Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Lekhani Bela
Front matter
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१५
टमा
ज्ञानपीठ लोकोदय-ग्रन्थमाला-हिन्दी ग्रन्थाक-६४
लेखनी-बेला
तथा
दिल
अन्य कृतियाँ
धीरेन्द्र मिश्र
भारतीय ज्ञान पीठ.का शी
ज्ञानपीठ लोकोदय-प्रथमाला-सम्पादक और नियामक
श्री लक्ष्मीचंद्र जैन एम० ए०
प्रकाशक
मनी,भारतीय ज्ञानपीठ
दुर्गाकुण्ड रोड, वाराणसी
प्रथम सस्करण
जनपरी १६५८०
मूल्य तीन रुपये
मुद्रक
बाबूलाल जैन फागुल्ल
समति मुद्रणालय
दुर्गाकुण्ड रोड, वाराणसी
यह सृजन 'लेसनी बेला' में अपनी कविताओंके सम्बधमें स्वयम् कोई वतव्य में नहीं दे रहा है। पिछले सग्रह 'गीतम' (१९५३) म भी में इससे बचा था। भविष्यमें यदि आवश्यक सममूंगा तो सविस्तार कुछ कहूँगा। और तभी रचनामूलक मेरे दृष्टिकोण, मान्यताएँ, तथा मन्तव्य हिन्दी काव्य और काव्यकारसे सम्बद्ध भूमियोपर उजागर हा सकेंगे। 'गीतम' के पश्चात् लिसित मेरी छोटी-बडी सत्तारन रचनाओं के इस प्रतीक्षित नये गीत-समहम प्रेमी पाठकों और श्रोताओंको पूर्व परिचय का आकर्षण मिलेगा। मैंने यहाँ कुछ उन कविताओंको भी स्थान दिया है जो गीतम कालके पहलेकी हैं पर महत्वपूर्ण हैं । 'मसूरी' एक ऐसी ही ध्वनि रचना है, जिसे मेंने रगावलोकन तथा दृश्य प्रभावकी एक ही कलम से उक्त प्रकृति केद्र घूमते समय ज्यों-का-त्यों रेसाकित कर लिया था। 'देश' भी है इसमें, जिसका व्यापक रूप से स्वागत हो चुका है। देशकी सस्कृति और शान्तिकी पृष्ठभूमिपर इतिहास, भूगोल और राजनीतिको नामावली प्रणालीमें सर्वदा लिसित रचनाओंसे भिन्न है यह सगीतमयी कृति । क्ला और सास्कृतिकताके उपेक्षित तत्त्वों का इसमें पालोकन हुआ है। इस समह म अत्यन्त छोटे गीत भी है जिहें अपने विशष छन्दों में लिखा गया है। कुछ अन्य गीत है जिनमें विभिन जीवनानुभूतियाँ अपनी तरह से अभिव्यक्त हुई हैं। विगत सग्रहकी ही भांति इस
[ ४ ]
सफलनम भी मृत्यु, निराशा तथा रीतिकालीन शृङ्गार-गधसे मुक्त
गीतों द्वारा नये वातावरणका प्रभार निदित हुआ है।
भारतके सारशतिक प्रतिनिधि मण्डलके एक सदस्यके नाते
अपनी नेपाल-यात्राके समय विमानका अपना यानानुभव हिन्दी
वर्तमान काव्य घरातलके प्रतीक रूपमें मुक्त छन्द के 'वायुयान में
सहज भावसे व्यक्त करनेका एयत्ल किया है।
विविध रूप विधानके इस सग्रहमें कृतित्वको मनोवाछित अभि
व्यक्ति मुझे अधूरी ही लगती है । शब्द-स्वर द्वारा अभी अनकहे
हिमालयकी कितनी अनवरत अभिव्यजना होनी है। फिर भी यदि
इन रचनाओं में मुझे कहीं कोई सफलता मिली हा तो उसे पाठक
और समीक्षक अग्रसर कर सकते हैं । उहें मेरा अभिम धन्यवाद !
आने का आजार
वीरेन्द्र मिश्र
लश्कर (ग्वालियर)
रचना-क्रम ६ १८ २१ २३ २५ २८ १ शब्द-स्वर वाले दुराहे पर [लेखनी ला] २ तू सिसकती शाम-सा गमगीन है ३ मिले हो तो कहो कुछ तुम ४ मिल गये हो मददगार हम-उम्र तुम ५ आज मुझसे कहा गीत ने ६ घटा उठे.तो मेरा भी मन हो ७ तुम्हारे प्यार की दहरी बुलाती है मुझे ८ ऑसू बिल्कुल ही सो जाएँ ६ जाते-जाते मुड-मुड कर मत देसो तुम १० जा रहा हूँ, नहीं भूलना ११ दूरी और निकटता का अद्भुत विस्तार हुआ जाता है १२ तेरै हर ऑसू से बोझिल है मन मेरा १३ तुम मेरे गीतों के द्वारे आयो ना पात्रो २४ मेरे नयन की उदासी तुम्हें ज्ञात है १५ खडा उम्र की दहरी पर में सोचता १६ श्राज मावस मुझे है मिली १७ पीता हुआ,अँधेरा बढ़ता जाता हूँ १८ बढा दिया है पाँच आज मैंने अलबेली राह पर १६ एक सस्ती मिली ३६ ४६ । ५१ ५७ - [ ६ ] २० हो रहे है सर तरफ से २१ किमी स्वप्न को सोज लाने डगर पर २२ रो-रो कर सिन्दूर ढूँढती २३ जब भी गिरा एक आसू कहीं ६० ६४ ६८ ما २४ सपन सभी जो ७३ २५ इस दिये के माथ पर ၂၄ २६ सुख भी छूटा ७६ २७ मन | तुम न दृट्टो अभी हार कर २८ विल्कुल नये अश्रुके राहियो । २६ निशा के राजकुँवर । [ डूबते चोद के प्रति ] ८७ ३० कुकुम पिसेरती सुवह सुहागिन गाती है [ फागुन ] ८६ ३१ कि जर नील नभ में चमकता सितारा [जहू-स्मृति ] ६२ ३२ सावन ने तो आसें भर डालीं वादल से ६५ ३३ ठण्डी-उण्डी छाँव है [ मसूरी] ३४ नीली निशा के किनारे [ सितारे ] १०६ ३५ घिरते रहो, घुमडते रहो [वादल से] १०६ ३६ पगडण्डी से जाने वाली युग की भोर ] १११ ३७ हग की दुकान पर २८. जिस समय से रचा गीत है ११५ ३६. किमने निहारा ४० मेने कोहनूर-सा प्यार किया १२० ४१ चूल्हा जलता रहे जिन्दगी का सदा [गीत की विक्री के १२२ पणाम गीत के प्रति गीत ] ४२ मेरे मन तुम पढ़ा और समझो तो इस ससार को [ وام
३
[ ७ ]
४३ कलम चल रही है कागज पर
१२६
४४ तोडने को डोर पल में तोड दूं, मुश्किल नहीं है
१२६
४५ ओ समय की वसती किरन ।
४६ सत्य को एक बार देसा
४७ भैरवी का है समय
[गीतकार के प्रति] १३७
४८ मिट्टी से फसलों का सोनादेने वाला देनता [ किसान ] १३६
४६ लो अब गाता हूँ
[ देश १४१
५० आगाज आ रही है [कलम के जादूगरो । उठो ] १४६
५१ ज्योति दो
१५७
५२ गूंज-भरे जगल में
२६२
५३ अाज मैं आकाश में हूँ
२६६
५४ साझ सकारे चन्दा सूरज करते जिसकी आरती १७२
५५ कौन स्वीकारे भरी अजलि नयन की
१७५
५६ बोल, बोल, बोल, अरी वेला ! तू है कहाँ
१७८
५७ मजिल के मन्दिर में, पूजा के थाल-सा
१८१
中 -
लेखनी-बेला
शब्द-स्वर वाले दुराहे पर
देस तो रे, जुड़ रहा मेला
योन पर है गीत का जादू
लेखनी में गूंजती बेला
करपना के कण्ठ में सरगम
भैरवी में भावना का म
दो उगर है एक मजिल की
धार दो हैं, एक है सगम
दर्द को गह्नादयो मे सुन
गीत की गहरादयों में बुन
मन निराशा से नहीं बला
पास तो आसावरी के जा
दावे से
रौट आ पिडले भुलाने से
गीत है सागर
अगर सगीत मन्थन है
व्यक्ति का अभिव्यक्ति में अद्भुत विसर्जन है
गद्य वाले राज-पथ पर तू
व्यर्थ जाकर हाथ मत फैला
तू कहेगा कौन
गॅज पर छाया तिमिर कैसा
योम है तम के शिविर जैमा
जर अमित-फित सृजेता भी
कार सम्भव है न पिर ऐसा
लेसनी-बेला
जन कि ज्वाला शान्त होगी कल
यह सठी दृष्टान्त होगी फल
यह फि कविता की ध्वजाओ को
आह से फूटी ऋचाओं को
लोग कुछ करते उजागर थे
धूल में भी फूल के स्वर ये
जान या विज्ञान के तूफान के आगे
थे नहीं सर लोग
भेडो की तरह भागे
गीत की रस-रागिनी सुनकर
थम गया था अश्रु का रेला
छन्द रे, म्वछन्द होकर गा
मत कहीं भी बन्द होकर गा
मॉस से सींचे बगीचे में
पल-सा ग्विल, गन्ध होकर गा
गन्ध लेकिन गॅजती भी हो
धूल जिसको पूजती भी हो
बन म्वयम् मन्दिर निवेदन का
हो नहीं बन्धन विशेषण का
लेसनी-चेला
अश्रु ही दीवार हो उसमें
म्वप्न वन्दनवार हो उसमें
धूप से थक लेखनी जो डॉह में उतरी
थाम ले तू आज उसकी पीर की गठरी
ज़िन्दगी के चन्दनी तन का
चॉदनी ऑचल हुआ
मैला
१२
लेसनी-येला
२
त सिसकती शाम सा गमगीन है
आ तुझे सिलती फिरन तक ले चले
गीत के रूपम गगन तक ले चलूं
लेरानीचेला
म्वप्न तेरे उड गये आकाश में
तू पुना तो ऑमुओ के हार से
तेरता मन कृल वारी प्याम में
क्या उमे फिर द्वीप के त्योहार से
तू अ-पूजित मूति-सा चुपचाप है
आ तुझे मुग्वरित सपन तक ले चलूँ
माफ-सुथरे आचरण ल च→
तक
,
टेन्वते हम आ रहे हर क्न गरम
रेत के हर श्वेत रेगिस्तान म
एक हिरनी, एक तृष्णा, एक भ्रम,
प्रश्न फिर है ही नहा मधुपान का
गन्ध तू भटकी हुई वीरान में
आ तुझे तेरे परन तक ले चलूँ
एफ सिन्दूरी चमन तक ले चलूं
हर दिशा म भागनेवाली हवा
देस, सूनी है मलय की पालकी
जुड़ रही है सर्द सॉसों की सभा
और त्यौरी है बदलती काल की
लेसनी बेला
१४
जो कि तेरे ही दुग्खो से है दुखी
चल उसी भीगे नयन तक रे चलूं
चॉद को जाते चरण तक ले
जगमगा तू चॉदनी की सेज पर
मै रहें तो द्वार का स्वरकार ही
मजिलो के मन्दिरी में भेजकर
मै रहूँ तो सिर्फ वन्दनपार ही
मूक राधा की निरुत्तर बॉसुरी
चल तुझे सगीत-क्षण तक ले चलूँ
रूप-मन को गीत-मन तक ले चलें
सनी-येला
३
मिले हो, तो, कहो कुछ तुम, कहें कुछ हम, सुने जीवन
बहुत दिन बाद फिर सुनने-सुनाने का हुआ है मन
लेसनी-पेला
न जाने तुम कहाँ किम पन्थ मे चलकर यहाँ आए
कहीं पर भोर की होगी कि जो ढलकर यहाँ आए
जरा बोलो किरन-स्वर मे, धुंधलके के कटें बन्धन
न रूठे तुम, मगर फिर भी मनाने का हुआ है मन
,
जवानी की मियासत-से, यहाँ तुम मौन बैठे हो
हृदय रह-रह यही कहता, न जाने कौन बैठे हो
कहीं तुम भी जगत की भाँति, बदले तो नहीं इस क्षण
न हम-तुम मिल सकें या भी, ज़माने का हुआ है मन
कहोगे तुम कि क्यो सन्देह की यह कल्पना की है
रुआसी साध ने मेरी, तुम्हारी साधना की है
बहुत है आँसुओ का मोल, मेरी सॉस का क्रन्दन
इसी से फिर तुम्हे अपना बनाने का हुआ है मन
अधर की प्यास झूली है, सलोनी याद के झूले
कहो सघर्ष की गाथा, कहाँ भटके, कहाँ भूले
जरा अब मुस्कराओ भी, खिले मधुऋतु, बहे मावन
वसन्ती चॉदनी झूम जाने का हुआ है मन
न जो गाया गया, वह गीत गाने का हुआ है मन
मिले हो तो, कहो कुछ तुम, कहे कुछ हम, सुने जीवन
लेसनी-बेला
मिल गये हो मददगार हम-उन तुम
लग रहा है चमकता सितारा मुझे
स्वार्थी विश्व में है किसे क्या पता
प्यार कितना मिला है तुम्हारा मुझे
१८
तेसनी-बला
मै भ्रमर गीत जर गुनगुनातो रहा
पारखी एक श्रोता मिला ही नहा
थे महकते रहे डालियो पर बहुत
धूल म फूल कोई खिला ही नहा
गीत की आरती का समय हो गया
तब तुही ने नयन भर निहारा मुझे
ताज
संगमरमर हिला देखकर
प्यार इतना मिला है तुम्हारा मुझे
का
जब निगा का प्रथम ही प्रहर या ल्गा
ज़िन्दगी का दिया टिमटिमाने लगा
ऑसुओ की झडी, ऑधियो का तिमिर
काल शतरज अपनी निठाने लगा
तर तुम्ही नेह लेकर प्रकाशित हुए
चाहिये और क्या था सहारा मुझे
रूप फितने खडे आज पछता रहे
प्यार इतना मिला है तुम्हारा मुझे
भूल पाए न तुमको निछुड कर, मगर
भूल बैठे तुम्हें भी कि जन आ मिले
ये हमारी तुम्हारी कशिश खून है
तुम हमें जब मिले, गीत से जा मिले
लेसनी-बेला
१६
और सच तो यही, हो विरह या मिलन
प्रेरणा बन तुम्हीने
तुम मे दिय रहे, हम तुम्हें रिस रहे
प्यार इतना मिला है तुम्हारा मुझे
पुकारा मुझे
रोशनी दे रहे चॉद-सूरज, मगर
दर्द दिल का नहा वे बटा पा रहे
एक तुम प्राण के दीप हो मनचले
साथ मेरे खुशी से जले जा रहे
यह जलन है मधुर, यह तपन है बहुत
जन्म लेना पड़ेगा
दुवारा
उम्र में प्यार का कर्ज चुकना कठिन
प्यार इतना मिला है तुम्हारा मुझे
मेघ का राज है, खूब अन्धेर है
चिमनियो के धुएँ म छुपे है सपन
और आओ निकट, मत डरो आग से
है प्रलय-काल, फिर भी बढाओ चरण
एक पतार तुम, एक पतवार मैं
ले चलो नाव, दिखता किनारा मुझे
तीर पर जो खडे हँस रहे, देख लें
प्यार स्तिना मिला है तुम्हारा मुझे
२०
लेसनी-बेला
आज मुझसे कहा गीत ने
मन किसी रूपका जीतने
मौज से हार जा
लेसनी-बेला
२१
ऑख तूफान की अनसुली
चॉदनी है नहाई - खुली।
आज मुझसे कहा रूप ने
डॉव दी शीतला धूप ने
ज़िन्दगी वार जा
सिर्फ तू ही नहा है दुखी
पी रही पीर चन्दा-मुखी
आज मुझसे कहा प्राण ने
सम के भेद को जानने
अश्रु के द्वार जा
म्वप्न के माथ पर है शिस्न
इस किनारे थकन ही थकन
आज मुझसे कहा प्यार ने
धार में उठ रहे ज्वार ने
तू नदी-पार जा
२२
लेसनी रेला
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पिछी मधुऋतु ने पी ली थी साँसों की सुरमई सुराही
चलते अन ये झुलसे अमलतास-से नयन प्राण के राही
कोई पीर नढी बन जाए अँखिया नीर परमने को
तो उमडें-घुमड गीतों के मेघ-महार बरसने को
पगटण्डी वैमी ही टेढ़ी, लेकिन यह सूनी-सूनी है
या तो वह मस्थल की दासी, या वह साधू की धूनी है
कोई भीगी हुई सॉवर्ग नागिन आए उसने को
तर तो सम्भव है आ जाए रिप पर सुधा बरसने को
अम्बर के ऊँचे मचान से कजरी गा, बढरी कनरारी ।
चुल् मे ही पी रेंगे हम. ढोल जरा क्वारी पनिहारी !
मन हरियाग जामुन चुनर, चूंघट उठा दरमने को
मेरे गीत बड़े आकुर हैं तेरे माथ परमने को
अमराई कर रही प्रतीक्षा, सारन का हमराही आग
चाना यहां दरटया जाए, कोयर रहा रिमझिमा जा
उच दिन को मिल जाय नगरिया इन्द्र-धनुष की, वमने को
युग-युग मा रे रगमममी, मातो ग बरमने को
लेसनीयला
७
तुमारं प्याकी दहली जुलाती है मुझे
हमी से में तुम्हारे द्वार जाया करता हूँ
बती-गा
सयानी रात करती यात मेरे चॉद से
मुझे लगता कि कोई गत रानी खिल रही
सपन मेरा जुडा जाता तुम्हारी आँख से
मुझ लगता कि है कोई कहानी चल रही
तुम्हारी प्यास तो पागल बनाती है मुझे
इसी से मे समन्दर साथ राया करता हूँ
जरा-सी जिन्दगानी है, बहुत-से दर्द है
मगर आकाशने दुग्खडा सुनाया है फिमे
सलौने है कि जो अरमान मेरे, सर्द है
मगर उनसे कहो मेंने सताया है झिसे
तुम्हारी पीर वीणा-सी लुभाती है मुझे
इसीसे मै तुम्हें दुखडा सुनाया करता हूँ
निमत्रण-सा रहा से आ रहा सन्देश है
मगर वह चुप नहीं, उसमे बडी आवाज है
सवेरे को हवा हे, और सादा वेश है
तुम्हारा साज वजता है, तुम्हे भी नाज़ है
तुम्हारी रागिनी रगती प्रभाती है मुझे
इसी से मे हमेशा गुनगुनाया करता हूँ
लेसनी-बेला
२६
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८
ऑसू बिल्कुल ही सो जाएँ
सपने अपने में सो जाएँ
तुम इतनी रोशनी न फेंको
बन्द हो जाएँ
मेरे नयन
लेसनी-बेला
माटी का बनगई दिया यह धूल नेह से गीली होकर
छूकर इसे धन्य कचन भी, गप न कुछ भी इसको खोकर
सूरज-चॉद उसे दुलराते
अन्धडआ-आकर फिर जाते
मिट्टी के घर दिया गीत का सदा जला है गाते-गाते
कृति-आकृति सन कुछ लुट जाए
प्राणों का मेला उठ जाए
तुम इतना आकाश न छाओ
धरा-क्षितिज सर कुछ मिट जाए
भूली-भटकी बहुत ज़िन्दगी, आखिर कुछ पा आने को ही
गायक आया, बीन छेडता, आखिर उठगा जाने को ही
मिले मुम्फराहट मज़िल की
इसीलिए तो हूँ मै पथी
अर्थ-हीन मुसकानें होता उसमें, तो क्या मुझसे बनती
,
पत्थर बादल हो जाए
घर का घर पागल हो जाए
तुम इतना उल्लास न बॉधो
सुख से दुख बोझिल हो जाए
लेसनी-बेला
२६
मुझको चरने देना है तो प्यार करो, मजिल बन जाओ
वैसे ही तूफान बहुत है, पथ में तुम ऑधी मत लाओ
निरखो तो परसो भी मन को
मेरे मधुमासी सावन को
ऑग से मत साफ करो तुम मेरे गीतो के दर्पण को
गीत जवानी मे ढल जाए
काल समय पाकर छल जाए
तुमद तना सन्ताप न साधो
जिसमे अगला कल जल जाए
जन्मे हुए गीत-गुञ्जन पर वासन्ती पृरो की टोली
चित्र-लिखित विस्मय-विमुग्ध है, उस पर क्या नीलामी बोली
यह मेरा सगीत सलौना
है बच्चो का नहीं खिलौना
दम पर चल पाएगा केसे स्वर्ण रजत का जादू टोना
यामा मिटे प्रात हो जाए
सन कुछ स्वर्ण-सात हो जाए
तुम इतना मधुमास न व्यापो
पाटल पारिजात हो जाए
३०
लेसनी-चेला
है
जाते-जाते मुड-मुड कर मत देसो तुम
बादल का गगाजल ढुल-दुल जाएगा
लेसनी-बेला
M
इस अक्लुप अक्लक अश्रु के मोती को
दृग-मगम पर तुम्हां लुटाने आये ये
किसी हर्पर्धन की तपमी साधों की
क्या तुम हमको याद दिलाने आये ये
तुटते-लुटते हमको भी मत लूटो तुम
पागल-सा पान-दिल गलगल जाएगा
हग
आज चिदा-बरखा भी धूमिल घडियो में
अमराई का सूना झूला हिरता हे
से
काजल, पग से पायल, रूठ रहे
पर कोई रूठे भी तो क्या मिलता है
खिलते-खिलते प्राणो पर मत खेलो तुम
पाटल-हग में सपना घुल-धुल जाएगा
महबी-लगी-हथेली-जुडी काई की
धडकन को मत सुनो निगाहे गीली हे
श्याम घटाओ के अनचीहें प्यालो से
सर्द हवा ने भीगी मुधियाँ पी सी है
पठी बन कर उड-उड कर मत देखो तुम
घायल-सा म्नेहाश्चर खुल-युर जाएगा
૨
लसनी-बैला
म गीतो के इन्द्रधनुप है, शर हो तुम
जगल में मगर-सी रजनीगन्धा हो
पर उसकी हरियाली रोकोगे कैसे
जो सब कुछ हो पर सावनका अन्धा हो
अगर निरखना हो तो नभ को निरखो तुम
शबनम से मलयानिल वुल-खुल जाएगा
लेसनी-येला
१
३
१०
जा रहा हूँ, नहीं भूलना,
याद करना कि जन झलना,
प्यार की डाल पर
३४
लेसनी-चेला
आज रोती हुई आँख है
और भीगी हुई पॉख है
कल उजाली दिसेगी निगा,
जगमगाने लगेगी दिशा,
चॉट के भाल पर
पीर है, तुम सहो, मै सहूँ
क्या कहूँ, और मै क्या कहूँ ?
देख-मुन राह चरना जरा,
घाटियो में सम्हलना जरा,
खास कर ढाल पर
अब तल्फकर पता था चला
उम्र से उन का फासला
जा रहा मैं अकेला कहा,
हरेगा नहीं,
उड रहे बाल पर
धूल कोई
लेसनी-बेला
दूरी और निकटता का अद्भुत विस्तार हुआ जाता है
इतनी दर रहा न करो तुम जीवन भार हुआ जाता है
लेखनी-रेला
गिनती की सों से है उनपर भी सभार नहा कुछ कम है
अनहोनी बात है जिनका दुर्व्यवहार नहीं कुछ कम है
तिस पर तिल-सा एकाकी हर निमिप पहाड हुआ जाता है
नाव-हीन पतझर आ-आ कर नसा रहा चीरान नगरिया
भाग रहे पछी उड-उडकर, शेष हुए घरबार अटरिया
देर न लगती मधुवन का मधुरन मिम्मार हुआ जाता है
तुम भी कुछ-कुछ खोए होगे, बारम्बार कहो न कहो तुम
चुपके-चुपके रोए होगे, बन जर वार रहो न बहो तुम
तट जिसको समझे था माझी, यह मझधार हुआ जाता है
दुनियाँ का बाजार भरा है, हँसते ऑसू , रोते सपने
नदिया-नाले-पर्वत के उस पार शिविर है अपने-अपने
मेरी प्यासी परको को दर्शन दुश्वार हुआ जाता है
कल तक जो चुप्पी साधे था, प्रिय-नियोग का गीत रुआसा
मेरे पास चग आया है लेकर जाने क्या-क्या आशा
बचना बहुत कठिन है उससे, जो गल्हार हुआ जाता है
लेसनी-बेला
२७
देसो तो, घिरती आती है भोर-गगन मे काली छाया
तयों के दीप-शिखर पर, शरभ बनी कचन-सी काया
अपने हास-स्टन पर अब युगका अधिकार हुआ जाता है
लेसनी-थेला
१२
तेरे हर ऑस से बोझिल है मन मेरा
फागुन की ऑसो में सावन भर आया है
लेसनी-बेला
३४
फिरनी की ऑस सि नेहा मे डनी है
मुझको तो वासन्ती अम्बर भी मावनी
कोई यह कहता है दुखडा यह कम होगा
लिस-लिख कर गा-गाकर सुधियो की लावनी
उजडी सी बस्ती है, जगल है मन मेरा
ऐसे में रोता तू मेरे घर आया है
सामो की राधाएँ, धडकन के मनमोहन
सेले है तेरी उस मन्ती की डॉच में
तूने जो मेरे सन्तापो को दे दी थी
सूरज-सा आया था, चन्दा के गॉव मे
तत्र से ही डाली पर पाटल है मन मेरा
तेरा दुख उसमें अत्र शबनम धर आया है
इतना मत रोना रे, इतना मत दुस देना
रफ जाए दूरी पर, सपनों की पालकी
पानी म तेरी जो फिरनो की इन्द्रेनी
दासी बन जाए यह अँधियारे कार की
वैसे ही युग-युग से घायल है मन मेरा
चिन्ता का पाहुन क्यो माथे पर आया है
४०
लेसनी-येला
३
३
१३
तुम मेरे गीतों के द्वारे आओ ना आओ
दरद भरे मनकी आकुलता को तो आने दो
ननी-बेला
४१
तुम मुझसे अनजान मगर दुग्य तो अनजान नहीं
उससे तो हो चुकी बहुत पहले पहचान नहीं
कहा रहे वह किसी नयन में, है वह मेरा
कैसे कह दू उसको होगा मेरा ध्यान नहीं
तुम अपनी शरबती निगाहे करलो बन्द भले
ऑखो से बह रही सरलता को तो आने दो
जिस बॉसुरिया के प्यासे दिन-रात अधर मेरे
उसी डगर से सॉवरिया तक जाते म्वर मेरे
मन का गान-निवेदन सुननेवाले श्रोता ओ
उसी एक वगी का जादू होता
तुम अपने निर्विघ्न मौन में पल-पल सुखी रहो
बेचारी सगीत बहुलता को तो आने दो
घर मेरे
मै धडकन का प्यासा मुझको भाता घोप नहा
लेकिन मुझको किसी शोर पर रोष नहीं
फिस पर्वत की कौन शिला तुम पता न भक्तो के
पृजन भी है नगा कि जिसमें रहता होग नहीं
तुम पापाणी मूर्ति चने मन्दिर को धन्य रो
पर मुझ तक अपनी दुर्बलता को तो आने दो
लेसनी-
मेरे नयन की उदासी तुम्ह ज्ञात है
रूठे अगर तुम सपन तिलमिला जॉयगे
मेरी खुशी पर दुखी मेव घिर ऑयगे
मैं कह रहा हूँ कि तुम मुस्कराओ जरा
लेसनी-बेला
पूनम-अमावस मिलरी रात की राह पर तुम दिया जगमगाए
चूनर गुलानी नज़र की डा र रुआसे क्षणों को भुराए
जीवन-नदी पर है आज, वरसात है
हारे रहर से रहर म समा जॉयगे
मन के पडोसी-निटेमी न घर ऑयगे
मैं कह रहा हूँ कि तुम जगमगाओ जरा
यह जो उडे जा रहे खग सुबह-शाम, यह जो उडी जा रही धू
यह सन तुम्हे देस कर हो रहा है कि मस्थल बना अश्रु का फू
मन की अपेरी-उजेरी किये साथ है
भूले अगर तुम, नयन टनटना जॉयगे
बीते कथा-गीत भर-भर उभर ऑयगे
मै कह रहा हूँ कि तुम गुनगुनाओ जरा
इंढी बहारं गगन मे, जलधि मे, कहा कुछ मिला ही नहीं प्राण
जब से तुम्हे है निहारा, पुकारा, दुलारा, मिली गन्ध वीरान
तुम पर निछावर सदा पूल है, पात है
गनम स्लाकर सुमन फिर कहाँ जॉयगे
सौग्भ-संदेसे हवा में बिम्पर ऑयगे
मै कह रहा हूँ कि तुम झूम जाओ ज़रा
लेसनी
सब पृटते हो अगर, तो सुनो, एक ऐसी रहर है उठाना हमे
हम-तुम भले हर जाएँ मगर धार से उठ पुकारे जमाना हमें
तुममे ठिपी अनम्ही कौन-मी यात है
जिस दिप्रणय के विहग कग जॉयगे
उस दिन निमिप जिन्दगी के अवर जॉयरो
फिर रह रहा है कि तुम मुम्कराओ ज़रा
लेसनी-बेला
सडा उम्र की दहली पर मैं सोचता-
एक फूल तेरी वेणी मे गूंथकर
जीवन में कब ला पाया मधुमास में
फिर भी चलता ही जाऊँगा निशि दिन बारह मास मे
लेसनी घेला
सदा रहा तुझको बिलखाता हँसते हुए जहान म
तुझे खाच ले गया दूर तक मै आँधी-तूफान मे
जितनी सिन्दूरी साधे था धरती से आकाग तक
एक-एक कर सन सुम्हलाई, धूल हुई वीरान में
आज म्बय मैं अपने से ही पूछता-
एफ पीर अगणित पीरो में पूछकर
कितना तुझको दे पाया उल्लास मे
फिर भी चरता ही जाऊँगा निशि-दिन बारह मास में
कभी सोचता था कि करूँगा होड गगन के चॉद से
बाधूंगा मलयानिर तेरी सॉसो के उन्माद से
रेशम के परिधानो मे दुल्हन नाचेगी झूमकर
मै युग-युग तक प्यार करूगा, नई नली साध से
और आज मै ऑग्य फाडकर देखता-
पास पड़ा अमृत का प्याला छोडकर
चिप पीने का करता हूँ अभ्यास मैं
फिर भी चलता ही जाऊँगा निशि-दिन बारह मास मे
प्राणों से प्यारे अरमानो पर मेने बारा तुझे
तुझे प्यार कर भी रचना की दुनिया मे हारा तुझ
फिर भी जीत मिली है जो, तेरे आगे कुछ भी नहीं
गीत और तू दोनो मेरे, और न कुछ प्यारा मुझे
लेसनी-बेला
मै ग्वुशियो का राजसिहाँसन छोडता-
एक गीत अगणित सॉसों से जोडकर
भोगे जाता हूँ आथिक वनवाम में
फिर भी चलता ही जाऊँगा निशि-दिन बारह मास
में
.
साध रेंगी गेरू से तूने, चला झुलसते पथ पर
गॉव-नगर-नदिया-परत के समारम्भ पर, अन्त पर
दरस-परस केवल पीडा का, नहीं मिला सुख का तुझे
वैरिन हुई दिवाली-होली, खिरते हुए वसन्त पर
ऑग्व भरे बादल नभ मे है टोलता
एक वेद तेरे ऑसू की चमकर
सावन से कब रेंग पाया आकाश मैं
फिर भी चरता ही जाऊँगा निशि-दिन चारह मास मै
सारी बरबादी के पीछे भन्य सृजन की प्यास है
मिट्टी राग्व हुई तो क्या अब भी जीवित विश्वास है
तेरे म्वर मे दृष्टि, दृष्टि म गीत, रूप में माधुरी
और चरा चल, आने वाला कर म्मारक-तिहास है
जीवन-नदी स्निारे मृरा चीखता
एक बार तेरी धडकन पर झूमकर
जीवित कर दूगा शमशानी राग मे
फिर तो चलता ही जाऊँगा निशि-दिन बारह मास में
लेसनी-येला
१६
आज मानस मुझे है मिली,
और पूनम तुझे है
फली
किस पहर तक मुझे?
सनी-बेला
४६
+---
सर्जना को मिटाता प्रल्य
बीतता जा रहा है समय
गॉर मेरे लिए धूल है,
और तेरे लिए फल है,
किम नगर तक मगर ?
नीर मे पीर की गन्ध है
मीन का कब नयन बढ है
नाव मुझको निरग्व झूमती,
और तुझको लिये घूमती,
किस ल्हर तक मगर ?
अब नहा सो रहे भू-गगन
सुन रहे है हमारे कथन
एक में ऑमुओं का वजन,
और तू स्वमवाही नयन,
मिस नज़र वर मगर
?
५०
लेसनी-येला
१७
पीता हुआ अँधेरा वढता जाता हूँ
मे पर्वत पर पर्वत चढता जाता हूँ
जला गीत के दिये
मीत के लिये
चॉद, तू नेह चाँदनी ढाल रे!
,
लेसनी-बेला
P
मै तीरथ को निम्न पड़ा है राह पर
मन की धूप विटी है तन की राह पर
चुपके चुपके पूज रहा है प्रेरणा
मिलन छोड आया हूँ गिड़ी वोह पर
सावन पर तो बहुत लगाये आमा
पर यह कहना कठिन कि स्तिना प्यासा हूँ
भरी घटा की नदी,
रहर से लटी,
तीर पर है मछुए का जाल रे!
गुजर चुकी है धूप सुबह की, शाम की
यमी हुई हल्चर जीवन-सग्राम की
समय मिला चिन्तन, सुख-दुख-इतिहास का
रो'-गाएँ मज़ा अपने राम की
चला सफर में, दिया जला तो पवन हिरा
निहार जुगनू उडा, शरभ की तरह मिला
उसे रोशनी मिली,
ध्वजा-सी खुली
नाव पर उडासलीना पाल रे ।
,
लेसनी-वेला
तुझे पता क्या मन के हाहाकार का
गीत नहीं है कर्ज स्मिी के प्यार का
मरते-चपते जीवन का परिणाम ये
म्वाद कभी मिल सा नहीं त्योहार का
यह दीपक है, इसको जन्ते जाना है
मैं पथी है, मुझको चलने जाना है
प्रगट जहाँ मज़िलें,
सम्हल कर चले
वहा पर कहीं छुपा है काल रे।
लेखनी-बेला
५३
पढा दिया है पॉच आज मैंने अलबेली राह पर
गिरने लगू, नॉह दे देना
युझने लगू, स्नेह दे देना
यकने लगू, छोह दे देना
लेसनी-चेला
५४
विष का चाँद नहीं चाहा तोनयनों में भी प्यार न उमड़ा
रही चॉदनी फीकी-फीरी सपनो का समार न उमडा
स्टी मुझसे रजनीगन्धा औ' नाराज़ हुई गफाली
रेग्नि मुझको रही फ्ल्यती मर्पित मावस की दारी
मज़िल परेशान है मेरी उठती हुई निगाह पर
गिरने लगू, नॉह दे देना
बुझने लगे, म्नेह दे देना
थाने लगू, छोह दे देना
.
जो जीने को ही जीते हैं, उनके लिए समस्या हूँ मे
जो विप पीने को जीते है, उनके लिए तपम्या हूँ मैं
जो श्रम म तटस्थ चुप रहते, उनकी दृष्टि अर्द्ध-अन्धी है
जो न रहे हर भीड-भाड में, उनमें मेरी कृति बन्दी है
मेरी ज़िद्दी कलम न चर पाती गैरो की चाह पर
गिरने लगू, गॉह दे देना
बुझने लगूं, म्नेह द देना
थकने लगू, डॉह दे देना
.
अनगिन इन्द्र-धनुष टूटे थे, जिन मपनो की रॉगोली पर
वे सर मैने खुद ही माहा कर टाले पिठली होली पर
मरस्वती को प्रथम मनाया, लक्ष्मी रूठी दीवाली मे
आधी मे उड गये फूल, पर गन्ध रही पूजन-थाली में
लेसनी-बेला
आज उसे म्बर दे निग्पराया मैने दर्द-फराह पर
गिरने लगू, रॉह दे देना
बुझने लगू, स्नेह दे देना
थकने लग, डॉह टे देना
.
अपने लिए जिऊँ तो मृत है, मै हूँ अश्रु सभी आँखो मे
तुम्हे प्यार करने सत्र वारा, तुम ही एक दिसे राग्यो म
उस दिन तुमबोले थे,-कहते लोगसभीहरघर-ऑगन के
तुमने इन गीतो के पीछे सपने तोड दिये जीवन के ।
एक अजब इत्जाम लगा है मेरे शाहन्शाह पर
गिरने लगू, बॉह दे देना
बुझने लगू, स्नेह टे देना
थकने लगू, छाँह दे देना
५६
लेसनी-बेला
४
एक मस्ती मिली, दर्द भूलें, मगर
नाचती ही नहीं मन-मयूरी अभी
अधु ने जो कही, प्राण ने जो लिसी
वह कथा गीत की है अधूरी अभी
लेसनी-बेला
३७
पुत रही चॉदनी आज आकाश म
पर हदय का गगन तो सजल ही रहा
पेड से है बंधा साध का चद्रमा
मेघ रेफिन म-दर-बर निस्ल ही रहा
आज ऑसू रहा और सपने कहीं
मिट न पाई, रही एक दरी अभी
चार श्रोता जहाँ, आठ दर्शक जहाँ
वह ममा गीत की है अधुरी अभी
परदान तो
ग्वाचना चाहते एक मुम्कान तो
पृल म कुछ खिलो, धूल में कुछ मिरो
मॉगना चाहते एक
मेघ बनकर चलो, नीर वनस्र दरो
कोन अरमान पूरा तुम्हारा हुआ
मॉग किसकी हुई है सिर्पूरी अभी
इस तुम्हारे उँगारे सपन के लिए
सहिता प्यार की है अधूरी अभी
टूटता जा रहा मन मघन चोट से
पृटता जा रहा गीत मा वाँध है
लेखनी चल रही आज पतपार-सी
सूब मझधार का मिल रहा म्याद है
५८
लेसनी-ग्रेला
हर भयङ्कर रहर एक नागिन बनी
तैरती हे कलम की मजूरी अभी
नाव के सन की प्यास जिमको रगी
सभ्यता विश्व की वह अधुरी अभी
यह सही है न कुछ से बहुत हे हुआ
फिन्तु कितना अधिक आज भी शेप है
रूप के, प्रीति के, गीत के राज में
अनमुना, अनकहा, पिच है, देश हे
जो पुगनी शपथ मिलुणी उन फिरी
पोछना अश्रु उसके ज़रूरी अभी
जो गगन को मिली, पर धरा को नहीं
वह सुधा पात्र की है अधूरी अभी
दरबाती हुई ऑग्व-सी जिन्दगी
रो भरी तो मिला एक ऑचल उसे
जन सिमझता हुआ अश्रु उसमें गिरा
तब लगा है मिला एक मस्थल उसे
जो झुलयते दिनों में श्रमिक को मिले
वह रहत दर शिमला-ममरी अभी
पूर जिसम सिला, पृल जिसमे मिला
मान्यता वृल की यह अबूरी अभी
.
लेसनी-बेला
५६
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,
लग रहा ऐमा कि नभ के पाम भी मस्तिष्क है
पर मन नहा है
चॉद-सूरज गीत सुनने को फिरन-रथ रोक दें
ऐसा अनोखा क्षण नहीं है
जो झकोरा भी हवा का, हॉफता-सा जा रहा,
उसको दिशाओ से गरज है
जो न सुनती दूसरो की, उस घटा के गीत की भी
तो अलग अपनी तरज हे
इस तरह दूरी गगन में और मुझमे नढ रही,
यह बात लिखता जा रहा हूँ
गीत की अपनी बही में, विश्व के वातावरण का
हो रहा आयात के निर्यात, लिग्यता जा रहा हूँ
फूल खिलने
पैड बढने मे
लगा है,
शिकारी भृग अपनी ताक में है
गन्ध बौराई चली है, पात पर गनम ढुली है
ओम मेरी ऑच मे है
तमतमाती धूप भी सघर्ष के आकाश म
भारी तपस्या कर रही है
और छाया की न पूछो, जो कि अगणित वार क्षण मे
जी रही हे, मर रही है
लेसनी-बेला
६१
इस तरह कोई न कोई काम अपनी व्यस्तता का
है सभी के माथ, लिम्वता जा रहा है
पीर की नदिया किनारे घाट पर हग के भरा जो
नीर, उममे धो रहा है आज मनके हाथ
लियता जा रहा है
.
जुझती है वायु तरणी से कि तरणी जल-रहरियो से,
लहरियों दीर्घ तट से
उठ रहे है, गिर रहे है, शोर करते ज्वार-भाटे
फटते मानो रहर के पाप-घट से
और मेरी ज़िन्दगी का गम भरा मगीत, खुद में डबकर
वेसुध हुआ है
नार मेरे गीत की तूफान से टकरा रही, पर
मॉगती स्मिसे दुआ है
इस तरह सब ओर है मघर्ष का पिम्राट झझावात
लिखता जा रहा हूँ
काटती मझवार नाका, व्यग करता है मितारा व्योम का
अवदात, लिग्यता जा रहा हूँ
हो चुका घायल बहुत, तब गीत के इस प्राण-पथी को
मिले पथगीर, जो घायर म्ययम् है
दूसरा जन हो मुसीबत मे, कहो मत पीर खुद की,
हाँ यही प्रचलित नियम हे
लेसनी गेला
मजिलो तक जर पहुँच होगी, मिलेगा सुख न इतना,
है कि जितना टग्य टगर मे
क्योकि लापरवाह है, परवाह से मेरी, जगत,
सारी प्रकृति, धुधले पहर म
इस तरह म है अकेला, गीत रचना कार, रेकर
आज जीवन-कल्प की आशा-भरी मौगात
लिम्वता जा रहा है
सिर्फ दम उम्मीद पर, होगी कभी तो नेह की
जीवन-मयी बरसात,
लिग्वता जा रहा हूँ
है छिी शतरज जीवन की, रगी सघर्ष की जब शह,
हुई तर करपना की मात
लिखता जा रहा हूँ
जय-निनादो मे समय के, जारही किस रूप की बारात
लिखता जा रहा हूँ
लेसनी-येला
२१
किसी स्वप्न को सोज लाने डगर पर
उतारा
गया है अकेला मुझे
कहीं का दिया है, किसी का पिया हूँ
सफर पर समय ने ढकेला मुझे
लेसनी-बेला
चला पर्यटन के लिए इस जिम क्षण
हुई हसनी छ रआसी-रुआमी
न मौसम सुहाया, न त्यौहार भाया
समा-सी गई नीड-भर में उदासी
नई कोपलें कुछ समझ ही न पाई
घुली रोज़ सी नीट निर्दोष दृग म
पिता किस भयावह डगर पर उडा है
उन्हें क्या पता इस वडे व्यस्त जग मे
यहाँ के क्मिी दीप से स्नेह मॉगो
कहेगा, न देना उजाला मुझे
कहीं का दिया है, किसी का पिया हूँ
सफर पर ममय ने ढकेला मुझे
लुटाया हुआ स्नेह लौटा बहुत कम
यही गम मुझे इस सफर में अखरता
मगर सोचता हूँ, कसौटी मिली है
चलंगा निखरता, चलूंगा निम्वरता
अभी रेलगाडी चली जा रही है
खटर-खट खटर-खट घने जगले में
वहीं ग्वेत मुख के, कहीं रेत दुख की
कभी मन किरन में, कभी बादलो मे
लेसनी-बेला
६५
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धरे शीग गागर, भरे पोत ऑचल
मधुर मौन कुसुम, अगरु-गन्य-चन्दन
हना मेघ की सीढ़ियों से थिरक कर
चली जा रही लोपने गीत-आगन
जिधरआव फरी, उधर ही निकलता
दिया एक रंगीन रेला मु
कहा का दिया है, किसी का पिया हूँ
सफर पर समय ने ढका मु
लेसनी-येला
मुझे हाट उठती दिग्वी एक, लेकिन
भरा भी रगा एक मेरा मुझ
क्हा का दिया हूँ, फिमी का पिया है
सफर पर समय ने ढकेला मुझ
,
मिटा गीत म हूँ, बना गीत मे हूँ
मिना गीत के और चारा नहा हे
उन्हें प्यार करता कि निनको जगत ने
दुलारा नहा है, पुकारा नहा है
उन्हा के लिये गीत मेरी पिशता
उन्हा के लिये मे तकाज़ा समय का
नदी-पर्वतो-बीहडो-मस्थलो से
चला पृछता अर्थ मर्जन-प्रलय का
मुझे रग रही जिन्दगी एक पूजन
क्ला-आरती-दीप-वेला मुझे
कहा का दिया हूँ, किसी का पिया हूँ
सफर पर समय ने ढकेला मुझे
चिरह एक पथ है, मिलन एक मज़िल
पडी ओ धियाँ नागिनो-सी गले म
अगर हो सके, तो सुधा बन चरो तुम
मगन हो महादेव के काफिले म
लेसनी-बेला
धेरे शीश गागर, भरे पोत ऑचल
मधुर मौन कुकुम, अगरु-गन्ध-चन्दन
हवा मेघ की सीढियो से थिरक कर
चरी जा रही लीपने गीत-आगन
निधरऑग्य फेरी, उधर ही निकलता
दिखा एक रंगीन रेला मुहो
कहा का दिया है, किसी का पिया है
सफर पर समय ने ढमला मुझे
लेसनीयेला
६७
२२
रोगेकर सिन्दूर ट्रॅढती मधुमतु मेरे द्वार पर
वाग सजे क्या, दीप जले क्या, और मने त्योहार क्या
६८
लेसनी-बेला
सागर-दृग में नीर भरे वह व्योम है, यह धूल है
गनम से बोझिल बोझिल हर पात है, हर फूल है
घुटती-घुटती सॉमो-सा रुक-रुक कर चलना है परन
धरती घूम रही रपटो में, करती सपनो का हवन
शरद निशाएँ गगन-माग्यचो मे युग-युग से बन्द है
हेमन्ती की गतिविधियों पर वामन्ती प्रतिवन्ध हे
मन का उत्सर बलि देता धडकन के हाहाकार पर
गीत छिडे क्या, प्रीति हँसे क्या, रूप करे सिंगार क्या
भटका-भटका सा है मनवा, धीमा-धीमा राग है
मद्धिम मद्धिम गति जीवन की, फिर भी मनमे आगहै
मेरी उजरी दोपहरी पर फिर सन्या की छाँह है
सोच रहा जग, मुझको पावम को कितनी परवाह है
मे नकों की वट-पूजा पर स्वगा का वरदान है
झॉकी मजी दूर मदिर में, बिन-देखे हेरान हूँ
स्वप्न नहा ऑसू प्रहरी है जब दृग-वन्दननार पर
दर्शन कठिन महाजन को, मुझ हरिजन का परिवार क्या ।
कभी-कभी मेरे सिरहाने आ जाती है चाँदनी
नींद-भरे गुमसुम सपनो को मिल जाती है रागिनी
सोचा करता हूँ दुनियाँ मे सुख का नहा अभाव है
कहीं धूप का पलड़ा भारी, कहा भयानक व है
लेसनी-बेला
E
लेकिन अलग न हो सकता मे, खुद अपनी आवानसे
वचित करना बहुत कठिन है मुझे सिर्फ अन्दाज से
क्योकि बहुत से हृदय भरोसा करते मेरे प्यार पर
उनका दरद भुलाकर मेरे जीने में है सार क्या
मिट्टी का रेशा-रेशा असहाय है, निस्पाय है
गिट्टी तोडे जाता रोजी-रोटी का समुदाय है
कुजी लिये तिजोरी की, अन्याय देश म घूमता
कत्ल किये सन्चार्द का, ऐय्याश झूठ है झूमता
सोना-चादी मखमल-रेशम-सा निकता ईमान है
धूल उड रही राहो म भटका-भटका इन्सान है
अनगिन करमे आस लगाए, खुले चोर बाज़ार पर
मुझको सपने की छाया मे रहने स अधिकार क्या
मस्थल समझ न पाता है मेरी मधुमासी प्यास को
समय घसीटे लिये जा रहा मेरी जीरित लाश को
मै वहार की कम करपना से उस मसार में
जो अब तक मानव की म्मित बाँधे है तलवार में
जहाँ म य-युग रोट रहा है मिद्धान्तो की आड म
नया नया ईधन पडता है, मुलगे हुए पहाड म
मिट्टी की मुधियों साधे है ज्वालाओ के ज्वार पर
तट पर बैठा यह जाने हूँ मै उनको मझपार क्या
Lo
लेसनी-येला
जब भी गिरा एक ऑम कही,
चुपचाप तुम रह सके तर नहीं,
भटका किये वादलो-से दुसी हो
लेसनी-रेला
,
लेकिन अलग न होसकतामै, खुद अपनी आवाजसे
वचित करना बहुत कठिन है मुझे मिर्फ अन्दाज से
क्योकि बहुत से हृदय भरोसा करते मेरे प्यार पर
उनका दरद भुलाकर मेरे जीने म है सार क्या
ऐय्याग झूठ
है झूमता
मिट्टी का रेशा-रेशा असहाय है, निस्पाय है
गिट्टी तोडे जाता रोजी-रोटी का समुदाय है
कुजी लिये तिजोरी की, अन्याय देश मे घूमता
क्ल पिये सन्चाई का,
सोना-चादी मरवमल-रेशम-सा निकता ईमान है
धूल उड रही राहो मे भटका-भटका इन्सान है
अनगिन क्रम आस रगाण, खुले चोर बाजार पर
मुझको सपने की छाया में रहने का अधिकार क्या
मस्थर समझ न पाता है मेरी मधुमासी प्यास को
समय घसीटे लिये जा रहा मेरी जीवित लाश को
मै बहार की कीं करपना कैसे उस समार में
जो अन तक मानन की रिम्मत बॉधे है तलवार में
जहाँ म य-युग रौट रहा है सिद्धान्तो की आड में
नया-नया ईधन पड़ता है, मुरगे हुए पहाड में
मिट्टी की मुधियों साधे है जालाआ के ज्वार पर
तट पर बैठा रह जाने हूँ मै उनको मझधार क्या
Lo
लेसनी-बेला
२३
जब भी गिरा एक ऑम् कही,
चुपचाप तुम रह सके तर नहीं,
भटका किये बादलो-से दुसी हो
लेसनी-बेला
یا
--..
तुमको भुलावा दिया हर दिशा ने,
रारच दिया अन्धकारी निगा ने,
रेस्नि दिखा कॉपता जन दिया,
तुमने उसे प्यार रवि-सा किया,
तर वह खिला एक सूरजमुखी हो
चिन पूजनो के रहोगे अधूरे
तुम पर हँसे मन्दिरो के ऊंगरे
लेक्नि तुम्हे जब दिमी वह व्यथा,
जिसकी रही अनसुनी ही कथा,
तुमको लगा काश यह भी सुखी हो
पीछे चल
आ रहा कारवाँ था
तुमने यही मिर्फ उससे कहा था
पूरा करो यह सफर, हम-सफर,
हम तुम चलें उस निमिप के नगर,
मज़िल कि जिसके चरण मे झुकी हो
लेसनी-बेला
२४
सपन सभी जो,
रुदन सभी जो,
खिले नयन मे, नही तुम्हारे
प्रेरणा
मिली बहुत कुछ,
मगर नही सन, नदी-किनारे
बेला
७३
नहीं तुम्हारा खयाल आया, निहार पूनम खुले गगन की
सदा नहीं तुम दिये सुनाई, बहुत सुनी रागिनी चमन की
सुबह हुई तो मुझे लगा ये, निशा समय की गुज़र चुर्क
नपीन-शिशु-शी लगी लुभाने, प्रसन्न मूरत खिले सुमन की
जवान फिरने,
ल्गी थिरकने,
पलक उठाए, अरफ सँवारे
प्रेरणा
मिली बहुत कुछ,
मगर नहीं सन, नदी-किनारे
उजड गई बस्तियाँ कि जिनकी, झुलस झुल्स भूख की चिता में
निगाह रोई, रहे न ऑसू, नयन मरुस्थल बने व्यथा में
अधर पियासे रहे, अधूरी रही आरजू, टुटे श्रमों
उन्हे निसारा गया, दुलारा गया नहीं, विश्व-सभ्यता में
उन्हें भुलाकर,
उन्हें स्रा कर,
हिँस न सकते, नयन हमारे
मुझे प्रेरणा,
मिली बहुत कुछ,
मगर नहीं सन, नदी-स्निारे
लेसनी येत
मिलन तुम्हारा मुझे लुभाता, निरह तुम्हारा मुझे दुखाता
मगर समय की थपेड ग्वाता-हुआ मनुज भी मुझे बुलाता
सदा सँदेगा तुम्हें पठाऊँ, घुमड रहे सावनी घनो से
तुम्हीं कहो जन बदल रहा युग, यही मभी क्या तुम्हे सुहाता
कहो स्वयम् तुम
न जी रहे क्या,
कठोर सघर्ष के सहारे
मुझे प्रेरणा
मिली बहुत कुछ,
मगर नहीं सब, नदी-किनारे
.
कहीं उजडता, कहीं सँवरता, भविष्य, इस देश के निल्य में
दिवस-निशा-ज़िन्दगी डगर पर, कभी सृजन में, कभी प्रलय में
लगी हुई है असख्य तोपें, खुली हुई थैलियाँ अनर्थी
तुम्ही कहोक्या लिखू किजब एशिया उठा इस कठिन समय मे
उमड रहे,
क्राति के बटोही,
चमक रहे, शान्ति के सितारे
मुझे प्रेरणा
मिली बहुतकुछ,
मगर नहीं सब, नदी किनारे
लेसनी-ला
५
२५
इस दिये के माथ पर यदि स्नेह का अभिषेक हो तो
यह भी पान जलन का हो सकता जग के इतिहास में
सूरज और चमक सकता है इस फेले आकाश में
७६
लेसनीयला
किसे पता इसके ही हाथों होना हो अनमोल सृजन
कौन कहे इसकी किम्मत मे हो तुम सबसे अधिक वज़न
मरा-खपा तूफानो में यह रेगिस्तानी का पौधा
देना हो यदि म्नेह इसे तो करो नहा कोई सौदा
तुम वहार हो और तुम्हारे चरणो मे यह सावन है
जो पराश-वन से गुज़रा हो, यह वह झरना पावन है
इस उजागर स्वप्न के नयनों का ऑमू पोछ लो तो
लोह भी दे सकता है यह मरणोन्मुख उल्लास में
नई रोशनी भर सकता है, बुझते हुए प्रकाश में
,
इसमें भी दम हो सकता है, तुम वीरान कहो चाहे
रचनाकारों की बिरादरी मे अनजान कहो चाहे
यह गीतो की गागर मे सागर बनकर रहराता है
जाने कहाँ-कहाँ से प्रनिध्वनि आती, जर यह गाता है
बरस-चरस जाते है बादल, फूट फूट पडती कोपल
डोल-डोल जाता है चातक, बोल-बोल उठती कोयल
इस मुबह के गीत को यदि राई-भर भी प्यार दो तो
यह दुख के पर्वत दो मकता सुख की हर सॉस में
यह सयोग जोड सकता है हर दृटे विश्वास में
लेसनी-बेला
तुम किस राज-भवन की मजिल, यह किस मिट्टी का ढेला
तुम जिन तूफानो से बचते, यह उनमे पल-पल खेला
नहीं चाहता दया-कृपा यह, वह तो ढोग तमाशा है
भूखा है बस यह दुलार का, और स्नेह का प्यासा है
स्वप्न इसे मगलाचरण है, ऑमू राम-कहानी है
इस दर्दाले की दुनियों में तो पानी ही पानी है
इस किरन की पखुरी पर किरनो का आलेख हो तो
यह भी कुछ सौरभ भर सकता है सूने मधुमास मे
तुरत टाल सकता है शबनम जलते हुए पराश मे
लेसनी-येला
२६
सुस भी छूटा, दुस भी फटा, ना दहरीद्धारा रे
तृफानो ने शोर किया पर वेरा गीत न हारा रे
डगमग करते पैरो वाले। पथ में रुकना भूल है
लेसनी-बेला
७६
तेरे बुझने का तो कोई अर्थ नहीं
तुझ पर अम्बर का चन्दा न्योछावर है
तू उन सात सितारों का ध्रुवतारा है
मज़िल से पडचुकी कि जिनकी भॉवर है
सोच-समझ कर लौट गया है तुझ तक आ अँधियारा रे
नेह-पत्र सावन का राया वादल का हरकारा रे
ऑसू से भीगा भीगा ऑधी का धूल-दुकूल है
सपना तेरी नाव कि जिसका माझी तू
नयन महासागर के गहरे पानी में
तूने तट की झाफी जैसे पा री है
अनचाहे तूफानों की अगवानी में
तुझको उठती हुई लहर ने मिटते हुए निहारा रे
तट पर जागी हुई भोर ने अपना रूप सँवारा रे
बड़ी दूर से देख लिया उसने तेरा मस्तूल
आई है जो बाद उतर भी जाएगी
ऑसू ही तेरा दर्पन बन जाएगा
८०
लेसनी-बेला
सघपों की चलनी ही कुछ ऐसी है
जिससे जीवन का सौरभ छन आएगा
जैसे गगा म मिल्ने जाती जमुना की धारा रे
रात-ढले पर क्षितिज-कुएँ मे ठुलके उसका पारा रे
ऐसे ही झोंके में उडता पगडण्डी का शूल है
लेसनी-बेला
२७
मन ! तुम न टूटो अभी हार कर,
ऑवी न हरटम रही द्वार पर,
तुम भी न दुर्वल रहोगे सदा
लेखनी-बेला
८२
दी है चुनौती तुम्हे शाम ने
हँसता हुआ काल है सामने
शर ! तुम न छूटो अभी रोष से,
गुण छुप न पाते फिसी दोष से,
तुम भी न दुखडा कहोगे सदा
गहरा बहुत नीर है दृष्टि का
जलयान सक्षिप्त है सृष्टि का
हग । तुम न फूटो, रहो गागरी,
हर क्षण न गहरी व्यथा बावरी,
तुम भी न तृण से बहोगे सदा
तुम आरती गा रहे, भोर है
सागर किये जा रहा शोर है
स्वर । तुम न रूठो अभी मत्र से,
होता न कुछ घोप के तत्र से,
तुम भी पराजित न होगे सदा
लेसनी-बेला
३
₹
म
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नम हो कि मै जानते है सभी
गहरी बहुत है तुम्हारी व्यथा,
आकाश के हर दुखी मेघ ने
मुझमे कही है तुम्हारी कथा
वे जो कि तुमसे अधिक है करुण
जो चाहते है तुम्हारी शरण
उनकी सुबह हूँढ़ना है तुम्हें
हर एक मन के चरागाह से
मझधार मे तुम पडे नाव से
पर दूसरो के निकट कूल है
हर डबडमाती हुई आँख को
दुखडा सुनाना बड़ी भूल है
उसकी शिकन लो स्वयम् माथ पर
उससे कहो जिन्दगी है भमर
तन का दिया प्रश्न है कर रहा
मन पर बनी एक दरगाह से
तुमको नहीं चाँदनी मिल सकी
मेरा कहाँ चन्द्रमा दास है
लेसनी-चेला
इस ज़िन्दगी की विफल सृष्टि में
किसने रचाया कहाँ रास है
अपनी सुबह-शाम से भी परे
दुनियाँ करोडो चरण है धरे
जीवन सदा पूर्ण होता नहीं
केवल प्रणयवान निर्वाह से
लेसनी-वेला
२६
निशा के राजकुंवर !
चला तू आज किधर,
दिशा की पलको से
उठा कर चन्दरिमा
लेसनी-बेला
८७
उजाली किरन-किरन है रूप निखारे
अभी से उसे विरह तू नहीं सिखा रे
किसी ने तुझे निरख कर गीत लिखा रे
परन है वासुरिया
अरे ओ कान्हरिया ।
गगन के गोकुल मे
रही राधा शरमा
नयन की नगरी गगरी लेकर प्यासी
धरा से रूठ नहीं सपने आकाशी
कठिनता से मिलती है पूरनमामी
चुनरिया साध लिये
सधा उन्माद लिये
डगरिया पनघट की
कहे तेरी महिमा
किसी देवालय का तू देव अनोखा
कि जो भी आया, तूने कभी न रोका
बना है सगमरमरी राम-झरोखा
अभी चल रही कथा
किसी को नहीं पता
कभी खुद मन्दिर से
निकल जाती प्रतिमा
लेसनी-बेला
६
३०
कुकुम पिखेरती सुबह-सुहागिन गाती है
भर मॉग-मॉग सिन्दर,
न बेठो दूर,
कि फागुन गा लो रे !
लेसनी-बेला
CE
पीले सिंहासन पर सूरज बैठा जमकर
वासन्ती राजतिलक के पल जगमगा रहे
कोयल-पपीहरे उठते मगल-गायन को
उत्साही पक्न झकोरे ताली बजा रहे
नाचते-नाचते तुतली तितली आती है
नूपुर में जय-जय कार,
नयन मे प्यार,
कि होश सम्हालोरे।
रेगम पाटल के लालम गरम झरोखे से
मधुऋतु रानी मधुरन का उत्सव देख रही
वह प्यार-प्यार मे वेणी की रजनीगन्धा
चुपके-चुपके मान्सल भीडों पर फेंक रही
भौरो की टोली फूलो को समझाती है
तुम जानो जी की प्यास
लगी है आम
हमें अपना लो रे।
कचन फिरने पानी से रास रचाती है
सतरगो सपने साध लिये मॅटराते हैं
रसवन्ती बाहें सिमटी हुई जाती हैं
श्वासो के अश्वारोही घिर-घिर आते है
६०
लेखनी-चेला
चचल यहार रगों में भींग नहाती है
गाती है शबनम गीत,
मदिर है प्रीति,
नहाने वारो रे।
फूले पराश-से गीत वसन्ती छाया में
पतझर का बादल यहाँ नहीं घिर पाएगा
मम्तो के आलम की मिट्टी मधुमासित है
इसका कन-कन योवन का गीत सुनाएगा
मधुनतु कुजों पर जीवन-वेललगाती है
दावानल का उत्पात,
अंधेरी रात,
उसे समझा लो रे ।
लेखनी-बेला
१
३१
कि जर नील-नभ में चमकता सितारा
बहुत याद आता जुहू का किनारा
लेसनी-बेला
१२
पमारे गगन बीच सुकुमार बाहें
हजारो हिरोर उठाएँ निगाहे
निखरे समुद्री सपन है परन में
कुतूहल भरे दर्शको के नयन में
कि जब इनता है फिरन का नज़ारा
दय सोचता है कि कह
दे 'दुबारा
"
गरम रेत से त्रम्त बीहड अचचल
यहाँ आ गया है कहीं का मरम्थल
पिरी चाँदनी है, चरण धो रही है
झुरमती व्यथा अवतरल हो रही है
किसी दिन, किसी ने, किसी को पुकारा
परक को उठाया, अलक को सँवारा
जुही की कली-सी महकती जुह है
किमी कोफिला की मचरती कुहू है
किमी गूंजते-गीत की रागिनी है
किसी व्योम की झूमती चॉदनी है
कि जन ज्वार करता मिलन का इशारा
नयन में छलकता जलधि-नीर खारा
लेसनी-वेला
.
सलौने गगन की, महकती हवाएँ
निमी मेघ के बोझ से दब न जाएँ
न पाडव किमी वृंद से फूट जाए
कहीं वन नभ से नहीं टूट जाए
कि जब यह समा है, मधुर मौन प्यारा
किसी तीसरे नेत्र ने क्यो निहारा
६४
लेखनी वेला
सावन ने तो ऑसें भर डाली बादल से
देखें बहार किस उदयाचल से आती है
लेसनी-बेला
६५
वन-वन कर इन्द्रधनुप कितने ही टूट गए
गर-मी पुरवाई चली गई नक्षत्रों में
निजली का मन आहत हो-हो कर तडप उठा
औ' वरस उठा बूंदो के भेजे-पत्रो मे
कुछ ऐसा दर्द लुटाया उसने ऑचल से
पीडा की चुन ही हर पायल से आती है
इवे सपनो के खेत किसी जमुना-जर में
बह गए गाँव के गॉर बाद आई ऐसी
अमराई डूबी, ड्वे उसके झूले भी
सागर से मिलने नदिया इतराई ऐमी
सर कुछ गोकर रोनेवाले से पूछो तो
अर कौन हवा किस मलयाचल से आती है
ऐसा घेरा है बरसाती अँधियारी ने
सघों ने .. शहनाई ऐसी तोडी है
रचना गरी मगल-वेल फिर कुहरे में है
करनी ने अपनी म आखिर क्या छोड़ी है
पागुन के लिये मिहॉमन छोडेगा सावन
आवाज यही मन की मज़िर से आती है
लेसनी-बेल
बादल से ऑम मिला कर चलने वाले पर
जन निजली गिरना ही है तो फिर गिरने दो
गीतो की माटी में यह भी मिल जाएगी
चाहो तो मधुमतु म
वादल घिरने दो
मेरी धडकन का अमर उडेगा गुन-गुन कर
ऐसी मुगध पाटल-पाटल से आती है
लेखनी-बेला
६७
३
ठण्डी-ठण्डी छोर है
मीठा-मीठा राग है
धरती जैसी आँस में
सपने जैसा चाग है
लेसना-येला
६-
हल्ली-हल्की दूर है चलती-फिरती डॉव है उठती गिरती है हवा भूला-मुला गॉर है खोई-खोई धूप की चिखरी-निखरी प्यास है झरना-वाली बाँह में पर्वत क्या, आकाश है नीग-नीय व्योम है नीरी नीली रात हे भोगे-भीगे फूल है झीनी-झीनी बात है जगल की सुनसान म प्राणों-सी गहराइयाँ गहरी-गहरी कन्दरा आहो-सी तनहाइयों ठण्डक की अंगडाइयों गर्मी मेरी साँस में जैसे पता एक ही कोई सेले ताश में चलती-फिरती बीन पर पत्तों का सगीत है देखें सुनता कौन फिससे किसकी प्रीति है बूंदागोंदी देखकर आतप है बूंदो की ही भीड है मैदानों के 'हॉल' मे पाताल में पर्वत मेरा मच है छिड़ती जिस पर रागिनी गाता हूँ मैं झूमकर सुनती सारी यामिनो लेसनी-बेला ६६ दुहराती मगीत हैं ऊँची-नीची वादियों पतली-मी पगडण्डियाँ टेदी - मेढ़ी घाटियाँ ऑधी है झकझोरती झुकने वाली डाल को जुरमी करता तग है जैसे हर कगाल को दृश्यो के मैलाब में रगों की भरमार है लहरों की आवाज़ में गूंजा पारावार है फिमलय-दुल्हनटोरती मारत के हिल्लोल में परिवर्तन के चिह है जगती के भृगोल में पर्वत है या मेव है बादल है या शृङ्ग है कहते कुछ बनता नहा किसका कैमा रग है बादल और पहाड के अगो में है भेद क्या ? दोनो ही मजदूर है बहता है नास्वेद क्या? ऊँची-नीची खाइयाँ टेढ़ा-मेढा राम्ता चश्मा हर पापाण से पृटे मन के स्नेह-सा पेडो के झुक-झूम बन जाता है गेह-सा मे लगता है जैसे हमें इनसे ही है वास्ता १०० लेसनी-बेला कैसे कोई छोड टे पाफर ऐसे कोप को वर्णन करना है कठिन लिग्व चाहे सन्तोप को चट्टानो की भीड हे साया है चट्टान की बह्ती फेनिल धार है कल-कल झर-झरगान की भागी आती धार है जैसे मेरी प्रियतमा मिरने को इठला रही पाकर मस्ती का समाँ पर्वत चारो ओर है वादी बीचो-नीच है जिसमे भर कर मेघभी मन को लेता खींच है में भी वादी मे खडा खोया-सा हूँ टोलता कैमे क्या-क्या ऑक अपने मन में बोलता इतनी ऊँची है नहीं सिद्धान्तो की श्रेणियाँ जितनी इस सुनसान मे लटकी छवि की वेणियों आकाग पर ममूरी का राज है उसको औरो पर नहा अपने पर ही नाज़ है किरणों का अभिषेकले रानी बैठी शान से मेरी ओर निहार कर कहती इतमीनान से- खनी-चेला १०१ "आया तू परदेस से मेरे ठण्डे गाँव मे फिरनो जेसे गीत को बिखरा मेरी छॉव में भावो के वरदान से मेरा माथा चूम ले मै भी तुझमें झूम लूँ तू भी मुझमें झूम मै तो तन की बीन हूँ तू है मन का गीत रे मन के गीतो के बिना होती है का प्रीति रे आए मेरे पास तो डूबूं तेरे गीत में जीतूं तेरी हार मे हारूँ तेरी जीत में सिंहासन खाली पडा राजा तेरे वास्ते आ जा भवरे की तरह फल-पूरी के रास्ते कैसा अच्छाव्योम है खिल्ता मेरा फूल है झूला मेरी डाल का दुनियाँ जाती झूल है आमत्रण की बात पर पहली पहली वार है तुझको यदि म्वीकार है मुझको कर इन्कार है जाने कब से ढूँढती तुझको मै आफाग में आविरतूमिल हीगया मेरे ही आवास में लेसनी-बेला छेड़ जरा सगीत तू पूछ जरा मन की व्यथा देखू तेरी कल्पना कहती है क्या-क्या कथा झूम कि मेरीप्यास की सीमाएँ हे टूटती देख फिमेरे स्नेह की धाराएँ है फटती रानी के इस राज मे राजा अपना गीत गा मेरी बाज़ी हार कर अपनी बाज़ी जीत जा केसा मीठा है समा मेरे नीलम देश का सानी मिलता है कहाँ मेरे लहरिल केश का मेरी ठण्डी सॉस का समझेगा क्या मर्म तू अनबोरा जो कुछ रहा समझेगा क्या शर्म तू आशीतल होप्यार से सावन है, मधुमास है मेरे अन्धे प्राण पर हरा-हरा आकाश है चारो ओर बहार है चारो ओर खुमार है तू है, मै हूँ, गीत है, हरियाला जीवन इस ससारका चिन्ताओ से दूर है यह यौवन का देशतो स्वगों से भरपूर है ससार है लेसनी-बेला १०३ पारिजात खिल्ता यहाँ नन्दन के सीमान्त में गुजन करता टोल जा भेवरे मेरे प्रान्त में गीतो के चचल भ्रमर आमत्रण रस-पान का फिसको देता कौन है निन-मागे वरदान का भूरे-भूरे शृङ्ग पर जीवन-सी चट्टान है जिस पर बैठा हस है पखो मे तूफान है पर्वत-सेतो पर बिछी हरियाली घनघोर है यौवन-सी निर्बन्ध है चचल मन का मोर है रूमानी आकाश का फीरोजी सिंगार है शेफाली-सी भृमि पर ऊँचा तोरण द्वार है एक बड़ी चट्टान ही है प्रहरी के नाम पर जो निर्मम निर्द्वन्द-सी टटी हुई है काम पर चरती-फिरती बीन पर पत्तो का सगीत है देखें सुनता कौन है फिमको स्मिसे प्रीति है ठण्डकीअँगडाइयाँ गर्मा मेरी मॉस में जैसे पत्ता एक ही कोई सेले ताश में १०४ लेसनी-बेला
७
जगल को सुनसान में
प्राणी-सी
गहराइयाँ
गहरी-गहरी कन्दरा
आहों-सी तनहाइयाँ
नीला-नीला व्योम है
नीली नीली रात है
भीगे-भीगे फूल है
झीनी-झीनी वात है
अम्बर ही तो झील है
दर्शन ही तो प्यास है
झरने वाली बॉह मे
पर्वत क्या आकाग है
हल्की-हल्की दूर है
चलती-फिरती छाँव है
उठती-गिरती है हवा
भूला-भूला गॉव है
ठण्डी-ठण्डी छवि है
मीठा-मीठा
ऑसू-जैसा फॉल है
सपने जैसा बाग
लेसनी-बेला
१०५
३४
नीली निशा के किनारे
सुलते बहुत से किवारे,
हैं फिस महल के ?
लेसनी-चेला
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सूखे नयन, तुम्हारे निना, सुलगते रहे अंगारो-से
अपना चमन, तुम्हारे पिना, सजा ही नहीं बहारो से
फागुन मिला, बहुत मन हुआ, कि झूमे जरा पलागो में
ऑग्वें मगर, रहीं अनमनी, सभी फागुनी तमाशो
.
छाए रहे, हुभाए रहे, निछुड कर निगा-निशा म तुम
खिलते रहे, महकते रहे, ममय की दिशा-दिगा म हम
,
-
ढोरफ वही, मजीरा वही, मुरलिया नहीं, वही नदिया
सावन पिना,नहीं कुछ बना, अजन-सी रही सभी दुनियाँ
मछुआ विक्ल, कि ग्वाला विकल, रही सुधि किसी इशारे की
ओढ़े हरी चुनरिया, खडी पहाडी नदी किनारे की
तुम ही कहो कि कितने हिले मिले हो रहर-रहर मे तुम
भाते तुम्ही, मुहाते तुम्ही, निहार किमी पहर में हम
,
जुगनू मने तुम्हारे दिये, मृदगें बजी, छिडी कजरी
दिनली उठी, थिरकने लगी, वृदावन-जमुन-जरी बजरी
राधा नहीं, कन्हैया कहा, अलावें जली, सितारी की
झींगुर-धुनें, न फैसे सुने, कि रिमझिम रिडी फुहारो की
बूदें गिरा, पिलाते सुधा, धरा को नई फमर मे तुम
ओ
हमसफर । भटकने किधर, तुम्हें हूँढ़ते असल में हम
,
लेसनी-बेला
१०६
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३६
पगडण्डी से जाने वाली कृपापच के चेप मे
नई धूप का चीर उडाती आती युग की भोर है
लेसनी-बेला
पृरव के गेरए मच पर दृष्टि और अति आमत्रित
खेत-सेत मे फमल झूम पढ़ती अभिनन्दन पत्र है
चरवाहो की मधुर बमुरिया रह-रह कर यह गाती है
नई दिशा के माथे पर कितना सुसुम एकत्र है
रगमच पर पिसी नाट्य का परदा उठने से पहले
उत्सुक चर्चागत कोलाहल-सा यग-बुल का शोर है
उजो के विश्राम-गृहो में देर तलक सोनेनाले
उजडे-हुए रईसा-जैसे दिवा-म्वप्न में रोन हैं
कर्मठ हँसिया उठा, जार के व्यर्थ गर्व को काटने
अम्बर के सिंहासन पर सूरज राजा आसीन हैं
क्सिी सगठित सेना की अत्यन्त श्रेष्ठ टुकडी-जैसी
किरन कर रही पीछा, भागा जाता तम का चोर है
लेसनी-बेला
३७
दृग की दुकान पर
मोती निका नहीं
ऑसें मिली तुम्हे
फिर भी दिसा नहीं
लेखनी-बेता
यह भी नहा सही
वह भी नहा सही
केवल तुम्हा सफल
कीचड-भरे कमल
कोई भ्रमर कभी
तुम पर रुका नहा
मैने दिया दिया
तुमने नहा लिया
भी सूजन हुआ
तुमको वमन हुआ
मन का अहम वहम
अप तक थका नहा
सूरज बहुत चढा,
पर दिख नहीं पडा
बोले 'चिराग है
गाता विहाग है
पिछला सनेह ऋण
अब तक चुका नहीं'
तुममे बमा मनुज
अपना मसा नहा
लेसनी-चना
३
जिस समय से रचा गीत है
वह नयन का नया मीत है,
इक दुल्हन की तरह
लेसनी-बेला
११५
है उमडता बहुत आज प्यार
देखता हूँ
उसे बार-बार
जिस घडी मे जरा दीप है
उम घडी से बसा द्वीप है,
इक भवन की तरह
कुछ अजन-सी उठी एक प्यास
है गजब ऑसुओं का लिपास
जिस निमिप से खिला फूल है
आँख में सज रही धूल है,
इक सपन की तरह
छन्द ने भाव ने, छल किया
जो मुझे यह नगा दे दिया
मन अटकता हुआ चल रहा,
मै भटकता
हुआ चल रहा,
नील घन की तरह
११६
लेसनी-बेला
३६
किमने निहारा
.
तम की परत पर परत तो चढी
पर न चमका सितारा !
लेसनी-बेला
११७
दीपक बुझा और सोचा कि कोई नहीं नामलेग
सूने पड़े मन्दिरी से पुजारी गण
रोप यी देवता की सेवा
मेरी व्यथा को सुने निन
मधुर ऑय में भर गया किम तरह नीर खारा
मिमने निहारा?
फिसने पुकारा ?
भारी शिकायत रही नाम को
म्वर न पृटा बाग
भूले हुए रोग थे एक युग मे सुनी रागिनी को
टूटी हुई बीन, रूटा हुआ तार
भाया न युछ सरगमों के धनी को
मेरी दुखी भैरवी की प्रथम पक्ति
सुन क्यो किसी ने लिया एकतारा
किमने पुकारा ?
.
किसने दुलारा
?
आया बडी साध से स्वप्न
पर खुल न पाया दुआरा
लेसनी वेला
--
जो
आरजू भी उठी, वह गिरी पथ के मोड पर ही
हर प्यास घट के निकट जा सकी,
तृप्ति के पद-कमल, मिर्फ दम तोड कर ही
मेरी अकेली पिपासा बहुत थी
क्सिी ने उसे क्यो अधर से सॅचारा
किसने दुलारा
"
लेखनी-चेला
११६
मैने कोहनूर-सा प्यार किया जो चमका अम्बर मे
मैने सोचा शायद मुकुट परस का इसको मिल जाए
१२०
लेसनी-बेला
जर वह सघर्षों की कठिन कसौटी पर भी खरा रहा
उसको किसी प्रणय-टतिहासकार ने तिथि के साथ लिग
लेकिन जब लकीर का हर फकीर टकराया रम्ते पर
उसने कहा बिचारा कोहनूर था, मिट्टी-मोल चित्र
मुझको दो ससार मिले जीवन के दस सवत्सर में
सच पूछो तो दोनों और निकट मेरी मजिल लाए
श्र
मैने हीरे-जैसा गीत लिखा, जो गूंजा तारो मे
मैने सोचा शायद यह भी जोहर कही दिखा जाए
देखा उसे जौहरी ने तो वह यों डब गया रस में
जैसे गागर मे सागर पा जाए रेगिस्तानी
देखा उसे किसी बहुधन्धी ने तो उडती नजरो से
जैसे देख किसी सरज को ऑखो मे घिर आए तर
मुझको अलग-अलग मुम्कान मिली दोना दरबारो में
मैंने निश्चय किया कि दोनो पर ही गीत रिखा जाए
लेसनी-बेला
१२
चूल्हा जलता रहे जिन्दगी का सदा,
इसीलिये अनमोल गीत । मे तुझे दे रहा माटी मोल
१२२
लेखनी-बेला
तू मुझको कितना प्यारा है क्या कहूँ
कह कर बतलाना भी तेरे जन्म-दिवस का है अपर
तुझे गुनगुना कर सुनना तो है मधुर
रेफिन करना प्यार नहीं ऐसा जैसा करना अहर
अपने जीवन मे ईधन के चास्ते,
मै म्वार्था भी हैं निर्दय भी, पुत्र । न तू मेरी जय ।
ओ रहम्य मेरी नभ-चुम्बी रयाति के ।
कितना अग्वर रहा है मुझको तेरा यह अध्यक्त नि
जैसे दशरथ के घायल आदेश से
राम अनुज औ' भार्या-सँग वनमासीहो, वनवासी, ओर
तू न पर्यटक सिक्का है टकसाल का
पिदा दुधमुहे । भूल न जाना अपने कुनबे का भृगं
लेसनी-बेला
४२
मेरे मन तुम पढो और समझो तो इस ससार को
यहाँ आदमी एक नगर है जो अन्दर वीरान है
१२४
लेसनी-बेला
मै भी इसके नगर-राज्य का कोना-कोना छान रहा
कोशिश मेरी यह कि आँख से कोई दृश्य न हो ओझल
परकोटे के बाहर मनहर मूरत का आकर्षण है
भीतर उजडे पृलनाग में चुप है नेहा की कोयल
नहा सलोना सोनमहल यह पापाणो का देश है
इन्द्रधनुष का द्वार बना पर उसमें कठिन प्रवेश है
प्रेम यहाँ म्वाथो की गलियो मे खुफिया समझा जाता
एक पुरानी खण्डहर कारा मे बन्दी ईमान है
ताज है
यह है अद्भुत राजनगरिया महासमर के बाद की
व्यवहारो की कार्य-कुशरता का ही नाम समाज है
इसके म्वर्ण सराफे मे, कच्चे मीना बाजार म
नोटी की मीनार पहनती अधिकारो का
झूठ यहाँ हर रोज़ नया बन आता वक्त निहार कर
प्यार सिर्फ अहसान प्रदर्शन पोस्टर-सा दीवार पर
मेरे मन तुम चकित न हो इस चलती-फिरती गठरी पर
अपने में ही केन्द्रित-सीमित युग का यह इन्सान है
लेसनी-बेला
१२५
कलम चल रही है कागज पर, नार चल रही सागर में
देसू भर सकता हूँ कितना दर्द गीत की गागर में
लेसनी वेला
धूल बनूं तो वनूँ कभी, इस वक्त बहार-किनारे हूँ
सूरज की हर किरन भेटने दोनो हाथ पसारे है
प्यार, रूप, रस, गन्ध विश्च के, स्वयम् सिमिटते आते है
मूर्ति बनी प्रेरणा जमी है, मे आरती उतारे हैं
पृछे क्या घर-द्वार पुजारी, जो भक्तो म खोया है
गाए क्या-क्या राग किंगायक मुख के ऑमू रोया है
मागे क्या वरदान कि याचक सुध-बुध खोकर सोया हे
लूटे क्या आकाश कि पागल का मन नहीं म्चयम् कर मे
देखू भर सकता हूँ कितना प्यार गीत की गागर मे
सॉझ हो रही, धूप घट रही, पॉच बढ रहे है तम के
इना सूरज जली चिता सा, गीत गा रहा मातम के
लेकिन अपने जीवन के अगले-पिछले विश्वास लिये
स्वेद-अश्रु-कण पोछ रही लेखनी थकान-भरे श्रम के
ऑख अभी निंदिया के घर मे जोड रही हटे सपने
दीप अभी दुनिया के ऑगन में बैठा ही है तपने
फुल अभी भैपरे की सुधि मे लगा ओस-माला जपने
धूल पिसी रावण-रथ पर रोती सीता-सी अम्बर में
देखू भर सकता हूँ कितना दर्द गीत को गागर में
लेसनी बेला
रात मुझे दे रही रोशनी, अपनी ऑसो का पानी
मजिल दूर खड़ी है मुझसे, फिर भी करती अगवानी
मीत मिल रहे है पडाच पर, अलग-अलग आवाजो के
आगे बढ़ने को कहती नैपरयो की कोरस-वाणी
वह मन ही मेरा मन्दिर है, जहाँ नेह से जले दिया
वह क्षण ही मेरी मसजिद है,मरामनुज भी जहॉजिया
वह तृण ही मेरा गिरजा है,ग्वार कि जिसने जीत लिया
वह धन ही मेरा गुरुद्वारा, जो युग-युग के घर-घर में
देखू भर सकता हूँ कितना अर्थ गीत की गागर में
१२८
लेसनी-बेला
४४
तोडने को डोर पल में तोड दें मुश्किल नहीं है
किन्तु मन की और ही कुछ राय है
लेसनी-बेला
१२६
chia
मन यही मुझसे कहा करता कि प्यारे ।
जो समन्दर है उसे परवाह क्या
भाए हो है मेघ, बादल ही नदी है
सर तुझी मे आ मिलेंगे, राह क्या है
एक अधियारी अजन है, हर दिशा से छल रही है
किन्तु चन्दा तो तुझे अपनाय है
,
सोचता हूँ मै कभी यह भी, फिमी दिन
आदमीसे आदमी की होड भी दम तोड देगी
हर तरह से भागने की दौड कब तक
ख्याल मेरा है कि उसको राह हीखुद छोड देगी
इस तरह से क्या बटोही को मिली मज़िल कहीं है
इस तरह का हर मुसाफिर जो शुरू मे शेर-सा था
अन्तत वह गाय है
ट्रटना आसान है, जुडना कठिन है
जिन्दगी मे है अधूरी जोड-बाकी
इसलिये पटयन्त्र कोई हो वहा से
में उसे मना दिया करता निशा की
जानता हूँ यह निशा भी हार-थक कर ढर रही है
लग गई उसको सुबह की हाय है
लेसनी-बेला
४५
ओ समय की वसन्ती किरन !
अश्रु क्षण के सपन जागरण !
डबडयाना नहीं
लेसनी-बेला
यस रहा मूल का गॉन है
कॉपता गन्ध का पॉव है
टसलिए ओ मुबह के चरण
जिन्दगी के पथिक आमरण'
डगमगाना नहीं
गीत भी मॉगता भीख है
इन दिनो कुछ नहीं ठीक है
रोगनी से सजाना गगन
और बहना कि जैसे पान
तिलमिलाना नहीं
पाठ तेरी जलन का लिये
हर निगा में जलेंगे दिये
गोद लेगा तुझे हर पवन
चाहते है सभी धूप-धन
टिमटिमाना नहा
लेसनी-बेला
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रात की पूनम से कर वैर
चॉट से तुम्हें बुराई मिरी
तृप्ति को जन-जर भीतुम चले
प्यास से तुम्हें वधाई मिरी
नखत की सभा गगन में हुई
सपन की सभा नयन में हुई
अधर ने नहीं अधर को छुआ
चूम कर अल्क-पलक दी दुआ
मेघ को एक बार देखा
दर्द का बादल तुम्हें लगा
किन्तु जर बार-बार देखा
चॉद-सा कोमल तुम्हें लगा
राह चलते थे तुम चुपचाप
किसी चीरान चमन के पास
फूल-पत्तो से सूनी डाल
भीश धुनती थी सूखी घास
चुभा सहसा पैरो मे शूल
याद तम
आया कोई फल
सुरभि से वॅधी गुलाबी देह
नयन मे मधुर ओस का मेह
१३४
लेसनी-चेला
शूल को एक बार देखा
राह का कण्टक तुम्हें लगा
किन्तु जर बार-बार देखा
फूल से मोहक तुम्हें लगा
देय कर दुस-ददों की भीड
बचाए सुख तुम भागे कहीं
पीर, पर, तुम्हे मिली हर ओर
सदा ही तुमसे आगे रही
जिन्दगी के बन-बीहड बीच
नेह का कमल, घृणा का कीच
समय का अमर, प्रगति का गीत
कोटि नारी-नर-स्वर-सगीत
नर्क को एक बार देखा
रक्त का सावन तुम्हें लगा
किन्तु जब चार-बार देण्या
म्वर्ग से पावन तुम्हे रगा
शब्द की थी सादी पोशाक
भाव मे चमत्कार था नहीं
झोपड़ी में था मन का दीप
स्वर्ण जैसा सिंगार था नहीं
लेसनी-बेला
१३५
जा रहा था कोई कवि मौन
व्यग से तुमने पृछा 'कौन ?
छिड गया गीतकार का तार
तुम्हारा हृदय गयो झसर
गीत को एक बार देखा
व्यर्थ का सपना तुम्हें लगा
किन्तु जर बार-बार देखा
बहुत कुछ अपना तुम्हे रगा
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कह भले हम लें, दिशाओ ने हमारी आरती की
सत्य तो यह है, न मनिल तय हमारी भारती की
गीतवाले अनुभवी हर माथ पर गहरी शिफन है
रेत-सूनी रेत-प्यासे छन्द का होता निधन है
गर्व की प्रासाद-सीढ़ी पर विगत श्रम गे रहा है
दे चुके कुकुम जिन्हे हम, मिल रही है धूल उनसे
बिल रहे थे जो सुमन मे, नयन है उनके करण से
शाम की उजली डगर मे, चली बनजारिन सुबह की
जा रहे क्षण राश-नैसी पालकी ले चिर-विरह की
व्यर्थ सस्या दोपकों की, स्नेह जब कम हो रहा है
मूति भी हम है नहीं, मन्दिर-कलश भी हम नहा हे
अर्चना के फूल ये फिर भी किसी से कम नहीं है
कुछ कठिन है ही नहीं आरोह हर मन का जुड़े यदि
काल-घट का दूध-पानी नापने हसा उडे यदि
आज तो मन ऑसुओ का मूक आश्रम हो रहा है
१२८
लेसनी-पेला
मिट्टी से फसलों का सोना देनेवाला देवता
नई अलावें जला रहा है गाँवों की चौपाल में
लेखनी-बेला
१३८
बूढा नीम बता सकता है कडवी बात किसान की
लेकिन वह है मौन और आगे भी बोलेगा नहा
क्योकि आज धरती से आती ऐसी सोधी गन्ध है
जिसके कारण कोई दृग मे ऑसू घोलेगा नहीं
पीपल से पूछोगे तो वह खोलेगा इस राज को
हरदम भोर नहा छिपती है बादल वाले जाल में
इमली की खट्टी सुधियों में वह जी भरकर रो चुका
अन वह मीठी अमराई में फँकेगा वह बॉसुरी
जिसका सप्तफ जिसका सरगम सुना नहीं इतिहास ने
आल्हा, कजरी, निरहा दुहराएँगे उसकी माधुरी
अब वह बना रहा है अपने हाथो अपने स्वर्ग को
चिन्ता बन कर जो बैठा था कल तक उसके भाल में
१४०
लेखनी-बेला
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इसकी मिट्टी में है गर्मी काल की
इसमें ताकत है उठते भूचाल की
इतिहासो की गाथा इसके मूल मे
एक चमकती दुनियाँ इसकी धूल में
इसके पान-झकोरो मे वह प्यास है
सिर्फ बहारो को जिसका आभास है
सजा और सकारे ऐसे है कटॉ
सूरज-चाँद-सितारे ऐसे है कहाँ
श्याम-घटा-निजली-बरखा मन भावनी
रिमझिम बूद फुहार चदनियाँ सामनी
आल्हा की हुकार, रमायन की कथा
वृन्दावन के रास, गोपियो की व्यथा
त्योहारो की धूम, दिवाली के दिये
होली के रंगो-निन कोई क्या जिये
मनी पुरी के नृत्यो की चचल परी
और भरत नाट्यम पर छिडती बॉसुरी
यह सन मेरी दुनिया की आवाज है
इस पर ही तो होता मुझको नाज़ है
१४२
लेसनी-बेला
लो अब गाता हूँ
कोई हँसती-गाती राहों में अगार विछाए ना
पथ की धूल है ये
इससे प्यार मुझको
कोई मेरी खुशहाली पर खूनी आँख उठाए ना
मेरा देश है ये
इससे प्यार मुझको
मेरा देश है ये
झूमर - हॅसली - पायल - नूपुर - रागिनी
काजल-मॅढी-म्हावर, क्वारी चॉदनी
शुभशकुनो के मगल-कलश दुआर पर
अनन्याहे ग उठते बन्दनवार पर
और एक दिन जाती घर से लाडली
उकुम की डोली मे चम्पा की कली
देश कहीं परदेस कहा, किसकी लगन
फिमकी ममता-डोरी, मन किसमे मगन
और एक दिन सघपो की राह पर
जाता है परिवार निरखता आह भर
साध चली शमशान, उमगो पर कफन
प्यासे मनना प्यासे ही हो गए दफन
लेकिन इसका अर्थ नहीं होता मरण
मुझको जाना है न किसी की भी शरण
लेसनी-बेला
हसी उडाने वाले जाते भूल है
मेरे मरघट में भी खिरते फूल है
इन पैरों में अभी सफर की प्यास है
इन अधरो पर तो अब भी उल्लास है
लो अन गाता हूँ
कोई मधुऋतु इस पतझर पर दानी हाथ उठाये ना
मेरा याग है ये
इससे प्यार मुभको
कोई मेरे दुर्दिन को खरीद अहमान दिखाए ना
मेरा देश है ये
इससे प्यार मुझको
मेरा देश है ये
कौन गया है रेखाओ को चीर कर
रागोली से बनी हुई तमनीर पर
वासन्ती मिलनानिल सुरकर नाचती
गग-भरी-सी 'रूपम'-'गीतम' बाँचती
सस्कृति की पतली डाली है झूमती
नई गुलावी कला जिसे है चूमती
पृल रहे अॅबना बोझिल अमराइयाँ
मीठी-मीठी पीर-भरी ॲगडाइयाँ
बरसा मे विरही की ममता जागती
हेर-हेर निरहिन को नदिया भागती
१४४
लेसनी-बेला
गजाता
पौर मोरिया को सी गधा मे विडा या
गंगधार है ये,
हो प्यार मुझको,
पोई पूर पान की समीरी गयनम उजड़ाए जा
भीगी जीम है ये,
से प्यार तुझको,
मेरा देश है ये।
किमी पेड़ को पना मैगी, तेग में
गय चरी जाती है नभ के देश म
फिर मे अम्बर से हारते पल है
भू को म्पप्नाजलि में जाते झूल है
लेसनी-येला
लगता है, ये आई मीरा बावरी
नर्तित-गुजित-जीवित राधा सॉवरी
और 'सुनो भई साधो'-जुलहा बोलता
दास कतीरा विप में अमृत घोलता
नभ के पर्दे जलते सूरज-दीप से
चले संदेमे इन्द्रराज के द्वीप से
मेघदूत ज्या कालिदास के राज के
छिडते मेघमल्हार किसी के साज के
तानसेन-सँग आता बैजूबावरा
सुन जिसको निज सुध-बुध खोदती धरा
'बरमत नयन हमारे'--सूरा झूमता
चित्रकूट के वन म तुल्मी घूमता
गीतकार से कहता मै, तुम भी उठो
झूमो मत पिछली जय मे, आगाज़ दो
अन गाता हूँ
कोई मेरे सरगम के पदों में आग लगाए ना
मेरा गीत है ये
इससे प्यार मुझको
कोई मस्थल के मरघट म छन्दो को दफनाए ना
भैरव राग है ये
इससे प्यार मुझको
मेरा देश है ये
१४६
लेसनीन्येला
.
,
सुम्न का सपना हो चाहे दुग्य की बदली
मेरी दुनियों गैरो से सौ बार भली
तुम भी सुनते होगे इस सन्देश को
नई उमर है मिली पुराने देश को
जाऊँगा अपनी मिट्टी को पूजता
देतूंगा अब नहीं स्वप्न को टूटता
सिर-माये लेना है धरती-धृल को
जिसने जन्मा है मधुवन मे फूल को
लेकिन यह क्या, होती है आवाज़ क्या
धुंआ, आग, चीत्कार, ध्वस, है राज़ क्या
देगो मे होती है खाचातान क्यों
शीत-युद्ध से दुनियाँ है हैरान क्यो
मेरे सुग्व-सपनो पर किसका हाथ है
क्यो पीछे चलती छाया-मी रात है
तोप लगाई है किमने इन्सान पर
क्या एटम गिरना है हिन्दुस्तान पर
नहीं, नहीं, मै नहीं इसे होने दूगा
मै अपने सर प्रश्नो का उत्तर लगा
लो अन गाता हूँ
कोई मेरी कगाली पर अपना महल उठाए ना
ये जो झोपडी है,
इससे प्यार मुझको,
लेसनी-बेला
?
१४७
मैने खांची लक्ष्मण-रेखा कोई पॉव बढाए ना
मेरा देश है ये
इससे प्यार मुझको
मेरा देश है ये
..
..
.
लेसनी-चेला
आपराज आ रही है-
साधना तुम्हारी आज कहाँ से कहाँ जा रही है
पथ भी तुम्ही बनाते हो,
रथ भी तुम्ही चलाते हो,
राह बनाने वाले हो, पथ पूछा नहीं करो
कलम के कारीगरो। उठो
कलम के महनतकशो! उठो
कलम के जादूगरो। उठो
तुम्हे मिली अनमोल लेसनी, सौदा नहीं करो
कलम के जादूगरो! उठो
लेखनी-बेला
१४६
कल तुम क्या ये और आज क्या हो
कल स्रष्टा थे आज लालसा हो
कल तुम रोते थे, जग रोता था
झरना तुममें वेसुध होता था
नभ को जन तुम देते थे वाणी
इन्द्रधनुप करता था अगवानी
छिडता था गीतो का इकतारा
और चमक जाता था ध्रुवतारा
याद तुम्हें होगी कोयल की भी
बरखा रानी की पायल की भी
पर्वत जैसे सागर में घुलकर
तन तुम सनसे मिलते थे खुलकर
ऊपर से हर साज़ सँवारे से
अन तुम चरते हो मनमारे से
प्राणों के खेतो पर पाला है
यह सब तुमने क्या कर डारा है
आवाज़ आ रही है-
सर्जना तुम्हारी आज कहाँ से कहाँ जा रही है
लेसनी-बेला
१५०
५
तुम सपने के नायक हो,
तुम ऑसू के गायक हो,
मोती की कीमत पर ऑसू तोला नहीं करो
समय की आसावरी सुनो,
नये स्वर की बासुरी बनो,
कनीरा-सी शायरी बुनो,
तुम्हे मिली अनमोल लेखनी, सौदा नहीं करो
कलम के कारीगरो उठो
आज अजन कुछ हिलते-डुलते तुम
किसी धर्म-कॉटे पर तुलते तुम
कुन्दन हो लो जीवन में अपने
कचन तुमको दिखा रहा सपने
ढकी हुई रेशम में रोटी है
सरकी अपनी अलग कसौटी है
यह भी बडे मजे की है हलचल
दर्द घटाने आती है मखमल!
आवृत और अनावृत चोरी में
अब तुम भी जा रहे तिजोरी मे
गिरवी परकर गीतो के घर को
क्या संदेश दोगे दुनिया भर को
लेखनी चेला
१५१
क्या ऐसा पासा फेंकोगे तुम
वासन्ती मम्ती वेचोगे तुम
आग लगा केमर की क्यारी में
कर वहार आई फुरपारी मे
आवाज़ आ रही है-
करपना तुम्हारी आज कहाँ से कहाँ जा रही है
धूप तुम्हारी छाया है,
तुमको समने गाया है,
जग को कितनी प्यास तुम्हारी, भूला नहा करो
स्वरो की वीणा और कसो,
नयन में मन मे और वसो,
मिले मुख पर कुछ और हँसो,
तुम्हे मिली अनमोल लेखनी, सौदा नहीं करो
कलम के कारीगरो, उठो ।
वैकुण्ठी ऐरावत के आगे
तुम चारण-सेवक बन कर भागे
विद्यापति तो ढोल रहा रस को
मगर नहा शिवसिंह मिला उसको
चिन्तन का आदर्श सो गया है
चाण भट्ट का हर्ष खो गया है
१५२
लेखनीयला
कालिदास खिल्ता सरोज सा है
कहाँ पारग्वी आज भोज-सा है
भूपण है, पर नहीं पालकी है
है तो केवल छत्रसाल की है
क्यो सामन्त उठाए अब टोली
सिर्फ सराहे वह करि को बोली
इसीलिए वेतन की जाली में
गाली है कवि की कगाली मे
इससे बुरी दशा भी क्या होगी
कवि होता जाता वेतन भोगी
आवाज़ आ रही है-
वन्दना तुम्हारी आज कहाँ से कहाँ जा रही है
घिरी घटा का कहना क्या,
इस बहाव मे बना क्या,
कलम उठी तो उठी उसे फिर रोका नही करो
किसी तुलमी की तरह जियो,
किसी मीरा की तरह जियो,
किमी सूरा की दृष्टि पियो,
तुम्हें मिली अनमोल लेखनी, सौदा नहीं करो
कलम के जादूगरो । उठो
लेखनीयला
आई परिवर्तन की वेला है
यह समुद्र-मथन की वेला है
अब तो लगता है हर चमन लुटा
सरम्वती का वेणी-सुमन लुटा
मुरझाया है कमल, भग्न वीणा
यह भी कोई जीने में जीना
मण्डप को निसन कौमुदी-सी
आज शारदा लुटी द्रोपदी-मी
पल-पल सघर्षों का चौमासा
चातक फिर भी प्यासा का प्यासा
उससे मिलो कि कुछ तो दरद घटे
उससे कहो कि पथ के शूल हटे
तुम दर्शन-दिग्दर्शन में भूले
अमराई में झूल रहे झूले
कविता है प्रयोग के मरुथल में
या फिर वह गुरुडम के दलदल में
आवाज़ आ रही है-
अर्चना तुम्हारी आज कहाँ से कहाँ जा रही है
अमिय तुम्हीं ने गाया है,
विष का स्वाद बताया है,
इस शरान से बचो, पियो मत, झूमा नहीं करो
लेसनी-वेला
सुधा से खाली मेघ भरो,
सुबह के कर में फिरन धरो,
किरन के माथे तिलक करो,
तुम्हें मिली अनमोल लेम्वनी, सौदा नहीं करो
कलम के जादूगरो । उठो
तुम गाओ तो फिर धरती डोले
रुंधी रही जो कोयलिया, बोले
तुम ब्रह्मा हो, दो स्तन कृतियाँ
रचना की है अद्भुत परिणतियाँ
छन्दों का जयदेव निहार उठे
तुम्हें गीत-गोविन्द पुकार उठे
पूजा प्रतिभा और स्वेद की हो
रचना नूतन सामवेद की हो
मिट्टी आए, मगल-घट यन कर
पौधा झूमे, वशी-वट बन कर
लू-स्पटो पर ठंडी हवा चले
दुनियाँ कक्न राखी बैंधा चरे
गले मिले भस्मासुर मागर से
गीतल हो चादल की गागर से
गीत डिडे सदियों का साज लिये
नये शिया की आवाज लिये
लेसनी-येला
आवाज़ आ रही है-
प्रेरणा तुम्हारे लिये नया इतिहास ला रही है
तुम्हें मल्हार गाना है,
दीपक नहीं सुनाना है,
चमन समझ ज्यालामुखियो पर डोला नहीं करो
चन्दनी गीत बने फलो,
फूल पर शबनम वन झूलो,
राह की धूल नहीं भूलो,
तुम्हें मिली अनमोल लेखनी, सौदा नहीं करो
कलम के कारीगरो, उठो ।
कलम के मेहनतकशो, उठो ।
कल्म के जादूगरो, उठो ।
१५६
लेसनी-बेला
सस्कृतियो के देश मेरे !
समृतियों के देश मेरे !
सस्मृतियों के देश मेरे !
ज्योति दो
ज्ञान दो
तम जहाँ हो
छान दो
लेसनी वेला
अर तुम नभ से उतरे भू पर हो,
सामन्ती बाधा से ऊपर हो,
मिलकर मिट्टी के मुम-टम भोगो,
मेरी धरती के नृतन रोगो ।
एक नया ही मोड लिया है पथ ने हिन्दुस्तान के
माटी को शकले दे देंगे जादुगर निर्माण के
निर्माणा के देश मेरे!
वरदानो के देश मेरे !
तूफानो के देश मेरे ।
कुछ कहो,
कुछ सहो,
दूर
बैठे-
मत रहो
स्नेह जुडा दीपोत्सव मनता है,
बूंद-बूंद से सागर बनता है,
तुम भी सागर मर्यादा वाले,
ज्वार उठाओ मत बाधा वाले,
१५८
लेसनी वेला
.
बूंद-बूंद को, ल्हर-लहर को, ज्वार-ज्वार को जोड दो
मन-मन में हो भोर जहाँ, तुम नाव उधर ही मोड दो
खजुराहो के देश मेरे।
उज्जयिनी के देश मेरे ।
मृगनयनी के देश मेरे।
फिर उठो,
फिर जुटो,
स्वप्न वाली
आटो ।
रामटेक से दूत चला था जो,
मेघो मे बन गया किला था जो,
सॉची ने जो युग सर्जाया था,
वह विदिशा के पथ से आया था,
तर का दर्पण, अब का दर्पण दोनो ही है सामने
उन्हें देखकर आगत देखो ऑसें दी है रामने
ओ गालय के देश मेरे ।
ओ मात्र के देश मेरे ।
युग-मानर के देश मेरे ।
लेसनी-बेला
१५६
सुख सजो,
दुख तजो,
विक्रमो के
वशजो
अभी सफर काफी तय करना है
डगर-डगर की खाई भरना है
हम नक्षत्र बने सूनेपन में
पूरे हों सपने जो हैं मन में
सम्कृति सबकी है, उसमें क्या जाति और क्या प्रान्त रे
नगर-नगर में, गली-गली में, मत हो जाना भ्रान्त रे
कहते है विश्वास मेरे
ये धरती-आकाश मेरे
आएँगे मधुमास मेरे
साथ दो,
हाथ दो,
हर तिमिर को
मात दो।
ဝ
लेसनी-चेला
५२
गूंज-भरे जगल में
यूल-भरे अचल में
रात के अमगल में
मगली सितारा
तीसरा अॅगारा
झॉकता दुवारा
टुकटुक हो न जाय
एशिया हमारा
लेसनी-बेला
१६१
पूस की नील नदी है
तेरो बीसी सदी है
पशुओ का शोर किनारे
उनने कुछ शर्त बदी है
उनके सब स्वप्न विकल है
कीचड से मुक्त कमल है
दलदल मे वे पडे हुए
पिछले सपने सड़े हुए
मन मे भयभीत मनौती
फिर भी दे रहे चुनौती
स्वीकारो, क्योकि हमे खुलकर ही बना है
कमलो के गहनों को नदियो ने पहना है
नदी-नदी मुक्त बहे
ल्हर-हर मस्त रहे
बूंद-ज्वाल अम्त रहे
म्वस्थ हो किनारा
मजिली निगाहे
खींच रहीं बाहे
चीग्व रहा नीर-भरी
राह की राह
लंसनी-बेला
आतिशबाजी प्रकाश की
वन बैठो महानाश की
जन्मी चान्द चीन से
भोली साथिन कपास की
सुख क निर्दोष ये दिये
तोपो के काम आ लिये
डाल हिली शुक्ल पक्ष की
सस्कृति के वश-वृक्ष की
अन्धकार बॉध कर चला
पूरव के द्वार अर्गला
सूरज का दीप न जो जलता आकाश में
बैठे ही रहते हम किरनो की आस मे
चम्पा के पाँच पख
डोल रहे है निशक
पर्वत के अफ-अक, सगमी निधारा
नयन वेधशाला
देख रही ज्वाला
उपनिवेशवादी
चम्पद दुगाला
का
लेखनी-बेला
३
राज-योग के दिन बीते
बल-प्रयोग के दिन बीते
कोहनूर वापिस होगा
भोग-रोग के दिन बीते
फूल खिले जो गमलों में
अन्तर उनमें कमलो में
गुम्बद - महरान-मकबरा
मन्दिर वाली परम्परा
इनको फिरसे ज़रा पढ़ो
शिक्षक है मोहन जदडो
ठहरो रे ठहरो, ओ सवाहक ध्वन्स के !
अतिम दिन याद करो रावण ओ कस के
चीनी-बर्मा हम है,
मिस्री-रूसी हम है,
सैन्धव-वशी हम हे, विश्व में प्यारा
सून चले आधी,
नेह-डोर बाधी,
नहीं ज़ार-नीरो हम
बुद्ध और गाधी।
१६४
लेखनी-बेला
चूनर है आज अनमनी
निर्धन-सी त्रस्त करधनी
जग की हर एक दिशा की
होती दो टूक अर्गनी
ऑसू में
इबी-डबी
खुशियो से ऊनी-ऊबी
दहली का म्वर अँधा हुआ
शहनाई ने नहीं हुआ
लाठी औ भेस की कथा
सभ्यो के विश्व में वृथा
युग का इतिहास नहीं लौटाए लौटेगा
लोह का राजमुकुट स्वयम् गला घोटेगा
उठो एशियाइयो ।
देश-देश भाइयो ।
मुक्ति पर मरो-जियो, समय न कभी हारा
एटमी इरादे
वायुयान दे
जगल-कानुन चले
ओढ कर लबादे
लेखनी-बेला
१६५
५३
आज मे आकाश में हूँ
शीश पर बादल घिरे है
और कुछ ऐसे कि जो मेरे पगों में आ गिरे हैं
गीत उनकी वन्दना के गा रहा है
निकट-दर्शन के लिये मैं मेघ-तट पर आ रहा हूँ
किन्तु फिर भी कण्ठ सूखा,
लग रहा यह देश रूखा,
बादलो के देश में या मरुस्थल में ?
मैं कहाँ है?
लोग जिसको पूछते हैं, पूजते है
व्यर्थ है वह मेघ नगरी-
मै यहाँ भी प्यास में हूँ
आज मै आकाश में हूँ
-m
लेसनी बेला
-
मै विमानों के हवाई झूलनो में झूलता हूँ
बादलो से उठ, जरा ऊपर,
पहाडी चोटियो पर झूम कर,
उस भूमि को ही भूलता हूँ-
गीत का म्वर जिस जगह से अभी मद्धिम आ रहा है
प्रीति का स्वर ऑख के हर म्वप्न को ललचा रहा है
इस परी के लोक में भी
मै उसी की आस में हूँ
आज मै आकाश में हूँ
क्या नहीं यह सच कि मै इस
प्रयोगी नभ के निशकु-सुमात्रा में
यान की इस भीडवाली यात्रा में
मूर्तवत हूँ, किसी सुन्दर-असुन्दर के पास
बैठा
दृष्टि करती आरती है
और यह सम्मान मन्दिर में यहाँ के कम नहीं है-
मै इसी विश्वास में हूँ
आज मै आकाश में हूँ
घटा उतनी है नहा सुन्दर कि जितना सोचता था
स्न्तुि फिर भी खाचती है ही मुझे वह
देख कर उज्ज्वल कपासी पाटलों से वादलो को
लेसनी-बेला.
၆
(जो सदा से सिर फिरे है
और सिर से पॉच तक आकर घिरे है)
गुनगुनाने लग गया हूँ प्रेरणाएँ
और ये सह-यात्री कुछ सुन न पाते गीत-गुजन
यान के इस शोर गुर मे
यान के बाहर घटाओ को पता क्या
मै उन्हा की करपना में
व्यस्त हूँ, सगीत-मय हूँ
दूर बाहर हों भले वे
कितु वे मस्तिष्क में मन मे कि मेरे पास है
मैं भी उन्हा के पास मे हूँ
आज मै आकाश में हूँ
मेघ का आकाश ऊपर और नीचे
सृष्टि सर अदृश्य ही है
देख मैं पाता नहीं कुछ
फैक मै पाता नहा मन
उन सलोनी घाटियो पर पर्वतो पर
शिखर जिनके मन्दिरों के गुम्बदो से
सेत जिनकी सीढ़ियों से
जहाँ पर्वतराज ने उठकर युगो से
बाँध डाले है प्रभजन
१६८
लेसनी-बेला
११
आज उनको देवलोकी व्योम में क्यो
देख भी पाता नहीं मन
सोचता हूँ, भूमिका है
मै अभी अभ्यास में हूँ
आज मै आकाश में हूँ
अभी थोडी देर पहले क्या समा था
खेत-पतों के सलौने वस्त्र पहने
गिरि-शिखर-माला खड़ी थी
चीड-वन था मुग्ध, सयत
और मन में उठ रहे तूफान-सा मजमा जमा था
बहुत उल्लास में हूँ
मै
आकाश मे हूँ
सोचता था,
आज
यह हवाई यान पछी की तरह है
फडफडाते पख,
पछी भर रहा ऊँची उडाने
यह समय से खेलता हर बार
उडने के बहाने
हस यह ऊँचाइयो-गहराइयो के नीच उडता
लेसनी-बेला
१६६
१
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वह माली है, यह सुगबू है, हम चमन
वह मूरत है, वह मन्दिर है, हम नमन
छाया है माये पर आगीर्वाद-सा
वह सस्कृतियो के मीठे सवाद-मा
उसकी दहरी अपना माथा टेक कर
हम उन्नत होते है उसको देखकर
ऋतुओ । उसको नित नूतन परिधान दो
झुलस रही है धरती, सावन दान दो
सरल नहीं परिवर्तन मे मन ढालना
हर पत्थर से भागीरथी निकालना
जिस मन्दिर-मसजिद-गिरजे में कैद पडा इन्सान हो
जाओ उसमें किरन ! फिवारा खोल दो
कुकुम-पत्रो । भारत की जय बोल दो
उसको करो प्रणाम, दृगों में नीर है
झेलम की ओग्खो वाला कश्मीर है
बजरे और शिकारे उसकी झील के
लगते बनजारे तारे कन्दील से
किसी नारियर-वन की गेय सुगन्ध से
अतरीप के दूरागत मकरन्द से
फूटा करता नये गीत का
कुछ क्षण को दुख भृल, विहँसती है धरा
अन्तरा
लेसनी-बेला
१७३
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कौन स्वीकारे भरी अजलि नयन की
आज के कुछ, कुछ विगत के आँसुओ से
लेसनी बेला
दो छवि-कमलो के अन्तर-आवास में
कोई बादल घुमड रहा आकाश में
सर्जन की मगल-वेला में धूमकेतु क्या चाहता
बच्चो की पावन उत्सुकता तोल दो
देशज मित्रो । भारत की जय बोल दो
,
हम अनेकता में भी तो है एक ही
हर झगडे में जीता सदा विवेक ही
कृति, आकृति, सस्कृति भाषा के वास्ते
बने हुए है मिलते-जुलते रास्ते
आम्थाओ की टकराहट से लाभ क्या
मज़िल को हम देंगे भला जवाब क्या
हम टूटे तो टेगा यह देश भी
मैला होगा वैचारिक परिवेश भी
सर्जन-रत हो आज़ादी के दिन जियो
श्रम-कर्माओ, रचनाकारो, साथियो ।
शान्ति और सस्कृति की जो बहती स्वाधीना जाहनी
कोई रोके, बलिदानी रंग घोल दो
रक्तचरित्रो। भारत की जय बोल दो
१७४
लेसनी-बेला
५५
कौन स्वीकारे भरी अजलि नयन की
आज के कुछ, कुछ विगत के ऑसुओ से
लेसनी-बेला
दूर वेदी पर महादेवी प्रतिष्ठित
पुण्य-सलिला, गीत की भागीरथी
श्रेष्ठ पूजन के नियत्रक हाथ जोडे
घेर कर कहते कि 'हम ही है व्रती'
क्या मुझे ही रोकते प्रहरी उन्हीं के
पूछता
मैं मौन व्रत के ऑसुओ से
.
मान-मन्दिर मूर्ति का है, चारणों का
किन्तु है अपमान-मन्दिर वह मुझे
द्वार पर जो रोकता सावन-बहारें
एक रेगिस्तान मन्दिर वह मुझे
भूति-पूजन के नियन्ताओ । निहारो
रक्त गिरता है शपथ के ऑसुओ से
पूजनीयो को भले पूजक नया हूँ
प्यार प्रतिमा का मुझे भी तो मिले
वर्ग-भेदों में नहीं सीमित रहा जो
दान गरिमा का मुझे भी तो मिले
क्ह रहा है द्वार का हर एक हरिजन
मच पर होते स्वगत के ऑमुओं से
PLE
लेसनी-चेला
नींद के कारीगरो ने रूप शिल्पा
टिमटिमाती-रात की दीवार पर
आ गए जनभोर के शिल्पी वहाँ तो
व्यग करने लग गए अधियार पर
तर-बतर है सीढ़ियाँ हीरक-महल की
भीड-बोझिल राज-पथ के ऑसुओं से
लेसनी पेला
७७
५६
वोल, बोल, बोल, अरी बेला ! तू है कहाँ
अमजा सी स्वेदमयी
और सामवेद मयी
कागज की राह-चली लेसनी पुकारती
पोल, पोल, चोल, अरी वेला तू है कहाँ
,
१७%
लेसनी-बेला
शब्दो का, छन्दो का, भावो का हर भ्रमर
गाता है गीत किन्हीं गन्धो के राग मे
दूर किसी बगिया मे खिलने से लाभ क्या
वेला के फूल खिलो कविता के बाग मैं
बोल, बोल, बोल अरी वेला तू है कहाँ
भोर-सॉझ को निहारती हुई समुद्र-जा
एक बेशकीमती लहर मुझे उधार दे
एक छटा ज्वारो की मै भी तो देख लूँ
एक घटा सावन की रचना पर वार दे
बोल, बोल, बोल अरी बेला तू है कहाँ
गीतो की व्यक्ति और रागो की मीड-सी
तारो की तीर्थवती वेला को है नमन
पावन उस ममता का स्नेह पात्र है कहाँ
स्वेद-रक्त-अश्रु किस कटोरे मे लें शरण
बोल, बोल, बोल अरी वेला तू है कहाँ
जो है मन का धनी
जिसकी है रेखनी
लेसनी-बेला
१७६
उसकी ही वेला है, युग है, है भारती
कागज़ की राह चली लेखनी पुकारती
सगम को व्यग्र कलम, वेला तू है कहाँ
बोल, बोल, बोल परी वेला तू है कहाँ
१८०
लेसनी-चेला
५७
मजिल के मन्दिर में पूजा के थाल-सा
पूरन है गीत पर अपूरन है आरती
लेसनी-बेला
ऑसू के फल और मुट्ठी भर धूल है
ये ही बस कुकुम है, ये ही है अर्चना
पावन है, उजली है कर्पूरी सर्जना
भूलो से बोझिल ये नयनो का कल है
देगा वरदान अभी शायद ही देवता
मन मेरा फूला है, नैया के पाल-सा
धडकन की बनजारिन, हिम्मत ना हारती
सुख का जो कर्ज लिया, कुछ दिन के वास्ते
बढ़ जाए व्याज नहीं अब तक के मूल से
भूलो को कब तक है दुहराना भूल से
अँधियारा घेरे है उजियारे रास्ते
देगा वरदान अभी शायद ही देवता
पथ ये जो सीधा है घाटी के ढाल-सा
रथ अपना थम-थम कर ले जाना सारथी !
ले
गूंज रही बेला-सी मेरी ये लेखनी
सरगम जो सोए है इससे ही जाग
ऑखो से समिधाएँ, साँसों से आग
गहरी अधियारी है, आगे भी देखनी
देगा वरदान अभी शायद ही देवता
जिसका माथा ऊँचा सूरज के भाल सा
उसको ही राज तिलक करती है भारती
लेसनी-बेला
पृष्ठ
पक्ति
अशुद्ध
शुद्ध
३०
८
तुमड तना
तुम इतना
३
मुझे
मगर
९१
१
भींग
भीग
१०९
१६
सुने
१४६
१०
सुने
खोदती
बैठो
खो देती
१६३
२
बैठी
१६८
पास
पाश
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१९५७ के नवीनतम प्रकाशन श्री कन्हैयाराल मिश्र प्रभाकर निबन्ध माटी हो गई सोना प्रस्तुत पुस्तकमें बल और बलिदानको जीवन चेतना देनेवाले १७ अमर शहीदांकी जीवन कथाओंका अक्षरचित सींचा है। पृष्ठ स. १२४ श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर निबन्ध मूल्य दो रपये वाजे पायलियाके घुघरू मूल्य चार रुपये प्रस्तुत पुस्तकके इन लेखांमें वही शुभ सपर्क है जो अशान्तिमें शान्ति, नीरसतामें सरसता और निराशामे आशाके भाव देकर मनको बिना किसी प्रयत्नके बदल देता है। पृष्ठ म०२६६ श्री भानन्दप्रकाश जैन कहानियाँ कालके पख प्रस्तुत पुस्तकमें १४ ऐतिहासिक नवीन कहानियाँका सग्रह है। भाषा सरस और परिमार्जित है। पृष्ठस.२५६ मूल्य तीन रुपये श्री रामप्रकाश जैन सूक्तियों शरत्की सूक्तियाँ प्रस्तुत पुस्तकमें शरत्को लेखनीके निझरसे अनेक साहित्यिक सूक्तियों के मणि माणिक्य सहसा हो झरते चले गये है उन्हींका सक्लन इसमें है। ये सूनिया शरत्की बहुरूपी रचनाआ और पनासे चुनी गई है। पृष्ठ स०१६ मूल्य दो रुपये १९५७ के नवीनतम प्रकाशन उपन्यास श्री भज्ञेय कहानियाँ जय-दोल इस सग्रहमें अपने देशाटन और युद्धकालीन अनुभव का लेसक्ने पूरा लाभ उठाया है, ये कहानियाँ आपकोअपरिचित किन्तु आकर्षक नये प्रदेशों, नये लोगों, नयी स्थिति में ले जावेगी-किन्तु निरे कल्पना लोकमें परायन करके नहीं, एक नयो तन्मय कर लेनेवाली यथार्थताका उद्घाटन करके । पृष्ठ स० १६२ मूल्य तीन रपये श्री राधाकृष्ण प्रसाद एम. ए. संस्कारो की राह प्रस्तुत पुस्तक एक सामाजिक घटना प्रधान उप यास है । इसम लेसक्ने मध्यवर्ग तथा मध्यवर्गरे सस्कारोंकी क्या सरल सीधे-सादे शब्दांमें प्रथित की है। मूल्य ढाई रुपये श्रीकृष्ण एम० ए० तरकशके तीर प्रस्तुत पुस्तकमें १४ एकाकी नाटक सग्रहीत है। भाषा सरस सुबोध है । सभी नाटक रगमचपर आसानीसे सेले जा सकते हैं। पृष्ठ स०११६ मूल्य तीन रुपये सम्पादक-सयेन्द्र शरत् नये चित्र प्रस्तुत पुस्तकमें सन् १६४८ से १९५२ तक्की प्रतिनिधि हिन्दी कहानियाँका सक्लन किया गया है। मूख्य तान रुपये पृष्ठ स०१७२ एकाकी नाटक 1 कहानियाँ पृष्ठ स०११२
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अभिनव एव सग्रहणीय काव्य-कृतियाँ आँगन के पार द्वार अज्ञेय साहित्य अकादमी-द्वारा पुरस्कृत-मम्मा- नित अनेयकी नवीनतम एव मम- स्पर्शी कविताआमा सग्रह । मूल्य ३०० • चाँद का मुंह टेढ़ा है मुक्तिबोध स्व० मुक्तिबायकी कविताका यह मग्रह हिन्दी का यकी नयो प्रखरता, क्षमता और युगबोधको सचेष्टताका ही प्रयोग नही, नयी उपलचियोका भी मानक है। मूल्य ८०० •हिम विद्ध डॉ. जगदीश गुप्त ऐमी मर्मस्सी कवितामाता मग्रह जो अनुभूतिको उत्तता, अभिव्यक्तिरी ताजगी, व्यापन और समर्थ जीवन- चेतना तथा कविको अनूठी करा स्मकताका परिचय दता है। मूल्य ३०० मारतीय ज्ञानपीठ-द्वारा प्रकाशित