Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Telugu Vanimay Vidya Vidya

Balsouri Reddi · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएँ
वालशौरि रेड्डी
हिमुस्तानी एकामा

प.
ते
पह
में
अग
जा
प्रथम संस्करण. १६६१
अन
सा
मूल्य
: रु. ५०/-
: हिन्दुस्तनी एफेडेमी, इलाहाबाद
प्रकाशक
..
निः
सवे
मुद्रक
: रामायण प्रेस,
७३६-पुराना कटरा (पिंक मार्केट), इलाहाबाद
-

प्रकाशकीय अखण्ड भारत की अवधारणा-भाषागत वैविध्य के होते हुए भी मर्वमान्य है । स्वतंत्र भारत के माहित्यिक विकास में यहां की भाषाओ तथा उपभाषाओ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। देश का बहुसख्यक ममाज हिन्दीतर समृद्ध भाषाओ के साहित्य से भी प्राय. अपरिचित है। तेलुगु भापा आन्ध्र प्रदेश की भाषा है और भापाविज्ञान के अनुसार द्रविड-परिवार की भाषा मानी जाती है, किन्तु वह संस्कृत और प्राकृत भापाओ से पर्यात प्रभावित है । जहाँ भारतीय भापा एवं माहित्य का वैविध्य भी ममृद्धि का बोध कराता है, वही लिपि का अन्तर अन्तराल उत्पन्न करता है जिसको पार करना बहुधा दुष्कर हो जाता है। इसे दूर करने के अनेक प्रयत्न हुए हैं और ऐमी मानमिकता भी बन रही है कि व्यवधान मिट जाय । सोलह भाषाओ को एक ही देवनागरी लिपि में कम्प्यूटर के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है और उनके परस्पर अनुवाद भी किये जा सकते हैं । कार्य-रूप मे यह उपलब्धि क्रान्तिकारी परिणाम देगी----- ऐसा विश्वास है। अनेक संस्थानो और अकादमियो द्वारा अनुवाद का कार्य किया भी जा रहा है । एक भाषा मे दूसरी भाषा के माहित्य की पहचान कराने की चेप्टा निश्चय ही स्वागत-योग्य है । हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने राष्ट्रीय एकता और सास्कृतिक आदान-प्रदान के वृहत्तर उद्देश्य को दृष्टि में रख कर दो योजनाएँ स्वतः स्वीकार की है । एका, अन्य भाषाभाषी विद्वानो द्वारा हिन्दी मे महत्वपूर्ण एवं पठनीय सामग्री प्रस्तुत करना; और दूसरा, द्विभाषी अनुवाद-प्रकाशन । दूसरी योजना के अन्तर्गत कुछेक पुस्तके प्रकाशित भी हुई है। प्रस्तुत पुस्तक 'तेलुगु-वाइमय : विविध विधाएँ' पहली योजना के अन्तर्गत महत्वपूर्ण स्थान रखती है । इसके लेखक दक्षिण भारत में ही नहीं, उत्तर भारत में भी सुप्रसिद्ध और मम्मानित रहे है। मम्प्रति वे भारतीय भाषा परिपद्, कलकता के निदेशक पद पर समासीन है । इस पर डॉ० प्रभाकर माचवे और पाण्डुरग राब उनसे पूर्व दायित्व संभाल चुके थे।

इस पुस्तक का उद्देश्य हिन्दी-भाषी जनता को तेलुगु साहित्य की गतिविधि से अवगत कराना है। पुस्तक मे चौदह लेख संगृहीत है जिनमे से कई लेख तेलुगु भापा और माहित्य के महत्त्वपूर्ण पक्षो को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करते है । सारे लेख एकसाथ नही लिखे गये है। उनके प्रभाव और अभाव दोनों को संतुलित दृष्टि से लेना चाहिए। आशा है, प्रस्तुत पुस्तक विद्वानो के बीच ममादृत होगी। जगदीश गुप्त सचिव भूमिका किसी भी राष्ट्र अथवा देश के मास्कृतिक विकाम में उम राष्ट्र या देश की भापा. वाङ्मय, धर्म, दर्शन तथा ललित कलाएं अपनी अहं भूमिका रखती है । प्राचीन काल मे ही भारतीय अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए संस्कृत भाषा माध्यम रही है। भारत अनादि काल से ही एक अखण्ड भू-भा के रूप में विद्यमान रहा है। हालांकि इस भू-खण्ड में विविध प्रकार की भाषाएँ, सभ्यताएँ विभिन्न क्षेत्रों में पल्लवित, पुष्पित एवं पनपती रही है और परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती रही है । आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया में से विविधताएं-अनेकता में एकता तथा एकता में अनेकता का आदर्श प्रस्तुत करती रही हैं । हमारी मूल चितनधारा इतनो समान रही है कि परिणामस्वरूप विविध क्षेत्रों के चितको, मनीषियो, गायकों तथा साहित्यकारों का स्वर एक रहा है। साथ ही हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक जीवन के आदर्श भी समान रहे हैं । यही कारण है कि वे ही आदर्श हमारे साहित्य, कला तथा जीवन-शैती में समान रूप से प्रतिबिवित होते रहे है । इन्ही तत्वो तथा आदर्शों को आत्म- सात् करके हमारे देश के कवि, गायक तथा कलाकार माधनारत रहे हैं । इन विविध धाराओं के मध्य अंतर्वाहिनी के रूप में हमारी जो सांस्कृतिक स्रोतस्विनी प्रवाहित रही है, वही हमारी एकता एवं अखण्डता का प्रत्यक्ष प्रमाण है । हमारी संस्कृति सदा समन्वयात्मक रही है, इस कारण इसमे समस्त प्रदेशो की विशेषताएँ स्वाभाविक रूप से समाविष्ट होती गई है। परिणामस्वरूप हमारी संस्कृति अत्यन्त व्यापक, गहन तथा विविधताओ से पूर्ण हो परिपुष्ट बनती रही है । इसके उन्नयन मे आन्ध्र का योगदान भी अपनी अलग पहचान रखता है। इसी क्रम में भारत की समस्त भारतीय भापाएँ अपने-अपने क्षेत्र मे विक- सित एवं समृद्ध होती रही है । परन्तु भारतीय चितक, मनीपी, समाज-सुधारक, भाषाविद् एवं राजनायिकों ने यह अनुभव किया कि संपूर्ण भारतीय सामाजिक संस्कृति की अभिव्यक्ति के लिए एक आधुनिक भारतीय भाषा को माध्यम के रूप में विकसित करना आवश्यक हे । परिणामस्वरूप हिन्दी राष्ट्रभाषा/संपर्क- भापा/राजभाषा के रूप में स्वीकार की गई। स्वाधीनता के उपरांत भारतीय भाषाओं तथा हिन्दी के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला। साथ ही अन्य भारतीय भापाओं के उत्कृष्ट साहित्य पर विविध प्रकार की रचनाएँ प्रकाश में आने लगी । इसी परंपरा की यह भी एक कड़ी है।

. । PFODRFM 85 आधुनिक भारतीय भाषाओं मे तेलुगु भी एक सक्षम एवं ममृद्ध भाषा है । ग्यारहवी शती मे जव तेलुगु का प्रथम महाकाव्य 'महाभारत' का मूत्रपात हुआ, तव से निरतर तेलुगु भाषा विकसित एव परिपुष्ट होती रही। तेलुगु सात करोड जनता की मातृभाषा है और यह संस्कृत में अत्यधिक प्रभावित है। लगभग माठ फीसदी तत्सम शब्दो मे पूर्ण यह परिनिष्ठ भापा अपने उत्तम काव्य-ग्रन्थो के साथ विविध विधाओं की कृतियो से समलंकृत है । तेलुगु वाङ्मय की विविध विधाओं में यक्षगान, शतक साहित्य, अवधान कविता, द्वथि एवं व्यथि काव्य अपना अलग वैशिष्ट्य लिये हुए है । इम ग्रन्थ मे मै अवधान कविता तथा थि एव श्यथि काव्य-सम्बन्धी लेख नहीं दे पाया। अगले संस्करण में अवश्य मम्मितित करने का प्रयास करूंगा। इस ग्रन्थ में कुल चौदह निबंध है। प्रारभ के दो रोलो में मैंने तेलुगु माहित्य के क्रमिक विकास का परिचय दिया, शेप निबंधो में तेलुगु वाइमय के विविध परिदृश्यो का पर्यावलोकन । मैं मानता हूँ कि कुछ निबंधो में मैं अत्याधुनिक गतिविधियो तथा साहित्यकारो का विपुल परिचय नहीं दे पाया। एक तो ग्रन्थ के कलेवर के बढ़ने की आशका थी और दूसरी बात-मैने अपने नेलुगु साहित्य का इतिहास' तथा तेलुगु साहित्य के निर्माता में विशद चर्चा की है । इसके अतिरिक्त इमी ग्रन्थ के 'स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य' निबंध में मक्षेप मे ही सही, पूर्ण विहगावलोकन किया है। इस ग्रन्थ में मैंने तेलुगु वाइमय के विभिन्न परिदृश्यों के मार्गदर्शक मूत्रो का परिचय देने का अवश्य प्रयास किया है, इसकी गुणवत्ता तथा उपादेयता का निर्णय विज्ञ पाठक एवं सुधी ममीक्षक ही कर सकेंगे । मेरे कतिपय निवध एव तेलुगु माहित्य का इतिहास पढकर स्वर्गीय श्रद्धेय डॉ० रामकुमार वर्मा ने तेलुगु माहित्य के विविध परिदृश्यों पर कुछ चुने हुए निबंध भेजने का आग्रह किया, तदुपरात आदरणीय डॉ० जगदीश गुप्त जी ने बार-बार स्मरण दिलाकर इम ग्रन्थ को प्रकाश में लाने का प्रयास किया और बंधुवर डॉ० रामजी पांडेय ने ग्रन्थ के प्रकाशन की प्रगति एव मुद्रण में विशेष गचि लेकर इग ग्रन्थ को आकर्षक बनाने का मफल प्रयत्न किया है । अतः मैं हिन्दुस्तानी एये टेमी के इस विषय के प्रति अत्यंत आभारी हूँ। निदेशक -बालशौरि रेड़ी भारतीय भाषा परिपद. ३६. रमपीयर गरणी १. उगर प्रदेश हिन्दी संस्थान, नमन द्वारा प्रशस्ति । २. मादिय भान प्रा. लि., इलाहाबाद द्वारा प्रति ।

विषय-सूची
पृष्ठ
१-१८
१४-४०
विपय
१. तेलुगु भाषा और साहित्य
२. स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य
३. दिगंबर कविता
४ तेलुगु का शतक साहित्य
५. आधुनिक तेलुगु उपन्याम
६ तेलुगु नाटक साहित्य
७. तेलुगु का समीक्षा साहित्य
४१-५४
५५-६२
६३-६८
८ यक्षगान
७६-८२
८३-६१
६. तेलुगु साहित्य में हास्य
१०. तेलुगु काव्य में राष्ट्रीय भावना
११. तेलुगु वाङ्मय में राम-चरित
१२ तेलुगु में कृष्ण-काव्य
१३ भारतीय भाषाओं में बाल-साहित्य
१४ अनुवाद की समस्याएँ : तेलुगु से हिन्दी
६२-१०२
१०३-११७
११८-१२७
१२८-१४२
१४३-१५२

No text on this page.

१ तेलुगु भाषा और साहित्य तेलुगु भापा के आदि महाकवि नन्नय भट्ट ने "नन्दपूडि" शिलालेख में अपने सम्वन्ध में लिखा है--"आन्ध्र कवित्व विशारदुंडु" अर्थात् मैं आन्ध्र "तेलुगु" भापा की कविता का विशारद हूँ। इससे हमे विदित होता है कि तेलुगु भाषा प्राचीन समय में आन्ध्र नाम से भी व्यवहृत हुई है । आन्ध्र शब्द पहले देशपरक में, तत्पश्चात् जाति तथा भाषा के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। आन्ध्रवामियो का उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मणो मैं (ऐतरेय ब्राह्मण-६, अध्याय-३, खण्ड-१८) महाभारत के सभा पर्व में, ब्रह्म, मत्स्य, वायु इत्यादि पुराणों में ही नहीं अपितु महाभारत, रामायण आदि महाकाव्यों में भी हुआ है । वही आन्ध्र शब्द कालातर मे भाषा के लिए भी प्रयुक्त हुआ है । आन्ध्र भाषा का दूसरा नाम तेलुगु है । तेलुगु और तेनुगु : ब्रह्माण्ड पुराण के वर्णनो द्वारा हमे यह विदित होता है कि आन्ध्र देश के सुप्रसिद्ध शव तीर्थ श्रीशैन, कलाहस्ती तथा द्राक्षाराम के बीच में स्थित भूभाग विलिंग देश है । कुछ विद्वानों का विचार है कि यही त्रिलिंग शब्द तेलुगु के रूप में परिवर्तित हो गया है। प्राचीन काल में गंगा नदी के तट में लेकर उड़ीसा के कटक तक का भूभाग उत्तर कलिंग (उत्कल) नाम से व्यवहृत होता था। कटक से लेकर गंजाम जिले के मलय पर्वतो की श्रेणी पर्यंत मध्य कलिंग तथा मलय पर्वतों के दक्षिण भाग से लेकर गोदावरी तक का प्रदेश दक्षिण कलिंग नाम से पुकारा जाता था। ये ही तीन कलिंग विकलिंग कहलाये । कालातर मे त्रिलिंगा, विलिंग शब्दो में परिवर्तित होते हुए तेलुगु बना। विलिंग शब्द के सम्बन्ध में एक और सिद्धान्त निकाला गया है कि गोदावरी के उत्तर मे महेन्द्राचल तक का प्रदेश आन्ध्र था । इस देश का नाम कलिंग था। यह प्रदेश उत्कलिंग, मधुकलिंग और कलिंग नामक भागो में बेटा हुआ था; अतः वह देश निकलिंग कहलाया।

२ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं यूनान के भूगोलशास्त्री टालेमी ने ई० मन् १५० मे इम प्रदेश के लिए 'ट्रिलिंगान' शब्द का प्रयोग किया है । इसी का परियतित रूप तेलंगाना है। गंजाम जिले के पल तिमिडि तालुके के मुखलिगेश्वर मन्दिर मे प्राप्त शिलातेय मे लिखा है- महाराजाधिराज निकालिंगाधिपतिः श्रीमदनत वर्म महागज पचोड गंगदेवः आकल्पं गुणधाम सोमल महादेवी मनोमानमे हंसीयात्रिकलिंग मंडतापतेः श्रीगंगचूडामणे. उपर्युक्त विकलिंग शब्द कालातर मे विभिन्न रूपो को प्राप्त करते हुए 'निअलिंग', 'तेलुगु' और 'तेनुगु' के रूप में परिवर्तित हो गया है। विद्यानाथ ने (ई० सं० १३००) अपने 'प्रतापरुद्रीय' में अपने आश्रयदाता प्रतापरुद्रदेव का सम्बोधन "त्रिलिंगदेश परमेश्वर" नाम से किया है। तेलुगु के प्रसिद्ध वैयाकरण अप्पकवि ने अपने 'अप्पकवीयमु' नामक ग्रन्थ मे तनुगु और तेलुगु शब्दो की उत्पत्ति इस प्रकार बतायी है- श्री क्षितिधर कालेश द्राक्षारामंबुलनग दनरारेडु । त्रिक्षेत्र वुल लिगमु लीक्षिप संज्ञनेत्रिककेवकुन ।। अर्थात् श्रीशैल, कालहस्ती और द्राक्षाराम नामक तीन प्रसिद्ध शवतीर्थों के कारण इस प्रदेश का नाम बिलिंग पडा है . तत् बिलिंग निवासंवु तरुकतन नांध देशंवुधात्रिलिंगारूढमय्ये देलुगुगुचुद्भवमु दानिवलन बोडये वेनुक गोदरू दानिके तेलुगु तड़। उन तीन शवतीर्थों के कारण आन्ध्र देश 'त्रिकलिंग भूमि' कहलाया । उसी शब्द का तद्भव तेलुगु बना, वही 'तेनुगु' नाम मे भी व्यवहृत हुआ । पाश्चात्य काम्पवेल महोदय ने तेलुगु शब्द का मूलरूप त्रिलिंग माना है । डॉ. ग्रियर्सन ने तेलुगु और तेनुगु शब्दो पर विचार करते हुए यह सिद्धान्ती- करण किया है कि तेलुगु शब्द मे ही तेनुगु की उत्पत्ति हुई है । तेलगु भाषा को प्रशस्ति : तेलुगु स्वरात भाषा है । इसमें स्वरप्रधान संगीत तथा वर्णप्रधान माहित्य का मुन्दर ममन्वय हुआ है । यही कारण है कि इस भाषा की देशी तथा विदेशी विद्वानों ने भी बडी प्रस्तुति की है । विजयनगर साम्राज्य के अधिपति कृष्णदेव राय ने, जो संस्कृत तथा देशी भाषाओं के उद्भट विद्वान थे, तेलुगु की बड़ी प्रशंसा की है- तेलुगु भाषा और साहित्य तेलुगदेलछन्न देशंबुतेलुगेनु तेलुगु वल्लभुंड दलुगोकोड दल्लभाषलदु येरुगवे माटाडि देशभापलंदु देलुगु लेस्म । अर्थात् मुझमे यदि कोई यह पूछे कि तेलुगु ही श्रेष्ठ क्यो है, मैं निस्संकोच उत्तर दूंगा कि यह तेलुगु देश है, मैं तेलुगु सम्राट हूँ, तेलुगु भापा-भाषी हूँ। यही नहीं, समस्त देशी भाषाओ में पार्तालाप करके देखियेगा तो स्वयं ज्ञात होगा कि तेलुगु ही सर्वोकृष्ट भाषा है । तेलुगु भाषा के सम्बन्ध में हेनरी मारिस का कथन है- "तेलगु अत्यन्त मधुर भाषा है । द्राविड भाषाओं में तेलुगु-जैसी मधुर भाषा कोई दूसरी नहीं है। तेलुगु की प्राच्य को इटालियन भाषा कहना समुचित लगता है। तमिल इमसे भी समृद्व भापा है, इसका नाहित्य प्राचीन भी है, लेकिन स्वर-माधुर्य तथा प्रांजलता की दृष्टि से तेतुगु भाषा अनुपम है।" बी० एम० हलडेन महोदय ने १६५८, अप्रैल २७ के 'हिन्दू' में तेलुगु भाषा की प्रशंसा करते हुए लिखा है--"विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार संभव है, किन्तु विदेशी शब्दों का नही । मैं समझता कि ऐसे शब्दो की स्वीकृति के कारण ही संभवतः भारत की ममस्त भापाओ मे तुगु ही एक ऐगी भापा है जो अन्य भाषाओ के शब्दों को बडी मरलता मे आत्ममात् कर सकती है। इसलिए विज्ञान, चिकित्सा, इन्जीनियरी आदि शास्त्रों के शिक्षण में इसे हिन्दी के मुकाबले में लाया जा सकता है।" तेलगु भाषा शब्दावली की दृष्टि से आर्य भाषाओ के निकट है तो व्यापारण की दृष्टि से द्राविड भाषाओं के निकट है। उत्तर और दक्षिण के मन में स्थित होने के कारण नेलुगु भाषा में आर्य और द्राविड़ भाषाओं की गमस्त विशेषताओं का अच्छा समन्वय हुआ है । प्राचीन काल मे बहुत समय तक आन्ध्र में प्राकृत एवं संस्कृत भापानों का आधिपत्य रहा है । यही कारण है कि तेलुगु भाषा मे माहित्य-रचना अत्यन्त विलंब के माथ हुई है । उपलब्ध तेलुगु माहित्य के आधार पर हम संपूर्ण तेलुगु वाङ्मय को छ. युगों में बांट सकते हैं जो निम्नलिसित प्रकार हैं अज्ञात युग ई० पू० से ई० सन् १००० वर्ष तक २. भाषांतरीकरण युग या कवित्रय युग ई० मन् १००० से १३५० तक ३. सधि युग अथवा श्रीनाथ युग १३५० मे १५०० तक प्रवन्ध युग या रायल युग १५०० से १७०० तक ५. अर्वाचीन युग या संक्रांति युग १७०० से १८५० तक ६. आधुनिक युग १८५१ मे आज तक।

तेलुगु वाङ्मय विविध विधाएं - अज्ञात युग ईमवी पूर्व आन्ध्र देश पर मातवाहनो ने राज्य किया था। सातवाहन राजा आन्ध्र थे। किन्तु उन गजाओं के राज्य में आन्ध्र के साथ मैसूर तथा महाराष्ट्र के भी कतिपय भूभाग सम्मिलित थे ; अतः उन नरेशों ने अपनी शासकीय भाषा प्राकृत स्वीकार की। यही कारण है कि तेलुगु भापा को उस युग मे राजाश्रय प्राप्त नहीं हुआ। मातवाहन ने प्राकृत मे गाथा सप्तशती की रचना की तो उनके दरवारी कवि गुणाढ्य ने पंशाची में वहत्कथा का प्रणयन किया । उन दिनो मे तेलुगु का व्यवहार केवल घरो में होता था। यत्र- तत्र तेलुगु काव्य-ग्रन्थों का सृजन हुआ भी तो धार्मिक विद्वप के कारण वे मव ग्रन्थ या तो जला दिये गये अथवा नष्ट कर दिये गये थे। हां, सातवीं एवं आठवी शती के जो अनेक शिलालेस उपलब्ध हुए हैं, उनसे विदित होता है कि उस समय पद्य-गद्य तथा चंपू शैली में भी रचनाएं हो रही थी। उन रचनाओ के अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होगा कि तेलुगु भापा विकास के पथ पर अग्रसर हो रही थी। इनके अतिरिक्त उस काल मे अनेक प्रकार गीत प्रचलित थे, जिनका उल्लेख पालकुरिकि मोमनाय कवि ने (ई० सन् १६५८- १३२३) अपने काव्य "पंडिताराध्य चरित्र" के 'वाद प्रकरण', पृष्ठ' ५१३ में बताया है- पदमुल दुम्मेद पदमुलु प्रभात पदमुलु बर्वत पदमुलानन्द पदमुल, शकर पदमुलु, निवालि पदमुलु, वालेशु पदमुलु, गोन्वि पदमुलु, वेन्नेल पदमुलु, सज वर्णन, मरि गणवर्णन पदमुलु।। अर्थात् गीत-भ्रमरगीत, प्रभात गीत, पर्वत गीत, आनन्द गीत, आरती गीत, शकर गीत, ज्योत्स्ना गीत, संध्या गीत, गणवर्णन गीत इत्यादि प्रचलित थे। इनके अतिरिक्त कठपुतली के गीत, नौका गीत, ढेकली गीत, वीर गीत आदि लोकगीत तथा कुशलव कथा, ऊर्मिला देवी की निद्रा, लक्ष्मण मूर्दा, धर्मांगद चरित्र इत्यादि लोक-कथाएं भी जनता के ज्ञानबर्द्धन और मनोरजन के माधन बनी थी। पाकवि कृत "जिनेन्द्र पुराण' इस युग की उपलब्ध कृति है । अन्य काव्य-ग्रन्य अज्ञात ही रह गये, प्रकाश में नहीं आये । यही कारण है कि तेलुगु माहित्य के इतिहामकारो ने इस युग का नामकरण 'अज्ञात युग' किया है।

" तेलुगु भाषा और साहित्य भाषांतरीकरण युग या कवित्रय युग (सन् १००१-१३५०) : दसवी शती तक पहुँचते-पहुँचते आन्ध्र मे जैन तथा बौद्ध धमों का पतन होने लगा था । वैदिक धर्म के पुनरुद्धार का संकल्प दृढतर होने लगा था । । वैदिक धर्म के प्रतिपादन में पुराणो की प्रमुखता थी, किन्तु साधारण जनता तथा स्त्रियो की अभिरुचि पुराणो की अपेक्षा महाभारत के प्रति अधिक थी। लोगो में यह विश्वास था कि महाभारत के श्रवण मे सौ गायो के दान तथा अनेक विप्रो को नाना प्रकार की वस्तुओ के दान का फल प्राप्त होता है; अत. अपने अवकाश के क्षणो में लोग महाभारत का श्रवण किया करते थे। वैदिक धर्म का पुनरुद्धार पूर्वी चालुक्य वशी राजाओं के समय कुमारिलभट्ट ने किया था । वैदिक धर्म के सिद्धान्त सक्षप में यों है-१ वेद अपौरुषेय है, इसलिए प्रामाणिक है । २. वेदो द्वारा प्रतिपादित यज्ञ-यागादि के आचरण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । ३. उपनिषदो का श्रवण मोक्ष-प्राप्ति का मार्ग- दर्शक है । ४. चतुर्विध वर्ण एवं आश्रम मानव-ममाज के आचार-धर्म-सम्बन्धी नियम है तथा ५. ब्रह्मा, विष्णु और ईश्वर क्रमश. इस जगत की सृप्टि, स्थिति एवं लय के कारणभूत है । उपर्युक्त सिद्धान्तों का प्रभाव राजा और प्रजा पर ऐसा पडा कि प्रत्येक मागलिक कार्य के अवसर पर पुराणो का श्रवण करना तथा महाभारत की प्रतियाँ लिखवा कर बाँटना एक परिपाटी-मी हो गयी । किन्तु कठिनाई यह थी कि पुराण और महाभारत संस्कृत भापा मे ही उपलब्ध थे; सर्वसाधारण प्रजा उनका पूर्ण लाभ उठा नहीं सकती थी। यदि उपर्युक्त ग्रन्थ देशी भाषा तेलुगु में होते तो लोग स्वयं पढ़ कर उनका आनन्द उठाते । इसी अभिप्राय से प्रेरित होकर सर्वप्रथम बौद्धाचारों ने अपने धार्मिक ग्रन्थो का देशी भापाओ में रूपांतर कराया और स्वयं भी उन्होने अपने ग्रन्थों की रचना देशी भाषाओ मे की । इस भापातरीकरण ने जनता के हृदयो को अधिक आकर्षित किया और धर्म के प्रचार मे यह कार्य विशेष सहायक सिद्ध हुआ । ऐसी स्थिति मे वैदिक धर्म के 'पुनरुत्थान' के हेतु 'पंचमवेद' नाम से विख्यात महाभारत के भाषांतरी- करण की आवश्यकता का अनुभव चालुक्य नरेश राजराज नरेन्द्र ने किया । उन्होंने अपने दरबारी कवि एवं राजपुरोहित नन्नय भट्ट को आदेश दिया कि व्यासकृत महाभारत का तेलुगु मे अनुवाद करे । नन्नय ने अनुवाद का कार्य प्रारंभ किया। आदि पर्व और सभा पर्वो का अनुवाद समाप्त करके वन पर्व का अनुवाद कर ही रहे थे कि उनकी अकाल मृत्यु हो गयी। यद्यपि नन्नय ने अनुवाद किया, तथापि उनका ग्रन्थ मौलिकता को लिये हुए हैं । नन्नय की धौली तत्सम प्रधान है। उसमें कोमलता, सरसता एवं माधुर्य का सुन्दर समन्वय हुआ है। उनको कविता सागर को भांति अगम, गभीर तथा - तेलुगु वाङ्मम : विविध विधाएँ - अर्थपूरक है। उनकी शैलीगत गभीरता ने वयंविषय और पानी के चित्र में चेतना. तेज एवं प्राण-प्रतिष्ठा की है । नन्नम के काव्य में यत्र-तत्र जो मौलिक उद्भावनाएँ मिलती है, वे अत्यन्त हृदयग्राही तथा औचित्य के पोपण में समर्थ हैं। मुख्यत सौगंधिकाहरण के प्रसंग में हनुमान और भीमसेन का सवाद, बकासुर-वध के वृत्तांत में ब्राह्मण और ब्राह्मणी का वात्तोलाप, रूम और प्रमहरा नात, उदन्त की कहानी, शकुन्तला की गाथा, नलोपाख्यान, ययाति वृत्तान्त आदि वडे सुन्दर बन पडे है । अर्जुन को तीर्थयात्रा के प्रसंग में नन्नय नै आन्ध्र के वेंगी प्रदेश का अति मजीव एव मनोरम चित्र अंकित किया है। उनकी वैयक्तिक विलक्षणता और सरम अभिरुचियों का प्रभाव स्पष्ट रूप में उनकी कविता में परिलक्षित होता है। इन विशेषताओं के साथ वैदिक धर्म का उन्होने अद्भुत प्रतिपादन किया है। नन्नय महाकवि ही नहीं थे अपितु वैयाकरणी भी थे। उन्होने 'आन्ध्र शब्द चिन्तामणि' नाम से एक तेलुगु प्रथम व्याकरण ग्रन्थ संस्कृत भाषा में प्रस्तुत किया है । तेलुगु भाषा पर अनुशासन करके वे वागानुशासक (वाणी पर अनुशासन करने वाले) के रूप में विख्यात हुए है । नन्नय के दो शताब्दियो के पश्चात् महाकवि तिकन्ना ने वन पर्व के शेष भाग को अधूरा ही छोड शेप पर्वो का अनुवाद पूरा किया। ये चोडवंशी राजा मनुमसिद्धि के दरवारी कवि एवं महामंत्री थे। काव्य-रचना मे तिकन्ना ने अपने समय तक प्रचलित पुराण एवं प्रबंध काव्यो के संप्रदायो का समन्वय करके नवीन रीति का प्रादुर्भाव किया। साथ ही दृश्य काव्य की शैली में पार्तालाप तदनुकूल परिय-चित्रण भी प्रस्तुत किया है । ये सस्कृत और तेलुगु के प्रकाड पण्डित थे ही, साथ ही राजनीति और अर्थशास्त्र के पारंगत भी थे। तिकन्ना ने अपनी कविता का उद्देश्य यो बताया है--पुष्पो को पखुड़ियों में गन्ध देनेवाले पराग की भांति अर्थपूर्ण सुन्दर पशब्दो से हार गूंथ, रस-भरित भावों को प्रकट करना चाहिए। मुहावरेदार शैली में बाधा डालनेवाले तत्सम शब्दों का प्रयोग न हो और छोटे-छोटे शब्दो में मनोहर शैली में कविता करती चाहिए। सिकन्ना ने मूल काव्य को काही संक्षिप्त और कही विस्तृत करके स्वतंत्रता मा निर्वाह किया है। जैसे यदि भगवद्गीता वो संक्षिप्त किया तो विराट पर्व का विस्तार किया । कृष्ण का दूत कार्य, द्रौपदी और कीचक का प्रसग बहुत ही रमणीय है । कया-मदर्भ के अनुर रमपरिसाफ की दृष्टि से पात्रों में भावोद्रेक की अभिव्यक्ति कराने में तिकन्ना को असाधारण मफलता प्राप्त हुई है। भाग-गली काव्य के लक्षणों के निर्वाह मे ये अनुपम है । अत. ये तेलुगु माहित्य-रूपी आकाश के मूर्य माने जाते हैं ।

७ - तेलुगु भाषा और साहित्य तिकन्ना की अन्य कृतियों में निर्वचनोतर रामायण उल्लेखनीय है । तिकन्ना के पश्चात् वरप्रिगडा ने वन पर्व का शेपाश पूरा किया। इस प्रकार तीन कवियो द्वारा इस महाकाव्य का प्रणयन समाप्त हुआ। ये तीनो कवि 'कवित्रय' नाम से विख्यात है । यह महाभारत आन्ध्र मे ऐसा लोकप्रिय हुआ है कि इसके पीछे एक कहावत ही चल पडी है-"विन्टे महाभारतम् विनालि, तिटे गारेलु तिनाति" । अर्थात् सुनना है तो महाभारत ही सुने, खाना हो तो बड़े ही सावे। इस युग के अन्य कवियों में वेमुलवाड भीम कवि, नन्नेचोड़ देव, मंत्री भास्कर, गोनबुद्धारेड्डी, नाचन मोम आदि विशेपरूप से उल्लेखनीय हैं । भास्कर रामायण और रंगनाथ रामायण इसी युग की देन है। इन दोनो रामायणो मे वाल्मीकि रामायण से भिन्न अनेक ऐसे वृत्तात और प्रसंग वणित है जो काव्य के औचित्य के पोषण मे तथा रमणीयता लाने में सहायक सिद्ध हुए है । इनके अतिरिक्त अथर्वणाचार्य केतना, विन्नकोट पेद्दना आदि रीति शास्त्रकार भी हुए, जिन्होंने क्रमश. अथर्वण छन्द, आन्ध्र भापा-भूपणमु, काव्यालंकार चूडामणि आदि उल्लेखनीय है। इस युग के प्रायः सभी पुराणों का तेलुगु मे काव्यानुवाद हुआ है मारन कवि ने मार्कण्डेय पुराण लिखा तो मडिकि सिगना ने पद्म पुराण, अन्य कवियो ने नारसिंह पुराण, वराह पुराण, गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, लिग पुराण, वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का स्वतंत्रा- नुवाद किया है। उपर्युक्त कारणो से यह युग पुराण युग भी कहलाता है । पुराण और रीति ग्रन्थो के अतिरिक्त पावुलूरि मल्लना का गणितशास्त्र, केतना कृत विज्ञानेश्वरीय (धर्म-शास्त्र), बद्देना कृत नीति-शास्त्र, गणपाराध्य कृत स्वर-शास्त्र (संगीतशास्त्र), अप्पन मत्री द्वारा विरचित वैद्य-शास्त्र भी गणनीय है। नन्नेचोड़ ने 'कुमार संभव' नामक प्रवन्ध काव्य की सृष्टि करके और वाङ्मय की रचना का श्रीगणेश किया, तदुपरात मल्लिकार्जुन पंडिताराध्य पाल्कुरिकि मोमनाथ आदि ने शव साहित्य को ममृद्ध किया। सोमनाथ ने वीर- शैव मत को वैदिक मत के अनुरूप बनाने के निमित्त अथक परिश्रम किया और उस संप्रदाय के अनुसार ध्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास, काव्य, स्तुति इत्यादि की रचना की। वे ही चतुर्वेद सार, अनुभव सार, रुद्ध भाप्य, बसव पुराण, परिताराध्य चरित्र, वृपाधिप शतक इत्यादि है। वीरशैव धर्म में काव्यात्मक प्राण-प्रतिष्ठा करने का श्रेय सोमनाथ को प्राप्त है । शतक साहित्य का मृजन भी इस युग में प्रारम्भ हुआ जो भविष्य में जाकर खूब पल्लवित एवं पुष्पित हुआ। - " तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं संधि युग अथवा श्रीनाय युग : इस युग में भापातरीकरण युग की प्रवृत्तियो के माथ परवर्ती युग की काव्यगत विशेषताओ का समन्वय पाया जाता है। दोनो युगों की प्रवृत्तियो का संधि-स्थल होने के कारण इस युग का नामकरण 'सन्धि युग' किया गया है। इस युग का प्रतिनिधित्व श्रीनाथ ने किया था। धीनाथ ने जो परम्परा चलायो, वह बहुत समय तक अविच्छिन्न रूप में चलती रही। उस युग का पूर्णरूपेण प्रतिनिधित्व करने के कारण युग का नामकरण 'श्रीनाथ युग' किया गया है । यो तो इस युग की पृष्ठभूमि कवित्रय युग मे तैयार हो गयी थी, नन्नय द्वारा प्रवर्तित भापातरीकरण पद्धति, तिकन्ना द्वारा चालित प्रबन्ध रीति, नायन सोम का नवीन गुण-प्रदर्शन, परवर्ती प्रवन्ध युग की काव्यात्मक शैलियो का समावेश भी इस युग मे हो गया । यों तो इस युग के प्रतिभासंपन्न महाकवियों में बम्मेर, पोतना और श्रीनाथ के नाम आदर के साथ लिये जा सकते है। किन्तु इनके अतिरिक्त अनेक ऐसे प्रतिभाशाली कवि हुए है जिन लोगो ने अपनी अनुपम कृतियो द्वारा तेलुगु काव्य साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया । इस युग की उल्लेख- नीय कृतियों मे मडिकि सिंगना कृत 'वसिष्ठपुराण' और 'भागवत का दशम स्कन्ध', जक्कय कवि कृत 'विक्रमार्क चरित्र', अन्नतामात्य के 'भोजराजीयमु, रमाभरणमु तथा अनंतुनि चंदस्सु'. गोरना मंत्री द्वारा विरचित हरिश्चन्द्रो- पाख्यान और नवनाथ चरित्र, तिश्शंक कोम्मना प्रणीत, शिव लीला विलासमु, दूबगूट नारायण कवि का पंचतन्त्रमु, वेन्नेलकटि मूरना का विष्णु पुराण, नन्दि मल्लया प्रणीत प्रबोध चन्द्रोदयमु, घंट सिंगल्या कृत वराह पुराण, पिल्ललमरि पिन-वीरना प्रणीत जेमिनी भारतमु, नारदीय पुराणमु, शृङ्गार शाकुन्तलमु और अवतार दर्पणमु, ढग्गुपल्लि दुग्गख्या के नाचिकेतोपाख्यान तथा काचीपुर महात्म्यमु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन काव्यो ने इस युग की महत्ता बढायी, किन्तु इस युग के माहित्यिक वैभव का परिचय पोतना तथा श्रीनाथ की कृतियो द्वारा मिलता है। पोतना महाकवि ही नहीं अपितु महान भक्त भी थे । इन्होंने कृषि-कार्य के माय काव्य मर्जन भी किया है। इन्होंने श्रीमद्भगवत का तेलुगु में स्वतंवानुवाद किया और उसे अपने आराध्यदेव श्रीरामचन्द्र के चरणों में मपित किया। कवि ने अपने काव्य के मृजन की प्रेरणा भगवान रामचन्द्र से प्राप्त की । इम काव्य का प्रणयन कवि ने भवसागर से मुक्ति पाने हेतु किया है-- तेलुगु भाषा और साहित्य भागवतमट • - "पलिकेडिदि पलिकिचेडुयाडु रामभद्र डट ने पलिकिन भवहर मगुनट पलिकेद मेरेडुगाथ पलुकगनेल ।" अर्थात्-"मैं भगवान को सजना कर रहा हूँ। भगवान रामचन्द्रजी स्वयं मेरे मुंह मे बुलवा रहे है। इस ग्रन्थ की रनना द्वारा मैं भवसागर से पार पा मकता है'; अत मैं किमी दूसरे काव्य या प्रणयन क्यो करू ?" पोतना भगवत भक्ति प्रधान काव्य है। इसमें भक्ति और वेदांत संवधी अनेक आख्यान वगित है जिनमे प्रह्लाद चरित, वामन चरित, शृङ्गार गजेन्द्र मोक्ष, नरकासुर वध, कुचेलोपाख्यान, ध्र वोपाख्यान, अवरीपोपाख्यान और रुक्मिणी-परिणय विशेप लोकप्रिय है। ये आख्यान महाकाव्य की शृंखला की कड़ियां होते हुए भी स्वतंत्र अथवा भिन्न खण्डकाव्यो के रूप में वन पडे है । पोतना की कविता प्रांजल, ललित एवं मधुर है । इस काव्य में चमत्कार वैचिश्य और उक्ति वैचित्र्य दृष्टव्य है । कवि सार्वभौम श्रीनाथ इस युग की सबसे बडी विभूति थे। तत्कालीन मभी राजदरवारों में जाकर कनकाभिषेक का सौभाग्य प्राप्त किया। इनके वामपाद में गण्डपेण्डेर (स्वर्ण घंटिका) पहनाकर सम्राटो ने अपना अहोभाग्य माना। धन, कनक, वस्तु, वाहन, अग्रहार उपाधियाँ देकर इनका सत्कार किया । ये रेड्डी राजाओ के दरबारी कवि थे और वहाँ शिक्षाधिकारी के पद पर नियुक्त थे । अपने जीवन-काल में इस महाकवि ने जैसे ऐहिक भोग-विलासो का अनुभव किया, वैसा अन्य कवियो के लिए दुर्लभ था । तेलुगु के मर्मज्ञ विद्वान चिलुकूरि वीर भद्रराव ने एक स्थान पर लिखा है- "श्रीनाथ का जीवन-चरित्र प्रस्तुत करने का अभिप्राय है, १५वी शती के आन्ध्र देश का इतिहास लिखना।" इन्होंने एक दर्जन से अधिक काव्य-ग्रन्थो का सृजन किया है, जिनमे 'शृङ्गार नेषधमु', 'काशी खण्ड', 'भीम खण्ड', 'पलनाटि वीर चरित्र', "शिवरात्रि महात्म्यमु', 'हरविलास' मुख्य है । तेलुगु कविता को प्रौढता प्रदान करने का श्रेय श्रीनाथ को प्राप्त है । तेलुगु वाङमय की विविध शाखाओं को जन्म दिया तथा भाषा, भाव, शैली, छन्द, अलकार आदि की दृष्टि से भी समृद्ध बनाया। चाटूक्तियो के कहने में भी ये अत्यंत पटु "सिरिगलवानिकि जेल्लुनु' नामक पद्य में कवि ने अपने आराध्य पर अच्छा व्यंग्य कसा हे । इसमे उनको विनोदप्रियता का भी परिचय मिलता है । एक बार कवि पहाड़ी प्रदेश में यात्रा कर रहे थे। उन्हे वडी प्याम लगी। आराध्य देव का स्मरण किया--हे परमेश्वर, विष्णु जैसे धनी व्यक्ति चाहे सोलह हजार नारियो के साथ विवाह कर सकते हैं, तुम तो फकीर हो, तुम्हें दो - १० तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाए पत्नियो की दया आवश्यकता है ? पार्वती तो ठीक है, गंगाजी को छोडिये ना।' इस युग के मन्त कवियो मे वेमना का अनुपम स्थान है। सरम व मधुर लोकभाषा मे वेमना ने जो उद्गार व्यक्त किये है वे ज्ञान, भक्ति, सदाचार और नीति से ओतप्रोत है । इनको सूक्तियाँ लोकोक्तियो की भांति मनोहर होती है। ये आशु कवि थे। अपने अनुभवजन्य ज्ञान को इन्होने तेलुगु के सरल छन्द 'कन्द', 'आटवेलदि' तथा 'तेज गीत' में अभिव्यक्त किया है । मूर्ति-पूजा, जप-तप, उपवास आदि वाह्याडवरो की कटु आलोचना की । ये निर्गुणोपासक थे और इनकी सामाजिक भावना विद्रोहात्मक थी। इनमे और कबीर में पर्याप्त साम्य पाया जाता है । दुर्जन और सज्जन व्यक्ति का परिचय व्यवहार मे आनेवाली वस्तुओं के साथ साम्य बिठाते हुए कराते हैं- "अत्पुडेपुडु पल्कु नाडबरमुगानु" अर्थात्, “दुर्जन व्यक्ति सदा गप्पे हाँका करता है तो सज्जन सर्वदा मीठी बाते करते है -सत्य ही तो है-कॉसे की तरह कनक (स्वर्ण) नही बज सकता।" वमना साधक भी थे । अन्तिम समय मे ब्रह्मज्ञानी हो वस्त्र धारण को भी त्याग चुके थे। उनका विचार है कि मानव जन्म के समय न वस्त्र पहन कर उत्पन्न होता है और न मृत्यु के ममय वस्त्र धारण कर जाता है। ऐसी स्थिति में इस मध्य काल में वस्त्र धारण करना परिहास की बात तो नही । इस युग मे तेलुगु ग्रन्थो के माथ संस्कृत मे भी उत्तम कृतियाँ प्रस्तुत हुई । इस युग के राजा केवल उत्तम शासक ही नही थे अपितु उच्चकोटि के विद्वान, आश्रयदाता और कवि भी थे। काटय वेमा रेड्डी ने कालिदास के नाटक-वय की व्याख्या लिखी। सर्वज्ञ मिंगम भूपति ने रसार्णव सुधाकर की व्याख्या लिखी तो वेदकोमटि वेमा रेड्डी ने साहित्य चिंतामणि की रचना की। नाटकों का तेलुगु अनुवाद भी इस युग मे प्रारम्भ हुआ। काव्य मे लौकिक पक्ष के साथ आध्यात्मिक पक्ष भी कविता वैभव के साथ प्रस्फुटित हुआ । परिणामस्वरूप वेमना-जैसे सन्त कवि का इस युग मे प्रादुर्भाव हुआ । शतको की रचना विपुल माया में हुई। रीति ग्रन्थ भी अनेक आये। अन्यमाचार्य ने पद साहित्य का जन्म दिया और वे पद साहित्य के प्रवर्तक हुए, परवर्ती युगो पर उनका व्यापक प्रभाव पड़ा । प्रबन्ध पग या रापत-युग (ई० सन् १५०१-१७००) नेलुगु माहित्य के इतिहाम में यह युग म्वर्ण युग माना जाता है । इस काल मे उच्चकोटि के अमस्य प्रपन्ध काव्यो की मर्जना हुई जो काव्य-कला की दृष्टि में उत्कृष्ट अन्य माने जाते हैं । विजयनगर के सम्राट कृष्णदेव ने न तेलुगु भाषा और माहित्य केवल कवियों को आश्रय दिया, बलि श्रेष्ठ प्रबन्ध कान की रचना करके इम युग का प्रतिनिधित्व भी किया । अत. यह गुग काव्यगत विशेषताओ के कारण प्रबन्ध-युग कहलाता है तो युग प्रवर्तक के नाम पर रापत गुग भी। संस्कृत मे दण्डी ने 'सर्ग बन्ध' नामक महाकाव्य के जो लक्षण बताते है. उन्ही को तेलुगु के रीति-शास्त्रकारो ने प्रबन्ध-काव्य के लक्षणों के रूप में स्वीकार दिया है। तदनुमार प्रबन्ध-काव्य के निम्नलिखित लक्षण निर्धारित किये गये हैं--- "संध्या सूर्येन्दु रजनी प्रदोपध्यात वासरा. प्रातमध्याहन मृगया शैलर्तु वन सागरा. संभोग विप्रलभी च मुनि स्वर्ग पुराध्वरा. रण प्रयणोपम मंत्र पुत्रोदयादय वर्णनीया यथा योग सागोपागा अभी इह ।" ये प्रबन्ध-काव्य के अष्टादश वर्णन माने जाते है। इनके अतिरिका प्रबन्ध-काव्य की कथावस्तु सुप्रसिद्ध हो, धीरोदातादि नायको में से एक काम- नायक हो, शृगार रस प्रधान हो तथा अन्य रस आगि हो । कान्य मौलिक हो, रूपान्तर न हो । लाक्षणिक अथवा आलंकारिक शैली मे इसकी रचना हो-ये प्रबन्ध-काव्य के अन्य लक्षण है । इष्टदेवता की प्रार्थना, सुकपि-स्तुति, कृतिभर्ती के गुणों का वर्णन इत्यादि अन्य आवश्यक उपाग है । तेलुगु के प्रायः सभी प्रबन्ध काव्य चंपू है । प्रबन्ध काव्यो की अधिकता होने पर भी इस युग में रीति ग्रन्य, द्विाद काग, दयि काय्य, व्यभि काम, ठेठ तेलुगु काव्य, शतक आदि पर्याप्त मात्रा में रचे गये। परन्तु प्रवन्ध माध्य दृश्य, श्रव्य तथा मधुर कामो के गुणों से मुक्त हो, रामन रूप में प्रस्तुत हुए । प्रबन्ध-काव्यों के प्रेरणा-सोत मम्राट कृष्णदेव राय थे। इनके दरबार में अष्ट दिग्गज नाम से आठ महाकवि थे । वे महाकवि है-अल्लसानि पेदना, नदि तिम्मना, अद्यतराजु रामभद्रकवि, धूगंटि, मादयगरि मल्लना, गिति मूला, रामराजभूपग तया नेनालि रामकृष्ण करि कृष्णदेवराय या सभा- भवन 'भुवा-पिजय' नाम गे विख्यात या, गहाँ सदा पंडित, आपापं, कवि तथा अन्य कलाकारों की गोष्ठियां हुआ परती थी। गिनगे मास्त्र-चर्चा, कविता पाठ, गमस्यापूर्ति, आनु पारिता, अग्यान गायिता मुर घी । उम मभा-भवन मे ने नुगु भारती को प्रतिनिःय कपिना गुणगो द्वारा ऐती आराधना होती थी कि स्वयं कवियों के माय गरम प्रेशकी का भी शरीर पुका उठना था।

૧૨ मेगु वाहमय शिविध विधाएं कृष्णदेवगन गस्त के उभट विam तो घेही. माय ही वे तेनुगु के ममंश फयि भी ५ । सस्त में आपन मदालमा परिम, मल्पवधू परिणय, सकल-कथा गार सग्रह, भान चितामणि, नाम्चयती परिणय, मंगरी आदि काव्य एव नाटको का प्रणयन किया। तेलुगु में 'भामुक्त मापदा" नामक एक प्रबन्ध-कार की मृष्टि की जो विचित्तीयमु' नाम में विख्यात है। पेरियाल्यार का नाम ही विचित्त है । विष्णुनित द्वारा पारित गोदा देवी का वृत्तात आमुक्त माल्यदा में वर्णित है जी वैष्णय धर्म का प्रतिपादन एवं उसकी उत्कृष्टता को प्रमाणित करने वाला काव्य ग्रन्य है । इसमें विशिष्टाद्वैत मत का मुन्दर प्रतिपादन हुआ है । तेलुगु वाङ्मय के लिए यह काव्य अलंकार. प्राय है। अल्लमानि पेदना ने "स्मारोचिष मनुमभव" नामातर मनुचरित्र का मृजन किया। इम काव्य पर मुग्ध हो सम्राट कृष्णदेव राय ने पेदना को 'जान्ध्र-कविता पितामह' नागक उपाधि से विभूषित किया। उनके वामपाद में गण्डपेण्डेर नामक स्पर्णकंकण पहनाया तथा कवि की पालकी तक उठायो यो। मधुर कविता की रचना में नन्दि तिम्मना बेजोड थे। हरिवंश पुराण से कथावस्तु ग्रहण कर आपने "पारिजातापहरण" नाम से शृंगार रस प्रधान काव्य की सृष्टि की । पदलालित्य और अयं वैचिश्य को दृष्टि से यह काव्य अनुपम कहा जा सकता है। अभिमानिनी सत्यभामा का चरित्र मनोहर शैली में वर्णित है । वस्तु तथा काव्यगत विशेषताओ की दृष्टि से इसकी समता कर सकने वाले ग्रन्थ भारतीय भाषाओ में अत्यल्प है। सिंगलि सूरना ने कलापूर्णोदय, प्रभावती प्राम्नमु तथा राघव पाडवीयमु नामक तीन प्रबन्ध-काव्य लिखे है, जिनमे कलापूर्णोदयमु हमे कामेडी आफ़ एरंस का स्मरण दिलाता है। तेलुगु भाषा के मर्मज्ञ विद्वान इसे काव्योपन्यास मानते हैं । राघव पाडवीयमु थि काव्य है। इसमें एक साथ रामायण तथा महाभारत की कथाएँ वणित है। रामराज भूपण ने भी हरिश्चन्द्र नलो- पाख्यान नाम से एक थि काव्य लिखा है। उसमें हरिश्चन्द्र तथा नल के वृत्तात वर्णित हैं। इनका 'वस्तु चरित्र' तेलुगु का उत्कृष्ट प्रवन्ध-काव्य है । इम युग के अन्य विशिष्ट कामो मे तेनालि रामकृष्ण कवि कृत पांडुरंग महात्म्यभु तथा उद्भटाराध्य चरित्र, धूर्जटी का कालहस्ती महात्म्यमु, मोल्ला कृत रामायण, राधा माधव कवि कृत राधामाधवमु, मादयगारि मल्लना प्रणीत राजशेखर चरित्र, अय्यतराजु रामभद्र कृत "रामाभ्युदयमु" गणनीय हैं । रीति ग्रन्य, शतका, पद, यक्षगान आदि काव्य की अन्य नवीन विधाओ का उदभव एवं विकास भी इस यग मे हा है।

तेलुगु भाषा और साहित्य १३. अर्वाचीन युग या संक्रांतिक युग (ई० सन् १७६१-१८५०): विजयनगर माम्राज्य के पतन के पश्चात् वह माम्राज्यं अनेक भागों में विभक्त हुआ। छोटे-छोटे सामन्त भी उन भू-भागों के स्वामी बन बैठे। ऐसे संक्रांतिक काल में तेलुगु कविता मथुरा, तंजाऊर, पुदुक्कोटा, पिठापुरम, बोबिलि, विजयनगरम (विशाम जिना), चन्द्रगिरि, नंद्याल, पेनुगोडा आदि केन्द्रों में पल्लवित होने लगी। कुछ विद्वानों का यहाँ तक विचार है कि इस युग में अन्य युगों की समता मे उल्लेखनीय साहित्य का सृजन नहीं हुआ है । अत: इसका नामकरण क्षीण-युग करना अधिक समीचीन होगा । परन्तु इस युग मे भी तंजाऊर, मदुरे, विजयनगरम, मैमूर आदि राज्यों मे जो साहित्य सृजन हुआ है, वह कम महत्वपूर्ण नही है। तंजाऊर के राजा रघुनाथ राय ने कृष्णदेवराय की भांति अनेक कवि, आचार्य एवं कलाकारों को आश्रय देकर तेलुगु वाङ्मय के विकाम मे स्पृहणीय योगदान दिया है। उन्होने स्वय भी अनेक काव्य लिखे है । उनके पश्चात् उनके पुत्र विजयराघव नायक ने तथा महाराष्ट्र के शातगों ने तंजाऊर के दरबार में तेलुगु साहित्य के गृजन में विशेष प्रोत्साहन दिया है। इस काल मे पमुपुलेटि रंगाजम्मा, मुद्रुपलनि आदि उच्च कोटि की कवयरियाँ भी हुई है। इस युग की उल्लेखनीय कृतियों में रधुनाथाभ्युदयमु, विलाममु, उपा परिणयमु, विप्रनारायण चरिद्रमु, मत्यभामा स्वांतनमु, राधिका स्वांतनमु, रुक्मिणी परिणयमु, राम विलाममु, कविजनरंजनमु, अनिरुद्ध चरित्र, गोपीनाथ रामायणमु, भारताभ्युदयमु, शंकरविजयमु, आन्ध्र भाषार्णवमु, राजगोपाल विलासमु, चन्द्रालोकमु, गंगा गौरी संवादमु विलासमु, विष्णु- पुराण, हालास्यमहात्म्यमु, श्रीरंगमहात्म्यमु, मारंगधर चरित्र, अहल्या संक्रदनमु, चित्रकूट महात्म्यमु, चन्द्ररेणा विलापमु, नीला मुन्दरी परिणयमु, उत्तराय चरितमु आदि प्रसिद्ध है। रीतिशास्त्र, यक्षगान, पद, द्विपद, काव्य, नाटक, दूपणग्रन्थ, कोश, व्याकरण इत्यादि विभिन्न प्रकार की रचनाएँ संकटो नहीं बल्कि हजारो की मंख्या में रची गयी हैं, जिनका उल्लेख मान करना भी संभव नहीं है । आधुनिक युग (ई० सन् १८५१ से आज तक): तेलुगु वाङ्मय के आधुनिक युग का श्रीगणेश उन्नोमवी शती के उत्तरार्द्ध में हुआ। यह समय भारतीय साहित्य, इतिहाग और समाज मे भी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं परिवर्तनशील रहा है। इस युग की समस्त प्रवृत्तियों तथा परिस्थितियों का प्रभाव तेलुगु साहित्य पर स्पष्ट परिलक्षित होता है । विश्व- विद्यालयों की स्थापना के साथ ही माय भारतीय विद्यार्थियों ने अंग्रेजी मन्नारुदास १४ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं - साहित्य का अध्ययन करना प्रारभ किया । गद्य के विकास के साथ अन्य अनेक नयी विधाओं का जन्म हुआ। परवस्तु चिन्नयमूरि ने बालव्याकरण नाम मे तेलुगु का एक प्रामाणिक व्याकरण प्रस्तुत किया। तेलुगु भाषा के स्वरूप का निर्धारण किया और साथ ही नीति चन्द्रिका की रचना करके प्रामाणिक गद्य का भी सूत्रपात किया। व्याकरण के नियमो से आवद्ध भाषा को मुक्ति दिलाने के हेतु गिडुगु राममूर्ति पंतुलु ने व्यावहारिक भाषा नाम से तेलुगु की लोकभापा को प्रचलित किया तो पडित वीरेशलिंगम पतुलु तथा गुरजाड अप्पाराव ने इम लोक भाषा मे रचनाएँ करके इम आन्दोलन को बल प्रदान किया। पंतुलु ने साहित्य का इतिहास, नाटक, जीवनी, समालोचना, प्रहमन, आत्मकथा निबंध, उपन्यास, कहानी, एकांकी आदि की रचना तो की, साथ ही पत्र- पत्रिकाएँ चलाकर तथा पुरानी पांडुलिपियों का संशोधन करके उनके प्रकाशन द्वारा भी तेलुगु वाङ्मय को श्रीवृद्धि में अमाधारण योगदान दिया है। राष्ट्रीय कविता: गुरजाड अप्पाराव ने परम्परागत काव्य-रीतियो के विनयी शेती, नयी वस्तु और नयी रीतियों का जन्म दिया तथा राष्ट्रीय कविता का प्रणयन किया। 'देश भक्ति' में उन्होंने राष्ट्रीय भावना ध्वनित की है.~~ "देशमुनु प्रेमिचुना, मंचियन्नदि प्रेमिचुन्ना"। देशमंटे मट्टिकादोय, देशमंटे मनुप्युलोय"। है भाई, देश के माय प्यार करो, अच्छाई को बढाओ, देश के माने मिट्टी नही. देश के माने मानव है। करिता का लक्ष्य उन्होंने देग-प्रेम बताया है- आकुलदुन अणगिमनगि फयित कोयिल पलुक यते नोय । पनुगुलनु विनि देशमदभिमानमुनु मोलवेत्त बलेनोय ॥ अर्थात् पत्तो की आट में ट्रिो रहकर कविता सी कोयल बोले, उस वाणी को मुनार देश-प्रेम की भावना जागृत हो उठे। गपप्रोनु मुम्बाराव ने राष्ट्रीय कविता के माय भाव-कविता का मूत्रपात रिया । यह परमारा यत गमय ना अविजिटल गलती हो । प्राचीन माग्न की गरिमा या मध्य पिता की कविता की निगाता है. 13मी गरिमा का गान किया है राममोलु ने- वेदमागनु येलमे निपट अधिकार ना निचर ।

तेलुगु भापा और माहित्य १५ अर्थात्-वेद की शाखाएँ यही पर फूट निकली। आदि काव्य का प्रणयन इस भूमि पर हुआ है। राष्ट्रीय कविता का पोपण करने वालो मे कवि सम्राट विश्वनाथ सत्यनारायण, दुरि रामिरेड्डी, अबूरि रामकृष्णराव, कोडालि मुबाराव, अडवि बापिराजु, वेदुल सत्यनारायण, जामुवा तथा तुम्मल मीता- राममूर्ति चौधरी के नाम अविस्मरणीय है। भाव कविता: भाव कविता हिन्दी की छायावादी कविता के सदृश होती है । यह कविता आत्मपरक होती है। लाक्षणिक प्रयोग, भापा में वक्रता, प्राकृतिक आकर्षण, गेयात्मकता, प्राकृतिक उपकरणों में मानवीकरण, प्राचीन काल संप्रदायों के विरुद्ध विद्रोह इस कविता की मुख्य विशेषताएं हैं। इस कविता में कवि की अनुभूति अनन्यारोपित, तीन एवं स्वाश्रय होती है । भाव-सौन्दर्य तथा रीति- मौन्दर्य इम कविता की अन्य प्रवृत्तियां है। भाव कवि अपने वाछित मनोधर्म के अनुरूप भाव-तीव्रता का आराधक रहा है; अतः अपने मनोधर्म को प्रतिबिंबित करने वाली ऐमी कविता का नामकरण उसने 'भाव कविता' किया है। पूर्वापर घटनाओं से मुक्त हो केवल किमी एक भाव का चित्रण करने वाली गेय कविता भाव-गीत कहलाती है। यही हिन्दी में गीत काव्य से विख्यात है। भाव कविता का शुभारम्भ रायप्रोलु ने किया किन्तु इसे मार्दव एवं प्रौढता प्रदान करने का श्रेय श्री देवुलपल्लि वेंकट कृष्ण शास्त्री को प्राप्त है । भाव कवि आकांक्षा करता है- सच्चिदानन्द कल्याण सदनमयिन यी मनोहर जगतिकि नेगुचि प्रेमलक्ष्मिनि आराधिपवेमि यकट ! अर्यात् -यह मनोहर जगत् मच्चिदानन्द कल्याण का सदन है। इसमें जन्म धारण कर हे कवि, तुम प्रेम-लक्ष्मी की आराधना क्यों नहीं करते । देवुलपल्लि ने अपने प्रेम की व्याख्या कैसी अनूठी उक्तियों में की है- प्रेयदिकि लेदु शरीरम लेदु मेनु ना तीयनि प्रेमकेनि कलदे एडवाटिक माकु । अर्थात-मेरी प्रेयमी की कोई देह नहीं है, मेरे मधुर प्रेम का भी शरीर नही है। फिर भला हम दोनों का वियोग ही क्यो होगा. । इम कविता को पुष्ट करने वालों में मल्लवरपु विश्वेश्वरराव अब्बूरि, नायनि मुबाराव, स्वामी शिवशंकर शास्त्री, नंरि सुधाराव के नाम गणनीय तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं है । नडूरि ने 'एकि पाटलु' नाम मे जो गीत प्रस्तुत किये है वे तेलुगु काव्य की अनुपम निधियां है। अभ्युदय कविता: भाव कविता के विरुद्ध प्रतिक्रियाम्वरुप जिम काव्य का सृजन हुआ है, वह अभ्युदय कविता नाम मे विस्यात है । भाव कवि ने अपनी भावात्मक अनुभूति को एक सीमा तक व्यक्त करने में सफलता पायी। किन्तु वह सर्वांगीण काव्य- मर्जन के लिए आगे चलकर समर्थ एवं मफल सिद्ध न हो सकी । समाज की प्राचीन मान्यताएँ टूटने लगी । विज्ञान की उन्नति ने मानव को अधिक वास्त- विकता का बोध कराया। ससार मे पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ हुआ आर्थिक क्राति के साथ मामाजिक समता का स्वर तीव्र हो उठा 1 अग्रगामी जन-शक्तियो ने पूंजीवादी नेतृत्व का विरोध किया। इनके अतिरिक्त देश में अकाल, दरिद्रता, गुलामी तथा जीवन की जटिल समस्याओ ने साहित्य और कविता की गति बदल दी । नदीन मान्यताओ को स्थापित करते हुए तेलुगु मे अभ्युदय कविता (प्रगतिशील कविता) का जन्म हुआ। इस कविता के प्रवर्तक श्रीसगम श्रीनिवास राव (श्रीश्री) माने जाते हैं । 'महाप्रस्थान' गीत- मग्रह द्वारा अपने नवीन जनवादी कविता का मूत्रपात किया । तत्कालीन राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था को विच्छिन्न करके उसके स्थान पर नवीन मान्यताओ को स्थापित करना चाहा । इस आशय के पोपण में काव्य का निर्माण किया । वे नये सनार की सृष्टि के आकाक्षी हैं- "पुडमि तल्लिकि पुरिदिनोपुलु (नोप्पुल) मरो प्रपंचं स्फुरिस्तुदि" अर्थात पृथ्वी माता की प्रमत्र-वेदना नयी दुनिया के आविर्भाव का स्फुरण दिला रही है। कवि कभी आशा-निराशा के द्वन्द्व मे पड़ जाते है तो कभी मानव-समुदाय के अभ्युत्थान के समय को निकट देखते है । कभी भयंकर द्वैपाग्नि प्रज्ज्वलित करने वाली दानवता के विनाश की कामना करते है, तो कभी अपनी आहुति का परिचय देते हैं-- "नेनु संतमु प्रपंचाग्नि" नामक गीत द्वारा यह आशय अभिव्यक्त करते है तो फिर कभी अपना आत्म-परिचय देते है~-भूत हूँ, यज्ञोपवीत है, विप्लव- गोत हूँ। अभ्युदय कविता के पोपक कवियों में श्रीरंगम नारायण बाबू, आरुद्र, अनिशेष्टि मुबाराव, वेल्लमकोड रामदासु, कुंदुर्ति आजनेयुतु, पुल्यूरि तेलुगु भापा और माहित्य १७ सुब्रह्मण्यम, दाशरथी, कालोजी नारायणराव, अजता, के० वी० रमणा रेड्डी, रेंटाल, पुरिपडा आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है । विविध प्रवृत्तियां : तेलुगु कविता पर राष्ट्रीयता का प्रभाव है तो दूसरी तरफ अपनी मातृ- भूमि के प्रति अगाध अनुराग भी। इस परंपरा के काव्य-ग्रन्थों में 'आन्ध्र पुराण', 'महान्दोदय', 'नागार्जुन मागर', 'पेतुगोंड लक्ष्मी' आदि सुप्रसिद्ध है। श्री पुट्टपति नारायणाचार्यलु जंछाले पापख्या शास्त्री, वोठ भीमन्ना, नारायण रेड्डी, पल्ला दुर्गयन आदि असंख्य कवियो ने तेलुगु काव्य-भारती की आरती उतारी है । तेलुगु मे जितनी संख्या मे कवि है, संभवत किसी भाषा में इतनी संख्या में नहीं होंगे। नाटक: तेलुगु मे करीब दो हजार नाटक रचे गये है । प्रदर्शन की दृष्टि से भी अधिकांश नाटक मंच पर अभिनीत हो सफलता प्राप्त कर चुके है । कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ विजयवाडा केवल तेलुगु नाटक देखने आये थे । तेलुगु नाटको की पृथ्वीराज कपूर, साताराम आदि ने बडी प्रस्तुति की है । तेलुगु भाषा में कुरवंजी, यक्ष गान, भामा कलापमु, वीथि भागवतमु इत्यादि लोकनाटय भी हैं जो अत्यन्त ही लोकप्रिय हैं । 'कन्याशुल्कम' तेलुगु का प्रथम मामाजिक नाटक है जो अंग्रेजी नाटकों की शैली पर रचित है। संस्कृत, अंग्रेजी, बंगला, हिन्दी आदि भाषाओ से अनूदित नाटकों की सस्या भी कम नही है। नेलुगु मे सामाजिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक, पौराणिक, प्रगतिशील नाटक भी रने गये हैं । वीरेशलिंगम पतुल, धर्मवरमु कृष्णमाचार्युल, चिलक- मनि लक्ष्मी नरसिंहम, आत्रेय, नालं वेक्टेश्वरगव, वेलभु वेस्टराय शास्त्री, रानमन्नार. मुदु कृष्ण, अनिशेट्टि, श्रीवात्मव, भमिडिपाटि, डी० नरस राज, मल्लादि, आत्रेय प्रमुनि ने इम शापा को परिपुष्ट किया है । आन्ध्र प्रदेश मे मैकड़ो की संख्या में नाटक-कंपनियां स्थापित है । चिनकमति कृत "गयोपा- रस्पानमु" नाटक की हेन लाम मे अधिक प्रतियां अब तर विक नुकी है। तेलुगु रंगमंच के विकास का यह एक उत्तम उदाहरण कहा जा सकता है । अन्य विधाएँ: मेगु का गद्य माहित्य पर्याप्त प्रोह, पुष्ट एवं विविध मारत्र ग्रन्पों में पुर्ण है।मागोमाग गयो अतिरिक्त गणित, ज्योतिष, बंरक, मान, पन, दर्मन, इतिहाग, विमान, न, न्याय प्रादि गास्त्रों से सम्बन्धित न्य भी पर्याप्त मात्रा मे रपे गये हैं। ।

तेलुगु वाइमय : विविध विधाएं तेलुगु का उपन्यास और कहानी-साहित्य भी समृद्ध कहा जा सकता है । तेलुगु मे इम समय मैकडों कयाकार है । विविधता, व्यापकता और नवीनता को लिये तेलुगु कया वाङमय विकास के पथ पर अग्रसर है । पत्र-पत्रिकाओं द्वारा भी कथा वाङ्मय को विशेष प्रोत्माहन प्राप्त हो रहा है । तेलुगु की विशेषता यह है कि इसमे लेखिकाओं की संख्या भी अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक है । ऐतिहापिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक उपन्याम भी तेलुगु मे रचे गये है । जीवनी और आत्म-कथाओ की रचना भी समय-ममय पर हो रही है । ममाज-सुधारको, राजनैतिक नेनाओ तथा युग-प्रवर्तक कवि और लेसको ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी है शास्त्र तथा वैज्ञानिक साहित्य का भी प्रचुर गामा मे सृजन किया जा रहा है । लोक-माहित्य के पुनरुद्धार का प्रयत्न चालू है। आन्ध्र प्रदेश के तीनी विश्वविद्यालयो, अकादमियो तथा तेलुगु भाषा-ममिति के द्वारा भी उत्कृष्ट ग्रन्थो का प्रकाशन किया जा रहा है । कोश, व्याख्याएँ, व्याकरण आदि भी कम नहीं लिखे गये है । तेलुगु भाषा-समिति ने "विज्ञान सर्वस्वमु" नाम से १२ खण्डो में विश्वकोप के प्रकाशन की योजना बनायी और अब तक नो खण्ड प्रकाशित भी हो चुके है। आन्ध्र प्रदेश सरकार भी यथाशीघ्र तेलुगु मे ममस्त कार्य चलाने का निश्चय किया है । अतः यह आशा की जा सकती है कि तेलुगु भाषा और साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है।

माहित्य को प्रभावित किया। मानकर व मटार अनार प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित हमारा भी सर्वश्री अनिशेट्टी मुबारावद ट", दार- २ स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य तेलुगु के विख्यात महाकवि "श्रीश्री" ने स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु काव्य "त्वमेवाहम" (श्री आरुद्र कृत) की भूमिका में बताया है, "हमें मुख्यत स्मरण रखने की दो चीजें है-~-एक, भारत भर में राजनैतिक दृष्टि मे अधिक जागृत प्रदेश आन्ध्र प्रदेश है । दूमरी-नयीन कविता के लिए ममस्त भारत में तेलगु भापा का स्थान मर्वोपरि है । इन दोनो के बीच परस्पर घनिष्ठ मम्बन्ध है।" यह बात आज भी मत्य है। राजनैतिक चेतना तथा कविता की नवीनतम प्रवृनियों मे आन्ध्र प्रदेश आज भी अपणी है । स्वतन्त्रता की प्राप्ति के कुछ वर्ष पूर्व ही १६४३ मे अभ्युदय लेखक संघ (प्रगतिशील लेखक संघ) की स्थापना हुई थी। इस संघ का साम्यवादी दल के सिद्धान्तों के माय प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। महाकवि श्रीश्री ने यह बात 'प्रगतिशील लेखक और विप्लव दृष्टिकोण' नामक लेख में स्पष्ट की थी। अभ्युदय लेखक जिन सामाजिक अत्याचारो को निर्मूल करने की व्यथा अनन करता है, उन्ही के निर्मूतन के लिए अगर एक राजनैतिक दल प्रचार काटा है तो कवि अपने शिल्प को अवश्य उसके वास्ते गमपित करेगा।" रिट १६४७ मे भारत जब स्वतन्त्र हुआ, तब माक्र्मवादी मिदानी दा संवैधानिक प्रजातन्त्र की भित्ति पर राष्ट्रीय मरकार. there ममय तेलंगाना आन्दोलन छिड़ा । इम आन्दोलन के मागद ने नई उत्तेजना व प्रेरणा प्राप्त की। तेलंगाना क्षेत्र में रजाकारी अन्यात्रार मा उनका विरोध किया। पुलिस की कार्रवाई, नेलंगाना का माम्यवादी दल तथा प्रगतिशील रचनाओ पर प्रदिदाय, महानुटि दिखाने वाले लोगो के प्रति पुलिम में मरट या ३० तेलुगु वाड्मय : विविध विधाए नया “अग्नि धारा", गामगुन्दर विरचिन "बनायुधम्", रेटाल राधवराव रचित "मंघपंग" और आरुद्र कृत "स्वमेवाहम्"। गद्य के क्षेत्र में भी उपर्युक्त आन्दोलन में प्रमाविन मुन्दर रचनाएँ आविर्भूत हुई। श्री सुंकर मत्यनारायण तथा वामिरेड्डी भास्करराव ने मम्मिलित रूस में "मा भूमि" (जमीन हमारी) नामक नाटक रचा, जिसे काग्रेमी मरकार ने जन्ल किया था। अनेक वर्ष पश्चात् इस नाटक के प्रकाशन पर से प्रतिबन्ध हटाया गया। तेलंगाना में माम्यवादियो ने इसलिए मशस्त्र क्राति और गोरिल्ला-युद्ध शुरु किया कि उनकी दृष्टि मे राष्ट्रीय सरकार माम्राज्यवादियो की जी- हुजूरी करने वाली सरकार है। वे अपने सिद्धांतो के अनुरूप साम्यवादी सरकार स्थापित करना चाहते थे । वे असफल हुए। पुलिम कार्रवाई के साथ तेलंगाना भारत संघ का अन्तर्भाग वना। इसमे साम्यवादी आन्दोलन को गहरा आघात लगा । परिणामस्वरूप उन्हें अनिवार्य रूप से अपने कार्यक्रमों में परिवर्तन लाना पडा । कुछ लेखको की साम्यवादी कार्यक्रमो के प्रति आस्था शिथिल और प्रजातन्त्र के प्रति सुदृढ हुई। फलतः वे तेलुगु देश, तेलुगु भाषा, तेलुगु जाति का गान करने लगे। इम मंदर्भ में "महांद्रोदय" जैसे काव्य प्रकाश में आये। उपर्युक्त आन्दोलनों के प्रभाव मे १६५२ के चुनाव में साम्यवादी दल की आशातीत विजय हुई । आन्ध्रवासियो ने तीस वर्ष तक "विशाल आन्ध्र" का जो आन्दोलन चलाया, वह साकार हुआ। विभिन्न राज्यों मे बँटे आन्ध्र के प्रान्त में शासन के अन्तर्गत आ गये । भापा के आधार पर राज्यो के पुनर्गठन आन्दोलन का बीजारोपण आन्ध्रवामियो ने ही किया था। आन्ध्र प्रदेश की स्थापना के माय हो तेलुगु को शामन के स्तर पर मान्यता दिलाने का प्रयत्न हुआ। इसी अवधि मे तेलुगु कविता मे वस्तु और शैली सम्बन्धी बहुत बड़ा परिवर्तन आया। यों तो छन्दोवद्ध कविता को तिलांजलि देने का प्रयत्न इसके पूर्व ही हो चुका था, किन्तु इस अवधि मे गद्य कविता एक आन्दोलन के रूप में सामने आई । साथ ही जहाँ पहले कृपक, मजदूर, कलित, शोपित एवं पीडित प्रजा का स्वर तेलुगु कविता मे बुलन्द था, वहीं अब गुमाश्ते, क्लर्क, बेरोजगार व मध्यम वर्ग ने भी अपना स्थान बना लिया। उपयुक्त विचारधारा में भिन्न स्वर हमे अजन्ता, केशवराव, गोपाल चक्रवर्ती, अपिराल विश्वम, इत्यादि की कविता में दर्शित होता है । इनकी कविता में राजनैतिक चेतना की अपेक्षा मानसिक संवेदनशीलता अधिक दृष्टिगत होती है । इस स्थिति का चित्रण कविश्री आरद्र के शब्दों में स्पष्ट हुआ है---"श्री केशव राव जहाँ अनूदिन प्रभाव को देय गये, वहाँ पर " स्वातंत्र्योत्तर तलुगु साहित्य मादिराजु रंगाराव "जागृत आकाश' तथा उसके भीतर के "किमोरो" दर्शन कर सके। श्री गोपाल चक्रवर्ती ने "कलम के स्वप्न" 'देखे, अपिराल विश्वम् ने "काल गीस्तुम्न गीतल" अर्थात् काल द्वारा खींची गयी रेखाबी को स्वीकार किया तो बापू रेड्डी ने चैतन्य रेखाओ को पहचाना । इस प्रकार जहाँ प्रगतिशील लेखको का आन्दोलन सो रहा था, वहाँ पर प्रगति जागृत थी।" स्वतन्त्रता की प्राप्ति के साथ पुलिस की कार्रवाई और निजामशाही की समाप्ति का सर्वत्र स्वागत हुआ। निजामशाही के क्रूर शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रवादियो ने भी अथक प्रयत्न किया था, किन्तु प्रगतिशील शक्तियों का इसमें बहुत बड़ा हाथ था। उन्ही दिनो जो काव्य प्रकाश में आये, उनमे सर्वश्री कुन्दुर्ति आजनेयुलु द्वारा विरचित "तेलगाना" और गंगनेनि वेकटेश्वर राव विरचित "उदयिनी" तेलगाना के संग्राम का सजीव चित्र प्रस्तुत करते है। इसी सदर्भ मे रेटाल गोपाल कृष्ण कृत "सर्पयाग" और "सधपण" भी उल्लेखनीय है । श्री अनिशेट्टि सुब्बाराव ने “अग्नि वीणा" नामक काव्य- संग्रह मे वताया है--"प्रति ओकडू शिवुडु नेडु" अर्थात् अनेक व्यक्ति आज एक शिव है । विज्ञान के पथ पर पग धरने वाले मानव को सचेत करते हुए कवि कहता है- "अधिरोहण की दशा में तुम्हारे कदमो मे गलत ताल-लय नहीं करूंगा।" इसी परम्परा में "युग-युगे" काव्य का प्रादुर्भाव हुआ । साम्यवादी विचारधारा ने क्राति का जो आन्दोलन चलाया, जिसका लक्ष्य केवल मात्र विप्लव था, उसकी परिधि को पार कर राष्ट्रीय प्रजातन्त्र का पोषण "तेलंगाना" नामक काव्य मे हुआ है । एक समीक्षक ने बताया है कि कुन्दुति की कविता में यह जो परिवर्तन आया है, वह प्रगतिशील कविता को पीछे छोड नवीन कविता-युग का स्वागत करता है। उनके द्वारा विरचित "तेलगाना" काव्य एक प्रकार से दो युगो के लिए सेतु के समान है । प्रगति शील कविता आन्दोलन के दो प्रमुख व महान काव्य ग्रन्थो में बनी है, एक छोर पर महाकाव्य श्रीश्री द्वारा प्रगीत "महाप्ररथान" रो र पर "तेलंघाना"। ये दोनो काव्य अपनी कविता-शनि, मंदर की कसौटियो पर कसे जा सकते है । यदि प्रयम वाथ्य Ragni आधारशिला है तो दूसरा उसका उच्च गियर है। मामला जलधारा है । गुन्दुर्ति ने इस काव्य के द्वारा शारदा दौर काव्य भापा लोक भापा बनी। तेलंगाना में नाम्यवादियो दाग III उनके ममर्थन में अनेक कादि xit va 72 में कवियो को तत्कालीन मबार cert"' २२ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं नाटक जब्त किये । आन्ध्र गे ही समवन पहली बार कवियो यो कारागार में भेजा गया। राजनैतिक स्वतन्यता ये गाय युवा पीढ़ी के कवियों में तीन प्रकार की विचारधाराएँ दृष्टिगोचर हुई है ~पही विचारधारा के कवि, दान तथा समाज में जो परिवर्तन हुए है, उनके अत्यन्त निकट रहते हुए उन्हें भली-भांति ममझकर अपनी प्रतिमा के बल पर उनकी व्याख्या करते हैं। दूसरो कोटि के कवि उपर्युक्त परिवर्तन मे सतुष्ट न होकर भविष्य में मुन्दर परिवर्तन की कामना करने वाले हैं और तीसरे वर्ग के कवि वे हैं जो वर्तमान में माम लेते हुए भी वैचारिक क्षेत्र में अनेक पीड़ियों पीछे है । तीसरे वर्ग के कवियो का चित्रण यहां अनावश्यक है। युवा पीढ़ी के जिन विचारशील कवियों ने निजाम की तानाशाही पर व्यग्य कमा, भत्सना की, निन्दा की, फलतः कारागार में जाना पड़ा, उनमें दाशरथी एक है। दाशरथी ने निजाम नवाब को वृद्ध जम्बूक बताया था। दाशरथी प्रारम्भ मे मावर्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुए थे, कालांतर में राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक बन गये। सोमसुन्दर ने रजाकारो के विरुद्ध अपना स्वर बुलन्द किया । "गुलामी का हमला" नामक कविता इसका प्रवत उदाहरण है । सोमसुन्दर को कारागार में नहीं जाना पडा । पर उनका काव्य "वधायुध" जब्त हुआ। ये प्रगतिशील विचारधारा के प्रमुख कवियों में से है। १६५३ में गोदावरी नदी में जो भयंकर बाढ आयी, उसकी विभीपिका का चित्रण उनकी "गोदावरी जल-प्रलयम्' कविता में दर्शनीय है। कवि गोदावरी से प्रश्न करते है ।"माते, सद्य. प्रसव देने वाली शेरनी हा तुम । अपनी ही संतान को निगल डालती हो, यह कैसा न्याय है ? तालवृत्त बनकर बहने वाली तुम्हारी तरंगें आज तोलवृक्ष के बरावर उमड़ पड़ी।" प्रगतिशील तत्वो के साथ परम्परावादी कविता की धारा भी अतवाहिनी के रूप में धीमी चाल से वह रही है । ऐसे भी कवि हुए जिन्होंने देश, काल एव स्थिति के ऊपर उठकर कलात्मक तत्वो को प्रश्रय दिया । कतिपय कविनों ने सामयिक विचारधारा का पोषण करना अधिक समीचीन समझा । बुद्ध की २५००वी जयन्ती से प्रभावित होकर अनेक कवियो ने गाति, अहिंसा तथा सत्य की पुन. प्रतिष्ठा पर जोर दिया । इसकी पृष्टि में प्रकाश में आये काच्य "बोधिसत्व", "नागार्जुन सागर" इत्यादि । तिलक जैसे भावप्रवण कवियों ने अपनी कविता द्वारा मानवतावाद को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है । वे कहते हैं, "जीवन-मृत्यु के बीच जीवन में चारो तरफ संदेह-जमा अंधकार व्याप्त है । उसके भीतर चंदन जैसी सुगंधित मानवता ही हमारा - स्वातंत्र्यात्तर तेलुगु साहित्य एकमाय अलंकार है ।" आगे कहा है-~-"कविता हृदय के अंतर को ज्योतिपूर्ण सीमाओं को प्रकट करे और चेतना की परिधि का विस्तार हो, चाहे अग्नि की वर्षा हो या अमृत की, उसका परम लक्ष्य सौन्दर्य और आनंद ही है।" १६६२ मे चीन ने भारत पर हमला किया; फलत. भारत के प्रगतिशील तत्वो को बड़ा धक्का लगा। इससे यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि माम्यवादी सिद्धान्तो के अनुयायी राष्ट्रो का ध्येय, अन्तर्राष्ट्रीय मातृत्व की अपेक्षा राष्ट्रीय- प्रयोजनो का संरक्षण प्रधान है । अतः प्रगतिवादियो में से अनेक राष्ट्रीय प्रयोजनो पर अपना ध्यान केन्द्रित किया और कविता में भी देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता ने पुनः अपना स्थान बनाया । लेकिन इसी कारण प्रगतिशील शक्तियो के बीच संघर्ष भी हुआ। एक वर्ग का कहना था कि प्रगतिशील आन्दोलन का मूलभूत तत्व देशीय नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय है । दूसरे वर्ग का विश्वास था कि अन्य देशो की ओर दृष्टिपात करने वाली दृष्टि त्याग कर अपने देश के कल्याण के हेतु काव्यसर्जन उचित है । मार्क्सवादी साहित्यकारो के वर्ग ने स्पष्ट किया कि श्रमिक जीवन मे देश-विदेश का कोई अतर नहीं होता। उम श्रम को लूटने वाले वर्गों की प्रकृति एवं प्रवृत्ति के अनुरूप धर्म, दर्शन, संस्कृति एवं साहित्य का निर्माण होता है। श्रमजीवियो का दर्शन ही मार्क्सवाद है । उसके मूलभूत सिद्धान्त किसी भी समाज में विजातीय नहीं हो सकते । इस सक्राति काल में चीन के प्रति अपना असतोप प्रकट करते हुए जो काव्य प्रकाश में आये, उनमें श्री गज्जल मल्ला रेड्डी द्वारा विरचित "वृश्चिक संतान" गणनीय है। १६७० मे प्रमुख प्रगतिशील कवि "श्रीश्री" की पष्टि पूर्ति विशाखपट्टणम् मे मनायी गयी थी। उस वक्त कतिपय उग्रवादी कवियों ने चीन की सास्कृतिक क्राति, माओ का नेतृत्व, सशस्त्र क्राति, श्री काकुलम का नक्सलपथी आन्दोलन आदि का समर्थन करते हुये "विप्लव रचयितल सघम्" (क्रान्तिकारी लेखक-संघ) की स्थापना की जो "विरसं" नाम से प्रख्यात है । चीन के प्रति आक्रोश व क्रोध प्रकट करते हुए जो प्रगतिशील कवि अपने आराय स्पष्ट करते हुये उस दल से बाहर आ गये, वे अभ्युदय वावि ही रह गये। "विरसं" की ओर से "झंझा", "ले" (उठो), "रा" (आ), "तिरगबडु" (विद्रोह कर) इत्यादि रचनाएँ आयी । कतिपय पाठको तथा युवको को इन कृतियों ने उतेजिन किया, पर विरमं के लक्ष्यों में "कमिटमेट" अत्यन्त प्रधान है। श्री काकुलम् के गोरिल्ला युद्धो ने विरसं कवियों का उत्साहवर्द्धन किया, जमा कि १६४८ मे तेलंगाना के सशस्त्र आन्दोलन ने अभ्युदय (प्रगतिशील) तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं कवियो को प्रेरित किया था। फलत जैसे अभ्युदय कवियों की कृतियो पर प्रतिबन्ध लगाया गया था, वैसे ही विरमं के कवियों के कविता-संकलनों को आन्ध्र सरकार ने न केवल विद्रोहकारी घोपित कर उन पर प्रतिबन्ध लगाया अपितु एक दर्जन के करीव लेखकों एवं कवियों को भी कारागार में बन्द किया । आन्ध्र के उच्च न्यायालय ने सरकारी नीति को अवैधानिक घोषित कर न केवल उन सकलनों पर से प्रतिवन्ध हटाया, बल्कि कवियो को भी मुक्त किया। किन्तु आपातकालीन स्थिति में पुन. कुछ कवियों को कारागार में भेज दिया गया और अदालत में उन पर एक मुकदमा दायर किया गया। परिणामम्वरूप गर्वश्री के० जी० सत्य मूर्ति, के. सीतारामय्या, के. वी. समणा रेड्डी, टी० मधुसूदन राव, चेरवंड राजू, एम० टी० सां, रगनाथम् और बरवर राव को कारागार की मजा भोगनी पड़ी। प्रतिवाद के साथ तेलुगु काव्य-जगत् मे प्रयोगवाद अंतर्वाही बनकर प्रवाहित होता रहा । स्वतन्त्रता-प्राप्ति के दस वर्ष पूर्व ही कवि श्री पट्टाभि ने प्रयोगवादी कविता का शुभारम्भ किया था । उन्होने अपने "फिडेल रागल डजन" में अच्छे प्रयोग किये । मात्र छन्द का बहिष्कार करते हुए उन्होंने ना ई वचन पपलने दुड्ड् कर्रलतो पाधाल नडुमुल विरगदंतानु अर्थात, "मैं अपनी गद्य कविता रूपी इन लाठियो से कविता की कमर तोड़ दूंगा।" ? दूसरी जगह कहते है---"कासवर्ड्स पजल्स जैमी तुम्हारी आँखो को हल करने का भाग्य किमका होगा? हे वेश्ये, तुम समाज के लिए एक रद्दी की टोकरी हो ।" प्रयोगवादियों में मुख्यत तात्विक दृष्टिकोण, व्यष्टिवाद तथा आत्मा- मलोकन के तत्व उभर आये है । भाषा-शैली तथा काव्य-वस्तु में भी एक सुनिश्चित लक्ष्य दृष्टिगोचर होता है । इस परम्परा मे सासकर कुन्दुर्ति, आरुद्र तथा तिलक के नाम अवश्य ही उल्लेखनीय है । तीनों ने गुमाश्ते के जीवन की विशद व्याख्या की, उसकी व्यथा की गाथा गायी है । कुन्दुति ने यहाँ तक बताया कि-"गुमाने का जीवन न मिटा सकने वाला जीवन ही मेरा गीत है।" "जाति तथा अनीति के बीच होने वाला संघर्ष ही मेरा गीत है।" मध्यवित्त परिवार का चित्रण करने में ये तीनो पर्याप्त मफल हुए है। गुमाश्ते के जीवन का कलात्मक चित्रण इनकी कविताओं में पाया जाता है। श्री आरुद्र कृत "एन० जी० ओ० सन" (N. G. O. Sun) इसका उत्तम

स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य
उदाहरण है। श्रीश्री ने भी प्रयोगवादी सुन्दर कोटेदार अब
!
"शिशु को न प्राप्त होने वाले लन्य मा.
बहता है गोदावरी जव।"
"फटे कलेजे की भाँनि मेनों में दगा
गई।"
"हमारे उद्योग योजनाओं में बंद है।"
"हमारी प्रतिभा भवा के निद्रा
+
+
"अर्द्ध नग्न स्थिति में शाम
कर......."
"अधभरे पेट, उदा
इस प्रकार मार,
सकोगे ?"
कुछ ऐसे कवि भी है दिर irt ..
विचारधारा के थे । निरrekararew
किया है-

२६ रोनुगु वाङ्मय : विविध विधाएं में लक्ष्मी, मी० बी० कृष्णा गय, ये० नरगिहा गेटी, जगन्नाथ राव, मिरियाल रामकृष्ण इत्यादि के नाम अवश्य ने चाहिये । दिगम्बर कविता का जन्म वस्तुत: १६६७-६८ मे हुआ है। दिगम्बर कवियों ने गामाजिक अत्याचारों के प्रति अपना आक्रोश प्रक्ट कग्ने हुये अनेक रचना की। इस आशय के तीन काव्य-संग्रह भी प्रकाश आये और पाठको का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। निसिलेश्वर, महा- स्वप्न, चेरवण्ड राजु इत्यादि दिगम्बर कवियों ने मष्टिगत दायित्व को ग्रहण कर अत्यन्त आत्मविण्यास के साथ वर्तमान समाज की धज्जियां उड़ायी और उसे जलाकर भस्म कर देने का आवाहन किया । उनको कविता के तांडव एव विकट अट्टहाम नै पाठको में जहाँ प्रारम्भ में हलचल मचा दी वही वाद मे उनके जुगुप्सापूर्ण शब्दो के प्रयोग ने विरक्ति एवं घृणा पैदा की । प्रायः सभी दिगम्बर कवि अत्यन्त प्रतिभाशाली हैं, इसमे जरा भी सन्देह नहीं । पाठको मे प्रारम्भ मे आवेश एवं उद्रेक जागृत करने में ये कवि सफल हुए। इन कवियो ने पाठक वर्ग को यह आश्वासन दिया -"हम मानव द्वारा ओढ़े गये नकाब को फाड देगे। श्मशान के सिर पर फूलों के पौधे उगायेंगे । निरन्तर शोपित एव पीडित विश्व में अपनी कविता के द्वारा एक नया मोड़ ला देगे । अपने नेत्र की ज्वालाओ के द्वारा जगत् के लुच्चे-लफंगो को भस्म कर देंगे।" महास्वप्न नामक कवि का कहना है-"आप लोगो की रक्षा करने वाले इस अंधकारपूर्ण शिला-दुर्ग को तोड दूंगा । इस सभ्यता का मान भग करूंगा। (सतीत्व लूटूंगा), प्रत्येक बाँवी को तोड, विप-भुजंगो को पकड उनके दाढ निकालूंगा । इस भयकर अरण्य मे दावानल पैदा करूँगा । इस सभ्यता के रावण का लंका-दहन करूंगा।" इस प्रकार समाज के मानव की दुर्वलता पर खीझकर उसे राक्षस मानना समीचीन नही लगता। पर दिगम्बर कवियो ने जो नये उपमान दिये, जिस शैली में अपनी अभिव्यक्ति दी, उसके कारण वे शीघ्र ही प्रकाश में आये और उनका अधिक प्रचार भी हुआ । इस आक्रोश के पीछे उनका आशय यह है---"व्यक्ति के भीतर समूल परिवर्तन होना चाहिये । यह इसलिये सम्भव नही है कि आज के समाज में प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार अपने ऊपर नकाब धारण किये हुए है जिससे वह वास्तव मे पूर्ण रूप से सांस नहीं ले पाता, अत उस नकाब को हटाकर उसे एक सच्चे मानव के रूप में प्रकट होना है।" इसी ओर संकेत करते हुए वे कहते है-"तुम्हारी अस्थियो के भीतर समाये हुए सत्य को कीचड से मत ढंको । मानव बनो---- लाल गुलाब की भॉति "अंगारे जैसे, यौवन की भाँति-मदहास जैसे । वास्तव में गगन के बीच मार्तण्ड-में-आधा क्षण जियो।" इस प्रकार वे स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य मानव को पूर्ण व्यक्तित्व के साथ उभर आने का आवाहन देते है, उनकी दुर्वलता पर आक्रोश एवं क्षोभ प्रकट करते है उसकी निन्दा करते है, उसे मालियाँ देते हैं ताकि वह चौककर, मँभलकर या चेत कर अपने नकाब को उतार फेंके । यही व्यथा उनकी कविता का लक्ष्य है। इस प्रकार कतिपय त्रुटियो के बावजूद भी दिगम्बर कवि निस्सन्देह रूप से प्रतिभाशाली कवि है । कविता को दिगम्बर कविगो ने जो नये उपमान, अलंकार, प्रतीक, रस, ध्वनि, व्यग्योक्ति एव विलक्षणता प्रदान की, वह प्रशंसनीय है । इनकी कविता की एक वानगी देखिये- काल-काता के संग वीसवी शती की सौर-शय्या पर सश्लिष्ट समस्याओ का सौरभ घ्राण करते हुए पल-पल संघर्ष के साथ रमण करते शुक्र तर समस्त ग्रहों के संकेतो को सुना दूंगा प्रलयों की तहों के नीचे निश्शब्द को रूप दूंगा। मानाजिक बया तया वैयक्तिक व्यथा से प्रेरित होकर उत्तम रचना करने वालो की सख्या आज पचास से कम नहीं है। उन सबका संक्षेप में ही सही, परिचय देना या एकाध उद्धरण देना भी इस छोटे से निबन्ध में सम्भव नहीं है। इनके अलावा स्वतन्त्र रूप से काव्य-रचना करने वाले प्रतिभाशाली कवियों की मस्या सैकड़ो है। आरुद्रा में अपनी कविता के माध्यम से प्रतीकवाद को जन्म दिया । इनके प्रतीक बडे ही भाववोधक है। एक उदाहरण, "जीवितं" रेडियो सेटुकी, “भर्त एरियल भार्य अर्थ" अर्थात् जीवनरूपी रेडियो-सेट के लिए अगर पति एरियल है तो पत्नी अयं । उन्होंने तेलुगु कविता में अनेक मफल प्रयोग किये । उनकी फुटकल कविताओ में ही नहीं, “सिनीवाली" नामक काव्य-संग्रह मे भी ये प्रयोग पढ़ते ही यनते है । इस दिशा में तिलक, कुन्दुर्ति, दाशरथी, शियला आदि उल्लेखनीय है । इसी प्रकार कुन्दुति द्वारा विरचित "मुगे युगे" प्रयोगवाद मे गय कविता का उत्तम उदाहरण कहा जा भकता है। प्रगतिनील कविता के माथ ही नेलुगु में लोक-मापा के प्रयोग का मार्ग पुल गया था । किन्नु गत दो दनाब्दियों में ही इस भाषा को माधारण मानव फे जीवन, मुख-दु.स, उनकी समस्याएँ आदि को संजित करने का येय प्राप्त तेलुगु वाडमय : विविध विधाएं - हुआ है । मच तो, प्रयोगवादियों ने ही गद्य कविता को न केवल जन्म दिया अपितु उसे उच्च शिखर पर पहुँचा दिया । तिनक, कुन्दुति, आरुद्ध आदि ने इम विधा में प्राण फुके, बिंब कल्पना में अजन्ता कवि तया वैरागी ने कलम तोड कर रख दी। उनकी कविता में कोमल शब्दावली भावना की दृष्टि में अन्तर्मुसी बनकर मानय की वेदना को मूर्त रूप देती है । आदिराजु रंगाराव ने मुक्तक नामक एक नयी प्रक्रिया को जन्म दिया । गोपात चक्रवर्ती की कविता चमत्कारप्रधान है और शब्दो मे श्लेप को ध्वनित करते हुए एक नूतन जीवन तत्व की व्याख्या करती है। यह प्रक्रिया इतनी लोकप्रिय और प्रभावशाली बनी कि उस समय तक पद्य तथा गीतों की रचना करने वाले कपि भी गद्य कविता के आश्रय में आने लगे । गद्य कविता की वस्तु विविध रूपो मे हमारे मामने आयी है । प्रतिभा- शाली कवियों ने सूक्ष्म-दशिनी प्रतिभा द्वारा ज्वलन्त ममस्याओं के व्यापक रूप की गहराइयों को दर्शन का प्रयत्न किया है, कुछ लोगों ने किसी अदृश्य देवता या चन्दा मामा से अपनी समस्याओ का निवेदन किया है। कुछ लोगो ने स्वप्न रूप में उनका चित्र भी खीचा है। कतिपय कवियों ने उन्हे व्यंग एवं आक्षेप के रूप में प्रस्तुत किया है तो कुछ प्रबोधात्मक शैली में व्यक्त किया है, और कुछ ने आशानिराशा के स्वगत स्वर मे । भारतवर्ष गत तीस वर्षों से अनेक प्रमुख समस्याओं का सामना करता आ रहा है । अपर्याप्त खाद्यान्न, प्रकृति के प्रकोप से उत्पन्न अकाल, भूकम्प, परिवार नियत्रण, अभी हाल में आये आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु में तूफान तथा समुद्र के द्वारा की हुई ध्वंस लीला आदि । कोई कहता है--'सर्वत्र क्षुधा गीत, आज की वायु में सौरभ नही है ।" कोई व्यथा का हृदय लेकर आक्रन्दन कर उठता है--"अपना भार आप ही न ढो सकने वाली भूस।" एक और विद्यालय मे अशान्ति है, हडताले हो रही हैं तो दूसरी ओर मजदूरो की हड़ताले । आज जो हड्ताले हो रही है, इनका नेपथ्य क्या है, ये समस्याएँ भी कवियो को विकल कर रही है । इसी समय कविता के क्षेत्र में एक नया आयाम स्थापित हुआ। वह है शक्तिशाली इतिवृत्ति वाली आधुनिक काव्य-रचना । डॉ० सी० नारायण रेड्डी ने ऐतिहासिफ इतिवृत्ति को ग्रहण कर "नागार्जुन मागरम्", "कपूर वसन्त रापलु", "विश्वनाथ नायकुडु" जैसे मुन्दर काव्य-ग्रन्पो का निर्माण किया है। नारायण रेड्डी की कविता में प्रगतिनील तत्यो का अभाव नहीं है । वे विशुद्ध मानवतावादी हैं। गीतों की रचना में श्री रेड्डी मिद्धहस्त है । उन्होंने प्राय उन सभी ममस्याओं को अपनी कविता का लक्ष्य बनाया जिसने कवि के हृदय की उलित किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् मर्वश्री कोडटिगटि कुटुम्वराव, गोपीचन्द, स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य २६ नोरी, नरसिंह शास्त्री, चलम, विश्वनाथ सत्यनारायण इत्यादि ने अनेक उपन्यास लिखे जो सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, मनोवैज्ञानिक तथा अन्य विविध क्षेत्रो के है । राष्ट्रीय आन्दोलन तथा गाधीवाद से भी प्रभावित दो-चार उपन्यास उल्लेखनीय है। श्री कोडवटिगंटि कुटुम्बराव ने स्वतन्त्रता के पूर्व ही “चदुवु" (शिक्षा) नामक उपन्यास लिखा था, जिसने बाद की पीढी को भी अत्यन्त प्रभावित किया। श्री कुटुम्बराव सामाजिक सिद्धान्तों के प्रति स्पष्ट विचार रखने वाले लेखक है । राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था के माय सामाजिक सम्बन्धो मे जो एक अन्योन्य सम्बन्ध है, उम विषय में वे अपनी एक स्वस्थ एवं स्पष्ट विचारधारा रखते है । उनका विश्वास है कि आर्थिक मूल्यो के आधार पर सामाजिक मूल्य आधारित होते है । मध्य वित्त परिवार के कृत्रिम मूल्य, आत्म वंचना, भय एवं संदेहों के साथ निम्न वर्ग की व्यवस्थाओ एवं शोषण के गजीव चित्र, विश्व संग्राम की विभीपिकाएँ, बेकारी, रुपये के अवमूल्यन द्वारा उत्पन्न विषम समस्याएँ आदि आपकी रचनाओं के इतिवृत है । स्वातंत्र्योत्तर उपन्यास साहित्य में क्रान्तिकारी तत्वों को प्रश्रय देने वालों मे राचकोड विश्वनाथ शास्त्री अग्रगण्य है । उनके उपन्यामो में "अल्पजीवी", "राजू-महिषी", "गावुलोस्तुन्नायि", "जागृत" इत्यादि विशेष रूप से उल्लेखनीय है । "अल्पजीवी" मे वाह्य संघर्ष के साथ आन्तरिक संघर्ष पढते ही बनता है। इस उपन्यास का कथानायक सुब्बय्या स्वभा से भीरु और कायर है । वह चुपचाप अपमान और शोपण को महता जाता है । वह किसी को धोखा नहीं देता, न घूम लेता है। गवरय्या जैसे ठेकेदार द्वारा वह कमे शोपित होता है, उसका लम्बा इतिहास अंकित है । गवरय्या समाज के साथ प्रतिकार की भावना से प्रेरित हो उसे धोसा देकर, लूट कर अपना स्वार्थ मिद्ध करना चाहता है । शास्त्री का दूसरा उपन्यास "राजू-महिनी" के संबंध में श्रीश्री ने अपने पिचार यो व्यक्त किये है-~-"तेलुगु मे जैसे पूर्ण सतोप प्रदान करने वाली कविता व कहानियाँ आयी, वैसा उपन्यास आज तक नहीं आया । इस बात की मेरी शिकायत थी, पर मेरा विश्वास है कि यह उपन्यास एक समग्न रूप को प्राप्त कर सका है।" उन्होने यहाँ तक कहा है कि "यह उपन्यास बीसवी शती का क्लासिक माना जाएगा। इसमे ऐसी कोई बात नहीं रह गयी जिसका चित्रण न हुआ हो।" श्री महीधर राममोहन राव राजनैतिक सिद्धान्तों का स्पष्ट अवगाहन करते है । उन्होंने "ओनमालु", "रथ चक्रालु" और "दावानलम" नामक तीन उपन्यास लिखे, जिनका इतिवृत्त तलगाना में जमीन्दारो के विरुद्ध आन्दोलन का मजीव चित्र है। इसमे कृपक, मजदूर की दयनीय दशा के माथ तेनुगु वाङ्मय : विविध विधाएं - जगको ग स्थिति में मुक्त करने का मारथ्य करने गाला त्यागपूर्ण जीवन प्रस्तुत किया गया है । इगी निवृत्त को आधार बनाकर थी पटिटकोट आल. वार स्वामी ने "प्रजल मनिषि" (जनता का मानय) तगा धी दाशरथी रंगा- चार्य ने "चिल्लर देवुल्नु" (फुटकर देयता या छोटे देवता) प्रस्तुत किये हैं । इनमे जमीदार और जमीदारी के अत्याचार नया जनता का गोपण विविध दृष्टिकोणों में प्रस्तुन हुआ है। तेलुगु उपन्याम साहित्य में अत्यन्त ही उलनेग्यनीय कृति "चंघिम मो" है । तेलुगु के ऐतिहासिक उपन्यासों में इसकी ममता कर सकने वाला दूसरा उपन्याग नही है। मंगोल इतिहाग का अनेक वर्षों तक अध्ययन और शोध कार्य करके श्री तेन्नेटि मूरी ने यह उपन्याग प्रस्तुत किया है । भापा, भावना, शक्ति, शिल्प, गोबी मरुभूमि का चित्रण, चीन का गमग्र रूप इस कृति में प्रतिबिंबित है । यदि यह उपन्यास अग्रेजी में स्पांतरित हुआ होता तो इस नोबेल पुरस्कार प्राप्त होता । इतिहासकारो ने चंघिम खां को अत्यन्त कर मानव रूपधारी राक्षग घोपित किया है, मगर सूरी के उपन्यास में वह ममस्त मंगोल जातियो का सगठन करने वाला गहान वीर है। चंघिस खाँ अन्याय, अत्याचार, शोपण का अन्त करने के लिए प्रादुर्भूत एक मानवतावादी के रूप मे इस उपन्याम में प्रस्तुत है । इस उपन्याम की गमाप्ति में लेखक कहता है-~-"संघर्ष से अग्नि प्रज्ज्वलित होती है। चंघिस खाँ भयंकर प्रजा शोषण से अवतरित एक ज्वाला-रेखा है । जो विध्वस की रेखा के उद्भव का विरोध करते है, उन्हें इस प्रश्न का ममाधान देना होगा कि मानव-समाज मैं अमहनीय प्रजा शोषण क्यों होना चाहिए।" एक सन्दर्भ में चंधिम खां अपने किये कार्यो की कैफियत देता है---"उस दीन-हीन अवस्था में गोवी माभूमि की जनता को देखने पर मेरा हृदय फटा जाता है, आप लोग इमकी कल्पना तक नही कर सकते । समस्त गोवी जातियो को एक सूत्र में बांधकर उन्हे एक शक्तिशाली जाति के रूप में परिणत किये बिना इन्हे मुक्ति नहीं है । इस मत्य का अन्वेषण मैने अपने काल मे ही किया है। इसी एक मात्र लक्ष्य की पूर्ति के लिए मैं दिन-रात कार्यरत हूँ। इस कार्य को सम्पन्न करने में मैंने अनेक अकृत्य किये । अनेक जातियो को समूल नष्ट किया है।" आधुनिक मानव समाज, पारिवारिक समस्याएं, मानव का भीतरी व्यक्तित्व तथा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को आधार बनाकर असंख्य उपन्याम रचे गये। इस क्षेत्र में वलिवाड कांताराव, भास्करभट्टल, कृष्णा राव, मिंगराजु लिगमूर्ति, आर० एम० मुदर्शनम्, रंघि सोमयाजुलु, इच्छापुरम् जगन्नाथ राय, पाराज, धनिकोडा, कोम्मूरि वेणुगोपाल राव, पुराणम् सुब्रह्मण्य शर्मा, मूर्य स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य का " प्रकाश राव, वीराजी, शारदा, पीलाप्रगड राघव, मंजुश्री, पोरंकि दक्षिणामूर्ति इत्यादि के नाम गणनीय हैं। गत दशाब्दी के उल्लेखनीय उपन्यामो मे एन आर "नैमिषारण्य", श्री विनुकोड नागराजु कृत "ऊविलो दुन्न (दलदल भी नवीन कृत "अपशय्या" विशेष चर्चित है। "नैमिषारण्य" मे अग्र वर्णों के द्वारा हरिजनो के प्रति किये जाने वाले अत्याचार, मध्य वित्त परिवारों की आर्थिक समस्याएँ, नौकरी पेशा नारियों की कठिनाइयां आदि रोचक ढंग से वर्णित है । नागराजु कृत "ऊबिलो दुन्न" तथा नवीन रचित 'अंपशय्या" प्रयोगात्मक उपन्याम है । आज की मामाजिक एवं राजनैतिक ममस्याओं को सांकेतिक रूप में उठाकर नागराजु ने जहाँ मोचने के लिये पाठकों को बाध्य किया, वहाँ "अंपशय्या" में नवीन ने विद्यार्थियो की समस्याओं, छात्रावास तथा विश्वविद्यालयों का जीवन तथा युवा पीढी को उद्वेगपूर्ण प्रवृनियो का भी मजीव चित्रांकन किया है। तेलुगु में आज मशक्त उपन्याम लिखने वालो की संख्या में महिला लेखिकाओ की संख्या भी कम नही है। विशेषरूप से चर्चित महिला नेखिकाओं में वीना देवी, मीता देवी, मुप्पाल रंगनायकम्मा, के० रामलक्ष्मी, लता, इल्लिंदल मरस्वती देवी, मालती चन्दूर, यद्यनपूडि, सुलोचना रानी, कोडूरि, कौशल्या देवी, परिमला मोमेश्वर, सी० आनद रामम्, तुरगा जानकी राणी, काविलिपाटि विजयलक्ष्मी, कलिपाक रमामणि, वेदुल शकुन्तला, उन्नव विजयतक्ष्मी, मादिरेड्डी सुलोचना, डि० कामेश्वरी विगालाक्षी, कोमला देवी, छाया देवी, पी० रामलक्ष्मी वगैरह ने बीसों उसन्यान लिने और इन लेखिकाओ ने पाठक वर्ग की परिधि को अत्या व्यापक बनाया । उक्त लेपिकाओं की कृतियाँ भारी मात्रा में विक्री हो रही है । साथ ही पत्र-पत्रिकामो में इनके उपन्याम वरावर धारावाही छप रहे है। इनकी कृतियो पर अनेक फिल्मे भी बनी है। अधिकांश लेखिकाओ ने पारिवारिक जीवन का चित्र प्रस्तुत किया है । नारी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण इन उपन्यामों की विशेषता कही जा सकती है। किन्तु भाव, भाषा, गिला व तया ममाज में जागृति पैदा करने की दृष्टि से मुप्पाल रंगनायकम्मा कृत "वलि पीठम्", वीना देवी द्वारा रचित "हेग की कि" तथा "पुग्मभूमि आँखें खोनों", मीना देवी कृत "मना महिमनिषि" विशेष रूप से पठनीय हैं। तेलुगु का कहानी साहित्य इतना समृद्ध है कि विश्व की किनी भी भाषा की रचनाओं में ममता कर माता है। विश्वमहानी-प्रतियोगिता में तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाए श्री पपराजु कृत तेलुगु कहानी "गानि वान" (तुफान) ने द्वितीय पुरस्कार प्राम किया था । गुणाढ्य ने इमो प्रदेश में वृहत्कथा लिखी थी । वस्तुतः तेलुगु में कहानी साहित्य का प्रादुर्भाव सामाजिक सुधार को लेकर हुआ था। स्वतन्त्रता के पूर्व भी उच्चकोटि के २०-२५ ऐमे कथाकार हुये, जिन्होंने तेलुगु कहानी को न केवरा समृद्ध किया अपितु प्रतिष्ठा भी दिलायी। स्वतन्त्र्योत्तर काल कम से कम सौ उत्तम कथाकार हुए हैं। उन सब का उल्लेख करना सम्भव नहीं है। स्वतन्त्रता के पूर्व से कहानी लेखन मे अपना अमिट स्थान बनाकर वरावर कहानी के विकाम में योगदान देने वालो मे मबंधी कोडवटिंगटि कुटुंबराव का नाम उल्लेखनीय है । अन्य उल्लेखनीय कथाकारो मे चेलम, बुधि वाव, गोपी चन्द, बट्टिकोट. आलवार स्वामी, मुनि गाणिक्यम्, करुण कुमार इत्यादि है । स्वातन्त्र्योत्तर कथाकारो में सर्वश्री राचकोड विश्वनाथ शास्त्री, चार्गेटि मोमयाजुलु, कालीपट्टन रामाराव, पुराणम् गुब्रह्मण्य शर्मा, मी० एस० राय, मीता देवी, कोन्यूरो, मुप्पाल रगनायकम्गा वीराजी, मारुती राव, बनिवाडा, काताराव नवीन, बीना देवी आदि ने उत्कृष्ट कहानियां रची है। नेतुगु की श्रेष्ठ कहानियों में नीली, उसम्मडि व्रतुकुन्नु, पेवमेट, ए मैटर ऑफ नो इम्पोर्टेन्स, केलु पिल्लं चायु, यज्ञ आदि गिनी जाती है । युवा पीढी के लेखक बडी सुन्दर रचनाएँ कर रहे है । मामाजिक, भावात्मक, ऐतिहामिक, व्यंग्य प्रधान आदि कहानियां विपुल संख्या में लिखी जा रही हैं । आज की तेलुगु कहानी गे केवल पीडित-शोपित मानव का ही चित्रण नही अपितु समाज का यथार्थ चित्रण, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी इन कहानियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । आचलिक कहानियां भी जनता की पोती और क्षेत्रीय बोली मे लिखी गई है। नाटक के क्षेत्र में तेलुगु का विकाम अभूतपूर्व है । तेलुगु रंगमय का उद्भव एक शताब्द्रि पूर्व हुआ था। तब से आज तक हजारो नाटक रचे गये और मंच पर अभिनीत हुए है । स्वतन्त्रता के पूर्व अधिकाश नाटक पौराणिक, ऐतिहासिक रहे । मामाजिक नाटको की संख्या भी कम न थी, किन्तु १६४७ के बाद गमस्याप्रधान नाटक, कृपक, मजदूर एव जमीदारों के अत्याचारो को आधार बनाकर भी रचे गये । तेलुगु नाटक को एक कला मानकर उच्च शिक्षाप्राम परिवारों ने उसके विकाम में योगदान दिया। स्वयं स्वर्गीय महाकवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर नेलुगु नाटक देखने विजयवाडा गये थे । आज के नाटककारो में राचकोड, विश्वनाथ शास्त्री, गोल्लपूडि, मारुति राव, आत्रेय, गरम गजु, भमिडियाटि, कोडालि गोपाल राय, वोम्मिडिल्लि, गुर्ग रार, गिट्टि, श्री राममूनि अनिगेट्टी, गुब्बाराय, पानगुम्मि स्वातंत्र्योत्तर तेलुगु साहित्य पद्मराजु, सोमंचि यज्ञन्न शास्त्री आदि रेडियो रूपकों की रचना में सर्वश्री देवुलपल्लि कृष्ण शास्त्री, डॉ० सी० नारायण रेड्डी, आरुद्र, बोम्मिरेड्डीपल्लि सूर्याराव, पिनिशेट्टि आदि के नाम लिये जा सकते है । तेलुगु साहित्य की अन्य विधाओ का भी आज बडी तेजी के साथ विकास होता जा रहा है । बाल-साहित्य, समीक्षा, गद्य-साहित्य, एकाकी, जीवनियाँ इत्यादि भी प्रतिभाशाली लेखको द्वारा पूर्वाधिक विकास को प्राप्त हो रहे है । कुल मिलाकर हम यही कह मकते हैं कि तेलुगु माहित्य भारत के अन्य साहित्यों की तुलना में किसी भी दशा में कम नहीं ।

३ दिगंवर कविता आधुनिक तेलुगु कविता की नवीनतम प्रवृत्ति "दिगम्बर कविता" कह- लाती है। इस कविता के प्रणेता छ. प्रमुख कवि जो क्रमश नग्न मुनि, निसि- नेश्वर, ज्वालामुखी, चेरवडराजु, भैरवय्या और महास्वप्न हैं । इन लोगो ने अपने नाम में दिगम्बर मंवत् चलाया है, जिसके क्रमशः छः वर्ष है । प्रथम वर्ष नग्नमुनि के नाम मे ममाप्त हुआ और द्वितीय वर्ष निखिलेश्वर नाम में दिसम्बर १६६६ को प्रारम्भ हो चुका है। दिगम्बर कविता का प्रथम मंग्रह डेढ वर्ष पूर्व प्रकाशित हो चुका था और द्वितीय संग्रह "दिगम्बर कवि-संग्रह २" नाम से प्रकाशित हो चुका है और इस मंग्रह का प्रमोचन मन १६६६ दिसम्बर १८वी तारीख, रविवार, रात्रि के ठीक बारह बजे चिरंजीवी जंगाल चिट्ट (फिलहाल होटल क्लीनर है) के हाथों से हुआ। दिगम्बर कवि भाग-२ मे कुल तीम कविताएँ है । कवियों ने अपनी कविता के लिए "दिक" की सजा दी है। प्रारम्भ मैं अपने आशय का उद्घाटन करते हुये कवियों ने आठ पृष्ठो मे एक वक्तव्य भी दिया है। उसका शीर्षक "दिगम्बर संवत" से दिया। उप- शीर्षक ममकालीन जीवन के प्रति दिगम्बर कवियों का दप्टिकोण तथा "हम क्या चाहते है" नाम से प्रस्तुत किया है। बंगाल में "हंग्री जनरेशन", "भूखी पीढी" नाम से कविता का अत्या- धुनिक आन्दोलन चल पड़ा है, जिमके प्रवत्तंक वैस रस है, किन्तु प्रमुख दो ही हैं-नन्दीवन चट्टोपाध्याय तथा शक्ति चट्टोपाध्याय। ये लोग एक बुलेटिन भी प्रकाशित कर रहे हैं, जिसमें अपने आदर्शों की चर्चा भी करते है। उनकी दृष्टि में "इतिहास नामक कोई वस्तु है नहीं । इतिहास पर गर्व करने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है । ईश्वर केवल माम का पिण्ड है। मनुष्य के व्यक्तिव में आत्मा का संयोग करना ही शिल्प है।" " दिगंबर कविता व्यवस्था, भूखी पीढ़ी की कविता का उद्देश्य विद्रोह, क्रान्ति तथा परम्परागत सम्प्रदायों का ध्वंस ही है । इमी पीढी के कवि अपने हृदय में अशान्ति को स्थान बनाये समाज के प्रति अपना आक्रोश अभिव्यक्त करते हुए उसे परि- वर्तित करने की आकाक्षा रखते है । उनका कहना है, शरीर के साथ मन का, हदय के माय मेधा का कही माम्य नहीं बैठता। इम पीढी के करियो ने अपने आन्दोलन का एक प्रयत्न गतवर्ष कलकत्ते मे प्रदर्शित किया । मुंह पर विभिन्न रंगो के कागजो के विविध चित्रों को लट- काये मारे नगर में जुलूस निकाला । उन कागजो के चित्रों पर लिखा था- "अपने मुंह पर के पूंघट को हटा दीजिये"। इम पीढी के कवियो ने "ट्राफिक" को बन्द कर जनता की स्वतन्त्रता में स्वावट डाली थी. परिणामस्वरूप उन पर पुलिम ने मुकदमा चलाया था । इस प्रकार हम लोग देखते है कि भूखी पीढ़ी परम्परागत मामाजिक विचारधारा तथा सम्प्रदायों के विरुद्ध अपने विद्रोह का स्वर लिये ममाज के सम्मुख प्रस्तुत है। दिगम्बर कवि भी मामाजिक, धामिया, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं माहित्यिक क्षेत्रों में जो गन्दगी फैली हुई है उसका प्रक्षालन करने के हेतु अपना एक नवीन दृष्टिकोण लिये नई मान्यता स्थापित करने के विचार मे अपनी कविता यानी "दिक" प्रस्तुत करते हैं । जीवन के प्रति इन पकवियों का दृष्टिकोण इम प्रकार है -मानव भौतिक कामना अथवा वाछा महन है, स्वाभाविक है । इम कामना के माध अचेतन रुप में स्थित तीमरा विश्व भी सत्य है। इसी भाति मानसिक एकाकीपन भी यथार्य है। किन्तु यह एकाकीपन मात्र ही मानव का अस्तित्व नहीं है । चेतना ममन्वित हो आत्मगन्तुष्टि के माथ अप्रमर होने वाला जीवन ही वास्तव में मनुष्य का अस्तित्व है । मच्चे मानव की कमौटी इन कवियों ने निम्न प्रकार में स्थापित की है : कटिनाइयां मानवता की विषम परीक्षाएँ हैं। उस दशा मे भी तलवार की धार पर चलते जो मानवता को नही भूलता और जो अन्तर के संगीत मुनता है वही मना मानव है। मानव-जीवन का कोई अर्थ है और परमार्थ है। जीवन निरर्पक नहीं है। म शुन्य मे कही न कही अणु मात्रा में मही आशा की फिरण धुपी हु है. जीवन को प्रत्येक वस्तु तथा घटना के लिए-कता और नि. में तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं दोनो है । इसमे अपरिचित व्यक्ति अन्धविश्वाम में आकर किसी पर अपना दृढ विश्वास बना करके कर्म मिद्धान्त के भय में पत्थरो की पूजा करने वाला ही वास्तव मे नास्तिक है। हम ऐसे मानव को अपने बुलन्द स्वर में पुकारते है, जो किमी प्रकार के आच्छादन के समक्ष अपना मस्तक नहीं झुकाता तथा किसी प्रकार के भय से संत्रस्त नहीं होता; ऐसे मजीय मानव-ममुदाय का आह्वान करते है । दिगम्बर कवियों ने अपनी पुस्तक की भूमिका में अपनी कविता के आदर्शों का जो उल्लेख किया है उनमें समाज, राजनीति, धर्म, इतिहास इत्यादि के मम्बन्ध में भी अपने दृष्टिकोण स्पष्ट किये हैं। जीवन की व्याख्या करते हुए कवियों ने जो बाते स्पष्ट की है, वे बहुत ही उपयुक्त है। वे कहते है, मनुष्य का अस्तित्व भौतिक आनन्द के माय मन को सर्वदा सचेतन बनाकर मव में स्थान बना करके अपने आप में जीवित होना ही है । वे जीवन की तटस्थता का विरोध करते है और मुझाते है कि मनुष्य का जीवन एक द्वीप न बने, बल्कि महचरों में भी प्रेरणा-स्रोत बने । इस सन्दर्भ में वे आज के मानव को पथ-भ्रष्ट बताते है-समकालीन वैज्ञानिक युग में व्यक्ति स्वय अपने आप में संघर्ष कर रहा है। धन-सम्पत्ति के पीछे पागल हो सुस और लालच के पीछे कुत्ते की भौति घूम रहा है। अपनी छाया को देख भय-विह्वल हो अकेला रह गया है। मुख प्रदान करने वाले साधन अन्त में उसकी आत्मा को वोधने वाली बेडियों बन गयी है। आखिर वे कहते हैं---अभ्युदय के पथ में मानव इस धरातल पर छूट गया है । उसको भटकी हुई आत्मा को पकड सच्चा मानव बनाने की हमारी आकांक्षा है। आज के राजनीतिज्ञों की स्थिति का परिचय देते हुए कवि बताते है-- सडी, गली, जाति, धर्म, वर्ण तया वर्ग-व्यवस्था रूपी कीचड के गड्ढे में गिरकर कीड़ों की भांति राजनैतिक नेता तैर रहे हैं। धर्म, सम्प्रदाय तथा विभिन्न राजनीनिक बादी के सम्बन्ध में भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं--परिणाम दशा में मानव के कल्याण के हेतु उमे देवता बनाने के विचार मे भी जो धर्म और मिद्धान्त प्रचलित हुए हैं वे मब युग-परिवर्तन के साय अपने स्वरूप और स्वभावों को भी खो बैठे हैं। राजनीति के क्षेत्र में भी जो वैविध्य है उसके भंवर में पडकर मनुष्य को पिसने ये पसन्द नहीं करने; इमलिये वे कहते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक दिगंबर कविता क्षेत्र में मनुष्य को दाँव पर रखकर वाद रूपी पाँसो से छल-कपट का जुआ न खेलना चाहिये। समाज में आर्थिक समता लाने के लिये साम्यवाद का समर्थन करते हुए भी वैयक्तिक स्वेच्छा पर जोर देते है । इसी भांति विश्व-शान्ति के नाम पर निरन्तर जोरदार शब्दो मे भाषण देने वाले लोग अणु-अस्त्रों की परीक्षाओ के नाम पर विश्व के वायुमडल को दूषित करने वाले प्रमुख राष्ट्रो के नेता, चाहे वे किसी वाद विशेष के समर्थक हो, उनके उन कुकृतियो के प्रति दिगम्बर कवि घृणा प्रकट करते हैं । साहित्य के प्रति अपनी धारणा अभिव्यक्त करते हुए वे विशुद्ध मौलिकता का समर्थन करते हैं और साहित्य के नाम पर कई टन वजन वाला जो वाङ्मय उत्पन्न किया जा रहा है उसको जलाने के लिए आवश्यक रचनाओ का स्वागत करते हैं। माहित्य में वर्णित मिथ्या, दभ इत्यादि का त्याग करने की सलाह देते हुए आज की काव्य-रचना में जीवन की यथार्थता, सरलता, युग का सन्देश तथा अनुभूतियो की अभिव्यक्ति को सॉस के रूप मे सेवन करने वाले आधुनिक मानव के अस्तित्व का चित्रण दिगम्बर कवि चाहते है । दिगम्वर कवियों ने भावो को व्यक्त करने का जो विधान बनाया है वह प्रशसनीय है । शब्दों के माध्यम से भावो के उद्वेग को जिस रूप में अभिव्यक्त किया है वह अनोखा है, अपूर्व है । कही कही अमूर्त भावों को मूर्त वस्तु अथवा प्राणियो के साथ उपमा देकर कवि ने अमूर्त को मूर्त और मूर्त को अमूर्त रूप प्रदान किया है । ऐसे स्थलो पर कवियो के वाक्य हमे कहावतो तथा विरो स्मरण दिलाते है- जैसे तृष्णा गिरगिट की भांति लचकदार बनी बढी। तृप्ति-वन टुकड़े-टुकड़े हो गया । अहंकार फूटकर अरिपड्वर्गों का लावा छितराया। एकाकीपन दिन-प्रति-दिन ताप की भांति घनीभूत हो गया। जमाना गिरगिट की भौति तमाशा का रग पा गया। कवि ज्वालामुखी ने अपना आत्म-परिचय "पुनर्योनी-प्रवेशम्" नामका कविता में दिया है । वाहते है- शताब्दियों के विकाम की प्रगति पर अनादि ने बढ़ता हुआ अनन्त मानव हूँ मै ।

No text on this page.

दिगंबर कविताएं दिगम्बर कवियों ने अपने कविता-मराह भाग दो के प्रारम्भ में "दिक" नामक शीर्षक के अन्तर्गत यह स्पष्ट किया है--जैसे प्रथम सकलन मे हमने अपनी कविता-प्रबिया को गद्य कविता नहीं माना और दूसरो के कहते हुए भी हमने उमे रोकने का विश्वास प्रकट किया। उसी भांति द्वितीय संकलन से अपनी कविता को "दिक" का नामकरण किया है । इन "दिक" के उपयोग का महत्व भी बताया है-बीमारी की तहों को चीर कर कास्मिक मार्ग का निर्देशन करने वाली ये "दिक" इनकी मीमाएँ मानवता के मूल्य है। नमूनाथं दो-चार कविताओ को यहाँ प्रस्तुत कर रहे है- में अपने देश में एकाकी हूँ जब तब समक्ष खडे हो तलवार निकाल प्रश्न करते हैं "हाम्लेट"। देग ने मेरे लिए जो बचा रखा महान ममस्याओ का फदा प्रति नित्य वह सर पे ऐठता घूमता फलन कमती जाती भूख ी बेकारी की गाँठे उन गाँठो में गुन्दर मुखो के फल प्रफुल्लित पखुडियो के मध्य कटे डैनो से अमहाय दशा का विसाद विसाद की फमलो के बीच मूर्यमुखी सुमन की भांति लटकने वाला चन्द्रमा एक सफेद चमगीदड है। मेरी संस्कृति ने जब मुझे लात मारा हजारो वर्षों की प्रगति आँखों के समक्ष मेरे विचारों के हमलो से शिथिल हो इतिहास में कही स्थान न पा समुद्र तट सारा झाऊ से भरा नक्षत्र मब अल्यूमिनियम मिक्को की भांति चमकते जब मेरे घर की खिडकी में से दूसरे समुदर की हवा जोर से बह विश्वासो को ध्वंस करती एक-एक पृष्ठ के पलटने पर ३ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं मृष्टि-योनि मे फिसला विचित्र विकार रूप हूँ मैं अव भी अविकसित मानव हूँ मैं। पचभूत पयाधरो को निचोड-निचोड़कर प्रच प्राणो का पोषण कर वढ़ाया मैने । नाद-ब्रह्म में ब्रह्माड को झूला बना झूला हूँ मैं सतृप्ति रूपी इन्द्रधनुप मे अनुभूतियों की तन्मियों को झंकृत किया मैने आनन्द को आकृति दे जलाया मैंने । उम दिन मानवता के झरने झर-झर उठे अच्छाई के तीर सुशोभित हो उठे। पाप-पुण्य से अतीत जगत शाति-ज्योत्स्ना को पाला वर्ग-विहीन मानव स्वर्ग नदियो की सभ्यता मे तीर्थ हो भासित हुए। आगे कवि कहते है-- हृदय-मेधा के मध्य तरलता टूटी जल से विकाम गति गगन तक बढी विश्व मेरी हथेली पर आशा वनकर नाच उठा । यह कविता बड़ी लम्बी है। कही-कहीं कवि अपना आत्म-परिचय देते हुए जो वाक्य बताते है वे हमे सोचने, ममझने और चिन्तन करने को बाध्य करते हैं । उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्यो पर ध्यान दीजिए- अश्र जल की मधुकरी मांगनेवाला युग-भिक्षुक मैं हूँ विज्ञान द्वारा प्रसारित विष-किरण से दृष्टि खोया चक्षु मै हूँ अहकार रूपी काम पर हास किया रक्त गुलाबी मै हूँ कवि ने कुछ ऐसे भी प्रयोग किये हैं जो अपनी अलग विशेषता रखते है। जैसे- "मन की मस्जिद में नमान की पुकार की आइट" चरखन् गजू ने अपनी कविताओ का ध्येय बताते हुए आत्मा का महत्व गर में प्रस्तुत करते है- निरकाल तक जगत् पर मामन करने वाली आत्मा काल की प्रतिबिंब है यषिता कपियों की गतियों को, रीनियो को मुनानी है।

दिगंबर कविताएं । दिगम्बर कवियों ने अपने कविता-मग्रह भाग दो के प्रारम्भ मे "दिक" नामक शीर्षक के अन्तर्गत यह स्पष्ट किया है--जैसे प्रथम सकलन मे हमने अपनी कविता-प्रक्रिया को गद्य कविता नही माना और दूसरो के कहते हुए भी हमने उसे रोकने का विश्वास प्रकट किया। उसी भांति द्वितीय सकलन से अपनी वविता को "दिल" का नामकरण किया है। इन "दिक" के उपयोग का महत्व भी बताया है-बीमारी की तहों को चीर कर कास्मिक मार्ग का निर्देशन करने वाली ये "दिक" इनकी सीमाएँ मानवता के मूल्य है। नमूनाथं दो-चार कविताओ को यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं- मैं अपने देश में एकाकी हूँ जब तब ममक्ष खडे हो तलवार निकाल प्रश्न करते है "हाम्लेट" | देग ने मेरे लिए जो बचा रसा महान ममस्याओ का फंदा प्रति नित्य वह सर पे ऐठता घूमता फलत. कमती जाती भूख औ वैकारी की गांठे उन गांठो में सुन्दर मुखों के फन प्रफुल्लित पखुड़ियो के मध्य कटे डैनो से अमहाय दशा का विमाद विसाद की फसलों के बीच मूर्यमुखी सुमन की भांति लटकने वाना चन्द्रमा एक सफेद चमगीदड है। मेरी संस्कृति ने जब मुझे लात मारा हजारो वर्षों की प्रगति आँखों के समक्ष मेरे विचारों के हमलो से शिथिल हो इतिहास मे कही स्थान न पा समुद्र तट सारा झाऊ से भरा नक्षत्र मव अल्यूमिनियम सिक्को की भांति चमकते जय मेरे घर की खिडकी में से दूसरे समुदर की हवा जोर मे वह विश्वासो को ध्वंस करनी एक-एक पृष्ठ के पलटने पर

तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं
कुक्कुट युद्ध
कुक्कुटो की भांति लड़ने वाले वीर
पानी में ही परस्पर सर काटने वाले
बोब्बिलि के शूरवीर
वायु के झोकों से बुझी दोपो को बत्तियां
शेष अटपटे अंधेरे में
कतार मे खडे करेट के दीपको में
मैं अपने देश का पराया हूँ
स्नेह न देने वाले देश में
स्नेहहीन प्रत्येक व्यक्ति एक द्वीप है ।
"-निखि
वर"

४ तेलुगु का शतक साहित्य रेनुका गदर नाहि इमा नहर है कि राहे में अपना एक युन ही बना लिया है। इसे देर गिरको कोई अगानि न होगी । आमा "" " माम ने री काय-बार चल पड़ा है, रहो रेन्को बाहक E" नान से मदहृत है। नेनु का मकर नंदार को दो महिला है। परनु नतमई में उहाँ ७०० अपश १३ पदोंग संबह होता है, यहाँ र.* १० अपवा १०८ पदों का संकलन होता है। नाक को मनाएँ भक्ति, नौति, उपदेमात्नक एवं मनारसरक भी हैं। चौरे परप में नुर होता है। उसमें कवि अपने इष्टदेव, गुरु, निष वा अन्य अपने प्रियजनों को मम्दोधन करता है । मतनई की भांति यह शाम भी मुकार काम्बोजा है। इसमें भी एक पद ने दूसरे पद का बिनुन नबन्ध नहीं होता है अपितु ये मी पद माद ने अपने में पूर्ण होते हैं । तेनु के प्रायः मभी स्वातनामा कदि प्रारम्भ में बरकत हो रहे है। यह शतक वाङ्मय बहुत समय तक अज्ञात ही रहा है। कुछ पत्तिों का विचार है कि शतक-रचना अंग्रेजी की भाव-कविता जैसी है। यह साहिए- गाया मान इवनी व्यापक बन गयो है कि इन पर अनेक वृत्त सन्म भी प्रकाजित हो चुके हैं । उनमें श्री वंकूरि सुब्बाराव ना "शतक कगुल परित" (शतक कवियों का इतिहाम) और श्री वेदमु वेंकट कुन शर्माजी का "शतक वाङ्मय मर्वस्वमु” उल्लेखनीय है । उनके अलावा श्री कामिनाधुनि नागेश्वर. राव जी के "शतक-संग्रह", श्री वीर राघव शास्त्री, धी एतिकानि समा राव, वाविल्ल प्रेस वालों के शतक-संग्रह इत्यादि भी प्रसिख है। मग इस साहित्य शाखा की ममृद्धि एवं व्यापकता का परिगर पा मनाते हैं। इस प्रकार के लगभग १,००० शतकों का अब तक पता लगा है। विलो का साधन है कि तेलुगु में करीब २,५०० शतक रचे गये है। इनमें केपा . पर शोध-कार्य हो पाया है।

तेलुगु वाङ्मय : विविध विधार प्राचीन समय में माहित्यिक महत्व प्राप्त काव्यो की अधिक प्रधानता रही। शतक माहित्य का एक छोटी-सी शाखा मानकर इसका अनादर ही किया गया। महाकाव्य तथा प्रवन्धकाव्य रचना को अधिक गौरव प्राप्त था । प्राचीन आन्ध्र महाकवियो की दृष्टि में शतक उल्लेखनीय कृति नहीं माना गया । परन्नु मस्या की दृष्टि से, काव्य-गुण भावना की प्रौढता इत्यादि में शतक भी अन्य काव्यो गे कम नहीं है। समीक्षको ने भी इस ओर पहले ध्यान नहीं दिया । पं० वरि मृव्यारावजी ने जब तक "आन्ध्र शतक कबुल चरित्र" प्रकाशित नहीं किया, तब तक वे मभी शतक आन्ध्र-जगत् के लिए अज्ञात ही रहे । परन्तु "मुमती शतक", "दाशरथी शतक", "भास्कर शतक", "न मह शतक' और कालहस्तीश्वर शतक" को अधिक प्राप्त था। ये सभी स्कूलो मे पढास व कठस्थ कराये जाते थे। 7 गार, भक्ति एव नीति शतक प्रगर में थे और उम समय मन्दिर जाते समय ग्रामीण, वृद्ध व युवक इनका पाठ किया करते थे । अग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से क्रमश वह क्रम जाता भी आज के युग में यह धारणा हो गई है कि वाड्मय के माने केवल पद्य काव्य ही नहीं है। वह केवल बाङ्मय की एक शाखा मात्र है । उसके साथ अन्य शासाओ को समुचित एव मम्पूर्ण वृद्धि करने पर आन्ध्र वाङ्मयस्पी कल्पवृक्ष का सौन्दर्य निखर सकेगा। इस नग्न मत्य को आज के सभी साहित्यिक, समीक्षक, इतिहासकार आदि मब पहचाना है। सच पूछा जाए तो काव्य भी शतक उत्तम कृति माना जा सकता है। काव्यो मे कथावस्तु कवि की स्वतन्त्रता को उभी रूप में व्यक्त करने से रोक देती है। वहां कवि और काव्य के बीच में कथा उपस्थित रहती है। शतको मे ऐमी बात नहीं है । यह आत्म कविता पद्धति की है। अब तक के उपलब्ध शतक माहित्य के आधार पर यह कहा जा सकता है यिः आन्ध्र वाङ्मय में शतक माहित्य का आविर्भाव भक्ति प्रधान शैव गम्प्रदाय द्वारा हुआ। मग पूछा जाए तो तेलुगु का प्रथम शतक श्री यथा- वारका अन्नमय्या का "गर्वेश्वर शतक" माना जाना चाहिए। परन्तु इतिहासकार श्री नलिकार्जुन पटिनागम्युलु के "शिव तत्वसार" को शतक मानकर उमेदीनार कविता काप्रामा गौरा " है । निय मन में गौ पद ही होने चाहिए, यिनु व मानि पदोने पर भी यह पता ये लगन गिना । तेलुगु का शतक माहित्य भक्ति प्रधान है। शैव कवियों ने अपने शनको की रचना भक्ति एव धर्म प्रचारार्थ की। क्रमशः माहित्य में भक्ति, नीति, योग-भोग, हास्य, उपदेश आदि समस्त प्रकार के विषय वणित होते गये। उनमे शृ गार, करुण, हास्य, अद्भुत व शान्त रमो का भी वर्णन हुआ है। शब्दालकारो का अभाव भी नहीं है । व्याज-स्तुति, व्याज-निन्दाओ से पूर्ण भक्ति शतक भी है और वेदान्न प्रबोधित भी । काव्य की नित्र-कथा-कल्पना को छोड शेप काव्य के समस्त प्रकार के लक्षण तेलुगु शतक में आ गये। उनमे अनुपलब्ध वस्तु कोई नही है । यहाँ तक कि १८वी मदी मे काव्य-कविता के लक्षण भी शतक कविता में वर्णित होने लगे। विष्णुपरक-राम, कृष्ण, नृसिंह इत्यादि शतको मे दशावतार तथा शैव प्रधान शतकों में श्रिपुरासुर सहार का वर्णन हुआ है। यही नहीं, महा- भारत, रामायण, भागवत् इत्यादि पौराणिक गाथाओ को भी इन शतको ने जन माधारण तक पहुंचाया और प्रचार किया । १७वी शताब्दी मे १६वी शताब्दी के बीच में रच गये शतको मे देश, काल, समाज, देशी राज्यो व जमीदारों का अच्छा वर्णन मिलता है । स्वर्गीय श्री सुरवरम प्रताप रेड्डी को "आन्धुल मांगिक चरित्र" (आन्ध्रवामियो का मामाजिक इतिहास) की रचना मे शतको मे बहुत बडी महायता मिली है। इस प्रकार इन शतको का महत्व बहुत बड़ा है। जीवन के प्राय. समस्त क्षेत्रों का वर्णन हमे शतको में प्राप्त होता है। इस लेख में हम एक महय शतको और उनके रचयिताओ का परिचय तो दे नही पायेगे। कुछ प्रमुख शतको व इनके कर्ताओं का परिचय देना पर्याप्त होगा। १. शिवतत्व सारम--- -इसके रचयिता श्री मल्लिकार्जुन पडिताराध्युलु प्रथम तेलुगु शतक-स्वरूप-निर्माता माने जाते है । इनका समय गन् ११६० के लगभग है । इम शनक का मुकुट शिव है। परन्तु कुछ पद्यो में शिवजी के काव्य नाम "महेशा", "रुद्रा", "भजा" इत्यादि अनेक पर्यायवाची शब्दों का भी प्रयोग इस शतककर्ता ने किया है। इस शतक का कतिपय पद्यों में शतक- लक्षण भी दिखलाई नही देते । इतना होते हुए भी “पंडिताराध्य चरित्र" के रचयिता श्री पालकुरिकि सोमनाथ कवि ने शिवतत्वसार को शतक ही माना है । कुछ आधुनिक समीक्षकों ने भी बड़ी छान-बीन के उपरान्त इसे प्रथम शतक का गौरव प्रदान किया है। इस शतक में अद्वैत मत का खडन तथा आडम्बरपूर्ण पूजा का विरोध किया गया है और साथ ही माथ शिवगण वर्णन, भक्ति की महिमा इत्यादि विषयो पर लेखक ने प्रकाश डाला है । इसी नाम से कन्नड़ में भी एक शतक है, वह इसका जनुवाद माना जाता है । श्री पालकुरिकि मोमनाथ ने यह भी लिखा है कि श्री मल्लिकार्जुन पंडिता- तेलुगु वाङ्मय : विविध विधा राध्युनु गे कुल ४३ ग्रन्थों की रचना की। परन्तु केवल "मियतत्व सार" ही अब तक उपलब्ध हुआ है। २ सर्वेश्वर शतक कर्ता --मयावायकुल अन्नमम्या (सन् ई० १२१८- १२८५) इममें १४२ शार्दूल वृत्त है। कर्जा ने १३० व १४२ - पद्यों में अपने शतक रचना-काल के सम्बन्ध में लिखा है कि यह कर्नूल जिले के दृदिकोडा नामक ग्राम के निवामी में ! यो तो वह गोदावरी निवामी थे, लेकिन थी शैल की यात्रा से लौटो गमय पन्नाड तालुके की एक धर्मशाला मे अपना नियाम वनाया और वहीं पर अपने सवर शतक की रचना कर बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की। इनके पद्य भक्ति प्रोधपूर्ण है। अधिकाश पध अद्वैत भावों से आत्मा अनात्मा विचार तथा वेदान्त रहस्य तथा नास्तिको को भी परमात्मा की और झुकाने में समर्थ है। कुछ लोग इन्हें पालकुरिकि मामनाय कमि का शिष्य मानते है । लेकिन यह कदापि समन नहीं है। ये दोनो समस्त विषयों में भिन्नता रखते है। गुरु-शिष्य-मम्वन्ध का कोई अन्य प्रमाण भी प्राप्त नहीं हुआ है। ३. वृषाधिप शतक~~कर्ता F~~~''कवि ब्रह्म" श्री पालकुरिकि सामनाथ कवि (२२७०-२२)। शतक कवियो में सामनाथ जी का विशिष्ट स्थान है। इन्होंने द्विपद-पद विन्यास के साथ तेलुगु काव्य साहित्य के क्षेत्र में कई नयी रीतियो को जन्म दिया और विद्वत्ववियो की प्रशंसाएँ प्राप्त की। श्री मोमनाथ जी ने समस्त पातक लक्षण समुदाय को अपने दृपाधिप शतक मे गमलकृत किया । इसलिए यह समन शतक साहित्य का शिरोमणि बना हुआ है। श्री सामनाथ ने २८ ग्रन्थो की रचना की है। उनमें ७ पुस्तके तेलुगु की, आठ सस्कृत और ऐप कन्नड की है । इनमे "वसव पुराण", "पडितारा-युल चरित्रम्" और "पाधिप शतकम्" अत्यन्त मुख्य है । इस शतक कर्ता के जीवन से सम्बन्धित अनेक अद्भुत कहानियाँ जनपदो में प्रचलित है, जो इनकी भक्ति व पाण्डित्य का परिचय देती है। श्री सामनाथ जी का जन्म 'पालकुरिकि' नामक गांव में हुआ था। यह सगत्लु (वर्तमान समय के बारगल) के ममीप में है। इससे स्पष्ट है कि वह लगाना के निवासी थे। वह अच्छे भक्त भी थे। शैव सम्प्रदाय एवं आचारी का पालन करते हुए लोगो में शय धर्म का प्रचार करने रहे। इनके कई शिष्य भी थे । बीच-बीच में ये श्री शैल आदि शैव तीर्थों का मेवन भी करते रहे। कुछ विद्वानों का मत है कि यह मामनाथ कृत 'कृपाधिप शतक' हो तेलुगु तेलुगु का शतक माहित्य श्री सामनाथ कवि सर्वतोमुखी प्रतिभाशाली थे। वह वेद-वेदांगों में पारंगत थे, तेलुगु, तमिल, कन्नड, महाराष्ट्र व संस्कृत भाषाओं मे समान अधिकार रखते थे। वह पट् शास्त्रो मे प्रवीण ये । इन्होने 'वसव पुराण' और 'पडिताराध्य चरित्र' नामक काव्यों को देशी छन्द द्विपद मे रचा था । इनके 'वृपाधिप शतक' मे हम सोमनाथ कवि की अनेक कविता धाराओं का परिचय पा सकते है। ये पुस्तकें उनकी 'बमवेश्वर' (शिव) भक्ति का सुन्दर उदाहरण है। इस शतक के अधिकांश पद्य चपक अथवा उत्पल मालावृत्त है । इस शतक का मुकुट 'बसवा' अथवा 'वृपाधिपा' है । यह समस्त शतक- लक्षण समन्वित रचना है। मल्लिकार्जुन पडित ने शिवतत्वसार द्वारा शतक के एक स्वरूप को प्राप्त किया तो दूसरी ओर वृपाधिप शतक द्वारा शतक काव्य-कामिनी सर्वालंकारशोभिता हो प्रकाशमान है। इस शतक की शैली संस्कृत समास जटिल है । इसमे कुल १०६ पद्य है। अनुप्रास, नियम और शब्दालंकार वैचित्र्य इसकी विशेषताएँ है । कवि की भक्ति अपूर्व एवं अद्भुत थी। पद-पद पर उन्होने अपने आराध्य को पुकारा है । ४. सुमती शतक -कर्ता-बदेना (भद्र भूपाल १३, १४ सदी) आन्ध्र देश के आवाल-वृद्धों मे विशेप म्प से प्रचार प्राप्त शतक 'सुमती शतक' है। इसके पद्य कंठान पर न रखनेवाला व्यक्ति आन्ध्र भर में ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा। इससे जन-साधारण में इस शतक की लोकप्रियता का परिचय पाया जा सकता है। इसका प्रत्येक पद्य सुभाषित-जैसा महत्वपूर्ण है। परन्तु इस शतक के रचयिता सम्बन्ध में अब तक कोई सर्वमान्य निर्णय नहीं हुआ है । कुछ लोगों का ख्याल है कि 'मुमति' नामक किसी जैन भिक्षु ने 'आत्मनाम संबोधन' द्वारा इस प्रकार की नीतियो का उपदेश दिया है। श्रीमान् वल्लि रामकृष्ण कवि ने अपने 'नीतिशास्त्र-मुक्तावली' नामक ग्रन्थ की भूमिका में लिखा है कि मुमति शतक "भद्रभुपाल कवि' विरचित ही हो सकता है । श्री कूचिमंचि तिम्म कवि ने अपने 'मर्वलक्षण सार संग्रह नामक लक्षण ग्रन्थ की भूमिका में इम शतक को भीम कवि कृत बताया है । परन्तु इस शतककर्ता के सम्बन्ध में इस समय के अधिकाश विद्वानो की राय है कि यह भद्रभूपाल रचित ही है। यह शतक सुन्दर, सरल एवं सुबोध तेलुगु मे रचा गया है । भीम कवि की शैली मंस्कृत जटिल ममासयुक्त है । 'सुमती शतक' का प्रत्येक पद एक हीरे के टुकड़े के समान है । इसमे लोकानुभव और नीति का सुन्दर ममन्यात्मक सम्मिश्रण हुआ है । उदाहरण के लिए- "अपनी सम्पत्ति ही इन्द्र भोग है और अपना दुःस ही समस्त जगन् को दरिखता है।"

४६ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं "दामी का भी पुत्र क्यों न हो, जिनके नाम पंगा है, वही रागा है।" "प्रेम व विनयपूर्वक देने में दूध का भी पान नहीं करने. और जबरदस्ती करने पर विषपान भी करने अच्छी पत्नी काम के गमय अच्छी पत्नी मिद्ध होती है, मेवा के ममय दामी, भोजन के ममय माता और मोने के ममय रंभा।" यही भाव इम मंस्कृत श्लोक में भी है "कार्येषु मंत्री, करणेषु दानी, भोज्येषु माना, णयनेषु रंभा।" "विच्न की पूंध मे जहर रहना है, मकवी के मिर में और माप के दांत में, पर दुर्जन के तो मारे शरीर मे विप ही विप भरा है।" मंस्कृति का एक श्लोक है- "वृश्चिकस्य विपं पुच्छम् मक्षिकस्य विपं शिर' नक्षकस्य विषं दंष्टा माग दुर्जने विपं । "हे मुमती ! इस पृथ्वी मे वचन के लिए प्राण सत्य है । दुर्ग का प्राण उसके वीर रक्षक होते है। नारी का प्राण मान है और चिट्ठी का प्राण हस्ताक्षर होता है ।" बदेना या भद्र भूपाल से अपरिचित व्यक्ति आन्ध्र मे आपको मिल सकते है परन्तु सुमती शतक के पदो मे अपरिचित शायद ही कोई प्रमाण मिलेगा। दरा वर्ष पूर्व तक भी मुमती शतक के प्राय सभी पद्य ग्रामीण पाठशालाओ मे वालको मे अनिवार्य रूप मे कंठस्थ कराये जाते थे। ५. वेंकटेश्वर शतक–कर्ता -तारलपाक अन्नमाचार्युलु (ई० म० १४०८- १५०३) । श्री अन्नमाचार्य जी के वशज सगीत और माहित्य दोनो मे प्रवीण रहे है । ये तिरुपति में स्थित भगवान श्री वेकटेश्वर के मानिध्य मे वण परम्परागत रहते आये है। उनमें प्रथम श्री अन्नमाचार्य थे। भगवान की भक्ति में लीन हो आशु रूप में वह प्रतिदिन कुछ कीर्तन बनाकर गाया करते थे । भगवान के प्रति भक्त का निवेदन ही इनके कीर्तन है। गीत-माहित्य मे वह भक्त त्यागगज की कोटि मे आते है । थी अन्नमाचार्य जी ने "वकटेश्वर शतक" की रचना की है। नमे एक - -- तेलुगु का शतक माहित्य सौ चंपक माला एवं उत्तल मालावन है । इस शतक का मुकूट"वकटेश्वरों है। यह एक शृंगार प्रधान शतक है । इममे अलिवेलु मेंगों और चेकटेश्वर की लीलाओं का मुन्दर वर्णन हुआ है । सुन्दर शब्द-योजना चमत्कार भाव मौन्दर्य इस शतक की विशेषताएँ है। इनके शतके भे माढालय प्रयोग हुआ है । भक्ति में नो ये तेलुगु के महान भक्त कवि पोतन्ना का हम स्मरण दिलाते हैं। ६. श्री फालहस्ति शतक ---कर्ता-धूर्जटि कवि । श्री धूर्जटि कवि कालहस्ती के निवासी और शिव-भक्त थे । इनकी कृति 'श्री कालहस्ति शतक' नाम से विख्यात है। इनकी कविता के सम्बन्ध में 'आन्ध्र वाङ्मय का इतिहास' के लेखक ने लिखा है-'धूनंटि की शतक रचना गंगा-धारा की तरह वेगमय है।" इस शतक के सम्बन्ध विद्वानो मतभेद है । कारण, इसकी अनेक प्रतियां प्राप्त हुई है। किसी में १०८ पद्य हैं, किमी मे १२० तो किमी में १४२-१४८ पद्य है। इस शतक में ३३ नये पद्यों का ममावेश हुआ है। कही-कही अल्प मात्रा मे पाठ-भेद भी है । कुछ विद्वानो का मत है कि कुछ पद्य ऐसे भी आ गये है जो समानार्थ बतलाने वाले है । इस कवि का 'कालहस्ती महात्म्य' अत्यन्त श्रेष्ठ काव्य है । ७. बैंकटेश्वर शतक--कर्ता-श्री ताल्लपाक तिरुमलाचार्य । यह अन्नमाचार्य जी के द्वितीय पुत्र थे । स्वयं कवि ने अपने 'बेकटेश्वर शतक' के अन्तिम पद्य में इस बात का उल्लेख किया है । इन्होने भी वेकटेश्वर शतक की रचना की है । इसके अलावा इनके और बारह ग्रन्थ मिले है। इन बारह ग्रन्यों में से दो शतक हैं । एक नीति प्रधान और दूसरा शृगार रस प्रधान । दोनों का मुकुट 'वेकटेश्वरा' है। प्रथम शतक सीस छन्द मे कहा गया है । इस छन्द का यही प्रथम शतक है । बाद के शतक इसके अनुकरण पर ही बने हैं । यत्रतत्र लोकोक्तियों का अच्छा प्रयोग किया गया है । उदाहरण के लिए-- ''कधा क्या जाने सुगंध की बास ?' ८. रंगनाय शतक कर्ता—कोंड राम कपि । इम कवि ने रंगनाथ शतक की रचना की है । वेदान्त विषय होने के कारण इसका उचित प्रचार नहीं हो पाया है । शतक साहित्य-रचना में काव्य-लक्षणों का प्रवेश कर इस कवि ने एक नयी रीति को जन्म दिया है। शतक के प्रथम पद्य में इप्ट देवता की प्रार्थना की गयी है। ये तिरुमल देवरायलू के समकालीन थे। इनके गुरु नाग वैकट रंगनाथ जी थे। इस शतक में विजयनगर साम्राज्य तथा तत्कालीन विभिन्न विषयों का वर्णन भी हुआ है । शतक में कुल १०१ पद्य हैं । मुकुट इस प्रकार है-"गंज पुरंधाम शृङ्गार कलित सोम मंगलोद्धाम ,श्री फलि रंगाधाम" । वेदान्त ज्ञान और शब्दालंकार बहुलता इसकी विशेषताएं हैं ।

४८ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं ६. येमन शतक-कर्ता-वेमना (१५६५-१६२५) शतक कवियो में वेमना के गम्बन्ध में जितनी छानबीन हुई है, उननी शायद ही किसी अन्य शतककार के सम्बन्ध में हुई हो। इनके वंशज तथा ममय के सम्बन्ध में विद्वानों में विशेष मतभेद न रहने पर भी स्थान के सम्बन्ध में अनेक मतभेद है। वेमना का जन्म रेड्डी-वंश में हुआ था। इतिहासकारों का कयन है कि वेमना कोडवीडु सीमा के निवामी थे और उनकी मृत्यु वर्तमान अनन्तपुर जिले के कटारपल्ले मे हुई । वेमना स्थायी रुप से एक स्थान पर नहीं रहे । वह समस्त आन्ध्र मे भ्रमण करते रहे। हैदराबाद के तेलंगाने में भी गये । इनके अनेक मठ आज भी वहां पर मौजूद हैं । आन्ध्र मे तो आज भी इनके मठो मे उत्सव आदि हुआ करते है । वेमना ने अपने एक पद्य में अपने निवाम-म्यान के सम्बन्ध में स्वयं कोंडवीड के मूग चितपल्ले का उल्लेख किया है। यह स्थान वर्तमान समय के ओंगोल के समीप मे पडता है। वेमना के अनेक पद्यो से पता चलता है कि वे शैव योगी थे । इसलिए कुछ विद्वानो ने उक्त पद्य मे कोंडवीड का अर्थ कलास लगाया है । उम कैलास की प्राप्ति के लिए भूडाचिंता (मौन ध्यान) नामक गाँव से गुजरना पड़ता है। तभी मुक्ति मिल मकती है । योगी बेमना कबीर की भांति घुमक्कड थे । वे सदा साधु-संत, बैरागियो की मंगत मे रहा करते थे। इन मण्डलियो के साथ खूब देशाटन भी किया था। इमी ममय वेमना ने योगाभ्यास भी किया था। वैद्यक (दवा-दारू) विद्या तथा हेमकार (स्वर्ण) विद्या भी उन्होंने मीखी थी। क्रमशः इहलोक की ओर से उनका मन पूर्णरूप से उठ गया और अन्तर्दृष्टि को प्राप्त कर सके । धीरे-धीरे अपने शिष्यो का भी संग छोड वे एकान्त जीवन व्यतीत करने लगे और अवधृत की भाँति कौपीनधारी हो तपस्या मे लीन हो गये थे। अव तक वेमना के ५,००० पद्य उपलब्ध है। अनुसंधानकर्ताओ का विश्वास है कि और भी अनेक पद्य अभी अज्ञात है। उनका यह भी विश्वास है कि वेमना के पद्यों मे कुछ प्रक्षिप्त भी है। कुछ लोगो ने अपनी तरफ से कुछ पद्य रचकर वेमना के नाम प्रमारित किये। इससे उनके वास्तविक पद्यो अनुसंधान कुछ कठिनाइयाँ उपस्थित हुई हैं । देमना के पद्य तेलुगु के सरल देशी छन्द 'आट वेलदि' और 'तेट गीत' मे है । कबीर जैसे लोगो ने हिन्दी के सरल छन्द दोहे को अपनाया, वैसे ही तेलुग के लिए ये दोनो छन्द सरल है। इसके चार पाद होते है और चौथे चरण मे तेलुगु का शतक साहित्य में मुकूट-~-'विश्वदाभिराम विनुर वैमा' होता है। अब तक वेमना के पद्यों के अनेक चरण संग्रह प्रकाशित हो चुके है और इनकी जीवनी भी कई विद्वानो ने लिखी है । अव तक वेमना के ३,००० से ३,५०० पद्य ग्रन्थस्थ हो चुके है। वेमना बहुत बड़े पण्डित भले ही न हों, किन्तु अच्छे विद्वानो का सान्निध्य उन्हे प्राप्त था। उनके पद्यो में वर्णित महत्तम विषय ही हमे इसका परिचय दे रहे है । उनकी भाषा माहित्यपूर्ण भले ही न हो, परन्तु उनके उपदेशो मे विलक्षणता है, जो आत्म-स्वरूप से अनिभिज्ञ अज्ञानी लोगों को सुज्ञानी बनाने में समर्थ है। तमिल भाषा-भापियो का 'वेदं तिरुक्कुरल' माना जाता है । वैराग्य में वेमना 'वक्कुवर' (तिरुवक्कुवर) से भी श्रेष्ठ कहे जा सकते है । परन्तु वेमना के महान व्यक्तित्व को हम आन्ध्रवासियो ने पूर्ण रूप से पहचाना ही कहाँ ? वेमना जन्मजात कवि थे। अनेक सूत्रप्राय नीतियो को सर्वसाधारण के लिए सुबोध शैली मे छोटे-छोटे वाक्यो में देशी छन्दो मे विठाने में उनका सानी नहीं है । महाकाव्य के प्रणेताओ को वह सफलता प्राप्त नहीं हुई, जो इन्हे आटवेलदि छन्द की रचना मे प्राप्त हुई है । वेमना के पदों में पादांत, विराम, धारा-शुद्धि, भाव-पुष्टि इत्यादि देखते ही बनता है । उनको पद्यों को पढ़ते समय पाठक के मन मे वे भाव नये विद्युत प्रवाह की भांति हृदय मे प्रविष्ट हो अज्ञान-तिमिर को दूर करने में अद्भुत काम करते है। वेमना परम वैरागी थे। उन्होंने अपने समय की सामाजिक परिस्थितियो का मूक्ष्म निरीक्षण कर प्रजा मे व्याप्त दुर्नीति एवं अन्धविश्वासों का तीन रूप मे खण्डन किया। वेद, शास्त्र और पुराणों के प्रति उनकी श्रद्धा थी, लेकिन इनको आधार बनाकर अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना उन्हे कतई पसन्द नहीं था। ऐसे लोगो को वे क्षमा नहीं कर सकते थे। इनके पद्यो में स्वर्ग-नरक, अवतार, पुरुष, देवता आदि की प्रशंसा है । परन्तु बाह्याडंवर, यज्ञ-याग उपवास, व्रत, मूर्तिपूजा इत्यादि का घोर विरोध किया है । काम्य- कर्मों का वह विरोध करते थे । 'अहं ब्रह्मास्मि' नामक अद्धत तत्य ही उनका लक्ष्य था । पवित्र चरित्र (आत्म शुद्धि) पर इम महात्मा ने बहुत अधिक बल दिया है । वह गुरु की प्रधानता मानते थे। गुरु द्वारा मोक्ष-माधन इन्होने मुकर माना है। इनके पद्यो में कुछ 'कूट पद्य' भी है । ठीक कबीर की तरह । उनमें रहस्य भावनाएं वर्णित है। इनका प्रधान छन्द 'आट वेलदि' था। इसमें वेगना ने जो प्रोडता व मधुरिमा दिवाई वह और किसी कवि के लिए भी - फा०-४ नेनुगु वाइमय : विविध विधाएं मंभव नही हुई । इनका प्रत्येक पद्य एक मूत्र के गमान है जिगका आन्न देश में घर-घर में प्रचार है । कुछ नीनिपूर्ण पद्यों का हम उदाहरणार्य यहाँ उल्लेख "मनुष्य के कर्मों को क्या शकुन रोक गकते हैं ? क्या शिगेमुंडन मे कामनाएँ भी मुंडी जाती हैं ? पत्थर (गिला-पंड) ही ईश्वर हो जाए तो वह विश्व को ही निगल जाए। जाति और वंश से भी गुण ही प्रधान है । विना हृदय की शुद्धि के ईश्वर की पूजा करने से नया लाभ? भाल पर अंकित चिह्नों से यह भले ही भक्त जैसे दीने, परन्तु उसका मुंह भैदिये के समान है। क्रोध को दबाने मे कामनाओ की पूर्ति हो जाती है।" इस प्रकार के भाव हम तेमना के प्रत्येक पद्य में देख सकते हैं । इनके पद्य इनका असाधारण लोकानुभव जाहिर करते हैं। इनकी उपमाएँ भी अद्भुत है । इसके अतिरिक्त वे आनानी से समझ में आती हैं। इस महात्मा के पद्यों में लोकोक्ति और कहावत का भी समयानुकूल अच्छा प्रयोग हुआ है । इनमे नीति-वाक्य भी देखने योग्य हैं- "चाहे ये जीवर अच्छे भी क्यो हो 1-पर कुत्ता, गाय, खरगोश, वाघ और मच्छर गज कभी नहीं बन सकते । वैसे ही लोभी आदमी स्वभाव से अच्छा होने पर भी वह दाता नही बन सकता है।" "दुष्ट (निम्न जाति के) व्यक्ति को घर में प्रवेश दिया जाए तो बड़े से बड़े आदमी को भी उसके द्वारा हानि होती है। जैसे मक्खी पेट में जाकर तंग करती है।" "गधा सुगन्ध को क्या जाने और कुत्ते के पास ऊँची बुद्धि कहां से आए ? वैसे ही नीच व्यक्ति ईश्वर की उपासना करने के लिए विरक्ति कहाँ से पायेगा?" कुछ पद्यो मे संस्कृत के श्लोको की छाया भी दीखती है- 'शूद्रतनमुपो ये शूद्र डगाननि द्विजुडनुकोनुटेल्ल तेलिवि लेमि।' 'जन्मना जायते शूद्रः कर्मणा जायते द्विजः ।'

तेलुगु का साहित्य शतक ५१ वेमना ने अपने अनुभवो व अनुभूतियों को स्पष्ट रूप से कहा है, चाहे वे अश्लील भी क्यो न हो। तेलुगु साहित्य के कवियों में वेमना अपने ढंग के अकेले है । दूसरे से इनकी तुलना नहीं की जा सकती। १०. कवि चौडप्पा शतक-का-कवि चौडप्पा । इम कवि के सम्बन्ध मे समुचित निर्णय करने के लिए हमें इन्ही के पद्यो में आधार मिलते हैं। चौडप्पा ने अपने पूर्व कवियों की स्तुति की और ममकालीन राजाओ की प्रशंसा। राजा रघुनाथ राय की महिमा भी इन्होंने गायी है। इससे स्पष्ट है कि वे १७वी शताब्दी के थे। उस समय के शिलालेख आदि द्वारा इनके समय का ठीक-ठीक निर्धारण किया गया, जिसके अनुमार पता चला है कि ये १६००-१६३० के मध्य भाग मे कविता करते रहे। इन्होने अपने शतक में आत्मसंवोधन-परक कविता कही है। शतक का मुकुट 'कुदवरपु कवि चौडप्पा' है। 'कुदवर' तो उनका ग्राम माना जाता है और ये उस गांव के पटवारी थे। इनके शतक की तीन-चार प्रतियाँ प्राप्त हुई है । एक मे १११ पद्य है तो दूसरी मे ६४ और तीसरी मे ६६ ही। चौडप्पा ने अपनी रचनाओ में आत्मस्तुति भी की है। इनका प्रधान छन्द 'कंद' था । इनकी रचना के प्रधान विषय आत्मस्तुति, नीति वोध, लोभी-निन्दा, भक्ति आदि हैं। अपनी नीति की प्रशस्तता का वर्णन स्वयं कवि के शब्दो मे मुनिए--- "ऐसे व्यक्ति को हम ढूंढने पर भी नही पा सकते, जो मेरी नीति के उपदेश सुनता व पढता हो, जिसके शरीर पर सूर्य की किरणो का प्रसार न हुआ हो और जो वर्षा में भीग नही गया हो।' 'शिवजी का वरदान व्यर्थ साबित हो सकता है । देवताओं के गुरु भी नीति-मार्ग से हट सकते है । मूर्य और चन्द्रमा भी अपने मार्ग से हट सकते है । अयोध्या के राजा रामचन्द्रजी का बाण भी निशाना चूक सकता है । परन्तु सरस व चतुर कवि चौडप्पा का पद्य कभी नीति मार्ग से विचलित नही होता।" "जो व्यक्ति दूसरों की मम्पत्ति को गाय km के समान देखता है, जो पर-नारी ! माता ममझता है, वह मनुष्य मा gen नारायण ही है।'

तेलुगु वाङमय : विविध विधाएं । . ११ फुषकुर्टश्वर शतक और भर्ग शतक कर्ता-कूचिमचि तिम्म कवि । इन दोनो शतको के कर्ता श्री कूचिमचि तिम्म कवि (१६६०-१७६०) थे। श्रीनाथ महाकवि के उपरान्त आन्ध्र साहित्य मे इन्ही को 'कवि सार्व- भीम' नामक उपाधि प्राप्त हुई। इन्होने कुल १२ अन्य लिसे है। जिनमें कुक्कुटेषत्रर शतक और भर्ग शतक नामक दो शतक भी है। इनके अन्य ग्रन्थो में 'सर्वलक्षण मार सग्रह', एक श्रेष्ठ लक्षण (रोति) ग्रन्य है । 'रुक्मिणी परिणय', सारंगधर चरित्र', 'राजशेखर विलास', 'शुद्ध तेलुगु रामायण', 'शिव लीला विलास', रसिक जन मनोभिराम', 'निता सुन्दरी परिणय' आदि भी उतम ग्रन्थ है। कुक्कुटेश्वर शतक का आन्ध्र मे अच्छा प्रचार है । इसमें सामाजिक दुराचारी का निर्भीकता के साथ खण्डन किया गया है । भावों के आवेग और आवेश के कारण कही-कही काव्य-लक्षणो का भी अतिक्रमण हुआ है। इस शतक का मुकुट 'कुक्कुटेश' है। प्रायः मुकुट के नाम पर ही शतक का नाम- करण होता है। अपने आराध्य देव के नाम पर कवि ने यह शतक रचा है । इस शतक में कुल ६२ पद्य । इष्टदेव तथा अन्य देवताओ की स्तुति, सुकवि स्तुति, कुकवि-निन्दा, दाता मप्त संतान, खल (दुष्ट), लोभी, सुजन, दुर्जन, संपदा, गरीबी आदि के वर्णन करने वाले पयो का इसमें समावेश है जो उम समय की सामाजिक दशा का परिचय कराते है। इस शतक की एक विशेषता यह है कि इसमें मुहावरों की भरमार है। कहावते, लोकोक्तियों और उपमान आदि अद्भुत बन पड़े है । 'जातस्य मरणं ध्रुवम', 'राज्याते नरकं ध्र वम्' इत्यादि इसके सुन्दर उदाहरण हैं । यह शतक बाद के कवियो के लिए आधार बन गया है । इसके अनुकरण पर बने अनेक शतकों में 'वेणुगोपाल शतक' इत्यादि मुख्य है। इस कवि का दूसरा शतक भर्ग शतक है। यह समग्न रूप में उपलब्ध है। इसमें कुल मिलाकर १०१ पद्य है । भर्ग शतक की शैली कुक्कुटेश्वर शतक की अपेक्षा प्रौढ है। यह कवि को प्रौढावस्था में रचा गया है। यमक आदि शब्दालंकारो की बहुलता पायी जाती है । १८वी शताब्दी के उल्लेखनीय शतकों में इसका भी स्थान है। १२. भक्त मंदार शतक कर्ता-कूचिमंचि जग्गकवि । ये कूचिमचि तिम्मकवि के तीन भाइयों में से थे। इस बात का उल्लेख जग्ग कवि ने 'अनि मिह शैत महात्म्य' में किया ये विभिन्न प्रान्तों का भ्रमण कर अनेक राजाओ के दरवारों में गये और कितने ही कवियों को पराजित कर इन्होंने अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसके 'चन्द्ररेखा विलापमु नामक प्रत्य के एक पद्य द्वारा मालूम होता है कि इन्होंने 'जानकी परिणय', 'द्विपद तेनुगु का साहित्य शतक - राधा-कृष्ण चरित्र', 'सुभद्रा विवाह', 'चन्द्र रेखा विलापमु' तथा कुछ चाटु प्रबन्ध और तक लिसे थे। उस पद्य में 'मोमदेव रागीय' का उल्लेस नही हुआ है। सम्भवतः यह कृति बाद में रची गयी होगी। उपालभ में इनसे किसी की तुलना नही हो सकती । चन्द्ररेगा विलाप एक निन्दात्मक काव्य है। इन्होंने भक्त मंदार शतक की रचना की। यह कालहस्तीश्वर आदि भक्तिपूर्ण शतको की समता कर सकने वाला शतक है। इस शतक में नीति व प्रभू (राजा) निन्दात्मक पद्य भी यत्र-तत्र मिलते हैं । १३. रामलिगेश्वर शतफ-कर्ता-आडिदमु सूरकवि (१७२०-१७८५) । श्री मूरकवि ने अपना परिचय स्वय एक पद्य में इस प्रकार दिया है- "कॉन-सा? -~-चीपुरपल्ले । नाम ? सूरकवि, वंश का नाम आडिदमु । आपके राजा कोन ? विजयराम महाराज । वह क्या सरस हे ? नहीं, राजा भोज ही हैं।" कवि ने कई उत्तम ग्रन्य-रत्नो का निर्माण किया । 'आन्ध्र चन्द्रालोक', 'आन्ध्र नामशेप', 'कवि संशयं विच्छेद', 'रामलिंगेश्वर शतक' और वेकट- मंत्ति शतक' इन्ही महाकवि रचित माने जाते है। इनका 'वेकट मनि शतक तो अपूर्ण है । 'रामलिंगेश्वर शतक' मे १०६ सीस (एक छन्द का नाम) पद्य है । इस शतक का मुकुट 'रामलिंगेश रामचन्द्र पुरवास' है । इसके कुल-देवता रामलिंगेश्वर स्वामी थे। इसलिए कवि ने अपनी समस्त कृतियां अपने आराध्य देव को समर्पित की है। इस शतक मे नीति, भक्ति इत्यादि के साथ उस समय के जमीदारो के अत्याचारो का भी वर्णन किया गया है। संदर्भ के अनुमार हास्यरस पूर्ण व्यंग्योक्ति तथा कहावतो का सुन्दर प्रयोग हुआ है । १४. कृष्ण शतक-कर्ता--सिंह कवि । आन्ध्र देश मे सुमती व वेमना के बाद इसी नृसिंह कवि कृत 'कृष्ण शतक' का विशेष रूप से प्रचार है । इस शतक का मुकुट 'कृष्ण' है । कवि ने तेलुगु के महाकवि पोतना और श्रीनाथ की कविता-रीतियो का अनुकरण किया है । नसिंह कवि बहुत बड़े विद्वान थे, इसलिए इनके पद्यों में छन्द-दोप, प्रास-भंग, व्याकरण-दोष इत्यादि पाये जाते है। १५. दाशरथी शतक-कर्ता-कंचल गोपन्ना । यह सत्रहवी शताब्दी में हुए थे। इनका दूसरा नाम 'रामदास' है । आन्ध्र महान भक्तो में ये भी एक थे। पोतना और त्यागराज के बाद भक्ति में इनका नम्बर आता है। इन्होंने रामचन्द्रजी पर एक शतक लिखा है। दाशरथी शतक नाम से प्रसिद्ध है । शतक का मुकुट 'दाशरथी तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं है। इस शतक के प्राय. गभी पद्य भक्ति एवं नीतिपरक है । इस शतक का भी आन्ध्र में अच्छा प्रचार है। श्री रामचन्द्रजी आन्ध्र देश के आराध्य देव है। रामदास तो श्रीरामचन्द्रजी के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी संपूर्ण भक्ति को मानो शतक के इन पद्यों मे उड़ेल ही दिया है । इनके अलावा अन्य भी कितने ही शतककार हुए है । हमने ऊपर केवल ऐसे ही शतको का परिचय दिया है, जिनका आन्ध्र देश में अधिक प्रचार है अथवा उनके कर्ता लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति है। बताया जाता है कि महाकवि पोतना ने भी 'नारायण शतक' की रचना की है। यह विवादास्पद विषय होने के कारण उस शतक पर मैंने विचार नही किया । अन्य शतको में श्री एनुगुलक्ष्मण कवि कृत 'भर्तृहरि शतक' (१७२५), तथा इसी नाम का श्री पुष्पगिरि तिम्मना कृत शतक (१७५०) भी प्रसिद्ध है । अन्य शतको मे सीतापति शतक, जानकीराम शतक इत्यादि प्रसिद्ध है । परन्तु अनेक कवियों ने एक ही नाम के शतक भी लिखे है। तेलुगु मे उपलब्ध होने वाले केवल शतक व शतककर्ताओं के नामो का उल्लेख मात्र भी किया जाए तो लगभग एक पोथा बन जाएगा। शतक के प्राय. समस्त प्रमुख विषयो पर मैंने सक्षिप्त रूप से यथाशक्ति प्रकाश डालने का प्रयास किया है । इसी मे समस्त तत्वो का समावेश आ गया है। अन्य शतकों की अपनी-अपनी विशेषताएँ है। परन्तु शतक वाङ्मय में उनका प्रतिनिधित्व कर सकने वाला स्थान नहीं है। यह शतक साहित्य १२वी शताब्दी से लेकर आज तक बराबर प्रवाहित होता जा रहा है। यहां तक कि १६५५ मे भी तीन-चार शतक प्रकाशित हो चुके है। जब तेलुगु के अन्य अज्ञात शतको का भी पता लग जायगा, तो तेलुगु का शतक-साहित्य और भी जगमगा उठेगा ।

आधुनिक तेलुगु उपन्यास आधुनिक युग मे उपन्यास अपनी प्रभावोत्पादकता तथा रोचकता के कारण माहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हो गया है । उपन्यास में मानव जीवन की मीमासा होती है और उसमे मानव-मन की आंतरिक अनुभूतियो का विश्लेषण होता है। मानव-जीवन के सत्य का रसात्मक रूप में उद्घाटन करके वह आनन्द प्रदान करता है। यही कारण है कि यह प्रक्रिया मानव-जीवन के अधिक निकट है। यो तो भारतीय साहित्य के लिए उपन्यास पाश्चात्य साहित्य की देन है। किन्तु भारतीय वातावरण में इस प्रक्रिया का आशातीत विकास होता जा रहा है। तेलुगु का प्रथम उपन्यास स्वर्गीय वीरेशलिंगम पतुलु कृत 'राजशेखर चरिन' माना जाता है। यह उपन्यास अंग्रेजी के सुविख्यात लेखक गोल्ड- स्मिथ के 'विकार ऑफ वेल्फील्ड' के अनुकरण पर रचा गया है । पंतुलुजी नै उपन्यास की वस्तु और पात्रो मे ही नहीं अपितु वातावरण की सृष्टि में भी भारतीयता लाने का सफल प्रयत्न किया, अत. यह एक प्रकार से रूपान्तर होते हुए भी मौलिक प्रतीत होता है । यह उपन्यास आन्ध्र देश में इतना लोकप्रिय हुआ कि इममे प्रभावित हो एक अंग्रेज विद्वान ने पुन. अंग्रेजी मे 'फारचून्स हवील' नाम से इसका रूपान्तर किया। 'लन्दन टाइम्स' ने इन रूपान्तर की बड़ी प्रस्तुति की। मद्रास के प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक 'हिन्दू' ने लिखा था-'राजशेखर चरित्र' ने तेलुगु साहित्य मे एक नये युग का शुभारंभ किया है। इस उपन्यास में चणित बरागी की स्वर्ण विद्या, मुब्रह्मण्यम् की परिहाम बुद्धि और कृष्णगजपति की उदारता अविस्मरणीय है । शैली मनोहर एवं मरस है। घटनाओं की रोचकता के कारण अन्त तक पाठक में औत्सुक्य बनाये रखने में यह उपन्यास २९ सफल रहा । ममाज सुधारवादी दृष्टिकोण को लेकर इस उपन्याग का प्रणयन हुआ है।' उन्हीं दिनो मे श्री पडविल्लि रामचन्दुइ ने 'धर्मवती विलास', 'मालती राघवमु' और 'लक्ष्मी सुन्दर विजयमु' नामक तीन उपन्याग रचे । ये तीनों 'चिन्तामणि' पत्रिका द्वारा पुरस्कृत हुए हैं। प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास : श्री वीरेशलिंगम पतुलु के बाद श्री चिलकमति लक्ष्मी नरसिंहम में न केवल तेलुगु उपन्याम को अपनी अनुपम प्रतिभा द्वारा ममृद्ध किया अपितु उसे विविधता, व्यापकता एवं लोकप्रियता भी प्रदान की। आपने 'रामचन्द्र विजयमु' नाम से अपना प्रथम मौलिक उपन्यास प्रकाशित कर 'चिन्तामगि' का पुरस्कार प्राप्त किया। इसमे आन्ध्र देश का जनजीवन प्रतिविदित हुआ है । तत्कालीन आन्ध्र समाज का इसे दर्पण कहे तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। इसके पश्चात् आपने क्रमश 'हेमलता', 'अहल्या बाई' और 'कर्पूर मंजरी' नाम से तीन उपन्यासों का प्रणयन किया। ये तीनो चितामणि के प्रथम पुरस्कार से सम्मानित हुए। इनमे 'हेमलता' व 'अहल्या बाई' ऐतिहासिक उपन्यास है । इस प्रकार चिलकति जी ने सामाजिक उपन्यामो के साथ ऐतिहासिक उपन्यासो का भी श्रीगणेश किया। आप का 'सौन्दर्य तिलक' पौराणिक कथा से सम्बन्धित उपन्यास है। आप के उपन्यासो में 'रामचन्द्र विजयम्' के पश्चात् 'कर्पूर मजरी' विशेष लोकप्रिय हुआ है । 'गणपति' आपका हास्य रम प्रधान उपन्यास है । इसका प्रत्येक वाक्य पढकर पाठक हँसी के मारे लोट-पोट होता जाता है। शिष्ट हास्य का पोपग होने के कारण इसे मर्वत्र समादर प्राप्त हुआ है । आप के उपन्यासो की लोकप्रियता का मूल मत्र कथोपकथन मे कोशल, मनोहर शैली तथा स्फुट हास्य है। आपकी भाषा निर्दोष एव प्रभावयुक्त होती है। वातावरण की सजीवता, भावाभिव्यजन में चुटीलापन आपकी अन्य विशेषताएँ है । 'शापमु' कलिंगदेश से सम्बन्धित एक और उपन्यास है। आप एक कुशल मौलिक उपन्यासकार ही नही अपितु एक अच्छे अनुवादक भी है । बगाल के यशस्वी लेखक रमेशदत्त कृत 'लेक आफ पाम्पस' का आपने 'मुधा-शरत्चन्द्र' नाम से तेलुगु में रूपान्तर किया है। आपकी तुलना अंग्रेजी उपन्यासकार 'स्काट' से ही की जाती है। उपन्याम की बढती लोकप्रियता को देख अनेक पुस्तक प्रकाशन संस्थाओं ने उपन्यास प्रकाशित करना प्रारम्भ किया और साथ ही उत्तम कृतियो को पुरस्कृत कर प्रोत्साहित भी किया। 'विज्ञान चन्द्रिका ग्रन्थ मडली' नामक आधुनिक तेलुगु उपन्यास पुस्तक प्रकाशन सस्था ने कई एक उनम ऐतिहामिक अन्यास प्रकागित किये , उनमे श्री भागरागु नागयगमूर्ति कृत "विमला देवी' और 'चन्द्रगुप्त', श्री वेलाल गुयाराव द्वारा विरचित 'रानी सयुक्ता' और श्री क्षेतवरपु वेकट शास्त्री का लिसा 'रायचूर युद्धमु' विशेष रूप से उल्लेखनीय है । श्री वैकट गास्त्री के अन्य उपन्यामो में 'अग्रहारमु', 'पूर्णानन्दमु' और 'इच्छिनी कुमारी' विख्यात है । उपर्युक्त उपन्यामो में शिल्प को प्रमुखता है, भाषा निर्दोष है, शैली में गति होने के कारण ये पाठको के प्रिय हो गये है। राजनैतिक चेतना का प्रभाय: देश में स्वतन्त्र आन्दोलन जोर पकड़ने लगा। उसका प्रभाव जन-मानम पर ही नहीं अपितु माहित्य पर भी परिलक्षित होने लगा । आन्ध्र के सुप्रसिद्ध देशभक्त एव समाज-सुधारक श्री उन्नव लक्ष्मीनारायण पंतुलु ने 'मालपहिल' (हरिजन बस्ती) नाम से एक अत्युतम उपन्यास प्रस्तुत किया। इसमे राज- मैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक समस्याओ पर सम्यक् प्रकाश डाला गया । गांधी जी के आगमन से देश मे जो राष्ट्रीय जागृति पैदा हुई, उसके परिणाम- स्वरूप सामाजिक मान्यताएँ बदलने लगी। ऐसी स्थिति में गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों में हरिजनोद्धार का कथावस्तु बनाकर लक्ष्मीनारायण पंतुलु जी ने उपयुक्त उपन्यास की सृष्टि की। भापा, शैली, व्यवहार, विचार- धारा, वातावरण इत्यादि सभी दृष्टियो से यह उपन्यास पूर्णत. तेलुगुपन को लिये हुए है । इसकी शैली ठंठ देहाती और भापा आम बोलचाल की है । कथोपकथन मे स्वाभाविकता और सहज माधुर्य पढते ही बनता है। चमार भगत रामदास (संघदाम) का पात्र लेखक की अपूर्व सृष्टि है । उसका चरित्र पवित्र है । सहनशीलता, अदम्य आत्मविश्वास और अपने 'हको के लिए लड़ने की प्रवृत्ति ने उसे एक सच्चा देशभक्त बनाया है । उपन्यास में यत्र-तत्र जेल-जीवन की कठिनाइयो, अधिकारियो के अमानवीय व्यवहार, दलित जातियो पर उच्च वर्ण वालो के रोमाचकारी अत्याचार इतने सजीव बन पड़े है । कि उपन्यास के पढ़ते समय तत्कालीन समाज का चित्र हमारे मामने प्रत्यक्ष होने लगता है। इस प्रकार यह उपन्यास तेलुगु साहित्य का कंठहार बना हुआ है। उन्नवजी से प्रेरणा पाकर कई लेखक इस दिशा में अग्रसर हुए । उनमें श्री विश्वनाथ सत्यनारायण का स्थान प्रथम है। मत्यनारायणजी ने दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे और आग भी लिखते जा रहे है । आपका विशालकाय उपन्यास 'वैयि पडगलु' (महर फग) में आन्ध्र देश के सास्कृतिक एवं सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है । लेखक एक तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं की सनातन आर्य धर्म और वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति गहरी आस्था है। आस्तिकता, धर्मपरायणता एव प्राचीन मान्यतामों का प्रतिपादन करते हुए नवीनता को लेखक ने अग्राह्य माना है। इसमें धर्मराव का आदर्श चरित्र 'गिरिका' के द्वारा देवदासी प्रथा के मूल में स्थित मदाशयता तथा 'मंगम्मा' पात्र के द्वारा वेश्या के प्रति भी तिरस्कार के स्थान पर अनुकम्पा के भाव प्रस्तुत किये हैं । सत्यनारायण की शैली पाडित्यपूर्ण, साहित्यिक एवं प्रवाहमान है । ऐतिहासिक उपन्यानो की रचना मे उनकी शैली और भी अधिक निसरी है । यह उपन्यास आन्ध्र विश्वविद्यालय द्वारा पुरस्कृत हुआ है । एकवीरा-सत्यनारायणजी के उपन्यासों में विशेष लोकप्रिय कृति 'एकवीरा, है । उपन्यास कला के ममस्त तत्वो का इसमे सम्यक निर्वाह हुआ है । कथावस्तु के संगठन मे पात्रो की सृष्टि मे, वार्तालाप के संयोजन मे, भावों के प्रदर्शन मे लेखक ने अनुपम कौशल का परिचय दिया है । यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है जो मधुरा की पृष्ठभूमि पर रचित है । वातावरण की सजीवता इस उपन्यास को अधिक लोकप्रिय बनाने में सहायक सिद्ध हुई है। चेलियलिकट्ट (सिन्धु की वेला) --आपका एक उत्तम सामाजिक उपन्यास है । रचना-कौशल और पात्रो के मानमिक विश्लेषण में लेखक को असाधारण सफलता प्राप्त हुई है । आपके अन्य उपन्यामो मे 'धर्म चक्रमु', 'वीर वल्लड़े, 'तेरचि राजु', 'कडिमि चेटु', 'मा बाबू', 'हा हा हूँ हूँ", 'स्वर्गानिकि निच्चनलु', 'अश्वमेध', 'अन्तरात्मा', 'देवतलयुद्धं', 'धूम रेख', 'पुलुल मत्याग्रह', 'बद्दन्न सेनानि', 'प्रोयु तुम्मेद', 'विष्णु शर्मा इग्लीषु चदुवु', ‘समुद्रपु दिब्ब' आदि हैं। श्री अडवि बापिराजु बहुमुखी प्रतिभासंपन्न कलाकार है। उनकी कृतियों मे शिल्ल की प्रधानता और कला-पक्ष का निखार देखने योग्य है। भाषा मे काव्यत्व और वार्तालाप मे नाटकीयता आपकी अन्य विशेषताएँ है। आपने ऐतिहासिक और सामाजिक दोनो प्रकार के उपन्याम रचे । 'हिम बिन्दु' और 'गोन गन्ना रेड्डी' ऐतिहासिक उपन्यास है, जो क्रमश, शातवाहन तथा काकतीय साम्राज्य के वैभव का सजीव चित्र हमारे समक्ष उपस्थित करते है । इनमे यथार्थ और कल्पना का गंगा-जमुना संगम हो गया है। बापिराजु की ख्याति का कारण उनका 'नारायण राव' नामक मामाजिक उपन्याम है । इनमे यात्रा सम्बन्धी विषयो के साथ आन्ध्र का जनजीवन चित्रित है । आन्ध्र की जीवन-सरणी का प्रतिविम्ब जिन थोडे से उपन्यासो मे हुआ है, उनमें 'नारायण राव' भी एक हैं । यह उपन्यास आन्ध्र-विश्वविद्यालय आधुनिक तेलुगु उपन्यास । - द्वारा पुरस्कृत हुआ है। आपके अन्य उपन्यासो में 'मधुर वाणी', 'कोनगी', 'जाजि मल्लि', 'नरडु', 'तूफान' आदि प्रसिद्ध है। सुवर्ण युग के कुछ पन्ने : ऐतिहासिक उपन्यासो की रचनाओ मे थी नीरि नरसिंह शास्त्री सिद्धहस्त है । आपने आन्ध्र के इतिहास से सम्बन्धित नीन महायुगों का परिचय कराते हुए क्रमशः 'नारायण भट्ट', 'रुद्रम देवी' और 'मल्ला रेड्डी' प्रस्तुत किये । ये चालुक्य, काकतीय और रेड्डी राजाओं के राज्य वैभव और आन्ध्र की संपन्नता का परिचय देते है । साथ ही राजनैतिक उलझनो, कुतो के साथ आन्ध्र की सामाजिक रीति-नीति व धर्म-कमों का भी। लेखक के गहन अध्ययन, अनुशीलन एवं अनुसंधान का परिणाम उपर्युक्त उपन्यास है उपन्यानों के कालनिक अंश को हटा दे तो इतिहास मान बचा रहेगा । पात्रो के मानसिक विश्लेपण और वातावरण की सजीवता में लेखक ने अपनी कुशलता का परिचय दिया है। पंडिताऊ भापा खटकती है। तेलुगु में ऐतिहासिक उपन्यासो की अपनी परपरा है। इनमे ऐतिहासिक घटनाओं के साथ मनोरम कल्पना और भावना का समावेश करके तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्र उपस्थित किया गया है। इस श्रेणी के उपन्यासो मे डॉ. काकर्ल नरसिंहम् कृत 'कनकाभिपेकमु' और 'रघुनाथरामुलु', श्रीमति मल्लादि वसुधरा द्वारा रचित 'तंजावूरि पतनमु' और 'सप्तपर्णी', श्री धूलिपाल श्री राममूर्ति का लिखा 'भुवन विजयमु', तेनटि सूरि कृत 'चेगीज खाँ' प्रशंसनीय है। - समस्यात्मक उपन्यास: पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से भारतीय समाज में परिवर्तन होने लगा। आर्थिक अव्यवस्था, राजनैतिक उलझन, धार्मिक जकड़वंदियाँ, नैतिक मापदण्डो में नये दष्टिकोण से पुनर्विचार----इत्यादि ने जनजीवन को अस्थिर बना दिया। इन विकृतियो से पूर्ण सामाजिक जीवन को स्वस्य एवं सुखी बनाने के अभिप्राय से विचारशील मेधावी लेखकों ने समाज का अध्ययन किया। परिणामस्वरूप विभिन्न दृष्टिकोण से मानव-जीवन को केन्द्र बनाकर समाज का मूल्याकन करने वाले उपन्यासो का प्रणयन हुआ । ऐसे लेखको में श्री कुटुम्बराब, गोपीचन्द्र, बुच्चियाबु, जी० वी० कृष्णराव आदि के नाम विशेष प्रसिद्ध है। श्री कुटुम्पराव के उपन्यासों मे 'चदुवु', 'वारसत्व', 'मिचिन मनिषि', 'पंचकल्याणि', जीवितम्', 'आडजन्म', 'कुलंलेनि पिल्ल', 'लेचिपोयिन मनिपि', 'कोत्त कोडलु', 'कोत्त अल्लुडु' इस श्रेणी के उत्तम उपन्यास है। सामाजिक व्यवस्था के चौखट में मनुष्य अपने विचारों को ६० तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं जब्त करके कैसे खुद बन्दी बने हुए है और उनसे मुक्त होने के लिए संघर्ष करते हुए मानव अपने आशयो की पूर्ति के लिए कैसे प्रयत्नशील है, सामाजिक रुग्णता से पीडित मानव स्वस्थ समाज के निर्माण में कैसे निरत है और इस सक्राति काल में मानव की कैसी दशा होती है --इन समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए मामाजिक व्यवस्था में नारी के उत्थान और पतन का भी समग्र चित्र कुटुम्बरावजी ने अपनी कृतियो मे अंकित किया है । गोपीचन्दजी ने अपने विशुद्ध मानवतावादी दृष्टिकोण द्वारा अपने उपन्यासो के माध्यम से भावात्मक क्राति का आह्वान किया है। वे एक लेखक ही नही बल्कि विचार एवं तत्ववेत्ता भी थे। अत पात्रो के चरित्रो के चित्रण मै तात्विक दृष्टि से आपका 'असमर्युनि जीव यात्र' विशेष जनप्रिय हुआ है । 'चीगटि महुलु' नामक उपन्यास मे आपने अपने पिता त्रिपुरनेनि रामस्वामी के जीवन के साथ तत्कालीन आन्ध्र देश की राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक दशा का सुन्दर चित्र खीचा है। आपने पडित परमेश्वर शास्त्री की 'वीलुनामा' नामक उपन्यास को हाल ही में साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। अन्य उपन्यासो मे 'परिवर्तन', 'पिल्ल तेम्मर', 'अतिम विजयं' आदि मुख्य है । गोपीचन्द की श्रेणी के लेखको में श्री जी० वी० कृष्ण राव की गणना होती है। आपने तेलुगु को सुन्दर उपन्यास प्रदान किये। उनमे 'कीलु बोम्मलु', 'चैत्र रथं', 'राम सेवलु' और 'पापि कोडलु' प्रख्यात है । श्री उत्पल लक्ष्मण राम कृत 'अतडु'--'आमे' (वह और उसकी) पत्र-प्रणाली पर रचित एक सुन्दर मनोवैज्ञानिक उपन्यास है । इसमे दो विभिन्न मनोवृत्ति बाले दंपति' का सहज मानसिक विश्लेपण हुआ है। बुच्चिबाबु ने 'चिवरकु मिगिलेदि' (जो शेष होगी) नाम से नवीन शैली में एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास का प्रणयन किया। यह अपनी शैली की विशिष्टता, चरित्र-चित्रण की मनोवैज्ञानिकता, सजीव भापा और अभिव्यक्ती- लिए विशेष प्रख्यात हुआ है। मानव-मन की अचेतन भावनाओ को रूप-कल्पना करके मनुष्य के व्यक्तित्व और सच्चे रूप का प्रतिनिधित्व कराने वाले अनेक उपन्यास तेलुगु में आये । उनमे श्री राचकोड विश्वनाथ शास्त्री कृत 'अल्प जीवि', श्री पिनिशेट्टि श्रीरामुलु द्वारा विरचित 'दत्तत' और 'ममता', श्री पोतुकूचि साम्वशिवरावकृत 'उदय किरणालु', इच्छापुरपु जगन्नाथ राव कृत 'गुलावी मुल्लु' आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय । , करण चमत्कार आधुनिक तेलुगु उपन्याम विद्रोह का स्वर : श्री गुडिपाटि वेंकटाचलम ने मामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध विद्रोह का झंडा लेकर तेलुगु साहित्य में एक बड़ी काति उपस्थित की। नर और नारी के सम्बन्धो पर अपने क्षोभ प्रकट करते हुए प्राचीन काल से नारी के प्रति जो अन्याय होता आ रहा है, उसे व्यंग्यात्मक कृतियों द्वारा दिखाया और उनकी खिल्ली उड़ायी । आपके उपन्यासो की कयावस्तु अन्धविश्वास, आर्थिक पराधीनता, यौनदासता, नारी की स्वेच्छाहीनता, ममाज की रीति-नीति इत्यादि के प्रति असंतोष के माय विद्रोह की भावना है। इनके चित्रण में आपने 'देवमिच्चिन भार्य', 'मैदानमु', 'कन्नीटि काल्व', 'मा कर्ममिट्ला कालिदि', 'शशिरेखा', 'जीवितादर्श' आदि उपन्यास लिखे। 'जीवितादर्श' मे एक प्रकार से लेखक का जीवन प्रतिबिंबित हुआ है। एक विलासी व्यक्ति भोग-विलाम से ऊब कर अन्त में संयम का पाठ पढता है और संन्यासी होता है । चलम की शैली मे जादू है जो पाठक को अन्त तक अपने माथ खीच ले जाती है । भाव-व्यक्तीकरण का अद्भुत कौशल और अनुभूतियो को उसी रूप में अभिव्यक्त करने की मरम व सजीव भापा चलम की अनुपम संपत्ति है । वे एक शैलीकार है । तेलुगु माहित्य के 'फ्राइड' माने जाते हैं । चलम का अनुकरण करते हुए लेखको का एक दल ही तैयार हो गया है । उनमे धनिकोडा अनुमंतराव, रावूरी भरद्वाज, श्रीमती लता के नाम विशेष प्रसिद्ध हैं । धनिकोंडा के उपन्यासो मे ‘मगुव मनसु' और 'जगदेक मुन्दरी क्लियोपात्रा' और श्रीमती लता के उपन्यामो में 'एडारि पुन्बुलु', 'वन किन्नेर', 'राग जलधि', 'वारिज', 'पथ विहीन', 'जीवन वंति', 'चरित्र शेपुलु' आदि प्रसिद्ध है। तेलुगु उपायाम वस्तु की विविधता की दृष्टि मे समृद्ध तो है, साथ ही रसो की दृष्टि से भी कम ममृद्ध नहीं है । तेलुगु में विशेष हास्य का पोषण करने वाले असंख्य उपन्यास रचे गये हैं। उनमे श्री मोक्कपाटि नरसिंह शास्त्रीकृत 'दारिस्टर पार्वतीशम्' का स्थान अद्वितीय है । इस में एक सनातन धर्मावलंबी युवक की विलायती यात्रा का रोचक वृत्तात हास्य प्रधान शैली में वर्णित है । उपन्यास आद्योपान्त हास्यरस से ओतप्रोत है । यह एक चरित्र- प्रधान उपन्याम है। इस वर्ग के अन्य उपन्यासों में श्री मुनिमाणिक्यम् का 'उपाध्यायुडु', श्री जलसूत्रम् रुक्मिणीनाथ शास्त्री कृत 'देवय्या' उल्लेखनीय . राजनैतिक आन्दोलनों का प्रभाव भी. तेलुगु माहित्य के अन्य अंगों पर जैसा परिलक्षित होता है वैसा प्रभाव उपन्यामो में भी देखा जा सकता है।

तेलुगु याङ्मय : विविध विधाएं . मभी प्रकार की गगनैतिक विचारधाराओ तया वादो की पुष्टि में जो उपन्याम आये, उनमे महीधर जगमोहन राव कृत 'रय नमानु', 'ओनमानु', 'दवानलमु' और 'कुत्तल वतेन' विशेष प्रम्यात हैं। पट्टिकोट आल्वार म्वामी कृत 'प्रजल मनिपि' मेलुगाना मे निजामशाही के विग्द्ध विप्नव और जागृति का परिचय कराता है। अन्य युवा पीढी के लेखक भी बडे ही विश्वास के माय इम क्षेत्र में आगे वढ रहे हैं । शारदा ने अल्पायु मे ही 'एदि गत्यं', 'मंचि चेटु', 'अपस्वरालु' नाम से तीन सुन्दर मामाजिक उपन्यामो का प्रणयन किया है। अन्य उपन्यामो मे बलिवाड कान्ताराव का 'दगा पनि तम्मुडु', पोरंकि दक्षिणामूर्ति कृत 'निवेदन' और 'संघ जीवुलु', शिंगराजु लिंगमूनि विरचित 'रंगुल मेड', मंजुश्री का 'ऋणानु बंधम्', घटिष्ट कृत 'केरटालु', उपश्री का 'ज्वलित ज्वाला', माइभूपि के 'तीरनि वांधव्यालु' और 'बोधवि', इमुकपल्लि लक्ष्मी-नरसिंह शास्त्री कृत 'मंचु तेरलु' और 'सघ जीवुलु', एन० आर० चन्दूर कृत 'शिक्षा', राघव कृत 'हेम रेखलु' और गोल्लपूडि मारुतीगव के एक दर्जन के करीब उपन्याम इस परम्परा को परिपुष्ट बना रहे है। महिला लेखिकाओ का योगदान भी तेलुगु उपन्याम में अविस्मरणीय है। नारी-ममम्याओ के चित्रण के माथ नारी दृष्टि में समाज का मूल्यांकन लेखिकाओ द्वारा नयी रीति मे हुआ है। कुछ लेखिकाओ ने ऐतिहामिक और पौराणिक उपन्याम भी लिये है। इन लेखिकाओ के उपन्यामो में श्रीमती जयंती सूरम्मा का 'मुदक्षिणा चरित्रमु', पुल्नुगुति लक्ष्मी नरसमांबा कृत 'मुभद्रा', 'योगेश्वरी' और 'अन्नपूर्णा', और कनुपति वरलक्षम्मा कृत 'घमुमति', डॉ० पी० श्रीदेवी कृत 'कालातीत व्यक्तुलु' मालती चन्दूर का 'चेदल पुरुगु', लक्ष्मी रघुराम का 'धन्य जीवुलु', के० रामलक्ष्मी कृत 'मेरुपु तीगे', 'अवतलि गर्दु', मुप्पाल रंगनायकम्मा के 'कृष्णवेणी' और 'वलि पीठमु', कोरि कोसल्यादेवी कृत 'चक्र भ्रमणमु', 'शंखुतीर्घमु' और 'धर्म चक्रमु' डि० प्रमीला कुमारी कृत 'तेगिन तीगलु' उल्लेखनीय है। अन्तिम तीनो लेखिकाओं के उपन्याम 'आन्ध्र प्रभा' माप्ताहिक पत्र द्वारा चलायी गयी उपन्यास प्रतियोगता मे पुरस्कृत हैं। इस प्रकार आज तेलुगु उपन्यास प्रगति के पथ पर अग्नमर हो रहा है । अतः हम विश्वाम कर सकते है कि तेलुगु उपन्याम का भविष्य उज्वल है।

तेलुगु नाटक साहित्य तेलुगु नाटक साहित्य का इतिहास १०६ वर्ष पुराना है । वैसे १६वी शती मे ही तेलुगु नाटक के अस्तित्व का प्रमाण "लक्षण मार संग्रह" काव्य से प्राप्त होता जाता है । १४वी शताब्दी में श्रीनाथ द्वारा रचित “क्रीडाभिगमम्" एक सफल वीथि नाटक है । १८७० में धारवाड मे स्थापित "आप्तेकर हिन्दू डमेटिक कंपनी'' ने आन्ध्र के विभिन्न केद्रों में ताडपत्रो के पण्डालो मे हिन्दी नाटकों का अद्भुत प्रदर्शन किया। सर्वप्रथम इसी कम्पनी मे शीशे के दीप, धक् धक् चमकने वाले हार, विभिन्न रंगीन दृश्यो वाले परदे इत्यादि अपूर्व उपकरणों का प्रयोग करके प्रेक्षकों मे नाटक के प्रति अभिरुचि जागृति की । उनकी देखा-देवी आन्ध्र के विभिन्न केन्द्रों में नाटक मण्डलिया स्थापित हुई। असंख्य पौराणिक एवं ऐतिहासिक नाटकों का प्रदर्शन किया। इन नाटकों के द्वारा अनेक कुशल अभिनेता एवं अभिनेत्रियां सामने आयी और बडी द्रुत गति के साथ तेलुगु रंगमंच का विकास होने लगा। विशेषकर राजमन्डी, मछलीपट्टणम्, विजयवाडा, गुटूर, नेल्लूरु, बल्लारी आदि शहरो में स्थापित नाटक कम्पनियो ने तेलुगु नाटक एवं रंगमंच के विकाम मे अभूतपूर्व योगदान दिया । वल्लारी में मरम विनोदिनी ममा के नाम से एक नाटक समाज की स्थापना करके स्वर्गीय धर्मवरम् कृष्णमाचार्युलु ने असंख्य अंग्रेजी, संस्कृत व तेलुगु नाटकों का प्रदर्शन कराया । तेलुगु रंगमंच में बल्लारी राघवाचार्य के आगमन से एक अपूर्व क्राति पैदा हुई। श्री राघवाचार्य ने "शैक्मपियर" के कई नाटको का प्रदर्शन वल्लारी मद्रास, विजयवाडा आदि केन्द्रों में ही नहीं बल्कि लंदन में भी प्रदर्शित करके प्रेक्षकों से प्रशंसा प्राप्त कर ली है । आन्ध्र के महानटों में इनका स्थान सर्वप्रथम माना जाता है । इनके द्वारा अभिनीत नाटकों मे दुर्योधन, कम, हिरण्यकश्यपु आदि पात्र आज भी उनके यश और अभिनय कुगता अद्भुत उदाहरण माने जाते है।

६४ तेलुगु वाङ्मय - विविध विधाएं तेलुगु नाटक के इतिहास मे "सुरभि नाटक कंपनी" का योगदान अविस्मरणीय है। नाटक कला को ही अपना पेशा बनाकर परिवारों के साथ गाँव-गाँव मे जाकर इस कम्पनी ने नाटको का प्रदर्शन किया । इस कम्पनी का इतिहास भी एक शताब्दी का है। राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ तेलुगु नाटक साहित्य मे भी अभूतपूर्व क्रांति हुई । इस आन्दोलन के प्रभाव से "रोशनारा", "रमपुत्र विजय", "राणा प्रताप", "दुर्गादास", "राजसिंह", "शिवाजी", "चन्द्रगुप्त", "मेवाड़ पतन", इत्यादि असख्य नाटक प्रकाश मे आये । दामराजु पुण्डरीकाक्ष ने "गांधी विजयम्" नाम से राष्ट्रीय विचारधारा से ओतप्रोत एक नाटक लिखा, जिसके पात्र गाँधीजी, तिनक, मोतीलाल नेहरू इत्यादि ने प्रेक्षको के दिल मे देश- भक्ति का वीजारोपण किया । १६०० से १६३० तक तेलुगु रगमंच के विकास मे जमीदारो एवं सम्पन्न परिवार के उदारमना लोगो ने योगदान दिया । सारा खर्च उठा कर विभिन्न नगरो में प्रदर्शन करवाया । थिएटर निर्मित किये, लेखकों को प्रोत्साहन दिया और नाटक कम्पनियां भी चलायी । लेकिन इसके बाद तेलुगु रंगमंच ठेकेदारों के हाथों में चला गया। जहां पहले नाटकों का प्रदर्शन एक विशुद्ध कला मानकर उनकी आराधना होती थी, वहाँ पर १६३० के बाद एक व्यावमायिक रूप धारण करके नाटक अपनी प्राचीन गरिमा मे वंचित होने लगे । लगभग इसी समय में सिनेमा का आविर्भाव हुआ, फलत तेलुगु रंगमंच के विख्यात नट और नटी फिल्म-क्षेत्र में चले गये। नाटकगृह सिनेमा गृह के रूप मे परिवर्तित होने लगे। आन्ध्र नाटक कला परिषद-आन्ध्र मे एक ओर जहाँ पेशेवर नाटक और ठेकेदार नाटक विस्तृत पैमाने पर चल रहे थे, उसी समय १६२६ मे तेनाली में 'आन्ध्र नाटक कला परिषद' की स्थापना हुई। इसमे अनेक नाटककारो, अभिनेता और अभिनेत्रियो मे एक नया उत्साह आया। इस प्रकार नाटक कला और रंगमंच के विकाम मे एक नये अध्याय का मूत्रपात हुआ । वास्तव मे नाटक कला परिषद की स्थापना के पश्चात ही अत्यधिक सामाजिक नाटक रचे गये व प्रदर्शित होने लगे। इसके पूर्व भी कतिपय सामाजिक नाटक रचे गये। किंतु उनमें दो-चार नाटक ही विशेष लोकप्रिय हुए। वैसे नाटक कला परिपद की स्थापना १६२६ में हुई। किंतु १६४६ तक परिषद के द्वारा उल्लेखनीय कार्यक्रम प्रस्तुत नही हुए। प्रारम्भ मे परिषद के द्वारा नाटक प्रतियोगिताएं संचालित होती थी और श्रेष्ठ नाटको व कलाकारो को नकद पुरस्कार तथा म्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया जाता था। यह - कार्यक्रम तेलुगु नाटक माहित्य १६४६ के बाद पुनः चालू हुआ। उत्तम सामाजिक रचनाओं को पुरस्कार देने की व्यवस्था करके नाटक लेखन व प्रदर्शन के लिये भी कुछ नियम बनाये गए । परिपद का वार्षिक आयोजन एक विशाल मास्कृतिक समारोह के रूप में होता था। जनता उन नाटको को देख मनोरंजन के साथ मामाजिक विकृतियो से दूर रहने की प्रेरणा भी ग्रहण करती थी। १६४६ मे नाटक कला परिषद ने नाटक-प्रतियोगिता का आयोजन किया । उम संदर्भ मे आचार्य आयेय ने श्री कोडमुदि गोपाल राय शर्मा कृत "एदुरीता" (विपरीत तर) नाटक का प्रदर्शन करके उत्तम अभिनेता तथा दर्शक के पुरस्कार प्राप्त किये। यह नाटक वर्णान्तर विवाहों के समर्थन मे रचा गया था। इसके उपरान सामाजिक कुरीतियो तथा अन्धविश्वास के खण्डन में अनेक उत्तम नाटक प्रकाश में आये। तदुपरात १६४६ मे आचार्य आत्रेय द्वारा विरचित "एन० जी० ओ०" (गुमाश्ता) सर्वोत्तम नाटक घोपित हुआ। आय के अन्य नाटको मे "ईनाई" (आज) हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रबोध करने वाला नाटक पर्याप्त लोकप्रिय हुआ । इनके द्वारा प्रणीत "विश्व शान्ति" (युद्ध की विभापिका का खण्डन व शान्ति की स्थापना पर बल देने वाला नाटक) "कप्तलु" (मेढक), "भयं" तथा "सम्राट अशोक" आदि मफलतापूर्वक मैकडों बार मंच पर अभिनीत हुए । “कसलु' सामाजिक कुरीतियों पर एक व्यंग्यप्रधान नाटक है तो "सम्राट अशोक" प्राचीन इतिहास की ममकालीन स्थिति पर व्याख्यात्मक एवं प्रतीकात्मक नाटक है। वैसे श्री गुरजाड अप्पाराव ने "कन्याशुलकम' नाटक रचकर तेलुगु नाटक-जगत में उन्नीसवी शती के उतरार्ध मे ही अभूतपूर्व क्रांति पैदा की थी । तदनन्तर अंग्रेजी भापा के विख्यात नाटककार इमन के नाटको के आधार पर राजमन्नार, वल्लारी राघवाचार्य इत्यादि ने समाज मे नारी के प्रति होने वाले अत्याचारों की कटु आलोचना करते हुए अनेक नाटक रचे । समाज में जमीदारों व नवाबों तथा उच्च वर्ग द्वारा निम्नवर्ग के प्रति होने वाले शोपग पर स्वतंत्रता के पूर्व ही कई नाटक समाज के सम्मुख प्रस्तुत हुए। परन्तु १६४७ तथा १६५५ के बीच जो नाटक रचे गये उनमें कृपक, मजदूर तथा जमीदारों के बीच होने वाले संघर्ष को अधिक प्राथमिकता देते हुए असंख्य नाटक रचे गये। इन नाटकों के नायक पीडित, शोपित एवं दलित वर्ग के नेता हैं। आत्रेय ने समाज, शासन-व्यवस्था, पीडित प्रजा का आक्रन्दन, अमहन- शीलता, क्रोध इत्यादि गामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विषमताओं पर करारे की चोट करते हुए जनता का प्रतिनिधित्व किया । जनता की समस्त फा०-५ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं प्रकार की समस्याओं का ययार्थ चित्रण करते हुए उगमें जागृति पैदा करने वाले नाटक रचकर आचार्य आय य आधुनिक नाटक के युगकर्ता बन गए । आत्रेय के अनुकरण पर दलित वा के जीवन मे सम्बन्धित निरामा, व्यथा, कुण्ठा अनास्था तथा विषमताओं का चित्रण करते हुए श्री अनिशेट्टि सुब्बाराव ने "गालि मेडलु" (हवामहल), श्री पितिशेट्टि श्री राममूर्ति ने "कुल लेनि पिल्ल" (निम्न जाति को युवती), "पल्ले पडुचु" (देहाती युवती), “अन्नाचलेल्लु" (भाई-बहन). "पंजरं लोनि पक्षलु" (पिंजडे के पक्षी) रचे जो मंच पर अनेक वार मफलतापूर्वक मंचित हुए । तेलुगु नाटक-क्षेत्र में आन्ध्र नाटक कला परिपद के माथ दो-तीन अन्य मंस्थाओं ने भी अभूतपूर्व प्रयोग किये। उनमे अत्यन्त उल्लेखनीय प्रथाम "आन्ध्र विश्व कला परिषद" (आन्ध्र विश्वविद्यालय वालटेर) के द्वारा स्थापित "प्रयोगात्मक नाटक मंन (Experimental Theatre) तथा १६४५ में विजयवाडा में डॉ० राजा राव के पर्यवेक्षण में स्थापित "प्रजा नाट्य मंडली' द्वारा हुए है। १६४४-१६६३ के वीच आन्ध्र विश्वविद्यालय के नाटक समाज के महयोग से लगभग १७५ छोटे व वडे नाटको का प्रदर्शन करके तेलुगु नाटक रंगमंच के क्षेत्र में अभूतपूर्व चेतना पैदा की । १६४३- १६६३ के मध्य जो आन्ध्राभ्युदय उत्सव मनाये गये, उनके द्वारा विद्यार्थी- शिक्षकों के बीच तेलुगु नाटक-प्रदर्शन व प्रयोग सम्बन्धी कार्यक्रमों मे अनुपम जागृति हुई। इन उत्मवो के सन्दर्भ में अन्तरकालेज नाटक प्रतियोगिताएँ आयोजित हुई, जिनमें उनम नाटक, अभिनेता, प्रदर्शन एवं नाटककार भी पुरस्कृत किये जाते थे। इस मस्या की ओर मे दर्जनो सामाजिक, ऐतिहासिक, समस्याप्रधान, संगीत व नृत्य रूपक, गेयात्मक मूक नाटक तया अंग्रेजी व हिन्दी नाटक भी प्रदगित हो प्रशंसित हुए है । १६४५ मे स्थापित प्रजा नाट्य मण्डली की ओर से श्री सुंदर सत्यनारायण नथा वामिरेड्डी भास्कर राव द्वारा संयुक्त म्प में रचित "मुदडुगु" (आगे कदम) तथा "मा भूमि' (हमारी जमीन) अनेक नगरो मे सफलतापूर्वक मंचित हुए। १२ प्रदर्शनो के पश्चात तत्कालीन शामन ने 'मुंदडुगु' नाटक के प्रदर्शन पर रोक लगा दी और वह नाटक जब्त हुआ। तेलुगु नाटक रंगमंच के विकास में अनुपम योगदान देने वाला नाटक "समाज तेलुगु लिटिल थिएटर" है । इसके संस्थापक श्री कोप्परपु मुम्बाराव ने न केवल अनेक नाटक रचकर सफलतापूर्वक उनका प्रदर्शन कराया अपितु नाटक कला सम्बन्धी सैकडों तेलुगु व अंग्रेजी की पुस्तकों का एक मुन्दर पुस्तकालय भी स्थापित किया।

. तेलुगु नाटक माहित्य इसके अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश नाट्य संघ, आन्ध्र नाटक कला परिषद, मंगीत नाटक अकादमी इत्यादि के संयुक्त तत्वावधान में प्रतिवर्ष नाटकोत्सव मनाये जाते हैं। इन संम्पाओ ने नाट्य विद्यालय का भी मंचालन किया । तेलुगु नाटक-क्षेत्र मे पुनर्जागरण पैदा करने के विचार से राजमहेन्द्री के "राघव कला ममिति", "वेकटगिरि नाटक समाज" यापट्ला की “कलावाणी", विजयवाडा का "रमना ममास्य". श्रीकाकुलम का "नटराज कला मन्दिर", अनन्तपुर का "ललित कला मन्दिर", पालकोल्लु को "आन्ध्र नाटक मंडली", कोप्परपु सुब्बाराव की "नाटक कला परिपत्तु", नरसापुरम की "नाटक कला परिपत्तु" कूडूर का "संस्कृति सम्मेलन" तथा अन्यान्य ललित कला परिपत्तु, रायल नाटक कला परिपत्तु, इत्यादि असंख्य नाटक ममाजो ने नाटक प्रदर्शन तयोगिताएं चलाकर उत्तम नाटक, नटन्नटी, प्रदर्शन, रंगकर्मी इत्यादि को पुरस्कार, पदक, प्रमाण-पत्र एवं आर्थिक महायता प्रदान करके तेलुगु रंगमंच के विकास में अनुपम योगदान दिया । इस प्रकार नाटक ममाजी व संस्थाओ द्वारा प्रोत्साहन पाकर नाटक लेखक कला व प्रदर्शन मे अनेक नवीन प्रयोग किये गये । नाटक वस्तु मे आश्चर्य- जनक परिवर्तन आया, मामाजिक चेतना, "कमिटमेंट" प्रधान नाटक रचे गये । नारी पात्रों के बिना भी नाटक लिये गये । फाइड, कार्लमासं, फेडरिक आदि मनीषियों के विचारो को प्रतिविम्बित करने वाले नाटक भी रचे गये। कोरंपाटि गंगाधर राव ने ८८ नाटक रचकर विभिन्न प्रकार के प्रयोग किये । "तस्मात जानत", "लोक पोकडा" आदि इनके नाटक प्रेक्षको मे अभिरुचि पैदा करने में सफल रहे । तेलुगु के मुप्रमिद्ध नाटककारी मे भीमन्ना, कोडालि गोपाल राव, बेन्लम- कोंड रामदाम, अंगर मूर्याराव, पी० वी० दरमराजु, रायि कोडल राव, कोर्लपाटि श्रीराममूर्ति, वेदात कनि. पडान, चिल्लर भाव नारायण, भमिद्धि- पाटि कामेश्वर राव, राधाकृष्ण, के० एल० नरसिंहाणाम, गेल्लपूडि मास्ती रा, श्रीवात्मव, मोमंचि यज्ञन्न शास्त्री आदि प्रमुख है। श्री मी० नागभूषणान 'शशि थिएटर्स' की ओर से "रक्त कन्नीर" (खून के आंमू) अब तक ३०० बार आन्ध्र मे प्रदर्शित करके तेलुगु रंगमंच तहलका मचा दिया । सर्वश्री राचकोड विश्वनाथ शास्त्री, कोडमुदि श्रीराम- मूर्ति, मंथा वैकट रमण, आर० वि० एम० गणेश पात्रो, एन० आर० नंदी, पलिगुम्मि पद्मराजु, राघव, रामस्वामी, दुच्चिबाबू, मच्चिदानन्द शास्त्री, कुंटुबरावा, मी० नारायण रेड्डी, गोरा शास्त्री, अमरेन्द्र, हितश्री, अमंचल गोपाल राव, चिल्लर भाव नारायण, वेणु, के० वी० रमणा रेड्डी नार्ल मे तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं वेकटेश्वर राव आदि असंख्य नाटककारो ने तेलुगु नाटक साहित्य के विकास मे अनुपम प्रतिभा का योगदान किया है। आज आन्ध्र मे सामाजिक चेतना को दृष्टि में रखते हुए तेलुगु रंगमंच मे प्रयोगात्मक नाटक प्रस्तुत किये जा रहे है । श्री बी० नरसिंग राव ने "जन नाट्य मंडली" (हैदराबाद) स्थापित कर "Street Corner Plays" (नुक्कड नाटक) प्रदर्शित करना प्रारम्भ किया। "थिएटर आर्ट्स की ओर से गद्दर भी इस विधा को अधिक लोकप्रिय बनाने मे संलग्न है । गली-कूचों के नुक्कडो पर ३०-४५ मिनट के अन्दर किसी प्रकार के अलंकारों के बिना गाँव व शहरों में भी ऐसे नाटक प्रदर्शित किये जा रहे है। इन नाटको की विशेषता यह है कि गली के किमी नुक्कड पर साधारण दरजे से पर्दे का उपयोग करके नाटक प्रदर्शित किये जाते हैं । एक व्यक्ति समय, संदर्भ व घटना के आधार पर अनेक पात्रों का रूप धरकर अभिनय करता है। इस प्रकार मचित होने वाले अनेक तेलुगु नाटको के माथ बगला के प्रख्यात नाटककार श्री बादल सरकार का जुलूस "ऊरेगिंपु" नाम मे वीसो बार मंचित होकर जनप्रिय हुआ है। अन्त में तेलुगु नाटक एवं रंगमंच की लोकप्रियता का यही एक उदाहरण माना जा सकता है कि आजकल तेलुगु मे एक हजार के लगभग नाटक तथा ६००० के करीब एकांकी रचे गये है और तेलुगु नाटक देखने कवीन्द्र रविन्द्र- नाथ टैगोर स्वयं विजयावाडा पधारे और नाट्य-सम्राट स्वर्गीय पृथ्वीराज कपूर ने तेलुगु नाटक परिपद के वार्षिकोत्सव में उपस्थित होकर न केवल प्रमुख कलाकारों को पुरस्कार प्रदान किये अपितु गद्गद् होकर तेलुगु रंगमंच की सफलता की हार्दिक प्रशंसा भी की।

७ तेलुगु का समीक्षा-साहित्य तेलुगु मे ममीक्षा-साहित्य का प्रादुर्भाव १६वी शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ और वह बराबर प्रगति को प्राप्त करता जा रहा है। तेलुगु के सम्पूर्ण-ममीक्षा साहित्य को हम स्थूल रूप से दो भागो में विभक्त कर सकते है । तेलुगु भाषा रो सम्बन्धित समीक्षा और दूसरा माहित्य मे सम्बन्धित समीक्षा । पाश्चात्य भाषा शास्त्रवेत्ताओं ने बडी छानबीन के उपरान्त अपनी भापाओ के लिए जो सिद्धान्त निर्धारित किये, उनका अपनी भाषाओ के साथ समन्वय कर नयी रीतियों में यहाँ के विद्वानों ने विमर्शनात्मक ग्रन्थ प्रस्तुत किये । कुछ ऐसे भी ग्रन्थ रचे गये है जिनमे केवल तेलुगु भाषा से सम्बन्धित समीक्षा ही नहीं अपितु तेलुगु के साथ अन्य दाक्षिणात्य भाषाओ के सम्बन्ध पर विचार किया गया है । ये समीक्षा-अन्य भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्व- पूर्ण हैं । इस प्रकार तेलुगु मे ममीक्षा-शास्त्र ग्रन्थों के प्रणयन का सूत्रपात हुआ। गद्य साहित्य के विभिन्न अंग एवं उपांगो का विकास भी होने लगा था। "गद्य ब्रह्म" नाम से विख्यात श्री वीरेशलिंगम् ने "विवेकबधिनी", "सतीहित बोधिनी" और "हास्य संजीवनी" नामक पत्रो में विमर्शनात्मक लेख लिखना प्रारम्भ कर दिया। श्री वीरेशलिगम् केवा कवि, नाटककार, कहानीकार और उपन्यासकार ही नहीं थे अपितु वे आलोचक भी थे। उन्होंने देखा कि लोग मनमाने ढंग पर रचनाएँ करते जा रहे हैं । उनका समुचित रूप से परिष्कार न किया जाए तो साहित्य के विगडने की संभावना थी । अतः उन्होंने उन रचनाओ पर आलोचना रूपी अंकुश का प्रहार किया । ये तेलुगु साहित्य के "महावीर प्रमाद द्विवेदी" कहे जा सकते है । इन्होंने भी द्विवेदी जी की तरह पत्र-पत्रिकाओ में अपने आलोचनात्मक लेखो द्वारा काव्य और कवियों के गुण-दोपो का निरूपण किया। माथ ही माथ आलोचनात्मक ग्रन्थ भी प्रकाशित किये है। इनका प्रथम ममीक्षा ग्रन्थ 'कोक्कोड वेकटरत्न कविकृत गेलुगु वामग : विविध विधाएं विग्रहाम रिमर्शनग' है। मग नाहित्विक मनीशारातियों का माय नही, परन्तु इसमें व्यक्ति-दूपण गटकना है। तलुगु मे ममीक्षा-माहित्य का प्रारम्भिक ममय पत्र विकाओं में विमगं- नात्मक लेख प्रकाणित करने तक मोमित रहा है । उममें विवेकवधिनी', 'मुद्रित ग्रन्य चितामणि', 'कलावती', 'आन्ध्र भापा मंजीवनी' आदि पत्रिकाओं में विशेष म्प में गनीक्षा प्रधान निवन्ध प्रकाशित होते थे और इनमें 'रेफद्धय', 'पायोचित भापा' आदि विषयों पर आलोचना चलती थी। क्रमश यह आलोचना पुस्तक मप में होने लगी। श्री टी० एम० शेषगिरि शास्त्री जी ने 'अर्धानुमार तत्य' और 'आन्ध्र शब्द तत्वम्' नाम रो दो समीक्षा अन्य प्रकाशित किये । यह सन् १८७३ की बात है। फिर ५ वर्ष के उपरान्त श्री गोपालराव नायुडू ने तेलुगु भाषा के सम्बन्ध में बड़ी छान-चीन की और इस अनुसंधान के परिणामस्वरूप 'आन्ध्र भाषा चरित्र संग्रहम्' (तेलुगु भाषा का इतिहास सग्रह) नामक ग्रन्य तेलुगु वाङ्मय को भेंट किया। भापा मम्बन्धी आलोचनात्मक ग्रन्थी के माथ अलंकार शास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों की रचना अधिक होने लगी। श्री धीरेलिगम पतुलुजी न वालको के उपयोगार्थ 'काव्य संग्रह' और 'अलकार संग्रह' नामक दा पुस्तक लिखी । 'अलकार सग्रह' नाम से श्री पी० रगाचायुलुजी ने भी एक पुस्तक लिखी है । श्री ए० वरदाचारीजी ने 'तेलुगु वचन (गद्य) रचना' नाम से गद्य साहित्य पर एक समीक्षात्मक ग्रन्य उपस्थित किया। श्री एम० एच० सुब्बरायुडु जी ने 'उपाध्याय बोधिनी' और 'उत्कलेखन चन्द्रिका' लिखी। श्री कृत 'वर्ण निर्णय' भी एक उत्तम कृति है। श्री काशीभट्ट ब्रह्मय्य शास्त्री न भास्कर कवि पर "भास्कररोदंतम्' नामक एक समीक्षात्मक ग्रन्य लिखा । प्रेस की स्थापना के उपरान्त धड़ाधड़ प्राचान ग्रन्थ, जो अमुद्रित थ, प्रकाशित होन लग । उस समय उन ग्रन्यो की भूमिका के रूप म उन उन काव्यो की जा समाक्षात्मक भूमिका लिखो गयी, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये आमुख अत्यन्त मूल्यवान व उपयोगी साबित हुए । ये आमुख ५-१० पृष्ठ की साधारण आलाचनाएं नहीं अपितु ५० पृष्ठो स लकर सौ-डेढ़ सा पृष्ठ के है । हिन्दी में श्री रामचन्द्र शुक्लजी आर लाला भगवानदीन न इस प्रकार की भूमिकाएँ लिखी है । इसी काल में श्री वेन्नेटि रामचन्द्र रावजी ने 'मनु- वसु चरित्र-रचना विमर्शनम्' नामक ग्रन्थ लिखा जो तेलुगु साहित्य के उत्तम महाकाव्य 'मनु चरित्र' और 'वसु चरित्र' पर समीक्षात्मक है। तेलुगु भाषा और साहित्य के क्षेत्रो मे खोज का कार्य बढ़ता गया, फलत. समीक्षा-साहित्य का समुचित रूप में विकास होने लगा। धीरे-धीरे परवस्तु रगाचायुलु तेलुगु का समीक्षा साहित्य ७१ ? पाश्चात्य नवीन समीक्षा-पद्धति का प्रभाव तेलुगु पर पूर्ण रूप से लक्षित होने लगा। प्राचीन अलकारिक पद्धति पर जो ममीक्षा चलती रही, क्रमश वह लुप्तप्राय होने लगी। तेलुगु माहित्य मे नूतन पाश्चात्य समीक्षा-पद्धति पर प्रथम ग्रन्थ प्रस्तुत करने वाले थी मट्टमंचि रार्मालगा रेड्डी जी थे। इन्होंने महाकवि पिंगलिमूरना की कविता-शक्ति का निम्पण करने के अभिप्राय से 'कवित्व तत्व विचारम्' नामक एक सुन्दर समीक्षात्मक ग्रन्थ प्रस्तुत किया। यह अपने ढंग का अद्वितीय है । इसमें समीक्षा सम्बन्धी कई नये सिद्धानो का प्रतिपादन किया गया है। इस गन्थ ने तेलुगु साहित्य में तहलका मचा दिया । नये आलोचकों को प्रोत्साहन एव मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। फिर क्या था श्री वंगूरि मुबाराव जी ने लेलुगु साहित्य का अच्छी तरह से अनुसंधान करके 'जान्ध्र वाङ्मय चरिय' तितुगु साहित्य का इतिहास) लिखा। इमसे वे सतुष्ट नहीं रहे, अन्वेषण का कार्य चलता रहा, फलस्वरूप तेलुगु साहित्य को 'शतक कवुल चरित्र', 'वेमना' आदि अनेक विमर्शनात्मक ग्रन्थ प्रदान किये । इनके उपरांत तेलुगु साहित्य का इतिहास कई लोगों ने अपने ढंग से खोज करके प्रस्तुत किया है। उनमे श्री के. वेंकटनारायण का 'आन्ध्र वाड्मय चरित्र संग्रहम्', श्री काशीनायुनि नागेश्वरराव पंतुलु कृत 'आन्ध्र वाङ्मय चरिन' उल्लेखनीय है। श्री खंडवल्लि लक्ष्मीरंजनमजी ने भी तेलुगु माहित्य 'का संक्षिप्त इतिहास 'आन्ध्र साहित्य चरित्र सग्रहम्' नाम से दो भागो में प्रस्तुत किया है। तेलुगु साहित्य अत्यन्त विस्तृत है। उसका सपूर्ण साहित्य एक ही ग्रन्थ मे प्रस्तुत करना कठिन था । अलावा इसके कि कुछ आलोचको ने इस क्षेत्र में गहरी छान-बीन करके दो-तीन ग्रन्थ (साहित्य का इतिहास) प्रस्तुत किये थे, अत. बाद के आलोचको ने तेलुगु वाङ्मय के एकाध युग को अथवा गद्य या पद्य मम्बन्धी किसी एक शाखा को लक्ष्य में रख कर खोज की उससे सम्बन्धित ममीक्षा-ग्रन्थ तैयार किये। ऐसे लोगों में श्री टेकुमल्ल अच्युत राप प्रथम ह । इन्होने केवल तेलुगु साहित्य का स्वर्ण-युग कहे जाने वाले विजयनगर साम्राज्य के समय के माहित्य पर शोध-कार्य किया और "विजय नगर साम्राज्य मंदलि 'आन्ध्र पाङ्मय चरित्र' नाम से एक उत्तम विमर्शनात्मक ग्रन्थ प्रस्तुत किया। श्री गोधूरि वैकटानंद राधररावजी ने तेलुगु के गद्य साहित्य की खोज की और 'भान्ध्र गय वाङ्मय चरित्र' नामक समीक्षा-ग्रन्थ लिया । श्री भोगराजु नारायणगृति में भी तेलुगु कविता की धान-चीन करके उस पर 'आन्ध्र बाविस्व चरित्र' नामक एक आलोचनात्मक प्रत्य नैयार किया है । मद्रास विश्वविद्यालय की तरफ से श्री निडदवोतु वंकटराव ने अनुसंधान का अच्छा कार्य किया । इनके अनुसंधान के फलस्वरूप अब तक 'तेनुगु कवल । . का तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं चरित्र' (तेलुगु कवियो का इतिहास), 'आन्ध्र वचन (गद्य) वाङ्मयम्' और 'दाक्षिणात्याघ्र साहित्य चरित्र' उल्लेखनीय है। उन्होंने तेलुगु की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'भारती' में शैव वाङ्मय तथा अन्य विषयों पर जो समीक्षात्मक लेख प्रकाशित किये, वे अधिक स्थायी मूल्य रखते है । इस समय तेलुगु के समीक्षा-साहित्य को समृद्ध करने में अनेक अनुसंधान- कर्ता लगे हुए है । श्री चागटि शेषय्याजी तेलुगु वाङ्मय के समस्त कवियो का ममग्न परिचय एक बृहत् समीक्षा ग्रन्थ प्रकाशित कर रहे है। उसका नाम है 'आन्ध्र कवितरगणि' । इसके अब तक ४-५ भाग प्रकाशित हो चुके हैं । दम भागो मे प्रकाशित करने की योजना है । इसमें कवियों का व्यापक परिचय ही नहीं दिया जाएगा अपितु उसके साथ उस ममय की सामाजिक, राजनैतिक आदि परिस्थितियो का भी परिचय दिया जाएगा, जो साहित्य के इतिहास काम देने वाला सिद्ध होगा। तेलुगु के कवियो की जीवनियो व परिचय अनेक लोगों ने प्रकाशित किया है। श्री वीरेशलिंगमजी ने 'तेलुगु कवुल चरित्र' नाम से तेलुगु कवियों का पूर्ण परिचय (इतिहास) तीन भागो में प्रकाशित किया है । यह अपने दंग का अनूठा ग्रन्थ है । इससे अनेक लोगो को मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है। जहाँ कवि और लेखको ने कवियों की जीवनिर्या प्रकाशित की वहाँ कवयित्री व लेखिकाएँ भी चुप नही रही । श्रीमती ऊटुकूरि लक्ष्मीकातम्माजी ने 'आन्ध्र कवयित्र लु' (आन्ध्र कवयित्रियाँ) नामक समीक्षा-ग्रन्थ लिखा जिसे 'तेलुगु भाषा समिति' का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। डॉ० नेलटूरि वेकटरमणय्या ने मधुरा और तगाऊर के नायक राजाओ के समय के आन्ध्र वाङ्मय की समीक्षा करते हुए उस युग की समस्त साहित्यिक प्रवृत्तियो पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला और 'दक्षिणाध्र वाङ्मय चरित्र' नामक एक सुन्दर समीक्षा-ग्रन्थ प्रस्तुत किया। यह ग्रन्थ आन्ध्र वाङ्मय के केवल एक युग पर प्रकाश डालने वाला मात्र है। विजयनगर साम्राज्य के समय मे तेलुगु साहित्य ने बडी उन्नति की । इसके बाद तंजाऊर और मधुरा के राजाओ के दरवारो मे तेलुगु साहित्य ने अच्छा विकास प्राप्त किया था। श्री वेंकटरमणय्या ने इम युग के साहित्य की बडी छान-बीन की और अनेक अज्ञात ग्रन्थो एवं कवियो का परिचय आन्ध्र-जगत् को कराया है । स्वर्गीय श्री मुवरम प्रताप रेड्डी जी ने आन्ध्रवासियो के सामाजिक जीवन का अच्छा अध्ययन किया और प्राचीन समय मे आज तक के आन्ध्र जीवन का परिचय देने वाला एक बृहत् ग्रन्थ 'आन्धुल साधिक चरित्र' (आन्ध्र- वामियो का मामाजिक इतिहास) प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ को १६५५ में भारत मरकार में ५००० रुपये का पुरस्कार प्राप्त हुआ था। ।

तेलुगु का समीक्षा साहित्य ७३ आज तो गद्य व पद्य के प्राय ममस्त प्रकार के अग और उपागो का बड़ी तेजी के माथ विकास होता जा रहा है। वाङ्मय की प्रत्येक शाखा व उपशाखा की बड़ी मूक्ष्मता के माय पोज की जा रही है। उम शाखा से मम्बन्धित सभी विवरणो का विस्तृत रूप से परिचय भी दिया जा रहा है । मानव अधिक जिज्ञासु होकर वस्तु की जड़ तक पहुँचने और उसके रहस्यो के उद्घाटन करने में प्रवृत्त है । इममे अनेक नये विपयों का पता लग रहा है और मानव का मस्तिष्क भी विकसित होता जा रहा है। आज तक जो अनादृत वाङ्मय माना जाता था, वह भी आज साहित्य के अतर्गत माना जा रहा है । उदाहरण के लिए लोक-साहित्य की ही बात लीजिए । इसकी बड़ी छानबीन इम गमय हो रही है । इस साहित्यिक शाखा के उद्धार में और इसकी मम्यक रूप से समीक्षा करके विस्तृत रूप से समाज को परिचित कराने के हेतु कई विद्वान लगे हुए हैं । श्री हरि आदिशेपुवुजी ने इस शाखा की खोज करके 'जानपद गेय विमर्श' (लोकगीतो की ममीक्षा) नाम से उत्तम आलोचनात्मक ग्रन्य तैयार किया है । लेखक के अनुसधान कार्य की प्रशस्ति सर्वत्र हुई । तेलुगु भाषा समिति ने पुरस्कार द्वारा लेखक को गौरवान्वित भी किया है । श्री मरि संगमेशम जी ने भी 'तेलुगु माहित्य में हास्य रस' नामक एक विमर्शनात्मक ग्रन्य लिखा । इस ग्रन्थ को भी तेलुगु भाषा समिति का पुरस्कार प्रास हुआ है। ममीक्षा-साहित्य को इस ममय तेलुगु भाषा समिति द्वारा खूब प्रोत्साहन प्राप्त हो रहा है । १६५५ मे तेलुगु भाषा समिति ने 'दक्षिणात्युल नाट्य कला चरित्र' (दक्षिणात्यो की नृत्य-कला का इतिहास), जिसे श्री नटराज रामकृष्ण ने तैयार किया था, पुरस्कार मिला । इसके अलावा 'कवित्तय', श्रीवात्सव कृत 'उपः किरणालु' आदि अनेक समीक्षा-ग्रन्थो को तेलुगु भाषा समिति ने पुरस्कृत किया है। तेलुगु साहित्य के अनुसंधानकर्ताओ मे श्री वेटूरि प्रभाकर शास्त्री, श्री कोमर्राजु लक्ष्मण राव पंतुलु, श्री मल्लादि रामकृष्ण शास्त्री, श्री राल्लपल्लि अनंतकृष्ण शर्मा, श्री नेलटूरि वेकटरमणय्या, श्री पिंगलि लक्ष्मीकांतम् विशेप रूप से उल्लेखनीय है। इन लोगों ने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे है जो बाद को पुस्तकाकार में प्रकाशित हुए है। उनके द्वारा तेलुगु वाङ्मय व इतिहास का अच्छा परिचय मिलता है। इन लेखो के अलावा श्री प्रभाकर शास्त्री ने कवि मार्वभौम श्रीनाथ चरित्र शृंगार नेपध पर 'शृंगार श्रीनायम्' नाम से एक श्रेष्ठ समीक्षा-ग्रन्थ लिखा है । वैसे ही श्री अनंत कृष्ण शर्माजी का 'वेमना' भी उत्तम कोटि का समीक्षा-ग्रन्थ है। इन्होने नाटक माहित्य पर जो भापण दिये वे भी समीक्षा-साहित्य में स्थायी मूल्य रखते हैं।

S यक्ष गान 'यक्ष गान' आन्ध्र का एक प्राचीन लोकगीति नाट्य है। इसमें साहित्य, सगीत, नृत्य, अभिनय इत्यादि कलाओ का अच्छा संगम हुआ है । उन दिनो में संस्कृत से पक, उपम्प आदि केवल सभ्य ममाज के मनोरंजन के माधन बने हुए थे । मर्वसाधारण प्रजा का मनोरंजन यक्षगान-जैसे देशी लोकगीति नाट्य ही किया करते थे। यो तो मानव की नाटक कला की तृष्णा एवं रूपक प्रदर्शन की अभिलापा भिन्न वर्गो मे, भिन्न रूपो में अभिव्यक्त हुई । आन्ध्र देश का प्रथम नाट्य-कला का रूप 'कुरबजि' माना जा सकता है । 'कुरव' एक जंगली जाति है, 'अंगि' का अर्थ कदम होता है । इस प्रकार कुरव जि 'कुरव' + 'अंजि' दो शब्दो के संयोग मे बना है अर्थात् कुरव नामक एक जंगली जाति का (नृत्य मुद्रा समन्वित) कदम । उनका प्रारंभिक नाट्य रूप कुरवंजि कहलाया । कुरव जाति के लोग दक्षिण मे-मुख्यत आन्ध्र मे तिरुपति, श्री शलम इत्यादि पुण्य तीर्थो में यात्रियो के विनोदार्थ नृत्य किया करते थे । कुरवं जि आन्ध्र में ही नहीं अपितु समस्त दक्षिण प्रदेश में प्रचलित है। आन्ध्र मे ज्ञान कुरवंजि, जीव कुरवजि तथा सत्यभामा कुरवजि नाम से उमके तीन रूप प्रसिद्ध थे । किन्तु आज वे सब केवल नाम मात्रावशेष है। कुरवंनि के अनुकरण पर यक्षगानो का निर्माण हुआ है । जक्कुलु नामक जाति ने जिस देशी मंगीत नाट्य को जन्म दिया, वही जक्कुल पाट याने 'मक्ष गान' नाम से विख्यात हुआ । यक्ष जाति से सम्बन्धित गीत या गान होने के कारण कालान्तर मे यक्षगान कहलाये। इसका देशी रूप ही जक्कुल पाट हे यक्षगान 'नाटक' नाम से भी व्यवहृत है । प्रथम पालकुरिकि सोमनाय ने अपने ग्रन्थो मे समकालीन तथा प्राचीन अनेक देशी नृत्य, संगीत एव साहित्य की प्रक्रियाओ का उल्लेख किया है । तदुपरान्त कविसार्वभौम श्रीनाथ ने (ई० सन् १४३० के लगभग) अपने काव्य 'भीम खण्ड' मे द्राक्षाराम पुण्य तीर्थ की प्रस्तुति करते हुए लिखा है-- ।

यक्ष गान 'कीर्तितु रंदानि कीति गंधर्बुलु गांधर्वमुन यक्षगान सरणि' अर्थात, 'गन्धवं यक्षगान की शैली मे संगीत मे जिसका यश गाते हैं । यहाँ पर यक्षगान सरणि का जो प्रयोग हुआ है, इमसे अभिप्राय यही है कि गन्धों ने यक्षगान पद्धति, रीति अथवा शैली में गान किया था। गान कला की निपुणता के लिए गन्धर्व प्रसिद्ध हैं ही। वे गान कला की विविध रीतियों से भलीभांति परिचित थे। उम सन्दर्भ मे उन लोगों ने यक्षगान की रीति पर गान किया था। जक्कुलु नामक जिम जाति ने यक्षगान को अपनाया, उसे प्रचलित एवं लोकप्रिय बनाया, वास्तव में उनकी जाति कोई भिन्न रही होगी । परन्तु यक्षगान के अभिनय को उस जाति ने अपना पेशा बनाया। यक्ष-गान को पेशा बनाने के कारण उनकी असली जाति का नाम लोप होता गया और दे 'यक्ष' कहलाये गये होंगे। यक्ष से 'ज' हो गये। सदुपरान्त तेलुगु का 'लु' बहुवचन रूप जुड़ने के कारण 'जक्कुलु' हुए। इस प्रकार हम देखते है कि पेशेगत शब्द क्रमश. जातिवाचक रूप में परिणत हुआ होगा। 'जक्कुलु' जाति के लोग आन्ध्र देश के गुण्दर, गोदावरी आदि जिलों में ही नहीं अपितु रायलमीमा में भी फैले हुए थे। आज भी अनन्तपुरम् जिले में जक्कुलचेरूवु (जक्कों का तालाब) नाम से एक बडा गाँव है। इस समय वह मद्रास और बम्बई के गस्ते में एक रेलवे स्टेशन भी है। १५वी शती में विरचित 'क्रीडाभिराममु' में 'जवकुल पुरन्ध्रि' नामक गान-कता की बड़ी प्रस्तुति हुई है। उसमे यक्ष-कन्याओं (जयकु युवतियों) का वर्णन भी हुआ है। उमी शती के उतरार्द्ध में श्री चेलशौरि द्वारा रचित 'मौरभ चरित' जमुजाति के मंगीत का कयास्पान पद्धति मे प्रस्तुत हुआ है । 'जबकुल पुरन्ध्रि' यक्षगान का प्रारम्भिक रूप है। इस नृत्य विशेष के अनुरूप वेष धारण करके, नेपथ्यसंगीत एवं वाद्य विशेषों की सहायता में गान करते तथा गीत के अनुरूप अभिनय करते और कथा सुनाया करते थे। यह मर क्रिया-कलाप एक ही पात्र द्वारा संपन्न होता था। विभिन्न व्यक्तियों द्वारा भिन्न पार-धारण करने की दशा तक उस समय की कला पहुँची न थी। १७वी शताब्दी मे रचिन 'तंजापुरान्नदान' नाटक का प्रदर्शन जयकुल रंगमानि की सराये में संपन्न हुआ था। इस कृति द्वारा विदित होता है कि जानु जाति के लोग गीत एवं अभिनय कला में प्रवीण थे। स्वर्गीय सुरवरम प्रताप रेड्डी ने लिखा है-"यक्ष गानों का नामकरण यक्ष (जबालू) जाति के आधार पर ही किया गया है। पक्ष अक्षस प्रान्त, तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं या यक्षी नामक मंगोल जाति के अथवा युक्षन् प्रदेश के लोग होगे । यह सम्बन्ध कुछ दूर का अवश्य प्रतीत होता है । यक्ष और गन्धर्व गान विद्या में प्रवीण थे । अत हमारे पूर्वजो ने नृत्ययुक्त गान का नामकरण 'पक्ष गान' किया होगा। श्री सण्डवलित लक्ष्मीरंजनम् ने यक्ष गान प्रकरण में लिखा है-~~पक्ष गान संगीतप्रधान नाटक है । तेलुगु का प्राचीनतम, नाटक-रूप ही यक्ष गान है। यह 'यक्षगान नाटक तथा 'यक्षगान प्रबन्ध' नाम से भी व्यवहृत है । यक्ष- गानो मे नाटक के लक्षण, वार्तालाप नथा प्रवन्धात्मक वर्णनो का भी गुन्दर समन्वय हुआ है; अत यक्षगान इन दोनो नामो मे प्रचलित हुए है । आज यक्षगान देगी शैली का नाटक माना जाता है। संस्कृत के रूपक एवं उपरूपको के लक्षणो से भिन्न होने के कारण यह लोकनाटक कहलाता है । आज यक्षगान भी नाटक की रीतियों पर अच्छा विकास कर चुका है । प्राचीन यक्ष-गानों में संस्कृत के पकों की भांति नान्दी-प्रस्तावना, अंक- विभाग, सन्धि-नियम इत्यादि दिखाई नहीं देते। इनमे रगड विकारम् (ताल प्रधान), द्विपद तथा एलनु, अद्धचन्द्रिक आदि पद थे। ये सब देशी छन्द की प्रक्रियाएँ है। प्राचीन यक्षगानो मे गद्यभाग कम था। यत्र-तत्र कथा-संविधान के अनुरूप गीत-भागो को जोड़ने वाले गद्यभाग माय थे। यक्षगानों के प्रदर्शन के समय प्रारम्भ में इप्टदेवता की प्रार्थना, गणेश की स्तुति होती । तदनन्तर प्राचीन करियों का स्मरण, कृतिपति का वर्णन, कृति- कर्ता का परिचय होता । तत्पश्चात् ही यक्षगान का नामोल्लेख करके सूत्रधार कथा का परिचय देता, कथा-सन्धियो का परिचय सूत्रधार देता और नटी गीत गाते-गाते अभिनय करती। कुरवंजि और यक्षगानों में अनेक प्रकार की भिन्नताएँ हैं। कुरवनि में जहाँ दो-तीन पात्र होते है वहां यक्षगान में अनेक पात्र होते है। कथा-मूत्र को मिलाने के लिए बीच-बीच मे यक्षगानों में गद्य का प्रयोग किया जाता है । ऐसे गय भाग का वाचन भूपधार करता है। पात्र के प्रवेश के समय नाटककार उमके वेप धारण का वर्णन करता है। वर्णन के ममाम होते ही पात्र प्रवेश करके अपने अभिनय का प्रदर्शन करते हुए गीत गाते हैं । नाटककार के परिचय वाक्य तथा वर्णन जिन यक्ष मानो में कम होते है, वे नाटकीयता के अधिक निस्ट होते हैं। जिनमें वर्णन का अंग अधिक होता है, वे प्रबन्ध काय जैमें यक्षगानो में देगी छन्दों के माय तान और लय मे युक्त गीत भी होने मे हैं। ये गीत अधिकतर लोकगीतो की परम्परा के होते हैं, जिनमे माधुर्य गुण की प्रधानता होती है। असल पर होने के माय भावपूर्ण होते हैं । इमी थेगो के वीयि नाटक आन्ध्र देश में बहुत प्राचीन समय में प्रचलित है जो बाद को वोयि भागवत नाम मे दिरयात भी हुए हैं। उनमें भक्ति और शृङ्गार को प्रमुखता होती है। इन परम्परा के देनी रूसकों में भागवत की कथा मुख्य है। भागवत कया के प्रदर्शन में कूचिपूडि भागवनो (भागवत का अभिनय करनेवालों) को विशेष आदर प्राप्त हुआ है। उन कथाओ मे 'पारिजातापहरण' पर्याप्त जनप्रिय हुआ है । कूचिपूडि भागवतों में शास्त्रीय नृत्य प्रधान है। यही कारण है कि वे भरत नाट्य के उत्तम नमूने माने जाते हैं । इनकी विशेषता यह है कि नारी पात्रों का वेष धारण पुरुप ही करते है । पक्षगानों को कथावस्तु मुख्यत: पौराणिक होती है । आधुनिक युग सामाजिक एवं राजनैतिक घटनाओं को इतिवृत बनाने का प्रयत्न हुआ है, किन्तु नब्बे प्रतिशत यक्षगानों को कथावस्तु पौराणिक ही है। पुराण प्रसिद्ध कयाओं को ग्रहण कर यक्षगानों की रचना हुई है । रामायण, भागवत तथा महाभारत की कयाओं के साथ नल, हरिश्चन्द्र इत्यादि पुराण पुरुषों की कथाएं ही यक्षगानों का आधार बनी हुई हैं। किन्तु युग का प्रभाव यक्षगानों पर भी परिलक्षित होता है। २०वी शती मे पट्लोरि वीरपा ने 'क्रोधापुरि रेतु विजयमु' (क्रोधापुरि के कृपकों की विजय) नामक यक्षगान लिखा है जिसमें भारत माता की प्रार्थना, गान्धीजी की स्तुति इत्यादि भी देसी जा मकती है । इसकी कयावस्तु सामाजिक समस्याओं से परिवेष्ठित राजनैतिक समस्याएँ हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यक्षगान भी युग स्वरूप को परिवर्तित करके जनता के मनोरंजन का माधन बना हुआ है। प्राचीन समय में आन्ध्र में रंगमंच का विकास नहीं हुआ था। आन्ध्र देश में जो भी लोकनाट्य थे वे सब चलते-फिरते प्रदर्शन मार थे । लोकनाट्य के अभिनेता एक जगह कही स्थिर रूप से रहते न थे, गांव-गांव घूम-धूमकर अपने नाटकों का प्रदर्शन करना पड़ता था। रंगमंव का विकास बहुत समय तक हो नही पाया । वे जिम गांव में पहुँचरे, उस गाँव के मुहाने पर,-चोपात अथवा मन्दिर के सामने तत्काल ही पण्डाल डालते । उस पण्डाल मे ही यक्ष- गानों का प्रदर्शन होता । पण्डाल के मामने और दाय-बाय भी जहाँ तक दष्टि जाती है, खुला प्रेक्षागार ही होता। रंगमंच की साधन-मामग्री क्या थी, यों चे प्रदर्शनकर्ता आवश्यक सामग्री अपने साथ ले जाते थे, लेकिन वैमे वे जिस किसी भी गांव में पहुँच जाते वही उन्हें वह सामग्री उपलब्ध होती। मंच अभया पण्डाल के गामने के अनुरूप अपने तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएँ मफेद परदा लटकाया जाता, यह परदा कोई बहा दुपट्टा होता या दो-तीन खादी के दुपट्टो को जोडकर बडा नथा मंच के अनुरूप बना लिया जाता। परदे के दोनों तरफ दो मशाल रण दिये जाते, जिनकी रोशनी में प्रदर्शन होता । क्रमश मशालों की जगह पैट्रोमाक्म लालटेनों ने ले ली । परदे के पीछे प्रबन्धकर्ता या सचालक, गाने में साथ देने वाले, ढोल या मृदंग तथा जन्वना देनेवाले होते है । परदे के मामने मूत्रधार होता है, वही प्रदर्शन का प्रवर्तक होता है। मूत्रधार पात्रो के प्रवेश की मूचना देता है, पात्रो से वार्तालाप कराता है, नेपथ्य में गाने वाले गायकों को टेक पहुँचा देता है, अभिनय के अनुरूप ताल देता है, मन्धि-गद्य का वाचन करता है और समय-समय पर हास्य-प्रसंग करता है। यक्षगान भाव, राग, ताल इत्यादि के माय नृत्य, गीत और अभिनय के सुन्दर समन्वय के रूप है। ममोक्षकों का कथन है कि यक्षगान नृत्य नाट्य सम्प्रदाय के रूपक हैं । इनमे नृत्य मुख्यत तीन रूपों में प्रस्फुटित हुआ है। गीत के माथ नृत्य तो होता ही है, साथ ही ताल, गमक आदि के अनुरुष दूसरी पद्धति का नृत्य होता है। तृतीय दशा में उद्धत नृत्य अथवा ताण्डव नृत्य होता है । नाट्य-शास्त्र प्रणेता भरत मुनि द्वारा निर्देशित प्राचीन ताण्डव नृत्य के लक्षणों का यक्षगानों मे अनुकरण हुआ है। प्राचीन यक्षगानो के आधार पर उनका पुनरुद्धार करने के इच्छुक नाट्य-शास्त्रियों के लिए आवश्यक लोक-नृत्य की मामग्री उनमे उपलब्ध होगी । इस कार्य के लिए उपयुक्त यक्षगान प्राच्य लिखित पुस्तक भाण्डागार में तालपत्रों तथा लिखित प्रतियों में उपलब्ध है। उसमे उपा चरित्र, उपा परिणय, कालीय-मर्दनम् आदि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। कुछ विद्वानो का विचार है कि अब तक प्राप्त यक्षगानो मे ओबय मन्त्री कृत 'गडाचलम्' अत्यन्त प्राचीन है । कतिपय ममीक्षकों का विश्वास है कि फन्दुकूरि रुद्रय द्वारा विरचित 'सुग्रीव विजयम्' उपलब्ध यक्षगानों में प्राचीन- तम है । सुग्रीव विजय के कर्ता कृष्णदेवराय के समकालीन माने जाते है । सुग्रीव विजय की कथावस्तु रामायण से गृहीत है। वीर हनुमान का राम-लक्ष्मण के दर्शन से प्रारम्भ होकर शलि-वध तथा सुग्रीव के रट्टाभिषेक के साथ समाप्त होता है । इसमें बालि-मुग्रीव का युद्ध, वालि-वध, तारा का वालि-वध पर दुखी होना और रामचन्द्र की निन्दा करना अत्यन्त मनोहर बन पड़ा है । वीर और करण रमो के पोषण मे कवि को अमाधारण मफलता प्राप्त हुई है।

यमगान १ . तेलुगु साहित्य में कृष्णदेवराय का युग 'प्रवन्ध युग' नाम से विख्यात है, किन्तु फिर भी इस युग मे यक्षगानो के प्रति आदर का भाव था। इतिहास इस बात का मासी है कि कृष्णदेवराय को नाट्यशाला मे यलगानो का प्रदर्शन होता था। बताया जाता है कि कृष्णदेवराय की पुत्री ने 'मरीची परिणय' नामक यक्षगान का प्रगयन किया था। शिलालेसो द्वारा इग वान की पुष्टि होती है कि कृष्णदेवराय की नाट्यशाला मे 'तालुकोंड' नामक नाटक का प्रदर्शन होता था और उस युग मे नागय्या नामक नट अपने अभिनय के लिए बहुत ही प्रसिद्ध था। गराग भक्त शिरोमणि तो थे ही, माथ ही मगीतमार्वभौम थे । 'प्रहलाद चरित्र' में भक्ति की परवणता तथा ब्रह्मानन्द साक्षात्कार देखते ही बनते है । इप्ट देवता की स्तुति मे नाटक शुभारंभ करके पूर्व कवि की स्तुति के बदले प्राचीन भक्त तुलसीदाम, रामदाम, नामदेव, तुकाराम, जयदेव, श्री नारायण तीर्थ इत्यादि भक्तो का स्मरण किया है। इसमे ज्ञान, वैराग्य नथा भक्ति का गंगा-गमुना मंगम हुआ है । यह कृति श्री रामचन्द्र को समर्पित है। प्रस्तावना के पश्चात् दौवारिक तथा मूत्रधार का संभाषण होता है । नाटक का उल्लेख कर प्रहलाद को नागपाग में बांधकर ममुद्र मे फेकने के वृत्तान्त से प्रारम्भ करते है । अन्त में हरि का साक्षात्कार कराते हैं । नौकाभग अथवा 'कोका विजयम्' भक्ति तथा शृगार का ममन्वित रूप है। गोपिकाएँ वालकृष्ण के माथ यमुना नदी में नौका-विहार के लिए चल पड़ती है। मौन्दर्यगविता गोपिकाओ का गर्व भंग करते है बालकृष्ण । नौका में पानी आता है, उन रन्धो को पहले चौलियो तथा वाद को साडियो द्वारा भरने का गोपाल गोपिकाओ को आदेश देता है। अन्त मे गोपिकाएँ अपनी देह का अभिमान त्याग प्राणों की रक्षा के लिए वैमा ही करती है। इस प्रकार भवसागर के तारणहार कृष्ण अपनी लीला का परिचय देते है । इम श्रेणी की रचनाओं में 'लेपाक्षिरामायणमु' अत्यन्त उल्लेखनीय है । इममे प्रारंभ मे आराध्य की प्रार्थना, गुरु-वन्दना, पूर्व कवि-स्तुति, वंश वर्णन है । यह पूर्णत. दृश्य प्रबन्ध है। प्रदर्शन की दृष्टि से अन्य यक्षगानों की अपेक्षा यह अधिक सफल रहा है। इम परम्परा मे कवि वेकटदामु कृत 'धेनुकोड विराट पर्व नाटक' अत्युत्तम है। 'रामदास' भी इसी श्रेणी का एक उत्तम यक्षगान है। इनके अतिरिक्त अन्य लोकप्रिय यक्षगानो मे 'किरातार्जुनीयमु', 'गंगा गौरी विलासमु', 'एकलवेसं कय, त्रिपुर-संहारम्', दारुवन क्रीड', 'मृत्युजय विलासम्', 'शिव पारिजातम्', 'गोपाल विलामम्', 'रंगपुरि पारिजात नाटकम्', 'तारा शशाकम्', फा०६ ८२ तेलुगु वाङ्मय , विविध विधाएं 'सीता कल्याणम्', 'सुन्दर काण्ड नाटकम् तथा कंकटि पापराजु कृत 'विष्णु माया बिलासम् गुप्रसिद्ध हैं । तंजाऊर के नायक राजाओं के समय में यक्षगान नाटक अथवा दृश्य- प्रवन्ध नाम से भी व्यवहत होने लगे। क्रमश यक्षगानो में टेक का स्थान राग लेने लगे । कविता का स्थान पद या गीत लेने लगे । कविता की अपेक्षा गद्य, विपय-क्रम को जोडनेवाले गद्य के स्थान पात्रों का परस्पर मम्भापण प्रधान माना गया । उस समय के यक्षगानों में नायक राजाओ के विवाह, शृङ्गार आदि के साथ आस्थान या दरवार का वैभव, उनके राज्य का प्रजा-जीवन, नगर के राजमार्ग पर जुलूस में जाने वाले नायक अथवा राजा को देख नायिका का मोहित हो जाना, विरह-वर्णन आदि की प्रचुरता होने लगी। महाराष्ट्र के राजाओं ने भी तेलुगु के यक्षगानो के विकास में अच्छा योगदान दिया था। शहाजी ने (ई० १६८४-१७१२) ने छ-सात उत्तम यक्षगानो की रचना की है, यो तो उनकी संख्या नीम तक बतायी जाती है । इम युग में कथा का साराश द्विपद छन्द में बतला दिया जाता था, तदनन्तर गणेश की स्तुति, कथा सन्धान, सूत्रधार के प्रसंग, विद्रुपक इत्यादि की प्रधानता रही। इस प्रकार को रचनाओं मे दर्भा गिरिराजु का स्थान उल्लेखनीय है । इस युग मे कुरवंजियो का पुनः यक्षगानो में प्रवेश हुआ। करवंजि पात्र को प्रधानता दी गयी । मैसूर के कण्ठीरव राजा ने 'आन्ध्र कोरवंजि' नामक एक रूपक की रचना की। त्यागराज आदि की श्रेगी के मेतत्तूरु वेंकट्राम शास्त्री ने जो रचनाएँ की वे 'मेलत्तूरु भागवतमेल नाटक' नाम से विख्यात है। तैलंगाना मे १८वी शती में ही यक्षगानों की रचना प्रारम्भ हुई और १०० के करीव यक्षगान उस प्रदेश मे रचे गये। वहाँ पर यक्षगान पर्याप्त लोकप्रिय भी हुए । १७८० मे शेषाचल कवि कृत 'धर्मपुरि रामायण', १८३४ मे श्री मुद्दय कवि द्वारा रचित 'मयेन रामायण' काफी प्रसिद्ध है । वहाँ के अन्य नाटककारो में गोवर्धन नरसिंहानायुलु पटें पापकवि, शेपभट्टर कृष्णमाचार्युल, आदि के नाम आदर के साथ लिये जा सकते है । आन्ध्र विश्वविद्यालय ने यक्षगानो के पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया । अव तक पाँच जिल्द प्रकाशित भी हो चुके है। कुल २५ जिल्द प्रकाशित करने की इनकी योजना है। अत. हम विश्वास कर सकते है कि संपूर्ण यक्षगानों के प्रकाशन के साथ तेलुगु वाङ्मय की यह विघा समृद्ध हो तेलुगु भारती के लिए अलंकारप्राय होगी।

तेलुगु साहित्य में हास्य
मानव की मानसिक प्रसन्नता को व्यक्त करने वाला माधन ही हास या
हमी है । यह एक शारीरिक प्रक्रिया है। बच्चों की हमी मे उनके मानसिक
आगलाद का परिचय मिलता है । हास से पूर्ण मुसमुद्रा प्रसन्न चित्त का द्योतक
है । हर्ष का बाह्य चिह्न ही हमी है । किसी विषय को देखते, सुनते या सोचते
ममय उम विषय के अन्तर्भूत वैपरीत्य, वैषम्य, अतिवास्तविकता, कृत्रिमता
इत्यादि गुणों के कारण ही हमे हंसी आती है। हमने के पूर्व हमे उस हँसाने
वाली वस्तुओं के ज्ञान का होना आवश्यक है। वस्तुस्थिति मे उत्पन्न विकृत
आभाम भी हमे हमा देता है-
"चाकिवानि तोड जगडाल पड लेक
मिरिगलाडु पटु चीरगट्टे
शिवुडु तोल गप्पे छी यनि मदि रोमि
भैरवूडु चीर पार वैसे ।"
अर्थात्, धोवी की झंझट से मुक्त होने के लिए विष्णु ने पीतांबर धारण करना
प्रारम्भ किंगा तो शिवजी ने चर्म पहनना शुरू किया। भैरव ने वस्त्र ही त्याग
दिया; वैसे ही-
'शिवुटदिनि शनिचुटु
रविचन्दुतु मिंटनेंट राजीवाएं
डविरलपुग शेपनि
बलिंचट नल्लिबाध पडलेक मुमा ।"
अर्थात्, शिवजी का हिमाद्रि पर शयन करने, सूर्य तथा चन्द्र का आकाश में
रहने व विष्णु भगवान का शेष नाग तल्प पर शयन करने का कारण खटमलो
की झंझट से मुक्त होने के लिए ही है। यह चित्रण पढते ही हम हमी के मारे
लोटपोट हो जाते है। विकृति हास को जन्म देती है।

तेलुगु याङ्मय : विविध विधाएं मानव का जीवन सुख-दुख रूपी अनुभूतिद्वय से प्रारम्भ होता है। बच्चो के हास-रुदन मे हमे ये ही दो अनुभूतियां दिखाई देती है। किन्तु हमारी इच्छा, ज्ञान व क्रियाशक्तियो के विकास के साथ बाह्य विषय की वैविध्यता के माथ आतरिक सुख-दुख से पूर्ण अनुभूतियां भी जन्म लेने लगती हैं । हास एक स्थायी भाव है। यही हास्य के रूप में परिणत होता है । काव्यानंद का दूसरा नाम ही रम है। काव्य, नाटक इत्यादि के अध्ययन, श्रवण एवं दर्शन से हमारे हृदयों के भीतर जो अनुभूतियां उत्पन्न होती हैं तथा जो हमे शुद्ध आनन्द प्रदान करता है, वही आनन्द रम है । उमी आनन्द- अनुभूति को रसानुभूति कहते है । जिम भाव को हम अनुभूति मे लाकर आनंद पाते है, उमी भाव के नाम पर उम रम का व्यवहार करते है। यही कारण है, कि कुछ लोगो ने रस के अन्तर्गत एक ही माना है कि वास्तव में रस एक है, वही आनंद का स्वरूप है। स्थायी भावों के आधार पर रम नौ हैं, उनमे हास्य एक है। हास के लिए आनंद, उद्दीपन एवं विभाव के रूप मे लाक्षणिको ने इस प्रकार बताया है- 'विकृताकार वाक्येप्टं यमालोक्य हासेज्जन । नदत्रालंबन प्राहुस्तच्चेप्टोद्दीपनं मतम् ॥' जिन विकारो के कारण हम किमी व्यक्ति या विषय को देखकर हँसते हैं वह व्यक्ति या विषय हमारे हास का आलंबन है और उसके अन्य विकार उद्दीपन है। वाङ्मय में हाम्य के भी भेद है । लाक्षणिको की दृष्टि मे साधारण भौतिक हास निन्नकोटि का है । दुमरों को दुखाने वाला मध्यम तथा सब को प्रसन्नता एवं सुख प्रदान करने वाला उत्तम कोटि का हास्य माना जाता है । पडित रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार आलंबन के प्रति प्रेम उत्पन्न करने वाला हास्य ही उत्तम हाम्य है। हास्य आलंबनप्रधान रस है। आलवन के विस्तृत एवं मुस्पष्ट वर्णन से हान का उदय होता है। हास का आश्रय प्रेक्षक ही होते है । मुख्यत. हास्य दो प्रकार का होता है पहला आत्मस्थ और दूसरा अन्यस्थ 1 आलंबन को देख हँसने वाला आत्मस्थ है, तो अन्यो को हँसते देख उनके साथ हंसना अन्यस्थ है । रीति ग्रन्थकारों ने शृंगार और वीर-रस को काव्य और नाटको का प्रधान रस माना है ! हाम्य को महायक रस प में अगीकार किया ८५ प्रधानत तेलुगु साहित्य मे हास्य गया है । हास्य और शृंगार रस के बीच सुन्दर मैत्री है। वैसे ही वीर रस के लिए हास्य सहायक रस के रूप में स्वीकृत है । सच पूछा जाय तो हास्य के बिना शृगार रस मे सरराता नही आती। किन्तु असभ्य शृंगार को हास्य के रूप में ग्रहण कर हमारे साहित्य हास्य का उपहास किया गया है । नाटक के नायक के नम्र सचिवो मे एक विदूषक होता है । 'हास्य प्रायो विदूषकः' बताकर इस पात्र का चित्रण केवल हास्य के लिए करते है । नाटक मे विदूपक ही नहीं बल्कि कोई भी पात्र हास्य का प्रयोग कर सकता है । वाम्-चमत्कार के द्वारा हास्य का उदय होता है। प्रहसन और शतक-साहित्य में हास्य का विशेष पोपण हुआ है । मुख्यत: कहावतो, लोकोक्तियो, यमक, श्लेप, व्याज-स्तुति, व्याज-निंदा, वक्रोक्ति, अनुकरण इत्यादि के द्वारा हास्य को ध्वनित करते है । भारतीय लाक्षणिको की दृष्टि मे हास्य का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है । उनका मत है कि किसी वस्तु मे विकृति और आरोपण मे हास्य का उदय होता है । पाश्चात्य वाङ्मय मे हास्य ‘ा मर' और 'विट' नाम से दो प्रकार का माना जाता है। उनका मत है कि ह्य मर मे विकृति सहज होती है और विट में विकृति का आरोप किया जाता है। इनके अतिरिक्त भारतीय साहित्य मे और तेलुगु में भी 'पैराडेज' और अधिक्षेप हास्य अपना विशिष्ट महत्व रखते है । तेलुगु में इस प्रकार की रचनाओ में श्री पिडिप्रोलु लक्ष्मण कवि कृत 'रावण दम्भीयमु', तिरुपति वैकटद्वय कृत 'गीरतम्', श्री अनंतपतुल रामलिंग स्वामी कृत 'शुक्लपक्षम्' अधिक्षेप काव्यो मे आदर के साथ लिये जा सकते हैं । श्री जलमूत्रम रूक्मिणीनाथ शास्त्री कृत पराडेज आन्ध्र में काफी लोकप्रिय किसी भी साहित्य मे रचित हास्यरस सम्बन्धी ग्रन्थो पर विचार करते समय हम उन ग्रन्थों के लिए आवश्यक लक्षण निश्चित रूप से निर्धारित नही कर सकते। हो, उसके काव्यो की शैली, घटना-चित्रण इत्यादि के आधार पर हास्य ग्रन्य का निर्णय किया जा सकता है। तेलुगु के कवियों ने यों तो अनेक रीतियों को हास्य-ग्रन्थों की रचना मे अपनाया है । उसमें मुख्यतः पांच रीतियो उल्लेखनीय हैं-- १. शब्द सम्बन्धी विकृति पैदा करना, २. अर्थ सम्बन्धी विकृति, ३. कथावस्तु की गति में वक्रता लाकर घटना में विकृति पैदा करना, ४. आलंबन वर्णन और ५. रसाभाम पंदा करना। तेलुगु साहित्य के हास्य का समय परिचय प्राप्त करना है तो उसके दोनों प्रकार के साहित्यो का अवलोकन करना आवश्यक हो जाता है। प्रथम प्रकार तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं का लोर-माहित्य और दूसरा मागं अथवा ग्रन्थस्थ साहित्य । प्रत्येक जाति के आचार-विचार, रीति-रिवाज इत्यादि का दर्पण उसका साहित्य होता है। अनाहत अथवा अनुश्रृत वाङ्मय जो कि लोक-साहित्य के नाम से प्रचलित है, शिष्ट समाज का आदर भले ही प्राम कर चुका हो, परन्तु अनुभूतियों से दोनों के बीच विशेष अन्तर नहीं होता है । तेलुगु में लोक-माहित्य विपुल माना में उपलब्ध हुआ है और उपमे हास्य का विशेष स्थान है । पूर्ण रूप से लिपिबद्ध न होने पर भी गत २५-३० वर्षों में इसके उद्धार का विशेष प्रयत्ल हुआ है। इम माहिन्य के श्रवण और अध्ययन से श्रोता एवं पाठको का मन रमाद्र के में उछलने लगता है। व्यावहारिक जीवन मे लोक साहित्य इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि उसे अलग नही किया जा सकता। जन्म-मृत्यु, पर्व-त्योहार, शादी-ब्याह में ही नही बल्कि जीवन के पग-पग पर जनपदों में इस साहित्य का व्यवहार है । ढेकली चलाते, नाव खेते, धान कूटते, खेतो मे धान रोपते, कटाई करते, मेलो मे, सामूहिक कार्य-कलापों में यह साहित्य लोकजीवन का आलंबन बना हुआ है । मागलिक कार्यों मे जहां शिष्ट गीतो का गायन होता है वहाँ अश्लील गीतों का भी । हास्य-रस के अंतर्गत विकृत शब्द-सम्बन्धी होने के कारण अन्य भाषाओं में उसका उसी रूप में अनुवाद मंभव नहीं है। फिर भी नमूने के लिए एकाध उदाहरण प्रस्तुत करते है-- तेलुगु का देशी नाट्य 'भामा कलापम' में से एक उदाहरण लीजिए। हास्यकर्ता नायक कृष्ण के हाथो मे नायिका को समर्पित करते हुए नायक को उपदेश देता है । तदुपरान्त राधा को समझाता है- बाव मरदुलु निन्नु एव्वरेमन्ना, कदुरेगाकालियकंटलोनपे? तोडिकोडलु बिड्ड कूटि केडुस्ते, पीट चेवकातोनु पेणतुडगोटु इरुगु पोरुगुलवारु निन्नेमि यन्ना , पिल्लुतगुर्वेट्टि मल्लिरावम्मा बुद्धलेरतगदु बालमडुले कानि, बुद्धलोच्चेदाक दिदुकोवय्या' अर्थात् हे बेटो) देवर-जेठों ने तुमसे कुछ कहा तो तकली गरम करके उनकी आँखों में भोक दो। देवरानी व जेठानी के बच्चे खाने के लिए रोयें तो चौकी तेलुगु साहित्य में हास्य है। से खोपड़ी उड़ा दो। अड़ोस-पड़ोस वालो ने तुमसे कुर्छ' कहा, आग लगाकर मायके लौटना । हे दूल्हे, यह तो अबोधमा से पली है, इसके समझदार बनने तक महानुभूति दिसायी शिष्ट साहित्य में हास्य प्रारम्भिक युग से उपलब्ध होता है। तेलुगु-ही प्रथम काव्य महाभारत है। इसका प्रणयन महाकपियो ने किया है। ये महाकवि है । नन्नयभट्ट आदि कवि माने जाते है । इन्होने वायुपुत्र भीमसेन के चित्रण मे हास्य का संदर्भानुसार अच्छा पोपण किया है । भीम के जन्म के दसवे दिन जब राजा पाडु, कुन्ती देवी को साथ लिये बच्चे सहित एक पर्वत पर स्थित देव-मन्दिर जा रहे थे, अचानक एक शेर ने उन पर धावा किया । कुन्ती गय-कपित हो उठी। उसके हाथो से बच्चा भीम पर्वत के पत्थरो पर गिर पडा तो वे सभी पत्थर चूर्ण हो गये । इसके वर्णन मे कवि ने जिस स्वाभाविकता, विकृति एवं व्यंग्य को ध्वनित किया है, वह अत्यंत प्रशसनीय एक दूसरी घटना भी पाठको को हँसाकर लोट-पोट करने म समर्थ है । कुन्ती देवी द्रौपदी को भीमसेन को खाना खिलाने का तरीका यो वतायी है--- भीम का उदय छोटा है। लेकिन वह बलबान है, जरा ज्यादा खिलाओ। इस वाक्य में जो व्यंग्य है, और तेलुगु में जिस चतुरता के साथ कविता मे वर्णित है, उसका आनन्द लेते ही बनता है । ऐसे उदाहरण तेलुगु के गत सहस्र वर्षों से रचित ग्रन्थो मे से सैकड़ो की संख्या मे दिये जा सकते हैं । परन्तु इस छोटे से लेख में विपुल परिचय संभव नहीं है । अतः हम कुछ चाटूक्तियाँ और नमूने के तौर पर कुछ पद्यो का उदाहरण देते है। तेलुगु के कवि सार्वभौम श्रीनाथ प्रकाण्ड पंडित थे । उन्होंने प्रौढ़ कविता मे सरसता का भी समावेश किया। उनकी असंख्य चाटूक्तियाँ आज भी उपलब्ध है। वे आन्ध्र की पलनाडु सीमा मे पयन. कर रहे थे, प्यास लगी। उस क्षेत्र में पानी का अभाव था। इस पर श्रीनाथ ने अपने आराध्य शिवजी से प्रार्थना की जो कि हास्य से परिपूर्ण है- 'सिरिगलवानिकि चेल्लुनु तरुणुत पदियारवेल दग बैड्लाडन् दिरिपेमुन किछरांडला परमेशा गंग विडुमु पार्वति चालुन्' - तलुगु वाङ्मय . विविध विधाएं हास्य का अर्थात्, धनी व्यक्ति सोलह हजार तगियो से भी शादी करे तो भी वह मान्य हो सकता है । (यहाँ विष्णु मुख्यत कृष्ण की सोलह हजार गोपिकाओ की ओर सकेत) हे ईश्वर, तुम तो भिखारी हो, तुम्हे दो पत्नियो की क्या आवश्यकता है ? गंगाजी को छोड दो (मैं अपनी प्यास बुझा सकता हूँ) तुम्हे तो पार्वती पर्याप्त है। भक्त शिरोमणि महाकवि ने अपने भागवत में शिष्ट हास्य का पोपण किया है । यह वात्सल्य और शृंगार रस के चित्रण मे सहायक बन कर अत्यन्त सहज रूप मे वर्णित है। कृष्ण अवस्था मे छोटे है, पर बडो के कार्य कर बैठते है । इस विरोधाभास में स्थित विकृति ही सहज रूप आलंवन बन जाती है । एक दो उदाहरण लीजिए । वामकृष्ण गोपिकाओं के यहाँ खेलने जाते है और क्या-क्या करते है-- 'आडजनि वीरल पेरु गोडक नी मुतुडु द्रावि योयिंचुक ना कोडलि मूर्तिदुडिचिन, गोडलु मुच्चन्नुमुनत्त कोट्टे लतांगी' यशोदा से एक गोपिका शिकायत करती है-'हे लतागी, देखो, तुम्हारा लडका खेलने के बहाने घरो में घुस आया और सारा दही पीकर थोडा-सा उम घर की बहू के मुंह पर पोत दिया। साम ने यह सोचकर कि उसी की बहू चोर है, उसकी खूब खबर ली।" एक और गोपिका यशोदा से शिकायत कर रही है-- "नम्मि निदर वोव नापट्टि जुटु मा लेग तोक तोड लील गट्टि वीथुलदु द्रोले वेलदि नी कोमरुंडु राचबिडडडेन रव्य मेले" हे माई, तुम्हारे पुत्र ने यकीन के साथ मोनेवाली मेरी पुत्री के जूड़े को हमारे बछड़े की पूंछ से बांध दिया और उम बछड़े को गलियों में खदेड़ दिया। इसके अतिरिक्त सोमन्ना के उत्तर हरिवंश, जक्कन के विक्रमाकं चरित्र, अल्लसानि पेद्दन्ना के मनुचरित्र, पिंगलि मूरन्ना के कलापूर्णोदय, नंदि तिम्मन्ना के पारिजातापहरणम्, चामकूर वेंकट कवि के विजय विलास, तेनालि तेलुगु साहित्य में हास्य . रामकृष्ण के चाटुपद्य, अप्पकवि कृत शशिरेखापरिणयम्, इत्यादि काव्यो में हास्य का अच्छा वर्णन किया है । एक उदाहरण देखिए- निदुर बोगोटु ग्रममुगानेत्ति केक्कु गलुपत घटिंचु गुडयु गर्रयु दने चेति कोनगर्च नदिगान जेपनगु वेश्यकुनु नश्यमुनकुनु भेदमिलनु । अर्थात्, निद्रा को तिलाजलि दिलाकर क्रमश. सर पर चढती है। शरीर और हृदय को भी कलुपित करती है और हाथ मे लाठी और घडा पकडा देती है । अब सूंघनी और वेश्या मे अतर क्या है ? अर्थात् दोनो से एक ही प्रकार की हानि होती है । वेश्या के द्वारा अप्रतिष्ठा, धन का सर्वनाश होता ही है । भिक्षा-पान और लाठी हाथ मे पकडा देती है। इस प्रकार दोनो मे श्लेप को ध्वनित कर कविद्वय ने उचितज्ञता का परिचय दिया है। काव्यों मे हास्य रस का जैसा पोपण हुआ है, वैसा ही हम गद्य-ग्रन्य शतक और चाटु कविता में भी पाते है। यहाँ पर नमूने के तौर पर कतिपय उदाहरण प्रस्तुत करेंगे । शतक कवियों श्रीकवि चौडप्पा ने हास्य के लिए गालियों की आवश्यकता बतायी है । वह लिखते है- "नीतुलकेमि योकिंचुक बूताटकदोरक नव्वु पुट्टदु धरलो नीतुलु बूतुलु लोक ख्यातुलुरा कुदवरपु कवि चौडप्पा । उपदेशों का क्या अभाव है ? निन्दा और गालियों के बिना इस जगत में हँसी नहीं होती। नीति, उपदेश, निंदा और गालियों तो जगत् की ख्याति के चिह्न है। आगे वही कवि बताते हैं कि दस उपदेश और दस गालियां, दस शृगार- प्रधान कविताएँ सभा में जो पढ़ता है, वही श्रेष्ठ कवि माना जाता है । शतक करियो में सात वेमना का अपना विशिष्ट स्थान है । विस्तार के भय से इनके पद्यो का सारांश मान देते हैं । एक स्थान पर वे लिखते हैं--- १. क्षीर-सागर में शयन करने वाले विष्णु गोपिकाओं के घरों में दूध चुराने क्यों गये ? दूसरों को वस्तुएँ सब को भली लगती है।

तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं २ गुफाओं में जाकर लोग गुरु को ढूंढने लगते है, यदि हिंस्र पशु उसमे से निकला तो मुक्ति का मार्ग अवश्य यह जल्दी दिखा देता है। ३ लोभी को मारने के लिए इस जगत मे किसी दवा की जरूरत नहीं उमका तो उपाय कुछ और है। उसरी धन मागिएगा तो वह जल-भनकर गर जायेगा। ४ बकरी के गल-थनों के पीने से भूख नही मिटती, केवल मात्र आशा ही है वैसे ही लोभी व्यक्ति से धन मांगने पर लाभ क्या है ? तेलुगु मै भाव कविता के उदय होने पर उसका परिहास करते हुए एक कवि ने लिखा है। भाय कविता हिन्दी में छायावादी कविता कहलाती है । भाव कवि का कथन है- भाव कवि के लिए तेलुगु मे पढना-लिखना जान लेना काफी है । अंग्रेजी ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं। देशाटन करते रहना चाहिए, नौकरी के पीछे उसे पागल नहीं रहना है। कल्पना की उड़ाने भरनी है और प्राचीन कवियो को निन्दा करनी है । भाव-गीतो का गान करते रहना है । अप्पकवि (वैय्याकरण और रीति ग्रन्थकार) के लक्षणो की उपेक्षा करनी है और केशों को इस तरह बढ़ाना है कि वे कर्णद्वय को ढंक दे। नयी वेश-भूषा में जनता के सामने आना है। यही संक्षेप में हमारी समिति के सदस्यो के नियम है। स्वर्गीय भोगराजु नारायणमूर्ति का "पंडुग कट्नमु” (पर्व का उपहार) चार आश्वासो वाला विशुद्ध हास्य-ग्रन्थ है । इसमें से सैकड़ो उदाहरण दिये जा सकते है। आज की दहेज-प्रथा की कड़ी आलोचना करते हुए कवि ने एक स्थान पर बतलाया है कि एक युवक ने विवाह के समय हजारो रुपये दहेज लेकर सास-ससुर को राह का भिखारी बना दिया और पत्नी को ससुराल में छोड़ कर ऊँची शिक्षा का बहाना बतलाकर लन्दन चला गया। आज दस साल बीत रहे है, वह लौटकर नहीं आया है। लोगों का कहना है कि वहाँ किसी रखेली के साथ रंगरेली करते हुए भारतीय सभ्यता से ध्रप्ट हो गया है। इसके अतिरिक्त श्री हट्टि नरसिंहम् कृत "प्रयास शाप विमोचनम् श्री वीरेशलिंगम् के प्रहमन, श्री चिलकति नृमिहम् के गणपति और दुंदुभि, श्री गुरजाड अप्पाराव का कन्याशुल्कम्, श्री वेदुम वेंकटराय शास्त्री का प्रतापरुद्रीयम् श्रीपाद सुब्रह्मण्यम् की कहानियाँ, श्री भमडिपाटि कामेश्वर राव कृत प्रहसन, कहानियों और लेस, श्री विश्वनाय कविराज कृत एकाकी, तेलुगु साहित्य मे हास्य श्री मल्लादि वेकट कृष्ण शर्मा के प्रहसन, श्री चिन्ता दीक्षितुलु की हास्य कथाएँ तेलुगु हास्य रस प्रधान साहित्य मे आदर के माथ गिनी जाती है । परन्तु श्री पानुगंटि लक्ष्मीनृसिंह राव के निवन्ध संग्रह "साक्षी" के छ भाग, उन्ही के "वृद्ध विवाह", "कंठाभरण' नाटक, श्री मोक्कपाटि नरसिंह शास्त्री कृत "वारिस्टर पार्वतीशम्", श्री मुनि माणिक्यम् नरसिंह राव की कहानियाँ एवं ममिडि कामेश्वरराव के प्रहसनो पर आन्ध्रवासियो को अभिमान है। हास्यप्रधान साहित्य मे इनकी रचनाएँ किसी भी भाषा की समता कर सकती है।

१० युग ने तेलुगु काव्य में राष्ट्रीय भावना भारतीय स्वाधीनता संग्राम की उज्ज्वल पृष्ठभूमि के दर्शन क्षेत्रीय भाषाओ के साहित्य में किये जा सकते है। इस विशिष्ट मोर्चे पर तेलुगु ने, जो साहे छ करोड से भी अधिक लोगो की भापा है और अपनी असीम मधुरता के कारण “पूर्व की इतालवी" कहलाती है, कीमती योग दिया है। राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के माध्यम से तेलुगु के मनीपी लेखको ने साहित्य और जनता के बीच की कृत्रिम दूरी को मिटाने के साथ-साथ हमारी आजादी की लडाई का पथ भी प्रशस्त किया। राजा-रानी की जगह सामान्य जन एवं उनके सुख-दु ख इनकी रचनाओ के प्रधान विषय बने । स्वाधीनता के तेलुगु के साहित्य को ओजस्वी तो बनाया ही, उसके द्वारा पूरे प्रदेश में नये सिरे से प्राण फूंके तेलुगु साहित्य के इसी रूप की यह एक रोचक झाँकी । अग्विल भारतीय राष्ट्रीय महासभा अर्थात् काग्रेस की स्थापना के साथ ही इस देश मे नये सिरे से राष्ट्रीय भावना का सूत्रपात हुआ। तब देश भर में समाज-सुधार के आन्दोलन की जो प्रबल लहर बही, उससे आन्ध्र भी अछूता नही रह सका। साहित्यिक, सास्कृतिक, सामाजिक और कुछ अशो मे धार्मिक क्षेत्र में भी नवीन धारा प्रवाहित हुई और क्राति की भावनाएँ उभरी । परिणाम- स्वरूप देशवासियों मे नयी चेतना और जागृति की नयी लहर दौड़ पड़ी। तेलुगु साहित्य मे यह भावात्मक क्राति तीन महानुभावो के द्वारा संपन्न हुई । श्री गिडुगु राममूर्ति पंतुलु ने भापा के क्षेत्र मे मौलिक क्राति उपस्थित की; श्री वीरेशलिंगम पंतुलु ने समाज सुधारवादी आन्दोलन को जन्म दिया और गुरजाड अप्पाराव ने उपर्युक्त दोनों आन्दोलनों को आत्मसाद करते हुए नये विचार दिये । इसी समय से तेलुगु कविता में भावात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगा।

तेलुगु काव्य मे राष्ट्रीय भावना ६३ गुरजाइ अपाराव ने तेलुगु काव्य को नयो वस्तु, नया छंद, नये भाव और नयी शैली प्रदान की तत्कालीन युग की सामाजिक प्रगति और परिवर्तन के चिह्न इनकी कविता में परिलक्षित होते हैं । तेलुगु काव्य में राष्ट्रीय भावना मर्यप्रथम अप्पारावजी की रचनाओं द्वारा ही मुखरित हुई। ऐगा यदि कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। अप्पाराव ने अपने काव्य का आदर्श नीचे की पंक्तियों में व्यक्त किया है "आकुलंदुन अणगि माँग कवित कोपिल पलुक चलनोय पलुकुलनु विनि देशम दभिमानमुलु मोलकेत वलेनोय ।" अर्थात्-पत्तो की आड मे छिी रह कर कवित्तरूपी कोयन कक उठे और उसको वाणी मुनकर जनता मे देश-प्रेम की भावनाएं जागृत हो जाएँ। अप्पाराव की देशभक्ति आदर्श रही। उन्होने “देशभक्ति" नामक कविता में अपने भावो को ओजस्वी रूप में अभिव्यक्त किया है --- "देशमुनु प्रेमिचुमन्ना मंचियन्नदि पेंचुमन्ना ओट्टि माटलु कट्टिपेट्टोय् गट्टि मेल् तलपेटवोय ।" अर्थात-देश से प्यार करो' अच्छाई को बढाओ, बेकार की बकवास बन्द, करो, जन-हित के लिए कोई ठोम कार्यक्रम बनाओ। आगे ये कहते है-- "हे भाइयों, श्रम करो, मांस-मज्जावाला व्यक्ति ही मानव है। मास-मज्जा खाद्य-पदार्यों से निर्मित होते है । खाद्य-गदायों के उत्पादन के लिए थम करना आवश्यक है। विभिन्न विद्याओं और कलाओ का अध्ययन करो। देश को समृद्ध बनाओ। विद्याओं (के क्षेत्र) में ही स्पर्धा की भावना बढाओ। व्यर्थ का कलह न बढाओ। देश-प्रेम का ढोग रचकर गप्पें हांकने न रहो । जनता के हित के हेतु कोई महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाओ। अपने स्वार्थ को त्यागकर पड़ोमी की सहायता करो।

तेलुगु पाङ्मय : विविध विधाएं देश के माने मिट्टो नहीं है, देश के माने मानव है । चाहे धर्म विभिन्न प्रकार के क्यों न हों, किन्तु हृदय एक हो तभी इस जगत् का कल्याण होगा। देश रूपी सुन्दर वृक्ष, प्रेम रूपी पुप्पो को मंजरित करें और मानव के स्वेद मे मिचकर धरती स्वणिम फसल उगत उठे।" जातीय और राष्ट्रीय भावनाओ को एक साथ ध्वनित करने वाले आचार्य रायप्रोलु सुब्बागव का भी तेलुगु काव्य मे कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं है । आपने जनता को प्रबुद्ध करने वाले कई गीत "उद्बोध" शीर्षक से लिखे है जो राष्ट्रीय गीतों का काम दे रहे हैं। उनका निम्नलिखित गीत बहुत ही विख्यात है-- "ए देश मेगिना एन्दु कालिडिना ए पीठ मेक्किना एवरेदुरैना पोगडरानी तल्लि भारतिनि निलुपरा नी जाति निडु गर्वम्मु लेदुरा इटुवंटि भूदेवि यदु लुरुरा मनबंटि धीरुलिकेन्दु अवमानमेनरा अनुमानमेगरा भारत पुत्रडनंचु भक्तितो पलुक !" भावार्थ चाहे तुम किसी भी देश मे पग रसो, चाहे किमी भी आसन पर क्यो न विराजमान हो जाओ, चाहे किसी से भी तुम्हारा मामना हो जाए, तुम अपनी माता भारत की स्तुति करो, अपनी जाति के अभिमान की रक्षा करो। हे भाई मेरे ! ऐमी भू माता अन्यत्र नहीं है। हमारे जैसे धीर-वीर भी कही नहीं है। अपने को भारत पुत्र कहलाकर मभक्ति ऐमा घोषित करने में तुम्हें सन्देह क्यो? आगे कहते हैं- " पूर्वपुण्यमो एक योग बलमो जन्मिंचिनाडवी स्वर्ग खण्डमुना ए मंचि पूवुलनु प्रेमिचिनावो निनु मोमे ई तल्लि कनक-गर्भमुना पोलमुल रलालु मोलिचायि रा इट वाधिलो मुत्यालु पंडाइरा इचट पृथ्वि दिव्योषधुलु पिदिकेरा मनकु तेलुगु काव्य में राष्ट्रीय भावना अर्याद (--- जाने किंग पूर्वजन्म पुष्प और योग के बल मे तुम स्वगंतुल्य हम भू-भाग में जन्म ने गुरो हो। तुमने किन मुन्दर गुमनों मे पार किया होगा जिगके फतम्यम्प ग माता ने तुम्हें अपने स्वर्णगर्भ मे ढोया है । यहाँ धे गेनों में रन उगे है. गागर में मोती पैदा हुए हैं। पृथ्वी गे (यहाँ) दिध औषधिषी को निलोड़ा है। ऐमी भूमि में पैदा होने का तुम्हें अभिमान होना चाहिए । इसमें सन्देह और अपमान अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है । सो भनि आचार्य रापप्रोलु ने अपनी मातृभापा यी माधुरी पर विमुग्ध होकर उगकी प्रस्तुति का गान जिन शब्दों में किया है. वे गुनगुनाने योग्य हैं "ए प्रफुल्ल पुप्पंचुल नीश्यलकु पून सल्लितिनो येनु पूर्वमन्दु कानदयेनि पुनर्जन्म कलुगनाकु मधुर-गार मैन तेनुगु मातृभाषा ।" अर्यात्-~-मैंने किन विकगित मुमनों गे प्राचीन काल में ईश्वर की उपासना की थी, ज्ञान नही, इगी के कारण मुझे इस गन्म में मातृभापा के रूप मे नेलुगु उपलब्ध हुई है । मैं मर्वशक्तिमान ईश्वर मे यही निवेदन करता हूँ कि यदि मुझे पुनर्जन्म प्राप्त हो तो अत्यंत मधुर तेलुगु ही मातृभाषा के रूप में (मुझ) प्रदान करें। राष्ट्रीयता फा बिगुल देश भर में राष्ट्रीय आन्दोलन का विगुल बज उठा। उम राष्ट्रीय यज्ञ के लिए आन्ध्र यामियों ने भी एक ओर समिधाएँ दी, तो दूसरी ओर १६१३ ई० में मे पृयक आन्ध्र प्रदेश को स्थापना का आन्दोलन जोर पकडने लगा। फिर भी प्रान्तीयता की इम भावना को राष्ट्रीयता के मार्ग में मुबाराव ने बाधक बनने न दिया। आपने वर्ण वर्ग, जाति, धर्म इत्यादि संकुचित भेद भावों का यही निर्भीकता के माय गडन किया। निम्न पंक्तियां इनके विशाल दृष्टिकोण का परिचय देने के लिए काफी हैं--- "कुलमु दठयक, पोलिमेर गोल पडक बोयवले तल्लि पल्लकी मोयुमांध्र।" हे आन्ध्रवामी ! जाति, वर्ण आदि विभेदों की मीमा मे न जाकर एक कहार की भांति सी माता की पालकी ढोओ। गुब्बाराव नहीं आन्ध्र के प्राचीन वैभव का स्मरण दिलाफर ..

-- तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं को अतीत के समान स्वणिम बनाने की प्रेरणा प्रदान करते है, वहां वर्तमान की पतनावस्था पर भी गंद प्रकट करने में नहीं चूकते; जैसे- "कृष्णा की तरंगो पर कदम रत जय आन्ध्र की नौकाएँ नृत्य करती यो. जब क्षेत्रीय साहित्य कपी दीपकों के द्वारा आन्ध्र का कोना-कोना आलोकित था, रमणीय शिल्प मंमार में आन्ध्र की प्रवीणता प्रतिस्पर्धा कर रही थी, जब ममर-भूमि में सेना-व्यूह की विजयी पताकाओ के नीचे आन्ध्र का पौरुष अपने दपं का परिचय दे रहा था, उसका अवलोकन कर प्रसन्नतावश मिर चालन करने अभिमान के साथ आन्ध्र के युवक- युवतियाँ शाति का अनुभव करेंगे, तब तक हमे विराम नही है और न यह युद्ध की पोशाक उतारने का समय ही है।" एक अन्य छंद मे आन्ध्रवामियो के तेग एवं पौरुष का परिचय कवि इन शब्दो में देते है~-- "जब कोडवीड़ के रेड्डी युवक कुदा- लियो को पिटुवे के डंठलो की भांति झुकाकर उनमे गाँठे नगा देते थे पलनाटि के वीर योद्धा बडे-बडे पहोडो को नवनीत के दंशो के समान तोड-तोड कर चकनाचूर कर डालते थे अदंकि के वीर भटो ने तालाब के छेदो से बहनेवाले प्रवाह को इस तरह रोको

3
या में शिवजी ने गंगा की धारा को
रोका
जब तेलंगाना के भटों ने विशाल
जिना के कपाटो को अपने घूमों मे
नोड डाला था
हे आप्रवामी ! देखो तो मही, ऐसे
वलि इम आन्ध्र भूमि में पैदा हुए हैं
और उन लोगों ने विजय कन्या का
वरण किया था
ऐमी मेरनी का पेट अब चीटियो
का बिल बन गया है
अतः तुम अपने आलम्प को त्याग
गांधीजी के आगमन के साथ आन्ध्र प्रदेश मे राष्ट्रीय भावना और भी
प्रवल हो उठी। १६०७ मे गोदावरी मण्डल महासभा का आयोजन हुआ
था। श्री विपिन चन्द्र पाल इममें प्रधान वक्ता थे। उस सभा में चिलकमति
लक्ष्मी नरसिंहम ने, जो "आन्ध्र के मिल्टन" के नाम से विख्यात रहे. एक
छंद गामा था, जिसमें अंग्रेजों द्वारा भारत के शोषण का परिचय मिलता है :
• भारत घडवु पनि पाडियावु
हिन्दुवुलु लेगदडल एड्चुचुंड
तेल्लवारनु गडुमरि गोल्लवार
पिद्रुकुचुन्ना मूतुलु बिगिय कट्टि"
अर्थात् ---भारतवर्ष एक सुन्दर दुधारू गाय है, हिन्दू सर उसके बछड़े बन
मदन कर रहे हैं । गोरे नामक चतुर ग्वाले इन बछड़ों के मह बांधकर गायों
का दूध दुह रहे है।
यह कविता मुनकर गोरे अफमर कयि पर अत्यंत कुपित हुए. परन्तु
डॉ० पट्टाभि मीतारामम्या ने उम छंद मे ग्लेष पटिन या ध्वनित कर उन्हे
शात किया था। "तेल्लनारनु" शब्द का अर्थ "गोरे" और "मरा"
होता है।
फा०-७

तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं नवयुग के उद्गाता "कवि सम्राट" विश्वनाथ सत्यनारायण के कण्ठ मे राष्ट्रीयता का स्वर जिम रूप मे मुखरित हुआ है, वह अत्यन्त ही प्रशमनीय है । प्राचीन आन्ध्र साम्राज्य के वैभव की कहानी के स्मरण मात्र से उनका हृदय पुलकित हो उठता है। आन्ध्र की महिमा के प्रसंग में कवि विश्वनाथ ने "आन्ध्र पोरुप" तथा "आन्ध्र प्रशस्ति" नामक दो खंडकाव्यों का प्रणयन किया है। "झाँसी की रानी" और "कुमाराभ्युदयम्" देशभक्ति एवं राष्ट्र-प्रेम को उद्बोधित करने वाले इनके दो दूसरे अनुपम काव्य ग्रन्थ है । आन्ध्र की इसी परम्परा मे कवि कोकिल दुवृरि रामिरेड्डी का योगदान स्मरणीय है । इनके द्वारा विरचित प्रायः प्रत्येक काव्य में राष्ट्रीय भावनाएँ ओतप्रोत हैं। विशेषकर खडकाव्यों में यह भावना प्रबल रूप मे पायी जाती है। रामिरेड्डी ने “स्वतंत्र रयम' शीर्षक कविता में स्वतत्रता देवी का माक्षात्कार ही किया है । अपनी "नैवेद्य" कविता में ये कहते है- "प्रोदुपोडुपुन नी पाद पूज कोरफु कविनि तेच्चिति दोमिट गन्नेरुपूलु वलिवितर्दिक निरतंबु वेलुगुनटुल हृदयपु मुगंधदीप मपितु गोनुमु ।" अर्थात्---सूर्योदय के समय तुम्हारे चरणो की पूजो करने के हेतु, मैं (कवि) अपनी अंजलि में कर्णर के पुष्प लेकर प्रस्तुत हुआ हूँ, लो, निरंतर प्रज्ज्वलित दीप को भी समर्पित कर रहा हूँ, ग्रहण करो। इस प्रकार ये अपने हृदय के मुरभित मुमनों को अर्पित कर धन्य हो गये। "गौतमी कोकिल" नाम से विख्यात श्री वेदुल सत्यनारायण शास्त्री ने अपनी राष्ट्रीय. भावना का पुष्प की अभिलाषा के माध्यम से भलीभांति अभिव्यक्त किया है, जो सहज ही हमे माखनलाल चतुर्वेदी "एक भारतीय आत्मा" की "फूल की चाह" की याद दिलाती है । रचना इस प्रकार है-- "नाकु, दलपुलेदु" नीचपु दास्यवृत्ति मन नेरनि शुरत मातृदेश से तेलुगु काव्य में राष्ट्रीय भावना वाचरणमुनं दसुवु लपंण सेसिनवारि पार्थिव श्री चेलुवारुचोट, तद स्था चुलन विकमिचि, वासनल वीचुचु रालिपोवग व लेन, तदुदात्त ममाधि मुक्तिकन्" अर्थात् --रमणियो की वेणियो मे गुथे जाने अथवा प्रिया के कण्ठ में सुशोभित हो इठलाने की मेरी कामना नहीं है । मैं चाहता हूँ कि नीचतापूर्ण दासता के प्रति विद्रोह करके स्वतंत्र होने की अभिलाषा में जिन वीरो ने मातृभूमि के पवित्र णो में अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए प्राणो की आहुति दी, उनका अवशेष जहाँ अपने यश का परिचय दे रहा हो, वहाँ पर विकसित हो अपने मौरभ को विखेरते हुए उस उदात्त मृण्मय ममाधि पर झर जाऊँ । पुष्प की यही आकाक्षा कवि के हृदय की अभिलाषा है । इसी परम्परा मे श्री तुम्मल सीताराममूर्ति, जी० जापुवा, राल्लपल्लि अनंत कृष्ण शर्मा, मल्लमपल्लि, गडियारम, दर्भा, मल्लवरपु नालमकृष्णाराव आदि के नाम उदार के साथ लिये जा सकते हैं । इनके राष्ट्र गान, आत्मकथा, उदय-गान, पेनुगोड लक्ष्मी, पेनुकोड, हंपीक्षेत्र, शिव भारतमु, राणा प्रताप चरित्र इत्यादि काव्यों ने आन्ध्र प्रदेशीय जनता को प्रबुद्ध, प्रोत्माहित और प्रेरित किया। गीतो के रूप मे इन भावनाओं का अपेक्षाकृत अधिक प्रचार- प्रसार हुआ। ऐसे गीत अनगिनत है । वमवराजु अप्पारावु, गरिमेल्ल मत्य- नारायण और देवुलपल्लि कृष्ण-शास्त्री के गीत प्रायः प्रत्येक आन्ध्रवासी की जवान पर चढकर अमर हो गये हैं, ऐमा यदि कहा जाए तो एकदम गलत नहीं होगा। गांधी गान बसवराजु अप्पाराव महात्मा गांधी के अनोखे व्यक्तित्व में इतने प्रभावित हुए कि उनके अन्त.म्तल से उम महामानव की प्रशस्ति में एक अपूर्व गीत यूं प्रस्फुटित हुआ-- "कोल्लायि गट्टितेनेमि मा गांधि माल तिरिगितेनेमि वेन्नपूस मनमु कन्नतल्लि प्रेम - १०० तेलुगु याड्मय : विविध विधाएं पंडटि मोमु पे ब्रह्म तेजस्गु मालुगु परफल पिलक नाट्यमाडे पिलक नालुगु वेदाल नाण्यमेरिगिन पिलक चौसिनोविप्पुते मुत्याल तोलकरि चिरुनव्वु नबिते परहाल यमे चकचका नडिस्ते जगति कंपिचेनु ।" माने-हमारे गांधीजी अंगोया पहने तो वपा, हरिजन बन फिरने से क्या ? उनका मन मक्पन जैमा (कोमल) है, उनका प्रेम माता का-सा है । उनके मुखमण्डल पर ब्रह्म तेज शोभायमान है। उनकी चोटी में चार ही वाल है, पर वह चोटी नाचना (औरों को नचाना) जानती है। चारों बाल चारो वेदों के मार मे अभिभूत हैं। बापूजी यदि अपने पोपले मुंह को खोलते है तो उममें से मोतियों की चौद्धार हो जाती है। यदि वे मुस्करा पढ़ते हैं तो रत्नों की वर्षा हो उठती है। अगर ये जल्दी-जल्दी पग पर डग धरने लगते हैं तो जगत ही कांप उठता है । इम प्रकार के असंख्य मधुर एवं पुलकित करने वाले भावों को गीतों का रूप देकर आन्ध्र के कवियों ने तेलुगु भापा-भापियों मे उष्ण रुधिर का संचार ही नहीं किया, देश के प्रति उनमें अपार प्रेम भी जगाया । गरिमेल्ल सत्यनारायण जैसे कवियों ने अंग्रेज सरकार के प्रति जन- असंतोष एवं विरोध प्रकट करते हुए अपने स्वर को अधिक विद्रोही बनाया । इनका निम्नलिखित गीत बहुत ही जनप्रिय हो चुका है-- "माकोदु ई तेल्ल दोरतनमु नूट नलुवदि नालुगु नोटिकि तगिलिचि माटलाइवबंटाडु मम्मु, पाट पाडवबंटाडु मम्मु, टोपी तोसि वीपुन बादुताडु- माकोददु" हमें गोरो का यह शासन नहीं चाहिए । वह एक मौ चालीस की धारा लगाकर हमारा मुंह वन्द करता है और कहता है, तुम बात मत करो, गीत मत गाओ । उल्टे जबर्दस्ती गांधी टोपी हमारे मिर पर से उतार कर पीठ पर तेलुगु साहित्य में राष्ट्रीय भावना १०१ कोड़ों की बौछार करता है। हम इस शासन से तंग आ गये है। यह शासन हमें नहीं चाहिए, नही चाहिए। राष्ट्रीय भावना को मुखरित करने वाले अन्य प्रमुख तेलुगु कवियो मे श्री श्री, नारायणबाबू, जलसूत्रम्, काटूरि, पिंगलि आदि है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद यह भावना और भी यथार्थ रूप मे प्रस्फुटित हुई है। सर्वश्री मधुना पंतुलु सत्यनारायण शास्त्री कृत "आन्ध्र पुराणम्" के दो भाग, श्री दाशरथी कृत "महादोदयम्" और नारायण रेड्डी कृत "नागार्जुन सागरमु" नयी तेलुगु काव्य रचनाओ मे अपना विशिष्ट स्थान रखते है । "आन्ध्र पुराणमु" के प्रथम खड में इक्ष्वाकु-वंशी नरेशों से लेकर काकतीय काल तक की कथा वणित । वौद्धयुगीन वैभव, शिल्प, चित्रकला इत्यादि समर्थ भापा एव सशक्त शैली मे तेलुगु काव्य में वर्णित है। आन्ध्र भू-भाग को दो टुकडो में बंटता देख श्री दाशरथी को दुख हुआ और उन्हे एक ही शासन के अन्तर्गत लाने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए उन्होने निजामशाही के विरुद्ध विद्रोह का जो शंखनाद किया, वह ऐतिहासिक महत्व रखता है । तेलंगाना में जब एक करोड के लगभग तेलुगु भाषी निजाम के शासन के अन्तर्गत थे, तब कवि ने उनके प्रति अपनी भावनाएँ इन शब्दो में व्यक्त की थी: "कोटि तुम्मुल कड रेडु कोट्ल तेलुगु टन्नलनु गूचि वृत्तातमंदजेसि मूड कोट्ल नोक्कटे मुडि बिगिचि पाडिनाडमहान्ध्र सौभाग्य नीति ।" एक करोड़ छोटे भाइयों के समक्ष दो करोड़ बड़े भाइयों का समाचार रखकर तीन करोड़ तेलुगु भाषा-भापियों को एक ही प्रेम-सूत्र में बांध कर मैंने महान आन्ध्र के सौभाग्य के गीतो का गान किया है। इस परम्परा में आन्ध्र भर में राष्ट्रीय गीत के रूप में गान किये जाने- वाले दो-चार गीतो का यहां उल्लेख न किया जाए तो यह लेख अपूर्ण ही माना जाएगा । ऐसे गीतों में श्री देवुलपल्लि कृष्ण शास्त्री कृत "जय जय जय प्रिय भारत जनयित्री!" तथा "युव पताक, नव पताक अरुणारुण जय पताक..."

१०२
नंनुगु वाश्मय : विविध विधाएं
प्रमुख है, जो आन्ध्र भर में प्रत्येक सभा के प्रारम्भ एव अन्त में गाये जाते है।
इगी भौति
'मा तेलुगु नल्लिकि मल्ल' दंड
मा फन्न तल्लिकि मंगलारतुलु"
अर्थाद-हमारी तेलुगु माता को चमेली के पुप्पों की माला अर्पित है, हमारी
जनन धात्री माता के लिए भगलमय आरती है ।
इम गीत में अनेक उदात्त भार है। इस प्रकार तेलुगु काव्य-साहित्य
राष्ट्रीय भावनाओ से पुष्ट, मान्न एवं मुशोभित हो भारत को राष्ट्रीय एकता
में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है।

११ तेलुगु वाङ्मय. में राम चरित भारतीय काव्यो में ही नहीं अपितु विश्व के काव्य-ग्रन्थो में भी रामायण आदि-काव्य माना जाता है और वाल्मीकि आदि-कवि । रामायण भारतीयो के लिए आदर्श ग्रन्थ है। वह इतिहास है, आध्यात्मिक है, एक क्या, समस्त विपयो का ज्ञान-कोप है। उसमें धर्म, नीति, परिवार, राज्य एव सामाजिक व्यवस्था इत्यादि समस्त वातो का चित्रण है और भारतीय संस्कृति, वाङ्मय तथा ज्ञान-विज्ञान का वह काव्य-भण्डार है। उसके पात्र आदर्श गुणों से पूर्ण एवं उत्तम है। राम जैसे सम्राट, सीता जैसी पत्नी, लक्ष्मण जैसे भ्राता, हनुमान जैसे सेवक, सुग्रीव जैसे सखा,भरत जैसे भक्त तथा दशरथ जैसे करुणामूर्ति विश्व के अन्य वाङ्मय मे दुर्लभ है । ऐसे उत्तम काव्य की सृष्टि करके वाल्मीकि धन्य हो गये है : रामायण काव्य की उत्पत्ति का हेतु क्रौच मिथुन की कथा है : "मानिपाद प्रतिष्ठा त्वमगम श्शाश्वती स्समाः। यत् क्रौंच मिथुना देकमवधीः काममोहितम् ॥" महर्षि वाल्मीकि के मुंह से उक्त श्लोक के वहिर्गत होने के पूर्व वैदिक वाङ्मय को छोड़ लौकिक वाङ्मय मे छन्दोबद्ध वाणी नहीं थी। महर्षि स्वयं इस वाणी पर चकित थे कि ब्रह्मा ने प्रत्यक्ष होकर उन्हें आदिकवि कह कर आशीर्वाद दिया और राम-चरित लिखने का आदेश दिया। तदनंतर नारद मुनि द्वारा रामचन्द्र जी के उदात गुणो का वर्णन सुनकर वाल्मीकि रामायण की रचना की। रामायण केवल काव्य मात्र नहीं है, वह एक आध्यात्मिक ग्रन्थ भी है। राम चरित के महत्व का वर्णन नहीं किया जा सकता है। श्री मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में सुनिए. "राम तुम्हारा वृत्त स्वयं काव्य है। कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है ।।".

१०४ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाए हिन्दी मे तुलसीदास रचित "रामचरितमानस" काफी लोकप्रिय है। तुलसीदाम उच्चकोटि के भक्त, प्रकाण्ड पंडित तथा कवि थे। उनकी कृतियो से हमे इस बात का भलीभॉति परिचय मिल जाता है। तुलसी भावुक थे और उनका लोकानुभव भी परिपूर्ण था । यही कारण है कि उन्होने जीवन के मर्मस्पर्शी स्थलो का चित्रण चित्र वडी मामिकता एवं योग्यता के साथ किया है । तुलमी ने वाल्मीकि रामायण से कथा मात्र ग्रहण कर ती और उसे अपने ढग से लोकभाषा में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया । वे जिन घटनाओ से अधिक प्रभावित हुए, उनका वर्णन कुछ विस्तारपूर्वक तथा उनमे मग्न होकर किया है। वाल्मीकि ने रामचन्द्रजी को अवतार पुरुप नही माना, बल्कि कालातर में रामचन्द्र अवतार पुरुष हुए। तुलसी तो राम के अनन्य उपासक तथा सेवक थे । उन्होने समस्त जगत् को सीताराममय देखा . सिया राम मय सब जग जानी। करौ प्रणाम जोरि जुग पानी । भक्ति के आवेश में तुलसी ने काव्य के लक्षणों का निरादर नही किया । काव्य की प्रौढ़ता का उन्होने सदा ध्यान रखा और औचित्य तथा पात्रो के चरित्रों की परिस्थिति का अपने आदर्शानुकूल पोपण किया । कवि का अपने पात्रो के प्रति जिस प्रकार भाव होता है तथा जिस आदर्श को कवि अपने काव्य द्वारा समाज सम्मुख उपस्थित करना चाहता है, उसी के अनुरूप अपने पात्रो को सृष्टि करता है । यही कारण है कि एक ही कथावस्तु को ग्रहण करने पर भी विभिन्न कवियो की रचनाओं में भिन्नता दिखायी देती है। साथ ही साथ कवि जिस समाज में निवास करता है, उस युग की देश-कला परिस्थितियों का प्रभाव भी काव्य मे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में परिलक्षित होता है। केशवदास केवल मात्र पडित और आचार्य थे। वे भक्त नही थे। जितने अंशों मे वे पंडित थे, उतनी मात्रा में वे कवि नही थे। पंडित और आचार्य में कवि की अपेक्षा तार्किक विचारो को अधिक प्रधानता होती है । इस कारण से उनकी रचनाओ मे कलापक्ष का भले ही विकास हो किन्तु हृदय-पक्ष कमजोर पडता है । तुलसी की रचना में कहीं-कही इन दोनो पक्षों का संतुलन होने पर भी मार्मिक स्थलों में हृदय-पक्ष का पलड़ा भारी दिखायी देता है। वे भक्त होने के कारण उस भावुकता मे बहते दिखाई देते है। ऐसे प्रसंग तुलसी रामायण में अनेक मिलते हैं। केशव ने जहां अपने पात्रो द्वारा वार्तालाप कराया है, वहां पर उनकी ताकिक शक्ति का अच्छा परिचय मिल जाता है। गिद्ध और रावण का संवाद पढ़ते ही बनता है। लेकिन तुलसी की कृति में ।

तेलुगु वाङ्मय में राम चरित १०५ राम और भरत का मिलन, राम का वन गमन, केवट-प्रसग, जनकपुर में स्वयंवर से पूर्व सीताजी का रामचन्द्र को देखना, लक्ष्मण का शक्ति लगने से मूच्छित होना, इत्यादि प्रसग अत्यंत उत्तम एव नूतन वन पडे हैं । इन प्रसंगो के आधार पर हम अन्य रामायणो से मेल खाने वाली घटनाओ की समानता एवं असमानताओ पर विचार करेंगे । तेलुगु मे राम-चरित को लेकर अनेक काव्य, शतक एव लोक-कथाएँ रची गयी है । कुछ पंडितो एवं कवियो ने मूल कथा को आधार बनाकर अनुवाद कार्य मात्र किया तो कुछ ने कया-संगठन में अपनी रुचि के अनुकूल उसम काफी परिवर्तन किया । आन्ध्र देश मे महाभारत और भागवत को जो लोक- प्रियता प्राप्त है, वह रामायण को नहीं । फिर भी आन्ध्र के आराध्य देव राम है। आन्ध्र के कोने-कोने में स्थित राम मन्दिर इसकी पुष्टि करते है । भक्त पोतन्ना, भक्त रामदास तथा त्यागय्या ने अपनी कृतियो द्वारा आन्ध्र देश में राम-भक्ति का अच्छा प्रचार किया। काल की दृष्टि से देखा जाए तो रंगनाथ रामायण प्रथम मानी जाती है । इसके कवि गोन बुद्धा रेड्डी ने कथा संविधान मे नवीन कल्पनाओं तथा लोक प्रचलित वृत्तातो को स्थान देकर काव्य को और भी रोचक बनाने का अच्छा प्रयत्ल किया है। तुलसी के सम्मुख लोक-संग्रह भावना का आदर्श था। उनके नायक राम सव के लिए अनुकरणीय हैं। तेलुगु में महाभारत और महाभागवत के कवियों के सम्मुख यह आदर्श था। रामायण की रचना करते समय कवियों ने केवल मात्र काव्य के आदर्शों को ही अपने सामने रखा । रगनाथ रामायण "द्विपद" छन्द में रचा गया है । कवि काव्य-लक्षणों के निर्वाह में सजग रहे। गोन बुद्धा रेड्डी ने रामचन्द्रजी के चरित्र को आदर्शपूर्ण एवं उज्ज्वल तो बनाया साथ ही साथ रावण को भी अपार शक्ति-संपन्न, वीर, शिव भक्त तथा उत्तम चक्रवति के रूप में चित्रित किया। गोन बुद्धा रेड्डी के रावण सत्व और तमोगुणों से युक्त है। उसमे अच्छाइयां भी हैं और बुराइयां भी। पात्र-चित्रण मे कवि की सहृदयता, सहानुभूति तथा समभावना प्रशंसनीय है। रावण के सभी भाई राम के भाइयो जसे आज्ञाकारी है। मंदोदरी कौसल्या जैसी पति-भक्तिन तथा सुलोचना (रावण की बहू तया इंद्रजीत की पत्नी) सीताजी जैसी पतिव्रता थी। इनके आदर्श सबके लिए अनुकरणीय हैं । हाँ, केवल रावण के अपराध से उस वंश पर जो कलंक का टीका लगा, बम उस के कारण सब बदनाम हुए। वैसे तो रघुकुल में भी कई-जैसी स्वापिन ने अपने कलुप का परिचय दिया है । रंगनाथ रामायण के रावण रामचन्द्रजी के भक्त थे। वह जानते थे कि १०६ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाए रामचन्द्र जी के हाथो में प्राण त्याग देने का सौभाग्य सब को प्राप्त नहीं होता है । जब युद्ध भूमि में मंदोदरी आकर रावण ने प्रार्थना करती है कि युद्ध बन्द कर दे तब रावण कहते है 'मैं किसी भी हालत में रामचन्द्रजी को छोड़ नही माना हूँ। मैं उन्हे मीताजी को नहीं दूंगा। यदि युद्धभूमि में मैं राम के बाणो के आघात से प्राण त्याग दूं तो मुझे मुक्ति मिल जायगी। देवता मेरी प्रशसा करेगे । उस वैकुण्ठ के मामने सारी संका और तुम सब बलिहारी है।" ऐसे ज्ञानी थे रंगनाय रामायण के रावण । रावण का ऐसा उज्ज्वल पक्ष फिमी भी रामायण मे हमे उपलब्ध नही होता है। वाल्मीकि ने रावण को लम्पट, क र एव हठी के रूप में चित्रित किया है। तुलसी की भी ममभावना नही थी । यद्यपि रावण सीताजी के साथ राक्षम विवाह करना चाहता था। लेकिन उन दिनो में राक्षस विवाह करने के लिए भी एक साल की अवधि नारी को दी जाती थी। इस अवधि के भीतर ही रामचन्द्र ने रावण पर विजय पाकर सीताजी को मुक्त किया । तुलमीदास ने केवट-प्रसंग में अपनी विमल एव धवल भक्ति का अच्छा परिचय दिया है। केवट का राम के चरण धोकर नाव पर चढाना, उतराई लेने से बचना, यह मार्मिक प्रसंग पाठकों के हृदयो मे गुदगुदी पैदा कर देता है । भरत मिलाप के समय भरत के हृदय की पवित्रता, कैकेई का पश्चात्ताप, अयोध्या की प्रजा की राज-भक्ति, रामचन्द्रजी की सच्चरित्रता का वर्णन पढ़ते ही बनता है। जनकपुर मे धनुप-यज्ञ के पूर्व राम और सीता की मुलाकात कराकर उनमे परस्पर प्रेम की भावनाएँ पैदा कर कथा-वस्तु मे औचित्य की रक्षा की है। उनके विवाह को तुलसी प्रणय-विवाह साबित करना चाहते थे । उनकी दृष्टि मे रामचन्द्रजी अपनी शक्ति का परिचय देकर किसी कन्या से शादी कर ले, तो वह वैवाहिक-आदर्श उत्तम नही है । समयोचित कल्पना द्वारा अपने काव्य को तुलसी ने सजाने एवं संवारने में कोई कसर उठा नही रखी । तुलसी के राम मानव रूपधारी परमात्मा थे। वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम के उपासक थे । उन्होने रामचन्द्रजी के शील, शक्ति एव सौन्दर्य के रूप विभिन्न घटनाओं के द्वारा पाठकों के सम्मुख रखे । इन आदर्शों के द्वारा तुलसी ने असहाय जनता को संबल देकर धर्म की रक्षा की । यही कारण है, तुलसी- रामायण आज भी जनता का कण्ठहार बना हुआ है। गोन बुद्धा रेड्डी के रंगनाथ रामायण में द्राविड आदर्श एवं दृष्टिकोण का परिचय मिलता है । इन्होंने अपने काव्य में संदर्भ के अनुसार औचित्य की रक्षा करते हुए कई नये प्रसंगों को स्थान दिया है जो तुलसी और वाल्मीकि तेलुगु वाङ्मय मे रान चरित १०७ रामायणो में भी हमे नहीं मिलते। उनमे ४-५ प्रसगो का हम यहां परिचय देते हैं- यो तो मभी रामायणकारो ने पंचवटी में शूर्पणखा का प्रवेश कराया है; किन्तु कथा ऑचित्य की दृष्टि से अचानक शुर्पणखा का प्रवेश कुछ विचित्र-मा लगता है। इस ओर किसी रामायणकार का ध्यान नहीं गया । गोन बुद्धा- रेड्डी ने एक अपूर्व कल्पना द्वारा पंचवटी में शुर्पणखा के प्रवेश को अत्यंत स्वाभाविक बना दिया है। १. जंबुमाली वृत्तांत--जंबुमाली शूर्पणखा का पुत्र था। रावण ने जवुमाली के पिता विद्यु ज्जिह्न का अपमान किया था। उसका बदला लेने के लिए जंबुमाली एक सघन वन में सूर्य के प्रति तपस्या कर रहा था । सूर्य भगवान ने उसकी तपस्या पर प्रसन्न हो एक सुन्दर खड्ग भेजा। लेकिन जम्बुमाली ने उसे ग्रहण करने से इसलिए इनकार किया कि स्वयं सूर्यदेव ने आकर उमे नहीं दिया। खड्ग को आकाश को और वापस लौटते लक्ष्मण ने देखा । तक्ष्मण उस समय कंदमूल और फल के लिए आये थे। उस खड्ग को अपने हाथ में लेकर देखा, उसकी धार पैनी थी। उसकी जांच करने के विचार से लक्ष्मण ने पास में स्थित एक वास के झुरमुट पर खड्ग चलाया। उसके माथ उसमें तप करने वाला जम्बुमाली भी कट मरा । इससे लक्ष्मण भयभीत हो राम के पास गये । वही पास मे बैठकर तप करने वाले मुनियो द्वारा उन्हे मालूम हुआ कि जम्बुमाली एक राक्षस है । योडी देर के बाद शूर्पणखा आयी और अपने पुत्र की मृत्यु को देख विलाप करती रही । जब उसे भी मुनियो द्वारा मालूम हुआ कि एक मुनिवेषधारी राजकुमार ने उसका संहार किया तो वह वदला लेने के लिए राम की पर्णशाला के निकट आयी। रामचन्द्रजी के अपार सौन्दर्य को देख वह अपने क्रोध को भूल गयी और उनसे विवाह करने की कामना प्रकट की। २. सुलोचना का वृत्तान्त-रंगनाथ रामायण में सुलोचना (इन्द्रजीत की पत्नी) का चरित्र अत्युत्तम बन पडा है । सीता के समान पातिव्रत्य का प्रतीक सुलोचना-वृतान्त है । सुलोचना को विवाह के समय. उनके पिता ने वरदान दिया था कि उसका पति यदि युद्धभूमि में जाते समय उससे कह करके जाये तो उसकी कभी मृत्यु नही होगी और चाहे विपक्षी दल के , जितने भी बड़े वीर क्यों न हो, उसका वध नहीं कर सकेंगे। राम रावण के युद्ध के दिनो में एक दिन शीघ्रता में इन्द्रजीत अपनी पत्नी की अनुमति लिये बिना चला गया । उस दिन युद्ध में लक्ष्मण के हाथों से मारा गया। पतियता सुलोचना अपने पति के मृत शरीर के साथ सती होना चाहती है। इसलिए पनी १०८ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं और ससुर से कहती हैं कि वे उसके पति का शरीर मँगवायें। लेकिन रावण बताते है कि युद्ध भूमि मे जाकर शत्रु ओ के बीच से इन्द्रजीत का मृत शरीर लाना सम्भव नही है। इस पर वह अपने ममुर से आज्ञा मांगती है कि युद्धभूमि मे स्वय जाकर अपने पति के मृत शरीर को ले आने की अनुमति दे । विवश हो रावण मान लेता है। सुलोचना उड़ती हुई शत्रु के शिविर के निकट पहुँच जाती है । पहले हनुमान वगैरह सशंक हो जाते हैं, वाद को समझ लेते है । रामचन्द्रजी से अपने पति का शरीर मांगती है तो वे बताते हैं कि युद्धभूमि मे वीरो को शरीर मिलना कठिन है। क्योकि कही धड, कही सर कटे गिरे होते हैं। तव हनुमान कहते है--तुम पतिव्रता हो, ऐसा करो कि 'तुम्हारे पातिव्रत्य के वल मे धड और सर एक साथ मिल जाय । सुलोचना के प्रार्थना करने पर गेसा ही होता है। उसके पातिव्रत्य से प्रसन्न हो राम कहते है, तुम चाहो तो कोई वर माग सकती हो। इम पर हनुमान घबरा उठते है, क्योकि यदि सुलोचना अपने पति को पुनर्जीवित करने का वर माँगे तो फिर इन्द्रजीत का वध करना किसी के लिए सम्भव नहीं है। इसलिए हनुमान तुरन्त सरस्वती देवी से प्रार्थना करते है कि वह सुलोचना के जिह्वा पर बैठ कर उसके मुंह से यह वरदान निकलवाये कि वह अपने मृत पति को पुनः जीवित करने का वर न माँग वैठे । सरस्वती हनुमान की प्रार्थना को स्वीकार कर लेती है और सुलोचना के मुंह से कुछ दूसरा पर ही प्रकट कराती है । सुलोचना रामचन्द्रजी से कहती है-'भगवन्, यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो ऐसा वर दीजिए कि दूसरे जन्म में हम दोनो फिर पति-पत्नी के रूप मे जन्म धारण करें । रामचन्द्र जी ऐसा वर देते है। सुलोचना बडे आनन्द से अपने पति के शवसहित सती हो जाती है । जव उस महापतिव्रता का सम्पूर्ण समाचार जानने की जिज्ञासा लक्ष्मण प्रकट करते हैं, तब रामचन्द्र जी बताते हैं, "हे लक्ष्मण, यह सुलोचना और कोई नही, तुम्हारी पुत्री ही है।" लक्ष्मण मे निर्वेद की भावना पैदा होती है । वह अपने जामाता की मृत्यु अपने हाथो से होने तथा अपनी पुत्री के मंगलसूत्र को आप ही तोडने के अपराध में खिन्न हो जीवन से विरक्त हो जाते हैं । तव रामचन्द्रजी अपने विष्णु के अवतार का रहस्य खोलकर उपदेश देते है- "मैं जब विष्णु के अवतार मे था, उस समय तुम मेरे वाहन शेषनाग थे । उस अवतार मे तुमने अपनी पुत्री सुलोचना का विवाह इंद्रजीत के साथ किया था।" इस वृत्तात से पता चलता है कि रामायणकार ने आर्य और द्राविड़ संस्कृतियों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध की सृष्टि करके दोनो के प्राचीन औन्नत्य तेलुगु वाङ्मय में राम चरित १०६ का उत्तम परिचय दिया है । मुलोचना का चरिय रंगनाथ रामायण में इतना अद्भुत बन पड़ा है कि उसके सामने सीताजी का चरिम कुछ फीका-सा मालूम होता है । सुलोचना द्राविड नारियों को प्रतिनिधि है । यहाँ की नारियो के पातिव्रत्य, पतिपरायणता, वीरता इत्यादि का मुन्दर परिचय मुलोचना के चरित्र द्वारा प्रस्तुत किया गया है । ३. ऊर्मिला देवी को निद्रा -वाल्मीकि तथा तुलसी ने ऊर्मिला के चरित्र तथा त्याग की महानता का एक प्रकार से अनादर किया। इस पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी अपना क्षोभ प्रकट किया है। लेकिन श्री मैथिली शरण गुप्तजी ने अमिला के महान त्याग का मुन्दर परिचय दिया है। लक्ष्मण और ऊर्मिला का आलादपूर्ण वैवाहिक जीवन का भी मुन्दर चित्र खीचा है और साथ ही माथ उनके विरह का भी विस्तृत परिचय उपस्थित किया है । इस प्रकार उपेक्षिता मिला का त्यागमय जीवन साकेत में चित्रित हुआ है । ऐसा अद्भुत परिचय अन्यत्र दुर्लभ है । ऊमिला के प्रति गुप्तजी की महानुभूति तथा उनके महान त्याग का आदर प्रशंगनीय है । ऊर्मिला को ही काव्य की नायिका बनाकर यह मावित किया है कि मीताजी से भी मिला का त्याग महान है। परन्तु गोन बुद्धा रेड्डी ने ऊर्मिला का दूसरा पक्ष उपस्थित किया है । मिला के प्रति वुद्धा रेड्डी की महानुभूति और आदर की भावना उनके इस वृत्तांत से प्रकट होती है। रामायणकार चाहते है कि अमिला उद्दाम यौवन के ममय पत्ति के वियोगानल मे जलती न रहे, इसलिए एक ऐसी कथा की सृष्टि की जिससे ऊर्मिला को वियोग की वेदना का अनुभव न हो । यही कथा ऊर्मिला देवी की निद्रा है। यह यों है- सक्ष्मण पंचवटी में अर्ध रात्रि के ममय एक दिन नित्य की भांति पहरा दे रहे थे । हठात् निद्रा देवी ने अपनी सपूर्ण शक्ति के साथ उन पर हमला किया । वीरवर लक्ष्मण यदि सो जाते तो वे अपने कर्तव्य-पथ से गिर जाते, इमलिए उन्होंने निद्रादेवी से सविनय प्रार्थना की- "हे माता, मुझे तो अपने भाई-भाभी की सेवा करना है । मेरे वियोग में मिला बड़े कप्ट से अयोध्या में अपने दिन बिता रही है । आप कृपया उन पर अपनी कृपा दृष्टि प्रसारित करें, ताकि वह १४ वर्षों तक मेरे वियोग की व्यथा का अनुभव न करे ।" लक्ष्मण की प्रार्थना निद्रा देवी ने मान ली। जब १४ वर्ष के बाद लक्ष्मण अयोध्या लौटते हैं तो रामचन्द्रजी उनमे कहते हैं कि वह तत्काल ही ऊर्मिला के कुशल होने का पता लगावै ! भाई की आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी अंत.पुर में ११० तेलुगु याङ्मय : विविध विधाएँ पहुँच जाते है। किन्तु देखते क्या है कि मिला गाढ निद्रा में निमग्न है । लक्ष्मण ऐमी ध्वनि करते है कि अमिला जाग पडती है । अपने महल में आये हुए व्यक्ति को परपुरुष मानकर यह धमकाती है कि यह समानार उनके पनि लमण तथा उनके भाई रामचन्द्रजी को मालूम हो जाएगा तो जान की सैर नहीं । इसके उपरांत वह रघुवश की बढाई करती है। लक्ष्मण अनेक उदाहरणो द्वारा यह मावित करते हैं कि वे ही लक्ष्मण हैं और वनबाग ममाप्त कर अयोध्या लौटे हैं। मार्ग कहानी को मुनकर ऊमिला लक्ष्मण के चरण छु लेती है। देवर लक्ष्मण को हंसी-इग वृत्तांत मे गोन बुद्धो रेड्डी ने लक्ष्मण के न्यागमय जीवन पर प्रकाश डाला है। वनवास करने का आदेश केवल राम- चन्द्रजी को ही मिला था, फिर भी लक्ष्मण भाई और भाभी की सेवा के लिए उनके माय चल पड़ते हैं प्राण प्यारी पत्नी को भी छोडकर; वह भी अपनी इच्छा से । ऐसे महान त्यागी पुरुष के पवित्र चरित्र पर प्रकाण न डालें तो उनके प्रति अन्याय ही होगा । कथा-सार यों है- अयोध्या मे रामचन्द्रजी का दरबार लगा हुआ था। विभीषण, सुग्रीव, हनुमान इत्यादि उम मभा में उपस्थित थे। सीताजी रामचन्द्रजी के अंक पर शोभायमान थी। अचानक लक्ष्मण हॅम पडे । मीताजी ने मोचा कि भरी सभा मे रामचन्द्रजी की गोद मे नैठे देख लक्ष्मण हँस रहे है । तुरन्त उनका कमल- जैसा मुख-मण्डल म्लान हो उठा। विभीषण और सुग्रीव ने मोचा कि दोनो ने अपने भाइयो के प्रति अन्याय किया है। इसकी याद करके लक्ष्मण हँस रहे है। हनुमान ने मोचा कि उनके जैसे बड़े वीर को रामचन्द्रजी के चरणो के पास बैठे देख तक्ष्मण हँस रहे है । इसी प्रकार मभी उपस्थित गदस्यो के चेहरे विवर्ण हो गये । रामचन्द्रजी ने मारी मभा के म्लान हो जाने का कारण लक्ष्मण ही को मान बिना कुछ मोचे-विचारे लक्ष्मण का वध करने का आदेश दिया। इस पर पणिष्ठ, विश्वामित्र इत्यादि मुनियों ने रामनन्दजी से निवेदन किया कि विना हमी का कारण जाने वध करने की आज्ञा देना उचित नहीं । इस पर रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण जी से कारण पूछा तो उन्होने निद्रादेवी की सारी कथा मुनायी और कहा-~-आज पूरे १४ माल हो गये है । निद्रादेवी मे मैंने पंचवटी में प्रार्थना की थी; आज उस अवधि के ममाम होते ही उसने मेरे ऊपर ही हमला बोल दिया है। रामचन्द्र जी को यनवाम की मारी कहानी याद आयी, लक्ष्मण ने निद्रा और आहार त्याग कर उनकी सेवा की थी। ऐगे भ्राता को तुरन्त यध करने का आदेश दिया, रामचन्द्र ने अपने इस अपराध पर पश्चात्तार किया। मुनियो ने प्रायश्चित्त का विधान लक्ष्मण के - तेलुगु बाड्मय मे राम चरित १११ चरण हुने का बताया। लक्ष्मण के सोते समय रामचन्द्र जी ने अपनी भूल का प्रायश्चित्त किया। इम रामायण के कई प्रसंगो को आज भी लोक-कथाओ के म मे पुतली गेल, दुर्रकथा, हरिरुया, इत्यादि के प्रदर्शन के समय जनपदो में व्यवहार में ला रहे हैं। साधारण प्रजा में इस रामायण को जो लोकप्रियता प्राप्त है वह अन्य रामायणी को नहीं । इम रामायण का प्रत्येक पात्र नाल्मीकि तथा तुलसी रामायण से भिन्न उत्तम आदों को लेकर प्रस्तुत हुआ है। विस्तार के भय से हम उन सब का वर्णन नही कर रहे है । यो तो मंध्या की दृष्टि से तेलुगु मे ३०-३२ रामायण रने गये । हम यहाँ केवन ३-४ रामायणों की चर्चा मात्र करेंगे। रंगनाथ रामागण के उपरान्त भास्कर रामायण का नम्बर आता है । भास्कर रामायण की रचना ४-५ कवियों ने की है। इसमें राम का आदर्श अत्यन्त उत्तम बन पडा है। श्री रामचन्द्र जी ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए राज्य त्याग दिया। राम-रावण के युद्ध के समय विभीषण रामचन्द्र जी की शरण में आये, उम समय रामचन्द्र जी विभीषण से कहते है-"हे विभीषण, तुम्हारी भक्ति और श्रद्धा पर मुग्ध हूँ। रावण का संहार कर तुम्हें लंकापुरी राज्य का राजा बनायेगे। अपने हाथों से तुम्हारा पट्टाभिषेक कम्गा।" इस पर मुग्रीव शंका प्रकट करते है-"प्रभू ! रावण अपनी भूल पर पश्चात्ताप करके जगज्जननी जानकी देवी को आपको समर्पित कर आपकी शरण मे आवे तो क्या करेंगे?" उस हालत मे लंका का राज्य रावण का ही होगा न ! विभीषण को कौन-सा राज्य देकर आप अपने वचन का पालन करेंगे?" रामचन्द्र जी मुग्रीव के ये वचन सुनकर बडी उदारता से कहते है---- "तब तो मैं अपना अयोध्या का राज्य उन्हे दे दूंगा।" ये वाक्य रामचन्द्र के मुंह मे ही प्रकट होते है "अनघ चरित्र मीकु शरणागतरक्ष कुलवतंबु, मी सुनिश्चित बाण जालमुल चोकुन कोकवच्चितादशा ननड्भवबु वेडिकोनि नंदगवेटलगुगन्न नविभु डिनुसुतुजूचि यट्लयिन निच्चेदवानिकयोध्य यंचनन्" -~भास्कर रामायण भास्फर रामायण में सीता-राम का अद्वैत प्रेम, भूतदया अत्यद्भत एवं ११२ तेलुगु वाङ्मय · विविध विधाएं अवर्णनीय है । रामचन्द्र जी का प्रेम-प्रकृति और पुरुष का हमे स्मरण दिलाता है। वे सीता जी से कहते है--"तुम मेरे जीवन हो, मेरे द्वितीय हृदय हो, मेरे नेत्रों की ज्योत्स्ना हो और मेरी देह के लिए अमृततुल्य हो ।" राम और भरत का मिलाप तुलमी रामायण मे जैसा मनोहर बन पड़ा है, भास्कर रामायण में भी उतना ही सुन्दर चित्रित हुआ है। चित्रकूट में प्रवेश कर भरत मुनि वेषधारी रामचन्द जी को देख विलाप कर उठने हैं। यारोश यो है- ''महनीय मणिमय मन्दिरो मे निवास करने वाले श्री रामचन्द्र जी आज पर्णशाला में है । मखमल की गद्दियो पर विश्राम करने वाले राम आज दर्भ- शय्या पर आराम कर रहे है । मूल्यवान मालाओ तथा पीताम्बर धारण करने वाले राम आज जटाधारी हो वल्कल पहन रहे है। जिस मम्राट की मेवा मे समस्त राज परिवार (ममस्त राज्यो के राजा) उपस्थित रहता था, वही सम्राट आज मुनियों की सेवा में है। कैकेई के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ही मुझे आज यह दुरवस्था देखनी पड़ी।" इस प्रसग को पढ़ते ही पाठको का हृदय विदीर्ण हो जाता है। भास्कर रामायण में छ: काण्डो का ही वर्णन है। उत्तरकाण्ड की रचना ककटि पापराजु ने की है। श्री पापराजु ने उत्तरकाण्ड के वृत्तान्तों को आधार बनाकर अपनी रुचि के अनुरूप कया-विस्तार करके उसे एक महाकाव्य का रूप दिया है । पापरागु के पूर्व कवि ब्रह्मनाम से विख्यात महाकवि तिक्कना ने भी निर्वचनोत्तर रामायण प्रस्तुत किया था। तिक्कना का निर्वचनोत्तर रामायण संक्षिप्त मात्र बन पडा है। इन दोनो काव्यो में जानकी का शोक वृत्तान्त भिन्न रूप में वर्णित है । तिक्कना के उत्तर रामायण की कथा यो है-"लीला-विहार के ममय एक दिन श्री रामचन्द्र ने गर्भवती सीताजी मे वह अपनी कोई इच्छा हो तो वतावे !" मीनागी तो पहलै लजा गयौं । तदुपरान्त रामचन्द्र में कहा- "मुझे गगा नदी के किनारे रहने की इच्छा हो रही है।" रामचन्द्र ने मान लिया। दूसरे दिन जब रामचन्द्र दरबार में पहुंचे तो उनके नम-मचिव (निजी मचिर) भद्र द्वारा यह जानकर कि लोग मीताजी का रावण के यहाँ में लाने के कारण तरह-तरह की बातें करते हैं, मीताजी को वन भेजने का निश्चय करते है । तुरन्त अपने भाइयो को बुलाकर मयणा करलें है और यह वृत्तान्त मनाकर अपना निर्णय भी बना देते हैं । भातृप्रेमी गमचन्द्र जी के अनुज मौन धारण करते हैं । दूसरे दिन मुमन्त्र मा तरार का लक्ष्मण के मामने उपस्थिन से है। पूछा कि तेलुगु वाङ्मय में राम चरित ११३ रामचन्द्र सीताजी से कहते है--"तुम्हारे गंगा तट पर विहार करने का उचित प्रबन्ध किया है। लक्ष्मण तुम्हारे माथ चलने वाले हैं। ये वचन कहकर सीताजी को रथ पर चढाते हैं। जानकी भी अत्यन्त आनन्द के माथ रथ पर आरोहण करती है। रामचन्द्र जी कानन में मुनि-पत्नियो को देने के वास्ते अमूल्य आभूपण एवं वस्त्र देकर विदा करते है। मीता जी को मार्ग-मध्य में अनेक अपशकुन देस दुःख होता है । गंगातीर पर पहुँच कर लक्ष्मण रथ रुकवा देते हैं । गंगा पार करके एक भयंकर कानन के निकट पहुँचने के बाद लक्ष्मण विपाद हृदय मे रामचन्द्र जी की आज्ञा सुना देते है, अपने आपकी निन्दा करने तथा विधि की विडम्बना पर खेद प्रकट करते हुए । जानकी कांपते हुए लक्ष्मण को देख चकित हो शंकाकुल हो जाती है । इसके बाद लक्ष्मण अपने हृदय को पत्थर बनाकर राम का आदेश सुनाकर बता देते है--"पास मे ही मुनियो का आश्रम है, चिन्तारहित हो वहीं रहें।" सीताजी अपने दुर्भाग्य पर शोक प्रकट करती हैं। उन्हें इस बात का वड़ा दुःख होता है कि रामचन्द्र जी ने उनसे मच्ची हालत क्यो नही बतायी । जैसे गौतम भी यशोधरा से बिना कुछ कहे चल पडे तो यशोधरा को दुःख हुआ था। इधर जानकी सोचती ही रहती हैं कि लोगो अपवाद को कैसे दूर किया जाय । लक्ष्मण जानकी जी के चरणो पर गिर पडते है । पाप्टांग दण्डवत करके नगर की ओर भारी हृदय लेकर चल पडते है । यह प्रसंग हमे तुलमी रामायण में दिखाई नहीं देता। कंकटि पापराजु ने अपने उत्तर रामायण मे उक्त प्रसंग को दूसरे ढंग से उपस्थित किया है । कथा-वृत्तान्त इम प्रकार है-रामचन्द्र जी अपने भाइयो को बुलाकर सीता जी पर लोकापवाद का समाचार सुनाते है, और कहते है.---"महादेव, ब्रह्मा, मुनि तथा देवगणो की प्रशंमा प्राप्त करने वाली सती को मुझे अग्निदेव ने प्रदान किया है । ऐमी मती पर कलंक का टीका लगा है।" यो विलाप करके अन्त मे सीताजी को वनवास भेजने का निर्णय करते है। लेकिन इम प्रमंग में तिक्कना के भाव इम प्रकार परिवर्तित किया है--सीताजी के पास दूमरे दिन सुबह स्वयं लक्ष्मण पहुँच जाते हैं और कहते है-- "हे माता ! गगा तीर पर विहार करने के लिए रामचन्द्र जी ने मुझे भेजा है । रय भी ले आया हूँ, तैयार हो जाइए।" ये वचन सुनकर प्रसन्न चित्त हो मीताजी स्वयं आभूषण एवं वस्त्र लेकर रथ पर मवार हो जाती हैं। सीताजी के जाते ममय मार्ग-मध्य में लोमड़ी, चील, उल्लू इत्यादि का रास्ते में दिखाई देना, रथ की ध्वजा पर चीलों का आक्रमण इत्यादि अपशकुन देख मीताजी का हृदय व्याकुल हो उठना है। कानन में पहुंचने के उपरांत को पापराजु फा०-८ गुमाश्मय : विविध मिग्रार लामण रामामा हो मुनाने गे पहा । इस गंभ में गमग मी गुणीलना का गुलर पग्विा गिामाग पिला करणे गरजे--" मा, आगिर में मिली कठिन विधि की बात गुनाने जा रहा है। मुझ, जगे मग मी गृष्टि विधि ने लिग प्रकार की गमगरनी ने पा गोचकर मुझेम पार्य के लिए निया विमा हैशियत गटिन गित गाला कोई भी पार कर गाता है । मेगा पापी किनु साने गनिदेश में अलग कर अदम भंयकर फानन में दोदकर गला जा रहा।" गीता और सपा के यवन गरमा ग्य में भीगे हुए और पाठा पापाने यग्यम गे उठने । लोकापवाद का गगाजार गुन मी मच्दिा हो जाती है. फिर होग में आने पर कहती -"मैंने शायद अणे पूर्व जन्म में किमी दंाति को अलग किया था; उगी फा का अब भोगने जा रही है।" फिर कभी पहती है कि "मभी मुझे गनी, मात्री और पनिद्रा पहने में गंतोष करने वाले रामनन्द्रजी आज मेरे कार दोपारोपण गारगे बनवाम फा कठिन कष्ट देने वाले है, यह मैं कल्पना भी नहीं कर गस्ती थी।" फिर भी कहती है --"हे लक्ष्मन, तुमने रामचन्द्रजी की आगा ठीक तरह में मुनी नहीं होगी, या मतिभ्रम होने के कारण कह रहे हो । रामनन्द्रजी तो स्वप्न में भी ऐमा आदेश नहीं दे सकने है।" फिर थोड़ी देर बाद दुपानि मे कह उठनी हैं--"सक्ष्मण मैंने भूल मे ये कठिन वचन कहे, मरन करो।" आखिर जीवन से विरक्त हो बता देती है -"मेरा शरीर है और है मामने भागीरथी । फिर क्या १ में अपनी दहलीला यही ममाप्त कर गकती है।" फिर विलाप करनी हैं---"मुनि-पत्तियो के पूछने पर मैं या उनर दूंगी' राम की निन्दा होते को महन कदंगी। उनकी आज्ञा को शिरोधार्य मानकर कानन-वाम कगी।" इस प्रकार जानकीजी की मन.स्थिति का वर्णन पढ़ते ही बनता है । लक्ष्मण मे मीताजी को विदा लेने देख पाठको के नेत्र मजल हो उठते है। मोल्ला (मोल्लावा) नामक एक कवयित्री ने भी तेलुगु मे रामायण की रचना की है, जो मोल्ल रामायण नाम से विख्यात है । कुम्भकार वंश मे जन्म तेकर उत्तम कवितावेश के साथ संग्रह रामायण सरल भाषा मे कवयित्री ने प्रस्तुत की है । सारा रामायण भक्ति-भावना मे ओतप्रोत है। यह रामायण साधारण प्रजा, स्त्री तथा वालक-बालिकाओ के उपयोगार्थ रची गयी है। 'कवयित्री ने रामायण की रचना का उद्देश्य यह बताया है कि जिस प्रकार मधु खाने से मुंह मीठा हो जाता है, उसी भांति काव्य-पठन मे काव्य के रम तेलुगु वाङ्मय में राम चरित ११५ का आनन्द पाठक उठा मके, यही काव्य का प्रयोजन है । अन्यथा गूढ शन्दो मे काव्य रचा जाय तो वह मूक और बहरे लोगों का विलाप ही होगा। रावण द्वारा मीता का अपहरण होने पर सीता-विलाप का प्रसंग हृदयस्पर्शी बन पडा है। रावण का मीताजी के समक्ष अपनी वडाई का वर्णन, मोता-राम का प्रेम-वृत्तात इत्यादि प्रसंग वाल्मीकि तथा तुलसी रामायणों से अधिक स्वाभाविक एवं उत्तम बन पड़े हैं। धनुष यज्ञ के प्रसंग में तो श्रीरामचन्द्र जी लीलामानुप के रूप में चित्रित है। राजकुमार सीताजी के स्वयंवर में भाग मेने आये हैं। शिव-धनुष को देख मभी चकित हो जाते है । उस प्रसंग का वर्णन कवयित्री के शब्दों में सुनिए- "यह धनुप तो पर्वताकार है । इसकी ओर देवता भी अपनी आँख उठाकर देखने का साहस नही कर सकते हैं । यह तो शिवजी का धनुप है, इसे या तो हरि तोड सकता है या हर, अन्य लोगो के लिए कैसे संभव होगा? ऐसे महान धनुष को उठाने का दम्भ भरना, उसके पास पहुँचना और अपयश प्राप्त करना तो मूर्खता है । अपनी शक्ति और बाहुबल का ज्ञान रखते हुए भी उसे तोड़ने का प्रयत्न क्यों करें ? शिवधनुष तोडकर मीता जी को प्राप्त करने का सौभाग्य किसी देवता के लिए ही सभव है। अर्थात् मीताजी तो उन्ही की संपत्ति है । दूमरों की संपत्ति को पाने की लालसा उचित नहीं । यह सोचते वहाँ पर उपस्थित मभी राजकुमार धनुप यज्ञ के मण्डप से बाहर आ गये।" मरल भाषा मे रचित मोल्ल रामायण जनपदो मे काफी आदर प्राप्त है। इमका पठन-पाठन भी रंगनाथ रामायण की तरह आन्ध्र के जनपदो मे आज भी होता आ रहा है। इसके उपरांत रघुनाथ राय ने रघुनाथ रामायण, गोपीनाथ ने गोपीनाथ रामायण इत्यादि अनेक व्यक्तियो ने रामायण की तेलुगु में गद्य व पद्य मे रचना की । आधुनिक युग में श्री वाविलिकोलनु सुब्बाराव, श्री जनमंचि शेषाद्रि शर्मा, श्री श्रीपाद कृष्णमूर्ति शास्त्री (आस्थान कवि) तथा कवि सम्राट श्री विश्वनाथ सत्यनारायणजी ने रामायण लिखे । श्री विश्वनाथ सत्यनारायण कुत "रामायण कल्पवृक्ष" अपने ढंग का अपूर्व तथा अद्भुत है । ये राम के अनन्य भक्त तथा महाकवि है। रामायण की केवल कथा मात्र को ग्रहण कर अपनी स्वतंत्र प्रतिभा के द्वारा आपने एक उत्तम कला-ौध का निर्माण किया है। पांडित्य तथा शिल्प की दृष्टि से इसकी समता कर सकने वाला रामायण दुर्लभ है । यह आन्ध्र देश तथा तेलुगु के लिए बड़े गौरव एवं गर्व की बात है। कवि रामायण की रचना का उद्देश्य इस प्रकार बताते हैं..-"लोग ११६ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं मुझसे पूछ सकते है कि तेलुगु में इतने रामायणो के होते हुए फिर रामायण की ही रचना आप क्यो कर रहे हैं परन्तु यह जगत भी तो प्रतिदिन एक ही तरह खाना खाता है, लेकिन स्मरण रखने की बात यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की अभिरुचि, जीवन शैली, अनुभूति, भक्ति इत्यादि भिन्न होती है । कवि की प्रतिभा मे काव्यगत रम या निरूपण नित्य नूतन हो वहिर्गत होता है । इसे प्राच्य और पाश्चात्य सभी विद्वान स्वीकार करते हैं। मेरी कविता की भी यही विशेषता है। श्री विश्वनाथ सत्यनारायण जी अपनी लोकोत्तर प्रतिभा के द्वारा रामायण कल्पवृक्ष को एक महान माहिती कल्पवृक्ष का रूप देने में संलग्न हैं। कवि में पारमार्थिक दृष्टि अधिक है। उनका कहना है कि "जागृति तथा स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं में उनकी जिहा पर रामनाम नृत्य करता रहता है।" इसलिए कवि उम कृति को भगवान को ही समर्पित कर चुके हैं। वे कहते है.---'हे देवादिदेव । पाठक मेरे इस काव्य को पढे या न पढे, अर्थात् इसका आदर करे या न करें, इससे मुझे कोई मतलब नहीं । मैं अपना हृदय उन लोगों के मामने रख रहा हूँ, इसका फल मुझे प्राप्त हो।" महाकवि की कविता प्रौढ़, सरम, मधुर तथा पाडित्यपूर्ण है। कैकेयी के चित्रण मे कवि ने एक नया दृष्टिकोण अपनाया है। उनके प्रति कवि के हृदय मे जो अगाध सहानुभूति का स्रोत है, उमड पडा है। कैकेयी तो मानवी है । मानवीय दुर्बलता नो स्वाभाविक है। उसने तो अपने हक की मांग की है। वैसे तो यह रामचन्द्रजी को कितना चाहती है। संतानप्रियता पाप नहीं है। विवाह के समय में ही दशरथ वचन दिया था कि उनकी संतति को ही राजगद्दी मिलेगी। भला फिर दशरथ ममय पर मुंह क्यों मोड़ते हैं । राजा शांतनु के लिए भीम ने अपना राजपाट त्याग नहीं किया था? प्रारम्भ में संतान के न होने पर दशरथ का दुखी हो महामान्य के सामने जो दुःख प्रकट करते हैं, वह प्रमग पाठको के हृदय को द्रवीभूत कर देता है। ऐसे असंखम मार्मिक प्रसंगी से पूर्ण रामायण कल्पवृक्ष के कुछ ही कांड प्रकाशित हो सके हैं । दो-तीन काण्ड अभी शेष है। उनके प्रकाशन से तेलुगु माहित्य जगमगा उठेगा। आन्ध्र देशा में रामचरित मम्बन्धी इन काव्य-ग्रन्थो के अतिरिक्त शतक, कीर्तन, गीत विपुल संख्या में रचे गये हैं। उनमें भक्त रामदास कृत, दाशरयी शतक तथा भक्त शिरोमणि श्री त्यागराग कृत कोतंग आज भी जनता के कंठहार बने हुए हैं। लोग भक्ति के पारवश्य में मुग्ध हो वे कीर्तन गाते-झूमने तेलुगु वाड्मय मे राम चरित ११७ दिखाई देते है। इनके अलावा कथाएँ असस्य पन्मिाण मे रची गयी है । उनमें लक्ष्मण-मूर्छा, शतकठ रामायण, कुश-लव कथा, पाताल होमम् इत्यादि प्रसिद्ध हैं । ये सब राम को अवतार पुरुष मानकर रची गयी है। इनमें अलौकिक घटनाओं का समावेश अधिक हुआ है । यहाँ पर केवल शतकट रामायण का सारांश मात्र देगे। "दशकंठ (रामायण) की मृत्यु के उपरांत शतकठ नामक एक राक्षस ने राम से बदला लेने के विचार से ब्रह्मा के प्रति घोर तपस्या की और ब्रह्मा वर प्राप्त कर मुनियों को तंग करने लगा। मुनियो ने राम की शरण ली । राम और शतकठ के बीच घोर युद्ध हुआ। रामचन्द्रजी की ओर से उनके भाइयों ने ही नहीं अपितु उनकी पत्नी मीतानी ने भी युद्ध किया । युद्ध हो ही रहा था कि शतकंठ के रक्त से गतमुख पैदा हुआ, अंत में रामचन्द्र आदि ने सब का संहार किया। इस प्रकार रामचरित पर असंख्य कवियों ने विभिन्न रूपो मे रचनाएँ प्रस्तुत की। राम चरित का ऐसा विपुल प्रचार क्यों हुआ? कवि मुरारी के शब्दो में मैं अपनी रचना समाप्त करता हूँ। "अनवराघवम्" मे मुरारी लिखते है-"रामचरित पर अनेकों ने कलम चलायी है। यह सोचकर चुप रहे तो ऐसे महान गुणों से पूर्ण नायक और कौन है, जिसके गुण विशेषो का वर्णन कर कवि अपनी वाणी को मार्थक बना सकते है।"

१२ तेलुगु में कृष्ण काव्य गर्ग सहिता में विष्णु के अवतार का परिचय देते हुए कहा गया है कि अवतार प्रधानतः पाँच प्रकार के है । जो क्रमश अंशावतार, अंशाशावतार, आवेश अवतार, कलावतार और परिपूर्णावतार । किन्तु उनमे से कृष्णावतार को ही परिपूर्णावतार बताया गया है । अन्य अवतार परिपूर्ण होते हुए भी सर्वव्यापी नहीं है। एक ही समय मे समस्त लोकों मे ममस्त रूपो में दर्शन देना ही उसकी अनुपमता का निदर्शन कहा जा सकता है । अपने मुखमण्डल में यशोदा देवी को समस्त ब्रह्माण्डो का दर्शन कराना, गोवत्स तथा गोप-बालको को ब्रह्ममय बना देना कृष्ण का स्वयं उन रूपो में प्रस्तुत होना, गोपिकाओ को अनेक रूपो मे एक साथ एक ही समय में दिखाई देना, रासक्रीड़ा करते हुए उसी समय नारद मुनि को सोलह हजार एक सी आठ अपनी प्रियाओं के महलो मे दर्शन देना, अपने आजन्म शत्र, कंस को प्रकृति के प्रत्येक परमाणु में दिखाई देना, द्वारका नगरी में रहते हुए कौरव सभा में द्रौपदी का चीर-हरण होते देख उनकी मान-रक्षा करना, धृतराष्ट्र तथा अर्जुन को विश्वरूप का दर्शन देना, नारद ऋपि को गोलोक मे राधा-समेत दर्शन देना इत्यादि असंख्य अमानवीय घटनाओ के आधार पर हमें विदित होता है कि श्रीकृष्ण परमात्मा प्रकृति के प्रत्येक परमाणु में स्वयं प्रकाशमान हैं; अत. उनका कृष्णावतार अन्य अवतारो की अपेक्षा अधिक परिपूर्ण है। कृष्णावतार तत्व का परम रहस्य यह है कि कृष्ण अहंकार एवं ममता, मुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से परे विशुद्ध चैतन्य स्वरूप थे। यही कारण है कि आपने मामा, फुफेरा भाई, भानजा यहाँ तक कि अपने पुत्रों को मरते देखकर भी विचलित हुए बिना विश्वरूपी रंगमंच पर जगन्नाटक सूत्रधारी हो अपने पात्रो ११६ - ने दुगु मे कृष्ण काव्य का रसानुकूल अभिनय कलं--प्रक्षयो की अनुभूतियो से तटस्थ रह कर ममस्त प्रकार के मनोविकारो से निलिप्त हो, आद्यन्त एक आलोकमय दीपक को भांति आनन्दमय हो, साक्षी मात्र रहे. इसी से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीकृष्ण परमात्मा है। कृष्णोपनिपद में श्रीकृष्णा के अवतार का रहस्य बताया गया है। रामावतार में सर्वांग मुन्दर रामचन्द्रजी के असाधारण मौन्दर्य के दर्शन कर वनवामी मुनि मोहित हुए । उनकी प्रार्थना स्वीकार करके श्री महाविष्णु ने कृष्णावतार लिया। मव मुनि गोपिकाएं हुए । मुक्तिकाता यशोदा है, परमानद नद है, सत्य अनार है, दम उद्धव, काली कस, हूँप चाणूर, मत्मर मुप्टिक तथा दर्प कुवतय पीड़ हुए। कृष्ण ने मर्वज्ञ की भाँति व्यवहार किया है । शोक-मोह, निन्दा-स्तुति, मान-अपमान इत्यादि द्वन्द्वो से अतीत रहकर सिद्धावस्था को प्राप्त महायोगी- जैसे जीवन-रंगमंच पर अभिनय किया है। इस प्रकार अपनी दिव्यता का परिचय ही नहीं दिया अपितु भगवद्गीता-जैसे ज्ञान-भण्डार को अर्जुन के माध्यम मे जगत को प्रदान किया। ममस्त उपनिषदो का सार भगवद्गीता है । गीता के स्थितप्रज्ञ सम्बन्धी सभी लक्षण, गुणातीत स्थिति, सिद्धावस्था को प्राप्त योगीश्वर के लक्षण, कर्म, ज्ञान आदि के विधानो को हम कृष्ण मे देख सकते हैं। इसलिए कृष्ण चरित सर्वाधिक महिमासम्पन्न है । कृष्ण चरित तेलुगु वाङ्मय में प्रधानतः तीन रूपो में उपलब्ध होता है : १ काव्य, २. यक्षगान और ३. लोकगीत । इनके अलावा गद्य की विविध विधाओ मे भी कृष्ण चरित विभिन्न रूपो में वर्णित है। उपलब्ध साहित्य मे तेलुगु का प्रथम काव्य नन्नयभट्ट द्वारा विरचित 'महाभारत' है। आदि कवि नन्नय ने 'महाभारत' को कृष्णद्वैपायन के उद्यान मे प्रादुर्भूत पारिजात की संज्ञा दी है- "असंख्य कथारूपी शाखाओं से शोभित वेदार्थरूपी निर्मल छाया से पूर्ण, पुरुषार्थरूपी पुप्प-समूह से शोभायमान, कृष्ण और अर्जुन-जैसे उत्तम पुरुपो के गुणों की प्रस्तुति करने वाले फलो से पूर्ण, व्यासरूपी उद्यान में प्रादुर्भूत महाभारतरूपी पारिजात वृक्ष ब्राह्मणो के लिए वांछित है।" भारतीय वाङ्मय पुरुषार्थपरक है । इस कर्मभूमि मे पुरुषार्थविहीन कार्य को कोई महत्ता नहीं है । साधारण कथा से लेकर वेद और उपनिषदों तक का समस्त साहित्य पुरुषार्थ को प्रबोधित कर रहा है । .

- तेलुगु बाङ्मय . विविध विधाएं पुम्पार्य का प्रतिपादन महाभारत का प्रधान उद्देश्य है। महाभारत का पठन, श्रवण तथा उसके आचरण यज्ञ-मदृश्य हैं। महाभारत के अन्तर्गत भगवद्गीता स्वप इस बात की घोषणा कर रही है कि ममस्त यजी में जान- पन ही श्रेष्ठ है। महाभारत के नायक लोकोत्तर प्रतिभासम्पन्न है। उनमें भी कृष्ण और अर्जुन अमदृश्य है । इसलिए कहा गया है-- "नारायण पाडवेय गुण महात्मयामस ज्योत्सना" अर्थात् कृष्ण और पाण्डवो के गुणो का माहात्म्य निर्मल ज्योत्मना है। महाभारत भारतीय वाङमय में पचम वेद माना जाता है और इसके मूमधार भगवान कृष्ण है। उनकी लीलाएं इम महाकाव्य में यप-तत्र अभिवणित है । नन्नयभट्ट ने विष्णु का कृष्ण को सृष्टि, स्थिति एवं लय का फारणभूत बताते हुए उनकी महिमा का गान किया है। "हे कृष्ण, तुम पूज्य हो, पुराण पुरुप हो, ईश्वर हो, अप्रमेय हो और चर तथा अचर (वेतन और जड़) तुम्हारे ही भीतर जन्म धारण करते है, बढ़ते है और लय हो जाते हैं।" (वनपर्व अ० ७, प० १२६) सभा पर्व मे द्रौपदी के चीर-हरण-प्रसंग मे ननर ने कृष्ण को जगत्वन्ध सिद्ध किया है। करुणा-रस से ओतप्रोत यह घटना अत्यन्त हृदयस्पर्शी बन पड़ी है । द्रौपदी के पातिव्रत्य के तेज की महिमा विस्पष्ट रूप में प्रतिपादित नन्नय भट्ट ने तेलुगु महाभारत के आदिपर्व एव सभापों की रचना और वनपर्व की रचना करते समय उनका निधन हो गया। वनपर्व का शेषांश एप्रिगेड़ा ने पूरा किया तो शेप १५ पर्वो की रचना महाकवि तिकमा ने की है। तिकन्ना महाकवि ही नहीं अपितु महामन्त्री भी थे । यही कारण है कि उन्होंने अपनी राजनीति की कुशलता का परिचय प्रसंगवश सर्वत्र दिया है । मुख्यतः कृष्ण जब दूत बनकर कौरव की सभा मे जाते है, वहाँ जो दूत-कार्य सम्पन्न है, उनका वाक्चातुर्य तिकन्ना को मेघा का परिचय कराता है। महाकवि तिकन्ना ने कृष्ण को केवल राक्षसों के संहारक के रूप में ही चित्रित न कर उन्हे सारथी, सलाहकार, सखा, राजद्गत, हितपी, विश्वव्यापी, परमात्मा इत्यादि विविध रूपों मे चित्रित किया है। कृष्ण ने कंस, बक, बकासुर, नरकासुर, मुरासुर, शिशुपाल, चापूर, शकटासुर इत्यादि का वध करके अपने अवतार का कार्य सम्पन्न किया और धर्म की स्थापना की। इन घटनाओं का मनोहर चित्र तेलुगु वाङ्मय में पाया जाता है । लेकिन इनमे भी अधिक मर्मस्पर्शी प्रसंग जो तेलुगु में वर्णित है और तेलुगु मे कृष्ण काव्य १२१ जिनके चित्रण में तिकन्ना ने अपनी प्रतिभा का खुलकार परिचय दिया है, ये काव्य गरिमा से ओतप्रोत है। . पाडवों का अज्ञातवास समाप्त हो गया है। वासुदेव गाट यो यो देशाने पी अभिलापा से उपालाव्यपुर मे पधार रहे है । बलराम गात्यकी मगेन गुभद्रा और अभिमन्यु को भी साथ लिये उचित रयों पर आड़ हो प्रयाण मार रहे है। उनके साथ कृतवर्मा, प्रद्युम्न, साम्यु, खमक, युयुध, अफर, पाठवा के गार्थी भी चल रहे है । इस घटना का वर्णन पाठको को पुलकित किय देता है । उत्तरा और अभिमन्यु के विवाहानंतर युधिष्ठिर नथा अन्य पाय, राजा विराट, राजा पांचाल, श्रीकृष्ण, बलराम इत्यादि रागा विगट के दरबार में उचित आमनी पर विराजमान है। उग ममय पाहयो न अंक प्रकार से सोच-विचार कर कौरवो ये माथ गमोना करने के लिए कृष्ण भगवान से निवेदन किया । युधिष्ठिर ने यहां तक कहा कि यदि कोरब आधा राज्य देने के लिए तैयार न हो तो कम से कम पांच गाँव पर्याम हैं। भीम में इसका विरोध किया । पग्ल द्रौपदी गन्धि करने के लिए तैयार ही न थी। कृष्ण भगवान भी अपनी बहन गुभद्रा ग बढ़कर. दापनी में अधिक प्रेम करणे थे और उमका आदर कराय। महाकवि निकना न प्रोपदी के चरित्र को अत्यन्त उरग्बन बना दिया है-ौपदी का जन्म अरदान गया था। मग्न वंश में टमका विवाद, शुत्रा 1 पान की यह बनी । जनबंध पनियों को पाया। नीतिविरुम पुत्रों का जन्म दिया। पर मनना पुच हीन अग, कानन्द कष्टों का मामना करना पड़ा। मत्रिय-यंग में मप्र करके महा- पराममानी पनियों के लिए भी पागम पाटी की कठिनाइयों का सामना करना पाकर भी न बरामी मग विदित नही हूँ. मानाय भाग में कविया । दृष्टिर कोनीfarmniu RahIRE पारीता श्री-गामी की भी ifram | Sir famil में ममार मंग्या are wer; निती" ng that I feer •imertisment / rutife 42 MAnti Remient १२० तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं पुम्पार्थ का प्रतिपादन महाभारत का प्रधान उद्देश्य है। महाभारत का पठन, श्रवण तथा उसके आचरण यज्ञ-मदृश्य हैं। महाभारत के अन्तर्गत भगवद्गीता स्वय इस बात की घोषणा कर रही है कि ममस्त यज्ञों मे ज्ञान- यज्ञ ही श्रेष्ठ है। महाभारत के नायक लोकोत्तर प्रतिभासम्पन्न है। उनमें भी कृष्ण और अर्जुन असदृश्य है । इसलिए कहा गया है- "नारायण पाडवेय गुण महात्मयामल ज्योत्सना" अर्थात् कृष्ण और पाण्डवो के गुणो का माहात्म्य निर्मल ज्योत्सना है। महाभारत भारतीय वाड्मय में पचम वेद माना जाता है और इसके मूत्रधार भगवान कृष्ण है। उनकी लीलाएँ इस महाकाव्य में यत्र-तत्र अभिवर्णित है । नन्नयभट्ट ने विष्णु का कृष्ण को सृष्टि, स्थिति एवं लय का कारणभूत बताते हुए उनकी महिमा का गान किया है । "हे कृष्ण, तुम पूज्य हो, पुराण पुरुप हो, ईश्वर हो, अप्रमेय हो और चर तथा अचर (चेतन और जड़) तुम्हारे ही भीतर जन्म धारण करते है, बढ़ते है और लय हो जाते है ।" (वनपर्व अ० ७, प० १२६) सभा पर्व में द्रौपदी के चीर-हरण-प्रसंग में नन्नय ने कृष्ण को जगत्वन्द्य सिद्ध किया है। करुणा-रस से ओतप्रोत यह घटना अत्यन्त हृदयस्पर्शी बन पड़ी है । द्रौपदी के पातिव्रत्य के तेज की महिमा विस्पष्ट रूप से प्रतिपादित नन्नय भट्ट ने तेलुगु महाभारत के आदिपर्व एव सभापर्वो की रचना और वनपर्व की रचना करते समय उनका निधन हो गया। वनपर्व का शेषाश एप्रिगेड़ा ने पूरा किया तो शेष १५ पर्वो की रचना महाकवि तिकन्ना ने की है। तिकन्ना महाकवि ही नही अपितु महामन्त्री भी थे । यही कारण है कि उन्होंने अपनी राजनीति की कुशलता का परिचय प्रसंगवश सर्वत्र दिया है । मुख्यत. कृष्ण जब दूत बनकर कौरव की सभा में जाते है, वहाँ जो दूत-कार्य सम्पन्न है, उनका वाक्चातुर्य तिकन्ना की मेधा का परिचय कराता है। महाकवि तिकन्ना ने कृष्ण को केवल राक्षसो के संहारक के रूप मे ही चित्रित न कर उन्हें सारथी, सलाहकार, सखा, राजदूत, हितपी, विश्वव्यापी, परमात्मा इत्यादि विविध रूपों में चित्रित किया है। कृष्ण ने कंस, बक, बकासुर, नरकासुर, मुरासुर, शिशुपाल, चाणूर, शकटासुर इत्यादि का वध करके अपने अवतार का कार्य सम्पन्न किया और धर्म की स्थापना की । इन घटनाओं का मनोहर चित्र तेलुगु वाङ्मय मे पाया जाता है । लेकिन इनमे भी अधिक मर्मस्पर्शी प्रसंग जो तेलुगु मे वर्णित है और तेलुगु में कृष्ण काव्य १२१ जिनके चित्रण में तिकन्ना ने अपनी प्रतिभा का खुलकर परिचय दिया है, वे काव्य गरिमा से ओतप्रोत है । पाडबों का अज्ञातवास समाप्त हो गया है। वासुदेव पाडवो को देखने की अभिलापा से उपप्लाव्यपुर मे पधार रहे है । बलराम सात्यकी समेत सुभद्रा और अभिमन्यु को भी साथ लिये उचित रयो पर आरुढ हो प्रयाण कर रहे हैं। उनके साथ कृतवर्मा, प्रद्युम्न, साम्यु, खमक, युयुध, अकर, पाडवो के साथी भी चल रहे है । इस घटना का वर्णन पाठको को पुलकित किये देता है । उत्तरा और अभिमन्यु के विवाहानंतर युधिष्ठिर तथा अन्य पाडव, राजा विराट, राजा पाचाल, श्रीकृष्ण, बलराम इत्यादि रागा विराट के दरवार में उचित आमनी पर विराजमान है। उस समय पाडवो ने अनेक प्रकार से सोच-विचार कर कौरवी के माथ समझौता करने के लिए कृष्ण भगवान से निवेदन किया। युधिष्ठिर ने यहाँ तक कहा कि यदि कौरव आधा राज्य देने के लिए तैयार न हो तो कम से कम पाँच गाँव पर्याप्त है । भीम ने इसका विरोध किया। परन्तु द्रौपदी सन्धि करने के लिए तैयार ही न थी। कृष्ण भगवान भी अपनी बहन सुभदा से बढ़कर दोपदी से अधिक प्रेम करते थे और उसका आदर करते थे। महाकवि तिकन्ना ने द्रौपदी के चरित्र को अत्यन्त उज्ज्वल बना दिया है-द्रौपदी का जन्म वरदान से हुआ था। भरत वश मे उसका विवाह हुआ । पांडुराज की बहू बनी । जनवेद्य पतियों को पाया। नीतिविक्रम पुत्रों को जन्म दिया। परन्तु इतना कुछ होते हुए भी उन्हे कष्टो का सामना करना पड़ा। उत्तम क्षत्रिय-वंश में जन्म धारण करके महा- पराक्रमशाली पतियों के होते हुए भी पग-पग पर द्रौपदी को कठिनाइयो का सामना करना पड़ा । फिर भी वह अपने उत्तम गृहणी धर्म से विचलित नहीं हुई । एक आदर्श भारतीय नारी के रूप में लोक विख्यात हुई है। युधिष्ठिर को भी कठिन अवसरों पर सलाह देकर चकित करने वाली है । जरूरत पड़ने पर उन्हे डॉटने में भी भय नही खाती। भीमसेन-जैसे वापराक्रमी को भी अपने संकेत पर चला लेने की क्षमता रखती है। अनेक विषयो मे समान संस्कारों के होने के कारण वह स्वभावत. अर्जुन के प्रति पक्षपातिनी है । द्रौपदी कौरवों से प्रतिकार की कामना करती थी। उनसे संधि करना कदापि उन्हे पसन्द नहीं था। दूतकार्य पर जाने वाले कृष्ण को सम्बोधित करके द्रौपदी ने जो वाक्य कहे वे पाठकों के कानों में सदा गूंजते रह जायेंगे। द्रौपदी के मन में इस बात का डर था कि कही गोविन्द सन्धि न कर दें। इस भय से अपने श्यामत केशों को फैलाकर हृदय से उमड़ने वाले रोप एवं १२२ तेलुगु वाङ्मय . विविध विधाएं विपादो को दबान में असमर्थ हो द्रौपदी ने कृष्ण भगवान से रोषपूर्ण वाणी में निवेदन किया-- "ह अच्युत ! ये केश दु.शासन की उँगलियो से खिंचकर आधे कट गये, वाकी सब कौरवो ने सभा मे जो अपमानजनक बाते कही उनसे अदृश्य हो गये है; अत दूतकार्य करते समय इनका ख्याल रखियगा।" इसके उपरात द्रौपदी कृष्ण को परमात्मा मानते हुए सविनय निवेदन करती है-'"हे अच्युत ! मैं आपकी भगिनी हूँ । आपके प्रति भक्ति रखती हूँ। मेरे पति तेजोवान है, फिर भी दुष्टो के द्वारा पग-पग पर हमारा अपमान होता है । आपने दुप्टो का संहार करने व शिप्ट जनो की रक्षा करने हेतु अवतार लिया है, अत जगत की रक्षा कीजिए।" उद्योग पर्व में कृष्ण जव दूत बनकर कौरव-सभा में पहुंचते है, तब धृतराष्ट्र से पाडवो का निर्णय सरस एवं संदर्भानुसार वड़ी कुशलता के माय सुनाते है और कहते हैं- ये अन्तिम वाक्य है . "पांडव शात वीर हे, आपके चरणो की सेवा करने के इच्छुक है । यदि आप राज्य देने के इच्छुक नहीं है, अर्थात् यह अप्रिय हो, तो वे लोग युद्ध के लिए भी सन्नद्ध हैं। इन दोनों मार्गो मे से आपको कौन-सा ग्राह्य है, निश्चित कोजिए।" परन्तु उनके सारे प्रयत्न विफल हुए । उलटे दुर्योधन ने अज्ञान के वशीभूत हो कृष्ण भगवान को बन्दी बनाने का असफल प्रयत्न किया । यह पड्यंत्र दुर्योधन, दु.शासन, शकुनि तथा कर्ण नामक दुष्ट चतुष्टय ने रचा था। इस षड्यंत्र को विफल सिद्ध करते हुए भगवान कृष्ण ने कौरव-सभा में अपने विश्वरूप का दर्शन कराया । महाभारत मे कृष्ण का पात्र सूत्रधार का है। द्रौपदी के मान-सरक्षण, संधव-वध तथा विश्वरूप का दर्शन कराने वाले मन्दर्भो मे उन्होने अपनी दिव्यता का उद्घाटन किया है । कथावस्तु के अध्ययन से हमें विदित होता है कि कृष्ण पाडव के पक्षपाती हैं, परन्तु उन्हे धर्म-पक्षपाती कहना अधिक समीचीन होगा। यदि वे केवल पांडव-पक्षपाती होते तो क्या अपने भानजे पराक्रमी अभिमन्यु का वध होने देते? कदापि नही । स्थितप्रज्ञ कृष्ण अहं तथा ममता, स्व एवं पर भेदो से अतीत रहकर साक्षीभूत हो प्रत्येक प्राणी को कम-फल भोगने देते रहे । वे तत्वकोविद थे।

तेलुगु में कृष्ण काव्य १२३ " उनके राजनैतिक कौशल का तिकप्ता ने मजीव चित्र उपस्थित किया है । व्याम महर्षि के आदर्श को तिकन्ना ने भी यत्र-तत्र प्रतिविम्बित किया है--- "भगवान वामदेवश्च कोयंत मनातन अर्थात श्रीकृष्ण के संकीर्तन से महाभारत पूजनीय हो गया है । एप्रिगेडा ने कृष्ण के वंश का ममग्र परिचय कराते हुए 'हरिवंश' नाम से एक अद्भुत प्रयन्ध-काव्य का प्रणयन किया और 'प्रबन्ध परमेश्वर' नाम से विख्यात भी हुए। एराप्रगेडा के पश्चात् कृष्ण चरित को काव्य म्म देने वालों पे अममान प्रतिभाशाली 'शाश्वत रमपोपण मंविधान चक्रवर्ती' उपाधि से विभूपित नाचन सोमनाथ का नाम आदर के साथ लिया जा सकता है। इन्हों? उत्तर 'हरिवंश नामक काव्य का सृजन कर 'नवीन गुण मनाथ' की ख्याति प्राप्त की। शोभनाथ की कविता में एक नाद वाले पद पर्याप्त संख्या में पाये जाते है, जो शैली मे रमणीयता ला देते है। अविदित वेद्यांतर आनन्द प्रदान करने वाली शक्ति उनकी कविता में भरपूर है । कृष्ण-काव्यों की परम्परा में भक्त शिरोमणि वम्मेर पोतना द्वारा विरचित 'आन्ध्र महाभागवत' का अपना विशिष्ट स्थान है । भागवत पुराण से तेलुगु में एक प्रौढ़ महाकाव्य का रूप प्रस्तुत हुआ है। महाभारत के पठन के पश्चात् पोतना प्रणीत महाभागवत विशेप जनप्रिय है । पोतना उच्चकोटि के महाकवि ही नहीं, अपितु महान भक्त भी थे । उनका काव्य जहाँ महाकाव्यो के लक्षणो से समन्वित है, वहाँ उसमे भक्ति की अन्तरधारा निश्चल, शांत एवं गंभीर ध्वनि के साथ प्रवाहित भी है । भागवत के सृजन का कारण महाकवि ने भव-बंधनों से मुक्ति पाना बताया है- "मैं भागवत का प्रणयन कर रहा हूँ। मुझसे साक्षात् रामचन्द्रजी बुलवा रहे है । यदि मैं भागवत की रचना करूं तो मुझे इस भवसागर से मुक्ति मिलेगी। ऐसी हालत मे भला मैं अन्य गाथा का सृजन क्यों करू।" पोतना ने भागवत की कल्पना कल्पवृक्ष से की है। इसका जो रूपक बांधा है वह श्लेप-प्रधान है। यहां तक कि महाकवि ने रूपकालंकार में भागवत को ही कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया है। कल्पवृक्ष के लक्षणों का भागवत मे निरूपण किया है। भागवत के दशम स्कंध मे पोतना ने कृष्ण के जन्म से लेकर उनकी समस्त लीलाओ का हृदयनाही चित्र प्रस्तुत किया है। वैसे संस्कृत-भागवत में वीस १२४ तलुगु वाङ्मय : विविध विधार हजार श्लोक है । परन्तु पोतना का भागवत तीस हजार पद्यों से विभूपित है । उनमे दशम संघ मे केवल ३१३१ छन्द है। यह स्कन्ध दो भागो में विभाजित है-पूर्वार्द्ध मे १७८० छन्द है तो उत्तरार्द्ध में १३४१ । भगवान कृष्ण की लीलाओ का उद्घाटन पोतना ने भक्त के आवेश मे तथा तन्मयावस्था में किया है । अत ये लीलाएँ काव्यत्व की गरिमाओ से पूर्ण होते हुए भी भक्तिपरक हैं; इसलिए सरल हृदय रखने वाले पाठक तथा श्रद्धा-भक्ति रखने वाले भक्त भी समानरूप से इस काव्य का रसास्वादन करते है । माखन-चारी का प्रसग भी पोतना ने बड़ा ही मधुर एव सरस बनाया है। रास-लीला के प्रसग में पोतना ने गोपिकाओ की हृदय-विह्वलता तथा कृष्ण के वेणु-नाद के प्रति जो अनुरक्ति दर्शायो है वह अन्यत्र दुर्लभ है। मुरली नाद पर मुग्ध हो का अन्वेषण करते गोपिकाएँ वन मे आ गयी है, वहाँ पर कृष्ण को न पा कर कहती है- "हे हतविधि ! हमारे बन्धु-पति, भ्रात, पुत्र सबो ने हमे आदेश दिया था कि रात्रि के समय गृह-द्वार को लॉधकर वाहर न जावे, परन्तु हमने तुम्हारे मृदुगीतो की ध्वनि के कानों में पडते ही विकल हो उन मर्यादाओ का अतिक्रमण किया है । हे नाथ ! हम तुम पर मोहित हो यहाँ आ गये है, किन्तु तुम निर्दयी बनकर कहाँ चले गये हो ?" कृष्ण के दर्शन कर गोपिकाएँ तन्मय हो गयी। अनन्त विभु कृष्ण ने चित्र-विचित्र गतियो के साथ गोपिकाओ के समेत लीला को। गोपिकाओ की चित्त-वृत्तियो, सरस-संलापो तथा अनुनय-विनय सम्बन्धी वर्णन अद्वितीय बन पड़े है । लता-गृहों मे गोपिकाएँ कृष्ण का अन्वेपण करते पहुँच जाती है और मल्लिका पुरुषों से पूछती है- हे मल्लिकाओ ! श्याम गाववाले कमल नयनवाले, कृपारस की वृष्टि करनेवाले, मयूरपुच्छ धारण करनेवाले, विमल हास से पूर्ण मुखमण्डल वाले, नारियो की मान-सम्पदा का हरण किये, आकर यहाँ कहाँ छिप गये है, क्या तुम लोगो की झाड़ियो मे कही छिपे तो नहीं हैं;' पोतनाकृत भागवत में अत्यधिक रसपूर्ण प्रसंग 'रुक्मिणी परिणय' है। आन्ध्र के विवाह का सजीव चित्र इस घटना में अंकित हुआ है । रुक्मिणी की बाल्य-क्रीड़ाएँ, कृष्ण के प्रति उसके मन में प्रेमोदय का होना, पुरोहित द्वारा कृष्ण के पास सन्देशा भेजना तथा रुक्मिणी-हरण बहुत ही सरसतम बन पडे है। विजयनगर साम्राज्य के अधिपति कृष्णदेव के दरवार में अष्ट दिग्गज नामक आठ महाकवि थे। इनका समय तेलुगु साहित्य का स्वर्ण युग माना तेलुगु मे कृष्ण काव्य १२५ जाता है । इस युग में अनेक प्रबन्ध एवं महाकाव्यो का प्रणयन हुआ। उन काव्यों में भी कृष्ण चरित पर्याप्त मात्रा में वर्णित है। स्वयं कृष्णदेवराय ने भी भगवान कृष्ण की स्तुति की है। परन्तु इस युग के दो-तीन काव्यों में कृष्ण का मनोहारी चित्र प्रस्तुत हुआ है। उनमें श्री नन्दि तिम्मना द्वारा विरचित 'पारिजातापहरण' तथा पिंगलि सूरना द्वारा प्रणीत 'कलापूर्णोदयम्' एवं प्रभावती प्रद्म म्नमु' उल्लेखनीय है । 'पारिजातापहरण' काव्य का नायक श्रीकृष्ण और नायिका सत्यभामा है । आलम्बन एवं उद्दीपन के विभागो का जैमा रमणीय सम्बन्ध इसमे प्रतिपादित है, वह श्लाघनीय है। प्रथम आश्वाम में नारद का स्वर्ग से पारिजात पुप्प लाकर उसकी महिमा का गान करके उसे श्रीकृष्ण को समर्पित करना-उस समय कृष्ण सत्यभामा का स्मरण करके पास में स्थित रुक्मिणी को दुखी न बनाने के विचार से उमको देते हैं । मत्यभामा की एक सखी जो वहाँ पर उपस्थित थी, वह तत्काल ही मारा वृत्तान्त नमक-मिर्च मिलाकर मत्यभामा को भुना देती है। परिणाम- स्वरूप मत्यभामा कुपित हो कोप-भवन में प्रवेश करती है। मत्या के मन्दिर में प्रवेश कर कृष्ण उसे समझाने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु वह कृष्ण के मस्तक पर पाद-ताडन कर अपने विरस का परिचय देती है। इस सन्निवेश का अद्भुत चित्रण बन पडा है । पात्रो के मनोभाव उन-उन परिस्थितियों मे कैमा परिभ्रमण करते है, उनका परिणीलन कर विवेचन करना महाकवि तिमन्ना के लिए ही शक्य था । में एक दन्तकथा प्रचलित है कि विजयनगर के मम्राट कृष्णदेवराय के जीवन में भी यह घटना घटित हुई थी। राज-परिवार में यह प्रथा है कि रामा के आगमन के पूर्व शयनकक्ष में रानियां पंताने की दिशा में सर रखे लेटी रहती हैं और राजा के आने के पश्चात् ही उनका स्वागत कर सिरहाने की दिशा में लेटती है । एक वार कृष्णदेवराय की पट्टमहिपी चिन्नादेवी राजा के आने के पहले भूल से सो गयी थी। राजा ने उसे जगाया नही । उन्हें इस बात पर क्रोध आया कि उनके आने के पूर्व ही रानी ने मोने की धृष्टता की है और उसे जगाना अपने राजसी ठाट के विरुद्ध माना । यथा प्रकार सो गये लेकिन गाइ-निद्रा में जब चिन्नम्मा देवी ने करवट बदली तो उसका पैर सम्राट के मर पर जा लगा। सम्राट नौं रुकर जाग उठे। एक औरत का पदाघात मम्राट के लिए अमह्य था । इमलिए उम दिन से मम्राट ने चिन्नादेवी के अन्त पुर में जाना बन्द कर दिया। चितादेवी को इसका कारण ज्ञात न था। वह मन ही मन दुखी होने आन्ध्र १२६ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं लगी। उसकी व्यथा बढ़ती गयी। आखिर उसने कल्पना की कि यही कारण होगा । मम्राट से क्षमा मांगना चाहती थी । अपनी करनी पर पछता रही थी। परन्तु मम्राट से क्षमा मांगने का अवसर भी मिले तो। आखिर विवश हो महाकवि तिम्मन्ना से सारी कहानी सुनायी और उस विपत्ति से बचाने की प्रार्थना की। महाकवि चिन्नादेवी के साथ दहेज में भेजे गये थे; अतः चिन्नादेवी के प्रति बडी सहानुभूति और श्रद्धा रखते थे। उन्होने दिमाग टटोला तो अन्त में उन्हें श्रीकृष्ण के जीवन में भी तत्समान घटना झलक उठी। फिर क्या था, चिन्नादेवी के नायक भी तो कृष्णदेव राय हो तो थे। उस घटना को कथावस्तु बनाकर एक प्रौढ प्रवन्धकाव्य का रूप दिया । कहा जाता है कि इम काव्य के श्रवण के परचान कृष्णदेवराय ने चिन्नादेवी के शयन-मन्दिर में जाकर बड़ी उदारता के साय क्षमा मांगी थी। कृष्णदेवराय के समय में पिंगली मूरना ने तीन प्रबन्धकाव्यों की मृप्टि की। इन तीनो काव्यो में कृष्ण चरित वर्णित है। उनका प्रथमकाव्य है- 'कलापूर्णोदय' । आन्ध्र की यह महिमामयी भूमि पर विकसित तेलुगु काव्योद्यान का एक अक्षय सुरभित काव्य-कुसुम है । वस्तु-कल्पना तथा विभि घटनाओ की क्रम-बद्धता की दृष्टि में यह अद्वितीय है । मूग्ना ने अपनी उर्वर प्रतिभा एवं कल्पना-शक्ति के वल पर कल्पित कथा की भिन्नि पर सम्पूर्ण काव्य-मोध का निर्माण किया है । महाकवि कालिदास के सम्बन्ध में एक समीक्षक ने बताया है कि उन्होंने म्वर्ग एवं मयं लोको को एक गांठ मे बाँध दिया है यह उक्ति कलापूर्णोदय के प्रति सर्वथा ठीक बैठती है । सूरना ने मत्यं, स्वर्ग एव मत्य लोको को एक ही गाँठ में बांध दिया है । शृङ्गार रम के वर्णन मे सूरना ने अत्यंत आत्म-निग्रह एवं सभ्यता का परिचय दिया है। इसके काव्य मे स्वर्ग लोक के रंभा नलकूबर, मर्त्यलोक के सुगात्री-शालीन, कलभाषिणी, मणिकंधर तथा मधुर लालमा एवं कलापूर्ण की जोड़ियाँ तथा मत्यलोक की चतुर्मुख मरस्वती की जोडी भी अभिवणित है। प्रेयमी-प्रिय के गरय मंभाषण तथा कोमल चित्त- वृत्तियो के पोषण में सूरना ने अपनी निपुणता का अच्छा पदर्शन किया है। अनुरक्ति एव भक्ति के लिए ममान स्प मे उद्दीपन करने वाली कला संगीन है, इस सत्य का परिचय इम काव्य के द्वारा भलीभांति हमे मिल जाता है। इसीलिए इम यन्य का नामकरण 'कलापूर्णोदय' मर्वथा सार्थक हुआ है । गांगदेवराय के पश्चात् दक्षिण आन्ध्र वाङ्मय युग में वृष्ण चरित्र संबंधी अनेक काव्य-ग्रन्थ रने गये । परन्तु उनमे यज्ञगान एवं पद-गाहित्य को प्रचुरता ।

دي १३ भारतीय भापाओं में बाल साहित्य पान गाहित्य पर विशार करने ममय हमें पॉर जाई की अमर कृनि 'युवग चिल्न एण्ड मैन' के कनिषय यावर स्मरण करने योग्य है। उनमें लेखा बार माहिरा के गम में आना निश्चित मत यो प्रकट करते है जो मर्वया निविवाद गन्य है। वे कहते है--- "मैं ऐगी मुग्नको को पसन्द करता हूँ जो साहित्य की आत्मा के प्रति वफादार होती है, जो बच्चों के लिए सहज और प्रत्यक्ष शान का द्वार खोल देती है, गोगा गरल मौन्दर्य प्रस्तुत करती है जिमे बच्चा तुरन्त ग्रहण गर गकता है, जो बच्चे के हृदय में ऐगी चेतना और ऐगा ग्पन्दन भर देती है जो बच्चो के जीवन से स्थायी सति बन जाती है जिनमें बटिया चित्र होते है--विर जिन्हे बच्चे पगन्दारे, जिन्हें समस्त विश्व के कला-वैभव से चुना गया हो। मुझे ऐसी पुस्तक पसन्द है जो बच्चो को महान मानवीय संवेदनाओ की अनुभूति कराती है, जो ज्ञानवर्धक और नैनिक गुणों से युक्त होती है।" इस कसौटी पर रचित पुस्तकें हमे भारतीय भाषाओ मे बहुत कम ही उपलब्ध होती है। हमारे देश में आज तक याल साहित्य उपेक्षित रहा है । पाश्चात्य देशो मैं बारा साहित्य के मृजन, प्रकाशन, रचना-प्रक्रिया, स्तर, उपयोगिता, मनो- वैज्ञानिकता इत्यादि विभिन्न पहलुओं पर जो चिन्तन, मनन और जो प्रयोग हुए वे भारतीय भाषाओ के संदर्भ में नगर है। विदेशो मे जहाँ भूर्धन्य साहित्यकारों ने इस विधा को साहित्य का एr अभिन्न अंग मानकर उसके विकास में स्पृहनीय योगदान दिया, वहाँ पर भारतीय भाषाओ के वार साहित्य के उन्नयन में सराहनीय प्रमान नहीं हुआ है । विदेशों में बच्चो को जो शिक्षा दी जाती है वह पद्धति अपूर्व है। यहां पर बच्चो के पालन-पोपण में विशेष

No text on this page.

१३० तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं लेखन में बच्चों की मानसिकता को जाने बिना जो साहित्य प्रस्तुत किया जाता है, उसके द्वारा हमे यांछित फल प्रान्त नहीं होते। आज के अधिकाश लेखक बाल साहित्य की मात्र आलोचना करना और अन्य पत्रिकाओं पर व्यंग्य करना, अपने कर्तव्य की इतिश्री मान बैठे है और यह गोचकर संतोप की मांस लेते है मानो उन्होने बहुत वडा कार्य संपन्न किया है । किन्तु रचनात्मक दृष्टि में इस दिशा में उनका योगदान नही के बराबर होता है । वे यह नहीं बताते कि श्रेष्ठ वाल साहित्य के लक्षण क्या हैं और इस दिशा मे हमारा कर्तव्य क्या है ? यह बात सभी लोग स्वीकार करेंगे कि बाल साहित्य रोचक, सरल, मरम और उपादेय हो । पर इसके माय ही उसकी भापा सरल और बोधगम्य हो । आज के बालक का बौद्धिक स्तर बड़ा ही ऊंचा होता जा रहा है। आयु-वर्ग की दृष्टि से भी साहित्य भिन्न हो सकता है। प्रारम्भ में हम बच्चों को ऊँचे बौद्धिक स्तर का साहित्य दें तो वे पूर्ण रूप से हृदयंगम कर उसका लाभ उठा नहीं पायेंगे, इसीलिए प्रारम्भिक बात माहित्य में कुतूहल और जिज्ञासा की पूर्ति करने वाली मामग्री भरपूर हो और माय ही वह माहित्य उनका मनोरंजन करने वाला हो और ज्ञान-वद्धंक भी हो । जैसे-जैमे उनका मानसिक विकास होता है, उसके अनुरूप साहित्य देना हमारा कर्तव्य हो जाना है। हम बालकों से क्या अपेक्षा करते है ? बच्चों का निर्माण हम किस रूप में करना चाहते हैं आदि मूलभूत प्रश्न है। इन प्रश्नों का समाधान हम बडी आसानी से ढूँढ सकते है। विश्व की श्रेष्ठ बाल साहित्य की जिन कृतियो ने बच्चों को विशेष रूप से आकृष्ट किया है, उनके मूल में कौन से तत्व प्रति- पादित है, मेरे मत में प्रारम्भ मे उन्हे ऐमा साहित्य देना चाहिए जिससे बच्चो के भीतर साहित्य पढने की अभिरुचि जागृत हो। वच्चों को साहित्य के प्रति उन्मुख करने के पश्चात् हम उन्हें क्रमश. विविध प्रकार की सामग्री दे सकते है। आखिर हमारा लक्ष्य बच्चो को उत्तम भावी नागरिक बनाना है। इसलिए उन्हें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति दायित्व का बोध कराने वाला साहित्य देना परमावश्यक हो जाता है। अत. हम जो माहित्य उन्हें देते हैं वह बच्चों के भीतर साहस, पराक्रम, नैतिक बल, स्वावलंबन, चरित्र-निर्माण, देश-भक्ति, सेवाभाव, आत्मरक्षा आदि गुणो का पोषण करने वाला हो। परन्तु वह साहित्य उपदेशात्मक न हो। उनमें अंधविश्वास के बजाय तार्किक बुद्धि, विवेकशीलता और दृढता पैदा करें- ये गुण नितांत आवश्यक हैं। क्योकि बच्चों की अवस्था के बढ़ने के साथ उनकी कल्पना

No text on this page.

। १६० गेलुगु यामय : विधि विधा मेगन में पन्नों की माननिहा को जाने दिया जो माहिन्य प्रस्तुत रिया जाता है, उगरे साग हमे याट्रिा कर प्रा-न नहीं होते। आज ये अधिकार मेगा पाप माहित्य की मात्र आलोचना करना और अन्य पत्रिकाओं पर संग्य गारला, अपने पतंय की इतिश्री मान बैठे है और यह गोषफर गंगोप की गोग लेने है मानो उन्होने बहुत बडा कार्य संपन्न किया है । किन्तु रचनात्माः दृष्टि में इस दिशा में उनका योगदान नहीं के परावर हो । मह नहीं पता किष्ट बाल साहित्य के नाम क्या हैं और इस दिशा में हमारा कांप गया है। यह बात गभी लोग स्वीकार करेंगे कि बात माहित्य रोचा, गरल, मरम और उपादेय हो । पर इनो गाय ही जगको भाषा गरल और बोधगम्य हो । आज के यालक का बौद्धिक स्तर बडा ही ऊँचा होना जा रहा है। आयु-वर्ग की दृष्टि से भी गाहित्य भिन्न हो माता है। प्रारम्भ में हम बच्चों को केंच बौद्धिक स्तर का गाहित्य दें तो ये पूर्ण सर मे हृदयंगम कर उसका नाम उठा नही पायेंगे, इसीलिए प्रारम्मिा यात माहित्य में कुतूहल और जिज्ञासा की पूर्ति करने वाली सामग्री भरपूर हो और माय ही वह माहिन्य उनका मनोरंजन करने वाला हो और शान-वर्द्धक भी हो । जैसे-जैने उनका मानमिक विकाम होता है, उसके अनुरूप माहिन्य देना हमारा कर्तव्य हो जाता है। हम बालकों में क्या अपेक्षा करते हैं ? बच्चों का निर्माण हम किम स्प में करना चाहते हैं आदि मूलभूत प्रश्न है। इन प्रश्नों का समाधान हम बड़ी आसानी से ढुंढ गकते हैं। विश्व की श्रेष्ठ बाल साहित्य की जिन कृतियों ने बच्चों को विशेष रूप मे आकृष्ट किया है, उनके मूल मे कौन से तत्व प्रति- पादित हैं, मेरे मत में प्रारम्भ में उन्हें ऐसा माहित्य देना चाहिए जिसमे बच्चो के भीतर माहित्य पढ़ने की अभिरुचि जागृत हो। बच्चो को माहित्य के प्रति उन्मुख करने के पश्चात् हम उन्हें क्रमशः विविध प्रकार की सामग्री दे गकते हैं। आखिर हमारा लक्ष्य बच्चों को उत्तम भावी नागरिक बनाना है। इमलिए उन्हें अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति दायित्व का बोध कराने वाला माहित्य देना परमावश्यक हो जाता है। अत: हम जो साहित्य उन्हे देते हैं वह बच्चो के भीतर माहस, पराक्रम, नैतिक बल, स्वावलंबन, चरित्र-निर्माण, देश-भक्ति, मेवाभाव, आत्मरक्षा आदि गुणों का पोषण करने वाला हो । परन्तु वह माहित्य उपदेशात्मक न हो। उनमें अंधविश्वास के वजाय ताकिक बुद्धि, विवेकशीलता और दृढता पैदा करे ये गुण नितांत आवश्यक हैं। क्योकि बच्चों की अवस्था के बढ़ने के साथ उनकी कल्पना भारतीय भापाओ मे बाल साहित्य १३१ और भावना शक्ति भी बढती जाती है। साथ ही साथ उनमे हेतुवाद को समान्तर रूप मे जागृत करने का प्रयाम होना चाहिए। बाल साहित्य के क्षेत्र मे संसार भर में जो लोकप्रिय ग्रन्थ है, जिन्हें बच्चों ने बहुत ही रुचि के साथ पढा, उन पुस्तको में बालको का मनोरंजन करने की असीम शक्ति के माथ अपूर्व रोचकता भी थी। विश्व की महान् कृतियों में पंचतंत्र, गलीवर की कहानियाँ, राविन्सन क्र सो, ट्रेजर ऐलाण्ड, ईसक की कथाएँ, एलिस इन द वन्डरलैण्ड आदि महत्वपूर्ण स्थान रखती है । इन कृतियो के पात्र पशु-पक्षी और बच्चे हैं। ये कृतियां बहुत पुरानी है, फिर भी आज भी बच्चे बडी रुचि के माथ पढने है। उपर्युक्त कृतियों में नीति, उपदेश, गाहग, अनोखी मुझ-बूझ, समयस्फूर्ति तथा अन्य शाश्वत मूल्यो के गुण विद्यमान है। साथ ही उनमे ऐसे भी तत्व है जिनमे उन सारी बातो पर चिंतन किया हुआ है जो जीवन और जगत् से जुड़ी हुई है । इन कृतियो को लाखो प्रतियां बिक चुकी है और विश्व की तमाम भाषाओ मे इनका रूपान्तर हो चुका है । गभी भापाओ, ममानो और देशो के बच्चो ने इन कहानियों को खूब पढा और गराहा । इन कहानियो मे परी-कथाएँ भी - है ग्रिम ब्रदर्स की कहानियो में भूत-प्रेत आदि पात्रो के साथ जानवरो की चर्चा भी अधिक हुई है। जानवर परस्पर बात भी करते है। पर एण्डरसन की कहानियां इससे भिन्न है । उनमें घरेलू वातावरण का चित्र ज्यादा मिलता है। बच्चों की कल्पना और उनकी समस्याओ को उजागर करने का इन कृतियों में प्रयास हुआ है, पही कारण है कि ये कृतियां विश्व भर में विशेष रूप में नोकप्रिय हुई हैं। विश्व-कथा-माहित्य के अध्ययन से हमे यही विदित होता है कि प्रारम्भ में श्रेष्ठ लेखको ने वान माहित्य की रचना करने मे मंकोच का ही अनुभव किया था । स्वयं चार्लेस लुडविग डागमन जो आक्मफोर्ड यूनिवर्सिटी में गणित- शास्त्र के प्रोफेसर थे, उन्होने लुई करोल नामक उपनाम से अपनी कहानियाँ प्रकाशित की थी, जो मैकमिलन कपनी मे १८६४ मे छपी थी। कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार बाल माहित्य प्रारम्भ मे अनादत ही रहा, यही बात भारतीय भाषाओ के संदर्भ में भी कही जा सकती है। भारतीय भापाओ मे भी प्रारम्भ में विश्व की इन महान कृतियों के अनुवाद हुए। पंचतंत्र के साथ हितोपदेश, कया सरित्सागर, वेताल कथाएँ, विक्रमादित्य की कहानियां, जानक कथाएँ, अरेबियन नाइटम, सोहराव और , १३२ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं रुस्तम, सिन्दबाद की कहानियां, परी-कथाएँ, लोक कथाएँ, बीरवल, तेनालीराम जैसे विदूपको की कहानियां, पुराण-महाकाव्य, संस्कृत के प्रसिद्ध नाटको की कहानियाँ, उपनिषद् की कहानियाँ प्राय. सभी भारतीय भाषाओं में रची गयी है या अनूदित हुई है । ये सारी कहानियाँ बच्चो मे बहुत लोकप्रिय भी हुई हैं। परन्तु डॉ० हरिकृष्ण देवसरे के कथना- नुसार समाजवादी दृष्टिकोण पर उन पौराणिक और प्राचीन साहित्य की कथाओ का आज के संदर्भ में, आज की स्थिति तथा आज के बच्चों की मानसिकता के अनुरूप उन कहानियो का पुनर्लेखन होना चाहिए । पर माथ ही हमारे प्राचीन कथा साहित्य भण्डार से पहले बच्चे अवगत हो जाएँ और उनसे अपनी कल्पना शक्ति और भावना की परिपुष्टि करे तब अपने मानसिक विस्तार के अनुरूप ज्ञान-विज्ञान तथा जीवन से जुड़े हुए अन्यान्य क्षेत्रों की समस्याओ से सम्बन्धित कहानियो तथा साहित्य की अन्य विधाओ का ज्ञान प्राप्त करे तो अधिक उपयुक्त होगा। विश्व की प्राय प्रत्येक भाषा की प्रारम्भिक बाल कृतियो मे अद्भुत कथाएँ, पशु-पक्षियों की कहानियां, नीति व उपदेशात्मक कहानियां और साहसिक कथाएँ पायी जाती है । ये कहानियाँ ही वास्तव मे बच्चो की जिज्ञासा को परिपूर्ति करके साहित्य पढने की और प्रवृत्त करती है । यदि हम उन्हें यह साहित्य पढने न दे तो संभवत अधिकाश बालक-पाठकों से लोग वंचित रह जायेंगे। भारत जैसे देशों में ही नही, माम्यवादी तथा समाजवादी देशों में भी आज भी बालको को प्रारम्भ मे परी-कथाएँ, पशु-पक्षियो की कथाएँ पढ़ने को ही दी जाती हैं । वहाँ की लोक-कथाओ के पात्र पशु-पक्षी है । आये दिन प्रकाशित होने वाले विदेशी बाल माहित्य की पत्रिकाओं में आज भी उन्हें हम देख सकते है। वहाँ के देश अधिक जागृत होते हुए भी परम्परा एवं रूढिवाद से दूर रह कर भी धर्म, दर्शन इत्यादि को न मानते हुए भी उन कहानियो को बच्चों से क्यों पढवाते है ? वे मानते हैं, कोरी कल्पना, भावना, अद्भुत घटनाओं में भी अगर कही कोई यथार्थ सत्य हो तो बच्चे अपनी विवेकशीलता के साथ उसे ग्रहण करे, अच्छे-बुरे का विवेचनात्मक दृष्टिकोण को वे विकसित करें। इस तरह की विवेचनात्मक शक्ति प्राप्त करने के पश्चात् उनकी बौद्धिक प्रतिभा के अनुरूप ज्ञानवर्द्धक बाल साहित्य दिया जाता है । भारतीय भाषाओं में भी यही क्रम पाया जाता है। भारतीय भाषाओं में प्रस्तुत वाल माहित्य का समग्ररूप में अनुशीलन भारतीय भाषाओ मे बाल साहित्य १३३ करना इस छोटे से निबन्ध में सभव नहीं है; अत: अति संक्षेप में उस पर प्रकाश डालने का प्रयास काँगा। असमिया: भारत की पूर्वांचलीय भापाओं में असमिया भाषा का साहित्य किसी भी दृष्टि से अन्य भारतीय भापाओ की तुलना में कम समृद्ध नहीं है। प्रारम्भिक अवस्था में असमिया भाषा में भी परी-कथाओ, लोक-कथाओ और देश-विदेश की लोकप्रिय बाल कथाओ की भरमार पायी जाती है। किन्तु क्रमश. वहाँ के वाल माहित्यकारों का दृष्टिकोण युग के अनुरूप बदलता गया । सर्वश्री नवकांत बरुआ, प्रेमधर दत्त, डॉ० वाणी कात काकति, प्रफुल्लदत्त गोस्वामी, महादेव शर्मा, वेणुधर शर्मा, महेश्वर नेओग, सैयद अब्दुल मालिक, निर्मला, प्रभा रघुनाथ चौधरी, कीर्तिनाथ हाजरिका, हरेन्द्रनाथ शर्मा, यतीन्द्रनाथ गोस्वामी प्रभृति ने आधुनिक युगबोध के अनुरूप उत्तम बाल साहित्य प्रस्तुत किया है। वालकों को वैज्ञानिक साहित्य प्रदान करने के ख्याल से असमिया के लेखकों ने आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों को सरल एवं सरस भाषा में बाल- कोपयोगी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। ऐसे लेखकों में द्वीपेन्द्रनाथ शर्मा, शांति राम दास, लक्ष्मीशेखर बरुआ इत्यादि का प्रयास अभिनन्दनीय है। उनके द्वारा विरचित कृतियो मे 'महाकाश अभियान', 'विज्ञान अरु वैज्ञानिक', 'इलेक्ट्रसिटी' वगैरह रचनाएँ उल्लेखनीय है । असमिया भाषा मे बाल नाटको के कृतित्व के साथ विविध विधाओ पर भी पुस्तकें रची गयी हैं । बाल नाटककारी में कीर्तिनाथ हजारिका, हिरण्य- मयी देवी, प्रेमनारायण, मुक्तिमाल बरदले, नलिनीवाला देवी के नाटक मंच पर भी सफलतापूर्वक अभिनीत हुए है। अन्य विधाओं की रचनाओं मे रघुनाथ चौधरी कृत 'मानव सभ्यता', लक्ष्मीनन्दन बरा द्वारा रचित 'गाँवरे स्वर्ग रचो', अनिलकुमार शर्मा की 'जीव जन्तुर साधु', क्षेमेन्द्र द्वारा विरचित 'सागरिका', निर्मलेश्वर की 'आमार इह पृथिवीरतन' आदि स्मरणीय है। असमिया में वाल पत्र-पत्रिकाओ का अभाव खटकता है, पर वहां के दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक पत्रो मे बच्चों के वास्ते वाल-स्तंभ के अन्तर्गत चालकोपयोगी रचनाएँ प्रकाशित होती हैं। विशेषकर बच्चो के लिए प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओ में 'दीपक' और 'जोन वाहे' नामक इस संदर्भ में गणनीय है।

१३४ तेलुगु वाडमय विविध विधाएं ओडिया: स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ओडिया में जो बाल माहित्य रचा गया, वह आज की कसौटी पर श्रेष्ठ कहा नहीं जा मकना । पर पांचवी रण में जो बाल साहित्यकार उभर आये, उनमे कविता के क्षेत्र में गोपाल महाराज, नन्दकिशोर वल, मधुसूदन दास, मृत्युंजय रथ, पद्मचरण पटनायक, द्विजेन्द्र- लाल पशू, उपेन्द्र त्रिपाठी, लक्ष्मीकान्त महापात्र, कुंजविहारी दारा, अनंतचरण शतपथी आदि हस्ताक्षर आदर के साथ लिये जा मकते है। स्वाधीनता के पश्चात् ओडिया के श्रेष्ठ कलाकारो ने वाल-साहित्य के प्रति अपने दायित्व का अनुभव किया और बच्चों के लिए सुन्दर पुस्तको की रचना की। इस समय की रचनाओ मे मनोवैज्ञानिकता और प्रयोगवादिता के साथ शैली की मरमता भी दृष्टिगोचर होती है। प्राचीन एव पौराणिक साहित्य को भी नये मंदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ। इस प्रकार की कृतियो मे महामानव, मिनिर मनकथा इत्यादि गणनीय है। मौर जगत, दूर देश की कथा, आविष्कार और उद्भावन इत्यादि वैज्ञानिक कृतियों के साथ मनोवैज्ञानिक, भौगोलिक, मास्कृतिक और राष्ट्रीय भावनाओ से ओतप्रोत बाल साहित्य भी प्रस्तुत हुआ है । कविता के क्षेत्र मे गोदावरीश कृत छविर, कविता, उपेन्द्र त्रिपाठी द्वारा रचित पिलाक पशु-पक्षी पुराण तथा निशा राक्षसी, निज; कानूनगो कृत 'इन्द्रधनु', विश्वनाथ पाइक राय का 'राष्ट्रीय संगीत' इस दिशा में उल्लेखनीय कृतियाँ है । कहानी के क्षेत्र मे दर्जनो लेखको ने नये-नये प्रयोग किये हैं । उदयनाथ पडंगी की माकडर देश भ्रमण, 'बडकिए', जगन्नाय महांतिकी 'नयी मडीला', दुर्गाप्रसाद पटनायक की 'मोखाट घोडा', 'कथाकहे' इत्यादि आदर के साथ ली जा सकती है। अन्य लेखकों में गणेश्वर महापान, लोक- नाथ नन्द विविध विधा की रचना के लिए प्रसिद्ध है । वैज्ञानिक सम्बन्धी रचनाएँ करने में गोकुलानन्द , महापात्र मातनुकुमार आचार्य, वासुदेव त्रिपाठी के नाम आदर के माय लिये जा सकते हैं । बाल एकांकी को रचना में योगेन्द्रनाथ पटनायक, सूर्यचन्द्र नन्द जहाँ प्रसिद्ध है वहाँ बाल उपन्यास के क्षेत्र में डॉ. जयकृष्ण माहेती और चन्द्रशेखर महापात्र गोकप्रियता प्राप्त कर चुके है। करा: प्रारम्भ मे कामड़ बाल साहित्य के क्षेत्र मे मैकमिलन कंपनी मद्रास, बाल साहित्य मण्डल मंगलूर ने प्रशंसनीय कार्य किया है। ए० एस० कामत ने बच्चों के लिए कई नाटक लिसे। डी० के० भरवाज भी नाटक के क्षेत्र में .

भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य नादर के साथ स्मरण किये जाते है । अन्य बाल साहित्य के विशिष्ट लेखको में डॉ० शिवराम कारंत का योगदान अविस्मरणीय हैं। इन्होंने बच्चो के वास्ते कहानियों के साथ गीतों की भी रचना की है। मगलकूट नाम से वालको के लिए एक संस्था स्थापित कर प्रतिवर्ष उनके द्वारा मचन कराने के लिए कई रोचक नाटक भी लिखे । साथ ही बाल प्रपचं नाम से बच्चो के लिए तीन भागों में इन्होने एक मुन्दर विश्व-कोप भी प्रस्तुत किया है । मैसूर की चिल्ड्रन बुक कौन्मिल संस्था के द्वारा भी प्रशंसनीय कार्य हुआ है । अन्य बाल गाहित्यकारों में सर्वश्री जी० पी० राजरत्नम, होइसलगी, आर० के० नारायण इत्यादि के नाम अविस्मरणीय है। कन्नड में वालको के लिए उपन्यास भी कम नहीं रने गये है । वैसे विज्ञान सम्बन्धी बाल साहित्य भी कन्नड में उपलब्ध है, किन्तु अधिकांश साहित्य या तो अंग्रेजी से अनूदित हैं, अथवा अनुकरणात्मक है । साउथ इण्डियन युक ट्रस्ट द्वारा भी बच्चों के लिए कन्नड की पुस्तके प्रस्तुत हुई है, किन्तु उनमे अधिकांश इतर भापाओ से अनूदित है। श्री डी० के ० मूर्ति ने 'मक्कल पुस्तकमाला' द्वारा वच्ची के लिए पर्याप्त पुस्तकें उपलब्ध करायी है। तमिल: तमिल में भी प्रारम्भ मे अन्य भापाओ की भांति प्राचीन कथा साहित्य पर बालको के लिए पुस्तकें रची गयी हैं। प्राचीन काल में तमिल की प्रसिद्ध कवयित्री अन्वयार ने गीत शैली में बच्चो के लिए बहुत ही रोचक पुस्तके प्रस्तुत की तो आधुनिक युग में महाकवि सुब्रह्मण्य भारती ने 'नयी आत्ति चूंडि', 'पाप्पा पाटु' तथा 'ओडि विलयाडु पाप्पा' जैसे बाल गीतो की रचना करके सुन्दर एवं स्वस्थ बाल साहित्य की नीव डाली। अन्य श्रेष्ठ बाल-साहित्य- कारों में नमः शिवाय मुदलियार, भारती दासन, देशिक विनायकम पिल्ले, वल्लि- यप्पा के नाम अत्यन्त आदर के साथ लिये जा सकते हैं । इन महानुभावों ने असंख्य गीत और कविताएँ रचकर न केवल तमिल बाल साहित्य के भम्हार को समृद्ध किया, अपितु भावी वाल साहित्यकारो के लिए सुन्दर पाठक वर्ग भी तैयार किया । उपर्युक्त कलाकारों की रचनाएँ केन्द्रीय तथा राज्य सरकारो के द्वारा भी पुरस्कृत हैं । बल्लियप्पा को 'कुलंदै कविङ्गर' याने यालकों के कवि नामक उपाधि से भी विभूपित हैं। पेरियस्वामी, तूरन, पो० आर० चूडामगि, कोत मंगलम सुब्बु, तगिक उलगनायन, भरतन, तंरि श्रीनिवासन, तमिलगन, तिरुच्चि वासुदेवन की सेवाएं इस दिशा में सदा अविस्मरणीय हो तेलुगु वाड्मय विविध विधाएं रहेगे। श्रीलंका के तमिल वाल कवियो मे, नवालियूर सोमसुन्दर पुलवर वगैरह विशेष रूप से लोकप्रिय हैं । गद्य साहित्य में राज चूणामणि का योगदान प्रशंसनीय रहा है। अन्य बाल साहित्य के विशिष्ट कलाकारो मे राजाजी का योगदान मदा स्मरणीय रहेगा । तमिल के चोटी के कलाकारों ने भी यालको के लिए असंख्य स्तरीय पुस्तके लिखकर तमिल वाल साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिकाअदा की है । ऐसे महानुभावो मे ती० जा० रगनाथन, कल्कि, कि० वा० जगन्नाथन, अकिलन, तुमिलन के नाम तमिल बाल माहित्य के क्षेत्र में गर्व के साथ लिये जा सकते है। बाल साहित्य की अन्य विधाओं के रचनाकारो में मर्वश्री पी० एन० अप्पुस्वामी, वानमामल, नागराजन, कल्वि गोपालकृष्णन, एम० एल० वरदराजन, श्रीमती शांता लक्ष्मी प्रभृति ने गणनीय कार्य किया है तमिल बाल साहित्य के क्षेत्र में श्री पेरियस्वामी तूरन के सम्पादकत्व में प्रस्तुत बालरलवकल चियम, याने 'बाल विश्वकोश' एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है । यह कई खण्डो मे प्रस्तुत है । । तेलुग इस सदी के दूसरे दशाब्द में तेलुगु मे बाल साहित्य लेखन का शुभारम्भ हुआ। प्रारम्भ में संस्कृत तथा अग्रेजी की उत्कृष्ट बाल कृतियो का या तो रूपान्तर हुआ अथवा उनको आधार बनाकर लेखकों ने अपनी भाषा में पुस्तके प्रस्तुत की। साथ ही परी-कथायें, लोक-कथाएं अधिक संख्या में रची गयी। किन्तु तेलुगु की प्रथम उल्लेखनीय कृति डॉ. गिडुगु सीतापति द्वारा विरचित वालानन्दम् है जो तेलुगु भाषा समिति द्वारा पुरस्कृत भी है । तेलुगु के विख्यात कवि गुरुजाड अप्पाराव, श्री श्री आदि ने भी बच्चों के लिए सुन्दर रचनाएँ की है । श्री कवि रावु, वी० वी० नरसिंहाराव, नंदुरि राममोहन, अलपति वगैरह बच्चों के लिए गीत लिखने मे विशेष प्रिय हुए हैं। ये सब अपनी बालकृतियों के लिए भारत सरकार तथा प्रान्तीय सरकार द्वारा भी पुरस्कार प्राप्त कर चुके है । बी० वी० नरसिंहराव 'बाल बन्धु' नाम से विख्यात है। वैज्ञानिक दंग पर लिखी गयी इनकी रचनाएँ, बच्चो की मानसिकता के अनुरूप में है । ऐसे गीत-सग्रहो मे 'बाल हृदयमु', 'आवु-हरिश्चन्द्र' प्रसिद्ध हैं । कवि राव कृत 'बोम्मरिल्लु' (घरौन्दे) गीत कथायें पर्याप्त लोकप्रिय है । तेलुगु की बालकृतियो में दो दर्जनो से अधिक केन्द्रीय शासन द्वारा पुरस्कृत है । मागंटी बापिनीडु ने बच्चो के लिए छोटा-सा विश्वकोश ही तैयार किया था। चिंता दीक्षितुलु ने 'सूरी-सीता-वेंकी' पात्रों के माध्यम से बहुत सुन्दर कहानियाँ प्रस्तुत की पापात... हैं। अन्य उल्लेखनीय साहित्यकारों में नातं चिरंजीवी. वेकटरामचन्द्र मूर्ति. सापति रापवराव दंपति, शशांक, टोल रामचन्द्र राव, के एल नरसिंहाराव, शीवास्तव, के सभा, एल्लोरा दाशरथि, नारायण रेड्डी इत्यादि की रचनाये विशेष मोरप्रिय हुई है। बाल उपन्यान के लेखकों में सर्वश्री बलिवाड कांताराव, अन्ने उमामहेश्वर राव, दिगल्लि शेषगिरि राव प्रसिद्ध है। डॉ. लगा वेंकटपमा चौधरी का योगदान अविस्मरणीम है। तेलुगु में विज्ञान सम्बन्धी भी पुस्तकें बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा में रची गयी है। विज्ञान सम्बन्धी प्रायः हर विषय का स्पर्श करने हुए वेमराजु भानुभूति, वमन्तराव वेंकटराव, कोड वटिगंटि कुटुम्बराव ने सराहनीय कार्य किया है। एकांकी के क्षेत्र में भी तेलुगु भापा पीछे नहीं है। बच्चो के लिए रचित अनेक मौलिक एकाकी मफलतापूर्वक मचित हुए हैं। ललित कलाओं पर भी मुलभ शैली में बच्चों के वास्ते पुस्तके उपलब्ध करायी गयी हैं। इस समय आन्ध्र प्रदेश सरकार बच्चों के वास्ते अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष के सन्दर्भ में पचास लाख रुपये व्यय करके एक विश्वकोश सोलह जिल्दी मे प्रस्तुत करने की योजना बना चुकी है । विभिन्न रंगों में छपनेवाले इस कोश की पच्चीस हजार प्रतियां पाठशालाओ मे मुफ्त में वितरित की जायेगी, यह तेलुगु भाषा-भाषी बच्चों के लिए एक विशेष उपलब्धि ही कही जायेगी। पंजाबी: पंजावी में बाल साहित्य के लेखन और प्रकाशन बड़े ही विलम्ब के साथ हुआ। वैसे वालक नाम से तीस-चालीस वर्ष पूर्व ही निकली, जिसके माध्यम से कथा, कहानियाँ व गीत बच्चों के लिए उपलब्ध होने लगे। परन्तु ५ दशम में प्रकाशित दूर दुराडे देश इत्यादि बहुत ही लोकप्रिय हुई। पंगामी भाषा मे बाल लेखकों में सर्वश्री प्यारा सिंह सहराई, ओमप्रकाश, गुरदयाल सिंह, बलवंत सिंह आदि जाने-माने लेखक माने जाते है । माथा साहित्य के रोग मे ओमप्रकाश (सुने-सुनाओ), राजदुलारे (कर भला-सोहो भसा), गुरदयाल सिंह (टुक्क खोह लए कांबा) नामी लेसक माने जाते है । पंगायी में ज्ञान सम्बन्धी भी रचनाएँ बच्चों के लिए रची गयी है, जिनमें शमशेर सिह, भगत कौर, अवतार सिंह, दीपक की कृतियां बच्चों में विशेष प्रतित है। हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में बलवंत सिंह शीतत और प्यारा सिह दाता का योगदान प्रशंसनीय है । Tara ननुगु बाइपय : विविध विधाये धगताः बंगला वाल साहित्य के उत्थान में यहां के विशिष्ट कवि, कथाकार एवं मनीषियों ने गृहनीय योगदान दिया है । मोहित पोष का कविता संग्रह 'टापुर टुपुर' (रिमझिम), निर्मलेन्दु गोस्वामी सेलार गज्ये', मंजिल सेन की 'पडझा' इत्यादि कविता-पुस्तके न केवन लोकप्रिय हुई कि भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत भी हैं। बगला के यशस्वी कथाकार प्रेमेन्द्र मिश्र ने बच्चों के लिए आधे दर्जन के करीव उत्कृष्ट चारा कृतियाँ प्रस्तुत की, जिनमे कुछ पुस्तक पुरस्कृत भी है। इनकी वात पुस्तकों का कथानक, धनादा है जिम पात्र के नाम से प्राय. इनकी मारी पुस्तकें लोकप्रिय हुई है । 'धनादार गल्प' इनकी मर्वोत्तम कृति है। नारायण गोपाध्याय वाल माहित्यकारो के सिरमौर है। इनकी रचनाओ के दो विशेष पाय है-पला और टेनिदा । इनकी रचनाएँ हास्य रस के उत्कृष्ट नमूने कहे जा सकते हैं। अन्य बाल सको में श्रीमती लीला मजुमदार, सत्यजित राय, भिवरराम चरवर्ती, शरदिन्दु न्योपाध्याय, इन्दिरा देवी, रवीन्द्रनाथ टागोर, प्रशात चौधरी, योगेन्दनाथ सरकार, विभूतिभूपणा बन्यो- पाध्याय, आशापूर्णा देवी, युद्ध देव यमु, नृपेन्द्रकृष्ण चट्टोपाध्याय, ताराशंकर बन्योपाध्याय आदि विशिष्ट हस्ताक्षर है । संभवतः किमी भारतीय बाल साहित्य के क्षेत्र को ऐसे महान कलाकारों का योगदान उपलब्ध नहीं हुआ है। प्रेमेन्द्र के धनादा की भांति सत्यजितराय का 'प्रोफेसर शंकू' का पात्र अपनी विशेषता के लिए वेजोड़ है। बंगला में बच्चों के लिए जितनी और जैसी उत्तम पत्रिकाएँ छपती है पशायद और भाषाओं में नहीं । मराठी: मराठी का बाल साहित्य पर्याप्त समृद्ध है । उस भाषा में आयु वर्ग की दृष्टि से शिशु, वाल और किशो का वर्गीकरणात्मक साहित्य प्रस्तुत हुआ है । मराठी के अधिकांश बाल साहित्यकारों का ध्यान सदैव इस बात की ओर रहा है कि हम क्या लिख रहे है ? हम किसके लिए लिख रहे हैं ? यही कारण है कि इस भाषा में रचित बाल साहित्य में वैविध्य के साथ व्यापकता भी दृष्टिगोचर होती है। मराठी भाषा के प्रारम्भिक बाल साहित्यकारों में सर्वथी गोपीनाथ तलवलकर,. वा. रानडे, कवि मायादेव आदि के नाम सादर लिये जा भारतीय भापाओं में बाल माहित्य बाल गाहित्य के मृगन प्रकाशन के क्षेत्र में ही नहीं अपितु प्रोत्साहन की दृष्टि से भी महाराष्ट्र सरकार ने जो उत्माह दिखाया, वह प्रशंसनीय है । इस भाषा में बाल साहित्यकारो की सस्या इतनी अधिक है, मत्र का नामोल्लेख करना भी सम्भव नहीं है, परन्तु सर्वश्री ग. दि. माडगूनकर पराजपे, शं० र० देवले, मंगल वेढेकर, म० रा. भागवत मंगेश पाड गांजकर, दाणेकर, भैयासाहब ओकार, आदि ने बाल माहित्य की समृद्धि मे जो योगदान दिया है, वह सदा अविस्मरणीय है। मराठी की बाल पत्रिकाओ ने भी स्तर व उपादेयता की दृष्टि से बच्चो के दिलों में अपना अमिट स्थान बना लिया है। मराठी बाल साहित्य को महिलाओं का योगदान भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हुआ है । वाल-लेखक व लेखिकाओं ने अल्पायु मे ही वाल माहित्य का सृजन कर इस क्षेत्र में अनूठा मानदण्ड स्थापित किया है। ऐसे साहित्यकारों में माधुरी पारसनीस विशेष रूप से उल्लेखनीय है । आपने अपनी छ. वर्ष की आयु मे ही कविताएँ रचकर अपनी अपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया है । मराठी भाषा में बच्चों के लिए विविध विधाओ की पुस्तको एवं पत्रिकाओ के साथ उत्तम श्रेणी के विश्वकोशो का भी निर्माण हुआ है। गुजराती इस भाषा में भी प्रारम्भ मे बच्चों के वास्ते नीति, उपदेश व सदाचार पर पुस्तकें रची गई और विश्व गाथा-साहित्य-भंडार को रूपांतरित किया गया, पर स्वतन्त्रता की प्राप्ति के पश्चात् बाल साहित्य की ओर अधिकांश लेखकों का ध्यान आकृष्ट हुआ। इतनी संख्या मे बाल साहित्य की सर्जना मे प्रवृत्त सवका परिचय सम्भव नहीं है । पर अन्य विधाओ की अपेक्षा कहानी सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम रही। इस विधा की समृद्धि में हाथ बॅटाने वाले कलाकारों मे जयभिक्खु जीवराम जोशी, श्रीकांत त्रिवेदी, यशवंत मेहता, हरीश नायक, गिरीश मणात्रा, देवेन्द्र कुमार पण्डित वगैरह के नाम अग्रिम पंक्ति मे गिने जा सकते है । कविता के लेखन में मुरेश दलाल, जतीन आचार्य, बाल मुकुन्द दबे, रमणलाल सोनी, त्रिभुवन व्यास जहां प्रसिद्ध है वहां नाटको की रचना में यशवंत पण्ड्या, धराणी, इन्द्र वसावडा, हिम्मतलाल दबे अपने नाम को उजागर किये हुए है। अन्य विधाओं के साहित्यकारों मे शिशुभाई त्रिवेदी, सोमालाल शाह गणनीय हैं।

१४० तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं हिन्दी संख्या की दृष्टि में हिन्दी में बाल माहित्य प्रचुर मात्रा रचा गया है। स्थरीय बाल साहित्य का भी हिन्दी मे अभाव नहीं है किन्तु हिन्दी के विस्यात लेखकों ने इस विधा की समृद्धि में कोई विशेष अभिरुचि नही दिखाई, पर इस विधा को जिन लेखको ने अपनाया उनमे कवियो की संख्या अधिक है। ऐसे कलाकारो मे सर्वश्री मोहनलाल द्विवेदी, द्वारकाप्रसाद माहेश्वरी, निरंकार देव सेवक, राष्ट्रवन्धु, चन्द्रपाल सिंह यादव, रामावतार चेतन, चिरजीत, रामचन्द्र तिवारी, कपिल, धर्मपाल शास्त्री. रघुवीर शरण मित्र, रामेश्वर दयाल दुवे के नाम विशेपम्प से उल्लेखनीय है । वैसे हिन्दी के यशस्वी लेखक इलाचन्द्र जोशी, वृन्दावनलाल वर्मा प्रभृति ने ऐतिहामिक कथाएं प्रस्तुत करके हिन्दी बाल साहित्य के एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति में प्रशसनीय योगदान दिया है। हिन्दी में अनुवाद माहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है । प्रायः सभी प्रकाशकों तथा सरकारी व अर्ध सरकारी संस्थानो ने विविध प्रकार की रच- नाएँ प्रकाशित कर बाल साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया, परन्तु यहाँ उनका नामोल्लेख तक सम्भव नहीं है। लोक-कथाएँ, पौराणिक कथाएँ, नीति-कथाएँ, हास्य-व्यंग्य की रचनाएँ हजारो की संख्या मे रची गयी है । बाल-पाकेट बुक्स के नाम पर सैकडो पुस्तके बाजार मे आयी, परन्तु गुणात्म साहित्य के लेखन में अपना नाम रोशन करने वाले आज के लेखको में सर्वश्री विष्णु प्रभाकर, मनोहर वर्मा, डॉ० हरिकृष्ण देवसरे, व्यथित हृदय, विराज, शिवमूर्ति सिंह, योगराज थानी, मनहर चौहान, डॉ० मस्तराम कपूर, सुदर्शन, रमेश वर्मा, हिमाशु श्रीवास्तव, जयप्रकाश भारती, कन्हैलाल नन्दन, स्वदेश कुमार, उमाशंकर, विमला लूथरा, कमल शुक्ल, सरस्वती कुमार दीपक, वाल स्वरूप राही, राबिन शा पुष्प, गोविन्द सिंह, सत्यप्रकाश अग्रवाल, केशवदेव इत्यादि ने कहानी, उपन्यास एवं नाटकों के क्षेत्र में पर्याप्त यश अजित किया है । हिन्दी में बच्चों के लिए असंख्य पत्रिकाएँ निकली, वानर वाल सखा जैसी कुछ अच्छी पत्रिकाएँ काल कवलित हो गयी । पर आज जो पत्रिकाएँ विशेष रूप से बच्चों में लोकप्रिय हैं, वे हैं--बाल भारती, नन्दन, पराग, चन्दा मामा, चंपक, बालक । उर्दू उर्दू मे अन्य भाषाओ की तुलना में बाल साहित्य अल्प मात्रा में उपलब्ध है; किन्तु जो भी रचनाएँ आयो वे गुण की दृष्टि से उतम कही जा सकती है ।

भारतीय भांपाओं में बाल साहित्य १४१ मर्वप्रथम डॉ. जाकिर हुसैन साहब ने ही बच्चों के वास्ते प्रेरणादायक कहानियाँ लिखकर इस विधा का श्रीगणेश किया। उनकी प्राय सारी कहानी देश-भक्ति और राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है । 'अब्बूखाँ की बकरी और चौदह और कहानियाँ' इसका सुन्दर उदाहरण है। हुसैन साहब अंग्रेजी नाटकों के आधार पर बच्चो के लिए नाटक भी रचे जो वच्चो के द्वारा खेले भी गये । अन्य बाल साहित्यकारों में जनाब मुहम्मद शफीउद्दीन का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनका 'गाँव मुधार गीत' विशेष लोकप्रिय है और इसके अनेक संस्करण हाथोहाथ बिक गये हैं । उर्दू के ख्यातनामा लेखक किशनचन्दर/ने घच्चो के वास्तै चिडियो की 'अलिफ लैला' और 'उल्टा दरख्त' नाम से दो मुन्दर पुस्तक लिखी। उर्दू की अन्य मशहूर किताबों मे सालिब आविद हुसैन के नाटक, अवरार मुहसन की 'डाकू की गिरफ्तारी', सैयद वशीर हुसैन कृत 'दुनिया के बमने वालो' ज्यादा चाव से पढी जाने वाली हैं । मलयालम: मलयालम भापा मे प्रारम्भ से ही बाल साहित्य के उन्नयन की दिशा में अग्र-श्रेणी के कवियों तथा माहित्यकारो का योगदान रहा है। मलयालम के महाकवि आशान उल्लूर, वल्लतोल आदि ने इस विधा का मूत्रपात किया तो महाकवि जी० शंकर कुरूप जैसे महान कलाकारो ने इस विधा को सर्वगुणसम्पन्न बनाया। अन्य विशिष्ट साहित्यकारों में सर्वश्री सेतुनाय, गोपाल कृष्णन, टी० वी० गोण, परमेश्वरन, वेल्लायण अर्जुनन आदि तरुण पीढी के कवियों ने अपनी रचनाओ द्वारा परिपुष्ट बनाया। मलयालम बाल साहित्य को विविध विधाओ को ममुज्ज्वल बनानेवाले श्रेष्ठ रचयिताओं में मर्वथी मात्यु एम० कुलवेलु, मुकुमारन, रामकृष्ण नायर, ओ० पी० नम्बूदरीपादए, ए० पी० तानु, अनन्तु वगैरह का योगदान प्रशंसनीय है। केरल को साहित्यिक संस्थाओ तथा प्रकाशको ने भी बाल माहित्य के लेनन व प्रकाशन में विशेष प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्रदान किया। नेशनल बुक स्टाल, केरल माहित्य अकादमी के द्वारा भी महत्वपूर्ण बाल माहित्य प्रकाश मे आया है । अमंग्य बाल माहित्यकार अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के लिए भारत १४२ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं मरकार, प्रान्तीय गरकार, अकादमी तथा अन्य संस्थाओ के द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हुए हैं। उपर्युक्त विवेचन के पश्चात् हम इस निर्णय पर पहुंच जाते हैं कि भारतीय भाषाओं मे बाल साहित्य का मृजन पर्याप्त मात्रा में हो रहा है । खासकर अन्तर्राष्ट्रीय बाल वर्ष के मन्दर्भ में ममस्त भारतीय भाषाओ के लेखको ने वाल माहित्य के सृजन के प्रति अपने दायित्व का अनुभव किया है । अत हम यह आशा कर सकते है कि भारतीय बाल साहित्य का भविष्य अत्यन्त उज्ज्वल है।

१४ अनुवाद की समस्याएँ : तेलुगु से हिन्दी अनुवाद शब्द विभिन्न नामो से अभिहित' होता है। जैसे-भापातर, रूपांतर, उल्था, तर्जुमा, अनुकृति, अनुमरप इत्यादि । एक भाषा से दूमरी भाषा में मात्र शब्दो एवं वाक्यों का रूपांतर अनुवाद नहीं कहलाता। मूल लेखक की सूक्ष्म अनुभूतियो, संवेदनशीलताओं, भावो तथा विचारों के साथ तादात्म्य स्थापित कर उनके हृदयगत सौन्दर्य का सजीव चित्रण जीवन्त भाषा मे उतारना होता है। गहराई के साथ विचार करने पर हमे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि प्रत्येक मौलिक रचना अनुवाद होती है । क्योकि सर्जनात्मक माहित्य अनुभूतियों की तीव्रता के कारण निर्मित होता है, जबकि सृजन का रूप धारण करने के लिए अनुभूतियो को भाषा का कलेवर ओढ़ना पड़ता है । अनुवाद एक कला है: किमी भाषा मे रचित किसी दूसरी भापा में रूपान्तर करते समय मूल भाषा के सौन्दर्य की रक्षा करनी होती है । इस प्रयत्न में अनुवादक को मूल लेखक के परिवेश, दृष्टिकोण तथा उसके देश, काल और स्थिति का यथार्थ ज्ञान आवश्यक हो जाता है । जैसे चित्र लेखन प्रकृति की अनुकृति या प्रतिरूप होता है, वैसे ही अनुवाद मूल रचना की प्रतिकृति होता है। इसका तात्पर्य हुआ कि मूल रचना का समस्त सौन्दर्य, शोभा, वैभव, उद्वेग, रस, शैली, भाव-विलास तथा शब्द- विन्यास अनुवाद में भी दशित और प्रतिविम्बित हो । जिस प्रकार चित्रकार एक कलाकार होता है और चित्र-लेखन एक कला है, उसी प्रकार अनुवाद भी एक कला है जो मूल रचना की अनुकृति होता है। जैसे निसर्ग सहज ही मौन्दर्य का पुंजीभूत होता है और चित्रकार उसके रमणीय दृश्यों को अपनी कला के माध्यम से सही रूप में उतारने का प्रयास करता है । वह इस प्रयाम में अपनी प्रतिभा जितनी मात्रा मे प्रदर्शित कर पाता है उतनी ही मात्रा में १४४ तेलुगु वाङ्मय · विविध विधाएं उसकी कृति शोभा से युक्त होती है । कुछ सन्दर्भो मे मूल से भी कही ज्यादा उसकी अनुकृति रमणीय बन पडती है । इसी मे कला को मार्थकता निहित है । फोटोग्राफ तो मूल का प्रतिरूप या प्रतिबिंब होता है, पर चित्र अनुभूतिजन्य होता है । इसमें भापाओ तथा कल्पनाओ का सम्मिश्रण लक्षित होता है। इसी प्रकार अनुवाद किसी सर्जनात्मक कृति का फोटोग्राफ या प्रतिबिंब नहीं होता। वह कला से युक्त होता है। भाषा केवल कलेवर होता है, जबकि अनुभूतियाँ उस कला की आत्मा। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी कृति की भापारूपी बाह्य आवरण को कलात्मक ढग से प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है अपितु उसके आत्मगत सौन्दर्य को आकर्षक एवं मरस शैली में प्रतिबिंबित करना उतना ही आवश्यक है। गणतन्त्र भारत में हिन्दी साविधानिक समर्थन के साथ राजभापा, सम्पर्क भाषा तथा राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृति प्राप्त कर चुकी है। ऐमी स्थिति मे हिन्दी को सक्षम एव समृद्ध बनाने का दायित्व देश के ममस्त साहित्यकारो पर आ पड़ा है। यह तभी सम्भव है जवकि भारत की समस्त क्षेत्रीय भापाओ मे रचित वाङ्मय को अनुवाद के माध्यम मे हिन्दी मे उपलब्ध करा सके। वैमे तो सम्पूर्ण भारत का 'साहित्य' एक है और इस देश का 'मास्कृतिक स्वर' भी प्राय एक ही रहा है। प्रारम्भ में सस्कृत के माध्यम से हमारी सस्कृति एवं माहित्य मुखरित हुआ है। साथ ही भारत की प्राय समस्त क्षेत्रीय भाषाओ का सम्बन्ध संस्कृत के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में रहा है । आज हिन्दी को उसका स्थान ग्रहण करना है। किसी भाषा मे रचित कृति का दूसरी भाषा में रूपान्तर करने ममय अनुवादक को मूल भापा के मौन्दयं की रक्षा करनी होती है। इस प्रयत्न में रूपान्तरकार को मूल रोखक के दृष्टिकोण, परिवंश, देश-काल व स्थिति का यथार्थ ज्ञान आवश्यक हो जाता है । इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे चित्रकार एक कलाकार होता है. और चित्र बनाना एक कला है, उसी प्रकार अनुवाद भी एक कला है । क्योकि चित्राकन प्रकृति की अनुकृति या प्रतिरूप होता है । वैसे ही अनुवाद मूल रचना की प्रतिकृति होता है। निमर्ग के मौन्दर्य को चित्रकार अपनी प्रतिभा के बल पर जितनी मात्रा मे अपनी कृति में उतर पाता है, उतनी ही अधिक मात्रा में उनका चित्र सफल होता है। कुछ मन्दों के मूल मे कही ज्यादा उमकी अनुकृति वैभवपूर्ण हो जाती है, उमी अनुवाद की समस्याएँ : तेलुगु से हिन्दी १४५ में कला की सार्थकता निहित होती है । इसी प्रकार अनुवाद किसी सर्जनात्मक कृति, फोटोग्राफ या प्रतिबिंध नहीं होता, वह कला से युक्त होता है। अत. इसका यह अर्थ हुआ कि किसी कृति का भापास्पी बाह्य आवरण कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं होता अपितु उसके आगमगत सौन्दर्य को सही अर्थों में प्रतिबिंबित करना आवश्यक होता है। हिन्दी और तेलुगु दो विभिन्न परिवारो की भाषाएँ है; अत उनकी प्रकृति, शब्द-भण्डार, शैली, वाक्यरचना, महापरे, कहावते, छंद, अलकार इत्यादि की दष्टि से भिन्न है । हिन्दी व्यंजनात भाषा है जबकि तेलुगु म्वरात भाषा है। चल, पढ़, देख, गुन तेलुगु में नहुनु, चदुवु, नडु, यिनु होते हैं, अर्थात् प्रत्येक शब्द स्वर के माथ अन्त होता है । शब्द-भण्डार की दृष्टि में दोनों भाषाओं में तत्सम, तद्भव, देशज व विदेशी शब्द है । फिर भी प्रयोग की दृष्टि से इन भाषाओं में भिन्नता है । उदाहरण के लिए संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग नेलुगु मे ह्रस्व रूप में होता है जबकि हिन्दी में दीर्घ रूप में; जैसे- तेलुगु हिन्दी तेलुगु हिन्दी समें कृप कृपा ममतें करुण सीत सीता दयें जमुने नमुना अनुवाद में रूपान्तरकार को ये परिवर्तन करने पडेगे । तेलुगु भापा ने तत्सम शब्दों के माय अपने प्रत्यय जो दफर उन्हें अपनी भाषा के शब्द बनाये हैं; जैसे-स्नेह---स्नेहमु, चित्र-चित्रमु, वृक्ष-- वृक्षमु, ग्राम- प्राम, विष्णु-विष्णुवु, कृष्ण-~ कृष्णुडु, महन्त -- महन्तु, वायु-धातु, पवन-पवनमु, समीर-समीरमु । तेलुगु की प्रथमा विभक्ति के प्रत्यय है-डु, मु, बु, लु । इन प्रत्ययों को तत्सम शब्दों के साथ जोडकर तेलुगु ने उन शब्दो को अपना बनाये-राम-रामुह, धन-वरमु, मधु-मधुवु । 'लु' प्रत्यय विशेषत बहुवचन में प्रयुक्त होता है, जैसे- वनमुलु, मभलु, महलुलु, भवनमुलु आदि । इसी प्रकार नेलुगु वर्णमाला में देवनागरी वर्णमाला की अपेक्षा कुछ वर्षों की अधिकता है; अत: हिन्दी में उनका प्रयोग करना पड़े तो कुछ विशेष चिह्नीं को काम में लाना पडेगा । हिन्दी मे ऋ मात्र है जबकि तेलुगु मे इसका सभा मायें माया ममता करुणा दया फाo--१० तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएं दीर्घ रूप भी है । इसी प्रकार जहाँ हिन्दी में ए और ऐ है वहां तेलुगु में ए, ए, ऐ है । इसी भांति ओ, ओ, औ हैं। तेलुगु में अर्थ उपर्युक्त वर्ण वाले नामों या प्रदेशों के नामो को हिन्दी में लिखना पडे तो विशेष रूप से उन वर्गों के उच्चारण को ध्वनित करने के लिए विशेष चिह्नों मे अकित करना पड़ता है। इसी प्रकार कतिपय तत्सम शब्द तेलुगु में हिन्दी से भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होते है। जैसे- हिन्दी हिन्दी में अर्थ उपन्यास नावेल भापण प्रपंच धोखा विश्व, दुनिया आग्रह अनुरोध क्रोध सहवास संमर्ग मैत्री, दोस्ती संगति साथ समाचार बंधु भाई रिश्तेदार विधि कानून किस्मत विज्ञान साइंस ज्ञान, सम्पदा अभिमान अहंकार, गर्व प्रेम, आदर, अनुराग अरबी, फारसी तथा कतिपय हिन्दी के शब्द भी तेलुगु में भिन्न रूपो मे प्रयुक्त होते है; जैसे-नमाज़, जिन्स - जिनुसु, सरनाम-चिम्नामा, मरहम-- मलामु, बुर्ज-बुझजु, लिंग संबंधी कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है । हिन्दी मे प्रायः कुछ पर्याय शब्द पुल्लिग और स्त्रीलिंग दोनो स्त्री पु० स्त्री ग्रन्थ पवन, समीर पुस्तक टांग हवा, वायु चरण, पर वक्ष बालू उरु संसार, विश्व छाती नौका तस्वीर खिड़की जहाज चित्र वातायन झरोखा जांध दुनिया विघ्न वाधा नयन, नेत्र প্রায় अनुवाद की समस्याएं : तेलुगु से हिन्दी १४७ अप्राणिवाचक शब्दों के लिंग-निर्णय मे अन्य हिन्दीतर भाषा-भापियों की भांति तेलुगु से हिन्दी में अनुवाद करने वाले भी कभी-कभी अटक जाते है, जैसे-~-फल, फूल, अंकुर पुल्लिग है, पर लता, बेल स्त्रीलिंग। शरीर के अंगो में दाढ़ी, मूंछे, नाक, आँख स्त्रीलिंग हैं, पर हाथ, पैर, सिर, माथा, कान, मुंह पुल्लिग हैं । इस प्रकार प्रत्येक शब्द का लिंग स्मरण रसना कठिन होता है । इसी प्रकार तेलुगु से अनुवाद करते समय संज्ञा, विशेपण आदि शब्दो के लिंग-निर्णय में भी रुक जाना पड़ता है। कपट, धोखा, दगा पुल्लिग है पर प्रवंचना स्त्रीलिंग है । इस प्रकार के दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते है । पुरुष- बोधक मूंछे स्त्रीलिंग है, किन्तु स्तन पुल्लिग है । पलग पुल्लिंग पर चारपाई- खाट स्त्रीलिंग है। व्याकरण सम्बन्धी कुछ कठिनाइयां भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। प्रत्यय व कारक-चिह्नों के प्रयोग में भी लिंग रुकावटें खडी करता है-कर्म के अनुसार क्रिया रूप में परिवर्तन हो जाना हिन्दी व्याकरण की विलक्षणता है, जो द्रविण भाषाओं में नहीं देखी जाती है । नमूने के लिए- राम ने रोटी खायी-राम ने दस रोटियाँ खायी। सीता ने एक फल खाया-सीता ने दस फल खाये । सीता ने एक रोटी को खाया -सीता ने दस रोटियों को खाया। तेलुगु भाषा में कर्म के कारण क्रिया रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता । इसीलिए तेलुगु भापा अनुवादक को हिन्दी में अनुवाद करते समय कठिनाई होती है। वाक्य-रचना में भी हिन्दी और तेलुगु भाषाओं के बीच पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। जैसे-तेलुगु-गोपालुडु विडिक वेल्लुताननि चेप्पेनु (गोपाल ने स्कूल जाने की बात कही)। हिन्दी-गोपाल ने कहा कि वह स्कूल जायेगा । हिन्दी की वाक्य-रचना का गठन यहाँ पर अंग्रेजी के ढंग पर है; जैसे- Gopal said that be will go to school. तेलुगु--रमेश मंचिवाडनि अंता चेपुतुन्नाक (रमेश को सब अच्छा लड़का बताते है। हिन्दी-सव लोग कहते है कि रमेश अच्छा लड़का है। तेलुगु- वाडु वस्ताननि चेप्पेडु (वह आऊँगा कहकर बोला) हिन्दी-उसने कहा कि वह जायेगा ।

१४८ तेलुगु वाङ्मय : विविध विधाएँ इसी प्रकार मुहावरो व लोकोक्तियों का अनुवाद करते समय भी अनुवादक को वडी माथापच्ची करनी पड़ती है। वास्तव मे ये मुहावरे व लोकोक्तियाँ ही किमी भाषा के प्राण होते है । भाषा को सारी शोभा, सौन्दर्य व सम्पन्नता बहुत कुछ इन्ही पर निर्भर करती है । अनेक भाव, गुणों व कार्यों का परिचय इनके आधार पर सहज, सरल तथा मधुर शैली में दिया जाता है जो पाठक तथा श्रोता पर गहरा प्रभाव डालते है। किमी भाषा को श्रेष्ठता, गुणवत्ता एव अर्थवत्ता का निर्णय भी इन्ही के आधार पर किया जा सकता है। जो भाषा जितनी समर्थ, लचीली और भावबोधक होती है, उतनी ही मात्रा में उमको अभिव्यक्ति की पद्धति गहन, तीन, मक्षम तथा श्रेष्ठ होती है। अत अनुवाद मे यदि सही अथवोधक मुहावरों व कहावतो का प्रयोग न करे तो उसका भाव कृत्रिम, फीका, नीरस तथा कुछ-का-कुछ हो जाता है। भापा की सम्पदा व भाव वैभव के ये ही परिचायक है; अत: इनके अनुवाद मे बडी सतर्कता बरतनी पड़ती है। भारतीय संस्कृति समन्वयात्मक रही है, एक रही है; किन्तु प्रान्तीय विशेषताओ के कारण उसमें थोडी-बहुत भिन्नता दशित होती है। यही बात भाषा और साहित्य के सन्दर्भ मे भी सटीक बैठती है। अधिकाश मुहावरों व कहावतों के समानार्थी रूप हिन्दी व तेलुगु मे पाये जाते है, पर साथ ही अनेक ऐमे प्रसग है जिनमे ठेठ तेलुगु मुहावरो व लोकोक्तियो का प्रयोग पाया जाता है। ऐसे मन्दों में हिन्दी में समानार्थी मुहावरे नही मिलते; अत. या तो मूल भाव को व्याख्या से समझाना पडता है या पाद-टिप्पणी का सहारा लेना पडता है अथवा हिन्दी में पर्याय मुहावरे आदि गढने पड़ते है । कुछ मुहावरे ऐसे होते हैं जिनका थोड़े से हेर-फेर के साथ अनुवाद सम्भव ज्ञानोदय हुआ तेलुगु हिन्दी का अर्थ गुणपाठक (गुण-मबक) सबक सिखाना कनु विप्पु (आँख खुली) तोडु दोगलु (सार्थी चोर) चोर-चोर मौसेरे भाई एंदुरीत (प्रवाह के विपरीत तैरना) विपरीत परिस्थितियों का सामना करना कुछ ऐमे मुहावरे और कहावतें हैं जिनका अर्थ थोड़ा बदल जाता है । फिर भी लगभग उसी अर्थ को व्यंजित कर सकता है । किन्तु तेलुगु के प्रयोगों मे उनकी अपनी खासियत होती है; जैसे- भाव पडना - अनुवाद की समस्याएँ : तेलुगु से हिन्दी १४६ तेलुग हिन्दी कालिकि बुद्धि चेप्पुट (पर को अकल सिखाना) बेतहाशा दौडना (भाग खड़ा होना) पेरू गोप्प करू दिव्य (नाम का बड़ा गांव टीला) नाम बड़े दर्शन थोड़े इंटि पेरू कस्तूरि (वंश का नाम कस्तुरीवाले) (ऊँची दुकान फीका वारू इंटिलो गधि (पर घर में चमगादड़ों की पकवान) लाल कंपु बदबू) तल प्राणमु तोककु (सर का प्राण पूंछ में आना) भारी मुसीवत में वच्ट पर कुछ ऐसे प्रयोग भी होते है जिनका अनुवाद समय नही; जैसे- "इंटिकि रानी कथ चेपुता" अर्थात् “घर चले आओ, तुम्हारी कहानी सुना- ऊँगा" । मतलब-घर चलो, तब तुम्हें उचित दण्ड दूंगा। इसी प्रकार दुष्ट व धूर्त व्यक्ति को तेलुगु में 'देवांतकुडु' (देवता का अन्त करने वाला) कहा जाता है। कुछ प्रयोग ऐसे होते हैं जिनका अर्थ हिन्दी में विरोध ध्वनित करता है; जैसे-तेलुगु में-“पच्चि मोस गाडु" (कच्चा धोखेवाज) जवकि हिन्दी मे "पक्का धोखेबाज" कहा जाता है । इसमें तेलुगु का "कच्चा" विशेषण हिन्दी में विपरीत अर्थ मे "पक्का" हो गया है। तेलुगु मे घनिष्ठ मित्र को "प्राण मित्र" तथा बचपन के दोस्त को "बाल्य स्नेहितुडु" कहा जाता है । अनुवाद करने पर दूसरे के लिए "लंगोटिया यार" मूझे तो अनुवाद में बात नही आ लोकोक्तियों के प्रयोग में तो यह समस्या और भी जटिल हो जाती है । हम यहाँ पर तेलुगु की कुछ विशिष्ट लोकोक्तियो को प्रस्तुत कर रहे है । उनका भाव हिन्दी में लगभग उसी रूप में है- १. चल्लुकु वच्चि मुंयदाचुटेंदुलकु ? (छाछ लेने को आया) २. प्रोदुने वच्चिन वान प्रोदुपोयि बच्चिन चुटै पोयेदि लेदु । (सुबह की वरखा और रात के पाहुन जल्दी नही जाते!) ३. पाडि लेनि इल्लु पाताल लोकं । (विन गोरस घर नरक ममान) ४. रोहिणी कातें लो रोल्लु बद्दलदुतायि । (राहिणिया पास मे ओखली भी फट जाती है । ) १. ये उदाहरण भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'नाटककार वेंकटेश्वर राव' से लिये गये हैं; जिसका अनुवाद इन पंक्तियों के लेखक ने किया है पाती।

तेलुगु वाङ्मय . विविध विधाएं ५ लाभं लेनि सैटिट वरदनु पोडंट । (विना लाभ देये बनिया भरी गंगा में भी पवि नहीं देता) ६. कालु जारित तीसुको गलमु कानि नोरु जारिते तीसुको गलमा ? (पैर के फिमलने पर निकाल सकते हैं, पर जुवान के फिसलने पर वापस क्या ले सकते है ) समानार्थी बात का चूका आदमी और डाल का चूका बदर । ७. चंट बंगनिदि माने वगुना? (पौधा रहते न झुका, पेड होकर झकेगा?) ८. नडिमंत्रपु सिरि नराल मौद कुरुषु । (कच्ची दौलत रीढ़ का फोडा; अर्थात् बीच मे (जन्म-मृत्यु के बीच) (प्राप्त सपदा नसो पर उगे फोडे के समान है।) ६. मचि मनिपिकोक माट मचि गोडडुकोक देव । (अच्छे आदमी के लिए बात और ढोर के लिए लात) उपर्युक्त कठिनाइयों के बावजूद तेलुगु मे संस्कृत से सुन्दर अनुवाद प्रस्तुत तेलुगु से हिन्दी में पर्याप्त मात्रा में कहानी, उपन्यास, निबंध, जीवनियां, नाटक, इतिहास इत्यादि के रूपांतर विभिन्न प्रकाशनो के साथ साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, राष्ट्रभाषा परिषद् तथा अन्यान्य संस्थाओ के द्वारा प्रकाशित हुए है, जिनका अध्ययन करने पर हमें यही प्रतीत होता है कि तेलुगु से हिन्दी मे रूपांतर काफी सुगमता एवं सफलतापूर्वक संभव है। फिर भी भापायी भिन्नता के कारण सफल अनुवाद प्रस्तुत करने में कतिपय व्याव- हारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । इस संदर्भ में हम यहाँ पर तेलुगु के कतिपय लेखको के कथा-साहित्य एवं नाटको के रूपातर में उपस्थित होनेवाली समस्याओ की ओर ध्यान आकृष्ट कराना चाहेगे। अनुवाद के तहत भापा-शैली, वाक्य-रचना, शिल्प आदि की समुचित जानकारी के विना मौलिक रचना का अनुवाद संभव नहीं है। निबन्ध, इतिहास, समीक्षा इत्यादि का अनुवाद भापा-ज्ञान एवं पाडित्य के बल पर सफलतापूर्वक किया जा सकता है, लेकिन कविता, कथा-साहित्य और नाटक के संदर्भ में यह बात नहीं है। उदाहरण के लिए विश्वनाथ सत्यनारायण की शैली पंडिताऊ, क्लिष्ट, दुरुह तथा लम्बे समासों से युक्त है । उनकी भाषा की परिनिष्ठित तथा तत्सम शब्दो से पूर्ण होता है। उनके वाक्य इतने लम्बे अनुवाद की समस्याएँ : तेलुगु से हिन्दी १५१ होते हैं कि उनको उसी रूप में हिन्दी में उतारना कठिन ही नहीं, असंभव-सा लगता है । उन वाक्यों को तोड़कर उनके भीतर विखरे भावो को एक गोता- खोर की भांति एकत्रित करना होता है । श्री कुटुंबराव की भाषा व शैली सरल, सुवोध है । वाक्य इतने छोटे तथा सुगठित होते है कि उनमें एक भी शब्द व्यर्थ का नहीं होता । उसमे तेलुगुपन इतना अधिक है कि हिन्दी के जन-प्रचलित रूप की जानकारी के बिना अनुवाद असंभव है। उनकी कतिपय कहानियां सामाजिक संदर्भ को प्रस्तुत करने वाली हैं । उदाहरण के लिए "गंजिकैन्द्रम" रायल सीमा के अकाल का सच्चा चित्र प्रस्तुत करती है । यदि किसी प्रदेश में ऐसा भयंकर अकाल न पडा हो तो उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसी ही बातें अन्य कहानी तथा उपन्यासकारों, नाटककारों एवं कवियो की कृतियों के अनुवाद के विषय में भी कही जा सकती है। अन्तिम निष्कर्ष के रूप में हमें निम्न- लिखित तथ्यो पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। इस प्रसंग में पहला प्रश्न यह है कि आज उत्तम अनूदित साहित्य का अभाव क्यों है ? इम प्रसंग में इसका उत्तर यों दिया जा मकता है कि स्वतंत्र या मौलिक लेखन करने वाले लेखक सर्जनात्मक साहित्य के सृजन मे ज्यादा अभिरुचि दिखाते हैं, अनुवाद में नहीं । दूसरी बात यह है कि अनुवाद के लिए मौलिक लेखन की अपेक्षा कम पारिश्रमिक दिया जाता है । तीसरी बात है कि द्विभाषी साहित्यकारों की संख्या कम है। इसीलिए मूल से अनुवाद कराने की अपेक्षा अनुवाद से अनुवाद कराये जा रहे है। इसके कारण भी अच्छे अनुवाद हमारे मामने आ पा रहे हैं। चौथी बात यह है कि अनूदित ग्रन्यो की बिक्री कम होती है। पांचवीं वात यह है कि अनुवादों के लिए चयन करते समय किसी भाषा की उत्तम कृति का चुनाव भी सही ढंग से नहीं हो रहा है । उपर्युक्त विषमताओ के बावजूद इनके अपवाद भी हो सकते हैं । उदाहरण के लिए तेलुगु भाषा की विविध विधाओं के जनक श्री वीरेशलिंगम पंतुलु ने भर्वप्रथम अंग्रेजी के विख्यात लेखक श्री गोल्डस्मिथ द्वारा विरचित "विकार आफ देकफील्ड" उपन्याम का तेलुगु में "राजशेखर चरित्र" नाम मे स्वतंत्र अनुवाद किया। इस रूपांतर में अनुवादक ने संपूर्ण वातावरण का आन्ध्रीकरण किया, पात्रों व प्रदेशो के नाम बदल डाले; फलतः वह एक मौलिक उपन्यास के रूप मे तोकप्रिय हुआ । उम उपन्याम को पढ़कर एक अंगरेज महिला लेखिका मुग्ध हुई और उन्होंने इस नेलुगु उपन्यास का रूपांतर पुनः अंग्रेजी में "फाचूंन्म ह्वील" (भाग्य चक्र) नाम से प्रकाशित किया, जिसकी "लन्दन १५२ तेलुगु वाइ मय : विविध विधान टाइम्स" तथा मद्रास के सर्वाधिक लोकप्रिय अंग्रेजी दैनिक "हिन्दू" ने बर्ड प्रशंगा की और उसे एक अभूतपूर्व उपन्यास बताया। अंत में निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अनुवाद को रोचक, मरल तथा मौलिक तत्वो से सशक्त एवं सफल बनाने का प्रयास करना वाहिए, तब जाकर अनुवाद भी मौलिक ग्रन्थो की भांति पाठको द्वारा समादृत होंगे, उनकी विक्री बढ़ेगी तथा विश्व का संपूर्ण माहित्य समस्त भाषा- भापियो के लिए सरलतापूर्वक उपलब्ध हो सकेगा।

No text on this page.

No text on this page.

. उनकी कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियां हैं : 'जिदगी की राह' 'स्वप्न और सत्य', 'लकुमा', 'धरती मेरी मो', 'भग्न सीमाएं', 'वरिस्टर', प्रोफेसर', 'यह बस्ती', 'वे लोग', 'शवरी'. 'प्रकाश' और 'परछाई' आदि उपन्यास; 'तेलुगु की उत्कृष्ट कहानियां', 'तेलुगु की श्रेष्ठ कहानियां आदि । दक्षिण में मौलिक हिन्दी-लेखन की जो गौरवमयी परम्परा रही है, उसे श्री रेड्डी ने अपने उपन्यास. नाटक, निबंध आदि विधाओं से आगे बढ़ाया है। हिन्दी प्रचार सभा के लिए वह वरसोंचरस सक्रिय रहे हैं। उन्हें असाधारण साहित्य-सेवा के लिए भारत सरकार. उत्तर प्रदेश शासन, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् आंध्र प्रदेश अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। आपके मृजनात्मक साहित्य पर कई शोध हो रहे हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन उनको दीर्घकालीन सेवा के लिए "साहित्य- रत्न" व "साहित्यालंकार" की उपाधियों से भी उनको अलंकृत कर चुका है । कई केन्द्रीय मंत्रालयों की हिन्दी सलाहकार समितियों के आप सक्रिय मदस्य रहे हैं। तेलुगु और हिन्दी को एक-दूसरे के साहित्य से धनी करने, व्यापक हिन्दी लेखन और सेना के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान डॉक्टर रेड्डी को सौहार्द सम्मान से समादृत कर चुका है। उन्होंने अपनी साहित्य-यात्रा में मातृभाषा से अधिक राष्ट्रभाषा को स्थान दिया है। वे दक्षिण और उत्तर की सांस्कृतिक एकता के मिलन-विन्दु हैं । मम्प्रति भारतीय भाषा परिषद् (कलकत्ता) के निदेशक पद पर ममासीन हैं। मम्पर्क : 26 वादि बैनपुरम वेम्ट मम्बायम, मद्राम

Telugu Vanimay Vidya Vidya

Author
Balsouri Reddi
Title
Telugu Vanimay Vidya Vidya
File name
Telugu Vanimay Vidya Vidya
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Hindusthani Akadmi Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
168
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551055
Barcode
4990010031834.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
BvmuLabA2DH
Download PDF

Telugu Vanimay Vidya Vidya