Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Pyas Ke Pankh
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प्यास के पंख
एक समस्यामूमा सामाजिर उपन्यास
यावयेन सर्मा बन
रा ज पा ल ए पड सन्न, दिल्ली
91958 रामपाम एगमम
मूल्य
प्रथम संस्करण
प्रगपर
मुरम
दो रुपए पपास नए पैने
रिममर, १९९८
रायपास एग सम्म विम्मी
हिती मिटिंग प्रेस दिल्ली
मैं इतना ही कहूगा
प्यास के पंह एकमपुरपन्यास है। उपन्यास होमे
कारण इसमें उन भयों पर विस्तृत रूप से प्रकाप्त नहीं शता
मपा है बो एकबह उपन्यास के पुम होते हैं। इसमें मैने
बोपनकोई महत्वपुन समस्यामों पर प्रकास गना है। मान
हमारा जीवन पसंतोष में बन पा है । एक प्रातिका सामाग्य
हमारे चारों पोर म्याप्त है। समानको पातमाए मारपीय
-सी लगती है। पुरानी माम्यताए एट रही है मोर मां बन ही
है। संश्चम्ति कात की पीडामय सग्मि । तब मगवान् मुर की
पाभी का रोप-तृष्वाकामंतकरों हमारे समम समापान
केप में प्रस्तुत होता है। तीमत मबीन प्रयोप रपम्पास में
रोचकता की भीति करते हैं। पाठक इसका मिस एपि से
मूत्पादन करमे इसकी में प्रतोता कम्पा ।
यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र
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आदमी का मन
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अपराहकी प्राइस बपारमण मरवाकर इस तरह एक गईपी मानो सावन के नौन-सुप्र मसर में मुमपौनों की मावि निईन मागते हुए पेड पारमों के दुबोको मानिष्कम्प होकर देखना चाहती हो। कभी-कमी मापनों के घोठे-मोटे टुका मिलकर प्रवण मूर्प हो सकते थे तो संप्या वैसी भूषवा पाती थी। अपने सरियस कमरे में नमान्त चिन्ता-प्रसर मस्तिष्कमिए पकीन सरयूराम पपता से पहलकदमी कर पा था। उसकी ममिमा से ऐसा प्रतीत होता पा पैसे पामपने पम्तरास में तूफान विपाए इए है। उसने प्रामपम से अपने को स्विर व सपत रसना पाहा पर बह इसमें सर्पमा प्रसमर्प रहा । उसकी बहसकपमा बढ़ती गई। प्राव पनि पारम्पषित । प्रान्त-स्विर नोसे नम के भापते हए पारन के टुको अकस्मात् भीमकाय कानी पटामों में परिवर्तित हो गए । पटामों का पर्मन पस-पत भमिक मुबारित होहापा। चिन्ता की भारता से अभिभूत बह पटामों के बीच पीप्त पापिनी में दो गया। पूरों का वर्पप प्रारंभ हो गया था । एकाप र उसपर माकर पर बाती बी। विवली तापपीबी पन परब रहे थे और बाहर साफ पर दो चार बजे स्नान कर रहे थे। सरयू मे चनसों के साप अपने को मारमसात किया। ससे पपने पापको इमाएपारमसात करने में पसीम पानपा प्रमुभम मा । स्मृति के परमे प्रतीत की मोर गो। जब यह छोटा पा ठीक उसी प्रकार सन्न होकर पा में स्नान किया कखापा। उसकी मोहरम से टोका करती थी पर यह नदीपरा भी परवाह नहीं करता पा। वह अपनी मां का पता बेटापातपय का सहारा पौर प्राची कातारा बा मोसने वाले बनजहीम में मपर पड़े। पोसकर प्पासपंप प दूसरे बच्चे के मुंह परसा तमा पिया | इसरावना दुर्गम था इसलिए प्रति रोपकी शक्ति उसमें मही बी मा हरण रोदन करता पाएक पोर रवामा होपया। विनयी नाका सा कि समर भूमि में गिनता पानुको पराजित करने के पश्चात् विसयोल्मास में उन्मारित होकर हुकार करता है ठीक उमी मालिका नेगा। सरयू हठात् सोचने नया---मनुष्य अपनी पाश्मि प्रवृत्तियों को नहीं हो सकता । ये प्रवृत्तिया उसक पन्तरतम मन में उसके युद्ध प्रदेस में ग्बामामुमो के पाम की तहलिपी रहती। समय-समय पर उचित अवसर पाकर बार जापती तब मनुष्य पमुखद् हो जाता है। ये प्रवृत्तिा सेक्स युट, मूग और भय । मे में की प्रगति पौर इमरे में भयमित पारमरधा। मनुष्य सम्यता पप पर पास है ? वि. वि. ! मारमी इसी प्रवृतियोमा धारा है। तभी पराजित बच्चे ने गीसी मिट्टी का एक मोपड़ा उठाकर दिनयोग्मारित बने पर फेंक रिया । एसिवान् समिहीन को दबाए, इस पहनेही या पक्तिहीन भाग मया। सरजू ने एक बार महापर्वन करने मेवपकी प्रार निहाग । उसके मन में कटु स्मृतियां निमत माग की मारि ग्यातिमान होने मगी। रमे यार पाया-अपना सहर अपनी यम्ममूमि पा सका चपन मधुर भठरनिर्यो के साथ प्यतीत हा था। ममर कीबहारदीवारी मनिस्ट उसका कमा पर पाकन्या मी ऐसा कन्या केवम मिट्टी का सफर और मेहए रंग की मिट्टा में गायर मिनार से हमे जीवन-निर्वाह के लिए पर बना लिया पया था। उसका बाप पिस्सू उसे पूरा पर पहनाया। बार बीमारिय हो यह भूमिमा हा पाए। उसके मस्तिक में पह प्रस्न इम पर कामकर मरा उपस्थित हना पारगीवनक्षेप दिनों में उसे मार है किइसपर में उसके पिता को प्ररपेट पर पारम्पषित कर दिया था। रमरी माह की बयान हाने के माप-साथ उसके बाप मे गहर जिस पर हार मनी दी।भी भी उममे मर भापप महीं करती थी। फिर भी उस - पास पंछ आप उसे असीम स्नेह रखता पा । उस पर अपने प्राण न्यौछावर परसा पा । एक दिन उसका बाप शराब पीकर माया बा । विरापरी में पिसी की पारी नी। मोगी नाति में पिबाहोत्सव पर ररि से पखि योगी भी अपने सगे-सम्म 'चों को प्रसन्न करने के लिए जग मेकर मी प्रफीम घराब का प्रसन्म करता है। अगर मी जैसी पिपर देसी ताड़ी । उत्तेवक पौर बदबूदार! ऐसी दायत देना भरारी में सम्मानमूपक है, मान की बात है। इसे बेटी का बाप दुस्मी प्रची तरह जानता पा । इसलिए अपनी बिरादरी में अपनी मूस का बापम रखने के लिए उमने साहूकार से कर्म मेकर भी बिरादरी को तृष्ट छिपा ! उनसे बाहमाही मूटी। पिस्सू पुराना पियक्कापा। प्रिया-मय से भमे होमह प्रपमी मारमा की सबसेष्ठ (या को वगाता रहे लेकिन ?ही उसे किसी की मा मिनती त्योंही बह शराब में भा, स्नान करने का प्रयास करता था। वह तिबदी की भाति परम का पाठ पाम करता था । यह पीनेवामों के मध्य मराब की इस तरह सुति करवा पा विस तरह मन्दिर का परित प्रपने भागनों के समम प्रभु की करता है। तब यह मतवामे भैरव की भांति झूमता हुमा पपने पर माता पा । पराग में उसकी चेतना प्रामायो पाती थी। फिर भी उसके पवेतन मन में अपनी पत्नी का भय कापतीमो की तरह ममता रहता था। उन्मार के निस्व में अपने को खोकर भी गहास पुस्विता से मुफ्त मही हो पाता था। पर की रोहसीन पर बह एक बार सावधान होता । प्यार से पुकारता 'उसका यह स्वर सामाविकता से प्रषिक सम्बा होता था। सरमामकर उनसे मिपट माता पा। यह उसे पोर में उठाकर समागमा सैब या प्रनार देकर अपनी पत्नी की सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयास करता पा पर परनी उसकी बात को तुम्त भाप मेती दी । पनकी पात्रों की मापा पुरन्त समझ मेवी पी पीर सेनानी की मांधि भमकर तनकरण स्वर में पूषवी "पा परि मान यों है? यह प्राप्त होकर पगमें मगने मगता। पर-पर निहार कर पाते ते करता बात यह पात यह है सरयूडी ।"मह पूरागोन भो नही 'सायू प्याच पाना पाकिसह पोर में मरण पाटी " अपनी पाठ से सापार है। पिए बिना मानेपा नहीं चाहेबरा मरतुरे बरेवार विमा ही क्यों पिपा पाए । समुष बाप मही कमाई सपने हाथों पपमे बेट लिए पापाप विस्तू मुबक की तपमान वा और मूति की निस्वम । पर उसकी परवी पर मानने वाली थी? पावती पती पी पार पटावी यतीबी अनबतून पपरेप देवी एकी दी। पौर पन्त में वनिक रिपर और पाठ होकर पृथ्वी "प्राविर पाहता - विस्मू गाना कि उसकी पत्नी का मुस्ता कुप सपाना है उस पर मी सहकार की मांति लिप्मी पवाया। उसने पमी भी नही मनुकरण किया "तुन नियनी तू पुस्सा पर्प का करती है। गियरी की बात टहरी पीनी ही पाती। 'परे बह एम्सोम, उसने भोर-चारपती सनी पिलानी में उसे मना पीकरवाया "मम पाप से ममा पोको ऐऔर गापारको पिहाता पाहे पम!सिना सव मूल बात पहा है या उसने अपने घर में सराय की मती नमा रसीयारसे महा गाना मिल गया है। पादमसर नसके एम समोपमा यात्री। चारा पिस्सूप पात पौर परमीत। पूमीत होती तो पिठना प्रग्या होता । तुमे पीतमा बड़ा कठिन है। पप दूगड़ाई करती है। मास को ऐसे काटती है बम गोमती बार होगाठी है। सिराहा है? "नहीं देना होगा। “पमा पत्रमा मह पाए तो उसे यह मेवरे रेना।" मेष प्रपनी पत्नी कोपरमो पालापा। पलो मेरो मुपार पायो पागर, सहामा पर यह रास्ते में सासरवाया है। पपिपरीश है तो पैसा मुफा में नुटा प्रामाविकोई 47 मसे तो पम्मी मूं। बबाह तेग सर में दूर से ही महती पर ना नहीं पाता है जो मरीपाको पैसा भूम में फेंक प्राठे हो। पिस्सू मपनी पत्नी का फरकारना पापाना पड़ीदेर तक सुनता पापा। मह बीमती-बोलती बरपाती तब यह विस्तरे से ही कहा "विषमी मूग मूग पम्प सुनते ही तिसमी का पारा फिर सात प्रासमान पर । स्वर में गरी पुणा मरकर कहती 'यह पड़ा नमक-रोटी मा पार पामे गारगाह की यह हम कही और पनाया कर, में अपने सर को बोगने पानी। बिस्म पाप से नहीं वर्षों से अपनी पत्नी के इस समाव से परिचित पाकि इसी प्रकार उपस मटमठ ही स्कर पनी माया दरखी है. सरयू वो केवम बहानामार है निमित्त है।मामानिमीउसके समक्ष पराजिव होना नहीं चाहती नामा महीं पाती। मह पर पली माती थी वो पिरमू पुपके से उम्कर रसोई पमा पाता। एक कोने मास की पप्पर रातकर बनाई रसोई, पुएं से कामी स्टममी मुटमार । यह प्राता और एक कटोरे में रखा कर बाहर उपमी पत्नी को दुपाए रेफर सो बाता। तब मह प्रेममिलन हो पाता पा। नसके नेत्र प्रमुप्तारित होवावे थे। वह रपमे पाप कह उठता पा 'रबान तीर-सी मसे ही हो पर य मोम-सा है। एमपनी पत्नी पर अपने पापको सात मोहों को विसर्जन करता तुमा निता की रमें सो पाता वा । सुख पौर संदीप की परिसीम भावना लिए। बह सो गया। मयुर स्वों के स्पषिम पर उसके मवेतन मस्तिप्फ में पाने गये। तभी सरयू की मां पाई। उसे सोया इमा रेफर मिगा उठी। अपने पषित से पुष पैसे सफर पूर्ववत् स्वर में धोमी 'पो रेचकर सो गया है। पर यह भ करण कायम है। पौर सरर कहा है ? 'सरयूपार पमी तक साहबगारे पधारे हामही है। पौरपसको देखोन रिताकोटी पर टीम करसोया है। गन्ना कहा क्यों नहीं पाया है रात बीतती भा ही है। नफ यहचानापन टेकी पिता पोरनबर की फि! सेठ पनीराम ने पास पैसा देने कोणापा
प्पासपर
१२
मरिमें ममी पाकर पैसा नहीं जाती दो सेठ उस मरवार को देवासा प्रतीय
पारमी है? ऐर की तरह मुर्ग कर कहता है-पैसा मैं बम मंगलवार को ही
बस मंगत तो मगम नही तो ममगत ! मबम मया पीर रोगकुमा
सोरफर पाप मुम्मने वालों का प्रमंगत माया ।" यह विचारों तूफान में गती
रही। उसके उर्बर मस्तिष्क में उबा-बाया पंपसी की मांति प्रयासपिक पौर
प्रमूमय पाउँ उठती रहती । वह उन्हें प्रमट करती रहती। यही नसरा सभाष
पारिमूवम-पिर पुण्डन ।
मूसमापार गर्पा पम गई की।
मेपों का मरना शिवलियों कापना पब प्राय माद हो गया था। साफ
पूम्यता में प्राईत बी। प्रतीत की मनु स्मृतिमा विषारोत्तेबह सरयू को तनिक
सोलनारेही पी। अब विपकी रेष्टकर पर्मम पर माकर यह पर्पयायित हो
गया था। उसने अपना बसम्पबना मिया।
प्रकार के साथ उसके अन्दर में पावन नपोन्मेप बाया। पतमात के महन
पावरमों में मुप्त ममत्त पंगाई मे उम। उसके म्हाम मुख पर पारसस्य पी
मधुरिम रेवाएं और गई।
रसही मा! ममता की सायात प्रतिमा । पीर, वीर मीर। दीवेसर
पानी पौरबावासिया
पर या भाठमीमा में पड़ता पालपाठ सालों में कोई विप परिव
न नहीं हुमा हा पहर का पना मर पया मा। युमार महाराजा बन पए पे।
बस इतना ही परिवर्तन । इतना ही हेरफेर ।
रसबाप कीबही मात । उसकी मौकापही समाव । यहीबटपट बही
पापुर मार नहीपाति-मममाता।
पनिकीता।काप्तिमा का सामाग्य सिहकती ममोका बस्त।
यसरीरीटीई
राम राम राम
प्यासपंर राम मममम पानकी दोनो हनुमान की सीताराम' सीताराम' 5555s प्रत्पेक माका अपना-अपना मूत्र बोम-योमार गिरोमी दम के सरकों को निष्कासित करक बय-मी का सहरा मपने पर मेमे का भरसक यन कर रहा था। सरयू कि बोगी पा प्रत उसने अपना मूत्र सबस भिन्न बना लिया था। विरोधी वन के क्षेत्र में घुसने के माप ही उस होठों से फूट पड़ता पा-कपड़ा पोळ, पग पोऊ dasss सोम उसके इस कपन पर ईसवे पामि पीटठे पे । हा-हा-हा ही-ही-ही। मेकिन सरयू अपने गेम में तन्मय रहता पा । उसका प्पान अर्जुन की मांति एकाप होकर सको परारित करने में मगा रहवा वा । यह निश्चित रूप से विममी होता पा । उसकदम मामे उसे सवा पाबासी दिया करते थे। प्रमीडेन समाप्त मी महीमा पा । भी मासूराम के मड़के प्रयाम न माों के बीच से छिपहर सरयू की पोटो जींचनी । सरयू स्वनी भीड़ में यह नहीं समझ सका कि यह हरमय किसने की है। पर उसने सभी के मुओं पर कुटिम हास्स रेखा को उसके लिए प्रमाप्त पा। मह हापमान होकर पड़ा हो गया। प्रयाम ने पुन एप्टवा की। सरयू ने उसम्म हप पा लिया । बस फिर क्या था ? मासी-गमार मुखम-मृत्वा मार-पीट ! प्रपाम तपमा वा । मोहल्ले के प्रसिद्ध परित बानूराम का बेटा पा। रक्त-यक्ति रस्म-गौरप बह सरयू पर पिल पड़ा । बम बम ! नाके उन दोनों को प्रेरकर बरे हो गए । कभी प्रयास को उकसाते पोर कमी परको माहवाही रेते। परिणाम यह निकला-सरयू पिट मया । वह अपने यस्म पाकर पाने को नखत हुमा ही पाकिसक कानों में किसी नारी की भयानक पीर पड़ी। उसके काम पए 1 'मौसी' उसके मुंह से हठात् निकमा और यह अपनी पीड़ा भूतकर हतपति से अपनी मौसीके पर की मोर मामा ।
प्पास
१४
उसके पर से घोड़ी ही दूर पर उसकी मौसीका मकान पानी मिट्टीका
पर उसके मकान से परामदायोसिसकी मौसीका ससुर मपनी विरहरीका
सरपंच वा प्रतिप्य सम्पम्न पूर।
उसका बा भी प्रसम पो परपलतापा। उसने पर बाप रहे। सेठ
पिम्मनमासपर से तीन रुपए सेठ रामराम रापा कापर-पांच रुपये परित
पुम्नीमान पीका पर—तीन सए, हंसा पिषमा का पर-एक स्पमा पारि
मादि।
विवाह-मारी पर प्रलय-प्रमय माग। मृत्यु भोग पर एक मामी। सम्मान
बरेन, म्पबहार नौकर-मामिक-मा।
बह अपने माहों को सेठी करता था और बाहर उसे 'फापू' या पाना'
बह 'माप' से सम्बोधित करके सम्मान देता बारे सूत्रके से गतीत
का स्मरण रिमा देते। फिर भी यह परम्पराका पोपक पाप्राचीनताप्रति
मोह मोर पादर।
मह पूर है, पा। मीच पतित पौर मुक्ताम | ऐसो उसके मन में मारमापी
सेगा उसका धर्म मोष नोक-परमोगका पस्पाप!
सबाप का बेटामा । सरयू का मौसा। पुरानी बार, पाममोर।
मकीन सर मेरेमी से करपट पमी। यह उत्तरा हो सठा । पा
पत्ताम पर उसके मानस को मयने नमी।
मानत-सामरकामपन।
अमृत पौर सूत नही नही दुस-पीड़ा प्यपा। संताप मर्मान्तक पाबाट
सका तमाम परीर स्थिर हो पया।
हो सकी मौसी | भारी बारिश की प्रतिमा। विविध महाविचित्र! सुमन
प्रमम पौर प्रयोगम्म!
उसकी मौती सरसा मौर तू ! प्रीत के प्रतीक । पमुकरणीय !
एक दिन बितासको तीर मावना पोपन-परिषिको मापार चम दोनों
मम्मतही होगई। बप्रापम में प्यार करमे सये। नाप नमी फिर रसा
ठीक ही तो है। प्यार की मपन पौत की तपस्या शिरमय मौर निवासासी
-
प्यातदेह सरपा ने संसार समस्त बम्पमों को तोड़गता। उसका ममी-प्रमी विवाह हमापा। हाथ की महवी का रंग भी फीका नाही पाना । मातावरण में गुपित पैमनियों क मम पुमरों का मभित भी बद नहीं हुमा पा पार उसने अपने पति को त्याग दिया। एक दिन लोगों में बेचा--सरमा विना मिराबरी का निर्णय सुने बतू के पर में पसी मई है। विरारी को पनौती देना सहन महींपा। बिरादरी की प्रससक्ति उसके कानून और उसकी मर्यादाएं। सरया के पति ने पाकर पंचों के परमाणों पर दुहाई लगाई। पिस्सू सरपंच पा । बिरादरी में उसका बड़ा बपना था। वो से उसके म्याय की गुभि पहर का मोबी समाज सुनता मापा पा । दूप का पूर्व पार पानी मा पानी यही उसका म्याम पा। यही उसके निर्भय का प्रतिफल होता मा । 'नीर मीर विवेक यह उति उसके न्याय के लिए कही जा सकती थी। सरपा का पति बेठू समाव को देहनीर पर प्रामा। उसने पों के कानों के परों को हिमाने की चेष्टा की। यह पिस्सू के पास पाया। निस्सू ने उसकी मात मुनी । उसने गेट को पाश्वासन दिया "तुम म्पाम मिलेगा। पेट मसतोप के स्वर में भरकर बोना को पिस्म, प्रवरा देवकर पाब फिसन नपाए। यह परका न्याय है समझा । ठेरी सगी सासी है, कहीं मोड़ कीट-पट में न्याय का गला घोंट देना।" पंचमपनी पो पर बैठकर भूठ का सहारा नहीं मेता है।" पिस्मू ने पम्म से कहा "एक बात में दो अपने नाते कहना चाईपा। मषित धाति से उस पर विचार करतो?" “क्या?" "तू मई का बच्चा है यदि देशपो तर हामों में नहीं है वो तू भी दूसरी से नातामों महीं कर मेता? अपने समान में यह सब पायम है। पेट को यह बात पिफर नहीं मगी। यह तुरन्त गुस्से में भर उठा तूने कर पिया म्पाप ? प्ररे पिस्मू ! में पहले ही पानता पा फितू फिसमेमा, यह सगी
प्यास
सामी का माममा है।"
फिर प्रर्प का पर्व निकामने मगा। मैने तुझे एक मित्र के मासे यह बात
कहीनी के नामहीं।
पडू निराय होकर हा से चमता बना।
मकीम सरयू का हरप मारी हो गया।
जौभाने कमरे में प्रवेश पर उसके प्रतीतके स्वप्न को मय कर दिया।
बीमा पारश्यकता से अधिक मौन रहनी दी। वही पीपी पीर सादी ।
बिना। परीष।
पिन भर का कठोर भम बराबर पचास रुपमा भारोपून रोटी।
'
पाधी चाय।" उसने कमरे में घुसते ही कहा।
सरजूट गया। उसके पहरे पर गम्भीरता पूर्ववत् पी।
पानी कहाँ है?"
ही पर। बीमा ने उत्तर दिया ।
"महारोग की एही ठीक नहीं है। कभी उसके सिर में दर्द कभीएसके पैट
में पीड़ा पार कमी उसकी कूकी की पोती कोवहिन दामाद पापाता है। यह
*सी समस्या है? यो पीना तुम मे वाफ-साफ रह देना कि काम पाम के
प से होना चाहिए, नहीं तो नही दो सरातिए ट्री में मो।
भीमा कुपगम निरपत-सी सड़ीपी। उसने पाप का प्पामा सरजूको पमा
शिमा।
बागरा एकटमारमा पुन हा भमेने को कहा तममे यह मुना
?"
*श्री पर मै पिन्नी को पर मब नहीं रही।"
पो?"
"पाय यह मानिए पही माई कि मैन म यह भाषामन पिया था कि
मुमारामाम में कर मगी।"
"तुम प्रान भापको लनी पीना पर्यो विया करती हो । म हसती हो न
बीमती होपोरम पर से बाहर निकमती हो। इस प्रकार में प्रारम मन करता
ग्यास पंच स्वयं को मताना कहाँ तक उचित है?" 'मैं अपने पापको सजाकर दूसरों को मुख पेन में ही प्रानन पाती है। इसे ही जीवन का परम मध्य एवं परम मुड मामती हूं। स्वयं की समाप्ति दूसरों का पोपण ।" "पों? बीमा नेमत नयम करक संयत स्वर में कहा 'बकीम सा क्योंपाकिम लिए' बाराबीपन के गहन मर्म को प्रमट कराना चाहते है।मैं एमप से मापके स्वभाव उसकी क्रिया प्रक्रिया प्रापळे कपन की प्रतिक्रिया समी तो देख रही ह। में भापके वजाम के बार में नहीं पा सकती। मौन निधान्त मौन ही मापके समम पिचमी हो सकता है।" सरा सपा की भांति चुप होने से पासे बाना 'तुम अपने पापको दुख पहुंचाकर पौरों को भी तो पीडा पहुचाती हो । पौर मह चुप हो गया। पाय समाप्त हो गई बी। पोपा उठती हुई गोली "वाना? 'प्राय में बाना मही बाउंगा।" पीपा चली गई। सरयू मेवना से अभिभूत हो योमा 'निष्कर !" मम मुह से निकलन के साथ ही सरन् सावधान हो पया। उसकी समग्न पतना इसी एक राम निप्पर पर केनित हो गई। उस महमूस हा से उसमे यह पम उन्ना खि करके एक पपराप कर दिया हो पाप कर दिया हो। पौधा उसकसने की प्राया एक सापारण नारी ठीक-ठीक। उसे पया अधिकार है-नस प्रकार गहरी प्रारमीयता से उसके बारे में सोचने का? मह निप्पुरमा कामस उस क्या यह तो नमके मातृहीम यम्मी पापा है किरापे की मा। योगी के बरसे पपनी ममता रेषतो है अपना स्नेह पेती है अपना नारीलका परम परती है। 'पोषा-दीगा-श्रीषायह पम्प उसके मानम-मोक विधियन्त में पनित प्रतिप्यनित हो उठा। मारेपनिट माकुमता के मारे वा पिपलित हो गया। बहीम सरर पुन चिड़ी पास पाकरगाहो मपा।
प्पा म रातोपका पासमान निर्मम हो गया था। ममपपा पुल पर कोई कोई बाम का दृमा उप पापी मनुष्य की मार बिना रहा था वो अपने जीवन के महापापों को एकान्त में पोने के लिए पाबन-गना में स्नान हेतु मामा हो । पबन का इसा मौका भी माना पापा। पाहीन सरयू ने एक पौर्य निश्वास लिया। अपने प्रापसे कह नम में विना असहाय मारपीन हूँ। मेरा कोई नही पड़ी एकाम्ठ यही पीड़ा और यह माणिक पेपर--कामत । मुल का पत्र और सच का भूर! एफ !पली निरिणा "हो मेरी गिरिजा पपनी स्मृति कर सप-सभा भिए मुझे दुखी बनाकर रमाई। 'यह मणः उसका बटा और मेरा मिलाना । पर 'मन 'मन का मन्ताप आधी प्रवृप्ति मौर वासना ! मोह में विना निस्सहाय। बनेको मोव में लेकर मन मा सस्ता पौरन अपनी बकामत में अपना पस्तित्व रिलीन रस एकान्त को भयंकरता को मन से निकाम साहू। नर-नारी! नारी पुरुप की सम्पूर्णता! मैसपिङ्ग मानन बीबनोस्मास। बीम पर मस्तिष्क में गोमा की प्रावि फिर चामे मपी। 1"पीषाने पुन' मारहा। जी। कहकर सरयू पावसान हो पया तुम मुझे नाम से मही पुकार सपली ? यही कहकर पपने एप में हीन भावना पयों उत्पनर ही हो।" '"पानि पम्पयन भी मन्पा नही । मनुष्य अपनी सारी सामागिता का परित्याग करके पिया के पावर्तन में भूतने समता है। यह ममोसानिक रपि से ररित है या मनुषित ! यह इस सिसास के पनाम है मा नहीं। यह गापा मेरे रेप के प्रतिपून? पाकर यह पपने का एक पाय उप का पिनाने ममता रिसे में मुविधापी माणिक रहती है। यह परिमारी यानिक साधारण यात्रिक से मपित वरमा होगा। क्योकिार सम हर हरपल हर मुसान हराम काताभिवात्पर्य निवासमा उसकी पत्नी रमः मित्र से रिपीष्टि करके महराई क्यों प्रबका रसकी अनुपस्पिति में उमरे रमको पाय पो पिसाई? नाक्यावसानिविरमपम ! सन्देह कामको पौर मन में पटना मनस्य और राम्बम्ब- पिर!" "बाबूजी ।
प्यात । पीना दुप हो गई। बकीत सरपू उसकी मोर नादान बालक की मांति कर हर देखने ममा। पब मीमा उसकी मोिं से प्रोमम हो गई जब यह अपने पाप पर भरना पड़ा में म्पर्ष में क्यों उसे समझाने का प्रयास करता है यह विही है मानती तो नहीं। उसने एक पम के लिए अपने कमरे में प्रवेश किया। से परे में जाति मिली। फिर मह प्रकाय करफे मपमी पत्नी चित्रसमस बड़ा हो गया, "मिरिगा तू मी बड़ी ही पौर पस पी। अपने हठ के प्रागे तू किसी की भी नहीं मानती थी । उस पर बीवन-मरण का प्रस्न सा कर देती थी। अपर्प और समर्पमा इच्छा की पूर्ति के बार प्यार का दाम मिरिया गिरिमा में कितना निस्सहाय है? पकीम सरयूक्षम भर के लिए हुमसे द्रवित हो गया । प्रतीत ससकी पांचों के समप पुन माप उठा । उसकी मौसी को उसका मौसा पीट रहा बा । मह पति के मेटे से मना कर बहतासा प्रपनी मौसी के घर में मुसा था । उसका मौसा तू पाता उसकी मौसी परत बरसा रहा था । मौसी पत्थर की प्रतिमा बनी पड़ी थी। रात के साथ उसके मुह से सरकार निकमती मी। बीस पैसे नस मारी की गई थी। बहसमा हा-एक चिमूर एक की मोति। उसकी मौसी प्रोमू बहाती- महाती बम से गिर गई और तू नसे में पुर हमाघ स्वर में कह रहा पा- "मैं कहता हूं कि तेरा मह मुहाग मला है तेरी यह भूपिया मही है मौरतपुर गरपात है। मैं पूपता ई किमान का भूमका कहाँ गया?" समीप ही सुरगा का पपाहिब बमा गुमसुम-सा मंठा पा । बाप मां को क्यों पौट हा मह उसकी प्रयोग युधि नहीं समझ पा रही थी ? सरया ने पीमे कम पामैने पूष बातो को ये रिपा उसने बनके लिए दूम यह कर दिया था।" "भूठीभी की परतू ने ब्सिीको सिला ।" सरमा चिजार पदो। मपटकर पठडी, "बररार, परि मेरे पर पोप मपाया ! बस में पौरत का मर्म निभा रही है। तुमसे मावा तोड़ना नहीं पाहतोह इसका मतसब यह महीं फितू मेप औरत को उपासता हे। अपचाप नीna ।
प्पासह घोबास। पीस सरको मन्त्री तरह याद हो उठा-उसका मौसा सो गया था उसकी मौसी गायीबी 'मैने तेरे लिए विरारी से ममता मोम सिमा काना पड़ा पौड़ा, धर्म पनी पीर तू तू मुझे बानबर को तह पीटता पिपकार है तुमे 1" यह सिसक पड़ी। उसने अपने पपादित बनेको सीने से मगा सिया-'पदि पब मै चुमे शोरी तो मोग मुझे प्रेम की मारी नहीं मिलान करेंगे। मुम पर पूर्वेमे दियह तो हमेसा पोगने परमवी पत। बस यही मुझे रोके हुए है। फिर मैंने तुझ प्रेम किया है। प्रेम एप से परमवा पो और इस प्रकार हर दिन बीत जाता था। (कीन सरन की पति सन की मोर नगी । पब उसकी मौषी ने शिोह की परिपिकालाप दिया था। उसने बैत के लिए अपने पति को नापस लिया, एस पर कामू नाचा नवाए, पीवे जी मिपमा का कामा कपडा पोना तीन सौ रुपए प्रपनी जेब स स दिए पौर तू की बनी। स्वमी मापरायों मेगाने उसे पपना प्रेमो पिमा । प्रीत बीत गई थी। सी -10 मकीन सपू को अपनी मौसी का एक बाप बार-बार पार हो उठता पा। उसने एकरिन पुत से पहावाकिनारी नारी है और जोमरमारित्तो संतीप न दे सके वह मर मर नही । उमे एक नारी के बोबन पर प्रतिकार करने का कोई - पौरतू काम्सान मुरगा को पार कहा गया। उसमें उसकी गातिक समी सगुण पर करने नपे जो पाप सुन की भांति इन पिपी मातियों में सपे हुए है। पीरे-धीरे प्रेम पम हाता यया। नमा तापमा। इस बीर मुरगा मे एक पाहिम रणको पम दिया। प्राविमेने उसको पक्तिहीन बमा रिमा 11 साप पट पगबन में मार रिया । अपरिसीम म्ममा पौर ममम प्रशारमाएं हार भी मुग्णानको मुन-माप रिया परती पी। जैतूने रसकी सारी पुगी पपे में उगारी पापमहामोसी । पासिन पारवे वाब से पकने में प्राबादी कीसिनुरगामपा हो गया है। यह माने पति को नाम मारमाप की प्याम पर २२ पोर क्यों भेगही है? यह उसे रोकती क्यों नहीं ? पर सुरगा सात पी। मह पौर उसका अपाहिन बना। परामय पौर मटूट गम्भन ! यह हार गई उसकी भारी मंबर में फसी परमी झी तए महरों के सम्मम पर ही रह गई। सरयू का पम्तर पनी मौसी की अपनीय या देव-देवार पीरित होता पा। कभी-कभी उसे अपने भाप पर भी मुस्सा माता पा । क्यों उसके बाप यह निर्णय रिया मा “सरसा को यदि हम बैतू के घर में नहीं गलेंगे वो पादुक मुपकर कुकर्म करेमी पमह-जगह मुह मारखी फिरेपी यह बिरादरी के लिए बरे धर्म की बात होगी इसलिए सरगा हाना देकर पेपर पा सकती है। यही याय यही इन्साफ है। बाहीस सरयू ने साति से सास लिया जैसे उसने एक कहामी समाप्त कर मी रात का गहरा पावरक संमृति पर पा गया। तारों को रीत विऐप मुखरित हो गई। सूपता स्व सांय-सांय कर पी पी। ए पूण्यता उसके एकान्त मन में सम्मय हो गई। दूर, बहुत दूर पारम्पक भूमि पोर पार्यस्प भूमि का परमात एक होकर भयानक तिमिर का सर्वन कर रहा पा। पहपापकार और पाएकात! याप्रति और मर्मान्तरमा मिग्जिा पिरिगा! बह विचनिन हो उसउसका अंग-अंग प्रम्प पीग से पिम्मा ठा। उसने अपने दोनों हामों मपमा घिर पसलिया । वह मौन कन्दन कर रठा- "पिरिया में क्या कर? तेरे बिना भैरा यह बोबन मम एकजनता प्रमार बह परिता !" रेपो रोने की पनि ने सरयू का पाम मग कर दिया। यह पीपत्रा से भीचे तर प्रामा 1 बीना गप्पू को दवा पिला रही थी। दमा उपपदो पो। इसलिए पप्पू कोपरा गाकर दवा पिनानी पायी पौ। सरयूको देखते ही बीमा सम्र्पम मोनी 'ममता है कि प्रापसे पेट ने पथिक रोस्ती नहीं निमाई “महसव" "भूत मग गई होगी ?
२२ पाप्त पर नही मैं बप्पू को देखने मिए पमा मामाईहरोक्यों रहा है?" या मौमा मौर गए सनिष्ट पा गया था। "मा काम मेरा। मुझे प्राप उनलाह ही इसी बातमी देते है कि गमू रोए नहीं हंसे । पासा प्रसन्न रहे । से पपनी मां की यापन पाए।" उसने पवना सबकुषमटपट बोल दिया। फिर भी उसे पपमी मा की माप पाती है। मा को भूल जाना उसके लिए माताम मोही? माबी! मां चाहे अपने बच्चे को कितना ही नमो न रे पर बेटे के मन में उसके प्रति ममाप कम नहीं हो सकता । पप कि उस पर में उसने की कोईरावी-फूफी न हो।" "तुम ठीक करती हो। मेरे पम की एक पटना मुझे पार हो पाती है। मेरे पड़ोसी परिव बानूराम के नारे से एक बार मैग मगमा हो पा पार रसमे मुझे पीटामा । फिर भी ससक पाप नष्ट कार मेर पर पर पा पा । हाकि बामूराम की मीमी बहुवापानु मोर भती पी। यह हम सब बागों को एक- साप्यार करती थी। पति रावणको तप मेरे मां-बाप फौस पामिना रमे नया । मुझमें नहीं रहा यया । मै बिगड़ पहा । मानते हो मा ने मुझे उस्टा पीटा। मेरे मन में ना मरठी । कि मां ने कहा पाकिस्म पूर है मीर परित पीका विरोष पौर अपमान करना भी हमारे लिए प्रक्षम्य है । मेकिन बहमपमान की प्राग मुझ समिया की भाति बमती रहो। मैं जब मकामत पास करके पुन पहा में पारा तब बामूराम का देश एक बोरी पण में पक्षमा गमा पा । हावामिह प्रभिक रोपी नही था फिर भी मैमे मर-पप करणे उसे दो वर्ष काठोररादिता दिया। उन दिनों पतिाइन मरईबी। मेरी मा को इनमे गा मा पा र रतका महमा पाकिसान के कोसविता पर इसने अपना माम् परमो पोर्नोबिमा, मिए) पर मुझे उसकी बरामी पिता नहीं पौ। मुझ मुग मिमा प्रसीम मम | इस बार न मानूम म मा मुक्रमे गोरमी रहने मगी। पास उसके पषतन मन की पदपार्यों में पुप गया। मागतानि मे पीडित रहन मसी।
पास के २५ "मुझे यही कापावावरण परिकार मही सगा।मा का गंमार मौन मेरे मिए पहना। एक दिन मै आकर महारो घोर माया । माके प्रति मेरे मन में पृमा म पग्म में मिया था। यह एमा किस रूप में मेरे मन पनप रही थी समका वितपण में मात्र एक महीं कर सका दिन मेरा पद परप उम्र मात को मार मी बार-बार रोहावा है किमा कामहम्पबहार प्रन्या नहीं था। उस घटना के बाद मा मे पुम कभी मी चिट्ठी नही मिची पौर म ही उसने भी मुझे पापी रब ही हमामा। ममता मैने मार पुषवाया सो मा में प्रत्यन्त स्थाई उत्तर दिया कि वह बुध ऐ । देखो उसने एक नाम' बेटे कोमन भिमरा कर कितना बड़ा पुनार कर तिमा है। यह प्रय बहुप पहा पादमी हो पपा है। रकी छाप तमी तो उसने इस गरीब मोकामाना नहीं माना हम होगी हैपौर यह वकीमा 'एक पनीर-सी मसन उसके अन्तर में उत्पन्न हो पर और मह पमन मृत्यु पर्यन्त उस रित से नहीं गई। बरबह मरने मणी तब मेरे बाप मे सोक मरवा के भय से भूमे सार रिम पामा । मेरे मन में भी मा के प्रति कठोरता पम्म ते चुकी पी। मेक्नि वारपाकर मैं अपने पापका दुषस पाने जमा । ममाप्रमान मेरे प्रम-ग्रंप में मार मारने सपा । मैंसप मर का पौर मीरा मां के पास बसायमा। म पन्तिम सा में रही थी। मुझे कही यह टो हुए स्वर में पोसी 'सग्नु प्रायश्चित करना बहानका मेटा मा, सह पाप हुमे पैन मी मैने गा। झणमता है, देवता । वह मर गई ।QUAans पीना मां की ममता इतनी महान होती है कि पा यह पुकारतीय प्पषित मापनहीन होकर उसकी पोर भामता में भी मामा । रस पृभामपी मी के ममस्त दीप भूमाकर मैं उसके मन्तकाम पर पहुंचही पदा। बीना बहार सममी पही। मपन्दितावस्था में भूमने सगा सा रसो मुसार पीमा पभरी मुस्कान अपने होठों पर लाठी हुई मोती "मोक नमा मय पापको ममतमी में गम पिया मारे हृदय में ममता नहीं पी, निमशार पापाप मे तोरसरमा भप से पापको तार रिमा मी २४ प्पासकेपर प्रभर पाप मोर मया के भय से मपमी मौके पास पहुंच गए । चाहे पापकी अवनता इसे स्वीकार करें पर पवन मम में मोग-मग्गा का मम' ही प्रधान बाराहम बात से काम पाम्तरिक पाना स भी करते है जिसका हमें पता नही सरन मुस्कराकर बोला "तुम बड़ी विषिष हो। एकमात्र कहकर स्वयं नमको काट देती हो। 'माप में पौरमा में बहुत पन्तर है। उसके समम प्रभी एक नारी पूर्ण स्ना भरपाईदी पौरपानी-उसीमा। बहमन भरपको माफिम प्रापबात का प्रसंग पाकर बामप्पीशानी कहना पानते है। इस प्रकार की बातें किसी के प्रम्हर में पापके प्रति स्नेह रत्सम्म महीर सावी।" "मुझे किसी का स्नेह नहीं चाहिए ।" यह स्पष्ट होकर बोमा । "पाम है।पहान पहम् । मनुष्य का यह मिया अभिमान है कि वह सस्म को पस्वीकार कर अपने को प्रसाधारण पावित करे अपना पारेप्ति परिस्पि सियों से मुगल बताए । म पानीमाप पार के भूखे है। मा की रचाई मिरिगा की प्रममय मुस्प और अन्य रिमी सुषती प्रेम से बचित पार पाप प्रेम के प्रति निरपेस पही नहीं साते। योगा ने पत्यम्त पुरता से मा। "मै अपनी सारी प्रशान्ति इस मासूम को देखकर भूल पाता । इसे मैं पर मातिपन में पाराकरतातोपर्गीय मुपा पातन पाना । पस्नीको मृत्यु सरात समसाबमा ही उस पति की सबसे पानावरापक परोहरहोती है। बीना मरनू मुव को भीरता से देखा और उसे मिरम्तर विधीची। सरयू पपरम पिपति हो पपा । उपकी पा स्वत ही मुगई। मांगापिका सर में गोली 'मनुष्य अपने स धप करत में बहुत मानम् पाठा बह पारमाना की परम्परा पामुनिक युग की बहुत प्रचलित परम्परा बम बामप्र मी पहरा पनपन होना चाहिए ताकि मनुष्य के मन पम्पयन माना हो पाए। *पार माने गरेको बतप्पार करते है। पिरिमाकर पमा समानाकी मपुर मुस्कान पूरती म इस नही मानती। मैं मानती किपिरिया कापसाव हो पापपान को इस परपी पोर पापित किए प्पासच हुए है। यह प्रतिमही होती तो इस बच्चे की स्मृति मी नहीं होती। यह स्टूषित मनपम है पर इस चापमूसी नहीं । सरस् का चेहरा उवास हो गया पा। पीना ने उसके मन्तर के ममें को समझ मिया बा। बीगा ने उसके मेरे ही दवासी पौर प्राओं में सलकी पीड़ा को पेषकर मानव का पनुमा किया । सन्तोष की भाप मी। में अपराजेय । उसने मन ही मन कहा। परन् पराबित हो गया। पीपा मे मातरम कमीन पर पिछा हिच्यिा समाफरमणपरमादरमठे हुए उसने कहा "पाप गाकर माराम कीथिए । पौर तुम? मेस बायर और सतरंज पर पर बाळगी। "और या विस्तर से पाप दिसौ को रान कर पीजिए।" 'तमारे मम पो में महीं समझ सकता । तुम प्रकृति के प्रमोष नियमों से परे हो। पारमपाइन में पुरानुभूति पाती हो।" गिस प्रकार पाप साम्बिक ऐगिता में अपने पापको देते है।" सरप होकर पहा से भोट पाया। बीमा यम पतर्रर पररायिन की भांति सो गई। उस बिना मारक प्रभात- समसामा हुमा सरर मोही बिस्तरे से उठा त्योहीमप्पू मे मामकर यह पर दी पिकवावा पाया है। "प गागा। सरयू बोल पा । मानकर नीचे पाया। पापसे सगा। पर पाए मार?" उसने बरे प्यार से कहा। “पम ममी।" विस्तर का? पिसीने गुगनिया।
प्पास
"पुलिस मेंबररी?"
रहख गया है। बो होना पा यादोहोहो गया। मग उसके लिए परे
पान होना पर्व ।।पिम्तित होना निरक है।"
'पया सामान पा"
"छोटे ने पोड़ा बहुत उपया पिया पा। 'घोड़ा न बमीन साहब इस
मटका । परे, मप्पू बटा हो ?
पप्पू पा के पास मा गया। गप्पू ने पाकी पोनों मूछों को मालास भरी
दृष्टि से देखारकमा 'बाबा इन मयों को साफ कर दो।"
'यो 7-
पमा
तुम मुझे कहोने पप्पू पेटा चूमा दो पौर में हंपा नि नहीं दूंगा।"
उसने मधमारका।
"परेबेटा पर्यो?"
"यह मेरे गुमठी।"
लोगों की बात को सरयू ने बीच में होमन कर दिया तुम्हारे लिए पाप
।
सी तुम्हारी।
टोस्ट"
"जो तुमारे पास है, से पामो । मुझे पूछने की कोई पारस महो है।"
सपना गया।
पप्पू ने तुरन्त पपनी बात का सिममिमा बारा 'फिर काट तुम्हारी मू
“परचीमा ?"
यह रही पोरे पाये। संत से गप्पू ने पो को बताया। पापी
पठा नापा । रेगोनैराने मूर्षे पायर।
पपू
में सपाकरपाका पुमान रेरिया ।
वावा मर मीट माया पा। पापी मूः न देसर बह नि पुस्से में
भरा "महमा करसामा दाबी हर बात मान मी पाएगी तो मह गिदी
प्पासपंख
२७
हो पाएमा।"
'नहीं-नहीं मनुष्य को दूसरों से मित्रता यानी चाहिए, मित्रता ही प्यार को
बम्म देती है अपनल मढ़ाती है। हम मवि इसके अनुहस बन पाएंम तो यह हमारे
अनुकम मत पाएमा । दोनों की अनुकूमता हमें प्रदूट बाबन में बाम बगी।" एक
वाक्य समाप्रकर-करते प्रत्यन्त मम्भीर हो गया। उसकी गम्भीरता के समक्ष
सरयूप राता पा।
नौकरानी पिच्ची चाय और टोस्ट में पाईपी।
पाप का मग पर रखकर यह पाने को तैयार हुई। पकने उसे रोका "दीमा
'अपने कमरे में।"
"पया कर दी है?"
"उसे जरा उमर मेन दे। पिन्बी पी पी । उसक बाते ही सरजू मे कहा
'अपने पापको बहुत मताती है। स्वारमा के प्रति ऐसीरता ठीक नहीं है।
"यह न किसी की मित्र बन सकती है और न ही कोई इसके भनुम हो
समता । हम फरमा से इसे देखते है। बारणा से देखते-देखत पफ पाएमे तब
इसके प्रति हम उदासीन हो पाएपे। किसी के प्रति मेरी उपासीनता ही मरी उपेक्षा
है। काम तो पन्छा करती है न?"
“ह पप्पू पारका मोड़ी-बहुत प्रयेबी भी बोम मेठा है।"
"पुरा तुम ससुपत बानेबाहे पेन?"
"भारहीषमा बाउँपा। मप्पूकी नानीमपूको बहुत यावकरती है। मिरिरा
की मृत्यु कबाप ।"
का मटन नियम हैबीवन पौर मरण । प्रादमी पदा होता पौर
मर पाता है। इसके लिए सताप करना उचित नही है। कना कहकर
टोटवाने भगा।
गपूने मी एकदा उठाया।
समी बीमा प्रा गई। चक्रको नमस्कार करने मेठ गई।
प्पासपंच २८ 'कहो मम्मी हो ? कम्य मन्त्री तप निमा ही होन?" ही पीने की सामान ही वामन है। म समझो मृत्यु का अषित पीडामन भय इस बबनमी की पीड़ामों के प्रपिक एसर है। फिर भी मनुष्य इन अनेक पौगों को बहन परला सचित पयों समजा? घिसम्-सिसकार बीने में सुबहै।" जामे की प्रति मृत्यु की प्रवृत्ति पर सरा पाई हती है। समिए प्रापी पीकर अनेक संताप व भापगए उठाण" ने अपनी नीमी गहरी पार उस पर पमा । भीमा की रिमासा मरी परिभर गई। "सूरन काया हामबात है? पीना में बात को पदमा "एक समान का मुख से उपनयो। सब कहवा ई वीमा भर में उसके मुख में अपने को शापारम्प करता है तब मपूर्व प्रानम्द का पनुभव करता है। सोचता हूँ कि मैने अपनी दमा का भमोरमुख प्मा का किती पहनता से प्रत कर लिया है। मुर्मम, मेरा छोटा माम! मेबामता पाकिास सम्पत्ति का सौप कभी हमारे पास कोष हेगा। धीरे-धीरे मन में पल-गमत के प्रति प्रगान विरक्ति होती पई पीर एक दिन मुरर्मन को सर्पस संभालकर म मुक्त । दीमया। सरयू का मुमक्किम सेठ प्रसार मा पदावा। पारससे सम्पति परमे मिएपमा पपा । मप्पू को दीपा ने पादेसरे रिपा किमहनाकर अपना पाठ मारकरे। पीपारे एकान्त पावे ही पूषा "भैया सरप्पा मारमी ममे है कभी कनी मग प्रत्यय कठोर तरावीहूं फिर भी पति एक है। पर उसके इस कपन पर मुस्करा पा "उसकी घोति उसके प्रभाष की प्रति करती। मिरिया का प्रभाव उसके लिए प्रसस है। फिर एक नकोस जीसम्मतिबी नोरोन नामाऽपित हो सकती है ? यदि सारी प्रेपनि पर्ष में मुस्करा मीर तो बेटों उस पर एक मनोज्ञानिकदी मावि शिसारखा रहेगा। यह हर बात को भावना से ना चानिए मापा में पहेमा। पार तुम पानी हीहो रिप्रोत भरे से हम मुम्पर धादिर ऐहिना में मटरमा प्पासपर २१ अधिक पसरकार है। उनकी भाषा भी पूषक होती है। इसलिए तुम्हारी कठोर मापा पार उसके तकी में एक समम्बय-सा हो पाता है । म उसका महा म्हें प्रषिक पाता है और न तुम्हारा उसे। मेरी समझ में तुम दोनों एक दूसरे को पीडा पहुंचाकर मुष पाते हो तो पापचर्य नहीं।" भीमा मन्तकरण में मान्योधन-सा हो उठा । पक भैया ने यह सी बात कह की ? मरवू बापू मोर मुझमें समता ? नहीं ऐसा नही हो सकता। यह मेरी परयय होमी। मेरी प्रतिमा का बग्न होगा। महीं नहीं। मा प्रगट होकर पक से मोमी 'मुझे कही नोकरी रिमा को मैं किसी के ग्राम समन्वय सामगस्म मौर समता उत्पन्न नहीं कर सकती।" पाने उठते हुए कहा 'मनुष्य में पर प्रारमयपना की प्रमृत्ति कम होती है तब यह मानाय भागनामों की मोर पाता है। परिवर्तन प्रभाय होगा क्योंकि पीने की प्रति वही समर होती है। मतिम छ पर पड़ी पीता भीवन अन्धेरे की मोर बागाएगा। पोपहर की पड़तीपूप बीमा सिर भाव से निष्कम प्रदीप-सी सरयू के पर में एकाकी बैठी थी। पसंत-मुप्पों की प्रामरमचारिणी परिणीगिकी की राह प्रत्यन्त योभापमान धम पड़ी थी। नव फिसलम-दम उस भी में मुखिकर हेपे । नपनामिराम इस्प, हाय मोहक पीना पोर मूना भर। पान सरण गप्प को मेकर अपनो ससुराम चमा मया पा। इसलिए बीमा ने नाम रखा। उपवास से उसके मन को गहरी घोति मिमती ची एक प्रबाट मुख प्राप होता था। भीगा उस सुख में समय पी । तभी मुल हास्य से उसका पुष्क मन्चर कामना रठा | उसने मपफर कारकी पोर मांगा- “पड़ोसी सम्बन की नरेनी पुरिहन पति के पंग मटसमियां करके पपने मुमच
.
प्यात
मपुरिम हाम से एक सुर मोकपी सुबना रही है। उसके पति ने उसका
कोमल हाप पा रहा है पौर का मासचिवमन से प्रपने पति कोरही है।"
उसकी पारमा पह उठी। उसके पन्चर के पुल पातों सासर मा
उठे।
"भुती पूर्व मुनी! उममे छाद सापा क्यों हंस हे है? पेपर्मो पाना
में पास्मविभोर हो ?
पीपाटीमाई बिमापही से विषापा तीर फर इनमें से एक की
मारमा कोपरे ताकि इनके हे मम्मों छीटों में पास पाए ।
पर बह ऐसा महीपर सकी। मा सिर पकाठमई।
वही महामहे मधुर संगीत भरे, मुह
बीमा का प्रतीत सामारो नठा ।
एक दिन यह भी दुम्हिन बनकर माईपी।
सौपर्य की पुष्टि को अपने पंभट में पाए.रम के समाप में यह बसत
श्री-सी मान रही थी। मौवन से भाराकात उसका पादलित मानस बार-बार पोक
परवा पा पर साहना प्रमपूर्ण था। पापा मम किसी के पास
मनकीती पत्कठा में सप्नाविष्टको माति छन ।
उसमें एक पाहमी-मुग्ना-सी परिष।
मानिनी का पारा भरा पापम नमना रहा था। परामरे से विश्व नमका
सौम्म सो स्पष्ट प्टिपोषर हो पाया।
बीमा गग भर के लिए मेमोग्मे परे मैठी रही से बह कोई मपुर
समापरही हो। फिर मह उठौ पौर परामों में पाकरमानी हो ।
बोगारीच तारे उम्र मुभार- प्रतीत हुए ।
तभी पीछे मे पदचाप मासिने पुमार पारे।
मानग्या से मिहर उठी । मर्पर-भव पर प्रावण रामना तक भूम गई।
हा पचने सपने मुग सौन-सोकोहाबों सम्पुट में पर सिपाही हो
मामघाप-गो।
रमा पनि प्रात्र पौर परमेश्वर !
प्यास पोनों पामने-सामने । चमेमने मुस्कराकर कहा “पचार की मोर देखता हू और बम भीवर पाकर अपने को पावन में मुप्त करने का प्रयास करना । में प्राऊंगा तुम सर्माना में तुर्म स्मारमा पौर दम सिहरम के मारे पामी-पानी हो पाना। पौर उमेध पीरे से इस पड़ा । बीमा मीवर की प्रार माम गई। उमेस बीना का बहुत सम्मान करता था । दाम्पत्य जीवन का मानर! प्रानंद के प्रवाह में रे दोनों ठिरोहित । उम उन दिनों बी.ए. में पलाया। कीणा ने विवाहापरात पाना छोड़ दिया था। इन्टर वह पास कर पुकी पी। बी.एस्सलिए उसने ज्यान नही किया क्याफि माध का कहना पा कि उसकी बा कहीं नौकरी बार ही करेगी किमह श्री. ए. एम. ए करती येवीणा को पढ़ाई चोपवे एपरामा किन सास को मा नारा करना नहीं चाहती थी। इस पर उमेश ने भी कोई पिधप उत्सुकता पौर नितासा नहीं दिखाई कि उसकी पढ़ाई जारी रहे। मीना प्रपनी पास मंगोत्री का पर-गहमी काय में दाप बंटाने मनी। हर तीसरे-बोये या पपने पिता कपर पनी बाया करती थी। पीमा का पिता पहर का मत्यन्त प्रतिष्ठित 'सटोरिया'पा। फीचर्स के साथ से मेकर महादश सोना और प्रेयसौ की सेन-देन गरे पैमाने पर कप्ता पातुन सम्पत्ति का स्वामी वा । प्रत समेतको मा मगोभी न विधेप सौन्दर्य का मूस्याका मकराए यह रिश्ता स्वीकार कर मिया ।हामाफि मेमोभी स्वप मेममा म्यापार करती थी। अपने पति की मृत्यु के पश्चात उमने अपने पति के पापार को बढ़ाया ही। पति अपनी मासामियों की दखिनासपा विषयवारयकर वस-पोस पए पर्मापं घोडमी दियामता पा पर पोत्रो एक पाई भी नहीं मोती की। उसका कहना पा किम्मापार व्यापार है । मेनीन ही उसका मूब है। यरिमून के प्रति भरा मी प्रसारमानी एप सारा रिवाई कि साराचा पोपट पा। महमंचे कोपरा मी चौपट करना नही पाहतीपी प्रत यह दिन प्रति दिन 1 प्यात छोरोपीपी।कमी-कमीमहलोरता उमेत प्रौर बीमा के प्रति भी पर पालीगी। तो मी पाय-बट्टे का ना करने पाती बयोगी बीमा के प्रति प्रागमता से पषिक स्यामु पी। उसके मुख और मनोपका पूर्व स्वास रखती थी। मिस प्रकार एकरदी की वीर मरा होती है, उसी प्रकार मंगोत्री की बी। भीगा के बाप मी प्रतुत सम्पत्ति पर उसकी गर-सौ तीपी दृष्टि जमी हुई थी। इमलिए बहकमी-कभी पीषा को लेकर ग्मेशको भी बिमारतीपी। मंगोय की बात करिए। मीमा पीये महीमे ही गर्भवती होगी। फिर क्या ना? गंमोपी पपार प्रसम्मवा में माष रठी । प्रामामी सुधियों की पात्रता मात्र बोमा पिता मोमिनप्रसारको मस्ती में मा रिमा। रमहीम पपने दोहिये के लिए हजारों रुपयों के पेवर बनने क लिए दिए हीरोंकीतीम पोटी-मोटी मंगूठिया से सोने कीबचीरें। एक पारी सोने का कमरबम्प। पापी मादी परिस मादि। पिर सुबकासापर मनुष्पपा पोर माताई वाकिमह सुबका पाट उामोपकरे। मोपी ने नौ माह सरही पोते पर्सन किए र गोविन्दप्रसाद मेष में पांच नायरमाए । फिर पा पा? पाइयो बाटी गई। मनिय पीम स्पीन दिन तकनपातार पाती रहीं। उस प्रारमोत्सव में संपीत पी. मनुरापका करना पाया। इस प्रमतता में पहली बार मुगमन पसरता से पापा। पत्र में से एक प्रमत्म सोने को अंगीर की पदयपन मित्र रमेस के बटे को पाहना पाए । परमेयपरी प्राया। दीना पपने कमरे में बेटी-बैठी मापन गरेको यूपमा ममा ही पी। गंगोषीमुनीम मापाराम मे अपनी प्रामामिया के समय-समय परराए पीहिनि पागामी मलिनापारमप।
प्यास
पुरधान को देखते ही मगोत्री रिहस कर बोनी 'मों रे सूर तूफा मामा
कम ही प्रामा । उमेटने पर बहुत देरी से दिया । परी मौसी, मुझे तो
वार मिलना चाहिए।
“वझे नमूने वार नहीं दिया?"
"हो मा दुप्ट? मुझे पूरे एक नाब का प्रोममा विमा दिया।"
“मौसी गहराब पया है।"
"पाने दे फिर मैं उसकी सबर मूनी। भीवरमा मौर अपने भतीजे को
देखभा । मगरल ने तुझे बार-सा मारा मतीया freiti" अधिक मुमता के
बाप बमोनी मे सब स्वर में कहा 'बह देखा पाया । उमेश का बोस्त से
प्रचना रेगर ही समझना । परे भीतर क्यों नहीं पाता?"
सूरान सहमताहा मीतर गया। एक अपरिमित नारी के समक्ष पाते हुए
यो भिमक एक पुरप में होती। यही मुपर्मन में बी ।
सोहागनादर नमस्कार दिया ।तर में पीपा ने स्मिा रेखा साप
दाप गोपरिए।
या पदमा ममसर पापबसूर्पन ने वीणाकादेवा ।हामांकि इसके पूर्व उमेर
वाग पनों में परवीना की भावुकता पौर उसकी वीरम दुद्धिमी काफी प्रसंसा पर
पुखरना।
ठिए । पीमा में मपुरता से कहा।
मुरर्पन बह गया।
'पापके मिए पाय बता"
पयों
“पभी पार पाया हूँ।
"दो मा हुपा !
"मुझे पषिक माम पछी नहीं लगती।"
योगी?" योगा गहरे अपनल से स्टापसदर देशवाईसपा से योगी,
प्पास पंच यहाँ तो पाय मोप बहुत अधिक पोते ।पाप वो पापको पीनी ही होगी मही तो गितमा गुण फोन करने। फीम उसने हम सम्म दो दोहराया। इस घर में एक पिसेप प्रतिक्रिया सुवर्णन के मस्तिष्क में की। मफिर पापको मी। पप्रमट होकर मोमा "मै पहरे नि महा मोम मेना नहीं चाहता पौर फिर में इस बात को मानने वामाई किमित्रता पक्की रखनी हो दो मित्र की बीवी पर अभिभार रखो उसे प्रसन्न रखो उसकी हा में ही मिनापो।" गोगा मुस्कराकर पती गई। पीछे से मुपर्थन मे उमेय के सामने उठाया और उसे एकहपार की सोने की बार पाना हो। उसमें एक हीरा पान के प्रागार में बाहुपा पा । वीणापामा सामान मेकर माई। मुरयन कोबले फोरमा रेखकर मन्द-मार मुस्करा पड़ी। पर उसकी प्टि पाही पंजीर पर पो त्योंही पापिभोरहोपापाय रखकर तुरतमको मेकर पंगोत्री के पास गई।गीर रिचाई। मंगोनी भापी-मापीपाई। रनकोबनाए मेवीहुईमोमी “परे क्या पसरत है? पापापा की मूम है । देने में ही उसको भानन भावा है। या पाय तोबनाकर पिला।' बीणा पाय बनाने सपौ। मनमोका पोर में नरम पापा। गोपीवीगाफोमा बता रही थी कि मुरर्पन पामदान से हमारे खानाम काबन ही पुराना सम्बन्ध है । हामांकि हम दोनों के बीच सभी कोई रिश्ता नहीं है कि प्रेम इतना है कि हम सने परिवारों में लगते है। पौर यह प्रेम ही मबस बहो पातामा प्रेम से पुमरे, नही पपना है। पाप पर पाबीर मामातक न पूष की पारा बहा दी। मूषको पाए मुरन की पेंर को मियोहरमीप फेम गई। मुख्यम-पो-रे: परर उपापा। बीमा मुममसरटी। मासकी प्याटपंच बराबी भी पोते की इस हरकत पर किसक उठी। सुपर्धन ने दोनों को किषित रोष संदेवा । उस रोप में पृमा कम बुइस मधिक पी। मीणा ने अपनी हंसी को पाने के लिए मुह के प्रामे पावस का परमू दे लिया। गमोत्री प्रब उपहास से मोती भरे बेटा क्यों घबर की मह मान रहे हो छोटा बच्चा बता सस्म होता है, इसक मूत्र से तुम पवित्र हो गए। यह तो प्रया पर के समान होता है। "फिर मौसी एक पुस्तू पी क्यों नहीं मेवो" सुवर्मन मे कहा । गोमा न मब तक मूष साफ कर मिया। मासे मुहविषकाहर बोली पबि दि ऐसी बात कहते पापको पिन नहीं पाती? कैस है मौसी-मानब?" पूरन परन्त स्मित विखरता हुमा नम्मे सर में बोला "भाभी पी पहनाक मटकना सब भूम पाएगी ममी तो पचा नम्बर बन ही हुमा है। परा पाच पस होने परीषिए, फिर इस मिबाप को देगा।" मामा के माम मग्रा से मारमाहा उठे। रखनहीं बोली। सर्म से उसने अपनी निगाहें मका भी। गंगोत्री पोते को उठाकर मह कहती हुई पर पड़ी में बराबरता के यहा मा माती। उसे पहबीर बजा पार्क !" मुरर्णन पाय पीन में मग्न पा । बीगा म बाने किस विचार में सोई हुई थी। उसकी पारी फासी महि गनुपाकार की पी बो ममी पनी हुई बी। पचानक सुर पन मुख्यकर मोता 'भाभी माप इस पोर में बड़ी सुन्दर ममती है। भीमा पर्म के मारे सिहर उठी । "मापडी पाय ठही हो रही है। पूषन हंसकर बोला। उसकी रसो में निश्चमटापौर मिर्मास्यपा। एक ऐसा प्रारूपन पाविसने बीमा के मन में हमपस उत्पन्न करापीमा मे पकाम सोचा कि यहईसी सम तमाम हसियों से न्यारी है। इसमें एक ऐधा मिठास पार भाव है मो यात्रा कामातुर उमेरे होठों पर विपती है। पौर सुबर्मन पुन एकरम गंभीर हो गया। उसकी पन मुरुगराया मम स्चारकरके पाठा बना।
प्यार परपमा मया। बौना सारा काम निच करके कमरे में मार पो पर मेट गई। तुम का सम्बर सगती हो। पर पाक्य दोहरा-दोहरा कर मामाधाम-सी हो भठी । उस मह मानन के लिए कि मेरे मन में बरे मार तो उत्पन्न नहीं हो मए है पन पपने मुख को रेसा । उसका मुख पूषपद या फिर मो उसे नया किसे पी हो गया । सूरर्सन की दृष्टि उसे भाई मही । उसमें उसे पाप पर पाया पाप काना पाप और पवित्र! तबपीमाको कामेरी एकपटमा पार हो उठी। पर मैट्रिक तोमर माई कामेर में पाई पी। उपम्पाप पड़ने का बिसेप रोमारहारी उपम्पा पानेका सेना पक्षपाहत्या की घटनाएं यह परपन्त विमरस्सी से पढ़ाकर पी। एक दिन उसके हाप में कामन गमन' का एक उपम्पास पा। परंपर पाने माना मनोर नामक पान मसे सबागौर से देखता था। एक-दो मारपीमाग खास पारे भी किए पौर एकदिन उसने मौका पाकर यह कह गन "यहम्प पीर ये देसमाई।" पास बिन बीमा निरन्तर पा (मह मानती मोहि मानेगचाओं में रह धमता अमिर मात्रा में पा रही है । मारियों का प्रति अपने मापको साहसि परित कलेकीसी पेष्टा करत ह । इसलिए इस तरह की पारवे है उस मालकपन ने पोपा पम्तम् मेंपरा भी हलचम नही मपाई।। दूसरे दिन नई पोसाक पहनकर पाई। मनोग उसका चचार कर हा पास रेपत हो मुस्कराकर बोमा 'तम पडो सुन्दर ममती हो। बीमा मुस्ले में भर उठी। उमम चप्पल पाब से मिरामका विषार पिया परम गाने क्या सोपारा हो गई। मुस्कराकर मोती -पौर मैं क्या मगनी ?" मचाना बीमामपुर मपहार मे पनीर को प्रारपर्ष में गत दिमा। म पारकर भी बोन मही मका । उमडी पाहात्मा गई। मोकाममहा "मविप्प में प्रारमिता सीखने का प्रयास पसे । ऐनं भाया में रखूनी। नहीं तोमो पाप डिसी मतीमाही से नरमों की पूमाकर प्रयासोपंत बारमे । एम?" उस दिन के बार मनोरने कभी पीपा से हावानी नहीं पी मोरनही पौषा मेस पर गंभीरता से सोपविषाराही । उस यह पटना पसचित्र-सी ममी। पर माम सूरक्षन में नमी बाप को साकर उसे पैन कर दिया। बहरड़ी देर तक मन्द्र में साफती दी। यह बाहती थी कि ससकाम्मान सूवर्णन से हट पाए पर बहलाने में सर्वथा असमम हो पी पी । पुरन उसकी मपुर मुसमान उसका मासन मदन एक-एक करके उसके अन्तराल में बसने मगे-पाटे गए भी। इसके पश्चात् यह दिन भर उनिम्न-सी ही। बाहर भी वा पुरन की भएर मुस्कान को नहीं भुता सकी। सपोप की बात उस दिन उमेष भी कामेब से सीमाही सिनेमा पेचने पता पपा मा। उपकी अनुपस्पिति ने पापा को मिविध पनुभव रिया ।पा ममी होने सनी । पसलमा कि उसके पन्तर में वोर तिमिर का साम्रास्म है और उसका पाप फिसमाया है। वह तुरत समलने की चेष्टा रमेहमी। उमेपमा गया था। जैसी उसकी सराकी पादत रही। उसने उसे मासिंगल में पावडर प्यार से सिमित स्वर में कहा, "भाग तो तुम निबार पर हो । क्या बात है?" पीपा चौक पड़ी। हालांकि उमेश में गारीमात्मीमा से यह मामय कहा पा पर पीपा की ममा दिपापा से भरा। उसकी निराधन मुस्कान में भाग निएप है। "नही मुममें कोई फर्क नही है। उसने रुमाई से । या बात है? पाय तुमारा मुह उरामा क्यों है ?" "नही हो? सिर में घर है। उसमे अपनी रष्टि उसने पार्टी की पोर करमा पार सुदर्शन पो पाए थे पके लिए ये अंगीर नाएष इसमें एक हीरा मी पाई। "प्रभा दमाने से चाय-बाप पिलाई किनहीं ? इन छोटी-मोटी बातों फोबत मीरखा से देता है। यामधाभ मिठाईमा पी।"
प्पात गरीमा! पोर हा कम पाएमा म?" एकहपया या मिनीपो पाऊंगा। समेप पशोपर बोला 'पल मुझेर से माठ बजे ही पाना है। वि. पर सूरर्पन की यालिर-समया में कोई कोर-कसर बाकी न रहे । असे पाच पचे पाम को पाने के लिए फिर कह देना । मेरी भोर से माफी मी माप सेना।" पापा मारारमोनी 'बाह पाप मीनूप है। भापका दोस्त हजारों मीलों से पतकर पाए मोर माप उसको पर परहीम मिमें यह कहा की पupat! पापको कम ना ही पड़ेगा। में नहीं रुक सगा मुझे प्रोग्रेसर मापुर महा पाना है, एक पारी काप है।पुष नहीं बानी हि प्रोवर मात्र पिनासनही है।मह कहा -यमुन का भूर' ही सोपरि है। मूसले पोखिमबार करता है उस पर मेरी बड़ी गाष्टिपती कम यह मुझे सोगिक परमोट्स मिसाएगा। में नहीं पया तो उसका मूर वाप रेनापपिशा में भी पौरोरेगा। वहा सकी है। बात को भूमवा मही । उस निक पाट की तरह माव करता है। मिस start, उसकी पमास में सदा पीकरवा रहता है। उसके लिए पो परमाताप मरे म्बर में कहा १-मने कांता को राहोरपवेबुमाया ना मानही पाई । मेरा हो पया । मूर के साथ मेरी सारी पर हो गई। में मो नहीं सका बड़ा पनपा।मों कावा तुम पर्यो नही पाई? पहचारी | संकोच पारप पानी-पानी । श्या उत्तर रेती ? मान रही। पर प्रोफेसर साहब गोमते ही पए-'तुम इसलिए नहीं मान रा र ममम है मीरा होमा । में प्रोफेसर और एकात! पर मै पा पा रेट प्रोफेवरों में नही ईगो अपनी भोमी मामी पायों पर प्रेबगर समार सिनो को बदनाम करते है। प्रेम सौदर्य पौर पातिप्रति मेरा भी बनना ही मही । 'पौर उस पार नामा प्रोफेसर माहब वैचारीमाता को मा पमिदा करते है। पौर पदि का में नहीपमा वा हमरा नमार मरा मा गाएमा महिए में करवाऊमा हो।" बीगा निस्तरही। उसने मन ही मन मारपद पररा कोही है। यह प्पन गोहीदी २१ प्यासह दूसरे दिन सुबर्मन फिर माया । प्राण वह अपने साथ तीन साड़ियां पौर कुछम्माब-पीसेबमामा पा । दीपा के समक्ष रससे गोमा “पक भैया मे मेगे है। कहा है कि बीमा बहू को मेरी पोर से मेंट। मीमा के मन में तुरन्त पाया कि यह भी कहा कि प्राप मेरे लिए क्या साए है? इस कपन से सूधर्मम बसर मिन्दा होगा। पर मह ऐसा मही कह सकी। अपने को समाप्तकर मोनी, "समें मेरी पोर से धन्यवाद काना।" सुरक्षम उसके सामने बमकर बैठ मया । एक दौर्ष निस्वास नी पौर बोला 'मामी तुमारी बैसी बीवी भाम्पसामी को ही मिचती है। बहुत ही मन्यास्वमार प्रापका । बीमा मर्म से गा गई। हसबमकर बोनी "मापके लिए बाय सा। और वह ठकर पसीपई। सुबर्मन एमी तबियत का म्पपित था। बहुत गुसकर मोमता था। निप्पाप भावना से प्रेरित बह, पपने मन की प्रत्येक बात को स्पष्टता से रखता था। मोता की प्रतिषिमा से बह निश्चित रहता था। विचार उसके मन में उठते मे पौर मह दरम्त उन्हें बाहर निकाम सामा। एक-दो मार उसके मित्रों की पत्नियों ने उसकी कई बातों को बुरा भी माम मिया था। मोहन चौपाय से बातों ही बातों में दोस्ती टूट गई थी। फिर भी यह मपनी इस दुर्गमता को घोड़ने में चाचार पा। पीगा चाय बना कर दे पाई। मुबर्मन ने उसके माते ही मबहास के साप का "उमेस का? “दो कॉमेग गए है।" "बाह बेटा में पाई और बह पसा पाए। यह मेरा बहुत बड़ा अपमान है।" उसने मोटेदीकरी का। 'मैने उन्हें प्रापके बारे में बता पिमा पामेकिन उनके साम भी मगरी पी। एक सनकी प्रोफेमर से पाना पड़ गया था। उन्होंने बतामा कि उनकी भी दुनिया मात मोसे ग्यारी है । 'मूरहीनका सर्वस है।" "नही मामी मां का कचौता बेटा ससूर की एकमाती बेटी का पति ।
प्यास पिर पुछना ही क्या? 4 महोदो मी मम पाए। मुर्भम तनिक गंभीर हो गया। "पाप इन बातों को ग्याषा गभीरता से मनीजिए। चीनी से पम्ममा तीन?" "जितना पाप प्रेम से राम। प्रपन तो भाभी बीनी के नही प्रेम के भूखे " "पीमा मे मटियां ठान ली क्या प्रेमम नपा रखी है। प्रम* पाकर में बीवन परा हो जाता है।" "नही मामी प्रेम महान है। प्रेम के कारण ही मैना ने नवा कास्म पारण रिया, रोमियो मे तरंस विसर्जन किया राम मक्त की भावि मरकता पा भगवान श्रीकृप्प ने विदुरकर साप-सम्मी बाई । पौर तुम कहती ।" सुपर्यन बीमा ही पोर रेवा । पुप हो पा । उसकी मानों में हल्का रोप बह बात बनकर उमण-सा बीना पुम्हें प्रेमीबात मन्धी नाही समती पीपाने रो।" सुपर्धनमा पाया। पोषागार में बड़ी पाई । पसने सोचा कि पास्तव में यह उसकी प्रमाता है। उसे पाप में रखना गंभीर मही रोमा पारिए पा। पिहर सूपर्पन सुपर्णन है। तब बीपा को सुरसमापी गई अपनी प्रवाएं नाही प्रिय मनी । उसकी बागी फूल गई। वह मुगा-सी बैठी मुम्पन के बारे में सोचती रही। इसके बारे में सोचने में ससे प्रतीक मानर मा पापा पाय मारिमा एक अपरिपित से प्रपणापम मुनकर पर्व का पनुभव करती है। टीसी ही पुमान भरी प्रसन्नता पानामा मुसार पीपी। उसने निश्चय म्मिा रिसेपरेमा ही बह से मुबर्णन यहाँ मेरेपी । रस बीपणा वाटा। उसकी अवि प्रयास है। मृत्यु पार पीबम रामी बस मानववारसा पीपा रेमन में, पाठे हए मो गुरमन न पर कर लिया। वह पति को समारने नोकिया मेप्मा प्रोगन पर मुरर्मन को सर माए भौरवा प्यारपत्र मह पा पाता तर बीमा तुमी में मतिरेक होकर सुबर्णन से हंसी-मजाक किया परती भी कमी सनका मयाक दायिक मर्यादा से बाहर हो जाता पा तब समेत को पर बममा पा । नेकिन उमेश इसे दर्शाता नही था। उसके मन का सम्देह चमकी प्रताड़ियों में ऐंठन उत्पन्न करता पा पर यह इस वाहन पुरको सम्पता कमाते गरम पान की तए पी रहा था। मंगात्रो को सूपर्यन पपने बेटे से मौ प्याए मगठा पा । सपति का बेटा मार्को रपए और कुछ नहीं । बीणा के माप पुमने-मिलने में उसमे कोई परोप नहीं किया। पौर एक दिन सूपर्धन सारी मोह-माया योड़कर पुन कमाता पमा गया। बीमा की प्रारें मर पाई । एक बार उसने पाहा हिमह सुरमन की बाहों में लिपट कर रो पड़ पर यह विवाहिता पी। यह कार्य कुप प्रमिक पमर्यादित हो भाता है। मन बह भीतर ही भीतर तप कर रह गई। पौर मुपर्मन मे पाते-बाते इतना ही कहा अब की बार यहाँ के दिन हंसी चुपी में बीत गए । मामी के प्रा पाने से हपय की मुफला मिट पी।" उमेध मे नामों क क्या पर्व समाए, नही माने किम उसका चेहरा स्पाह हो गया क्योरि सुवर्मन की पैनी प्टि तरकास उस पर बम नई पी।
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संघर्ष बढ़ता ही गया
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सटोरिमा का धनुभव है कि सट्टा पाही सहारा का नसीर, मोराव को भू-नये को दिन में कोठियों का स्वामी बना दे। और तीसरे दिम पुम एक नि का सूत्वान' की माति भिती का भिती बना है। पीपा पाप गोविन्दप्रसाद का भाम्प-वारा पोर की लासीक साब मुप्त होने नमार रोष पासा रहा पाने ममा । हासत बिगड़ती गई। गंगोपी को इस बात की मी चिता हुई। पाए गाम में टममे पर एक गूगर को जोपुल होता है ही पंगोत्री को होने लगा। पौर एक दिन उसने दीपा को गुलाकर कहा, "बहू प्रब तुम्हें होधियारी रखनी है मरे पहने पर मेसी वो तुमारा पाम ही मुभा पाएगा। "कहिए।" उसने बीमे से कहा। “बह पाम भाम को बताऊमी। कहकर पाप ने उच्छे एक छोने काठहार दिया । यह पहला मौका पाबा गंगोत्री ने अपनी मसे सना कीमती बेपर मनापा पीपा को दिया हो। पीणा मुरित बी।हिम' ? उमेट में रात को नटते हुए बीमा से पूछा "तुम अपने इस दिन की टॉग तोड़ोपीकि नहीं? तुम मुझे बापमा परेसान करती हो ।पमा सुपर्णन कुप मिरिया नही हो । "भरे गातो पता महनार है। मुह के सामने प्रीत और कार में तीन पते का कारक नहीं।" बीमाहा मुख मसौम हो गया । मास्वर सुदर्शन मुंहबोर निकमा सकता भाने के बाद एक चिट्ठी भी मही मिली। करवा पारिभामीबी मेरा मन मापके पिनास नगेगा। सचमुष पुरुप पत्थर के होते हैं। पनामा प्रमिग्राप ही नहीं समझते। "म उदास क्या होगा ?"रमेसम हवात् पूषा बीमा कर्मा।
४६ प्यास फिर?" मीषा इतना कहकर पुप होगा। बीमतीयों नहीं ? तुरन के पाने के बाद हम बोई-कोई-सी हवी हो। क्या उसकी यार ?"सस्पर में मया। मीना इस बार दिपाकर मूठ बोमो 'मैं उसे पर्यो यार करने पर मेरा तो पर यह भी रिश्ते के बादाम। मै इसमिए परेशान हूँ कि फिर में मां [" उमेश की प्रति विस्पारित हो गई। विस्मय-पिमूह होता हुमा मोना, या क्या करती हो प्रमी तो पांच महीने मीमही बीते।" "मे पा पान। यह धर्मा पई । . 'गनामा पहरी मारमीयता से मोमी, "पए में राब रस्टा पड़ने मयता है ष यह पुमारी को कनान करके छोड़ता है। तुम्हारे पिताजी दिन-दिन बानी होते पा रहे हैं। पाकर रिवना मिसे धीरे धीरे यहाँ नेपा।" मीनाको प्रपने पिता के प्रति अपनी सास का मह मसुम पिचारगत पीड़ा पन नमा। ममा तरेर बोनी "ऐसा पापको नही सोचना चाहिए । माला- मुनाफा पापार में होता ही है।" "समस्तीपयों नहीं ?" सास ने अपने सों पर जोर दिया। में ऐसा नही र वमनी या मीच काम है। मैं अपने पाप के यहां से एक पाभीनही नानी बहू से टका-सा उत्तर पार गोषी तितमिना ठी। मारकर वह मकर ठमई से पवना बीमाको पारे हार्पो नेपी। मेक्निमह जाने क्या सोचकर पुम कोमल होगा पर हरयों में फरपा ही पया । यह फर्फ मनोमीनीपानी में विष बनकर फूटा। वह उमेश को भरने मपी । पौर उमेश अपनी बुद्धि को ताक में रतसर मोना रो पर एने मना । बीमा का राष्ट्रपबहार में ऐसा मगता पारिमेधको नारायपीपीछेतमा का परममामा महाँ एक वी पमा पूना! तर बीमा को मुबर्णन पार हो रखता मारमा कितने प्यार से पासनापा तिने प्यार से मार कार्यकोवापरता पापा उसस्प पुग मीर तोगग्य कामगर पईसन बीमत्रा हना पा । मापस टी पस्नी भी प्यास पाना चाहता पा। पर यह प्रतीत की स्मृति में अपन का तस - Ye run ' ' तब उसे सुगमन की अनुपस्थिति बहुत पसरती पी। मीणा मे पूसरे बच्चे को बाम दिया। माम्प से बह भी मामा हपा लेकिन इस बार उतनी बुधिया नही मनाई गई मिनी पासे यम पर मनाई गई श्री। मोपिन्दप्रसार की हालत बहुत सराव हाने लगी। इस बार उन्होने अपने पोह को हार नहीं पहनाया जिसे लेकर बमात्रीई दिन तक बया करती इसी बप उमटका फाइनल बा। मा प्रध्ययन में अपनी समस्त सक्ति मगा देना पाहता पा पर गृह कलह के मारे यह मौत नहीं हो पा या पा। सास और बहू कोई न कोई बोरा करके पसके मन को प्रशांत कर दिया करती थी जिससे उसके अन्दस् की पनामग-प्रवृति बहती मोफिन पीना मे अपनी सास के समक्ष हथियार नहीं सने । गृह-वाह के संतप्त बातावरण में रहार भी उसने स्वीकार नहीं किया कि यह बहाने बनाकर या चोरीकरके अपने पिता की मेप सपति उठा साएपी। पस रिन उमेट ने मौकामाबाना रात को पापेर तक सुना । पापपन प्रम्पपन में तस्मीन पा।मम्मा पा *मा चुप नहीं रहती ? प्राबिर यह हमेमा की काय-काय क्यों हो रही है ? यह अपने बाप का बन यो भाएगी। यह रिगाह के समय एग्रीमेंट नही पा पा । तुम वामता पारी को परेशान करती पती हो।' नमेप का स्वमा गहना पाकि मनोधी भरक पठी । कर बोली "पर विधौ पौरको दिखा प्रमीठो में अपने यसम की कमाई जाती हूं।" उमेश मे शांत सर में रहा 'मारिर तुम गापापमयों गमती हो? मग बान का रिमा तुम्हारे पास सब कुछ तो हैमा फिर पहबेकार की वृप्या मर्यो ?" "मुझे उपदेश देने की कोई कारण नहीं है। गयोती साम पा करके ।
प्यास
गोली उपरेस मपमी इस बनुको दे से भीतर ही भीतर तुमको भर यो
है? और यह छोररा भी इसकी 'हा में ही मिलाने सगा पैसे में अपने
मने की बात कही। मुझे या बहरत है पनपी सेक्नि मै वो तुमारे सुन
की सोचती । पौरत? पंगोत्री पीस पड़ी "रा को सुख देनेवामी के सामने
पेट में मो माइ रखने मानो को भूम गया।" मंगोषी रो पड़ी।
उमेपपुस्तक रखकर गरम पहा "भा में पाए मह पर पौर पदाई । म चमा।
में इस नरक में नही रह सका। राम ममहा दिन भगा से मह पर म होकर
महाभारत का मैवान है । तुम अपनी बात पर पपीहापौर यह मपनी बात पर।"
नमेश बाहर पाने मपा ।
मीणा उपके पामे प्राकर हो गई, पहनाए म पासमी बुद्धि
पानी नहीं पती।"
'चा उमेसपमा गया।
बीपा पाकर भी उसे नहीं रोका। पर बाजाको पाए, कोई रातो
मही मो से समचा-यमाए ।
उमेपटीन दिम पर नही मोटा।111
बीमालिन्वित हाण्ठी पति पर समग परमे मातीमारी लिए
पति की अनुपस्थिति मनित पारसी पाड़ाने ममौ । गोत्री मे पमये सर्वमा
बीमनाबम्द कर दियापा।
प्राधिरणीमा प्रपने पापको नहीं रोकमकी । सपस मेज मेकरकापमोली
पास "माबीतीनमि।"
मोतीबीच में ही उबम पड़ी "तीन दिनमा तीन पटक परि बहन
पाए, तो उसकीपरमही एगी।"
बीमा कमेरे पर पाबर तार मोट पड़ी। नमे मुनाने स्पाम से मंगोत्री
पौरपोमी में प्रार की पाही से एमपुर पा री-अपनी बहिन पास
फिर गूब मेरे बेटको पाठ पकाना।
पीपा गापौन हो।
पनको माहोपर गंगोत्री मत्रपुष पसी गई।वीपाको निवास महींपा।
४८ मगोत्री सरा एसी ममकियां रिया करती थी। इन गीरा भभकियों से बीमा भसी भांति परिचित पी मेक्नि मागये मीरए ममियो सत्य हा गई। पीमा सिसा-सिमकार रोही पी। उसके दोनो बनवितामोंस मुक्य निीव मुमनों की भांति सो ऐथे। पौरपीमा पर अपनी सासरे परस्पा करन रे सिए बड़ी हर पन मोमुप साप विषाक्त स्मर में योनी “बहू ! तूने मेरा पुष मुमसे पीन मिया भयवान तुम्मे तेरे पुर्षो को धीन में। ऐमा ममानक पाप बीमा कांप उठी। रात भर उसे ममता ॥ कि कोई प्रवृपय सक्ति उस अपने दोनों पुर्नोस गिलग कर रही है।मामो नही सकी। तीसरे दिन भयकर पटना घट गई। गोविन्द प्रसाद मा प्रत्यासित देहान्त हो गया। सारे शहर में मह समाचार माकी तय फैन मया मेनबार उसकी नाप को कुराक करने के लिए पाप गए । *सा मूषित दृश्य पापाहीन मुना की तय यह पौना का युगों-युगों तक स्मरणरपा भौर उसके हरूप में ममता कीजपा एक स्पायी भूमापागम देगा। उसके बाप की मृत देह पड़ामी । वह विपार के मारे निवात हुई काम-राम कपन कर ही पी। एक पड़ोसिन उस मरेपोपी। सप समे-सम्परिणयों के मासे-रिफ्ते समय बापकी सम्पत्ति सापसमाप्त ही गए पे । पैसे पैसा है तो प्यार है से सम्पत्ति है दो सम्पाप है। प्रारमी पर हो रहा है।मह प्रपन प्रापको पुग कापरेच रहा है। दिलनी गो मामना है। तमी मठ रतननाम नेवीमा को प्रभाता। दीपाको समा किन्न पापाप मन् एम्सानों के बीच एकतो करमामय निकमा । यह उस बाबा कहकर मिपट पड़ी। जनमाम रमे एक पोर में पया। स्नेहसिक स्वर में दोसा गती को है बेटो भैप रण पोहोना मा मह हो ही गमा भगवान की यही मर्यापी चुप फ. बेटी परा।" विमती बीमामे का एक मांस मिया।
उसमें एक बार करुणा से रतनमाम की पोरसा।
खममाम पीरे सेोमा रेसोबटी गोविर में मेरे इस बार पए में
रसवार ।"
उसका साना साना पानि मह यह माफ उये। उसे नपा हि मनुष्य अपर
समस्त माननीय भाषनामों से १र पर्प के याधिक मातन में पायेष्टित हो
है। परीयार फफक पड़ी।
उमेरमा गया था।
बह अपराधीपी मागि एक मोर पापा। बीमा को उसके पापमा
मस्मिना हुई। सेठ गोविश्वप्रमार की पर्मी बड़ी धूमधाम से निकली।
हमके पीछे गा मोब भी किया गया पर रोगी के बाद मीषा मे पाना
उमा मापनी एप-एकट बिकी है।
गंगोत्री पानीपईपी।रोबरचे पौर वर्ष।
उमेश परेशान हो उठा।
पपाको? फिर मारापरली मी बाप्रति! बह रिमित हो गया
परीक्षा से पपि उनिएपर होने की चिता होने मपी। पीर एक रि
उमः पीपा मेमा “मै कानेटके धामों के साथ तीन रोगमा पर
।"
"पर्यो ? पहा माना?"
काचिन् कोई पनगेमा । तुम पिता न करो में पौधही पापाया।
"प पा चाहिए। बीमा मेन मुमार धीम मे पूपा ह समाना
मए। रम पिपना चुना करके ममा मगपाना है।"
'मोरोभिया था उमापा पवारपामा ?"
बोमने पझ पा। वीपाना सर तिल हो गया पापो सा
गौरव पापा सम्म है। गरिम मुमे दरा पर ताना मी यकीन महीं । मह रात
गौरप सा-मम्याप समर मर मिप्पाई। माममारपीऐदीपामोधप
ममस मोरे नि मबस पिमर समानिरीबाबास। हम सरा
प्पासोपंस पपने गह 1 सबसे मजबूत रिश्ता है--स्मार्च। पब तक स्वार्थ की मेघना पटूट है संसार की हर निधि हमसे निपटी रहेगी। बीना के निरन्तर दो प्रजनन के पश्चात् हुए पाएर मुख पर एक पान मसा पड़ा । उमेस भाव-निषा रहा। मीना एमरी पोर मुह बुमाकर बोली 'मा में लिया है कि मै तुम भोगों के मिए मरी समान हूं। मुझे तुम मोरों की बितनी सेवा करती भी यह कर प्राप इन पक्तियों के मर्म का नहीं पान? इनका स्पष्ट प्रमिप्राय यही है शिबपाप दोनों भी मेरे लिए मरे समान है। तभी तो मैं कहती हूं कि ये सम्पत्य मपनत्व ममत्व सब बम है।" उमम कुछ नहीं बोमा । उसके नेत्र बममता पाए । बह पाता हा मोमा "तुम किसी भी तय भपना प्रबन्ध कर मेना। फिर ? परीवाको बीच में छोर येना मषिप्य के मिए प्ररपन्त पातक सिट होगा। उमेश पमा गया। दौमा पती पगई। सामका प्रससाया पावावरमा रहा पा। प्रतीची प्रांगण में परणिमा की पाली भाभा फूट रही थी। उसमें एक मारनुमा मेपसा ऐसा भग पा पा से नाब किसी मयानक पाग में बम रही हो । मीणा काममा पाका मु. रो पापा। उसको दूध पिलाने का समय हो पा। पीपा ने उस दूध पिलाने के लिए स्रोग पर पानी पारिया। राष्टर अपनानुसार से पिसायतीष पिमामा बाता पा । बर्तन मावोगामी सामिनी' प्रावी। पौर मीना विचारों में पो-िसी बैठी रही। प्रपान यह उठी। फाउन्टेन पेन कर सुरमन को पत्र लिखने गठी । मम मर के लिए उसे यह कार्य प्रमादित समा। विवाहिता को प्रन्य पुस्प को पन मिखने का कोई अधिकार नहीं है। पर एसे पुस्प को मो उस पैसी बीपी पाहता है। मन के समर्पमय प्रान्दोलन को रोकार यह सिक्षमे बैठ मई, "सुरर्शन भी उनकी माता पी हमसे माकर रायपुर पसी गई। पिता बी की मुरम के उपरान्त मुझ पपना पानेवाला कोई नही पा माप घर दिनों के लिए यही नहीं पा 1 २२ सकत ।" उसने स्वामिनी मोपत पोस्ट परने लिए ये रिया देते समय उसके यम में सहसा यह विचार पाया कि मह प्रवित नहीं है। पुप में पपनों को होगा सिवा पाता है फिर मुवचन परका अनुग है।पक देवतुस्य पकी रमेश की तबीयत पर पराब पी। कोई फोका हो मया मा । मुबर्सन बीमा का पथ पाकरमा गया था। पइस दिन ही सुपश्चन पसाप नमेप पर माया । समेण पिस्तरे पर सोमा-सोमा कोई पुस्तक पा रहा था। मोपा दोनों बच्चो को पूष पिमार उमेघ के धमीप बैठी-4ठी स्वेटरन पीपी। शिकी की राहवन निमर-सा मुखरित पभिनव पानोक पिवर हाया। पस मामो में मन चस्मास मन्दहित पा। पकाको सम्बोभित करके कहा प्रारुति का प्रकास बहुत पवित्र होगा है बीना मुझपो सूब इनसे मिमता है यह इन इत्रिम उपासनों से नही । मा मेने तो मुर्गम को कर दिया है कि मेरे लिए तो एक मतप मोपड़ी मनमा यहाँ दीया पोपा को उपहास भूमा। यह मुस्कराकर मोमो " भैया पर साही बनने पार फिर वीए की पमा बरठ ? परमेरे में ही प्रमाहिए।" मपनी भून पोस्सीकार करता मा पर मोमा "विचार तुमाराममा। सपयुष मनुष्य को मन्धकार में ही प्राय वर्णन करने चाहिए। पर में प्रमी माफ भिमा । मेरा माना तुम ममम गई होंगी कि पभी तक में मास्म ही रेता उमेस की बीमारी नाममातर मुमार मेरी बानागा पोड़ा पाने लगी। पाना ही पा। पयों भैया उमेप मा हाम है तुम्हारे इम परेका। मुझे तो नगस पहमे तुम्हार इस बारे में ही पूना चाहिए रमेय स्पिरपनमोधा रोबार दिन में प्रधागाया। बमने-फिले ममा यो पुश्मन मारा माना जैसे हमा ?" गुरन भी बीणा की पिरम पर मम मइ । मुरापन र पम् मर्म को हम गरा। प्रिमो परमाता हुमा दोघा "र्भमादी पार हो पात न्यातपंच कर सत्ता गए महत दिन हो पर पे। मुझे अपनी मिट्टी की याद बहुत पाती । बात यह है नमेच मनुप्प को पात्मीयों में रहने में दो प्रान प्राप्त होता है पैसा पानाद उसे कहीं भी नहीं मिलता ।" पाने सुरर्पन की बात को काट दिया "यह मी तुम्हारी सकीर्णता है। मनुष्य को प्रत्येक अनुपूल बनना चाहिए। या अनुकूमता अपनल की पारमा है। उप सीहाईकी परमप्तीमा है वो मनुष्य को एक दुसरे के साथ सापारम्प मुरर्पन कुष मन कुस रहा । उसने एक विज्ञासु की मांति पूषा "यह कैसे भव हो सकता है मैया उपाहरण के लिए मेरी पारी मित्रता बीणा मामी से रही चिों में क्यों हो गई पर कि मैं इसके पूर्व कई भाभियों से मिम पुकार साथ-साप एमी काह ?" पा ने रिहंस कर उत्तर दिया “तुममे पपनी मनुकमवा के भाष मीमा में पीघ्रता से पा सिए पोर मीणा ने मी तू अपने मनुएम पाया। यदि बीमा तुमारी बातमीत को प्रोत्साहन नहीं देती तो क्या हम उससे बुनना-मिमना उभिव समझते“महाँ कापि नहीं। इसलिए मैहर एप का मित्र बन सकता है। मैं हरएक पनुन बनने का प्रयास करता हूं मिप महाठा हूँ मना रखता है।" का विद्वान हो यमा। क्षम भर के लिए गहरा सन्नाटाका गया । बोरे मारे गए ने रोना प्रारंभ कर दिया । पीमा ठकर समोरपनी गई। भीषन दुपटना अन्न। सौभाग्य-दुर्माम्म में पड़े प्राम में सांस की तरह बोपन के साथ गए है। मनुष्य की पाणा से विपरीत महा कर-कम खिोर पार न पाने क्यों रमेश पीना पर प्रापरता दो श्या । प्रयोष पालक की तरा उस ऐप के कारप का वह पता भयाने भगी। उसने प्रपन पापको देवा-माता या तुरम्त समम गई। रमेश के विमाने का कारण देवम सुपर्सन है।
१८
प्पास
।
पड़ी। उसने अपना मुबगुटनों में पा मिया।मुबर्मन धरता उसे देखताए
यह माह सकी धमझ में महीमा पापा।
बीमा प्रामू पोकीहाज ठसे मोदी *सास पसौ सौ पमी पर म
भारपर्म करें कि एक मका पैसा भी नहीं मोड़ पी। मपि मेरे पास अपने पो
की सम्पत्ति नहीं होती तो गुजारापरला कठिन हो जाता।"
"मौसी ऐसी दिखती हो नही पीर कौन कि मन में एकरका
भगवान पाने । मुनि म पन तक मामा के बारे माप पावा हाप
पापों पर टि टिकारा मोमा पाया ठीक कहते पे कि ये मावेन
ति मन को सांत्वना देन के साइन है स्वप में कोई किसी का नहीं है।"
इसके बार मुबर्णन परेर तक गुपचाप महा। फिर मह बिमा कुष
होपमा पमा । भाग बीगा में भी उसे पमही कहा । यह भी नियम-धा
राठमो उमेपमपमय बारापोनीटा।
बीना हिली का उपायास पाही भी।
एमप ने कसो बरसार पूमा "साई मही।
"पाएका पार कर दी है।"
"पर्यो
"मोरम मरीये?"
"भूय तो नहीं फिर भी तुम बुरा मान गामोपी नामो एररोटीवा-
सदा की भांति इस समय उमेशपा पनम् प्यार ७ भर पाता पाउन
मनी तमनुपना सब पावन परितापीबाराही मति निर्मन पौर प्रेम
हो पातीपीएपीपा से एस-इंस कर बोलना था पर उपर पीए
पला पापौर दीपा दामन प्रतिय तार की भाति मनममा कर यही पार
करता मारमो बहुत पमनार है, पादमीगा कमगार है।
बीरे-धीरे एकमत समंद मुनि मारपीगा को मेकर उमेरा मन
प्पात पर पर करता गया। यह चिन्न यने मया। उसके सभाब में स्साई के प्रमाण पुष पिचिपन मा मना । पीपा को यह प्रभाठा पन्धी नहीं बनी पौर उमेश बर्मघामाके यात्री की मांति प्रपने को समझने मया। भाता पा जाता पापौर पापस पता पाता था। रात को यह कमीकमी प्राता भी नहीं पा । बहाना पा-माईपास रही है। नया बच्चा सुर गई महीने का हो गया था । उमेश को पन्या हुए ममी मनमग चार-पाच सप्ताह ही हुए किमीगा को महसूस हुपा शिफिर सतरा हो गया परमग्या के मारेबह कुछ नहीं बोली। और दो महीने फिर बीत गए । पर सिर पहर से दर एक प्रसप घोटा-सा संगमानुमा मकान तैयार हो पापा । मुरथन मापस पाने की तैयारियां करने मना । ममाले क्यों मानक पुनर्भमन से पीपा उदासी महसूसी करमे वमौ । अब पीना सूपर्सन को अपने पास प्रभिक से अधिक देखना चाहती पी । बह पो देखना चाहती थी इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। यह अनुमति की बात है। प्रमाव की वृष्णा पूर्णम्पेन मनुष्य के चारों पोर निपटी ही है। योगा कोममता पाकि रमेश प्रपनी माता पी को लेकर उससे पसन्तृष्ट । राष्ट है। यह विचार कर भी-कभी बह पत्यम्त पपीर हो उम्ती भी। क्या मई के लिए माही सर्वसह पली मुछ नहीं? ऐसा भी सोचा करतीपी। उस दिन यह एकांत में बैठी-4ठी प्रपमे दुर्माम्प पर रोबैठी । यह दुस्सहपुर पापमान नही कर सकती। उसकापति रसे बरामी प्रात्मीयता नापिन प्रतिदिन उससे दूर हावा पाए, यह सब से एकमारी सहन कर सकती है? पत्रणा भी एक सोमा होती है। रात के पियारे की तय एक सामगीना अपसाव से गिरी हुई थी। मुन्न पोसिबो यहा पाए सोया हुआ था। कमरे में प्रदेश वा । प्रदरे में भी कमी पाषा की मिसरिया सूनाई पा माती पी पीरे पोरे सिसकियां कम हो पईएविसरे पर मेट पई। भी सुपर्पन नेभर में प्रवेश किया। पुधारा-मामी। ।
प्यासी बीमा की सत्तर देने को नहीं हुई। अपने बिस्तर पर करारासमी। "भाभी 'भाभी बी माह कहाँ पमी नई ? पर सूना पौर पर गाया। नही पा से कोई चोर स पया दो। भुसे उनकी माता से मास पाएपाधोगबारे उमप का मामी!' उसने पोर से पुकारा।। - यहाई सोने के कमरे में।" सुष्यन उस कमरेकी और यया । मेराका फिर भी उसने पती प्रासानी से पसा पो भयोकिया हकमरे परिचित था। 'मा बाव?" सुबपन ने पूछा। "बिमय ठीक नही है।" "मों। "सुवर्णन म पो परे छोटे भाई हो, या बना सम्टे हो किनारी भाष्य में क्षेत्रम ऐन पापा बपौर मी निघा? पन पम की उपेक्षा प्रवारमा पौर मीन-चाकतिक दुलारें। मपता किमाण के धामत प्रकार की भोलि नारी का माम्म है।बम प्रपम भरमसाप उपेमा दुर्भाग्य पौर या पामा बमकर निस बीवन का प्रारम्भ होता है ससा तस्विना परमामय होपा यह पुरप नहीं जान सकते । परम्मत सिमवान भी उसके लिए मन्तिमप देनेगामे करीम पत्थरबिन पर सहमतावमा नहीबाता। एक महापमपान को पाति पोर परेनापम ही उसरे वय काहपासाची पोर मन मधुम कासापोरबो उसने गुम हास्य के साप पापा के सुपरसोप- मिए लिा मिए । रन उसके भुव पर पतपे संपर्प की रेलामो को पता रहा। प्रभुवन पित पन पाएर मुप पाम्तरिक पपा से पार पीला हो गया। 'बावषया?" 'माप सपने मिरको समका नही साते ! मह मुझे मौलना सात है। इमस पोरमें मुमविपरमारमा पाहिए।" मुश्मन हरम हो पा । परनी पैनी टि मे बीगा मेवर मागेको पाता हुमा रोना "गर्गे क्या कोई पिप बात पपई ? मुझे पार पटे पहर स मेश रेस्था में मिला था। मैंने सपा मी पाया कि भाभीबीकी सरियत नेह नहीं है।" "और सोने या सवर दिया?" बीमा महान् पृषा । "पपया । मैं समकमया कि उसकी चुप्पी का कोई विशप कारण हो धमा । तभी तो पाया। चीन रोग से बोत नहीं है। पर पर भोजन नहीं कर रहे। कारण पूचीई हो पाते कि पूंही। इस यूही का इस्म में समझ में सरपा असम" पर रोग से मुमसे मी ठीक से बात नहीं करता। मानोपानोपा उहिम पता है। 'भो पोरबह के झगड़े में ये अपने पापको सक्षित नहीं कर पा रहे हैं।" मफिरका मेर पास कोई उत्तर नहीं है। मैंने कोई अपराग नहीं किया। इस पर भी मन बीस बव पास को सिव दिए है। उमें यह भी सिव रिपाक में अपनी पसरिता सम्पत्ति भी पाएको रेपी पर यह मेरे पर का उत्तर देना भी पचित नहीं समझती।नके मन में यह परकर मना है कि मैने उनमें उनका बेटा धीन लिया है।" पर रमेस दो समपार? पेट भाकपी उस पर भी प्रत्यापार करने लगता पिसने अपने पोरन का बाप मामुप पमृत समर्पण सोपागों में पयामसिक साप पपित कर रिमा है । बिसने पपने अंग-अंग की एक-एक पत्री में रसके रक्त का मिषन कर तिया है, उस स्त्री पनि पुस्प सना पटोर होकर पल को भगम बना रहा है। के कोई भी सनी यातनाप्नों के समक्ष घना नियो पिएप मान कर परे प्रापको पवित्र पनि किमान पावार में मंत्रों को मायी बनाकर एक अपरिचित पुरुष को अपना ऐपता पपना शिवन् पपना भएप्प मालेगी? या स्थापत्याचार मही?"
प्पासो मह गिम हो उठी। उसने लपककर मुबर्णन का हाप पका मिमा 'मी बतामो में क्या कर यह पर अब भुम काटने को दौड़ता है। पौरतो पौर, गनप्पहार पार भयानकर से मुझे भम मगने सपा । पारसम एक दुषिता में विरोपीई कियौ यह मौका माता ममत्व की पग्नि में हार मुझे पान से म मार।" "परे मरे। म यह सा पाममपन कर ही हो ? समेण तुम्हें मारेषा, हिघि पूम्हें ऐसा पोषना भी नहीं चाहिए। गृहकमाह से कभी-कभी पारमी भावासकता से पमिक परेपाम परम्प हो सस्ता है, परखना भयंकर नहीं बन सकता। प्राबिर यह माय पति है। "पनि माईपोर बाप करिस्ते को मैं नही मामठी "पिकर मोती। मुर्भन यह सुनकर पाया हो या उसमे तीन धि से बीमाको रेया 4 उममें कोई महान् परिपतन या पपा हो। जैसे पार पाना पदपीका माबो कुछ दिम पहल पी। "तुम मुझे पसे पूरबों रहे हो में ? पाकिम कुम परम परिमेम के बारे में।" "कट सरम पप्रिय होता है। सोमोना-पॉरमो की नायिकाका में पहार सिहर पर दी। पाय से पांच रोग पहने रमेप निष्प्रयोगम हीमोगार कोरेत रहा। उसकी मंमिमा सीही पीसो किवन करनेवासान की होती। पि में भरकर स्मिरवा तन में निषमता पौर नीमहे उसके भयानक पदे की प्रतीकी और बात मी कोई विधप महीबी। बस पवना दीपा में फिर मोबन पाई।" "तुमरमा बम पीही से! रमेश ने सिर पूछा।" मुस्म में भरसोपिस में मापा किमाछ- मागापरपमा रमित मसमपरपुप हो गई। मरेगा मेने देवाशिम पोर परिवर्तन पापा मी पानि पम्पा शिलकी मानि मिलोपामिनाने मममम पपनी पुनी गोपुपरिष ममानिया या मुरेनका यह पबहार बड़ा ही प्रमा मना! मन मोहम मपी परमारी भारतीय नारी रितनी ही विद्रोहिपी यो M प्यास पंप म हो पर उसके विमान हप के किसी कोने में दुर्वक्षता छिपी ही रहती है। यह बिमाप्त कारदा मेकर गड़ी हाती है और विरोगी को ठेस पहुंचात-महुपाते वह निर्वस पर बाती है। यही कमरोरी मुझमें है। मकिन मैं तुम्हें सबसहा कि में यह सब गुम्म सह महीं दी। मुझे यह सब रुचिकर नहीं लगता। में पत्र भैया को तय किसी के भनुम नहीं बन सकती। उसके मनुहम बनने में मुझे समस्त तृष्यापों से विमुख होना पड़ता है। तमाहीन बीपन को में जीवन नहीं मानती। इससे तो मै मृत्यु को ठीक सममयी। सच पूछो तो मैं तुम्हें एक बात बाहना पाहूनी विमासना रहित बीवन जीवन्त मृत्यु है । एक बनती-फिरती बात है।" "मामी, म तिनी रहस्यमयी हो। मै समझता पा कि तुम बसी ही भूपिया हो वो हमारे समार में पैदा होती है पोर बोगन मर परिवार पासों की सवा करती-करती मोक्ष को प्राप्त बाती है।" "पाया की संगत का प्रमाव तुम पर भी पड़ने लगा है।" बीमा सामिमाम मुस्कराकर बोली 'मोम निनि मोर म्याण य व पसायमवादियों के पाय पापी समर--मनुष्य को प्रम में रामना उन सब को उम्ही गहनन करमामा! मझ पर मे शव प्रमाण मी गम सकते। मैगीवन का सुख मन पौर संगोप पाहती है। नपिन उमेस ये सब नो मुमसे छीन या है। में ।" पसको प्रा अमरामा पाई। कठ प्रयास सुवर्णन ग्मन हो उन से होकर उसने एक बन्दाई पी। पम्हारे पाप अंगलाई। तब बोला 'तुम उमेस से साफ-साफ क्यों नहीं देती धादिर बह चाहना नया है? उसके मन में क्या है? “तुम नहीं बारवे मुपसैन ।' पीपा सिलस हो उठी "पा पहन पुखी पौर विखित रहता। इस पर परीक्षा इसलिए मैं मान हूँ मम्मषा में कोई न कोई निणर्म निकासार हीरम मेती। मेरे बाप मे मेरे लिए बाने मर कोरिया है। “यह पर्व का अहम् मुझे मन्या नहीं भपता । म समझता है कि पापप में मिनार रिसों का मैम साफ करना चाहिए।" घमी पीने बस गराए । सुवर्णन या हार हमा कौतए पाहर मा मया।
मया "मोह ! रस बन गए है। ग्पबामिम माझावरण में उसका बम-सा पुटने ममा । उसे महमूसहमामि बिस मारी के पास पीपीईसन तिने मापा बहमारी भागकम मार्मिक पपा से पीड़ित है। उसमें पम पुरी । सुरत जैसे ही पर से बाहर निकलामैसे ही चमेस मित पमा। उमेप नगर जपाकर पारेरे में बाहो गया। सुदमन ने भाग लिया । पश "उमेस मया?" प्रसार में बड़ी माइति चुप रहो। मुरम मे घोर से पुमा “उमेरा !* फिर वह उनके पास मया। उसे अपनी पार पात रेतकर स्वप मेषा प्रकार की भोर पड़ा। “भर पा रहे हो ?" पूरते ही नमेध मे पूषा । हो तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते एक गया फिर क्या करता ?" पसने कम्प मिपाकरमहा "तुम इतनी राव गए कहानगर पपके पाते फिरते हो 1" -गिसके भाग्य में बानिया होता उसे वही पाना पाताहै। मेरे माम्म में पEt बाता हूँ तुम्हारे माग्य में पारर तुम पार पाते हो।" सुरणन उमेप के पम को समम पपा ।बसे पावरा सपा । तनिए कठोर स्वर में गोमा “यह युम मेरा पपमान पर रहे हो?" यो !"यह बनानटी विस्मय से पर बोसा “मने भाग्मवार की मात्र मी तो दम भपयाम सममने नगे। में अपने सम मापत लिए देवा है। फिर म मान मोदि पर पाने में ही मुझे मेहर भानर मिलता है। मुरम या उत्तर देता ! बोड़ो रेर तक सोपहरोमा "मगत मुके होपपनीत का निधाम पणेना हो" 'महीना गुपोषम पुारे माग्य से विरासरूप तुम्हाण मा पार सम्पत्ति न मो का प्रमोप पौरन का मेमइस पर भाभी, भाभी भी ऐमी पियका मन पप भर लिए भो रेसर मे दूर रहना नहीं पाया पौर देवर भी मन म्यापार को पाकर मामीमा मन बहमा दा है।" "यह सोई दुरी पार नहीं है। मेदिन रिम दोन में तुम र पे हो कर मारमा पर है। उसमें पापकीमाप पा रही है।
प्पासोपट 'पाप! एक प्रश्न-मा उमेपके मन में मागापौर निरमे प्रोठ दान से राब परपोमा "प्रबाइस बरती पर पाप पुम पा?यामेरमबीन मान्यतापों के साथ समाप्त हो गया है। माना मुममे ईसकर नहीं बोल सक्ती तुमसे बोप्त समती है। मै बर तक पर में रहता हू तब तक यह मुराराठी महीं। पली की पार प्रवृत्ति पति के मन में कैसी भावमा उम्पन्न पर मम्मी है ?" पक्मा इवना करना चाहि सुदर्मन उबल पड़ा। 'चम नीता पर स्तर पर हो। "पौर तुम'-!" कहकर उमेप चुप हो गया । मुदरत कोप से पोप उठा। भादी से परम उठाकर पवा पया। पौषा उमेस को देखते ही मनको संभाममे ममी। उसने रमेश की मोर साहनही से उसका पागम म्पर्ष है। उमेश पाकर वितरे पर पामया। एक-दोभार उसने यमाई मी। प्रग्यमनस्कमा बस्न पर प्टि माना हुमागामा "मुबर्मन पाया था?" 1 "इन तीन दिनों में बही तो यहाँ पाकर मरे सुख-सुख की पूर्ण करता है। मापके लिए वो मै मरी मान हूं।" "मरीमही पण मरोमी यह सूरःम में मारकर ही दम मेरा।" उमेप की पूषा बोर बोसी। पाचारामयों मारेगा मारेपी पापको मो न मासूम क्यों उसे मेरा सूत्र नही पाता है। मेरीगोमामाम मतमो।"पापाप से बाहर होकर पिस्ता पड़ा मेप मो को एकपम भी सातो पानही होगा ही कहे देवाई1" गौमा सिमक पपी "प पा हो मगा उमेस सास ने हम दोनों के पोष रोकारवादी है। ऐसा मासूम होता तो मै पपने पाप से पाप पम पाप परसे उसके यहाँ पोरी मारी मां की इमा पूरी परती। में ऐसा उपेक्षित पीमित जीवन यापन नहीं कर सकती। इससे अश्या किम मुझे प्पात पान से मारपो।" "सा तुम करोगी बसा ही दम पापोगी।" "यदि ईमर का म्याय इसी मीति पर अबम्बित होता तो मुमें कभी भी सुत्त नही मिमता। परन्तु पिरमा म्पाप भी पार के पूजीवादी युग की तह मेमा पौर अनुमान पर दौड़ने नपा है । मुझे एक बात बवाना पाखिर तुम्हें सिकायत क्या है? जनहीं। फिर मुझसे पहमे साम्पबहार क्यों नही करते?" मम प्रान का उत्तर तुम स्वयं को। बीषा पुप हो गई। उमप अपनी रो-बार पुस्तक मेकर चलमेनपा । पीना ने उसे रोककर कहा "पार म यहाँ पर पामो मुझे र मग रहा। रमेष, मान पापो।" उमप उसे परमारकर बोमा मारत होतो मुरर्पन को बुमरा हो । में प्रय वापस नहीं पाऊंगा।" बीमा पर मिसियो टूट पड़ा। उसके ठन-बदन में पाप तप गई।बहनराकर बाहर कीमोर भागी- उमेण | पर सपेराबाहरपमा पयावादीमा पापस मार पपने बिस्तर पर निसन होगर रोपड़ी। दूसरे दिन ही सबेरे मौरपनी ने पाकर बताया 'घोरे गाइफम रान ही कह पचापस है। उन्होंने माताए मुमे पापरे लिए एक संदेस मेगा है। उन्होंने पाउिमेयने मरी नीयन पर पर मिया है और यह प प्राप दोनों के जीवन में बिगर रम पाल रेमा इसलिए मैगाहामममान माप रोनों पति पानी को मुणी रत। पापा पापाम प्रतिमा को तरह मुरन रामदिरा मुननी हो। उसमें अपनी पाद में मुम्न का उतार दिया । मुलूची-बी रोने मग्रा । पीपा मे वाटप पण्हेरा-नीन पण मार दिए। मौकरानी प्रतिम होकर अपनी स्वामिनी प्यास देखने मगी। पीमा भापकर अपने कमरे में प्रा गई और फूट-फूट कर रो पड़ी। रोने से परकाय हस्सा हो गया तब उसने नौकरानी को बुलाकर कहा "तुम सुपर्सन की नौकरानी हो इसलिए प्रमी से दहें पट्टी मिनती है।" मौकरानी गोगारूप के सामने भूगी रही। धीरे-धीरे पनी गई। मुम्न के साप पुए भी रोने मगाथा । परमीपा भावहीन मैठी-4ठी सन योनों गों को रेस रही दी । उसकी ममिमा कहदी पी किपाकहीं पौर। पौर है। उस दिन बहन के प्रमावा हा महामना । चमेस को सूबसन के पान कीरबर मिम मई मीरपत को बस-माहे रस बजे सीट कर मामा । उसका मह भयानक पापीमा रमई । सेफिन फिर क्रोष में ऐंकर मोमी 'प्रापको इतना मीचे नहीं मिरमा पाहिए।" या पाती हो !" “मापने मुरर्सन के चरित्र के बारे में बो भी ममत सोचा है, उसके लिए पापको उनसे ममा माननी चाहिए। मधमा मांगू? बह बम नठा। हो या मै प्रष्ट सी? क्या मैने कोई गुरा काम किया है ?" यह चिस्माकर बोमी। "हा-हा स्टा है, परिव है मीच है। "प रहो महीं तो "माहीता! पार उमेश ने सीमा को चार मात-यूसे मार दिए । यह विस्ता-विस्माकर कहने नयी "माणे, पौर मारो मै कहती हपान से र रो पर मुझे कुस्टा मठ कहो।" "वस्टा स्टा है।" कहने के साथ-साथ उमेस ने दो तीन मुके गाना पौर या दिए । मोका पिटते बरबमे भी रोने ममे। ऐसा भयानक मप्रिय एस्य हो ममा पा से चार प्रणियों को विधानमन्वकर पटावे घोर रिए हों। भमा पात हो गया। रमेघ पत परयतने भगा।
प्पास भीमा के मन में उमेरे प्रति दुपामनापों का मोत फूट पड़ा। प्रभय स्वयं माम पर वासी भारतीय नारी अपने पति के प्रति की प्रार्थना करने सगी । यह देखतामों करेम में प्रमानुपिक प्रत्याचारों से पीड़ित ममममरी विमाप करने मगीताक्तिीस करो समाप देवता सीता-सो सप्तपदी थी का संतापमोसमा सके। यह ममम सकियों की इमामों में जिस महिमा का गुणगान मिस प्रमौलि सत्ता का विम्बर्सन है वाइस प्रताडित परनी के प्रभु का मुकाबमाकर समते है? युग ममे ही इस सत्य को स्वीकार न करें पर सबको मानना ही पड़ेगा कि मन्तर से चमकर, प्राध की माति निष्कनुप तप्तका एक भी भघु एकान से महान है उसका एक मन पन से पती पहिस्सा के रिपुम विमापसे कम नहीं । पर पर मोर पत्रकार पा। रोते रोते गोपने सो गए थे। मुररे के समान पीणा उठी। संस्कार समारपोर बिगाह के पवन उसे पहीन पगारमर के प्रमापाप नही मगे । उम मगा किस्सीको निर्णन करके पुस्पापीम बनाने पाना मनीपी नारीपाति का सबसे निरसी पर पा । उसका मास्न पाहत सांप की मांति मारकर एक बार फिर उमेश से मरना चावाया। समेमन उसे एस्टा पर्यो कहा। परम्पर लिए पसर पान पो भयकी ससके पति ने उस परहाण उठाया तोरनारीत्व की सीमा का सम्मपन कर पाएपीमिह मारमहीबासमती महीपा समी। प्रायरे में रमेप पावा। पीनापस कसे पुमारा "प्रापने मुझे मुस्टा पर्यों कहा?" "मनामी में पिभी तुम यहाँ से पीणामी पर्ता मेरे हाम से किती पायूम हो पाएगा?" "मैं मरमे को पारस्पर पहपे हम बात पानिप पौर सीरप पाहती है। गया यह सपा तुम्हारा नही ?" "यह सपा पहले हो ?" पीपा पर पहा! दूट पा।
प्यात पंच "सही करता हूं।" गौमा मुन्न हो गई। उसकी प्रारों के पाये मेरा-सा था पया । यह म्सानि के मार मधेत हो गई। पौर मेप एक कोने में बैठकर सिसक पा। मह कितना मागा है? बीपा दूसरे का पाप मकर भी उसके ममड़ा करपी है। देसी निर्तग्य पौर पापिष्ठा है यह। बात विधिमपी। बन्नों से तम पाकर उमेधने प्रपना पापरेपन पय सिया पा। पैसा कि परिवार प्रायोजन क लिए नियुमा माम निरोषक गनटर कहते है कि इसका मसर दो माम से लेकर छह मास के पार तक भी रहता है। इन महीनों के बीच पर्म रहने का भवरापना पता है । कुप महीने पूर्व चमेपर दो फोम हमावा पर फोदानही मापरेपनही या मया वाटर ने पसती से उसे यह नहीं बताया हिपभी सतरा किसने माह पौर रोया। पीठ ठोककर हावापो देपर हिल में तुमने यह पापरेशन कराकर या मारी पोप विपा है। और उसके ठीक इमरे महीने ही मीमा को मर्म ए पया। बार में पाकर उमेध ने गफ्टर से पूष तोराफ्टर ने उसे सममा पिया कि छह माह तक वीर्य के पीटानु पर्ष के । पीपं में मो यो है । गभ रहने की भावना बनी रहती है । रमेघ ने गटर इस मन को दूसरे ही पर्व में मिया । उसने सोचा कि रामटर उस पहमा गाई। मो को मार मोपमा उमेरेमन में मोपा के प्रति गायीपी पह मया कहकर प्रमर होमे ममी। मुगमन का अपने से पत्रिक मोपापर प्रभार देख नमरे भीतर की हीनता के मुंह बामे सांप की तरफ्तार राख । एप पूमा भरी परिप उपके मन में पनपती यई । उम हर पाउ में सन्देह दृष्टिमोचर होने मगा। तब पोरे भीरे उसे पुरपन की हर बात में माना की पंच प्राने समी। मक बीमा माषपान हो गई थी। रमेश धन की दीवार पर निरिणापा। धीमा मुस्से में सोच रही थी--पहसिनामीचे सतरगया है। हमाम्म .. प्पातपंच खोकर यह मुमेस्टा कहता है। उसने रेखा कि उसकी मोह से सह पफ पा है। मह पीच पड़ी-रेवो यह चूम मापा है। यदि मेप सून हो करना चाहते हो तो मो मुझे रीचार से पारे। 'म कहता हूं किन चुपचाप मेरे घर से निकल पा नही तो सून करने तक कीनीत पा पाएगी। “यहां से निकल कर पाऊं कहा ?" जिसका यह माना है, उस मित्रपाती मुर्पन के यहो।" 'उमेध!" पामी मार पुत्री ने अपनी बेटी के सच्चे बिछोह को देता । पर मुस्करा रही । सरानी को लगा पैसे पर ससका कन-कण उसके ही रात से रपा पया।पोकर प्रत्याचार, मिप्यापारका सामना करने ममापीमा ने बोर कापाटा चमेपरमास पर मार दिया। “यायला तुम्हारा है तुम्हारा !"परिकारपूर्ण स्वर में बोली। रय स्वरको कोन समता ? बह पिचपका। समीप एक दूटी मनी पड़ी पी। उमेश ने उसे मकड़ी से पिटना पुरु कर दिया । बीमा पटाकर कह पठी 'भगवान पुझे उम मे तुझे गरम में भी पहन मिचे।" यही प्रादमी मौत की मारिम प्रवृति बही पुम्म धिमाफ मावि एप्समना भरा एलान । बीमा पोत हो गई। उसके सिर मै नगने सपा पार पड़ोसियों ने पहनी । बार सुना--एक पारापमानवारिमेय की तारा यमीन पर पीपाप इसके बाद मीना के मन में पोर परिवतन के पारम मंग्यने भने । पहले की वृप्मामपोपीणा मर गई । सास पापा की। मीमा इस्पात में भी पो। उसम्म मर्मपात हो गया था। रनमार प्रपिहोने से मागासहोम वी। सभी उसे पाकार ममे । मने भी पभी-कमी पारपती भी किसी ने प्रपन परिपा मारा है। बीमारा पानी थी। कभैया कनी-मी पापा करते थे। रम्होंने पीपाको पाएमतिकहा । प्पात पर यह काफी सस हो पईपी 'तुम्हारी गस तुम्हारे दोनों बच्चों को लेकर अपनी बहिन के यहां जा रही है। उसका कहना है कि वोकुल ममपिनी भपने पति को मार सकती है यह अपने बों को कैसे गिरा रह सकती है। मधि बह उसका कलामहीं मानेमी तो वह अपने बेटे की हत्मा का प्रारोप उस पर लगाकर केस पहाबी।" बीमार मन की मारी ताप उठी। उसने नियमित सर में कहा गया माप यह मान सकते है कि मैंने अपने पति की हया की है ? मेरी बदमाए भवस्य पी। पर मने चहें मारा नही। नन्हें तो भगवान ने अपनी करनी का दर दिया है। उमेघ ने मुम पर गुस्टा का मास्न मगाया पौर साप्त ने पति की हत्यारिन कहा। पर ये दोनों मरेपारोप है । पाप विस्वास क्यों नहीं करते?" 'मुझे तुम पर विश्वान है। मेकिन मरितुमने अपनी सास का कहना नहीं माना तो तूपहा फप्ट उठाना पोया।" "भक्ति में पों को सेगसी पति की मृत्यु के बाप एक विमा के लिए उसके बच्चे ही सर्मसभाप मुझे अपने बच्चों से घर म कीथिए, मैया । पनों की मां से पिनग करने का मुस्वर पपराब में वहीं करना चाहा। मुझे किसी के पिम दुजाने से साम ही क्या ? पर तनिक तुम सोको यदि तुम्हारी पास ने माममाप्रपालत में पेप कर दिया तप इन पन्नों का भविष्य क्या होगा?' "क्या होगा?" "मो नदिए इए पाप की भारा मठरी उनके मासूम मनों पर सरा रहेंगी पौर यह पाप की प्रापि उन्हें कभी सुख से महीं पहने ऐपी।पाका सर करमा से मोड-योता। बीपाठोर बन गई। सास मे ससका मुंहतक नहीं देखा। मपीमा के मुंह परपस कामिष पोतना चाहती पी पौर मीना ने अपने पन्नों को पूमना-बना सौकार नहीं किया यह ऐमी बन मई सौ पाया परनी होती पिने कमी प्रसव किमाही महो।
भ्यास पास पीनही पपने रोनों पोत्रों को लेकर रापपुर पनी गई। पीगा की एक टीप टूट ईपी।ग पी पट्टीपनते ही वह पर माई पौर उसने पत्र की समाइ सिए बिना ही अपनी सारी पक्तिक सम्पत्ति (मगर)को अपनी सास को मेंट रेपी-पर के पट्टों सहित । तब उसने को कहा--"मुझे इस शहर के प्रमापा कहीं ऐसी ममह का काय रिसा रो पहाँ मेरा अपना कोईमहो।" पारे सरयू के माम चिट्ठी मिव दी। परजू की पत्नी पिरिया का सम्हारिनो देहान्त हुमा पा वीणा पाया मार परलूपरभा नई। धीरे-धीरे पीपा माय भूल गई कि उसका विगत क्या बा। उसका प्रतीत तिना मपुर पा। उसके बचे भी थे। पुस-स्वप्न काम यों के साथ दूर-दूर तक उम्ते रहे। वोगा एप में राख का मानद पाने मर्गी। गह पानसीपी किसका इस संसार में कोई नही है। तब संसार के प्रति उसका कठोर पाहनाहीमा । उसकी भवानबरत से अधिक स्पष्ट हो गई। उसका मान विपमय हो गया। स्तना ही नहीं सम पपने प्रापका पीय देने मनी। मारमपीमने उसकी अनुमति के दृष्टिकोण को होमल दिया । या पारमहस्पा मीरसती पी मेरिन रसा सोचा था कि पारमहरपा में पी एक मार पर पर मिए मिनी पौर उमे पापवत ना की प्रापपासा पी-धीरे भारे विमनिन भर जमनापमहीन मीन की पपापसापार प्रव के निमी प्रेम सोना। प्रतीत को स्मरणार मीणा पुसरित हो ग्ठी। उसके मात्र प्रभूमों पर पाए । सो पपरों पर मुसान पिरक उठी। पपारपानन्दलेखना। भनिनीय परम मुष-परम दुण । सुगमा रामू मरी के प्राह मै मिरिकका मानस पापा मनात प्रितिरकापमा मागिन परा पारी मिशन की सए पपनीमा पम पानिपानिपर यहा पर।
प्यास पंड
पीपा उप पार देखकर मन ही मन बह उठी, पनाहूत प्रबुमासी देवारी
कोममांगी रितिक रोगमात् सर मनुतरा करहा है।
फिर मह उन्मत्त-मी पुमगुना उठी-
मेरे एक में मुड पाया।
दिर यौवनम्न मतपत ।
पर में पारी निस्तारता भी वीणा किमको पीडा पहुंचाए, यही सोप-सोरकर
माप्रपने को पौपित करणीपी।
बीमा रिपिण और इस समय पीर म्ययामयी।
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चक्र
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बे-वैसे मनुष्य म्पपा है उन्मुक्त होने की चेप्टापरता है वैसे-वैसे गया उसके चारों मोर बेम की तरह सिपटती पाती है। पिरिना की स्मृति सरयू के मस्तिष्क में दिन प्रतिदिम गहरी होती गई। उसका प्रभाव कमी-कमी इवना पीका पायर होने मगता था कि उसकी इभ्या होती पीलिपीमन के समस्त गोरख पन्नों को धोकर संन्यास ग्रहम कर मे । मेक्मि मिस गति से यह विचार उसके मस्तिष्क में पावा पा उसी गति से वापस मा पाता था। कोई-कोई मुवक्किन प्रामाणापा मोर फिर सरन बीवन की पितामों से मुक्त होकर फाइनों में हो जाता था। राधिका पम्पकार पिनी के प्रकाप में विलीन हो या पा। पवन के पीवम कोरे कमरे में मा हेरे। गप्प पाई समाप्त कर सोने की तैयारियां कर रहा पा । बीगा उसे सुमा- कर सरपमरे में पाई । सरयू ने बीमा को प्रातभरी दृष्टि से रेवा बीमा में मम्द स्मित से कहा "पापको पारषय होगा कि में इस समय मापके मार्य में विष्ण रामने क्योमा मा। "हो म पाहता हूँ कि ममो तुम मुझे पिमहम पकेमा छोरो, में एक विषिष समस्या में पममा पाई।" "मुझे बताए, पायरम पापकी मार पर सई।" सरयू मीणा की बात पर पुप हो गया। कई या न पहमार पड़ी सोचता था। फिर बोला-बात यह है कि एक पली प्रपने पति को पोना बााती है पद पति मेपनिकटका मित्र।मने घससे हवारों पए कमाए है,मरीया किससकी सतरची एं। बीमा को यह समझते दरमही ममी कि मामला पसीन। "माबिरबह अपने पति को छोड़ना पर्यो पाती है?" बीमा मे पूषा 'मान तो प्रारमी पारमी नही है।"
प्पात "मान मो मापंमा है इसरो गर्ममा तो मही हो गया ? मै उसके देखने की पति तो समाप्त नहीं हो पा 'स'मान मो' से सरप का दोष नहीं होता।" "उसे पपमा पति पर मही! कारप?" 'नही मारी की पिर सम्मा पौर प्रवृत्ति ! उसका पति गुमा है, पाय पर्प कापौर महासवर्षकी। "इतना पसर। बीगा के सर में अपमामिमित विस्मय पा। “ऐसीबाव नहीं है बीमा । पहले म पवमा पिमता को बताया मुझे अपनी मौसी गाव हो मातो पी। मौसी पपने पति का परिरमान का त के भर में चमी प । पनुपमम्प की प्राप्ति हो बार बार तु मे समी पुनों को अपना मिया । यह मौनी को पीटता पा मारवा पा कोस पामिमा देवा मा सकिन यह सीपी प्रतिमा बनकर अप पति का हर प्रत्याचार सहती थी। अक विममा भीलनी मानसिक पाएं पहफर भी प्रधम्न मरन राती भी।" "हर कोई विषयमा पी, पापकी मौसीरेखाय पम्पपायों कोई कितीका पुस्म सहे?" बीनारे पपनी राम बाहिर की। "हो पतके एक पपादिरापा।" पिर बात साफ हो पाती है। यदि यह सपा नहीं होता दो पा प्रापकी मौसी मेनका गुस्म साइटी ?' "महाँ, पिर वह अपने पहने पति ही भांति मंतू को भी घोह सती दी। तन्नि उसके प्रेम को पारपामरामहोपान परवाना कि मेरी मौसी होवो सबनी है।" 'ममर पनारकीबार पोरिए, नाममा धोती।" "बस तुम 'रमा मामाषा यह को नही सोपली हम समीरेयोग पास्मिर बम्पन भाम को भी पस्तु होती है?" बहकिगया। गुस्से में मर बीमा नगी पान पाप मोमी "यत् मासिक पम्पन की बात भी पूर्ण पा में प्रागे पृछ माती यह बापन मिल पामों से रामा पाता है?"
५१ प्यार "मावना से।" गोमा बिसविधाकर हंस पड़ी "वमी पति ने मेरे परिण पर सन्नेह किया मी सास ने अपनी को पति की हत्पारिन कहा । मी एक मां के सामने समस्त ममता भूमकर चोर-मूरब की मांति प्रबस पोर तेजस्वी बन है। कहिए, पर बायु मे सब भावना के मामों से ही हुए है ?" सर माता पा "ठो तुम समनी हो कि भगवान भावना और प्रारमा ३६नहीं ?" "हैपयों ना ? हम एक दूसरे के प्रति प्रच्छी-पूरी 'भाबनाए रखते ही है मन्दिरों में दो प्रतिप्ठ्यपित है- 'भगवान' के माम से युगों-पर्गों से पूरे माते पा मो हमारे इपय में पाकन है, उसे पारमा की संभा दी गई है। मेकिन पाप इनसे कोई माय मर्प ही भगाते ?" सर उपमहीं बोना । उसने एकटी सांस भी। "माप चुप क्यों हो गए? “म पुप इसलिए हो गया कि प्रारमी प्रपना दुखा दूसरों के सामने क्यों रोता है ? महा कोई खटावा ठो मी फिर भार मांगने की क्या जरूरत सरसर में रोप सष्ट पा। "प्रापका कमाना ठीक है। पर हम भी तो एक पाठी कर पाये बात-पात मेंबात निकामने की बोप्रवृत्ति है यह हमें पासर विषयावर कर देती है। पापने मुमसे मार मापी में देने को तैयार । कहिए ?" पीपा के होठों पर हस्की मुस्कान पी। "मन काने की कोई प्रावश्यकता नही है । मुझे मय है कि तुम समस्या को पौर पर न बनायो।" *सौ पापडी छ । न मैने पहले प्रापको पिया पिया पा मार न प्रमही संपी। इसके बार मीमा ने उठले हुए कहा, "एक मारीदुसरी नारी के मर्म को मच्छी दए समम सकती है। मेरे पाते नहीं अपनी नौकरी के नाते ही एक प्रामा दीमिए। सामी-मस्तिनी कोतएउमे मै पाणी!"
. प्पास सरयू पपनी पैनी दृषिमाकर बोला "तुम्हारे विचारों में गड़ी परिष रखा है। कभी मुझमे प्रपिकपात करना नही चाहनी पौर कमी मुमते काव करते माती ही नहीं। ऐठी अस्थिरता हितार सिर नहीं हो पाती।" पीगा मुस्कुराकर योनी "मह बोमने पौरन बोलने की बात महत्वपूर्ण मही है। लेकिन कभी-कभी म मापसे पति पार हा बानी । मिरिया के मरमाने संवाद सापके मन में मी परिमरता उत्पन्न हो या है। हमारे पहने माप को मे बड़े मुकदमे में परमान मही हाते पे ।सा कि पा भैया का कहना है कि विक- पर पाप मूर का जप साबित करने के हो मामले मपन हाप में मिया करते है। पार को कोर कापम म होने देना हो पापकी विधपता है। फिर इस परा-सी बात पापम पिपनि होगा पता नहीं।" सरयू मागावेघ में हो उठा “से तुम परा-सी बात कहती हो। एक मारी पो पम तर पपने पति को रेवता की भाति पूनती बी मा एकाएम से छोपने को प्रस्तादो मई मौरतुम दस सापारम पटनामाव ही समझती हो? मेरा मित्र बसमाप्यापारी है, उसकी इग्गव पूम में मिम पाएगी। बहारा ?" "उसकी पादी से हो?" "परीवी पा नही कराठी? भाजीपाप में अपनी बेटी बाते एक गीरहमती पीकन उसका बाप पाया पा। रसन अपनीटी सामन अपनी पगारपार प्रना की रिपो मेरमापको बिगाड़ रही हो जो तुम्हारे माप्प में मिला था यह तुर्ग मिल गया। उप महती विममा ने पपा ग्ता रिया पराकर बोसी दिवार की रात बेटी जीवन में बड़ी गोमेटी मन पगार भीमाश्मी का धनरी पाना मेम्नि गईहर एयरीनोरकरापानी। * पापी मेक्नि परिमापी विमता मे पारमहरमा रमी फिर यह भी महापापी।नौरपोमिनुपकी मरले गनिपिग्मी रया ६ पोर मरतोरिपाचीरान । मुझे पर बाल पपिर मन मगीर- तापान है। सिमाना महमा पाउरे पिता मा ठे, स सही रमत नहीं यह मादमी बीते जी मरा हुआ है। निममा ने उत्तर दिया ही पिठागी प्रापाति से सोधिए, एक पौरत पार पपनी एयरपती वही रख कम मापके समान में स्स बदमकर पूजनीय मनपाती है। पहिस्सा ऐसी ही मीई महासती है। कई सेठ दिवासा निकालकर मार में धीमही माम बम र पूर्ववत् प्रतिष्ठा पा गाते है । बेरमाणामी सूरपास भक्त कवि हमाते हैं । राष्ट्र स्मीरिमादिकवि बनकर रामायण की रचना करते है। यहस्पग्नि प्रपनी मामी गवतात्कारकरदेवतामों के गुरबनमाते है। ममपान सकर मोहिनीस्पके हस्म होचानका मी गाम कासना पीनहाकर मामले होते है । कुमारी मेरी' कौमार्य में भी पुत्र वसल करके करोड़ों की मो म्हसाठी है। फिर भी नमको सारा समायग्गव की दृष्टि से देखता है। सिग्मत कीम्पाम्या पाप कर रहे है, स मत की कसौटी पर बरा इस परती का कोई भी पति तो पपा उस पाकाप के वेठीस करोड़ देवता भी नहीं उतरेप । यदि से इम्मत के भय से मर बाते तो ? उनके नाम से पाये शुम्प का प्रस्य पावरप छापामा । भव बीवन प्रभिक महत्वपूर्ण है। मनुप्म मिम्वा एकर प्रपन कर्मों को भुभावा अपने श्रीगम को किसी न किसी के लिए साफ करता है तब से पुन प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। इसलिए भीपन महान है। उसके पिता को पराजित हो गए गोमा लेकिन उनाने एकाएक उपमकर दिममा नाम पर दो बार पटि रसीव पर दिए पौरहा की तरह परे पए। ये मसप्टसर में विस्मा ऐप, 'यह पपने बाप का माम निकासेमी बार निकालेगी। पाटेसाकर पिमसा प्रेषित नहीं हुई। गवा रसका अवश्य भर पाया। पह कापसे पार्को मोसी किपाप करणे माता प्राणी पिठना निर्मप होता है ? यतबेपने पासा इग्यत के मिए से बमीन-पासमान एक कर सम्मा है। इसके बाद मने उस धमकामा । कहा यह किसी के हक में उचित नहीं रहेगा। पर यह नहीं मानी । उसका एक ही उत्तर बारिमें कहां प्रपने भापकी रक्षा कर रफीम साहरा माप वह क्यों नहीं समझो कि मैकमनोर पोरत है। फिर यहा के मातापरम में में कोई महापाप परपी वो? इस महापाप की म्यास्पा उसने महीं दी। पौभा कम रात में सारणमानी सहापिलिधिन रहा। तब मुझे गिरिमा की
દર
प्पासस
बोपार पाई।"
हठात् वीगा मे कहा।
पहमारय मममेडी तारमी तरह उसक दिन पर सपा।
'तुम को निप्दर।। सरदरम्त योमा "तुम पमे हुए एपको पती
हो । तुमने गिरिना को नहीं देपा । यदि ऐस मेठी तो तुम यह कहते परा भी
संकोच नही होता कि उसे भूनना अत्यन्त कठिन है।
“फिर पाप मरीबाव मानिए।
'पहमपा ?"
"दूसरी शादी कर मीपिए।"
पर्यो ?"
"पिरिना का प्रभाव कम होता-होगा समाप्त हो पाएपा जिसमे प्रापको
मानमिक माराम मिमगा। फिर एक महीम के मिए मर स्थिति का और एना
बहुत ही जरूरी
नमाने पर उसके इस कपन पर प्रशाम्त क्यों नही पा । पपीर-मीर
प्राति से बीना मी पपलक देखता रहा । उसी दृष्टि में पहस्य ममक पा
पारिरिप संपर्प हिमोर मारहामा। प्रधान सरयू मारों पर कुटिम
मुबान कि उठी। पर मोमबार मा स्वर में दोमा "प्रस्ताव कारिते
तारीफ है। मुझे पस्त्री ही विवाह कर मेमा पाहिए। पर मैंने तय किया है कि
विगाह उमाने पगा पो मुझे पापी मस्ती । म मानता हूँ कि यह पुषती
मग में विाह करना चाहता हूँ अपने प्रापमे बहन ही पूमा करती। पर में
दम उग ही प्यारपर मरना।
पापा स्पर-उपर तारने ममी। पबयर बाती पर पुषी कौन है?
4-1 सिमी-गी पिरीयोमा पर, मरिमी में पापी मही कर सरती।"
मागेरो पिग"
'पौर पिपुर।
पावर । "मै विवाह के दुष्परिमाम को देख पुकी है।" "म विवाह के परिधीम पानम को भोप पुड़ाई। 'मैं परिवहीन पोंकि मैमे अपने पति के होठ हुए एक प्रम्य पुरुष को पपने मन काय बनाया।" बीमा प्रपना बचाप र ममी। ममै उससे मी पतित है। मैं सदा पिरिया को यह पर मोसा रेता रहा कि मै बामण ई पौर पर यह विवाह के पहले मो बनी तब मैने उस इस इस्म से परिचित कराया कि मै एक पोगी है। क्यापित यह पोगा उसके मन में पम्पि बनकर पटक पगा हो पोर पापन की पीड़ा से चम बसी हो।" भीमा सरजूको इस तरह देखने मपी पैसे बह प्रत्यन्त एस्पपूर्ग है। यह शिप से बीमी "फिर मुझे निष्ठुर कहते हो? मै पब इस नतीचे पर पहली ई कि तुम बोगी भी नही हो बार तुम कोई गेम-प्रमार हो। में कत ही महा से पसी बापी। मुझे तुम्हारी नौकरी की धरूरत महो।" यह पायेस में भर उठी। "मह क्या कह रही हो ? सत्य के उद्घाटन का प्रारम्म तुमने ही किया पा। पतो होड़ में पीछे रहना मही पाहता पा। 'मचा दिया नहीं तो मै मासे पानी कि प्रानी कितमा धम-कपट और मू-सब से भरा।" " में भी यह कैसे मानता रिसे तुमने मारक क्षिा रखा था। बीमा हम एक दूसरे से बो पापी है । सम्मानित पातकी । फिर भी हम पछे वस्त्र पहनकर यतेोवापि मोग हमें पहचाने नहीं। तुम तपस्विनी काबीवन पवीत करती हो पौर में प्रसिस वकीन का। यचित् मै चीप ही सरकारी नप पद पर भासीन हो माः प्रौर मुझे न्याय करना पड़े। "यरियाय की गारमेर वम्हारे हाप में प्रा गई वो मै समझती हूँ कि सत्य ऐसा होन्ही।" पहमी बार सरको पानद पाया कि उसने भीमा को परारित कर दिया। उसके कौनस समठ मह पहीन सदों-सौ हो गई। पहली बार उसके मन में सरजू प्रतिमा का भाव नरम मा । अपनी बीव रेवार पर में एक बार फिर प्या को "यो वीमा, दमने क्या सोपा ? बोमो विपाह करन को तैयार हो ?
प्यास
मुभमें पार तुम काई प्रभार महीं। एक ने पानी होपर पति को पना पौरसरे
म परि होकर पत्नी को पोवा रिमा। रोनों में एक-सा दम फिर उसका मुमर
प्रायश्चित्त क्यों नपर?
बीमा निरुतरही। कोप रही थी।
मरयू असगनल करवा ही गया। पीमा उठकर पनी गई।
पर राज विशेप गहरी हो या पी।
बीमा ने लिममा से सरजू को बिना पूछे ही मेंट की।
अपने परिषम में उमने का मुफ मापके पति के मित्र कीम सरयू बापू
मे मेगा है। उनके कबनानुसार एक नारी मरी नारी के मन को मन्त्री तप
समझ सकती है। म पाप मन को नहीं गेष्य को सुनने माई। या या
निषित पाप अपने पति को वसाफ देंगी।
बिमता बीमाकीमा वाव मुनकर पाक पड़ी। प्रारम में बीमारामो
विधिप्रपन रिया पापा उसने दिममाकोबरा सारषानमा दिया।
बह बीमा त पूरी हुई बोमी मै पापके प्रश्न का मनता नहीं समझी।
प्राविर पीन साहब ने मुझे गमम या रणा है? मैंने उन्हें स्पष्ट कह रिमा है
मिमहीने का प्रपरन म्पर्य है। में निस्सना पाने मौमूदा पति से मुक्त होना
पाहती।
“पापके विचार से सहमत हूं।"
"पाप मेरे विचार में पहमत होकर बोस साल की पोर मे परामत गर्यो
करनमा
में सो नीमरानी हूँ। हामी पी भागा का पामन मला मेरा प है
मकिन में नारी जाति रोग तरह पिराते हुए नहीं देरा मानी। म प्रापको साहम
पपराने पार पाप पपमे पिच पर परम रहें।" बीमा मे रामे रहा।
विसनासा "पार विपना पापारी ?"
मरपा
नसीमा मिपूरमही है।
बीमा पपी। विमताने "रिया बनने के पास ही म अपनी मांग के सिमर को पापकर दी कि रिपाहाबानगरन मासूम नारीमाधि में विपिन सासरता कर ममावेश क्यों हो पाता है ? बायरमे की अपेक्षा अपने मत्तको पनिक पीयाने सगती है।" "पापका कहना ठीरहे। "फिर प्राप पिकाहारमीगिए । माप मुझे हिम्मत पचाने भाई हे पैरामी पर एक मित्रता के नाते यह हो पाता भारको ऐसी सनाइएको पुरानी सदियों को मोर-मोर गमे।" "श संगर मही है।" क्यों?" पिया के बार पति का दो मामाघार मिया, उससे में कभी दुबारा ऐसो भूत नही कर सकती। "मोह !" बिमला ने पाए छोड़कर कहा 'तो पाप यकीन पाहब कोर सीपिएपिमता मी प्रपनी प्रतिमा पर पटम है।" सलि बिपना ने पीया सपरिक वा मसी की मेकिन पीरे धीरे पीला मे पिमता पर अपना प्रभारबमा निमा श्रीमा प्राव रोपहर को विममा के पास पही गातो पी मरतूको उसने बता दिया पाकिमह बिमना को अपन पदे से सामीपतु प्रतिकिया रसी पर पानी पी रेसी होती गई। विममा पर पूर्व निर्मप पर पटक पो। इस भीष मुन का पिबाह हो गया। उसने बीमाको विवाह का निमग्नक- ९५ मी नही मना मनपामा को ए मामी को मारमा।उसने पा सोनी पिगमत पी मिताबिसका उतरसदए दियाभी-अभी म बारी धाम की मात्रा पर मारा। इस यात्रा में मन विभिन्न प्रान्त देव पौर विभिन्न मोमों में गिना मा सोर पोर पाप या परीब पौर मा पीपमा पो पार सारे - बड़े बीच मैने मनुष्य के मुख की पाठक पना को मापक य में पाया । तो मा किमीना, हम पपने पापको प्पात मुझमें मार झमें कोई पम्तर मही । एक ने परती होकर पति को पता पौर दूसरे में परि होकर पलीको पोशा रिमा। दोनों में एम्सा वर फिर उसमा मुम्बर प्रायश्चित्त क्यों ना? पीपा निकर रही। वह कॉप ही पी। सरयू उसमत माहवा ही गया। बीमा सम्पर पनी गई। पर रात पिप गीहोपदी। दीपा ने विममा से सरयू को बिना पूछेही मॅट की। पपने परिचय में उसने कहा "मुझे पापके पति के मित्र बीस सरयू बापू में मेगा है। उनके अपनानुसार एक नारी दूसरी पारी के मन को पन्ची वप समझ सकती है। मैं पापके मन को नही गय को सुनने पाई।। क्या मा निविपरिधाप भपने पति मोसमामी। बिमना पीपा की यह बात सुनकर पर पड़ी। पारस्म में बीमा हरायो पिषित प्रश्न यिा गया था उसने गिममा कोबरा सामान पर दिया। बह पीपा को पूरती हुई बोली में पापके प्रश्न का मतहर नही समझो । पावित बकीन साहब ने मुझे समझ पा रहा है? मैंने उन्हें स्पष्ट कर दिया। किसमझाने का प्रपल म्पर्प है। मे निस्सन्दो सपने मोनूपा पति से मुक्त होना जाती है।" में पाप विचार से सहमत हूं।" "पाप मेरे विचार से सहमत होकर कीस साहरकी पोर से बकासन मों करने पाईहे" "मैं उनसी नोपयनी है। सामी की मामा का पालन करना मेरापर मनिममारीपारिको इस तरह पिसते हुए नहीं देख सन्तो। मैं पापको साहस अपनाने पाकि पाप सपने निर्णय पर पटन रहे।"रोगा ने मारा। बिममा मेकहा “पाप विषबाईबाईपाये? पिता तमी मांग में मिथर नहीं है।"
प्पासर बीषा चुप रही। बिममा मे कहा विषमा वमने से पहम ही म प्रपनी मांग के सिम्यूरो पास्वत कर सूमी क्योंकि पिपना हो बान के बारन मासूम मारी बाति में निषित्र कायरता का समावेश क्यों हो पाता है ? यह हारने की प्रपेक्षा अपने प्रापको पानिक पीडादेन मगठी है। “प्रापका कहना ठीक है। पिर माप विवाह कर मीबिए । पर पाप मुझे हिम्मत कामे पाईप मेरा भी फर्य एक मित्रता मावे यह हो पाता है कि मापको ऐसी समाहर्मो पुरामी रूदियों को तोड़-फोर गरे। “पा संभव नहीं है। पयों? विवाह के बाद पति का मो प्रत्याचार मिना उससे में कमी दुवारा ऐसी मूस नही कर सकती। "मोह ! बिमता मे माह घोरकर कहा "तो पाप पकीम साहब को कह पीगिएकि बिमला देवी मपनी प्रतिमा पर प्रटम है।" उस दिन निममा ने मीना से अधिक बातें माी की। मेकिन पीरे धीरे बीमा में विममा परमपना प्रभाष ममा निया । वीणा प्राय दोपहर को विममा के पास पनी बाती दी। सरयू को उसने बता दिया वा किया विममा को अपने इरादे से हला नेत्री परम् प्रतिक्रिया मेसी यह पानी पी सी होती गई। निममा पप पूर्व निर्मम पर प्रटम बी। इस बीच मुबर्णन का विवाह हो गया। उसने बीमा का विवाह का निमन्त्रम- पर भी नहीं भेजा । इसकापीमा को एक मामी को पका कप्ट हुमा । उसने पत्र को इसकी विकायत भी मिनो जिसका उत्तर बामे इस राह बिया-"ममी-पमी मै चारी बाम की यात्रा कर पा रहा। इस मामा में मैंने बिभिन्न प्रान्त रेगे पीर विभिन्न मोमों से मिला । या घाटे प्रौर पमा परे पया परीब पौर गया पमीर, मया पोपोर मपाइरेन सबके बीच मैने मनुष्य के सुख की पातक 'वृष्णा' को पापक रूप में पाया है। सब तो या है किमीगा हम पपने पापको - प्यास पीमित करके मी है मुस मोत पप्पा को समाप्त नहीं कर सकते। कौन पिसको बुमावा है और पनि पिसका नहीं बुलाता इस प्रस्न को हो समाप्त कर देना चाहिए । पब मुरापन मे सिमा किम प्रापर्क मिना निगाह मही करूगा वो मैने क्या उत्तर रिया ? मनोगी तो प्रारमय करोरी । मैन उसे सिसा कि तुम मेरे घोर भाई हो । में निपट दीपक इ उसक तुम मप। हममें और तुममें ग्योति मी एक है पर मरा पाना पति दुर्मम है। सपा अपने में मस्त गा । परितुम मुझे मस्त कराये तो फिर महाराभवानुमसे सपा सरा के लिए रिमय हो बीएपा। इस प्रकार का निरपाठ मुझे पसन्द नदी । मरितुम पापी करमा चाहते हो तो करना मन्पपा विचार को परत दो। पाकिम सादी परमही माना। में पमी तीन-चार ब क प्रमग करना पाहताह मह-उन पौर समायर हयिार है वहाँ से मै तुम पौर सुरमन को पत्र सिवा । यह पर तुम नोर्मों के पाम पागा तब तक म बहुत दूर निमम बाळगा। तब मैं तुममें से किसी को मी परमही निप सकृपा। बीणा बीवन के विस्त बिटोह करना पषित नहीं है । परि तुम किसी पम्य के पनुन या मित्र नहीं बन सकती तो कम से कम पपने प्रति ही पनुन पर बापो । पपने पापकी सप्पी बर पामो। "कभी-कभी मेरेशप में तुम्हें मेकर पीड़ा का संचरण होता है। तब मुझ प्रतीति होती है कि यह पारमपीड़न की प्रवृत्तितुम्हें मृत्यु की मोर पसीट ही है। 'इस बार तुममे पपनी मां सहेली का किरिया । याना सहमी महारी मांति एक पोती है । उसका पति पुरा है पीर पर पपन पति को तमाला चाहती है। अपने हठ पर पड़ी हुई है। एम्सिी भी पर्व पर समझौता करने कोवमार महापौर करे नी पर्यो ? पुम्हारी सगोवा टहरी | फिर मी उर गिममा को मेरी भोर स निमेशन करना कि मनुष्य करताप उमे मुसुकी पोर समाधाइनप्तिए मतीन पामों में प्रत्यम्त सागवानी सपनना चाहिए- सप, पीपल प्रौर गए । पे कमरा जीवन की रेगुनार सौदिया जिनको पार पर मनुष मृत्यु धार पर गावाहै। “तुमने मिचारिसमा पनि समारका सम्माननीय पतिरामापारियों प्यातच भग नमकी मही प्रतिष्य है। उसने अपनी बीवी के लिए जीवन के समस्त पेष्ठ सापन बगरते है मेग्नि उनक पाम एक वस्तु नहीं है यह उसका पोप ! पौरुप के पमान में वह पानी पहली पात् मुमारी सवो बिमा के मन को नहीं पाता। मेक्नि प्रपनी मची बिमना से एक निभवन परना दिया एक औरत इस मुव के अभाव में बीवन के प्राय ममता गुव नहीं भोपना पानी ? उसका कहमा होगा कि नारी इम उत्तमित मुख से रचित एकर जीना ही नहीं चाहगी। यह म्यर्प का साना है। इस प्रकार का निर्मम हमारी निधि का सूपर है। प्राय रे मोतिष- युम में हम एक बस्युको भूत गाते है-पा, मारमदम ! इस में मप पनी में कर वो मनुष्य की महासक्ति ! पोंकि पान के प्रानी मारमा पान' और 'धर्म मार्मों से इस मानि पाते है मिस तरह माम रथ से बैस । मेकिन में इन नामों से नहाना । मुझे पता है। वहाँ भागने मनीपी युम बता पर प्रतिसीस फमाकार मारीको सनत संपर्प करमे बासी पुपों समक्ष म झरने मामी चित्रित करते यहां एक विचार विरोध की भांति मेरे मन में उत्पम होता है कि एक सूत्र के प्रभाव में नारी पुरुष का सम्बम ही क्यों मेठी है ? मारी को मर माहिए ही पपामहमठा एक नारी की महान् परामय की बात नहीं ? पो लिममा को एक एपाकर पाहिए पो उसे वृति दे सके ? मन कई संपामो व साधु सुबह देखे। निरहोंने एव पुरसता पर पिरय पा भी है। मुझे एक हामी अन्दापन में मिसी पी। उम पुठीका मारमा तुम्हारी बिममा से काफी मिलता-जुलता पा । उसन मी माने पति को पोर दिया या क्योंकि उसका पति परिवहीनमा परामत में मामलापमापामारी मे भिनय देते हुए कहा 'यह प्रमाणित हो गया है कि मा पनि परिणहीलोन कानून पनुनार उसका तना मजूर किया जाता है उस मुरती में मुझे पर फोन से रवाया दिउमरे पनि न उमा संम धरा पश्यन्न उपेषापूर्ण महार रचा । रसे माय- पीटा। लेकिन पति से मुपर ही पाने के पार रसको क्या मिला? पहल जमने दूसरा विवाह करना चाहा कि यह प्रपन रेपर पर पुगेरह पासात हुई। परिणाम यह नियमादिषा मे भोलि प्राचीन विचारपारी कामापर मुषा पा, प्रपनी पानी की परित पर गुस्टाम्मे गिरोपों से सम्मोतिमा।
प्पास पंच मारी की प्रतिहिसा बाप रठी । एक दिन उसने अपने देवर पर बमाकार का भूठा प्रारोप मगा रिया । पुलिस ने उसके घर को पकड़ लिया। उस युवती ने मुझे राकर कहा कि उसका रेपर बिमकुम निप पा । उसने उसकी भोर कभी विषा तक महीपा सकी योग्यत करता पा। पब उस युवती के पाप का पीवन प्रारम्भ होता है। ऐसा पाप जिसने उस मुबती को चिरम्तम नारकीय पातमा मेरोम दिया। रेपर के प्रति अपनी मिपुत बासना का वराम मेकर भब पर उसकी पोर बड़ी पार अपमानित हुई तब उसने अपना रस गाम दिया । पस्माम मा पा पतास्टर को अपनी पोर मिमाना बकरी पा । इस पूनीवार का पित पक्ति अपनी हर नविश्वा पेचकर एक ही वस्तु परीबना पाहता है पा-पैसा । गफ्टर ने स्पष्ट पमों में उसे का दिया कि वह इतना स्परा समा। स्पमा देमा पड़ा और उस पर पपमा नारीव तत्पश्चात यह और चमता ही मया । प्राय यह पापिन मेश्या का बीवन यापन कर दी है। पर यह अपने पापा का प्रायश्चित करने पाई है। बड़ी एपी मोर पसाठ है। कहती है कि मैने एक पुष्प तो क्या पैरो पुस्प लिए है मेकिम यो सूच-सम्तोप उस पवा में पा यह पर प्रतुत सम्पत्ति कोसामिनी होने के बार मी प्राप्त नहीं है । समार केनौर पौर मुरिसर पर्व की मै पर महापापिष्ठा है बिसके पपरों ना पान बोरे सनातनी मौनवी पौरपडित करते है पर हाय की रोटी नहीं सका। उसके स्पर्य का बम पहर से कम नहीं। यह फूट-फूट कर रो पड़ोपी । मुम रस परपयामा पर।मने उससे निवेन स्मिा दिपमा पर पुन ਬਾ को प्राप्त नही कर सकती? उसे पाहिए कि मह तमाम भपतों को मोड़कर मालिक जीवन बिताए। मेरेस प्रान पर यह पाकर बोली कि पायाग्स बीपन से से मुक्त हो मम्नी? पहमे पह प्रकेमी पी और पब रसके पीय क माप पाठ-पम प्रामी पौरपये है। ये सने प्रार्मम्म पौर निकम्मे हो पए। रिपरि रसका पापप रम नहीं मिया तो वो से गो संकट में पास है। यह मामबीय बबन पार ईमता है। “मनी पिममा इसी मप पार्वतन में प्राप्टिव है । सा दुत भी उसी के अनुमारयोरा परमो बाद मै नहीं समझनालिदिममाको भविष्य की किस हर पौरसवोप पर प्याप्त दुन्ति सिमा से टकराना पड़े। और हाँ इसी पीप मेरी एक ऐसी रमपी से सीनायबी के रास्ते में भेंट हो गई। पामीसगचास वर्ष की पह रमगी.दी। राममिक की माति प्रमात मन मासी । चब से बिसने प्रभु की उपासना में अपने बीपन के क्षमम्मतीत करमे प्रारम्भ किए। भावाम कौमार्य पत उसमे बिना कष्ट के रखा। उसने कहा नारी स्वरं प्रपनी स्वामिनी है, उसका दूसरा कोन स्वामी हो सकता है ? अपनी तृप्नामों को रमन करके वह एक ऐसे स्वामी को प्राप्त करती हैमो उससे कभी इस प्रपंच और उस पर मम्याय महीं करता। म रिश्वास करता है कि इस 'रमन के नाम को मुनकर मामुनिक विज्ञान परिप-मनाम अपना पमन मयों करे ? मैं कहता हूं कि मनुम्प प्रपनी कुछ इभ्यामों कारमन नरेंदोषया बह पो भर मी न पा सकता है? बीमा | यह बीवन भनेक प्रभावों एवं विषमताओं से मिराह यहाँ हमें कुछ बोरना पड़ता है पौर कृपया अपनाना पड़ता है। सवमनीमार के पीवन का सही मार्ग हो साया अपनी सिमसा को मपमाम पुर का एक मा मुमाना-प्रारोग्य परम नाम है।सम्तोप परम धन है । मिरमास परम बन्दु है। निर्वाम परम सुख है । इस उपरेप पदोंमोहेर-फेर कर सकती हो । संशाओं के विरोपन भी पर-उपर पिए पा सम्व (मकिन मून' बात में कोई प्रस्तर नहीं पाएगा । "मापीर महित । पीणा मेसपतका विनिममा से कर दिया पिममा मे बोप्पान मे उस पत की एक-एक पंक्ति पदो विमना के मन में इस पत्र की मोर प्रतिक्रिया हुई पीर यह पपनी परिम प्रतिमा से विचलित होने कमी। मेकिन पत्र की समाप्ति के पाबाद गंभीर मौत मिलेपम करके दिममा ने पापम्त उपेपा से कहा "मुझे उपरेशात्मक सम्पावमी एवं महान विचारों पर हारिक पता नहीं है। साधु-वैरागी किसी प्रमा' । पति के शिकार होते है। पृणा हीनय की वास्तविक भावना होती है। अपने बीवन की प्रसफलता T प्याप्त अपवा पाप हो पिपामे के लिए ये प्रसाद सदों का निर्माण कर मेते है जो मुनने में प्रभावमामी सनते है कि उनका कियारमक रुप प्रत्पन्त फर होता है। 'मे हिप्नोटिएम जानते है। मोनामों के सोपे-मावे जीवन में भारी-भरकम विचारों से पो-बड़ी नमम गम देते है। मेरी पोर से उन्हें नमस्कार पर मिरना । यह भी भिखना हि विममा प्रपना रारा मही परम सकती। बीमा विममा से यह सत्तर पा ममाने मयों सुबके साम म्पपता का अनुभव करने नवी। पापा पर मोटी तब सरयू पपने कमरे में बैठा सिमरेट पी दाबा । मम्मू पिच्ची से बातचीत कर रहा था। मौपाने पुकारा "पपू तुममे नाश्ता र सिमा ? सरयू ने अपर से ही पुकारा 'पप्पू बरापोभा पी को भेग दोन?" बीमा पग्यमनस्क-सी पाई। सरयू ने मिस कर पूछा 'तुमने क्या राय भकिस बात का? "विवाह की बात का। मैंने तय कर लिया है। मे तुमसे ही विवाह कया।" बीमा प्रतिक मारामनी से बोनी “मैंने इस मौकरीरमी मै यहाँ ते भीनपनी बाम्मी। 'समस्या या महीं है। "समस्या *सी भी हो मेकिन मै प्रब यही नहीं पाती। मुझे प्रम या पहर बाड़ना ही है। पत्र बात यह है कि मैं परिपर मान की प्रत में कभी भी रिपरता से नहीं एसम्ती। में कम ही विमता से पत्र सेफर उसके मैक पती पानी।" करने बापा दीपाति कानी पमीर हो गई। तोमोमा पपू तुमसे काफी मिमिम गया है। मै तुम्हारा प्रमाण पुरी सपपरगा।परा सोचोम तुम्हारे बिना उमरा क्या हाम होगा?" पीगा सरयूकी पामरिक प्रसन्नता प्रेरफटता को भाप मई । निमि स्वर में बोमो मानि रिसी स्वामीका दियौ भरा का भी से ।
सकती।" फिर अपने कमरे में प्राकर अपने मापसे बोसो 'म यह रहना पत्तरे से बाप्ती नहीं है। यह पोटी बात का ठहरा म पाने कर मनुष्यता घोहर कुकर्म पर ठे। में पारविममा के मरेपमी पाऊगी। 'नही पहा माना उचित नही होमा। बिमना अपने पति को तलाक दे रही है। उसके पीहर वाले मुझे उसकी भारती सममकर न जाने क्या-नया सोचने लग ? कहीं गुस्से में मुझे ही परी खोटी सुनाने लगे तो ? नहीं में यहां नहीं बाउंगी। फिर कुछ भी हो म प्रव पहा नही रहेगी । कहीं भी चमी पाऊँगी। सास-मह माह तक में कहीं भी रह समती । कम ही मुझे पास बने पाना होगा। दूसरे दिन बीमा दिममा से मिमने मई । बिममा उसका बदनादराबादेव कर दिया पड़ी "तुम मेरे पर क्यों नहीं बाठी ? मने अपने पति को तलाक दिया [१ मैने पपने बाप दी इयव उबानी पर तुमने मही। फिर तुम्हें मय किस बात बीमा निहत्तर रही। सोचती रही पौर पम्त में बोमी 'यहाँ का वातावरण बमीर हो विपाक्त होमहा मन हो पाने की समावना रहती है। "फिर तुम मेरे पास ही यो। बिमता मे मया सुमाग रहा। मही में पहा नहीं एपी।" 'दम मेरा कहा नहीं मानोमी ?" “नियम हूं।" "फिर बामो।" बीमा तुरन्त बनी गई। विममा में उसे रोका रेखा भीगा में पायफल परेमी हूँ । सेम्मी की अनुपस्पिति के कारण मामले की तारीख भी निश्चित नहीं है। इस बीच परि तुम मरे साप होतो । बीमामे सबममेरों से उसकी पौर देखकर कहा 'मैं यही नहीं रह सकती। मैं एक पस्बिर मस्तिष्क की प्रौख ह। सरजू बापू के पहर में हर मही फिपतन बाई । मुमे मगता है कि तरबार सम्मोहन मा मम बामने है। सम्मो इनका मन नही दो नसा कोई प्रादमी मुझे स्पष्ट पनों में यह स कह सकता है कि मैं तुमसे विवाह कम्पा । मैं उस कहने माने का मन मोच ! पर मै पिन प्यास प्रतिदिन दुर्गम होती या पीई । विमला ! मेरा सम्माह धोरदो।" इस बार पिमचा ममा पड़ी “हें अपने पर भरोसा नहीं फिर जिन्दा से होपी ? क्या ही पौर सरजू बामसे पारमी महीं मिले ? मोबसरा यहां है पापरा महा मी हो सकता है? "मेदिन महासतरे की संभावमापौर याचिरा प्रस्पथ है। यो प्रस्पष है। सबसे पहसे उससे बचना चाहिए।" "मसमय यह कि तुम्हारा इरादा पपका?" "यही समझनो। “फिर पापो हामोकि तुम मेरा काना मान रही हो फिर भीम तुम्हें विश्वास बेती किवा किय पापति विपत्ति में हो मुझे बहर सिपना । मै तुमगार सहायता सी।" पौणा मे छोर होकर कहा जाबर ममें सनी म न बनाए ।" "कामना मेरी भी ऐसी है। गोवा मे पाते हुए एक बार का “मैं तुम्हें कमी नही भूपी । में संपर्प है गरपई। मैंने अपने बच्चों तक कोयोर दिया। अपना सारा पन रेबिया पर तुमने विद्रोह का मेरामा कर दिया है। ऐसी परिनाम मया निकालता है।" पिममा बुध नहीं बोनी । यह पीना को पर्वमष्टि से देखती रही। बीमा परस भरीईसो हंसकर बोली 'उस समय हम कितने प्रारच में पाबाहेर इमपते हलको पुरती कम पड़ोसिीबी मार पाय उसका छ परा भी परमवा विर हुए नही है। लेकिन हम भी मुम बाते है किनकी परिस्थिति में पौर प्राय की परिस्थिति में किसना प्रवर है। नमस्कार !" बीमाबनी गई। बिममाना भर पाए ।
देवता बन गए
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मनुष्य का जीवन पाकाध के उपग्रह भी भानि एक निश्चित दायरे पर घूमता इवा है । संसर्प पिकर्पन सुख-बुच बीवन-मृत्य निधि-विपान के ये हरप पौर उससे चपसभ्य प्रतिक्रियाएं एप उपमक्षम हमें स्वाभीम पोर पराधीन कई समस्यामा में पका देते हैं । गुमान अपमे बाप का विद्रोह करके अपनी बग्मभूमि को त्याग करके दक्षिण के पुरस्म प्रांत मग्राम में पाकर वस मया पाणही वह सोने-बारीमी बमामी करता था। उसका जीवन सुखमय बा। कुमास का बाप मरित संभावनामों को दृष्टि-मोमल करके अपने पर नई बुसिन माया । बाप के इस दुफरप को पेटा सहन नहीं कर सका। नए युग के मेरे बोहर प्रापत्तिजनक हरि विषय मान्ति का पालाम करना चाहते पे उन बार्कों का मन्त्र विरोध करने मने पो पूगी के परोसत नारी को एक पुमाम की मातिारीख कर में प्राते है। गुमान ने पपने बाप का विरोध किया। तब सरयू ने ऋपि-मुनि की मांति ममीर होकर कहा पा प्रियसी प्रयाक ने अब तिप्परमिता से विवाह किया तब उसके बेटे कुमाम ने कोई पिरोप-अपरोप लहानही किया था। पौर तुम ! गुगान में इसकर कहा था 'युग के साप परम्पराए मान्मताएं पदम पाती है। प्रियरस की इस भूम के कारण उन्हें अपने पुत्र की दुर्दशा देखनी पड़ी। उस कुमान ने की प्राशा पर प्रति भी निकालकरदेवी । यह महारपान उस युग का पुत्र ही कर सकता है । मुममें यह हिम्मत नहीं । मैं हूँ तब तक यह निगाह नहीं होन गा । पिठापी की मायु ५. केनगमग हो पी।पके लिए मैं मामूरा फिर यह एफ्स्य कर्मो ? मेरे घर यो पुरती मा वमकर पाएगी पौर वह मटकर प्रपने पुत्र अर्थात् मुझ पर दुरी पुष्टि रखनी उसे क्या में सहन का समा? मही मुममें पा हिम्मत नही है। मावना का यह म्पमिकार समात्र रेमिए ही महीं पाएमा के लिए भी बड़ा ही निम्नकोटि का होता है। ममा ऐसी पापी पारमानों को बम्म-सम्मावर ममा नहीं करता है।"
प्पासरे सरयू मे भी रिहम परमा गत सामर यह पता नही है कि प्रापमानमा मी या नहीं होता। मह सरापुमा पापापमप पौर सदाशियाची पता उसके इसके कान पर कुमाम जिपमा । मेनों में ही चिनगारी पार गोमा पवनप्रासका पुरवीत मया है यकीन साग पौरन ही मस्वनी कुमारी सप ही है। उसने अपनी दृष्टि सरी मौर धूमा मी "मपि माप मन्त्री तरह नहीं मानें तो मै समान की उन दुपारगावी संस्थानों के बिना सर-पटा उंमा गोमामाणिक प्रष्टाचार का विरोध करते है। माप और बेटे के इस सेप में पर की गत पर प्रयाय एम पर पाएमी। "ब तुम इसके लिए तत्पर ही हो गए हो तब किया क्या पाए। लेकिन मै यह समझना। यह निरोप तसरे हित में घातक ही देगा । इस स्तुत सम्पत्ति में हाप पोना पड़ेगा।" 'मुझे सम्पत्ति नही अपना बीपन पाहिए। 'जीवन !"बकीम सरयू नोंक पड़ा। पाम मेमोई उत्तर मही रिया। भीपम विरोष वामद भी सरयू के मिन गोकुमप्रसाद का विवाह पसी रात के समीप के गांव में गोही रहस्पभय बंग से सम्पन्न हो गया । अपनी इस परामय गारपास का पस पहर में रहना पस्मन्त एमरबहास्यास्माता दो पया पायरमनीसवमी मो विमला हो बिना देणे ही मनास में बाकायस पथा। पामी रात बिममा में मुसिन बनकर मोकुम को भम्प पट्टालिका में प्रवेश दिया । मममबीच प्रपने प्रापको पाकर विममा में अपने भाग्म की सरा- हना की और मन में अभिमान का अनुमब भी किया। यह उसे पहने ही मासूम पासिन्हिी रिकारों से उसकेमाप को यह सौरा करना पड़ा है। धिमतापूषा प्रपना जीवनयापन करने मगी। पति की यह निता कि पौरपदीन से पति पाडायना नहीं मपी। पति एक मौकर से उसकी पानी ही पनिष्ठ पारमीयता एवं स्नेह सम्माचमाभित्रमा मीन रकमम मना प्पास पर १७ कापनों एक दुसरे की पाड़ा पहचान पे दुपटात प पोर कभी-कभी विगत बीका को स्मरण कर प्रमागिपा करते थे। भारकामाय पापा । और युवका की अपेक्षा मम्मीर मोनयत रयते बाता सीधा-सादाम किसी से मिलवा दाताबा पौरम किसी से दुश्मनी सापता था। समी के मन में होमी के उस दयनीय पान के प्रति करना पड़ती थी। मी सबके मन में मह उत्सुकता पती किया हमारा मित्र बने । ही कमी-कभी बुरा रसोइया महायर उमसेबाना विनावे समय च प्रश्न पूषही लिया करता था "तुम माति कौन हा? भारत्तर रेता "ब्राह्मण हूं महाराय !" महाराब उसे अपनी प्राति का समझकर उसके खाने की भीनों में भेर महा रखता पा । नमे एलपी सपा सठनी रेसिए बनी विपप मिठापयो परोसता पा। सप पवार रात को उधे पिसाता हपा पता 'तमारा पर कहा है ?* पाएपपीता हुपा कहता “पर यही है।" काकिरहनेगासे हो?" “अपगढ़ का पर-बार सपषप्रामाहामा-बाप मर गए। मेरा इस संसार पभोई नहीं। महारा।" "भार ब?" महाराज की पा प्रधानता से माष ची। अपने सिर को गुरु की मार हिमाकर मुदित स्वर में कहा “इस पड़ी उम्र में हमारे रेप में काई बात नही रहता। परेरा यह मारपार पाप मन पनियों को भी माह रिया बाता है। एसंतप्त स्वरक्त्तर रेता 'पौर तुम्हारे ही मारभार में प्रारमी परिमा और पाका भिमाप लिए इरमण गरे पारों की पैमियों की भारत सुनन को पार पता है। परिणामला है उसकी स्मृष्टि में नाग' (मपान भूमि पर एक दोा मा एरा पारमियों की स्मृति में गमस्थान की वर्ग पातियों में बना दिया जाता) बना दिया जाता है। और उनकी प्राणपारमाए मारे गीच ताबमकर पानी होती है। भेफिन तुम पारे नहीं एसी । फोनम हो। मौकरी भी कर - .
प्यास चेहरे से पन्चे बानवान के भी समते हो फिर यह विलास नहीं होता किमारी धादी मही हुई। "कोई किसी को न तो विनास वै सम्ना और म विश्वास में समता है। महापर। यह प्रविपास ही पाय हमारे मन की सबगता बनाइपास सोप है कि इस पुम में सरप का दर्शन दुर्मम है । फिर से पर-पुस्प पर विपाव महारान इस पाप नहीबामता पा। पा मुस्कराकर कहता "माफ करना बेटा गाव पूषने की प्रारत बो ठहरी। तलक में मुझे बड़ा पानव माता है। दिममा को मी उसने यही उत्तर विमा मा परी पपने की भारत मेरी पार की मही याच पुरानी है। बचपन में ही में सा एकांत पारमनिरम में पान मिया परवा पा। पर यह एकाच प्रारमनिरल प्रषिक हो गया है जिससे मोगो को मेरे परिवार में संधय होने लगा है।" विमला पहर कर बहवी “यह एकीट का पारमनिवेदन सा इस बात पोरी कि तुम पपन मापसे किसी बटिम समस्या पर गम्मीर मम्ममा करने रहने हो? 'म तो मानर बीमन ही समस्यामा से परिपूर्ण है। इसे भी मै समस्या का एक पपार मानता है कि मैं तुम्हारे पहा साप-सपी माने पामा एकतन्य मौकर "शुपनीहर हो पा सम्मानित यह मै मन्त्री एमानवीयचित् इस पर में एक तुम्ही ऐसपमि हो बिसे सब का मारमा पापा सस्ता है।" “मह मी मग दुर्भाग्य है कि मैं रिस परम दुख की पार में यह खनाही मुमसे प्रनम पनोपर बनता जा रहा है।पयों मुझे मुग मितवा (बलि में ना पोप्रतिभापा भी नहीं पाता। विममा समपन्नरसी महीपाका समममई। इस उम्र में पिर सामना करम पामा प्रागीतिनानी हो सम्वार से पानीपत मरी मिया गा सकता।
प्पाचन पापिममा समसमें स्वय पारमसात् हो पाती पी। रमफे मन की माना कावा तब दुर्गासा के काप-सा प्रवाहो पातापा। मह पीड़ा में वित मिमा रखी थी। तब से अपने इलय में रस मानव-प्रवा घूम्यता का मान होता पा पोसा पम्पता को संहा सेकर अपने में महापति-कम्प निहित रखती पो। रोनों एक दूसरे के मम को समझने में प्रयत्नप्रीम पे । बीरे-बोरे प्रतीत कापारण हटता गया। समें बताया गरीब पुरप को पौरपणनित परामम मिमठी । उपमह महा मानि के अपने प्रापको मृत समान समझ मता है। कौन सुखद जीवन नहीं बाहा! मेक्नि पाहने भर से गया सब कुछ मिम सकता है । मैने तो देखा है कि पारमी निस मोर प्रपत्नशील होता है, वह मचिम रस उतनी ही विपरीत होती पाठीt" इतके मारपसने अपने मिगत भीवन के समस्त विस्मृत पगों की पर्वा कर गती । उसने दो कुछ बताया यह इस प्रकार पा उसका विवाह सब हम की काया को पार ही किया गया माग उस में पन्म लेने पर उसे ममता को छोड़ना पड़ा क्योंकि परकायत पी। माग कामदों को अपनी सम्मान कहकर अपमानित दिया करते है। इसमें हम अपना गौरव समझ है। मेनिकायस्वाइसे किसी भीप में सीकार करने को तैयार नही। पारमयुग प्रमाांत्रिक व्हय । नादि-मेर को मेकर सोषमा- पिवारना या पपने से किसी भी प्राणी को हीन समझना उसका प्रत्यक्ष अपमान करता है। बाप ने ब्रह्म की बारी अपने ही से कुमीन माझम पर कोरबका पनापत ममन भगनासम्बन्ध-विच्छेद साप प्रमगम बनमपा। ममता का बाप भी सम्मान रेफर अपनी बेटीमागचे को भी माना ममी पाहता पा। उसने भी स्पष्ट कारिया मिह प्रपनी नदी को विपदया। पए भी पानी पीनू से हो गई। मोनू गापान पुस्ती पी। परिषम द्वारा यह मास्म की नायिका बनी हुई की। और मम करके रसने समस्त पर की सभापनामों को पहन कर लिया पा। - पास होती है। में तुमसे मुखी मन से विमप नहीं हो पाई। यह मेरी दुर्वमता पौर होमण है। मेरे पति परिष स्त्री के साथ रह सकता है यह मेरी गय की पासना से पर है । कमी-कमी में पारमाहत्या करने की भी सोच सेवानिएक मृण्वक तुम्हारे इस प्रम का परिणाम रे? 'एक भार फिर तुम बोल्य से मापाएं रेपा हूँ कि तुमने मुफेना कामही रखा पानी मुह सपाकर पहा राईमा । पपस्य से परिचित हो जाने वार बिममा रस निकर पाती गई। पीमाएं मिलाकर एक मजीब सुबका संचरण करने की। एकति निममा ने अनुराप पूर्ण स्वर में पूषा "मायकल मीनूम मा हाप- पाम है। मह एकांत पीडा बहन पधी हेवी होशी है। मैं समझती हूँ प्रबरकमकोई परिभाम निकम ही पमा होगा? एकमममम जा रहा। "प नमो हो ? " विरसा ने मारा था। "तुम पहम पूछो तो मन्या पंगा।" यो ? पिस परिमाम से परिचित होने लिए तुमने पीवन मोह बनाए रखा गया उस परिणाम मे प्रपनीरीदी को परिचित नहीं करामोपे ?" जसपरेर तक किसी की यह स्पन्ध पाकायको निहारता पा। उसकी पायों में पारम रमा माए । मारपस हो गया। मेजों को मुकार कहने समा “मिस एम्ति परिप्प की में कामना करता था मासके विपर ही निमावी गिस एकापता से मैंने असीम पता की प्रार्थना की, रस मोमीनपा प्रेम-रोम मस्प हो पाना पाहिए पा। मेरी हर सांसपों के काम विनय की पाया है। पर मौन मान पेन साप बहुत सी पौर मलजि है। मानों की मा। एकताका पर एक मारकी । एक बार में अपने परि पान में परमत होने के लिए मया मौपा पर हो रोग मन्हें पार्षोकोसार मेरे मन माप परममा मन्नों प्रतिपय भी परमही बन सारे निरिमन मोमन पार पपियों में बाहर बने समसारी, प्पासपंर यह विचार मेरे मस्तिष्क में हठात् पा गया कि पाप ये बच्चे मेरे अपमे होते ? तभी मीन की पावार सुनाई पड़ी।बच्चे भागकर मीतर बसे गए । उस दिन से पब में नन बच्चों के लिए मीनू की भी शुभकामना करने ममा ई। मय उसके माहित क साथ उन रो मामूम पन्नों का भी प्रहित है । प्रार्थनाएं बदल मई, मन पूरमों पर पापा मए । पारमी भी क्या पूर्ण है ? धीरे-धीरे सबसे समर्माता रमे पता है। बस पब वही इसी घोटी होमी में वियत बीपन की कटु स्मृतियों काक्षिाफर मर बाऊगा। बाप की गोही दृष्टि उठी उसने देखा कि विमसा अपने मुहको प्रबिम में छुराकर रो रही है। पापी ममुप्प अपने विचारों की प्रतियया दूसरों में भी देखता है । यह पार की मपेमा पषिक मिप्र होता है । सेठ गोकुमप्रसाव मारकर कई दिन तक निमसा मोर सनकी पहरी दोस्ती को घेरते ये पोर मन ही मन पीडामनक बातें सोचकर मपने मापको संताप परमाते पे । मकिम यब विममा रात के पार उनके धम्मा-गृह में पाने में देर- पबेर फरने नमी दब सेठ गोडुम ने ग्रा का पता ही काट दिया । बझ की प्रति मर माई । मह बिगसित स्वर में पोता "सेठ बी बीते बों में भी में पापस पर्व की तनखाह मेहापा। में प्रापमा एक पनावस्पक नौकर है। वन रोटी-कपड़े पर पहता प्रापा है सब पाप मुझे यहाँ पर्यो निकामठे पेठ पोलुम गहरी संवेदना के साप मोते "नहीं नहीं यह बात नहीं है पास के गाने के बाद मेरे पापार में पार पाटा मग गया है और दिन प्रतिदिन मग रहा है । मैन पो तुम्हारा पोम उठाया प्रब उठाने में एकदम प्रसमबई।" "में पड़ा मिना भोई। पापड़ी दुकान के बहीबात भी सभाम सम्ता हूँ। 'बात यह है कि मै वम्हें अपनी मम्वस्नी माते मही बता सफ्ता पुष ऐसी विषयताएं है जिनके कारण पर मारा यहाँ पना समय नहीं हो सकता।" मठ काला उत्तर पाकर यह रोपड़ा । प्रपनी पंगुत्तियों में एक १.४ प्यास । पौधारोता मी पापकी मी काही पना बाना। रिममा गृहस्प के कार्य से निरव होहर हिन्दी ना मासिक पत्र मनीपर' पा पीपीको मारमा कहानी पी। पाते-पात कभी-कभी नमक होठों पररासी मीमाप उनीमी। मौहार में पोटमी लिए पप' पाया। उसका रास मुस देखकर वायोमा 'नया पात है बम ? पाठीमार कहाँ त ?" सादर या पाई।" "क्या सनी किसी काम के लिए पम्हें भेग पे?" "मही तो?" "पया फिर परिणाम' से परिचित होने वा हेहर' मरे प्याम में इस बार मीन तीन बच्चों की मां बनी हुई मिमेयी ।" उसके पमरों में पंम सष्ट भत्ता पापा की पांच में पान मा गए । "परे, तुम रोने पर्यों मो?" बिमना सनीपर' को रखकर एकपम उडी । बह उस समिट प्राई । उसका हाप पहार योमी "बात या? बोलो करों नहीं? । म पार मी चुप रहा ।पम उसके पिते रहे। बिमना की पार्वे समत होरदी। स्नेरसिका सर में दोमी "प्रनाम ममंगम पनि पानी को पििषत नही कपोने विकरामागे । दस संसार में तुमी बतानो कि मेरे सिपाप कौन है तम्हारा? मैं और तुम ऐनों बसे भाप्प के सवाए, लिपि के एगारहए है। पर यही हम एक दूसरे का समान हो सकता है। इस पापा "में सपा-सपा के लिए मापारी सेठगी के पास अप मेरे लिए काम नहीएममा है।" एक भमहोती पोट से मोबावा म्मिी में पाबली है पापाता रिमता भाई। उपरचुप रहकर यह माती पर्यो साना लिासा पिट रही है मो मार लिए जमा नही है!' "एम प होने की कामहरी! मै नौकर। मुझेगाना म प्यास पंख १.१ ही पोगा। "तुम नहीबा साठे! 'खोपया तुम मेरे लिए अपने पति से विरोध करोगी? नहीं, ऐसा करना मरंमा पारित है। मगहीन कार्य हम दोनों के सम्बन्धों में पाप को स्थापित कर बीबी पुम्हें मेरी कमम है कि मुझे मेपर तुमने सेठ बी को एक सम भी करतो। मैं नहीं चाहता कि बाते समय मेरे सम्मान पर कोई पार पाए। इन घोरे पोरे गौबरों का मोलर पौर ममता मुझे बों से मिलती पा रही है उसमें पमापी रेसा मी देखना मुझे स्मीनार नहीं।" “तुम इन साधारण बातों के सम्मोह में उस विप रहस्य को क्यों विस्मृत करते हो मोठ श्री रे मन में छुपापा है ? भात यह है कि वो पुरुप मारी को प्रेम दे सकते ये समय के शिकार हो जाते है मा वे इस प्रयास में भये पते हैकिनारी ननकी सामवानियों से परिचित रहे। पर क्यापसे धमस्या कर धमानान मोरे हो ही जाता है? बिममा का सरकठोर पा । बममा विस्फारित हो गए। बोमा 'तो ममा सेनी मेरे पोर तूम्हारे बीच पाप करन करते?" बिममा की पांचों में म्यमा रमाई। भावना के प्रवाह में उसका सर टूट का यही मात्र हैन पो पुरुप नारी को मतोप पौर सूब देने से सविहीन हो बाते है उन्हें मम्य पुरुषों से वृणा हो बाटी है। रेपा है उनकी पौर आम सरे प्रहीन प्रमस-मीनाओं से सतोप कर मेरे पाहते है किमास्नी बो म्तिी परवठा मै उनकी वुम्हिन बनकर मापई है, महबीते जी अपनी नालसाों बाबासनार्मों का सह-मस्कार कर मे। लेकिन प्रकृति मी अपने मेक में सिवनी हो प्रपुर प्रवृत्तिपा शिक्षा हुए है। नारी को निर्मम महाँ पो रेतीं । मह सपने मतोप का पता किसी भी सराएही मेती है। मैंने भी अपना नया मार्म पफ- माया ! सोप गिया कि मैं विवरा होई। पर क्या मुझे भगवान स्वरूप पुरुष को मस मानकर मन की बात करने का अधिकार महीं। उस निप्पाग मूतिकी मत मर्षमा का मौरी बीवन भर एक प्रमाण पत्र का मानव से सती है, क्या पदा में पान सारे समय अपनी पीपों प्रस्टीकरण से पणि प्रामा - प्पासह मही में सस्ती? परकीया प्रेम मोपियों की सरालाएं रापा की मामरिक पर एता पनित मुगाना का सर समोसा मोड़प्प महासमर्पण का अभिमारी बमार भी मारी की चारित्रिक पावनताका तमोप कर सकता है, हो मुझे न पुष्प को संसर्ग का सुख पो मही ठाने दिया जाता है जिसने सकीया पत्तीपो इसलिए रमाय पिया दियह परिवहीन बी। विममा की प्रारं भर पाई। अपनी पांचों को पोषकर बह दो मिनट के पार योमी 'ब! यह भीपप सामागि विसम्बना है कि पीवित मनुप्प को पब देवता की संज्ञा नहीं दी जाती नहीं तो -तुर्मे समा समम पग करके कहती कि उम पापामगे की पूजा को बोहर से पूगोमयासिका मन अनेक प्रामातों से तपकर धर्म की भांति निको गया है। प्रार्थना की मांति पवित्र होगया है। मै चुप नहीं बैठूगी गए 1 र अपमान की परम सीमा है। यह मेरे निप्पमक परिण पर सूना मापन है । इम मेमही तासाती। यह सब मेरे लिए प्रसए है।" पाक म-विनीत सर में मोमा "मेरा देवस्थ तुमारे विवाह में सम्निरिव नहीं है तुमारी सोति पौर पे में है । बस मुझे मापीर सहित गिरा करो कि मेरा यह रेवल सपा कायम ऐ हालांकि मे इसे देवस्व महाँ मनुप्पमार की पुतता ही हगा। भफिर में ऐसे ही बना पाऊंगा। लेकिन पन्तिम बार में मुरित मन पारा पाहवारी पिकप नारी का धर्म है, परि रसमें निम्म पासमानीका पापि परम न होवो ? सम्मा विमोहमही है जिसमें पुर संघर्ष का प्राद्वान हो।" विमला नेत्र रठात्री इसके पूर्व होगा उसकी पुष्टि से दूर हो गया।
नई तिष्यरक्षिता
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दूसरे दिन सदरे सेठ मी को पिमता का मधुर स्वर से प्रस्फुटिन मौरी का गीत सुनाई नही पड़ा। बस हो उठ। उन्होंने विममा के कमरे में गापर ऐसा-रिन के सात बब ये पौर पिमता विस्तरे पर पर्यो सो रही है? मपुर सर में पुकारा "सुनो पार तुम सोई हुई पयों हो? क्या प्राय पूगा पाठ महीपरना है! "पों। 'मेरी मर्मी। प्रब इस पाम्ममा पौर भाव-भक्ति से मेरा मन भर गया । विवास करते करत विश्वासपी पास्पा ही टूट गई।" सेठ मीने मोर परिवर्तन विमना बेहरे पर देखा। वो स्नेह सौगत्पता एवं सविनयता मसावीपीये सब निर्भाव निममता में परिवर्तित हो गए । किट होकर बोमे "बात या है ? "प नहीं।" "कुछ तो बर।। "सुनना चाहते है।" ।" पेठ बी पहे. - फिर सृनिए, कम से पहले मै प्रापको एक पोपहीम देवता उममती दी। मैं नाही पानठी भी किस्त्री के प्रति मोर प्रासक्तिक कारण मापने मुझसे विवाह पिया । मने इसे विषि-माममा सममकर संतोप कर पिया मेकिन काम के पाने पर मै वा महसूस करने लगी कि प्राप मुझे मर्यादा के भीतर भी सुती रहने देना नहीं चाहते हैं। पापमें यही स्पर्श है बो एक सम्पूर्ण पुरुप में होती है।" मेठ पी बोच में ही बोल पड़े सूफान का परमा देवकर मनुष्य को सावधान हो पाना पाहिए । पह ब्रह्म का ही एस्पपूर्व पक्ति है । क्या पता कभी यह पर्म विममा न प्रमरोपपराध्यिा 'बो परिमाहीन स्त्रीमारण पुल भोग का
वह किसी को परिसहीन नहीपमा सम्मा। पर परिवहीम मा के प्रति वर
सम मेंपी गुमाए । नम भूधारे कारण साडे मन में परिणाहीन स्त्री पनि
स्थान भी नही पा सकती।)
“फिर भी मनुष्य को सावधान "
"साबमानामतमय"
में बहुत इयार समिरी पाकमी नहीं मानी शाहिए।
दिन मैले तुर्मयो स्तम्मवारी समरमयोग करके मैरे विमास को बारिश
सरयू साग का कहना है कि सार ।
सरयू साइब कीप है। बीमों कमा में मह सिमान्त पर किए पता
किबो हवा है मह पर सत्य बोक्ता पौर मोसम बोलता है यह पता
-
"सम्म मतलब यह है कि तुम ही सती पीता हो।
गीता मन का मर्म पीता ही जान सकती है। फिर भी में सीता की
पनि परीक्षा नहीं रहती। क्योंकि भार की मणि का काम बन सगीर
भस्म करना है।"
"अग्नि-मरीमा के लिए तन और मन दोनों की पवित्रता चाहिए।"
“चर की परिषता तो उसने बसों से मासूम हो होभाएपो और मगर
पवित्रता के लिए इतना ही काफी है कि मैंने पापडीपारतकमही प्रेमामे मार
एकमार पत्नी बनकर पौ।
कि पी पहोपए । पहा हा रोलीबीसहपीना पा पा । विमसा
परक रत्तरी प्रठीमा पिपिता ही बाहर पनी ।
इस पटना मार विममा मीरे-धीरे बाबी पी माह नित्व
माड़ियां पहनकरगाहर बारे मपी। उसकी साथियों की संस्था लि प्रतिक्लि
बक्रीि की मांति पाने मपी।
बीमा का कोई पपन दिनों नही भाग पा फिर नी उमकी स्मृति दिवसा
कोबरा-रामाही पाठी पी।
एकल नहरे पर पार्टी भी। उसमीक्षा के पति का प्राय पाहि
प्पास पह
पर एक दिन हम सबको अपने पर गुसाकर विमाए-पिनाए ।
मिन-भिन्न समाव की स्भिों के बीप विमसा एपिता नारी भी भावि पूम
पीपी।प्रपार सम्पत्ति मापम प्राय नम हरे पर ममक रहा पा। मोबन
परपुल्ने कारण पुरपों ने बिमसा से उसके पति के बारे में प्रश्न किए।
स्ने रहते समाव से रत्तरतिमा। प्रधाना सरक मित्र रामटर बास में
पूजा फिर पापक पति पाए क्यों नहीं ?"
किमया मे सटाफ उतर दिया 'यह पनकी मी।"
"यह मर्गी शिण्ता के शिष्य है।"
बात यह गिफ्टर बोस हम एक दूसरे के पक्तिगत मामों में परा भो
रिसस्सी नही भेते।
"मविगत स्वाभनुकरणीय है।" बोस ने कमाकर उत्तर दिया।
वमी सरयूपा गया। उनकी मामी में प्रपने बैठने के लिए कुर्ती विसकाकर
योमा हो बोस, पक्तिपत सावता का पानरतो दो बराबर मामों में पाता
है। हीरा और मूगर का मुकाबमा पुष बता नहीं। बात यह है मोहा हा
उस नाम लयाय प्रच्छी नहीं सकती।"
दिममा नदीवी दृष्टि से सरयू को देखा । परम् पपनी भारत के अनुमार
अपने पारों को मंत्र की भाति हिमाने लगा।
बोस पास्तको मान पया। प्रानाकरपोमा "बामा रयामा मह
पारिवारिस्म का ममाफ बामेसा पर कोई बात नहीं मार तुम पार
पिए हुए हो।"
प्रकार एक पोर पमा गमा। मिमै मर्मा कानों पर झम ग्यार
गोमा “प्रा पाप मुझे अपने पास कुमारी?
मिसेस गर्मा काफी गुस्स पर चतुर पुगतो पी।
महाप काकीनार
कीया से हटाती हुई मोती "उनसे यह प्रप्त करना कितना अनुचित चिोमे
सम्पामत को सदा के लिए निमायण रे रखा हो।"
मेकिन मुझे भूस पाने की मास!!"
मिमेन पर्मा पंग साप मुस्कराफर बोली “फिर नो प्रापको मिला पत्र
सपा में हपि।
पिममा ने इस पर ही पाधक भतिरिमा कुछ नही किया।
संस्कारों से प्राव मावानात्मक मन का उमिन बिममा को एक नृतम-विधि
स्थिति में मोहता पा। उस पिचित स्थिति में यह ममपार में मटकी तरणी
कीए प्रयासम्बनहीन होर रहपाठीदी। पठीत की पीड़ा पार मविप्यारा
तिमिर उसकी उप कामना को सहलाया करते 4 पो कामना अपने सवंग
मस्विस का माहान किया करती है।
सेठी से उसका एकात देखा नही मया । उन्हें पारा होने समा किसी
विममा पामम महा पाए पर ये विमला पारों पोर इस तरह माराने करे
रिस तरह कोई उम्मावास्त म्पतिवारों पोर भूमठा है। निममा का कोष
इससे और महागमा।
एकदिन रातमा कर बोली "पाप मेरे पीछे-पीछे को भगे रहते?"
“माम तुमारी तबीयत ठीक नहीं।"
'नहीं है तो मुझे मर गाने दो। मुझे विधी की मी सहानुभूति की पार
पयवा मही।"
क्यों ? म तुम्हारा पति ! यदि मैं तुम्हारी चिता नहीं कमा वो कोग
करेगा?
बिए सैठनी एकता प्राप ऐस ही दुर्वत है फिर परि पाप मेरी पिता'
करेंगे तो पापहरु में प्रधा नही ऐसा ।"
बीकापहरा उतर गया।
“मास की कोई विहीनही पाठी?"
“मही उसमे एकबार लिया का माप यह सोच में कि पापकोटा पाव
मरपया।"
समी मापुरीका माई मोप मा मया । उता माठे ही बात का सिमविचा
ही परत गया । विममा रम्त बन-मगरकर बाहर पनी पई।
पा पर माटी तब सहनी रखी कमरे में अपनी से सहम ऐसे भिमा को
रेलवेदी र मोमे गए पर पी"
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यूमने मुझे वारकर?" "याकरठी?" “म मी तुमारे साप पस समता का। "पाव पाप दिमाग में यह नया विचार एकाएक पैदा क्यों हो पया?" "सिर्फ इसलिए किपरका इम्बत बाहर बार कामिष म मगा से । मर) और ते कि पाप विममा पर कन्ट्रोम कौगिए अस्यमा मापकी दिनता बीप में ही मोनी "यह सरजू बाबू भी पायका रहस्यमय बनते या है। मुमसे प्रमवीरेन में चातुर्य का प्रयोग करते हैं और भापको इयतो नति उमारते है। पाप सरयूपा को कहिए कि कोई पग्मी-सी माती देखकर प्पाइकर पीथिए। या बीपी की स्मृति की प्रात्मना मापश्यकता से अधिक पीपदी हो चुकी है।" "तुम्हे परमासे नमते हैं ?" "मुझे? 'मयों? "पूमना माबिर हमारे वहीन है।" " मेप्टिकोग से उन्हें देखने-परखने का प्रयास महीं किया से मारकम मग घरानो परिवहीन पार मा सममती ईबोकाको इन्होंने ही विवाह का प्रस्ताप करेगा दिया ।चारी म माने पाबकम कहाँ होगी?" इसके बार सेयी पौर विममा माता की पटुता बती गई। बातचीत की मर्मागर्म में विमनान सेमी के अधिकारपूर्ण वाक्यपि वम्हारा पति :- कातना कठोर उत्तर दिया कि वेठबी को चुप एमा पाा। यह मोती " पापकी पाली मा पार न पाप मेरे स्वामी पापने पपने बटे के विरोध करने वापर मुभमे विवाह किया कि माप यह भप्ती भाति मानते थे कि पाप एक मर्प का है। मारो के लिए उतने ही निष्प्रयोरन है जितनी मैत लिए बीन। सेठबीस समय चले गए।
मास रात को पेटबी माने किसी एक विऐप मौकर कोहहे किवम् विपन्न से मित्रता बढ़ानी चाहिए ताकिमल काम बाहरमसा पाए । रसोगिनाने पाते ने यह पात पिमता के कानों में भर की। विममा कोइससे हारिक संसापामा! पापहर रात तक रोशी दी। क्योंकि पपनी पवित्रता पर सम्वेह की लामा मी उसे पसनही बी।किसे पता पाकिएकमारी मपनी पीमित अभिमापार्यो में कपल मूव मानकर बीपी सिने उसकी मुस्कान को सममने का प्रयासमा बिहभपने प्रमुमुखी पन्तर से सरा उस मम सम सुहाम की कामना करती है जिसने उसे वेषम माप में सिपुर भरने की प्रामा रे रखी है। किन पेठ पीकी इस दुटिस-निम्न मारमा को सुनकर उसका हम निर्माण नरीकी नए नाचे मारने मगा। उसने निश्चय कर लिया कि भावनाकार मेकर ममुप्प एकनिष्ठ भय बन एसा परन्तु यह अपने बीवनको पनि रामसुखपौर महान मध्य से पचित पता है। यह पति-सकी पाय- पना में मग्न रहकर क्या मारी-माइति प्रपनी रस भपाता को भूम एस्तीबो पान सपर्प पिकचरे में पिपुस पासना की भाति उसके अन्तराम को को तीनी है ? महासती मुकम्पा की पिरति पौर सेतोप में छिपा हाहाकार पार पुमा को या मरम्परन अपि नही पानवा पा? यह नारी दी राजमारी की पापी।फिरविममा रम पमोगकोपपने मन से पैसे निकाल सकसीपीयोगमा बमारीकी रचना के समय ही उसमें प्रारोपित पर दिया है। यह पगाव मन थिए। समभर पम्मा पर करवटें बबनती रही पौर प्रम में रखने विवर ही निर्णय लिया पिच परिवतीकुमारों में प्रमान में से मया मार्ग ही मूमना पड़ेगा पोषि पास युप में सपानापरप में महासती' का विपनपने नाम मागे कमी महीना सनी । उनका पति रमे पुरपरिष सममा मौकर से संदिपष्टि यतेtपौर उसकार पुरुष-मित्र की नजर उसको एकही फोम मे पेलती है कि कामा उमके प्रेम को स्वीकार करे। पपप बनकर पोषन गमारने से पहा मिडिस मुक्त होकर पवित्र जीवन प्रपनाया जाए। सारिचार पूर्व की स्लिप ज्योत्स्ना प्रथम दर्षन साप मिसरे
प्यास
परिपत हो गया।
पप्राट प्रमोकदीपली तिप्परक्षिता कापसत निद्राह उसके जीवन का विनाश
परमसमेकिन यह सही पप को अपना र स्पानकारी बीवन को अपनाएगी।
पही दिन ही सूखापरण होता है।
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प्यास के पंख १२२ प्यासोपंप "मेरी मिष है।' "कोन है?" 'ममी से रेप पापस मिना-मता है। उस मी प्रापनिवती होगी। मगनी सदी में उससे विवाह करने का विचार है।" रिमनाने भर पाए। हुणाम निक्षम सा में बोला में प्रापके पर को मानता हूँ। पर बल 'मा बमकर इस घर में पागई है तब पाप मेरे मिए पूजनीय बन गई। हमारी समस्त भावनामो से ती मोकल्याप को ही भावना है। इस मामना से होर प्रामी प्राणीमही होग।" *मेकित में से पीसो नाक दे रही है। या मेरे इस कुकर्म कोषेपकर तुमे मुमसे पूना नही होती ?" "पनाका स मामले से क्या सच? यदि मेरा बापनर की समस्त पत्तियों से पूर्ण होता तो में पापसे प्रवक्ष्य मा काला। प मुझे नमवाना पशापौर स्याप की बया पारिधि दुईमताए एवं पानमामी प्रतिमा को किन माप पीवन के लिए मा पोई पोरगीयन के लिए अप करना सम्मा- मनीय समझा पाश"Tनाम भीर होकर बोला हमारे यहाँ जो की महदा पर सपिकमरमती पर एक की मौत पीसको फोरमही समाना। पण बोच सकते है पर इस पभु पार है । मकिन पमुगी मावा पहा ।। प्राणियों के सिप प्राप है इसलिए यहाँ नारी भिकामियोपन होगा। दिममा अपने पदों पर पोरदार योमी फिर भी मोप मुझ होता काया बालें रहते है।" बहसकी माल है। लेकिनए यूप में हम न मामामों एक नए विश्वास मार नहीं पीएने तो एक रिन स्त्री-पुरुष सम्म ने पोहानक हो पाएंगे दिनाना मीएर समस्या समाएगा।" "महादेवला सहनमा ये मना बा एता है पर मारमी नही ! मा में पानी सकता तो प्रारमी बन गारे में ही समया।
पास पंड
१२३
पिममा उसके स्से बातों में अंगुमिया उनमावी हुई मोसी “मरी एक बात
मानोमे कुमाल ?"
*यों नही ? पापील सेवामा काबदसा मी वा मुझे चुकाना है।"
"तुम मुझे 'मानकहा करो मेरे लिए बिमला ही पापी है।
रों"
"हो।" यह फिर रो पड़ी।
“मै मापक रई को समझता है। पौरब रचिए, म्याप प्रापके ही साफ है।
मैं पापो नाम में ही पुकार मा । मुसे कोई फर्क नहीं पहना-मा पार विमता
शाएं हम के सामने पहलहीन होती है।
तौन रोगबार
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समर का कहना था कि सास्प्प-काम के मिए गास को तु परिबर्डम
की पावश्यकता है। किसी पर्वत पर से गापा माए ।
पाना तय हुपा । विममा ने मा कि मैं इसक पाप
बामा । सेठ पी पी चिट्ठी प्राई पी किमान को किसी पहार पर भेर दिया
पाए । रिस होने सपा पाकिकरामिद कुणाल की ममता भोर स्नेह
पिममा को अपने पद से शिक्षित कर। मिनि विममा का विधिन हान
पाहिप्पम एन सीमाम से बह कम गोमती पी। भयंकर स भयंकर पाते
ए सोचने मगी।वह बारबारही पदों को पापिया करती थी कि पहनाम
साव प्रोमी गाएपौ।
निश्चित रिन विमना और भान दोनों ममे गाड़ी पर पुषार हो गए। कई
कर रहें पहचाने प्रारमे । मापुरी मी प्राई दो। मापुरी से मिलते समय दिममा
इमक पड़ी।
"अरे तुम रोने पर्यो नी ? अब तो दुगात बाबू काफी प्रयोपए है।"
परम परेने पाही नापस पहुंचाएगी कि नहीं भय मपता है। किसी
की पमानत की रेखभाल कला प्रत्यम्त कठिन है।"
“यर टीक है दिन पर पतरे की बलियोन गई।
"मगुप्यके भीमकाया मरोठा ?"
१२१ प्यास पर कोपिए। "महीनही मुझे मागपुर की भोर ही माना है। उसने अपने कतरे को दोनों हार्पो से वामकर महा। फिर रसमे भयभीत पृष्टि से उन दोनों पक्किों को देखा। वामान गई कि ये उसकी हागराहट को समझ पाएंगे। इसलिए उसन कोर मौन मारण कर लिया । यह तुरन्त कुमाम के पास बैठ गई । गाड़ी रवाना हो पई। पपने मुंह को पापकर बहार स्वर में बोमो "ये प्रचारक मेहोश हो पर ने इसलिए मैं घबरा पा । मुझे मामपुर हो थामा है।" “आई कोई मारी" "फिर ठीक।" कहकर पल में एक पम के लिए उस रोगीका रेखा, "मे मने कही देखा है। पार नहीं पाता । माईगरेम्द, वागी बनने मे स्मरण पपित की भोर से वापरासीन होगमा ।।" पाने अपने साप रमपित प्रभी पीड़ी देर पहले ये गिमहुच ठरपे । कमबोरी के कारण एकाएक ऐसा हो मया। "कोई बात नहीं। मैं पार कर हा कि ये कौन है ? या पाप बचा सकती बिमलाका पाप पवार बनकर मी पापापापा पया। प्राण क्या उतर? मे वो ममूरी बाला या पिरमा ममाही में क्यों उपा मन ही मन अपने पर मामा पट्टी । पर स्मितिमी बिस्ट बी। की विधान पाणु पास पर लगी थी। नमकी भी दृष्टि से प्रतीत होता था कि पों में यह दृष्टि स्मृति-परम का मी करके यह पानाम पाएगी कि यारी है?? मेदिन हमम कर सपत स्वर में मोमी 'पाप नही पा पान साते। मा गोम में ही रहने पाए। हम राजस्थान है।" " यह मी ता हो मम्ता है कि पारेकोम्पति हो । एक मैरान पौर ए पापापति प्यार विममा नकार विकी के बाहर देखने मनी । पर मे पासासन पर सर में कहा "पापपराइए नही पिर सब मन्या पिन रिमता नस प्रत्यकार में पोकर पपने प्रसर की उस पिसापिनी का कोस रही थी मिसने उसकी मारी को मार दिया था। बहनों महीं कहनी कि यह उसका पति नहीं है। लेकिन पर बात दुध मागे मा गई पी। इसलिए उसने पुप रहना ही सचित्र समझा । यह शिगनी के बाहर मर्दन निकामे देखनी पी।रेतीरही। दिक ने पारा कहा 'भारतीय नारी की निस्सीम पया से फोन प्रपरिचित t? निवपाय पोर पाना मीठो इनकी मापारण बीमारी में पाप तमी मममौत हो गई। पर पाप नहीं मानी प्रिधिसी को नहीं सताता ! बहका पपासु है। सब मन से उसकी भारावमा म सब मंगन होगा। भारी पिममातीमोर पीठ करके बैठ गई। faons अपने मनही मन सोचा कि वह अपने मन पर उतर पाएगी पर ही पहा ? नहीं नही है प्रम्, मेरी मदर फरमा।" पचानक उसके मुख से यह पम्प निम्म पपा । भी तो कहायता है कि प्रभु कपियों की पल्पना ही को महो पर प्रापी मान की सबसे बड़ी प्रास्पा है। गहरा दिसणाम है। पम्तिम सम्बत है। एक मे नरेन्द्र को कहा वृत्रा के प्रमत पर है। ये पंच प्राणी को उस निस्सीम मिचिन पाम में गाते ही रहते है वहां वपकी इन्चाएं, नायनाए और प्रवृत्तियां मनपिन तारों को माति प्रसम्म कम में कमी हुई है। क्या तुम उस सुप्मा का मेउनहीं पर सम्ले हो बापापानिक पुराचार के प्रनामा पस्यम्त अपम्प प.पानपीन है ? मैं समझता है कि वह तुरारमा एक क्षण मी मनही पा सकता। मोजो भी घूमा उमे मुप की सांस भी नहीं मने पी। वह पीन पण प्रारमा की हीनता के कारण ही परमाएपा।" प्रणव मप मौन पाउन पाती भावों से पक को देखकर तप्त पर में कहा "तुमारास ममापार मानिमित्र है। पौर सय पारप में बोध मा पारमिया पाए, यहां सर है और उस पाप रोसरा के लिए मिटा देने के लिए उठाया गया श्राप महा नमाने किन परे पिपों के पुकापवावा माह कदम में प्रति औरहीको समाउ परने के लिए पिस पारन मामना की प्रामामाता होती उसका प्रभाव रहता है। अपनी पासना की तृप्ति शी प्रहार की मना नही जाती।") २न्ट्रीय Teave "तुम भी ऐसा कहते हो मैगा। हा मिनाह एक संयोग है पीर सम्मान मामपाय मानते। मां और बेटे के सिते मी नही टूटवे । मह तुम्हारी सौउनी मा है।' लेकिन मेरा उससि क्या सम्बल? उसने अपने पति को पागकर इसरा रिवाह भी कर लिया है। मेरे पाप का रससे कोई समान्य नहीं पा सब मेरा * पेगा ? मैं कहता हूँ कि उसने मनोरको त्यागकर एकस्य सचिम करनिया । प्रमतो रघकीपाति भीमसगई। मेरा उससे पत-सम्मान की हाफिर महापाषा क्यों ?" 'तुम्हारे पिक पर बासमा का पाविपरय हो गया है।हम पुन पारिम' गई बम समये। मगप्प के तीन बोकों में सबसे स महानोर यह पारमा मन्तर प्रसार में पापियों करनाल पियों में पम पनिा हमारे मानव सौर की ममिळाली होती. मी मठ पर महान् पषिप्ठात्री है । से। परसेपुन करने के बार तुम मी पुबी मार प्रसन्न नही रह सकते।" "मेनिस पुप्पी पर पो पविती माताए अपने सौटने बटों से पपयामि करती ते प्रति विनाम के पैरों को नहीं रोली? पाई हमारे समा कपार, मनीपी पुपारपसार परप को मेरा कमीनापन हमार नमा पाराम मनोकरदे पर पापीमरम सबt" 'भप्यार एक मति बन सकना सप महीं। मेनिक्या या विश्वास सापक हि बार दोनों स्त्री-पुरुष या मा पाएंगे शिकभीम 2? तनिक प्रेषित हो गया। पपने का कारण उसका मस्तानी होपमा। महमति से बीता "तुम पुपर' रम पानि सम्मानको कनी गई म सम्वे मोरम ही नारी पो पनि पया मैमे मरमहा है।'
प्पासपंर १२५ मिना निरम-सी उन दोनों की बातें सुन रही थी। उसका सारा मदन पसीने से ठरवार हो गया था। प्रानक रक गारा प्रश्न किए पान पर बह पीप पती-रोटी अपने पाप कामे ममी मारी की म्पबा को नहीं समझ सक उसके पतराप्त की प्राम को महसूम नहीं कर सकते। पर विदेप की पुततो है बास्ना कापावार पौरपीका महासापर है। किसी भी परम्परा की बना के पास इन मर्मो से परिचित हो बाप्रो। उसने गाम का हाप मपमे रोनों हायों पस मिया का मजबूती के साप।) पर अपनी बात पर सवार पा( यह सामाजिक राधार है। इससे बयो । अनून पा रोटा? पर कभी किसी ने पया ऐसा एफर्म करने पर दुस्साहस मिया है ! ऐमी दुपटनापों का परिणाम बहुत बुरा होता है) तिप्यरशिता का पुमान की पार निकलवाकर विसयिनी बन गई? नहीं नरेन यह उस मारी मी सबसे बड़ी परामय पी। पुमाम 'मां' परकी महामठा पर मर मिटने के लिए उत्तर हो मया । 'गगाई की मात यह है किनारी अपने मौदर्य स पुषय दुति करती है कि यह पपनी पासक्तिमोकांतिका उपोप समम मेवा है। वही पासक्ति तुम्हारे पम्तरगहन गहरों में स प बरन कर मोत यी है। इसम सारपान हो जामो ! बला! इस पाप मूस का नाश करार विवाहको मत होने योग की ममापि पार पह विप-पक्ष कभी नहीं लगे । सामाविक मनापारको समाधान समम्मा सबसे महाप्रपराध है। नरेन्! पता नहीं मनठा कि पान का प्रादमी निमा प्रमन्तुष्ट पयों है? पिमो को पग भी संताप महीं है । मैं रमा भाग मामबमोप्याम मममता हूँ। यह तप्का एक दिन हर किम परिमाम से टपराएगी इम मी करना ही नहीं पर धन हम एक दूसरे मालिप्रतिदिन दूर होवे गा रहे है।"मरा घोग माई कमी मुझे गत नहीं मिलना में गिरा पा मर मपा। वीणा पारमरीन और पर पीएम को देर मनोपरा पनुभव करती-भरती मृत्यु-पम्मा पर पप रोम मे पीडित पदो प्रतिम पत्र गिन रही है। पिरिमापी स्मृति में जीवन निर्वाह करम बामा सरयूएमएपरिवार में प्राने-मानेपानी युक्ती मै रिसाद करके प्रपन गुर ziparon faoll .
प्पास पर । 1 के प्रति निष्फर होपया है। बीमा की सहेती विममा अपने पति को तयारी रही है। तुम पपनी सविपी मा में विवाह करने की बात सोचते हो। तो पहा को मौदेषी मा मपमे पुत्र को मेकर माय पी होगी।" मिपमा विकास निर हो गई। पीव उसके मुख से निकमते-निम्म प पई। ( यह सा मुम । भैया! 'बारों मोर प्यास, प्यास पाप! उफ! या हम मुमो ममिपापों स बार उस सत्य और मुबको नहोबार सस्ते मोबन-चन कास्पाय करता हो। म सोचने के लिए अपनी परिष सापनासे उप्त परस्म के प्राप्रकाश में पपन को नीन करना होगा। मेधूप-वाह को मांति परमते हुए हमारे समरपा का मस्प एक हो काम उस महामंत के पिरन्तम स्वरी में अपने पित कर्मों को बायोपरकरके दप्मा का पंत करें, मालसा को मारे पौर प्रमार को प्रभु का परचम समझा संताप ग्रहण करें सम्पपा एक दिन पादमी प्रातिका पर्यापमापी हो पाएगा। Analai than n पानी सटा-सटाम्परती गई। Hurry स्पन छोटा ही पा । प्रकाश के नाम पर सिसम्मा हुपा सैम्प बस पापा। गिममा उन्मत्त-मी पाई। उसके पास कोप रहेरे। उसके पार पाता मर ही पी रिसम यह पुमा करती थी । भबमा सही पायको हामी। सिरे से निम्मत ही रसने प्रपमे प्रापको कुछ निर्भय पापा । 'यह रास्ता पमा है। उसकी प्रास्मा मेमहापौर बह रखर गई। माड़ी पहन पम्पमा पूर्व माल ने पुकाप मा मा!" मावाभिमूनकर पा मो !" मराज मुह मे निवरा पहा "मी !" पाग पनवनिमिर में मरट पर पाकिएकमारी स्टेशन के बाहर विस्तृत तिमिर में पातोफ परचिन घोड़ती हुई पाप हो रही है पीर पाही पानीमति पा रही है। पामे करेन पहा "तस्य बीत गया। पाम पंग हीन हो गई। तिप्प
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प्रसारमा मार्ग पपना दिया । पर सहरको सभामो, इम मनप्प समझार
को उतावीत मेरा में समापोr यही हमारे मन का पमरे, गौरन ।
|सस पारी पर और उचित संप प्रौर कारि!" मातीचमी
पीपी।