Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Prarambhik Rachana Anuvadh Koamudi
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प्रारम्भिक रचनानुवादकौमुदी
1
डा० कपिलदेव दिवेदी
वधि
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
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प्रारम्भिक रचनानुवादकौमुदी ( संशोधित और परिवर्धित संस्करण ) नवीनतम वैज्ञानिक पद्धति से लिखी गयी संस्कृत-व्याकरण और अनुवाद की पुस्तक, संस्कृत के प्रारम्भिक छात्रों के लिए लेखक- डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आचार्य, एम० ए० (संस्कृत, हिन्दी), एम० ओ० एल०, डी० फिल्० (प्रयाग); विद्याभास्कर, साहित्यरत्न, व्याकरणाचार्य, पी० ई० एस०, संस्कृत-प्रोफेसर गवर्नमेंट कॉलेज, ज्ञानपुर ( वाराणसी) aa विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
© विश्वविद्यालय प्रकाशन, १९७८ ई०
दशम संस्करण : १९७८ ई०
मूल्य : तीन रुपये पचीस पैसे
प्रकाशक : विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी-२२१००१
मुद्रक
: शिवलाल प्रिन्टर्स, नायक बाजार, वाराणसी।
समर्पण
श्रद्धा, विश्वास, शील और आस्तिकता की मूर्ति
जीवन-संगिनी
श्रीमती ओमशान्ति द्विवेदी एम. ए.,
सिद्धान्त-शास्त्री
के
कर-कमलों में
सस्नेह समर्पित।
कपिलदेव द्विवेदी
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आत्म-निवेदन १ (१) पुस्तक-लेखन का उद्देश्य:-यह पुस्तक संस्कृत के प्रारम्भिक छात्रों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रस्तुत की गयी है । किस प्रकार कोई भी विद्यार्थी २ या ३ मास में निर्भीक होकर सरल और शुद्ध संस्कृत लिख तथा वोल सकता है, इसका ही प्रकार उपस्थित किया गया है । 'संस्कृत भाषा क्लिष्ट भापा है' इस लोकापवाद का खंडन करना मुख्य उद्देश्य है । संस्कृत के प्रारम्भिक छात्रों के लिए जितने व्याकरण का ज्ञान अत्यावश्यक है, उतना ही अंश इसमें दिया गया है। अनावश्यक सभी विवरण छोड़ दिया गया है। समस्त व्याकरण अनु- वाद के द्वारा सिखाया गया है । रटने की क्रिया को न्यूनतम किया गया है । (२) पुस्तक को शैली:-पुस्तक कुछ नवीनतम विशेषताओं के साथ प्रस्तुत की गयी है । हिन्दी, संस्कृत तथा इंग्लिश में अभी तक इस पद्धति से लिखी गयी अन्य कोई पुस्तक नहीं है । जर्मन और फ्रेंच भाषा में इस पद्धति पर लिखी गयी कुछ पुस्तकें हैं, जिनके द्वारा सरल रूप में जर्मन आदि भाषाएं सीखी जा सकती हैं । इंग्लिश् तथा रूसी भाषा में भी वैज्ञानिक पद्धति से नवीन भाषा सिखाने के लिए अनेक पुस्तकें हैं । इन भाषाओं में मापा-शिक्षण की जो नवीनतम वैज्ञानिक पद्धति अपनायी गयी है, उसको ही इस पुस्तक में भी आधार माना गया है। (३) अभ्यास और शब्दकोष:-इस पुस्तक में केवल ३० अभ्यास दिये गये । प्रत्येक अभ्यास में २० नये शब्द हैं। इस प्रकार कुल ६०० अत्यावश्यक मौलिक (Basic) शब्दों का प्रयोग विशेष रूप से सिखाया गया है। शब्दकोष के शब्दों का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से है- (क) अर्थात् संज्ञा या सर्वनाम शब्द ३४९ (ख) अर्थात् धातु या क्रिया शब्द १२२ (ग) अर्थात् अव्यय शब्द (घ) अर्थात् विशेषण शन्द ८० ४९ पठित एवं अभ्यस्त शब्दों का योग ६०० (शब्दयोग) (४) विद्यार्थियों से (१) संस्कृत भाषा को अति सरल, सुवोध और सुगम बनाने के लिए यह पुस्तक प्रस्तुत की गयी है । प्रयल किया गया है कि छात्रों की प्रत्येक कठिनाई को दूर किया जाय । अतएव सरलतम भाषा का प्रयोग किया गया है । (२) पुस्तक में केवल ३० अभ्यास हैं । प्रत्येक में केवल २० नये शब्दों का अभ्यास कराया गया है। कोई भी प्रारम्भिक छात्र एक या दो घंटा प्रतिदिन समय देने पर दो दिन में १ अभ्यास पूरा कर सकता है। इस प्रकार दो मास में यह पुस्तक समाप्त हो सकती है। केवल ८० नियमों में सब आवश्यक नियम दे दिये गये हैं। (३) संस्कृत भाषा के प्रारम्भिक ज्ञान के लिए जितने शब्दों, धातुओं और नियमों के जानने की आवश्यकता है, वे सभी इस पुस्तक में हैं । इस पुस्तक का ठीक अभ्यास हो जाने पर छात्र निःसंकोच सरल एवं शुद्ध संस्कृत लिख और वोल सकता है। (४) प्रारम्भिक छात्रों के लिए उपयोगी सम्पूर्ण व्याकरण इस पुस्तक के अन्त में दिया हुआ है । शब्दों के रूप, धातु-रूप, संख्याएँ, १८ मुख्य सन्धियों के नियम, १० मुख्य प्रत्ययों से बने हुए धातुओं के रूप परिशिष्ट में हैं। (५) प्रत्येक अभ्यास में कुछ विशेष शब्दों और नियमों का अभ्यास कराया गया है। उनको प्रारम्भ से ही ठीक स्मरण करना चाहिए। विशेष सफलता के लिए त्येक अभ्यास के अन्त में दिये हुए अभ्यास-प्रश्नों को भी करना चाहिए । ट एंड्रूज कॉलेज, गोरखपुर कपिलदेव द्विवेदी ३०-६-१९५३ नवम संस्करण की भूमिका संस्कृत-प्रेमी अध्यापकों, विद्यार्थियों और जनता ने इस पुस्तक का हार्दिक स्वागत किया है, तदर्थ उनका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। पिछले संस्करणों में छपाई सम्बन्धी या अन्य जो त्रुटियाँ रह गयी थीं, उनका इस संस्करण में निराकरण कर दिया गया है । प्रस्तुत संस्करण प्रथम आठ संस्करणों का संशोधित रूप है। अनुवादार्थ गद्य-संग्रह, आवश्यक संकेत, हाईस्कूल के लिए उपयोगी शब्दरूप, धातुरूप और २० संस्कृत-निवन्ध आदि वढ़ाये गये हैं । आशा है प्रस्तुत संस्करण विद्यार्थियों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होगा। गवर्नमेंट कॉलेज, ज्ञानपुर (वाराणसी) कपिलदेव द्विवेदी दिनांक २०-६-७६ ई० विषय-सूची १४ १८ १२. पंचमी" 1 " " अभ्यास विवरण पृष्ठ १. वर्तमानकाल, प्रथमपुरुष २ २. मध्यमपुरुप ४ ३. उत्तमपुरुष ६ ४. संख्या १-१०, कृ, अस धातु लट्, कारक-परिचय ८ ५. राम शब्द, लट् लकार, प्रथमा विभक्ति १० ६. गृह लोट द्वितीया १२ ७. रमा ८. हरि विधिलिङ् तृतीया ९. गुरु लट् १०. ५ सर्वनाम शब्द (पु०) अस् धातु, चतुर्थी विभक्ति २० ११. (नपुं०), २२ स्त्री०), कृ २४ १३. युष्मद् २६ १४. अस्मद् पप्ठी" २८ १५. कर्तृ ३० १६. पितृ सप्तमी ३२. १७. भगवत् ३४ १८. करिन लट् (आ०) लकार द्वितीया" अनुस्वारसन्धि ३६ १९. राजन् तृतीया " यम् २०. गच्छत् चतुर्थी अयादि ४० पंचमी गुण ४२ टट् पष्ठी वृद्धि ४४ २३. धेनु " सप्तमी वि० ४६ पूर्वरूप २५. मधु क्तवतु २चुत्व २६. पयस शत जरत्व ५२ २७. नामन् शानच् ५४ २८. एक, द्वि क्री, ज्ञा तुमुन् विसर्ग २९. त्रि, चतुर् क्त्वा उत्व ३०. सं०.५-१०" तव्य, अनीयर् ल्युट् ६० " लोट " वि० लिङ् २१. मति २२. नदी क्त प्रत्यय दीर्घ २४. वारि दा घातु ४८ ५० श्रु " चव " परिशिष्ट-व्याकरण - पृष्ठ (१) शब्दरूप-संग्रह ६२-८० (क) १. राम, २. हरि, ३. गुरु, ४. कर्तृ, ५. पितृ, ६. गो, ७. भूभृत्, ८. भगवत्, ९. गच्छत्, १०. करिन्, ११. पथिन्, १२. आत्मन्, १३. राजन्, १४. विद्वस्, १५. रमा, १६. मति, १७. नदी, १८. स्त्री, १९. धेनु, २०. वधू, २१. मातृ, २२. वाच्, २३. दिश्, २४. क्षुध्, २५. उपानह , २६. गृह, २७. वारि, २८. दधि, २९. मधु, ३०. पयस्, ३१. नामन्, ३२. अहन्, ३३. जगत् ३४. सर्व ३५. किम्, ३६. तत्, ३७. एतत्, ३८. यत्, ३९. युष्मद्, ४०. अस्मद्, ४१. इदम्, ४२. एक, ४३. द्वि, ४४. त्रि, ४५. चतुर्, ४६. पञ्चन्, ४७. ष, ४८. सप्तन्, ४९, अष्टन्, ५०. नवन्, ५१. दशन् । (ख) ५२. सखि, ५३. सरित्, ५४. शर्मन्, ५५. मनस्, ५६. पूर्व, ५७. कति, ५८. उम। (२) संख्याएं ८१-८२ गिनती १ से १०० तक तथा संख्याएँ अरब तक । (३) धातुरूप-संग्रह ८३-११८ क) १. भू, २. हस्, ३. पठ्, ४. रक्ष, ५. वद्, ६. पच्, ७. नम्, ८, गम्, ९. दृश्, १०. सद्, ११. स्था, १२. पा, १३. स्मृ, १४. जि, १५. सेव्, १६. लभ्, १७. वृध्, १८. मुद्, १९. सह, २०. याच् २१. नी, २२. ह, २३. अस्, २४. दा, २५: दिव्, २६. नृत्, २७. नश्, २८. भ्रम्, २९. श्रु, ३०. आप्, ३१. शक्, ३२. तुद्, ३३. इष्, ३४. प्रच्छ्, ३५. लिख्, ३६. कृ, ३७: क्री, ३८. ग्रह, ३९. ज्ञा, ४०. चुर्, ४१. चिन्त, ४२. कथ्, ४३. भक्ष्, । (ख) ४४. वस्, ४५. अद, ४६. ब्रू, ४७. दुह, ४८. रुद्, ४९. स्वप्, ५०. हन्, ५१. इ, ५२. आस्, ५३. शी, ५४. हु, ५५. भी, ५६. दा, ५७. धा, ५८. युध्, ५९. जन्, ६०. सु, ६१. स्पृश्, ६२. मृ. ६३. मुच, ६४. रुध्, ६५. भुज्, ६६. तन् । (४) सन्धि-विचार ११९-१२२ १८ मुख्य सन्धियों का उदाहरण-सहित विवेचन । (५) समास-परिचय १२३-१२५ (६)प्रत्ययविचार १२६-१३४ १. क्त, २. क्तवतु, ३. शह, ४. तुमुन्, ५. तव्यत् ६. तृच्, ७. क्त्वा, ८. ल्यप्, ९. ल्युट्, १०. अनीयर् । (७) अनुवादार्थ गद्यसंग्रह १३५-१४२ (८) निबन्ध-संग्रह १४३.-१५२ . .
आवश्यक निर्देश से इन । १. प्रत्येक अभ्यास में २० नये शब्द दिये गये हैं। ३० अभ्यासों में कुल ६०० अत्यावश्यक शब्द एकत्र किये गये हैं। प्रत्येक अभ्यास में मुख्यरूप शब्दों और धातुओं का अभ्यास कराया गया है। इनको ठीक स्मरण कर लें। २. शब्दकोप को ४ भागों में बांटा गया हैं। क = संज्ञा-शब्द, ख) धातु या क्रिया-शब्द, (ग) = अव्यय, (घ) = विशेषण। शब्दकोप के लिए (क) (ख) आदि संकेत स्मरण कर लें। शब्दकोश में जहाँ (क) (ख) (ग) या (घ) नहीं है, वहाँ यह अर्थ समझे कि उस विभाग का शब्द वहाँ नहीं है । शब्दकोष के अन्त में सूचना दी गयी है कि शब्दों या धातुओं के रूप किस प्रकार चलेंगे। तदनुसार उनके रूप चलावें। ३. प्रत्येक अभ्यास के लिए केवल दो पृष्ठ दिये गये हैं। दोनों पृष्ठों पर पंक्तियाँ गिनकर रखी गयी हैं । बायीं ओर-(१)शब्दकोप, (२)व्याकरण सम्बन्धी नियम दिये गये हैं। दायीं ओर-(१) उदाहरण-वाक्य, (२) संस्कृत बनाने के लिए हिन्दी के वाक्य, (३) अशुद्ध वाक्यों के शुद्ध वाक्य, (४) अभ्यास आदि । ४. व्याकरण के जो नियम उस अभ्यास में दिये गये हैं तथा जो नये शब्द दिये हैं, उनका प्रयोग उदाहरण-वाक्यों में किया गया है। उदाहरण-वाक्यों को बहुत ध्यानपूर्वक समझ लें। उनसे बहुत मिलते हुए वाक्य ही संस्कृत-अनुवाद के लिए दिये गये हैं। जहां कोई कठिनाई हो, वहाँ उदाहरण-वाक्यों और अशुद्ध-वाक्यों के शुद्ध-वाक्यों से सहायता लें। ५. *चिह्न वाले नियम विशेप आवश्यक हैं । जिन अशुद्धियों का एक वार निर्देश किया है, बार-बार उनका निर्देश नहीं है। राम, गृह, रमा आदि के तुल्य चलनेवाले शब्दों के लिए प्रत्येक शब्दकोष में निर्देश नहीं है, उसके रूप तदनुसार चलावें। ६. सभी आवश्यक शब्दों और घातुओं के रूप पुस्तक के अन्त में दिये गये हैं; उन्हें वहाँ देखें। १ से १०० तक गिनती, १८ मुख्य संचियाँ तया १० मुख्य प्रत्ययों से बने धातुओं के रूप और संस्कृत में निवन्ध अन्त में हैं। उनको वहीं । देखें।
२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम १-३) अभ्यास १. क सः (वह), तौ (वे दोनों), ते (वे सव), कः (कौन) (सर्वनाम)। रामः (राम), ईश्वरः (ईश्वर), बालकः (बालक), मनुष्यः (मनुष्य), नृपः (राजा), विद्यालयः (विद्यालय), ग्रामः (गाँव) । (११) । (ख) भू (होना), पट् (पढ़ना), गम् (जाना), हस् (हँसना) । (४)। (ग) अत्र (यहाँ), तत्र (वहाँ), यत्र (जहाँ), कुत्र (कहाँ), किम् (क्या)। (५) । सूचना-~-१. शब्दकोष के लिए ये संकेत स्मरण कर लें। आगे भी शब्दकोष में (क) (ख) (ग) (घ) का यही अर्थ समझे । (क) संज्ञा या सर्वनाम शब्द । (ख) = धातु या क्रिया-शब्द । (ग, - अव्यय या क्रियाविशेषण । (घ)= विशेषण शब्द। २. (क) चिह्न-(अर्थात् लकीर) 'तक' अर्थ का बोधक है । जैसे-१-१० अर्थात् १ से १० तक । रामग्राम अर्थात् ऊपर शब्दकोष में दिये राम से ग्राम तक सारे शब्द । (ख, 'वत्' का अर्थ है तुल्य या सध्श । जिस शब्द या धातु के तुल्य अन्य शब्दों या धातुओं के रूप चलेंगे, उसका संकेत 'वत्' लगाकर किया गया है । जैसे 'रामवत्' अर्थात् राम के तुल्य रूप चलेंगे। "भवतिवत्' अर्थात् भवति के तुल्य रूप चलेंगे। ३. (क) रामग्राम, रामवत् अर्थात् ऊपर शब्दकोष (क) में दिये राम से ग्राम शब्द तक के रूप राम शब्द के तुल्य चलेंगे। (ख) भू-हस्, भवतिवत् अर्थात् भ से हस् धातु तक के रूप भवति के तुल्य चलेंगे । व्याकरण (लट्. परस्मैपद) १. राम शब्द के प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के रूप स्मरण करो। (देखो शब्दसंख्या १) राम के तुल्य ही ईश्वर आदि के भी रूप चलाओ। २. लट् का अर्थ है वर्तमानकाल । प्रथम पुरुष में धातु में एकवचन में अति, द्विवचन में अतः, वहुवचन में अन्ति लगेगा । जैसे-भवति भवतः भवन्ति । इसी प्रकार पठ् आदि के भी रूप बनाओ । लट् रूप बनाओ । लट् आदि में गम् का गच्छ् हो जाता है। गच्छति गच्छतः आदि। नियम १-कर्ता के अनुसार क्रिया का वचन और पुरुष होता है । जैसे, सः पठति । कर्ता प्रथमपुरुष एकवचन है, अतः क्रिया भी प्र० पु० एक० है । नियम २-तीनों लिंगों में धातु का रूप वही रहता है । नियम ३... कर्ता में प्रथमा होती है और कर्म में द्वितीया । के अन्त - वर्तमानकाल, प्रथम पुरुष ३ अभ्यास १ ? मनुष्य गाँव १. उदाहरण वाक्य-१. वह पढ़ता है-सः पठति । २. वे दो पढ़ते हैं (या पढ़ रहे हैं)--तौ पठतः । ३. वे सब पढ़ते हैं-ते पठन्ति । ४. वहाँ क्या हो रहा है ?-तत्र किं भवति ? -तत्र किं भवति ? ५. वालक वहाँ जाता है-बालकः तत्र गच्छति । ६. वह मनुष्य हंसता है-सः मनुष्यः हसति । २, संस्कृत बनाओ-(क) १. वह पढ़ता है । २. वह हँसता है । ३. बालक पढ़ता है । ४. राम गाँव जाता है । ५. बालक विद्यालय जाता है । ६. राजा जा रहा है । ७. वह मनुप्य कहाँ जाता है ? ८. वहाँ कौन पढ़ रहा है ? ९. यहाँ क्या हो रहा है ? १०. वह वालक हँसता है । (ख) ११. वे दोनों पढ़ते हैं। १२. वे दोनों कहाँ जाते हैं ? १३. दो बालक हँसते हैं । १४. दो जाते हैं । १५. दो वालक विद्यालय जाते हैं। (ग) १६. वे सब पढ़ते हैं । १७. सव वालक हंसते हैं । १८. सव मनुप्य गाँव को जाते हैं । १९. वे वालक जहाँ जाते हैं, वहां हंसते हैं । २०. सब बालक पढ़ रहे हैं । ३. अशुद्ध वाक्य देखो नियम-संख्या (१) रामं ग्रामः गच्छन्ति । रामः ग्रामं गच्छति । १,३ (२) तौ पठति । ती पठतः । (३) वालको विद्यालयः गच्छन्ति । वालको विद्यालयं गच्छतः । १,३ (४) यत्र गच्छन्ति तत्र हसति । यत्र गच्छन्ति तत्र हसन्ति । शुद्ध करो तथा नियम बताओ-सः पठतः । सः पठन्ति । तो पठति । ते पठति । बालकः हसन्ति । सः गच्छन्ति । रामः ग्रामः गच्छन्ति । ते किं पठति । ५. अभ्यास ( संस्कृत में ;-(क) २ (क) के वाक्यों को द्विवचन और वहुवचन में वदलो। (ख) २ (ख) के वाक्यों को एकवचन और बहुवचन में बदलो। (ग) भू, पठ्, गम्, हस् के लट् प्रथम पुरुष के रूप लिखो। (घ) राम, बालक, मनुष्य, नृप, ग्राम के प्रथमा और द्वितीया के रूप लिखो। ६. वाक्य वनाओ-पठति, पठन्ति, गच्छति, गच्छन्ति, हसति, कः, किम्, अन, यत्र, तत्र, कुत्र। शुद्ध वाक्य १ or ४. - . , - अभ्यास २ - -- - ~ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ४) शब्दकोष २०+२० =४०] (व्याकरण) (क) त्वम् (तू), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सव) (सर्वनाम) । गृहम् (घर), ज्ञानम् (ज्ञान), पुस्तकम् (पुस्तक), पुष्पम् (फूल), जलम् (जल), सत्यम् (सत्य), भोजनम् (भोजन), राज्यम् (राज्य)। (११)। (ख) रक्ष (रक्षा करना), वद् (बोलना), पच् (पकाना), नम् (नमस्कार करना) ।(४)। (ग) अद्य (आज), इदानीम् (अव), यदा (जब), तदा (तव), कदा (कव) (५)। सूचना--(क) गृह-राज्य,गृह्वत् । (ख) रक्ष-नम्, भवतिवत् । व्याकरण (लट्, मध्यमपुरुष १. गृह शब्द के प्रथमा, द्वितीया के रूप स्मरण करो। (देखो शब्द-संख्या २६) । शब्द के अन्त में प्रथमा और द्वितीया में अम्, ए, आदि न लगेगा । गृह और पुष्प शब्द में आनि के स्थान पर आणि लगेगा। २. मध्यमपुरुष में धातु के अन्त में एकवचन में असि, द्विवचन में अथः और बहुवचन में अथ लगेगा । जैसे-पठसि, पठथः, पठथ । इसी प्रकार रक्ष भादि धातुओं के रूप बनाओ । जैसे-रक्षसि, वदसि, पचसि, नमसि, गच्छसि, भवति , हससि आदि। ३. संस्कृत में तीन वचन होते हैं--एकवचन, द्विवचन, बहुवचन । एक के लिए एकवचन (एक०), दो के लिए द्विवचन (द्वि०), तीन या अधिक के लिए बहुवचन (बहु०)। ४. तीन पुरुष होते हैं:-प्रथम (या अन्य पुरुष (प्र० पु०) अर्थात् वह, वे दोनों, वे सब, किसी व्यक्ति या वस्तु का नाम। (२) मध्यमपुरुष (म० पु०) अर्थात् तू, तुम दोनों, तुम सब। (३) उत्तमपुरुष (उ० पु०) अर्थात् मैं, हम दोनों, हम सब । ये नाम स्मरण कर लें। नियम ४-- (अपदं न प्रयुञ्जीत) बिना प्रत्यय लगाये किसी शब्द या धातु का प्रयोग न करें। (शब्द के अन्त में जुड़ने वाले अः, औ, आः आदि तथा धातु के अन्त में जुड़ने वाले अति, अतः, अन्ति आदि को प्रत्यय कहते हैं ।) अन्त में बिना कुछ प्रत्यय लगाये गृह, पुस्तक, भोजन, पठ्, रक्ष आदि का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। गृहम्, पुस्तकम्, पठति आदि का ही प्रयोग होगा। - लट, मध्यमपुरुष ५ अभ्यास २ --- १. उदाहरण-वाक्य-१. तू पढ़ता है-त्वं पठसि । २. तुम दोनों पढ़ते । हो-युवां पठयः । ३. तुम सब पढ़ते हो-यूथं पठथ । ४. त्वं पुस्तकं पठसि । युवां राज्यं रक्षथः । ६. यूयं भोजनं पचथ । ७. त्वम् ईश्वरं नमसि । ८. युवां गृहं गच्छथः । ९. यूयं सत्यं वदथ । १०. त्वम् इदानीं किं पठसि ? २. संस्कृत वनाओ-(क) १. तू पढ़ता है । २. तू घर जाता है । ३. तू हँसता है । ४. तू राज्य की रक्षा करता है । ५. तू सत्य वोलता है । ६. तू क्या कहता है ? ७. तू ईश्वर को नमस्कार करता है । ८. तू पुस्तक पढ़ता है । ९. तू कहाँ जाता है ? १०. तू आज क्या पढ़ रहा है ? ११. जव तू आता है, तब वह भोजन पकाता है । १२. तू अब पुस्तक पढ़ रहा है । (ख) १३. तुम दोनों कव पुस्तकें पढ़ते हो ? १४. तुम दोनों सत्य वोलते हो । १५. तुम दोनों क्या कहते हो ? १६. तुम दोनों राजा की रक्षा करते हो। (ग) १७. तुम सब विद्यालय को जाते हो । १८. तुम सब हँसते हो । १९. तुम सब कव पुस्तकें पढ़ते हो ? २०. तुम सब अव कहाँ जाते हो? ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) त्वं राजस्य रक्षसि । त्वं राज्यं रक्षसि । (२) गुवां पुस्तकं पठसि । युवा पुस्तकानि पठथः। (३) यूयं विद्यालयं गच्छयः । यूयं विद्यालयं गच्छथ। (४) यूयं हसन्ति । यूयं हसथ । ४. शुद्ध करो तथा नियम वताओ-त्वं पठति । युवां पठथ । यूयं पटन्ति । यूयं वदसि । त्वं गच्छति । त्वं नृपस्य रक्षति । त्वं पठ् । ५. अभ्यास क) २ (क) के वाक्यों को द्विवचन और बहुवचन में वदलो। (ख) भू, पट, गम्, हस्, रक्ष्, वद, पच्, नम् के लट् मध्यम पुरुप के रूप लिखो। (ग: गृह, ज्ञान, पुस्तक, पुप्प, भोजन के प्रथमा और द्वितीया के रूम लिखो। (घ) संस्कृत में कितने वचन और पुरुप होते हैं ? वताओ। ६. वाक्य बनाओ-पठसि, गच्छति, पुस्तकम्, गृहम्, सत्यम्, अद्य । ३ १,४ on . - -- - - प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ५ शब्दकोष ४०+२० = ६०] अभ्यास ३ (व्याकरण) (क) अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों), वयम् (हम सब) (सर्वनाम)। रमा (लक्ष्मी), वालिका (लड़की), लता (लता), कथा (कथा, कहानी), क्रीडा (खेल), पाठशाला (पाठशाला), विद्या (विद्या)। (१०) । (ख) आ + गम् (आना), दृश् (देखना), स्था (रुकना, बैठना), पा (पीना), ब्रा (सूंघना), सद् (बैठना)। (६) । (ग) इतः (यहाँ से, इधर), ततः (वहाँ से), यतः (जहाँ से), कुतः (कहाँ से) । (४) । सूचना-(क) रमा-विद्या, रमावत् । (ख) आगम्--सद्, भवतिवत् । व्याकरण (लट्, उत्तमपुरुष, वर्णमाला) १. रमा शब्द के प्रथमा और द्वितीया के रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० १५) । इसी प्रकार बालिका आदि के रूप चलाओ । २. उत्तमपुरुष में धातु के अन्त में एक० में आमि, द्वि० में आव: और बहु० में आमः लगेगा । जैसे-पठामि, पठावः, पठामः । ३. लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ् में इन धातुओं के ये रूप होते हैं—गम्- गच्छ्, गच्छति आदि । आगम्-आगच्छ, आगच्छति । दृश्-पश्य, पश्यति । -तिष्ठ, तिष्ठति । पा-पिव्, पिबति । ब्राजिघ्र, जिघ्रति । सद्-~- सीद्, सीदति । लट् में गम् आदि ही रहेगा। ४. वर्णमाला-कोष्ठ में पारिभाषिक नाम हैं, इन्हें स्मरण कर लें। (क) स्वर- अ, इ, उ, ऋ, ल, (ह्रस्व) ए, ऐ, ओ, (ह्रस्व) ए, ऐ, ओ, औ (मिश्रित) ) आ, ई, ऊ, ऋ, (दीर्घ) (ख) व्यंजन-क, ख, ग, घ, ङ (कवर्ग), च, छ, ज, झ, ञ (चवर्ग) ट, ठ, ड, ढ, ण (टवर्ग), त, थ, द, ध, न, (तवर्ग) प, फ, ब, भ, म पवर्ग), य, र, ल, व, (अन्तःस्थ) श, ष, स, ह (ऊष्म), अनुस्वार, (अनुनासिक) : (विसर्ग) सूचना-वर्ग के प्रथम (१) अक्षर का अर्थ है-क च ट त प । द्वितीय (२) ---ख छ ठ थ फ। तृतीय (३)—ग ज ड द ब । चतुर्थ (४)-घ झ ढ व भ । पंचम (५) | ङ अ ण न म । संधि-नियमों के लिए ये संकेत स्मरण रखें। नियम ५ - अचहीनं परेण संयोज्यम्) हल् व्यंजन आगे के स्वर से मिल जाता है। (यह नियम ऐच्छिक है) । जैसे-अहम् + अद्य = अहमद्य । त्वमिदानीम् । - - - लट्, उत्तमपुरुष अभ्यास ३ 1 १. उदाहरण-वाक्यः-१. मैं पढ़ता हूँ-अहं पठामि । २. हम दोनों पढ़ते हैं-आवां पठावः । ३. हम सब पढ़ते हैं—वयं पठामः । ४. अहं विद्यां पठामि । ५. आवां क्रीडां पश्यावः । ६. वयं पाठशालां गच्छामः । ७. अहम् अत्र आग- च्छामि । ८. वयमत्र तिष्ठामः । अहं जलं पिवामि । १०. अहं पुष्पं जिवामि । ११. वयमत्र सीदामः ! १२. वालिका कुतः आगच्छति । २. संस्कृत बनाओ-(क) १. मैं पढ़ता हूँ। २. मैं पाठशाला जाता हूँ। ३. मैं खेल देखता हूँ । ४. मैं फूल सूंघता हूँ। ५. मैं वहाँ से आता हूँ। ६. मैं यहाँ वैठता हूँ। । ७. मैं मैं लता देखता हूँ। ८. मैं जल पीता हूँ। । ९. मैं सत्य बोलता हूँ। (ख) १३. हम दोनों कहाँ से आते हैं ? १४. हम दोनों वहाँ से आते हैं । १५. हम दोनों जल पीते हैं । १६. हम दोनों राजा को देखते हैं । (ग) १७. हम सब विद्या पढ़ते हैं । १८. हम सव ईश्वर को नमस्कार करते हैं । १९. हम सब फूल सूंघते हैं । २०. हम सव बालिका की रक्षा करते हैं ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) अहं पुष्पं घ्रामि । अहं पुष्पं जिघ्रामि । घातुरूप (२) अहम् अत्र स्थामि । अहमत्र तिष्ठामि । (३) वयं वालिकायाः रक्षामि । वयं वालिकां रक्षामः । १,३ ४. शुद्ध करो तथा नियम बताओ-अहं दृश्यामि । अहं स्थामि । अहं पामि । अहं ब्रामि । वयं सदामः । आवां गच्छतः । वयं पश्यन्ति । ५. अभ्यास -(क) २ (क) के वाक्यों को द्विवचन और बहुवचन में बदलो । (ख) इनके लट् उत्तम पुरुप के रूप लिखो-~-भू, पठ्, रक्ष, वन, गम्, आगम् ; दृश्, स्था, पा, घ्रा, सद् । (ग। इनके प्रथमा और द्वितीया के रूप लिखो-रमा, वालिका, लता, विद्या, कथा । ६. रिक्त स्थानों को भरो-(लट् लकार) १. अहं जलम् (पा) । २. अहं गृहं (गम्) । ३. अहं लतां (दृश्)। ४. अहं पुष्पं (घ्रा)। ५. वयं सत्यं (वद्)। ६. आवामत्र (स्था) । ७. वयं पुस्तकं (प) । ८. ते भोजनं (पच्) । .
८ - स्थः स्थ म० पु० उ० पु० स्मः प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ६) शब्दकोष ६०+२० = ८०] अभ्यास ४ (व्याकरण) (ख) कृ (करना), अस् (होना) (२)। (ग) इत्थम् (ऐसे), तथा (वैसे), यथा (जैसे), कथम् (क्यों, कैसे), अपि (भी), न (नहीं), च (और), एव (ही) ।(८)। (घ) एकः (एक), द्वौ (दो), त्रयः (तीन), चत्वारः (चार), पञ्च (पाँच), षट् (छः), सप्त (सात), अष्ट (आठ), नव (नौ), दश (दस)। (१०) व्याकरण (कृ, अस्, लट्; कारक-परिचय) १. कृ (करना) लट् २. अस् (होना लट् करोति कुरुतः कुर्वन्ति प्र० पु० अस्ति स्तः सन्ति सन्ति प्र० पु० करोषि कुरुथः कुरुथ असि म० पु०. करोमि कुर्वः कुर्मः अस्मि स्वः उ० पु० २. संस्कृत में सम्बोधन को लेकर ८ विभक्तियाँ (कारक) होती हैं । उनके नाम, कारक-नाम और चिह्न ये हैं । इन्हें स्मरण कर लें। विभक्ति (कारक-चिह्न) (१) प्रथमा (प्र०) कर्ता (२) द्वितीया (द्वि०) कर्म को (३) तृतीया (४०) करण ने, से, द्वारा (४) चतुर्थी (च०) संप्रदान के लिए (५) पंचमी (पं०) अपादान से (६) षष्ठी (ष०) सम्बन्ध (७) सप्तमी (स०) अधिकरण में, पर (८) सम्बोधन (सं०) संबोधन हे, अये, भोः नियम ६-संस्कृत में 'च' (और) का प्रयोग एक शब्द के बाद कीजिये। अर्थात् हिन्दी में जहाँ 'और' लगता है, संस्कृत में 'च' एक शब्द के वाद में लगेगा । जैसे फल और फूल: फलं पुष्पं च । फलं च पुष्पम्, अशुद्ध है । इसी प्रकार रामः कृष्णः च, वालकः बालिका च, प्रयोग करें। कारक ने का, के, की संख्या १-१०, क, अस्, लट्. कारक-परिचय ९ अभ्यास ४ -।। . ? ? ? . १. उदाहरण-वाक्यः-१. अत्र एकः वालकः अस्ति । २. अत्र द्वौ मनुष्यो स्तः । ३. अत्र त्रयः नृपाः सन्ति । ४. चत्वारः ग्रामाः ५. पञ्च पुस्तकानि । ६. पट् पुप्पाणि । ७. सप्त वालिकाः। ८. अष्ट गृहाणि । ९. नव विद्यालयाः । १०. दश पाठशालाः । ११. सः किं करोति ? १२. स पठति । १३. त्वं कि करोपि ? १४. अहं भोजनं करोमि । १५. सः अपि अत्र एव पठति २. संस्कृत बनाओ---(क) १. वह है । २. वे दोनों वहाँ हैं। ३. सव वालक यहाँ हैं। ४. तू कहाँ है ? ५. तुम दोनों यहाँ हो । ६. तुम सब कहाँ हो ? ७. मैं वालक हूँ। ८. हम दोनों भी यहाँ ही हैं। ९. हम सब मनुष्य हैं । (ख) १०. वह क्या करता है ? ११. वे सब भोजन करते हैं। १२. तू क्या करता है ? १३. तुम सब क्या करते हो ? १४. मैं भोजन करता हूँ। १५. हम राज्य करके हैं । (ग) १६. ईश्वर एक ही है। १७. दो वालक फूल सूंघते हैं । १८. तीन आदमी खाना खाते हैं। १९. चार वालक आ रहे हैं । २०. पाँच पुस्तकें और पांच फूल यहाँ हैं । २१. छः वालिकाएं इस प्रकार पढ़ रही हैं । २२. सात वालक भी यहीं पढ़ते हैं । २३. आठ पाठशालाएं यहाँ हैं । २४. नौ फूल वहाँ हैं । २५. दस आदमी गाँव को जा रहे हैं । ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम १) तौ अस्ति । त्वम् अस्ति । तौ स्तः । त्वम् असि । (२) तौ कुर्वन्ति । अहं करोपि । तौ कुरुतः । अहं करोमि । (३) चत्वारः वालकाः आगच्छति । चत्वारः वालकाः आगच्छन्ति । १ (४) पञ्च पुस्तकानि च पुष्पाणि । पञ्च पुस्तकानि पुष्पाणि च । ६ ४. शुद्ध करो-ती सन्ति । ते अस्ति । अहम् अस्ति । त्मम् अस्मि । ते करोति । त्वं करोति । अहं करोपि । वयं करोमि । ५. अभ्यास-(क) १ से १० तक की गिनती के १० वाक्य बनाओ। (ख) अस् और कृ के लट् के रूप लिखो। (ग विभक्ति और कारकों के नाम तथा उनके चिह्न वताओ। ६. रिक्त स्थान भरो-(लट् लकार) १. सः अत्र (अस्) । २. अत्र (अत्)। ३. त्वम् (अस्)। ४. अहम् (अस्)। ५. न कि (कृ) ? ६. त्वं कि (कृ) ?
- अतः अन्ति १० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ७-१० शब्दकोश ८०+२० = १००] अभ्यास ५ (व्याकरण (क) भवान् ( (आप, पुंलिंग), भवती (आप, स्त्रीलिंग)। जनक (पिता), पुत्रः (पुत्र), उपाध्यायः (गुरु), नरः (मनुष्य), सूर्यः (सूर्य) चन्द्र : (चन्द्रमा), प्राज्ञः (विद्वान्), सज्जनः (सज्जन), दुर्जनः (दुर्जन), शिष्यः (शिष्य), प्रश्नः (प्रश्न)। (१३) । (ख) खाद् (खाना), क्रीड़ (खेलना), पत् (गिरना), स्मृ (स्मरण करना), जि (जीतना), नी (ले जाना), ह (ले जाना, हरण करना)। (७)। सूचना--(क) जनक-प्रश्न, रामवत् । (ख) खाद्-ह, भवतिवत् । व्याकरण (राम, लट्, प्रथमा, संबोधन) १. राम शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। देखो शब्द संख्या १)। जनक आदि के तुल्य चलेंगे, अन्त में संक्षिप्त रूप लगाओ। २. भू- लट् (वर्तमान) संक्षिप्त रूप भवति भवतः भवन्ति अति भवसि भवथ असि वामि आमि आव: आमः सूचना-खाद् आदि के रूप भवति के तुल्य चलेंगे। संक्षिप्त रूप अन्त में लगेंगे । जैसे-खादति, क्रीडति, पतति, स्मरति, जयति, नयति, हरति । *नियम ७-कर्ता (व्यक्तिनाम, वस्तुनाम आदि ) में प्रथमा होती है । जैसे-रामः पठति । बालकः गच्छति । नियम ८--किसी को सम्बोधन करने (पुकारने) में संबोधन विभक्ति होती है। जैसे-हे राम !, हे कृष्ण !, हे देवदत्त ! नियम ९-भवत् (आप) शब्द के साथ सदा प्रथम पुरुष (अन्य पुरुप) आता है, मध्यम पुरुष नहीं। भवत् के रूप पुलिंग में चलते हैं-भवान्, भवन्ती, भवन्तः आदि। स्त्रीलिंग में-भवती, भवत्यौ, भवत्यः-आदि। जैसे- भवान् पठति, भवन्तौ पठतः, भवन्तः पठन्ति । भवती पठति । भवत्यौ पठतः । भवत्यः पठन्ति । नियम १० - र् और ष् के बाद न् को ण् हो जाता है, यदि स्वर, ह, य, व, र, कवर्ग, पवर्ग, न, बीच में हो तो भी । इन शब्दों में यह नियम लगेगा- राम, ईश्वर, नृप, ग्राम, पुत्र, नर, सूर्य, चन्द्र, शिष्य । अतः इनमें तृतीया एकवचन में एण और षष्ठी बहु० में आणाम् लगेगा। प्र० पु० म० पु० उ० पु० अथ: भवथः भवावः अथ भवामः । - । - - राम शब्द, लट् लकार, प्रथमा, संवोधन विभक्ति अभ्यास ५ . । : १. उदाहरण-वाक्यः-१. आप जाते हैं-भवान् गच्छति । २. आप सब जाते हैं-भवन्तः गच्छन्ति । ३. आप हँसती हैं- भवती हसति । ४. पुत्रः भोजनं खादति । ५. पुत्रः क्रीडति । ६. पुप्पं पतति । ७. रामः ईश्वरं स्मरति । ८. नृपः राज्यं जयति । ९. शिष्यः पुस्तकं तत्र नयति । १०. दुर्जनः धनं हरति । २. संस्कृत बनाओ :-(क) १. बालक धर जाता है । २. मनुप्य आते हैं। ३. पुत्र पिता को नमस्कार करता है । ४. बालक सूर्य और चन्द्रमा को देखता है । ५. शिष्य गुरु से कहता है (वद्) । ६. विद्वान् और सज्जन सत्य बोलते । ७. दुर्जन असत्य बोलते हैं । ८. बालक खाना खाता है। ९. पुत्र खेलता है। १०. फूल गिरता है'। ११. शिष्य पाठ याद करता है । १२. राजा राज्य को जीतता है । १३. बालक पुस्तक ले जाता है। १४. दुर्जन राज्य का हरण करता है। (ख) १५. तू पढ़ता है । १६. तू सत्य बोलता है। १७. तू भोजन करता है । १८. मैं यहाँ आता हूँ। १९. मैं खेलता हूँ। २०. मैं पुस्तक ले जाता हूँ। (ग) २१. आप यहाँ आते हैं । २२. आप सब वहाँ जाते हैं । २३. आप सत्य बोलती हैं। २४. आप सव पुस्तकें पढ़ती हैं । ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) भवान् आगच्छसि । भवान् आगच्छति । ९ (२) भवती सत्यं वदसि । भवती सत्यं वदति । ४. अभ्यास-(क) २ (ख) को द्विवचन और बहुवचन में बदलो। (ख) इन धातुओं के लट् के पूरे रूप लिखो-भू, पठ्, गम्, वद्, आगम्, दृश्, स्था, पा, घ्रा, सद्, खाद, नी, ह । (ग) इन शब्दों के पूरे रूप लिखो-राम, बालक, मनुप्य, नर, जनक, पुत्र । ५. वाक्य बनाओ--खादति, क्रीडामि, स्मरामि, भवान्. भवती, भवत्यः । ६. रिक्त स्थान भरो-(लट् लकार) १. भवान् (हस्) 1 २. भवती (पठ्) ३, बालकाः (पट)। ४. वयं (क्रीड्)। ५. यूयं (वद्)। ६. पुप्पाणि (पत्) ७. दुर्जनः वालिका (ह)। ८. यूयं किं (खाद्) ? शुद्ध वाक्य ९ ....
1 १२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ११-१२) शब्दकोश १००+२०-१२०] अभ्यास ६ (व्याकरण) (क) धनम् (धन), फलम् (फल), पत्रम् (पत्ता, चिट्ठी), वनम् (वन), नगरम् (नगर), अध्ययनम् (पढ़ना), कार्यम् (कार्य)। (७) (ख) तु (दुःख देना), इथ् (चाहना), स्पृश् (छूना), लिख् (लिखना), प्रच्छ (पूछना), विश् (प्रविष्ट होना)। (६) (ग) अभितः (दोनों ओर), उभयत. (दोनों ओर), परितः, (चारों ओर), सर्वतः (सव ओर), प्रति (ओर), धिक धिक्कार), विना (बिना)। (७) । सूचना-(क) धन-कार्य, गृहवत् । (ख) तुद्--विश्, भवतिवत् । व्याकरण (गृह, लोट्, द्वितीया) १. गृह शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द संख्या २६) । संक्षिप्त रूप लगाकर धन आदि के रूप गृह के तुल्य चलावें। नियम १० इन शब्दों में लगेगा -~~गृह, पुष्प, पत्र, नगर, कार्य । अतः इनमें आनि के स्थान पर आणि एन की जगह एण और आनाम् की जगह आणाम् लगेगा। २. तुद् आदि के रूप भू के तुल्य चलावें। लट्, लोट्, ल, विधिलिङ् में इष् का इच्छ् और प्रच्छ का पृच्छ हो जाता है। जैसे--तुदति, इच्छति स्पृशति, लिखति, पृच्छति, विशति । ३. भू-लोट (आज्ञा अर्थ) संक्षिप्त रूप भवतु भवताम् भवन्तु अतु अताम् अन्तु भवतम् अतम् भवानि. भवाव भवाम आनि सूचना-संक्षिप्त रूप लगाकर पठ्, गम आदि तथा तुद् आदि के रूप वनावें। जैसे, पठतु, गच्छतु, वदतु, तुदतु, इच्छतु, लिखतु, पृच्छतु आदि । सनियम ११-(कर्मणि द्वितीया) कर्मकारक में द्वितीया होती है । जैसे-~रामः विद्यालयं गच्छति । स पुस्तकं पठति । स प्रश्नं पृच्छति । नियम १२-~-अभितः, उभयतः, परितः, सर्वतः, प्रति, धिक् और विना के साथ द्वितीया होती है। जैसे-ग्रामम् अभितः उभयतः वा (गाँव के दोनों ओर)। ग्राम प्रति । दुर्जनं धिक् (दुर्जन को धिक्कार)। राम विना (राम के बिना) भव भवत प्र० पु० म० पु० उ० पु० अ अत आव आम :- गृह शब्द, लोट् लकार, द्वितीया विभक्ति १३ अभ्यास ६ १. उदाहरण-वाक्य :-१. वह पुस्तक पढ़े-स पुस्तकं पठतु । २. तू खाना खा-त्वं भोजनं खाद। ३. मैं गाँव जाऊँ अहं ग्रामं गच्छामि । ४. गाँव के दोनों ओर जल है—ग्रामम् अभितः उभयतः वा जलम् अस्ति । ५. विद्यालय के चारों ओर फूल हैं-विद्यालयं परितः सर्वतः वा पुप्पाणि सन्ति । ६. स विद्यालयं प्रति (विद्यालय की ओर) गच्छतु । ७. स पृच्छतु। ८. त्वं लिख । ९. अहं पुप्पं धनं च इच्छामि। १०. सत्यं वद । २. संस्कृत बनाओ-(क) १. वह पुस्तक पढ़े । २. वह गाँव जावे । ३. वह फल खावे । ४. वह पत्ते को छूए । ५. वह फूल चाहे । ६. वह पत्र लिखे । (ख) ७. तू ज्ञान और धन चाह । ८. तू यहाँ आ । ९. तू वहाँ जा। १०. तू असत्य न बोल । ११. तू सत्य बोल । १२. तू भोजन पका। १३. तू सज्जन को दुःख न दे । १४. तू घर में प्रविष्ट हो। (ग) १५. मैं प्रश्न पूछू । १६. मैं विद्या पहूं । १७. मैं पत्र लिखू। १८. मैं पुस्तक चाहूँ। १९. मैं फूल छूऊँ । (घ) २०. नगर के दोनों ओर जल है। २१. गाँव के चारों ओर वन है। २२. घर की ओर जाओ। २३. दुर्जन को धिक्कार । २४. विद्या के बिना ज्ञान नहीं होता है । ३. अशुद्ध वाक्य नियम १) त्वम् असत्यं न वदतु । त्वम् असत्यं न वद । २) त्वं गृहे प्रविशन्तु। त्वं गृहं प्रविश। ११,१ (३) दुर्जनस्य धिक् । दुर्जनं धिक् । १२ ४. अभ्यास-(क) २ (क), (ख), (ग) को बहुवचन में वदलो। (ख) इनके पूरे रूप लिखो-गृह, फल, ज्ञान, पुस्तक, पुष्प, घन, वन । (ग) लोट् के पूरे रूप लिखो-भू, पट्, लिख, गम्, स्था, पा, श्, वत, इष्, प्रच्छ् । ५. वाक्य बनाओ-अभितः, उभयतः, परितः, सर्वतः, प्रति, विक्, विना, पठतु, पठ, वन, तिष्ठ, इच्छानि, लिखानि, पृच्छानि । ६. रिक्त स्थान भरो-१." अभितः जलम् । २." उभयतः वनम् । ३. परितः पुप्पाणि सन्ति । ४.""धिक् । ५. त्वं"पठ। 4 शुद्ध वाक्य १ . , ....
प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम १ शब्दकोश १२०+२०-१४०] अभ्यास ७ ( व्याकर. (क) कन्या (लड़की), अजा (बकरी), वसुधा (पृथ्वी), सुधा (अमृत) भार्या (पत्नी), आज्ञा (आज्ञा), निशा (रात्रि), जटा (जटा), क्षमा (क्षमा), माला (माला), गङ्गा (गंगा), यमुना (जमुना), शिला (शिला), प्रजा (प्रजा), लज्जा (लज्जा) । (१५) । (ख) चुर् (चुराना), चिन्त (सोचना), कथ् (कहना), भक्ष् (खाना), रच् (बनाना)। (५) । सूचना-(क) कन्या~लज्जा, रमावत् । व्याकरण (रमा, लङ्, द्वितीया) १. रमा शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द संख्या १५)। संक्षिप्त रूप लगाकर कन्या आदि के रूप बनाओ। नियम १० इन शब्दों लगेगा-रमा, भार्या, क्षमा । २. चुर् आदि धातुओं के निम्नलिखित रूप बनाकर 'भवति' के तुल्य रूप चलेंगे। चुर्-~चोरयति, चिन्त्-~-चिन्तयति, कथ्-कथयति, भक्ष्-भक्षयति, रच-रचयति । ३. संस्कृत में क्रिया (धातु) के १० प्रकार के रूप बनते हैं। इन्हें 'लकार' कहते हैं। इस पुस्तक में ५ लकार ही दिये गये हैं। उनके नाम और अर्थ ये हैं, इन्हें स्मरण कर लें। (१) लट् (वर्तमानकाल), (२) लोट् (आज्ञा अर्थ), (३) लङ् (अनद्यतन भूतकाल, आज के भूतकाल में लङ् नहीं होगा), (४) विधिलिङ् (आज्ञा या चाहिए अर्थ), (५) लट् (भविप्यत् काल) । ४. भू-लङ् (भूतकाल) संक्षिप्त रूप अभवत् अभवताम् अभवन् अत् अताम् अन् अभवः अभवतम्. अतम् अभवाम अभवम् अभवाव अम् आव सूचना-धातु से पहले 'अ' लगेगा, अन्त में संक्षिप्त रूप । जैसे, अपठत्, अगच्छत् आदि । घातु का प्रथम अक्षर स्वर होगा तो पहले 'आ' लगेगा। नियम १३ - गमन (चलना, हिलना, जाना) अर्थ की घातुओं के साथ द्वितीया होती है। जैसे-~-ग्रामं गच्छति । गृहं गच्छति । अभवत प्र० पू० म०पू० उ० पु० अः अत आम रमा शब्द, ललकार, द्वितीया विभक्ति अभ्यास ७ --- १. उदाहरण-वाक्य-१. उसने पुस्तक पढ़ी-स पुस्तकं अपठत् । २. तू गाँव गया-वं ग्रामं अगच्छः । ३. मैंने भोजन खाया-अहं भोजनं अखादम् । ४. दुर्जनः पुस्तकं आचोरयत् । ५. सः अचिन्तयत्। ६. अहं अकथयम् । '७. कन्या मालां अरचयत् । ८. प्रजा नृपं अनमत् । ९. भार्या सुधां अपिवत् । १०. वसुधायां गंगा यमुना च स्तः । ११. स आगच्छत् । २. सस्कृत बनाओ-~(क) १. वह गाँव गया। २. वह यहाँ आया। ३. वह हँसा । ४. वह बोला । ५. उसने विद्या पढ़ी। ६. उसने भोजन खाया। ७. उसने धन चुराया। ८. उसने माला बनायी। ९. उसने पत्र लिखा। १०. उसने कन्या की रक्षा की । (ख) ११. तूने पुस्तक पढ़ी। १२. तूने कन्या देखी । १३. तू घर गया । १४. तूने जल पिया। १५. तूने वकरी छुई । (ग) १६. मैं रात्रि में घर गया। १७. मैंने अमृत पिया। १८. मैं शिला पर बैठा। १९. मैंने भोजन खाया। २०. मैंने पुस्तक वनायी। (घ) २१. कन्या लज्जा करती है। २२. शिष्य क्षमा चाहता है। २३. मालाएं और जटाएं यहाँ हैं। २४. गंगा और यमुना को देखो। २५. वकरी घर जाती है । ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) स ग्रामे अगच्छत् । स ग्रामम् अगच्छत् । (२) स कन्याया अरक्षत् । स कन्याम् अरक्षत् । ११ (३) अहम् गृहम् अगच्छत् । अहं गृहम् अगच्छम् । ४. अभ्यास-(क) २ (क), (ख), (ग) को बहुवचन में वदलो। (ख) २ (क), (ख), (ग) को लट् और लोट् में वदलो। (ग) इन शब्दों के पूरे रूप लिखो-रमा, बालिका, लता, विद्या, अजा, माला, गङ्गा। (घ) इन धातुओं के लङ्ग के रूप लिखो-भू, पठ्, गम्, लिख्, वद्, दृश्, स्था, पा, घ्रा, चुर्, कथ्, म । ५. वाक्य बनाओ-अपठत्, अलिखम्, ऐच्छत्, अपदयत्, अतिष्ठम्, अपिवम्, अजिघ्रत्, अचोरयत्, अगक्षयत् । ६. रिक्त स्थान भरो-(लङ् लकार) १. स पत्रम् (लिस्) । २. स फलम् (३)। ३. अहं भोजनम् (भक्ष)। ४. त्वं कन्याम् (श्)। ५. अहं पुष्पम् (घा)। शुद्ध वाक्य - . . १६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम १४-१६ शब्दकोश १४०+२० = १६०] अभ्यास ८ व्याकरण (क) हरिः (विष्णु), मुनिः (मुनि), कविः (कवि), यतिः (संन्यासी) रविः (सूर्य), अग्निः (आग), गिरिः (पहाड़), कपिः (बन्दर), भूपति (राजा), सेनापतिः (सेनापति)। अर्थः (१. अर्थ, २. धन, ३. प्रयोजन), दण्डः (डंडा), कन्दुकः (गेंद)। प्रयोजनम् (प्रयोजन)। (१४) । (ख) दिव (१. चमकना, २. जुआ खेलना), नृत् (नाचना), नश् (नष्ट होना), भ्रम (घूमना)। (४) (ग) सह (साथ), सार्धम् (साथ) । (२)। सूचना-(क) हरि-सेनापति, हरिवत्। (ख) दिव-भ्रम्, दिव् के तुल्य । व्याकरण (हरि, विधिलिङ्, तृतीया) १. हरि शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द संख्या २) । संक्षिप्त रूप लगाकर मुनि आदि के रूप हरिवत् बनाओ। नियम १० इन शब्दों में लगेगा-हरि, रवि, गिरि । जैसे-हरिणा, हरीणाम् । २. दिव आदि के निम्नलिखित रूप बनाकर 'भू' धातु के तुल्य रूप चलावें दीव्यति, नृत्यति, नश्यति, भ्राम्यति । दीव्यतु, अदीव्यत्, दीव्येत् आदि । ३. भू-विधिलिङ (आज्ञा अर्थ) संक्षिप्त रूप भवेत् भवेताम् भवेयुः प्र० पु० एत एताम् एयु भवेः भवेतम् भवेत ए: एतम् एत भवेयम् भवेव भवेम एयम् एव एम संक्षिप्त रूप लगाकर पूर्वोक्त पठ् आदि के रूप इसी प्रकार चलावें। * नियम १४-- (कर्तृकरणयोस्तृतीया) करण कारक में तृतीया होती है औ कर्मवाच्य या भाववाच्य में कर्ता में। जैसे--कन्दुकेन क्रीडति । दण्डे गच्छति । रामेण भोजनं खादितम् । * नियम १५-- (सहयुक्तेऽप्रधाने) सह, सार्धम्, साकम्, समम्, (जब सार अर्थ में हों) के साथ तृतीया होती है । जैसे-~-पिता के साथ घर जात है--जनकेन सह साध साकं समं वा गृहं गच्छति । ® नियम १६-~किम्, कार्यम्, अर्थः, प्रयोजनम् (चारों प्रयोजन अर्थ में हों तो के साथ तृतीया होती है। जैसे----दुर्जनेन पुत्रेण किम्, किं कार्यम्, क अर्थः, किं प्रयोजनम् ? (दुर्जन पुत्र से क्या लाभ या क्या प्रयोजन ?)। म० पू० उ० पु० हरि शब्द, विधिलिङ्, तृतीया विभक्ति १७ अभ्यास८ १. उदाहरण-वाक्य--१. उसे पढ़ना चाहिए (वह पढ़े)-सः पठेत् । २. तुझे भोजन खाना चाहिए-त्वं भोजनं खादेः। ३. मुझे जाना चाहिए-अहं गच्छेयम् । ४. त्वं दुर्जनेन सह न तिष्टेः । ५. स दण्डेन क्रीडेत् । ६. यतिना सह कविः तिष्ठति । ७. दुर्जनेन कोऽर्थः, किं कार्यम्, किं प्रयोजनम् । ८. रवि दीव्यति । ९. बालिका नृत्यति । १०. गृह नश्यति । ११. छात्रः भ्राम्यति । २. संस्कृत बनाओ-(क) १. उसे पढ़ना चाहिए। २. उसे हँसना चाहिए। ३. उसे यहाँ आना चाहिए। ४. उसे वहाँ नहीं जाना चाहिए। ५. उसे गेंद खेलना चाहिए । ६. उसे पिता के साथ घूमना चाहिए । ७. कन्या को नाचना चाहिए। (ख) ८. मुझे पत्र लिखना चाहिए। ९. तुझे भोजन खाना चाहिए । १०. तुझे जल पीना चाहिए। ११. तू मुनि को देख । १२. तू हरि के साथ खेल । (ग) १३. मैं प्रश्न पूछू । १४. मैं पत्र लिखू। १५. मुझे पुस्तक पढ़नी चाहिए । १६. मैं फल चाहूँ। १७. मैं वन्दर के साथ खेलूं । १८. मैं सूर्य को देखू । (घ) १९. सूर्य चमका । २०. वालिका नाची। २१. गाँव नष्ट हुआ । २२. गुरु शिष्य के साथ घूमता है। २३. दुर्जन शिप्य से क्या लाभ ? २४. राजा सेनापति के साथ यहाँ आया । २५. पहाड़ पर वन्दर खेल रहे हैं। ३. अशुद्ध वगमय (१) स जनकस्य सह भ्राम्येत् । स जनकेन सह भ्राम्येत् । १५ (२) दुर्जनात् शिप्यात् कोऽर्थः ? दुर्जनेन शिप्येण कोऽर्थः । १६ (३) ० सेनापते सह० । सेनापतिना सह० । १५ ४. अभ्यास -(क) २ (क), (ख), (ग) को वहुवचन में बदलो। (ख) २ (क), (ख), (ग) को लोट् और लङ् में बदलो। (ग) इन शब्दों के पूरे रूप लिखो-हरि, मुनि, कवि, कपि, भूपति । (घ) इन धातुओं के विधिलिङ् के रूप लिखो-भू, पठ्, लिख्, गम्, दृश्, स्था, पा, दिव्, नत्, नश् । ५. वाक्य बनाओ:-कन्दुकेन, सह, सार्धम्, कोऽर्थः, पठेत, खादेयम् । ६. रिक्त स्थान भरोः-(विधिलिङ्) १. स पुस्तकं (पठ्) । २. त्वं पत्रं (लिस्) । ३. त्वं जनकेन सह (गम्)। ४. त्वं रवि (दृश्) । ५. कपिः (नृत्) । शुद्ध वाक्य नियम . .
अभ्यास ९ - - ३ १८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम १५-१९) शब्दकोश १६० + २० = १८०] व्याकरण) क) गुरुः (गुरु), शिशुः (बालक), भानुः (सूर्य), इन्दुः (चन्द्रमा), शनुः (शनु), पशुः (पशु), तरुः (वृक्ष), साधुः (सज्जन, सरल, चतुर), वायुः (हवा)। काणः (काणा), कर्णः (कान), बधिरः (वहिरा), विवादः (विवाद) । नेत्रम् (आँख), सुखम् (सुख), दुःखम् (दुःख), हसितम् (हँसना)। (१७) । (ख) वस् (रहना), जीव् (जीना) । (२) (ग) अलम् (बस) (१)। सूचना-(क) गुरु-वायु, गुरुवत् । (ख) वस्जीद, भवतिवत् । व्याकरण (गुरु, लुट, तृतीया) १. गुरु शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द संख्या ३)। संक्षिप्त रूप लगाकर शिशु आदि के रूप बनाओ। नियम १० इन शब्दों में लगेगा:- गुरु, शत्रु, तरु । जैसे-गुरुणा, गुरुणाम् । शत्रुणा, शत्रूणाम् । भू-लुट् (भविष्यत्) संक्षिप्त रूप भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति प्र० पु० (इ) स्यति (इ) स्यतः (इ) स्यन्ति भविष्यसि भविष्ययः भविष्यथ म० पु० (इ) स्यसि (इ) स्यथः (इ) स्यथ भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः उ० पु० (इ) स्यामि (इ) स्यावः (इ) स्यामः सूचना-~(क) इन पूर्वोक्त धातुओं में 'इष्यति' आदि लगाकर रूप बनावें- भू, पठ्, गम्, रक्ष, वन, आगम्, कृ, खाद्, क्रीड्, पत्, स्मृ, ह, इप्, लिख्, चुर्, चिन्त, कथ्, भक्ष्, रच्, दिव्, नृत्, नश्, भ्रम् । जैसे-पठिष्यति, गमिष्यति । ख) इनमें 'स्यति' आदि लगावें:--पच, नम् , दृश्, स्था, पा, घ्रा, सद्, जि , नी, तुद्, स्पृश्, प्रच्छ, विश्, वस् । जैसे, स्थास्यति, पास्यति । इन धातुओं के क्रमशः लट् के रूप उदाहरण-वाक्यों में देखो। नियम १७~अलम् (वस, मत) के साथ तृतीया होती है। जैसे-झगड़ा मत करो-अलं विवादेन । मत हँसो-अलं हसितेन । नियम १८ -- (येनाङ्गविकारः) शरीर के जिस अंग में विकार से विकृति दिखाई पड़े, उसमें तृतीया होती है। जैसे---नेत्रेण काणः (एक आँख से काणा)। @ नियम १९-प्रकृति आदि क्रियाविशेषण शब्दों में तृतीया होती है । जैसे- स्वभाव से सरल = प्रकृत्या साधुः । सुखेन जीवति । दुःखेन जीवति । - .
। १९ गुरु शब्द, लृट् लकार, तृतीया विभक्ति . . . - अभ्यास ९ १. उदाहरण वाक्य :-१. वह पढ़ेगा-स पठिप्यति । २. तू पढ़ेगा- त्वं पठिप्यसि । ३. मैं पढूंगा-अहं पठिष्यामि । ४. स गृहं गमिप्यति, हसिप्यति, बालकं रक्षिप्यति वदिष्यति, अत्र आगमिप्यति, कार्य करिष्यति, भोजनं खादि- प्यति, क्रीडिप्यति, पतिप्यति, स्मरिष्यति, हरिप्यति, एपिष्यति, लेखिप्यति, चोरयिष्यति, चिन्तयिष्यति, कथयिष्यति, भक्षयिष्यति, रचयिष्यति, देविष्य ति, नतिप्यति, नशिप्यति, भ्रमिप्यति च । ५. स भोजनं भक्ष्यति, गुरुं नस्यति, पुत्रं द्रक्ष्यति, स्थास्यति, जलं पास्यति, पुप्पं ब्रास्यति, सत्स्यति, शत्रु जेष्यति, पुस्तक नेप्यति, दुर्जनं तोत्स्यति, पुप्पं स्प्रक्ष्यति, प्रश्न प्रक्ष्यति, गृहं प्रवेक्ष्यति, अन वत्स्यति च। २. संस्कृत बनाओ :-(क) १. वह पुस्तक पढ़ेगा। २. वह गाँव जायेगा। ३. वह हँसेगा । ४. वह वालक की रक्षा करेगा । ५. वह बोलेगा । ६. वह घर जायेगा । ७. वह काम करेगा। ८. वह फल खायेगा । ९. वह खेलेगा। १०. पत्ता गिरेगा। (ख) ११. तू ईश्वर को स्मरण करेगा । १२. तू धन नहीं हरेगा। १३. तू चाहेगा । १४. तू पत्र लिखेगा। १५. तू धन नहीं चुरायेगा। १६. तू सोचेगा । १७. तू कथा कहेगा । १८. तू फल खायेगा। १९. तू पुस्तक वनायेगा । २०. तू नाचेगा । (ग) २१. मैं भ्रमण करूंगा। २२. मैं भोजन पकाऊँगा । २३. मैं पिता को नमस्कार करूँगा। २४. मैं चन्द्रमा को देखूगा। २५. मैं यहाँ रुकूगा। २६. मैं जल पीऊँगा। २७. मैं शत्रु को जीतूंगा। (घ) २८. विवाद मत करो। २९. मत हँसो । ३०. वह आंख से काणा है । ३१. वह कान से बहरा है । ३२. वह स्वभाव से सरल है। ३३. वह सुख से रहता है । ३४. वह दुःख से रहता है। ३. अशुद्ध वावय शुद्ध वाक्य निएम (१) अलं विवादस्य । अलं विवादेन । १७ (२) कर्णस्य बधिरः । कर्णन वधिरः । १८ ४. अभ्यास-(क) २ (क), (ख), (ग) को बहुवचन में वदलो। (ख) इन शब्दों के रूप लिखो-गुरु, शिशु, भानु, गनु, वायु । (ग) इनके लट् के रूप लिखो-भू, पठ्, गम्, वद्, कृ, खाद्, ह, लिख, दृश्, स्था, पा, जि । - - २० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम २०-२३ शब्दकोश १८०+२० =२००] अभ्यास १० (व्याकरण) क) सर्व (सव), तत् (वह), यत् (जो), एतत् (यह), किम् (कौन) (सर्वनाम)। ब्राह्मणः (ब्राह्मण), क्षत्रियः (क्षात्रय), वैश्यः (वैश्य), शूद्रः (शूद्र), वर्णः (वर्ण), पाठः (पाठ); लेखः (लेख). मोदकम् (लड्डू); दुग्धम् (दूध) । (१४) । (ख) अस् (होना); दा (यच्छ), (देना), धाव (दौड़ना), चल् (चलना), रुच् (अच्छा लगना)। (४) (ग) नमः (नमस्कार), स्वस्ति (आशीर्वाद)। (२) व्याकरण (सर्वनाम लिंग, अस् धातु, चतुर्थी) सूचना-(क) सर्व-किम् , सर्ववत् । (ख) यच्छ्-~-चल, भवतित् । १. सर्व शब्द के पुंलिंग के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द संख्या ३४ क)। सूचना तत्, यत्, एतत् और किम् के रूप पुंलिंग में सर्व के तुल्य चलते हैं। इनका क्रमशः त, य, एत और क रूप रहता है, इनके ही रूप चलेंगे। तत् और एतत् का प्रथमा एकवचन में क्रमशः सः, एषः रूप बनता है । जैसे- सः तौ ते । यः यौ ये। एषः एतौ एते । कः कौ के इत्यादि । २. अस् धातु के लट्, लोट् , लङ् के रूप स्मरण करो। (देखो धातु० २३) ३. दा (यच्छ्) के रूप भवति के तुल्य चलेंगे, परन्तु लट् में दास्यति होगा । जैसे—यच्छति, यच्छतु आदि । रुच् का लट् में रोचते रूप होता है । नियम २०-सर्वनाम और विशेषण शब्दों का वही लिंग, विभक्ति और वचन होता है, जो विशेष्य का होता है। जैसे-सः वालकः, तं वालकम्, तेन बालकेन । कः मनुष्यः, यः मनुष्यः, एषः मनुष्यः । तस्य नरस्य । तस्मिन् वृक्षे। नियम २१-संप्रदान कारक (दान, देना आदि ) में चतुर्थी होती है । जैसे- ब्राह्मणाय धनं यच्छति ददाति वा । वालकाय पुस्तकं ददाति । सनियम २२-नमः और स्वस्ति के साथ चतुर्थी होती है । जैसे—गुरवे नमः । जनकाय नमः । पुत्राय स्वस्ति । शिष्याय स्वस्ति । छनियम २३-रुच् (अच्छा लगना) अर्थ की धातुओं के साथ चतुर्थी होती है। जैसे-शिष्याय 'मोदकं रोचते । पुत्राय दुग्धं रोचतें । -- - ५ सर्वनाम लिंग, अस् धातु. चतुर्थी विभक्ति -- . ७. . अभ्यास १० १. उदाहरण-वाक्य- १. वह किस ब्राह्मण को धन देता है–स कस्मै ब्राह्मणाय धनं यच्छति । २. स तस्मै ब्राह्मणाय धनं ददाति । ३. गुरु को नमस्कार-गुरवे नमः । ४. -गुरवे नमः । ४. पुत्र को आशीर्वाद-पुत्राय स्वस्ति । ५. पुत्र को फल अच्छा लगता है-पुत्राय फलं रोचते । ६. सर्वे छात्राः अत्र सन्ति । । ये छात्राः अत्र सन्ति, ते सर्वे धावन्तु। ८. एपः वालक: चलति । ९. चत्वारः वर्णाः सन्ति। १०. सः अस्तु, त्वम् एघि, अहम् असानि च। ११. सः अत्र आसीत् त्वम् आसीः, अहं च आसम् । २. संस्कृत बनाओ-(क) १. वह आदमी इस ब्राह्मण को धन देता है । २. वह सज्जन उस वालक को पुस्तक देता है। ३. वह पिता पुत्र को लड्डू देता है । ४. वह गुरु किस शिष्य को फल देता है ? ५. वह गुरु इस शिप्य को फल देता है । ६. उस गुरु को नमस्कार । ७. इस शिष्य को आशीर्वाद । ८. किस वालक को फल अच्छा लगता है ? ९. पुत्र को लड्डू अच्छा लगता है । १०. गुरु सारे शिष्यों को फल देता है। (ख) ११. चार वर्ण हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । १२. वह बालक पाठ पढ़ता है । १३. वह शिप्य लेख लिखता है । १४. वह शिशु चलता है। १५. यह क्षत्रिय दौड़ता है। (ग १६. वह है । १७. तू है । १८. मैं यहाँ हूँ। १९. वह वहाँ होवे । २०. तू यहाँ हो । २१. मैं यहीं होऊँ। २२. वह यहाँ था । २३. तू कहाँ था ? २४. मैं यहाँ ही था। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) एतं ब्राह्मणं धनं ददाति । एतस्मै ब्राह्मणाय० । २०, २१ (२) कं वालकं फलं रोचते । कस्मै वालकाय० । २०,२३ (३) गुरु नमः । शिप्यं स्वस्ति । गुरवे नमः । शिप्याय० । ૨૨ ४. अभ्यास-(क) २ (क) की वहुवचन में वदलो। (ख) २ (ग को वहुवचन बनाओ। (ग) सर्व, तत्, यत्, एतत् और किम् के पुंलिंग के रूप लिखो। (घ) अस् धातु के लट्, लोट् और लङ् के पूरे रूप लिखो। ५. वाक्य बनाओ :-- यच्छति, ददाति, रोचते, नमः, स्वस्ति, आसीत् । ६.. रिक्त स्थान भरो:-१. सः......"फलं यच्छति । २. स पुत्राय".... । ३."."." नमः । ४." स्वस्ति । ५. आसीत् । ६...दुग्धं रोचते । शुद्ध वाक्य ।
- २२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम २४-२५ शब्दकोश २००+२० = २२० ] अभ्यास ११ (व्याकरण (क) मूर्खः (मूर्ख), चोरः (चोर), मोक्षः (मोक्ष), स्नानम् (स्नान पठनम् (पढ़ना), भक्षणम् (खाना) ।(६)। (ख) क्रुध् (क्रोध करना), कु (क्रोध करना), द्रुः (द्रोह करना), ईर्ण्य (ईर्ष्या करना), असूय (दोः निकालना), निवेदि (निवेदन करना), उपदिश् (उपदेश देना), क्रन्द् (रोना) (८) (ग) अर्थम् (लिए), कृते (लिए) । (२)। (घ) सुन्दरम् (सुन्दर) शोभनम् (अच्छा), समीचीनम् (अच्छा), मधुरम् (मीठा) । (४) । सूचना-(क) मूर्ख-मोक्ष, रामवत् । स्नान-भक्षण, गृहवत् । व्याकरण (सर्वनाम नपुंसक, अस् धातु, चतुर्थी) १. सर्व शब्द के नपुंसक लिंग के पूरे रूप स्मरण करो (देखो शब्द० ३४ख) त्त, यत्, एतत्, और किम् के रूप नपुंसक लिंग में सर्व के तुल्य चलेंगे। इन सबके रूप तृतीया से सप्तमी एक पुंलिंगवत् चलेंगे। प्रथमा और द्वितीया में अम्, ए, आनि लगेगा। तत् आदि के प्रथमा और द्वितीया एकवचन में तत् यत्, किम् रूप ही रहेंगे। २. अस् धातु के रिधिलिङ् और लूट के रूप स्मरण करो। (देखो धातु २३) । अस् को लट् में भू होता है। अतः भविष्यति आदि रूप बनेंगे। ३. क्रुव् आदि के ये रूप बनाकर भू के तुल्य रूप चलेंगे-क्रुष्यति , कुप्यति, द्रुह्यति, ईर्ण्यति, असूयति, निवेदयति, उपदिशति, क्रन्दति । * नियम २४- (क्रुधद्रा०) क्रुध्, द्रुह, ईर्ण्य , असूय अर्थ की धातुओं के साथ जिस पर क्रोध किया जाय, उसमें चतुर्थी होती है। रामः मूर्खाय (राम मूर्ख पर) क्रुध्यति, कुप्यति, द्रुह्यति, ईर्ण्यति, असूयति । ॐ नियम २५–कथ्, निवेदय, उपदिश् धातुओं के साथ चतुर्थी होती है। जैसे- शिष्याय (शिष्य को) कथयति, निवेदयति, उपदिशति । शिप्यम् उपदि- शति वा। नियम २६-जिस प्रयोजन के लिए जो वस्तु या क्रिया होती है, उसमें चतुर्थी होती है । मोक्षाय हरिं नमति । शिशुः दुग्धाय क्रन्दति । नियम २७-चतुर्थी के अर्थ में अर्थम् और कृते अव्ययों का प्रयोग होता है। अर्थम् समास होकर शब्द के साथ मिल जाता है । कृते के साथ पष्ठी होती है । जैसे—पठनार्थम्, स्नानार्थम् । भोजनस्य कृते (भोजन के लिए)। C सर्वनाम नपुंसक, अस् धातु, चतुर्थी विभनि २३ अभ्यास ११ १ उदाहरण-वाक्यः-१. कृष्णःतस्मै दुर्जनाय (उस दुर्जन पर) क्रुध्यति, यति, द्रुह्यति, ईर्यति असूयति वा । २. शिष्यः तस्मै गुरवे कथयति । ३. पुत्रः नकाय निवेदयति। ४. गुरुः शिप्याय शिप्यं वा उपदिशति । ५. नानाय गुरुं पति । ६. म स्नानार्थ गच्छति । ७. त्वं भोजनस्य कृते अत्र आगच्छ । ८. - फलं, तानि पुस्तकानि च अत्र सन्ति । ९. तानि पुष्पाणि सुन्दराणि शोभ- नि च सन्ति । १०. स अत्र स्यात्, त्वं स्याः, अहं च स्याम् । २ संस्कृत वनाओ:-(क) १. राम चोर पर क्रोध करता है। २. चोर ज्जन से द्रोह करता है। ३. मूर्ख विद्वान् से ईर्ष्या करता है। ४. दुर्जन मज्जन दोप निकालता है। ५. सेनापति उस राजा से कहता है । ६. वालक उस गुरु निवेदन करता है । ७. मुनि बालक को उपदेश देता है। ८. वह मोक्ष के लिए द्या पढ़ता है । ९. वह नहाने के लिए वहाँ जाता है । १०. वह पढ़ने के लिए द्यालय जाता है । ११. वह खाने के लिए फल चाहता है। १२. बालक दूध के ए रोता है । (ख) १३. वे पुस्तके सुन्दर हैं। १४. वे फल मधुर हैं । १५. फूल अच्छे हैं । १६. वह कार्य अच्छा है । १७. जो कार्य अच्छा है, वह करो कुरु)। १८. कौन से फल मीठे हैं ? (ग) १९. वह घर पर होवे । २०. तू हाँ होना । २१. मैं यहाँ होऊँ । २२. वह वहाँ होगा। २३. तू कहाँ होगा? ४. मैं यहाँ होऊँगा। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) चोरः सज्जनात् द्रुह्यति । चोरः सज्जनाय द्रुह्यति । २४ (२) त नृपं कथयति । तस्मै नृपाय कथयति । २५,२० (३) ते पुस्तकानि सुन्दराः । तानि पुस्तकानि सुन्दराणि । २० ४ अभ्यास -(क) २ (ग) को (क) २ (ग) को वहुवचन में वदलो। (ख) अस् धातु धिलिङ् और लट् के रूप लिखो। (ग) सर्व, तत्, यत्, एतत् और किम् के पुंसक लिंग के रूप लिखो। - ५. वाक्य बनाओ-क्रुध्यति, द्रुह्यति, कथयति, अर्थम्, कृते, स्याम् । ६. रिक्त स्थान भरो-१. हरिः "क्रुध्यति । २. मूर्खः “असूयति । स"कथयति । ४. भोजनस्य कृते । ५. तानि फलानि सन्ति । शुद्ध वाक्य - .
. - २४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम २८-३१) शब्दकोश २२०+२० = २४०] २४०] अभ्यास १२ (व्याकरण) क) वृक्षः (वृक्ष), अश्वः (घोड़ा), प्रासादः (महल), यवः (जौ), क्षेत्र- पालकः (खेत का रक्षक)। क्षेत्रम् (खेत)। (६)(ख) भी (डरना), – (रक्षा करना), आनी (लाना), वृ (हटाना), अघि + इ (पढ़ना)। (५) । (ग) अतः (इसलिए), अथवा (अथवा), वा (अथवा), यदि (यदि), सर्वत्र (सब जगह), सदा (सदा), सर्वदा (सदा), अन्यत्र (और जगह), अवश्यम् (अवश्य)। (९)। सूचना-(क) वृक्ष-क्षेत्रपालक, रामवत् । व्याकरण (सर्वनाम स्त्रीलिंग, कृ धातु, पंचमी) १. सर्व शब्द के स्त्रीलिंग के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० ३४ ग)। तत्, यत्, एतत् और किम् के रूप स्त्रीलिंग में सर्वा के तुल्य चलेंगे। इनके क्रमशः ता, या, एता और का शब्द बनते हैं, इनके ही रूप चलेंगे। ता और एता के प्रथमा एकवचन में सा और एषा रूप होते हैं । शेप सर्वावत् । २. कृ धातु के लट्, लोट् और लङ् के रूप स्मरण करो। ( देखो धातु० ३६ )। ३. भी आदि के क्रमशः ये रूप बनते हैं-विभेति, त्रायते, आनयति (भवतिवत्), वारयति, अधीते । * नियम २८~~अपादान कारक में पंचमी होती है। जैसे--पेड़ से पत्ता गिरता है--वृक्षात् पत्रं पतति । अश्वात् मनुष्यः पतति । नियम २९-(भोत्रार्थानां भयहेतुः) भय और रक्षा अर्थ की धातुओं के साथ भय के कारण में पंचमी होती है। जैसे-चोराद् विभेति । चोरात् जायते । नियम ३०-जिससे विद्या पढ़ी जाये, उसमें पंचमी होती है । जैसे-~-गुरोः पठति । उपाध्यायात् अधीते । * नियम ३१-~-जिस वस्तु से किसी को हटाया जाय, उसमें पंचमी होती है । क्षेत्रपालकः ग्वेभ्यः पशुं वारयति निवारयति वा । .
. ५ सर्वनाम स्त्रीलिंग, कृ धातु, पंचमी विभक्ति २५ अभ्यास १२ १. उदाहरण वाक्य :-१. प्रासादात् वालकः पतति । २. तस्याः लतायाः एतत् पुप्पं पतति । ३. वालकः दुर्जनात् विभेति । ४. सज्जनः तां वालिकां चोरात् त्रायते । ५. क्षेत्रपालक: क्षेत्रात् पशुं वारयति । ६. एतां लतां पश्य । ७. कां कन्यां पश्यसि ? ८. तस्य वालिकाय फलं यच्छ । ९. सः कार्य करोतु, त्वं कुरु, अहं च करवाणि । १०. सः कार्यम् अकरोत्, त्वम् अकरोः, अहं च अकरवम् । २. संस्कृत बनाओ:-(क) १. वृक्ष से पत्ते गिरते हैं । २. घोड़े से बालक गिरा । ३. गाँव से बालक आता है । ४. वह वालिका घर से पुस्तक लाती है। शिष्य गुरु से डरता है । ६. राजा वालक को चोर से बचाता है । ७. वह वालक गुरु से पढ़ता है । ८. वह शिष्य मुनि से विद्या पढ़ता है । ९. क्षेत्रपाल खेत से पशु को हटाता है। १०. महल से पुत्र गिरा । (ख) ११. उस लता को देखो। १२. इस कन्या को फल दो। १३. इस लता से यह फूल गिरा । १४. सारी कथा कहो । १५. किस कन्या को पूछते हो ? (ग) १६. वह वालक काम करता है । १७. तू भोजन करता है । १८. में स्नान करता हूँ। १९. दह काम करे । २०. तू भी सदा काम करे । २१. मैं अवश्य काम करूँ। २२. उसने अन्यत्र काम किया । २३. तूने काम किया । २४. मैंने काम किया । ३. अशुद्ध वाक्य नियन (१) अश्वेन वालकः अपतत् । अश्वात् बालकः अपतत् । २८ (२) सः गुरुणा पठति । स गुरोः पठति। (३) तं कन्या फलं यच्छ । तस्य कन्यायै फलं यच्छ । २०, २१ ४. अभ्यास-( (क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो। (ख) कृ धातु के :: लट्, लोट् और लङ् के पूरे रूप लिखो। (ग) सर्व, तत्, यत्, एतत् और किम् के स्त्रीलिंग के रूप लिखो। ५. वाक्य बनाओ:-~पतति, विभेति, त्रायते, वारयति, अघीते, अन्यत्र । ' ६ रिक्त स्थान भरो:-१. वृक्षात् पर। २. बालक विभेति । ३. चोरात्""" ४. यवेभ्यः पशुं। ५. तस्याः कन्यायाः पुस्तकम्। ३ . शुद्ध वाक्य ...
२६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ३२-३४) शब्दकोश २४०+२० = २६० ] अभ्यास १३ (व्याकरण) क) युष्मद् (तू) (सर्वनाम) । अड्कुरः (अंकुर), प्रजा (प्रजा), बीजम (बीज) । (४) । (ख) उद्भू (निकलना), प्रभू (१. उत्पन्न होना, २. समर्थ होना), जन् (उत्पन्न होना), नि+ली (छिपना)। (४)। अति (अधिक), इव (तुल्य), चेत् (यदि), नोचेत् (नहीं तो)। (४)। (घ) पटुः (चतुर), पटुतरः (उससे चतुर), गुरुः (१. भारी, २. श्रेष्ठ), गुरुतरः (उससे भारी या अच्छा), दूरम् (दूर), समीपम् (पास), पार्श्वम् (समीप), निकटम् (समीप)। (८)। व्याकरण (युष्मद्, कृ धातु, पंचमी) १. युष्मद् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० ३९)। २. कृ धातु के विधिलिङ् और लट् के रूप स्मरण करो। (देखो धातु०३६ ३. उद्भू आदि धातुओं के क्रमशः ये रूप होते हैं:-उद्भवति (भवतिवत् प्रभवति (भयतिवत्) जायते, निलीयते । शनियम ३२--उद्भवति, प्रभवति, उद्नच्छति, जायते ( ये जव उत्प होना या निकलना अर्थ में हों), निलीयते के साथ पंचमी होती है । जैरे प्रजापति से संसार उत्पन्न होता है-प्रजापतेः लोकः जायते, उद्भव वा। हिमालयात् गङ्गा उद्भवति, प्रभवति, उद्गच्छति वा । भार्याय पुत्रः जायते । बीजेभ्यः अङ्कुराः जायन्ते। नृपात् चोरः निलीयते । नियम ३३----तुलना में जिससे तुलना की जाती है, उसमें पंचमी होती है जैसे--राम से कृष्ण अधिक चतुर है-रामात् कृष्णः पटुतरः । धन ज्ञान अधिक अच्छा है-धनात् ज्ञानं गुरुतरम् । दुर्जनात् सज्जनः गुरुतरः असत्यात् सत्यं गुरुतरम् । नियम ३४-दूर और समीपवाची शब्दों में पंचमी, द्वितीया और तृतीया तीन विभक्तियाँ होती हैं । जैसे-गाँव से दूर-ग्रामाद्दूरम् । जनकस्य समीपम् समीपात्, समीपेन वा । पिता के पास से आयी हूँ-जनकस्य समीपा पाश्र्थात्, निकटात् वा आगच्छामि। .
युष्मद् शब्द, कृ धातु, पंचमी विभक्ति २७ ? - अभ्यास १३ १. उदाहरण-वादयः -१. बीजेम्यः अङ्कुराः जायन्ते । २. रमायाः उमा पटुतरा । ३. अहं दूरात् आगच्छामि । ४. रामः कृष्ण इव अति पटुः गुरुः च अस्ति । ४. तुम पढ़ते हो तो पढ़ो, नहीं तो यहाँ से हट जाओ-त्वं पठसि चेत् पठ, नो चेत् इतः दूरं गच्छ । ६. त्वं पठसि, यूयं पठथ । ७. त्वां पश्यामि, युप्मान् वदामि । ८. त्वया सह कः एषः अस्ति? ९. तुभ्यं युप्मभ्यं वा कि रोचते ? १०. तव गृहं कुत्र अस्ति ? ११. सः एतत् कार्य कुर्यात्, त्वं कुर्याः, अहं च कुर्याम् । १२. स भोजनं करिष्यति । २. संस्कृत बनाओः -(क) १. वीजों से अंकुर उत्पन्न होते हैं । २. प्रजापति से प्रजा उत्पन्न होती है । ३. हिमालय से गंगा निकलती है। ४. सेनापति से चोर छिपता है । ५. देवदत्त से यज्ञदत्त अधिक चतुर है । ६. धन से विद्या अधिक अच्छी है । ७. मैं गुरु के पास से यहाँ आ रहा हूँ। ८. वह बहुत दूर से आ रहा है । ९. देवदत्त कृष्ण की तरह बहुत चतुर और श्रेष्ठ है । १०. तुम पत्र लिखते हो तो लिखो, नहीं तो यहाँ से हटो । (ख) ११. तू यहाँ आया। १२. मैं तुझको देखता हूँ। १३. तेरे साथ वहाँ कौन है ? १४. तुझे फल अच्छा लगता है या लड्डू ? १५. तेरी पुस्तक कहाँ है ? (ग) १६. वह काम करे। १७. तू काम कर । १८. मैं भोजन कसे। १९. वह काम करेगा । २०. तू भोजन करेगा। २१. मैं स्नान करूंगा। ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) सेनापतिना चोरः निलीयते। सेनापते: चोरः० । (२) णनेन विद्या गुरुः । घनात् विद्या गुरुतरा। ३३,२० (३) करेन्, करेः, करेयम् । कुर्यात्, कुर्याः, कुर्याम् । धातुरूप ४. अभ्यास -(क) २ (ख) को द्विवचन और वहुवचन में बदलो । (ख २ (ग) को वहुवचन में बदलो । (ग) युप्मद् शब्द के पूरे रूप लिखो। (घ) क घातु के विधिलिङ् और लूट के रूप लिखो । ५. वाक्य वनाओः-जायते, उद्भवति, उनच्छति, निलीयते, त्वया, तुभ्यम्, त्वत्, कुर्यात्, कुर्याः, कुर्याम्, करिष्यति, करिप्यामि । । --- - .
२८ (व्याकरण - प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ३५-४१ शब्दकोश २६०+२०%D२८०] अभ्यास १४ (क) अस्मद् (मैं) (सर्वनाम)। छात्रः (विद्यार्थी), अन्नम्, (अन्न), निमित्तम् (कारण), कारणम् (कारण), हेतुः (कारण) । (६) । (ख) स्म (भूतकालबोधक अव्यय), उपरि (ऊपर), अघः (नीचे), नीचैः (नीचे), पुरः (सामने), पश्चात् (पीछे), अग्रे (आगे), अग्रतः (आगे), यावत् (१. जितना, २. जब तक), तावत् (१. उतना, २. तब तक), इयत् (इतना), क्रियत् (कितना) । (१२) । (ग) श्रेष्ठः (श्रेष्ठ), पटुतमः (सबसे चतुर) । (२) । व्याकरण (अस्मद्, षष्ठी विभक्ति) १. अस्मद् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० ४०) । नियम ३५-धातु के लट् लकारवाले रूप के साथ 'स्म' अव्यय लगाने से भूत- काल अर्थ हो जाता है । जैसे-वह पढ़ता था-स पठति स्म । नियम ३६-~सम्बन्धकारक के अर्थ में पष्ठी विभक्ति होती है । जैसे-रामस्य पुस्तकम् । कृष्णस्य गृहम् । गङ्गायाः जलम् । वृक्षस्य पत्रम् । नियम ३७---हेतु शब्द के साथ षष्ठी होती है । जैसे-अध्ययन के हेतु रहता है-~अध्ययनस्य हेतोः वसति । धनस्य हेतोः पठति । नियम ३८-निमित्त अर्थवाले शब्दों (निमित्त, हेतु, कारण, प्रयोजन) के साथ प्रायः सभी विभक्तियाँ होती हैं। जैसे-वह किसलिए पढ़ता है-स कि निमित्तं पठति, केन निमित्तेन, कस्मै निमित्ताय, कस्य हेतोः कस्मात् कारणात् केन प्रयोजनेन वा । क्षनियम ३९-स्मरण अर्थ की धातुओं के साथ (खेदपूर्वक स्मरण में) कर्म में पप्ठी होती है । जैसे--मातुः स्मरति (माता को खेदपूर्वक स्मरण करता है)। नियम ४०-बहुतों में से एक को छाँटने के अर्थ में, जिससे छाँटा जाय, उसमें षष्ठी और सप्तमी दोनों होती हैं । छात्रों में राम श्रेष्ठ है-छात्राणां छात्र वा रामः श्रेष्ठः । वालकानां बालकेपु वा कृष्ण: पटुतमः ।। नियम ४१-उपरि, अधः, नीचैः, पुरः, पश्चात्, अग्ने, अग्रतः के साथ पप्ठी होती है । जैसे-गृहस्य उपरि, अवः, पुरः, पश्चात् अग्रे वा । . -- अस्मद् शब्द, पष्ठी विभक्ति २९ अभ्यास १४ १. उदाहरण-वाक्यः-१. यह राम का घर है-एतत् रामस्य गृहम् अस्ति । २. भोजनस्य हेतोः आगच्छ । ३. कस्मात् कारणात् हससि ? ४. बालकः जन- कस्य स्मरति । ५. शिष्याणां रामः श्रेष्ठः पटुतमः च अस्ति । ६. गृहस्य उपरि, पुरः, पश्चात् च के सन्ति ? ७. अहं पठामि । ८. मां पश्य । ९. मया सह रामः अस्ति! १०. मह्यं मोदकं रोचते। ११. मम एतत् पुस्तकम् अस्ति । १२. मयि क्षमा सत्यं च स्तः । १३. यावत् इच्छसि तावत् भक्षय । १४. यावत् गुरुः अत्र अस्ति, तावत् अत्र एव तिष्ठ। २. संस्कृत बनाओ:-- (क) १. यह राम की पुस्तक है । २. यह सुशीला का घर है । ३. गंगा का जल मधुर है । ४. वृक्ष के पत्ते लाओ । ५. मैं यहाँ अध्ययन के हेतु रहता हूँ। ६. धन के हेतु विद्या पढ़ो । ७. किसलिए विद्यालय जाते हो ? ८. किस कारण तुम पाठशाला नहीं आये ? ९. बालक माता को स्मरण करता है । १०. छात्रों में कृष्ण श्रेष्ठ और सबसे चतुर है । ११. कवियों में तुलसीदास श्रेष्ठ हैं । १२. घर के ऊपर, सामने और पीछे वालक हैं । १३. जितना चाहो उतना पढ़ो । १४. जब तक गुरु नहीं कहते हैं, तब तक यहाँ से न जाओ। १५. तुम कितना धन चाहते हो ? १६. मैं इतना धन चाहता हूँ। (ख) १७. मुझको देखो। १८. मेरे साथ रमा यहाँ आयी। १९. मुझको फल अच्छे लगते हैं । २०. मेरा घर यह है । २१. मुझमें सत्य और विद्या हैं । ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) अध्ययनेन हेतुना वसा मि । अध्ययनस्य हेतोः । (२) मातरं स्मरति । मातुः स्मरति । ३९ (३) कविम्यः कालिदासः श्रेष्ठतमः । कवीनां कालिदासः धेष्ठः । ४. अभ्यास -(क) २ (ख) को द्विवचन और बहुवचन में बदलो। (ख) अस्मद् शब्द के पूरे रूप लिखो। ५. वाक्य बनाओ:-अस्मान्, अस्मभ्यम्, अस्मत्, अस्माकम्, अस्मासु, हेतोः, श्रेष्ठः, पटुतमः, यावत्, कियत्, इयत् । शुद्ध वाक्य प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ४२-४५) शब्दकोश २८०+२०=३००] अभ्यास १५ (व्याकरण) (क) कर्तृ (करनेवाला), हर्तृ (हरनेवाला), धर्तृ (धर्ता), श्रोतृ (श्रोता), वक्तृ (वक्ता), गन्तृ (जानेवाला), द्रष्ट (देखनेवाला), नेतृ (नेता), दातृ (दाता) भोक्तृ (खानेवाला) । गमनम् (जाना), शयनम् (सोना), दानम् (देना), भाषणम् (भाषण, बोलना), भद्रम् (कुशल), कुशलम् (कुशल)। (१६) । (ग) समक्षम् (सामने), मध्ये (बीच में), अन्तः (अन्दर), अन्तरे (अन्दर) (४) सूचना-(क) कर्तृ-भोक्तृ, कर्तृवत् । गमन-माषण, गृहवत् । व्याकरण (कर्तृ, षष्ठो विभक्ति) १. कर्तृ शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० ४) । हर्तृ आदि वे रूप कर्तृ के तुल्य चलेंगे नियम ४२-कृत् प्रत्यय (धातु के अन्त में तृ, ति, अ, अन आदि) लगाकर बने हुए शब्दों के कर्ता और कर्म में षष्ठी होती है। जैसे -बालक का जाना-वालकस्य गमनम् । इसी प्रकार बालकस्य शयनम् । धनस्य दानम् । पुस्तकस्य पठनम् । कार्यस्य कर्ता । धनस्य हर्ता । मापणस्य श्रोता। धनस्य दाता । नराणां नेता। नियम ४३ - कृते (लिए), समक्षम्, मध्ये, अन्तः, अन्तरे के साथ पष्ठी होती है। जैसे-भोजन के लिए--भोजनस्य कृते । घर के सामने, मध्य में या अन्दर-गृहस्य समक्षम्, मध्ये, अन्तः वा । नियम ४४-दूर और समीपवाची शब्दों के साथ पष्ठी और पंचमी दोनों होती हैं। जैसे-गाँव से दूर-ग्रामस्य ग्रामाद् वा दूरम् । पिता के समीप से- जनकस्य समीपात् । गुरोः पार्वात्, निकटात् वा । नियम ४५-आशीर्वादसूचक शब्दों (भद्रम्, कुशलम्, सुखम्, शम् आदि) के साथ षष्ठी और चतुर्थी दोनों होती हैं । जैसे-राम का कुशल हो-रामस्य रामाय वा भद्रम्, कुशलम्, शं भूयात् । (भूयात्-होवे) । - - ।
कर्तृ शब्द, पष्ठी विभक्ति , १ -- -- : -( अभ्यास १५ १. उदाहरण-वाक्य :-१. बच्चे का पढ़ना मुझे अच्छा लगता है-शिशोः पठनं मह्यं रोचते । २. वालकस्य गमनम्, धनस्य दानम् । ३. कार्यस्य कर्ता, धनस्य हर्ता, दण्डस्य घर्ता, भाषणस्य. श्रोता, सत्यस्य वक्ता, ग्रामं गन्ता, विद्यालयस्य द्रष्टा, नराणां नेता, घनस्य दाता, भोजनस्य भोक्ता च एतस्मिन् 'नगरे सन्ति । ४. कार्यस्य कर्तारं धनस्य हरिं च अत्र आनय । ५. वक्तृभ्यः श्रोतृभ्य नेतृभ्यः च फलानि देहि । ६. दातुः दानं पश्य । २ संस्कृत बनाओ ( क ) १. पुत्र का पढ़ना मुने अच्छा लगता है । २. वालक का जाना देखो । ३. बच्चे का सोना मनोहर है । ४. पुस्तक का पढ़ना हितकर है । ५. धन का देना अच्छा है । ६. पढ़ने के लिए (कृते) यहाँ आओ। ७. मेरे सामने आओ । ८. खेत के बीच में मनुष्य खड़ा है । ९. घर के अन्दर मनुष्य हैं । १०. मैं पिता के समीप से यहाँ आ रहा हूँ । ११. घर से दूर भ्रमण के लिए जाओ । १२. शिष्य का कुशल हो। (ख) १३. कार्य का कर्ता यहाँ है । १४. पुस्तक का हर्ता वहाँ जाता है । १५. सत्य का धर्ता सुख से रहता है। १६. भापण सुननेवाला हँसता है । १७. सत्य बोलनेवाला सत्य वोलता है । १८. गांव जानेवाला गाँव जाता है। १९. लता देखनेवाले को देखो। २०. नेता के साथ मनुष्य जा रहे हैं । २१. धन के दाता को ये फूल दो। २२. भोजन सानेवाले को फल और फूल दो । अशुद्ध वाक्य नियम (१) पुत्रं पठन मम रोचते । पुत्रस्य पठनं मह्यं रोचते । ४२, २३ (२) जनक समीपात् आगच्छामि । जनकस्य समीपात् । (३) घनं दातारं फलानि यच्छ । धनस्य दाने फलानि । ४२,२१ ४. अभ्यास (क) २ (ख) को वहुवचन में बदलो। (ख) इन शब्दों के पूरे रूप लिखो-कर्तृ, हर्तृ, श्रोतृ, वक्तृ, नेतृ, दातृ । वाक्य बनाओ :-गमनम्, पठनम्, शयनम्, दानम्, भाषणम्, कारः, हर्तारम्, धर्तारम्, श्रोत्रा, वक्तृभ्यः, नेतारः, दातुः, समक्षम्, कृते, कुगलम् । शुद्ध वाक्य (व्याकरण ३२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ४६-४८ शब्दकोश ३००+२०=३२०] अभ्यास १६ (क) पितृ (पिता), भ्रातृ (भाई), जामातृ (जवाँई, दामाद), धर्म (धर्म), प्रातःकालः (प्रातःकाल), मध्याह्नः (दोपहर), सायंकालः (सायंकाल) दिनम् (दिन), वस्त्रम् (वस्त्र) (९)। (ख) दह, (जलाना), ज्वल् (जलना) गै (गाना), आ + | (पुकारना, बुलाना), अभि + लष् (चाहना) । कृत (किया), गतः (गया), आगतः (आया) । (८) । (ग) प्रातः (प्रातःकाल) सायम् (सायंकाल), नक्तम् (रात्रि) । (३) । सूचना-(क) पितृ-जामात, पितृवत् ।(ख) दह-अभिलए, भवतिवत् व्याकरण (पितृ. सप्तमी विभक्ति) १. पितृ शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द०५)। भ्रातृ औ जामात के रूप पितृ के तुल्य चलेंगे। २. दह, आदि के रूप भू के तुल्य चलेंगे । दहति, ज्वलति, गायति, आह्व यति, अभिलपति। सनियम ४६-अधिकरण कारक में सप्तमी होती है । जैसे-विद्यालय में पढ़ता है- विद्यालये पठति । गृहे वस्त्राणि सन्ति । नगरे मनुष्याः सन्ति । (देखें नियम ४० भी)। नियम ४७-'विषय में, बारे में' अर्थ में तथा समयबोधक शब्दों में सप्तम होती है । जैसे मोक्ष के बारे में इच्छा है-मोक्षे इच्छा अस्ति । धर्म के विषय में अभिलाषा है-धर्मे अभिलाषः अस्ति । वह प्रातःकाल यहाँ आता है--स प्रातःकाले प्रातः वा अत्र आगच्छति । स मध्याह्न, सायंकाले सायं वा कार्य करोति । सूचना-प्रातः, सायम्, नक्तम् के रूप नहीं चलते हैं, ये अव्यय हैं । प्रातःकाल, सायंकाल आदि के रूप चलते हैं। छनियम ४८-~एक क्रिया के बाद दूसरी क्रिया होने पर पहली क्रिया में सप्तमी होती है । कर्तृवाच्य में कर्ता और कृदन्त में सप्तमी होगी । कर्मवाच्य में कर्म और कृदन्त में सप्तमी होगी तथा कर्ता में तृतीया । जैसे, राम के वन जाने पर भरत आये-रामे वनं गते भरतः आगतः । मेरे काम कर लेने पर गुरु आये-मया कार्ये कृते गुरुः आगतः । रामे आगते सीता अपि आगता । - पितृ शब्द, सप्तमी विभक्ति ३३ ३ . अभ्यास १६ १. उदाहरण-वाक्य :-१. गृहे वालकाः सन्ति । २. मम पठने अभिलापः अस्ति । ३. प्रातःकाले सायंकाले च ईइवरं नमत । ४, धर्म अभिलापं कुरु । ५. अध्ययने कृते भोजनं कुरु । ६. अग्निः गृहं दहति । ७. अग्निः गृहे ज्वलति । ८. शान्तिः गानं गायति । ९. पिता पुत्रम् आह्वयति । १०. शिप्यः विद्याम् अभिलषति । ११. नक्तम् (रात में) अधिकं न पठ । २. संस्कृत बनाओ :-(क) १. राम विद्यालय में पढ़ता है । २. इस कक्षा में १० बालक हैं । ३. घर में वस्त्र और पुस्तकें हैं । ४. गाँव में मनुष्य रहते हैं। ५. मेरी धर्म के विषय में इच्छा है । ६. पढ़ाई के विषय में अमिलापा करो। ७. उसकी मोक्ष के बारे में इच्छा है । ८. प्रातःकाल और सायंकाल गुरु को प्रणाम करो। ९. दिन में पढ़ो । १०. रात्रि में अधिक न पढ़ो और न लिखो। ११. मेरे घर आने पर कृष्ण भी आया । १२. युधिष्ठिर के वन जाने पर अर्जुन भी वन गये । (ख) १३. पिताजी आ रहे हैं । १४. पिता को देखो। १५. पिता के साथ पुत्र भी आया । १६. पिता को भोजन दो। १७. पिता से विद्या पढ़ो। १८. पिता की यह पुस्तक है । १९. भाई को बुलाओ । २०. जंवाई को फल दो। (ग)२१. आग वस्त्रों और वृक्षों को जलाती है । २२. आगजल रही है । २३.बालिका गाना गा रही है । २४. गुरु शिष्य को बुलाता है । २५. वह धर्म को चाहता है। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) पठनस्य अभिलापं कुरु । पठने अभिलाषं कुरु । (२) मम गृहे आगते। मयि गृहम् आगते। ४८, १३ (३) पितुः सह पुत्रः आगतः । पित्रा सह पुत्रः । १५ ४. अभ्यास-(क) २ (ग) को लोट्, लङ् और विधिलिङ् में वदलो । (ख) पितृ और भ्रातृ के पूरे रूप लिखो। (ग) इनके लट्, लोट्, ल और विधिलिङ् के पूरे रूप लिखो-दह , ज्वल, गै, आ+ ढे, अभि + लष् । ५. वाक्य बनाओ:--प्रातःकाले, सायंकाले, नक्तम्, अदहत्, अज्वलत्, अगायत्, आह्वयत्, अभ्यलपत्, कृते, गते, आगते । शुद्ध वाक्य ४७ - -- प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ४९-५१ शब्दकोश ३२०+२०=३४०] अभ्यास १७ (व्याकरण (क) भगवत् (भगवान्), भवत् (आप), श्रीमत् (श्रीमान्), बुद्धिमा (बुद्धिमान्), धनवत् (धनवान्), बलवत् (बलवान्) । स्नेहः (स्नेह), विश्वास. (विश्वास), मृगः (हरिण), वाणः (बाण), श्रद्धा (श्रद्धा) । (११) । (ख) क्षिप् (फेना), मुच् (छोड़ना)। (२) । (ग) आसक्तः (१. अनुरक्त २. लगा हुआ), युक्तः (लगा हुआ), लग्नः (लगा हुआ), तत्परः (लगा हुआ) कुशलः (चतुर), निपुणः (चतुर), चतुरः (चतुर) । (७) । सूचना-(क) भगवत्-~-बलवत्, भगवत् के तुल्य । व्याकरण (भगवत्, सप्तमी विभक्ति) १. भगवत् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० ८)। भवत आदि के रूप भगवत् के तुल्य चलेंगे । २. क्षिप् और मुच् के रूप लट् में क्षिपति, मुञ्चति हैं। इनके ये रूप बनाकर भवति के तुल्य रूप चलेंगे । *नियम-४९-~-प्रेम, आसक्ति और आदरसूचक शब्दों और धातुओं के साथ सप्तमी होती है। जैसे-उसका मुझ पर स्नेह है-तस्य मयि स्नेहः अस्ति । तस्य कन्यायां स्नेहः अस्ति । पिता पुत्रे स्नेहं करोति । रामः रमायाम् आसक्तः अस्ति । मम गुरी आदरः अस्ति । *नियम-~५०-संलग्न और चतुर अर्थवाले शब्दों के साथ सप्तमी होती है । जैसे-वह पढ़ाई में संलग्न है--सः पठने लग्नः, युक्तः, तत्परः, आसक्तः वा अस्ति । राम विद्या में निपुण है-रामः, विद्यायां कुशलः, निपुणः, चतुरः, पटुः, दक्ष: वा अस्ति । *नियम~५१-~-फेंकना अर्थ की धातुओं के साथ तथा विश्वास और श्रद्धा अर्थवाली धातुओं और शब्दों के साथ सप्तमी होती है । जैसे--मृग पर वाण फेंकता है-मृगे बाणं क्षिपति, मुञ्चति वा । उसका धर्म पर विश्वास है-तस्य धर्मे विश्वासः श्रद्धा वा अस्ति । स धर्मे विश्वसिति । स मम वचने विश्वसिति । ।
भगवत् शब्द, सप्तमी विभक्ति अभ्यास १७ १. उदाहरण वाक्यः-१, बुद्धिमान् शिष्येषु स्नेहं करोति । २. स धनवान् यायाम् आसक्तः अस्ति । ३. अहं काय लग्नः अस्मि । ४. सेनापतिः शत्रौ वाणं पति मुञ्चति वा । ५. मम भगवति श्रद्धा विश्वासः च स्तः । ६. भवान् कुतः गच्छति ? ७. श्रीमन्तं बुद्धिमन्तं च नमत । ८. धनवद्भिः वलवद्भिः च सह च वेत् । ९. भवते नमः । १०. एतत् तस्य श्रीमतः गृहम् अस्ति। ११. भगवति श्वासं श्रद्धां च कुरुत । १२. बुद्धिमत्सु विद्या बनवत्सु धनं वलवत्सु वलं च भवन्ति । २. सस्कृत वनाओ:-(क) १. गुरु शिप्य पर स्नेह करता है। २. कृष्ण [ उस कन्या से स्नेह है। ३. राम रमा पर आसक्त है । ४. उस गुरु का शिप्यों आदर है। ५. वह बुद्धिमान् पढ़ाई में संलग्न है । ६. कृष्ण वेद में निपुण र चतुर है । ७. मैं खेल में कुशल हूँ। ८. राजा दुर्जन पर वाण फेंकता है । . सेनापति मृग पर वाण छोड़ता है। १०. मेरा सत्य और धर्म पर विश्वास । ११. तेरी भगवान् पर श्रद्धा है । १२. वह मेरे वचन पर विश्वास करता है। ३) १३. भगवान् को नमस्कार करो । १४. आप क्या पढ़ते हैं ? १५. आपके स पढ़ने के लिए आया हूँ । १६. श्रीमान् को नमस्कार । १७. उस बुद्धिमान् । ये पुस्तकें दो। १८. यह उस धनवान् का घर है । १९. बलवान् वालक की क्षा करता है । २०. आपमें ज्ञान, विद्या, सत्य और धर्म ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) गुरुः शिष्यं स्नेहं करोति । गुरुः शिष्ये स्नेहं० । (२) राजा दुर्जनं वाणं क्षिपति । राजा दुर्जने वाणं० । ५१ (३) श्रीमानं नमः। श्रीमते नमः। २२, शब्दरूप (४) तस्य धनवानस्य गृहम् । तस्य धनवतः गृहम्० । ४. अभ्यास-(क) २ (ख) को वहुवचन में वदलो। (ग) इन शब्दों के पूरे sप लिखोः-भगवत् भवत्; श्रीमत्, बुद्धिमत्, धनवत्, बलवत् । ५. वाक्य बनाओ:-स्नेहः, आसक्तः, आदरः, लग्नः, कुदालः, विपति, हुञ्चति, श्रद्धा, विश्वरिति, भगवन्तम्, भवान्, धनवतः । ? शुद्ध वाक्य ४९ शब्दरूप 4 ..
प्रा० रचनानुवादकौमुदी - (नियम व्याकर - - । - शब्दकोश ३४०+२०=३६०] अभ्यास १८ (व्या (क) करिन् (हाथी), पक्षिन् (पक्षी), दण्डिन् (१. संन्यासी, २.५ धारी), विद्यार्थिन् (विद्यार्थी), स्वामिन् (स्वामी), मन्त्रिन (मन्त्री), २. (ज्ञानी), योगिन् (योगी), त्यागिन् (त्यागी), घनिन् (धनी)। (१० (ख) सेव् (सेवा करना), लम् (पाना), वृध् (बढ़ना), मुद् (प्रसन्न होन सह, (सहन करना), याच् (माँगना)। (६)। ग) सकृत् (एक वा असकृत् (बार-बार), मुहुः (वार-बार), पुनः (फिर) (४) । सूचना-(क) करिन्-धनिन्, करिन् के तुल्य । (ख) सेव-याच्, सेवतेव व्याकरण (करिन्, लट्, अनुस्वार-सन्धि) १. करिन् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० १०) । पार आदि के रूप इसी प्रकार चलाओ । नियम १० इन शब्दों में लगेगा-करि पक्षिन्, मन्त्रिन् । २. सेव्-लट् (आत्मनेपद) संक्षिप्त रूप सेवते सेवेते सेवन्ते अते एते अन्ते सेवसे सेवेथे सेवध्वे असे एथे अध्वे सेवे सेवावहे सेवामहे आवहे आमहे संक्षिप्त रूप लगाकर लम् आदि के रूप बनाओ। जैसे-लभते, वई मोदते, सहते, याचते । सूचना-भ्वादिगण (१) की सभी आत्मनेपदी धातुओं के रूप सेव के तु चलेंगे। ३. सूचना-जिन धातुओं के अन्त में लट् में अति, अतः, अन्ति आ लगता है, उन्हें परस्मैपदी कहते हैं और जिनके अन्त में अते, एते, अन्ते आ लगता है, उन्हें आत्मनेपदी कहते हैं । ४. अभ्यास ५,६,७ में दिये प्रथमा, द्वितीया के नियमों का पुनः अभ्यास करो नियम ५२-(भोऽनुस्वारः पद (शब्द) के अन्तिम म् के बाद कोई व्यंज हो तो म् को अनुस्वार (') हो जाता है। बाद में स्वर होगा तो म् नी रहेगा । जैसे-कार्यम् + करोति = कार्य करोति । सत्यम् + वद = सत्यं वद गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति । गृहम्+अगच्छत् = गृहमगच्छत् । प्र० पु० म० पु० उ० पु० ए करिन्, लट् (आत्मनेपद), अनुस्वार-सन्धि, द्वितीया ३७ सार अभ्यास १८ नी १. उदाहरण-वाक्य :-१. वने करिणः सन्ति । २. रामः पक्षिणः पश्यति । जी दण्डी दण्डेन सह भ्रमति । ४. विद्यार्थिनः स्वामिनः मन्त्रिणः ज्ञानिनः योगिनः Iगिनः घनिनः च अत्र सन्ति । ५. विद्यार्थी गुरुं सेवते । ६. मन्त्री धनं मते । ७. त्वं सुखेन वर्षसे । ८. अहं विद्यया मोदे । ९. योगी दुःखं सहते । 'To. विद्यार्थी नृपं धनं याचते । ११. सकृत् कार्य कुरु । १२. असकृत् मुहुः पुनः r विद्यां पठ, सत्यं वद, धर्म च कुरु । २. संस्कृत बनाओ:- क) १. इस नगर में पांच हाथी हैं । २. इन पक्षियों ने देखो । ३. दण्डी इधर आ रहा है । ४. विद्यार्थी ज्ञानी, योगी और त्यागी की वा करता है । ५. स्वामी घनी से धन मांगता है । ६. योगी दुःख सहता है । 5. मन्त्री धन पाता है और सुखपूर्वक बढ़ता है । ८. योगी और त्यागी प्रसन्न हैं । ९. योगी एक वार भोजन करता है । १०. धनी बार-बार भोजन करता । (ख) ११. ज्ञानी के चारों ओर विद्यार्थी हैं । १२. मन्त्री के दोनों ओर ज्ञानी । १३. त्यागी वन जाता है । १४. विद्यार्थी विद्यालय जाते हैं। (ग) १५. वह गुरु की सेवा करता है । १६. वह धन पाता है । १७. तू बढ़ता है । १८. तू प्रसन्न होता है. १९. मैं दुख सहता हूँ। २०. मैं राजा से धन मांगता हूँ। ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) एतत् नगरे पञ्च हस्ती सन्ति । एतस्मिन् नगरे पञ्च हस्तिनः । २० (२) स्वामी घनिनः धनं याचते । स्वामी घनिनं धनं यायते । (३) अहं नृपात् धनं याचे । अहं नृपं धनं याचे । ११ ४. अभ्यास-क) २ (ग) को द्विवचन और बहुवचन में बदलो । (ख) इन शब्दों के पूरे रूप लिखो-करिन्, पक्षिन्, दण्डिन्, विद्यार्थिन्, घनिन् । (ख) इनके लट् के पूरे रूप लिखो-सेव्, लम्, वृष, मुद्, सह, याच् । ५. वाक्य वनाओ-विद्यार्थिनः, घनिनाम्, सेवते, सहसे, सकृत्, मुहुः । ६. सन्धि करो-कार्यः+करोति । पुस्तकम् +पठति । गृहम् + गच्छति । लेखम् +-लिखति । त्वम् + पठसि । सत्यम् + वद । पुस्तकम् + अपठत् ।
प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ५ शब्दकोश ३६०+२०=३८० ] अभ्यास १९ (व्याकरण (क) राजन् (राजा), मूर्धन् (सिर), तक्षन् (बढ़ई)। (३) । (ख) वृद्ध (होना), ईक्ष् (देखना), भाष् (कहना), कूर्च् (कूदना), यत् (यत्न करना) रम् (१. लगना, २. रमण करना), वन्द् (वन्दना करना), शिक्ष् (सीखना) कम्प् (काँपना), परा+अय् = पलाय् (भागना), चेष्ट् (चेष्टा करना) आलम्व् (सहारा लेना), ध्वंस् (नष्ट होना) । (१३) । (ग) अन्यथा (नहीं तो) शीघ्रम् (शीघ्र), सहसा (एकदम), किंचित् (कुछ) । (४) । सूचना-~(क) राजन्-तक्षन्, राजन् के तुल्य । (ख) वृत्-~-ध्वंस्, सेट के तुल्य । संक्षिप्तरूप उ० पु० व्याकरण (राजन्, लोट्, यण-सन्धि, तृतीया) १. राजन् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० १३) । मूर्ष और तक्षन् के रूप राजन् के तुल्य चलाओ । २. सेव् लोट् (आत्मनेपद) सेवताम् सेवेताम् सेवन्ताम् प्र० पु० अताम् एताम् अन्ताम सेवस्व सेवेथाम् सेवध्वम् म० पु० अस्व एथाम् अध्वम् सेव सेवावहै सेवामहै ऐ : आवहै आमह संक्षिप्त रूप लगाकर लम् आदि तथा वृत् आदि के रूप बनाओ। ३. वृत् आदि के लट् में ये रूप होते हैं-वर्तते, ईक्षते, भाषते, कूदते, यतते, रमते, वन्दते, शिक्षते, कम्पते, पलायते, चेष्टते, आलम्बते, ध्वंसते । लोट् में सेव के तुल्य इनके रूप चलाओ । ४. अभ्यास ८, ९ में दिये तृतीया के नियमों का पुनः अभ्यास करो। नियम ५३-(इको यणचि) इ ई को य, उ ऊ को व्, ऋ कोर्, ल को ल् हो जाता है, यदि बाद में कोई स्वर हो तो। (सवर्ण (वैसा ही) स्वर हो तो नहीं) 1 जैसे- (१) प्रति + एक प्रत्येकः। इति +आह= इत्याह । यदि + अपि3 यद्यपि। सुधी-+उपास्यः = सुध्युपास्यः । (२) मधु +अरिः = मध्वरिः। वधू+औ = वध्वौ। गुरु+आज्ञा = गुर्वाज्ञा । . (३) पितृ+आ = पित्रा। धातृ + अंश= धात्रंशः (४) ल+आकृतिः- लाकृतिः । .
राजन्, लोट् (आ०), यण-सन्धि, तृतीया अभ्यास १९ १. उदाहरण-वाक्य--१. राजा राज्यं करोति । २. राजानं पश्य । ३. राज्ञा सह मन्त्री वर्तते । ४. राज्ञः राज्ञां कुरु, अन्यथा स कोपिप्यति । ५. वालकस्य मूनि फलम् अपतत् । ६. तक्षा कार्य करोति । ७. अत्र रामः वर्तते, स ईक्षते, मापते, कूदते च । ८. स पुत्रम्, ईक्षताम्, वचनं माषताम्, कूर्दताम्, यतताम्, रमतां च । ९ त्वं गुरुं वन्दस्व, विद्यां शिक्षस्व, ज्ञानं लभस्व च । १०. अहं चेष्ट, वर्षे, मोदै, दुःखं सहैच । ११. दुर्जनः पलायताम् । १२. वन्दे मातरम् । २. संस्कृत वनाओ-(क) राजा आ रहा है । २. राजा को नमस्कार करो। ३. राजा के साथ सेनापति है ।४. राजा को धन दो । ५. राजा का राज्य वढ़े । ६. बालक का सिर सूंघो । ७ शिष्य के सिर पर फूल गिरा । ८. बढ़ई इधर आ रहा है । ९. विद्या पढ़ो, नहीं तो दुःख होगा । १०. वह स्वभाव से सज्जन है । ११. वह आँख का काणा है । १२. विवाद मत करो। (ख, १३. यहाँ सुख हो । १४. वह लता को देखे । १५. वह सत्य बोले । १६. तृ वृक्ष से नीचे कूद । १७. तू पढ़ाई में यत्न कर । १८. तू काम में लग । १९. मैं गुरु की वन्दना कसे । २०. मैं विद्या सीखू । २१. दुर्जन सहसा काँपे । २२ चोर शीघ्र भाग जावे । २३. शिष्य चेष्टा करे । २४. बालक पिता का सहारा ले । २५. यह घर नष्ट हो । २६. वह धन पावे और बढ़े। ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) राजाम्, राजेन, राजाय । राजानम्, राज्ञा, राज्ञे । (२) त्वं पठने यत्। त्वं पठने यतस्व। धातुरूप (३) बालकः पितुः आलम्वतु । वालकः पितरम् आलम्बताम् । ,, ११ (४). अभ्यास--(क) २ (ख) को बहुवचन में बदलो । (ख) राजन् शब्द के पूरे रूप लिखो । (ग) इनके लोट् के पूरे रूप लिखो-सेव्, लम्, वृथ्, याच्, मुद्, वृत्, ईक्ष्, कूर्द , यत् । ५. वाक्य बनाओ अन्यथा, प्रकृत्या, भाषताम्, कूर्दस्व, यतस्व, ६.सन्धि करो-यदि + अपि । इति+मत्र । पठति+अत्र । पठतु + अत्र । मधु + अरिः । पितृ-+ए । धातृ + अंशः । कर्तृ + आ । शब्दरूप - शिक्ष।
४० -- तुल्य। संक्षिप्त रूप प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ५४ शब्दकोश ३८०+२० = ४००] अभ्यास २० (व्याकरण) (क) सिंहः (शेर), व्याघ्रः (बाघ), ऋक्षः (रीछ) , शूकरः (सूअर), वृक: (भेड़िया), शृगालः (गीदड़), शशकः (खरगोश),वानरः (बन्दर), वृषभः (बैल); उष्ट्र: (ऊँट), गर्दभः (गधा), कुक्कुरः (कुत्ता), मार्जारः (विल्ली), अजः (बकरा), मूषकः (चूहा) । (१५) । (ख) गच्छत् (जाता हुआ), पठत् (पढ़ता हुआ),लिखत् (लिखता हुआ), कुर्वत् (करता हुआ), (४) । (ग) यत् (कि) । (१)। सूचना-(क) सिंह-मूषक, रामवत् । (ख) गच्छत्-कुर्वत्, गच्छत् के • व्याकरण (गच्छत्,लङ्, अयादि सन्धि, चतुर्थी) १. गच्छत् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० १) । पठत् आदि के रूप गच्छत् के तुल्य चलाओ । इस प्रकार के बने हुए अन्ये शब्दों के लिए देखो अभ्यास २६ का व्याकरण । २. सेव लङ् (आत्मनेपद) असेवत् असेवेताम् असेवन्त एताम् असेवथाः असेवेथाम् असेवेथाम् असेवध्वम् म० पु० अथाः एथाम् अध्वम् असेवे असेवाबहिं असेवामहि उ० पु० ए आवहि आमहि सूचना-~लङ् लकार में धातु से पहले अ लगता है । यदि धातु का पहला अक्षर कोई स्वर हो तो आ लगेगा । संक्षिप्त रूप लगाकर अभ्यास १८ और १९ में दी गयी लभ् आदि धातुओं के रूप चलाओ । ३. अभ्यास १०, ११ में दिये चतुर्थी के नियमों का पुनः अभ्यास करो। ४. 'यत्' अव्यय 'कि' अर्थ में आता है । जैसे, उसने कहा कि मैं नहीं जाऊँगा-सः अभाषत यत् अहं न गमिष्यामि । नियम ५४-(एचोऽयवायावः) ए को अय्, ओ को अव्, ऐ को आय और औ को आव हो जाता है, बाद में कोई स्वर हो तो। (शब्द के अन्तिम ए या ओ के वाद अ होगा तो नहीं)। जैसे-(१) हरे+ए- हरये । जे +अ = जयः । कवे+ए- कवये । (२) भो+अति = भवति । पो+अनः = पवनः । (३) नै+अकः = नायकः । गै--अकः = गायकः । (४) पौ+ अक:=पावकः 1 द्वौ+ एतौ द्वावेतौ। प्र० पु० अत अन्त गच्छत्, लङ् (आ०), अयादि सन्धि, चतुर्थी, पशुवर्ग ४१ - को - अभ्यास २० १. उदाहरण वाक्यः-१. वालकः पठन्, लिखन्, कार्यं च कुर्वन् अस्ति । २. गच्छन्तं सिंह पश्य । ३. पठता वालकेन सह रामः तिष्ठति । ४. गच्छते शिष्याय पुस्तकं यच्छ । ५. गच्छतः अश्वात् वालकः अपतत् । ६. लिखतः शिष्यस्य लेख श्य । ७. वृकः गच्छन् आसीत् । ८. रामः अभापत यत् स सदा सत्यं वदिष्यति । १. रामः गुरुम् असेवत्, धनम् अलभत, अवर्धत, अमोदत च । १०. त्वं दुःखम् मसहथाः, कन्याम् ऐक्षयाः च । २. संस्कृत वनाओ:-(क) १. शिष्य जा रहा है । २. राम काम कर रहा है। ३. कृष्ण लिख रहा है। ४. एक शेर जा रहा था। ५. जाते हुए वाघ को खो। ६. जाते हुए कुते के साय बकरा और विल्ली भी हैं । ७. र बिल्ली भी हैं । ७. पढ़ते हुए वालक दो । ८. काम करते हुए शिष्य का काम देखो। ९. राम ने कहा कि वह र जा रहा है। १०. वन में शेर, बाघ, रोछ, सूअर, भेड़िया, गीदड़, खरगोश र बन्दर रहते हैं। ११. नगर में घोड़े, वैल, ऊँट, गधे, कुते, बिल्ली, बकरे र चूहे भो रहते हैं । (ख) १२. कुते को भोजन दो । १३. मुझे लड्डू अच्छा गता है। १४. गुरु को नमस्कार । १५. धन के लिए पढ़ो। (ग) १६. उसने न पाया। १७. उसने गुरु को सेवा को। १८. तूने वृक्ष देखा । १९. तूने कहा। ०. मैंने यत्न किया । २१. मैंने विद्या सीखी। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) गच्छन् व्याघ्रं पश्य । गच्छन्तं व्यानं पश्य । २० (२) पठन् बालकं मोदकं यच्छ । पठते बालकाय मोदकं यच्छ । २०,२३ (३) कार्य कुर्वन् शिष्यस्य० । कायं कुर्वतः शिष्यस्य० । २० ४. अभ्यासः-(क) २ (ग) को वहुवचन में वदलो। (ख) गच्छत्, पठत्, वत् के पूरे रूप लिखो। (ग) इनके लङ् के रूप लिखो-सेव, लम्, वृध्, सह,, च, वृत्, भाष, कू; यत्, बन्दु । ५. वाक्य बनाओ:-गच्छन्तम्, कुर्वतः, अलभत, ऐक्षत, असहत । ६. सन्धि करो:-मुने + ए | कवे + ए । जे + अति । भो + अति । पो+ 'नः । गुरो+ए । गै+अकः । गै+ अति । पो* अकः । हो इमो। शुद्ध वाक्य - ४२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ५५-५६ शब्दकोश ४०० + २० = ४२०] अभ्यास २१ (व्याव (क) मतिः (बुद्धि), बुद्धिः (बुद्धि), गतिः (चाल), धृतिः (धैर्य), कृतिः (क भूतिः (ऐश्वर्य), उक्तिः (कथन), मुक्तिः (मोक्ष), युक्तिः (युक्ति), भक्तिः (भा श्रुतिः (वेद), स्मृतिः (स्मृति), शक्तिः (बल), शान्तिः (शान्ति), प्रवृत्तिः (प्रवृि प्रणतिः (प्रणाम), भूमिः (पृथ्वी), समृद्धिः (ऐश्वर्य), रात्रिः (रात), अंगुलिः (उँगलं (२०) । सूचना-मति-अंगुलि, मतिवत् । व्याकरण (मति, विधिलिङ, गुण-सन्धि, पञ्चमी) १. मति शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द १६) । बुद्धि आदि रूप मति के तुल्य चलाओ। २. सेव-विधिलिङ् (आत्मनेपद) संक्षिप्त रूप सेवेत सेवेयाताम् सेवेरन् एत एयाताम् एर सेवेथाः सेवेयाथाम् से वेध्वम् एथाः एयायाम् एव सेवेय सेवेवहि सेवेमहि एय एवहि एमा अभ्यास १८, १९ में दो गयी लभ आदि धातुओं के रूप इसी प्रकार बनाओ ३. अभ्यास १२, १३ में दिये पंचपो के नियपों का पुनः अभ्यास करो। नियम ५५-दीर्घ, गुण, वृद्धि, संप्रसारण के लिए यह विवरण स्मरण कर लें ऊपर स्वर दिये हैं । गुण, वृद्धि आदि कहने पर ऊपर के स्वर के नीचे आदि के सामने जो स्वर दिये हैं, वे होंगे। स्वर अ, आ, इ,ई, उ,ऊ, ऋ, ऋ, लु ए ऐ ओ औ ऋ २. गुण अ ए ओ अर अल ए ओ ३. वृद्धि ओ आर् आल् ऐ ऐ ओ औ ४. संप्रसारण- को इ, व् को उ, र् को ऋ । नियम ५६-(आद्गुणः) अ या आ के बाद (१) इ या ई हो तो दोनों को (२) उ या ऊ हो तो दोनों को 'ओ', (3) ऋ या ऋ हो तो दोनों को 'अ (४) ल हो तो दोनों को 'अल्' होगा। जैसे-रमा + ईशः = रमेशः । पर उपकारः = परोपकारः । महा + उत्सवः = महोत्सवः । महा + ऋषिः महर्षिः । तव + लकारः = तवल्कारः । प्र० पु० म० पु० उ० पु० १. दीर्घ आ ई आ ऐ मति, विधिलिङ् (आ०), गुण-सन्धि, पञ्चमी ४३ अभ्यास २१ १. उदाहरण-वाक्यः-१. मतिम् इच्छा । २. वुद्ध्या कायं कुरु । ३. करिणः तिम् ईक्षस्व । ४. रामे धृतिः भक्तिः शक्तिः भूतिः शान्तिः च सन्ति । ५. मधुराम् उक्ति भापेथाः । ६. भूमौ युक्त्या वर्तेथाः । ७. श्रुतिं स्मृतिं च पठ। ८. भक्त्या ईश्वरम् ईक्षेथाः । ९. स गुरु सेवेत, धनं लभेत, वर्धेत, मोदेत च १०. त्वं दुःखं पहेयाः, ईश्वरं मतिं याचेथाः, ईश्वरं वन्देथाः, विद्यां च शिक्षेथाः । ११. अहं पत्यं भापेय, फलम् ईक्षेय, यतेय, कार्ये रमेय, कुशलं वर्तेय च । २. संस्कृत वनाओ—(क) १. वालक की मति अच्छी है । २. बुद्धि से कार्यो को करो। ३. वालक की चाल देखो। ४. दुःख में धैर्य रखो (धारय )। ५. रघुवंश कालिदास की कृति है । ६. इस नगर में राजा की भूति, समृद्धि और शक्ति देखो। ७. श्रुति और स्मृति को शान्ति से पढ़ो। ८. यति भक्ति से मोक्ष को पावे । ९. वालक भूमि पर बैठे । १० मधुर उक्ति ही कहो । (ख) ११. रात्रि में बन्दर वृक्ष से पृथ्वी पर गिरा। १२. मुनि से श्रुति और स्मृति पढ़ो। १३. शिष्य सिंह से डरता है । १४. राम कृष्ण से अधिक चतुर है । (ग) (विधिलिङ्) १५. शिष्य गुरु की सेवा करे, ज्ञान पावे, वढ़े और प्रसन्न हो । १६. तू ईश्वर ने त्रुद्धि मांग, दुःखों को सह और भक्ति से मुक्ति को पा। १७. मैं गुरु की वन्दना करूं, विद्या सीखू, यत्न करूं, सत्य बोलूं और धर्म में रमू । ३. अशुद्ध वाक्य नियन (१) वुद्धिना, शान्तिना, भक्तिना । बुद्ध्या, शान्त्या, भक्त्या । (२) सेवेत्, लभेत्, वर्धेत् । सेवेत, लभेत, वर्धेत । धातुप (३) वन्देयम्, शिक्षेयम्, यतेयम् । वन्देय, शिक्षेय, यतेय । ४. अभ्यासः-(क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो । (ख) इनके रूप लिखो- -मति, बुद्धि, गति, कृति, युक्ति । (ग) इनके विधिलिङ् के रूप लिखो- सेव, लभ, वृध्, मुद्, सह, याच, वृत्, ईक्ष्, भाप । (घ) दीर्घ, गुण, वृद्धि, संप्रसारण से क्या समझते हो, लिखो। ५. सन्धि करो:--महा + ईशः । रमा + ईशः । तथा + इति । न + इति । पर + उपकारः । हित + उपदेदाः । राज + ऋषिः । सप्त + ऋपिः । ब्रह्म + ऋषिः । - . शुद्ध वाक्य दाब्दम्प .
४४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ५७ + - , शब्दकोश ४२० + = ४४० ] अभ्यास २२ (व्याकरण (क) नदी (नदी), गौरी (पार्वती], मही (पृथ्वी), रजनी (रा.), . सर्ख (सखी), दासी (दासी), पुरी (नगरी), वाणी (वचन), सरस्वती (सरस्वती) बुद्धिमती (बुद्धिमान् स्त्री), ब्राह्मणी (१. ब्राह्मण स्त्री, २. ब्राह्मण की स्त्री), मृर्ग (हिरनी), सिंही (सिंहनी), सर्पिणी (साँपिन), राज्ञी (रानी), भवती ( आप स्त्रीलिंग), श्रीमती (ऐश्वर्यवाली स्त्री), कौमुदो (चाँदनी), कमलिनी (कमलिनी) इन्द्राणी (इन्द्र की स्त्री) । (२०)। व्याकरण (नदीः, लूट, वृद्धि-सन्धि, षष्ठी) सूचना--(क) नदी-इन्द्राणी, नदीवत् । १. नदी शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। ( देखो शब्द० १७) । गौरी आदि नदीवत् । २. अभ्यास १४, १५, में दिये षष्ठी के नियमों का पुनः अभ्यास करो। ३. सेव-लट (आत्मनेपद) संक्षिप्त रूप सेविष्यते सेविष्येते सेविष्यन्ते प्र० पु० इष्यते इष्यते इष्यन्ते सेविष्यसे सेविष्येथे सेविष्यध्वे म० पु० इष्यसे इष्येथे इष्यध्वे सेविष्ये सेविष्यावहे सेविष्यामहे उ० पु० इण्ये इष्यावहे इष्यामहे कुछ धातुओं में इष्यतेवाले रूप लगते हैं, कुछ में स्यते, स्येते आदि । सूचना-अभ्यास १८, १९ की इन धातुओं में, 'इष्यते' वाला रूप लगेगाः-सेविष्यते, वर्धिष्यते, मोदिष्यते सहिष्यते, याचिष्यते, वतिष्यते, ईक्षिष्यते, भाषिष्यते, कूर्दिष्यते, यतिष्यते, वन्दिष्यते, शिक्षिष्यते, कम्पिष्यते, पलायिष्यते, चेष्टिष्यते, आलम्बिष्यते, ध्वंसिष्यते । इन धातुओं में 'स्यते' वाला रूप लगेगाः-लभ-लप्स्यते, रम्-रंस्यते । *नियम ५७-(वृद्धिरेचि) (१) अ या आ के बाद ए या ऐ होगा, तो दोनों को 'ऐ' होगा । (२) अ या आ के बाद ओ या औ होगा तो दोनों को 'औ'होगा। जैसे-अत्र + एकः अकः । राज + ऐश्वर्यम्=राजैश्वर्यम् । सा + एपा= सैषा। महा + ओषधिः महौषधिः । तण्डुल + ओदनम्=तण्डुलौदनम् ।
नदो, लुट (आ०), वृद्धि-सन्धि, षष्ठी ४५ - अभ्यास २२ १. उदाहरण-वाक्यः-१. रमा गौरीं वन्दिप्यते । २. ब्राह्मणी नद्यां स्नानं करिष्यति । ३. सरस्वती वाणी भापिण्यते । ४. राज्ञी सखीभिः सह पुर्या भ्रमति । ५. बुद्धिमती दासीं पृच्छति । ६. सिंही मृगीम् इच्छति । ७. इन्द्राणी श्रीमतों भवतों किं पृच्छति ? ८. राज्ञी नृपं सेविष्यते, वन्दिष्यते, भापिण्यते, ईक्षिप्यते च । ९ श्रीमती धनं लप्स्यते रंस्यते च । - २. संस्कृत बनाओ:-(क) १. नदी को देखो। २. नदी में स्नान करो । ३. नदी का जल मीठा है । ४. जल के लिए नदी पर जाओ। ५. रानी पार्वती को प्रणाम करेगी। ६. पृथ्वी पर ब्राह्मणी वैठी है । ७. आप क्या पढ़ती है ? ८. इन्द्राणी इन्द्र के साथ घूमेगी। ९. रात्रि में रानी दासियों और सखियों के साथ घूमती १०. बुद्धिमती वचन कहेगी। ११. ब्राह्मणी सरस्वती की वन्दना करेगी। १२. मृगी सिंहनो से डरती. है । १३. चांदनी में नगर में आदमी घूमते हैं । (ख) १४. पुत्र माता को स्मरण करता है । १५. कमलिनी के फूल को देखो। १६. पुस्तकों में वेद श्रेष्ठ है । १७. धर्मों में वैदिक धर्म श्रेष्ठ है। १८. सांपिन की गति देखो। (ग) १९. कृष्ण गुरु को सेवा करेगा, दुःख सहेगा, सत्य वोलेगा और प्रसन्न रहेगा। २०. तु यत्न करेगा, विद्या सीखेगा, धर्म का सहारा लेगा और बढ़ेगा । २१. मैं सत्य बोलूंगा, धन पाऊँगा, यत्न करूंगा, धर्म में रमूंगा और प्रसन्न रहूँगा। ३. अशुद्ध वाक्य नियम : (१) मृगी सिंही विभेति । मृगी सिंह्याः विभेति । २९ : (१) लभिष्ये, रमिप्ये । लप्स्ये, रंस्थे। धातुरूप "४. अभ्यासः-(क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो । (ख) इनके रूप लिखो- नदो, गौरी, बुद्धिमती, भवती, श्रीमती । (ग) इनके लट् के रूप लिखो-शेव, ल, वृ, मुद्, सह, याच, वृत्, भाष, लभ, रम् । ५. वाक्य बनाओ:--सेविष्यते, शिक्षिष्ये, सहिष्ये, लप्स्यते, रंस्थे । ६. सन्धि करो:--अत्र+ एषः । न + एतत् । पश्य + एतम् । सा + एपा । देव + मोदार्यम् । राज + ऐश्वर्यम् । जल + ओघः । वन + ओषधिः । -- शुद्ध वाक्य - - - ४६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ५८-६० शब्दकोश ४४० + २० = ४६०] अभ्यास २३ (व्याकरण (क) धेनुः (गाय), रेणुः (धूल), रज्जुः (रस्सी) । सुलेखः (सुलेख) परिणामः (परिणाम), अङ्कः (अंक ), अवकाशः (छुट्टी), कक्षा (श्रेणी) परीक्षा (परीक्षा), सचिका (कापी), लेखनी (कलम), मसी (स्याही)। मसी पात्रम् (दावात), मित्रम् (मित्र), उत्तरम् (उत्तर), क्रीडाक्षेत्रम् (क्रीडाक्षेत्र) (१६)। (घ) उत्तीर्णः (उत्तीर्ण), अनुत्तीर्णः (फेल), उपस्थितः (उपस्थित) अनुपस्थितः (अनुपस्थित) । (४) । सूचना-(क) धेनु-रज्जु, धेनुवत् । व्याकरण (धेनु, क्त प्रत्यय, दीर्घ-सन्धि) १. धेनु शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० १९)। रेणु, रज्जु, धेनुवत् । १. अभ्यास १६, १७ में दिये सप्तमी के नियमों का पुनः अभ्यास करो । नियम ५८-(अकः सवर्णे दीर्घः) अ इ उ ऋ के बाद सवर्ण (समान) अक्षर हो तो दोनों के स्थान पर उसी वर्ण का दीर्घ अक्षर हो जाता हैं । अर्थात (१) अ या आ + अ या आ = आ । (२) इ या ई + इ या ई = ई । (३) उ या ऊ+ उ या ऊ = ऊ । (४) ऋ+ ऋ = ऋ । जैसे-हिम + आलयः = हिमालयः । विद्या + आलयः = विद्यालयः । श्री + ईशः = श्रीशः । गुरु + उपदेशः = गुरूपदेशः । होतृ + ऋकारः = होतृकारः। शनियम ५९-भूतकाल अर्थ में धातु से क्त (त) प्रत्यय होता है । क्त का त शेष रहता है । जिन धातुओं के साथ अन्य स्थानों पर बीच में इ लगता है, उनमें 'इत' जुड़ेगा, अन्य धातुओं में केवल 'त' जुड़ेगा। जैसे-पठ-पठितः (पढ़ा), लिख-लिखितः (लिखा), कृ--कृतः (किया), गम्-~~गतः (गया)। नियम ६०-'त' प्रत्यय लगाकर अनुवाद बनाने के लिए ये नियम स्मरण कर लें:- (१) जब सकर्मक धातु से 'त' प्रत्यय होगा तो कर्म में प्रथमा, कर्ता में तृतीया क्रिया का लिंग-वचन और विभक्ति कर्म के अनुसार होगी, कर्ता के अनुसार नहीं। (२) अकर्मक धातु से 'त' प्रत्यय होने पर कर्ता में तृतीया, क्रिया में नपुंसक- लिंग एकवचन । (३) 'त' प्रत्ययान्त शब्द कर्म के अनुसार पुंलिंग होगा तो उसके,रूप रामवत्, स्त्रीलिंग होगा तो रमावत्, नपुंसकलिंग होगा तो गृहवत् । जैसे--उसने काम किया--तेन कार्य कृतम् । तेन पुस्तकं पठितम् । तेन लेखः लिखितः । तेन हसितम् । तेन भोजनं खादितम् । तेन वालकः रक्षितः। , धेनु, क्त प्रत्यय, दीर्घ-सन्धि, सप्तमी, विद्यालय ४७ १. उदाहरण-वाक्य-१. धेनुः गच्छति । २. धेनुं पश्य । ३. धेनवे अन्नं देहि । ४. तस्यां कक्षायां दश छात्राः सन्ति । ५. तेषां समीपे पुस्तकानि संचिकाः # लेखन्यः मसीपात्राणि च सन्ति । ६. परीक्षायां पट् छात्राः उत्तीर्णाः, अन्ये * अनुत्तीर्णाः च सन्ति । ७. मया भोजनं भक्षितम् । ८. तेन पुस्तकानि पठितानि । * ९. मया पत्रं लिखितम्, पत्रे लिखिते, पत्राणि च लिखितानि । १०. त्वया कार्य - कृतम्, कार्याणि च कृतानि । २. संस्कृत बनाओ:-( क ) १. गाय आयी । २. गाय को लाओ । ३. गाय का दूध पोओ। ४. गाय को अन्न और जल दो । ५. धूल उठ रही है (उत्तिष्ठति) । ६. धूल पर न वैठो। ७. रस्सी लाओ। (ख) ८. यह विद्यालय है । ९. यहाँ पर : छात्र पढ़ते हैं । १०. कक्षा में ९ छात्र उपस्थित हैं और १ अनुपस्थित है । ११. परीक्षा में सात छात्र उत्तीर्ण हैं और अन्य अनुत्तीर्ण । १२. कापी पर कलम से सुलेख लिखो । १३. परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करो। १४. आज विद्यालय में छुट्टी है, अतः क्रीडाक्षेत्र में खेलो । १५. इन छात्रों के पास पुस्तकें, कलम, स्याही और दावात हैं । १६. सत्य के बोलने में तत्पर होओ। १७. धर्मग्रन्थों में वेद । श्रेष्ठ हैं । (ग) १८. बालक ने पुस्तक पढ़ीं। १९. मैंने पुस्तकें पढ़ीं । २०. तूने काम किया । २१. मैंने लेख लिखा। २२. हमने लेख लिखे । २३. मैंने भोजन खाया । २४. सेनापति ने वालक की रक्षा की। २५. मैं हंसा । २६. तूने फल खाये । २७: मैंने ग्रंथ पढ़े। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) अहं पुस्तकानि पठितम । मया पुस्तकानि पठितानि । ६० २) सेनापतिः बालकस्य रक्षितम् । सेनापतिना वालकः रक्षितः । ६० (३) त्वं फलानि खादितम् । त्वया फलानि खादितानि । ४. अभ्यासः-( क ) धेनु शब्द के पूरे रूप लिखो। (ख) इन धातुओं के कि प्रत्यय लगाकर रूप बनाओ:-पल्, लिख, गम्, कृ, रक्ष्, हम् । ५. वाक्य बनाओ:-कृतम्, रक्षितः, पटितानि, लिखितः, धेनोः, मित्रस्य । ६. सन्धि करो:-विद्या + आलयः । शिष्ट + आचारः । महा + यात्मा । श्री+ ईशः । गिरि + ईशः । पठति + इदम् । गुरु + उपदेशः । भानु + उदयः । शुद्ध वाक्य ३ ६० - -- ४८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ६१-६२ - - - शब्दकोश ४६० + २०-४८०] अभ्यास २४ (व्याकरण) (क) वारि (जल)। हस्तः (हाथ), दन्तः (दाँत), ओष्ठः (ओष्ठ), अधरः (नीचे का ओष्ठ), स्कन्धः (कन्धा), कण्ठः (गला), केशः (वाल), नखः (नाखून), पादः (पैर)। नासिका (नाक), ग्रीवा (गर्दन), जिह्वा (जीभ), जंघा (जाँघ)। मुखम् (मुंह), उरःस्थलम् (छाती), हृदयम् (हृदय), उदरम् (पेट), शरीरम् (शरीर)। (१९) । (घ) शुचि (स्वच्छ, पवित्र ) । (१)। सूचना--(क) हस्तपाद, रामवत् । नासिका-जंघा, रमावत् । व्याकरण (वारि, क्त, दा धातु, पूर्वरूप-सन्धि) १. वारि शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। ( देखो शब्द० २७ ) । शुचि, वारिवत् । २. दा धातु के लट्, लोट्, लङ् के रूप स्मरण करो। (देखो धातु० २४) । सनियम ६१-(एडः पदान्तादति)-पद ( शब्दरूप या धातुरूप के अन्तिम ए या ओ के बाद अ हो तो वह हट जाता है । (अ हटा है, इस बात को बताने के लिए ऽ अवग्रह-चिह्न लगा दिया जाता है)। जैसे-लोके + अस्मिन्- लोकेऽस्मिन् । हरे+ अव हरेऽव । को+ अपि-कोऽपि । विष्णो + अव- विष्णोऽव । को+ अयम्-कोऽयम् । नियम ६२-जाना, चलना अर्थ की धातुओं और अकर्मक धातुओं से 'त' प्रत्यय होने पर कर्ता में प्रथमा और कर्म में द्वितीया होती है । जैसे---स गृहं गतः । स विद्यालयं प्रासः । स आगतः । स सुप्तः । स मृतः । सूचना-'त' प्रत्यय से बने कुछ प्रसिद्ध रूप ये हैं-(देखो प्रत्यय-विचार) अस् (२प.) भूतः । चुर् धृतः । भू भूतः आप् आप्तः । छिद् नतः । लिख लिखितः ईक्ष् ईक्षितः । जन् जातः । नश् कथ् कथितः ज्ञातः । पठ् पठितः । वस् उपितः कृतः । त्य त्यक्तः पा (१५.) पीतः । वह क्रीड क्रीडितः प्रच्छ पृष्टः । श्रु खाद् दृष्टः । बू गम् हितः । भक्ष् भक्षितः ह चोरितः । धृ छिन्नः नम् नष्टः वद् उदितः ज्ञा दा दत्तः खादितः । दृश् ऊठः ध्रुतः स्था स्थितः हृतः गतः धा वारि, त प्रत्यय, दा धातु, पूर्वरूप-सन्धि, शरीरवर्ग ४९ अभ्यास २४ १. उदाहरण-वाक्यः-१. शुचि वारि पिब । २. शुचिना वारिणा स्नानं रु। ३. शुचिने वारिणे नदी गच्छ । ४. रामः गृहं गतः । ५. कृष्णः गृहम् गतः । ६. स नदी प्राप्तः । ७. रामेण रावणस्य मूर्धा छिन्नः । ८. रामेण राह्मणाय धनं दत्तम्, जलं पीतम्, भारः नीतः, वचनम् उक्तम्, कार्य कृतम्, लं हृतम्, पुस्तकं घृतम्, भोजनं खादितम्, प्रश्नः पृष्ट', गृहं त्यक्तम्, रावणः हतः, त्रुः बद्धः, कार्यम् आरब्धम्, सीता दृष्टा, वने उषितः च । ९. देवः पुत्राय धनं दाति, ददातु, अददात् वा । १०. त्वं शिष्याय धनं ददासि, देहि, अददाः वा । २. संस्कृत वनाओ:-(क) १. राम स्वच्छ जल पीता है । २. तू स्वच्छ ल ला । ३. स्वच्छ जल के लिए तू नदी पर जा। ४. तू हाथ, पैर, मुंह, आँख, साक, कान, वाल और गले को स्वच्छ कर । ५. उस कन्या के दांत, ओष्ठ, खून, गर्दन, जंघा और मुंह सुन्दर हैं । ६. हृदय को सदा पवित्र रखो (स्था (य)। ख) ७. शिष्य विद्यालय गया। ८. बालक आया। २. बच्चा सोया । १०. रावण रा (मृतः)। ११. मैंने धर्म जाना, दान दिया, दूध पिया, वचन कहा, कार्य केया और धर्म धारण किया । १२. तूने स्नान किया, भोजन खाया, प्रश्न पूछा, कार्य मारम्भ किया और शिष्य की रक्षा की। (ग) १३. वह दान देता है । तू धन देता है । १५. मैं बालक को फल देता हूँ। १६. पिता वालक को ल दे । १७. तू मुझे पुस्तक दे । १८. मैं तुझे धन हूँ। १९. उसने धन दिया। १०. तूने ब्राह्मण को भोजन दिया । २१. मैंने निर्धन को धन दिया । ३. अशुद्ध वाक्य नियम दानं दत्तः । मया धर्मः जातः, दानं दत्तम् । ६० २) त्वं स्नानं कृतः, भोजनं खादितः । त्वया स्नानं कृतम्, खादितम् । ६० ४. अभ्यासः-(क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो। (ख) वारि शब्द के रे रूप लिखो। (ग) इन धातुओं में क्त प्रत्यय लगाकर रूप बनाओ-कृ, ह, , म, दा, पा, स्था, दू, प्रच्छ, त्यज्, भिद्, हन्, स्वप्, गम्, दृश्, वह । घ) दा धातु के लट्, लोट् और लङ् के रूप लिखो। ५. सन्धि करोः-हरे + अव । गृहे + अस्मिन् । के + अत्र । धर्म + अयम् । वेष्णो + अव । को + अयम् । को + अब । को+ अपि । सो + अपि । १४. शुद्ध वाक्य १) अहं धर्म ज्ञातः, ५० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ६३-६ - ( द् . । शब्दकोश ४८० + २० = ५०० ] अभ्यास २५ (व्याकर (क) मधु (शहद), दारु (लकड़ी), जानु (घुटना), अम्बु (जल), वस्तु (वस वसु (धन), अश्रु (आँसू)। (७)। (ख) प्र + आप (पाना), स्वप् (सोना), (जानना), स्ना (नहाना), ब्रू (बोलना), धृ (धारण करना), मृ (मरना), (छोड़ना), भिद् (तोड़ना), छिद् (काटना), हन् (मारना), आरभ् (आर करना), वह, (१. ढोना, २. बहना) । (१३) सूचना-(क) मधु-अश्रु, मधुवत् । (ख) धृत्यज्, वह, भवतिवर व्याकरण ( मधु, क्तवतु, पा धातु, श्चुत्व-सन्धि ) १. मधु शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० २९) । दारु आदि रूप मधु के तुल्य चलाओ। १. दा धातु के विधिलिङ् और लूट के रूप स्मरण करो। (देखो धातु० २' नियम ६३-(स्तोः ३चुना श्चुः) स् या तवर्ग से पहले या बाद में श् या चव कोई भी हो तो स् को श् और तवर्ग को चवर्ग (त् को च्, द को ज्, न् । न) हो जाता है । जैसे-रामस् + च = रामश्च । कस् + चित् = कश्चित् हरिस् + च = हरिश्च । ( २ ) तत् + च = तच्च । सत् + चित् = सच्चित् उत् + चारणम् = उच्चारणम् । (३) सद् + जनः = सज्जनः । उद् + ज्वल उज्ज्वलः । (४) याच् + ना = यात्रा। नियम ६४-भूतकाल अर्थ में धातु से वतवतु (तवत्) प्रत्यय होता है । क्तवतु व तवत् शेष रहता है । तवत् प्रत्यय लगाकर रूप बनाने का सरल उपाय यह कि क्त (त) प्रत्यय लगाकर जो रूप बनता है, उसमें बाद में 'वत्' और जोर दो । जैसे—कृ-कृतः, तवत् में कृतवेत् । पठ्-पठितम्, तवत् में पठितवत् । छनियम ६५-तवत्-प्रत्ययान्तरूप के साथ अनुवाद के लिए यह नियम स्मरण कर लें:- कर्ता के तुल्य ही तवत्-प्रत्ययान्त के लिंग, विभक्ति और वचन होंगे। कत में प्रथमा होगी, कर्म में द्वितीया, क्रिया कर्ता के तुल्य । तवत्-प्रत्ययान्त के रूप पुंलिंग में भगवत् (शब्द० ८) के तुल्य, स्त्रीलिंग में 'ई' लगाकर नदी (शब्द० १७) के तुल्य और नपुंसक लिंग में जगत् ( शब्द० ३३ ) के तुल्य चलेंगे। जैसे-उसने पुस्तक पढ़ी-स - पुस्तकं पठितवान् । तौ. पुस्तकं पठितवन्तौ । स पुस्तकानि पठितवन्तः । रमा पुस्तकं पठितवती ।
मधु शब्द, नवतु प्रत्यय, दा धातु, श्चुत्व-सन्धि ५१: । अभ्यास २५ १. उदाहरण वाक्य-~-१. स मधु खादितवान् । २. मधु आनय । ३. मधुने श्यस्य गृहं गच्छ । ४. मधुनः भक्षणं कुरु । ५. शुचि अम्बु पिव । ६. एतन् वस्तु, भवानय । ७. स त्वम् अहं वा गृहं गतवान् । ८. तो युवाम् आवां वा गृहं गत- वन्तौ । ९. ते यूयं वयं वा गृहं गतवन्तः । १०. स भाषणं दत्तवान् । ११. सा वचनम् उक्तवती । १२. ते गृहं त्यक्तवन्तः । १३. स दारु छिन्नवान् । १४. रामः ब्राह्मणाय धनं दद्यात्, , त्वं दद्याः, अहं च दद्याम् । १५. स धनं दास्यति, त्वं च दास्यसि । २. संस्कृत बनाओ:-( क )१. शहद लाओ । २. शहद खाओ। ३. शहद के लिए वर्तन लाओ। ४. शहद का सेवन करो। ५. अच्छी लकड़ी लाओ । ६. अपने घुटने को स्वच्छ करो । ७. स्वच्छ जल पीयो । ८. जल के लिए नदी पर जाओ । ९. मेरी वस्तु यहाँ लाओ। १०. इस वस्तु को ले जाओ। ११. बालक के आँसू भूमि पर गिर रहे हैं । (ख) ( तवत् प्रत्यय ) १२. उसने पुस्तक पढ़ी । १३. उसने लेख लिखा । १४. तू घर गया । १५. मैं यहाँ आया । १६. उसने धन पाया । १७. वह भूमि पर सोया। १८. उसने धर्म जाना । १९. मैं नहाया । २०. लड़की वचन बोली । (ग) २१. उन्होंने वालक पकड़ा (धृ) । २२. वे मरे । २३. तुम सबने घर छोड़ा । २४. तुमने घड़ा (घट:) तोड़ा । २५. हमने लकड़ियाँ काटों । २६. हमने शेर मारा । २७. हमने काम आरम्भ किया । २८. हमने भार दोया । (घ) २९. वह धन दे । ३०. तू फल दे। ३१. मैं निर्धन को धन हूँ । ३२. वह विद्या देगा । ३३. तू रमा को फूल देगा । ३४. मैं साधु को भोजन दूंगा। ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) तेन लेखः लिखितवन्तः । स लेखं लिखितवान् । (२) तैः बालकः धृतवान् । ते बालकं धृतवन्तः । ६५ ४. अभ्यासः-( क ) २ (ख) को बहुवचन में बदलो । (ख) २ (ग) को एक- वचन में बदलो । (ग) २ (घ) को वहुवचन में बदलो । (घ) मधु, अम्बु, वस्तु,. अव के पूरे रूप लिखो। (ङ) दा धातु के विधिलिङ और ल्ट् के रूप लिखो। ५. सन्धि करो:-कृष्णः + च । गुरुः + च । कम् + चन । सत् + चरित्रः । सत् + चित् । सत् + जनः । तत् + जलम् । याच् + ना । । ।
५२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ६६-६ - , 'शब्दकोश ५००+२०५२० 1 अभ्यास २९ ( ०५ (क) पयस् (१. जल, २. दूध), यशस् (यश), शिरस् (शिर), सरस् (ताला ‘मनस् (मन), तमस् (अन्धकार)। कोकिल: (कोयल), मयूरः (मोर), (हंस), शुकः (तोता), कपोत (कबूतर), काकः (कौआ), बकः (बगुला), उलू (उल्लू) । (१४) । (ख) श्रु (सुनना), शक (सकना) [आप् (पाना)] । (२) ।। स्वकीयः (अपना), परकीयः (दूसरे का), त्वदीयः ( तेरा ), मदीयः (मेरा) । (४) सूचना-(क) पयस्--तमस् के तुल्य । (ख) श्रु-आप, श्रु के तुल्य । व्याकरण ( पयस्, शतृ प्रत्यय, श्रु धातु, जश्त्व-सन्धि ) १. पयस् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो । ( देखो शब्द० ३०) । यशस् । के रूप पयस् के तुल्य चलाओ । २. श्रु धातु के लट्, लोट और लङ् के रूप स्मरण करो। ( देखो धार २९) । शक् और धातु के रूप श्रु के तुल्य चलाओ । नियम६६- (झलां जश झशि) वर्ग के १, २, ३, ४ ( पहला, दूसरा, तीस चौथा वर्ण) को ३ (अपने वर्ग का तीसरा अक्षर) हो जाता है, बाद में । के ३ या ४ (तीसरा या चौथा वर्ण) हों तो। जैसे-वुध् + धि:-बुद्धि सिध्ः + धिः-सिद्धिः । दुध् + धम्-दुग्धम् । लभ + ध:--लब्धः । युध धः युद्धः। नियम६७-'रहा है', 'रहा था' आदि 'रहा' वाले प्रयोगों का अनुवाद संस्कृत शतृ (अत) प्रत्यय लगाकर होता है । परस्मैपदी धातु में लट् के स्थान पर ३ होता है । शतृ का अत् शेप बचता है । शतृ प्रत्यय लगाकर रूप बनाने सरल उपाय यह है कि धातु के लट् के प्रथम पुरुप बहुवचन के रूप में अन्तिम इ और बीच के न को हटा दें। इस प्रकार शतृवाला रूप बच चले है । शतृ प्रत्ययान्त के रूप पुंलिंग में गच्छत् ( शब्द० ९) के तुल्य स्त्रीलिंग में ई लगाकर नदोवत्, पुंसक० में जगत् (शब्द० ३३) के तुल्य शतृ के रूप -पट-पठन्ति-पठत् । लिख-लिखन्ति-लिखत् । इसी प्रक कृ- कुर्वत् । गम्----गच्छत् । हस्-हसत् । पच-पचत् । दृश-पश्यतु स्था-तिष्टत् । पा-पिवत् । घा-जिघ्रत् आदि । शतृ-प्रत्ययान्त के बाद अर्थ के अनुसार अस् पातु के लट् या लङ् का प्रयोग करो। जैसे-वह रहा है-स पठन् अस्ति । - ।
पयस, शतृ प्रत्यय, श्रु धातु, जश्त्व-सन्धि, पक्षिवर्ग - अभ्यास २६ १. उदाहरण-वाक्यः-१. वह पढ़ रहा है-सः पठन् अस्ति । २. वे दो पढ हैं-तौ पठन्ती स्तः । ३. ते पठन्तः सन्ति । ४. त्वं पठन् असि। ५. यूयं पठन्तः । ६. अहं पठन् अस्मि । ७. वयं पठन्तः स्मः । ८. सा पठन्ती अस्ति । ९. रा { आसीत् । १०. स पठन् भविष्यति । ११. पठन्तं शिष्यं पश्य । १२. पठते याय दुग्धं देहि । १३. स हसन्, भोजनं पचन्, वालिकां पश्यन्, पुष्पं जिनन्, च पिवन् अस्ति । १४. पयः पिब । १५. यशांसि इच्छ। १६. स वचनं ति, शृणोतु, अशृणोत् वा । १७. स धनम् आप्नोति, आप्नोतु, वा । २. संस्कृत बनाओ:-(क) १. वह लिख रहा है । २. वे दो लिख रहे हैं । वे सब लिख रहे हैं। ४. तू काम कर रहा है । ५. तुम दोनों जा रहे हो । तुम सब हंस रहे हो । ७. मैं फलों को देख रहा हूँ। ८. हम दोनों जल पी रहे हैं। हम सब फूल सूघ रहे हैं । १०. वह पढ़ रहा था । ११. तू भोजन कर रहा । १२. मैं काम कर रहा था। १३. रमा पढ़ रही थी। १४. बालक लिख [ होगा। १५. इधर आते हुए कोयले, हंस, मोर और तोते को देखो। हुए कबूतरों, कौओं, बगुलों और उल्लुओं को देखो। १७. काम ते हुए बालक को लड्डू दो। १८. काम करते हुए मनुष्य का यश होता है । ) १९. जल पीओ। २०. यश के लिए यत्न करो। २१. अपना शिर छुओ। .. तालाब में बगुले हैं । २३. अपना मन पवित्र करो । २४. अन्धकार में मत गे। (ग) २५. वह मेरा भाषण सुनता है । २६. तू दूसरे का वचन सुनता है । 9. मैं तेरा वचन सुनता हूँ। २८. वह सुने । २९. तू सुन । ३०. मैं सुनूं । १. उसने सुना । ३२. तूने सुना । ३३. मैंने सुना । ३. अशुद्ध वाक्य शुद्ध वाक्य नियम (१) वयं पुष्पं जिघ्रन् सन्ति । वयं पुष्पाणि जिघ्रन्तः स्मः । (२) कार्य कुर्वन् नरं यशं भवति । कार्य कुर्वतः नरस्य यशः भवति । ६७,२० ४. अभ्यास :-(क) २(ग) को बहुवचन में वदलो । (ख) इनके रूप लिखो : रस, यशस्, मनस् । (ग) ध्रु के लट्, लोट् और लङ् के पूरे रूप लिखो। ५. सन्धि करो:-ऋध् + धिः । शुध् + धिः । बुध् + धिः । वृध् + धिः । ~ वहाँ बैठे “५४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ६८-६ - शब्दकोश ५२० + २०-५४०] अभ्यास २७ (व्याकर (क) नामन् (नाम),प्रेमन् (प्रेम), व्योमन् (आकाश)। स्वर्णकारः (सुनार ' लौहकारः (लोहार), चर्मकारः (चमार), कुम्भकारः (कुम्हार), रजकः (धोबी 'नापितः (नाई), व्याधः (वहेलिया), क्षुरः (उस्तरा) । ऋतुः (ऋतु) । (१२) (ख) प्र+क्षल, प्रक्षालि.(धोना), प्रेर्, प्रेरि (प्रेरणा देना), तड, ताडि (पीटना धारि (१. रखना. २. पहनना), स्थापि (रखना), कृत् (काटना) । (६) (ग) ह्यः (बीता हुआ कल), श्वः (आगामी कल) । (२) । सूचना--(क) नामन्-व्योमन्, नामन् के तुल्य । (ख) प्रक्षल-4li 'चुर् के तुल्य । व्याकरण (नामन्, शानच् प्रत्यय, श्रु धातु, चव-सन्धि) १. नामन् शब्द के पूरे रूप स्मरण करो। (देखो शब्द० ३१) । प्रेमन् ओ व्योमन् के रूप नागन् के तुल्य चलाओ । २. प्रक्षल आदि के ये रूप बनाकर भवति के तुल्य रूप चलाओ-प्रक्षालयति प्रेरयति, ताडयति, धारयति, स्थापयति, कृन्तति । ३. ह्यः और श्वः के अन्तर के लिए यह स्मरण कर लो-'ह्यो गतेऽनाग तेऽह्नि श्वः' । बीते हुए दिन के लिए ह्यः, आगामी के लिए श्वः । ४. श्रु धातु के विधिलिङ् और लृट् के रूप स्मरण करो। (देखो धातु० २९) शक् और आप के रूप श्रु के तुल्य चलाओ । ५. ६ ऋतुएँ और १२ मास ये हैं-सन्तः, ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, हेमन्तः 'शिशिरः । चैत्रः, वैशाखः, ज्येष्ठः, आपाढः, श्रावणः, भाद्रपदः, आश्विनः, कार्तिकः मार्गशीर्षः, पौषः, माघः, फाल्गुनः । नियम ६८-(खरि च) वर्ग के १, २, ३ ४ को १ (उसी वर्ग का पहला अक्षर) हो आता है, बाद में वर्ग के १, २, श ष स कोई हो तो। जैसे-~~-सद् + कारः सत्कारः। तद् + परः तत्परः । उद् + साहः-उत्साहः । सद्+ पुत्रः सत्पुत्रः। नियम ६९--आत्मनेपदी धातुओं के लट् के स्थान पर शानच (आन) हो जाता है, 'रहा' अर्थवाले प्रयोगों में । शानच् का आन शेष रहता है। कहीं पर 'मान' रहता है । शानच् प्रत्ययान्त के रूप पुंलिंग में रामवत्, स्त्रोलिंग में रमावत्, नपुंसक० में गृहवत् । शतृ के तुल्य शानच में भी अर्थ के अनुसार अस् धातु का प्रयोग करो । शानच् के बने रूपः-वर्तते--वर्तमानः । यजते--यजमानः । वर्धते--वर्धमानः । मोदते-मोदमानः । सहते-सह मानः । याचते-याचमानः । । - नामन्, शानच प्रत्यय, श्रु धातु, चर्व-सन्धि, जातिवर्ग ५५ अभ्यास २७ १. उदाहरण-वाक्यः-१. वह मांग रहा हैस याचमानः अस्ति । २. स .नोदमानः आसोत् । ३. अहं वर्तमानः आसम् । ४. मयि वर्तमाने (मेरे रहते हुए) 1 hः एतत् कर्म कुर्यात् । ५. तव किं नाम अस्ति । ६. मम नाम देवदत्तः अस्ति। ७. सर्वेषु प्रेम कुरु । ८. व्योम्नि पक्षिणः सन्ति । ९. रजकः वस्त्राणि प्रक्षालयति । 11१०. नापितः क्षुरेण केशान् कृन्तति । ११. वर्षे षड् ऋतवः, द्वादश मासाः च भवन्ति । १२. स मधुरं वचन शृणुयात्, त्वं शृणुयाः, अहं च शृणुयाम् । १३. स -भापणं श्रोष्यति । २. संस्कृत बनाओ:--(क) १. वह प्रसन्न हो रहा है । २. वह मांग रहा था। ३. तू विद्यमान था । ४. तू वढ़ रहा है । ५. तेरे रहते हुए कौन दुष्ट यह काम कर सकता है ? ६. आपका क्या नाम है ? ७. मेरा नाम दयानन्द है । ८. इसका क्या नाम है ? ९. शिष्यों से, पुत्रों से और मित्रों से प्रेम करो । १०. सबसे प्रेम करो। ११. आकाश स्वच्छ है । १२. आकाश में हंस हैं। १३. वह कल आपा था और आज गया । १४. तुम आज जाओ और कल आना । १५. वर्ष में ६ ऋतुएँ और १२ मास होते हैं । १६. इस नगर में सुनार, लोहार, कुम्हार, धोबी, 'नाई, चमार और बहेलिये सभी रहते हैं। १७. नाई उस्तरे से बाल बनाता (काटता) । १८. धोबी वस्त्रों को धोवे । १९, कुम्हार घड़ा बनाता है (रच्) । ३२०. लोहार लोहे को (लोहम्) पीटता है । २१. कुम्हार घड़े को पृथ्वी पर रखता है (स्थापि) । २२. वालक कपड़ा पहनता है (धारि)। २३. गुरु शिष्य को प्रेरणा देता है । (ख) २४. वह भाषण सुने । २५. तू सुन । २६. मैं सुनूं । २७. वह सुनेगा । २८. नू सुनेगा। २९. मै सुनूंगा। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) नामः, प्रेमम्, व्योमे। नाम, प्रेम, व्योम्नि । : (२) कुम्भकारः घटः पृथ्वी स्थापयति । कुम्भकारः घटं पृथ्व्यां० । ११, ४६ ४. अभ्यास:--(क) २ (ख) को बहुवचन में बदलो । (ख) इनके पूरे रूप लिखो-नामन्, प्रेमन, व्योमन् । (ग) श्रु, आप् और शक् के पांचों लकारों के रूप लिखो। (घ) इसके शानच् के रूप लिखो-याच्, मुद्, वृत्, वृध्, यज । ५. सन्धि करो:--सद् + कर्म । सद् + पात्रम् । उद् + कृष्टः । उद् + साहः । 7 शुद्ध वाक्य शब्दरूप -~- . --- (व्याकर प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ७०-७ शब्दकोश ५४० + २० - ५६०] अभ्यास २८ (क) अग्रजः (बड़ा भाई), अनुजः (छोटा भाई), पितृव्यः (चाचा), मातुः (मामा), पितामहः (दादा), मातामहः (नाना), पौत्रः (पोता), श्वन (श्वसुर)। श्वश्रूः (सास), भगिनी (वहन)। (१०)। (ख) की (खरीदना ग्रह (ग्रहण करना), [ज्ञा (जानना)], शुभ् (शोभित होना)। (३) । (घ) के (कितने), श्वेतः (सफेद), हरितः (हरा), रक्तः (लाल), कृष्णः (काला), पी (पीला), नीलः (नीला) । (७)। सूचना--(क) अग्रज-श्वशुर, रामवत् । (ख) क्री-ज्ञा, क्री के तुल्य । व्याकरण (एक, द्वि; तुमुन्, क्रो धातु, विसर्ग-सन्धि) १. एक और द्वि शब्द के तीनों लिंगों के रूप स्मरण करो। (देखो शन ४२-४३)। २. क्री और ज्ञा ध तु के लट्, लोट् और लङ् के रूप स्मरण करो। (देर धातु० ३७-३९) । क्री के तुल्य हो ज्ञा और ग्रह धातु के रूप चलाओ । ३. 'कति' के रूप बहुवचन में ही चलते हैं। प्रथमा आदि के रूप क्रमः ये हैं:-कति, कति, कतिभिः, कतिभ्यः, कतिभ्यः, कतीनाम्, कतिपु । ४. अग्रज आदि के स्त्रीलिंग बोधक शब्द ये हैं-अग्रजा (वड़ी बहन), अनुर (छोटी बहन), पितृव्या (चाची), मातुलानी (मामी), पितामही (दादी मातामही (नानी), पौत्री (पोती)। ५. १ से १० तक क्रमवाची संख्या-शब्द ये हैं:-प्रथमः (पहला), द्वितीय (दूसरा), तृतीयः, चतुर्थः, पञ्चमः, षष्ठः, सप्तमः, अष्टमः, नवमः, दशमः । नियम ७०.-(विसर्जनीयस्य सः) विसर्ग के बाद वर्ग के १, २ या श् प् स् । तो विसर्ग को स् हो जाता है। श् या चवर्ग वाद में हो तो स् को श है जायेगा । जैसे- रामः + तिष्ठति = रामस्तिष्ठति । कः + चित् = कश्चित् रामः+चरामश्च । नियम ७१ ---को, के लिए, अर्थ को प्रकट करने के लिए धातु से तुमुन् प्रत्या होता है । तुमुन् का तुम् शेष रहता है। यह अव्यय होता है, अतः इसके रूप नहीं चलते हैं । धातु को गुण होता है । जैसे--कृ-कर्तुम् (करने को) पठितुम् (पढ़ने को), लेखितुम् (लिखने को), स्नातुम् (नहाने को) । इन धातुओं के ये रूप होते हैं-है-हर्तुम् । धृ-धर्तुम् । रुद्रोदितुम् गम्-नान्तुम् । हन् हन्तुम । पच्-~-पक्तुम् । खाद्-खादितुम् । छिद्- छेत्तुम् । दा-दातुम् । पा-पातुम् । नी-नेतुम् । दृश्द्रप्टुम् । वह वोढुम् । सह, --सोढुम् । प्रच्छ्-प्रप्टम् । - -2 N एक, हि शब्द, तुमुन् प्रत्यय, की धातु, दिसर्ग-सन्धि, सम्बन्धिवर्ग ५७ अभ्यास २८ : १. उदाहरण-वाक्य-१. मैं पढ़ना चाहता हूँ-अहं पठितुम् इच्छामि । {. अहं कार्य कर्तुं शक्नोमि । ३. सः पुस्तकं पठितुम्, गृहं गन्तुम्, भोजनं खादितुम्, नं दातुम्, भारं नेतुम्, शिष्यं द्रष्टुम्,प्रश्न प्रष्टुम्, दुःखं सोढुम्, जलं पातुम्, भारंवोढुं । इच्छति । ४. एकः बालकः, एका बालिका, एकं पुस्तकं चात्र सन्ति । ५. एकस्मै बालकाय, एकस्य वालिकायै च फलं देहि । ६. एकस्मिन् वने एकः सिंहः वसति स्म । १. द्वी छात्री, द्वे वालिके, द्वे पुस्तके चात्र सन्ति । ८. स वस्त्रं क्रीणाति, क्रीणातु, पक्रोणात् वा । ९. स धर्म जानाति, जानातु, अजानात् वा । १०. स धनं गृह्णाति । २. संस्कृत वनाओ:-(क) १. वड़ा भाई घर जाना चाहता है । २. छोटा माई पुस्तक चाहता है। ३. वहन काम करना चाहती है। ४. मैं पढ़ने के लिए विद्यालय जाता हूँ। ५. चाचा, दादा और मामा भोजन खाने को घर जाते । ६. मेरा पौत्र यह काम कर सकता है । ७. राम पाठ पढ़ने को, फल खाने को, प्रश्न पूछने को, लेख लिखने को, जल पीने को, भोजन खाने को और खेल देखने को वहाँ जाता है । ८. वह पुस्तक रखने को (धृ), धन ले जाने को, शत्रु को मारने को, वृक्ष काटने को (छद्) और नहाने को यहाँ आता है । (ख) ९. यहाँ पर एक बालक, एक कन्या और एक पीला फूल हैं। १०. एक शिप्य और एक वालिका को यह लाल पुस्तक दो। ११. एक वन में एक वाघ रहता था । १२. वहाँ पर दो शिष्य, दो बालिकाएँ और दो नीली पुस्तकें हैं । (ग) १३. वह हरी पुस्तक खरीदता है। १४. तू फल खरीदता है । १५. मैं सफेद वस्त्र खरीदता हूं। १६. वह अन्न खरीदे। १७. उसने पशु खरीदा। १८. वह धर्म को जानता है । १९. तू सत्य को जान । २०. मैं पुस्तक को ग्रहण कार । ३. अशुद्ध वाक्य नियम ३ (१) लिखितुम्, प्रच्छितुम्, दर्शितुम् लेखितुम्, प्रप्टुम्, द्रष्टुम् । ७१ (२) क्रयति, जानति, जान । क्रीणाति, जानाति, जानीहि । धातुरूप ४. अभ्यास-(क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो । (ख) एक और द्वि शब्द के तीनों लिंगों के पूरे रूप लिखो। (ग) की, ज्ञा, ग्रह के लट्, और लङ् के रूप लिखो । (प) इनके तुमुन् के रूप लिखोः-कृ, गम्, पठ्, लिख, दृश्, नी, दा, पा। ५. सन्धि करो:-हरिः + तत्र । क + तिष्ठति । रामः + च । हरिः च । शुद्ध वाक्य . - ५ (व्याकरण - . प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ७२-७३/ शब्दकोश ५६०+२० = ५८० ] अभ्यास २९ (क) पाचकः (रसोइया), सूपः (दाल), शाकः (साग), रोटिका (रोटी शर्करा (शक्कर), लप्सिका (हलुआ)। भक्तम् (भात), पायसम् (खीर मिष्ठान्नम् (मिठाई), पक्वान्नम् (पकवान), नवनीतम् (मक्खन), घृतम् (धी लवणम् (नमक), वासरः (दिन) । (१४) । (घ) शतम् (सौ), सहस्रम् (हजार लक्षम् (लाख), कोटिः (करोड़), अधिकम् (अधिक), न्यूनम् (कम) । (६)। व्याकरण (त्रि, चतुर् ; क्त्वा, ल्यप् ; उत्व-सन्धि) १. वि और चतुर् शब्द के तीनों लिंग के रूप स्मरण करो। (देखो शब्द ४४-४५)। २. क्री और ज्ञा धातु के विधिलिङ् और लूट के रूप स्मरण करो। (देव धातु० ३०-३९)। ३. २० आदि के लिए संस्कृत शब्द ये हैं-विंशतिः (२०), त्रिंशत् ( चत्वारिंशत् (४०), पञ्चाशत् (५०), षष्टिः (६०), सप्ततिः (७०), अशी (८०), नवतिः (९०)। ४. सात दिन ये हैं-रविवारः, सोमवारः, मङ्गलवारः, वुधवारः, वृहस्पति वारः, शुक्रवारः, शनिवारः । नियम ७२-(ससजुषो रु:) शब्द के अन्तिम स् को रु (र) हो जाता है । सूचना प्रथमा के एकवचन में इसी र का विसर्ग दिखाई देता है । सन्धि में यह अ आ के अतिरिक्त अन्य स्वरों के बाद रहेगा । जैसे-हरिः + अवदत् हरिरवदत् । गुरुः + अस्ति गुरुरस्ति । वधूः + एषा-वधूरेषा । गुरोः भाषणम्-गुरोर्भाषणम् । नियम ७३-(अतो रोरप्लुतादप्लुते) अः को ओ जाता है, बाद में अ हो तो अर्थात् अः+ अ-ओऽ । जैसे-कः + अपि कोऽपि । कः + अस्तिकोऽस्ति कः + अयम्कोऽयम् । सः + अपठत्-सोऽपठत् । नियम ७४-'कर' या 'करके' के अर्थ में क्त्वा (त्वा) प्रत्यय होता है । इस त्वा वचता है । इसके रूप नहीं चलेंगे, अव्यय है । जैसे, पढ़कर-पठित्वा इसी प्रकार कृ-कृत्वा, ह-हृत्वा, लिख-लिखित्वा, गम्-~-गत्वा, हन्-हत्वा नम्नत्वा, दा-दत्त्वा, बू-उक्त्वा, स्वप्-सुप्त्वा, ग्रह - गृहीत्वा प्रच्छ्-पृष्ट्वा, वस्-उषित्वा, दृश-दृष्ट्वा, पच-पक्त्वा, खाद्-- खादित्वा, पा-पीत्वा, लभ-लब्ध्वा । शनियम ७५--यदि कोई उपसर्ग (प्र, निर्, सम्, वि आदि ) धातु से पहले है तो त्वा के स्थान पर ल्यप् (य) होगा । जैसे-आदाय ( लेकर ), विक्री (बेचकर), आगत्य, आगम्य ( आकर ), प्रहृत्य ( प्रहार करके ), विहत्व (घूमकर), आनीय (लाकर), आहूय (बुलाकर)। ५ , त्रि, चतुर्, क्त्वा, ल्यप, क्रो, ज्ञा, उत्व-सन्धि, भक्ष्यवर्ग ५९ . - अभ्यास २९ १. उदाहरण-वाक्य--१. वह पढ़कर घर जाता है-स पठित्वा गृहं गच्छति। स स्नात्वा, पठित्वा, लिखित्वा, भोजनं खादित्वा, जलं पीत्वा च विद्यालयं च्छति । ३. स धनम् आदाय, फलानि विक्रीय, शत्रु प्रहृत्य, गृहम् आगत्य च प्ठति । ४. त्रयः छात्राः, तिस्रः वालिकाः, त्रीणि फलानि चात्र सन्ति । ५. चत्वारः प्याः, चतस्रः कन्याः, चत्वारि पुस्तकानि च तत्र सन्ति । ६. वस्त्रं क्रीणीयात्, तकं गृह्णीयात्, धर्म जानीयात् च । ७. स पुस्तकं ऋष्यति, वस्त्रं ग्रहीष्यति, धर्म स्यति च । २ संस्कृत बनाओ-(क) १. छात्र पाठ पढ़कर, लेख लिखकर, भोजन खा- र और जल पीकर विद्यालय जाता है । २. वालक नहाकर, ईश्वर को नमस्कार र, रोटी, भात, दाल, साग खाकर और पुस्तक लेकर (ग्रह) पाठशाला गया । रसोइया भात, दाल, रोटी, साग, हलुआ और खोर पकाकर छात्रों को देता । ४. राम मिठाई, पकवान, मक्खन, घी, दूध और चीनी खाकर यहाँ आता । ५. कृष्ण वाटिका को देखकर, बालक को धन देकर, पुस्तकें पाकर (लम्), श्न पूछकर और वचन कहकर (बू) यहाँ आया। ६. १०० छात्र, १ हजार स्तकें और एक लाख मनुष्य । ७. साग में नमक कुछ कम है । ८. सप्ताह में त दिन होते हैं-रविवार, सोमवार, आदि । (ख) ९. ३ शिष्य, ३ लड़कियां और ३ फूल वहाँ हैं । १०. ४ मनुष्य, ४ वालिकाएँ और ४ पुस्तकें यहाँ हैं । ११. ४ छात्रों और ४ छात्राओं को ४ पुस्तकें दो । (ग) १२. वह फल खरीदे । १३. तू वस्त्र 'वरीद । १४. मैं पुस्तक खरीदूं । १५. वह फल खरीदेगा। १६. वह धर्म को जाने । ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) पात्वा, नमित्वा, ग्रहित्वा । पीत्वा, नत्वा, गृहीत्वा । (२) पश्यत्वा, दात्वा, ब्रूत्वा । दृष्ट्वा, दत्वा, उक्त्वा । ४ अभ्यास-(क) २ (ग) को बहुवचन में बदलो । (ख) त्रि, चतुर् के तीनों लिंगों के पूरे रूप लिखो। (ग) क्री, ग्रह , ज्ञा के विधिलिङ् और लूट के रूप लिखो। (घ) इनके क्त्वा (त्वा) प्रत्यय लगाकर रूप बनाओ-पठ्, लिख्, गम्, हत्, स्ना, खाद्, पच्, दृश, लम्, प्रच्छ्, बू, वस्, ग्रह, दा, ५. सन्धि करो:--(क)कः + अपि । देवः + अधुना। सः + अयम् । रामः + 'अवदत् । (ख) हरिः + अगच्छत् । शिशुः + आगच्छत् । पितुः+ इच्छा । । शुद्ध वाक्य ७८ - ७४ पा। ।
प्रा० रचनानुवादकौमुदी (नियम ७६-८० शब्दकोश ५८०+२०-६०० ] अभ्यास ३० (व्यास (क) यानम् (सवारी), संस्करणम् (१. पुस्तक आदि का संस्करण, २. सप्त आम्रम् (आम), दाडिमम् (अनार), द्राक्षाफलम् (अंगूर), बदरीफलम् (के कदलीफलम् (केला), जम्बूफलम् (जामुन), बिल्वफलम् (वेल) । ककःच (कुन उत्तरीयः (चादर), कम्बलः (कम्बल), पादयामः (पायजामा), (गहना), अधोवस्त्रम् (धोती), अङ्गप्रोक्षणम् (अंगोछा), मुखप्रोशः (रूमाल), शाटिका (साड़ी), शय्या (विस्तर), उपानह -त् (जूता) । (२०) । व्याकरण ( पञ्चन् से दशन्; तव्य, अनीय, ल्युट; उत्व-सन्धि ) १. पञ्चन् से दशन् तक के पूरे रूप स्मरण करो । (देखो शब्द० ४६-५१ २. आम्र आदि नपुंसकलिंग होंगे तो इनका अर्थ आम आदि फल होगा। पुंलिंग आम्रः, दाडिमः आदि का अर्थ आम आदि का वृक्ष होगा । नियम ७६-(हशि च) अः को ओ हो जाता है, बाद में वर्ग के ३, ४, ५, ह, य, र, ल, कोई हों तो । जैसे-रामः + गच्छति रामो गच्छति । कृष्णः + वर्दा कृष्णो वदति । का+वाको वा। वाल:+लिखितम्बालो लिखा नियम ७७--(एतत्तदोः सुलोपः०) एपः और सः के विसर्ग का लोप हो जाता वाद में कोई व्यंजन हो तो । जैसे---सः + पठतिस पठति । सः + लिर्खा स लिखति । सः + गच्छति स गच्छति । एपः + गच्छति-एप गच्छति । नियम ७८~'चाहिए' अर्थ में धातु के साथ 'तव्य' प्रत्यय लगता गुण होता है। जैसे-कृ + तव्य कर्तव्यम् (करना चाहिए)। इसी प्रम हर्तव्यम्, पठितव्यम्, लेखितव्यम्, गन्तव्यम्, हसितव्यम्, वक्तव्यम् । नियम ७९-~-'चाहिए' अर्थ में धातु के साथ 'अनीय' प्रत्यय भी लगता है। घ को गुण होता है । तव्य और अनीय के साथ कर्ता में तृतीया और कर्म में प्रय होगी। इनके रूप कर्म के अनुसार चलेंगे । जैसे-मया भोजनं कर्तव्यं करणं वा । त्वया पुस्तकानि पठितव्यानि, पठनीयानि वा । मया लेखः लेखनीयः नियम ८०-भाववाचक शब्द बनाने के लिए धातु से ल्युट् (अन) प्रत्यय हो है । ल्युट का 'अन' वचता है । गुण होता है। नपुंसक० में ही रूप चलेगा जैसे-के-करणम् (करना)। इसी प्रकार पठनम्, गमनम्, लेखन मरणाम स्थानम आदि । 1 धातु -rrrrTr FTIII पञ्चन् से से दशन्, तव्य, अनीय, ल्युट, उत्व-सन्धि, वस्त्रवर्ग अभ्यास ३० १. उदाहरण-वाक्य:-१. मुझे पुस्तक पढ़नी चाहिए-मया पुस्तकं पठितव्यं उतीयं वा । २. मया भोजनं खादितव्यम् । ३. त्वया ग्रामः गन्तव्यं । ४. त्वया या अस्माभिः वा कार्य करणीयं कर्तव्यं वा । ५. त्वया पुस्तकानि पठनीयानि । अस्मिन् वने आम्राः, दाडिमाः, बदर्यः, कदल्यः, विल्वाः च (इनके वृक्ष) न्ति । ७. अस्मिन् उपवने (बगीचे में) आम्राणि, दाडिमानि, द्राक्षाफलानि, दिलीफलानि (इनके फल) सन्ति । ८. पञ्चभिः, षड्भिः, सप्तभिः, अष्टभिः, वभिः वा छात्रः एतत् कार्य करणीयम् । २. संस्कृत बनाओ-(क) १. मेरे लिए सवारी लाओ। २. शरीर की फाई करो। ३. वह प्रतिदिन (प्रतिदिनम्) आम, अनार, अंगूर और केला खाता ई। ४. तू जामुन, बेल और बेर खाता है । ५. उस छात्र के पास कुर्ता, धोती, रायजामा, अंगोछा, रूमाल, चादर, कम्बल, विस्तर और जूता हैं । ६. इस लड़की के पाम साड़ी, अंगोछा, रूमाल और बहुत से (बहूनि) आभूपण हैं । (ख) ७. मुझे पुस्तक पढ़नी चाहिए। ८. तुझे खाना खाना चाहिए । ९. उसे गाँव जाना चाहिए । १०. तुने हँसना चाहिए। ११. मुझे लेख लिखना चाहिए । १२. तुझे ग्रंथ पढ़ना चाहिए। १३. उसे काम करना चाहिए। १४. तुझे सत्य बोलना चाहिए (वक्तव्यम्) । (ग) १५. इस बगीचे में ५ आम, ६ अनार, ७ वेर, ८ केले और ९ बेल के पेड़ हैं । १६. पाँच छात्रों ने यह पुस्तक पढ़ी है । १७. दस छात्रों का आज भापण होगा। १८. सदा सत्य बोलो, धर्म करो, यत्न करो, सुखी हो और सदा यश पाओ। ३. अशुद्ध वाक्य नियम (१) अहं भोजनं खादितव्यः मया भोजनं खादितव्यम् । (२) स कार्य कर्तव्यः । तेन कार्य कर्तव्यम् । ४. अभ्यास—(क) २ (ख) को वहुवचन में वदलो । (ख) पञ्चन् से दशन् तक के पूरे रूप लिखो। (ग) इन धातुओं के तव्य, अनीय और ल्युट् प्रत्यय लगाकर रूप लिखो-कृ, ह, धृ, भृ, पठ्, लिख, गम्, हस्, खाद् । ५. सन्धि करो:-शिष्यः + गच्छति । रामः+लिखति । बालकः वदति । रामः + जयति । देवः + हसति । सः + पठति । सः + लिखति । सः+ गच्छति । . शुद्ध वाक्य ७९ ६२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (व्या व्याकरण आवश्यक निर्देश १. जिन शब्दों और धातुओं के तुल्य अन्य शब्दों और धातुओं के रूप च हैं, उनके रूपों के सामने उनका संक्षिप्त रूप दिया गया है । संक्षिप्त रूप का यह है कि उस प्रकार के सभी शब्दों या धातुओं के अन्त में वह अंश रहे अतः उस प्रकार से चलनेवाले सभी शब्दों और धातुओं के अन्त में संक्षिप्त लगाकर रूप बनावें । संक्षिप्तरूपों को शुद्ध स्मरण कर लें। २. शब्दों और धातुओं के रूप के साथ अभ्यासों की संख्याएं दी हैं । उमा भाव यह है कि उस शब्द या धातु का प्रयोग उस अभ्यास में हुआ है और र प्रकार से चलनेवाले शब्द या धातु भी उसी अभ्यास में दिये हुए हैं । ३. संक्षेप के लिए निम्नलिखित संकेतों का उपयोग किया गया है (क) शब्दरूपों में प्रथमा आदि के लिए उनके प्रथम अक्षर रखे गये जैसे -प्र०-प्रथमा, द्वि०-द्वितीया, तृ-तृतीया, च० -चतुर्थी, पं0-पंचा १०-षष्टी, स-सप्तमी, सं०-सम्बोधन । (ख) पुं०-पुंलिंग, स्त्री०-स्त्रीलिंग, नपुं०-नपुंसकलिंग । एक-ए वचन, द्वि०-द्विवचन, बहु०-बहुवचन । प्रत्येक शब्द और धातु के रूप में ऊ से नीचे की ओर प्रथम पंक्ति एकवचन की है, दूसरी द्विवचन की और तीट बहुवचन की । जो शब्द किसी विशेष वचन में ही चलते हैं, उनमें इसी वचन रूप हैं। दे०-देखो । अ०-अभ्यास । (ग) धातुरूपों में प्र० पु० या प्र०-प्रथम पुरुप (अन्य पुरुप), म० पु० म०मध्यम पुरुष, उ० पु० या उ०-उत्तम पुरुष । प०-परस्मैपद, आ. आत्मनेपद, उ०-उभयपद । ४. सर्वनाम शब्दों का संवोधन नहीं होता, अतः उनके रूप संवोधन में नहीं हो ५. संक्षिप्त रूपों मे न का ण होता है, यदि वह र् या प के बाद हो त यदि र या ष के बाद और न से पहले स्वर, ह य व र कवर्ग, पवर्ग और बीच में हों तो भी न काण हो जायगा । संक्षिप्तरूपों में न ही रखा गया है, सर्वमाधारण है । (देखो अभ्यास ५ में नियम १०) ।
शब्दरूप-राम, हरि, गुरु शब्द rior अ. द्वि० " " मात् " (१) (क) शब्दरूप-संग्रह १) राम (राम) अकारान्त पुंलिंग (१) राम (संक्षिप्तरूप) (देखो अभ्यास ५) मिः रामो रामा: प्र० मो याः मिम रामान् अम् आन् मेण रामाभ्याम रामैः तृ० एन आभ्याम् ऐ: माय रामेभ्यः च० आय एभ्यः पं० आत् रामस्य रामयोः रामाणाम प० अस्य अयोः आनाम रामे रामेषु स० ए एषु हे राम हे रामो हे रामाः सं० भ भी माः (२) हरि (विष्णु) इकारान्त पुं० (२) हरि (सं० रूप) (दे० अ० ८) हरिः हरी हरयः प्र० इ: लगः हरिम हरो हरीन् इम ईन हरिणा हरिभ्याम हरिभिः तृ इना इभ्याम इभिः हरये हरिभ्यः अये इभ्यः हरेः पं० ए: योः हरीणाम ५० योः हरी हरिषु स० औ इपु है हरे हे हरी हे हरयः सं० ए अयः " ई द्वि० च० " ईनाम hor (३) गुरु (सं० रूप) (दे० अ० ९) ऊ . उम EEEEEE (३) गुरु (गुरु) उकारान्त पुं० गुरुः गुरू गुरवः गुरुम गुरू गुरून् गुरुगा गुरुभ्याम् गुरुभिः गुरवे गुरुम्यः गुरोः गुर्वोः गुरुपु है गुरो है गुरू है गुरवः अवः ऊन उभिः उम्पः उभ्याम् उना अवे ८ प्र० द्वि० तृ० च० पं० प० स० सं० . ओः गुरूणाम वोः ऊनाम : औ ओ ऊ अवः कर्ता कर्तारम आरम ६४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (४) कर्तृ (करनेवाला) ऋकारान्त पुं० (४) कर्तृ (सं० रूप) (दे० अ० १ कारी कारः आ आरौ आरः कर्तृन् द्वि० ऋन् का कर्तृभ्याम् कर्तृभिः तृ० रा ऋभ्याम ऋभिः करें कर्तृभ्यः च० ऋभ्य कर्तुः पं० कों ष० रोः ऋणार कर्तृरि कर्तृषु स० अरि ऋपु हे कर्तः हे कर्तारौ हे कर्तारः सं० आरी आर: . 영시의 कर्तृणाम, अः (५) पितृ (सं० रूप) (दे० अ० १ आ अरी अरः ऋन् शेप कर्तृवत् (दे० शब्द ४) अरम (५) पितृ (पिता) ऋकारान्त पुं० पिता पितरौ पितरः प्र० पितरम पितृन् द्वि० पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः तृ० पित्रे पितृभ्यः पितुः पं० पित्रोः पितृणाम् प० पितरि पिर्तृषु है पितः है पितरौ हे पितरः सं० स० (६) गो (गाय या बैल) ओकारान्त पुं० स्त्री० सूचना- गौः गावी गात्रः प्र० साधारणतया (घो शब्द में गाम गा: द्वि० छोड़कर) अन्य कोई शब्द ग गवा गोभ्याम् गोभिः तृ० शब्द के तुल्य नहीं चलता। गवे गोम्यः गोः पं० गवोः गवाम गवि गोपु हे गौः हे गावी हे गावः सं० प० स० भूभृत, भगवत, गच्छत् शब्द ६५ (७) भूभृत् (सं० रूप) ती त् तः तम. " समभृता ७) भूभृत् (राजा, पर्वत) तकारान्त पुं० भृत् भूभृती भूभृतः प्र० सूभृतम द्वि० भूभृद्भ्याम भूभृद्भिः तृ० मूभृते भूभृद्भ्यः च० भूभृतः पं० भूभृतोः भूभृताम् प० भूभृतोः भूभृत्सु हे भूभृतो हे भूभृतः सं० a म याम द्भिः भ्यः ते " " तोः . ताम त्सु भूभृति स० ति ই মুমূ त् ती तः प्र० अन्तः द्वि० अतः " ) ता च० प० स० अन्तः 15 (८) भगवत् (भगवान्) तकारान्त पुं० (८) भगवत् सं० रूप) (दे० अ० १७) भगवान् भगवन्ती भगवन्तः आन् अन्ती भगवन्तम भगवतः अन्तम भगवता भगवद्भ्याम् भगवद्भिः तृ० याम द्भिः भगवते भगवद्भ्यः ते भ्यः भगवतः पं० भगवतोः भगवताम तोः ताम भगवति भगवा ति त्सु हे भगवन् हे भगवन्ती हे भगवन्तः सं. अद् अन्तो (९) गच्छत् (जाता हुआ) तकारान्त पुं० (९) गच्छत् (सं० रूप) (दे० अ० २०) गच्छन् गच्छन्ती अन् अन्ती गच्छन्तम द्वि० शेष भगवत् के तुल्य (देखो शब्द ८) गच्छता गच्छद्भ्याम् गच्छद्भिः तृ. गच्छते गच्छद्भ्यः च० गच्छतः पं० गच्छतोः गच्छताम् गच्छति गच्छत्सु हे गच्छन् हे गच्छन्ती हे गच्छन्तः सं० द प्र० अन्तः गच्छन्तः गच्छतः प० स० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (करिन, पथिन्, आम " (१०) करिन् (सं० रूप) दे० अ० १८ प्र० इनौ द्वि० इनम तु इना इभ्याम च० इने इम पं० इनः प० इनोः इना करिणाम स० इनि -- (१०) करिन् (हाथी) इन्नन्त पुं० करी करिणी करिणः करिणम करिणा करिभ्याम करिभिः करिणे करिभ्यः करिणः करिणोः करिणि करिषु हे करिन् हे करिणौ हे करिणः (११) पथिन् (मार्ग) इन्नन्त पुं० पन्थाः पन्थानौ पन्थानः पन्थानम पथः पथा पथिभ्याम् पथिभिः पथे पथिभ्यः पथः पथोः पथाम पथि पथोः पथिपु हे पन्थाः हे पन्थानौ हे पन्थानः tur सं० इन् इनौ सूचना-साधारणतया परि प्र० शब्द के तुल्य अन्य किसी द्वि० के रूप नहीं चलते हैं। तृ० च० पं० ० प० स० सं० (१२) आत्मन् (आत्मा) अन्नन्त पुं० आत्मा आत्मानी (१२) आत्मन् (म० आनी आत्मानः प्र० आ द्वि० आत्मानम आत्मनः आत्मना आत्मभ्याम आत्मभिः आत्मने आत्मभ्यः आनम अना अने आ अभ्यान तृ० च० पं० आत्मनः अनः प० अनोः अना आत्मनो आत्मनाम आत्मनि आत्मसु हे आत्मन् हे आत्मानौ हे आत्मानः स० अनि सं० आनी आ अन् स ने नाम सं० अन् आनी प्र० विद्वांसम राजन्, विद्वस, रमा शब्द ६७ (१३) राजन् (राजा) अन्नन्त पुं० (१३) राजन् (सं० रूप) (दे० अ० १९) राजा राजानी राजानः प्र० आ आनी आनः राजानम् राज्ञः द्वि० आनम नः राज्ञा राजभ्याम राजभिः तृ० ना अभ्याम् अभिः राजे राजभ्यः च० ने अभ्यः राज्ञः प० नः अभ्यः राज्ञोः राज्ञाम प० नोः राज्ञि, राजनि राजसु स० नि, अनि असु हे राजन् हे राजनी हे राजानः आनः (१४) विद्वस् (विद्वान्) असन्त पुं० विद्वान् विद्वांसी विद्वांसः सूचना-साधारणतया अन्य विदुषः द्वि० किसी शब्द के रूप विद्वस् के तुल्य विदुपा विद्भ्याम् विद्वद्भिः तृ० नहीं चलते हैं । विदुषे विद्वद्भ्यः च० विदुषः पं० विदुषोः विदुपाम् प० विदुपि विद्वत्सु स० हे विद्वन् हे विद्वांसौ हे विद्वांसः सं० (१५) रमा (लक्ष्मी) आकारान्त स्त्री० (१५) रमा (सं० रूप) (दे० अ० ७) रमा रमे रमाः प्र० आ ए आः रमाम् द्वि० आम् रमया रमाभ्याम् रमाभिः तृ० अया रमायै रमाभ्यः च० आय आभ्यः रमायाः पं० आयाः रमयो रमाणाम् प० अयोः आनाम् रमायाम् रमासु स० आयाम् मामु हे रमे हे रमाः सं० ए ए आः ए आभ्याम् आभिः हमायाम् है हे रमे ६८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (मति, नदी, स्त्री) (१६) मति (सं० रूप) (दे० अ० २१) प्र० इ: ई अयः द्वि० ई: इभ्याम् इभिः (१६)- मति (बुद्धि) इकारान्त स्त्री० मतिः मती मतयः मतिम् मतीः मत्या. मतिभ्याम् मतिभिः मत्य, मतये मत्याः, मतेः मत्योः मतीनाम मत्याम , मतौ मतिपु हे मते हे मती हे मतयः मतिभ्यः तृ० च० पं० इम्यः इम् या यै, अये याः, ए: योः औ प० ईनाम इपु स० याम.. सं० ए ई अयः ई (१७) नदी (नदी) ईकारान्त स्त्री० नदी नद्यौ नद्यः नदीम् ਜ नदीः नद्या नदीभ्याम नदीभिः नद्य नदीभ्यः नद्याः नद्योः नदीनाम नद्याम नदीषु हे नद्यौ हे नद्यः (१७) नदी (सं० रूप) (द० अ० २२) प्र० यौ यः द्वि० ईम ई: तृ० या ईभ्याम ईभ्यः च० ईभ्यः पं० याः प० योः स० याम ईपु सं० इ यौ यः 리 " नाम हे नदि प्र० द्वि० सूचना-स्त्री शब्द के तुला अन्य किसी शब्द के रूप नह चलते हैं। (१८) स्त्री (स्त्री) ईकारान्त स्त्री० स्त्री. स्त्रियौ स्त्रियः स्त्रियम स्त्रियः स्त्रीम स्त्रीः स्त्रिया स्त्रीभ्याम स्त्रीभिः स्त्रिय स्त्रीभ्यः स्त्रियाः स्त्रियोः स्त्रियाम स्त्रीषु हे स्त्रि हे स्त्रियो हे स्त्रियः तृ० स्त्रीणाम पं० प० स० सं० धेनु, वधू, मातृ शब्द .. चतुम उम वाः, ओः प० " . वाम , औ ओः (१९) धेनु (गाय) उकारान्त स्त्री० (१९) धेनु (सं० रूप ) (दे० अ० २३) धेनुः धेनू धेनवः प्र० अवः धेनूः द्वि० धेन्वा धेनुभ्याम् धेनुभिः तृ० वा उभ्याम उभिः धेन्वं, धेनवे धेनुभ्यः च० वै, अवे उभ्यः धेन्वाः, धेनोः पं० धेन्वोः धेनूनाम ओः ऊनाम धेन्वाम्, धेनौ धेनुपु स० उपु हे धेनो हे धेनू हे धेनवः सं० ओ अवः (२०) वधु (वहू) ऊकारान्त स्त्री० (२०) वधू (सं० रूप) वधूः वध्वी वध्वः वी वः वधूम वधूः द्वि० ऊः वध्वा वधूभ्याम् वधूभिः तृ० वा ऊभ्याम् ऊभिः वध्वं वधूभ्यः ऊस्यः वध्वाः पं० वा: वध्वो वधूनाम ष० वोः वध्वाम वधूषु स० वाम हे वधु हे वध्वौ हे वध्वः सं० व: प्र० च० वै ऊनाम बाम वौ (२१) मातृ (सं० रूप) आ अरी अरः पर मातरम् अरम (२१) मातृ (माता) ऋकारान्त स्त्री० माता मातरौ मातरः प्र० मातृः द्वि० मात्रा मातृभ्याम मातृभिः तृ० माने मातृभ्यः च० मातुः पं० मात्रोः प० मातरि मातृपु स० हे मातरौ हे मातरः सं० रा रे नः ऋभ्याम् ऋभिः अभ्यः रो: मातृणाम् ५० अरि ऋणाम् ऋप अरः हे मातः अरो ७० प्रा० रचनानुवादकौमुदी ( वाच, दिश, सुध (२२) वाच् (सं० रूप क, ग् चौ २. चम . भ्याम नि (२२) वाच (वाणी) चकारान्त स्त्री० वाक्-ग वाची वाचः प्र० वाचम् द्वि० वाचा वारस्याम वाग्भिः तृ० वाचे वारस्याः च० वाचः पं० वाचोः ष० वाचि वाक्षु स० हे वाक्-ग् हे वाचौ हे वाचः सं० चा चे . चः " वाचाम चोः चाम चि क्ष कन्ग ची चः (२३) दिश् (सं० रूप) शौ " (२३) दिश् (दिशा) शकारान्त स्त्री० दिक्-ग दिशौ दिशः प्र० दिशम द्वि० दिशा दिग्भ्याम् दिग्भिः तृ दिशे दिग्भ्यः च० दिशः पं० दिशोः दिशाम दिशि दिक्षु स० हे दिक्-ग हे दिशी हे दिशः सं० क्-ग शम शा शे भिः ग्भ्याम गस्थः शः " " प० शोः शाम शि क्षु का शौ (२४) तुध् (भूख) धकारान्त स्त्री० क्षुत् क्षुधौ क्षुधः प्र० सूचना-साधारणतया क्षुध क्षुधम द्वि० शब्द के तुल्य किसी शब्द के रूप क्षुधा क्षुद्भ्याम् क्षुद्भिः तृ० नहीं चलते हैं। क्षुधे क्षुद्भ्यः क्षुधः पं० क्षुधोः क्षुधि क्षुत्सु सं० च० क्षुधाम, प० स० हे क्षुत् है क्षुधौ हे क्षुधः (का उपानह , गृह, वारि शब्द ७१ को उपानत् प्र० सूचना--साधारणतया उपानह शब्द के तुल्य किसी शब्द के रूप नहीं चलते हैं। . " वा (२५) उपानह, (जूता) हकारान्त स्त्री० उपानही उपानहः उपानहम द्वि० मार उपानहा उपानदभ्याम उपानद्भिः तृ० उपानहे उपानद्भ्यः च० उपानहः पं० उपानहोः उपानहाम उपानहि उपानत्सु हे उपानत् हे उपानही हे उपानहः सं० । " प० स० (२६) गृह (सं० रूप) (दे०अ० ६ ) अम ए आनि गृहम " (२६) गृह (घर) अकारान्त नपुं० Fin गृहे गृहाणि प्र० द्वि० गृहेण गृहाम्याम् गृहै: तृ० गृहाय गृहेभ्यः च० गृहात् पं० . गृहस्य गृहयोः प० ६. गृहे गृहेषु स० हे गृह हे गृहे हे गृहाणि सं० एन आय आभ्याम ऐ: एभ्यः गृहाणाम आत् अस्य अयोः आनाम ए है एपु आनि अ ए -- (२७) वारि (सं० रूप) (दे०अ० २४) इनी ईनि इ " इभ्याम् इभ्यः (२७) वारि (जल) इकारान्त नपुं० वारि वारिणी वारीणि प्र० द्वि० वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः तृ० वारिणे वारिभ्यः च० वारिणः पं० वारिणोः वारीणाम १० वारिणि वारिषु स० हे वारि-रे हे वारिणी हे वारीणि सं० इना इने इनः इभ्यः " " इनि इनोः ईनाम इपु इनी ईनि इ,ए (दधि, मधु, पयत . ७२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (२८) दधि (दही) इकारान्त नपुं० (२८) दधि (सं० रूप दधि दधिनी दधीनि प्र० इ इनी ईनि द्वि० दहना दधिभ्याम दधिभिः ० ना इम्याम इभिः दध्ने दधिभ्यः च० ने इभ्यः पं० दनोः दनाम् प० नोः नाम दनि,दधनि दधिषु स० नि, अनि इयु हे दधि-धे हे दधिनी हे दवीनि सं० इनी ईनि . (२९) मधु (सं० रूप) दे०अ० २ उनी ऊनि (२९) मधु (शहद) उकारान्त नपुं० मधु मधुनी मधूनि प्र० द्वि० मधुना मधुभ्याम् मधुभिः तृ मधुने मधुभ्यः च० • मधुनः पं० मधुनोः मधूनाम् प० मधुनि मधुषु स० हे मधु-धो हे मधुनी हे मधूनि सं० उभिः उना उने उनः उभ्याम उभ्याम उभ्यः उनोः उनि उ, ओ ऊनाम उपु ऊनि उनी (२०) पयस् (सं०रूप) (दे०म० २६ असी आंसि अः (३०) पयस् (दूध, जल) असन्त नपुं० पयः पयसी पयांसि प्र० द्वि० पयसा पयोभ्याम् पयोभिः पयसे पयोभ्यः पयसः पं० पयसोः पयसाम प० पयसि पयासु स० हे पयः हे पयसी हे पयांसि सं० 생명 असा असे ओभ्याम ओभिः ओम्यः च० असः असो. - असाम असि मासु आंति अः असी नामन् अहन्, गत् शब्द Sit(३१) नामन् (नाम) अन्नन्त नपुं० (३१) नामन् (सं० रूप) (दे० अ० २७) नाम नामनी अ अनी आनि नामानि प्र० द्वि० नामभिः तृ० अभिः ! म अभ्यः " লালা नामभ्याम् अभ्याम् इनाम्ने नामभ्यः च० ने नाम्नः पं० नाम्नोः नाम्नाम् प० नो: इनाम्नि, नामनि नामसु स० नि, अनि हे नाम, नामनी हे नामानि सं० अ, अन् अनी नामन् नाम् असु आनि cho महः " सूचना-अहन् शब्द के तुल्य अन्य किसी शब्द के रूप नहीं चलते हैं। (३२) अहन् (दिन) अन्नन्त नपुं० अहनी अहानि प्र० द्वि० अहना. अहोभ्याम् अहोभिः ४० अहोभ्यः च० अतः पं० अनोः अनाम् प० अहःसु की हे अहः हे अहनी हे अहानि सं० भढे । " म अनि, अनि,, स० १० (३३) जगत् (संसार) तकारान्त नपुं० शांति जगत् जगती जगन्ति (३३) जगत् (सं० रूप) अत् अती अन्ति प्र० द्वि० " औः अद्भ्याम् अभिः जगता जगते जगतः जगट्य म् जगद्भिः जगद्भ्यः तृ० अता च० अते. पं० अतः प० अन्यः R जगतोः जगताम् अतोः जगति जगत्सु . स० अति अताम् अत्सु अन्ति हे जगत् हे जगती हे जगन्ति सं० अत् अती ७४ अः प्रा० रचनानुवादकौमुदी (सर्व, तीनों (३४) क) सर्व (सव) सर्वनाम पुं० (३४) (क) सर्व (सं० रु (दे० अ० १०-१२) सर्वः सौं सर्वे प्र० औ ए सर्वम् सर्वान् आन् सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः तृ० एन आभ्याम् ऐ: सर्वस्मै सर्वेभ्यः च० अस्मै एभ्यः सवस्मात् सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् प० अस्य अयोः एपाम् सर्वस्मिन् सर्वेषु स० अस्मिन् एपु द्वि० अम् पं. अस्मात् (३४) (ख) सर्व (सव) नपुं० (३४) (ख) सर्व० (सं० रूप सर्वम् सर्वे सर्वाणि प्र० अम् ए आनि द्वि० सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः तृ० एन आभ्याम् सर्वस्मै सर्वेभ्यः च० अस्मै एभ्यः सर्वस्मात् सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् प० अस्य अयोः एपाम् सर्वस्मिन् सर्वेषु स० अस्मिन् पु ऐ: पं० अस्मात् " -- प्र० द्वि० आम् (३४) (ग) सर्व (सव) स्त्रीलिंग (३४) (ग) सर्व (सं० रूप सर्वा सर्वे सर्वाः आ ए आः सर्वाम् सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वामिः तृ० त० अया आभ्याम् आदि सर्वस्य सर्वाभ्यः १० अस्य सर्वस्याः in पं0 अस्याः सर्वयोः सर्वासाम् प० अयोः सर्वस्याम् सर्वासु स० अस्याम् आसु भ्य " आसा किम्, तत् शब्द ७५ । (३५) (क) किम् (कौन) पुंलिंग (३६) (क) तत् (वह) पुंलिंग (देखो अ० १०-१२) देखो अ० १०-१२) इकः को के प्र० ती ते कम् कान् तान् । केन काभ्याम् कैः तृ० तेन ताभ्याम् त: केभ्यः च० तस्मै तेभ्यः , कस्मात् . पं० तस्मात् कस्य कयोः केषाम् प० तस्य तयोः तेपाम् । कस्मिन् केषु स० तस्मिन् तेपु द्वि० तम् कस्म , " 5. (३५) (ख) किम् (कोन) नपुं० : किम् के कानि (३६) (ख) तत् (वह) नपुं० तत् ते तानि प्र० द्वि० काभ्याम् कैः केभ्यः तृ० टेन ताभ्याम् तैः तेभ्यः ६ च० तस्म केन कस्म कस्मात् कस्य कस्मिन् पं० तस्मात् " कयोः तयोः केपाम् केषु प० तस्य स० तस्मिन् तेषाम् तेषु " " द्वि० ताम् (३५) (ग) किम् (कौन) स्त्रीलिंग (३६) (ग) तत् (वह) स्त्रीलिंग का के का: प्र० सा ते ताः काम् किया काभ्याम् काभिः ४० तया ताभ्याम् तामिः कस्य काभ्यः च० तस्य ताभ्यः कस्याः पं० तस्याः कासाम् प० तयोः तासाम् कयो कासु स० तस्याम् तासु : " " " कयोः 4 कस्याम् ७६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (एतत्, यत् (३८) (क) यत् (जो पुलिस (देखो अ० १०-१२) यः यौ प्र० ये द्वि० यम् (३७) (क) एतत् (यह) पुंलिंग (देखो अ० १०-१२) एषः एतौ एते एतम् एतान् एतेन एताभ्याम् एतैः एतस्मै एतेभ्यः एतस्मात् एतस्य एतयो: एतेपाम् एतस्मिन् एतेषु तृ० येन यान याभ्याम् यः येभ्यः च० यस्मै पं० यस्मात् ययोः प० यस्य स० यस्मिन् येपास येपु (३७) (ख) एतत् (यह) नपुं० एतत् एते एतानि ये (३८) (ख) यत् (जो) ना प्र० यत् यानि द्वि० येन तृ० यः याभ्याम् येन्यः " एताभ्याम् एतैः एतेभ्यः च० यस्मै एतेन एतस्मै एतस्मात् एतस्य एतस्मिन् एतयोः एतेपाम् एतेषु पं० यस्मात् ष० यस्यं स० यस्मिन् ययीः येपाम् येपु (३८) (ग) यत् (जो) स्त्रीलिं प्र० या ये याः द्वि० याम् तृ० यया याभ्याम् याभिः (३७) (ग! एतत् (यह) स्त्रीलिंग एषा एते एताः एताम् एतया एताभ्याम् एताभिः एतस्यै एताभ्यः एतस्याः एतयोः एतासाम् एतस्याम् एतासु याभ्यः च० यस्य पं० यस्याः प० ययोः यासाम् याम म० यस्याम् र: -- अस्मान् वः युष्मद्, अस्मद्, इदम्, किम् शब्द (३९) युष्मद् (तू) (देखो अ० १३) (४०) अस्मद् (मैं) (दे० अ० १४) त्वम् युवाम् यूयम् प्र० अहम् आवाम् वयम् त्वाम् । युवाम् । युष्मान् ? द्वि० [माम् आवाम् अस्मान् त्वा । वाम् मा नौ नः त्वया युवाभ्याम् युप्माभिः तृ० मया आवाभ्याम् अस्मामिः हुम्यम् } आवाभ्याम् अस्मभ्यम् वः मे नी नः त्वत् युवाभ्याम् युष्मत् पं० मत् आवाभ्याम् अस्मत् तव युवयोः प० मम [अस्माकम् ते वः मे नौ (नः त्वयि युवयोः युष्मासु स० मयि आवयोः अस्मासु यामम्याम् } युष्मभ्यम् } च० {मह्यम् } ( } युष्माकम् वाम् प्र० (४१) (क) इदम् (यह) पुं० अयम् इमौ इमे इमम् इन् अनेन आभ्याम् एभिः अस्म एभ्यः अस्मात अस्य अनयोः एपाम् एषु (४१) (ख) इदम् (यह) नपुं० " अस्मिन् (४१) (ग) इदम् (यह) स्त्री० इयम् इमे इमाः द्वि० इमाम् तृ० अनया आभ्याम् आभिः अस्यै आभ्यः पं० अस्याः ष० अनयोः आसाम् स० अस्याम् आसु (४२) एक (एक) (दे० अ० २८) पुलिंग नपुंसक० स्त्रीलिंग प्र० एक: एकम् एका द्वि० एम् एकाम् तृ० एकेन एकेन एकया एकस्म एकस्म एकस्य पं० एक मात् एकस्मात् एकस्याः प० एकस्य एकस्य स० एकस्मिन् एकस्मिन् एकस्याम् सूचना-एकवचन में ही रूप चलते हैं। इदम् इमे इमानि आभ्याम् एभिः एभ्यः अनेन अस्म अस्मात् अस्य अस्मिन् अनयोः एषाम् एषु ७८ द्वे प्र० त्रयः प्रा० रचनानुवादकौमुदी (द्वि से दशन् शन (४३) द्वि (दो) (देखो अ० २८) (४४) त्रि (तीन) (देखो अ० २९ पुंलिंग नपुं०, स्त्रीलिंग पुं० नपुं० स्त्री० द्वौ त्रीणि तिस्रः द्वि० त्रीन् द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् त्रिभिः तिसृभिः त्रिभ्यः त्रिभ्यः तिसृभ्यः पं० द्वयोः द्वयोः त्रयाणाम् त्रयाणाम् तिसृणा त्रिषु त्रिपु तिसृषु सूचना-केवल द्विवचन में रूप चलेंगे। सूचना-बहु० में ही रूप चलेंगे तृ० त्रिभिः च० " ब० (४५) चतुर् (चार) (देखो अ० २९) (४६) पञ्चन् (पाँच), (४७) पप्( पुं० नपुं० स्त्री० चत्वारः चत्वारि चतस्त्रः प्र० पञ्च पट चतुरः द्वि० चतुर्भिः चतुर्भिः चतसृभिः तृ० पञ्चभिः पकि चतुर्यः चतुर्म्यः चनसृभ्यः च० पञ्चभ्यः पं० चतुर्णाम् चतुर्णाम् चतसृणाम् प० पञ्चानाम् पण्णाम् चतुर्षु चतुर्यु चतसृपु स० पञ्चसु प पभ्य नवभिः (४८) सप्तन् (सात), (४९) अष्टन् (आठ) (५०) नवन् (नौ), (५१) दशन् (दा अष्ट अष्टौ नव द्वि० सप्तभिः अष्टभिः अष्टाभिः तृ० दशभिः सप्तभ्यः अप्टस्यः अप्टाभ्यः च० नवम्यः दशम्यः पं० अष्टानाम् सप्तानाम् अप्टानाम् प० হানা नवानाम् अष्टसु सप्तसु अप्टासु स० दासु नवसु सूचना-त्रि से दशन् तक के रूप बहुवचन में ही चलेंगे। (देखो अ० २९-३०)।
सखि, सरित्, शर्मन्, मनस् शब्द ७९ (ख) शब्दरूप-संग्रह (५२) सखि (मित्र) इकारान्त पुं० (५३) सरित् (नदी) तकारान्त स्त्री० सखा तृ० सरिता सखायौ सखायः प्र० सरित् सरितौ सरितः सखायम् सखीन् द्वि० सरितम् सख्या सखिभ्याम् सखिभिः सरिभ्याम् सरिद्भिः सख्ये सखिभ्यः च० सरिते सरिद्भ्यः सख्युः पं० सरितः सख्योः सखीनाम् सरितोः सरिताम् सख्यो सखिषु स० सरिति सरित्सु हे सखे ! हे सखायौ ! हे सखायः ! सं० हे सरित् हे सरिती हे सरितः प० " (५४) शर्मन् (सुख) अन्नन्त नपुं०. (५५) मनस् (मन) अन्नन्त नपुं० राम शर्मणी शर्माणि प्र० मनः मनसी मनांसि तृ० मनसा च० मनसे मनोभ्याम् मनोभिः मनोभ्यः द्वि० गर्मणा शर्मभ्याम् शर्मभिः कर्मणे. शर्मभ्यः गर्मणः पं० मनसः शर्मणो शर्मणाम् प० मणि शर्मसु शर्म, शर्मन हे शर्मणी हे शर्माणि सं० हे मनः . मनसोः मनसाम् स० मनसि मनःसु,-स्नु हे मनसी हे मनांसि - ८० EEEEEE प्रा० रचनानुवादकौमुदी (पूर्व, कति, न (५६) (क) पूर्व (प्रथम, पूर्व) पुंलिंग (५६) (ख) पूर्व-स्त्रीति पूर्व! पूर्वी पूर्वे प्र० पूर्वा पूर्वे पूर्वाः पूर्वम् पूर्वान् द्वि० पूर्वाम् पूर्वेण पूर्वाभ्याम् पूर्वैः तृ० पूर्वया पूर्वाभ्याम् पूर्वाभिः पूर्वस्मै पूर्वेभ्यः च० पूर्वस्यै पूर्वाभ्यः पूर्वस्मात् पं० पूर्वस्याः पूर्वस्य पूर्वयोः पूर्वेपाम् प० पूर्वयोः पूर्वासा पूर्वस्मिन् पूर्वेषु स० पूर्वस्याम् पूर्वासु (५६) (ग) पूर्व- नपुंसकलिंग (५७) कति (कितने), (५८) उभ (दोनं पुं० स्त्री० न० पूर्वम् पू पूर्वे पूर्वाणि प्र० कति उभे उमौ द्वि० ८ उभाभ्याम् उभाम पूर्वाभ्याम् पूर्वः पूर्वेभ्यः तृ० कतिमिः च० कतिभ्य. पूर्वेण पूर्वस्मै पूर्वस्मात् पूर्वस्य पूर्वस्मिन् पं० उमयो पूर्वयोः पूर्वेषाम् पूर्वेषु प० कतीनाम् उभयोः स० कतिपु संख्याएँ ८१ ५७ सप्तपञ्चाशत् ५८ अप्टपञ्चाशत् ५९ एकोनपष्टि: (२) संख्याएँ १ एकः, एकम्, एका २९ एकोनत्रिंशत् २ हौ, द्वे, द्वे ३० त्रिंशत् ३ त्रयः, त्रीणि, तिस्रः ३१ एकत्रिंशत् ४ चत्वारः, चत्वारि, ३२ द्वात्रिंशत् चतस्त्रः ३३ त्रयस्त्रिशत् ५पञ्च ३४ चतुस्त्रिशत् ६ पट् ३५ पञ्चत्रिंशत् ७ सप्त ३६ पत्रिंशत् ८ अप्ट, अप्टौ ३७ सप्तत्रिंशत् ९ नव ३८ अष्टात्रिंशत् १० दश ३९ एकोनचत्वारिंशत् १ एकादश ४० चत्वारिंशत् २द्वादश ४१ एकचत्वारिंशत् ३ त्रयोदश ४२ द्विचत्वारिंशत् ४ चतुर्दश ४३ त्रिचत्वारिंशत् ५ पञ्चदश ४४ चतुश्चत्वारिंशत् ६ षोडश ४५ पञ्चचत्वारिंशत् ७ सप्तदश ४६ पट्चत्वारिंशत् १८ अप्टादश ४७ सप्तचत्वारिंशत् १९ एकोनविंशतिः ४८ अष्टचत्वारिंशत् २० विशतिः ४९ एकोनपञ्चाशत् २१ एकविंशतिः ५० पञ्चाशत् २२ द्वाविंशतिः ५१ एकपञ्चाशत् २३ त्रयोविंशतिः ५२ द्विपञ्चाशत् २४ चतुर्विंशतिः ५३ त्रिपञ्चाशत् २५ पञ्चविंशतिः ५४ चतुःपञ्चाशत् २६ पड्विंशतिः ५५ पञ्चपञ्चाशत् २७ सप्तविंशतिः ५६ षट्पञ्चाशत् २८ अष्टाविंशतिः ६० षप्टि: ६१ एकपप्टि: ६२ द्विपष्टि: ६३ त्रिषष्टिः ६४ चतुःपष्टि: ६५ पञ्चपष्टिः ६६ पट्पष्टि: ६७ सप्तपप्टि: ६८ अप्टपप्टिः ६९ एकोनसप्ततिः ७० सतति: ७१ एकसप्ततिः ७२ द्विसप्ततिः ७३ त्रिसप्ततिः ७४ चतुःसप्ततिः ७५ पञ्चसतति. ७६ पट्सप्ततिः ७७ सत सप्ततिः ७८ अप्टसप्ततिः ७९ एकोनाशीतिः ८० अशीतिः ८१ एकाशीतिः ८२ द्वयशीतिः ८३ त्र्यशीतिः ८४ चतुरगीतिः । - ८२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (संस्थाएं ८५ पञ्चाशीतिः ९१ एकनवतिः ९७ सप्तनवतिः ८६ षडशीतिः ९२ द्विनवतिः ९८ अष्टनवतिः ८७ सप्ताशीतिः ९३ त्रिनवतिः ९९ नवनवतिः ८८ अष्टाशीतिः ९४ चतुर्नवतिः एकोनशतम् ८९ एकोननवतिः ९५ पञ्चनवतिः १०० शतम् ९० नवतिः ९६ षण्णवतिः १ हजार--सहस्रम् । १० हजार-अयुतम् । १ लाख-लक्षम् । लाख-नियुतम्, प्रयुतम् । १ करोड़-कोटिः । १० करोड़-दशकोटिः । १ अरव-अर्बुदम् । सूचना-१. (क) १०१ आदि संख्याओं के लिए अधिक शब्द लगाकर संख्या-शब्द वनावें। जैसे-१०१ एकाधिकं शतम् । १०२ द्वयधिकं शतम् आदि। (ख) २०० आदि के लिए दो आदि संख्यावाचक शब्द पहले रखकर वाद में 'शती' रखें, या शत पहले रखकर द्वयम्, त्रयम्, चतुष्टयम् आदि रखें । जैसे- २०० द्विशती, शतद्वयम्, ३०० त्रिशती, शतत्रयम् । ४०० चतुःशती, ५०० पञ्च- शती, ६०० पट्शती, ७०० सप्त शती (हिन्दी, सतसई) आदि । २. नि (३) से अष्टादशन् (१८) तक सारे शब्दों के रूप केवल बहुवचन में चलते हैं । दशन् से अष्टादशन् तक के रूप दशन् के तुल्य । ३. एकोनविंशति से नवविंशति (२९) तक सारे शब्द एकवचनान्त स्त्रीलिंग हैं। इनके रूप एकवचन में ही चलते हैं । इकारान्त विंशति, पप्टि, माति, अशीति, नवति तथा जिनके अन्त में ये हों, उनके रूप ‘मति के तुल्य चलेंगे। तकारान्त त्रिंशत्, चत्वारिंशत् के रूप स्त्रीलिंग एकवचन में चलेंगे । ४. शतम् , सहस्रम्, अयुतम्, लक्षम्, नियुतम्, प्रयुतम् , आदि शब्द सदा एकवचनान्त नपुंसकलिंग हैं । गृहवत् एक० में रूप चलेंगे। कोटि के मनिवत् । ५. संख्येय (क्रमवाचक विशेषण) बनाने के लिए ये नियम हैं :-(१)१ से १० तक के क्रमवाचक प्रथम, द्वितीय आदि अभ्यास २८ में दिये हैं। (२) ११ से १८ तक के संख्येय शब्दों के अन्त में 'अ' लग जाता है। जैसे-~-एकादमः (११ वा) । (३) १९ से आगे संख्येय शब्दों के अन्त में 'तम' लगता है जैसे---विंशतितम. (२० वाँ), त्रिंशत्तमः (३० वा), शततमः (१०० वा) । -- भ्वादिगण । भू धातु ८३ आमः । --- म० पु० अ आम 12 अभवत् (३) धातुरूप-संग्रह (क) भ्वादिगण (परस्मैपदी धातुएँ ) (१) भू (होना) लट् (वर्तमान) (१) भू (सं० रूप) (दे० अ०५) भवति भवतः भवन्ति प्र० पु० अति अतः अन्ति भवसि भवथः भवथ म० पु० असि अथः अथ भवामि भवावः भवामः उ० पु० आमि आव: लोट् (आज्ञा अर्थ) लोट् (सं० रूप) (दे० अ० ६) भवतु भवताम् भवन्तु प्र० पु० अतु अताम् अन्तु राभव भवतम् भवत अतम् अत भवानि भवाव भवाम उ० पु० आनि आव लङ् (अनद्यतन भूतकाल) लङ् (सं० रूप) (दे० अ० ७) अभवताम् अभवन् प्र० पु० अत् अताम् अन् अभवः अभवतम् अमवत म० पु० अः अतम् अत अभवम् अभवाव अभवाम उ० पु० अम् आव आम सूचना - धातु के पहले म लगेगा। विधिलिङ् (आज्ञा या चाहिए अर्थ) विधिलिङ् (सं० रूप) (दे० अ० ८) 'भवेत् भवेताम् भवेयुः प्र० पु० एत् एताम् एयुः भवे: भवेतम् भवेत म० पु० ए: एतम् एत भवेयम् भवेव भवेम उ० पु० एयम् एव एम लट् (भविष्यत्) लट् (सं० रूप) (दे० अ० ९) भविष्यति भविष्यतः भविष्यन्ति प्र० पु० इण्यति इप्यतः इप्यन्ति भविप्यसि भविष्यथः भविष्यथ म० पु० इष्यसि इप्यथः इप्यय भविप्यामि भविप्यावः भविष्यामः उ० पु० इष्यामि इप्यावः इप्यामः सूचना-(१) कुछ धातुओं में इप्यति वाले रूप लगते हैं और कुछ में स्यति, स्यतः, स्यन्ति आदि विना इ वाले रूप लगते हैं (२) स्वादिगण (१) की परस्मैपदी सभी धातुओं के रूप पांचों लकारों में भू धातु के तुल्य चलते हैं । उपर्युक्त संक्षिप्त रूप अन्त में लगेंगे । - ८२ - प्रा० रचनानुवादकौमुदी (संख्या ८५ पञ्चाशीतिः ९१ एकनवतिः ९७ सप्तनवतिः ८६ षडशीतिः ९२ द्विनवतिः ९८ अष्टनवतिः ८७ सप्ताशीतिः ९३ त्रिनवतिः ९९ नवनवतिः ८८ अष्टाशीतिः ९४ चतुर्नवतिः एकोनशतम् ८९ एकोननवतिः ९५ पञ्चनवतिः १०० शतम् ९० नवतिः ९६ षण्णवतिः १ हजार-सहस्रम् । १० हजार-अयुतम् । १ लाख-लक्षम्। १ लाख-नियुतम्, प्रयुतम् । १ करोड़-कोटि: । १० करोड़-दशकोटि: १ अरव-अदम् । सूचना-१. (क) १०१ आदि संख्याओं के लिए अधिक शब्द लगाक संख्या-शब्द बनायें। जैसे-१०१ एकाधिकं शतम् । १०२ द्वयधिकं शतम् आदि (ख) २०० आदि के लिए दो आदि संख्यावाचक शब्द पहले रखकर वाद 'शती' रखें, या शत पहले रखकर द्वयम्, त्रयम्, चतुष्टयम् आदि रखें । जैसे- २०० द्विशती, शतद्वयम् , ३०० त्रिशती, शतत्रयम् । ४०० चतुःशती, ५०० प शती, ६०० षट्शती, ७०० सप्तशती (हिन्दी, सतसई) आदि । २. त्रि (३) से अष्टादशन् (१८) तक सारे शब्दों के रूप केवल वहुवच में चलते हैं। दशन् से अष्टादशन् तक के रूप दशन् के तुल्य । ३. एकोनविंशति से नवविंशति (२९) तक सारे शब्द एकवचनान्त स्त्रीलिं हैं। इनके रूप एकवचन में ही चलते हैं । इकारान्त विंशति, पष्टि, सप्तति अशीति, नवति तथा जिनके अन्त में ये हों, उनके रूप ‘मति' के तुल्य चलेंगे तकारान्त त्रिंशत्, चत्वारिंशत् के रूप स्त्रीलिंग एकवचन में चलेंगे। ४. शतम् , सहस्रम्, अयुतम् , लक्षम्, नियुतम्, प्रयुतम् , आदि शब्द सद एकवचनान्त नपुंसकलिंग हैं । गृहवत् एक० में रूप चलेंगे। कोटि के मतिवत् ५. संख्येय (क्रमवाचक विशेषण) वनाने के लिए ये नियम हैं :-(१)१ से १० तक के क्रमवाचक प्रथम, द्वितीय आदि अभ्यास २८ में दिये हैं। (२) ११ से १८ तक के संख्येय शब्दों के अन्त में 'अ' लग जाता है। जैसे-एकादशः (११ वाँ) । (३) १९ से आगे संख्येय शब्दों के अन्त में 'तम' लगता है। जैसे-विंशतितम (२० वा), त्रिंशत्तमः (३० वाँ), शततमः (१०० वां) । . - भ्वादिगण । भू धातु प्र० पु० म० पु० उ० पु० अ प्र० पु० म० पु० (३) धातुरूप-संग्रह (क) भ्वादिगण ( परस्मैपदी धातुएँ ) (१) भू (होना) लट् (वर्तमान) (१) भू (सं० रूप) (दे० अ०५) भवति भवतः भवन्ति प्र० पु० अति अतः अन्ति मवसि भवथः भवथ म० पु० असि अथः अथ मवामि भवावः भवामः उ० पु० आमि आवः आमः लोट् (आज्ञा अर्थ) लोट् (सं० रूप) (दे० अ०६ मवतु भवताम् भवन्तु अतु अताम् अन्तु मव भवतम् भवत अतम् अत मवानि भवाव भवाम आनि आव आम लङ् (अनद्यतन भूतकाल) लङ् (सं० रूप) (दे० अ० ७ भमवत् अभवताम् अभवन् अत् अताम् अन् नभवः अभवतम् अभवत अः अतम् अत भभवम् अभवाव अभवाम उ० पु० अम् आव आम सूचना-धातु के पहले अ लगेगा। विधिलिङ् (आज्ञा या चाहिए अर्थ) विधिलिङ् (सं० रूप) (दे० अ० ८) पवेत् भवेताम् भवेयुः प्र० पु० एत् एताम् एयुः भवेतम् भवेत म० पू० ए: एतम् एत पवेयम् भवेव भवेम उ० पु० एयम् एव एम लट् (मविष्यत्) लट् (सं० रूप) (दे० अ० ९) विप्यति भविष्यतः भविष्यन्ति प्र० पु० इष्यति इप्यतः इप्यन्ति विष्यसि भविप्यथः भविष्यथ इष्यसि इप्यथः इप्यय विप्यामि भविप्यावः भविष्यामः उ० पु० इप्यामि इप्यावः इप्यामः सूचना-(१) कुछ घातुओं में इष्यति वाले रूप लगते हैं और कुछ में यति, स्यतः, स्यन्ति आदि विना इ वाले रूप लगते हैं । (२) भ्वादिगण (१) की परस्मैपदी सभी धातुओं के रूप पांचों लकारों भू धातु के तुल्य चलते हैं । उपर्युक्त संक्षिप्त रूप अन्त में लगेंगे । वः म० पु० - ८४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (हस्, पठ् घातुएं (२) हस् (हँसना) (दे० अ० ५-९) सूचना--भू के तुल्य रूप चलेंगे। (३) पठ् (पढ़ना) (दे० अ० ५-६ सूचना-भू के तुल्य रूप चली लट् हसतः हसन्ति पठतः पठन्ति हसति हससि हसामि हसथः हसथ प्र० पठति म० पठसि पठामि पठथः पठय हसावः हसामः पठावः पठामः लोट लोट • पठताम् हसतु हसताम् हसन्तु प्र० पठतु पठन्तु हसत म० पठ पठतम् पठत हस हसानि हसतम् हसाव हसाम पठानि पठाव पठाम अहसत ल अहसताम् अहसन् अहसतम् अहसत प्र० अपठत् अपठताम् अपठन् अहसः म० अपठः अपठतम् अपठत अहसम् अहसाव अहसाम उ० अपठम् अपठाव अपठाम हसेत् हसेः हसेयम् विधिलिङ् हसेताम् हसेयुः हसेतम् हसेत हसेव हसेम प्र० पठेत् म० पठेः उ० पठेयम् विधिलिङ् पटेताम् पठेयुः पठेतम् पठेन पठेव पठेम लट् हसिष्यति हसिष्यतः हसिष्यन्ति प्र० पठिष्यति पठिष्यतः पठिप्यन्ति हसिष्यसि हसिष्यथः हसिष्यथ म० पठिष्यसि पठिष्यथः पठिप्यय हसिष्यामि हसिष्यावः हसिष्यामः उ० पठिष्यामि पठिप्यावः पठिप्यामः भ्वदिगण । रक्ष, वद् धातुएँ ८५ - - - - ४)रक्ष् (रक्षा करना) (दे० अ० ५-९) (५) वद् (बोलना) (दे० अ० ५-९) सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे। लट् लट् रक्षतः रक्षन्ति प्र० वदतः वदन्ति क्षति क्षसि क्षामि रक्षथः रक्षथ म० वदति वदसि वदामि वदवः वदथ रक्षावः रक्षामः वदाव: वदामः लोट लोट प्र० क्षतु क्ष क्षाणि रक्षताम् रक्षतम् रक्षाव रक्षन्तु रक्षत रक्षाम वदतु वद वदानि वदताम् वदतम् वदन्तु वदत म उ० वदाव वदाम रक्षत् प्र० रिक्षः अरक्षतम् अरक्षन् अरक्षतम् अरक्षत अरक्षाव अरक्षाम म० अवदत् अवदः अवदम् अवदताम् अवदन् अवदतम् अवदत अवदाव अवदम रक्षम् विधिलिङ् विधिलिङ् क्षेत् क्षे क्षेयम् रक्षेताम् रक्षेयुः रक्षेतम् रक्षेत रक्षेव रक्षेम म० प्र० वदेत् वदेः उ० वदेयम् वदेताम् वदेयुः वदेतम् वदेत वदेव वदेम ल्ट् लूट क्षिप्यति रक्षिप्यतः रक्षिष्यन्ति प्र० वदिप्यति वदिप्यतः वदिप्यन्ति रक्षिप्यसि रक्षिप्यथः रक्षिष्यथ म० दिग्यसि वदिप्यथः वदिप्यथ एक्षिप्यामि रक्षिप्यावः रक्षिप्याव: वदिप्यामि वदिप्यावः वदिप्यामः प्रा० रचनानुवादकौमुदी (पच् नम् धा (६) पच (पकाना) (दे०अ०५-९)(७)नम् (प्रणाम करना) (दे०अ०५. सूचना--भू के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-भू के तुल्य रूप चलं लट् लट् . पचतः पचन्ति पचति पचसि पचामि नमतः नमन्ति पचथः पचथ प्र० नमति म० नमसि उ० नमामि नमथ: नमथ पचावः पचामः नमाव: नमामः लोट लोट पचतु प्र० नमतु पच पचताम् पचतम् पचाव पचन्तु पचत पचानि म० नम उ० नमानि नमताम् नमन्तु नमतम् नमत नमाव नमाम पचाम लङ् अपचत् अपच: अपचताम् अपचन् अपचतम् अपचत अपचाव अपचाम प्र० अनमत् म० अनमः उ० अनमम् अनमताम् अनमन् अनमतम् अनमत अनमाव अनमाम अपचम् पचेत् पचेः पचेयम् विधिलिङ् पचेताम् पचेयु: पचेतम् पचेत पचेव पचेम प्र० नमेत् म० नमः उ० नमेयम् विधिलिङ् नमेताम् नमेयुः ननेतम् नमेत नमेव नमेम पक्ष्यतः पक्ष्यन्ति पक्ष्यति पक्ष्यसि पक्ष्यामि पक्ष्यथः पक्ष्यथ . प्र० नंस्यति म० नंस्यसि उ० नस्यामि नंस्यतः नस्यन्ति नस्यथः नस्यय नस्यावः नस्यामः पक्ष्याव: पक्ष्यामः भ्वादिगण । गम्, दृश् धातुएँ (८)गम् (जाना) (दे० अ० ५-९) (९)दृश् (देखना) (दे० अ० ५-९) सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे । गम् को लट्, लोट्, लङ, विधि दृश् को लट्, लोट, ल, विधि- लिङ् में गच्छ होता है। लिङ् में पश्य होता है। लट् गच्छतः गच्छन्ति प्र० पश्यतः पश्यन्ति गच्छति गच्छसि गच्छामि गच्छथः गच्छथ म० पश्यति पश्यसि पश्यामि पश्यथः पश्यथ गच्छावः गच्छांमः उ० पश्यावः पश्यामः लोट लोट गच्छन्तु प्र० पश्यताम् गच्छतु गच्छ गच्छानि गच्छताम् गच्छतम् पश्यन्तु पश्यत गच्छत पश्यतु पश्य पश्यानि म० पश्यतम् गच्छाव गच्छाम पश्याव पश्याम लङ् ल अपश्यत् अगच्छत् अगच्छताम् अगच्छन् प्र० अगच्छ: अगच्छतम् अगच्छत म० अगच्छम् अगच्छाव अगच्छाम उ० अपश्यः अपश्यताम् अपश्यन् अपश्यतम् अपश्यत अपश्याव अपश्याम अपश्यम् गच्छेन् विधिलिङ् गच्छेताम् गच्छेयुः गच्छेः गच्छेतम् गच्छेत गच्छेयम् गच्छेव गच्छेम प्र० पश्येत् विधिलिङ् पश्येताम् पश्येयुः पश्येतम् पश्येत पश्येव पश्येम म० पश्येः उ० पश्येयम् ल्ट् द्रक्ष्यतः द्रक्ष्यन्ति लूट गमिप्यति गमिष्यतः गमिष्यतः गमिष्यन्ति प्र० द्रक्ष्यति गमिष्यसि गमिष्यथ: गमिष्यथ म० द्रक्ष्यसि गमिष्यामि गमिष्याव: गमिष्यामः उ० द्रक्ष्यामि द्रक्ष्यथः द्रक्ष्यथ द्रक्ष्याव: द्रक्ष्यामः ८८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (सद्, स्था धातु (१०) सद् (वैठना) (दे० अ०५-९) (११) स्था (रुकना) (दे० अ० ५-९) सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे। सद् को लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ् स्था को लट्, लोट्, लङ्, विधिलि में सीद् होता है। में तिष्ठ होता है। सीदति सीदसि सीदामि लट् सीदत. सीदथः सीदावः सीदन्ति प्र० तिष्ठति सीदथ म० तिष्ठसि सीदामः उ० तिष्ठामि तिष्ठत: तिष्ठथः तिष्ठाव: तिष्ठन्ति तिष्ठय तिष्ठाम लोट सीदताम् सीदन्तु सीदतम् सीदत सीदाव सीदाम सीदतु सीद सीदानि लोट तिष्ठताम् तिष्ठन्द्र तिष्ठतम् तिष्ठत तिष्ठाव तिष्ठाः प्र० तिष्ठतु म० तिष्ठ उ० तिष्ठानि असीदत् असीदः असीदम् ला असीदताम् असीदन् प्र० अतिष्ठत् अतिष्ठताम् अतिष्ठन् असीदतम् असीदत म० अतिष्ठः अतिष्ठतम् अतिष्ठत असीदाव असीदाम उ० अतिष्ठम् अतिष्ठाव अतिष्ठा विधिलिङ् विधिलिङ् सीदेताम् सीदेयुः प्र० तिप्ठेत् तिष्ठेताम् तिप्टर सीदेतम् सीदेत तिष्ठेतम् तिष्ठे सीदेव सीदेम उ० तिष्ठेयम् तिष्ठेव तिष्ठर म० तिप्ठे: सीदेत् सीदे: सीदेयम् . सत्स्यति सत्स्यसि सत्स्यामि लूट सत्स्यतः सत्स्यन्ति प्र० स्थास्यति स्थास्यतः स्थास सत्स्यथः सत्स्यथ म० स्थास्यसि स्थास्यथः स्थास सत्स्यावः सत्स्यामः उ० स्थास्यामि स्थास्याव: स्थार भ्वादिगण । पा, स्मृ, जि धातुएं ८९ प्र० म० प्र० म० (१२) पा (पीना) (भू के तुल्य) (१३) स्मृ (स्मरण करना) (दे०अ० ५-९) सूचना-पा को लट्, लोट्, लङ्, सूचना-भू के तुल्य रूप चलेंगे। 'विधिलिङ् में पिव हो जाता है। लट् लट् पिवति पिवतः पिवन्ति स्मरति स्मरतः स्मरन्ति पिवसि पिवयः पिवथ स्मरसि स्मरथः स्मरथ पिवामि पिचावः पिवामः स्मरामि स्मरावः स्मरामः लोट लोट - पिबतु पिवताम् पिवन्तु स्मरतु स्मरताम् स्मरन्तु पिव पिवतम् पिवत स्मर स्मरतम् स्मरत पिवानि पिवाव पिवाम स्मराणि स्मराव स्मराम ल अपिवत् अपिवताम् अपिवन् प्र० अस्मरत् अस्मरताम् अस्मरन् अपिवः अपिवतम् अपिवत म० अस्मरः अस्मरतम् अस्मरत गि अपिवम् अपिवाव अपिवाम उ० अस्मरम् अस्मराव अस्मराम विधिलिङ् विधिलिङ् पिवेत् पिवेताम् पिवेयु: प्र० स्मरेत् ‘स्मरेताम् स्मरेयुः पिवेः पिवेतम् पिवेत म० स्मरेः स्मरेतम् स्मरेत पिवेयम् पिवेम पिवेम उ० स्मरेयम् स्मरेव स्मरेम लूट पास्यति पास्यतः पास्यन्ति प्र० स्मरिष्यति स्मरिष्यतः स्मरिप्यन्ति पास्यथ म० स्मरिष्यसि स्मरिष्यथः स्मरिष्यथ पास्यामि पास्यावः पास्यामः उ० स्मरिष्यामि स्मरिप्यावः स्मरिप्यामः पद (१४) जि (जीतना) (भू के तुल्य) लट-जयति, जयतः, जयन्ति । जयसि, से जयथः, जयथ । जयामि, जयावः, जयामः । लोट-जयतु, जयताम्, जयन्तु । ‘ जय, जयतम्, लयत । जयानि, जयाव, जयाम । लङ्- अजयत्, अजवताम्, अजयन् । अजयः, अजयतम्, अजयत । अजयम्, अजायव, अजयाम। विधि- लिङ- जयेत्, जयेताम्, जयेयुः । - जयेः, जयेतम्, जयेत । जयेयम्, जयेव, जयेम । लुट-जेष्यति, जेष्यतः, जेष्यन्ति । जेप्यसि, जेप्ययः, जेप्यथ । जेप्यामि, जेप्यावः, जेष्यामः । पास्यसि पास्यथः -- - . ७ ९० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (आत्मनेपदी सेव् धा आत्मनेपदी धातुएँ (१५) सेव (सेवा करना) लट् (वर्तमान) (१५) सेव् (सं० रूप) दे० अ० । सेवते सेवेते सेवन्ते प्र० पु० अते एते अन्ते सेवसे सेवेथे सेवध्वे म० पु० असे एथे अध्ये सेवे सेवावहे सेवामहे उ० पु० ए आवहे लोट् (आज्ञा अर्थ) लोट् (सं० रूप) (दे० अ० १ सेवताम् सेवेताम् सेवन्ताम् प्र० पु० अताम् एताम् अन्ता सेवस्व सेवेथाम् सेवध्वम् म० पु० अस्व एथाम् अवम सेवै सेवावहै सेवामहै उ० पु० ऐ आवहै आमहै लङ् (अनद्यतन भूतकाल) लङ् (सं० रूप) (दे० अ०२ असेवत असेवेताम् असेवन्त प्र० पु० अत एताम् अन्त असेवथाः असेवेथाम् असेवध्वम् म० पु० अथाः एथाम् अध्व असेवे असेवावहि असेवामहि उ० पु० ए आवहि सूचना-धातु से पहले 'अ' लगेग विधिलिङ् (आज्ञा या चाहिए अर्थ) विधिलिङ् (सं० रूप) (दे० अ० २ सेवेत सेवेयाताम् सेवेरन् प्र० पु० एत एयाताम् एरन् सेवेथाः सेवेयाथाम् सेवेध्वम् म० पु० एथाः एयाथाम् एवम् सेवेय सेवेवहि सेवेमहि उ० पु० एय एवहि एमहि लट् (भविष्यत्) लट् (सं० रूप) (दे० अ० २ सेविष्यते सेविष्येते सेविष्यन्ते प्र० पु० इष्यते इप्येते इप्यन सेविष्यसे सेविष्येथे सेविष्यध्वे म० पु० इप्यसे इयेथे सेविष्ये सेविष्यावहे सेविष्यामहे उ० पु० इप्ये इप्यावहे इप्या सूचना-(१) कुछ धातुओं में इष्यते वाले रूप लगते हैं और कुछ स्यते, स्येते, स्यन्ते आदि विना इ वाले रूप लगते हैं। (२) भ्वादिगण (१) की आत्मनेपदी सभी धातुओं के रूप पांचों लया में सेव धातु के तुल्य चलते हैं । उपर्युक्त संक्षिप्त रूप अन्त में लगेंगे । आम इप्या - .
भ्वादिगण । लभ, वृध धातुएँ (१६) लभ् (पाना) (दे०अ० १८-२२) (१७) वृध् (बढ़ना) (दे०अ०१८-२२) सूचना-सेव् के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-सेव के तुल्य रूप चलेंगे। प्र० म० उ० .. ल लिभते लभेते लभन्ते लमसे लभेथे लमध्ये लभावहे लभामहे लोट लभताम् लभेताम् लभन्ताम् लभेथाम् लभध्वम् लिम लभावहै लभामहै वर्धते वघेते वर्धन्ते वर्घसे वर्धेथे वर्धध्वे वर्ध वर्षावहे वर्धामहे लोट प्र० वर्धताम् वर्धेताम् वर्धन्ताम् वर्धथाम् र्धध्वम् वर्धं वर्धावहै वर्षामहे म० वर्षस्व 1- त अलभे लङ लङ अलभत अलभेताम् अलभन्त प्र० अवर्वत अवर्धेताम् अवर्धन्त अलभथाः अलभेथाम् अलमध्वम् म० अवर्घथाः अवघेथाम् अवर्धध्वम् अलभावहि अलमामहि उ० अवर्धे अवर्धावहि अवर्धामहि विधिलिङ लभेत लभेयाताम् लभेरन् वर्धत वर्धयाताम् वधैरन् लभेथाः लभेयाथाम् लभेध्वम् म० वर्धथा: वर्धेयाथाम् वर्धवम् लभेय लभेवहि लभेमहि वर्षय वर्षेवहि वर्धेमहि . विधिलिङ, प्र० । उ० प्र० लप्स्यते लप्स्यसे लुट् लप्स्येते लप्स्यन्ते लप्स्येथे लप्स्यध्वे लप्स्यावहे लप्स्यामहे उ० लद वधिप्यते वधिप्येते वधिप्यन्ते वधिप्यसे वधियेथे वधिप्यध्वे वधिये वधिप्यावहे वधिप्यामहे लप्स्ये.
९२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (मुद्, सह धातुः (१८) मुद् (प्रसन्न होना) (दे०अ०१८-२२) (१९) सह, (सहना) (दे०अ०१८-- सूचना-सेव् के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-सेव के तुल्य रूप चलेगे लट् लट् मोदते मोदेते मोदन्ते प्र० सहते सहेते सहन्ते मोदसे मोदेथे मोदध्वे म० सहसे सहेथे सहध्वे मोदे मोदावहे मोदामहे उ० सहे सहावहे सहामहे लोट लोट मोदताम् मोदेताम् मोदन्ताम् प्र० सहताम् सहेताम् सहन्ताम् मोदस्व मोदेथाम् मोदध्वम् म० सहस्व सहेथाम् संहध्वम् मोदै मोदावहै मोदामहै उ० सहै सहावहै सहामहै लङ् लड़ अमोदत अमोदेताम् अमोदन्त प्र० असहत असहेताम् असहन्त अमोदथाः अमोदेथाम् अमोदध्वम् म० असहथाः असहेथाम् असहवा अमोदे अमोदावहि अमोदामहि उ० असहे असहावहि असामा विधिलिङ् मोदेत मोदेयाताम् मोदेरन् प्र० सहेत सहेयाताम् सहेरन् मोदेथाः मोदेयाथाम् मोदेध्वम् म० सहेथाः सहेयाथाम् राहेध्वम् मोदेय मोदेवहि मोदेमहि उ० सहेय सहेवहि महेमहि विधिरिङ्ग लुट लुट मोदिष्यते मोदिष्येते मोदिष्यन्ते प्र० सहिष्यते सहिप्यते सहिप्यन्त मोदिष्यसे मोदिष्येथे मोदिष्यध्वे म० सहिप्यसे सहिप्येथे महिप्यध्वं मोदिष्ये । मोदिष्यावहे मोदिप्यामहे उ० सहिष्ये सहिप्यावहे सहिष्यामहे भ्वादिगण । याच्, नो धातु m (२०) याच् (माँगना) (सेव् के तुल्य) (२१) नी (ले जाना) उभयपदी धातु लट् परस्मैपद-लट् याचते याचेते याचन्ते प्र० नयति नयतः नयन्ति याचसे याचेथे याचवे म० नयसि नयथः नयय याचे याचावहे याचामहे उ० नयामि नयावः नयामः लोट लोट याचताम् याचेताम् याचन्ताम् प्र० नयतु नयताम् नयन्तु याचस्व याचेथाम याचध्वम् म० नय नयतम् नयत याचं याचावहै याचामहै उ० नयानि नयाव नयाम .... अनयः अनयत ल अयाचत अयाचेताम् अयाचन्त प्र० अनयत् अनयताम् अनयन् अयाचथाः अयाचेथाम अयाचध्वम् म० अनयतम् अयाने अयाचावहि अयाचामहि उ० अनयम् अनयाव अनयाम विधिलिङ विधिलिङ् याचेत याचेयाताम् याचेरन् प्र० नयेत् नयेताम् नयेयुः याचेयाः याचेयाथाम् याचेध्वम् म० नयेः नयेतम् नयेत याचेय याचेवहि याचेमहि उ० नयेयम् नयेव नयेम ल्ट् लट् याचिप्यते याचिष्येते याचिष्यन्ते प्र० नेष्यति नेष्यतः नेप्यन्ति याचिप्यसे याचियेथे याचिष्यध्वे म० नेप्यसि नेप्यथः नेप्यथ याचिप्ये याचिष्यावहे याचिप्यामहेउ० नेष्यामि नेप्यावः नेप्यामः (२१) नी (आत्मनेपद)-लट्-नयते, नयेते, नयन्ते । नयसे, नयेथे, नयध्वे । नये, नयावहे, नयामहे । लोट-नयताम्, नयेताम्, नयन्ताम् । नयस्व, नयेथाम्, नयध्वम् । नयै, नयावहै, नयामहै । लङ-अनयत, अनयेताम्, अनयन्त । अन- यथाः, अनयेथाम्, अनयध्वम् । अनये, अनयावहि, अनयामहि । विधिलिङ्ग- नयेत, नयेयाताम्, नयेरन् । नयेथाः, नयेयाथाम्, नयेध्वम् । नयेय, नयेवहि, नयेमहि । लुट्नेष्यते, नेष्येते, नेप्यन्ते । नेप्यसे, नेप्येथे, नेप्यन्वे । नेप्ये, नेप्यावहे, नेष्यामहे ।
प्रा० रचनानुवादकौमुदी (ह धान (२२) ह (ले जाना) उभयपदी धातु (भू और सेव के तुल्य) परस्मैपद-लट आत्मनेपद-ल हरतः हरन्ति हरति हरसि हरामि हरथः हरथ प्र० हरते म० हरसे उ० हरे हरेते हरेथे हरावहे हरन्ते हरवे हरामहे हरावः हराम लोट हरतु हरताम् हरन्तु हरन्ताम् लोट प्र० हरताम् हरेताम् म० हरस्व हरेथाम् उ० हरै हरावह हरतम् हरत हरध्वम् हामहै हराणि हराव हराम अहरताम् अहरन् अहरत् अहरः अहरम् अहरत अहरतम् अहराव अहराम लङ् प्र० अहरत अहरेताम् अहरन्त म० अहरथा: अहरेथाम् अहरध्व उ० अहरे अहरावहि अहरामा विधिलिङ् प्र० हरेत हरेयाताम् हरेरन् म० हरेथाः हरेयाथाम् हरेध्वम् उ० हरेय हरेवहि हरेमहि विधिलिङ् हरेत् हरेताम् हरेयुः हरेः हरेतम् हरेत हरेयम् हरेव हरेम लट् हरिष्यति हरिष्यतः हरिष्यन्ति प्र० हरिष्यते हरिप्येते हरिप्यन्ते हरिष्यसि हरिष्यथः हरिष्यथ म० हरिष्यसे हरिप्येथे हरियाचे हरिष्यामि हरिष्यावः हरिष्यामः उ० हरिप्ये हरिप्यावहे हरिप्यागों अस्, दा धातु ९५ २३)अस् (होना) (दे० अ० १०-११) (२४)दा (देना) (दे० अ० २४-२५) सूचना---अस् को लट् में भू हो जाता है । भू हो जाता है। (परस्मैपद के रूप ये हैं)- ..- अदादिगण-लट् स्तः सन्ति जुहोत्यादिगण-लट् ददाति दत्तः ददति प्र० अस्ति असि अस्मि स्थ म० ददासि दत्यः दत्य स्मः उ० ददामि दद्रः दद्मः लोट लोट F स्ताम् सन्तु प्र० दत्ताम् ददतु अस्तु एघि असानि स्तम् स्त म० ददातु देहि ददानि दत्तम् दत्त असाव असाम ददाव ददाम ल अददात् अदत्ताम् अददुः ल आसीत् आस्ताम् आसन् आसीः आस्तम् आस्त आसम् आस्व आस्म विधिलिङ् म० अददाः अदत्तम् अदत्त उ० अददाम् अदद्व अदम विधिलिङ् स्यात् स्यास्ताम् स्युः प्र० दद्यात् दद्याताम् दद्युः स्याः स्यातम् स्यात म० दद्या: दद्यातम् दद्यात स्याम् स्याव स्याम उ० दद्याम् दद्याव दद्याम टूट दास्यति दास्यतः दास्यन्ति भविष्यति भविप्यतः भविष्यन्ति प्र० भविष्यसि भविप्यथः भविप्यथ म० भविष्यामि भविप्यावः भविप्यामः उ० दास्यसि दास्यथः दास्यय दास्यामि दास्यावः दास्यामः (२५)दिव (चमकना आदि) (दे०अ० ८) (२६) नृत् (नाचना) (दे०३० ८. सूचना-धातु में य लगाकर भू के तुल्य। सूचना-दिव के तुल्य रूप चल दिवादिगण-लट् लट् दीव्यन्ति दीव्यति दीव्यतः दीव्यसि दीव्यथः दीव्यामि दीव्यावः नृान्त नृत्यय दीव्यथ प्र० नृत्यति नृत्यतः म० नृत्यसि नृत्यथः उ० नृत्यामि नृत्यावः लोट दीव्यामः नृत्यामः प्र० लोट दीव्यतु दीव्यताम् दीव्यन्तु दीव्य दीव्यतम् दीव्यत दीव्यानि दीव्याव दीव्याम म० नृत्यतु नृत्यताम् नृत्यन्तु नृत्य नृत्यतम् नृत्यत नृत्यानि नृत्याव नृत्याम म० लङ् अदीव्यत् अदीव्यताम् अदीव्यन् प्र० अनृत्यत् अनृत्यताम् अनृत्यन अदीव्यः अदीव्यतम् अदीव्यत अनृत्यः अनृत्यतम् अनृत्या अदीव्यम् अदीव्याव अदीव्याम उ० अनृत्यम् अनृत्याव अनृत विधिलिङ् विधिलिङ् दीव्येत् दीव्येताम् दीव्येयुः प्र० नृत्येत् नृत्येताम् नृत्येयु दीव्येः दीव्येतम् दीव्येत म० नृत्येः नृत्येतम् नृत्येत दीव्येयम् दीव्येव दीव्येम नृत्येयम् नृत्येव नृत्येम लट् लट् देविष्यति देविष्यतः देविष्यन्ति प्र० नतिप्यति नतिप्यतः नति देविष्यसि देविष्ययः देविण्यथ म० नतिप्यसि नतिप्यथः नतिष देविष्यामि देविप्यावः देविष्यामः उ० नतिप्यामि नतिप्यावः नति दिवादिगण । नश, भ्रम् धातुएँ ९७ उ० ... २७) नश् (नष्ट होना) (दे० अ० ८) (२८) भ्रम् (घूमना) (दे०अ० ८) सूचना-दिव के तुल्य रूप चलेंगे। सूचना-दिव के तुल्य रूप चलेंगे। लट् नश्यति नश्यतः नश्यन्ति प्र० भ्राम्यति भ्राम्यतः भ्राम्यन्ति तश्यसि नश्यथः नश्यथ म० भ्राम्यसि भ्राम्यथः भ्राम्यथ नश्यामि नश्यावः नश्यामः भ्राम्यामि भ्राम्यावः भ्राम्या-: लाट लोट नश्यतु नश्यताम् नश्यन्तु प्र० भ्राम्यतु भ्राम्यताम् भ्राम्यन्तु भ्राम्यन्तु नश्य नश्यतम् नश्यत म० भ्राम्यतम् भ्राम्यत नश्यानि नश्याव नश्याम उ० भ्राम्याणि नाम्याव भ्राम्याम लङ अनश्यत् अनश्यताम् अनश्यन् प्र० अभ्राम्यत् अभ्राम्यताम् अभ्राम्यन् अनश्यः अनश्यतम् । अनश्यत म अभ्राम्यः अभ्राम्यतम् अभ्राम्यत अनश्यम् अनश्याव अनश्याम उ० अभ्राम्यम् अभ्राम्याव अभ्राम्याम विधिलिङ नश्येत् नश्येताम् नश्येयुः प्र० भ्राम्येत् भ्राम्येताम् भ्राम्येयुः नश्येतम् नश्येत म० भ्राम्येः भ्राम्येतम् भ्राम्येत नश्येयम् नश्येव नश्येम भ्राम्येयम् भ्राम्येव भ्राम्येम लुट लुट (क) नशिप्यति नशिष्यतः नशिष्यन्ति प्र. भ्रमिष्यति भ्रमिप्यतः भ्रमिष्यन्ति नशिप्यसि नशिप्यथः नशिष्यथ म० भ्रमिष्यसि भ्रमिष्यथः भ्रमिप्यथ नशिप्यामि नशिष्यावः नशिष्याम: उ० भ्रमिष्यामि भ्रमिप्यावः भ्रमिप्यामः (ख) नक्ष्यति नक्ष्यतः नङ्ख्यन्ति प्र० सूचना-भ्रम के रूप भू धातु के नक्ष्यसि नक्ष्यथः नक्ष्यथ म० तुल्य भो चलते हैं। जैसे-भ्रमति, नध्यामि नझ्यावः नङ्ख्यामः उ० भ्रमतु, अभ्रमत्, भ्रमेत्, भ्रमिप्यति । विधिलिङ : नश्ये:
न विधिलिङ, ९८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (चु, आप, शक् धातु (२९) (सुनना) (दे०अ० २६-२७) (३०) आप् (पाना) (दे०१०२६-१० भ्वादिगण-लट् (श्रु को शृ) स्वादिगणः-लट् शृणोति शृणुतः शृण्वन्ति प्र० आप्नोति आप्नुतः आप्नु, शृणोषि शृणुयः शृणुय म० आप्नोषि आप्नुथः आप्नुप शृणोमि शृणुत्रः शृणुम: उ० आप्नोमि आप्नुवः आप्नुमः लोट (श्रु को शृ) लोट शृणोतु शृणुताम् शृण्वन्तु प्र० आप्नोतु आप्नुताम् आप्नुवन्नु शृणु शृणुतम् शृणुत म० आप्नुहि आप्नुतम् आप्नुत शृणवानि शृणवाव शृणवाम उ० आप्नवानि आप्नवाव आप्नवान लङ (श्रु को शृ) लड अशृणोत् अशृणुताम् अशृण्वन् प्र० आप्नोत् आप्नुताम् आप्नुवन् अशृणोः अशृणुतम् अशृणुत म० आप्नोः आप्नुतम् आप्नुत अशृणुवम् अशृणुव अशृणुम उ० आप्नुवम् आप्नुव आप्नुम विधिलिङ (श्रु को शृ) शृणुयात् शृणुयाताम् शृणुयु: प्र० आप्नुयात् आप्नुयाताम् आप्नुयुः शृणुयाः शृणुयातम् शृणुयात म० आप्नुया: आप्नुयातम् आप्नुयात शृणुयाम् शृणुयाव शृणुयाम उ० आप्नुयाम् आप्नुयाव आप्नुयाम लुट लुट श्रोष्यति श्रोष्यतः श्रोष्यन्ति प्र० आप्स्यति आप्स्यत. आप्स्पति श्रोष्यसि श्रोष्यथ: श्रोष्यथ म० आप्स्यसि आप्स्यथः आस्थय श्रोप्यामि श्रोष्याव: श्रोष्यामः उ० आप्स्यामि आप्स्याव: (३१) शक् (सकना) । सूचना-आप के तुल्य रू चलेंगे। लट-शक्नोति, शक्नुतः, शक्नुवन्ति । शक्नोपि, शक्नुथः, शक्नुय । शक्नोमि शक्नुवः, शक्नुम. । लोट शक्नोतु, शक्नुताम्, शक्नुवन्तु । गक्नुहि, गानुतम् शक्नुत । शक्नवानि, शक्नवाव, शक्नवाम। लङ-अशक्नोत्, अशवनुताम् अशक्नुवन् । अशक्नोः, अशक्नुतम् , अशक्नुत । अशक्नवम्, अशक्नुव, अशक्नुम विधिलिङ-शक्नुयात्, शक्नुयाताम्, शक्नुयुः । शवनुयाः, शक्नुयातम्, शक्नुयात शवनुयाम्, शक्नुयाव, शक्नुयाम । लुट -शक्ष्यति, शक्ष्यतः, शक्ष्यन्ति । गध्यान शक्ष्यथः, शक्ष्यथ । शक्ष्यामि, शक्ष्याव:, शक्ष्यामः । आस्थाम । -- । तुदादिगण । तुद्. इष धातुएँ ९९ ३२) तुद् (दुःख देना) (दे० अ०६) (३३) इष् (चाहना) (दे० अ० ६) चना- तुद् को लट्, लोट्, लङ् और सूचना-इष् को लट्, लोट्, लङ् और वधिलिङ् में गुण . नहीं होगा । भू के विधिलिङ् में इच्छ होता है । भू के पुल्य रूप चलेंगे। तुल्य रूप चलेंगे। तुदादिगण-लट लट् उदति तुदतः तुदन्ति इच्छति इच्छतः इच्छन्ति सुदसि तुदथः तुदथ म० इच्छसि इच्छथः इच्छथ तुदामः इच्छामि इच्छावः इच्छामः लोट लोट तुदतु तुदताम् तुदन्तु इच्छतु इच्छताम् इच्छन्तु तुद तुदतम् तुदत इच्छ इच्छतम् इच्छत तुदानि तुदाव तुदाम उ० इच्छानि इच्छाव प्र० तुदामि तुदावः उ० म० इच्छाम लङ् प्र० ऐच्छत् म० ऐच्छः उ० ऐच्छम् अतुदत् अतुदताम् अतुदन् अतुदः अतुदतम् अतुदत अतुदम् अतुदाव जतुदाम विधिलिङ् तुदेत् तुदेताम् तुदेयुः तुदेतम् तुदेत तुदेयम् तुदेव तुदेम ऐच्छताम् ऐच्छन् ऐच्छतम् ऐच्छत ऐच्छाव ऐच्छाम विधिलिङ् इच्छेताम् इच्छेयुः इच्छेतम् इच्छेत इच्छेव इच्छेम तुदेः प्र० इच्छेत् म० इच्छेः उ० इच्छेयम् लट् लट् तोत्स्यति तोत्स्यतः तोत्स्यन्ति प्र० एपिप्यत एषिप्यतः एपिप्यन्ति तोत्स्यसि तोत्स्यथः तोत्स्यथ म० एषिष्यसि एपिप्यथः एपिप्यथ तोत्स्यामि तोत्स्यावः तोत्स्यामः उ० एपिष्यामि एषिष्यावः एपिण्यामः प्रा० रचनानुवादकौमुदी (प्रच्छ, लिख् धातुएं (३४) प्रच्छ (पूछना) (दे० अ०६) (३५) लिख् (लिखना) (दे० अ० १ सूचना-लट्, लोट्, लङ् और विधि- सूचना-लट्, लोट्, लङ् और विवि लिङ् में प्रच्छ को पृच्छ हो जाता लिङ् में लिख् को गुण नहीं होगा है । भू या तुद् के तुल्य रूप चलेंगे। भू या तुद् के तुल्य रूप चलेंगे। लट् पृच्छति पृच्छतः पृच्छसि पृच्छथः पृच्छामि पृच्छावः लोट पृच्छन्ति प्र० पृच्छथ म० पृच्छामः उ० लट् लिखति लिखतः लिसन्ति लिखसि लिखथः लिखथ लिखामि लिखावः लिखामः पृच्छतु पृच्छताम् पृच्छ पृच्छतम् पृच्छानि पृच्छाव पृच्छन्तु पृच्छत पृच्छाम लोट प्र० लिखतु लिखताम् लिखन्तु लिख लिखतम् लिखत लिखानि लिखाव लिखाम म० अपृच्छत् अपृच्छताम् अपृच्छन् प्र० अलिखत् अलिखताम् अलिखन् अपृच्छः अपृच्छतम् अपृच्छतम् अपृच्छत म० अलिखः अलिखः अलिखतम् अलिखत अपृच्छम् अपृच्छाव अपृच्छाम उ० अलिखम् अलिखाव अलिखाम विधिलिङ पृच्छेत् पृच्छेताम् पृच्छेयुः प्र० लिखेत् लिखेताम् लिखेयुः पृच्छेः पृच्छेतम् पृच्छेत प० लिखेः पृच्छेयम् पृच्छेब पृच्छेम उ० लिखेयम् लिखेव विधिलिङ् लिखेतम् .लिखेत लिखेम लट् प्रक्ष्यति प्रक्ष्यतः प्रक्ष्यसि प्रक्ष्यथः प्रक्ष्यामि प्रक्ष्याव: लट् प्रक्ष्यन्ति प्र०' लेखिष्यति लेखिष्यतः लेखिप्यन्ति प्रक्ष्यथ म० लेखिष्यसि लेखिष्यथः लेखिप्यय प्रक्ष्यामः उ० लेखिष्यामि लेखिष्याव: लेखिप्याम तनादिगण कृ धातु । क्यादिगण क्रो धातु १०१ ३६) कृ (करना) (दे० अ० १२-१३) (३७) को (खरीदना)(दे०अ० २८-२९) केवल परस्मैपद के रूप यहाँ दिये हैं। ) (केवल परस्मैपद के रूप यहाँ दिये हैं। ) तनादिगण-लट् क्यादिगण-लट् करोति कुरुतः कुर्वन्ति प्र. क्रीणाति ऋणीतः क्रीणन्ति करोपि कुरुथः कुरुथ म० क्रीणासि क्रीणीयः क्रीणीथ करोमि कुर्वः कुर्म क्रीणामि क्रीणीवः क्रीणीमः उ० लोट करोतु कुरुताम् कुरु कुरुतम् करवाणि करवाव कुर्वन्तु कुरुत लोट प्र० क्रीणातु क्रीणीताम् क्रीणन्तु म० क्रीणीहि क्रीणीतम् कोणीत क्रीणानि कीणाव क्रीणाम करवाम अकरोत् अकुरुताम् अकुर्वन अकरोः अकुरुतम् अकुरुत 'भकरवम् अकुर्व अकुर्म ल प्र० अक्रीणात् अक्रीणीताम् अक्रीणन् म० अक्रीणाः अक्रीणीतम् अक्रीणीत उ० अक्रीणाम् अक्रीणीव अक्रीणीम विधिलिङ् कुर्यात् कुर्याताम् कुर्युः कुर्याः कुर्यातम् कुर्यात कुर्याम् कुर्याव कुर्याम विधिलिङ् प्र० क्रीणीयात् क्रीणीयाताम् क्रीणीयुः क्रीणीयाः क्रीणीयातम् क्रोणीयात उ० क्रीणीयाम् क्रीणीयाव क्रीणीयाम म० करिष्यति करिष्यतः करिप्यन्ति. प्र० केष्यति करिष्यसि करिप्यथः करिप्यथ म० ऋप्यसि करिष्यामि करिप्यावः करिप्यामः उ० क्रेप्यामि ल्ट् ऋप्यथः क्रेप्यथः ऋप्यावः ऋप्यन्ति ऋयय यामः १०२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (ज्ञा, ग्रह, घाई । r (३८) ज्ञा (जानना) (दे०अ०२८-२९) (३९) ग्रह, (लेना) (दे०अ०२८-२ सूचना-लट्, लोट्, विधिलिङ् में सूचना-लट्, लोट्, विधिलिः ज्ञा को 'जा' हो जाता है। में ग्रह को गृह हो जाता क्री के तुल्य रूप चलेंगे। क्री के तुल्य रूप चलेंगे। (rs) E CE प्र० गृहीत यानि घासत प्र० लट् जानाति जानीतः जानन्ति प्र० गृह्णाति , गृहीतः गृहन्ति जानासि जानीथः जानीथ म० गृह्णासि गृह्णीथः गृहीव केवानि जानामि जानीवः जानीमः उ० गृह्णामि गृह्णीवः गृहीमः लोट लोट माया जानातु जानीताम् जानन्तु गृह्णातु गृहीताम् गृहन्तु प्रत्य जानीहि जानीतम् जानीत म. गृहाण गृहीतम् जानानि जानाव जानाम उ० गृह्णानि गृह्णाव गृहाम लङ् ल अजानात् अजानीताम् अजानन् अगृह्णात् अगृहीताम् अग्रह जोय अजानाः अजानीतम् अजानीत अगृहा: अगृह्णीतम् अगृहीत आजानाम् अजानीव अजानीम उ० अगृह्णाम् अगृह्णीव अगृह्णीम विधिलिङ् विधिलिङ जानीयात् जानीयाताम् जानीयुः प्र० गृह्णीयात् गृह्णीयताम् गृहीयुः जानीयाः जानीयातम् जानीयात म० गृह्णीयाः गृह्णीयातम् गृह्णीयात ये जानीयाम् जानीयांव जानीयाम उ० गृह्णीयाम् गृह्णीयाव गृह्णीयाम को लट् लट् ज्ञास्यति ज्ञास्यन्ति प्र० ग्रहीष्यति ग्रहीष्यति ग्रहीष्यतः गृहीप्यन्ति । ज्ञास्यसि ज्ञास्यथ म० ग्रहीष्यसि ग्रहीष्यथः ग्रहीप्यय ज्ञास्यामि ज्ञास्यावः उ० ग्रहीष्यामि ग्रहीष्यावः ग्रहीप्यामः । म० शोखर - ज्ञास्यतः ज्ञास्यथ: ज्ञास्यामः चुरादिगण । चुर्, चिन्त् धातुएं १०३ म सूचना-चुर और चिन्त के अन्त में 'अय' लगाकर भू के तुल्य रूप चलते । केवल परस्मैपद के रूप यहाँ दिये हैं। (४०) चुर् (चुराना) (दे०अ० ७) (४१) चिन्त् (सोचना) (दे०अ० ७) चुरादिगण-लट् लट् रियति चोरयतः चोरयन्ति प्र० चिन्तयति चिन्तयतः चिन्तयन्ति औरयसि चोरयंथः चोरयथ म० चिन्तयसि चिन्तयथः चिन्तयथ गोरयामि चोरयाव: चोरयामः उ० चिन्तयामि चिन्तयावः चिन्तयामः लोट लोट बोरयतु चोरयताम् चोरयन्तु प्र० चिन्तयतु चिन्तयताम् चिन्तयन्तु चोरयतम् चोरयत म० चिन्तय चिन्तयतम् चिन्तयत वोरयाणि चोरयाव चोरयाम उ० चिन्तयानि चिन्तयाव चिन्तयाम . बोरय ल अचोरयत् अचोरयताम् अचोरयन् प्र० अचिन्तयत् अचिन्तयताम् अचिन्तयन् अचोरयः अचोरयतम् अचोरयत म० अचिन्तयः अचिन्तयतम् अचिन्तयत अचोरयम् अचोरयाव अचोरयाम उ० अचिन्तयम् अचिन्तयाव अचिन्तयाम विधिलिङ् विधिलिङ् चोरयेत् चोरयेताम् चोरयेयुः प्र० चिन्तयेत् चिन्तयेताम् चिन्तयेयुः चोरये: चोरयेतम् चोरयेत म० चिन्तयेः चिन्तयेतम् चिन्तयेत चोरयेयम् चोरयेव चोरयेम उ० चिन्तयेयम् चिन्तयेव चिन्तयेम ट् चोरयिष्यति चोरयिप्यतः चोरयिप्यन्ति चिन्तयिप्यति चिन्तयिप्यतः चिन्तयिप्यन्ति चोर यिप्यसि चोरयिप्यथः चोरयिष्यथ चिन्तयिप्यसि चिन्तयिप्यथः चिन्तयिप्यथ चोरयिष्यामि चोरयिष्याव: चोरयिष्यामःचिन्तयिष्यामि चिन्तयिप्यावः चिन्तयिप्यामः १०४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (कथ्, भक्ष घा सूचना-कथ् और भक्ष् के अन्त में 'अय' लगाकर भू या चुर् के तुल्य र . चलते हैं। केवल परस्मैपद के रूप यहाँ दिये हैं। (४२) कथ् (कहना) (दे० अ० ७) (४३) भक्ष् (खाना) (दे० अ०७ लट् लट् कथयति कथयन्ति प्र० भक्षयति भक्षयन्ति कथयसि म० भक्षयसि कथयामि उ० भक्षयाणि लोट लोट कथयतः भक्षयतः कथयथः कथयथ भक्षयथः भक्षय कथयावः कथयामः भक्षयावः भक्षयामः ... प्र० भक्षयतु भक्षयताम् भक्षयन्तु कथयतु कथयताम् कथयन्तु कथय कथयतम् कथयत कथयानि कथपाव कथयाम म० अक्षय भक्षयतम् भक्षयत उ० भक्षयाणि भक्षयाव भक्षयाम अकथयत् अकथयताम् अकथयन् प्र० अभक्षयत् अभक्षयताम् अभक्षयन् अकथयः अकश्यतम् अकथयत म० अभक्षयः अभक्षयतम् अभक्षयत अकथयम् अकथयाव अकथयाम उ० अभक्षयम् अभक्षयाव अभक्षयाम विधिलिङ् विधिलिङ् कथयेत् कथयेताम् कथयेयु: प्र० भक्षयेत् भक्षयेताम् भक्षयेयु: कथयेः कथयेतम् कथयेत म० भक्षयेः भक्षयेतम् भक्षयेत कथयेयम् कथयेव. कथयेम उ० भक्षयेयम्. भक्षयेव भक्षयेम लट् . ल्ट् कथयिष्यति कथयिष्यतः कथयिष्यन्ति प्र० भक्षयिष्यति भक्षयिप्यत: भक्षयिष्यन्ति कथयिष्यसि कथयिष्यथः कथयिष्यथ- म० भक्षयिष्यसि भक्षयिष्यथः भक्षयिप्यय कथयिष्यामि कथयिष्यावः कथयिष्यामःउ० भक्षयिष्यामि भक्षयिष्यावः भक्षयिप्यामः भ्वादिगण. वस् धातु । अदादिगण, अद् धातु १०५ धातुरूप-संग्रह (ख) भ्वादिगण अदादिगण (४५) अद् (खाना) परस्मैपद लट् ४४) वस् (रहना) (भू के तुल्य) लट् सति वसतः वसन्ति सिसि वसथः वसथ सामि वसावः वसामः . प्र० अत्तः अदन्ति म अत्ति अत्सि अनि अत्थः अत्थ उ अद्वः अमः लोट लोट अत्ताम् सितु स सानि वसताम् वसतम् वसाव वसन्तु वसत अत्तु अद्धि अदानि अदन्तु अत्त म० अत्तम् अदाव वसाम उ० अदाम विसत् विसः अवसन् प्र० आदत् अवसताम् अवसतम् ल आत्ताम् आदन् आत्तम् आत्त आद्व आद्म अवसत म० आद: विसम् अवसाव अवसाम उ० आदम् विधिलिङ् विधिलिङ् वसेताम् वसेतम् वसेव सेत् सेः सेयम् प्र० वसेयुः वसेत वसेम अद्यात् अद्याः म० अद्याताम् अद्युः अद्यातम् अद्यात अद्याव अद्याम उ० अद्याम् वत्स्यतः वत्स्यन्ति प्र० स्थति त्स्यसि त्स्यामि ल्ट् अत्स्यति अत्स्यतः अत्स्यन्ति अत्स्यसि अत्स्यथः अत्स्यथ अत्स्यामि अत्स्यावः अत्स्यामः वत्स्यथः वत्स्यथ म० वत्स्यावः वत्स्यामः उ० ८ अदादिगण, बधा १०६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (४६) ब (कहना) सूचना-दोनों पदों में लूट में ब्रू को वच् हो जाता है । परस्मैपद आत्मनेपद लट् प्र० ब्रूते ब्रुवाते ब्रुवते बु ब्रुवन्ति आहुः बूथ म० ब्रूपे ब्रुवाथे बब्वे लट् प्रवीति ब्रूतः आह आहतुः ब्रवीषि बूथः आत्थ आहतुः ब्रवीमि वः लोट प्रवीतु ब्रूताम् बेहि ब्रूतम् अवाणि जवाव ब्रूमः ब्रुवन्तु ब्रूत व्रवाम म० ब्रूव उ० ब्रुवे ब्रूवहे महे लोट प्र० ताम् ब्रुवाताम् ब्रुवताम् ब्रुवाथाम् ध्वम् उ० वै बवावहै व्रवार लङ् प्र० अब्रूत अब्रुवाताम् प्र अनुवा म० अब्रूथाः अब्रुवाथाम् उ० अब्रुवि अब्रूवहि विधिलिङ् प्र० ब्रुवीत ब्रुवीयाताम् ब्रुवीरन् म० ब्रूवीथाः ब्रुवीयाथाम् ब्रुवीध्व उ० ब्रुवीय ब्रुवीवहि ब्रुवीमहि लट् (बू को वच्) प्र. वक्ष्यते वक्ष्येते वक्ष्यन्तं म० वक्ष्यसे वक्ष्येथे वक्ष्य वक्ष्ये वक्ष्यावहे वक्ष्यामहे अब्रवीत् अताम् अब्रुवन् अन्नवीः अब्रूतम् अब्रूत अनवम् अव अब्रूम विधिलिङ् ब्रूयात् ब्रूयाताम् ब्रूयुः ब्रूयातम् ब्रूयात ब्रूयाम् ब्रूयाव ब्रूयाम लट् (ब्रू को वच्) वक्ष्यति वक्ष्यतः वक्ष्यन्ति वक्ष्यसि वक्ष्यथः वक्ष्यथ वक्ष्यामि वक्ष्यावः वक्ष्यामः অরুণ अमति ब्रूया:
. अदादिगण । दुह , रुद् धातुएँ १०७ ४७) दुह, (दुहना) परस्मैपद (४८) रुद् (रोना) परस्मैपद चना-धातु उभयपदी है । केवल रस्मैपद के रूप दिये गये । अरोदीत् } लट् ग्धि दुग्धः दुहन्ति प्र० रोदिति रुदितः रुदन्ति मोक्षि दुग्धः दुग्ध म० रोदिषि रुदिथः रुदिथ रोहि दुतः दुह्मः उ० रोदिमि रुदिवः रुदिमः लोट लोद ग्घु दुग्धाम् दुहन्तु प्र० रोदितु रुदिताम् रुदन्तु ग्घि दुग्धम् दुग्ध म० रुदिहि रुदितम् रुदित हानि दोहाव दोहाव दोहाम उ० रोदानि रोदाव रोदाम ल लङ् घोक् अदुग्धाम् अदुहन प्र० अरोदीत् अरुदिताम् अरुदन् अरोदत् अदुग्ध म० अरोदीः अरुदितम् अरुदित अरोदः अदुह्म उ० अरोदम् अरु दिव अरुदिम विधिलिङ् विधिलिङ ह्यात् दुह्याताम् दुह्यः रुद्यात् रुद्याताम् रुधुः ह्याः दुह्यातम् दुह्यात म० रुद्याः रुद्यातम् रुद्यात ह्याम् दुह्याव दुह्याम उ० रुद्याम् रुद्याव रुद्याम लुट् लुट् क्ष्यति घोक्ष्यतः घोक्ष्यन्ति प्र० रोदिष्यति रोदिप्यतः रोदिष्यन्ति क्ष्यसि घोक्ष्यथः घोक्ष्यत म० रोदिष्यसि रोदिप्यथः रोदिप्यथ क्ष्यामि घोक्ष्यावः धोक्ष्यामः उ० रोदिष्यामि रोदिष्यावः रोदिप्यामः घोक् अदुग्धम् } दोहम् अदुह्व म १०८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (अदादि० स्वप, हन् धातुएँ) (४९)स्वप् (सोना) परस्मैपद (५०) हन् (मारना) परस्मैपट लट् ल घ्नन्ति . स्वपिति त्वपिषि स्वपिमि स्वपितः स्वपिथः स्वपिवः स्वपन्ति स्वपिथ स्वपिमः प्र० हन्ति म० हन्सि उ० हन्मि हतः हथः हन्वः हथ हन्मः लोद लोट स्वपितु स्वपिताम् स्वपिहि स्वपितम् स्वपानि स्वपाव स्वपन्तु स्वपित नन्तु हन्तु म० जहि उ० हनानि हताम् हतम् हनाव हत स्वपाम हनाम प्र० अहन् अहताम् अनन् अस्वपीत् । अस्वपिताम् अस्वपन् अस्वपत् अस्वपीः । अस्वपितम् अस्वपित अस्वपः अस्वपम् अस्वपिव अस्वपिम म० अहः अहतम् अहत उ० अहनम् अहत्व अहन्म विधिलिङ् विधिलिङ् स्वप्यात् स्वप्याताम् स्वप्युः स्वप्या: स्वप्यातम् स्वप्यात् स्वप्याम् स्वप्याव स्वप्याम प्र० हयात् हन्याताम् हन्युः म० हन्याः हन्यातम् हत्यार उ० हन्याम् हत्याव हन्यार लुट् लुद स्वप्स्यति स्वप्स्यतः स्वप्स्यन्ति प्र० हनिष्यति हनिष्यतः हनिप्यन्ति स्वप्स्यसि स्वप्स्यथः स्वप्स्यथ म० हनिष्यसि हनिष्यथः हनिप्यय स्वप्स्यामि स्वप्स्यावः स्वप्स्यामः उ० हनिष्यामि हनिष्यावः हनिप्यामः अदादिगण । इ, आस् धातुएँ १०९ (५१) इ (जाना) परस्मैपद (५२) आस् (बैठना) आत्मनेपद लट् लट् इतः यन्ति प्र० एपि इथः इथ आस्ते म० आस्से उ० आसे आसाते आसाथे आस्वहे आसते आघ्वे आस्महे ."- एमि इवः इमः लोट लोट प्र० इताम् इहि इतम् अयानि अयाव यन्तु इत म० आस्ताम् आस्स्व आस आसाताम् आसाथाम् आसावहै आसताम् आध्वम् आसामहै अयाम लड प्र० आस्त आसत ऐत् ऐताम् ऐ: ऐतम् आयम् ऐव आयन् ऐत ऐम म० आस्थाः आसि आसाताम् आसाथाम् आस्वहि आध्वम् आस्महि उ० विधिलिङ् प्र० इयात् इयाताम् इयुः इयाः इयातम् इयात इयाम् इयाव इयाम विधिलिङ् आसीत असीयाताम् आसीरन् आसीथाः आसीयाथाम् आसीध्वम् आसीय आसीवहि आसीमहि म० ल्द ल्ट एप्यति एप्यतः एप्यसि एप्यथः एप्यामि एप्यावः एष्यन्ति प्र० आसिप्यते आसिप्येते आसिप्यन्ते एप्यथ म० आसिष्यसे आसिप्येये आसिप्यध्वे एप्यामः उ० आसिप्ये आसिप्यावहे आसिप्यामहे प्रा० रचनानुवादकौमुदी ११० (५३) शी (सोना) अदादिगण । आत्मनेपद (५४) हु (हवन करना | जुहोत्यादिगण । परस्म लट् लट् जुहुतः शेते शेषे शये शयाते शयाथे जुहुथः शेरते शेध्वे शेमहे प्र० जुहोति म० जुहोषि उ० जुहोमि जुह्वति जुहुय जुहुमः जुहुवः शेवहे लोट लोट शेताम् शयाताम् शेरताम् शयाथाम् शेध्वम् शयावहै प्र० जुहोतु म० जुहुधि उ० जुहवानि जुहुताम् जुतु जुहुतम् जुहुत जुहवाव जुहवाम शेष्व शय शयामहै लड लङ् अशेत अशयाताम् अशेरत प्र० अजुहोत् अजुहुताम् अजुवुः अशेथाः अशयाथाम् अशेध्वम् म० अजुहोः अजुहुतम् अजुहुत अशयि अशेवहि अशेमहि अजुहवम् अजुहुव अजुहुम विधिलिङ् विधिलिङ् शयीत शयीयाताम् शयीरन् जुहुयात् जुहुयाताम् जुहुयुः शयीथाः शयीयाथाम् शयीध्वम् म० जुहुयाः जुहुयातम् जुहुयात शयीय शयीवहि शयीमहि उ० जुहुयाम् जुहुयाव Яo जुहुयाम होप्यन्ति लट् शयिष्यते शयिष्येते शयिष्यन्ते प्र० होप्यति होप्यतः शयिष्यसे शयिष्येथे शयिप्यध्वे म० होप्यसि होप्यथः होप्यय शयिष्ये शयिष्यावहे शयिष्यामहे उ० होष्यामि होप्यावः होप्यामः जुहोत्यादिगण । भी, दा धातुएँ १११ १९५) भी (डरना) परस्मैपद (५६) दा (देना) आत्मनेपद सूचना-परस्मैपद के रूप देखो पृष्ठ ९५ .. : लट् लट् भेति भिपि भिमि विभीतः विभीथः विभीवः विभ्यति प्र० दत्ते विभीथ म० दत्से विभीमः उ० ददे ददाते ददाथे दद्वहे ददते दवे दद्महे लोट लोट भेतु विभीताम् विभ्यतु बभीहि विभीतम् विभीत म० भयानि विभयाव विभयाम उ० दत्ताम् दत्स्व ददै ददाताम् ददाथाम् ददावहै ददताम् दध्वम् ददामहै ल विभेत् अविमीताम् अविभयुः प्र० विभेः अविभीतम् अविभीत म० विभयम् अविभीव अविभीम उ० अदत्त अददाताम् अददत अदत्थाः अददाथाम् अदद्ध्वम् अददि अदद्वहि अदद्महि विधिलिङ् भीयात् विभीयाताम् विभीयु: भीयाः विभीयातम् विभीयात म० मीयाम् विभीयाव विभीयाम उ० प्र० विधिलिङ् ददीत ददीयाताम् ददीरन् ददीथाः ददीयाथाम् ददीध्वम् ददीय ददीवहि ददीमहि ल्ट् ल्ट् प्यति प्यसि प्यामि भेप्यतः भेष्यथः भेप्यावः भेष्यन्ति भेण्यथ भेष्यामः प्र० दास्यते दास्येते दास्यन्ते म० दास्यसे दास्येथे दास्यव्ये उ० दास्ये दास्यावहे दास्यामहे ११२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (५७) धा (धारण करना) (जुहोत्यादि० ० धावा जुहोत्यादिगण । उभयपदी लट्-परस्मैपद लट्-आत्मनेपद धत्तः दधति प्र० दधाति दधासि दधामि धत्थः पत्थ 영봉경 धत्ते धत्से दधे दधाते दधाथे दध्वहे दघते घद्ध्ये दध्महे दध्वः दध्मः लोट लोट धत्ताम् प्र० दधातु घेहि दधानि दघतु धत्त म० धत्तम् दधाव घत्ताम् दधाताम् दधताम् घत्स्व दघाथाम् धद्ध्वम् दधै दघावहै दधामहे दघाम ल अदधात् अदधाः अधत्ताम् अधत्तम् अदधुः अधत्त प्र० अधत्त अदधाताम् अदधत म० अघत्थाः अदधाथाम् अघव उ० अदधि अदध्वहि अदमाह अदधाम् अदध्व अदध्म विधिलिङ् दध्यात् दध्या: दध्याताम् दध्युः दध्यातम् दध्यात दध्याव दध्याम विधिलिङ् दधीत दधीयाताम् दधीरन म० दधीथाः दधीयाथाम् दधीच्या दघीय दघीवहि दधीमहि दध्याम् धास्यतः धास्यन्ति प्र० धास्यति घास्यसि चास्यामि धास्यथः धास्यथ म० धास्यते धास्येते घास्यन्ते धास्यसे घास्येथे धास्यांचे धास्ये धास्यावहे घास्यामहे धास्यावः घास्यामः दिवादिगण । युध्, जन् धातुएँ ११३ १८) युध (लड़ना) आत्मनेपद (५९) जन् (उत्पन्न होना) आत्मनेपद सूचना - लट्, लोट्, लङ्, विधि- लिङ् में जन् को जा होता है । लट् (जन् को जा) यते यसे युध्येते युध्यन्ते युध्येथे युध्यध्वे युध्यावहे युध्यामहे प्र० जायते म० जायसे उ० जाये जायेते जायन्ते जायेथे जायध्वे जायावहे जायामहे ये लोट यताम् युध्येताम् युध्यन्ताम् पस्त्र युध्येथाम् युध्यध्वम् युध्यावहै युध्यामहै लोट् (जन् को जा) प्र० जायताम् जायेताम् जायन्ताम् म० जायस्व जायेथाम् जायध्वम् जायावहै जायामहै ये उ० जाये लङ् (जन् को जा) घ्यत अयुध्येताम् अयुध्यन्त प्र० अजायत अजायेताम् अजायन्त ध्यथाः अयुध्येथाम् अयुध्यध्वम् म० अजायथाः अजायेथाम् अजायध्वम् ध्ये अयुध्यावहि अयुध्यामहि उ० अजाये अजायावहि अजायामहि विधिलिङ् विधिलिङ् (जन् को जा) युध्येयाताम् युध्येरन् जायेयाताम् जायेरन् पेथाः युध्येयाथाम् युध्येध्वम् जायेयाथाम् जायेवम् येय युध्येवहि युध्येमहि जायेवहि जायेमहि येत प्र० जायेत म० जायेथाः उ० जायेय ल्द ल्ट् स्यते योत्स्येते योत्स्यन्ते प्र० जनिप्यते जनिप्येते जनिष्यन्ते स्यले योत्स्येथे योत्स्यध्वे जनियेथे जनिप्यन्वे त्यै योत्स्यावहे योत्स्यामहे उ० जनिप्ये जनिप्यावहे जनिप्यामहे म० जनिष्यसे ११४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (स्वादिगण, सुप (६०) सु (स्नान करना या कराना, रस निकालना) स्वादिगण । उभयपदी लट्-परस्मैपद लट्-आत्मनेपद सुनोति सुनोषि सुनोमि सुनुतः सुनुथः सुनुवः सुन्वः सुन्नुवः } सुनमः } उ० सुन्वे सुन्म: सुन्वन्ति प्र० सुनुते सुनुते , सुन्वाते सुन्वते सुनुथ म० सुनुपे सुनुपे सुन्वाथे सुनुध्वे सुनुमः सुनुवहे। सुनुमहे सुन्वहे । सुन्महे लोट सुन्वतु प्र० सुनुताम् सुन्वाताम् सुन्वताम् सुनुत म० सुनुप्व सुन्वाथाम् सुनुध्वम् सुनवाम उ० सुनवै सुनवावहै सुनवाम सुनोतु सुनु सुनवानि लोट सुनुताम् सुनुतम् सुनवाव असुनोत् असुनोः असुनुवम् ल ल असुनुताम् असुन्वन् प्र० असुनुत असुन्वाताम् असुन्वत असुनुतम् असुनुत असुनुथाः असुन्वाथाम् असुनु असुनुव असुनुम उ० असुन्वि असुनुवहि । असुनुम असुन्वहि । असुर्मा म० विधिलिङ् विधिलिङ् सुनुयात् सुनुयाताम् सुनुयुः प्र० सुन्वीत सुन्वीयाताम् सुन्वीर सुनुयाः सुनुयातम् सुनुयात म० सुन्वीथाः सुन्वीयाथाम् सुन्वीर सुनुयाम् सुनुयाव सुनुयाम उ० सुन्वीय सुन्वीवहि सुन्वीर लट् लट् सोष्यति सोप्यतः सोष्यन्ति प्र० सोष्यते सोप्यते सोप्य सोष्यसि सोष्यथः सोप्य म० सोष्यसे सोयेथे सोप्यामि सोष्यावः सोण्यामः उ० सोष्ये सोयावहे सोप्य सोप्य तुदादिगण स्पृश्, मृ धातुएँ १) स्पृश(छूना) परस्मैपद (६२) मृ (मरना) आत्मनेपद सूचना-लट् में मृ धातु परस्मै- पदी होती है। लट् लट् शति स्पृशतः स्पृशन्ति प्र० म्रियते म्रियेते म्रियन्ते रासि स्मृशथः स्पृशथ म० म्रियसे म्रिसथे म्रियध्वे गामि स्पृशावः स्पृशामः स्पृशामः उ० म्रिये म्रियावहे म्रियामहे लोट लोट तु स्पृशताम् स्पृशन्तु प्र० म्रियताम् म्रियेताम् म्रियन्ताम् T स्पृशतम् स्पृशत म० म्रियस्व म्रियेथाम् म्रियध्वम् सानि स्पृशाव स्पृशाम उ० म्रियै म्रियावहै म्रियामहे पृशत् अस्पृशताम् अस्पृशन् प्र० अम्रियत अम्रियेताम् अम्रियन्त पृशः अस्पृशतम् अस्पृशत म० अम्रियथाः अम्रियेथाम् अम्रियध्वम् पृशम् अस्पृशाव अस्पृशाम उ० अम्रिये अम्रियावहि अम्रियामहि विधिलिङ् विधिलिङ् शेत् स्पृशेताम् स्पृशेयुः प्र० म्रियेत म्रियेयाताम् म्रियेरन् स्पृशेतम् स्पृशेत म० म्रियेथाः म्रियेयाथाम् मियेध्वम् गेयम् स्पृशेव स्पृशेम उ० म्रियेय म्रियेवहि म्रियेमहि लट् ल्ट् स्त्रक्ष्यति स्प्रक्ष्यतः स्प्रक्ष्यन्ति प्र० मरिष्यति मरिप्यतः मरिप्यन्ति स्प्रक्ष्यसि स्प्रक्ष्यथः स्प्रक्ष्यथ म० मरिप्यसि मरिप्यथः मरिष्यथ स्त्रक्ष्यामि स्त्रक्ष्यावः स्प्रक्ष्यामः उ० मरिष्यामि मरिप्यावः मरिष्यामः )स्पयति स्पर्ध्यतः स्पयन्ति प्र० स्पयसि स्पयथः स्पग्रंथ म० स्पयामि स्पावः स्पामः उ० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (मुन्, रुच् या (६४) रुध् (रोकना, ढकना) रुघादिगण । उभयपद : लट्-परस्मैपद रुन्धः रुति रुन्धः सत्य (६३) मुच् (छोड़ना) तुदादिगण । उभयपद लट-परस्मैपद मुञ्चति मुञ्चतः मुञ्चन्ति प्र० रुणद्धि मुञ्चसि मुञ्चथः मुञ्चथ म० रुणत्सि मुञ्चामि मुञ्चावः मुञ्चामः उ० रुणमि लोट मुञ्चतु मुञ्चताम् मुञ्चन्तु प्र० रुणझु मुञ्च मुञ्चतम् मुञ्चत म० रुन्धि मुञ्चानि मुञ्चाव मुञ्चाम उ० रुणधानि a . - रुन्ध्वः ल्यमः लोट रुन्वाम् रुपान्तु रुन्धम् रूप रुणधाव रुणचान रुन्च्यातम् ध्यान अमुञ्चत् अमुञ्चताम् अमुञ्चन् प्र० अरुणत् अरुन्धाम् अरुपन् अमुञ्चः अमुञ्चतम् अमुञ्चत म० अरुणः अरुन्धम् अन्य अमुञ्चम् अमुच्चाव अमुञ्चाम उ० अरुणधम् अरुन्ध्व अलम विधिलिङ् विधिलिङ् मुञ्चत् मुञ्चताम् मुञ्चे युः प्र० रुन्ध्यात् रुन्ध्याताम् रूप्युः मुञ्चे: मुञ्चतम् मुञ्चेत म० रुन्ध्याः मुच्चयम् मुञ्चव मुञ्चम उ० रुन्ध्याम् रुन्ध्याव रुन्ध्याम लट् लट् मोक्ष्यति मोक्ष्यतः मोक्ष्यन्ति प्र० रोत्स्यति रोत्स्यनः रोल्यात मोक्ष्यसि मोक्ष्यथः मोक्ष्यथ म० रोत्स्यसि रोत्स्ययः रोल्स्यप मोक्ष्यामि मोक्ष्यावः मोक्ष्याम: उ० रोत्स्यामि रोत्स्याव: रोस्यान सूचना-आत्मनेपद में सेव के तुल्य सूचना-आत्मनेपद में रुम् के है रूप चलेंगे। लट्-मुञ्चते, लोट- भुज् (धातु ६५) के तुल्य मुञ्चताम्, लङ्-अमुञ्चत, विधि लट्-रुन्धे, लोट्-रुन्धाम्, न लिङ्-मुञ्चत,लट्-मोक्ष्यते । -रोत्स्यते। चलेली -- अरुन्ध, विधिलिङ्-रुन्चीत, न धादिगण । उभयपदी भुज् धातु ११७ E (६५) भुज् (१. पालन करना, २. भोजन करना) सूचना-भुज् धातु पालन करने अर्थ में परस्मैपदी होती है और भोजन ना, उपभोग करना अर्थ में आत्मनेपदी होती है । लट्-परस्मैपद लट्-आत्मनेपद भुङ्क्तः भुञ्जन्ति प्र० भुङ्क्ते भुजाते भुजते क्षि भुक्थः भुक्थ म० भुङ्क्ष भुञ्जाथे भुजवे भुमः उ० भुजे भुज्वहे भुज्महे क लोट लोट नक्तु भुङ्क्ताम् भुञ्जन्तु प्र० भुङ्क्ताम् भुजाताम् भुजताम् ग्धि भुङ्क्तम् भुङ्क्त म० भुक्ष्व भुञ्जाथाम् भुङ्गध्वम् इनजानि भुनजाव भुनजाम उ० भुनजै भुनजावहै भुनजामहे : 12:- 1 पज्मि भुज्वः 7 लङ -- भुनक् अभुङ्क्ताम् अभुञ्जन् प्र अभुङ्क्त अभुजाताम् अभुञ्जत भुनक् अभुङ्क्तम अभुङ्क्त म० अभुङ्क्थाः अभुञ्जाथाम् अभुग्ध्वम् भुनजम् अभुज्व अभुज्म उ० अभुजि अभुज्वहि अभुमहि विधिलिङ् विधिलिङ ज्यात् भुज्याताम् भुज्युः प्र. भुजीत भुजीयाताम् भुजीरन् ज्याः भुज्यातम् भुज्यात म० भुञ्जीथाः भुजीयाथाम् भुजीध्वम् सुज्याम् भुज्याव भुज्याम उ० भुञ्जीय भुञ्जीवहि भुजीमहि लुट् मोक्ष्यति भोक्ष्यतः भोक्ष्यन्ति प्र० भोक्ष्यते मोक्ष्यसि भोक्ष्यथः भोक्ष्यथ मोक्ष्यामि भोक्ष्यावः भोक्ष्यामः उ० भोक्ष्ये म० भोक्ष्यसे मोक्ष्येते भोक्ष्यन्ते मोक्ष्येथे मोक्ष्यध्वे भोक्ष्यावहे भोक्ष्यामहे .
११८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (तनादिगण, तन् या ६६. तन् (फैलाना) तनादिगण । उभयपदी लट्-परस्मैपद तनोति तनोषि तनोमि तनुतः तनुथः तन्वन्ति प्र० तनुते तनुथ म० तनुषे तनुवः } तनुमः लट -आत्मनेपद तन्वाते तन्वते तन्वाथे तनुम्बे तनुवहे तन्वहे तन्महे ) लोट उ० तन्वे तनुमहे) तन्मः तनोतु तनु तनवानि लोट तनुताम् तन्वन्तु तनुतम् तनुत तनवाव तनवाम प्र० तनुताम् तन्वाताम् तन्वताम् म० · तनुष्व तन्वाथाम् तनुध्वम् उ० तनव तनवावहै तनवामहे लङ लङ अतनोत् अतनुताम् अतन्वन् प्र०. अतनुत अतन्वाताम् अतन्वत अतनोः अतनुतम् अतनुत म० अतनुथाः अतन्वाथाम् अतनुवम् अतनवम् अतनुव । अतनुम । उ० अतन्वि अतनुवहि । अतनुमहि अतन्व । अतन्म। अतत्वहि । अतन्महि विधिलिङ, प्र० तनुयात् तनुयाः तनुयाम् विधिलिङ तनुयाताम् तनुयुः तन्वीत तन्वीयाताम् तन्वीर तनुयातम् तनुयात म० तन्वीथाः तन्वीयाथाम् तन्वीध्वम् तनुयाव तनुयाम तनुयाम उ० तन्वीय तन्वीवहि तन्वीमहि तनिप्यने लुट लुट तनिष्यति तनिष्यतः तनिष्यन्ति प्र० तनिष्यते . तनिष्येते तनिष्यसि तनिष्यथः तनिष्यथ म० तनिष्यसे तनियेथे तनिष्य तनिष्यामि तनिष्यावः तनिष्यामः उ० तनिष्ये तनिष्यावहे तनिष्याम् सन्धि-विचार ११९ - गायकः (४) सन्धि-विचार (१) यण-सन्धि (देखो अभ्यास १९) (इको यणचि) इ ई को य्, उ ऊ को उ, ऋ को र्, ल को ल हो जाता यदि बाद में कोई स्वर हो तो। सवर्ण (वैसा ही) स्वर होतो नहीं । जैसे :- ते + एकः = प्रत्येकः | मधु + अरिः = मध्वरिः घातृ+अंशः-धात्रंशः द+ अपि = यद्यपि अनु + अयः -अन्वयः पितृ + आ = पित्रा ते+माह - इत्याह वधू 7 औ = वध्वौ ल+आकृतिः = लाकृतिः (२) अयादिसन्धि (देखो अभ्यास २०) एचोऽयवायाव ) ए को अय, ओ को अव्, ऐ को आय, औ को आव हो ता है, वाद में स्त्रर हो तो। (शब्द के अन्तिम ए या ओ के वाद अ हो [ नहीं ।) जैसे :- t+ए - हरये भो+अनम् = भवनम् गै+अति - गायति +अनम् - नयनम् पो+अनः-पवनः गै+अकः +अनम् = शयनम् | श्रो+अणम् श्रवणम् | भौ+अकः =भावकः चे + अ = संचयः । गुरो+ए - गुरवे द्वौ+ इमौ = द्वाविमौ (३) गुणसन्धि (देखो अभ्यास २१) (आद्गुणः) (१) अ या आ के वाद इ या ई हो तो दोनों को 'ए' होगा। २) अ या आ के बाद उ या ऊ हो तो दोनों को 'ओ' होगा। (३) अ या [ के वाद ऋ हो तो दोनों को 'अर्' होगा। (४) अ या आ के बाद ल हो । दोनों को 'अल्' । जैसे :- हा + ईशः = महेशः हित + उपदेशः = हितोपदेशः ब्रह्म+ ऋपिः = ब्रह्मर्पिः हा + ईश्वरः = महेश्वरः गङ्गा+ उद्कम् == गङ्गोदकम् सप्त + ऋपिः = सप्तर्षिः +इति-नेति पश्य + उपरि= पश्योपरि तव + लकार:-तवल्कारः (३) वृद्धिसन्धि ( देखो अभ्यास २२) (वृद्धिरेचि) (१) अ या आ के वाद ए या ऐ होगा तो दोनों को 'ऐ' होगा। २) अ या आ के वाद ओ या औ होगा तो दोनों को 'ओ' होगा। जैसे:- अत्र+एपः = अषः जल+ओधः= जलौघः पश्य + एतम् = पश्यैतम् तण्डुल + ओदनम् = तण्डुलादनम् न+एतत् = तत् देव+औदार्यम् = देवौदार्यम् जन + ऐक्यम् = जनैक्यम् कार्य+औचित्यम् = कायौचित्यम् .
१२० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (सन्धि-दि (५) दीवसन्धि देखो अभ्यास २३) ( अकः सवर्णे दोघः) अ इ उ ऋ के बाद कोई सवर्ण (सदृश) अक्षर हो। दोनों के स्थान पर उसी वर्ण का दीर्घ अक्षर हो जाता है । अर्थात् (१) आ +अ या आ = आ । (२) इ या ई+इ या ईई। (३) उ या ; या ऊऊ। (४) ऋ+ ऋ = ऋ । जैसे : दया + आनन्दः= दयानन्दः गिरि + ईशः = गिरीशः भानु + उदयः = भानूदर विद्या + आलयः= विद्यालय:नदी-+ ईशः - नदीशः होतृ + ऋकारः होता. (६) पूवरूपसन्धि देखो अभ्यास २४) (एङः पदान्तादति) पद (शब्दरूप या धातुरूप) के अन्तिम ए या ओ बाद अ हो तो वह हट जाता है। (अ हटा है, इस बात को बताने के लिए। चिह्न लगा दिया जाता है) जैसे : हरे+अव% हरेऽव विष्णो+अव - विष्णोऽव सर्वे+अपि = सर्वेऽपि सो+अपि = सोऽपि (७) श्चुत्वसन्धि (देखो अभ्यास २५) (स्तोः ३चुना श्चुः) स् या तवर्ग से पहले या बाद में श् या चवर्ग कोई भी हो तो स् को श और तवर्ग को चवर्ग हो जाता है । जैसे :- रामस् + च = रामश्च सत् + चित् = सच्चित् (सद् + जनः = सज्जनः हरिस् + शेत = हरिश्शेते तत् + च = तच्च शाङ्गिन् + जय शानियत (८) ष्टुत्वसन्धि (ष्टुना ष्टुः) स् या तवर्ग से पहले या बाद में प् या टवर्ग कोई भी हो की स् को ष और तवर्ग को टवर्ग होता है । इष् +तः = इष्टः रामस् + षष्ठः-रामष्षष्ठः विष् + नुः- विष्णुः दुष्टः उद-+डीनः = उड्डीनः (९) जश्त्वसन्धि (१) (झलां जशोऽन्ते वर्ग के १,२,३,४ (अर्थात् पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ण) को ३ (अपने वर्ग का तीसरा अक्षर) हो जाता है, यदि वह पद (शब्द) का अन्तिम अक्षर हो तो। जैसे :- जगत् + ईशः = जगदीशः सुप्-7-अन्तः-सुवन्तः सत्+आचारः-सदाचारः अच्+अन्तः = अजन्तः दुष् +तः = उष् +त्रः-उप्टः सन्धि-विचार १२१ - - - - (१०) जश्त्वसन्धि (२) (देखो अभ्यास २६) (झलां जश् झशि) वर्ग के १, २, ३ ४ (पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ण) ३ (अपने वर्ग का तीसरा अक्षर) हो जाता है, बाद में वर्ग के ३, ४ (तीसरा चौथा वर्ण) हो तो । (यह नियम पद के बीच में लगता है और नियम ९ पद अन्त में।) जैसे: +धिः=बुद्धिः बुध +ध-बुद्धः दुध् + धम्-दुग्धम [+धि: शुद्धिः युध् +धः-युद्धः दध् +धः=दग्धः +धिः ऋद्धिः लभ् + धः-लब्धः क्षुभ् +धः क्षुब्धः (११) चत्वसन्धि (देखो अभ्यास २७) (खरि च) वर्ग के १, २, ३, ४ को १ (उसी वर्ग का प्रथम अक्षर) हो जाता बाद में वर्ग के १, २, श ष स कोई हों तो। जैसे:- सद् + कारः सत्कारः सद् + पुत्रःसत्पुत्रः उद् + साहः-उत्साहः तद् + परः-तत्परः (१२) अनुस्वारसन्धि (देखो अभ्यास १८) ( मोऽनुस्वारः ) शब्द के अन्तिम म् के बाद कोई व्यंजन ( हल ) हो तो म् । अनुस्वार ( ) हो जाता है । वाद में स्वर हो तो नहीं । जैसे यम् + वद सत्यं वद पुस्तकम् + पठति पुस्तकं पठति म् + चरम्धर्म चर भोजनम् +खादति भोजनं खादति र्यम् + कुरु-कार्य कुरु ईश्वरम् + नमति ईश्वरं नमति (१३) विसर्गसन्धि ( देखो अभ्यास २८) (विसर्जनीयस्य सः) (विसर्ग) (:) के बाद वर्ग के १, २, श प स कोई हों । विसर्ग को स् हो जाता है । (श् या चवर्ग वाद में हो तो संधि-नियम ७ से स् श हो जायगा। ) जैसे:- लकः + तिष्ठतिबालकस्तिष्ठति | पुत्रः+ चलति-पुत्रश्चलति मः+तरतिरामस्तरति हरिः+च-हरिश्च + चित्-कश्चित् रामः+ शेते-रामश्रोते - - ९ १२२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (सन्धि-विः (१४) रुत्वसन्धि देखो अभ्यास (ससजुषो रुः) शब्द के अन्तिम स् को रु (र) हो ज ता है । (सूचन प्रथमा के एकवचन में इसी र् का विसर्ग रहता है। संधि में यह र् अ और र के अतिरिक्त अन्य स्वरों के बाद रहता है) । जैसे:- हरिः + अवदत्-हरिरवदत् हरेः + एव-हरेरेव गुरुः + अस्ति-गुरुर स्ति गुरोः + धनम्=गुरोर्धनम् (१५) उत्वसन्धि (१) (देखो अभ्यास (अतो रोरप्लुतादप्लुते) अः को ओ हो जाता है, वाद में अ हो तो। अ अः+अ-ओ। जैसेः- कः+ अपि-कोऽपि रामः + अवदत्-रामोऽवदत् रामः + अस्ति-रामोऽस्ति कः + अयम्कोऽयम् (१६) उत्वसन्धि (२) (देखो अभ्यास (हशि च) अः को ओ हो जाता है, बाद में वर्ग के .३, ४, ५ ह य व र कोई हों तो। जैसे:- राप:+गच्छति रामो गच्छति पुत्रः + वदति-पुत्रो वदति कृष्णः + लिखति-कृष्णो लिखति देवः + जयति-देवो जयति नृपः + जयति-नृपो जयति नृपः + रक्षति नृपो रक्षति (१७) यत्वसन्धि (भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि) भोः, भगोः, अघोः शब्द और अ या आई बाद रु (र या :) को य होता है । - बाद में कोई स्वर होगा तो य का दर वकल्प से होगा। यदि कोई व्यंजन होगा तो य का लोप अवश्य होगा। देवाः+गच्छन्ति-देवा गच्छन्ति रामः+ इच्छति-राम इच्छति कन्याः+ इच्छन्ति-कन्या इच्छन्ति शिष्याः+ एते-शिष्या एते (५८) सुलोपसन्धि (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनन्समासे हलि) सः और एषः के विसर्ग का न.. हो जाता है, बाद में कोई व्यंजन हो तो । जैसे:- 1:+ गच्छतिस गच्छति + लिखति-स लिखति - (देखो अग्यास एषः + गच्छति-एष गच्छति एषः+ वदति-एष वदति समास-परिचय १२३ (५) समास-परिचय (१) अव्ययीभाव अव्ययीभाव समास को पहचान यह है कि इसका पहला शब्द अव्यय उपसर्ग या निपात ) होता है। बाद का शब्द कोई संज्ञाशब्द होगा । अव्ययी- व समास वाले शब्द अव्यय होते हैं या नपुंसकलिंग एकवचन होते हैं । इनके प प्रायः नहीं चलते हैं। अव्ययीभाव समास के समस्त पद और विग्रह में न्तर होता है, क्योंकि इसमें किसी विशेप अर्थ में अव्यय का प्रयोग होता है से-सप्तमी के अर्थ में अधि, हरौ-अधिहरि (हरि में)। २. समीप अर्थ में प, पगङगायाः समोपम्-उपगङ गम् ( गंगा के समीप ) । ३. अभाव अर्थ - निर्, विघ्नानाम् अभावः-निर्विघ्नम् ( विघ्नों का अभाव )। ४. पीछे अर्थ अनु, हरेः पश्चात् अनुहरि (हरि के पीछे)। ५. प्रत्येक अर्थ में प्रति, गहं "ई प्रति-प्रतिग्रहम् (प्रत्येक घर में )। ६. अनुसार अर्थ में यया, शक्तिम नतिक्रम्य-ययाशक्ति ( शक्ति के अनुसार ) । . (२) तत्पुरुष । तत्पुरुष समास उसे कहते हैं, जहाँ पर दो या अधिक शब्दों के बीच में तीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी या सप्तमी विभक्ति का लोप होता है । मास होने पर बीच की विभक्ति का लोप हो जायेगा । जिस विभक्ति का लोप ता है, उसी विभक्ति के नाम से वह तत्पुरुष कहा जाता है। जैसे-पप्टी त्पुरुष आदि । इसमें वाद वाले शब्द का अर्थ मुख्य होता है । (१) द्वितीया- भयप्राप्तः । दुःखम् अतीतः-दुःखातीतः । कृष्णम् थितः-- :ष्णश्रितः । (१) तृतीया-खड्गेन हतः-वड्गहतः । विद्यया हीनः--विद्य:- नः । ज्ञानेन शून्यः-ज्ञानशून्यः । वाणेन हतः-त्राणहतः । (३) चतुर्थो- पाय दारुयूपदारु । स्नानाय इदम्-स्नानार्थम् । (४) पंचमी-चोराद् यम्-वोरभयम् । पापात् मुक्तः-पापमुक्तः । वृक्षात् पतितःवृक्षपतितः । ५) पष्ठी-राज्ञः पुरुषः-राजपुरुषः । ईश्वरस्य भक्त:-ईश्वरभक्तः । विद्यायाः सालयः-विद्यालयः। देवानाम् आलयः-देवालयः । (६) सप्तमी-मारो पुणः-शास्त्रनिपुणः । जले मग्नः-जलमग्नः । कार्ये चतुरः-कार्यचतुरः । दे निपुणः-युद्धनिपुणः । - - - यं प्राप्त १२४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (३) कर्मधारय विशेषण और विशेष्य का जो समास होता है, उसे कर्मधारय समास कहते हैं । विशेषण शब्द पहले रहता है, विशेष्य वाद में । इसमें दोनों पदों में एक है। विभक्ति रहती है। नीलम् उत्पलम्-नीलोत्पलम् (नीला कमल) । कृष्णः सर्पः-कृष्णसर्पः (काला साँप)। महान् चासो आत्मा-महात्मा (महात्मा)। इन अर्थों में भी कर्मधारय होता है । (१) एव (ही) अर्थ में-मुखमेव कमलम्- मुखकमलम् (मुख-कमल)। पादपद्मम् (चरण-कमल)। (२) सुन्दर अर्थ में 'सु' और कुत्सित अर्थ में 'कु' लगता है । सुन्दरः पुरुषः-सुपुरुषः (अच्छा आदमी)। कुत्सितः पुरुषः-कुपुरुषः-(नीच आदमी)। कुपुत्रः (कुपुत्र), कुदेशः (बुरा देश)। (३) इव (तरह) अर्थ में-घन इव श्यामः- घनश्यामः (बादल की तरह काला ) । नरः सिंह इव-नरसिंहः (शेर के सदृश व्यक्ति ) । चन्द्रसदृशं मुखम्- चन्द्रमुखम् (चन्द्रमा के सदृश मुंह)। (४) द्विगु कर्मधारय समास का ही उपभेद द्विगु है । कर्मधारय में प्रथम शब्द संख्या- वाचक होगा तो वह द्विगु कहलाता है। यह समास प्रायः समाहार (समूह) अर्य में होता है। त्रयाणां लोकानां समाहारः-त्रिलोकम् (तीन लोक) । चतुर्युगम (चार युग) । समाहार में साधारणतय नपुंसकलिंग एकवचन होता है । अकारान्त शब्द स्त्रीलिंग भी हो जाते हैं। त्रिलोकम्-त्रिलोकी, चतुर्युगम्-चतुर्युगी, शताब्दम्-शताब्दी। (५) नञ् समास तत्पुरुष समास का ही एक भेद नञ् समास है । 'नहीं' अर्थ वाले नन्न् का दूसरे शब्द के साथ समास होने पर नञ् समास होता है । यदि वाद में व्यंजन होगा तो नन का म शेष रहेगा। स्वर बाद में होगा तो नञ् का अन् शेष रहेगा। न ब्राह्मणः-अब्राह्मणः (ब्राह्मणेतर)। अप्रियः (अप्रिय), अस्वस्थः (अस्वस्थ), अज्ञानम् (अज्ञान) । न उपस्थितः-अनुपस्थितः (अनुपस्थि) । अनुचितः (अनुचित), अनुदारः (कृपण), अनीश्वरवादी (ईश्वर को न मानने वाला) । .
समास-परिचय १२५ - (६) बहुव्रीहि बहुव्रीहि में अन्यपद के अर्थ की प्रधानता होती है। इसमें समास होने पर मस्त पद किसी अन्य पद के विशेषण के रूप में काम करता है। बहुव्रीहि की सहचान है कि अर्थ करने पर जहाँ, जिसको, जिसने, जिसका, जिसमें आदि अर्थ नकले । बहुव्रीहि के साधारणतया तीन भेद होते हैं । (१) समानाधिकरण- जहां दोनों पदों में प्रथमा विभक्ति रहती है। (क) कर्म--प्राप्तम् उदकं यं स'–प्राप्तोदकः ( जिसको जल मिल गया है)। (ख) करण-हताः शत्रवः येन सः-हतशत्रुः ( जिसने शत्रुओं को मारा है, ऐसा राजा)। (ग) संप्रदान- दत्तं भोजनं यस्मै सः-दत्तभोजनः ( जिसको भोजन दिया गया है, ऐसा भिक्षुक) । (घ) अपादान-पतितं पणं यस्मात् सः-पतितपर्णः (जिसके पत्ते गिर गये हैं,. ऐसा वृक्ष) । (ङ) सम्बन्ध-दश आननानि यस्य सः-दशाननः ( दस मुंह वाला, रावण) । पीताम्बरः (कृष्ण), चतुर्मुखः (ब्रह्मा) (च) अधिकरण- वीराः पुरुषाः यस्मिन् सः-वीरपुरुषः (वीर पुरुपों वाला, ग्राम) । (२) सहार्थक- साथ अर्थ में बहुव्रीहि । विनयेन सहितम्-सविनयम् (सविनय) । सपुत्रः, सवान्धवः, सादरम् । (१) व्यधिकरण-दोनों पदों में भिन्न विभक्तियाँ हों । धनुः पाणौ यस्य सः-धनुष्पाणिः (धनुर्धर)। (७) द्वन्द्व इसमें दो या अधिक शब्दों का इस प्रकार समास होता है कि उसमें च और) अर्थ छिपा रहता है। इसमें दोनों पदों का अर्थ मुख्य होता है । द्वन्द्व मास की पहचान है कि जहाँ अर्थ करने पर 'और' अर्थ निकले। इसके साधारणतया तीन भेद होते हैं। (१) इतरेतर-जहाँ बीच में 'और' का अर्थ होता है और शब्दों की संख्या के अनुसार अन्त में वचन होता है। रामश्च कृष्णश्च-रामकृष्णौ (राम और कृष्ण )। पत्रं च पुष्पं च फलं. च-- पत्रपुष्पफलानि (पत्र, पुष्प और फल ), हरिहरौ, रामलक्ष्मणौ, भीमार्जुनौ । (२) समाहार-समूह अर्थ में। इसमें प्रायः नपुंसकलिंग एकवचन अन्त में रहता है । हस्तौ च पादौ च हस्तपादम् ( हाथ-पैर ) । नीहिंयवम् (जौ-चावल)। शीतोष्णम् (ठंडा-गर्म) । (३) एकशेप- समान आकार वाले शब्दों में से एक शब्द शेष रहता है और अर्थ के अनुसार द्विवचन या बहुवचन होता है । वृक्षश्च वृक्षश्व-वृक्षौ ( दो पेड़)। ।
जातः १२६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (क, व (६) प्रत्यय-विचार (१) क्त (२) क्तवतु प्रत्यय (देखो अभ्यास २३, २४, २., सूचना-(१) क्त और क्तवतु प्रत्यय भूतकाल में होते हैं। क्त का त और तवतु का तवत् शेष रहता है । धातु को गुण या वृद्धि नहीं होती है। संप्रसार, होता है। यहाँ पर केवल क्त-प्रत्ययान्त के रूप दिये गये हैं। क्तवतु-प्रत्ययान्त. रूप बनाने का सरल उपाय यह है कि क्त-प्रत्ययान्त रूप के वाद में 'वत्' और जोड़ दो । अन्य नियमों के लिए देखो अभ्यास २३-२५ । (२) प्रत्यय विचार में आगे सर्वत्र धातुएँ अकारादि-क्रम से दी गयी है। अधिक प्रसिद्ध रूप ही यहाँ दिये गये हैं । अद् जग्धः, अन्नम् कृष् कृष्टः छिद् छिन्नः अधि+इ अधीतः कृ कीर्णः जन् अर्च अचितः कन्द् क्रन्दितः जीव जीवितः अस् (२प.) भूतः क्रान्तः आप आप्तः क्री क्रीतः तम् ला+रभ् आरब्धः क्रीड़ क्रिडितः तुष् तुएः आ+ लम्ब् आलम्बितः क्रुध तृप् आ+कें आहूतः क्षिप क्षिप्तः त्यज त्यक्तः इतः खाद् खादितः दण्ड दण्डितः इप इष्टः गण गणित: ईक्ष ईक्षितः गम गतः दुह, दुग्धः उत् + डी उड्डीनः गर्ज गजितः वृश दृष्टः गीत: हितः कथितः कथ कम्पितः ग्रहीतः धाव चलितः कुप चल कूदितः चिन्तितः । ध्वंस् नतः नम चोरितः कृ कृतः चुर E ज्ञा तप्तः तृप्तः 5 दा दत्तः गै (गा) धा १ ग्रह. धावितः धृतः धृ कुपितः चिन्त् 290 त; क्तवतु प्रत्यय १२७ श नष्टः नीतः मुह यज् या kar याच युज् रक्ष रच रज रम प् सह, रुद् रुध च्छ पक्तः पठितः पंतितः । (१ प०) पीतः लि. पालितः पुष्टः पूजितः पूर्णः पृष्टः प्रेरितः ध् वद्धः बुद्धः (वच्) उक्तः भक्षितः ण् भणितः भापितः भिन्नः भोतः रुह, लभ लिख लुभ मुग्धः,मूढः । शास् शिंष्टः इष्टः शिक्ष शिक्षितः यातः शी शयितः याचितः शुप् ব্দ: युक्तः थि श्रितः रक्षितः श्रु श्रुतः रचितः सद् सन्नः सोढः रतः सिच् सिक्तः रुदितः सिध् सिद्धः रुद्धः सिव स्यूतः रूढः सृज सृष्टः लब्धः मेव सेवितः लिखित: स्तु स्तुतः लुब्धः स्था स्थितः उक्तः स्निह, स्निग्धः उदितः स्पृश सप्टः उप्तः स्वप् सुप्तः उषितः हन हतः ऊढ: हस् हसितः विष्टः हा (३प.) हीनः वृत्तः हिस् हिंसितः वृद्धः हुतः विद्धः ह हृतः शक्तः हष हएः शान्तः हूतः वच् (बू) ر کر مر مر - کر भुक्तः भूतः भ्रान्तः वद् वप् वस् वह विश् वृत् वृध व्य शक 14 बम मतः मिलितः मुक्तः शम.
१२८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (शत मत भू तृ (३) शतृ प्रत्यय (देखो अभ्यास सूचना-रहा' अर्थ में परस्मैपदी धातुओं से लट् के स्थान पर शत् ! होता है । शतृ का अत् शेष रहता है। तीनों लिंगों में रूप चलते हैं । यहाँ पुलिंग के रूप दिये गये हैं। अन्य नियमों के लिए देखो अभ्यास २६ । ! प्रयोग ही यहाँ दिये गये हैं । धातुएँ अकारादि-क्रम से दी गयी हैं। अस् (१ प.) सन् जीन् जीवन् भिद् भिन्दा आप् आप्नुवन् ज्ञा অনিন্ भवन् आ+ ह्वे आह्वयन् तप् तपन् भ्रम् भमन् इष् इच्छन् तरन् रक्ष रक्षन् कथ् कथयन् त्यज त्यजन् रच कुर्वत् कृ लिस दा ददत् लिख कर्षन् दुह, कृष् दुहन् वद् वदन् क्री क्रीणन् दृश् पश्यन् वस् वसन् क्रीड क्रोडन् धा दधत् खन् विशन खनन् धाव धावन् विश् खाद् खादन् नश नश्यन् वृप गण गणयन् नी नयन् शक श्रि. श्रयन् गच्छन् नृत् नृत्यन् गायन् शृण्वन पच 'श्रु पचन् ग्रह पठ् पठन् सद् जिघ्रन् घ्रा पत् पतन् सिच् तिण्ड चर स्था चरन् पा (१५.) पिवन् चल चलन् पृच्छन् स्मृ चिन्त हनन चिन्तयन् प्रेर् प्रेरयन् चुर चोरयन् ब्रुवन् हस् जयन् भक्ष् भक्षयन् वह PEEEEEEEEEEEEEEEEEEE गम गै བྷཱུ བྷྱཱ བླ གླུ ཟླ प्रच्छ् ब्रू her .. तुमुन्, तव्यत्, तृच प्रत्यय १२९ शेप । (४) तुमुन्, (५) तव्यत्, ( ६ )तृच् प्रत्यय ( देखो अभ्यास २८, ३० ) सूचना-(क)तुमुन् प्रत्यय 'को' 'के' लिए' अर्थ में होता है । तुमुन् का तुम रहता है । इसके रूप नहीं चलते हैं। धातु का गुण होता है । (ख) तव्यत् प्रत्यय 'चाहिए' अर्थ में होता है । तन्यत् का तव्य शेप रहता है । तव्य प्रत्यय लगाकर रूप बनाने का सरल उपाय यह है कि तुम प्रत्यय वाले रूप में तुम के स्थान पर तव्य लगा दो। (देखो अभ्यास ३०) । (ग) 'करने वाला' या 'वाला' अर्थ में तृच् प्रत्यय होता है । तृच का तृ शेप रहता है । इसके रूप बनाने का सरल उपाय यह है कि तुम् प्रत्यय वाले रूप में तुम के स्थान पर तृ लगा दो । जैसे-कृ-कर्तुम , कर्तव्य, कर्तृ । कर्ता, हर्ता, धर्ता, भर्ता, श्रोता सव रूप तृच् प्रत्यय प्र० १ के हैं। धातुएँ अकारादिक्रम से दी गयी हैं। कर्टम क्रन्दितुम चर चल चि . क्रमितुम केतुम, अद् अत्तुम अधि + इ अध्येतुम अचितुम अस् (२प.) भवितुम आप् आप्तुम 'आ+ रम् आरब्धुम आ + रुह, आरोढुम आ+ ह्वे आह्वातुम इ एतुम इप् एपितुम ईक्ष् ईक्षितुम कथ् कथयितुम कम्प कम्पितुम कूदितुम कर्तुम् कृप क्रन्द् क्रम क्री क्रीड़ क्रुध् क्षिप् खन् खाद् गण गम गर्ज गै चिन्त चुर छिद् जप जि जीव चरितुम चलितुर चेतुम चिन्तयितुम चोरयितुम छेत्तुम जपितुम जेतुम जीवतुम क्रीडितुम क्रोद्धम क्षेप्तुम खनितुम खादितुम गणयितुम गन्तुम जितुम गातुम ग्रहीतुम ज्ञा ज्ञातुम . तप् ततुम, त तरितुम त्यक्तुम मातुम दंष्टुम त्यज् त्रै दंश ग्रह. कृ घ्रा घ्रातुम १३० प्रा० रचनानुवादकौमुदी दह दा (तुमन्, तव्यत्, दातुम धा वृध 24 शक नम मुच भेत्तुम वृत् वर्तितुम भेतुम वर्षितुम भोक्तुम वृष् वपिता भवितुम शक्तम भतुम शप् शप्तुम भ्रमितुम् . | शिक्ष शिक्षित मेलितुम् मोक्तुम धि मर्तुम श्रु यष्टुम यातुम सिन् याचितुम सिव सेवितुः योद्धम रक्षितुम सृज् शी मृ शयितुम, श्रयितुम् दग्धुम भिद् भी दिश् देष्टुम भुज दुह, दोग्धुम भू धातुम भृ धाव धावितुम भ्रम घृ धर्तुम मिल ध्ये ध्यातुम नन्तुम नश नशितुम यज् नी नेतुम या नृत् नर्तितुम याच पच पक्तुम युध पठ् पठितुम रक्ष पत् पतितुम रच पद् पत्तुम पलाय् पलायितुम रुद् पा (१,२ प.) पातुम ल पालि पालयितुम, लिख प्रष्टुम प्रेर् प्रेरयितुम् वच् बन्ध बन्धुम वक्तुम वप् भक्ष् भक्षयितुम् वस् भज् भाषितुम । विश् सह तुम सृ सम रचयितुम् सृप् रम रन्तुम स्रष्टुम, सप्तम सेवितुम् . सेव रो दतुम प्रच्छ स्तु स्तोतुम . स्था लिह, स्थातुन स्ना स्नोतुम बू वद् लब्धुम लेखितुम लेढुम वक्तुम वदितुम वस्तुम वस्तुम वोढुम स्पृश स्मृ हन् भक्तुम स्प्रटम स्मर्तुम हन्तुम हसितुम हातुम हर्तुम भाप वह., to do ho ho ho बेधुम- हापितुन .
... पत्वा, ल्यप प्रत्यय त bir ter her +डी 1) क्त्वा, (८) ल्यप् प्रत्यय ( देखो अभ्यास २९ ) सूचना-'कर' या 'करके' अर्थ में क्त्वा और ल्यप् प्रत्यय होते हैं। क्त्वा का [ और ल्यप् का य शेष रहता है । धातु से पहले उपसर्ग नहीं होगा तो क्त्वा यय होगा। यदि उपसर्ग (प्र, सम आ, उप, नि, वि आदि) पहले होगा तो प् होगा। दोनों प्रत्ययान्त रूप अव्यय होते हैं, अतः इनके रूप नहीं चलते । धिक प्रचलित रूप ही यहाँ दिये गये हैं । धातुएं अकारादि-क्रम से दी गयी हैं । धि + इ (२ आ.)- अधीत्य जि जित्वा विजित्यः स् (२५०) भूत्वा संभूय ज्ञा ज्ञात्वा विज्ञाय प्ि आप्त्वा प्राप्य तन् तनित्वा वितत्य इत्वा प्रेत्य तुष् तुष्टवा सन्तुष्य ईक्षित्वा समीक्ष्य तीळ उत्तीय उड्डी त्य त्यक्त्वा परित्यज्य कूदित्वा प्रकूध दा दत्त्वा आदाय कृत्वा उपकृत्य | दिश दिष्टवा उपदिश्यः कृष्ट्वा आकृप्य दुह, दुग्ध्वा संदुह्य कीर्वा विकीर्य दृश दृष्ट्वा संदृश्य क्रन्दित्वा आक्रन्च धा विधाय हित्वा क्रीत्वा विक्रीय धाव् धावित्वा प्रधाव्य मेड क्रीडित्वा प्रक्रीड्य ध्य ध्यात्वा संधाय क्षप् क्षिप्त्वा प्रक्षिप्य नम नत्वा प्रणम्य गन् खनित्वा उत्खन्य नश विनश्य नटवा गणयित्वा विगणय्य नि+वृ निवृत्य नीत्वा गत्वा नी आनीय आगम्य ह. गृहीत्वा . संगृह्य नृत् नतित्वा प्रनृत्य ना घ्रात्वा आघ्राय मंपच्य पच पक्त्वा चन्त चिन्तयित्वा संचिन्त्य । पठ् पठित्वा संपट्य छन् छित्त्वा उच्छिद्य पत् पतित्वा निपत्यः प् को ण [म.
लिह, पोष वह विश् भ्रम प्रा० रचनानुवादकौमुदी (कत्वा, व ‘पलाय् (परा + अय्)- पलाय्य लिख लिखित्वा अलि 'पा (१५.) पीत्वा निपाय लीडवा आनि "पृ पूर्वा आपूर्य वद् उदित्वा प्रच्छ पृष्ट्वा संपृच्छ्य वप् उप्त्वा रामद बुध बुद्ध्वा प्रबुध्य वस् उपित्वा जू उक्त्वा प्रोच्य ऊढ्वा प्रोह भक्ष भक्षयित्वा संभक्ष्य विष्ट्वा प्रविश्व 'भज् भक्त्वा विभज्य वृत् वर्तित्वा निवृत्त भाष भाषित्वा संभाष्य वृष वपित्वा प्रम भिद् भित्त्वा प्रभिद्य शम् शान्त्वा भुज भुक्त्वा उपभुज्य शास् शिष्ट्वा अनुमित भू भूत्वा संभूय शी शयित्वा संशय भ्रमित्वा संभ्रम्य श्रि श्रित्वा आविश्व मन् मत्वा अनुमत्य श्रु श्रुत्वा संश्रुत्व मिल मिलित्वा संमिल्य सह, सहित्वा संसहा मुच मुक्त्वा सिच् मिक्त्वा সমিমি यज् इष्टवा समिज्य सृज सृष्ट्वा विसम्म -या यात्वा प्रयाय सेव् सेवित्वा निषेध युज युक्त्वा प्रयुज्य स्तु स्तुत्वा न्युध युद्ध्वा प्रयुध्य स्था स्थित्वा रक्ष रक्षित्वा संरक्ष्य स्पृश् स्पृष्ट्वा मस्त रचयित्वा विरचय्य स्मृ स्मृत्वा विस्मन ‘रभ रळवा आरभ्य हत्वा निहत्य रम रत्वा विरम्य हस् हसित्वा विहत्य रूढ़वा आरुह्य हा (३५.) हित्वा विहाय लपित्वा विलप्य हृत्वा लव्व्वा उपलभ्य हूत्वा विमुच्य प्रस्तुत रच रुह, लप he the बाप .......
-- क्रम क्रीड् क्रीडनम् ज्ञा ल्युट्, अनीयर प्रत्यय १३३ (९) ल्युट्, (१०) अनीयर् प्रत्यय (देखो अभ्यास ३० ) सूचना—(क) भाववाचक शब्द बनाने के लिए धातु से ल्युट् प्रत्यय होता । ल्युट का अन शेष रहता है । धातु को गुण होता है । ल्युट् (अन) प्रत्यय ले शब्द नपुंसकलिंग होते हैं । जैसे-हिन्दी में पढ़ना, लिखना, जाना, आना [ संस्कृत में पठनम, लेखनम्, गमनम्, आगमनम् । (ख) 'चाहिए' अर्थ में धातु नीयर् प्रत्यय होता है । अनीयर् का अनीय शेष रहता है। अनीय लगाकर प बनाने का सरल उपाय यह है कि ल्युट् प्रत्यय वाले शब्द के अन्तिम अन के पान पर अनीय लगा दो। जैसे—पट का पठन, पठनीय । लिख-लेखन, खनीय । धातुएं अकरादि-क्रम से दी गयी हैं। धि+इ अध्ययनम क्रमणम जि जयनम (न्विष. अन्वेषणम क्री क्रयणम जीव जीवनम चिं अर्चनम् ज्ञानम ज" अर्जनम ऋध् क्रोधनम ज्वल ज्वलनम स्(२५.) भवनम क्षिप् क्षेपणम तप् तपनम मा+क्रम आक्रमण खन् खननम तुष् तोषणम मा+चर आचरणम खाद् खादनम तृप् तर्पणम HT + रुह आरोहणम गण गणनम तरणम मास् आसनम् गम गमनम त्यज त्यजनम प्रा + हे आह्वानम गज गर्जनम वाणम ईक्ष ईक्षणम गानम दंशनम उद् + डी उड्डयनम् ग्रह, दण्डनम कथ् कयनम चर चरणम कम्प कम्पनम चल चलनम दानम् कूर्दनम् चि चयनम दोहनम.. क करणम चिन्त दृश् कर्पणम चुर् चोरणम धा क्रन्द् क्रन्दनम छिद् धाव गै दंश दण्ड ग्रणम् दह. दहनम. दा दुह. चिन्तनम दर्शनम- कृष् छेदनम. धानम धावनम.. .
१३४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (ल्युट, अनीयर . भन्न भाप् भुज भू नम् भोजनम शपनमः भृ भ्रम मन् मिल मुच मुह मृ या नम धरणम ध्य ध्यानम् नशनम् नि + गृ निगरणम् निन्द् निन्दनम् नि+यम नियमनम नि + विद् निवेदन नी नयनम नृत् नर्तनम पच पचनम् पट पठनम पत् पतनम पलाय पलायनम पा पानम् पाल पालनम 'पुप् पोपणम पूज् प्र+काश प्रकाशनम प्र+आप् प्रापगम् प्र+हस् प्रहसनम प्रेर प्रेप प्रेपणम बन्ध वन्धनम बू वचनम 'भक्ष. भक्षम्म 'भज् भजनम याच युज रक्ष भजनम वृष् वर्धनम भाषणम वृप वर्षणम् शप् भवनम शम शमनम् भरणम् शास् शासनम भ्रमणम् शिक्ष शिक्षणम मननम शी शयनम मेलनम शुभ शोभनम् मोचनम शुप् शोषणम् मोहनम ध्रु श्रवणम् मरणम सं० + मिल संमेलनम, यानम सह. सहनम याचनम् साधु सधनम् योजनम् सिन् सेचनम् सिव सेवनम रञ्जनम सृज सर्जनम सेव सेवनम् लेखनम स्तु स्था स्थानम वचनम स्नानम वञ्चनम स्पृश् स्पर्शनम, वन्दनम् स्मृ स्मरणम स्वप् वहनम् हन् हननम् विधानम् हु हवनम वर्तनम रक्षणम पूजनम रोदनम स्तवनम् रज रुद् लिख लोन् वच वञ्च वन्द् लोचनम, . प्रेरणम वण वर्णनम स्वपनम वह वि+धा वृत् हरणम - अनुवादार्थ गद्य-संग्रह १३५ (७) अनुवादार्थ गद्य-संग्रह (१) संस्कृत-भाषा शुद्ध भाषा को संस्कृत कहते हैं। इसके हो नाम देवभापा, देववाणो आदि है। यह भारतवर्ष की एक बहुमूल्य निधि है । भारतवर्ष का सारा प्राचीन ज्ञान- भण्डार इसी भाषा में है । वेद, उपनिषद्, दर्शन, रामायण, महाभारत, गीता आदि ग्रन्य इसी भाषा में हैं । प्राचीन समय में संस्कृत-भाषा आर्यों के दैनिक व्यवहार की भापा थो। पाणिनि और पतंजलि के कथनों से यह बात सर्वथा सिद्ध होती है । इस भाषा के ज्ञान से ही प्राचीन भारतीय-संस्कृति का ज्ञान होता है । हमारा कर्तव्य है कि हम इसके प्रचार और उन्नति के लिए प्रयत्न करें। (२) कालिदास महाकवि कालिदास संस्कृत-साहित्य के सर्वोत्तम कवि हैं। उन्होंने नाटक, महाकाव्य और गीतिकाव्य लिखे हैं। उनके लिखे हुए ७ प्रमुख ग्रन्थ ये हैं- (क) नाटक-मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय, अभिज्ञान शाकुन्तल; (ख) महा- काव्य-कुमारसंभव, रघुवंश; (ग) गीतिकाव्य-ऋतुसंहार, मेघदूत । उनको प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। उनकी रचनाओं में प्रसाद-गुण और माधुर्य-गुण हैं। वे नीरस कथा को भी सरस. बना देते हैं। उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है-उनकी सरल, सुन्दर और शुद्ध शैली । वे बहुत कम शब्दों के द्वारा अधिक और सुन्दर अर्थ कहते हैं। वे चरित्र-चित्रण में असाधारण पटु हैं। उनका भाषा पर पूर्ण अधिकार है । वे उपमाओं के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं । उनकी रचना दूसरे कवियों के लिए आदर्श रही हैं। संकेत-(१) वचनैः, एतत्, सिध्यति, प्रयतेमहि । (२) कृतिपु, सम्पादयति, स्वल्पैरेव पदैः, वर्णयति, आदर्शरूपा अभवन् । - - १३६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (३) अहिंसा किसी को दुःख देने को हिंसा कहते हैं । हिंसा तीन प्रकार की होती है- मन से, वचन से और कर्म से । मन से किसी का अशुभ सोचना, यह मानसिक हिंसा है । कटु-वचन और असत्य-भापण से किसी को दुःखित करना, यह वाचिक हिंसा है । किसी जीव की हत्या करना या उसे दण्ड आदि के द्वारा पीड़ा देना, यह कायिक हिंसा है। इन तीनों हिंसाओं के त्याग को अहिंसा कहते हैं । संसार में अहिंसा की व त आवश्यकता है । अहिंसा से मनुष्य की आत्मा प्रसन्न रहती है । अहिंसा से पशु-पक्षी भी मनुष्यों पर प्रेम करते हैं । अहिंसा से शत्रु भी मित्र हो जाते हैं । संसार के सभी महापुरुषों ने अहिंसा को अपनाया है । अहिंसा से ही संसार में शान्ति रह सकती है । अतएव कहा गया है-अहिंसा परमो धर्मः । (४) आरोग्य मनुष्य के जीवन में आरोग्य का बहुत महत्त्व है। मनुष्य का जीवन तर्भ सुखी हो सकता है, जब वह निरोग हो । जो मनुष्य निरोग है, वह सब प्रकार के पुरुषार्थ कर सकता है। जो मनुष्य रुग्ण है, जिसके शरीर में शक्ति नहीं है वह किसी प्रकार भी संसार में सुख का अनुभव नहीं कर सकता है । अतः शरो को निरोग रखना अनिवार्य कर्तव्य है। शरीर की निरोगता व्यायाम से होर्त है । व्यायाम अनेक प्रकार के हैं, जैसे-घूमना, दौड़ना, खेलना, तैरना आदि वालकों के लिए खेलना, दौड़ना और तैरना विशेष लाभप्रद हैं। योगासन औ भारतीय व्यायाम भी शरीर की निरोगता के लिए विशेष उपयोगो हैं । जीव को सुखमय बनाने के लिए सदा व्यायाम करना चाहिए और शरीर को नोरो रखना चाहिए। संकेत:-(३) परपीडनम् , त्रिविधा, मानसिकी, वाचिकी, हननम, तिसृणाम , प्रसीदति, स्वीकृतवन्तः, संभवति । (४) सर्वविधम , कतुं शक्नोति कथमपि, नानाविधाः, तरणम् , निरामयं कर्तव्यम् । कायिकी - अनुवादार्थ गद्य-संग्रह १३७ -- (५) सदाचार सज्जनों के आचरण को सदाचार कहते हैं । सज्जन जिस प्रकार आचरण करते हैं, उसी प्रकार आचरण करना सदाचार है । सज्जन अपनी इन्द्रियों को श में रखते हैं, दुर्गुणों पर विजय पाते हैं और सद्गुणों को उन्नत करते हैं । वे त्य बोलते हैं, असत्य को छोड़ते हैं, माता-पिता और गुरुजनों का आदर करते ई, सत्कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, असत्कार्यों से निवृत्त होते हैं और परोपकार के कार्य करते हैं। सदाचार को अपनाने से ही देश, जाति और समाज की उन्नति होती है । सदाचार से ही मनुष्य संयमी होता है । सदाचार से मनुष्य का शरीर. पुष्ट होता है, उसकी बुद्धि दढ़ती है, मन निर्मल होता है, सद्गुणों का समावेश होता है और दुर्गुणों का नाश होता है। अतएव कहा गया है-आचारः परमो धर्मः । (६) सत्संगति सज्जनों की संगति को सत्संगति कहते हैं । सत्संगति एक विशेष गुण है सज्जनों की संगति से मनुष्य में सद्गुण का समावेश होता है और दुर्गुणों का नाश होता है । मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह संगति से ही गुणों और अवगुणों को सोखता है । वह जैसे मनुष्यों की संगति में रहेगा, वैसे ही गुण सीखेगा। सज्जनों की संगति से मनुष्य सद्गुण सीखता है और दुर्जनों की संगति से दुर्गुण । सत्संगति से मनुष्य का जीवन सुख और शान्ति से युक्त होता है, मनुष्य उन्नति की ओर अग्रसर होता है और उसकी कीर्ति फैलती है । बाल्यकाल में बालक पर संगति का प्रभाव विशेषरूप से होता है। अतः जीवन को सुखी और शान्ति- युक्त बनाने के लिए सत्संगति ही करनी चाहिए । संकेत:-(५) आचरन्ति, स्थापयन्ति, लभन्ते, प्रवर्तन्ते, निवर्तन्ते, वर्धते । (६) शिक्षते, निवत्स्यति, शिक्षिष्यते, प्रथते । १० - १३८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी ये (७) महात्मा गांधी महात्मा गांधी का जन्म गुजरात प्रान्त में हुआ था। इनके पिता का ना करमचन्द और माता का नाम पुतलीबाई था । ये दोनों बहुत सज्जन-प्रकृति । महात्मा गांधी भी वचपन से ही सज्जन-स्वभाव के थे। महात्मा गांधी भारतवर्ष और विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् वे देश सेवा काम में लग गये। उन्होंने अपना सारा जीवन भारतवर्ष की सेवा में ल दिया। उन्होंने प्रण किया कि भारतवर्ष को स्वतन्त्र करूँगा। उनके त्याग के तपस्या का फल है कि भारत स्वतन्त्र हुआ और आज भारत स्वतन्त्र राः में आदरणीय हो रहा है। वे सत्य और अहिंसा के प्रबल समर्थक और पार थे । उन्होंने हरिजनोद्धार, स्त्री-शिक्षा, भारतीय कला-कौशल की उन्नति का प्रशंसनीय कार्य किये हैं। (८) महर्षि दयानन्द महर्षि दयानन्द का जन्म गुजरात में हुआ था। वे भारतवर्ष के समा सुधारकों में सर्वप्रथम हैं। अपने चाचा और वहिन की मृत्यु को देखकर उ मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ और वे सत्य शिव को ढूंढने के लिए घर से निः पड़े। उन्होंने अनेक वर्षों तक तपस्या की। उन्होंने समाज की त्रुटियों की करने के लिए आर्यसमाज की स्थापना की। उन्होंने वेदों का भाष्य करके का महत्त्व संसार को प्रदर्शित किया। उन्होंने समाज-सुधार के बहुत-से में किये । जैसे-अस्पृश्यों का उद्धार, स्त्री-शिक्षा, गो-रक्षा, गोशाला और अनाधार की स्थापना आदि । वे पूर्ण सदाचारी, त्यागी, तपस्वी, देशभक्त, समाज-सुधार वेदों के अद्वितीय विद्वान्, असाधारण वक्ता और निर्भीक संन्यासी थे। संकेत:-(७) प्रकृत्या अतिसज्जनौ, सरलस्वभावाः, यापितवान् (८) । व्यस्य, प्रादुरभवत्, अन्वेष्टुम्, अपाकर्तुम्, अस्थापयत् । .
अनुवादार्थ गद्य-संग्रह १३९ (९) दशहरा दशहरा आर्यों का सबसे मुख्य पर्व है । यह पर्व आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की दशमी को होता है । यह क्षत्रियों का मुख्य पर्व माना जाता है। जनश्रुति है कि श्री रामचन्द्रजी ने इसी दिन रावण पर विजय पायी थी। इसलिए इस पर्व के अवसर पर हिन्दू रामलीला का आयोजन करते हैं । उसमें राम की विजय और पापी रावण का वध दिखाते हैं। यह पर्व बहुत प्राचीन समय से मनाया जाता है। क्षत्रिय इस अवसर पर अपने शस्त्रों की पूजा करते हैं । यह पर्व शिक्षा देता है कि धर्मात्मा की सदा विजय होती है और पापी का नाश होता है । यह पर्व क्षात्रबल की उन्नति का सूचक है । क्षात्रवल की उन्नति से ही देश की उन्नति होती है । इस पर्व को विजयादशमो भी कहते हैं । (१०) दीपावली दीपावलि भी हिन्दुओं का प्रसिद्ध पर्व है । इसको दीवाली और दीपमालिका भी कहते हैं। यह कार्तिक मास की अमावस्या के दिन विशेष आयोजन के साथ मनायी जाती है । इसके विषय में जनश्रुति है कि श्री रामचन्द्रजी रावण को जीतकर जब अयोध्या लौटे तो इसी दिन विजयोत्सव का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर सभी हिन्दू अपने मकानों की स्वच्छता करते और कराते हैं यह वैश्यों का मुख्य पर्व माना जाता है। वे इस दिन लक्ष्मी-पूजन करते हैं और अपने व्यापार में श्री-वृद्धि के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हैं । इस अवसर पर रात्रि में सभी घर दीपमाला से सुशोभित होते हैं और सभी आनन्दोलव मनाते हैं। संकेत:-(९) पर्व ( पर्वन् ), दशम्याम्, मन्यते, दर्शयन्ति, आयोज्यते । (१०) कथ्यते, विजित्य, प्रत्यागतः, कारयन्ति, गण्यते, सम्पादयन्ति । - १४० प्रा० रचनानुवादकौमुदी मनुष्य - (११) स्वदेश-प्रेम स्वदेश-प्रेम सर्वोत्तम गुणों में से एक गुण है। संसार का प्रत्येक देश का ऋणी है। जिस देश में उसने जन्म पाया है, जहाँ निरन्तर मोर कूदा है, जिसके अन्न और जल का उपभोग किया है, जहां की व जीवित रहा है, उसके प्रण से कभी उऋण नहीं हो सकता है । मनुष्य अप फा ऋणी है, अतः उसका कर्तव्य है कि वह देश की उन्नति के लिए कुछ करे। वह कोई ऐसा कार्य न करे, जिससे देश की अवनति या अर्काति महात्मा गांधी, सुभाष बोस, जवाहरलाल नेहरू आदि ने अपना सारा : देश के लिए दे दिया, अतः वे महापुरुप हो गये हैं। हमारा भी कर्तव्य है देश की उन्नति के लिए सदा यत्नशील हों। f (१२) स्वावलम्बन स्वावलम्बन अलौकिक गुण है, जो मनुष्य के जीवन को सदा सुखमय है । स्वावलम्बन शिक्षा देता है कि मनुष्य को अपना काम स्वयं करना चा अपने काम के लिए दूसरों के आश्रित नहीं रहना चाहिए। जो मनुष्य स्वावलम्बी होता है, वह उतना ही सुखी रहता है। जो परावलम्बी हो वह सदा दुःखी रहता है । स्वावलम्बन से मनुष्य में पुरुषार्थ, साहस, कर्तव्यशीलता और प्रसन्न-चित्तता आदि गुणों का उदय होता है । परावर से हीनता, दीनता, खिन्नता, अधीरता आदि दोषों का उदय होता है । ६ का साधन स्वावलम्बन है। अतः जो मनुष्य या देश उन्नति करना चाह उसे स्वावलम्बी होना चाहिए। संकेतः-(११) अनृणः, भवितुं, शक्नोति, अर्पितवन्तः । (१२) ६ शिक्षयति, करणीयम्, स्यात्, यावान्, तावान्, भवेत् ।
अनुवादार्थ गद्य-संग्रह १४१ (१३) अनुशासन-पालन कुछ विशेष नियमों के पालन और अपने से बड़ों को आज्ञा के पालन करने : अनुशासन-पालन कहते हैं । अनुशासन-पालन से मनुष्य का जीवन नियमित ता है। वह अपने सब कामों को ठीक समय पर करता है। वह अपने समय ! मूल्य समझता है और अपने जीवन का महत्त्व समझता है । अनुशासन-पालन मनुष्य उन्नति की ओर जाता है । जो मनुष्य, जो समाज और जो देश अनु- सन का पालन करता है, वह उन्नत होता है । जहाँ अनुशासन नहीं होता है, हाँ अनियम और अव्यवस्था होती है । जीवन के प्रत्येक स्थान पर अनुशासन- लिन की आवश्यकता होती है। जीवन की सफलता के लिए अनुशासन का लिन अवश्य करना चाहिए (१४) मित्रता निःस्वार्थ भाव से परस्पर स्नेह करने को मित्रता कहते हैं। मनुष्य सामा- जक प्राणी है, वह चाहता है कि उसका कोई मित्र अवश्य हो, जिसे वह अपने ख और सुख को सब बातें बता सके । अतएव मित्र की आवश्यकता होती है । मंत्र का निर्णय सावधानो से करना चाहिए । मित्र ऐसा होना चाहिए कि जो वार्यों न हो, वंचक न हो, दुर्जन न हो । सच्चा मित्र वह है, जो वड़ी विपत्ति में भी साथ न छोड़े । दुख में अपने मित्र का साथ दे और सुख में सुखी हो । सदा सज्जन से ही मित्रता करनी चाहिए, दुर्जन से नहीं। दुर्जन से मित्रता दुःखदायी होती है। मित्र का कर्तव्य है कि वह अपने मित्र के दुःख में दुःखो हो, उसे उत्तम संमति दे, उसे कुमार्ग से बचावे और सदा सन्मार्ग पर लावे । संकेत: -(१३) ज्येष्ठानाम्, आज्ञापालनम्, ययासमयम्, जानाति । (१४) पारस्परिकः स्नेहः, विज्ञापयेत्, सावधानतया, तादृशं स्यात्, ययार्थः, सङ्गम्, साहाय्यम् आचरेत्, करणीया, निवारयेत्, आनयेत् ।
१४२ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (१५) विद्याथि-जीवन जीवन को चार भागों में बांटा गया है। इनको चार आश्रम भी कहते हैं । पहला आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम है । यही विद्यार्थि-जीवन है। मनुष्य के जीवन की आधार-शिला विद्यार्थि-जीवन ही है। मनुष्य विद्यार्थि-जीवन में अपना जीवन जैसा बना लेता है, उसका भविष्य जीवन भी उसी प्रकार का हो जाता है । यही समय है जब विद्यार्थी सारी विद्याओं, सारे गुणों और सारी कलाओं को सीखता है। विद्यार्थि-जीवन में सीखी हुई सारी विद्याएँ आदि उसके भावी जीवन में काम आती हैं। इस समय ही मनुष्य आचार-विचार, संयम, शील और सत्य आदि गुणों को सीखता है । जो मनुष्य विद्यार्थि-जीवन का जितना सदुपयोग करेगा, वह उतना ही वड़ा मनुष्य होगा। (१६) शिक्षा का उद्देश्य शिक्षा मनुष्य की बौद्धिक शक्ति को विकसित करती है । शिक्षा ही मनुष्य को पशु से पृथक् करती है । शिक्षा के द्वारा मनुष्य विद्वान् और बुद्धिमान होता है । शिक्षा के द्वारा मनुष्य शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म को ठीक-ठीक समझता है। वह उनमें से उत्तम वस्तुओं और गुणों को स्वीकार कर लेता है और अनुचित को छोड़ देता है। शिक्षा से मनुष्य अपने कर्तव्य को ठोक जानकर एक सुयोग्य नागरिक होता है। वह ज्ञानोपार्जन करके अपनी उन्नति करता है और अपनी विद्या के द्वारा समाज और विश्व को उन्नत करता उसके है । शिक्षा का उद्देश्य है--मनुष्य की विवेक-शक्ति को जागृत करना, चरित्र को शुद्ध बनाना, बौद्धिक शक्तियों को विकसित करना, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति करना । संकेत:-(१५) चतुर्यु भागेषु, विभज्यते, विद्यार्थि-जीवनम्, यादृशम्, तादृशम्, शिक्षते, भाविनि, उपयोगिन्यः भवन्ति, महान् । (१६) वोद्धिकीम्, विकासयति, यथार्थतः जानाति, स्वीकरोति, विज्ञाय, उद्बोधनम्, करणम्, विकासनम् । । -- निबन्ध-संग्रह १४३ (८) निबन्ध-संग्रह आवश्यक निर्देश १. किसी विषय पर अपने विचारों और भावों को सुन्दर, सुगठित, सुबोध नं क्रमबद्ध भाषा में लिखने को निबन्ध कहते हैं। निवन्ध के लिए दो वातों की अवश्यकता होती है-१. निवन्ध की सामग्री, २. निवन्ध की शैली । : निबन्ध की सामग्री एकत्र करने के तीन साधन है-१. निरीक्षण अर्थात् कृति की वस्तुओं को स्वयं सावधानी से देखना और उनके बारे में ज्ञान प्राप्त रना । २. अध्ययन अर्थात् पुस्तकों आदि से उस विषय का ठोक ढंग से ज्ञान प्त करना । ३. मनन अर्थात् स्वयं उस विषय पर विचार करना । २. निवन्ध-लेखन में इन बातों का सदा ध्यान रखें-१. प्रस्तावना या 'परम्भ-प्रारम्भ में विपय का निर्देश करें और उसका लक्षण आदि लिखें। विवेचन-बीच में विषय का विस्तृत विवेचन करें। उस वस्तु के लाभ- नि, गुण-अवगुण, उपयोगिता, अनुपयोगिता आदि का विस्तृत विचार करें। पने कथन की पुष्टि में सुभाषित, पद्य या श्लोक आदि उद्धरण के रूप में दे कते हैं । ३. उपसंहार-अन्त में अपने कथन का सारांश क्षंक्षेप में दें। प्रस्ता- ना और उपसंहार संक्षेप में दें। अधिक स्थान विवेचन में दें। ३. निवन्ध की शैली के विषय में इन बातों का ध्यान रखें-१. भाषा पाकरण की दृष्टि से शुद्ध हो । २. भाषा प्रारम्भ से अन्त तक एक-सी हो । ३. 'पा में प्रवाह हो और स्वाभाविकता हो । ४. उपयुक्त और असंदिग्ध शब्दों का ही प्रयोग करें। ५. भाषा सरल, सुबोध और आकर्षक हो। ५. सुभाषित, होकोक्ति और अलंकारों को भी आवश्यकतानुसार दें। ७ अनावश्यक विस्तार, नरुक्ति, पाण्डित्य-प्रदर्शन और क्लिष्टता का परित्याग करें। ४. निबन्ध के मुख्यतया तीन भेद हैं-१. वर्णनात्मक, २. विवरणात्मक, विचारात्मक । ५. उदाहरण के लिए २० निवन्ध अतिप्रसिद्ध विषयों पर सरल संस्कृत में ये जाते हैं। सरलता और छात्रों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन निबन्धों सन्धियां नहीं की गयी हैं । छात्र आवश्यकतानुसार सन्धियां कर लें।
-- १४४ प्रा० रचनानुवादकौमुदी - (१) विद्या कस्यापि वस्तुनः यथार्थतः ज्ञानं विद्या इति कथ्यते । संसारे यानि धना सन्ति, तेषु विद्या सर्वश्रेष्ठं धनम् अस्ति । विद्यया मनुष्यः स्वकीयं कर्तव्य अकर्तव्यं च जानाति । विद्यया एव मनुष्यः जानाति यत् संसारे कः धर्मः, अधर्मः, किं पापम्, किं च पुण्यम् इति । विद्यया एव मनुष्यः सन्मार्गम् अनुसर्रा कुमार्ग न परित्यजति । विद्यया एव मनुष्यः यथार्थतः मनुष्यः भवति । । विद्याहीनः अस्ति, स स्वकीयं कर्तव्यं न जानाति । अतः कथ्यते--विद्याविही पशुः, अर्थात् विद्यया रहितः नरः पशुः भवति । सर्वाणि धनानि व्यये कृ न्यूनानि भवन्ति, परन्तु विद्या व्यये कृते वर्धते । विद्यया मनुष्यस्य सम्मा भवति । विद्वान् मनुष्यः सर्वत्र सम्मानं लभते । राजा स्वदेशे एव पूज्यते, पर विद्वान् सम्पूर्णे जगति आदरं प्राप्नोति । सर्वेपाम् एतत् कर्तव्यम् अस्ति यत् परिश्रमेण विद्यां पठेयुः । (२) सत्यम् यद् वस्तु यथा विद्यते, तस्य तेन एव रूपेण कथनं सत्यम् इति कथ्यते संसार सत्यस्य महती आवश्यकता अस्ति । सत्येन एव समाजस्य स्थितिः अस्ति सत्यस्य एव एप महिमा अस्ति, यद् वयं समाजे मनुष्येपु विश्वासं कुर्मः । सत्य भाषणेन मनुष्यः निर्भीकः भवति । सत्यभाषणेन तस्य तेजः यशः कीतिः गौर च वर्धन्ते । य सत्यं वदति, स सदा सर्वेभ्यः पापेभ्यः निवृत्तः भवति । स सत्कर्म प्रवर्तते, सद्गुणान् आश्रयति, धर्मे मतिं करोति, अधर्मे न प्रवर्तते, यशः इच्छति प्रतिष्ठां प्रियं मन्यते, अप्रतिष्ठां च मृत्युं गणयति । सत्यभाषणं सर्वोत्कृष्टं तप विद्यते । सत्यभापणस्य अभ्यासेन एव मनुष्यः महात्मा, त्यागी, तपस्वी भवति । सत्यस्य प्रतिष्ठया एव संसारस्य कल्याणं भवति । सत्यस्य व्यवहारे एव देशः, समाजः जातिः च उन्नति प्राप्नुवन्ति । असत्यभाषणं पापानां मूला अस्ति । अतएव उच्यते-नहि सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् असत्यभाषणेन नरस्य पतनं भवति । सत्यस्य पालनार्थमेव राजा हरिश्चन्द्र सर्वाणि दुःखानि असहत । सत्यस्य प्रभावेण एव राजा युधिष्ठिरः विजयम अलभत । सर्वेषाम् एतत् कर्तव्यम् अस्ति यत् ते उन्नत्यै सदा सत्यं वदेयुः ।
निबन्ध-संग्रह १४५ -- -- , - . (३) परोपकारः परेषाम् उपकारः परोपकारः अस्ति । अन्येषां हितकरणम्, निर्धनेभ्यः दानम्, असहायानां सहायता एतत् सर्वं परोपकारः एव उच्यते । संसारे परोप- कारः एव स गुणः अस्ति, येन मनुष्येषु सुखस्य प्रतिष्ठा अस्ति । समाजसेवायाः भावना, देशप्रेम्णः भावना, देशभक्तेः भावना, दीनोद्धारस्य भावना, परदुःखेषु सहानुभूतिः च परोपकारस्य भावनया एव सम्भवति । परोपकारकरणन मनुष्यस्य हृदयं पवित्रं निर्मलं सरलं विनीतं च भवति । परोपकारी अन्यस्य दुखं स्वकीयं मन्यते, तस्य नाशाय च प्रयत्नं करोति । द नेभ्यः दानं ददाति, निर्धनेभ्यः धनं ददाति, वस्त्रहीनेभ्यः वस्त्राणि ददाति, पिपासितेभ्यः जलं ददाति, क्षुधितेभ्यः अन्नं ददाति, अशिक्षितेभ्यः विद्यां च ददाति । प्रकृतिः अपि परोप- कारस्य शिक्षा ददाति । परोपकारार्थ सूर्यः तपति, चन्द्रः प्रकाशं ददाति, वायुः चलति, नद्यः वहन्ति, वृक्षाः च फलानि वितरन्ति । (४) उद्योगः संसारे सर्वे जनाः सुखम् इच्छन्ति । न कोऽपि जनः दुःखम् इच्छति । सुखं पुरुषार्थेन विना न सिध्यति । उद्योगेन एव मनुष्यः धनं लभते, विद्यां लभते, संसारे गौरयं प्राप्नोति, कलासु कुशलतां प्राप्नोति, जगति कीति च लभते । ये जनाः पुरुषार्थ न कुर्वन्ति, ते न सुखं लभन्ते, न शान्ति प्राप्नुवन्ति, न विद्या लभन्ते, न कलासु कुशलतां प्राप्नुवन्ति, न च जगति कीति लभन्ते । उद्योगः एव जीवनस्य आधारशिला अस्ति । उद्योगेन एव सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति, न तु मनोरयमात्रेण । अतएवोक्तम्---उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः । उद्यमेन एव निधनाः धनिनः भवन्ति, विद्याहीनाः विद्यासु निपुणाः भवन्ति, निर्दलाः सबलाः भवन्ति, दुःखिनः च सुखिनः भवन्ति । संसारे यावन्तः अपि महापुरुषाः अभवन्, ते सर्वे अपि उद्योगम् एव अकुर्वन् । यः कश्चित् जीवने सफलताम् इच्छति, स उद्योगम् एव आश्रयेत् ।
१४६ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (५) वसन्तः ऋतुः वर्षे पड् ऋतवः भवन्ति । प्रथमं वसन्तः ऋतुः आगच्छति । अस्मिन् ऋतौ गर्वे वृक्षाः सर्वाः लता च प.लैः पुष्पैः च युक्ताः भवन्ति । सर्वेपु वृक्षेप नवीनानि पाणि भवन्ति । आम्रपु मञ्जयः आगच्छन्ति । आम्रस्य वृक्षेप कोकिलाः मधुरेण स्वरेण कूजन्ति । सरोवरेपु कमलानि विकसन्ति । तेषु भ्रमराः सानन्द विन रन्ति । भ्रमराः कमलानां रसं पीत्वा मधुरं गुञ्जन्ति, इतस्ततः भ्रमन्ति च । अस्मिन् बातो शीतस्य अन्तः भवति । शीतलः मन्दः सुगन्धिः च वायुः वहति । अयम् प्रतुराजः इति कथ्यते । अयम् अतीव सुखदः ऋतुः भवति । (६) ग्रीष्मः ऋतुः अस्मिन् ऋती मूर्यस्य किरणाः तीक्ष्णाः भवन्ति । सूर्यः भूमिम् अत्यधिक तापयति । उष्णः तोवः च वायुः वहति । अल्पे अपि परिश्रमे कृते स्वेदः प्रवहति । नद्यां स्नानं रुचिकरं भवति । मध्याह्न तीवः सूर्यस्य तापः भवति, अतः प्रातः- कालः सायंकाल: च सुखकरी भवतः । मध्याह्ने वदि: गमनं न सम्भवति, अतः छायासु शयनं रुचिकरं भवति । पिपासा अधिकं वाधते । शरीरे शिथिलत्वं राजायते । कार्येषु मनः न लगति । केचन आतपेन रुग्णाः भवन्ति । वृक्षाः लताः च प्रायः शुष्यन्ति। (७) वर्षा ऋतुः अस्मिन् ऋतौ सर्वतः जलेन परिपूर्णाः मेघाः दृश्यन्ते । ते कदाचित् गर्जन्ति, कदाचित् वर्षन्ति च । मेवाघां गर्जनं श्रुत्वा मयूराः नृत्यन्ति । महता वेगेन जलं वर्षति । नद्यः सरोवराः च जलेन पूर्णाः भवन्ति । सर्वत्र जलम् एव दृश्यते । मेघेषु विद्युत् पुनः पुनः द्योतते । अस्मिन् ऋतौ कृषकाः मोदन्ते । ते क्षेत्राणि कर्पन्ति, बीजानि वपन्ति च । सर्वतः भूमिः शस्यैः श्यामला दृश्यते । वर्षासु जनाः आतपत्रं गृहीत्वां बहिः गच्छन्ति । जलेन परिपूर्ण : मार्गाः मलिनाः भवन्ति । रात्रौ खद्योताः दृष्टिगोचराः भवन्ति ।
निवन्ध संग्रह १४७. (८) श्रीरामचन्द्रः श्रीरामचन्द्रः पुरुषोत्तमः अभवत् । तस्य पितुः नाम दशरथः आसीत् । तस्य नातुः च नाम कौशल्या आसीत् । तस्य त्रयः भ्रातरः आसन्--लक्ष्मणः, भरतः शत्रुघ्नः च । स बाल्यकाले एव सर्वासु विद्यासु कुशलतां प्राप्तवान् । स धनु-- विद्यायाम् अतीव निपुणः आसीत् । राज्ञः जनकस्य पुत्र्या सीतया सह तस्य विवाहः अभवत् । पितुः दशरथस्य आज्ञां पालयित्वा स चतुर्दशवर्षाणि वने अवसत् । तत्रैव रावणः सीताम् अहरत् । युद्धे रावणं हत्वा रामः अयोध्याम् आगच्छत् । तत्र राज्यं च प्राप्तवान् । तस्य राज्यम् आदर्शरूपम् आसीत् । अधु- नापि तस्य रामराज्यम् इति जनाः सादरं स्मरन्ति । (९) श्रीकृष्णः भगवान् श्रीकृष्णः महात्मा महायोगी च आसीत् । तस्य पिता वसुदेवः, माता देवकी च आस्ताम् । स वाल्यकाले एव सर्वासु विद्यासु महती योग्यता प्राप्नोत् । स शस्त्रविद्यायाम् अतीव निपुणः आसीत् । मुरलीवादने तु अद्वितीयः अभवत् । स बाल्यावस्यायाम् एव वहूनां राक्षसानां वधम् अकरोत् । स महा- नीतिज्ञः आसीत् । युद्धे अर्जुनः किंकर्तव्यविमूढः अभवत् । भगवान् श्रीकृष्णः तस्मै गीतायाः उपदेशम् अददात् । भगवद्गीता न केवलं भारतवर्षे, अपि तु सम्पूर्ण जगति आदरेण पठ्यते । तस्य जन्मतिथि : श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इति पर्वरूपेण भारतवर्षे सर्वैः सोत्साहं सम्मान्यते । (१०) श्रीजवाहरलालनेहरुः श्रीजवाहरलालनेहरुः न केवलं भारतवर्षस्य, अपि तु विश्वस्य महती विभूतिः बासीत् । तस्य पिता श्रीमोतीलालनेहरुः जननी च स्वरूपरानी आस्ताम् । स वाल्यकाले विदेशं गत्वा तत्र आङ्ग्लभाषायाः अध्ययनम् अकरोत् । स गुणानाम् आकरः, धैर्यस्य धाम, विद्वत्तायाः निधिः, अहिंसायाः प्रवलः प्रचारकः, राजनीति- विशारदः, असमः देशभक्तः च आसीत् । स देशस्य स्वाधीनतालाभाय बहुवारं कारावासं प्राप्तः । स सप्तदशवर्षाणि प्रधानमन्त्रिपदम् अलञ्चकार । तस्य पुत्री श्रीमती इन्दिरागान्धिः अपि एकादशवर्षाणि प्रधानमन्त्रिपदम् अल अकरोत् ।
१४८ प्रा० रचनानुवादकौमुदी (११) ग्रामजीवनम् भारतवर्ष ग्रामप्रधानः देशः अस्ति । अधिका जनता ग्रामेषु एव निवसति । ग्रामवासिनः जनाः ग्रामीणाः इति कथ्यन्ते । ग्रामीणानां जनानां दिनचर्या शोभना शिक्षाप्रदा च भवति । ग्रामेषु ग्रामीणाः जनाः प्रातः चतुर्वादने उत्तिष्ठन्ति । ते शोचं स्नानं सन्च्याम् अन्यत् च आवश्यक कार्य कृत्वा स्वकीयेपु कार्येषु संलग्नाः भवन्ति । ग्रामान् परितः शस्यैः पूर्णानि क्षेत्राणि भवन्ति । सर्वतः शस्यश्यामला भूमिः दृश्यते । तत्र उद्यानपु सुन्दराणि पुष्पाणि फलानि च दृश्यन्ते । ग्रामेषु स्वच्छः वायुः प्रवहति । ग्रामेषु शुद्धं जलम्, स्वच्छः वायुः, शुद्धं दुग्यम्, शुद्ध वृतम्, शुद्धानि खाद्यवस्तूनि च प्राप्तानि भवन्ति । अतः ग्रामेषु स्वास्थ्यं समी- चीन भवति । तत्र जनाःह टाः पुष्टाः बलवन्तः प्रसन्नाः भवन्ति । ग्रामेषु जीवनम् अति सुन्दरं भवति । (१२) नगरजीवनम् भारतवर्षे वहूनि नगराणि सन्ति । नगरेषु जीवनं सुखदं रुचिकरं च भवति । नगरवासिनः जनाः नागरिकाः इति कथ्यन्ते । नगरेपु सुविधाः अधिकाः सन्ति, अतः सर्वे अपि नगरेपु एव निवासम् इच्छन्ति । नगरेषु विद्याध्ययनार्थ विद्यालयाः ... महाविद्यालयाः विश्वविद्यालयाः च भवन्ति । तत्र यः यावत् पठितुम् इच्छति, -तावत् पठितुं शक्नोति । तत्र यानस्य, धूम्रयानस्य, स्वच्छेपु भवनेषु निवासस्य, 'पठनस्य, पाठनस्य, आदानस्य, प्रदानस्य, अन्येषां जीवनोपयोगिनां वस्तूनां च बहुविधा सुविधा भवति । तत्र जीविकायाः उपार्जनस्य च वहवः सुविधाः सन्ति । तत्र जनाः सरलतया जीविकायाः निर्वाहं कतु समर्थाः भवन्ति । तत्र आमोदस्य प्रमोदस्य मनोरञ्जनस्य च बहूनि साधनानि भवन्ति, यैः जना मनोरञ्जनं कुर्वन्ति । नगरजीवनं सर्वेभ्यः रोचते ।
निवन्ध-संग्रह १४६ (१३) आदर्शः गुरुः शास्त्रपु गुरोः वहु महत्त्वं वर्णितम् अस्ति । गुरुः मनुष्य मनुष्यंः करोति । आदर्शः गुरुः सः अस्तिः; यः यथा छात्रान् उपदिशति, तथैव स्वयम् अपि आचरण करोति । छात्राः गुरुं दृष्ट्वा, तस्य आचरणं च दृष्ट्वा, तथैव आचरणं कुर्वन्ति ।। आदर्शस्य गुरोः कर्तव्यम् अस्ति यत् स शिष्यं पुत्रवत् गणयेत्, तं पापात् निवारयेत्,. तं सन्मार्गम् आनयेत्, तं सद्गुणान् शिक्षयेत्, तं सत्कर्मसु योजयेत्, तं हितकार्येषु नियोजयेत्, तं सर्वाः विद्याः स्नेहेन पाठयेत् । आदर्शः गुरुः सदा छात्राणां हितम् इच्छति । शिष्याणां हितार्थ वहूनि दुःखानि अपि सहते, परन्तु सदैव तेषां हितं करोति । स सदा स्वसमयं पठन पाठने च यापयति । स आस्तिकः धार्मिक:: विनीतः सुशीलः सदानारी च भवति । स सदैव वन्दनीयः भवति । (१४) छात्राणां कर्तव्यम् छात्राणां प्रधानं कर्तव्यम् अस्ति यत् ते स्वगुरूणाम् आज्ञां पालयन्तु । गुरूणाम् आज्ञायाः पालनं छात्राणा पवित्रं कर्तव्यम् अस्ति । गुरूणाम् आज्ञायाः. पालनेन एव छात्रः संसारे उन्नति कतु समर्थः भवति । गुरूणाम् आशीर्वादेन एव छात्रः सर्वाः विद्याः सरलतया शिक्षते । छात्राणां कर्तव्यम् अस्ति यत् ते गुरूणां सेवां कुर्वन्तु, सावधानतया विद्यां पठन्तु, विद्यायाः अध्ययने चित्तं ददतु, सत्कर्मसु प्रवृत्ताः भवन्तु, दुर्गुणेभ्यः निवृत्ताः भवन्तु, आस्तिकाः भवन्तु, पापेभ्यः विरमन्तु, सदाचारस्य पालने मनः योजयन्तु, ब्रह्मचर्य पालयन्तु, विनीताः सुशीलाः च भवन्तु, मातॄणां पितॄणां च सेवां कुर्वन्तु, स्वज्येष्ठानाम् आज्ञां स्वस्य उन्नत्यै च प्रयत्नं कुर्वन्तु । ये एवं जीवने उन्नति कुर्वन्ति, सफलाः च भवन्ति ६...न्तु, सदा त, ते - . एवं कठिनं कर्म न कुर्युः, तर्हि देशः धनेन धान्येन च पूर्णः न भविष्यति । र १५० प्रा० रचनानुवादकौमुदी (१५) स्वदेश-रक्षा जगति स्वकीयः देशः सर्वोत्तमः मन्यते । उच्यते च-जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी । स्वदेशः स्वर्गाद् अपि गुरुतरः पूजनीयः च अस्ति । जगति ये देशाः उन्नताः सन्ति, ते सर्वे एव स्वदेशं सर्वोत्तमं मन्यन्ते । ते स्वदेशस्य कर सर्वस्वम् अपि त्यक्तुम् उद्यताः भवन्ति । स्वदेशस्य रक्षा मनुष्यस्य सर्वोत्ता कर्तव्यम् अस्ति । यदि देशः सुरक्षितः अरित, तहि देशे उद्योगाः सर्वाः योजना च राफलाः भविष्यन्ति । यदि देशः असुरक्षितः अस्ति तहि केनापि प्रकारेण देशस उन्नतिः न सम्भवति । अस्माकं ये महापुरुपाः अभवन्, ते सर्वे अपि देशस्य रक्षाः बहुनि दुःखानि असहन्त । श्रीमहाराणाप्रतापः, श्रीशिवाजी, महात्मा गान्धिः श्रीसुभाषचन्द्रः, श्रीजवाहरलाल नेहरुः देशरक्षायै वहूनि दुःखानि असहन्त, बीच ल सफलं कृतवन्तः । स्वदेशस्य रक्षा सर्वेपाम् एव प्रधानं कर्तव्यम् अस्ति । (१६) कृषक: कृपकः प्रतिदिनं प्रातःकाले उत्याय वृपभान् आदाय क्षेत्रं गच्छति । स त क्षेत्राणि कर्पति । कृष्टेषु क्षेत्रपु वीजानि वपति । वीजेभ्यः अंकुराः जायन्ते अंकुरेभ्यः शस्यं जायते । शस्येन एव सम्पूर्णः देशः धनवान् धाग्यवान् च भवति भारतवर्षे ग्रामीणानां जनानां मुख्यं कर्म कृषिकर्म अस्ति । ग्रामीणाः कृषक कठोर परिश्रमं कुर्वन्ति । ते ग्रीष्मती अतिप्रतप्ते दिवसे मध्याह्ने अपि कृषि कर्मणि संलग्नाः भवन्ति । एवम् एव वर्षासु शीतकाले च ते कठि परिय कुन्ति । ते स्वकीयानि सुखानि त्यवत्वा देशस्य कृते दुःखानि सहन्ते । यदि कर्म श्रेष्ठं कर्म अस्ति । सर्वः अपि देशः कृषकाणाम् ऋणी वर्तते । ते सद सम्माननीयाः सन्ति ।
निबन्ध-संग्रह १५१ (१७) सज्जनः यः धार्मिकः विनोतः परोपकारी सदाचारी च भवति स सज्जनः कथ्यते। सज्जनः सदा परेषां दुःखे दुःखी भवति । स परेषाम् उपकारं करोति । स यथा वदति, तथैव करोति । स यथा करोति, तथैव वदति । तस्य वचने कार्य विचारे च एकता भवति । स परेषाम् उपकारं धर्म मन्यते । स परोपकारे आनन्द लभते, प्रसन्नः च भवति । स सर्वेषु दयां करोति । स सर्व सुग्वम् इच्छति । स ऐश्वर्य प्राप्य गर्वितः न भवति । स सुखे अधिकं हर्ष न प्राप्नोति, न च दुःखे अधिकं खेदम् अनुभवति । स सक्ष प्रियं हितं चं वचनं वदति । स सर्वस्य हितं चिन्तयति । स सर्वेषु जीवेषु स्नेहं करोति । स विपत्ती धैर्यम् आश्रयते, सम्पत्तो विनीतः भवति, यशसि हीच करोति, सभासु मधुरं भापणं ददाति, धर्मकार्येषु विद्याध्ययने सत्कर्मसु च स्वसमयं यापयति । सज्जनः सदैव वन्दनीयः भवति । (१८) दुर्जनः यः अधार्मिकः अविनीतः परेपाम् अहितकारी दुराचारः च भवति स दुर्जनः कथ्यते । दुर्जनः सदा परेपाम् अहितं चिन्तयति । स देशस्य जातेः संसारस्य च अहितं चिन्तयति, सर्वस्य अहितं च करोति । सः यद् वदति, ततः विपरीतम् आचरति, विपरीतं एवं कार्य च करोति । तस्य भाषणे कार्य चिन्तने च एकता न भवति । दुर्जनः सदा दोषम् एव चिन्तयति, दुर्गुगान् एव आचरति, उचितं कर्म त्यजति, अनुचितं कर्म आचरति, मातुः पितुः गुरूणां च आज्ञा न पालयति, समाजे दुर्गुणानाम् एव प्रचारं च करोति । स सम्पत्ति प्राप्य गर्वितः भवति, विपत्तो अत्यधिक दुःखम् अनुभवति, कलहं रुचिकरं मन्यते, गृहे शूरतां दर्शयति, युद्धे भीरुः भवति, दुष्कर्मसु च प्रवृत्तः भवति । दुर्जनः समाजे सदा अनादरं लभते । -
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