Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Mai Na Jannu Kaun Paraya
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मैं न जानूं, कौन पराया
मुनि ज्ञान
प्रकाशक
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी जैन संघ
समता भवन, बीकातेर (राज.)
1 मै न जानू, कौन पराया
मुनि ज्ञान
प्रथम संस्करण • अगस्त
प्रतिया
मूल्य 20/-
अर्थ सहयोगी : श्री सायरचन्द जी छल्लाणी
:
प्रकाशक:
श्री अ.भा.साधुमार्गी जैन संघ,
समता भवन, रामपुरिया मार्ग, बीकानेर
मुद्रक :
अमित कम्प्यूटर्स एण्ड प्रिन्टर्स, बीकानेर
दूरभाष:547073
प्रकाशकीय श्रमण भगवान महावीर ने चतुर्विध सघ के कुशल सचालन का उत्तरदायित्व आचार्य श्री सुधर्मा स्वामी के कधो पर रखा। सुधर्मा स्वामी ने आचार्य श्री जम्बू स्वामी एव जम्बू स्वामी ने आचार्य प्रभव स्वामी के कंधो पर रखा। उसके पश्चात् से आचार्य परम्परा निरन्तर गतिमान चली आ रही है। साधुमार्गी के इस दीर्घकालीन इतिहास मे हास और विकास का क्रम चलता रहा है। यह सुखद सयोग रहा है कि हास के विकट काल मे भी समर्थ एव सुयोग्य आचार्यों का पावन सानिध्य इस परम्परा को प्राप्त होता रहा है। श्रमण परम्परा में लगभग 200 वर्ष पूर्व शिथिलाचार व्यापक रूप से फैलता जा रहा था। शुद्ध साधुत्व के दर्शन दुर्लभ होते जा रहे थे। क्षेत्र, धर्म स्थल एव शिष्यो के व्यामोह मे साधुता भग्न होती जा रही थी। ऐसे युग मे आचार्य श्री हुक्मीचन्द जी म सा का जन्म हुआ और उन्होने दीक्षित होकर आगमिक ज्ञान और शुद्ध साधुता के बल पर साधुमार्गी परम्परा को प्राणवान बनाया। आचार्य श्री हुक्मीचन्द म सा के बाद इस परम्परा को पश्चात्वर्ती आचार्यों ने उत्तरोत्तर आगे बढाया। आज हमे परम प्रसन्नता है कि समता विभूति, समीक्षण ध्यान योगी आचार्य श्री नानेश के पट्टधर प्रशान्तमना, व्यसन मुक्ति के प्रेरक, श्री वाल प्रतिबोधक, आचार्य श्री रामलालजी म सा के सानिध्य मे साधुमार्ग की वह धारा विकसित रूप मे उभर कर आ रही है। आचार्य श्री रामेश के निर्देशन मे श्री अ भा साधुमार्गी जैन सघ जिनशासन की सुरक्षा/सवर्धन के लिए कृत सकल्प है। सघ की शासन उन्नयन की विभिन्न प्रवृत्तियो में सत्साहित्य का प्रकाशन भी एक अह प्रवृत्ति है। प्रस्तुत कृति मै न जानूं, कौन पराया का प्रकाशन उसी ध्येय की पूर्ति है। प्रस्तुत कृति विद्वद्वर्य ओजस्वी व्याख्याता, सत प्रवर श्री ज्ञानमुनिजी म सा के ज्ञान का सदोह है। साधुमार्गी धर्म सघ के अष्टमाचार्य श्री नानेश के अन्तेवासी सुशिष्य श्री ज्ञानमुनिजी ने 13 वर्ष की अल्प आयु मे दीक्षित होकर उत्कृष्ट ज्ञान साधना, अथक लगन एव रचना धर्मिता द्वारा अपने नाम को सार्थकता प्रदान की है। मुनि श्री विद्वान साहित्यकार और सफल प्रवचनकार है। अपनी विद्वता और वक्तृत्वकला से उन्होने शासन की जो भव्य प्रभावना की है उससे संघ गौरवान्वित है। इतिहास, चितन स्मरण, काव्य उपन्यास, कहानी, प्रवचन आदि अनेक विधाओ और विषयो पर आपकी गद्य व पद्य मे अनेक (3)
।
कृतिया प्रकाशित हो चुकी है। जो जैन-समाज मे समादृत है। प्रस्तुत कृति के लिए
हम मुनि श्री के आभारी है। प्रस्तुत कृति मैं न जानूं, कौन पराया का प्रकाशन
असावरी जिला नागौर निवासी सघ/शासननिष्ठ सुश्रावक श्री सायरचन्द जी
छल्लाणी के अर्थ सौजन्य से हो रहा है। साहित्य के प्रकाशनार्थ प्रदत्त अर्थ
सहयोग हेतु सघ हार्दिक साधुवाद एवं आभार ज्ञापित करता है। प्रकाशन प्रक्रिय
मे सहयोग हेतु श्री उदय नागोरी धन्यवाद के पात्र है। पूरा विश्वास है मुनि श्री
की कृति मे सन्निहित संदेश आत्मसात कर पाठक अंतरावलोकन करने मे समर्थ
होगे और जीवन को सम्यक् दिशा मे अग्रसर करेगे।
निवेदक
शान्तिलाल सांड
संयोजक
साहित्य प्रकाशन समिति
श्री अ भा सा जैन सघ, समता भवन, बीकानेर
अर्थ सहयोगी परिचय विद्वद्वर्य, ओजस्वी व्याख्याता श्रद्धेय श्री ज्ञानमुनि जी म सा की प्रस्तुत कृति में न जानूं, कौन पराया का प्रकाशन सघ/शासननिष्ठ, सेवाभावी सुश्रावक श्री सायरचन्दजी छल्लाणी के अर्थ सौजन्य से हुआ है। मूलत ग्राम असावरी जिला नागौर निवासी श्रीमान झूमरमलजी छल्लाणी के आत्मज श्री सायरमलजी को सरलता, सेवा व समर्पणा के सस्कार विरासत मे मिले, जिन्हे आपने वृद्धिगत रखा और समाज मे अपनी पृथक् पहचान बनाई। आपके पितृश्री विगत तीन दशक से नित्य सामायिक, स्वाध्याय एव त्यागमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आप दोनो समय सामायिक की साधना करते है तथा लगभग 25 वर्षो से चौविहार का पालन करते है। ईमानदार, सादगीपूर्ण जीवन, सरल/सहज व्यवहार, सत्य के प्रति समर्पित जैसे गुणो से युक्त व्यक्तित्व है आपका। श्री सायरचन्द जी व इनके अनुज द्वय-श्री कैलाश चन्दजी एव श्री सुमेरचन्दजी ने कक्षा 5 से 11 तक जैन हॉस्टल, भोपालगढ मे रहकर जैन विद्यालय में अध्ययन किया एव तदनन्तर जैन दिवाकर होस्टल, व्यावर से बी कॉम किया। सन् 1978 मे इन्होने मामाजी व ननिहाल वालो के साथ निर्यात (Export) का व्यवसाय किया और अथक परिश्रम, प्रतिभा व लगन से अनवरत सफलताए अर्जित की। विगत 25 वर्षों मे इन्होने 60-70 बार विदेश यात्रा की। अमेरिका, इटली, फ्रास, जर्मनी, स्पेन, डेनमार्क, U.K. आदि देशो मे प्रामाणिकता व विश्वसनीयता की छाप छोडकर आपने जैन समाज, राजस्थान व भारत को गौरवान्वित किया है। सन् 1985 मे तीनो भाइयो ने सयुक्त रूप से Jewellery (जवाहरात) व Handicrafts (हस्तकला) का व्यापार प्रारभ किया। जवाहरात मे दिल्ली राज्य का अवार्ड (Award) मिला व दो बार अखिल भारतीय स्तर का (1993 व 1999) Jewel का अवार्ड मिला। 1994 मे आपका श्री ज्ञानमुनिजी म सा से एव तदनन्तर पूज्य गुरुदेव आचार्य प्रवर श्री नानालालजी म सा से सम्पर्क होना जीवन मे महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। तभी से आप नियमित सामायिक, स्वाध्याय करते है और भक्तामर का पारायण भी। अब प्रतिक्रमण भी सीख लिया है। आपने उत्तराध्ययन सूत्र, दशवैकालिक सूत्र, स्थानाग सूत्र सहित जैन धर्म का मौलिक इतिहास (चार भाग) जवाहर किरणावली आदि का स्वाध्याय/अध्ययन कर लिया है। विगत (5) चातुर्मास मे श्रावक के बारह व्रतों को भी अंगीकृत किया है। उल्लेखनीय है कि आपने एक बाल्टी से नहाना, पुष्प नहीं तोडना या उपयोग मे न लेना, इत्र आदि के त्याग-प्रत्याख्यान किये हुए है, जो स्तुत्य व अनुकरणीय है। आपकी धर्मपत्नी पुष्पाजी भी नियमित सामायिक की आराधना करती है व प्रतिक्रमण, पुच्छिसुणं आदि कठस्थ कर लिये है। आपका परिवार दिल्ली मे पधारे हुए संत-सतियां जी म सा आदि की सेवा से बराबर लाभान्वित होता है और धर्म-लाभ से वचित नहीं रहता। स्वाध्याय के प्रति विशेष रुचि व साधु-सतो, महासतियांजी म सा के स्वास्थ्य सबधी कार्य में छल्लाणी परिवार का सदैव योगदान रहता है, जो श्लाघनीय है। विश्वास है सद्-साहित्य के प्रकाशन हेतु आपका सहयोग भविष्य में भी मिलता रहेगा। उदय नागोरी सदस्य साहित्य प्रकाशन समिति अनुक्रमणिका क्रस विषय पृष्ठ सख्या १ 9 २ 21 ३ 40 ४ 49 مر 60 ६ 75 मै ना जानू, कौन पराया मै कहा से आया हू, कहा जाऊगा अन्दर की आग जला दे बाग मृत्यु है द्वार मुक्ति का सथारा उत्कर्ष उत्कर्ष आत्महत्या-अपकर्ष विश्व युद्ध होने पर भारत का क्या होगा ? सवत्सरी कैसे मनाए जैनियो । भागो मत, जागो बाहर के लिए भीतर को बदले अनित्य देह मे नित्य आत्मा मै का सस्कार या असस्कार स्वाध्याय और ध्यान क्यो आवश्यक ? समीक्षण ध्यान साधना प्रयोग विधि ७ 95 117 ६ 124 १० 128 ११ 132 १२ 142 १३ 149 १४. ज्वलत प्रश्न समाधान 161 (7)
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1 मैं ना जानें, कौन पराया अनुसार, भोजन । प्रज्ञाशील उपासको । जिन्दगी के शाश्वत इतिहास को बताने वाला एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण शास्त्रो मे आता है कि एक सत भिक्षा के लिये घर- घर मे जा रहे थे। जाते-जाते एक ऐसे घर मे पहुचे, जिसमे यह नियम था कि इस दिन अमुक महिला रसोई बनायेगी। दूसरे दिन दूसरी महिला, इस प्रकार उस घर की व्यवस्था बनी हुई थी। उसी व्यवस्था के बनाया जाता था। प्रत्येक गृहिणी यह चाहती थी कि वह स्वादिष्ट रुचिकर भोजन बनाए। इस होड मे नित नये पकवान एव व्यजन बनाये जाते थे। सभी यही चाहती थी कि उसके हाथ से बढिया से बढिया भोजन बने ओर घर के सभी सदस्य उसकी प्रशसा करे। उस दिन जिस महिला ने भोजन बनाया। उसमे तुम्बे की सब्जी बनायी। बढिया मसाले डाले, फिर उसे चखा तो पता चला कि यह तो एकदम कडवी सब्जी है। इसे खायेगे तब पारिवारिक जन क्या कहेगे ? कहेगे कैसी फूहड महिला है। अभी तक सब्जी बनानी नहीं आती। अत पहले चख लिया सो अच्छा हुआ। अब इसकी जगह दूसरी सब्जी शीघ्र बना दू इस सब्जी को इधर-उधर रख दू फिर बाहर डाल दूगी। किन्तु डालने जैसी जगह नहीं दिख रही थी। सभी आ जा रहे थे। सयोगवश उसी समय सत आ गये। उस महिला ने सोचा-चलो इनके पात्र मे डाल दू। इससे बढिया ओर क्या होगा? पातरा खोलते ही उदात्त भावो का प्रदर्शन करते हुए मनुहार करके महाराज के बस-बस करते सारी सब्जी डाल दी। उसे लेकर वे गुरुजी के पास आये। गुरुजी ने चखी तो लगा भयकर कडवी है। वे बोले- यह खाने योग्य बिलकुल नही है इसको खाने से व्यक्ति मर भी सकता है। अत तुम इसे ले जाओ और जहा एकान्त स्थान हो, निरवद्य भूमि हो, वहा इसको परठ देना। (9) मे मुनि उस पात्र को लेकर जगल मे एकात स्थान मे पहुचे। गुरुजी के आदेश-निर्देशानुसार निरवद्य स्थान भी देखा। उस निरवद्य स्थान पर पहले एक बूद डाली, डालते ही वहा उसकी गध से कीडिया आने लगी। उस गध से उन चीटियो का प्राणान्त होने लगा, ऐसा देखकर वह शिष्य विचार करने लगा कि गुरुदेव ने तो कहा है कि निरवद्य स्थान पर परठना। वह स्थान कहा है ? चिन्तन करने लगा। उसे लगा कि सबसे ज्यादा निरवद्य स्थान यह शरीर है उस करुणासागर साधक ने सभी जीवो को अपनी आत्मा के समान मानकर वह सारी सब्जी खुद ने खाली। घोर वेदना होने लगी। भयकर असाता वेदनीय कर्मों का उदय हो गया उस असह्य वेदना को वे शात भाव से समाधि पूर्वक सहने लगे। आत्म स्वरूप मे निमग्न हो गये। देहातीत अवस्था को प्राप्त हो गये उन्ही क्षणो मे बैठे-बैठे प्राणात हो गया। वे उस समताभाव से कहा पहुचे ? देवलोको को लाघते-2 वे सर्वार्थ सिद्ध विमान पहुच गये । इधर गुरुजी इतजार कर रहे थे। दो घटे हो गये पर शिष्य नहीं आया तो गुरुजी ने अपने निर्मल ज्ञान से मालूम किया तो पता लगा कि उसने तो कडवा तुम्बा खाकर अपना कारज सिद्ध कर लिया। सर्वार्थ सिद्ध विमान मे चले गये। गुरुजी का सीना खुशी से फूल गया। इसने मेरी बात कैसी मानी, स्वीकार की। मैंने निरवद्य स्थान हेतु कहा। उसने इस निरवद्य स्थान हेतु अपने प्राणो की आहुति दे दी, क्योकि वे आत्मन प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत की दृष्टि ही नही व्यवहार करने वाले थे अत यही सोचा कि जैसी मेरी आत्मा है वैसी ही अन्य प्राणियो की आत्मा है। वे सव्व भूयप्प भूयस्स, सम्म भूयाइ पासओ के आदर्श थे। इस किस्म के थे कि "मैं ना जानू, कौन पराया" यदि कीडियो की हिसा होती है, पशुओ की हिसा होती है तो वह हिसा भी मेरी है। इस आदर्श को दुनिया के सामने रखा और बताया कि तुम्हे सुख से, शान्ति से जीना है तो यह समझना होगा कि पराया कोई है ही नहीं तुम गुस्सा कर रहे हो, परन्तु किस पर ? जब कोई पराया है ही नहीं तो फिर गुस्सा करके स्वय की हानि क्यो कर रहे हो ? अन्य आत्माओ के साथ अभेद सबध जोड लो। कनेक्शन सही होगा, तभी लाइट जलेगी। आप चाहे कि पडौसी के घर मे प्रकाश न जावे। इसलिए आप पडौसी के घर जाने वाली लाइन को काट देगे। तो क्या आपके घर की लाइटे चल सकेगी ? क्या आपको प्रकाश मिल सकेगा? अगर आपको प्रकाश चाहिये तो पडौसी के लाइन को भी दुरस्त रखना होगा। पानी की लाइन पडौसी के यहा जा रही (10) है उसे आप काट देगे। तो क्या आपके यहा पानी आ सकेगा। नही । जैसे लाइट ओर पानी हेतु लाइन की सुरक्षा जरूरी हे वैसे ही आप स्वय सुख चाहते हैं तो दूसरो के सुख की सुरक्षा भी करनी होगी। ओरो को तो जाने दीजिये। एक ही परिवार की छत के नीचे रहने वाले माई-भाई एक दूसरे के सुख की सुरक्षा करे। सास बहू के सुख का ध्यान रखे। दिवरानी-जेठानी के सुख की कामना करे। अगर किसी ने भी किसी के सुख को टुकराने की कोशिश की तो वह भी दुखी हो जायगा। एक के साथ किया गया दुर्व्यवहार, रखा गया दुर्भाव या दुश्मनी अन्य सभी को खराब कर देगी। एक बार श्री कृष्ण वासुदेव पर एक देव प्रसन्न हो गया और उस देव ने प्रसन्न होकर एक भेरी दी। उस भेरी की यह विशेषता थी कि जो भी बीमार व्यक्ति उस भेरी की आवाज सुन लेता, वह स्वस्थ हो जाता। श्री कृष्ण उस भेरी को हर छह माह के बाद बजाते थे। जिस दिन भेरी बजाते उससे पहले ही दूर-दूर से काफी रोग पीडित लोग एकत्र हो जाते। भेरी की आवाज सुनकर वे स्वस्थ हो जाते। एक बार एक धनाढ्य सेठ का पुत्र बीमार हो गया। उस सेठ को मालूम पड़ा कि मेरी तो छह महीने बाद बजती है। पर इतना इतजार कौन करे ? उस सेठ ने पता लगाया कि वह भेरी किस कर्मचारी के पास है। सेट उस कर्मचारी के पास पहुचकर कहने लगा कि में तुम्हे 100 मोहरे दूगा। तू मेरे पुत्र को भेरी की आवाज सुना दे । परन्तु कर्मचारी ने साफ मना कर दिया। फिर भी सेठ कहने लगा। भेरी की आवाज तेजी से निकलती है। इसलिए तुम नही सुनाना चाहते हो। तो एक काम करो मैं तुम्हे 1000 स्वर्ण मोहरे देता है। तुम मुझे भेरी का एक छोटा सा टुकडा काटकर दे दो। 1000 स्वर्ण मोहरो की बात सुनते ही उस कर्मचारी के मन मे आया कि इस बात को कोई जान नही पायेगा। मुद्रा के लोम मे उसने सेठजी की बात स्वीकार कर ली और 1000 स्वर्ण मुद्राए लेकर मेरी का एक छोटा सा टुकडा काटकर सेठजी को चुपचाप दे दिया। और मेरी के वेसा ही नकली टुकडा चतुराई के साथ लगाकर फिट कर दिया। सेठजी ने उस टुकडे को पीसकर पुत्र को पानी के साथ दवा की भाति पिला दिया। वह लडका उस चूर्ण को लेते ही स्वस्थ हो गया। गाव के लोगो को आश्चर्य हुआ कि लडका एकदम सख्त बीमार था। इतना जल्दी कैसे ठीक हो गया। अभी कोई भेरी तो नही बजती है। सो ठीक हो जाय ? सेठ जी ने हसते हुए कहा यही तो हमारा कमाल है कि भेरी बजने से पहले ही हमारा काम हो जाता है। इससे लोग समझ गये कि इसने जरूर कर्मचारी को घूस दी है। अन्यथा यह काम (11) दुष्कर था। इस सभावना से इन्कार भी नही किया जा सकता अत अन्य श्रेष्ठी वर्ग भी जब कभी बीमारी की समस्या से घिरते तो वे उस कर्मचारी के पास लुके छिपे रूप पहुच जाते और कोई 10000 स्वर्ण मोहरे उसको दे रहा है। तो कोई 50000 स्वर्ण मोहरे दे रहा है। कोई एक लाख स्वर्ण-मोहरे देकर भेरी का टुकडा ले जा रहा है। इस प्रकार टुकडा कटते-कटते भेरी का असली स्वरूप समाप्त होने लगा और उसके स्थान पर नकली टुकडे जुङ-जुडकर नकली रूप असलियत के रूप मे अवशेष रह गया। 6 महीने बाद जब श्री कृष्ण मेरी बजाने आये जब भेरी नही बजी तो वे असमजस मे पड़ गये। विचारने लगे क्या हुआ क्यो नही बज रही है। वे उस भेरी को अच्छी तरह से देखने लगे तब पता चला कि मेरी मे तो टुकड़े-टुकडे जुडे हैं। श्रीकृष्ण ने उस कर्मचारी को बुलाया उससे पूछा तो वह भय से कापने लगा उसकी धृष्टता भरे दुसाहस के कारण उसे तुरत मौत की सजा सुना दी। आज इन्सान क्या कर रहा है यदि किसी को छोटी सी बात के लिए भी झूठ बोलना पडे तो वह बोल जाता है, चोरी करनी पड़े, 5 रुपये के लिये बेइमानी करनी पड़े तो कर लेता है। छोटी-छोटी बातो मे अपनी प्रतिष्ठा खराब कर लेता है। इस प्रकार इस जीवन रुपी मेरी मे व्यक्ति अन्याय अनीति अत्यचार, झूठ, चोरी, छल प्रपच करके टुकडे जोडता जा रहा है। उस व्यक्ति का तो एक जन्म ही बिगडा। पर आप अपने जीवन मे स्वार्थ, मोह, ममता जोडते चले गये तो कितने जन्म बिगड जायेगे क्या कभी इस बात का विचार किया ? करे भी कैसे इस ओर आपका ध्यान ही नही है ? न ही इस रूप मे इन बातो को समझ रहे हैं न ही ले रहे हैं। लेकिन भगवान महावीर कहते हैं कि तुम अपना अस्तित्व सही बनालो। इन दूषित भावनाओ का त्याग कर दो छोड दो। वीर प्रमु के समवसरण मे जन्मजात दुश्मनी रखने वाले शेर और बकरी भी एक साथ एक ही स्थान पर भी शान्ति से बैठते थे। क्योकि भगवान महावीर की अहिसा, मैत्री और समत्व भाव की ऊर्जा एव इनके वायुमण्डल का इतना जबरदस्त प्रभाव रहता था कि वे वहा अपने जन्मजात वैर भाव को भूल विस्मरण हो जाता। शत्रुता के भाव ही जागृत नहीं हो पाते। इतना सशक्त उनके शुद्धमावो का आभामण्डल रहता था। यदि आपके प्रति कोई शत्रुता रखे तो आप भी उसके प्रति शाति रखे। आप उसके प्रति शुम चिन्तन करे, मगल भावना रखने का अभ्यास कर ले तो वह भी आप से प्रेम करने लग जायेगा। स्थान-स्थान पर जैन स्थानक बने हैं। इनके नाम के नीचे लिखा रहता है-" परस्परोपग्रहो जीवानाम" इस सूत्र का रहस्य हम समझते ही नहीं (12)- जाते।
1 है। इसके भावो को छूते ही नही है यह सूत्र सस्कृत मे हैं। इसका अर्थ नहीं समझ पाए, बस उस चिह्न को देख लेते हैं। इसमे विश्व शाति का सदेश छिपा है यह शाति का प्रतीक है। परस्पर सहयोग करने का निर्देश रहा हुआ है। एक-दूसरे की सुरक्षा का ख्याल रखने से स्वत ही सुख-शाति का सचार होने लगता है। हमारे शरीर मे रही इन्द्रिया भी एक दूसरे का कितना सहयोग करती है। पैर मे काटा चुम जाय तो मस्तक को तुरत सूचना पहुच जाती है। आख उस स्थान को देखती है, हाथ काटे को निकालने का कार्य करता है। खाना मुह से खाया जाता है पर उसका हिस्सा सभी इन्द्रियो को मिलता है इसीलिये तो शरीर मे पुष्टि आती है। एक किडनी फेल हो जाती है तो दूसरी किडनी विशेष काम करना शुरू कर देती है। एक हाथ के काम मे दूसरा हाथ सहयोग देता है। एक पैर के साथ दूसरा पैर सहयोग देता है तभी व्यक्ति चल सकता है। इस प्रकार एक दूसरे के साथ सहयोग देने पर ही शरीर की स्थिति सही चल सकती है। वैसे ही हम दूसरो की आत्मा को सहयोग करना सीखे दूसरे की आत्मा के साथ जुडना सीखे। जैसे हम शरीर को चलाते हैं, वैसे ही हमे परिवार समाज के चलाने के लिए एक दूसरे के साथ जुडना होगा। जोडना होगा। एक-दूसरे के साथ जुडेगे तब ही शाति से जी सकेगे। आज के मानव ने परस्पर मे सहयोग करना तो बद कर दिया है किन्तु परस्पर विग्रह (परस्पर विग्रहो जीवानाम) करना, भेद डालना प्रारम कर दिया है। सेठ के चारो बेटे अलग-अलग रहना चाहते हैं। सास, बहू को सहयोग नही देती। देवरानी-जेठानी को सहयोग नही देती बल्कि सहयोग करने वाले को दूर हटाती है। अपनी ओर खीचती है। इस प्रकार विग्रह करते हुए चाहती है कि हम ही शाति प्राप्त करे अन्य को नहीं मिलनी चाहिये। एक बार ब्रह्माजी ने सभी देवताओ को भोज पर बुलाया। सभी पगत मे बैठ गये। सुन्दर बाजोटो पर थालिया लगी हुई थी। ब्रह्म माया होने से जिसको जो मिठाई आदि खाद्य पदार्थ अच्छा लगता है। वह उसकी थाली में मौजूद रहता। सभी खुश थे। खाने के लिए अपना हाथ आगे बढाने लगे। लेकिन हाथ कडक हो गये। हाथ मुह की ओर मुडता ही नही है। सोचा हाथ बादी के कारण ऐट गया। अत हाथ सख्त हो गया है। पडौसी की ओर नजर पहुची तो उसका भी वही हाल है। समझ गये कि यह ब्रह्मा जी की माया है। अद समस्या के समाधान का विचार किया तो ध्यान मे आया कि हाथ नही मुड रहा है पर अगुलिया तो मुड ही रही है। अत अगुलिया व अगूठे के साथ जुडकर थाली से खाद्य सामग्री उठा करके सामने वाले के मुह मे दे सकते हैं। ऐसा सोचकर । (13) उन्होने अपनी-अपनी थाली मे से मिठाई आदि उठा-उठा करके एक दूसरे के मुह मे डालने लगे। सभी को इस प्रकार खाने व खिलाने मे बड़ा मजा आने लगा। आनद से खा रहे थे। हमेशा से भी ज्यादा पेट भर गया। लाखो देवता खा गए पर कुछ देवता अडे रहे कि वे दूसरो के मुख मे भोजन न देकर थाली छोड उठ गए और ब्रह्माजी के लिये कहने लगे कि ये हमारी मजाक उड़ा रहे हैं, हमारा अपमान कर रहे हैं। वे ब्रह्माजी के पास पहुचे। ब्रह्माजी ने उनसे पूछा क्या आपने भोजन कर लिया। उन सबने कहा- नही किया आपने हाथ ऐठा करके हमारी मजाक उडाई। भोज के लिए बुला भी लिया और अपमान भी किया। ब्रह्माजी ने कहा-मैंने न अपमान किया न हाथ ऐठाया है तभी भोजन करने वाले बोले- हमने भोजन नही किया है, इतने मे दूसरे देवता भी वहा आ पहुचे। ब्रह्माजी ने उनसे भी पूछा- कि तुमने भोजन कर लिया क्या ? तो उन्होने कहा- हा । हमने आज आराम से भोजन खाया, बडा मजा आया पेट भरके भोजन खाया है। तब ब्रह्माजी ने कहा- जो दूसरो को खिलाना जानता है, वह देव है। जो स्वय ही खाते हैं, अन्य को नही खिलाते हैं, वे दानव हैं। क्या आप खिलाते हैं पहले दूसरो को। पहले के लोग जगल मे जाते, बाहर जाते तो साथ मे रोटिया ले जाते थे। कुत्ते, गाय आदि को खिलाकर आते। फिर कुल्ला करते थे पर आज दिशा के लिए जाने की जरूरत नही शौचालय कमरे से अटेच हैं। आज गाय बाधने को जगह नहीं है। पर गाडी रखने को गेरेज हैं। आज मानव एक-दूसरे का सहयोग नही करता। सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करने मे लगा रहता है ऐसी स्थिति मे फिर कही न कही गाडी एक्सीडेट होगी और उस स्वार्थ का परिणाम भोगना पडेगा। आज पति-पत्नी आपस मे लडते रहते हैं। तो क्या वे अपना उद्धार करेगे और क्या परिवार, समाज, राष्ट्र का उद्धार करेगे। पति कहता है - पत्नी नही मानती। पत्नी कहती है पति ध्यान नहीं देता। पर ऐसा करने से काम नहीं चलेगा। परस्पर मे समन्वय बिठा करके चलना होगा। एक युवक को गुस्सा बहुत आता था। उसकी शादी का समय आया तब उसने विज्ञापन जारी किया कि जो भी लडकी मेरे साथ शादी करे वह मेरे इशारे पर जब तक काम करती रहेगी, तब तक तो ठीक है। यदि उसने मेरे इशारे के अनुसार सकेत के अनुरूप काम नहीं किया तो मैं उसे पीट सकता है। अब आप ही बताओ कि ऐसा विज्ञापन पढकर कौन उसके साथ अपनी लडकी की शादी करेगा। अपनी प्यारी बिटिया को जानबूझकर कौन खड्डे मे डालेगा। एक लडकी ने भी उस विज्ञापन को पढा, सोचा कि यह (14) । । लडका भी कैसा है जो अपने दुर्गुण का विज्ञापन कर रहा है। इससे स्पष्ट है कि उसमे इस कमी के साथ विशेषता भी रही होगी। आज लडकी के चश्मा लग रहा है तो लेन्स लगा लेते हैं ताकि पता नहीं चले। बीमारिया छिपाते हैं। भगवान ने कहा है कि- "कन्नालिए गोगलिए, भोमालिए"। अर्थात् कन्या के लिए झूठ नही बोलना। पर आज कन्या के लिए झूठ बोल रहे हैं। लडकियो को दुखी कर रहे हैं। उस लडकी ने अपने माता-पिता से स्पष्ट कह दिया कि मुझे इस लडके के साथ ही शादी करना है। माता-पिता मे उसे खूब समझाया परतु लडकी ने भी अपने माता-पिता को समझाया कि जो अपना दुर्गुण प्रकट कर सकता है, उनमे अनेक सद्गुण जरूर होते हैं ओर वैसे मैं स्वय ध्यान रखूगी। पति परमेश्वर का रूप होता है। अत हर इशारे को वेसे भी मानना ही है। आप किसी तरह की चिता मत करो मेरा सबध इसी लडके के साथ कर दीजिए। माता-पिता को अपनी लडकी पर पूरा भरोसा था कि इसकी सोच एकदम सही है। इसलिए उन्होने उससे सवध करना तय कर लिया। कुछ समय बाद इसकी शादी हो गयी। लडकी खूब सावधानी रखती। पति के इशारे पर चलती। पति के मानस-स्वभाव को समझकर हर कार्य मे प्रवृत्त होती थी। अत दो वर्ष मे झगडे का अवसर ही नही आया। एक सन्तान भी हो गयी। किन्तु युवक ने सोचा झगडा हो नही रहा है। अब क्या करे ? झगडा हुये बिना तो मजा नहीं आता। अगर नाराज हो जाय तो पत्नी को वापस मनाने में मजा आयेगा उसने सोचा कि मैं किसी तरह इसे छेडू। उसने प्लान । बनाया और कहा आज आलू के जितने भी आइटम बन सके उतने बनाना। जो मागू वही आना चाहिये। अगर नहीं आया तो ठीक नही रहेगा। पत्नी ने कहा-ठीक है। उसने सारी तेयारी चालू कर दी, हर तरह के आइटम तैयार किये। कचौरी, समोसा, आलू का हलवा, टिकिया, वाटी, पूडी आदि। शाम को युवक घर आया। पति के बैठने के लिए सुन्दर तैयारी थी। टेबल पर थाली रखी। युवक जो मागे वही हाजिर। पत्नी पूछ रही थी और क्या हाजिर करू ? आज आलू घर-घर मे बडे शोक से खाया जा रहा है। किन्तु उन्हे मालूम है या नही आलू मे कितने जीव होते हैं। एक सूई की नोक पर आये उतने आलू मे अनत जीव होते हैं। सूई के अनमाव पर समाये उतने कद-मूल मे असख्याता श्रेणिया होती हैं। एक-एक श्रेणी मे असख्याता प्रतर होते हैं। एक-एक प्रतर से असख्याता गोले हैं। एक-एक गोले मे असख्याता शरीर (15) हैं। एक-2 शरीर मे अनन्त जीव हैं। इधर उस युवक की पत्नी पूछ ही रही है-ओर क्या दूं। उस युवक को गुस्सा आया, कि यह तो जीत रही है, मैं हार रहा है। उसने सोचा इससे कुछ न कुछ ऐसी वस्तु मांगू जिससे इसको थोडा विचार करना पड़ जाये। युवक ने कहा और क्या-2 देऊ-2 क्या कह रही हैं अब ओर क्या देगी पोटी दे। पत्नी ने कहा-वह भी तैयार है। पति के घर आने से पहले-2 बच्चे ने लेटरिंग कर दी थी। बच्चे को साफ करके लेटरिंग उठाने वाली ही थी कि पतिदेव आ गये। अत उसके मान सम्मान में लग गयी। पति को खराब न लगे इसलिये उसने उसके ऊपर एक कटोरी ढक दी थी। उसने हाथ जोड़ कर नम्र भाव से कहा यह लीजिये पोटी। पति को भी खूब आश्चर्य हुआ। जिस पत्नी को इतना बडा समर्पण है वहां शान्ति क्यों नहीं रहेगी ? उसने भी सदा के लिए झगडा नही करने की प्रतिज्ञा ग्रहण कर ली। अगर आप भी अपनी सतान को अच्छा रखना चाहते हैं तो पहले एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहना सीखिए। एक बार एक बच्चे ने गम्मी से पूछा- रेडियो और टी वी मे क्या अन्तर है, उसकी मम्मी ने बताया कि जब तक पापा-मम्मी कमरे मे लडते रहे तब तक रेडियो। बाहर आने पर टीवी चालू जाता है। यह है आज की स्थिति। जरा आप अपने आप मे समन्वय बनाये रखने की कोशिश करे। पत्नी के लिए एक शब्द आता है- अर्धागिनी-- इसका मतलब है आधा अग। जैसे-दो पैर, दो हाथ, दो किडनी, दो आखे एक दूसरे का सहयोग करते हैं। वैसे ही पति-पत्नी का भी आपस मे परस्पर सहयोग होना चाहिये। पति-पत्नी दोनो अकडकर रहेगे तो एक-दूसरे के प्रति सहयोग नही रहेगा उसके न रहने से शांति नही रह सकेगी घर मे त्रैसठ के आक की तरह परस्पर स्नेह सौहार्द्र सामजस्य बना रहता है तभी तक घर मे शाति रह सकती है। यदि एक दूसरे का एक दूसरे के प्रति दुख दर्द मे सहयोग बनता है, दूसरो के सुख के लिए अपने सुख का बलिदान कर देते हैं तो उसका विस्तार स्वत हो जाता है। दोबीवे एक सेठ का लडका था। लडका जब पढ़-लिखकर होशियार हो गया तब पिताजी ने उसे परदेश जाकर धनोपार्जन करने की आज्ञा दी। दोबीवे ने पिता की आज्ञा मानी। पिता ने जहाज मे माल भरवा दिया। दोब्रीवे परदेश के लिये रवाना हो गया। रास्ते मे एक तुर्की जहाज मिला। उस जहाज मे से मनुष्यो के करुण क्रन्दन की आवाजे आ रही थी। दोबीवे को दुःखद आश्चर्य हुआ कि इस में से रोने-चीखने की आवाजे क्यो आ रही हैं ? उससे रहा नहीं गया। दोवीवे ने तुर्की जहाज के कप्तान से पूछा कि तुम्हारे जहाज मे से यात्रियों के रोने की (16) . आवाज क्यो आ रही है ? क्या वे भूखे हैं ? वीमार हे ? तुर्की कप्तान ने कहा- नही । ये न भूखे हे ओर न ही बीमार हे पर ये सारे केदी हैं ? हम इन्हे गुलाम बनाकर लाए हैं। बेचने ले जा रहे हैं। दोन्रीवे ने कहा-अच्छा । ऐसी बात हे तो अपन जहाज का आपस मे सौदा कर लेते हैं। तुर्की कप्तान ने दोव्रीवे के जहाज मे झाककर देखा तो बहुत माल दिखाई दिया। बेशकीमती सामान देखकर तुर्की कप्तान के मुह मे पानी आ गया। जहाज बदलने को तैयार हो गया। जहाजे बदली हो गयी। दोव्रीवे ने पास वाले बन्दरगाह पर पहुचकर सभी कैदियों को मुक्त कर दिया अपने-अपने स्थान पर सुरक्षित पहुचाने की व्यवस्था भी कर दी। अत मे एक सुन्दर कन्या व एक बुढिया बची। उन दोनो को भी यथास्थान पहुचाना चाह रहा था। किन्तु उनका देश बहुत दूर होने से ओर वहा का रास्ता मालूम न होने से पहुचा न सका। उस लडकी ने बताया कि मैं रूस के बादशाह की पुत्री है। यह बुढिया मेरी दादी है। मेरा देश बहुत दूर होने से घर लौटना मुश्किल है। अत यही पर रहकर मेहनत मजदूरी करके अपना काम चलाऊगी। दोव्रीवे ने उन दोनो को अपने साथ रखा। राजकुमारी, दोव्रीवे के रूप गुण और व्यवहार से आकर्षित होती जा रही थी। अत उसने दोबीवे को अपने साथ शादी करने हेतु निवेदन किया। दोनो की शादी हो गयी। राजकुमारी ने अपने हाथ की अगूठी दोबीवे की अगुली मे पहना दी। दोबीवे अपनी जहाज, राजकुमारी और बुढिया के साथ अपने देश पहुचा। बन्दरगाह पर पिताजी प्रतीक्षा कर रहे थे। दोनीवे ने पिताजी से सारी बात कह दी। किन्तु पिताजी वहुत नाराज हुये। कुछ दिनो बाद पिताजी ने सोचा कि- बेटा अब पहले जैसी गलती थोडे ही करेगा। अत बेटे को पुन जहाज मे माल भरवाकर परदेश के लिये विदा किया। दोत्रीवे एक बन्दरगाह पर पहुचा। उसने देखा कि सिपाही कुछ गरीबो को जबरन केद कर रहे हैं। उन गरीबो के बच्चे बिलख-बिलख कर रो रहे हैं। दोबीवे ने वहा पर रहने वाले अन्य लोगो से पूछताछ की तो मालूम पड़ा कि इन को राज्य का टेक्स नहीं चुकाने के अपराध मे कैद किया जा रहा है। ऐसा सुनते ही दयालु दोव्रीवे ने अपने जहाज का सारा माल बेचकर उस सपत्ति से उन गरीबो का सारा टेक्स चुका दिया उन गरीयो को छुड़ा लिया। दोबीवे पुन घर लौटा। पिताजी को सारा वृत्तान्त सुनाया तो पिताजी आग बबूला हो गये। उन्होने अपने घर से दोबीवे. उसकी पत्नी तथा बुढिया को निकाल दिया। नगर के लोगो ने सेट को बहुत समझाया। तब कही जाकर पुन घर मे उन तीनो को जगह दी तथा साथ ही कडी चेतावनी दी कि अब ऐसा नही होना चाहिये। दोनी को तीसरी । (17) बार फ़िर धनोपार्जन हेतु जहाज मे माल भरवाकर परदेश भेजा। दोव्रीवे इस बार जिस बन्दरगाह पर उतरा वहा पर दो पुरुष बादशाही पोशाक पहने मिले। वे दोनो उस दोबीवे को ध्यान से देख रहे थे। एक ने दोबीवे से कहा कि तुम्हारे हाथ ही अगूठी जानी पहचानी लग रही है। मेरी लडकी भी ऐसी ही अगूठी पहनती थी। आपको यह अगूठी कहा से मिली है। दोबीवे ने उन दोनो को सारा वृत्तांत कहा। तब वह भाई बहुत खुश होता हुआ बोला कि मैं रूस का बादशाह व आपका ससुर हू। आप सपरिवार यहा पधारिये। में आपको रूस का आधा राज्य दे दूगा। रास्ता बताने हेतु मैं अपने मत्री को आपके साथ भेजता हू। दोब्रीवे पुन कुछ समय बाद देश की ओर लोटा तो मत्री दोबीवे के साथ उसके नगर पहुचा। इस बार दोबीवे के पिता ने रूस के आधा राज्य वाली बात सुनी तो बहुत खुश हुये। सेठ सपरिवार रूस के लिए जहाज मे रवाना हुआ मत्री के दिल मे दोबीवे के प्रति ईर्ष्या पैदा हो गयी कि यह दोबीवे कहा से कहा तक पहुच रहा है। ईर्ष्या के कारण उस मत्री ने रास्ते चलते जहाज से दोबीवे को समुद्र मे धक्का दे दिया। दोबीवे पूरी शक्ति के साथ तैरने लगा। पुण्यवानी से समुद्री लहरो ने उसे समुद्री किनारे पहुचा दिया। तीन दिन वह वहा जैसे तैसे रहा। चौथे दिन एक मछुआरा नौका लिये निकल रहा था दोबीवे ने उस मछुआरे से सारी बात कही। तब उस मछुआरे ने कहा कि मैं तुम्हे रूस तक तभी पहुचाऊगा जब तुम मिलने वाली सपत्ति का आधा हिस्सा मुझे देने का वादा करो। दोबीवे ने वादा स्वीकार कर लिया। दोबीवे रूस पहुचा। राजमहल मे पहुचकर बादशाह से मिला। बादशाह की प्रसन्नता का पार नही रहा। पिछला सारा वृत्तात सुनाकर बादशाह से प्रार्थना की कि आप मत्री को माफ कर दे। इस उदारता से बादशाह ओर खुश हुआ। और अपना सारा राज्य दोव्रीवे को सोंपकर बादशाह प्रमु भक्ति मे लग गया। जिस दिन दोबीवे ने महोत्सव के साथ राजमुकुट पहना। उसी दिन वह बूढा मछुआरा आया उसने दोनीवे को वादे की बात याद दिलायी। दोब्रीवे ने उस मछुआरे का स्वागत किया और कहा कि राज्य का नक्शा देखकर अपना आधा-आधा राज्य बाट लेते हैं। खजाना भी आधा आधा बाट लेते हैं। बूढा बहुत प्रसन्न हुआ ओर दोबीचे की पीठ ठोकते हुए कहा शाबास बेटे | तुम इसी तरह दयालु, दानी व ववन के पक्के बने रहो। तुम मानव की आकृति मे देव हो। असली धर्मात्मा हो आदि कहता हुआ बिना कुछ लिये ही वहां से चला गया। दोनीचे का न्याय नाति पूर्वक आनद से राज्य चलता रहा। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि (18) । जिसने दूसरो की रक्षा की हो, उसे सब कुछ मिलेगा। किन्तु आज तो बेईमानी, झूठ, हिसा, चोरी आदि से लेना चाह रहे हैं। भगवान महावीर को चडकोशिक ने डक मारा उसके बदले में उन्होने क्या दिया ? बोध दिया अगर ऐसा करोगे तो अवश्य सामने वाला भी सुधर जायेगा। आजकल धनवान भी दुखी हैं क्योकि वे अपने सुख के लिये दूसरो का नुकसान करने तैयार रहते हैं। अपनी सुख-सुविधा के लिए दूसरो के सुखो को लूट रहे हैं। अपने पानी लाइट के लिए दूसरो की लाइट काट रहे हैं तो फिर वे स्वय भी दुखी होगे या नही। अगर किसी के घर को आग लग जाये तो सबसे पहले सूचना कौन करेगा-पडौसी। इसका मतलब यह नही कि उसकी आप के प्रति हमदर्दी है। अपितु वह अपनी सुरक्षा के लिए फोन करता है कि आग बढ गयी तो मेरे घर का क्या होगा? पडोसी के दुख दर्द की हमने परवाह नहीं की तो वह बरबादी कभी न कभी हमारे लिए भी खतरा उत्पन्न कर देगी। सास-बहू भाई-भाई की बरबादी हमे खराब कर देगी। अत हम समन्वय करना सीखे। यदि हमने आग को हवा देना सीखा तो वह आग आपको जला देगी। आप भी शाति से नहीं रह सकेगे। अगर आपने वर्तमान मे दूसरो का सहयोग नहीं किया तो यह भव, परमव सभी बेकार हो जायेगे। एक बार बादशाह ने बीरबल से कहा कि तुम मेरे समक्ष चार व्यक्ति ऐसे लाकर खडे करो। 1 जो यहा हे वहा नही 2 यहा तो नही, पर वहा है। 3 यहा भी है, वहा भी है। 4 यहा भी नही व वहा भी नहीं। बादशाह की इन चारो बातो को सुनकर बुद्धिमान बीरबल तुरत वहा से निकला नगर मे जाकर एक वेश्या, एक साधु, एक सेठ तथा एक भिखारी को वह लेकर आया बादशाह के समक्ष उपस्थित किया। बीरबल ने बादशाह को एक-एक का परिचय देना प्रारम किया। 1 नगर वधू वेश्या के पास इस भव मे सपत्ति, महल आदि की कमी नही है पर परमव मे इसके लिये कुछ भी नहीं है। 2 कचन कामिनी के त्यागी साधु के पास इस भव मे खाने को भी कुछ नही रहता किन्तु परमव मे उनके लिए सब कुछ है क्योकि इनकी गति देवताओ की है। 3 तीसरा व्यक्ति सेट है जो दानवीर है उसके पास वर्तमान में भी बहुत कुछ है और दीन हीन गरीबो की सेवा मे वैभव का सदुपयोग करता है धर्म ध्यान त्याग तप करना है। अत परलोक उसका देव का होने से वहा भी उसके लिए सब कुछ है। 4 चौथा व्यक्ति भिखारी है जिसके पास वर्तमान कुछ नही है और अगले जन्म के लिए कुछ भी नहीं करने से उसे अगले भव मे भी कुछ नही मिलने वाला है। इस जीवन को नैतिकता-मानवता आदि । मे भी (19) की साधना मे जोडना होगा। दया, उपासना, पौषध, सामायिक आदि साधनाओ मे लगना होगा। अगर ऐश्वर्य के नशे मे झूमते रहे। सुखोपभोग मे डूबे रहे। मौज मस्ती मे जीवन को खोते रहे तो नगर वधू की तरह भले ही यहा अपने आप को सुखी समझ लो अपने को सब कुछ मान लो पर बरबाद हो जाओगे और अगर भिखारी की तरह से कजूस बने रहे और त्याग तप मे भी जीवन नही लगाया तब भी बरबाद हो जाओगे। आप इसे भूल मत जाना कि कौन पराया है ? सभी आत्माएं समान हैं। जैसी आपकी आकाक्षा रहती है वैसी ही आकाक्षा उसे भी रहती है। आप अपने लिए सब सुख सुविधाए चाहते हैं तो वह भी चाहता है। स्वरूप की दृष्टि से मूल चाह की दृष्टि से कोई भिन्नता आप मे और उनमे नही है। अत आप अपने जीवन मे उपलब्ध वस्तुओ का विनिमय करते हुए अपने वर्तमान जीवन के साथ भविष्य को उज्ज्वल एव प्रकाशमय बनाने की चेष्टा करेगे तो आपका जीवन सफल एव सार्थक बन सकेगा समवत आप अपने इस लोक और परलोक को सफल बनाने मे यथाशक्ति प्रयत्नशील रहेगे इसी भावना एव आशा के साथ अपने विषय को विराम दे रहा हूं। (20) मैं कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा हे में कौन हू, कहा से आया हू और कहा जाऊगा ? यह एक ज्वलन्त प्रश्न हर भव्य-आत्मा के मन मे सदियो से उठता रहा है। इसका उत्तर जिन्हे प्राप्त हुआ वे तो पारगामी बन गए ओर जिनके लिए अनुत्तरित रहा वे आज भी इस ससार-अर्णव (समुद्र) मे इधर से उधर अगाध जल प्रवाह के थपेडे खा रहे हैं। उनमे से हम भी एक यद्यपि इन प्रश्नो की खोज करने मे हमने कई जिन्दगिया खपा दी हे तथापि हताश-निराश होने वाली बात नही है हमे फिर से इस प्रश्न की नये सिरे से खोज करनी होगी। कहते हैं किसी समय महान् वैज्ञानिक एडिसन अपनी प्रयोगशाला में एक नया प्रयोग कर रहे थे। अपनी सहायता के लिए एक नवयुवक वैज्ञानिक को भी रख रखा था। जिसकी उम्र मात्र सत्रह-अठारह वर्ष की रही होगी। एडिसन जैसे महान् वैज्ञानिक का सपर्क पाकर पहले तो वह नवयुवक बड़े उत्साह-लगन से काम करता रहा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया प्रयोग मे सफलता जब नही मिल रही थी, तब उसके मन मे उकताह सी आने लगी। उसे यह लगने लगा। अब इस प्रयोग को छोड़ देना चाहिये। लेकिन एडिसन के सामने कहने का साहस नहीं था। इधर एडिसन उसी अगाध धैर्य के साथ नित नये प्रयोग करते जा रहे थे। जब बहुत सारे प्रयोग करने पर एक लम्बे समय तक भी सफलता नहीं मिली तो उससे रहा नहीं गया, एक दिन साहस करके उसने एडिसन पर अपना हतोत्साह व्यक्त कर दिया। युवक की इस हरकत पर एडिसन ने आख उठाकर कहा- काम करो। इस काम के लिए मुझे माफ करे। 3 महीने हो गए - युवक बोला (21) लगातार प्रयोग करते हुए एक भी सफल नही हुआ। सब प्रयोग व्यर्थ गए। तब एडिसन ने जो जवाब दिया, वह हर क्षेत्र में निराश व्यक्तियो के लिए समझने वाला है। वे बोले- युवक | सफलता के इतने नजदीक आकर बद कर दे ? युवक आश्चर्य से बोला- सफल कहा ? हम तो सफलता से आज भी उतने ही दूर हैं। जितने तीन महीने पहले थे। एडिसन बोले- लगता है तुम्हे सही गणित नहीं आती। इतने रास्ते हमने देख लिए जो बेकार हो गए। इससे साफ है कि अब बेकार रास्ते कम हो गए। अगर तीन सौ रास्ते हैं। उसमे दो सौ बेकार हो गए तो अब देखने वाले 100 ही बचे हैं ना। आज नहीं तो कल, कल नही तो परसो हम सफलता के रास्ते मे निरतर आगे बढ़ते जा रहे हैं। तुम कैसे नवयुवक हो जो सफलता के पास आकर हार मान रहे हो। एडिसन के इन वाक्यो ने उस युवक मे फिर से जोश भर दिया। हमारा भी आध्यात्मिक जगत् मे यह हाल बना हुआ है। हम भी भवो-भवो से खोज कर रहे हैं कि "मैं कौन हू लेकिन वह लगातार अनुत्तरित ही चल रहा है कोई बात नहीं। हमने 200 रास्ते नही बल्कि 84 लाख रास्ते रूप योनिया पार करते-करते यह मानव जीवन प्राप्त कर लिया है। किनारे आ गए हैं। सफलता नजदीक है। अब तो इसकी खोज करके ही रहना है। साहस के साथ हमारा सकल्प मजबूत बने। नेपोलियन ने अल्पास-पर्वत को पार करते हुए यह नही सोचा कि पहले कई महारथी इसे पार नहीं कर सके तो मैं भी नही कर पाऊगा। बल्कि वह हताश व्यक्तियो की बात सुनकर उसे पार करने मे दुगुना उत्साहित हो उठा। हमे भी गिरने वालो से भी शिक्षा पाना है और पारगामियो से भी शक्ति पाना है। निराशा- हताशा को तो अपने पास फटकने ही न दे। यद्यपि मैं कौन हू यह प्रश्न बडा जटिल है। सहस्राब्दियो से अनेकानेक लोगो ने विभिन्न रूपो मे इस पर अन्वेषण किया है। कोई कहता है मैं शरीर हू, मैं धन हू, मैं आत्मा हू, मैं जीव हू या मैं अमुक लिगी हू, अमुक व्यक्ति ह आदि विभिन्न रूपो मे अनुसधानात्मक बाते उमर कर सामने आती रही है। पर हकीकत मे देखा जाय तो मैं, ऐसा-वैसा कुछ नही हूँ। में तो केवल में ही हू। निपट में, अकेला मैं। जिसमे दो हो ही नहीं सकते। जहा दो है वहा मैं और तू है। वहा फिर मैं केसा। मैं को समझने के लिए हमे इस द्विरूपता को छोडना होगा। (221 । । मैं, मतलब मैं, और कुछ नही। भगवान महावीर ने "एगे आया" का सूत्र देकर यह स्पष्ट कर दिया कि बस अकेली आत्मा दो नही। जहा दो वहा, अधूरापन है। जहा दो हे, वहा सघर्ष है, द्वन्द है, अशान्ति है। केवल मैं ही दर्पण अलग होकर भी उसमे देखने वाला व्यक्ति दर्पण को न देखकर अपने को देख रहा होता है। वैसे ही दुनिया को देखने वाला व्यक्ति भी अगर "मैं" मे है तो वह वहा पर भी मैं को ही देख रहा है। वहा तू कुछ है ही नहीं। तू नही तो कुछ झगडा है ही नहीं। जो कुछ भी है वह मैं तुम का झगडा है। भगवान महावीर ने सगम जेसे घोर निकृष्टता पर उतर आए देव को भी तू के रूप मे नही देखा, उसमे भी मैं ही देखा। वह भी में है। यही कारण था कि सगम देव द्वारा छ मास तक घोर कष्ट देने के बावजूद भी प्रमु उसका हित ही सोच रहे हैं। क्योकि वहा तू कोई है ही नही। धर्म रूचि अणगार ने चीटियो की रक्षा के लिए कडवा तुम्बा नही पिया। बल्कि वे तो अपनी रक्षा के लिए ही कडवा तुम्बा पी रहे थे। वे चीटियो की नही अपनी रक्षा चाहते हैं। क्योकि वे चीटियो को भी अपने से अलग नहीं समझते, वह भी में ही हू। जब व्यक्ति एगे आया के सूत्र का इस प्रकार से विस्तार कर देता है तो उसके सारे द्वन्द, सघर्ष, हिसा, ईर्ष्या, द्वेष, राग सब कुछ विलीन हो जाते हैं। बस आत्मा के तल पर एक ही तथ्य रह जाता है कि मैं है। जब तक तू तू, मैं में करते रहेगे तब तक हम ऊपर की परिधि मे ही भटकते रहेगे। परिधि के केन्द्र पर पहुचने के लिए हमे इससे ऊपर उठना होगा। पारिवारिक जीवन मे भी एक छत्त के नीचे रहकर भी यदि तू तू में मैं करते रहे तो वहा भी शान्ति नही रह सकती। तू में को समाप्त करना होगा। तू तू नही वह में हू। फिर उसके हित, आपके हित बन जाएगे। उसके अहित आपके अहित होगे। वैसी स्थिति मे दुख द्वन्द आ ही नहीं सकता। मैं ऐसे दो भाईयो को जानता हू। जिनके पास करोडो अरबो का धन है। धन कमाने मे उनकी पुण्यवानी खूब काम करती है। लोहे मे भी हाथ डाले तो सोना बन जाता है। पर माता-पिता के रहने तक तो दोनो एक थे। क्योकि केन्द्र जो एक है। उनके स्वर्गस्थ होते ही केन्द्र टूट गया। इगो टकरा गया। वह कहता है मैं अलग तुम अलग। छोटा बोला- इतनी संपत्ति होते हुए भी मैं तुम्हारे अधीन नही रह सकता। मैं तुम अलग-अलग रहेगे। आखिर सघर्ष बढने लगा। इसी बीच बडे भाई का अच्छे सतो से सपर्क हो गया। उसे तू मैं की दीवार तोडने के लिए कहा। परिधि नहीं केन्द्र समझाया। वह समय गया। घर गया और अपने छोटे भाई को स्टाम्प पर लिखकर दे दिया। मैं में मैं हूँ। - (23) कुछ नही, सब कुछ तुम हो। मेरा कुछ नही, सब कुछ तुम्हारा है। यह धन दौलत सब तुम्हारे हैं। मैं भी कुछ नही बस तुम ही हो। मैं भी तुम मे है। यह सुनते ही और स्टाम्प पर लिखा देखते ही तो छोटा भाई भी दिल से बदल गया। वह भी कहता है। जहा ऐसा भाई हो, वहा मैं कुछ हू ही नहीं। मुझे कुछ नही चाहिये। बस वह भाई चाहिये। मैं सब कुछ वही हू जो माई है। झगडा खत्म। दोनो परिधियो से हटकर केन्द्र तक जो पहुच गए थे। यह व्यवहारिक तौर पर केन्द्र पर पहुचने की एक कला है। जहा कहीं भी द्वन्द खत्म होकर शाति आ सकती है तो हमे आन्तरिक तल पर यह बात समझनी होगी। समझनी ही नही, आत्मसात् करनी होगी। हम, मैं को किसी दौलत. परिवार, मकान या रिश्ते नाते के साथ न जोडे। वे सब पलटने वाले हैं। वे मैं के साथ जुडने वाले नहीं हैं। अनमेचिग । अनमेज्ड कर दिया तो खतरनाक रूप ही उभरता है ब्लड ग्रुप मिलाए बिना रक्त चढा दिया तो वह मरीज की जान ले सकता है। यही हाल इन बाहरी जड तत्त्वो के साथ आत्मा का है। जड तत्त्व अनमेच्ड है। जब तक उनकी जड तत्त्वो की आत्मा के साथ मेचिग कराते रहेगे। तब तक सघर्ष पनपते रहेगे। हमे आज नही कल इन रास्तो को बद करना होगा। जो रास्ते एडिसन के शब्दो मे व्यर्थ हो गए हैं। जिन पर हम एक बार नही अन्नती बार जा चुके हैं। वैसी स्थिति मे अब उन रास्ते पर जाने की आवश्यकता नही रह गई है। मत घबराइये हमारा किनारा आ चुका है। अब यदि उस युवक की तरह हताश हो गए तो सफलता चरण नहीं चूमेगी। सफलता पाने के लिए हमे, अपने "मैं" को जगाना है। बाहर से नही भीतर से। बाहर के प्रयास, केवल भीतर को जगाने के लिए हैं। बिना भीतर को जगाए काम हो ही नहीं सकता। बाहर की ए बी सीडी भीतर की एबी सी डी को जगाने के लिए हैं। अगर वह न जगे तो बाहर से भरी गई ए बी सी डी बच्चे के दिमाग मे नही रह सकती। बहुत बार ऐसा होती भी हे अत हमे बाहरी ज्ञान, विज्ञान एव सारे आदर्शों को भीतर मे जगाने के लिए लगाना है। अन्तत हमे यह नॉलेज - "मैं" मैं हू। जागृति करना है। तभी तरगे समाप्त होगी। द्वन्द्व समाप्त होगे। इच्छाए नि शेष होगी। भगवान महावीर ने सही माने मे मैं को जगाया था। यही कारण था कि उन्हे अपनी मा त्रिशला भी त्रिशला नहीं, वे ही दिखने लगने लगे। त्रिशला का कष्ट भी उनका न होकर वर्धमान का हो गया। वे एक हो गए। परिणाम- स्वरूप हिलना-डुलना बद कर दिया। वे त्रिशला के देह से एक नहीं थे। अपितु उनकी आत्मा से एक थे। कष्ट के लिए एक थे। यह एकात्म (24) --- । दृष्टिकोण भगवान महावीर का गर्म से लेकर निर्वाण तक की जीवन यात्रा मे स्पष्ट रूप से परिभाषित होता है। वे जहा भी गए, जिन्होने, चाहे उन्हे सुख दिया हो या दुख। अनुकूल हो या प्रतिकूल। रागी हो या द्वेषी। पर उनकी मैं की धारा उन सबके लिए भी एकात्म भाव के रूप में प्रवाहित होती रही। कर्मों की गदगी साफ होती रही और एक दिन, में का विराट स्वरूप पूरे लोक मे विस्तीर्ण हो गया। वे सब कुछ पा गए कृत-कृत्य हो गए। आध्यात्मिक गहराइयो मे उतारने वाला "मैं' व्यवहारिक समस्याओ का भी पहले समाधान करता है। जिन्दगी मे होने वाले हानि-लाम, उत्थान-पतन के बीच यह समझने की आवश्यकता हे कि मेरा है वह जाता नहीं, जो जाता है वह मेरा नही। ये विचार भी किसी हद तक व्यक्ति को सतुष्ट करने वाले होते हैं। निश्चय मे तो यह शाश्वत सत्य है कि जितनी वस्तुए इन्सान ऊपर से एकत्रित करता है उन्हे जाने के पहले यही छोडकर ही जाना होता है। इसमे परमप्रिय समझा जाने वाला शरीर भी है। वह भी यही रह जाना है। मानसिक स्थिति को समतोल बनाए रखने के लिए यह प्रखर चिन्तन व्यक्ति को मानसिक स्तर पर निश्चिन्त बनाए रखता है। यही चिन्तन आगे से आगे बढता हुआ चरमोत्कर्ष मे परमरूपता पा जाता है। "मैं" को समझने के लिए सतत चिन्तन एव स्वाध्याय की अपेक्षा है। भगवान महावीर ने आचाराग सूत्र मे भव्यात्माओ को सबोधित करते हुए कहा है- “सपेहए अप्पग भप्पएण' हे भव्य आत्मन् । तू अपनी आत्मा से अपने को ही देख दुनिया मे भी दुनिया को नही, अपने को देख। सब जगह जब स्वय को देखेगा तो द्वन्द समाप्त हो जाएगे। यदि तुम्हे लड़ने की इच्छा भी हो जाय तो दूसरे से न लडकर अपने से लडो। जेसा कि प्रमु कहते हैं- अप्पाणमेव जुज्झाहि कि ते जुज्झेण बज्झओ। हे आत्मन | अपने आप से युद्ध कर, अन्य किसी से युद्ध करने में कोई लाभ नहीं है। क्योकि जो दूसरो से युद्ध करने वाला है, वह कभी नही जीतता। बल्कि जीतकर भी पराजित हो जाता है। अत युद्ध अपने ही कुविचारो से किया जाय, उन्हे सशोधित कर स्वच्छ बनाया जाय। प्रभु ने कहा है-- अप्पाणमेव मप्पाण जइत्ता सुह मेहए। (25) ܚ मैं केवल मै हूँ। अपने आप से, अपने आपको जीतने वाला सच्चे सुख को पा जाता है। इसलिए अपने आपको पहचानना जरूरी है। कौन हू में। मैं तन नही, धन नहीं, मन नही, दौलत नही, परिवार नही, जड नही है इसके अलावा कुछ नही यह स्वरूप भीतर मे उभरना चाहिये। तब वही "में स्वरूप बडा होते-होते विराट लोकरूपता को पा लेता है। मैं कौन हू, पर कुछ समीक्षा करने के बाद इस पर विशेष कुछ मथन करने के लिए कहा से आया हू, कहा जाऊगा आदि पर विचारणा करने के लिए सर्वप्रथम वीतराग देव प्रभु महावीर की वाणी आचाराग सूत्र के प्रारभिक सूत्रो पर मन्थन कर लेना भी आवश्यक है। इह मेगेसि णो सण्णा भवइ, तजहा- पुरत्थिमाओ वा दिसाओ आगओ अहमसि दाहिणाओ वा दिसाओ आगओ अहमसि पच्चत्थिमाओ वा दिसाओ वा आगओ अहमसि, उत्तराओ वा दिसाओ आगओ अहमसि, उद्याओ वा दिसाओ आगओ- अहमसि ? अहो वा दिसाओ आगओ अहमसि । अण्णरीओ वा दिसाओ अणु दिसाओ वा आगओ अहमसि ? एवमेगेसि णोणाय भवइ । अस्थि मे आया उववाइए णत्थि मे आया उववाइए के अह आसि ? के वाइओ दूओ चुओ इह पेच्चा भविस्सामि ? से ज पुण जाणेज्जा सह सभइयाए परवागरणेण अण्णेसि अतिए वा सोच्चा तजहा- पुरत्थिमाओ वा दिसाओ आगओ अहमसि-जाव अण्णयरीओ दिसाओ अणुदिसाओ वा आगओ अहमसि । एवमेगेसि ज णाय भवइ- अस्थिमे आया उववाइए जो इमाओ दिसाओ अणुदिसाओ वा अणुसचरइ "सोहं" सव्वाओ दिसाओ-अणु दिसाओ जो आगओ अणुसचरइ "सोहं" से आयावाई-लोयावाई कम्मावाइ-किरियावाई।। अकरिस्स चाह कारवेसुं चाऽह करओ यावि समुणन्ने मविस्सामि । एयापकति अर्थ भगवान का यह कथन अर्द्ध मागधी भाषा मे हुआ है। इसका तात्पर्य यह है कि इस दुनिया मे बहुत सी आत्माएं ऐसी हैं जिन्हें इस बात का गान नही है कि मैं पूर्व दिशा से, दक्षिण दिशा से, पश्चिम से, उत्तर से ऊची नी: (26) । या किसी विदिशा से आ रहा हू या अनुदिशा से आ रहा है। फिर बहुत से प्राणियो के मन मे ऐसी जिज्ञासा भी उठती हे कि मेरी आत्मा पुनर्जन्म पाने वाली है या नहीं ? में पहले कोन था ? ओर यहा से मरने के बाद परभव जन्मान्तर मे क्या होना है ? अर्थात् आगे कहा जाऊगा ? इसका उसे यथार्थ ज्ञान नही होता। किसी-किसी को ऐसा ज्ञान हो सकता है। उस हो सकने मे सहयोगी तीन कारण होते हैं-जाति स्मरण ज्ञान से, या फिर ज्ञानी तीर्थकर या केवली महापुरुषो के कहने से या उपदेश द्वारा यथार्थ तत्त्व सुनने से बहुत से जीवो को ऐसा भी ज्ञान होता है कि मेरी आत्मा पुनर्जन्म को पाने वाली है। जो अमुक दिशा से आई है। वह मै हूं इस प्रकार जिसे ज्ञान हो जाता है, वह आत्मवादी, लोकवादी, कर्मवादी, क्रियावादी बन जाता है। इस प्रकार मैंने किया, करता हू, करूगा। इस प्रकार करने, कराने ओर अनुमोदन करने के त्रिकाल की दृष्टि से तीन भेद होकर नो भेद हो जाते हैं। जिन्हे मन-वचन-काय से सयुक्त करने पर 9 x 3 =27 भेद बन जाते हैं। वीतराग देव ने लोकोत्तर ज्ञान मे अनन्तानन्त आत्माओ को अवमासित कर दुनिया को यथार्थ स्वरूप समझाने हेतु निर्देश दिये हैं। सर्वप्रथम यह जानना तो बहुत मुश्किल है कि "में" कोन है। जब तक इस बात का यथार्थ ज्ञान न हो जाय तब तक उसे करणीय अकरणीय का भी सही बोध नही हो सकता। दार्शनिक गेटे, एक बार शाम को बगीचे मे घूम रहे थे। वे अपने चिन्तन मे मस्त घूमते ही रहे। घूमते ही रहे। समय गुजरता गया। कई आए और चले गए। पर गेटे वैसे ही घूम रहे हैं। रात्रि के 12 बजने को आए। बगीचा खाली हो गया। पर वह साया अभी भी घूम रहा है। जिन्हे कोई भान नही। बगीचे का रक्षक चकराया, घबराया, बोला कोन है ? पर कोई आवाज नही। वही चक्रमण यो ही चलना। आखिर चौकीदार घदराकर जोर से चिल्लाया रुक जाओ। नही तो गोली मार दूगा। इस बीच गेटे की गति धीमी पडी वे रुके तो चौकीदार फिर बोला- कौन हो तुम ? दार्शनिक ने अपनी ही भाषा मे जवाब दिया कि इसे ही तो जानने का प्रयास कर रहा हू कि कौन हू मैं ? यह बात अभी तक नहीं जान पाया है। । । (27) चौकीदार सोचने लगा-लगता है कि कोई पागल है। यह बात सही भी है कि किसी पागल को समझदार आदमी कभी भी सही नहीं लगता। वह उसे अपनी थ्योरी से अलग ही नजर आता है। वह तो पागल ही मानेगा उसे। आज भी जिसने मैं को नहीं पहचाना या "मैं" को विकृतरूप मे पहचाना वह कभी भी "मैं" को जानने वाले को सही मानेगा ही नही। क्योकि उसके नाप मे वह आ ही नहीं सकता। दुनिया मे ज्यादातर लोग "मैं" के स्वरूप को जानते नही है। विकृत "मैं' तो अह को बढाने वाला है। शुद्ध स्वरूपी "मैं" अहकार को क्षीण नष्ट करने वाला होता है। मैं के साथ बहुत सारे फाल्स रिलेशन जोड रखे हैं। जिनमे चिपका हुआ आदमी आजकल से नही अपितु अनन्त जन्मो से 84 लाख रूपो मे भटका है। उन रूपो को जरूर छोड आया पर उनके कुसस्कार नही छोडे। इसलिए आज भी घूम फिर कर उसी चक्कर मे उलझा पड़ा है। वे ही सरकार उरो बार-बार अडचने खडी कर रहे हैं। परेशान कर रहे हैं। उन सब कुसस्कारो को हटाने के लिए मैं की झलक पानी होगी। तभी वह कहा से आया है और कहा जाएगा इस तथ्य को जान सकेगा। इसकी जानकारी के लिए तीन मुख्य कारण बतलाए गए हैं। प्रथम तो जाति स्मरण ज्ञान से। जाति स्मरण यह शब्द जैन दर्शन का पारिभाषिक शब्द है। महत्त्वपूर्ण है यह शब्द । इस ज्ञान को मतिज्ञान का भी भेद माना है। अर्थात् पहला जो सामान्य ज्ञान है मतिज्ञान का भेद है। जाति स्मरण, वेसे भी सामान्य ज्ञान है। क्योकि जो सस्कारो मे भरा होता है वह निमित्त पाकर कभी-कभी, किसी-किसी के मस्तिष्क मे उभर जाता है। जाति से पूर्व जन्म के सस्कार लिये जा सकते हैं उनका स्मरण हो आना, जाति स्मरण ज्ञान माना जाता है। यह ज्ञान, जीव को बीते भव की जानकारी दे सकता है। मैं के साथ ही गत एव आगत भवो की जानकारी के लिए दूसरा कारण ज्ञानियो का कथन भी माना गया है। जिनके दिव्य नेत्र उद्घाटित हैं। ऐसे आत्मज्ञानी के सपर्क में आने वाले व्यक्ति को उनके कहने मात्र से भी ऐसा विशिष्ट ज्ञान हो सकता है। इन्द्रभूति आदि गणधरो के सामने प्रमु ने त्रिपदी के रूप में 'उप्पेइया विगमेइ वा धुवेइ वा" ये तीन वाक्य कहे। इतने मात्र से ही उन्हें 14 वर्षों का ज्ञान होना स्वीकार किया गया है। जब मेघ कुमार मुनि दीक्षित होने की प्रथा (28) रात्रि मे ही विचलित हो गए ओर पुन ससार मे जाने का सकल्प करके प्रमु की सेवा मे पहुचे। तब प्रमु ने उनकी आत्मा को जगाते हुए उसे उसके पूर्वमव का स्मरण करने के लिए हाथी के भव में की गई खरगोश की रक्षा की घटना सुनाई। जिस छोटे से तुच्छ समझे जाने वाले प्राणी खरगोश के लिए मेघकुमार ने हाथी के भव मे अढाई अहोरात्र पर्यन्त एक पैर अधर मे ही रखा। प्रभु बोले तएण तुम मेहा | गाव कडुइत्ता पुणरवि पाय पडिनिक्खमिस्सामि ति कटु तु ससय अणुपविठ्ठ पाससि, पासित्ता, पाणेणुकपाए, भूयाणुकपयाए जीवाणुकपयाए, सत्ताणुकपयाए से पाए अतराचेव सघारिए नो चेवण णिक्खित्ते। हे मेघ | तुमने उस समय 272 दिन-रात तक अपने पेर को ऊपर रखकर उस छोटे से प्राणी की रक्षा की थी। और आज सतो के प्रमार्जन से घबरा गए। बस यह सुनते ही कुछ मेघकुमार पर इन शब्दो का चमत्कारिक असर हुआ ओर "सुमेहिपरिणामेहि ए पसत्थेहि अज्झवसाणेहि लेस्साहि विसुज्झ माणीहि तयावरणिज्जाण कम्माण खओसमेण ईहा-पोह-मग्गगण-गवेसण करेमाणस्स सन्निपुव्वे जाइसरणे समुप्पन्ने।। मेघकुमार को शुभ परिणाम, प्रशक्त अध्यवसाय, विशुद्ध लेश्या के कारण से जाति स्मरण के वे आवारक कर्म के क्षयोपशम होने पर इहा ऊपोह मार्गण गवेषणा करते हुए जाति स्मरण ज्ञान प्रकट हुआ। जिसमे उन्हे पूर्वभव स्पष्ट नजर आने लगा। मेघकुमार की यह घटना, शब्दो के चमत्कारिक प्रभाव को भी स्पष्ट करती है। प्रभु सर्वज्ञ थे, उन्हे यह सब ज्ञात था कि कौन सा शब्द बोलने से मेघकुमार की उस अदृश्य सुषुप्त शक्ति पर झटका लगेगा और वह सक्रिय हो उठेगी ? जिस प्रकार किसी के क्रोध को जगाने के लिए आपको शब्द प्रयोग की जानकारी होती है कि कुछ अपशब्द बोलो ओर सामने वाले को गुस्सा आ जाएगा। वैसे ही कुछ प्रशसा करो तो मान मे चेहरा खिल उठेगा तो भगवान को तो यह भी पता था कि मेरे हम शब्द के प्रयोग से इस आत्मा को जाति स्मरण ज्ञान हो जाएगा। ये वचन प्रयोग, शास्त्रीय दृष्टि से वचन चिकित्सा को स्पष्ट कर रहे हैं। मानसिक सोच एव वचनो के सही प्रयोग से भी किसी की चिकित्सा की जा सकती है। आज शारीरिक इलाज के लिए मेडिसन प्रयोग एव मानसिक इलाज के प्रयोग तो काफी हो रहे हैं। पर वचन चिकित्सा पद्धति का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। जबकि यह पद्धति । । (29) अत्यन्त सरल एव विशिष्ट असरकारक होती है पर इसके चिकित्सक की नॉलेज महत्त्वपूर्ण होना आवश्यक होता है। इसीलिए शास्त्र मे ज्ञानी, तीर्थकर, महापुरुषो के वचन प्रयोग से ही 'सोहं का सही ज्ञान होना बतलाया है और जिस दिन वह स्वय का स्वरूप जान गया उस दिन गत-आगत की जानकारी भी सम्यक हो जाती है। "मैं" का बोध होने पर यह जाना जा सकता है कि मैं कहा से आया हू। इसे जानने के लिए पुद्गल परावर्तन का स्वरूप भी जान लेना चाहिये। जिसके माध्यम से आगत की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। यह आत्गा अनादिकाल से कर्मवर्गणाओ से आबद्ध विविध योनियो मे भटकता चला आ रहा है। पुद्गल परावर्तन जैन धर्म का पारिभाषिक शब्द है। इसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के भेद से चार भागो मे विभक्त किया गया है। सूक्ष्म और बादर के भेद से हर पुद्गल परावर्तन दो-दो प्रकार का कहा गया है। स्थूल द्रव्य पुद्गल परावर्तन से तात्पर्य यह है कि एक जीव लोक के समस्त पुद्गलो को ग्रहण करके त्याग कर दे और सूक्ष्म द्रव्य पुद्गल का मतलब यह है कि सात वर्गणाओ के रूप मे जो समस्त लोक मे पुद्गल है। उनमे सबसे पहले एक पुद्गल परमाणु को औदारिक वर्गणा के रूप मे अपने मे परिणमित करे फिर छोडे। इसी प्रकार व्यवधान रहित दूसरी वर्गणा मे क्रमश वैक्रियादि छहो वर्गणा को परिणमित करे-छोडे। इस प्रकार क्रमश सातो वर्गणाओ के रूप मे सर्व पुद्गलो का ग्रहण विसर्जन हो। तब द्रव्य से सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन होता है। यदि इस बीच एक परमाणु औदारिक वर्गणा के भोगने पर बीच मे उसे वैक्रियादि वर्गणा के रूप मे चाहे जितनी बार भोगा जाय। उसका सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन मे परिगणन नही होगा। इसी तरह क्षेत्र के दृष्टि से सपूर्ण भू भाग को व्यत्क्रम से एव क्रमश मृत्यु द्वारा स्पर्श किया जाय। इसी प्रकार काल की दृष्टि से उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल के समयो को मृत्यु की दृष्टि से व्युत्क्रम और क्रमश स्पर्श करना तथा अध्यवसायो की दृष्टि से असंख्य अध्यवसायो को मरण के साथ व्युत्क्रम और क्रमश स्पर्श करना। द्रव्य क्षेत्र कालभाव से बादर और सूक्ष्म पुद्गल परावर्तन है। हमारी इस आत्मा ने एक नहीं अनन्त बार ऐसे परावर्तन कर लिए हैं। इस लोक में एक भी कोना ऐसा नही जहा पर हमने जन्म-मरण नहीं किया हो। भगवती सूत्र शतक 2 उद्देशक 8 मे इस बात को बकरे के वार्ड की उपमा से भी भगवान ने समझाया है। (30) यह बतलाने से यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि इस आत्मा के लिए अपरिचित कुछ रहा ही नही है। न तो कोई जगह है और न ही कोई रिस्ता ही है। इस आत्मा के सभी आत्मा के साथ सभी तरह के रिश्ते एक नहीं अनेक वार हो चुके हैं। ऐसी स्थिति मे हमारी आत्मा के लिए न तो कोई रिश्ता महत्त्वपूर्ण है ओर न ही कोई क्षेत्र महत्त्वपूर्ण रहा है और न ही कोई समय महत्त्वपूर्ण है। सभी समयो मे जी चुकी है, मर चुकी हे तब क्यो वह किसी पदार्थ के प्रति आकर्षित हो रही है आकर्षण की तो कोई जगह ही नहीं रह जाती। सब कुछ तुम्हारे ग्रहण करके छोडा हुआ है। आत्मा के निस्पृह भावो को जगाने के लिए प्रमु द्वारा किया गया कथन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। तुम्हारे सम्यक् जागरण मे तुम्हे ज्ञानी के कथन से यह ज्ञात हो जाता है कि तुम कहा से भटक कर आए हो। शास्त्रकारो ने तो यहा तक बतलाया है कि यदि तुम्हे छोटी-छोटी बातो मे क्रोध ज्यादा आता हे ओर भयभीत भी जल्दी होते हो तो समझ लो नरक से आ रहे हो। दूसरी बात यदि छल कपट ज्यादा करने की आदत हो और इधर भूख भी बार-बार लगती है तो समझ लो तिर्यच-पशु-पक्षी की योनि से आ रहे हो। तीसरी बात यदि तुम्हे अहकार ज्यादा हो रहा है इसके साथ ही मेथुन की भावना भी प्रबल रहती है तो मनुष्य योनि से आ रहे हो। चौथी बात यदि तुम्हे तृष्णा ज्यादा हो तथा परिग्रह की भावना अधिक मुह फैलाती हो तो समझो कि देव गति से आए हो। यह एक सामान्य रूप से बीते किस भव से आ रहे हो, उसका अदाज लगाया जा सकता है। यह भी एक स्थूल दृष्टिकोण है। सूक्ष्म रीति से तो हमारी वृत्तिया-आदते किस-किस रूप में उभर-उभर कर आ रही हे इसे पकडने की आवश्यकता है। वे आदते बीते सस्कारो का सकेत करती है। जैसे इस गव मे भी किसी आदमी की गलत आदमियो के साथ रहकर गाली देने की आदत पड़ जाती है तो वह भविष्य मे सस्कारित भी हो जाता है, तथापि उसकी वह आदत कमी न कभी उभरती है और उसके मुह से वह अपशब्द निकल जाता है या फिर कई बार जिसकी जन्म जात जो भाषा रही हो, पढने के बाद वह अपनी भाषा को कितना भी परिवर्तित कर ले, फिर भी उसकी वह आदत एकदम नहीं छूट सकती है। जो कि उसके पूर्व जीवन का आमास कराती है उसी प्रकार इन्सान की आदते, उसके पूर्वभव का भी आभास करा देती है। (31) । जीव के 563 भेदो की दृष्टि से यदि चिन्तन किया जाता है तो मनुष्य गति मे कर्म भूमिज जीवो की दृष्टि से आने वाले रास्ते 279 हैं। 101 समूछिग मनुष्य के अपर्याप्त बतलाए हैं। 15 कर्मभूमिज पर्याप्त अपर्याप्त बतलाए है। । तिर्यंच मे केवल तेजस्काय- वायुकाय के 8 भेद छोड कर सभी तिर्यच के जीव मनुष्य मे आ सकते हैं और देवलोक मे से तो सभी 99 मे ही देवलोक मे से जीव निकल कर मनुष्य मे आ सकता है। अब इन आगमन के 279 स्तोत्रो पर चिन्तन आवश्यक है कि इनमें से मैं कहा से आ रहा हू ? क्योकि इन योनियो से मनुष्य मे आने का डाइरेक्ट सपर्क है। समूछिम मनुष्य वे होते हैं जो मनुष्य के द्वारा ही छोडी गई विभिन्न अशुचियो मे पैदा होते हैं। अब वहा से मरकर जो इस कर्म भूमिज मनुष्य में आता है तो उसका उस गदगी की ओर सहज आकर्षण हो सकता है, जिसे वह छोडकर आया है। तिर्यच मे पशु-पक्षी मे से किसी भी प्रकार के पशु से पक्षी से निकलकर वह यहा मनुष्य बन सकता है। ऐसी स्थिति मे उस पशु पक्षी की पाशविकता की झलक उसमे आज भी आ सकती है। जो जीव पृथ्वी, पानी, वनस्पति से आया हो उसमे वह आकर्षण भी उसकी उरा गति के आगमन का ज्ञापक बन सकता है। यदि वह देवलोक से आत्मा है तो भवनपति के असुर कुमार आदि देवो से आया है। ये जो नारकियो को लडाने वाले परमाधर्मी देवो से आया है यह उसके आज की झगडेल आदतो से अन्दाज लगाया जा सकता है। पापपूर्ण वृत्तियो से समझा जा सकता है। यही स्थिति व्यन्तर, ज्योतिष और वैमानिक देवलोको से आने वाले जीव के चिन्तन मे अपने-अपने कारणो के अनुसार बन सकती है। कहा से मैं आया है। इसे समझने के लिए यह भी एक उपयुक्त दृष्टिकोण रहता है। इसीलिए इन्सान की बहुत सी आदते इस जन्म से जुडी न होकर पूर्व जन्म से चली आ रही होती है। पर विशेषता बहुत बड़ी यह है कि इस जन्म मे अपने प्रखर-चिन्तन और विशुद्ध आचरण के बल पर अपनी आदतो को जड मूल से उखाडता हुआ, निजी स्वरूप को विकसित कर सकता है। इसीलिए नर से नारायण बनने की क्षमता मनुष्य जीवन में रवींकार की गई है। यह क्षमता और किसी भी गति मे रह-रहे जीव में नहीं होती। कोई भी इसे विकसित नहीं कर सकता है। चित्त एक उमय प्रेक्षी दर्पण है, वह विकारों से जितना शुद्ध होता जाएगा उतना ही उसे दोनो तरफ भूत और भविष्य दियना प्रारम हो जाएगा। (32) मनुष्य के जाने के लिए सारे रास्ते खुले हुए हैं। वह एक ऐसे चोराहे पर है, जहा से वह किसी भी मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। चारो गतियो में से किसी भी गति मे जा सकता है। जीव के 563 भेद बतलाए हैं। उनमे से किसी भी जीव के भेद मे/योनि मे उसकी उत्पत्ति हो सकती है अर्थात् इन्सान मे अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा करने की शक्ति रही हुई है। वह जिस किसी प्रकार से उसका उपयोग कर सकता है वह उसी अनुसार उस गति मे चला भी जाता है। नरक में जाने के चार कारण बतलाए गए हैं-महाआरम, महापरिग्रह, पचेन्द्रिय वध और मासाहार। महारम से हिसा जनित कार्य लिये जाते हैं। जिन कार्यो मे भयकर हिसा हो, वह महारम मे आता हे जेसे जगल जला डालना। 15 कर्मादान को भी महारम की कोटि मे लिया जाता है। वैस अल्पारभ या महारम आदमी के विवेक पर निर्भर करता है। वह क्या कार्य कर रहा है ? अल्प हिसा वाले कार्य मे भी कई बार महाहिसा हो जाती है। रोटी बनाना अल्पारम है। पर यदि महिला फूहड है और वह न तो पूरा छानती है, न ही अरणि-काष्ट देखभाल कर जलाती है उस स्थिति में वस जीवो की भी भारी हिसा होने की समावना होने से महारभ भी हो सकता है। या फिर गैस की टकी से गैस लिकेज हो रहा है और ध्यान नहीं दिया जाता है, तब जब भारी विस्फोट हो जाता है, तो वह प्रमाद जन्य हिसा भी महारम की कोटि मे आ सकती है। अहिसक दिखने वाला व्यापार भी कई बार महारभ की कोटि मे आ जाता है जैसे कि ब्याज पर दिये जाने वाले पेसे। इसमे ऊपर से तो कोई हिसा नजर नही आती है। लेकिन किसी की परिस्थिति का लाभ उठाकर उससे भारी मात्रा मे व्याज लेना भी मनुष्य की हिसा है। इन्सानियत की हिसा है जो कि महारभ है। दहेज प्रथा, मृत्यु भोज जैसी कुरीतिया जिसमे इन्सानी खून चूसा जाता है, वह भी महारभ की कोटि मे आ सकते हैं। आजकल तो धर्म के नाम पर भी भारी आडम्बर और डेकोरेशन होने लगे हैं। जो धर्म अहिसा का परम पुजारी माना जाता है बारीक सी हवा के जीवो के लिए भी रक्षा की बात करता है, उसके धर्माधिकारियो द्वारा भी खुले आम आडम्बरकारी महारम जनित गतिविधियो मे भाग लेना भी महारम की कोटि मे आता है। महाराजनित बड़ी-बड़ी कपनियो के शेयर खरीदना भी महारम के भागीदार बनना है। जिस प्रकार कण-मास खाओ, चाहे मण मास खाओ। मास तो खा ही लिया गया। वह मासाहारी माना जाता है। चौबीस घटे भूखे रहकर एक घूट (33) ।
चाय पीने वाले के उपवास नहीं माना जाता है उसी प्रकार महारम जनित कार्यों में जरा भी शेयर रखने वाला व्यक्ति, महारभ से पूरी तरह अछूता नहीं माना जा सकता। कई व्यक्ति बाहर से अहिसक होते हैं, पर भीतर से मानसिक तौर पर हिसा करते रहते हैं। प्रमु की दृष्टि मे वे भी महारभी हैं। कालिया कसाई को जब श्रेणिक ने एक कोठे मे 24 घटे के लिए बद कर दिया तो श्रेणिक खुश हो रहा था कि इस व्यक्ति ने 500 पाडे कल नही मारे अब मेरी नरक टल जाएगी। पर जब वह प्रमु के पास पहुचा और प्रभु ने कहा- सुनो- उरा कालिया कसाई ने मन से तो 500 पाडे मार लिए हैं। उसे 500 पाडा मारने जितना पाप हो गया है। काया से मारे या न मार पाए। उसे पाप तो हो ही गया। ऐसी स्थिति मे बिना काया के मन से भी महारम हो सकता है। तन्दुल मत्स्य मन से हिसा करके ही तो सातवी नरक मे गया था। अत तन से अहिसक, मन से महारभ करने वाला भी महावीर की दृष्टि मे महारभी है। नरक मे जाने का दूसरा कारण महापरिग्रही बतलाया है। महापरिग्रही से ये ही तात्पर्य नही है कि जिसके पास सबसे ज्यादा पैसा, धन-काचन हो। बल्कि कई बार तो ज्यादा धन होकर भी महापरिग्रह को दूर भरत जी जेरो व्यक्ति केवलज्ञानी भी हो जाते हैं। मूर्छा को परिग्रह कहा है। "मुच्छा परिग्गहो वुत्तो' आराक्ति ही परिग्रह का कारण है। आदि तीर्थंकर ऋषभदेव ने बाहर से अल्पपरिग्रही सुनार की लम्बी भव परपरा बतलाकर यह निर्दिष्ट कर दिया कि आदमी बाहर से भले ही धन-सपत्ति रहित हो, परन्तु भीतर मे परिग्रह के प्रति उद्दाम-लालरा मडरा रही है, तो वह महापरिग्रही माना जाएगा। क्योकि शास्त्रकारो ने अर्थ को अनर्थ का मूल बतलाया है सभी अनर्थों की खान अर्थ है। ऐसे अर्थ को चाहने वाला गोणरूप से उन सारे अनर्थों का समर्थक हो जाने से/अनुगोदक हो जाने से महापरिग्रही बन जाता है। पचेन्द्रिय वध से भी जीव नरक में जा सकता है पचेन्द्रिय गे मनुष्य और सारे तिर्यंच पचेन्द्रिय आ जाते हैं। उनकी हिसा करने वाला भी नरक में जा सकता है। जिन कल कारखानो में पचेन्द्रिय का घात होता हो, उसका शेयर होल्डर बन जाना भी पचेन्द्रिय वध की कोटि मे आ जाता है। आजकल है श्रृगार प्रसाधन की / रहन-सहन की बहुत सारी वस्तुए ऐसी बनी है जिसमें पचेन्द्रिय जीवो की हिसा होती है। उनका खुला उपयोग भी पचेन्द्रिय दर की (34) कोटि मे आता है। अत इनके उपयोग का परहेज रखना भी जरूरी है। लेदर- चमडे के साधनो का खुश होकर किया जाने वाला उपयोग घोर हानिकारक बनता जा रहा है। स्कदक अणगार की आत्मा ने एक काचरे को छीलकर प्रसन्नता जाहिर की थी जिसके कारण उनके शरीर की चमडी उतारी गई ओर यहा जब लेदर की वस्तुए या ऐसी पचेन्द्रिय घाती वस्तुओ का उत्साह के साथ अपने अह का प्रदर्शन करने के लिए आसक्ति पूर्वक किया जाने वाला उपयोग उसकी आत्मा के लिए कितना घातक होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। आज के आधुनिक युग मे गर्भपात भी एक आम घटना होती जा रही है। आदमी अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए अपनी गर्भस्थ सतान को भी मार डालता हे । भ्रुण परीक्षण के माध्यम से बच्चे का लिग परीक्षण कर लिया जाता है। गर्भगत शिशु लडका है या लडकी। इसके बाद अनिच्छित शिशु को खत्म करवा दिया जाता हे यह स्पष्ट रूप से पचेन्द्रिय वध तो है ही। साथ ही अपनी सतान की नृशसा हत्या भी है। ऐसा व्यक्ति ऊपर से कितना भी धर्मानुष्ठान करले उसकी होने वाली गति नही सुधर सकती। पहले ऐसे घोर पाप को रोकना जरूरी है। किये का सधोधन प्रायश्चित करना होगा। चोथा नरक में जाने का कारण मासाहार भी बतलाया है। वर्तमान के युग मे शाकाहार और मासाहार का स्पष्टत विभाग करना मुश्किल हो रहा है। कई खाद्य शाकाहारी पदार्थो मे भी कमोवेश मास मिला होता है। 'घी जैसे विशुद्ध पदार्थ मे भी चर्बी के मिश्रण की बात सुनी जा चुकी है। हर रोज सबेरे किये जाने वाले कोलगेट मे भी हड्डी का चूरा बतलाया जाता है। यही नही कई प्रकार की आइसक्रीम मे भी अखाद्य मिला होता है। इसके अलावा कई चाकलेट-विस्कुटो मे भी नॉनवेज मिलता है ऐसी शाकाहार के नाग से चलने वाली सैकडो वस्तुए मिल जाएगी, जिसमे नॉनवेज मिलाया जाता है। इस प्रकार के शाकाहार मे होने वाला, मिश्रण भी शाकाहारियो के पेट में मास उतारने वाला बनता चला जा रहा है। ऐसी स्थिति मे मासाहार से बचने के लिए विशेष सतर्कता की आवश्यकता है। जिन वस्तुओ मे कण भर भी मास मिला हो, नरक से बचने के लिए उसे छोडना भी जरूरी है जिस प्रकार कण भर फिटकरी भी मण भर दूध को फाड देती है। वैसे ही कण भर मास भी व्यक्ति की सात्विकता को विकृत कर देता है। अत मासाहार की स्थिति से स्वय को बचाना बहुत जरूरी है। उपर्युक्त चार कारणो मे से एक भी कारण घटित हो जाता है तो वह जीव नरक गति की ओर आगे बढ़ सकता है। । । (35) तिर्यच गति मे जाने के लिए भी चार कारण बतलाए गए हैं-माया करने से, गूढ माया करने से, असत्य बोलने से, न्यूनाधिक माप तोल करने से। जो व्यक्ति छल कपट करता है छोटी-छोटी बातो मे भी माया का आसेवन करता है। वह तिर्यच गति मे जाने वाला बन सकता है। दूसरा कारण गूढ माया बतलाया है। इससे तात्पर्य है कि माया भी करता है, पर जरा छिप कर । अर्थात् लोगो की दृष्टि मे सरल सयमी बना रहे और अन्दर ही अन्दर कपट का सेवन करने वाला गूढ मायावी होता है। तीसरा कारण झूठ बोलने का बतलाया है। कई व्यक्तियो की छोटी छोटी बातो मे झूठ बोलने की आदत होती है। कारण-बिना कारण आदमी झूठ बोल कर भी तिर्यच गति का मेहमान बन जाता है। चौथा कारण कम माप तोल का बतलाया है। व्यापारी आदि कार्यों में लेती वक्त ज्यादा लेना और देती वक्त कम तोल कर देना। थोडे से लाग के पीछे व्यक्ति अपने दोनो भव बिगाड लेता है। जिसको कम दिया है या ज्यादा लिया है, उसे पशु योनि मे जाकर उसका भुगतान करना ही पड़ता है। मनुष्य गति मे जाने के भी चार कारण बतलाए हैं। पहला कारण प्रकृति से भद्रिक हो अर्थात् सरल हो। मनुष्य गति सबसे उत्तम गति बतलाई जाती है। मोक्ष भी इसी गति से जाया जा सकता है। इसे पाने के लिए सरल होना जरूरी है। दूसरा कारण प्रकृति से अर्थात् नेसर्गिक रूप से ही विनय युक्त व्यवहार वाला हो। तीसरा कारण- दीन-दुखियो पर दयागाव हो और चौथा कारण अहकार एव ईर्ष्या भाव कम हो। देवगति मे जाने के भी चार कारण बतलाए हैं- सराग सयम, पालन करने वाला- अर्थात् सराग साधु जीवन मे चल रहा है, उसकी गति वेगानिक देवलोक की बतलाई है। श्रावक भी देश विरत रूप से व्रतो का पालन करता है तो वह भी देवलोक मे जाता है। यद्यपि बाल तपस्वी है। पर घोर तपश्चर्या करता है तब भी देवलोक की गति है और कई बार अकाम निर्जरा रोग देवलोक प्राप्त हो जाता है। यह सब कथन स्थूल दृष्टिकोण को लेकर है। कई बार अध्यवसाया की तीव्रता मंदता से भी बाहरी कारणो के कुछ भी रहते हुए भी गतिया में परिवर्तन होता देखा जाता है। इसीलिए कर्मवाद में कर्म परमाणुओं के जीव के साथ आपकार मे प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश रूप चार विभाग किये हैं। कौनसा का (36) ।
। । किस स्वभाव का हे ओर उसकी स्थिति कितनी बध रही है और वह अनुभाग की दृष्टि से फल देने की दृष्टि से कितनी शक्ति वाला है तथा कितने कर्म दलिक सचित हुए हैं। अपने विशिष्ट क्षयोपशम के बल पर जीव इस समय भी यह अन्दाज लगाकर कि "में कहा जाऊगा" यह जान सकता है। देहली दीपक न्याय के अनुसार आपका वर्तमान जीवन ही आपके भूत एव भविष्य का दृष्टा-सर्जक बनता है। जिस प्रकार कक्ष की देहली पर पडा दीपक, अन्दर-बाहर दोनो तरफ प्रकाश करता है। उसी प्रकार व्यक्ति का वर्तमान जीवन, उसके भूतकालीन जीवन का भी परिचय देता है और भविष्य मे कहा जाने वाला है। यह भी स्पष्ट कर देता है। कहा जाना हे ? यह इतना महत्त्वपूर्ण नही है, जितना कि क्या कर रहे हो, यह महत्त्वपूर्ण है। प्रभु महावीर ने स्पष्ट रूप से उद्घोषित किया है कि तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथो मे है। भविष्य को सवारने के लिए वर्तमान को सवारना सीखे। श्रेणिक राजा का ऐतिहासिक घटना क्रम सामने है। उसने जब भगवान महावीर सहित सैकडो सतो को विधि पूर्वक भक्तिभाव के साथ वन्दना की थी, तब उसके सात नारकी तक के कर्म दलिक कटकर एक नारकी तक के रह गए थे। प्रसन्नचन्द राजर्षि ध्यान मे खडे-खडे ही अशुद्ध अध्यवसायो से सातवी नरक मे जाने तक की कडीशन अपनी बनाली ओर जब अध्यवसायो को विशुद्ध किया तो इतना विशुद्ध कर लिया कि केवलज्ञान-केवलदर्शन प्राप्त कर लिया। इसलिए हमारा भविष्य हमारे हाथो मे है। जड से जड़ दिमाग वाला व्यक्ति भी अपने पुरुषार्थ से बड़े से बडा दिमागी आदमी बन जाता है। अलबर्ट आइस्टीन के लिए कहा जाता है, वह गणित मे सबसे ज्यादा कमजोर था। मास्टर लोग उसे कहा करते थे कि इसे गणित तो सात जन्मो मे भी नहीं आएगी। जबकि आइस्टीन ने मन लगाकर मेहनत करी तो उसी भव मे विश्व का सबसे बडा गणितज्ञ बन गया। इसी प्रकार विलिग्टन नाम का अनाथ बच्चा अपने सत्पुरुषार्थ के बल पर लन्दन का मेयर बन बैठा। लकडिया बेचने वाला पाइथागोरस, ग्रीक देश मे, डेमोक्रेटिस के बाद सबसे बडा विद्वान बन गया। रेखा गणित मे पाइथागोरस का सिद्धात उसी के नाम पर चल रहा है। भाग्य के भयकर थपेडे खाकर भी अब्राहम लिकन हताश नहीं हुआ। जिन्दगी मे सघर्ष करता रहा। कई बार व्यापार चौपट हुए. जो भी चुनाव लडा, सबमे हारा पर अन्त मे अमेरिका के प्रेसीडेन्ट का चुनाव जीत गया और (37) एक सर्वाधिक शक्तिशाली देश अमेरिका का राष्ट्रपति बन गया। इसी प्रकार कृशकाय सामान्य सा दिखने वाला मोहनदास गाधी, पूरे भारत का भाग विधाता बन गया। अकेले मदनमोहन मालवीय ने अपने सतत पुरुषार्थ के बल पर काशी यूनिवर्सिटी का निर्माण कर दिया। ऐसे एक नही सैकडो उदाहरण मिलेगे जो इस बात के गवाह हैं कि सामान्य से सामान्य दिखने वाले व्यक्ति ने अपने पुरुषार्थ के बल पर असामान्य से असामान्य काम करके दिखलाया। इसीलिए भगवान महावीर ने कहा कि हे- भव्य आत्मन् । उहिए नो पमायए। उठो प्रमाद का परित्याग करो। इधर, उधर की बातो मे मत उलझो। तुम स्वय अनन्त शक्ति के सोत हो। अनत शाति के भडार हो। अनत सुख के समुद्र हो। अनत ज्ञान के दिव्य प्रकाश हो। बुज्झ बुज्झ किम न बुज्झह । जाग-जाग क्यो नही जागता है। जगाइये अपने विशुद्ध स्वरूपी ' में को जिसके साथ जड तत्त्वो का जरा भी सपर्क न हो। पारसमणि से थोडा सा व्यवधान भी लोहे को सोना नहीं बनने देता। इसी प्रकार जड तत्वो की जरा सी आसक्ति भी आत्मा के अनत स्वरूप को प्रकट नही होने देती। प्रकटाना है उसे। जिस प्रकार राजा बनाने के आश्वासन पर भी भिखारी जब अपने मागने का डब्बा छोड़ने के लिए तेयार नही हो तो उसे राजा नहीं बनाया जाता। इसी प्रकार जव तक जड तत्त्वो की पकड नही छूटेगी, तब तक अनतता का दिव्य रूप प्राप्त नहीं होगा। यदि इसान हर दिन रात्रि को सोते वक्त्त यह चिन्तन करने लग जाय कि- में कौन हू कहा से आया हू कहा जाऊगा। प्रतिरात्रि को यह चिन्तन करने से उसकी अन्तश्वेतना में इसका समाधान प्रस्फुटित हो जाएगा विचारों को शुद्ध बनाइये। विमावों से हटकर (38)
स्वभाव मे रमण करना सीखिये।
मैं के साथ जितना भी रिलेशन जुडने लगता है। वह उसके अस्तित्व
को विकृत बनाता हुआ, अहकार मे भटकने लगता है। अत में को में के
शुद्ध
रूप मे ही ले। जहा द्वेत न होकर एक अद्वैत रह जाय। सबध रूप द्वन्द न
होकर निर्द्वन्द रह जाय। विकल्प समाप्त हो जाय।
शुद्ध स्वरूपी अस्तित्व का प्रकटीकरण ही परमात्म स्वरूप का जागरण
हे।
(39)
3 अन्दर की आग : जला दे बाग आचाराग सूत्र मे प्रमु महावीर की वाणी मुखरित हुई कि जहा अतो तहा बाहिम" भव्य आत्माओ को समझाने के लिए अति सूक्ष्म प्रयत्न किया। इन्सान के अन्तर मानस मे अर्थात् दिल की भावना जेसी होती है पेसी ही बाहर मे उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है। अतरग विचारो का प्रभाव बाहर पहे विना नहीं रहता। अन्दर के भावो को कितना भी छुपाले परन्तु रामदार व्यक्ति उन भावो को ताड जाता है, रामझ लेता है। वह उसको पकड लेता है अगर भीतर मे क्रोध है तो चेहरा उसको बता देता है। आखे लाल हो जाती हे, होठ फडफडाने लगते हैं। अन्तरग की स्थिति बाहर में व्यक्त हो जाती है। अगर भीतर मे मान है तो शरीर मे अकडन आ जायेगी। भीतर में गोर है तो उसकी आखे व एक्शन बोल देगे कि क्या चल रहा है। आज इन बातो पर वैज्ञानिक ओर मनोवैज्ञानिक भी बोल रहे हैं। आकारे इगितेर्गत्या, चेष्टया भाषणेन च नेत्र वक्त्र विकारेण लक्ष्यतेन्र्तगत मन ।। आकार इगित, गति चाल चेष्टा, नयन के रफुरण से व्यक्ति के भीतर के विचार जाने जाते हैं। यह बात व्यावहारिक जगत में मानी जाने लगी है। जब कोई बड़ा आदमी आशीर्वाद देता है तो हाथ का एक्शन भी या सीधा होता है। (दया पालो का एक्शन हाथ से किया गया) उलटा नहीं हो है। कभी इसका विचार किया कि हाथ ऐसे क्यो किया जाता है। व्यक्तिला अन्दर से बिलकुल खाली होता है तब आत्म समर्पण करना चाहता है। इस समय वह दोनो हाथ खड़े कर देता है कि मैं समर्पित हूँ। मैं आपके अम हू जब व्यक्ति खतरे में होता है तो वह दोनो हाथ खडा करके दया पाला.' एक्शन करते हुए समर्पित हो जाता है। इसी प्रकार आशीर्वाद देते रामम (40) । । । दया पालो के एक्शन के साथ ऊपर किया जाता है। उस हाथ से ऊर्जा का प्रसारण होता है। अगर व्यक्ति क्रोध मे है तो चेहरा बोल देगा-उसके हाथ के एक्शन बोल देगे। यह काम ऐसे करना है। वह आदेशात्मक भाषा मे बोलेगा। आदमी के हाव भाव एक्शन बोल देते हैं कि व्यक्ति कहा झूठ बोल रहा है। कितना सत्य बोल रहा है। सत्य बोलने वाला शीघ्र बोल देगा। लेकिन झूठ बोलने वाले को विचार करना होगा, सोचना पडेगा। बच्चा तर्क पैदा नहीं करता। वह झट से बोल देता है। एक बार एक बच्चे को स्कूल से छुट्टी लेनी थी। परन्तु ले केसे ? स्कूल चालू है। वह झूठ बोलना सीख रहा है। वह आधे रास्ते से ही घर लौट आया और कहने लगा आज प्रिसीपल ने छुट्टी कर दी है। यहा तो उसने झूठ बोल दिया पर स्कूल मे प्रिसीपल से भी तो छुट्टी लेनी होगी। अत उसने फोन उठाया और बोला कि आज मुन्ना स्कूल नही आयेगा। प्रिसीपल ने पूछा क्यो नही आयेगा तब वह स्वय ही बोला कि उसको बुखार आ रहा है। प्रिसीपल ने कहा-कोन बोल रहा है ? तव मुन्ना बोला मेरे पापा बोल रहे हैं। उसने सच्चाई को छिपाने की बहुत कोशिश की किन्तु सच्चाई प्रकट हो गई। हम बोलना चाहते हैं झूठ, पर हमारे हाथ आदि के एक्शन सच्चाई को प्रकट कर देते हैं। यदि वह झूठ बोल रहा हे तो एकदम नही बोल सकता। वह दाढी पर हाथ घुमाये तो सोच लीजिये वह निश्चित रूप से झूठ बोल रहा है। अभिनय कर रहा है। भगवान ने कहा- " जहा अतो तहा गहि" जो अन्दर मे होता है वह बाहर आये बगेर नही रहता है। अगर आपको बाहर मे शाति प्राप्त करना है तो पहले भीतर मे चेन जरूरी है आज का मानव बाहर का सुख प्राप्त करने मे लगा हुआ है। वह बाहर की फेसिलिटी को बढा रहा है वह उनसे सुख पाना चाहता है। शाति पाने की लालसा रखता है पर शाति मिले कैसे ? अन्दर मे जब तक शाति नही होगी। अन्दर की आग नही बुझेगी तब तक शाति मिलेगी नही। चूल्हे मे नीचे आग जल रही है, ऊपर तवा पड़ा है, वह गर्म हो रहा है। उस तवे को ठडा करने के लिए ऊपर से पानी के कुछ छीटे डाल रहे हैं। उससे क्या तवा ठडा हो जायेगा? लकडिया के नीचे जलते तवे पर छीटे डालने का कोई अर्थ नही। उसकी सार्थकता नहीं। इसी प्रकार बाहर से सतप्त जिदगी को शात बनाना है तो अन्दर मे धधकने वाली आग को शात करना होगा। वरना बाहर के उपाय सार्थक नही होगे। अन्तर की आग जीवन को जलाकर भस्मीभूत बना देगी। बाहर का थोडा सा क्रोध जीवन को अशान्त बना देता है। विविध प्रकार से जीवन को नुकसान पहुचाता है। उसकी उस अवस्था मे । (41) मे आखे लाल हो जाती है और अन्ट सन्ट बोलना चालू कर देता है। " भी अशात बन जाता है। वातावरण में अशाति फैल जाती है। आज के वैज्ञानिकों ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि एक बार क्रोध मे भान भूल जावे ऐसे क्रोध से 80 तोला खून जल जाता है। जो खून मे जहर पैदा हो जाता है। उस व्यक्ति के खून का प्रयोग दूसरो पर किस जावे तो कई व्यक्ति समाप्त हो जाये। वेज्ञानिक पद्धति ने यह सिद्ध करत बता दिया कि एक बार एक व्यक्ति तीव्र गुस्सा कर रहा था। उसी सगर एक सर्प आया। उस सर्प ने उसे काटा। काटते ही सर्प खत्म हो गया। उस व्यक्ति का जहर सर्प पर चढ गया। एक बार एक मा गुस्से में बच्चे : स्तनपान करा रही थी- दूध जहर मिश्रित हो चुका था। अत बो को से: दूध जाते ही बच्चा खत्म हो गया। ऐरो प्रयोग वेज्ञानिक जगत मे हो हैं। यदि कोई क्रोध मे खाना खा रहा है तो खाना विषाक्त बन जायेगा। पीर का हास होगा व आत्मा की भी हानि होगी ही। कोह पीइ पणासेइ क्रोधी व्यक्ति से कोई प्रेम नहीं करता। पत्नी सोचती है पति र जले जावे तो अच्छा है क्योकि उसे डर रहता है कि किसी निमित से उबल पडे ? कब शाति भग हो जाय इसीलिए कहा गया है कि जो ग्री का नाश करने वाला है। गुस्सेल व्यक्ति के लिये माता-पिता, गाई-17 आदि रिस्ते भी काम नहीं आते। वे पारा मे आना नहीं चाहते. बात करना न चाहते। क्रोध की आग सारे सदगुणो को जला देती है। यह भीतरी आग था के बाग को जला देती है। बाहर के रावधो को भी खा कर देनी ।। जर्गनी का सम्राट हिटलर बहुत सद्गुणी था। किन्तु उसमें एक दुर्गुण था वह यह कि उसको क्रोध बहुत आता था। कहा जाता है कि ...' एक बार होटल मे बेला था। होटल वाले को न जाने क्यों हसी आई तिर की उस पर नजर पड गयी, गुस्सा आ गया। आदेश जारी हुआ। कार होटल को उड़ा दिया जावे। टेक द्वारा बचो से होटल को उड़ा दिया सभी खत्म हो गये। आज भी कोई ज्यादा गुस्सा करता है तो उसे कि कहा जाता है। क्रोची व्यक्ति हर समय अशात रहता है। पर दुकान : सभी स्थानो पर अज्ञात रहता है। एक व्यक्ति को गयकर गुस्मा आ. पत्नी उसे इसलिए सहन कर लेती है कि महामारत न मी करत - का समय था। 5 वर्ष का बच्चा था। पत्नी को कहीं फवगन अटप. (42) । । । जाना था। पत्नी बच्चे को साथ ले जाने के लिए नये कपडे पहना रही थी। पति ने कहा- तुम इस बच्चे को मत ले जाओ। गर्मी का समय है। वह बोली- मैं ले जाऊगी। यह साथ मे चलेगा। कुछ भी नहीं होगा। इधर पति भी अड गया- यह मेरा भी तो वच्चा हे इसे रखूगा पत्नी बोली- आपको गुस्सा तेज आता हे। बच्चे को सभालना आपके लिए मुश्किल है। मा ही बच्चे को समाल सकती है। यदि बच्चा तग करने लगे तो बाप दो थप्पड मार भगा देगा। किन्तु मा खिलोना देगी, प्यार करेगी, उसे सहलायेगी, समझायेगी किन्तु पिता मे इतनी कहा सहनशीलता होती है ? पति के कथनानुसार बच्चे को छोडकर फक्शन मे चली गयी। किन्तु मन बच्चे मे ही था। इधर पिता जो दुकान से रुपये कल लाया था उन रुपयो को गिनना था। रुपये के बण्डल निकाले और 10-10 हजार गिन कर रखने लगा। पिता का ध्यान रुपये गिनने मे लगा हुआ था। इधर पास मे बेठे बच्चे ने एक बण्डल उठाया, ओर बाहर चला गया। बच्चो ने कहा- अपन नाव बनाते हैं। रुपयो की नावे बनाकर बच्चे नाली मे तेराने लगे। सारे नोट खत्म हो गए। तब उन नावो की गोटिया बना-बना के एक-दूसरे पर फेकने लगे। सारे नोटो को मसल दिया। नष्ट कर दिया। फिर वह बच्चा नोट लेने घर मे आया। इधर उसका पिता नोट का वडल जो गुम हो गया उसे ढूढ रहे थे। पूरा कमरा छान मारा पर वह बडल नही मिला। इतने मे बच्चा अन्दर आया और पापा से बोला- पापा-पापा वे बाबा वाले कागज ओर दो। इसका मतलब एक बडल पहले ले गया। तो से पूछा- वे पहले वाले कागज कहा है ? बेटा बोला- उसकी तो नावे बना ली, नावे कहा है ? तो बोला- नावो की गोटिया बना करके फेक दी। 10,000 रुपये पानी मे मिला दिये। पिता को भयकर क्रोध आया। हाथो से, लातो से उस बच्चे को मारना चालू किया। लात मारने से बच्चा उछलकर दूर गिरा फिर भी पिता ने उसकी कोई परवाह नही की। ऊपर जाकर सो गये। इधर वह बच्चा दीवार से टक्कर खाकर गिरने से खत्म हो गया। उस बच्चे की मा आई। बच्चे को नीचे एक तरफ सोये हुए देखा। उठाया तो हिलना-डुलना कुछ नही । में पहले ही जानती थी कि इनका गुस्सा बहुत तेज है। वह अन्दर गई। पति गुस्से मे बेभान हो रहा था। बोला- तेरे कपूत ने मेरे 10 हजार रुपये नष्ट कर दिये। उसको यह सुन बडा दुख हुआ। सोचा-ऐसे पति के साथ रहना बेकार है। जहा सन्तान के साथ भी प्रेम नहीं। वह बच्चे को अन्दर वाले कमरे मे ले गई और फासी लगाली। बहुत देर हो गई। दह बाहर नही आई तो वह उस कमरे मे गया देखा-यह क्या ? अरे । रुपये ता पिता ने पुत्र । (43) । में फिर भी कमा लेता पर पत्नी बच्चा कहा से लाऊ। अत किसी को समझा हो तो प्रेम से समझाओ, गुस्से से कोई समझने वाला नहीं है। गुरसा करने वाले को अन्तत पश्चाताप करना पड़ता है। इसलिए किसी को समझाना। तो शाति से समझाइये। आपके पास धन नहीं है, परिवार नही है, मकान न है तो कोई बात नही पर आपके अन्त करण की प्रशान्त अवस्था है, सान्ति। तो आप आराम से सुख से जी सकेगे आपका अस्तित्व बना रहेगा। आज राजनीतिक पार्टियो मे भी कहा जाने लगा है-अगर तुम्हे राफर होना है तो गुस्सा मत करो शान्त भाव से बात सुनो, मिलनसार प्रवृति र आदि। अमेरिका में एक राजनीतिक पार्टी बनी थी। उसमे यही कहा गया कि जो भी इस पार्टी में भर्ती होना चाहता है उसको गुस्सा किसी भी हालत में नही करना होगा। इसका इटरव्यू हो रहा था। उसमे पहली शर्त थी कि तुम कोई भी कुछ भी कहे, तुम गुस्सा नहीं करोगे। शाति से जवाब दोगे। एत. व्यक्ति पार्टी में भरती होने फार्म भरने, इटरव्यू देने आया। उसे वही ना. समझायी गई। उसने हा भर ली। तब इटरव्यू लेने वाले ने राबसे पहले का कि- तुम्हारे जैसे सिद्धात हीन, नालायक, बदमाश को लेना तो नही चार मगर तुम्हारा फार्म भर रहे हैं। जैसे ही गाली सुनी वह तगतमा उठा आहे मे कहने लगा आपको गालिया बोलने की क्या जरूरत पड़ गई। तब इटर लेने वाले ने कहा- पहले तुम 5 डालर रखो क्योकि पार्टी का पहला नियम यही है कि जो भूल से भी गाली बोलेगा। उसे 5 डालर फाइन रखना पडेगा फिर उसने दुवारा उसी प्रकार से गालिया दी तो फिर 5 डालर रखने को कार गया तब वह कहने लगा-अरे | मैं भूल जाता हू। अब गुस्सा नहीं करता। पर वह कहता है-पहले डालर रखो। फिर आगे बोलो-हगनं सुना है कि तुम तो कर्जा चुकाने मे भी बदनाम हो। हरामखोर हो। इतना सुनते ही फिर उस गुस्सा किया तो 5 डालर और रखवा लिए। इन्टरव्यू लेने वाले ने फिर कहा- मैंने सुना हे तुम्हारा बाप बेवकूफ-लुच्चा एक नम्बर का बदमाश रहा है। वह फिर क्रोधित होकर बोलने लगा- आप क्या गलत-गलत बाते बोल रहे हो ? उसने कहा- पहले तुम 5 डालर रखो वह समझा- चोंका अरे | 3rh तो इन्टरव्यू चल रहा है। उसमे भी इतना क्रोध आ रहा है तो फिर पार्टी : क्रोध करोगे तब क्या होगा ? अगर विरोधी पार्टी वाले कुछ भी कह दे। जन " कुछ भी कह दे तो भी गुस्सा नहीं करना है। इस प्रकार आज राजपा पार्टियो मे भी क्रोध पर पहले ब्रेक लगाया जाता है। क्योंकि क्रोच करन र के लिए सफलता पाना मुश्किल ही नहीं अति मुश्किल है। जीवन में गरी . - (44) ३ । पाने की लालसा है तो अन्दर की आग को खत्म करना होगा। वह अन्दर की आग एक प्रकार की नही, अनेक तरह की है क्रोध भी एक आग है, ईर्ष्या भी एक आग है। देवरानी- जेठानी मे छोटी-छोटी वस्तु के पीछे आपस मे ईर्ष्या की आग धधकती है, अशाति हो जाती है। बेटा मा को छोड पत्नी का गुलाम हो जाता है। सास-ससुर कुछ का कुछ सुनाने लगते हैं। पर वे सास-ससुर ये नहीं सोचते कि हमारी स्वय की पूर्वावस्था कैसी थी ? जब हम नये थे तब हमारी स्थिति कैसी थी, क्या ऐसी ही नही थी। आज तो सतो के जीवन मे भी ईर्ष्या प्रवेश कर गई है यदि सतो के सामने अन्य सतो के गुण गाये जाते हैं वे उन्हे सहन नहीं होते। उनके सामने बस उनके ही गुण गाये जाए अन्य के नहीं। परन्तु तुम यह मत सोचो कि मैं ही बडा हू। अन्य छोटा है तुम अपने-अपने अस्तित्व के साथ चलते रहो। दो गाव पास-पास मे थे। दोनो गाव मे एक-एक सेठ थे। एक सेठ करोडपति था दूसरा उससे कम था। जब भी दूसरा सेठ सुनता कि अमुक सेट के पास इतनी जमीन हो गयी है। इतने मकान हो गए हैं, खेत हो गए हैं, तो वह जलता रहता। उसको सुन-सुन करके क्या हुआ उसको ? अन्दर की आग मे वह झुलसने लगा बीमार पड़ गया। बेटो ने बहुत इलाज करवाया पर ठीक नही हुआ। क्योकि बीमारी आसू बहाने की नही अन्दर की थी। घर वाले दिन, रात हैरान होते थे। उस सेठ का भाणजा पास वाले गाव मे रहता था। जब उसने सुना तो वह मामा की साता पूछने दोस्त के साथ आया। पूछा-क्या बीमारी हो गयी ? निढाल पड़े हो। तब मामाजी पूछते हैं- क्यो रे । तुम्हारे गाव मे जो सेठ जी है-उनका क्या हाल चाल है। कितनेक पेसो वाला हो गया। भाणजा बोला- मामाजी | उनके खेत मे आग लग गयी। अभी बहुत नुकसान हो गया। जेसे ही ऐसी बात मामाजी ने सुनी कि मामाजी लटकी गर्दन तन गई। आग की बात सुनते ही एकदम बोले- अच्छा-अच्छा और क्या हुआ ? भाणजे ने कहा- उनका एक बेटा कपूत निकल गया। सपत्ति लेकर परदेश गया था एशो आराम मे खत्म कर दी वापस आया ही नहीं। मामाजी सुनकर उठ बैठे- हो गये जैसे बीमारी कुछ हो ही नही बोले- ओर क्या हुआ। तब भाणजे ने बताया दोनो बेटे और दो बहुए हैं- उसमे आपस मे बनती नहीं है। जोरदार लडाई हुई। घर का बटवारा हो गया, सपत्ति बट गयी। दुकान मे भी भारी नुकसान हुआ। बेलो की जोडिया प्लेग जैसी बीमारी मे मर गई। यह सब सुन उसका मुआया चेहरा खिला हुआ सा दिखायी देने लगा या तो मामाजी निढाल पडे थे, करवट लेने की शक्ति नहीं थी, वे उठ बैठे। नाणजे । । (45) को भोजन कराया और कहा- तू कल जरूर आना। भाणजे के स.. दोस्त था, उन्होने भी सारी बात सुनी। मकान से बाहर निकलने पर दो बोला वाह | तूने क्या गप्पे मारी। कहा नुकसान हुआ है। उनके बेटो ने बर: पैसा कमाया है। घर मे बहुए स्नेह से रह रही है। वह बोला- दोस्त ।। मामाजी को टॉनिक दे रहा था क्योकि उनकी बीमारी उस सेठ को बढ़ने से ईर्ष्यावश रो रही हैं। देख ले जब उन्हे ऐसा टॉनिक दिया तो उनमे करट सः गया। झूठ बोलना पड़ा तो क्या हुआ ? मामाजी को आराग हो गए! देवरानी-जेठानी अलग-अलग फ्लेटो मे रहती है अगर जेठानी को समाकर मिले कि आपकी देवरानी के बहुत नुकसान हो गया, चोरी हो गयी, या वजन चली गयी तो बहुत खुश हो जाती है। भाई के नुकसान हो जाये तो बला गा" आता है। ऊपर से भले ही कुछ दु ख बता दे। किन्तु अन्दर रो खुप्पी हो। है इस अन्दर की आग को बुझाना है तो मन मे करट पेदा करना होगा। मन क्या कह रहा है ? क्या कर रहा है ? इसको गत देखो, अपने को देखो। शादी मे यदि कोई बहुत खर्चा कर रहा है तो भी ईर्ष्या हो जाती है। उसमे भी गुण दोष की चर्चा छिड जाती है। यह आदत ज्यादातर लोगो मे मिलेगी। जीवन के बाग की हरियाली को जलाने वाली अनेक लकलिगा है उसमें पहली क्रोध की, दूसरी ईर्ष्या की, तीरारी द्वेष की ओर चोथी चिन्ता की। चेटी घर में पैदा होते ही चिन्ता शुरू हो जाती है। बेटी की शादी आदि । इतना-इतना खर्चा चाहिये। वह कहा से आएगा ? में खाली हो जालगा? आज का जमाना भयकर हे ? बहुत कुछ देने पर भी या नहीं मिलता। एक वृद्ध आदगी लकडियो का भारा लिये जा रहा है। परेशान है। आकाश गेर से देव-विमान जा रहा है। देवी की दृष्टि नीचे पडी। वह अपने रसागी का से बोली- जरा इस पर रहम करो। वृद्ध है। कितना कष्ट पा रहा है। क: इसे दे दो। देव ने कहा- इसके भाग्य में नहीं है। देवी ने कहा- देगा ।" सही। देव ने उसी समय जिस रास्ते से लकडहारा गुजर रहा था। उसी सम्म मे उसके आगे चिन्तामणि रत्न डाल दिया। लकडहारे के मन में आया। लो में कमी अधा हो गया तो केरो चलगा। अत पहले से ही अन्याग कर । ऐसा सोचकर वह लकडहारा आखों पर पट्टी बाधकर चलने लगा। चलता' वह आगे निकल गया और हीरा पीछे ही छूट गया। तब देव ग देवी देख ले इसका भाग्य ही ऐसा है। इसको कुछ मिलने वाला नही ।। आप चिन्ता करके परेशान न हो। आपकी पुण्यवानी सिकन्दर ।" आपका भविष्य सही होकर रहेगा। अगर दुष्कर्म । अन्तराम का दुनिया । (46) । कोई भी ताकत आपके भविष्य को सही बना नहीं सकती। भविष्य की चिन्ता-चिन्ता मे वर्तमान को खराब करना अच्छा नहीं है। चिन्ता वह चित्ता हे जो जिन्दे आदमी को जला देती है। यह जिन्दगी चिन्ता करने के लिये नही मिली है। जो बीत गया, वह गया। भविष्य का कोई भरोसा नहीं अत वर्तमान को सुफल रखो। वर्तमान को सही बनाओ। यह लकडी भी ऐसी है, इसे आग मे से निकालो। एक लकडी ओर है भ्रम की। वात-बात मे एक दूसरे के प्रति अम कर लिया जाता है। शका को लेकर चलते रहते हैं वाप-बेटे पर विश्वास न रख प्रम करता है कि यह कही अन्दर ही अन्दर अपना बैंक बैलेस तो नहीं बना रहा है। में ऐसे ही रह जाऊगा। सासू-बहु के बीच प्रेम की दीवार खडी रहती हे वह सोचती है कि कही यह अपने पीहर साडिया तो छोडकर नहीं आई है। घी, दूध कही ज्यादा तो खत्म नही कर रही है। कई बार पत्नी को पति का अम हो जाता है कि इतनी देर बाहर क्यो घूमते रहते हैं। तो पति को पत्नी पर बात-बात मे बहम हो जाता है। मम ही अम मे व्यक्ति परेशान हो जाता हे। अगर कुछ कहना हे, मन मे अम हे तो पूछ लेना चाहिए। साफ-साफ कह देना चाहिए किन्तु प्रम रखने से जिन्दगी अशान्त बन जायेगी। विध्वस होने लग जायेगा। एक बुजुर्ग बहुत बहमी था। (वेसे तो ज्यादातर बुड्ढे वहमी प्रकृति के होते हैं।) एक बार वह अपने कमरे मे वेठा था। उसके नकली दात थे। खाना खाने के लिये लगाता फिर उन्हे खोल कर धोकर रख देता था। एक दिन दात डिब्बे मे नही मिले। तो उसके मन मे विचार आया कि मैंने दात कल लगाये थे। पर निकाले नही। सभव है वे मेरे पेट मे उतर गये। बहम दृढ बनता गया। पेट की ओर ध्यान गया तो पेट में दर्द हो रहा हे 10 मिनिट मे वह दर्द असहा बन गया चिल्लाने लगा। बेटा दोडकर आया। पिताजी से पूछा-क्या हुआ पिताजी बोले-दात पेट मे उतर गये हैं अत दर्द बहुत तेजी से हो रहा है। बेटे ने कहा- पिताजी । दात पेट मे नहीं उतर सकते। पिताजी बोले-तू कहता तो ठीक है या मैं कहता हू वो ठीक है। डाक्टर को बुलाने पोते को भेजा उतनी देर मे तो वे जोर-जोर से चिल्लाने लगे। अस्पताल से एम्बुलेस मगाई। उन्हे स्टेचर पर लिटाकर बाहर ले जा रहे थे। उसी समय उनका छोटा पोता खेलते-खेलते आया। दोनो दात उसके पास थे। पिताजी की नजर उस बच्चे पर पड़ी। उसके हाथ मे दात देखे। जिन्हे वह उछालता हुआ आ रहा था। पिताजी ने पूछा- अरे। तू ये दात कहा से लेकर आया। देटे ने कहा- पापा । ? । (47) । एक डली मे दो खिलोने पड़े थे। में उसमे से अपने खेलने के लिये सेलेर आया हू। ये तो मेरे खिलोने हैं। पिता ने कर्म फोड लिये। वाह रे रे । खिलोनो के कारण पिताजी का पेट चीर दिया जाता। वह उन दातो को लेदार एम्बुलेस मे सोये पिताजी के पास दोडता-दोडता पहुंचा और बोला- पिताजी-पिताजी दात तो ये रहे। पोता खेलने ले गया था। दादाजी को याद आया-हा। वह रोज-रोज मेरे से मागता था। ओह वे दात पेट मे नही गर्ने। थोडी देर में सब ठीक हो गया वह बैठ गये और चलकर घर आ गए। इस प्रकार बहमी जीव शान्त प्रशान्त जीवन मे भी आग लगा देते है। छोटी-छोटी बातो मे अशान्ति फैला देते हैं। आपने अपने जीवन मे यह एक धारणा बनाली कि धन आरोगा तो शांति मिलेगी ? बगला होगा तो शान्ति मिलेगी। मैंने देखा कि एक त्यति को अलग रहने की इच्छा थी। उसकी इच्छानुसार बगला हो गया। वह घर से भी अलग हो गया। कालान्तर मे पहुचा। तो देखा कि वह बहुत दुसी । क्यो भाई तुग तो अलग होना चाहते थे। अब क्या ? वह बोला- महाराज अक्ष पता चलता है कि साथ रहने से कितना सुख था ? अत कितना आनद ।' आप अपने आपके जीवन मे सुख चाहते हो तो जो विविध रूप मे लकलिया अन्तरग मे जल रही हैं जीवन रूपी चूल्हे पर रहे शरीर रूपी तवे को शा करना है तो जलती लकडियो को निकालना होगा। अगर ये निकल जाएगी ता अन्दर मे शाति आ जाएगी। (48) 4 "मृत्यु है द्वार मुक्ति का " । प्रज्ञाशील उपासको | आज की चर्चा एक शास्त्रीय उदाहरण से प्रारम करते हैं। छठे अग ज्ञाताधर्म कथाग सूत्र मे प्रमु महावीर ने जिन्दगी की शाश्वतता को समझाने के लिए भव्य आत्माओ के समक्ष एक महत्त्वपूर्ण घटना प्रस्तुत की। द्वारिका नगर मे एक विशाल भवन के ऊपर छोटा सा बच्चा खडा था जिसकी उम्र मुश्किल से 8 वर्ष ही होगी। वह बच्चा भवन के ऊपरी छत की दीवाल के पास खडा था। अनायास ही पास वाले मकान मे दृष्टि पडी तो देखा कि कई लोग बढिया-बढिया वस्त्र पहनके आ रहे हैं। सिर पर तिलक लगे हैं। किसी-किसी के हाथो मे नारियल हैं। बाजे बज रहे है। ढोलक बज रहे हैं। छोटी-छोटी लडकिया नृत्य कर रही हैं। बहिने मधुर गायन गा रही है। बच्चा बहुत खुश हो रहा था। वह नीचे आकर कहने लगा-- मा-मा पास वाले घर मे बहुत सुन्दर वातावरण है। गायन, वादन, नृत्य हो रहा है। चलो ऊपर चलो देखो, सुनो। बडा आनद आयेगा। मा ने कहा-बेटा ! में अभी काम कर रही हूं। तुम जाओ खुशी से देखो। बच्चा कहता है- नही मा, तुम भी चलो। तो मैंने कहा- अभी मेरे कुछ आवश्यक काम है। बेटे ने पूछा- मा पास वाले घर मे इतनी खुशी किस बात की मनाई जा रही है। अपने घर मे तो ऐसा नहीं हो रहा है। मा ने कहा । उनके घर मे बच्चे का जन्म हुआ है, इसलिये खुशिया मना रहे हैं। बेटे ने कहा- तो मा क्या मैं जन्मा तव भी इस प्रकार खुशिया मनायी गयी। हा । इससे भी ज्यादा तेरे जन्म के समय खुशिया मनायी गयी थी। तेरा तो कहना ही क्या ? वह बच्चा उसी समय जल्दी-जल्दी उस दीवार के पास पहुचा पुन देखने लगा। किन्तु तद तक दृश्य बदल चुका था। इस बार वातावरण बडा वीभत्स था। औरते रो रही । । (49) मा ने थी। सभी के चेहरे फीके पड़े थे सब के सब उदास थे। छोटी-छोटी बात जो नृत्य कर रही थी। वे भी रोने लगी थी। बच्या पगराया-धारामा मा : पास आय और कहने लगा- मा-गा इस बार तो बड़ा डरावना गायन गार जा रहा है। क्या बच्चा जन्म लेता है, उस समय दो तरह का गाया मा जाता है, दो तरह का नृत्य किया जाता है। मा राय कुछ रामा चुकी मा ने कहा-बेटा । जिस बच्चे का जन्म हुआ, वह मर चुका है। शाल. कहा- मा आप क्या बोल रही है गरना । मरना । क्या होता है ? बेटा इस जिन्दगी की समाप्ति होने को मरना कहते है। तो क्या मै भी मरूगा? मा उसके मुह पर हाथ रखती हुई बोली- बेटा । ऐसी अपशकुन गाली बात नहीं बोला करते। बेटे को रातोष नहीं हुआ। उसने मा रो पुन पूछा- मा मु.. सही-सही बताना। आप बात को छिपा क्यो रही हैं। मुझे सच-राय तब मा ने कहा- बेटा । यह सूर्य जो सुबह उदित हुआ वह सारा का सारा हो जाता है। 12 घटे गे इसकी तीन अवस्था होती है- बालपन, जवानी और बुढापा और फिर वह शाम को अरत हो जाता है। ठीक इसी प्रकार जिस जन्म हुआ हे उसकी मृत्यु अवश्यगावी है। दुनिया की कोई भी ताकत गरा हुए को नहीं बचा सकती। रावको गरना पड़ता है। अपने को भी एक दिन गरना पडेगा। जब तक अपना आयुष्य कर्म प्रवल है तब तक अपन सर जि... है। उस बच्चे का आयुष्य खत्म हो गया। अत वह गर गया। बेटे ने ! - तो गा उसकी क्या कोई दवा नहीं है। जिसे लेने के बाद मरण न हो। पुन जन्ग. पुनरपि गरण | मा मुझे यह पुन -पुन जन्म लेना, पुन --पुन मर अच्छा नहीं लगता। तब मा ने कहा- इस गूगण्डल पर 22पे साधकर ' सर्वदर्शी भगवान अरिष्टनेमि है उनके चरणो में जो आना जीवन राम करता है, यह मृत्युजयी हो जाता है। मात को भी जीत लेता है। एक की शरण सही है। तय यावच्चा ने कहा-मा, में तो उन्हीं के पास ! यहा तो कभी सुख है, कभी दुख है। कभी जन्ग की राशी है ता की का दुख हैं। मुझे तो अजर-अमर बनना है। प्रभु की शरण में जाना है। कुछ छोडना है। मुझे मा-बाप, धन-दौलत-महलादि कुछ ना चाहिये। सोचा रे । मंने सच्ची-सच्ची बात बताई तो यह गागने लगा है। एसी देखकर आज के मा- बाप तो सही बात बताते ही नहीं। वायटी' के सामनं विटायगे, हाल म ले जायगे। क्लयों में मेज दमा उसी ग स एकान करते हैं, डायलॉक गोला है और भा' लगते हैं। । - (50) । इस प्रकार के माहोल मे जीने वाले मा-बाप की सन्तान से क्या आशा कर सकते हैं। बीज खराब हे तो फल केसे अच्छा आयेगा? आज सत्य बात बताने वाले मा-बाप कम है। थावच्चा कुमार को उसकी मा ने सच्ची बात बताई। बच्चा अरिष्टनेमि नाथ की शरण में जाने को तत्काल तेयार हो गया। मा की ममता भी जागृत हो गयी। वह रोकने लगी किन्तु वच्चा मानने वाला नही था। अत मा ने तीसरा रास्ता निकालते हुए बोली- बेटा । अभी अरिष्टनेमी प्रभु का विचरण किधर हो रहा है, वे कहा विराज रहे हैं। इसकी जानकारी हो जाय फिर चले जाना। यह सुन बच्चा शान्त हो गया। समय निकलता गया। बचपन बीत गया, जवानी मे आ गया। 32 कन्याओ के साथ शादी कर दी गयी, शादी के पहले ही दिन पत्नियो के साथ मनोविनोद की बाते चल रही थी कि सयोग से उसी दिन अरिष्टनेमी प्रभु का नगर मे पदार्पण हो गया। देव दुदुभि बज रही थी। नगर मे चारो ओर सूचना जारी हो रही थी कि त्रिलोकी नाथ अरह अरिष्टनेमि प्रभु पधारे हैं। लाभ उठाया जाये। आज तो जैन बन्धुओ को पता नहीं भी चलता तो भी कोई-कोई जान बुझकर ही सोये रहते हैं। जान बुझकर सोये को जगाना मुश्किल है। जो असली मे सोये हे उन्हे जगाया जा सकता है। प्रमु आगमन की सूचना को थावच्चा ने सुना। अरिष्टनेमी का नाम सुनते ही विचारमग्न हो गये। सोचने लगे यह नाम पहले कही सुना तो है। सोचते-सोचते बचपन की बात स्मरण मे आ गयी। दीक्षा लेने की धुन पुन सवार हो गयी। शीघ्रता से उसकी तैयारी करने लगे। पारिवारिक जनो ने बहुत समझाया कि किन्तु थावच्चा ने कहा में तो निरन्तर मोत के मुह मे जा रहा है। क्या आप बता सकते है कि मेरी आयु कितनी है। माता-पिता थावच्चा को समझा नही सके। आखिर दीक्षा लेकर ही रहे। उसने अपना समय गवाना उचित नही समझा। अब आप पाजिटिव पोइन्ट सोचिये। क्या दीक्षा लेते ही वह अमर बन गया। सुखी हो गया-नही वह निर्भय बन गया उसे मौत का डर नही रहा। सदेव भय अपनी कमजोरियो का होता है। चैकिग इस्पेक्टर यदि इस हॉल मे आकर बैठ जाये तो क्या आपको डर लगेगा ? आप उनसे यहा आराम से बातचीत करगे। किन्तु आपकी दुकान की गद्दी पर आकर बैठ जावे तो आपकी घबराहट दद जायेगी। गद्दी पर तो दूर आपको मार्केट में भी दिख जाये तो आपकी घबराहट बढ़ जायेगी। क्यो आप अपनी गल्तियो से घदराते हैं। यदि हमार पास आवे तो हम नहीं घबराते। क्योकि जहा अपराध है, वहीं घबराहट हे , है, साधु बनते समय पर सारी अपराध वृत्तियो को छोड़ देते हैं। अपराध जन्य । पर । (51) F 1 कार्यों को नैतिक समझा ही नहीं जाता उनसे सर्वथा मुरा मोह लिया है इसलिए वहा घबराहट नहीं आती। सफेद कपडे किसे पहनाया " है ? मुर्दे को क्या, घर में शादी के समय सफेद कपड़े पहने जाते है ? न फक्शन के समय सफेद कपडे अपशकुनकारक माने जाते हैं। किलर बनते ही उसे सफेद कपडे पहनाये जाते हैं। पारिवारिकजन भी सफेद ओढाते हैं, डालते है। इसका कारण यह है कि वह साधु बनते ही राम वातावरण से भर गया है। सासारिक अन्याय अनीति पूर्ण कामनाओ पाराना को जीवन से समाप्त कर वह अमरता की ओर गतिशील बन गया है। मोत से इसीलिए डरता है कि उसने जिन्दगी में अपराध किये वे अपराा उस समय उसे आतकित करने लगते हैं। मेरी गति खराब होगी. अब मेरा होगा? जिसने अपराध ही नहीं किए उसके डरने का कोई कारण नहीं होता। उसके लिए मृत्यु भी महोत्सव बन जाता है। वह उसका रवागत करता है। राहर्ष उसका वरण करता है। जो मृत्युजयी बन गया उसे कोई भी गति उरा नही राकता। भगवान ऋषभदेव 12 महीने भूखे प्यासे रहे किन्तु कोई कष्ट नही, तकलीफ नहीं। भगवान महावीर छ महीने तक ध्यानमार, भूखे प्यासे रहे किन्तु वे भूख से आतकित नहीं हुये क्योकि उन्हें मोता का नहीं था। बाहुबली जी एक वर्ष तक कायोत्सर्ग में खडे खडे तपरया पर.) रहे उन्होने इस बात को अच्छी तरह से जान लिया कि मोत तो कपडे बदाम है। खराब कपडे उतार कर अच्छे कपडे धारण कर पहनाए जाते है तो रात डरने की क्या बात है। मोत से सघर्ष करने हेतु जो व्यक्ति साधना कर वह एक न एक दिन मृत्युजयी बन जाता है अगरता को प्राप्त कर लेता। अगर अमरता पाना हे तो एक बार अपने आपको जिन्दे को ही खतरेगा" होगा। अगर शरीर की ही हिफाजत मे लगे रहे तो कभी भी विकास पाओगे। जो तैरने के लिए पहली बार जब नदी में कूदता है ता " है कि कही डूब न जाऊ। जव डूबने की स्थिति सामने नजर आती है ता । स्वत सावधान हो जाता है। अपने हाथ-पैर बलाने शुरू कर देता है। डूबने जितना खतरा मोल लेता हे तभी वह एक दिन राक बन जाता , tik... सीख जाता है। शुरू-शुरू मे जो ड्राइविंग करता है, वह भी रातर है कि कहीं टकरा न जावे आदि किन्तु एक बार खतरे में पड़ना है ? उसके बाद वह शने-शने निडर हो जाता है। गदि तुम्हें मयुकाम:' है, जन्म मरण से मुक्त होना है तो खतरे से डरना नहीं, किन्तु नि ! गणित को सही करना है। he (52) । बच्चा स्कूल मे पढता है। गणित की पुस्तक मे आगे सवाल होता है। पीछे उत्तर होता है। एक बच्चे को प्रश्न दिया। वह यदि प्रश्न लिख कर उसका सही उत्तर जो पीछे लिखा है मात्र उतना सा लिख दे तो क्या नवर मिलेगा। कुछ नही। क्योकि उसने गुणन फलादि बीच की विधि नहीं की। अगर जोडने, घटाने, भाग देने, गुणा करने का फार्मूला सही होगा, उसके अनुसार सही उत्तर आये तो उसको पूरे के पूरे नबर मिलेगे इसी प्रकार यह जिन्दगी भी एक गणित है। इसमे जन्म-मरण रूप प्रश्न उत्तर का समझना है। जिसने जन्म को तो समझा किन्तु बीच के फार्मूले को नहीं समझा तो मोत के आते ही घबराहट पैदा होगी। अगर बीच का फार्मूला जो भेद विज्ञान की साधना का सही है तो वह मौत का स्वागत करेगा, घबरायेगा नहीं। जिस बच्चे ने अच्छी तरह से पढाई की हे वह परीक्षा आने पर घबरायेगा नहीं उसका स्वागत करेगा। इसी प्रकार यदि जिन्दगी को भेद विज्ञान के साथ जिया है तो अत मे घबराहट नही होगी। वह मृत्यु का स्वागत करेगा। मृत्यु को मनुष्य समझ नहीं पा रहा है। किसी के दाग मे जाकर वापस घर मे आयेगा तो श्मशान के मौत के परमाणु घर मे न घुस जाये। इसलिए वे पहले नहायेगा। महाराज की मागलिक सुनेगे, फिर घर मे घुसेगे। महाराज के वहा सीधा श्मशान जाकर व्यवित्त आवे तो डर नहीं क्योकि सफेद कपडे उन्होने पहले ही पहन लिये हैं एक सन्यासी जगल मे रहकर साधना कर रहा था। दो मित्र रास्ता भूल जाने से उधर जगल मे आ गए। उन्हे रास्ता पूछना था। इधर-उधर देखने पर भी दिखाई नही दिया फिर योगी की झोपडी दिखायी दी वे वहा आ गये। बोले हम रास्ता भूल गये हे अत आप हमे रास्ता बता दीजिए। योगी ने कहा- तुम पहले यह बताओ कि तुम्हे कहा जाना हे वस्ती मे जाना हे या मरघट मे ? दोनो मित्रो ने सोचा यह योगी कोई सनकी दिमाग का लगता है जो मरघट का पूछता है। हम जिन्दे हैं। किन्तु करे क्या ? उन्होने कहा- योगी राज हमे बस्ती मे जाना है। योगी ने कहा तुम । एक बार फिर सोच लो। दोनो ने कहा- आप हमे बस्ती का रास्ता बता दीजिये। योगी ने पुन कहा देखो एक बार फिर सोच लो तब दोनो ने कहा- हा ! हा । हमने आपको कह तो दिया कि हमे बस्ती मे जाना है। योगी ने बस्ती का रास्ता बता दिया उन्होने जाकर देखा तो वहा चिताए जल रही हैं। ओहो अपन तो श्मशान आ गये। आपस मे कहने लगे रे अपन ने पहले ही सोचा एव कहा था कि वह सन्यासी सनकी दिमाग का है। वापस योगी के पास आये, उस पर चढ़ गये । (53) । कि तुम कैसे मूर्ख हो हमने 10 बार कहा कि पत्ती का रास्ता बत भी तुमने हमको मरघट का रास्ता स्ता दिया। योगी मुस्करा रहा । उस उनसे पूछा- भाईयो बस्ती ओर मरघट की राही परिभाषा क्या है ? उसे अभी तक समझते ही नहीं। जहा जाकर लोग बस जाते हैं-पह बरसी जहा जाकर लोग मर जाते है वह है मरघट । क्या तुम्हारे गाव मे ऐसी जगह है जहा व्यक्ति मरता न हो। श्मशान में जो भी जाता है पर लोकर नहीं आता वह वही बस जाता है। दोनों ने समझा कि यह तो बड़ा आत्मा है, कहने लगे गुरुदेव । हम गलत रारते पर थे। हम मरघट मे ही जी ।। आप हमे अब गरघट का रास्ता बता दीजिए। योगी ने रास्ता बता दिया। गाव मे पहुच गए। सत्य तथ्य तो यही है पर नीचे उतर कर किसी से स. मत कह देना कि हमे मरघट का रास्ता बता दो- वह तुम्हे मूर्रा समोर क्योकि हमारी धारणा ही गलत है। मोत ने हमारी आसे बद की। हमने से बचने के लिए अपनी आखे बन्द कर ली है। जेरो- खरगोश शिकारी में बचने के लिए अपनी आखे बद कर लेता है पर शिकारी ने शोर्ड ही मान आखे बन्द की है। वही हाल सभी का हो रहा है। हग निरन्तर आगे से मार भागते जा रहे हैं। जन्म दिन मनाते हैं उस मोत को भुलाने के लिए। दुन भी अपना जन्म दिन, गोल्डन जुबली आदि मनाते हैं। शादी के 50 वर्गका गोल्डन जुबली हेतु गडप बनाया जाता है, नाच गाने होते है। बटे, उनके सामने नाचते हैं. खुशिया मनाते हैं। जिस रागय उनकी शादी हुई समय तो 10-20 हजार में काम चल गया होगा किन्तु अब तो मम । सजाने में कितना पैसा बहा देते हैं। जैसे नई शादी हो रही है। यह मा. मुलाने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए आगे दिन फक्सन गनाय ! है। किन्तु मौत आपको भूल नहीं सकती। आपको अपनी जिन्दगी की गार को सही बनाना होगा। आज पाश्चात्य सरकृति की देखा दी ज..?? मनाया जा रहा है। उससे भी तथ्य स्पष्ट हो रहे हैं कि अगर प. 10 " का है तो टेबल पर 10 मोमबत्ती जलायी जाती है। फिर उन मोगायो वह बच्चा रवय बुझाता चला जाता है। इस प्रकार वर गावित करता मेरे 10 वर्ष अधकार में जा चुके हैं। एक भी मामवती अभियान जाती क्योंकि अगले वर्ष का कोई भरोसा नहीं हारा भी पता न. जिन्दगी भी अधकार में हैं। फिर कक काटत ह, गाना "हम भी अगर बच्चे हात नाम हमारा हाना अवताल... मिलते लड-लड्ड़ दुनिया कहती है हेपी वर्ष र दय । (54) । 7 । गाते हुए नाचते हैं। बडी अजीबो गरीब खुशिया मनाते हैं। जैनियो की महिलाए नाच रही है। मा-बाप खुश हो रहे हैं। यह क्या हो रहा है ? नीच जाति मे नाचने के लिए हिजडो को बुलाते हैं। गोगेलाव मे, मैं स्थानक के बरामदे मे बेठा था। गर्मी का समय था। दरवाजा भी बद नही किया जा सकता। इधर सामने वाले मकान के बाहर हिजडा नाच रहा था उसे हमको देखकर शर्म आ गई। हिजडा मुश्किल से पाच मिनट नाचा होगा फिर भाग गया। लोगो ने कहा- रे | क्या हुआ हिजडे ने कहा- सामने महाराज बैठे हैं। उनके सामने नहीं नाचूगा । मुझे शर्म आती है। अगर महाराज नही होते तो नाच लेता। उसके बाद हिजडा मकान अन्दर ही नाचा। अब आप ही बताइये कि हिजडे को तो गुरुजनो की शर्म आती है। किन्तु हमारे लोगो को शर्म नही आती। वे कहते हैं- हम मोत को भूल जायेगे। किन्तु मोत तुम्हे नही भूल सकती। केक काटते हुए इस बात को सिद्ध किया जाता हे कि तुम्हारी जिन्दगी कट रही है। जब जिन्दगी पूरी हो जायेगी तो यही लोग घी, खिचडी, मिठाई खाएगे। हमारी जिन्दगी निरन्तर मोत के मुह मे समाती जा रही है। जिनके पीछे जिन्दगी अशात हो रही है। उन परिवार, मकान, दुकान आदि के लिए समय है। ऐसा व्यक्ति मौत के समय भी ज्यादातर अशात रहता है। घर के सब व्यक्ति पास मे खडे हैं, देख रहे हैं और वह असहाय बना हुआ तडफता रहता है। कोई भी उस समय उसके दुख से ताप आदि को वटा नही सकता। जिस परिवार के लिए महल बनाया सब कुछ करने की चेष्टा की, माया जोडी उन सबको एक दिन यही छोड़कर जाना होगा। एक सेठ के चार पुत्र थे- एक डॉक्टर, दूसरा जज, तीसरा वकील, चौथा व्यापारी । बाप बीमार हो गया। जो डॉक्टर था वह लडका आया वह इजेक्शन निकाल कर भर रहा था कि उसके पिताजी बोले क्या पानी का इजेक्शन लगायेगा डॉक्टर ने कहा-हा ओरो के तो खाली इजेक्शन ही लगा देता है। आपके पानी का तो लगा रहा हू। अन्तिम मे कोन पेसा बर्वाद करे। बाप ने सोचा ओ-हो जिन्दगी भर मेने कमाया, लडको को पढ़ाने-लिखाने में खर्चा किया और यह लडका डॉक्टर बना है जो मेरे खाली पानी का इजेबान लगा रहा है। दूसरे लडके को बुलाया अब तू कुछ उपचार करा सकता है तो करा। वह जज बना लडका बोला- पिताजी आप ऐसा कीजिये कि 50 पैसे का टिकिट लगाकर याचिका दायर कीजिये कोर्ट मे। उस पर विचार करेंगे कि क्या करना है ? पिता ने तीसरा लडका जो वकील था उसे बुलाकर पहा । । (55) 1 1 तू इलाज करवा दे। वह बोला पिताजी पहले तो यह देखना होगा कि आप बीमारी भी है या नही ? बहस की जायेगी। जीरह चालू हुई। वकील वाला पुत्र अपने पिता से पूछने लगा कि आपको दर्द कहा पर है ? पिता- कमर मे। वकील- कब से हैं। पिता- तीन दिन से। वकील- कितनी बार दर्द चालू हुआ। पिता- सात बजे से। वकील- क्या अपने उस रागया देखी थी। पिताजी-हा। वकील-उस समय ओर कोई आया था ? पिताजी दो तीन आदमी आये थे। वकील- और किसको देखा। अब पिता गुरसे आ गया और बोला- हा और मौत को देखा था। वकील ने कहा- यह के बीमारी का नही। "सुसाइड' (आत्महत्या) का है। वकील ने अपने असिराटे से कहा- लिखोजी-केश। बाप ने सिर फोड लिया- ये बेटे हैं। उसनेदिर चौथे बेटे को बुलाया। उससे उपचार हेतु कहा। चौथे बेटे का दिमाग व्यापारिक दिमाग था। वह कहता है पिताजी आपने कहा था कि राई काम किया करो। अत पहले हिसाब देखना पडेगा। पिता ने कहा- वाह रे । तुम्हारे जीवन को बनाने के पीछे सारी जिन्दगी लगा दी ओर तुम इलाज नहीं करा सकते। गान लो- कभी पेला इलाज करा भी दे। परिवार आपके सामने खडा है। फिर भी एक दिन ऐरा: आयेगा कि उनके सामने आपकी मौत होगी। परिवार व धन को देखार आखो मे आसू होगे। अत जब तक जीवन साधना की गणित राही नहीं हो एक नम्बर का हिसाब नहीं होगा। तब तक भय आखो के सामने बना रहेगा। सब यही रह जायेगे जो बाहर की वस्तुओ के पीछे न भागकर आत्मा की ओर जाना है। हमे सावधान होना है। खाये तब भी सावधानी रखनी है, सोयें तर भी सावधानी रखना है। अगर हम हर समय सावधान रहे तो मोत हो परेता! नही कर सकती। जापान मे एक मकान है उसके बाहर लिखा है- House of Good भगवान का घर। वहा लोगो को तलवार चलाना सिखाया जाता है। व्यक्ति ऐसे ही तलवार चलाते थे उसके बाद सावधान किया जाता है। तुम खा रहे हो उस समय भी तलवार चला सकता हू काम कर रहे हा.' भी सावधान न रहे तो तलवार चल सकती है। बोलते-बोलते बलत- सोते वक्त भी चुक गए तो तलवार गर्दन पर चल सकती है अत हर स" जागृत रहना होगा। पहले तो गुरु ने लकडी की तलवार बनाई। साना सारा समय जरा सा चुके कि खट से तलवार पडी, सावधान हुआ। इसी प्रकार (56) । चलते समय कभी बोलते समय तो कभी सोते वक्त तलवार पड़ी। तब उसके दिल दिमाग मे बात बैठ गयी कि मुझे हर समय जागृत रहना है। अब वह हर तरह जागृत हो गया। अबकी बार गुरुजी ने लोहे की तलवार उठायी वह सचेत हो गया जागृत बन गया। तलवार उसके शरीर तक नही पहुच सकी। गुरुजी ने समझ लिया कि इसमे अब पूर्ण जागृति आ गयी है। अब यह कहीं भी जावे। इसे कोई मार नही सकता। प्रभु कहते हैं- भव्यो । तुम खाते पीते सोते सभी क्रियाए करते समय जागृत रहो। हर समय जागृत रहना सीखो। अगर इस जीवन मे जागना सीख गये, तो तुम हर समय, हर क्षेत्र मे सफल हो जाओगे। हमे अपने जीवन को सफल बनाने के लिए भौतिकता से विमुख बनकर, दूर रहकर आत्मा के विषय में सोचना होगा। शारीरिक सुविधा के पीछे आदमी निरन्तर भाग रहा है पर शरीर को वह स्थिर नही रख पा रहा है। इसलिये जितने भी सत महापुरुष हुये हैं वे शरीर की सुविधा से दूर हटकर आत्म साधना मे लगे थे। कई महापुरुषो ने अपना पूरे का पूरा जीवन दूसरो के लिये समर्पण कर दिया। इटली मे एक भोरिया पाजियो हो गये हैं। वैज्ञानिको की मीटिग हुई उसमे यह प्रस्ताव आया कि एक्सरे की किरणो से व्यक्ति का शरीर कितना प्रभावित होता है। यह देखने लिखने के लिये उन्होने अपनी जिन्दगी कुर्वान कर दी। दुनिया के लिये अपने आपको अर्पण कर दिया। मोरबी का बाध टूटा। सारा शहर पानी मे डूब रहा था। चन्द्रकान्त भाई अपनी ऊपरी मजिल पर बैठ प्रलयकारी दृश्य देख रहा था। कई मरे व्यक्ति पानी मे वहे जा रहे हैं तो कई जिन्दे व्यक्ति भी पानी मे बहकर जा रहे हैं। उन्हे वह देख नहीं सका एक मजबूत रस्सा लिया उसके एक सिरे को मजिल से तथा एक सिरे को कमर से बाध वह पानी मे कूद पडा। कई जिन्दे व्यक्ति को उसने बचा लिया किन्तु इसी बीच रस्सा कट जाने से वह चन्द्रकान्त भाई पानी मे वह गया। चन्द्रकान्त ने अपनी जिन्दगी खतरे में डालकर कितनो की जिन्दगी बचा ली। अपना यह जीवन भी अन्यो के जीवन को जीवन दान देने मे, हित साधने मे, रक्षण करने में काम आवे तो ही इसकी सार्थकता है। आज मानव स्वार्थ से जुड़ा है। वह अन्य का नही सोचता। तब मृत्यु मुक्ति का द्वार कैसे बन सकती है। भगवान महावीर के पास सगम देव आया। उपसर्ग देकर छ महीने बाद वापस जाने लगा तो भगवान दयार्द्र हो उठे। चडकौशिक जैसे जहरीले सर्प को भी बोध प्रदान किया। उसे भी शाति दी। इसीलिये उनकी मृत्यु, 1 (57) : मुक्ति का द्वार बनी। किन्तु आज के व्यक्तियो का क्या हाल हो र छोटी-छोटी बातो मे उलझ रहा है झगडा हो रहा है। स्वार्थ की माला तिलाजली देनी होगी और अन्य की जिन्दगी के साथ भी जुडना हो। श्मशान मे एक योगीराज बेठे थे। राजा ने देखकर सोचा राजा. व्यक्ति है। राजा ने योगी राज ने पूछा कि तुम यहा क्यो बैठे हो। यः। मुर्दे आते हैं। योगी ने कहा इस स्थान पर सभी को एक न एक दिन 30 ही हे इसलीए मैं पहले ही आकर बैठ गया। राजा ने कहा तुम बड़े मूरी हो। योगी ने राजा के हाथ मे सोने की छडी पकडाते हुए राजा को २० ने कहा- में क्या करूं इस छडी का। राजा ने कहा जो तुगसे भी :: मूर्ख मिले उसको दे देना। योगी ने कहा ठीक है। एक बार राजा बीमार ! गया। योगी छडी लेकर राजा के पास पहुचा और राहानुभूति पूर्वक लो" आपकी आगामी व्यवस्था मत्रीजी ने कर दी होगी। राजा ने कहा--"।' योगी ने कहा- तो आप अपने टेन्ट खाने, पाने आदि सब वस्तुओ दो। दी होगी। राजा ने कहा-नही। योगी ने पुन कहा तो दोलत व गडोर- सामग्री तो भेज दी होगी। राजा को गुस्सा आ गया योगीराज से सोनम -- तो मर रहा हू और तुम्हे मजाक सूझ रही है क्या ये राब वस्तुए कभी कि के साथ गई है, जाती है क्या इसका साथ भी तुम्हे पता नहीं कि ये . न कभी किसी के साथ गई है न कभी जायेगी सब कुछ यही पर ' जायेगी। योगी ने कहा- राजन् जब आपको मालूम है कि-ये रात वस्तुए। के साथ नहीं जाती है फिर भी आप इनके साथ क्यो चिपके हुए है। जिन्दगी के बहुमूल्य क्षणो को आपने ताद कर दिये। तो फिर यः'', आपको ही देता है। क्योंकि मुझे आपसे बडा मूर्ख ओर कौन मिया आज के व्यक्तियों का क्या हाल हो रहा है ? गाग रहे ।- धन . के पीछे। महाराज किराना भी समझाए किन्तु जिनवाणी सुनने का समय ।' है। महिलाओ को बच्चो को तैयार करने में घर के कामकाज में लग". पुरुष को दुकान पर जाना है। यदि मृत्यु को महोत्सव बनाना हो के गणित का फार्मूला सही बनाना होगा। गीत को सागन रसार , जिन्दगी को सही गनाने की कोशिश करे ताकि मृत्यु का भय राम मुक्ति मिल जाये। अन्तिम समय भयकर आता है तब महाराज की मार है। पिक्चर. होटले, बगीची में जाने समय महाराज याद नहीं आ .. (58)
से ही महाराज को याद करना सीखो। परमात्मा का स्मरण करो। आप पहले
से ही जिनवाणी सुनना हृदयगम करना सीख ले तो आपकी जिन्दगी सही
हो जायेगी तब मृत्यु को निश्चय ही सही ही होगी अत आप अभी से अपनी
जिदगी को सही बनाने के लिए जागृत बन जाये। जितनी-जितनी मात्रा मे
आप अपनी जिदगी को सही ढग से जीने का प्रयत्न करेगे उतनी-उतनी
मात्रा मे आपका जीवन सफल एव सार्थक बनेगा। मृत्यु का भय आपके
जीवन से दूर हटता चला जायेगा मृत्युजयी बनने की अवस्था को प्राप्त कर
सकेगे। इसी भावना के साथ मे अपने इस विषय को विराम दे रहा हू!
६.३०
६.२०
६१०
६४६ ५४६
६.४८ ५.५०
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संथारा : उत्कर्ष : आत्महत्या-अपकर्ष प्रज्ञाशील उपासको । वीतराग देव, प्रमु महावीर ने अपने अनन्त-अनन्त ज्ञानालोक से ससार की अधिकाश आत्माओ को आधि, व्याधि, उपाधि से ग्रस्त देखा, देखकर के उन आत्माओ को समाधि तक पहुचाने के लिए जिन्दगी के शाश्वत सत्य को बहुत ही सहज एव सरल ढग से अपनी देशना मे प्रस्तुत किया, वही भव्यात्माओ को समझाते हुए कहा- कि हर इसान के साथ कर्म- बद्ध आत्मा के साथ के एक तत्त्व शाश्वत रूप से जुड़ा हुआ है वह है-मृत्यु। जिस इन्सान ने इस दुनिया मे जन्म ग्रहण किया है, वह इसान मृत्यु को भी अवश्यमेव प्राप्त करेगा। ऐसा कोई इसान दुनिया मे पेदा नहीं हुआ, जिसने जन्म तो लिया हो परन्तु मृत्यु न पाई हो। जन्मने वाला व्यक्ति मरता ही है। दुनिया की कोई ताकत उसे मौत से बचा नहीं सकती। एक ही सिक्के के दो पहलू हे, एक ही नोट की दो छाप है, एक ही जिदगी के दो पक्ष हैं। जिस व्यक्ति ने जन्म ओर मौत को समझ लिया, वह व्यक्ति अपनी जिन्दगी को सही ढग से आगे बढ़ा सकता है। आज के इसान ने जन्म को जरूर समझ लिया है किन्तु मोत की ओर से वह आखे मूदे हुए हैं। वह मोत का नाम सुनना नहीं चाहता, मौत की बात सोचना नहीं चाहता, मोत की चर्या नहीं करना चाहता, किन्तु मौत तो एक दिन आनी ही है, वह आयेगी ही। इसलिए सुख के अन्दर अगर हमे अपनी जिन्दगी को सार्थक बनाना है तो हमे मृत्यु को समझना ही होगा, उसे निकटता से देखना होगा और जिस दिन भी हमने मृत्यु को देख लिया, जान लिया, समझ लिया, उस दिन हमारी आत्मा, मौत से निर्भय हो जायेगी। इस बात को यों कह सकते हैं कि एक छबडी के अन्दर सर्प है। इस बात की जानकारी होने के बाद व्यक्ति का छबडी से डर लगता है, वह उससे दूर रहता है किन्तु जब उसे खोल कर बता (60) । दिया गया कि उसमे सर्प जरूर है लेकिन वह असली सर्प नहीं है। तो क्या उसके बाद उसे उस छबडी से डर लगता है ? उस सर्प से डर नहीं लगता। वेसे ही जब तक हम मौत से दूर खडे रहेगे, मौत से अपनी भावनाओ को हटाये रखेगे और उसकी चर्चा से घबराते रहेगे, तब तक हमे मोत से डर लगता रहेगा किन्तु जब हम मौत को सुनेगे, मोत को देखेगे, मौत को समझेगे ओर उसे समझने का प्रयास करेगे तो हमे मालूम पडेगा कि वह हमारी आत्मा के लिए नकली सर्प है। फिर वह मौत हमे कभी भी भयभीत नहीं कर सकती। इस बात को समझने के लिए आज हमे महावीर के उन पृष्ठो को खोलकर देखना है, जिन्होने एक बात बताई कि हर इसान प्रति समय मर रहा है, हर प्राणी प्रति समय मर रहा है। भगवती सूत्र मे एक शब्द आया है आवीचिक मरण। आवीचिक मरण का तात्पर्य यह है कि प्रति समय मौत। जब से इस आत्मा ने देह धारण की हे तब से वह निरन्तर मृत्यु का वरण कर रही है। उसका आयुष्य प्रति समय क्षीण होता जा रहा है, वह उस आत्मा का मरण ही हो रहा है। लेकिन स्थूल दृष्टि से लेकर चलने वाले पुरुषो यह बात समझ मे नही आती और न ही वे जीवन विज्ञान के बिना समझ सकते हैं। वे तो यह सोचते हैं कि हम इतने बडे हो गये और उसकी "बर्थ डे" मनाने की तैयारी करते हैं, परन्तु जो समय बीत गया उतना समय उनकी आयु का क्षय हो गया। वे उतने ही मोत के सन्निकट हो गये। इस प्रकार से हर समय आत्मा का मरण हो रहा है लेकिन प्रत्येक आत्मा के मरण मे अतर रहता है। हर समय आत्मा कभी बाल मरण से मर रही है, कभी पडित मरण से मर रही है, कभी बाल पडित मरण से मर रही है। लेकिन आज यह समझ ले कि पडित मरण अथवा बाल मांत आदि जब जिन्दगी की अतिम स्टेज पर आयेगी, जिसके बाद तो कुछ भी बचा नहीं रह जायेगा। तब हर समय मौत क्यो हो रही है ? उसमे शास्त्रकारो की दृष्टि कुछ ओर है। उनका कहना है " जा जा वच्चइरयणीणसापडिणियत्तइ" (अ 14 गा 24) कि जो-जो रात्रिया बीत रही हैं, जो-जो समय बीत रहा है, वह लाख कोशिश करने के बावजूद भी पुन लोट कर नही आयेगा। जो व्यक्ति इस समय के अन्दर अपनी भावनाओ को हिसक बनाये रखता है, विकारो से ग्रस्त बनाये रखता है, क्रोध मे उलझाये रखता है, विषयो मे फसाये रखता है, उस व्यक्ति की उस बीत रहे समय मे हो रही मोत बाल मौत होती है, वह बाल मरण है और जो व्यक्ति उस समय मे साधना कर रहा है, समता की भावना बनाये हुए हैं. सामायिक के भाव लिए हुए हैं. ब्रह्मचर्य की साधना में (61) । । । लगा है, ऐसे व्यक्ति की उस समय मे हो रही मृत्यु पडित मरण है। जेन दृष्टि मे प्रति समय मौत का कलेक्शन हो रहा है। इस मरण का मतलब हर समय का कलेक्शन। मैं भी प्रति समय मर रहा हू, आप भी प्रति समय मर रहे हैं क्योकि मौत निरतर हो रही है। जो समय बीत रहा है, वह मृत्यु हो रही है. उस समय मे अगर आपके विचार सही हैं तो उन विचारो मे होने वाली आपकी मौत पडित मरण की स्थिति में है। अगर वह विचार गलत है तो वह समय बाल मरण की गिनती मे जा रहा है। आज के बच्चो की पढाई पर आपने ध्यान दिया होगा। बच्चे जन स्कूल जाते हैं, उनके टेस्ट होते हैं तो टेस्ट के अन्दर बहुत जोरदार पढाई करते हे। मैं समझता हू पहले इतनी पढाई नही होती थी जितनी आज के बच्च पढाई कर रहे हैं। आज बच्चो के छोटे-छोटे टेस्ट हो रहे हैं। महीने-महीने मे, 2-2 महीने के अन्दर हो रहे हैं। टेस्ट में भी बहुत जमकर पढाई करते हैं। बच्चो से पूछा जाता है कि यह कोई 12 मासी की परीक्षा तो नहीं है, फिर तुम इतनी पढाई क्यो कर रहे हो। बच्चो ने कहा, महाराज, ये टेस्ट हो रहे हैं, इन टेस्ट के नम्बर भी जुडेगे। बारह मासी परीक्षा के साथ ये भी जुड जायेगे। अगर मेरा टेस्ट अच्छा होगा तो मेरी बारह मासी परीक्षा भी अच्छी मानी जायेगी। इसलिए आज बच्चे उस टेस्ट में भी जमकर पढ़ाई कर रहे हे यानी साल भर तक पढाई की जाती है। जैसे टेरटो का कलेक्शन हो रहा है, वैसे ही हमारी जिन्दगी के लास्ट समय मे होने वाली मौत के समय का कलेक्शन हो रहा है, इस समय हमारी मोत हो रही है। इस मोत के अन्दर बाल मरण या पडित गरण जो भी स्थिति बनती है। उसका कलेक्शन होता चला जायेगा और वह कलेक्शन लारट स्टेज के अन्दर सही होगा। वह लास्ट स्टेज आयुष्य वध की अपेक्षा से आपको समझना हे। आयुष्य वध के योग्य परिणाम जब तक जीव के नहीं बनते हैं तब आयु का क्य नहीं होता है। जिस समय जीव के आयुष्य वध का प्रराग आता तब उसके साथ-साथ ही गति, जाति, स्थिति, अवगाहना, अनुभाग और प्रदेश इन छ स्थानो का बच भी वह कर लेता है। इनका वध किये बिना जीव अपन पूर्व स्थान को नहीं छोडता है। लेकिन शास्त्रीय सिद्धान्त के धरातल पर अनिम जन्म का आयुष्य बधन जिन्दगी के दो हिरसे बीतने के बाद सागर दिसे हुआ करता है। यथा कोई व्यक्ति 90 वर्ष की उम्र लेकर आगा है उसारा वर्ष जतीत होने के बाद जब वह 61वे वर्ष में प्रवेश करणा नमय उनके अन्तर्मुदत अर्थात् 48 मिनट के अन्दर-अन्दर जो दिवार - (62) बनते हैं, जेसा आचरण होता है, भावना रहती है, उसके अनुसार उसके आयुष्य वधन का प्रसग उपस्थित होता है, उस समय आयुष्य का वध नहीं हुआ तो पुन आयुष्य बध का अवसर 9 वे भाग मे प्राप्त होता है। यदि उस अवसर को भी वह चूक गया तो पुन उसको 27 वे भाग मे वह अवसर प्राप्त होता है। इस प्रकार उसको आयुष्य वध के कई अवसर प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन परिणामो की अध्यवसाय की धारा जो आयुष्य वध के योग्य होनी चाहिए वह नही बनने के कारण आयुष्य का बध नही किया तो जीवन के अतिम समय के अन्दर अन्तर्मुहूर्त मे तो वह आयुष्य का बध अवश्यमेव कर ही लेता हे। आयुष्य बधन के बाद ही वह अपने वर्तमान शरीर को छोडता है। आयुष्य बध के समय जैसे जेसे अध्यवसाय की धारा रही, परिणाम बने वे ही अध्यवसाय एव परिणाम जीवन को छोडते समय आ जाते हैं इसलिए कहा जाता है कि " अन्त मति सो गति" अन्त समय जीव के यदि शुभ परिणाम जन्य लेश्या रहती है तो उसके सुगति जन्य बध पडता है और परिणाम यदि सक्लिष्ट है, अशुभ है तो दुर्गति का बध पड जाता है। इसे शास्त्रीय भाषा मे यो कह सकते हैं कि पडित मरण अथवा बाल मरण। जीवन का जितना भी समय गुजर रहा है उन सबका कलेक्शन तो हर समय हो रहा है। मगर आयुष्य वध के समय परिणाम कैसे रहते हैं। उसकी मुख्यता रहती है। इसलिए प्रत्येक सुज्ञ चिन्तक पुरुष को अपने जीवन के अन्दर शुभ भावो शुद्ध अध्यवसायो के कलेक्शन के प्रति सतर्क रहना चाहिए, सावधान बने रहना चाहिये। क्योकि आयुस् बध का प्रसग जीवन मे किस समय, किस क्षण मे आ जाय इस सबध मे कुछ भी नही कहा जा सकता। आयुष्य का वध चार गति, चौरासी लाख योनियो मे से एक स्थान का होता है, जिस गति मे जीव को जाना है उस गति के अनुसार उसके विचार होना चाहिए। इसके साथ मे आपको एक बात और बता दू कि मनुष्य गति गति से जेन सिद्धान्त के अनुसार गोक्ष जाना स्वीकार किया है। वैसे ही मनुष्य गति से जैन सिद्धान्तानुसार जो 84 लाख योनिया हैं, उन 84 लाख योनियो मे से, यह आत्मा यहा से मरकर किसी भी योनि मे जा सकती है, अन्य किसी भी गति से जीव के सभी भेदा मे नही जाया जा सकता। देवता नरक मे नही जाते हैं लेकिन यह मनुष्य नरक मे भी जा सकता है, देवता भी बन सकता है। जितने पशु-पक्षी आपको नजर आ रहे हैं उनमे से वह किसी भी योनि मे जा सकता है। क्योंकि वह जितना धर्म कर सकता है, उतना ही पाप भी कर सकता है। जीव के 563 भेद माने गये है, उनमे से हरेक भेद के अन्दर मनुष्य जा सकता है। पुण्य और पाप दोनो । । । (63) । की स्थिति उसके साथ जुडी होती है। ऐसी आत्मा को निर्मल बनाने के लिए, उसे अपनी मोत को सही बनाने के लिए मौत को नजदीक से देखना होगा। जो बात देखी जाती है वह बात ज्यादा प्रमावशाली बनती है, जो बात समझी जाती है, वह उतनी प्रभावशाली नहीं बनती। इसलिए शास्त्रो मे दो शब्द आये हैं- "जाणइ और पाराइ जानना भी और देखना भी, दोनो ही स्थिति घटित होनी चाहिए। व्यक्ति को अपनी आत्मा का कल्याण करने के लिए अगर लाभ प्रापा करना हे तो हानि को देखना ही होगा, हानि को भी जानना होगा। वैसे ही अगर हमे अपनी जिन्दगी को सार्थक बनाना है, तो हमे अपनी मोत को भी समझना होगा। जब हम मोत को सही ढग से देख लेगे उस समय हम अपनी जिन्दगी को भी सार्थक बना सकते हैं। जैसे- आप किसी व्यक्ति को कह कि देखिये, मास इतना खराब होता है, कत्लखाने ऐसे चलते हैं, तो उरो, मारा से थोडी घृणा होगी। लेकिन उसी व्यक्ति को यदि मारा दिखा दिया जाय. कल्लखानो को दिखा दिया जाय तो उसे जबर्दस्त घृणा होगी। वेसे ही हग जब मौत को नजदीक से देखते हैं, जिन्दगी की उन अवरथाओ को समझते है, तो अपनी आत्मा की शक्ति जागृत होने लगती है, हमारी आत्मा का हमे मान होने लगता है, कि आत्मा क्या है हमे किस तरीके से जीना चाहिए। आज का इन्सान अपनी जिदगी की बीच की परिधियो को बिगाड रहा है। उन्हे विगाडने के कारण से उसे सही गति प्राप्त नहीं हो पा रही है। मशीन का एक पुर्जा भी अगर खराब हो जाता है, तो मशीन चल नहीं पाती अगर बच्चे का एक भी पेपर विगड जाय, दस पेपर मे से एक पेपर भी बिगड़ गया तो वह अपनी परीक्षा मे पास नहीं हो सकता। शरीर के अन्दर एक अग में भी रोग पैदा हो गया तो वह शरीर सही नहीं कहला सकता। वेसे ही जिग व्यक्ति ने अपनी जिन्दगी को सही निगाह से नहीं देखा, सही नहीं रामला: ऐसा व्यक्ति अपनी जिन्दगी के शाश्वत सुख को प्राप्त नहीं कर सकता। जिदगी के शाश्वत सुख को प्राप्त करने के लिए अपनी सारी की सारी जिदः को व्यवस्थित ढग से लेकर चलना होगा, सही तरीके से जीवन जीना होगा। उसे शाति पाने के लिए अपने भार से मुक्त होना पडता है। व्यापारिक जीवन में देखिये आपकी जेब के अन्दर रुपये है तो आपको नीद अली तर से नहीं आएगी। लेकिन आपने वे रुपये अगर किसी दूसरे व्यक्ति को दे दिए आपकी जेब खाली हो गई संकट एव खतरे जैसी जोखिम नहीं रही तब : (64) । शाति से नीद लेगे। वैसी ही शास्त्रकार कहते हैं कि प्रत्येक आत्मा विविध प्रकार की सासारिक कामनाओ, भावनाओ, वासनाओ मे उलझी रहती है। सकटो से घिरी रहती है, जिससे उसमे रही राग-द्वेष की भावनाए सक्रिय रूप मे उभरती रहती है। वह आत्मा राग-द्वेष मय भावनाओ से, विषय की कामनाओ से भारी होती चली जाती है। उस भारी आत्मा को शाति नहीं मिलती। उसे शान्ति पाने के लिए उस भार से मुक्त होना होगा। वह आत्मा ज्यो ही उस भार से मुक्त होने लगती है त्यो ही उसको शाति का अनुभव होने लगता है। जैनागमो मे से सथारे की विधि बतलाई गयी है वह आत्मा को, आधि, व्याधि और उपाधि से मुक्त बनाने के लिए ही है, परन्तु सथारे को लेकर दुनिया मे बडा ऊहा पोह चल रहा है। लोग कहते हैं, क्या यह सुसाइड है, आत्महत्या है। कोई क्या कहता है ? कोई क्या कहता है ? जितनी मुह उतनी बाते। जिसने सथारे को नहीं समझा है वही ऐसी बाते कर सकता है। बाकी सथारा एक साइन्टिफिक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जो व्यक्ति की आत्मा का उद्धार करने के लिए सही समय पर करवाया जाता है। जिस व्यक्ति का शरीर स्वस्थ हो जो निरोग शरीर वाला हो जिसकी जिन्दगी चल रही हो उस व्यक्ति को सथारा नही करवाया जाता है। सथारा करते-कराते वक्त उसके सारे शरीर लक्षणो को देखा जाता है। जब लगता है कि उस व्यक्ति की जिन्दगी भविष्य मे चल नही सकती, अथवा चलने जैसी नहीं है। ऐसी जब स्थिति बन जाती है तब उसे सथारा करवाया जाता है। जब वह अपनी जिदगी की सारी एलोपैथिक चिकित्सा करा ले, डॉक्टर यह कह दे कि भले ही इलाज कराओ लेकिन यह व्यक्ति अब बच नहीं सकता, ऐसी जब शरीर की स्थिति बन रही हो तो उसके बाद ही सथारे की स्थिति बनती है। दूसरी बात, ऐसी स्थिति बन जाने के बावजूद किसी भी व्यक्ति को बिना इच्छा के सथारा नही करवाया जाता। परन्तु आज सथारे की परम्परा कुछ रूढिगत परम्परा बन गई है। कई लोग देखते हैं कि यह बेहोश हो गया, इसको होश नहीं रहा, किसी की हालत गिर गई उस समय सथारा करवायेगे। अब परम्परा से संथारा करवाया जाता है लेकिन अगर सामने वाला व्यक्ति नही धारता है तो उसके सथारा सही रूप मे नही आ सकता। खैर सथारे को हम ऐसी स्थिति के अन्दर आत्महत्या नहीं कह सकते। किन्तु सथारे से लाम क्या ? लोग सथारा-सधारा करते हैं। पण्डित मरण कहते हैं इसको, लेकिन इस पण्डित भरण से लाम क्या होता (65) है ? यह बहुत विचारणीय बात है। बहुत लोगो को इस बात की पूरी जानकारी नही है। अब आप ही विचारिये कि सथारा कौन व्यक्ति कर सकता है ? जो व्यक्ति स्व-पर का भेद विज्ञानवेता हो जाय आत्म प्रतीति दृढ जाय मौत से भी निर्भय हो जाय, जिसकी पक्की मन स्थिति बन जाय। यही सथारा करने का साहस कर सकता है। जिसके मन मे जरा भी भय है, जो मौत से डरता है उसका सही ढंग से सथारा लेना तो दूर वह उसके नाम से ही कतराता है, कापता है। डरपोक उसे धारण नहीं कर सकता। कदाचित ले भी लिया तो उसको सही ढग से आराध नहीं सकता है। अत जिसकी मन स्थिति निर्भय बन जाती है उसके भीतर से आत्म शक्तिया जागृत होने लगती है। व्यवहारिक जीवन मे लीजिए कि डॉक्टर लोग किसी का आपरेशन करते हैं तो वे पहले क्या चेक करते हैं ? डॉक्टर सूर्या जी बैठे हैं यहा पर वे रोज-रोज कहते हैं कि मैं सुनना चाहता हू, मैं सुनना चाहता है। लेकिन उन मरीजो की सेवा के पीछे वे यहा नही आ पाते। वह उनका पहला कार्य है। वे सेवा के अन्दर लगे हुए हैं। हा, तो किसी का ऑपरेशन करना पड जाय तो सब से पहले उसका हार्ट देखा जाता है कि उसका हार्ट सही है या नही ? हार्ट मजबूत है या नही ? अगर उसका हार्ट मजबूत नहीं है और उसका आपरेशन कर दिया जाय तो हो सकता है उसका हार्ट फेल हो जाए और मर जाय। इसीलिए उस व्यक्ति का ऑपरेशन करते वक्त हार्ट की मजबूती देखी जाती है तब जाकर उसका ऑपरेशन किया जाता है। वैसे ही जब व्यक्ति सथारा लेता है, तब उसका विलपावर कितना मजबूत होता होगा। जिन्दगी मे सबसे ज्यादा डर होता है अगर किसी व्यक्ति को तो मात का होता है, मौत के अलावा किसी का डर नहीं होता। जिस व्यक्ति ने मौत पर विजय प्राप्त कर ली, मौत पर निर्भयता प्राप्त कर ली, वह दुनिया की किसी भी ताकत से नहीं डरता, वह बड़े से बड़े काम करने को तैयार हो जाता है, क्योकि उसे अपनी मौत का भय नहीं है। आप देखेगे सेना के अन्दर जो भर्ती होते हैं वे सेनिक, मांत को अ पीछे रखते हैं और जो सैनिक निर्भय होता है वह ही व्यक्ति सेना के अन्दर कोई बड़ा काम कर सकता है। सन् 1965 के अन्दर जव युद्ध चल रहा था, उस समय फ्लाइग अफसर प्रेमराज चदानी भारत की ओर से लड रहे । युद्ध जारी था और उस समय वह लडाकू विमान में बैठ कर जा रहा था। उसे जिस जगह बम्ब डालना है। वहा पर शत्रुओं की भयकर सेना ? (66)- । लिए और उस भयकर सेना के बीच मे जाकर बम डालना है, सो प्रतिशत यह बात निश्चित थी, यही आशा थी कि वह बम डालने वाला मर जायेगा, बच नहीं सकता। लेकिन उस फ्लाइग अफसर ने कहा- मुझे भारत की रक्षा करने के युद्ध के अन्दर मौत का डर नही है ओर वह फ्लाइग अफसर उस लडाकू विमान मे बैठ शत्रुओ की भयकर सेना के बीच मे गया ओर बीच मे जाकर उसने भयकर बम डाले और बम डाल कर लौटा उस समय उसके भी गोलिया लगी और गोलिया लगते-लगते भी वह विमान सहित सुरक्षित भारत मे पहुच गया। लेकिन गोलिया उसके शरीर मे बहुत लग चुकी थी। उसके अफसरो ने उसको बहुत बधाई दी कि तुमने बहुत ही साहस का काम किया है। उसने कहा- शरीर की ओर मत देखो, यह बताओ कि मेरा निशाना सही लगा या नही ? उन्होने कहा- तुम्हारा निशाना सही लग गया और वह शाति के साथ सदा के लिए सो गया। आप सोचिये जिस व्यक्ति मे मोत का डर नही रहता हे, वही व्यक्ति शत्रुओ के बीच मे जाकर भी अपना काम कर गुजरता है। वैसी ही हालत सथारे की है, सथारे मे भी वही हाल होता है कि चारो ओर शत्रु ही शत्रु खडे होते हैं, उन शत्रुओ के बीच मे व्यक्ति को परमात्मा को पकडना होता है वह कैसे पकडे। उनके शत्रु काम, क्रोध, मद, मत्सर, तृष्णा और लोमादि हैं वे सब सन्नद्ध होकर के एकदम सावधान खडे हैं, उन सारे शत्रुओ के बीच परमात्मा है, व्यक्ति जब सथारा करता है तो एकदम निर्भय हो जाता है और निर्भय होकर के वह उन शत्रुओ के अन्दर प्रवेश करता हे ओर प्रवेश करके उस परमात्मा के साथ प्यार करने लगता है, उसके साथ जुड जाता है, तो आत्म शक्ति प्रकट होने लगती है। सथारा करने वाली आत्मा जब समभाव मे चलने लगती हे उस समय, उस आत्मा की अनन्त- अनन्त शक्तिया बहुत तेजी के साथ प्रकट होने लगती हे, वह हमे मालूम नही पडती, उस व्यक्ति की आत्मा ही उसे जान सकती है, जो आत्मा सथारे मे समभाव के साथ जीवन जी रही है, समता के साथ आगे बढ़ रही है। उसकी निश्चित रूप से आत्म शक्तिया बहुत तेजी के साथ फैलने लगती है, उसका विल पावर बहुत तेजी के साथ आगे बढ़ने लगता है क्योकि सथारे के अन्दर उसकी आत्मा शारीरिक भावो, सासारिक परिधियो से ऊपर उठती है और परमात्म स्वरुप स्वभाव मे रमण करती है। आपने देखा होगा दीये तले अधेरा रहता है। क्यो रहता है ? जद दीये की बाती पूरा प्रकाश फैला रही है, उसके पूरे प्रकाश फैलाने के उसके तल मे अधेरा रहता है, वह अधेरा इसलिए है कि वह पाती दीये के दावजूट भी (67) सहारे खडी है और जब तक वह बाती दीये के सहारे रहेगी तब तक स्धेरा रहेगा। उस बाती को ऊपर उठा लिया जाय और केवल ज्योति रह जाय और दीया न रहे उस समय उस तल मे कोई अधेरा नहीं रहेगा। वैसे ही यह आत्मा जब तक शरीर के साथ चिपकी रहेगी, तब तक उस आत्मा के तल मे दुख का, शोक का, सताप का और अशान्ति का अधेरा बना रहेगा। उस आत्म ज्योति को ज्यो ही शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है, अर्थात् अनासका भाव से जीवन जिया जाता है और निस्पृह होकर केवल आत्म स्वरूप मे रहा जाय तो उस समय उस आत्मा मे केवल ज्योति ही रह जायेगी और इस ज्योति के तल मे अधेरा रहेगा ही नहीं तो सथारे की वह प्रक्रिया उस तल के अधेरे को मिटाने वाली है, वह शरीर के सहारे को तुडाने वाली है, उरा शरीर से इसमे अशाति फैल रही है, उस शरीर से रोग फैल रहा है, क्लेश फैल रहा है, उस शरीर को हटाने के लिए हम अपनी आत्म शक्ति को जगाना चालू करे। आप देखेंगे कि जो व्यक्ति तैरना चाहता है लेकिन तैरते वक्त भी जब तक लकडी का सहारा लेता है, ट्यूब का सहारा लेता है या दूसरे आदमी का सहारा लेता है तब वह बढिया तैराक नही बनता। लेकिन जब वह सारे सहारे छोड कर तैरने लगता है तो बढिया तैराक बन जाता है। जीवन मरण के अन्दर सथारे की प्रक्रिया बिना सहारे तैरने की प्रक्रिया है, सथारे के काल मे आत्मा अपने शरीर के सहारे को भी छोड़ देती है, उस सहारे को परे हटा देती है, तब जाकर उसकी आत्मा मे शाति प्राप्त होती है। इसलिए जैन समाज के अन्दर सथारे का बहुत महत्त्व दिया गया है। संथारा उसी व्यक्ति को सही आ सकता है, जिस व्यक्ति ने अपनी जिदगी की गणित को सही किया हो, पूरी जिन्दगी जिसने सही तरीके से निकाली हो। उस व्यक्ति का ही सथारा सही आ सकता है। हमारी बहने रसोई बनाती हैं, पूरे एक घटे तक रसोई मे ध्यान देती है, किन्तु एक क्षण के लिए भी चूक जाय और सब्जी बनाते वक्त नमक की जगह शक्कर डाल दे तो क्या होगा ? सारी रसोई विगड जाएगी। रोटी बनाती है। रोटी पका वक्त पूरा ध्यान देना पड़ता है। वे क्या करती हैं ? अगर थोडा सा रोटी पकाने वक्त ध्यान न दे तो ज्यादा पक जाय या जल जाय, थोडा कम ध्यान दें तो रोटी बीच में कच्ची रह जाय। दोनो स्थिति बिगडने लगती है। इसीलिए बहने पूरा ध्यान देती हैं कि रोटी कच्ची नहीं रहनी चाहिए और ज्यादा पकनी : नहीं चाहिए। बीच की स्थिति रहनी चाहिए। जब बीच की स्थिति रहे ती रोटी सही पकती है। वैसी ही सथारा उसी व्यक्ति को सही आता है, जो पूर्ण (68) - अन्दर । जिदगी को सही ढग से लेकर चलने की कोशिश करता है, जिसकी पूरी जिदगी मे न कच्ची रोटी रहे न ज्यादा पके, जिसके न सब्जी में शक्कर पडे न सीरे मे नमक जाय। इन सारी बातो का जो ध्यान रखता है, जो अपनी पूरी जिन्दगी मे विषमताओ को न आने दे, अपनी पूरी जिदगी मे दुर्भावनाओ को न आने दे, ऐसी स्थिति बनती है तभी अतिम समय मे सथारा सही आता है। सारे पेपर सही होते हैं तो ही अतिम समय मे रिजल्ट सही आता है। जिसने एक पेपर भी बिगाड दिया तो वह वर्ष भर की परीक्षा मे पास नहीं हो सकता। सथारे मे आत्म ज्योति का प्रकटन होता है। आत्म ज्ञान का प्रकटन होता है। लेकिन व्यक्ति को उतनी ही समता लानी होगी, उतनी ही निस्पृहता लानी होगी, तब जाकर सथारे का ज्ञान प्रकट होने लगता है। यह नहीं कि यह मर रहा है, सथारा करवा दो, आत्मा का उद्धार हो जाएगा। समता भाव को लेकर जो व्यक्ति ज्ञान सहित सथारा करता है, तो उसकी आत्मा का उसी वक्त उसी क्षण से उद्धार होने लगता है। इसलिए बधुओ | आप सामायिक करते हैं, उपवास करते हैं, कितना मन को वश मे रखते हैं। आपने सूत्र के सुना होगा, जितने महापुरुष मोक्ष मे गये उन सभी ने सथारा किया। महीने महीने भर तक सथारा चलता रहा है। उन्होने बुरे कर्मो का क्षय किया। सारे कर्मो का क्षय पडित मरण से हुआ तब जाकर आत्मा की ज्योति प्रकट हुई। वह ज्योति बिना सहारे के हो गई। आत्मा को शरीर का सहारा नही रहा। केवल ज्योति हो गई। जहा केवल ज्योति हो जाती है वहा आत्मा का सम्पूर्ण ज्ञान प्रकट होने लगता है। स्व आचार्य श्री गणेशी जी महाराज साहब के समय मे आपने सुना होगा उन्होने सथारा लिया और वह सथारा उन्होने बडी ही सजगता के साथ लिया। बैठे-बैठे और पूर्ण सजग अवस्था मे उन्होने सथारा लिया और हजारो हजार व्यक्तियो को उन्होने दर्शन दिया। पूर्ण समाधिमाव के साथ वे इस शरीर के सस्कार की प्रक्रिया से परे थे। मेने आचार्य श्री गणेशी जी महाराज के दर्शन नहीं किए। मैंने ये बाते अनंन्त आराध्य गुरुदेव एव श्रावको के मुह से सुनी हैं, लेकिन बधुओ आज भी इतिहास इन बातो का गवाह है। जिस बात को मैंने नजदीक से देखा है और बहुत निकट से समझा है, उस बात को भी मैं आपको बता दू। गत वर्ष निम्बाज के अन्दर परम श्रद्धेय हस्तीमल जी महाराज का सथारा हुआ था। वह आज भी आपकी आखो के सामने होगा। उन्होने सथारा कैसे लिया? मैं उस सथारा के समय उनके साथ नजदीक से रहा, । (69) नर नजदीक से उन्हें देखने की कोशिश की। मैंने अगर अपनी जिदगी में किस व्यक्ति को जाते हुआ देखा है तो वे पहले व्यक्ति थे। मैंने इससे पहले अपनी जिदगी में किसी को निकट से मृत्यु का सामना करते नही देखा। मैंने सुना है कि उन्होने पूरी जिन्दगी मे कभी भी तेले से अधिक तप नहीं किया। कोई कहता था इतनी जल्दी सथारा करा दिया। इतना लम्बा सथारा चला। क्यो ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं। कोई भी महान् आत्मा और उसमे भी आचार्य सथारा करते हैं तो वे सोच समझकर करते हैं। उनकी जिदगी सयन साधनामय होती है। आप देखेंगे कि कोई काम एक साल से कर रहा है तो उसकी वह हेबिट पड़ने के बाद वह काम अपने आप होने लग जाता है। जैसे किसी व्यक्ति की हेबिट पड गई बीडी पीने की तो जब भी बीडी का समय आयेगा तो उसे ध्यान आ जायेगा कि बीडी पीनी है। जो आदत पड जाती है वह ध्यान मे आ जाती है तो जरा सोचिए जिस आत्मा ने लगभग 60-60 साल तक सयम पर्याय का पालन किया, 50 साल तक जो आचार्य पद पर रहे उस व्यक्ति की हेबिट कितनी गहराई से पडती होगी। उसकी आदत रोबॉट मे याने कि अनकासियस माइड के अन्दर कितनी गहरी जाती होगी। जब उन्हे अपने महाप्रयाण की स्थिति महसूस होती है तो उनका अन्तर मन बोलता है मुझे क्या करना है। अपनी आत्मा को ऊपर उठाना है तो महापुरुषा से प्रेरणा लेने की कोशिश कीजिए। हम सभी भगवान महावीर के अनुयागी हैं। हम यह न सोचे कि हमारे गुरु हैं तो अच्छे हैं और दूसरो के हे तो राराम जहा ऐसी स्थिति है, वहा वह व्यक्ति महावीर का अनुयायी नही माना जा सकता। सच्चा अनुयायी वह व्यक्ति होता है जो औरो के गुणो को भी ग्रहण करने की कोशिश करे। जवाहराचार्य के विषय में सुना कि जिन्होने अपने फोडे का आपरेशन बिना क्लोरोफार्म सूघे होश हवाश की अवस्था मे डॉक्टर से करवाया, सजगता के साथ उन्होने अपने फोडे का ऑपरेशन करा लिया। सथारे मे साधक की सोच यह भी होनी चाहिए कि इस समय न कोई मेरा है और न मैं किसी का है और यह सब यही रहेगे। इस समय मुझे अपन, आत्म ज्योति को ऊपर उठाना है, शरीर रूपी दीपक से अनाराक्त बनाना इस ज्योति को बाहर निकालने के लिए एक समय की भी गडबड हो गई तो मेरी आत्मा का उद्धार नहीं हो सकता। अगर बहनो ने एक घण्टे की रस मे जरा भी गडवड कर दी तो सब कुछ विगड जायेगा। अगर रोटी को ज्यादा सेक दिया तो वह जल जायेगी। अगर कम सेका तो रोटी कच्ची रह जायगी। इस तरह सथारा मे व्यक्ति विरोधी के प्रति प्रतिशोध की भावनाओ, लोकन (70) कामनाओ, वैषयिक वासनाओ से घिर गया, अपने-पराये के द्वन्द्व मे उलझ गया, मोह ममता के चक्र मे फस गया तो वह कापायिक अध्यवसाय, उच्च परिणाम रोक सकते हैं। इसलिए सथारा लेने वाले के लिए यह निर्देश दिया है कि वह अपने जीवन की सम्मानजनक स्थिति देख जीने की आकाक्षा न करे और न ही वह दु खो से घबराकर मरण की कामना ही करे तथा न ही सासारिक सुख समृद्धि की लालसा करे। वह इन सबसे निर्लिप्त निस्पृह रहकर आत्म चिन्तन मे अपने योगो को लगाये। समत्वभाव मे रमण करे तभी उसमे ज्योति स्फुलिग फूटने लगते हैं और वह आत्मा अहिसक भावनाओ से ओत प्रोत होती जाती है, सत्यमय परमात्मा के साथ जुडती चली जाती है। अहिसा की किरणे विकिरण होती हैं अर्थात् फूटती है, उससे समता का वायुमण्डल बनता है। वह सभी आत्माओ को प्रभावित करते हुए उनका आत्मज्ञान बनाने में सहयोग करती है। ऐसी आत्माए अपने जीवन मे सही ज्योति दे पाती है। उस ज्योति को समझने की कोशिश कीजिए। हम विनोद के घेरे से ऊपर उठे, हमे अपनी समझ को सही बनाना चाहिए। में इस सम्प्रदाय का हू वह इस सम्प्रदाय का है, वह अलग है, ऐसी भावना अन्तर्मन एव मानस मे है तो समझिये हमने महावीर के उपदेशो को तोडकर रख दिया है। जो कहता हे यह मेरा है, वह व्यक्ति अपनी आत्मा का उद्धार नहीं कर सकता। शास्त्रकारो ने यह एक महत्त्वपूर्ण बात बताई है। लोग कहते हैं, हमारी आत्मा का उद्धार होता हे या नहीं। हमे इसका कैसे पता लगे ? इसके लिए ऐसा कोई थर्मामीटर होना चाहिए जो यह भी बता देता है। मैं आपको वह थर्मामीटर देता है। उस थर्मामीटर को अपने अन्दर लगा लीजिए। इस पेरामीटर को अन्दर लगाकर देखिये, आपकी आत्मा हकीकत मे सही होती है या नहीं ? इसके लिए में आपको एक उदाहरण बताना चाहूगा। अगर हमारे सामने किसी पराये व्यक्ति के गुण गाये जाते है, उन गुणो को सुनते समय यदि आपकी आत्मा दिल से खुश होती है तो समझ लीजिये आपकी आत्मा ऊपर उठ रही है। अमुक व्यक्ति की प्रशसा न हो, यह भावना दिल मे रहती है चाहे वह गुणी है, ज्ञानी हे, तपस्वी है, धर्म ध्यान करने वाला है तो भी उसके अन्दर गुणो के प्रति प्रमोद भाव नहीं है, दुराग्रह भाव है. सम्प्रदाय दुराग्रह की भावना है। जिस व्यक्ति मे गुणो के प्रति मेरे ओर तुम्हारे का भाव है, उस व्यक्ति की आत्मा ऊपर नहीं उठ सकती है, उसकी आत्मा नीचे गिर रही है। ससार को बढ़ा रही है। इसलिए आप अपने अन्तरमन मे पैरामीटर लगाकर देखिये। इसी तरह अगर कही यह ज्यादा (71) धर्म ध्यान कर रही है, सासू धर्म ध्यान नही कर रही है तो सासू को बहू से ईर्ष्या होने लगे तो समझ लीजिए उसकी आत्मा ऊपर नही उठ रही है। इस बात को इस तरह से समझे कि दो सेठ थे उसमे से एक सेठ ने दान दिया, उसका नाम दानवीर सेठो मे होने लगा तो दान न लेने वाला से कहता है कि अरे, उसने तो दो नम्बर का पैसा इकट्ठा कर लिया है, इसलिए उस पैसे को कही न कही तो लगाना ही है। ऐसे व्यक्ति जरूर सामायिक करने वाले हैं, प्रतिक्रमण करने वाले हैं। लेकिन दिल मे गुणो के प्रति प्रमोद भाव नही है तो वह व्यक्ति ऊपर नही उठ सकता। आज अधिसख्य लोगो मे सच्चे गुणो के प्रति अच्छे भाव बहुत कम मिलेगे। आज अन्तरात्मा से हा मे हा करने वाले बहुत कम मिलेगे और उनमे भी जो पराया व्यक्ति है, उसके गुणो को मानने वाले तो बहुत कम मिलेगे। इसलिए ऐसी स्थिति मे आत्मा का कल्याण नही होगा। अगर उस व्यक्ति के अन्दर गुण हैं, जो चाहे हमारा कम्पीटीटर है, हमारा दुश्मन है, घोर शत्रु है, तो भी उसकी सही बात को मान लेना चाहिए, उससे आपकी आत्मा ऊपर उठ सकेगी। हमे अपने को चेज करना चाहिए, अपनी आत्मा को बदलना चाहिए अगर मेरे या तेरे के भाव में ही रहेगे तो कभी भी पडित मरण को नहीं समझ सकते। हमे अपनी जिन्दगी की किताब को सही रखकर चलना है। अपने विचारो मे परिवर्तन लाना है। सत्य को सुनने की क्षमता बढानी चाहिए, सत्य को स्वीकार करने की तत्परता होगी तब जाकर के हमारी आत्मा परमात्मा के साथ जुडेगी। जो मेरा है, वह बढिया है, मेरी चीज अच्छी है ऐसी भावना यदि आपकी है तो वह आपको घटिया बना देगी। आपके जीवन को उन्नति की ओर अग्रसर नहीं होने देगी। इस बात को सहर्ष दिल से स्वीकार करना होगा, अत जहा कही गुण की साधना, सत्य की साधना, शील की साधना, तपस्या की साधना, अहिसा की साधना नजर आती है, उसे सहज स्वीकार कर लीजिए दिल से स्वीकार कर लीजिये, दिल मे उसके प्रति प्रमोद भाव पैदा करना चाहिए। सत्य की साधना, अहिसा की साधना करनी चाहिए। आप उसके गुणो को गाइये। जो सही काम करते हैं, हम उसको क्यो नहीं मानते क्यो उसको मानने में हमारी हमे हीनता नजर आती है ? क्यों अभिमान नजर आता है ? क्यों अहकार नजर आता है, इसलिए हम उसकी सच्ची बात को भी घुमा फिराकर बताते है। जिससे वह व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से खराब है। यह धारणा हमारी आत्मा को निरन्तर खराव कर रही है, हमारी जिन्दगी की गणित के दुदाई कर रही है, टेशन पैदा कर रही है। पडित मरण को समझने के लिए गणित (72)- । को सही करना पडेगा। हम यदि यह सोचते हैं कि हमारा पण्डित मरण आयेगा वह अतिम समय आयेगा। अरे वह अतिम समय नही बन्धुओं, पण्डित मरण हर समय आ रहा है, हर समय हम मौत के मुह मे जा रहे हैं। अगर हर समय को आप ध्यान मे रखेगे, जागरूक रहेगे, समता में रहेगे, अहिसा मे रहेगे तो आपका पण्डित मरण सही आयेगा, और वह सथारा बिना दीप की ज्योत है, बिना दीये की बाती है। दीया है तो अधेरा रहता है लेकिन दीया नही है वहा तो केवल ज्योत है। तो हमारा सथारा है वह केवल ज्योत है, केवलज्ञान है, केवल प्रकाश पुज है, जिसके अन्दर कहीं भी दुख, द्वन्द, क्लेश ओर अशान्ति नही है, इसलिए जो आज यह प्रातिया फैला रहे हैं कि सथारा सुसाइड है, आत्महत्या है, यह नासमझ लोगो की बात है, उन नासमझ लोगो की बातो मे आप मत आइये। भगवान के कथन को आप गहराई से सोचने की, समझने की कोशिश करिए। जब हम गहराई से बात को समझेगे तो हमारी आत्मा निर्मल हो जायेगी, हमारी आत्मा सही स्तर पर चली जायेगी। हमारी आत्मा मे शाति और समता फूटने लगेगी। जहा कभी भी बाहर का विभाव आता है, वहा जाकर दबाव आता हे, अशाति आती है ओर जहा बाहर का विमाव टूटने लगता है वहा शाति और समता फूटने लगती है। अत आत्म- हत्या एव सथारे के स्वरूप को समझना जरूरी है। आत्महत्या जब कभी भी होती है, वह आवेश मे होती है, बेहोशी मे होती है, अज्ञानता मे होती है जबकि सथारा शान्त सतुलित अवस्था मे किया, लिया जाता है। समझने की शक्ति जागृत रहती है, ज्ञान दशा बनी रहती है। आत्महत्या करने वाला अपने शरीर मे आग लगाने तक जोश मे रहता है जयोही आग की लपटो मे वह झुलसने लगता है, तब वह चिल्लाता है, अपने आपको बचाने की कोशिश करता है पर तब बात उसके हाथ से निकल चुकी होती है, इसी तरह से जहर खाने वाला जोश-जोश मे जहर खा लेता है, फिर बचने की कोशिश करता है। अपने आप पर पछताता भी है। परन्तु किए का परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है। उससे बचा नही जा सकता लेकिन सथारा ग्रहण करने वाले को पछताने की नौबत ही नही आती क्योकि वह सोच समझकर लिया गया होता है। वह अपने आप को जीवन और मरण से अलग रखता हुआ स्व-स्वरूप मे रमण करता है। समता भाव की साधना जीवन आराधना के क्षणो मे जीता है, उसे अन्य शब्दो मे यो कह सकते हैं कि सथारा जीवन के लिए अगर ज्योति है तो आत्महत्या जीवन का अधेरा ही नहीं घोर अधेरा है। सथारा मोक्ष का द्वार है, तो आत्महत्या नरक का द्वार है क्योकि । (73) आत्महत्या जीवन के प्रति अतिकुण्ठा, घोर निराशा छा जाने पर ही होती है। जबकि सथारे में किसी प्रकार की कोई आकाक्षा न जीवन के प्रति रही होती है और न मृत्यु के प्रति भी, जबकि ससार के अन्दर आत्महत्या करने वालो को महापापी कहा गया है। सथारा करने वाले को नही । आवश्यक है कि आत्महत्या और सथारे के अन्तर मे छिपे गहरे तथ्यो को समझने की। सथारे से आत्म शक्ति निरन्तर जहा उद्घाटित होती है, तो आत्महत्या से वह आy होती चली जाती है। महादु खो का उपार्जन हो जाता है जबकि राथारे में जन्म-जन्मान्तरो के दुखो का नाश होता चला जाता है। बन्धुओ । समय बहुत ज्यादा हो गया है, इसलिए मैं इस बात को और लम्बा नही करके इतनी सी बात और बता दू कि जब भी हमारे अन्दर विभाव की बात आती है, तो दिमाग भारी होने लगता है, खराब होने लगता है। लेकिन ज्यो-ज्यो विभाव का वजन, विषयो का वजन घटेगा, हमारी आत्मा हल्की होगी, त्यो-त्यो हमारी आत्मा मे सुख शाति फूटने लगेगी। इसलिए हमे अपना पर्युषण सही मायने में मनाना है, और उसे उचित ढग रो आगे बढाना है, तो इस सत्य को आप अपने जीवन के साथ जोडिए और यह समझिये कि उस दीये की बाती का प्रतिक्रमण करना है, हमे बिना सहारे चलना है। उस बिना सहारे चलने के लिए यह पर्युषण हमारी आत्मा के सा जुडता हुआ हमारी आत्मा का कल्याण करने लग जायेगा। इसलिए पर्युषण पर्व मे यह बाते बताई जाती है। अब कल क्या आने वाली है, कल सवत्सरी आने वाली है, कल आपकी भी जिन्दगी का रिजल्ट आने वाला है। सात दिन पर्युषण में आपन क्या धर्म-ध्यान किया, क्या समझा, उसकी समीक्षा की, परीक्षा का समय काल आ रहा है। इसलिए हम अपनी तैयारी बहुत अच्छे ढग से करे और बहुत अर्क ढग से हम साधना मे, सयम मे उतरने की कोशिश करे। मन की ग्रथियो में उतरने की कोशिश करे ताकि वे विमोचित हो सके, तभी हम परम ध्यान परम शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं। आज का विषय परमशान्ति का महाधाम-सथारा और पण्डित गरम था, मैं अपनी बात कितनी समझा पाया, यह में नहीं कह सकता। समय गया है, कोई नहीं समझ पाया हो तो वह मुझसे पूछ सकता है। आप र बातो को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करेंगे तो आपका जी मगलावस्था को प्राप्त करेगा। (74) ri ।। २ विश्व युद्ध होने पर भारत का क्या होगा ? . - । प्रज्ञाशील उपासको, विश्व हितकर, सर्वज्ञ, सर्वदृष्टा, वीतराग देव प्रमु महावीर ने ससार की आत्माओ की आन्तरिक जिजीविषा को बताने के लिए सकेत दिया कि "सब्वे जीवा वि इच्छति, जीविउ ण मरिज्जिउ' (दश अ 6) अपना अपना जीवन सबको प्रिय है। इसीलिए जिस किसी भव मे जिस किसी योनि मे, कोई भी आत्मा जी रही है, चाहे वह योनि कैसी भी क्यो न हो, वह आत्मा उस योनि को छोडना नही चाहती, वह उसी मे जीना चाहती है। चाहे वह गन्दी नाली के कीडे के रूप मे ही क्यो न हो, वह भी जीना चाहती है। मरना नही चाहती, हर प्राणी को अपनी जिन्दगी प्रिय है। किन्तु इस प्रिय जिन्दगी की रक्षा करने के लिए उसे क्या करना चाहिए। किन उपायो को आख्तियार करना चाहिए, इस ओर अन्य प्राणियो का ध्यान जाना तो विशेष सभव नही है, लेकिन मानव जीवन को धारण कर चलने वाले इसान का भी इस ओर ध्यान बहुत कम जा पाता है। क्योकि इसान ने अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर यह सोच एव समझकर निर्णय ले लिया है कि मुझे मेरी जिन्दगी प्रिय है। अपनी जिदगी की सुरक्षा करने के लिए चाहे मुझे अपने पास वाले की जिन्दगी की भी उपेक्षा करनी पडे या उसका शोषण अथवा हनन भी करना पड़े तो कर दिया जाय, इस स्वार्थ परक सकुचित मानस के कारण वह अपने आप की रक्षा भी सही ढंग से नहीं कर पा रहा है, अपने आप पर हर समय खतरा महसूस करता रहता है, यह सब इस वैज्ञानिक बौद्धिक युग को सम्यक्तया न समझने की देन है। "आत्मवत् सर्वभुतेषु की भावना को भूल विलासिता मे डूबने का परिणाम है। (75) भगवान ऋषभदेव से पहले जब आदिम कालीन युग था। जिस समः यौगलिक जिन्दगी जीते थे, उस समय मे उनकी यह अवस्था नहीं थी। लोग सग्रह की भावना एव कामना नहीं करते थे न ही वे सग्रह रखते थे। इसलिए कोई सघर्ष उनमे नहीं होता था वे अपनी जिन्दगी मे मस्त रहते थे। इसे इस रूप मे समझे कि यौगलिक लोग खुद जीते थे और दूसरो को में जीने का अधिकार देते थे। किसी के भी जीने के अधिकार का हनन नई होता था, न किया जाता था। इसलिए उस जिन्दगी के अन्दर शाति बराबर बनी हुई थी। लेकिन जैसे-जैसे कल्पवृक्ष ने फल देना बन्द किया अथवा कम कर दिया, तभी से उन लोगों मे सग्रह की भावना पैदा हुई कि आज तो में खा लूगा, कल क्या होगा ? इसी दृष्टि एव भावना को लक्ष्य मे रखकर बल का और आज का साथ मे इकट्ठा कर लिया जाय। लेकिन इकट्ठा करते वका यह नही सोचा गया कि मैंने तो दोनो वक्त का साथ मे इकट्ठा कर लिया, मगर मेरे बाद जो यौगलिक आएगा वह क्या करेगा ? वह खाये या नहीं खाये ? उसको मिले या नही मिले ? मुझे मिल जाना चाहिए। यह धारणा उस समय पैदा हुई। यह स्वार्थ का बीज उस समय पैदा हुआ कि मेरा पेट भरना चाहिए। इस बीज ने ही सघर्ष पैदा कर दिया। यौगलिक ही यौगलिक से लडने लग गया। शातिमय जीवन मे अशाति का प्रादुर्भाव हो गया, समता के बीच मे विषमता का उद्भव हुआ और जिदगी के बीच मे दुर्भाव एव दूरद जागृत हुआ। उसका पहला कारण था स्वार्थ। स्वार्थ इन्सान मे ऐसा घुस गया कि उस स्वार्थ मे इन्सान ने इन्सान को मारना चालू कर दिया। इसान ही इंसान को मार रहा है। अपने स्वा को पूरा करने के लिए, अपनी जिन्दगी की रक्षा करने के लिए जब हम दूसरो की जिन्दगी के साथ खिलवाड करने के लिए तैयार हैं तो आप स्वय जरा सोचिए कि दूसरा व्यक्ति भी अपनी जिन्दगी की सुरक्षा करने के लिए सामने वाले के साथ क्या कुछ करने के लिए कटिबद्ध बन जायेगा ? यही कारन है कि इसान ही इसान को जितना मारता रहा है उतना कोई अन्य प्राणी नहीं मारता। दुनिया की कोई भी ताकत इसान को इतना नहीं मार रही है उसर' ज्यादा इसान ही इसान को मार रहा है, इसान ही इसान को खा रहा है। मैं चाहता हू मेरी जिन्दगी रहनी चाहिए उस जिदगी के लिए मैं दुसरो की मारता हू और दूसरा भी यही चाहता है कि मेरी जिदगी रहनी चाहिए। ता वह भी मारता है। (76) । इतिहास इस बात का गवाह है कि इसान ने इसान को कितना मारा। भगवती सूत्र के अन्दर स्थभूशल सग्राम, महाशिला कटक सग्राम बताया है जिसके अन्दर 1 करोड 80 लाख आदमी मारे गये। दो दिन के भयकर युद्ध मे करोडो आदमियो का मारा जाना विश्व युद्ध का भी रिकार्ड नहीं है। इतना भयकर युद्ध उस प्राचीन काल मे हुआ। क्योकि कोणिक ने अपने स्वार्थ के लिए निरपराध व्यक्तियो का हनन कर डाला, मेरे पास मेरा राज्य भी रहना चाहिए और भाईयो का भी रहना चाहिए। भाई के पास हार और हाथी हैं, वे भी मेरे हो जाना चाहिए। यौगलिक के बीच मे जो स्वार्थ का वीज पडा वह छोटा सा था। उस स्वार्थ का विस्तार इतना बढ़ गया कि पहले बातचीत की लडाई शुरू हुई उसके बाद हाथा पाई की स्थिति बनी, उसके बाद पत्थरो से फिर लकडियो का इस्तेमाल होने लगा। फिर वह लडाई बढते-बढते महावीर के समय इतनी जबर्दस्त फैली कि इसान ने ही इसान को मारना चालू कर दिया। करोडो आदमी थोडे से स्वार्थ के पीछे घमासान हो गये। यह इस बात का साक्षी है कि इसान ने अपने अन्दर कितना स्वार्थ फैला लिया है। यद्यपि इसान के पास बहुत बड़ा वरदान है, जो किसी भी योनि के पास नही है। 84 लाख योनियो मे अगर किसी को वरदान है तो केवल इसान को । देवताओ को भी यह वरदान प्राप्त नही है, तिर्यचो को भी यह वरदान नहीं मिला नारकी के नैरिए भी इस वरदान से वचित रहे, केवल मनुष्य ही उस वरदान का अधिकारी बना। मनुष्य मे ही एक मात्र ऐसी शक्ति है कि वह परमात्मा को पा सकता है, मोक्ष मे जा सकता है। इसके अलावा दुनिया मे ऐसी ताकत किसी भी योनि के पास नही जो परमात्मा बन सके। परमात्मा बन सकता है तो केवल मनुष्य ही बन सकता है। बहुत बडा वरदान है यह। जैन शास्त्रो मे ही नही, जितने भी धर्मों के प्रमुख ग्रथ हैं उन्हे उठाकर देख लीजिए हर धर्म के प्रवर्तक ने यह बात दुहरायी है कि इसान ही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। इतना बड़ा वरदान हमे प्राप्त हुआ, लेकिन हमने उस वरदान को न समझकर अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर एक दूसरे को मारना चालू कर दिया। सस्कृत मे एक वाक्य आता है कि "सुन्दोपसुन्द न्याय' सुद और उपसुन्द ये दो भाई थे। यह न्याय की परिभाषा है। कहा जाता है- उन दोनो भाईयो ने भोलेनाथ की सेवा की और भोलेनाथ उनके ऊपर बहुत खुश हो गये. उन्होने उनसे कहा- जाओ, मैं तुम्हे वरदान देता हू और दुनिया मे तुम्हे मारने वाला कोई दूसरा पैदा नही होगा, तुम अमर रहोगे और यदि तुम दुनिया मे मरोगे तो दोनो परस्पर लडोगे तो ही मरोगे। इसके अलावा दुनिया मे तुम्हे (77) । मारने वाला कोई दूसरा इसान नही होगा। यह वरदान भोलेनाथ ने सुन्द : उपसुन्द भाइयो को दे दिया। उन दोनो भाइयो ने देखा, वाह अब तो हम पर हो गये, अब हमे दुनिया मे कौन मारने वाला है। जब आदमी मैं इतनी म ताकत आ जाय, अजेय बन जाय तब फिर कहना ही क्या ? यदि इस दिन को पचाने की क्षमता और इसके सदुपयोग की कला जीवन मे न हो तो कर शक्ति दूसरो को परेशान करने, सत्रास पहुचाने तथा सहार करने के उपयो मे आती है। ऐसा ही हुआ वे दोनो सुन्द और उपसुन्द भी अपने आपको निर्भग और अजेय मानकर तथा जानकर अपराध करने लगे। कही चोरिया कर लो। कही मारकाट मचा देते. किसी के साथ छेडछाड कर देते, यह उनके लिए मामूली बात हो गई, क्योकि दुनिया की कोई भी ताकत उनसे टकरा नहीं सकती थी। वे अजेय हो गये। उन्होने देश के भीतर भयकर विप्लव मा दिया, जहा भी जाते वहा बदमाशिया करते। सारे लोग परेशान हो गये। और तो और न्याय कहता है, वे देवलोक मे चले गये, स्वर्गलोक मे जाकर उनी। इन्द्र को परेशान करना चालू कर दिया। क्योकि वरदान से वे अजेय बन तुक थे, अत उनको कोई मार तो सकता नही, इन्द्र भी उनको नहीं मार सक भी परेशानी महसूस करने लगे कि यह क्या हो गया ? इन्हे गारे केरो ? य.' बुलेटप्रूफ है कि देवताओ की ताकत भी काम नहीं करती। इन को ऐसा आशीर्वाद प्राप्त हुआ है कि कोई शक्ति उनके सामने काम करना तो दूर भी नहीं सकती, इन्द्र ने पता लगाया कि इनको ऐसा आशीर्वाद किसने दिया ? पता लगा कि भोलेनाथ ने दिया। इन्द्र भोलेनाथ के पास गए और हाथ जोडकर निवेदन किया कि प्रभो | आपने इन दोनो भाईयों को जेर बनने रूप जो आशीर्वाद दिया वे इसके लायक ही नहीं है। वे आपके इस आशीर्वाद रूप शक्ति का कितना दुरुपयोग कर रहे हैं ? घोर अनर्थ हो गया। यह कार्य तो ऐसा है कि बदर को नग्न तलवार दे अग रक्षक नियुका किया हो। यह क्या कर दिया आपने ? उन्होने कहा कि आशीर्वाद तो मैंने दे दिया मैं भी दुखी हू पर अब क्या होगा? आशीर्वाद तो आशीर्वाद ही है। इन्द्र : कहा-भगवन्, आपने आशीर्वाद किस रूप में प्रदान किया ? मोना कहा- कि तुम्हे कोई नहीं मार सकता यदि तुम मरोगे तो आपस में लगा " ही मरोगे, एक दूसरे से मरोगे अन्य कोई तुम्हें नहीं मार सकता। इन्द्र न कर वाह ! वाह ! इस रूप में है तब तो में सब काग कर लूगा, इतनी बया जगह उस आशीर्वाद में रखी हुई है तो फिर मैं आगे का सारा कार्य स्व' कर लूगा, इन्द्र ने मन ही मन विचार किया कि अब मुझे इसके लिए -- . (78) करना है। उपाय सोचते-सोचते एक उपाय उनके विनाश का मिल ही गया, इन्द्र स्व-स्थान पर लौट आया। आकर इन्द्र ने स्वर्गलोक मे जो देविया थी, उन देवियो का जो सुन्दर रूप था, उन एक-एक देवियो के रूप का एक तिल जितना-जितना अश सभी का निचोड निकाला, निकाल कर फिर उससे एक अप्सरा बनाई जिसका नाम रखा तिलोत्तमा। ऐसी तिलोत्तमा कि स्वर्गलोक मे उससे सुन्दर कोई दूसरी देवी नही। ऐसी सुन्दर देवी उसने बनाई और उस देवी को मृत्युलोक के जगत् मे उतार दिया, साथ ही यह सदेश देकर भेजा कि जिस उद्यान मे सुन्द और उपसुन्द दोनो घूमने आते हैं उस उद्यान मे तुम जाकर ऐसे स्थान पर रुकना कि उन दोनो की दृष्टि तुम पर पड जाय, जैसा निर्देश इन्द्र ने किया तदनुसार ही उसने कार्य किया। दोनो ही उद्यान मे पहुचे कि उनकी दृष्टि उस पर पडी सोचा कि इतनी सुन्दर देवी आज तक हमने कही नही देखी। उसे देखते ही उनके अतरग मे उसे पाने की इच्छा जागृत हुई। परस्पर कहने लगे इसे तो अब हमे पाना चाहिए, बात-बात के आवेश मे अब वे "हमे" तो भूल गये और कहने लग गए कि इसको तो "मुझे पाना है। "हम' भूले और मुझे' पकडा उन्होने। सुन्द कहता हे कि अप्सरा को में पाऊगा ओर उपसुद कहने लगा कि इस अप्सरा को मैं पाऊगा। सुन्द उस अप्सरा के पास जाने लगा तो उपसुन्द कहता है कि तुम नही जा सकते, और उपसुन्द जाने लगा तो सुन्द कहता है कि तुम नहीं जा सकते। एक कहता है कि यह मेरी है तो दूसरा कहता है कि यह मेरी है। बात बहुत गर्मा गई, आवेश सीमा को लाघ गया, दोनो अपने आप को अजय समझ रहे थे। स्वबल के बलोन्माद मे परस्पर उन्होने कहा कि इसको तो बाद मे पायेगे, पहले अपनी शक्ति अजमाले जो शक्तिशाली होगा वह इसको पायेगा। बस फिर क्या था, तिलोत्तमा एक तरफ खडी हो गई ओर सुद और उपसुन्द परस्पर भिड गये और इतने जबरदस्त भिडे कि दोनो के दोनो खत्म हो गये और तिलोत्तमा खडी की खडी रह गई। इसे कहते हे सुन्दोपसुन्द न्याय। यानी व्यक्ति जब स्वार्थ मे आकर मैं-में की बात करता है, हम से हटकर मुझ पर आने लगता है और ज्योही इसान के दिमाग मे मैं-में की बात घुसी कि झगडा पैदा हो गया। देखिए उन सुन्द और उपसुन्द को कितना बडा वरदान मिला था, उसको भी अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर खो दिया। वैसे ही इसान को कोई सामान्य वरदान नही मिला है। अर्हन्त भगवान ने यह उद्घोष किया, वरदान दिया है कि इसान मे ऐसी शक्ति है जो परमात्मा को (79) आज के । प्राप्त कर सकती है। लेकिन उस परमात्मा को पाने के लिए उसे 'आगा सर्वभूतेषु' की भावना ससार की समस्त आत्माओ के साथ कायम रखनी होगी, उसको वह भूल गया है और स्वार्थ के वशीभूत होकर अपने आप के पेट को भरने के लिए, अपने आप की इच्छा को पूर्ण करने के लिए वह दूसरों को मार रहा है। मारना भी किसे ? अरे मानव मे इतना स्वार्थ आ गया है कि युग मे भाई ही अपने स्वार्थ के लिए अपने भाई को मार रहा है, बाप- बेटे से लड रहा है। कोर्ट केस चल रहा है। पता नहीं क्या-क्या इस दुनिया मे हो रहा है। पति-पत्नी सम्पत्ति के नाम पर झगड़ रहे हैं। यह सारी सम्पति, यह सारी दौलत, यह सारी जायदाद यहीं रह जाने वाली है। अरे, तिलोतमा वहीं की वहीं खडी रह गई, सुन्द और उपसुन्द मारे गये। वैसे ही दुनिया में जो बड़े-बड़े महारथी पैदा हुए, बडे-बडे पराक्रमी राजा महाराज पैदा हुए सब लडे, जमीन की खातिर लडे, दौलत के खातिर लडे। किसने दौलत प्राप्त की. किसने जमीन प्राप्त की ? वह सारी जमीन, सारी दौलत यही रह गई. दुनिया मे भयकर युद्ध मचने लगे और आज के इस आधुनिक युग के अन्दर तो युज की सख्या और बढ गई। आज के युद्ध बन्दूको से नही होते. आज के गुप्त पिस्तौलो से नही होते, तोप और अणुवमो से होते हैं। भगवती सूत्र के अन्दर परमाणुओं की व्याख्या मिलती है कि परमाणुओ मे आचित्य शक्ति रही हुई है। भगवान महावीर ने दो बाते कही थी कि परमाणु सृजनात्मक काम भी करता है ओर परमाणु विघ्वसात्मक काम भी कर सकता है। दो बाते शास्त्रो मे आती है कि परमाणु से मानव का उद्धार की किया जा सकता है, तो परमाणु से मानव का विनाश भी किया जा सकता है। लेकिन आज के वैज्ञानिको ने दोनो मे से एक बात पकड ली लि. परमाणुओ से मानव का विनाश कैसे किया जा सकता है ? अधिक रा अधिक मानव कैसे परमाणु बम से मारे जा सकते हैं ? किस तरीके से इनका घात की जा सकती है। इस ओर आज के वैज्ञानिको का ध्यान विशेष तर पर लगा हुआ है। आपको मालूम होगा पानी को गर्म करने के लिए किन डिग्री हीट चाहिए, सौ डिग्री हीट के अन्दर पानी भाप बन जाता है। 100 डिग्री हीट लगने पर लोहा भी पिघलने लगता है और पच्चीस सौ डिग्री होट लग जाय तो लोहा भाप बन जाता है, लोहा आकाश में उड़ने लगता है कि वैज्ञानिको ने जो हाड्रोजन बम बनाया है उस हाइड्रोजन बम की गर्मी 10 करोड डिग्री है। उस हाइड्रोजन बम की ताकत 45 हजार वर्गमील जमीन को खत्म करने की हैं। ऐसे हाइड्रोजन बम इस दुनिया के अन्दर (80) । पचास हजार से भी ज्यादा हैं। यही नहीं आज जो दुनिया है, ऐसी सात दुनिया इकट्ठी हो जाय तो उसे समाप्त करने की ताकत रखते हैं। हाडड्रोजन बम तो मामूली बम है, इसके बाद तो वैज्ञानिको ने न्यूट्रोन बम, मेगाटन डूम्सडे आदि भयकर अणुबमो का निर्माण किया है, जिन अणु बमो ने देश को प्रलयकारी कगार पर खड़ा कर दिया है। आज के इस आधुनिक विज्ञान के युग मे विनाशकारी ही नहीं महाविनाश की, अस्त्र शस्त्रो के निर्माण की होड सी लग गयी है। इस युग में छोटे से छोटा अपने को अपराजित बनाने के लिए नित नये तकनीक का आश्रय लेकर अधिकाधिक मारक शस्त्रास्त्रो का निर्माण कर रहा है। वह यह चाहता ही नहीं, बल्कि उसके योग्य कोशिश भी जारी रखता है। साथ ही अपने देश की वस्तुओ का निर्यात कर वह दूसरे देश से शस्त्रो का आयात करता है। इसका कारण यह है कि हर एक देश मे शस्त्रो की होड से भय व्याप्त है। उस भय से उभरने के लिए वह भयकर साधन रूप शस्त्रो को सग्रहित करने मे लगा हुआ है। यही कारण है कि हर देश मे विनाशकारी शस्त्रो का प्रभाव बढता चला जा रहा है और यह पशु-पक्षियो को मारने के लिए नहीं बल्कि इसानो को मारने के लिए बनाए जा रहे हैं। मेरा देश बढे और दूसरो का नाम नही आए, यह धारणा एक खतरनाक रूप धारण कर रही है, विनाशकारी विकट स्थितिया पैदा कर रही हैं। हिरोशिमा और नागाशाकी का युद्ध, जिसमे एक युद्ध मे 65150 आदमी मारे गये। इसके अतिरिक्त 36452 आदमी अपग हो गए। यह सिर्फ अपनी अहम् की तुष्टि के लिए अपनी भावनाओ को पूरा करने के लिए अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए हुआ है। दूसरे विश्वयुद्ध के अन्दर 2 करोड 70 लाख लोग मरे और छुटपुट युद्धो मे 25 करोड मरे। 61 देशो मे परस्पर युद्ध हुआ। उसके बाद अभी बहुराष्ट्रीय सेना और इराक का युद्ध स्वार्थ पूर्ति का परिचायक है। यह क्यो हो रहा है ? इसलिए कि हमारे अन्दर स्वार्थ घर कर गया है। किसी व्यक्ति के अन्दर स्वार्थ की भावना काम करने से, महासग्राम होने लगता है। तिल-तिल पैदा होते तिलोत्तमा पैदा हो गई। वैसे ही व्यक्ति-व्यक्ति में स्वार्थ पैदा होते-होते खतरनाक महास्वार्थ पैदा हो गया, जो मानवीय सस्कृति को निरन्तर खा रहा है। बोटुलिज्म जहर का एक ग्राम एक करोड आदमियो का मारने की क्षमता रखता है। यहा तक बताया जाता है कि अशुद्ध बोटुलिज्न जहर का 1/4 ग्राम 7 अरब आदमियो को मारने की क्षमता रखता है। ऐसी-ऐसी भयानक ताकते विश्व मे विनाश पैदा करने की क्षमता रखती है। किसी देश । । (81) को कैसे मारा जाय, यह भावनाए इंसानो के दिल मे पैदा हो रही है। न्यूट्रोन बम के अविष्कारक सेमुअल कोहन ने एक भविष्यवाणी की। कि 1985 से 1999 के बीच तीसरा विश्वयुद्ध होने की समावना है। उनों यह भी बताया कि भारत और पाकिस्तान लडेगे, अरब और चीन लडेगे * रूस एवं अमेरिका ब्रेक से लडायेगे। ऐसी स्थिति की घोषणा सेम्युअल कोहा ने की। वे बाते सच निकले या न निकले इसका कोई महत्व नहीं है। सी हिन्दुस्तान पाकिस्तान का अघोषित युद्ध विश्व को फिर विश्व युद्ध के कगार पर ला रहा था। लेकिन फिलहाल तो विश्वयुद्ध की अग्नि ज्ञात हो गई है। कब भडक जाय कुछ कहा नहीं जा सकता है। क्योकि दोनों देशों के दिलों में तो आक्रामकता की चिनगारिया उठ रही हैं। इस भयानक स्थिति को देखते हुए हमे क्या करना चाहिए यह हमे सोचना है। ऐसे समय मे हमारा क्या उत्तरदायिय होता है और उसका निर्वाह कैसे हमे करना चाहिए? हर व्यक्ति अपनी धारण को किस रूप में लेकर चले कि जिससे इस प्रलयकर/भयकर स्थिति से हर कोई अपने आप को उबार सके और हम भी अपने आपको बचा सके। भारत के अदर कितनी भी प्रलयकारी स्थिति क्यो न हो पूरे वली ताकत इस भारत को तहस-नहस करने, मारने के लिए लग जाय तो भी या निश्चित है कि भारत सम्पूर्ण रूप से खत्म नहीं होगा और न नाश को प्रार हो सकेगा। सारी दुनिया के अणुबम भी यहा आकर पड जाय तो भी भारत का अस्तित्व विलय को प्राप्त नहीं हो सकता। आप कह सकते हैं कि क्या आप सर्वज्ञ हो गए है ? में सर्वज्ञ तो न? हो गया लेकिन सर्वज्ञो की बात जरूर कहता हू। भगवान गहावीर से पृr गया कि-भगवन् ! आपका शासन कितने हजार वर्षों तक चलेगा ? उन्हान कहा कि यह शासन 21 हजार वर्षों तक चलेगा, अर्थात् मेरे साधु-श्रावक 21 हजार वर्षों तक बराबर रहेगे। तो महावीर की भाषा क्या इयूठी कई जायेगी ? क्या भगवान महावीर ने असत्य कहा ? भगवान महावीर ने व कि दुनिया की कोई भी ताकत इसे पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। आदि इसके पीछे क्या रहस्य छिपा है ? यह क्यो नही खत्म होगा? भारत के पर इतनी बडी कौनसी ताकत हैं ? जिसके कारण यह बात कही गई है। दुनिया की सारी ताकत लग जाय तो भी भारत को खत्म नहीं कर सब । भगवान महावीर की इस बात के पीछे कोई न कोई ताकत जरूर रही। भगवती सूत्र में एक बात और आई है। जब चगरेन्द्र अपनी राजा चमरचचा की राजसभा में थे। उस समय उसने अपने अवविज्ञान से मार । (82) देव लोक के इन्द्र को अपने ऊपर बैठे देखा। देखकर वह विचार करने लगा कि यह कोन है ? अपनी मौत को निमत्रण देने वाला मेरे ऊपर कोई इन्द्र नही हो सकता। में इन्द्र से बडा हू। उसने अन्य देवी देवताओ से कहा- कि में इसको मारकर रहूगा, कैसे मारू ? उसने अवधिज्ञान का प्रयोग करके देखा इस समय प्रमु महावीर कहा है ? ज्ञान से जाना कि तीर्थेश प्रमु महावीर जम्बूद्वीप के सुसुमारपुर नगर के बाहर अशोक वन खण्ड के अशोक वृक्ष के नीचे एक रात्रि की महाप्रतिमा धारण कर ध्यान साधना मे निमग्न बने हुए थे, उस समय प्रभु छट्ठ-छ? तप की आराधना कर रहे थे और साधना काल का यह ग्यारहवा वर्ष था। वह सीधा देवलोक से चला और भगवान महावीर के पास आया। भगवान महावीर तो ध्यान मे खडे थे उसने कहा कि हे । देवाधि देव | मैं आपके सान्निध्य से देवराज शक्र के पास जाता है। इतना कहकर वह ऊपर गया देवराज शक्र के पास और अपशब्द बोलने लगा। देवराज ने सोचा कि इसमे इतनी ताकत कैसे आई, शकेन्द्र ने उसको मारने के लिए वज छोडा । वज्र बहुत ताकतवर था, जिसका विरोध चमरेन्द्र के पास नही था। चमरेन्द्र घबराया, वह घबराकर नीचे मुह करके भागने लगा। सोचा अब अगर मेरा बचाव हो सकता है तो अरिहत की शरण मे ही, ऐसा विचार कर चमरेन्द्र ने तेजी से दौड़ लगाई। आगे चमरेन्द्र पीछे वज उसको मारने के लिए दौड रहा था। यह चमरेन्द्र ऊपर कैसे आ गया। चमरेन्द्र की तो इतनी ताकत नही कि वह ऊपर आ सके। जरूर इसने किसी न किसी तीर्थकर का सान्निध्य लिया है, तभी इसके पास ताकत आई है। जब शक्रेन्द्र ने ध्यान लगाया तो मालूम हुआ कि यह तो तीर्थेश प्रमु महावीर के सान्निध्य से आया है। कही अनर्थ न हो जाय। आगे-आगे चमरेन्द्र और पीछे वज भाग रहा हे ओर उसके पीछे देवराज इन्द्र घबराये भाग रहे हैं। वह जहा अशोक वनखण्ड था, जहा महावीर ध्यान मे खडे थे वहा चमरेन्द्र पहुचा। उसने छोटा रूप बनाया और महावीर के पैरो मे घुसकर बैठ गया और सोचा कि अब मुझे कोई नही मार सकता। वज भी चमरेन्द्र के पीछे-पीछे आ रहा था उसको मारने के लिए। शक्रेन्द्र अति तीव्र गति से दोडे । प्रमु महावीर के पेर से 4 अगुल दूर रहते-रहत वज को शक्रेन्द्र ने पकड लिया। इन्द्र बोले कि हे भगवन् । मुझे यह नहीं मालूम था कि चमरेन्द्र आपकी शरण मे आया है। यदि मुझे पहले मालूम होता तो मैं वज नही छोडता। मैं आप से क्षमा चाहता हू और चमरेन्द्र को अभयदान देता हू। चमरेन्द्र बच गया। यह कहानी, कहानी नहीं है। यह विदेचना (83) । । - भगवती सूत्र में वर्णित है। आगे बताया गया है कि महावीर के सान्निध्य से उन्हे अमय प्राप्त हो गया। उनके दर्शन किये, उनके साधनाशील जीवन से चमरेन्द्र मे इतनी ताका आ गई कि वह इन्द्र के पास पहुंच गया। शास्त्रकार कहते हैं कि 'आत्म शक्ति साधना की ताकत दुनियां मे सबसे बडी सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। केवल साधना ही एक ऐसी ताकत है जिसके सामने दुनियां की ताकत हार जाती है, साधना की ताकत विजय पाती है। संकल्पबद्ध अहिसामय पावन विचारों की ताकत जीत जाती है। जिस व्यक्ति के विचार ताकतवर हो, वह अहिंसा के आमामडल से दूसरो को परास्त कर सकता है। आज के वैज्ञानिकों ने इस बात को स्वीकार कर लिया है, उन्होंने ऐसे अनेक प्रयोग अपनी प्रयोग- शालाओ मे गृहीत कर लिये हैं। शब्दो और भावो मे गहरा सम्बन्ध है। जो बाहरी वस्तुओ को आश्चर्य जनक ढग से प्रभावित करता है। फास की मेडम फिनलाग आश्चर्यजनक ढग से प्रभावित करती है। फ्रास की मेडम फिलेलांग के विषय में पढ़ा गया कि उसने ऐसा एक प्रयोग किया जिसमे चाक के एक टुकड़े को बाधकर उरावं साथ बिजली के दो तारो को जोड दिया। सामने काला बोर्ड लगा दिया। इसके बाद वह अपने प्रेमी का चिन्तन करती हुई कुछ गाने लगी। गाने के बाद जब उसने बोर्ड की ओर देखा तो उसे आश्चर्य हुआ कि चाक का टुकडा घूमा और उस बोर्ड पर उसके प्रेमी का रेखाचित्र बन गया। उसके बाद तो फिलेलाग ने अनेक प्रयोग किये। पेरिस मे एक महाविद्यालय मे इसी ढग से एक छात्र से भैरवाष्टक गवाया तो देखा भैरू जी की मूर्ति बोर्ड पर बन गई। शब्दो का भावो के साथ गहरा सम्बन्ध दुनिया के सामने प्रमाणित हो गया। यही नहीं मन का प्रभाव तो अचिन्त्य है। जैन दर्शन मे तो कहा गया मन एवमनुष्याणा कारण वध मोक्षयो' मन ही मनुष्यों के लिए बध गोश का कारण है। लोगो की मले ऐसी सोच रही है कि मन मे कुछ भी सोचे किरी को मालूम नहीं चलता, पर अब साइस इसे भी पकडने लगती है। मन की बहुत बड़ी ताकत स्वीकार की गई है। यूरोप के चेकोस्लोवाकिया देश की राजधानी प्राह में बेतिस्लाव काफ्का नाम के व्यक्ति ने अपने मन और दृष्टि को एकाग्र करके यूरोप के सैकडो वैज्ञानिको के सामने यह प्रयोग कर दिखाया कि वृक्ष पर बैठे सैकडो पक्षी उसकी दृष्टि के सामने अपर घडाघड नीचे गिर गए खतम हो गए। वैज्ञानिकों को मानना पड़ा। बेतिस्लाव की प्राण ऊर्जा ने पक्षियों की प्राण ऊर्जा खींचकर नीचे गिरा दिया। 1 है . (84) - मन से प्राण ऊर्जा खींचने का यह आश्चर्यजनक प्रयोग सामने आया। अरब कट्री मे एक व्यक्ति हुआ है, यूरीगेलर जिसने अपने मन को एकाग्र करके घडी की सुई घुमादी चम्मच तोड दिया। बिना किसी हाथ लगाए जड मूर्ति को अपने कधे पर बिठा दिया। यह सब घटनाए मन की शक्ति को प्रमाणित करती है। अब वह समय भी दूर नहीं कि जब एटमबम के बाद लोग मन से युद्ध करने लगेगे। मन से ही सोचकर सामने वाले शत्रु को मार दिया जाएगा। अब सोचने वाली बात यह है कि जिस मन से इतने सहारक हिसक प्रयोग हो सकते हैं तो क्या उसी मन से रक्षक के रूप मे अहिसक प्रयोग नही हो सकते ? शक्ति तो वही है उसे दोनो रूपो मे काम ली जा सकती। यदि मन ओर वचन से अहिसा की रक्षा की सोच और आवाज पैदा की जाय तो रक्षा का बहुत बड़ा काम हो सकता है, बल्कि हो रहा है। इस देश मे जितने त्यागी, योगी, महायोगी आत्माए हैं जो पूरी तरह अहिसा का पालन करती है, उतनी विश्व के किसी भी देश में नहीं है। जितने प्रमु की प्रार्थना करने वाले इस देश मे हैं शायद और किसी देश में नहीं। जितने शाकाहारी लोग इस देश मे, उतने किसी देश में नहीं। जरा सोचिये करोडो लोग जब प्रभु की भक्ति के साथ विशुद्ध मन से सभी जीवो की रक्षा की कामना करते हैं तो उनके मन एव वचन से निकलने वाली रक्षात्मक तरगे इस पूरे देश की रक्षा करने वाली नही होगी ? अवश्य होगी। भारत का यह एक ऐसा सशक्त आभामडल होगा जो विश्व की सगठित विनाशक शक्ति का प्रतिरोधक करने मे भी समर्थ हो जाएगा। जिस दिन मन से युद्ध होने लगेगा। उस दिन मन से रक्षात्मक भाव होने से विश्व युद्ध होने पर भी भारत कमी भी सपूर्णत खतम नही होगा। यद्यपि भारत का यह अहिसक आमामडल पूरे विश्व मे सचार करता है। पर वहा इसे कैच करने वाले अहिसक व्यक्ति नही होने से वहा इतना प्रभावी नहीं बनता। जिस प्रकार लन्दन से ब्रॉडकास्टिग की तरगे यहा पर भी आती पर यदि हमारा रेडियो ऑन नही हो तो वह तरगे, हमारे काम की नहीं रहती। इसी प्रकार अहिसक तरगे विदेशो मे भी जाती है, पर उन मासाहारियो का भावात्मक रेडियो ऑन न होने से वह प्रमावी नही बन पाती। जदकि भारत मे तो अहिसा त्याग की तरगे चौबीसो घटे प्रोडक्ट निर्मित हो रही है। जो निश्चय ही इस देश की रक्षा करने का सामर्थ्य रखती है जैन साधु तो पूर्ण रूप से अहिसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के सिद्धान्तो के साथ चलने वाला होता है। ऐसे साधु का तो पूरे - (85) विश्व मे कोई विकल्प नही मिलेगा। ऐसे लोगो के अहिसक आमामडल से देश की रक्षा अवश्य होगी। आपने सुना होगा कि जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति मेरा बात आती है कि लवण समुद्र मे ज्वारा भाटा आता है, उसका पानी इस. जम्बूद्वीप मे आ जाय तो इस जम्बूद्वीप मे प्रलय मच सकता है। वह पयो न आता, यह बात भगवान से गौतम स्वामी ने पूछी। भगवान ने कहा कि कहा कि इस जम्बूद्वीप मे बहुत से साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाए हैं, अहिसादि पील गुणो की साधना, पालन कर रहे हैं। धर्म का शुद्ध आचरण कर रहे हैं। उनमें धर्ममय जीवन और आचरण का प्रभाव ही इस पानी को रोक रहा है। इसलिए इतनी ताकत रखने वाले साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविकाए भारत देश में भी विद्यमान हैं और रहेगे। तब यह कैसे खत्म हो सकता है। प्रश्न हो सकता। फिर देश मे टुकड़े-टुकडे मे युद्ध हो रहा है उन युद्धो का कारण क्या है ? उनका कारण यह है कि हमारे अन्दर धार्मिक भावना की कमी आ रही। हमारे अन्दर अहिसा की वृत्ति गौण बन रही है, सत्य की कमी आ रही है, त्याग भावना की कमी आ रही है। आज देश मे हिसा फैल रही है, रस फैलता जा रहा है, जिससे भयकर विनाश की स्थिति पैदा हो रही है. इस बात को समझना होगा कि हम अधिक से अधिक ध्यान करे, हग पर्युषण प के अवसर पर तप करे, इस पर्व पर यह बात स्पष्ट कही जाती है कि हम अधिक से अधिक धर्म ध्यान करे, इतनी अधिक तप की साधना करे, समता की साधना करे जिससे वह आमामण्डल मजबूत हो जाय, जिसे कोई भी न तोड सके। आपने सुना होगा कि द्वारका नगरी 9 योजन चोडी और 12 योजन लम्बी थी, अर्थात् 36 कोस चोडी और 48 कोस लम्बी द्वारका नगरी थी, एक योजन चार कोस का कहा गया है। इतनी बडी द्वारिका नगरी के लिए भगवान ने भी कृष्ण को का । हे कृष्ण | जब तक इस द्वारका नगरी में एक भी व्यक्ति आयग्निल कर रहेगा उस नगरी को देवता की ताकत भी नहीं जला सकेगी और यह भी। जब तक द्वारका नगरी में एक भी आयम्बिल चलता रहा देवता की ताकत नही रही कि वह उस द्वारिका नगरी को जला सके। लेकिन बहुत के बाद महीनो के बाद लोगो ने सोचा कि अव देवता कुछ नहीं कर सा' है। उन्होंने सोचा वह आयम्बिल कर लिये। ऐसा भरोसा जता दाता। दोष ही होता है। इस चक्कर में एक दिन ऐसा आया जब पूरी सारिसका ना में एक भी व्यक्ति ने आयम्चिल नहीं किया और देव ने उस नगरी का जाप भस्म कर दिया, तो जय एक आयविल पूरे नगर में चलता रहा तब ५ (85) की शक्ति नाकामयाब होती रही, विफल बनती रही ओर नगर की रक्षा होती , रही। । । । मैं पूछता हू आपके परिवार मे एक आयविल होता रहे तो क्या आपके परिवार को आप अनिष्ट आक्रमणो से नही बचा सकते ? हा, आप जरूर बचा सकते हैं। मेरी माताए कहती हैं, मेरा बेटा गया है विदेश मे, सुरक्षित है कि नही ? ट्रेन मे आ रहा है, कहीं ट्रेन का एक्सीडैण्ट तो नहीं हो गया ? प्लेन मे आ रहा है कही प्लेन नीचे तो नही गिर जाएगी ? पता नही क्या-क्या सोचते रहते हैं। उसके लिए देवी-देवताओ को मनाते हैं। भैंरू भवानियो को ध्याते रहते हैं। पता नही क्या-क्या मानताए करते रहते हैं। जब एक आयबिल से पूरे नगर की रक्षा हो जाती है, देवता भी नही मार सकते तो क्या आपके छोटे से परिवार की रक्षा नही हो सकती? जरूर हो सकती है। लेकिन हमारे मन मे श्रद्धा होनी चाहिए हमारे मन मे सकल्प होना चाहिए। हमारे अन्दर दृढ विश्वास की भावना होनी चाहिए। तब जाकर हमारी रक्षा हो सकती है। पर न हम आयम्बिल करना चाहते हैं, न तप करना चाहते हैं। ऐसे लोग वास्तव मे तपस्या का महत्त्व नही जानते। सारी दुनिया एक तरफ और तपस्या एक तरफ। तपस्या मे इतनी ताकत होती है कि वह पूरी दुनियां को हिला दे, स्वर्गलोक के इन्द्र के आसन को कपायमान कर दे। तप करना कोई सहज नहीं है, एक टाईम भूखे रहने पर भी व्यक्ति घबराता है। मुह मे लार टपकने लगती है। सवत्सरी आने से पहले ही भूख लगने लग जाती है। लोग कहते हैं, महाराज | जिस दिन भी सवत्सरी मनाते हैं, जिस समय उपवास का नियम लेते हैं, उसी समय बल्कि उससे पहले ही भूख लगने लगती है। कई लोग कहते हैं कि वैसे तो 9 बजे से पहले नास्ता नही करते हैं, चाय नही पीते हैं। लेकिन उपवास यदि कर लिया तो 6 बजे ही भूख लग जाती है, माथा दुखने लगता है। यह साइकोलॉजिक इफेक्ट है। इसलिए आप तप से इस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। बहुत मुश्किल साधना है, पर जिस व्यक्ति ने तपस्या के बल पर शरीर पर, मन पर विजय प्राप्त कर ली, वह परमात्मा के निकट होता चला जाता है। इसलिए जेनी भारत की रक्षा मे सबसे ज्यादा उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हैं क्योकि इतनी बड़ी अहिसा की शक्ति, तपश्चर्या किसी भी धर्म मे नही मिलेगी, जितनी इस जैन धर्म में है। अगर देश की रक्षा करनी है, देश को विश्व युद्ध से बचाना है, विनाश से बचाना है, अधिक से अधिक धर्म साधना लानी है तो छोटे-छोटे तप बहुत । 187) बडी स्थिति पैदा करते हैं, व्यापक स्तर पर पैदा करते हैं। एक बार आयुर्वेद के आचार्य के सामने एक बात आई उसने कहा- कि एक रुपये की दवा ऐसी हो जो कि पूरे विश्व में स्वास्थ्य का सरक्षण दरे शाति फैल जाय। आयुर्वेद के आचार्य ने महायोगराज गुगर मगायी। उस जलाया, जलने से उसके परमाणु वायुमंडल मे फैलना शुरू हुए उ गंध फैलने लगी। आचार्य ने कहा- कि यह हवा जहां-जहां भी जाती वहां-वहां स्वास्थ्य का संचार करेगी। एक रुपये की महा योगराज गुगर या प्रमाव वायुमडल में सर्वत्र फैल गई। मैं अकेला आयंबिल करू, अकेला रोता करू तो दुनिया का कल्याण होगा? नहीं। इसलिए मैं क्यों करू ? ऐसा मा सोचिये। अकेले आप पैसा कमाते हैं दुनिया नहीं कमाती है, तो क्यों सोको हैं, कि मैं अकेला क्यो कमाऊ, किसलिए कमाऊं, लोग तो भूखे मर रहे हैं? अकेले समता फैलाएंगे, अकेले तपस्या करेगे तो आपका उद्धार होगा तो होगा, लेकिन उसकी तरगे जो वायुमण्डल मे प्रसारित होगी व जहा-जहा भी फैलेगी वहा-वहा शाति फैलेगी, वहा-वहा अहिसा फैलेगी, वहा-वहा रायम फैलेगा। जितनी आप प्रभु की भक्ति करेगे साथ ही उसकी शब्दो में अभिव्यक्ति करेगे उतना असर उसका अधिक फैलेगा। मैंने सुना है एक बार दो हजार सैनिक एक पुल के ऊपर जा रहे थे। आप जानते हैं सैनिको को। सैनिको का कदम एक साथ उठता एक सय पडता है। ऐसा नहीं होता है कि एक पैर कभी उठ रहा और दूसरा पैर की। सैनिक एक साथ पैर उठाते हैं। एक साथ पैर नीचे रखते हैं। हुआ क्या ? दो हजार सैनिक चल रहे थे पुल के ऊपर। पदचाप की आवाज आ रही शी। उस आवाज से पुल टूट गया। इजीनियरों को कहा, पुल कैसे टूट गया। जिस पुल के ऊपर से हजारों टन की ट्रकें माल लेकर गुजर जाती है, उससे वह पुल नहीं टूटा, किन्तु सैनिकों की पदचाप की आवाज से टूट गया। तर इजीनियरो ने कहा कि ध्वनि तरगे इतनी ताकतवर हो गई कि शविनशन पुल उस पदचाप की ध्वनि को बर्दाश्त न कर ध्वस्त हो गया। वैज्ञानिकों ने इस बात को एक स्वर से एक मत से मान लिया कि आवाज से ब्रिज (पुल) टूट सकता है, महाविनाश हो सकता है, तो दा आवाज से महाविनाश रुक नहीं सकता? यदि महाविनाश हो सका रूक भी सकता है। अगर हमारी अहिसा की आवाज बुलन्द हो. राम आचरण प्रबल हो, हमारी क्षमा सबल हो मैत्री की भावना सक्रिय हो, हर सहिष्णुता की क्षमता तेज हो, समन्वय की दृष्टि विकसित :.rer । हो (88) । । महाविनाश को भी रोक सकते हैं, भयकर से भयकर युद्ध को टाल सकते हैं। लेकिन आज हम अपनी रक्षा करने के लिए दूसरो को मार रहे हैं। मारते समय हम यह क्यो भूल जाते हैं, दूसरा भी आपको मारेगा। एक दूसरा एक दूसरे को मारने मे लगा है। हम अपने आप ही टकरा-टकरा कर खत्म हो रहे हैं। "सुन्दोपसुन्द' का न्याय हमारे ऊपर लागू हो रहा है। तिलोत्तमा तो खडी ही रह गई। सब कुछ यही रहेगा, दौलत भी यही पडी रहेगी, जमीन जायदाद भी यही रह जायेगी कोई किसी भी इसान के साथ जाने वाली नहीं है। लेकिन इसान खुद इन वस्तुओ पदार्थों के लिए लडकर अपनी ताकत को खत्म कर रहा है। आप पर्युषण पर्व के इन दिनो मे तो विशेष रूप से अपनी आत्मा को ध्याने का प्रयास करेगे। जीवन मे राग और द्वेष की भावना काम करती रहती है, छोटी-छोटी बातो मे लडाई हो जाती है। मूछे तनने लगती है, इसने ऐसा कैसे कह दिया। यह नीचा है, मैं ऊचा ह, आदि-आदि। क्या गौतम स्वामी से ऊचा कोई इतनी बडी दुनिया मे है अभी ? गौतम स्वामी को भगवान महावीर ने कहा-आनन्द श्रावक सही है। उसने जो बात कही वह सत्य कही है। उसको जो अवधिज्ञान प्राप्त हुआ है, वह सही प्राप्त हुआ है। आनन्द श्रावक सच्चा है, तुम गलती पर हो, जाओ माफी मागकर आओ। गौतम गये, उसी वक्त गये। आनन्द के पास पहुचे और माफी मागी कहा कि आपने जो कहा जैसा कहा वह बिल्कुल सत्य है। मैं गलती पर था। इसी सरलता सहजता निरभिमानता आदि सद्गुणो के कारण उनको आगे जाकर केवल्यज्ञान हुआ। उस समय गौतम कह देते कि मैं क्यो जाऊ, मैं नहीं जाऊगा। नहीं जाते तो उन्हे केवल्यज्ञान प्राप्त नहीं होता। क्योकि वह वृत्ति उनकी सबलशाली बन जाती। ग्रन्थि मजबूत हो जाती। फिर वह ग्रन्थि जब तक नहीं खुलती तब तक केवलज्ञान होता ही नहीं। लेकिन गौतम स्वामी उसी वक्त गये और आनन्द श्रावक से क्षमा मागी। है हमारे मे इतनी ताकत ? अगर नौकर ने गलती कर दी तो हम उससे लड पडेगे और यदि हमारी गलती हो गई तो हम नौकर से कभी माफी नही मागेगे। हमारी भावना पता नहीं किस-किस रूप मे क्या-क्या कार्य कर रही है, ऐसी स्थिति मे हमे कैसे होगा केवल ज्ञान ? कैसे हम समतामाव मे रत रह सकेगे? कसे यह विश्व युद्ध टले ? विश्व युद्ध टले या न टले लेकिन हमारा स्वय का तो उद्धार होना चाहिये। आप ऐसा वातावरण बनाये अपने परिवार का जिससे परिवार वाकयुद्ध व वैर विरोध की भावना न जन्मे । मान लो युद्ध न टाल सके, देश की लडाई न टाल सके परन्तु परिवार की लडाई तो टाल सकते हैं। इसके । । मे (89) लिए आप आयबिल के तप को अपनाए, तेले के अन्दर आये। इससे परिवार का झगडा टल सकता है। पारिवारिक झगडे से जो प्रदूषण का रहा है जो दूसरे परिवारो को अप्रत्यक्ष रूप से खराब कर रहा है वे उससे जायेगे। जो घातक प्रदूषण जन-जन के विचारो का हो रहा है, उससे दे के अन्दर खतरनाक स्थिति पैदा हो रही है। उस हानि से देश को बचाने ही ताकत है, आप सब मे भी। उस ताकत से आप भी दूसरो को बचा सकते है। ऐसे साधु आज भी हैं, जिनके सत्य, अहिसा, त्याग, तप के प्रभार भारत देश का सरक्षण हो रहा है। यह मत समझ लेना आप कि वे उस समा थे और इस समय नहीं है तो महावीर की भाषा झूठी हो जाग। लेकिन महावीर ने यह कहा-साधु इस समय है वैसे ही साधु 21 हजार वर्ग न्यूनाधिक रूप मे रहेगे और वैसे साधु आज नही है तो क्या आज धर्म शासन नही चल रहा है ? आज भी चल रहा है। क्योकि जैसे आचारवान, शीला प्रधान साधु भगवान महावीर के समय थे, उस प्रकार के साधु 21 हजार तक चलेगे। वे अपनी ताकत का प्रयोग तभी करते हैं जब कोई महाविना की स्थिति पैदा हो रही हो। अत यह कहा जा सकता है कि भारत को कभी सम्पूर्ण रूप से समाप्त करने की, खत्म करने की ताकत किसी में नहीं है। इसलिए हम इस शक्ति को अधिक से अधिक जोड़ने की कोशिश करे अधिक से अधिक इस तरह की भावना को जगाने की कोशिश करे, जिससे विश्व की समस्याओ को टाला जा सके। कम से कम अब जन-जन, इस भगवान महावीर का व्यवहार प्रान पहला सूत्र तो अपना ले जो "जीओ और जीने दो' के रूप में है। लेकिन आर आप जिस दुनिया में जी रहे हैं, उसमे दूसरो को जीने देना है या नहीं ? अगर आपकी दुकान के पास मे अन्य कोई दुकानदार बैठा है, उसकी कगाई ज्यादा हो रही है तो आप क्या चाहेगे। क्या उसके लिए सोचने लगेंगे कैसे भी इस ऊपर इनकम टेक्स का छापा आ जाय, केसे भी उसको राराय किया जाए यह भावना तो आपके मन मस्तिष्क मे पेदा नहीं हो रही है। आपके पग मे कोई व्यक्ति बैठा हे उसके घर में शाति है और अपने घर में अशाnि आप क्या करते हैं, उसका घर नर्क जैसा कैसे बने ? कहा तक है, अपने अन्दर "जीओ और जीने दो' की भावना ? इसको समझिये आप आपन,' और दूसरो को भी जीने का अधिकार दो। आप गुणी हैं या नही, दुगरा है तो उसकी प्रशंसा आप नहीं करेंगे, जल्दी से आदी दृरार दुई निकालेगा और दुनिया को कहेगा कि तुम तो कहते हा वर आदी " Pr (90) वढिया है, लेकिन उसे पहचान पाना बहुत कठिन है। अच्छे-अच्छे उसे पहचानने मे धोखा खा जाते हैं। मैं उसकी नश-नश को जानता हू, उसके पूरे के पूरे खानदान को जानता हूं कि वह केसा है ? इस तरह वह हर प्रकार से उसके विषय मे, उसके चरित्र पर लाछन लगाने का प्रयास करेगा। शकास्पद स्थिति निर्मित करना चाहेगा वह भी इतनी सज्जनता के साथ कि उसके जीवन के प्रति भ्रामक वातावरण बन सके, न जाने कैसे-कैसे विचार उसके लिए प्रकट कर बैठेगा जिसकी कोई प्रामाणिकता भी न हो। न ही उसका कोई अस्तित्व हो, इस ढंग का अनर्गल भ्रामक वातावरण बनता है और कहता रहता है कि वह तो इतना लचर है यानी उसके गुणो को आप जल्दी से कभी नही देखेगे। बहुत कम इसान ऐसे हैं जो किसी के गुण देखेगे, सुनेगे अगर वह आदमी मेरा नही है और उसके गुण मेरे सामने गिनाये जा रहे हैं तो मैं कहूगा कि वह आदमी खराब है। यदि वह मेरा आदमी है तो बदमाश है तो भी अच्छा है, दुर्गुणी है तो भी सद्गुणी है। मेरा आदमी नहीं है तो वह खराब है चाहे वह सौ टच सोने की तरह खरा भी क्यो न हो? क्या इसे कहते हैं साधना ? सत्य मे भी जो मेरा हे वह सच्चा है, मेरी बात सच्ची है, दुनिया की बात झूठी है यह तो आज का ज्यादातर मानस है। यह बात हमारे दिमाग मे घर की हुई है। यह पर्युषण की धारणा नही है। मेरा है वह ही सत्य नही हे. जो सत्य है वह मेरा है, यह भावना हमारे मे आनी चाहिए, सत्य को ग्रहण करने की सहज सरल वृत्ति जीवन मे आनी चाहिए। हमारे मे सत्य को ग्रहण करने की क्षमता नही, पात्रता नही तो हम सत्य को कैसे ग्रहण करेगे ? तो फिर कैसे इतनी साधना, तपस्या हम कर सकते हैं। तुम कहते हो कि हमने इतनी साधना कर ली, इतने आयबिल कर लिये क्या साधना कर ली ? क्या भूखे रहने से आयबिल हो गया। हमारे मन मे तो दूसरो को मारने की, खत्म करने की, गिराने की भावना है। शरीर को भूखा रखने से साधना नहीं सध सकती है, मन मे भी आयबिल करना होगा, मानसिक वृत्तियो को शुद्ध करना होगा, लोभ का आयंबिल करना होगा, अहकार का आयबिल करना होगा, क्रोध का आयबिल करना होगा, अहकार और मोह का आयबिल करना होगा तब कही जाकर हमारे अन्दर शाति आयेगी, जीवन मे सद्गुण पनपेगे। आज का विषय आपके सामने रखा गया कि क्या विश्व युद्ध मे भारत का विनाश होगा ? चाहे कितने भी विश्व युद्ध हो जाय, कितनी ताकत लग जाय तो भी सम्पूर्ण रूप से भारत का विनाश कभी नही होगा। 21 हजार वर्ष की स्थिति का यह आरा है इस आरे की समाप्ति तक कुछ नहीं होगा। लेकिन (91) । ध्यान से सुनिये जब तक इस भरत क्षेत्र के अन्दर एक साधु, एक सादर श्रावक और एक श्राविका भी नहीं रहेगी उस दिन भरत क्षेत्र को बिना से कोई भी ताकत नहीं रोक सकेगी। फिर प्राकृतिक प्रकोप का प्रभुत्व का चला जायेगा और यह सब कुछ खत्म हो जायेगा। फिर क्या होगा? कि यहां पर कोई साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका नहीं रहेंगे इस क्षेत्र की दृष्टि से धर्म विलोप हो जायेगा, धर्म समाप्त हो जायेगा, धर्म का एक अश भी न रहेगा उस दिन इस भरत क्षेत्र को खत्म होने से कोई नहीं रोक सकेगा, सप कुछ खत्म हो जायेगा। बहुत मामूली-मामूली आदमी रह जायेगे। अब आप सोचिये धर्म का, समता का, अहिसा का कितना प्रगाव इस प्रमाव को आज के वैज्ञानिको ने, मनोवैज्ञानिकों ने मान लिया है। समता होगी, अहिसा होगी तो हम दुनिया की रक्षा कर सकते हैं। गा' अग्रेजो के शिकजे से कैसे स्वतन्त्र बना, मुक्त बना-अहिसा से। महाग गांधी ने क्या किया, अहिसा को इस पूरे देश मे बढाया और ब्रिटीश सरा को इस देश से भगा दिया। इतनी बड़ी ताकत हमारे पास है, फिर भी पीछे हट रहे हैं ? क्यो नहीं हमारे में धर्म का जोश आता, क्यो नहीं हमारे अन्दर समता आती. ईर्ष्या की भावना क्यो नहीं छोड़ रहे है ? स्वार्थ का जो बीज युगलिक काल के अन्त समय वपित हुआ, आज वह महा वटा र चुका है। उस वटवृक्ष के बीज को सम्पूर्णत नष्ट करने के लिए हम अपा भावना और विचारो को नि स्पृह शुद्ध बनाने की कोशिश करे। जब गारी भावना निस्पृह बनेगी तब कहीं जाकर वह वीज निकलेगा। आप कम से कम वह बीज अपने भीतर से तो निकाले। जिस व्यक्ति के भीतर से पहनी निकलेगा वह व्यक्ति सुखी हो जायेगा। एक कैदखाने के अन्दर हजार व्यक्ति बद है, हजार व्यक्ति दुली। लेकिन एक व्यक्ति को उस कैद से बाहर निकाल दिया तो कम से कम ।' तो सुखी हो गया। वैसे ही संसार की समस्त आत्माओ के अन्दर रवा है, सभी स्वार्थ के कैद खाने के अन्दर यद हैं लेकिन जिस व्यक्ति ने के कैदखाने से अपने आप को निकाल लिया वह सुखी हो गया. अपन। को उस सुख को पाने के लिए स्वार्थ के कैदखाने से बाहर निकलना स्वय जीओ और दूसरो को भी जीने का अधिकार दो, यह परली रटे । जो इससे आगे बढ़ना चाहते हैं वह यह समझ ले कि में भी जी, और पास जीने के अधिकार नहीं है उसे हम अपने अधिकार से जाने का दें। यह दूसरी स्टेज है। पहली स्टेज है जीओ और जीने दा और दृगः Y (92) r H .. --- -- है- तुम भी जीओ और जो जी रहें हैं उन व्यक्तियों के पास जीने के अधिकार नही हैं और आपके पास ज्यादा हैं, तो आप उन्हे अधिकार दीजिए। जो आपको देता है आप भी उसको दीजिए। यह दूसरी स्टेज है और तीसरी स्टेज यह है कि जो आपको जीने का अधिकार नहीं देता हैं लेकिन आपके पास जीने के अधिकार बहुत ज्यादा हैं तो आप अधिकार नहीं देने वाले को भी आप अपने अधिकार मे से जीने का अधिकार दीजिए। यह तीसरी स्टेज है, और चौथी स्टेज यह है कि आप दूसरों को जीने के लिए, दूसरो को जीवन दान देने के लिए आप अपनी जिदगी का भी बलिदान दे दीजिए, अपनी जिन्दगी को भी कुर्बान कर दीजिए। इस चौथी स्टेज पर जो चला जाता है वह आदमी परमात्मा के निकट आने लगता है, वह आदमी आगे बढ़ने लग जाता है। पर ऐसे आदमी दुनिया मे बहुत कम हैं जो दूसरो को जीने के लिए अपने अधिकार दे सकते हैं। एक बार मोरवी शहर मे वर्षा के कारण अत्यधिक पानी आ गया था। बाध भी पूरा भर गया था, और पूरे गाव मे पानी ही पानी हो गया था। उसके कुछ समय बाद जब हम वहा पहुचे तो एक श्रावक ने मुझे बताया कि आज से 7-8 महीने पहले यह बांध टूट गया, पूरा गाव पानी मे था और हजारो आदमी बेघर हो गए थे। उस समय एक आदमी अपने मकान मे बैठा था, वह आदमी देख रहा था कि पानी के अन्दर अनेक लोग बह रहे हैं। अनेक औरते बच्चे बहे जा रहे हैं, कुछ मरे हुए जा रहे हैं लेकिन कुछ जिन्दे भी जा रहे हैं। उसके मकान की भी एक मजिल पानी मे थी, उसने क्या किया ? अपने मकान के झरोखे से एक डोरी बाधी और उस डोरी को अपनी पीठ से बाध लिया। उस पानी के बहाव मे जो बच्चे, औरते जिन्दा बहे जा रहे थे। उनको बचाने के लिए वह पानी मे कूद गया। वह कूदकर उन बहने वालो को पकड लेता और उस रस्सी के सहारे अपने मकान मे आ जाता। इस प्रकार उसने एक दो नही बल्कि कई व्यक्तियों की जिन्दगी बचा ली। अनेक व्यक्तियो को पकडकर अपने घर मे ले आया। लेकिन वह एक बार पानी मे कूदा और कूदने के बाद एक व्यक्ति को अपने घर मे लाने की कोशिश कर रहा था कि खीचा-खाची के अन्दर रस्सी का फदा टूट गया और दोनो ही डूब गए। उस व्यक्ति का आज तक पता नहीं। जिस व्यकित ने दूसरो की जिन्दगी की रक्षा के लिए अपनी जिदगी कुर्बान कर दी ऐसे व्यक्ति कम हमारे अन्दर दूसरो को बचाने की ताकत होनी चाहिए। जयपुर में भी एक जैनी थे जिन्होने दूसरो के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया। जयपुर । के प्रधान (93) जिन्होने जयपुर को बचाने के लिए अपनी कुर्बान दी थी। वैसी ही हमारे मे भी पेदा होनी चाहिए हम सबके अन्दर ऐसी भावना आएगी। यह पर्व मनाना सार्थक हो सकता है। इसलिए मैंने भाई और बहनो से " है हम अधिक से अधिक तप और सयम की आराधना करके अपने जी सफल एवं सार्थक करते हुए देश की रक्षा के अन्दर भी यथायोग्य 3: सहयोग प्रदान करे। इस भावना के साथ मे अपने विषय को यही विराम : रहा है। अस्तु (94) संवत्सरी कैसे मनाएं प्रज्ञाशील उपासको | ध्यान केन्द्रित करिये, आज आपको यहा से कुछ न कुछ ग्रहण करके जाना है। इसलिए आप अपने विचारो को एकाग्र बनाइये, कानो को सजग करिये कि हमे आज कुछ न कुछ सुनना है, कुछ न कुछ समझना हे, कुछ न कुछ सीखना है ओर यथा शक्ति जीवन को कुछ न कुछ बदलने का प्रयास करना है। इसके लिए मानस को सतर्क एव सावधान करना आवश्यक है। श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने साधु जीवन स्वीकार करने के बाद चातुर्मास के 50 वे दिन इस सवत्सरी पर्व को मनाया था, और 70 दिन अवशेष रहे थे। भगवान महावीर ने चतुर्विध सघ को भी इस बात का निर्देश दिया है। वह निर्देश समवायाग सूत्र मे यथावत उल्लिखित हे कि "रमणे भगव महावीरे सवीसराइ मासे वइक्कते, सत्तरिएहि राइदिएहि सेसेहि वासावास पज्जोसेवेई।" चतुर्विध सघ चातुर्मास प्रारम से 50वे दिन सवत्सरी महापर्व की आराधना करे, उसे मनावे और बाद मे सत्तर दिन चातुर्मास के अवशेष रहने चाहिए। मगर आज के ज्योतिष विज्ञान ने इस परम्परा को, इस व्यवस्था को विश्रृखलित कर दिया है। क्योकि जब 4 महिने की जगह 5 महिने का चातुर्मास आता है, उस समय व्यवस्था बिगडने लगती है। यदि भादवा सुदी पचमी को सवत्सरी मनाने के आग्रह किया जाय तो, जब सावन दो होगे तो वह सवत्सरी पचासवे दिन न होकर 80वे दिन आएगी और जब आसोज दो हो तो भादवा सुदी पचमी को सवत्सरी मनाने पर पीछे 70 दिन की जगह सौ दिन बच जाऐगे। ऐसी स्थिति मे कभी पहला नियम टूटेगा, तो कनी (95) दूसरा। इस प्रकार जब नियम भंग होते देखा, तब मूर्धन्य मुनिराजों ने दो। से एक नियम तो सुरक्षित रह सके। इस दृष्टि से विचार किया कि पारेर भी महीना घटे, बढे पर सवत्सरी 50वे दिन ही मनाने का निर्णय लिया. जिस एक नियम सदा सुरक्षित रह सके। उदय अस्त तिथि के कारण भी कभी-कभी सवत्सरी एक दिन ri पीछे हो जाती है। किसी का यह मानना है कि सूर्योदय के समय जो कि हो उस उदय तिथि को मानकर सवत्सरी मनाई जाय, गले शाम प्रतिक्रमण के समय छट्ट आ जाय और कईयो का मानना यह है कि उस तिथि महत्त्वपूर्ण न होकर अस्त तिथि महत्त्वपूर्ण है। सूर्यास्त के समय अगर पचमी आ जाती है तो सूर्योदय के समय चाहे चौथ रही हो यदि सूर्यारत के समय पचमी आ रही है, तो उसी दिन सवत्सरी मनाई जाय। क्योकि राबासरी का प्रतिक्रमण ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है। अत सूर्योदय के समय अगर चौथ हो, शाम को पचमी लग जाय तो सवत्सरी उसी दिन मनाना उपयुम। है। साधुमार्गी परम्परा की यही धारणा है। चाहे सावन दो हो, चाहे भारत दो हो, चाहे आसोज दो हो। कोई भी महिना दो क्यो नहीं हो, हमे रावरा 50वे दिन मना लेनी चाहिए। लेकिन अलग-अलग समाज के, सम्प्रदारा, सघ मान्य मूर्धन्य सतो एव श्रावक-श्राविकाओ के द्वारा सवरारी पौष को मनाई जाती है, तो कोई पाचम को मनाता है। इस स्थिति के कारण ! समाज की बहुत बड़ी हसी होती है। लोग कहते हैं इतना बड़ा जैन रामा। अपने आत्माराधना जीवन साधना के महत्त्वपूर्ण पर्व को भी एक दिन नही मा पा रहा है ? जैन समाज को सवत्सरी के नाम से तो कम से कम एक होग" चाहिए। इस बात को ध्यान में रखते हुए भोपालगढ के अन्दर र इतिहासविद परम श्रद्धेय आचार्य श्री हस्तीमल जी महाराज और वमान विराजित समता विभूति आचार्य श्री नानालाल जी महाराज, जो fit: समाज में ख्याति प्राप्त हैं। इन दो विद्वान साधनाशील, ज्ञानशील आz : मिल कर यह निर्णय लिया कि, अगर सम्पूर्ण जैन समाज रावरान को करना चाहता है और समाज की एकता के लिए अगर एक दिन म मनाना चाहता है तो हम दोनों आचार्य तैयार है। जो तिथि हम बताई चाहे वह तिथि हमारी परम्परा की नहीं रही हो, पांच की जगर क्यों न आ जाय? कोई भी तिथि क्यों न हो, उस तिथि को सक्षम लेंगे। ऐसी आम समा में घोषणा की और उस घोषणा के अनुप movie (96) प्रवर ने अपनी-अपनी परम्परा की तिथि समाज की एकता के लिए गोण कर के बता भी दिया। पूरा जैन समाज आचार्य श्री की इस बात को समझे ओर समझकर अपनी-अपनी अतिथियो को गौण कर सवत्सरी के लिए कोई नई तिथि निकाल दे तो यह जैन समाज की बहुत बड़ी उपलब्धि हो सकती है। लेकिन आज हम सवत्सरी के नाम से एक नहीं हो पा रहे हैं तो हमारा क्षमापना पर्व मनाना कैसे सार्थक हो सकता है ? इसलिए हमे सबसे पहले यह बात समझना चाहिए कि सवत्सरी को एक दिन मनाने मे गडबडी कहा हो रही है ? और क्यो गडबडी हो रही है ? अगर हम अपनी-अपनी तिथियो को गोण कर दे और जैन समाज की एकता के लिए हम किसी नई तिथि को मान ले तो हमारी सवत्सरी एक हो सकती है। इसके लिए हमे अपने मन ओर मस्तिष्क को एक रखना है। ताकि सवत्सरी की एकता मे आने वाली बाधाए और दोष दूर हो सके। पहली बात मैंने आपको सिद्धात की समझा दी है। अब दूसरी बात जो है वह यह है कि हमे सवत्सरी के रोज क्या करना चाहिए ? इस बात को हमे समझना है। हमने सवत्सरी की स्थिति को इस रूप मे समझ लिया है कि आज उपवास करना है। धर्म स्थानक मे जाकर थोडी देर बैठ जाना, थोडा बहुत सुनना, और एक दूसरे से मिलकर चले जाना, यह सवत्सरी है ? नही, सवत्सरी केवल जैन समाज का ही पर्व नहीं है। महावीर ने जो बात कही है, वह सम्पूर्ण विश्व के लिए है, सारे विश्व के लिए सवत्सरी पर्व है इसको मनाने मे गूढ तथ्य छिपा है। गहरा विज्ञान रहा हुआ है। उस विज्ञान को अध्यात्म की गहराई मे उतरे विना अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, इस पर्व को मनाने वालो अध्यात्म प्रेमी साधक जहा अपने जीवन के अतरग रहस्यो को छूता है, वही वे विश्व स्तर पर अपनी भावना एव मानसिकता का विकास करने की ओर गतिशील बनते हैं, जिनके सत्सानिध्य मे राग-द्वेष, वैर विरोध, घृणा, द्वेष प्रतिशोधादि भावो का कालुष्य घुलता चला जाता है। इनका प्रमुत्व क्षीण होने की स्थिति अथवा उपशमनता को प्राप्त हो जाता है। भव्य दिव्य अध्यात्म प्रधान वायुमडल बना रहता है अत इसे मनाना सबसे ज्यादा आवश्यक है, क्योकि सवत्सरी के माध्यम से हम विश्व मे मैत्री भाव का प्रसारण करते हैं, फेल रहे मानसिक प्रदूषण जन्य वेर विरोध, अपने पराये के क्षुद्र घेरे को समाप्त करते हैं जिससे सही वातावरण बनने लगता है। मन का मन से रिलेशन बनाते हैं और मन मे उठने वाले जिन विचारो से पूरा वायुमण्डल प्रभावित हो रहा है और सारा का सारा वायु (97) मण्डल खराब हो रहा है, उस दूषित वायुमण्डल को विशुद्ध, सही बनाये रहने के लिए हमे सवत्सरी को मनाना सर्वाधिक ज्यादा आवश्यक है। देश खतरा जितना शोर प्रदूषण से हो रहा है उससे भी अधिक खतरा मागरित प्रदूषण का है। विचारो का प्रदूषण आज पूरे विश्व के अन्दर इतना : फैल गया है कि आज छोटे से छोटे बच्चे के अन्दर सुसस्कार पैदा नहीं पाते हैं, सही विचार नही आते हैं, गदे विचार आते हैं, गदी भावना जल्दी पैर होती है। क्योकि मानसिक प्रदूषण पूरे विश्व के अन्दर भारी स्तर पर कोर हुआ है और फैलता चला जा रहा है। इस संवत्सरी के रोज हम उस मानसि प्रदूषण का त्याग करने के लिए, मन का मन से सम्बन्ध जोडने के लिए अपनी भावना को समतामय बनाते हैं, क्षमामय बनाते हैं, जिससे की मानसिक प्रदूषण समाप्त हो। जिस मानसिक प्रदूषण से देश की स्थिति निरनार साना: बनती चली जा रही है, उस खतरनाक स्थिति को टालने के लिए रामती के रोज हम अपने मन को साफ करते हैं। हमारे मन में जो राग और द्वेष की भावनाए हैं, तेरे और मेरे के सकीर्ण विचार हैं, काम, क्रोध, गद, गोह की दृष्टि वृत्तिया हैं जिसके कारण हमारी आत्मा खराव होती है, विकृत भाव को प्रा होती है और उस सोच से पूरा वायुमण्डल खराब होता है यह वायु प्रदूषण पूरे विश्व को प्रभावित करता है। अमेरिका के वैज्ञानिक रुडॉल्फ ने दुनिया के सामने यह प्रयोग कर। बताया कि जैसे पानी का गिलास हे, उस पानी के गिलास को किसी ने अपने हाथ मे उठाया और अपने मन मे क्रोधपूर्ण विचार किये, हा विचार किये, घृणापूर्ण विचार किये और उसके बाद उस गिलारा के पानी ? किसी व्यक्ति को पिला दिया। पानी पीने के बाद उस व्यक्ति के दिगार भी उसके प्रति क्रोध पैदा हो गया, घृणा पैदा हो गई, द्वेष पैदा हो गया। इस प्रयोग द्वारा वैज्ञानिक रुडॉल्फ ने यह सिद्ध कर दिया दुनिया के सामन, हमारे सोचने का दुनिया के पदार्थो पर केमिकली तो नहीं, किन्तु गुणा ! प्रभाव जरूर पड़ता है। जैसा हम सोचेगे उस सोच के अनुसार पर प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। इसलिए हमे अपनी सोच को बदलना र ५.२ ज्यादा जरूरी है। रूसी वैज्ञानिक वासीलिएव और कामिनिएद का टैलीती ' विचारो का आदान-प्रदान पूरे वैज्ञानिक जगत में एक प्राी गला गर?" वैज्ञानिक जगत् में वनस्पति विज्ञान, जिसको आपने गुना होगा fri वेकेस्टर ने वनस्पतियों पर प्रयोग किया और उस प्रयोग में यह . (98) अगर हम वनस्पति के प्रति भी बुरे विचार करते हैं तो वनस्पति भी मुरझा जाती है। उस वनस्पति के अन्दर भी आपके विचारो से प्रकपन पैदा होने लगता है। उसके अन्दर भी उन्होने प्रयोग किया कि किसी आदमी ने वनस्पति के प्रति बुरा चिन्तन किया तो उस वनस्पति के साथ मे जो गेल्वेनो मीटर की मशीन फिट थी, उस मशीन की सुइया बड़ी तेजी के साथ हिलने लग गई। वैज्ञानिक वेकेस्टर ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि अगर हम वनस्पति के प्रति भी बुरा सोचते हैं तो वह वनस्पति भी प्रकपित होने लगती है। इन सारी बातो से यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसा हम सोचते हैं उस सोच का प्रमाव पूरे विश्व पर पड़ता है। भगवान महावीर ने इस सवत्सरी के रोज पूरे विश्व के अन्दर फैले हुए दूषित वायुमण्डल को समाप्त करने के लिए यह कहा कि ससार के सभी चिन्तनशील प्राणी यह चितन करे कि- मैं ससार की समस्त आत्माओ से क्षमायाचना करता हू, मैं ससार की समस्त आत्माओ के साथ मैत्री भाव कायम करता है। आपका यह विचार पूरे विश्व मे फैलेगा, फैल करके उस वायुमण्डल को साफ करने लगेगा, उसके अन्दर आने वाली विकृति को साफ करने लगेगा। आज के वैज्ञानिक शोर प्रदूषण को रोकने के लिए सोच रहे हैं, ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए सोच रहे हैं। लेकिन उससे भी ज्यादा मानसिक प्रदूषण को रोकने के लिए सोचना जरूरी हो गया है। आज नही कल, कल नही परसो उन्हे महावीर के सिद्धान्तो पर आना होगा और वैज्ञानिको को मानसिक प्रदूषण को रोकने की बात सोचनी होगी और जिस दिन भी वैज्ञानिक मानसिक प्रदूषण को रोकने की बात सोचेगे उस दिन पूरे विश्व के अन्दर सवत्सरी का मूल्याकन सामने आ जायेगा कि भगवान महावीर ने क्यो सवत्सरी मनाने की बात कही है। आज हम माने या नही माने लेकिन फोरेन के अन्दर इस बात को बहुत अच्छी तरह से लोग मानने लग गये हैं। मैं आपको एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात बताने जा रहा है। अमेरिका के अन्दर न्यूयार्क मे घटना घटित हुई स्टेट बैंक मे, जिस स्टेट बैंक के अन्दर काउन्टर के ऊपर जहा कैश-राशि दी जाती है वहा छह काउन्टर लगे हुए हैं और उन छहो काउन्टरो पर कहते हैं प्रतिदिन करोडो का लेन-देन होता है। उन काउन्टरो मे से एक काउन्टर पर एक व्यक्ति बैठा था, जिस व्यक्ति का नाम था, लाम्यु जॉन। उस लाम्यु जॉन के काउन्टर पर बडी भीड लगी रहती थी, उसके पास मे पैसा लेने के लिए एक लम्बी लाईन लगी रहती थी दूर-दूर तक, जबकि दूसरे काउन्टर खाली पड़े हैं, उन काउन्टरो पर कोई भी । (99) + । नहीं खडा है फिर भी लोग अपना टाइग सराव करके उस ता काउन्टर पर खडे रहते थे। स्टेट बैंक के मैनेजर ने जर सरकार उसने सोचा अरे, इतने लोग लॉन्यु जॉन के पास क्यो राडे रहो।। बात हे ? तो उस बैंक मैनेजर ने उस काउन्टर पर सरे आदमिरी को अपने पास बुलाया और उस व्यक्ति से पूछा, कि तुम जॉन .. पर क्यो खडे हो ? दूसरे काउन्टर पर क्यो नही खड़े हो जाते ? तर कहा- हम इस व्यक्ति से पैसा लेते हैं तो हमे वह पैसा बरकत हो, हमारे अच्छे काम में आता है। यह कोई बात हुई कि इससे पैसा लेने से बरकत हो जाम गने: । समझ मे नही आया। उसने दूसरे व्यक्ति को बुलाया और उस से । तुम यहा क्यो खडे हो ? तो वह कहता है-इस व्यक्ति से पैसा लेने से सारे काम सरल हो जाते हैं। मैनेजर को फिर भी समझ में नहीं आय: तीसरे व्यक्ति को बुलाया। तीसरा व्यक्ति एक महिला थी उस का नाम रीटा हेवर्थ। वह महिला जब गई तब मैंनेजर ने उससे पूछा कि तुम .. जॉन के काउन्टर पर क्यों खडी हो? तो वह बोलती है कि साहब इसरो। लेने से मेरी जिन्दगी मे चमत्कार घटित हुआ। मैनेजर ने कहा- ' तो वह बोलती है कि मेरी शादी हो चुकी है लेकिन मेरा एक प्रेमी, मैन' किसी उस व्यक्ति के साथ था और हम प्यार किया करते थे। एक ह...' प्रेमी को मालूम हुआ कि मेरा ओर मेरे पति का बैंक के अन्दर पे .... तो उस व्यक्ति ने मुझसे कहा कि तुम पैसे निकाल लो और अपना प्रेरणा !' यहा से भाग जाते हैं और दूसरी जगह आराम से रहेगे। में उसकी मा आ गई। मेरा वह प्रेमी मुझे यहा लेकर आया मैं काउन्टर पर आई 3. चैक पर दस्तखत करके बैंक मे से अपना जितना भी पंसा समाजमा पैसे को निकाला। लॉम्यु जॉन ने मुझे सारा पैसा केश राशि के ज्योही वह कैश मेरे हाथ में आया, त्योही मेरे विचार म, गर : परिवर्तन आया। मैंने सोचा कि इतना पैसा मैंने ले तो लिया और के साथ भागने की कोशिश कर रही है, लेकिन मग प्रेमी पैगाम बाद मुझे छोड सकता है। इसलिए मुझे प्रेमी के साथ में अपनी को बर्वाद नहीं करना चाहिये, यह विचार इस लॉन्यु डॉन कलर लेते समय मेरे दिमाग में आया। मेरा दिमाग घूम गया। उ , पैसे पुन वहीं बैंक में जमा करा दिये और में स्वयं चुपचाप दरवाजे से अपने घर चली गई। मैंने अपनी पति की मुबली ! र. "" 4 -(100) । मेरे मन मे उस लॉम्यु जॉन से केश लेने के कारण से बनी है। लॉम्यु जॉन की आत्मा कोई ईश्वर का रूप है, इस से ऐसे विचार पेदा हुए/हो रहे हैं। मेनेजर ने एक के बाद एक कई व्यक्तियो को बुलाया। उनमे से एक व्यक्ति ने आचर्यजनक बात बताई। उसने कहा कि मैं वेश्यागृह मे जाता था। अपना सारा पैसा वैश्यागृह मे लगाता था। जिस दिन मेंने लॉम्यु जॉन के काउन्टर से पैसे निकाले, उस दिन मेरा दिमाग बदल गया। मुझे ऐसा लगा कि में जो काम कर रहा हू, वह बहुत खराब काम है, बहुत गलत काम हे, में पैसो की बर्बादी कर रहा है। उसके बाद मैंने गिरजाघर जाकर यह निर्णय ले लिया कि आज के बाद में कभी भी वेश्यागृह नही जाऊगा। रात मे मुझे सपना आया। यह चमत्कार जॉम्यु जॉन के कारण से हुआ है। बैंक का मैनेजर विचार मे पड गया। उसने कहा लॉम्यु जॉन मे इतनी ताकत कहा से आ गई। यह कैसे चमत्कार कर रहा है। मैनेजर ने लॉम्यु जॉन को बुलाया और कहा कि तुम यह बताओ कि तुम्हारे काउन्टर के ऊपर इतने लोग क्यो खडे रहते हैं ? इस बात को मुझे समझाओ। लॉम्यु जॉन ने कहा साहब, में कोई भगवान नही हू। में कोई ईश्वर नही हू, मैं कोई परमात्मा नहीं हूं, लेकिन आप ध्यान से सुनिये मैं एक पादरी का बेटा हूं। मेरे पिता पादरी रहे हैं, मेरी माता सदाचारिणी रही है। मुझे जोखिम भरी नौकरी मिली है, मेरे दिल मे सदेव यही भावना रहती है, मैं यही सोचता रहता हूँ कि ससार के सभी प्राणियो का कल्याण हो। उसने कहा, मेरे पास नौकरी खतरे की हे, रिसक की है, पेसो का लेन-देन है, ऐसी स्थिति मे मेरे काउन्टर पर जो भी व्यक्ति केश-राशि लेने आता है, जिस समय मैं उसे पैसे देता हू, उस समय एक बात मुह से बोलता हू। वह क्या बोलते हो-" मै गॉड ब्लेस यू" उसने कहा कि में रोज यह बोलता हू। हे, ईश्वर, तुम सभी का कल्याण करो, इस सामने वाले का कल्याण कर दो, इसका उद्धार हो जाय। इस बात को अपने दिमाग मे रखता हइस बात को निरन्तर बोलता हू। मैं इसके अलावा कुछ नही जानता हू। बैंक मैनेजर ने सारी बातो की समीक्षा की, सारी बातो की समीक्षा करने के बाद इस बात का निर्णय लिया कि जो कुछ भी चमत्कार हे, केवल इन शब्दो का है " मै गॉड ब्लेस यू"। इसके बाद उस बैंक मैनेजर ने न्यूयार्क की स्टेट बैंक के अन्दर यह वाक्य बैंक के मेन गेट-द्वार पर लगा दिया, बैंक की खिडकियो पर लगा दिया कि अगर हम सामने वाले का कल्याण चाहते हैं तो सामने वाले का दिमाग बदल सकते हैं, उसके विचार बदल सकते हैं। यह बात भारत में नहीं, । (101)- अमेरिका के न्यूयार्क के अन्दर घटित हुई। आज गरे न्यूयार्क के लोग इ" बात को मानने लग गये हैं। हम जो कुछ भी चिन्तन करते हैं, उसका प्रय सामने वाले के मन पर निश्चित रूप से पड़ता है। सवत्सरी के दिन यह कहा जाता है कि आप लोग दूसरो के प्रति भावना रखिये, दूसरो के प्रति शुद्ध चिन्तन रखिये। अपने मन के अन्दर र ईर्ष्या को समाप्त करिये, घृणा को समाप्त करिये, द्वेष को रामापा कारित निश्चित रूप से उसका प्रमाव सामने वाले इसान पर पड़ेगा। गगवान महार कहते हैं कि ससार की समस्त आत्माओ के साथ हम क्षमायाचना करो। आज के विज्ञान ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि आत्मा से आत्मा का सबध करना सीखिये। जब तक इस बात को गहराई सेन.' समझेगे, तब तक हमारा सवत्सरी पर्व मनाना सार्थक नही हो सकता। लोग सवत्सरी केसे मनाते हैं ? उपवास कर लिया, मूखे रह लिये, मु.॥ पट्टी बाध ली, ये सब तो शरीर की साधना है। यदि भूखे रहे तो कोक्त शरीर को भूखा रखा। आपने मन की साधना क्या की ? यदि आपने मामी साधना नहीं की तो वह साधना आत्मा तक नहीं पहुंच सकती। आत्मा .. साधना को पहुचाने के लिए काया से साधना करनी होगी ? मन रो साता करनी होगी ? वचन से साधना करनी होगी ? काया की साना मा आयेगी और मन की साधना आत्मा तक जायेगी। हम अपने विचारो ॥ समन्वय करके रहे। इसलिए सवत्सरी के रोज आप इस बात का सिर कीजिये कि हमारा किसी के साथ में कोई झगडा हुआ हो. क्लेश हुमा हो विवाद हुआ हो तो उस आज के रोज अपने दिल, दिगाग से निकाल दी अपने दिल मे उनके प्रति अपनी शुभमगलमय भावनाओ को, रगान दी। आपकी भावना निर्मल बन गई तो उसका सबसे पहले आपकी आगा प्रभाव पडेगा। जब आत्मा के ऊपर प्रभाव होगा तो सारे विश्व प्रग होगा। सवत्सरी का यह पहला तत्त्व है जो मैंने आपको बताया है। जीवन मे मैत्री भाव को कैसे कायम किया जाय? आत्मा रो आमाका समझा जाय ? भगवान महावीर ने बताया है कि हम अपनी आत्मा की अ" करने की कोशिश करे, जन्म-जन्म के उन अपराधों की आलोचना कर अपराधों को धोने की कोशिश करें। आज का इसान अपने गुणों दीद' आया है, अपनी झूठी प्रशसा सुनता आया है, अपनी झुट्टी प्रसरण कर है, लेकिन हर इसान के अन्दर कोई न कोई कमी होती है, हर दमा (102) न कोई गलत काम होता है, अपराध करता है, उस अपराध की आलोच नहीं करके वह उस अपराध को दुनिया से छिपाना चाहता है। ऐसा व्यक्ति अपनी आत्मा को सार्थक नहीं बना सकता। हमे अपने अपराधो पर आज के रोज सोचना है, आज के रोज दिमाग मे यह लाया जाय कि एक साल मे हमारी आत्मा ने क्या-क्या अपराध किये हैं ? आपने राष्ट्र के नेता ठक्कर बाबा का नाम सुना होगा। जिस समय ठक्कर बाबा की जन्म जयती मनाई जा रही थी, उस समय वे 80 वर्ष के थे। राष्ट्र के बड़े-बड़े नेता उनकी जन्म जयती मे आये थे और लोग उनके गुणगान गा रहे थे कि आप बहुत अच्छे, बहुत सात्विक हैं और बहुत चरित्रवान परोपकारी आदमी हैं जिन्होने देश की भारी सेवा की है। इस तरीके से उस ठक्कर बाबा की भारी मात्रा मे प्रशसा हो रही थी। उस वक्त ठक्कर बाबा खडे हुए और कहा आप सब लोगो ने मेरी बाहरी जिन्दगी को देखा है, आपने मेरी ऊपर की जिन्दगी देखी है। लेकिन मेरे अपराध मुझे परेशान कर रहे हैं, मेरे अपराध मुझे खा रहे हैं, वे कह रहे हैं कि तेरी जिन्दगी अन्दर से खराब है। ऐसा कहते हुए उस समय उस साहसिक ठक्कर बाबा ने भीड भरे अभिनन्दन के बीच मे, महोत्सव के बीच एक बात स्पष्ट शब्दो मे कही- कि मैंने अपनी पूरी जिन्दगी मे दो बार परस्त्रीगमन किया है, दो बार रिश्वत ली है। यह बात मैंने महात्मागाधी को कह दी है लेकिन महात्मा गाधी के बाद मैं दुनिया के सामने भी यह बात कर दू, जिससे दुनिया को भी यह मालूम हो जाय कि मैंने ऐसे गलत काम भी किये हैं। इस बात को ठक्कर बाबा ने दुनिया के सामने जन्मोत्सव के रोज मे रखा था। है किसी जैनी मे यह ताकत, कि वह अपने अपराध को इस समा के बीच मे आकर स्वीकार करे, कोई यह भी कहे कि मैंने अपनी जिन्दगी मे ये अपराध किये हैं। कोई चोरी की है, कोई अत्याचार किया है, कोई बदमाशी की है ? किसी की धरोहर दबाई हो, धोखा दिया हो, हत्या की हो इत्यादि जो-जो अपराध हैं उन हुए अपराधो को स्वीकार करने वाला कौन महिला होगी, कौन पुरुष होगा? हम आलोचना करना जानते हैं, हम सवत्सरी मनाने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन सवत्सरी मनाने के लिए हमे मन का उपवास करना होगा। हमारे मन मे जो पाप मय विचार भरे पडे हैं, जो हमने जिन्दगी मे अपराध किये हैं, उन अपराधो को आज के रोज सोचना होगा। जब तक उन अपराधो के विषय में नहीं सोचेगे तो वे अपराध एक कुण्ठा का रूप ले लेगे, ग्रथि बन जायेगे अन्तर मे और वह ग्रन्थि हमे दिन-रात सताती (103)- " - रहेगी। आज अगर हमारे मन मे क्लेश पैदा हो गया तो हमारे स्वारथ्य भी स्वस्थ नहीं रह सकता। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हम मन को स्वस्थ रखना होता है। जब हमारा मन स्वस्थ होगा तो ही हमारा शरीर सुचारू रूप से कर तरीके से चल सकेगा। मन को स्वस्थ बनाने के लिए यह सवत्सरी ! इस दिन यह सोचे कि हमसे जो अपराध हुए हैं, उसे दुनिया तो नहीं लेकिन मैं स्वय तो जानता हूं, उन अपरायो को सोच कर उन से पता उन्हे छोड़ने का प्रयास करे, उन्हे दिल से खत्म करने का प्रयास कर ।। के सामने एकान्त मे सब कुछ कहकर प्रायश्चित लेकर मन हत्या तो कही जाकर आपके मन की ग्रन्थि खुलेगी, मन के विचार राशी बगे ।। आत्मा को शाति मिलेगी। नहीं तो, व्यक्ति जब सोया रहता है उस . उसके दिमाग मे तनाव रहा है ? टेशन रहता है ? क्यो रहता है, इसलिए उसने जिन्दगी में बहुत सारे अपराध किये हैं। अपरार होना कोई का बात नहीं है लेकिन अपराध को स्वीकार कर लेना, अपराध की आतोला । ' प्रायश्चित ले लेना, यह बहुत बड़ी बात है। भगवान महावीर ने इस सस के रोज अपने भाइयो को यह सदेश दिया कि अपनी जिन्दगी के 3. भी अपराध हो गया हो, किसी तरह का गलत काग हो गया हो किसी की गलती हो गई हो तो आज के रोज अपने सारे अपराधों को गाकर' मन की ग्रन्थि को खोल कर अपने मन को साफ कर लो, शुन्न नगा तो व्यक्ति का मन शुद्ध बन जायेगा निर्मल हो जायेगा तो उसकी आग: . निश्चित रूप से शाति मिलेगी। अब आप ही चोलिये बन्धुओ ! लोग ऐसे हैं जो इस प्रकार सवत्सरी मना रहे हैं ? आप क्या कर रोमा के रोज ? इस रोज भी दूसरो को आलोचना करना, निदा करना न ।' सवत्सरी के रोज भी कईयो का मन शात नहीं रहता, मन म रामता न आत्म चितन नहीं रहता तो केरो मन पवित्र बनेगा। अगर हम अपन पवित्र बनाना है तो भगवान महावीर के इस सिद्धान्त को रामसा: हम अपने मन की सारी ग्रन्थियो को खोलकर क्षमायाचना कर, ए. साथ मेत्रीभाव कायम करे। यह पर्व जैनियों का ही पर्व नहीं है, यह पं विश्व का प.. के अन्दर शाति फेलाने में जैनियों का सबसे बड़ा योगदान ।। इस बात को समझ जाये और इस सवत्सरी पर्व को राही टप माना " निश्चित रूप से आज के वैज्ञानिकों को भी सोचना पगा.' } जैन (104)- । सवत्सरी मनानी होगी। आपने सुना होगा-अभी पृथ्वी सम्मेलन ब्राजील के अन्दर हुआ, उसके अन्दर हुए निर्णय दुनिया के सामने आये, उसमे यह कहा गया कि शोर प्रदूषण, वायु प्रदूषण को रोकना होगा तथा वायु प्रदूषण को रोकने के लिए वनस्पति की रक्षा करना बहुत जरूरी है। वनस्पति की रक्षा होगी तो वायु प्रदूषण को रोका जा सकता है और व्यक्ति की जिन्दगी मे जीवतता लाई जा सकती है। इस बात का जिक्र ब्राजील के अन्दर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ। आने वाला भविष्य यह बतायेगा कि अगर विश्व के लोगो को मानसिक शाति देनी है, मन को शात बनाये रखना है तो विश्व भर के अन्दर हमे सवत्सरी मनानी होगी, दुनिया से क्षमायाचना करनी होगी, दुनिया को मेत्रीमाव का महत्त्व समझना होगा। यह बात भी निकट भविष्य के अन्दर आप देखेगे वैज्ञानिक लोग मानने लग जायेगे क्योकि वैज्ञानिको ने इतना तो मान ही लिया है कि अगर हमे आत्मा से आत्मा का सबध कायम करना है तो निश्चित रूप से परस्पर मेत्री भाव लाना होगा और सवत्सरी का भी मूल उद्देश्य यही है। इस सवत्सरी पर्व को मनाने का आपको कुछ प्रेक्टिकल प्रयोग कराना चाहता हू। केवल हमे प्रवचन ही नही सुनना है, अपनी जिन्दगी को शुद्ध और साफ करने के लिए कुछ प्रेक्टिकल प्रयोग करना है। उस प्रेक्टिकल प्रयोग मे आने के लिए आप शाति के साथ बैठ जाइये, सब पालथी मार कर बट जाइये। अब मैं आपको सवत्सरी कैसे मनाई जाती हे इसका प्रेक्टिकल प्रयोग बता रहा हू कि सबसे पहले अपनी आत्मा की आलोचना कैसे करे ? अपनी आत्मा की शुद्धि कैसे करे ? कैसे इस सवत्सरी को मनाये ? में इस प्रवचन के माध्यम से ही आपको सवत्सरी मनाने का सही तरीका बना रहा है। आप खुद ध्यान मे प्रवेश करके अपने आप को अपने सामने खडा करे अपनी जिन्दगी को देखने का प्रयास करे। आपने सही ढग से अपनी जिन्दगी को देख लिया तो निश्चित रूप से सवत्सरी सही ढग से मना लेगे। इसलिए आप इस सवत्सरी को सही ढग से मनाने के लिए ध्यान मे उतरने की कोशिश । करिये। जरा सोचिए कि हमने बीते एक वर्ष मे कितने जीवो की हत्या की, कितने पशु-पक्षी हमारे हाथो, से मारे गये। सोचिए. हमने कितने लोगों की हिसाएं की हैं। जरा अरिहत भगवान की साक्षी से सोचे कि साल भर मे मैंने कितनी हिसा की। जान या अनजान मे जो हिसा हुई है मैं अरिहत भगवान की साक्षी मे उन सारे पापो से अपने मन को दूर ले जाता है। जो हिसा मेने (105) की है उस हिसा के अपराध को छोडता हूं। मैंने परिवार के निमि को चलाने के लिए, अपनी इज्जत को बचाने के लिए जितना भी हो है जितनी गलत बातें कहीं है, जो गलत बाते दिमाग मे गरी है. अपनी इ.५ १. बचाने के लिए कितने झूठे प्लस्तर लगाये हैं और आज अरिहत मा साक्षी से मैं उन सारे अपराध को छोडता हूँ। मैं अरिहत भगवान के अपनी आत्मा को खोलकर रखता हू। मैने जितनी भी गलत बाते बोती है." बोला है, उनको गलत मानता हू, पापपूर्ण मानता हूं और उनको छोने ? संकल्प लेता है। जितनी भी चोरिया की है. अपराध किए हैं उनको भी हो .. हू। अब्रह्मचर्य ने मेरी आत्मा मे प्रवेश किया है, पराई स्त्रियो के रा" बर्ताव किया, दूसरी स्त्रियो को गलत ढग से देखा है या स्त्रियों के प्रतिमा मे बुरी भावना पैदा की है तो अपने अपराध को स्वीकार कीजिए कि मेरे मे जो गलत भाव पैदा हुए है, जो गलत काम किए है, कुचेष्टाए : मैं अरिहत भगवान की साक्षी से उन सारी विकारी भावनाओ का त्याग :: हु, मैं अपनी बुराइयो को स्वीकार करता हू और उनको छोडता हूँ। इस पर से आप अपने अपराधो को छोड़ने का प्रयास कीजिए। मैंने अको बुरे !' ध्यान नहीं किया और पेसा कमाने के चक्कर मे लोगो को ठगने का प्र":" किया। मैं उन सारे व्यक्तियो के साथ मे हुए अपराधो को स्वीकार कर । साथ क्षमायाचना करता हू मैत्रीभाव कायम करता है। यह आने . भावना करिये। मैंने क्रोध के वशीभूत होकर उचित-अनुवित बारा " किसी को गाली दी हो तो में उन पापो को छोडता हूँ। मैं बहुत बड़ा रो बहुत पैसे वाला है, ऐसा सोचकर नोकरो के साथ, मुनिगो के राशन के साथ, अहकार के वश दुर्व्यवहार किया हो, यदि कोई अपमान की कही हो, उनकी निन्दा की हो, तो आप सोचिए, उस बात को । उस बात की मैं निन्दा करता हू, उस गलती को स्वीकार करता है। इस से आप अपने अहकार को निकालिए। एक-दूसरे के साथ छल , है, एक-दूसरे को ठगने का प्रयास किया है, लोग के दीयार के हितों को चोट पहुचाई है, उन्हें नुकसान पहुंचाया है in ar: स्वीकार करता हूं। मैंने किसी की निदा की है. किसी ही इजा पर .. पहुचाई है तो मैं दिल से उस दोष को रवीकार करता हासिल चुगलिया की है, किसी की झूठी बात की है तो उनके लिए! मांगता हूं। इस एक वर्ष की फिल्म को अपने दिमाग में लाइक और दार। की एडिटिग करिये। जो चीजें गलत हुई है उनको हटा दी - , -(106) । पिक्चर साफ हो जाय, वह क्लीयर हो जाय और सोचिए भगवान कृपा बरसा रहा है इस कृपा से मेरे सारे पाप धुल रहे हैं। आपका मानसिक चिन्तन आपकी आत्मा को पवित्र अथवा दूषित बनाता है। वैज्ञानिको ने इस बात को मान लिया है। व्यक्ति जो सोचता है उसका प्रभाव निश्चित रूप से उसकी आत्मा पर पड़ता है। इसलिए आत्मा को प्रभावित करने के लिए मन से शुद्ध चिन्तन करने का प्रयास कीजिए ताकि सारे पापो को दूर करने के बाद आत्मा शुद्ध हो जाय । आप सोचिए कि मैंने जीवो की रक्षा के लिए कितने काम किए हैं ? मैंने इसान की भलाई के लिए कौनसा त्याग किया है ? ऐसे काम अपने दिमाग मे मत लाइये जिसमे आपको कोई लाभ न हो। यदि साल भर मे ऐसा कोई काम नही किया हो तो यह निश्चित कीजिए कि भविष्य मे एक काम ऐसा करूगा जो सच्ची इसानियत का होगा ? जीवो की रक्षा करने के लिए कोई न कोई ऐसा काम निश्चित रुप से भविष्य मे करूगा, यह सकल्प अपने दिल और दिमाग मे पक्का कीजिए तब जाकर आपकी आत्मा ऊपर उठेगी। साथ ही आप सोचिए कि मैं ससार की समस्त आत्माओ के साथ मैत्री सबध कायम कर रहा हू। ध्यान लगाइये, ससार की आत्माए जो आकाश मे हैं, धरती पर हैं, किसी भी भाग पर क्यो न हो उन सारी आत्माओ के साथ मैं मैत्री सबध जोडता हू। वे मेरी हैं मैं उनका हु, उनकी आत्मा मेरी आत्मा है, मेरी आत्मा उनकी आत्मा है। इस तरह का विचार अपने भीतर जमाइये, अपने मन मे इस तरह का चिन्तन लाइये। आपकी आत्मा निर्मल बनेगी, पवित्र बनेगी निर्मलता को प्राप्त कर सकेगी। अपने मन की वृत्तियो को निर्मल बनाने के लिए आपको अपनी आत्मा के साथ रिलेशन कायम करना होगा, टेलीपैथी। टैलीपेथी रिलेशन जब सही ढंग से कायम होगा तब आपकी आत्मा का कल्याण होगा। अब आप एक मिनट के लिए आखे बद कर ले और परमात्मा का चितन करे, अरिहत भगवान को देखने की कोशिश करे। उनकी दृष्टि साथ अपनी दृष्टि मिलाए। एक मिनट के लिए सब कुछ भूल जाइये और परमात्मा के चरणो मे अपने अस्तित्व को समर्पित कर दीजिए। चुप हो जाइये और परमात्मा के साथ अपने अस्तित्व को मिला दीजिए। प्रमु को सच्चे दिल से स्मरण करने का प्रयास कीजिए। (एक मिनिट का मौन) मैंने आपके सामने सामूहिक रूप से ध्यान की प्रक्रिया जो सवत्सरी के दिन की जाती है उसका सामान्य ज्ञान आपको दिया है। जब भी समय मिले आपको चिन्तन करे। अपनी आत्मा को पावन बनाने का प्रयास करना (107) . . । - है तो इस बात को जीवन में गहराई के साथ उतारना होगा जोडना होगा। जो व्यक्ति सच्चे दिल से अपनी सारमा क मानि है उस व्यक्ति का बड़े से बड़ा पाप भी धुल जाता है. उस : .. हो जाती है। मैं इतिहास की एक घटना आपको बताता हूँ। इससे म!" ... होगा कि बड़े से बडे पाप की भी सवत्सरी के रोज दित से मानी' . ' आलोचना कर ली जाय, अपना पाप स्वीकार कर लिया जागो...' धूल जाता है । एक आचार्य महाराज थे। उन्होने एक जगास: उस चातुर्मास गे उनके पास बहुत सारे सायु थे। उनमे एक छोरा र जो बहुत सुन्दर था. नौजवान था। उस नोजवान साधु को गोहा : भेजा गया। गोचरी के लिए जब वह किसी घर में गया तो उस घर : अकेली महिला थी। उसका पति विदेश में रहता था। उस महिला . . . साधु को देख विकारी भावना आ गयी, गलत भावना आ गई। १६ : ' . ने क्या किया ? अपना मेन गेट गुखा द्वार बद कर लिया। १५i . वह महिला महाराज को अदर ले जाती है। बहुत अदर ले गई। ४ ... के बाद वह कहती है कि महाराज | आप क्यों इरा रासार को मो...' इतने कोगल शरीर को, सुन्दर शरीर को बर्बाद कर रहे हो। मेरे सा'; ससार का सुख भोगिये ओर ऐशो आराम करिये। यह सारी २१ }. . हो जाएगी। इस प्रकार कहा तो महाराज ने समझाया में रासार :: हू। रासार की सारी महिलाए मेरे लिए माता और बहिन है, इस नहीं कर राकता। उस महिला ने महाराज को बहुत समझान की दुनिया भर के प्रलोगन दिये, लेकिन वे महाराज अडिग १' for: . हुए। तब महिला ने सोचा कि बात तो कह दी लेकिन ये गरी बा " ,' वह खाली जा रही है। अब ये अपने गुरु महाराज के पास ना . महाराज के सामने मेरी सारी बात कह दी तो इज्जत मिह मेला ! ऐसा सोचकर उस महिला ने एक लकड़ी उठाई और महाल । मारी। लोच कराया हुआ था, मस्तिष्क कच्चा शा त ': :: से महाराज नीचे गिर गये। नाक से रन आने लग गम भर मे महाराज खत्म हो गये। महिला ने देखा किमान गये। उसे यह संभावना नहीं थी लेकिन अब क्या कार" समय के लिए दिगमृढ सी हो गई। फिर उसने गm महाराज को दफना दिया उसे टक दिया। टानाद, --- - । १ . - . 4 + (103)- ओर सोचने लगी कि, अब मुझे कोई जानने वाला नहीं है, किसी को भी मेरा अपराध मालूम नही होगा। उसने ऐसा सोचकर दरवाजा खोल दिया जिससे किसी को वहम नही हो। इधर स्थानक के अन्दर महाराज इतजार कर रहे थे कि मेरा प्रिय छोटा साधु गोचरी के लिए गया अब तक नहीं आया। एक घटा हो गया, दो घटे हो गये, तीन घटे हो गये। फिर भी वह नहीं आया तो महाराज ने श्रावक और श्राविकाओ को बुलाया ओर सारी बात समझाई। श्रावक-श्राविकाओ ने खोज करनी चालू की। घर-घर, गली-गली मे खोज की, जगल मे खोज की। महाराज हो तो मिले। उन्होने तो अपनी साधना मे दृढ रहकर शरीर को छोड दिया था। एक दिन बीत गया। आचार्य महाराज ने भोजन नही किया, साधुओ ने भोजन नहीं किया। जब तक महाराज नही मिले तब तक क्या करे। दूसरा दिन हुआ। दूसरे दिन भी खोज की। तीसरा दिन भी गया। तीन दिन हो गये। पूरा साधु समाज ओर आचार्य महाराज भूखे बैठे थे। लेकिन वह साधु नही मिला। यह बात उस महिला को मालूम हुई। उसने सोचा कि मेरी पाप वासना के कारण एक साधु मर गया ओर उसके बाद पूरे साधु भूखे बैठे हैं, खुद आचार्य महाराज भूखे बैठे हैं। तीन दिन हो गये किसी ने आहार नही किया। उस महिला को उसका पाप खाने लगा, महिला अन्दर ही अन्दर घबराने लगी। मैं कितनी पापिनी हु, अत्याचारिणी हू, सत घातिनी हूँ। मैंने साधु की हत्या कर दी, उसे मार डाला। मैंने घोर पाप किया है। उसकी आत्मा उसी को खाने लगी, उसका पाप उसी को कचोटने लगा। अब उसे न तो सोना अच्छा लगता है न पीना अच्छा लगता है। उसका जीना हराम हो गया तो मरना भी दुष्कर हो गया। चिता करने लगी दुखी हो गई। आखिर उससे रहा नहीं गया। वह अपने घर से निकल कर स्थानक मे आई। वहा आकर उसने आचार्य महाराज को कहा कि हे आचार्य देव । मैं आप से एकात मे बात करना चाहती हूं। मुझे कुछ समय चाहिए। महाराज ने एक भाई को दूर खडा कर दिया बोलो तुम्हें क्या कहना है। लेकिन उससे बोलते नही बन रहा था कहने लगी कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। क्या किया है ? उसने साहस बटोर हिम्मत कर कहा कि आपका प्रिय चेला, जो बहुत गुणवान था, सुन्दर था। वे मेरे घर मिक्षार्थ गये थे। अकेली थी। मैंने उनकी जवानी को देखकर, रूप को देखकर उन पर मोहित हो गई। मेरे पति विदेश है। उस हवेली के अदर और कोई नही था। मेरा मन डोल गया और मैंने मुनि राज से कहा, महाराज- आप मुझे स्वीकार कर लीजिए, यहा आराम से रहिये। लेकिन वे महाराज अपने सपन जीवन डी (109). - . 4 - साधना मे पक्के निकले। मैने बहुत कहा लेकिन वे जरा भी विका बात नहीं माने तो मैंने अपने अपराध को छुपाने के लिए एक ..." और महाराज के मार दिया। लेकिन महाराज एक ही साले में गिर: हो गए। मैंने अपने घर के अदर खड्ढा खोदकर आपके प्यारे सियत दिया है। यह मैंने घोर जघन्य पाप किया है. घोर कुकर्म किया। हूं, मैं कुलक्षिणी हूँ। मैं अपने पापो की स्वीकार करती हूँ। मेरी कार होगी ? मेरा कैसा उद्धार होगा? आचार्य गुरुदेव ने जब यह बात सुनी तो वे बहुत सुश हुए। र.' आत्मा को शाति हुई। आचार्य श्री ने कहा कि मैं इस बात से बात पुर। कि मेरे प्यारे चेले के सामने अनुकूल परीपह आया लेकिन यह मानेस मे पक्का रहा कुर्वानी दे दी लेकिन वह विचलित नहीं हुआ। जो चरित्र मे दृढ रहकर अपने संयम मे स्थिर बनकर इस जीवन को हो। वह अमर हो जाता है। गुरु महाराज ने कहा- हे श्राविका, तुझे चासो : जरूरत नहीं है। अपराध जरूर किया है लेकिन अपने अपराग को भी करना भी महानता है। उस महिला ने कहा कि मेरे अपराध का प्रायति' है ? तो गुरुदेव ने कहा कि कल सवत्सरी आ रही है। उस राघरारी । जो श्रावक-श्राविकाये बैठे रहेगे परा समा-हॉल मरा रहेगा उन सबके मा? खडी होकर जो पाप किए हैं उसे कहने कि अगर तुम्हारे में }ि " तुम्हारे सारे पाप धुल जायेगे। महिला ने कहा, अगर मेरे कहने से गार : धुल जाते हैं तो मैं तैयार हूं। मैंने पाप किया है, घोर पाप किया उस"; : धोने के लिए सारी दुनिया अगर मेरी निदा करे तो भी मै तयार, सरकार पाप धुल जाने चाहिए। गुरुदेव ने उस महिला से कहा कि कल सर्ग: रोज काली साडी पहन कर आना और यहा आकर अपनी बात महिला चली गई और गुरुदेव ने अपने प्रावक और श्राविकाओं को कि मेरे चेले को ढूढना बद कर दीजिए वह मिल गया। ता' रागार में ।। गया कोई बात नहीं है लेकिन उसका सयग उसकी सास ant; नहीं मरा है इसलिए आप उस चेले को दृटना बद कर दीजि ! ME श्राविकाओं को बहुत आश्चर्य हुआ कि पता नहीं चला कैसे मिल गया।" गुरुदेव ने कह दिया तो सबने मान लिया। दूसरे दिन सवत्सरी आ रही थी। आज सपसरी के दिन : यह सभा भवन भरा हुआ है उसी तरह यह हॉलनी मग मी उस हॉल में आयी और उस महिला को सबके सामनरा दिया . . . . * 1 - . . (110) । को क्या मालूम कि करके उससे कहा गया कि बोलो, तुम क्या कहना चाहती हो ? महिला ने अपनी बात कहना चालू की। उसने सारी बात बताई कि आप गुरु महाराज के जिस चेले को ढूढ रहे थे वे महाराज मेरे यहा पर आये थे। मैं उनको अदर ले गई मैंने अपनी खराब भावना उनके सामने रखी। उनको प्रलोभन देकर सयम से डिगाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वे सयम के पक्के निकले। मैंने खीजकर उनको लकडी मार दी और वे लकडी के प्रहार के कारण मर गए। उस महिला ने सारी बात उपस्थित महिलाओ और पुरुषो के सामने स्पष्ट कहना चालू कर दिया। उसने यह नही सोचा कि ये सब लोग मुझे क्या कहेगे ? मेरी इज्जत इससे मिट्टी में मिल जायेगी यह बात उसने नही सोची। उसने झूठी इज्जत की परवाह नही की। उसने सारी की सारी सच्ची-सच्ची बात सबके सामने कह दी। उसने यह नही कहा कि महाराज ने मुझे छेडा, छेडने के कारण मैंने उनको लकडी मार दी। यदि ऐसा कह देती तो दुनिया क्या हुआ? लेकिन उस महिला ने सवत्सरी के रोज सारी वात स्पष्ट रख दी। श्रावक और श्राविकाओ ने सुना तो उनका खून उवल गया, और उनको भयकर गुस्सा आया कि यह महिला लम्पटी है, कामी है, दुराचारिणी है, कलकिनी है, घोर व्यभिचारिणी है। पूरी सभा मे भयकर रूप से उसकी निदा होने लग गई। सब लोग उसकी निदा करने लगे, उसको गाली बकने लगे। पूरी सभा को उसके प्रति इतना गुस्सा आया कि वे कहने लगे कि इसको पत्थरो से मारो, इसको जूतो से मारो, ऐसी महिला को इस सभा से बाहर निकाल दो। इस तरह से पूरी समा मे हगामा मच गया। पूरी समा जोर-जोर से बोल रही थी। तभी आचार्य गुरु देव ने हाथ खडा किया और हाथ खडा करते ही सारी समा चुप हो गई शात हो गई। जिस समय मे सारी सभा निदा कर रही थी, सारी सभा के लोग गालिया बक रहे थे उस समय वह महिला शाति के साथ सुन रही थी। वह सोच रही थी कि ये पुरुष व महिलाए सच्ची बात कह रहे हैं। मैं कामी हू मैं कुलक्षिणी हू, मैं व्यभिचारिणी हूं। मैंने साधु की हत्या की है, मैंने घोर पाप किया है। ये जो कुछ भी कहते हैं वह सब सही बात कह रहे हैं। 10 मिनिट तक पूरी सना मे शोर-शराबा चलता रहा। करीब-करीब सारे लोगो ने निदा की। उस निदा से क्या हुआ एक चमत्कार घटित हुआ। वह काली साडी ऑटोमेटिक रूप से सफेद होने लगती है। वह धुलने लगती है और साडी घुलती जाती है। 10 मिनिट मे वह साडी बिल्कुल सफेद हो जाती है। लेकिन उस साडी पर दो घले रह जाते हैं। दो काले छापे रह गये। बाकी साडी एकदम सफेद हो । (111) - । . . + गई। उसके बाद गुरु महाराज ने अपना कमाल्य जारी f. . .: : कि इस ओरत ने जितना बड़ा पाप किया है उतना ही .. इसने अपने सारे पापो को सबके सामने स्वीकार कर लिया है। स .. से इस ने अपराध को मान लिया है। लेकिन इस पूरी सगा में दो हैं जिन्होने इसकी निदा नहीं की. गाली नहीं निकाली। आचार्य देव ने दोनो श्रावको को खड़ा किया। जो सम..; त्यागी थे, पूरे समाज का आदर्श थे। उन दोनो श्रापको ने निदा : आचार्य महाराज ने पूछा, अरे । तुगने निदा क्यो नहीं की ? गाती, बोली ? तब उन्होने कहा, गुरुदेव | यह महिला बहुत पुण्यता ; सती है। अपराध तो किसी भी व्यक्ति से हो सकता है, यदि को पाप कर सकता है, लेकिन अपराध को इतनी बली रामा में रतीकार , बहुत कठिन काम है। यह बहुत पवित्र आत्मा । हगने भी ... लेकिन हम हिम्मत नहीं रखते। इराने कितनी हिम्मत की है। यह पुण्यवान है। अगर हमे निदा करनी है तो हम हमारी निदा कम र.. क्यो करे ? इससे तो हमारी आत्मा दूषित बनेगी। रासार रागर र, .. आचार्य देव ने कहा कि इस गरी सभा के अन्दर दो व्यक्ति, नहीं की बाकी सभी ने इसकी निदा की। इराकी निदा करने से धुल गये। इसका प्रमाण यह है इराकी काली साली एकदा सो केवल दो विदु रह गये, धो रह गये। इसलिए कि इस रामा में ने इसकी निदा नहीं की। आचार्य देव ने उस महिला से कतi , मुह से मिच्छागि दुक्कड। मिच्छामि दुक्कड़ को दो बार गोता.. एक ही झटके के साथ गायर हो गये। साड़ी एकदम राम ! ... महाराज ने कहा कि इराने जितना बड़ा पाप किया है सारा का मा ....' पाप धुल गया है। यह एक सती सन्नारी हो गई है। उन म : स्वीकार कर लिया, साध्वी बन गई। रापकी पूजनीय बन गई। ... : महाराज ने रामा को सबोधित करते हुए कहा इस मा के ' ने इसकी निदा नहीं की, गाली नहीं बकी। लेकिन य.' ऐसा है जिसने एक भी पाप नहीं किया हो ? form] सम्पूर्ण रूप से पवित्र बनाये रखा हो. गला पान : ' . सोची नहीं हो ? अगर नहीं तो इस गरिला की निदा बर:: : अविकार था? पहले अपने गिरेबान को योतकर दे। किया है ? कितनी बार परस्त्रीगमन किया है ? निर: : । .. + -- -- .. . (112) । जुआ खेला है, दूसरो को ठगा है। पहले स्वय के पापो को खोलकर देखिये। हमे अपनी निदा करनी चाहिए, हम अपनी आलोचना करे, अपनी आत्मा की शुद्धि करे। तो ही जाकर सवत्सरी मनाना सार्थक हो सकता है। उस महिला ने सच्चे दिल से सवत्सरी मनाई इसलिए इसके सारे पाप धुल गये। आप भी मनाएगे, लेकिन कब मनाएगे ? रात को। जब प्रतिक्रमण होगा और आप लोग खमत-खामना, खमत-खामना बोलेंगे। लेकिन अपनी आत्मा को पवित्र बनाना है, निर्मल बनाना है तो उस महिला की तरह आलोचना करिये। ज्यादातर लोग मिच्छामि दुक्कडं कुम्हार का देते हैं। मटकी फोड दी बाद मे बोले मिच्छामि दुक्कड। फिर मटकी फोड दी। फिर मिच्छामि दुक्कड ऐसा मिच्छामि दुक्कड किस काम का ? अगर सच्चे दिल से सवत्सरी मनानी है तो अपने आप के पापो को धोने का प्रयास कीजिए, अपने दिल मे पवित्रता लाइये, समता की भावना पैदा करिये। आज परिवार के बीच झगडे हो रहे हैं, मा-बाप, भाई-भाई, पति-पत्नी का। आप उससे माफी माग लीजिए। माफी मागने वाला इसान छोटा नही होता। महावीर की दृष्टि से क्षमा मागने वाला इसान वीर होता है। "क्षमा वीरस्य भूषणम" । क्षमा वीरो का आभूषण है, आपको महावीर का अनुयायी बनना है तो क्षमा मागना सीखिये भले ही आपने अपराध नहीं किया हो, गलती सामने वाले की हो और भले ही सामने वाला व्यक्ति माफी मागता है या नहीं। इसकी परवाह मत करिये पर आप सच्चे दिल से माफी मागे। वह पाप धुल जाएगा। जो कठोर से कठोर तपस्या से नहीं धुल सकता, वह पाप, सच्चे दिल से माफी मागेगे, क्षमायाचना करेगे तो धुल जाएगा, आप पवित्र हो जाएगे। इसलिए इस सवत्सरी के रोज अपने दिल और दिमाग मे यह बात अच्छी तरह से धारण कर ले कि मुझे सच्चे दिल से माफी मागनी है। मैं क्या कहू। इस समय मे हमारी सवत्सरी ज्यादातर हसी का पात्र बन गई है, क्योकि हमारे भाई सवत्सरी के नाम से लड रहे हैं। समाज में आएगे तो केवल अपनी मूछ ऊची रहनी चाहिए, अपनी बात रहनी चाहिए. यह धारणा लेकर सवत्सरी मनाने के लिए तैयार होगे तो वह सवत्सरी कर्मों को न घटाकर और बढ़ाने वाली होती है वे चाहे श्रावक हो या साधु हों। अगर साधु भी सच्चे दिल से क्षमा याचना नहीं करता है, अपने अहकार को लेकर चलता है, अपने क्रोध को नही छोडता है तो साधु का भी कल्याण नहीं हो सकता है। कल्याण तभी होगा जब कि आज सवत्सरी के रोज अपने अहकार को भूल जाये, अपने अपमान को भूल जाये, ईर्ष्या को भूल जायें, सम्मान को -(113)- . 1 भूल जाये और भगवान महावीर के चरणो में सच्ची दमा का करे, माफी मागने की कोशिश करे। गगवान महारिने का सवत्सरी भी सच्चे दिल से मना ले तो आपका मोश निति कोई भी ताकत आपका मोझ नहीं टाल सकती। आनी सात बढाना है तो इस सवत्सरी कोई जैनियो का ही पर्व नहीं है। पूरी प्राणी वर्ग का कल्याण इस पर्व में रहा हुआ है। यह सवारी प्रक्रिया है। इस साइण्टिफिक प्रक्रिया को समझकर अपने जीवन जोडने का प्रयास करे। मैं समझता हू, पूरे विश्व के अन्दर यदि जरा है, जरा भी अहिसा है तो उस सब के मूत में यह जैन धर्म है और र का पर्व है। विचारो का भयकर प्रदूषण पूरे विश्व मे हो रहा है .. उसको साफ करती है। क्योकि आज के रोज हजारो-लाखो की रखकर अपने मन को साफ करते हैं, शुन्द चिन्तन करते है, समता र करते है विश्व कल्याण की भावना रखते हैं। इसलिए वायुमण्डता र है, प्रदूषण की भावनाए समाप्त होती है। अभी आपके सामने एक भाई ने जैन समाज में आडम्बरकारी चाते रखी। उनको मैं रखता, लेकिन आपने स्वय गलती को सम्म समाज में बहुत आडम्बर हो रहा है। शादी ब्याह के नाम पर जिरा जीवो की रक्षा करनी चाहिए वे जीवो का राहार कर रहे फिजूलखर्ची हो रही है। लाखो रुपये शान-शौका बलाने में लगा फूलो को बिछाने मे हिसा हो रही है। यह चद रामय का पर को खराब करने वाला है। यह पैसे का गयकर दुरुपयोग हो । बजाय सच्चे दिल से इसान की सेवा करना सीरो। यह वासी को समझेंगे तो यहा का जैन समाज बहुत बडा कार्य कर गलेगा। र से क्षमापना पर्व को मनाने के लिए इसे जीवन में उतारने की को अगर इस क्षमापना पर्व को अपने जीवन के साथ जोदने की कि तो आपकी आत्मा मगल अवस्था को प्राप्त होगी। अगी-अनी श्री सघ की ओर से सा-साथियों से समाया उन्होंने कहा कि हमारे द्वारा कोई अपराध हो गया हो. हमारी कमी रही हो तो क्षमा मागते हैं। अरे ! आर क्या आरकर । मच पर जब खडा हो जाता है तो मैं किसी से नीता ! से डरता हू तो केवल अरिहत भगवान से, कि उ:: नहीं निकालना चाहिए, इसके अलावा दुनिया का Pr । (114) समय जो मुझे सच्ची हितकारी बात नजर आती है उसे कहने मे कोई सकोच नहीं करता भगवान महावीर के बताए हुए सिद्धात हैं हम उनको माने। इस चातुर्मास मे मैंने निरन्तर भगवान महावीर के सिद्धातो को आप तक पहुचाने का प्रयास किया है, लगातार मैं बोला है। हमारे सम्पर्क से, हमारे साधुओ के सम्पर्क से, हमारी साध्वियो के सम्पर्क से, उनके व्यवहार से, बोलने से, गोचरी से अगर आपको मन मे जरा भी बुरा भाव आया हो, आपकी किसी भावना को ठेस पहुची हो तो मैं सबकी की ओर से आप श्रावक-श्राविकाओ से क्षमा याचना करता हू। जो बाते आपके सामने कही है, उन बातो को जीवन के साथ जोडने की कोशिश करे। आप हमारे हैं और हम आपके हैं इसलिए जो अपने होते हैं उनके सामने कहने मे कोई सकोच नही होता। संघ के अधिकारी, कार्यकारिणी के सदस्य, सघ से जुड़े सभी पुरुष व महिलाए गुणवान हैं, सभी को जीवन मे एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए। झूठी बातो की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। गलत भाव पैदा नहीं करना चाहिए। इस सघ की जितनी प्रशसा की जाय, जितना गुणगान किया जाय वह कम है। यहा के सघ की जो कुछ भी साधना की सीमा है उस साधना की सीमा को आगे बढाइये यहा के सघ कार्यकर्ताओ की सयमी जीवन की सुरक्षा रखने के लिए, भगवान महावीर की परम्परा को अक्षुण्ण रूप से चलाने के लिए अपना योगदान निरन्तर देता रहेगा, मर्यादा के सरक्षण के लिए सघ अग्रणी रहेगा, यह मैं अपेक्षा करता है। यहा के सघ के अधिकारी, सदस्य इस बात का ख्याल रखेगे, इस बात को जीवन के साथ जोड़ने का प्रयास करेगे। इसके साथ ही हम सभी लोग अरिहत भगवान से क्षमा याचना कर लेते हैं, जिन्होने साधना का मार्ग दिखाया है। हम उनके सिद्धातो को लेकर आगे बढेगे तो हमारा जीवन मगलमय भविष्य को प्राप्त करेगा। आप श्रद्धा से हमारी बात को सुन रहे हैं इससे हममे खुशी है। उपर्युक्त तरीके से अगर हम अपने जीवन को बनायेगे तो हमारा सवत्सरी पर्व मनाना सार्थक हो सकेगा। सवत्सरी आ रही है और जा रही है लेकिन आप यह मत भूलिए कि चातुर्मास नही जा रहा है। चातुर्मास के अभी 70 दिन बाकी हैं आप यह मत भूल जाना। अब कुल 4 महीनो मे 70 दिन हमे स्थानक के अदर रहना है। ऐसी स्थिति मे श्रावक-श्राविकाओ से निवेदन है कि वे सच्चे दिल से जिनवाणी को सुनने के लिए समय निकाले। सवत्सरी के रोज अपने आपको भूलने का प्रयास न करे, अपने आपको जोड़ने का प्रयास करे। अगर भविष्य के 70 दिन सही ढग से निकालेगे तो आपका चातुर्मास कराना सार्थक हो सकेगा। इस चातुर्मास 1 (115) v..41 १७ को सही ढग से उत्तरोत्तर आगे बढ़ाने के लिए आपको अनि ध्यान करना अपेक्षित है। हमे लाइसेंस रिन्यू करना है। हम जैन है, हमारे लिए प्रतिर:: लेना ही जरूरी नहीं है। जैन के लिए सात बाते ध्यान रखना जर.. जुआ नहीं खेलता, जो मास नहीं खाता, जो अण्डा नहीं पाता. लो रा." पीता, जो चोरी नहीं करता, जो शिकार नहीं करता. जो परस्त्रीगमन :: करता, जो वेश्यागमन नहीं करता, जिनेश्वरो की वाणी पर ला रहा वही जैन है। जो इन कुलक्षणो को छोडता है वह जैन है। आज शा" यह निर्णय लें कि अगर हमने गलत काम किया है तो भविष्य में ऐसा नहीं करेंगे, ऐसा गलत काम नहीं करेंगे, अपनी आत्मा को शुद्ध करेगे। जाकर हमारा सवत्सरी मनाना सार्थक होगा। निन्दा करना हो । अपनी आत्मा का शुद्ध चिन्तन करना चालू करिये। रागय आपका नाम । हो गया है, 12 बज चुके हैं। लेकिन ऐसे घड़ी की कितने ही भारत माज: हमारे कर्मों की बारह बजनी चाहिए, हमारे कर्म साफ होने चाहिए। उकता रहा हू आप भी नहीं उकता रहे है। इसी प्रकार आपको र्य का इन बातो को जीवन के साथ जोडना चाहिए। हर रोज सोहम 3' पगलिए करने आते हैं अर्थात् भिक्षा आदि के लिए आते हैं पर आज भRE) यहा आए हो क्योकि आज तो रोज नही आने वाला भी आर.' सोचे। जब हम आपके घर आए हो और आकर भी कुछ नी गोजन से । आपको कैसे लगेगा। हम आपके घर से गोचरी नहीं लें तो आप दुख होगा. कितनी पीडा होगी। सोचेगे महाराज घर पर आगे. yrk लिया, खाली चले गये, तो सोचिये मेरे को भी इरा बात की दी: Fir'' जब आप श्राविकाओ ने यहा आकर भी कुछ नहीं किया ! ' आप भी कुछ लेकर जाय, सदगुण लेकर जाय और दुर्गुगों को होगा। मैं समझता हूं कि सच्चे ढग से कोई एक गुण भी आप ले लगे । तो संवत्सरी पर्व को मनाना, महाराज के स्थानक में आना : ,, मुझे भी पीडा नहीं होगी। अगर हमारे यहा से कुछ भी ले | । महाराज की आत्मा को शाति हो तो इतना जो अपने सुगर बातों मे से कुछ न कुछ लेकर जाय और उस तरीके से अप1ि8" बनाएं तगी आपका जीवन समतामय होगा आरा:: इसी के साथ में सम्पूर्ण पापद-प्राविका समय में सबरं, शाय" ; हू। क्या ? (116)- 20 जैनियों ! भागो मत, जागो वीतराग देव भगवान महावीर ने दो प्रकार का धर्म बतलाया है। दुविहे धम्मे पण्णत्ते-आगार चेव, अनगार चेव । धर्म दो प्रकार का प्रज्ञप्त है- आगार धर्म और अनगार धर्म। आगार धर्म से तात्पर्य गृहस्थ जीवन मे रहते हुए धर्माचरण से एव अनगार जीवन से तात्पर्य जैन सन्यास लेकर किये गए आचरण से। इन दोनो मे से किसी भी धर्म को स्वीकार करने से पहले प्राथमिक भूमिका के रूप मे सम्यक्त्वी होना अनिवार्य है। बिना सम्यक्त्व के किसी भी व्रत का आचरण करने की भूमिका नही बनती। याने कि व्रताचरण करने से पहले जैनी बनना आवश्यक है। जैन कोई काष्ट विशेष न होकर एक जीवन्त धर्म है। जो तेरे-मेरे की भावना से ऊपर उठकर सत्य का परम साक्षात्कार करवाता है। जैन जन्मना नहीं कर्मणा माना जाता है। कर्म से जैनी होना ही सही माने मे जैन है। ऐसे जैनी को जुआ, मास, शराब, चोरी, शिकार, परस्त्रीगमन और वेश्यागमन का त्याग करना जिन्दगी भर के लिए अनिवार्य होता है। जैन श्रावक और जैन सन्यासी बनने से पहले जैनी बनना अनिवार्य है। जैन श्रावक, 12 व्रतो का पालन करता हुआ धार्मिकता के साथ ही सदाचार, नैतिकता एव इन्सानियत की जिन्दगी जीने वाला होता है। जैन सन्यासी तो अहिसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के सिद्धातो का पूर्ण रूप से पालन करने वाला होता है, जो कि सिद्धातो के आचरण का एक उच्चतम आदर्श है। -(117) गुमर आचरण की उच्चतम पवित्रता में प्रवेश पाने वाले की मानसिक तरतमता के कारण कई जैन मतानुयायियो मे किसी देखी जाती है। घी मे चर्वी काण्ड, शेयर घोटाला, जैन डायरी मापारि: कत्लखाना मे जबर्दस्त फाइनेस आदि कुछ सगीन का ऐसेर निश्चय ही जैनियो के पवित्र भाल पर एक कलक है। इसके " एव खान-पान की पवित्रता मे भी निरन्तर कमी आई है। एक यो जैन श्रावको को राजमहलो मे भी निराबाय प्रवेश दिया जाता। आज को शका-कुशका की नजरो से देखा जाने लगा है। जैन श्रावक ही जैन साधुओ की भी शकारपद स्थिति बनी। है। जबकि जैन साधु पवित्रता एव चरित्र के आधार 'गू हो) । साधुओ मे भी विकृतिया, भयकरता के साथ पनपती जा रही ।। ३५ के परम आदर्श पर चलने वाला साघु जन कल्याण के नाम से भाग से रुपये एकत्रित कर पूजी निवेश कर रहा है। कितना भी कल्याणकारी हो पर भगवान महावीर की दृष्टि मे साधु मर्यादित उपदेष्टा तो होस: पर सहभागी नहीं बनता। लेकिन कुछ मठधारी साधुओ को कार" साधु की राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय छवि बिगडती जा रही है। इस परिणः । पर ही तथाकथित अपरिग्रहधारी साधुओ की ओरगाबाद एक निमा गई हत्या साधुता को प्रश्नाकित बना रही है। इसी प्रकार पार्मिर । भी श्रमण सस्कृति मे कुछ तथाकथित साधुओ के कारण परि है। जहा जैनी के लिए परस्त्री माता एव बहिन बरालाई । साधुओ के लिए ससार की समस्त गहिलाएं बहिन एव गा!" सावु तो उनके स्पर्श की बात तो दूर रही, महिला से गतिं.' स्पर्श नहीं करता। वह परपरागत सगट्टानी टाल जाALAf" एकान्त में अकेले, साधु को और किसी साच्ची को एक बात करना भी सख्त निषिद्ध है। लेकिन जैनियों की साधुओ मे भी चरित्रहीनता को पनपाया है। सभी कारण 'क' सालों में ऐसा देखा जा रहा है कि हर 2-4 महीना : " सेक्स स्कैण्डल उभर कर आ रहा है। यह कोई महत्त्वपूर्ण नहीं कि दः दिगदर " .. स्थानकदासी, मंदिरमार्गी या तेरापी साउन ६.८". ;" हैं। दिगम्बर साधु नान रहते है। स्थानमा (1121 7 तेरापथी लम्बी मुखवस्त्रिका मुह पर लगाते हैं। जबकि मदिरमार्गी साधु मुख वस्त्रिका को हाथ मे रखते हैं। लेकिन है सभी भगवान महावीर के अनुयायी । जैन। किसी भी वर्ग विशेष के जैन साधु एव जैन श्रावक में पनप रही विकृतिया पूरी जैन समाज को प्रमावित करती है। अत बढती हुई विकृतियो के समूल उन्मूलन के लिए समस्त जैन समाज को जागरूक होना आवश्यक है। जिस प्रकार एक भारतीय नागरिक के लिए भारतीय सविधानो की अनुपालना आवश्यक है। नियमो का उल्लघन करने पर भारतीय दण्ड सहिता के अन्तर्गत उसे दण्डित किया जाता है। उसी प्रकार प्रकार जैन साधु एव जेन श्रावक की भी आचार सहिता है। उसका उल्लघन करने पर भगवान महावीर की दृष्टि मे तो वह दण्डनीय है। पर जब गुरु चेले दोनों स्वार्थ-परस्त हो जाय- तब जैन समाज/जन समाज को जागृत होना आवश्यक हो जाता है। जेन सस्कृति, अन्य सस्कृतियो की अपेक्षा, विचार एव आचार दोनो ही दृष्टियो से पवित्रतम सस्कृति रही है। कतिपय व्यक्तियो के कारण वह दूषित परिलक्षित होने लगी है। विकृतिया पैदा करने वाले चन्द नाम हैं, जिन्हे अगुलियो पर गिना जा सकता है। लेकिन जन उद्धार का काम करने वाले नामो मे भी जैनी सदा अग्रणी रहे हैं। जयपुर का सतोकबा दुर्लम जी हॉस्पिटल एक ही जैनी का बनाया हुआ है। लातूर भूकप के बाद करीब 1400 अनाथ बच्चो को गोद एक ही जैनी ने ले लिया। अतीत के इतिहास के पृष्ठो मे तो ऐसे सैकडो हजारो जैनियो के नाम मिल जाएगे, जिन्होने अपने सद आचरण के बल पर व्यक्ति से लेकर समूचे राष्ट्र को तन-मन-धन से सहयोग किया था। ऐसे उदारमना जैनियो की आज के युग मे भी कमी नहीं है। देश के कोने-कोने मे जैनियो द्वारा सचालित हॉस्पिटल, कॉलेज, स्कूल, धर्मशाला, अनाथालय, छात्रावास आदि जनहित के हजारो काम देखने/ सुनने को मिल जाएगे। जैन समाज मात्र जैनियो के लिए ही नही अपितु समस्त जैन समाज बल्कि प्राणी मात्र के कल्याण मे सक्रिय रहा और है। ऐसी स्थिति मे चद व्यक्तियो के गलत आचरण से सारे जैन समाज को बदनाम करना उचित नहीं कहा जा सकता। फिर कोई भी जैनी अगर गलत आचरण करता पाया जाता है तो पत्र पत्रिकाए आश्चर्य व्यक्त करती हुई छापती है कि जेनी होकर । इससे स्पष्ट है कि उन प्रकाशको के दिमाग मे भी जैन समाज की बहुत उज्ज्वल है। किन्तु अमुक जैनी ने ऐसा किया। तो एक जैनी विशेष - ऐसा छवि -(119) गुटका, पान मसाला, बीडी, सिगरेट जैसी छोटी-छोटी पर के दुराचरण से सबको खराब कहना कथमपि न्याय समानद सकता। उपयोग का भी जैनियो मे परहेज दिया जाता है। यदि कोई खास तो वह भीतर शर्मिन्दगी महसूस करता है। जबकि जैन समाज से इतर सा मे देखें तो लोग ये वस्तुए तो क्या इससे भी भयानक परतुओं का दिल शर्म के खुला उपयोग करते हुए देखे जा सकते है। इसी प्रकार जैन साधुओं के चरित्र की समीक्षा कर लेना भी है। जैन साधु कनक-कामिनी का सर्वथा त्यागी होता है। पर जिला तक देश के कोने-कोने मे पदयात्राए कर नैतिकता का अपूर्ण जागरण है। छोटे से छोटे जीव की भी हिसा नहीं करता। चाहे त piha हो या पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति का ही। यही कारण है कि जिन : से इन स्थावर कायिक जीवो की हिसा होती है उनका भी उपयोग : करता। किसी प्रकार के वाहन का उपयोग नहीं करता। किसी भी प्रसग पर झूठ नहीं बोलना। सदा सर्वदा सरग मोरा । वह भी निष्पापकारी सत्य। छोटी से छोटी वस्तु भी अदत्त-बिना दिये नहीं लेता है। अनि वस्तु को भी स्वामी की आज्ञा के बिना नहीं लेता। गले या दारे । तिनका ही क्यों न हो। जैन साधु छ महीने की लडकी का भी रपर्श नहीं कर सगर' बाद उसके स्थानक मे स्त्री मात्र का और साध्वी के रमानन म पुरा का प्रवेश निषिद्ध है। दिन में भी साक्षी के साथ ही चर्चा कर है। विना अरामय मे साध्वियो को सायुओ के स्थान पर भोर म: साध्वियो के स्थानक पर जाना निषिद्ध है। किसी भी नि: लडके-लडकी बताना निषिद्ध है। जेन सायु किसी प्रकार पैसा-टका. मकान अनिस लज्जा निवारणार्थ सायु 62 हाथ और साविया 97 : है, इससे ज्यादा नहीं) पोस्टकार्ड, लिफाफा तक अपये : किसी को भी अपने हाथ से पत्र लिखकर नहीं देना : • • से भी चदा चिट्टा एकत्रित नहीं करवाना। कोई किसी भी जन कल्याणकारी सस्था का स्वर समान ★ + . - (120), । ज्योतिष ज्ञान के बल पर हस्तरेखा नही देखना। किसी की कुण्डली आदि नहीं बनाना। मत्र-तत्र-यत्र का प्रयोग नहीं करना। जिस गाव जाना, वहीं के शाकाहारी घरों से एषणीय आहार ग्रहण करना। किसी भी गाव या शहर मे मर्यादा के उपरान्त नहीं ठहरना। इन सब नियमो का पालन करना प्रत्येक जैन साधु के लिए आवश्यक है। यदि कोई साधु नियमों का उल्लघन करता है तो प्रत्येक व्यक्ति को उन्हे सावधान करने का पूरा अधिकार है । अगर जैन साधु विश्व वन्द्य है तो प्रत्येक व्यक्ति को उसकी सुरक्षा करना भी अति आवश्यक है। कुछ साधुओ के गलत आचरण से साधु समाज की प्रतिष्ठा को काफी धक्का लगा है। चाहे वे साधु किसी भी समाज विशेष के रहे हो, पर उनके दुराचरण ने पूरी जैन समाज की प्रतिष्ठा को प्रभावित किया है। इतर समाज मे प्रतिष्ठा धूमिल हुई है। वैसे ही जैन समाज मे भी साधु-साध्वियो की प्रतिष्ठा दूषित हुई है। जिसका यग जनरेशन पर काफी प्रभाव पड़ा है। वैसे ही यग जनरेशन, धर्म को जल्दी से मानने को तैयार नहीं। फिर ऐसी बाते सुनकर तो वे और भी अधिक दूर हटी है। बल्कि जैन साधुओ के पास जाने आने मे भी परहेज करने लगी है। अपने बच्चो तक को भी वह जैन साधुओ के पास जाने तक के लिए जैनी रोकने लगे हैं। लेकिन जैनियो । भागो मत, जागो। इस प्रकार पलायन करना न उस जैनी के लिए और न ही पूरी जैन समाज के लिए उचित है। कुछ साघुओ के कारण सारे साधु-साध्वी समाज को नकारना ठीक नही कहा जा सकता। दस हजार साधु-साध्वियो मे दस बीस पचास साधु-साध्वी ऐसे निकृष्ट आचरण वाले निकल जाय तो सभी को केसे नकारा जा सकता है। आम जैसा मधरु फल, फलो का राजा आम यदि कही से सडा है तो सारा आम नहीं फेका जाता है, अपितु उस सडे भाग को ही काटकर अलग कर दिया जाता है। अवशेष आम उपयोग मे ले लिया जाता है। वही स्थिति यहा पर भी है। चद जैन साधुओ मे दुराचरण की स्थिति आज की नहीं, अपितु ऐतिहासिक एव प्रागएतिहासिक काल से चली आ रही है। भगवान महावीर के समय मे राजा श्रेणिक का पुत्र नदीषेण अनगार, घोर तपश्चर्या करके नी भटक गया। वेश्या के यहा रह गया। साधु वेश छोड दिया। महावीर का ससार पक्षीय जवाई जमाली भी धर्म सघ छोडकर जिन्दगी भर अलग रहा। -(121)- इसी प्रकार महावीर निर्वाण के बाद भी कई साधु-साध्वी, बल्कि आचार्य तक मे चरित्र शैथिल्य आया। तथापि जिन शासन की गरिमा अक्षुण्ण बनी रही। इसलिए जैनियो को चाहिये कि वे अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए भागे नहीं जागे। जैन साधुओ की समाचारी से परिचित हो और अच्छे बुरे हर साधु के पास पहुचे और उनकी गतिविधियो का सूक्ष्मता के साथ अवलोकन करे। जहा कही भी स्खलना देखें बिना किसी सकोच के उस साधु से पूछ ले कि क्या उनका कार्य साधुचर्या के अनुकूल है ? यदि नहीं तो वे उसे सुधारे। अगर न सुधारे तो जो भी उनके गुरु हो, उन्हे सूचित करे। यदि गुरु भी ठीक नही तो जैन समाज के सामने बात रखी जाय। जैन समाज कडक कदम उठाए। पीछे न हटे। अभी कुछ अों से जैन साधुओ की चरित्रहीनता के चर्चे दैनिक पेपरो मे भी छपते रहे हैं। यद्यपि इससे जैन समाज की प्रतिष्ठा रोड पर आ गई। चद साधुओ की घिनौनी हरकतो ने जैन समाज को कही का नही रखा। फिर भी घबराने वाली, पीछे हटने वाली या धर्म छोड़कर भागने वाली बात नही है किसी भी धर्म, समाज पार्टी मे विकृतिया न आये, वह पूरी तरह शुद्ध रह जाय यह कम सभव है। ऐसी स्थिति मे केवल जैन समाज मे ही विकृतिया आई हो तो ऐसी बात नहीं। खैर हमे दूसरो की तरफ न देखकर अपने को ही देखना है सशोधन करना है। स्वच्छ करना है। इस कडी मे एक दृष्टि से दैनिक पत्रिकाओ मे छपना भी अनुचित नहीं है। बीमारी, उभर कर बाहर आना जरूरी है। ताकि उसके कीटाणुओ तक को समाप्त किया जा सके। दैनिक पेपरो मे छपने से आम आदमी हर जैन साधु पर सशक हो उठा है। उसे हर एक मे विकृतिया लगने लगी है। रायको कुशकाओ की दृष्टि से देखने लगा है। इसका परिणाम यह है कि साधु अर और अधिक सावधान रहने लगा है और आगे भी रह सकेगा। जब एक दुकान पर छापा पडता है तो पूरा मार्केट सावधान हो जाता है। पुराने जमाने मे अपराधी को काला मुह कर, सिर मुडवाकर गये पर बिठाकर पूरे शहर मे घूमाया जाता था। साथ ही उसके अपराध और द; की घोषणा भी की जाती थी। यह प्रचलन इसलिए था कि जिरासे अन्य लोग इसे देखे और अपराधो से परहेज करे। ऐसी स्थिति में अमुक जैन सानु दी खुलकर होने वाली बदनामी अन्य जैन साधुओ के विशुद्धावरण में सहयोग बन जाती है। अत. दुष्प्रचार से पीछे न हटकर आगे बढना सीखें। महावीर की सतान है, कायरता, भगौडापन न लाकर वीरता ल (122)
।
सामना करे। मुकाबला करे।
भगवान महावीर विशुद्ध रूप से साधुत्व का आचरण करने वाले जैन
साधु-साध्वियो की 21 हजार वर्ष तक उपस्थिति बतलाई है। अमी तो 27
हजार से कुछ अधिक ही बीता है। करीब 18 हजार वर्ष बाकी है। तब तक
शुद्ध साधुता का झडा इस देश मे फहराता रहेगा।
21वीं सदी, उसके उज्ज्वल भविष्य के रूप में उभरेगी ऐसा विश्वास
है।
जगिये, जगाइये।
असाधुता का, चरित्र हीनता का
जमकर मुकाबला करे।
अहिसक असहयोग करे।
यह महावीर की सच्ची सेवा करना
उनकी परम भक्ति करना है।
उत्कृष्ट उपासना करना है।
है
-(123)
बाहर के लिए भीतर को बदलें श्रद्धाशील उपासको । अतर की वीणा बजाने के लिए सकेत दिया गया है। जब तक हम भीतरी वाणी को सही नही कर लेते, तब तक भीतर से प्रस्फुटित होकर बाहर प्रकट होने वाली वाणी सही तरीके से बन नहीं सकती। जिस व्यक्ति का मानस ठीक नहीं है, जिसका मानसिक तन राही नहीं है, उसका बाहरी शारीरिक तत्र भी सही नहीं हो सकता। बाहरी शरीर को सही तरीके से तन्दुरस्त बनाने के लिए, अंतर की आत्मा की स्वस्थता का ख्याल रखना परमावश्यक है। आत्मा को सुचारू रूप से ऊर्ध्व गति प्रदान करने के लिए अतर के मन और बाहर के तन की समान रूप से स्वस्थता का होना अनिवार्य है। बाहर के शरीर मे भले ही कोई रोग हो जाए, पर यदि मनोबल मजबूत होता है, आत्मबल दृढ होता है, तो काम चल सकता है। आत्मा एव मन की स्वतन्त्रता मे शरीर की स्वस्थता का विशेष महत्व नहीं होता है। पर जब मन अस्वस्थ हो जाता है, तो शरीर की प्रक्रियाओं परिवर्तन आने लगता है। मन के रोग ग्रस्त हो जाने से शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। शोध सताप, भय, वियोग से दुखी, क्रोध मान, माया, लोम और मोहादि मन की रोग ग्रस्तता के प्रतीक है। आत्मा के साथ चले आ रहे अनादि काल के इन रोगो को समाप्त कर तन एव मन की स्वरथता के लिए प्रमु महावीर । फरमाया "जहा अंतो तहा बाहि, जहा वाहि तहा अतो।" प्रमु ने बतलाया: अदर की रुग्नता बाहर प्रकट होती है, बाहर की रुग्नता अतर की रुमा पूरा सबध रखने वाली है। जिस प्रकार कि एक मटकी के अन्दर तक जल रही है, उसके बाहर हाथ लगाने पर हाथो में जलन होगी, लहर अन्दर में जल रही है, परन्तु उसकी उष्मा मटकी के बाहर फैल रही है। य: . ॥ -(124)- दूर कर उस मटकी के अन्दर शीतल पानी भर दिया जाता है तो मटकी के अन्दर रहे हुए पानी की शीतलता बाहर भी आती रहती है। यही मानवीय जीवन के भीतर और बाहर का प्रतिविम्ब है। इसलिए प्रमु महावीर ने वाहर अस्वस्थता पर इतना जोर नहीं दिया, जितना कि अन्तर की अस्वस्थता को आत्मा की स्वस्थता पर जोर दिया है। जब तक हमारे अतर की जागृति नहीं होगी, तब सही माने मे सुख शान्ति की उपलब्धि नहीं हो सकती। शाश्वत शाति की सप्राप्ति हमको तभी होगी जब हम भीतरी जीवन को स्वस्थता प्रदान करेंगे, भीतरी जीवन की स्वस्थता तभी हासिल हो सकेगी जब कि हम आत्मा पर लगे हुए कषायो को विश्लेषित कर उन्हे पूरा करने का प्रयास करेगे। उस अदर की अशाति को भग करने के लिए सबसे पहले हमे मोह की चिनगारी बुझानी होगी, आसक्ति को छोडना होगा, तब कहीं जाकर हमारा आन्तरिक जीवन स्वस्थ हो सकेगा। मानव इस तरह के सम्बन्धो को लेकर चलता रहता है, पर हकीकत में कोई सबध सही नही है, जैसे कि मेरे पाव मे काटा चुम जाता है तो उसके कारण मेरे पूरे शरीर मे एक प्रकार के करट की अनुभूति होती है। पर यदि आपके शरीर मे काटा चुम जाएगा तो मेरे शरीर मे कष्ट नहीं हो सकता, कुछ सवेदना ही हो सकती है। प्रमु कहते हैं हकीकत मे ससार का कोई भी सम्बन्ध सही नहीं है, तुम उन सम्बन्धो को तोड़ डालो ये सबध कभी शाति नहीं देते बल्कि वियोग का दुःख उत्पन्न करने वाले होते हैं। हमे चिन्तन करना चाहिए कि ससार के बाह्य सबध कुछ अलग हैं मेरा स्वरूप उससे मिन्न है। बाहरी भौतिक वस्तुओं का स्वरूप दूसरे प्रकार का है एव मेरी आतरिक अनुभूति का रूप अन्य तरह का शास्त्रीय दृष्टि से इस तथ्य की पुष्टि हो सकती है। उत्तराव्ययन के नवमे अध्याय के अनुसार जब मिथिला नगरी के सम्राट श्रमण धर्म अगीकार कर चुके थे, तब इन्द्र ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हे (मिथिला) जलती हुई बतलाई। मिथिला नरेश जो साधु बन चुके थे कि परीक्षा के लिए पहुचा और कहा कि मिथिला नगरी जल रही है, लोग करूण क्रन्दन कर रहे हैं, तद परीक्षक स्वरूप आए देव को उन्होने उत्तर दिया कि भव्य मिथिला के जलने पर मेरा कुछ नही जल सकता। अध्यात्म सम्पन्न साधकात्मा यही विचार करते हैं कि मैं अलग ह शरीर भिन्न है और ससार अन्य है। गजसुकुमाल मुनि ने नी तो यही सोचा है (125) था, यही कारण है कि दहकते हुए अगारो को भी माथे पर रामता भार सहन कर लिए। कितनी सहनशीलता, किचित् मात्र भी क्रोध नहीं आml जलते हुए अगारे, दहकते हुए अगारे और सिर पर ऐसी भयकर अपरसा में बड़े-बडे आध्यात्मिक कहलाने वाले साधक भी डिगमिगा जाते है पान गजसुकुमाल मुनि ने अतर के जीवन के मुख्य मूल रहस्य को समझ लिया कि मैं कुछ और हू और यह शरीर कुछ और है। आत्मा अलग है शरीर अलग है. आत्मा अजर अमर है उसका कोई कुछ नहीं कर सकता, उसका नुकसान दे के नुकसान से सम्बन्धित है। । शरीर नाशवान है, नश्वर शरीर को एक दिन तो जाना ही है। आत्म स्वरूप वे जान गए, अंतर की जागृति उनमे आ गई, यही कारण कि इतनी भयकर वेदना को भी समता भाव के साथ सहन कर गए। उस वेदना को सहने से ही गजसुकुमाल मुनि के भीतर के पट खुल गए। जर व्यक्ति मे सहनशीलता आने लगती है, शरीर की वेदना को राहने की रामा आती है तो उस वेदना से उसका आतरिक व्यक्तित्व उभरने लगता है। आज व्यक्ति की क्या हालत बन रही है, व्यक्ति को जरा सा कुछ कह दिया जाता है तो वह अपने अहकार पर चोट लगी समझने लगता है, अपने आपको अपमानित हुआ समझने लगता है, वैसी अवस्था मे या तो वह क्रोध से जिल्ला उठेगा अथवा अदर ही अदर घुटता रहेगा। क्या ही अच्छा हो कि हम अभी आत्मा के आतरिक मौलिक स्वरूप को समझते हुए मन की वृत्तियों का विश्लेषण करना सीखे, अतर के कषायो को विषयो को, विकारो को समार करने का पुरुषार्थ करे। अन्तरात्मा की समीक्षा के लिए मन की स्वरयता के लिए, तन की स्वस्थता के लिए अपने विचारो को अन्तर्मुखी, ऊर्ध्वमुखी बनाने का प्रयास करते हुए, जीवन की मौलिकता एव यथार्थता में परिमगण कर। अन्तर की वीणा को बजने दो सुज्ञ बन्धुओं मे अन्तरनाद के विपण के बारे में आपको समझा रहा था, वात कुछ इसी ढग की चल रही थी, शागर आप पूरा ध्यान नहीं दे पाए हो। पूरी तरह से पकड नहीं पाए हो, यो अन्तर का समीक्षण करने के लिए व्यक्ति को अपनी दृष्टि अन्तर्मुसी बना होती है, अपने विचारों को स्वमुखी बनाने होते हैं। दृष्टि को अन्तर्मुटी बार के लिए, विचारो को स्वमुखी बनाने के लिए शरीर की अतिरिका शास. होने लगती है, पर वह वैसा चाहता नहीं है, शरीर की अतिरिक्त विकार, नहीं चाहता, श्रम करना नहीं चाहता, जब व्यक्ति पुरुषार्थ से ही मुरमाड से" है और असलियत से विमुख हो जाता है तो उसे अतर की समीक्षा (126) स्वस्थता-स्वच्छता दुस्साध्य सी लगने लगती है। किन्तु यदि हमे सही माने मे आत्मस्थ होना है, समाधिस्थ होना है तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो कभी न कभी इस तथ्य को स्वीकार करना होगा, इसीलिए प्रमु महावीर ने कह दिया "जहा अतो तहा बाहि, जहा बाहि तहा अतो।" प्रमु ने कहा कि बाहर का सबध. अतर के साथ सयुक्त है, बाहरी रोग को, बाहरी बीमारी को समाप्त करने के लिए अतर मे जाना ही हमारे लिए श्रेयस्कर होगा। जब हम अपने भीतर को ठीक कर लेगे तो बाहर आप ही आप ठीक हो जायेगा आपने देखा होगा कि जब पाव मे किसी प्रकार का फोडा हो जाता है, फोडा वाहर हुआ, किटाणु बाहर है, पर उसके इलाज के लिए जो डॉक्टर लोग दवा देते हैं, इजेक्शन देते हैं वह अन्दर मे दिये जाते हैं, क्योकि उस जर्स की जड उस फोडे का आधार अन्दर मे रहा हुआ है। जब दवा से अन्दर की वह जड समाप्त हो जाती है, वह आधार दूर हो जाता है, तब बाहरी फोडा अपने आप ठीक हो जाता है। वैसे ही शरीर की हर बीमारी, शरीर की प्रत्येक रुग्नता का जर्स हमारे अन्दर मे रहा हुआ है। शरीर को स्वस्थता प्रदान करने के लिए पहले हमको अपनी आत्मा और मन को स्वस्थ बनाना होगा। कषायो के फोडे हमारे अदर मे रहे हुए हैं। क्रोध, मान, माया, लोम और मोह हमारे भीतर मे उलझे हुए हैं, जिसमे हमारा शरीर और आत्मा रुग्ण होता जा रहा है। हमको अपने मन का विश्लेषण करना होगा। मन के विश्लेषण के लिए विचारो को स्वमुखी बनाने के लिए वीतराग वाणी का श्रवण सशक्त साधन है। सत्सग के माध्यम से इन्सान अपने भीतर को भी आमूल बदल सकता है। । (127) 10 अनित्य देह में : नित्य आत्मा श्रद्धाशील उपासको ! प्रमु महावीर ने द्वादशागी के विशाल रामुद्र वो जिन्दगी को सजाने एव सवारने के लिए अनेकानेक मणियो से भरा है, जिन माणक मुक्ताओ को सम्पूर्णत यथार्थ दीर्घ-दर्शन कर पाना संभव नहीं दिन्नु यदि कुछेक बातो का भी हम गहराई से चिन्तन कर ले तो वे माणक मुकार हमारे इस जीवन मे एक अद्भुत परिवर्तन लाने में समर्थ हो सकती है, प्रणु ने कहा है कि "अनियच्चमावास मुवेई निच्च"। वे बोलते हैं कि अनित्य आवास मे नित्य आत्मा रह रही है, अस्थिर आवास मे स्थिर आत्मा निवास कर रही है। समझे आप अस्थिर आवास मे कौन स्थिर अवस्थित है। हमारा यह शरीर हकीकत मे अस्थिर है, परिवर्तनशील है, बदल " है। हरपल, प्रतिक्षण प्रतिपल हमारे इस शरीर में परिवर्तन होता जा रहा। इसमे बदलाव आ रहा है, बचपन से जवानी, जवानी से बुढापा इस बदता का प्रत्यक्ष प्रमाण माना जा सकता है। दुनिया की कोई ताकत इरा असारमा शरीर के परिवर्तन को रोक नहीं सकती, जो बदलना है वह बदलेगा ही। . ही हम इस शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए कितने ही सावनों का प्रमाण कर ले, लेकिन जिसकी नियति ही बदलने की है, जिसका स्वभाव ही होने का है तो वह समाप्त होगा ही दुनिया की कोई ताकत उसके गा: को बदल नहीं सकती। प्रमु कहते हैं-" अनियच्चमावास मुवेई निच्च" कि इस अनित्य-निगा आवास मे नित्य स्थिर आत्मा निवास कर रही है, आत्मा इसमें रह रही । हम उस नित्य स्थिर आत्मा की ओर अपना ध्यान आकर्षित करने का प्राय करें। यदि हमारा सारा चिन्तन, हमारी सम्पूर्ण शक्ति अनित्य नियाग की ? (128)- ही चली गई तो उसमे निवास कर रही शाश्वत आत्मा को नहीं जान पाएंगे। शरीर अनित्य है, परिवर्तनशील है यही कारण है कि हमारे जीवन मे बदलाव आ रहा है, कभी सुख तो कमी दुख, कभी शाति तो कभी अशाति, यह दुर्दशा हमारे जीवन के साथ अनादि काल से सयुक्त है, ये विभिन्न प्रकार की परिस्थितिया हमारी आत्मा के साथ चल रही है। उस परिवर्तनशील अस्थिर शरीर से हमारा ध्यान हटकर जब तक उस शाश्वत नित्य आत्मा की तरफ नहीं जाएगा, तब तक हम वास्तव मे उस नित्य तत्त्व की अनुभूति नहीं कर पाएगे। जब हमे नित्य शाश्वत तत्त्व की अनुभूति ही नहीं होगी तब तक हम नित्यता को जान ही नहीं सकेगे केवल अनित्यता मे ही हमारी दौड होती रहेगी, तब सुख और शान्ति भी अनित्य, अस्थिर ही प्राप्त होगी, सदा-सदा के लिए रहने वाली सुखानुभूति शाश्वत शाति का अनुभव हमे नहीं हो सकेगा, क्योकि हमने नित्यता को पहचाना ही नही, केवल अनित्यता की एक परिधि मे ही हमारा यह जीवन चल रहा है। तो जरा सोचे कि अनित्यता से नित्यता की अनुभूति किस प्रकार होगी, हमे नित्यता का अनुभव करना है तो नित्यता का ध्यान धरना ही होगा। जब हमारी वृत्तिया अनित्यता से नित्यता मे परिणित हो जाएगी, तब हमारी आत्मा अनित्यता के आवरणो से विलग होती हुई सम्पूर्णत स्वतत्र स्वावलबी बन जाएगी, वही स्वतन्त्र स्वावलम्बन की स्थिति हमारे जीवन मे शाश्वतता लाने वाली होगी, परन्तु वह स्वतत्रता आए तब है न, कितने-कितने विमावो मे हमारी आत्मिक वृत्तिया होती चली जा रही है, किन-किन कष्टो के मध्य गुजरती हुई भयकर दुखो का अहसास हमारी आत्मा कर रही है, कितनी अशान्ति व्याप्त हो रही है, उस अशान्ति के मध्य यदि शाति का प्रादुर्भाव करना है, उस दुख की वेला मे सुखानुभूति करनी है, उन सारे सकटो का विमोचन करना है तो आत्मा का सम्बन्ध जो बाहरी तत्वो से रखा हुआ है, उस अस्थिर आवास के प्रति अशाश्वत तत्त्वो के प्रति जो हमारा लगाव है उन्हे दूर करे। पूर्ण रूप से हम निरासक्त भाव मे रमण करे। किन्तु यह हो नही रहा है आत्मा स्वतन्त्रता की उस परिधि से दूर हटती हुई पराधीनता की बेडियो मे जकडती हुई चली जा रही है, यही कारण है कि हमारी आत्मा विकास के पथ से विमुख हो पतन की ओर बढती जा रही है, अपने मौलिक स्वरूप नित्य का भान भूलकर अनित्य तत्त्वो के प्रति आसक्त बनी हुई है, यह अवस्था आज से नहीं, कल से नहीं जन्मो-जन्मो से इन आत्मा की बनी हुई है। केवल अनित्य पदार्थो के पीछे ही इसकी दोड नाग -(129) - होती चली आ रही है, परिणाम यह हुआ कि अनन्त जन्मो में भटकने । बावजूद भी सफल नही हो पा रही है, शाश्वत सुख को वर नहीं पाती। आपने राजा भर्तृहरि का नाम सुना होगा। एक पिगला को प्रकरण से उन्होने जीवन का बोध पा लिया, संसार से निरासक्त हो गए. सारा रा वैभव, भौतिक सत्ता सम्पति का परित्याग कर दिया, गृहस्थ जीवन से सन्य" ग्रहण कर लिया, अपने जीवन को बदल दिया, ससार से सन्यास में परिवति हो गए, पर पूर्ण रूपेण वे अपने आपको बदल नहीं पाए, यधपि घर बार कान: कान्ता का परित्याग कर दिया, सन्यास जीवन मे रमण कर रहे थे. पर पूरी तरह जीवन को बदल नहीं पाए, कुछ अनित्यता रह गई। एक समय की घटना, वे मध्याह्न के समय जगल से गुजर रहे थे, रात, मे उनको एक चमकीला लाल पदार्थ दिखाई दिया। उनके मन में आया। यह मणी रत्न चमक रहा है, इसे उठा लेना चाहिए, परन्तु उनके अन्दर २. आत्मा की आवाज आई कि तुमने तो ऐसे कई रत्नो का, सत्ता सम्पति के धन वैमव का परित्याग किया है, अब इस मणि की तुमको क्या आवश्य है, तुम सन्यासी बने हुए हो, तुम नित्यता के रास्ते पर बढ़ रहे हो, अनित्या का तुम्हारे लिए क्या महत्त्व है, यह आत्मा की अतर की आवाज थी, जिरा: आत्म विश्वास दृढ होता है, जिसका मनोबल मजबूत होता है, तब प्रमे परिस्थिति एव सकट का शालीनता के साथ सामना करता हुआ, उन पर विजय हासिल कर सकता है, किन्तु जिसका आत्म विश्वारा इतना दृट न होता है, वह मोह रूप शत्रु पर विजय भी हासिल नहीं कर पाता । गोह से हरा देता है, पर जिसका आत्म विश्वास दृढ हो जाता है वह मन पर गोर आवरण से विचलित नहीं होता, बल्कि आत्मा की आवाज पर चलता । उसको परास्त कर देता है। मन और आत्मा मे द्वन्द होने लगा। आत्मा का स्वर प्ररफुटित हो।" था कि तुम तो सन्यासी हो, निरासक्त होकर चल रहे हो इसके प्रति आ' तुम्हारे लिए उचित नहीं है, दूसरी ओर मन से आवाज आने लगी कि ) तुम्हारे काम नही आएगा तो क्या है उठालो तुम्हारे किसी ना का आएगा। बडी विचित्र अवस्था बन गई थी। आखिर मन की, गोह की हुई आत्मा की आवाज दबी रह गई, निश्चय कर लिया कि गाय को ?' जाए किसी मक्त को खुश कर दिया जाएगा. वह निहाल हो जाए। । (130)- बन्धुओ । जिस व्यक्ति ने ससार के रिश्तो का त्याग कर दिया, घर, पत्नी परिवार को जिसने दौड दिया पर भक्त का मोह नहीं गया, भक्त को खुश करने की भावना से उन्होने वह चमकता हुआ पदार्थ उठाना चाहा, मणिरत्न जानकर उसे उठाने लगे। जैसे ही उनका हाथ उस पर लगा तो हाथ लिप-लिप करने लगा, उनको बडा आश्चर्य हुआ कि यह क्या हो गया, हुआ क्या वे जिसको मणि मान रहे थे। वह थूक था, कोई पान खाता था, उसे कफ आता था, कफ आया थूका और वह पान का पिलापन उसमे मिक्सर हो गया, और वह सूर्य की किरणो के कारण चमकने लगा। उनको भान हुआ कि में कहा से कहा आ गया हू, कहा से ऊपर उठने का प्रयास कर रहा था और कहा इस चिपचिपे तत्त्व के प्रति इतना आसक्त बन गया, वे समल गए, परन्तु हमारा क्या हाल हो रहा है, हम ससार के उन लिपलिप करने वाले अस्थाई तत्त्वो से कितने चिपके हुए हैं। ससार का प्रत्येक तत्त्व अनित्य है, वे समाप्त होने वाले हैं, उनसे प्राप्त होने वाली सुख और शाति भी क्षणिक ही होगी, समाप्त होने वाली ही होगी। यदि हमको शाश्वत सुख की अनुभूति करनी है तो शाश्वत तत्त्व से ही होगी। अनिच्चमावा-समुवेईनिच्च" यानी हम अनित्यता की परिधि मे जकडे हुए उस नित्य तत्त्व को पहचाने, आत्मा की अनन्त शक्तियो का अहसास करे, उस पर लगे हुए शाश्वत आवरणो को दूर हटाए। जब अशाश्वत आवरण दूर हो जाऐगे तो निश्चय ही वह शाश्वत स्वरूप प्रकट हो जाएगा, शाति की वह शाश्वत अनुभूति होने लगेगी, स्थाई सुख की उपलब्धि होगी। आत्मा के उन अनित्य अशाश्वत आवरणो को हटाए। आत्मिक वृत्ति को जगाए। मौलिकता मे रमण करे। शाश्वत तत्त्व को पहचान कर शाश्वत शाति की अनुभूति करे । जो भी शाश्वतता को पहचानने का प्रयास करेगा, वह परम आनद परम सुख की उपलब्धि हासिल करेगा। (131), 11 मैं का संस्कार या असंस्कार असख्य जीविय पमायए जरो वणीयस्स हु णात्थि ताण एव वियाणहि जणे पमत्ते किण्णु विहिसा अजया गाहिति प्रज्ञाशील उपासको ! आत्म बोध के लिए आत्म दृष्टि से पूर्ण विकसित आत्मा का आदर्श आवश्यक समझा जाता है, जिसकी हमे चाह है, जिसे हम अपनाना चाहते हैं, जिसके साथ जुडना ही नही, अभेद हो जाना चाहते हैं। उस आदर्श के प्रति व्यक्ति को "सर्वतो भावेन" समर्पित होना आवश्यक माना गया है। जब तक हमारा समर्पण आशिक रूप से रहेगा तर तक सही माने मे आत्म जागृति नहीं आ सकती। इसलिए प्रमु महावीर ने इस बात का स्पष्टत सकेत दिया है कि यदि तुमको वास्तव में जागना है तो नी: को पूर्ण रूप से उडानी होगी। अलसाई आखो मे, अर्थ निद्रावस्था की-का जीवन की वास्तविकता, असलियत और हकीकत को छ नहीं पाएगी। यार भले ही पूरी नींद नहीं ले, पर कुछ क्षणो की नींद भी उसके जीवन की ग साधना को धूल मे मिलाने वाली बन सकती है। ड्राईविंग करने वाला गदि । भले ही पूरी नींद नहीं ले रहा है, परन्तु कुछ क्षणों के लिए भी उसकी 3 बद हो जाती है, तो वे क्षण भी उसकी जिन्दगी में बहुत बड़ा खतरनाक' उपस्थित कर सकते हैं। घोर सकट में डाल सकते हैं। ड्राईवर ने " सावधानी से कुशलता पूर्वक दस घण्टे लगातार गाडी को चलाया, २.. उसके बाद बीच मे दस सैकड भी नींद ले लेता है तो वे दस सेकRE' दस घण्टे की ड्राईविंग को खाक मे मिला दंगे। वह दस घण्ट तक सुक" (132)- रूप से गाड़ी चलाने के बाद दस सैंकड की नींद गाडी का एक्सीडेट करा सकती है, ।। सुत्ता अमुणी मुणिणो सया जागरति ।। उसके सम्पूर्ण पुरुषार्थ पर पानी फेरने वाली बन सकती है। सारी ड्राईविग वेकार हो जाती है। ठीक उसी प्रकार से जिदगी मे कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो कि हमारे सारे जीवन को धूमिल करने वाले बन सकते हैं। सम्पूर्ण जीवन पर एक भयकर प्रश्नचिह्न खडा हो जाता है, शरीर के भीतर की जरा सी सुषुप्ति सारे जीवन को मिट्टी मे मिलाने वाली बन जाया करती है, भले ही हम अपने आपको कितना ही जागृत करने का प्रयास करे, किन्तु अन्दर मे जो हमारे सुषुप्ति आ गई है, अदर मे जो हमारे प्रमाद छा गया है, अदर में जो आलस्य एव अकर्मण्यता की भावना सक्रिय बनी हुई है तो वह भावना उस व्यक्ति को कभी चैन से नहीं रहने देगी। आत्मस्वरूप के जागरण पर कुछ इस प्रकार की ग्रन्थिया छा गई है, जिन ग्रन्थियो को सही तरीके से विश्लेषण कर सही ढग से विमोचन नही किया गया तो ऐसी ग्रन्थिया समय- समय पर हमारे अन्त करण मे उभरकर जीवन मे अनेक प्रकार की समस्याए खडी कर देगी। जैसे कि छोटे-छोटे रोग के किटाणु जब शरीर मे रथाई रूप ले लेते है तो वे जर्स शनै शनै केसर का रूप धारण कर लेते हैं। केसर की उत्पत्ति के अनेक कारणो को खोजते हुए वैज्ञानिको ने बतलाया है कि जब शरीर मे थोडे-थोडे रोगाणु एकत्र होकर अपना स्थान बना लेते हैं। उनका इलाज नही होता है। उन जर्स को जल्दी ही शरीर से निष्कासित नही किया तो वे बढते ही चले जाते हैं और वे छोटे-छोटे किटाणु बढकर एक दिन इतना भयकर विकराल रूप धारण कर लेते हैं कि फिर उसका इलाज ही समव नहीं रह पाता उस ग्रन्थियो की विकृतावस्था को केसर की सज्ञा दे दी जाती है। जैसे यह शरीर की अवस्था है ठीक उसी प्रकार आत्म जागृति की अवस्था है। जीवन मे शाति पाने के लिए महाप्रनु महावीर ने यह सकेत दिया कि हम अपने आपके मन का विश्लेषण करे। मन मे उठने वाले राग द्वेषात्मक भावनाओ को देखने का प्रयास बरे, आल जागरण मे बाधक बनने वाले सकल्पो विकल्पों को पहचानने की चेष्टा दरे। जिनसे आत्मा अपने स्वभाव को भूल विस्मृति को प्राप्त होते है। दिन-प्रतिदिन विमावो का प्रभुत्व जीवन पर बढता जसा । दिपय- कषायो और विकारो की जो अवस्था बढ़ रही है, उनदा यदि हमने सन्य रा 1 -(133) ܀ सही इलाज नही किया, उनको दूर भगाने का पुरुषार्थ नही लि.. " करने का प्रयत्न नही हुआ, तो एक समय ऐसा आएगा कि मन में उतरने सकल्प-विकल्प भयकर रूप धारण करते हुए हमारी आत्मा को सरकार बनाते हुए चले जाएगे। उस विकृत वैमाविक अवस्था मे हम आम ती का अनुभव ही नहीं कर पायेगे हमारी मूर्छा इतनी प्रगाढ हो जायेगी। स्वात्मा जागृति की स्फूरणा तक नहीं बन पायेगी, आत्गा उसी में आ दुष्कर बन जायेगा। बल्कि ज्यो-ज्यो सुलझने का प्रयास होगा (को- निरन्तर उलझाने वाला बनेगा। आत्मा दूषित होती चली जाएगी. वह पानी ओर गमन करने वाली होगी। हमे वास्तव मे अपनी आत्मा का पराम: पतन नही करना है, उसको विकृत होने से बचाना है, उत्थान की ओर :-' है तो, आत्मा का पतन एव पराभव करने पाली भावना से रवाला काम.. एव पराभव करने वाली भावना से स्वात्मा का सरक्षण करना आवरमा । प्रमु महावीर ने जन हितार्थ जो सकेत दिया उराको रामझने की सगरमा " है। केवल समझकर ही नहीं रहना है उसको जीवन के साथ जोड़ना , तब कही जाकर सही माने मे आत्मा की गोलिकता हमको प्राप्त हो रा . है। प्रमु ने इसी बात को समझाने के लिए सकेत दिया है- अरा: जीविय मा पमायए"। हे भव्य पुरुषो । भव्य साधको । हमारा जीवन असर । है, इसलिए इस जीवन के प्रति जागृत बनो जीवन मे तुग प्रमाद ग बारा प्रा: जीवन जीते-जीते अनादि काल बीत गए। जीवन की सफलता एक सय सिद्ध नही हुई अब तुम उस असस्कृत जीवन को सस्कृत बनाने का प्रसार एव पुरुषार्थ करो। सस्कृत से तात्पर्य सस्कृति से नहीं, सरकारित असे लिया गया है। जीवन की परिष्कृत अवस्था से लिया जाता है। जी .. असद् सस्कारो भावो को सशोधित परिमार्जित करते हुए जो आगे जाना। जो परिवर्तन की अवस्था जीवन व्यवहार में घटित होती है वजह अवस्था ही, असस्कृत से सस्कृत बनना है। सरकृत में एक ही अर्थ निकाले जाते हैं। असस्कृत का अर्थ अपरिमार्जित भी होता है। विकार युद: है इस दृष्टि से चिन्तन करे तो प्रभु महावीर ने जो कहा है कि है। उसमे किचित् भी सशय को स्थान नहीं है, हमारी पर : विकारी अवस्था मे, इस चतुर्गति ससार में परिमण कर रही है। " वास्तविक नहीं है। उसे वास्तविक मान रही है। इन दिम : - - ." (134)- ही यह चैतन्य ज्यो-ज्यो प्रयत्न करता है उसका विपरित परिणाम इसको भुगतान करना पडता है। परिणाम भुगतते हुए भी अपनी दूषित वैमाविक वृत्तियो के कारण वह उसका आरोपन दूसरो पर करके अपनी दशा को और मलीन एव मलीनतर बनाता चला जाता है। वह उसकी दिग्विमूढ अवस्था हे यह अवरथा जब कुछ कम होती है तब वह अपने स्वरूप के प्रति कुछ जागृत बनती है। आप लोगो मे से कोई कह सकता है कि हम कहा अपावन हे मलीन है। हमारा वदन और वस्त्र सब कुछ तो पावन है फिर हमारा जीवन अपवित्र किस प्रकार हो सकता है ? इस शरीर को साफ करने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहते हैं इसे स्नान करवाते हैं, इसको धोते हैं, सावुन लगाते हैं, तेल लगाते हैं, सेन्ट लगाते हैं, अरे यही इस बात को सूचित करते हैं कि हमारा शरीर अपवित्र है जिसको हम निरन्तर पवित्र करने का प्रयास करते है, पर यह शरीर तो पवित्र होता ही नही है। सुबह साफ किया शाम को गदा हो गया, शाम को पवित्र किया सुबह पुन अपवित्र बन गया। जिसका स्वभाव ही अपवित्र है वह पवित्र होगा ही केसे। जिसका जो स्वभाव है वह किसी भी हालत मे बदल नही सकता, शरीर का स्वभाव ही अपवित्र है, उसकी यही मोलिकता है। आप इसके लिए कितना ही कुछ प्रयास करे यह सही हो ही नही सकता है, चाहे कितना ही आप तेल, साबुन, सेट, पानी से पवित्र बनाने का प्रयास करो, पर यह अपवित्र हुए विना रहेगा ही नहीं, क्योकि जिसका स्वभाव ही अस्वच्छता है वह स्वच्छता मे आ ही नहीं सकता, शरीर हमारा अपवित्र कसे हे इसे उदाहरण के तौर पर समझिए एक व्यक्ति अपने डाइनिग टेवल पर बैठा हुआ है, हाथ मे दूध का ग्लास हे, जिसगे बादाम, पिस्ता, इलायची एव केसर आदि मिलाई हुई है दूध से सुगध प्रस्फुटित हो रही है, डायनिग हॉल उस दूध से निकलने वाली खुशबू से भरा हुआ है । वह दूध को पीने के लिए मुह लगाता है, उसी समय उसका एक रिश्तेदार उस घर पहुच जाता है और उसे दूध का घूट लेते वह रिश्तेदार देख लेता है, और दूध का घूट लेने वाला आने वाले मेहमान को देख लेता है. दूध का ग्लास वह नीचे दूर टेबल पर रख देता है उसका सत्कार सम्मान करता है उसको विठा कर उससे वह दूध का ग्लास देता हुआ कहता कि लीजिए या वृध पीजिए। क्या वह आने वाला रिश्तेदार भाई उस दूध को पीएगा ? जी पीएगा. क्योकि वह दूध का ग्लास झूठा हो गया दूध झुठा हो गया, दोहा गया, उसने उसको मुह लगा दिया, यह शरीर उस दूध का ए गया ज्या विचार कीजिए कि यदि वह झूठा दूध नही देकर दूसरा दार देता भ (135) कितना खुश होता कि "शाह" जी ने कितना अच्छा बादाम पिता पर और केसर वाला दूध मेरे को पिलाया, पर मुह तगने से वह पति गया। बन्धुओ ! सोचो जो दूध अपने आप मे पवित्र है. शरीर को पुति वाला है, मेहमानो का आदर और सत्कार करने वाला है। वही दूर शरी टच हो गया, मुह ने उसको छू लिया तो वह अपवित्र हो गया तो यह कितना अपवित्र है, दूध को अपवित्र किसने किया ? इस शरीर में ही अपवित्र किया। इसलिए प्रमु ने कहा कि यह शरीर अस्वच्छ है यह। स्वच्छ होने वाला नहीं है, एक व्यक्ति बाजार से दो हजार की कीमत एक सुन्दर पोशाक लाता है और उसे पहनकर एक दिन या गाजार में जाता है, बाजार मे घूम फिर कर वह वापस आ गया, दूसरे दिन का । पोशाक को बेचने बाजार मे जाएगा तो क्या उरो दो हजार की कीम जाएगी ? नही मिलेगी। तो क्या उराकी कीमत घट जाएगी ? गति जाएगी तो उस पोशाक की कीमत किराने घटाई ? इस पोशा) ने र घटाई, या इस शरीर ने घटाई ? शरीर ने घटाई। अपवित्र शरीर के सी पोशाक जुड गई तो वह भी अपवित्र हो गई, यानि उसकी कीमत घट एक कोई गाडी खरीदता है, पांच दस दिन चलाकर उसको . जाएगा तो वह सेकड हैण्ड मानी जाएगी, अपवित्र शरीर में सेना सैकड हैण्ड बना दी। अब आप ही सोचिए हमारा शरीर कितना अपवित इसलिए प्रमु महावीर ने स्पष्ट शब्दो मे यह बात कही है कि तुम्ास यश अपवित्र है, तुम उसे कितना ही पवित्र बनाने का प्रयारा करो यः पवित्र ही नहीं सकता। अत इस शरीर को पवित्र बनाने के लिए जीवन की को खर्च मत करो। इस शरीर के भीतर रहने वाला जो आत्म-तत्व। तुम शुद्ध करने की कोशिश करो, उसे पवित्र बनाने का प्रयास करो, यो र पवित्र बन गया तो बस सब कुछ पवित्र हो गया, और उसे अनजान बनाया और केवल शरीर को ही पवित्र बनाने का प्रयास किया तो पवित्र नहीं होगा, बल्कि प्रति समय मलीनता गहराती चली जाएगी। को पवित्र बनाने के लिए, आत्मा की असरकृतावस्था का रास्ता हर! लिए यह पहली बात हुई अब आप दूसरे तथ्य को समडिए प्रयुक तुम्हारा यह शरीर स्वस्थ नहीं है, यह पूर्णत स्वस्थ कमी हो । नाम: बस शरीर में कोई न कोई बीमारी, कोई न कोई रांग तो बना सम्पूर्णत इस शरीर को कमी स्वरथ बनाया ही नहीं जा मा (136)- । आधुनिक युग मे चाहे कितना ही वैज्ञानिक अनुसधान हो चुका हो, परन्तु सम्पूर्णत यह हमारा शरीर कमी स्वस्थ हो ही नहीं सकता है। किसी वैज्ञानिक लेबोरेट्री मे शरीर की जाच करवाई जाए, ओर उसके तुरन्त बाद पुन उसका परीक्षण किया जाएगा तो उसमे कुछ न कुछ तो परिवर्तन अवश्य ही जाएगा, पूरी तरह से हमारा यह शरीर स्वस्थ ही हो यह कभी नही हो सकता। प्रभु ने जो बात कही है, वह किसी भी हालत मे असत नहीं हो सकती, जो कुछ उन्होने कहा वह शाश्वत है, नित्य है, उन्होने कहा कि यह औदारिक तन अपवित्र है और यह पूर्ण रूपेण पवित्र कभी नहीं बन सकता। इसके साथ ही उन्होने इस तन को अस्वस्थ बनाया ओर कह दिया कि सम्पूर्ण यह शरीर कभी स्वस्थ नही हो सकता। शरीर मे रोग प्रवेश करे इसके लिए कितने द्वार हैं ? हमारे शरीर मे ये रोम कितने हैं ? साढे तीन करोड रोसी हैं हमारे शरीर पर और एक-एक रोम मे पौने दो-दो रोग की अवस्था विद्यमान है। इस अपेक्षा से इस शरीर में सवा पाच करोड रोगो का आस्तित्व रहा हुआ है। वैसी अवस्था मे हमारा यह शरीर पूर्णत स्वस्थ रह पाए ऐसा नही कह सकते हैं, अत हमे इस शरीर की निरोगता की अपेक्षा उसके अतर मे जो पूर्ण स्वस्थ होने वाला, पवित्र होने वाला आत्मा है उसकी और ही हम अपना ध्यान दे। इसके पश्चात भगवान ने एक बात और कह दी कि हमारा यह शरीर अनित्य है, कभी टिक नहीं सकता, इसमे कोई न कोई परिवर्तन अवश्य ही घटित होता रहता है शरीर स्वभाविक तौर पर समाप्ति की ओर गतिशील होने वाला है यह रथाई रूप से कभी टिक नहीं सकता। मानव चाहे इसको कितना ही सुरक्षित करने का प्रयास करे पर यह शरीर जाने वाला है, दात टूट जाय तो नकली दात लगाये जा सकते हैं, टाग नकली लगाई जा सकती है, हृदय दूसरा लगा दिया जाएगा, पर एक समय ऐसा आएगा जो इस शरीर को समाप्त कर देगा, काल चक्र के आगे किसी का वश नही चल सकता है, शास्त्रीय धरातल पर प्रभु महावीर की वाणी को ही उन्होने बताया है कि 199 वर्ष से ज्यादा कोई भी इसान आज के युग मे जीवित नहीं रह सकता, यही कारण है कि आज आपको इतनी उम्र का कोई भी व्यक्ति नही मिल पाएगा। इससे कम उम वाले ही मिलेगे। 150, 160 की उम्र वाले व्यक्ति मिल सकते हैं, पर 129 से ज्यादा उम्न का कोई भी नहीं मिल सकता। प्रमु की वाणी सत्य हे शाश्वत है. उसमे किसी प्रकार का परिवर्तन नही हो सकता, क्योकि उन्होने जो कुछ कहा है वह सब परिपूर्णता प्राप्त करने के पश्चात् ही कहा है। यही कारण -(137) है कि ढाई हजार वर्ष पहले कही गई प्रमु की बात आज भी जैसी की तैसी स्थाई है, दुनियां की कोई ताकत उसे असत् सिद्ध नही कर सकती! परन्तु मानव जो उस ओर ध्यान ही नही दे पाता। शरीर अनित्य है, मृत्यु शाश्वत है इसको यदि मानव अच्छी तरह से ठीक से समझ ले तो वह अपनी जिन्दगी को ही सफल बना लेगा, पर मृत्यु की शाश्वत शरीर की अनित्यता को समझे तब ना। आज का इन्सान पर पदार्थों के साथ जुडतां जा रहा है। मृत्यु की शाश्वतता को भूलता जा रहा है, शरीर अनित्य ही है, इस बात को आज के वैज्ञानिक लोग भी स्पष्ट कर चुके हैं। पावलफ नाम के एक वैज्ञानिक ने इस बात की खोज की। इस विषय का अनुसधान किया और जनता के सामने स्पष्ट कर दिया कि शरीर अनित्य है और यह अनित्यता को और बढाता रहेगा, यह कभी नित्यता को प्राप्त कर ही नही सकता है। उन्होने एक प्रयोग किया। एक व्यक्ति बहुत शराब पीता था, पावलफ के पास उसे लाया गया, पावलफ ने कहा कि मैं इसको शराब छुडाने का प्रयास करूगा, उसे एक कुर्सी पर बिठा दिया और अपने अनुचरो से कह दिया कि यह जब भी शराब मागे तो उसे शराब दे देना और जैसे ही यह शराब पीने लगे तब उसे बिजली का झटका लगा देना, जब उसको दारु पीते समय झटका लगेगा तो हव समझने लगेगा कि शराब पीने से तो बिजली का झटका लगता है। इसलिए मेरे को दारु नही पीना चाहिए, यह विचार कर उसने उनके साथियो को वेसी आज्ञा दे दी। उसने आपनी आदत के अनुसार शराब मागा, अनुचरो ने शराग की बोतल हाथ मे दी जैसे ही वह पीने को हुआ बिजली का झटका लगा तो उसके हाथ से वह बोतल गिर गई, पुन होश मे आया तो उसे पुन वही शराब की बोतल दी गई वह शराब पीने लगा तो उसे पुन झटका लगाया गया ऐसे एक दो दिन तो उसके हाथ से बोतल गिरती रही, पर एक समय ऐसा आया कि उसके हाथ से वह बोतल गिरी नही बल्कि वह पीने लग गया, पीता रहा, पद्रह दिन बाद पावलफ वहा पर आया उसकी हालत पूछी तो उन्होने बताया कि हालत और भी खराब हो गई है पूछा क्या हुआ तो उन्होंने पावलफ को बताया कि कुछ दिन तो इसके हाथ से बोतल गिरती रही पर धीरे-धीरे स्थिति में परिवर्तन आया। अब तो शराब पीने से पहले बिजली का झटका लगने की इतजार करता है इसमे आनन्द मानने लग गया है, पहले तो हालत बिगड गई पर अब यह इसका अभ्यस्त हो गया, बिजली के झटके का इसको नया नशा लग गया, अब इसकी नयी आदत बन गई शरीर की (138).
पूर्वावस्था बदल गयी। वह शरीर विजली के झटके का अभ्यस्त बन गया। जब तक बिजली का झटका नही लगाया जाता तब तक वह शराब नही पीता। पावलफ ने एक प्रयोग और किया, वह हमेशा सुबह कुत्तो को रोटी खिलाता ओर एक घटी बजाता, इस तरह पन्द्रह दिन लगातार घटी बजाने के साथ ही उसने उनको रोटिया खिलाई सोलहवे दिन पावलफ ने खाली घटी ही बजाई, तो वहा कुत्ते दौडे आए और एकत्र हो गए दुम हिलाने लग गए, उनके मुह से लार टपकने लगी, पावलफ विचार करने लगा कि इस घटी के बजने पर कुत्ते यहा कैसे आ गए ? जब स्कूल की घटी बजती है तो कोई कुत्ता वहा पर नही जाता है, पर यहा कैसे आ गए ? पर उन कुत्तो की ऐसी आदत बन गई कि घटी बजने के साथ हमको खाने को मिलता है इस कारण वे वहा पर एकत्र हो जाते। इन आदतो के परिवर्तन की भाति ही इस शरीर मे प्रति समय परिवर्तन होता रहता है। यह शरीर की अनित्यता है, इसको नित्य मे नही बदला जा सकता, वीतराग वाणी मे किसी प्रकार का परिवर्तन नही किया जा सकता, इसलिए यदि वास्तविक रूप मे जीवन को सार्थक करना है, जिन्दगी को सफल बनाना है तो हमे शरीर मे रहने वाले उस नित्य आत्म तत्त्व का चिन्तन करना होगा, जैसा कि प्रभु ने कहा कि जीविय मा पमायए।" तुम्हारा यह जीवन असस्कृत है, अपवित्र हे अस्वस्थ हे अनित्य है। अत बन्धुओ प्रमाद को त्यागो और सदा-सदा के लिए अप्रमत्त भाव मे रमण करने का प्रयास करो। पर मेरे भाई उस अप्रमतत्ता को कहा समझ पा रहे हैं वे तो राशियो को लेकर चलते हैं। मेरी राशि सही नहीं है। अरे राशि तो राम और रावण, कृष्ण और कस की भी एक ही थी, पर उनके जीवन मे रात और दिन का अतर था, किसी को पूर्व दिशा मे जाना हे ओर कोई कह देता है कि आज तो दिशा शूल है तो जाना गौण हो जाता है। इस प्रकार प्रमाद मे जीवन जीया जा रहा है, पर मैं आपसे पूछता है कि जिस दिन पूर्व दिशा मे या किसी अन्य दिशा मे दिशा शूल है उस दिन उस दिशा मे जाने वाली गाडिया क्या बद हो जाएगी ? प्लेन उडना बद जा जाएगी ? जब उसमे जाने वाले हजारो लोगो को दिशा शूल प्रभावित नही कर सकता तो आपको कैसे करेगा ? उनको दिशाशूल प्रभावित नही कर हमको करता है तो, इसका कारण यही है कि हमने वैसी विचारधारा बना ली, हमारी सोच पैसी बन गई, राम और रावण की एक ही राशि थी, कृष्ण और कस की एक ही राशि पर कितना अन्तर था, रात और दिन का अन्तर था। यह सब जानते . असख्य । (139).
हुए भी हमारे अदर किस प्रकार की भावनाए काम कर रही है। हम असस्कृत जीवन की और ही जा रहे हैं। क्या हमारे जीवन की दशा बन रही है ? प्रमु महावीर ने कहा है कि "असख्य जीविय मा पमायए"। जीवन असस्कारित है, प्रमाद मत करो, अप्रमत्त भाव मे रमण करते हुए उस पवित्रता को, नित्यता को पाओ। उन कुत्तो की तरह हमारी हालत न बन जाए, वे तो कुत्ते थे पर हम इन्सान हैं, वे नादान थे पर हम नादान नहीं हैं उनकी तरह नासमझ नहीं हैं, समझदार है। रावण की वृत्तियो को लेकर मत चलो राम की वृत्ति को अपनाओ। राम और रावण की एक ही राशि होते हुए भी रावण के अत करण मे मलीनता थी, अपवित्रता थी, उसका जीवन दूषित बन गया था, जीवन में प्रमाद छाया हुआ था, उसके पास मान भी था, धन भी था, सत्ता शाति सब कुछ था परन्तु अन्त करण मे जो विकारी वासना छायी हुई थी उसने उसके जीवन को किस प्रकार से धूमिल कर दिया कि आज तक उसको बदनामी मिल रही है, उसके पुतले जलाए जा रहे हैं। आज कोई भी माता-पिता अपनी सन्तान का नाम रावण नही रखना चाहते हैं, कही पर भी आपको रावण नाम का इन्सान नही मिलेगा, आपको कोई मिला हो तो बात अलग है, पर हमको तो कोई नही मिला, गाव-गाव मे हमारा विचरण होता रहता है पर कहीं पर भी हमे रावण नाम का व्यक्ति नही मिला। क्यो सिर्फ इसलिए कि उसका जीवन असस्कारित था, आज विजयादशमी है, आज के दिन रावण जलाया जाता है, अभद्र व्यवहार किया जाता है, पर बन्धुओ जरा विचार करे कि कहीं वह रावण विकारो के रूप मे, क्रोध के रूप मे, अभिमान के रूप मे हमारे भीतर तो नही रह रहा है। जब तक हम हमारे अन्त करण से रावण की वृत्तियो को दूर नही भगाएगे। तब तक यह विजयादशमी का पर्व मनाना हमारे लिए सार्थक नही हो सकेगा, अरे उस रावण ने तो मात्र एक सीता का हरण किया था पर आज दुनिया के रावणो का क्या हाल बन रहा है। भारतीय संस्कृति को समझने का प्रयास करे, उससे अपने जीवन को सस्कारित करे, आज अगर दुनिया के लोगो का अन्वेषण किया जाय तो आपको ज्ञात होगा कि दुनिया के लोगो मे कही अभिमान के रूप मे, कहीं क्रोध के रूप मे और कहीं वासना के रूप मे वह रावण रहा हुआ है, उस रावण को जब तक भीतर से नहीं निकाला जाएगा, आत्मा रूपी सीता की सुरक्षा के लिए राम की वृत्तियों को जब तक अदर मे पैदा नहीं की जाएगी, तब तक बाहर के पुतले जलाने मात्र से कुछ नहीं होगा। हमे हमारी अन्तरंग वृत्तियों की खोज करनी है कि हमारे भीतर मे क्या कुछ रहा हुआ है, जब तक हम भीतर का सशोधन नहीं . (140)- करेंगे, अतर मे रही हुई रावण के स्वभाव वाली दानवीय वृत्ति को दूर नहीं करेगे, अमानवीयता को दूर हटाकर माननीय जीवन नहीं बनाएंगे, अनैतिक जीवन को बदलकर नैतिक जीवन नहीं अपनाएगे, तब तक विजयादशमी मनाना जीवन के लिए लामप्रद सिद्ध नहीं हो सकता। आज से अपनी आत्मा की समीक्षा करो और अतर में रही अनैतिकता, अमानवीयता, दानवीयता को दूर भगाए एव नैतिकता, प्रामाणिकता, मानवीयता, मौलिकता, वास्तविकता को प्रतिष्ठापित करने का पुरुषार्थ करे। आपने देखा होगा कि रावण का पुतला बनाने वाले उसके दस मुह बनाते हैं, हकीकत मे उसके कोई दस मुह नहीं थे, मुह एक ही था पर चन्द्र चूड हार मे जब उसने अपना मुह देखा तो उसमे उसको अपने दश मुह दिखाई दिये और उसी के कारण उसके दशमुख की प्रसिद्धि हुई। दशानन नाम पड़ा। इस प्रकार हार की दिव्य मणियो के प्रभाव से दश मुह हो ऐसा प्रतीत होता था, पर हकीकत मे उसके दस मुह नहीं थे, मुह मुख्य रूप से एक ही था, एक के चले जाने पर सारा शरीर चला गया, सारे मुह चले गए शास्त्रकारो ने दस प्रकार के मुडन की बात कही है "दसविहे मुडे पण्णत्ते"। वे दस प्रकार के मुडन ये कहे हैं- श्रोतेन्द्रिय, चक्षुइन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और स्पशेन्द्रिय। क्रोध, मान, माया, लोम और मन इन दस का आप मुंडन कीजिए। मुडन के दश प्रकार बतलाये है। इसके लिए अपने जीवन मे अप्रत्त भाव को जागृत करे, अप्रमत्त भाव मे रहते हुए दस प्रकार का मुडन का जीवन के भीतर मे रहे हुए रावण का विनाश करे, उसे दूर भगाए तब वही चरित्र रूपी सीता की सुरक्षा के लिए राम जैसी वृत्तिया भीतर मे प्रकट होगी, वे कहीं बाजार मे नहीं मिलेगी, अतर से अतर की समीक्षा करते हुए राम की वृत्ति को अपनाने एव आत्म रमण रूप सुख के लिए चरित्र रूपी सीता की सुरक्षा करने का प्रयास करेगे तो हमको वास्तविक शाति प्राप्त होगी, आत्मबोध प्राप्त होगा, परमानद की अवस्था मिल जाएगी। (141) 12 स्वाध्याय और ध्यान क्यों आवश्यक ? प्रज्ञा चक्षु (नेत्रहीन) पुरुष, जिसे प्रकाश होते हुए भी कुछ नहीं दिखलाई दे रहा था। उसे अन्धेरे मे इधर-उधर हाथ पैर पटकते देखकर एक दयालु इन्सान ने सहारा दिया और उसे सही दिशा में ले जाने लगा। जिस स्थान पर जाना था, वहा पहुचाने के बाद उस दयालु इन्सान ने पुन उसे छोड दिया। तब वह प्रज्ञाचक्षु पहले की तरह ही बेसहारा हो गया। उसकी इस दयनीय दशा को देखकर किसी सुज्ञ दयालु पुरुष ने उसके अधेपन को सदा के लिए दूर करने के लिए उसे अस्पताल ले गया। शल्य-चिकित्सा के माध्यम से उसकी रोशनी पर आए पर्दे को दूर करवा दिया। अब वह प्रज्ञाचक्षु नही रहा और आराम से सभी वस्तुए देखने लगा। उसे अब चलने-फिरने में किसी के सहारे की आवश्यकता नही रही। उस प्रज्ञाचक्षु पर सहारा देने वाले ने भी उपकार किया और नेत्र देने वाले ने भी उपकार किया। पर सहारे की अपेक्षा नेत्रदान ही उसके लिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ, क्योकि अब वह स्वय ही देखने में समर्थ हो गया, किसी सहारे की आवश्यकता नही। ठीक उसी प्रकार सासारिक जीवन मे अनेकानेक समस्याओ से उलझे इन्सान की समस्याओ का समाधान करना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि उस पुरुष की प्रज्ञा मे समस्या के समाधान की ही शक्ति उत्पन्न कर देना महत्त्वपूर्ण है। क्योकि समस्याओ के समाधान के लिए तो उसे बार-बार समाधनकर्ता के पास आना होगा। पर समाधानकर्ता गुरु हर समय उपलब्ध नहीं होता। जबकि समस्या कमी भी पैदा हो सकती है। उत्त समस्याओ का समाधान करके प्रज्ञा पाना ही महत्त्वपूर्ण है। जो व्यक्ति को (142)- स्वावलम्बी बनाती हुई जीवन के प्रत्येक कार्य को व्यवस्थित सचालित करती हे। उस स्वावलम्बी प्रज्ञा-बुद्धि को पाने के लिए भीतरी नेत्र को खोलना होगा। उस भीतरी नेत्र को खोलने का ही महत्त्वूपर्ण उपाय है। स्वाध्याय एव ध्यान से भव्य मानव अपने आप में समस्याओ का समाधान करने की वह प्रज्ञा उत्पन्न कर लेता है। जो प्रज्ञा उसकी प्रत्येक समस्या को सुलझाती हुई सच्चा मार्गदर्शन करती है। जिस प्रकार अन्धकार भरे हाल मे सभी प्रकार की सामग्री विद्यमान होने पर भी दिखलाई नहीं देने से वे वस्तुए विद्यमान होकर भी व्यक्ति के लिये उपयोगी नहीं बन पाती है। पर जब वल्व का प्रकाश होता है तो विद्यमान सारी वस्तुए यथावत दिखने लगती है और उनका उपयोग भी व्यवस्थित रूप से किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार विश्व के प्रत्येक मानव को सुख प्राप्त करने के सारे साधन प्राप्त हैं। पर उन साधनो का उपयोग एव प्रयोग कैसे किया जाय, यह यथार्थ रूप में नहीं होने से उन साधनो का दुरुपयोग कर इन्सान अपने ही साधनो से दुखी बनता जा रहा है। इन दुखो से छुटकारा पाने के लिए साधनो का यथार्थ प्रयोग कैसे किया जाय इसके लिए वैसी ही प्रज्ञा का होना आवश्यक है और वह प्रज्ञा, स्वाध्याय एव समीक्षण ध्यान के माध्यम से सहज ही प्राप्त हो जाती है। स्वाध्याय के महत्त्व को समझ लेने के बाद स्वाध्याय क्या है ? यह भी समझ लेना चाहिये। स्वाध्याय मे दो शब्द है। स्व + अध्याय। रव अर्थात अपना अध्याय याने बोध। जिस अध्ययन से हमे अपने आपका बोध हो जाय उसे स्वाध्याय कहते हैं। आज का इन्सान दुनिया भर की बातो का ज्ञान प्राप्त कर रहा । अमेरिका और रूस मे क्या हो रहा हे ? देश का राजनैतिक हालचाल क्या है ? अर्थ तत्र कैसा है ? वैज्ञानिक क्या कर रहे है ? आकाश पाताल में क्या हो रहा है ? इन सबको जानने की बडी तमन्ना है उसमे। इसलिए स्टतही अखदार हाथ मे ले लेता है। टीवी पर विविध कार्यक्रम देखने मेलिन्दनी का बहुमूल्य टाईम खर्च कर देता है और फिर अनी तो क्रिकेट मैच देखने एद सुनने की ललक के पीछे आदमी सब कुछ भूलता जा रहा है। पर इन का इन्सान को कभी शाति नही दी अपितु अशाति ही विद दी है। इसलिए आज के मानव का मानसिक एवं शारीरिक टेन्सन अघिद दा है। यही न (143) मानव मन में स्वार्थ, क्रोध, अह, मोह की भावनाएं विशेष पनपी है। मानव की इस दुखाक्रान्त स्थिति से यह स्पष्ट है कि उसे सुख पाने के लिए बाहरी वस्तु के अवबोध की अपेक्षा भीतरी बोध प्राप्त करना अधिक आवश्यक हो गया है। भीतरी बोध के लिए महत्त्वपूर्ण कडी के रूप मे प्रमु ने स्वाध्याय एव ध्यान को बतलाया है। शास्त्र का अध्ययन, धार्मिक पुस्तको का अध्ययन भी स्वाध्याय का ही एक अग है। क्योकि उनका अध्ययन करने से स्वय का बोध किया जाता है। जिस काच को देखकर काच को नही, स्वय को देखा जाता है। वैसे ही धार्मिक पुस्तको के अध्ययन से पर का नहीं स्वय का बोध प्राप्त करने मे महत्त्वपूर्ण सहयोग प्राप्त होता है। जिस प्रकार प्रारम मे बच्चे को चलने के लिए किसी के सहारे की आवश्यक होती है उसी प्रकार भव्य आत्मा को आत्म बोध एव स्वय पर नियत्रण कैसे किया जाय ? इसकी जानकारी के लिए शास्त्र एव धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। जिससे हम अपनी आन्तरिक प्रज्ञा को जागृत करने मे सफल बन सकते हैं। जिस प्रकार बच्चो को यह बोध कराया जाता है कि विष मारक है। बच्चा इस बात को पकड लेता है। उसकी प्रज्ञा में यह बात जम जाती है। उसके बाद उसके सामने विष आता है तो वह कभी भी उसे खाता नहीं है। क्योकि उसकी प्रज्ञा मे विष की मारकता का बोध अकित हो गया है। उसी प्रकार स्वाध्याय के माध्यम से हमे क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये। इस बात का यथार्थ बोध हो जाता है। जो हमे जीवन के हर मोड पर सच्चा मार्गदर्शन कराने वाला होता है। स्वाध्याय के साथ शारीरिक एव मानसिक समस्याओ का समाधान करने के लिए ध्यान भी उतना ही आवश्यक है। समता विमूति आचार्य श्री नानेश ने ध्यान के लिए समीक्षण ध्यान की अभिनव विधा प्रस्तुत की है। ध्यान और स्वाध्याय के लिए वैसे ही माहौल, वातावरण की आवश्यकता है। कई लोगो की यह धारणा होती है कि स्वाध्याय ही तो करना है, हम घर पर बैठकर भी कर लेगे, उसके लिए किसी स्थान विशेष या सामूहिक रूप की क्या आवश्यकता है। उनके विचार किसी दृष्टि से उपयुक्त हो सकते हैं। पर उसमे सशोधन अपेक्षित है। जिस प्रकार बच्चा अकेला रहकर जितना अध्ययन नहीं कर पाता है, उतना वह स्कूल में जाकर सामूहिक रूप में बैठकर कर लेता है। जिस प्रकार महफिल मे मजा लेने वालों के लिए समूह की आवश्यकता है वैसे ही आत्म चिन्तन के लिए, ध्यान एव स्वाध्याय के लिए उस प्रकार की विचारधारा वाले समूह की आवश्यकता रहती है। जिस समूह -(144)---- से वातावरण वैसा ही बन जाता है। वातावरण का प्रभाव व्यक्ति पर बहुत जल्दी पडता है। आज वैज्ञानिको ने भी इस बात को स्वीकार किया है, व्यक्ति जिस वातावरण मे जी रहा होता है, एक दिन वह भी वैसा ही बन जाता है। ऐसे कई उदाहरण उन्होने जनता के सामने पेश किये हैं। अत स्पष्ट है कि घर पर स्वाध्याय ध्यान करने वाला व्यक्ति, घर के वातावरण से प्रभावित हुए विना नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में उसका ध्यान सही रूप मे बन नहीं सकेगा। अत स्वाध्याय ध्यान के लिए वैसा स्थान एव वातावरण की आवश्यकता रहती है। जिस प्रकार नृतकी के पैर तबले की थाप से स्वत ही थिरकने लगते हैं, वैसे ही उस प्रकार के सौम्य स्थान एव वातावरण मे जाने पर स्वत ध्यान स्वाध्याय करने की भावना स्फूरित हो उठती है। इसलिए निश्चित रथान एव वैसे ही वातावरण का अत्यन्त महत्त्व है। आज के मानव के जीवन का कोई भरोसा नही है। न मालूम वह कर किस समय वह इस शरीर को छोड़कर चला जाय कहा नहीं जा सकता और वह जिन वस्तुओ को प्राप्त करने के लिए दिन रात दौड रहा हे-ऐसी वस्तुए धन, दौलत, परिवार उसे कोई भी नहीं रोक सकता है, न शान्ति ही दे सकता है। अत स्पष्ट है कि शान्ति पाना है तो इन सबसे परे हटकर कुछ समय अपने आप को जानने एव अपनी बुरी आदतो को बदलने लिए स्वाध्याय एव ध्यान मे देना चाहिये। ध्यान मे मानसिक एव शारीरिक समस्याओ का भी सहज समाधान किया जा सकता है। विदेशो मे तो ध्यान एव सकल्प के बल पर कष्ट साध्य कैंसर जैसी बीमारियो का भी इलाज किया जा रहा है। ध्यान एव स्वाध्याय के लिये प्रात काल का समय निश्चित ही महत्त्वपूर्ण है। जैन आगमो की दृष्टि से वह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि उस समय देवताओ को आकारा अदृश्य रूप से गमनागमन होता है। वे भव्यात्माओ को आशीर्वाद देते है। यदि भव्य पुरुष उस समय ध्यान स्वाध्याय आदि शुभ कार्यो मे लगा है तो उसकी इस लोक एव पर लोक दोनों प्रकार की भावनाए पूर्ण हो सकती है। व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाय तो प्रात काल मे व्यक्ति जब उठता है तो उस समय करीब करीब सभी समस्याओ से मुक्त होता है। बीते हुए दाल का कष्ट नीद से दूर हो गया होता है और आने वाला दिन का प्रारम है। उन उस शान्त वातावरण में स्वाध्याय ध्यान करने से उनके मन रूपी पर्दे पर जो शुद्ध विचार अकित होते हैं वह उसके आने वाले समय को निश्चित रूपन सुन्दर बना देते हैं। मे (145) रोगी व्यक्तियो की तरफ ध्यान दिया जाय तब भी ज्ञात होगा कि भले वे रोग से कितने ही दुःखी हो पर प्रातःकाल 3 बजे बाद से करीब आठ बजे तक का समय ऐसा होता है कि उन्हे भी स्वत ही कुछ शान्ति की अनुभूति होने लगती है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाय तो यह स्पष्ट होता है कि दिन भर मानव कुछ न कुछ बोलता रहता है, सोचता रहता है, करता रहता है, और वह सब करीबन स्वार्थ एवं प्रपचो से भरा होता है जिससे वायुमण्डल भी दूषित हो जाता है। यह प्रदूषण व्यक्ति के मानस को भी शात नहीं रख पाता है, पर जब रात्रि व्यतीत होने लगती है तो गत दिन का प्रदूषण ज्ञात होने लगता है और आने वाले दिन की हलचल अभी विशेष रूप से प्रारम नहीं हुई है, इसलिए वह समय बडा शान्त होता है अत प्रातकालीन समय में किया गया शुभचितन व्यक्ति के जीवन मे परिवर्तन लाने के लिए विशेष रूप से सहयोगी होता है। सामूहिक चिन्तन और सामूहिक उच्चारण मे बहुत बड़ी शक्ति होती है, यह बात वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्पष्ट है। वैज्ञानिको ने ऐसे सामूहिक अनेक प्रयोग किये हैं। जो बडे चमत्कारिक घटित हुए हैं। सामूहिक रूप से किसी भी एक वस्तु पर मन को केन्द्रित करके कुछ सोचा जाय तो शीघ्र ही कुछ परिवर्तन होने लगता है। कहते हैं अमेरिका मे नौ सैनिको ने एक साथ एकाग्रता का करीब छ महिने तक प्रयोग कर एक दिन उन्होने गोदरेज जैसी भारी-भरकम आलमारी पर दृष्टि लगाकर मन को एकाग्र कर सोचा- यह आलमारी यहा से खिसककर सामने चली जाय, आश्चर्य की उनके इस चिन्तन से वह आलमारी बिना सहारे निर्देशित जगह चली गई, यह सामूहिक चिन्तन का प्रभाव है। यही नही ध्यान द्वारा दृढ सकल्प के बल पर हम व्यक्तिश. भी बड़े-बड़े काम कर सकते हैं। आवश्यकता है स्वाध्याय के द्वारा अपने आप को समझते हुए ध्यान करने की। सामूहिक आवाज के भी बहुत प्रयोग हुए हैं। एक बार करीब दो हजार सैनिक एक पुल को पार कर रहे थे। उनके पैरो की टाप जो एक साथ उठती एवं पडती थी। उसकी आवाज से पुल टूट गया। फ्रान्स देश की एक प्रसिद्ध महिला वैज्ञानिक मैडम फिनेलांग ने अपने विचारो के अनुसार उच्चारण करने अनेक प्रयोग जनता के समक्ष कर बताए हैं। उसने बोर्ड पर बिजली के दो तारो से सयोजित कर एक चाक रख दी और उसके बाद उसने मन में जिस व्यक्ति के लिए सोच और उच्चारण किया तो चाक के द्वारा बोर्ड पर स्वत ही वैसा चित्र बन गया। ऐसे अनेक प्रयोग फिनेलाग ने फौरेन में कर (146)- अपने मन दिये हैं। अत स्पष्ट है कि हम तो सोचते हैं और बोलते हैं। वह वायुमण्डल मे फैलता है और अन्यो को भी निश्चित रूप से प्रभावित करता है। सामूहिक पैरो की आवाज से पुल तक टूट सकता है तो वेसे ही हम मन को अहिसक भावना से भरकर सामूहिक रूप से जिन शब्दो का उच्चारण करते हैं, उससे भी बहुत बडा चमत्कार घटित हो सकता है। जिसे हम जान भी नहीं सकते हैं। ऐसी अहिसक भावना के साथ किया गया शुद्ध चिन्तन उच्चारण विश्व युद्ध जैसी समस्याओ का भी हल कर सकता है। इन सबसे पहले हमारी आत्मा तो पवित्र होती ही है। प्रात कालीन स्वाध्याय एव ध्यान से आत्मा मे पवित्र ऊर्जा शक्ति, एकत्रित होती है जो उसके समूचे जीवन को पवित्र एव शान्त बनाए रखती है। अत प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि वह अपने देनिक कार्यों में से कुछ समय स्वाध्याय एव ध्यान के लिए अवश्य निकाले जिस प्रकार घडी मे गरी गई चाबी से घडी चौबीस घटे तक चलती है, वेसे ही आत्मा को निश्चित समय पर दी गई स्वाध्याय एव ध्यान साधना रूपी खुराक समूचे जीवन को सचालित करती है। निश्चित स्थान पर निश्चित समय पर पहुचकर को शुद्ध करने का प्रयास करे। हमारी पढी हुई सोची हुई कोई भी बात निरर्थक नही जाती। वह अचेतन मस्तिष्क मे चली जाती है और समय पर वह हमारा सहयोग करती है। जिस प्रकार वर्षों पूर्व बीती घटना, हमे समय पर याद आती है। वैसे ही वर्तमान मे किया गया स्वाध्याय ध्यान वर्तमान को सुधारने के साथ ही भविष्य को भी निश्चित रूप से सुधारता है। अत आलस्य और प्रमाद को छोडकर नवीन जागृति के साथ आगे बढे, स्वाध्याय और समीक्षण ध्यान जैसे कार्यों मे सक्रिय बनकर अपनी आत्मा को जागृत करने का प्रयास करे। यह प्रयास निश्चित रूप से हमे सही बोध देता हुआ मानसिक समस्याओ को समाप्त कर शान्ति देने वाला है। इसमे कोई सन्देह नहीं है। आपका यह कार्य निश्चित रूप से आपकी सन्तान को भी प्रेरित करेगा और उनमे भी सत्य पथ की और बढ़ने की तमन्ना पैदा होगी। अन्यथा आज के युग के विलासी वातावरण एव आधुनिक साधनो का प्रचार घर-घर में दिख रहा है। टी वी पता नहीं आने वाली पीढी को कहा ले जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस बच्चे को आज चौबीस तीर्थकरो के नाम याद नहीं है. नमस्कार मत्र बोलना नहीं आता, उसे पचासो फिल्मी एक्टरो के नाम याद होगे जिसे हाथ जोडना नहीं आता है, वह बच्चा दडी स्टाइल से एक्टरो की एक्टिग कर लेता है। पता नहीं कैसे भद्दे-भद्दे फिल्मी गाने गाते रहता है। (147) अगर यही स्थिति बनी रही तो मानवीय सस्कृति का निकट भविष्य मे कितना भयानक रूप होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। अत अभी से जग जाइये स्वय के साथ ही परिवार मे विनय, नैतिकता, चारित्रिकता, सदाचार बढ़ाने के लिये स्वाध्याय और ध्यान मे लग जाईये। (148)- 13 समीक्षण ध्यान साधना : प्रारम्भिक प्रयोग विधि प्रारम्भिक पद्धति : मानसिक तनाव के बढने से लोगो का ध्यान के प्रति काफी आकर्षण बढा है क्योकि ध्यान, मानसिक तनाव को समाप्त करने का सशक्त साधन है। समता विभूति गुरुदेव आचार्य प्रवर श्री नानालाल जी म सा ने आगम की गहराई मे उतर कर समीक्षण ध्यान का अनुपम मोती हमारे सामने रखा था। जो कि भव्यात्माओ के लिए तनाव मुक्ति ही नही अपितु कर्म मुवित्त काराकर आत्म समाधि देने वाला है। आचार्य प्रवर द्वारा उस समीक्षण ध्यान को पाकर रतलाम, ब्यावर, जयपुर, दिल्ली, जालन्धर, बीकानेर, गगाशहर, देशनोक आदि विभिन्न स्थानो पर ध्यान शिविर लगाए गए। लोगो ने रुचि से भाग लिया। यद्यपि ध्यान, थ्योरी का विषय न होकर प्रेक्टिकल ही अनुभूति का विषय बन सकता है। तथापि समीक्षण ध्यान की प्रारभिक प्रयोग विधि मात्र जानकारी के लिए आपके सामने प्रस्तुत है। आन्तरिक अनुभव तो सगीक्षण ध्यान करने पर ही हो सकता है। इस समीक्षण ध्यान का मूल उद्गम सात भगवान महावीर की वाणी है। जिसका प्रवर्तन आचार्य प्रवर ने किया ! उसकी यहा प्रस्तुति की जा रही है। मुख्य आयाग तीन है- 1 मन को केन्द्रित करना। 2 वृत्तियो का सशोधन करना। 3 आत्म-जागरण परमात्म अभिव्यक्ति । । (149)- 1 दीर्घ श्वास निश्वास सर्वप्रथम रीढ़ की हड्डी को सीधा करके हम किसी भी सुखासन से पालकी लगाकर बैठ जाये और ध्यान के आरम्म से अन्त तक अपनी आसे बन्द रखे क्योकि नेत्र खुले रहने पर ध्यान जल्दी विकेन्द्रित हो जाता है। श्वास को अधिक गहराई से अधिकाधिक रूप मे भीतर ग्रहण करे, उस समय अपने मन को इस तरह से विचारो मे केन्द्रित करे मेरे श्वास ग्रहण करने के साथ ही वायुमण्डल मे व्याप्त शुद्ध मेटर मेरे शरीर में प्रवेश कर रहा है। जो शुद्ध मेटर मुझे विश्व के अनेक महापुरुषो के गुणो से प्रभावित कर सकता है। क्योकि मनोवर्गणा, वचनवर्गणा आदि रूप मेटर वायुमण्डल मे घूमता है यह बात आगम और विज्ञान सम्मत है। आवश्यकता है इसको पकडने की। श्वास के ग्रहण के समय हमारे मन मे यह भी भाव होने चाहिए कि सभी सद्गुण, अहिसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, करुणा, दया, दान आदि आक्सीजन के साथ मेरे शरीर मे प्रवेश कर पूरे अन्तरमन में व्याप्त हो रहे हैं। इस ग्रहण किये श्वारा को पुन बाहर निकालिये। श्वास को निकालते समय मन के भावो को इरा तरह का बनाये कि मेरे अन्दर व्याप्त दुर्गुण, क्रोध, अहकार, कपट, लोम, ईया, राग, द्वेष, मद, मोह बाहर निकल रहे हैं। मैं निश्वास के साथ इन्हे भीतर से बाहर निकाल रहा है। यह क्रिया कम से कम पाच बार अधिक अपनी सुविधानुसार की जा सकती है। 2 पूरक-कुंभक-रेचक : इस प्रक्रिया में सबसे पहले श्वास भीतर ग्रहण करे, पर यह ध्यान रखे जितने समय मे श्वास को भीतर ग्रहण किया जाय उतने समय तक भीतर मे रखे। यदि इतने समय तक भीतर मे रखने मे दुविधा हो तो ग्रहण के समय से आधे समय तक भीतर रखे और ग्रहण जितने समय में किया है उतने ही समय मे श्वास को बाहर निकाले। सर्वप्रथम पाच बार दाये नाक से श्वास ग्रहण कर बाये नाक से निकाले और फिर पाच बार बाये नाक से ग्रहण एव निस्सरण दाये नाक से हो, जिस नाक से श्वास ग्रहण करें उस वक्त पारा वाले नथुने को अगुली से दबा ले। इस प्रक्रिया में हमे इस बात का बराबर ध्यान रखना है कि हमारा मन श्वास के साथ भीतर यात्रा करे हम ध्यान ररो कि हमारा श्वास भीतर मे कहा कहा जा रहा है। अधिकाश व्यक्तियो को यही ध्यान है कि हमारा श्वास फेंकडे और उदर तक ही जाता है, जबकि वस्तु सत्य यह है कि श्वास की गति पूरे शरीर (150).--- । मे होती है। पर सूक्ष्म-सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम होती चली जाती है। अत इस गति को पहचानने के लिये मन को समीक्षण प्रज्ञा से अनुरजित करिये श्वास से होने वाले सवेदन की ओर हमारा पूरा ध्यान होना चाहिये। मन को पूरी तरह श्वास पर केन्द्रित रखा जाये। श्वास से सम्बन्धित यह प्रारभिक प्रक्रिया है। जिससे भी हम अपने चित्त को स्थिर कर सकते हैं। यह प्रक्रिया भी अन्तरग मे प्रवेश करने में सहायक है। 3 भामरी गुंजार : नेत्र तो ध्यान मे आरम्भ से ही बन्द कर रखे हैं। अब दोनो कानो मे भी अगुली डालकर उन्हे बन्द करना है। जिससे बाहर की आवाज हमे सुनाई नहीं देनी चाहिये अब अधिक से अधिक श्वास ग्रहण कर ले। अर्थात् जितनी श्वास खीच सके खीच ले। उसके बाद कान आख तो वन्द है ही, नाक का भी नीचे का हिस्सा बद कर ले, केवल ऊपरी हिस्सा खुला रहे, उस हिस्से मे श्वास को तेजी से निकालने का प्रयास किया जाय। पर नाक के छिद्र सकुचित होने से श्वास जल्दी से बाहर निकल नहीं सकता। ठीक उसी समय श्वास को निकालते समय गले से भ्रमर की गुजार की तरह गुज पैदा करनी है और उस गुज के समय हमारे अगो मे प्रकम्पन कहा-कहा होता है. इस पर हम ध्यान केन्द्रित करे। यह गूज जितनी लयबद्ध होगी, उतना सुखद प्रकम्पन हमारे शरीर मे होगा, दूसरी बार पुन श्वास खीचकर अव नाक का ऊपरी हिस्सा बन्द करके उसी प्रकार की गूज के साथ मन को प्रकम्पन पर केन्द्रित करते हुए श्वास बाहर निकाले, तीसरी बार भी इसी प्रकार करे पर नाक का मध्य भाग बन्द रखे। ऊपर और नीच के हिस्से से श्वास निकाले। यह प्रक्रिया भी अपनी सुविधानुसार चाहे जितनी बार की जा सकती हैं। इस प्रक्रिया से पूरे शरीर मे एक विशिष्ट प्रकार का प्रकम्पन पैदा होता है। जिस प्रकम्पन से शारीरिक मानसिक टेन्सन से मुक्ति के साथ शुषुप्त शक्तियानी जागृत होने लगती है। ब्लड सर्कुलेशन बराबर होने लगता है। मन को केन्द्रीयकरण के साथ आरोग्य लाम भी मिलता है। 4 केन्द्रों पर मन को स्थिर करना : हमारे शरीर मे अनेक केन्द्र हैं, उन सबकी यथावत् जानकारी और उन जागृत करने के प्रयास अभ्यास हेतु बहुत समय चाहिये। समयाल्य होने ने एव समीक्षण ध्यान साधना का प्रारम्भिक चरण होने से पनी हमे दो तीन केन्द्रो पर ही हमारा ध्यान केन्द्रित करना है। सबसे पहले दान केन्द्र ला । (151) शिखर चौटी भाग पर है, जागृत करने के लिए श्वास ग्रहण करने के साथ ही अपने मन को ज्ञान केन्द्र पर केन्द्रित करते हुए यह समीक्षण करने का प्रयास कीजिये कि कहा क्या सघटित हो रहा है। इसके बाद ज्ञान केन्द्र से चार अगुल आगे तालवे के भाग मे शाति केन्द्र है वहा पर अपना मन केन्द्रित करिये और समीक्षण करिये। तदनन्तर ज्योति केन्द्र जो ललाट के मध्य भाग मे स्थिर है, वहा मन को स्थिर करे। श्वास को ग्रहण कर जब तक श्वास बाहर नही निकले तब तक मन को केन्द्रो पर केन्द्रित करे। प्रत्येक केन्द्र पर कम से कम तीन बार प्रक्रिया सघटित करे। बार-बार के इस प्रयोग से हमारे सोये हुए केन्द्र जागृत होने लगते हैं, जिससे हममे अनेक लाभ होते हैं। मन को केन्द्रित करने की प्रक्रिया श्वास प्रक्रिया से अलग हटकर स्वतत्र रूप से यथानुकूल समय तक भी की जा सकती है। ज्ञान केन्द्र पर मन को स्थिर करते वक्त यह भी ध्यान रखे कि हमारे पूरे अन्तरग मे ज्ञान की किरणे व्याप्त हो रही हैं । शान्ति केन्द्र पर केन्द्रित करते समय यह ध्यान रखे कि पूरे अन्तरग मे शान्ति का संचार हो रहा है और ज्योति केन्द्र पर मन को स्थिर करते समय यह ध्यान रखे कि पूरे अन्तरग मे ज्योति पुज प्रसर रहा है। अन्तरग विलक्षण ज्योति से जगमगा उठा है। 5 तृतीय नेत्र जागरण : दोनो आख के ठीक बीच मे भृकुटी मे ध्यान को केन्द्रित करिये ओर देखने का प्रयास करिये। बार-बार मन को वहा दृष्टा भाव से लगाने पर एक दिन आपको विशिष्ट अनुभूतियां होने लगेगी। तृतीय नेत्र का सामान्य जागरण भी भूतभावी स्थितियो को स्पष्ट करता हुआ आपके वर्तमान जीवन को भी सुधारने वाला बनेगा। 6 रीढ की हड्डी में मन को गुजारना : अब एक बार फिर से आप रीढ़ की हड्डी सीधी करलें और श्वास को भीतर खींचकर रीढ़ की हड्डी में मन को इस ढग से सचारित करें कि एक श्वास में कम से कम पाच बार हमारा मन रीढ की हड्डी में ऊपर से नीचे घूम जाये, यह प्रक्रिया कम से कम तीन बार हो, इसके बाद समभाव के साथ कुछ समय तक मन को रीढ़ की हड्डी में केन्द्रित करते हुए समीक्षण करने का प्रयास करें। इससे रीट की हड्डी की स्वस्थता के साथ ही हमे अनेक लाभ हैं वैसे मन को केन्द्रित करन की अनेक प्रक्रियाये है, उपर्युक्त प्रक्रियाओ की भी अनेक विचार हैं। फिलहाल सक्षिप्त मे यह दो चार विधाए ही यहा पर करवाई जा रही है। (152)- र ह म । 7 अहम की ध्वनि : आख, कान को बन्द करके मुह से अर्हम् शब्द के अक्षरो का एक श्वास प्रश्वास मे "अ के रूप मे उच्चारण किया जाये।'अ' के उच्चारण के साथ विशुद्धि केन्द्र "र" के उच्चारण के साथ दर्शन केन्द्र "ह' के उच्चारण के साथ विशुद्धि केन्द्र "म" के उच्चारण के ब्रह्म केन्द्र पर ध्यान होना चाहिये। यह प्रक्रिया कम से कम तीन बार करे। तदन्तर एक श्वास प्रश्वास में दो बार अर्हम शब्द का उच्चारण हो। तत्पश्चात् अर्हम शब्द की लयबद्धता जगाई जाये। लयबद्धता के साथ इच्छानुसार इसका उच्चारण किया जा सकता है और अन्त मे धीरे-धीरे विलिनीकरण हो। अर्हम् शब्द की लयवद्धता के साथ उच्चारण करते वक्त भावो को केन्द्रित करे कि हमारे पूरे अतरग मे अर्हम् की ध्वनि व्याप्त हो रही है। अहम् का बड़ी तेजी से प्रकम्पन हो रहा है। वस्तुत हमारा मौलिक रूप अर्हम् स्वरूप ही है उसे जगाने के लिये अहम् को मन के केन्द्रीयकरण के साथ उच्चारित करना है। तीतर की आवाज से तीतर आते है। वैसे ही अर्हम् का मनोयोग पूर्वक उच्चारण करके हमारे अर्हन्त स्वरूप को प्रकट करना है। अर्हम् शब्दोच्चारण के भी अनेक आयाम हैं तथा अन्य भी अनेक ध्वनियो के उच्चारण का प्रावधान भी हे पर फिलहाल प्रारम्भिक साधना मे मन लगाना है। अर्हम् की ध्वनि के अतिरिक्त नित्योह, बुद्धोह, सिद्धोह, मुक्तोह, निरजनोह, निराकारोह, निरूजोह, अवर्णोह, अगधोह, अरसोह, अफासोह इत्यादि भी ध्वनित किये जा सकते हैं। 8 वृति संशोधन : अव हमे अपनी वृत्तियो का सशोधन करना है। समता विभूति अनन्त- अनन्त आराध्य गुरुदेव (आचार्य श्री नानेश) ने योग की परिभाषा देते हुए बतलाया है कि- योगश्चित वृत्ति सशोध योग से तात्पर्य चित्तवृत्तियो का ससोचन करना है। हमे अपनी दूषित वृत्तियो को दूर करने के लिये सबसे पहले गत 24 घंटे मे हमने क्या किया? किसको क्या कहा ? करना आर कहना. हमारा उचित था या नहीं ? नही कहने से क्या काम नहीं चल सकता था ? यदि चल सकता था तो फिर ऐसा क्यो बोला और किया। अद आगे से ऐसा नहीं करूगा और न ही बोलूगा। इस प्रकार एकावधानता के साथ आलसामी र गत 24 घंटे मे घटित जीवन घटनाओ का प्रतिदिन चितन करें और दिया -(153) के लिये निर्णय ले। जब हमे अपनी गलती ध्यान मे आने लगेगी और हम उसे रोज-रोज निकालने का प्रयत्न करेगे तो एक दिन उसका सशोधन हो जायेगा। क्योकि हमारी ऐसी स्थिति बन गई है कि हम ऐसे ऐसे काम कर डालते हैं जिनकी और हमारा ध्यान तक नहीं जाता। अत प्रतिदिन वृति सशोधन के लिये हम यह चितन बराबर करे, करने और कहने के चितन के साथ ही जब हमारी प्रज्ञा प्रखर होने लगती है। 24 घटे मे मन ने क्या-क्या सोचा यह जो ज्ञान नही हो पाता है पर बराबर अभ्यास से यह भी सघ सकता है। हमे अभी विस्तार में नहीं जाना है। अभी तो वृत्ति सशोधन की गहराईयो मे उतरते जाइये और अपने जीवन को परिमार्जित परिष्कृत बनाते जाइये। प्रतिदिन इस तरह वृत्ति सशोधन की क्रिया और मन चितन से बुरे कार्यों के प्रति स्वत. अरूचि और अच्छे कार्यों के प्रति लगाव होने लगेगा और धीरे धीरे हमारा व्यवहारिक जीवन भी बदलने लगेगा। सच्चा ध्यान वही बनता है जिस ध्यान से हमारा अतरग और व्यवहार बदल जाये। लोगो को हमारा व्यवहार सात्विक, नैतिक एव अध्यात्म से परिपूरित लगे। 9 दुर्गुण मेरा सबसे बडा : गत चौबीस घटे मे सघटित घटनाओ के समीक्षण के बाद यह चितन करे कि मेरे अन्दर सबसे बड़ा दुर्गुण कौन सा है सबसे बडी कमजोरी क्या है। आज इन्सान मे कोई न कोई दुर्गुण तो होता ही है। किसी को क्रोध ज्यादा आता है तो किसी को अहंकार तो कोई छल-छद्म करता है तो किसी को लोम ज्यादा है तो किसी को असहिष्णुता ज्यादा है। हमारे मे सबसे बड़ी कमजोरी क्या है चिन्तन कर उस कमजोरी को पकडे और फिर उसे दूर करने के लिए चिन्तन करे। क्रोध है तो क्षमा का सभी प्रकार से चिन्तन हो और क्षमासागर महापुरुष के जीवन के विषय मे सोचे, इसी प्रकार मान को हटाने के लिए विनय, कपट को दूर करने के लिये सरलता, लोम को हटाने के लिए सतोष, मोह को मिटाने के लिये निरासक्ति भावना का चिन्तन करे। और इनके आदर्शों का भी चिन्तन करे। इस प्रकार जब हम स्वय अपनी गलती को पकडकर उसे दूर करने की कोशिश करेंगे तब एक न एक दिन हम उसगे सफलता प्राप्त कर ही लेगे। वैसे वृत्ति सशोधन भी बहुत विस्तृत है अगी तो यह प्रारम्भिक चरण ही है। 10. समर्पण सर्वतोभावेन : अब हम आत्मस्वरूप को जागृत करने के लिए सबसे पहले जो आत्मस्वरूप को जागृत कर चुके हैं और जो निरन्तर प्रयलशील हैं, उनके प्रति (154)--- 1 - अपना पूर्ण समर्पण करे। अपने अस्तित्व को भूलकर जागृत आत्मा के अस्तित्व मे स्वय को विलीन करने का प्रयास करे। पानी भी दूध मे मिलने पर अपना अस्तित्व छोड देता है तब दूध की सज्ञा पा जाता है। हमे अपने अस्तित्व को अरिहन्त आदि के सानिध्य मे विलीन करना है। इसके लिए एक लयवद्धता के साथ उच्चारण करें और उसके साथ मन मे अरिहतादि के प्रति पूर्ण समर्पणा की भावना पैदा करे। अरिहन्ते शरण पवज्जामि सिद्धे शरण पवज्जामि। साहू शरण पवज्जामि। केवलीपण्णत धम्म शरण पवज्जामि । अरिहन्त की शरण को प्रकर्ष रूप से स्वीकार करता हू, सिद्ध की शरण को प्रकर्ष रूप से स्वीकार करता हू, साधु की शरण को प्रकर्ष रुप मे स्वीकार करता हू। केवली भाषित धर्म को प्रकर्ष रूप से स्वीकार करता है । इस प्रकार से भावनाओ का उभार हमारी चेतना को जागृत करने वाला बनता है। मन का शुभ चिन्तन आध्यात्म भावना के साथ तन-मन को भी स्वस्थ बनाता है। आज तो मनोवैज्ञानिक केसर जैसी असाध्य बीमारियो को भी ध्यान से ठीक कर रहे हैं। 11 अरिहंत ध्यान योग : मन को स्थिर करिये और ध्यान लगाइये कि आपके सामने पद्मासन मे अरिहत देव विराजमान है। उनके पवित्र मुखमण्डल का दर्शन करिये और ध्यान लगाइये कि वे मुझे देख रहे हैं, मैं उन्हे देख रहा है। उनके नेत्रो से तेजस्वी किरणे निकल रही है। जो मेरे भीतर मे प्रवेश कर मेरे अग अग को शक्ति सम्पन्न तेजस्वी बना रही है। इतने मे आशीर्वाद के रूप मे उनका हाथ उठा है। जिसकी हथेली से धाराए निकल रही है। जो मुझे ऊपर से नीचे तक आप्लावित कर रही है, मेरा भावुक मन उत्कठित हुआ और मैंने उनके अगुष्ठ को सिर से स्पर्श किया तो करते ही एक अनूठी शक्ति मेरे भीतर मे आ रही है। मेरे अन्दर और बाहर मे एक पवित्र शाति का सचार होने लगा है। अनूठी शाति को पा गया है। फिर धीरे-धीरे स्वस्थ अवस्था मे आ जाइये। 12 क्रोध समीक्षण : क्रोध मेरा स्वमाव नहीं है। यह ज्यादातर बाहरी निमित्तो से आता है। मै उनका परित्याग करता हूं। क्रोध मेरी आत्मा के लिए हानिकारक है। - । । --- (155).
दृढ सकल्प के साथ छोडता हू। धन्य है क्षमाशील मेतार्य मुनि को, स्काल अणगार को, गजसुकुमाल अणगार को। मैं भी क्षमाशील बन रहा हु । इरा चिन्तन से मेरे क्रोध के लाल परमाणु स्कध हिलने लगे हैं और वे कपाल मे शान्ति केन्द्र मे आए हैं पर शान्ति केन्द्र सक्रिय होने से वे उसका कुछ नहीं बिगाड सके और मुख से बाहर जा रहे हैं। मेरा क्रोध बाहर निकल चुका है। 13 मान समीक्षण : जब दुनिया की कोई भी वस्तु मेरी है ही नहीं तो अहकार किस बात का है। सब यही रह जाने वाले हैं। जिस पर भी अहकार किया, उस स्थिति से मैं गिर जाऊगा। अत अहकार का परित्याग करता हू। धन्य है गौतम स्वामी को जो लब्धियो के भण्डार होकर भी पूर्ण विनीत थे। त्रिसडाधिपति कृष्ण भी माता-पिता आदि का विनय करते थे। विनय से ही उपलब्धि होती है मेरे मे विनय आ रहा है जिससे अहकार के हरे रंग के परमाणु रका पूरे शरीर में एकत्रित होकर गले मे आ गए हैं वहा से वे आगे बढकर नाक रो निकल रहे हैं। मेरी आत्मा से मान निकल रहा है। 14 माया समीक्षण : छल कपट करके किसी को धोखा देना, अपनी आत्मा को ही धोया देना है। माया की वक्रता आत्मा के सहज रूप को दवा देती है। में माया को छोडता हू सरल भाव अपनाता हू। मल्लिनाथ प्रमु को सामान्य सी माया के पीछे स्त्रीलिग मे आना पड़ा। मैं उसे त्यागता हू! माया के आसमानी जामुनी रग के परमाणु स्कध पूरे शरीर से हिलते हुए घुमते हुए कमर के पृष्ठ भाग मे एकत्रित हो गए हैं। वहा से रीढ़ की हड्डी मे से ऊपर की ओर आगे बढत हुए कान से बाहर निकल रहे हैं। में माया रहित हो चुका है। 15 लोभ समीक्षण : जब मेरे जीवन का ही भरोसा नहीं तो लोग-तृष्णा किरा पर कल। इच्छाए आकाश के समान अनन्त हैं। वे कभी पूरी नहीं होती। अत में लाग से हटकर सतोष को अपनाता है। जिस प्रकार कपिल केवली ने सतोप आपना कर सिद्धि पाई थी। वैसे ही मैं भी सतोष भाव मे आता हू। सतोष के प्रसार से लोम के कत्थई रंग के परमाणु स्कघ हिलने लगे हैं, और वे पेट मे एकत्रित होकर नाभि मण्डल से बड़ी तेजी से बाहर जा रहे हैं। मेरी आत्मा लोग ग खाली हो चुकी है। सभी घाती अघाती कर्म हट चुके हैं। अब मेरी अगा (156)- अनन्त लोक की यात्रा करने के लिए ऊपर उठ चुकी है। अनन्त आनन्द में निमग्न हो रही है। 16 चिन्तन कैसा हो: सत्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोद, क्लिप्टेषु जीवेषु-कृषा परत्वम। मध्यस्थ भाव, विपरीत वृत्ती, सदा ममात्मा, विद्धातु देव।। मध्यस्थ भाव, विपरीत वृत्ती, सदा ममात्मा, विद्धातु देव ।। ससार की समी आत्मा पर मेरी मैत्री भाव रहे। दुखी जीवो पर करुणा भाव रहे। विपरीत वृत्ति वालो पर मध्यस्थ भाव रहे। हे प्रमो । मेरी आत्मा में सदा ऐसी अवस्था बनी रहे। 17 कोऽहं मैं कौन हू, कहा से आया हू, कहा जाऊगा! इसका भी शास्त्रीय धरातल पर चिन्तन हो। 18 नवकार ध्यान योग . नवकार मत्र की ध्वनियो से आभा मण्डल को सशक्त एव अन्तरग को विशुद्ध करने के लिए उनका उच्चारण आवश्यक है। आखे बद करके काना मे अगुली डाल ले, ताकि बाहर की आवाज सुनाई न दे। अब नवकार के एक- एक अक्षर को एक श्वास के साथ धीमे उच्चारण करते हुए लम्बा ले आर भीतर मे ध्यान लगाए कि उसमे कहा-कहा प्रकपन हो रहा है। यथा- मो अ रि ण। ण ह ता ण ण। मो सि द्धा मो आ य ण रि या ण। ण मो al व ज्झा या णा ण स व्व सा मो लो ए हू ण। इस प्रकार से सारे अक्षरो का उच्चारण कम से कम 3 वार किया जाय। उसके बाद एक एक श्वास मे एक पद का उच्चारण किया जाय। यह भी तीन बार हो। इसके बाद एक एक श्वास मे एक पद का उच्चारण करती वक्त कान, आख, नाक, मुख एव त्वचा के भीतर हिस्से में उपयोग लगाया जाय। ताकि वे ध्वनिया वहा पहुचकर उसे शक्तिवान बना सके। फिर नदद, का अर्थ चिन्तन किया जाय। (157) नवकार मत्र मे सारे विशुद्ध आत्मा महात्मा एव परमात्माओ का समावेश है। जिनके विशुद्ध परमाणु पूरे ब्रह्माण्ड मे फैले हुए हैं। जिन्हे भीतर मे लेने के लिए स्विच ऑन करना है और वह नवकार है। जिस प्रकार कि लन्दन की ब्राड कास्टिग सुनने के लिए रेडियो का वही से बटन दबाते ही रेडियो तरगे केच करके सुनाता है। वैसे ही नवकार के ये पद विशुन परमाणुओ को केच करके अपने भीतर मे लाते हैं। 19 आत्मा से परमात्मा की ओर : आत्मा का परम स्वरूप उजागर करने के लिये हम अतरग में प्रवेश कर रहे हैं। शरीर मे कही भी दर्द हो गया हो तो स्वस्थ कर ले और पुन सुखासन मे बैठ जाये। सामान्य रूप से चल रहे श्वास पर मन को केन्द्रित कर अपने मन को शात बना ले। अब यह दृढ सकल्प करे कि इस समय मेरा किसी से कोई सम्बन्ध नही है। धन, दौलत, परिवार, मकान आदि सभी से मैं सम्बन्ध तोडता हूं यहां तक कि अपने शरीर से भी परे हटता है। ऐसा दृढ सकल्प मन मे जमा ले। अब चिन्तन करिये कि मेरे दुर्गुण, क्रोध, मान, माया, लोम, राग, द्वेष, विषय, कषाय, ईर्ष्या, मोह, आदि जो विमाव है। वस्तुत मेरे नही हैं। फिर भी मैं चिपका हुआ है। मैं उन सबसे अलग हट रहा हूँ। मेरी आत्मा उन दुर्गुणो से हटकर हल्की हो रही है। आत्मा का मौलिक स्वभाव ऊपर उठना है। आत्मा ऊपर उठ रही है, कर्म टूट रहे हैं। वायु प्रेरित रजकरण की तरह ध्यान समीक्षण से कर्म रजकण आत्मा के प्रदेशो से निकलकर अलग हट रहे हैं। मेरी आत्मा बिल्कुल हल्की हो रही है। ऊर्ध्व मे उडान भरने के लिये तैयार हो रही है। मेरा अन्तरंग विशिष्ट ज्ञान से भर रहा है। पूरा जीवन ज्ञान की ज्योति से जगमगा रहा है। दर्शन चारित्र से भर रहा है। आग शक्ति का पूरे अतरग मे तेजी से सचरण हो रहा है। निरन्तर हो रहा है। मन में तेजी से उभार लाइये। मेरी आत्मा समत्व से भर रही है, क्षमा से भर रही है। मरती जा रही है। भरती ही जा रही है। भरती ही जा रही है। मेरा सिद्ध स्वरूप प्रकट हो रहा है। आत्मा से परमात्मा की अभिव्यक्ति हो रही है। मैं शारवा भाति मे निमग्न हो रहा है। इस प्रकार के विचार से मन मे उभार लाइये। कुछ समय तक अगम लोग की यात्रा करिये। अब धीरे-धीरे मन को पुन शात बनाइये। विचारों के उतार-चढाव को श्वास समीक्षा के साथ समीकरण में ले । आइये। (158)- । 20 प्रतिदिन प्रतिज्ञा करें : परिवार समाज के बीच रहकर यह समव नहीं कि दिन भर ध्यान ही करते रहे वैसे ध्यान तो हर समय चलता ही रहता है कभी शुम तो कभी अशुम। हमारे ध्यान को अशुभ से हटाकर शुम मे लाने के लिये तथा व्यावहारिक जीवन मे ध्यान की प्रविष्टि हो इसके लिये प्रतिदिन कोई भी एक प्रतिज्ञा करे। आज हम क्रोध नहीं करेगे। आज हम अहकार नहीं करेगे। आज हम कपट नहीं करेगे। आज हम अधिक लोम नहीं करेगे। आज हम मोह नहीं करेगे। आज हम ईर्ष्या नही करेंगे। आज हम अपशब्द नहीं बोलेगे। आज हम हिसा को कम करेगे। आज हम झूठ नहीं बोलेगे। आज हम ब्रह्मचर्य का पालन करेगे। हमारी गुणग्राही वृत्ति रहेगी आदि । अनेक प्रतिज्ञाओ मे से प्रतिदिन एक-एक प्रतिज्ञा के पालन का अभ्यास किया जाय। इस प्रकार जो जो बुराइया हमारे मे विशेष रूप से हो उनमे से एक-एक के बारे मे एक-एक दिन उन्हें दूर करने की प्रतिज्ञा करे। और पूरे चोवीस घटे सतर्क रहे। इस क्रिया से हम हमारी साधना का दैनिक जीवन मे और व्यवहार मे प्रयोग करना सीखेगे। जिससे हमारा जीवन निर्मल बनेगा। 21 डायरी हो : एक डायरी रखिये जिसमे प्रतिदिन नोट करे कि हमारा मन ध्यान मे लगा कि नहीं। वृत्तियो मे सशोधन हुआ या नही। हुआ तो कितना हुआ प्रतिदिन नोट करके जरा अपने जीवन की इस खाताबही को मिलाकर देखिये कि महीने पहले मेरे ध्यान की क्या स्थिति थी ? और अब क्या है ? इस चिन्तन से हमे महीने भर की क्रिया का परिणाम ध्यान आ जायेगा। यह समीक्षण ध्यान पद्धति का प्रारम्भिक प्रयोग है। अभी तो समीक्षण ध्यान के अनेक आयाम है। हमे उन सभी की चर्चा मे नहीं उतरना है। पहले जब उपर्युक्त पद्धति का पूरा अभ्यास हो जायेगा तभी आगे चर्चा की जा सकेगी। 22 शरण प्रवेश: परमात्मा की शरण मे जाने वाला व्यक्ति सभी ओर से सुरक्षित हा जाता है। यह सशक्त कवच है। अत शरण प्रवेश के अक्षरो को भी एक-एक करके उच्चारण करे। आख कान बद करले- 1 अ रिह ते श र ण प व ज्जा नि । ? (159)
2 सि हे श र ण प व ज्जा मि
ण प व
प
3 सा हू श र
ज्जा मि
4 के व लि प ण त घ म्म
ण
व . ज्जा मि
इस प्रकार एक-एक श्वास मे अक्षरो को उच्चारण के बाद एक-एक
श्वास पूरे-पूरे एक पद शरण का उच्चारण करो। फिर लयबद्ध उच्चारण करे।
उसके बाद यह सोचकर उच्चारण करे कि अब मैं अरिहत, सिद्ध. साधर्म
की शरण को स्वीकार कर चुका है। एक मेल हो चुका है। जिरा दिन यह
सोच, मजबूत बनेगी। उस दिन भीतर से अचिन्त्य शक्तिया फूट पडेगी।
(160)-
14. ज्वलंत प्रश्न : समाधान (पत्रकार कान्फ्रेन्स मे दिये समाधान) प्रश्न - उत्तर भारत मे ऋषि, महर्षि, त्यागियो का प्रावल्य होते हुए भी नैतिकता एव चरित्र का पतन निरन्तर क्यो हो रहा है ? यह सत्य हे कि भारत मे ऋषि -त्यागी सत बहुत हे ओर वे भारतीयो को नेतिक बनाने का प्रयत्न भी करते हैं। आज से 100 वर्ष पहले भारत मे नैतिकता का विकास था ही किन्तु इस समय त्यागियो के निरूतर प्रचार करने के बावजूद भी नैतिकता तथा चरित्र के निरूतर पतन का कारण हे-अश्लील साहित्य, सिनेमा, नाटक आदि का अत्यधिक प्रचार। अब ता घर-घर मे टी वी पहुच चुका है ओर वीडियो से जो चाहे फिल्म देखी जा सकती है। आज भारत मे जहा देखो वहा अनैतिकता चरित्रहीनता का वातावरण अधिक दिखलाई देता है। आज छोटे बच्चो को सिनेमा के एक्टरी के नाम याद हे पर राम, बुद्ध, महावीर आदि के नहीं। ऐसी स्थिति में त्यागिया के द्वारा नैतिकता एव चरित्र का बरावर प्रचार करने के बावजूद भी भारत में अनैतिकता अधिक पनप रही है। दूसरी बात कुछ अच्छे साधुओं की भी पनी रही है। चरित्रहीन साधुओ के कारण भी युवाओ का मानस विशेषकर पित होने से वे अच्छे साधुओ के सानिध्य का भी लान नहीं उठा पात । दस साधुओ के सानिध्य मे जाने वालो की सख्या नगण्य है। नैतिदाता के बाद के लिए सरकार की ओर से भी कठोर अनुशासन की आवश्यकता है । सब कुछ होते हुए भी भारत मे अन्य देशो की अपेक्षा दया अनुकमा समन्वय, पति-पत्नी मे स्थायित्व भाव, गता-पिता दी सवा साल ऐसे कई विशिष्ट गुण हैं जो अन्य देशो में कर दिटलाई । (161) - प्रश्न क्या कोई उपाय है ऐसा, जिससे भारत में नैतिकता एव चरित्र का विकास किया जा सके, उसे पतन से रोका जा सके ? उत्तर हा उसके अनेक उपाय हैं। प्रथम जो भारत मे अश्लील साहित्य, अश्लील सिनेमा, नाटक आदि एकदम बद होना चाहिये। सभी धर्म प्रवर्तको की ओर से जनता के नैतिक विकास के लिये सभी का एक ही स्टेटमेन्ट निकलना चाहिये। और उसी का प्रचार हो। दूसरा पत्र-पत्रिकाओ को भी चाहिये कि वे अपने पत्रो मे नैतिक एव चरित्र विकास के मेटर को अधिक स्थान दे। ऐसे आदर्श व्यक्तियो का परिचय हो ताकि जनता भी पैसा अनुसरण कर सके। आज के पत्रकारो का ध्यान इस ओर नही बत् है। हर पत्रिका मे प्राय राष्ट्र सम्बन्धी, नेताओ विषयक या देगे, मारकाट एक्सीडेण्ट विषयक समाचार ही पढने को मिलते हैं। अत पत्रकारो का भी इस ओर ध्यान जाना आवश्यक है। क्योकि पत्र-पत्रिका, दूर-दर्शन आदि के माध्यम से जनता का मानस बहुत जल्दी बनाया जा सकता है। प्रश्न कोई ऐसा उदाहरण है कि किसी जैन साधु ने लोगो को सस्कार मुक्त नैतिक बनाया हो ? बहुत उदाहरण हैं। आपके मध्य प्रदेश मे ही ले लो। आज से लगमग 35 वर्ष पहले जैनाचार्य श्री नानालाल जी म सा ने रतलाम, उज्जैन के समीपस्थ ग्रामीण अचलो मे पैदल यात्रा कर बलाई आदि निम्न जाति के लोगो को कुव्यसन मुक्त किया था। आज उनकी संख्या 1 लाख तक पहुर गई हैं। जैन समाज के बड़े-बडे श्रेष्ठी वर्य कई दिनो तक उनके ग्रामो मे पद यात्रा करके उन्हे सत्सस्कारित करने का प्रयत्न करते है। कई बार उन क्षेत्रो मे पैदल यात्रा हुई है। प्रश्न विश्व मे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, क्या उसे दूर किया जा सकता है ? अवश्य दूर हो सकता है पर इसके लिये समी राष्ट्रों को अपना हटाग्रह छोडना होगा। भले निर्गुट सम्मेलनो मे निःशस्त्रीकरण की आवाज उठाई जा रही है, पर विश्व का प्राय राष्ट्र शस्त्रो की होड में अविक लगा है। प्राय सभी के मन में एक ही विचार उठता है कि मेरी शक्ति सर्वाधिक हो, मेरा ही अधिकार क्षेत्र बढे। जब तक यह भावना रहेगी, तब तक प्रायड राष्ट्र को खतरा रहेगा। रूस और अमेरिका चीन आदि जिसे महाशक्ति समझा जाता है, सही देखा जाय तो उन्हे अन्य राष्ट्रों से ज्यादा भय है, करा अमेरिकार उत्तर - उत्तर - (162)- प्रश्न की और अमेरिका रूस की हर गतिविधि की और आखे जमाए हुए हैं। एक दूसरे को परस्पर पूरा भय है। अत यह सुनिश्चित है कि शस्त्रो की होड से कोई भी सुखी नहीं बन सकता है। अगर विश्व युद्ध का खतरा टालना है तो समी राष्ट्र यह निर्णय ले ले कि हम हमारा विकास करेगे। पर दूसरे को कमी हानि नहीं पहुचायेंगे। तब तो विश्वयुद्ध का खतरा टल सकता है। एक पडोसी भी जब दूसरे पडोसी के साथ समन्वय लेकर चलता है। हर व्यक्ति परस्पर विश्वास से चलते हैं तभी गाव और नगर की व्यवस्था सही चलती है तो फिर राष्ट्रो की व्यवस्था बनाए रखने के लिए विश्वयुद्ध को टालने के लिए प्रत्येक राष्ट्र को यह समन्वय एक न एक दिन करना ही होगा। ऐसा समन्वय होने पर पूरे विश्व को अनेक लाम हो सकेगे। वे क्या लाभ हो सकते हैं ? उत्तर- प्रथम तो सभी निर्भय हो जायेगे। आज जो आदमी ही आदमी को खत्म करने के लिये अणु बम आदि बना रहा है उनके निर्माण मे जो प्रतिदिन अरबो रुपये व्यय हो रहे हैं वे बच जाएगे और जो बड़े-बड़े वैज्ञानिको का दिमाग सहारक शस्त्रो के अविष्कार मे लगा है, वे सर्जन मे लगेगे। जब व्यक्ति को मारने के लिए बम बना सकते हैं तो व्यक्ति को स्वस्थ निरोग बनाने के लिये भी ऐसे बम बन सकते हैं जिससे सौ दो सौ किमी मे फैले हेजे का प्रकोप आदि बीमारिया उस बम के डालने से समाप्त हो जाय। दूषित वायुमण्डल नष्ट हो जाय। आज डॉक्टर व्यक्ति-व्यक्ति का इलाज कर सकता है पर वायुमण्डल का नहीं। इसके लिये वैसे ही अणु बम की आवश्यकता है। यह कोई अनहोनी बात भी नही है क्योकि भगवान महावीर परमाणु मे अचिन्त्य शक्ति बतलाई है। जब वह विनाश कर सकता है तो ऐसा सर्जनात्मक कार्य क्यो नहीं कर सकता। बस आवश्यकता है वैज्ञानिको द्वारा प्रयोगात्मक खोज की। यदि इस प्रकार से सर्जनात्मक काम होने लगेगे तो धरती पर मानो स्वर्ग उतर आएगा। जब हर राष्ट्र परस्पर समन्वय के साथ काम करता है तो विश्वयुद्ध का खतरा सदा के लिये समाप्त हो जाता है। जनता को सुखी बनाने के लिये प्रत्येक राष्ट्र को इस विषय मे सोचना ने जरूरी है। प्रश्न - जैनियो मे फिजूल खर्च ज्यादा देखा जाता है ऐसी स्थिति मे उन्हे जन-कल्याण की ओर कैसे प्रेरित किया जाय ? उत्तर- ऐसी बात नहीं है कि जैनियो के द्वारा जन-कल्याण का काम होता ही है। आज भारत मे जैनियो के द्वारा करोडो अरबो रुपये खर्च करके (163) - स्थान-स्थान पर कॉलेज, स्कूल, धर्मशाला, हॉस्पिटल आदि अनेक जन कल्याणकारी कार्य हो रहे हैं। उन सबकी लिस्ट ली जाय तो बहुत लम्बी हो जाएगी। जैनी ही नही, हर समाज मे जन कल्याणकारी कार्य तो होते ही है, किन्तु उसमे कुछ सशोधन की आवश्यकता है। प्रश्न वह सशोधन क्या हो? उत्तर वह यह कि जो भी ऐसे जन कल्याणकारी कार्य करना चाहते हो, वे सभी मिल जाय और फिर मिलकर निर्णय ले कि यहा किरा कार्य की आवश्यकता है। जहा धर्मशाला, हॉस्पिटल, स्कूल तीनो की आवश्यकता हो तो एक-एक कार्य एक-एक वर्ग अपने हाथ मे ले ले तो तीनो कार्य हो सकते हैं। अन्यथा होता क्या है कि अलग-अलग सर्जनात्मक कार्य होते है तो सभी आवश्यक वस्तुओ का निर्माण तो नहीं हो पाता और कभी-कभी तो सारी ही शक्ति एक ही कार्य मे लग जाती है। सभी के द्वारा मिलकर कार्य करने पर कार्य का सर्वेक्षण भी सही ढग से किया जा सकता है। (164)
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