपराधों को आपसे क्षमा मांगने के लिये विवश हुए । आपने उनकी तरफ देखकर कहा कि यह वजीरखा रामचन्द्रनी का भक्त है इसलिए आप लोग यदि कुछ दिन जीवित रहना चाहते हैं तो उसी फे शरण में जाइये जिस पर आप लोगों ने हेलों की वर्षा की थी, अन्यया आप लोगों को मृत्यु निकट श्रा पहुंची है। आपको यह बात सुनकर चे भयभीत होकर उसी भक्त के पास पहुंचे जिस पर देले पर्साते थे । उसने भी आपका सङ्केत पाकर उन शरणार्थिया से कहा कि ऐसा कार्य भविष्य में कभी न करना यदि ऐसा फिर करोगे तो सानाश हो जायेगा । अव यहां से जाओ और श्रीरघुनायनी के शरण में जाकर उनसे क्षमा मांगो । वजीरखां की यह बात सुनकर वे सर लज्जित होकर वापिस चले गए और पनीरखां हरिकीर्तन में प्रवृत्त हुभा। इस प्रकार पान सामान्य में अपना बल दिखाकर भाप यहां से भी अगाड़ी कन्धार पहुंचे ॥३९-५०॥

जगद्गुरुत्रीचन्द्रदिग्विजये अत्रापि सोमदेवादिशिष्यैरनुगतो मुनिः । निगमागतसिद्धान्तं शङ्खघोपेरपूरयत् ॥५१॥ यदायमगमत्तत्र गान्धारविषये मुनिः । वलवद्यावनमभूच्छासनं धर्मनाशनम् ॥५२॥ नष्टसङ्गठनाः सर्वे द्विजन्मानो भयाकुलाः । यवनध्वस्तभवना विविशुगिरिगह्वरम् ॥५३|| न कोपि देवसदने शङ्खघोपमवर्धयत् । प्राणापहरणं तत्र तदाभूच्छखनिस्स्वने ॥५४॥ एवंविधव्यतिकरव्यवस्थाया निदर्शकम् । एकमैतिरामधुना लिख्यते दृश्यतां बुधैः ॥५५॥ सोमदेव आदि अनेक शिष्यों के साथ कन्धार पहुंच कर मापने अपने योग पल से शङ्खनाद के साथ अपने सिद्धान्तों का प्रचार आरम्भ किया । जिस समय आप फन्धार पहुंचे उस समय अफगानिस्तान पूर्णरूप से यवनाकान्त था। हिन्दुओं की दुर्दशा चरम सीमा तक पहुंच चुकी थी, सङ्गठन से रहित प्रामपादि वर्ण यवनों के भय से अपना अपना घर छोड़कर पर्वतों की कन्दराभों में मा दिपे, कोई अपने देवमन्दिर में शक नहीं बना सकता था, यदि कोई पजाता था तो उसके लिये प्राणदण्ड दिया जाता था। इस प्रकार के म्पतिकर का उदाहरण स्वरूप एक इतिहास यहां पर उपस्थित किया जाता है। पाठक ध्यानपूर्वक उसका अवलोकन करें ॥५१-५५॥ गान्धारविषये कश्चिद्राह्मणो धर्मतत्परः। तदा लक्ष्मणदत्ताख्यो बभूव भगवत्परः ॥५६॥ कृष्णभक्तः स भवने मन्दिरं बहुसुन्दरम् । विधाय भगवत्पूजां चकार गतमत्सरः ॥५॥ एकदा स बहिः कार्यपारवश्येन यन्त्रितः। जगाम रामरत्नाख्यं सुतं हित्वाऽल्पहायनम् ॥५८) - २१३ प्रयोदशः सर्गाः गते पितरि कार्येण वहिः पुत्रो गृहस्थितम् । शङ्खमादाय चिक्रीड मुखमारुतपूरणैः ॥५६॥ दैवयोगेन तद्वायुरेकदा शङ्खमध्यगः । सूचयामास शहस्य ध्वनिमस्फुटतां गतम् ॥६॥ तस्य नादेन विक्षुब्धो यवनः कोपि बालकम् । तमाचकर्प भवनाद्दएडदाने समुद्यतः ॥११॥ एतावतैव कालेन तत्पिता समुपागतः । बलादाकृष्यमाणं तं बालकं वदतर्जयत् ॥६२॥ पालकोयमिति ज्ञात्वा भवतास्य विचेष्टितम् । क्षन्तव्यमिति तं प्राह यवनं पुरतः स्थितम् ॥६३॥ अनादृत्य पितुर्वाक्यं बलादाकृष्यवालकम् । यदा निनाय यवनस्तदा विक्षुब्धमानसः ॥६॥ ब्राह्मणः स मुनेः पाश्र्वे समागत्य तथाविधम् । सर्व निवेदयामास बालकस्य विचेष्टितम् ॥६५॥ ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा करुणासागरो मुनिः । निजकुएडात्समुद्धृत्त्य ददी भस्म विभूतिदम् ॥६६॥ तदादाय गते तस्मिन्ब्राह्मणे यवनालयम् । विक्षोभः समभूत्तेषां यवनानां दले दले ॥६॥ कन्धार में लक्ष्मणदत नामक एक ब्राह्मण रहता था भो कि भनन्य कृष्ण भरत था। उसके घर में एक कृष्ण मन्दिर या निसमें पाशुपनाप दिना गम भादि वाप पनाए कृष्ण पूजन करता या! एफ दिन किसी कार्यरत या पाहर गया हुआ या वसमा इफलाता रामरण नामक एक पुत्र या नो पर सा गपा पा वा पिना के पाहिर पले जाने पर रात में खेलने लगा । शा उससे पनना नहीं पा । एक मार देरयोग से या चोदा मा पन गया निमा हुए भस्फुट शब्द मार मुनाई पहा । उस पद से पुग्प भा एक परन मालवा २१४ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये चालक को पकड़ लेने के लिये दरवाजे पर आ गया, इतने ही में उसका पिता भी बाहर से आ गया । पिता ने यवनाकृष्ट अपने उस बालक को बहुत फटकारा और उस यवन मौलवी से कहा कि इस अपोष वालक के इस कृत्य को आप क्षमा कीजियेगा इसने अज्ञानपूर्वक ऐसा कार्य किया है। पिता के इतना कहने पर भी उनकी बात पर कुछ ध्यान न देकर जब यवन उस वालक को बलपूर्वक खींचकर ले जाने लगा, तब ब्राह्मण घड़ाकर आपके शरण में आया और बालक का सब हाल आपके समक्ष कह सुनाया । करणासागर भगवान् उस ब्राह्मण की करुण कहानी सुनकर अपने अग्निकुण्ड से मन्त्राभिमन्त्रित विभूति देकर कहने लगे कि तुम शीघ्र जाकर बालक के मस्तक पर इस विभूति को लगा दो। आप की आज्ञा पाते ही ब्राह्मण विभूति लेकर कामरान के दरवार में पहुंच गया और उसने जाते ही चालक के मस्तक पर उसका तिलक कर दिया। ब्राह्मण के इस कृत्य को देखकर दरवार के मौलवी लोगों में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और वे रामरत्न को दरवार में खड़ा करके अपने अपने मन्तव्यानुसार दण्ड का निर्णय करने लगे ॥ ५६-६७ ।। एकः समवदत्तेपां दले वालकघातनम् । अपरो नेत्रकदनं तदन्यो हस्तशातनम् ॥६॥ लोष्ठघातैर्वधं कश्चिद्दएडघातैरथापरः । दिदेश तस्य वालस्य कृते धर्मविपर्ययम् ॥६॥ एवं भिन्नमतेष्वेषु यवनेषु स वालकः । मनिदत्तप्रसादेन पवित्रीकृतमस्तकः ||७|| विहस्य सर्वानवदत्किमर्थ क्रियते भ्रमः । सजोहमस्मि धर्मार्थे प्राणदानाय सत्वरम् ।।७१॥ हतः स्वर्ग गमिष्यामि भविष्याम्यथवाऽमरः । परं धर्म न हास्यामि जीवनार्थे कदर्थितः ॥७२॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा चालकस्य यथोचितम् । यावत्ते निर्णयमदुस्तावता जडतां गताः ॥७३|| ht r

योदशः सर्गः
२१५
। कोई कहने लगा कि इस बालक को माण दण्ड देना चाहिये दूसरा कहने
लगा कि इसकी आंखें निकालनी चाहिये तीसरा कहने लगा कि इसके हाय काटने
चाहिये चौथा कहने लगा कि डले मार-मार कर इसको मारना चाहिये पांचवां
कहने लगा कि लाठियों के प्रहार से इसको मारना चाहिये छठवां कहने लगा कि
क्लात् यवन बना कर अपने दल में मिलाना चाहिये इस प्रकार उनकी अनेक
विध दण्डाज्ञा सुनकर वह बालक बोला कि आप लोग क्यों इस प्रकार के प्रपञ्च
में पड़े है मैं भगवान् के आशीर्वाद से अपने धर्म के लिये प्राण तक देने के लिये
उद्यत हूँ यदि मैं धर्म के लिये मारा जाऊंगा तो स्वर्ग जाऊगा अयवा अमर हो
जाऊगा परन्तु इस तुच्छ जीवन के लिये अपना धर्म नहीं छोडूगा इस प्रकार
बालक की धैर्य युक्त गम्भीर वाणी सुनकर जब तक वे मौलयी कामरान के दर-
चार में अपना निर्णय देने के लिये उधत हुये वय तक भगवान् फी अमृत योग
माया से वे सबके सब जकड़ गये ॥ ६८-७३ ॥
जिह्वाजाड्यमगाद्धस्ती बद्धी पाशेन केनचित् ।
काष्ठतामगमत्सद्यः शरीरं पापकर्मणाम् ॥७॥
तेषामेवंविधां दृष्ट्वा दुर्दशामतिदुःखदाम् ।
हाहाकारः समभवत्सर्वत्रापि गृहे गृहे ॥७॥
रामरत्नपिता पुत्रं समादाय मुनेः पदम् ।
पस्पर्श यत्प्रभावेन पुत्रो मृत्युमतीतरत् ॥७६॥
गान्धारदेशाधिपतिः सर्वमेतदिलोकयन् ।
निजस्य सख्युः कथनान्मुनेः पदमुपागमत् ।।७७॥
नताननो गतमदो मुनेरस्य पुरःस्थितः ।
अपराधक्षमाभिक्षा बारम्बारमयाचत ॥७६||
मनिरप्यस्य विनयं विलोक्य शरणप्रदः।
निजसिद्धिप्रभावेण बन्धन पर्यवारयत् ।।७।।
विमुक्त बन्धनेष्वेषु गतेषु निजमालयम् ।
मुनिः शिवाय भूतानां शिवमेव मुदाऽस्मरत् ॥८॥

२१६
.
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
उन सब की जिन्हा स्तन हो गई, हाय और पैर कर गये और शरीर
काठ की तरह जद हो गया उनकी यह दशा देख फर पर घर में हाहाकार मच
गया रामरत्न का पिता रामरत्न को लेकर भगवान् के चरणों में आकर गिर गया
क्यों कि आपके आशीर्वाद से ही उसके प्राण बचे हुये थे । कन्यार का बादशाह
कामरान इन सब बातों से भयभीत होकर गुलप्रकार नामक अपने मित्र के साय
भगवान के पास पहुंचा और नतमस्तक होकर अपने अपराधों की वार वार ममा
चाहने लगा । भगवान् इसकी दीन दशा देख कर अपने प्रभाव से सरको मुक्त
वन्धन करके अन्त में सबको घर मेग कर अपनी योग विधा से शिव का
स्मरण करने लगे॥७४-८०॥
इदमेकं मया तस्य मुनेत्र विचेष्टितम् ।
निवेदितमतोप्यन्यद्दीयतेस्य निदर्शनम् ॥१॥ .
अधित्यकामधिगतो निर्भयो मुनिरेकदा ।
निजाश्रमे समासीनो ददर्श मृगशावकम् ॥२॥
गिरेरुपत्यकादेशे चरन्तमकुतोभयम् ।
यवनः कश्चिदागत्य मृगयुस्तमघातयत् ॥८॥
निपात्त्य नयने तस्य समुद्धर्तुं समुद्यतः ।
यदायमभवत्तत्र तदा मुनिरुवाच तम् ॥८॥
येनास्य नयने वेगादुद्धते समयान्तरे ।
तस्यापि नयने कोपि बलादेवोद्धरिष्यति ॥८॥
एवमत्यन्तभयदां गिरमस्य महामुनेः।
निशम्य स मदोन्मत्तो मुनिमेवमभापत ॥८६॥
यद्ययं सद्यएवाद्य प्रभावात्ते मृगो निजाम् ।
दशामुपेयात्तदहं हास्यामि मृगयामिमाम् ॥७॥
वदन्तमेवं यवनं विलोक्य मुनिसत्तमः।
दृशापश्यन्मृगं सद्यः सोपि जीवनमाप्तवान् ॥८॥

प्रयोदशः सर्गः परमस्य मुनेः शापाद्गते काले सहोदरः। नयनेऽस्य समुद्धृत्त्य शापस्यान्तमदर्शयत् ।।८।। एवंविधान्यनेकानि चरितान्यस्य भूतले । लभ्यन्ते मुनिवर्यस्य निदर्शनपथानुगैः ॥६॥ यह एक इतिहास यहां पर आपके सम्बन्ध में लिखा गया है, जो उस समय के अत्याचारों का निदर्शनमात्र कहा जा सकता है। अब इसी के जोड़ का दूसरा इतिहास भी उपस्थित किया जाता है । पाठक गण ! उसका धैर्यपूर्वक मनन करें। एक समय भगवान् पर्वत की अधित्यका में आश्रम में चरते हुए एक मृगशावक को ऊपर से देख रहे थे । उसको उस पर्वत की उपत्यका में घासे चरते चरते एक शिकारी यवन ने मार दिया। मारकर यह शिकारी उसकी आंखें निकालने पर उतारू होगया । उसके इस कुकृत्य को देखकर आप उससे कहने लगे कि जिसने इस मृगशावक की आंखें निकाली हैं समयान्तर में उसकी आखें भी इसी मकार वल पूर्वक निकाल ली जायेंगी, भगवान् को इस अभिशाप पूर्ण यात का सुनकर वह कन्यार नरेश कामरान शिकारी भयभीत होकर भगवान से कहने लगा कि यदि आपके प्रभाव से यह सूग शावक सजीव होकर पहिली जैसी हालत में हो जावे तो आज से मैं शिकार खेलना बन्द कर दूंगा, यवन की यह बात सुनकर भगवान् ने उसकी और देखा । देखते ही वह सजीव होकर चलने लगा परन्तु कुछ दिन बीतने पर कामरान अपनी प्रतिज्ञा भूलकर फिर शिकार खेलने लगा अन्त में विक्रम सवत् १६११ में बाघर के पुत्र हुमायू ने काबुल पर चढ़ाई करके लड़ाई में कामरान को मार कर उसकी आखें निकलवाली कामरान हुमायू का छोटा पुत्र था । भगवान् का दिया हुआ शाप अन्त में सफल होकर रहा । इस प्रकार के अनेक इतिहास भगवान् की योग सिद्धि का महत्व दिखा रहे हैं जो इस भूतल पर हो चुके हैं ।। ८१. दिनानि कतिचित्तत्र गान्धारविपये वसन् । मुनिरेष यथामार्ग वभ्राम वनभूमिपु ॥६१|| मागें समागतानन्यान्गिरीनवटसकुलान् । समतीत्य महाघोरं विपयान्तरमभ्यगात् ।।२ --१०॥ -- . २८ F २१८ जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये तत्रापि कृतसञ्चारो दिशं वरुणलाञ्छनाम् । विजित्य यवनाकान्तां प्रत्यावर्तत भारतम् ||३|| येन मार्गेण संयातस्तेनैव पुनरावजन् । क्रमशः प्राप्तमनुज पेशावरमुपागमत् || मातुः सन्देशमादाय तत्रायातमुपस्थितम् । धर्मचन्द्रं समालोक्य मुनिस्तमिदमब्रवीत् ॥१५॥ किमर्थं म्लानवदनः समायातोसि मातरम् । विहाय वद तत्सर्वं यन्मात्रा समुदीरितम् ॥६६॥ धर्मचन्द्रो निशम्येदं मुनेवचनमादरात् । विनीतः प्राह भगवन्नवाच्यं श्रयतामिदम् ॥७॥ ऋत्वलवाणेन्दुमिते शुभे विक्रमवत्सरे। मासे तथाऽश्विने कृष्णदशम्यां त्वामनुस्मरन् ।।८।। लोकमेनं परित्यज्य परलोकमनुस्मरन् । पिता ते निधनं प्राप्तस्तदियोगेन दुःखिता ॥६६॥ माता तवाननमिदं द्रष्टुमुत्सहतेऽवला । तदेहि सत्वरं तस्याः सविधे भव धेर्यदः ॥१०॥ इस प्रकार के आश्चर्य मय कार्य करते हुये आप कन्धार में कुछ दिन रहकर वहां से शिवबुलान चले गये मार्ग में आये हुये अनेक बन तथा गहर पर्वत कन्द- राओं को पार करते हुये आप अत्यन्त भयङ्कर बिलोचिस्थान पहुंचे। वहां पर भी प्रचार करते हुये अन्त में पश्चिम दिशा को जीत कर भारत के लिये लौट पड़े .मार्ग से पहिले आये थे उसी से फिर लौट कर पेशावर आगये । इसी समय का सन्देश लेकर वहाँ पर आये हुये धर्मचन्द्र को देख कर भगवान् कहने कि माता को छोड़ कर इस समय यहां पर क्यों आये हो ? जो कुछ सन्देश माता जी ने भेजा है उसे कहो, भगवान् की यह आज्ञा पाकर धर्मचन्द्र ने कहा कि भगवन् !! विक्रम संवत् १५९६ की आश्विन वदी दशमी के दिन आपको याद करते करते आपके पिता जी परलोक सिधार गये उनके वियोग में अत्यन्त . ।

प्रयोदशः सर्गः
दुःखित आप की माता आपको देखना..चाहती हैं इसलिये यहां से आप जल्दी
उनके पास चलिये और उनका धैर्य पूर्वक सान्त्वना दीजिये ॥ ९१-१००॥
भवानेवाधुना तस्याः माणाधारः परं बलम् ।
शरण्यः सर्वलोकानां भक्तानुग्रहकारकः ॥ १०१ ।।
निशम्येदं वचस्तस्य धर्मचन्द्रस्य धीमतः ।
उवाच मुनिरमाप्तं किमपि प्रतिचिन्तयन् ॥ २ ॥
धेर्यावलम्बनं मातुस्त्वया पूर्व विधीयताम् ।
अहमयागमिष्यामि गतानुगतिककमात् ॥ ३॥
मुनेरिदं वचः श्रुत्वा निवृत्ते मातुरन्तिकम् ।
धर्मचन्द्रे मुनिस्तत्र कृतवान्समयोचितम् ॥ ४ ॥
भक्तानुपस्थितानत्र वियोगबहुदुःखितान् ।
सान्त्वयित्वा कथमपि प्रतस्थे भगवानितः॥ ५ ॥
मार्गागतेषु नगरेप्वयमागतसज्जनान् ।
निबोधयन्धर्मतत्वं प्रपेदे मातुरन्तिकम् ॥ ६ ॥
ग्रामादहिः कृतावासं निशम्य निजमात्मजम् ।
वियोगविधुरा सद्यः प्रपेदे जननी जवात् ॥ ७॥
समायातां मुनिदृष्ट्या मातरं शोकविह्वलाम् ।
उवाच भगवत्यम्ब ! किमर्थमसि दुःखिता॥ ८॥
या गतिः पुण्यशीलानां धर्ममार्गानुवर्तिनाम् ।
तामेव समनुप्राप्तः पतिस्ते जनको मम ||
शिवा भवन्तु पन्थानस्तस्य धर्मानुवर्तिनः।
तवाप्यम्ब ! शिवः पन्था भवितास्ति न संशयः॥१०॥
एवमाश्वासनपरैर्वचोभिः परिसान्त्वयन् ।
शिवावतारः श्रीचन्द्रो मातरं वहमन्यत ॥११॥

२१८ जगदुरभीचन्द्रदिग्विजये तत्रापि कृतसञ्चारो दिशं वरुपलाञ्छनाम् । विजित्य यवनाकान्तां प्रत्यावर्तत भारतम् ॥३॥ येन मार्गेण संयातस्तेनैव पुनरावजन् । क्रमशः प्राप्तमनुजं पेशावरमुपागमत् ॥६॥ मातुः सन्देशमादाय तत्रायातमुपस्थितम् । धर्मचन्द्रं समालोक्य मुनिस्तमिदमब्रवीत् ।।६५॥ किमर्थं म्लानवदनः समायातोसि मातरम् । विहाय वद तत्सर्वं यन्मात्रा समुदीरितम् ॥१६॥ धर्मचन्द्रो निशम्येदं मुनेर्वचनमादरात् । विनीतः प्राह भगवन्नवाच्यं श्रूयतामिदम् ॥६॥ ऋत्ववाणेन्दुमिते शुभे विक्रमवत्सरे । मासे तथाऽश्विने कृष्णदशम्यां त्वामनुस्मरन् ।।३८|| लोकमेनं परित्यज्य परलोकमनुस्मरन् । पिता ते निधनं प्राप्तस्तद्वियोगेन दुःखिता || माता तवाननमिदं द्रष्टुमुत्सहतेऽवला। तदेहि सत्वरं तस्याः सविधे भव धैर्यदः ॥१०॥ इस प्रकार के आश्चर्य मय कार्य करते हुये आप कन्धार में कुछ दिन रहकर वहां से शिवयुलान चले गये मार्ग में आये हुये अनेक वन तथा गहर पर्वत फन्द- राओं को पार करते हुये आप अत्यन्त भयङ्कर विलोचिस्थान पहुंचे। वहां पर भी प्रचार करते हुये अन्त में पश्चिम दिशा को जीत कर भारत के लिये लोट पड़े जिस मार्ग से पहिले आये थे उसी से फिर लौट कर पेशावर आगये । इसी समय माता का सन्देश लेकर वहाँ पर आये हुये धर्मचन्द्र को देख कर भगवान् कहने लगे कि माता को छोड़ कर इस समय यहां पर क्यों आये हो ? जो कुछ सन्देश माता जी ने भेना है उसे कहो, भगवान् की यह आज्ञा पाकर धर्मचन्द्र ने कहा कि भगवन् ! विक्रम संवत् १५९६ की आश्विन वदी दशमी के दिन आपको याद करते करते आपके पिता जी परलोक सिधार गये उनके प्रियोग में अत्यन्त m '- अमोदशः सर्गः २१६ दुःखित आप की माता आपको देखना चाहती हैं इसलिये यहां से आप जल्दी उनके पास चलिये और उनको धैर्य पूर्वक सान्त्वना दीजिये ।। ९१–१०० ॥ भवानेवाधुना तस्याः प्राणाधारः परं बलम् । शरएयः सर्वलोकानां भक्तानुग्रहकारकः ॥ ११ ॥ निशम्येदं वचस्तस्य धर्मचन्दस्य धीमतः । उवाच मुनिरप्राप्तं किमपि प्रतिचिन्तयन् ॥ २ ॥ धैर्यावलम्बनं मातुस्त्वया पूर्व विधीयताम् । अहमण्यागमिष्यामि गतानुगतिककमात् ॥ ३ ॥ मुनेरिदं वचः श्रुत्वा निवृत्ते मातुरन्तिकम् । धर्मचन्द्रे मुनिस्तत्र कृतवान्समयोचितम् ॥ ४ ॥ भक्तानुपस्थितानत्र वियोगवहुदुःखितान् । सान्त्वयित्वा कथमपि प्रतस्थे भगवानितः॥ ५ ॥ मार्गागतेपु नगरेप्वयमागतसज्जनान् । नियोधयन्धर्मतत्वं प्रपेदे मातुरन्तिकम् ॥ ६ ॥ ग्रामादहिः कृतावासं निशम्य निजमात्मजम् । वियोगविधुरा सद्यः प्रपेदे जननी जवात् ॥७॥ समायातां मुनिदृष्ट्वा मातरं शोकविह्वलाम् । उवाच भगवत्यम्ब ! किमर्थमसि दुःखिता ॥ ॥ या गतिः पुण्यशीलानां धर्ममार्गानुवर्तिनाम् । तामेव समनुमाप्तः पतिस्ते जनको मम ॥ ६ ॥ शिवा भवन्तु पन्थानस्तस्य धर्मानुवर्तिनः । तवाप्यम्ब ! शिवः पन्था भवितास्ति न संशयः॥१०॥ एवमाश्वासनपरर्वचोभिः परिसान्त्वयन् । शिवावतारः श्रीचन्द्रो मातरं वहमन्यत ॥११) C २२० 7 जगद्गुरुनीचन्द्रदिग्विजये मातापि तस्य वचनैर्दर्शनैरमृतोपमः। परां नितिमापेदे न सस्मार गतं पतिम् ।।१२।। इस समय उनके आपही एक मात्र अवलम्ब हैं और आप ही प्राण रक्षक तथा आश्रय देने वाले है इस प्रकार की धर्मचन्द्र की बात सुनकर आप कुछ देर तक धयानस्थ होकर कहने लगे कि मेर क्यान से आप पहिले माता के समीप चले आप के पीछे मैं भी आता हु आप की यह आज्ञा पाकर धर्मचन्द्र माता के पास चले गये । उनके जाने पर भगवान् कुछ दिन वहा ठहर कर अपने भक्तों का सम झाते हुये यहा से चले, मार्ग में गुजरात स्यालकाट आदि नगरों में होते हुये अन्त में देहरावावा नानक पहुचे । आपने ग्राम के बाहर शिशपा वृक्ष के नीचे आसन लगाया । आपके आते ही आपकी माता आपके पास पहुची । माता जी को देख कर भगवान् उनसे कहने लगे कि माता जी आप क्यों इस प्रकार दुख प्रकट करती है। आपके आराध्य पति दव और हमार पिता ता उत्तम लोक को माप्त हो गये हैं। उनके मार्ग कल्याण पूर्ण हों और उनके पीछे आपका भी मार्ग कल्याण पूर्ण हा इस मकार माता जी का सान्त्वना देकर आप निवृत्त हुये और आपरी माता भी आपसे सान्त्वना पाकर आपके दर्शन से पति वियाग जन्य दुःख को भूल गईं ॥१-१२॥ भगवानपि तत्रत्यपर्वतीयजनबजे। धर्मप्रचारक शिष्यं योजयामास सत्वरम् ॥१३॥ शिशपातरुमुत्सृज्य कृतावासं निजेच्छया,। 1 तदन्यशिशपावृक्ष निजावासमकल्पयत् ॥१॥ दिनानि कतिचित्तत्र वसन्पञ्चवटीतटे । , भक्त. प्रफल्पिता पर्णकुटी मुनिरुपागमत् ॥१५॥ अत्रापि कृतसंवासो हरदारदिदृक्षया । !!" , "बहुभिः सज्जने. सार्धं प्रतस्थे भगवान्मुनि. ॥१६॥ ग्रामेषु मार्गसंस्थेपु नगरेषु वनेष्वपि । निवसन्नयमेकान्ते धर्ममार्गमवर्धयत् ॥१७) २२१ . m प्रयोदशः सर्गः जलन्धरपुरप्रान्ते ग्राममेकमुपेत्य सः। विशुष्क शिशपावृक्षं दर्शनाद्धरितं व्यधात् ॥१८॥ : इतो यथाक्रम गच्छन्हरद्वारमुपागतः । मुनिः कनखलं प्राप्य विशश्राम सरित्तटे ॥१॥ सनत्कुमारस्यमुनेराश्रमे निवसन्नयम् । शिष्यैः सह कृतालापः साधुकालमयापयत् ।।२०॥ इधर आप भी कांगड़ा के पर्वतीय प्रान्तों में धर्म प्रचार के लिये अपने शिष्य कमलदास को नियुक्त कर एक शिशपा वृक्ष को छोड़कर दूसरे शिंशपा वृक्ष के नीचे ठहरे । यह दोनों स्थान आज तक इस प्रान्त में प्रसिद्ध हैं। यहां कुछ दिन ठहरकर आप पञ्चवटी के पास एक पर्णकुटी में रहे । यह स्थान वट साहब के नाम से अब भी पञ्जाब में प्रसिद्ध है । यहां पर भी कुछ काल तक निवास कर आप बारठ ग्राम में पहुंचे । कुछ दिन यहां पर ठहर कर यहां से भी आपने इरद्वार जाने का निश्चय किया । पूर्वोक्त चारों स्थान जिला गुरदासपुर में प्रख्यात हैं । हरद्वार के जाने के समय आपने प्रत्येक नगर और ग्राम में ठहर २ कर धर्म प्रचार किया। जिला जालंधर के पास दौलतपुर ग्राम में ठहरकर आपने दर्शन मात्र से एक सूखे शिशपा वृक्ष को हरा भरा कर दिया। यहां से भी धीरे २ चलकर आप हरद्वार पहुंचे। यहां कनखल में भागीरथी के तट पर सनत्कुमार मुनि के पुण्याश्रम में मापने अपने शिष्यों के साथ कुछ समय तक निवास किया । उदासीन मार्ग के प्रधान आदिम आचार्य श्री सनत्कुमार मुनि प्रायः कनखल में ही रहा करते थे, इस कारण यह स्थान साम्प्रदायिक दृष्टि से ऐतिहासिक तथा परम पवित्र माना जाता है ।। १३-२०॥ इतो यावदयं शिष्यैः सहान्यत्र रुचिंव्यधात् । तावदभ्यागतः कश्चिद्गमनेऽस्य मुनेः पुरः ॥२१॥ समागतं सिन्धुदेशादामचन्द्रमवस्थितम् । मुनिः पप्रच्छ देशस्य ज्ञातवृत्तोपि संस्थितिम् ॥२२॥ स दीनतामनुप्राप्तां देशस्य बहु दर्शयन् । मुनिं तत्र प्रचाराय प्रार्थयामास दुःखितः ॥२३॥ .

२२४ जगद्गुरशीचन्द्रदिग्विजये मुनिस्तत्सर्वमाकर्ण्य तदागमनकारणम् । तमेनमाह करुणारुणया मुदितो दृशा ॥ ४ ॥ यस्या दर्शनमुद्दिश्य भगवत्यास्त्वमागतः । सा सर्वजगतां माता वन्दनीया सुरासुरैः॥ ४२ ॥ यद्यत्रैव समागत्य स्वेनरूपेण दर्शनम् । दद्यात्तदा किमर्थस्ते दूराध्वगमनश्रमः ।। ४३ ॥ इदं वचनमाकएर्य मुनेविस्मितमानसः । सद्यो भक्तगिरिस्तत्र विशश्राम मुनेस्तटे ॥ १४ ॥ भगवत्प्रेरिता सापि भवानी समुपागता । । नतं भक्तगिरिं प्राह करुणारुणवीक्षणा ॥४५॥ यदि ते हृदये वाञ्छा कल्याणपथगामिनी। वरीवति तदा दासो भवास्य मम शासनात् ॥४६॥ अयं साक्षान्महादेवो जगदुद्धर्तुमागतः । अस्यैव शासनादत्र समायातास्मि सत्वरम् ॥४७॥ एवमुक्त्वा भगवती हिङ्गलाजपदस्थिता । चभूवान्तहिता सद्यो भक्तमुद्धर्तुमागता ॥४॥ दृष्ट्वाद्भुतं चमत्कारं मुनेरस्य स मागधः । सद्यः शिष्यत्वमापेदे मुनिमार्गमनुव्रजन ॥४॥ भगवानपि विश्वात्मा विधाय समुपागतम् । शिष्यमेनं निजाम्नायरहस्यं समबोधयत् ॥५०॥ जिन दिनों में आप यहां पर विराजमान थे उन्हीं दिनोंमें मगधदेश का रहने वाला एक भक्तगिरि नामक तान्त्रिक अपने ३६० शिष्यों के साथ हिंगलाजदेवी के दर्शनार्थ जारहा या वह आपको कीर्ति सुनकर अपने समस्त शिष्यों के साथ आपके दर्शनार्थ आरहा था। उसके साथ रामरत्न नामक एफ तान्त्रिक था जो आपकी कीर्ति सुनकर अपने मनमें जलता था और साथ ही मार्ग में जाने वाले अन्य सज्जनों २०५ , जमादशः सर्गः । को झूठी २ गते सुनाकर पहलाता था। दैवयोग से इसको एक दिन सोमदेव के साथ मिलने का अवसर मिला। सेामदेव ने उसको अनेक प्रकारों से समझाकर आपके समीप आने के लिये उसको बाध्य किया। अन्त में वह भक्तगिरि के साथ आपके पास पहुँच गया, आपके स्वागताचार से देखकर वह चिर-लिखित जैसा होगया। भगवान्ने भक्तगिरिसे इधर आनका कारण पूछा,भक्तगिरि ने भी आपके पूर्छने पर अपना समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। सुनकर भगवान भक्तगिरि से कहने लगे कि जिस हिमलान देवी के दर्शनार्थ आप वहा मारहे है, वह देवी यदि यहीं ऑफर दर्शन दे दे तो वहा जाने का कर आप क्या उठाते हैं ? आपकी यह आश्चर्यभरी वाणी सुनकर भक्तगिरि आपके पास ही ठहर गया । राति मीनने पर माताकोल होते ही भगवती ने आकर भक्तगिरि को दर्शन देकर कहा कि यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं तो मेरे कथन से आप इनके चरणों का दास्य अङ्गीकार करें। ये साक्षात् भवानीपति भगवान् शङ्कर हैं, जगत् का उद्धार करने के लिये इस रूप में आतीर्ण हुये हैं। इनके कपन से ही मैं यहा पर उपस्थित 'हुई हैइतना पहकर देवी अन्तर्हित होगई । भगवान् पा ग्रह अद्भुत चमत्कार देखकर भक्तगिरि भगवान् से शिष्य हाने की इच्छा प्रकट भरने लगा, अन्त में भगरान् ने भी उदासीन मारी फोहीसा देकर भक्तगिरि को, भक्त भगवान के नाम से प्रख्यात परसपने आगम का समस्त रहस्य समझा दिया । .[ भक्तगिरि के साथ जो ३६० शिष्य थे, वे भी अन्त में उदासीन बनकर अपने अपने नाम से ३६० उदासीन मरे के अपक्ष हुये, यह सर कार्य अविनाशो मुनि के सत्य सङ्कल्प से ही पूर्ण हुआ] ।। ३३-५० [युग्मम् ] मानि यानि रहस्यानि मुनिनानेन नामतः । कथितानि समामेन मनातनपथानुगे. ॥५१॥ तानि सर्वाणि दिग्यात्रानन्तरं वदनान्मुने. 1, श्रोतव्यान्यग्रसर्गेपु सप्रमाणानि सजने ॥५२॥ सूचनामेचमादिश्य मोमदेवमुखोदताम् । मुनिरत्र निजोदश्यमाधनाय कृति व्यधात् ॥५३॥ 11 २२४ । जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये मुनिस्तत्सर्वमाकर्ण्य तदागमनकारणम् । तमेनमाह करुणारुणया मुदितो दृशा ॥ ४१ ॥ यस्या दर्शनमुद्दिश्य भगवत्यास्त्वमागतः । सा सर्वजगतां माता वन्दनीया सुरासुरैः॥ ४२ ॥ यद्यत्रैव समागत्य स्वेनरूपेण दर्शनम् । दद्यात्तदा किमर्थस्ते दूराध्वगमनश्रमः ॥ ४३ ॥ इदं वचनमाकर्ण्य मुनेविस्मितमानसः । सद्यो भक्तगिरिस्तत्र विशश्राम मुनेस्तटे ॥ ४४ ॥ भगवत्प्रेरिता मापि भवानी समुपागता। नतं भक्तगिरिं प्राह करुणारुणवीक्षणा ॥४५॥ यदि ते हृदये वाञ्छा कल्याणपथगामिनी। वरीवति तदा दासो भवास्य मम शासनात् ॥४६॥ अयं साक्षान्महादेवो जगदुद्धर्तुमागतः । अस्यैव शासनादत्र समायातास्मि सत्वरम् ॥४७॥ एवमुक्त्वा भगवती हिङ्गलाजपदस्थिता । बभूवान्तहिता सद्यो भक्तमुद्धर्तुमागता ॥४॥ दृष्ट्वाद्भुतं चमत्कारं मुनेरस्य स मागधः । सद्यः शिष्यत्वमापेदे मुनिमार्गमनुव्रजन ॥१६॥ भगवानपि विश्वात्मा विधाय समुपागतम् । 'शिप्यमेनं निजाम्नायरहस्यं समवोघयत् ॥५॥ जिन दिनों में आप यहां पर विराजमान थे उन्हीं दिनोंमें मगधदेश का रहने थाला एक भक्तगिरि नामक तान्त्रिक अपने ३६० शिष्यों के साथ हिङ्गलाजदेवी के दर्शनार्य जारहा था वह आपकी कीर्ति सुनकर अपने समस्त शिष्यों के साय आपके दर्शनार्य आरहा था। उसके साथ रामरत्न नामक एक तान्त्रिक या जो आपसी फोनि सुनकर अपने मनमें जलना या और साथ ही मार्ग में जाने वाले अन्य सजनों "नोदशः सर्गः.. को झूठी २ बातें सुनाकर माता था। दैवयोग से उसको एक दिन सोमदेव के साथ मिलने का अवसर मिला। सेामदेव ने उसको अनेक प्रकारों से समझाकर आपके समीप आने के लिये उसके वाध्य किया । अन्त में वह भक्तगिरि के साथ २ आपके पास पहुँच गया, आपके स्वागताचार को देखकर वह चित्र-लिखित जैसा होगया। भगवान्ने भक्तगिरिसे इधर आनेका कारण पूंछा भक्तगिरि ने भी आपके पूछने पर अपना समस्त वृत्तान्त कह सुनाया । सुनकर भगवान् भक्तगिरि से कहने लगे कि जिस हिगलान देवी के दर्शनार्थ आप वहां जारहे हैं, वह देवी यदि यही आकर दर्शन दे देवें" तो वहां जाने का कष्ट आप क्यों उठाते हैं ? आपकी यह भारचर्यभरी वाणी सुनकर भक्तगिरि आपके पास ही ठहर गया। रात्रि बीतने पर भातःकाल होते ही भगवती ने आकर भक्तगिरि को दर्शन देकर कहा कि यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं तो मेरे कयन से आप इनके चरणों का दास्य अङ्गीकार करें। ये साक्षात् मवानीपति भगवान् शङ्कर हैं, जगत् का उद्धार करने के लिये इस रूप में अवतीर्ण हुये हैं। इनके कथन से ही मैं यहां पर उपस्थित 'हुई है । इतना कहकर देनी अन्तर्हिस होगई । भगवान् का यह अद्भुत चमत्कार देखकर भक्तगिरि भगवान् से शिष्य होने की इच्छा प्रकट करने लगा, अन्त में भगवान् ने भी उदासीन मार्ग की दीक्षा देकर भक्तगिरि को, भक्त भगवान्के नाम से प्रख्यात कर अपने आगम का समस्त रहस्य समझा दिया। [ भक्तगिरि के साथ जो ३६० शिष्याथे, वे भी अन्त में उदासीन बनकर अपने अपने नाम से ३६० उदासीन मठों के अध्यक्ष हुये, यह सब कार्य अविनाशी मुनि के सत्प सङ्कल्प से ही पूर्ण हुआ ] ।। ३३-५० ।। [ युग्मम् ] यानि यानि रहस्यांनि मुनिनानेन नामतः । कथितांनि समासेन सनातनपथानुगः॥५१॥ तानि सर्वाणि दिग्यात्रानन्तरं वदनान्मुनेः।, श्रोतव्यान्यग्रसर्गेषु सप्रमाणानि सजनः ॥५२॥ सूचनामेवमादिश्य सोमदेवमुखोद्गताम्। ', मुनिरत्र निजोदेश्यसाधनाय कृति व्यधात् ॥५३॥ - । । २९ - -- ग - 7 - 7 जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विनय सहेकादशभिः पुत्रैर्बलिवेदीमुपागतः । । मातृभूमे. समुद्धर्ता विस्मृत. किं सालक्ष्मण- ॥६६॥ युद्धे विजित्य यवनानिन्द्रप्रस्थरणागणे । शूर. संग्रामसिंहोपि गत स्वर्ग तव प्रभुः ॥७॥7 त्रयोदशसहस्राणि यया सह चितामगु. । वीराङ्गना. सा भवता पद्मिनी विस्मृतास्ति किम् ॥७१ दुर्दशामनयद्देवी या रणाङ्गणमध्यगा । यवनानति दुर्धान्कर्मदेवीमवेहि ताम् ।।७२।। मेवाडभूमेरुद्धर्ता रक्षक सर्वभूभुजाम् । एकलिङ्गोयमधुना विजयं तव शसति ॥७३॥ मन्त्री तवायमतुला सम्पत्तिं समराङ्गणे । योजयिष्यति साहाय्यप्रदानाय कृतोद्यमः ॥७॥ तस्मादुत्तिष्ठ युद्धाय विजयी भव सर्वतः । अविलम्बमितो गच्छ शिव. श ते विधास्यति ॥७५।। इत्येवमादिभिर्वाक्य प्रतापं बहु बोधेयन् ।। ॥ विरराम मुनिस्तत्र यवनप्रनिमर्दन ॥७६॥7- भगवान् ने महाराणा प्रतापसिह से कहा कि आप उस सूर्यवंशी रामचन के वशार हैं जिन्होंन महा यादा रावण पर भी विनय माप्त किया था। आप इस समय इस देश की अवनत दशा को अपने बाहुवल से शीघ्र दूर करें। उत्साही पुरपी के लिये असम्भर भी सम्भव हा जाता है ! इसका दृष्यन्त भग वान् श्री रामचन्द्र ने स्वय करके दिखलाया है न्याय पथ पर चलने वाले पुरुप के लिये तिर्यश्च भी सहायक बन जाते हैं इसमें उदाहरण रूप वानरी सेना को लेर भगवान् का लङ्का पर विजय प्राप्त करना ही है, समस्त यानों पर विजय प्राप्त करने वाले वप्पाराव जी आपके ही वंश में हुए हैं जिनकी विजय वैजयन्ती गजनी तक फहरा रही थी । पद्वती नदी के तट पर सग्राम म जीवन दने वाले वीर समरसिंहजो आपके ही पूर्वजों में हुए है। अपनी मातृभूमि की रक्षा के . nu प्रयोदशः सर्गः लिये जिन्होंने अपने ग्यारत पुत्रों के साथ अपने को भी बलिवेदी • पर चढ़ा दिया या वे वीर लक्ष्मणसिंह जी क्या आपका स्मृति से उतर गए हैं ? जिन्होंने चिचीर गई में अपना पराक्रम दिखाकर दहली के मैदान में अपने पराक्रम से यवनों को मार कर देहली अपने अधिकार में कर ली यी चे आपके दादा राणा संग्रामसिंह जी मग आपके स्मरण में नहीं रहे ? अपने धर्म को रक्षा के लिये जिसने १३००० तेरह सहस्र वीर क्षत्राणियों के साथ अपना जीवित शरीर धधाती हुई चिता में भस्म कर दिया था उस पीरागना पमिनी को क्या आप भूल गर ह ? समर म जिसने कुतुबुद्दीन को हरार अपना पल सर्वत्र पिरयात कर दिया उस कर्मदेवी को आप स्मृति पय पर लाइये । मेवाद मान्त के एरमात्र सध्या सके रसक भगवान् एफलिङ्गेश्वर इस समय आपका विनय देखना चाहने हैं, ऐसी अरस्या में आपका चिन्ता फिस पान की है। यह जो आपके मन्त्री भामाशाह आपके साथ आए हुए है इनके पास अतुल सम्पत्ति नियमान है। आपके मगराङ्गण में आने पर यह सर सम्पत्ति देश जाति आर धर्म की रक्षा के लिये आपरा अर्पण कर देंग। इसलिये आप इस समय युद्ध के लिये उठिये । सर ओर से यानों पर विजय प्राप्त पीजिये । यहा से अविलम्ब मस्यान कीजिये भगवान् शङ्कर आपका पल्याण करेंगे । इस प्रकार आपने महाराणा प्रताप का भलाभांति समझाकर अपना कयन समाप्त फिया ॥ ६३-१७६ ॥ प्रतापोपि मनेर्वाक्यमाकार्य यहविस्मित.।. भवदुक्कं करिष्यामीत्युक्त्वा मुनिमभापत ७७॥ यस्मिन्वंशे मपज्जन्म ममभून्मुनिमत्तम । तमहं श्रोतुमिच्यामि भवान्वदतु विस्तरात् ||७|| वाक्यमेतत्प्रतापम्य ममाफर्य यथाक्रमम् । वंशं नियोधयामाम मुनिरेवं मितानरः ॥७॥ रामो दाशरथि- मीनामुदाद्य जनरात्मजाम् । सुनो लवकुशी नाम जनयामाम धर्मतः ||८०|| P - - TR 1 - 4 - - । जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय आपने कहा कि यवन साम्राज्य का अब अन्तिम समय आगया है। घर ठाने की काई बात नहीं है । साहस पूर्वक अपने आपरी उन्नति के मार्ग पर ले चलिये । चन्द्र वश में उत्पन्न धनराय आजकल बहुत से शूरवीरों के साथ युद्ध का आयोजन एफन कर रहा है । आपके वशधर जो कि आजकल महाराष्ट्र देश में जाकर बसे हैं उनी दसवीं पीढ़ी म एक बालक जन्म लेगा। हमारी प्ररणा से एक साधु उस वालक का सहायक होगा और काश्मीर में जाकर वह बालक मेरे शिष्यों से मिलेगा । इस प्रकार यह दोनों सूर्य चन्द्र यश आपस में मिलकर यवन साम्राज्य को उन्छिन्न करेंगे । इतमा भविष्य कहकर भगवान् हारीत मुनि के आश्रम में जाकर समाधिस्य हुए और महाराणा प्रताप वहां से उदयपुर चले गये ।। ९०-९५॥ प्रमङ्गादित उत्थाय भगवानधिकप्रभः11 राजस्थानगतं योद्धपुरं सत्वरमभ्यगात् ॥१६॥ तत्रापि तत्पुराधीशर्मुपेत्त्य विजयोचितम् । सर्व निबोधयामास दिव्यमायोधनक्रमम् ॥६॥ बीकानेरादिपु पुन. ममीपनगरेप्पयम् । भ्रमन्नवाप काश्मीरप्रदेशं भूसुरालयम् ॥६८|| हरिदत्तंसुतं तत्र कमलामनमागतम् । शिष्यतामयमानीय कृतकृत्यमकल्पयत् | अयमेव मुनेः शिष्य. काले यहुतिथेगते ।' अलिमत्तपदं लेभे गुरुत्वं मुनिसत्कृतः ॥२०॥ कुछ समय के अनन्तर भगवान् यहा से नाथपुर गए । यहा जाफर सामयिक गना से मुंद सम्बधी विषयों में परामर्श करके बीगनर पाच यहां के आस पास क नगरों में भ्रमण करते परते पाए राते हुए फारमीर पहुंच गए। वहां पहुंचकर मापने पण्डित हरिदत्तनी के पुत्र कमलामन को विक्रम समन् १६३१ में भपना शिष्य बनाया । इना गन्म श्रीनगर में प्रभारती देवी की युति से हुआ था । यही फमलामन यात ममय पानने पर मलिमर मुनि फे नाम से मर गात हुमा । [ गगन ने इनका अमन हर वर दिया कि मरिष्य में नायर तुग ॥

योदशसर्ग ૨૩૩ इस सम्प्रदाय के प्रधान पुरुष तथा विजयी होंगे और तुम्हारे शिष्यों को समस्त सिद्धिया प्राप्त हुआ करेंगी ] ॥ ९६ -२०० ॥ अस्यानुजो वालकृष्णः सतीोऽस्य मुनेः पुरा । प्रामादादपनदमी कालेन कालीकृतः ॥२०१॥ तमादाय मृतं सर्वे मुनेरस्य पुरो भुवि । विन्यस्य वहुदुःखार्ता रुरुदुः सहपाठिनः ॥ २ ॥ पुरोगतमिमं वीक्ष्य गतप्राणं दयाकुल.। मुनिराह न मन्येहमेनं मृतमुपस्थितम् ।। ३ ।। वालोयं भवतां बाचमाकएर्य वह विस्मितः । हासतीच जनाः सर्वे पश्यन्तु नवजीवनम् ।। ४ ।। निशम्य भगवद्वाक्यमेवं विधमुपद्रुताः । जनाः सर्वे पुनः प्राप्तजीवन बहु मेनिरे ॥ ५ ॥ मातास्य बालकृष्णस्य मरणादहुदुःखिताः । मुनेः प्रसादतः प्राप्तजीवनं तमुपागमत् ॥ ६ ॥ तवार्य न ममेत्युक्त्वा तमिमं प्राप्तजीवनम् । मुनेरुपान्ते विन्यस्य मुनिमाह नतानना ॥ ७ ॥ दासमेनं भवानेव शिष्यतां नयतु प्रभुः । भवत्कृते मयालब्धः पुत्रोयं यमसादनात् ॥ ८ ॥ अभ्यर्थनां वान्धवानामङ्गीकृत्य मुनीश्वरः । बालकृष्णमिमं बालहासतामनयत्क्षणात् ॥ ६॥ कमलासन के सहोदर भाई एक पण्डित बालकृष्ण जी थे जो भगवान् के साथ पढ़ने के कारण सतीर्थ्य भी थे ! वह विद्यालय मे हो छत से गिर पर मेर गये थे। उनको सहपाठियों ने आपके समक्ष में रखार दु ख मार पिया। आपने उनको दयाई दृष्टि से देखकर सहपाठियों से कहा कि यह तो बालरी तरह हस रहे हैं इनको आप लोग मरा न समझिये । इनमे जाकर देखिये ये २३४ . जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये जीवित हैं । आपकी इस कौतूहल पूर्ण वात को सुनकर सब लोग चकित हुये और वालकृष्ण को फिर उन्होंने जीवित पाया । माता प्रभावती ने जब यह संवाद सुना तब वह आपके पास आकर कहने लगी कि अब यह वालक आपका ही है आपने ही इसको नवजीवन प्रदान किया है इसलिये आप इसको अपना शिष्य बनाइये, माता का आग्रह देखकर आपने उसको अपना शिष्य बनाया और वालहास के नाम से उसको सर्वत्र प्रख्यात कर दिया ॥१-९॥ कालान्तरे मुनिवरं काश्मीरविपयस्थितम् । समाकएर्य समायातो जयदेवः प्रतापवान् ॥१०॥ 'मुनेः सविधमागत्य सभार्यः स सुतद्रयम् । अनपत्योर्थयामास वंशक्षयभयाकुलः ॥११॥ मुनिस्तदासनामीक्ष्य निदानं सुतयोर्दयो। वरन्ददौ तत्प्रभावादस्यापत्यमभूदयम् ॥१२॥ तयोज्येष्ठं स्वमनसा जननी दातुमुद्यता । कनिष्ठं तत्पिता दातुं मुनये समुपागमत् ॥१३॥ • एवमन्योन्यसद्भावफलतस्तावुभौ सुतौ । मुनेरस्य तदा तत्र सत्वरं शिष्यतां गतौ ॥१४॥ आद्यो गोविन्ददेवोभूत्पुप्पदेवस्तदुत्तरः। उभावपि मुनेः शिष्यौ विश्रुती भुवनत्रये ॥१५॥ 'द्वयोरप्यनयोः शिप्यपारम्पर्यक्रमाद्भुवि । बहवो मुनयः सिद्धा रामदेवादयोऽभवन् ॥१६॥ कुछ समय बीतने पर भगवान को काश्मीर में आया हुआ सुन कर अपनी धर्मपत्नी सुभद्रा देवी के साय जयदेव जी आपके पास पहुंचे, पहुंच कर आप से दो पुत्र होने का वरदान मांगा । आपने भी उनकी सची वासना देख कर दो पुत्र होने का वरदान दिया । वरदान के प्रभाव से जयदेव जी के दो पुत्र हुये । उन दोनों में बड़े पुत्र को माता ने और कनिष्ठ पुत्र को पिता ने अपने अपने मन में भगवान् को अर्पण करने के लिये सङ्कल्प कर लिया या दैवयोग से दोनों पुत्रों को त्रयोदशः सर्गः लेकर दोनों महानुभाव भगवान् के पास पहुंच कर अपना अपना सङ्कल्प कहने लगे उनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् ने उन दोनों पुत्रों को अपना शिष्य बनाया जिनमें एक का नाम गोविन्ददेव और दूसरे का नाम पुष्पदेव है। यह दोनों भगवान् के शिष्य ससार में सर्वत्र प्रसिद्ध है। इन दोनों की शिष्य परम्परा में रामदेव आदि अनेक सिद्ध मुनि हुये जिनका कार्यक्रम आज तक भारत में अविरत रूप से चल रहा है। कार्यक्रम का विस्तृत विवरण इस महा काव्य के अन्तिम सर्ग में मिलेगा ॥१०-१६॥ भगवानत्र काश्मीरविपये कतिचित्समाः। अलौकिकचमत्कारैर्यापयामास दैवतः ॥१७॥ एकदा ध्यानमग्रोयं दिव्यदृष्ट्या विलोकयन् । निमग्नं विपदां सिन्धी सिन्धुदेशं दयानिधिः॥१८॥ तदुद्धाराय सन्त्यज्य काश्मीरविषयं जवात् । तदेवनगरं प्राप सिन्धौ यत्र पुरावसत् ॥१६॥ निहितामिः स पञ्चामिमध्यगः समुपागतम् । जननातं विलोक्यादी पप्रच्छ कुशलं सताम् ॥२०॥ ते विलोक्य मुनि तत्र रुरुदुर्बहुपीडिताः। यवनः पापनिरतः कदाचारप्रवर्तिभिः ॥२१॥ दशामेवंविधां वीक्ष्य तेषां मुनिरुपागतः । सान्त्वयामास मधुरैर्वचनैरतिपीडितान् ।।२२॥ यदा ते सान्त्वनां प्राप्य मुनिदत्तां विशश्रमुः। तदा मुनिस्तानवदद्धेर्यमालम्ब्यतां जनैः ॥२३॥ भगवान् काश्मीर में कुछ दिन ठहर कर इसी प्रकार के अनेक चमत्कारों से जगत् को चमत्कृत करते रहे । एक दिन अकस्मात् आपने समाधिकाल में सिन्न फी दुर्दशा का निरीक्षण किया या इस कारण समाधि से निवृत्त होते ही आप पुनरुद्धार के लिये काश्मीर छोड़ कर सिन्ध के नगर उहा में पहुंचे। यहां पहुंच कर आपने उसी स्पंत पर धूनी लगाई जहां कि पहिणी वार आफर लगा २३६ 7 - -- जगनुरुलीचन्द्रदिम्बिजये चुके ये । पञ्चाग्नियों की मध्यस्थली में पद्मासन जगा कर आपने अपना कार्य क्रम चलाते हुये आगत सजनों से कुशल पूवा उन्होंने आपके समक्ष यवनों का प्रास कहते कहते दोन भाव से दन करना आरम्भ किया भगवान् ने उनकी यह दयनीय दशा देखकर उनको सान्त्वना दी आर यहुत कुछ समझा कर शान्त किया जा वे शान्त हुये तर आपने आजस्थी शब्दों में उनको कुछ उपदेश दिया जिसका उपक्रम इस प्रकार है ।। १७-२३ ॥ (नायं वेक्लव्यसमयः सज्जा भवतासजनाः। परीक्षासमयः प्राप्तो भवतां धर्मनिर्णये ॥२४॥ धर्मः प्राणंपणेनापि रक्षणीयः प्रयत्नतः । प्राणाधिको यतः प्रोक्तो धर्मः पूर्वजसजनैः ॥२५॥ 'धर्म विहाय सहजं यदि जीवितुमिच्छर्थ । वृथैव जीवनं तर्हि मन्मते भवतामिदम् ॥२६॥ भवद्विधा धर्मवीराः प्राशिनो धर्महेतवें। सर्वस्वमपि सन्त्यज्य धर्म रक्षन्ति संततम् ॥२७॥ बलिवेदीमधिष्ठाय मृत्युमाह्वयत स्वयम् । यद्येन निजं धर्म नाशयन्तीह कातराः ॥२८॥ अवश्यम्भावि मरणं मत्वा भवत सज्जनाः। 'स्वधर्मरक्षणे सजाः समयोयमुपागतः ॥२६॥ मन्दिराणि समुद्घाट्य देवपूजा विधीयताम् । घण्टाघोषः प्रतिदिनं मन्दिरेपु निवेश्यताम् ॥३०॥ आयान्तिचेत्तं निरोदु शत्रवः केपि दुर्मदाः । सद्यो बलिप्रदानेन प्रेप्यन्तां ते सुरालयम् ॥३१॥ धर्मयुद्धे मरिष्यन्ति ये जना मम शासनात् ।- तेपामहं समुद्धर्ता भविष्यामि न संशयः ॥३२॥ 7 - -. .

जयादशः सर्गः
૨૩૭
-
एवं बहुविधैर्वाक्यैर्योधयन्नुपसङ्गतान् ।
गृहेषु प्रेषयामास शाम्भवोमिरिवासहः ॥३३॥
आपने कहा सजना !! यह समय धैर्यावलम्पन का है घरगहट का नहीं, इस
लिये हर प्रकार का कष्ट सहन करने के लिये तैयार होजाओ धर्मरक्षा के लिये यह
समय आपकी परीक्षा लेने के लिये आया है प्राणों की बाजी लगाकर इस समय
धर्म की रक्षा करनी होगी । क्योंकि प्राणों के मूल्य से धर्म अधिक मूल्यवान है ।
धर्म को छोड़कर यदि आप अपने जीवन को इच्छा रखते हो तो मेरी अनुमति से
जीवन रखना व्यर्थ है । आप जैसे धर्मवीर धर्म के लिये सर्वस्व देकर भी पूर्वकाल
से धर्म की रक्षा करते चले आ रहे हैं, आप लोग धर्म रक्षा के लिये बलिवेदी पर
चदार स्वय मृत्यु का आवाहन करें, जिस मृत्यु के भय से कातर जन अपना
धर्म छोड़ देते हैं, मरण अवश्यम्भावी है ऐसा समझकर अपने धर्म की रक्षा
के लिये सन्नद्ध हो जाओ । परीक्षा का समय निकट आ गया है। अपने अपने
मन्दिर खोलकर देवताओं की पूजा आरम्भ करी । मन्दिरों में प्रति दिन घण्टा
घोप करो उसके रोकने के लिये यदि आपके शत्रु आवे तो आप उनको बलिदान
देकर शीघ्र सुरपुर भेनें । जो सजन धर्म युद्ध में मेरे कथन से मृत्यु को प्राप्त
होंगे उनका उद्धार में स्वय करूंगा। इस प्रकार उनको उपदेश देकर आपने उन
आगत जनों को अपने अपने घर भेज दिया ॥२४-३३॥
गृहेषु ते वीरवरा धर्मयुद्धमभीप्सवः ।
भेरीपटहशङ्कोत्थेनिनादैः रवमपूरयन् ॥३था
आकर्ण्य यवनास्तत्र निनादं घोरनिःस्वनम् ।
चुनुभुश्चुकुशुः पापाः पराभवपदं गताः ॥३५॥
ते मन्दिरोदरपतानाहूय बहुमज्जनान् ।
कथयामासुरादेशात्कस्येय क्रियते कृतिः ॥३६॥
तेऽवदनिदमागत्य मन्दिरेभ्यः पुरोगतान् ।
मुनेर्धर्मगुरोराज्ञावर्तते तादृशी शिवा ॥३॥
समाकर्ण्य वचस्तेपामेवंविधमुपद्रुताः ।
यवनास्तेऽवदन्यस्य बलमालम्ब्य निर्भयाः ॥३८॥

-- २३८ जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये भवन्तः प्राणदएडार्हमेतत्कुर्वन्ति सोऽधुना। विक्षिप्तएव भवतां नाशाय समुपस्थितः ॥३६॥ एवंविधं वचस्तेपां यवनानां निशम्य सः । मुनिराह क्षणादेव ज्ञातमेतद्भविष्यति ॥४०॥ अहमस्मि भवन्तो वा विक्षिप्ता इति निर्दिशन् । हुकारमकरोत्तीनं दहन्निव जगत्त्रयम् ॥११॥ तेन हुङ्कारमात्रेण सद्यस्तद्देशशासकः । निजाघातगतप्राणो विक्षिप्तो यवनोऽभवत् ॥१२॥ आश्चर्यमिदमालोक्य सद्यो जातं गतासवः । अभूवन्यवनाः प्रायो मुनेरस्य महात्मनः ॥४३॥ एवामत्रत्ययवनप्रभावं बहु मर्दयन् । मुनिः पश्चाग्निमध्यस्थो निजधर्ममवर्धयत् ॥४॥ घरों में जाकर उन उत्तप्त हिन्दू वीरों ने अपने अपने देव मन्दिर खोलकर भेरी पटह शङ्ख आदि वाद्य घोपों से जमीन और आसमान को एक कर दिया । उसको सुनकर हिन्दु द्रोही यवन बहुत क्षुब्ध हुए और मन्दिरों के मालिकों को चुलाकर कहने लगे कि आप लोग किसकी प्रेरणा से ऐसा कार्य कर रहे हैं ? यवनों की बात सुनकर हिन्दू सज्जनों ने कहा कि आजकल हमारे धर्म गुरु यहां पर आये हुए हैं। उनको ही आशा से हम यह कार्य कर रहे हैं । हिन्दुओं की ऐसी निर्भय बात सुनकर वे यवन कहने लगे कि जिनके बल पर निर्भर रह कर आप प्राणदण्ड योग्य यह कार्य कर रहे है वे आपके धर्मगुरु पागल हैं और आप लोगों के नाश के लिये यहां पर आये हुए हैं । यवनों की ऐसी उत्तप्त बात सुनकर भगवान् कहने लगे कि जरा ठहरो ! अभी मालूम हो जायगा कि पागल कौन है ? ऐसा कहकर भगवान् ने एक ऐसा तीव्र हुंकार किया जिससे उस देशका शासक मिरजा संद्यः पागल होगया और अपनी कटारी से अपने को मारकर उसने अपने पापमय जीवन का स्वय अन्त कर दिया । यह घटना विक्रम संवत् १६४२ में हुई। भगवान् की यह आश्चर्यगयी घटना देखकर सिन्ध के समस्त यवन । भयभीत हुए और गतप्राण जैसे होकर इधर-उधर भाग गए । इस मकार अपने प्रयोदशः सर्ग मभाव से सिन्ध में यवनों के प्रभाव को घटाकर भगवान् फिर पश्चाग्नि मध्यगत होकर अपना कार्य करने लगे ।।३४-४४ ॥ सिन्धुदेशमनुप्राप्तं मुनिमाकर्ण्य भूमिपः । प्रतापसिंहो मेवाडभूभितो मुनिमन्वगात् ॥१५॥ अतिक्रम्य निजं देशं मरुसीमानमागतः । प्रतापो यावदभवद व्याकुलः सह सैनिकैः ॥४॥ तावन्मनिर्ध्यानदृशा तमायान्तं विलोकयन् । मध्येमार्गमदात्स्वप्ने दर्शनं हर्षवर्धनः ॥१७॥ तस्य प्रभावतो नष्ट गमनागमनव्यथः । प्रतापस्तत्र शिविरं योजयामास सर्वतः ॥४८॥ शिविरे कृतविश्रामं प्रतापममितप्रभम् । अमात्योऽवददागत्य भामहः स्वप्नचेष्टितम् ॥४॥ भगवन्नद्य शयने शयानं मां प्रबोधयन् । अवधूतोऽवदत्स्वप्ने मामिदं यनिवेद्यते ॥५०॥ इस विचित्र घटना के अनन्तर एक और घटना सुनिये । भावान् को सिन्ध में आया हुआ सुनकर मेवाड़ से महाराणा प्रताप भगवान के दर्शनार्थ सिन्ध की और आरहे थे। वे मेवाड़ भूमि का अतिक्रमण कर जैसे ही मारवाड़ की सीमा पर पहुंचे वैसे ही उनका समस्त वल समाप्त हो गया। यहा तक आते आते उनके बहुत से सैनिक मुगलों के हाथों से मारे गये । कुछ बचे हुये सैनिकों को साथ लेकर महाराणा भगवान् के पास जाने को उद्यत हुये । इतने ही में ध्यानयोग से भगवान् ने उनको आता हुआ देखकर बीच मार्ग मे ही उनको स्वममें दर्शन दिया दर्शन पाते ही महाराणा ने भागे जाना वढ कर वहीं कैम्प डाल दिया। उसी कैम्प में विश्राम करने के समय उनके मन्त्री भामाशाह ने प्रताप के पास आकर अपने स्वसका वृत्तान्त कहना आरम्भ किया। आपने कहा-महाराज ! आज शयन में हमको एफ अवधूत ने स्वम में जगाकर हमसे कुछ बाव फही, जो मैं आपके समक्ष इस समय कहता है । आप उसे ध्यान पूर्वक सुनिये १ ॥४५-५०॥ - - जगदुरभीचन्द्रदिग्विजये अद्यावधि निजधर्ममनुसृत्य यदर्जितम् । ...) तत्सर्व देशरक्षायै प्रतापाय प्रदीयताम् ॥५१॥ अर्जन पंणिजां धर्मः कथ्यते धर्मकोचिदैः। 'धनोपयोगो धर्माय क्रियते धर्मतत्परैः ॥५२॥ भवता धर्ममास्थाय यद्धनं बहु सञ्चितम् । देशरक्षामनुस्मृत्य तव्ययः प्रविधीयताम् ॥५३॥ एकादश समाः शूरः प्रतापो यवनासुरे। सह मेवाइविपये घोरं जन्यमयोजयत् ॥५४॥ तत्र तत्कोप निहितं सर्व धनमुपार्जितम् । तत्पूर्वजैः क्षयं प्राप्त प्रतापस्तेनपीडितः ।।५५|| अतुला धनसम्पत्तिस्तव कोपे विलोक्यते । । मया समाधियोगेन भवता सा मदीयताम् ।।५६।। अवाप्य बहु तत्सर्वं प्रतापः परवीरहा। यवनासुरनाशाय भविष्यति महबलः ॥५७॥ तदिदं तन्निदेशेन मयाद्य भवतां पुरः । स्थाप्यते देशरक्षायै तद्गृहाण यथोचितम् ॥५॥ एवमात्मगतं भावं स्वप्नदृष्टंनिवेदयत् । 'अमात्यो भामहः सर्व प्रतापाय न्यवेदयत् ॥५॥ प्रतापोपि तदादाय सर्व भामहदर्शितम् । निजमप्यस्य पुरतः स्वप्नमाह विलोकितम् ॥६॥ स्वम में अवधूत जी मेरे से कहते है कि-शाह नी ? आपने अब तक अपने धर्म का पालन करते हुये जो धन कमाया है यह सर देश-रक्षा के लिये महाराणा को दे दीनिये ? धन यमाना वैश्य का धर्म है, उसका उपयोग धर्मरक्षा के लिये होना आवश्यक है । आपने धर्म से जो धन कमाया है, उसका उपपांग इस समय देश की सा के लिये आपको फरना चाहिये । ग्यारह वर्ष तारापर यरनों के -- 1 - .

२४१ त्रयोदशः सर्गः के साथ युद्ध करते करते महाराणा नी अपने पूर्वजों का कमाया हुआ कोपगत सब धन अब तक व्यय कर चुके हैं इसलिये आमफल बहुत चिन्तित हैं । आपके कोप में अतुल सम्पत्ति है-जिसको में समाधि में देख रहा हूँ आप उसे देने के लिये शीघ्र उद्यत हुजिये ? आपके उस धन को प्राप्त होकर प्रतापी प्रताप यवनों के नाश के लिये समर्थ हा जावेंगे। यह मेरे लिये उनका स्थान सन्दिप आदेश है । इस लिये अब आप कृपा करके मेरी इस तुच्छ सम्पत्ति को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये ग्रहण कीजिये ऐसा कहकर शाहनी ने अपना सर धन महाराणा को दे दिया महाराणा ने भी धन्यवाद पूर्वक उस धन को लेकर अपना स्वमदृष्ट वृत्तान्त शाहनी के समक्ष कहना आरम्भ किया जिसका उपक्रम इस प्रकार हे ॥ ५१-६० ॥ यथाद्य भवतादृष्टः स्वप्नो निशि तथा मया । शयने विनिविष्टेन वीक्षितोद्भुतकल्पनः ॥६१॥ एकलिङ्गे पुरादृष्टः स योगी शङ्करप्रभः । मामुपेत्य यथाकालं क्थयामास हृद्गतम् ॥१२॥ मम पार्वे समागत्य कि करिष्यसि भामहः । मत्प्रेरितो बहु धनं प्रदास्यति पथि स्थितः ।।३।। तदादाय ममादेशाद्धनमात्मपराक्रमः। निपातय बलं सर्वं यवनानां दुरात्मनाम् ॥६॥ त्वादृशाः क्षत्रिया लोके देशरक्षासमुद्यताः । मयान्येपि यथाकालं देशे देशे नियोजिताः ॥६५॥ केपि पञ्चनदे देशे केपि बङ्गेपु दुर्जयाः। विहारदेशे केप्यों कलिङ्गे केपि भूभुजः ॥६६॥ मर्दयन्ति वलं सर्व यक्नानां दुरात्मनाम् । नानामहरणैर्दिव्यैरुपेताः शक्तिशालिनः ॥७॥ त्वमपि प्राप्तमम्पत्ति महानिजदेशजान् । विमर्दय मृधे शत्रून्विभञ्जय वलं द्विपाम् ॥६८ * "T T YA २४२ जगानुरात्रीचन्द्रदिग्विजये यातायातव्यथाकष्टमतिवाह्य ममाज्ञया । मार्गादेव निवर्तस्व कुरु कार्य मयोदितम् ||६|| एवमादिश्य मां स्वप्ने स योगी मनसि स्थितम् । विहायमा समगमत्सिन्धुदेशं शिवप्रभः ॥७०|| शाहजी ! जिस प्रकार आपने अपने स्वम का वृत्तान्त हमको सुनाया है ठीक उसी प्रकार का एक स्त्रम आज रात्रि में हमने देखा है सुनिये !! एकलिङ्ग महा- देव के माङ्गण में जो योगिराज पहले मिले थे वे स्सम में मुझे जगासर कहने लगे कि मेरे पास आकर तुम क्या करोगे मेरे कैयन में भामाशाह मार्ग में ही आपको बहुत सा धन देंगे उसको लेकर आप मेरी आज्ञा से यवनों का समस्त वल नष्ट कीजिये आप जैसे देश रक्षक वीर क्षत्रिय योद्धा हमने अन्य देशों में भी इस समय लगा दिये है कोई पनाव में, कोई वगाल मे, कोई विहार में, कोई अङ्ग और बग में, कोई कलिङ्ग में यवनों का दर्प दलन कर रहे है । आप भी भामाशाह से धन लेकर अपने देश के यवन शत्रुओं का नष्ट कीजिये और उनकी सेनाओं को उच्छिन्न कर देश को निष्कण्टक वनाइये । यहां तक आने का कष्ट न उठाकर मार्ग से ही अपने मेवाड़ को वापिस लौट जाइये और मेरे आदेश का पालन कीजिये ऐसा स्वम में हमसे कहकर शिवस्वरूप यह योगी आकाश मार्ग से सिन्ध की ओर चले गये यही हमारा स्वम दृष्ट वृत्तान्त है ॥ ६१- तदेहि तन्निदेशेनप्राप्तमेतद्धनं मृधे । नियोज्य यवनवातं मर्दयावः समागतम् ॥७१॥ इत्यामन्त्र्य महीपालः प्रतापो भामहापितम् । धनमादाय मेवाड़प्रदेशं पुनरन्वगात् ॥७२॥ तत्र सामन्तभूपालरनेकैः कृतसत्कृतिः। प्रतापः क्षत्रियकुलं युद्धाय समयोजयत् ॥७३॥ विमर्दितरिपुत्रातस्तत्र मेवाड़भूमिपः । पुनर्दिदीपे भगवान्भास्वानिव घनोद्गतः ॥७|| सेनासन्नाहनिपुणेनिजसेनाधिपः सह । अवातरद्युद्धभूमि प्रतापः सिंहविक्रमः ॥७॥ -७० ॥

२४३ त्रयोदश. सर्ग. केपाश्चित्पातयामाम शिरांसि यवनद्विपाम् । केपाञ्चिचूर्णयामास गदापातैः स वाहिनीम् ॥७६॥ निकृत्तसेनापतयो यवनाः शरणार्थिनः । द्रुतमाहवमुत्सृज्य विविशुगिरिगह्वरम् ॥७॥ उत्खातयवनव्रातः प्रतापो निजविक्रमः । द्वात्रिंशद्दुर्गभूभागान्यवनेभ्यः समाहरत् ।।७।। एवमस्य प्रतापेन प्रतापः प्राप्य सत्वरम् । मुनेविजयमातेने स्वराज्यं पुनरागतम् ॥७॥ उभयत्र विनिर्गत्य यवनानेवमात्मवान् । मुनिः स्वतपसा सिन्धुं कृपासिन्धुरमूमुचत् ॥८॥ इसलिये अब चलिये उस योगी के आदेश से पाप्त यह धन युद्ध कार्य में लगा कर हम दोनों यवन साम्राज्य को नष्ट करें ऐसा कहकर महाराणा प्रताप शाहनी का धन लेकर फिर मेवाड़ को वापिस चले गये वहां पहुंच कर मापने झाला जैसे स्वामि भक्त सामन्त सैनिकों से सत्कृत होकर अपने देश के वीर क्षत्रियों को युद्ध में लगा दिया। चारों ओर घमासान युद्ध छेड़ कर शत्रुओं पर निर्दय प्रहार करने वाले वीरवर प्रताप फिर सूर्य की तरह चमक उठे और अनेक प्रकार की व्यूह रचना करने वाले अपने सेनापतियों के साथ स्वयं युद्ध के मैदान मे उतरे, मैदान में उतरते ही प्रताप ने अनेक यवन सेनापतियों के शिर जमीन पर गिरा दिये और लाखों सैनिकों का यात की बात में सहार कर दिया । इस महा युद्ध में बहुत से यवन मैदान छोड़ कर भाग निकले और इधर उधर अपने माण पचाने के लिये पहाड़ों में जा छिपे । इस प्रकार यवन साम्राज्य उच्छिन्न कर महाराणा प्रताप ने भगवान् के आशीर्गद से बत्तीस किले यवनों से छोने । वह सव मताप भगवान् का हो या जिसके प्रभाव से पहाराणा ने युद्ध में विजय मा फर मेराद को एक बार फिर स्वतन्त्र ग्ना दिया [ भामाशाह के धन से पचीस इनार सैनिक चारह वर्ष तक यवनों से लड़े यह बात इतिहास से स्पष्ट है । आत्मापल सम्पन्न भगवान् इस प्रकार मेवाड़ और सिन्ध में एक साप यवम -- जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय साम्राज्य को उच्छिन्न कर नगर उहा को सर्वदा के लिये यवनों के चङ्गुल से बचा गये ॥७१--८०॥ दुःखानिवृत्ता भगवत्कृपया सिन्धुवासिनः। मुनिमेनममन्यन्त योगिराज महेश्वरम् ॥१॥ दिव्यदृष्टिरयं वीक्ष्य समाधौ दुःखकर्पितम् । काश्मीरदेशमगमत्तदुद्धाराय सत्वरम् ॥२॥ तत्र श्रीनगरे श्रीमान् श्रीचन्द्रोयं श्रिया युतः । समित्समिद्धमाधाय निजाग्निं तपसि स्थितः ॥८॥ समागतमिमं तत्र मुनिमाकएर्य भक्तितः । विष्णुकोलाभिधः कश्चिद्वाह्मणः पदमन्वगात् ॥८॥ शोकाकुलं तमालोक्य बाह्मणं पदयोनतम् । मुनिः पप्रच्छ शोकस्य कारणं सोऽवदन्मुनिम् ॥८५॥ भगवन्नेकपुत्रेयं विधवा ब्राह्मणी सुतम् । मृतमादाय भजते श्मशानं पश्य तामिमाम् ॥८६॥" मुनिर्दीनार्तिशमनो विलोक्य विधवां पथि । तामुवाच मुधा वत्से किमयं नीयते शिशुः॥७॥ वृथा विलपनं मातस्त्यज्य पश्य निजं सुतम् । शयानं निद्रया नायं मृतः पश्य तदाननम् ॥१८॥ इत्त्यं मुनेचस्तस्य समाकएर्य यदा सुतम् । साऽपश्यद्विधवा तावत्स जीवनमुपागतः ॥८६॥ श्मशानातमुपादाय जीचित्तं पालक पदा। गृहं विवेश विधवा तदा जनरवोऽभवत् ।।१०|| मिन्ध के निवासी यानों द्वारा प्राप्त हुए अनेक यष्टों से छूटने पर भगवान् साक्षात् शङ्कर मानने लगे । इमी अरसर में अपने दिव्य दृष्टि से फारमीर फो विपदमस्त देखा । देखते ही आप उसके उद्धार के लिये नगर ठट्टा से चल 1 -- 7 भ -- 1 ॥ को २४५ त्रयोदशः सर्गः पड़े। [ इस काश्मीर में शमसुदीन से लेकर याकूब तक तीस यवन शासक हुए । जिन्होंने तलवार के जोर से यहां के हिन्दुओं को मुसलमान बनाया था । केवल ग्यारह घर ही ब्राह्मणों के पासो रह गए । जो यवनों के अत्याचारों को सहन करते रहे । जिस समय आप वहां पहुंचे उस समय वहां के ब्राह्मणों पर वार पर बार हो रहा था । आपने वहां जाते ही एक विचित्र युग उपस्थित कर दिया ] शहर के बाहर धूनी लगाकर आप अपने कार्यक्रम में लग पड़े। आपको आया हुआ सुनकर एक विष्णुफोल नामक ब्राह्मण आपके समीप पहुँचा । आपने उसको शोकग्रस्त देखकर उससे शोक का कारण पूछा। पूछने पर उसने कहा भगवन् ! हमारी जाति की एक यह विधवा अपने इकलौते मरे हुए पुत्र का शव लेकर मार्ग में जा रही है कृपया आप इसकी और जरा निहारिये। ब्राह्मण की यह दयनीय बात सुनकर भगवान् उस ब्राह्मणी को मार्ग में देखकर कहने लगे कि तुम इस वालक को व्यर्थ क्यों श्मशान ले जा रही हो ? विलाप छोड़कर जरा इसकी ओर निहारो । यह नींद में सोया हुआ है, मरा नहीं है, इसको मुख तो खोलकर देखो। भगवान् को यह बात सुनकर उसने जैसे ही उसका मुंह खोल कर देखा वैसे ही वह वाला जी उठा । उस जीवित पुत्र को श्मशान से वापिस लेकर जैसे ही वह घर को ओर चलो पैसे हो सर्वत्र शोर मच गया ॥८१-९०॥ अनुगृहीता विधवा मुनिनानेन या सुतम् । जीवितं पुनरादाय गृहमेतदुपाविशत् ॥१॥ सर्वैरैयं मृतो दृष्टो वालको नगरस्थितैः । कथं जीवनमापेदे मुनेः करुणया पुनः ||२|| एवमुच्चावचैर्भावनगरस्था महोदयाः। मुनिमेनममन्यन्त साक्षादीश्वरमागतम् ॥१३॥ अस्मिन्नेवान्तरे तत्र शासको देशवासिनाम् । याव इत्यभिधया प्रथितो यवनेश्वरः घटनामीदशी सद्यः समाकर्ण्य मुनेः पराम् । समस्तं ब्राह्मणवातमादिदेश यथावलम् ॥६५), 1 F TE - २४६ जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये भवन्तो मन्निदेशेन ममावासगृहे द्रुतम् । समायान्तु विचारोत्र कर्तव्यः कोपि साम्प्रतम् ॥६६॥ आदेशमिममाकएर्य तस्य शास्तुमहोदयाः। विष्णुकौलं पुरस्कृत्य मुनि शरणमागताः॥१७॥ मुनिस्तानाह कृपया मा भयं भजत दिजाः । ईश्वरादेशतः सर्व शिवमेव भविष्यति ॥८॥ सनातनमिमं धर्म भगवत्परिरक्षितम् । न कोपि भुवि शक्नोति विमर्दयितुमुद्धतः ॥६६॥ स्वयमागत्य भगवानिजं धर्मधनं बलात् । रक्षतेऽवतरल्लोके नानारूपेरनारतम् ॥३०॥ शहर के सब लोग कहने लगे कि इस विधवा पर भगवान् ही ने अनुग्रह किया है जिसके कारण यह अपने मृत पुत्र को जीवितावस्था में लाकर घर आ रही है। हम सर नगरवासियों ने यह इसका पुत्र मरा हुभा देखा था परन्तु भगवान् को कृपा से यह दुवारा जीवन कैसे प्राप्त कर चुका यह इमारी बुद्धि में भी नहीं आता है। इस प्रकार के उच्चावच भावों से व्याप्त शहर के सजन भगवान् को साक्षान् ईश्वर समझने लगे । और भगवान् भी इस प्रकार के अनेक कौतूहलों से जनता को जागृत करते हुए अपने कर्तव्य के पालन में लग पड़े । इसी अवसर में इस प्रान्त का शासक याकूब भगवान् की इस अद्रुत घटना को सुन- कर घबड़ा गया और शहर के समस्त ब्राह्मणों को बलपूर्वक अपने दरबार में बुलाने के लिये उसने एक आदेश पर निकाला । जिसमें लिखा था कि आप सब लोग विचार करने के लिये मेरे दरवार में अवश्य आ. इस आदेश पत्र के निकलते ही सब ब्राह्मण पण्डित विष्णुफॉल को अगाढ़ी करके भगवान् के पास गये । भगवान् ने उन सको देखकर कहा कि भय की कोई बात नहीं है । धैर्य धारण करो ! भगवान की कृपा मे सर कल्याण होगा। भगवान् के द्वारा रक्षित इस सनातनधर्म फो ससार में कोई नष्ट नहीं कर सकता है। धर्म रूपी अपने धन को भगान् अनेक रूपों में स्वय अवतीर्ण होकर अपने बल से सुरक्षित रखते हैं ॥११-३००॥

२४७ प्रयोदशः सर्ग विश्वासः क्रियतां सर्वर्भगवत्यम्बिकापतो। सएवासुरनाशाय समेष्यति पदे पदे ॥३०१|| सर्वस्वमपि रक्षायै धर्मस्य यदि गच्छति । माहाभाग्यं तदा सर्वे जानन्तु पुरतःस्थितम् ।। २ ॥ अत्याचारपरस्यास्य शासनं कतिचिद्दिनः । लयं यास्यति मा शोकं यात गच्छत तद्गृहम् ॥ ३॥ गत्वा स वाच्यो यवनो धर्मस्य परिरक्षिता । गुरुरस्माकमायातः साम्प्रतं स भवेद्यदि ॥ ४ ॥ भवद्धर्मपरः सर्वे वयं तदनुगास्तदा । स्वयमेव भविष्यामो भवद्धर्मपरायणाः॥५॥ एवमादिश्य भगवानागतान्भूसुराग्रगान् । प्रेपयामास बलवत्परीक्षाये पुरोगतान् ॥ ६॥ तेपि सवें गृहं तस्य समेत्य मुनिभापितम् । सर्वं निवेदयामासुः पुरतस्तस्य सङ्गताः ॥ ७॥ निशम्य तेषां वचनममात्यमयमादिशत् । गच्छ तत्सविधे गत्वा तमानय मदाश्रयम् ॥ ८॥ आदेशमिममादाय गतोऽमात्यो मनेः पुरः । न शशाक किमप्यस्य सविधे वक्तुमुत्तरम् ॥ ६ ॥ प्रणम्य पदयोस्तस्य निपत्य तदुपान्तगः । सर्व विलोकयामास मुनेरस्य चिचेष्टितम् ॥१॥ आप लोग अम्बिकापति भगवान् शङ्कर में विश्वास करें ये शङ्कर ही असुरों के नाश के लिये पद पद पर आपकी रक्षा करेंगे । धर्म की रक्षा में यदि आपका सर्वस्व भी नष्ट होता हो तो आप अपना अहोभाग्य समझे। अत्याचार प्रवृत्त इस याक्व का शासन कुछ दिनों में ही समाप्त होने वाला है इसलिये अा अधिक चिन्ता मत करो । निर्भय होकर उसके दरवार में जाभी और जारर कहो कि

॥
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
हमारे धर्म गुरु यहां पर आये हुये हैं वे यदि आपका धर्म स्वीकार करेंगे तो उनके
पीछे हम भी आपका धर्मग्रहण करेंगे। इस प्रकार उन ब्राह्मणों को समझाकर
भगवान् ने यांच के दरवार में भेज दिया वहां जाकर उन ब्राह्मणों ने वही कहा
जो उन्हें समझापा गया था। ब्राह्मणों की बात सुनकर याकूब ने अपने दीवान
को भगवान के पास उनको अपने दरवार में लाने के लिये भेना । दरवार का
हुकुम लेकर दीवान भगवान् के पास गया पर कुछ कहने के लिये उसको साहस
न हुआ वह उनके चरणों में नतमस्तक होकर आपके पास ही बैठ गया। उसके
बैठने पर भगवान ने एक आश्चर्यमय घटना उपस्थित कर दी ॥३०१-३१०
अस्मिन्नमात्यपदवीमपयाते महोदये।
मनेः सविधमागत्य स्थिते दर्शयितुं बलम् ॥११॥
मुनिरमिगतं काष्ठमर्धदग्धं ज्वलन्मुखम् ।
समादाय पुरोस्यैव भूमिमत्वन्य पार्श्वगाम् ॥१.२।।
तस्यां निवेशयामाम सत्वरं तद्धवि स्थितम् ।
वृक्षतामगमद्येन विलक्षः स पुरोभवत् ॥१३॥
तादृशं वीक्ष्य स मनेश्चमत्कारं भयाकुलः।
"चित्रन्यस्तइवामात्यो बभूव बहुविस्मितः ॥१४॥
एवं कृतचमत्कारो मुनिर्याकूबदुःखदम् ।
शूलमुत्पादयामास जठरे तस्य कौतुकात् ॥१५॥
शूलवेदनयाकान्तः स सत्वरमितो गतम् ।
अमात्यमाद्धयामास सोपि तत्र गतोऽवदत् ॥१६॥
महाशक्तिरयं योगी दिधक्षति जगत्त्रयम् ।
प्रमादनीयः म जवादद्यैव भवता ततः ॥११॥
अमात्यनेयमुक्तः स समागत्य मुनेः पदम् ।
दर्शनादेव शूलेन मुक्तोऽभवदनुग्रहात् ॥१८॥
विमुक्तशूलः म यदा पाश्निनं निजागमाम् ।
अपच्यद्ययनः शास्ता तदा मुनिरुवाच तम् ॥१६॥

त्रयोदशः सर्गः N - २४९ अतिकान्तान्यमर्यादं भवदागः समुन्नतम् । नाधुनार्हति देवेन प्रायश्चित्तमवस्थितम् ॥२०॥ असाध्यतामधिगतो यथारोगो महौपधैः । न शाम्यति तथा तेद्य महदागोपि न क्षमाम् ॥२१|| . न्यायालयेभगवतस्तवेदं शासनं जवात् । विलयं प्रगतं यस्य परिणामोयमागतः ॥२॥ नातः परमिदं राज्यं तब शासनमेष्यति । भविष्यत्यन्यएवास्य शास्ता भगवता कृतः ॥२३॥ एवं प्रदाय बलवच्छापं तस्मै मुनिद्रुतम् । समाधिमगमत्सोपि ममार मुनिशापतः ॥२४॥ समाधियोगे निर्वृत्ते मुनिः काश्मीरदेशतः । देशं पञ्चनदं गत्वा कादराबादमन्वगात् ॥२५॥ दीपान भगवान् को सर वाते देखता रहा ज्यो हो दीवान के मन में कुछ अहकार अपने वल में हुआ त्योंही भगवान ने अपनी धूनी से एक आजली लकड़ी निकाल कर पास को जमीन में उसको गाढ दिया। वह कुछ ही देर में हरी भरी होकर वृक्ष के रूप में परिणत होगई । इस आश्चर्य को देखकर दीवान बहुत विस्मित हुआ और भगवान् को ऐसो शक्ति देखकर मन में भय भीत हुभा इस प्रकार भगवान् ने दीवान को चित्र लिखित जैसा बनाकर याकूब के पेट में शूल उत्पन्न कर दिया, शूल के उत्पन्न होते ही याकूर ने दीवान को बुलाया । उसने वहां जाकर याकूब से कहा कि ये योगिराज बड़े बलान है । अपने बल से त्रिलोकी को दग्ध कर सकते है । इसलिये आज ही जाकर इनको प्रसन्न करना चाहिये । दीवान की रेसी बात सुनकर याव तुरन्त भगवान् के पास गया, भगवान के दर्शन करते ही याकूब का शूल शान्त हो गया । शूल शान्त होने पर याकूब ने भगवान् से अपने किये हुये पापों का प्रायश्चित्त जब पूछा, तब भगवान् ने याकूर से कहा कि आप पाप मर्यादा का उल्लङ्घन कर चुके हैं इसलिये आपका मायश्चित नहीं हो सकता है । असाध्य रूप में परिणत रोग जिस प्रकार औपयों से शान्त नहीं हो सकता है उसी प्रकार अब आपका पाप भोसमा से शान्त

२५०
-
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
नहीं हो सकता है, ईश्वर के दरवार में अब आपका शासन काल समाप्त हो गया है ।
उसका अब अन्त समय उपस्थित है । आपका शासन आ नहीं रहेगा। अब इसका
शासक ईश्वर ने और ही नियत किया है । इस प्रकार याव को शाप देकर भग-
पान् समाधिस्थ हुए और याकूब थोड़े समय में मर गया इसी समय में [ याकूब
के राज्य पर अकबर का सेना ने आक्रमण करके उसके राज्य को दिल्ली में मिला
लिया] समाधि से निवृत्त होने पर भगवान् काश्मार से चलकर पञ्जाव के कादरा-
वाद शहर में आगये ॥११-२५
अत्रापि यवनाधीशो जहांगीरपदाभिधः ।
मुनेदर्शनमादातुमायातो लवपत्तनात् ॥२६॥
मुनेः पदाम्बुजं नत्वा वहुशो लवपत्तनम् ।
समानेतुमयं चक्रे मुने नाविधार्थनाः ॥२७॥
मुनिरप्यस्य सद्भावमधिगत्य तदिच्छया ।
जगाम नियते काले दिव्यं लवपुरं रसात् ॥२८॥
कमलासनमायातं मुनिः सह दिदृक्षया ।
जगाद मम कन्थेयं त्वया कोणे निधीयताम् ॥२६॥
मुनेरादेशतः कोणे कन्यां संस्थाप्य दुर्धराम् ।
आसीनोऽभवदेकत्र तदा स कमलासनः ॥३०॥
सिंहासने निवेश्यायं यवनो मुनिमादरात् ।
तदेकदेशे स्वयमप्याससाद नतानन· ॥३१॥
आमोनस्य सुसं तत्र यवनेशस्य देवतः।
दृष्टिः पपात कन्यायां या तदाभृदिलक्षणा ॥३२॥
कदापि मा ममभवृहती बहुकम्पिता ।
कदापि तस्य पुरतः संयुकोच यदृच्छया ॥३३॥
कदापि पुरुषाकारा कदापि गिरिशृङ्गवत् । .
समभूदुस्थिता तत्र जनविस्मयकारिणी ॥३॥

२५१ त्रयोदशः सर्गः कौतुहलाविष्टमना यवनेशो विलोक्य ताम् । मुनि पप्रच्छ सभयः किमिदं समुपागतम् ॥३५।। भयेन कम्पितं दृष्ट्वा यवनं मुनिरब्रवीत् । न त्वया विस्मयः कार्यो ममेयं वशवर्तिनी ॥३६॥ न किमप्यत्र भयदं कर्तुमर्हति कौतुकम् । मदादेशेन कुरुते सर्वमेतद्विलक्षणम् ॥३७॥ एवमुक्तो भगवता मुनिना स भयाकुलः । रहस्यमस्याः पप्रच्छ चलने जातकम्पनः॥३॥ मुनिस्तथा विधं तस्य कौतूहलमुपस्थितम् । विलोक्य मन्दस्मितया दृशा तमिदमब्रवीत् ॥३६॥ ममेयं सहजा कन्था वर्तते सिद्धिसङ्गता । मदादेशेन कुरुते सर्वमेतत्कृताकृतम् ॥४॥ आप को कादरावाद में आया हुआ सुनकर लाहौर का बादशाह जहांगीर आपके दर्शनार्थ आया और आपको लाहौर ले जाने के लिये उसने आपसे बहुत कुछ प्रार्थना की, परन्तु आपने उस सगय लाहौर जाना अस्वीकार किया । कुछ दिनों के वाद जहांगीर ने फिर दुवारा लाहौर जाने के लिये आग्रह किया अब की वार आपने उसको अधिक श्रद्धा देखकर जाना स्वीकार कर लिया और नियत समय पर आप लाहौर पहुंचे । वादशाह ने भापके भातिथ्य का सत्र भवन्ध करके एक दिन आपको अपने दरवार में बुलाकर अपने राज्य सिहासन पर बिठाया और आप दरवारियों के साथ नीचे बैठ गया । आप के साथ कमलासन भी दरवार देखने के लिये गया हुआ या आप ने उसको अपनी गुदड़ी देकर कहा कि तुम इसको किसी कोने में रख दो उसने आप की आज्ञा से उस को एक तरफ रख दिया और आप भी वहीं बैठ गया । जव सिंहासन पर भगवान् बैठ गये तव पाद- शाह की नजर एकाएक उस गुदड़ी पर पड़ी जो उस समप अनेक प्रकार के श्य दिखा रही थी कभी वह विस्तृत होकर फांपने लगती थी कभी छोटी बन कर ऊपर की उड़ने लगती थी कभी पुरुषाकार होकर हिलती पी कभी पर्वत के मन " -.

२५०
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
नहीं हो सकता है, ईश्वर के दरवार में अब आपका शासन काल समाप्त हो गया है ।
उसका अर अन्त समय उपस्थित है। आपका शासन अब नहीं रहेगा। अब इसका
शासक ईश्वर ने और ही नियत किया है । इस प्रकार याकूब को शाप देकर भग-
घान् समाधिस्थ हुए और याकूब थोड़े समय में मर गया इसी समय में [ याकूब
के राज्य पर अकबर को सेना ने आक्रमण करके उसके राज्य को दिल्ली में मिला
लिया] समाधि से निवृत्त होने पर भगवान् काश्मोर से चलकर पञ्जाब के कादरा-
वाद शहर में,आगये ॥११-२५
अत्रापि यवनाधीशो जहांगीरपदाभिधः ।
, मुनेर्दर्शनमादातुमायातो लवपत्तनात् ॥२६॥
मुनेः पदाम्बुजं नत्वा बहुशो लवपत्तनम् ।
समानेतुमयं चक्रे मुनेर्नानाविधार्थनाः ॥२७॥
मुनिरप्यस्य सद्भावमधिगत्य तदिच्छया ।
जगाम नियते काले दिव्यं लवपुरं रसात् ॥२८॥
कमलासनमायातं मुनिः सह दिदृक्षया ।
जगाद मम कन्थेयं त्वया कोणे निधीयताम् ॥२६॥
मुनेरादेशतः कोणे कन्यां संस्थाप्य दुर्धराम् ।
आसीनोऽभवदेकत्र तदा स कमलासनः ॥३०॥
सिंहासने निवेश्यायं यवनो मुनिमादरात् ।
तदेकदेशे स्वयमप्याससाद नताननः ॥३१॥
आसीनस्य सुसं तत्र यवनेशस्य देवतः।
दृष्टिः पपात कन्थायां या तदाभूदिलक्षणा ॥३२॥
कदापि मा समभववृहती बहुकम्पिता ।
कदापि तस्य पुरतः संचुकोच यदृच्छया ॥३३॥
कदापि पुरुषाकारा कदापि गिरिशृङ्गवत् ।
समभूस्थिता तत्र जनविस्मयकारिणी ॥३॥

२५१ त्रयोदशः सर्गः कौतूहलाविष्टमना यवनेशो विलोक्य ताम् । मुनि पप्रच्छ सभयः किमिदं समुपागतम् ॥३५॥ भयेन कम्पितं दृष्ट्वा यवनं मुनिरब्रवीत् । न त्वया विस्मयः कार्यों ममेयं वशवर्तिनी ॥३६॥ न किमप्यत्र भयदं कर्तुमर्हति कौतुकम् । मदादेशेन कुरुते सर्वमेतद्विलक्षणम् ॥३७॥ एवमुक्तो भगवता मुनिना स भयाकुलः । रहस्यमस्याः पप्रच्छ चलने जातकम्पनः ॥३॥ मुनिस्तथा विधं तस्य कौतूहलमुपस्थितम् । विलोक्य मन्दस्मितया दृशा तमिदमब्रवीत् ॥३६॥ ममेयं सहजा कन्था वर्तते सिद्धिसङ्गता । मदादेशेन कुरुते सर्वमेतत्कृताकृतम् ॥४०॥ आप को कादराबाद में आया हुआ सुनकर लाहौर का बादशाह जहांगीर आपके दर्शनार्थ आया और आपको लाहार ले जाने के लिये उसने आपसे बहुत कुछ मार्थना की, परन्तु आपने उस सगय लाहौर जाना अस्वीकार किया । कुछ दिनों के बाद जहांगीर ने फिर दुवारा लाहौर जाने के लिये आग्रह किया अब की बार आपने उसको अधिक श्रद्धा देखकर जाना स्वीकार कर लिया और नियत समय पर आप लाहौर पहुचे । वादशाह ने आपके आतिथ्य का सब प्रवन्ध करके एक दिन आपको अपने दरवार में युलाकर अपने राज्य सिहासन पर बिठाया और आप दरवारियों के साथ नीचे बैठ गया । आप के साथ कमलासन भी दरवार देखने के लिये गया हुआ या आप ने उसको अपनी गुदड़ी देकर कहा कि तुम इसको किसी कोने में रख दो उसने आप की आज्ञा से उस को एक तरफ रख दिया और आप भी वहीं बैठ गया । जब सिंहासन पर भगवान् बैठ गये तव वाद- शाह की नजर एकाएक उस गुढड़ी पर पड़ी जो उस समय अनेक प्रकार के दृश्य दिखा रही यो कभी वह विस्तृत होकर फांपने लगती यी कभी छोटी बन कर अपर को उड़ने लगती थी कभी पुरुषारार होकर हिलती यी फभी पर्वत के मृङ्ग .

२५२ . जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्निजये फे समान बहुत ऊची होजाती यो । उसको इस प्रकार अनेर विध प्रदर्शन दिखाती हुई को देख कर बादशाह को भय हुआ आर उससे भयभीत होकर भग- वान् से उसने कहा कि यह गुढढ़ी ऐसा क्यों कर रही है ? भगवान् ने कहा भय की कोई बात नहीं है विना हमारी आज्ञा के यह कुछ कर नही सकती है । और हमारे फयन से यह सर कुछ पर सस्ती है। इस प्रकार भगवान् से सान्त्वना पार भयभीत वादशाह गोला कि इसके हिलने का कारण क्या है ? भगान् ने उपर दिया कि यह गुदड़ी अनादि काल से हमारे साथ है। इसमें अनेक प्रकार की सिद्धियां भरी हुई हैं । यह सर्वदा हमारे वश में रहती है और आदेश से अस- म्भव को भी सम्भव कर देती है ॥ २६-४० ॥ अस्यां रौद्रोज्वरः सर्व जगदेतच्चराचरम् । भस्मीकर्तुं क्षमः शेते मनिदेशेन निश्चलः ॥११॥ भूताः प्रेताः पिशाचास्ते यक्षगन्धर्वकिन्नराः। सर्व एव वितिष्ठन्ति मदादेशेन निश्चलाः ॥१२॥ यानहं यादृशं कर्तुं पहिणोमि यदृच्छया। ते तादृशं तत्र कर्तुं यतन्ते मनिदेशतः ॥४३॥ एवं वदति योगीशे मुनौ तत्र व्यवस्थितः । सङ्कतेन मुनेः कण्ठग्रहं सद्यश्चकार सः ॥१४॥ तेन सद्यः प्रविष्टेन शरीरे तस्य सर्वतः । यवनस्य कृतं सर्व जर्जरं वपुरातुरम् ॥१५॥ येन केन प्रकारेण स मुनेः पदयोलुंठन् । जगाद देहि मे सद्यः प्राणदानं मुने द्रुतम् ॥४६॥ अन्यथा भवदादिष्टो ज्वरोयं रौद्रतां गतः । गतासु मां विधायैव गमिष्यति शरीरतः ॥१७॥ एवं तस्य वचः श्रुत्वा यवनेशस्य सद्दयः । मुनिः संकेतमकरोत्तेन तस्मात्स निर्गतः ॥४८॥ -- प्रयोदशः सर्गः विनिर्गते मुनेरिच्छावशतः सत्वरं ज्वरे.! कथविद्यवनाधीशः संज्ञा लेभे सभाङ्गतः॥४ा विलोक्य तादृशी शक्तिं मुनेरस्य महात्मनः । चकम्पे यवनप्रातः सद्यएव भयाकुलः ॥५०॥ इसमें हमने रौद्रज्वर भरा है जो हमारी आज्ञा से चराचर को भस्म कर सकता है । इस समय हमने इसका रोक दिया है अलावा इसके भूत प्रेत पिशाच यक्ष गन्धर्व किन्नर सभी मेरे आदेश से निश्चल होकर इसमें रहते हैं । जिस काम के लिये उनको मैं कहता हूं उसी काम को वे करते हैं । इतना कह कर भगवान् मौन हुये, आप के मान होते ही यह रौद्रज्वर आपका संकेत पाकर बादशाह के गले से चिपट गया । उसके चिपटते ही वादशाह जर्जर होगया जैसे जैसे भगवान् के चरण पकड़ कर वद्द कहने लगा कि महाराज मुझे आप इससे जल्दी बचाइये नहीं तो यह मुझे मार कर ही दम लेगा। आप ने उसकी यह बात सुनकर उसके शरीर से उसे अलग कर दिया उसके अलग होने पर वादशाह बहुत देर में सचेत हुआ । दरवार में भगवान् की यह अद्भुत शक्ति देखकर सारा यवन दल भय से कांपने लगा ॥४१- विलोक्य भयसन्त्रस्तं यवनप्रातमुत्त्वरः । मुनि प्रसादयामास सभाध्यक्षः प्रभावितः ॥५१॥ प्रसन्नतामुपगतो मुनिस्तत्र मनोगतम् । भावमादाय सर्वेपामिदमाह शुचिस्मितः ॥५२॥ देवी शक्तिमुपाश्रित्य साधवः समदर्शिनः । समर्थाअपि वाञ्छन्ति न कस्यापि क्षति भुवि ॥५३|| सर्व मनोगतं भावं जानन्तोपि यदृच्छया । कदनं नाभिवाञ्छन्ति दुर्मदानां निसर्गतः ॥५॥ एतावता न बोद्धव्या दुर्वलास्ते दुरात्मभिः । क्षणेन दग्धुमखिलं समर्थाः परमार्थतः ॥५५॥ भस्मनाच्छादितो बहिर्यथालोकैर्न दृश्यते । तथा महात्मनामन्तर्निहितः शक्तिसञ्चयः ॥५६॥ -५०॥

२५४
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
एवं वदन्तमागत्य पुरतो यवनेश्वरः।
मुनि प्राह मम प्रश्नान्वद मे हृदि ये स्थिताः ॥५७॥
मुनिस्तस्येदृशं भावमधिगत्य यथाक्रमम् ।
प्रश्नानामुत्तरमदात्सर्वेपां हृदयेशयम् ॥५॥
जहांगीर ने अपने दरबारियों की यह हालत देखकर भगवान से मार्थना
की कि आप कृपया अप इन लोगों का भय नष्ट कर दीजिये। भगवान् ने प्रसन्न
होकर कहा कि हमने योगदृष्टि से आपके दरबारियों का पुरा भाव देखकर यह
सारा कौतूहल किया था। अब इनका युरा भाव जाता रहा इसलिये हमने भी
अपनी शक्ति को उपसहृत कर लिया । समदर्शी साधु दैवी शक्ति का पल होने
पर भी व्यर्थ किसी को नहीं सताते है । सबके मन की बात जानकर भी किसी
का नाश करना नहीं चाहते । इतने से उनको कमजोर नहीं समझना चाहिये ।
वे क्षण भर में सब कुछ कर सकते हैं । भस्म से आच्छादित अग्नि जिस प्रकार
सपको नहीं दीखता है उसी प्रकार साधुओं में विद्यमान देवीशक्ति भी सरको
नजर नहीं आती है । उसको विरले ही पहिचानते हैं । इस प्रकार भगवान का
आदेश सुनकर वादशाह उसी दरवार में भगवान् के प्रति कहने लगा कि यदि
आप सबके मन की बात जानते हैं तो मेरे बिना पूछे इस समय मेरे मन में जो
प्रश्न उठ रहे हैं उनका उत्तर दीजिये । भगवान् ने उसका यह भाव देवकर
उसके हगत प्रश्नों का जो उत्तर दिया उसका उपक्रम इस प्रकार है [ यहां
पर उत्तर से प्रश्नों का अनुसन्धान करना केवल क्रान्तदर्शियों का ही
काम है ] ॥५१-५८॥
मनुष्यजीवनोद्देश्य भगवदर्शनं मतम् ।
न गृहासक्तता सातु सर्वेषामेव जायते ॥५६॥
हृदये विद्यते येषां सर्वभूतदया स्थिरा।
तएव सर्वभुवने श्रेष्ठतामुपसङ्गताः॥६०॥
व्यापको भगवानीशः सर्वत्र समवस्थितः ।
न चर्मचचुपा तस्य दर्शनं दिव्यया दृशा ॥१॥

२५५ प्रयोदशः मर्गः अनन्यभक्त्या भगवन्तिठया सा पलभ्यते । दिव्यदृर्बिहुज्ञाननिष्ठया भगवत्पदम् ॥६॥ उदेति भक्तिोंकेत्र सत्सङ्गेन प्रवाहिणा । सत्सङ्गो ज्ञाननिष्ठानां हेतुरत्र सनातनः॥६॥ ईश्वरादतिरिक्तं यो न मानयति भूतले । सएव साधुरुदितो न लिङ्गी धर्मनिन्दकः ॥६॥ भवदिधानां लोकेत्र विक्षिप्तानां प्रशासनम् । कर्तुमेव प्रसङ्कन गमनागमने मम ॥६५|| चलेन शासनं तेपां क्रियतेऽत्र भवादृशाम् । अपृष्ट्रय प्रमत्तानां चिकित्सा भूतले मता ॥६६॥ इदमेव यथायोग्यमुत्तरं तब ये हृदि । विद्यन्ते वहवः प्रश्नाः परस्परविरोधिनः ॥१७॥ निर्भीकमुत्तरमिदं निशम्य यवनाधिपः । प्रसादमगमत्पश्चात्प्रशशंस मुनि बहु ॥६॥ निजानुरूपमतुलं रत्नादिसमलंकृतम् । उपायनमदादस्मे मुनये यवनेश्वरः॥६॥ मुनिस्तथाविधं तस्य द्रव्यराशिमवस्थितम् । नाङ्गीचकार पापेन यतस्तत्तेन सश्चितम् ॥७॥ विहाय तद्धनं सर्व तत्रैव यवनार्पितम् । सद्यो लवपुरादेप कादराबादमन्वगात् ॥७१|| (१) भगवान ने.करा -मनुष्य जीवन का उद्देश्य भगामाप्ति है गृह में आसक्त रहना नहीं है यगोंकि गृहामक्ति तो पशुपति आदि अन्य योनियों में भी देखने में आती है। (२) निन के इदग में सिप में भून दगा रानी है। ही समस्त संमार में सबसे उत्तम है।

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये (३) भगवान् सर्वव्यापक होने के कारण सर्वत्र रहते हैं । परन्तु व्यापक भाव में उनको देखना सबका काम नहीं है । दिव्य दृष्टि वाले ही उनको सर्वत्र देख सकते हैं। (४) वह दिव्यदृष्टि भगवान् की अनन्य भक्ति से प्राप्त होती है और भग- यान का दर्शन विशुद्ध ज्ञान से होता है। (५) भक्ति का उदय निरन्तर सत्सङ्ग से होता है और ज्ञान-निष्ठ पुरुषों का सङ्ग ही सत्सङ्ग कहलाता है। (६) ईश्वर के अतिरिक्त जो अन्य किसी की परवाह न करता हो उसको साधु कहते हैं । धर्म निन्दक लिङ्गी को साधु समझना केवल अज्ञान (७).आप जैसे विक्षिप्त मनुष्यों को शासन करने के लिये ही साधु गृहस्थों के यहां आया जाया करते हैं अन्य उनका कोई लौकिक प्रयोजन नहीं है। (८) यदि कोई प्रमत्त पुरुष अपनी इच्छा से अपनी चिकित्सा नहीं कराता है तो हम बलपूर्वक उसकी चिकित्सा करते हैं क्योंकि पागलों को चिकित्सा ससार में पूछकर कहीं भी नहीं की जाती है । भगवान् ने इस प्रकार प्रयों का उत्तर देकर वादशाह से कहा कि इस समय आपके हृदय में यही प्रश्न विद्यमान थे जिसका समुत्तित उत्तर हमने दिया है भगवान् के कथन को सुनकर बादशाह ने भगवान् के मनोविज्ञान की बहुत प्रशंसा की और आपके योग्य उपायन भेट किया परन्तु पाप सश्चित उस उपायन को आपने अस्वीकृत कर छोड़ दिया और तुरन्त लाहौर से कादरावाद आगये । ॥ ५९-७१॥" अत्रापि मुनिमायातं मार्गमाणो बने वने । रत्नदेवीसुतः सद्यः समागादनुरागतः ॥७२॥ अनन्यश्रद्धमालोक्य मुनिरेनं पदस्थितम् । शिप्यतामनयत्प्रीतः सेवयास्व कृपानिधिः ॥७३॥ अस्यापि सेवकः कश्चिच्छिष्यतामुपसङ्गतः । सत्यश्मश्रुरितिख्यातः प्रीतिपात्रमभून्मुनेः ॥७॥ मुनिरेवं बहुविधैः समायातः परीक्षणैः । परीक्ष्य सत्यसन्धत्वाच्छिप्यमेनमकल्पयत् ॥७॥... .

प्रयोदशः सर्गः गतानुगतिकैरस्य बहुभिः सज्जनैः कृतम् । देशे पञ्चनदे तत्र धर्मस्य परिरक्षणम् ॥७६॥ मुनिरत्र शिवादेशादागतः कतिचित्समाः । समाप्य दक्षिणं देशमगमदर्शनेच्छया ॥७॥ रामेश्वर महादेवं द्रप्टमेष कृतोद्यमः । मार्गे मार्गे जनवातमायातं पर्यवेक्षयत् ॥७॥ सद्यः पञ्चनदं देशं समतीत्य विहायसा । प्रपेदे प्रथमप्राप्तमिन्द्रप्रस्थं जयस्थलम् ॥७॥ गिरेरुच्चतमे शृङ तत्र सजनवन्दितः । निनाय कतिचिद्देवादहानि यमुनातटे ॥८॥ फादरावाद में आपको दुबारा आया हुआ सुनकर बहुत काल से आपके इंदने में लगा हुआ रत्नदेवी का पुन काराय आपके पास आया इसके पिता का नाम राजाराम या। इन्होंने आपकी अनन्य भाव सेवा की इस कारण आपने इनको अपना शिष्य बनाया इन काराय के एक सङ्गतदेव नामक शिष्य थे । जिनका दूसरा नाम सत्पश्मश्रु या ये फिरोजपुर के डरौली ग्राम में उपल जाति के क्षत्रिय विनयराव के घर उत्पन्न हुये । इनका पहिला नाम विजयराय या आपने इनकी अनेक बार परीक्षा की जिनमें वह सच्चे भक्त सिद्ध हुये इसलिये अन्त में इनको भी शिष्य बनाया । इनको शिष्य मशिष्य परम्परा में अगाड़ी जाकर बहुत से ऐसे महात्मा हुए हैं जिनके द्वारा पक्षाव में बहुत कुछ सनातनधर्म की रक्षा हुई। भगवान् के वरदान से ये ही सङ्गतदेव अन्त में उदासीन सम्पदाय को एक शाखा के सञ्चालक हुए । इस प्रसार भगान् कादराबाद के जङ्गल में कुछ वर्ष विताकर यहा से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थित हुए । इस दिशा में आने का प्रगान कारण रामेश्वर का दर्शन या । भगवान् वहां से चलकर मार्ग में आए हुपे अनेक जनों को भाकाश मार्ग से देखते हुये पजाब से देहली पहुंचे। वहां एक पर्वत के ऊचे टीले पर आपने झण्डा गाद दिया । यह स्थान आज कल झण्टे वाले कूर के नाम से मसिद्ध है । यहा कुछ दिन ठहर कर आप मधुरा के लिये प्रस्थित हुए ॥ ७२-८० ॥

जगद्गुरुनोचन्द्रदिग्विजये मध्येमार्गमतिक्रम्य समायातां मयोः पुरीम् । पश्यन्नयमगात्सद्यस्तदर्गलपुरं महत् ॥८॥ तत्रापि यमुनातीरे कृतवासो निजेच्छया । भरतेन कृताचाममगमत्पुरमद्धतम् ।।८२|| सुर्यवंशीयभरतप्रतिष्ठापितमीदृशम् । पुरं विलोक्य तस्याभूत्कापि चेतसि कल्पना ॥८॥ सूर्यवंशभव पैरिदमत्र निवेशितम् । पुरमद्य दशां जीर्णामासाद्य विलयं गतम् ||८|| यवनैरिदमाकान्तं पुरमालोक्य दुःखितः । ययो वनमतिक्रम्य ततो धवलपत्तनम् ॥८॥ चर्मएवती नदी तीरे तत्र विश्रम्य सत्वरम् । तोपि गिरिभिर्व्याप्तं गवालियरमन्वगात् ॥८॥ महाराष्ट्ररयं तत्र बहुधा कृतसत्कृतिः । जलितः पदविन्यासैललितं पुरमभ्यगात् ॥८॥ नर्मदायां कृतस्नानो मुनिरेप ततः परम् । विदर्भभूसमासक्तं ययौ नागपुरं जवात् ॥८८|| दिनानि कतिचित्तत्र विश्रम्य नगमूर्द्धनि । रामगिर्याश्रमं सद्यः प्रपेदे रामसेवितम् ॥८६॥ दण्डकारण्यभूभागमितः पश्यन्नवं नवन् । परीतो वहुभिः शिष्यैः पुण्यपत्तनमन्वगात् ॥६॥ पुण्यपत्तनतः पश्चादागतं पथि विस्तृतम् । मद्रदेशमनुप्राप्य सद्यो मद्रपुरं ययौ ॥१॥ मद्रे भदं व्यवस्थाप्य निजसिद्धान्तमुन्नतम् । भगवानयमापेदे रामेश्वरमनश्वरम् ॥२॥ FAL त्रयोदशः सर्गः रामेश्वरमयं तत्र प्रणम्य निजपूर्वजैः । प्रपूजितं समुद्रस्य तटमाप लसत्कटम् ||३|| सूर्यवंशीयभूपानां सेतुरूपेण संस्थिताम् । पताकां वीक्ष्य जलधौ मोदमाप मुनीश्वरः ॥४॥ त्रिशङ्कतिलकामेवं समाप्य दिशमुन्नताम् । नगैरय नवधनमण्डितां प्रत्यगागमत् ॥५॥ कमलासननिर्दिष्टप्रत्यावर्तनपद्धतिम् । अनुव्रजन्नयं मार्गे किष्किन्धामप्यवीचयत् ॥६॥ तदुपान्तगिरिस्थानि वनानि नगराणि सः। क्रमेण पश्यन्नापेदे मुनिीलगिरि शिवम् ॥७॥ अवतीर्य ततः श्रीमानयं पञ्चवटीं प्रियाम् । गोदावरी परिसरे विचचार तपोधनः॥९|| नासिकक्षेत्रमालोक्य त्रम्बकेश्वर दर्शनम् । कर्तुमेव ततः प्रागादुन्नतं हेमपर्वतम् ॥६॥ तत्र गोदावरीधारामवतीणा नगादधः । पश्यन्ननुगतस्तस्माट्टाकलीग्राममद्भुतम् ।।४००॥ मार्ग में आई मधुरा को देखते हुए आप आगरा पहुंचे। वहां यमुना के तट पर कुछ दिन ठहर 'फर भरतपुर पहुंचे । भरत मतिप्यापित इस राजधानी की गिरी हुई अवस्या देखकर आपके मन में बड़ा सोभ हुभा । यह 'भरतपुर प्राचीन समय के सूर्यवंशी राजाओं का निवास स्थान या जो आन इस अवस्या में पड़ा हुआ है । यवनों ने इस पर कई बार भाक्रमण किया था। इसी कारण इसको देखकर आपको दुःख हुआ। यहाँ से आप करौली राज्य में विद्यमान देवी जी का दर्शन फरके जङ्गलों में घूमने हुए घालपुर पहुंचे। यहां आपने वर्ष वती नदी के तट पर कुछ दिन विश्राम फिपा । यहाँ से आप चम्बल पार करके गवालिपर पहुंचे। यहां महाराष्ट्र मंगन नरपनि ने आपका बड़ा स्वागत किया।

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
यहां से आप ललितपुर पहुंचे । ललितपुर से भूपाल होते हुए आप होशङ्गाबाद
पहुंचे। यहां नर्मदा के तट पर कुछ दिन ठहर कर आप जबलपुर होते हुए नाग-
पुर पहुंचे वहां कुछ दिन पर्वत के शिखर पर निवास कर आप रामगिरि के ऊंचे
शिखर पर पहुंचे। यहां वनवास के समय भगवान् श्री रामचन्द्र जी ने आकर
कुछ दिन निवास किया था इसी कारण इसका नाम रामगिर्याश्रम हुआ । यहाँ से
आप दण्डकारण्य देखते हुए अनेक शिष्यों के साथ-साथ पुण्यपत्तन पहुंचे। यहां
कुछ दिन विश्राम कर इस प्रान्त के मुख्य २ स्थानों को देखते हुए आप मद्रास
पहुँचे । यहां मद्र में अपने भंद्र सिद्धान्त का प्रचार कर आप उटकमण्ड होते हुए
रामेश्वर पहुँचे । यहां अपने पूर्वजों द्वारा प्रपूजित रामेश्वर जी को प्रणाम कर
आप समुद्र के तट पर लङ्का पहुंचे । वहां पर मूर्यवंशीय राजाओं का स्मारक
सेतुबन्ध देखकर आप बड़े प्रसन्न हुए । इस प्रकार दक्षिण दिशा की यात्रा समाप्त
कर आप वहां से वापिस लौटे । कमलासन के यतलाए हुए मार्ग से लौटते हुए
भाप मार्ग में किष्किन्धा पहुंचे यहां आस पास के पर्वत नगर और वनों को देखते
हुए आप नीलगिरि पहुंचे। नीलगिरि से उतर कर आप गोदावरी वट-स्थित
पश्चवटी पहुंचे । आस पास के वनों में भ्रमण करते हुए आप नासिक होकर
त्र्यम्बकेश्वर देखते हुए हेमपर्वत पर पहुंचे। यहां पर गोदावरी की धारा को देख
कर आप टाकली ग्राम में पहुँचे ॥ ८१-४०० ।।
अत्रागतः स भगवन्नारायणमुपागतम् ।
कुमारमुग्रतपसं समीक्ष्य मुदितोऽभवत् ।।४०१॥
अष्टादशाब्ददेशीयं कुमारं पदयोः स्थितम् ।
मुनिः पप्रच्छ कुशलं मधुरस्निग्धया गिरा ॥२॥
भावं मुनेरभिज्ञाय कुमारोपि मनोगतम् ।
किमपि प्रष्टुमभवद्विवतुः स्फुरिताधरः॥ ३ ॥
ध्यानयोगेन तत्प्रश्नानुत्तरेण निवेदयन् ।
मुनिराह तमासीनं समाकर्णय हृद्गतम् ॥ ४ ॥
यदर्थमागतोसित्वमत्र विश्वेश्वरेच्छया ।
तदेव कुरु साफल्यमगाद्येन जनिस्तव ॥ ५ ॥

त्रयोदशः सर्गः अभिन्न जगतों रूपं विराजः कथ्यते बुधैः । जगदाराधनं तस्माद्विराजो भक्तिरुत्तमा ॥ ६॥ भारते यवनरद्य महोत्पानपरम्पराः । प्रवर्त्यन्ते यथास्माकं सभ्यता नाशमाप्नुयात् ॥ ७ मन्दिराणि निपात्यन्ते रामकृष्णादिमूर्तयः । खएड्यन्ते निगमा वह्नौ ज्याल्यन्ते प्रतिपत्तनम् ॥८॥ अयोध्या मथुरा काशी निदर्शनपथ गता । विद्यते पश्य तत्रत्यां दुर्दशा यवनैः कृताम् ॥ ६॥ समर्थो रामभक्तस्त्वं कर्तुमेतन्निवारणम् । अब्धेरुल्लङ्घने यदद्धनूमान्दासतां गतः ॥१०॥ समर्थोरामदासस्त्वं विपदुद्धरणक्षमम् । कमपि क्षत्रियमिह प्रवर्तय बलोन्नतम् ॥११॥ कुरुतीर्थाटनं पश्य पूर्वजानां कृतिस्थलम् । देशाटनप्रसङ्गेन पर्यालोचय दुर्दशाम् ॥१२॥ कमलासननिर्दिष्टं रामचन्द्रकुलोद्भवम् । अवेहि मामिहप्राप्तं तवोद्धाराय दैवतः ॥१३॥ कृतं कृत्यं मया सर्व नान्यः कार्यक्रमो मम । शिवनेरपुरं गत्वा प्रतीक्षस्व शिवांशजम् ॥१४॥ क्रमेण तद्धदिस्थानामेवमुत्तरमावदन् । प्रश्नानामादरात्तत्र मुनिः शान्तिमुपाययौ ॥१५॥ निशम्य सर्वप्रश्नानामुत्तरं योगमायया । समर्थोरामदासोभूदिलक्षः पदयोः स्थितः ॥१६॥ यहां आकर आपने एक अठारह वर्ष की अवस्या वाले नारायण नामक तपस्वी ब्रामण कुमार को देख बड़ा हर्षमाट किया और अपने चरणों में उपस्थित उस कुमार को देखकर आपने कुशल पूंचा कुमार ने भी आपके अभिप्राय को २६२ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये समझ कर कुछ कहना चाहा परन्तु समाधियोग से उसके मष्टव्य विषय को समझ कर आपने उसके विना प्रश्न किये हो उत्तर देना आरम्भ किया। [इस उत्तर से कुमार के प्रश्नों का अनुमान अनायास ही हो सकता है । (१) आपने कहा कि ईश्वर ने जिस कार्य के लिये आपको संसार में भेजा है वही आपका मुख्य कर्तव्य है। (२) यह नगत् विराट् का अभिन्न 'रूप है । इस लिये मगन का दुःख दूर करना ही भगवान् की सब से उचम भक्ति है। (३) इस समय भारत में यवनों ने बड़े अत्याचार मचाये हैं, जिनसे हमारी सभ्यता नष्ट होरही है, मन्दिर गिराये जारहे हैं, देवमूर्तियां तोड़ी जारहीं हैं वेदों के पुस्तक जलाये जा रहे हैं, अयोधया मथुरा और काशी इनके प्रत्यक्ष निदर्शन है वहां जाकर देखिये कि यवनों ने कैसे अत्याचार किये हैं। इससे पदकर हमारे लिये और नया दुःख हो सकता है ? (४) आप रामभक्त होनेके कारण इस समय समर्थ हैं क्योंकि रामभक्त सदा से समर्थ होते आये हैं देखिये रामदास हनुमान ने किस प्रकार समुद्र का उल्लन किया है। (५) आजसे आप समर्थ रामदास हैं आप सब कुछ कर सकते हैं किसी क्षत्रिय राजकमारको इसके उद्धार कार्य में नियुक्त कर आप अपने कर्तव्य का पालन करें। (६) आप इस समय तीर्थाटन करें, इसी बहाने से अपने पूर्वजोंके कार्यों का निरीक्षण करें । इसी प्रसंग से देश और जाति की दुर्दशा का अनुसन्धान करें। विना देश भ्रमण के देश दशा का निरीक्षण नहीं हो सकता है। (७) मेरे शिष्य कमलासत के द्वारा जिसका विस्तृत विवरण आपको ज्ञात हो सकता है मैं उस मूर्य वश फा एक बालक हूँ मेरा जन्म पश्चनदमें हुआ है निवास प्रायः काश्मीर में रहता है भगवान राम के वश में मेरा प्राकट्य हुआ है आपके उदार के लिये ही में इस समय यहां पर आया हु ! (८) आठ प्रश्न उत्तरमें आपने केरल-कृत-कृत्पम्' इतना ही उत्तर दिया, जिसको सुन कर कमलासन और समर्थ दोनों ही स्तब्य होगए । भगवान् ने ऊपर की ओर देखकर कहा कि शिवनेर ना कर शिगंशन शिपामी की प्रतीक्षा करो, इतना कहते कहते भगवान् मौन होगये, अपने समस्त मरनों का उचित उत्तर सुन कर समर्थ रामदास आश्चर्य में मान होगये । नारायणके समस्त प्रश्नों का प्रमशः उचर देकर भगवान भी अपने मन में प्रसन्न हुए ॥१-१६॥

२६२
.
प्रयोदशा सर्गः
योगमागं समादिश्य तस्मै तत्र मनीश्वरः ।
प्रतस्थे टाकलीग्रामादिन्दौरनगरं महत् ॥१७॥
मध्येमार्गमनुप्राप्तं कोटानगरमीक्षयन् ।
क्रमेण मथुरामाप गोविन्दजननस्थलीम् ॥१८॥
अतीत्य मथुरामारादिन्द्रप्रस्थमुपस्थितम् ।
मार्गे पश्यन्नवापायं कुरुक्षेत्रमलक्षितः ॥११॥
कुरुवंशीयभूपानां रुधिरेण परिष्कृताम् ।
भूमिमेनामतिक्रम्य पुनः श्रीनगरं ययो ॥२०॥
दिनानि कतिचित्तत्र स्थित्वा पुनरितोद्रुतम् ।
वारठं ग्राममागत्त्य ददौ सन्देशमन्तिमम् ॥२१॥
आपाढी पूर्णिमामाप्य दत्तसन्देशवाङ्मयः ।
मएडलं स्थापयामास प्रचाराय यथोचितम् ॥२२॥
मुनेरादेशतस्तत्र भक्तो भक्तगिरिः क्रमात् ।
मण्डलाधिपतीनस्य शिष्यानेयमुपादिशत् ॥२३॥
प्रथमो मएडलाध्यक्षः कमलासन एव सः।
यो मुनेः कृपया लब्धमलिमत्त पदं ययो ॥२४॥
दितीयो मएडलाध्यक्षो बालहासपदाभिधः ।
यो लब्धवानस्य मुनेः कृपया जीवनं पुनः ॥२५॥
गोविन्ददेवनामास्य तृतीयो मण्डलेश्वरः ।
चतुर्थः पुष्पदेवोर्य मण्डलाधिपतिर्मतः ॥२६॥
एते चत्वार आदिष्टा मुनिना मण्डलेश्वराः।
प्रधानः पनमस्तेपामुपास्यः शङ्करः स्वयम् ॥२७॥
पचानामनुमत्यान्ये ये भविष्यन्ति तत्परम् ।
नेपि भमण्डले भाविमएडलेश्वरभाजनाः ॥२८॥

२६४ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये एवं भक्तगिरिद्वारा चतुरो मएडलेश्वरान् । मुनिरादिश्य मुदितो गमनाय रुचिं व्यधात् ॥२६॥ वारठाग्रामतः श्रीमानयं चम्बाभिधं पुरम् । गन्तुमुत्कः क्रमप्राप्तान्यामानन्यानवीक्षयत् ॥३०॥ मध्ये मार्गमनुप्राप्तं ममूनग्राममद्भुतम् । समेत्य तत्परिसरे शिश्रिये शुष्कपिप्पलम् ॥३१॥ मनेस्तत्र निवासेन सद्यः स भगवद्रुमः । हरितोभूजनपदे योद्यापि परिलभ्यते ॥३२॥ मुनिर्ममूनमुत्सृज्य चम्बानगरमुत्तमम् । समेत्य तत्परिसरे समाधिमगमच्छिवाम् ॥३३॥ पञ्चाग्निमध्यमध्यास्य निराहारो निराश्रयः । समाधिमेव सविधे स्थापयामास नेतरम् ॥३४॥ अतीत्य कतिचिन्मासानेवमेव तपोधनः । ऐरावतीतटमटन्नवतस्थे शिलामयम् ॥३५॥ भगवान ने कुछ दिन यहां पर ठहरकर समर्थ रामदास को योगाभ्यास फरना सिखाया। फिर यहाँसे चलकर आप इन्दौर पहुंचे । वहां से झालावाड़, कोटा, ब्दी आदि नगरोंको देखते हुये आप मधुरा पहुंचे, मथुरासे चलकर इन्द्रमस्य होते हुये आप कुरुक्षेत्र पहुंचे । कुश्वशीय राजाभों के गघिरसे परिप्लुत इस कुरक्षेत्रभूमि का अतिक्रमण कर आप पार होते हुये श्रीनगर पहुंचे। यहां कुछ दिन ठहरकर आपवारठ ग्राममें पहुंचे, यहां पहुंचकर आपने अपने शिष्यों को अन्तिम मन्देश सुनाया जिसका उल्लेख इसी अन्यमें अन्यत्र मिलेगा। अन्तिम सन्देश मुनकर आपने पश्चपरमेश्वरकी स्थापना करने की अनुमति देदी । आपकी अनुमति से भक्त भगवान्ने सर शिष्यों फो बुलाकर एक मण्डल स्थापित किया जिसके कमलासन वालहास गोपिन्ददेव पुप्पदव यह चार प्रमशः मण्डलपति निर्वाचित हुये इन चारों के अलावा पश्चम उपास्पदेव मरके अयक्ष माने गये यही पांच पश्च परमेश्वर के नाम से सर्वन प्रसिद हुये इन पत्रों की अनुपति से भरिप्य में जो अन्य सजन नुने जायेंगे त्रयोदशः सर्गः वे भी मण्डलपति करे जावेंगे ऐसा भक्तगिरि के द्वारा कहलगा कर भगवान् चम्या को और चल पड़े । योच में आये हुये अन्य अनेक ग्रामों में भ्रमण करते करते आप ममून पहुंचे । यहां पर एक मुखे पीपल के नीचे आपने आसन लगाया आपके आसन लगाते ही वह हरा भरा हो गया जो अब तक विद्यमान है। यहां से चल कर आप चम्बा पहुंचे, वहां पहुंच कर आपने नगर से बाहर धूनी लगाई पश्चाग्नियों के म य में वठ कर आप समाधिस्थ हुये कुछ दिन इसी प्रकार निरा- हार निराश्रय भगवान् वन में समाधिस्थ रहे विक्रम सवत् १७०० में एक विचित्र घटना उपस्थित हुई भगवान् समाधि से उठकर अकस्मात् ऐरावती के तट पर घूपते घूमते एक शिला पर जाकर बैठ गये ॥ १७-३५ ॥ अध्यास्य विस्तृतशिलां सरित्पारदिदृक्षया । घमघटकमिदं मुनिराह यथोचितम् ।।३६॥ गन्तास्मि सरितः पारं भवान्नयतु मामितः । पश्योपस प्रमुदितां सर्वतः प्रसृतामिमाम् ॥३७॥ एवमादिशति क्षिप्रं मुनौ प्रातः समागतः । मार्गमाणो मुनिपदं ब्रह्मकेतुर्दिदृक्षया ॥३॥ अयं भूटानवास्तव्यो मुनेः शिष्यः पुरातनः । वहोः कालान्मुनि द्रष्टुमियेप परमादरात् ॥३६॥ दैवतः समनुप्राप्तः सोप्यत्र भगवत्पदम् । विलोक्य कृतकृत्योभूनिरस्तबहुवन्धनः ॥४॥ परं पारं जिगमिपुर्भवाम्भोधेरयं जनः । भगवत्कृपयाऽपश्यद्भगवन्तं भवोद्भवम् ॥११॥ मुक्तिदं समनुप्राप्य मुनिमेष महोदयः । सेवामस्य यथाम्नायं चकार समुपस्थिताम् ॥१२॥ कैवर्तमयमाहूय ब्रह्मकेतुस्तमब्रवीत् । विलम्बः क्रियते कस्मान्मुनेरिच्छानुगम्यताम् ॥४३॥ है

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये
सोब्रवीदेकपुरुपं नेतुं नौका न विद्यते ।
बहवो यदि गन्तारस्तदा सा नीयते तरिः ||४||
एवं वदन्तमाकएर्य कैवर्त कोपि तद्गतः।
प्राह साङ्केतिकः शब्दर्भगवन्तं शिलास्थितम् ॥१५॥
भगवन्नेवमधुना श्रुतमस्माभिरादरात् । .
भवान्वंशधरः श्रीमान्रामचन्द्रस्य भूभुजः ॥४॥
सत्यमेतद्यदि मया श्रुतं तर्हि महानयम् ।
विस्मयो जायते चित्ते भवन्तं वीक्ष्य विस्तृतः ॥४७॥
येन रामेण जलधौ निवद्वः सेतुरद्भुतः ।
तस्य वंशे जनिं गत्वा भवान्नौकामपेक्षते ॥४॥
गिरयो जलधी येन निक्षिप्ताः समवातरन् ।
तद्वंशीयाः शिलामेकां नैव तारयितुं क्षमाः ॥४६||
असम्भवमिदं मन्ये भवदर्शनतः स्थिरम् ।
रामस्य यजलनिवी सेतोर्वन्धनमद्भुतम् ॥५०॥
एवमुच्चावचैः शब्दैः पूर्वजानपि विक्षिपन् ।
यदा स मुनिना दृष्ट. पान्यः पथि तदा मुनिः ॥५१॥
असहन्पूर्वजापं तस्यैव पुरतः स्थिताम् ।
शिलामाह विनिक्षिप्य तरीव तर सत्वरम् ॥५२॥
सा मुने. कथनात्मद्य. शिला नौकेव सुन्दरी।
ऐरावतीजले क्षिप्ता चचाल मुनिदर्शनात् ॥५३॥
दृष्ट्वा तथाद्भुतं तस्य मुनेः कर्म स्तिटथताः ।
। मर्वेऽवदन्नयं सत्यं तस्यैव किल वंशजः॥५४॥
यथा तेनाम्बुधी निप्ताः पर्वतास्तेरुरुन्नताः ।
'तथानेन शिला क्षिप्ता ततार गहनं जलम् ॥५५॥

एक शिला नहा तेरा साते है इससे तो यही भनीत आता है कि पूर्व २६७ । . जिनके फैने ये पति आज ता समुद्र में तैर रहे हैं? उनी वशर पान प्रयोदश सर्ग एवं निजतपःशक्तिं तत्र दर्शयताऽमुना। उभयं सत्यता नीतं किमाश्चर्यमतः परम् ॥५६॥ अध्यास्य तामेवशिलां मुनिराश्चर्यतोयधिः । ऐरावती समत्तीर्य विवेश गहनं वनम् ॥५॥ अदर्शनं गते तत्र मुनौ तदर्शनेच्छया । ब्रह्मकेतुः समादाय नावं परमगातटम् ।।५८॥ यावता समयेनास्य नौका परतटं गता। तावता समयेनायं बहुदूरं गतोऽभवत् ॥५६॥ इतस्ततः समन्विष्य ब्रह्मकेतुमुनि तदा । यदा न लेभे बहुशस्तदा सन्धामिमामगात् ॥६॥ आप की इच्छा पार जाने की थी इसलिये आपन मल्लाह को बुलाकर नाव छोड़ने को कहा । इस समय कुछ अधेरा या प्रकाश अच्छी तरह खिला नहीं था इसीलिये पार जाने वाले मनुष्य भी न आसके । परन्तु भगवान् पार जाना जरूर चाहते थे इस कारण पार वार मल्लाह से प्रेरणा कर रहे थे । इतने ही में मात काल भूटान का रहने वाला एक ब्रह्मकेनु नामक आपका प्राचीन शिष्य आपको हृढते दूदते वहीं पर आगया यह बहुत दिनों से आपको दृढ रहा था इसको दैवयोग से आप यहा पर मिल गये । इसने भी भगवान् की पार जाने की उत्तर इच्छा देवकर मल्लाह से नार छोड़ने को कहा । परन्तु उसने मष्टा कर कहा कि एक मनुष्य के लिये नाव नहीं छाड़ी जा सकती है । बहुत मनुष्य एकत्र होने पर ही नाव छोड़ी जायेगी । मल्लाह की यह बात मुनार यहा बैठे एक मनुष्यने भगवान् से कहा । महाराज !! मैंने ऐसा मुना है मि आप श्री रामचन्द्र जी के है यदि यह यात सत्य है तो आपको देखकर मेरे मन में पटा विस्मय होता है जिन रामचन्द्र ने पूर्व काल में समुद्र में पत्थरों से मेतु गा या उनके वश में जन्म लेकर आप रावी उतरने के लिये नाम की मनीशा कर रह? वशर फाल में रामचन्द्र ने भी समुद्र में सेतु नहीं पाया होगा इस प्रशर पूर्वनों पर आक्षेप करते हुपे उम पान्य या देखकर उसका सटन न करते हुये

२६८
जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय
आपने उसके समक्ष ही अपनी शिला से कहा कि तू भी नाव की तरह जल में
तैरती हुई उस पार चल । आपकी आना पाते ही यह शिला आपकी कृपा से
नाव की तरह रावी में चलने लगी । इस आश्चर्य यो देख पर उसके तट पर
खड़े सर मनुष्य कहने लगे कि वास्तव में ये भगवान् श्रीराम के वंशपर अपश्य
हैं। क्यों कि जिस प्रकार समुद्र में उनके फैंके हुये पर्वत तैर रहे है उसी प्रकार
रागी में इनकी फैनी हुई शिला भी प्रत्यक्ष में नाव की तरह तैर रही है । इस
प्रकार तपोरल से वहा पर चमत्कार दिखा कर आपने दोनों अगली
पिछली बातें सत्य सिद्ध कर दी और उसी शिला पर बैठ कर आप रावी के उस
पार चले गये। शिला से उतर कर आप एक जङ्गल की घाटी में प्रविष्ट होकर
अदृश्य हो गये आपके अदृश्य होने पर ब्रह्मकेतु उनके दर्शन के लिये नाव पर चढ़
पर उस पार पहुचे परन्तु इतने में समय अधिक लग जाने के कारण बहुत अन्तर
हो गया। जितने समय में नाव धीरे धीरे दूसरे किनारे पर पहुची उतने समय में
भगवान् बहुत दूर निकल गये । ब्रह्मकेतु ने उस पार जारर आपके ह दने के लिये
बहुत कुछ प्रयत्न किया परन्तु जब आप न मिले तर ब्रह्मकेतु ने यह प्रतिज्ञा की
॥३६-६० ॥
यावन्मुनिन मे दृष्टिमागमिप्यति मद्गुरुः ।
तावदस्मादधिष्ठानान्नगमिष्यामि कुत्रचित् ॥६१॥
निराहारो जितश्वासः समाधिकृतचिन्तनः ।
जलमप्यात्मरक्षायै न ग्रहीप्यामि तत्परः ॥६॥
एवंविधामयं सन्धां ब्रह्मकेतुरिह स्थितः ।
विधाय मुनिमेवान्नः सस्मार शिवरूपिणम् ॥६३॥
दिनद्वयमयं तत्र कृतसन्धः सरित्तटे ।
निराहारव्रतं तन्वन्नवतम्थे यथोत्तरम् ॥६॥
योगदृष्ट्या मनिस्तस्य सन्धां वीक्ष्य भयावहाम् ।
आविरासीत्परिसरे तस्यैव विलसज्जटः॥६५॥
ध्रुवं तमात्मविपये ब्रह्मकेतुं विलोकयन् ।
करुणारुणया दृष्टया तमाह परिसान्त्वयन् ॥६॥

२६६ .. त्रयोदशः सर्गः नैवविधस्त्वया कार्यों हठः कुत्रापि मत्कृते। अयमेवान्तिमः शब्दो मया तुभ्यमिहोच्यते ॥६॥ एकान्तवासमिच्छामि बहुधाहमतः परम् । न वक्तुमन्यदिच्छामि सन्देशादपरं वचः ॥१८॥ एवमादिश्य तं सद्यो ब्रह्मकेतुं पदस्थितम् ।। मुनिरन्तिमसन्देशं दिदेश हृदयस्थितम् ॥६६॥ सोपि तं परमाराध्यगुरोः सन्देशमन्तिमम् । समाकयं समुत्तस्थौ ब्रह्मकेतुर्निजासनात् ॥७॥ यावदस्य मुनेः पादौ ग्रहीतुमयमभ्यगात् । तावदेव तपोमूर्तिर्मुनिरन्तर्हितोभवत् ॥७१।। तेन यद्यत्समादिष्टं तत्तदक्तुमयं ततः। शनैश्चम्बापुरमगात्ततः श्रीनगरं शिवम् ॥७२॥ तत्र गत्वा समाहूय सर्वानस्य प्रतिष्ठितान् । शिप्यानयं ब्रह्मकेतुर्यदाह गुरुणोदितम् ॥७॥ तत्सर्वमपि सन्दिष्टं श्रोतुमिच्छास्तिचेद्धृदि । द्रष्टव्योस्य तदासर्वैरुपान्त्यः सर्ग आदरात् ॥७४|| एतावदत्र सन्दिश्य मुनेश्चरितमद्भुतम् । सर्वदिग्विजयावद्धः क्रमः परिसमाप्यते ॥७५|| कृतदिग्विजयः श्रीमान्धीचन्दः श्रीमुखोदतम् । यद्यदाह महाकाव्ये तदने वीक्षतां बुधैः ॥७॥ सूचनामेवमादाय मृद्रीकामधुरैः पदैः । सर्गस्त्रयोदशः पूर्ति नीयते विपयक्रमात् ॥७७]] - । जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये एतन्मुनेश्चरित्रं विचित्रभावं विशुद्धमतयो ये। द्रक्ष्यन्ति ते भवेस्मिन् भवं न यास्यन्ति शङ्करादिष्टाः॥१७॥ नव' तक मुझे भगवान् का दर्शन प्राप्त न होगा तब तक मैं 'यहा से कहीं नहीं जाऊगा। यहीं पर निराहार रहकर जल तक ग्रहण नहीं करूगा, यह दृढ़- तर प्रतिज्ञा करके ब्रह्मकेतु ने शिव स्वरूप भगवान् का स्मरण किया। दो दिन वीतने पर जब आपने उसकी प्रतिज्ञा भयङ्कर देखो तर आप सद्यः वहीं पर प्रकट होगये और ब्रह्मकेतु की अपने में अनन्य श्रद्धा देखकर आपने कहा कि "ऐसा हठ अब भविष्य में कभी न करना अब हम एकान्तवास करना चाहते हैं । तुम ध्यानपूर्वक हमारा अन्तिम सन्देश सुनो ! यह कहकर आपने अन्तिम सन्देश सुनाया । उसके अनन्तर आपने ब्रह्मकेतु से कहा, अव तुम हमारी आज्ञा से यहां से काश्मीर जाकर अपने गुरु भाइयों को हमारा अन्तिम सन्देश सुना दो।" यह कहते-कहते विक्रम संवत् १७०० पौष कृष्ण पञ्चमी के दिन आप अश्वत्थामा की तरह अदृश्य हो गए , आपका सन्देश सुनकर ब्रह्मकेतु भी अपने आसन से उठकर चम्बा होते हुये सवत् १७०१ की आपाढ शुक्ला पूर्णमासी के एक दिन पूर्व ( अर्थात् ) चतुर्दशी को श्री नगर पहुंचे यहा पूर्णिमा के दिन भगवान् के सर शिष्यों को एकत्र कर ब्रह्मकेतु ने श्री भगवान् का अन्तिम सन्देश सुनाया वह साहोपाग इस महाकाव्य के अग्रिम सर्गों में मिलेगा इस सर्ग में भगवान् के सम्ब- न्य में इतना ही लिखकर दिग्विजय सम्बन्धी आयोजन हम समाप्त करते है । दिग्विजय के अनन्तर भगवान् ने अनेक नगरों में जो अपने मुख से सनातन- धर्म के मुख्य मुख्य अगों का विशद रूप में प्रतिपादन किया है वह आगे के सगों में लिखा गया है । इतनी सूचना देकर अब हम मसगागत विषयानुपात के अनुरोध से इस सर्गको यहीं पर समाप्त करते हैं । इस सर्ग में कहे हुये भगवान् के अताकि चमत्तार पूर्ण चरित्रों को जो महानुभाव निश्छल भाव से पढ़ेंगे वे इस संसार में शङ्कर की कृपा से दुवारा जन्म प्राप्त नहीं करेंगे ॥४६१-४७८॥ इनिश्री सनाहायशोड्य पविवर श्रीमदग्विलानन्दशर्मप्रणीते मनिलय जगद्गुरुवाचारिधिजये महाराज्ये मदिविजयो नाम प्रयोदश सर्ग -

।
ST
SHOMAN
-
श्री
Amanata
साधुबेला तीर्थ
C
के
en SADHOLULA TIRATI SUNKUR SANA
-TAMAnath
महात्मानों
।
की
माला
SRI SADHBELLA TIRATH MAHATMA KAY HAR MAHA

चतुर्दशः सर्गः अविगतविजयो मुनीन्द्रवर्यः सनकमनन्दननारदप्रदिष्टम् । मुनिमतमघुनाऽधिकं विवतु- मधुमधुरां गिरमाह पुष्पिताग्राम् ॥ १ ॥ जगद्गुर भगवान् श्रीचन्द्र जी ने दिग्विजय के अनन्तर अपने पूर्वज सन- कादि मुनियों द्वारा प्रदिष्ट मुनिमत का विस्तृत रूप में वर्णन करने के लिये मधुर मधुर पुष्पिताग्रा वाणी से कुछ वदिफ रहस्य कहना आरम्भ किया ॥१॥ जगदिदमखिलं गुणप्रभेदा- बहुविधरूपकलाभिरुताभिः । सलिलजनववीचिवदिभिन्नं गतमतय. प्रवदन्ति भेदभाजः ॥ २॥ आपन कहा कि प्रकृतिगत गुणत्रय भेद से उद्भत अनेक विध रूप कलाओं से विचित्र इस जगत को भेदवाद वादी मूढजन ब्रह्म से भिन्न मानते हैं ॥२॥ अधिगतपरमार्थदृष्टयो ये निगमविदो मुनय. समाधियोग । सकलमपि तदेतदात्मनिष्ठं हृदि विमलेऽनुदिनं विभावयन्ति ।। ३ ॥ परमार्य दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले श्रौतमुनि ता समाधियाग से समस्त जगत् का आत्मनिष्ठ मानकर अपन हृदयमें केवल अद्वेतब्रह्म का ही चिन्तन करते है ।३। सक्लमिदमुदेति यन्निदेशा- त्पुनरक्लम्ब्य यमेकमाविभाति । १-पुष्पिनामामृत्तम्। - ।

२७० " जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये विलयमपि तथैति यत्र देवं हृदयतले तमलं निभालयन्तु ॥४॥ इसलिये आप सर लोग अपने हृदय में उसी ब्रह्म का चिन्तन करें, जिसके इच्छा मात्र से यह प्रतीयमान समस्त जगन् उद्भव-स्पिति-प्रलयादि भेद से विभिन्न होने पर भी अन्त में एफमान ब्रह्मरूप में ही लीन होफर रहता है ॥४॥ स भजति निजशक्तिसम्प्रयोगा- त्सगुणतयानुगतः स्वरूपभेदैः। हरिहरविधितामनन्तभेदां निगमविदो निगदन्ति यां यथावत् ॥५॥ अनेक विध शक्ति सम्पन्न वही ब्रह्म निर्गुण से सगुण रूप होकर आत्मनिष्ठ हरि हर आदि अनेक भेदों से अनेक रूप होता है ऐसा घेदज्ञ विद्वान् कहते है।।५।। शतपथगतमन्त्रजातमन प्रथितनिदर्शनमागमैकवेद्यम् । निगमपथपरा वदन्ति केचि- द्विधिनियतं यदिहापि दर्शयन्ति ।। ६ ।। इस विषय में [ एक वा इद वित्रभूव सर्वम् ] (१) तत्सम्भूय भवत्येकमेव (२) इत्यादि वेदमन्त्र तया शतपथ ब्राह्मण की अनेक कण्डिकायें प्रमाण रूप में मस्तुत हैं ॥६॥ प्रकृतिविकृतिमात्रमत्र तेन स्वगुणवशेन समन्ततोऽनुगृह्य । नियमितमिदमप्रतीयमानं कपिलमतेन यदादिशन्ति विज्ञाः ॥७॥ गुणभेद से विभिन्न प्रकृति का यावन्मान विकार सब ओर से अपने वश में करके इस अप्रतीयमान अव्यक्त जगत् को उस ब्रम ने अपने सदसद्विलक्षण रूप में धारण किया है।॥ ७॥ 7 mar

F
जगदुरभीचन्द्रदिग्विजये
प्रलयमुपगतं जगत्समस्तं
पुनरुचितानुचितक्रमेण योऽत्र ।
प्रकटयति यतस्ततः स लोके
विधिरभिधीयत उत्तमो विधानात् ॥१२॥
प्रलय काल में समस्त जगत् को अपने स्यरुप में रखकर प्रलयान्त में उसको
फिर प्रकट करने से वही ब्रह्म ब्रह्मा के नाम से कहा जाता है ।। १२
रविशशिकलयाऽभितः प्रपश्य-
न्सकलमिदं परिपाति धातृसृष्टम् ।
निखिलमिदमनुप्रविश्य यस्मा-
तत इह सत्यमुदीर्यते स विष्णुः॥१३॥
ब्रह्मा के द्वारा प्रकट हुए जगत् को मूर्य और चन्द्रमा के द्वारा वार पार
देख कर उसका पालन करने से वही ब्रह्म विष्णु के नाम से सर्वत्र कहा
जाता है ॥१३॥
विधिनियतगुणानुगस्वशक्ति-
व्ययबहुलब्धपरिश्रमप्रशान्तम् ।
जगदिदमखिलं समाप्य शेते
यत उदितस्ततएव सोत्र शेपः ॥१४॥
विधि नियत शक्तियों के घटने पर कारण में लोन जगत् को प्रसुप्तावस्था में
रख कर अन्त में शेष रूप से रहने के कारण वही ब्रह्म शेप शब्द से सम्बोधित
किया जाता है। [ शिष्यत इति शेषः] ॥ १४ ॥
समविपमविभागभेदभिन्नं
मकलमिदं गुणपारंवश्यतोऽलम् ।
जगदवति यतस्ततः स लोके
रविरतमोमिति नामतोऽत्र गीतः ॥१५॥

चतुर्दशः सर्गः २७५ गुणों की परवशता से सम विषम भावावस्थित इस जगत् का निरन्तर पालन करने से वही ब्रह्म ओम् शब्द से कहा जाता है। [ अवतीति ओम् ] ब्रह्म का यह सगुण नाम है । संसार में निर्गुण ब्रह्म का कोई नाम ही नहीं है। ॥१५॥ प्रथममवतरन्महालयान्ते निगमपदैः प्रथितः सहस्रनेत्रः। स जगति भगवान्सहस्रपादः पुरुपपदेन यजुभिरत्र गीतः ॥१६॥ महामलय के अनन्तर सबसे प्रया अवतीर्ण होने के कारण वही ब्रह्म पुरुण- वतार के रूप में प्रकट होता है जिसका वर्णन यजुर्वेद के पुरुष सूक्त में आया है ॥१६॥ चरमचरमिदं जगत्समस्तं रविमधिरुह्य रथं यतः स पश्यन् । सरति वियदुपेत्य गीयतेऽतः स जगति सूर्यपदेन देवदेवः ॥१७॥ रय पर अवस्थित होकर चराचर विश्व का अवलोकन करने से वही ग्राम आकाशगामी होने के कारण सूर्य पद से कहा जाता है [ सरति आकाशे गच्छ- तीति सूर्यः ] ॥१७॥ निजनिजकृतिभिर्विभेदमाप्त प्रकृतिगणं गणयन्ननेकरूपम् । यदवति ततएव वेदविज्ञे- गणपतिरित्यभिधीयते स देवः ॥१८॥ अपने अपने कार्य में परिणत होने के कारण अनेक रूपों में अवस्थित पकृतिके गण को परिगणित करने से वही ब्रह्म गणपति पद से व्यवहृत होता है [गण्यन्ते संख्या विषयी भूता भवन्ति ये ते गणाः । तेपाम्पत्तिर्गणपतिः ] ॥१८॥ अधिगतबहुशक्तयो यथाव- द्यत अधिगत्य बलं क्रियानुरूपम् ।

7 1 T 7 r १ जगद्गुरुभाचन्द्रदिग्विषय दिविपद उदय प्रयान्ति काले स जगति शक्तिरुदीर्यते तार ॥१६i)}" अपने अपने कार्य के अनुरूप रत का प्राप्त होरर ट्रगण जिसके, आलम्ब पर ससार में काम करते हैं यहा,शक्ति मय ब्रह्म ससार में शक्ति पर से कहा जाता है ॥१९॥ इति बहुविधनामरूपभेदै- रिदमभित परिवीतमप्रमेय ।। प्रविशति किल य सएव विज्ञै- जगति विराडिति गीयते महेश ॥२०॥ इस प्रकार अनेक नाम और गुणों के द्वारा समस्त विश्व का व्याप्त कर जा उस में ही प्रविष्ट रहता है उसी ब्रह्म का गुणत जन विराट पद से 'सम्बाधित करते हैं ॥२०॥ सकलमपि जगत्तदेव तस्मि- ।। नधिगतमित्युप नक्ष्य य सपर्याम् । जगत इह करोत्यभेदबुध्या भाति संएव महानभिन्नदृष्टि ॥२१॥ यह समस्त जगन् ब्रह्म ही है और ब्रह्म में ही अधिष्ठित है ऐसा समझकर अभेट बुद्धि से जा जगत् की सेवा करता है वह महत्त्व का प्राप्त होता है।। २१ ॥ प्रथममिह भवे विधातृसृष्टै. सनकमनन्दननारदादिमुख्यैः। अनुमतमिदमेव तत्त्ववुध्या जगदिदमीक्ष महेश्वरादभिन्नम् ॥ २२|| F 1 - - TrIT - 17 - । TF -- का मन में रख कर अपना सिद्धान्त स्थिर किया था ॥ २२॥ अतिकठिनमिदं विभेदबुद्धिं-।। व्यवमितमीक्ष्य समासतो मुनीशे -- - Pri - - चतुर्दश सर्ग । जगदुपतये मता समर्चा प्रतिगतस्य विभोरनेकरूपैः ॥२३॥ ईश्वर और जगत् में भेद रखने वाले पुरुषों के लिये प्राचीन मुनियों ने दूसरा मार्ग उपासना का स्थित किया है जो सर्वोपकारक होने से सर्वत्र प्रचलित है ॥२३॥ निजरुचिवशतो जनैर्गुणाना- । मनुसृतिमेत्य गुणैविभिन्नरूपाः । 17 हरिहररविशक्तिरूपमाप्ता ! २६ बहुविधदेवगणा. समाद्रियन्ते ॥२४॥ ससार में गुणों की भिन्नता से मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न गुण वाले शिवादि देव गणों का पूजन करते है । ॥ २४ ॥ अनुसरति जन. शमप्रधानं । पुरुपमजं बहुसत्वसम्प्रसूतः। 'शिरसि धृतरापर्ग यथाव- जगति न यत्र कदापि भेदबुद्धिः ॥२५॥ जो मनुष्य सत्व सम्पन्न होता है वह शप प्रधान शिव की उपासना करता है जिसमें कदापि वैपम्प देखने में नहीं आता है ॥ २५ ॥ रजसि निपतितो जनो निसर्गा- दजति रजोगुणवन्तमेव देवम् । | दशरथतनयं नयप्रधानं गिरिवरधारिणमादरेण कृष्णम् ॥२६॥ रजोगुणी पुरुष स्वभाव से माय रामकृष्णादि देवगणों का समर्थन करते हैं जिनमें नीति प्रधान जीवन देखने में आता है ॥ २६ ॥. तमसि निपतितस्तम.प्रधानं परशुधरं नरसिंहमुग्ररूपम् ।, 1- हलधरमथवा ततोऽधिकंवा कमपि गुणानुगचित्तपारवश्यात् ॥२७॥ - - ॥ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये तमोगुण प्रधान पुरप मापः तमोगुण प्रधान देव की ही उपासना करते हैं जिनमें परशुराम नृसिंह.बलराम आदि मधान माने गए है ॥ २७ ॥ 12- निजनिजरुचितारतम्यभेदा- च्छयति जनः किल यां निजेष्टमूर्तिम् । तदुनितफलदानतो महेशः स्वयमुपयाति तदीशतां प्रसन्नः ॥२८॥ मनुष्य अपनी भावना के अनुसार जिस निस इष्टदेव की उपासना करता है उस उस के द्वारा व्यापक ईश्वर सवका अभीष्ट पूरा करता है । ॥ १८ ॥ अवतरति विभुर्यदाप्य लिङ्गं गुणवशतः सगुणीभवञ्जगत्त्याम् । निजरुचिवशतस्तदेव लोकै- रमुदिनमादरतः समय॑तेस्य ॥२६॥ निर्गुण ब्रह्म सगुण होकर जिस रूप में प्रकट होता है उसी रूप को उपासक लोक अपना उपास्य समझ लेते हैं ।॥ २९ ॥ रविशशिजलभूमरुदिहायः- प्रभृति यदत्र दृशोः पदं प्रयाति । सकलमपि तदेतदस्य लिङ्गं निगमनिदर्शनतः समामनन्ति ॥३०॥ ससार में सूर्य चन्द्र जल वायु आदि जो जो पदार्थ देखने में आते हैं वे सब उसी निर्गुण ब्रह्म के लिङ्ग हैं ऐसा वेदों में लिखा है । ॥ ३० ॥ प, यमनियमपरा यदत्र सान्ध्यं- विधिमधिकृत्य जलाञ्जलिं वहन्ति । रविरथमधिरुह्य तं प्रगृह्णन . विभुरयमेव शिवः प्रसादमेति ॥३१॥ कर्मकाण्ड में निरत मनुष्य सन्ध्या के समय मिसको जलाअलि अर्पित करते हूँ वह सूर्य मण्डलगत प्रझ ही है ॥३१॥ - 1॥ M In २०५ 1 चतुर्दशः सर्गः विधिरचितविचित्रवह्निकुण्डो निहितमनेकविध हविः प्रपश्यन् । हुतवहधृतदिव्यलिङ्गरूपो जगदवति प्रथितः सएव विष्णुः ॥३२॥ विधि पूर्वक वेदी बनाकर उसके अन्दर जो हवन किया जाता है वह भी अग्नि रूप लिङ्ग के द्वारा उसी ब्रीं को माप्त होता है ॥ ३२ ॥ रविशशिनयनो द्यलोकमूर्धा धरणिपदो दहनप्रसन्नवक्त्रः। विभुरयमखिलं जगत्समेत्त्य श्रयाति विरडिति कल्पनामनन्ताम् ।।३।। निस ब्रह्म के सूर्य और चन्द्रगी नेत्र है धुलोक मूर्धा है पृथिवी चरण हैं और अग्नि मुख है यही ब्रह्म सर्वत्र व्यापक होरर विराट के रूप में अवस्थित है ।।३३॥ जनिमगमदयं शशी कलावा- नहह स यन्मनसो रविः प्रचण्डेः । नयनत उदियाय मातरिश्वा श्रवणयुगात्स कथं गताकृतिः स्यात् ||३|| निसके मन से चन्द्रमा नयन से सूर्य और श्रोत्र से वायु प्रकट होता है उस ब्रह्म को निराकार मानना सर्वथा असगत है क्यों कि सर्व व्यापक होने के कारण ये सब उसी के आकार हैं ॥३४॥ यजुपि निगदितं तदस्य रूपं बहुविधमन्त्रपदैर्यदस्त्यनन्तम् । जगति गुणवशेन तत्वविद्भिः प्रतिपदमाद्रियते तदेवं भक्तः ॥३५॥ यजुर्वेद के पुरुष सूक्त में अनेक मन्त्रों से उस ब्रह्म का वर्णन मिलता है जो अनन्त होने पर भी उपासों के द्वारा अनेक स्पों में पूजित होता है ॥३५॥ A r . , जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय निगदितबहुभिन्नदिव्यलिङ्गे भगवति ये निजतर्कपारवश्यात् ।। कुपथमनुगता वितर्कबुद्धिं -gro विदधति ते पशवो निरस्तशृङ्गाः॥३६॥ घेद में जिस ब्रह्म के अनेक लिन कहे गये हैं उसको अपने तर्क वल से जो नहीं स्वीकार करते हैं वे वास्तव में निरस्त शृङ्ग पशु हैं ॥३६॥, अत इह जनिमेत्त्य कर्मयोगा- जगति गुणानुगमेन सर्वरूपः ।। सकलगुणमयो गुणप्रसूतिः, प्रतिदिनमादरतः समर्चनीयः ॥३७॥ इसलिये ससार में जन्म लेकर प्रत्येक पुरुष को उस सर्वव्यापक स सर्वगुणमय सगुण ब्रह्म का प्रतिदिन पूजन करना चाहिये ।। ३७ ।। 'न जगति जनिमेत्य यैरनन्तः सकलजगन्निलयो विभिन्नलिङ्गः। निजहदि विमले समय॑ते ते हतविधिना हठतो हताः प्रमत्ताः ॥३८॥ जन्म लेकर अनन्त शक्ति सम्पन्न भनेक रूप जगन्निवास ब्रह्म का जो अपने हृदय में आदर नहीं करते हैं वे वास्तव में वञ्चित हैं ॥३८॥ प्रणमत शिवमेकमदितीयं तत इह जन्मनि योष्टमूर्तिरुक्तः। सकलगुणमयोप्यथर्वमन्त्र- रगुण इव प्रतिभाति हृत्प्रतिष्ठः ॥३॥ इसलिये अपर्यवेट में निसको अष्टमूर्ति माना है उस अद्वितीय शिव का पूजन करो जो सगुण होने पर भी निर्गुण जैसा प्रतीत हाता है ॥३९॥ अखिलभुवनरक्षणाय यात्र प्रथितगुणा महिषासुरमही। , } M - . - - । चतुदशः सर्गः ॥ -- 4 जगतिविजयते शिवा भजध्वं r । परमसुखाय सुखेन तामुपास्याम् ॥४॥ समस्त विश्व की रक्षा का भार जिस पर अवलम्बित है वह महिषमर्दिनी भगवती समस्त सुखों की देने वाली है इस कारण उसकी उपासना करो ॥४०॥ अधृत निजकनिष्ठिकाग्रभागे शिशुरिव यो गिरिमप्रमेयशक्तिः । । । दिविषदुपनतं तमेव राधापति- मिह वेदकथं समाद्रियध्वम् ।।११॥ कनिष्ठिका के ऊपर गार्धन गिरि को धारण कर जिसने घन की रक्षा की पी उस राधापति भावान् का ' आदर पूर्वक अर्चन करो।'[ स्तोत्र राधानापते ] इस ऋग्वेद के मन्त्र में राधापति की स्तुति का वैदिक आदेश विस्पष्ट है ॥४१॥ । "त्रिभिरिदमखिल जगन्मिमीते निजचरणैरलधुर्लघुस्वरूपः। भजत तमिह वामतं विचित्र- प्रथितगुणं गदितोस्ति यः श्रुतिभ्याम् ॥४॥ तीन चरणों से समस्त जगत् को नापकर जो अनन्त होने पर भी लघु रूप मचीत होते हैं उन वामन का अर्चन करो [ इद विष्णुर्विचक्रमे (१) मतद्विष्णुस्त- पते (२) ] इन दो यजुर्वेद के मन्त्रों में वामन का विस्पष्ट वर्णन है ॥ ४२ ॥ निजजनकमिहाशु सत्यवाचं जगति विधातुमपास्तराज्यसौख्यः। वनमुपगतवान्य एकवीरः प्रभुरवतात्स जगज्जनं ससीतः ॥४३॥ अपने पिता को सत्यवार सिद्ध करने के लिये जो राज्य छोड़ कर बनको गये वे भगवान् संसार की रक्षा करें॥४३॥ बलविजितसमस्तशत्रवर्गः प्रथितवल. पुनरत्र यो युगान्ते। -- - T - २८२ - । -- अगदुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये जगदिदमविता सएव कल्की ,, -7 ।। हतयवनः शिवमातनोतु विष्णुः ॥४४॥ चार लाख बत्तीस हजार आयु वाले कलियुग के चतुर्थाश शेष रहने पर अवतार लेकर जो विश्व की रक्षा के लिये दुष्टों का सहार करेंगे वे क्ल्की सब का कल्याण करें॥४४॥ बहुविधजनधारणाभिरस्मि- . अगति गतो वहुरूपतां य एकः । स भवतु जगतां शिवाय देवः 111 स्थितिलयसर्जनहेतुभूतलिङ्गः ॥१५॥ 1. मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप जा अद्वितीय होने पर भी अनेक रूपों को धारण करते हैं वे सृष्टि स्थिति प्रलय कारण रूप भगवान् सब का कल्याण करें ॥४५॥ इति भगवदुपासनाविशिष्ट निजकथनं विनिवेद्य भक्तवृन्दे । मुनिरयमवदत्प्रसिद्ध तीर्थrrrr स्थितिविषये मतमात्मचित्तनिष्ठम् ॥४६॥ इस प्रकार अपने शिष्यों के प्रति उपासना के विषय में अपना मत कहकर भगवान् श्रीचन्द्रजी तीर्थों के विषय में अपना मत प्रकट करने लगे। तरति जनिमृतिप्रपञ्चदुःख- वजमिह यत्परिसेवनेन सद्यः। गुरुपदयुगलं तदाद्यतीर्थं विमलमनोपि समुच्यतेन तीर्थम् ॥४ा । आपने कहा कि आवागमन रूपी चा से बचाने वाला पहिला तीर्थ गुर का चरण युगल है और दूसरा तीर्थ विशुद अपना मन है। इसीलिये तीर्थी पर किं स्वमनो- विशुद्धम् ] ऐसा श्री शङ्कराचार्य जी ने लिया है ॥ ४ ॥ Pr- 't- F ॥ - २८२ 11 - । चतुर्दशः सर्गः विधिनिहितमहाध्वरप्रसङ्गै- रुदयमियाय सुखेन यत्र देवः । सकलकलुपनाशनतमन्त- द्धरणितलं जगतीह तीर्थभूतम् ॥४॥ वेद विहित अनेक यज्ञों के करने से जहां पर भगवान् अवतीर्ण हुए हैं वह समस्त पाप क्षय कारक भू प्रदेश तीसरा तीर्य है । इसमें वर्तमान समस्त वीयों का समावेश हो जाता है ॥४८॥ । भगवत उरुगायपुण्यकीर्तेः प्रथितगुणश्रवणेन पत्र कल्कम् । सपदि विलयमेति तन्मुनीनां सदनमरण्यगतं वदन्ति तीर्थम् ॥४॥ -,जहां पर भगवान् के गुणों का अहर्निश श्रवण होता है वह मुनियों का धन- गव आश्रम चीया तीर्य है । जहा पर जाने से मानसिक पाप नष्ट होते हैं।॥ ४९ ॥ हिमवत उदयं समेत्य ये ये जलधिमवाप्य लयं प्रयान्ति ते ते । निजगुणवशतो जलप्रवाहा- व्यवहतये भुवि तीर्थतां प्रयान्ति ॥५॥ हिमालय से अवतीर्ण होकर जो सागर तक प्रवाहित होकर भारत को पवित्र करते है वे गङ्गादि नदी मवाह भी ससार में तीर्य कहे जाते हैं ।। ५० ॥ कृतनिवसितिरेषु पुण्ययोगा- न्मलुज पैति विशुद्धिसन्नरड़े। तदनु विमलबोधसम्भवेन प्रशममुपैति निरस्तसर्ववन्धः ॥५१॥ इन तीयों में यथा समय निवास करने से मन शुद्ध होता है और शुद्ध मन में ज्ञान का उदय होने से मनुष्य बन्धन रहित और शान्त होता है ।। ५१ ॥ +- aar टर , जगदात्रीचन्द्रदिविजये न भवति किल मुक्तिरत्र लोके विमलविवोधमृते कथानापि। निगदितमिदमेव वेदमन्त्र-- ..." यजुपि निरस्तप्तमस्तभिन्नमार्गम् ॥५२॥ । संसार में विना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती है यह अटल वैदिक सिदान्त है इसी कारण [ऋते ज्ञानान मुक्तिः (१) नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय ) इत्यादि मन्त्र अन्य मार्ग का निराकरण करते है ॥५२॥ ।। इति निगममतं समाधियोगा- न्मुनिरयमाश्रितवत्सलो विलोक्य । हृदि विमलतरे पदाश्रितानां शिवफलदं निजगाद सत्यसन्धः ॥५३॥ - भगवान् श्रीचन्द्र ने समाधि में इस सिद्धान्त का मनन करके अपने आश्रित जनों के कल्याणार्य इस प्रकार कयन किया है जो सनातनधर्म का पदे पर्दे पोपण करता हुआ मनुष्य को सर्वोन्नत बनाता है ॥ ५ ॥ यदुदितमिह भक्तिमार्गनिष्ठ ।। भगवद ग्रहतोपि मुक्तिसीख्यम् । तदपि न निगमप्रदिष्टमार्गा- "नुगमविरोधि विचार्यतां विधिज्ञैः ॥५४॥ भक्ति का पक्ष लेकर जो मनुष्य भगवान् के अनुग्रह मात्र से मुक्ति का होना मानते हैं उनका कयन भी ज्ञान मार्ग का विरोधी नहीं है क्योंकि [ भक्ति नाय कल्पते ] इत्यादि वाक्य उनके मत में भी भक्ति से ज्ञान और ज्ञान से मुक्ति का होना बतलाते हैं । भक्ति भगवान तक पहुंचाने वाली है परन्तु ज्ञान स्वरूप भगवान फा तात्विक स्वरूप केवल ज्ञान वेद्य ही माना गया है ॥५४ यदवधि हृदयं न शुद्धिमेति । . प्रकृतिमलेन समन्ततोऽनुविद्धम् ।। तवधि समुदेति नैव भक्ति- # भगवति सर्वगुणाश्रये यथावत् ॥५५] . 14 - - 1 N - - 7 चतुर्दशः सर्ग- प्राकृतिक मलों से सम्बद्ध मन जब तक शुद्ध नहीं होता है तब तक सर्वगुणा- श्रय भगवान् में यथार्थ भक्ति नहीं होती है यह बात सोश में सत्य है ॥ ५५॥ प्रकृतिविकृतयो मनस्युपेताः प्रमभमुदस्य मनांसि रागभाजाम् । भगवदुदितमार्गत. स्वमार्गे मनुजमिमं विनिवेशयन्ति दृप्ताः॥५६॥ मन में उठे हुए प्राकृतिक विचार सांसारिक जनों का मन हठ से अपनी ओर खींचकर भगवत्सदिष्ट मार्ग से मनुष्यों को हटाते हैं और अपने २ विषयानुसारी मागों में मनुष्य को हठात् आकृष्ट करके उनको अधोगति में ले जाते हैं ।। ५६ ।। सुपथकुपथभेदमत्र लोके 7 निगमनिवोधितमार्गतोऽवगत्त्य । सुपथमनुसरत्यपास्य जन्तु. . कुपथमलं भगवत्कृपावलम्ब० ॥५॥ जो मनुष्य भगवत्कृपा का अवलम्ब लेकर काम करता है वह सुमार्ग और कुमार्ग को वेद के द्वारा अलग अलग समझ कर कुमार्ग छोड़ कर सुमार्ग में प्रवृत्त होता है।॥५६॥ यदवधि विमले मनस्यनन्तः समुदयमेति न वोधगम्य ईशः । तदबधि न भवत्युपासकानां मनसि कदापि निरन्तरोऽनुरागः ॥५८|| जब तक विमल हृदय में ज्ञानगम्य अनन्त ईश कला का उदय नहीं होता है तब तक उपासकों के मन में सतत अनुराग उत्पन्न नहीं होता है जो कि मनुष्य जन्म का निस्तारक और वन्धन का उच्छेदक माना गया है ।। ५८॥ व्यभिचरणपरा मनुष्यभक्ति- नं भवति मुक्तिपथानुमोदयित्री ।- यदि भवतिकथञ्चिदाशु नाश ब्रजति निराश्रयिणी लतेव साज़ ||५६j] -- 1 -- . १ ।

२८६ - m4 . 27 -- जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये भगवान् में व्यभिचारिणी भक्ति मनुष्य को मुक्ति की ओर नहीं लगा सकती है यदि कुछ समय तक यह उनकी ओर चलती भी है तो अन्त में वह निरालम्ब लता की तरह शीघ्र ही नीचे गिर जाती है ॥ ५९ ॥ दृढ़तरमवलम्व्य तत्त्वयुध्या निगमपथं भगवत्कृपैकलभ्यम् । मुनिमतमतएव शुद्धचित्ते विमलधियोऽनुदिनं विभावयन्तु ॥६०॥ भगवत्कृपा से माप्य निगम मार्ग का तत्व पुद्धि से समझ कर जो पुरुष मुनि मत में चलते हैं वे ही ससार में आवागमन रूप चक्र का उच्छेद करके अन्त में मुक्त होते हैं ।। ६०॥ न भवति मुनिमार्गवञ्चकानां भगवति भेदजुपां कदापि भक्तिः । तरलतरधियां भवे क मुक्ति- भजत ततः शिवमेकमद्वितीयम् ॥६१॥ मुनिमार्ग निन्दक भेदवादी पुरुषों को भगवान् में कदापि भक्ति नहीं होती है उसके अभाव में मुक्ति का होना सर्वथा असम्भव है इसलिये मुनि मार्ग का अनु- करण अवश्य करना चाहिये ।। ६१ ॥ निगमनिगदितं तदेव सोऽहं- पदमधिगत्य निरस्य भेदबुद्धिम् । . भगवति हृदयस्थिते नितान्तं नयत मनो भगवत्कृपावलम्बा ॥२॥ वेद प्रोक्त साह पद का अबलम्ब लेकर भेदवाद को हृदय से दूर करके हृदय स्थित भगवान् में मन लगाकर मनुष्यों को अपना कल्याण करना चाहिये । ६२ ।। हृदयविनिहितोस्ति योयमात्मा भवति स एव विवेकत. परात्मा । मतमिदमनुरागतो मुनीनां हृदि विनिवेश्य लयं नयन्तु भेदम् ।।६३|| *- T - - । .

चतुर्दश सर्ग - २८० T । ८ -- हृदय में विद्यमान जो यह आत्मा है वही तात्विक दृष्टि से परमात्मा वन जाती है मुनियों के इस सिद्धान्त का हृदय में धरकर भेद को नष्ट करना चाहिये ।। ६३॥ इदमधिगतमात्मतत्त्वमेक बह विनिवेद्य भवत्सु भावुकेषु । 1111, कृतकृतिरधुनाहमस्मि दैवा- द्गुरुतरभारमुपस्य यददीशः ॥६॥ भगवान् कहते हैं कि हे प्रिय शिष्यो ! इस तत्व को आप लोगों के समक्ष रख कर मैं इस समय कृत कृत्य बन गया है और बढ़ा भारी..भार उतार कर ईश्वर की तरह आनन्द सागर में निपन हा रहा हू ॥६४।। इति मुनिरुपदिश्य तीर्थतत्त्वं निगमगवेपितमागमविभक्तम् । भगवदुदितभक्तियोगगम्य- क्रममपि तत्वदृशा बभूव तुष्ट ॥६५॥ इस प्रकार अपने प्रिय शिष्यों का सम्बोधित करके भगवान् श्रीचन्दजी ने जा अवतार तत्व आर तीर्थतत्व वर्णन किया है उसका कर्तव्य बुद्धि से उपक्रमोपसहार समझ कर भगवान का अवतार सम्बन्धी समस्त कार्य सिद्ध हो जाता है इसीलिये भगवान् प्रसन्न होगए हैं॥६५॥ मुनिगदितमिदं निशम्य सर्वे चरणयुगार्पितवीक्षणा. समस्तम् । निजहृदयगतं निरस्य भेद चिमतभया चिमतश्रमा भूचुः॥६६|| भगवान् का उपदश सुनकर आपक समस्त शिष्य भी द्वैतभाव से नष्टभय और गतश्रम हो गए ॥६६॥ इयमतिरुचिरा सुपुष्पिताना हृदयहरी मम मालतीलतेव ।

222 जगदुरात्रीचन्द्रदिग्विजय मदयतु भुनिमएडलानि सद्य. कृतिरधुनाशुकवे. प्रशस्तवाचः ॥६॥ इस विषय का वर्णन करने वाली अत्यन्त चिर मनोहारिणी पिताना यह कति भी मुनिमण्डल को आनन्द दती हुई मालती लता फै समान सबको आनन्दित करे ।।६७॥ अवसितिमु पनीय शारदाया- श्चरणमरोरुहवन्दनाय सर्गम् । कविरयमधुना निरस्तचिन्तः स्मरति महेश्वरमेकमद्वितीयम् ॥१८॥ इतना कहकर भर हम विषय का उपसहार फरके नियमपूर्वक सरस्वती का चन्दन करने के लिये इस सर्ग को यहीं पर विश्राम देकर अपना 'चित्त उसी की और लगाते हैं ॥६॥ -- इतिश्री सनाव्यवंशोद्भव कविवर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते मतिलके जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिविनय महाकाव्ये देवोपासनायिकश्चतुर्दश मर्ग

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय
परमपूज्य दर्शनरत्न मण्डलेश्वर स्वामि सर्वानन्द जी महाराज काशी ।
यी०एनप्रेस इटावा

पञ्चदशः सर्गः- श्रीमानतःपरमुपस्थितवालहास- श्रीपुष्पदेवकमलासनमुख्यशिष्यैः । पृष्टः प्रसन्नवदनः परलोकवृत्त- मेवं क्रमेण निजगाद यथावकाशम् ॥ १॥ गत सर्ग में अवतार और तीर्य विषय में अपना मत प्रकट कर इस सर्ग में भगवान् कमलासन बालहास पुष्पदेव आदि अपने मुरय शिष्यों के प्रश्न करने पर परलोक के विषय में अपना मत अभिव्यक्त करते हैं ॥१॥ लोकान्तरंपति गतस्य कृतानुगस्य जीवस्य कर्मविषये यदहं भवद्भिः । पृष्टोस्मि तत्सकलमेव सनत्कुमारः पूर्व'जगाद मुनये समुपागताय ॥ २ ॥ आप कहते है कि हे प्रिय शिष्यो ! आप लोगों ने इस समय परलोक के विषय में जो प्रश्न किया है वही प्रश्न प्राचीन समय में सनत्कुमार के समक्ष अन्य मुनियों ने भी किया या जिसका उत्तर उस समय सनत्कुमार जी ने दिया या ॥२॥ तस्मादनुक्रमवशेन मया यदाप्त सवृत्तमन विषयेऽवितथं गुरुभ्यः । सर्व तदेव निगमानुमतं भवद्यः सन्दिश्यस्ते सकललोकहिताय सद्यः ॥ ३ ॥ गुरु परम्परा प्राप्त वही उत्तर अपने गुरुवर्य से जो हमने अनुक्रमसे प्राप्त किया है आज आप लोगों के मरन करने पर ससार के कल्याणार्थ इस समय कहता है आप इसको ध्यानपूर्वक श्रवण करें ॥ ३ ॥ जीवो विभुः कृतवशेन विहायलोकं मत्यं यदैति, परलोकमदृष्टमार्गम् । 14 २९० - जगद्गुरुमीपनदिग्विजये मार्गद्वयं निजगतागतहेतुभूतं पश्यत्यचक्षुरपि बुद्धिवलेन दिव्यम् ॥ ४ ॥ जीव जिस समय अपने कर्मवश से इस लोक को छोड़ कर लोकान्तर के लिये पस्थित होता है उस समय उसके समक्ष दो मार्ग उपस्थित होते हैं । इसका निर्देश [ द्वे सूती अमृणवम् ] इस मन्त्र में मिलता है ॥४॥ आयस्तयोनगदितो निगमेन देवः पत्रोऽपरः प्रथितलक्षणवाननन्तः । विश्वं समस्तमपि गर्भगतं समेति याभ्यामिदं सुकृतदुष्कृतभावविद्धम् ॥ ५ ॥ उन दोनों मागों में पहिला देवयान और दूसरा पिठ्यान है । इन दोनों मागों से ही समस्त विश्व आता और जाता है जो कि माता और पिता के सहयोगसे अनेक योनियों में जीव को मिलता है ॥५॥ एकोत्तराः शतमिदं हृदयं प्रविष्टा नाड्यः शरीरमधिगत्य शिरः प्रदेशम् । यातात्र कर्मपरिपाकवशेन तासा- मेकाऽमृतत्त्वमिममापयति स्वभावात् ॥ ६ ॥ इस मानव शरीर में हृदय के अन्दर एकसौ एक नाड़ियों का सम्बन्ध है। उनमें एक नाड़ी शिरोभाग में जाकर ब्रह्मरन्ध्र से सम्बन्ध रखती है यदि जीव उसके द्वारा इस देह से निकल जाता है तो अमरत्व को माप्त होकर सर्वदा आनन्द भागता है इस विषयका निर्देश [.शतचेकाहृदयस्य नाड्यः ]. इस मन्त्र में अन्यासु यद्ययमुपेत्त्य गति समेति नाडीपु कर्मवशतो गमनक्रमेण । 'नीचैः प्रयाति विविधार्तिमनुप्रविष्टो जीवो गतिद्वयमिदं निगमप्रदिष्टम् ॥ ७॥ यदि जीव इसके अतिरिक्त अन्य नाडियों से निकलता है तो गमनानुक्रम से 'अनेक पश पक्षि सरीम्प आदि निकृष्ट योनियों में - ८ है } +w पञ्चदशः सर्गः २९१ जाता है यही दो गतियां इस जीवके लिये वेदमें कही गई है जिनका निर्देश ऊपर के पत्र में दिखाया गया है ।। ७ ॥ योगी गतिद्धयमिदं प्रविविच्य मूर्द्ध- द्वारेण वायुमपसार्य विभिद्य सूर्यम् । प्राणं विधाय बलवत्तरमप्रमेयां ब्रह्मस्थिति समभियाति न यत्र पातः॥८॥ योगी इन दोनों मागों का विवेचन करके अपने प्राण को ब्रह्मरन्ध से निकालकर सूर्य मण्डल के द्वारा उस अप्रमेय ब्रह्मभाव को मास हो जाता है जहां से कभी आवागमन चक्र में आना नहीं होता है ॥ ८॥ येपामियं भवति नैव गतिः स्वभावा- ते चन्द्रमण्डलमुपेत्य मनोवलेन । तं पितृलोकमुपयान्ति न यत्र पापाः सम्प्राप्नुवन्ति गतिमन्धतमिस्रयाताः ॥ ६ ॥ निनको यह गति माप्त नहीं होती है वे मनोवल से चन्द्रमण्डल फा भेदन करके इस पितृलोकको प्राप्त होते हैं जहां पर पापी पुरुष फभी नहीं जा सकते हैं इसी का दूसरानाम स्वर्ग है ॥९॥ येषां न सूर्यगतिरत्र भवे जनानां नापिदिजेन्द्रगतिरेव भवत्यपास्य । ते मानवं वपुरनन्तगतागतेषु देवेन यान्ति निजकर्मफलेन बिद्धाः ॥१०॥ माणरल और मनोरल के अभाव में निनको ऊपर कही हुई दोनों गति मास नहीं होती है वे मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर ग्राह्मण से पापालपर्यन्त भनेक तथावध योनियों में आते और जाते हैं ॥१०॥ भस्मान्तमेतदुदितं निगमे शरीरं यदन्हिसावति नात्र गतः स जीवः ।

.. जगदुरभीचन्द्रादिग्विजय । यः पितृलोकमधिगत्य जनैः प्रदत्तं भुंक्ते फलं जगति वान्धवतीमुपेतेः ॥११॥ वेद में शरीर को भस्मान्त कहा है आत्मा को नहीं, आत्मा अनादि अनन्त अजर और अमर है यही अजर अमर जीव ज्ञानवान होने के कारण पितृलोक में पहुंचकर वान्धवों द्वारा प्रदत्त पदार्थों का अनुभव करता है ॥११॥ नैनं दहत्यनल-एव न मातरिश्वा ,' :--. . .--जीवं विशोपयति नैव जलप्रपातः। .. संक्लेदयत्यतिशितं न छिनत्ति शस्त्रं भिन्दन्ति नास्त्रनिचयाः परितो विसृष्टाः ॥१२॥ इस जीवन को अग्नि नेता नहीं सकता, है वायु सुखा नहीं सकता है मल गला नहीं सकता है और शितधार शस्त्र काट नहीं सकता इतना ही नहीं . इस जीव को मन्त्र प्रयुक्त आग्नेयादि अनेक अस्त्र भी किसी समय नहीं घेर सकते हैं।॥१२॥ अत्यन्तसूक्ष्मकरणों भरणेन हीनों जीवों ने गर्मगमने मनुजेः कथंचितं । सन्दृश्यते न सं विनिर्गतएवं देहां- तत्रापराध्यति मते मम दृष्टिमांन्धम् ॥१शी देह त्याग के अनन्तर अत्यन्त सूक्ष्म भाव में अवस्थित यह जीवन तो गर्भ में आता दीखता है और न किसी को शरीर छोड़ने के समय माता दीखता है इस विषय में हमारी अनुमति में दृष्टि की मन्दती ही प्रधान कारण प्रतीत होती है॥१३॥ विज्ञानवेद्यविपये नवकलाक्त- नेत्रप्रवेशमपि ये निजबुद्धिदोपात् । : पश्यन्ति ते शशंक शृङ्गविनिर्मितेने कस्मान्न दिव्यधनुपा प्रहरन्ति वातम् ॥१४॥ जो मनुष्य विज्ञान वेद्य विपर्य में अपनी फजरोटी आंखों को भी सम्बन्ध रखना चाहते हैं वे अपनी ' मन्द बुद्धि को खेर नाकों से शेशक शृङ्ग निर्मित । -" पञ्चदेश.स अलोकिक चाप से श्राश प्रसृत वायु पर क्यों आक्रमण नहीं करते हैं ? यह तो उनके लिये एक मामूली सी बात है ॥ १४ ॥ कूर्मावताररमणीकुचकुम्भनिर्य- दुग्धाब्धिरोधसि निविश्य विमूकगीतम्। रागं कथं न निजकर्णपुटेपु कुर्यु- ये सर्वमक्षियुगलैरिह वेत्तुमर्हाः ॥१५॥ जो मनुष्य मत्येक विषयको आंखों से देखना चाहते हैं वे कच्छपकी धर्मपत्नी फे कुचकुम्भ से निकले हुए सारसमुद्र के तटपर बैठकर भूजन गीत रागरागिणियों का श्रवण क्यों नहीं करते हैं ? ॥१५॥ बन्ध्या वधूर्यदि सुतं जनयेजगत्त्यां रागोऽष्टमस्वरभिदामपि यहि यायात् । । धेश्यां भवेद्यदि सती कथमप्यशव मूढ़ोपि तहि नयनेरिदमन पश्येत् ॥१६॥ ससार में यदि पन्ध्यो स्त्री वालक को जन सकती हो ? राग यदि अष्टम स्वरसे गाया जा सकता हो ? वेश्या यदि सतो बन सकती हो ? तो मूदनन मी अपनी आँखों से सब कुछ देख सकता है। यदि ये तीनों घातें असम्भव है तो विज्ञान पेद्य विषय भी आखों से नहीं देखा जा सकता है ॥ १६ ॥ अन्धो न पश्यति यदि स्थितमग्रदीपं दीपस्य कोत्रविपये बत दोपलेशः। मुरो न वेत्ति यदि जीवमपास्तरूप जीवेन तत्र विपये किमिहापराद्धम् ॥१७॥ मत्या में विद्यमान प्रदीपरी यदि अन्धा नहीं देख सकता है तो इसमें प्रदीप फा पपा दोप है ? इसी प्रकार मूदनन यदि एमावस्या में स्थित नीव को नहीं देख सकता है तो इसमें जीका या अपराध है 11॥ विश्वासमत्र विपये भगवढनोभिः कृत्वास्तिकेः मालमाद्दयते विधानम् ।

जगदुरमीचन्द्रदिग्विजये श्रद्धावतां भगवतश्चरणे जनानां नोदेति चेतसि कदापि वितर्कवादः ॥१८॥ जो विषय आंखों से नहीं देखा जा माता है उसमें ईश्वरीय वेद वाक्य के आधार पर केवल विश्वास ही किया जा सकता है । जो आस्तिक भगवान् में अविचल विश्वास रखते हैं उनके चित्र में कभी तर्फबाद स्थान प्राप्त नहीं कर सकता है।॥१८॥ ये तर्कमेव भुवि विश्वसनीयमत्र मत्वा न विश्वसितिमादरतो वहन्ति । वेदे वदन्तु किल ते निजतातपुत्राः केन प्रमाणनिचयेन भवन्ति सिद्धाः ॥१६॥ जो मनुष्य केवल तर्क के बल पर वेदों पर अपना विश्वास नहीं करते हैं वे अपने पिता के पुत्र होने में कौनसा प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित कर सकते हैं ? ॥१९॥ मातुर्बचांसि यदि तादृशपक्षसिध्य प्रामाण्यवादमुपयान्ति मतेन तेपाम् । निःश्वासमूतवचनानि जगन्नियन्तुः प्रामाण्यमत्र विपयेपि तथास्तिकानाम् ॥२०॥ यदि वे इस अदृष्ट विषय में अपनी माता का कयन प्रमाण मानते हैं तो आस्तिक भी परलोक सिद्ध विषय में ईश्वर के निःश्वास रूप वेद को प्रमाण मानते हैं विश्वास उभयत्र समान है ॥ २०॥ यस्मिन्नदृष्टविपये किमपि प्रमाणं प्रत्यक्षदृष्टमथवा न तथानुमानम् । वेदस्तदादिशति सम्यगवस्थितार्थ- प्रत्यायको विधिवशादिधिवदिधिज्ञः ॥२१॥ जिस अदृष्ट विषय में प्रत्यक्ष अथवा अनुपान ,नहीं हो सकता है उस विषय को वेद अनायास ही वतलाने के लिये तयार रहता है इसी लिये वेद धी सर्वोचम साधन माना जाता है ।॥ २१॥ -

२९५
-
पञ्चदश सर्ग.
एतत्समस्तमपि चेतसि संविभाव्य
श्रीमानुवाच भगवान्निगमागमज्ञः।
पश्यन्ति मूढमतयो न गतागतानि
जीवस्य वेदनयनाः प्रविलोकयन्ति ॥२२॥
इस बात को हृदय में रखकर ही श्रीकृष्णने गीता में जीवका गमनागमन
ज्ञान वेद्य कहा है चसुवेद्य नहीं कहा है इस विण्य मे [ उत्क्रामन्त स्थित वापि]
यह भगवद्वाक्य सर्वोत्तम प्रमाण है ॥ २२ ॥
कर्मानुगो जगति यदिशति प्रसह्य
जीवः शरीरमथवा विजहाति यद्यत् ।
गन्धानिवाशयगतानुपगृह्य याति
सर्वाणि वायुरिव कर्मवनप्रविष्टः ॥२३॥
जीव अपने कर्मों के फल से निस शरीर में प्रविष्ट होता है अथवा जिस
शरीर का छोड़ता है उससे अपना वासनात्मक वृत्तियों को साथ लेकर ही
चलता है जैसे यहन शील वायु पुष्पों का गन्ध साय लेकर चलता है इसमें
[ वायुर्गन्धानिवाशयात् ] यह भारद्वाक्य उपादेय है ॥ २३ ॥
यं भावमात्मनि विचार्य जहाति देह
जीवः स्वकर्मपरिपाकवरोन सद्यः ।
तद्वावभावित उपैति तमेव भावं
वत्सो यथाऽनुगतिमानिजमातृगन्धम् ॥२४॥
जीव देह छोड़ने के समय जिस भार से हृदय में रखता है उसी के
अनुरूप उसको वासनामय गरीर प्राप्त होता है इसमें माता का गन्य
लेर नरीन बत्म या उसके पीछे पीछे चलना विस्पष्ट निदर्शन है ॥२४॥
एवं निवार्य हृदयस्थिततर्फबादं
श्रीचन्दएप भगवानुचितप्रमाणेः।
छान्दोग्यमन्त्रगतमद्भुतभावगर्भ
पशामिमार्गमधिकृत्य रमादुवाच ॥२५॥

जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये भगवान् श्रीचन्द्रनी इस प्रकार हृदय स्थित तर्क वाद को-प्रमाणों से-हटाकर अपने शिष्यों के प्रति इसके अनन्तर छान्दोग्य के आधारपर पञ्चामि विद्या का उपदेश करते हैं ॥ २५॥ अमौ निवेश्य करणं यदि चेतनावा- जीवः प्रयाति परलोकमदृष्टमार्गम् । तस्मानिवृत्त्य पुनरेति तमेव देवा- दमिं गतागतविधेरिह सानिभूतम् ॥२६॥ चेतना युक्त जीव अपना शरीर यदि अग्नि में छोड़ कर लोकान्तर फो जाता है तो वहां से लौटने पर वह फिर अग्नि को ही अपना अवलम्ब बनाकर पृथ्वी पर आता है क्यों कि अग्नि जन्म और मरण दोनों का साक्षी है ॥२६॥ अस्मिन्नदृष्टविपये जगति प्रमाणं ऋग्वेद एव किल यत्र मनुद्येन । प्रश्नोत्तरकर्मपरम्परया प्रदिष्टं जीवस्या भूमिगमनं मुनिभिः पुराणैः ॥२७॥ इस अदृश्य विषय में। [कस्य नून कतमस्यामृतानां (१) अग्नेयप्रथमस्या मृतानां (२)] यह ऋग्वेद के दो मन्त्र प्रमाण हैं जिनमें प्रश्नोत्तर रूप से अग्नि के द्वारा जीव का भूमि पर आना सिद्ध है ॥२७॥ केचित्पुराणमनयो निगमप्रदिष्ट- मत्रेतिहासमिसमेवमुदाहरन्ति। साहाय्यमादिशति यो गुरुशिष्यभाव-. मभ्यागतेषु मनुजेषु बहुप्रतिष्ठः ॥२८॥ इस विषय में प्राचीन मुनियों ने एक इतिहास उपस्थित किया है। जो छान्दोग्य में गुरु शिष्य सम्बाद का रूप देकर लिखी गया है वह इतिहासः इस प्रस्तुत विषय में अत्यन्त उपादेय प्रतीत होता है-॥२८॥ अभ्याजगाम गुरुगर्वभरः पुरान करित्रहिजः परित्रयाय-स-आरुणेयः ।। ।

ए. T चतुदेशः सर्गः। सद्यः प्रवाहणमुनेरधिवासमेको यः श्वेतकेतुरिति विश्रुतनामधेयः ॥२६॥ इतिहास इस प्रकार है एक समय प्रवाहण मुनि के पास परिचय मात करने के लिये अत्यन्त अभिमानी एक ब्राह्मण कुमार आरुणेय श्वेतकेतु उनके आश्रम पर गया हुआ था ॥ २९॥ अभ्यागतं तमुपसङ्गतमीक्ष वादे- सज्ज प्रवाहणमुनिर्निजगाद किन्त्वम् । वेत्सि प्रयान्ति कथमत्र भवे समेता लोकान्तरं प्रकृतयो विनिपात्त्य देहम् ॥३०॥ उनको विवाद के लिये सनद्ध देखकर जैवलि प्रवाहण ने कहा कि यहां से मरकर जीव किस प्रकार अपना शरीर बोड़ कर लोकान्तर को जाता है ? क्या इस विपय को आप भली प्रकार जानते हैं ? ॥ ३०॥ स्वर्गस्थिता निजनिजोचितकर्मवन्धे- भोंगानवाप्य बहुपुण्यफलाननेकान् । तस्मान्निवृत्य कथमत्र पुनर्भवन्ति वेत्सि त्वमेतदपि किं भगवन्यथावत् ॥३१॥ जीव अपने कर्म फल से स्वर्ग को प्राप्त होकर वहां पर पुण्य लभ्य अनेक भोग भोगने के अनन्तर फिर किस मकार यहां आकर जन्म लेते हैं ? क्या आप .. इस विषय से परिचित है १॥३१॥ व्यावर्तनं जगति देवपथस्य केन सम्प्राप्यते सुकृतिना वद वेत्सिचेत्त्वम् । केनाथवान परलोकगतेन तस्मा- दागम्यते पितृपथः पुरुषोत्तमेन ॥३२॥ जीव यहां से जाने पर फिस फर्म के फल में वहां से देवयान मार्ग से लौटता है ? और मिस फर्म के फल से पिठ्यान मार्ग से लौटता है ? उस विषय में क्या आप कुछ कह सकते है १ ॥३२॥ . ३८ । । जगहमीचन्द्रदिग्विजये पूर्ति समेति न यया किल पितृलोको जीवेरितः प्रतिगतैनितरामनन्तः । 1 -- वेत्सि त्वमत्र विपये किमपि प्रशस्तं पत्सूत्तरं भवितुमर्हति सभ्यवृन्दे ॥३३॥ यहां से गये हुये अनन्त जीवों से पितृ लोक भर क्यों नहीं जाता है इस विष्य में आप कृपा करके क्या कुछ कहने का साहस रखते हैं ९ ॥ ३३ ॥ आपो यथा पुरुषतामुपयान्ति लोके - देवैर्हताः प्रथितपञ्चमभावमेत्त्य। हित्वमत्रविषये यदि वेत्सि किञ्चि- सर्व यथोचितमनुक्रमतः प्रसादात् ॥३॥ देव प्रदत्त जल यहां से किस प्रकार पश्चम आहुतियों में जाकर पुरुष भाव को प्राप्त होते हैं ? इस विषय में आप क्या कुछ कह सकते हैं ?-इन प्रश्नों का अनुक्रम से यदि आप उत्तर दे सकते है तो कृपया उपक्रमोपसहार द्वारा उत्तर देना आरम्भ कीजिये ॥ ३४ ॥ प्रश्नानिमानुचितवाग्भिरुदारभावः संस्थाप्य तस्य पुरतो विनयेन पञ्च । किंवक्ष्यतीति मुखमस्य मुनिर्विवक्षो- स्त्रागतस्य विहप्सन्निव साध्वपश्यत् ॥३५॥ उदार शब्दों में इन पाच प्रश्नों को आरणेय श्वेतकेतु के समक्ष उपस्थित कर के नैवलि प्रवाहणा उसके मुख की ओर देखते हुये उत्तर को मतीक्षा में काल यापन करने लगे ॥३५॥ मूकं तमेषु विषयेषु मुनि विलोक्य - ; नष्टाभिमानमनवेक्षितलोकवृत्तम् । १ सद्यः प्रवाहण उवाच गृहं समेत्त्य तातं वदस्व स वदिष्यति सूतरं त्वाम् ॥३६॥ 7 - Y । -- २९९ पञ्चदशः सर्गः बहुत देर तक मौन धारण किये हुये मुनि कुमार को देख कर प्रवाहण ने उनसे कहा कि आपसे इन मश्नों का उत्तर यदि न होता हो तो आप पर जाफर अपने पिता से इनका उत्तर पूछिये ।। ३६ ।। एवं प्रवाहणमुनेः कथनेन सद्यः स श्वेतकेतुरधिगत्य पितुः समीपम् । सर्व प्रवाहणमुनेः कथनं निवेद्य | तस्योत्तरं मुहुरपृच्छदनन्यचेष्टः ॥३७॥ इस प्रकार प्रवाहण से घर जाने की अनुमति मिलने पर वेतकेतु घर जाकर अपने पिता से समस्त वृत्तान्त कहने लगे और इन मश्नों का उत्तर पिता से पूछने के लिये उत्सुक ये ॥ ३७॥ सोपि प्रसन्नमनसा निजपुत्रमात प्रश्नरनन्यगतिकैरवगत्य पृष्टः। सद्यः प्रवाहणमुपेत्त्य जगाद नाई वक्तुं क्षमः किमपि तत्कथय त्वमेव ॥३८॥ पिता ने पुन को प्रश्नों के उत्तर न आने पर दुखी देख कर मवारण के पास स्वय नाना निचय किया और जाकर कहा कि मित्र ! मैं इन मरनों का उत्तर इस को नहीं बतला सकता हूँ इस कारण आप ही इसे रतलाइये ॥ ३८॥ गर्वापहारकभवद्विधभव्यमूर्तेः पुत्रोपदेशकरणक्षममीक्ष्य भावम् । गोंद्धतो निजसुतः प्रहितो मयैव यस्त्वामुपेत्य गतसर्वमदो बभूव ॥३६॥ हमारा यह पुन पड़ा अभिमानी है इसका गर्व आपही दूर कर सकते हैं ऐसा समझ फर हमने इसको आपके पास भेना पा अब इसका गर्व दूर हो गया इस इसके लिये अत्यन्त आभारी है ॥३९॥ इत्यं निपीय परमादरतः समुक्तं स श्वेतकेतुजनकस्य वचः प्रसनः ।

३०० " जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय ' सद्यः प्रवाहणमुनिर्निजमित्रपुत्रं प्राह प्रसन्नमनसा शृणु वत्स सर्वम् ॥४०॥ इस प्रकार अत्यन्त गौरवपूर्ण श्वेतकेतु के पिता की बात सुनकर प्रसन्न हुए भवाइण ने कहा कि वत्स ! तुम मेरे मित्र के पुत्र हो इस कारण अत्यन्त रहस्यपूर्ण इस विषय को मैं तुमसे कहता हू ।। ४० ॥ लोकोयममिरुदितः समिधोत्र सूर्यो । धूमोस्य दिव्यकिरणाः सुदिनं प्रकाश । अङ्गारको विधुरनेककलः प्रसिद्धो विजेरनन्तनिलया गदिताः स्फुलिङ्गाः ॥४१॥ . तस्मिन्विचित्रविभवे नियमेन बन्ही देवा घृतं यदभिजुह्वति दिव्यकामाः । श्रद्धामयं भवति तेन नवीनसोमो यः कारणं भवति जीवगतागतेषु ॥४२॥ अब सबसे पहिले तुम पश्चम प्रश्न का उत्तर सुनो !!! यह लोक अग्नि है इसको प्रदीप्त करने वाला सूर्य ही उसकी समिधा है सूर्य की किरणें ही उसकी धूमराजि है दिन उत्तका प्रकाश है चन्द्रमा अङ्गार है नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं। इस प्रकार की दिव्याग्नि में देवगण श्रद्धाप जल का हवन करते हैं उससे सोम उसन्न होता है ।। ४१-४२ ॥ पर्जन्य अमिरुदितः समिदन वायु- धमोऽभ्रमस्य चपलेव बहुः प्रकाश- 1 अङ्गारको शनिरनेकनिनादमूलो हादः स्फुलिङ्गनिचयो गगनप्रतिष्ठः ॥४३॥ तस्मिन्ननेकविभवे नियमेन वह्नौ देवा घृतं यदभिजुद्दति सोमरूपम् । तेनात्र वर्पणमलं भवति प्रशस्तं यत्कारणं भवति जीवगतागतानाम् ॥१४॥ 1 . -- पञ्चदश सर्गः ३०१ अब दूसरा अनि सुनो !!! पुरुष अग्नि है वायु उसको समिधा है अन्न धूम है विद्युत् प्रकाश है अशनि अङ्गार है और शब्द विस्फुलिङ्ग है । इस अग्नि में देव- गण सोम का हवन करते हैं उससे वर्षा होती है । ॥४३-४४ भूलोक अग्निरुदितः समिदन वर्षों धूमः खमेव रजनी किल तत्पकाशः। अङ्गारका दिश इमा विदिशः स्फुलिङ्गा दिव्योयमनिरुदितो मुनिभिस्तृतीयः ॥४५॥ तस्मिन्ननन्त विभवे नियमेन वन्ही देवा घृतं यदभिजुह्वति वर्परूपम् । अन्नं भवत्यधिकमुद्तमत्र तेन यत्कारणं भवति जीवगतागतानाम् ॥४६॥ अब तीसरे अग्नि का वर्णन सुनो ! पृथिवी अमि है सवत्सर उसकी समिधा है आकाश धूम है रानि प्रकाश है दिशा अङ्गार है और अमान्तर दिशा विस्फुलिङ्ग है इस अग्नि में देवगण वर्षास्प हवन करते हैं उससे अब उत्पन्न होता है।। ४५-४६॥ मोयममिरुदितः समिदस्य वाणी प्राणः स धूमनिचयो रसनं प्रकाशः । अङ्गारका नयनमुद्तविस्फुलिङ्गाः श्रोत्रं चतुर्थ उदितोऽमिरयं यथावत् ॥१७॥ तस्मिन्ननन्तविभवे नियमेन वन्ही देवा यदन्नमुपजुदति भिन्नभेदम् । तेनान वीर्यमुपजायत उपवेग यत्कारणं भवति गर्भगती जनानाम् ॥४८॥ भर पाये अमि का उपक्रम सुनो। पुरुप अनि है याणी उसकी समिधा है प्राण धूम है जिहा अर्चि है नेर अङ्गारक है और भोर विस्फुलिङ्ग है। इस अग्नि में देवगण अन का हवन करते हैं उससे वीर्य वन फर तयार हो जाता है।।४७-४८ ॥ :

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्वजये र योपेयममिरबला तदुपस्थमेव दिव्या समित्तदभिमन्त्रणमुग्रधुमः । योनिः प्रकाश उदितो मिथुनं प्रशस्त- मङ्गारकः सुखकला इह विस्फुलिङ्गाः ॥४॥ तस्मिन्नलंकृतपदे नियमेन वन्हीं वीर्य हविर्यदभिजुह्वति देवसङ्घाः ।। तैनात्र सम्भवति गर्भ उदीर्णरागो.. यः कारणं जगति जीवगतागतानाम् ॥५०॥ अब पश्चम अमि का उद्भव सुनो !!! स्त्री अग्नि है उसके पास रहना समिधा है उससे बात करना ही धूम है योनि उसका प्रकाश है शिश्न उसका अङ्गार है और आनन्द प्राप्ति ही विस्फुलिङ्ग है । इस अग्नि में देवगण वीर्य का हवन करते है उससे गर्भ बनता है। इन पांच अमियों का यथार्य ज्ञान ही पश्चामि विद्या के नाम से प्रसिद्ध है । इस पञ्चम आहुति में जल पुरपभाव को प्राप्त होता है यह एक प्रश्न का उत्तर है ।।४९-५० ॥ पञ्चामिभिर्जलमिदं गतिभेदमाप्त पञ्चत्त्वमित्त्वमधिगत्य कलाविरोपः।। सूते जगत्पुरुपतां प्रगतं यथेदं सन्दर्शितं तव तथाद्य मयापि यत्नात् ॥५१॥ गर्भादहिः स नवमे दशमेऽथवालं निर्गत्य मासि नियतं निजमायुराप्य । यस्मादुदेति समयेन यथावकाशं तत्रेव याति विलयं दहने यथावत् ॥५॥ इन पांच अमियों से अनेक प्रकार की अवस्या को पहुँचा हुभा देवदत्त जल समस्त जगत् का मूलकारण घनकर पुरुप तक मीर को पहुंचा देता है। गर्भ में भापामा पुरुष नाम अपरा दशम मास में याइर आफर अपनी नियमित मायु का उपभोग करफे निस अग्नि से उसन है उसी अनि में विलीन होता है यही जी के आवागमन का प्रकाश है ।। ५१-५२॥ । 1- -- -- ३ -- मवेदश. सर्गः ३०३ एवं गतिं समवलोक्य भवे जनानां योगी प्रकाशमवलम्ब्य दिनं प्रयाति । शुक्लं ततोपि निजयोगवलेन पक्षं तस्मादुदग्गतिमुपैति रखेः क्रमेण ॥ १३ ॥ संवत्सरं तत उपेत्य रविं ततोपि चन्द्रं क्षणातिमवाप्य ततः क्रमेण । ब्रामं पदं समभियाति यतो न भूयः सम्भूतिमत्र भुवने लभते कदाचित् ।। ५४ ।। । योगी इस प्रकार को अपने योग बल से समझ कर पिता से प्रकाशका अवलम्ब लेता हुआ क्रमशः दिन शुक्लपक्ष उत्तरायण सवत्सर आदित्य चन्द्र विद्युत् के अवलम्बसे ब्रह्मलोक में पहुचता है इस मार्ग को ही देवयान कहते हैं ॥ ५३॥ ५४॥ ये धूममार्गमवलम्ब्य निशामुपेताः कृष्णं प्रयान्ति निजकर्मवशेन पक्षम् ।। ते दक्षिणायनमवाप्य ततः प्रयान्ति तं पितृलोकमपि यत्र मृताः प्रयान्ति ॥५५॥ तस्मादवाप्य नियतेनियमेन दिव्य- माकाशमएडलमवाप्य ततोपि चन्द्रम् । तस्मादनुक्रमवशेन तमेव लोकं यस्मिनातागतवशेन विशन्ति भूयः ॥५॥ सामान्यजन इस मार्ग से न जाकर चिता से धूमका अवलम्य लेफर क्रमशः रात्रि कृष्णपक्ष दक्षिणायन पितृलोक आकाश चन्द्रमा के अवलम्ब से मर्त्यलोक में पहुंचता है इसी मार्ग को पित्यान कहते हैं इन दो भागों से ही जीव आता है इनमें देवयान योगियों के लिये और 'पिढ्यान यज्ञादि कर्म करने वालों के लिये नियत है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ 1 . ++ - . ३०६ जगद्गुरुत्रीचन्द्रदिग्वजये भुक्ते यदत्र मुखजः स्वमुखेन दत्तं Imपुत्रैर्हविस्तदभिवीक्ष्य स तुष्टिमाप्तः । सद्यः सुखं समभियाति ददाति शान्ति सर्वाणि पूरयति चेतसि मङ्गतानि ॥६५॥ भाद में पितरों के उद्देश्य से पुनों द्वारा प्रदत्त जो हविष्य ब्राह्मण भोजन करता है उसको देखकर प्रसन्नता को प्राप्त हुआ वह परलोक गत 'जीव 'यहां आकर सुख का अनुभव करता है और पुत्र के चित्त को शान्ति देता है और उसके समस्त मनोरयों को अपनी दिव्यशक्ति से पूर्ण करता है ।। ६५ ।। क्रव्यादममिमधिगत्य यमेन दृष्टा ये केपि वन्हिजलभूमिगताः समन्तात् । तानमिरानयति सर्वगतः क्रमण ये यत्र पूर्वमुपिताः पितरो गृहेषु ॥६६॥ क्रव्याद अग्नि में जलने के समय निनको यमराज ने देखा है ये यदि अमि जल भूमि आदि में भी पहुंच गए हों तब भी अनि उनको श्राद्ध में लाकर उपस्थित कर ही देता है ॥६६ अस्मद्तं निरवलम्बमवेक्ष्य जीवं तातो यथास्मदुदयाय ददौ स्वरेतः । तोयात्मकं तदुदयाय तथा सुतोपि तस्मै ददाति परलोकमुपागताय ॥६॥ हमारे जन्म से पूर्व हमार-जीव का निस प्रकार हमारे पिता ने वीर्य देफर साव- लम्ब पनाया है उसी प्रकार पुन भी परलोक्गन निरालम्ब अपने पिता को अवलम्ब देने के लिये यहाँ पर जलको तीन अञ्जलि देकर जल का बदला चुकादेता है ॥६७ आनृएयमेवमधिगत्य सुत. पितॄणां तस्योदयाय बहुदत्तजल समान्ते । तातें स्मरत्यविरतं यत एव तस्मा- दवागतम्तदवलम्बमुपेत्य जीव. ॥६८||--- - ", TE पश्चाशः सर्गः ? 1 -- TH - 11 - ३०७ इस प्रकार पुत्र पिताके ऋण से अनृण होकर वर्ष के अन्त में एक बार उसके आत्मा को अभिवृद्धि के लिये जल देकर उसका स्मरण करता है जिसने वीर्य- रूप जल का अवलम्ब देकर पुत्र को निरवलम्ब से सावलम्ब बनाया है ॥ ६८॥ 3. - एवं परस्परसमुन्नतिमीक्षमाण- स्तातः सुतोपि निगमोक्तपथं वितन्वन् । संसारचक्रमिदमीश्वरशक्तिनद्धं , सम्वर्धयत्यवनिमाप्य तयावनद्धः ॥६६॥ इस प्रकार दोनों पिता पुत्र आपस में एक दूसरे को अवलम्ब देफर वैदिक मार्ग की रक्षा करते हुये उस ईश्वरीय चक्र को चलाते हैं जिसमें वे दोनों घर्ष हुए है ॥ ६९ ॥ तस्मादिदं निगममन्त्रपदेःसमुक्तं श्राद्धं यथोक्तविधिनात्र सुतेन कार्यम् । यस्मादितः प्रतिगतः स पितास्य धन्यः . स्वर्गे निवासमुपयातु चिराय तृप्तः ॥७॥ इसलिये इस वेद प्रतिपादित मृतक थाद को विधि पूर्वक यहां पर करना चाहिये जिससे स्वर्ग में पहुंचे हुये हमारे पिरगण चिरकाल तक वहां पर आनन्द पूर्वक रह सकें ॥ ७० ॥ ये वैदिक मतमिदं निरपेक्षबुध्या लोके निरस्य न भवन्त्यनृणाः पितॄणाम् । तेषां पतन्ति पितरो निरयेप लुप्त- प्रत्यक्षपिएडजलदानकथाः प्रमादात् ॥७१॥ जो मनुष्प इस वैदिक सिद्धान्त को माहेलना करके पिश्ऋग से मद्रण नहीं होते हैं उनके पित्र गण पाद और तर्पण के अमार में नरफ में गिर फर पिर- फाल वक दुःख का उपभोग करते हैं ।। ७१॥ तेषामनुप्रपतनेन महान्ति सद्यो । नाशं प्रयान्ति सुफुलान्यपि नैव कश्चित् -- . - ।७। " F- १ . T1 जगद्गुक्ष्मीचन्द्रदिग्विजये तेषु प्रधानपुरुषः समुपैति भूति निःश्वासदग्धकुलतन्तुपु दृष्टमेतत् ॥७२॥ उनके नरक में गिरने पर बड़े बड़े समृद्ध कुल भी सर्वढा के लिये नष्ट होजाते हैं उनमें नाम लेवा पानी देवा कोई भी पुरुष पितरों के 'शाप से नहीं रहता है यह दशा सात पीदी के बाद हो जाती है ।। ७२ ॥ एवं विचिन्त्य हृदये कुलतन्तुरक्षा- ।" दर्यथाविधि समस्तमिदं विधिः । कार्य समस्तकरणं भरणं पितृणा- ।।। - मैतिह्यसिद्धमनुविद्धमुदारकल्पैः ॥७३॥... इस बात को हृदय में विचार कर अपने कुलतन्तु की रक्षा करने के लिये यह मृतक श्राद्ध अवश्य करना चाहिये जिसके करने के लिये श्रुति स्मृति पुराण इतिहास सभी आदेश करते हैं ।। ७३ ।। ये केपि नास्तिकपथानुगताः पितणां 17 {{"वाञ्छन्ति दर्शनमिह प्रसभं क्रमात्ते । देवव्रतेन विहितं निजतातपाद- श्राद्धं प्रसिद्धमितिहासगतं पठन्तु ॥७॥ जो मनुष्य नास्तिक मव के अनुगामी होकर श्राद्ध में मृत पितरों का प्रत्यक्ष में दर्शन करना चाहते हैं, वे महाभारत पोक्त भीष्मपितामह कृत शान्तनु श्राद्ध का अवलोकन करें जो इरिवश पर्व में [१६ से २०] अध्याय तक मिलता है ।।७४॥ शोकातुरो दशरथः प्रविहाय देहं । || यत्पितृलोकमधिगत्य जगाद तुष्टः। रामप्रदत्तमुपलभ्य निवापभागं नाकर्षितं तदपि किं मनुजैर्यथावत् ॥७॥ 11 महाराजा दशरथ के मरने पर श्री रामचन्द्र जी ने चित्रकूट में अपने भाई से उनका निधन सुनकर जो श्राद्ध का आयोनन किया था उसका वर्णन वाल्मीकि रायामण के अयोध्या काण्ड में सर्ग १०२ के अन्दर देखना चाहिये ।।७५ 7 पञ्चदशः सर्गः .. । M ३०९ । सीता वनोदरगता समवाप्य यस्य सन्दर्शनं दशरथस्य दिवं गतस्य । लीना वभूव विनतेषु लतागृहेषु नाकर्णितः स मनुजैरिह किं महीपः ॥७॥ एक वार श्री रामचन्द्र जी ने वनवास के समय श्राद्ध का आयोजन किया था उसमें निमन्त्रित ब्राह्मणों के साथ साथ दशरथ को आता देखकर सीता जी विपफर अदृश्य हो गई थीं यह आख्यान पद्म पुराण सृष्टि खण्ड अध्याय ३३ पद्य ७४ से ११० तक है ॥७३ ।। ऐतिह्यसिद्धमपि ये मनुजाः स्वत- हल्लंघ्य वेदविहितं परलोककृत्यम् । कुर्वन्ति नैव यमएव ददातु तेभ्यो दण्डं ससिद्धकरणः स्वकरेण चएडम् ॥७॥ वेद प्रतिपादित इतिमाह सिद्ध इस श्राद्ध कृत्य को जो पुरुप नास्तिक मोक्त तकों के आधार पर नहीं मानते हैं उनको यमालय में घुला कर यमराज ही अच्छे मकार से समझा सकता है ।। ७७ ।। एवं मनी वदति तत्र यथाक्रमण श्रीपुष्पदेवकमलासनवालहासाः। पप्रच्छुरानतधियः परलोकमार्गे कस्याधिपत्यमिति तानिदमाह देवः ॥७॥ इस प्रकार भगवान् श्रीचन्द्र जी के मुख से श्राद्ध का गूद रहस्य सुनकर वालहास आदि भगवान् के शिष्यों ने प्रश्न किया कि उन पितरों पर किसका आधिपत्य वना रहता है ? ॥७८ ॥ मत्येषु य. प्रथममत्र ममार लोके यश्चाप पितृसदनं प्रथमः स एव । वैवस्वतो मनुजसङ्गमनः समुक्तो वेदेन पितृसदनाधिपतिर्यमाख्यः॥७॥ ॥ । 1 - - AN AN H 1 -- -- जगदरुनीचन्द्रदिग्विजये इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् कहते हैं कि मरणधर्मा जीवों में प्रथम ही मरकर यहां से जो पितृलोक पहुंचा है, उस वैवस्वत यम का ही उस पिट लोक में पूर्ण आधिपत्य है । इस पद्य का मूलाधार [ यो ममार प्रथमो माना] यह अपर्व का मन्त्र है ।। ७९ ।। तस्याधिपत्यमधिगत्य समस्तजीवाः 'कर्मानुगेन फलभागजुपा कृतेन । 1. स्वर्ग ब्रजन्ति सुकृतेन परे यथावद्- दुःखाकुलं निरयमात्मकृतेन पापाः ॥८०॥ .. उसी यमराज के अधिकार में यहां के समस्त जीव अपने अपने कर्मों के फल से पहुँच कर उनके विवेचनानुसार स्वर्ग में अपवा नरक में जाते हैं ॥८॥ भीमाः प्रचएडवचसो धृतहस्तदएडाः पाशाङ्कशादिविविधायुधबद्धकक्षाः । दूता यमस्य विचरन्ति समस्तलोके येसूनिगृह्य यमलोकमुपानयन्ति ॥८॥ पमरान के प्रचण्ड दूत अपने हायों में वारुणपाश और अन्य अनेक प्रकार के भयमद आयुध लेकर इस लोक में इधर उपर गुप्तरूप से घूमते हैं जो माणों को खींचकर यमलोक में पहुंचाते हैं ॥९१ ॥ जीवेषु पुण्यपरिपाकवशेन येषां स्वर्गस्थितिनिगदिता मनुजाधिपेन | सत्कर्मणा जगति ते विविधाप्सरोभिः क्रीडन्ति सार्धममराधिपतेर्वनेषु ॥२|| उन जीवों में निनका पुण्यफल अधिक होता.ई ये यम के भादेशानुसार स्वर्ग में जाकर नन्दन पन में मुन्दर सुन्दर अमराभों के साथ मामोद प्रमोद करते हैं। उन अप्सराभों के नाम मेनका पक्षियस्यला मादि यनुरंद में लिखे हुए हैं। ८२॥ - -- . , .

पञ्चदशः सर्ग T लोकान्तरानुगमने बहु यत्प्रदग्धं , कर्मानुगं करणमत्र धनञ्जयेन । 'भूयस्तदुत्तमतमं पुनराप्य दैवा- त्साङ्गाः प्रयान्ति पितरो दिवि दिव्यदेहा. ॥३॥ लोकान्तर जाने के समय जो शरीर अग्नि ने जला दिया है वह दुवारा उत्तमरूप में फिर प्राप्त कर इमारे पितृगण सशरीर स्वर्ग में आनन्द करते हैं इसी लिए अथर्व में [ साङ्गा स्वर्गे पितरो मादयध्वम् ] ऐसा मन्त्र मिलता है इस मत्र का आरम्भ [ यद्वो अग्निरदहादेकमङ्ग ] इस चरण से होता है ।। ८३ ॥ उद्दिश्य तानिह यथाविधि दीयमाना धारा धृतोदकपयोदधिमाक्षिकाणाम् । सम्प्राप्य तानुचितमन्त्रपदैः क्रमेण सम्वर्धयन्ति विविधश्रुतिजुष्टकृत्यान् ॥८॥ उन पितरों के उद्देश्य से यहां पर जा-जा घृत-मधु दधि दुग्ध जल आदिद्रयों की धारायें दी जाती हैं उनको मन्त्रों के बल से माप्त कर वहा के पितृगण आप्या. पित होते हैं इसका वर्णन [ घृतहदा मधुकुल्याः सुरांदकाः ] इस अपर्व के मन में मिलता है ।। ८४॥ सूर्यांशुभिः सह समाहृतदिव्यभागा भोगाः प्रविश्य यमलोकमुपागतानाम् । सद्यो मनांसि मदयन्ति विधिप्रदिष्टाः सन्दर्शनेन नियमोयमिहस्थितानाम् ॥८॥ वे हमारे दिये हुये पदार्य सूर्य के फिरणों द्वारा भूक्ष्मरूप होकर यमालयगत पितरों के मनको तुरन्त ही आनन्द देते हैं। यह आनन्द उनको फेरलदर्शन मात्र से माप्त होता है। इसीलिये [नवै देया भरमन्ति न पिरन्ति एतदेवामृत दृष्ट्या प्पन्ति ] ऐसा छान्दोग्य [३।६।१] में लिखा है ॥ ८५ ॥ येचेह न. पितर आगतभूमिभागा येचान्तरिक्षगमना दिवि ये निविष्टाः। 1 1 - जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजय सर्वेपि ते हुतवहेन निरीक्ष्यमाणाः pii. सम्प्राप्नुवन्ति हुतमत्र न यान विद्मः ॥८६॥ हमारे पितरों में जा यमालय से लौट कर यहां जन्म लेचुके है और जो अभी तक अन्तरिक्ष में हैं याजो स्वर्ग पहुच गये है उनमें भी जिनको हम जानते हैं या नहीं जानते हैं उन सबको हमारा दिया हुआ पदार्य अनि के द्वारा पहुँच जाता है ॥८६॥ वैश्वानरे यदिदमत्र हुतं हविष्यं तद्वायुमण्डलमुपेत्त्य रवमयूखैः। । जुष्टं ततं प्रतिविभर्ति ततामहं तं वेदप्रदिष्टविधिना प्रततामहं द्राक् ॥८॥ जिस पदार्य को हम यहां पर अमि के द्वारा स्वर्ग को भेजते हैं वह वायु मण्डल के द्वारा सूर्य के फिरणों में पहुच कर तत ततामह मततामह इन तीनों को वृप्त करता है ततादिपद अथर्व में पिता आदि के अर्थ में प्रयुक्त है ।। ८७ ॥ आदित्यरुद्रवसुतामधिगच्य ते ते सर्वे ततादय उपेत्य नवीनभावान् । शुद्धाः शुचिं समभियान्ति नवीनलोकं नेपां दहत्यनल आत्ममयं शरीरम् ॥८॥ यहां से गये हुये हमारे पितृगण रद, वसु, आदित्य के भावों को प्राप्त होकर नवीन नवीन रूपों में प्राप्त हुये सुन्दर सुन्दर शरीरों से स्वर्ग में पहुचते हैं और उनका इन्द्रिय गण भी दिव्य रूप में उनके साथ ही रहता है यह यात [ अनस्थाः पूताः पवनेन शुद्धाः ] इस अथर्व के मन्त्र में विस्तार के साथ मिलती हैं ।। ८८ ॥ भूमएडलादुपरि यस्य विधिप्रदिष्टो वासो हिमांशुपरिधि समतीत्त्य दृष्टः । स्वर्गः स एव गदितो मुनिभिः सहस्र- माश्वीनमेव किल यत्परिमाणमुक्तम् ॥६॥ वेद में जिसका निवास अन्तरिक्ष में बताया गया है वह स्वर्ग यहांसे एक हजार आश्वीन ऊचा और चन्द्र मण्डल के ऊपर है । यह बात [ सहस्राश्वीनो वा इतः स्वर्गो लोकः ] इस कोपीतकि श्रुति में कही गई है ।। ८९| 11T . -- - +- - । m म ये अगदुरभीचन्द्रदिग्विजये सज्जनाः स्वकृतिभिनिगमानुगाभि- र्जुष्टाभवन्ति विधुमण्डलमत्त्य ते ते। स्वर्ग प्रयान्ति विनिरुद्धपथास्तु भूमि-- मागत्य जन्ममृतिचक्रमिहाब्रजन्ति ॥४॥ जो अपने २ कर्म के फल से स्वर्ग जाते हैं वे चन्द्रमण्डल के उपर जाकर आनन्द भोगते हैं और जो दरवाजे पर रोक दिये जाते हैं वे वहां से लौटकर पृथ्वी पर आते हैं और मावागमन रूपी चक्र में पड़कर जिप्त योग्य होते हैं वहीं पहुंचते हैं ॥१४॥ तस्मादिमी विविधमार्गविहारदक्षी नानाविधानवलिभिनियमेन विज्ञः । सर्वात्मभावमधिगत्य महालयेषु भूमिस्थितैरहरहः क्रमशोईणीयौ |ent इसलिये मनुष्यों को चाहिये कि बलि-वैश्व-देव के समय इन कुत्तों का भाग निकाल कर प्रतिदिन इनका सत्कार करें जिससे स्वर्गद्वार पर जाकर कोई रुकावट उत्पन्न न हो ।। ९५॥ पानास्तिलैरनुगताः सयवाः स पुष्पा- श्चान्दं सुवर्णमथ मन्यभृतः प्रयोगाः। गोदुग्धमाज्यमुदकं सकुश सदूर्व सन्तर्पणाहमुदितं निगमे पितृणाम् ।।६।। अपर्य के मन्त्रों में तिल तण्डुल यब पुष्प सोना चादी तथा मन्य प्रयुक्त अय, गौका दुग्ध, घृत, जल,कुश, दूर्वा आदि द्रव्य स्वर्गस्य पितरों के लिये तृप्तिपद होते हैं ॥९६ सर्व तदेतदधिकृत्य विधिप्रदिष्ट कन्यागते सवितरि स्वगृहेषु सर्वेः । कार्य परेतपरितर्पणकारि पुत्रैः - कृत्यं यथाविधि दिनेषु तदङ्कित्तेषु ।।६७|| मन्त्र प्रतिपादित इन सब पदार्थों को एकत्र कर कन्या की सक्रान्ति में पुत्रों को चाहिये कि वे नियत तिथियों को स्मृति रम्पकर समस्त कार्य, मृत पितरों के लिये करें ।। ९०॥ " स

पश्चदशः सर्गः
ये मासिकं निगममन्त्रपदैः प्रगीत
श्राद्धं पितर्युपरते विदधत्त्यनन्ताम् ।
ते साधयन्ति परितृप्तिमिति प्रदिष्ट
वेदेन तत्सहचरैरपि धर्मसूत्रः ||८||
जो पुरुष प्रत्येक मास की अपावस्या को मन्त्र मतिपादित श्राद्ध करते हैं वे
पितरों की अनन्त तृप्ति के कारण होते हैं यह यात घेद और धर्म सूत्रों में स्पष्ट-
रूप से कही है ।। ९८ ।।
देनन्दिनक्रममुपेत्य पितर्युपेते
लोकान्तरं सुतवराः किल येत्र लोके ।
सन्तर्पयन्ति ततमुन्नतिमार्गभाज-
स्ते सम्भवन्ति सदुपार्जितभोगभाजः ||६||
पिता के मरने पर जो पुत्र प्रतिदिन तर्पण के द्वारा मृत पिता की आत्मा
को तुष्ट करते हैं वे संसार में हरप्रकार की उन्नति प्राप्त करते हैं ॥१९॥
अमो यथाविधि हुतं मुखजेपु दत्तं
गङ्गादितोयनिहितं गवि सम्मयुक्तम् ।
सङ्कल्पतो दिविगतानुपयाति दत्तं
पुत्रादिभिर्नियम एप विधिप्रदिष्टः ॥१०॥
विधि पूर्वक अमि में हुत, प्रामणों को खिलाया हुआ, गमा आदि में मवा-
हित, गोमुख में प्रदान, श्राद प्रयुक्त समस्त द्रव्य सङ्कल्प पूर्वक यदि पितरों के
उद्देश्य से दिया गया हो तो ईश्वरीय नियम से अवश्य पितृलोक गत नीवों को
पहुँच जाता है, इसमें सन्दह करना भारितफों का काम नहीं है ॥ १० ॥
सर्वं तदेतदपराहकृतं पितृणणं
कृत्यं विघेरनुगमेन सुतैरुपेतः।
सम्बर्धपत्यमरतां दिवि सङ्गतानां
येनाप्नुवन्ति पितरः सुखमाश्वनन्तम् ॥१०॥

३१६ . -- T- जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजय भाद्ध सम्बन्धी यह सब कार्य विधिके आदेश से अपराल में किया जाता है पुत्रों के द्वारा सम्पन यह कार्य स्वर्ग में स्थित पितरों के अमरत्व को बहुत काल तक नियत रख उन के लिये आनन्ददायक होता है ।। १०१ ॥ एवं निवेद्य निजशिष्यवरेषु सद्यो लोकान्तरस्थितिरहस्यमनुक्रमेण । हृष्टो वभूव मुनिरेप निरस्तशङ्कः शिष्यत्रजोपि निगमानुगमेन तुष्टः ॥१०२॥ अपने शिष्यों के प्रति इस प्रकार श्राद्ध सम्बन्धी सबै रहस्य अनुक्रम से कह कर भावान् बहुत प्रसन्न हुये और आपके शिष्य गण भी इस वैदिक रहस्य को आप से सुनकर सर्व प्रकार शङ्का रहित हो गये। १०२॥ श्रद्धावतां मतिमतां विदुपां हिताय .: 'सम्यग्विविच्य परलोकरहस्यमत्र । सों निसर्गरमणीयसमस्तवृत्तः केनाप्यचिन्त्यविभवेन मयापि वद्धः ॥१३॥ इस सर्ग में श्रद्धावान् पुरो के लाभ के लिये परलोक सम्बन्धी समस्त रह- स्य लिखकर इस विषय में हमभी अपने कर्तव्य भार से बहुत अशों में सफल होकर यहीं पर इस प्रसङ्ग को विश्राम देवे हैं ॥१०३॥ सोयं समस्तनिगमोदितमन्त्रभाग- सम्बोधितक्रमकथः परलोकविज्ञैः । संवीक्ष्यतां मुनिमिरादरतः प्रसिद्धैः सिद्धरनुद्धतधिया विनयापनः ॥१०॥ समस्त वेद मन्त्रों द्वारा प्रतिपादित इस विषय को देखकर विद्वान् परलोक गत समस्त विपपों में विश्वास रखर आने मन में अपश्य आनन्द का अनुभव करेंगे ऐसा हमारा विश्वास है ॥ १०४ ॥ एवं निवेद्य हृदयस्थितमुन्नभावं 1180 सिंहोद्धतेन मधुरेण मनोहरेण । ।" । --- ॥ Honesty - - पञ्चदशः सर्गः ३१७ वृत्तेन पबदशएप दिनावसाने सम्पूर्यते विधिवशेन मनोज्ञसर्गः ॥१०॥ अपने हृदय में विद्यमान इस उचभाव को मधुर तर सिंहोद्धत वृत्त से निबद्ध कर दिनान्त भाग में यह सा समाप्त किया जा रहा है ॥१५॥ अस्मात्परं यदवशिष्टमुदारवृत्तं श्रीचन्दमौलिगदितं विशदं चरित्रम् ।..] तत्सर्वमेव, मुनिभिः कृपयाग्रिमेषु सर्गेषु वीक्ष्यमिदमत्र मया निवेद्यम् ॥१०६|| इससे अवशिष्ट श्रीचन्द्र भगवान् के मुख से निकला हुआ जो वृत्तान्त, अभी आपको देखना अथवा सुनना चाकी है उसके लिये समस्त मुनिगण अग्रिम, सगों का अवलोकन करें ॥ १०३ ॥ ये नास्तिकाः कुमतयो निजशुष्कतः श्राद्धं निरस्य निगमोदितमुगिरन्ति ! .. वेदं महेश्वरविनिश्वसितं यथाव- ते,सर्व एव मनसाद्य पठन्तु सर्गम् ॥१०॥ जो नास्तिक अपने तर्क बल पर वेट प्रतिपादित श्राद्ध का उपहास करते है वे इस सर्ग का ध्यान पूर्वक पालीफन करें ॥१०७ ।। अस्मिन्निवद्धमपि येद्य निसर्गसिद्धं वेदप्रदिष्टमनुमोदितधर्मसूत्रम् । श्राद्धं न कमिह चेतसि बद्धभावा- स्तेषां यमोस्तु शरणं धृतहस्तपाशः ॥१८॥ इतने पर भी जिनके मन श्राद्ध करने की इच्छा उत्पन्न न हो उनको हम (पाशहस्त यमराज के सुपुर्द करके अपने कर्तव्य कार्य में प्रवृत्त होते हैं ।। १०८॥ इनिश्री सनाढ्गवशोद्भव कविवर श्रीमदखिलानन्दशर्मपणी मतिलरे जगद्गुरुपीचन्द्रदिग्विजये महाकाव्ये. परलोकरहस्यविवेचननामपञ्चदशः सर्गा FE -- , पोडशः सर्गः श्रीचन्द्रो भगवानथ तुष्टस्वान्तः पुरोगतान्वीक्ष्य । निजशिष्यानिदमाह प्रशस्तवाचा हर्दिस्थितं वृत्तम् ॥ १॥ मसन्नचित्त भगवान श्रीचन्द्रमी ने इसके अनन्तर कमलासन आदि अपने शिष्यों को उपस्थित देखकर हृदय में विधमान वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी रहस्य को इस प्रकार कहा ॥१॥ धर्मः सनातनोयं विभिन्नशाखः अवड़ितोस्माभिः । लोकानलङ्करिष्य- त्यनन्तकाल भवादृशैः पुष्टः ॥ २॥ अनेक शाखाभों में प्रसूत जिस 'सनातनधर्म को मैं आप लोगों के समक्ष 'कह रहा है यह आप लोगों के द्वारा भविष्य में पुष्ट होकर अनन्तकाल तक मनुष्यों को सुमार्ग पर चलाएगा ॥ २ ॥ अस्याधिपत्यमाप्य स्वभावसिद्धं महेश्वरः सिद्धः। किं किं न संविधत्ते तदेकरक्षाप्रवर्धकं कृत्यम् ॥ ३ ॥ भगवान् इसके आधिपत्य को प्राप्त होकर इसकी रक्षा के लिये संसार में क्या आयोजन एकत्र नहीं करते हैं अर्थात् उनको हर प्रकार से 'इनकी रक्षा करनी पड़ती है ॥३॥ तस्य प्रधानमूलं समस्तवेदादिशास्त्रतः सिद्धम् ।

पोडशः सर्गः
३९९
वर्णव्यवस्थिति
निसर्गसिद्धा गुणत्रयावद्वा॥ ४॥
इसका प्रधान मूल स्वभाव से गुणत्रय सम्पद वर्णव्यवस्था है जिसका
वर्णन वेदादि सत्य शास्त्रों में सर्वत्र मिलता है ॥ ४ ॥
सत्वादयः प्रसिद्धा
गुणास्त्रयोत्र प्रधानतामाप्ताः।
नानाविधां प्रसुति
प्रवर्तयन्तिाकमेण सर्वत्र ॥ ५ ॥
प्रकृति के सत्व आदि तीन गुण प्रधानरूप से इसमें कारण हैं जोकि' सर्वत्र
सर्वदा अनेक प्रकार की सृष्टि प्रकट करते हैं ॥५॥
भूगर्भजातवस्तु-
प्ववस्थितास्ते विभिन्नरत्नानि ।
सम्भूतिमानयन्ति
प्रकाममन्तर्निविष्टतद्वेदाः ।।६।।
ये ही सत्व आदि तीन गुण जर भूगर्भ में जाकर अपना। काम करते हैं तर
उसमें अनेक प्रकार के रत्न प्रकट होते हैं॥६॥
भेदोयमीक्षणाभ्यां-
न वेत्तुमर्हः ममानरूपाणाम् ।
-सूक्ष्मेतिकाभिरपां
भिदा प्रसिद्धिं समेति सर्वत्र ।।७।।
इन रयों में आन्तरिफ जो भेद है यह विज्ञान क्षेत्र है नेत्रों से उसको पहिचान
सर्वया असम्भव है इनके भेद को नाहरी दी जान सकता है अन्य नहीं ॥७॥
एवं निसर्गसिद्धो
गुणानुगोर्य क्रमागतो भेदः ।
वृक्षेप्यवस्थितोणि
प्रतीयते तद्विदाभिरन्वेप्यः ॥ ८॥

जगद्गुनश्रीचन्द्रदिग्विजय इसी प्रकार जर ये तीन गुण वृक्षों में जाकर अपना काम करते है तर उनमें भी अनेक प्रकार के भेद प्रकट होते हैं ॥ ८ ॥ । देशकमेण कश्चि- त्प्रतीयमानः प्रतिष्ठितो भेदः । कालर्तुभेदतोऽन्यो रसायनज्ञैरवेक्ष्यते विज्ञः ॥६॥ । उनमें कोई देश भेद से कोई काल भेद से कोई चीन भेद से प्रकट होता है निसको रसायन शास्त्र जानने वाले जानते है ॥ ९॥ । एकेव सोमवल्ली कलाभिरिन्दोः समेधिता विज्ञान् । दैनन्दिनप्रविष्टं निवोधयत्याशु पत्रगं भेदम् ||१०|| एक ही सोमवली क्रमश. चन्द्रकलाओं के धरने और यदने से अपने पनों में दैनन्दिन भेद को दिखाती है जिसको रसायनज्ञ जानते हैं ॥ १० ॥ बीजं स्वभावसिद्धं विभेदमाप्त ऋतुक्रमादेकम् । नानाविधं विधत्ते फलं रसज्ञैरुपात्तबहुभेदम् ॥११॥ एक वृक्ष का एक ही वीज भिन्न भिन्न ऋतुओं में वोने कारण भिन्न रपन पुष्प फल देता है जिसको विज्ञान वेत्ता जानते है ।। ११ ॥ एवं विभेदमाता द्रुमेपु जातिः प्रतीयते यदत् । तदत्पशूनुपेता समीक्ष्यते किन भूतले विज्ञः ॥१२॥ अनेक भेदों में व्यस्थित वृक्ष जाति जिस प्रकार दखने में आती है उसी प्रकार पशुओं में भी उसका विकास दृष्टि में आता है ।। १२ 1 plener A A- । - । योडासागर ३१ एकव गोरनेक का विभेदमाप्य प्रतिष्ठिता लोके । .} '1, विज्ञैरुपात्तभेदैः TT ,-शतोदनावद्विविच्यते सद्यः ॥१३॥ एक ही गो जाति सत्वादि गुण भेद से ससार में अनेक विध देखने में आती है निसका वेद में शतोदना आदि भेद उपलब्ध होता है ॥ १३ ॥ गृष्टिः सकृत्प्रसूता धेनुर्गीपघातिनी वेहत् । ------- बन्ध्या वशा समुक्ता विधिप्रदिष्टेन जातिभेदेन ॥१॥ इसमें काई गृष्टि के नाम से कोई पेहत के नामसे कोई वशा के नाम से कोई धेनु और कामधेनु के नाम से ससार में प्रसिद्ध है ॥ १४ ॥ एताननेकभेदा- विविच्य पाएडोः सुतः प्रयत्नेन । प्रच्छन्नवेषगुप्तो विराटभूपं निबोधयामाम ॥१५॥ एक गो जाति गत 'इन अनेक भेदों को सहदेव ने विराट नगरी में जाकर द्रुपद रानों को बताया जिसका वर्णन महाभारत में विस्पष्ट रूपसे मिलता है ॥ १५ ॥ एवं विधाश्वजाति- नितान्तगूढापि शालिहोत्रण || 1 - 1 शास्त्रोक्तलक्षणानां' विवेचनादेव लक्षिता सद्यः ॥१६॥ गांनाति के समान अरानाति में भी गुण भेद से इसी प्रकार अनेक भातिया देखने में आती है जो शालिहोत्र ने भिन्न २ रूप में कही हैं ॥१६॥ '। आवर्तिनः समुक्ताः सशुक्तिकाः केपि छिद्रगोप्तारः। 1 - । - ३१२ जगद्गुरमीचन्द्रदिग्वजये सम्पन्नदेवमणयः मांगा केपि तथाश्वाः स्वजातिभेदेन गारणा फोई अश्व आवर्ती होते हैं कोई देवमणि वाले होते हैं कोई शुक्तियुक्त होते हैं कोई छिद्रगोप होते हैं इनको सब नहीं जानते हैं। लक्षण शास्त्र के जानने वाले ही पंदिलानते हैं ॥ १७ ॥:. ::: भद्रीयमस्ति मन्दों मृगोयमित्त्यं विविच्य शास्त्रम् ।। निजगाद पालकाप्यः Finition पुरा मुनीन्द्रो गजस्थितं भेदम् ॥१८॥ इसी प्रकार दृस्तिनाति में भी कोई मद्र जाति का कोई मन्द जाति फा .फोई मग जाति की इस्ती होता है जिसका लक्षण पालकाप्प ‘मुनि ने इस्त्यायुर्वेद में लिखा है ।। १८ ॥ EARifmiri एवं मितामुपेता. गवाश्वहस्तिप्रतिष्ठिता जांतिः। सर्वत्र लोकमध्ये STRani ,तदेकविज्ञेरवेक्ष्यते नान्यः ॥१६॥ । इस प्रकार से भेद: फो:माप्त हुई गौ अश्व हस्ती आदि पशु जाति समस्त लोक, में व्याप्त है जिसको जानने वाले जानते हैं ॥ १९ ॥in आनन्त्यमेवमातमागाला स जातिभेदः प्रतीयमानोपिकजनांजा शास्त्रैकनेत्रवेद्यो | EP JPTET सानो * त:चर्मचघुष्यपेक्षतो गूढः ।।२r fari ॥ संसार में इस प्रकार प्रतीयमान भी जाति भेद अत्यन्त गूद होने के कारण केवल शास्त्र से ही ज्ञात होता है, उसके भेद जानने में नित्र मात्र काम नहीं दे सकते हैं ।। २० ॥ . 2.

३२३ षोडशः धर्गः एकोत्र राजहंसः परोपि भेदेन मल्लिकाक्षोऽन्यः। हंसेषु धार्तराष्ट्रो विनैव शास्त्रं वदन्तु केनोक्त॥३१॥ मा पक्षियों में एक हंस जाति में भी राजहंस मल्लेिकास धाराष्ट आदि भेद विद्यमान हैं जिनको शास्त्र के विना अन्य कोई नहीं बता सकता है ॥२१॥ सपु कावेया- लगर्दगोनासशेपभेदोयम् ।" केनात्र सम्प्रदिष्टो महालयान्ते विनैव विज्ञानम् ॥रशो इसी मकार सर्प जाति में कावेय, अलगर्द, ' गोनास, शेप, पासुकि आदि अनेक जातियां हैं जिनको आहितुण्डिफ ही जानते हैं सर्वसाधारण नहीं ॥ २२ ॥ सौवर्णरौप्यताम्र- प्रवाललोहाभ्रमौक्तिकादीनाम् | Fa' केनापि नैव शक्यो ir] नार वक्तुं भस्मन्यवस्थितो.भेदः ॥३३॥ r सुवर्ण, रौप्य, ताम्र, मवाल, लोह, अभ्रक, मुक्ता, आदि द्रव्यों के के हुये भाम में जो भेद है उसका मानना सर्व साधारण के लिये अशक्य है केवल विन वैप हो मान सकता है।॥ २३ ॥, तस्मान्न वीक्षणाभ्यां कदापि केनापि जाविजो भेदः। शक्योऽत्र वो मस्माद्- स्थैव तत्र प्रवत्यते वादः ॥ २४ ॥, इसलिये अन्त में न्यही सिद्ध हुआ कि जातिगत भेद का प्रात नेत्रों से नहीं हो सकता है इसलिये इस विषय में विवाद करना च्पर्य है ॥ २४, . 1 ३२४ 7 . - १ जगद्रभीषन्द्रदिग्विजय ईशेन जन्मवादं प्रकृत्य ये ये यथा यथा सृष्टाः। ते ते तथा तथास्मि- 15 नियोजनीयाः प्रवृत्तिभेदेन ॥ २५॥ ईश्वर ने जन्म से निसको जैसा पैदा किया है उसको उसी के उपयुक्त फार्स में लगाना चाहिये इसी में ससार की परिस्थिति रह सकती है ॥ २५॥ । जन्मान्तरागतो य. -ITVE प्रधानरूपेण सङ्गतो भाव. सोस्मिन्भवे यथाव- निदानतामेति जातिभेदेषु ॥ २६ ॥ । जन्मान्तर से आया हुआ जो सस्कार है वही इस जन्म में पैतृक भाव को लेकर जाति भेद का कारण बनता है जिसका काई परिवर्तन नहीं कर सकता है॥ २६॥ -TITH पूर्वत्र केन कीदृक्. कृतं शुभं वाऽशुभं मनुष्येण | | कौति निर्णयाय स्वयं भवेस्मिन्स 'जायते भूयः ॥२७॥ पूर्व जन्म में किसने फैसा फर्म किया है ? इसका यदि अन्दाज लगाना हो 'तो उसका वर्तमान जन्म देखना चाहिये जो कि पिछले कर्मों के फल में प्राप्त होता है। इसी लिये [ सति मूले तद्विपाको जात्यायुभॊगा ऐसा लिखा है ॥२७॥ स्वातन्त्र्यमस्ति कर्म- IT SIT FAF एयवस्थितानां भवेत्र जीवानाम् । नो तत्फलोपभोग TET प्रफल्पने तन्नियामको देवः॥ २८॥ IT संसार में समस्त जीवों को कर्म करने में पूरी स्वतन्त्रता है परन्तु उसके फल भोगने में उनको ईश्वरेच्छा का अनुगमन करना होता है 1,२८ ७.) . - mer T IT for षोडशः सर्गमा द्रव्याश्रिताः समस्ता गुणा जडं कर्म नैव लोकेत्र । दातुं फलानि शक्त फलप्रदः कोऽन्याईशतो भिन्नःगा २६ ॥ 7 गुण द्रव्याश्रित होते हैं और कर्म जड़ होने के कारण सय पङ्गु है इस कारण ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई फल नहीं दे सकता है।।। २९ ।। सर्वेपि नीचयोनी जनिं प्रयाताः स्वकर्मयोगेन । वाञ्छन्ति भावमुझं नियामकस्तत्र कोभवेदन्यः ॥ ३०॥ Fi हरेक माणी नीच योनि से उच्च योनि में जाना चाहता है यदि उसमें कोई प्रबन्धक न हो तो जीवों के कर्मों की जान किस प्रकार हो सकती है और बिना जांच किये फल देने का उचित नियन्त्रण नहीं बन सकता है ॥ ३० ॥ एकेन जन्मनाये महोच्चजाति प्रयातुमीहन्ते तेपां कृताकृतानां. " विवेचना केन शक्यते कर्तुम् ॥ ३१ ॥। जो मनुष्य एक ही जन्म में नीच योनि से उपयोनि में जाना चाहते हैं उनके फर्मों का विवेचन ईश्वर के अतिरिक्त अन्य फौन कर सकता है १॥ ३१ ॥ अतएव तनियन्ता महेश्वरस्तत्प्रदिष्टभावानाम्- जन्मैव वक्तुमर्ह .. ~~ फलाफलं नात्र विद्यतेोवादः॥ ३२|| । इसलिये कर्मों का फैसला करने वाला ईश्वर है और उसके निर्णय का परि- माम इस जन्म के शरीर से प्रतीत होता है । इसमें कोई सशय, नहीं है ॥३२ . ISIT OF ।

जगदुरुबीचन्द्रदिग्विजये धारा द्विधा विभिन्ना IME TIPS नवीनसृष्टी गुणानुयोगेन। या कल्पयत्यनन्तां TF ।। जगत्प्रसूति स्वभावंसंसिद्धाम् ॥३शा नवीन कल्प में सृष्टि की धारा दो प्रकार से चलती है जो सत्व आदि तीन गुणों के अनुगमन से अनन्त जगत की कल्पना करती है ।। ३३ ।। Tri एका तमःसमुत्था IFTIME प्रयाति सत्वं गुणानुबन्धेन 17 1 सत्वोत्थिता तदन्या गा तमा प्रधानं स्वभावता सृष्टा ||३४|| उनमें प्रक धारा समोगुण से सत्व गुण की ओर चलती है और दूसरी सत्व गुण से तमो गुण की ओर चलती है यही इन का गमन क्रम है ॥ ३४॥ एतत्समुत्यभावा- वनद्धयोगा भिदाश्चतस्रोत्रं । सम्भूतिमानयन्ति 15 MITTER प्रकामसृष्टं चराचरं सर्वम् ॥३५॥ इन दोनों धाराओं के सहयोग से सृष्टि में चार भेदै उद्भूत होते हैं जो समस्त ससार में चराचर का सर्जन करते हैं ॥ ३५ ॥ ॥ एका तमः समुत्था रजस्तमोभ्यां समुत्थिता मध्याm TOTE सत्वप्रधानराजस- MASTE भावाबद्धा तृतीयसम्भूतिः ॥३६] TIGE उनमें सर्वप्रथम जीव केवल तामस दशा में प्रवेशकिरता है उसके अनन्तर -तमी मिश्रित रेजों गुण में और उसके अनन्तर रजौ मिश्रित सत्व गुण में प्रविष्ट हरि रहता है ।। ३६ || -- १ IFTIN . 111", IT: 7 । भ -- पोहा सण केवलसत्वसमुत्त्था FIFTETT भूमिः प्रकृतस्तदन्तिमा मोक्ता Iris *गयासु-विकास प्राप्य - क्रमेण लोके भवन्ति ते वर्णाः॥३७|| NTFF : सब के अन्त में जीव केवल सत्र में प्रविष्ट होकर अपना विकास करता है। यही चार भूमिका दो पाराओं में विभक्त होकर चलती है दूसरी धारा में सर्व प्रथम जीव केवल सत्व में प्रवेश करता है, उसके अनन्तर सल मिश्रित रज में उसके अनन्तर रजो मिश्रित तम में प्रवेश करता है, इस प्रकार एक धारा तम से सत्व की ओर और दूसरी सत से तम को और आती और जाती है ॥ ३७॥ सत्वसमुन्नतभूमे- विकासतो याति सम्भवं विप्रः ।। केवलतामसभूमे-1 FT. L.Ft -1 जनि समभ्येति जन्मतः शूद्रः ३/ इन चार धाराओं में विभक्त होफर मनुष्य चार वर्णों में विभाजित होता है, उनमें केवल सत्व के विकास में ब्राह्मण और केवल तम के विकास में शूद्र होता है।।। ३८ ।। सत्वप्रधानराजस- भूमेः सम्भूतिमेति राजन्यः |-मोकामा राजसतामसभूमे-1 विकासमभ्येत्य जायते वैश्य मारहवा गोभी सत्त्व मिश्रित रिजोगुण से सिविर्य और रजो मिश्रित तमोगुण से वैश्य होता है। इनके उलटे चलने में सङ्कर सृष्टि होती है और सीधै चलने मचार- . H . -- " mmH r - साITY - पर्ण होते हैं।।। ३९॥ । ha स्थावरजङ्गमभावं hi प्राप्ता या भाति संसृतौ सृष्टि T}' 7 जगनुरंभीचन्द्रदिग्विजये एतास्वेव चतसृषु THUFITFOTO भूमिपु. सालं विभाजिता भवति ॥४॥ इसी प्रकार ससार में जितनी स्यावर जगमात्मक सृष्टि देखने म आती है वह इन चारों विभागों में ही विभानित होती है ।। ४), एतामेव चतुर्विध- InFiभावाबद्धां जगत्स्थिति केचित् चातुर्वर्यपदेन :, . प्रकर्पमाप्तां वदन्ति विद्वांसः ॥४॥ इन चार धाराओं में विभक्त सृष्टि क्रम को हो' कोई 'सज्जन वर्णव्यवस्था के नाम से कहते हैं, जो सर्वत्र व्यवहार में देखने में आती है ॥४१॥ प्राकृतिकी वर्णभिदा F सेयं लोके नियन्तुरादेशात् ।- उद्विजादिविभेदै-T. ' Sश्चातुर्विध्यं यथाक्रम प्रासा ॥१२॥ शुमति निष्ठ तया स्वभाव सिद्ध - यह वर्णव्यवस्था संसार में ईश्वरादिष्ट होने के कारण जरायुज, स्वेदज, उद्भिन तथा अण्डन इन चारों जातियों में अविर रत रूप से मस्त रहती है ।। ४२ ।। मानवजातिविकासं . IFF विलोक्य वेदेषु धर्मशास्त्रेषु । त्रिंशद्विधो विभागात rip परस्परोत्यः प्रकीर्तितः प्राज्ञैः ॥४३॥ FATFFFF जाइनमें मानव जाति का ही विकास सर्वत्र प्रथम वेद तथा धर्म शास्त्रों में तीस प्रकार का लिखा है, जो कि परस्पर सयोग से प्रसृत होता है।॥ ४३fi.ir त्रिंशत्तमे विभागे iTETTER यजुष्यमीपां निसर्गजं कृत्यम् । 1171 .UTTF १२ ९ - - FFIघोडेशा सग वेदेन संविभक्त यदद्य लोकेषु विस्तृतं भाति मोरया- यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में वह तीस भेद चार विणा के अतिरिक्त उनके नियत कों के साथ कहे हैं जोकि आनर्मात्र देखने मामाते हैं ॥४४॥ या कर्मणा विभक्ता "पूर्वाभ्यस्तेन साङ्करी जातिः । सात्रापि कर्मभेदं श्रयत्यमन्दं तमेव वेदोक्तम् ॥४ा सृष्टि के आदि काल से जो-मातिया पूर्व सृष्टि नियत कर्मों के कारण इस वर्तमान सृष्टि में विभक्त दीखती है वै पूर्वाभ्यस्त धर्म को यहां पर भी करती हुई देखने में आती हैं इसलिये यह कल्पित अथवा नवीन नहीं है। अनादि- काल से इनका अस्तित्व वेद सिद्ध कर रहा है । यदि यह जातियां कल्पित होती तो सृष्टि के भारम्भ में प्रवृत्त वेद में इनका सकर्मक निर्देश न मिलता ॥४५॥ सेय विधिप्रदिष्टा समस्तभेदापि मानवी जातिः। आर्यानार्यविभागा- दिधा विभक्ता प्रतीयते लोके ॥४सा - इस लिये मानवजाति में यह नाति भेद ईश्वरकृत एवं अनादिकाल से प्रच. मित है और इसमें आर्य अनार्य भेद भी अनादिकाल प्रचलित है ॥४६॥ ऋग्वेदमन्त्रमध्ये स्फुटं प्रदिष्टाः क्रमेण ते सर्वे ।। आर्यास्त्रयस्ततोऽन्ये समस्तभेदाहि दस्यवः सभ्यः ॥४७॥ ऋग्वेद के [ तिसः प्रना आयोः ] इस पत्र में दिनों को आर्य और द्विजे- तरों को अनार्य अपना टम्यु का ॥४७HIT * - -- T - जगद्गुरुमीरदिग्विजये "ये पामराः प्रमादा-। निजार्थहेतोः पदोद्भवानत्र । वेदं प्रबोधयन्ति प्रभुः स तेषां यमोस्तु सर्वेषाम् ॥५५॥ जो मनुष्य अमानवशं अपने स्वार्य की सिद्धि के लिये शूद्र आदि को वेद का उपदेश देते हैं हम उनसे कुछ न कह कर उनको यमराज के सुपुर्द करते है वे ही धर्मराज इस पत्र के दण्ड का निर्णय देंगे ॥ ५५॥ ये कर्मणैव लोके द्विजेषु सेवां प्रतन्वते सर्वे । ते कारवः समुक्ताः समस्तवेदार्थचुञ्चुना मनुना ॥५६॥ जो जातियां ससार में जन्म लेफर फेवल अपनी सेवा से द्विजों का उपकार करती हैं उनको मनु ने कारुपद से निर्दिष्ट किया है ॥ ५६ ॥ सर्वेपि कारवोऽस्मिन जगत्यनन्ते निजक्रियावद्धाः। - । । । 'शिल्पं बहुप्रकार F . - . . -समाश्रयन्ति स्वभावतः सिद्धम् ॥५७॥ इस अनन्त ससार में यह सब फारु गण अपनी कुल, परम्परा से अनुमाप्त अनेक विध शिल्प लेकर अपना और पराया काम करते रहते हैं ।। ५७ ॥ जातिनिसर्गसिद्धा सदैकरूपाननाशमभ्येतिर या ब्राह्मणादिभेदा- विभर्ति सर्वत्र सर्वतोभावः॥५८॥ ससार में जाति स्वभाव सिद्ध और नित्य है उसका कदापि नाश नहीं होता है। ब्राह्मणादि भेदों में विभक्त होकर वही जाति समस्त विश्व में विस्तृत हो जाती है ।। ५८॥ mal " । ma पोडशः सर्गः ३३३ -- 7 अतएव भाष्यकार- रनेकवारं निदर्शितं भाष्ये। नित्यत्वमेवजाते- विपर्ययस्तत्र नेक्ष्यते विज्ञः॥५ r" इसीलिये भाष्यकार ने इस जाति को कई बार अपने महाभाष्य में, नित्य बताकर जाति का नित्यत्व सिद्ध किया है जा यहा पर उपादेय है ।। ५९ ।। - योऽयं स्वभाव उक्तः स जातिमाश्रित्त्य सर्वतो व्याप्ताम् । . नित्यत्वमेति लोके निदर्शनं तस्य तद्गुणः स्वगतः ।।६।। इसी प्रकार जिसको हम स्वभाव पद से निर्दिप करते हैं वह भी जाति के भायय से नित्य ही रहता है जिसका निदर्शन उसका स्वगत गुण संयोग है।६०॥ लोक स्वभावसिद्ध न वैरमायाति कहिचिच्छान्तिम् । अत्यन्तमुष्णमम्बु- प्रशामयत्येव पावकं सद्यः ॥६॥ ससार में स्वभाव सिद्ध जो कर है उसफा नाश कदापि नहीं होता है उदा. हरणार्य यहां पर जल को ही ले लीजिये । उसका अग्नि के साप स्वभाव सिद पैर है। जल कितना हो गरम पयों न हो परन्तु अग्नि के पुझाने में वा. सर्वदा सपर्व रहता है ।। ६१ ॥ सर्वो जनः स्वभाव प्रयाति कस्तत्र निग्रहं कर्तुम् । शक्तो जनो जगत्यां स्वभावसिद्धस्य निग्रहो नोक्तः ॥१२॥ संमार में सर प्राणी अपने प्रकृति जन्य म्पसाव फाटो अनुगमन करते हैं नपा निरोध करने पाला ससार में कोई नही है ॥ १२॥ - + Au । -- ३३४ जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये प्राचीनकर्मवीजा- जनो जगत्यां प्रयाति तां जातिम् । भोगाननेकरूपा- विचित्रमायुनियन्त्रितं भोगैः॥६३|| मनुष्य प्राचीन कर्मों के फलस्वरूप इस जन्म में नाति आयु और भोग प्राप्त करता है जिसका निर्देश [सति मूले तद्विपाको जात्यापुढेगः] इस योग सूत्र में किया है ।। ६३ ॥ एतत्त्रयं विधातु-- निदेशलभ्यं न मानवः कश्चित् । केनापि कर्मणास्मिन् विपर्ययं नेतुमीक्ष्यते शक्तः ॥६॥ जाति आयु और भोग इन तीनों को जो कि ईश्वर की तरफ से मनुष्य को प्राप्त होते हैं ससार में कोई अपने कर्म से बदल नहीं सकता है । ६४ ॥ एतन्निबोधनाय- प्रशस्तरीत्या मतङ्गसंवादम् । इन्द्रेण साकमारा- जगाद सूनुः पराशराज्जातः ॥६५॥ इसी बात को बतलाने के लिये व्यास मुनि ने महाभारत में मतङ्ग इन्द्र संवाद लिखा है जो महाभारत के अनुशासन पर्व में पूर्ण रूप से देखा जा सकता है ।। ६५॥ किन श्रुतं भवद्धि- विधातृसूनोः पुरातनं वृत्तम् । यद् व्यासनारदाभ्यां स्वयं समुक्तं मिथः प्रसङ्गेन ॥६६॥ आपने श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में नारद के प्राचीन इतिहास को नहीं देखा जो व्यास नारद संपाद के रूप में लिखा गया है १ ॥६६॥ F 47 an- -- क्या --- । । पोडश सर्ग १] सूतं कथां वदन्तं विलोक्य सद्यः स नैमिषारण्ये । निजघान यनिगद्य स्वयं हली तदिलोक्यतां विज्ञैः ॥६॥ इसी भागवत के द्वादश स्कन्ध में कया कहते हुए सूत को नैम्पिारण्य में जो पात कह कर बलराम जी ने मारा है क्या वह आपको स्मरण नहीं है ।। ६७॥ तस्माद्विहाय सद्यो विडम्बनामत्र सज्जनै. सर्वम् । कार्य विधिप्रदिष्टं यथा न पात. पुनर्भवे भूयात् ॥६८॥ इसलिये मनुयों को चाहिये कि वे विडम्बना छाइकर ससार में सब कार्य शास्त्रों में कहे हुए आदेश के अनुसार ही करें जिससे उनको फिर दुवारा अधोगति माप्त न हो ॥ ६८ ॥ वेदागमो न जाते- विपर्ययेत्र प्रमाणतामेति । रामार्जुनादिनाना- वतारवृत्तं निदर्शनं यस्मात् ॥६॥ 7 फेवल वेद पढ़ने मात्र से ससार में कोई जाति नहीं बदलती है क्योंकि येदा- ध्ययन क्षत्रिय और वैश्य के लिये भी नियत है और राम, अर्जुन, द्राण, अश्वत्त्या- मा आदि अनेक इसमें उदाहरण हैं ।। ६९ ॥ योनिः श्रुतं तपस्त- त्रयं प्रधानं निसर्गतो यत्र। स ब्राह्मणोऽत्र मान्यः समिद्धनव्याग्निसाम्यमायातः||७|| - जिसमें तप श्रुत और। योनि यह तीनों पूर्ण रूप से विद्यमान है वह प्रदीप्त प 1 N - - - - जद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये अग्नि के समान पूर्ण ब्राह्मण है । इसमें [ तपः श्रुत चं योनिश्चयह पतञ्जलि का कपन प्रमाण है ।। ७० ॥ यस्मिन्न विद्यते स- च्छुतं तपो नापि विप्रयोनिः सः। जात्यैव विप्र इत्य- प्यवोचि शेषेण विस्तृतं भाष्ये ॥७१॥ जिस ब्राह्मण में तप और विद्या का अभाव है वह केवल नाति ब्राह्मण है परन्तु जाति गत ब्राह्मण्य का उसमें अभाव नहीं है ।। ७१ एतन्मतं विविच्य प्रधानभावेन जन्मसंसिद्धम् । शर्मादि नाम सद्यः प्रदीयते यत्प्रयुक्तमाचार्यः ॥७२॥ इसी बात को लक्ष्य में रखकर ससार में बालक का जन्म से ग्यारहवें दिन में शर्मा वर्मा गुप्त आदि नाम धरा जाता है जिसका अनुमोदन गृह्यसूत्र करते हैं ॥७२ तस्यापि सत्कृतिर्या निमित्तमुद्दिश्य 'दृश्यते लोके। साश्वत्थसौरभेयी- समर्चनावच्छिवान्यलं सूते ॥७॥ उस जन्म सिद्ध ब्राह्मण को जो सक्रिया निमित्त से लोक में की भाती है वह भी 'पिप्पल और गो के अर्चना के समान पूजा करने वाले का कल्याण करती है सामान्य दृष्टि से पिप्पल वृक्ष और गौ पशु है परन्तु इनके सत्कार से यममानं फा अभ्युदय अवश्य होता है ॥७३॥ कर्मापि जन्मवाद। प्रकृत्य वेदेन वर्णितं मन्ये । नोचेत्कथं चतुर्थी-. विभक्तिरुक्ता यजुर्गते मन्त्रे ॥७॥ -- .

। . , । - पोदरा सो वेदादि सत्य शास्त्रों में जो वर्षों के लिपे कमों का निर्देश मिलता है वह भी जन्म गत वर्ण व्यवस्था को ला में रख कर ही लिखा गया है अदि ऐसा न होता तो [ब्रह्मणे ब्राह्मण ] इत्यादि वेद मन्त्रों में चतुर्थी विभक्ति का निर्देश न होता॥ ७४॥ हारीतधर्मसूत्र त्रयोदशाङ्गं यदुक्तमेकान्तम् शीलं तदप्यशई जनि समभ्येति जन्मतः सिद्धम् | हारीत स्मृतिम तेरह प्रकार का जो शोल ब्राह्मण के लिये नियत किया गया है वह भी जन्म गत जाति मानने पर ही सिद्ध हो सकता है अन्यथा उसका होना असम्भव है ।। ७५॥ कर्माणि धर्मशास्त्रे मनुप्रदिष्टे यथाक्रम यानि। गदितानि तानि विगै- यदि क्रियन्ते तदान सम्पातः ॥७६|| । मनुमोक्त धर्मशास्त्र में ब्राह्मण के लिये जिन कर्मों का विधान है उन कर्मों का अनुष्ठान करने पर ब्राह्मण अपने पद से कमी गिर नहीं सकता है । ७६ ॥ तेषु प्रतिग्रहो यो मनौ समुक्तः सःधार्मिकैविप्रेमा । आपत्तिकाल एव प्रधानरूपेण धर्मतो ग्राहाः ॥७७॥ परन्तु उन कों में जो प्रतिग्रह लेने का विधान है वह आपकाल के अति- रिक्त अन्य समय में नहीं लेना चाहिये ।। ७७ ॥ यस्मात्प्रतिग्रहेण प्रयाति नाशं सहागतं तेजः। .

. - 1 -- + ra 7 - न - ३३० जदूरबीचन्द्रदिग्विजये } 'तस्मान्न तं ग्रहीतुं कदापि यत्रो मुखोद वैः कार्यः ॥७॥ प्रतिग्रह के लेने से ब्राह्मण का सहन ब्रह्म तेज नष्ट हो जाता है इस कारण उसके लेने के लिये ब्राह्मण को कभी इच्छा नहीं करनी चाहिये ॥ ७८॥ शूद्वान्नमप्यशाई - विनाशयत्येव धार्मिकं तेजः । विप्रेषु यनिसर्गा- 'दिबोक्यतेऽन्यैः स्वभावसंसिद्धम् ॥६॥ शूद्र का अन्न लेने से भी ब्राह्मण का धार्मिक तेम नष्ट होता है इस कारण जहां तक यने वहा तक उससे ब्राह्मण को बचना चाहिये ॥ ७९ ।।।। ये. कर्मभि. प्रपातो भवत्यशई प्रयत्नतस्तानि । हेयानि विप्रवंश्यः } प्रयत्नतोऽत्यानि सेवनीयानि ॥३०|| जिन कर्मों के करने से ब्राह्मण अधोगति को प्राप्त होता है उन फर्मों का त्याग करके अच्छे कमां को ओर ब्राह्मण को जाना चाहिये । ८०॥ गृह्यानुमोदितादे द्विजातिभावोगमाय संस्का। कर्तव्यो विधिवाक्याद्- द्विजन्मभिपॅन संस्कृतिर्भूयात् ॥१॥ गृह्य सूत्रों में लिखे हुये नियत समय के अन्दर द्विजत्व देने वाला उपवीत सस्कार अवश्य करना चाहिये जिससे आत्मा का सस्कार हो जाये ।। ८१ ॥ आषोडशादमेवो- पवीतसंस्कार उक्त आचार्यः।। है - 7 1 -- 1 1 F षोडशः सर्गः मुखजेषु तत्परन्ते भवन्ति लोकेषु निश्चितं व्रात्त्याः ।।२।। ब्राह्मण का उपवीत संस्कार सोलह वर्ष तक होता है उसके अनन्तर बामण बात्य भाव को प्राप्त हो जाता है ।। ८२ ॥ कात्यायनोक्तसूत्र- क्रमानुसारेण संस्कृतिस्तेषाम् । कर्तव्या द्विजमुख्य- र्यथा न ते स्युः कदापि सन्त्याज्याः ।।३।। विद्वानों को चाहिये कि चे कात्यायन श्रीत सूत्र में लिखित व्रात्य स्तोम नामक यज्ञ के द्वारा उन व्रात्य ब्राह्मणों का प्रायश्चित्तोप सस्कार फरके उन ब्राह्मणों को फिर यज्ञोपवीत देकर अपने दल में मिला जिससे वे कदापि त्याज्य न हों ।। ८३॥ योयं नात्यस्तोमो ऋपिप्रणीतेषु गृह्यसूत्रेषु। वेविद्यते स यत्नाद्- वात्यवाते यथाक्रम योज्यः ॥४॥ यह जो नात्यस्तोम नामक यज्ञ प्राचीन आप गृह्य स्त्रों में मिलता है उस का वर्तमान समय में व्रात्य द्विजों के लिये उपयोग करना अत्यावश्यक प्रतीत रोता है क्यों कि इस समय प्रात्य द्विजों की संख्या अधिक है ॥ ८४ ॥ अयमेव वेदमूलो ब्रात्यस्तोमः पुरातने काले। गणशः कृतप्रयोगो दिनातिमंख्यामवर्धयदेगात् ॥८॥ वेद मूलक इसी प्रात्य स्तोम यश के दाग भाचीन समय में पार्मिक भाचार्यो ने स्वधर्म प्रष्ट दिन गणों को पवित्र कर दिनों की संख्या का हास ना होने दिपा मो इस समय हो रहा है ॥ ८५॥ । . । - ३४० T । -- -- H T जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्वजये पारस्करेण गृह्य- अनुमोदितोयं दिजन्मनां भूत्यै। 17 लाट्यायनेन सम्यक् प्रवर्धितोयं यथोत्तरं मान्यः ॥८६|| पारस्कर और लाट्यायन प्रणीत गृह्यादि स्त्रों में इन नात्य स्तोम का विधान बहुत सुन्दर रीति से प्राप्त हो रहा है जो वर्तमान समय में अत्यन्त उपादेय है ॥ ८६ ॥ ताएड्यपि तत्मयोगः पलभ्यते य. सनातन. सत्य. धर्माविरुद्धहेतो- रयं प्रयोज्य. सुखेन विद्वद्भिः ॥८७॥ इस बात्यस्तोम का विधान ताण्ड्य ब्राह्मण में भी विस्तृत रूप से मिलता है इस कारण इस सनातन व्रात्य स्ताम का उपयोग वर्तमान काल में धर्म से अविरुद्ध होने के कारण वेदज्ञ विद्वानों का अवश्य करना चाहिये ।। ८७ ॥ अज्ञानत. प्रमादा- त्कुलेषु येषां द्विजातिजातानाम् । नीभूत्कदापि यज्ञो- पवीतमेतेन ते पुनर्लाह्या ॥८॥ अशान से अथवा प्रमाद से निन द्विजों के कुलों में तापमान आगया है उन फूलों का पुनस्ल्यान फरने के लिये इससे अधिक उपयोगी अन्य कोई उपाय नहीं हैं इसके द्वारा उनका अपने वर्ग में लेना इस समय नितान्त आवश्यक है ।।८८॥ पतनं स्वभावसिद्ध तदुद्धृतिर्या सनातनी मापि। तस्मादियं विधिने- विविन्य यनेन भृतले स्थाप्या ॥६ T । T पोटशा सर्गः । अपने धर्म से मनुष्य का पतन स्वभाव सिद्ध है और उसका उदार करना भी सनातन ही है इस कारण इस सनातनी पद्धति का स्थापन विद्वानों को अवश्य करना चाहिये ।। ८९ ।। ये पाहुजाः प्रमादा- तथोरुजा ये क्रमेण सञ्जाताः। वात्यास्तदुद्धृतिस्त- न्मतानुसारेण सर्वतः स्थाप्या More वर्तमान समय में प्रमाद से जो सत्रिय और वैश्य प्रात्य हो गये हैं उनका इस प्रात्यस्तोम यज्ञ के द्वारा उद्धार यदि चे चाहें तो अवश्य करना चाहिये ॥९॥ १ (- जात्या बभूवुरादो। 7 F , 4 न केपि सृष्टरुपक्रमे पश्चात् । सत्कर्मणां विलोपा- द्वभूवुरेते द्विजन्मनां पुत्राः 118२॥ सृष्टि के भारम्भ में कोई प्रात्य उत्पन्न नहीं हुआ है, अपने कर्मोके परित्याग से वे पीछे प्रात्य हुपे हैं। उनमें ब्राह्मण मात्रिय वैश्य ही मायः मात्प, बनकर अधो- गति की ओर अग्रसर हुए हैं क्यों कि शूद्र व्रात्य होते नहीं है प्रात्य संज्ञा तो उनकी होती है जिनका सपय पर उपर्वातान हो ॥९१ तेपाते समुक्तो प्रात्यस्तोमो दिजन्मनां मुख्यः।.. ग्रन्थेषु योऽद्य सम्यम् विलोक्यतोतःस साग्मत ग्राख १६ सा उन प्रात्यों के लिये कात्यायन आदि प्राचीन आचायों ने अपने अपने अन्यों में मात्यस्तोम का उल्लेख किया है जो वर्तमान समय में भी मिलता है उसका इस समय प्रयोग अवश्य हाना चाहिये ॥ १२ ॥ एतन्मया समुक्तं दिजन्मनामेव भूतये यस्मात् । - + . - - t M - जगद्गुरुभोचन्द्रदिग्विजये मा सन्तु वर्णवाद्या- द्विजातिपुत्रा. कुलप्रणेतारः ॥६३|| भगवान् श्रीचन्द्रजी कहते हैं कि इस व्रात्यस्तोम का प्रसङ्ग हमने द्विजों के उद्धार के लिये ही यहा पर प्रस्तुत किया है जिससे द्विजों के कुल बफ द्विज कुमार समयान्सर में वर्ण वाद्य न समझे जावें ऐसा होने पर वे अन्त में असवर्ण बनकर हिन्दू जाति से अलग हो सकते हैं ।। ९३ ॥ येषां न वेदमध्ये - न धर्मशास्त्रेषु नामनिर्देशः । ते मन्मते यथावद- द्विजन्मजाताः समासतो व्रात्याः,६४||-- जिनका वेद और धर्मशास्त्रों में नाम निर्देश नहीं मिलता, है और ऐसा होने पर भी जो द्विज प्रतीत होते हैं वे सब प्राचीन काल से बात्य भाव को प्राप्त हुये दिनों के वंशधर हैं ॥ ९४ ॥ वर्णाः सवर्णजायां विवाह्य धर्मेण तासु यान्पुत्रान् । उत्पादयन्ति ते ते सवर्णजाता. सवर्णतां यान्ति ॥१५॥ चारों वर्ष अपनी अपनी सवर्ण स्त्री से विवाह करके उनमें जो सन्तान उत्पन्न करते हैं वे पुत्र अपनी अपनी जाति में सवर्ण कहलाते हैं ॥१५॥ तेषु द्विजन्मभावं तएव संयान्ति ये यथाकालम् । उपवीतधारणान्ते गुरुपदिष्टां पठन्ति गायत्रीम् ॥६६॥ उनमें यया सपय जिनको उपरीत होने पर गायत्री का उपदेश मिलता है वे दिन बन जाते हैं और जो इन दोनों से यश्चित रह जाते हैं वे केवल जाति से मामण परिप वैश्य कार ने ॥९६ ॥ - -- । - , aaye Mana थोडशः सर्ग ३४३ अस्मिन्दितीयजन्म- न्यनन्तवीर्या क्रमेण गायत्री। माता भवत्यशवं पिता गुरुयों ददाति नां धर्मात् ॥६७|| इस दूसरे जन्म में माता गायत्री और पिता आचार्य होता है जो उपवीत देकर समस्त कार्यों के करने का अधिकार दिलाता है ॥ ९७ ॥ वेदोपवेदवेत्ता ददाति यां जातिमुत्तमामस्मै । सत्याजराऽमरा सा समुच्यतेऽन्यैर्विविच्य सन्दत्ता ॥८॥ T वेदज्ञ ब्राह्मण इस द्वितीय जन्म में जिसको निस जाति में मानकर उपवीत देता है वह उसकी जाति उसके लिये सर्वदा के लिये नित्य हो जाती है ॥९८॥ तस्मादवश्यमेपा द्विजातिजाते. प्रयलतो ग्राह्या । गायत्री गुरुवर्या- 1. द्यया दिजत्वं प्रयान्ति सम्भूता. ॥६॥ इसलिये द्विज कुमारों को चाहिये कि वे ठीक समय पर वेद विद्वान् को मुला कर उससे गायत्री मन्त्र का उपदेश ग्रहण करें जिसके प्रहण करने पर वे पास्तव में द्विज बन जाते है ।। ९९॥ धन्येयं गायत्री चधा दिजत्वं प्रदयिते नधा। वेदेषु चाधिकारी विभिन्नयज्ञेषु देवतार्चासु ॥१०॥ पर गायत्री धन्य है जिसके ग्रहण करने पर सघ दिनच माल होने पर मनुष्य यज्ञ वैदाम्ययन और देवएनन ग अधिकारी हा जाता है ॥ १० ॥ T ܨ܀ . . . । r in 1 जंगहरुश्रीचन्द्रदिग्विजये किन्तैरनन्तमन्त्र- न ये द्विजत्वं प्रदातुमर्हन्ति । शतशो मुखेन गीताः सहस्रशो-ये गुरुभ्य आदत्ताः॥११॥ उन अनन्त मन्त्रों से ससार का क्या भला हो सकता है, जो सौ बार मुख से कहने पर और हजार वार गुरुओं से लेने पर भी-द्विजत्व आप्त कराने में समर्थ नहीं होते हैं १ ॥ १०१॥ Timi एकैव सर्वमान्या गायत्रीय परःशतानन्यान् । मन्त्रानिपात्य नीचेः ... समस्तमूर्धन्यधन्यतामेति ॥१२॥ ।। सर्वमान्य यह एफ,गायत्री हजारों अन्य मन्त्रों को नीचे गिरा कर समस्त मन्त्रों के शिर पर बैठने का महत्त्व रखती है ॥ १०२ ॥ अस्या जपप्रभावाद्- द्विजाः समस्तानि पापमूलानि । उच्छिद्य सर्वमान्य पदं प्रयान्ति क्रमेण सनद्धाः ॥१०॥ इसके जप के प्रभाव से द्विज समस्त पापों के मूलों को उच्छिन्न कर सर्व मान्य ग्रह्म पद को प्राप्त करने के लिये सन्नद्ध हो जाते हैं || १०३ ॥ एवं प्रशस्य वन्द्यां धन्यां पुरयां यशस्विनी सेव्याम् ।। गायत्रीमयमेवं श्रीचन्दः माह कर्मणां भेदम् ॥१०॥ इस प्रकार वेदमाता गायत्री का महत्व वर्णन करने के अनन्तर भगवान् श्री चन्द्र जी आ वर्णों का कर्म निर्णय करते हैं ॥ १०४ ॥ । . - T - m 1 . - पौडशः सर्गः । ज्ञानं स्वभावसिद्ध विलोक्यते येषु धर्मशास्त्रण : ते ब्राह्मणाः समुक्ता- श्चतुर्विधास्तेन कर्मणां भेदात् ॥१०॥ "जिनमें स्वभाव सिद्ध ज्ञान की मात्रा अत्यधिक होती है वे शमदमादि ' सम्पन्न ब्राह्मण चार मकार के होते हैं ॥१५॥ एके तपः प्रधानाः परेऽत्र यज्ञादिकार्यकर्तारः।' र अन्ये श्रुतिप्रवीणाः पुराणविज्ञास्ततोऽपरे लोके ॥१०॥ एक तपः प्रधान, दूसरे यज्ञ करने और कराने वाले, तीसरे वेदनान और चौथे पुराण विधा जानने वाले पौराणिक ? ये ही चार कर्मे ब्राह्मणों में प्राय: मिलते हैं ॥१०६ ॥ एवं स्वभावसिद्धं वलं विशिष्टं विलोक्यते येषु । ते क्षत्रियाः प्रशस्ता- श्चतुर्विधाएव धर्मशास्त्रण ||१०७॥ इसी प्रकार जिनमें स्वभाव शील सिद्ध पल की मात्रा अधिक होती है वे शौर्यादि गुण सम्पन्न क्षत्रिय चार प्रकार के होते हैं ।। १०७॥ एके बलप्रधानाः परे धरित्रीपतित्वमापनाः। अन्ये महीपमान्याः समस्तकर्मस्ववस्थितास्तुर्याः ॥१०॥ एक पल प्रधान योद्धा, दूसरे पृथिवी पर अधिकार रखने वाले भूपति तीसरे राजमान्य पादशाह और चौथे सामान्य सब काम करने वाले १ ये ही चार भेदे। प्रायः क्षत्रियों में मिलते है ।। १०८॥ ----- T ॥

. ३४६ जगदुरमीचन्द्रदिग्विजये एवं स्वभावसिद्धं धनं विशिष्टं विलोक्यते येपु । ॥ वैश्यास्तएव लोके ॥ चतुर्विधत्वं क्रमागतं तेषु ॥१०॥ T इसी प्रकार जिनमें स्वभाव सिद्ध धन और धन कमाने की व्यापार- शक्ति अधिक होती है वे वैश्य चार प्रकार के होते है.।।,१०९ ॥ एके धनप्रधाना. परे रमादिप्रवर्तने सक्ताः | अन्येन्नमात्रपएयाः फलादिपण्येषु सङ्गतास्तुर्याः ॥११॥ 7. एकाधन प्रधान व्यापारी, दूसरे घृत-तेल-दुग्ध आदि के वेचने वाले, तीसरे अन्न, मात्र का काम करने वाले और चौथे फल मेवा वस्त्र आदि से लाभ उठाने वाले १ ये ही चार भेद प्रायः वैश्यों में मिलते हैं ॥ ११०॥ एवं निसर्गमिद्धा समस्तसेवैव येपु विन्यस्ता ।। । . शूदास्तएव लोके । चतुर्विधत्वं व्यवस्थितं तेषु ॥१११॥ । इसी प्रकार जिनमें स्वभाव सिद्ध सेवा भाव और शिल्पकला व्यवस्थित रहती है वे शूद्र चारा प्रकार के होते हैं ।।,१११ ॥ एकेत्र शिल्पदक्षाः परे दिजानामुपासने रक्ताः ।। अन्ये कृषिप्रधाना निकृष्टमार्गानुगामिनस्तुर्याः ॥११२॥- गएका शिल्प प्रधान कारीगर, दूसरे द्विजों की सेवा करने , पाले जाई धीवर आदि, तीसरे खेती करने वाले और चौथे निकृष्ट काम करने वाले ? ये ही चार भेद मायः शूद्रों में मिलते हैं ॥ ११० ।। 4 १ 7 - -- षोडशः सर्गः एभ्यश्चतुर्थ्य अन्ये निदर्शिता ये निसर्गतो मन्त्रः r सङ्कीर्णयोनयस्ते विवर्णयोनिप्रसङ्गजाः सर्वे ॥११॥ इन चार वर्षों के अतिरिक्त जो जातियां यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में नामतः निर्दिष्ट की गई हैं वे सकीर्ण मिश्रित जातियां हैं ॥ ११३।। ये प्रातिलोम्यभावं स्वभावसिद्धं क्रमेण सम्प्राप्ताः । ये चानुलोम्यमाप्ताः प्रभुन तेषां विपर्यये मर्त्यः ॥११॥ उनमें कोई प्रतिलोम और कोई अनुलोम भाव से संसार में व्यवस्थित हैं उनमें विपर्यय करना मनुष्य की शक्ति से बाहर है॥ ११४ मा. जन्मान्तरे कृपातः प्रभो कदाचित्कथञ्चिदेतेषु । वर्णानुपैतिकश्चि- न जन्मनैकेन सदतिस्तपाम् ॥११५॥ जन्मातर में ईश्वर की कृपा से इनमें कोई क्रमशः वर्गों में जन्म ले. सकता है परन्तु एक जन्म में इनका उठना असम्भव है ।। ११५ ।। मन्वत्रिगोतमानां मतेन तेषां विपर्ययः कर्तुम् । " 'शक्योत्र सप्तमे वा- ऽथ पञ्चमे वापि जन्मनि प्रायः॥११६॥ मनु अत्रि गौतम आदि मुनियों के मन में पांचवें अथवा सातवें जन्म विपर्यय हो सकता है ॥ ११६ ।। सद्यः समुद्धति ये ।' वदन्ति तत्रापि वल्लभाचार्याः । F f - में इनका . - ३४८ त जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्वजये सद्यः यदस्य जन्मा- न्तरार्थमेवानुमोदयन्त्यत्र ॥११॥ जो महानुभाव [ श्वादापि सद्यः सवनाय कल्पते] इत्यादि पचों में सपः पद का अर्थ न समझ कर अर्थ का अनर्थ करते हैं उनको, श्री वल्लभाचार्य के मतानुसार जन्मान्वर परक हो, भर्थ लगाना चाहिये । वे श्री सुबोधिनी में सपः पद का अर्थ [ उत्तरजन्मनि ] ऐसा करते हैं, अनेक जन्म प्राप्य अर्थ.का एक नन्म के बाद ही प्राप्त करना सद्यः पद के अर्थ में बहुत कुछ भ ग्रह रखता है जो भग- वत्कृपा पर निर्भर है ॥११७॥ एते विवर्णजाताः सवर्णजानां कुलेषु दैवेन ! यदि सङ्गमं प्रयाता- स्तदा निपातः सवर्णजानां स्यात् ॥११८।।" विवर्ण प्रस्त ये सङ्कीर्ण वर्ग यदि कदाचित् सवर्णों के साथ सम्पर्क करेंगे तो सवर्णों का अधःपतन अन्त में अवश्य होगा । १२८॥.. . - एभ्यः सदार्यजातेः । कुलानिरिक्ष्याणि यनतो विज्ञः । 4. "नोवेदिमे प्रमत्ताः प्रपातयन्ति प्रसङ्गतः स्त्रीणाम् ॥११॥ आर्यों को चाहिये कि वे इन अनार्य देस्युओं से अपने कुलों की अवश्य रसा फरें, नहीं तो ये बलपूर्वक भार्य ललनाओं से ससर्ग कर उनके बलों को नष्ट कर देंगे ॥ ११९ ॥ कामान्धतामुपेत्त्य स्वभावतः कैपि कामिनो माः संसर्गमेभिरेत्य स्वयं विनाशं प्रयान्ति कालेन ॥१.२०॥ + m । - 1 । पौडरा सर्ग। कोई २ पामी पुस्प अनार्य स्त्रियों से सम्पर्क रख कर स्वयं अपने कुलों में 11सकरता फैलाने का उद्योग करते हैं निससे अन्त में जाकर उनके कुलों का सर्वा- पहारी लोप हो जाता है ॥ १२०॥ एतन्मतं विवक्षु- मनु. सवर्णासु वर्णजातानाम्।। , TITA वैवाहिकं विधान। निबोधयामास धर्मशास्त्रेण ॥१२१॥ इसी बात को लक्ष्य में रख कर मनु ने सवर्णों का विवाह सवर्ण कन्याओं फे साय करने का विधान किया है जिससे सवर्णों में विवर्ण जाति के उद्भव फा फदापि भय न हो ॥ १२१॥ वर्णानां व्यभिचरणा- द्विधवागमनास्त्रकर्मविभ्रंशात् । सङ्कीर्णयौनिजानों समुद्भवोस्मिन्मजायते लोके ॥१२२|| चारों वर्गों में आपस के व्यभिचार से विधवाओं के गमन से तया अपने अपने कर्मों के त्याग से मनुष्यों में सकरता आ जाती है ॥ ११२ ।। नरकाय सङ्करोयं निबोधितस्तेन वासुदेवेन। गीतासु यत्प्रभावा- त्पतन्ति सद्यो दिविस्थिताः पितरः ॥१२३|| in उत्तम कुलों में सङ्करता का होना गीताकार के मंत में पितरों नरक जाने में प्रधान रूप से कारण बनता है ॥१२३।। शङ्कामिमां यथाव- न्मनस्यवस्थाप्य सङ्गरात्सद्यः) पाएडोः सुती महात्मा 1. निवृत्तिमेवान्वमस्त यत्नेन ॥१२४ - । १ 8 । rar - - - F १ ३५० जगदुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये “इसीफे शङ्का उत्पन्न होने पर अर्जुन युद्ध से निवृत्त होकर भगवान् के पास आकर युद्ध से अपनी अनिच्छा प्रकट करने के लिये उद्यत हुआ या ॥१२॥ अद्यत्वे भुविकेचि- त्पचएडपाखएडमएडने सक्ताः। विधवानां करपीडन- मादरणीयं वदन्ति तर्केण ।।१२५|| भाजकल कोई २ महानुभाव शास्त्रों का मर्म न समझ पर केवल अपने तर्क से विधवाओं का विवाह प्रयोजनीय बतलाते हैं ॥ १२५ ॥ T, परमत्र वेदमन्त्र- प्रमाणराहित्यमीदृशं तेपाम् । कर्म स्वभावनिन्छ निबोधयत्येव नात्र सन्देहः ॥१२६॥ परन्तु इस विषय में किसी वेद मन्त्र का आदेश न मिलने से उनका यह कयन स्वय निन्दनीयता में जाकर परिणत हो जाता है ।। १२६ ।। धर्मः सएव वक्तं ॥ शक्यो वेदेन धर्मशास्त्रेण । गृह्येश्च धर्मसूत्रः समर्थनं यस्य लभ्यते लोके ॥१२७॥ धर्म उसी को कहा जा सकता है जिसका समर्थन वेद वस्त्र धर्मशान आदि से हो सकता हो । १२७॥ --मीमांसया न यस्य प्रधानरूपेण साध्यतेस्तित्वम् केनात्र तस्य सिद्धिः प्रकल्पनीया प्रमाणवादेन ॥१२८॥ मीमांसा शास्त्र में प्रधान रूप से जिस सिद्धान्त का अस्तित्व नहीं नहीं मिलता है उसका किस प्रमाण से धार्मिकत्व सिद्ध किया जा सकता है ? ॥१२८ ।। 17115 - . - ३ . पोडशः मर्गः क- शब्दानुपातमात्र- प्रमाणमन्विध्य ये वदन्त्यर्थम् । ते नैव पण्डितेषु प्रशस्तिपात्रीभवन्ति संसत्सु ॥१२६ पूर्वापर प्रसङ्ग विन्द किसी एक शब्द का अवलम्ब लेकर जो मनुष्य अपने मन का प्रतिपादन करते हैं ये बेटों के समक्ष मान - माम नहीं कर माते ।। १२९ ॥ ऐतिह्यगीतगाथा- प्रसङ्गमुत्थाप्य मूढसंसत्सु । येऽर्थ प्रसाधयन्ति । प्रकाममज्ञास्त ईदृशे धर्म ॥१३०॥ फेवल ऐतिय सिद्ध गाथाओं के बल पर जो मनुप्प अपने मत का मूसा में बैठकर प्रतिपादन करते हैं ये धर्म का तत्व समझने में कदापि सपर्य नहीं ॥१३०॥ रामो वनं जगाम स्वतातपादानुमोदनात्सीताम् । दर्पाजहार तस्मि- न्दशाननोपि स्वभावतश्चएडः ॥१३१ पिता के कपन से श्रीराम नी पन को पस्थित हुए और वहां पर दशानन ने भी जानकी जी का अपहरण किया ।। १३१ ।।- ऐतिह्यसिद्धमेतद्- दयं यथावत्पलभ्यते लोके। किन्तेन मलोकाः-- परस्य दारानयन्तु यनेन ॥१३२॥ पा दोनों पाते इनिराम मिद होने के कारण लोक में प्रचलित है क्या इतने से सर मनुप्प परग्री पा मारण करें। ॥ १३२।।। 7 - I - ३५० ॥ - जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये एवंविधप्रसङ्ग- - 1 TTT:) प्रवृत्तवादेषु मानवैः कार्यम् । विज्ञैस्तदेव यस्मि- नधर्मबाधा समापतेद्यः ॥१३३॥ ! ऐसे प्रसङ्ग उपस्थित होने पर विद्वानों को चाहिये कि वे उस पा का सम- थन करें जिससे सनातन धैदिक मर्यादा का नाश उपस्थित न हो ॥ १३३ ॥ वेदाविरुद्धतर्क- प्रतिष्ठितं यत्तदेव संग्राह्यम् । यच्छुष्कतर्कवेद्यं न तत्कदापि प्रतिष्ठितं धमें ॥१३॥ धर्म प्रतिपादन में पडी तर्फ 'उपादेय होता है जो वेदादि सत्य शास्रों के विरुद्ध न हो, जो वेद विरुद्ध शुष्क तर्क होता है वह धर्म प्रतिपादन में मान्य नहीं हाता है ॥ १३४ ॥ धर्मः सनातनोयं न तर्कवेद्यः कदापि केनापि । rji सिद्धस्य साधने किं प्रमाणवाद. करिष्यति प्राप्तः ॥१३५॥ अनादिकाल प्रचलित यह सनातन धर्म तर्फ से किसी को ज्ञात नही हो सकता है और सिद्ध पदार्थ के साधन में प्रमाणवाद भी उपस्थित होकर क्या कर सकता है ? ॥ १३५॥ सूक्ष्मा गतिः समुक्ता सनातनस्यास्य धर्ममार्गस्य । नात्र प्रमादचर्चा कदापि केनापि विस्मयात्कार्या ॥१३॥ धर्म की गति बड़ी मूम है इसमें किसी को प्रमाद से काम नहीं लेना चाहिये । प्रमाद से काम लेने पर इसमें अनेक आपत्तियां उपस्थित हो जाती हैं जो अन्त में अपने ही नाश का कारण वनती हैं ॥१३६||| ILI N . . . - F ।

३५३ .. योडशः सर्गः धर्मः समस्तवस्तु- घ्ववस्थितोऽयं स्वरूपरक्षायाम् । शक्तः पदार्थरक्षा सदा विधत्ते यथाक्रम प्राप्तः ॥१३७॥ धर्म पदार्य मात्र में रहकर सबके स्वरूपों की रक्षा करता है इसी कारण इसको वैदिक मुनिगण स्वरूप रक्षक मानते हैं। ॥ १३७ ।। अतएव धर्मरक्षा- समर्थकरेष ग्रनतः प्रायः सम्बधितः स्वरक्त- प्रदानतोपि प्रकाममुन्निद्रैः ॥१३॥ स्वरूप रक्षक होने के कारण ही इसकी रक्षा करने में हमारे पूर्वजों ने अपना रक्त तक देकर इसको आन तक पचाया है ॥ १३८ ॥ निधनं वरं स्वधर्म परस्य धर्मो भयावहः प्रोक्तः। गीतासु योगिवर्यः समस्तविज्ञानरचकैः कृष्णः॥१३॥ अपने धर्म में मरना तक अच्छा है परन्तु दूसरे के धर्म में जाकर सुख भोगमा भी महापाप है इस बात को भगवद्गीता में श्री कृष्णचन्द्र जी स्वय अपने श्री मुम्ब से कह चुके हैं ।।१३९ ॥ आत्यन्तिकी ममृद्धिं परत्र मोक्षं ददाति यो धर्मः । कस्तस्य रक्षणेलं प्रयत्नवान्न प्रकाममन स्यात् ।।१४०॥ नो आत्यन्तिक उमति के साय-साय अन्त में मो तक देने में समर्थ है उस धर्म के रक्षण में फोन मनुष्य प्रयत्न शोल न होगा ? ॥१४० - जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये मीमांसकैः समुक्ता प्रचोदनैवात्र धर्मरूपेण । या वेदमूलिकालं निवारयत्येव पापतो मान् ॥१४१॥ मीमांसकों ने इस जगत् में प्रेरणात्मक ईश्वरीय सन्देश को धर्म पद से अनु- मत किया है जो प्रेरणा वेद मूलक होने के कारण मनुष्यों को पाप करने से हटाती है ।। १४१ ॥ नियमेन कार्यमेत- न्न कार्यमित्येव चोदना वेदात् । सम्प्राप्यते ततोयं समस्तवेदप्रचोदितो धर्मः ॥१४२।। यह कार्य नियम से करना चाहिये और यह न करना चाहिये इस प्रकार की प्रेरणा वेद से ही प्राप्त हो सकती है इस कारण वेद ही समस्त प्रेरणाओं का मूल माना गया है ।। १४२॥ धोयमेव लोके समस्तविश्वस्य धारको यस्मात् । तस्मादवोचदेवं मुनीन्द्रवर्यः पुरातनो व्यासः ॥१४॥ समस्त विश्व की धारण क्षमता इसमें देखकर मुनिवर व्यास ने जो इसका लक्षण किया है अब उस पर ध्यान दीनिये ॥९४३ ॥ यं धारयन्ति सर्वे जनाः प्रयत्नेन धारयत्यन्यान् । यः सर्वदा विनिद्रः स धर्म इत्येव गीयते विज्ञः ॥१४॥ भाप कहते हैं कि निसको सब धारण करते हैं और जो मरके द्वारा धारण किया हुआ मी जो अपने पल से सबका धारण स्वयं करता हो उसीकी धर्म कहा जा सकता है। ।। १४४ ॥ . ३ षोडशः सर्गः यस्यात्र यत्स्वरूपं विलोक्यते तत्तथैव येनालम् । संस्थाप्यते स धर्मः स्वरूपरक्षात्मकः समादिष्टः ।।१४५।। जिस पदार्थ का जो स्वरूप देखने में आता है उसको उसी स्वरूप में अप- स्थित रखना जिसका कर्तव्य हो वही स्वरूप रक्षक धर्म माना जाता है उसके विपरीत स्वरूप से गिराने वाला पातक कहा जाता है [ पातयतीति पातकम्, धार- यतीति धर्मः ] ॥१४५॥ देहात्मवादमात्र स्वरूपमात्मन्यवस्थितं येषाम् । शौद्धोदनादयस्ते बभूचुरत्र प्रतिष्ठिताः पूर्वम् ।।१४।। अब स्वरूप शब्द के अर्थ पर विवेचन किया जाता है। जिनके मन में केवल शरीर मात्र हो अपना स्वरूप है वे बौद्ध अनीश्वर वादो नास्तिक कई जाते हैं॥१४६ ॥ लोकोत्तरान कीतिः स्वरूपशब्देन यर्मता लोके। ते विक्रमादिभूपाः समस्तलोकेषु विस्तृतात्मानः ॥१४॥ इसके अतिरिक्त जिनके मत में अचल कीर्ति स्वरूप पद वाच्य है वे विक्रम, नल, भोज आदि लोकमान्य पुरुष संसार में आज भी फहे जाते हैं ।। १४७ ॥ विश्वं ममस्तमेत- स्वरूपमेकान्तमुन्नतं येषाम् । जीमूतवाहनाद्या- स्तएव लोकेत्र मन्मते मान्याः ॥१४८|| जगद्गुरुभौचन्द्रदिग्विजय इन दोनों के अतिरिक्त जिनके मत में समस्त विश्व अपना स्वरूप है के जीमूतवाहन दधीचि आदि महानुभाव सर्वमान्य होते हैं ।। १४८ ॥ एवं स्वरूपशब्द- प्रदिष्टनानार्थवोधकं भावम् । सम्यग्विविच्य धर्म- व्यवस्थितौ किश्चिदुच्यते भूयः ॥१४॥ इस प्रकार स्वरूप के सम्बन्ध में इतना विवेचन करके अब धर्म के विषय में कुछ कहते हैं ।। १४९ ॥ दशभिः प्रदिष्टमङ्गैः स्वरूपमेकान्तमञ्जुलं यस्य । साधारणः स धर्मों मनुष्यमात्रव्यवस्थितो लोके ॥१५॥ धृति क्षमा आदि मनु प्रोक्त दश अङ्ग जिस धर्म के लक्षण हैं वह सर्व साधारण धर्म सामान्य धर्म है ॥१५० ॥ वेदेन यः समुक्तो अनुमोदितोयोऽत्र धर्मशास्त्रेण । आचारतोपि सिद्धः सएव धर्मः सनातनो मान्यः ॥१५१॥ अनादि काल सिद वेद, प्रतिपादित धर्मशास्त्रानुमोदित तथा सदाचार प्रतिष्ठित जो धर्म है वही आत्मोनति कारक विशेष धर्म है ॥ १५१॥ विज्ञानसिद्धमेत- प्रशस्तधर्मप्रवर्धकं लिङ्गम् । यस्यास्ति लोकमध्ये सएव धर्म समुच्यते सद्भिः ॥१५२|| जिसका विज्ञान सिद् आत्मोन्नति फारक विश्वव्यापी सर्वमान्य लक्षण ऊपर कहा गया है उसी को सजन गण धर्म कहते हैं ।। १५२ ]] - - Shan पोइशः सर्गः नास्यादिरस्ति नान्तो न मध्यमस्य प्रकांमतो लभ्यम् । केनापि धर्मरक्षा- समर्थकेन स्वभावसंसिद्धम् ॥१५३।।. इस धर्म का आज तक किसी महानुभाव ने पारम्भ दिन नहीं देखा फिर अन्त कौन देख सकता है, इसीलिये इमको सर्वदा एकसा रहने के कारण सना- तन करते हैं ॥ १५३ ॥ अस्यैव रक्षणार्थे स रामभद्रो ययावरण्यानीम् । कृष्णोपि धर्मरक्षा निजावतारप्रयोजनेष्वाह ॥१५॥ इसी धर्म की रक्षा के लिये श्री रामचन्द्र जी राज्य छोड़ कर धन को गपे और इसी को करने के लिये श्री कृष्णचन्द्र जी ने अवतार लिया ॥ १५४ ॥ एतन्निमित्तमेव प्रकामममौ जुहाव तं देहम् । सा पद्मिनी प्रशस्या समस्तनारीपु याऽभवद्धन्या ।।१५५।। इसी की रक्षा करने के लिये महारानी पद्मिनी ने अपना अनुपम सुन्दर शरीर धधकती हुई चिता में उपहार रूप रख दिया ॥ १५५ ॥ भूपः प्रतापसिंहो महान्ति कष्टानि निर्जनेरएये। सेहेस्य रक्षणार्थे मयैव धर्मे नियोजितः पूर्वम् ।।१५६।। इसी की रक्षा के निमित्त वीरवर महाराणा प्रतापसिंह ने हमारे आदेशानु- मार निर्जन बन में घोरातियोर कष्ट सहन किये ॥ १५६ ॥ " ३५८ जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये एवं विधाः महान्तः परः सहस्राः स्वरक्तसेकेन । धर्म सनातनं तं प्रबर्धयामासुरार्यसम्भूताः॥१५॥ इसी प्रकार अनेक महा पुरुषों ने प्राचीन समय में इसकी रक्षा में अपना रक्त देकर इसकी रक्षा की ॥ १५७ ॥ ये धर्ममेनमज्ञा वदन्ति विस्पष्टमुन्नतेः शत्रुम् । न ज्ञातमत्र मन्ये . महत्वमेतस्य तैरतत्त्वज्ञैः॥१५॥ जो मनुष्य अज्ञान वश इस धर्म को अपनी उमति का वाधक समझ कर इसकी अवहेलना करते हैं उन्होंने इसके महत्व को अभी तक समझा नहीं है ॥१५८॥ आजीवनं मनुष्यं जहाति यो नैव सार्थरूपेण । लोकान्तरेपि यान्तं प्रयाति कस्तं नरोत्तमो जह्यात् ॥१५॥ जो धर्म जीवन भर मनुष्य के साथ रह कर मरने पर भी उसका साय नहीं छोड़ता है उस सर्वदा रहने वाले अपने साथी को कौन भद्र पुरुष छोड़ने के लिये उद्यत होगा? ॥ १५९ ।। सर्वस्वं यदि नाशं प्रयाति यातु प्रयान्तु ते प्राणाः। किन्त्वेकः सहपान्यो न जातु यातु प्रतिष्ठितो धर्मः ॥१६॥ इसकी रक्षा में यदि हमारा सर्वस्व नष्ट होता हो तो होने दो यदि माण भी जाते हो तो जाने दो । परन्तु सर्वदा साथ रहने वाला यह इमारा सनातनधर्म हमको बोरकर न जाने पाये, ऐसा यन परो॥१६॥ है

३५९
.
षोडशः सर्गः
धर्मावलम्बनेयं
मही नभस्तत्प्रतिष्ठितं तोयम् ।
दहनोऽथ मातरिश्वा
तमेकमाश्रित्य तिष्ठति श्रेष्ठम् ।।१६१॥
जरा विचार कर देखो यह पृथिवी धर्म के अलम्ब पर ही स्थित है और
आकाश, वायु, अग्नि, जल आदि तत्त्व इसीके अवलम्ब से ठहरे हुये हैं ॥१६॥
धर्मेण विश्वमेत-
तनोति धाता दधाति तद्विष्णुः ।
धर्मेण शम्भुरन्ते
विनाशयत्याशु कारणे लीनम् ।।१६२॥
इसी के बल पर ब्रह्मा सर्जन करता है विष्णु पालन करता है और महेश
इसी के नियमानुसार अन्त में सहार करता है ॥ १६२ ॥
अन्यैर्वहुपलापै-
रलं यईशश्चराचरस्यास्य ।
अवलम्बमेत्त्य सोस्य
प्रतिष्ठते का पुनः कथान्येपाम् ।।१६३॥
अधिक कहा तक कहें समस्त विश्व का एकमात्र अधयक्ष जो ईश्वर है वह
भी इसी के बल पर ठहरा हुभा है औरों की तो फिर कथा हो क्या है ॥१३॥
नानामतानि लोके
जनैर्निजेच्छावशेन यान्यत्र ।
सञ्चालितानि धर्म
कदापि नार्हन्ति यत्नतो गन्तुम् ॥१६॥
आज कल ससार में मनुष्यों ने जितने मत चलाये हैं वे इस सनातन धर्म
के मुकारिले पर इसके पासङ्ग पर भी नहीं चढ़ सरते हैं ॥ १६४ ॥

- ३६० जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्धजये भानावथान्धकारे यदन्तरं तन्मतेषु सर्वेषु । वेविद्यते किमन्य- कलापि धर्मस्य तेष नैकास्ति ॥१६५|| सूर्य और अन्धकार में अनादि काल सिद जितना अन्तर है उतना ही अन्तर धर्म और मतों के मध्य में है और तो क्या धर्म की एक कला भी उनके अन्दर नहीं झलकती है।॥ १६५॥ अस्तगतेच भानौ तमिस्रमभ्येत्य दीपते यदत् । खद्योतपंक्तिरेवं मतानि धर्मेऽवसानमायाते ॥१६६|| सूर्य के अस्त होने पर अन्धकार में जिस प्रकार खद्योत चमकते हैं उसी प्रकार धर्म के तिरोहित होने पर मनुष्य कल्पित मतमतान्तर चमकते हैं ||१६६॥ अद्यापि येषु नाम प्रलभ्यतेऽत्र प्रवर्तकानान्ते । वादा मनुष्यपोष्याः कथं प्रयास्यन्ति भूतले साम्यम् ॥१६॥ - जिन मतों के साथ आज भी प्रवर्तकों का नाम लगे हुये दीखते हैं वे मनुष्य रक्षित मत-बाद सनातनधर्म की तुलना किस प्रकार कर सकते हैं ।।.१६७ ॥ सर्वोपभोगयोग्यः समस्तविश्वोपकारकः कोऽन्यः । धर्मादृते जगत्यां मतप्रवादो वदन्त्वदो विज्ञाः ॥१६॥ 'विश्व मात्र का कल्याण करने वाला सबके उपकार में समर्थ इस धर्म के अतिरिक्त और कान मत है ? विद्वान् विचार फर इसका उत्तर दें ॥१६८ ॥ - - घोडश.सग 7 . HA अस्तित्वमेव यस्मि- विपर्ययं याति तत्र किं तत्वम् । विद्यते यदर्थ मुघा विवादः प्रवर्त्यते मूढः ।।१६६॥ जिन मतों में जाकर अपना स्वरूप ही नष्ट होता है उनमें क्या तत्व है ? जिस के लिये मूढ़ जन व्यर्य का विवाद उठाकर लड़ते हैं ॥ १६९ ॥ सत्वादिसद्गुणानां प्रयोजकत्वेन लभ्यते यत्र । भेदः सएव धर्मः समस्तरक्षां विधातुमुत्कृष्टः ॥१७०॥ सत्व आदि गुणों के सहयोग से जिसमे भेद प्रतीत हाता है वही सनातनधर्म सब की रक्षा करने के कारण सर्वोत्तम कहा जा सकता है ॥ १७० ।। वैद्यो यथा निदानं विधाय रोगप्रणाशने शक्तम् । नानौपधप्रयोगं करोति तद्वत्सनातनो धर्मः ॥१७१॥ सद्वैद्य जिस प्रकार निदान के अनन्तर रोग नाशक अनेक औषधों का प्रयोग करता है उसी प्रकार यह धर्म भी गुणानुरूप प्रकृति को देखकर मनुष्यों के लिये अनेक विध धर्माङ्गों का निरूपण करता है ॥ १७१ ॥ वैद्यस्य नास्ति मैत्री न तस्य बैरं कदापि रुग्णेषु । अधिकारिभेद एव प्रयोजकस्तत्र तादृशे भेदे ।।१७२॥ वेद्य की किसी रोगी के साथ न शत्रुता होती है न मित्रता होती है केवल अधिकारी भेद से बलावल को देख कर वह अनुपान और पथ्य में भेद करता है ॥ १७२ ॥ . 1 " ४६ जगारूमीचन्द्रदिग्विजये यो देशकालदोषा- नवेत्ति रोग निदानतो वैद्यः । -- - यमदूतएव मन्ये समागतः सोत्र रोगिणां शत्रुः ॥१७॥ जो वैद्य देश काल दोप और रोग को न देख कर अपने मन से विना सोचे समझे इलाज करता है वह रोगियों के लिये प्रत्यक्ष यमदूत है ॥ १७३ ।। दृष्टान्तमेनमात्म- न्यलं विचार्य प्रयत्नतो विज्ञाः। पश्यन्तु धर्ममार्ग- व्यवस्थिति या पुरातनेईष्टा ॥१७॥ इसी दृष्टान्त को अपने हृदय में विचार कर विद्वान् धर्म का निर्णय करें जैसा कि प्राचीन समय में हमारे पूर्वनों ने किया है ॥ १७४ ।। सर्वे समानभावं ने जातु गच्छन्ति भूतले माः । तस्मादिभिन्नतेयं प्रतीयतेस्मिन्सनातने धर्मे ॥१७५।। संसार में सब मनुष्यों को प्रकृति एफसी नही होती है इसी कारण इस धर्म में भी विभिन्नता प्रतीत होती है ॥ १७५ ।। गुणपारवश्यमेत- विभिन्नतायाः प्रयोजक धर्मे । नो भेदबुद्धिरेपां समुन्नतौ याऽवरोप्यते मूढैः 11१७६।। सत्व आदि गुणों की परपशता से इस धर्म में विभिन्नता है भेद पुदि से या किसी की उन्नति रोकने के लिये नहीं, जैसा कि आज कन कुछ अदूरदर्शी मनुष्य फरने लगे हैं ॥१७६ ॥ e । त Ja .. षोडशः सर्गः अयमेव भेदवादो गुणानुगो देवपूजने भेदम् । " सन्दर्शयत्यनन्तः प्रतिष्ठितोयोऽद्य लभ्यते लोके ॥१७७|| गुणपरवश इसी भेद बाद को लेकर देवपूजनादि कार्यों भी वारतम्य प्रतीत होने लगा है जो संसार में सर्वत्र प्रचलित है ॥ १७७ ।। यदर्शनेन दैवी कला विनाशं प्रयाति ते शूद्राः । नो देवपूजनार्हाः कदापि धर्मेऽत्र तत्तदादेशात् ॥१७॥ निनके दर्शन मात्र से दैवी कला नष्ट होती है वे शूद्रादि अन्त्यज वर्ग शास्त्रों के आदेशानुसार देव मन्दिर में मविष्ट नहीं हो सकते हैं ॥ १७८ ॥ तेपांकृते समुक्तं प्रधानरूपेण धार्मिकग्रन्थे । शिखरध्वजादिलिङ्ग- प्रदर्शनं यत्समानमर्चायाः ॥१७॥ उन्न अन्त्यजों के लिये शास्त्रों में मन्दिर का शिखर और गोपुर। देखने का विधान है उनको इसी से भगवदर्शन जन्य फल माप्त हो जाता है. ॥ १७९ ।। यस्मिन्निबन्धभागे शिवादिदेवार्चनाविधिः प्रोक्तः-- तत्रैव तयवस्था प्रदर्शिता या कदापि नोल्लङ्घया ॥१८॥ जिस ग्रन्थ में देव पूजन का विधान लिखा है उसी में उसकी व्यवस्था भी लिखी है जिसका पालन करना प्रत्येक आस्तिक का काम है ॥ १० ॥ नवीनतकर्यदीश्वरस्यार्चा) - .. " उल्लङ्घय तव्यवस्था ३६४ T - 7 जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये क्रियते फलं तदाकि तथाविधार्चासमर्थनाल्लभ्यम् ॥१८॥ यदि तर्क से उसका उलङ्घन करके ईश्वर की पूजा की जायगी तो उसका अन्त में फल क्या होगा ? देवतात्व के अभाव में देवपूजन निष्फल है ॥१८॥ । तस्माद्विविच्य शास्त्रं यथाविधानं तदाज्ञया कार्यम् । सर्व भवे भवेद्य- समादरेण प्रयोजनं सिद्धम् ।।१८२॥ इसीलिये शास्त्र के आदेशानुसार सब को काम करना चाहिये जिससे अना- यास अपना प्रयोजन सिद्ध हो ।। १८२॥ अतएव वासुदेव- स्तथाविधं प्राह तासु गीतासु । शास्त्रानुवर्तनं य- फलानुवन्धाय भूतले भूयात् ॥१८॥ इसीलिये भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी गीता में शास्त्र मानने पर जोर देकर तदनुकूल कार्य करने का सबको आदेश दिया है जा सर्व मान्य है ॥१८३॥ शास्त्रोक्तधर्मरक्षा- मनुष्ययोनेरनुत्तमं कृत्यम् । नैतदिघीयते चे- जनुस्तदेदं गवादिभिस्तुल्यम् ॥१८॥ ससार में मनुष्य का कर्तव्य शास्त्रीप व्यवस्था का पालन करना है यदि यह न किया गया तो यह जन्म भी पशुभों के समान हो समझना पड़ेगा ॥ १८४॥ अस्मिन्मनुप्यदेहे समस्तमेवास्ति यत्परेस्तुल्यम् ।। - - .- ३६५ - . + . - , पोडशः सर्गः ।। स्वीयन्तु धर्ममार्गा- नुवर्त्तनं यनलभ्यतेऽन्येषु ॥१८॥ इस मनुष्य शरीर में सब कुछ औरों के सनान है नाक सोते की नाक से, आँखें खञ्जन की आंख से, दांत अनारदानों, से, कमर शेर की कमर से, मुख चन्द्रमा से, बाहु युगल शुण्ड से, ऊरु युगल कदली स्तम्भ से, केश मयूर पिच्छ से उपमित किये जाते हैं। सबसे अधिक इसमें यदि कुछ है तो वह धर्म का अनुगमन है जो अन्यत्र नहीं मिलता है । १८५॥ एतत्समस्तमात्म- न्यल विचार्य प्रयत्नतो धर्मे । सर्वैर्मनः प्रदेयं मदीर्याशष्यैरदोममाभीष्टम् ॥१८६॥ इन सब बातों को विचार कर हमारे अनुगामियों को धर्म में मन लगाना चाहिये यही हमारी आन्तरिक इच्छा है ॥१८५ ॥ . धर्मस्य मूलभूता " - T वर्णानामेव संस्थितिः सेयम् । मोदादिह प्रदिष्टा भवद्विधानां मयाप्रमोदाय ॥१८॥ सनातन धर्म की मूल भित्ति वर्ण व्यवस्था है जिसका वर्णन माप जैसे पुरुषों के लिये हमने किया है ॥ १८७॥ यावद्भुवि प्रतिष्ठा- मियं समेष्यत्यनन्तसम्पत्ति तावन्न भारतीय- व्यवस्थितौ कोपि संशयः प्रायः॥१८८|| जब तक भारत में इस वर्ण व्यवस्था का समुचित रूप से रक्षण रहेगा तब नक भारतीयों की पर्यादा उन्नत बनी रहेगी ॥ १८८ । जगद्गुरमीचन्द्रदिग्विजये दुर्गस्य सार्गलेयं निबद्धमूलस्य भारतीयस्य। भेत्तुं न शक्यते या पर. सहविरोधिनां वातैः ॥१८॥ भारत में हिन्दुओं की रक्षा करने वाला वर्ण व्यवस्था रूपी यह अभेद्य दुर्ग है जिसकी आला को ताड़ने के लिये हजारों विधर्मी समर्थ नहीं हो सकते हैं ॥ १८९॥ एनां महेश्वरेण प्रदत्तवीयों बलेन ये केचित् । कर्षन्ति तेपि सद्यः पतन्त्यधर्मेण नष्टसर्वस्वाः ॥१६॥ ईश्वर निर्मित इस दुर्ग को अर्गला को जो पलपूर्वक खींच कर तोड़ना चाहते हैं वे भी इसके प्रभाव से नष्ट होकर अपना अस्तित्व खोदते हैं । १९० ॥ बौद्धैरियं प्रमादा- दनन्तवीरलं समाकृष्टा । तानेव सन्निपात्त्य प्रभुत्वमात्मीयमुन्नतं धत्ते ॥१६॥ प्राचीन काल में अपने प्रमाद से बौद्धों ने इसको नष्ट करना चाहा परन्तु वे इसको न तोड़ कर आप ही भारत से उजड़ गये ॥ १९१।। तेभ्यः परं यथाव- त्पचएडमोहंमदीयमाघातम् । आयातमात्मनेयं विमर्दयामास मर्दने दक्षा ॥१२॥ इसके अनन्तर यवनों ने तलवार के जार से इसको नष्ट भरना चाहा परन्तु वे भी इसके नष्ट करने में सफल मनारय नहीं हुए ॥ १९२ । .

३६७ षोडशः सर्गः अद्यापि दिव्यवीर्या समागतं धर्मविप्लवं सद्यः। विद्राव्य भारतीया- विमूपयिष्यत्यनन्तसम्पद्भिः ॥३६३॥ वर्तमान समय में भी जो धर्म विप्लव उपस्थित हुआ है उसको जल्दी हटा कर यह फिर भारतीयों को समृद्ध करेगी ॥ १९३ ॥ सेयं भवद्विरन्य- विहायसर्व ममाज्ञया शिष्यः। यनेन रक्षपीया सदेति सम्बोध्य मौनमयमागात् ||१६|| इसको आप सब लोग मेरी आज्ञा से और सब काम छोड़ कर यत्न से सुर- शित रखना इतना अपने शिष्यों के पति कहकर भावान् समाधिस्प हो गये ॥ १९४॥ अस्माभिरप्यमन्दं समस्तमानन्दमद्भुतं प्राप्य । सानन्दमेष सगों दिनान्तभागेऽद्य नीयते पूर्तिम् ॥१६५॥ इसलिये अब हम भी उसके वर्णन से अनन्त आनन्द पाकर दिनान्त भाग में इस सा को यही समाप्त करते हैं ॥ १९५ -- 1 इनिश्री सनाब्यवशोद्भर फविर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रपीते - मतिलके जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये महाकाव्ये वणव्यवस्थानिरूपण नाम पोडशः सर्ग सप्तदशः सर्गः 3 -- -- . भगवानेवमादिश्य निजशिष्यानुपस्थितान् । धर्मतत्त्वं पुनः प्राह समयोचितमादरात् ॥१॥ यद्यदावश्यकं तत्तद्वेदशास्त्रानुमोदितम् । भवद्भयः कथितं येन भवतामुदयो भवेत् ॥ २ ॥ : इदानीमुपकाराय लोकानां किञ्चिदुच्यते । . रहस्यं सर्वशास्त्राणां हृदये यत्प्रतिष्ठितम् ॥ ३॥ पहिले तीन सगों में धर्म का मर्म कह कर प्रस्तुत सर्ग में भगवान् श्रीचन्द्र अपने शिष्यों को सम्बोधित करके समयोचित धर्म तत्व का उपदेश करते हैं । आप कहते हैं कि मैंने आप लोगों के कल्याणार्थ जो २ धर्मशास्त्रानुमोदित धर्म का तत्व या उसका उपदेश दे दियो अब समस्त जगत् के कल्याणार्य जो कुछ मेरे हृदय में भाव हैं उनका शास्त्रानुमोदित रहस्य आप लोगों के प्रति कह रहा हूँ ॥१-३॥ उपास्यः सर्वभूतानामेकएव महेश्वरः । यश्चराचरमाविश्य कुरुते समयोचितम् ॥ ४॥ हृदये तमुमाकान्तं निवेश्य जगतां पतिम् । भवद्भिः क्रियतां सर्वधर्ममार्गानुवर्तनम् ॥ ५॥ भारते धर्मरक्षायै ममेयं जन्म सम्प्रति । समभूदिति विज्ञेयं भवद्भिः परमार्थतः ॥६॥ देवतः शिष्यताम्प्राप्तैर्भवद्भिरपि यत्नतः । सएव धर्मः संसेव्यो यदर्थोयं ममश्रमः ॥७॥ धर्मसेवा जातिसेवा देशसेवा ततःपरम् । सर्वापि भगवत्प्रीत्य कर्तव्या तदनुग्रहात् ॥ ८॥ । -- ३६९ # सप्तदशः सर्गः । “सर्वासां धर्मसेवानां सएव जगतां पतिः । फलप्रदः कर्मयोगमादिशत्युपकारकम् ॥ ६ ॥ सबके लिये उपास्य देव एक भगवान श्री शङ्कर हैं उनको हृदय में रखकर दी आप सब लोग धर्ममवार करें। मेरा यह जन्म भारत में धर्म रक्षा के लिये हुआ है दैवयोग से आप लोग मेरे शिष्यभाव को प्राप्त हुए है, इसलिये आपलोग भी यत्न से इसकी रक्षा करें । देश सेवा, जगति सेवा, धर्म सेवा यह तीनों धर्म के ही अङ्ग है इनका भगवत्मीत्यर्थ पालन करना चाहिये । इन सब सेवाओं का फल एक भगवान् शङ्कर हो देते हैं ॥४-९॥ सेवा न सुलभा लोके दुर्लभा भगवद्धता । यामुपाश्रित्य मुनिभिर्लभ्यते भगवत्पदम् ॥१०॥ सर्वत्रावस्थितं मत्वा भगवन्तं महेश्वरम् । यः सेवते जगत्सर्व सेवकः स निगवते ॥११॥ सेवाधर्मप्रतिष्ठायां योगिनोपि विचक्षणाः। मुह्यन्ति का कथान्येषां विवेकरहितात्मनाम् ॥१२॥ दम्भमास्थाय ये सेवावलम्बन मनोगताम् । स्वार्थसिद्धिं समीहन्ते बञ्चकास्ते न सेवकाः॥१३॥ अद्यत्वे बहवो लोकाः सेवाधर्मावलम्बिन.। वञ्चयन्ति नरानुग्रकर्माणः स्वार्थसाधकाः॥१४॥ न तेपां सेवया कोपि देशस्यार्थः प्रसाध्यते । न जातेनैव धर्मस्य यतस्ते सर्वबञ्चका. ॥१५॥ हारीनादिमुनिश्रेष्ठदर्शिताध्वी मनोहरः। पुरतो भक्तामस्ति भवदाह्वानतत्परः ॥१६॥ यथास्मत्पूर्वजैः सेवा मुनिभिः परिदर्शिता । भवद्भिरपि यत्नेन मा तथैव विधीयताम् ॥१७॥ - - । जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये ससार में सेवा सुलभ नहीं है उसमें भी भगात्सेवा 'अति कठिन है जिससे प्रसन्न हाकर भगवान् अपना सायुज्य तक देते हैं । सर्वत्र भगवान् का निवास समझ कर जो जगत् की सेवा करता है उसको सेकफ कहते है सेवाधर्म के पालन करने में योगी तक चूक जाते है, औरों की ता यात ही क्या ? स्वार्थवश दम्भ से जो सेना में मवृत्त हाते हैं, वे सेवक नही पञ्चक । आज कल ऐसे लोग बहुत है जो सेवा के बहाने से अपना काम करते हैं, ऐसे मनुष्यों से न देश की सेवा होतो है और न धर्म की ही सेवा होती है ये देश और धर्म दोनों को ठगते हैं हारीत आदि मुनियों ने जो सेवा का मार्ग चलाया है वह आपो बुला रहा है और आपके समक्ष है। हमारे पूर्वजों ने जिस प्रकार धर्म की सेवा की है, उसी प्रकार आप भी इस समय अपनी सेवा प्रस्तुत करें॥१०-१७॥ निरस्य मोगानादत्तं यदर्थं साधुजीवनम् । ' तदेव मन्निदेशेन क्रियतां ममयोचितम् ।।१।। जलाञ्जलिमुदस्याशु विषयेभ्य. प्रयत्नतः । अवाप्तं यत्कृते जन्म तदेवाशु विधीयताम् ॥१६॥ समयः समुपायातो धर्मरक्षापरीक्षणे। कार्यक्षेत्रमत. प्राप्तं भवद्भिरिदमुत्तमम् ॥२०॥ आप लोगों ने मेरे कथन से भोगों पर लात मार कर जो इस मुनिवेश को धारण किया है वह देश और धर्म की सेवा के लिये ही किया है इस लिये अब सासारिक सुखों को जलाञ्जलि देकर मेरे आदेश और सन्देश का पालन करो ये ही मेरा आप लोगों के लिये उपदेश हैं। अब धर्म रक्षा के लिये परीक्षा का समय आ गया हे उठो !! और अवसर प्राप्त कार्य क्षेत्र में उतर कर वीरोचित कार्य करते हुये दश और जानि का मुव उज्वल करी ॥ १८-२० [मन्देश'] निजोपदेशेरधुना जनताहृदयेशयम् । क्षाल्यतामाशु वैक्लव्यं दुर्दैवादुपसङ्गतम् ॥२१॥ स्वसमानवला वीरास्त्यागिनो धर्मरक्षकाः। निजापदेशेर्विमलेरुत्पाद्यन्तां पदे पदे ॥२२॥ .- " । pay सप्तदशः सर्गः ३७१ । 1 वीरेषु वीरपुत्रेषु शैथिल्यमुपसङ्गतः । शौर्यामिरुच्छिखः सद्यो वीज्यतां वाक्यमारुतैः ॥२३॥ भारते सर्वभागेषु भ्रामं भ्रामं मुहुर्मुहुः । एकतावर्धको भावः शङ्खनादेन पूर्यताम् ॥२४॥ मृतप्रायेषु लोकेषु महोद्योगप्रवर्तनः । निजोपदेशमन्त्रण स्थाप्यतां नवजीवनम् ॥२५॥ महत्वं धर्ममार्गस्य नियोध्य मनुजबजे । पाठ्यतां देशरक्षायै शौर्यपाठः क्रमागवः ॥२६॥ धर्मरक्षाकृने सनिर्भयरधुना हठात् । मृत्युरालिङ्गयतां प्राप्तो हसद्भिर्जीवनोपमः ॥२णा. बलिवेदीमुपागत्य सत्वरं धर्मविद्विपाम् । शिरांसि भुवि सम्पात्य वीरोचितमुपास्यताम् ॥२८॥ धर्मयुद्धे गतासूनां वीराणां तर्पणोचितम् । रक्ततोयमुपादाय निवापः सम्प्रदीयताम् ॥२६॥ यहतास्ते महात्मानो धर्मयुद्धे दुरात्मभिः । तच्छिरोमालया तेषां माल्यभूपा प्रवर्त्यताम् ॥३॥ मृधे मृतानां वीराणां रक्तचन्दनलेपनैः । तिलकीक्रियतां सद्यो भालमाला मनस्विनाम् ॥३१॥ मातरो जगतां लोके बलादाकृष्टमेखलाः । यवनासुरमुएडीधैर्विधीयन्तां समेखलाः ॥३२॥ [ भा यहां से आपका सन्देश आरम्भ होता है ] आप कहते हैं कि हे मेरे पो !! अब तुम बढ़ो !! अपने सदुपदेशों से जनता के हृदय पर विद्यमान । को छुट्टालो, अपने समान वीर त्यागी धर्मरसक पुरुषों को देश देश में र नगा दो, वीर और वीर पुत्रों में शिथिलता यो पाम हुये शौर्य रूप अनि ३७२ जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्वजये को उपदेश रूपी वायु से जगाओ, भारत के कोने कोने में जाकर एकता का शङ्ख नाद फूक दो, मृतपाय मनुष्यों को देश रक्षा के लिये शौर्य का पाठ पढ़ाओ, धर्म रक्षा के लिये माप्त मृत्यु को निर्भय होकर बुलाओ और हंसते हंसते उसका आलि. गन करो, वलिवेदी पर आकर अपने धर्म की निन्दा करने वालों की गर्दन हलकी करदो, धर्म युद्ध में मृत अपने पूर्वजों की आत्माओं को रक्त जल से जलाञ्जलि दो, जिन्होंने उनको माग है उनको मुण्ड-माला से माला बनाकर , उनको पहिना दो धर्म युद्ध में मरे हुये चोरों के मस्तक पर रक्त चन्दन लगाकर उनका तिलक निकालो, जिन इमारी माताओं की मेखलायें विधर्मी उतार कर ले गये हैं उनके मुण्डों की मेखला बनाकर उस स्थल पर पहिना दो । ॥ २१ . ३२ ।। आक्रान्ता यवनेरेषा मातृभूमिः पदे पदे।। विरौति करुणं दृष्ट्वा भवतां मुखमण्डलम् ॥३३॥ दीना विवस्त्रा मलिना दुर्बलाङ्गी नताना ।। निजोद्धाराय परितः प्रेक्षते भूरियं सुतान् ॥३॥" समुद्रवसना सेयं पर्वतस्तनमएडला। मातृभूर्भवतामद्य यवनरुपभुज्यते ॥३५॥ किमतः परमस्माकं दीर्भाग्यमुपवीक्ष्यते । मातृभूर्यदियं पुरस्माभिः परसङ्गता ॥३६॥ बलादाकृष्य सुभगां जाराइव पदे पदे । भुञ्जते यवनाः पापाः प्रत्यहं योवनार्थिनः ॥३७॥ परःशतेषु पुत्रेषु वलवीर्यादिशालिषु । विद्यमानेष्वपि बलाद्यदियं भुज्यते परैः ॥३८॥ धिगस्माकं बलं शौर्य धिग्जन्म धिगिदं धनम् । धिगिदं कुलमुद्रूता वयं यत्र नपुंसकाः ॥३॥ शूराः श्रद्धालवो वीरा ममशिष्याः पदे पदे । सद्यो मदनुरोधेन भवन्तु भुवि सङ्गताः ॥४०॥ H । ।

सप्तदशः सर्ग द पद २ पर यवनों से आक्रान्त यह हमारी मातृभूमि आपकी तरफ देखकर रोदन कर रही है हर प्रकार से दीन हीन मलिन होकर अपने उद्धार के लिये अपने पुनों की ओर देख रही है समुद्रवसना पर्वतकुचा यह आपकी मार- भूमि अाज एवनों के अधिकार में पहुंच गई है, इससे अधिक लजा की क्या बात हो सकती है कि हम जैसे पुत्रों के होते हुए भी अभी इस पर यवनों का अधिकार पियमान है, इस हमारी मातृभूमि को यौवनार्थी जार पवन पद २ पर पलसे खींच कर इसका उपभाग करते हैं यदि बल वीर्यशाली हम जैसे पुत्रों के होने पर भी इस हमारी माता पर यवनों का अधिकार है तो हमारे पलको हमारे धन को हमारे जन्म और कुल तक को वार २ धिक्कार है जिसमें हम जैसे नपुसक उत्पन हुए हैं, इसलिये हे श्रदालु वीरशिष्यो ! उठो ! मेरे कपन से सर्वत्र सङ्गठित होकर अपने २ मण्डल नियत करी ॥३३-४० ॥ मएडलानि ममाभीष्टसिद्धये निजयत्नतः । संस्थाप्य भवनोद्धारः क्रियतां सार्वदेशिक. ॥११॥ द्विजरक्तनदीपड्वचितेष्टकसमुच्चयैः। निर्मितानि निपात्यन्तां गोपुराणि सुरद्विपाम् ॥४२॥ मन्दिराणि निवेश्यन्तां तत्र तत्र ममाज्ञया । स्थाप्यन्तां तेषु ते वेदा येषु धर्मव्यवस्थितिः ॥४३॥ दौर्भाग्यतः प्रवृत्तोयं शेववैष्णवसङ्गतः । कलहो नीयतां नाशं देवपूजा प्रवर्त्यताम् ॥३॥ बलाद्या यवनीता ललनाः कुलसम्भवाः। सद्य. समुद्धतिस्तासां बलेन क्रियतां जनः ॥१५॥ वेदवेदाङ्गरक्षाय विद्यालयनिवेशनम् । सर्वत्रादिश्यतां येन वेदरचा पुनर्भवेत् ॥४६॥ ब्रह्मचर्यमुपाश्रित्य बलवीर्यपराक्रमाः। शरीरेपु निवेश्यन्तामात्मरक्षणहेतवे ॥४७) -1 x जगद्दीपनदिग्विजये हारीतमुनिवत्सः सर्वत्र समदर्शिभिः । सनत्कुमारसन्दिष्टो मार्गएषः प्रवर्त्यताम् ॥४८॥) * अपने २ यत्र से मण्डल नियत करके मेरी प्रसन्नता के लिये सार्वदेशिक भुवनका उद्धार करो !! हमारे रामकृष्णादि के मन्दिरों को गिराकर जिन यवनों ने दिनों के रुधिर फर्दम से ईंटें चिन २ कर अपने २ उच्चगापुर बनाये हैं उनकी तरफ भी जरा ध्यान दो, उन स्थानों पर अब दुवारा अपने मन्दिर बना कर उनमें अपने धर्मरक्षक वेदोंका स्थापन करो, दुर्भाग्य से भारत में प्रवृत्त आपस का शैव वैष्णव कलह मिटाकर समान भाव से पञ्चदेवोपासना का प्रचार करो, निन हमारी कुलाङ्गनाओं को बल पूर्वक हमसे छीनकर यवन ले गए हैं उनका पुनरुद्धार करो, वेद भार घेदाहों की रक्षा करने के लिये विद्यालयों का स्थापन करो, ब्रह्मचर्य धारण कर अपनी रक्षा के लिये अपने २ शरीरों में धीर्य का रक्षण करो हारीत मुनि की ताइ समान भावसे सर्वत्र एक ब्रह्म की सत्ता देखकर सनकादि मुनियों द्वारा मवृत्त उदासीन धर्मका भारत में स्थापन फरो॥४१-~-४८॥ प्रवृत्तिमार्गमेकान्तं विहाय परिपन्थिनम् । "निवृत्तिमार्गमेवात्र भजध्वमुपसङ्गताः ॥४॥ प्रवृत्तिमार्गानुष्ठानक्षेत्रं गार्हस्थ्यमुच्यते । निवृत्तिमार्गानुष्ठानक्षेत्रमस्माकमागमः ॥५०। प्रवृत्तिमार्गसेवायाः फल स्वर्गादिसदतिः । निवृत्तिमार्गसेनायाः फलं मोक्ष उदाहृतः ॥५१॥ पान्थो निवृत्तिमार्गस्य ब्रह्मनिष्ठो नरो भवेत् 1 ।। प्रवृत्तिमार्गपान्थस्तु लोकनिष्ठः स्वतो मतः ॥५२॥ सनादयो मुनिवराः सृष्टेरादो विधेः सुताः । निवृत्तिमार्गमभजन्विहाय गृहबन्धनम् ॥५३|| परःमहस्रा यच्छिम्याः शवलाश्चादयो मताः नारदः सोप्यभूलोके निवृत्तावेव निश्चलः ||५|| 1 -- सप्तदशः सर्गः २७% T - मृग्यादिभिर्मुनिवरः प्रदिष्टोऽस्मत्सहोदरैः । प्रवृत्तिमागों ववृधे लोकानामनुरागतः ॥५५॥' मार्गाविमो विधेः पुत्रराश्रितो सर्जनक्रमे । यावद्य सर्वलोकेषु भातो विस्तृतिमागतौ ॥५६॥ पाखएिडभिरिमौदैवदुर्विपकिन नाशिौ ।' यदुद्धाराय विदुपामदय. समपेक्ष्यते ॥५७॥' धर्मस्कन्धास्त्रयो लोके यत्नतो विश्वरक्षकाः । रक्षणीयाः प्रदिपदं यथा लोकः सुखी भवेत् ॥५॥ गीतायां यत्समादिष्ट वासुदेवेन धार्मिकम् । ।। तत्वं तदेव संगृह्य 'लोकरक्षा विधीयताम् ॥५६॥ अनन्यभावतो ब्रह्म समुपास्यं सनातनम् । भेदाः पञ्चापि यस्यैते मायाशवलितात्मनः ॥६॥ आत्मा की उन्नति में रुकावट डालने वाले प्रगृत्ति मार्ग को हटाकर निवृत्ति मार्ग के पथिक ना | मचि मार्ग का अनुष्ठान क्षेत्र गृहस्थाश्रम है और निवृत्ति मार्ग का अनुष्ठान क्षेत्र उदासीन धर्म है। प्रवृत्ति मार्ग को सेवा का फल स्वर्ग है और निवृत्ति मार्ग की सेवा का फल माक्ष है, प्रवृत्ति मार्ग का पथिक लोकनिष्ठ होता है और निवृत्ति मार्ग का पथिक प्रमनिष्ट होता है सृष्टि के आदि में सन आदिक ब्रह्मा के सात पुत्र प्रवृत्ति मार्ग' को छोड़कर निवृत्ति मार्ग के अनुगामी हुए । शवलाश्य हर्यक्ष आदि दश हजार जिनके शिष्य थे वे नारद भी निवृत्ति पार्ग पर ही चले । हमारे सहोदर भृगु आदि ऋपियों ने लोक रक्षा के लिये इस प्रति मार्ग का अनुगमन किया या । यह दोनों मार्ग सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा के पुत्रों ने चलाये थे जो आज सर्वन फैले हुये हैं। पाखण्डी मनुष्यों ने इन दोनों मार्गों को आज कल नष्ट किया है इस लिये इन दोनों मागों के उदार के लिये विद्वानों का सहयोग अपेक्षित है। यज्ञ अ ययन दान यह तीन धर्म के स्तम्भ है लोक रक्षा के लिये इन तीनों की रक्षा होनी चाहिये । गीता में भगवान कृष्ण ने जा धर्म का तत्व पहा है उसी के अनुसार लोक रक्षा करनी चाहिये । अनन्य मार से एक सनातन ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये ३७६ + । *- जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये माया शवलित होने पर जिसके ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, शक्ति, सूर्य आदि भेद हो गये हैं ॥ ४९-६० ॥ अनन्यता ब्रह्मगता न भेदमुपसङ्गता वरीवति यतस्तासु तदेवकं प्रतिष्ठितम् ॥३१॥ मूढेरनन्यताशब्दः स्वेष्टवस्तुपु कल्पितः । अविज्ञाय तदीयाथ स्वार्थरक्षणहेतवे ॥६२।। ब्रह्माभिन्नं जगदिदं तदुद्भूतं तदाश्रितम् । अनन्यपरतन्त्रत्वादनन्यत्वेन कथ्यते ॥६॥ तदेवामिस्तदादित्यस्तदायुस्तदु.चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आप. स प्रजापतिः दिशा सदेकं वस्तु विवुधैर्वहुधा गीयते जनः । तदेवामिरिति स्पष्टमुपदिष्टे मनौ स्थिरम् ॥६५॥ पश्चानामपि तत्वानां ब्रह्माभिन्नतया स्थितिः । वेदादिसत्यशास्त्रेषु लभ्यते वेदकोविदः ॥६६॥ स्मार्तमध्वानमास्थाय रविशक्तिगणाधिपाः ।। शिवविष्णू तदंशत्वादनन्यत्वमुपागतौ ॥६॥ मायाशवलमूर्तीनां सर्वासामपि पूजनात् । ब्रह्मैव पूज्यते लोकैरेकं सर्वप्रतिष्ठितम् ॥६॥ आधारभेदतस्तोये यथासूर्य. प्रतिष्ठितः । तथैकं ब्रह्म सर्वत्र मूर्तिभेदैरवस्थितम् ॥६॥ अतो न भेद. कुत्रापि देवपूजाविनिर्णये । मतं ममेदमेकान्तमनुप्ठेयं मदाश्रितैः ॥७॥ अनन्यता ब्रह्मगत है भेद बाद में उसका अस्तित्व नहीं है क्योंकि उसके भेदों में अस्तित्व एक ब्रह्म का हो है मूहोंने इस अनन्यता शब्द का अर्थ न समझ कर अपनी स्वार्य सिद्धि के लिये अपने २ इट : पदार्थों में अनन्यता का भाव T १ - सप्तदश संग -- -~-७०॥ स्थापित किया है जो उनमें पता नहीं है । यह जगत् ब्रह्म से अभिन्न है इसका उद्रव स्थान और अधिष्ठान एक ब्रह्म ही ह वह ब्रह्म अपने कार्य में अनन्य परतन्त्र होने के कारण अनन्य शब्द से कहा जाता है। अग्नि वायु आदित्य नल चन्द्रमा शुक्र अथवा ब्रह्म पदवाच्य समस्त प्रकृति में उस एक ब्रह्म की ही कला अवस्थित है । सत् पद वाच्य ब्रह्म एक है उसा को कवियों ने पूर्व कथित मन्त्रात्मक श्लोक में अग्नि आदि अनेक भेदों से गाया है वेदों में पृथिवी आदि पाचों तत्वों की ब्रह्म से अभिन्न स्थिति वताई है जिसको वेदज्ञ जानते हैं स्मात सम्मदाय में मूर्य आदि, पाचों दवता ब्रह्माश होने के कारण ब्रह्म के अनन्य रूप में ही पूजित किये जाते हैं माया शरल सभी मूर्तियों के पूजन से वह एक ब्रह्म हो पूजा जाता है जो सबमें विद्यमान है आधार भेद से जिस प्रकार एक ही सूर्य छोटा बड़ा प्रतीत होता है उसी प्रकार भिन्न भिन्न मूर्तियों में अवस्थित एक ही ब्रह्म अनेक होकर भासता है । इसी लिये किसी देवता मे पूजन के समय भेद नही मानना चाहिये यही मेरा मत है मेरे शिष्यों को इसी पर चलना चाहिये ॥ ६१-- एवमादिश्य भगवान्निजशिष्येषु हगतम् । भावमात्मीयमभजत्समाधिमुपसङ्गताम् ॥७१।। सन्देशमिममाकर्य भक्तगिर्यादयो मुने । शिष्याः सर्वेपि कर्तव्यसमारूढास्तदाऽभवन् ॥७२॥ हृदयादुद्गतान्यस्य शिक्षाबीजानि देवतः । शिप्यभूमिपु सङ्गत्य नवाङ्कुरमदु. स्फुटम् ॥७३|| द्विपत्रितानि तान्येव ममयेन यथोत्तरम् । पुष्पितानि मुनिनाते फलितानि जगत्त्रये ॥७॥ धर्मप्रचारकरस्य शिष्य रतभूमिप । भ्रामं भ्रामं तदाकारि यदादिष्टं मुनीश्वरैः ॥७॥ सन्देशमेवमादिश्य गुरुः श्रीनगरे शिवम् । - वारठं ग्राममामाद्य विशश्राम वनोदरे ॥७॥ + 1 । ४८ ३७८ - T जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजय 'तस्मादुत्त्थाय भगवान्सहशिष्यरुपान्तगम् । चम्बानगरमागत्य गुरुदत्तं व्यसर्जयत् ॥७॥ गुरुदत्तो मुनेः शिष्यः समेत्य भुवि कीर्तिदम् । शिवं कीर्तिपुरं गत्वा तपश्चर्यापरोऽभवत् ॥७॥ तस्मादाकर्ण्य वृत्तान्तं मुनेरस्य पुरातनः । 'ब्रह्मकेतुस्तदेवायाचम्बापुरमुपश्रुतम् ॥७॥ भगवत्पदमासाद्य तत्र यत्तेन वीक्षितम् । त्रयोदशे गतं सर्गे वृत्तं तदहुसुन्दरम् ॥३०॥ इस प्रकार अपने हृद्गत भावों को शिष्यों के प्रति कहकर भगवान् समाधिस्थ हो गये । आपका सन्देश पाकर भक्तगिरि आदि शिष्य भी अपने अपने कर्तव्य पर आरूढ़ होगये । भगवान् के मुख से निकले हुये शिक्षा रूप वीज शिष्य रूप भूमि में गिर कर उगने लगे। वे ही समय पाकर ससार में द्विपत्रित होकर फूलने और फलने लगे, धर्म प्रचारक इनके शिष्यों ने भारत में सर्वन घूमकर उस समय गुरु के कथन का पालन किया श्रीनगर में इम सन्देश को देकर भगवान् वारठ ग्राम पहुच फर विश्राम करने लगे यहा से चलकर चम्बा पहुँचे । यहा आकर आपने गुरुदत्त को वापिस भेजा । गुरुदत्त गुरु की आज्ञा से कीर्तिपुर जाकर तपश्चर्या में लग गये । गुग्दर से खार पाकर, आपका पुराना शिष्य ब्रह्मकेतु आपको हृदते हढते चम्बा पहुच गया । वहा जाकर उसन जो शिला तैरने का दृश्य देखा वह तेरहव सर्ग में लिखा जा नुफा है ॥ ७१ - ८०॥ - [ युग्मम गुरोराज्ञां महामान्यां मालामिव गुणोज्वलाम् । शिरस्याधाय मद्भक्त्या यदकारि शिवं कृतम् ॥१॥ बीजरूपेण तच्छिप्येस्तदप्यस्माभिरादरात् ।।। पूर्वमं ममादिष्टं गतमर्गेपु विस्तरात् ॥२॥ एमन्तियाममन्विञ्चन्यदाह गुरुरादरात् । । ब्रह्मकेतुम्तदशृणोत्मयं नान्यो जनस्तदा ॥३॥ - । . .

veer - 1 . TE सप्तदशः सर्गः . ब्रह्मभूयं गते देवे ध्यानयोगेन दुःखितः । ब्रह्मकेतुः पुनरगात्सद्यः श्रीनगरं शिवम् ॥८॥ तत्र सर्वान्गुरोः शिष्यान्समाहूय स धैर्यतः।। प्रोवाच गुरुसन्दिष्टं श्रूयतामद्य सज्जनः ।। विहाय सर्वान्नः शिष्यानत्रलोके निजेच्छया । गुरुरस्माकमगमद्वैपायनमुनर्गतिम् ॥८६॥ ततः पूर्व स भगवांल्लोकानुग्रहवाञ्छया । मामाह न त्वया कार्यों हठः कोपि ममाज्ञया ॥७॥ मदादेशेन मद्यस्त्वमितो गत्वा ममान्तिमम् । सन्देशमात्मतुल्येषु मच्छिप्येषु निवेदय ||८|| गुरोरिदं वचः श्रुत्वा समायातोस्मि दुःखितः । श्रूयतां मन्मुखादद्य गुरुभिर्यदुदीरितम् ॥८॥ गुरु की आज्ञा को माला की तरह शिर पर रखकर जो उनके शिष्यों ने पञ्चायतन रूपी कार्य का आरम्भ किया उसका भी बीज रूप से गत सगों में वर्णन हो चुका है एकान्तवास की इच्छा से उस समय गुरु ने जो कहा वह केवल ब्रह्मकेतु ने ही सुना । भगवान् के अदृश्य होने पर दुःखित ब्रह्मकेतु वहां से चल कर श्रीनगर पहुँचे। वहा पर अपने सर गुर भाइयों को एकल फर उसने कहा कि हमारे दुर्भाग्य से भगवान् व्यास मुनि की तरह अज्ञात काल के लिये अदृश्य हो गये ह । अदृश्य होने के पूर्व लोकानुग्रहकाशा से उन्होंने मेरे से कहा कि अब तुम मेरी आज्ञा से पहिले की तरह कोई हठ मत करना । मेरी आमा से तुम श्रीनगर जाकर मेरी आत्मा के तुल्य मेरे प्यारे शिष्यों को मेरा सन्देश सुनाना । भगवान् को उस भाशा से दुखी होकर अब मैं यहा आया हु । तुम सप लोग मेरे मुख से उस गुरु के अन्तिम सन्देश को सुनो ॥८१-८९ ॥ [अन्तिम सन्देश ] अवतीर्य महामान्यैर्धर्मक्षेत्रे मदाज्ञया । - पदं पश्चान्न दातव्यमग्रेगन्तव्यमादरात् ||६|| . + - - जगद्मश्रीचन्द्रदिग्विजय भगवत्यम्विकाधीशे दृढं विश्वस्य धैर्यतः ATT सत्यमेवाग्रतः कृत्वा मदादिष्टं विधीयताम् ।।१।। जीवनं तिजमत्यन्तं तपोमयमहनिशम् ।। । सम्पादनीयं यत्नेन यथा लोकः सुखी भवेत् ॥२॥ वासनासु दुरन्तासु निपत्त्य न भवादृशैः । त्यागादर्शः क्रमप्राप्तो हातव्यः मर्वभूतिदः ॥६॥ स्वातन्त्र्यमात्मनः प्राप्तुं यत्नः कार्य. पदे पदे । यथा निर्यन्धनमिदं जीवनं भवतां भवेत् ॥ ४॥ स्वयं प्रकाशमभ्येत्य प्रयत्नेन मदाज्ञया । घोरान्धकारपतिताः समुद्धार्याः कलौ जनाः ॥६॥ अविनाशिमुनेर्लक्ष्यं जगतामुपकारकम् । . . न विस्मर्तव्यमायातप्रसङ्गेपु समागतम् ॥६६॥। मनसा कर्मणा वावा तदुद्धाराय यत्नतः । कर्तव्यबुध्या कर्त्तव्यं सर्वमेव यथोचितम् ॥१७॥ अहम्भावेन लोफेत्र फलवामनयापि वा । कर्तव्यपद्धतिर्नेव दूपणीया मदाज्ञया IEE|| योगक्रियामनुगतः शिक्षणश्रोत आदरात् । न शोपणीय. केनापि वर्धनीयो यथाक्रमम् ||६|| अयमेव ममादेशो जगतामुपकारकः । न विस्मर्तव्य इत्येव ममान्तिममुदीरितम् ॥१०॥ । इतना पा पर ब्रह्मान ने भगवान् पा [मन्तिम सन्देश सुनाया । जिसका उल्लेख इस प्रशर मर मिप शिष्यो । धर्म सत्र में उतर पर पीछे पदम न एगाना, भगवान् शङ्कर में माल पिशास रख पर ससार में सर फाम सचाई सामने गप पर परना, भाना नीवन मगार में नपामय पनाना, लोपासनाओं पोदामना पर गाके उप मार्गोपनदिन न धरना मामा की - -- सप्तदश सर्ग ३८१ - -7 स्वतन्त्रता के लिये यथा शक्ति प्रयत्न करना स्वय प्रकाश में पहुच कर अन्य मनुष्यों को अन्धकार से बचाना गुर अविनाशी के पवित्र लक्ष्य को कदापि न भूलना और मन वाणी और कर्म से उसके उद्धार के लिये प्रयत्न करना अह- द्वार से अथवा फलवासना से कर्त्तव्य की पवित्र पद्धति को पित मत करना, याग क्रिया का शिक्षणस्रोत सर्वदा जारी रखना, और इन हमारे उपदेशों को कभी नहीं भुलाना [ यही भगवान् का अन्तिम सन्देश है ] ॥९०-१९० ॥ एवमादिश्य स तदा गुरुषोक्तमनुक्रमांत् । मौनमेवागमत्सद्यो ब्रह्मकेतुः सभास्थितः ।।१०१॥ तस्मिन्मौनमुपायाते ब्रह्मकेतौ गुरोः पदम् । स्मरन्तो मनसा तस्य प्रणेमु. पदपङ्कजम् ॥१०२॥ अन्तिमामस्य वदनाद्गुरोराज्ञां निशम्य ते । I TA समयोचितकार्याणि चक्ररत्यन्नमादृताः ॥१०३|| तैर्यथा यत्कृतं तत्तद्विस्तरेण यथाक्रमम् । । पश्यन्तु मुनयः सर्गे मया निर्दिष्टमग्रिमे ॥१०॥ एतावदत्र निर्दिश्य मुनेश्चरितमुत्तमम् । आह्निकोयं मया सर्ग. प्रसङ्कन समाप्यते ॥१०॥ इस प्रकार सब शिष्यों के समक्ष भगवान् का अन्तिम सन्देश सुनाकर ब्रह्म केतु मौन हो गया उसके मौन हाने पर भगवान के सव शिष्यों ने अपने गुरुदेव का स्मरण कर उनके श्री चरणों में श्रद्धाञ्जलि अर्पित 'की और गुरुजी की अन्तिम आज्ञा सुनकर बड़े आदर से समयोचित कार्यों में वे सब मवृत्त' हुए । उन्होंने जिस मकार जो काम किया उसका वर्णन अगले सर्ग में देखिये इस सर्ग में इतना ही भगवान् का चरित्र लिम्वकर यह [ आन्हिक ] सर्ग अब समाप्त किया जाता है। [ अन्हा निवृत्त सर्ग आह्निकः ] ॥१०१-१०५॥ इनिश्री सनात्ययशोद्भव कविवर श्रीमदखिलानन्दशर्मप्रणीते। मतिलक जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये महाकाव्ये 11 सन्द्रेशकथन नाम सप्तदश, मर्ग ins T अष्टादशः सर्गः, 1 " 7 N 1 मा अथ प्रयाते विलयं मुनीश्वरे : - जगद्गुरौ शोकमहार्णवे द्रुतम् । ममज सर्व जगदेव निश्चला- मलं'प्रपेदे मथिताब्धिमन्दताम् ॥ १ ॥ जगद्गुरु श्रीचन्द्र भगवान् के अचल समाधिस्थ होने के अनन्तर "यह प्रतीय- न समस्त जगत् उस अवस्या में पहुंचा जिसमें मन्यन के अनन्तर चौदह रत्नों के निकलने के बाद निस्तरङ्ग 'समुद्र पहुंचा था ? यथा यथा तदिलयानुगा कथा !! विवेश मतानि जवेन गत्वरी तथा तथा भारतभूमिमएडल' । बभूव मन्ये गतसूर्यमण्डलम् ॥ ३॥".: जैसे २ यह चर्चा बड़े वेग के साथ समस्त भुवनों में फैलती गई वैसे २ समस्त भारत मण्डल अन्यकार 'से आक्रान्त होता गया ॥२॥ कथं प्रयातः स विहाय सद्गुरु- निजोपदेशोदतनव्यजीवनाम् । -निजालय शिष्यपरम्परामिमा- .., मितीय चुक्रोश तदास्य भएडली ॥ ३ ॥ • अपने सदुपदेशों से हमको नगीन जीवन की और लगाकर हमारे गुरुदेव हमको अकेला छोड़कर कैसे अपनी जीवन लीला का संवरण कर नुफे यह सोच कर यार २ आपकी मण्डली गदन करने लगी ॥ ३ ॥ निरस्तनि विगतप्रसाधनं विसृष्टनानाविधयोगसाधनम् । । m - 1 । अष्टारशासग T 1 बभूव सर्व जगदेव मन्मते गुरोवियोगेोबत को न दूयते ।।४।। आपके वियोग में यह समस्त जगत् निद्रा रहित अलङ्कार शून्य नष्ट , योग- साधन होकर ऐसा स्तब्ध हुआ जैसा पहिले की नहीं हुआ था । पात भी ठीक है। गुरु के वियोग में कौन सजन दुखी नहीं होता है।॥४॥ दशामिमामत्र विलोक्या तादृशीं- 1- --Trai मनेवियोगेन, विदीर्णमानसः। -7 विहस्य किञ्चिनिजगाद विस्मितः ना, स बालहासो निजमएडलाधिपान ॥ ५ ॥ अपने गुर भाइयों की यह अवस्था देखकर गुरुवियोगद्न मानस वालहास मण्डलाध्यक्षों को लक्ष्य में रखकर कहने लगा ।। ५ ॥ अभूतपूर्व यदभूदिह प्रभो- रनुज्ञया सर्वमिदं यथोत्तरम् । विचार्य पश्यन्तु भवन्तएव ते हृदन्तरे विस्मयकारि वर्तनम् ॥ ६ ॥ यह सा अभूतपूर्व अघटित घटना भगवान् की इच्छा से उपस्थित हुई है इस बात को आप लोग भले प्रकार अपने हृदयों में विचार कर देखें ॥६॥ क भारतीयोद्धरणक्रियाक्रमः व सद्गुरोरत्र भचे पदार्पणम् । क तद्धियोगोद्य जवादुपागतः समस्तमेतचरितं जगदगुरोः।। IITF कहा भारतीय जनों के उद्धार का कार्यक्रम ? कहा जगद्गु श्रीचन्द्र भग- वान् का इस भारत भूमि में अवतार ? कहां आज उनका यह अचानक पियोग ? या सा भगवान् की माया का विलास है ।। ७ ॥ परं मुनेरेव यदृच्छयागतं समस्तमेतद्यदि मन्यते तदा । -- ।

८४ r जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये न शोकलेशः कथमप्युपासितु- TET FREE क्षमो गुरूणामनुशासने रतैः ॥ ८॥ परन्तु यह सब कार्य भगवान् की इच्छा से यदि आप हुआ मानते हैं।? तो इस समय शोक करना व्यर्थ है क्योंकि समयोचित गुरु की आज्ञा पालन करने का समय आगया है ॥ ८॥ JI " प्रियं गुरोस्तस्य यदीह काम्यते।। निजप्रयत्नेन तदास्य यत्प्रियम्। तदेव कार्य भुवने यथा गुरुः 7 ।' . प्रसन्नचित्तः पुनरप्यवातरेत् ॥ ॥ यदि आप गुरुजी का प्रिय करना चाहते हैं तो अपने २ प्रयत्नसे उनके अभीष्ट कायों का सम्पादन कीजिये जिससे प्रसन्न होकर वे फिर आकर दर्शन दें ।। ९ ।। उवाच कश्चित्कविरेव यच्छ्रुते ज पुरा मया योगनिविष्टचेतसा। अलक्षितोस्त्यत्र मुनिर्महीतले यथा सुतः सत्यवतीसमुद्भवः ॥१०॥ हमने किसी कवि के मुख से यह सुना है कि भगवान् व्यासमुनि की तरह चिरजीवी है अब वे केवल अदृश्य हो गये हैं ॥ १० ॥, मागा. परश्वधाङ्कः म निरीक्ष्यतेजने- र्यथा कदाचिद्रुवनभ्रमे स्तः । [ifi bf स वायुसूनुर्भुवि लभ्यते यथा तथा गुरुः सोपि समागमिष्यति ॥११॥ 'निस प्रकार प्रमण करने वालों को गङ्गा तट पर परशुराम जी और हनु मान जी मिलने १ सम्भर है इसी मकार भगवान् भी कभी आकर मिलें॥११॥ ममिद्धयोगामिविनष्टकिल्विपा-...- स्तपोधना लोकहितकवामनाः। L . h १ - अष्टादश संग न मृत्युमर्हन्ति कदापि भूतले गुरुः स मृत्युञ्जयएव मन्मते ॥१२॥ प्रचण्ड समाधि योग से नष्ट पाप लोकहित में रत तपोपन भूतल में कभी मृत्यु का मुख नही देखते ? भगवान को तो फिर बात ही क्या ? वे तो हमारे मत में स्वयं मृत्युञ्जय थे।॥ १२ ॥ महालये मृत्युगवाप्य निश्चलं समस्तमेतत्किल योऽवलोकते । शिवः स साक्षादवतीर्य भूतले कथं प्रयास्यत्यतिशोचनीयताम् ॥१३॥ महामला के समय जो भगवान् शङ्कर समस्त भुवन को मसुप्तावस्था में देखते हैं वह साक्षात् स्वय अवतीर्ण होकर शोयनीय दशा को क्यों कर पहुँचेंगे ॥ १३॥ तदद्य विश्रम्य जलाञ्जलिकियां विधाय तस्याद्रुतवीर्यकर्मणः। तदीयसन्दिष्टमनन्यचेतसा समर्थनीयं भगवत्कृपाबलात् ॥१४॥ इसलिये भाज कुछ देर विश्राम करके उनके परलोक सम्बन्धी कार्य करके उनके अभीष्ट कार्यों का हम सब सम्पादन करने में लगें जिससे उनकी आत्मा प्रसन्न रहे ॥१४॥ इति प्रशस्तं समयोचितं तदा निशम्य भावानुगतं वचोऽमृतम् । बभूवुरत्यन्तविनष्टमूर्यनाः क्रमेण सर्वेपि सभामुपागताः ॥१५॥ इस प्रकार वालहास को समयोनित बात सुनकर मण्डल में उपस्थित सभी मुनि जन गत शोक होकर शान्त चित्त हुए ॥ १५॥ विचार्य तस्याद्धतकार्यपद्धति विधाय कार्यक्रममागमोचितम् । ८९ ३८६ जगहमीचन्द्रदिग्विजये समस्तशिष्यरुचितन्तथा कृतं यथा जनैरद्य रसादिलोक्यते ॥१६॥ इसके अनन्तर उन सब शिष्यों ने कार्य पद्धति पर विचार कर ऐसा उचित कार्यक्रम बनाया जिसका निदर्शन अवतक चला आ रहा है। ॥१६॥ धृतवतास्ते गुरुकार्यसाधने तपोमयञ्जीवनमात्मना गताः। दृढ़प्रतिज्ञाः परमार्थरक्षणे गुरूपदिष्टानि शिवानि सस्मरुः ॥१७॥ गुरुजी के कार्य के साधन में घृतवत तपोमय जोवन के धारण करने वाले वे सब हद मतिज्ञ होकर गुरूपदिष्ट कार्यों के स्मरण में लग पड़े । ॥१७॥ जगाद कश्चिजगदुद्धतिक्षमः समस्तमेवात्र मुनेर्मनोगतम् । निजश्रमणाशु विधाय भूतले मया निवेद्यं गुरुचे कृताकृतम् ॥१८॥ उनमें सर्व मयम पालहास ने कहा कि मैं अपने जीवन में परिश्रम के साथ गुग नी के सर उद्देश्यों की पूर्ति करके गुरु जी के समक्ष अपने कार्यों की सूची अर्पण करूंगा ॥१८॥ गुरोः पददन्दमनन्तशर्मदं निधाय चित्ते निजगाद तत्परः। किमस्ति तद्यन्न मया भुवस्तले समापनीयं मुनिकार्यमुत्तमम् ॥१६॥ पालाम की यह पात गुनकर पुष्पदेव ने कहा कि संसार में यह काम फोन सानिसको बिना पूरा किये में अपना नीवन समान कर सके पीछे राने योग्य बनूगा ? ॥१९॥ दयोरिमामहुतभारगर्भितां निशम्य वावं कमलामनो मुनिः ।

अष्टादशः सर्गः
मुनेर्मतानामनुमोदनार्थक
समर्पयामास समस्तजीवनम् ॥२०॥
बालहास और पुष्पदेव की बात सुन कर कमलासन ने कहा कि मैं अपना
समस्त जीवन गुरुजी के कार्यों की पूर्वि में लगाने का आज से प्रण करता हूँ ॥२०॥
मुनित्रयीवाक्यमुदारकल्पनं
निपीय गोविन्द उवाच सर्वथा ।
समर्थनीयं भुवने पदे पदे
मया गुरोश्वेतसि यत्समाहतम् ॥२१॥
इन तीनों की बात सुन फर चौथे शिष्प गोविन्ददेव ने कहा मैं अपने जीवन
में पद पद पर गुरु जी के कार्यों का समर्थन करने के लिये आज से रद प्रतिन
होफर प्रयत्न करूगा ॥ २१॥
प्रधानशिष्यानुमतिं गुरोर्मते
विलोक्य तेषामनुयायिनोपि ते ।
समर्थितार्थानुमतेः समर्थन
समानभावाजगदुः क्रमागतम् ॥२२॥
इस प्रकार गुरु जी के चारों शिष्यों की बात सुनकर प्रलकेत आदि अन्य
शिष्यों ने उनके फयनों का अनुमोदन करके अपनी २ सहानुभूति प्राट की ॥२२॥
इति क्रमेणाहतसत्यभावना
गुरोर्गुरूणामविनाशिनो मुनेः।
हदि स्थितानि क्रमशः पदे पदे
समर्धयामासुरिमे सभागताः ॥२३॥
इस क्रम से गुरु के कार्यों का समर्थन फरफे सभास्थित उनके शिष्यों ने
अविनाशी मुनि का समस्त मनोरप पद पद पर पूरा करके अपना कर्तव्य पालन
प्रचारकार्य भुवि कार्यमित्यलं
विवार्य चित्ते किल सर्व एव ते।
फिपा ॥२३॥

जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये,
निवेशयामासुरनन्तमण्डल-
व्यवस्थिति तत्परतामुपागताः ॥२॥
गुरु जी के कथनानुसार धर्मप्रचार का कार्य अवश्य करना चाहिये यह
बात अपने चित्र में सोचकर उन सबों ने सर्व प्रथम मण्डलों का स्थापन
किया ॥ २४ ॥
विधाय नानाविधमएडलस्थिति
दिगन्तविश्रान्तविशुद्धकीर्तयः ।
मुनेर्मनीषामविराममात्मना
समन्वगुस्तादृशदिव्यकल्पनाः ॥२५॥
मण्डलों का स्थापन कर उन सबों ने अनवरत गुरु जी की आज्ञाओं का
पालनकर अपने अपने जीवन को यथार्य में सार्थक बनाकर दिखा दिया ॥ २५ ॥
समाप्य सर्व नवजीवनं क्रमा-
दुरोनियोगेन नदर्थमादृतम् ।
स बालहासो मुनिमएडलाग्रणीः
समाधियोगेन गुरोः पदं गतः ॥२६॥
उन सर शिष्यों में सर्व प्रथम पालहास ने अपना कार्यक्रम समाप्त कर
समाधियोग के द्वारा देहरादून में अपना शरीर समाप्त किया ॥ २६ ॥
[शाला परिचय
हरिदत्तसुतः सोयमलिमत्तसहोदरः।
काश्मीरदेशजो विप्रः सर्वशास्त्रविचक्षणः ॥२७॥
देहरादूननगरे कीर्तिमेवात्र विन्यसन् ।
लेभे ममाधिमवलां गुरुवर्यपदानुगः ॥२८॥
सर्वतः प्रागिदं स्थानं सम्प्रदायप्रवर्थकम् ।
बालहासेन मुनिना स्थापितं धर्महेतवे ॥२६॥

२८४ प्रधादशः सर्गः यत्र लक्ष्मणदासाख्या महान्तो मएडलेश्वराः। निवसन्त्यधुना धर्मरक्षणे दत्तदक्षिणाः ॥३०॥ अस्य शिष्येप्वभूदेको भगवदास उत्तमः । समाधिर्लभ्यते यस्य तत्रैव गुरुसन्निधौ ॥३१॥ कक्षां चतुर्दशीमेत्य यत्प्रशिष्येषु विश्रुतः । मुनिः सुन्दरदासोभूदायुर्वेदविशारदः ॥३२॥ तस्य शिप्यो जगन्मान्यो रामानन्द इति श्रुतः । वर्ततेद्यापि भुवने वेदवेदाङ्गपारगः ॥३३॥ यत्प्रसादेन भुवने लब्धकीर्तिर्जगद्गुरुः। मुनिर्गङ्गेश्वरानन्दो वरीवति भुवस्तले ॥३॥ शाखेयं वालहासस्य विश्रुता भुवनत्रये । वर्धतेद्यापि भुवने मुनिमण्डलमध्यगा ।।३५या भर पातहास का परिचय दिया जाता है ये पालहास पण्डित परिदा नी के पुत्र अलिमत्त के सहादर माई काश्मीरी ब्राह्मण ये इन्होंने अपना शरीर देहरादून में छोड़ कर अपना यशोमय शरीर सर्वदा के लिये अजर अमर पना लिया । साम्म- दापिक रष्टि से सर्व प्रथम देहरादून में आपका ही स्थान है वर्तमान समय में निसके अध्यक्ष श्री १०८ महन्त लापणटास जी {गुग रामराय दरवार देहरादून है पालहाप्त के शिष्यों में एक भगरतदास जी उदासीन हुये निनकी समाधि पाल. पास की समाधि के पास ही देहरादून में बनी है पालास की चौदावी पीटी में एक मान्त मुन्दरदास जी हुये है मिनके शिष्यों में भी रामानन्द नी मिनसे दीक्षा लेकर श्री १०८ गावरानन्द नी मान फल पर्व मनार कर र पाता पालहाल की शाखा मशाखामों का वर्णन दिया गया है ॥२७-३५।। अलिमत्तपदेन गीयते भुवि यः सम्पति मर्वमानवः। स गुरोरनुकम्पया जग- जनिमभ्येत्य चकार निर्मलम् ॥३५॥ - जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजय अब अलिमत्त के कार्यों का परिचय दिया जाता है । ससार में जिनकी कीर्ति अलिमत्त के नाम से गाई जाती है उन्होंने अपने गुरुओं की कृपा से जगत् को निर्मल कर दिया ॥ ३६॥ कृततीर्थपरिभ्रमः क्रमा- दयमादर्शचरित्रजन्मभूः। गुरुदेवपदारविन्दयो- बहु सस्मार पदे पदे मुनिः ॥३७॥ आपने समस्त तीर्थों में भ्रमण करके अपने जीवन को आदर्श बनाकर अपने गुरुदेव के चरणारविन्दों का वार २ स्मरण कर. उनका कर्तव्य पूरा किया ॥३७॥ गुरुवर्यमतं पुरे पुरे भुवि तन्वन्स निवृत्तिमार्गगम् । कमलासन एव जीवनं फलभारावनतं मुदाकरोत् ॥३८॥ भारत के प्रत्येक नगर और ग्राम में गुरु प्रदिष्ट उदासीन मार्ग का प्रचार कर इन्होंने अपने जीवन को फल भार से अवनत बना दिया ॥ ३८ ॥ अस्यातिमञ्जलमतेर्गुरुशिष्यवर्य- वर्यस्य विस्तृतजगत्त्रयकीर्तिभाजः । कि कि चरित्रमिह वर्णयितुं मनो मे मोदेन न त्वरति सत्वरतामुपेतम् ॥३॥ अत्यन्त सुन्दर परित्र वाले विमल कीर्ति युक्त आपके जीवन में कौन सी ऐसी पात नहीं है जिसका वर्णन करने के लिये हमारा मन न चाहता हो ॥३९॥ मान्योतिधन्यचरितस्त्रिजगद्दान्यो नान्योस्य कश्चिदपि भूवलये समानः । सन्दृश्यते यदुपमानपदं प्रदातु- मस्मिन्मनो भवतु मे विमलावतारम् ॥४०॥ .

अष्टादशः सर्गः आपके समान धन्य मान्य और यान्य अन्य कोई दृष्टि में नहीं आता, जिसके साथ तुलना करके आपको जनता में प्रस्तुत किया जा सके ॥४०॥ शिष्यानयं दशसहस्रमितान्निबोध्य प्राप्त गुरोः करुणया निगमकवेद्यम् । तत्वं निरस्तबहुजालकथं कथन- प्रापानुजस्य पदवीमदवीयसीन्ताम् ॥११॥ आपने दस हजार शिष्यों में अपने गुस्पोक्त धर्म का प्रचार करके ससार में भपने भाई वालदास से अधिक कार्य कर अपनी गुरुभक्ति का परिचय दिया ॥४१ अस्मै जगद्गुरुरदादरमप्रमेयं यं पूर्वमत्र भुवनेप्वतिदुर्लभन्तम् । भावोन्नतेन मनसा समवाप्य मन्ये सर्व तदस्य फलितं हृदये निविष्टम् ॥४२॥ भावान् श्रीचन्द्र न शिष्य बनाने के समय इनको एक शाखा सञ्चालन करने का कर दिया था, जिसके प्रभाव से आपने सभी काम पूरा करके उनके घर को चरितार्थ फर दिया ।। ४२ ।। कूर्माचलीविषयं समुपेत्त्य सोऽय- मन्तेज नानकमताभिधरम्पदेशे। लेभे समाधिमचल नयनाभिधान- पीठोपकाठगमकुण्ठितदिव्यशक्तिः ||४|| अन्त में आपने कर्माचल मान्त में प्रतिष्ठित जिला ने नीताल में "नानकमता" नामक स्थान में जाकर सर्वदा के लिये अचल समाधि प्राप्त की ।। ४३ ।। ये वर्तमानसमये विविधप्रकाराः प्रान्ते वसन्ति किल सम्पति पष्ठिखाते । शीताम्धुपानरसिका मुनयः क्रमेण सर्वेपि तेस्य चरितानि समामनन्ति ॥४॥ - जगदरुनीचन्द्रदिग्विजये वर्तमान समय में इस पष्ठिखात (एखाता) प्रान्त में जो उदासीन मुनि रहते हैं, वे सब समय २ पर प्रायः आपका गुणगान किया करते हैं ॥४४॥ हरिदत्तात्मजः सोयं वालहाससहोदरः। काश्मीरदेशसम्भूतः सर्वविद्याविचक्षणः ॥२५॥ एतत्पदानुगैरेव केशवानन्दसूरिभिः । सम्पादितः कनखले महाविद्यालयः शिवः ॥४६॥ एतच्छाखानुगैरेव पूर्णानन्दमहादयः । विद्यालयद्रयं लोके स्थापितं लोकविश्रुतम् ॥४७॥ वाराणस्यां तयोराद्यो विद्यते यं जगद्गुरुः । मुनिगंगेश्वरानन्दः सम्बर्धयति मर्वतः ॥४८॥ द्वितीयो मिथिलाप्रान्ते निमानीग्रामभूगतः । विद्यालयो वरीवति सुन्दरः शारदाभिधः ॥१६॥ विद्यालयदयमिदं पूर्णानन्दप्रवर्तितम् । कमलासनशाखीयं विज्ञेयं मुनिसत्तमैः॥५०॥ अलिमत्तीयशाखाया एतदन्तं मया कृतम् । निवेदितमतः पश्चाद्गोविन्दकृतिरुच्यते ॥५१॥ अब कमलासन की शाखा का परिचय दिया जाता है, अलिमत्तापरनामधेय ये कमलासन पंडित हरिदत्त जी के पुत्र और बालहास के सहोदर थे। इनकी पद्धति के अन्दर एक श्रीस्वामी केशवानन्द जो हुये, जिन्होंने कनखल में एक उदामीन संस्कृत विद्यालय के सम्बन्ध में हमने ऐमा सुना है कि वर्तमान समय में जहां पर विद्यालय है, वहां पर प्राचीनकाल में एक महात्मा म्वरूपदास जी उदा- सीन रहा करते थे। उन्होंने काशीमे विद्याध्ययन करके अपने स्थानमे यह विद्यालय खोना था, कुछ दिन स्वय चलाकर अन्त में उन्होंने इसको अपने शिष्यो के सुपुर्द किया। उनके शिष्य अनेक थे, जिनमे आज कल श्रीस्वामी हरिप्रकाश जी विद्यमान हैं। इन्होंने इस विद्यालय यो अपने परिश्रम से बहुत काल तक चलाया, अब आपने भी इसका सम्बन्ध भागमी गंगेश्वरानन्द जी के सुपुर्द कर दिया है। - अष्टादशः मर्गः मुनिमण्डलाश्रय स्थापित किया था। इन्हीं की शाखा में श्रीस्वामी पूर्णानन्द जी महाराज हुये, जिन्होंने अपने परिश्रम से दो विद्यालय स्थापित किये। उनमें पहिला काशी में दुण्डिराज के पास उदासीन सस्कृत विद्यालय है, जिसका सचा- लन वर्तमान समय में बाल हास शाखीय मगद्गुरु श्री१०८ स्वामी गङ्गेश्वरानन्द मी कर रहे हैं। दूसरा मिथिला मान्त में निपानी ग्राम के पास शारदा विद्यालय है, ये सब विद्यालय फगलासन की शाखा के ही समझने चाहिये। यहां तक हमने अलिमत्त की शाखा के विषय में लिखा है, इसके अनन्तर गोविन्ददेव के विषय में कहा जायगा ।। ४५-५१ ॥ गोविन्ददेव इति यस्य शुभाभिधानं जेगोयते गुणिगणेषु स लोकमान्यः । शिष्यो मुनेर्जगदिदं समवाप्य देवा- दाविश्चकार मुनिनायकमएडलानि ॥५२॥ श्रीचन्द्र जी के शिष्यों में गिनका नाम गोविन्ददेन है उनीने सर्व प्रथम ससार में मुनि मण्डलों का स्थापन किया ॥५२]] सर्वेषु भारतभुवः परिशोभमान- प्रान्तेषु मण्डसमहर्दिवमेधमानः। संस्थाप्य तेष्वनुविधाय परःसहस्रां- लोकानयं मुनिमतेऽनुरतानहप्यत् ।।५३|| भारत के कोने २ में मुनि मण्डल स्यापित कर इगाने. उनमें हमारों शिप्पकाम करने योग्य तैयार किये जिनका काम देखकर स्मय ये पान मसन सोते थे ॥५३॥ अस्यानुगेपु महनीयमहोदयेपु कोप्यप्रमेयचरितः किल रामदेवः । शिप्यो बभूव निजधर्मगुरोः क्रमेण यः पञ्चमीमुपजगाम गुणेन कक्षाम् ॥५४॥ योगप्रभावमधिगत्य जवेन येन दुर्मिनपीडितकृपीपलदैन्यभावम् । - - जगदुखीचन्द्रदिग्विजये सद्योऽवलोक्य निजयोगवलेन मेघ- मालाभिरम्बरमकारि परीतमारात् ॥५५|| गोपिन्ददेव की पांचवीं पीढ़ी में एक महात्मा रामदेव जी हुये जिन्होंने अपने योग-पल से दुर्भिक्ष पीदिन मिसानों के खेतों पर पार-गार मेह परसाकर पार • में 'मीहां नाम पापा है। पजानी भाषा में मेप को मीहां कहते है ॥ ५४-५५ अस्यानुगेषु शिप्ये- प्वभूदनन्तप्रतापसम्भूतिः। प्रियतमदासो धन्य- स्ततान लोकेत्र यो मुनेर्दीताम् ॥५.६।। सन्तोपदासदत्त- प्रकृष्टसाहाय्यमादरादाप्य ।। येनात्र वीजगुप्त नवीनविस्तीर्ण पद्धतेर्दिव्यम् ॥५॥ धन्याविमौ महान्ती नवीनरूपप्रदानसन्दक्षो। संस्थायाःप्राणाविव न केन मान्यौ महानुभावेन ॥५८॥ रामदेवनी के शिष्यों में एक महामहिम स्ननाम धन्य महामना प्रियतमदाप्त जी हुये भौर इनके सहयोगी एक महात्मा सन्तोपदासजी हुये । इन दोनों महा- स्माभोंने श्रीचन्द्रमतिष्ठापित पञ्चायतन को नवीन रूप में उदासीन पञ्चायती अखाड़ा का रूप दिया । विक्रम की उन्नीसवी सदी के अन्त में निर्वाण मियतमदास जी ने इस सस्मा का सामपिक विशेष रूप देकर सगठित किया था इस कारण उपर्युक्त दोनों महात्मा वर्तमान रूप के जन्मदाता भौर सस्था के माण स्वरूप माने जाते हैं ॥५६-५८॥ एकदा दक्षिणाशास्थमनयोः प्रथमो मुनिः। जगाम दैवयोगेन हैदराबादपत्तनम् ।।५६॥

अष्टादशः सर्गः मातामहं तत्र गत्वा मन्त्रिणः शिष्यतां नयन् । लेभे मुनिरयं तस्मान्नवलक्षमित धनम् ॥६०॥ त्यागादर्शमयं तत्र दर्शयन्नुपसङ्गतम् । पञ्चायतनसंस्थायै ददौ तत्सर्वमादरात् ॥६१॥ पजायतनसंस्थाया यस्या यत्नेन भूतले । नानातीर्थेषु लभ्यन्ते मुनिस्थानानि सर्वतः ॥६२॥ पुराणनव्यभेदेन भिन्नो कार्यालयो दी। प्रयागपत्तने रम्यौ तिष्ठतोऽस्पाः प्रयत्नतः ॥६॥ वृन्दावने कनखले ततोन्यत्रापि यत्नतः । पञ्चायतनसंस्थाया लभ्पते बहुशः कृतिः ॥६॥ एतदन्तं रामदेवादारभ्य यदिहोदितम् । पञ्चायतनसंस्थायास्तत्सर्व कार्यमुत्तमम् ॥६५॥ एक समय निर्वाण प्रियतमदासमी देवपोगसे भ्रमण करते२ दक्षिण हैदराबाद गपे थे, उस समप यहां के दीवान चन्दलाल मी ये । दीनान साहब के नाना नानकरकस मिण प्रियतमदासनी के शिष्प हुये थे, उनोंने शिष्य होने के समय सन्तान न होने के कारण सपना सर धन मा कि नौलाख से कुछ अधिक या, निर्वाण मियतमदास मो को भेंट किया या । आपने भी अपने त्याग का आदर्श उपस्थित करके पर सरपन पश्चायती अखाड़े के भेट किया । भाग उसी पञ्चा- यती भखाड़े के प्रयत्न से अनेक तीयों में वासीन मुनि मण्डल पाये जाते हैं। उसी पनापती भलाई के प्रपत्न से भान प्रयाग में पुराना मग्वाड़ा और नया भखादा मशग मनग फर माना भाना काम कर रहा है। इसी पश्चायती अखादे के प्रपत्न से वृन्दावन, फनसल, उग्नन आदि भनेर पुण्य स्थानों में उदासीन मुनियों के स्थान पाये गाते हैं । रामदेव उपनाम मीसिाहप से लेकर यहाँ तक हमने पशापती असादे के कार्यों का ही फेरल मक्षित परिचय दिया हैं। भर गोविन्ददेव का यश परिचय दिया जाता है ॥५९-६५||

जगद्गुरश्रीचन्द्रदिग्विजये
जयदेवसुतः सोयं पुष्पदेवसहोदरः ।
सुभद्रागर्भसम्भूतः क्षत्रियान्वयवर्धनः ॥६६॥
जातः श्रीनगरे रम्ये श्रीचन्द्रवरदानतः।
गुरूपदिष्टकार्याणि यो यथावदपूरयत् ॥६७॥
शतधा द्रवमाणस्य शतद्रोस्तारभूस्थिते ।
फिल्लौरपत्तने सोयं समाधि प्राप निश्चलम् ॥६८।।
फिल्लौरपत्तनमिदं देशे पञ्चनदाभिधे।
प्रसिद्धमस्ति दुर्गेण यत्समन्ताद्विशोभितम् ॥६॥
अद्यापि यत्र मुनयो मुनिमार्गपरायणाः ।
कणेहत्य तपोयोगमाचरन्ति गतलमाः ॥७॥
पह गोविन्ददेव जी श्रीनगर के रहने वाले क्षत्रिय कृत तिलक जयदेव के पुत्र
सुभद्रा माता के गर्भ से उत्पन्न हुये थे, पुष्पदेव इनके सहोदर छोटे भाई थे। यह
दोनों श्रीचन्द्र जी के परदान से उत्पन्न हुये। गोविन्ददेव ने अपने गुरुदेव की
समस्त आज्ञायें पूर्ण करके शतद्रु के तट पर विद्यमान फिल्लोर शहर में भन्तिम
समाधि प्राप्त की। यह फिल्लौर पञ्जाब मान्त में प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ पर भाज
फल किला बना हुभा है.। भान भी पहां पर पहुत से उदासोन योग-साधन में
बगे हुये हैं ॥ ६६-७०॥
। शासा परिचयः]
गोविन्द देवशाखीया वहवः सन्ति भूतले ।
निवेशास्तेषु कतिचिनिवेद्यन्ते यथाक्रमम् ॥७१॥.
साधुवेलाभिधं स्थानं तच्छाखीयः प्रवर्तितम् !
यदद्य लभ्यते सिन्धोर्मध्यभागे व्यवस्थितम् ॥७२||
अस्मादपरमास्थानं सुधासरसि लभ्यते।
तस्मादप्यपरं दिव्यं रामानुजपुरे स्थिरम् ॥७३॥

अष्टादशः सर्गः ३९७ --- गोविन्ददेवशाखेयं समासेन मयेरिता । दृश्यतां पुष्पदेवस्य शाखाग्रे मत्समीरिता ||७|| गोविन्ददेव की पद्धति के बहुत से आश्रम इस समय भारत में मिलते हैं, उनमें साधुपैसा नामक स्थान सक्सर सिन्ध में है, संगल वाला अखादा अमृत- सर में है और बाग वाया हमारा लखनी में है। यह तीनों स्थान गोविन्ददेव की पद्धति के हैं। यहां तक हमने गोविन्ददेव की शाखा का वर्णन लिखा, भर हम पुष्पदेन के विषय में लिखते हैं ॥७१-७४ ॥ पुष्पदेव इति यस्य मनोज्ञ नामधेयमभितो निगदन्ति ।। विश्रुतः स जयदेव सुनोयं स्वागतानि विदधे गुरुकृत्ये ॥७५|| विश्रुतेन भुवने जयदेव- स्यात्मजेन यदिकारि मुनीनाम् । कार्यमुत्तमतमं नहि कश्चि- तचकार गुरुपादृतवार्यः ॥७६॥ एप विश्रुतकथः कथनीयं यद्यदाविरकरोट्टुचि तत्तत् । गीयते मुनिगणेन कथासु स्वागतोचितपदेः प्रथितासु ॥७॥ गुर्जरदविडमद्रकलिङ्गा- नाङ्गमगधानधिगत्य । भावगुम्फितपदेरयमेकः श्रीगुरोश्चरितमेपु वितेने ॥७॥ .

३९८ जगद्गश्नीचन्द्रदिग्विजये आदराहतविलोचनपातः स्वागतानि बहुशः प्रतिगृह्णन् । मन्दमन्दगमनीयममन्दं मन्दरध्वनिगभीरमवोचत् ॥७॥ ससार में जिसका पुष्पदेव के नाम से सम्बोधित करते हैं, जयदेव के उस मसिद्ध पुत्र ने श्रीचन्द्र के सम कार्यों का स्वागत किया । जगत्मसिद इस पुष्प- देव ने गुरु का जो उत्तम दङ्ग से काम किया उसकी तुलना ससार में किसी से नहीं की जा सकती है । इन्होंने जा कुछ काम किया उसकी चर्चामायः मुनिगण समय समय पर करते रहते हैं। गुजरात, द्रविड़, मद्रास, गङ्ग, पा, कलिङ्ग इन सब देशों में जाकर इन्होंने गुरुफा सिद्धान्त मनुष्यों को समझाया । इनके बोलने का ढङ्ग ऐसा था कि पे मादर से सबको देखते हुये सब फे यहां स्थागत पूर्षक जोकर मन्दर ध्वनि के समान गम्भीर शब्दों से सरको मुग्ध करते थे ॥७५-७९॥ विश्वविश्रुतमनोरमकीतें- रस्य भव्यचरितस्य जनस्य । केन केन मनुजेन न लोके गोयतेत्र विविधा गुणपंक्तिः ॥८॥ अद्भुतप्रथितवीर्यविमर्द- ध्यस्तवैरिनिवहोदितसाराः। कान्दिशं न ययुरस्य विपक्षाः कान्दिशीकपदमेत्य सकक्षाः,८१॥ आदरेण गुरुणा यदभीष्टं शिष्टमिष्टवचनरुपदिष्टम् । तदिशिष्टकरणेरवशिष्ट मिष्टतामनयदात्मनि तुष्टः॥२॥ -

३९९
अष्टादशः सर्गः
पूर्वमेव सनकादिभिरुक्तं
तत्वमन गुरुणा पुनरुक्तम् ।
स प्रसार्य जगदेव विमुक्तं
यचकार तदलं भुवि युक्तम् ॥८॥
एवमत्र मतमस्य विशाखं
यच्चकार गुरुमएडलशाखम् ।
श्रीगुरोः कथनमुन्नतशाख
तद्भवे भवतु सत्फलशाखम् ॥४॥
जगत्मसिद्ध इस महानुभाव का सप्तार में कौन मनुष्य आदर पूर्वक प्रतिदिन
स्मरण नहीं करता है ? इनके बल-वीर्य और पुरुषार्थ को देख कर फोन ऐसा
विपक्षी या ?.जो दुम दवाकर नहीं भागता पा, गुरुने आदरपूर्वक निस सपने हृद्गत
भभिप्राय को इनके समक्ष उपस्थित किया था उसका इन्होंने पूर्ण रूप से पालन
किया । सनकादि प्रदिष्ट जिस मार्ग को गुरु नो ने दुबारा उपस्थित किया था
उसका सर्वत्र फैला कर इन्होंने अपने योग्य ही काम किया अनेक शाखाओं में
विभक्त निस उन्नत शाख मत को श्रीचन्द्र जी ने विशाख रूप (चीज रूप) में
मकर किया था, उसको आपने सत्फल शाख बनाकर दिखा दिया ||८०-८१॥
एवं श्रीपुष्पदेवस्य विपये यदुदीरितम् ।
तद्भवत्वतिमोदाय कवीनां दूरदर्शिनाम् ॥५॥
गोविन्ददेववदयं पुष्पदेवोपि भूतले ।
उदासीनं मतं तेने बहुशासं यथायथम् ॥८॥
देश पचनदं प्राप्य जीवनान्ते स योगवित् ।
वहादुरपुरे लेभे समाधिमुपसंगतम् ॥८॥

४००
जगद्गश्रीचन्द्रदिग्विजये
यत्राद्य मञ्जुलतरं पुष्पदेवीयपद्धतेः ।
स्थानमेकं वरोवर्ति मुनिमएडलमएडनम् ॥८८||
उदारचरितो यत्र महानद्य विराजते ।
श्री विश्वम्भरदामोल सनातनपथानुगः ||६||
एतावदस्य विषये विविच्य हृदयस्थितम् ।
निवेद्यते भक्तगिरेः शाखावृत्तं यथाक्रमम् ॥६॥
यहां तक हमने पुष्पदेव का वृत्तान्त लिखा है। गोविन्ददेव के समान पुप्पदेश
ने भी अनन्त शास उदासीन मत का पूर्ण रूप से प्रचार किया । अन्त में पाप
में जाकर होशियारपुर जिले के वहादुरपुर नामक ग्राम में अचल समाधि ग्रहण
की। वहां पर भाजकया आपकी पद्धति का एक स्थान विद्यमान है, जिसमें मान्त
विश्वम्भरदास जी रहते हैं । यहां तक मने पुष्पदेन का वृत्तान्त लिखा है, अब
हम भक्त भगवान को शाखा का वर्णन करते है ।।८५-९०॥
भक्तो भक्तगिरियोभूनमुनेः शिष्यः पुरा क्रमात् ।
सोपि सर्व मुनेः कार्य पूरयामास यत्नतः ॥११॥
जीवनान्ते स भगवान्भक्तः सिन्धोस्तटे शिवे ।
लेभे समाधिमचलं योद्यापि भुवि लभ्यते ॥२॥
एतच्छाखीयमुनिभिर्वहवोत्र भुवस्तले ।
मुनीनामाश्रमा. पुण्याः प्रायस्तीर्थेषु कल्पिताः ॥३॥
गोविन्दानन्दमुनिभिर्वा राणस्यां प्रवर्तितः ।
विद्यालयो महानेकः श्रीचन्द्रपदभूपितः ॥४॥
एतच्चाखीयगोविन्दानन्दशिप्यैः प्रबर्जितम् ।
यमद्य दर्शनानन्दः संचालयति सूद्यमः ॥१५॥

४०१ अष्टादश सः एतस्याः पद्धतेरेव राणोपालीति विश्रुतम् । अयोध्यायां वरीवति महदास्थानमुत्तमम् ॥६६॥ आत्मस्वरूपमुनिभिर्हरिद्वारे निवेशितम् । गुरुमण्डलमेतस्याः शाखाया विश्रुतं पदम् ॥७॥ रम्ये राजगिरावध हंसदेवेन शोभितम् । पदं यदस्ति तदपि भक्तशाखीयमीक्ष्यते ॥१८॥ एवमत्र समासेन यस्या वर्णनमाहितम् । शाखा भक्तगिरेः सेयं ज्ञातव्या मुनिनायकः ॥६६॥ भीचन्द्र जी के शिष्यों में भक्त भगवान के नाम से जो शिष्य हुये हैं उन्होंने भी यत्न से मुनि की आज्ञाभों को पूर्ण कर के जीवन के भन्त भाग में सिन्यु के वट पर समापि प्राप्त की, जा आज भी देखने में आती है। इनकी शाखा में अनेक महानुभागों ने उदासी मुनियों के भनेक स्थान बनाये, निनमें पहिला श्रीचन्द्र विद्यालय है। इसका स्थापन काग्री मे आशा भैरव के सामने मुनिवर श्रीगोपिन्द जी ने किया था। आजकल इसका सञ्चालन श्री स्वामी दर्शनानन्द मो नेदान्तकेसरी कर रहे है। इनकी शाखा का दूसरा स्थान अपोध्या में रानोपाला के नाम से प्रसिद्ध है । वौसरा स्थान हरिद्वार में गुरु-मण्डलामम नाम से प्रसिद्ध है, जिसका स्पापन श्री आत्मस्वरूप नी महाराज ने किया था। इस स्थान के वर्तमान सबालक मान्त भीरामस्वरूप नो हैं। इसी शाखा का गैया स्थान मगर देश में रानगिरि के पास है, जिसमें भानफन स्वामी सदैव जी निवास करते हैं । इस प्रकार सभेप से निसका वर्णन मने किया हैवह भक्त भारान् को शाला समझनो पाहिये ।।९१-९९॥

४०२
जगदधीचन्द्रदिग्विजये
अतः परमहं वक्ष्ये प्रधानपरिचालकान् ।
गुरुसंगतशाखायाः क्रमेण मुनिनायकान् ॥१०॥
केन न ज्ञायते लोके नास्तिकवातमर्दनः ।
उदासीनो बालरामः सर्वशास्त्रविचक्षणः ॥१०॥
महापुरुपनामानो यदध्यक्षाः क्रमेण ते ।
सप्ततीतस्यभूवंस्तेरविन्दानन्दयोगिनः ॥१०२॥
गोकुले यदवस्थानमद्यापि परिलभ्यते ।
मोपि श्रीकाठिणगोपालदासोभून्मुनिनायकः ॥१०॥
सम्पादकपदेनाद्ययो बुधैः परिगीयते ।
स्वामी रामस्वरूपोयं केन न जायते भुवि ॥१०॥
एवंविधा मुनिचरा यस्यामासन्पुरे पुरे ।
गुरुमंगतशाग्वेयं मा मयात्र निदर्शिता ॥१०॥

४०३ अष्टादशः सर्गः [ शाखा परिचय ] अतःपरं वर्तमानकार्यालयपरिस्थितिः। प्रदर्श्यते समासेन या करोति यथोचितम् ॥१०॥ वर्तमानेत्र समये दश शाखाः प्रतिष्ठिताः। उदासीनस्य लभ्यन्ते सम्प्रदायस्य सर्वतः ॥१०॥ अनिकुएडपुरस्कारशदाभ्यां ताः समासतः । कथ्यन्त धार्मिकजनस्तत्र तत्र निवेशिताः ॥१०॥ पारिभापिकशब्दाभ्यामुभाभ्यां लक्षणावशात् । व्यञ्जनानुगतस्तत्र कश्चिदर्थोवगम्यते ॥१०॥ अन्तरङ्गपदं प्राता वालहासादयो मुनेः। शिष्याः सवेंगिकएडेति पदेन परिलक्षिताः ॥११॥ श्रय हम वर्तमान अखाड़ों के विषय में कुछ लिखते हैं। [पूर्व समय में श्रीचन्द्र जी ने स्वय जिस पश्चायतन का स्थापन करके उसके मण्डलाध्यक्षों का निर्वाचन किया था पर पञ्चायतन तेरहवें सर्ग के अन्त भाग में दिखाया जा चुका है ] वर्तमान समय में उदासीन सम्पदाय की दस शाखायें है । जिनमें चार अप्रि- कुण्ड (धूना) के नाम से प्रसिद्ध है और छ पुरुस्कार (पकशीश) के नाम से प्रसिद्ध है। इन दो पारिभाषिक शब्दों से लक्ष्यार्थ को अनुपस्थिति में व्यापार्य से काम लिया जाता है अन्तरङ्गरूप में परिणत पालहासदि जो भगवान् के शिष्य भगवान् के समाप्त में पण्डलपति निर्वाचित हुये हैं वे [ उदासीन सम्पदाय की प्रपा के द्वारा ] अग्नि कुण्ड (धूना ) के साधु कहे जाते हैं और जो भक्तगिरि आदि पहिरण शिण भगवान् के पीछे मण्डलपति नियत हुये हैं ये घर माप्त पुरस्कार के कारण पुरस्कार के साधु ( अथवा ) वफशीश के साधु कहे जाते हैं ॥१०६-११०॥ बहिरङ्गगता ये ये भक्तगिर्यादयो मुनेः । शिष्याः मर्वेपि ते लोके पुरस्कारपदे स्थिताः ॥१११॥ मर्वेपामैकमत्येन पचायतनमंस्थितिः । पूर्वमासीत्परं साऽद्य दैविध्यमुपमङ्गता ॥११२|| ४०४ जागाभीपददिग्विजय लभ्यते विक्रमान्दो यः शून्याकाशनवेन्दुभिः । तस्यान्तभागे महती मंहतिः स्थापिताः बुधैः ॥११३॥ नवीना संहतियेयं लभ्यते यत्रकुत्रचित् । विशां शताब्दीमभ्येत्य मारम्भे स्थापिताऽभवत् ॥११॥ सत्यश्मश्रुमुसा ये ये मुनेः शिष्याः पुराभवन् । तेरियं कल्पिता शाखा द्वितीया याद्य लभ्यते ॥११॥ वरदानं मुनेरेतत्पुरानेन प्रतोपिणा । अवाप्तं गुरुपादेभ्यो यस्येदं फलमाभवत् ।।११६॥ पूर्वा शाखातिमहती स्थापिता यमहोदयः। गोविन्ददेवशाखायां तेषां वर्णनमीक्ष्यताम् ।।११७॥ मएडलद्धयमप्येतत्प्रयागनगरे स्थिरम् । वरीवति ययोः शाखाः मर्वतीर्थेषु संस्थिताः ॥११॥ सर्वासामपि शाखानां वर्णनं विपयक्रमात् । पूर्वमेवाहितं सर्गे तदप्यन्यत्र वीक्ष्यताम् ॥११॥ पञ्चायतनसंस्थायाः स्थापनं मुनिना कृतम् । त्रयोदशे मया सर्गे निवेदितमनुक्रमात् ।।१२८॥ पहिले सर की सम्मति से पश्चायतन का काम चलता था परन्तु कुछ समय के बाद उसमें दो विभाग हुये । विक्रम की उन्नीसवीं के अन्त में निर्वाण मियतमदास जी ने उदासीन सम्पदाय का बड़ा अखाड़ा स्थापित किया और नया अखादा विक्रम की वीसवी सदी के आरम्भ काल में स्थापित हुआ है इतना ही इन दोनों अखाड़ों के समय में अन्तर है। [वर्तमान समय में आपस के वैमनस्य के कारण नया अखाड़ा बड़े अखाड़े से अलग होकर काम करता है इन दोनों सस्याओं के रजिष्टर्ड नाम अलग अलग हैं एक का नाम [ उदासीन पञ्चायती बड़ा अखाड़ा ] है दूसरे का नाम उदासीन पञ्चायती नया अखाड़ा है पश्चायतन पञ्चपरमेश्वर यह दोनों नाम एकार्यक हैं ] 1) - pe अष्टादशः सर्गः ४०५ सत्यश्मश्रु आदि जो भगवान् के शिष्य अथवा मशिष्यं भगवान् के बाद मण्डलपति निर्वाचित हुये हैं उनके अनुयायियों द्वारा नया अखाड़ा बड़े अखाड़े से अलग होकर काम करने लगा है क्यों कि उनको भी सम्भदाय की एक शाखा चलाने का वरदान भगवान् दे चुके थे । वरदान वृथा हो नहीं सकता इसीलिये उसके परिणाम में शाखाओं में वैविधय होना स्वाभाविक है पहिली शाखा का जिन्होंने स्थापन किया था उन प्रियतमदास आदि का वर्णन गोविन्ददेव की शाखा में किया जा चुका है इन दोनों छोटे बड़े अखाड़ों का प्रयाग में कार्यालय विद्य. मान है वाकी शाखा कार्यालय सब तीर्थों पर काम करते हैं। अन्य सब शाखा कार्यालयों का भी वर्णन इससे पूर्व हो चुका है उसका यहाँ पर दुहराना व्यर्थ है पश्चायतन का वर्णन तेरहवें सर्ग में हो चुका है इसलिये उसका दुहराना भी अर व्यर्य है ।। १११-१२० ।। अतीते वर्तमाने वा ये ये मुनिमतानुगाः। अभूवन्समये तेषामतःपरमवस्थितिः ॥१२॥ मुख्या मुख्यतरास्तेषु ये ये मुख्यतमाः क्रमात् । अनुक्रमेण पश्यन्तु सर्वे ते वर्णनक्रमम् ॥१२२॥ इनके अनन्तर अर हम माचीन अथवा नवीन उन महानुभावों का वर्णन करेंगे जिनको मुरय मुख्यतर और मुख्यतम माना गया है ॥ १२१ १२२ ॥ आद्यो बभूव किल तेषु महोदयेषु धन्यो वदान्यचरितो जनतासु मान्यः । लोकोपकारकरणार्पितजीवनश्रीः श्रीमानलं जगति सुन्दरदासवेद्यः ॥१२॥ अस्यावदातचरितस्य भिषग्वरस्य शिप्यावभूवुरमितप्रतिभाः शतन्ते । येरादरान्निजगुरोः करुणावशेन मन्ये जगहतमिदं गतसर्वरोगम् ॥१२॥ वैदेशिकानि धनधर्महराणि योः यो निरस्य विविधातिविडम्बनानि । .

- ४०६ जगदुरुभीचन्द्रदिग्विजये यः स्वागतं चरकसुश्रुतवाग्भटानां चक्रे तदुक्तवहुयोगनिरूपणेन ॥१२५॥ नानावलेहवटिकासवतैलचूर्ण- काथाज्यफाएटरसधूपविलेपनाद्यः । सिद्धाञ्जनस्तदनु मञ्जनवतियोगैः सद्यः समुन्नतगदं शमयाम्बभूव ॥१२६॥ उत्खातभूमिषु विपाएयमृतानि येन सन्धुक्षितामिपरिदग्धमदानि कृत्वा । सञ्जीवनोपमनिजौपधदानयोगा- सञ्जीवितं जगदिदं करुणार्णवेन ॥१२॥ यस्यागुतक्रमपरस्य भयेन भीता रोगाः सजीववपुषो मरुतासहैव । । बङ्गानगुः प्रसभमङ्गकलिङ्गभागा- न्केचिजवेन विविशुः किल मद्देशान् ।।१२८॥ उनमें सर्व प्रथम वैध सुन्दरदास जी हैं जिन्होंने लोकोपकार धुदि से सब फाम फर सुन्दर पय प्राप्त किया है ससार में इनके शिष्य एकसौ वैध आज कल काम करते हैं जिन्होंने ससार को बहुत अशों में मुक्त कर दिया है वैध सुन्दर- दास जी ने अपने समस्त जीवन में धन धर्म के हरने वाले विदेशी औषधों का बहिष्कार करके अपने आयुर्वेदोक्त औपधों का बल पूर्वक प्रचार किया । अनेक प्रकार के आसव, अवलेह, वटिका, तैल, काय, घृत, फाण्ट, रस, धूप, मरहम, अञ्जन, और मान आदि से आप सघः बहे हुये रोगों को शान्त फरते थे आपने विपों को पृथिवी में गाद फर फिर उनको दम्प फरके अपने सीवनोपम औपपियों से जगत को सोषित कर दिया । आपके भय से बहुत से रोग उत्तर भारत को छोड़ कर अङ्ग बङ्ग फलिङ्ग और मद्रास में जाकर अपना कार्य क्षेत्र बना सुके हैं ॥ १२३-१२८ ॥

४०७ अष्टादशः सर्गः अस्य शिष्या महात्मानः सर्वप्रान्तेषु विश्रुताः । लभ्यन्ते यरिदं व्याप्तं त्रैलोक्यमिव विष्णुना ॥१२॥ गुर्जरे केपि लभ्यन्ते केचित्पञ्चनदेऽपरे । युक्तप्रान्तपुरेप्यन्ये तदन्ये मध्यभारते ॥१३०॥ भ्रमता ये मया दृष्टा विशिष्टास्तेषु सर्वतः । तेषां कपाचिदत्राद्य निर्देशः स्थाप्यते रसात् ॥१३१॥ आपके बहुत से शिष्य समस्त भारत में विष्णु की तरह व्याप्त है उनमें कोई गुनरात में कोई पञ्जाव में कोई युक्तमान्त में और कोई मध्य भारत में मायः रहते हैं। देश भ्रमण प्रसङ्ग में उनमें से जिनको हमने देखा है उनका असा प्राप्त वर्णन हम यहां पर करते हैं ।। १२९-१३१ ।। प्राणानानन्दयितुं समस्तलोकस्य भेषजैदिव्यः। प्राणानन्दपदं यः स्वयं समागास विद्यते वैद्यः ॥१३॥ श्रीचन्द्रपादयोर्यः श्रद्धामद्धा समयॆ तहत्तम् । आनन्दमाप लोके श्रद्धानन्दः स वैद्यराजोस्ति ॥१३३।। सत्वं रजस्तमोभ्यां विशुद्धमेव प्रकाशते यत्र । शुद्धप्रकाशनामा स वैद्यवर्यः प्रकाशते लोके ॥१३॥ वेणीव मातृभूमे- विधा विभक्ता विभाति यं प्राप्य ।

४०८ . जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये सन्दृश्यतां तृवेणी- दासः सोयं महत्त्वमापन्नः ॥१३५॥ सन्तोपि यस्य सन्तत- मारादिच्छन्ति दर्शनं लोके । वैद्यः स सन्तरामः सन्ततरामं करोति भूलोकम् ।।१३६॥ माणों को आनन्द देने के कारण जिन का नाम प्राणानन्द हुआ श्रीचन्द्र जी के चरणों में श्रद्धा रखने के कारण उनके दिये हुये आनन्द से जो श्रद्धानन्द हुये रजस्तमोरहित शुद्ध सत्व प्रकाश के कारण जो शुद्धप्रकाश हुये मातृभूमि की एक वेणीको त्रिया विभक्त कर उसके दास्प में जो तृवेणोदास हुये राम का सन्तत स्मरण करने के कारण जो सन्तराम हुये वे क्रमशः माणानन्द श्रद्धानन्द शुद्धम- काश तृवेणीदास सन्तराम ससार में प्रसिद्ध हैं ॥ १३२-१३६ ॥ एवंविधा महान्तः सहस्रशो यस्य शिष्यतामाप्ताः । वेविद्यन्ते वैद्याः स वैद्यनाथः कथं न लोके स्यात् ॥१३७॥ श्रीरामचन्द्रभूमा- वारामं यः प्रसाधयामास । नाम्ना माधवरामो रानोपालीमहत्त्वमध्यास्ते ॥१३॥ इस प्रकार अनेक वैद्य जिनसे शिक्षा प्राप्त कर संसार को जीवन दान दे रहे है उन सुन्दरदास जी को यदि हम वैवनाय कहें तो अत्युक्ति न होगी। [अर महन्तों का वृत्तान्त सुनिये] 1 भगवान् रामचन्द्र जी की जन्मस्थली अयोध्या में जिन्होंने आराम पना पर आनन्द का स्रोत यहाया हुमा है ये महन्त माधवराम जी रानोपाली नाम की उवामीनों की बड़ी गहो पर विराजमान है॥१३७-१३८|| L ४०९ - सम्प्रीणयत्यतितरां परमार्थदृष्टिः ॥१४२॥ अष्टादशः सर्गः।. बेला समस्तमुनिमण्डलमएडनाय यः साधु साधुजनसंहतिमातनोति ।। श्रीचन्द्रसद्गुरुपदाम्बुजदत्तचित्तः सर्वत्र विस्तृतकथो हरिनामदासः ॥१३॥ समस्त मुनि मण्डल के मण्डनार्थ जो अच्छे प्रकार मर्यादा की तरह सजनों की सङ्गति में लगे रहते हैं वे भगवान् श्रीचन्द्र जी के अनन्य भक्त जगत्मसिद्ध श्री १०८ योगिराज बनखण्डी सिंहासनासीन दानवीर महन्त श्री १०८ हरिनाम दास जी साधुवेला तीर्य [ सक्खर सिन्ध ] हैं ॥ १३९ ।। दास्यं समस्तजगतामपहाय येन सर्वातिनाशनपरं हरिनामदास्यम् । अङ्गीकृतं जगति सार्थकनामधेयः सोयं कृती विजयते हरिनामदासः ॥१४०|| ससार की तुच्छ दासता छोड़ कर जिन्होंने समस्त दुःख नाशक केवल हरि नाम का दास्य अङ्गीकार किया है वे अन्वर्थ नाम-धेय महन्त हरिनामदास जी धन्यवाद के योग्य है ॥१४० ॥ यस्यानसत्रमभितः समुपागतानां नानादिगन्तरगताखिलमानवानाम् । सेवामहर्दिवमनुक्रमतः करोति सोयं स्ववैरिविजयी हरिनामदासः ॥१४१|| सब और से आए हुये महानुभावों की अहर्निश सेवा करने के लिये साधु वेला तीर्य में जिनका अन्नसत्र सर्वदा खुला रहता है वे दानवीर महन्त हरिनाम- दास जी धन्य हैं ।। १४१॥ यः कुम्भसङ्गतमुदासिगणं यथाव- दाराध्य दानवहुमानपरम्पराभिः । विद्वज्जनानपि यथोचितदानमानः ४१० जगद्गुरुमीचन्द्रदिग्विजये प्रत्येक कुम्भ के महोत्सव पर जो उदासीन मण्डल की अनन्य भाव से सेवा फरते हुये अन्य आगत विद्वानों का भी ययावसर सत्कार करते हैं ।। १४२॥ श्रीचन्ददिग्विजयमादरतो दिहतु- यः सत्वरं तदुपयोगि समस्तमेव । आयोजनं बहुविधाय मुनेःप्रमाद- माकांक्षते भवतु सोत्र चिराय मान्यः ॥१४३।। "जगद्गुरु श्रीचन्द्र दिग्विजय " की दर्शनेच्छा से जिन्होंने उसके प्रकाशन फा बहुत अंशों में आयोजन एकर कर जगद्गुरु के प्रसाद की आकांक्षा में बहुत सा समय व्यतीत किया है वे मदन्त इरिनामदास जी चिरफाल तक जगत के मान्य यने रहें यही हमारी अभिलापा है ।। १४३ ।। यो वालहाममुनिमएडलमान्यसंस्था- मध्यास्य राजविभवोचितमागतेषु । मानं तनोति सुकृती स वदान्यवृत्तो वेविद्यते जगति लक्ष्मणदामभूपः ॥१४॥ पालद्वारा पदति के मुनि मण्डलों की माननीय संस्था पर आसीन और जो भागत मजनों का गनविभाचिन म्यागत करते हैं वे श्रीमान् योगिरान गुरु राम- राय सिंहासनाध्या शाइना गहानशीन श्री १०८ महन्त, लक्ष्मणदास जी गुरु रामराप दायार [देहगन ] विमान है।१४४ ।। पूर्वप्रतिष्ठितजगदुलरामराय- मम्पर्धिनापिलममृद्धिममेधिनम्य । यम्याद्य मर्यमहनीयगुणोन्नतम्य राजोचिनानि करणानि ममुलमन्ति ॥१४५|| इसरो पर परिन मरने या गुरु गराप जी के दाग यहाई सम्पत्ति पा रोग पनि पाने निम मान्न या गरोगन गन पान्य गंगार मापात काल माननाग ना रिमा निगमागमन गरी निपे माप॥१४५॥ --

४११
अष्टादशः सर्ग.
लोकाभिरामनवसद्गुणगुम्फितस्य
यस्यात्र शासनजुपः परिचीयमानाः।
प्रान्ताधिपेष्वपि बहुप्ववदानभाव-
मुद्भावयन्ति गरिमाणमुपागतस्य ।।१४६॥
उत्तम गुणों के आधार स्वरूप जिस महन्तका वर्तमान समय के सर्वोमत राज
फर्मचारी राजोचित सन्मान कर अभिनन्दन करते हैं गुरुत्व को माप्त हुये उस महन्त
लक्ष्मणदास जी का हम कहां तक वर्णन कर सकते हैं ॥ १४६ ॥
संवत्सरे निजगुरोर्गुणगौरवाणा-
मुच्चैस्तरां परिणति जनताजनेषु ।
यः साभिमानमधिरोप्य समागतानां
मोदेन सत्कृतिमुपायनदः करोति ॥१४७॥
मति वर्ष एक बार अपने पूर्व महन्तों का महत्त्व स्मरण करने के लिये उनके
स्मारक रूप में जो झन्डे फा मेला लगवाते है उनके विषय में अधिक परिचय देने
को आवश्यकता नहीं है ॥१४७ ॥
तस्यातिगौरवजुपो यशसाम्प्रसूते-
भूमीश्वरस्य महिमोढ़तमानभूमेः ।
किं किं न विस्तृतकथं चरितं मते में
यदर्णनाहमिह नास्ति गुणातिरेकात् ॥१४॥
उस महन्त का ससार में कौन ऐमा कार्य है जो विस्तृत रूप में वर्णन
करने के योग्य न हा इसलिये उनकी महत्त्व सीमा के विषय में अधिक लिखना
-
पर्य है॥१४८॥
येनातिभव्यगुरुमएडलरक्षणाय
लोकाभिराममुपलब्धमिदं शरीरम् ।
रामस्वरूपमधिगत्य स एव मन्ये
भूयस्तदेव कुरुते यदकारि पूर्वेः ॥१६॥

४१०
.
जगदुरुपीचन्द्रदिग्विजये
प्रत्येक कुम्भ के महोत्सव पर जो उदासीन मण्डल की अनन्य भाव से सेवा
करते हुये अन्य आगत विद्वानों का भी ययावसर सत्कार करते हैं ॥ १४२ ।।
श्रीचन्द्रदिग्विजयमादरतो दिहतु-
यः सत्वरं तदुपयोगि समस्तमेव ।
आयोजनं बहुविधाय मुनेःप्रसाद-
माकांक्षते भवतु सोत्र चिराय मान्यः ॥१४॥
"जगद्गुरु श्रीचन्द्र दिग्विनय " की दर्शनेच्छा से जिन्होंने उसके प्रकाशन फा
बहुत अंशों में आयोजन एकर फर जगद्गुरु के प्रसाद की आकांक्षा में बहुत सा
समय व्यतीत किया है वे नन्त इरिनामदास जी चिरफाल तक जगत के मान्य
पने रहें यही हमारी अभिलापा है ॥१४३ ।।
यो वालहासमुनिमण्डलमान्यसंस्था-
मध्यास्य राजविभवोचितमागतेषु ।
मानं तनोति सुकृती स वदान्यवृत्तो
विद्यते जगति लक्ष्मणदामभूपः ॥१४॥
पालदास पदनि के मुनि मण्डलों की माननीय संस्था पर आसीन होकर जो
भागत सजनों का रानरिभाचिन म्यागत परते है ये श्रीमान् पोगिराज गुरु राम•
राप मिरासनाध्यक्ष शाहना गानशीन श्री १०८ महन्त, लक्ष्मणदास नी गुरु
रामराप दरपार [ देवगन ] विद्यमान है । १४४ ॥
पूर्वप्रतिष्ठितजगद्गुरुरामराय-
मम्बधितापिलममृद्धिममेधितस्य ।
यस्याद्य मर्वमहनीयगुणोनतम्य
गजोविनानि करणानि ममुममन्ति ॥१४५||
जप गरी पा पनि ने गा गुरु गराप नी के दाग पाईपणि
भांग पाने याप्न निगपाल पागमा गनमान्य गंगार में मपाल
२ से मान नाममदाप भीगो नि पाग न ! भगत गरी रिपे
पाप॥१५५॥

अष्टादशः सर्गः
-
लोकाभिरामनवसद्गुणगुम्फितस्य
यस्यात्र शासनजुपः परिचीयमानाः।
प्रान्ताधिपेष्वपि बहुप्ववदानभाव-
मुद्भावयन्ति गरिमाणमुपागतस्य ॥१४६॥
उत्तम गुणों के आधार स्वरूप जिस महन्त का वर्तमान समय के सर्वोन्नत राज
कर्मचारी गोचित सन्मान कर अभिनन्दन करते हैं गुरुत्व को प्राप्त हुये उस महन्त
लक्ष्मणदास जी का हम कहां तक वर्णन कर सकते हैं ॥ १४६ ॥
संवत्सरे निजगुरोर्गुणगौरवाणा-
मुच्चैस्तरां परिणति जनताजनेषु ।
यः साभिमानमधिरोप्य समागतानां
मोदेन सत्कृतिमुपायनदः करोति ॥१४७॥
प्रति वर्ष एक बार अपने पूर्व महन्तों का महत्त्व स्मरण करने के लिये उनके
स्मारक रूप में जो झन्हे का मेला लगवाते है उनके विषय में अधिक परिचय देने
की आवश्यकता नहीं है ।। १४७॥
तस्यातिगौरवजुपो यशसाम्प्रसूते-
भूमीश्वरस्य महिमोद्तमानभूमेः ।
किं किं न विस्तृतकथं चरितं मते मे
यदर्णनाहमिह नास्ति गुणातिरेकात् ॥१४॥
उस महन्त का ससार में कौन सा ऐमा कार्य है जो विस्तृत रूप में वर्णन
करने के योग्य न हो इसलिये उनकी महत्त्व सीमा के विषय में अधिक लिखना
व्यर्थ ॥१४८॥
येनातिभव्यगुरुमएडलरक्षणाय
लोकाभिराममुपलब्धमिदं शरीरम् ।
रामस्वरूपमधिगत्य स एव मन्ये
भूयस्तदेव कुरुते यदकारि पूर्वेः ॥१४६॥

४१० ... जगदुरमीचन्द्रदिग्विजये प्रत्येक कुम्भ के महोत्सव पर जो उदासीन मण्डल की अनन्य भाव से सेवा फरते हुये अन्य आगत विद्वानों का भी ययारसर सत्कार करते हैं ॥ १४२ ॥ श्रीचन्द्रदिग्विजयमादरतो दिदृशु- यः सत्वरं तदुपयोगि समस्तमेव । आयोजनं बहुविधाय मुनेःप्रसाद- माकांक्षते भवतु सोत्र चिराय मान्यः ॥१४॥ "जगद्गुरु श्रीचन्द्र दिग्विजय " को दर्शनेच्छा से जिन्होंने उसके प्रकाशन का पहुत अंशों में आयोजन एकत्र कर जगद्गुरु के प्रसाद फी आकांक्षा में पहुत सा समय व्यतीत किया है वे महन्त इरिनामदास जी चिरफाल तक जगत के मान्य पने रहें यही हमारी अभिलापा है ।। १४३ ॥ यो बालहाममुनिमएडलमान्यसंस्था- मध्यास्य राजविभवोचितमागतेषु । मानं तनोति सुस्ती स वदान्यवृत्तो वेविद्यते जगति लक्ष्मणदामभूपः ॥१४॥ पालदास पनि के मुनि मण्डलों को माननीय संस्था पर आसीन होकर जो भागत सजनों या रानरिभोचित स्वागत करते है वे श्रीमान् योगिराज गुरु राम- राम सिंहासनाध्या गाइना गरीनशीन श्री १०८ पदन्त, लक्ष्मणदास नी गुरु रामराप दग्पार [देगन ] शिरमान है ।' १४४ ।। पूर्वप्रतिष्ठितजगद्गुरूरामराय- मम्बधितापिलममृद्धिममेधिनस्य । यम्याद्य मर्यमहनीयगुणोनतम्य राजोविनानि करणानि ममुनमन्ति ॥१४५।। मग पर पति ने गांगुगाराप नी दाग पदाई दुई गति पा भाग माने पाल निम पाल का मापा गनमान्य मगा में मापात मन मनगटाग ना गिरे नि पागनभा रात्रि मान्य ६ ॥११॥ म अष्टादश सर्गः लोकाभिरामनवसद्गुणगुम्फितस्य यस्यात्र शासनजुपः परिचीयमानाः। प्रान्ताधिपेष्वपि बहुप्ववदानभाव- मुद्भावयन्ति गरिमाणमुपागतस्य ॥१४६॥ उत्तम गुणों के आधार स्वरूप जिस महन्तं का वर्तमान समय के सर्वोमत रान कर्मचारी राजोचित सन्मान कर अभिनन्दन करते हैं गुरुत्व को माप्त हुये उस महन्त लक्ष्मणदास जी का हम कहां तक वर्णन कर सकते हैं ॥ १४६ ॥ संवत्सरे निजगुरोर्गुणगौरवाणा- मुच्चैस्तरां परिणतिं जनताजनेषु । यः साभिमानमधिरोप्य समागतानां मोदेन सत्कृतिमुपायनदः करोति ॥१४॥ प्रति वर्ष एक वार अपने पूर्व महन्तों का महत्त्व स्मरण करने के लिये उनके स्मारक रूप में जो झन्डे का मेला लगवाते हैं उनके विषय में अधिक परिचय देने की आवश्यकता नहीं है ॥१४७ ॥ तस्यातिगौरवजुषो यशसाम्प्रसूते- भूमीश्वरस्य महिमोद्तमानभूमेः । किं किं न विस्तृतकथं चरितं मते में यदर्णनाहमिह नास्ति गुणातिरेकात् ॥१४॥ उस महन्त का ससार में कौन सा ऐमा कार्य है जो विस्तृत रूप में वर्णन करने के योग्य न हो इसलिये उनकी महत्त्व सीमा के विषय में अधिक लिखना व्यर्थ है ॥१४८॥ येनातिभव्यगुरुमएडलरक्षणाय लोकाभिराममुपलब्धमिदं शरीरम् । रामस्वरूपमधिगत्य स एव मन्ये भूयस्तदेव कुरुते यदकारि पूर्वेः ॥१४६]] - -- ४१४ . . . जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये यश्चेतनामयवपुः किल चित्स्वरूपे- णाविश्य सर्वमिदमात्मभवं यथावत् । एको विभाति बहुविम्वगतः स लोके केनार्थ्यते न भुवि चेतनदेव-देवः ॥१५७॥ चिद्रूप से समस्त जगत् में प्रविष्ट होकर स्वयं चेतन स्वरूप जो देव एक होने पर भी प्रतिविम्ब भेद से 'अनेक प्रतीत होता है वह चेतनदेव फिसको पाञ्छनीय नहीं है १ ॥१५७॥ गुरुमुखतो नाधीतं दास्यं येनाप्य तद्गृहे तत्वम् । चेतनदेवस्याएं तेन कथङ्कारमात्मना कार्या ॥१५८|| जिसने दास्यभाव अङ्गीकार फरफे गुरुमुग्व से शास्त्रों का तत्व प्राप्त नहीं किया यह अपने शरीर से चेतनदेव की पूजा फिस प्रकार कर सकता है ? अर्याद गुरुमुखदास पन फर हो चेतनदेव ( ब्रह्म की ) सेवा कर सकता है जो सबकी शरीर रूप (कुटिया ) में रह रहा है ॥१५८॥ ''. सुन्दरतां गुणनिष्ठा दास्येनाध्यास्य यो महानन । पूरणदासेत्यभिधा- मवाप कस्तस्य दर्शनं नेच्येत् ॥१५॥ गुणगत सुन्दरता को दास्प से प्राप्त कर निहोंने पूरणदास नाम को अवर्ष पनाकर संसार को अपनी गुणानुगता का परिचय दिया है घे दक्षिण हैदराबाद फी उदासीन गरी के मान्त स्वनामधन्य थी पूरणदास जी किस के लिये दर्शनीय नहीं है १ ॥१५९॥ एभिः सङ्केतपदे रभिघावद्धः सुलक्षणावद्भिः ) ४१५ अष्टादशः सर्गः . को माप्त कर जो भवन मे पिरानते हैं घे भचतानन्द जी, गोविन्द के नाम श्रवण से ही जिनका आनन्द पढ़ता है वे गोविन्ददेर जी, अन्य अवतारों को चर्चा में व्यज्यन्ते ये मुनय- स्तात्पर्याख्या भजन्तु ते वृत्तिम् ॥१६॥ ( स्पष्टार्थमेतत्पद्यम् ॥ १६० ॥) धर्मावतार इति यं प्रवदन्ति लोके धर्माय योवतरति प्रमभं महेशः । रामादयस्त्रिभुवनप्रथितप्रभावा- स्तस्यैव भूमिवलये कलयावताराः ॥१६१॥ [ सनातनधर्मविजयाद] संसार जिनको धर्मावतार कहता है और धर्म की रक्षा के लिये समय समय पर जो अवतार लेते हैं रामकृष्णादि सब उनके ही अशावतार हैं ॥१६१ ॥ दुर्लभं दर्शनं यस्य मुनिभिः परिकीर्त्यते । सुदर्शनो मुनिः सोयं भूतले दृश्यतां जनैः ॥१६२|| आनन्दमचलं प्राप्य भुवने योवतिष्ठते । अचलानन्दतां प्राप्तः स कोप्यवतु मण्डलम् ।।१६॥ गोविन्द इति नाम्नेव यस्यानन्दः प्रवर्धते । गोविन्दानन्दरूपेण सोवतीर्णः प्रकाशते ॥१६॥ अन्यावतारचर्चायामानन्दो यैर्न लभ्यते । कृष्णानन्द यथाकाम ते भजन्तु भुवस्तले ॥१५॥ विशुद्धं यत्पदं प्राप्य निवर्तन्ते न मानवाः । विशुद्धानन्दरूपेण तेवतीर्णा मुनीश्वराः॥१६॥ रामदासपदं प्राप्य पुनरिच्छन्ति ये सुखम् । जानकीदासतां लोके गुर्जरेऽनुभवन्ति ते ॥१६॥ जिनका दर्शन मुनिजन भी दुर्लभ बतलाने हैं वे सुदर्शन मुनि, अचल आनन्द

४१८
जगनुरुलीचन्द्रदिग्विजये
लवपत्तने यथाव-
त्प्रधानपीठं समेत्य सौवर्णम् ।
मोदेन यो जयन्ती-
महोत्सवं तत्र कारयामास ॥१८॥
जिन्होंने सांसारिक तुच्छ पढायों से अपनी दृष्टि हटाकर गुरुओं द्वारा समस्त
दर्शन और वेद पढ़कर केवल ज्ञानवेद्य ब्रह्म सुख का अपने हृदय में अनुभव
किया है ? जिन्होंने काशी में विद्वद्वर श्रीकाशीनाथजी से वेदान्त और अभिनवगदा-
घर श्रीवामाचरण भट्टाचार्य से न्याय पहा है, जिन्होंने काशी में हरिनारायण जी
तिवारीसे कौमुद्यादि व्याकरण ग्रन्य और दुःखभञ्जनात्मन से साहित्य अन्य क्रमशः
पड़े हैं, जिनके विद्यागुरु और दोसा गुरु श्री रामानन्द जी राजोआना (लुधियाना)
में अपने गुरुवर श्री सुन्दरदास जी के निवास स्थान पर रहते हैं, जिन्होंने कुछ
काल तक अश्यापनकार्य करके संवत् १९८२ में अपने गुरु की आज्ञा से सनातन
वैदिक धर्म का प्रचार कार्य आरम्भ किया, जिन्होंने समस्त मान्तों में और समस्त
तीयों में भ्रमणकर अपने प्रचार के द्वारा सनातनधर्म को ऊपर उठाया है, जिन्होंने
सर्व प्रयम सिन्ध प्रान्त में जाकर वहां अवैदिक अनार्य कपोल कल्पित नवीन मतों
का उच्छेद करके मनुष्यों के हृदयों में सनातनधर्म का महत्त्व स्थापित किया है,
जिन्होंने सिन्ध के बाद पञ्जाव में आकर स्वार्य पर प्रतिनिधि सभा का विचित्र
ढोंग तोड़कर वेदिक वल्लरी का वीजारोपण कर दिया जिन्होंने नडियाद में
महन्त जानकीदास को महासत्र करने का परामर्श देकर तीन वर्ष तक लगातार वेद
दर्शन और अठारह पुराणोंका माचन कराया और उसके अन्तमें एक महायज्ञ कराया
जिसमें १०८ श्रीमद्भागवत पारायण तया सप्तशती के १०८ सम्पुट पाठ हुए
[इम महायनमें तीन लक्ष धन व्यय हुआ और पांचलक्ष मनुष्यों का भोजन हुआ]
निन्होंने स्थानीय पुरातन सनातनधर्म सभा के सुवर्ण जयन्ती महोत्सरपर स्थानीय
समस्त सनातनधर्मियों की प्रार्थना स्वीकार करके उसका अध्यक्षपद ग्रहणकर लाहौर
की जनता में धर्म प्रचार का कार्य सुचारु रूपसे सम्पन्न कराया (?)७१-८०॥
श्रीकृष्णचन्द्रनाम्नः-
समादरेणाप्य सैन्धवं देशम् ।
यो वेदमन्दिरस्य
प्रशस्नमारम्भमेधयामास ॥११॥

अष्टादशः सर्गः ४१९ अमृतसरसि येनाकारि दुर्गम्यतोय- प्रसृतिविषमकार्यस्यापि यत्नेन पूर्तिः । प्रथितजलधिकन्याकान्तमन्तः प्रसाद्य क्रममनुसरता तं यो वृतः पूर्वजातैः ॥१२॥ नवाहसप्ताहविधिप्रदिष्ट- पारायणैर्यः प्रथयाम्बभूव । पदे पदे श्रीरघुनाथगाथा मनस्युपेतां यदुनाथगाथाम् ॥१८॥ सुवर्णवर्णामृतवारिपूर- प्रवृत्तकल्लोलपरम्पराभाम् । यदीयवाणीमनिमेपनेत्राः पपुर्जनौघा दशलक्षसंख्याः॥१८|| जिन्होंने सिन्ध हैदराबाद में श्रीमान् सेठ लेखराजनी के सुपुत्र सेठ कृष्णचन्द्रजी को परामर्श देकर एक दिव्य घेद मन्दिर की स्थापना कराई ? जिन्होंने सवत् १९९७ वें में अमूसर जाकर वहां पर दुर्गियाना सरोवर में लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पास पड़ी नहर से जलधारा लाकर अपने प्रभाव से वहां के जल फष्ट को सर्वदा के लिये दूर कर दिया इस महोत्सव के उपलक्ष्य में नयाद और सप्ताद हुए जिनमें ३० सहस्र जनता उपदेशामृत पीकर सन्तुष्ट होती थी। शरत्पूर्णिमा के दिन यह सब समारोह तीन ला जनताके समक्ष में हुआ था ।।१८१-१८४।। यदीयसन्मएडललब्धदीक्षाः पुरे पुरे भारतभूमिभाजाम् । समुद्भति कर्तमनेकयने- रनारतं कार्यभरं यहन्ति ॥१८॥ परिश्रमाद्यस्य यथावकाशं वाराणसीमध्यगतः प्रसिद्धः ।

४२० . 11- जगद्गनीयन्द्रदिग्विजये श्रीदुण्डिराजानुगते विभाति विद्यालयः श्रीभवने यथावत् ॥१८६॥ वृन्दावने यस्य विशालभूमौ परिश्रमाद्दिव्यविभिन्नशालम् । विभाति भव्य भवनं मुनीनां विनोदनाय प्रतिपाद्यमानम् ॥१८॥ कुम्भादिपर्वस्वपि यस्य योगा- दरिद्रनानाजनपोषणार्थम् । प्रवर्तते सत्रमुदारभावा- त्पदीयते यत्र जलानदानम् ॥१८॥ श्रीचन्द्रपादानुगतस्य तस्य गङ्गेश्वरानन्दमहोदयस्य । किमत्र वक्तव्यमनन्तकीतें- स्नन्तवीर्यस्य मया चरित्रम् ॥१८॥ जिनके साथ रहने वाले उदासीन मण्डल में पढ़कर सहस्रों विद्वान् भारत में आपण फर इस समय पर तर सर्वत्र सनातनधर्म का कार्य कर रहे हैं (१) जिनके परिश्रम से वर्तमान समय में काशी का उदासीन सस्कृत विद्यालय बड़ी उमति के साथ अग्रगामी हो रहा है (१) जिनके परिश्रम से वृन्दावन में स्टेशन के पास विस्तृत मैदान में बड़ा भारी उदासीन मुनिमण्डल का एक विद्यालय पनरा है () निनके परिश्रम से कुम्भ आदि महापों पर ददि जनता के उपकारार्थ अन्न सन खुला रहता है (१) जिनके पर्तव्यों का ऊपर के पयों में सक्षिप्त परिचय दिया जानुका है ये हमारे अभिन्न हदय परमपित्र स्वनाम धन्य परमादरणीय प्रमनिष्ठ घेददर्शनाचार्य महामण्डलेश्वर श्री१०८ गावरानन्दजी महारान है ।।१८५-१८९।। एवंविधा निगमतत्वविदः प्रसिद्धा यस्यावदातवरितस्य यथावकाशम् ।

माता पिता से मुनकर स्तनपान के साथ २देरराणी पा भी पान फिया ॥१९३ ४२१ अष्टादशः सर्गः जिसने पाल्यकाल में ही फुल परम्परागत देवाणी को रिना प्रयास गायन्ति सद्गुणगणानवदानपद्यैः श्रीचन्द्रएव भगवान्स जगत्सु मान्यः ॥१०॥ संसार में इस प्रकार के अनेक महानुभाव जिनका प्रतिदिन गुणगान करते हैं वे जगद्गुरु श्रीचन्द्र भगवान् ही एक मात्र स्तुत्य और धन्य हैं ॥ ९ ॥ तस्योदयात्प्रभृति सर्वमनुक्रमेण वृत्तं यथावदनुगृह्य परिथमेण । लोकोपकारमनसा स कविश्चकार काव्यं निसर्गमधुरं भगवत्प्रसादात् ॥१६॥ उनका अवतरण से लेकर अचल समाधि पर्यन्त जीवन का समस्त वृत्तान्त एकपर निसर्ग मधुर शब्दों में इस प्रस्तुत महाकाव्य में उस महाकवि ने वर्णन किया १ [जिसका वंश परिचय अग्रिम पधों में हैं ] ॥ १९१॥ [कविवंशवर्णनम् ] वंशं सनाव्यमधिगत्य विधेनिदेशा- धर्मेण यां समधिगत्य सुबुद्धिदेवीम् । काले कलावपि मुनिप्रवरः स टीका- रामो मुनिः फलमिवाप यमादिपुत्रम् ॥१६२॥ भगवान् को प्रेरणा से सनान्य वंश में जन्म लेकर श्रीमती सुदिदेवी का धर्म से पाणिग्रहण करके मुनिवर श्री टीकाराम शास्त्री जी ने सस्याथम के पण फलस्वरूप जिनको प्राप्त किया ॥ १९२॥ पित्रोरनुक्रमवशेन गृहेनिविष्टां देवी गिरं हृदयमादरतः प्रविष्टाम् । यो वाल्य एव जननीस्तनदुग्धपान:- साकं पपी श्रुतिपयानुगतां यथावत् ॥१६॥ 7 - गङ्गोत्तरीभवसरिनटपुण्यभूमी . यज्ञोपवीतमधिगत्य पितुःमकाशाद ।

४२४ जगद्गुरुभीचन्द्रदिग्विजये उसी अखिलानन्द शर्मा ने अनूप शहर में रहकर गङ्गा तट पर इस जगद्गुर श्रीचन्द्र दिग्विजय महाकाव्य का निर्माणकर मुनि मण्डल के लिये इसको अर्पित कर दिया ॥ २०२॥ [श्रद्धाञ्जति समर्पण] एवं निवेद्य हृदयोद्गतमात्मभावं भावाभिराममनसा वचसा शिवस्य। नन्नम्य पादयुगलं भवतापशान्त्यै सन्दीयतेञ्जलिरयं भगवत्पदेष।।२०३ इस प्रकार अपने हगत अभिप्राय को कहकर अब हम भगवान् श्रीशङ्करके चरणों में प्रणामकर भवताप निवारणार्थ उनके श्रीचरणों में श्रद्धाजलि अर्पित करते हैं।२०३ स्वीकृत्य त सभगवानमृतांशुमौलिः पादारविन्दपतिते मयि दिव्यदृष्टिम् । नित्यं तनोतु वितनोतु समस्तलोके कीर्ति ददातु हृदयस्थितमस्ति यद्यत् ॥२०॥ वे भगवान् शङ्कर हमारी श्रद्धाञ्जलि को स्वीकार फर चरणों में नतमस्तक मुझपर सर्वदा कृपा दृष्टि का सञ्चार करें ? और हमारी कीर्ति को सर्वत्र विस्तृत करें और हमारी समस्त अभिलापाओं को पूर्ण करें । २०४ ।। एतावदद्य विनिवेद्य यथावकाश भावोन्नतेन मनसा शिवसन्निधाने । पूर्वानुवृत्तविषयावसितेः प्रसङ्गा- दृष्टादशोयमपि पूर्तिमुपैति सर्गः ॥२०॥ यही उनके श्री चरणों में भावोन्नत मन से निवेदन कर पूर्वानुगत विषय के समाप्त होने पर इस महाकाव्य का यह अन्तिम सर्ग समाप्त किया जाता है ॥२०५॥ इतिश्री सनाध्यशोद्भर कविवर श्रीमदसिलानन्दशर्मप्रणीते सतिलके जगद्गुरुश्रीचन्द्रदिग्विजये महाकाव्ये प्रचारकनिरूपण नामाष्टादश सर्ग * समाप्तमदो महाकाव्यम् के ब्रह्माग्निविष्णुपदनेत्रमिताङ्कपद्यम् ॥२०३१॥ -

Jagatguru Shrichandra Digvijayam Mahakavya

Author
Sharma,khilanand
Title
Jagatguru Shrichandra Digvijayam Mahakavya
File name
Jagatguru Shrichandra Digvijayam Mahakavya
Text
OCR done
Citation
1942
Published
2012/08
Publisher
Banaras.,udasin Sanskrit Vidyalaya
Language
Sanskrit
Pages
443
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313044
Barcode
99999990321771.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
BmwK9gVPQTE
Download PDF

Jagatguru Shrichandra Digvijayam Mahakavya