Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Jain Silalaksanghar

Shree Hiralal Jain · 2011/07

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Front matter

- प्रकाशक:- नाथूराम प्रेमी, मन्त्री- माणिकचन्द्र जैन ग्रन्थमाला, हीरावाग, पो. गिरगाँव, बम्बई। (a गा का र्फ भूमिका और अनुक्रमणिका आदिके मुद्रक- मंगेश नारायण कुळकर्णी, कनाटक प्रिंटिंग प्रेस, ३१८ ए, ठाकुद्वार, बम्बई। और शेष संपूर्ण पुस्तकके मुदक- ए.शेस, इडियन प्रेस लिमिटेड, बनारस केष्ट।

. निवेदन दिगम्बर जैन सम्प्रदायके शिलालेखों, ताम्रपत्रों, मूर्तिलेखों और अन्यप्रशस्ति- यो जनधर्म और जैन समाज के इतिहासको विपुल सामग्री बिखरी हुई पड़ी है जिसको एकत्रित करने की बहुत है बड़ी भावश्यकता है । जब तक जैनहितधी' निकलता रहा, तब तक मैं बराबर जैनसमाजके शुभचिन्तकों का प्यान इस ओर माकर्षित करता रहा हूँ। परन्तु अभी तक इस ओर कुछ भी प्रयत्न नहीं हुआ है और जो कुछ पोहासा इधर उधरसे हुभा भी है यह नहीं होने के बराबर है। बनी प्रसन्नताकी बात है कि सबू हीरालालजीकी कृपा श्रीर निस्वार्थ सेवासे माज मेरी एक बहुत पुरानी इच्छा सफल हो रही है और जैन शिलालेससंग्रहका यह प्रथम भाग प्रकाशित हो रहा है। बाबू हीरालालजी इतिहास के प्रेमी और परिश्रमशील विद्वान् हैं। उनके द्वारा मुझे बड़ी बड़ी भाशायें है। वे संस्कृत के एम.ए.है । इलाहाबाद यूनीवर्सिटीकी श्रीरसे उन्हें दो वर्ष तक रिसर्च स्काल- पि मिल पुरी है और इस समय अमरावतीके किंग एडवर कालेज में वे संरक- सके प्रोफेसर है। कारंजाके जैनशानभण्डारोंच एक अन्वेषणात्मक विस्तृत सूचीपत्र सी. पी• गवर्नमेष्टकी ओरसे आपने ही तैयार किया था, जो मुद्रित हो चुका है। आपकी इच्छा है कि शिलालेखसंप्रहके और भी कई भाप प्रकाशित किये जायें और उनके सम्पादनका भार भी भाप ही लेना चाहते हैं। मुझे बाशा है कि माणिकचन्द्र प्रन्यमालाडी प्रबन्धकारिणी कमेटी इस भागके समान भागे भागों को भी प्रकाशित करनेका धेय सम्पादन करेगी। अस्तव्यस्त और जीर्णशीर्ण अवस्थामें परे हुए जैन इतिहासके साधनों को अच्छे रूपमें प्रकाशित रना बढ़े ही पुष्पा कार्य है। निवेदक- नाथूराम प्रेमी

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प्राचीन शिलालेख संग्रह
•ommenामन्यनमायणगगणन
...
Coodootodddtia00RS.भटकaddocure.
AN
श्री मोदी यालगन्दी
(मंयक के पिता )

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समर्पण
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पिवाजी,
आपने अत्यन्त परिश्रम करके मुझे जो कुछ
विद्यादान व धार्मिक ज्ञान दिलाया है,
उसीके फलस्वरूप यह प्रथम
भेंट आपके फरकमों में
सादर समर्पित है।
आपका पुत्र,
हीरालाल
&armammornarmorne

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विषय-सूची ... Preface पृ० प्राथमिक वक्तव्य भूमिका-(प्रवणबेल्पलके स्मारक) १-१६२ चन्दगिरि विन्ध्यगिारे श्रवणबेलगोल नगर प्रवणबेल्गोलके आसपास के ग्राम लेखोंकी ऐतिहासिक उपयोगिता व भिन्न २ राजवंश ५-१२ लेमोका मूल प्रयोजन लेखासे तत्कालीन एसके भावरा अनुमान १२२-१२३ भाचायोग कशावली १२५-१४४ संघ, गण, गच्छ और बलि भेद m-10 भाचायकी नामावली १४९-१६२ .. टेस- ... .. ... .. .. चन्द्रगिरिके चिरालेरा विनयगिरि के शिलालेख ... १५७-२२२ धवणबेलगोल नगर के लेख २३३-२९३ श्रवणबेल्गोलके धामगसके ठेस २९४-२९७ श्रवणबेलगोल और आसपाराके प्रामों के अवधि लेस ३.१-४२. अवविध लेखोंके समयका अनुमान... मणिका ... ... ...

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PREFACE The inscriptions at Sravana Belgola were first collected and publisbed by Nr. & Lewis Rice, C.LE., M.R.A.S., Director of Archaeological Rescarches in Mysore, as far bach as 1889. A thoroughly revised and enlarged edition of the same was brought out by the Late Director of Afysorc Archaeological Researches, Praktana Vimarsha Vichakshana Rao Bahadur R. Narsinhaclar, M A., M.R A.S. While the first edition contained only 144 inscriptions, Rao Bahadur Narsinhachar has brought to light hundreds of other inscrip trons from the same locality and his edition contains no less than 500 of them The site may now be said to be more or less thoroughly explored. These inscriptions have a peculiar interest for the historian in so fu as all of them are associated in one way or another with the ſain Religion. Interest in histoncal researches has of late been awakened in almost all the Important communities of India and it is a happy augury of the times that the Directors of the Manjhachandra Digambara Jan Grothamala have decided to include in their distingu shed senes a set of solumes bringing together in a handy form, all the known inschkians of the Dogamlara fans, thus facilitating the work of the future Jan Histonen it was thought suitable and convenient to start this senes with a volume of Sravana Belzula inscriptions and the work was chtrusted to me Tie prescat edition is based upon the above menuonod two editions. It has, thus, nothing new to offer to the scholar; but to the general reader, Rho is interested in Jan History but who for one reason or another can not go to the previous costly editions in Roman and Katarese characters, this edition has a few advantages. The tert of the sosc, tions is here presented for the first time in Devanagari characters, the numbers of the inscriptions in the previous two editions have been given and the verses have been numbered to facilitate reference; the substance of the inscriptions having portions of Kanarese in them has been given in Hindi; all the important information about Sravana Belgola and its surroundings, as contained in the previous two editions is given in the introduction and the historical importance of the inscriptions from the Jain point of view is more thoroughly discussed and the inder of the names of Jain monke, poets and works has been separated from the gencral inder, My sincere thanks are due to the Mysore Government and its distinguished Directors of Archaeology, mentioned alors, without whoss previons labours this edition would have heen impremsblind to Pandit Nashuram Premi, the able Secretary of the Vinchachandra Digimbira Juina Granthamile without whois iniziative and encouragement the work woul. I have never been urdurtaken. AMRAOTI, King Edward College, HIRALAL Blurch 2/91 1929.

प्राथमिक वक्तव्य भवण बेगोल के शिलालेख सबसे प्रथम मैसूर सरकार की कृपामे सन् १८८५ में प्रकाशित हुए थे। मैसूर पुरातापरिमाग के तत्कालीन अधिकारी हाम राम साहरमे उस समय प्रश्ण धेश्गुल के ४४ लेखों का संग्रह प्रका- शित किया। मंग्रह की भूमिका में राइम साहरने पहले पहल इन लेनों के साहित्य-सौन्दर्य व ऐतिहासिक महत्व की ओर विदापमाज का प्यार भाषित किया ष चन्द्रगुप्त मौर भदाहु वाले मम का विस्तृत विवेचन कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चन्द्रगुप्त ने पपात भद्रया मुनिसे दीक्षा ली भी वश में उन्ही का स्मारक है। तबसे इस प्रभ पर विद्वानों में परावर वादविवाद होता आया है। उन. संह का दूसरा सस्करण अभी सन् १९२२वी में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह के रचयिता मापान विमर्प- विपक्षण र पहादुर भार• रसिंहासारजी है, जिन्होंने धवगवेगोल के पब रेगों की पुनः सूक्ष्मतः जाँच ही प परिश्रमपूरक खोज काकै अन्य सैकड़ों नों का पना एगापा। हम संस्करण में उन्होंने पंच सौ लेसोका मंद किया है व एक विस्तृत व विवाद भूमिका में नहीं के समस्त स्मारकों का वर्णन व लेमों के ऐतिहासिक महाप का विवेचन किया है। किन्तु ये संग्रह कनाली व रोमन लिपिमें प्रमशित किये जाने व पहु- मूल्य होने के कारण बहुतमे इतिहाममियों को उनसे कुछ भ म हो मका और अधिकांश जैन लेखक इनका उपयोग न कर सके । वास्तवमें इन लेम्बों का परिशीलन किये विना बाजकल जैन साहित्यिक, धार्मिक व राजनै- तिक इतिहास के विषय कुछ लिम्बना एक प्रकासे अनधिमार चेष्टा है, क्योंकि पे हम प्रायः समस्त माधीन दिगम्बर जैनाचार्यों के कृत्यों के प्राची. बतम ऐतिहासिक प्रमाण हैं। इस प्रकार के समस्त उपलब्ध जैन लेख जय तक संग्रह रूप में प्रकाशित हो जायगे नवतक प्रामाणिक जैन इतिहास मंतोषजनक रीति से मही लिखा जा सकता। इमी पावश्यकता की भावना से प्रेरित होकर श्रीयुक्त पं. माथूरामजी प्रेमी ने सन् १९२४ में रक्त लेखोंका देवनागरी संस्करण तैयार करने का मुझसे अनुरोध किया। प्रथमत: कार्यभार का ध्यान करके मुझे इसे स्वीकार करने का साहस न हुआ किन्तु अन्तमें लाचार होकर वह कार्य हाथ में लेना ही पड़ा । सन १९२५ में कार्य प्रारम्भ हुआ। आशा की गई थी कि कुछ मासमें ही कार्य समाप्त हो जायेगा। किन्तु कार्य यड़ा होने व मेरे अलाहाबाद से अमरावती आ जाने के कारण वह आशा पूर्ण न हो सकी। अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित हुई और समय बहुत लग गया। किन्तु इपंका विषय है कि अन्ततः कार्य निर्विन पूर्ण हो गया । राइस साहय के संग्रह के १५४ लेखों की, श्रीयुक्त बाबू सूरजभानुजी वकील द्वारा कारी की हुई और पं. जुगलकिशोर जी मुख्तार द्वारा शुद्ध की हुई एक प्रेस कापी मुझे पं. नाथामजी द्वारा प्राप्त हुई। प्रथम यह विचार हुआ कि इन्ही लेखों में नये संस्करण के कुछ चुने हुए लेख सम्मिलित कर प्रथम संप्रद प्रकशित कर दिया जाय । किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर यह उचित न जचा। किसी न किसी ररिये सभी लेख भावश्यक संयने लगे व लेखों का पाठ नये संस्करण के अनुसार रखना भाव- श्यक प्रतीत हुभा । प्रस्तुा संग्रह में पड़े परिश्रम से पाठ शुद्ध कर उसे सर्वप्रकार मूलक अनुपारी रखा है। समाशा भी मूलके अनुसार है यपशि इससे कही कहीं शादी के रूप मपरिचित से हो गये है। किंतु की कठिनाई के कारण कनाड़ी भाग के कुछ दगी का मि स्वरूप यहाँ मही दाया जा सका । उदाहरणार्थ, को पहा' ५०० को भो.. को 1.... को 'ल' से ही सूचित किया है। भूग-शोधन में यया. पारित कर रही थी गई किनकिर भी कुछ छोटी मोठी भशुदिया मा होगई। उलेश के मुभीने के लिये लेकौ की लोक संख्या दे दी गई। यह पाल पूर्व संस्करण में मही है। जहाँ पर प्रथम और तिीय संस्करण के पालों में कुछ विचारणीय मित्रता ज्ञान हुई वही दूमा। पाठ फुटनोरमें दे दिया गया है। बहुत पछा होना परिसो का पूरा भनुपार दिया जा सकता रित इममे या भाकार बहुत वा जाना । भाएर मिन सेखों में थोड़ी भी कनादी भाई उनका हिन्दी भाशा देकर मतोष काना पारे। प्रथम गगम माह मानुमार लडा पधारा म स्पन- प्रवामेन सया गया है। में नये संस्था मायादेपे गये जिसमे भावना होने पर पहले दूसरे मम्बरण प्रमंगोयोगी ला पुगमता से मिलान किया जा सकता है। संस्करण के पाप हेत कहाँ दोही सेयों (.५,.) मा गये हैं व एन. १९४और ४.१- पोपयोगी महीने के नामोड़ दिये गये हैं। इस प्रका दस ग्लो समोरचत हुई उनके स्थार में एपीमाफिमा करांटिका माग ५ मैं मे सुनकर दम लेग सम्मिलित कर दिये गये है। भूमिका का वर्णनामा भाग संबंधा.. भरसिंहाचार के वर्णन के भाधार पाही लिया गया है किन्तु ऐतिहासिक व भाचार्यों के सम्मन्ध का विवेचर पुत बुरा संग्रता से किया गया है। गोमटेश्वर मूर्ति की स्थापना का समय नि व शिलारसा विधन नरसिंहाचारजी के मससे अन्न में इम मैमूर सरकार में उनके पुरातत्व विभाग के सुयोग्य अधि. जारी भूतपूर्व गइम साहब .. मरसिंहापार के बहुत कृतज्ञ हैं। विना उनकी पूर्व सोजों भार अनुपम प्रयास के जैन इतिहास पर यह भारी प्रकाश पाना व इस पुस्तक का प्रसारित होना.माध्य याहम माणिकचन्द्र दि जैन प्रन्यमाला के मश्री पं. माथूरामजी प्रेमी के विशेष रूपसे उपकृत हैं। भारके सस्नेह प्रेरण पार उस्माह क विना हमसे यह कार्य होना माश्य पा। मापने असाधारण विकास होने पर भी धर्य पवा जिससे पंच सुचाररूपसे सम्पादित होमका । पुस्तक के-विशेषत.कनादी अंशों के-कमोजिंग यफ शोधन में सवारों को भारी कठिनाई और विलम्ब का साम्हना करना पड़ा किन्तु उन्होंने योग्यतापूर्वक इस कार्य को निवाहा। इस हेतु इंडियन प्रेम, बसाहारारमैनेजा हमारे धन्यवाद के पात्र हैं। भूमिका की अपूर्णताओं और श्रुटियों का ध्यान जितना स्वयं मुझे है रतना कदाचित् हमारे उदार हृदय पाटकों को न होगा किन्नु विषयकी भोर विद्वानों का लक्ष्य दिलाने के हेतु इन त्रुटियों में पड़ना भी मावश्यक था। यदि इस पुस्तक से जैन ऐतिहासिक प्रभों के हल करने में कुछ भी सहायता पहुंची तो मैं अपने को हतार्य सम्झंगा। यदि पाटकों ने चाहा भौर भविष्य अनुकूल रहा सो दक्षिण भारत के र खोका दूसरा संप्रह भी शीघ्र ही पाठीवी भेंट किया जायगा। विंग एस्पालेश, अमरावती, हीरालाल पाल्गुन का . स.१९८४ }

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शुद्धिपत्र (भूमिका) ७ वेल्गोल सविखना १२४ मापनन्दि आदि थापायों अगदेव नामक भरव बीर १२८ १२८ दयापाल पुपन्द बेल्पोल साइराना १६२४ मापनन्दि भाचार्यो जगदेव के १५ भटत वीरह पदावली दयालपाल ४ पुष्पनान्द (लेस) धीम विष्णुदईनद्वारा २ विष्णुवन नरेश पदों १४ एर पस्ति " धा चामुण्डराज रामचा मृप कुलो... पण्डिताप्य अन्तिम नं.(३५४) ४१ ru चाय विष्णुषनके मंत्री गगरान गगराज मंत्री [द्वारा किया एर पस्तिमें धीशमुगराज राथमाए कुलोपुर परिताप म. १४ (२५४) 10 २१९(11) विजयराध्यप्य विजयराजय १. पक्ति के पक्षात साकार का।

गमिकामे गाना
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metrint.
2.मा.r-int HEROHANI
गा..ARATHI

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२ मादोगोनम्मारक पाराने सन मंगों में भी इस मान का नाम सेर गरोसर, पानपरापमार पाये जाने । 'रेगोन' नाम गभग मानिके एकग में और मगभग माsfi साधिके कमरे मेग Amमाम 'कोन' पारा गाया है। इनमे पीचर citो में गुनगुन और ये मुगुम माम पाये जाने है. येणार गांग माम भी पाया जाता है Pme witm का (का)ोल। antभागोरगण मागमान, manifeवेशनकारनामा AT AIRTET नाम inार भी+ । rniantaram मा पागली. .imamarape हागन निमंत्र- Marriमुना मारिया बोरामा है। Faitan) नामावनिकी गाय * *muttr ना पहारी Traininाबामा की पालकी ran ram naam . . an-

चन्द्रगिरि
A
अतिरिक्त कुरा पस्तियां (जिन-मन्दिर ) मी इम पहाड़ी पर
है। दूसरी बाटी पहाड़ी (चिषक बट्ट), ओमार में पार
की मार, पगिरि के नाम से प्रग्यात है। अधिकार
प्रापानतम लेग पर बस्तियों इसी पहाड़ी पर हैं। कुछ
मन्दिर, लेग प्रादि माम की सीमा के भीतर र प
अशापेगाम के प्रामगाम के ग्रामों में है। म.प
समस्त प्राचीन स्मारक का धन इन चार मां की में करना
टोक दोगा- १) चन्द्रागिरि, (२) विभ्यगिरि, (३) अवर
गाल (पाग) और (४) बम-पास के मामलंग में
२५४मनुमार भवपाल के ममन मन्दिरों की माया
२२६ धान माठ यिन्यगिरि पर, साल पन्द्रगिरि पर पार
भाह प्राम में । पर मेरा में इन परिमयों माममह दियंगम् ।
चन्द्रगिरि
पन्द्रगिरि पर्थव
समुद्र-मन
२,०५० फुट
की धार पर
है। प्राचीनतम मेलों में इस पर्वत का नाम कर (1)
सम्यापु या कल (कनारे )जाताई.
गिरि और कपि-गिरि गाम से भी या पदाही प्रसिद्ध
मदेव मन्दिरको हार हम पर्वत पर शेष भर
एमाग-1..,,,,,
-
माल...
-

अवधयेल्गोल के स्मारक
जिनालय एफ दीवाल के घेरे के भीतर प्रतिष्ठित हैं। इस धेरे
की उत्कृष्ट लम्बाई ५०० फुट और चौड़ाई २२५ फुट है। सब
मन्दिर द्राविड़ी ढङ्ग के घने हुए हैं। इनमें से सबसे प्राचीन
मन्दिर ईसा की पाठवीं शताब्दि का प्रतीत होता है। घेरे के
भीतर के मन्दिरों की संख्या १३ है। सभी मन्दिरी का ढङ्ग
प्रायः एक सा ही है। सभी में साधारणतः एक गर्भगृह,
एक सुखनासि खुला या घिरा हुभा, और एक नवरङ्ग रहता
है। नीचे इस पहाड़ी के सय मन्दिरों व अन्य प्राचीन
स्मारकों का सूक्ष्म वर्णन दिया जाता है:-
१ पार्श्वनाथ यस्ति-इस सुन्दर और विशाल मन्दिर
की लम्बाई-चौड़ाई ५८x२६ फुट है। दरवाजे भारी है।
नयरङ्ग और सामने के दरवाजे के दोनों पर परामदे पने
हुए ६। बाहरी दीयाले स्तम्भी और छोटी-छोटी गुम्मटी से
मी हुई। सप्तफणी नाग की छाया के नीचे भगवान
पारनाथ की १५ फुट पी मनोश मूर्ति है। इस पर्वत पर
यही मूर्ति मनसे विशाल है। मामने छन् और सुन्दर
मानराम्भ गड़ा हुभा है गिग चारों गुयों पर पर यति.
दिमी की मूर्तियां मुदी है। कहा नहीं जा सकता कि इस
मन्दिर निर्माय का ठीक समय क्या है। नगर में एक
पा मारी मंग मुदा दुभा है (संग ०५१) भिगमें 1
म. १.५० में मधिय-मापारि देव के ममाधि-पाचा
मंगर है। पर मन्दिर निमारक विषय की कोई वादा

१ पन्द्रगिरि लेख में नहीं पाई जाती। यों के मानस्तम्भ के विषय में अनन्त कवियव कनाड़ी भाषा के 'येल्गोलद गोम्मटेश्वर- चरित' नामक काव्य में कहा गया है कि उक्त मानस्तम्भ मैमूर के चिष. देव-राज प्रोडेपर नामक राजा (१६७२-१७०४ ईस्वी) के ममय में पु?य नामक एक सेट-द्वारा निर्माण कराया गया था। इसी काव्य के अनुसार मन्दिर की यादरी दीवाल भी इसी सेट ने पनवाई थी। यह काव्य लगभग डेढ़ सा पर्ष पुराना है। २ कत्तले यस्ति-चन्द्रगिरि पर्षद पर यह मन्दिर सबसे भारी है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई १२४४४० फुट है। गर्भगृह के चारों ओर प्रदरिया है। नवरा से सटा हुमा एक मुसमण्डप ( सभा भवन ) भी है और एक पाये पगमा भी। सामने के दरवाजे के अतिरिक इस सारं विशाल भवन में और कोई सिडिकियां व दरवाजे नहीं। पादरी ऊँची दीवाल के कारण उम एक सामने के दरवाजे से भी पूरा-पूरा प्रकारा नहीं जाने पाता। इसी से इस मन्दिर का नाम कत्तले चरित (अन्धकार का मन्दिर) पड़ा है। परा- मदे में पद्मावती देवी की मूर्ति है। जान पट्टटा है, इसी से इस मन्दिर का नाम पधारतीपति मी पड़ गया है। मन्दिर पर कोई शिसर नहीं है, पर मठ में इस मन्दिर का जो मान-चित्र इसमें शिखर दिखाया गया है। इससे जा परता कि किसी समय यह मन्दिर शिवर-पर रहा

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यह लेख चन्द्रगिरि यायें छोर पर सर्वायत्त को भूतियाँ हैं। सभी मूर्तियाँ पद्मासन है। बरामदे के सम्मुस जो बहुत ही सुन्दर प्रवाती (दरवाजा ) है वह पीछे निर्मापित हुमा है। इसकी कारी- गरी देखने योग्य है। । पेरे के पत्थरों पर जाली का काम, जिस पर श्रुतकेवलि भद्रबाहु पौर मौर्य सम्राट चन्द्रगुम क कुछ जीवन-दृश्य खुदे हुए है, भपूर्व फौशल का नमूना है। इसी जाली पर एक जगह 'दासोजः' ऐमा लेस है जो इस प्रोली के पनानेवाले कारीगर का नाम प्रतीत होता है। इसी नाम के एक व्यक्ति ने लेस नं. ५० उत्कीर्य किया है। शक सं० १०६८ का है। यदि ये दोनों व्यक्ति एक ही होता यह प्रतालो शक सं० १०६८ के लगभग की पनी सिद्ध होती है। उपर्युक्त लंस की लिपि भी इसी ममय की बात होती है। मन्दिर के दोनों वाजुनों के कोठी पर छोटे खुदावदार शिखर भी है। मध्य के कोठे के सम्मुख समा-भवन में संग्र- पाल की स्थापना है जिनके सिंहासन पर कुछ लेस भी है। इस मन्दिर का नाम चन्द्रगुप्त-यस्ति पड़ने का कारण यह बतलाया जाता है कि इसे स्वयं महाराज चन्द्रगुम मार्य ने निर्माण कराया था। इसमें सन्देश नहीं कि इम मन्दिर की इमारत इस पर्वत के प्राचीनतम स्मारकों में से है। ४ शान्तिनाप पस्ति -यह छोटा सा जिनालय २४४१६ फुट लम्बा-चौड़ा है । इमकी दीवालों और छत पर ममी वा चित्रकारी के निगान है। शान्दिनीय . 1 मारगोन के स्मारक स्वामी की मूर्ति महामन ११ पुट पो है। मन्दिर के बनने का ममय मात नहीं। ५ मुपायनाप पस्ति-इम मन्दिर की लम्बाई पौडाई २५४१४ फुट है। सुपासनाय स्वामी की पद्मा. मन मूर्ति तीन पापी है, जिसके द्वार गमामयी माग की Pratी। मन्दिर के बनने के पिय की कोई वार्ता Amमरी है। निमम गरिरा- मन्दिर का रोल ४२ x २४ा है। भलामी की पयागन मूर्ति तीन पर । साल में तीर्थकर के पार पक्षिणी mar lami निराजमान है। मंदिर के माग a ur 'गिमारमादि' ( २५६ ) पेमाल है। पिंगा प्रमोवामान: Hingintyार पिलीय, भौगुण के 11 का राग नियमित (नि)का ५, सभा का गही नाम पनि हो। *"surm: भयगर कोई पनि नदी है। पी मन MA निगमलाममा • भामुपगम नि मा भान बनाता tr or main मागला है। Harirritat| Tre 1 चन्द्रगिरि एक मुन्दर गुम्मट भी है। इसमें नेमिनाथ स्वामी की पाप फुट ऊँची मनोहर प्रतिमा है। गर्भगृह के दरवाजे पर दोनों धाजुभों पर प्रमशः यस मार मार यसियो कुमापिहनी की मूर्णिया। थाहरी दीपाले स्तम्भी, मालों और उत्कीर्य या उचेली हुई प्रतिमाभी से अलंकृत हैं। पादरी दरवाजे को दोनो पानुभों पर नीचे की भोर' श्रीचामुण्डराज माडिसिदं' (२२३) मा लेप है। इससे स्पष्ट है कि यह पस्ति स्वयं गजनरेश रापमल के मन्त्री चामुण्डराज ने निर्माण कराई भी पौर उसका ममय ८२ ईस्वो के लगमग होना चाहिये। पर नेमिनाय स्वामी के सिंहासन पर लंस है (६६)कि गङ्गराज सेनापति के पुत्र 'एचप' ने प्रैलोक्यरसन मन्दिर अपरनाम घोप्पयत्यालय निर्माण कराया था। यह लेख सन् ११३८ के लगमग का अनुमान किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि एचय का निर्माण कराया हुमा चैत्यालय कोई अन्य रहा होगा जो प्रबधंम हो गया है और यह नैमिनाय स्वामी की प्रतिमा यहीं से लाकर इस पस्ति में विराजमान करा दी गई है। मन्दिर के ऊपर के सण्ड में एक पार्श्वनाथ भगवान् की तीन फुट ऊँची मूत्ति है। उनके सिंहासन पर लेख है (न०६७) कि चामुण्डराज मन्त्रो के पुत्र जिनदेव ने येलगाल में एक जिन- भवन निर्माण कराया। अनुमान किया जाता है कि इस लेख का तात्पर्य मन्दिर के इसी ऊपरी भाग से है जो नीचे के खण्ड से फूल पीछे बना होगा।

प्रवणबेलगोल के स्मारक शासन बस्ति-मन्दिर के दरवाजे पर जा लैम् शासन नं. ५६) है, जान पड़ता है, उसी से इसका नाम शासनवस्ति पड़ा है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई ५५४ २६ फुट है। गर्भगृह में आदिनाथ भगवान् की पांच फुट ऊँची मूर्ति है जिसके दोनों ओर चौरी-वाहक खड़े हुए हैं। सुखनासि में यक्ष यक्षिणी गोमुख और चक्रेश्वरी की प्रतिमाएँ हैं। बाहरी दीवालों में स्तम्भों और बालों की सजावट है। बीच-बीच में प्रतिमाएँ भी उत्कीर्ण हैं। आदिनाथ स्वामी के सिंहासन पर लेख है (न० ६५) कि इस मन्दिर को गजराज सेनापति ने "इन्दिराकुलगृह" नाम से निर्माण कराया । वाजे पर के लेख मे समाचार है कि शक सं० १०३६ फाल्गुण मुदि ५ को गङ्गराज ने 'परमा नाम के ग्राम का दान दिया। यह प्राम उन्हें विष्णुवर्द्धन नरेश से मिला था। इसी समय से कुछ पूर्व मन्दिर यना होगा। ८ मज्जिगण्णयस्ति-इसको लम्बाई-चौड़ाई ३२४ १६ फुट है। इसमें अनन्तनाथ स्वामी की साढ़े तीन फुट ऊँची प्रतिमा है। माहरी दीवाल के आसपास फूलदार चित्रकारी के पत्थरों का घेरा है। मन्दिर के नाम से अनुमान होता है कि असे किसी मजिगण नाम के व्यक्ति ने निर्माण कराया होगा। पर समय निश्चित किये जाने के कोई साधन उपलब्ध नहीं है। १० एडुकपस्ति-इस मन्दिर का नाम उसके दायों मार पायी वाजू पर की सीढ़ियों पर से पड़ा है। इसकी चन्द्रागिरि लम्याई-चौड़ाई १५४२६ फुट है। प्रादिनाय स्वामी की मूत्ति पांच फुट ऊँची है और प्रभावली से अलंकृत है। दोनों मार चौरी-वाहक रहे हैं। गर्भगृह के बाहर सुरपनासि में यस और यचिपी की मूर्तियां हैं। प्रादिनाय स्वामी के सिंहासन पर लेय है (२०६३) कि इस मन्दिर को राज सेनापति की भार्या लक्ष्मी ने निर्माण कराया था।- ११ सपतिगन्धयारणयस्ति-दोयसलनरेश विष्ण- वर्द्धन की रानी का नाम शान्तल देवी और पनाम 'सवति. गन्धवारण' (सौतों के लिए मत हाथी) था। इसी पर मे इस मन्दिर का यह नाम पड़ा है। साधारणतः इसे गन्ध- वारय-मस्ति कहते हैं। मन्दिर विशाल है जिसकी लम्बाई- चौड़ाई ६८४ ३५ फुट है। शान्तिनाथ स्वामी की मूति प्रभावली-संयुक्त पाच फुट ऊँची है। दोनो पर दो चौरी- वाइक सड़े हैं। सुपनासि में यस पतिथी किम्पुरुष art मदामानसि की मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह के ऊपर एक पाली गुम्मट है। बाहरी दीवाले स्तम्भो मे प्रलंकृत है। दरवाजे पर के लेग्य (०५६ ) और शान्तिनाथ स्वामी के सिंहासन पर लेप (२०६२) से विदित होता कि इस परितको विष्णुपद्धन मरेश की रानी शान्वल देवी ने शक सं० १०४४ में निर्माण कराया था। १२ सेरिनपस्ति-इम मन्दिर के सम्मुख एक सय (क)माकार की इमारत पनी । इसी से इसका १२ স্বধায়াল * নাঙ্ক। नाम तेरिनयस्ति पड़ा है। इसमें पाहुयलि स्वामी की मूर्ति है। इसी से इसे याहुबलि पस्ति भी कहते हैं। इसकी लम्बाई चौड़ाई ७०४२६ फुट है। याहुलि स्वामी की मूर्ति पाँच फुट ऊँची है। सन्मुख के रथाकार मन्दिर पर चारों ओर पावन जिन-मूर्तियां खुदी हुई हैं। मन्दिर दो प्रकार के होते हैं नन्दी. श्वर और मेरु। उक्त रथाकार मन्दिर नन्दीश्वर प्रकार का कदा जाता है। इस पर के लेख (नं० १३७ शक सं० १०३८) में विदित होता है कि इस मन्दिर और पति को विष्णुवर्द्धन नरेश के समय के पोयसल सेठ की माता माचिकव्ये और नेमि सेठ की माता शान्तिकव्वे ने निर्माण कराया था। १३ शान्तीश्वर वस्ति-इसकी लम्बाई-चौड़ाई ५६ ४३० फुट है। यह मन्दिर ऊँची सतह पर बना हुआ है। इसकी गुम्मट पर अच्छी कारीगरी है। गर्भगृह के बाहर सुखनासि में यक्ष-यत्तियों की मूर्तियाँ हैं। पीछे की दीवाल के मध्य-भाग में एक माला है जिसमे एक खड्गासन जिन-मूर्ति खुदी हुई है। इस मन्दिर को कम और किसने निर्माण कराया, यह निश्चय नहीं हो सका है। १४ फूगेब्रह्मदेवस्तम्भ-यह विशाल स्तम्भ चन्द्रगिरि पर्वत पर के घेरे के दक्षिणी दरवाजे पर प्रतिष्ठित है। इसके शिखर पर पूर्वमुखी प्रझदेव की छोटी सी पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। इसकी पीठिका पाठों दिशाओं में पाठ हस्तियों पर प्रतिष्ठित रही है पर भय केवल थोड़े से ही हाथी चन्द्रगिरि रह गये हैं। स्खम्भ के चारों ओर एक लेस है (नं. ३८) (५६) जो गङ्गनरेश मारसिंह द्वितीय को मृत्यु का स्मारक है। इस राजा की मृत्यु सन् २७४ ईस्वी में हुई थी। प्रवः यह स्तम्भ इससे पहले का सिद्ध होता है। १५ महानयमी मण्डप-फत्तले पस्ति के गर्भगृह के दक्षिण की मोर दो सुन्दर पूर्व-मुस चतुस्तम्भ मण्डप बने हैं। दोनों के मध्य में एक एक लेखयुक्त स्तम्भ है। उत्तर की पोर के मण्डप के स्तम्भ की बनावट पहुत सुन्दर है। उसका गुम्मटाकार शिखर बहुत ही दर्शनीय है। इस पर के लेख नं० ४२ (६६) में नयकीर्तिमाचार्य के समाधि-मरण का संवाद है जोसन् १९७६ में हुमा । यह सम्म उनके एक आवक शिष्य नागदेव मन्त्री ने स्थापित कराया था। ऐसे ही अन्य अनेक मण्डप इस पर्वत पर विद्यमान हैं जिनमें लेख-युक्त स्तम्भ प्रतिष्ठित है। एक चामुण्डराय पस्ति के दत्तिण की पोर, एक एरडुको वस्ति से पूर्व की पोर मार दो वेरिन बस्ति से दतिय की और पाये जाते हैं। १६ भरतेश्वर-महानवमी मण्डप से पश्चिम की ओर एक इमारत है जो प्रथ रसोईघर के काम में मादी है। इस इमारत के समीप एक नव फुट ऊँची पश्चिममुख मूति है जो पाहुबलि के भ्राता भरतेश्वर की पवलाई जाती है। मूधि एक भारी पट्टान में घुटनों तक खोदी जाकर मपूर्ण छोड़ दी गई है। इम मृत्ति से थोड़ी दूर पर जो शिलालेख नं० २५ (११) है । श्रवणबेलगोज के स्मारक उमसे अनुमान होता है कि वह किसी परिट्टीनेमि नाम के कारीगर की बनाई हुई है। पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता क्योंकि लेख का जितना भाग पढ़ा जाता है उससे केवल इतना ही अर्थ निकलता कि 'गुरु परिट्टोनेमि' ने पनवाया । पर क्या बनवाया यह कुछ स्पष्ट नहीं है। परि- होनेमि अरिष्टनेमि का अपभ्रंश है। लेख ईसा की नवमी शताब्दि का अनुमान किया जाता है। १७ इरुवे ब्राध्यदेव मन्दिर जैसा कि ऊपर फह प्राये हैं, केवल यही एक मन्दिर इस पहाड़ी पर ऐसा है जो घेरे के बाहर है। यह घेरे के उत्तर-दरवाजे के उत्तर में प्रतिष्ठित है। यहाँ ब्रह्मदेव की मूत्ति विराजमान है। सम्मुख एक वृहत् चट्टान है जिस पर जिन-प्रतिमाएँ, हाथी, स्तम्म प्रादि खुदे । कहीं-कहीं खोदनेवालों के नाम भी दिये हुए मन्दिर के दरवाजे पर जो लेख (नं० २३५) है उसकी लिपि से यह दसवीं शताब्दि के मध्य भाग का अनुमान किया जाता है १८ कश्चिन दोरी-इरुवेब्रह्मदेवमन्दिर से वायव्य की और एक चौकोर घेरे के भीतर चट्टान में एक कुण्ड है। यही कश्चिन दोघे कहलाता है। 'दो' का अर्थ एक प्राकृतिक 'कुण्ड होता है और 'कश्चिन' का एक धातु जिससे घण्टा प्रादि धनते है।। कहा नहीं जा सकता कि इस कुण्ड का यह निमियों पड़ा। यहाँ कई छोटे-छोटे लेख हैं। "मुरुकल्लंकदम्य तरसि' (२८२) अर्थात् कदम्ब की प्राज्ञा - एक लेख - चन्द्रगिरि से तीन शिलाएं पहा लाई गई। इनमें की दो शिलाएँ अप भी यहाँ विद्यमान है और तीसरी शिला टूट-फूट गई कुण्ड के भीतर एक सम्म है जिस पर यह लेस है-'मानभ आनन्द-संवध्वदल्लि कट्टिसिद दोणेयुः (२४४) अर्थात् इस कुण्ड को मानम ने मानन्द-संवत्सर में धनवाया था। यद संवत् सम्भवतः शक सं०१११६ होगा। १८ लक्किदोणे-यह दूसरा कुण्ड घेरे से पूर्व को मोर है। सम्भवतः यह किसी लकि नाम की स्त्रीद्वारा निर्माण कराये जाने के कारण लकिदोष नाम से प्रसिद्ध हुमा है। कुण्ड से पश्चिम की ओर एक घट्टान है जिस पर कोई वीस छोटे-छोटे लेस हैं जिनमें प्रायः यात्रियों के नाम पङ्कित इनमें कई जैन भाचार्यों, कवियों और रामपुरुषों के नाम हैं (40 २८४-३१४)। २० भद्रयाहु की गुफा-फहा जाता है कि प्रन्तिम श्रुत-केवली भद्रबाहु स्वामी ने इसी गुफा में देवात्सर्ग किया था। उनके परप इस गुफा में प्रतित हैं और पूजे जाते हैं। गुफा में एक लेख भी पाया गया या (न०७१ (१६६) पर यह लेस अप गुफा में नहीं है। हाल हाल में गुफा के सन्मुस एफ भदा सा दरवाजा बनवा दिया गया है। २१चामुण्डराय की शिला-चन्द्रगिरि पर्वत के नीचे एक पट्टान है जो इस नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि चामुण्डराय ने इसी शिला पर खड़े होकर विभ्यगिरि पर्वत की জঘনাল মা मोर पान पलाया गा जिममे गोम्मटपर की गाजर्मि प्रकट हुई थी। गिला पर कई जैन गुरुषों के मिनिममें नाम भी प्रदिन है। चन्द्रगिरि पर्वत पर के अधिकांग प्रापीनतम गिनाने याता पार्श्वनाथ पति के जिसकी शिला पर परकीया उम शिक्षा पर जो शामन यति और पामुण्यराय बलि के सन्मुम है। विन्ध्यगिरि यह पर्वत दोहोट्ट प्रर्धान बड़ी पहाड़ी के नाम से भी प्रख्यात है। यह समुद्रतल से ३,३४७ पुट और नीचे के मैदान से लगभग ४७० फुट ऊँचा है। कभी-कभी इन्द्रगिरि नाम से भी इस पर्वत का सम्योधन किया जाता है। पर्वत के शिखर पर पहुँचने के लिये नीचे से लगाकर कोई ५०० सीढ़ियाँ बनी हुई है। अपर समवल चौक है जो एक छोटे घेरे से घिरा हुमा है। इस घेरे में यौच-बीच में वलपर हैं जिनमें जिन-प्रतिबिम्ब विराजमान हैं। इस घेरे के चारों ओर कुछ दूरी पर एक भारी दीवाल है जो कहीं-कहीं प्राकृतिक शिलाओं से बनी हुई है। चौक के ठीक बीचो-बीच गोम्मटेश्वर की वह विशाल खड़ासन मूर्ति है, जो अपनी दिन्यता से उत्त समस्त भूभाग और पवित्र कर रही है। को मलत - । विन्यगिरि गोम्मटेश्वर-यद नन, उत्तर-मुग्म, महामन भूनि ममम्त मंमार की प्रार्यकारी पस्नुपी में गेहै। मिर के पास बराल, कान पई पार लग्य, पराग्थल चौहा, विगान वार नीर को लटकते हुए पार कटि किश्चिम जीण है। मुग्प पर कान्ति और प्रगाध शान्ति। घुटनों से फूष पर नक पमीठे दिपाये गये जिनमें पप निकम । दाना पंग और पार से माधवी लता लिपट रही है विग पर भी गुण पर प्रटल भ्यान मुदी विराजमान है। मृति पया है मानो तपस्या का अवतार दी। सरप पदादी भव्य पार प्रभावोत्पादक है। सिंहासन एक प्रष्ष कमल कंपाकार का बनाया गया इम कमल पर पाय परप के मीर्ष तीनपुर पार मार मा तुपा। कहा जाता है कि एक स्टार गुपित करने पर गति की पाई निकाती। जो শিকা कार ने किसी प्रकार माप लियादा गा। निग्मन्दं मूर्तिकार ने अपने दम पूर्ण प्रयास में अनुपम मफलता प्राप्त की। एशिया पणमा गमार भूतान का विपरयकर मारणे, गट पर की तुमना ari पानी मूर्ति मापी कपिन गोरगी। परिषमीय विद्वानी मनिका मूर्तिको मार्ग पर m गये। तो भारी पोर प्रथम पापा पर निशान कारीगर निगम में अपनी जीभ से भात * गतिका मानक देव गई गंगामा ।

कम से १८ प्रवणबेलगोल के स्मारक सम्भव नहीं जान पड़ता कि ५७ फुट की मूर्ति खोद निकालने के योग्य पापाय कहीं अन्यत्र से लाकर उस ऊँची पहाड़ी पर प्रतिष्ठित किया जा सका होगा। इससे यही ठीक अनुमान होता है कि उसी स्थान पर किसी प्रकृतिप्रदत्त स्तम्माकार चट्टान को काटकर इस मूर्ति का आविष्कार किया गया है। कम एक हजार वर्ष से यह प्रतिमा सूर्य, मेघ, वायु आदि प्रकृति- देवी की अमोघ शक्तियों से बातें कर रही है पर अब तक उसमें किसी प्रकार की थोड़ी भी क्षति नहीं हुई। मानो मूर्ति कार ने मसे आज ही उद्घाटित की हो। एक पहाड़ी के ऊपर प्रतिष्ठित इतनी भारी मूर्ति को मापना भी कोई सरल कार्य नहीं है। इसी से उसकी ऊँचाई के सम्बन्ध में मतभेद है। पुचानन साहब ने उसकी ऊँचाई ७० फुट ३ इथ और सर अर्घर पेल्सली ने ६० फुट ३ इश्य दी है। सन १८६५ में मैसूर के चौफ कमिश्नर मि० पौरिंग ने मूर्ति का ठीक ठीक माप फराकर उसकी ऊँचाई ५. फुट दर्ज की थी। सन् १८७१ ईस्वी में मस्तकाभिषेक के समय कुछ सर- कारी अकमरों ने मूत्ति का माप लिया था जिससे निप. लिम्पित माप मिले :- परप से कर्म के प्रधाभाग तक * अधोमाग से मस्तक तक (लगभग) विन्ध्यगिरि . पद की लम्याई घरप के पप्रभाग की पाड़ाई परप का अंगुष्ठ पादपृष्ठ की ऊपर की गुलाई अंपा की म गुलाई नितम्य मे कर्यक पृष्ठ-प्रशिधामागसे कई क.-. माभि के नीचे उदर की चोदाई कटि की पाड़ा कटि और रेहमी से की नक पागूल से करक वसायल की पीड़ाई मोबाधामागसेकर्षक वजनी की लम्बाई मायगा की लम्बाई प्रनामिका की लम्बाई कनिष्ठिकाकी लम्बाई लगभग एक माग पुराने 'मरमानषितादि काम्प करिति गाता पनि बनाये गए मगर शोक मिनं जिनमें गामघर मूनि माप लार अंगु मेरि मलम भोग से पता पहारेक

२०
श्रवणबेलगोल के स्मारक
मैसर-नरेश कृष्णराज प्रोडेयर तृतीय की प्राज्ञा से कवि ने स्वयं
ये माप लिये थे। ये श्ोक नीचे उद्धृत किये जाते हैं।
जयति बेलुगुल-श्री-गोमटेशोस्य मूर्त:
परिमितमधुनाई वच्मि सर्वत्र हात् ।
खसमयजनानां भावनादेशनार्थ
परसमयजनानामद्भुतार्थ च साक्षात् ॥ १॥
पादान्मस्तकमध्यदेशचरम पादार्ध-युगातु पट्-
त्रिंशद्हस्तमितोच्छयोस्ति हि यथा श्रीदोलि-स्वामिनः ।
पादाविंशविहस्तसन्निममिति भ्यन्तमस्त्युच्छ्यः
पादार्धान्वितपोडशोच्यभरा नाभेरिशरोन्वं तथा ॥२॥
चुयुकन्मूर्ध-पर्यन्तं श्रीमद्वाहुयलीशिनः ।
प्रस्त्यङ्गुलि त्रयी-युक्त-हस्त-पटकप्रमोच्छयः ॥३॥
पादत्रयाधिक्ययुक्त-द्विहस्तप्रमिताच्यः ।
प्रत्येक कर्ययोरस्ति भगवदोबलाशिनः ॥४॥
पश्चाजपलीशस्य तिर्यग्भागेस्ति कर्णयोः ।
अष्ट-इस्त-प्रमोच्द्रायः प्रमाद्भिः प्रकीर्तितः ॥ ५॥
सोनन्देः परितः कण्ठं तियंगस्ति मनोहरम् ।
पाद-नयाधिक-दश-इस्त-प्रमित-दीर्घता ॥६॥
मुनन्दा तनुजस्यास्ति पुरस्तात्कण्ठ-सूरमयः ।
पाद नयाधिक्य-युग्म हस्त-प्रमिति निश्चित: ॥७॥
भगवद्गोमटेशस्योगयोरन्तरमम्य वे।
नियंगायतिरस्यय मलु पाडरा-इस्त-मा ॥८॥

विन्ध्यागिरि पघुक-संलक्ष्य रेयाद्वितय-दीर्घ ता । नवाडुलाधिस्ययुक्तचतुईम्तप्रमेशितुः ॥ ६ ॥ परिता मध्यमेवम्य परीवत्वेन विस्तृवः । प्रति विशतिहस्तानी प्रमाणे दायली शिनः ॥ १० ॥ मध्यमाहुन्निपर्यन्तं स्कन्धादर्पत्वमाशितुः । पाहु-युग्मस्य पादाभ्यो युवाधादशहस्तमा ॥ ११॥ मणिबन्धम्यास्य विर्यवपरीतत्यातरमन्मतः । द्विपादाधिक-पर-दल-प्रमाण परिगण्यते ॥ १२ ॥ दस्ता टोरायोस्त्यस्यकाष्टापद्विदनमा । लख्यते गोम्मटेगम्य अगदाश्चर्यकारिधः ।। १३ ।। पादाटस्याम्य दर्य द्विपादाधिकता-युमः । चतुष्टयम्य दलाना प्रमाणमिति निशिवम् ॥ १४ ॥ दिष्य श्रीपाद-दीर्घस्य भगवतीमटेशिनः । मैकाल-चतुर्दल-प्रमाणमिति बदितम् ॥ १५ ॥ मोमटणगृपालकारितमहामगेक-पूजासो शिष्ट पा तस्य कटारोपिरगृतक्षातन गातन है। मानीत कविपनापरयुगतर-मोशान्तरान तह वीरपर परिमायलगिहाकारोदमेतद्विभोः ॥1॥ इसका निममेखिव तात्पर्य निकमताt:- रसगुल पाप से मन १ A भारत के मारक सगुण गुिन में मातम - १५ मेरा wumauni मा मात्र . +mantu t| Ham • mratathi upane . . म । विन्ध्यगिरि २३ नाम पभदेव प्रथम तीर्घदूर के पुत्र थे। इनका नाम पाहुवलि या भुजाले भी था। इनके ज्येष्ठ भाता भरत थे। अपभदेव के दौसा धारण करने के पश्चात् भरत और बाहुपलि दोनो भ्राता में राज्य के लिये युद्ध हुमा जिसमें याहुबलि की विजय पर संमार की गति से विरक हो उन्होंने राज्य अपने ज्येष्ठ भ्राता भरत को दे दिया और पाप तपस्या के हेतु यन को पर्ने गये। घोड़े ही काल में घोर तपस्या कर उन्होंने केवल शान प्राम किया। भरत ने, जो मप चक्रवर्ति राजा हो गये थे, पांदनपुर में उनको शरीगकृति के अनुरूप ५२५ धनुप की प्रतिमा स्थापित कराई। समयानुसार मूर्ति के मामपास का प्रदेश कुर फुट-मर्पो से व्याम हो गया जिमसे उस मूर्ति का नाम कुक्कुटेश्वर प६ गया। धोर-धोरे यह मूत्ति लुप्त हो भार उसके दर्शन कंवल दीक्षित व्यक्तियों को मंत्रशक्ति से प्राप्य हो गये। पामुण्डराय मंत्री ने इस मूर्ति का वर्णन सुना और उन्हें उसके दर्शन करने की प्रभिलापा हुई। पर पोदनपुर की यामा प्रशक्य जान पन्होंने उमी के समान स्वयमूर्चि स्थापित कराने का विचार किया और तदनुमार इस मूर्ति का निर्माण फराया। इस वार्ता के परचान लेय में मूर्ति का वर्णन है। यही वर्दन थोड़े बहुत हेर-फेर के माय भुजगलियतक, भुभयलि. परित, गोम्मटेयर-चरित, राजापलिकया और स्थलपुराण में भी पाया जाता है। इनमें से पहले काम्य को छोड शेष सप कनाड़ी भाश में हैं। ये मय अंघ १६षों 1 अवयोलगोल के स्मारक शताब्दि से लगाकर १८वीं शताब्दि तक के हैं। भुजलि- चरित में वर्णन है कि मादिनाथ के दो पुत्र थे; भरत, रानी यशस्वती से और भुजयलि, रानी सुनन्दा से । भुजपलि का विवाद इच्छा देवी से हुमा या और घे पोदनपुर के राजा थे। कुछ मतभेद के कारण दोनों भाइयों में युद्ध हुभा और भरत को परामय हुई। पर भुजपलि राज्य त्यागकर मुनि हो गये। ५२५ मारु- प्रमाण भुमपलि को स्वर्ण मूर्ति पनवाफर स्थापित कराई। फुकुट सर्पो से ज्यात हो जाने के कारण केवल देव दी इस मूर्ति के दर्शन कर पाते थे। एक जैनाचार्य जिनमेन दक्षिण मधुरा को गये और उन्होंने इस भूमि का वर्णन चामुण्डा राय की माता कालल देवी को सुनाया। उसे सुनकर माती ने प्रय किया कि जब तक गोम्मट देव के दर्शन न कर भूगी, नहीं मारेंगी। जर अपनी पत्नी प्रजितादेवी के मुम्ब पर गंवाद चामुणराय सना तर अपनी माता को लेकर पोदनपुर की यात्रा को निकल पड़े। मार्ग में उन्होंने अप- अंगाल की पन्द्रगुप्त पम्नी में पारनाथ भगवान के दर्शन किये और भद्रबाहु के चरणों को बन्दना की। सी रात्रि को पावती देवी ने दिया कि कृषकुद मोके कारण पोदनपुर की बन्दना तुम्हारे लिये पगम्भर है। पर तुम्हारी काला बायो गाने में की गुदीपप्रभाग र मांडलगुरी प्रभाग मा मनाला 'म'rt , चिम्यागिरि भाष से प्रगमकर गोम्मटभर पुरेपहीपती पहाडी (विस्य. गिरि ) पर दर्शन देंगे। तुम शुद्ध होकर हम खाटी पदादी (पन्द्रगिरि ) पर से एक वर्ष थाप दाड़ी, और भगवान के दर्शन करो। मात्र श्री को भी ऐमा हो म हुमा। दमरे दिन प्रात:काल दी पामुण्टराप में मान-पूजन से गुल ही दाटी पहाड़ी की एक शिला पर स्थित होकर, परिप दिशा की मुर फरकं एक रस वाश छाडा जो पडो पहाड़ों के मानक परकी शिना में जाकर लगा। बाद में लगतेदी गोम्मद स्वामी का मस्तक गिपर हुमा। फिर जैनगुरु ने हीरे की दैनी पार मोदी के पौड़े से म्यादी गिला पर प्रहार किया त्यादी शिला के पापाय-यण ममग जा गिरे पार गोम्मटेश्वर की पूरी प्रतिमा निकल पाई। फिर कारीगरों से पामुण्डराय ने दक्षिण पाजू पर मदेव मदित पाताल गम्म, सन्मुग्य प्रादेव- महित यम-गम्य, ऊपर का पण्ड, प्रमदित स्यागद कम्य, प्रम्य पागिनु नामक दरवाजा मार यम-तत्र माढ़िया पनवाई। इसके पश्चात् प्रभिषेक की नैयारी हुई। पर जितना भी दुग्ध चामुण्डराय ने एकत्रित कगया उससे मूर्ति की जंपा से नीय के मान नहीं दीमके। पामुण्डराय ने घबराकर गुरु से सलाद ली। उन्होंने पादेश दिया कि जो दुग्ध एक पृद्धा खो अपनी 'गुष्ट कायि' में लाई है उमसे स्नान करामा। माश्चर्य कि पस प्रत्यल्प दुग्ध की धारा गोम्मटेश के मस्तक पर छोड़ते दी ममस्त मूचि के मान हो गये और मारी पहाड़ी पर दुग्ध श्रवणबेलगोल के स्मारक पहाड़ी पर विराजमान कर उनको पूजन-अर्चन किया करते थे। जाते समय वे इन मूत्तियों को उठाने में असमर्थ हुए, इसी से वे उन्हें उसी स्थान पर छोड़कर चले गये। उपर्युल्लिखित प्रमाणों से यह निर्विवादत: सिद्ध होता है कि गोम्मटेश्वर की स्थापना चामुण्डराय द्वारा हुई है। शिलालेख नं०८५ (२३४ ), १०५ ( २५४ ), ७६ (१७५) और ७५ (१७८) भी यही बात प्रमाणित करते हैं। शिलालेख नं. ७५, ७६ मूर्ति के आस-पास ही खुदे हैं और मूर्ति के निर्माण समय के ही प्रतीत होते हैं। चामुण्डराय कौन थे? भुजबलिशतक आदि प्रन्यों से विदित होता है कि चामुण्डराय गगनरेश राचमल्ल के मन्त्री थे। शिलालेख नं० १३७ (१४५) से भो यही सिद्ध होता है। राचमल्ल के राज्य की अवधि सन् ६७४ से ६४ वक बांधी गई है। अतः गोम्मटेश्वर की स्थापना इसी समय के लगभग होना चाहिये। चामुण्डराय का पनाया हुमा एक चामुण्डराय पुराण मिलता है। इसमें पंथ- समाप्ति का समय शक सं० २०० (सन् १७८ ईस्वी) दिया हुआ है। इसमें चामुण्डराय के कृत्यों का वर्णन पाया जाता है पर गोम्मटेश्वर की प्रतिष्ठा का कहाँ उल्लेख नहीं है। इससे अनुमान होता है कि उक्त अन्य की रचना के समय (सन् १७८०) तक चामुण्डराय को इस महत्कार्य के सम्पादन का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। पाहुबलि-परिन में गोम्म. टेश्वर की प्रतिष्ठा का ममय इस प्रकार दिया है:- - - विन्ध्यगिरि "कश्यन्दे पशवारचे विनुतविमवमवत्सरे मामि पेत्रे पथम्या पतप दिनमणिदियसे कुम्भलग्ने सुयोगे । मामाग्यं ममनाम्नि प्रकटित भगरो मुमशस्ना पकार श्रीमायामुण्डरामा पेन्गुलनगर गोमटेशप्रतिष्ठाम् ॥" अर्थात् कलिक सय ६०० मे विमा संवत्मर में पत्र गुल ५ रविवार को कुम्मनम, माभाग्य योग, मस्त (मृगशिरा ) नपत्र में पामुण्रराज ने पंगुल नगर में गोमटेश की प्रतिष्ठा कराई। । विद्याभूषण, काव्यतीर्थ, प्रो. शरचन्द्र पोपाल ने हम अनुमान पर कि यह तियि गहनरंग राचमल्ल के समय में (मम् १७४ पौर ८४ के बीच ) ही पड़ना पाहिये, सक्त विधि को बारीम २ प्रल ८० ईस्वी के परायर माना । उनके कथनानुमार इस तारीख को रविवार चैत्र शुक्ल ५ निधि घी पार कुम्भ लग्न भी पड़ा था। हमने इस तारीग्य का मि० स्यामा कन्नपिलाई के 'डियन एफेमैरिम से मिलान किया तो २ प्रपन ८० वी को दिन शुक्र- पार पार विधि १४ पाये। न जाने प्रोफेसर साहय ने किस प्राधार पर उम वारीस को रविवार और पश्चमी विधि मान लिया है। इसके अतिरिक्त प्रोफेसर मादय की सारीस में एक और भारी त्रुटि है। ऊपर उद्धृत श्लोक में संवत्सर का नाम 'विभव दिया हुमा है। पर सन् २८० ईस्वी (शक सं.२०२ 'विभव नहीं "विक्रम संवत्मर था। इन कारयों से प्रो० घोपाल की निश्चित की हुई विधि में सन्देद होता है।

भागोन Tोर में मेरा गम दोना का nि गा और में पना? हरितगपुराण, TIT, frater dir विनोहमान में गिजा का mam जाए। मक का मरा नाम पगुंग गा! प्रिती में कन्कि का ममग म प्रकार दिया:- पिशागदे पोरे परामदागिदिमामगिरे। जाप मगधरिली र पापाम दुमय पाशना ॥३॥ दोणि मदा पपा गुणागं उमुहस्मयादान । परम दोदिमहम कई पनि था प्रर्यान्चार नियांग के ४६१ पोराने पर शक राजा हुमा, और इम यश के रागानों ने २४२ वर्ष राग्य किया। उनके परपात गुप्तवंशी नरेशों का २५५ यसक राज्य रक्षा और फिर चतुर्मुख (फल्कि) ने ४२ घर राज्य किया। कोई- कोई लोग इस तरह (४६१+२४२+२५५+४२ = १०००) एक हजार वर्ष बतलाते हैं। अन्य प्रघा में भी कल्कि का समय महावीर के निर्वाण से १००० वर्ष पश्चात माना गया है। पर इन ग्रंथों में इस बात पर मत-भेद है कि निवांब संवत् से १००० वर्ष पीछे कल्कि का जन्म हुमा या मृत्यु । ऊपर हमने जिस मत का उल्लेख किया है उसके अनुसार १००० वर्ष में कल्कि के राज्य के ४२ वर्षमी सम्मिलित हैं। अतः इस मत के अनुसार निर्वाण सं० १००० कल्कि की मृत्यु मादोगा। विन्यगिरि । जिनपद में कल्कि का मलंग पाया जाता है उन मनुमा निर्वाह का समय शक से १०५ वा, विक्रम #. मे १७० वदी मन में ५२० पर पूर्व पटवा है। मतपय कन्कि मृत्यु का समय सन् १७२६वा पाता है। मेषत पहुधा राजा के गम्प-काम से प्रारम्भ किये जाते हैं। पर कल्कि मजा मन ४७२-४२ = ४३० ईसा से प्रारम्भ गोम्मदेश की प्रतिष्ठा का समय फल्कि संवत् १०. कहा गया है जो अपर की गएना के अनुमार मन ईस्वी १०३० परापर है। हमने स्वामी फन्नूपिलाई के इण्डियन एमरिम से इस संवन के लगभग उपर्युक्त तिधि, धार, नक्षत्र प्रादि का मिदान किया वो २३ मार्च सन् १०२८ को पत्र मुदि ५ रविवार पाया। इस दिन मृगशिरा नक्षत्र और मौभाग्य योग भी वर्तमान थे, और दक्षिणी गणना के अनुसार यह सबसभी विभव था। इस प्रकार बाहुपन्निधरित में दी हुई ममल पाते इस विधि में पटित होती है, जिससे विश्वास होता ६कि गोम्मटेश की प्रतिष्ठा का ठीक ममय मन् १०२८,२३ मार्च (शक सं० १५१) है।" इस विधि के विरोध में केवल एक किंवदन्ती का प्रमाध प्रस्तुत किया जा सकता है। यह किंवदन्ती यह फि गोम- ० उपयुक्त विरेचन लिम्बे जाने के परचा इमें मैमूर भाक्लिाजि- कन्ट रिपोर्ट १२३ दमने को मिली। इसमें दा. शाम शासी ने विस्तृत रूप संसान को प्रमाणित किया है।

पानमा टंग की मूर्ति की प्रतिमा गममनोगमा की और मनांग का गमग गिलानगों के पापार पर २७ में निरिणा किया गया है। पर इग किय. दन्ती पर विगंप जोर नहीं दिया जा गनमा गरिएको उमके नियको शिलानगों का प्रमाय नहीं और दूसरं यह कायन फेयन मुजयनिगमक में ही पाया गया है, जिमकी रचना का ममय मा को सालदयी शनादि अनुमान किया जाता है। जिन अन्य प्रन्यों में गोम्मदेश की प्रतिष्ठा का कथन है उनमें यह कदीनदी कहा गया कि यह कार्य रापमा जीते ही हुमा था। मम् ६७८ ईस्वी में रपे जानेवाले चामुण्डराय पुराण से यद निश्चित दी कि उम ममय तक मूर्ति की स्थापना नहीं हुई थी, और मन १०२८ मे पहले के फिसी शिलालेय में इम प्रतिष्ठा का ममाचार नहीं पाया जाता। एक बात और है जिसके कारण उपर निश्चित किया हुमा ममय ही गोमटेश की प्रतिष्ठा के लिये ठीक प्रतीत होता है। कहा जाता है कि नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ति चामु- ण्डराय के गुरु थे और गोमटेश की प्रतिमा के समय उनके साथ थे। द्रव्य-संप्रद नामक अन्य के टीकाकार ब्रह्मदेव ने अन्य के मूलकर्ता नेमिचन्द्र को धाराधोश भोजदेव के मम- कालीन कहा है। ऊपर निश्चित किये हुए समय के अनुसार यह कथन प्रयुक्ति-सङ्गत नहीं कहा जा सकता क्योकि भोजदेव - विन्ध्यगिरि करायापा। का राज्य-काल उस समय विद्यमान था। भाजदेव के सन् २०१८, १०२२ और १०४२ ईस्वी के उल्लेप मिले हैं। वर्षों के अन्दर से गोम्मटेश्वर का मस्तकाभिषेक होता है, जो पड़ी धूमधाम, बहुवनियाकाण्ड मारभारी द्रध्य-व्यय के साथ मनाया जाता है। इसे महाभिरेक भी कहते हैं। इस मस्तकाभिषेक कामबसे प्राचीन उल्लेसशक सं० १३२० के लर ० १०५ (२५५ ) में पाया जाता है। इस लेख में कपन कि पिता ने सात पार गोम्मटेश्वर का मस्तकाभिषेक पवाद कवि ने मन् १६१२ ईसवी में शाद. वणि द्वारा कराये हुए मलकाभिषेक का उल्लेख किया है, मनन्त कवि ने मन् १६८७ में मैसुर नरेश पिक्मदेवराज पार पर के मन्त्री विशालात पपिडत-द्वारा कराये हुए और शान्त. राज पण्डित ने सन् १९२५ के लगभग मैसूर-नरेश फाराम प्रोटयर तृतीय द्वारा कराये हुए मम्तकाभिषेक का कल्लेर किया। शिलालेय ०८ (२२३) में सन् १८२७ में दाने. पाने मस्तकाभिषेक का उल्लर है। सन् २००८ मे मी मस्तकाभिषेक हुमाया। अभी तक मपसे अन्तिम प्रमिक हाल ही में-मार्च सन् १-९२५ में-हुमाई जिमके विषय में 'बोरर पत्र में पद समापार प्रकाशित हुमा ता०१५-३-२५ को श्रीमान महाराजा कृष्पराज पदार मैसूर अपने दो सालों- सदिय पदाद पर पधार परमपनी तरफ से भिककराया। पन्दोपान बाहुन मगाया। भाज लगभग ३०,००० मनुष्य - ग । माय प्रयाएमेन्गोल के स्मारक अभिषेक देग मफे जिममें करीब पांच हजार विन्ध्यगिरि पर ये और शेष मय चन्द्रगिरि पहाड़ पर घर-उधर बैठकर दूर से अभिषेक देवते थे। महाराजा ने अभिषेक के लिए पांच हजार रुप्या प्रदान किये। उन्होंने स्वयं गोम्मटस्वामी की प्रा. क्षिणा की, नमस्कार किया तथा द्रव्य पूजन की व मुख प्रतिमाजी व भट्टारकजी को भेंट किये प भट्टारफजी को नम- स्कार किया। सुबह सपने में दोपहर एक बजे तक इम प्रथम अभिषेक का कार्य अतीव प्रानन्द व धर्म-प्रमावना के माध हुआ। इस अभिषेक में जल, दुग्ध, दही, केला, पुष्प, नारि- यल व चुरमा, घृत, चन्दन, सर्वोपधि, इतुरम, लाल चन्दन, बदाम, खारक गुड, शक्कर, खमखस, फूल, चने की दाल आदि का अभिषेक उपाध्यायो द्वारा मचान पर से हुआ।" फहा जाता है कि जय होयसल-नरेश विष्णुवर्द्धन जैन-धर्म को छोड़ वैष्णव धर्मावलम्बी हो गया तब रामानुजाचार्य ने गोम्मट की मूर्ति को तुड़वा डाला; पर इम फयन में कोई सत्य का अंश प्रतीत नहीं होता क्योंकि मूर्ति आज तक सर्वघा अक्षत है। गोम्मटेश्वर की दो और विशाल मूर्तियाँ विद्यमान है। ये दोनों दक्षिण कनाड़ा जिले में ही हैं; एक कारफल में और दूसरी एनूर में। कारकल की मूर्ति ४१ फुट ५ इञ्च ऊँची है। इसे सन् १४३२ ईस्वी में जैनाचार्य ललितकीर्सि के एपदेश से वीर पाण्ड्य ने प्रतिष्ठित कराई थी। एनूर की मूर्ति ३५ फुट ऊँची है और सन् १६०४ में पारकीत्ति पण्डित के । - विन्ध्यागिरि उपदेश से चामुण्डवशीय 'तिम्मराजा द्वारा प्रतिष्ठित की गई यो। इन तीनों मूत्तियों की बनावट प्रायः एक सी ही है। धमोठे, मर्प और लताएँ तीनों में एक मे हो दिखायं गय हैं। विन्यगिरि के गोम्मटेश्वर की दोनों याजुमों पर यक्ष और यतिषी की मूत्तियाँ हैं, जिनके एक हाथ में चोरी और दूमरे में कोई फल है। मूर्ति के पायों और एक गोल पाषाण का पात्र है जिसका नाम 'ललितसरोवरखुदा हुपा है। मूर्ति के अभिषेक का जन इसी में एकत्र होता है। इस पापाय- पात्र के भर जाने पर अभिषेक का जल एक प्रयालीद्वारा मूर्सि के सम्मुख एक कुएं में पहुँच जाता है और यहां से पह मन्दिर की सरहद के बाहर एक फन्दरा में पहुँचा दिया जाता है। इम कन्दरा का नाम 'गुत्रकाजि यागिलु' है। मूर्ति के मम्मुख का मण्डप नव सुन्दर रचित छतों से सजा हुमा प्राट et पर मष्ट दिक्पाला की मूत्ति या पोर यांच फी नवमी धन पर गोम्मटेश के प्रभिरंक के लिये हाथ में कलश लिये हुए इन की मूर्ति है। ये छत बड़ो कारीगरी के पने हुए हैं। मध्य की छत पर खुदे हुए शिलालेप (२० ३५१) से अनुमान दावा है कि यह मण्डप पासव मन्त्री ने १२ वीं शताब्दि के प्रारम्भ में किमी समय निर्माण कराया था। शिला. लेस नं० ११५ (२६७) मे विदित होता है कि मेनापति भरत- मध्य ने इम मण्डप का कठघरा (इपलिग) निर्माण कराया था। शिलालेख ० ७८ (१८२) में कथन है कि नयen- - अवयेलगोल के स्मारक चक्रवर्ति के शिष्य यसरिसेटिने कठपरे की दीवाल और पायोस सोर्यकरों को प्रतिमाएं निर्माण कराई घों और उसके पुत्रों में धन प्रतिमा के सम्मुस जालीदार खिड़कियाँ पनगाई । शिक्षा लेसन० १०३ (२२८) से शात होता है कि पहाव-नीरा मदार के प्रधान सचिव केशवनाय के पुत्र पम पोम्मरस और नजरायपन क भावको ने गोम्मटेशरमप के ऊपर के राण (पजिराय) का जीर्णोद्वार कराया। परकोटा-गोमटेयर की दोगा पागुनों पर मुरे हुए गिलाग० ७५ (१००) ७६ (१७७ ) से शिक्षित होता पामार का परकोटा गहराज ने निर्माण कराया था। पड़ी लेना.४५ (१२५), ५(१),८०(२०) .५८६ मे भी देती है। गाराम होरमन मरेश नि. नगंगापनि । पसिनालेग शक 100 .परता है। इंगके पहले के शिलानगी पर arein नही है। इमरी मित्र दोगा ०१.३५ मगमग होगका निर्माणमा है। पाजार भावर मril Yaft. भूमिका नि, नाग प्रकार है- • Aat मप . हा सामान जिबन पान friw२ नम विन्ध्यगिरि पर १ मुनिमुनत २ मि २ बहान १ मति २ नमि १ पाव पाएपनि १ कृष्माशिनि २ १(सात) अधिकांग भूमियाँ ४ पुट ऊँची। पापछः मूतिया पौष पुट, एक यः पृट व दो-तीन मिपा नीन माई-गीन पुट की है। एक परप्रम को व अन्तिम प्रशाम मृत्तिका गंप जिन मूनि यो पर संगो गय मयकीनिमिष धार उनके शिष्य पाठ पन्द्र अध्यात्म के समय की मिली। लेग०७८(१२) ३७ (१) काना कि गयीतिक गिण पाविसंगे या पनि सी कंगकी प्रतिष्ठा करा दी। पर कंवल सीम गति को पर पाविष्टि का माम पाया जाता है (मेय. ३१५११८, २७) । उपयुक्त मूतिया में पधरमताका मही है। पाभ की एक मूनि पा मारवाड़ी में at in गरे (विषम ) १६३५ मे मंजीगतमीपत्य गजनी में प्रतिचित कराई पी (३३१) । मनात सिपा। ग पर मारा में ला कि (विषम ) मे १५४० प्रगुणाजी जगद.. ... प्रतिष्ठित कराई (२१)। परको कार पर दांनी बाजुगों परपुरार. पालक परकोट बार नागरिक सम्मुखा. मगरको रमाई परमादेशाता। इसमें पीपलमन मि। पर गुम्मट गाना अवयल्गोल के स्मारक पाँच ऊँची 'गुल्लकायजि' को मूर्ति है, जिमके हाथ में 'गुल्लकायि' है। जन-श्रुति के अनुसार यह स्तम्भ और गुल्ल- फायजि की मूर्ति दोनों स्वयं चामुण्डराय ने प्रतिष्ठित कराये छ । २ सिद्धर बस्ति-यह एक छोटा सा मन्दिर है जिसमें तीन फुट ऊँची सिद्ध भगवान की मूत्ति विराजमान है । मूर्ति के दोनों ओर लगभग छः-छः फुट ऊँचे सचित स्तम्भ हैं। ये स्तम्भ महानवमी मण्डप के स्तम्म के समान ही उच्च कारीगरी के यने हुए हैं। दायाँ बाजू के स्तम्भ पर प्रहदास कवि का स्या हुमा पण्डितार्य को प्रशस्तिवाला यड़ा भारी सुन्दर लेख है [१०५ ( २५४)] जिसके अनुमार पण्डितार्य की मृत्यु शक संवत् १३२० मे हुई थी। इस स्तम्भ में पीठिका पर विराज- मान, शिष्य को उपदेश देते हुए, एक प्राचार्य का चित्र है। शिष्य मन्मुग्र बैठा है। दूमरे चित्र में जिनमूत्ति है। पायी पाजू के स्तम्भ पर मगराज कवि का रचा हुमा सुन्दर [१०८ (२५८)] जिसमें शक सं० १३५५ में श्रुतमुनि के स्वर्गवाम का पल्लेग है। ३ आखण्ड यागिणु-यह एक दरवाजे का नाम है। यह नाम इमलिये पड़ा क्योंकि यह पूरा दरवाजा एक प्रमण्ड शिता को काटकर बनाया गया। दरयाजे का ऊपरी भाग पर दो गुन्दर मचित है। इसमें लक्ष्मी की पनामन मूनि' मुदी है जिसको दोनों ओर से रो दापी दान करा रद हैं। मन-अनि अनुमार यदद्वार भी पामुणराय ने निमांच लेख । . विन्ध्यगिरि कराया था। दरवाजे के दानी भोर दाय-बायें क्रमश: याहुबलि पार भरत की मूर्तियाँ हैं। इन पर जो लेस हैं (३६८-३६६) उनसे विदित होता है कि वे गण्डविमुक्त सिद्धान्तदेव के शिष्य दण्डनायक भरतेधर द्वारा प्रतिष्ठित की गई। इनका समय शक मं० १०५२ के लगभग प्रवीत होता है। इन मूर्तियों की प्रतिष्ठा का उल्लेग्य शिलालेय नं. ११५ (२६७) में भी प्राया है जिसके अनुमार ये मूर्तियाँ दरवाजे की गोमा पढाने के लिये स्थापित की गई है। इस संग के अनुमार इस दरयाजे की सीढ़ियां मी उक्त दडनायक ने ही निर्माण कराई ४ सिद्धरगुण्ड-प्रपण्ड दरवाजे की दाहिनी भार एक वृहत शिला दे जिसे 'सिद्धर गुण्ड' (सिद्ध-शिला ) कहते हैं इस शिला पर अनेक क्षेप है। ऊपरी भाग की कई मतरों में जैनाचार्या के चित्र। कृल चित्रों के नीचे नाम भी मङ्कित है। ५ गुल्लकायज्जियागिनु-यह एक दूसरे दरवाजे का नाम। इस दरवाजे की दाहिनी और एक शिला पर एक पेटी हुई नी का चित्र खुदा है। यह लगभग एक फुट का है। इसे लोगों ने गुतकानि का चित्र समझ लिया है। इसी में एक दरवाजे का नाम गुल्लकायजियागिनु पड़ गया। चित्र के नीचे जो लेख (४१८) पाया गराईमरी विदित पीता है कि पद एक मतिष्टि की पुत्रो का चित्र है। गुल. कायि की मूर्ति का वर्णन ऊपर कर ही चुके हैं। - पर पागोषो मारक . गद प्रयोग साभ-याच पागल' n:ोबारा कर मामाको कामना कि मनोग मेरमा nि मारे। ग. मी पाNिT RET मा PrIMETरेर योन.१.२८) भी पर मन मा * or TOन गरेका दो महीने TAR MARE गाणे ...( ५. मालेपाका ने "mr) MAIT Imat mim mrtmnीनाममा wants ... श्रीनिवास पर का निरी माता पार पाडी AR पमा भोग मादायी का गरम । - malitainant HA tart at है। ना . * ..REMIfmain विजयगिरि । मामय है कि ये मूर्विया पेमण्ण और उनकी धर्मपनो की । यस्ति से शान की और दो दोगे (कुण्डों) के योध एक मण्डप पना एमा। उपर्युक्त लेस में मम्भवत: इसी मण्डप का उल्लंग। सोदेगा पस्ति-इम निट पम्ति भी कहते हैं क्योकि इसमें तीन गर्भगृह है। पन्द्रगिरि पर्वत की शान्तोश्वर परिन के समान पद पम्ति भी खूब ऊँचो गवद पर पनी । सीढ़ियों पर से जाना पड़ता है। भोतों की मज- पूती के लिये इममें पारा के प्राधार (प्रादेगल ) लगे हुए ६,इसी से इसे पादंगल घरती कहते हैं। पीच की गुफा में पादिनाथ की और दायों पाई गुफाम्रों में प्रमशः शान्तिनाथ और नेमिनाथ की पद्मामन मूर्तियां हैं। पस्ती के पश्चिम की पार की पट्टान पर सत्ताइस लंब नागरी प्रत्तरों में हैं जिनमें अधिकतर वीर्घ-यात्रियों के नाम प्रतित है (न. ३७८-४०४)। चोयीस तीर्य कर यस्ति-यह एक छोटा सा देवालय है। इसमें एक पढ़ाई फुट ऊंचे पापाय पर पायर्यास पीकरों की मृत्ति यो उत्कीर्ग है। नीचे एक कवार में -सीन पट्टी मूचियाँ खुदी हुई हैं जिनके उपर प्रभावती के माकार में इकोस अन्य छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं। इस पस्ति के लेख न० ११८ (३१३) से मात होता है कि हम चौर्यास तीर्थ कर मूर्सि की स्थापना पालकात्ति पण्डित, धर्मचन्द्र प्रादि ने शक सं० १९७० में की थी। ।

श्रवणयगोल के स्मारक १० ब्रह्मदेव मन्दिर यह छोटा सा देवालय विन्थ्य- गिरि के नीचे सीढ़ियों के समीप ही है। इसमें सिन्दूर से रंगा हुमा एक पापाग्य है जिसे लोग अझ या 'जारुगुप्पे अप्प' कहते हैं। मन्दिर के पीछे चट्टान पर के लेख नं० १२१ (३२१) से ज्ञात होता है कि इसे हिरिसालि के गिरिगोड के कनिष्ठ भ्राता रङ्गय्य ने सम्भवत: शक सं० १६०० में निर्माण कराया था । मन्दिर के ऊपर दूसरी मंजिल भी है जो पीछे से निर्माण फराई गई विदित होती है। इसमें पार्श्वनाथ की मूत्ति है। श्रवणबेल्गोल नगर अपर कहा जा चुका है कि श्रवणबेलगोल चन्द्रगिरि और विन्ध्यगिरि के बीच बसा हुआ है। यहाँ के प्राचीन स्मारक इस प्रकार हैं:- १ भण्डारि बस्ति-यह श्रवण घेलगील का सयस घड़ा मन्दिर है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई २६६ ४७८ फुट है। इसमें एक गर्भगृह, एक सुखनासि, एक मुखमण्डप और प्राकार हैं। गर्भगृह में एक सुन्दर चित्रमय वेदी पर चौबीस तीर्घ- करों की सीन २ फुट ऊँची मूत्तियाँ है। इसी से इसे पायोस सीर्थकरयस्ति भी कहते हैं। गर्भगृह में तीन दरवाजे हैं जिनकी प्राज-पाजू जालियां बनी हुई है। सुखनामि में पद्मा- बनी और प्रम की मृत्ति यो है। नवरट्र के चार स्तम्भों के बीच - - । प्रयदयेनोन नगर जमीन पर एक दम पृट का धोकार पत्थर विधा हुमा पागे के भाग और परामदे में मो इतने इतने बड़े पत्थर लाए । ये भागे-भारी पापाय यहाँ मे लाये गये दंगे, यह भी पाश्चर्यजनक है। नवरद्वार की चित्रकारी यड़ा ही मनोहर है। इसमें लताएँ व मनुष्य और पशुमों के चित्र सुरे हुए हैं। मुग्न्य भवन के पारों पर परामदा पार पापाय फा पार फुट उपा कठपगई। पम्ति के मन्गुग्म एक पापाच-निर्मित मुन्दर मानम्तम्भ है। दारमल नरेश नरसिंह (प्रथम ) के भण्डारि हुल्ल द्वारा निर्माण कराये जाने के कारण यह भण्डारि यस्ति कहलाती है। लेय नं० १३७ ( ३४५ ) और १३८ ( ३४६) मे मात दावा है कि यह शक मं० १८८१ में निर्माण कराई गई थी व नरसिह नरेश ने इसे भव्य-चूडामडि नाम देकर इमकी रक्षा के इंतु सपा प्राम का दान दिया था। लेगों में और उनके पम्ति-निर्माण का सुन्दर यर्थन है। -नगर भर में यही पनि होरमल- शिल्पकला का एकमात्र नमूना है। इम मुन्दर भवन में गर्भगृह, मुम्बनासि, नवरम पौर मुग्यमण्डप हैं। ममफयी पार्श्वनाथ की पांच फुट ऊँची भव्य मूति है। गर्भगृह के दरवाजे पर घड़ा अच्छा खुदाई का काम है। सुम- नासि में एक दूसरे के मन्मुस साढ़े तीन फुट ऊँची पञ्चफी घरपेन्द्र यत्त और पद्मावती यतिथी की मूत्तियां हैं। दरवाजे के प्रामपास जालियाँ हैं। नवरष्ट्र के चार काले पापाय के २ सकन यस्ति- । गर्भगृह में प्रागोजके स्मारक बने हुए मारने के महरा धमकीले स्तम्भ और कुरान कारीगरी के बने हुए नाजा बड़े हो सुन्दर है। मंदिर को गुम्मट अनेक प्रभार को जिन मूर्तियों से चित्रित , शिखर पर सिंहललार है। दसिय की दौरान सीधीन होने के कारण उसमें परमर के पाधार लगाये गये है। द्वार के पास के लेप (ने. २४ । ३२७ ) से मात दगा है कि यह परिव दोगल नरेश पाल (द्वितीय) के प्रासय मंत्री पन्द्रमौषि की जरमा मनाली भार्या पियाने शाम. ११.३ में निमारकराई घोराने गीता के निमिा पम्मेयनहलि नामक समकाना। 'सकस' भाचियान काही मंतिम गोमेमे पका पति कहने। यही बात मेरा ११.१५ मे भी गिर होती है। गिद्वारा पति-पद पनि पान पति के पति भारी गिवान्तममममी Ratni जान गागीका माम ना जानापान, भगवान भनय नहीं है। गर्म पRafiनिमार्ग की प्रतिमा। पाप Trimurबीपतिमान ruी न. ४(१) बाल imirent मूल' मा autari tara..Maniबी ।

- ऊँचे पापाय श्रवणलगोन नगर ४५ ४दानशाले पस्ति-यह छोटा सा देवालय प्रशन पस्ति के द्वार के पास ही है। इसमें एक वोन पर पचपरमेष्ठी की प्रतिमायें हैं। चिदानन्द कवि के मुनि- वंशाभ्युदय (शफ सं० १६०२) के अनुसार मैसूर के चिक. देवराज मोडंपर ने अपने पूर्ववर्ती नृप दोन देवराज मोरयर क समय में (सन् १६५८~~१६७२ ईस्यो) घेलगोल की यात्रा की, दानशाला के दर्शन किये और राजा में उसके लिये मदनेय प्राम का दान करवाया। यहां पहले दान दिया जाता रहा दोगा इसी सेइम पस्ति का यह नाम पड़ा। ५ नगर जिनालय-इस भवन में गर्भगृह, सपनामि और नवरा है। इसमें प्रादिनाथ को प्रभावली संयुक्त पढ़ाई फुट ऊँची मूर्ति है। । नवरा की बाई मोर एक गुफा में दो फुट ऊँची प्रमदेव की मूर्ति ६ जिमफे दायें हाथ में कोई फल और पायं दाय में कोई के माकार की कोई पीज है। परो में सडा है। पीठिका पर घोड़े का चिद बना हुमा है यहाँ के लेग नं० १३० (३३५ ) में सात होता है कि इस मन्दिर को होयसल नरेश बहाल (द्वितीय) के 'पदस्थामी' वनयको सिद्धान्त पक्रवर्ति के शिष्य मागदेष मंत्री ने शक सं० १११८में निर्माण कराया था। नगर के महाजनी द्वारा ही इसकी रसोती थी इमी से इसका नाम नगर जिनालय पड़ा। 'श्रीनिलया भी इस मंदिर का नाम रहा है। उक्त लेस में नागदेव मंत्री द्वारा कमठपार्श्वनायवमादि के सन्मुख 'नत्य में । प्रवणबेलगोल के स्मारक रङ्ग' और अश्मकुट्टिम (पापाणभूमि ) व अपने गुरु नय. कीर्ति देव को निषधा निर्माण कराये जाने का भी उल्लेख है। लेख नं० १२२ (३२६) के अनुसार उन्होंने नयकीर्ति के नाम से ही नागसमुद्र नामक मरोवर भी बनवाया। यह सरोवर प्रय 'जिगणक कहलाता है। पर लेख नं० १०८ (२५८) कहा गया है कि पण्डित यति के तप के प्रभाव से ही नगर जिनालय (नगर जिनारपद) की मृष्टि हुई। ६ मङ्गायि बस्ति-इसमें एक गर्भगृह, सुखनासि और नवरङ्ग है। इसमें एक साढ़े चार फुट ऊँची शान्तिनाथ की मूर्ति विराजमान है। सुखनासि के द्वार पर प्राज-पाजू पाँच फुद ऊँची चवरवाहियों की मूर्तियां हैं। नवरा में वर्तमान स्वामी की मूत्ति जिस पर लेस है, ४२६ ( ३३८)। मन्दिर के सन्मुस सुन्दरता मे सचित दी इरती हैं। लेख नं० १३२ ( ३४१) व ४३० (३३६) से ज्ञात होता है कि यह मस्ति अभिनय धासकीर्ति पण्डिताचार्य के शिष्य पेलाल के महायि ने बनाई थी। उक्त लेखों में इसे त्रिभुवनचूड़ामणि कहा। ये लेख शक की तेरहयों शवान्दि के जात होते हैं। शान्तिनायमूत्ति की पीठिका पर के लेस मे विदित होता है कि वह मूर्ति पपिहनाचार्य की शिष्या व देवराय महाराम की रानी भीमादेवी ने प्रतिष्ठित कराई थी [मेलन० ४२० (३३७)]। ये देवराय मम्मवत: विजयनगर के राजा देवराम प्रथम जिनका राज्य गम् १४०६ से १४१६मक रहा था।

-- अवगोन मगर अन महावीर स्वामी की पीटिका परके मेर में मिस दाना कि पनी प्रतिष्ठा पण्टितदेप की शिष्या मतापिने कराई थी। पका भी नाममय ही अनुमान होता। इमी म दिर के एक लेप [२० १३४ (३४२)] मे विदित होता है कि इसकी मरम्मत सम्भवतः शक १०१३३४ में गेरमोपे के दिरिय पथ्य गिप्प गुम्मटण्य ने कराई थी। नमठ-यद पहा के गुरु का निवास स्थान है। इमारत पहुन गुन्दर , यांच में मुला हुमा मांगन है। हाल दी में दूसरी मन्जिन भी बन गई है। मणसम्भे मन्त्री कारीगरी के बने हुए हैं। उन पर खूर चित्रकारी है। यहाँ के सीन गर्भगृहों में अनेक पापाय और धातु की मूत्तियाँ हैं। इनमें की अनेक मुसिया यहुन पर्वाधान हैं। इन पर संस्कृत व वाभिन्न भाषा में प्रय अत्तरों के मेस जिनसे मात होता कि प्रधिकांग मदाम प्रान्ताय धर्मिष्ठ भाइयों ने प्रदान की ६। नवदयमा विम्य में पचपरमेष्ठी के अतिरिक्त जिनधर्म, जिनागम, पेत्य और चैत्यालय भी चित्रित हैं। मट की दीवालों पर वीर्य करों व जैन राजा के जीवन की घटनामों के भनेक रङ्गीन चित्र हैं। इनमें मैसूर-नांश कृप्यराज मोडे- यर तृतीय के 'दमर दरवार का भी चित्र है। पार्श्वनाथ के समवमरख व भरत पक्रवत्ति के जीवन के चित्र भी दर्शनीय चार चित्र नागकुमार की जीवन-घटनामों के है। एक पन के दृश्य में पडलेश्यानों के पुरुषों के परित्र बड़ी उत्तम रीति ४८ अवयवल्गोल के स्मारक से चित्रित किये गये हैं। ऊपर की मधिल में पार्श्वनाथ की मूर्ति है और एक काले पापाय पर चतुर्विशति तीर्थ कर सचित है। कहा जाता है कि चामुण्डराय ने गोम्मटेश्वर की मूर्ति निर्माण कराकर अपने गुरु नमिचन्द्र को यहाँ का मठाधीश नियुक्त किया। यह भी कहा जाता है कि इससे पहले भी यहाँ गुरु-परम्परा चली भाती थी। लेख नं० १०५ (२५४) १०८ ( २५८) में उस्य है कि यहां के एक गुरु पार• कोसि पणित ने होरसल नरेश बल्लाल प्रभम (सन् ११००० ११०) को एक पड़ो दुम्माष्य व्याधि से मुक्त किया था गिमसे उन्हें पल्लालजीपरक की उपाधि मिली थी। करयाणि-यह नगर के बीच के एक छोटे से सरा- पर का नाम है। इसके पारों और सीढ़िया और दोयाल है। दोगन के दरवाजे शिगरपद है। उत्तर की भार एक सभा. जिग एक सम पर लेप हे (४४४ (३६५) कि या पिकव राजेन्द्र ने यमवाया। मैसूर के चि. imन्द्र पर १६०२ से १७०४ तक राग किया है। जनन कति गोगटेगरपरित (श 2.१७००) में मन्मन कि विराम ने अपने पक्षमा माय की प्रार्थना में कम्गाणि निर्माण कराया। मार * होने में प्रथम ही की Ei. बाल गिपर भार॥ गा - प्रवणबेलगोल नगर प्रथम (मन् १७१३-१७३१) के समय में शिखर, मभामण्डप मादि पनवाकर पूर्ण कराया। सम्भवतः यदी यहा पुराना सरोवर रहा है जिस पर से इस नगर का नाम ल्गुल (धवन सरोपर)पड़ा। उक्त पुरुषों ने सम्भवतः इसका जीर्णोद्धार कराया दागा। यह भी हो सकता है कि इस स्थान को नाम देनवाला धवल सरोवर कोई अन्य ही रहा हो। ८ शक्तिक?—यह भण्डारि पस्ति के दक्षिण में एक छोटामा मरोवर है। इसके पास की दो घट्टानों पर जैन प्रतिमा के नीचे के दो लेख न० ४४६ (३६७) पार ४४७ ( ३६८) से ज्ञात होता है कि घोपदेष की माता, गणराज के ज्येष्ठ भ्राता की भार्या, शुभचन्द्र सिद्धान्तदेव की शिष्या अक्किम ने गे जिनमुत्तियां और मरोवर निर्माण कराये । लेगन० ४३ (११७)व मन्य लेसे से सिद्ध है कि गहराम दारमल नरेश विष्णुपद्धंन के सेनापति थे और शक सं. १०४५ में जीवित थे। इमलेस में अक्किमध्चे की भी प्रशस्ति है। गाणेदेखि एक लेप नं. ४८६ (४००) से सात दाता किसी धर्मपरायणा माध्वी महिला ने यहां भी एक अस्ति निर्माण कराई थी। १० घेतगण का कुण्ड-नगर से दक्षिण की पार कुछ दूरी पर यह कुण्ड है। इसका निर्माता पो पेमण्य पति का निर्माता पेना. पेलण्यकी कृतियों का उल्लेख स्नेख नं. १२३ तथा ४४९-४५३ १ ४६३-४६५ मे।

अपरायेगोल के स्मारक नं० ४८० ( ३९०) से इस कुण्ड का ममय शक सं० १५६५ के लगभग प्रतीत होता है। गजराज प्रयणबेलगोल के मासपास के ग्राम जिननाय पुर-यह अवश्यमेगान मे एक मीन उत्तर को पर है। प नं. ४७८ (३८८) अनुसार इसे हारमल- नरेश निरर्द्धन के मेनापति ने মালিথ এটি शक १०५० साभग यमायापा। महा की शान्तिनाथ तिहारमा शिल्पकारी का बहुत मुन्दर माना है। इसमें एक गर्भगृह. सुमनामि और गरम है। गलिना को माहे पाय फुट भी माना भव्य और गनीय है। गदपमापसी और दान र परराहियो में समभित है। गार के चार साम भली मूंग की कारीगरी इमनार भी सुन्दर । मामा दोगुना पाने को हरी maratहै। दिशामा गर भित्राद। कति रही | ननीशंकर, या, सिपी, A, HIMH1, मम्मा, दिनी, मृगमारिही, , बराही रिक Fun | Rth.filmमाया पानाम। बामे गम भर पनि |लमान की टिका .. । चामान - अवयवोल के प्रामपास के प्राम (२८०)मेशातामा है कि इस परिव को 'वसुधै बान्धव रेपिमरया सेनापति ने बनवाकर सागानन्दि सिद्धान्तदव के अधिकार में दे दो घी। एक लेख (ए०० पर्मीको ७७ मम् १२२० ) में उल्लेग्य है कि पुरु सेनापति कलचुरि- नरेश के मंत्री घ, पत्रान् इन्होंने दोरमल नरेश पचाल (द्वितीय) (मम् ११०३-१२२०) की शरय लो। इमसे शान्तिनाथ परित के निर्माण का समय लगभग शक सं० ११२० सिद्ध होता है। नवरण के एक स्तम्भ पर के लेस न० ४७० (३.८) से विदित होता है कि इस यस्ति का जीर्णोद्वार पालेद पदुमन्न मेशक सं० १५५३ में कराया था। प्राम के पूर्व में प्ररेगल यस्ति नाम का एक दूसरा मंदिर है। यह शान्तिनाथ पम्ति में भी पुराना है। इसमें पावनाघ भग- पान की मनपायी, प्रभावली संयुक्त पाँच चरंगट पनि फुट ऊँची पधामन मूर्ति है। सुग्वनासि में धरणन्द्र पार पावती के सुन्दर चित्र है। मन्दिर में मफाई प्रच्छी रहती है। एक चट्टान (मंगल) के ऊपर निर्मित होने सेही यमन्दिर परेगन पति कहलाता है। पार्श्वनाथ की पीठिका पर के लेख नं. ४७४ (३८) से विदित होता है कि वह मूत्ति शक सं० १८१२ में घेल्गुन के भुजवलेय्य ने प्रति- प्टिव कराई है। इसका कारण यह था कि प्राचीन मृत्ति बहुत ग्यण्ठित हो गई थी। यह प्राचीन मूर्ति प्रय पाप ही के सामात्र में पड़ी हुई है और उसका छत्र यस्ति के द्वार के पास ५२ श्रवणबेल्गोल के स्मारक रक्खा हुमा है जहाँ पर कि लेख नै० १४४ (३८४) है। मदिर में चतुर्विशति वीर्य कर, पञ्चपरमेष्ठी, नवदेवता, नन्दीश्वर अादि की धातुनिर्मित मूर्तियाँ भी हैं। प्राम की नैऋत दिशा में एक समाधिमण्डप है। इसे शिलाकूट कहते हैं। मण्डप चार फुट लम्बा-चौड़ा पार पाँच फुट ऊँचा है। ऊपर शिखर है। इसके चारों ओर दीवालें हैं पर दरवाजा एक भी नहीं है। इस पर के लेखनं ४७६ (३८९) से वह यालचन्द्रदेव के तनय की निषद्या सिद्ध हाती है जिनकी मृत्यु शक सं ११३६ में हुई। लेख में पास. चन्द्रदेव के तनय का नाम घिस गया है, पर उनके गुरु लि. कुम्ब के न मिचन्द्र पण्डित व निषना निर्मापक पैरोज के नाम लन में पढ़े जाते हैं। लेख के मन्तिम भाग में यह भी लिग्गा कि एक साध्वी षो कालबे ने सल्लेखना विधि से शरीरान्त किया सम्भवत: यह उक्त मृत पुरुष की विधवा पनी नही होगी। ऐसा दी एक समाधिमण्डप तावरेकरे सरोवर के समीप है। इसके पाम जो लेख (नं. १४२ (३१२) उमसे विदित देता है कि यह पारकीति पण्डित को निपचा है जिनकी मृत्यु शक सं० १५६५ में हुई। मगन०४० (६४) में पल्लेश कि देवकीति' पण्डित, जिनकी मृत्यु एक सं० १०६५ में, जिननाय पुर में एक दानशामा निमांजरायो। ।

1 । अवयवेलगोल के भासपास के प्राम हसेयेल्गोल-यह प्राम प्रवणयेल्गोत्र से पार मील सत्तर की ओर है। यहां का होम्सल शिल्पकारी का बना हुमा जैनमन्दिर बस प्रवस्था में है। गर्भगृह में पढ़ाई फुट की सगासन मूत्ति है। सुखनासि में लगभग पांच ऊँची सप्तफपी पावनाय की खण्डित मूर्ति रक्सी है। नवरा में मच्छो चित्रकारी है। योप की छत पर देवियो-सहित रघारूढ़ भष्टदिक्शनों के चित्र हैं जिनके बीच में पञ्चफयी घरपेन्द्र का चित्र है। धरपेन्द्र के पोय हाय में धनुष और दाधिने में सम्भवतः शङ्ख है। नवरन में दो पवरवाही पार एक तीर्थकर मूत्ति खण्डित रमलो हुई है। नारङ्ग के द्वार पर पदो कारीगरी दिखलाई गई है। इस मन्दिर के मन १०६४ क लेख (नं. ४९२) से विदित होता है कि विष्णु- वर्द्धन के पिता दरसल एरेयड ने घेलगोल के मन्दिरों के जीर्यो- द्वार के लिये जेनगुरु गोपनन्दि को रामनहत प्राम का दान दिया। इस शेख य लेस नं. ५५ (६८) में गोपनन्दि की खुप प्रशंसा पाई जाती है। यह पति संभवतः लगभग शक सं०१०१६ की बनी हुई है। इस माम में एक और पार एक वैष्णव मन्दिर भी है। सास होता है कि प्राचीन काल में यहाँ अधिक मन्दिर रहे हैं क्योंकि यह एक तालाब की नहर में प्राय: सारा मसाला टूटे हुए मन्दिरों का लगा हुआ है। ग्राम के मध्य में एक तालाब के पास एक सहित जिन प्रतिमा भी है।

५४ श्रवणबेलगोल के स्मारक साणेहल्लि-यह माम श्रवणबेल्गुस्त से तीन मील पर है। यहाँ एक ध्यंस जैन मन्दिर है। जैसा कि अपर कहा जा चुका है, लेख नं० ४८६ (४००) के अनुसार की भावज जकिमव्ये ने निर्माण कराया था। । इसे गहराज लेखों की ऐतिहासिक उपयोगिता विशेष राजवंशों से सम्बन्ध रखनेवाले लेख का विवेचन करने से पूर्व यहाँ एक ऐसी घटना पर कुछ विचार करना भावश्यक है जिसका राजकीय व जैन-धार्मिक इतिहास से प्रत्यन्त घनिष्ठ मम्बन्ध है। जनसंघ के नायक भद्रबाहु सामी के साथ भारतमम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण यात्रा का प्रसङ्ग जैसा जैन इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है वैसा ही वह भारत के राजकीय इतिहास में अनुपेक्षणीय है। लगातार कई यों से इस विषय पर इतिहासवेत्तानों में मतभेद पला पाया है। यद्यपि मतभेद का प्रमी सक अन्त नहीं हुमा, पर अधिकांश विद्वानों का मुकार एक ओर होने से इस विषय का प्रायः निर्णय ही ममझना चाहिए। संक्षेप में, जैनमादित्य में यह प्रसङ्ग इस प्रकार पाया जाता है-अन्तिम श्रुतकेयसी स्वामी ने निमित्त-शान से जाना कि तर भारत में पारह वर्ष का भीपय दुर्मिक पहनेशाता है। ऐसी विपत्ति के समय में यहां मुनिवृत्ति का पालन दाना कठिन मान लेखो की ऐतिहामिक उपयोगिता उन्होंने अपने समस्त शिष्यों-सहित दक्षिण की भोर प्रस्थान किया। भारतसम्राट चन्द्रगुप्त ने भी इस दुर्भित का ममा- चार पा, संमार से विरक्त हो, राज्यपाट छोड़ भद्रयाह स्वामी से दीक्षा ली और उन्हीं के साथ गमन किया। अब यह मुनि- संघ प्रवण बेल्गोल स्थान पर पहुँचा वा भद्रबाहु स्वामी में प्रपनी पायु पहुत घोड़ो शेष जान, संघ को भागे बढ़ने की माशा दी और भाप चन्द्रगुप्त शिष्य सहित छोटी पहाडो पर रहे। चन्द्रगुप्त मुनि ने अन्त ममय तक उनकी राय सेवा को पार उनका शरीरान्त हो जाने पर मन के परचित की पूजा में अपना शेष जीवन व्यतीत कर पन्त में सल्लेखना विधि से शरीरत्याग किया। प्रम देखना चाहिए कि श्रवध वेगाल के स्थानीय इतिहास से, शिलालसों से व साहित्य से इस बात का कहा सक समर्थन दावा है। कहा जाता है कि पन्द्रगुप्त के वदा रहने से ही प्रम पहाड़ी का नाम चन्द्रागिरि पहा । इस पहाड़ी पर की प्राचीनतम यानि चन्द्रगुम द्वारा ही पहले-पहल निर्माण कराये जाने के कारण चन्द्रगुप्त पस्ति कमाई। इस पहाड़ी पर की भद्रयाहु गुफा में चन्द्रगुप्त के भी चरण-चिट्ल हैं। कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त ने इसी गुफा में समाधिमरण किया था। सेरिङ्गपट्टम के दो शिलालेयों ( ५० क०३, मेरिङ्गपट्टम १४७, १४८) में इस्तेख है कि कल्यप्पु शिग्यर (पन्द्रगिरि) पर महामुनि भद्रया के चरण-चिट्ट है। ये शिला. और परगुप्त ५६ शकसं अवयवेलगोल के स्मारक लेस लगभग शक सं० २२ के हैं। प्रवणबेलगोल के लगभग शक सं० ५७२ के लेख नं०१७-१८ (३१) में कहा गया कि 'जो जैनधर्म भद्रयाहु और चन्द्रगुप्त मुनीन्द्र के वेज से भारी समृद्धि को प्राप्त हुमा था उसके किश्चित् तीण हो जाने पर शान्तिसेन मुनि ने इसे पुनरुत्थापित किया ।" १०५० के लेख नं० ५२ (६७) (श्लोक ४ ) में भद्रबाहु और मनके शिष्य चन्द्रगुप्त का उल्लेख है। ऐसा ही बल्लेख शक सं० १०८५ के लेख नं० ४० (६४) (श्लोक ४-५) में व शक सं० १३५५ के लेख नं० १०८ (२५८) (श्लोक ८-८) में है। इन सल्लेसे में चन्द्रगुप्त की गुरुभक्ति और तपश्चरया की महिमा गाई गई है। माहित्य में इस प्रमङ्ग का सबसे प्राचीन उल्लेख हरिपेण- कृत 'वृहत्कयाकोपा में पाया जाता है। यह मन्य शक सं० ८५३ का रचा हुमा है। इसमें मद्रया पार चन्द्रगुप्त का वर्षन इम प्रकार पाया जाता है-'पौण्डूवर्धन देश में देवकोट इस नगर का प्राचीन नाम कोटिपुर यहाँ पनाथ नाम का राजा राज्य करता था। इनके एक पुरोहित सामशर्मा और उनकी भार्या मेोमश्री के भद्रवातु नामक पुत्र हुपा। एक दिन अन्य वालको के साथ नगर में रोसते हुए भद्रबाहु की चतुर्थ श्रुतवल्ली गोवर्धन ने देखा । जन्होंने देवकर जान लिया कि यही बालक अन्तिम अवक्षेपली दानवाला है। प्रतएर माता-पिता की अनुमति से उन्होंने मामका नगर था। था।

लेके की एतिहासिक उपयोगिता भया को अपने मरसव में ले लिया भार सन्दें मय विद्याएँ सिधाई। पचासमय भद्रबाहु ने गोवर्धन स्वामी से जिन दीक्षा घारट की। एक समय विहार करते हुए भद्रबाहु म्यामी जैनी नगरी में पहुँचे और सिप्रा नदी के तीर एक उपवन में टहरे। इस समय पानी में जैनधर्मावलम्बो राजा चन्द्रगुप्त अपनी रानी सुप्रभा-सहित राज्य करते थे। जर भद्रपाटु स्वामी पाहार के निमित नगरी में गये तब एक द में भूले में झूलते हुए शिशु ने उन्हें चिलाकर मना किया और वहां से चले जाने को कहा। इस निमित्त से स्वामी को मात दो गया कि वह एक बारह वर्प का भीषण दुर्भिस पहनेवाला है। इस पर मन्होंने समस्त संघ को बुला- कर मय हाल कहा और कहा कि "मय तुम लोगों को दक्षिण देश को चले जाना चाहिए। मैं स्वय' यही ठहरूँगा क्योकि मेरी प्रायु सीण है। चुकी है। सर चन्द्रगुप्त महाराज ने यह सुना तब उन्होंने विरक्त टोकर भद्रबाहु स्वामी में जिन दीक्षा ले ली। फिर चन्द्रगुप्त मुनि, जो दशपूर्वियों में प्रथम ये, विशाग्याचार्य के नाम से जैन संघ के नायक हुए। भद्रपाहु की मात्रा में वे संघ को दक्षिण के पुन्नाटो देश को ले गय । इसी प्रकार रामिल्ल, स्थूलपृद्ध, प्रहमत्र व निष्ठामि सीणमायुर्ममाधुना । + पुबाट बढ़ा पुराना राज्य रहा है। कना साहित्य में यह पुमार के नाम से प्रसिद्ध है। टाने मी' ने इस उल्लेख पर श्रवणबेलगोल के रमारक पौर भद्राचार्य अपने-अपने संघों-सदित सिधु प्रादि देशे। की भेजे गये। स्वयं भद्रबाहु स्वामी उन्नयिनी से 'भाद्रपद' नामक स्थान पर गये और वहां उन्होंने कई दिन तक अनशन प्रत कर समाधिमरण किया जय द्वादशवर्षीय दुर्भिन का पन्त हो गया तब विशाखाचार्य संघ-सहित दक्षिण से मध्यदेश को लोट प्राये। दूसरा ग्रंथ, जिसमें उपयुक्त प्रसङ्ग पाया है, रत्ननन्दिकृत भद्रबाहुचरित है। ग्ननन्दि, अनन्तकीति के शिष्य ललित- कीर्ति के शिष्य थे। उनका ठीक समय ज्ञात नहीं है पर वे पन्द्रहवीं साल हवीं शताब्दि के लगभग अनुमान किये जाते हैं। इस प्रन्थ में प्राय: अपर के ही समान भद्रबाहु का प्राथमिक वृत्तान्त देकर कहा गया है कि वे जब जयिनी मा गये तर वहाँ के राजा 'चन्द्रगुप्त' ने उनको खुव भक्ति की और उनसे नाम से किया है और कहा है कि वहां रकमणि ( Veryl) बहुन पाये जाते है । यहा के राष्ट्रवर्मा धादिराजाश्री की राजधानी कीर्तिपुर' थी। कीर्तिपुर कदाचित मैमूर जिले के हेगडे यकोटे तालुके में कपिनी नदी पर के घाधुनिक 'कित्तर' का ही प्राचीन माम है। हरिपेण गाजिनसेन कवि सपने को पुकार संघ के कहते है। यह संर मम्भवतः 'कित्तर' मंघ का ही दूसरा नाम है जिसका उल्लेय शिलालेख *. १५ (1) में भाया है। " प्राप्य भादपर देश भ्रंमदग्जयिनीभषम । पकारानशन धीरःस दिनानि यहून्य टम् ॥ समाधिगरणं प्राय भदवादिय ययः ।।

मंगों की ऐतिहामिक उपयोगिता भपने साम्न स्वानों का फल पूछा। इनके फल-कचन में भद्र- पाहु ने कहा कि यह धर्ष का दुर्भिक्ष पहनेवाला है। इस पर पन्द्रगुप्त ने उनसे दीसा ले ली। फिर भद्रयाहु अपने पारद हमार शिप्यों-सहित कर्नाटका को जाने के लिये दक्षिण को चल दिये। जय थे एक बन में पहुँचे सय अपनी प्रायु पूरी हुई जान उन्होंने विशारपाचार्य को अपने स्थान पर नियुक्त कर पन्हें संप का मागे ले जाने के लिये कहा पार माप चन्द्रगुप्ति-मदिन वहीं ठहर गये। संघ चौह देश को पला गया। चाहे समय पश्चान् भद्रबाहुन समाधिमरण किया। चन्द्रगुप्ति उनके घरण-चित पनाकर मनकी पूजा करते रहे। विशाम्यापार्य जप दक्षिण में लाटे तर चन्द्रगुप्ति मुनि ने उनका भादर किया । विशाखापार्य ने भद्रयाहु की ममाधि की वन्दना कर कान्यकुरा को प्रस्थान किया। चिदानन्द कवि के मुनिबंशाभ्युदय नामक कन्नड काव्य में भी भद्रपा पार चन्द्रगुप्त की कुछ वार्वा माई है। यह पन्ध शक सं० १६०२ का बना हुमा है। इसमें कधन है कि "इतकेवली भद्रवाह घेल्गोन को प्राय और चिकट्ट (चन्द्र- गिरि) पर टहरे । कदाचित् एक व्याघ्र ने उन पर धावा किया भार उनका शरीर विदीर्य कर डाला। उनके चरणचित प्रत्र तक गिरि पर एक गुफा में पूजे जाते है........अईद्वलि की माक्षा से दक्षिणाचार्य बेल्लोल माये । चन्द्रगुप्त भी यहां सीर्य- यात्रा की माये थे। इन्होंने दत्तिणाचार्य से दीठा प्रध्य की कुछ कालोपरान्त अवषयेलगोल के स्मारक और मनके बनवाये हुए मन्दिर की तथा मद्रमाह के घर- चिह्नों की पूजा करते हुए वहाँ रहे। दतियाचार्य ने अपना पद चन्द्रगुप्त को दे दिया।" शक सं० १७६१ के बने हुए देवचन्द्रकृत राजावलीकथा नामक कन्नड प्रन्ध में यह वार्ता प्रायः रत्ननन्दिकृत भद्रबाहुचरित के समान ही पाई जाती है। पर इस ग्रन्थ में और भी कई छोटी-छोटी बातें दी हुई हैं जो अधिक महत्व को नहीं है। यहाँ कथन है कि श्रुत केवली विष्णु, नन्दिमित्र और अपराजित व पाँच सौ शिष्यों के साथ गोवर्धनाचार्य जम्बूस्वामी के ममाधिस्थान की वन्दना करने के हेतु कोटिकपुर में पाये। राजा पद्मरथ की सभा में भद्रबाहु ने एक लेख, जिसे अन्य कोई भी विद्वान नहीं समझ सका था, राजा को समझाया। इममे उनको विलक्षण बुद्धि का पता चला । कार्तिक को पूर्व- मासी की रात्रि को पाटलिपुत्र के राजा चन्द्रगुप्त को सोलह स्वप्न हुए। प्रात:काल यद्द समाचार पाकर कि भद्रबाहु नगर के उपवन में विराजमान है, राजा अपने मन्त्रियो-सहित उनके पास गये। राजा का मन्तिम स्वप्न यह था कि एक बारह फण का सर्प पनकी मोर भा रहा है। इसका फल भद्रयातु ने २६ यताया कि यहाँ धारह वर्ष का दुर्भित पड़नेवाला एक दिन जब भद्रबाहु माहार के लिये नगर में गये तब सन्होंने एक गृह के सामने खड़े होकर सुना कि उम घर में एक झूले में भूलता हुमा मानक मार-मार से विष्ठा रहा है। । ।

लेखों की ऐतिहासिक उपयोगिता षद शिशु यारद पार चिलाया पर किसी ने उसकी प्रावास नहीं सुनी। इमसे स्वामीजी को विदित हुमा कि दुर्भि प्रारम्भ हो गया है। राजा के मन्त्रियों ने दुभि को रोकने के लिये कई यज्ञ किये। पर पन्द्रगुप्त ने मन सबके पापा के प्रायश्चित्त स्वरूप अपने पुत्र सिंहसेन को राज्य दे भद्रबाहु से जिन दीक्षा ले ली और उन्हीं के साथ हो गये। भद्रबाहु अपने यारह हजार शिष्यों सहित दतिय को पल पड़े। एक पहाड़ी पर पहुँचने पर उन्हें विदित हुपा कि उनकी मायु प्रय पाहुत घोडी शेष है। इसलिये धन्होंने विशासाचार्य को संघ का नायक पनाकर पन्हें पाल पार पाड्य देश को भेज दिया। केवल पन्द्रगुप्त को उन्होंने अपने माघ रहने की अनुमति दी। उनके ममाधिमरण के पश्चात् पन्द्रगुप्त सनके घरणविदों की पूजा करते रहे। कुछ समय पश्चात सिंहसन नरेश के पुत्र भास्कर नरेश भद्रपाहु के समाधिस्थान की सपा अपने पिता- मह की बन्दना के हेतु यहाँ प्राये और कुछ समय ठहरकर सन्हाने पहा जिनमन्दिर निर्माण कराये, वघा पन्द्रगिरि के समीप पेल्गोल नामक मगर बसाया। चन्द्रगुप्त ने उसी गिरि पर ममाधिमरण किया। इस सम्बन्ध में मबसे प्राचीन प्रमाग पन्द्रगिरि पर प्रार्थ नाथ बस्ति के पास का शिलालेख (०१)। यह लेख श्रवण पेल्गोल के समस्त लगो में प्राचीनतम सिद्ध होता है। इस लेख में कथन है कि "महावीर स्वामी के पश्चात् परमपि - अबेलगोल के स्मारक गौतम, लोहार्ग, जम्यू विष्णुदेव, पाराजित, गावद्धन, भद्रवाई, विशास, प्रोष्ठिल, कृतिकार्य, जय, सिद्धार्थ, धृतियण, मुद्धिचादि गुरुपरम्परा में हेग्नेशले भद्रा सामो के काल्यदर्शी निमित- शान द्वारा पुनयिनी में यह कयन किये जाने पर कि बहाद्वारा वर्षका वैषम्य (दुर्भिस ) पड़नेवाला है, मारे संप ने उत्तर पश मे दक्षिणापथ को प्रस्थान किया और कम से वह एक यहत ममलियुक्त जनपद में पहुँचा। यहा प्राधार्य प्रमाण ने सामादि व दरीगुफादि-संकुल सुन्दर कटरा नाम शिखर पर पानी पायु मल्पही शेर जानसमाधित करने की माशा मेर, ममतपकोगे भेगार य के एक शिष्य को माप करदेव की समाधि-भागपना की।" कर इस विषय के जितने दिये गये दो पान गगमत-मम यह कि भद्रा ने पारद ब दुर्भिस की भरिमाणो की और दूसरे यह कि म वाणी का सुनहरा नागपादरियनुमार मनिवाथ का नहीं गये। होने जयिनी के ममी होसमाधिमा माति गुनि सपा नाम funामगारमिएकाग। मामा परिन Karianा के मनुमार भद्रा मामी नदी RR. पER मनापानाम बिना टीमा गुमान artml Famara ना in निमय - लेगों की ऐतिहामिक उपयोगिता अन्गाल के लंग ०१५.१८,४०,५४ तथा १०८ भद्र- थात पार पन्द्रगुप्त दानी का चन्द्रागिरि से सम्बन्ध स्थापित करते हैं। पर जैसा कि उपर के वृत्तान्त मे विदित होगा, शिवालय ० १ की पार्मा इन ससे विज्ञाप। धमके अनुमार विकासदर्शी भद्रयाहु ने दुर्भित को भविष्यवाणी की, और संपविलाप की गया व करवप्र पर प्रभाधन्द्र ने जैन संघकोपागं भेजकर एकशिश्य-मदित समाधि-भाराधना की। पटवार्ता स्वयं लब के पूर्व पार पपर भागों में वैषम्य उपस्थित करने के अतिरिक्त उपर जिग्मित समम्न प्रमाणों के विरुद्ध पड़ती । महमा दुर्भित की भविष्यवाणी करके कहा धने गये, प्रमा. चन्द्र पाचार्य कान में, पन्हें जैन संघ का नायकत्व कय और कहा से प्राप्त हो गया इत्यादि प्रमों का लेप में कोई उत्तर नहीं मिझता। इम मस्तान का सुलझाने कं लिये हमने लेख के मूल सूक्ष्म रीति में जाम की। इम जांच से हमें ज्ञात हमा कि उपर्युक मारा पता ग की छठी पंक्ति में 'থা: সমাখামানিশ पत्यादि पाठ मे खड़ा होता है। यह पाठ दा० पलीट और रायबहादुर नर- मिहापार का है। अवयवल्गाद शिशों के प्रथम संग्रह के रचयिता राइम पाहप ने 'प्रमापन्द्रीना.....' की जगह 'प्रमापन्देल . .. ' पाट दिया है। 1. टा० के० मष्ट भी राइम माप पाठ को ठीक समझते हैं। 'प्रमाचन्द्र की जगह 'प्रभाधन्देश होने में उपर्युक्त मारा पड़ा मन ही -- श्रवणबेलगोल के स्मारक । सय हो जाता है। इससे 'प्राचार्य:' का सम्बन्ध मद्रवार स्वामी से हो जाता है और लेख का यह अर्थ निकलता है कि भद्रबाहु स्वामी संघ को प्रागे बढ़ने की प्राज्ञा देकर प्राप प्रमा- चन्द्र नामक एक शिष्य-महित कटवा पर ठहर गये और उन्होंने वहीं समाधिमरण किया। इससे लेख के पूर्वापर भागों में मामन्जस्य स्थापित हो जाता है और अन्य प्रमाणों से कोई विरोध नहीं रहता। मूल में प्रभाचन्द्रोना 'प्रभाचन्द्रगाम' भी पढ़ा जा सकता है। इस पाठ में कठिनाई केवल यह आती है कि 'म प्रक्षर का कोई पर्य व सम्बन्ध नहीं रहता। पर इसके परिहार में यह कहा जा सकता है कि लेस को खोदनेवाले ने 'प्रभाचन्द्रयनाम,..की जगह भ्रम से प्रभाचन्द्र याम' खोद दिया है; वह 'न को भूल गया। ऐसी भूलें शिलालेखों में बहुधा पाई जाती हैं। प्रभाचन्द्र के भद्रयाहु के शिष्य होने से ऊपर के समस्त प्रमाणों द्वारा यह बात सहज ही समझ में पा जाता है कि प्रभाचन्द्र चन्द्रगुप्त का ही नामा- न्तर व दीना-नाम होगा। भव प्रभ यह सपस्थित होता है कि ये मद्रयाहु और चन्द्र- गुप्त कौन ये पार कब हुए। शिलालोव नं० १, जिसकी थार्ता पर हम ऊपर विचार कर चुके हैं, अपनी लिखावट पर से अपने को लगभग शक संवत् की पांचवी-ठी शताब्दि का सिद्ध करता है। मत: मुममें उशिसिव भद्रया और प्रभा. चन्द्र (चन्द्रगुप्त ) शक की पांचवीं ६ठी शताब्दि से पूर्व सोनिकामिक उपयोगिता दाना पादि। दिगार हानि मह मो समय में लगाकर की शान्दियो तर 'भार' नाम दोभापायी पानम मिला , म मा अन्तिम श्री. कंप मापार और दूसरे से भद्रा जिनमे मरम्मती गल्छ की मन्दो मानाप की पावनी प्रारमिला है। मरे भागाका गमय पूर्व ५३ वर्षय संरम मे १५ वर्ष पूर्व पापा जाता। नक शिष्य का नाम गुतिगुप्त पाया माताजीमा पचान पगायक हुए। डा०पनीट का मत किसिय की यात्रा करनेवाले यही द्विवीय भा- पा ६धार चन्द्रगुप्त पर शिघ्य गुप्तिगुप्त का ही नामान्तर पर दम मन मम्मन्ध में कई कार उत्पमाती है। प्रथम मा गुमिगुप्त पार पन्द्रगुरु को एक मानने के लिये कोई प्रमाद नहीं है, दूमर इसम उपयुक्त प्रमाणों में जो पन्द्र- गुप्त नरेगकंगम्य त्यागकर भट्याए से दोसा लेने का नंग्य है, उसका कुछ खुनामा नहीं होता और सोमर जिम द्वादश- वर्षीय दुर्भित के कारण मद्रयाहु ने दक्षिय की यात्रा की घी मम दुर्मिस के दिनीय भद्रबाहु के ममय में पड़ने के कई प्रमाय नहीं मिलते। इन कारणों से सा० पलीट को कल्पना बहुत कमजोर है और अन्य कोई विद्वान इसका समर्थन नहीं करने। विद्वानों का अधिक झुकाव मष इसी एकमात्र युक्तिसंगत मतको भार है कि दक्षिण की यात्रा करनेवाले भाषा अन्तिम बुनकवली भद्रा हो हैं और उनके lur प्रवणबेलगोल के स्मारक । साथ जाने वाले उनके शिष्य चन्द्रगुप्त स्वयं भारत सम्राट चन्द्रगुप्त के भविरिक्त अन्य कोई नहीं है। यद्यपि घोर निर्वाण के समय का पर तक अन्तिम निर्णय न हो सकने के कारण भद्रबाहु का जो समय जैन पट्टावलियों और प्रयों में पाया जाता है तथा चन्द्रगुप्त मम्राट का जो समय प्राजकल इति- हाम मर्व सम्मति से स्वीकार करता है उनका ठीक समीकरण नहीं होता, • तथापि दिगम्पर और श्वेताम्बर दोनों ही सम्प्र. दाय के प्रयो मे भदयाहु और चन्द्रगुप्त समसामयिक सिद्ध इन दोनों सम्प्रदायों के प्रछौ में इस विषय पर कई विरोध होने पर भी ये उक्त यात पर एकमत है। हेमचन्द्रा. चार्य के परिशिष्ट पर्व से यह मी सिद्ध होता है कि इस समय पारह वर्ष का दुर्भित पड़ा था, 'उम भयङ्कर दुष्काल के पड़ने पर जय साधु ममुदाय को मिक्षा का प्रभाव होने लगा व मप लोग निर्वाह के लिये ममुद्र के समीप गांवों में पन्ने गयं'। म ममय चतुर्दशपूर्वधर भुतकदली श्री भद्रपाहु सामो •• जैन प्रयो अनुमार माह का प्राचार्य निर्माण मे 14 मे १२ वाजता निर्माण के अनुमार से सपा हिमानुपार पत्रात मार्य राय teart 1 से माना जाता। इमार मग - पथगुप्त परमा। खेतावर प्रो अनुमार राममप मि.tt. से 10.नुमार मे.गि। इसका समयमा मा ममीजान। तथा मेग्यों की ऐतिहासिक उपयोगिता ने पारह वर्ष के महापाव नामा म्यान की प्राराधना प्रारम्भ कर दी थी। परिशिष्ट पर्व के अनुमार भद्या स्वामी इम समय नेपाल की मोर चले गये थे और मासंघ के बुलाने पर भी थे पाटलिपुत्र को नहीं भाये जिसके कारण श्रीसंघ ने सन्हें संपयास कर देने की भी धमकी दी। पक्तमय में चन्द्रगुन के समाधि पूर्वक मरय करने का भी उद्धन्य है। इस प्रकार यद्यपि दिगम्बर और श्वेताम्यर प्रन्धों में कई बारीकियों में मत-भेद है पर इन भेदों से ही मूल यातों की पुष्टि देती है क्योंकि उनसे यह सिद्ध होता है कि एक मत दूमरे मत की मस्त मात्र नहीं है व मूल या दोनों के प्रन्यों में प्राचीनकाल से चली माती है। पय इम विषय पर भिन्न-भिन्न विद्वानी के मत देखिये । डा० ल्यूमन और डा० छानने श्रुतकवली भद्रबाहु की दनिय यात्रा को स्वीकार करते हैं। टामस साहय अपनी एक पुस्तक में लिखने है कि "चन्द्रगुप्त जैन समाज के व्यक्ति ये यह जैन प्रत्यकारों ने एक सयंसिद्ध पौर सर्व प्रसिद्ध पात के रूप से लिखा है जिसके लिये कोई अनुमान प्रमाय देने की मावश्यकता ही नहीं थी। इस विषय में लेखों के प्रमाण बहुत प्राचीन और माघारमत: सन्देह-रहित । मेगस्थनीज • Vienn, Oriental Journal VII, 352. + Indian antiquary XII, 39-60. * Jainism or the Esrly Faith otasoka P.23. .

६८ प्रवणबेलगोल के स्मारक के घनो से भी झलकता है कि चन्द्रगुप्त ने ब्राह्मयों के मिद्धान्तों के विपक्ष में श्रमणों (जैन मुनियों) के धर्मोपदेशों फो प्रड्नीकार किया था ।" टामम साहव इसके प्रागे यह भी सिद्ध करते हैं कि चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र और प्रपौत्र बिन्दुमार पार अशोक भी जैनधर्मावलम्बी थे। इसके लिये उन्होंने 'मुद्राराक्षम' 'राजतरशियो' तथा 'माइने प्रफयरी' के प्रमा दिये हैं। श्रीयुक्त जायसवाल मोदय लिखते हैं कि "प्राचीन जैनपंथ पार शिलालेस चन्द्रगुप्र को जैन राजर्षि प्रमायित करते हैं। मेरे अध्ययन ने मुझे जैनप्र घों की ऐतिहासिक वार्ता का भादर करने को बाध्य किया है। कोई कारण नही है कि हम जैनियों के इस कथन को कि चन्द्रगुप्त अपने राग्य के अन्तिम भाग में राज्य का त्याग जिन दीशाले मुनि पृति में रप को प्राप्त हुए, न माने। मैं पहला ही व्यक्ति पद मानने वाला नहीं है। मि. राइम, जिन्होंने Ram. नगाला के शिलानंमों का अध्ययन किया है, पूर्णरूप से प्रपनी राय मी पक्ष में देते हैं और मि. ही भी मैं इस मत की और मुके हैं।" हा स्मिथ लियते कि "पगुप्त मौर्य का घटना-पूर्ण राज्यात किम प्रहार मनात प्राइम पर ठीक प्रकाश एक मा: जैन कपामीरोही . Journal of the Buhu hut Oria Reyerek - city Vol. III. fOxford History of Imsa 73-7li. +4 जोर पर लंखों की ऐतिहासिक उपयोगिता पाहता है। जैनियों ने मदेव उक्त मौर्य सम्राट को बिभ्यसार ( श्रेषिक ) के सरश जैन धर्मावलम्बी माना है और उनके इस विश्वास फो झूठ कहने के लिये कोई उपयुक्त कारय नहीं है। इममे ज़रा भी मन्देह नहीं है कि, शैशुनाग, नन्द पार मौर्य राजशों के समय में जैन धर्म मगध प्रान्त में यहुत था। पन्द्रगुम ने राजगद्दी एफ कुशन माश्य की सहायता से प्राप्त की घी यह पात चन्द्रगुम के जैनधर्मावलम्बी होने के कुछ भा विरुद्ध नहीं पड़ती। 'मुद्राराक्षस' नामक नाटक में जैन माधु का उल्लेख है जो नन्द नरेश के भार फिर मौर्य मनाट् के मन्त्री राक्षस का खास मित्र था। "एक पार जहां चन्द्रगुम के जैनधर्मावन्दी होने की पात मान ली सहा फिर उनके राज्य को त्याग करने व जैनविधि के मनुसार मोबना द्वारा मरय करने की पात सहज ही विश्व- मनीय हो जाती है। जैनयन्य कहते हैं कि जय भद्रयाहु की द्वादशवर्षीय दुर्भिक्षवाली भविष्यवाची उत्तर भारत मे सच होने लगी तब पाचार्य यारह हजार जैनियों को माघ लेकर न्य सुदेश की पोज में दक्षिण को पल पड़े। महाराज चन्द्रगुप्त राज्य त्यागकर सह के साथ दो लिये। यह सह प्रवण लगाला पहुँचा। यहां भद्रबाहु ने शरीर त्याग किया। राजर्षि चन्द्रगुप्त ने उनसे यारह घर्ष पीछे ममाधिमरण किया। इस कथा का समर्थन श्रवणबेलगोला के मन्दिरों भादि फं नामों, पा की मातवी शतादि के उपरान्त के लेखों सघा दसयों अवस्यगोल के स्मारक ३९% उपयन्दिरम् का दानान (सा००४० २, ३८७), का का दानपत्र (मै० मा.रि. १९२१. २६); २० क. शिमोग ४, ए. क. ८ नगर ३५ प ३ इत्यादि। इसके अतिरिण, गोम्मदसार पति के फर्मा प्रभपपन्द्र nि. पता ने भी प्रग्ने अन्य की त्यानिका में इस पर का पग किया है। इन मामा से यहापि पद पर नहीं माना कितनापार्य ने गहरा की जा जमाने में किग प्रकार महायता की या ममापि यह पात पूर्णत: मिर कि मांग की गह जमानेगा जैनापार्य मिद कहा गाता है कि पापार्य पूज्यपाद देकन्दि इसी mriti in fiत के रामगुरु । ngin के गतमा जनाधाय से सावध गा| . ३८ ( १ ) में नामिद के प्रताप का अपना मत। सारी मार्ग पो म पाकर wirritt : Mant मन्तिा र than KUREL जिम महारको "44 Htta triने शरीर याग किया। ...+ay ) काममा। ATHIममनोmm um MI, पान ८४ ) Kingनमा ... 40am fat Rani - सगरमी गङ्गवश ३ दोनों पोप घनिष्ठ मित्रता थी। भारमिंदनं भनक यद कृप्यराज के लिये हो जाते थे। कृडलूर कं दानपत्र । में प्रा० रि० १९२१ पृ. २६ मन ६३ ) में कहा गया कि स्वयं कृष्णराजमारमिष्टका राज्याभिषेक किया था मारमिद के अपराधिकारी राघमध (चतुर्य) छ । के मन्त्री चामुण्टराज ने बिनभ्यगिरि पर पामुण्डरायमानी निर्माण कराई पार गोमटेश्वर की वर शिाल मृति दाटित की (नं. ७५-७६ मादि)। लेय १०८ (२८.१। पारि अधूरा ६ सयापि इसमें चामुण्डराय का कुछ परिषय पाया जाता। उस दिन ता कि चामुण्राप दास फुल कंपार पन्हान अपने स्वामी कनिये पनेक मान इतना ही नही पागुण्राय एक कवि भी । झिगा मा पागुणराय पुसमाम का एक काम भी पाया जाता। यह अधिकांश गा में । इसमें बीपीम सीकरों के जीवन का पर्दन है। यह प्रयाग मं० २०० में समाप्त किया था। इस परम में मा एम प गुरु प्रसितमर प्रादि का परिचय पाया जाता प्रकार भिन्न भिन्न युस जीतकर उन्होंने समर पुरकर, भोर मान', डालिग, परिन कालदण्ड, मुषिक्षम, समर. पाएराम की उपाधियाँ rasी भी इसका भी पांगमय में है। पनी मदनिता के कारद मत्पर - मात। कमरों में शराम म - अवखोल्गोन के स्मारक दो किया गया है०१३७ (३४१)। लेस नं० १०(१२१) में पनंग है कि चामुण्डाय के पुत्र, व मजिवसेन के गिन्य जिनन ने गोल में एक जैन मन्दिर निर्माग कराया था। इनके अतिरिक अन्य ईमेसों में गहरा ऐमे नरंगों का पेग मात्र प्राया है, जिनका प्रभी तक अन्य कहीं कोई frगर परिपय नहीं पाया गया। लेग न. २५६ (४१५) में जिम गितमान पद का उमेश विद सम्मा: गलत *गिरमार माग ( मम्मन शिरमार द्वि० श्री-पुरुष के पुर) में निमांग कराई पी। संघ न. ६०(१८) में किसी गरम पर नाम मममणिका अन्य जिना माम एक बार माला ने घरेग और कोयगा के nि पर का are frपति किये। परेग राष्ट्राला WRITTी का नाम भी था। गङ्गास गार्मिग नाश की मीना (ने. ३ (१) मेरा ६१ (१३.) माग पर नाम पपगार का स्नेहै। tv नही 1 जा सकता कि पद भी कोई गरी ART नाम है पा महा, निनायो ret TITI पासमार्य, जपा पतपुरका माम या ना!".८, नगर ३५) माfinी REnा ३०(५५)। मना है tiger NE भी कोई गनरेशदा है। ३. .( ) में main महामन्त्री मा.

। राष्ट्रकूटश सिग के एक नासी नागवर्म के सपना मरबका बस्य। सूटि पकूलपूर के दान-पत्रों (ए०१०३, १५८: म.पा. रि० १४२५, १० २५) में गगनरंग एण्याप गौर उनके पुत्र नरसिंग का उल्लेख है। मम्भव है कि उपर्युक्त नंग्य के और नरसिंग ये ही हो। फुल लेगों में बिना किसी राजा के नाम के गंगग मात्र का उस्लेस है। लेग में० १६३ (३७); १५१ (४१); २४६ (१६४), ४६८ (३७८)] । लेग ४५ (६६) में उस कि जो जैन धर्म हाम अवस्था को प्राप्त हो गया था उसे गोपनन्दि ने पुनः गगकाल के समान गरिपार यानि पर पहुँचाया। लेय. १४ (६.) में उसक प्रोविजय का गहनाशी में पहुत मम्मान किया था। मेर नं०१७ (३४५ ) में प्रेस है कि इन ने जिनगी में मक पस्तियाँ निर्माण कराई थी उसको मोव गगरंगो मही हाली थी। लेग ०४ में गवाहिका रोप। २राष्ट्रकूटश-राकटया का दक्षिण भारत में नि की पाठवी शवाद मायभाग से प्रारम्भ दोता है। राममय राकटव'एक दन्तिदुर्ग नामक एक राजा में पालुक्यनरेश कीनिवर्मा द्वितीय को पराल कर TE पाप्राग्य की नीव हाली । बस सतराधिकारी प्रम में पालुक्य राज्य प्राय: गारे दंग अपने भाधीन कर लिये। एक पसात् गमरा: गादिन्द (द्वितीय) और भूष सन .

इनके समय प्रयवयगोल के म्मारक किया में राष्ट्रकूट राज्य का विस्तार और भी या गया। भागामी नरेश गोविन्द सृतीय के समय में राहाट राज्य विध्य और मालवा से लगाकर काची सक फैल गया। इन्होने अपने भाई इन्द्रराज को लाट (गुजरात) का सूपदार पनाया। गोविन्द सृतीय के पश्चात् अमोघवर्ष राजा हुए जिन्दोंने लगमा सन ८१५ से ८७७ ईस्वी सक राज्य किया। इन्दोंने अपनी राजधानी नासिक को छोद मान्यसेट में स्मारित को। इनके समय में जैन धर्म की राय उन्नति हुई। अनेक जैन कवि-मे जिनसेन, गुणभद्र, महावीर मादि-इन ममा में हुए। गुगभद्राचार्य ने पसर पुराण में कहा है कि गा प्रमोगा जिनमेनाचार्य को प्रयास करके अपने को पन्य समझता था। प्रमोधवर्ष भय भी करिये। रंगमगालिका' नामक पुस्तक में बात होगा कि ये मन गमय का यागकर मुनि दो गये छ । farmयन रागे रनमानिका। निजामा गुपिया मदनिः ।।" पापा TT द्वितीय र जिनकी मान मांशु, प्राणायम, यमग, महाराजाधिराम, पागमा पालियो पाई जाती। इन प? मोर) Tragli को पागा कर पा राम मममम मिहापमान का रिका हुई fiftat ती गाite इनको ना राष्ट्रकूटवंश जिन्होंने राजादित्य चोल के ऊपर सन् ६५६ मे यही भारी विजय प्राप्त की। इस समय के युद्धो का मूल कारण धार्मिक या। राष्ट्रकूट नरेश जैनधर्मपापक और चोलनरेश शैव धर्म- पापक थे। इनके ममय में सामदेव, पुष्पदन्त, इन्द्रनन्दि प्रादि अनेक जैनाचार्य हुए हैं। कृपाराज के उत्तराधिकारी खोटिंग. देव और उनके पीछे कर्कराज द्वितीय हुए। इनके समय में चालुक्यवंश पुन: जागृत हो उठा। इस वंश के नेल व सेलप ने फर्फराज को मन् १७३ मे बुरी तरह परास्त कर दिया जिससे राष्ट्रकूट मश का प्रताप सदैव के लिये प्रस्त हो गया। जैसा कि माग विदित होगा, लेस नं० ५७ ( शक सं० ८०४) में कृष्णराज तृनीय के पात्र एक इन्द्रराज ( चतुर्थ ) का भा उल्लेस है व लेस नं०३८ में कहा गया है कि गङ्गनरेश मार- सिह ने इन्द्र का अभिषेक किया था। सम्भवत राष्ट्रकूट वश के दितपी गगनरेश ने राष्ट्रकूट राज्य को रक्षित रखने के लिये यह प्रयत्न किया पर इविहास में इसका कोई फल देरने में नड़ी माता। दचिप का राष्ट्रकूटवंश इतिहास के मर्फ से उड़ गया। मय इस संसद के लेखों में इस वंश के जो उल्लेख उनका परिचय कराया जाता है। इस वंश के यग व प्रमापरी मृतीय ने कार्यय गंग के माय गावन्न व समणि के विरुद्ध युद्ध किया था, "मा ग्लेर न०६० (१३८) (मनु: शफ ८६९)के उस्लेस में ७८ अवयोलगोल के स्मारक मात होता है। मेय न० १०६ (२-१) (मनु० शा २५०) से भाव होता है कि राष्ट्रकूटनरेश इन्द्र की प्राशा से पामुगाराम के स्वामी जगवीर राघमन ने यमलदेव को परास्त किया था। लेग ० ३८ (५६) (शE CES) से विदित inar कि राष्ट्रकूटनरेश कृश्य तृतीय के लिये गगनरेश मारसिंग ने गुर्जर प्रदेश को जीता या व राष्ट्रकूट नरेश इन्ट (पर्ष ) का राज्याभिषेक किया था। इन उल्लेखों से स्पष्ट हो है कि गश और राष्ट्रदवश के वीप पनिष्ठ समय था। मश का सबसे प्राचीन लेग, जो इस संपद में भारी है. लेय. २५ ( ३५ ) (मनु० शा २) है। इस लेख में मुर के पुजन गारिन्द ( तृतीय) के ज्येष्ठ माता रणानो पए का एस नेग है। पम (२००४ देणार 8)मेशाग होता कि जज शिवमार द्वितीय काभत ने कर लिया था तप राम हमार काप गाने गानित किये गयेथे १०० नेपाल में amar कप शक 100.4(गन ८०२) में गागागन कर रहे थे। दाल दीपाराम प्रमाणात मि (पा .१२.१.३१) रितमानतालि निगममा कमला मिरमान मगरME) में मानन महांने अपने पुराना nitiसम्...) एम. पापमानादिया । मग प्रमायोजन ७६ राष्ट्रकूटवंश हुमा है कि ध्रुब नरेश ने अपना उत्तराधिकारी अपने कनिष्ठ पुत्र गोविन्द ( तृतीय) को बनाया था व कम्त्र को गङ्गप्रदेश दिया या। इस हेतु कम्ब ने गोविन्द के विरुद्ध तैयारी की पर अन्त में उन्हें गोविन्द का प्राधिपत्य स्वीकार करना पड़ा। लेख नै० ५७ (१३३) में इन्द्र पतर्य की किसी गेंद के खेल में चतुराई मादि का वर्णन है व उल्लेख है कि उन्होंने शक सं० १०४ में अवशवेल्गुल में सलबना मरण किया। लेख में यह भी कहा गया है कि इन्द्र कृष्ण ( त्वीय ) के पौत्र, गङ्गगंगेय (धूतुग) के कन्यापुत्र व राजचू मिलि के दामाद घे यह विदित नहीं हुमा कि ये राजचूडामणि कौन थे । इन्न की रसकन्दर्प, गजमार्तण्ड, चलङ्कराव, पलदगलि, कीर्तिनारायण, एलेवरेटेंग, गेडेगलाभरण, कलिगलोलगण्ठ पौर घोरर पीर ये उपाधियां शी। जैमा अपर कहा जा चुका है, गानरेश मारसिंह ने इन्द्र का राज्याभिषेक किया था। लेस नै०५८ (१३४ ) 'मावषगन्धहस्ति' उपाधिधारी एक धीर योधा पिट्ट की मृत्यु का स्मारक है। लेस में इस वीर के पराक्रम. वर्णन के पश्चात् कहा गया है कि उसे राजचूड़ामणि मार्गे हैं- मन ने अपना सेनापति पनाया था। लेख की लिपि और राजचूडामणि व चित्रभानु संवत्सर के उस से अनुमान होता है कि यह भी इन्द्र पतुर्य के समय का है। प्रसङ्गवरा लेख नं० १४ (६०) में साहसतुइ और कहा- राज का उल्लेख है। अफवडूदेव ने अपनी विद्वता का वर्दन - प्रायेलगोल के ग्मारक है जिसका उल्लेख ए. क. ३, मैमूर ३७ के लंच में पाया जाता है। इस लेम्प में वे 'ममधिगतपचमहाराद" महा. सामन्त कहे गये हैं। जहां से यह लेस मिला है उसी वरण नामक प्राम में अन्य भी अनेक वीरगल हैं जिनमें गोग्गि के अनुजीवी योद्धाओं के रण में मारे जाने के उल्लेख है (म. मा० रि० १६१६ पृ. ४६-४७)। लेख नं० ४५ (१२५) और ५६ (७३ ) में उल्लेख है कि होम्सलनोश विष्णुवर्धन के सेनापति गङ्गराज ने चालुक्य मम्राट् त्रिभुवनमष्ट पैाडि. देव (विक्रमादित्य षष्ठ (१०७६-११२६ ई०) को भारी पराजय दी। इन लेखों में गङ्गराज का कनेगाल में चालुक्य सेना पर रात्रि में धावा मारने व उसे हराकर उसकी रसद वाहन मादि मब स्वाधीन कर अपने स्वामी को देने का जोर- दार वर्णन है। नं० १४४ ( ३८४ ) होरसलवश का लेख है पर उसके आदि में चालुक्याभरय त्रिभुवनमल्ल की राज्य- वृद्धि का उल्लेख है जिससे होयसल राज्य के ऊपर त्रिभुवन मल्ल के प्राधिपत्य का पता चलता है। लेख ० ५५ (६८) में मलधारि गुणचन्द्र "मुनीन्द्र बलिपुरे मल्लिकामोद शान्तीशच- रवार्चकः" कहे गये हैं ( पद्य नं० २०)। अन्य अनेक लेखों (ए. फ०७, शिकारपुर २० भ, १२५, १२६, १५३, ए० इ० १२, १४४) से ज्ञात हुआ है कि मल्लिकामाद चालुक्य. नरेश जयसिंह प्रथम की उपाधि थी। इससे अनुमान जा सकता है कि सम्भवतः पलिपुर में शान्तिनाथ की प्रतिष्ठा किया - ८३ होरसलवंश जयसिंद नरेश ने दी कराई थी। इसी लेख में यह भी उल्लेख है कि पासवचन्द्र ने अपने वाद-पराक्रम में पालुक्य राजधानी में पालसरस्वती की उपाधि प्राप्त की थी। लेख नं० ५४ (६७) में उल्लेख है कि वादिराज ने चालुक्य राज- धानी में भारी ख्याति प्राप्त की धी धघा जयसिंह (प्रथम) ने उनकी सेवा की घो ( प ४१,४२) इसी लेख में पद भी उल्लेख है कि जिन जैनाचार्य को पहिरनरेश ने स्वामी की पाधि दीघा उन्हें दो माहवमल (पालुक्यनरेश १०४२- १०६८ ई.) ने शब्दचतुर्मुग्य की उपाधि प्रदान की थी। लेख नं० १२० (३२७) ११३७ (३४५) में होरम नरेश एरे. या पालुम्य नरेश की दक्षिण बाहु कहे गये हैं (पद्य नं०८)। ४ होप्सलव-पश्चिमी पाद की पहाड़ियों में कादुर जिले के मुदगरे तानुका में 'प्रगडि' नाम का एक स्थान है। यही ग्यान हारसल नरेशों का उद्गमम्मान है। इसी का प्रापीन नाम शशकपुर जादा परब भी वामविका देवी का मन्दिर विमान है। । यदों पर 'मह' नामक एक मामन्त ने एक ध्यान मे जैनमुनि की रक्षा करने के कारण पोरसाल नाग प्राप्त किया। इस वंश के भावी नरेशों ने अपने को 'मालपरोन- ग' अर्यात् 'मलपामों' (पहाड़ सामन्दों) में मुख्य का है। इसी से सिद्ध होता है कि प्रारम्भ में दोसलवंश पहाड़ी था। हम पेश के एक 'काम' नाम के नप के कुछ शिलालेख मिले हैं जिनमें उसके कुईके फोडाल नरेशों से श्रवणबेलगोल के स्मारक । युद्ध करने के समाचार पाये जाते हैं। होरसाल नरेश इस समय घालुवयनरेश के माण्डलिक राजा थे। जिस समय ईसा की ११ वीं शताब्दि के प्रारम्भ में चोलनरेशों द्वारा गङ्ग- वंश का अन्त हो गया उस समय होयसल माण्डलिकों को अपना प्राबल्य यढ़ाने का अवसर मिला। 'काम' के उत्तरा- धिकारी 'विनयादित्य' ने चोलों से लड़-भिड़कर अपना प्रभुत्व पढ़ाया यहाँ तक कि चालुक्य नरेश सोमेश्वर माहयम के महामण्टलेश्वरों में विनयादित्य का नाम गङ्गवाडि ८६००० के साथ लिया जाने लगा। विनयादित्य के उत्तराधिकारी बयान ने अपनी राजधानी शशपुरी से 'येलूर' में हटा ली। द्वारा- ममुद्र में भी उनकी राजधानी रहने लगी। इन्होंने बङ्गाल्वा मोशे से युद्ध किया था। इनके उत्तराधिकारी विष्णुवर्धन के समय में होरसल नशों का भाव बहुत ही बढ़ गया। गया डि का पुराना राज्य सब उनके प्राधीन हो गया और विष्णुवर्धन ने कई अन्य प्रदेश भी जीते। प्रारम्भ में विभा- बर्द्धन जैन धर्मावलम्यो थे पर पीछे वैष्णव हो गये थे। बयान जैन धर्म में उनकी सहानुभूति पनी हो रही। विष्णुवर्धन ने लगागम् ११०६ से ११४१ तक राज्य किया और फिर एनके पुत्र नरसिंह ने सन् १९७३ तक। नरसिंह ने अपने पिता के ममान ही होरसल राज्य की वृद्धि की। इनके पुत्र पौर पधात के समय में यह राग्य चालुक्य साम्राज्य के प्रातर्गत नहीं रहा और स्वतंत्र हो गया। पीर पम्मान ने सम् १२२० होरसलवंश खक राज्य किया। इसके पश्चात् वीरपल्लाल के उत्तरा. धिकारियों ने दोरसल राज्य को नजे व तक मार कापन रक्खा। सन् १३१० ईसी में दक्षिण पर मुसलमानों की पढ़ाई हुई। दिल्ली के सुखान मनाउदीन खिलजो के सेनापति मलक काफूर ने होयसल राज्य को नष्ट-भ्रष्ट कर बाला, दोरपलनरेश को पकड़कर कैद कर लिया और राजधानी द्वारा- समुद्र का भी नाश कर डाला। द्वारासमुद्र का पूर्णत: सत्या- नाश मुसलमानी फौजों ने सन् १३२६-२७ मे किया। पर इस श के सम्बन्ध के जो उल्लेख मंगृहीत लेखों में पाये हैं उनका परिचय दिया जाता है। इम संग्रह में होरपलवंश के सबसे अधिक लेख है जिस नं० ५३ (१४३), ५६ ( १३२ ), १४४ (३४८) ४६५ में विनयादित्य से लगाकर विष्णुवर्धन तक, लेख में १३७ (३४५) और १३८ ( ३४६) में विनयादित्य से नारसिंह (प्रथम) सक व १२४ (३२७), १३० (३३५) और ४६१ में विनया. दित्य से बवाल (द्वितीय) तक की वंशपरम्परा पाई जाती है। ने. (१३२) में इस वंश की उत्पत्ति का इस प्रकार बन पाया जाता है-"विष्णु के कमलनाल से उत्पम पमा के. पत्रि, प्रति के पुष, युध है पुरूरव, पुरूरव के पायु, मायु फे नहुप, नहुप के ययाति व पयाति के या नामक पुत्र उत्पार हुए। यह के वश में अनेक नृपते हुए। इस वंश के प्रक्ष्यात नरेशों में एकमल नामक नति हुए। एक पा, चन्द्र के ८६ प्रवणबेलगोल के स्मारक समय एफ मुनिबर ने एक कराल व्याघ्र को देखकर कहा 'पटसल' 'हे सल, इस मारो'। इस वृत्तान्त पर से राजा ने अपना नाम पारमल रक्खा और व्याघ्र का चिद धारण किया। इसके आगे द्वारावती के नरेश पारसल कहलाये और ज्याम उनका लाञ्छन पड़ गया। इन्दी नरेशों में विनयादित्य हुए। अन्य शिलालेखौ ( ए० क. ५, असिफेरै १४१, १५७) से ज्ञात होता है कि विनयादित्य के पिता नृप काम होयसल धै। अनेक लेखों ( ए० फ० ५, मसरामाद ४३, प्रल्गुद ७६; ए० ० ६, मूगरे १६ ) से सिद्ध है कि नृप काम ने भी उसो प्रदेश पर राज्य किया था। लेखन. ४४ (११८) में मी नृप काम का एचि के रक्षक के रूप में उल्लेस है (पच १) मतएव यह कुछ समझ में नहीं पाता कि उपर्युक्त यशावली में उनका नाम क्यों नहीं सम्मिलित किया गया। विनयादित्य के विषय में लेख ० ५४ (६५) में कहा गया है कि उन्होंने शान्तिदेय मुनि की परयसवा से राज्यलक्ष्मी प्राप्त की थी (पचन ०५१), तथा लेप ० ५३ (१४३) में कहा गया कि उदाने कितने ही सालाप कितने ही जैनमन्दिर प्रापि निमाण कराये में यहां तक किटी के लिए जो भूमि मोदी गई यहा तालाब बन गये, जिन पर्यते। से पत्थर निकाला गया वे ध्वी ममनल हो गये, जिन रालों से नूने की गाड़ियां निकों ने गहरी पाटिया होगये। पारमनरेश जैनमंदिर निर्माच कराने में ऐगदाचित थे। (पचने०४-१)।

होगमलवंश विनयादित्य के कलेयपरसि रानी से एरंया पुत्र हुए जो लेख नं. १२४ ( ३२७) २ १३७ (३४५) में पालुक्यनरेश की दतिय पाहु कदे गये हैं। लेख नै १३८ ( ३४८) के फई पयों में इस नरेश के प्रताप का वर्णन पाया जाता है। ये पहा 'सबकुलप्रदीप' व 'सत्रमालिमणि 'मातात्समर-कृतान्त' व मालपमण्डलेश्वर पुरी धारा के जलानेवाले, कराल घोलकटक को भगानेवाले, पक्रगोट के हरानेवाले, व कलिङ्ग का विध्वंस करनेवाले कहे गये हैं। लेस ने० ४८२ (शक १०१५) विनयादित्य के पुत्र एरेयङ्ग के समय का है। इस लेख में एरंय और उनके गुरु गोप. नन्दि की कीर्ति के पश्चात् नरेश द्वारा चन्द्रगिरि की पस्तियों के जीर्योद्धार के हेतु गोपनन्दि की कुछ मामों का दान दिये जाने का उल्लेख है। एरंयन गङ्गमण्डल पर राज्य करवे थे, लेय में इसका भी उल्लेख है। एरेयन की रानी एघलदेवी से यसाल, विष्णुवर्धन और उदयादित्य ये वोन पुत्र उत्पन्न हुए। विष्णुवर्धन की उपाधियों व प्रतापादि का वर्णन लेस नं. ५३ (१४३),५६ (१३२), १२४ (३२७), १३७ (३४५), १३८ ( ३४८), १४४ (३८४ ) और ४९३ में पाया जाता है। वे महामण्डलेश्वर, समधिगतपचमहाशब्द, त्रिभुवनमाल, द्वारावतीपुरवराधीश्वर, यादवकुलाम्बरधुमणि, सम्यक्त्वपूड़ा- मथि, मलपरोल्गण्ड, तलकाहु-को-नलि-कोरतूर-उच्छङ्गि- नोलम्बवाहि-शानुगल-गोण्ड, भुजवल वीरगङ्ग प्रादि प्रताप. ।

अयमयलगाल के स्मारक सूपफ पदवियों से विभूषित किये गये हैं। उन्होंने इतने दुर्जेय दुर्ग जीते, इतने नरेशो को पराजित किया य इतने माश्रितों को उन पदों पर नियुक्त किया कि जिससे मझा भी चकित हो जाता है। लेखेमें उनकी विगयों का सूप पर्यन है। लेरा न० २२६ (१३७) जो शक सं० १०३ का वि. पर्खन फे राज्यकाल का ही है। इस लेग में पोरमलसेहि और नेमिसेहि नाम के दो राजल्यापारियों का प्रेस है। इन व्यापारियों की माता माघको र शान्तिकारी ने जिन. मन्दिर पार नन्दाशर निर्माण कराकर मानुफीति गुनि से जिन दीपाले ली। यह मन्दिर पन्द्रगिरि पर सेरिन पनि गाम मे प्रसिद्ध है। लेखन. ४४५ ( ३६६ ) अपूरा परममें Fregri का चुम्नेगा है। ० ४५८ (२८८) से मात दोला दकिइम पति के दिरियानायक, मामिनोदपर गाराम नेपाल में जिननायपुर निर्माण कराया। पहलेशन foun। विदित होता है कि राजन मरेश की अनुमतिपत्र दान मी मन्दिर का दिया था। मेस में गगका पम्नेगरे। 'कामग' एक मशेष या ग २०५५ १५.मी जीयो. बार बालिका माहारमान के शम्ग माम पास पारग। पाान नि , fry ra, मनपरिणत का लिया गया तो स्ना भाग २.५५. पाप ।

हमलवंश मिनुवनमान के साधनमाय विष्णुवर्धन का उल्लेख है जिससे सिद्ध होता कि विष्णय न घालुक्यों के प्राधिपत्य को स्वीकार करते थे। इस लेख में नयकीर्ति के स्वर्गवास फा भी पल्लंस। मंग ०४५ (१२५ ), ५८ (७३),६० (२४.), १४४ (३८४) ३६० ( २५१ ) या ४९६ (३६७) विष्णपद्धन नरेश दी के समय के हैं। इन लेखे। में गङ्ग- राम की वंशावली तथा उनके प्रयापमय प धार्मिक कार्यों का पर्पन पाया जाता है। गगराज का वंशवृक्ष इस प्रकार है- कौण्डिन्यगानीय नागवर्मा - मार-माकलब्ध । एच (अपर नाम धुमित्र-नृपकाम हो- रसल के माश्रित)-पाधिको । चम्मचमूप गहराज (देखा लेख नं० १४४, १०२८६) लेप न० ४४ (११८) में गङ्गराज की ये उपाधियां पाई जाती है-समधिगतपश्वमहाराब्द, महामामन्वाधिपवि, महा. प्रचण्डदण्डनायक, वैरिमयदायक, गोत्रपवित्र, युधजनमित्र, प्रोजैनधर्मामृताम्युधिप्रवर्द्धनसुधाकर, सम्यक्त्वरनाकर, माहार- अवयवेलगोल के स्मारक भयभैपज्यशास्त्रदानविनोद, भव्यजनहृदयप्रमोद, विष्णुवर्द्धन भूपालहोय्सलमहाराजराज्याभिषेकपूर्ण कुम्भ, धर्महम्योद्धरण- मूलस्तम्भ और द्रोहघरट्ट। इसी लेख में यह भी कहा गया है कि गणराज के पिता मुल्लूर के कनकनन्दि भाचार्य के शिष्य थे। चालुक्यवंशवर्णन में कहा जा चुका है कि इन्होंने कन्नेगाल में चालुक्य-सेना को पराजित किया था। उनके तलकाड, कोग, चेगिरि प्रादि स्वाधीन करने, नरसिंग को यमलोक भेजने, अदिपम, तिमिल, दाम, दामोदरादि शत्रु को पराजित करने का वर्णन लेख नं० ८० (२४०) के, १० व ११ पद्यां में पाया जाता है। जिस प्रकार इन्द्र का वन, बलराम का हल, विष्णु का चक्र, शक्तिधर की शक्ति व अर्जुन का गाण्डीव उसी प्रकार विष्णुवद्धन नरेश के गङ्ग- राज सहायक घे। गङ्गराज जैसे पराक्रमी थे वैसे ही धर्मिष्ठ भी थे। उन्होंने गोम्मदेश्वर का परकोटा मनवाया, गणवाडि परगने के ममस्त जिनमन्दिरों का जीर्णोद्धार कराया, तथा अनेक स्थानों पर नान जिनमन्दिर निर्माण कराये। प्राचीन कुन्दकुन्दान्वय के वे उद्धारक थे। इन्दों कारयों से घे चामुण्ड- राय से भी मोगुणे अधिक धन्य कहे गये हैं। धर्म बल से गहराज में प्रलाकिक शक्ति धौ। लेख नं० ५६ (७३) के पच १४ में कहा गया है कि जिस प्रकार जिनधर्माप्रयी पत्ति. यम्वरसि के प्रभाव से गोदावरी नदी का प्रवाह रुक गया था इसी प्रकार कावेरी के पूर से घिर आने पर भी, जिनभक्ति के जाये । होरमलवंश १ कारय गडराज की लंशमात्र भी हानि नहीं हुई। कन्नेगल में पालुक्यो को पराजित कर लोट वर विष्णुवर्द्धन ने प्रसन्न होकर उनसे कोई वरदान मांगने को कहा। उन्होन परम नामक प्राम मांगकर इसे अपनी माता तथा भार्या द्वारा निर्माण कराये हुए जिनमन्दिरी के इंतु दान कर दिया । इसी प्रकार उन्होंने गोविन्दवाडि प्राम प्राप्त कर गोम्मटेश्वर की मर्पय फिया। राज शुभचन्द्र सिद्धान्तदेय के शिष्य थे। लेय नं० १६ (७३) से विदित होता है कि दण्डनायक एघि. राज नेइम परम प्राम दान का समर्थन किया था। गङ्गराज से मम्बन्ध सनवालार भी प्रनेक शिलालंप हैं, पयपि उनमें गहराज के समय के नरेश का नाम नहीं पाया। लेग न० ४६ ( १२६ ) गणराज की भार्या लक्ष्मी ने अपने भ्राता पूचन की मृत्यु के म्मरणार्य लिगवाया था। धूपन शुभचन्द्र सिद्धान्त देव के शिष्य थे। लेय. ४५ (१२७) जैनाचार्य मंपचन्द्र विणदेव की मृत्यु का स्मारक पार से गहराज और उनकी भार्या लक्ष्मी ने लिसवाया भा। हर *०४९ (१२६)समीमतिजी ने अपनी भगिनी मति के मरणार्य नियवाया था। लेखन. ६३(१३०) से सात दावा है कि शुभपनदेव की शिष्या लक्ष्मी ने एक जिन मन्दिर निर्माण कराया जा अप एरपतिमाम समस्या है। लंग०६४ (४०) में कहा गया कि गहराज ने अपनी मावा पाचम्केतु कत्तले पनि निमांद का सेवन.

श्रवणबेलगोल के स्मारक ६५ (७४) में गड़गज के इन्द्रकृत गृह (शासन परिव) पनवाने का उल्लेख है। लेख नं. ७५ (१८०) और ७६ (१७७ ) में गजराज द्वारा गोम्मटेश्वर का परफोटा बन. वाये जाने का उल्लेख है। लेख नं० ४३ (११७ ), ४४ (११८), ४८ और ( २२९) गणराज द्वारा निर्माण कराये हुए क्रमश: उनके गुरु शुमचन्द्र, उनकी माता पोचिकम्ये और भार्या लक्ष्मी के स्मारक हैं। लेख नं. १४४ (३८४) ) में गगराज के वंश का पहुव कुछ परिचय मिलता है व लेख न०४४६ ( ३६७), ४४७ ( ३६८) और ४८६ (४००) में गगराज के ज्येष्ठ भ्राता पम्मदेव की भार्या जकपलने के सत्कायों का उल्लेख है। ये सब लेख विष्णुवर्द्धन नरेश के समय के प उस समय से सम्बन्ध रखनेवाले है इसी लिये इनका यहाँ उल्लेस करना भावश्यक हुमा। विष्णुपद्धन के समय के अन्य लेस इस प्रकार हैं। लेगा नं. १४३ ( ३७७ ) में राजा के नाम के साथ ही गहराम नामोल्लेप के पश्चात् कहा गया है फि थलदराय हेडेमीय और अन्य मजनों ने कुछ दान किया। गान पड़ता है यह दाग गोम्मटेघर के दायर्या और की एक कंदरा को भरकर ममतत करने के लिये दिया गया था। लेखन. ५६ (१३३) में विष्णुपदन की रानी शान्तन देयी द्वारा 'मयति गन्धारण पनि' के निर्माण कराये जाने का पलेय है। इस लेप में मेषचन्द्र के गिय प्रमापद की सुति, वीरतन धरा की पति के ।

होमलवंश कवि एवम सक की वंशावलि, विष्णुबर्द्धन की उपाधियों व शान्तलदेवी की प्रशंमा व उनके यंश का परिचय पाया जाता । सान्यानदेषी की उपाधियों में 'उबृचमवविगन्धवाररा' अर्थात् 'उम्पल मौतों के लिये मत्त हाथी' भी पाया जाता है। शान्तलदेवी की इसी उपाधि पर मे पति का उक्त नाम पडा। लेख न०६२ (१३१) में भी इस मन्दिर के निर्माय का उल्लेस है। इस संप में यह भी कहा गया है कि उक्त मन्दिर में शान्तिनाय की मूर्ति स्थापित की गई थी। लेख नै०५३ (१४३) (शक १०५०) में शान्तलदेवी की मृत्यु का पत्य है जो 'शिवगन' में हुई। यह स्थान पथ पङ्गलार में कोई तीस मील की दूरी पर गैवों का तीर्घन्धान है। लेग्य में गान्तालदेवी के वंश का भी परिषय है। उनके पिता पर्गेई मारसिङ्गम्य गंव घे पर माता माविषव्ये जिन भक्त थीं। लेस ने०५१ (१४१) पौर ५२ (१४५) (शक १०४१) में शान्तन्तदेवो के मामा के पुत्र यलदेव और उनके मामा सिटिमय्य की मृत्यु का उल्लेख है। पलदेव ने मारिङ्गरे में समाधिमरय किया तब उनकी माता और भगिनी ने उनकी स्मारक एक पट्टशाला ( वाचनालय ) स्थापित की। सिङ्गि- मध्य के समाधिमरस पर उनकी मार्या पार भावज ने स्मारक लिखवाया। लेख नं० ३६८ (२६५) और ३६६ (२६६) में दण्डनायक भरतेश्वर द्वारा दो मूर्तियों के स्थापित करा' जाने का उल्लेख है। भरतेश्वर गण्डविमुक्त सिद्धान्तदेव के प्रायगोल के स्मारक गिल ये और अन्य शिनालेयों ( नागमङ्गन ३२ १०६.५, चिकमगर १६० ए००६) मे मिद किये और उनके बड़े माई मरिमा विश्वन नरेश के सेनापति थे। अंग नं.४० (६४) (शक (51) मे भो भरत के गाविमुगा के शिग होने का उनेरा है। लेस. ११५ (२६) मेसिविल होता है कि भरतेपर ने जिन दो मूर्तियों की स्थापना कराई जोवे भरत पौर पाहपनी मामी की मूर्तियां भो। म मेग में भरीपर के अन्य धार्मिक कृगों का भा मेरा। mat गतिकी के भागपाम फपर (पति) का in * पागवामपदा गर्भगृह पापा, hirt पाना गाडिको पुरानी मिपी कासार It सीनाantRRIT गई। पहलेलभरन श्री गानोनिया पा। (1) in ( २२१ ) भागी नगी होने १TATE का Amrita TT माNि HAR Partitantपाका ...(२५) मन) 14ta भारि गाय न Niraul-1 HIT UNI MARA। मnिuaina wati मम न पाच 4mhar दोसलवंश पचान कहा गया है कि एक बार मपनी दिग्विजय के समय भांग यौल में भाये, गोमटेश्वर को धन्दना की और पुत्र के धनयाये हुए पतुर्दिशति जिनालय के दर्शन कर उन्होंने उस कन्दिा का नाम 'भध्यचूडामणि रपया क्योंकि पुत्र की उपाधि 'मामाथि थी। फिर उन्होंने मन्दिर के पूजन, दान तथा जीर्णोद्धार के हेतु 'सवर' नामक प्राग का दान किया । संघ में पद भी रोष है कि हार न मरंग को अनुमति में गोम्मटपुर सहाध्यापारी परभो पर के कुछ कर (टंग ) गाम मन्दिरको कर दिया। जापानिपक शक्तिराज मेंशगन्याय में भी अधिक काम र mitta # सयमा t.LAY | में भी मागितगोदनाक का mte एसए में यह भाला trart Pr (Aryasa. समय में भी मा में पान.. ११.१ बिदिन लानाN Offortu म में भी नियोंकि uttra nnn दान मार किया था। पल में की शायदना का वर्णन है। • गुरा तर Ministen to है। (पा) और लोकाम्बिका पुत्र, मरण पार पगा की zा व मलपारिवामी के शिष्य छ । काहान मन्होंने पातुनि को दिया था। पनि मे भी अधिक प्रवास थे।

V पारेमोन स्मारक के नमो नेशन. २५)। परके गुरु नको मेग में कहा गया पनौतिकोपार्षग पर लानाने मानदेशी किमपि मग समेनमि का रानी ग में और भी भने, 'म यो मन । var ( ग १.५ ) मा ना, ...) TD WITREE aunt माप HTTLEnfinी.. PRE .... amnad गुरु नTRIf I am . * २ मामा का जन्म ५. ५) 17 (५.. 4. ५.. ( . ) if us Tak *.ornt.THyat HAIगनत ** pak rat Timaril traintirtanAmAttrina -- दोरमक्षवंश शिकारपुर १९७ ) लेसन० ४६५ में बवामदेव के ममय में अपने गुरु श्रीपाल योगीन्द्र के वर्गवास होने पर यादिराजश्व के परवादिमध जिनालय निर्माण कराने व भूमिदान देने का गई। इस राग्य का प्रन्तिम लेप में० १२८ (३३३)(क ११२८) का जिममें धीर बधालदेव के कुमार पर और नमी रामदेव नायक का नंगतिहाग में काही पापत्र यस्लालदेव के गोमंधर मामक पुत्र का का इस्लंग नाही पाया जाता। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि गम्भवत मांग का कोई निनिधि ही पद दिन की नरंग का पुत्र कहता है। (कंग गाग नियं देवा ने०१२८)। बमाल द्वितीय के पुत्र मालिदिलीप के पग का एक दीसंगम पद मे पाया। लंगर st (1) में कहा गया है कि पविक्षा गमाविगत quivr भारसिंह के समय में पदुमति पुयारिम सरपन्द्र * शिष्य गोम्मट गाग्मा की पूजा कर गाय का दान दिया। मसिह द्वितीय पत्तराधिकारी मामेभर in संचन.१९ (Itu.रमे सामरस गीतिका परिषय इनकी राधियों में पाया जाता है। झंगर में कहा गया कि समिर के मेनापति 'ma'ने सारेगोन के स्मारक गान्तिनाथ मन्दिर काशीयोंजार गया होग में मार पापानाकोपरापरा भी दी है। मेर ( २५६) (११) में और गरम पर मे मेपर के पुनारसिंह दिलीप ra) inान, १२४ ( ३३४ ) ( १२० ) मासा गारेगमग का है। इस aur mont. और कहा गया है कि ग * मेलिस। येदी पत: शापमार के कमरे FMATrim पक्ष में दी। (murti FIRMA.)। म. १०१ ( २५५ ) ( ३८.) २ 411 unt ( २५.) (१३५ ) 21 1411 मनमानी Nirentrit चाकीनी हमारामा a format माना Prag www 101) 'भुमिमा 4neriभागमा पिजयनगर जप मा १३२७ ईस्वी में मुहम्मद मुगलक में झोरमल गाय का पूर्ण रूप से सत्यानाश कर डाला और दोरमल राज्य को अपने माम्राज्य में मिला लिया वय ६रिश के अन्य गग्य सपेक्ष हुए। धे सब दो वीर योधाभों के नायकत्व में एकत्र हुए। इन वीर योपानों, जिनके वग प्रादि का विशेष कुछ पता नहीं चलता, ने घाड़े दो वर्षों में एक राम्य स्थापित किया जिसकी राजधानी बन्दोंने विजयनगर पना। तीनों वारों के नाम प्रमशः दरीदर और पुक्क थे और नों भ्राता थे। इन्होने गुगलमानी पने प्रवाह को गक दिया। इसी समय दसिय में मुसलमानों ने बामनी राय स्थापित किया जिसकी राजधानी गुणवर्गा थी। प्रबदसिय में ये दोनों राज्य की मुगप रहे और दोनों पाप मार झगाने रदं। मम् १४८१ के लगभग बहमनी राग्य एमा, विदर, महमदनगर, गालकृण्मा और पीजापुर नामा में पट गया। विजयनगर नगगी का भागहा बीजापुर के मादिन साह चलता रहा। ममें अधिकत: विजयनगर वियो रहता था क्योंकि पत्ता पार्यों मुसनमानी गयी में था। अन्त में गुमलमानी गमामी ने अपनी भूल पहचान में। २ पर १५६५ में एक होकर साली कोटा महान पराइए पार पहा रिप भारत में हिन्दू साम्राज्यका निपटारा मर के लिये गया। विजयनगर गश रामराया लिये १०२ प्रवणलाल के स्मारक गये और मार डाले गये और उनकी सुन्दर राजधानी विजय- नगर विध्यम कर दी गई। यह संक्षिप्त में विजयनगर राज्य का इतिहास है। माप संपवीत लेख में इस राज्य के जो पाये उन्हें देखिये। इम राजवंश के समन्ध का सपसे प्रथम और समसे मदप का लेरा ने० १३६ ( ३४४) (शक १२१०) का जिसमें युपराय प्रथम द्वारा जैग और ययय साप्रदायों के बीप गानिग पार संधि शापित किये जाने का वर्णन है। सो मे नियों के अधिकारी में कुछ इससेप किया था। इसके किये जैनियोजनरेश में प्राथना की। नरेश ने जैनियों का हाय पी के हाथ पर शकर कहा किधार्मिकता में भी और पापो में कोई भेद नहीं। जैनियों को पूर्यता दी • महानागार कलश का विकार जैन वनको शानिय afar का अपनी दोहानिय धिगमगा पाहिए। जी की मशिगन गमन मिगीगा ना ना नानक गर्ग और rat नधर्म की रमाकाग। गई अतिरिका गया है कि प्रत्येक जन प्रति म पनि form जपा जिम बात को मालिनी rernamanीगो वा Aft rimगागन कापन गा विजयनगर १०५ पर राज्य का, संघ का बमगुताय काही सांगा। म सम्बन्ध मे पदयानिकी कान्तीपर पती का तिम्भ लग भी महाल पूर्ण मंग में वो दाग जैनियों के प्रभिः कार्ग की रा का पाग। एगमें कहा गया है कि पमादि पाग गुलं धारक, गुरु और दयों के मत कलिकाल की कानिमा इराक, हाकृतीधर सिद्धान्त के अनुयायी, पचारा प्रियायों के विधायक मात करोड़ भोग्दों ने एक- वित कर मूलपंप, देगीगद, पुनक गाब के कदम्यहधि के जिनालय को 'एशोटि जिनालया की उपाधि प्या पश्चमहावा का अधिकार प्रदान किया। जो कोई इसमें ऐसा नहीं दोना चाहिए' कदंगा बह शिव का द्रोही ठहरेगा। लगभग एक स. ११२२ का है। लेख न. १२६ ( ३२८ ) में हरिहर द्विवीय की मृत्यु का पल्लंप जो वाग्य सवत्मर ( शक १३६८) भाद्रपद कृप्या गगी मामधार को हुई। अन्य एक संप ( ए० क.८, तीधि १२८) से भी इमा पास फा समर्थन होता है। लेप ०४२८ (३३७ ) से विदिन होता है कि देवराय महाराय की रानी पण्डिवाचार्य की शिष्या भीमादेवी ने मनायी पन्ति में शान्तिनाथ भगवान की प्रतिष्ठा कराई। राजा मम्मवत: देवराय प्रथम शिलालेख से यह नई पात विदित होती है कि इस राजा की रानी जैनधर्मावलम्पिनी यह ख लगमग शक मं० १३३२ का है। लेस यदलस । यो।

अपवेगोल के स्मारक नै.८२ ( २५३ ) (शक १३५४ ) में दरिदर द्वितीय के सेना पति मगर का परिपय है और कहा गया किने पेल्मोन, एक वनकुन और एक तानाप का दान गोमोपर कर दिया। लेग में झगप की शपनी इस IT पाई गाली- पैन नायक ( पुराय प्र. मनी) मानगा-गामी गा मा इगप म मिना मनि की प्रगान memam नान किया गया था। पर कातिमगे होगा MITrmfनी ममतभी गिरामान। दान मानारामा THE पनामा, सीनाजममिय arrearmedia Fttafan मैसूर राजवंश कथन है कि इरुगप ने विजयनगर में कुंधजिनालय निर्माण कराया। लेख नं० १२५( ३२८) पार १२७ ( ३३० ) में देवराय द्वितीय की तय संवत्सर (राफ १३६८) में मृत्यु का पलस। मेमूर राजवंश लेय ०८४ (२५० ) शफ सं० १५५६ का है। इसमें मैमूर नरेश पामराज मोहेयर द्वारा पेगोल के मंदिरों की जमीन के, जो बहुत दिनों से रहन यो, मुक्त कराये जाने का एलेख है। नरेश ने जिन लोगों को इस अवसर पर युलवाया घा उनमें भुजवलि परित के कर्ता पक्षमा कवि के पुत्र पोम्यप्प व कवि योमण्य भी थे। इसी विषय का कुछ और विशेष विवरण लेप न० १४० ( ३५२) (शक १५५६ ) में पाया जाता है। इस लेस में राजा की और से मंदिर की भूमि रहन करने व कराने का निषेध किया गया है। यद्यपि लेखो में इस बात का उल्लेख नहीं है सघापि यह प्रायः निश्चय ही कि उक्त विषय के निर्यय के लिये नरेश गोल मवश्य गये दांगे। चिदानन्द कवि के मुनिवंशाभ्युदय में नरेश की घेल्गाल की यात्रा का इस प्रकार वन है। "मैसूर नरेश पामराज पेलगोल में प्राये और गर्भगृह में से गोम्मटेश्वर के दर्शन किये। फिर उन्होंने द्वार पर माफर दोनों पाजुओं के अवषयगोल के स्मारक शिलालेस पढ़वाये। उन्होने यह ज्ञात किया कि किस प्रकार चामुण्डराय पेल्गोल पाये ये और अपने गुरु नेमिपन्न को प्रेरणा से उन्हान गोम्मटेश्वर को एक लास बयान दजार 'वरह' की प्राय के प्रामो का दान दिया था। इसके पार नरेश मिटर पसि में गये और यहाँ के सौ से जैनापायों की वंशावनी, उनके महल य उनके कार्यों का परिचय प्राप्त किया। फिर उन्होने यह पूछा कि अय गुरु कहाँ गये। बम्मय करि, जो मन्दिर के प्रयों में से थे, ने मुत्तर दिया कि जगर के से नुगु गामन्त के ग्राम के कारण गोम्मटेघर की पूजा पर कर की गई और गुरु पारकीर्ति उस गान को छोड़ भैरव गा की सा मे मनातकीपुर ( गहमोप्पे ) में रहते हैं। म पर नरेश गुरु का पुता होने के लिये कहा और गया राग का गया, फिर देने भारि पति के दर्शन frौर पन्द्रागिरि क गम मंदिरों के दर्शन कर मे सेरिजा. पप गग। पशुमा गोद पार पनुमा पनि भार. की िक लिये मावानीपुर में गये। म पाने पामा गाल गाय गरेर राजा ने ना. सुपारन बिरा साल पन मेंजिग minा in या गंमान का गामन राजा था। बदर 4.२ में नामाकTरगागा। मंगन.४४४(३६५ ) मेरा भारद्वारा aur में मादी (P) L M साहा - मंसूर राजवंश उबेस है। लेख न.८३ (२४५) में कृष्पराज प्रोडयर के शक सं० १९४५ में पेसगोल में पाने व गोम्मटेश्वर के इंतु पगाल प्रादि कई प्रामों के दान का व चिषदेवरामवाने कुण्ड के निकट पनी दानशाला के हेतु कयाले नामक ग्राम के दान का उल्लेग है। लेस में कहा गया है कि गोमटेश्वर के दर्शन कर नरेश पहुव ही प्रसाए भार पुल शितगात्र होकर उन्होंने रक्त दान दिये। अनन्तकवि घव 'गोमटेश्वर परित' में भी इस नरंश की पेन्गोल यात्री का वर्णन है। लेपन, ४३३ ( ३५३) और ४३४ (३४४ ) फागण पर निश्पी हुई पुष्पराज प्रोष्टेयर कृतीय की गनदी समय-समय पर लगाल के गुरु का दी गई। तमे की प्रथम सनद नरेश के मंत्रा पुष्कर की दरी पारस में . राज भोयर धमकं रान का समर्थन किया गया द्वितीय मन्द म्ययं नरंश न दा। लामें पंचालक समान मदिरों * जीपोटार *रिये सीन Hit के दान का लेगई। इस संप में समस्त संगिकी परया सेनीय दी.-दिगिरि पर माउ, पद्रगिरि पर -मेल, माम में पाठ व मयूर की पहाड़ी पर एक ! गरी पूर्व गटको रत मंदिरों के प १ मा बार लिये राज्य एका भीमकान मिलता था। परतामही पासी समास " पर इस लेख में उल्लेख है १०८ अवयवेलगोल के स्मारक लक्ष्मी पंडित की प्रार्थना पर इसके बदले तीन प्रामों का उक दान दिया गया। कृष्णराज प्रोडेयर तृतीय के समय का एक और लेख नं० ८ (२२३) (शक १७४८) है। कि चामुण्डराज के एक वंशज, कृष्णराज के प्रधान अङ्गरक्षक की मृत्यु गोम्भटेश्वर के मस्तकाभिषेक के दिवस हुई। इस पुत्र ने गोम्मट स्वामी की प्रतिवर्ष पूजा के हेतु कुछ दान दिया। वर्तमान महाराजा कृष्णराज प्रोडेयर चतुर्थ का नाम तिधि सहित चन्द्रगिरि के शिखर पर अंकित है जो नवम्बर १६०० ईस्वी में उनके बेलगोल पाने का स्मारक है। पर उनके की पदम्ब वश अनुमान शक की नवमी शताब्दि के लेखन २८२ (४५३) में फाश्चिन दाणे के पास एक कदम्ब राजा प्राशा से तीन शिलायें लाई जाने का बल्लेस है। यह कदम्य नरेश कौन था व शिलायें किम हेतु लाई गई थी यह विदित करने के कोई साधन उपलब्ध नहीं है। क्षेत्र न.11 राइम मायके संग्रह में छपा है पर भोयुक गर मिहागा के मये मकाण में यह नहीं पाया गया। श्रीयुक्त मार्मिnt का कथन है कि पद लेख मयुर दोनों सनदी के परमे पार डिग गया है और इसका पक्षमा में पता नहीं चला (या लेखम. १०) कोहाल्वंश नोलम्य व पल्लव पंथ लेपनं. १०६ (२८१) में चामुण्डराज द्वारा नोडम्य मरंग फे हराये जाने का उल्लंग है। सम्भवतः पद नरम दिलीप का पुत्र ननि नोक्षम्य धा। लेस नं० १२०(३१८) में भरकरे के पीर पटवराय व उमफ पुत्र शहर मायक के नाम पाये जाते हैं। शहर नायक फा माग बंग ०७३ (१७०) २४६ (१७१) में भी पाया जाता है। पलंग लगभग शक सं० ११४०६। पोलयंश शक की गवीं शतान्दि के एक अधूरे लेप न. ४९९ (३७८) में एक बोल पेर्मति का गहों के माय पुर का पात्र है। गम्भवतः पद नरंग राजेन्द्र पाल दी था जो गगनरेश भूवराय द्वारा शक सं०८७१ के जगमग माग गया था जिसका किल्लय प्राकूर के लंग्य में है। संयम २० (१४.), ११०(२५१) ४८८ (१९७) में गहगद्वारा पोकाम मरसिंह वर्मा व दामोरर की पराजय का सख। फोङ्गारवयंश फोन मरंगों का गग्य मगुरालुका मन्नत कारी और ईमवती गदिया दीपा। इनके संरक ०२४२ मे १०१२ तक पाये गये। नास्ति में शामराग्य था। इसका सबसे प्राधा रिप संख... में राजाकी पारियों में पाया जाता है।

। सारेगोत्रसारक गजरातो 'मmaa, 'म', 'TTAMINE. 'पोलो Kare , 'गरिमा कहे गरे है। भार है कि करेगी और पोशाक । भोर र गोप को पापोt Portी. शिधागोगे RETARI Prart+TATANI- - HEART ..amiti .nRI HIR FORIES RITHI.. ...... nanानी का। 4. - 17.1.1 HRI11 निरुलाल ११ पानार (माधुनिकमा शालुका)या। रानः १० (८८) में पन है कि इस वश कं एक नरेश कुलाच पगाल्प महादेव के मन्त्री के पुत्र ने गामटेश्वर की परी मधिन का रामपं० १४२२ में जालोशार कराया । एक नरेश का मखय एक और लंग में भी पाया गया है (ए. क. ४, उपसर १३) निडुगलपंग निगम नरंग मूर्यवशी ऐ और सपने को करिफाल घोल राज कहते थे। वे मारयुराधीश्वर की पाधि धारण करते थे। रियूर (विपनापना के समीप) पान राज्य फी माधान राजधानी थी। ये नरेश पाल महाराजा भी कहलाते थे। उनकी राजधानी पंजेर थी जो अप अनन्तपुर जिले में मारती कहलाती है। दारमन नरंग विष्णुवर्धन के ममय इम पंश का एक दरुगोल' नाम का राजा राज्य करता था। लेन न. ४२ (६६) में इसके नयीति सिद्धान्तदेव के शिप्य दाने व लंस न० १३८ ( ३४८ ) में उसके विष्एवर्द्धन द्वारा दराये जाने का उल्लेख है। उपयुक्त राजकृलों के अतिरिक्त कुछ लेखों में और भी फुरफर राजाभों व गजब शों का उल्लेस है। लेखन० १५२ (११) में परिष्टनेमि गुरु के ममाधिमरण के समय दिण्डि- फराज उपस्थित थे। दिक्षिक का पस्नेस एक और लेख (सा. इ. इ. २-३८१) में भी माया है पर वह लेख लगभग प्रागोन 5 मारक मर.. कार प्रण ले। उगो कोई दो मौका जामीन मनुमान गिजाता है। लेगने. १४(३४) को मान गति में नागनायश नाम के एक मामला का है। मेरा ५५ (१) में कहा गया है বাগাাগীয় মামলা:ঋfi নিশান TRAIलित हुए। मंग(40) में कम fru मे हिमगीत गरेश कोमा में जाकर PITALघा नागो। ने पापा को शनि om की पी। गत (IN) Imafur • २६ (५५.) गागादिश्य, tum arat HE.. (61) मन पाक कान मालिक andir भार matri .. मापा गायक कला (१५, १५) भी पाया जाता है। पमपम मि पानि rammafreATHदा है। 11. (14fuTRA.COM grम, 1 amTHE में पास emain, 1 (Matt मHERLAHAftent -- मन्दिरों के दर- लेखों का मूल प्रयोजन प्रस्तुत लेगों का मूल प्रयोजन पार्मिफ है। इस सतह में लगभग एक मी लेस मुनिमों, माणिकामों, पावक और श्रावि- कामों के समाधिमरयम्मारक हैं; लगभग एक सौ मन्दिर- निर्माय, मूर्तिप्रतिष्ठा, दानशाला, वाचनालय, वाजे, परफोटे, सिढिया, रङ्गशालायें', पालाय, कुण्ड, ग्यान, जीर्योसार मादि कार्यों के स्मारक है, अन्य एक मो के लगभग मन्दिरों के सर्च, जीर्णोद्धार, पूजा, अभिषेक, माहारदान मादि के लिये प्राम, भूमि, घरकम के दान के स्मारक हैं, लगभग एक मी साठ संघों पर यात्रियों की तीर्थयात्रा के स्मारक है और शेष घालीस ऐसे हैं जो या तो किसी प्राचार्य, प्रावक, पयोधा की स्तुति मात्र हैं, व किसी स्थान विशेष का नाम मात्र अंकित करते हैं। जिनका प्रयोजन अपूर्ण होने के कारण सह विदित नही हो सकता। सल्लेखना-समाधिमरण से सम्बन्ध रमनेवाले सी लेखों में अधिकांश-अर्थात लगभग साठ-मातवी पाठवीं शतान्दि व उससे पूर्व के मोर शेष उससे पश्चात् फे। इमसे मनु- मान होता है कि सातवीं पाठवों शताब्दि में सल्सना का निवना प्रचार था उतना उससे पश्चात् की शताब्दियों में नहीं रहा। समाधिमरण करनेवालों में लगभग सोलह के संख्या स्त्रियो-मजिका व भाविकाकी भी है। लेसों में कहीं पर इसे सल्लंखना, कदी समाधि, कहीं संन्यसन, ११४ प्रवणबेलगोल के स्मारक कहीं प्रत य उपवास व अनशन द्वारा मरण व स्वारोहण कहा है। अनेक स्थानों पर सल्लेखना मरण की सूचना केवल मुनियों घ श्रावकों की निपद्यानों ( स्मारको) से चलता है। सपना क्यों और किम प्रकार की जाती थी इसके सम्बन्ध में प्राचीन जैन ग्रन्थों में ममाचार मिलते हैं। इम विषय पर समन्तभद्र स्वामी कृत रखकरण्ठ मायकाचार में इस प्रकार कहा है- उपसर्गे दुर्मिरे जरसि रुजायां च निःप्रतीकारे। धर्माय तनुविमोचनमाहुः स खनामार्याः ॥१॥ स्नेहं र मङ्ग परिग्रह पापहाय शुद्धमनाः । स्वजनं परिजनमपि च सान्त्वा समयेत्रियवचनः ॥२॥ पालोध्य मर्वमेनः कृतकारिसमनुमत व निव्र्याजम् । प्रारोपयेन्मदायतमामरयस्थायि निरशेपम् ॥ ३॥ शो मयमवमादं हे कालुप्यमरतिमपि दित्वा । मस्वरमाहगुदीर्य घ मनः प्रमाद्यं अनेरमनः ॥ ४॥ मादार' पाहाप्य मय: स्निग्ध वियचंयेत्पान । निय चहापयित्वा खरपान परयेक्रमश: ॥६॥ मापानहापनामपि कृत्या छत्वोपयासमपि शकता। पचनमस्कारामनामर्नु त्यभन्मयनेन ॥६॥ प्रर्यात "जप कोई उपमर्ग व दुर्भिस पड़े, ५ पुढापा, स्यापि मताने और निवाबन की जाम मयाय धर्म की रताना त्याग करने की गणना करने। इगर यात्रियों केलंय बन्दना करनी चाहिए। श्रवणयेनगाल पहुव काल में एक ऐमादी स्थान माना जाता रहा है। इस नव-ममन में लगभग १६. लस तीर्थयात्रियो। इनमें से अधिकांश-मगभग १०७-दक्षिय भारत के यात्रियों के पार पर भारत- वामियों के पहियी यात्रियों कंगा में लगभग ५४ में पल पात्रियों के नाम मात्र ग्रंकित ६, गंध लगा में यात्रियों की कंवल पाधियां व उपाधियो मधिन माम पाये जाने हैं। गों में यह भी पष्ट कहा कि भगुरु पाप पारिया में रंग की पीर्थ की बन्दना की। यात्रियों को माम पार्य जाने। इनमें से पुष्प-मोधरम, पीनराशि, पातुहरप, काविरम, पारस पनि मलपकुमार महागुनि, माप पमावर, महादेव मणि, पन्द्रकीनिं, मार्ग, मारमियर ममिपंख। सम्भाकि इनमें 'कविरा यही भाषा प्रसिद्ध कपि दो जिन्दं पालुपय IRamaiय में 'कविषायति' की पाधि विभूषित किया था जिन्होंने एक ० ८.५ में 'पजितपुराम' की रचना की थी। पर्ण भरतवही गिज नाही कवि शि. गारंग . नेपपने दरबार में पकाया और जिन्ही. पुषिभार कारपरी' मामक भार की रचना की। 'पकी ही भाषा शिक्षा बलेख (११७)में पापा भाभी पारसिप : पागुणराज मन्त्री र गतिमा imn -- अवयल्गाल के स्मारक हो। फेवल उपाधियों में से कुछ इस प्रकार है-समधिगत पञ्चमहारान्द; महामण्डलेश्वर, श्रीराजन घट्ट ( गजव्यापारी), श्रीषडवरयण्ट (गरीयों का सेवक), रखधीर, इत्यादि। उपाधि- महित नामों के उदाहरण इस प्रकार है-श्रा ऐचटग-विरोधि. निर, पोजिनमार्गनीति-मम्पन्न-मर्पचुगमणि, पावत्सराज बालादित्य, परिट्टनेमि पण्डित परममयध्वंसक, इत्यादि । जिनके साप में यह भी कहा गया है कि उन्होंने देव की तीर्म की बन्दना की, उनमें से कुछ के नाम ये ई-मतिपय महारक के शिष्य परेनस्य, अभयनन्दि पण्डित के शिष्य फातम्य, श्रीपर्मपन्नगीतय्य, नयनन्दि निगुपदेय के शिष्य मधुपग्य, गागनि के राजा इत्यादि। कुछ शिल्पियों के गाम भी ६,-हविगुतमिद्धान्वदेश के शिष्य भौधरोग, चिदिग, बोग, पन्द्रादित और नागवर्मा। इम प्रभार के शिलालंग यो तो निपयोगी गम पापा इतिहामयाजक के लिये कमो-कभी येदी को लागी गिर होते हैं। कम से कम से कम बन गिद्धहामी दीकि किगने प्राचीन समय से भान भी माना जाता रहा और पनि मुनि, कार, गिगा पानि हितने प्रकार के यात्रियों में nim मामा पर माल की जा बनना काना अपना धर्म गा है। मौसम शान की माहिना, प्राचीनताraints यात्रियों के लेख । ३६ लेया उत्तर भारत के यात्रियों के लेखों की संख्या लगभग ५३ है। ये सब मारवाड़ी-हिन्दी भाषा में हैं। लिपि के अनुसार ये लेख दो भागों में विभक्त किये जा सकते हैं। की लिपि नागरी और १७ की महाजनी। नागरी लेखों का समय लगभग शक सं० १४०० मे १७६० सक है। इनमें के दो लेख स्याही से लिये हुए हैं। इन लेखों में के अधिकांश यात्री काष्ठा संघ के थे जिनमें के कुछ मण्डितटगच्छ के थे। यह गच्छ काठा संघ के ही अन्तर्गत है। कुछ यात्रियों के साथ उनकी घेरवाल जाति ध गोनामा और पीला गान कर उल्लेस है। फुछ लेखों में यात्रियों के निवासस्थान पुरस्थान, माडवागढ़ व गुड़पटीपुर का उल्लेख है। महाजनी लिपि के १७ लेस उस विचित्र लिपि के हैं जिसे मुण्डा भाषा कहते हैं। इमफी विशेषता यह है कि इसमें मात्राये प्रायः नहीं लगाई जाती। केवल 'मा और 'इ' की मात्रामों से ही अन्य सर मात्रामों का भी काम निकाल लिया जाता है। व्यञ्जनों में 'ज' और 'झ', 'ट' और '', '' और 'य', 'भा और 'ब' में कोई भेद नही रवाया जाता । यह भाषा प्रागरा, प्रवध मार पजाप प्रदेशों के व्यागरी महाजनों में प्रचलित है। कुछ लेखों में 'टाकरी' लिपि के प्रसार भी पाये जाते हैं, जो पम्जाप के पहाड़ी दिरसों में प्रचलित हैं। इम पर से अनुमान किया जा सकता है कि रक्तमय प्रदेशों से यात्री इस तीर्थस्थान की बन्दना को पाते थे। सद्धिरित पात्रियों में अधिकांश मा.

अश्यलगोल के स्मारक बाल और मराजगी जातियों के । अमालों के मत हो वे सर भयान्तर भेद पाये जाते हैं जिनका उमेश लेखों में पाया है; यथा--सरधनाला, सहनगला, गढ़ानिया इत्यादि। अनेक पारियों ने अपने को पानीरीया कहा है जिससे विदित होता कि 'पानीपत' के थे। लेरों में गाया और गर्ग व मानक और मोहनगर थानों के नाम भी भार है। इन लेगों का ममय लगभग शक में शीर्णोद्वार शोर दान-मन्दिराविनिर्माण, जीर्थावार कार गाभिकादिकाग से माय गो होगों को मागभाना मौदे। । मन्दिनिर्मायक dil का पहले मन्दिरों मालिकेपर्यत मामुका है। शेष के गुष्य २ का कुछ परिमय दिया मक ग. ११.. मगभग के.. (२५.), 01 ( २३८) गौर न. ( २४२ ) में गामडेपर दीपा गुर्गा के निदान का है। प्रथम माना कि महासमायिक जिग्गामा भिमान महामाया मनामको मRATART की पूजा में बीम JInt 11, yahan मिमा tra.1 मा मम का RR LAALI मीमर जीयाद्वार और दान १२१ लेख में उल्लेख है कि पेलगोल के समस्त व्यापारियों ने 'संघ' से कुछ भूमि खरीद कर उसे मालाकार को गोम्मटेश की पूजा में पुष्प देने के लिये दान कर दी। लेख नं०११ (२४१) में कथन है कि पेलगोल के समस्त व्यापारियों ने गोम्मटेश और पार्श्वदेव की पूजा में पुष्पों के लिये प्रतिवर्ष कुछ चन्दा देने का पचन दिया। लेख नं. १३ ( २४३) के अनुसार पेनि सेहि के पुत्र प पन्द्रकीर्ति भट्टारक के शिष्य कलय्य ने कुछ द्रव्य फा दान इस हेतु दिया कि कम से कम पुष्पों की छः माला प्रतिदिवस गोम्मटदेव और मीर्य करों को चढ़ाई जावें। लेख नं० १४, १५, ६७ ५ ३३० (२४४, २४५, २४७, २००) में गोम्मटेश के प्रतिदिन भभिषेक के हेतु दुग्ध के लिये दान का उल्लेग्य है। इन लेखों में दुग्ध का परिमाय भी दिया गया। और पेलाल के व्यापारी इस कार्य के प्रबन्धक नियुक्त किये गये हैं। लेसन०१०६ ( २५५) (शफ सं० १३३१) में गोम्मटेश को मध्याद पूजन के हेतु दान का उल्लेख है। लगभगशफस०११०० के लेखन०८६,८७,२६१ (२३५, २३६,२५२) में घमविसेहि द्वारा स्थापित पतुर्विशति वीर्य करों की प्रविध पूजा के हेतु व्यापारियो के वार्षिक बन्दों का उल्लेख है। इसी प्रकार लेप ने० ८.१०२, १३१, १२५, १३७, ४५४ और ४७५ में भिन्न भिन्न सत्पुरुषों द्वारा भिन्न-भिन्न देवों और मन्दिरों की भिन्न भिन्न प्रकार की सेवापार पूजा ६ भिन्न-भिन्न ममय पर नाना प्रकार के दानों का उल्लेख है। , अय्य १२२ अवयवेलगोल के स्मारक लेख नं० १३४ ( ३४२ ) में कहा गया है कि हिरिय. के शिष्य गुम्मटन्न ने चन्द्रगिरि पर की चिक्कवस्ति, उत्तरीय दरवाजे पर की तीन बस्तियों और मङ्गायि पस्ति का जीर्णोद्धार कराया। लेख नं. ३७० (२७०) के अनुमार बेगूरु के धैयण ने एक बड़ा होज और छःपर बनवाया। ने० ४६८ (५००) के अनुसार एक साध्वी स्त्री जिण्णन ने एक मन्दिर को रथ का दान दिया, व नं० ४८३ के अनुसार मदेय नायक ने एक नन्दिस्तम्भ बनवाया। लेखों से तत्कालीन दूध के भाव का अनुमान- अनेक लेखों में मस्तकाभिषेक के हेतु दुग्ध के लिये दान दिये जाने के उल्लेख हैं जिनसे उस समय के दूध के भाव का कुछ ज्ञान हो सकता है। उदाहरणार्थ, शक सं० ११६७ के एक लेस नं० ८५ ( २५५ ) में कहा गया है कि हलसूर के केतिसेट्टि ने गोम्मटदेव के नित्याभिषेक के लिये ३ मान दूध के लिये ३ गद्याण का दान दिया। यह दूध उक्त रकम के व्याज से जब तक सूर्य और चन्द्र है तब तक लिया जावे। गद्याय्य दक्षिण भारत का एक प्राचीन सोने का सिक्का है जो करीब दस पाना भर होता है, और मान दक्षिण भारत का एक माप है जो ठीक दो सेर का होता है। प्रतएव स्पष्ट कि ? भर (दो भाना कम दो तोला) सोने के साल भर के व्याज से ३६०४३४२२१६० सेर दूध पाता था। शक सं० ११२८ के लेख नं० १२८ (३३३) से ज्ञात होता लसौ से तत्कालीन दृघ के भाव का अनुमान १२३ है कि उस समय पाठ 'हव' का मालाना एक 'हब' व्याज मा मकवा या प्रर्थात् प्याज की दर सालाना मूल रकम का प्रष्टमांश थी। इसके अनुसार १|| भर सोने का माल भर का प्याज (पौने चार माना ) भर साना हुमा । प्रतएव स्पष्ट है कि शफ की बारहवीं शताब्दी के लगभग अर्थात् माज से छ: सात सौ वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में पाने पार माना भर सोने का २१६० सेर दूध रिकवा था। इसे माजकल के चाँदी सोने के भाव के अनुसार इस प्रकार कर सकते हैं कि उक्त समय एक रुपया का लगभग साढ़े नौ गन दूध भाताया। इसी प्रकार लेख नं०६४ (२४४) में जो नित्यप्रवि ३ मान दूध के लिये ४ गाय के दान का पल्लेस है उसका दिमाष लगाने से २१६० सेर दूध की कीमत पाप माना भर सोना निकलती है। शक सं० १२०१ के लेस १३१ (३३६ ) में नित्यप्रति एक 'या' दूध के लिये पौष 'गद्याय' के दान का उल्लेख है जिसके अनुसार ३१० 'पन' दूध की कीमत मका छः माना भर सोना निकलती है। पत्र सम्भवतः उस समय 'मान' से बड़ा कोई माप रहा है। . गवाण' पार 'मान' अर्थ मुझे भीयुक्त पं. नावामी प्रेमी द्वारा विदित हुआ। इन्होंने भवण बेहोश से समाचार में गाकर अपने पाले पत्र में मुझे इस प्रकार रिपाश-"गाण-यामा अनुमान : तोले बरा होता है और एक मुवर्ण माण्य (1)को गागा की पंगायली और शाम को मेरे मेरा TRIME जिसमें आपको गों में ऐगी पर Tantriar | TREN में मामलों को Trarm भाताई का प्रपर an orm Friमारी परचा प्रामा TALL कोलार १.(" 1 " आमालो imaamit ORTAN में हरित II को prith 3 है . मान " ALER | 1. I मा at At Marat गगा Tan १.garal inा,REER 4.11.BAnion मामanim antaram .

माचार्यों की वंशावली १२५ नं०१ १ गौतम १ गौतम नं० १०५ (२५४) हरिवंश पुराण (शक सं० १३२०) (शक सं० ७०५) (अनु०७वीं शताब्दी) महावीर महावीर महावीर १ इन्द्रभूति। गौतम २ भमिमूति ३ वायुभूति ४प्रफम्पन ५ मौर्य मुधर्म । सुधर्म २ सुधर्म २खोदाचार्य ७पुत्र ११ गयधर ६ फेवली मैत्रेय V मौण्डय १०अन्योल 1११ प्रभासक। जम्बू। ३ जम्यू । ३जम्यू १ विपदव २अपराजित ५ श्रुतकेवली १ विष्णु २ अपराजित ३ नन्दिमित्र ४ गोवर्द्धन १ विष्णु २ नन्दिमित्र ३ अपराजित ४ गोषद्धन ३ गोवर्धन ४ भद्रवार ५ भद्रबाह ५ भद्रबाहु १२६ अवयवांगाल के स्मारक विशाप १ विशास २ प्रीष्टिल ३ उत्रिय ४जय ११ दशपूर्वी १सत्रिय २ प्रोष्ठित ३ गङ्गदेव ४जय ५ सुधर्म ६ विजय ७विशाख ८बुद्धिल धृतिपेण १० नागसेन 1 ११ सिद्धार्थ ५ नाग ६ सिद्धार्थ ७ विपेश ८विजय बुद्धिल १० गङ्गदेव ११ धर्मसेन २ प्रोष्ठित ३ कृत्तिकार्य (क्षत्रिकाय) ४जय ५ नाम (नाग) ६ सिद्धार्थ ७ धृतिपेय ८ बुद्धिल मादि- १नक्षत्र १ नक्षत्र २ यशःपाल ५ एकादशाही २ पाण्डु ३जयपाल ४ कंमाचार्य ५ द्रुमसेन (धृति- ३पाण्डु ४ ध्रुवसेन ५ कंसाचार्य सेन) [१ लोह १ सुभद्र ४ पाचारानी २ सुभद्र ३ जयभद्र ४ यशोबाहु २ यशोभद्र ३ यशोबाहु ४ जोहाचार्य भाषायों की 'गावठी पद पधारी प्राचार्यों की पहावानी।गामों के प्रम में जा र फर पाये जाते हैं, समका काम यह है कि मंग म०१०५ दरिया पुराव मंभित इन्दों में तिगया।पिन बन्द में नामों का समावेश करने के लियं गनझा पार गाना पहा। इसी कारण कटीबद्दी गामों मभीर पर पाप जाते. य में पश:पान क लिये जात, धर्मपन सुधर्म, धार शाम को जागर जपम गाय पाप। गंग की जग जाग्य में दागा पाया काना , urmire गूल व पदने में मूल है। into tit ragn पापमपाई जानी २ समका का पहला rathe wriinा अभिप्राय Th पायलिन मा । ने कुछ ना कर दिगाकर ग Nus wron का मात्र किया। antatwatोष एक माग भी गया है। Ritual का गमय पी बालाया गया nuit fam मजाना जातामा वामी. Rm (२१, पाच भग 11. म. In प, पाच एका वर्षा एकागो में * #Famit मामी या CERT RECEPT । यो मेभादायक.. पारा में हो गई है। Twiter trit ster ।

मजयगोल के स्मारक अतहानियों और कुन्दनाचार्य के पोप की पूरी गुरुपरमारा नहीं पाई जाती। फेरन उपयुकलेसन० १०५ में ही इस बार के पापारों कुर नाम पाये जाते हैं जो इस प्रकार है- ७ रास निीत या प्रदिनी ८मगुप्त ३सपर मद्विधर र १० पान ११मदानीर मेहमीर १२ वीरगाव मन्दिरको पानी में नवाचार्य की गुजारा ग प्रकार पाई जाती है. । गनिगुत मापनदि मEिTAITHI HIT भागों ANTERTAIR rrfant - प्राचार्यो की वंशावली १२६ कुन्दकुन्दाचार्य जैन इतिहास, विशेषतः दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के इतिहास, में सबसे महत्वपूर्ण पुरुष हुए हैं। वे प्राचीन भार नवीन सम्प्रदाय के बीच की एक कड़ी है। उनसे पहले जो भद्रयाहु प्रादि श्रुतज्ञानी हो गये हैं उनके नाममात्र के सिवाय उनके कोई अंघ मादि हमे पय तक प्राप्त नहीं हुए हैं। कुन्दकुन्दाचार्य से कुछ प्रथम हो जिन पुष्पदन्त, भूतपति प्रादि प्राचार्यों ने भागम को पुस्तकारूढ किया उनके भी प्रन्यों का पब कुछ पता नहीं चलता । पर कुन्दकुन्दाचार्य के भनेक मन्य हमें प्राप्त है। मार्ग के प्रायः सभी प्राचार्यों ने इनका स्मरण किया है और अपने को कुन्दकुन्दान्वय के कह- कर प्रसिद्ध किया है। लेगो में दिगम्बर सम्प्रदाय का एक पौर विशेष नाम मूल संघ पाया जाता है। यह माम मम्म- पर सबसे प्रथम दिगम्बर संघ का श्वेताम्पर संघ से पूधक निर्देश करने के लिये दिया गया । १०२२ के शिलालेस नं० ५५ में कुन्दकुन्द को दी मूल संघ के प्रादि गयी कहा है यया- श्रीमता बर्द्धमानस्य पद्धमानस्य शासने । श्रीकोटकुन्दनामाभून्मूलसघाप्रयोगयो । पर शिलालस नं० ४२, ४३. ४७ और ५० (प्रमश. शकसं० १०९६, १०४५, १०३७ भार १०६०) में गीतमादि गुनीश्वरों का स्मरण कर कहा गया है कि पन्ही की सन्तान के मन्दि गय में पचनन्दि अपर नाम कुन्दकुन्दापार्य हुए। नेख भनुमान शक संवन अवयवेल्गोम के स्मारक नं० ५४ (शक १०५०),४०(शक १०६५) और १०८ (शक १३५५ ) में गौतम स्वामी के नल्लेख के पश्चात् उन्हीं को मन्तति में भद्रबाहु और फिर उनके शिष्य चन्द्रगुम का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनके हो अन्वय में कुन्द कुन्द मुनि हुए। इन लेखों में इस स्थल पर संघ गवादि फा नाम निर्देश नहीं किया गया । लेस ने०४१ में बिना किसी पूर्व सम्बन्ध के यह मापार्य- परम्परा भी दी है- কুমুখ मापनधि एमयम ग्रेविध नारहीनि पति माघननिती भभावम बाट पनि बामग ......मगल मानाया की पारा प्रकार पाई जाती है।

A .. प्राचार्यों का वंशावल्ली शक सं० १०८५ के लेख न. ४० में निम्न प्रकार भाचार्य-परम्परा पाई जाती है- । गावमादि (उनकी सन्तान में) भद्रबाहु -- चन्मगुप्त (उनके चन्वय में) पअनन्दि (कुन्दकुन्द) (उनकं चन्दय में) रमाम्बाति (गृपिञ्ष) पलापिन्द (अनकी परम्परा में समन्तभद (हमके पश्चात् देवनन्दि (जिन्यवृद्धि व पूज्यरार) (उनके पक्षा) (इनकी सन्तति में भूल संघ में नन्दिगल का जो देशीगय प्रभेद हुमा उममें गोलदेशाधिप हुए।)

अवधयेलगोल के स्मारक गोष्ठाचाय' काल्ययोगी अविदर्य पमनन्दि (फौमारदेव) । कुठभूपण प्रभाचा कुलचन्मयेष मापनन्दि गुनि (सोलापुरीय) निक भानुजीनि' (ii. ...) अनुमान गरु म. १०२२ मंग.५५ की मापार्य पापरापप्रकार ANS:- भाषायों की वंशावस्ती मूल संघ, देशीगण, पक्रगच्छ कुन्दकुम (मूलसंधामणी) (सके मन्वप में) देवेन्द्र मिसान्तदेव चतुर्मुखदेव (वृषभन्याचार्य) (इनके ८५ शिष्य थे) । गोपनन्दि प्रभाचन्द दामनन्दि गुणचन्द्र मापनन्दि, जिनपद, देवेग्म दामवचन्द्र यरा.. कीनि', भकीति पं.दे. । त्रिमुष्टिमुनि मारिहमचन्द मेघन कल्याणकीति' वारचन्द्र (गण्डविमुन गारमुनि) मूल पद्यात्मक लेख के पश्चात् प्राचार्यों के नामों की गद्य में पुनरावृत्ति है। इस नामावली में अपर के भाग विशेषतायें पाई जाती हैं। मूलसंप देशीगया, वागच्छ कुन्दकुन्दान्वय में यहाँ देवेन्द्र सिद्धान्तदेव से प्रथम पादेव का नामोल्लेरा है। देवेन्द्र सिद्धान्तदेव के पश्चात् धतुर्मुग्वदेव का द्विवीय नाम पृषभन्याचार्य दिया है। चतुर्मुरदेव के शिष्यो में महेन्द्रपद पतिदेव का नाम अधिक है। मापनन्दिर शिष्यों में विरवनन्दि का नाम अधिक है। यशकीरि वासवपन्न गोपनन्दि के शिष्यों में गिनाये गये हैं। इनमें पन्द्रनन्दि का नाम अधिक है।

१३४ प्रवणबेलगोल के स्मारक लेख नं० १०५ ( शक १३२०) की कुन्दकुन्दाचार्य तक की परम्परा हम ऊपर देख चुके हैं। कुन्दकुन्दाचार्य से मागे इस लेख की गुरु-परम्परा इस प्रकार है- उमास्वाति (गृद्धपिछ) बलाकपिछ समन्तभद्र शिवकाटि देवनन्दि (जिनेन्द्रवद्धि व पूज्यपाद) महाकलङ्क जिनसेन गुणभद्र घदति पुषहन्त मूतबद्धि नेमिचन्द्र मापनदि (नोवंश में) प्राचार्यों की वंशावली । पभपचन्द्र देव ( इनके मनुज) भुसझीति तमुनि (इनके प्रशिघ्य ) पण्डितदेव (स्वर्ग १३२०) । अभिनव ध्रुतमुनि अभिनव पण्डित लेर नं. १०८ की परम्परा प्रादि से प्रकलङ्कदेव तक लेख न०४० के समान दी है। प्रकलदेव के पश्चात् संघ-भेद हुमा जिसकी ईगुलेश पलि की लय परम्परा इम प्रकार दी है। सुतकीति चारुकीति । पण्डित । सिद्धान्तयोगी । मुतमुनि (स्वर्गशम ११५) शक संवत् १२१५ के लेख नै०१११ में गूलसंप पलात्कार गय फी कुछ परम्परा निम्न प्रकार पाई जाती है। लेस पहुत धिमा दुमा हाल के कारण परम्परा के ऊपर और नीचे के कुल नाम स्पष्ट नहीं पढ़े गये।

भवषयेलगोल के स्मारक मूल संघ-बलात्कार गण .कीति (वनवामि के) देवेन्द्र विशालकीति शुभकीर्तिदेय महारफ धर्मभूषणदेय भमरकीति'-माचार्य धर्मभूषणदेव (की निग्या पनई गई शर #. १२५) गक सं• १०४७ के लेख नं० ४८३ मे नन्दि संघ, द्रमिय. गण प्रान्तान्वय की निम्न प्रकार परम्परा है। इस लेख में पापायों का गुरु-शिष्य-मम्यन्ध नहीं पतलाया गया केवन पकके पश्चात दूसरे हुए ऐसा कहा गया है। मन्दि ग'घ, द्रमिणगण, सालान्पय मारवामी सम गणधर .. ममनभावती AN मापायों की वंशावन्नी एक सन्धिमुमनि-महारक भकरदेव वादीमसिंह धम्मीयाचार्य धीमन्यापार्य मिहमन्दाचाय श्रीपाल मारक कनकर्मन यादिरामदेव भीविजपशान्तिदेव पुष्पमेन सिदानदेव वादिराज शान्तिषण देव कुमारमैन मैदान्तिक মপ্তি মাের धीशल पौविधदेव (शक २००४ में विष्णुवन मरेश ने शल्य प्राम का दान दिया।) लगभग शक मं० १०९८ के लेख नं०११३ में उल्लेख कि देसी गण पुस्तक गच्छ कुन्दकुन्दान्यय के निमो- द्विसित प्राचार्यों ने मिलकर पथकल्याणोत्सव मनाया- त्रिभुवन राजगुरु भानुचन्द्र सिद्धान्त-पक्रवर्ती, सोमपन्द्र सि० १०, धतुर्मुख भट्टारकदेव, सिंहनन्दि भट्टाचार्य, शान्ति भट्टारक, शान्तिकीर्चि, कनकचन्द्र मलधारिदेव और मेमिपन्द्र मलधारिदेव ।

अयणगोल के स्मारक शान्तिदेय (विनयादिय पोरमन नरेश शरां प्रय) पागोर (पारस्य मरेश द्वारा स्वामी की गधि और भासमान पतुगोर की उपाधि प्राप्त की) गुणपेन ( गार के) पजिसमेन वाडीभमिर केति शान्तिमाप कवितासागत पनाम वारिवाज कुमारमेन मतिगेल मरधार (प्रजितपेन पण्डित शिष्य, सय ...) गत यशायालयों के पापार्यो में से माम पाने लेखा में कही गई इस प्रकार कुन्दकुन्दागाय-ये मूल गेप के अप्रगणी थे (भूग. मपागयोगपी) (५५)। इन्होंने पतम पारिन बारा भारत माधि प्राप्त की यी (५०, ५२, ५३, ५.., ५०) जिसके बात में पणा मेनार गुण कसर नपत (१३) मानो पदमारने तुहि वा प्रयन्तर पर है।१०१)। मास्पाति-प्रेमियानाकरमान । ०५१, १., ५. ) नायि गुरुवार at Amit Ast Parn Hrofer ।

प्राचार्यों का परिचय समन्तभद्र- वादिमिद, गपभृत पार ममातयि- निधि पदों से विभूषित घे (४०, ५४ ४९३ ) इन्होंने भाम म्याधि को जीता था पाटलिपुत्र,माला सिन्धु, टप (पजाब) काम्चीपुर, विदिशा (पाजेन ) व करहाटक ( कोल्हापूर ) में पादियों का मामन्त्रित करने के लिये भी पाई। म्होंन 'भूटि. की जिदा को भी स्थगित कर दिया था ( )। समन्तभः 'मामूति जिन गासन के प्रशना पीर प्रतिवाद-प्रमों को वाग्वयमे पूर्ण करनेवाले (१०८) शिपकाटि-परमन्तभद्र के गिष्य पतरवाईटीका पूज्यपादनका दीनाम 'दवाद' या मारि के कारण ये जिनन्दति कहलाए तथा संपादों की पूजा बनवता परसे पेमस विद्वानो मे प पूज्यपादक माम से परयात ए (४८. १८५ ।। जनेन्द्र पाए. मा मिति टीका) नाभिषक, समाशि १ . शाखारायणERani (४०) ri संग (रि ए.. (७) म म्यापपलाय . टापन सूत्र म्याम यस पारिनिराध दातार over Mararu muster isी दि(१).rikrrr hir RAL NIVERahimantrit orarrior nikrrrrrrr.

भाग १४२ श्रवणबेलगोल के स्मारक न्यास, वैवशास्त्र और तत्त्वार्थ सूत्रटीका (सर्वार्थसिद्धि) के कर्ता कहे गये हैं। वे सुराधीश्वरपूज्यपाद, अप्रतिमौषद्धि, 'विदेहजिनदर्शनपूतगात्र' थे। उनके पादप्रक्षालित जल से लोहा भी सुवर्ण हो जाता था (१०८) । गोल्लाचार्य-ये मुनि होने से प्रथम गोछ देश के नरेश थे । नून चन्दिल नरेश के वंशचूडामणि घे (४७)। चैकाल्ययोगी-इन्होंने एक ब्रह्मराक्षस को अपना शिष्य बना लिया था। उनके स्मरणमात्र से भूत प्रेत जाते थे। उन्होने करज के तेल को घृत में परिवर्तित कर दिया था (४०)। गोपनन्दि-बड़े भारी कवि और तर्क प्रवीण थे। उन्होंने जैन धर्म की वैसी ही उन्नति की जैसी गङ्गनरेशों के ममय में हुई थी। उन्होंने धूर्जदि की जिह्वा को भी स्थगित कर दिया था (५५-४९२)। प्रभाचन्द्र-ये धारा के भोज नरेश द्वारा सम्मानित हुए थे (५५)। दामनन्दिइन्होंने महायदि 'विष्णुभट्ट' को परास्त किया घा जिससे ये 'महावादिविष्णुभट्टपर' कहे गये हैं (५५)। जिनचन्द्र-ये व्याकरण में पूज्यपाद, सर्फ में महाकार और साहित्य में मारवि थे (५५)। ०विरोष जानने के लिये माणिहचान प्रन्यमाटाकर मार काचार की भूमिका 'जन साहित्य संशोप' भा ... देखिए सापायों का परिचप पामपन्द्र पाण्य नारा के फाटक में बाल- मरावती की पाकीधी (५४)। पयोति-नादाने मिशन से सम्मान प्राप्त किया था (४.)। फरपाकीर्ति-पाकिनी भादि भूत-प्रेवों को भगाने में प्रदीप (५५)। श्रुतकीर्ति-रापपपारपोप' काव्य के कर्ता थे। यह साध्य अनुलोमप्रनि नाम नामक पित्रामद्वार-पुष या अर्थान पर पादित अन्त में पादि की पोर एक मा पढ़ा ज्ञा सकता था। काम्प के नाम सेदी विदित होवा पद वर्मक भी था। तीति ने देवेटर पन्य विपत्तियों को बाद में परास्त किया था। मम्भव है कि उत्तवेट पस नाम के दो पेवाग्बरापार्यदों जिनके विषय में प्रभावक धरित में कहा गया कि रनि दिगम्बराचार्य कुमुदपन्द्र को परान किरा था । (ख..मीचे प.पुरनाट देगिए ।) पादिराज-जयसिंह पालुपय द्वारा सम्मानित हुए घे (५४)। चतुर्मुखदेव-पापय मरेश से स्वामी की पाधि प्राप्त कीची। इन पाचार्यों के प्रतिरिक्त प्राय जिनप्रभावशाली प्राचार्यों का परिषय हमें लेखों से मिलता है उनका विवरण उपर ऐति- है धगच्छ अवयत्रेगोल के स्मारक में कोई चारित्र-भेद नहीं है। कई लेखों ( १११, १२६ आदि) में बलात्कारगण का उल्लेख है। इन्ही उल्लेखों से सर है कि यह भी नन्दिगण व देशीगण से अभिन्न है। लेख नं. १०५ में कहा गया है कि प्रत्येक संघ गय, गच्छ और यलि (शाखा) में विभाजित है। देशोगय का सबसे प्रसिद्ध गच्छ पुस्तकगच्छ पुस्तकगद और जिसका उल्लेख अधिकांश लेसों में पाया जाता है। इसी गण का दूसरा गच्छ 'चक्रगच्छा है जिसकी एक परम्परा लेख नं० ५५ ( लगभग शक १०८२ ) में पाई जाती है। लेख नं० १०५, १०८ व इंगुलेश्वरवलि १२८ में देशोगथ की इंगुलेश्वावलि (शाखा) का उल्लेख है। वाले या शासा किसी प्राचार्य-विशेष व स्थान विशेष के नाम से निर्दिष्ट होती घो। देशीगण को एक दूसरी 'हनसेोगे' नामक शाखा का उल्लेख लेखनं०७० में पाया हनसागे पपनसोगे वलि जाता है। लेख घिमा हुआ होने से वहाँ यह स्पष्ट नहीं ज्ञाव होता कि यह शाखा देशोगय की ही है। पर जिन आचार्या (गुणचन्द्र व नयकीर्ति) को यहाँ हनसोगे शाखा का कहा है वे ही लेख नं० १२४ में मूल स घ देशोगय, पुस्तकगच्छ के कहे गये हैं। इसी से उक्त शाया का देशीगणान्तर्गत होना सिद्ध होता है। इनसोगे शाखा का कई अन्य लेसों में भी उल्लेख पाया है। इनसोगे एक संघ, गय, गच्छ और पलि भेद स्थान-विशेप का नाम था। कहीं-कहीं इसे पनसोगेय लि भी कहा है। (रि०ए० ० ० २२३, २३९, ४४६ प्रादि ) अनेक लेख (२८, ३१, २११, २१२, २१४, २१८) मे नविलूर संघ का उल्लेस है। इसी संघ को कहीं कहीं (२७, २०७, २१५) नमिलर संघ कदा नविलूर, ममिलूर है। इसी का दूसरा नाम 'मयूर संघ' च मयूर संघ पाया जाता है (२७, २८)। लेख मं० २७ में पहले नमिलूर संघ का उल्लेस है और फिर उसे दो मयूर संघ कदा है। लेख नं० २६ में इसे 'मयूर प्राम' संघ कदा है जिससे सष्ट है कि यह संघ पलि ध शाखा के समान स्थान-विशेर की अपेक्षा से पृथक् निर्दिष्ट हुमा । कदी पर सष्ट उल्लेख तो नहीं पाया गया पर जान पड़ता है कि यह भी देशीगय के ही अन्तर्गत है। इसी प्रकार जो लेस ० १९४ में कितूरमध* नं० २०३, २०६ में कोला- तूर म घ नं. ४८६ में दिण्डिार शाखा व न० २२० में 'श्रीपूरान्वय' का उन्लेग्य है वे सप भी देशोगप की ही स्थानीय शाग्याएँ विदित होती। कित र मैसूर निझे के होगाम्बोटे तालुका में है। इसका माधीन नाम वीतिपुर था जो पुनार राज्य की रामधानी था। साहित्य में पुक्षार राय का रस्त है। सलेमी में भी पोट' माम से इसका सबष किया है। हपी राम्य का पुबाट पैर प्रसिद्ध है। हरिवंश पुराणको जिमसेन व व्याप के तां हरिपेय पुजार- सीय दी थे। सम्भवतः कित्त र सज पुबाट का ही दूसरा नाम है।

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गिड नं0.11............ और को छोड़ शेर गरिगित मार्ग का परिचय। xx " x मनर का नाम मंत्रमादिम, पिरविरत कमें ११ घ..२ ममाधिमरग। नमुनि समाप्रिनरप । भदान और गन्धगुप्त मुनीन्द्रने जिम धर्म को रमति की भी उसके धीरा होने पर इन मुनिराज ने में पुनरुधारित किया। fri समाधिमरान अनेक शिष्य थे।पमाधि ममरदिनिाराज' मादी थे। मेय (10) * .१३.यरिमरानी गदि के भनुमान किये जार तथापि सम्मान उनमें भी इन्हीं प्राचार्य का रहेगा है। न.२मधे 'परगमय. मरा मे विभूपित किये गये हैं य मोपोन' के गये है। हम विपीने समाधिमाप किया। पारिताका ममाधिमाको सम्भ- गरपन गुरु कोग * .रमन गुरु थे। (१४८) xx .

मेर माचार्य का नाम गुरु का नाम संव,गण,गच्छादि लेप नै० समय विशेष विवरया शक सं०में चरितश्री मुनि पानप (मान) x x xxx ६ घरदेव गुरु धर्मसेन गुरु ७ " अग्रसेन गुरु पहिनि गुरु । x - 5 ३ ० ६२२ समाधिमरण। समाधिमरण । । इनके गुरु 'कित र' परगने में 'वेपमाद' नामक स्थान । इनके गुरु 'मालनूर' के थे। उनमेनजी ने एक मास तक अनशन किया। | लेसन. २ में सम्भवत: इन्दी मीनिगुरु का नछस है। गुणसेन कोहर' के थे। (१५०) गुणमेन गुरु मानि गुरु X है " 1 उहिक गुरु २) कारागिकिला X X x " एक शिष्य का समाधिमरण । पक) गुरु " नागसेन गुरु सिंहनदि गुरु अपमसेन गुरु पटे गुरु XX गुणभूपित x मन्दिगगण() " " समाधिमरण । । खेप बहुत पिसा, इसमें भार स्पष्ट नहीं था।

--- +4 -- lul 1. निमामि । x من لو . xxx MDREMusadu भीर मेष घ. १२५ समाधिमरा ये गुरु 'इनुदूर' के थे। " thyteen " در منه مره rxxxx यानदिपायथे। anmastu KALA २१ xxxx " " " دمياط (مدیر) xx xx । ये 'वेगुरा'थे। । पे दरिय मदरा' से बारे थे। इन्हें मनमनाया था। ( १५१) " Houstilly याचाप मेर पाखाप का माग गुरु का नाम मेय,गण गच्छादिलेस नं. समय विशेष विवरण १६५५०६२२ समाधिमरण । X X X " " - xxxxxxxx परदेवाचार्य नन्दि मुनि २॥ पुरनान्द विगोश महारक ॥ इन्दनन्दिधाचार्य २५उपसनाचाय १५ धादेवाचा एमटिमन भारक २० मारनविभहार १५ जिवनमारक कोलातूर संघ x नविलर रघ " " " " XX ( १५२ ) xx x । २०५ २१२ समाधिमरण। १४६ अनु० इयों इनके एक शिष्य ने तीर्थ वन्दना की । शतादि २२७ ३८ अनु० लेख ने० ३८ में कहा गया है कि गहनरेश मारसिंह ने इनके निकट समाधिमरण किया। व लेस नं. ६७२ अनुसार इनके शिष्य चामुण्डाय के पुत्र जिन देवन ने जिन-मंदिर ३०४ अनु०१७० नयनन्दि विमुक्त के एफ शिष ने तीर्थ वंदना की। ४१८०१ महामण्उलेश्वर त्रिभुवनमत कोमार ने बनवाया। नपनन्दि विमुक्त X समढशारिदेव रसवानिरव x x का भूमि का दाम दिया। ...याटय के हेतु कोमात्र नरेश अदटरादित्य दारा भूमिदान । उपाधि-रभयसिद्धान्तरका- 'সমাশিয়ান देव x x कोनावनरेश राजेन्द्र पृथुनी द्वारा यम्ती- निर्माण और भूमिदान । ४२ गण्डविमुनदेव । मूलसंग कानूरगण । तगरिल गच्च देवनम्ति महारः x गोपनि पनि मुखदेव मू० दे० पु. पंच . (१५३ ) " " " x X X X X X x x x १॥२ ०.०५पायमलनरेश त्रिभुवनमल परेप ने यतियों के जीर्णोद्धार के हेतु प्राम का दान दिया । गोपनन्दि ने चाय होते हुए जैनधर्म का गा नरेशों की सहायता से पुनद्वार किया। वे पडदर्शन के ज्ञाता थे। उपयुक नरेश के गुरुषों में से थे। १६१ १०१.२० २२४ चरणचित है। २२५ २२.१०२२ एक शिष्य ने देववन्दना की। १०३०ये पायाल नरेश विष्णुवद्धन के मंत्री १३ गमराज दण्डनायक और बनके कुटुंब १५,६३.। १.४. के गुरु थे। इन्होंने दन्त कुटुम्न के गदस्यों से कितने ही जिनालय निर्माण कराये, देगेन्द्रमिदानादेव मार पणिता सातनन्दि देव ५८ पन्द्रकीनिदेव अमरनन्दिपति १.एमद्रकमलधारिदेष मू.दे.पु. " । " x - मेरा भाचार्य का नाम, गुरु का माम संघ,गण,गच्छादि लेखन समय विशेष विवरण ४४६ जीर्णोद्धार कराया, मूनियाँ प्रतिष्ठित ४४७, कराई और कितनों ही को दीपा, ४८५ | 2०1०४१ संन्यास भादि दिये। १८ १०४२/ 1.४४ १० दिवाकरनन्दि | देवेन्द्र मि० देव मू० २० पु. (१५४ ) १०.११.० 1. इस लेप से यह गुरुकम विदित होता है- देवेन्द्र सि. देव दियाकरनन्दि x २१मानुकीनि मुनि समाचन्द्रनिदेव मेपद देर मू.दे. २२६ मलधारिदेय शुभचन्द्र देव मि. मु. १०३६पासल राजमेटिने इनसे दीण ली। १०इनकी एक शिप्या ने पहशाटा (वाचना. ०४३ लय) स्थापित कराई। ये विष्णुपन १.४५ नरेश की रानी शामालदेगी के गुरु धे। ४४ " x x xx ५५ नारकोनिदेव १६बनकनन्दि १४ वर्षमानदेव x ...उसके निर्माण कराये हुए मवनि गम्भ. वारण मन्दिर के लिये हमें ग्राम भादि दान दिये गये थे। " जेब के लेगक योम्मिथ्य के गुरु । ४४] ये मुन्छ र निवासी थे(मुल्लर कुर्ग में है)। नृप- काम परिमल के प्राधिा पनिगाके गुरुथे। १२ १.१० इनकी और प्रभाचन्द्र मि०देव की सानी से शान्नारदेवी की मानाने सन्यास लिया था। १०१०दनके शिष्य दण्डनायक भरतेश्वर ने मुना २४.प्र.1... बलि स्वामी का पादपीठ निर्माण कराया। १०१० विगुपयन नरेश के गल्यकाल में मय- कीप्ति का स्वगंगम हो जाने पर कल्याण- सीति का जिनालय बनाने व पूजनादि के देतु भूमि का दान दिया गया। x गविमुक.मि. x मू.दे.. देव X (१४) x x xx ११५ भ010 " करवायबीमित " भानुप्रीनिदेव माधमदेव गमवन्द मिश्देव मू ... म.(हिरिय) नीति देव (चित्र) x १५१,०१०॥ 1८८.प्र.1.1 X X - नशा चाप का नाम गुरु का नाम संघ,ग,गम्यादि लेप ने. ममय विशेप विवरण x X X " निगरपोगी ४०३१०१.६७ अभपदेव मुटसंय ६. भरधारि ११७८०१०८० मग्री के गुरु । ६ नीति' पि. गुपचन्द्र मि. मू.१०० " हुछ मंत्री ने ग्राम का दान दिया। दंव (म.म. हनसाये शाखा। GE.१०२ १२२ ३१७-२० " " " ( १५६) " "मिति १२७ १.८1] १७.05 " भानुनि निदेव वारचम म. मा नय- मू.३० पु. वीनिदेव हनमागे गाया कुन्दकुन्दाचार्य के प्राभूत अप पर इनकी ".. कनादी टीका पाई जाती है।

- - ".. १२४ मापनन्दि । महारक . पपनाम्दाव मप्रवादि नमिचन्द्र देव १५ १२८;"1115 ८ .. - पनन्दि देवहीनि मुनि को भारी सीमा चार बना थे। निधिको नहा- वार होने पर 3 गिगों ने उसकी निस धनवाई। x माधवचन्द्र देवकीन माम. प्रिभुयनमठ योगी ८० मेपचन्द्र गलवामी मू... 1 मयकीति देव | (हरि) नय. धनकाति देव x इनके एक गिय गमोधिने निनाम च०११मवारा प दान दिया। x . घ.

मेयर चाचाप' का नाम, गुरु का नाम संघ,गण,गच्छादिलेस न० समय विशेप विवरण चन्द्रप्रभदेव हिरियनयनीति X xxx xxxx FEELI 1105 ११२० २३८ ११२०॥ " इनकी प्रतिमा है। मू.दे.पु. " " " " २ नम्नन्दिदेव ८ महिपण सागरनन्दि मि.देव देव रामचन्द माघनन्दिगि दव वादिराज महिपेप मापारि x धापाटयोगीन्द्र x वादिरादेव भीपाठ योगीन्द गाग्निरिगणि परवादिमल पण्डित नमितादेव मामराजगुर ४५०३१२२ " X X X X X X " " " " " " " X ४७.

i xxx xxx . " भवनन्ति । मुरकीति गुदद भानुनि मावन दिमिः . दे. पु. ...माधान महारक भानुमति चन्दयदेव x म.म. १.नन्दकोतिभशाक x 1. प्रभापमहाक X मुनिन्द्रदेव रदयनन्यदेव xxx हन आचार्यों और अन्य सम्यनों ने चन्दा किया। " " (१५६) 1. कुमुरपन्न ..मानन्दि गि.. x x x x x होय्यसराय राजगुरु । सम्भवतः येही उस शखयार के कर्ता ६ जिसका उल्लेख प्रारम्भ के एकश्लोक में पाया है।मापिक- चन्द प्रन्पमाला न. २१ में एक शान- पार समुच्चय' नामक प्रत्य सपा है और भूमिका में कहा गया है कि सम्भवत चे कुमुदचन्द्र के गुरु थे। (रेमो मा. प्र• भूमिका पृ. २३.२४) -- नंबर प्राचार्य का नाम, गुरु का नाम संघ,गण,गम्छादिलेखन. समय गिनिवाग १३१ अजिनकीति' चारकीति' देसी गण 11एक मामधन रानमे मोमना। अजितमीति' शान्तकीति' १३३ चाहकीति पं. x प्राचाय १३४ सन्मतिरागरवर्णी पाहकीति' गुरु भू०६.पु. "" ४३३१.३२ । मैमूरनोरा कृष्ण परमेसन ४३४१३५२) प्राप्त की। ४३११७७ इनके मारय में सिन्थापना की गई। ४५० ४३१11८. " संकेतात का अर्थ प. व अनु० = अनुमातः। कु० - कुटामन । १० देय-विषरेव। . भाचा परिनामा'। ६. देव पंडितदेव । पक्ष-ग्रह्मचारी। म. म. महामण्डलाचार्य । म..पु.-गूल मेर, देशीगप, . गच्छ। सि• देव - सिद्वान्तदेव । सि.च.-सिद्धान्त पावती सि. मु.-पिशन गुनीया।

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पानाच पग्नि दक्षिण । धारगिलासय ( ement) भिगना श्रीमान-पापिना। पमान माना-Infe-inस्याग्राममा ॥१॥ remi-यानु पीपरा विदामाक-गनि हाम्पानु पाप ला ॥२॥ माफिय-माहाल्य-माविमायुषः । माराम पुण्वीप-महान्त्यि गुपंदुषः ॥३॥ मनु श्री-पिशापम् (सापाम) जयत्यय जगदितम् । मायामनमध्यावादि-गन-शामनम् ॥ ४॥ पर बड महाप-जगदुदय-कग्दोदिव-नितिशय गुणा- पदान-पामजिन-शामनगराममभिर्दिक भन्यजन-मान- विकगम-विविमिा-गुण-किरण-महम-महान महावीर-पवितरि परिनिभाया .गौतम. गार. माचारिय. •win tfor و الله طاها ها هع: في طهي اللطياره له باڈیز اما نوعيار و جميلة واد الدهلوائط باللون ( طبلطي نه فره (4) لايه بالالالاعياد النحاليا لله يا علليالانيا 1 : دمج مدة انة يين، النط مار اسطنطتها لمطاط الامالمحه، راه ع بلدنا وا الله ولدا ياء للطب بلطه ولده . و لاعطايد11:: مأدبا: - ملا با شنیدم درة النمل 18 مغازه ره وشت.. لماندیم ملتا ہے۔ اند. ما با ما تمام مال دا . خذ منه امه الابدره ا ا ا : هاهما انه ل له : لا - لاة . من المه - مدير ما در لنده ای نداده اند امال ماده - ورود - لی۔ و مه دا ده؛ تلأطعته, ۴، والمعاطمه معلو متر مقبره به غمه د ملي ام بالماء ولا من الحمل من الماء. له المظهر اعمال کا اندام د بلوط هم ط ط شما انها for de relations here for the coolest to the basic biolo dimostrato direttore دوست عمل نمایند شما + مما هو اه يا امي ههه that takes in the listas de hottile din tabah أنا فلازم در هجوم in معامله او به مطهره - ط. هم pang tak tahu apatan it lijkt hitting the پانل، تم خلیل زاد بلخ داماد دو تا سه باطنه نه - مدل चन्द्रगिरि पर्वत परके शिफालेल। [चौमाह में शिर मानि गुरुजी या मान गतिया में नीम मापन रेपमा गरीब किस। (खगभग गपं०१२) श्री। दुरिताभूद् धमाकीस्तारे पादेशानगेन्द्रमान दुर-मिघ्याव-प्रमूद धिरता-मृपनामगिन्धेममयदान । पुरविणमधमेन्द्रामुदामुनिभित्त्य सम्पम्पिमा परितग्रीनामधेयप्रमुगनिन्धत गानुपापना | [पार, असा fanartneritam बसचनिधी गुमि-तमुको REVI (लगभग 20.) गलमोन्तु गुलिपि। IMATE लोलिया। (गभग रा) ग्वनि की जामाप गिा तोर बरोज मनु गुपिर। [anा ATTER मिला।। (लगभग ) भी मेडपारेप पानप -भारमोन्नु Triveni TIMATERIAGEktamanner thanमार भी सीबा (क) ५ मनगिरि पर गिनाग। [पान मे rAI ७ (२५) ( मगमग गा मै १२३) भी किसूरा मारा धर्ममेनगुपटिगना गियर पालदेयगुरपडिगन मन्यामनं मान्नु मुद्रिपिचार! (किर में यरमा रे पमेनगुन २ गियर रे मम्यामन पान प्रागोया रिया। ८(२५) (जगभग शक मं०६२२) श्री मासनूर पहिनि गुरवडिगन शियर उग्रसेनगुर• बढिगल मान्दु तिङ्गल मन्यामनं नोन्तु मुडिपिदार । [ मरनर के पहिनिगुरु के शिष्य उममेनगुम में एक माम तक सनास प्रत पाल प्राणोग्य किया। (लगभग शक सं०६२२) श्री अगलिय मोनिगुरवर शिष्य कोहरद गुणसेनगुर- वोन्तु मुडिप्पिदा । [प्रगति के मौनिगुरु के शिक्ष्य कोहर के गुणसंभ गुरु ने व्रत पाल प्राणोत्सर्ग किया।] १० (७) (लगभग शक सं०६२२) श्री पेरुमा गुरवडिगला शिष्य धरणे कुत्तारेविगु- रवि...डिपिदार ! * एचि।

(wmumme the rit मिritraftmare......। Sofrrer ( witer) mmm (det) miner mertaim (nelman) गभग रा.) की कालापिलगिन गिपातकार र पाच कलापकर गुपटिशना ति गम्याने माग्न मुििपता MITanaltkar. गुरु गुरु fasttim feam TRA पारोल' fermi] (मगभग सं. २६) पभगम गुरडिया शिष्या मागसेन गुए. मटिगा सम्यामनगिमि इन्नु मुष्टिपदार। -नमा गुमनामना।

चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिलालेख । नागसेनमनघं गुणाधिक नागनायकजितारिमण्डलं। राजपूज्यममलीयाम्पदं कामदं वमदं नमाम्यहं ।। [ऋषमसेनगुरु के शिष्य नागमेनगुरु ने सन्यास-विधि से प्राणोन्म किया। १५ (२) (लगमग शक सं० ५७२) श्री । उद्यानजितनन्दनं धनदलिन्यामकरकोत्पन-- व्यामिश्रोतां-शालिपिजरदिशं कृत्वा तु बाहाचलं । मर्चप्राविदयायदाधिभगवद्ध्यानेन सम्बोधयन आराध्याचलमस्तके कनकसत्सेनोमवत्सत्पति ॥ १ ॥ अहो पहिरिगरिन्त्यक्त्वा बलदेवमुनिश्श्रीमान् । पाराधनम्प्रगृहीत्वा सिद्धलोकं गतप्नः॥२॥ १६ (३०) (लगमग शक सं० ६२२) श्री ..म्मडिगल नोन्तु कालं केयदार । [...म्मडिगल ने व्रत पाल देहोत्सर्ग किया।] १७.१८ (३१) (लगभग शक सं० ५७२) श्री-भद्रबाहु मचन्द्रगुप्तमुनीन्द्रयुग्मदिनोप्पेवल । भदमागिद धर्ममन्दु वलिक्केवन्दिनिसरकलो ।। ग्यापि श्रीकृत भगना (शा) मेन (भया एदीराम) ७ पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षालेख। विटुमाघर शान्तिसेनमुनीगनाशिएल्गोल। भट्रिमेलशनादि विट्टपुनर्भवकारे मागि.. 11 [जो जन-धर्म भद्रबाहु और चन्द्रगुप्त मुनीन्द के तेल से भारी समृद्धिमास हुमा पा इसके विचित् सीए हो जाने पर शान्निसेन मुनि ने दमे पुनस्थापित किया। इन मुनियों मे बेगोल पर्वत पर भरान आदि का त्याग कर पुनर्जन्म को जीत लिया। १८ (३२) (लगभग शक सं०६२२) भी बेटे गुरवडिगमायाकर्सिगणन्दिगुरवडिगल्नोन्तु- कालं-केयदा । [बेडेगुर शिष्य सिंहनन्दिगुरु मे व्रत पाल देहासा किपा] २०(२६) (लगभग शक सं० ६२२) ..... .. ...यसरि पीठ दिल्दी नान् ......वारि कुमाररि नचिकेय्यता स्थिरदरलिन्तुपेगुरम मुरलोकविभूति एय दिदार। [......इस प्रकार पेगुरम (1) मे मुरलोक विभूति को 'माप्त किया।] २१ (२९) (लगभग शक सं०६२२) म्वस्ति श्रीगुणभूपितमादि माउरिमिदा निसिदिगे सद्धम्मगुरुसन्तानान् सन्द्विग-गपवा-नयान गिरिवलदामे- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । लति... स्थलमान तोरदाणमाकंलग ननदि मानदा सद्धम्मदा गेलि ससानदि पताम् । [इस लेख का भाव स्पष्ट नहीं हुआ।] २२ (४८) (लगभग शक सं०१०२२) श्री अभयान्दि पण्डितर गुह कोत्तय्य यन्दिधि देवर पन्दिसिद। [अभयनन्दि पण्डित के गृहस्थ शिष्य कोतव्य ने पहाभार देव-वन्दना की। २३ (२८) ( लगभग शक सं०६२२) म्यस्ति श्रीहनुहगरा मे लगयामगुरवल्यप्पो- ल्कालं कयदार। [इनागर के मेगासगुरु में कप (रयम) पर पा होमग किया। २४ (३५) (लगभग शक सं० ७२२) বলি ममविगतपञ्चमहारादपददलिपनमाम्या" महामहासामन्ताधिपति प्रीयतमहाराजाधिरा" मंगर-महाराजरा मगन्दिर रणवशोक-ग्रीकम्यप्पन प्रयुवीरामे गये परमवापुस पेर्गसपना पनि --- - . चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । सुदु कोदृदु सेन मडिगत मनसिजरानाभरसिधेनेत्ति मौनमुनमिवल्लि कोहदु पोलमेरे तदृग्गेरेय किल्केरे पौगि प्रतरकल्ल भेगे मल्लिन्दा सेल कर्गलमारदु सल्लु पेरिय पाल ...'वारि मरल पुणुमपरि'"तारेय भालर मेरे दुषेट्टगे निकल्लु कोवधादा पेरिय एनवु मल्लि कुडिनु परमरा श्रीकरण ......... गादियर दिण्डिगगामुण्डरुम् एनुपरु बङ्गक वल्लभ-गामुण्डरम मन्दि पचरु इण्डि मारम्मनु कादलूर श्रीविक्रम-गामुण्डर फलिदुर्गगामुण्डा अगदिपो" ..."यरर "रणपारगामुण्डर सन्दमासल उत्तम गामुण्टर नविलूर नानगामुण्डरूं घेल्गोलद गोविन्दपा. डिय..ल्लामन्दु येरुगोलदा वलि गोविन्दाढिगे कोदु. यहुभिर्वसुधाभुक्ता गजभिरमगरादिभिः । यस्य यम्य यदा भूमिः यस्य तम्य सदा फलं स्वदत्ता परदस्ता वा यो हरेत वसुन्धरा । पष्टिवर्षममाथि विष्टायां जायने ऋमिः ॥ (श्रीवरममहाराज पुत्र महासमन्ताधिपति राय भीकमप्यन् के राज्य में मनमिन (1) की राशी के व्याधि मे मुख दोने पधार मान न समास हारे पाप भूमि का दान दिया गया था, जिसकी सीमा मादि लेन में दी है। प्रेस दान की सपर साथ समास होता है। दो झोकमरे एडीशन में बहुभयर। ग्स में भूमि' स्थान पर पधामि' साद' परमिrani mt. ॥ - चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस। २५. (११) (लगभग शक सं०८२२) श्रीमत्... पु"शिप्यरिडोनेमिमाडिसिहर सि. ..शिष्य परिहोनेमि में मनाया। -- मरिन ।

शासनवस्ति के पूर्व की ओर के शिलालेख २६(८८) (लगभग शक सं० ६२२) सुरघापंचोले विद्युल्लतेगल तरवारमन्जुयोल्तारि पेगं । पिग्गुिं श्रीरूप-सीला-धन-विभव-महागशिस्निलवार्ग ।। परमार मेचेनानीघरपियुलिरवानंन्दु सन्यासन-गे। दुर मत्वननन्दिसेन प्रवर-मुनिवरन्देवलोक के मन्दान् ।। [म्प, सीग, भाव विभव, इम-धनुर, बिजली व सबिन्दु केसमान पगिक, ऐसा विचारकर मनसेन गुनि मे सभ्यास धार मुरखकको प्रस्थान किया।] २७ (११४) (लगभग शक सं०६२२) श्री। एभान्वित-श्रीनमिलूरमहा । प्रभावती......। प्रमात्यमी पर्वतदुल्ले नान्नुताम् । स्वभाव मौन्दर्य करा- राधिपर्॥ प्राम मयूरसईऽन्य पार्यिका दमितामसी। कट्यप्रगिरिमध्यस्था साधिता प समाधिता ।। मिमिलरमय की प्रभावनी में इस पर्वत पर बन भाविष्य एरी प्राप्त शिया 1 चन्द्रगिरि पर्वत पर कं शिलालेख । [ मयूरप्रामसंघ की प्रायिका दामनामती ने करवा पर्वत पर समाधि-मरण किया। २०(८) (लगभग शक सं० ६२२) श्री ॥ तपमान्द्वादशदा विधानमुखदिन् करोन्दुवाधात्रिमेल । चपलिल्ला नविलूर सङ्घदमदानन्तामतीखन्तियार ।। विपुलश्रोकटवप्रनल गिरियमेल्नोन्वोन्दु मन्मार्गदिन । उपमील्या सुरलोकसांख्यदेडयान्तामरिद दाल मनम् ॥ [ नविलर संघ की अनन्तामती-गन्ति ने दादरा तप धार करवा पर्वत पर यथाविधि व्रतों का पालन किया और मुरजोक का अनुपम मुख प्राप्त किया। २८ (१०८) (लगभग शक सं०६२२) श्री ॥ मनवरसमालम्पि भृत-शय्यममेन्त विच्छेयं वनदोलयोग्य... नामदि......गलो... मनव मिक्कन .....दि...मान्तुसमाधिकूटिदों अनुपम दिभ्यापदु सुरलोकद मार्ग दोलिल्दरिन्थिनिम् ॥ मयूरग्मामसंहम्य मौन्दर्या-शार्य-नामिका। फटगिरिशजेष माधितस्य ममाधितः ।। [ मामा माम-बम-सहित समाधि का पालन किया और पास ही अनुपम मुरलोडका मार्ग प्राnि)) [ मरमामधीमा पर्यन पासमाधिमा किया ३ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । ३० (१०५) (लगभग शक सं०६२२) भङ्गादिनामन के गुणकीर्तिदन्तान तुङ्गोधमक्तिवरादिन वोरदिखिदेवम् पोहोल विचियगिरिकूटमयंकुचेलम् । [ गुणकीजि मति सहित व देवारमर्ग किया। २१ (१०६) (लगभग शक सं०६२२) नविष्ठूरा श्रीसदुल्ले गुरपनम्मानियाधारिपर प्रवराशिप्यानिन्दिता यमि "वृषभनन्दोमुनी । भवविश्जन-सुमार्गदुल्ले नहान्दारापना-योगदिन प्रवरं साधिसि स्वर्गलोकमुख-वित्त.......माधिगल । महिलूर मप मीनिद भाग शिष्य पमनदि मुवि में समाधि-मरण किया। (लगभग शक सं०६२२) वना मृत्युवरवानरि देन्दु सुरक्षिान् । अनेक-शील-गुणमालेपलिन्मगिदोप्पिदोन् । विनय-देवसेन-नाम-महामुनि नोन्तु पिम् । इन दरिष्दु पलिपटे वान्दिवमेरिदाम् ।। मायु का समय निकर जाम गुशार और सौरान रेसले महाविमा पार गंगामी हुए।

गनगिरि पर्वत पर गिलादेगा। (लगभग शक सं०६२२) परंगीनई कम्त मग्यममान्कोल गरमत..। वई कारदिन्नुपाल्गुनरिदिनगन्दु ममाधि कूडिए ।। एडे-विडियरकाडि कटाप्रयंएरिये निल्लइनन्धन पडेगमालिप......न्दा-मुग्लोक-महा-विमरस्यननादं । ["अब मेरे लिये जीवन समय "प्रेमा कारोल- तर संप.......(.) मे समाधि-तरा लिया और पत्र पति पर मे मुरक्षाक प्राप्त किया। ३४ (८४) (लगमग शफ सं०६२२) स्वस्ति श्री प्रनवधनदि-राष्ट्रदुल्ले प्रधिव-यशो ..न्दकान्वन्दु..लाम् विनयाचार प्रभावन्तपदिनधिमन्चन्द्र-देवाचार्य नामन् सदित-श्री-कलप्पिनुल्ले रिपिगिरि-शिले-मेल्नान्तुवन्देहमिकि निरवद्यन्न रि स्वर्ग शिवनिलेपडेदान्साघुगपुग्यमानन् । [मदिराज्य के यराधो, प्रमावयुक, शील-सदाचार सम्पन्न चन्द्रदेव पावाय' कल्वप्प नामक ऋषिपात पर प्रत पाल वर्ग: गामी हुए।] ३५ (७६) (लगमग शक सं०६२२) सिद्धम् नरेदाद प्रत-शील नान्पि-गुणदि स्वाध्याय सम्पत्तिनिम् ।

--- चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिलालेस। करेइल-नस्तप-धर्मदा-ससिमति-श्री-गन्तिय न्दुमेल ।। परिदायुष्यमनेन्तु नोडेनगे सानिन्तेन्दु फल्वप्पिनुल । तोरदाराधने-नोन्तु वीर्य-गिरि-मेल स्वर्गालयो रिदार ।। [व्रत-शील-मादि-सम्पन समिमति-न्ति कस्वापु पर्वत पर भाई भार थरकार कि मुझे इसी मार्ग का अनुसरण करना तीगिरि पर सन्यास पारणकर स्वर्ग'गामी हुई।

कांचिन दोणे के मार्ग पर के शिलालेख ३६ (१४५) (लगमग शक सं० १२२) श्रो एरेयगये कवट्टद लो...... [व में परेयगवे......] ३७ (१४६) (लगभग शक सं० १०७२) श्रीमतु गरुडकेसिराज स्थिरं जीयातु । ३८ (५६) (शक सं०८९) कूगे प्रधादेय स्तम्भ पर (दक्षिणमुस) म्वस्ति म......म् पदधि कृत्वावधि मेदिनी ..पक्र . ...वो भुमन मुजासेपलात् । न्योजग. पतंगगडान्वयरमाभुजा भूधानममम. .वनितायतन्दुमेयोदयः ॥१॥ तम्य मकसजगतीन नोगामार ग।

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस। कौमुदी-महातेजायमानस्य । सत्यवाक्यकापिवर्म-धर्म- महाराजाधिराजस्य । कृप्यराजोत्तरदिग्विजयविदितगुर्जराधि- राजस्य । वनगजम प्रतिमलबजवदधदर्प-दलनप्रकटीकवविक- मस्य। गण्डमार्तण्ड-प्रतापपरिरतिव-सिंहासनादि-सफल-राग्य- चिदस्य । विन्ध्याटलोनिकटवर्ति...ण्डक-किरावप्रकरभङ्ग-करस्य । भुजयजपरि...... मान्यखेट-प्रवेशिवचक्रवर्तिकट...विक्रम... श्रीमदिन्द्रराजपट्टबन्धोत्मवस्य ... ...समुत्सादिवसमरसम. यज्जल.........मस्य। भयेोपनयनवासिदेशाधि...... मणिकुण्डलमदतिपादि-समस्त-वस्तुम ... .. मगुपनम्ध-सीत. नस्य । प्रयतमाटूरपंराजम्य......ज-सुवसत-गुज-यमावलेप-गज- घटाटोपगदुतमकलनोलम्याधिराजममरविध्वंसकम्य । ममुन्मूलितराग्य कण्टकस्य।मम्पूर्णिमापनि गिरिदुर्गस्य । महन. नरगाभिधानरायरप्रधानस्य । प्रवापापनाचेर-चोख-पापस्या पल्लयस्य प्रतिपालितजिनशासनम्य ।.........मदामजस्य । पलबदरिनृपद्रविणापहरण......महादानस्य । परिपालितरोतु पन्धम...धुसम्पन्धवसुन्धरातलस्य मीनालम्यकुरलान्त)क- देवस्या शार्यशासन धर्मशामन चमचरतु दिग्मण्डज्ञान्तरमा- कल्पान्तरमाचन्द्रवारम् ।। (पधिममुख) ......पा के प्युपायान्त......तिरियरगशेयर एवारी श्रोगापामद ...पना.......पाथि... पलय...मा...नामि...

... .... ... चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख। ...भुनावक्षेपमल...फत्वा...गं स्वयं ... गुत्तियगभूपति .. नोखम्यान्तकः।। .....यिय... यिय......मन्मुखं...युधि......गावस्मर ......प्रतिगज......विक्रमं ।।...सलमिय... नोलम्बान्तकः ...मूनोकादनेकन्द्र...नेकन्धान्धक...चौल-पल्लव...ा नन्दहतोर...प्रोमारसिंह-ति विनक-सत्र-पन्द्रस्य...पन्न ...प...र्यर......दर्प..................मनोपना ...न्महाविजयोत्मये......सिंहासनावी-प... इत्याधिष्ठात-योर-गगर-गिरःघालुक्य-पूडामो राजादित्य-हरेईवामिरजनिभोगा-पूधामषि। देत्येन्दर्मधुकैटभप्रभृतिमियरतम्रद्धे... किमायारिमिरित्यमुस्चित मिति मातसारक. ...लमरगासुरम्य वसुपानन्दामिभरिश... दाधैिरकरोरमराममयनीय नलम्बान्तकः । (सत्तरमुग्य) (प्रथम पनियां प्रापट) ..... गन... ..धमानः याय ...न ..... ....ति...तिना......पर......॥ ......मिश्रीहन-म., पीर-पिग्मयीग.........गुत्तिष-गा भूमिनियंरि........ ...ति परिमा ...ष्टम्यष्टायनि-मिशामिन्द्रराज........ रह... पर......... .मोगा-रामविविध ...सम्पति मारमिगतसिंजारत. कनिः॥

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चन्द्रगिरि पर्यत पर के शिलालेख ।
[इस लेख में गाराज मारसिंह के प्रताप का वर्णन है। इसमें कर
है कि मारसिंह ने (राष्ट्रकूट मोश) कृष्णराज ( सीय) लि
गुवर देश को विजय किया, कृप्यराज विपती भाल का मद जून
किया, विन्ध्य पर्वत की तली में रहने वाले किरात के समूहों के
जीता; मान्यवेट में नृप (कृपयराज) की सेना की रकी, इन्दराज
(चतुर्थ) का अभिषेक कराया. पातालमल के कनिष्ट माता वाजल
को पराजित किया वनवासीनरेश की धन सम्पत्ति का अपहरण किया,
मादर वंश का मनक मुकाया, मालम्ब कुलकेमरेशका सर्रनारा किया,
कापति जिस दुर्ग को नहीं जीत सका था उस उ िदुर्गको स्वाधीन
किसा, शवराधिपति मरकामहार किया, द नरेश राणादिस्यको
भीना, तापी-तर, मान्यवंट. गोनू, पति बनपासि व पाभ के पुर
जीते, वर, पोड़, पाण्य और पलक नरेशों को पास किया व जैन
धर्म का प्रतिपालन किया और भने जिन मन्दिर बनवाये। अन्त में
उन्होंने राज्य का परित्याग र भजितसेन महार समीप तीन दिवस
तासलेखना प्रतका पालन हापुर में देवोपन किया। लेख
में गाडामणि मालम्बाम्तक, गुचिय-गा, मालिकत्रिनेत्र, गा-
विद्याधर गादर्प, गायन, परमिंद, सत्यवारय कोणिवर्म-धर्म-
मारामाधिराज भादि अनेक पदवियों से विभूषित किये गये हैं।]
३८ (६३)
महनवमी मण्डप में
(शक सं० १०८५)
(पूर्वमुस)
श्रीमत्परमगम्भीर-रपाद्वादामपहाडन ।
जोया मोक्यनाथस्य सामनं जिनशासनम् ॥ १॥

२० चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । दलासाध्यदोले गङ्ग-चूडामणिया । नुडिदने कावुदने एल्दे- गिडदिरुजवनिट रक्के निनगीयुदने नुडिदने एप्रदु कय्यदु नुडिदुदु तप्पुगुमे गङ्ग-चूड़ामणिया। इन्तु बिन्ध्याटवी-निकद-तापी-तटवं। मान्यखेट-पुर. परतुं । गोनूरुमुच्चगियुं । पनवासिदेशवं । पामसेयकोटेयं । मोदलागे पलवेडेयोलमरियरं पिरियरुवं कादि गेल्दु पन्तयेडे. गलोल महाध्वजमनेत्तिसि महादानंगेदु नेगल्द गङ्ग-विद्याधरं । गङ्गरोल्गण्डं। गङ्गरसित । गचूडामणि गडकन्दर्प। गङ्गवम् चलदुसरङ्ग । गुत्तियगन। धर्मावतारं । जगदेकयी। गुडि. दन्तेगा। प्रहितमासण् । कदनकरा । मण्डलिक निणे । ओमनोलम्यकुलान्तकदेवं पत्नवेडंगलालं पसदिगलं मागात- मानुर्व माडिसिद । मङ्गलं । धर्म(म)गलं गमस्यं नयिसिपलिय- मान्दुवर्ष राज्यमं पत्तविटु यतापुरदील भाजितगेनभट्टारकर श्रीपादमनिधियोल माराधना विधियिमूरद...सं नोन्तु गमाधिप माधिसिदं॥ वृत्त । एते चोलतिविपात मन्ताय नी गोपिकात निम-गाते मातित पापड पलाय भयोटारनिमिझम. हप्तादि पिद निल्योगनिनिन्नु न...गग- लिक दवनिवामदत विजय-गेम नवम्पान्त।

चन्द्रगिरि पर्यत पर के शिलालेख । . [इस क्षेत्र में गाराज मारसिंह के प्रताप वर्णन है। इसमें कथन है कि मासिर मे (राट मरेश) कृष्णराज (तृतीय) के लिए गुर्जर देश को विजय किया कृष्णराज के विपक्षी भाउ का मद धूर किया, विन्य पर्वत की तस्ली में रहने वाले किरातों के समूहों को जीना मान्यखेट में नप (कृप्यराज) की सेना की रप की, इमरान (चतुर्ष) का अभिषेक करायाः पातालमरल के कनिष्ठ माता यजल को पराजित किया, वनशासीनरेश की धन सम्पति का अपहरण किया, मादर वंश का मस्तक मुकाया, मोलम्ब कुल के मरेशों का सर्वनाश किया, काहि जिस दुर्ग को नहीं जीत सका उस उपशि दुर्ग को स्वाधीन किया, शवराधिपति माग हा संहार किया, और नरेश राजादिस्य को जीता; तापी-सट, मान्यखेट. गोनू, पति बनवासि व पामले के युब जीते, पचर, चोड़, पापल्य और पल्लव नरेशो को परास्त किया व जैन धर्म का प्रतिपाटन किया चार भनेक जिन मन्दिर बनवाये। अन्त में उन्होंने राज्य का परित्याग कर अजिनसेन भट्टारक के समीप सीन दिवस सल्लेखना प्रतका पालन कर बकापुर में देशसग किया। लेस में गाढ़ामणि, मोलम्बान्तक, गुत्तिय-TF, मण्डलिकत्रिनेत्र, गा- विद्याधर, गाकन्दर्प, गायन, गासिंह, सत्यवारप कोणिवर्म-धर्म- महाराजाधिराज प्रादि भनेक पदवियों से विभूषित किये गये हैं। ३९ (६३) महनवमी मण्डप में (शक सं० १०८५) (पूर्वमुख) श्रीमत्परमगम्भीर-रयावादामोपताइन । जीयान लोक्यनाघस्य शासन जिनशासनम् ॥१॥ - चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । स्वस्ति समस्त - भुवन-स्तुत्य-नित्यनिरवद्य-विधा-विभव- प्रभाव-प्रहरुद्वरीपाल-मालि • मणि-मयूख-शेखरीभूव-पूत-पद-नल. प्रकरलं । जिवजिनजिनपतिमतपयर्पयोधिलीजामुधाकररं । चार्वाकासगळदुर्बारोधरोत्पाटनपटिष्टनिष्ठुरोपालम्भर म्भोलिदण्डरुं भकुण्ठ-कण्ठ-कण्ठीरव-गभीर-भूरि-भीम-बान- निर्दलितदुईमेद्धपौद्धमदवेदण्डरुम्। प्रप्रतिक्षत-प्रसरदसम-असदु. पन्यसननित्यनैसित्य-पात्र-दाम-दलिवनैयायिकनयनिकरनस । घपल कपिलविपुलविपिनदहन-दावानलीं। शुम्भवम्भोद-नारनो. दिसविततवेरोपिकप्रकरमदमराज। शरदमलशरापरकरनिकरनी- हारदाराकारानुपतिकीर्तिवल्लील्लितदिगन्तरालमप्पश्रीमन्म- घामण्डनापार्यरु श्रीमद्देवकीर्तिण्डिनदेवरु । कुठयनमः कपिल-यादि-नाप्र-वाइये पाकि-यादि-मकराकर-वाहनापये। योसीयादितिमिरप्रविभेदभानवे भादेवकीर्तिमनये कविवादिवाग्मिने ॥२॥ मां अल्पपल्लींविषयमुपनयंश्यणवैडिकोति- श्रीस मूल झटिति विपट पन्बादमेकान्तमेवं । निर्षिण्मुगाडगलं गपदि विषयमूनिवौड़गा. सामन्मेवामानां जयतु विजयते देवकीर्तिदिपेन्द्रः ॥३॥ पतु मुंगपनुतनिर्गमागमदुम्मदा । देवनिमगाम्भाने नृयतीवि मरमती ॥४॥ चतुर सतदिनामिनने पक्षमा प्रम.

२ पद्रगिरि पर्वत पर शिक्षामंग। २३ अनमतियोल प्रवीदने मागम- विचारदोल पर: ज्यते सपदील पवित्रते परित्रदोलोन्दि विराजिमाल प्रसि. समें मुनि-देवकीर्तिरिपुधामणिगोपुदी परित्रियोन ॥५॥ करमागिरद एम्भपादनंय ।। पण्यान-गुभानु नामनि सिने पक्षे तदापाड़के मासे ननयमोतियो युध-युते पार दिनेगादये। श्रीमत्तापिपति-दशदिग्बाईकोतिप्रिया मात पायधूमन:प्रियतम. श्रीदेवफोर्तिप्रती ॥६॥ जातकीत्यवशेष यतिपता बोदेवकीतिमी यादीभरिपी जिनेश्वर-मच-सोराधितारापती । कम्थान परवावर्जिनमुनिमा ममति पुटं सामागं कुरुते ममनधरणी दाक्षिण्य-लक्ष्मीरपि ॥ ७॥ सद्धिप्या नुवलपरणन्दिमुनिप: श्रीमाधयेन्दुप्रती भव्याम्भोरदभास्करनिमुवनाख्यानवयोगीधरः । एने से गुरुभक्तिती गुरुनिश्यायाः प्रविधामिमा मृत्याकाममकारयग्निजयशस्मम्पूर्ण दिग्मण्डलाः ॥८॥ [स लेख में अपन समय के अदितीय कवि, नार्षिक और पना महामासाचार्य मुनि देवशीति पगित की विद्वत्ता काम्याल्यान है। इस समय जैनाचार्य के सम्मुख माख्यिक, चार्वाक, नेपायिक, वेदाली. बारमादि सभी दार्शनिकहर मानते थे। शक सं... मुभानु संवम्मा पापा शुषळ । बुधवार की सूर्योदय समय इन तापिरति भी देवकीर्ति मुनि का गं.

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख। वाट हुमा! उनके शिन्य लरसनन्दि, माघरेन्दु मार त्रिभुवनमा में मरने गुरु की मारक या निपणा प्रतिष्ठित कराई। ४० (६४) उसी स्तम्भ पर (शक सं० १०८५) (परियमुरा) भर भूयामिनेन्द्राय शामनायापनाशिने । कुतीर्थ-धान्त-महारा-प्रमिापन भानरे ॥१॥ श्रीमहाभेयनाथायगन-जिनकरानीक-साधार-याति: प्रशनाप-प्रमेय-प्रपय-विषय-काल्प-योधास येदिः । रानम्यारकार-गुदा-रारलित-जनमानन्द नादाद-धोप: यादाचन्द्र-नारे परम-गुस्ख-महावीर्य-योगा-निकाय. ॥२॥ श्रीमन्मुनीन्द्रीतमरन श्रीगोतमाणाभरिया नायुधा गतमयिकामनरमानना यानिपिग ॥३॥ [ ] भद्रगश्यना यादि भापारिति मत । अस्मानिनामा परममा मुनि ॥५॥ पद-प्रकाश-कीर्मि भागन्द्रगुप्तोframa free पण प्रमापानदेयतामिति गा मुनीनm नम्पान्या मनीवित याय, पप्रनन्दिग्यमाभानः । प्राकाहान्दादि मुनीम-in in अमृदुमानाति मुनीयामानाचारमा

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चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख ।
वदन्वये तत्सरशोऽस्ति नान्यस्तात्कालिकाशेष-पदार्थ-वेदी ॥७॥
श्री गृद्धपिच्छ-मुनिपस्य बलाफपिच्छः
शिष्योऽजनिष्टभुवनत्रयवर्तिकीर्तिः।
चारित्रपञ्चुरखिलावनिपाल-मालि.
माला-शिलीमुख-विराजिवपादपत्रः ।।८।।
एवं महापार्य-परम्पराया स्यात्कारमुद्राङ्कितत्त्वदीपः ।
भद्रस्समन्ताद्गुणतागणोशसमन्तभद्रोऽजनिवादिमिदः ।।
ततः।
यो देवनन्दि-प्रथमाभिधाना युखरामहत्यास जिनेन्द्रपुद्धिः।
श्रीपूज्यपादोऽजनिदेववाभियंत्यजित पाद-युग यदीय ॥१०॥
जैनेन्द्र निम-शब्द-भोगमतुलं सर्वार्थसिदिः परा
सिद्धान्त निपुणत्व मुद्रकविता जैनाभिपंकस्यकः ।
छन्दग्मूचमधियं समाधिशतक.म्यारम्य पदीय विदा
माल्यातीद म पूज्यपाद-मुनिपः पुग्यो मुनीनां गणः ॥११॥
सतश्च ।।
(पश्चिममुख)
अजनिष्टाकलहू यजिनशासनमादितः ।
प्रकल वभी येन सा फलको महामतिः ॥१२॥
इत्यायु द्धमुनीन्द्रमम्ततिनिधी श्रीमूलमतता
जाते नन्दिगय-प्रभेदविलमद्देगीगणेवि मते ।
गोलाचार्य इति प्रसिट-मुनिपाऽभूगोलदंशाधिपः
पूर्व कम परंतुना भवाभिया दाता गृहीवरमुधीः ॥१३॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । श्रीमत्रैकाल्ययोगी समजनि महिका काय-लमा तनुत्रं यस्याभूदृष्टि-धारानिशिवशर-गणापीष्ममार्तण्डविर्य । चक्रं मवृत्तचापाकलित-यति-वरस्याघशवन्विजेतुं गोल्लाचार्य्यस्य शिष्यस्मजयतु भुवने भन्यसत्करवेन्दुः ॥१४॥ तच्छिष्यस्य ॥ प्रविद्धक दिकपद्मनन्दिसैद्धान्तिकाल्यो अनि यस्य लोके । कोमारदेय-प्रतिताप्रसिद्धि यातुसे शाननिधिस्सधीरः ॥१५॥ तस्छिप्य: कुलभूपणाख्ययतिपश्चारित्रधारानिधि- स्सिद्वान्ताम्युधिपारगो नतविनयस्तरमपो महान । शब्दाम्भोगहभास्फरः प्रथितवर्कप्रन्यकार: प्रभा- चन्द्राख्यो मुनिराज पण्डितरः श्रीकृण्डकुन्दान्वयः ॥१६॥ तस्य श्रीकुलभूषणायसुमुनेरिशघ्यो विनयस्तुत. म्सद्वृत्तः फुलचन्द्रदेवमुनिपस्सिद्वान्तविधानिधिः । सनिदायोडमनि माचनन्दिमुनिर: फोल्लापुरे तीर्थ. प्राद्धान्तारानपारगोऽपलतिधारित्रपक्रधरः ॥१७॥ एन्ने मारियनजदि तिल्लिगीतं माणियदि मण्डना- पलिलाराविपनि नर्म गुभदमा गिन्तिरियनि- मनवीगन कुलचन्द्रदेव-गरणा मामातमेगापिति-- अजमेदान्तिकमाघनन्दिगुनिपिं श्रोकोल्यान्वयम् ॥१८॥ दिमतकोत-मुनाफन-तरसरार-हान्दुिकुन्दी- पमानिध्यातदिग्मतनगनत-म-गणानं मध्यागमो. प्र-मरोपीमगतं पति-नि-विनतं मापनपापा Srinin fikir giuris referraget" ** , titoli mold farmi, non arentfawrý nikto mindre per ingen p. mitte 1) el Ujumi MARI! RIMÉMIA po por conta het enignir' HITAMINE groetinutiunilor diversi ortal miamussuntolakun* ***** ullohen ry Pineapa bumili wa to otwagine for stoppe Turisme vieta II Mikie yra nur ein 01 priser Timinirati to samo post**** en la formatulepit ** ***** *** werrrfagytaxtuuripominn ************* siullius***, 64*** Tritannie's "S***.** २९ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस। प्रति राघवपाण्डवीयमं विभु (यु)घरम- स्कृतियेनिसि गत-प्रत्या- गदि पेल्दमलकीर्तियं प्रकदिसिदं ॥२४॥ प्रवरमजरु॥ यो पौद्धनितिभृत्कराल कुलिशचा कमेघान (नि) लो मीमांसा-मत-वत्तियादि-मदवन्माता कण्ठीरसः ॥ स्याद्वादाब्धि-शरत्समुद्गतसुधा-शोचिम्ममस्तैस्तुत. स्म श्रीमान्भुविभामते कनकनन्दि-स्यात-योगी घर ॥२५॥ चैताली मुकुलोकृताञ्जलिपुटा संसेवते यत्प झोहिम प्रतिहारको निामति द्वार च यस्यान्तिक । येन कोडति मन्ततं नुनतपालदमीयंश (') प्रोप्रिय- रसोऽयं शुम्भति देवचन्द्रमुनिपो भट्टारकापायी ॥२६॥ मार मधर्मांधनन्दि-प्रेरिय-देवरु विद्यापति श्रीमद्देयकीति परिवृतदेवर शिया प्रोगुभगन्द्रगविष देवा गण्डविमुक्तादि चतुर्गुण-रामचन्द्रवियदेव वाविनाश-श्रीमरकराविषदेवरमापरमेश्वरन गुपय माणिपभण्डारि मरियाने दण्डनायका प्रोगगहाप्रधान मन्त्राधिकारिकिरियदण्डनायकंभरतिमप्यालीकरण ग! चिमप्याल जगदंब-दानि हंगई कारस्य । प्रहमा शिलाजि-रा-निजामी यक्षरा निमा. -बिमामामि मात्र पन्छिने मुगीझापार शनि- २६ चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिलालेख । --कदम्व-स्तुत-पाद-पद्मनरुहं माथं यदुशोषिपा- लक-चूड़ामपि नारमिङ्गनेनलेनोम्पुष्टनाहुल्लपं ॥२७॥ श्रीमन्महाप्रधान सर्वाधिकारि हिरियभण्डारि पभिनवगङ्ग- दण्डनायक-श्रीहुल्लराजं तम्म गुरुगलप्पश्रीकाण्डकुन्दान्वयद श्रीमूलसहद देशियगवद पुस्तकगच्छद श्रीकामापुरद श्रीरूप. नारायणन यसदिय प्रतिविद्धद गोमत्केघगरेय प्रतापपुर पुनम रपवं मादिसि जिननाघपुरदलु कछ दानशालेयं माडिसिद श्रीमन्महामण्डलापार्यदेवकीर्तिपण्डितदेवगर्गे परोचविनय- पागि निशिदियं माडिसिद प्रवर शिष्यर्लक्खणन्दि-माधय- मिभुवनदेवमहादान-पूजाभिषेक-माडि प्रतिष्ठेयं माहिदर मग महा श्री श्री श्री ।। [ इस लेख में गौतम गयभर से लगाकर मुनिदेवकीसि पतिदेव की गुर-परम्परा दी है। । कनकनन्दि और देवचन्द्र के भ्राता श्रुतकीति' विध मुनि की प्रशंसा में कहा गया है कि उन्होंने देवेन्द्र सारा विपर- पादियों को पराजित किया और एक चमत्कारी काय्य राघव- पापीय की रचना की जो भादि से अन्त को छ भन्त से धादि को दोनो घोर पढ़ा जा सके x । प्रतापपुर की रूपनारायण बीका भूमिका देखो। ४ श्रुतकीति की प्रशंसा के ये दोनों छन्द मागधयकृत रामनाम परितपुराणा' पर माम 'पम्प रामायण' के प्रथम भावास में #. १४. २५ पर भी पाये जाते हैं। इस काव्य की रचना शक...२ रगमगा। मिन विपर-सदानिक देवेन्द्रका पहाँ रख सम्भवत 'प्रमापनपतावाकारार' मादि-प्रशारदेताम्मा- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख । जीर्णोद्धार घ जिननायपुर में एक दानशाला का निर्माण कराने वाले महामण्डलाचार्य देवकीति पण्डितदेव के स्वर्गवास होने पर यादव वंशी नारसिंह नरेश (प्रयम) के मंत्री हुलप ने यह निपद्या निर्माण कराई जिसकी प्रतिष्ठा देवकीर्ति प्राचार्य के शिष्य लक्खनन्दि, माधर और त्रिमुवनदेव ने दान सहित की।] ४१ (६५) उसी मण्डप में (शक सं० १२३५) श्रीमत्स्याद्वादमुद्राङ्कितममलमहीनेन्द्रचक्रेश्वरेड्य जैनीय शासनं विश्रुतमखिलहितं दोपदूरं गभीरं । जीयाकारण्यजन्मावनिरमितगुणैर्धय॑नोक-प्रवेकैः संसेव्यं मुक्तिकन्या-परिचय करणप्रौढमेतत्रिलोक्यां ॥१॥ ओमूलसव-देशीगण-पुस्तकगच्छ-कोण्डकुन्दान्वाये। गुरुकृतमिह कथमिति ब्रवीमि सझे पता भुवने ॥२॥ यः सेव्यः सर्वलोकः परहितचरितं यं समाराधयन्ते भव्या पेन प्रयुद्धं खपर-मव-महा-शास्त्र-तत्त्वं नितान्तं । यस्मै मुक्तयङ्गना संस्पृहयति दुरितं भीरता याति यस्मा- धस्याशानास्ति यस्मिंत्रिभुवन-महिता विद्यते शीलराशिः ॥३॥ - चार देवेन्द्र देवी है, जिनके विषय में प्रभावक-चरित में कहा गरा कि गन्होंने वि. मे. 1 में दिगम्बराचार्य कुमुदपार को चार में पराम किया था।

चन्द्रगिरि पर्वत परके शिलालेय। तन्मेषचन्द्र विद्यशिष्यो राधान्तवेदी लोकप्रसिद्धः । श्रीयीरणंदी मासुस्तदन्नवासी गुणाधिःप्रास्ताङ्गजन्मा ।।४।। यः म्याद्वाद-रहस्य-वाइनिपुणेऽगण्यप्रभावो जना- नन्दः श्रीमदनन्तकीर्तिमुनिपश्चारित्रभावत्तनुः । कामोग्राहि-गर-द्विजापहरणे रुढी नरेन्द्रोऽभव- सच्छिध्या गुरुपयकस्मृति-पथ-स्वच्छन्द-सन्मानसः॥५॥ मलधारिरामचन्द्रो यमो तदोप-प्रशस्य शिष्योऽसौ । थपरययुगलसेवापरिगतजनति चन्द्रवा जगति ॥६॥ परपरिणतिदूरीऽध्यात्ममरसारधारी विषय-विरति-भावों जैनमार्ग-प्रभावः । कुमत-घन-मीरी वस्तमायान्धकारी निसितमुनिविनूती रागकोपादिधातः ।।७।। चित्ते शुभावना भैनी वाक्ये पचनमस्क्रियां। कार्य प्रनममारोपं कुर्वन्नध्यात्मविन्मुनिः ॥ ८॥ पञ्चविंशत्संयुत-शत-द्वयाधिक-सहस्र-नुसवर्षेषु। वृत्तेपु शकनृपस्य तु काले विस्तीर्नविलमदनवनमा प्रमादि (सं)वत्मरेमासे भाषणे तनुमत्यजन् । पक्रे कृष्णचतुर्दश्यां शुभचन्द्रो महायतिः ॥१०॥ प्रमरपुरममरवास तद्गत-जिन चैत्य-पैत्यभवनाना। दर्शन कुतूहलन तु याना यावान-रोद-परिणाम. ॥ ११ ॥ सन्दिप्य ।। दुरिताधिकाररविहिम- ३ २ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस। -कररागदपद्मणन्दिपण्डिनदेवर् । वर-माधयेन्दु-समया- भरणीमूलसार-देशागणदात् ।। १२ ॥ गुरु-रामचन्द्र-यतिपन वर-शिष्य-शुभेन्दुमुनिय निम्निगेयं वि- स्तरदि माडिसिदं बेलु- करेयधिपं राय-राज-गुरुगुम्मटुं ॥ १३ ॥ ओविजय-पार्श्व-जिनवर-चरणारुण-कमल-युगल-यजन-रतः। बोगार-राज-नामा तद्वैयामृत्यतो हि शुभचन्द्रः ॥ १४ ॥ हेयादेय-विवेकता जनतया यस्मात्मदादीयते तस्य श्रीकुलभूषणस्य वरशिष्योमाघनन्दिनती । सिद्धान्ताम्युधितीरगी विशद-कीर्तिम्नम्य शिष्योऽभवन् विद्यः शुभनन्द्र-योगि-तिलक: म्याद्वाद-विद्याञ्चितः।।१५।। तच्छिप्यश्चारुकीति-प्रधित-गुण-गणु पण्डितस्तस्य शिष्यः ख्यात: श्री माघनन्दिनति-पति-नुत-भट्टारकस्तम्य शिष्यः । सिद्धान्ताम्भोधिसीत-द्युतिरभयशशी तस्य शिष्या महायान बालेन्दुः पण्डितस्तत्पदनुतिरमन्ना रामचन्द्रोऽमलाङ्ग ।।१।। चित्रं सम्प्रति पग्ननन्दिनिह कृत्ततावकीनं तपः पद्मानन्द्यपि विश्रुताप्रमद इन्यासीम्मता नम्रतां । कामं पुरयसे शुभेन्दु-पद-भत्तयामक्त चैत' सदा कामं दूरयसे निराकृत-महा-माहान्धकारागम ॥१॥ काम-विदारोदारः समावृताप्यतमी जगनिभासि चन्द्रगिरि पर्वत पर शिलालेय । श्रीपद्मनन्दिरण्टिन पण्डिम जन-उदय- मुदगीरकर Item पणित-ममुक्ष्याति शुभचन्द्र-प्रिय-गिय मप्रति मुख्याति । श्री-पान-मन्दि-पण्डित-यमोश भयदिशा-मुनिपमानाका श्रीगदध्यात्मिगुभचन्द्रदेवाय ज्योपान्तबागिना पत्र नन्दि-पणिहा-देन माधवचन्द्रदेवेन पपगल-विनय-निमन निपराका कारपिता ॥ मई भवतु जिनगागनाय ।। मिलराभवामुनिबार्यशाini पातिथि दास, मर च, Times, Ert में गुशि परा में शामिन wam सति मारि सम म भए गुमिका • भार mniaurat निति निमक और माधARAven निर्माण में विकास प्रकार दरमाल, मानन्दिती, mine, arra पनि, मापनदि भा, भा, बारा Rin महाममो मण्डप के उमर में एक मम्भ पर म. १०) (ग) HTRAERONAपाने । राशयमा TRARATमने " चन्द्रगिरि पर्वत पर कं शिलालेम्य । श्रीमन्नाभयनाथायमल-जिनवरानीक-साधाम-वार्द्धिः प्रध्वस्ताप-प्रमेय प्रचय-विषय-कैवल्य-बोधोरु-वेदिः । शस्त-स्यात्कार-मुद्रा-शवलित-जनवानन्द-नादार-धोप: स्धेयादाचन्द्रतारं परम-सुख-महावीर्य-वीची-निकाय: ॥२॥ श्रीमन्मुनीन्द्रोत्तमरत्नवर्गा श्रीगौतमाद्यामविष्णवस्ने । तत्राम्बुधा मप्तमहर्द्धि-युक्तास्तत्मन्तता नन्दिगणं बभूव ।।३।। प्रोपद्मनन्दीत्यनवद्यनामा ह्याचार्यशब्दोत्तरकाण्डकुन्दः द्वितीयमासीदभिधानमुद्यच्चरित्रमब्जातसुचारणद्धिः ॥४॥ अभूदुमास्वातिमुनीश्वरोसावाचार्य-शब्दोत्तरगृद्धपिञ्छः। तदन्वये तत्सहसा(शो)ऽस्ति नान्यस्तात्कालिकाशेष- पदार्य-वेदी॥५॥ श्रीगृद्धपिञ्च्छ-मुनिपम्य बलाकपिञ्च्छ- शिष्याऽजनिष्ट भुवनत्रय-वर्ति-कोनि:। चारित्रचुञ्चुरखिलावनिपालमौलि- माला-शिलीमुख-विराजित-पाद-पद्मः ॥६॥ तच्छिप्या गुणनन्दिपण्डितयतिश्चारित्रचक्रेश्वर स्तक-व्याकरणादि-शास्त्र-निपुणरसाहित्य-विद्यापतिः । मिथ्यावादिमदान्ध-सिन्धुर-घटासट्टकण्ठोरखो भव्याम्भाज-दिवाकरी विजयता कन्दप्प-दीपः ॥ ७ ॥ शरिखध्यात्रिशता विवेक-निधयरशाखाधिपारङ्गता म्तेपूत्कृष्टतमा द्विसतिमितास्सिद्वान्त-शाम्बार्यक- घ्याख्याने पटवा विचित्र चरितानपु प्रसिद्धोमुनि- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षामय। नानानून-नय-प्रमाणनिपुगो देयेन-सैद्धान्तिक |॥८॥ प्रजनि महिपघूशनयराराजितामि चिंजिन-मकरकेतरण्डदार-गाय कुनय-निकर भूदानीक-दाभानि-दण्ड मजयतु विभुधन्दामासी-माल-पहः ॥ ॥ मक्खिप्यः फलधौतनन्दिनिपग्मिसान्त-परवा पारावार-परीव-धारिणि-कृत-व्यापाomree पचासोन्मद-कृम्मि वाम-दाम-प्रोन्मुक्त मारमा प्राय-प्रापित गरी धनुती काकामिनी-बाम ॥१॥ मार्गे रविचन्द्र-सिद्धानविदार्म पृण्टचा गिटात मुनि- प्रबरपाया शिष्यप्रवर मादामनन्दि-गमुनि पनि ।११॥ बाधित-भव्यान-मदनार्मद-पति -मानगा श्रीपविण्यावर्गप्रतवैभवरागा- श्रीपाद शियरवाल मगन्दर्मलपारिदए श्रीधरदेव मत-मन-ति (कि)Me-IPLORER भानप्रावनियाम-जानकाशिरारम-भामापुर. भोपादास-सपाश्मीमनारम्जन । मार-पूर-महीमा दुरपय सrien. मप्यातचीधादेव मुनिता भाभानि भूमणरे लिया भन्याभीre-or-MATE Ti .. विधि .

३६ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख। (दक्षिणमुख) भातिश्रीजिन-पुङ्गव-प्रवचनाम्भाराशि-राका-शशी भूमी विश्रुत-माघनन्दिमुनिपस्सिद्धान्तचक्रेश्वरः ॥१४॥ न्छिध्यर ॥ मच्छीलश् शरदिन्दु-कुन्द त्रिशद-प्रोद्ययश-प्रोपति. प्यापक दार्प-दाव-दहन-बालालि कालाम्बुद.। श्रीजैनन्द्र-वच:पयोनिधि-शरत्सम्पूर्ण चन्द्रः तिना भाति श्रीगुणचन्द्र-देव-मुनिपो राद्धान्त-पक्राधिपः ॥१५॥ सत्सधर्मर्॥ उद्भूनं नुत-मेघचन्द्र-शिनि प्रोगराश्चन्द्रिक संपस तदस्तु नाम नितरा राधान्त-रभाकर । चिनं तावदिदं पयोधि-परिधि-साणा ममुद्रात्यने प्रायंगाम विज़म्भते भरत-शास्त्राम्भाजिनी मन्तन ॥१६॥ तन्मधम्मर ॥ पन्द्र व धवन-कीर्ति वनीकुमत मम मु यम । नचन्द्रकीर्तिमान-भट्टारह-यावति नाम्य विभाति । ३ ॥ तन्मधर्मर ॥ नयायिकम-मिही मीमामतिगिर- निरनिमन-तपन याव-बन दाव-दानाजानमहानुदयनन्द्रामा १८ रिद्धाल-पवनी श्रागुणगादत्राम्य काम श्रीनपीति मनोन्दा जिताति-रिवामिनाया गय चन्द्रगिरि पर्वत पर शिलानंद । सम्यनवरत-विनत-महिप-मुकुट-माक्तिक-मयूम-माला-सरी- मण्डनीभूत-पारचरणारविन्दर। भव्यजन-इदयानन्दरूं । फोटकन्दान्वय-गगन-मात पडा। सोला-मात्र-विजितापण्ड- कुसुमकाण्डर । दशीय-गण-गजेन्द्र-मान्द्र-मद-धारावमाम। वितरमाविलामम् । पुस्तकगदखन्छ-मरसी-सरोजरु। बन्दि- जनमुरभूजम्। श्रीमद्गुणचन्द्र-सिद्धान्त चक्रवत्ति-चारुतर-घरय मरसीरह-पटपरखरं । प्रशंप-दीपदूरीकरणपरिणवान्त:करण- ग्मप्प श्रीमन्नयकीर्ति-सिद्धान्त-चक्रवत्ति गले न्तप्परेन्दई ।। मादिन्य-प्रमदा-मुग्गाजमुकुरश्चारित्र-चूडामणि श्रीजैनागम-वादि-वर्द्धन-सुधाशाचिम्ममुन्नासते। यशल्य-त्रय-गारव-त्रय-लमहण्ह-त्रय-ध्वंसक म्म श्रीमानयकीर्तिदेवमुनिपग्सैद्धान्तिकाप्रेमरः ॥२०॥ माणिक्यनन्दिमुनिप श्रीनयकीर्तिवतीश्वरम्य सधर्म:! गुणचन्द्रदवननयाराधान्त-पयोधि-पारगा-भुविभाति॥२१॥ दार-वीर-दराहदाम हलभृस्कुन्देन्दु-मन्दाकिनी- कापूर-म्फटिक-पुरवश्यशा-धापत्रिज्ञाकादरः । उमण्ड-स्मर-मूरि-भूघरपवि:ख्याता बभूवचिता मश्रीमानयकीर्ति देवमुनिपस्मिद्धान्तचक्रेश्वरः ॥२२॥ शाके रन्ध्रनवद्युचन्द्रममि दुर्मुण्याच*संवत्सरे पेशाधवले मतुर्दशदिने बारेच मूर्य्यात्मजे । पूर्वाह ग्रहरेगतेऽर्द्धसहिते म्वर्ग जगामात्मवान् ३९ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख। विख्याता नयकीर्ति-देव-मुनिपी राद्वान्त-चक्राधिपः ॥२॥ श्रीमज्जैन-बचौब्धि-बद्धन-विधुम्साहित्यविद्यानिधिम् (पश्चिम मुख) मर्पटपक-दस्ति-मस्तक-लुठत्तोत्कण्ठ-कण्टीरवः । म श्रीमान गुणचन्द्रदेवतनयम्मोजन्यजन्यावनि स्थेयात् श्रीनयकीर्ति देवमुनिपम्सिद्धान्तचक्रेश्वरः ॥२४॥ गुरुवादं खचराधिपङ्ग बलिगं दानके विपिङ्गता गुरुवादं सुर-भूधरके नेगल्दा कैलाम शैलके तां । गुरुवादं विनुतङ्ग राजिसुविरुडोलङ्ग लोकके मद् गुरुवादं नयकीर्तिदेवमुनिपं राद्धान्त-चक्राधिपं ॥२५॥ वच्छिप्यर् ।। हिमकर-शरदभ्र-शोर-कलोल-जालस्फटिक-मितन्यश-श्री- शुभ्र-दिक्-चक्रवालः। मदन-मद-तिमिस्र-श्रेणितीत्रांशुमाली जयति निखिल-वन्द्यो मेघचन्द्र प्रतीन्द्रः ॥२६॥ तत्सधर्मर् ॥ कन्दर्पाहयकतिौद्ध रतनुत्राणोपमोरम्थली पश्चद्भरममा विनेय-जनता-नीरेजिनी-मानवः । त्यक्ताशेष पहिर्विकल्प-निचयाश्चारित्र-चक्रेश्वर गुम्मन्त्ययितटाक-धासि-मलधारि-म्पामिनी भूतल ॥२७॥ सत्मधर्मर् ॥ पट्-कर्म-विषय-मन्त्रे नानाविध-रोग-हारि-वैद्य च ।

पद्रगिरि पर्वत पर के शिलालेय ।
जगदेकमसिंए श्रीधरदेयो बभूव जगति प्रयः ॥२८॥
मत्मधर्मर ॥
तघ्याकरणागम-मादित्य-प्रभृति-मज-गावायज्ञ ।
विख्यात-दामनन्दि-प्रेविय-मुनीश्वरो धराप्रे जयदि ॥२८॥
श्रीमज्जैनमताजिनोदिनकरी नेग्यायिकाभ्रानिल
शाकावनिभृत्करालकुलियो योचाम्धिकुम्भोद्भवः ।
यामीमामकगन्धसिन्धुरशिंगनिर्भेदकण्ठौरव--
विद्योत्तमदामनन्दिमुनिपग्मोऽयंभुविभ्राजने ॥३०॥
सत्मधर्मर ॥
दुग्धाब्धिस्फटिकन्दु-कुन्द-कुमुद-च्यामामि-कीर्तिप्रिय-
स्मिद्धान्तोदधि-वर्द्धनामृतसर:पारात्थ्य-रत्नाकरः ।
ख्यात-प्री-नयकीर्तिदेवमुनिपश्रीपाद-पद्म-प्रियो ।
भात्यम्याभुविभानुकीर्ति-मुनिपम्पिद्धान्त पक्राधिपः ॥३१॥
उग्गंन्द्र-वीर-नीराकर-रसव-गिरि-श्रीमितछत्र-गङ्गा-
दरदासरावतम-फटिक-पम-शुभ्राध्रनीहार-हारा-
मर-राज-श्वेत-पवरह-इलघर-वाक-ईसेन्दु-कुन्दो-
स्करपञ्चकोशिकान्तं धोया मेदनी भानुफोर्ति-प्रतीन्द्र
तत्मधर्मर ॥
॥३२॥
मसाकृति-शोभिवारािलकला-पूर्ण-ग्मर-यंपकः
शश्वद्विश्व-वियोगि-हनसुखकर-श्रीबालचन्द्रो मुनिः ।
वणान-कलेन-काम-सुध्दाचश्चद्वियोगिद्विषा
लोकस्मिन्नुपमीयनं कथममा तेनाप यानेन्दुना ॥३३॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेगा उमण्ड-मदन-मदनगज-निभेदन-पटुतर-प्रदाप-मृगन्द्रः । भव्य-कुमुदधि-विकसन-चन्द्रो भुवि भाति बालचन्द्र-मु 1E तारादि-तीर-पूर-म्फटिक-सुर-सरित्तारदारन्दु-कुन्द- श्वेतायत्कीति लक्ष्मी प्रसर-धवलिवाशेपदिक चक्रवाल श्रीमत्सिद्धान्त-चक्रेश्वर-नुन-नयकीर्ति-वनीशादि भक्त (उत्तर मुख) श्रीमान्भट्टारकंशो जगति विजयने मेघचन्द्र प्रतीन्द्रः ॥३ गाम्भीर्य मकराकरी वितरणे कल्पद्रुमन्तेजमि प्रोचण्ड-मणिः कलास्वपि शशी धैर्ये पुनमन्दरः । सोनी-परिपृष्र्ण-निर्मल-यशा-लक्ष्मी-मनी-रसना मात्यस्यां भुवि माघनन्दिमुनिपी भट्टारकाप्रेसरः ॥३६ वसुपुर्णसमस्ताश:तितिचक्रे विराजते । चञ्चकुवलयानन्द-प्रभाचन्द्रोमुनीश्वरः ॥३॥ वत्सधर्मर ॥ उचण्डपदकोटयो नियमितास्तिष्ठन्ति यंन तिता यद्वाज्ञातसुधारसाऽखिल विपन्युग्छेदकरशोभते । यत्तन्त्रोद्भविधिःसमलजनताराग्याय संवर्तत सोऽयं शुम्भति पद्मनन्दिमुनिनायो मन्त्रवादीश्वरः ॥३८ वत्मधर्मर ॥ पचमल-मरीचि-शारद-धन-तोराधि-ताराचल- प्रोद्यकीति -विकास-पाण्डुर-वर-प्रमाण्ड-भाण्डादरः ।

चन्द्रगिरि पत्र पर शिलाग्य।
वापरान्ता-कटिन-स्तन-द्रय-तटी-दारागभारन्धिर
मोऽयं ममतानेमिचन्द्र-मुनिपी विभाजनं भूतले ॥३॥
भण्डाराधिकृत ममस्त-मचिवाधीशी जगद्विश्रुत-
श्रीरलो नयकीर्ति-देव-मुनि-पादाम्भोज-युग्मप्रिय ।
कीति-श्री-निमय.परात्य धरिता नित्यं विभाति सिता
मोऽयं श्रीजिनधर्म-रत्तवकर: मम्यत्तव-रक्षाकरः ॥४॥
धामन्धीकरणाधिपसचिवनायो विश्व-विन्निधि-
धातुपण मदानदान करगोत्साही तिनी शामत ।
श्रीनीलो जिन-धर्म-निर्मल-मनास्साहित्य-विद्याप्रिय.
म्माजन्यक-निधिग्गमाइ-विगद-प्रोद्यधश-श्रोपतिः ॥४१॥
पाराध्यो जिनपा गुरुश्च नयकीर्सि-ख्यात योगीश्वरी
आगाम्या जननी तु यम्य जनक (:) श्रीयम्मदेयो विभुः ।
श्रीमत्कामलता-मुना पुरपति श्री मल्लिनायम्सुता
भात्यम्या भुवि नागदेव-मचिवश्वण्डाम्बिकायनभः ॥४२॥
मुग्गज-गदिन्दु-प्रस्फुरत्कात्ति-गुश्री
भवदखिल-दिगन्ना वाग्वधू-चित्तकान्त ।
युध-निधि-नयकीर्तिनळ्यातयोगीन्द्र पादा-
म्युज-युगकृत-संव. शोभन मागदेवः ॥४३॥
ख्यात श्रीनयकीर्तिदेवमुनिनाथाना पयःप्रोष्ठस.
स्कीना परमं परात-विनय कर्नु निषध्यालयं ।
भागाकारयदाएशाडू-दिनकृत्तार धिर स्थायिनं
श्रीनागम्मचिवासमा निजयशश्रोशुभ्र-दिग्मण्डलः॥४४॥

४२
चन्द्रगिरि पर्वत पर के गिलालेख ।
।
।
[इस लेख में नागदेव मत्रीद्वारा अपने गुरु पो नएफीति योगीन्द
की निषद्या निर्माण कराये जाने का उल्लंक है। नपकीर्तिमुनि का
म्वर्ग
वास शक सं.. वैशाम्ब शुक्ल ११ को ना था। मुनि की
विस्तार सहित वर्णन की हुई गुरु-परम्परा में निम्नलिमित यानार्यों का
उल्लेख पाया है। पमनन्नि अपर नाम कुन्दकुन्द, उमाम्बातिगृदपिच्छ,
बलापिच्छ, गुणनन्दि, देवेन्द्र मैद्धान्तिक, करधाननन्दि, रविचन्द्र
अपर नाम सम्पूर्णचन्द्र, दामनन्दिमुनि श्रीधर देव, मलधारिदेव,
श्रीधरदेव, माघनन्दि मुनि, गुणचन्द्रमुनि, मेषचन्द्र, चन्द्रकीत्ति महारक
और उदयचन्द्र पण्डितदेव । नयकीनि गुणचन्द्रमुनि के शिष्य ये
और उनके सधर्म गुणचन्द्र मुनि के पुत्र माणिक्यनन्दिने । उनकी शिष्य-
मण्डली में मेवचन्द्र वीन्द्र, मलधारिस्वामी, श्रीधरदेव, दामनन्दि
विद्य, भानुकीर्ति मुनि, बालचन्द्र मुनि, मानन्दि मुनि, प्रभाचन्द्र
मुनि, पमनन्दि मुनि और नेमिचन्द्र मुनि धे।
४३ (११७)
चामुण्डराय वस्ति के दक्षिण की ओर मण्डप में
प्रथम स्तम्भ पर
(शक सं० १०४५)
(पूर्वमुख)
श्रीमत्परम गम्भीर-स्याद्वादामाघ लाञ्छनं ।
जीयान प्रैलोक्यनाथम्य शामनं जिन-शामनं ॥१॥
श्रीमन्नाभयनाघाद्यमल-जिनपरानीकसाधार-वाद्धि':
प्रयस्ताघ प्रमेय-प्रचय-विषय-कैवल्य-योधार-वेदिः ।
रास्तम्यारकार-मुद्रा-शवलित-जनतानन्द-नादारुपोपः
रघयादाचन्द्रतारं परम-सुख-महा-बाय-वीची-निकायः ॥२॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर शिलानंग। श्रीमन्मुनीन्द्रीसमरम- बगीतमाश: प्रभविगवन्तं । ग्राम्युधा मतमटियुगातलमन्नती नन्दिा बभूव ॥३॥ श्रोपद्मनन्दीत्यनवानामा सापायंशब्दोत्तरकाण्ड- कुन्दः। द्वितीयमामीदभिधानमुपचरित्रम जातमुचारपलि: ।।४।। प्रदुमाम्यातिमुनीश्वरोऽभावाचार्यशब्दात्तरगृद्ध पिन्छः। वदन्वय तत्मशामिन नान्यस्तात्कालिकाशंषपदार्त्यवेदी ।। श्रीगृद्भपिञ्-मुनिपम्य बनाकपिञ्चरिशप्योऽजनिष्टभुवन- प्रयवत्तिकीति । चारित्रधुन्धुरपिलानिपान मौलिमाला-शिलीमुख-विरा- जित-पाद-पद्मः ॥६॥ छाच्छाप्यो गुणनन्दिण्डितयतिश्चारित्रचक्रेश्वरः वर्षव्याकरयादिशास्त्रनिपुधस्मादित्यविद्यापतिः । मिथ्यावादिमदान्धसिन्धुर-घटा-महह-कण्ठीरवो भव्याम्भोजदिवाकरी विजया कन्दर्प-दोपहः ॥७॥ वच्छिप्याषिशता विवेकनिधयश्शाम्बाधिपारङ्गता- म्तेपूत्कृष्टतमाद्विमप्रतिमिना:सिद्धान्तशास्त्रात्यक- व्यायानेपटवा विचित्र चरिताम्तषु प्रमितामुनिः नानानूननयप्रमाणनिपुयादेवेन्द्रसैद्धान्तिक प्रजनिमहिप-वृष्टा-रम-राराजिवाडिविजितमकरकंनूह पहदाईण्डगर्वः।

४२
चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेखा
-
इस लेख में नागदेव मंत्री द्वारा अपने गुरु नो नयीत्ति योगीद
की मिपद्या निर्माण कराये जाने का उल्लर है । नयकीर्तिमुनि का बर्ग-
वास श सं. 10 वैशाख शुक्ल १४ को हुधा था। मुनि की
विस्तार सहित वर्णन की हुई गुरु-परम्परा में निम्नलिखित प्राचार्यों का
उल्लेख पाया है। पमनन्दि अपर नाम कुन्दकुन्द, दमास्वाति गृपिच्छा
बलाकपिच्छ, गुणनन्दि, देवेन्द्र सैद्धान्तिक, कलधौतनन्दि, रविचन्द्र
अपर नाम सम्पूर्णचन्द्र, दामनन्दिमुनि, श्रीधरदेव, मलयारिदेव,
श्रीधरदेव, माघनन्दि मुनि, गुणचन्द्रमुनि, मेरचन्द्र, चन्द्रकीत्ति महाक
पार उदयचन्द्र पण्डितदेव । नमकीर्ति गुणचन्द्रमुनि के शिष्य ये
और उनके सधर्म गुणचन्द्र मुनि के पुत्र माणिक्यनन्दिने । उनकी शिष्य-
मण्डली में मेवचन्द्र बनीन्द्र, मलधारिस्वामी, श्रोधादेव, दामनन्दि
विय, भानुकीर्ति मुनि, दाल चन्द्र मुनि, माघनन्दि मुनि, प्रभाचन्द्र
मुनि, पमनन्दि मुनि और नेमिचन्द्र मुनि थे।
४३ (११७)
चामुण्डराय वस्ति के दक्षिण की ओर मण्डप में
मथम स्तम्भ पर
(शक सं० १०४५)
(पूर्वमुख)
श्रीमत्परम गम्भीर म्याद्वादामाघ-लाञ्छन ।
जीयान गोक्यनाथम्य शामनं जिन-शामनं ॥१॥
श्रीमन्नाभयनाधायमल-जिनवरानीकसौधोर-माद्धि:
प्रवस्ताप-प्रमेय-प्रचय-विषय-कैवल्य-चौधोर-वेदिः ।
शस्तम्यारकार-मुद्रारालित जनतानन्द-नादारपोपः
स्थेयादापन्दतारं परम-सुग्य-महान्याय-वीधी-निकायः ॥२॥

for mám problem perfeiçinPinedita. #m. HITTIMPIAS Toskopi optimees.ee Imamqe11* ****** Mes** ************* afereex. toorainetzt., ***** ***************** 51 1 > चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस। कुनयनिकरभूधानीकदम्भोलिदण्डःमजयतु वियुधेन्द्रो भारती-भालपट्टः ॥ (दक्षिणमुख) तच्छिष्यःकलधौतनन्दिमुनिपः सैद्धान्तचक्रेश्वरः पारावारपरीतधारिणि-कुल-व्याप्तोकोतश्विरः । पश्चातोन्मदकुम्भि-कुम्भ-दलन-प्रोन्मुन-मुक्ताफल- प्रांशुपाश्चितकेमरी बुधनुतो वाकामिनीवल्लभः ॥१०॥ अवार्गे रविचन्द्रसिद्धा- न्तविदसम्पूर्णचन्द्र-सिद्धान्त-मुनिः। प्रवररवरवशिष्य- प्रवरश्रीदामनन्दि-मन्मुनि-पतिगतु ॥११॥ पोधितभव्यरस्तमदनमंद-गिर्जत-शुद्ध-मानमर श्रीधरदेवरेम्बरवर्गप्रतनुभवरादरायशम् श्रीधरर्गाद शिष्यरवोल नेगदर्मलधारि-देवम् । श्रीधग्देवग्नतनरेन्द्र किरीट-नटार्चित-मर ॥१२॥ मलधारिदेवरिन्द येलगिदुदु जिनेन्दशामन मुन्ननि- म्मलमागिमत्तमोगल घेलगिदपुदु चन्द्रकीर्तिमहारकरि ॥१३॥ प्रवर शिप्यर।। परमातापिन-शान-सम्वनिलयं मिद्वान्त-पूडामणि स्फुरिताधारपरं विनेयमननानन्दं गुणानाकमु- . --- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेखा न्दरनेम्युमतिथि समन्त-भुवन-प्रश्तुत्यनादं दिवा- ঋয়েগিরিনাঘাযহা বিয়ারিশায়ান {}}} विदितम्याकरणद तईद सिद्धान्त विशेषदि विधा-- पदोन्दो-घरंपणिपुदु दियाफरणन्दिदेवसिद्धान्तिगर॥१५॥ परराद्वान्विकपक्रवर्ति दुरितप्रध्वंसि कन्दर्पसि- न्धुरमिदं वर-गोल-मदगुण-महाभारागि पवंशपु. कर-देवेभ राणाह-मत्रिभ-यश-श्री-सपना दो दिवा करणन्दिविनिम्मंदं निम्पर्म भूपन्द्रयन्दा ॥१६॥ (पश्चिममुम्ब) परमव्यानन-पप्रमुखलरलमानीकनेत्रालाल कारगल्यापतमम्नमं परयनंत जैनमार्गामला--- म्बरमत्युगलमागले यज्ञगिताभूभागमे श्रीदिया-- फरन्दिरनिविदयाकरफराकारम्बालुमीनुत ॥१७॥ यस्तचन्द्रविलमट्टचनामृताम्भ:पानेननुष्यनियिनेयपको अनेन्द्रशामनमराश्रराजहंमी जोयादसामुविदिवाकरण. न्दिदेयः ॥१८॥ प्रवर गिया॥ বিবিযসত্মঘাবি-শুনাৰায়ম कण्डमाध्यमें नेने भापजनकमकोप- दा-विराधिदण-नृप-दा-वस्यु-दमण-को- दण-करान-सहभ-पेरपिति-पग ११६॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेग बलयुतरं यळल्चुव लतान्तशरशिदिरागितानिस ध्वलिसे पलच्चि तूल्दवननोडिसिमेय वर्गयाद दूसरि । कलेयदे निन्द कम्युनद कर्गिद सिप्पिनमोथेतक- सलमेनिसिसु पुत्तडईमेय्य मलं मलधारि-देवरं ॥२०॥ मरेदुमदाम्मे लौकिकद यातयनाइद केत यागिलं सेरेयद भानुयस्तमितमागिरे पोगद मेय्यनाम्मेयुं । सुरिमद कुक्कटासन सोलद गण्डविगुत्तस्तियं मरेयद पोर-दुशर-तपश्चरितं मलधारिदेवर ॥२१॥ प्रा-पारिन यति गल शिष्यरु॥ पञ्चेन्द्रिय प्रधित मामल-कुम्भपीठ-निोट-सपट महाम. समम-सिंद। सिद्धान्त पारिनिधि पूण्न निशाधिनाया पाभाति भूरिभुराने शुभचन्द्रदेवः ॥२२॥ शुभाघ्रामसुरद्विपामरमरित्तारापतिम्घारफुट- ज्योत्दा कन्द गशीद्ध कम्यु-कमनाभाय तरङ्गीकरः । प्रग्न्य-प्रयत कीनि मम्महमिमा गायन्ति देवाणगा विकन्या शुभचन्द्रदेय भवतभारित्र मामिनि ॥२३॥ गुमचन्द्रमुनीन्द्रयरा प्रमेयानमरियागनारदिन्नी पर। प्रभुनंगि बलि दिन- नमर-मिनिक बन्दु ॥२५॥ एनन विजयखा- * It *****yo inalt * 13 stre-jesus kesdykti jo tu meja bronhitaraunert**** ***747 ****** Mix *********** - चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख महाराजराज्यसमुद्धरपकलिगलाभरयाप्रोजैनधर्मामृताम्युधिप्रवर न-सुधाफर-सम्यक्त-रबाकराधनेकनामावलीसमाजवर मोम न्महाप्रधानदण्डनायकगगराज सम्म गुरुगल श्रीमलसहरदेसि गवद पुस्तकगच्छद शुभचन्द्र सिद्धान्तदेवम् परोसविनय निसिधिगेय निलिसि महापूमेयं माडि महादानमं गेदक। मामहानुमापनतिगे ॥ शुभचन्द्रसिद्धान्यदेवर गुष्टि । घरजिनमेयनत्या- दरदिन्दं गकपम्ये माडिसुबसुस- परिते गुणान्विते ये- न्दी धरपीरात मेचि पागलुतिदु निष्पं ।।२।। दोरो जवाधिकम्मेगी गुवनशेल पारिप्रदेशल शीतकात परमश्रीजिनपुगेयोल सकलदानावयाल गरपदेल । गुरुपादाम्युमभक्तियोल विनयदोन भव्यर्कतं कन्दरा-- दरदि ममिनिष्पं पेम्पिनेयोन मत्तत्यकारतानम् ॥३॥ श्रीमाप्रमाणन्द्र मितान्तर गुइदेगडेमारमायो । विश्वरूवारिमुष्पनिक गर्द्धमानाचारि मंरिमित गहन महा।। श्री। {पत्र में परमर IT TEAmal गम एमाला fulhamat. ne. भागणा गम कामायन विnिtern म माग authtimजमिठा..." (1) AMIn.

市} 「如 考:ht thirls 4 4 - चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख गुरुगनुदासवितनदासयशं नृपकामयोसज़ पोरेद महीरानेन्दोडेजे पणिपरानेंगरदेचिगाडून ॥५ * [८] ॥ मनुपरितनेचिगाडून मनेयोल मुनिमनगमूहमुं युधजनमु। गिनपूजने जिनकन्दने जिनमदिमेगलायकालगुंशोभिसुगु ॥६॥ पामहानुभाषगाड़ियेन्तप्पनेन्दोई। पत्तम-गुण-तनियनिता- वृत्तिगनात मादुरन्तु जगमेनं क- ग्याविनमालगुणरा- पत्ति जगालग पापिफम्ये गान्त ॥७॥ मनु जिजानिनुलिपि पनम मुनिजनामिनि गफलमिशि- भनगली मागेगाल मनमा पानिनिरिपनु । जन रिनुनधिगान- मामि गगनधना बर जननि जननि गुरम- नंगल पाक्षिक गुपनुमतिथि 01 बामिद पातात्रिी- समान में ममत- पावर पाय हाम- - पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख [A] नन्तमं नरपि परपि जसमंजगदालु ॥१०॥ पपन] ॥ इन्तेनिसिदापोपाम्बिके येल्गालद सीर्य मोदलागनेकतीत्यंगलोलु पलवू चैत्यालयङ्गल माडिसि महा- दान गेरदु॥ [] ॥ प्रदनिन्ननेन्येनानान्दमन्द सुकृतमं नोह रामाय माद- पुदु पेल्युद्योगदिन्दं मरियिपदेनमा वोवरागाय गाई- स्थ्यद योपि भावदी कालद परिणवियिं गेल्दु सल्लेसनास- म्पददिन्दं देविपाचाम्बिके सुरपदमं लीयिंगाण्डल॥११॥ सकवर्ष १०४३ नेय सार्यरि संवत्सरदापाढ़ मुद्ध ५ सोमवारदन्दु सन्यमनमं फैकोण्ड एकपार्थनियमदि पश्च- पदमनुचारिसुत्त देवनोकरके सन्दल ।। प्रा जानननियपुग्नं ॥ ममधिगतपचमहाशब्द मद्दामामन्ताधिपति महाप्रचण्डदण्ड- नायकं । वैरिभयदायकं । गोत्रपवित्रं । पुधजनमित्र । श्रीजन- धर्मामृताम्बुधिप्रवर्द्धनसुधाकरं । सम्यक्त्वरमाकरं । पादाराभय- भैषज्य-शास्त्रदानविनोद । भव्यजनहृदयरमोद । विष्णुवर्द्धन भूपाल दोरमममहाराजगग्याभिषरुपकुम्भ। धर्महोट- रणमूनस्तम्भ । नुटिदन्तंगण्डपगंवरं बेड्डोण। मोहपरसायनेक नामावलीसमालङ्कतनप्प श्रीमन्महाप्रधानं दण्डनायकं गा. राज समारमायिक पोषलदेवियर दिवले सजनु परासविन. यकेन्दी निमिधिगयं निलिसि प्रतिष्ठे गेग्नु महादानपनाप. नाभिकङ्गलं माहिद मङ्गलमहा श्री श्री ।। ।

- ५२ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालंय श्री प्रभाचन्द्रसिद्धान्तदेवगुई पेगडे चावराज वरदं ।। रूवारिहोसलाचारियमगं वर्द्धमानाचारिविरुदस्वारि- मुखविलकं फण्डरिसिद ॥ [ इस लेख में 'मार' और 'मारुणम्ये' के मुपुत्र 'एचि' व 'एचि. गाङ्क' की भार्या 'पोचिकच्चे' की धर्मपरायणता और अन्त में सन्यास विधि से स्वर्गारोहण का उल्लेख है। पाचिकब्बे ने अनेक धार्मिक कार्य किये । उन्होंने बेल्गोल में अनेक मन्दिर बनवाये। शक सं० १.१३, मागढ़ मुदिर सोमवार को इस धर्मवती महिला का स्वर्गवास हो जाने पर उसके प्रतापी पुत्र महासामान्ताधिपति, महाप्रचण्ड दण्डनायक, विष्णुवर्धन महाराज के मंत्री गाराज ने अपनी माता की स्मारक यह निषद्या निर्माण कराई। यह लेख प्रमाचन्द्र सिद्धान्त देव के गृहस्थ शिष्य चापराज का रखा हुआ और होय सलाचारि के पुत्र वर्धमानाचारि द्वारा उसकीर्ण है ] ४५ (१२५) एरडु कट्टे वस्ति के पश्चिम की ओर एक पापाण पर। (लगभग शक सं०१०४०) श्रीमत्परमगम्भीर-स्याद्वादामोपलाञ्छनं । जोयात त्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनं ॥१॥ भद्रमस्तु जिनशासनाय सम्पद्यतां प्रतिविधानदेववे । प्रन्यवादिमदहस्तिमस्तस्फाटनाय घटने पदीयसे ॥ २॥ स्वस्ति 'समधिगतपञ्चमहाशब्द महामण्डलेश्वर द्वारवतीपुर वराधीधरं यादवकुलाम्बर घुमयि सम्यकचूडामपि मलपरोल चन्द्रगिरि पर्यत पर के शिष्याय गणाराकनामावली-गमालमरण श्रीमन्महामण त्रिभुः पनमल सकागोग गुज-याजवीर गा विष्णुपईन ষল মিথ্যালাসিম্বিয়ান এলা- नागपुनरमलादपरोपजीवि ।। पून। जनताधारनुहारनन्यनिनाद बचागुन्दरी- पनान-दानुराधार मान्दप । अन मानेने माकण विधुपायाप्रयु. बरे निकामाचरिताममिदन महापाय॥ बन्द विप्रधान- मित्र सिमपवित्रचम जगदाल । पात्रमरिकापनि कामियान महy मनुचिगान नेपालगुरिजमा धनम् । जिमनंदिने मिनाहि काम yिju मगुलततिनिता पनियामा का नविनामा पति अपना॥ निसिपाधिका पुरसreket. minaरिता शाही विपुल चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख यायनुक्सम-समर-रस-रसिक-रिपु-नृप-कलापावलेपन्लोप-लोलुप- कृपाणनुवाहाराभय-भैषज्य-शास्त्रदान-विनोदनुं सकल - लोक. शोकापनोदनुं ।। वृत्त ।। वयं वप्रभृतो हलं हलभृतश्चक्र तथा चक्रिण श्शक्तिशशक्तिपरस्य गाण्डिवधनुगाण्डीव-कोदण्डिनः । यस्तद्वत विवनोति विष्णुनृपतेष्कार्य कथं मादृशे. गर्गङ्गो गाङ्ग-रगरखित-यशो-राशिस्सवर्णो भवेत् ॥ ७ ॥ इन्तेनिप श्रीमन्महाप्रधानं दण्डनायकं द्रोहघरट्टगङ्गराज चालुक्यचक्रवर्ति त्रिभुवनमल्ल पेाडिदेवनदलं पग्निर्वर- स्सामन्तव्वेरसुकण्णेगालवीडिनलुबिहिरे । कन्द ।। तेगेवारुवम हारुव यगेयं वनगिरुल यवरवेनुत सवङ्ग । बुगुवकटकिगरनलिरं पुगिसिदुदु भुजासि गङ्गदण्डाधिपन ॥८॥ वचन । पम्यिनमवस्कन्द केलियिन्दमनियाँ सामन्तहम भनिसि तदीयवस्तु-वाहनसमूहमं निजस्वामिगे • तन्दु को निज. भुजावष्टम्भकेमेषि मेचिदें पेडिकोल्लेने ॥ फन्द । परमप्रसादम पहेंदु राज्यमं धनमनंनुमं येहदन- स्वरमागे वेहिकोण्ड परमननिदनइंदरचनाधिसचित ॥६॥ अन्तुर्वेहिकोण्ड।

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६ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस गुणमणिगणसिंधु रिशष्टलोकैकबन्धुः विबुधमधुपफुल्ल: फुल्लबाणादिसष्ठः ॥१॥ श्रीवधुचन्द्रलेखे सुरभूमहदुद्भवदि पयोधिवे- लावधु पेम्पुवेत्तयोल निन्दिते नागले चारुरूपली-1 लावति दण्डनायकिति लकनेदेमति चिराजन- म्बीविभु पुढे पेम्पु वडेदार्जिसिदलु पिरिदप्प कोचिय ॥२। भावयन्वय मगनेन्तप्पनेन्दडे । स्वस्ति समस्तभुवनभवनविख्यावख्यातिकान्तानिकामकमनी यमुखकमलपरागपरभागसुभगीकृतात्मीयवक्तनुं । स्वकीयकायक' न्तिपरिहसितकुसुमचापगावर्नु । माहाराभयभैषज्यशास्त्रदान विनोदनुं । सकललोकोकामनोदनुं । निखिलगुणगणाभरणतुं जिनचरपशरणनुमंनिसिद यूचर्य। वृत्त । विनयर सीमे सत्यद तवर्मने शौचद जन्मभूमि ये- न्दनवरतं पागल्बुदु जनं विवुधोत्करकैरवप्रयो- धनदिमरोचियं नेगर्ड यूचियनुद्धपरायसद्गुणा- भिनवदधोचियं सुमटमीकरविक्रमसव्यसाचियं ॥३॥ मान्यण्णं सकवर्ष २०३७ नेय विजयसंवत्सरद पेगाससुद्ध १० मादित्यवार दन्दु मर्वसङ्गपरित्यागपुर्व मुडिपिदं॥ (पश्चिममुस) पच ॥ श्यामगुणाधिक तदनुज गारयं च नमान्य धेस्यं गव्यंगुणातिहारपरिपुं शान मनोऽन्य सता ।

- बन्द्रगिरि पता (urin राणोऽन्यादि मा मन्यगुदी निकिकान परानुन्धमा ।।४।। दीवार पमम दानको प्रषणो पालगुग्गृणमूपमनी गम्मोरवाया । पामारमुपगुमानि-गुण भी मंगभूयं गत- मामपना मनीरिri गीयमयंगरः ॥ ५॥ माराम गिटनराम्यस्यूजित-श्रीरिति प्राप्रयागंपतिप्रमुत्यगुमायुपर्मनीपीति श्रीमानले प्रिपनमा सरमीमरा शिना-- मम्भ व्यापपतिम्म पुषगुणमयानिवृद्धि प्रति ॥6॥ परे सवारण विविनेयनिकायमनाथमारसुवाक- ववियुमीगली जगदोहाग्गमनादरदीयादशे- न्दिरदं विषादमादमादवुति भव्यजनान्त [] दालु निरुपमनेदिद नंगा पूचियगं दिविजेन्द्रलाकर्म ॥७॥ मी मूलमहर मिगगणद पुनकगर शुभचन्द्रसिद्धान्त- दंपर गुएर पूषगन निणिधिगं ।। हम अंश में माता के मुत्र 'पविराम दूषण साम्दशा पर सद्गुषों का है। यह सेजम्ब। परमिट पुरष .... शाम मुदि. रविवारी सर्व-परिग्रह का सागा मांगामी हुमाग्न माया सेनापति गहन एक पापाया- नाम प्रारोपित पाया। रविराज गुरु मृर मेघ, देशीगय पुस्तक पद के एभचन्द मिशान्त वेव थे।

५८ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख ४७ (१२७) उसी मण्डप में द्वितीय स्तम्भ पर (शक सं० २०३७) (दक्षिणमुख) भद्रं भूयाजिनेन्द्राणां शासनायाघनाशिने । कुतीय-ध्वान्तसङ्घातप्रभिन्नघनभानवे ॥ १ ॥ ओमन्नाभेयनाघाद्यमलजिनवरानीकसौधोरुवादिः प्रध्यस्ताघ-प्रमेय-प्रचय-विषय-कैवल्यवोधोरु-वेदिः । शस्तस्यात्कारमुद्राशयलितजनतानन्दनादोरुषोप: स्यादाचन्द्रतारं परमसुखमहावीर्यवीचीनिकायः ॥२॥ श्रीमन्मुनीन्द्रोत्तमरत्नवर्गाः श्रीगौतमाद्याः प्रभविष्णवन्ते । तत्राम्मुधौ सप्तमहर्द्धियुक्तास्तत्सन्तती नन्दिगणे बभूव ॥३॥ श्रीपद्मनन्दोत्यनवद्यनामाह्याचार्यशब्दोत्तरकाण्डकुन्दः। द्वितीयमासीदभिधानमुद्यचरित्रसखातसुचारणद्धिः ॥४॥ प्रभूदुमास्वातिमुनीश्वरोऽसावाचार्यशब्दोत्तरगृद्धपिञ्छः । तदन्वये तत्सदृशोऽस्ति नान्यस्तात्कालिकाशेषपदार्धवेदी ॥५॥ श्रीगृद्धपिञ्चमुनिपस्यबलाकपिञ्छ: शिष्योऽजनिष्टभुवनग्रयवत्तिकोतिः । चारित्रचुञ्चुरखिलावनिपालमालि- मालाशिलीमुखविराजितपादपप्रः ॥६॥ सच्छिप्योगुणनन्दिपण्डितयतिश्चारिपचक्रधर- म्तव्याकरणादिशानिपुणस्माहित्यविद्यापतिः । । - ५८ चन्द्रगिरि पर्षय पर शिवाय मिसावादिमदान्धमिधुरघटामारण्टीरको भल्या मोजदिया nिt कन्दपदापरः ।। मण्डिप्यानिशा विकनियरसाबाधिपारवा. पाटनमा हिमततिमिनापियवान्यामारमंत्र- श्याम्याने पटया विपित्रपरिकाम्पु प्रसिलो मुनिः मानामननयममाटनिपुग्यो देवेन्द्रमंदान्तिकः ॥ पजनि महिपहारनराराजिवाहि लिजिमकरके रहदारण्डाः । एनयनिकरमानीकदाभोलिदण ग्मजया पियुधेन्द्रो भारतीमालपटः ।। वधिप्यः फलधौतनन्दिमुनिपम्मेद्धान्तपयोधरः पारावारपरीवधारिपिशव्यातोरीश्वरः। पचासोन्मदकुम्भिकृम्भदलनपोन्मुत्तमुक्ताफल- माराप्राधिपतकमरी युधनुना वाकामिनीवधमः ॥१०॥ तत्पुत्रको महेन्द्रादिकोतिर्मदनशङ्करः । यस्य वाग्देवता शका श्रीतीं मालामयूयुजन् ॥११॥ सद्धिप्यायोरणन्दीकवि-गमक-महावादिन्याग्मित्वयुक्तो पम्य श्रीनाकसिन्धुत्रिदण्पविगजाकाशसहायकीर्ति। गायन्युगिन्तं विदरायुवतयः प्रीतिरागानुबन्धात मोऽयं जीयात्प्रमादप्रकरमदिघरामीलदम्भोलिदण्डः ॥१२॥ श्रीगोल्लाचार्य्यनामा समजनि मुनिपरशुद्धनत्रयात्मा सिदात्माधयन्सात्य-प्रकटनपटु-सिद्धान्त-शास्त्राधिन्वाधी- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख सवातचालिताहः प्रमदमदकलालीढबुद्धिप्रभाव: जीया पाल-मालि-घुमणि-विदलितास, गजलक्ष्मीविलामः ॥ पेार्गडे पावराज यरेदमङ्गल ॥ (पश्चिममुख) पीरणन्दिवियुधेन्द्रसन्तती नूनचन्दिलनरेन्द्रवंशचू- खामणिः प्रधितगोधदेशभूपालक: किमपि कारणेन मः ॥१४॥ श्रीमत्काल्ययोगी ममजनि महिकाकायलग्नानुन यस्याभूष्टिधारा निशिव-शर-गया भीममार्तण्डयियं । घम्सद्वृत्तचापाकलितयविवरस्यापरान्यिजेतुं गोधाचार्यस्य शिष्यस्मजयतु भुवने भव्यसत्केरवेन्दुः॥१५॥ तपस्सामर्थ्यतो यस्य छानोऽभूप्रझराधसः । यस्य स्मरणमाण मुञ्चन्ति प महापदाः ॥१६॥ प्राग्याग्यता गर्न लोके कर सम्य दिन। सपामामध्यंतस्तम्य सपः कि यपिणनुमं ॥१७॥ कास्य-योगि-यतिपाप-विनेयग्न- स्मितान्तवापिरियनपूर्णचन्द्रः । दिग्नागकुम्मतिखिताग्यलकीर्तिकान्ता जीयादमावभयनन्दिगुनिाशंगरयां ॥१८॥ येनावारीपहादिरियामायरिजवा: प्रोसता: नाना दरातगात्तममहाधर्मायकम्पनुमाः । यनाशेष-भयोपनाप-हननम्माभ्यामवेदन प्रान यादभयादिनन्दिनियरमा नारों गुnिt!

पद्रगिरि परगिलासंग नरियामागमारपंनिपुणो मातामयुत. तिविपिरावरितमोमयकदारः । দিবাস্বাবলম্বাণাসনাবাদ- पारयामकलेन्दुनाममनिपः कामाटवीपावकः ॥२०॥ पपिए सकलगन्द्रो विविधभरेश प्रपोज दहान्दुरोपिः । विदशगजराशयाममिन्धुमकारा प्रतिमविरादीनिमिधूकर्णपूरः ।।२१।। शिष्यस्तम्य दवतररामनिधिम्मसंयमाग्भानिधिः शिक्षाना विपुमालयम्ममितिभियुधिम्विगुमिभिवः । नानासद्गुरसहमगिरिर प्रोगनपी जन्मभूः प्रख्याता मुवि मेघचन्द्रमुनिसम्प्रैविद्यधकाधिपः ।। २२ ।। विपयोगीश्वर-मंपचन्द्रस्याभूस्मभाषन्द्रमुनिरमुशिष्यः । गुम्भद्रवाम्भानिधिपूर्णचन्द्रो निइंतदग्दत्रितयो विशल्यः २३ पुष्पाग्मानून-दानात्कट-कट-करटिच्ईद-टप्यन्मगंन्द्रः नानाभध्याम्जपण्डप्रति-विकसन-श्रीविधानकभानुः । समागम्माधिमध्यात्तरयकरणायानरमत्रयेगः मम्याजेनागमार्यान्वित-विमलमति: योगी ॥२४॥ (उचरमुप) श्रीभूपालकमालिलालिवपदस्मज्ञानलक्ष्मीपति- प्रचारित्रोत्करवाइनश्गिठयशरशुभ्रातपत्राचितः । श्री प्रभाषन्द्र -

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
त्रैलोक्यागुवमन्मघारिविजयस्सद्धर्मचक्राधिपः
पृथ्वीसंस्तवतूर्योपनिनदस्वैविधचक्रेश्वरः ॥ २५ ॥
शाब्दीघस्य शिरोमणिः प्रविलसत्तज्ञचूड़ामयिः
सैद्धान्तेद्धशिरामयिः प्रशमवद् प्रातस्य चूड़ामणिः ।
प्रोद्यत्संयमिना शिरामविरुदश्चद्भव्यरक्षामणि-
जर्जीयात्सन्नुतमेघचन्द्रमुनिपस्त्रविद्यचूडामयिः ॥ २६ ॥
विद्योचममेघचन्द्रयमिनः पत्युर्ममासि प्रिया
वाग्देवी दिसहावदित्यहृदया तश्यकायिनी।'
कीर्ति रिधिदिककुलाचलकुले खादात्मा प्रष्टुम--
प्यन्वेष्टुं मथिमन्त्रतन्त्रनिचयं सा सम्भ्रमाभ्राम्यति ॥२७॥
तर्कन्यायसुवझवेदिरमलाईत्सूचितन्मौक्तिकः
शब्दप्रन्यविशुद्धशङ्गकलितस्याद्वादसद्विद्रुमः।
व्याख्यानोजितघोषणर् प्रविपुलप्रज्ञोद्ववीचीचयो
जीयाद्विश्रुतमेघचन्द्र-मुनिपस्त्रविद्य-रनाकरः ॥२८॥
श्रीमूलसङ्घकृत-पुस्तक-गच्छ-देशी
योधगयाधिपसुतार्किकचक्रवर्ती।
सैद्धान्तिकेश्वरशिखामणिमेघचन्द्र-
स्पैविधदेव इति सद्वियुधा(:) स्तुवन्ति ॥ २६ ॥
सिद्धान्त जिन वीरसेन महश. शास्याज-भा-भास्करः
पटतप्यकलङ्कदेववियुधः सातादयं भूवले ।
सर्व-ज्याकरणे विपश्चिदधिपः श्रीपूज्यपादस्वयं
विद्योत्तममेघधन्द्रमुनिपा वादीमपश्चाननः ॥ ३०॥

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चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
त्रैलोक्याद्भुतमन्मघारिविजयरसद्धर्मचक्राधिपः
पृथ्वोसंस्तवतूर्यपोपनिनदस्त्रविद्यचक्रेश्वरः ॥ २५ ॥
शान्दाघस्य शिरोमणिः प्रविलसत्तज्ञचूडामयिः
सैद्धान्तेद्धशिरोमणिः प्रशमवद् प्रातस्य चूड़ामणिः ।
प्रोगसंयमिना शिरामविरुदश्याव्यरत्तामधि-
ओपात्सन्नुतमेघचन्द्रमुनिपरविद्यचूडामणिः ॥ २६ ॥
विद्योत्तममंपचन्द्रयमिनः पत्युर्ममासि प्रिया
याग्दयी दिमहारहित्यहदया सदश्यकमायिनी।।
कीर्सिारिधिदिक्कुलायलकुले स्यादात्मा प्रष्टुम-
प्यन्वेन्दु मणिमन्यतन्त्रनिचयं सा सम्भ्रमाभ्राम्यति ॥२७॥
तर्गन्यायसुबमोदिरमामात्सूक्तितन्मौक्तिकः
शम्दमन्यविशुधरातकलि तस्याद्वादमद्विदमः ।
व्याप्त्यानार्जितपोषण प्रविपुल प्रशोदबीपी पया
जीयाद्विश्रुतमेघचन्द्र गुनिपानविगरमाकर ॥८॥
श्रीमूलमहशत पुस्तकाच्य-देशी
पोगणाधिपमुताविकपक्रया।
सैतान्तिघरशियामणिमेघपन्द्र.
ग्रेवियोव इति गद्वियुधा(:) तुवन्ति ॥ २५ ॥
मिटानं जिन पीरमेन-गहरा शागारज.मा.माका
पदना प्रकाशदेवरियुषः मासाद भूलने ।
मद्यपार शिविष: श्रीपूग्यपादाम्यय
वियोगमपएममुनिका बादामाचाननः ॥३०॥

पन्द्रगिरि पर्वत पर शिक्षास । वर गुद्धि। परमपदात्यनियमनान्त विदग्धते दुर्भपडलोल परिचयमेन्दुमिदतिमुग्धते समिनियन चित्तदोल । पिरिदनुरागमं पटव रूप विनेयजनान्तरङ्गदोल निरुपमभतिय पर पम्पिवु लक्ष्मोगेन्दुमन्वितं ॥३॥ चतुरतयोल लावण्य दी- सतिशयमेन नेगल्द देवमतियोलिन्दी हितियोलगे गहराजन मति लरम्यम्बियालिवरसवियरेये ॥४॥ सौभाग्यदलमर्शद सामास्पदमादरूपिनोल्पि प्रत्य- सोभूत क्षदिमयेन्दपु- दो भूतसमिनितुमयदे लक्ष्मीमतियं ॥ ५ ॥ शोभेयनें क्यकोदो मीमाग्यद कपि यनिम्प लक्ष्मीमतिथि- न्दी भुवन-तजदाहाहा- राभय-भशापयशानदानविधानं ॥ ६॥ वितरणगुणमदे वनिता- कवियं कोण्डदेनिप मदिमेय लक्ष्मी- मठियायो देवताधि- टितेयधद केवलं मनुष्यानेये ॥७॥ इभगमने दरियलोपने

६
समान
चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
कलधौतनन्दि के पुत्र महेन्द्रकीत्ति हुए जिनकी प्राचार्य परमरा में
क्रम से धीरनन्दि, गालाचार्य, कास्ययोगी, भमयनन्दि और सकल-
चन्द मुनि हुए । लेख में इन प्राचार्यों के सप और प्रभाव का महा
वर्णन है। काल्योगी के विषय में कहा गया है कि तप के प्रभाव से
एक ब्रह्मराक्षस उनका शिष्य होगया था। उनके स्मरणमात्र सेवई को
भूत भागते ये, उनके प्रताप मे करन का तेल पृत में परिवर्तित होगमा
या। सकलचन्दमुनि के शिष्य मेवपाद विद्य हुए जो सिदान्त में
वीरसेन, तर्क में प्रकला और म्याकरण में पूज्यपाद
के
विद्वान् थे।
शक सं० १०३७ मागसिर सुदि ११ बृहस्पतिवार को उन्होंने
सथानसहित शरीर त्याग किया। उनके प्रमुख शिष्य प्रभावन्द्र
सिद्धान्त देव ने महामधान दण्डनायक गजराज द्वारा उनकी निपद्या
निर्माण कराई।
लेख धादराज का लिखा हुआ है।]
४८(१२८)
उसी मण्डप में तृतीय स्तम्भ पर
(शक सं० १०४४)
श्रीमत्परमगम्भीर-स्याद्वादामोघलान्छन ।
जीयास्त्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनं ॥१॥
जयतु दुरितदूरः सोरकूपारहारः
प्रधितपृथुलकीर्तिश्रीशुभेन्दुभतीशः ।
गुणमणिगणसिन्धुः शिष्टलोकैकबन्धुः
विबुध-मधुप-फुल्छः फुधयाणादि-सधः ॥२॥

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षाप्लेस प्रवर गुद्धि। परमपदार्यनियमनान्त विदग्यो दुर्भयङ्कलोल परिचयमेन्दुमिष्टदतिमुग्धते समिनियों पित्तदोल। पिरियनुरागमं पटव रूप विनेयजनान्दरगदोल निरपमभक्यिं पडेय परिपतु समझेगेन्दुमन्वितं ॥३॥ पतुरतेयोल लावण्य दो- सतिशयमेने नेगल्द देवमक्तियोलिन्दी सितियोलगे महराजन सवि लक्ष्म्यम्बिकेयोलितरसतियरिये ॥४॥ सौभाग्योलमहद साभारपदमादरूपिनोल्पि प्रत्य- सोभूत लदिमयेन्दपु- दो भूतखमिनितुमयदे लक्ष्मीमतियं ॥ ५ ॥ शोभेयनें कयकोण्हुदो मौभाग्यद कपियनिष्प लक्ष्मीमतिथि- न्दी भुवन-तज्ञदोलाहा- राभय-भैशापयशानदानविधानं ।। ६॥ विवरणगुणमदे वनिता- कृवियं कयको हुदैनिप महिमेय लक्ष्मी- मठियेलवा देववाधि- टिवेयदे केवलं मनुष्यागनेये ॥ ७॥ इभगमने दरियाझोपने ८ . . चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख शुभलक्षणे गङ्गराजनङ्गिने ता- नभिनवरुग्मियियेनली त्रिभुवनदाल पाल्वरोलरे लक्ष्मीमतियं ॥८॥ श्रीमूलसङ्घद देशियगषद पुस्तकगच्छद श्रीमत-शुभवन्द्र सिद्धान्तदेवर गुडि दण्डनायकिति लकव्ये सक वर्ष २०४४ नेय नवसम्वत्सरद शुद ११ शुक्रवारदन्दु मन्यसनं गेयदु समाविवरसि मुडिपि देवलोकके सन्दल ॥ परोक्षविनेयके निषिधिगेयं श्रीमदण्डनायक-गङ्गराज निलिसि प्रतिष्ठेमाडि महादानमहापुजेगलं माडिदरु मङ्गल महा श्री श्री॥ [इस लेख में दण्डनायक गाराज की धर्मपत्री लक्ष्मीमति के गुण, शील और दान की प्रशंसा की गई है। इस धर्मपरायण सावी महिला ने शक सं. १४४ में संन्यास-विधि से शरीर त्याग वह मुटसंघ पुस्तक-गछ देशीगण के शुभद्राचार्य की शिष्या थी। अपनी साध्वी स्त्री की स्मृति में दण्डनायक गाराज ने यह निपद्या निर्माण कराई। ४८, (१२६) उसी भएडप में चतुर्थ स्तम्भ पर. शक सं० १०४२) (उत्तरमुप) भद्रमस्तु जिनशासनम्य ।। जयतु दुरितदूरः चारकूपारहारः किया।

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालंच
प्रधिवपघुलकोनिरनी शुभेन्द्र बनीशः ।
गुणमणिगणसिन्धुः शिष्ट लोकसन्धुः
वियुधमधुपफुल्म फुल्लवाणादिगधः॥१॥
मोवधुपन्द्रलंखे सुरभूरहदुसयदि पपोधि-वे-
लावधु पम्पु वत्तयोलनिन्दिते नागले पाइरूपली-
लाववि दण्डनायकिति लक्कले देमति यूधिराजन
म्यो विभु पुढे पम्पु षडदार्जिसिदल पिरिदपकीर्तियं ॥२॥
पचन ।। प्रा यधेय मगलंन्तापलेन्दहे । खस्ति निम्नुपाति.
जितजिन-भाग- भगवदईदईयायचाचरणारविन्दद्वन्द्वानन्दक
मदनबेलाविलोकनीयादमायमाण-सरमीविलासयु। अपहमनी
यस्वोयजा वितरजीवितान्तजीवन विनोदानारतरतरतिषिलासे ।
काशेयकालरासमरसाविकलसकलवायिजत्राणतिप्रपाषा-
मुण्डातिभेष्ठराजष्ठिमानसराजमानराजसषनिताकपयु।
परमजिनमवपरित्राणकरणकारणीभूत -जिनशासमदेवताकारा.
कस्पर्यु । भिरामगुणगणवशीकरलीयतानुकरदीपथायीमुने।
श्रीसाहित्यसत्यापिततारादमुन्यु । सदर्भानुरागमतिपनिमि.
दमियक।।
पोषामुण्डमनोमनारश्रयम्यापारकरिया
मीचामुण्डमनस्मरोजरजमाराजदिरेपाना।
श्रीचामुण्डायोड़तमहामाकल्पाची लय
भीचामुण्डमन:प्रिया विजयामदिमबहाना ॥३॥

-- चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिलालेय (पश्चिममुम्ब) माहारं त्रिजगजनाय विमयं भीताय दिव्यौपध व्याधिव्यापदुपैतदीनमुखिने प्रोग्रे च शाखागर्म । एवं देवमविस्मदेव ददती प्रप्रक्षये स्वायुषा-- मईदेवमतिविधाय विधिना दिव्या वधू प्रोदमू ॥ ४ ॥ मासीत्परतोभकरप्रतापाशेपावनीपासकवादरम्य । चामुण्डनानो वणिजःप्रियात्री मुख्यामतो या भुविदे- मतीदि ॥ ५ ॥ भूलोफ-चैत्यालय-चैत्य-पूजा-व्यापार-कृत्यादरताऽवतीणी स्वगात्सुरनोतिविलोक्यमाना पुण्यनलावण्यगुणेनयात्र।।६।। माहारशास्त्राभयभेपजाना दायिन्यलंवपेचतुष्टयाय । पश्चात्समाधिक्रिययायुरन्ते स्वस्थानवत्स्वः प्रविवेशयाच्चैः ॥७॥ सद्धर्मशत्रु कलिकालराज जित्वा व्यवस्थापितधर्मपत्या। तस्याजयस्तम्भनिभंशिलाया स्तम्भंव्यवस्थापयतिस्म लक्ष्मीः।। श्रीमूलसङ्घद देशिगगणद पुस्तकगच्छद शुभचन्द्र सिद्धान्तदेवर गुहि सकवर्ष १०४२ नेय विकारिसंवत्सरः दफाल्गुणब ११ वृहवारदन्दु मन्यासन विधियि देमियक मुडिपिदल ।। [इस लेख में चामुण्ड नाम के किप्ती प्रतिष्ठित और राजसन्मानित पणिक की धर्मवती भार्या 'देमति' व 'देवमति' की प्रशंसा है। महिला की माता का नाम 'नागले' व उसके एक भाई और बहिन के नाम कमशः पधिराज और लश थे। दान-पुण्य के कार्यों में जीवन पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेग्य प्यतीत कर इस महिला मे शक ०१०१२, फाल्गुण पदि। वृहस्पति वार को सम्यास-विधि मे शरीर त्याग किया। यह महिला शुभम मिदास्तदेवी शिष्या थी। ५० (१४०) गन्धयारण यस्तो के प्रथम मण्डप में एक स्तम्भ पर (शक सं०१०६८) ( पूर्वमुख) महं भूयामिनेन्द्राय शासनायापनाशिने । कुतीर्यवान्तमहावाभिमघनभानवे ॥१॥ श्रीमहाभेयनाथाचमलजिनवरानीकसाधारवाद्धि: प्रध्वम्तापप्रमेयप्रथयविषयकैवल्योपोरवेदिः। शम्तस्यात्कारमुद्राशवलितजनवानन्दनादरपोषः म्यादापन्दवारं परमसुखमहावीर्यघीयौनिकाय' ॥२॥ भीमन्मुनीन्द्रीत्तमरनवः श्रोगौतमाचाः प्रभविष्यवस्त । सवाम्बुधासप्तमर्दियुक्तास्तत्सन्तानन्दिगणे बभूव ॥ ३ ॥ श्रीपद्मनन्दीयनवधनामाशापार्यगग्दोत्तरकाण्डकुन्दः। द्वितीयमासीदभिधानमुद्यचरित्रसंजातसुचारद्धिः ॥ ४ ॥ प्रभूदुमास्याति मुनीश्वरोऽसावाचार्यशब्दात्तरगृद्ध- पिच्छः। वदन्ययतत्सशोऽस्विनान्यस्वात्कालिकारोपपदार्यवेदी ॥५॥ श्रीरापिञ्चमुनिपस्ययलाकपिछः शिष्योऽजनिटभुवनत्रयवर्तिकीर्तिः ।

७ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख चारित्रचन्चुरखिलावनिपालमौलि. मालाशिलीमुखविराजितपादपद्मः ॥ ६ ॥ तच्छिप्यागुणमन्दिाण्डितयतिश्चारित्रचक्रेश्वर- स्तर्कव्याकरणादिशास्त्रनिपुणस्साहित्यविद्यापतिः । मिथ्यावादिमदान्धसिन्धुरपटासट्टकण्ठीरवो भव्याम्भोजदिवाकरा विजयता कन्दपदापहः ॥ ७ ॥ तच्छिप्याविशता विवेकनिधयश्शाखाधिपारङ्गता- स्वैपूत्कृष्टतमा द्विसप्ततिमितासिद्धान्तशास्त्रार्यक- व्याखाने पटवो विचित्रचरितास्तेषु प्रसिद्धो मुनिः नानानूननयप्रमाणनिपुणो देवेन्द्रसैद्धान्तिकः ॥ ८॥ प्रजनि महिपचूडारत्नराराजितादि- विजितमकरकेतूदण्डदाईण्डगः । कुनयनिकरमूधानीकदम्भोलिदण्ड सजयतु विबुधेन्द्रो भारतीमालपट्टः॥६॥ तच्छिष्यः कलधौतनन्दिमुनिपम्सद्धान्तचक्रेश्वरः पारावारपरीतधारिणि फुलव्याप्तोरुकीर्तीश्वरः । पञ्चाक्षीन्मदकुम्मिकुम्भदलनपोन्मुक्तमुक्ताफल- प्रांशुप्राञ्चितकमरी युधनुतो याकामिनीवल्लभः ।। १० ।। तत्पुत्रको महेन्द्रादिकीर्तिर्मदनराङ्करः । यस्य वाग्देवता शक्का श्रौती मालामयूयुजत् ॥ ११ ॥ तन्छिन्योवीरणन्दोकवि-गमक-महावादि-वाग्मित्वयुक्तो यम्य श्रीनाकसिन्धुधिशपतिगलाकारासङ्काशकीर्तिः ।

७३ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षालंग गायन्सुच्चदिगन्तं विदरायुवतयः प्रोविरागानुपन्धान सोऽयं जीयात्प्रमादप्रकरमदिधराभीलदम्मोनिदण्डः ॥१२॥ श्रीगोल्लापार्यनामा ममजनि मुनिपरशुद्धायत्रयामा सिखात्माचत्य-सात्र्य-प्रकटनपटु-सिद्धान्त शाखाधि-याधी- सहावसालिवाहः प्रमदमदकरलालीटयुद्धिप्रभाव: जीयादभूपाल-मोलि घुमणि-विदलिताइ, मरमी- विलागः ॥१३॥ पीरन्दिविपुर्धन्द्रमन्ततो नूनन्दियनरेन्द्रवंश डामणि. प्रचितगावदशभूषालक. किमपि कारमेन सः॥१४॥ श्रीमान्कारपयोगी समजनि मटिकाकायनानुन यस्याभूपृष्टिधारा निशित-रगया माध्ममापि । चमत्तचापाकलितपतिवास्यापरावन्धिों गोधाचार्यम्य शिष्यम्मजयतु भुपने भध्यगास्करन्दु ॥१४॥ गाण्तन लिखित (दक्षिणमुख) तपम्मामार्यता याप दात्रोऽभदायरास । पाय स्मरणमात्रेय गुचन्ति महापहा ॥१॥ प्राम्याग्यता करताप ज़िक सपम्गामार्यतस्तम्य तपः विjिri ॥१७॥ काल्य-योगि-पतिपाम-विनेयान.' wिarranपरिशनपूटमः। दिमाभलिcिinnifसकसी चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख जीयादसावभयनन्दिमुनिजंगयां ॥ १८ ॥ यनाशेषपरीपहादिरिपवस्सम्यजिता: प्रोद्धता: येनाप्ता दशलक्षणोत्तममहाधम्माल्यकल्पमाः । येनाशेप-मवापताप-हननं स्वाध्यात्मसंवेदन प्राप्त स्यादमयादिनन्दिमुनिपस्सोऽयं कृतात्यों भुवि ॥ १६ ॥ वच्छिष्यस्सकलागमायनिपुणे लोकज्ञतासंयुत- स्सच्चारित्रविचित्रचारुचरितस्सौजन्य कन्दाङ्करः । मिथ्यात्वान्जवनप्रतापहननश्श्रीसोमदेवप्रभु- जर्जीयात्सत्सकलेन्दु नाममुनिपः कामाटवोपावकः ॥ २० ॥ अपिच सकलचन्द्रो विश्वविश्वम्भरेश- प्रणुतपदपयोजः कुन्दहारेन्दुरोचिः। त्रिदशगजमुवमव्योमसिन्धुप्रकाश- प्रतिमविशदकीर्तिग्विधूकण्यपूरः ॥ २१ ॥ शिष्यस्तम्य सदन नश्शमनिधिस्सत्संयमाम्मानिधिः शीलानी विपुलालयसमितिभिर्युक्तिविगुमिश्रितः । नानासद्गुणरत्नराहगिरिः प्रोत्तपोजन्मभूः प्रख्याता भुवि मेघचन्द्र मुनिपाविद्ययक्राधिपः ॥२२॥ श्रीमपालकमालिलालितपदस्मज्ञानलमीपति- चारित्रोत्करवाहनशितयशरशुभ्रातपत्राश्चितः। प्रैलोक्याद्भुतमन्मथारिविशयरमद्धर्मचक्राधिपः पृथ्वीसंस्तवतूर्योपनिनदरविद्यक्रेश्वरः ।। २३ ॥ - चन्द्रगिरि पर्वत पर शिक्षालेस शादीपम्य शिरोमणिः प्रविलमत्त महामणिः सैदान्तपुगिरोमणिः प्रशमवद्-मासम्म पुडामणि । प्रोगसंयमिन शिरामयिपध्यरतामणि- ऊयात्म भूतमेघपलमुनिपाविषयूहरामणिः ॥२४॥ विधोत्तमपधनपमिन' पत्यार्ममामि प्रिया वाग्देवी दिमहावादित्यादया सदरयकम्मारिधनी। कीर्तिवारिधि दिवसायक्ष कुलम्वादात्म [ . मटुमा प्यन्वेष्टुं मधिमत्रतन्त्रनिषयं मा सम्भ्रमाभ्राम्यनि ॥२५ न्यायमुबसवेदिरमालाईनितन्मीनिक गदपन्यविपरराष्ट्रकलिनम्म्याहादसहिदुम । व्यायानाग्निपाषण प्रविपुशप्रमोदवीपीयो जीयादिभूतमेघनन्द्र गुनिपात्रविधमाकर ॥६॥ श्रीममम हात-पुस्तक- देगी पापनाविरमुनाकिमतीं । লিমিহিমঘল- प्रिमियर इति महिषधा( नुन्ति ॥५॥ सिमा मिनवीरसेन-मायाज-मा-माका पटतपकलादेववियुधामासादयं भूत है। सम्पाविधिपधिप बापूज्यपादास प्रविणोतमममुनिश वाभिधानमः ॥२८॥ लिखिता मनीर पामारीमतररमाप गाण्टन निखिल परियममुरा) 1 पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख रुद्राणीशस्य कण्ठं धवलयति हिमज्योतिमोजावमङ्क पोतं सौवर्णशैलं शिशुदिनपतनुं राहुरेहं नितान्त । श्रीकान्तावष्टभाङ्ग कमलमत्रवपुम्मघचन्द्रप्रतीन्द्र- विद्यस्याखिलाशावलयनिलयसत्कीर्तिचन्द्रातपाऽसौ ॥२ मूवत्तारं गुणदि भावजनं कट्टि पेट्टवेलेदर् वृषदि । भाविपडे मेषचन्द्र- विद्यरदेन्तो शान्तरममं तलेदर ।। ३० ।। मुनिनाथं दशधर्मधारिदृढ़पत्रिंशद्गुणं दिव्या- ण-निधानं निनगिनु चापमलिनोज्यासूत्रमारोन्देपू- विन बाणगलमयदे हीननधिकङ्गाक्षेपमं मात्पुदा- अ नयं दर्पक मेघचन्द्रमुनियोल मानिन्नदाईर्पमं ॥३१॥ श्रवणीय शब्दविद्यापरिणतिमहनीयं महातर्कविद्या- प्रवणत्वं श्लाघनीयं जिननिगदितसंशुद्धसिद्धान्तविद्या-- प्रत्यप्रागल्भ्यमेन्देन्दुपचितपुलकं कोर्तिसल कूर्तु विद्व- निवहं विद्यनामप्रविदिठनेसेदं मेघचन्द्रवतीन्द्रं ।। ३२ ।। तमेगीगल जीवनं तीविदुदतुलतपःोगे लावण्यमोगल समेमन्दित्तु वग्निं श्रुतबधुगधिकप्रौढियारती गजेन्द- न्दे महाविख्यातियं ताल्दिदनमलचरित्रोत्तम भव्यचेता- रमणं त्रैविध विद्योदिवविशदयशं मेघवन प्रतीनं ॥३३॥ इदै ईसीयन्दमीण्टल पगंदपुदु चकोरीचय पञ्चुविन्द कदुकल माईपुदीशं जडेयोलिगरिमलेन्दिापंसेरोगेरल् । - - - चन्द्रगिरि पर्वत पर शिक्षानंग्य पदेदप्पं कृष्णनेम्यन्वेसेदु यिसलमरकन्दलीकन्दकान्न' पुदिदत्तो मेघचन्द्रप्रतितिलकजगदर्भिकीनिंप्रकाशं ॥४॥ पूजिवविदग्धवियुध-स- मा विद्यमेन्द्रप्रदिरा- राजिसिदं विनमितमुनि- राज वृषभगभगाताराराज॥ ३५ ॥ म्तब्धारमरनतनुरार- शुष्पाने छोगल्ले पोगजे जिनशासनाद- ग्याग्धिसुधारावनाग्विज-क-- कृतवनिमकीर्ति मेषचन्द्रमनिय ।। १ ।। तत्सधार्मह॥ श्रीपालचन्द्रमुनिराजपविधपुत्र. प्रोपवादिजनमानसानामवित्रः । जीयादयं जितमनोजगुजप्रताप ग्यालादनि शुभाशुभकीर्तिदेव ॥ ३७॥ विबापस्मृतिविरगृत किमुफसिमरत किगुपपा. घ्योऽस्मिन्यमानानानन रयो । गन्नानंधुभकीर्तिदेवविदुपा पिटुषिभाषारिए मालामा किन जिमितमतिराम ॥१८॥ पनदीम-लिलिपपरियोपन्दी बन्दी बन- एमयायिकापतिमिरतादिदी बन्दना करीम मेसम्मोमागाएपरिरिरिपु सिरनी परमल चन्द्रगिरि पर्वत परके शिलालेख दने पापोवादि पोगन्दुलिवुदु शुभकीर्तिद्वकीर्तिचाप।३।। वितघोफियस्तजंपशु- पतिमानि येनिप्प मूब शुभकीर्ति- प्रतिमानिधियोल नामो- चितचरितरेताडडितरवादिगनलवे ॥४०॥ सिङ्गद सरमं केल्द म- ताजदन्तलुकि पलुफनल्लदै सभेयोल । पोशिशुभकीर्सि-मुनिपनो- संगल नुडियल्के वादिगल्गेन्तेलयं ॥४१॥ पो साल्युदु यादि वृपा- पाम रियुधोपहासमनुमनेोप- न्यास निमोनेछ-- वास मेरपुर वादिवानापुरानोल ॥ ४२ ।। गाण्णन निस्थित ॥ मेराणुपवरदेव दारिरामगन मा दामा करिसि॥ (त्तामुन विद्यागीभरमंघचन्द्रम्याभूगमभाचन्द्र मुनिग्गुशियः। एम्भवाम्भानिपिगंवला नि तणनियोपिरामः ।। गोलममेघपरद्रयापीयूषवारागिः मम्पूर्वाधाननिर्मलगनु पुष्यधानमनः । यायः शुणिमपि यः प्रापाषागम;

पन्द्रगिरि पर्वत पर शिक्षाम्नेख सिद्धान्ताम्युधिवर्द्धनो विजयतें पूर्वप्रभाचन्द्रमा ॥४४॥ मंमाराम्भोधिमध्योत्तरणकरबयानग्मयशः। मम्यग्जैनागमावितविमलमति:श्रीमभाषन्द्रयोगी ॥४॥ मकलजनविनूनं पाहयात्रिनेत्रं मुकरकविनिवासं भारतीनृयरङ्गम । प्रकदिवनिजकीर्ति दिव्यकान्तामनाम मकलगुणगणेन्दं श्रामभाचन्द्रदेव ।। ४६ ॥ नत्मधर्मर ॥ गणपरं असदील पा- गण-रिपयरनमनपरितमाल पागिमना- प्रमियदे यमदमिका- गपये पुदे वीरपाम्दिौसान्तिकरान ।। ४० ॥ हरिहरहिरण्यग- गुरवधियि गेल्द कामन दीप्रतपा- भरविन्दुरिपिसने यि- परिमदरारिणन्दिद्धान्तिका ॥ पानिगला जनम्य मयने कापराय। पातिकमा विपकचर मासोलनान्तायो । - ... ... अंजीपा विधोरणन्दिगुनिया समान्तविप. AYE भीटीपतिरहगुतिम् परन्द्र- पिचभ्यामपनमाहिस्ता भरा।

८० चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख सैद्धान्तव्यूहचूड़ामयिग्नुपजचिन्तामणिज्जनाना योऽभूत्सौजन्यरुन्द्रप्रियमवतिमहो वीरणन्दी मुनीन्द्रः ॥५०॥ श्रीप्रभाचन्द्र सिद्धान्तदेवर गुडि विष्णुवर्द्धन मुज- बल वीरगङ्ग बिट्टिदेवन हिरियरसि पट्टमहादेवी ।। शान्तल-देविय सद्गुण- वन्गे सौभाग्यभाग्यवतिगे वचनी- कान्तेयुमच्युत [ ......] कान्तेयुमेपेयष्ठदुलिद सवियर्दोरेय ॥ ५१ ॥ शान्तल-देविय वायि । दानमननूनमं कः केनार्थी येण्दु कोटु जिननं मनदोल् । ध्यानिसुतं मुडिपिदलिन् नेनेम्बुदा माचिकब्धे योन्दुन्नतियम् ॥ ५३॥ सकवर्ष १०६८ नेय क्रोधनसंवत्सरद् आश्विज सुद्ध-दशमी बृहवार दन्दु धनुलग्नद पूर्वाद् मारुषलिगे. यप्पागल श्रीमूलसइद काण्डकुन्दान्वयद देशिगगणद पुस्तक गच्छद श्री मेघचन्द्रविद्यदेवर हिरियशिष्यरप्प श्री प्रभाचन्द्र सिद्धान्तदेवर स्वर्गस्तरादरु ।। [इस लेप के प्रथम इस्तीस पच शिलालेख न. ४७ (१२७) के प्रथम पत्नीस पद के समान ही है, केवळ ४७ ये लेख में पच नं. १ और २५ पार इस लेख में पधम...अधिक है। 'कुदामापार से प्रारम मेघनाद बती तक की गुरुपरम्परा का बहम बाने के ।

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख पया देख में मेषचन्द्र गुरुभाई पाटचन्द्र मुनिराज का बलख है। सापश्चात् रामकीत वाचाय का स्लेख है मिनके सम्मुख बाद में बौद, मीमांसकादि कोई भी नहीं ठहर सकता पा। इसके पश्चात लेम्प में मेघचन्द्र विचदेव के शिष्य प्रभाचन्द्र और धीरनन्दि का चक्लेख है। प्रमाचन्द भागम के अच्छे दाता और वीरमन्दि भारी सैदान्तिक थे। लेखके चन्तिम भाग में विष्णुवर'न-मरेश की पटराज्ञी शान्तलदेवी की धर्मपरायणता का भी उल्लेख है। वे प्रभाषद की शिष्या थी। प्रभाद्रदेव का स्वर्गवास शक सं०.६८ मासाश सुदि . हरपति- पार कोमा। यह देख उन्हों का स्मारक है।) ५१ (१४१) उसी स्थान के द्वितीय मण्डप में प्रथम स्तम्भ पर (शक सं० १०४१) (पूर्यमुम्म) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामेघलादने । जीयात्यलोक्यनाथस्य शामनं जिनशामन ॥ १॥ सकल-जन-विनृतं चार योध-त्रिनेत्रं सुकरकविनिवासं भारतीनृत्यरन । प्रकटितनिजातिदियकान्तामनोज सकलगुणगयेन्नं श्रीमभाचन्द्रदेव ॥ २॥ प्रवर गुहनेन्तप्पनेन्द॥ म्वस्ति समसभुवनजनवन्धमानभगदईहरगिन्धि- गन्धोदककणव्यवमुक्तावलीताप्राईस सुजनमनःकमलिनी- राजहंस महाप्रचणदण्डनायक। समयदायक। पविहित जिनवचनचन्द्रिकाचकोरनुमाप श्रीमतु बनदेवदनानने चन्द्रगिरि पर्वत पर के गिलास प्रकारन् । एकाङ्गवीर । सवामरान । साहममान । मुनिक विनयजनबुधजनमनस्तरोवरराजहमननूनदानामिनवयास । जिनमतानुप्रेचा विचन । कृतधर्मना । दयारसमरिवार। नंगई। पनर मुन्निन पुण्यदोन्दोदविनि भाग्यके पकाोर्ड चलदि नेत्रदिनापिनि गुणदिनादाक्षाय दे धदि । ललनाचिनहरीपचारविधियि गाभादि साम्यदि चादव ममानमःपरोलर मनन्यदण्डाधिप । ३ ॥ वनस्वदण्डनायक- नमध्यभुजवलपगम मनुचरित जननिधियोष्टधात्री- तनदालु ममना मन्यिचूडामपियानु मा महानुभावनाङ्गलादमयन्त पनन्द मनियम नापंड सिनियाल मौभाग्यवतियनुनतमानय पनिनिय गुणवान मनतंकीनिंपुर गाधिका मानन प्रहमा सपुर सनिनम पागमयमा.. भरिभरागदावि रिक्षा नागपत गिायन ।

चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिलालेख ३ (पश्चिम मुख) प्रवरोलगे। दोरेयारी भुवनङ्गलोलु दिटकं केलु मम्यक्त्वदोल सत्यदोल परमश्रोजिनपजेयोनु विनयदोल सौजन्यदोलु पेम्पिनालु । परमोरसादे मापदानदेडेयोलु सौचत्रताचारदालु निरुतं नार्प हे नागदेवने वलं धन्यं पेरन्यरे ॥ ७ ॥ अन्तनिप नागदेवन कान्ते मनारमयसकलगुणगणेधरणी--- कान्तगवधिकं नाप कोन्तिय दारयनिसि नागियक नेगरर्दल ॥८॥ अन्तरियर तनयं मन्ततमपिनाकियालगे जसवेसेविनेगे। चिन्तितवस्तुवनीयल चिन्तामणिकामधेनुरेनिपं यल्ल ।। एन्वन्तु नार्पट गुण- यन्त कलि मुरिदयापरं सत्यविदं । भ्रान्ते नेनुतं पुधर- श्रान्तं कीर्तिपुदु धात्रियोल यष्टयनं ॥१०॥ मातननुमाते भुवन- ख्यातियनेरे कादि दानगुणदुप्रतिथि । सीतादेविगवधिक भूतलदोडगेचियानेनेमेषदराय ।। ११ ।।

चन्द्रागिरि पर्वत पर रिजाल भाजगजननि योहिदं ।। भारिसिपश्चपरङ्गल- नोवदे परिदिनि मोहपासद तोहरं । देश-गुरु-मनिपानद- लागिण पलदेवनमरगनिय पडे ॥१२॥ सकर १०४१नेय गिद्वार्थि यसरद मार्गचिर. गुद्धपाठिप मामगरदन्दु मारिशरेय तीदास गन्यरानी. शियि मुडिषिः॥ पातन जननि नागिय पचियकनु परोविनयके . 'पुनाहान भोमानिगेप एनलमहमानेय माडिमि सम्म गुरुगन प्रभापमितान्त-देवर काल कनिधारा माडिको पायरेगुम मा करेग मूषण देशयनु भण्डग पेरणे ॥ इपोग feet Rigrati. Fiftanteam पापी माना पार भागमी मी मत १० पाटा (पापनाzय) मा बम .fमीन वानमा mafrat Eknary.4 पामीsutra rati amarriaगावर धAttare गरी ut Eि TI II मी म TRA feart an. +ron... ofantri Mir Int NITn का fur-fm. from में प्रमा पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख लेस में यह सम्बत् सिदाधि सम्बसर कहा गया है पर मिलान करने से विशारी और श..सिदार्थों पाया जाता है। क्षेत में सम्पत् की भून। ५२(१४२) उसी मण्डप में द्वितीय स्तम्भ पर (शक सं०१०४१) ( पूर्वमुर) श्रीमत्परमगम्भीर-स्थाद्धादामोघलान्छन । जीयालोक्यनाथस्य शासनं जिनशामने ॥१॥ म्वन्त्यनवरतप्रयलरिपुबलविषसमरावनीमहामहारिसंहारक- रगकारपप्रचण्डदण्डनायकमुखदर्पणकर्णेजपकुभृत्कुलिश जिन- धर्मदयमाणिक्यकलश मलयजमिलिवकास्मीरकालागरुधूपधूम- ध्यामलीकवजिनानागार । निर्विकार मदनमनोहराकार । जिनगन्धोदकपवित्रीकृतोचमान वीरलक्ष्मीभुजङ्गनाहाराभयभैष. ज्यशास्त्रदानविनोद जिनधर्मकथाकथनप्रमोदनुमाप श्रीमतुपल- देवदण्डनायकने गर्द। धिरने बाप्पमराद्रिविन्दवधिक गम्भीरने पाप्पु मा. गरदिन्दगालमेन्तु दानिये सुरानिक मारण्डलम् । सुरराजणे येन्दु कीर्तिपुदुकयकोण्हरि सन्तत घरयलंयलदेवमात्यननिलालोककविख्यातनं ॥२॥ पलदेव दण्डनायक- ननाध्यमुनवलपराक्रम मनुपरितं । - पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिवलिंग जलनिधिोधिनधानी- तलदोलु ममनारो मन्त्रिमूडामणियानु ॥ ३ ॥ पलर मुनिन पुण्यदान्दोदविनिमाग्यवादा पादि तेजदिनाल्पिनि गुणदिनादादादिधति। ललनाचित्तहरीपचार विधियिं गाम्मी-यदि सौर्यदि यजदेवा समानमप्परोलर मत्तन्यदण्डाधिपः ॥ ४ ॥ मा यत्नदेवा मृग- शावेचणेयनिप याचिकव्ये गवसिलो- वीबन्धु पुट्टिदं गुण- लोवरनदटनेव मिलिमय्यनुदारं ॥५॥ जिनधर्माम्बरतिग्मरीचिसुचरित्रं भव्यवंशोत्तम सिष्टिनिधानं मन्त्रिचूड़ामणि बुधविनुतं गौववंशाम्बराक । वनिताचित्तप्रिय निर्मलननुपमनत्युत्तमं कूरे कूप विनयाम्भोराशि विद्यानिधिगुणनिलयं धात्रियाल्मिणि- मयं ॥ ६॥ (पश्चिममुख) जिनपदभक्तनिष्टजनवत्सलनाश्रितकल्पभूरुदं मुनिचरणाम्युजातयुगभृङ्गनुदारननूनदानि म- त्तिन पुरुषग्गे पोलिपुददार्दोरेयम्बिनेगं नेगईनी- मनुजनिधाननेन्दु पागल्गुं धरे पेगडे सिड्निमय्यन ॥७॥ एने नेगल्द सिङ्गिमय्यन वनिते मनोरधन लक्ष्मियेनिपल रूपि ।

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख जनविनुते गिरिय देविय- मनुनयदि पागदविल भूगस्त वेध ॥८॥ वपन ।। मा महानुभावनयमानकामदालु ॥ परमश्री जिनरापराहम ममिपिं तादि नि- मादि पञ्चपलं मनेगु दुग्महिमादोहर्म । स्वरितं स्पण्विं ममाधिविधियि मध्यामितीमार निमत परे सिनिमय्यनमग्न्द्रामाराम पादिदं ॥२॥ बस्ति मधिगतपचमहाकम्यागार महापातिदायमाnि. दविरायविराजमान-मगरदईल्पामेघर-परमभक-पुष्पकमक. विनिर्गतमदगदादिषानुवरूपानासादिक शाबपारावारगपरमपरनिनामाप श्रीगामाचार्य प्रभापद्रगिमात्तबर गुप्त मागिय पिरियध्ययुगमा १०४१ नेय सिमा कातिक गुराग सामरा. एपन्दु महापाटिनिशिधिय निरिसितम् ।। [ RANषा, कीसिया र उमा MRAPrata TRI धर्मपती बापुर FARMIRan गुणकारी पाशविर NAM समाधिमा म RIRAL LIRIT रिपरिकार मि. ..ति.धिमा Resfaste.t LAT--astinianaamsutra • 1.ANIMAR चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख ५३ (१४३) उसी मंडप में तृतीय स्तम्भ पर- (शक सं०१०५०) ( पूर्वमुख) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामोघलान्छनम् । जीयात्रैलोक्यनाथस्य शामनं जिनशासनम् ।। १ ॥ श्रीमद् यादववंशमण्डनमणिःसोयीशरसामणि- लक्ष्मीहारमणिः नरेश्वरशिरःप्रोत्तुशुम्मन्मणिः । जीयानोतिपधेतदर्पणमणिः लोकैकचूडामणि श्रीविष्णुविनयार्चितो गुणमणिः सम्यक्तचूडामयिः ॥२॥ एरंदमनुजङ्ग सुर-भू- मिरुदं शरणेन्दवङ्ग कुलिशागारं । परवनितेगनिलतमयं। धुरदालु पाणर्दा मृत्तु विनेयादित्यं ॥ ३ ॥ एने तानु फेरे देगुलङ्गले नितान जैनगंहङ्गाल- न्तनेतुं नालनगर्णलं प्रजेगलं सन्तापदि मादिदं । विनयादित्यपालपायसलने सन्दिा पलिन्द्रों मे- लेने पं पागल्वननायनी महागम्भीरन धौरन ।।४।। पहिगंगेन्दगल्द कुलिगल्यादयु कल्लुगं गाड पेर बंदु परावलो मरियादवु सुखद भण्ठि मन्द चन्द्रगिरि पर्वत पर शिक्षामन महेयं परमादुवेने माहिमिदं जिनराममं मेहने पोयमनं मनेने पति पराम्र्मनं राजगजन ॥ ५ ॥ कन्दं ।। मा पायमल भूगों म- दीपान कुमारनिकरपहार । भोपनि-निग-मुज-विजय-ग- दीपति जनियिमिदनदटनीयाप ॥९॥ वृत्त ।। पिनपादित्यपालनारमनिलालीकाकापदुर्ग गनुमा गर्दक धोरमेरेयाना- सगणु रिपुगिपाल कगदागमन विष्णुप- टुन भूपं गवं पायदान भाटव ॥॥ कन्दं । भामंगल्या गपा- हरिमर्दन मलमरि- श्री माधर्मि जनता- भानुगुतं विएपनुष्य गंय॥८॥ प्ररिनासिराम्फालम- कानुसतवरिपपागद- दमा निमारबा- भाभी विधि बनी रह भामधिगपचमशर RRENT Indigenी। पारस शाम्बरपति! मन. मयि | Rane | पापा । पारिरिव । कारण HERE' सपना जय । गन्द्रगिरि पगा शिवाय निजगन्याभ्युदयकरणका प्रविनयनराममनगिधक । घोर यनदायानगर । प्रदितमण्डलिकालानन । तोरड. मण्डनिकमण्डलदानिज । प्रबनरिपुपममहरणकारय । विद्विष्टमण्डलिकमदनियागकरण । नौलम्बादिगोण्ड। प्रतिपक्षनरपानरनिमयनिष निगा । तप्प तपुर । श्रीकान्तेयनपुर। फरफूपं मौर्यमं नार्प। वीराङ्गना- लिङ्गितदविणोदंण्ड । नुडियन्ते गण्ड । प्रदियमनहृदय. शूल । पोराङ्गनालिशित लोल । उद्धताराविक वनकचर। मरयागतवार | महजकीर्तिध्वज । मद्रामविजयघज । चेगिरेय मनोभङ्ग । वीरप्रमङ्ग नरसिङ्गवर्मनिम्मूलन। कत- पालकालानलं । हानुनलु ाण्ड। चतुर्मुख गण्ड। चतुरचतु- र्मुखन् । प्राइवषण्मुम्ब । मरस्वतीकवतंमन् । उन्नतविष्णुवंम । रिपुहृदयसे । भीतरंकोच । दानविनोद । चम्पकामाद । चतुस्समयसमुद्धरण। गण्डराभरण । विवेकनारायण । वीरपारा. यण । साहित्यविद्याधर | समरधुरन्धर । पोयसलान्वयभानु । कविजनकामधेनु । कलियुगपार्य । दुष्टार्गेधूर्त । सद्रामराम साहसभीम। इयवत्सराज। कान्तामनोज । मत्तगजभगदत्तन् । अभिनवचारुदत्त । नीलगिरिसमुद्धरण | गण्डराभरण । कोङ्ग- रमारि। रिपुकुलननप्रहारि । तेरेयुरनलेव । कोयतुरतुलिव । हेब्जेरुदिसापट्ट । मनामजत्तजट्ट । पाण्ड्यनवेड्कोण्ड । उद्दि गोण्ड । एकाङ्गवीर। सनामधार । पोम्युञ्चनिर्द्धाटण । साविमल निलोटण । वैरिकालानलन् । प्रहिवदावानल । शत्रुनरपाल- - ।

- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलारस दिशाप मिशनरपालललाटपट । पवनलिव । सुलुवर सेलेय । गोयिन्दवाडिभयङ्करन् । प्रहितबलसर । दवतु- लिव । सितगरं पिडिव । रायरायपुरसूरेकार। वैरिभङ्गार । वीरनारायण। सौर्यपारायण। श्रीमतुकेशवदेवपादाराधक । रिपुमण्डलिकसापकाद्यनेकनामावलीसमालकृतनु गिरिदुर्ग- वनदुर्गजलदुर्गाधनेकदुर्गङ्गलनश्रमदि काण्ड पण्डप्रतापदिं गङ्गवाडिवोम्भत्तर-सासिरमुमं लोकिगुण्डिवर मुण्डिगे माध्य. म्माडि । मत्तं ॥ वृस-एलेयोलद्रुष्टर नुवारिगल नाटन्दोसि भकोण्डदो- शदि देशमनावगं वनगे माध्य माडिरलु गङ्गम- ण्डलमेन्दोनंगे सेतु मित्त पेसन पूण्दिर्पिन विष्णु पा- यसलनिर्द सुखदिन्दे राज्यदादविन्दं सन्तोत्साहदि॥१०॥ एसिद नेत्तजस्तलिदिराद-नृपालकरल्कि बल्कि क- डित्तु समस्लवस्तुगलनालुवनममलेपुण्दु सन्तत मुत्तलुमालगिप्पाने मुभिनवर्गमनकरादव- गर्गतजगं पोगतेंगेने पण्ािपनावनो विष्णुभूपनं ।। ११॥ मन्तु त्रिभुवनमन्त सनकाहुगोण्ड भुजबलवीरगन विष्णु- बर्द्धन पायसहदेवर विजयराभ्यमुत्तरोत्तराभिवृद्धिप्रवर्द्धमानमा. चन्द्राईतारं परं सलुत्तमिरं सत्पादपनोपजीवि पिरियरसि पट्ट. महादेवि मान्तलदेवी।। (दसिपमुख) म्यम्त्यनवरतपरमकल्याणाभ्युदयसम्रफलभोगभागिनि उत्तसपनि चन्द्रगिरि पर्वत परके शिलालेख द्वितीयलक्ष्मीलचममानेयु । मकलगुणगणान्नेयुं । प्रति रगुमिग्रीदेवियुं । पतिहितमसमावेयु। विवेकानिji प्रत्युत्पन्नाचस्पतियुं। मुनिजनपिनेयमनविनीवेयुं । पतुम्समा ममुदरगयु । मतगुणशीलपारिवान्तःकराये । सं विरज्यातेयुं । पतिग्रवाप्रभारप्रसिद्धसोतेयुं । सकजानित चिन्तामणियुं । मम्यक्तचूडामयियुं । पारणे। पुण्योपार्जनकरणकारणेयं । मनोमरामविशेयरपारे। निकलाभ्युश्यदोपिकेयुं । गीतवाचसूत्रधारेयुं । जिनसमरण निराप्राकारेयं । जिनधर्मकथाकथनप्रमोदेयु । प्रादारामार- शानदानविनादेयं । जिनधर्मनिर्मले । भव्य मनगा। जिनगन्धोदकपवित्रोकतोत्तमायुमप ॥ ॥मा नगई विगुनपन म- नोनयन प्रियं पनामनीशाजकिच- द्रानने कामन रनिय यु नाने नागरिमामाने शान्तदेवी ।। १२॥ पुष । पुरानु शिना मियोपो गरम परमानन्मदिनानु नियमित पाने गरासि। परमिनियन गदिमानव कीर्तिमानुनिjt धांगाय मानविय नरय मhिut Ans- आwिafrम मेशिने - ३ - -- पद्रगिरि पर्वत पर गिलान महाविय माभाग्यम- नंग गणित मुनग्यपि ॥ १४ ॥ गावाजदेविगे महाप- मग मौमाग्यभाग्यवतिगपश्री- कायमगजगरगुन-- कानपेयमदुनिद गलियोपं ॥१४॥ पहा ॥ गुदगल प्रयापद्रनिदानदया पंगना gerfe भि बियपंग गाष्ट्रिय न मा tir trgan | मार सिंगापं पास लिनमान furan umla thafvenger सयप २०५० TRufnaam cerest भगवान् विपासास gfety mimmy पलिका मनापतिबन्दि माRE - rufenstruujefauzita triwulu**** + MजनातYRILE MEनिर- InHA.Pune Nirurture ..। ule unfrgaon.m...... PRETRITINir writer | Angwww tarNTERE mami Teet RE !

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
फन्द ।। अनुपम शान्तल देवियु-
मनुनयदि वन्दे मारसिङ्गय्यनुमि-
बिने जननि-माचिकब्बेयु-
मिनिबरु मोहनोडने मुडिपि स्वार्गतरादरु ॥१६॥
लेखक बोकिमय्य।
(पश्चिममुख)
अरसि सुरगतियनेयदिद-
लिरलागेनगेन्दु बन्दु येलुगोलदल दु-
चर-सन्यासनदि [ न्दं]
परिणते तायि माचिकचे वार्नु तोरेदलु ॥ २० ॥
घृत्त । भरेमगुल्दिर्दकण्मलालोदुव पश्चपदं जिनेन्द्रनं
स्मरियिसुवोजे यन्धुजनमं विडिपुग्नति सन्यसकत्र
न्दिरलो सेशन्दुतिगलपवासदोलिम्पिनेमाचिकम्ये तो
सुरगतिगेय दिदलु सकलभव्यरमनिधियोलुसमाधियि ॥२१॥
कन्द ।। प्रा मारसिङ्ग मय्यन
कामिनिजिनपरणभक्ते गुणसंयुन छ-
राम-पविग्रने एन्दी-
भूमिजन पागले माचिकल्ये नेगल्दल ॥ २२ ॥
जिनपदभक्त बन्धुजनपूजितेयाश्रितकामधेनुका-
मन मविगं महासनिगुणाथि दानविनोदे मात ।
मुनिमनपादपङ्कमहभक्त जनानुन मारसिङ्गमा
ग्यन सति माचिकर यने कीर्ति सुगंधर मंमिनिष ॥२३॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख जिननाघं तमगातनागे पलदेवं धन्दे पंतव्ये म- द्वनिताप्रेसरे पाचिकच्चे येने सम्मं सिङ्गणं सन्दमान्-- सनदिन्दग्गद माथिकव्ये सुर-लोकचोदलेन्देन्दुमे-- दिनियेल्लं पागलुत्तमिप्पु देने यक्षिणप्पण्णनेवपिं ॥२४॥ कन्द ।। पेण्डिर्मन्यासन गाण्डवरालगिनियाराम्पिन - कोरबागलुघोरवीरमतपरिणतेयं मयि सन्तोपदिन्दं । पाण्डित्यं चित्तदालु तल्तिरे जिनधरणाम्भोगमं भाविगुत्त कोण्हाहलुधावितन्न मुरगतियटेदमुलीलपि माचिकणे ॥२५॥ पानमननूनमं कः कमा पेन्दु कोह.जिनने मनदोलु । ध्यानिमुसं मुलिपिदलि- मम्युदो माचिकम्येयोन्दुतियं ॥२६॥ इन्तु परम गुरुगलु प्रभाचन्द्रसिद्धाम्सदेवरं बर्द्धमानयर रविचन्द्रदेवरं गमलमप्यजनगल गमिधिया राज्यसनमें कैकोडवर पेल्व समाधिय नुत मुद्धिपिदल पण्डितमरयदिनी भू- मादोलु माधिकरयन्तोला- कोणिन्तु नेगदसरिगल- राण्डितम धोर-धीर-सन्दासनम ॥९॥ प्रपर शावतारमेम्नेन्द। कन्द ।। मिनधर्मनिम्मलभ- व्य-निभाने गुददाम भनुपरिवं। - - चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख मुनिचरण-फमल-भृङ्ग जन-विनुतं नागवर्मदण्डाधीशं ।। २८॥ वृत्त ।। अनुपम-नागवर्मनकुलाङ्गने पेम्पिन चन्दिकब्बे स-- जननुते मानिदानिगुणिमिकपतिव्रते सीलदिन्दे मे--- दिनिसुतेगं मिगिलुपोगलानरिये गुपदकार्वियं जिनपदभक्तेयं भुवनसंस्तुतेयं जगदेकदानियं ॥२८॥ प्रवर्गगें मुपुत्रं बुधजन- निवइकार्तीव कामधेनु वेनुत्तं । भुवनजनं पोगतलु मि- कानुदयं गेयदनुत्तमं बलदेव ॥३०॥ वृत्त ।। सकलकलाश्रयं गुणगणाभरणं प्रभु पण्ठिताश्रयं सुकविजनस्तुतं जिनपदाजभृङ्गननूनदानिली- किकपरमार्यमेम्बेरडुमन्नेरे बचनेनुत्ते दण्डना- यक यलदेवनं पागल्वुदम्युधि-वेष्टित-भूरि-भूतलं ॥३१॥ मुनिनिगहफे भव्यनिकरके जिनेश्वर-पूजेगलो मि- फनुपमदानधर्मदोदविङ्ग निरन्तरमोन्दे मागदि । मनेयोलनाकुलं मदुवेयन्दद पाङ्गिनोलुष्युदेन्दडिं मनुजनिधाननं पागल्वने योगस्वं यलदेवमाय॑न ॥२२॥ स्थिरने मेरु-गिरीन्द्रदिन्दे मिगिले गम्भीरने याप्पु मा. गरदिन्दगल मेन्तु दानिये सुराजाजयोमेलु भागिये। . सुरराम पे येन्दु कीर्तिपुदु कप कोण्डकरि सम्ता घरेयाल श्रीषदेवमास्यननिहालोकै कविल्यातन ॥३शा - - - । चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख कन्द ।। बलदेय-दण्डनायक- मलइध्य-भुजबल-पराक्रम मनुपरितं । जलनिधिवेष्टितधात्री- वलदोलु समनारो मन्त्रिचूडामणियोल ॥३४॥ श्रीमत् पारुकीर्तिदेवर गुइ लेखकयोकिमप्य घरद विरुदरूवारि-मुखतिलक गङ्गापारिय सम्म कावाचारि कण्डरिसिद।। (उत्सर मुख) स्वन्त्यनवरतप्रवलरिपुबलविषमसमरावनिमहामहारिसदार- करणकारय । प्रचण्डदण्डनायकमुखदर्पण । फरकमागध- पुण्यपाठककविगमकिवादिवाग्मिजनवादारिटसन्तर्पण । जिन- समयमदागगनशोभाकरदिवाकर | सकलमुनिजननिरन्तरदान. गुणाश्रय श्रेयांस । सरस्वनीकण्णावतंस । गोत्रपवित्र । पराङ्ग- नापुत्र । पन्धुजनमनारचन । दुरितप्रभजन । क्रोधलोभानृत- भयमानमदविदूर। गुचवारदत्तजीमूतवाहनममानपरोपका- रोदार। पापविदूर। जिनधर्मनिर्मल । जिनगन्धोदकपवित्रोफतातमाङ्गन् । अनुपमगुग्णगणेतुन । मुनिचरणसरसिर । पण्डिवमण्डलोपुण्डरीकवनप्रसङ्ग । जिनधर्मधाकथनप्रमोदन। प्रादाराभयभैषम्यशास्त्रदानविना- दनुमप्प श्रीमत् बलदेव दण्डनायकनेने नेगल्द ।। मा पनदेव मृग- शावेषणे यनिप पाचिकम्येगव सिली- बिन्धु पुहिद गुषि- । भव्यजनबत्मल।

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख लोपरनाटय सिङ्गिमम्गनुदारं ॥३५॥ वृत्त ॥ जिनपतिमानिष्टमनसत्सलनावितकल्प मुनिपरणायुमारायुगानुशारननूनदानि म- सिन पुरुषार्ग पोजिसुहारियेम्पिने मेगस्दनी. मनुग निधाननेन्दु पोगरगं धरे पेग्गडे सिङ्गिमम्पन । गिनमामीम्परतिग्गगि सुपरि गम्यांशतगंसि- एनिधान मन्त्रिचिन्तामपि पुरिगुतं गोत्र गायरा । पनिसानिप्रिय निर्मशानुपमगरगुत्तमं कर कूर्ण रिगयाम्भोगशि विधानिधि गुणनित पारियोगिfferin । कन्न ।। श्रीयादी गुणामधि- गौ गुगदार नानाधिनतामपि गू- वीप कामीदेविय दोगन गिनिमगन बार ३॥ मानवामगाणा मनमानागभामिनि statममा सकतनामाने मनिममनि-fir निमतामाnिant रामयिमनमHिIT HIMARAT सामना मा भीमागुवन atthfranfirit मर गाणtfarastramkritam farew Rifeffortal frient *निक मारनपूर्म Meri . पन्द्रगिरि पर्वत परके शिक्षास मयरयकु कोलगाय सेण्टगुमं नाबगद्यापपाननिकि कहिसि पारगिल विनमनामुम श्रीमद्विपावर्द्धन पारसलदेवरं पेडि. कोण्डु सफवर्ष साविरद नास्वत्तयदेनेय शोभफुरसम्वत्सरद त्रशुद्धपहिवदम्पतिगरदन्दु सम्म गुरुगल श्रीमूलसड्यद देशियगपद पास्त गन्द प्रोमन्मेघवन्दवविद्यदेवरशिष्यरप्प प्रभाचन्द्रसिदान्तदेवों पादप्रशान्तन माहि सवाघापरिहार- पागि विदन्ति ।। वृत्त ।। प्रियदिन्दिन्तिदनेय दे काव पुरुषार्गायुं महाश्रीयुम- हे.यि कायदे कारख पापिगे कुरक्षेत्रोबियालु वाणरा. सियोलेरकोटिमुनीन्दरं कवितेयं वेदाध्या कोन्दुदो- न्दयशं मार्गुमिदेन्दु सारिदपुवी शैलातरं मन्ततं ॥३॥ श्लोक ।। यदत्तो परदत्ता वा यो रवि वसुन्धरा । पयिषसहस्रायि विष्टायां जायते कृमिः ॥४०॥ [यह लेख तीन भागों में विभक है । मादि से उसीप पच सक इसमें द्वारावती के यादव वंशीय पारसल नरेश विनपादित्य घ उनके पुत्र और उसराधिधारी एरेयान व उनके पुत्र और उत्तराधिकारी विष्णु- बईन का पर्यान है। विरगुवन बड़ा प्रतापी नोरा हुचा। इसने अनेक माण्डलिक राजामों को जीतकर अपना राज्य-विस्टार बढ़ाया। इसकी पटरानी शान्तलदेवी जैनधर्मावलम्धिनी, धर्मपरायणा चार प्रमा- चन्द्र सिदान्तदेव की शिष्या थी। इसने शक सं० १.१. चैत्र मुदि ५ सोमवार को शिवग मामक स्थान पर शरीर त्याग किया। शान्तलदेवी के पिता का नाम मारसिहाय्य और माना नाम मानिकर या। इन्होंने शान्तरदेवी के पश्चात् शरीरस्याग किया।

. व्रत चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस लेख के दूसरे भाग में, जो पप २० से ३५ तक जाता है, शान्तर देवी की माता मापिकायेका देवगोल में माकर एक मास के मन पश्चात् सन्यास विधि से देहत्याग करने का वर्णन है और पार इसके कुल का वर्णन है। दणामीरा नायर्म और नही भाई सन्निपारे पुत्र प्रतापी बलदेव दाभाय और उनकी भायो बाधित करने से ही मापिकाने की उत्पत्ति हुई थी। माविका ने अपने गुरु प्रभाग्य मिशतव, पधमानष पार विम्यदेव की सादी से मैग्यास प्रहण किया था। क्षेत्र के प्रतिम भाग में पलदेव बनाया और नो पुष सिनिमय ही प्रशस्ति पत्रात् शान्तजदेवी द्वारा सवति गम्यारण माम जिन मामा निर्माण कराये जाने और पी भाभी अति विपन नरेश की अनुमति से कय भूमि मरे जाने का है। यह राम गुरमेय, रशिप गण, पुस्तक ঘক্ষ পিয়া বিত্ত artণ বয়স যা যা [मार-मच में श... विधिten मोनित गणमारे अनुपात...... निगरिमिता पागेाग (२४) शE ... Star Aमर । राम शहर (महत) मन में गिना at fifari भार (Tran) पynt)

बादामपत पर निशाना
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पाना पतिक नाम पर
(2.10.0
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(मामुप)
श्रीपाप-परिम-श्री-गुणा--
भागधास-mi-i-f. कारं मरम।
armera-र्म-वादि रिपुन मीरमाना mat
मध्य-पर-परमाणु श्रीवर्टमाना गिनः॥१॥
जीपादरमपुतन्द्रभूतिविदिवाभिल्यो गदी गोम-
ज्यामी समर्षिभिखिजगीमाराय-पापा: ।
पदोधायुधिमेय धीरदिमपरकृतीकण्टापुधा-
भादाला मुका पुनावि पनपाइन्द-मन्दाकिनी ॥२॥
सीप-दानभवायरमन-पिसम्प-योप-पपुर.
तरहीन्दाः।
निभिन्दना विपुध-वृन्द द-शिरोभिवन्दारहाचः कुलियतः
कुमणादिमुद्राः ॥३॥
बन्यः कथन्नु मदिमा भव भद्रपाहो.
मोनि-मन-मद-मनचाहीः ।
परिछप्यतामसुन म चन्द्रगुप्त-
रएषप्यनेम्म मुचिरं वन-देवताभिः ॥ ४॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख वन्द्योविभु वि न कैरिह कोण्डकुन्दः कुन्द-प्रभा-प्रणयि-कीर्ति-विभूषिताशः । यश्चारु-धारण-कराम्बुमचचरीक- श्रुतस्प भरते प्रयत प्रतिष्ठाम् ।। ५ ।। यन्योभस्मक भस्म-मारकृति-पटु. पगारती-देवता- दसोदात्त-पदस्थ मन्त्र-वधन-व्याहत चन्द्रप्रभः । पापार्यस्स समन्तभद्रगणभुगने काने कला जैन धर्म ममन्तभद्रमभव मगन्तानमुप्तः ॥६॥ पूर्णि ॥ पायनिया वादारम्भसंरम्भरिज़म्भितामिभ्यतया रसायः॥ वृत्त ।। पूर्ण पाटलिपुत्र-मध्य-नगरे मेरी मया ताड़िता प्रधान्माला-गिन्धु-ठा-विषये कालोपुरे गदिशे। प्रा करहाटा पशु-भर्ट निगोर सादं भावार्थी पिपराम्यनारगने शान-निकोधित ॥७॥ साद-गदमटविझदिति पटगदु-बापादमिशिदा । याविति मगन्तभद्र गिति र गमि भूग बाणा ग्य||ch पानी मानि-मसिगना-मावती-न- प्पानामिः पागा भग प्रगामी धाभ्याति पमिहर्नान्द गनिमा म mar. भाभाराडा-मागमाजरिधानापियो पा.."

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
वक्रग्रीव-महामुने-देश-शत-पोवोऽप्यहीन्द्रो यथा-
जातं स्तोतुमलं बचावन्नमसी किं भान-वाग्मि-प्रज।
योऽसौ शामन-देववा-बहुमतो हो-वक्त्र-वादि-मह-
प्रोवोऽस्मिन्नध-शब्द-वाच्यमवदद्मामान्ममासेन पट्॥१०
नवस्तोत्रं तत्र प्रसरति कवीन्द्राः कथमपि
प्रयामं वादी रचयत परन्नन्दिनि मुना।
नवस्तोत्रं येन व्यरचि सकलाईप्रवचन-
प्रपध्यान्तर्भाव-प्रवय-वर-मन्दर्भ सुभगं ॥ ११ ॥
महिमा म पाधकेसरिगुरोः परं भवति यस्य भझ्यासीत
पद्माववी सहाया विलक्षण-कदयनं क ॥ १२ ॥
मुमति-देयममुं स्तुतयेन घरसुमति-सप्तकमालतया ।
परिहतापय-तत्व-पधायिनामुमति कोटि-विवर्तिभवार्ति
उदत्य सम्यग्दिशि दक्षिणस्या कुमारसेनो निरस्तमापन :
तत्रैवचित्र जगदक-मानास्तिष्ठत्यसौ तस्य तथा प्रकाराः॥१४
धर्मार्थकामपरिनिय विधारगिन्तचिन्तामधि:प्रतिनिकेवम
कारियन
म म्नूयते मरमसौख्यभुजा-सुभातचिन्तामणि निवृष
न कथं जनन ।
मूडामयिः कवीनां पूडामवि-माम-सेव्य-काध्य-कविः ।
श्रीपर्दुदेव एव हिदपुण्यः कीतिमा ॥१६॥

. १०४ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख चूर्णि ॥ य एवमुपश्लोकितो दण्डिना ।। जोः कन्यां जदामेश यभार परमेश्वरः । श्रीवर्द्धदेव सन्धत्से जिद्दार सरस्वतीं ॥१५॥ पुपास्त्रस्य जयो गणस्स परयम्भूभृच्छिखा-घरनं पद्भ्यामस्तु महेश्वरस्तदपिन प्राप्तुं तुलामीश्वरः । यस्यारुण्ड-कलावतोऽष्ट-विलसदिक्पाल-मानि-रसजन-- कोत्ति स्वस्सरिता महेश्वर इव स्तुत्य स्स फैरस्यान्मुनिः ॥ १८॥ यम्मप्तति-महान्यादान जिगायान्यानयामिवान् । प्रारसोऽर्चितस्मोऽर्यो महेश्वर-मुनीश्वरः ॥१६॥ तारा येन विनिर्जिता पट-कुटी गूढाश्वारा मर्म पोद्धर्यो धृत-पीठ-पीडित-कुटादेवात्त-सेवासनिः । प्रायश्चित्तमिवामि-यारिज-रज-नान प पस्यापरण दोषणा मुगतस्म कम्य विषयो देवाकलकती ॥२०॥ चूणिं ॥ यायेदमात्मनानन्य-गामान्य-निरपध-विधा-निमो. वनमार्णने।। राजन्मादमा मन्ति यायः शेतातपत्रा गुपाः किन्तुलगा विजयिनम्म्यागोमता दुभाः । लालमन्ति युवा नगलिया वादासरावामिनी नाना-गानीवारपातुरधियः काजी मदिपाः ॥२१॥ नमा मनिपेश मनधारिया ॥ 1 चन्द्रगिरि पर्षद परके शिलालेस १०५ (पूर्वमुम) राजन्मवारि-दर्प-प्रविदलन-पटुरत्वं यघात्र प्रसिद्ध- सहयातोहमस्या भुवि निसिल-मदासाटन: पतिताना। नांदेपोऽदमते तव सदसि सदा सन्ति सन्तो महान्तो वयम्यास्ति शक्ति:म वदतु विदिवाशेष-शास्त्रो यदि स्यात् ।। ॥२२॥ माइकार-वशीकृतेन मनमान पिया केवलं नराम्यं प्रतिपय नश्यति अने कारुण्य-युद्धरा मया। राज्ञः श्रीहिमशीतलस्य मदसि प्रायो विदग्धात्मनी मोद्वौपान्सकलान्विजित्य सुगतः पादेन विस्फोटियः ॥२३॥ मोपुप्पसेन-मुनिरेव पदम्महिम्ना देवस्स यस्य ममभूत्म भवान्सघर्मा । श्रीविभ्रमस्य भवनमनु पामेव पुष्पेषुमित्रमिद यस्य सहस्रधामा ॥२४।। यिमलचन्द्र-मुनीन्द्र गुरोर्गुरु प्रशमिताखिल षादिमदंपदं। पदि पचावयत पण्डितैमनुतदान्ववदिष्यववाग्विभोः ॥ २५ ॥ पूर्थि ॥ क्याहि । यस्यायमापादित-परषादि-हृदय-शोकः पना- लम्बन-शोकः ॥ पत्रं शत्रु-मपरीर-भवनाद्वारे सदा सश्चरन- नाना-राज-करीन्द्र-वृन्द-सुरग-प्रावाकुले स्थापितम् । गवान्पायुपतास्तथागतसुवाकापालिकान्कापिला- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख नुद्दिश्योंद्धत चैतमा विमलचन्द्राशाम्बरेशादारान् ॥२६॥ दुरित-प्रह-निमहाद्भयं यदि भो भूरि-नरेन्द्र-वन्दितम् । ननु तेन हि भत्र्यदेहिनो भजतश्श्रोमुनिमिन्द्रनन्दिनम् ॥२७॥ घट-याद-घटा-कोटि-कोविदः कोविदा प्रवाक् । परवादिमल्ल-देवो देव एव न संशयः ॥२८॥ घूर्णि ॥ येनेयमात्म-नामधेय-निरुक्तिरुक्तानाम पृष्टवन्न कृष्ण- राजं प्रति ॥ गृहीत-पक्षादितरः परस्स्यात्तद्वादिनस्ते परवादिनस्स्युः। तेषां हि मछः परवादिमल्लस्तन्नाममन्नाम वदन्तिसन्तः प्राचार्यवयों यतिरार्य्यदेवो राधान्त-कर्ता ध्रियता स मूनि । यस्वर्ग-यानोत्सव-सीनि कायोत्सर्गस्थितः कायमुदुत्मसर्ज ॥३०॥ श्रवण-कृत-तृणाऽसा संयमं ज्ञातु-कामैः शमन-विहित वेला-सुप्त-लुप्तावधानः । श्रुतिमरभसवृत्योन्मृग्य पिच्छेन शिश्ये किल मृदु-परिवृत्या दत्त-तकीटवर्मा ॥३१॥ विध यश्श्रुत-बिन्दुनारुरुधे भावं कुशामोयया युध्येवाति-महीयसा प्रवचसा घसं गणाधीश्वरैः। शिप्यान्प्रत्यनुकम्पया कशमतीनेदं युगीनान्मुगी-.

4. AA पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलारस १०७ स्तं वाचार्चव चन्द्रकीर्ति-गयिनं चन्द्राम-कीर्ति युधा' ॥३२॥ मद्धर्म-कर्म-प्रकृति प्रणामाद्यम्याप्र-कर्म-प्रकृति-प्रमोस । सनाम्नि फर्म-प्रकृतिभ्रमामा भट्टारर्फ एट-सान्त-पारम ॥ ३३॥ प्रपिम्य-धाग्व्यस्त-ममम्त-विद्यस्वैविध शब्देऽप्यनुमन्यमान । श्रीपालदेय. प्रविपासनीयम्मता यतन्तत्व-विवेचनीधीः ॥४॥ सार्य भीमतिसागरो गुरुरिक्षा-धम पकार स्पुर- ज्योति:-पीव-समर्पय:-प्रवितति. पूर्व प्रभूनारायः । यम्मा रि-परार-पावन-गुण-श्रीवर्धमानोल्लग- द्रयोत्पसिरिला-सानाधिप-शिरस्यनारफारिण्यभूत ।।३।। पत्राभियोक्तरि लघुद्ध घु-धाम-घाम-माम्यामा पभवत्यपि- भूति-भूमिः। पिचा-धनजय-पद विशददधाना जि.म १५ दिमा. गुनिहमसेनः ॥६॥ पूणिय ।। यस्यायमवनिपति-परिषदि निमद-मदी-निपात-भीति- दुस-सुगर्गद्य-पवारूद-प्रतिगादिलोक. प्रतिक्षालोक.।। सर व्याकरणे कृत-प्रमतया धीमत्तयाप्युटी मध्यायेषु मनीपिपु डितिमृताममं मया पया। पः कधिनतिरक्ति सम्य विदुषो वाग्मेव-भार ध्य पश्यमिति प्रददि मृप हमसेनं ॥३॥ .

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
हिवैपियां यस्य नृणामुदात्त-वाचा निबद्धा द्वित-रूप-सिद्धिः ।
वन्यो दयापाल-मुनिः स वाचा सिद्धस्सवाम्मूद्धनि यः
प्रभावः ॥ ३८॥
यस्य श्रीमतिसागरो गुरुरसी पञ्चधशश्चन्द्रसूः
श्रीमान्यस्य स वादिराज-गणभृत्स ब्रह्मचारी विमोः ।
एकोऽतीव कृती स एव दि दयापालनती यन्मन-
स्थास्तामन्य-परिग्रह-मह-कथा वे विप्र विग्रहः ॥३॥
त्रैलोक्य-दीपिका वाणी द्वाभ्यामेवोदगादिह ।
जिनराजत एकस्मादेकस्मा द्वादिराजतः ॥४०॥
मारुद्धाम्वरमिन्दु-बिम्ब-रचितीत्सुक्यं सदा यद्यश-
छत्रं वाक्यमरीज-राजि रुचयोऽभ्यर्ण च यस्कर्णयोः ।
सेव्यःसिंहसमचर्य-पीठ-विभवः सर्व-प्रवादि-प्रजा.
दत्तीच्चैर्जयकार-सार-महिमानीवादिराजोविदा ॥४१॥
चूर्ण्यि ॥ यदीय-गुण-गोचरोऽयं वचन-विलास-प्रसरः कयोना ।
-
नमोऽईते ॥
(दचियमुख)
श्रीमच्चालुक्य-चक्रेश्वर-जयकटके वाग्वधू-जन्म-भूमी
निष्काण्डण्डिण्डिमः पर्यटति पटु-रटो यादिराजस्य
जियोः।
अयु पदाद-दापों जहिहि गमकता गर्व भूमा जद्दाहि
घ्याहारेर्यों नहीदि स्फुट-गृदु-मधुर-श्रव्य-काध्यायपः
॥४२॥

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस
पावाले व्याज-राजो षसवि सुविदितं यस्य जिह्वा-सहसं
निर्गन्वा स्वर्गवासीन भवति धिपणो वनभृद्यस्यशिष्यः ।
जीवेवान्तावदेता निलय-यल-यशाद्वादिनः के प्रनान्ये
गर्व निर्मुच्य सर्व जयिनमिन-मभे धादिराजं नमन्ति
॥४३॥
वाग्देवी सचिरप्रयोग-सुदृढ़-प्रेमाणमप्यारा-
दादते मम पार्वतोऽयमधुना श्रीवादिराजो मुनिः ।
भी भी पश्यव पश्यप यमिना किं धर्म इत्युध्य-
रमनण्य-पराः पुरावनमुनेवाग्वृचयः पान्तु वः ॥४४॥
गङ्गावनिश्वर-शिरा-मणि-बद्ध-सन्ध्या-रागोल्लम परय पाह-
नरसेन्दु-लक्ष्मीः ।
श्रीशब्द-पूर्व-विजयान्त-विनूत-मामा धीमानमानुष-गुषोऽ-
स्ततमः प्रमायुः ॥४॥
पूयिं ॥ रसुता दि स भगानेष श्रीयादिराज-देन ।।
पद्विधा-आपसेा. प्रशस्त मुभयं नोहेमसेने गुनी
प्रागासीमुचिराभियोग-सतो नीतं पराममति ।
प्रायः श्रीविजये तदेवदखिलं तत्पीटिकायां स्थिते
सान्तं कपमन्यथानतिपिराचिरगीरक वः ॥४६॥
वियोदयाऽस्ति न मदोऽस्ति तालि भाव-
मोमत्वमस्ति विभुवास्ति न पास्ति मानः ।
पसाये कमलभद्र-मनीपरन्त
प: स्यातिमापदि शाम्यग्गुिशोषः ॥४॥

- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख स्मरण-मान-पवित्रतमं मनो भवति यस्य सतामिह तीय॑िनां । तमतिनिर्मलमात्म-विशुद्धये कमलभद्रसरोवरमाप्रये सर्लान य॑मिहालिलिङ्ग सुमहाभागं फली भारती भास्वन्तं गुण-रन-भूपण-गौरप्यमिमं योगिनो । वं सन्तस्तुयतामलङ्कृत-दयापालाभिधानं महा- सूरि भूरिधियोऽत्र पण्डित-पदं यत्रैव युक्तं स्मृताः ।।४।। विजित-मदन-दर्पः श्रीदयापालदेव विदित-सकल-शास्त्री निर्जिताशेषयादी। विमलतर-यशोभिात-दिक्-चकवालो जयति नत-महीभृन्मालि-रनारुणः डिमः ॥५०॥ यस्योपास्य पवित्र-पाद-कमल-द्वन्द्वन्नृपः पोय सलो लक्ष्मी सन्निधिमानयत्स विनयादित्यः कृताशामुवः । फस्तस्यादति शान्तिदेव-यमिनस्सामर्थ्यमित्थं तये- त्यात्यातुं विरलाः खलु स्फुरदुर-ज्योतिरंगा तादृशाः॥५॥ स्थामोति पाण्ड्य-पृथिवी-पतिना निमृष्ट- नामात-ष्टि-विमवेन निज-प्रमादान् । पन्यरस एव मुनिराहयमल्लमभु- गाथायिका-प्रधिन-सम्द-यमुपायः ॥५२॥ श्रीमुना र विदूर-सारपसुधारने स नाया गुणे नाजून महीसितागुरु-गापिण्डरिय- मनः ।

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस माराध्यो गुणसेन पण्डित-पविस्म स्याग्थ्यकामेर्जना यत्सूकागदनान्धताऽपि गलिव-ग्लानि गति सम्मियाः ॥५३॥ वन्दे यन्दिवमादरादहरदास्याद्वाद-विद्या-विदा स्थान्त-म्यान्न वितान-धूनन विधी भास्वन्तमन्यं भुवि । भकला वाजिवसेन-मानतिकृतां यत्मन्नियोगान्मन:-- पच मन भवेद्विकास-विभवम्यान्मुक्त-निद्रा-भरं ॥५४॥ मिथ्या-भाषण-भूपपं परिधरेताडत्य...गुञ्चत स्याद्वादं वदवानमेत विनयाद्वादीम-कण्ठीरकं । नौ घेत्तद्गु.. गर्जित-श्रुति-भय-धान्ता स्थ यूयं पत- म्तूपर्ण निप्रह-जीर्घकूप-कुहरे वादि-द्विपाः पातिनः ।।१५।। गुणाः फुन्द-पन्दोइमर-समरा गमृत-या:- प्रव-प्राय-प्रेयः-प्रमर-मरमा कीर्तिरिव मा। नसेन्दु-ज्योत्साहन्न प-चय-पकार-प्रणयिनी न कामा शापानां पदमजिससेन प्रतिपतिः ।।५।। मकम्त-भुवनपालानम्र-मूपिबद्ध- स्फुरित-गुकूट-पडालीढ-पादारविन्द । मदयदाखिल-वादाभेन्द्र-कुम्भ-प्रभेदी गयभूजितसेनो भाति पादीभसिंहः ॥५॥ र्णियम्य संमार-राग्य-वैभवमविधासम्पाप सूपयन्ति । प्राप्त भीजिनशासने त्रिभुवने यार्लभं प्रादिना यसंसार-समुद्र-मप्र-जनता-इसाइटदायित। ८ : पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिज्ञानेरा पता: परनिपे-सहज-मान-प्रियाता. सामातिक गहन कुतो भयाराः काबारदेनि: मात्मराम्य विदितमधुनानन्त-पोपारिरूप सरगम्पापय तातु गमयं पतले और पेतः । लगायमियरपति-गुरे पति-पये पगा सारनगलमधी-लोभीत : rel मानामा गम-विषय-मान-1 गार्म मान्नमस्तापाता। कमी-4. समुषितमा कोपि यता गंगाने नायर या ton (मगु पण शिपाकविताका-पादिकाला मानामा गान्तिनापना ferritam Mirmir-TeturnfuTuneri मामामITAifnatrnat arfun.first- Marget मा दाग-10 गानाOLTA-ATीलगाया HIT मा प्रभागि वाम 411 MRITAMI. यासियो। नाम Tiwananान।

पन्द्रगिरि पर्यत पर के शिलालेख दीक्षा व शिक्षा प यतो यतीनां जनवपस्तापहरन्दधानात कुमारसेनोऽवतु यचरित्रं श्रेयः पयोदाहरणं पवित्रं ॥४३॥ जगदरिम-धम्मरम्मर-मदान्ध-गन्ध-द्विप- द्विधाकरण-केमरी चरण-भूप्य-भूभृच्छिखः । द्वि-पड्-गुण-धपुस्तपारद-चण्ड-धामादयो दयेत मम मलिपेण-मलधारिदेयो गुरुः ।।६।। वन्दे सं मलधारिणं मुनिपति माइ-द्विपद्-ध्याति- व्यापार-व्यवसाय-सार-हदयं सर्सयमोह-नियं। यत्कायोपचयीभवन्मनमपि प्रयत-मत्ति-क्रमा- नम्राकन-गना-मिलन्मल-मपि प्रशासनकलम 16॥ मतुध्द-तिमिर-च्छटा-टिल-जन्म-जीणाटवी. पवानम-गुला-गुपए पृथु-वर:-प्रभाव-विस पदं पद-पयार-भ्रमिव-मध्य-भृङ्गायलि. गर्ममालमतु मल्लिपेण-गुनिरागमना-मन्दिरे ॥६॥ नर्मल्याय मलाविलामरिरल-जोक्याराग्यलिये किचन्यमनुग्छ-वारदयेन्यपटुतारान्तः । यस्यासी गुग्ण-रम-रोदय-गिरिः श्री मल्लिपेणो गुर• मन्दो ये विचित्र पाह-परित त्रिी-पवित्री-ram॥ यम्मिनप्रतिमा समाभिरमवे परिमन्दया निया. पोपत्र-गमत्वधी: प्रदथिनी यापहा हा कामं निति-कागुकम्वयमवाप्पमेमरो पोगिना. मापर्याय यमनाम परिरमीमलिपेपो गनि. Item चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेस यः पूज्यः पृथिवीवले यमनिशं सन्तस्नुवन्यादरान येनानङ्ग-धनु-र्जिवं मुनिजना यस्मै नमस्कुर्वते । यस्मादागम-निर्णयोयमभृतां यस्यास्ति जीवेदया यस्मिन्त्रीमलधारिणितिपती धर्मोऽस्ति तस्मै नमः ॥६ घवल-सरस-चीत्य संघ सन्यास-धन्य परिणविमनुतिष्ठं नन्दिमा निष्ठितात्मा। व्यसृजदनिजमङ्गं भङ्गमड्डोद्भवस्य प्रयितुमिव समूलं भावयन्भावनाभिः ॥७०॥ चूर्ण्यि ॥ तेन श्रीमद जितसेन-पण्डित-देव-दिव्य-श्री-पाद- कमल-मधुकरी-भूत-भावेन महानुभावेन जैनागमप्रसिद्धसल्लेखना- विधि-विमृज्यमान-देहेन समाधि-विधि-विलोकनोचित-करण-कुतू- हल-मिलित-सकल-सङ्घ-सन्तोष-निमित्तमात्मान्त:करण-परिणति. प्रकाशनाय निरवद्य पद्यमिदमाशु विरचितं ।। माराध्यरत्न-त्रयमागमोक्तं विधाय निश्शल्यमशेषजन्तोः क्षमा च कृत्वा जिनपादमूले देहं परित्यज्य दिवंविशामः।।७१॥ शाके शून्य-शराम्बरापनिमिते संवत्सरे कीलके मासेफाल्गुनके तृतीय-दिवसेवारेसितेभास्करे। स्वाती श्वेत-सरोवरे सुरपुरं याता यतीनां पति- मध्या दिवसत्रयानशनतः श्री मल्लिपेसो मुनिः ॥७२॥ श्रीमन्मलधारि-देवरगुइविरुद-लेखक-मदनमहेश्वर मल्लिनाथ परेदं विरुद-रूवारि-मुख-विलकं गडाचारि कण्हरिसिदं ॥

। चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख ११५ ५५ (६) कत्तिले यस्ती के द्वारे से दक्षिण की ओर एक स्तम्भ पर (लगभग शक सं० १०२२) (पूर्वमुस) श्रीमत्परमगम्भीर-म्यादादामोप-नाडने । जीयात्यैलोक्यनाथस्य शासन जिनशासनै ।। १ ॥ भद्रमस्तु जिनशामनाय सम्पयना प्रविविधानईतरे । प्रत्यवादि-मद-इस्ति-मस्तक-फाटनाय घटने पटीयसे ।।२।। लोक ।। श्रीमती पर्वमानम्य वर्षमानम्य शामने । श्री कोपरकुन्द-नामाभून्मूनसामयी गयी ॥३॥ सस्यान्वयेऽजनित्याने..शिक गये। गुणी देवेन्द्रीडाम-देवा देवेन्द्र-दिस ॥४॥ सन्दिप्य। अपति पतुर्मुस-देयो योगीश्वर-हदप-रनज-ग- दिननाथः। मदन-मद कम्भि-म्भस्यल-इसनेत्रि-पटिय-निष्टुर- सिंहः॥५॥ योन्दोन्दु दिग्विभागो- सोन्दोग्योपामहिकायात्म- गन्दशेने नेगन्दु विङ्गल- भन्दहे पारिसि तुम्मुंग्मास्येयनादर ॥॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख प्रवर्गलिगं शिष्यराद- प्रविमल-गुणरमल-कीर्ति-कान्ता-पतिगल् । कवि-मकि-बादि-वाग्मि- प्रवर-नुतर्चतुरसीति-समय यनुलर् ॥ ७ ॥ अवरोलगे गोपन्दि- प्रवर-गुणरदिष्ट-मुद्राघातयश- कविता पितामहर्त्त- ई-वरिष्ठज़क्रगच्छदाल पेसर्वडेदर् ॥ ८॥ जयति भुविगोपनन्दीजिनमतलसदमृवजलधितुहिनकरः देशीयगणाप्रगण्यो भव्याम्युज-पण्ड-चण्डकरः॥६॥ वृत्त ।। तुझयशोभिरामनभिमान-सुवर्ण-धराधरं सपा- मङ्गल-जरिम-वभनिलावलवन्दितगोपनन्दिया- वङ्गमसाध्यमप्प पलकालदनिन्द-जिनेन्द्र-धर्मम गजपालरन्दिन विभूतिय रुढियनेरदे माडिदं ॥ १० ॥ जिनपादाम्भोज-भृङ्गमदन-मद-हरं कर्म-निर्मूलन वाग- वनिता-चित्त-प्रियं वादि-कुन-कुधर-यमायुधं पार-विद्व- जन-पानं भव्य-चिन्तामपि सकल-कला-कोविदंकाध्यकता- सननेन्दानन्ददिन्दं पागले नेगल्दनो गोपन्दिभतीनं मयदे शावर मयिक भौतिक पोनि कह पागनि गोमतील युद्ध पार वजेदारदे ये पहला वाग-

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११८ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख प्रवर सधर्मरु॥ श्रीधाराधिप भोजराज-मुकूट-प्रोवाश्म-रश्मि छटा. बाया-कुङ्कम-पडू-लिप्त-घरणाम्भोजात-जदमीधरः । न्यायाब्जाकरमण्डने दिनमणिशब्दाम्ज-रोदोमणि- स्थेयात्पण्डित-पुण्डरीक-तरपित्रीमान्मभाचन्द्रमाः ॥१७॥ श्रोचतुर्मुख-देवानां शिष्योऽधृष्यःप्रवादिभिः । पण्डितोमभाचन्द्रो रुद्रवादि गजादुशः ॥ १८ ॥ प्रवर सधर्मरु॥ योद्योधिर-शम्पः नय्यायिक-कल कुम-विधु विग्यः । श्रोदामनन्दिवियुधः सुद-महा-वादि-विष्णुभट्टयर तत्मधर्मह॥ मलधारिमुनीन्द्रोऽसौ गुणयन्द्राभिधानकः । पलिपुरे मणिकामोद-शान्तीय-परणार्चक:॥२०॥ ताधार्मह॥ श्रीमाघनन्दि-गिद्वान्त-यो देशगिरि-धरः। स्थाढाद-गुव-सिद्धान्त-वेदी वादि-गला.॥२१॥ मिद्वान्लागन-नादि-गन-विधुः मादिग-विधानिधि. वादादि प्रयित-ए-मनिशानागमे भारनि । मगागुनम-यम-र-निलयागत-बापादयः स्वादिषमाधनन्दि-मुनिष भीषकाnetri ||२९॥

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१२० चन्द्रगिरि पर्वत पर फं शिलानंग
दुष्टपरषादि-मायोत्कृष्टश्रीगोपनन्दि-यनिपविशिष्यः ॥२७॥
प्रवर सधर्मग ।।
मतदा [धा] रि हेमचन्द्रो गण्डविमुक्तरय गोल.
मुनिनामा।
श्री गोपनन्दि-पति-पति-शिष्योऽभूच्छुद्ध-दर्शनशानाद्याः।।
॥२॥
कन्द ॥ पारिणियोल मनसिजसं-
हारिगलं नेनेयलुप्रपापं किडुगु ।
सूरिगलनमल-गुण-स-
न्धारिगलं गौल-देव-मनधारिगलं ॥ २६ ॥
प्रवर सधर्मरु॥
श्री मूलसङ्घ गतदोषमेघे देशोगणे सचरितादिमद्गुणे ।
भारत्यतुच्छे वरवक्रगच्छे जातः सुभावः शुभकीत्ति देवः।।
माजिरगे कीर्ति नर्तकिगाजिर भूगोलबाग शुभकीर्ति
धुधं ।
राजावलि-पूजितने गजिसिदना वक्रगच्छ देशीयगणं
अवर सधर्मर॥
श्री माघनन्दिसिद्धान्तामृत-निधि-जात-मेघचन्द्रस्य
श्रीसोदरस्य भुवन-ख्याताभयचन्द्रिका सुता जाता
॥३२॥

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिवालय भवर सधर्मर कल्याणकीर्ति नामाभूमध्य-कल्याय-कारकः । शाकिन्यादिप्रदायां प निर्धाटन-दुर्टरः ॥ ३३ ॥ प्रबर सधर्मर॥ सिमान्तामृत-वादि-सूत-मुक्पो-समी-लमाटेवग: शब्द-व्याति नायिकाम्ब(क)चकोरानन्दचन्द्रोदयः । साहित्य-प्रमदाकटाह-विशिय-व्यापार-शिलागुरुः रघेयाद्विश्रव-पालचन्द्रमुनिपः श्रीषकगादाधिपः ॥३४॥ श्रीमूलसह-कमलाकर-राजसो देशीय-सहाय-गुप-प्रवरावसंसः । जीयाग्जिनागम-सुधाय-पूर्णचन्द्रः श्रीवक्रगट-तिलको मुनिमाल चन्द्र. ॥३॥ सिद्धान्तापसिजागमाय-निपुग्ण-व्याख्यानसंपतिपि शुटाप्यात्मक-तत्वनिर्णय-पो-विन्यारादिप्रीटिस- पद्ध-व्याकरमार-शाल-भरतामद्वार-साहित्यादि रायान्वोत्तम-पालचन्द्र-गुनियन्सारती लोक L विभागा-भरित-ख-शीतलकर-प्रभाजितासागर. प्रोसम्मकलानत कुवलयानन्दस्वामीपरः । काम-सन-भूपितः सितितले जाता पवार मोऽयं शिवन-यालपन्द्र-मुनिपस्मितान्त- १२२ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख (उत्तरमुख) प्रोमूलसइद देशीयगणद वक्रगच्छद काण्डकुन्दान्तरण परियलिय घड्डदेवर बलिय। देवेन्द्रसिद्धान्तदेवरु । भार शिष्यरु वृषभनन्द्याचार्यरेय चतुर्मुसदेवरु । पावर शिया गोपन्दि-पण्डितदेवरु । प्रवर सधर्मरु महेन्द्र-चन्द्र- पण्डित-देवरु । देवेन्द्र-सिद्धान्तदेवरु । शुभकीर्ति-पण्डिव-रेरक माधनन्दि-सिद्धान्त-देवरु । जिनचन्द्र पण्डित-देवरु । गुणचन्द्र-मलधारि-देवरु । प्रबरोलगेमाघनन्दि-सिद्धान्त देयरशिष्यरु । विरत्ननन्दि भट्टारक-देवरु । प्रवर मधर्मर कल्याणकीर्त्तिभट्टारकदेवरु । मेघचन्द्र-पति-देवरु । यालचन्द्र-सिद्धान्त-देवरु। मा गोपनन्दिण्डित-देवर शिष्यह जसकीर्ति-पण्डित-देवरु चन्दनन्दिपण्डिनदेया। हेमचन्द्र-मापारि गण्डविगुप्तरंग्य गौलदेवर धिमुष्टि-देवर। | वासयन्द्र-पण्डित-रेवरु । [ यह लेख व भाचार्यों की प्रतिमा अनि माग में परिवगित भाचायो मा की पुनरात प्राचार्य मगध शिप गण मार कर ठरे देष मिशनर समकालीन शिप थे। मुगदेव इसलिए गाया dieोंने गरों दिशाहीर प्रसनुस मुख मा मानिस frये पनि रितीवि और पावित जिलो मामुन ईपीनही शान थे। प्रभाभीn करा PAY । मामलि पार तिमय मा0 aff OR चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिक्षास १२३ बयाकरण थे। देवेन्द्र बकापुर के प्राचार्यों के मापक थे। पासवान ने अपने वार-पराकम मेमुक्य राजधानी में बालसरस्वती की उपाधि प्राप्त की थी। पश:की िसद्धान्तिक सिंहल द्वीप के मरेश दारा सम्मानित । त्रिमुष्टि मुमीन्द्र बड़े संद्धान्तिक ये चार तीन मुष्टि मत काही माहार करते थे । मरधारि हेमचन्द और रामजीतिदेव बरे मदापारी प्राचाय थे। श्यायीत्ति शाकिनी भादि भूत प्रेती मगाने की विद्या में निपुण थे। पालवाद मागग और सिदान्त भाता।] ५६ ( १३२) गन्धधारण पस्ति के पूर्व की सोर (शक १०१०४५) विद्योत्तममेघचन्द्रसुतपापीयूषधाराशिजः मम्पपीज्यवृत्तनिर्मस तनु.पुष्ययुधानन्दनः । प्रैलोक्य प्रमरपरारशुचिरचिर्यास्तदोषागमः सिद्धान्ता युधिवर्टना विजयते पूर्वः प्रभाषन्द्रमाः ॥१॥ श्रीसादराम्पुजभवादुदिवाऽविति. जातेन्दुपुत्र-पुषपुत्र-पुरुरवस्तः । मायुस्तता नहुषा नहुपाययाति: तामाधदुर्यफुले पायो भूयु ॥२॥ स्यात्पु तेषु नृपतिः कषित. कदाचित करिषाने मुनिरंभ(प)-प: कराल ।

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षानेग सालकं प्रतिद पायमल इयतोऽभू. तस्यामिधा मुनिषोऽपि यमूरसरमः॥३॥ ततो द्वारपसीनापा पोसला दोपिलायना । गातारारापुरे तेषु यिनयादिस्यभूपतिः ॥४॥ स मोरितरं जगानादि करवापरा पासपन गोगहमपत्रकगने लरमी चिरं वामपन। वार रिपुण्डलियारे वीरप्रियं गाटयन मिपाणित शिशिरपुत:प्रमोरयः ॥ ५ ॥ श्रोमगादापंगगनाल सोगोशरतामणि. संगीतामणि मरेगागिर:प्रोग्रामयिः । पानिपतपर्णागिरिमामणि. rif गाना गुणमणिपानामपिः ॥६॥ पसमा सुग- मिनमा लिगागार । ባtባt'ዛግብት TEM माविमगादिप ॥॥ मागितमममा 44446-- नाaam| MANY 4-- - चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख श्रीपतिनिज-भुजविनयम- दीपति जनियिसिदनदटनेरेयङ्गनृपं ॥ ८॥ वृत्त । अनुपमकीप्ति मरनेय मारुति नाल्कनेयुप्रदियय- देनेयसमुद्रमारेनेय पूगपेयेसनेयुपरेपने- ण्टेनेय कुलाद्रियाम्मतनेयुद्घममेतहस्तिप- सेनेय निधानमूर्तियेने पाहावरारपण देवा ॥ १० ॥ परिपुरदोल्धगद्धगिल्दन्यगिलेग्युदरातिभूमिरा- लरशिरदोस्परिगरिगरीगरिलेग्युदु परिभूनने- रार फरहाल चिमिस्थिमि पिमीचिमिनेम्युदुकोपटिदु. रसरमेन्दोहरकरदे कादुपरारेयादेषन ॥ ११ ॥ कन्द ।।पा नेगस्द एरेग पालन सूनु रिमन सकलरि- त्री-नायनारियंजनता- भानुमुत जिपणु विष्णुयर्द्धननेसेदं ॥ १२ ॥ सुदय गयनोरनोरन- न्तुदितादितमागे मालगायाभ्युदय । मदरदराति-नृपालक- पदविदसाननमम विष्णुपर्धन भूपं ॥१६॥ वृत्त केला कितिहि परं पिलरनायुपसलामोश-- स्दलं गाण्यपदिन्द केसर तजंगल मे मिन्दुपको। मलेबरयुपत्तरसातदुनिदु निमाम्यामाध्यमा लालदिनिकारक माहिदमधिल विजिपमा११॥

१२६ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख दुओरारिधराघरेन्द्रकुलिशं श्रीविष्णुभूपालना- यट्टिलु सेडेदेोडि पोगि भयदिन्दावन्दनीयन्दनेन्द् । उर्वीपालर कङ्गे लोकमनितुं तटूपमागिर्पिन मर्थ विष्णुमय जगत्तेनिपिदें प्रत्यक्षमागिहुंदो ॥१५॥ वचन । स्वस्ति समधिगतपञ्चमहाशम्दमहामण्डलेश्वरं द्वारामती- पुरवराधीश्वरं यादवकुनाम्बर मणि सम्यक्तचूडामपि मन- परोल्गण्डायनेकनामावलीसमालतर्नु। मत्तं पगा! सजका नीलगिरि का नङ्गलि कालालं रेयूरु काय- सूल कोलिय उहि तनेयुरु पोम्पुर्चयन्धासुरपीक पलेयरहण येन्दियु मोदलागर्नकदुर्ग प्रयङ्गसन ममाविकोपा प-प्रतापदि गङ्गाराहि ताम्मत्त सासिरमुमण्डिगे माय माडिसुपदि राज्य गेग्युत्तमिदं श्रीमन्महामणध त्रिभु वनमय तलकादुगाण्ड भुजबलवीरगङ्ग विष्णुपर्धन पाय मलदेवर विजयराग्यमुत्तरोत्तराभिति-प्रार्समागमापा. तारं पर मलुत्तमिरे ॥ बन्द ।। प्रा ने रिपन म- मो नयनपिये मालनीताकि.. द्रानने कामन रतिया । सानंग माय मरि ममाने गानाल देयि॥१॥ || भाग मारमिङ्गन मनानयर्षि माणिकर. नगीनि वेनेसामनाभो विष्णुपमा मार रिमामयनम्नभिागितमा re!

१२८ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख लयमं माडिसि देवता पूजेगर्षिसमुदायकाहारदानक कल्कलिनाड मोट्टेनविलेयं तम्म गुरुगल श्रीमूलसङ्घद देसियगणद पुस्तकग- च्छद श्रीमन्मेषचन्द्र विद्यदेवर शिष्यर प्रभाचन्द्र सिद्धान्त देवगें पादप्रक्षालनं माडि सवाधापरिहारवागि विट्ट दचि ॥ वृत्त ।। प्रियदिन्दिन्तिदनेयदे कावपुरुषार्गायुं महाप्रीयु म- केयिदं कायदे काय्व पापिगे कुरुक्षेत्रोबियाल बागरा- सियोलेर्कोटिमुनीन्द्ररं कविलेयं वेदाट्यरं कान्दुदो- न्दयसं साग्गुमिदेन्दु सारिदपुवी शैलातरंसन्दवं ॥२०॥ श्लोक ।। स्वदत्ता परदत्ता वा यो हरेति वसुन्धरा । पष्टिवर्पसहस्राणि विष्टायां जायते कृमिः ॥ २१ ।। एलसनकट्टव फेरेयागि कट्टिसि सवविगन्धहस्तियसदिगे सरुगिगे देवियरु जिनालयफ विट्टर ॥ श्रीमत् पिरियरसि पट्टम- हादेवि शान्तलदेवियरु वावु माडिसिद सवतिगन्धवारपद बम दिगे श्रीमद्विष्णुवर्द्धन पायसल देवर घेडिकोण्डु गङ्गस- मुद्रद केलगण नदुवयलयवत्तु कोलग गहें ताटवं श्रीमत्प्रभाचन्द्र सिद्धान्तदेवर कालं फर्चि धारापूर्वकं माडि बिट्ट पत्ति इदनलिदवं गङ्य तडियोले इदिनेण्टु कोटि कविलेयं कोन्द महापातक ।। मङ्गलमहा श्री श्री ।। (दचिव पाचपर) श्रीमतप्रभाचन्द्रसिद्धान्तदेवर शिष्यह महेन्द्रकीर्ति देवरु मनरहदिमूह कच्चिन इंग्लविगेय शान्त सदेविय यसदिगे माडिसि कोहरु मङ्गलमहा श्री श्री।

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख १२६ [पाख ग्रान्तलदेवी के दान का सार है। लेख में पादपकुल तीनपति मझा और बन्द से बतराई। इस कुल में 'स' नामक एक पाजामा। एक बार वन में किसी साधु ने एक व्याघ्र की भोर कर इस राजा से करा पारस' (हे सल, इसे मारो)। तभी से इस रामानाम पोरसव पड़ गया और उसने सिंह का चिह अपने मुकुर पर धारण किया । तब से इस वंश का नाम पाय्सल पड़ गया। जेम्स में इसके विनयादित्य, पोया र विष्णुवईन नरोके प्रसार का वर्णन है। विष्णबदन की पटरानी शान्तलदेवी, जो गति- मय, धर्मपराययता और मति में हरिमयी, सलमामा, सीवा जैसी देवियों के समान थी, ने सवति गन्धवारपवति निर्माण कराकर अभिषेक के लिए एक तालाब बनवाया और उसके साथ एक ग्राम का दाम मन्दिर के लिए प्रभाषन्द्र सिदान्तदेव को कर दिया।] [नोटसंख की ठीक तारीम्ड 'सासिरद नवचयदनेय' है, परन्तु खोदनेवाले की भूल से जा'नत्वच' छूट गया और 'सासिरदयदनेव' खुद गया तब उसने 'सासिरद, केको .. में बदलकर जितना अच्छा उसको सका बसे गदर दिया । यद्यपि पढ़ते समय इसमे ठीक अर्थ निकल पाता है परन्तु देखने में यह बड़ा विचित्र मालूम वा है। ५७ (१३३) गन्धवारण वस्ति के उत्तर की ओर स्तम्भ पर। (शक सं००४) (उचर मुख) संसारपनमध्येऽस्मिन्जूंस्तगान जननुमान । माझाक्यालोक्य सङ्घचान दिनत्ति यमतपकः ॥ १॥ ।

१२८ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख लयमं माडिसि देवता पूजेगर्षिसमुदायकाहारदानक कल्कचिनाड मो?नविलेयं वम्म गुरुगल प्रोमूलसङ्घर देसियगणद पुखकग- च्छद श्रीमन्मेषचन्द्र विद्यदेवर शिष्यर प्रभाचन्द्र सिद्धान्त देवगर्गे पादप्रक्षालनं माडि सवाघापरिहारवागि विद्य दचि ।। वृत्त ।। प्रियदिन्दिन्तिदनेयदे काबपुरुषर्गायुं महाप्रोयु म- केयिदं कायदे काय पापिगे कुरुक्षेत्रोवियोल बायरा- सियोलेकोंटिमुनीन्द्ररं कविलेयं वेदाट्यरं कान्दुदो- न्दयसं साग्गुमिदेन्दु सारिदपुवी शैवाक्षरंसन्तवं ॥२०॥ श्लोक ॥ स्वदत्ता परदत्ता वा यो हरेवि वसुन्धरा । पष्टिवर्पसहस्राणि विष्टायां जायते कृमिः ॥ २१ ॥ एलसनकट्टव केरेयागि कट्टिसि सबविगन्धहस्तिवसदिगे सरुगिगे देवियरु जिनालयक विहरु । श्रीमत् पिरियरसि पट्टम- हादेवि शान्तलदेवियरु वावु माडिसिद सवतिगन्धवारणद यस दिगे श्रोमद्विष्णुवर्द्धन पोयसल देवर बेडिकोण्डु गङ्गस- मुद्रद केलगण नडुबयलयवत्तु कोलग गहें वोटवं श्रीमत्प्रभाचन्द्र सिद्धान्तदेवर कालं कर्चि धारापूर्वक माहि बिट्ट पत्ति इदनलिदवं गङ्गेय तडियालं हदिनेण्टु कोटि कविनयं कोन्द महापावक || मङ्गलमहा श्री श्री।। (दक्षिय पाश्र्वपर ) श्रीमत्प्रभापन्द्रसिद्धान्वदेवर शिष्यरु महेन्द्रकीर्ति देवरु मुन्नरहदिमूठ कश्चिन होजविगंप शान्त सदेविय सदिगे माडिसि कोहरु मङ्गलमहा श्री श्री।

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षालेस १२४
[पापेष शान्तदेवी दान मारक है। खेष में पादपकर
परिवार से बताई है। इसमें 'स' नामक
एकाएकापन में किसी साधु ने एक म्यामकर
सरस मासेर पेस' (सक से मारो) भी से
इस नाम परिसरमा भर रसने सिरभिपने
मुकुट पर धारण किया हमे इस मनाम परिसर पड़ गया ।
भख में हमारे विषयादित, एरेया और विरगुवईम नरेश के
महाकावन। विएपनी पटानी शान्तबरेवी, जो गति.
धर्मपायपता और भटि में हक्मिणी, सत्यभामा, सीता जैसी
देवियों के समान धीमे स्वति गम्यवारयस्ति निर्माण कराकर
अभिकलिए एकतालाब पनवापा और उसके साप एक प्राम का
दाम मन्दिर के लिए प्रभाषण मिदान्तदेव कोर दिया।]
[नारस की मेक तारीख 'सासिरह नस्वासयइनेस' है, परन्तु
खोदनेवाले की भूल से समस्यत्त' हर गया और 'सासिरदपदने पर
गया बरसने 'सासिरह है.. में बदलबर जितना अच्छा
रससे सकारसे शुरकर दिया। पपि पढ़ते समय इससे ठीक
अर्थ खिल भाता है परन्तु देखने में या बड़ा विचित्र मालूम
हता है।
गन्धवारण वस्ति के उत्तर की ओर स्तम्भ पर।
(शक सं०९०४)
(उत्तर मुख)
संसारपनमध्येऽस्मिन्जूंखद्गान जननुमान् ।
मालोक्यालोक्य सद्वृत्ताधिनति यमवक्षकः ॥१॥

१३० चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख श्रीराजस्कृष्णराजेन्द्रन मगन मगं सत्यशाचद्वयाल- कारं श्रोगङ्गगाङ्गेयन मगल मगं वीरलक्ष्मीविलासा- गारं श्रीराजचूड़ामपियलियनिदें पेम्पो पेलेन्दलम्मि भूरिदमाचक्रमुंबण्णिसे सले नेगल्दं रट्टकन्दर्पदेवं ॥ २ ॥ परभूमीश्वरभीकरंकरनिशातोपासि शत्रुक्षिती. श्वरविध्वंसपरं पराक्रमगुणाटोपं विपक्षावनी- श्वरपतत्तयकारणं रणजयाद्योगं द्विपन्मेदिनी- श्वरसंहारहविर्भुजं भुजयलं श्रीराजमार्तण्डन ॥३॥ इरियल्कण्मुवरीयलाररवर् पुण्डीवरांरानुमा- न्तिरियल्कन्मरदाव गण्डगुण्मावादार्य मेन्दस्कदा न्तिरिवण्मुं पिरिदीव पम्पुमेसेदोप्पिल्दप्पुवापियसल मेरेवारद चागदुन्नतिकेयं श्री राजमाण्डन ॥४॥ किवद जसक्के ताने गुरियादचलं नेरेदगिर्यमं । कुडुव चलं तादलनुडियदिप चलं परवेण्णालोतादं- वड़द चलं शरण वरेकार चलं परसैन्यमं पेर- हे गुडदट्टि कोल्न चलमाल्द चलं पलदङ्ककार्न ॥५॥ इरु पेरदेननि पागलुविल्दपुदीपनेगल्ते फल्मभू. मिरुदिनग्गलं नुड़ि सुराचलदिन्दपलं पराक्रमं । खरफरतेजदि बिसिदु चागल ननिय बीरदन्दमी- रोरतेने यज्यिसलनेरेवरारलवं चलदकारन ॥ ६ ॥ प्रोगसुग मधदुल्लुदने पेल्दपेनेन्दुमवयंविक्रम मृगपति गडदिल्लं गत सन्द गभीरते वार्खिगक्षदि. . क चन्मगिरि पर्वत पर के शिखाजेरा स्लंगडजगरपासिलिगजे.........महामति-ये..." 'मनमोलवानरिवें. ( पूर्वमुख) दुस्थितलोककलवरुवम्युरिनरेन्द्र कुम्भिकु- म्भस्थ-पाटन-अवय-केसरियेभ्युदु कामिनीजनो- रस्सहारमेम्बुदु महाकविरिसरोरुहाकरा- पस्थिवइसनेम्बुदु समस्तमहोजनमिन्द्रराजन ॥८॥ पुसियु तक फालिपि कोल्बुदे मन्तणमन्यनारिंगा- टिमुरे चितमीयदुदे विनयमाश्मनेम्दे कुर्तुष- पियुदे कल्त कल्पियने मचवर पसर्गोण्डदेन्तु पो. लिसवुदो पेलिमीगढिन राजवनूजरोलिन्द्रराजनं ।। ६ ॥ निखिज्ञविनमनरेश्वर- मुखाम्जनेयोत्पलालकालाल गिलो. मुसनिकर-दिने सेवुदु पदनख- कमलाकरविलासमाहितर जवन ॥१०॥ मन्निसि पिरिदीववाद- लं नुडियन्ताहर्दु मायनजरिदमिदे- नुनविवढंदुदो पागद नन्निय धारद नेगल्ले पलदग्गलिया ।। ११॥ शरदमतकिरणचिपि परापरब्याप्तियि जगजननुतिमि करमेसेदिल्लपुदेनी- चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख श्वरमूर्तिये कीर्चि कीर्तिनारायणन ।। १२ ।। नुनिवरिमनोन्दुगण्ड सेडेवर्षागफेमुयुबाम्परी- वड़े पलगच्चुवरामे साचिगलेमेन्दिपपरलोयरोल- गडयं ननिगे वोगुवर्नुडितादल दोसके पक्कादेदं पढगण्डर कलिकालदोल कलिगलोल गण्डं बरंगण्डरे॥१३॥ (दक्षिणमुख) श्रीगे विजयके विहेगे पागमदटिङ्ग जसके पम्पिनि नित- कांगरमिदेन्दु कन्दुक- दागमदाले नेगल्गुमल्ने बीरर बोर ॥१४॥ मोखगं दक्षिण सुकरदुष्करमं पोरगय सुकरदुष्करभेदमं पोलगे वामद विषममननिय विषम दुष्करम निनदर पोरग- गलिके येनिपति विषममनदरविविपम दुष्करमेम्व दुष्कर्म एजेयोलोने चारिसल्वल्लंनाल्कुप्रकरणमुमनिन्दिराज पारिसे नाल्कु प्रकरण- चारणे मूनूर मूवतेण्टेनिसिदवा- पारगडनमदि पारिसुगुं कोटि तरदिनेजयेडे ॥१९॥ पळसदेख्न मुलिवगल्विन्तप्प पारणदीपमझदे पोष. होगेसमनागेगिरिगेय कोल्मुहिमिगतुं नेशमषमीयदिन्तो.

पन्द्रगिरि पर्वव परके शिवाजन्य १३३ दलवियोपरे पोरगानगढदोल पदासं कडगबुपिन्ने मर्प बसयन्दर पारिसुवरोजेयं रहकन्दमनन्ताव पल्लं ॥१७॥ मेलसिन निलिरिदु गिरिंगेय. मलंदाग्दोलामोल्लगे पोरगये मेलेवा- स्पक्षबडे पारिप यहलिके- यविदुकेवलमे कोचिनारायणन ॥ १८ ॥ गिरिगे मेलसिन्दं किरिदम कालाए नाल्वरललविग- किरिदुमक-- तुरग बेदि पिरिदम वक्षय, भूवलपदिनत्त पिरिदुमके। गिरिगे कोल्बलि वलयमिन्तिनितुमं वर्गवाङ्ग फरमरि- दिन्तिवराल- हरदं पसेण्टुवलयं धारिसदनं भौगमिश्वनचनिन्द्रराज कडुपुगलुद वलंगर बंडेल गल धेरै भङ्गिगल ललिगलिदें। कडुजाणेने पदिकयवर. मटर पुलने पिहमेलेरु मेशेववेडा ॥२०॥ नेगस्द मण्डलमाले त्रिमण्डल यामकमण्डलमपन्द्रमार्ग घावोहरिदप्प सर्वतोभद्रमुटवलं पफव्यूहं पल्मेगलं । पागनिसल्वम परवु दुष्करदे पगजनप्रमदिनेलेयोल १३४ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख जगदालेलेवबेडेडनावने वक्ष...न्वारालं मान्तरमे ॥ २१ ॥ (पश्चिम मुख) उहवल मेलेबरेम्बुदे- बिर मुन्नष्टि कडुपिनोल्बहु विघदि. न्दुरवसमेलेदु मुरिगं। विमेनल्बलल पोरगनेलेववेडे ॥ २२ ॥ एरकमल्लदे पोखदागेरगि दोरेकोण्डे कोस वेरनल्लो नेरेये परले दियधि पोसुवल्जिये योमलरिदवित्रा परियनादिट्टे मुरिवद्धि कडुपिनाल मुरिदयिधिनिय विनय मेरेये कल्पदे पीररपोरन गिडेगला-भरपने नोडि फखा ॥२३॥ भासुरनुं फूकुचन पीसुबर्नु गठये नंगल्द तकदियोजेनु- तामदेयु कुङ्कदेयु पिसन्देयुविरमलेगुमेलेयवेडे ॥२४॥ एरगन्तरियदे जिण्टुकम्मगुल्दयरमणमरियदेवपंपिन्तु तेरनारियदे भगमनिधियुम्गूरगर कहाडियं । मुरिय पोयिसिदनुरेयं फोन्दु धरंग गर्ग यिनिधी नयं कनापननिमस्के याकूमे गंगामायन र फामा लगन तुगर कालय तिचिनुदाधि चित।

- पद पर INTS print urga fucrafian अधिनमामिप्रिमितका सफायनिपात vilti felf frieमो. (म-गुमनामा समाखia Highere आनिद्रराजममिति ॥५॥ nिema (20) Margaretununitution ENTRIKNIITituRriralanam' antinumawat univen .गर में Hauntrwasnamust mins सामने -पूmain nute मा पो. bismo u sinni atfers to a nic, writ wir was Treast.manwr • गुरि writi ४८(१४) गरिन अस्तिफ परिषम फी योर एक स्तम्भ पर (गनगएक००४) पर गुख) गरपरिगु.......न्द पोगनिने...

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षालेम गिय...दिसिमो...हो...नु... मे...गदेन ...... वेमु... पोविसुवेल्सयुरि... योडि... नगिसुगुवेम्प... वपेद... मावन-गन्ध-हस्तिय॥ मदिरदिविञ्चिनिन्दरि...नेने पायिसि उन मिण्डर्नु कुदुरेय म्यिर्बु पेरसि वोल्वदु मेथिदिर...देषु काल गुहि-- गाले ताने...... (पूर्व मुख) साधिसि पोग.....निरदे........ ..दिव......... घेरित.........न्तलिय......ल्दरि...लय.........ल्दन्तवलो ....पेनकेल.........बोलगोल्ताये... उनठा...... यविट्टनेवे......अलिपि......य... चलिदु निजाधिपं वेस सिदेव्यसनं कुसिदिम्मॆकेल्दुवा. बलिपननव्यवस्थिवननोसकल्कुव जोलगल्लरं पलियेदे यिनदोल्पलेयुतिप्पुंदु मावन गन्धहस्तियं ।। परवलवेयदि कयदुवेडेयाडुव ताणदोलछि वीरमं परवधु वट्टेलावरेडेयाडुवताणदालखि सौचमं । परिकिसि सन्दरित्र पेररोबरुवेन्नलिदण्मु सौचमे- म्बरदरेल.. (दक्षिण मुख) ......वागेदि- टिगरन...वुद दोरेगे वर्षामे मावनगन्धहस्तियं ।। मोडनेय नायफदिदु वागुमे...मत्व वादोड्डुपु- Regirit from AsiaRangingfeelaitta- Kirtal afterrit. girnimatertaभाम malnit राजा- 4tatusterit- भय. (मिमुग्न) wan RC HINfaferiangritonlay in-efugh ifrainitaryभमान. HomETo मानगुनायरा पिष. भानुपम्पयरमधिकापादपाल दसमीदिन गुरु- पासपरियामद पिgarastutime" ९.माasfe anRIENTAT पुर the arभाब से एक untus. SAIRE HER NINE या भानु Awaitiस दीपावाब पर gavarमामी साग164.10. FAMITRA wिसे भी समयतिर arti १३८ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख ५६(७३) शासन वस्ति के सामने एक शिला पर । (शक सं० १०३६) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामोध-लाञ्छनं । जीयात्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनं ॥१॥ भद्रमस्तु जिनशासनाय सम्पद्यता प्रतिविधान-हेतवे । पन्यवादि-मद-हस्ति-मस्तक-स्फाटनाय घटने पटीयसे. ॥२॥ नमो वीवरागाय नमरिसद्धेभ्यः ।। स्वस्ति समधिगत-पथ-महाशब्द-महामण्डलेश्वरं द्वारवती- पुरवराधीधरं यादव - कुलाम्बर-धु-मयि सम्यक्व घडामणि मलपरोलगण्डायनेकनामावली-समालङ्कतरप्प श्रीमन्महामण लेश्वरं विभुवनमल्ल तलकाडुगोण्ड भुम यल-वीर-गा, विष्णुयईन-होयमल-देवर विजयराज्यमुत्तरोत्तराभिनि-प्रपर्व मानमापन्द्रार्फतारं सलुसमिरे उत्पादपनोपजीवि ।। वृत्त ।। जनताधारनुसारनन्यवनितादुरं वपस्सुन्दरी- पन-वृत्त-स्तन-हारनुप्र-रणधीरं मारनेनेन्द। जनक तानेने मामण वियुध-प्रक्ष्याव-धर्म-प्रयु. छ-निकामास-चरिये सायेनलिदेने महाधन्यनो ॥ ३॥ कन्द ।। वित्रतमलं युध-जन-मिनं विमलपवित्रो जाओ। पारिपु-कुल-बन्द-सनि कोमिन्य-गोवनमत्रपरि ॥४॥ मनुचरिदचिगान १३९ पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख मनेयोलु मुनिजन समूहम युधजनमु। जिनपूजने जिनकन्दने। जिनमहिमेगलावकालमुसोभिसुगं॥ ५ ॥ उत्तम-गुण-वतिवनिता- वृत्तियनालकोण्डुदेन्दु जगमेधम्क- यत्तुविनममल-गुण-स. म्पत्तिगे जगदालग पाचिकम्येये नान्तल ॥६॥ अन्तनिसिद् एचिराजन पोचिकन्वेय पुत्रनखिलती- र्यकरपरमदेवपरमचरिताकर्णनादीर्ण-विपुल-पुलक-परिकलित वारयाणनुवमम-समर-रम-रसिक-रिपुनृपकलापावलेप-लोप हो. लुप-कृपायनुवाहाराभय भैपग्य-शान-दान-विनोदनुं सकललोक- शोकापनादवें। वृत्त । नवमभृतो हल हलभृतश्यकं या परिण- स्थतियतिधरस्य गाण्डिवधनुर्गाण्टीरकोदण्डिनः । यस्त द्विवनावि विप्नृपतप्कार्य पं मारी गर्गलो गह-तरह-रवितयशो-राशिस्स-वण्यो भवेतु ॥७॥ इन्तनिए श्रीमन्महाप्रधान दण्डनायकं दाहपरष्टुं गङ्गराज घालुक्य-पाति विभुवनमरल-पेमाडिवन दलं पमित्र. मिन्तव्य र सकोगाल-मोटिनलु विष्टिरे । कन्द ।। वेगे वाहवम हारण बगेय हनगिरलयरमेनुव मा। पुगुव कटगिरनलिरं

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख
पुगिसिदुदु भुजासि गङ्ग-दण्डाधिपन ॥८॥
वचन ॥ एम्बिनमवस्कन्दफेलिविन्द
मनियर सामन्तहम
भङ्गिसिवदीय-वस्तुवाहन-समूहमं निजस्वामिगे वन्दु कोद,
निजभुजावष्टम्भक मैच्चिमेच्चिदंबेदि कोखिमेने ।।
फन्द ॥ परम-प्रसादम पडे--
दु राज्यमं धनमनेनुमं येउदनः
स्वरमागे पेटिकोण्डं
परमननिदनईदर्चनाधित चित्तं ॥ ६॥
प्रन्तु पेनिकाण्डु-
वृत्त ।। पसरिसे कीचनंजननि पोचलदेवियायिवटु मा-
डिसिद जिनालयकमोसेदात्म-मनारमे लचिमदेवि मा.
डिसिद जिनायज्ञयमिदु पूजन योजितमेन्दु को स.
न्तोसमनजनमाम्पनेने गणमूपनिदेनुदासनी ॥ १० ॥
प्रकर ॥ प्रादियागिप्पुदाईव-समयके मूलस कान्दा
प
यादु वेडर पलायिपुत्रिय देसिगगणव पुस्तकगग्य ।
वावविश्वद कुक्कुटासन मन्तधारि-वेवर शियरेनिपपेपि.
हाइमेसेदिप शुभचन्द्र-मिवान्त-यर गु गापमावि ११
गवाहिय यमदिग.नितीज्ञानिवनानेयो पासयिमिय
गायि गोम्मटदेवाणे मुतासयमनेयदे मारिपि।
गवाडिय तिगुशरं पोपडपोनिमियाई
गगाना मुबिन गरिराय नमधन्यन ॥ १२॥

पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख पचिनत्मिगल्लि नेलेवीदने माडिदल्लिगल्लि फट पचिदुदेखिगधि मनमावेडेयेयदिदुदेलिगल्लि स. म्पत्तिन जैनगेहमने मादिसे देशदोल्लेलिगलिगे- स्तत्तलुमावगं पडेय माल्कवोलादुदु गङ्गराजनि ॥ १३ ।। जिनधर्माप्रपियति मध्यरसियं लार्फ गुगंगाल्बुदे- कने गोदावरि निन्द कारणदिनीगलु गडदण्डाधिना- भनुम कावेरि पेचि सुत्ति पिरिदं नोरोत्तियुं मुहिवि- लेने सम्यकद पेम्पनिनेरेये वण्णिप्पण्पने पपिपं ॥१४|| इन्तेनिप दण्डनायक गङ्गराज मकवर्थ १०३८ नेय हेमण म्बि संवत्सरद फाल्गुण शुद्ध ५ सोमवार दन्दु वम्म गुरुगनु शुभचन्द्र-सिद्धान्तदेवर काले कधि परमनं फोटर् ।। दण्डनायक एचिराजनुं सनगभिद्धियागे मलिसिदं । परमन सीमान्तरं मूबल सल्ल्यद कब वे गति । तेङ्कल करिद कुम्मरि होर- गागि । हबलु पनालगेरेय माविन रेय गरेयोलगागि । पेलुगाल होद बट्टे गदि। बडगनु मरे। नेरिख-रेय मूडण कोविपि सेहूण होमगरेप-म्युगटादुदेल्लं। माहोसगरेय पडगय फोदियिन्दं मूड हाद नौहवफेमिन्दं। पयकनकद । साइबल्लदिन्द । तेसादुदेसविनितुं परमसीमेयागि विट्ट दत्ति॥ धर्ममं प्रतिपालि-सिदगें महापुण्यमर्छ । वृ॥ प्रियदिन्दिन्तिइनेय काप-पुरुषग्गायु महाश्रीयुम कपिद कायदे काय पापिनं कुरुक्षेत्रोमियाज बारा- १४२ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख सियोलेल्कोटि मुनीन्द्ररं कविजेयं वेदाट्यरं कोन्दुदो.. न्दयसं सामिदेन्दु सारिदपु वीशैलाचरं सन्तवं ॥ १५॥ श्लोक ॥ स्वदत्ता परदत्ता वा यो हसुन्धरा । परिजपसहस्राणि विष्ठायां जायते कमिः ॥ १६ ॥ बहुभिर्वसुधा दत्ता राजमिस्सगरादिभिः । यानि यानि यथा धर्म तानि तानि तथा फलं ॥ १७ ॥ विरुद-रूवारि-मुखनिलकं वर्द्धमानाचारि खण्डरिसिदं ॥ [ यह खेस एक दान का स्मारक है। मार और माकिणारे के पुत्र एचिराज हुए । एचिराज और पोचिये के पुग्न महाप्रतापी ग. राज हुए। ये हेयसल नरेश विष्णुवर्द्धनके महादण्डनायक थे। इन्होंने तिगुलों (तेलगों) को परास्त कर गायाहि देश को यषा लिया सथा चालुक्य नरेश त्रिभुवनमल पेमारदेव की सेना को जीतकर भपने भारी पराक्रम का परिचय दिया। उनकी स्वामि-भक्ति तथा विजय-शीलता से प्रसरोकर विष्णुपद न नरेश ने उन्हें पारितोषिक मांगने को कहा। उन्होंने परम' नामक प्राम मांगा। इस मामको पाकर उन्होंने उसे अपनी माता पोचट देवी तथा अपनी भाषा लक्ष्मीदेवी द्वारा निर्धापित जिन-मन्दिरों की भाजीविका अर्पण कर दिया। पर बेस इसी दान का मारक गराज जैसे परामी बसे धर्मिष्ट भी थे। इस दान के अतिरिकइन्होंने गावाति पागने के समय विन-मदिरों का जीनार कराया, गोमा स्वामी का परको बनवाया तथा अनेक स्थानों पर नये-नये विन-मन्दिर निमाया। देश में गा गया है कि इन हखों से या गान राप(पात राय-गोम्मट सामी के प्रतिवादी पेशामा गुने अधिक पन्द्रगिरि पर्वत पर विशाख २४३ महीनेजा सके। बेख में पास RTR की सीमा दी जिससे विदित रोवाकिया प्राम अक्षय वेगो के समीप ही ईशान दिण में था। दान शक मेव .t, फाल्गुण पुदि ५ मामकारो दिया गया था। राज कुन्दकुम्वाम्बय देशीगण धमाका कुकुरासन मटधारित शिष्य शुभस मिसान्त देवलिय थे। दान की खेत में कहा गया कि माम-द्रव्य में स्टप करेगा या पुरतंत्र व बनारस में मात करोड पापिषों, अपिल गौओं व यंदा पहिती पात पापी होगा । ६० (१३) पाहुबलि यस्ति के पूर्व की ओर प्रपम पीरगल पर (गभगएक.८०) श्रीगायने - कागरवेने नंगन्द गङ्गवचन जडू पोगायपनंम्बरवरी योगेय (कोथिग ) मार्पगारण्टनमन ८ ॥१॥ रहसमणिय फायन कागदात RE fire जागकिरसमणिय कनिषिERRY मानगुने पागले। पोरने काan बायसिद विज्ञपि माis विरियाक्तिबिज गति गिरपद जियार पायिसि भूल हम पर रहिसि पागले पखानुबोरिगनानानिषE Ru अतिरि...लि वरंगम फोगान माम १४४ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख वेदरुविन रल्चि पललं तुलिलालगलनिकितन्त्र बी- रद...लदेल्गेयं परबलं पागलल्बाडिक...मागि वि- ल्ददटिनलुकेयं मेरेदु साबुदु वोचिगनन्तिलाप्रोल ॥३॥ नट्ट-सरल्गलिन्दिदक (फन्वयको) विकिडि केय्दुबेडिरो- ल्लिट्ट निसान्तहेतुगलिनादमगुळिसिटु वीलुवो- तोट्टने नोन्दु पोल्वेडेये(ल नय्य) गोण्डु विमान म...ले मुलमित्तरित गल बोयिगनं दिविजेन्द्र-कान्तेय... ॥४॥ [ यह एक वीरगल है। इसमें उल्लेख है कि गायन (नरेश) पर नाम रक्कसमणि के योयिग नाम के एक वीर पोवा ने 'योग' और "कोणेय गन' के विरुद्ध युद्ध करते हुए अपने प्राण विसर्जित किये। युब में इसने ऐसी वीरता दिखाई कि जिसकी प्रशंसा उसके विपिणे ने भी की] ६१ (१३८) उसी स्थान के द्वितीय वीरगल पर (लगभग शक सं०८७२) भी-युगविगे निज-विजय. श्री-युवतिये सपवियनिसे रण-मूर्ख-नृपा. मायदोलायद मेय-गलि यायिकनेम्व नगल्तेयं प्रकटिसिदन ॥१॥ मी-पायिवन यायिकन म. नामयिवेगे मभदानुसेर जायरयाग वाम् ..

पन्द्रगिरि पर्वच पर के शिवास भादर्तनयजल मादुवर दोयिसम्मनेम्बर पंसरि ॥२॥ मरोड युटिदोहरिपिन तवरेने धर्मदरगुन्तियने नंगल्दभूः भुवनको सायियग्यिगम् अवनिजेगं दोरयन के पंडिकमालर || धोरन वनयं वियुधो- दारं धरंगेसंदाक-विद्याधरमन्त मारमपिगे पतियेने पर मादमनायसिप पम्पिनोज पीलिपुर ॥४॥ भावक- पदाल परियनल परिने सम्म विति. पाकिताने पनि जनकात्मताने पिना. दषकि ताने पम्पिनोसन्धति वा जिन्दभकिम- भावसायियम्ये जिन-सन जानकाबि उरपरिवाशनाप शापिन्छन्द्र (उसी पाषाण के शिखर पर) .."रिमिसिदाधि.... मामा ...'मा मा ..."र....." मुम... ...रवि........ जिप "मु" "पनि""""pter- गिलगिपमियानिषगाना नाति मुनार कादि पक्ष .. स्विरनजननिसापिम्मे....." रियार... माता..""करिए.."जिनंगमई मुशिपिड"ft" यह स्त्री रेवती, देवी, १४६ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख नुव गदल बगियुरल्लि सत्तल ...."वेत्त....."यब्बे सायजेन्दु पंण्डतिये...."वोत्तनलोगले पललंदोलगिद रायद चल मसख चलगि गन्दिनिप्पण्डवियिन् । [ यह भी एक वीरगल है जिसमें पराक्रमी और प्रसिद्ध वायिक और जावय्ये की पुत्री 'साविय का परिचय है। सावियाने का पति 'धोर' का पुत्र 'लोक विद्याधर' था। सीता, मरुन्धती प्रादि सदृश रूपवती, पतिग्रता और धर्मप्रिया थी। वह पछी श्राविका थी। जिन भगवान में उसकी शामन देवता के सदृश भक्ति थी। उसने 'बगियुर' नामक स्थान पर अपने प्राण विस. र्जित किये ] [नोट-लेखका अन्तिम भाग जिसमें इस वीराजना के प्राण त्याग का वर्णन है, बहुत घिस गया है इससे स्पष्ट नहीं है। ऐसा कुछ विदित होता है कि यह सती स्त्री अपने पति के साथ युद्ध में गई थी और वह लदते-उड़ते इसने वीरगति पाई। लेख के उपर जो चित्र सुदा है उसमें यह नी घोड़े पर सवार हुई हाथ में तलवार लिये हुए एक हाथी पर सवार वीर का सामना करती हुई चित्रित की गई है। हाथी पर पड़ा हुमा पुरुष इस पर वार करता हुमा दिखाया गया। 'सायिल्ये' सावियब्वेका संवेप रूप] ६२ (१३१) गन्धपारण पस्ति में शान्तीश्वर की मूर्ति के पादपीठ पर (लगभग शक सं० १०४४) प्रभाषन्द्र-मुनीन्द्रस्य पद-परमपट पदा।

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिवलिस शान्तला शान्ति जैनेन्द्र-प्रतिविम्यमकारयात् ॥१॥ (मिइपीठ १२) उको षष-गुगं गोस्वाला मद्विभ्रमं भ्रयुगे कादिण्यं कृपयानितम्म-फलके धासंऽतिमात्र-क्रमम । दीपानेव गुणांकगपि सुभग सौभाग्य-माम्यं व म्यक् शान्तल देषि वक्त मवनी शक्नोति काया कविः ॥२॥ राज राज-होव पाश्र्व विष्णु-महीमा । विख्यातायान्सलान्या सा जिनामामकारपत ॥३॥ (मार-साय पनि निमाय माता ...... पिकत में से 1 राषाा। दंगी (10) एर कट्टे पस्ति में पापोरवा की मूर्ति फे दिपीठ पर (सशक से 10.) शुभषन्द्र-गुननिय सिमा घिद्ध-मन्दिनः। पद-पप-राणे समीपमाdिund || याता परिक्षाali sat fulari jan यो राजिनामविस या पानी पर काय माहिर अपना गाना - चन्द्रगिरि पर्वत पर शिखालेर सालमोळसवि गुफैक-वसति यावीवनामवनाम् ॥ २॥ मोमूलसर देसिग गयद पुस्तकान्वय ॥ ६४ (७०) फत्तले पस्ति की ऊपर की मञ्जिल में सादीवर की मूर्ति के सिहपीठ पर (लगभग शकस.१०४०) भरमस्तु मोसूचसहर देशिगयर श्रीशुभचन्द्र मिसान्त र गुणनायक-ग(र)न्यनु तम्म वापि पो. पग मारिसिपमावि मङ्गलं ।। { एना गमय (या गरम्प) यमnिt. facuी पानी माता पोचलिए FAll t। ( मान) गामन पस्ति में सादोसर की मूर्ति के मिडपीठ पर (गनम स०१०४.) भामरागनगन्द्राय IIT KAIL. HIT मित्रनाम माता पालाम्बा पच्याrinister infEARTIATERIAHINit" चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षाशेम्व ६६ (१२०) चामुण्डराय यस्ति में नेमीबर की मूर्ति के सिंहपीठ पर (जगभग शक से.१०६०) गङ्गसनापतम्सुनुर एषण भारणीचयः । नायरन जैनत्यापायमधीकरत ॥१॥ बुपयन्सुस्मता पन्धुरेषणः कमक्षापयः । घोषणापरमामायालयमा ॥ ऊपर फी मशिल में पार्थनाय की मूर्ति के पादपीठ पर (गभग स. १६) जिन गृहम पेजमाना अनमेल्लंग मामुपहन. दनावर भासिद जिन-देवपनजितमन-मुनिया ॥१॥ [igar Mare Youniste Kaile wir faleman चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिक्षाजेस ६८ (१५) काचिन दाणे के एक स्तम्भ पर (शक सं० १०५६) (उत्तर मुख) श्रीमत्-परम-गम्भीरस्याद्वादामोघलान्छन । जीयात्रैलोक्यनायस्य शासनं जिनशासनं ॥ १ ॥ स्वस्ति समस्तगुणसम्पन्नरप्प श्रीमत् त्रिभुवनमल्ल चलद- कराव होयसल-सेट्टियरु भव्यावलेय युण्डिगेय दम्मिसेट्टिय मगं मल्लि-सेटिगे चलदराव होसलसेट्टिय् एन्दु पेसक्कोट्ट- रिन्तु सकवर्ष १०५८ सौम्यसंवत्सरद माघ-मासद शुष्ठ- पक्षद सङ्क,मणदन्दु वनवसानमनरिदु वन्न बन्धुगलं विडिसि समचित्तदोलु मुडिपि स्वर्गस्थनादं ।। (पश्चिम मुख) भावन सति एन्तप्पलेन्दडे ।। तुरवम्मरसग सुग्गवेग सुपुत्रि स्वस्ति श्रोजिन-गन्धोदक- पवित्री - कृतोत्तमाङ्ग युरुमाहाराभयभैषज्यशास्त्रदानविनादेयरप्प चट्टिकब्वे वन्न पुरुष चलदङ्कराव होयसल सेटिगं वनगं वन्न मग बूचणङ्ग परोक्ष-विनेयमागि माडिसिद निसिधिगे ॥ [त्रिभुवनमठ घळदरावहोरसलसष्टिने दम्मिसेहि के पुत्र मलिसेहि को चलदकरावहोरसलसेष्टि की उपाधि प्रदान की। मलिसेष्टि भय्यावले के एक राज्यकर्मचारी (युण्डिगेय) थे। इनकी पत्री जैनधर्म-परायया चष्टिकम्वे थी जिसके पिता और माता के नाम पन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख १५१ समयः मुरम्मरस पर मुग्गम्बे थे। इसी साध्वी स्त्री ने अपने पति की यह निपया निर्माण कराई। [नोर-सरसावले सम्भवत. बम्बई प्रान्त के कलादि जिलान्तर्गत भाधुनिक ऐदोने का ही प्राचीन नाम है। लेख में शक १५ सौम्य संवरसर का ख है। पर ज्योतिप-गणना के अनुसार शक 1. पिज़ल संवत्सर और पौम्य मेवासर ससे पाठ य पूर्व शक. १.१में पा। अतएव लेख का ठीक समय शक सं...१ प्रतीत होता ६८ (१५८) काञ्चिन दाणे के प्रवेशद्वार के निकट पड़े हुए एक टूटे पापाण पर (लगभग शक सं०१०४२) (प्रथम मुस) "व्यावृत्तविच्छिरये। ...क...कलिकल्मपत्यानुदिन श्रीबालचन्द्रमुनि पश्याम श्रुव-रब-रोहणधरं धन्यास्तु नान्ये वयं ॥१॥ प्रचुर-कलान्वितरकुटिलरचयजसुर-पर-यच- पापचय-प्रकाशनपालचन्द्र देवप्रभावमेनच्चरिये ॥२॥ श्री बालचन्द्र ...... 'पापापाप नही मिलता।

.. १५२ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख (द्विवीय मुख) "भद्रमप्प त्रिलो....'वरविहितपूर्त नित्य- कीर्ति.चित्य-समुचितचरितो य...रधृत...घुविन......यित्वाई भुजविम्बचिवमणि .....फर स्यं चिरादिमु......सम... ......गतिभिस्स......सनियरुद्ध-श्रीकवि......नध......... श्रीवई... (तृतीय मुख) ....रानो यभा......चित्रवनूभृताम......यतेवरा.... मकल......वन्य पादारविन्दं स...ममूर्ति सर्वसत्वा... दुरिव-राशिभव्यद......नुविजित - मकरकेतु.........तिम्र- वीन्दं । भाना... ..सुविक...पका......रो उत्पद् भव...... [यह लेख पहुत टूटा हुआ है। इसमें गाळपन्द्र मुनि की कीति' बर्षित रही है। द्वितीय पद्य पम्परामायण (मारवास । पम्) में भी पाया जाता है। ७० (१५५) अनदेव मन्दिर के निकट पड़े हुए एक टूटे पापाण पर (लगभग शक सं० १०४२) .....दा...वयदहन...य यलिय श्रोगुण पन्द्रसिवान्त. देवरपशिष्यह भीनयकोनिसियान्व-पक्रासिंगल शियर श्री.

चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिक्षास्त्र दायणन्दिविषदंबई भानुकोशिंपिताम्बर श्री प्रथा- मिपालचन्द्रवह ॥ परमागमवारिधि (हिम. फिर सासक नपकीसिपी. घरशियन..... सचिन परिजनप्यारिम पाणषाद्र गुनी ।।।। साह,... ( सराहा गया. (मा) RIMI. गुण fiamini nuncita' Nam. मबि fan, Higeria and man. पहली Aeri umrst artun Rate ME MIR.htmart भद्रपा गुफा के भीतर की ओर चहान पर.(ino kute) (Minist...) भद्रबाहु काम में जिनपन्द्र int.

. चन्द्रागिरि पर्वत पर के शिज्ञास ७२ (१६७) भद्रपाहु गुफा के बाहर परिचम की सोर चट्टान पर (शक स०१७३१) शालिवाहन शमादाः १७३१ नेय गुलनामात्सरा भारपाय ४ पुपारयति । कुन्दान्यान्य (न्य) देसिगया को गा। शिष्यराम गजितकीर्ति-देवरु प्रारशियह शान्ति- फोर्ति र शिष्यराद अगितकीर्तिीस मासेमा सम्पूर्ण माहिरियशि देवगतराल । [नवाबप शीगणपति पDिan ufantatus foप शाम शिप fift -मास पाम परणार ... भात Tu स्वगंगति प्राप्त भद्रयाहु गुफा के मार्ग पर गरगिल के पाम महान पर (ममाग गरम ११) wire भारमयामरद मा काम HEMA विमा बास {स in urming Trail 4 krtana fansl चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख पर वाय पलाये। बेख में मेसर का नाम ईश्वर दिया हुमा है। शक ईस्वर मवसाया] ७४ (१६५) भाकार के बाहर दक्षिण भागस्थ तालाब के उत्तर की ओर चहान पर (सम्भवतः शक सं० ११६८) स्वखि भीपराभवसंवत्मरद मार्गसिर अहमी मुक्रवारदन्दु मलेयाल प्रभ्याशि-नायक हिरिय- बेदि चिकवेष॥ (मलयाळ पारि मायने विश्वगिरि सेयमिरिकाममा उगाया में राम र सोख है। ME पराभव बर पा] मार्गसिर बहुल १५४ चन्द्रगिरि पर्वत पर के शिलालेख ७२ (१६७) भद्रबाहु गुफा के बाहर पश्चिम की ओर चट्टान पर (शक स० १७३१) शालिवाहन शकाच्दाः १७३१ नेय शुक्लनामसंवत्सरद भाद्रपद व ४ बुधवारदखि । कुन्दकुन्दान्य (न्वय) देसिगणद श्री चारु। शिष्यराद अजितकीर्ति-देवरु प्रवर शिष्यरु शान्ति- कीर्ति देवर शिष्यराद अजितकीर्तिदेवर मासेापवासयं सम्पूर्ण माडि ई गविधि देवगतरादरु । [कुन्दकुन्दान्यय देशीगण के चारु ( कीति पण्डितदेव ) के शिष्य भजितकीतिदेव के शिष्य शान्तकीति देव के शिष्य भजितकीति देव ने एक मास के उपवास के पश्चात् श. 1.11 भावपर यदि बुधवार को स्वर्गगति प्राप्त की। ७३ (१००) भद्रयाहु गुफा के मार्ग पर घरणचिह के पास चट्टान पर ( मम्भवतः शक स० ११३) स्वस्ति श्री ईश्वर मयस्सरद मलयाल कारयु-मख इल्लि एप गरेय हरण हुणिमय मुगुडिग [इस स्थान पर बोका मउपायु मने पार भूमि पश्चिम से बहमनी ममीप की शियायी चन्द्रागिरि पर्वत परके शिलालेख १५५ पराण पलाये। लेख में संवसर का नाम ईवा दिया हुआ है। शकईश्वर संवत्सर पा] ७४ (१६५) माफार के बाहर दक्षिण भागस्य तालाब के उत्तर की ओर पहान पर (सम्भवतः शक सं० ११६८) स्वस्ति भोपराभवसंवत्सरद मार्गसिर अष्टमी मुक्रवारदन्दु मलेयाल प्रभ्यादि-नायक हिरिय- बेदि चिकट्टच्ष ॥ मिळया माहि मायने विन्ध्यगिरि से चयगिरि का निशाना गाया। लेख में पराभव संवत्सा का उपख है। शक ME पराभव स्वत्सर पा] मार्गसिर बहुल

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विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख ७५ (१७९-१८०) गोम्मटेखर की विशालमूर्ति के यामचरण के पास नागरी प्रससमें मो चापडे-राजें करवियले। (लगभग शक सं०६०) श्रीगणराजे सुचाले करवियन्ने । (लगभग शक सं० १०३८) [चामुण्मराज ने ( भूति') मतिरित कराई। गाजने परकोटा निर्माण कराया। ७६ (१७५,१७६,१७७) दक्षिणवरण के पास (पूर्वद हले कन्नड़ पचरी में ) प्राचामुण्डराज मादिसिदं । (पन्य और वनुत्त,,) ग्रीचामुण्डराजन् सेजितान् । (कम प्रवरी में ) रोगङ्गराज सुधालयवं मादिसिद। [वारपर्य' पूर्वोक्त और समय भी पूर्वानुसार] १५८ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलाख ७७ (१८४) पद्मासन पर (लगभग शक सं० १०७२) स्वस्ति समस्वदेत्यदिविजाधिप-किन्नर-पन्नगानम- न्मस्तक-रलनिर्गत-गभस्तिरावात-पाद......। प्रास्व-समस्त-मस्तक-तमः पटलं जिनधर्मशासनम् विस्तरमार्गनिल्के घर-बारुधि-सूर्यशशाङ्करुद्धिनं ॥ १॥ [जैनशासन सदा जवन्त हो। ७८(१८२ वाम हस्त की ओर बमीठे पर ( लगभग शक सं० ११२२) श्रीनयकीर्तिसिद्धान्तचक्रवर्तिगल ट्टियरु सत्तालयद भित्तिय माडिसि चवीसवीर्यकरं माडिसिदर मत्त श्री बसविसेट्टियर सुपुत्ररु नम्विदेवसेटि बोकि सेट्टि जिनिसेट्टि बाहुबलि-सेट्टि वम्मग्य माडिसिद वीर्यकर मुन्दय जालान्दरवं माडिसिदर । [नयकीन सिदान्त ववर्ति के शिष्य बसविष्टि ने पाकोटे की दीवाल बनाई और वारीस तीर्थ करो प्रतिष्ठित कापाव नके पुत्र मम्मिदेव सैहि, बोकिसहि, जिपिसेष्टि और बाहुबलि सेहिने ती के सम्मुख प्रालीदार वातायन बनवाया।] गुड प्रोवसविसे-

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विन्ध्यगिरि पर्वत पर शिलालेस ७८ (१८५) उपर्युक्त लेख के नीचे जहाँ से मूर्ति के अभिपेफ के लिए व्यवहार में लाया हुलाजल बाहर निकलता है (लगभग शक मं० ११२२) प्रोजलिन सरार ८०(१७८) दक्षिण हस्त की ओर यमीठे पर (लगभग शक सं० १०८०) श्रीमन्महामण्डलेश्वर प्रतापहायमन नारसिंहदेवर कैयलु महाप्रधान हिरियभण्डारि हुल्लमग्य गोम्मटदेवर पारिश्चदेवर पतुर्विवितीर्यकर प्रष्टविधानगं रिपियराहारदान सव. परं विटिसि को दचि । [महामधान हुएमप ने अपने मामी होय्साल नरेग मारसिंह देर से सबक (नाम प्राम पारिताप में ) पान उसे गोम्मर हामी की महविध पूरपार शपि मुनि श्रादि के बाहर भवरदिया] ८१(१८६) तीर्पकरमुत्तालय में (सम्भवतः एक सं० ११५३) मोमत्सरमगम्भीरस्याद्वारामोघलान्छन ।

पदुमसेट्टिय मग १६० विन्ध्यगिरि पत र गिलाघ जीयात् तोक्यनाघस्य गामनं जिनगामनं ॥ १ ॥ स्वस्ति ममस्तभुवनाश्रयं प्रायो-वल्लभ-महाराजाधिराज- परमेश्वरं द्वारापतीपुरवराधीधरं यालाम्यामधि म. चूडामणि मगरराज्यनिम्मूलन चोलराज्य-प्रतिप्राचार्य श्री. मत्यतापचकनि दोयमन-श्रीपोरनारमिंहवरमह पृथ्वीराज्य गंय्युत्तिरलु तत्पादपोपनीवियुं श्रीमनमकीर्ति-सिद्धान्त. चक्रवत्ति गल ग्रिप्या श्रीमदध्यात्मयालचन्द्रदेवर गुड खति समस्तगुणसम्पन्ननुं जिनगन्धोदक-पवित्रोमोत्तमाङ्गनुं सद्धम्म- फघाप्रसङ्गनुं चतुर्विधदानविनादनुमप्प गोम्मटट्ट सरसंवत्सरद पुष्य शुद्ध उत्तरायय-सङ्क्रान्ति पाडिदिय बृहवारदन्दु प्रोगाम्मटदेवर चम्बोसतीत्यंकर अट- विधानेगे अक्षयभण्डारवागि कोट्ट गद्याप ।। १२ ।। [ दोरसल नरेश नारमिह के गज्य में पदुमसेष्टि के पुत्र व अध्यामि पालचन्द्र देव के शिष्य गोम्मट सेहि ने गोम्मटेश्वर की पूजार्चन के लिए १२ 'गद्याण' का दान दिया।] [नोट-दान 'खर' सवामर की उस तिथि को दिया गया था। शक. १३ खर सरसर था। ८२ (२५३) ब्रह्मदेव मण्डप में एक स्तम्भ पर (शक सं० १३४४) (दक्षिण मुख) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामाघलान्छन । ]

विभ्यगिरि पर्वत पर के शिलालेस
जीयान लास्यनाथस्य शासन जिनशासनं ॥१॥
श्रीयुक्रायस्य बभूव मन्त्री श्रीवैषदण्डेश्वरनामधेयः ।
नीतिदीया निखित्वाभिनन्या निश्शेषयामास विपद्ध-
लोकम् ॥२॥
दान पेकपयामि लुब्धपदवी गाहेत सन्तानको
वैदग्धिं यदि मा वृहस्पतिरुया कुत्रापि सेलीयते ।
शान्ति पेदनपापिनी जडठया स्पृश्यत मर्च सहा
स्ता वैषपदण्डनंतुरदनी शम्यं कवीनां कां ।। ३ ।।
सम्मादजायन्त जगद्जयन्तः पुत्रास्त्रया भूपिवधारुशीला:।
भूपितोऽजायव मध्यलोकोरलत्रिभिज्जैन इवापवर्ग:॥४॥
दरुगपदण्डनाधमय बुझपमप्यनुजी
स्वमहिमसम्पदाविरचयन सुतरां प्रपिता ।
प्रतिभटकामिनीपृथुपयोधरहारहरी
महिवगुणोऽभवद् जगति मङ्गपदण्डपविः ॥ ५॥
दाक्षिण्यप्रयमापदं सुपरिवस्यैकायस्सत्यवा-
गाधारस्सतत वदान्यपदवीमचारजहालकः ।
धम्मपिनवर' धमाकुलगृह सरजन्यसवभू
कोर्ति मङ्गपदण्डपोऽयमवनाजेनागमानुव्रतः ॥ ६॥
जानकीलभवदस्य गंदिनी चाशीलगुणभूपयोज्वला ।
जानकीव.वनुत्त-मध्यमा राघवस्य रमबीयतेजसः ।। ।।
प्रास्ता तयारस्तमितारिवा! पुत्री पवित्रोकृतधर्ममार्गी।
जापानभूत्तत्र जगद्विजेता भव्यामणो चैनपदण्डनायः॥८॥

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख इरुगपदण्डाधिपतिस्तस्यावरजस्समस्तगुणशाली। यस्य यशश्चन्द्रिकया मीलन्ति दिवाप्यरातिमुखपद्माः॥६॥ वृत्त। ब्रह्मन् भाललिपि प्रमार्जय न चेद् प्रावहानिर्भवे- दन्या कल्पय कालराजनगरी तद्वरिपृथ्वीभृतां । वेताल प्रज बर्द्धयोदरवति पानाय नव्यासृजा युद्धायोद्धतशावर इरुगपदमापः प्रकोपोऽभवत् ॥ १० ॥ यात्राया ध्वजिनीपतैरिरुगपदमापस्य धाटीघटद्- पोटोघोरखुरप्रहारतविभिः प्रोतधूलिग्रजेः । रखे भानुकरेऽगमरिपुकराम्भोजं च संकोचनम् (पश्चिम मुख) प्रापत्कीर्तिकुमुदती विकसने दीप्तः प्रतापानमः ॥ ११ ॥ यात्रायामिरुगेश्वरेण महमा शून्यारिसौधाङ्गण- प्रोखाम द्विधुकान्वकान्तशाले गच्छदनेभाधिपः । इवा स्वप्रतिमा प्रविद्विपमिति छिन्नकदन्तस्वदा पाहि पाहि गजाननेति यहुधा वेताबन्देसतुतः ॥१२॥ को पात्रा लिखिवं ललाटफलके वनं प्रमाष्टुं समो वार्ता धूसंपामयोमिति वयं वामि मन्यामहे । या पाण्यामिरगेन्द्रनृपती सखातमा प्रियो निरोरप्यधिकप्रियापटि रिपुस्सीपी:0१३॥ यह वादाविरगंन्द्ररणनृपतेम्बिभ्रत्यनन्याधुरं पाधीशफयागये नियमिठा मखानापास्सरा।

विध्यमिति पद पर सिमास लिनमान्द्रयम्भावना भूमापतिः पारमा मनामधारावगुहार धातुंभामफपी ।।१४॥ भादरमपदमपादिमापर षपस ममापवनित्यानम् । हिमावास्यनिहाम्पमन सपोर्च मारास पभूव दूरे ॥ १५ ॥ पाने पाम्य मुशात्र एक या दोनेपुरथिर्जिने भपिरम्भप जिनंन्द्रपरामामाकर्मनेषु भूती । जिया सद्गुली नेषु वपुपम्साल्यं प सद्वन्दने माय मायाजमारनयर सर्व प वत्संवने ॥ १६ ॥ पिरुगपदनाममा धवजे भुवने मलिनिममास्तर. परमधारह रिकुरं। पति पतम्य या परिघे परखीवजयं परमिरीराम-कदापि प वत्कृपयोः॥ १७ ॥ बिस्मृत कृष्णलेर विकासलबाटस्थ - राकोरम पयोधरवटेरस्पष्ट मुक्तागुषः। विम्बाप्टरपि वैरिराजमुद्रास्वाम्यूलरागाग्मिते. यस्य स्फारतरं प्रतापममद् भ्याकुलते सर्वतः ॥१८॥ पूर्वमुख) याकीर्तिभिस्मुरघुनीपरिलहिनाभि- र्धात चिराय निजविम्बगते फल ।

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख स्वच्छात्मकन्तुहिनदीधितिरङ्गनाना- मव्याजमाननचि करलीकरोति ।।१६।। यसादाब्जरजःकरणा प्रमुवते भक्त्या नताना भुवं यत्कारुण्यकटानकान्तिलहरी प्रचालयत्याशय । मोहाहरणं सियाति विमला यद्वैसरोमासरी वन्द्यः कस्य न माननीयमहिमा श्रीपरिडताय? यतिः ॥२०॥ मन्दारद्रुममखरोमधुझरोमन्जुस्फुरन्माधुरी- प्रौढाहद्दतिरूढिपाटयपरीपाटी फुकाटी भटः । नृत्यदुद्रकपर्दगर्तविलुठोंकनोजिनो- सद्यापी सलु पण्डिताय॑यमिना व्याख्यानकोलाइन: कारुण्यप्रथमावतारसरचिरशान्तन्निशान्तं स्थिरं वैदुष्यस्य तप.फलं सुजनतासौभाग्यभाग्योदयः । कन्दपद्विग्देन्द्रपश्चपदनः काव्यामृताना यनि- गर्जेना-भाम्बरभास्करश्श्रुतमुनि गर्ति नप्रतिजिन् ॥ २२ ॥ युक्तयागमाग्नंगविज्ञानानमन्दरादि- शब्दागमाम्बुदकाननपान सूर्यः । शुद्धारायः प्रतिदिन परमागमन सबने ग्रुतमुनियंतिमायभामः ॥ २२ ॥ वत्सनिया येनुगुलं अगदमाता श्रीमानसारिरुगपाइप रानामः।

1- farvinा शिवाय बागुम्मटरपरमनामना. मामातम पेनुगुलापमापीर: ॥ २४ ॥ शुभकृति पत्सरे जपति कार्ति फमासि सिपी। मुरमपनम्मामुपजारि गीतरुपी ॥२५॥ गदुश्मन निमिसनरीनापाम् । मपियापमोदिवा दियः ॥४॥ रुगपरिमयसमान। भावारमिदं पेलगतार्थ प्रकाशवामतुल ।।२७ ॥ दानपाननयाम्मभ्य दानात्ययाऽनुराबने । दानाल्यार्गमवावाति पालनादायुतं पदं ॥२८॥ स्वदना परदा वायरच वसुन्धरा । पष्टि साथि विशया जाय किमिः ॥२॥ मान्न महा श्री श्री श्री श्री ।। न०२ के पश्चिम की ओर मण्डप में एक स्तम्भ पर (शक स० १९२१) श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामोपलादनं । जायात्यायनाषस्व शासनं जिनशासनं ॥१॥ सति श्री विजयाभ्युदय शालिवाहनशकपर्प १६२१ने सलुव गोभकृतु संपासाद कार्तिक घ ११ गुरुपारपल्ट श्रीमन् महाराजाधिराज राजपरमेश्वर कीटकराज्याभिपवय *शमारानार देखा।

१६६ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख परितृप्त परमाहाद परममङ्गलीभूत षड्दर्शनसंरक्षणविर- चयोपाय विद्वद्गरिष्ठदुष्टदुप्वजनमदविभखन महिशूर धरा- धिनाघरप्प दोकृष्णराजबडेयरैयनवरु ।। मत्तं ॥ वृत्त ॥ जनताधारनुदारसत्यसदयं सरकीर्तिकान्ताजयं विनयं धर्मसदाश्रयं सुखचयं तेजः प्रवापोदयं । जननाचं वरकृष्णभूवरलमत्प्रख्यातचन्द्रोदयं पनपुण्यान्विततत्रियाण्म पडेदं सर्मसम्पचियं ॥२॥ कन्द ॥ आमाल्गुलदचलदि सोमार जरिव देवगामटजिनपन । श्रोमुखवयलोफिसलोड. नामोदवु पुष्टि हरुपभाजननुसुर्द ॥३॥ वचन ॥ पाविमपवित्रनुं कृष्णरामपुङ्गवर्नु गुमर जिनधर्मके पिटन्य प्रामाधिप्रामभूमिगन् । प्राईनइलियुं । दोसहधियुं । जिननाथपुरं । वस्तियमाममुं । रापना ल्लियुं । ननधियु । जिननरसियुं । कोपचुगल बेरस कम-बेलुगुलममेतं । मप्यममुमुवन्नेवर सप्तपरमसा नाधिपतियप गोम्मटम्वामियर पोत्सवमा पुण्यममा मम्प्रात्यनिमियायागियुं । मजाममित्रा-माधिप मम्बमान्यागि दयपातिसियु मत्त। दभिराल्या. पिय भागोनिप्पं प्रमादिगलिगे।

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख सगपियु कबामाम जगदेरयनु कृष्णराजशेसर नित्त ॥४॥ इन्ती पल्गुणधर्म अन्तरिसरे पन्द्रमर्यरचनेवर। सन्दसदिन्देम्मय भू. कान्स सिलि धर्मशियय ॥५॥ यो धर्ममं परिपालिसिदवर पार्यकाममा पाप पश्युबर।। पूछ । प्रियदिन्दी जिनपर्भमै नयिर्गायुं महाकायु- मयि कायम नीरपापिणे फुरुक्षेत्रादियान वापरा. शिवालस्कोटि मुनीन्दर कपिनेयं वदापरं का. म्हय मामिरेलु कृप्यनुपर्शलाचारगा मम ॥ इविमासं भवतु ॥ का भी की। [मेगा-परेश बोडेया Atta AIR बिरसे afsarita में RAATAN Ram प्रामाराम पाक में ga [ोर-श में RTwitten को शोभापही पाR ARCreatt. 4. Suntal सोमrani विन्ध्यगिरि पर्वत परक शिलालेख ८४ (२५०) उसी स्तम्भ की दूसरी बाजू पर (शक सं० १५५६) श्री शालिवाहन शकवरुप १५५६ नेय भावसंवत्साद आपाढ़-शु-१३ स्थिरवार ब्रह्मयोगदलु श्रीमन्महाराजा. धिराज राजपरमेश्वर मैसूरपट्टनाधीधर पढ्दशन-धर्मस्थापना- चार्यराद चामराजगाडियरु भय्यनवरु बेलुगुजद म्यानदर क्षेत्र यहुदिन प्रयु मागिरलागि प्राचामराजबोडेयरु-मय. नारु योवव भइवहिडिदन्तावरु होमवोसन केम्पप्पन मग चन्नपन वेलुगुलद पायिसेट्टियर मफलु चिमग्न चिग. पायसहि यिवरु मुन्ताद मध्यहिडिदन्वावर रस निम्म पर. पिन मालवन तीरिमेनु यमनागि चमन चिमान निगपापि सेहि मुदण्न अज्जापन पदुमप्पन मग पण्डेण्न पदुमरमम्य दान पश्चयाय निगम मग यम्मप्प बोम्मथरि विजेयन गुम्मन पाकमोनि' नागप येत्य्य घोम्मिहि दोपहाय रायपन परियनगोड यरसहि बरन यीम्य ६५ मुन्तार समस्लम वम्म नन्देवाविगविगं पुण्यं गालियन्दु गोम्मटामि मनिधियति सम्म गुरु चारुकीर्तिपतिरेर मुन्दे पाn. रचागि यो-प्रदिन पत्रमालयनु यी-म र सानो यो- वर गौदुगबु योमानानु पागकागि का यी विहन्त पयमाचरनु पापना भतुपियर काशिरामalia उक्त विन्ध्यगिरि पर्वत पर फ शिलालेय साहसकपिलयनु बामणरनु कौन्द पापके हागुवक येन्दु धरेद शिक्षाशासन || श्री श्री ।। [पेन्गुल मन्दिर भी जमीन मादि बहुत दिनों से रहन थी। विपि को महान चामराज मोडेयर ने पत्र मादि नदारों को दुलार कहा कि मुम मन्दिरों की भूमिका मुरू कर दो, हम तुम्हारा रुपया देते हैं। इस पर सहनदारों ने अपने पूर्वजों के पुण्य-निमित्त विना कुछ लिये श्रीगोम्मटम्मामी भार अपने गुर चारकोनि पण्डिन देव की साचो में मन्दिरों की भूमि एन से मुक्त कर दी और यह शिला- खेस बिपाया। ८५ (२३४) गोम्मटेश्वर-द्वार की याई और एक पाषाण पर (खगभग शक स०११०२) श्रीगोम्मटजिननं नर- नागामर-दिविज खचर-पति-पूजितनं । योगाग्निहतस्मरन योगिध्ययननमयनं स्तुनियिमुवें ॥१॥ क्रमदि मेवाणदारद कमदे पाद विटु नग्नि च- अमटुं निःप्रभमागे सिग्गनीजाण्डात्माप्रजङ्गोल्पु गं- रदुमहाराग्यमनिनु पागि वपदि कारि विध्वसिया. द महामं पुरुसूनुयाहुयलिवाल मचारा मानानवर ॥२॥ भूतजयवाहवाहुबलिकेवलिरूपसमानपञ्चवि- विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख शति-समुपेव-पञ्चशवचापसमुन्नतियुक्तमप्प तत्- प्रविकृतियं मनोमुददे माडिसिदं भग्तं जिताखिल. चितिपविचकि पोदनपुरान्तिकदोल पुरुदेवनन्दनं ॥३॥ चिरकालं सले सजिनान्तिकरित्रोदेशदोल्लोकभी- करणं कुफुटसर्पसकुलमसमल्यं पुढे दल कुफुटे. श्वर-नामन्तदघारिगादुदुयलिषं प्राकवर्गातगो. चरमन्तामहि मन्त्रतन्त्रनियताण्याचिन्नु पलर ॥४॥ केलकप्पुदु देवदुन्दुभिरवं मातेनी दिव्यार्चना- जालं कापलुमप्पुदाजिनन पादोद्यानस्वास्फुर- ल्लीलादर्पणमं निरीतिसिदवाण्वनिजातोव ज- न्मालम्याकवियं महाविशयमावशिलावियुवं ॥५॥ जनदि वन्निनविश्रुतातिरायमं ता केतु नापत्ति पे. तनेयाल पुहिरे पागलुचमिसे दूरं दुर्गमं सत्पुरा. वनियन्दार्यजनं प्रपोधिसिहोइन्वाइन्दु बरेवक- ल्पनेयि माहिपेनेन्दु माडिसिनिन्तीदेवने गामदं ।।६।। श्रुतम दर्शन गुटियु विभा सदात्त, दान, धृतियु ननोजे मन्द गायलय राघमर जग. न्नुननाभूमिपनद्वितीयविभां चामुण्डराय मनु प्रतिम गाम्मटन मारिसिनिम्तो देवने यनthil प्रतिनधाविया शवागारासान्दप्यमान गमुं नुनमोलदस्यमुमागे मत्ततिशयंवानागदोनय। नुतसन्दिप्यमुग्विावियप व निन्दिर विन्ध्यगिरि पर्वत परके शिलालेख वितिमम्पत्यमा गोम्मटेश्वरजिनीरूपमात्मोपमं ॥८॥ प्रतिविलं परंपज मयं नरये नोडल नाकलोकाधिपं स्सुविस्यम्म फपिनायक नेरेयनेन्दन्दन्यरारारि । प्रतिविलं बरेयल ममन्तु ववे नाटल बग्निसख निस्समा- कृतियंदतियाफ्टेशवनुवं माश्चर्यसौन्दर्यम || मदुपारदु मेले पपिनियई कनद्वयरिंशदोल मिरुगुत पारपाण्मुगुं सुरभिकाश्मोरारपच्छायमी- रदाश्चर्यम्नीनोकद जन धाने कण्डिदा. मेवजेट्टन गोम्मटेश्वरजिनो मूर्तियं कात्ति'सल ॥१०॥ नेलगट्टानागना जमवनि दिशाभित्ति भित्तिमजं स्व- स्तमभाग मुघर्ष मेगण सुगर विमानोरकरं फूटजालं । विलमत् सारीपमन्वयितवमणिवितानं समन्तागे नित्यं निलयं श्रोगाम्मदेयङ्गनिसिदुदु जिनाधावलोकं त्रिलोक अनुपमरूपने स्मरनुदमने निर्जितचाक मत् दा- रने मेरे गेल्दुमिसनखिोलियनत्यभिमानिये अपस- स्थनुमेरगप्रयित्नयोशिरपुदेम्वननूनयोधने विनिहतकर्मबन्धनने पाहुयलोणनिदेनुदायनी ॥ १२ ॥ अभिमानस्थिरभावमं नमर्ग माल्कयुद्घमानोगत शुभसौभाग्यमनङ्गज भुजबजावष्टम्भमं चकत्र- तिभुजादपवित्रापि याहुबलि कृप्पाच्छेदम मुक्करा- ज्यभरंसुलियनानिचिपदंश्रीगोम्मटेशंजिनं ॥१३॥ .

" १७२ विन्ध्यगिरि पर्वत पर शिजानस फुरदुद्यात्मिवान्वियि परिसरमौरभ्यदिन्दं दिगी स्करमं मुद्रिसुतुं नमेरुसुमनावर्ष स्फुटं गोम्मटे. श्वरदेवोत्तमचारुदिन्यशिरदौल देवकलिन्दादुई धरयेल्लं नर फन्डुदामहिमेयादेवदाश्वयमं ॥ १४ ॥ एनगायतीतिशलागदारतेनगे कागल्केम्वत्रालाटते स्वनिताबालकवृद्धगोपतियुं कण्दुल्करिन्दार्जिन । दिनवोन्दावगमुद्घदिव्यफुसुमासारं महीलोकली-, चन मन्तोषदमाटनु गोम्मटजिनाधीशोचमाशापशेल ॥१५॥ मिरुगुव तारकप्रकरमोपरमेश्वरपादसेवेगे- न्दरपुरे भक्तियिन्दमेने निर्मलिनं घनपुष्पवृष्टि ब. न्दरगिदुदभ्रदि धरंगदभ्रतराद्भवहर्षकोटि कण- देरेदिरे सन्द येल्गुनद गोम्मटनापन पादपद्मदोल ॥१६॥ भरतननादिचक्रधरनं भुजयुद्धदे गेल्द कालदाल, दुरितमहारिय तविसि केवलवधिमनाल्द कालदोल। सुरवति मुन्ने माडिदुदु पुमलेयोदारयकुमेम्विनं सुरिदुदु पुष्पवृष्टि विभुबाहुबलीशन मेले लोलेयि ॥१७॥ कम्मगिर्दक नाह पलवन्दद नन्दिद विन्दिगलं नी मालागि देवरिवरेन्दवरं मतिगे? निनने. कम्म तालल्विदप्पे भवकाननदाल परमात्मरूपन गोम्मटदेवन नेनेय नोगुवे जावि जरादिदुःखमं ।।१८।। सम्माहवागलाग कोलयु पुसियुं कलबुं पराङ्गना- सम्मतियु परिप्रहर मात्रै युमेम्बिवरिन्दमादाडे- विन्यगिरि पर्वत परके शिलालेख न्, मनुजागिरप्रेय परप्रेय कंटेनुतुं महाघोल गोम्मटदेवनिई सले मारुवाले सेदिनीधिम ॥ १६ ॥ एम्मुमनीरमन्मनुमनिन्दुवुमं नेविल्लुमधुर्म कंम्मगनाययुधमने मादि विसर नपर्क पुण्दु नि. दिम्मिनिता दें पडेबुदेन्दविमुग्धयरल्पनादमुं गोम्मटदेवाननफिविगंदवे निन्नवालारा निःपर् ॥२०॥ सम्मनिकनी चिसुदयन्देलेयं लतिकालियर्कलं सम्मन्नलिन्दे वन्दु बिगियप्पिदरम्यिनमगरधि पु. सुं मुरिदाचि वन्त कतिकालियुमोप्पे पानियोगदान गोम्मटदेवनिर्दिवहीन्द्रसुरेन्द्रमुनीन्द्रवन्दितं ॥ २१ ॥ सम्मनेपादरेननुभरे रुमेरद वपके नीनुमि- न्तम्म तरको वादाडेनगीसिरियोप्पदु पेठेनुत्त म. ज्ने मनमिल्दुमभुमिगेयुं वगंगोल्लदे दीगोण्डे नों गोम्मटदेव निम्न तरिसन्दल पार्यजनके गाम्म ॥२२॥ निम्मढियन्न धात्रियोलगिई पुषिदु वेद धात्रि का निम्मदुमेन्नदुं गंवोडल्लदु धेन्दु दृष्टिबाधवी- र्य महितात्मधर्ममभवोक्तियोलम्ब निजामतिय गोम्मटदेव नी मनद मानकरायमनेय्दे तूल्दिदै ॥ २३ ॥ सम्मतपस्विगग कुतपस्थिति वेल्दबलासन सम्म शरीरमार्ग नगलान्यवरासरशस्तवृत्तक । कम्मरियोजनन्दमे वलं स्वपराससौख्य हेतुवं गोम्मटदेव नी तपमनान्नुपदेशकनादुदोपदे ॥२४॥ -- विम्यगिरि पर्वत परके शिलालेख नी मनमंनिजात्मनाम्पिवमागिडे मोहनीयमु- रूपम्मविदोडि योजे पनपातिल जसपापसी. रूयं महिमाबित नंगले पतिसि मत्तमपातिपात गोम्मटदेयमुक्तिरदम पढेदे निरपायसास्यमं ॥२५॥ कम्मिा का पासपुगलिननिसि पापपगमं सम्मादिन्दे नोति भववाहतियं यनगीण पलपा. मिनमान्नु कीर्तिपवरें तायरी शानदार गोम्मटदेव निमनरिनिर्गमुतिपंजरे हतारो॥२९॥ कुसुमाम् काममाप्राम्या महिमेयनान्ति मुझे तो। सुधा माप्राग्य भरतकारिमुक्तं रयामानमुप. शु-गमनपसाईडमने जसिश यह मुकिमामा. भ्यसुखाय काय पालितानं मनरेने-दामा ॥३॥ मनात नुपि ननुवि- मन मुनियमनल रिपेनम्यो. मनदिनमाम गोम्मट- Faनने नुनिसियनिन्तु गुमनाम ॥२८॥ मुनानगर नगा नमुनममण पुजियाप्प। मुनाममनन मुबानमसम्म पुनिम ॥ २०॥ MARATमन नामीनिम्मिामा

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विम्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख नहीं पाता। पदिको भी हुई और सौनयं भी हुमा तो उसमें 10 प्रभाव का मभाव हो सकता है। पर पहा इन, सीनों के मिभव से गोम्मरेश्वर से पार हो गई है। कपि ने एक देवी घरमा का गलेस किया कि एक ममय सारे दिन भगवान की मूर्ति पर धारा से 'नमेह' पुरुषों की पर्श हुई जिसे सभी ने देखा। कभी कोई पनी मति पर कर नहीं गता। भगवान् की भुगमों भोभाग मे निस्य मुगध औरगर के समान ज्योति की मामा निती मायजि स्वामी ने किस प्रकार राज्यको त्याग कलि तपापा पीर की सा घोर तप किया, कर्म शत्रुओं को मा म किया भारि रियो का वर्णन कर तिमाही। पेल की कविता बोधे दो'की। पाmala संगण पति भार नाम 'मुबनोस की मारे। सेबोने पनि freय वा मुनिक शिपामय देन के पार पा] ८६ (२३५) उमी पाषाण के परियम मुष पर (गभग i०११.७) सखि मा पंगुनीत गोम्मद 40 माहारिमामय यसिंडिया वा मागिर पर्मिस. निर प्रयाग माग aftufter Feaning निमिया ruiti गरमा दिनाविपरम्प विमा योivur vfmait विन्यगिरि पर्वत पर के शिवाय १३ उयमसेहि पिदियमसेटि प ४ महदेव सहि र सेहिप २ पारिससहि यमविसेष्टि गयिसहिप ४ मारगलिसहि होसत. सटि ५२नम्पिदेवसेट्टि प ५ चोकिसहि प५ जिमिसेट्टि प ५ पायलिटिप ५ पट्टणसामि सदिसेहिमालिसेट्टि प३ महदेव- सेटि गोविहिप २ चम्मिष्टि सूकिसेट्टि प २ माराण्डिसेट्टि महदेवसैष्टि प २ चरिसहि मारिसेट्टि प २ सेविसेटि दुरिट्टि १२ हारसटि हरदिसेंट्टि ५२ पम्माधि प २ सान्वेय प१ कूतव्य प २ मामणिसटि कृतिसहिषमविसटि १ ३ चट्टिसेट्टि बसविसहिप१ मल्लिसहिप१ महदेव ययिर प २ यम्मेय मसण प २ काजेय गाडेप १२ गपुडमामि मदवनिगसेष्टिप २ मालि- संधि पारिमसहिप २ हालिसेटि बोकिसेट्टि प २ गनिसेहि भास्वसंहि देविसैट्टि (प) २ मालिसेट्टि दम्मिसेट्टि प २ मारि. सेहिसावमसहिप २ मारत हरियख फालेय प २ मारगी- ण्डनपत्तिय गुम्मन्न वैरय प १ माकिसहि धूविसैटिप १ एचि- संहिप १ सय महदेवसेट्टि पारिस्ससेष्टिप. निडिय मधिसेट्टिप १... [ मोसले के वह प्यारि भमसहिदारा प्रतिक्षापित पर्विशति सीकराकी पटविधपूजन के लिए मोसले महाजनों ने एक मासिक पदा देने का संकर किया।] '.

१७८ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख ८७(२३६) उसी पाषाण के पूर्व मुख पर (लगभग शक स० ११०७) प्रोबसविसेट्टियर वीर्यकर अष्टविधार्चनेगे मोसलेय नकर वरिस निवन्धियागि चवुण्डेय जाण्ण किरिय-चवुण्डेय ५२ महदेवसेट्टि कम्बिसेट्टिप १ उयमसेट्टि पारिससेटिप १ बोकि- सेटि बूकिसेटि प १ माचिसेट्टि होन्निसेट्टि सुग्गि सेट्टि प १ मूकिसेट्टिप १ रामिसेट्टिहाविसेटि (५) १ मश्चिसेट्टि बसविसेद्धि प१मखिसेट्टि गुझिसेट्टि चिकमाल्लसेट्टि(प)२ मसणिसेट्टि माचि- सेहि मम्माण्डिसेहिप २ अलियमारिसेट्टि मुहिसेट्टि प २ करि- किसेट्टि चिकमादि पर करिय बम्मिसेट्टि मारिसेट्टि प १ मधि- सेट्टि अयिविसेट्टि कालिसेट्टि प२ मणिगार मापिसेट्टि सेट्टियय ५१ तेरणिय चाण्डेय इंग्गडे वसवण्ण चन्देय रामेय हुल्लय जकण प२ मालगोण्ड मेट्टियण मापय मारेय चिकण गालेय ५१ मादिगाण्ड गोण्डेय माय बम्मेय होग्नेय जोडप तापर्य प्रयोक्तानुसार दी] ८८(२३७) पूर्वोक्त लेखके नीचे (संभवत: शक सं० १११८) नल संवत्सरद उत्तरायण-सरान्तिया भीमन्महापसा. पिवं विजयण्यनवरपिय चिकमदुण्य भीगोम्मटरेवर .

विभ्यगिरि पर्वव परके शिसाजेस नित्यानेगे २०वासिग इविङ्ग श्रीमन्महामण्डलाचार्यरु पन्द्र- मभदेयर केयनु मारुगाण्ड गङ्गसमुद्ररख गरे स १ पालक २०० नरखें कोण्ड फोह दति मङ्गलमहायो । { ग्फ निधि को महापसायित विजयण्य के दामार हि मदुरुण्य मे गसमय की कुल भूमि महामण्डलाय ममदेव से रोका गोम्मरदेव की तिदिन की पूजन पीस पुष्प मालामौलिए अर्पणी] [मोर-लेख में मल सवार का रन । . मळ पा) ८८(२३८) पूर्वोक्त लेख के नीचे (सभवतः शक सं० १९२०) फालयुक्तिसंपत्सरद फार्तिक मु१ मा मागोम्म दंवर पर्चनेगे हुरिन पगि श्रीमन्महामण्डावार्य हिरिय नयकोतिरेवर शिष्यरुपन्दप्रभदेपर कपल यजिपर कषि संष्ट्रिय सेमियनु गरे पश्वरंय गरेको १० गसमुद्रपति काम गलिकोपाल गुजय कंपमेगे गदाय भन्दुदीन दरखपाउन सीमे। [r falt() समिर fan राम गोमादेवी पुप-पूजन वरिपरि महामारामभरोपिया। [मोर-में शरयुध संबम्मर मोहै। श. ...पुरा --- ባw፡ብላ ኣዛብነብኝ ፡ኣ ኣልነ 3 ? :ነብየ ባንተ ነህ ፡፡ ለ2 ኛ ባተተና * ቅኔ ፣ ብi ኣ፡፡ «፡{{ ል፡፡ ይህ 11 14፡'{ ዛነፉ፡፡ 4 ክ ተቐ ና ናብ ህዝባሃነፃነጻ የ ነላ'ነ• Ifነፃ cu፡በዛ ካ3ኛ / \ {{ wኑ '{ ዛተ ፤itላ 4፡4 ፡፡(ገላ{ካብ እዛ ኣብ ፡ 'ጻህ»፡ {{ ttነ፡ ኣቶ ኣብ 40 4 ን ፡ ና' ቀ•፡፡ ብነብ ሰባ ላ። ናብ ነቀፋ {የ ፡ ሓ 4 , ስብ በዛ፥ 41 + ዛ 3 4 4 4 ነብዩ(ዞባtቁ {} }} { { ”

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१८३
विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख
भुवन पग्निसे गोवि.
न्दवाडियं पंडिदं जिनार्चन लुन्धं ॥१२॥
गोम्मटमेने मुनिसमुदा-
यं मनदोस्मेपि मंषि विचलिमुतुं।
गोम्मटदेवर पूजेग-
दं मुददि पिट्टनल्ते धीरोदात ॥१३॥
प्रकार ॥ मादियागिप्पुदाईवसमयके मूलसई काण्डकु-
दान्वयं
पादु वेवदं बलयिपुदलिय देसिगगणद पुस्तकगच्छप ।
पोधविभवद कुफुटासनमलधारि देवर शिप्यरेनिप पेम्पि-
शादमेसेदिम शुभचन्द्रसिद्धान्तदंवर गुई गड्डपमूपा
॥१४॥
गणवाढिय वमदिगर्लनिवासवनितुमं दानेदे पासपिसिदं
गङ्गवादिय गोम्मटदेवणे सुत्सायमनेरदे माखिसिदं।
गनवाडिय तिगुलरं पेड्डाण्डु वीरगङ्गा निमिधि को
गणराजनामुग्मिन गगर रायन नभरि धन्यनतं ॥१५॥
धर्मस्यैव बलालोको जयत्यसिलविद्विषः ।
भारोपयतु तत्रैव सर्वोऽपि गुणमुत्तम ॥१६॥
श्रीमग्जैनवपोधिवनविधु माहित्यविधानिधि-
स्सपर्यवहाखिमखमलुठोकण्ठकण्ठोषः।
स श्रीमान गुणचन्द्रदेववनयस्सौजन्यजन्यावनि-
रस्पयात प्रोनयकीर्तिदेवमुनिपस्सिद्धान्तपोधरः ॥१७॥

१८४ विन्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख कवदिग्जैयविदं परत्ते नरसिंहचोषिपं कण्डु स- न्मतिथि गोम्मटपार्श्वनायजिनरं मत्तोचतुर्विशवि- प्रविमागेदमनिन्विवः विनुतं प्रोत्साहदि विट्टन- प्रविमलं सवोरयेकफगरेयुमं कल्पान्तरं सल्विन ॥१८॥ नरसिंहहिमाद्रितदुद्ध तकलशहदकहुल्लकरजिहिफेया. नतधारागलाम्बुनि नयकीर्ति मुनीशपाइसरसीमध्ये ॥१६॥ लखनालीलेगे मुन्नवेन्तु कुसुमारनं पुट्टिदों विष्णुर्ग ललिवश्रीवधुपिङ्गवन्ते नरसिंहसोषिपालवे- पलदेवीवधुगं परार्थचरित पुण्याधिकं पुट्टियों यजयद्वैरिकुलान्वकं जयभुजं पल्लालभूपालकं ॥२०॥ चिरकालं रिपुगल्गसाध्यमनिसिई पङ्गिय मुक्ति दुसरतेमोनिधि धूलिगोटेयने कोणाकामयावनी. धरनं सन्दीडेयसितीश्वरननामधारमं नीयरं तुरगमातमुम समन्टु पिरिदं पल्लालभूपाल ॥२१॥ स्वस्ति श्रीमनयफिति सिद्धान्तपक्रयत्तिगत गुई मोसन्म. साधान सर्वाधिकारि हिरियभण्डारि दुल्लप्यनुल भीमप्रताप पश्यति पीरपलालदेवर कम्यसु गोम्मटपर पावर पतुम्धियति दीधारर अष्टविधान रिपियराहारपान पंडिका मोरकफगरेय यिद पनि । परमागमवारिधिदिम. पिरपंराद्वान्दरिनयकोसियमी.

विम्यगिरि पर्वत परके शिलालेस १८५ श्वरशिष्यनमलनिजचित्- परिपवनभ्यात्मिवालचन्द्रमुनीन्द्रं ॥ २२ ॥ फन्तुकुलान्तकालयमन्जितशासनम निशिधिका- सन्ततियं वटाफ सरसीकुलम नपफीत्ति देवसे- द्धान्तिकरोल्परोक्षविनयङ्गलनीतेरदिन्द मारपरा- रिन्तिरे नोन्तरारेनिसिदं नयकीर्तिनिलाविभागदाल ॥२३॥ [पालेख पादि से पाठवें पप तक लेख ०१४(१)के पूर्वभाग के समान ही है। केवल इसमें तीसरा पय मधिक है। इस पेस में भी विष्णु नरेश के महादण्डनायक गाराज के पराक्रम का पछा वर्णन है। उन्होंने पटकादु पर घेरा गलनेवाजे पोल सामन्त भदिया मरसि वर्मा, दामोदर व तिगुरदाम को भारी परामय दी। इस पर विष्णुदन ने प्रसन्न होकर उनसे पारितोपक मांगने को का। उन्होंने गोम्मटेश्वर की जन निमित्त 'गोविन्द वाद्धि' का दान मांगा। इसे नरेश ने पापं स्वीकार किया। गरा कुन्दकुन्दाम्बय के कुपकुरासन मळभारिदेव के शिष्य शुभ- चन्द्र मिशान्तदेव के शिष्य थे। उनके तिगुटों को सार गत्यादि की रक्षा करने, गावाहिके गोम्मटेश्यर का परकोटा बनवाने पबनेक • जैन पस्तियों का जीर्णोद्धार करने का लेख मं०१५ के मारा यह भी लेख और पहाभी वे चामुण्डाय से सौगुपे किम्य को एप 10 और 1 में गुपचन्द्र देव के समय मयकीति का रखकहा गया है कि मरसिंहनीश ने दिग्विजय से बहरते गोम्मटेयर के दर्शन किये और सदा के लिए पवना सीन प्रामों का पान दिया। इसके पचात् मासिंह मरेश और एपल देवी से बरपक होने वाले महान कामदेवशरोडे राजा जीवन, . -- १८६ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख का किला विजय करने तथा अपने प्रधान कोषाध्पर, नयनीति' देव के शिप्य 'हुछय' दारा उक्त तीनों प्रामों के दान को पूरा करने का न्छेख है। मन्त में नयकीति देव के शिष्य अभ्यात्मि वालचन्द्र के अपने गुरु के स्मारक अनेक शासन रचने व तालाब आदि निर्माण करवाने का ग्लेख है। [ नोट-पद्य 10 से ऐसा विदित होता है कि उसके लिखे जाने के समय नियकी िजीवित थे। किन्नु अन्तिम पय से स्पष्ट होता है कि उनके लिखे जाने के समय नयकीति' का सर्गवास हो चुका था। सम्भव है कि जेन का पूर्व भाग (पद्य २० तक) नयफीति के जीवन- काल में ही लिखा गया हो और शेष भाग पीछे से जोड़ा गया हो। ८१(२४१) उपर्युक्त लेख के नीचे (लगभग शक सं० ११००) खस्ति समस्तगुणसम्पन्नरप्प श्रोबेलुगुलतीपद समस्त माणिक्य नखरङ्गल श्रीगोम्मटदेवर पारिश्वदेवरिंग वर्षनिवधि- यागि हविनपडिगे जाविहवल तोलेगे ता १ फरिदो वोस ? यिद माचन्द्रावतारं वरं सलिसुवरु | मङ्गल महा श्री श्री। [येक्गुल के समस्त जौहरियो ने गोम्मट देव और पार्वदेव की पुष्प-पूजन के लिए अपने माणिक्यों पर उक वार्षिक चन्दा देने का संकाप किया।

विन्यगिरि पर्वत पर शिलालेख १२ ( २४२) उपर्युक्त लेख के नीचे (गभग शक मं० १९००) स्वस्ति भी पेडगुलवीत्र गुमिसेहिए इसेय पिकवेय फेवय कायन मरिसंहिय मग मन लोकेयसहपिप मगलु सामोरे मखमलद समस्तनम्बरा गोम्मटदेवर तुविन पडगं गधमुप हिन्दे ग स १ भागोम्मटपुरद भूमियोलो मान्नुहोम पेरले गुलयस्य समुदायाम करयनु मारुगोण्डु मा (म)लंगारगे पापन्द्रातारंयरं सनुपन्तागि घरदुको शासन ।। [गुबरे गुमि मादि समस्त पापारियों ने गासमुद्र पार rम्मरपुर की इस भूमि खरीप उसे गाम्मरदेव की पूजा के निमित्त सरिए मामी सदा के लिए मदान कर दी।] ८३(२४३) उसी पापाण की दूसरी बाजू पर (सम्भवतः शक सं० ११७) स्वोभाषसंवत्सरद भाद्रपद शुक्रवारदन्दु को गोमददेवरिग वारकरिंगेवु इविन पडिग चनियष्ट्रिय मग चन्द्रकीर्ति भट्टारकदेवर गुा कल्लप्यनु प्रचयभण्डारवागि फोट ग १.५२३ यि-मरियादेयलु कुन्ददै ६ वासिग-हुम्वनि- कुवर मरमहा श्रीश्री॥

१८८ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख [चेनिसेट्टि के पुत्र व चन्द्रकीति' भहारक देव के शिष्य कलम ने कम से कम ६ पुष मालाएँ निस्स चढ़ाये जाने के हेनु डक विधि को उक्त दान दिया।] [नोट-लेख में भाव संवरसर का उल्लेख है शक सं०110 भाव संवरसर था। ८४ (२४४) उपर्युक्त लेख के नीचे ( सम्भवतः शक सं० ११६७) खस्ति श्रोभावस बत्सरदपुष्य सुद्ध पनि (यू) श्रीगोम्मट- देवर नित्याभिषेकके श्रोप्रभाचन्द्रभट्टारकदेवर गुद धारकनूर मेधाविसेटिगे परोचविनेयक्के अक्षयभण्डारक्के कोट्ट गद्याय नाल्कु यहोनित अमृतपडिगे माचन्द्रा नित्यपाडि ३ य मान हाल नडसुवदु यि-धर्मव माणिक-नकरङ्गलं एलयिगर्नु भाखरु मङ्गलमहा श्री श्री॥ [प्रभाचन्द्र भट्टारक देव के शिष्य वारकनर के मेधावि सेष्टि की स्मृति में गोम्मट देव के अभिषेका ३ 'मान' दुग्ध प्रति दिवस देने के लिए उक्त तिथि को ४ गयाय' का दान दिया गया। [ नौर-लेख में भाव संवत्सर का उल होने से समय पयुंक। ८५ ( २४५) उपर्युक्त लेख के नीचे (लंगभग शक सं० ११७) इलसूर सोयिसैटिय मग कतिसेटियर गोम्मंट-देवरिगे .

चिभ्यगिरि पर्वत पर शिलाजेश १८६ नित्यपरि मूहमान हासन भभिपका कोहगा होन परि दास नायिकरु माविकनस्त्रर नदेयिसुवर मापन्द्रार्क- बुल्सनक मङ्गलमहा मी। [रियाभिपंकज ममि संरके पुत्र रकसूर निवामी ति मरिने 'मान' परिए गारान दिया जिसके ध्यान से दूध लिया जाये। ८६ (२४६) उसी पापाण फी दायीं बाजू पर (शक सं० ११६) श्रीमत्सरमगम्भीरस्यावादामधिलाछन । जीयात्त्रोक्यनाघस्य शासनं जिनशासनं ॥१॥ भौमत्वापचक्रवर्चि होयसल श्रीवीरनारसिंहदेवरसर श्रीमद्राजधानिदोरममुद्रालु सुबमहूया विनोददि राज्यं गेग्युच- मिर शफयरुप ११८६ नेय श्रीमुखसंवत्सरद प्रावण मु १५ आदिवारदलु श्रीमन्महामण्डलापार्यरु नयफोति देवर शिप्यरु चन्द्रमभदेवर कयल होनवगैरेय मादय्यन मग सम्भु- दवनु सङ्गिट्टियर मग पोम्मण्न अग्गप्पसेट्टियर मालु दोरय धरम्यनवरू श्रीगोम्मटदेवर अमृतपडिगे मचियकरय नट्टका सीमामादयालगाद गई सुचाशयद पतुर्विशतितीयकर ममतपडिगे कोट्ट मादलरिय गरे मलगे योन्दु-सहित सर्ववा- धापरिहारवागि धारापूर्वकं मादिकाण्ड प्राचन्द्रातारं बरं सल्वन्तागि का दधि । महलमहा मी श्री श्री !!

विन्भ्यगिरि पर्वत.पर के शिलालेख [ोसार नरेश भी पीर नारसिंह के समय में तिथि को हो. पोरे के मादम्प के पुत्र सम्भुरेर ने महामालाचा नीति शिम्प पन्धमभदेव से मातियो की उक्त भूमि परीक्षार से गोम्मा देर और चतुर्विशति सीकर के दुग्ध-पूजन के लिये महान महो।] ८७ (२४७) उपर्युक्त लेस के नीचे ( सम्भवतः शक सं० ११९७) स्वस्ति श्रीभावस यत्सरद भाद्रपद मुद्ध सादिवार व प्रोगाम्मटदेवर नित्याभिषेकको प्रमतपरिग भीमभाषन्द्र भट्टारकोपरगुत गरमपेप गायिन्दीहिय मा सारिन मध्यभण्डारयागि इरिसित गयाय नानिnिi दाग यडि पायचियनि नियाभिषेक यो वसन्त दान गरसमकई-डा. निमावियन एलम मोपमा प्रामनामनार meth न्वागि महसुवन । मङ्गलमहा मी प्रा । [m filan Hifier व प्रमा Musis शिल मारियाने aisfruifi RAM रामयिा। मम...' माप aar la' is a Marat विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख टर (२२३) - अष्टदिक्पालफ मण्डप एफस्तम्भ पर (शक स० १७४८) (पूर्व मुर) श्री स्वस्ति श्रीविजयाभ्युदय शालिवाहन शख यरुप १७४८ ने सन्द वर्तमान मलुव प्यपनामसवमरद फाल्गुण य५ भानुवारदल्नु कास्यपगारे पहनियसूत्रे यूपभप्रवरे प्रघमानु- योगशारयायो श्रीधावुपडराज यशस्वराद पिलिकरे सनन्त- राज पसिनवर प्रपा तोटविराजे परमिनपर पाय सत्यमङ्गलद धनुर्व-भरसिनबर पुर मोमन्महिमूरपुरवराधीश श्रीकृष्णराज- घडयरवर सम्मुग्यदधि भारिगाटु फन्दाधार सवारकचेरि- (उत्तर मुग) विलासे मार देवराजै परसिनवरु श्रीगोमटेश्वरस्वामियपर मस्तकाभिषेकजात्मवहिवम वर्गस्थराइक बीमठदिन्द वर्षप्रवि वदल्नु श्रीगोमटेश्वरस्वामिय वरिगं पादपजे मुन्ताद सेवार्य नयुक्दाग यिवर पुत्रगद पुदेवराजै परसिनकरु १०० वरद दाकिरुव पुदुवट्टिन संवेगे भद्र भूयाद्वद्धता जिनशासन । श्री। [भाग्यप गौर, जानिय सत्र, सूपम प्रबर और प्रथमानुयोग वायुया व राज, वितिको अनन्तराज सरमुके पात्र, हरदेवरा प्रामुक पार व समाल के अनु मरमु के पुत्र, मैसूर मरेश श्री कृष्णा प्रधान भरपा (भाव) देवराज भामु की मन्यु गोमटेश महासाभिषेक के दिवस हुई। अतएव ग्नो छावा में विभ्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख पुत्र पुर देवरा मासु ने गोम्मट स्वामी की वार्षिक पाद मारे लिए रफ तिथि को ... 'पर'का दान किया।] ट८ (२२४) उसी मण्डप में एक द्वितीय स्तम्भ के पथिम मुख पर (शक सं०१४५८). भोमत्परमगम्भीरस्याद्वादामपिताम्छन । जोयात्यलोक्यनाथस्य शासनं जिनशामनं ॥१॥ मसर माविरद १४५८ तनय विलम्बि रसपमाप शुद्ध " मल गेरसोप्पेय घटिमटिह सवियोम्मपन मा कम्भरयन वन क्षेत्र प्रहहागिरलागि धबुद्धिसदिक मानिस कोहरको बोन्दु तण्ड प्राक्षापान त्याग समन मुना हरिन नीट पोन्दु पदिक्षि प्रचतेपुरज तु भाषामा पियागि ना नशिबानु मातम भी मा श्री श्री॥ [माग मेशिने मेरा मिन में तो लिए सम्मानित पाना-५ मध ( ) माग सामाग (ख) पर. aft' - पिन्ध्यगिरि पर्वत पर के निशालेख १००( २२५) उसी स्तम्भ के दक्षिण मुख पर (शक स०१४५६) सत्संवत्सरदल गैरसोप्पेय पोडिसेहिरिगे दोउदेवप्पगल मग चिकपनु कोट पर्मसाधन नमर्ग अनुमत्य बरखागि नीवु नवर्ग परिहरिसि कोदछे १ तण माहार दानवनु प्राचन्द्रा. स्थापि यागि नडसि बहेवु मङ्गलमहा श्री श्री श्री श्री श्री ॥ [दार देवपके पुत्र धिणने पर धर्म साधन' बीहि संदिको दिया कि 'मापने हमारे सप्टका परिहार किया है इसके उपलक्ष्य में में सदैव एक संघ (स)ी पादार दूंगा।] १०१ ( २२६) नं० १०० के नीचे (शक सं० १४५६) सत्संवत्सरदल गैरसोप्पेय घायुटिसेरिग कविगल मग बोम्मणन कोट धर्मसाधन नमधि अनुपत्य वरलागि नीवु नवगे परिहरिसि कोहरले वर्ष १ के मारतिङ्गल पर्यन्त १ वण्डके माहारदानवनु माचन्द्रामस्थायियागि नससि यहेतु मङ्गलमहा मी श्री श्री श्री ॥ [कवि, पुत्र राम्मथ ने बुद्धि संधि को यह 'धर्म-साधन' दिया कि 'मापने हमारी भापद का परिहार किया है इस पलक में में समय में परमास ९०संघ (सण्ड) को महारगा।

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख ॥ १०२ (२२७) उसी स्तम्भ के पूर्व मुख पर . (शक सं० १४५६) इ मोदल...तत्संवत्सरदल गैरसोप्पेय चयुडिसहिरिगं हूविन चेप्रय्यनु कोट धर्मसाधनद सम्बन्ध नन्न क्षेत्र पर हाकिरलागि नीवु भाक्षेत्रवनु विडिसि को...... [घेनय्य माली ( हविन ) ने चयुटि सहि को यह 'धर्म-साधन' दिया कि 'मापने मेरी जमीन रहन से मुफ की है इसलिए मैं...] १०३ (२२८) उसी मण्डप में तृतीय स्तम्भ के पूर्व मुख पर (शफ सं० १४३२) सखवरुप१४३२ डनेय शुक्लसंवत्सरद पैशाख ५० १०० मण्डलेश्वरकुलो चालमददेवमहीपालन प्रधानसिमिथि केशव-नाघ-वर-पुत्र कुम्ल-पवित्रं जिनधर्ममदायततिपालकर योम्ययमन्त्रिमहादरम्ह मम्याप चूडामयि घेनयाम्मरमन नजरायपट्टणद श्रावकभन्यजनङ्गल गाष्टिमहाय श्री गुम्मटस्था• मिय पद्धिवाव जीपोंद्वारव माडिसिवन श्री ।। [ मणराध मह महापान के प्रधान मी, शवनापरे पुष, वाम्पण मन्यो रे भ्राता सम्मास AI पाय रे भाव में नाम्मद सामी सिसकी मति)ीयोरा]

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के विज्ञास १६५.
१०४ (१८५)
गोम्मटेखर के दक्षिण की ओर
कूमारिडनी के पादपीठ पर
(लगभग शक सं०११००)
श्रीनयकोतिसिवान्त-पक्रगिल शिप्यरु श्रीबाल-
चन्द्रदेवरगुडफेतिसेट्टिय मग चम्मिसेट्टिमाडिसिद यपदेव।।
[मयति सिद्धान्त कवतिके शिष्य पालचन्द्र देव के शिष्य
बम्मि सेहि टि सहि पुत्र, ने यह ए देवता प्रतिष्ठित कराया। ]
१०५ ( २५४)
सिद्धरवस्ती में उत्तर की ओर एक स्तम्भपर
(शक सं० १३२०)
(पश्चिम मुख)
श्रीमत्परमगम्भीरस्याद्वादामोघलान्छन ।
जीवात्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनं ॥१॥
ओनाभेयोऽजितःशम्भव-नमिविमलाम्सुमतानन्तधर्मा-
म्वन्द्रादूरशान्तिकुन्यु ससुमतिमुविधिश्शीतज्ञो वामुपज्यः ।
मल्लिरश्रेयस्सुपारी जलजरुचिरानन्दनः पार्वनेमी
श्रीवारश्चेति देवा भुवि ददतु चतुर्विशतिर्मङ्गलानि ॥२॥
वो विशिष्ट विनवाय रागोमिविजारभिवरनवे यः
निरस्वकर्मा निखिलार्धवेदी
पागदसा पश्चिमतीर्घनायः ॥२॥

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख वस्याभवन सदसि वीरजिनस्य सिद्ध- सप्तर्द्धयो गणधराः किल रुद्रसङ्ख्याः । ये धारयन्ति शुभदर्शनपोधवृत्त मिथ्यात्रयादपि गणान् विनिवर्त्य विश्वान ॥४॥ इन्द्रामिभूतीमपि वायुभूतिरकम्पनो मौर्य सुध- मपुत्राः। मैत्रेयमौण्ड्यौपुनरन्धवेलः प्रभासकरचेति तदीय. संज्ञाः ॥५॥ पूर्वज्ञानिह वादिनोऽवधिजुपो धोपर्ययज्ञानिनः सेवे वैक्रियकाश्च शिक्षकयतीन्कैवल्यभाजोऽप्यमून । इत्यग्न्यम्युनिधित्रयोत्तरनिशानाधास्तिकायैश्शवे रुद्रोनैकशवाचलेगापि मिवान्सप्नव नित्यं गणान् ॥६॥ सिद्धि गते वीरजिनेनुबद्ध-केवल्यभिल्यास्त्रयएर जावाः | श्रीगोतमस्ता प सुधर्मजम्बू यैः केवली ये तदिहानु पद्धं ॥७॥ जानन्ति विष्णुरपराजितनन्दिमित्री गोवर्द्धनेन गुरुणा सह भद्रयाहुः । ये पञ्चकंवलियदप्यसिलं श्रुतेन सुखा तोऽस्तु मम धोः श्रुतफेवलिभ्यः ।।८।। विद्यानुवरादपठने स्वयमागताभि- बिघाभिरात्मपरिवादममादभिताः।

विन्यगिरि पर्वत पर शिक्षालेस पापि ये दरापुरूण्यपि धारयन्ति मानौम्यभिन्नवसपूर्वधरान समस्तान || तक्षधियःमोठिल गङ्गदेवो जयस्मुधर्मा विजयो विशाखः। श्रीवुद्धिलोया धृतिघेणनागी सिद्धार्मफरपेत्यभिधानभाजः ॥१०॥ नक्षमपायडू जयपालकमा- पार्यावपि श्रीद्रुमपेणकाप। एकादगाडीधरणेन रूढा ये पप तेऽमी दिम वमन्तु ॥११॥ पापार-संज्ञान-भृता भवस्त लोहस्सुभद्रो जयपुर्बभद्रः। समाययोमाहुरमी हि मुस- खम्भा जिनेन्द्रागमरमहम्म्य ॥ १२॥ श्रीमान्कुम्भो यिनीतो हलधरपसुदेवायला मेरुधीर सर्प सपगुप्तो महिधर-धनपालीमहावीरवारो। इत्यापाने सरियस भुषमुपेत होम्यतया. शाखापारेषु पुण्याजनि मजगat काण्डकुन्दो पहीन्द्रः ॥१३॥ रजोभिपतमत्वमन्तविपि सम्मसरितुं पदीय म्मिगिरि Mittain रज: पां भूमिनन । नाम : utt भामानुमास्तातिर गोग. सामान टीचर मन्मुगिमागम माना सम्म गिगाह जनि गृपिwिan art- सरितानि मन भुगमानामोहनमानानि ॥ १॥ ममन्तभद्रम्म नियोगाद्वावीमायागमक्तिमानः । प्रभागात्मकसानो याम दुलादुका संयापि ॥१७॥ स्याकार-मुद्वित-ममम्स पवार गर्न त्र्यलोक्य-दम्यमम्मिलं ग म म्यनम्ति। दुर्भादुकाममा पिहितान्दरालं सामन्तभद्र-वधन-फुटनदोषः ॥ १८॥ दम्यैर शिप्यरिशवकोटिमरिस्तपो लवालम्बनहयष्टिः। संमार-वाराकर-पोतमेतत्तत्वात्सूत्र तदलश्चकार ।। १६॥ प्रागभ्यधायि गुरुणा किल देवनन्दी युझ्या पुनर्विपुलया स जिनेन्द्रयुद्धिः। ओपूज्यपादइति चैप बुधैः प्रचल्य यत्पूजितः पदयुगे वनदेववाभिः ॥ २०॥ भट्टाकलङ्कोऽव सौगदादिदुर्भाक्यप सकलभूत।

१८६ विन्यगिरि पर्वत परके शिलालेस जगत्स्वनामेव विपातुमुच्चैः सात्र्य समन्ताइकलङ्कमेव ॥२१॥ जीयाजगत्यां जिनसेनमूरिस्यस्योपदेशोज्वलदर्पणेन न्यकोकवं सर्वमिदं विनयाः पुण्न्यं पुराणं पुरुषा विदन्ति ॥ २२॥ विनय-भरण-पात्र भव्यलोकमित्र विबुधनुनचरित्र उद्येन्द्रामपुवं । विहिवभुवनभद्रं पाठमोहोनिद्रं विनमत गुणभद्र वोर्नविद्याममुद्र ॥२३॥ मयजनस्वरनभम्वनु लक्षणाङ्ग- च्छिमाण भीम-शकुनाङ्ग-निमिसकैय्यः । कालत्रयऽपि सुखदुःसजयाजयाय वत्साक्षिवत्पुनरवैति समस्वमेव ॥२४॥ पुष्पदन्तेन च भूनपल्याख्येनापि शिष्य-द्विवयेन रेजे। फनप्रदानाय जगजनानां प्राप्नोऽदुराभ्यामिवझल्पभूजः।।२।। अहवलि सहचतुर्विधं म श्रीकाण्डकुन्दान्वयमूलसह। कालस्वभावादिह जायमानद्वपतराल्पांकरवाय पकं ॥२६॥ Franटी विपरीत-रूपे खिले विस विनानु भेदं । यस्वं 1 यस्य विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख रजः पदं भूमितलं विहाय चचार मन्ये चतुरडुलं सः ॥१४॥ श्रोमानुमास्वातिरयं यतीश. स्तत्वायसूत्र प्रकटीचकार । यन्मुक्तिमार्गाचरणोधतानां पाघेयमयं भवति प्रजानां॥१५॥ वस्यैव शिष्योऽजनि गृपिञ्च-द्वितीयसंज्ञस्य यज्ञाक- पिछः। यत्सूक्तिरनानि भवन्ति लोके मुक्त्यनामोहनमण्डनानि ॥१६॥ समन्तभद्रस्स चिराय जोयाद्वादीभवनाकुसूतिजालः । प्रभावात्सकलानीय वन्यास दुर्बादुका चयापि ॥१७॥ स्यारकार-मुद्रित-समस्त-पदात्य-पून त्र्यैजोम्य-हर्म्यमसिल स खलु म्यनक्ति। दुर्जादुकोपितमसा पिहितान्तरालं सामन्तभद्र-वधन फुट-अनदीपः ॥ १८॥ सम्यैर शिष्यरिशवकोटिमरिसपो सवालम्बनोहयष्टिः। संमार-बाराकर-पोतमेतत्तत्वात्र्यसनं तदधकार ॥१७॥ प्रागभ्यपायि गुरुणा किल देवनन्दी बुड्या पुनर्विपुजया सजिनेन्द्रपुद्धिः। श्रीपूज्यपादाति पैर बुधैः प्ररस्य यजित पश्युगे वनवाभिः ॥२०॥ भट्टाकसडोटव सौगतादिदुक्यासाभूत'।

विन्ध्यगिरि पर्वत परके शिलालेख १६ जगत्स्वनामेव विधातुमुच्चैः सार्य समन्तादकलङ्कमेव ।।२१॥ जीयाजगत्यां जिनसेनमूरिस्यस्योपदेशोज्ज्वलदायेन । न्यकोछवं सर्वमिदं विनंयाः पुण्न्यं पुरामं पुरुषा विदन्ति ।। २२॥ विनय-मरण-मन भन्यहो कमित्र विबुधनुनपरि तद्येन्द्राप्रपुत्र। विहितभुवनभद्रं वीतमोहोनिद्र विनमत गुणभद्र सी विद्याम मुद्रं ॥ २३ ॥ मयजनस्वरनभाउनु लघणाग- च्छिमाह-माम शकुनाग-निमित्तकैय्य:। कालप्रयेऽपि सुग्रदुःसमयाजया वत्साधिवत्पुनावैति समस्तमंद ॥२४॥ यः पुष्पदन्नपभूतपस्यायनापि शिष्य-वियन रंगे । फलप्रदानाय जगजनाना प्राप्तोऽएराभ्याभिशापभू:२॥ सईद्वलिम्मदरम्धिं म श्रीकारकुन्दावरमूजस। कालस्वभावादिह जायमानपतराल्पीकरणाय प ॥२६॥ सिताम्बरादी विपरीत-रूपे खिले विस विनोतु भदं: सत्सेननन्दि-प्रिदियेशसिंहमहेषु या मनु कुरकर पप गयगत काले-प्रयंण साकार पपिभिदाजुरिनन्दिमा २०० विम्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख देशीगये धृतगुणेऽन्वितपुस्तकाच्छ- गच्छेङ्गुलेश्वरवलिर्जयति प्रभूता ॥२८॥ तत्रासन्नाग-देयोदय-रवि जिन मेघ प्रभा-बाल. चन्द्रा देयो-भानुचन्द्रश्रुतनप गुणधर्मादयः कीर्तिदेवाः। देश-श्रीचन्द्र-धर्मेन्द्र-कुल-गुण-तपो भूषणामूर योन्ये विद्या दामेन्द्रपद्मामरयम-गुण-माणिककनन्या इयाश्च ॥२॥ (उत्तर मुख) विहितदुरितमा भिन्नवादीमा वितत-विविध-मला विश्वविधामाः । पिजिन जगदनमावेशदूरोमनाङ्गा विशदपरतुना विश्रुतास्तेऽस्तसः ॥३०॥ जोयानीनेमिगन्द्रपलपनयन फूलकोटीरगोत्री नियोगन्दष्विाधाविरपन शसत्यभारिप्रतापः । चन्द्रस्येव पवनामत-वचन-यानीपत याय शान्ति धम्म्याग नेनुस्म्यमभिमत यश्च नमी रथस्य ॥३१॥ श्रीमानन्दोरियुधा प्रायामय मे नामनाम । ममुखमरवानिम्तमा नयनाभिनबिनानि ॥२॥ मयं धन-वादिमिद गुल्मindi

विध्यगिरि पर्वत पर के शिलालख २०१
प्रधादिवोऽभूमिजपादसेवाप्रमादिलोफोऽभयचन्द्रदेवः
॥३३॥
जयवि जिवतमोऽरिस्त्यत्तदोषानुषतः
पदमखिलकलानापात्र-मम्भोरुहायाः ।
अनुगवजयपश्चात्तमिवानुकूल्य-
स्सयतमभयचन्द्रस्मसभारनदीपः॥३४॥
उदीयतनुजस्श्रुतमुनिर्गणिपदेशस्तपोभर नियन्त्रित्तनुस्स्तु-
वजिनेशः।
वाजनि जिनेन्द्रवचनातविषयाशसवखयरामाभूत-
समस्तवमुधाशः ॥३५॥
भव-विपिनकशानुभन्यपङ्कजभानु-
सस विवतनमसोनु सम्पदे कामधेनुः ।
भुविदुरिववमाऽरिप्रोत्यसन्तापवारि-
श्रु तमुनिवरसरिरमशीला स्वनारिः ॥३६॥
पण्डोरण्डत्रिदण्डं परम-मुख-पदं पापबीजे परागो-
बारागारोतकार-विविधमधिकता गौरवगार १ ।।
सुल्यंभल्लान-शल्य-प्रयमतुजवपुरशर्ममर्मच्छिदंडी-
भापोन्मेपि त्रिदोपं श्रुतमुनिमुनिपो निम्ममापक एव ॥३७॥
प्रशिष्यभगणेशमहमा भुविवदीये प्रवर्द्धयति पूर्नकलइन्दु-
रिवयस्मा
भनादिनिधनादि-परमागम-पयाश्मिभूदभिनयभुतमुनि-
गविपदमः ॥८॥

२०२ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख मागे दुर्गे निसर्गात्प्रतिभटकटुजल्पेन वादेन वापि श्रव्ये काव्यं विनव्ये मृदुमधुरपदैः शर्मदैनर्मदेश्च । मन्त्रे तन्त्रेऽपि यन्त्रे नुतसकलकलायां च शब्दानवे का को वान्यः कोविदेोऽस्ति श्रुतमुनिमुनिवद्विश्व-विद्या- विनोदः ॥३६॥ शब्दे श्री पूज्यपादः सकल-विमत-जित्तर्फवन्त्रेषुदेवः सिद्धान्ते सत्यरूपे जिन-विनिगदिते गौतमः काण्डकुन्दः। अध्यात्मे यर्द्धमानो मनसिज-मथने वारिमुग्दुःखबन्हा. वित्येवं कात्तिपानं श्रुतमुनिवदभूद्भवये कोऽत्र कश्चित ॥४०॥ श्रद्धा शुद्धा प्रवृद्धा दधतमधिकता जैनमार्गे सुसग्गें सिविं युद्धमहर्मुध-बर-निवहेर वामर्त्यमाना । मित्रं चित्रं चरित्रं भरचय-भयदं भव्यनम्याम्पुजाना. मर्यनोन्यूनमेन श्रुतमुनि-मुनिपं पन्द्रमाराधय ॥११॥ रोमानितोऽस्याभय चन्द्ररस्तायागु जात [५]मुतकीर्ति देवः। प्रभूनिनेन्द्रादितलगानामापुण्यशीहत-धार-गुसः ॥४२॥ विदिव-मकनवे पीत-पता-विषाद विजित-निसिजन्या विश्वविद्यापिनारे। विठतपरिवार विस्फुरक्षित प्रसाद विनुव-जिना रिश्रम ॥४३॥ म श्रीमास्तममान गपिप सम्याच्याकीति:

विभ्यगिरि पर्वत पर के शिलाख कीयाकोपविलाच्या मुरयति विधुः कार्यमबाप्यानन्यः। (तृतीय मुख) यम्योपन्यास-वन्य-हिप-पटु-घटयोपाटिवारपाटुवापः पामग्रामियामलतररुपयोऽप्युरिचनामादिपणा : ॥४४॥ पारुनीयाकफीर्तिः पदनठवमुधाधीश्वराऽपोश्वगऽयं गर्व कुर्वन्तमुश्विर-मदगि महापादिन बादवन्ध्यं । पके दियोउदप्रेमरमसवघा माधिवाशेषमाध्या एवेद्यावेधाविद्याध्ययमविलमविश्वविद्याविनादः ॥४५॥ पल्लाल-क्षोणिपालं पनिस-यनि-पल वाजिभि जिला गावेगातासु स्थितिमपि महसास्लापतामानिनाय । माती व स्वयं माऽग्विविदभयमूरतवावास्यत्त- निस्सोमारोप-शामाम्युनिधिमभयपूर परविणार्या 1॥४॥ शिशे दुध पियो करय-निपुगए सूखम्प तस्यापदं. शिप्य पीयूष-निष्यन्दन ५टु वपन पivya avrar | सूरि नयाgesमिने मदम्याविधामा मामानाTAIAI गुतमगा सत्र मामि ॥४॥ परिमामुण्डराज भुभाननमिन गुम्मट टाक भाया शतया च मुक्त गावा-गुर-मार यमौ । सा-याधा-जिन-famantन मान्या न्यः मे Twaisi विभुनायfi-ainvi ने मतानमारमनुभं पारा २०४ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख श्रीमानेपोऽककीर्तिन्नृप इव विलसत्सालसापानकायः। चित्रं शोऽभिपिच्य त्रिभुवनतिलकं तं पुनस्सतवारान पडोन्मुक्तं विधायाखिलजगदुरुपुण्यैस्तथालधकार ||४el किंवा तोराभिषेकादुतनिजयशसो निर्मलाच्छङ्करादोन गोवाद्रीन्स्फाटिकी च शिविममरगजान्दिग्गजानेष धोरः। चोरोदान्सप्तसिन्धूनुदरिजलधराशारदानागलोकं शेपाकीन विदो मृतकलशमपि स्ववितेने न विद्यः ॥५०॥ मेरी जन्माभिषे सुरपतिरिव वत्तवात्र शेजे देवस्यादर्शयन्नो परमखिलजनस्यैप सूरिबिधाय । सन्मार्ग घाधुनैन पिहिवमपि चिर पामरग्यास्तमाभि.. निश्शे तानि पुर्व पुरुरिव पुनरयाकलाऽपनीय ॥५१॥ रे रे काणाद कोयं शरणमधिवस तुद्रनिद्रानिरासं मेमांसेच्छामतुद्धा त्यज निजपटुवादेषु फच्याशुगर । पौद्धायुद्ध विमुग्धोऽस्यपसर सहसा माझ्यमा! सम्पये श्रीमान्मथ्नाति वादीन्द्रगममभयमूरिः परं वादिसिमः॥५२॥ ऐश्वयं वदवश्व शाश्वतमुसे धत्तय मर्चवा विधावे प गिरीयता शिवदया श्रीधारुकीत्तीसरी। वायं जिनभागसाजिनभाग्योमानय मार्गो हेमादि समयच मार्गपमुरघेमा समाचले ॥४॥ शम्दादि-भाग-लोपन-गिरिश-मायावतीतस्य ने हो मन्मय जीरनौपरिभूषा पुरा शैरना। -- विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख २०५ सर्वोचमचारुकीर्ति समुनस्सम्यस्तपो-वहिना निईन्धस्य परिप्रचण्डमरुवातस्य का ते गतिः ॥५४॥ पितामहपरिष्वासनःप्रशान्तयं । चारुकीति वचोगङ्गालिनिवाडी सरस्वती ॥१५॥ भास्यं वायीनिवास्य हृदयमुरुदय व चरित्रं पवित्र दं शानस्य कगेई सकलसुजनवागण्यमुद्भव-पुण्यं । अन्या भव्या गुणालिनिखिल बुधववर्यस्य सेोऽयं जगत्या प्रत्यारूदप्रसादो जयतु चिरमय चारुकीर्तिप्रतीन्द्रः ॥१६॥ मूदं प्रौदं दरिद्रं धनपतिमधर्म मानवं मानवन्त' दुष्टं शिष्टं च दुःखानमपि मुरियन दुर्मद धर्मशीलं । कुन सामन्तभद्र परितमनुसरण वामन्तभ। (पतु मुख) वन्धन श्रोचायकोति जगति विजयवे पन्द्रिका पाइ. कीति: ॥७॥ र चाफि गर्व परिहर विरुदाल पुष प्रमुख सादरण्यासाध्येय-राजपरिकर-निकराधामपट्टोऽसि भट्ट पुन काणाद तर्न सज निजमनिशं मानमापनिदान हिंस-साऽभियंत्या प्रतिपदपराम्बादिनापिणार्य: पति मग्नुरती दिखादिनारी सम्राग-लोप-परमहानिधी, .

२०८ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख मग बोम्मननालगाद गौडुगल समक्षदलि देवरिग पाइपुजेय माडि क्रयवागि कोण्डु कोट्ट असाधारणवहन्त कौर्तियन् पुण्य- वन उपार्जिसि कोण्डनु मङ्गलमहा श्री श्री श्री ॥ [कर्नाट देश की गजवक्षी नामक नगरी में माणिक्यदेव और उनकी भायां याचायि रहते थे। इनके मायण्ण नामक पुत्र हुआ जो चन्द्र कीति का शिष्य था। मायण्णा ने उक्त तिथि को वेगुल के गासमुत्र नाम सरोवर की दो खण्डुग भूमि खरीद कर उसे गोम्मद स्वामी के अष्टविध पूजन के लिये बेल्गुल के कई पुरुषों के समक्ष दान की।] १०७ (२५६) उपर्युक्त लेख के नीचे (लगभग शक सं० ११०३) शीलदि चन्द्रमौलिविभुवाचलदेवि निजोद्धकान्तया. लोलमृगाधि बेल्गुलद गुम्मटनाथन पादद- लिगे येडे वेक्कन शीमेयनित्तनुदारवीरप- ल्लाल-नृपालकनुप्रियुमन्धियुमुल्लिनमेरदे मल्विन ॥ १॥ अन्तु धारापूर्वक माडिकोटन्त प्रामसीमे। मूढ होमेन हछि यस्विधि देवरहाल्ल पडुव चोलेनधि हाडानहति (पूर्व मुम के नीचे) यङग मम्पनहल्लिय विकाट प्रामौ प्राचन्दास्यायियागि मग मग महा श्री श्री ।। [चन्द्रमौलि की पयी पाचटग की प्रार्थना पर यहाउ नृपये '' नामक प्रामादार गोम्मानाय धन किया। में ग्राम की मीमारी।

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलाम . नोट-पापलरवीन्य अनेकदानीका रखएक... कलेखन. 10 (१२७) में है। अतएव प्रस्तुत लेख का समय भी शक... गभग होना चाहिये। परभाश्रय fe पान इसमे बहुत पीये के दो मंत्री (न... पार ...) नीचे बुदाहुपा है। विपि भी इसकी रतनी पुरानी प्रतीत नहीं डाली। सम्भव है कि किमी थाधार पर लेख पीछ ही मिना गया। १०८ (२५९) सिद्धरवस्ती में दक्षिण सोर एफ स्तम्भ पर (शक स०१३५५) (प्रथममुप) श्री जपत्य जय्यमाहात्म्य विशारितकुरामन । शामन जैनमुनासि मुक्तिनायकरासन ॥ १ ॥ अपरिमिनग्यमनपारगममय प्रपलपणाला निविलाय नाविभषं प्रमरगुरदय पर भ्याति ।। रहीमारियजनमुनजोमानानयात सस्याकारमुपाभिलिप्तिनिसाकारुण्यsina भाराप्य भयानपायाभूताप नयात पा. नंतीयकता महीपादय मध्यमाभ्यामता ।। मन धिमुक्नप्रभुस्थिति श्रीपर्द्धमानमुनितिम-नाय घरदीपिरपि ममिहिनाखिजाना पतिराभिमान शिकार ।।४।

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख वस्यामवचरमचिजगदीश्वरस्य या याबराज्यपदसंश्यतः प्रभूतः । श्रीगौतमोगणपविभगवान्वरिष्ठः श्रेष्ठ रनुष्ठिवनुतिर्मुनिभिस्स जीयान ॥ ५ ॥ तदन्वये शुद्धिमति प्रतीत समप्रशालामलराजाले । अभूद्यतीन्द्रो भुवि भद्रबाहुः पयःपयाधाविव पुन- भद्रवाहुरप्रिम: समयबुद्धिसम्पदा शुद्धसिद्धशासनं सुशब्द-बन्ध-मुन्दरं । इद्धवृत्तसिद्धिरत्र बद्धकर्मभित्तपो- वृद्धिवर्द्धितपकोत्ति रुधं महद्धि कः ॥ ७ ॥ यो 'भद्रबाहुः श्रुतकंबलीना मुनीश्वराणामिह पश्चिमोऽपि । अपश्चिमोऽभूद्विदुषां विनेता सर्वश्रु वात्र्यप्रतिपादनेन ॥८॥ वदीय-शिष्योऽजनि चन्द्रगुप्तः समपशीलानरदेवयुद्धः । विवेश यत्तीव्रतपःप्रभाव-प्रभूत-कोर्भुिवनान्तराणि ।। ।। तदीयवंशाकरतः प्रसिद्धादभूददीपा यतिरत्नमाला। भी यान्तर्मणियन्मुनीन्द्ररस कुण्डकुन्दोदित-चण्ड- दण्उ ॥ १०॥ प्रभूदुमास्वातिमुनिः पवित्रे वंशे तदीये सकलात्यवेदी। सूचीकृत येन जिनप्रणीत शाखात्यजात मुनिपुङ्गवेन ॥११॥ स प्राणिसरसणसावधानी धभार योगों किल गृद्वपक्षान् ।

बिभ्यगिरि पर्वत परफे चिल्लाझेख वदा प्रभूत्येव धुधा यमाहुराधाय्यंशब्दोचरगृद्ध- पिन ॥ १॥ तम्मादभूयोगिलप्रदीपो पलाफपिग्स: म तपा. महदि । यदनसम्पशनमाप्रताऽपि वायुर्विषादौनमनोपकार ।। १३ ॥ समन्तभद्रोऽजनि भद्रमूर्तिला. प्रणेता जिनशासनम्य । यदीयवाग्वन कटारपावरगूननिकार प्रतिवादिनीनाम् ॥१४॥ श्री पूज्यपादो नधर्मराम्यस्तमा मुराधाबर-म्य. यदायबंदुष्यगुणानिहानी वदन्ति शापि तदुमानि ॥१५॥ धृवविधरिपत्र योगिभिः छवस्त्यभारमनुविभ्रदुष जिनरभूव यमरापहन सजिनेन्द्रपुद्धिरिति ARYAvia neKI श्रीपूज्यपादयनिरपतिमीषा: याविरंजिनदर्शनपतताः । यत्वावधीत संप प्रभावा- कालायम किदा करावा. तत: पर रिहा मुनाना ममराऽभूदकलामरिः। मियाNIRAIगवाविवारी प्रभागिता याययुः॥१८॥ .

२१२ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख
वस्मिन्गते स्वर्गभुवं मही दिवःपतीनामिव प्रकटान ।
तदन्वयोद्भवमुनीश्वराणां बभूवुरित्यं भुवि सभेदाः ॥१८॥
स योगिसङ्घश्चतुरः प्रभेदानासाद्य भूयानविरुद्धवृत्तान् ।
वभावयं श्रीभगवान जिनेन्द्रश्चतुम्मखानीव मिधस्समानि ॥२०॥
देव-नन्दि-
सिंह-सेन-सङ्घभेदवर्तिना
दंशभेदतः प्रबोधभाजि देवयोगिनां ।
वृत्तवस्समस्ततोऽविरुद्धधर्मसेविना
मध्यतः प्रसिद्ध एप नन्दिसङ्घ इत्यभून ॥ २१ ॥
नन्दिसङ्घ सदेशीयगणे गच्छे च पुस्तके ।
इंगुलेशयलिर्जीयान्मङ्गलीकृतभूतलः ।। २२ ।।
तत्र सर्वशरीरिरक्षाकृतमतिर्विजितेन्द्रिय-
स्सिद्धशासनवर्द्धनप्रतिलब्ध-कीर्तिकलापकः ।
विश्रुत-श्रुतकीर्ति-भट्टारकयतिस्समजायत
प्रस्फुरदूचनामृतांशुविनाशिताखिल हत्तमाः ॥ २३ ॥
कृत्वा पिनेयान्कृतकृत्यवृत्तीनिधाय संपु श्रुतभारमुच्चैः ।
स्वदेहभारं घ भुवि प्रशान्तस्समाधिभेदन दिवं स भेजे ॥२४॥
(द्वितीयमुख)
गते गगनवाससि त्रिदिवमत्र यस्याच्छिता
न वृत्तगुणसंहतिवमति केवलं तद्यशः ।
प्रमन्दमदमन्मथप्रपमदुपचापोचल-
पतापहविकृत्तपश्चरणभेदलब्धं भुवि ॥ २५ ॥

विभ्यगिरि पर्वत पर के शिक्षाग मांचाएकीर्तिमुनिरप्रतिमप्रभाव- সনাবমূলিয়াঘলবায়। यस्याभवसपसि निष्ठुरतापयादि- धि गुणे प गुरुता का शरीर ॥ २६ ॥ यसपाजिभिजिनामा वतयामाम सारवय भूषजे । বুলিয়াকান্দি ঘ ৪াবি- शविद्याधुपिन्द्रमा. ॥२७॥ यम्य यागांशिम पादयाम्सला महिनामिnिt पायरया । चिन्नयनामबापानाख मान्यता नीभिरंपत्ती ॥२॥ गपशपयारपिवाता का प्रति रिवाना। पलालरात्विशान्तिसhleshan भरना मुनिम्मनापा- लता विपरित समाधिसमम । विविविधाat urinewsgita. माया मालिनि पर्य. नारिपतहा पपिटतयति. साम; बामियामसामरिक मतमरित्या मिहार || M

२१४ विन्ध्यगिरि पर्वत परके शिलालेख
वियुधजनपालकं फुयुध-मत-हारकं ।
विजितसकलेन्द्रिय भजत तमलं बुधाः ॥ ३२ ॥
धयल-सरोपर-नगर-जिनास्पदमसरशमाकृतवदुरु-
तपामहः ॥ ३३॥
यसादद्वयमेव भूपतिततिश्च शिरोभूषणं
यद्वाक्यामृतमय कोविद फुलं पीत्या जिजीवानिशं ।
यत्की विमलं
'यभूव भुरन रवाकरंगात
यद्विया विशदीपकार भुक्ने शास्त्रार्थनातं महन् ॥ ३४॥
कन्या तपस्तीप्रमनल्पमेधास्मापाय पुण्यान्यनुपप्लुतानि ।
नेपो फलस्यानुभवाय वराचेता इवाप प्रिदियंम योगी ॥३५॥
अस्मिन्माता भूग्नि सिद्धान्तयोगी
प्रायद्वापा वद्धंयन् सियशानं ।
राई व्याप्रिद्वादशात्मा करी-
म्याग्रहमुग्निध्यायः ॥ २६ ॥
दुराग शाम्रनानं विको बापाने मातासमपायः ।
पन्दोऽन्या मेघनालारपया भान भूमसहति वा
विभा॥३०॥
यशम्भुमननामनितालमोहि
बारा नियम yि: मरा।
नानुन यपूर्व पात
नायोम्मानन माध्यमि॥३॥

विन्ध्यगिरि पर्व पर शिहाजंग प्रविश्य शास्त्राम्युधिमंप धारा जमाह पूर्व मनाया। परेलमत्तानुशादककवात न मम्मा । सम्पाप शिप्यास मुनिः प्रसिद्धा- नध्यापयामाम कुशापयुटीन । जगत्पचित्रीकरणाय धर्म- प्रवचनायाचित्र संविदं च ॥४॥ कन्या भक्ति से गुरोम्यशा नीत्वा वास कामधेनु पापा। स्वास्यान्तपिपन्नाऽतिपुश शक्कि साध्यापयामामुरिता ॥ ४१ ।। तदीयशिष्येषु विदायां गुरमेन समुन्याभाय । गराज लंपुम गुमनाम मटविमा ॥४॥ कुशन शीन गुणन मत्या शा साप । विधाय मूरिषद Hai rafa य व गययाका ४६॥ प्रकाvिaयदिपना विति भगाना समय यामिन स्वयं समाचारयाभिसमार वापर॥ विधार्म समीयामास ARRRINEET मुनिः मा Riने समित्या विन्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख (तृतीयमुस) मदन्वयादेप समागतोऽयं गयो गुणाना पदमस्य रखा। त्वया मक्रियतामितोष्टं समर्पयामास गयी गएं स्व॥४६॥ गुरुविरहसमुह सदुन वदीय मुखमगुरुवयाभिस्स प्रसमांचकार । सपदि विमलिताब्द-लिए-प्रांमु-प्रताने झिमधियमति योपिन्मन्दफूत्कारयातः॥४७॥ कृतितविदितवृत्तस्नत्त्वगुप्तिप्रवृत्ती जितकुमतविशेषश शोपिताशेषाः । तरतिपति-मत्वम्तम-विद्या प्रभुत्व.. म्मुतफल-विधयं सोऽ गमहिन्यभूयं ।। ४८ ।। गत तत्सरिपक्षाप्रयोऽयं मुनीरसरस्म हमरदयसराम् । गुणध साम्धरितरनिन्दितः प्रचिन्तयन्तद्गुमरापमम् ॥ ४६ ।। प्रत्य इन्य तरारमा विहाय पात्यमनल्प मुनिः। प्रययन धर्ममनिन्दितं तद्गुलशान मफ तोपकार ॥५०॥ भगायायं मुनिश्चिमतराभित्गुस्तान अमन्द-मन- ममत-पारिवानादान । भ्रमर निमः मितारिधिोपन ना-नानरियम-यय-पातुरोjिir १ ॥

जिभ्यगिरि पर्वत पर शिनान का वं कामिनि कश्यता ग्रुतमुनेः फीति: किमागम्यत महान मप्रियमनिमा भुवि घरसम्मृायत मन्वंत. । नेन्द्रः किसष गोभित धनपति: कि नाग्न्यसा किर शेषः कृत्रमा पसिना हम पथना दि. 11 h वाग्देवताहदय रखन-मनानि मन्दार-गुरुप-मकरन्दरमपमानि। पानन्दिनाग्विन-जनान्यमृतं बर्माम कर्णपुयाय वपनानि को ५६ ॥ समन्तभोरप्यसमन्तभद्रः श्री-पध्यपादापि न पूज्यपादः । मनिवारयमपूरपिंजर- विषप्रायविष ॥४४॥ एपं जिनयिर्मगुरुयः प्रभाषयात yान aviva भारपस्या कमिना गुरु या मलमा पुनबन 11४॥ पाप मानुगाम Namantan समसमयिशEिR: . मायन म.सानि यापन पतास मः। मम्पमापरिगाम पितामा । मामाम vिingle मा RRisiRufARE RAMERAL. 15 विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख प्रङ्गेषु वस्मिन् प्रविज़म्भमाणे निश्चित्य योगी वदसाभ्यरूपता। नवरसमागत्य निजामजस्य प्रणम्य पादाववदत फवालिः ।। ५६।। देव पण्डितेन्द्र योगिराज धर्मयत्सन त्वत्पद-प्रमादतस्ममस्तमर्जितं मया । मदराः श्रुतं मतं तपश्च पुण्यमवयं कि ममात्र वर्तित कियस्य कल्प-काशियः ॥१०॥ दहता विनाय कष्टमस्ति कि जगत्तये तम्य रोग-पीडितस्य वाच्यता न शब्दवः । देय पर योगवा पपु-धिमर्जन-कम- साधु-वर्ग-मर्च-गत्य वेदिनी विदार ॥ ११ ॥ पिशाप्य कार्य मुनिरित्यमध्ये मुहम्मुरियना गयीशात। बांच्यमापनमात्मनीने ममाहिना भावयति म माध्यं ।।१२।। जगदपिपत-तिमि तिमिशिल-ना-चक. पाना-मृत्यनि-भीम-नाग-नाशि नीतासायानिधि-मध्य-माग डिभात्यभि समय पवितम्म भन्नुः ॥ १५ ॥ १२ गगन-नाममा नयममुखानिधि-मामामा।

विभ्यगिरि पर्वत पर के शिक्षाजंग प्रताप मुनय पर विगमनाय पदाण्या यनन्त सम्वतं कठिन-काय-कापक्षिमि ॥५ मयं विषयमपयो विषमषापास्पद पराम्जनि जुगामा बम मम्मा । मत गनु विवकिनस्तमपहाय ममदा विशन्ति पदमध्य fafay-swirlfrue . (पतु मुख) R-दु:ख-जिलि-विमलयष्टि वीमाजस-पासप-ताप art कबन्दनादि-विपयामि-t-famt का वानस्य भुवि सभाति प्र३ ॥१॥ मदु मायाम fea - पाण्याचाभूमिमा कानु पुबान कार्य कम माता पानुस .॥ fraiल्य पादु-योx. fम -- नामा संसa tan.pintent Re--पुकार मुमम सद्गामा : 1 T २२० विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख मदाश्रयः श्रीजिन-धर्मसेवा तता विना मा च परः कृती कः ॥९॥ इत्यं विभाव्य मकलं भुवन-स्वरूपं योगी विनश्वरमिति प्रशमं दधानः । प्रविमोलिवगस्वलितान्तरङ्गः पश्यन स्वरूपमिति सोऽवदितः ममाधा॥०॥ हृदय कमल-मध्ये सैद्वमाधाय रूप प्रमरदमृतकल्पमूलमन्त्रैः प्रसिञ्चन् । मुनि-परिषदुदीन-स्तान-पापरमदेव श्रतमुनिरथम स्वं विहाय प्रशान्तः ॥३१॥ प्रगमदमृतकल्प कल्पमल्पीकृतना विगलितपरिमोहस्ता भागामेषु । विनममर-कान्नानन्द यापाम्यु-धारा. पतन-द्वतजारन्त दाम-सोपानरम्य ॥२॥ यता याने तम्मिन जगजनि शून्य जनिभृता मना-माहवान्त गत जमपूर्यप्रतिक्षत। व्यदीप्युगरखामा नयन-जल सुधारियन चियाग किकुयांविद न पहना दुस्मतः ॥३॥ पादा यस्य मदामुनरपि न के रियमिता इस मन जिवण्याय नपाइ म्याम। सोय श्री मुनि-भानुमान विधि-माइस्ता महान चूयं वद्विधिमानरमातुं यत युधाः विन्ध्यगिरि पर्वत पर विज्ञानग्र ०२१ या प्रयान्ति पराकमनिराला. स्थानस्य तम्य परिषजनक मगा। ग्या भवेदिति छावण्याशि धेयादिय श्रुतमुनेग्मुचि नि । इशु-शर-शिखि-विधु मिस-गफ- परिधायि गद्वितीयगापा सित-नयमि-विधु-दिनादयतुषि मावशा प्रतिनियमित विहीन-पक-निय वित-गमत्यजित विहिल-माला-Infor yगा । प्रबार-मनम पापा जितना-यापम भदायायनिरा पमपाम (न्य मन..॥ प्रपन्च-aft-aligNINE महरामा पाणी पीणा । {मार-ina tant urinat fashift salaitn anmititi taant) १००(५८) मागदप्रद सम्म पर (खm. २१.) म.-याNAARITRijal HTRIAN-E-REKA-INE | .

२२२ विभ्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख प्रश्न-पत्र-कुलाकरायल-भर-प्रो-हार-वधीमयिः प्राम-चप्र-कुलामिपण्डपवनयायुण्ठराजोऽजनि ।। १ ।। कल्पान्त- भिवाब्धि भीषणयलं पातालमल्लानुजम् जंतुं यज्यिलदेवमुधवभुजस्येन्द्र नितीनवाया। पत्री जगदेकवीर नृपतेजेर-द्विपस्यापता भावन्तिनि या भग्नमदितानी गगानोकवत् ॥ २॥ पम्मिन दन्तिनि दन्त-पम-दलित-विट कुम्भि-कुमापसे योगसंस-गुगनिपारिनि रिपु-यालाश प लथि । ग्यारकानाम न गापरप्रंसिपो मयाग-गणारग- पागम्यतिमालम्पराजगमरे य: रजापितः स्वामिना ॥३॥ भात भार-पयोधिगनु परिधिपातु प्रिफूटरपुरी लहान पति नायास्तु व मुरारातिम्नथापि अनुजगदेच्योरापन रोजगतियान- निरगिज-पाधिपणे येनाfrienfriaम् ॥४॥ पापाय bण भूतिपय कण्डमा 341 HRIAL -नि लिहावा II ril गरमिबिगो मोis काना mini-E-IN-farmily: मामाnिensifuinfor नदी पलगानिsviraitrina | LilantaliMAATriaminatil बकायाप गया:ikalna ist:

विन्ध्यगिरि पर्वत पर कशिज्ञान ००३ [नाट-बल पही एक पेश जिसमें पामुसाय मत्री मनपार विस्त प वर्णन पाया जाता है। दुर्भाग्य खएक मात्र हात हातामा पाया बेब ...(२८१)विमान के जिये गरेकन हम माय सकी सीमा पिसाराधीहै। बरिया 7 MIT मोसम्भव किससे समुण्डाय र मनि मा मेको विदित हा जाती निमा वि 0 अनुमानती गाये जाने। ११० (२८.) उसी साम्भ पर (गभग शास. ११५) (पिप गुप) श्री-गोम्मट-जिन-पाद पागदम्बा मlates धीगम्भीर गुणा भागपुरानामपदमी कपणं ।। le sit últ guarani. f** à mf सागरमा निlanni १११ (६४) पपरपागिल के पूर्व की बहान पर (शकस.स श्रीमत्परम-गम्भीरसादामायबान जीयात डोनाम जिन शास" श्रीमूल-सक्षपय.पjिisthance भE-lesnufRATRAIL. . बी. कीर्ति । Patt राहत मा: -मुअमुराम...... Ent nireer-nik NIRTHEATER-H from fitutikarat:HTRAIभगोfrise mar Insi- मममभूषणदेवा. या माशा माtant...aantar ................ ... म. it insaanा ... tutt kum-{ it.. ... tattatrintml पगाrt withit TR५६ मा rrist anmant परिभागि int मीनानगर aantinati mamitte विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख स्वस्ति समधिगत-पश्च-महा-शब्द महा-मण्डलाचार्यादि- प्रशस्वय-विराजित-चिदालतलं विसम्बोधावयोधितरं सकळ- विमल-केवल-झान-नेत्र-वयर मनन्द-शान-दर्शन-वीर्य मुखात्म. कर विदिवात्म-मद्धोद्धारकरु एकत्व-भावना-भावितामह उभ-जय-पमधिसखरु' त्रिदण्ड-रहिवर त्रिशल्य-निराफतर' चतु-कपा-विनाशकरं चतुर्विधवुपमर्गगिरिफन्दरादि-देश्य- समन्त्रिवर पन्च-दम-प्रमाद-विनास-कत्तुगडं पचापार- वीयाचार-प्रवीण सडुरुशनद भेदाभेदिगलं मटु-कर्म मार सप्तनयनिरत प्रष्टाङ्ग-निमित्त कुशललं प्रष्ट-विध-मानाचार- मम्पनरु नर-विध समचरिय-विनिर्मुसरं दश-धर्म-शर्म-शान्तर मंकादशप्रावकाचारखुपदेशप्रसाचार-चारित्र द्वादशातप- निरस द्वादशा-श्रुवप्रविधान सुधाकररु प्रयोदशापार-शील. गुण-धर्यमं मम्पनर एम्यत-नाल्कु-लज जीव-भेद-मार्गमा जीव-दया-पर श्रीमत्काएउफुन्दान्वय-गगन-मार्चपर सिदिवातण्ड-कुप्ममाण्डर देशिगय-गजेन्द्र-सिन्धरमपधारावभा. सुरर श्री महादेशि-गण-पुस्तक गच्छ पाण्ड-कुन्दान्यय श्रीमन विभुवनराज गुरु-श्रीभानुपन्द्र-सिद्धान्त-पासिंगलुं ग्री- सोमचन्द्र-सिद्धान्त चक्रवर्तिगर्नु चतुर्मुखभट्टारफरेवई ओसिहनन्दिभट्टाचार्य श्री शान्तिभारकाचार्य श्री. शान्तिफोर्ति...र...भट्टरफदेवर... श्रीकनकनन्द्रमज- धारिदंवर श्री नेमिपन्द्र मलधारिदेवर धनुसहोसकल- गय-पापारय... .र-देवधामह' कलियुगापटपासव २२६ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख मुनीन्द्र प्रवर शिष्यरु गौरग्रीकन्ति यह सामग्रीकान्वयह ...नश्रीकन्तियाँ देवश्रीकन्तियनं कनक-श्रीकन्तियर शिष्य...यिप्पत्त-एण्टुतण्ड-शिष्यरु वेरसु हेवणन्दि संवत्स रद फाल्गुण पनि श्री गोम्मटदेवर तीत्यनन्द......पण कल्याय [इस लेख में कुन्दकुन्नान्वय, देशी गण, पुस्खकगच्य महाप्रभावी भाचार्यो-त्रिभुवनराजगुरु मानुचन्द्र सिद्धान्तकार्ति, सोमय सिदान्तपत्ति, चतुर्मुख भहारकदेव, सिंहनन्दि महापाय, शान्ति महारकाचार्य, शान्तिकी िभट्टारकदेव, कनापन्द्र मलधारिदेव, भार मिचन्द्र मलधारिदेव-2 उल्लेख के पश्चात् कहा गया है कि इन सब प्राचारयों व भनेक गयों और संघों के भाचार्य, रवियुग के गणधर पचास मुनीन्त्र, व उनकी शिष्यायो गोरधी, सोमश्री, देवधी, कनकधी व शिष्यों के पदाइस सों ने उस तिथि को एकत्रित होग पञ्चकण्यापोरसव मनाया। नोट-लेस में संवसर का नाम वयन्दि दिपा हुभाजिससे सम्भवतः हेमलम्य का ताल्पय है। शक समलम्ब था।] ११४ (२६८) एक शिला पर जो उस चट्टान के सामने पड़ी है ( सम्भवतः शक सं० १२३८) खखि श्रीमूलसइदेशोगय-पुस्खकगच्छ- कान्यान्वय श्रीविद्यादेपर शिष्या मन्दिया नल-मयस्सरद चैप-मु-१ सोमयाद नाफ-श्रीमामरोजिनोमरा. खराद मानमहाश्री॥ निधि विषशिप पम्पिक IVATE किया।

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख २२७ [ मोरम में मल सबसा का बेख है। शक . १२१८ मल पा] ११५ (२६७) सखण्डवागिल की शिला पर (लगभग शक मं० १०८२) स्वस्ति श्रीमन्मदाप्रधान भन्य-जन-निधान सेनेयङ्ककार रण-रणनीर श्रीमन्मरियाने-दण्डनाघानुजं दानभानुजनंनिसिद भरवमव्य-दण्डनायकनी-भरतवाहुबलिकेवलिगल प्रतिमेग- मुमनी - यसदिगलुमातीय-द्वार-पत्र-शोभात्य माडिसिदनी-रगद इप्पलिगेयुमनीमहासापानपड्डियुमं रचिसिदं श्रीगोम्मटदेवर सुचलु रङ्गम हप्पलिगेयं विगियिसिदनन्तुमधयुमी-गणवादिना- दालतिगल्लिगश नाप्पड। कन्द ।। प्रकट-यश-विभुदेण्य. सुकनेवमदिगन्जनासंदु जीर्णोद्धार- प्रकरमनिन्द्रनली. किक-धृति माडिसिदनेसेये भरत-चमूपं ॥१॥ भरत-चमूपतिसुते मु. स्थिरे शान्तल-देवि धूचिराजाने तदरखनेयं मरि...... ...नो सदु घरयिसिदनिद ॥२॥ [ मरिषणे दमनाय के लघु भ्राता महामंत्री भरतमप दणनायक ने ये भाम र रति संवनि की मूनि यां च ये बस्तियां हम तीर्थ.

२२८ विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख स्थान के द्वार की urमा के लिये निर्माण कराई। ऊहाने रागाला की हप्पलिग (कटघर ?) व महासोपान व गोम्मटदेव की ज्याला की हप्पलिगे भी निर्माण कराये, क्या गावाडिमट में श्रम्मी नवीन बम्नियाँ बनवाई और दो सौ बस्तियों का जीगोंदार कराया। भरत चमूपति की मुता शान्वल देवी...."ने यह लेख लिखवाया।] ११६ ( ३१२) घोदेगल बस्ति के पश्चिम की ओर चट्टान पर (शक सं० १६०२) श्रीमतु शालिवाहन शकवरुप १६०२ सिद्धार्त्य-संव- त्सरदमाघ-बहुल १० यल्लु मुनिगुन्दद सोमय देश-कुलकरणि- यर मकलुवा होनप्पय्यन अनुज वेङ्कप्पेय्यन पुत्र सिद्दप्पैन अनुज नागप्पय्यन पुण्यत्रीयराद बनदाम्बिकेयरु बन्दु दरु- शनवादरु भद्रं भूयात श्री ॥ श्रुतसागर-वर्निगल समेत यिदे तिथियति माडिगूर गिडगप्प नागप्पन पुत्र दानप्पसेटर पुण्य-त्री नागबन मैदुन भिष्टप्पनु दरुशनवादरु ।। [ उक्त तिथि को ध्रुतसागर गणी के साथ उक्त व्यक्तियों ने तीर्थ वंदना की। ११७ (२५६) कञ्चि गुब्धि बागिल के दक्षिण की ओर चट्टान पर (सम्भवतः शक सं०१५३१) श्री सौम्यसंवत्सरदोलु विभवद साखयज व ७ मियो- ल वा श्रोसोमनाथपुरवेनिसिद काङ्गनाडिगदं मनादिय प्राम ॥

विन्ध्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख ૨૨૪ प्रा-मामदल श्रीमत्पण्डित देवर शिष्या काश्यप गोत्रद द्विज- फुल-सम्परु सेनशेव मायग्ननकरु प्रवर मदलिग मदगिल प्रिय-पुत्र हिरियग्नन श्री गुम्मटनाच म्यामिगल दिव्य-श्री- पदवन दरुशनवागि परमजिनेश्वर-भकर वर-गुखिगनु मुक्ति-पघर्ष पडदरू ।। श्री [कश्यप गोत्रीय वाया और पति बने शिष्य नाव सप पुत्र जिनभन पिरिपपय ने क तिथि को समादि प्राममार की गणना की (1) और सही पत्री महादेवी ने गाम्मरमा मामी. रणविद की बम्द मा । मुनि-मार्ग प्राप्त किया। [नाट-लेख में सौम्प पवमा का गोख। शक . सौम्य था ११८ (३१३) चौबीस तीर्घकर पस्ति में (सक सं० १५७०) (नागरी लिपि) वो नम सिद्धेभ्यः गोमट-स्वामीः भादधिर मुल्ला. नाईकः पोषोम वीर्य करं कि परवीमाः पारकीरती पणियः धरमचन्द्र पल्लातकार पदसा: सके १५७० सर्पधारी-नाम-सवासा पैशाष यदी २ मुकुवार देहराडी पठी स्वर गेरपाल: यरंगोत्र: जीनासाः पीवासाका पुत्र. सदावनसाझासा पलामामा। पुरातापामा मनासा. फमुझपूरे सावमा भासमा...... ३९...भोपव......रसे राब...... ....

inगिरि tittसिनालय ११८ १२.७) ससग मागिनु को जानेगले मार्ग परिनम की मगर गहान पर (म.१.१५) (नागरी लिvि) संपत् ११८ वर्षे पैगाप-मुदि मामे प्रा me म मण्डिागाई...पा-राजकीतिः । गर में समोसेनात म श्री इन्द्रपणवर गोमू योरगाव गावी पोर-पुत्र पं भा धनाई तया पुन प साका पुगनाई सगा पुत्र पम-परिगर गोमट-वामि पाजापा,.....मफन्न १२०( ३१८) पहाड़ी पर चढ़ने के मार्ग के पूर्व की और चट्टान पर (लगभग शक स० ११४०) भारकरेय वीर वीरपल्लय-रायन मा केदेसवर-नायक बेल्लुगाल प्य...येच बेजपडिगर बेटके ।। १२१ (३२१) वाप्रदेव मण्डप के पीछे चट्टान पर सम्भवतः शक सं० १९०१) सिदाचिस । कार्तिक सुद्ध २ ग्लु । श्रीब्रह्म-देवर मटपवन्न हिरिसालि गिरिगौडना तम्म रहैयन से वे ।। ।

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२३२ विन्यगिरि पर्वत पर के शिलालेख १२३ (३७५) चेन्नएणन के कुछ में एक चट्टान पर (लगभग शक सं० १५६५) पुट्टसामि-सट्टर श्री-देवीरम्मन मग चेन्नपणन मट्टप भादि-तीर्त्तद कोलविदुः हालु-गोलनोविदु अमुर्तगालनोविदु गङ्गे नदियो। तुङ्गवद्रियोविदु मङ्गला गौरेयो विदु रुन्द- वनवोविदु सङ्गार-तोटवा । भयि प्रयिया अयि प्रयिये वले तीत वले ती जया जया जया जय ॥ [ यह पुजामि और देवीरम्म के पुत्र चण्णय का मण्डप और पादितीर्थ है। यह दुग्धकुण्ड है या फि अमृतकुण्ड ? यह गा नदी है या तु भद्रा या मालगोरी? यह वृन्दावन है कि विहारो. पवन ? ओहो! क्या ही उत्तम तीर्थ है। ॥

श्रवण वेलगोल नगर में के शिलालेख १२४ (३२७) अक्कन पस्ति में द्वार के समीप एक पापाण पर (शक सं० ११०३) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामाप-नाम्दन । जीयान त्रैलोक्य-नाघस्य धामनं जिन-शासनम् ।।१॥ भद्रम्भूयाजिनेन्द्राय शामनायाप-नाशिने । कुतीय-धान्त-सहात-प्रभेद-पन-भानवे ॥२॥ स्वस्ति श्री-जन्म-गई निभृत-निरुपमौनिलोदाम-तेज विस्तारान्त:कावा-वलममलयशचन्द्र-सम्भूति-धाम । वस्तु-बातोद्भव-स्थानकमतिशय-सत्वावलम्ब गभीर प्रस्तुत्य नित्यमम्भीनिधि निभमेसगुं होय सलोज़श- वंशं ॥३॥ पदरालु कौस्तुभदोन्दनार्य-गुण मं देवेभदुराम-स. त्वदगुर्ब हिमरश्मियुज्वल-कला-सम्पत्तियं पारिजा. खदुदारत्वद ऐम्पनार्यने नितान्त वाहिद मानल्वे हिदनुजित-वीर-वैरि-विनयादित्यावनीपाल ॥ ४ ॥ कं । विनय बुधरं रजिसे पनवेज वैरियलमनसरिसे नेगदं।

२३४ प्रवाशाल नगर में शिवाय
विनयादित्य-नपानक
ननुगत-नामात्यनमल फोति-ममत्य " !
मा-पिनयादित्यन व
भावोगा-मन्यदेवता-सप्नि मद्-
भार-गुण-भानममित क.
मा-विनसित केलेयारमियम्बनु पेमा ॥६॥
मादम्पति वनूभय.
नादं शनिगं मुराधिपविगं मुन्ने
न्तादं जयन्वनन्त रि-
पाद-विदूरान्तर रेया नृप ॥ ७ ॥
मातं चालुक्य भूपालन बन्नद भुजा-दण्डमुदण्ड-भूप-
ग्रात-प्रात्तु भूभृद्-विवजन कुलिरा वन्दि-सस्यौप-मेयं ।
श्वेवाम्भोजात-देव-द्विरदन-शरदधेन्दु-कुन्दावदाव-
ख्यात-प्रोदारारो-धवलितभुवनं धीरनकाङ्गवीर ॥८॥
एरेयने लगे निसि नेगल्दिई
एरेयङ्ग नृपान-तिलकनङ्गने चलवि-
रेवट्ट, शील-गुणदि
नेरदेचलदेवियन्तु नान्तरमोलरे ॥ ६॥
एने नेगल्दवरिमार्ग
वनूभवन्नेंगल्दरल्ले बल्लाल वि.
प्णु-नृपालकनुदयादि-
त्यनेम्य पेसरिन्दमखिल-वसुधा-तलदोल ॥ १०॥

अवस बेलगोल नगर में के शिलालेख २३५ प्रबरोल मध्यमनागियु भुवनदोलु पूपिराम्भोधिये. दुविन फूडे निमिच्चुंवोन्दु-निज-वाहा-विकम-कोडयु- दवदिन्दुत्तमनाइनुत्तम-गुण-नाक-धामं धरा- घव-चूडामणि यादवाज-दिनपं श्रीविष्णुभूपाल के एवेगसेव कोयतूर्तत- तलवनपुरमन्ते रायरायपुरं ब. स्वल बलेद विष्णु-तेजो- ज्वलनदे येन्दवु बलिष्ठ-रिपु दुर्गङ्गल ॥ १२ ॥ इनित दुर्गम-वैरि-दुर्ग-चयमं कोण्डं निजापदि. दिनिक परनाजियोल तविसिदं तनख-सहावदि- न्दिनिदानवर्गित्तनुद्य-पदम कारुण्यदिन्देन्दुवा- ननित लेकदे पेत्वोडब्ज-भवन विभ्रान्तनप्पं बलं ॥१३॥ कं । लक्ष्मीदेवि खगाधिप- लचमङ्ग सेदिई पिप्णुगेन्तन्ते वलं । लक्ष्मा-देवि-सन्मृग- लक्ष्मानने विष्णुगमसतियने नगल्लल ।। १४॥ प्रवर्गे मनेाजनन्ते मुदती-जन-चित्तमनीकालकेसा- स्ववयव-शभियिन्दवनुवेम्यभिधानमनानदाना- निवदमनचु मुवनयमानदे घोररनेचु युटदोल् । परिसुवानादनात्म-यवनप्रतिमं नरसिंह-भूभुने।।१।।

२३६ अत्रण वैल्गोल नगर में के शिलालेख
पडे-मानें बन्दु फण्डङ्गमृत-जलधि ता गदि गण्डबाट
नुडिवावङ्गेननम्यै प्रलय-समयदोल मेरेयं मोरिवपा
कडलन्नं कालनन्नं मुलिद कुलिकननं युगान्ताग्नियन्नं
सिडिलनं मिहदन्नं पुरहरनुरिगण्यननी नारसिंह
तदर्वाङ्ग-लक्ष्मि ॥
मृदु-पदयेचलदेवी-
सुदतिये नरसिंह-नृपविगनुपमसौख्य-
प्रदे पट्ट-महादेवी-
पदविगे सले योग्येयागि धरेयोल नेगल्दल ।। १७ ॥
वृत्त ।। ललना-लोलेगे मुन्नवेन्तु कुसुमात्र पुट्टिदों विष्णुगं
ललित-श्री-वधु-विङ्गवन्ते नरसिंहचोषिपालवे-
चल-देवी-वधुगं पराय॑-चरित पुण्याधिकं पुट्टिदो
बलवद्वैरि-कुलान्तकं जय-भुजं बल्लाल-भूपालकं ॥१८॥
रिपु-भूपालेभ-सिहं रिपु-नृप-नलिनानोक-राका-शशाङ्क
रिपु-राजन्यौप-मेघ-प्रकर-निरसनात-बाव-प्रपातं ।
रिपु-धात्रीशाद्रि-वन रिपु-नृपति-तमरस्ताम-विध्वंसनार्क
रिपु-पृथ्वोपालकालानलनुदयिसिदं वीर-बल्लाल देय।।१८॥
गव-लील लालनालम्पित-चहल-भयोम-ज्वरं-गूनरंस.
धृत-शूलं गोलनुच्चैःफर-धृव-विलसत्पल पल्लवी.
रिझव-घेलं चालनादं कदन-वदन-दालु भेरियं पारसपोरा.
हिस-भूभृञान-काजानजानतुज-यलं वीरव्यल्लाल-देव ॥२॥

अवय बेल्गोल नगर में के शिलालेस २३७ भरदिन्द तंत्र दागर्चदिनोडेपरस काग्दु कादकणं . हिरे पल्लाल-चितीशं नइदु बलसियुंमुत्तेसेना गजेन्द्रो- स्कर-दन्तापात-सचूर्णितशिखरदालुच्चशियोसिल्किदंभा. सुर-कान्ता-देश-कोश- ज-जनक-दयापान्वितं पाण्ड्यभूपं ॥२१॥ चिरकाल रिपुगलामाभ्यमेनिसिई चङ्गिय मुचिदु- ईर-जो-निधि धूलि-गोटेयने फोण्डाकाम-देवावनी. श्वरन मन्दोडेय सिवीश्वरननाभण्डारमं बीयर' नुरग-बातमुमं समन्तु पिडिदं बल्लाल-भूपालकं ।।२२।। स्वस्ति समधिगत-पञ्च-महा-शब्द महा-मण्डलेश्वरं द्वार- पदीपुरवराधीश्वरं तुलवयल जलधि-पडवानलं दायाद-दावानलं पाएज्य-कुल-कमलवेदण्ड गण्ड-भेरुण्ड मण्डलिक-वेण्टेकार घोल-कटक-सूरकार । सशाम-भीम । कलि-काल-काम । सकल- वन्दि-न्द-सन्तर्पण-ममम-विवरणविनोद । वासन्तिका देवी- लब्ध-वर प्रसाद । यादव-कुलाम्बर-घुमणि । मण्डलिक. मकुट-चूडामणि कदन-प्रचण्ड मलपरोलगा शनिवारसिद्धि गिरि-दुर्ग-मद्ध नामादि-प्रशस्ति-पहित श्रीमविभुवन-मल्ल तलकाडु-का-नगलि-नासम्बबादि-यनवसे हानुङ्गल-गोण्ड- भुज-पळ-वीर-गङ्ग-प्रताप-होयसल वीर-यल्लाल देवविध मण्डलमं दुष्ट-निग्रह-शिष्ट-प्रतिपालन-पूर्वकं सुखसया-विनी. पदि राज्योंगय्युधिरे। उत्पाद-पोपजीवि ॥ - २३८ श्रवण वेल्गाल नगर में के शिलालेख जनकं शिप्टेष्ट-चिन्तामणि जननि जगत्ख्यातेयकम्बेयेन्द- न्दिनिसं श्रो-चन्द्रमौलि-प्रभु सममे कालेय-मन्त्रीश वर्ग ॥ २३॥ पति-भक्तं वर-मन्त्र-शक्ति-युतनिन्द्रङ्गन्तु भासद्ह- स्पति-मन्त्रीश्वरनादनन्ते विलसद्वल्लाल-देवावनी. पविगी-विश्रुत-चन्द्रमौलि-वियुधेशं मन्त्रियादं समु- नव-जा-निलयं विरोधि-सचिवोन्मत्तभ-पश्चाननं ॥ २४॥ वर-ताम्बुज-भास्करं भरत-शावाम्भोधिचन्द्रं समु. दुर-साहित्य-लतालबालनेसेदं नाना-कला-कोविदं । स्थिर-मन्त्रं द्विज-वंश-शोभिवनशेषस्तुत्यनुद्ययशं परेयोन विश्रुत-चन्द्रमौलि-सचिव सौजन्य-जन्माश्य ॥ २५॥ तवर्धा-लचिम ॥ धन-बाधा-पदसोम्र्मि-भासिने मुस-त्र्यामारा-पढेज-म- पहने रसोन-विलासे नामिविवतावादेलावण्य-पा- वन-वास्तम्भूने चन्द्रमौलिपघुवी श्री साथिय जग. जन-सातुत्य कल-दर नुन हानि वानको ।। २६॥ म्यम्स्यनारत-पिनमदमर-मौलि-माला-मिलित-यजन-जतिन. सुगन्न-भगवाहतारमेरम-मातन्धोदक-परियोजनामा - कपाश नगर में मिखान भिषानुन-दान-प्रमुग जमाप कीमत हिरिय-गरितिपापल. देविदाई॥ पालिका- रापं मासबाडिमार सिन् । परम-बाबकनमल पासियाजी-शिवेयनायफ रिभुदेसर ॥२७॥ पातन पगि सीताम्सुम सीता-रालोद-रियदयरात्री- पाठ-परागपिनवि. नांतगे पन्दम्भेगषयारियण्टं ।। २८ ।। वत्र॥ जिन-पति-पद-सरसीरह- बिनम ममस-सानाना विनय-निधि-विश्व-यात्रियोल अनुपमनी यम्मदेव गाडे नंगल्दं ।। २ ।। वत्सदार ।। गत-दुरिवनम-परिवं वितरण-मन्वार्पवासिमात्यि-प्रकरे । वितियान-यापेय-नायक- नतिधार कल्प-वन्दं ॥ ३०॥ तत्सहोदरि॥ मरसिह-वदने घन-कुधे परिणाशि मदोत्ककाकिस-स्वने मरब २४० प्राण पलार नगर में गिजानन करि-पनि-गमने सन्तरि धरयोल फालध्ये रूपिनागामादल ।। ३१ ॥ तत्सहोदरि॥ धरयोल रूदिय मासयाडियरसं हेम्माडिदा गुमा. करना-भूपन पित्त-चलमें बमत्सोनाम्य गदानिशा- कर-तारापार-तार-दार-गदम्भावस्फुरकोर्स-मा- सुरंयमाचल-देवि विश्व-भुवन-प्रख्यातिय ताल्लिदल ॥ वत्सहोदर । वर-विद्वग्जन-कल्प-भूजनमलाम्भोरासि-गम्भीरतु- शुर-दर्प-प्रविनायक-प्रकर-तीन-भ्यान्त-सहात-सं• हरणार्क शरदभ्रशुभ्रविलसत्कीर्यनाराष्टमी धरेयोल सोवण-नायकं नेगल्दनुयद्वैर्य-शौाकर ।। ॥३३॥ कं ॥ गिरिसुतेगे जद्रुकन्नेगे धरणी-सुनेगत्तिमब्वेगनुपम-गुण-दोल । दौरेयेनलिन्तीसकला- बरेयोल बाचवे शोलवति सति नेगल्दल ॥३४॥ तत्पुत्रं ॥ परसैन्याहि-विहङ्गजितयशस्सङ्ग जिनेन्द्रांघ्रि-प- अरजा-भृङ्गनुदार-तुङ्गनेसेदं वनोप्पुवीसद्गुणो- अवय बेलगोल नगर में के शिलालेख करदि देशिय-दानायकनिजाभिष्टायसन्दायक धरयोल पम्मेय-नायकंनिसिलदोनानायसन्त्रायकं ॥३५॥ सदनिठे ।। शतपत्रेतये मल्लिसहि-विभुगं निश्शेप-चारित्र-मा- सिनेगी माचवे-सेट्टिकव्वेगवन्नात्मीय-सौन्दर्य-नि- र्जित-चिचोवकान्वयुद्धविसिदल दोघवे मकान्वे वा- र-नुपाराशु-प्रमशा-धवलिताशा-चयाधात्रियोस् । ॥३१॥ बम्मेय-नायकननुज ॥ मार मदनाकार हार-धाराधि-विशद-कास्यधार। धार घरेयाल नेगल्दं दूरीफव-पकज दुरित-विमलाचारं ॥ ३ ॥ तदनुजे ॥ हरिपी-नाचने पदजानन घनमोणिस्तनाभाग-भा- सुंग बिम्बाधर कोकिनस्वने सुगन्धवासे परचन- दरि-भशापलि-नीलफेशे-कम-ईसीयानेयीकम्यु न्यायप्पापलदेयि-कन्तु-मवियं सौन्दर्य दिनदेखिपा ।। ॥३६॥ वनुशे॥ इन्दु-खि मृग-विज्ञापन मन्दर-गिरि-धेश्य तुष-मुगो मुत्री- २४२ श्रवणबेलगोल नगर में के शिलालेख वृन्द-शिवि-केश-विलसिते चेन्दव्वे विनूतेयादलसिनावरेयाल ॥ ३८ ॥ तनुजं ॥ हार-दरदास-हिम-रुचि- तारगिरि-स्फटिक-शव-शुभ्राम्बुरुह- तोर-सुर-सिन्धु-शारद- नीरद-मासुर-यशोऽभिराम कामं ॥ ४०॥ सिरिगं विष्णुगवेन्तु मुन्नवसमास्त्र पुट्टिदों शम्भुगं गिरिसखावेगवेन्तु पव्वदननादो पुत्रनन्तीगली- धरणी-विश्रुत-चन्द्रमौलि-विभुगं श्रीयाचियक्कगवु- झुर-तेजंगुणि सोमनुविसिदं निस्सीम पुण्योदयं ॥४१॥ वर-लक्ष्मी-प्रिय-वल्लभ विजयकान्ताकर्नपुर विभा• सुर-वाणी-हृदयाधिपं तुहिन-वार-क्षीर-वाराशि-पा- ण्डरकीर्तीशनुदम-दुर्द्धर-तुरङ्गारूढ-रेवन्तनु- दुर-कान्दा-कमनीयकामनेसेदं श्री सोमनी धात्रियो ॥ ४२॥ परमाराध्यननन्त सौख्य-निलय श्री-मजिनाधीश्वर गुरु-सैद्धान्तिक-चक्रव िनयकीर्ति-ख्यात-योगीश्वरं । भरणी-विश्रुत-चन्द्रमौलि-सचिवं हत्कान्तनन्दन्दहा- हरियीयाचलदेविगिन्दु विशदोद्यकीर्त्तिगीधात्रियोल।४॥ भरदि बेलुगोल-तीर्थ-दोल जिन-पति-श्री-पार्व-देवोद्धम- न्दिरमं मानिसिदल विनूव नयकीर्तिख्याव-योगीन्द्रभा- अयाल नगर में निवास मुर-मिप्योचम-मानपन्द्र-मुनि-पासम्मोजिनामक गु. स्थिायणापरादपिकासिगदाग्रा.प माथि छापमान श्रीमान देशिय पुरक काय. इन्दाबयान ।। + If विदिस-गुणचन्द्र-finar. Fत--गुमनाम-दि पामता भिकापफोतिया- इस-दवस मुनीम ॥४॥ --पयाधि-न- शपिं ना.. refe-ifsa-hy in fulanets-in. Bा-बस-11 पापु-म. सुस्ती-मीमयफोkिarite teetle enteres परिवाया। w-tail-in-HIYीति :भामभाद्र in मापद alpath " PRE IN FAVIER-पीति anti.nati. सुसाहानमन्मY Vamathem. भानाAmattrate visittistives firtankiपालपita-NLK.

२४४ प्रवण वेल्गोल नगर में के शिलालेख गौरि वपङ्गलं नेगल्दु ता नेरेदल गड चन्द्रमौलियोल नारियर्गिनदे-सोयगु पेल्पलबुं भवदेोल निरन्तरं । सार-तपाल पडेदु ता नेरेदं गह चन्द्रमौलि-ग. भोरेयनिप्प समनंनिपाचलवाल सारगिङ्ग नान्तरार ॥४॥ शफयर्पद मायिरद नूर नाल्केनेय प्रव-संवत्सरद पोष्य-बहुल-तदिगेसुक्रवारदुत्तरायण संक्रान्तियन्दु । कृ॥ शोन्नधि चन्द्रमौलि-विभुषाचल-देयि-निजोद्ध-कान्तगा- लोल-मृगाधि-मालिसिद बेल्गोल-तोयद पारेवर. चालिगे पेडे बम्मेयनधियनिसनुदारि-वीर-य. लालनपालन्धरेयुम ब्धियुमल्लिनमे सल्लिन ॥५०॥ उदयनिपनिस दत्तिय- नदनाचले पासचन्द्र-मुनि-राजश्री. पद-युगमं पूजिसि चतु- नाधि-वर निमिरे कीति जिनपतिगित्तल ॥ ५५॥ अन्तु धारा-पर्यफ मादि कोह तद्र फेवरेप इल्लं । पति ने मेरे । प्रतिहिरिय-सरि । fain पाठदमर । मल्लिने मेलियननोच्छ । पति नेला. जाम्मे । मलित नागर-कट्टाहार रिमलि पर के न्वहिप । मल्लि पर मानतिय गुण । मलि पर मेरे पति पर्व किरियरय स्तति । मस्ति पर का वोड। पछि पनि । ममि पर अधिकारियो । नपदाधिय पारि । मस्ति हा देवन इम-सीमेमू प्रवश लोन मगर में के शिवालेख ताम्बळ । पछि पग इपिसेय गुण्ड। भनि बलगमावर गुण्ड । प्रति मूडलाये। पछि मूड नह-गुण्सु । पश्चि मूडळ. तेयलियनगुहे। मस्त्रि मूडवालद-मर । प्रधि मूगल फेम्बरप हवम सीमें फूदित स्थल पृत्ति ॥ प्री-करपद फेशिययन वम्म पाचन फैयि मार कोण्ड घेक्कन कोल्कीय पामगट्टम रिट्टरदर सीमे। मुडागर । ते सागर । पदुव हुधगह । पग न कल । दिरिय जत्रियस्य फरेप ताद । फेवा। गङ्गा-यमुद्रद कोलेरिय साट । यमदिय मुन्दप प्रदिपचु, नानादेसियु नाई नगर, देवरष्ट-विधानेगे विहाय दक्सद हेरिङ्ग बल्ल १ मढकंय हेरि हाग १ मेलसिन रिडू' दाग परिसिनम हेरिङ्ग हाग १ इत्तिय मलवेगेवार १ सोय मशगेल कोम १ एलेय इरिङ्ग पहनूरु ।। दान वा पालने वा दाना योऽनुपालने । दानास्वामवाप्नोति पालनादच्युतं पदं ।। ५२।। बहुभिर्वसुधा दमा राजमिस्सगरादिभिः । यम्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य यदा फलं ॥ ५३ ।। स्वदसा पर-पसा वायो हरेति वसुन्ध। परिप-महसापि विधाया जायदे कामः ॥ १४ ॥ महलमहा भी श्री श्री॥ [सस में नमानिमयासी भाषा भाषी (पा नाम पापिपरा निर्माण कराये हुए जिम मन्दिर (ख) मेनोमिकी प्रार्थना से हम्मरण र तारारम्बा. बलि नामक प्रामा हाम दिये जाये । प्रमाण पा मम्मा u fit antar Hart- मिना-miu । गरेप-14th 1 निभान -pirtinute नरसिंह-पमा गौर बजाल frTrandi गानों पर in at भने भो रग मे पिर, RBI परागर अगा। बीर मामीला नरा गान भारोगई. गुन-नोरा भीतिर गया, मार-नरेगा शूल समाया, पहनीय THIARोग, और बार-नरेय के सम्बनिरोगये। परमशभिमान में भारपुर मने की टानी, पर बसाउ-नांश ने उत्रि गरे शिव की पूर्ण र गला और पाण्य-नायोरमकी पाना-मशिनर जिया। पच बाइम से भागे इन्ही शास्त्री यादव यी नाश त्रिभुवन- मल वीर वलाउ देव का परिचय।नेस में इनकी यनेर प्रताप-मुध पदवियों तथा इनके तरकाड, काँगु, नरनि, नाउम्पवादि, नवये और गगल की विजय का उश्लेम है। शम्भुदेव और भोके पुय चन्द्र- मालि इनों त्रिभुवन मल्ल वीरबल्लाळदेर के मंत्री थे। पथ सचाइस से चालीस तहमाचल देवी के वश का वर्णन है जो इस प्रकार है- । - चन्द्रमौलि की भार्या माचलदेयी की वंशावली (मासदाहिनादु के प्राव) शियेयनायक-पदम . ... । । अम्मदेवार वाषनायक कारको पाच रदेवी (मासवारि मरेश इम्मादि सवियनायक-पासावं देव की पत्नी) 1 । जम्मेवनायक-दोबम्ब मार पदमानि-माचल देवी धन्दा (महिपति भार मापणे अवय बेलगोल नगर में के शिलालेख प्रति मावत देवी व - की पुत्री) साम २४९ प्रवण बेल्गोल नगर में के शिलालेख पाचल देवी नमकीति के शिष्य बालबन्द की शिष्या थी। नए- कीति मिशानदेव मूरमध, देशियगण, पुस्तक गछ, कुन्दकुन्दावन गुणयन्त्रमिदान्तदेव के शिष्य (सुत) थे। नयकीति के शिष्यों में भानुकीसि', प्रभासन्द, माघनन्दि, पमनन्दि और नेमिचन्द्र थे।] १२५ (३२८) अक्कन बस्ति के प्रधान प्रवेश द्वार के मागने की दक्षिणी दीवाल पर (शक सं० १३६८) क्षयाहय-कु-वत्सरं द्विवय-युक्त-यैशाखके मही-तनय-वारके युत-पलक्ष-पक्षतरे । प्रताप-निधि-देयराट् प्रनयमाप इन्वासमा चतुर्दश-दिने कथं पितृपनेनिवार्या गतिः । १२६ (३२६) उमी दीयाल के पूर्व कोण पर (शक स०१३२१) मारण-संवत्सरद भाद्र-पद-याला • दशमियू मो. मवार हरिहररायनु स्वस्थनादनु ।। १२० (३३०) उपर्युक्त लेख के नीचे (U०३६८) घयाश्य-गण-वत्सरे द्वित्य-गु-यगारा रे महोतन [य]. वारफे य.....

प्रवण बल्गाल नगर में के शिलालेख २४६ १२८ (३३३) नगर जिनालय के बाहर (? राक स० ११२८) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्थाद्वादामोध-लान्छन । जोयान त्रैलोक्य नाघस्य शासन जिन-शामने ॥१॥ भय-लोभ-दर-दूरन मदन-घोरचान्त-सीमाशुवं नय निक्षेप-युव-प्रमाण-परिनि तात्य सन्दोहन । नयनानन्दन-सान्त कान्त तनुवं सिद्धान्तराने नयफीति प्रति-राजन नेनेदोडं पापोत्करं पिहुगुं ।। २ ॥ पवर मन्छिष्यका श्री-दामनन्दि विय-देवरु श्री-भानुकीर्ति सिदान्त- देवरु पालचन्द्र-देवरु मभाचन्द्र-देवरु माघणन्दि-भट्टारक- देवरु मन्त्रवादि-पद्मणन्दि-देवरु नेमिचन्द्र-पणिव देवक इन्तिकर शिप्यरु नयकीर्ति-देवरु ।। धरयाल खबलि-मूलभद्र-विकास-शास्सत्य-गा. परसर सिह-पराक्रमान्वितग्नेकाम्भोधि वेला-पुरा. -নানা ৰন্ধা- সামনিষা- भरार येल्गुल-नीर्य-वासि-नगराल रूदिय माल्दिदरु॥ भोगोम्मटपुरद समस-नगरको भीमतु-प्रताप परति पीरबलाल-देवर मार सोमेखरदेवन प्रभाने हिरिप- २५० प्रवणबेलगोल नगर में के शिलालेख मायिय-भण्डारि-रामदेव-नायकर मनिधियलु श्रीमन्नर कीर्ति देवरु कोट्ट शासनपत्यलेय-क्रमोन्तेन्दडे गोम्मट-पुरद मनेदेरे अक्षय-संवत्सर मोदलागि प्राचन्द्रावतार वर सलुवन्तागि हणवोन्दर मोदलिङ्ग एन्दुहवं तेत्तु सुखविपर तेलिगर गाणयोलगागि भरमनेय न्यायवन्यायमलनय एनु यन्दहं प्रास्थलदाचार्यरु तावे तेत्तु निनयिमुबरु कल कारय कथेयिद्ध ई-शासन-मादेयं मौरिदवरु धर्म-स्थलब कंडिसि- देवरु ई-वीर्घद नखरगलोलगे ओव्यरिधरु प्रामिपिगलागि प्राचार्य्यरिगे कौटिल्य बुद्धियं कलिसि वोन्दकोन्द नेनदु तालसाटव माडि दाग वेलेयनलिहि वेडिकोल्लियेन्दु प्राचा- यरिगे मनंगामुडे अबरु समय-द्रोहरु राजद्रोहरु वश्चिग- पगंया नेत्त-गयरु कोलेकवतेंगोडेयरु इदनरिदु नखराल घिसिदरादडे ई-धर्मव नबरङ्गले केडिसिदवरल्जदे प्राचार्यों दुर्जनलं केडिसिदवरल्तु नखरङ्गल भनुमतविद्धदे ओवरिबरु प्रामिथिगलु प्राचार्य्यर मनेयनके अरमनेयनके होकडे समय द्रोहरु मान्य-मन्नणेय पूर्व-मर्यादे नउसुबरु ई-मर्यादेव किडिसिदवरु गङ्ग तडिय कविलेयं ब्राह्मण कोन्द पापद हाहरु । स्व-दत्ता पर दत्तां वा यो रेति वसुन्धरा । पष्टिज़प-महाणि विष्टायां जायते कमिः ॥ ४ ॥ [ नयीति मिद्धान्तक्रवत्ति के शिष्य दामनन्दि, भानुकीछि, बालवय, प्रभाधन, मावनन्दि, पानन्दि और नेमिचन्दए। इनके शिप्य भयकीसिंदेव हुए। नयीनिदेव ने दीरबलालदेव के कुमार उपे.

प्रवण मेललाम नगर में कं शिलालेस
सामगदेवमग्री रामदेव माया समस्गोल नगर के व्यापा.
रियाको शासन दिया कि वे सदेव रेविये
पास
दिया गे निमका एक 'य' व्याज मा सwar है। इसके अतिरिक्त
और कोई गम नहीं देखेंगे। यदि राज्य की ओर से कोई न्याय,
सम्यायव मरमय रंक्स लगाये जायेंगे तो स्वयं गोल के माचार्य
दो सा प्रबन्ध कांगे। यदि कोई म्यापारी बापायी पळ-कपर
सिम्यागे माघे धर्म और राज्य के दोही ठहरेंगे। व्यापारियों को
अपने अधिकार पूर्ववत् ही रहेंगे। ये व्यापारी सहजि पोर मूलभ
बराज जैनधर्मावलम्बी थे।]
(नोट-श्रवण वेग्गार पर पूरा अधिकार जैनाचा काही पा ।।
यहां के रेक्स भादि भी वे ही प्रबन्ध करते थे।
१२८ (३३४)
नगर जिनालय में दक्षिण की ओर
(शक सं० १२०५)
एक श्री मूलमईऽस्मिन्यतात्कार-ग.........
शासाराख्य शात् ॥ १॥
श्रीमत्परम-गम्भीर क्याद्वादामोप-लाल्छन ।
जीयात लाक्य-नाथस्य शासन जिन-शासन ॥२॥
नमः कुमुदचन्द्राय विद्या-विशद-मूर्चये ।
यस्य वाफ-धन्द्रिका भव्य-कुमुदानन्द-नन्दिनी ॥ ३
नमो नग्नजनानन्द-स्यन्दिने माघनन्दिने।
जगप्रसिद्ध-सिद्धान्त-वेदिनं चित्प्रमोदिने ॥ ४॥

२५२ अवय वेलगोल नगर में के शिनालय स्वस्ति श्री जन्म-गेहं निभृत-निरुपमीनिनोसामवेज विस्तारान्त:कवा नजममन्त्र-यशश्चन्द्र-सम्भूति-धाम । वस्तु-बातोद्भव-स्थानकमतिशय-सत्वावलम्यं गभीरं प्रस्तुत्यं नित्यमम्भानिधि-निभमेसेगुं होरमलाव्वा-वंश स्वस्ति श्री-जयाभ्युदयं सकवर्ष १२०५ नेय चित्रभानु संवत्सर धावण सु १० वृदन्दु म्वस्ति समस्व-प्रशस्ति-सहित श्रीमन्महा-मण्डलाचार्य्यरुमाचार्य-वर्य्यरुश्रो-मूल-सदाइलेवार देशिय-गयाप्रगण्यरुम् राज-गुरु-गलुमप्प नेमिचन्द्र-पण्डित- देवर शिष्यरु बालचन्द्र-देवरु श्रीमन्महामण्डलाचार्यरुमाचार्य वर्यरं होयमल-राय-राज-गुरुगनुमप्प प्रो-माघनन्दि-सैद्धान्त चक्रवर्तिगल प्रिय-गुड्डुगनुमप्प श्री-बेलुगुल-वीयंद बजारकार- गयाप्रगण्यरुमगण्यपुण्यरुमप्प समस्त-माणिक्य-नगरगल नखर जिनालयद प्रादि-देवर अमृत-पडिगे रायनहल्लिय होलवेरेगी- लगाद एडवलगेरेय केलगे पूर्वदत्ति मोदलेरिय ताटमुं अमृत- पडिय गहे...पारर भूमिय सेरुवेगे मा-बालचन्द्र-देवर कय्यनु समस्त-माणिक्य-नगरगल विडिसिकोण्ड वलय-शामनद क्रमवेन्वे. न्दडे राचेयन-हल्जिय मल्लिकार्जुन-देवर देव-दानद गद्दे होर- गागि मा-गहेयि मूडनु नट्ट कल्नु । मल्लि वेन्क हामरे गल्नु । पल्ज़ि तेर् गिडिगनालद गुण्डुगलि मूडय किरु-कट्टद गरे। नीरोत्तोलगाद चतुस्सीमे। मा-किरु-कट्टद पडुवण कोडियलु हुद्ध गुण्डिनलि वरद मुकोडे हसुभे ने? भल्लि तेहिरिय बेहद प्रवण येलोज नगर में के शिलालेस चप्पल शामरे-गल्लु । पाच मूडप देवलग रेप तंदूण कोदिय गुण्डि- नलि वरद मुफोडे इमुचे नट्टे मा-कर-नौरोतिश सीमें। प्राकरेय बडगण-फोदिय गुण्डि-ननिस घरद मुको हसु ने इन्ती करेयं किरु-फटे घोलगाद पतुस्सीमेय गरे॥ [ इस लेख में कुमुदचन्द्र पार माघनम्दि को नमस्कार प्रभात दोसलवी कीर्ति का उस्लेख है और फिर कहा गया कि लिपि मे इंगजेश्वर, देशिय गण, मूरसंघ के नेमिचान पतिदेव के शिष्य बालचन्द्रदेव भारवगाल के समस्त जाहरिपो (माणिक्य नगाव) से नगर जिनालयमादिदेव की पूजन व भूमि का राम दिया । या भूमि माने बालचन्द्रदेव से खरीद की थी। मेरी हेम्सव के जगुरु महामण्डलामा मापनदिशियन प्रथम पथ में साम्रसार मामक किसी शासकों का होगा पाप धिम जाने में प्राचार्य'माम नहीं पा गया | १३० (३३५) नगर जिनालय में उत्तर की ओर (शक सं० १११८) प्रीमत्परम-गम्भीर- स्यादामांप-शाम्बने । जीयात साम्य-नाशस्य शासन जिन-शामने ॥१॥ स्वस्ति-श्रीजन्मगंई निभूत-निरूपमानिलोदाम বিবাব:ফুৰামৰ-বাৰমষিখাম। यस्तु-बावामान-स्थानकमतिराय-मलावलम्ब गभीर प्रस्तुत्यं नित्यमम्मो-निधि-निभर्मस होमसोमोप- २५४ श्रवणबेलगोल नगर में के शिलालेख प्रहरोल कौस्तुभदेन्दिनय॑गुगर्म देवेभदुद्दाम-स- त्वदगुर्च हिम-रश्मियुज्वल-कला-सम्पविय पारिजा. तदुदारत्वद पेम्पनो ने नितान्त वाल्दि सानल्वे पु- ट्टिनुढेजित-वीर-वैरि-विनयादित्यावनी-पाखकं ॥ ३ ॥ क ॥ विनयादित्य-नृपालन तनु-भवनेरेयङ्ग भूभुजं वत्तनयं । विनुतं विष्णु-नृपालं जनपति तदपत्यनेसेदनीनरसिंह ॥४॥ तत्पुत्रं ।। गव-लील लालनालम्वित-बहल-भयोम-ज्वर गूर्जर' स. न्धृत-शूलंगौलनुच्चैः-कर :-कर-धृव-विलसत्पल पल्लव प्रो. ज्झित चेलं चोलनादं कदन-वदनदोल भेरियं पोय्से वीरा- हिव-भूभृजाल-कालानलनतुलबलं वीर-बल्लाल-रेवं चिरकाल रिपु-गलासाध्यमेनिसि१च्चड़ियं मुत्ति दु. र्द्धर-तेजा-निधि-धूलिगोटेयने कोण्डाकाम-देवावनी- श्वरनं सन्दोडेय नितीश्वरननाभण्डारमं स्त्रीयर' तुरग-प्रावमुमं समन्तु पिडिदं बल्लाल-भूपालकं ॥६॥ खस्ति समधिगत-पञ्च-महा-शब्द-महा मण्डलेश्वर द्वारवती- पुरवराधीश्वर। तुलुवनल-जलधि वडवानल । दायाह- दावानल। पापड्य कुल-कमल-वेदण्ड ! गण्ड-भेदण्ड। मण्डलिक • बेटेकार । चोल कटक-सुरेकार । साम-भीम ।

मामलाश नगर में शिवलिंग २५५ फलिकाम-काम । मकस-बन्दिनन्द गन्तपंच-समप्र वितरण विनोद । वासन्तिफा-दा-जन्म-पर-प्रसाद यादव-कुशा. मर-गुर्भाय। मण्डलिक-मट-पूढागि कदन-प्ररश मन- पराल- नामादिप्रशस्ति-महिलं भीमम्-मिभुपनमल- सलफाड फोनङ्गलि नोणम्यवादि-यनयमे हानुजल सोफिगुपिड फुम्मट-एरम्यरगेयोलगाद समस्व-देशद नानादुर्गसं लीना-मात्रदि माध्यं मारिकाण्ड भुज-पल-पीर गा-प्रता-सम्वन्ति होमम पीर-यलाल-देवर् समस्त-महो मण्ड हुए-निग्रह-शिष्ट-प्रतिपालन-पूर्वक मुरमडूपाविनी- ददि राज्य गंम्युचिरं । सदीय-करतल-कलिव-कराल-करवाल- धारा-दक्षन-निम्मपनोकत-पतुर्पयाधि-रिसा-परीव-पृघुल-पृथ्वी- समान्तबसियुं श्रीमर धिय-कुटेश्वर-जिनाधिनाय पद-कुशे- रायाधत्त, श्रीमझमठ-पाच देवादि-नाना-जिनवरागार-मण्डि. मुमप्प श्रीमद् बेलगाव-सीमंद श्रीमन्महा-मण्डलाचायरे न्तप्परेन्द।। भय-लाभन्दयन्दूरन मदन-पोरध्वान्त-तीप्रागुवं नय-निलेप-युव-प्रमाण-परि-निर्जीवात्य-सन्दोहनं । नयनानन्दन-शान्त-कान्त-अनुव सिद्धान्त-चरानं नयकीर्ति-प्रति-राजन ने दाडं पापोत्करं पिगुगु ॥ ७ ॥ तच्छिश्यर श्री-दामनन्दिविद्य-देवलं । श्री भानु- कीर्तिसिवान्द देवहं। श्री बालचन्द्र-देव । श्री-अभाचन्द्र देवर। श्री माधनन्दि-मट्टारकन्देवळं। श्री मन्त्रवादि-पम- ।

२५६ प्रवय पेलगोल नगर में के शिलालेख नन्दि-देवरु । श्री नेमिचन्द्र-पति देवरु । श्री-पूज-सा देशिय-गया पुस्तक-गच्छद भी काण्ड-कुन्दान्वय-भुनहर श्रीमन्महामण्डलापार्यर श्रीमन्नयकीर्ति-सिमान्त- तिगत गु॥ रितितलदेोल राजिसिदं धूत-सत्य नेगल नागदेवामात्य । प्रतिपालिव-जिन-पत्य फर-हत्य बोम्मदेव-सचिवापत्यं ॥८॥ सानिते ॥ मुशरिपट्टण-मामियेन्य पेसरं ताल्दिा खरमो-ममा मानप्पि-गुषि-मल्लि-संहि-विभुगं लामोत्तमानार-II मांगी-माघेये सेहिकाचेगमनूनोसाइमं तालिलपु. रिपन्दश्ये रमाम-गये भुक्न प्रख्यातिय तालिम महार॥ परमानन्मदिनन्तु नामानिर्ग पानामिग पुहिक परसादय-जयन्तनन्न तुहिन साराsats-HI. मुर-कोतिप्रिय-नागदेव-रिभुगे चन्दध्येग t बिरनी-ए-गामि-र-अनुन थामनिवार 10 धिनिया नियम्मदेव-गि गोगध्या : मुना गन्यमामिमानि--मलियाम: in-कामतषिरी मनकामामागुन नगा-चन्दले नायितनागयोग 114 अवय पस्नास नगर में के शिवाजेस्त्र २५७ कारित पीरबल्लाल-पचन-स्वामिनामुना । नागेन पाईदया नृत्यनतारम-कुहिने ॥ १२ ॥ श्रीमन्नयफोर्ति-सिद्धान्त चगिलो परोप-विनयात्य- चागिमुनिजमुमं निविधियुमं श्रीमत्कनठ-पार्व-देवर बसदिय मुन्दय फल-कहम नृत्यनजमुम मादिसिद तदनन्तर ।। श्री-नार-जिनालयम श्री- नियमनमल-गुण-गण-मादिसिद। श्रीनागदेवमचिवं श्रा-नयकीर्ति-व्रतीश-रद-युग-भक ।। १३ ।। सजिनालय-प्रतिपाकरप नगरङ्गल ।। धरयोल सयउलि-मूलभद्र-विलसद्-वंशोबस्सत्य-शी. चरवर सिह-पराममान्वितरनेकाम्भोधि-वेला-पुरा- न्तर-नाना-व्यवहार-जाल-कुरालर विख्यात-रन-त्रया. भाणर ज्वेलगोल-तीय-वासि-नगरगल रुदियं सादिदर ।। १४॥ सकघर्ष १९१८ नेय राक्षससंवत्सरदजेष्ठ मुश्यहवार दन्दु नगर-जिनालयके यडवलगरेय मोदलंरिय नोटमुं यार. सलगे-गयु उडुकर (मनेय मुन्दण रेय फेलगत पेरले कोलग १० नगर-जिनालयद वगण फेति-सेंद्रिय केरि प्राण परडु मने मा-भङ्गदि सेडेयफि गाण एरड मनेगे इण मग्दु अरिङ्गे मषिय हण मूरु॥

२५८ अवय बलान नगर में के शिलालेख [ इस लेख में नयकीर्ति के शिष्य नागदेव मीन्दारा नगर बिना. लय तथा कमठपारवंदेव पति के सन्मुख शिन्याकुटम और पण बनवाने व नगर जिनालय को कुछ भूमि का दान दिये जाने का रश्शन है। प्रादि में लेख नं. १२५ के समान होयसल वंश का परिचय है। वीरगलाल देव के प्रताप का वर्णन कुछ अश छोड़कर भवरण वहा है। इसके पश्चात् नयकीर्निदेव और उनके शिष्यों दामनन्दि, मानु- कीर्ति, बालचन्द्र, प्रभाचन्द्र, नावनन्दि, पद्मनन्दि पार मिवन्द्रका उल्लेख है। नागदेर के वंशका परिचय इस प्रकार है- वम्मदेव-नांगमे (वीर बलालदेव के पण सामी) नागदेव-चन्दम्बे (चन्दले) (मल्लिसहि और मार की पुत्री) (मल्लिदेव) (कामलदेवी) खंडलि और मूलभद्र के वंशज व्यापारियों का भी उल्लेख है। ये ही व्यापारी जिनालय के रामक थे।] । १३१ ( ३३६) नगर जिनालय के भीतरी द्वार के उत्तर में (शक सं० १२०१ तघा १२१०) स्वस्ति श्रीमतु-शफ-वर्ष १२०३ नेय ममाथि संवत्सरद मार्गशिर-सु (१०) यदन्दु श्रोवेलुगुल-तीत्यद ममस्त नस- रङ्गलिग नखर-जिनालयद पुजाकारिगल मोडम्बटु धरसिर प्रय बेलगोल नगर में के शिजास २४४ मासना बमोन्वन्दडे । नसर-जिनालयद मादि-देवर देव पानद गई पेल पछि मनु लदकालदल देवर मष्टविधा- ने भगव-पडि-महित श्रीशार्वरनु नकरङ्गाउ नियामिसि काट्ट पटियनु कुन्ददे नरमय भा-देव-शानद गरे परजन माधि- पर हालावे गुवां एम्म वंशकादियाषि मनु मनु दपदे मारु मासिद राजद्रोधि ममयद्रोहिगलेन्दु वोडम्बह, परसिद- शामन इन्वापुरके पार योर ओ-गोम्मटनाथ ॥ श्री बेलुगुज . तीमंद नकर-जिनालयद मादिदेवर नित्याभिरेको श्री-हुलिगे- रंय सोवन पह-भण्डार-नागि फोट्ट गवायं मयिदु-होनिङ्ग हानुप१॥ सीधारि संवत्सरद द्वितीय-भाद्रपद-सु ५ त्रि। श्री-चेलुगुल-वोत्यद जिननाप-पुरद समस्त-माधिस्य-नगरनु सम्मोलोबम्बहु दरसिद शासनद प्रमवेन्सन्दाहे । नगर-जिना- लयद श्री-मादिदेवर जीर्णोद्धारवुपकरण श्री कार्यशेयू धारा- पूर्वक माडि मापन्द्रातार पर मजुवन्तागि प्रा-येरा-पट्ट- रूद ममस्त-नसरङ्गलू म्वदेशि-परदेशिपिन्दं चन्दन्वद दवय गद्याय-नरके गया वोन्दरोपादिय दवण प्रादिदेवरिगे मलु- वन्तागि कोट्ट शासन यिदराने विरदिव-गतवनारु माडिएटमवन सन्तान निस्सन्तान पर देव-मोहि राज-मोहि ममय-प्रोहिगबेन्दु चौरम्य, यरसिद समस्तनकरङ्गालोप प्री-गोम्मट ।। [पान तीन भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में सरे कितिषि को नगर जिनालय के पुजारियों ने पगाल के व्यापारियों श्रवण केलगान नगर में के शिज्ञालेख को यह लिखा-पढ़ी कर दी कि जब तक मंदिर की देव-दान भूनि ने धान्य पैदा होता है तब तक वे सदैव विधि अनुमार मंदिर की पूजा करेंगे। दूसरे भाग में उलंब है कि नगर जिनालय के प्रादि देव के विमा- भिषेक के लिये दुलिगेरे के मोवण्ण ने पांच गद्याण का दान दिया जिसके म्याज से प्रति दिन एक 'बल' दुग्ध लिया जाये। तीसरे भाग में उक्त विधि को बल्गोल के समस्त जाहारियों के एक- त्रित होकर नगर जिनालय के जीर्णाद्वार तथा वर्ननों भादि के जिसे रकम जोड़ने का उल्लेख है। उन्होंने मी गद्याय की प्रामदनी पर एक गद्याय देने की प्रतिज्ञा की। जो कोई इसमें कपट करे वह विपुत्रो तम देव, धर्म और राज का द्रोही होवे।] [नोट-लेस के प्रथम भाग में शक सं० १२०३ प्रमायिमत्या का उल्लेख है । पर गणनानुसार शक सं० १२०३ वृष तथा शकम १२०१ प्रमाथी सिद होते हैं। बेस के तृतीय भाग में सर्वभारि संवत्सर का उल्लेख होने से वह शक सं० १२१. का सिद्ध होता है। १३२ (३४१) मंगायि वस्ति के प्रवेश मार्ग के बायीं ओर (लगभग शक सं० १२४७) स्वस्ति श्री-मूलसद्ध देशिय-गण पुखक-गच्छ काण्डकुन्दा न्वयद श्रीमदभिनव-चारुकीर्ति-पण्डिताचायर शिष्य सम्यक्त्वायनेक-गुण-गयाभरण-भूषिते राय-पात्र-चूडामणि बेलु गुलद मङ्गायि माडिसिद विभुवननूडामणियम्य चैत्याल- यम मङ्गलमहा श्री श्री श्री ॥

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अवण बेलगोल नगर में के शिलालेख सोऽयं श्री गोम्मटेशत्रिभुवन-सरसा-रजने राजहंसी भव्य:..व-भानुलुगुल-नगरी साधु जंजीयतीरं ॥२॥ नन्दन-संवत्सरद पुश्य-शु ३ लू गेरसोप्पय हिरिय. आय्यगल शिष्यरु गुम्मटरणगलु गुम्मटनायन सन्निधि- यधि वन्दु चिक्क-बट्टदल्जि चिक-वस्तिय फल-फटिसि जोन्र्णोद्धारि बडग-घागिल यस्ति मूरु मङ्गायि-वस्ति वोन्दु दागे प्रयिदु-बस्ति जीर्णोद्धार वान्दु वण्ठक्के प्रहारदान । [गुम्मटेश की प्रशस्ति के पश्चात् लेख में उल्लेख है कि उन विधि को गेरसोप्पे के हिरिय- अयं के शिष्य गुम्मटण्य ने यहां आकर निक बस्ति के शिला कुट्टम का, उत्तर दार की तीन बस्तियां मा तया ममापि बस्ति का कुल पांच वस्तियों का-जीर्णेदार कराया।] [ नोट-लेख में नन्दन संवत्सर का उलेख है। २३३४ नंदन था। १३५ ( ३४३) उपर्युक्त लेख के नीचे ( सम्भवतः शक सं० १३४१) विकारि-संवत्सरद प्रावण शुगेरसोप्पेय श्रीमति प्रवेगलु ममस्तम-गोष्टिय कोटु ग ४ ॥ [उ विपि गरसोप्पे की श्रीमती अर्म मार समन गोटी ने चार गवाण का दान दिया । ] (नोट-लेख में विज्ञारी संवत्सर का चक्लेख २४. विकारी था। शक सं. . शक.

सम्मानमगरम शिसानब ६॥ भपारि पनि में पूर्व की ओर प्रपम स्तम्भ पर म. १६८०) aitamin-amerमनि ।। पाप गागर- मग्न प्रोजराजयुज-म-दाम । भा-विष्णु-शाक-मणि-मण्डपमार्गदापी रामानुजा विजया यनि-रा- IN शक पर्प १२८० नर फीलक-मंपामरद भाद्रपद- १. पृ. ति मन्महा-मारिराय-मार भापत पुन रायर ग भी पीरपुर-रायनु प-यो- राम्या मादुर कामदस्त्रि अनरिगू अपरिग संगज बादसिमानयगान्दिदास-पटल पेनुगुण्य फलंद हरपाल- गाद ममस-नार मध्य-मनालु पा-युक-रायो भकारमाहुप भन्यायलन् विप्र मारलागि काबिल-तिम पे मान- काबिल-तिरुनारायणपुर मुख्यवाद मनाचार्य सफल-गमय गार सममाथिका माटिकर तिरूपवि-निरविडिवपनीका नासन्टु-जना मापन्त-धावपातु तिरिम जाम्बुवकुमा पामा दिनेण्टु-नार श्रीवैष्णवरफरयनु महारायनु यशव दर्शन-जनदर्शनाम-भेदरिल्लवन्दुरायनुवैषण- पर कम्पनु जेनर के-विहिदु काटु यी-जैन-दर्शनको पर्चमरियादे अत्रय चलगोल नगर में के शिलालेख यल पञ्चमहावाङ्गलू कलरावु सलुवुदु जैनदर्शनस्के भवर से यिन्द हानि-वृद्धियादरू वैष्णव-हानि-वृद्धियागि पानिसुवर यी- मर्यादेयल यल्ला-राज्य-दालगुल्लन्वह बस्विगलिग श्री-वैष्णवरु शासनव नट्ठ पालिसुबरु चन्द्राक-स्थायियागि वैष्णव-समया जैन-दर्शनव रचिसिकाण्ड बहेड वैष्णवरू जैनरू वांन्दुभेदवागि काणलाग श्री तिरुमलेय तात य्यङ्गल समस्त राज्यद भन्य-जनङ्गल अनुमतदिन्द बेलुगुलद विदल्लि वैष्णव-प्रहरवेगासुक समस्त-राज्यदालगुलन्ता जैनर यागिलुगट्टलयागि मने-मनेगे वर्षक्के १हण कोट्ट, प्रा-ये- तिद हानिङ्ग देवर अङ्ग-रोगेयिप्पत्तालनूमन्तविट, मिक होनिङ्ग जोर्न-जिनालयङ्गलिगे सोधयनिकूदु यी-मरियादयतु चन्द्राकरुल्लन्नं तप्पलीयदे वर्ष-चपके कोट्ट कीति यनू पुण्य- वन उपार्जिसिकोम्बुदु यो-माडिद कट्टलेयनु भावनोब्बनु मीरि- दवनु राज-द्रोहिसह-सम्दायक्केद्रोहि तपस्वियागलि प्रामि- णियागलि यी-धर्मव के सिदरादडे गय नडियधि कपि- लेयनु ब्राह्मणाननू कोन्द पापदछि हाहरु । श्लोक ॥ वदत्तं परदत्तं वा या हरति वसुन्धरां । पष्टि-वर्प-महस्राणि विष्टायो जायते कृमि ॥२॥ (पीछे से जोड़ा हुभ्रा) कल्लेदद हर्चि-सेट्टिय सुपुत्र वुसुवि-सेटि युक-रायरिगे बिनझमाडि तिरुमलय-तावय्यङ्गल विजय-गैसि वरन्दु जीनोद्धार भयगाल नगर में शिवाय व मादिमियम भयममटि बुषि-हिरिण मानानक . [ राप राय-कार में किया प्यम भगा हो गया। नवा मे मानवाधिकादिमा पुखराप मे प्रामामियोध्याय मिळा दिया और प्यार रगोन वन समाधी का INnt परिजननादित इसमपनी ही सरया दिमममता चाहिये। श्रीरप्या इसपिय शासन समस राज्य की नियां में गा देना चाहिये। भार वर एक भीनसमझेगा। भवण गोर में प्रतियुनिके लिये राज्य भा मका में प्रसादार पाई मसिव एक 'पण' लिया जाताममे तिरमतातय्य, देवपाके बिये, बीस नियुग पार शेष सम्म जैन मन्दिर के जीयोशार व पुताई धारिमें किया जाएगा। पानिपम प्रति वर्ष जबतक सूप' बात साहंगा। कोई इसका गल पन को वह राज्य का, संभ समाय का द्रोही मरेगा। यदि कोई सीमामा- कि इस धर्म में पतिपान करेगा तो यह गगाठट पर एक कपिल गीऔर प्रामण की स्याका भागी होगा। (पीई में जादा हुमा) पर हविसह पुत्र मुवि महिने बुधाय से प्रार्थनापत्र दंबर नियम तानग्य मे बुलवाया और शासन का जीर्यादा माया। दोनों पकों ने मिलकर मुवि महिको संघनायक का पद प्रदान किया।

श्रवणबेलगोल नगर में शिक्षालख १३७ (३४५) उसी स्यान में द्वितीय स्तम्भ पर (लगभग शक सं० १०८०) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्यावादामोध-लान्छन । जीयात् त्रैलोक्य-नाघस्य शासनं जिन-शामनं ॥१॥ भद्रमस्तु जिन-शामनाय ।। स्वस्ति-श्री-जन्म-गहं निभृत-निरुपमौनिलोदाम-दर्ज विस्तारान्तःकतीधर्मावलममल-यशश्चन्द्र-सम्भूति-धाम । वस्तु-प्रावोद्भव-स्थानकमतिशय-सत्वावलम्वं गभीरं प्रन्तुत्यं नित्यमम्मोनिधि-निभमेसेगुं होम्सलोवीश-वंश ॥२॥ अदरालु कौस्तुभदोदिनमर्च-गुण देवेभदुद्दाम-स- स्वदगुर्व हिम-रश्मियुज्वल-कला-सम्पत्तियं पारिजा- तदुदारवद पेम्पना+ने नितान्त तालिद तानस्ते पु- ट्टिदनुढेजित-वोर वैरि-विनयादित्यावनीपालकं ॥ ३ ॥ क॥ विनयं धुधर रजिसे घन-तेज वैरि-रलमननलिसे नंगई। विनयादित्य-नृपालक- ननुगत-नामार्थनमन्ज-कीर्चि-समय ॥४॥ भा-विनयादित्यन वधु भावोदय-मन्त्र-देवता-सन्निभं स- .

मायबाप नगर में शिक्षाजम भार-गुग-भवनबिनक- बा-विजमिन-फेसयरमियंम्प ने पंगा | प्रारम्पविग बनुभव. नाद शधिगं सुगधिपतिर्ग मुझ. वाजयन्तनन्त कि- पाद- विता नेरेया-नृपं । ॥ भान पामुपय-भूपालन पद गुमा-प. भाव-प्रोना-भूभृय विदतन planaमयोप-५ । तामिाजात-रव-पिन ARE-Purn. दयात-प्रोगपी-Nalaa-को भ-RIL ... एपने निमि नगद रेया-पानि Aler #NIRemia गौरपलदेविषाणु ना• BR५ ॥ पन नगारियन PARAMETREE यस्लान कि. bण-rwarjtilt FREE REEमुपासार समयमtam साल Hail. दुबिन Arjitatistics. anitदुमनामनुत्तम-Ye-de-intel HWARImteat andu.xel २६८ अवय वल्गोल नगर में के शिनालय कन्द ।। एलेगेसेव कोयतूर्च- त्तलवन-पुरमन्ते रायरायपुरव- ल्वस्त बलंद विष्णुतेजो- ज्वलनदे वेन्दुवु वलिष्ठ-रिपु-दुर्गङ्गल् ॥ ११ ॥ वृत्त ।। इनितं दुर्गम-वैरि-दुर्गचयमं कोण्डं निजारदि- न्दिनिवर्भूपरनाजियोतविसिदं तन्नत्र-मवावदि- न्दिनिवर्गानतत्तिनुद्य-पदमं फारुण्यदिन्दन्दु वा. ननित लेकदे पेल्बोउञ्ज-भवनुं विभ्रान्तनप्परलं ॥ १२॥ कन्द ।। लक्ष्मी-देवि-खगाधिप- लक्ष्मङ्ग-सेदिई विष्णुगेन्तन्ते वलं लक्ष्मा-देवि-लसन्मृग- लक्ष्मानने विष्णुगप्र-सतियेने नेगल्दल ॥ १३ ॥ अवगर्गे मनोजनन्ते तुदती-जन-चित्तमनोकोलस्के मा- स्ववयव शोभेयिन्दतनुम्यभिधानमनानदङ्गना- नियहमनेच्चु मुवनयमानदे वीररनेच्चु युद्धदाल तविसुबोनादनात्म-भवनप्रतिमं नरसिंह-भूभुजं ॥ १४ ॥ पडे माते बन्दु कण्डङ्गमृत-जलधि तां गदि गण्ड-बात नुडिवातङ्गेननेम्यै प्रलय-समय-दौल मेरेयं मोरिवर्मा- कडलन्न कालनन्न मुलिद-कुलिकनन्न युगान्वाप्रियत्न सिडिलन मिहदन्नं पुर-हर-नुरिगण्यननी नारसिंहं ॥१५॥ रिपु-मपरप्प-दावानल-बदल-सिखा-जाल-कालाम्बुवाई -रिपु-भूपाद्यपदोप-प्रकर-पटुवर-रफार-झन्झा-समारं। .

प्रवण बेलगोल नगर में शिक्षालेस जिन-सत्पुण्य-पुराव-संप्रवयदि सन्तापमं वाल्दिभ- न्यनुवं निच्चचुमिन् पोल्तुगलव श्रीहुल्ल-दण्डाधिपं ।। कन्द ॥ निप्पटमे जोपनमादुद- नुप्पट्टावन महा-जिनेन्द्रालयम। निप्पासतु माडिदं कर. माप्पिरं हुलं मनस्ति पापुरदौल ।। २५ ।। मत्वमधिय॥ थत ॥ कलिवन, विटत्वमुमनुल्लवनादियोलावनुप्रियाल कलिविटनंम्बनाउन जिनालयम नरे जोर्नमादुदं। कलि सल्ल दानदोल परम-सौख्य-रमारतियाल विटं विनि- रचलवे निसिद्ध हुल्लनदत्तिसिदं रजवाद्रि-तुङ्गम ॥ २६ ॥ प्रियदिन्दहुल्ल-सेनापति कोपण-महा-वीर्यदोल धात्रियुं वा- दियुमुल्लनं चतुविशंति-जिन-मुनि-सह निश्चिन्दमाग- आय-दाने सल्य पाहिं यहु-कनक-मना-चैत्र-जर्गित सङ्घ- चियनिन्तीलोफर्मशम्पागले विदिसिदं पुण्य- पुकधाम ।। माकेल्लारेयादि-वीर्यमदुमुन्न गरि निर्मित लोक प्रस्तुतमाग्नु कान-पथदि नामावशेष पलि- या-कल्प-स्थिरमागे माडिसिदनी-भास्वधिनागारम श्री-जान्त मल्लदिन्दमम्दे कलसं श्री-उल-दण्डाधिपं ॥२८॥ सन्द ।। पथ-महा-वसतिगलं पश्य-सुकल्याण-वान्दयि हुल्ल-बम- अत्रय समाज नगर में के शिजात धरयं गलिई तिप्पुल्जननुनधियनेनेभ्य गुण्पुलने • दरमं माकोल्ल पेम्पुाननमर-महोजामि मिज नाम: सरमपाल्जनपुल्जाननेसेप जिनेन्द्रारिप-प- किरदोज तल्पोरदलम्पुल्लमननुकरिसल मयंना सम | सुमनस्मन्तति-सेविसं गुरु-बना-निरि-नौति-सम ममदाराति-राज-प्रभेदन-र श्री जैन-पुमा समा. ज-महोत्साह-परपुरन्दरन पेम्पं तालि भारि- प्रमाणाधिपनि महियालण्भ-मानित ॥ २० ॥ मत प्राषि-वध रिनोरमताना उप-म. नामन्यात्मनोल्टु मान्नु यसै त पर-बोय । निगमागमन का मतियानेजगमाना नयर शोज-भटनागाहा मुलानं ॥ २॥ four-fनन-ग्रामीणरादियानारत रायमा वानर-मन्त्रि रापने पतिको पनि विष्णु मगि म मलिक नृगि माय नमाने पनिgar HAIRE || २२ ॥ PNA-मा-AMAR दि . सनान-गाना-in-HIrfar peth मन-मलपारि देवर नगगन Pathak Kai Hot Maint Particulataria THEAft. Forf 1-4*1* ***********tiple प्रापेमाल नगर में शिवलिंग जिन-पत्सुण्य-पुराम मंदिसतापमं वाल्दिभ- ध्यनु निम्पनुमिन्ने पारगनव श्रा श्रामुला-रण्यापि ॥२४॥ कन्द ॥ निप्पटमे जीप मादुद- तुप्पटावन महा-जिनम्यामपम । निप्पामा मारिएका. मापिर दुल्न मनाम्य पहापुरदील ॥ १५ ॥ मचमपि। १ । काननगु विसत्वगुमनु मनादियानाध्याय कनिविदासनातन मिना viमाधुर। कलि दानदान परम सत्य-रमा tet 1414- अपमाननाnturt wafar ॥ प्रियदि हुET-नापाकाप-acidentifugal. जिम vgfould-firelat-koiNSAR पप- दाय 4ita at-in-a-ray wr. nिindragin islatur gayari || भाwrita-मदुगुम गptetanic सास-मासमानुदिनामा KI.प.मि मासिनी-माता भी-1 alww.aniruittonsil M-महा-uldns पस्या-बाय नम २७२ श्रवण बेलगोल नगर में कं शिलालंग्य पं चतुरं माडिसिदं काश्चन-नग-धेयनेसैव केल्लनेरेयोल ॥ २६ ॥ फन्द । हुल्ल-चमूपन गुणनाम- मुल्लनितुमनाग नेरेये पोगन नरेवर, पल्लदोललंदुदधिय जल- मुल्लनितुमनारा पवणिमल नरेवन्नर ।। ३०॥ संश्रित-सद्गुणं मकल-भव्य-नुतौं जिन-भासितार्थ-नि- म्संशय बुद्धि-हुल्ल-पृतना-पति कैरव-कुन्द-इंस-शु- भ्राशु-यश जगन्नुवदाली-वर-बेल्गुल तीबंदोल चतु- विंशति वीर्घकृन्निलयम नेरे माहिसिदं दलिन्विद ॥३१॥ कन्द ॥ गोम्मटपुर-भूपणमिदु गोम्मटमावेने समस्त-परिकर-सहित। मम्मददि हुल्लचमू: पं माडिसिद' जिनाचमालयमनिर्द।। ३२ ।। वृत्त ॥ परिसूत्र नृत्य-गह प्रविपुल-विलसत्सत देशस्थ-शैल- स्थिर-जैनावास-युग्मं विविध-सुविध-पत्रोत्सद्-भाव-रुपा- कर-राजद्वार-दय बेरसतुल-चतुर्विश-तीत्येशगेह परिपून पुण्य-मुख-प्रविममेसेदुदीपन्ददि हुल्लनिन्दं ॥३३॥ स्वप्ति श्रो-मूल-सहद देशिय-गपद पुस्तक-गच्छद कोड- कुन्दान्वय-भूषणरम्प श्री-गुणचन्द्रसिद्धान्त-देवर शिष्याप्प प्रो-नयकीर्ति-सिद्धान्त-देवरेन्वापरन्दाडे ।

प्रय बलाष नगर में शिनाख पृषा भय-माह-य-रन मदन-पारमात-नीपुर नयनि-युध-प्रमाण-परिनिग्नीतामा । नयनान-दन-शान्त-कान्त-मनुर सिटाम्स-गमगर नयफोर्मि-निराजन नदार पापा पिग ॥१४॥ छत-दावविध पर नामिंद-वापिस कप म ग्मतिथि गाम्मट-पावनारि मनामनु मलि. प्रविमागममनिन्ति बिना प्रामा. पतिमाम समानभय कल्पा- niuit || || भनयकीर्ति-Earaafine ETHIMITIES जापाया॥ पत्त या नापिEstal at use सदगुदा- vian नेम-TE माla Tarilan . गुवन-भाglert wituintantay बियप.maujrati afration पामय..." प-14. Virent tharu wix a Riपविय wie tru कोमg wentyi it. धेर autta मर NisiM.५६. था पित्तियR 4tantr.. Kunthem Na RR पर Termutana RATE Ngresukal Se २७४ श्रवण घेलगाल नगर में के शिलालेख देसेयोल जन्नबुरा सवयरिङ्ग सागरमादे जन्नवर सबमेर कैरेयरिय नहुवण हिरिय हुषिसे सीमे यहगणदेसयोल ककिन कोहु प्रदर मूडप वीरबन फेरे मा-रेवालगे सवोर बेडुगन हस्तिय नडुवे वसुरिय दाणे अल्लि मूढलालबन कुम्मरि अलि- मूद चिल्लदरे सीमे ॥ ई-स्थलदिन्दाद द्रव्यमनिल्लियाचार्यरी-स्थानद यसदिगड खण्ड-स्फुटित-जीर्णोद्धारक देवता-पुजेगं रङ्गभागवंयसदिगे बेस कख प्रजेगं ऋषि-समुदायदाहार-दान सलिसुबुदु ।। इदनावं निज-कालदोन सु-विधियिं पालिप्प लोकोत्तम विदितं निर्मल-पुण्य-कीर्तियुगमवा वाल्दुगुमचमि- न्तिदनावं किडिपोन्दु कट्ट-धगयं तन्दावनाल्डं गभीर दुरन्तो [ इस लेख में होयसल वंशी नारसिंह नाशके मन्त्री हुछरान द्वारा गुणचन्द्र सिद्धान्तदेव के शिष्य नयीति सिद्धान्तदेव की सवयर प्राम दान करने का उल्लेख है। प्रारम्भ में पल वंश का वही वयं है जो लेखन० १२५ में पाया जाता है । हुन्छ वाजिवशी यवराज और ढोकाम्बिके के पुत्र थे। वे यहे ही जिनमक थे। 'यदि पूजा नाम कि बैन धर्म के सच्चे पोषक कौन हुए ता इसका उत्तर यही है कि प्रारम्भ में रामछु नोग के मन्त्री राय ( चामुण्डराय) हुए, उबले पश्चात् विष्णु नरेश के मन्त्री गगण (गराज) हुए और मार सिंहदेव के मन्त्री हुन्छ ।' हुछ मन्त्री के गुरु कुक्कुटासन मधारित थे। मन्त्री जी को जैनमन्दिरों का निर्माण व जीयोदार राने, जैन पुराव मुनने तपा जैन साधुनों को प्रादारादि दान देने की कोधि भी। न्होंने शपुर के मारी पार प्राचीन दो मन्दिरों का डीयोमामाका, अवय पगाष नगर में शिक्षा नय कापयनियमति Bafen, गरमोश स्वाति प्राचीन में विभाजिम मन्दिार- मिन्दानिया व गुज में पाराशरोभायमों मानदि"inाकर मन्दिर निर्माण कगार पर प्रामा रानमावि विपामा राम मन्दिर देवरिया गया था। ११७३४१) उसी पापाण की दापी पात्र पा (काभग शक से १०८.) भीमराव भू-माप हुन माभिनि-पद्मापति मागि माम || सनीयान-multianteaminate. • रामना-ति-wifal Est witet सभमा पनल-दंवि tinalesa मा समाया पानियाnnel - Rewarun दो. ५-Unit-in Hi.. कrtsextarang पद्मावती. wats-ta-गुE Nitrentiati श्रवण वेलगोल नगर में के शिलालेख उरगंन्द्र-चीर-नोराकर-रजत-गिरिश्री-सित-च्छत्र-गा. हर-हासैरावतंभ-स्फटिक-वृषभ-शुभ्राभ्र-नीहार-हारा- मर-राज-श्वेत-पडू रुह-हलधर-वाक्छ सेन्दु-कुन्दी- कर-पञ्चकीर्ति-कान्तं बुध-जन-वितुतं भानुकोति- ब्रवीन्द्र ॥ ४॥ श्रो नयकीर्ति-मुनीश्वर- सूनु श्री भानुकीर्ति-यति-पतिगित्तं । भूनुतनप्पाहुल्लप- सेनापति धारयरेदु सपणेकर ॥५॥ [इस लेख में हुलराज मन्त्री की धर्मपत्नी पमायती (पारंग) की प्रशंसा के पश्चात् उल्लेख है कि दुरळराज ने नयीति मुकि शिष्य (मनु ) भानुकीति' को पाराक सकणेरु प्राम का राय दिया। १३७ (३४७) उसी पाषाण की यायीं बाजू पर (शक सं० १२००) स्वसि श्री-जयाभ्युदयश-शक-वरुपं १२०० नेय पशु धान्य-संवत्सरद चैत्र-मु १ मु भवारियरयन बदिय श्री-देयरयल्लभ-देवरिग नित्याभिषेकको प्रय-भण्डालागि भीमनु महा-मनापारिया उदयन्द्र-देवर शिष्य मुनि- चन्द्र-देवा गर ५५ हाद मान २ श्रीमतु पन्द्रमभर

पल्लाल नगर में के रिजालंय
शिवरय-मवानमन्तप्रेमदारनिवास्निाराकान्तः ।
मारात्ममरकृतान्ता जयति चिरं भूप-मकुट-मणिरेयः।
प्रपि प ॥ शरदमृत-आतिमानि मनमिजमूर्थि
ब्रिाधिकुरुकपिफेतुः।
कलि-काल-जवधि-सनु.
जयति चिर -मीनि-मणिरेयः॥
प्रपि प ।। जयनरमीतमः कन-रिपु-भतः प्रान-गुण-गुन ।
भरि-प्रतापरला जयतिचिन-किरीट-मणिरेयः॥१०॥
अपि च ॥ लक्ष्मीप्रेमनिधिदिय-जनता पातुर्य-विधि-
जारमा-नलिनी-विकास-मिहिगंगाम्भीर्यमाबर ।
कीति-श्रा-नतिका-मन्त-मयामीरमामय-
रसीमानेरेयानपति के के मेवा | ११ ॥
मपि ५ ॥ करशकायरेयजमानपतकिमान
स्तोतुं माल -
मधरपुरी धारामासान पाम् ।
पडूबकराल पोरकट द्वाफ दिसी मान
निर्धामातचक्रगाहमकरोद् भन्नं फास ५ ॥ १२ ॥
बान्ता सस्पलतान्तवासना लावण्यपुण्यारयः
सौभाग्य मिशिपरिवा-भूतः ।
पुषिसत्करायुमासम्मोजयाने बंधू.
दिशा-नामपुण्यनिदा राम्रो पराकामी ॥ १३ ॥

प्रवणबेलगोल नगर में के शिलालेख
१३८ (३४६)
भएडारिवस्ति में पश्चिम की ओर
(शक सं०१००१)
श्रीमत्परम-गम्भोर-स्साद्वादामोपलाञ्छन ।
जोयात् प्रैलोक्यनाथस्य शासन जिनशासनं ॥१॥
भद्रं भूयाजिनंन्द्राया शासनायापनाशिनं ।
कुतोय-पान्त-महात-प्रभेद-पन-मानवे ॥२॥
स्वस्तिहोसलवंशाय यदुमूचाय यमः।
पत्र माक्तिसन्नानर पृथ्वीनायक-मणाने ॥३॥
भोधर्माभ्युक्याम्जपण्उतरपिन्सम्यापूडामपि.
आंतित्रीमरणिप्रतापधरणिदर्शनारिय-चिन्तामयिः ।
चंगे याश्यनानिमोनि-मगिति जगम्मत:
सीराधाकिर कोस्नुभोऽपिनयादित्याग्नोपास||
अपि ॥ भोकान्ता-कमनीयमिततासामुनित्योपया.
पन्धनिपामारहरणाद् भूयर प्रतापाययान ।
FREEमणादिश-यय-प्रय समानते
गानापियनितास्य विनयादित्यानinan: IN
पाar fit दर-मारणेमुंगसाय ffairमी।
समरिया केलियामयी मनात य-dिistinto
मानधनुमिरिक मानभूमिः ।
नमा प्रायः ॥ ॥

ताजनगर में fearsz rag-महानादिनाकाम । HITRमा.ना.ना in f भूग-म- मया "C" पिप || Manisatirnalnefन isinfepoयापिनुः। का धि- sath for wrila nator: uta e with g s it A Mulalentertairagi.. lowedhuni.luka im.aur.in Alia-tammnathkadialer Minila time... ॥११ । witten aamirmireonline भाजEvervey. पा.. 1.पा...itain... lashungreziinglis ..... NiralMAImnwunt Navetitlex पुजाlivinitary ketinakam alitati .

२८० अवय वेगान नगर में के शिलालेख
प्रपिच ॥ कुन्तल-कदली-कान्ता
'माति
घ्युकुच-कुम्मा मदानमा
महा।
स्मर-समरसज्जविजयमनङ्गोवचारु-मूर्तिरेचलदेवी।।
॥१४॥
भपि च ॥ शचीव शकंजनकात्मजेव राम गिरीन्द्रस्य सुदेव शम्भु।
पग्रेव विपणुं मदयत्यजत्रं सानङ्गलदमारेरेयङ्ग भूपं ॥१५॥
कौसल्यया दशरयो भुवि रामचन्न
श्रीदेवकीवनितया वसुदेवभूपः ।
'वं शचीप्रमदयेव जयन्तमिन्द्रो
विष्णु तया स नृपतिर्जनयांबभूव ॥१६॥
उदयति विष्णौ तस्मिन्ननेशदरिचक्र-कुल मिलाधिपचन्द्र।
अधिकतर-श्रियमभजत्कुवलय - कुलमश्वदमलधम्भिाधिः।।
मपि च ॥ निलिवकायतूरो भस्मोकृतकाङ्ग-रायरायपुरः।
घट्टित-घट्ट-कवाट: कम्पितकाञ्चीपुरस्सविष्णुनृपालः॥१८॥
भपि च ।। अतुल-निज-यल-पदाहति-धूलीकृततद्विराटनरपतिदुर्गः।
वनवासितवनवासो विष्णुनृपस्तरलितारु-वल्लूरः ॥१८॥
मपि च ।। निज-सेना-पद-धूलाकई मित-मलप्रहारियोवारिः ।
फलपाल-शोणिताम्बु-निशातीकृत-निजकरासिरवनिप.
विष्णुः॥२०॥
अपि च ॥ नरसिंह-वर्म-भूभुज-महस्रभुज-भूजपरशुरामोऽपि ।
चित्रं विष्णुपारशतकृत्वोऽप्याजिनिहित-शत्रु-चत्रः॥२१॥

अवय लाल नगर में के शिलालेस २८१ सदियम-धुशाायमराहुरगिरि-गिरीन्द्र-हवि-पवि- दण्ड तलवनपुरलक्ष्मी पुनरहरजयमिक रिपास्स विष्णु-नृपः ॥२२॥ अपि च ॥ चकिप्रेपित-मालवेश्वरजगहेवादिसैन्यानवे घूर्नन्त महमापिवत्करतलंनाहत्य मृत्यु-प्रभुः । प्राफ पश्चादसिनामदीदिद नहीं वत्कृप्यवेण्यावधि- माविष्णुर्भुजदण्डचूर्णिवनितान्तातु तुझाचलः ॥ २३ ॥ मपि च ॥ इरगोल-चांपी-पति मृगमगारातिरतुल: कदम्ब-सोपीश-चितिरुह-कुलच्छेद-परशुः । निज-व्यापारक-प्रकटितवसधार्यमहिमा म विष्णुः पृथ्वीशी न भवति वयोगोपरगुणः ॥२४॥ माशाखमो-पिदपगमे विश्वसाकस्य नाना लक्ष्मीदेवी विशदयशसा दिग्पदिक्चभितिः । दृप्वरि-चितिप-दितिजमात-विध्वस-विष्योः विप्लोस्तम्य प्राय-बमुधासीत्सुधानिर्मिताली ।। २५ ।। ब्रह्माण्ड-माण्ड-भरितामलकीर्ति-उदा. कान्तस्तयारजनि मूनुरजातयः । पृथ्वीश-पाण्डु-राधयारिव पुष्पापो देव-द्विपत कमजयोरिवनारसिदः ॥२६॥ मपि च ॥ गन्न बर मुध काधन-पय पोलाए राणेकुर प में भिसय चेर पावरमुसा दूरय विमारय ।

- २८२ श्रवण वल्गोल नगर में के शिलालेख स्वगौडेति नृसिंह-भूरि-नृपतेमध्ये मदरसर्चदा दुर्वारस्सरति ध्वनिः परिजनानिर्यात-निर्धोप-जित् ॥२७॥ अपि च ॥ शौर्य नैप इरः परत्र वरणेरन्यत्र वेजस्विता दानित्वं करिणः परत्र रविनामन्यत्र कोविरदात् । राज्य चन्द्रमसर्परत्र विपमानत्वं च पुष्पायुधा-- दन्यत्रान्य-जने मनाक च सहते श्रीनारसिंहोनृपः ॥२८॥ अपि च ॥ स भुज-यल-वीर-गङ्ग-प्रवाप-होयसलापर-नामा । पालयति चतुस्समय मर्यादामम्युनिधिरिवाति प्रीत्या ॥२॥ चागल-देवी-रमणो यादव-कुल-कमल-विमल-मात्तण्ड-श्रोः।। छित्वा दृप्त-विरोधि-बंश-गहनं दिगजैत्र-यात्रा-विधा- वारयोदय-भूधरं रविरिवाद्रि दीप-वत्ति श्रिया। नत्वा दचिण-कुकुटेश्वर-जिन-श्री-पाद-युग्मं निधि राज्यस्याभ्युदयाय कल्पितमिदं स्वम्यात्मभण्डारिता ।। ३० ॥ सर्वाधिकारिणा कार्य-विधा योगन्धरायया- दपि दरेण नीतिशगुरुपा व गुरोरपि ॥ ३१ ॥ लोकाम्बिकातनूजेन जकि-राजस्य सूनुना। न्यायसा लोकनक-नुदमधामरयारपि ॥ ३२ ॥ मलधारि-स्वामि-पद-प्रधित-मुदा पाजिश-गगनांशुमता। हिम-करिना गा-महो-निसिल-जिनागार-दान-नायधि-विभवे ॥३३॥ .

प्रायवेलगाल नगर में के शिलाशेग्व २८३ दूरी-कस-कलि-स्यूत-न-कजङ्कने भूयमा । परिव-पयसा कीर्ति-धवलोकद-दिशालिना ॥ ३४ ॥ विशषि-शक्ति-निर्भिन्न-मविद् स्वैिरिगा। हुल्लपेन जगनत-मन्त्रि-मायिस्य-मोलिना ॥ ३५ ।। चतुर्वि प्रति-जिनेन्द्र श्रा-निलय मायाचलं । सद्धर्म-चन्दनाद्भूती दृष्ट्या निर्मापितं ततः ॥ ३६॥ द्वितीयं यस सम्याव-चूड़ामणि-गुपाल्यया। भव्य-चूड़ामपिनाम वरमै प्रोत्या ददात्ततः ॥ ३ ॥ दाना भव्य-चूड़ामणि-जिन-उमदा वासिना सन्मुनीना भोगाय पानुजारियमिह जिनेन्द्राष्टविध्यर्चनाई। मो-पार-खामिना पत्रिजगदधिपतः फुटेशस्य परयुः पुण्यश्री-अन्याया विवहन-विधयं मुद्रिकामपंयन्या ॥३॥ एकाशीत्युत्तर-महन-सफ-पर्येषु गतेषु ममादि- संयत्सरस्य पुष्य-मारा शुद्ध शुक्रवारपतुर्दसामुत्त. रायसवान्दो प्री-मूल-संपदेशियगपुसकगरसम्मनि विधाय॥ नरसिंह-दिमानिवदुध्रिन-क-TR-क-दुल्ल-कर-जिदिए नत-धारा गद्गाम्बुनि सपनुम्विविजिनेश-पाइसरसीमा सपटमदापविरगदित-पति-कन्न नृपवि-शिवि-सम प्रगुपित-कुरेरविभवभिगुवाइस-सिइविम्मो नरसिंहः २८४ अवय गोल नगर में के शिलालेस मतःपरं माम-सीमाभिधास्यते ।। तत्र पूर्वस्या दिशि सम्शेर- चक्कन यडेय सीमे करडियरे भलि तेडू हिरियाव्ययि पागलु विधिसट्टियोरेय कोढिय किन्धयल । पछि त बरहाल मेरेय मच्चुगह मेरेयागि हिरियायेग बसुरिय तय केम्परेय हुरिगसे । दक्षिणस्यां दिशि वित्तिय सवयेर यडय एरेय दियेय हुणिसेय फोन दिरियाल । मधि घालु दिरियाच्य से मेरिडिय इवण वल्लंयरेय ते कुणादिय बजरिय पन।। भसिन्दत्त तरिदलिय फलियमनमद ताम जनयुरद दिरिय औरेय वावध सीमे । पश्चिमाया दिशि जन्नपुरक मयरिज' मागरमरियाद जन्नपूर सबग्रेर फेरेयरिय ना हिरियषिसे मीमे ।। उत्तरम्या दिशि फरिमन कोतु प्रदर मय बोरग्जन फैग्यारेयानगे सरणेर येडगनहल्लिय नहुये यमुरिय होय । प्रलिन मुडतालजन कुम्मरि मल्जि मूड चिसदर सीमे ।। सामान्याऽयं धर्म-सेतु पाणाकाले काने पालगोयाममः मनितान भाविनाभिवेन्द्रान भूयो भूयो पार रामचन्द्रः॥४०॥ मदत्त परदत्त वाया न वसुन्धरा । पष्टि य-महम्रावि विधायो जाया कमिः ॥४१॥ नविदिशमियानुर यस विषमुग्यो । विषमेकानिधन सम्म पुत्र-पौत्र ।। ४२ ॥ गरायोना-ममी वपि पवादमा दिणलोगोश भरदुमने।

प्रवणबेलगोल नगर में के शिलालेख २८५ त्रिलोकप्रामाद-प्रकटिव-सुधा-धाम विशदं यशो यस्य श्रीमान म जयति चिरं हुल्लप-विभुः॥ ४३ ॥ प्रस्तु स्वस्ति चिराय हुल्ल भवते प्रोजैन-चूड़ामणे भन्य-व्यूह-सरोज-पन्ह-तरपे गाम्भीर्य-वारानिय । भास्वद्विश्व-कलाविधे जिन-नुव-तोगन्धि-युद्धीन्दवे स्वयकौति सिवाम्बुजादरलमद्वारासि-वार्चिन्दवे ॥४४॥ श्री गोम्मट-पुरद विप्पेसुदधि प्रडकेय हरिङ्ग २०० दसम्बंगे प्रवचन ...गे विसिग १ सम्बे गोफन ५ मंजस हेरिने प १ ६सम्बंग मान १ मरिपत्रायदछि गलेय...... ......रंग हाग १ मलने २०० गायरे इनिनुमं धम्म मुदधि कारदन्दु पतुर्विंशति-तीयकरपू ........प्रधान मा- धिकारि हिरिय-भण्डारि हुम्लग्यङ्गल हंगडे लफाव्यालं हेगडे-म......... .....हारसल नारसिंह-देवनकस्य पंडि- कोण्डु विट्टर । इप्पत्त-नाल्वर मनंदरे प .... वो नुडिदुई सद्वाणि तन पेल्दन्दोलानदारदे मार्गमन्द नंदु... शशियिन्दम्बरमजदि तिलि-गोल नेशलिदानने पाममावि यनमिन्द्रनि विदियमासे... ...कीर्ति देय-मुनिषि मितान्त-पक श-नि- देसंगु रोजिन-पर्ममन्द पलिकवयि सि ॥४४ ..तो सन्या चमू-नायकः ॥ी हुल्ल रसवोरुमबमददादाप............... प्रानय........ ...

२८१ अवध येलगोल नगर में के शिक्षालेस ......क्त्या मुदा धारापर्चकमुबंरा-स्तुति-भू...... ....श्रो श्रो भन्याम्भोरुह-भास्करस्सुरसरिनोहार ............ .....निः पुरात्य-रनाकरः । सिवान्ताम्बुधि-वनामतकरः फन्दर्पशेजाशनि- सेोऽयं विश्रुत-भानुकीर्ति-मुनि.........वभूवजे ॥४॥ [Ram में भी दराम्सशी नारमिट देश-पिपरे पभान उन शिति मन्दिर की वन्दना मना हुए नारास पेड ग्राम का पानाने उमस में हुए पु भाता समय काय घमा का भी नाम पापा। नारसित देने का नाम भव्यपणामणि या रागाधिसम्यक समय पास भाग मत रिय गाम uint. पचारिश नारनिगमानागाम्ना टेगावापान परिणनिती निवि बान रख है। पन्त म भानु मुनि भीमगर।। १३८(३५१) मठ के उत्तर की गोशाता में (१०१०४१) आमत्सरम-भीर साहामा-नायो। पाय-नापस यागनि.l-ul॥ विश्रापमानयमानस्य यामने। भा-कापडायनामापारयः ॥२॥ .

प्रवप पेलान नगर में के शिलान्य वस्यान्वये जनि ख्यात विल्याते देविके गये। गुयो देवेन्द्र-सिद्धान्व-देवा देवेन बन्दिनः ।। ३ ।। प्रवर सन्तानदान ॥ वृत्त । पर-वादि-रितिभून्निशात-कुलिश श्री-मूल-गबाजपट - चरण पुस्तक-गज देशिग-1 प्ररात-यागीश्वरा- भग्य मन्मथ-मनं जगदानाद ख्यावनाद दिवा- फरणन्दि-प्रतिपं जिनागम सुधाम्भौराशि-गाराधिपं ॥ ४ ॥ मन्तनलिन्तकारियनन्दे जगत्त्रय-निरपपे- म्पं वजेंदिदरेमुदने बल्लेनदल्लदे संयम चार- नपम्पियनलगमिन्नु दिवाकरनन्दि-देव-सि- सान्विगर्गन्दडान्दु रमनारिया जानदनेन्तु पिया ॥५॥ तरिशप्यरण। नरये तनुत्रमिकिश्वालिद मलन्निने मेन्यनामेंगु मुरिसुवृदिल्ल निरे वा मग्गुलनिम बुदिल्ज पानि, फिर तेरेय पुदिन्नुगु-बुदिल्ल मन्नानुदिनहीन्द्रनुं नेवनं पण्यिासत्गुण-गणालिय मलधारिदेवर ॥६॥ बरशिष्यर ॥ al फन्मदापदक-और-दयापर-जैन-मार्ग-रा- दान्स-पवाधिगन विषय-वग्गिनुरुव-कर्म-भजन- सन्तन-भय-पय-दिनसमर शुभचन्द्र-देव-सि- सान्त-मुनीन्द्रर पोगरतुद पुधिष्टिक-भूरि -14 २८६ प्रवणबेलगोल नगर में के शिलालेख ......क्त्या मुदा धारापुर्वकमुरा-स्तुति-भृ... ......श्री श्री भन्याम्भोरुद-भास्करस्सुरसरिनोहार ..... ............ नि: पुरात्र्य-रवाकरः। सिद्धान्ताम्बुधि-वर्द्धनामृतकरः कन्दर्पशैलाशनि- सोऽयं विश्रुत-भानुकीर्ति-मुनि......... भूतले ॥४६॥ [ इस लेख में भी होयसलवंशी नारसिंह देव के वंश-परिचय पश्चात् उनका चतुर्विशति मन्दिर की वन्दना करने तथा हुछ द्वारा सर. येरु ग्राम का दान करने का उल्लेख है । इस लेख में हुछ के लघु भाता लक्ष्मण का व समर का भी नाम पाया है। नारसिंह देव ने उक्त बढी का नाम भव्य यूडामणि रसखा । हुछराज की उपाधि सम्यक्त्व शामणि थी। लेख का अन्तिम भाग यहुत विप गया है। इसमें हुस्लप बोकय्य मादि द्वारा नारसिंह देव को प्रार्थनापत्र देकर गोम्मटपुर के कुर टेक्सी का दान धनुर्विशति तीर्थ र बम्ति के लिये कराने का उल्लेख है। अन्त में भानु की िमुनि का भी उल्लेख है। १३८ ( ३५१ ) मठ के उत्तर की गोशाला में (शक सं० १०४१) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्थाद्वादामोप-लाधन । जीयात वैशाक्य नाथस्य शासन जिन-शासन ॥१॥ स्वस्ति प्रो-वर्द्धमानस्य पद्धमानस्य शासने । प्री-कापडछन्दनामाभूच्चतुरलपारयः ॥२॥ दुग्गडे,

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२८६ अवय बेलगोल नगर में के शिक्षालेस ......क्त्या मुदा धारापूर्वकमुखरा-स्तुति-भृ...... प्रो श्री भव्याम्भोरुह-भास्करस्सुरसरिनोहार .................नि: पुराय-रनाकरः। सिद्धान्ताम्बुधि-वर्द्धनामृतकरः कन्दर्पशैलाशनि- सोऽयं विश्रुत-भानुफीति-मुनि......... भूतजे ॥४॥ [इस लेग में भी होयसळयशी नारसिह देर के वश परिचय पत्रात उनका धनुर्विशति मन्दिर की वन्दना काने तपास द्वारा स. पेर माम का दान करने का उपजेल है। इस लेख में हुए जगु भाता लक्ष्मण का य समर का भी नाम पापा है। नासिर को का नाम भव्यतामणिराया। हुणराज की गाधि सम्पत्तर पाामपि पी। बेनका भागम भाग यहुत रिस गरा है। इसमें हुजम गरे, धोम धारिशरा नारनिद देर को मानापन देकर गाम्मटपुर देरस का दान पावियति ही पनि के लिये रान का है। अन्त में भानुकी िमुनि का भी मेरा है।। १३८ (३५१ ) मठ के उत्तर की गौशाला में (रासस०१०४१) श्रामत्सरम-गम्भीर-साताशमाघ-साम्दन । जीयान द्वाम्य-नाथस्य शासन जिज-यासन ॥१॥ स्वस्ति पार्द्धमानस्य बईमानस्य शामने। श्री-कापड दनामाभूउपमुपायः ॥२॥ ।

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२५६ अवण बेलगोल नगर में के शिलालेख
......क्त्या मुदा धारापूर्वकमुरा-स्तुति-भृ............म्म
....ो श्री
.
.
भव्याम्भोरुह-भास्करस्सुरसरिनोहार
........... .....नि: पुराय-रत्नाकरः ।
सिद्धान्ताम्बुधि-बर्द्धनामृतकर: कन्दर्पशैलाशनि-
स्पोऽयं विश्रुत-भानुकीर्ति-मुनि.........तभूवजे ॥४६॥
[इस लेरा में भी होयसलवशी नारसिंह देव के वंश-परिचय के
पश्चात् उनका चतुर्विशति मन्दिर की वन्दना करने तथा हुल द्वारा सब.
येरु ग्राम का दान करने का उल्जेस है। इस लेख में हुल के लघु भ्राता
लक्ष्मण का व अमर का भी नाम पाया है। नारसिंह देव ने उक्त बस्ती
का नाम भव्यचूडामणि रखा । हुछराज की उपाधि सम्यक्तव चुडामणि
थी । लेख का अन्तिम भाग यहुत विस गया है। इसमें हुरलय
हेगडे,
बोकरय शादि द्वारा नारसिह देव को प्रार्थनापत्र देकर गोम्मटपुर के कुछ
टेक्से का दान चतुविशति तीर्थकर बस्ति के लिये कराने का उल्लेख
है। अन्त में भानुकीर्ति मुनि का भी उल्लेख है।]
१३६ (३५१)
मठ के उत्तर की गोशाला में
(शक स०१०४१)
श्रीमत्सरम-गम्भीर-स्याद्वादामोघ-लाबनं ।
जीयात त्रैलोक्य नाथस्य शासनं जिन-ग्रासनं ॥१॥
स्वस्ति श्रो-वर्द्धमानस्य वर्द्धमानस्य शासने ।
श्री-काण्डकन्दनामाभूच्चतुरफुलपारणः ॥ २॥

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.... २८६ प्रवण येल्गोल नगर में के शिलालेख .....क्त्या मुदा धारापुर्वकमुरा-स्तुति-भृ............म्म ....श्री श्री भव्याम्भोरुह-भास्करस्सुरसरिनोहार नि: पुराय-रनाकरः। सिद्धान्ताम्युधि-वर्द्धनामृतकरः कन्दर्पशैलाशनि- स्सोऽयं विश्रुत-भानुकीर्ति-मुनि.........तभूवज्ञे ॥४६॥ लेप में भी होयसलवंशी नारसिंह देव के वंश-परिचय के पश्चात् उनका चतुर्विशति मन्दिर की वन्दना करने तयाहुल द्वारा स. पेरु ग्राम का दान करने का उपजेर है । इस लेख में हुल के लघु माता लक्ष्मण का व समर का भी नाम पाया है। नारसिंह देव ने उक्त बस्ती का नाम भव्यचूडामणि रक्खा । हुलराज की उपाधि सम्यक्तर चामणि थी । लेख का अन्तिम भाग यहुत विम गया है। इसमें कुल्लय हेगडे, खोकरय धादि द्वारा नारसिंह देव से प्रार्थनापत्र देकर गोम्मटपुर के कुम टेक्से का दान चतुर्विशति तीर्थ कर बस्ति के लिये कराने का उल्लेख है। अन्त में भानुकीर्ति मुनि का भी उल्लेख है।] १३८ (३५१) मठ के उत्तर की गोशाला में (शक सं०१०४१) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामोपलाञ्छन । जीयात त्रैलोक्य-नाथस्य शासनं जिन-शासन ॥१॥ स्वस्ति श्री-बर्द्धमानस्य बद्धमानस्य शासने । श्री-कापडकुन्दनामाभूञ्चतुरजचारणः ॥२॥ ।

याज.inichi 201namanmar Nimtim winning tituth ifinama malver wilunmun गतmilinामा। मठ कधिमार पक- पाच (10) भाnfra-male-04-६uru vurcापान tant nira MI-RamananRIAnni Aatmatatun anurn-in.. yaa Jati Mantrva.. vt.xn-khaninangi.in... Maste- Riterat .xx.ve n.in MARintain Smithrean 4. 1nth ultatistiane Elite Mjila Nali Na ....! tatus Musalartahyadre is wrt Trenit TRA... Raigaditimsary tr: ..

प्राय बेलगोल नगर में के शिलालेख इन्धिपर गुरुगजप प्रोमदिवाकरणन्दि सिमान्व-देवः ।। पुन ॥ मा-मुनि-धीरेय कुद समम-व-निधियागि पान- नामपियागि सद्गुण-गणापलियागि दया-दम-पमा- प्रो-मुख-माश्मियागि विनयार पन्द्रियागि सन्त मोमति गन्तिपन्नेंगदसब्धियातुर्वरेकर्ष भीतिमनु ॥८॥ मोमति गनिर्जित-पायिगमनपलियम तोमादिगाल पोगसँग नेगोंगे नातु समापिय अगत्- सामियनिल पनि जिनेन्द्रन पारपयोज-युग्मम प्रेम पिगल निनिसि देवनिराम-भूतिमिरज ॥ एफ-14 १०४१य ग्लिम्बि सम्बस्सरद फावगुरु. राव पञ्चमी युधयार वन मन्यान-नीधिया गनिम्न 4 गन्दर ।। प्रगति गाह-तर्ष पाय! गु-Pr-freणामपि. futhaगुमग-निगि. ani मा futurising it..॥ aan Ita AIM MItnanaat. ifm -HTi4-tgisterstt. सारा मामला करन्दिा II ATil viTipti [tatMRithunmitra hanuing antarwasna1011 Ram पंग में-melan it insan keth margive will Rudruman धीमी anal... दाका fafaat farmien मनाया। १४०(14) महधिमा एक पत्र पापा (Unitive) wilm I-III-एक tream पापापा Latest of MIRMERIERRIMAunt Raat InHere untihitent. प - Arun NIRatlam masmeerut-li Hitent ni nik Mintuit IRSANEAM ... RAN Ne Kirtantr.. Twith u great Ent... Mithigare Ritesight statite » Presider २ प्रायवेलगोल नगर में के शिलालेख इन्तिवर गुरुगलप्प श्रीमद्दिवाकरणन्दि-सिद्धान्त-देवरु ।। पृत ॥ मा-मुनि-दीय कुडे समप्र-तपो-निधियागि दान-चि. न्तामणियागि सद्गुण-गणामखियागि दया-दम-खमा-- प्री-मुख-लक्ष्मियागि विनयाव-चन्द्रियागि सन्दवं श्रीमति गन्तियन्नेंगस्दर्चियालुचरे कूर्त कोचिंसलु ॥८॥ श्रीमति गन्तियर्जित-कपायिगलुप्रतपङ्गलिन्दमि- न्तीमचियोन पागतेंगे नेगतेंगे नोन्तु समाधिषि जगत- स्वामियनिष्प पेम्भिन जिनेन्द्रन पाद-पयोज-युग्ममः प्रेमदे चित्तोल निलिसि देवनिवास-विभूतिगरिददल ।।। सक-वप १०४१ नेय विलम्बि-सम्बत्सरद फाल्गुण- शुद्ध-पञ्चमी युधवार दन्दु मन्यसन-विधियि श्रीमति गन्तियम्मुंडिपि देवलोक मन्दर । प्रगयितमैने पार-तप সমিন যুগ-মগ-বিমূষি- न्तयित-निजगुरु-निसि- धिगेय माइल्ये गन्धियामासिवर ॥ १० ॥ कमयं प्रावि गणाना चतुरवामम्पति सिमानामा परिताप गुण-सेम्य-भव्य-जनदान निर्ममा मुनी सरा धीर धार-वीर-सोन क्यामि पाण्मान दिया फरन्दि-यवि पेपर्ने होना in itm [शिय माnिfrik गिया मामी कामा-मामा मामी।

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प्रायान नगर में के शिनास १५२ (३६२) तापरफेरे के उत्तर की प्रारघट्टान पर श्रीरामवरूप १५६ नय श्रोमाञ्चारमुफीति-दिन यति माभानुमधाम मागे पुष्यचतुर्दशी लिपि कृष्णे मुमहाम । मध्याद पर मून पण भार्गध्यवार पार पुर जगाम मानant in-in | १४॥ (३७.) नगर ने सूर्य की परमाणार यमयप hinमें एक शिला पर (मग मे १०४२) यस्ति गत्तनम T-JR-या पोरगा - प. दिय-राय, सर भाग मा-गा- याद सय १.५TAनार गरे। यि धेहि किरायपमा मधिन .... अधिक संEि- मतिमपि at teriten ................ (Rudyana kiauanti Ene iament NIA mant R YA Nationali श्रवण बेल्गोल के ग्रासपास १४४ ( ३८४) जिननायपुर में अरेगल बस्ति के पूर्व की ओर (लगभग एक सं० १०५७) श्रीमत्सरम-गम्भीर-स्याद्वादामोघ-जान्धन । जोयात् त्रैलोक्य-नायस्य शामनं जिन-शासनं ॥ १ ॥ भद्रमस्तु जिन-शामनाय मम्पयता प्रतिविधान-देतवे । प्रन्य-वादि-मद-दस्ति-मस्तक-स्फाटनाय घदन-पटीयसे ।।२।। म्पम्ति ममस्त-भुवनाश्रय श्री-पृथ्वी वल्लम-महाराजाधिराज परमेश्वर-परम-भट्टारकं सत्याश्रय-कुल-तिलकं चानुफ्याभरपं श्रीमविभुवनमल्ल-देवर राज्यमुनरोनराभिवृषि-प्रार्डमान माचन्द्राक्तारम्बर मल्लुत्तमिर ॥ विनयादित्य-नृपालं जन-विनुन पारसलाम्बरान्वयदिनप । मनु-मार्गनिमि नाम वन-निधि परिगृत-ममम्न-धानी नलान ।। ३ ।। तत्पुत्र ।। एश्योरमलत. लोहि विगाव-भूगर धुरदयात।

परगान प्रासपास तस्सिन्दु गेदु वार. परवहागि मुमरा ॥४॥ भानंगाद एग नपान मन परि-मनि मकाल-पर- पानापनधि जनहा- कालीन पग बनानृपं ॥ ४ ॥ भागनाम ।। फेलु ममय जुम नायगाallujivani माननिर -Rs.1. मा-विष्णुपद्धना wafiry tilan५.५१६३०E-HEIR Emaat पुराधा पादयः an-jaisa मला IOERलकामका फाय- भूर, तर उपसले यूप्पम्युिशना ximit ** तुझं का ग alish ARM शुभारम्य refer ससाना HAI, पत्त in mentals-नागमन मारमय- मनु मनाएपि-राजलं... NRint पोधिक WIKSER "ध्यम- भाग 1 श्रवण वल्गाल के ग्रासपास १४४ ( ३८४) जिननायपुर में अरेगल बस्ति के पूर्व की ओर (लगभग गक सं० १०५७) श्रीमत्सरम-गम्भीर-स्याद्वादानोघ-जान्छन । जोयान त्रैलोक्यनाथम्य शामनं जिन-शासन ॥१॥ नद्रमस्तु जिन-शामनाय मम्पद्यता प्रतिविधान-देतवे । अन्य-बादि-मद-दस्ति-मस्तक-स्फाटनाय घटन-पटीयसे ॥२॥ म्वम्ति ममस्त-भुवनाश्रय श्री-पृथ्वी-वल्लभ-महाराजाधिराज परमेश्वर परम-भट्टारकं सत्याश्रय-कुल-तिलकं चालुक्याभरणं श्रीमत्रिभुवनमल्ल- व-देवर राज्यमुत्तरोत्तराभिवृद्धि-प्रवर्द्धमान माचन्द्राक्तारम्बरसल्लुत्तमिरे ।। विनयादित्य-नृपालं जन-चिनुत पोरसलाम्बरान्ययदिनप । मनु-मार्गनिसि नेगद वन-निधि परिवृतसमस्त-धात्रो ननदोज ।। ३ ।। तत्पुत्र ॥ एरेयङ्ग-पोरमलं त. ल्ताहि किंगपि.भुपर धुरदेइयोल।

अश्य बगाल के मासपास वरिमन्दु गेस्टु वार- पं.र वट्टागिर्दु मुगद गाय गं ॥ ४ ॥ भानंगा एग नृपालन मून पूरि-माने सफा-धी. पानापनधि जया- कानी घाग नगा यालालनृपं ।। १ ।। प्रापनामा कानु मलयजुम नायगारसि खाpिlvi targin-II मन श्री विष्णु नाva ॥ tafatNHEIR-Hren द्वारापat पुरापार यादय #u-atta मलपराम-लकार जानामिका. नूर-तापूर- उदितलम्बुि ६il . Trस का ग; 41 datestant सुनिदि lne HIR-An An वृत्त fatuit-नागम्मन मारमाय ... HJएसि-राna #tva.piniti मातम पोधिभvita Re "प्यम्मान गgrict.. 1ि4 श्ररण बेल्गोल के ग्रासपास १४४ ( ३८४) जिननायपुर में अरेगल बस्ति के पूर्व की भोर (लगभग शक सं० १०५७) श्रीमत्सरम-गम्भोर-स्याद्वादामोप-नान्चन । जोयान प्रैलोक्य-नाघम्य शासनं जिन-शासनं ॥१॥ भद्रमस्तु जिन-शामनाय मम्ममता प्रतिविधान हेतवे । मन्य गादि-मद-मस्ति-मस्त-म्फादनाय घटने-रटीयसे ॥२॥ मम्ति ममम्त-भुग्नाश्रय श्री पृथ्यो-लम-महाराजाधिराज परमेश्वर परम-भट्टारकं मन्याश्रय कुन्न-विनफ चालुक्याभर श्रीमस्विभुवनमल्ल देयर गज्यमुत्तगतराभिषि-प्राभान माचन्द्राक्तारम्बर मन्तुतमि ।। विनयादित्य-नृपाले जन-रिनुन पारसलाम्बरायदिनप । मा-मानसि नगद पम-निविपरिन ममान-याची मना॥३॥ एरेय मामलत- नग्यहि nिfryर पुरवाया।

पदमामक प्रासपा तस्मिन्नु गल्दवार ग्यागिहुँ मुपद गाय in ॥ ४ ॥ भानपद भूपालन मनु परि-माने मा. सहारनधि.in कानीन पग बनानृपं ॥ ५ ॥ भानाम। कान मजयम नाय ethinafrre मatarna-गा। 'मा विष्णुपटुंना ..॥ aplin tulee tuu wire 1703-4$1.de TONT पुरा यादय Huits 41... मानपOR TH-IIts Anाकारकाप. तुर र उदितल पम्प (HIKAn int grive trug Aile Hain मुगार पाहा इन । नागम्मन मारमर " . नगुनापि-राज Trainiat- Main. पोषिका SR "यम Peave -'ग' ...

श्रयण बेल्गाल के आसपास १४४ ( ३८४) जिननायपुर में अरेगल बस्ति के पूर्व की ओर (लगभग गफ सं० १०५७) श्रीमत्सरम-गम्भीर-स्याद्रादामोध-लाडनं । जोयान त्रैलोक्य-नायम्य शासनं जिन-शासनं ॥१॥ नद्रमस्तु जिन-शाननाय मम्पद्यतां प्रतिविधान-हेवो । अन्य-वादि-मद-दस्ति-मस्तक-स्फाटनाय घटने-पटीयसे ॥२॥ म्वस्ति ममस्त-भुवनाश्रय श्री-पृथ्वी-वल्लभ-महाराजाधिराज परमेश्वर-परम-भट्टारक सत्याश्रय-कुल त-तिलकं चालुक्याभर श्रीमत्विभुवनमल्ल-देवर राज्यनुत्तरातराभिवृद्धि-प्रबर्द्धमान माचन्द्राक्र्कतारम्बर मल्लुत्तमिरे ।। विनयादित्य-नृपालं जन-विनुत पोय्सलाम्बरान्वयदिनपं । मनु-मार्गनेनिसि नेगल्द वन-निधि-परिवृत-ममस्त-धात्रो तलदोज ॥ ३॥ वत्पुत्र ॥ एरेयङ्ग-पोरमलं त. ल्तरेयट्टि विरोधि-भुपर धुरदंडयाल ।

२६७ प्रवर बेलगोल के प्रासपास यासदिनुदायिसिदं ससि. मासुरवर-कोचियेचदण्टाधीश ॥१२॥ पृत्त । माडिसिदं जिनेन्द्र भवनहल्लना कोरयादि-तीर्यदल रूढियिनेला-वेचेसेव बेल्गाजदल यहु-चित्र-भित्तियि । नोडिदरं मनोलिपुम्बिनमेर पम्पनयि के. गुडे परिधि काण्ड फोनदा जमनलिदा लीयि ॥१३॥ भन्तु दान विनादन जिनधम्माभ्युदय-प्रमादनुमागि पनकाल मुरादलिदु मलिक सन्यामन-विधिवि शरीरमं वि. सुरलोक निवासियादनित ।। वृत्त । मलवायुद्धव-देश-कण्टकरनादन्दोत्तिहोउदो. नादि कागरनात्ति धरि नृपरं धेन्नाह सूदा विमुक्तन्य-मं. उलमं तत्रविगये मादि जगदालु योरोवानिन्नुगु. न्दलयादं कलि गानप्रवनयं श्रीयोप्प-दण्डाधिपं ॥१४॥ स्वस्ति समधिगत-पथ-महा-शब्द महा-मामन्दाधिपति महाप्रचण्डदण्डनायक वैरिभय-दापक द्रोह-वाह संपामजचजह । व्ययत्सराज। फान्चा-मनोज । गोत्र-पवित्र । युधजन-मित्र । श्रीमतु चोप्पदेव-दानायक । वम्मपनप एचिराज दण्ड. मायको पराध-विनय निसिभिगय निनिसि भातन मारिसिय पसदिगं। स-स्फुटिवशाहार-दानम् । गहुममुद्र-दख १० सण्डग गपिन-तोटमुंबसदिय मुख्य किरु-गर। पन- औरैय येईलयु धम्म गुरुगनष श्रीमजसहर देसिंग-गद पुस्तक अपर येलगोल के प्रासपास प्रदटापुमति सत्यमाण्मु घरमायुं सोचमौदार्यम- मु दिदं वनने निन्दुवेम्य गुणसंपावलं तालिदली. कद वन्धि-प्रकरलं तलिपि कः केनार्थियन्दितु पा. गद पेम्पिन्दमे गनरागनेसेदं विधम्भराभागोल ॥८॥ तलमा सेनदन्ते कानालापवावं... लियो- दि धेरियं कललिप नरसिङ्गान्तकापासमं । निलयं माडि निमिचि विष्णु-नान्यामादि गझल पडलम कोपनराति-यूप-रासिगंगा-मण्डाधिपं ॥ पातन-पिरियन ।। व्यापित-विमलय-यश. श्रो-गतिरित-विनोद पति पनपति- पापनियनित गम्म.न. भूति जिननिदाननिय ॥१०॥ भानमनि। चामन्या-जननाय गुग श्रा-भानुमोति पर Mit- निममदन पुरानयागप 41 TET न्य। भामाता पुण्यtni. प्रामाशिम-ग-मय:

अपय धेलाल के मासपास यामदिनदरिसिदं ससि. भामुरवर-कीपिचदाधीरा ॥१२॥ qध । मामिसिद जिनेन्द्रभवनमा ग्यादि-चीत्यदल रूदिपिलान्येसंग येल्लाहदल पाहु-चित्र-मिसिपि । बोडिदरं मनलोलिपुम्बिनमेव चमूपनधि के. गहे धरित्रि काण्ड फंनिंदाहे जमन्नलिदाडे लोलेयि ॥१३॥ भन्नु दान-विनोदनुं जिनम्मीभ्युदय-प्रमोदनुमागि पलकाल मुखदलिई पनिक सन्यामन-विधियि शरीरमं बिष्ट, मुरलोक निवासियादनित्त ॥ वृत्त । मलवत्युस्त-देश-कण्टकरनाटन्दोतिरोबुदो- मादि कारनासि बरि नृपरं पनाह सूदा वित्तन्य-मं. सलमं तत्पविगये माडि जगदीनु योरो तानिन्तुगु- न्दलेयादं फलि गानप्रतनयं श्री बाप्प-दण्डाधिपं ॥१४॥ स्वस्ति ममधिगव-पथ-महा-शन्द महा-मामन्ताधिपति महाप्रचण्डदण्डनायक चरिभय-दायक द्रोह-माट्ट संग्रामजत्ताह । दयपत्यराज। कान्या-मनोज । गोत्र-पवित्र । बुधजन-मित्र'। श्रीमतु याप्पदेव-दण्दनायकं । बम्म एनप्प एचि-राज दण्ड- मायकल परीक्ष-विनय निसिधिगय निलिसि पातन माखिसिद पादिगं। सण्ड-फुटिवकाहार-दान। गङ्गसमुद्र-दलु १० खण्डग गर्दयुं हबिन-तोट, पसदिय मुडप किर-गरयु । पेकन- फरेय वह लघु वम्म गुरुगनप श्रीमूलसहद देसिग-गवद पुस्तक अक्व पंतोजके मामराम बरीमतु शुभचन्द्रासमान्क देर-सपाल माघ (क) चन्द्रमा धार- माहि दांच।। मोगकाइना रदसो वा इरत नुन्धरा । परि समारिया शायद हनिः ॥१५॥ सांता-कान्तिा नार- नादन शराउनमा नेय मानदार मरिममा भलमा एचिकमेक... १६॥ सानानिमान:- मानविदार- मतिय . नाम समान एनिमामि ॥१०॥ पानापनाना पा पन्द्र मागु एपिक पागाई वामनानाम ALL RIENTIFast .

अवय चल्लास के पास पाम लिये गा सनद की कुछ भूमि दान यमचन्द्र मिरान्त देव के शिष्य माधवपन्ददेव को किया। परिज की भाषा परिने म उसकी पागपये में यह दिखाया। पिक शुभचन्द्र देव की शिष्या थी। मेख में गाराज की वंशाली इस प्रकार पाई जाती है- नागरम मारश्य । एचिराज-पाधि । बम्नदेव पनेर-बागलम्बे गराज दण्डनायक (भानुतिय की शिष्या) पचिराजदण्डनायक-पतिको योप्पदेव दण्दनायक ।

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श्रवण वेल्गोल और आसपास के ग्रामों के अवशिष्ट लेख

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अवशिष्ट शिलालेखों का निम्न प्रकार समय थनुमान किया जाता है शक सक्त की बठवीं शताब्दि ५२१०१. एक सवत की सातवीं शताब्दि । १५३,१५७,१५८, १५६ १६०,१६१,१६२, १६.१९०,११२. १६३, १४,१५,१६६ १६७, १६८,२००, २०२, २०३, ०५.२०६, २०७०८,२१०,२११.२१२,२१३ २१४, । २१५२१७,२१८,२१६, २२०,२४। १४७ १४६. १५४, १५, १७५, २६१, शक सवत् की माठवीं शताब्दि एक संवत् का नवमी शाब्दि १९८४१५६१७१.१८०, ९८५.२८६. २०१, २०६.१९१.२२७,२३५.३६,२३५, २५५,२७०, ५८२.२८७२६४.२९७,२८८ ३०७.३१५,४.८४१०। २ .

अवशिष्ट शिलालेखों का समय शक संवत् की दसवीं शतान्दि । १४८, १५०, १५१, २६३, १६५, १६६, १६३, १७२, २७३, १७४, १७७,२८, १८३,२१६, २२३, १२८,२२६,२५४,२५७,२५८, २५६, २६०,२६,२६२.२६३,२६४.२६६, २७२, २७३, २७४,२७७,२७८,२७६.२८०,२८१, २८५,२८६.२८८,२१,२६०,२६१,२६२, २६३, २६५,२६६,२६६,३००३०१,३०२ ३०३, ३०४.३०५.३०६,३०,३०६.३१०, (३११,३१२,३१३,३१४.४६६. १६८, १६६. १७०.२७६, १८१,१८५, ९८४ २८७, १६६ २०४,२२२,२२४,२२५,२३०० शक संवत की २३१, २४०,२४१.२४२२४६,२६५,२६६, ग्यारहवीं शताब्दि २६७, २७१, २०५.२.६,३१६,३५१.३६०, ३६८,३६६.४४५४४६.४४,४५४,४५८, । ४६० ४.३,४७८,४८८,४८६, शक संवत की बारहवीं शताब्दि १७६, १०, २२६.२३२.२३३,२३२,२३८ २४३, २४३, २४५,२४६,२५१,२८३,३१, ३१८, ३१६, ३२०.३२३. ३२४, ३२५, ३२६, ३२, ३२८, ३६१,४००,४०८,४११, ४२६ ४३१.४६९.४३६.४.१.४.५.४.६,120 ४९..

प्रवरिष्ट शिक्षाखों का समय २४,२५०,२५२,२१८,३३०.४०६,४१३. राक संवत् की ४१५.४१८,४२१.४३०,४३२,४४२.४४३, तेरहवीं शतादि ४६२,४६३४७७,४५,४५ शक सवत् की २४७.३५६ ३५७३.१.३.२.३०७,३०४ पदवी रावान्दि। ४.० ४२२ ४२३, ४२४.४२४.४२८, २९ । शक संवत् की :२१ ३२२. ३५२, ५३.५४ १५४.४.२. पन्द्रहवी शतान्दि ! ४८३, ४४४ । { ३३४,३३५, ३७०, ३.५ ३.६.३.७.२०१, म संवत की । ३९८,३६,४०२,४०३, ४००, ४१२.१६ सोलहवीं शतान्दि । १६४८,५४६ ४५०,४४१ १५२ ५५ १६३ ४६४,४६५ ४८२, ३४४,३४८,३६७.३.३.१.३० ३६१. २९४, ३६५.४२wn राक संबन की मसरी रातान्दि राक संवन की प्रठारहवीशवाद ४१.४५,४६.४..।

३०४ अवशिष्ट शिलालेखों का समय शक संरत की दसवीं शताब्दि । १४८, १५०, १५१, १६३, १६५. १६६, १६ १७२, १७, १७४, १७७, १७, १८३,२१ २२३, २२८२३६,२५४,२५७,२५८, २५ २६०, २६१.२६२.२६३.२६४.२६६, २७ २७३, २७४,२७७,२७८,२७६.२८०,२८" २८५, २८६,२८,२६,२६०,२६१,२१२ २६३, २६५,२६६,२६६,३०० ३०१.३०२ ३०३, ३०४ ३०५.३०६.३०८, ३०६.३१० । ३१२.३९२,३१३.३१४.४६६. । १६८, १६६.१७०५७६, १८१,१८१,१४, १८. १६६ २०४.२२२,२२४,२२५.२३०, राक संवत की २३१. २४०, २४१.२४२ २४६, २५५,२६, ग्यारहयो शताब्दि २६७, ७१, २०५.२.६,३१६.३५१.३५. ३६८, ३६६.४४५४४६.४४.४५४,४८, ४६०४.३,४७,४८८,४८, ग्रक संबन की बारहमी यतादि १.१. १८७,२२६.२३२.२३३,२३४,२५० २४३.२४१.२५५,२५,२५१.२३." ३१८,३१६, ३२०.३२०, ३२५, ३२५,३२१ ३२०, ३२९, ३९१.४०.४०३४१.४३५ ४३१.४११.४११.४५५.५.....

अवशिष्ट शिलालेखों का समय २४८, २५०,२५२,२६८,३३०,४०६,४१३, शक संवत् की ४१५.४१८,४२१,४३०,४३२,४४२,४४३, तेरहवीं शताब्दि ४६२,४६७.४७७,४८१,४०५॥ शक सवत् की २४७,३५६ ३५७.३.१,३०२, ३.३, ३०४, चौदहवीं शताब्दि) ४५० ४२२ ४२३,४२४,४२५.४२८, ४२६ । शक सवत् की ३२१ ३२२.३५२, ३५३, १४४,३५५.४७२, पन्द्रहवीं शताब्दि ४८३,४८४। ३३४,३३५, ३७०, ३.५ ३०६.३०७,३०१, शक संवत् की J३६२,३६६,४०२,४०३, ४०४,४१२, ४१६) सोलहवीं शताब्दि। ४१६४४२,४४६.४५०,४५१. १५२४५३. । ४६३. ४६४,४६५.४८२, शक संवत की । ३४५, ३४२, ३६७, ३०० ३.१, ३८० ३६१. सत्रहवीं शतान्दि ३६४,३६५,४२०,४४४। शक संवत् की ४१०,४३९,४३६,४४० अठारहवीं शताब्दि प्रवरिष्ट शिलालेखों का समय शक संरत की दसवीं शवान्दि । १४८, १५०, १५१.१६३, १६५,१६६,१४ १७२, १३,१७४.१७७,१७, १०३.२१ २२३. २२८२३६,२५४,२५७.२५८, २५ २६०,२६१.२६२.२६३,२६४.२६५,२७ २७३, २७४,२७७,२७८.२७.२८०,२७६ २८५, २०६.२८,२८९,२६०,२६१,२६२ २६३, २६५,२६६.२६४.३००३०१,३०२ ३०३, ३०४ ३०५.१०६,३०७, ३०६.३१० ( ३११.३१२,३१३.३२४.४६६. शक संवत की ग्यारहवीं शताब्दि ! १६८, १६६. १७०.१७६, १८१,१८१,१४, १८. १६६.२०४,२२२, २२४,२२५, २३०, २३१, २४०, २४१.२४२ २४६, २६५, २६६, २६७, ७१,२०५.२.६,३१६,३५१.३६०, ३६८, ३६६,४४५४४६.४४,४५४,४५६, ४६० ४०३,४७८,४८,४८६, शक संवत की बारहवीं शताब्दि १७६, १८०, २२६,२३२.२३३,२३०,२३८, २४३, २४३, २४५,२४६,२५१,२८३,३११ ३१८,३१६, ३२०,३२३.३२४, ३२५, ३२६, ३२, ३२८, ३६१,४०,४०८,४११,४२६ ४३१, ४६१,४६६.४.१.४.५.४७६,४८ ४६० परिशिखामोसमय २४८४०.४२.२६०,३३०.५०६,५१३. राभरकी ४१५४१८४२१.४३०,४१२.४४२.४७३, संरहवाल ४६२.४६७४७७.४८.४। कसको २४.५६ १५३ २.१.३०२. ३.३, ३०४. दशवादि ४५.४२२४२३.५२४.४२४.४२८,४२६ । शरसंगी :२१ २२२५२५३.३५४४०२, पन्दर प्रतादि । ४.३.४ । 1१४.३३५,३७०, ३.५ ३.६.३०७.३१. राक सेवन की ३५६,३६६,४०२,४०३.४०४, ४१२.४१६ सोसावी शतान्दि। ४१६.४४६४४१ ४४०,४४१.०५२४५३. ६३ ४६४,४६५४-२, राग संबन की ३५५,३४८, ३६७, ३.० ३.१,३८० ३६१ मरद गवादि २६५,३६५४२७,५४४ शकसंवत् की ४१०,४३८, ४३६.४४०। अठारहरीशवान्दि ३२, ३२८, ३६१,४०,४०८,४२१,४२६ ३०४ प्रवशिष्ट शिलालेखों का समय [ २४८, १५०, १५१, २६३, १६५, १६६, १ १७२, २७३,७४,२७७,१८८, १८३२ २२३. २२८,२२६,२४४,२५७,२५८,२३ शक संवत् की २६०, २६१,२६२.२६३.२६४.२६५२ दसवीं शताब्दि २७३, २७४,२७७,२७,२६,२०,२ २८५, २८६.२८,२८९,२६०,२६१,२६ २६३, २६५, २६६.२६६,३०० ३०१.३० ३०३, ३०४ ३०५, १०६,३०८, ३०६.३१० । ३११. ३१२.३१३, ३१४,४६६. १६८, १६६.१७० १७६,१८१,१०२,१८४ १८. १६६.२०४,२२२,२२४,२२५,२३० शक संवत की २३१.२४०,२४१,२४२ २४६,२६५,२६६६ ग्यारहवीं शताब्दि २६७, २७१, २७५.२०६, ३१६,३५१.३६०, ३६८, ३६६,४४५४४६,४४७,४५४,४५६५ । ४६०४०३,४७८,४८,४६, १७६, १७, २२६.२३२.२३३.२३३,२३८. २४३, २४३,२४५, २४६,२५१.२८३.३१॥ शक संवत् की ३१८,३१६, ३२०,३२३.३२४, ३२५,३२६, बारहवीं शताब्दि ४३१, ४६१,४६६,४११.४.५.४.६,४८, ४१०॥

प्रवशिष्ट शिलालेखों का समय २४८२५०, २५२,२६८,३३०,४०६,४१३, शकसंवत् को ४१५,४१८,४२१,४३०,४३२,४४२.४४३, तेरहवीं शताब्दि ४६२,४६७.४७७,४८१,४-५1 शक सवत् की २४७, ३५६ ३५७, ३.१,३७२, ३०३, ३०४, चौदहवीं शवान्दि । ४.० ४२२ ४२३, ४२४,४२५, ४२८, ४२६ । शक संवत् को ३२१ ३२२ ३५२, ३५३. ३५४, ३५५.४.२, पन्द्रहवीं शताब्दि। ४.३.४८४ । ३३४,३३५,३७०,३०५ ३७६.३०७.३०१, शक संवत् की ३९८,३९६,४०२,४०३,४०४,४१२,४१६॥ सोलहवीं शवान्दि। ४१६,४४८, ४०६.४५०,४५१. १५२ ४५३, ४६३ ४६४,४६५ ४८२, सक संवत् की । ३४५, ३४८, ३६७, ३०८, ३.६,३८० ३६१. मचरहवीं शताब्दि ३९४,३६५,४२७,५४४। शक संवत् की ४१.४३८, ४३६,४४०। मठारहवीं शताब्दि ३०४ अवशिष्ट शिलालेखों का समय शक संवत् की दसवीं शताब्दि [ १४८, १५०, २५१, १६३,१६५, १६६,१६७, १७२, १३, २७४, १७७,१७, १८३,२१६, २२३. २२८२३६,२५४,२५७,२५८,२५६, २६०,२६१,२६२.२६३.२६४,२६६, २७२, २७३, २७४,२७७,२७८,२७६.२८०,२८१. २८५, २८६,२८,२८९,२६०,२६१,२६२, २६३, २६५,२६६,२६६,३००३०१.३०२, ३०३, ३०४.३०५.२०६,३००, ३०६.३१०, । ३११.३१२, ३१३,२१४.४६६. । १६८,१६६.१७०,१७६,१८१,१८५,१८४, २८. १६६.२०४,२२२,२२४,२२५,२३०, शक संवत् की २३१.२४०,२४१.२४२.२४६,२६५,२६३, ग्यारहवीं शताब्दि २६७, २७१, २०५.२०६,३१६,३५१, ३६०, ३६८,३६६.४४५.४४६.४४.४५४, ४५६, । ४६० ४.३,४७८,४८,४८, ग्रक संवत की बारहवीं शतान्दि । १७६.१८०, २२६.२३२.२३३,२३४,२३८, २४३,२४३,२४५,२४६,२५१,२८३,३१॥ ३१८,३१६, ३२०.३२३, ३२४, ३२५, ३२६, ३२, ३२८, ३६१,४०,४०८,४१५,४२६. ४३१, ४६१, ४२६.४.१.४.५.४.६४ ४१०॥

अवशिष्ट शिलालेखों का समय ३०५ २४८,२५०.२५२,२६८,३३०,४०६,४१३, शक सवत् की ४१५.४१८,४२१,४३०,४३२,४४२,४४३, तेरहवीं शताब्दि ४६२,४६७ ४७७,४८१,४८५ शक सवत् की २४७,३५६. ३५७.३.१,३७२.३.३, ३७४, चौदहवीं शवान्दिो १२० ४२२ ४२३, ५२४,४२५, ४२८, ४२६ । शक संवत् को J२२१ ३२२ ३५२, ३५३. ३५४, ३५५.४.२, पन्द्रहवीं शताब्दि ४८३,४८४। । ३३४,३३५, ३७०, ३०५ ३०६, ३०७.३८१, शक संवत की ३६८,३६६,४०२,४०३,४०४,४१२,४१६, सोलहवीं शताब्दि: ५१६४७८,४४६.४५०,४५१. १५२ ४५३, ४६३.४६४,४६५४८२, शक सवत् की (३४५, ३५३, ३६७, ३७८,३.१,३८० ३६१, सचरहवीं शताब्दि ३९४,३६५,४२,५४४। शक संवत् की ४१०,४३६ ४३६,४४०॥ अठारहवीं शताब्दि { चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख पार्श्वनाथवस्ति के दक्षिण की मार घट्टान पर १४५ ( ३ ) श्रीदेवर पद। यमनि..... १४६ ( ४ ) मल्लिसन भटारर गुइंचरेग्यं तीर्थमं यन्दिसिदा १४७ ( १० ) श्रीधरन १५८ (४०८) नमोऽस्तु १४६ (४०९) औरत १५० (४१०) सिन्दय्य १५१ (४११)......गिक... कुन्द गगर वण्ट...गद नष्ट १५२ (११) सियाम्पतिः। पापाय......श्रीमाशिध्यानक परिप्रदः ।। १॥ ......विलासस्य निर्माणा......जनि पहायज्ञविशेपस्थ गुणवो प कम्पिता ॥२॥ दो परच गम्य साकरोदपिम् . सान् । वन दिपिइकराना माशो सग्निहिताऽभवत् ॥ ३ ॥ परिसम्म गणं मर्च पातुर्वण्यं विरोपित । माहारादिशरीरंप कटरम-गिराहि॥४॥ मापाप्योरिएनेमीयः गुफा कारण समाया गरि निश्चिाufel:॥५॥ Healer पन्द्रगिरि पर्वत के प्रशिष्ट नम्ब .... ... १५३ (१३) राग टेप-तमा-मान-पगतर[खात्म संयोजकर येगा परम-प्रभाव-रिपियरस्सर्वत-भट्टारकर ...गादेव... ..न ..स्ति . तम्मु... ..अमोल श्री कामिन्न-पुम.........र म्याममा रिदार [सम्परूपी PIEC से विमुक, राम शबेगूसरावासी पाम प्रभावी पिसाभार... शिखर पर...... .....भमलो मे पापादिन .. ..वगरे सप्रमाग का पारगड किरा। १५४ (१४) अरिष्टनेमिदेवर काल्पप्पु-तीयंदोल मुत. कालम पदु म... १५५ (१५) स्वस्ति श्री महावीर...प्रा.दुर तम्मडिगा मन्यसन दिन -तम्मजया निसिधिगे। १५६ (१६)......पाइपमनून......म-प्रव...... १५७ (१८) स्वस्ति श्री मण्टारक चिहापानदा तम्म- दिगल शिष्यर कित्तरे-यग निमिधिगं । १५८ (२१) पतिय-भागदामदुरे उयम् इनिवार...शापदे पातु मुदिन लक्षणवन्दर एन्तु एनल ग.. गई महा परूवदुल अक्षय-कीर्ति तुन्वाद वार्खिय मेन प्रदुनोन्तु भक्तियिम् ३०८ चन्द्रगिरि पर्वत के भवशिष्ट लेख मधि-मण के रम्य-सुरलोक-सुफक्के भागि मा...... पल्लवाचारि-लिकि (खि) वम् । [ दक्षिण भाग की मदुरा (नगरी) से माकर और शाप के कारण सर्प द्वारा सताये जाकर, परीक्षकों के विचार करते ही काते, अक्षयकीर्ति भक्तिपूर्वक इस शिखर पर प्रता करते पार कर, रमाक मुरलोक-सुख के भागी हुए। पल्लवाचारि लिखित] का पाटन हुए दुःख-सागर में १५८ (२२) श्री। बाला मेल सिखि-मेले सर्पद महा-दन्वाप्रदुल सलवाल मालाम्बाल-वपाप्रदिन्तु नडों नूग्ण्टु-संवत्सरं केलीय पिन कट वप्र-शैलमडद एनम्मा कलन्तूरनं याले 'पेगोरवं समाधि-नेरेदानो-रिददार सिद्धियान् ।। [ इस लेख में कारन्तुर के किसी मुनि के कटवन पर एक सौ पाठ वर्ष तक तप के पश्चात् समाधिमरण की सूचना है। १६० (२३) नम स्वस्ति। ...दे शास्त्रविदो येन गुणदेवाख्य-सूरिये कल्याप पव-विख्याते...नम...वमाग... ... द्वादश-तपो नुष्ठा...... सम्यगाराधनं कृत्वा स्वर्गालय...

पन्द्रगिरि पर्वव प्रवशिष्ट लेख [सदी गुपदेव सरिये समस्कार, जिन्होंने स्टवा परंतरे शिखर पर हादरा प्रत धारण करार सम्यगारापना पालन कर मगंगा स्पिा] १६१ (२७) श्री। मासनपरम-प्रभाव-रिपियर कल्यप्पिना बेट्टदुल भो-सजगल पेल्द सिर-समयन्तप्पादे नान्तिम्बिनिन् प्रासादान्तरमान्विचित्र कनक-प्रज्वल्यदिन्मिाकुदान सासिनबर-पूजे-बन्दुये प्रवर स्वर्गाप्रमानेरिदार ।। [इम खेल में परम अपि 'मासेन' के समाधि मरण की सुचना है। १५२ (३६) यो चिकुरापरविय गुरवर सिम्यर सर्वशन्दि प्रवन् श्री यसुदेवन् । १६३ (३७) श्रीमद् गङ्गाय । १६४ (३८) वीरासि। १६५ (३८) ओघावुण्डग्य । १६६ (४०) श्रीकविग्न । १६७ (४१) श्रीमद् अङ्कयोय । १६८ (४२) प्राधिरेपथ्य । १६० (४३) श्रीमद् प्रकला पण्डिवर । १७० (४४) श्री मुरा १७१ (४५)...सम्यकुलान्तक बीरर बण्ड परिकरन कि १७२ (४६) स्वस्ति श्री अण्नन काडेय पण्डिग फत्वप्प दीर्घव पन्दि...

-- चन्द्रगिरि पर्वत के भवशिष्ट लेख १७३ (४७) का...य भिजंग रायन कादगले वन्ति देवर यन्तिसिद। १७४ (४६) श्री दवन्दियलरर गुमासु...बन्दु तीर्य धन्दिसिद। १७५ (५८) अलस कुमारो महामुनि । १७६ (५१) श्री कण्टय्य । १७७ (५२) श्रीवर्म चन्द्रगीवय्य देवर बन्दिसिद १७८ (५३) श्री इमारय । १७६ (५४) प्रो विधिव्यम्म । १८० (५५) श्री नागणन्दि फित्तय्य देवर यन्दिसिदए । १८१ (५६) स्वस्ति समधिगतपञ्चमहासन्द महासामन्त प्रमगपय १८२ (५७) मारमन्द्र केय कोट...गवेय वीर झाट । १८३ (५८) मालव समावर । शान्तीश्यर यस्ति से नैनात की गोर १८४ (६०) श्री परंकरमारुग-यनर-पट मुल घण्टर सुन्न । १८५ (६२) म्वस्ति श्री तेय गुडि......न्दि-भटारर सिध्य गर-मटारर मिध्य क...र...मि-भदार प्रवर सिध्यर परश्या .....सि-भटार कुमा ...अ सिध्य न...मले मुनिने मन्त्रिपमुमम्म निमिचिगे।

चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख पार्श्वनाथ यस्ति में एक टूटे पापाण पर १८६ (६८) श्रीमन् चेहदवी...न मगल वैजये स्पप्पु तीर्यालय नान्तु मन्यमन। १८७ (७१) चन्द्रगुप्त पस्ति में पारर्यनाप स्वामी के सामुण एक छोटी मूर्ति के पादपीठ पर (मगभग शक मे०११००) (समभाग) भीमद्वाजविराटफोटिपटित पादपभयो देवो जैन...रविन्द-दिन हवागदेवतापम । ...पा...सनसमन्विता यतिपति... . रमाकर: साडम निजित ..तामिया भाभानुकोर्तिम्भूति॥ मो-यालयाद्र मुनिपादपपान... जैनागमा युनिपिाईन-प...... ......... दुग्धायुराशि-दर-दर (भाग) मति (पहा कायमेवम......समिनिक मिरिय' शिवम... महिमयि उमा..नि.पागे मान-मुनी "सुर नदिय बार " सुरवन्तिर रमतगिरिय पन्दन ..

३१२ चन्द्रगिरि पर्वत के प्रविष्ट लेख बल्पि पिरिदु वर...र्द्धमानर परमवपाध...रकीर्ति ...मुळं जगोलु ॥ .."च्छिप्यरु॥ तोत्याधीश्वरन [ इस लेख में भानुमति, बालचन्द्रमुनि और वईमान मुने का ग्छन है। अपरा होने के कारण लेख का प्रयोजन हात नी हो सका। [भाग का प्रथम U पम्प रामायण प्रावास , पद १५ से मिलता है। १८८७२) चन्द्रगुप्त यस्ति में पाश्र्वनाथ जिनालय के क्षेत्रपाल के पादपीठ पर (लगभग शक सं० १०६७) ...जनिष्ट.........रित्र...रखिला.. ..रित्र...रखिला......माला-शिलीमुख-वि. राजित-पा...... ॥१॥ त यतिश्चारित्र-बकेश्वर: वर्फ-व्या "दि-शास्त्र-निपु साहित्य-विद्या-नि... मिथ्या-वादि-मदान्ध-सिन्धुर-घटा-सङ्.........वो भव्याम्भोज (यहाँ पापाण टूट गया है)......॥२॥ तच्छिष्या गुण - चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवरिष्ट लेख .. उसी पीठबायें पृष्ठ पर) "जिने शुभकीर्ति-देश-विदुषा विद्वेषि-भाषा-विष- मामा-आहुलिकन जिलिव-मति दी बराकरस्वयं ॥३॥ पन-दोन पौद्ध-विविधर-पवियी बन्दनो यन्दनी प. न्दने मन् नेप्यायिकापतिमिर-तरणियो यन्दनी-पन्दनी व. न्दने सन्-मीमांसकोपत्करि-करिरिपयोपन्दनी पन्दनीष- न्दन पी पी वादि-पोगन्दुलियुदु शुभकीत्तीर-कीर्ति- प्रघापं ॥ ४॥ विवोक्तियत्व पशुपति शानियेनिप्प मूबरुं शुभकर्कात्ति- प्रति-मनिधियोल नामोचित-चरितरे वाईडितर-वादिग- खलवे ॥५॥ सिङ्गद सरमं कंद मजदन्वलुकलाधरे सभयालु पानि शुभकीर्ति-मुनिपनाङ्गल नुद्धियल्के वादिगलो- ण्टेल्देये। पा."स्वुदु वादि वृथायास वियुधापहासमनुमानाप- न्यास निन्नी वासं मन्दपुदे वादि-वादशनाल ।।६।। सत्सर्मिगल । [पाख टूटा हुमा पर इसके सय १८ प्रम्य शिशाखी से पूरे किये जा सकते हैं। इसके यहाँ पप शिलालेख न.१.(.) पच ... और के समान।]

गन्द्रगिरि पर्वत में गिर जेब १८६(७१) कत्तले यस्ति के मन्मुस गट्टान पर। (जगभग शक मं०५४२) ममास्तूरान्व... .......स कले......गद्गुरुः । स्यावा वृपभनन्दीति तपो-सानाधि-पारगः ॥ १ ॥ मन्तेवासी च तस्यासीदुपवास-परी गुरुः । विद्या-सतिल- नित-शेमुषी को जितेन्द्रियः ॥२॥ ...म...त तपो.........वासोंग-प्रभावोऽस्य तु बन्योऽनादिव-कामना निरुपमः ख्याया स...ना...! दृष्टा ज्ञान-विनोचनेन महता स्वायुष्यमेवं पुन: प.........गृह गुरुरसौ यो...स्थित...वशः ॥ ३ ॥ कटदप्प-शैल शिखरे सन्यस्य शास्त्र क्रमात् । ध्यान......दा...मषि-मुख प्रतिप्य कम्न्धन । ......दिव्य-सुखं प्रशस्तक-धिया सम्प्राप्य मद्धेश्वर- ज्ञानं...न्तमिदं किमत्र तपसा सर्व सुखं प्राप्यते ॥ ४॥ १६० (७७) (लगभग शक सं०६२२) सिद्धम् । श्री। गति-चेष्टा-विरह शुभाङ्गदे घनम्मारिट्टमान्विटुवल यतिय पेल्द विधानदिन्दु तारदे कल्वप्पिना शैलदुल पन्द्रगिरि पर्वत के प्रापिए खेस प्रचितारपदे नान्त निस्थित-यशा सायु:-प्रमा...यक रिधति-दहा कमलापम सभमुम् सीकर निश्चितम् ।। {सस में कमी समाधिमा सपना। १६१ (८) सहदेव माणि । १८२ (७६) (लगभग शक स०६७२) सन्दरपम्पदुमतपदागिद.........वादनिन्धमेन्दु पिन यन्दनुरागविन्दु बलगी... महोत्स वदरि शैलमान । सुन्दरि सोरदार्यदरदे...दु विमानमादिनि विचदिम् इन्द्र समानमम मुख.. पडदे उपदिवर्गवा ।। [सौ(मुनि) ने भारत से पत की पन्दना भार भन्त में यहां ही शरीर स्याग किंग। १६३ (८०) (लगभग एक सं०६२२) महादेवन्मुनिपु वनदर्पि कलु पईप महातबन्मरणम वनगा... कमु कपडे... महागिरि म ..गलेसलिसि मया...नविन्ती. महावदान्तु मखमल्बलबदु दिवं पोषक {महादेव मुविधाव में मृत्युका विष्ट माया शप पर्वत पर समय किया और स्वयं-गति प्राप्त की।]

चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख १६४(८१) (जगभग शक सं०१२२) योध्यातिरेच्य कैवल्य-बोध-प्रादि-मदाजसे। ईशानाय नमो योगि-निष्ठायार् परमेष्ठिने ॥१॥ ...रे फितूर-सस्य गगनस्य महसतिः । परिप...पारि..................वाण...... ख्यया... १६५ (८२) बलदेवाचार्य्यर पागमण । १८६ (८३) स्वस्ति श्री पद्मनन्दिमुनिप......मतुल...... ...दनिमा कृषदेवा......... प्रभव...देप.........मा... ... ...क्र. १६७ (८५) श्रीपुप्पणन्दिनिसिधिगे । १८८(८६) ..न तम्म......। १६७ (८७) श्री बाट। २०० (८८) कनादो... .. .. ए-वंशा...कवपिन्दुर्ग...... २०१ (६०)ो धम्म । २०२ (६१) दल्लग पेल्दखनपाल... २०३ (६२) स्वस्ति कोचात्तर सयदि विशोकभटारर निसिधिो। २०४ (२४) श्रीमद् गौड देवर पाद । २०५ (२५)....... साधु-म...र धीरभव-संयवा...मन् इन्द्रनन्दि प्रापार्य... .मे...म्म भामेर...रिदेव चन्द्रागिरि पर्वत के पशिष्ट लेख खान्तरि......भाव्यमवर्पिन्.. ण्ट... . दि मोहमगल्द इवलनविषयङ्गखनात्म-वश-कमरिदु फट............स्थिता- राधिता...विमु .....श्वररि, नन......रेन्द्रनाम्य- विभूति-सास्वतमेरिददान् । [पमी एपनन्दि भाचाने मे विषयादि को जीतकर 2 (पत्र) पर्वत पर समाधि मरण किया २०६ (१६) स्थम्ति श्री कालानर मम्पदा देव...म्पन्ति- यप्रिसि... २०७ (७) नमिनूरा सिरिमहद साजिगपदा राम्री. मती-गन्तियार प्रमालम् नल्लद शीलदि गुणदिना-मिकोत्तममनिरोर । नमगिन्दाल्ति एन्दु परि गिरियासन्यासन योगदाल ममा पिन्टरटुमै मन्त्रमण्मरि " स्वर्गालयं एरिदार ।। [ममिलूर मेघ, भाजिगणी पायी गोमती नि पर्षत परमम्पास धारयम-गति प्राप्त की। २०८(८)ो मस्ति तनगं मृत्यु-चरवानरिद पवाय-यंशवान कालनिकसुदे...पिन राम्य योगविन । पा...क...मादम.........मता विनि. पानम......सुर... गवियुल नेले डोपान। [समेख में पाप किरी मधिरे समाधि-मारका म्हस] ३१८ चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेंस २०६ (१००) परवतिमल । २१० (१०१)...मले-मेल प्रच......महा......बोल... २११ ( १०२ ) .. . जन्नल नविलूर अनेकगुयश * सध......दु.. ..मेनाल्विलक......श्रा...राचाव्यर। ..भिमानमयदे तारदेन्दो राग-सौख्यागति ....ददोन्दु पञ्चपददे दोष निरासं......... । नविलूर संघ के किसी भाचा'ने सन्यास धारण कर प्रापोरसा किया। २१२ (१०३ ) स्वस्ति श्रीमत् नविलूर सहर पुष्पसना. चारि...य निसिधिगे। २१३ ( १०४ ) श्री देगपार्य......निसिधिो। २१४ (१०७) श्री पन्दनुरागदिनेग्दु अन्धेगल कामदरिशील... वन्दनु मार्गदिन विमिरा विविय नविलूर सं...... पेन्दः बुद्धिय हारमनि...तियु...य मावि-सम्प्रेगन ....लिप्पि नल मुरर सौख्यमनिम्मोगोरागुम् । (नविर संघमा.वे मन समाधि माय डिया।] २१५(१०६) श्री मेवनन्दि मुनि वान नाममूम्बर साया ।

चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख .तोयदि सिद्रियान्... . २१६ (११०) श्रीकण्ठय्य । २१७ (१११) श्री स.........ना ..नेगर्ने यगु सेदेखे-वदेसि दल मुगिव......नान्तुम्मेवान...रुपमै ..नि......पौत्र नन्दिमुनिप........ ...माय न.. .........मालो वन इदरुल नान्तु सिद्धिस्थनादम्। [ननियनिने यह माल सिदि मास की ] २१८ (११२) श्री नविनूर, सइदा गुणमवि-प्रोगका निसिधिर्ग। २१८ (१२५) भनक शाम गुपदाप्पिदारिन्तु षिक सुदुम् ननेगेन्दोरु मुनियिन्दल पच्चले नोन्तु ताम् वमर्ग मृत्युवरवानरिदं भो पुर्तिम. .... [भने सीउ-गुण सम पूपियु भागमबाब..] २२० (११) ईपूज्या...समान्सरति परदोरेल-नर सत्पमा ... ३२० चन्द्रगिरि पर्वत के भवशिष्ट लेख श्रीपुरान्वय गन्धवर्मनमित-श्रीसदा पुण्यदो- सन्पोरा...निदे.. रिवलघ...री-शिला-वल... .........मानेरदुप....... [इम लेख में श्रीसंघ, पूरान्वय के पूज्य गन्धवर्मा द्वारा इस शिटा पर कुछ किये जाने का उल्लेख रहा है।] कत्तले पस्ति के पीछे चट्टान पर २२१ (४१२) चन्दग्य। चामुण्डराय बस्ति के द्वार के दक्षिण की शिला पर २२२ (११६) श्रीमत् लक्षण देवर पाद । चामुण्डराय बस्ति के द्वारे के दोनों बाजू २२३ (१२२) श्री चामुण्डराज माडिसिदं चामुण्डराय बस्ति के द्वारे से पायी और शिला पर २२४ (१२३) (नागरी अक्षरों में) सान्तयन्दि देवर पार २२५ (१२४) श्रीमतुचन्द्रकीर्ति देवर तेरिन बस्ति के बायीं ओर एक स्तम्भ पर २२६ (१३५) सस्ति श्रीमत्परमगम्भीरस्यावादामोपचाम्सन। जीयात लोक्यनाथस्य शासनं जिनशासन ।

.... चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवरिष्ट नख ३२१ तेरिन पस्ति के नयरङ्ग में एक टूटे पापाण पर २२७ (१३६ )........"ति कन्वप्पिनधि । कुमारणन्दिभटारर सिपित्तियर सायिव्ये-फन्तियर...... वपिदिगा। (एक पाजू में ) विस्स...'म.."सर्व तेरिन यस्ति के सम्मुख २२८(४२८) "स्वरद यद्र'नणद काल २२८(१७) सेरिन पस्ति के सम्मुख '' उत्तर मुख के ऊपरी भाग पर (शक से०१०३८) भदं भूयाविनंन्द्राय शासनायाप-नाशिन । कुस्तीर-धान्त-समाव प्रभिन-पन भानवे ।। १ ।। सकप सायद प्रन्टमेनस्मताभनयुविरल सुकरमेने हेमलम्बियोल मकसद जेष्ट मुद्ध-गुरु-सेरसियोल ॥२॥ यूच॥ भरपी-पालनप्प पोम्मलन राज-शिगल्तम्भुति- परेनल पाप्सल-दिस गुप-दाम्भारासिमोन्दु म.

३२२ चन्द्रगिरि पर्वत के अवशिष्ट संख न्दर गम्भारद नेमि-से [हि] युमिव श्रोजैन-धर्मके वाय- गरंगल तामेने मन्द पेम्पसदलम्पत्तुि भू-भागदेोल ॥३॥ कन्दा ममल-यशरमल-गुखनीय- रमलिन-जिन-शासन-प्रदीप करने पं. म्पमदिरे पोयसल-सेट्टियु- मर्मय-गुणि नेमि-सैट्टियु सुखदिनिरलु ।। ४ ।। प्रवर जननियरनल्की- भुवनतलं पागले माचिकम्येयुमुघद्- विविध-गुपि शान्तिकव्येयु. मवर्गलु जिन-जननियमीतजदाल ॥ ५॥ उसी 'तेरु' के पश्चिम मुख के ऊपरी भाग पर) जिन गृहमं मना-मुददं माडिसि मन्दरम विनिर्मिसि. नुिपम-भानुकीर्ति-मुनि-से "दिव्य-पदाग्म-गूसरात । मनमोसेदिव्य परम-दासयनाप्पिर वाल्दिपजंग- जन-तवि कोतिसकं मरु-देवियु [मिम] कित सान्तिकम्यु॥६॥ श्री मूलसङ्गोल म. चा-महिमानवनिप्प देसिप-गयालु दामिवंडमखिल-गुवो. रामेयाने नंगारिनु नान्तरमावर.॥

चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख ३२३ जिन-पविगे पृजेयं म- न्मुनि-पविगलुगन-दानमं भक्तियोलि- म्बिने पोम्सल-सेट्टियुमोल- पिन फषियेने नेमि-सेट्टियु माडिसिदर ।। पोसल नरेगा के प्रमिद सेटी पोरमसहि और नेमिसेहिकी माता-माचि चार शान्तिक-ने जिनमन्दिर पार नन्दीवर निर्माण कराकर भानुनि मुनि से दीपा ली। उक्त सेठियों ने भकि- पूर्वजिन-पूजन किया और दान दिये। गन्धवारण बस्ति के समीप एक टूटे पापाण पर २३० (१४४) नमस्सिद्धेभ्यः । शामनं जिनशासन ...भ.चन्द्र गन्धवारण पस्ति की सीढ़ियों के पास २३१ (४२८) श्रीमतु रविपन्द्र देवर पाद दरुयेवाप्रदेवमन्दिर के मार्ग पर २३२ (१४६) नेमगन पाद । २३३ (१४७) श्रीसिवग्गग्य । २३४ (१४८) श्री फलप्यन् । २३५ (१५०) इरुषेवनदेवमन्दिर के द्वार की दक्षिण बाजू पर। ने सेवल्कुन्द गुवु...हिसि पट्टम गुलिय...सिपिले मखे ३२४ चन्द्रगिरि पर्वत के विशिष्ट लेख राज्य......नमदे मन्त्रि नरसिङ्ग...तङ्गलियं विशेषदि ॥ एरेगङ्ग-महामात्य ...रेदं नव-गङ्ग-महिगे सफल-मतथि गुलिपालनातनलियं मेरे नेगल्दं नागवर्मनवनीतनदाल ॥ १ ॥ भावन पुअनधि-वृत-धात्यालितने रामदेव...न ईतने वत्सराजनिलेगीतने वाभगदत्तनागिविख्यातयसं वगुल्द कु...मं तारेदुन्नरे नोन्तुमेतु (शेप भाग टूट गया है) [गजराज्य के मन्त्री नरसिंह के जामाता। ऐरेगा के प्रधान मन्दी।-......नामाता नागवर्म के पुत्र ने-जो रामदेव, वासराव समान जगप्रसिद्धये-~-वैराग्य धारण कर......] उधी द्वार की बायीं बाजू पर २३६ (१५१ ).........पिडिदुल......मारदो...... बंदि...दृगोल माके जेगदि.........विमा...मानिसिप... उसी मन्दिर के सन्मुख चट्टान पर २३७ (१५२) चगमयपचि गाग्गिय नत्य....... २३८ (१५३) (नागरी मारों में) चन्द्रकीर्सि। २३६ (१५४) श्रीमनु रापमस्त देवर जति पनवार पा. मुगमरम्प यन्दिसिर चन्द्रगिरि पर्वत में भवशिष्ट लेख काञ्चिन दोणे के आस-पास २४० ( १५६ )............मुडिपिदरवर गुद्धिसायिके निसिदल पोल्जव्येकान्तियों......गे। २४१ ( १५७) श्रीमतु गण्डविसिद्धान्तदेवर गुह श्रीधर वोज । २४२ (१६०) श्रीमत्परमगम्भीर स्याद्वादामेघलान्छन । जीयान् त्रैलोक्यनाथस्य शामनं जिनशासन ॥१॥ जगन-त्रितयनाथाय नमो जन्मप्रमाधिने नयप्रमाणवागरश्मिध्वस्तध्वान्ताय शान्तये ॥ २!! परमश्रीजिनधर्मनिर्मलयशं भव्यान्जिनीभास्कर गुरुपादाम्बुजवृत्तनुचरितं विनो......म मेरुभू. धरधय गुणरत्नवादि विद्धमत्सम्यकरवाकर परमोत्साहदे रा......... ... ...म्यिशामागदालु ॥ ३॥ मा-पु............माय-गुणगन्ले २४३ (१६१) धनकीर्तिदेवर मानस्तम्भद कम्। २४४ (१६२) मानभ मानन्द सवच्छदारिद्ध पट्टि- सिद दोषयु।

ईतने वत्सराजनिलेगीतने वाभगदत्तनागिविल्याप २३६ (१५४) श्रीमतु राचमल्ल देवर जमिन नगी ३२४ चन्द्रगिरि पर्वत के अविशिष्ट लेस राज्य......नेमदे मन्त्रि नरसिङ्ग...तङ्गलियं विशेषां ॥ एरेगह-महामात्य ...रेदं नव-गण-महिगे सफल-मतथि गुलिपालनातनलियं नेरे नेगल्दं नागवमनवनीतनदाल ॥ १ ॥ भावन पुत्रनधि-वृत-धातृयालिवने रामदेव...न वगुल्द कु...मं तारंदुन्नेरे नान्तुमेतु (शेष भाग टूट गया है) [गभाज्य के मन्त्री नरसिंह के जामाता। ऐरेगा प्रकार मन्या ।-...... मामाता नागवर्म के पुत्र नेमो रामदेव, दर 1 भगवस के समान जगप्रमिद थे-वैराग्य धारण कर......) उसी द्वार की बायीं बाजू पर २३६ (१५१).........पिडिदुलु......मारदो...... ...बंदि...गोत माके जगदि.........विमा...मानिसि.... उसी मन्दिर के सन्मुख चट्टान पर २३७ ( १५२) चगभषयपत्ति गाग्गिय घा २३८ ( १५३) (नागरी प्रधरों में ) चन्द्रकीति । नत्य....... मुस्करस्य पन्दिसिद पन्द्रगिरि पर्वत के भविष्ट लस ३२५ काश्विन दोणे के सास-पास २४० (१५६)............मुरिपिटरवर गुदि सायिचे निसिदल पोल्लम्वशान्तियमा......ग। २४१ (१५७) श्रीमतु गण्डविसिद्धान्तदेवर गुई योधर वोज । २४२ (१६०) श्रीमत्परमगम्भीर स्याद्वादमायलाम्ने । जीयान लाम्यनाथस्य शामनं जिनशासन ॥ १ ॥ जगत-विदयनाथाय नमो जन्मप्रमाधिने। नयप्रमाणवागररिम प्रस्तधान्वाय शान्तयं ॥ २॥ परमश्रीजिनधर्मनिर्मलयशं भन्याजिनीभास्कर गुरुपादाम्बुजवृत्तनुपरित विप्रो......म मेरुभू. घरधय गुणरजवादि विनसत्सम्यकरवाकर परमात्माद रा...........म्यिनाभागदौलु ॥ ३ ॥ भा-पु............माय-गुणगन्ने २४३ (१६१ ) श्रीधनकर्मिदेवर मानस्तम्भद कम्भ । २४४ (१२) मानम मानन्द संवन्द्वदलित काहि सिद दोपयु।

३२४ पन्द्रगिरि पर्वत भरिशियनंग राज्य......नेमदे मन्त्रि नरमिज...तालिसिंगर एरेगङ्ग महामाल ...रदं नव-ग-मदिरो मफल-मय गुलिपासनातननियं नेर नेगल्द नागपर्मनवनीतलाल ॥ १ ॥ माउन पुप्रनधि-गुन-धागृयालितने रामदेव...न ईतने वत्सराजनिलेगीतने ताभगदत्तनागिविलय तगुल्द कु...मं वारदुरे नान्तुमेतु (शंप भाग टूट गया है) [गमाज्य के मन्त्री नरसिंह के जामाता। पेरेगा मन्त्री ।-...... नामाता नागवर्म में पुष न-तो रामदेव, वरसा भगदत्त के समान जगप्रसिद्ध थे-राम्य धाय कर......J उसी द्वार की बायीं याजू पर २३६ (१५१).........पिडिदुनु...... ...दि...दृगचौल प्राके जेगदि.........विमा.. उसी मन्दिर के सन्मुस चट्टान २३७ (१५२ ) चगभचयचक्रवत्ति गो। नत्य......र २३८ ( १५३) (नागरी भक्षरों में) चन्द्र २३८ (१५४ ) श्रीमतु राचमल्ल देवर जा सुबारय्य यन्दिसिद पन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख चन्द्रगिरि की सीढ़ियों के वाई पोर २५२ (१७४)ो नरवर जिनालय करे। २५३ (४६१) श्री रणधीर पन्द्रनाय वस्ति के सास-पास २५४ (४१३) चामुण्डय्य २५५ (४१३) सेट्टपरय २५६ (४१५) सिवमारन वसदि । २५७ (४१) यसह सुपार्श्वनाथ गस्ति के सन्मुख २५८ ( ४१७ ) श्री वैजय्य २५८ (४१८) भोजभव्य २६० (४१८) भी कडुग २६१ (४२०)...... चामुण्डराय बस्ति के दक्षिण की ओर ०१२ (४२१) महामण्ड... ..श्व... .. २६३ (४२२) श्री बाम २६४ (४२३) बसवव्य २६५ (४२४) योमर....... २६६ (४२५) नरणय्य २९७ (४२६)......रसप वम......य निपिधिगं धनमा।

३२६ चन्द्रगिरि पर्वत के अवशिष्ट लेख २४५ (१६३.) वम्मय्यङ्गे परोक्षविनयनिशिधि श्रीध- रङ्गे परोक्ष-विनय तम्मवेगे परोक्ष- विनयनिशिदि। २४६ (१६४ ).........दलि क.........गो...... ग्गलं गङ्ग...निसिदिगेय निरिसिदन ॥ .इ......गमदे......गलिय... सगि.. भद्रबाहु गुफा के प्रानय कान पर २४७ (१६८) श्रीमतु लक्ष्मीसेन भट्टारकदेवर शिष्यरु मल्लिसेन-देवर निसिधि । चन्द्रगिरि की चोटी पर चरण-चिह्न के नीचे २४८ (१६६)ो भद्रबाहुभलिस्वामिय पाद । चन्द्रगिरि के मार्ग पर चरण-चिह्न के नीचे २४६ (१७१ ) [ तामिल भक्षरों में] कोदइ-शङ्करनु मलयशारगलिङ्ग. कल्लनिक्कु मेर्कु निन पुलिक्कु निरे । तोरनगम्य के यायव्य में जिन मूर्ति के पास २५० (१७२) साम...... .देवरु...... चामुण्डराय शिला पर मूर्तियों के नीचे २५१ ( १७३) श्रीफनकनन्दि देवरु पसि देवरु मलि. देवरु।

चन्द्रागिरि पर्वत के प्रषिष्ट लेख चन्द्रगिरि की सीढ़ियों के बाई पोर ५२ (१७४)ो नरवर जिनालय केरे। २५३ (४६१) श्री रणधीर चन्द्रनाय बस्ति के आस-पास २५४ (४१३) ......चामुण्डव्य २५५ (४१३) सेपथ्य २५८ (४१५) सिस्मारन यसदि। २५७ (४१६) बसह मुपार्श्वनाथ बस्ति के सन्मुख २५८ ( ४१७ ) प्रो वैजय्य २५६ (४१८) श्रीजमग्य २६० (४१८) श्री कदुग २६१ ( ४२० ).........पनमा । चामुण्डराय घस्ति के दक्षिण की ओर २२(४२१) महामण्ड... ..श्व... २६३ (४२२) श्री याम २६४ (४२३) सवय्य २६५ (४२४) श्रोमर...... २६६ (४२५) नरपव्य २१७ (४२६).....,रसप बम......य निपिधिगं ३२८ चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख इस्पेब्रह्मदेव मन्दिर के सन्मुख २६८ (४३१) योजनु २६८ (४३२ ) मेलपय्य २७० (४३३) श्री पृथुव २७१ ( ४३४ ) चन्द्रादित ( परचित) २७२ (४३५ ) नागवर्म परदे २७३ (४३६ )...निगरजेयण शवत्रगण्ड २७४ (४३७ ) पुलियन २७५ (४३८) सौजन्य २७६ ( ४३६) केमवय्य २७७ (४४०) नमोऽस्तु २७८ (४४१ ) श्री ऐचव्यं विरोधिनिष्ठुरं २७६ (४४२) यास एरबुक यस्ति के पूर्व में २८०(४२७ ) फगत्तर शान्तीश्वर यस्ति के पीछे २८१ (४३० श्रीमत् कम्मरपन्द प्राचिरंग काञ्चिनदोणे के पास २८२ (४४३ ) मुह का फरम्य तरिसि......... परकोटे के पूर्वी द्वार के पास २९३ (४४४) जिनन वायो लविदाणे की पथिमी शितापर २८४ ( ५४५ )ोजिन मामांनोनिममममपंपूड़ामयि।

पद्रगिरि पर्थव प्रशिप (४४६ )ी पिम्प २८ (४४.) श्रीमद् भक २८. (४४०) श्री परशरन भरल्य B८८(४४)ी फस्नि २८८ (४५.)ी मपस्य २१० (४५१)ोचनपोग २८१ (४५२) श्री नागहि मादन दो २२ (४५३) श्री यामननन दण्डे २९३ (४५४)मो राजन ५ २२४ (४५५) मारण्ट २५ (४५६ ) श्री नागवाम २०(४५७) श्री यमराज पानादित्य २९७ (४५८) श्रीमन मनं गाला सरिनंमि पतिर पर-समय-ध्यमका २८८ (४५८) श्री यावर घण्ट २८८(४६.) श्री नागम्य ३०० (४६१) घी देवय ३०१ (४६२) श्री सिन्दव्य २०२ (४६३) मी गोषणग्या यिन-पतु मुफ ३०३ (४६४) श्री...गिवर्म पावसि मला...वि माई ३०४ (४६५) श्री मलधारिदेवख्यन५ मा नयनन्दिविमुकर गुई मधुवय्यवर' बन्दिसिद।।

- ३३० चन्द्रगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख विधु-विधुधर-हास-पयो- म्युधि-फेन-वियश्चरावलोपम-यशन- भ्यधिकतर भक्तियिन्द मधुवं बन्दिल्लि देवर बन्दिसिद ।। {मलधारिदेव के पिता नयनन्दि के शिष्य मधुवय्य ने देववन्दना की। ३०५ ( ४६६ ) कनवरसिय तम्म चावय्यतुं दम्मडव्यतुं नागवर्मनुं बन्दिछि देवर वन्दिसिदर । ३०६ (४६७ ) श्री सन्द बेल्गालदले निन्दु...डने बिटु अन्दमारथ्य मनदल अग्गल देवरेम्बर काण्व बगेयिन्द ।श्रो पेगेंडे रेतय्यन वेदे सङ्कच्या ३०७ (४६८) श्रीमत् एरेयप गामुण्डनु महल्यनु पन्दिखि व्रतकोण्डर ३०८ (४६८) ओ पुलिफजय्य ३०६ (४७०) श्री काश्चय्य. ३१० (४७१) श्रीमन एनगं कियद देव बसद ३११ (४७२ ) श्री मारसिङ्गस्य ३१२ (१७३) फत्तव्य ३१३ (४७४) पुलिचोरट्य महामजदोज...मणि-विवान- दोज तेज ३१४ (४७५) श्री कापण दीर्घद::. २१५ (४८२) सासिर गद्या विम्यगिरि पर्वत के प्रशिष्ट लेख विन्ध्यगिरि पर्वत के अवशिष्ट लेख ३१६ (१८१) गोम्मटेश्वर के वाय चरण के समीप श्रो-बिटि-देवन पुत्र प्रताप-नारसिंह-देवन कय्यालु महा-प्रधान हिरिय-भण्डारि हुल्लमथ्य गोमट-देवर पा...... ......वरवरू.........दानक्कं सवणेर विडिसि फोटर् । [महामन्त्री हुलमय्य ने विटिव के पुत्र नारसिंहदेव से (गाव) प्राप्त कर गोम्मटदेव पार दान के इंतु मर्पण किये।] ३१७ (१८७) श्रीमूलसह देशियगण पुस्तकगच्छ काण्डकुन्दान्वय नयकीर्तिसिदान्त- चक्रवत्ति गल गुहबसविसेटि माडिसिदं।। ३१८ (१८८) श्रीमूलसङ्घ देशियगण पुस्तकगच्छ कोण्डकुन्दान्वय नयकीर्ति सिवान्त- चक्रवर्षिगल गुडघसविसटि मालिसिदं। ३१६ (१८८) श्रीमूलसह देशियगण पुस्तकगच्छ काकुन्दान्वयद ओनयकीर्ति सिद्धान्तपमागिल गुड पल्ले य[६] पडना [4] कं मादिसिदं॥ ३२० (१०) भीमूसह देण्यगण पुस्तकगच्छ कोण्डकुन्दाबयर श्री-नयकीर्ति

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विम्यगिरि पर्वतकं प्रवशिष्ट लुम्म ३२६ (१६) श्रीनयफोर्ति सिद्धान्त परचि गल्ल गुड पदियमसहि मादिसिद सुमति महार॥ ३२७ ( १८७) नो मूलमह देशियगय पुस्तकगरछ काण्डकुन्दान्वय नयकीर्ति सिद्धान्त- परतिगर गुरु यसविसैट्टि पतुर्वि. शतितावकर मारिसिद। ३२८ (१) श्रीनयफीति सिद्धान्त पक्रवत्तिगल शिष्यरु श्रीवालचन्द्र देवर गुहकारलय महदेव संहि मालिभट्टारकरं माडिसिद॥ ३२८ (१६) शक वर्ष १२०२ नेय प्रमाधि सवत्सरद कार्तिक शुद्ध १० सोमवारदन्दु श्रीमनु- महा-पमायद तिरुमप्प......धिकारि सम्भुदेवण्न-नवर.. लु मखण्ननवरू- श्रीगोम्मट ... ...मगल महा श्री श्री। ३३० (२००) सर्वधारि-सवचरद वृदवार दन्दु श्रीगोमट-देवर नित्या- भिषकक्के विटयन दलिय मेसिन सोयि संदिप मग मादिसटि कोह...पाय १पय २ हालु मान॥ चैत्र-सुद्ध-पाध्य ३३२ विभ्यगिरि पर्वत के प्रशिष्ट नेस सिमान्तवाति गज गुह बच्चय दण्डनायकं माडिसिदं। ३२१ ( १८१ ) दुर्मुसि संबस्मरद पुप्यमासद शुद्ध बिदिर्ग मङ्गलवार कोपणपुरद... ..य-सेहि गुम्मटट्टि दनद.........वादक...... ३२२ ( १८२) प्रोसवत् १५४६ वर्ष जेष्ट सुदि ३ रवि [ नागरी लिपि में ] वामरि गोम्मट स्वामी की जात्रा किया गोमट बहुपाले प्रजासवाले कदिकवंस चमचारी पुरस्थाने पुरी प्रात्रुपुत्रसम... ३२३ (१९३) श्रीनयकीर्ति सिद्धान्तचक्रवर्ति गल- शिष्यरु श्रीबालचन्द्र देवर गुह असेिट्टि अभिनन्दन देवरंमाडिसिदं ।। ३२४ (१६४) श्रीमूलसङ्घ देसियगण पुखकगच्छ काण्डकुन्दान्धयद सिद्धान्तचक्रवर्तिगलगुड़ कम्मटदरामि- सेट्टि माडिसिद ॥ ३२५ ( १८५) श्री नयकीर्ति सिद्धान्त पक्रनिंगल शिष्यरु श्रीबालचन्द्र देवर गुड सुद भानुदेव द्वेग्गडे माडिसिद अजित. भट्टारकरु॥ प्रो-नयकीर्ति विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख ३२६ (१९६) श्रीनयकीर्ति सिद्धान्तचक्रवत्ति गल गुह यदियमसेहि मादिसिद सुमति भट्टारकर। ३२७ (१८७) श्री मूलमन देशियगण पुस्तकगच्छ कोण्डकुन्दान्वय नयकीर्ति सिद्धान्त- घकात्ति गन्न र यसविपट्टि चतुर्वि- गतिवायकर माडिसिद।। २२८ (१८) श्रीनयकोत्ति सिद्धान्त चकवत्तिगत शिप्यरु बाचालचन्द्र देवर गुहकालय महदेव सेहि मल्लिमहारफरं मारिसिद।। ३२६ (१८८) शफ वर्ष १२०२ नेय प्रमाधि सवत्सरद कार्तिक शुद्ध १० सोमवारदन्दु भोमनु- महा-पमायव तिरमप्प......धिकारि सम्भुदेवण्न-नवर.. मनन- श्रीगोम्मट ....... महल महा बो भी॥ ३३० (२००) सर्वारि-सवपक्ष घेव-मुर-पाध्य Pा दन्दु श्रीगोमटर नित्या. भिकपके बियन दलिय मेसिन सोपि संटिय मग मादिसटि कोह...पाय १५२६ मान विभ्यगिरि पर्वत के पशिष्ट लेख ३३१ (२०१ ) संवत् १६३५...पिमतौर-स। फ [नागरी लिपि में ] सुदोय सेनयोरमवजी श्री-जगवडरवो पदामहोदराजो प्ररसटोरव....... मघोपदे श्री रायरममी। २२ ( २०२) संवत १५४८ पराभव से.जे. मुर। [ नागरी लिपि में ] मूतमा अगुपजे श्री-जगद् त...TEST ......लं तदमन मेशराज गवराम ३३३ (२०३) संयत् १५४८ वी पत्र परि १४१ ( नागरी विपि 1 ने मदारक श्री अभयपन्द्रकस्य शिष्य अबधार्ममनि मगुणभागर॥ कोका यात्रामफज। २३५ (२०४) गेरसापेर सपनायर मात माधारगिनु २३१ (२०५) प्रामापी र [] [ indiaपि में मी म 4r (2rJ [३१ से ३५. नागwvtit] १५६ (२०१)ी ममग्राम नगाभावmat गयत 1000 मारी। {Hai 40minue girl विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट खेस ३३५ '३३७ (२०७) श्री गलसा म नमः सामो कपूरचन्द मेवीचन्द शतीदी रा सावत १८०० मगशरा वदी १३ गराऊ। [ श्रीगणेशाय नमः। पाव कपूरचन्द मोतीचन्द रातीदी रा सन् १८०. मगर पदि १३ गुरी] ३३८(२०८) सवत १८४२ मह सद ५ अवदस नगरवल दलवल पनपचय व सट भग- वनदस जतरक प्रय। [संवत् १८४२ मा मुदी १ अतदास अगरवाला विडीवाला पनपधिया वो सेठ भगवानदास जाया का प्राये] ३३६ (२०) सवत १८०० पाम बर १४ मगराय बाकीसनजी तेसुबको पण्डेजवाल युधलाल गगरामज करणो भोग...... ३४० (२१०) सपत १८०० मत प्रसङ सद १० सन- चरवर सुवप रयज बजकसनजराज- दवज चनरय 4 दनदयन प्रषट सज- दवज इक जवर इसघन पठकमगरवल सरवंग पनपघक गयगत प्रयघ [संवत् 1500 मिती थापा मुदि। गनीचावार सन्तापरायी मलसिनजी भजीतजी राय दीनदयाल वटा जीवजी एक जातरा स्थान पेठा भगरवारा सरावगी पानीपत का गोबर गांधी भाये थे] २२ ३३६ विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख ३४१ ( २११) सवत १८०० पस वद ६ मर्गलबर वनवरलन्तु दनदयल कयट। ३४२ ( २१२) सवत १८१२ यसह सद ११ वर मगल बलरम रमकसन फ बट म[गख ] ल सर [वग क] स रय ग[कल ] गढय वसह...................... [संवत् १८१२ वैसाख मुदि "वार नाल बलीराम रामकिसन का येटा अगरवाला केसोराय गोकलगढिया वैसारख......] ३४३ ( २१३) सवत १८४३ मत मह वद ३ लप [म] ए-रयक बट तइर मल्ल नरठनवल नत- मल गनरम धन.................. दज परप......नरक सहनवत [संवत् 15 मिती माह दि ३ लक्ष्मणराय का बेटा तोदामन नाउनवाला)[मत ][ मल गनीराम धन......... ३४४ (२१४) सपत १८१२ मत वसह वद ८ वर सन सठ रजरम रमकरसन मगत रया पट गयल गव...र......सरपल सभनय बट नय......कपट। ३४५ ( २१५)............सद मगज वर नय...... नरयनज वड... ..त्यय...... जहदय रमदनमा कसक..... यमय .

विभ्यगिरि पर्वत के भवशिष्ट संख कमद जैनदरयज......वन... .....ग .....रजम ... ३४६ (२१६) फमवराय का घंटा सवत १८१२ बमष मद११घरमगल-बरसमा मलकपट मज- रमागगनय मनगरपनपघय प्रगरब ३४७ (२१७) समत १८०० जर सद३ करपधक मट इमापन धनय यमद............... ...लसराय.. स्यज हमरमज लमन हलसरथ बनकदम सरवग लगावण पनपथ गरगगलपनय सननय । २४८(२१८) उदमग यगवल रतत.. रजए... पक्ष। २४६ (२१६)सपत १८१२ पमह मरनमारण सकरदसकपट भयप। १४० (२९०) सवत १८१२ मत बम सदसना. कनसउपरयः मगनरमकपरजा... नकपसरवग गट-दियपाल मण्डप फी पस के मध्य भाग में गोलाकार (a) परममादित्यापिके गांका विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख ३४१ ( २११) सवत १८०० पस वद ६ मगजवर वनवरलल दनइयल क बट । ३४२ ( २१२) सवत १८१२ वसह सद ११ वर मगल बलरम रमकसन क बट प्र[गरव] ल सर [वग फ] स रय ग [कल गढय वसह......इ................ [संवत् १८१२ वैसाख मुदि । यार माल बलीराम रामकिसन का बेटा अगरवाला केसोराय गोकलगढिया वैसाख......] ३४३ ( २१३ ) सवत १८४३ मत मह वद ३ लप [म] प-रयक घट तइर मल नरठनवल नव- मल गनरम धन.................. दज परप......नरक सहनवल [ सवत् १५३ मिती माह दि ३ लक्ष्मणराय का येटा तोदामन नरठनवाला (१)[ नत ][मल गनीराम धन... न............) ३४४ ( २१४ ) सवत १८१२ मत वसह वद ८ वर सन मठ रजरम रमकरसन भगव स्यक घट गयल गव...र......सरपल सभनय बट नय......कपट। ३४५ ( २१५)............सद मगन र नय...... नरयनज वड............रचय...... जहवय रमदनमल कसद.......... कमान किनभ्यागिरि पर्वत के प्रवशिष्ट संस कमद जैनदरयज......वन........ग ......रलम .. ३४१ (२१) कमवराय का येटा सवत १८१२ वसप सद ११ वरमगज़न्वरसमर-मक्षक षटमज. रमगगनय मडनगर पनपचय प्रगरवल। ३४७ (२१७) समत १८०० जट मद ३ करवधक सट इमापन धनय यमद................ र..लमराय...रयज इमरमज लसनय हलसरय बज्ञकदस सरग सगरवल पनपध गरगगद वनय सननय । ३४८ (२१८) उदसग वगवल रतन... रजप... ३४८ (२१८) सवत १८१२ वसद मद८ नवलरय सुकरदसक घटप्रयघ। ३५० (२२०) सवत १८१२ मत वसष सद ८ सनच. रकदन सवपरयःमगनरमक घट जाफर- नक पसरवग ३५१ (२२१) अष्ट-दिक्पाल मण्डप की छत के मध्य भाग में गोलाकार (उत्तर) प्ररस-मादित्यङ्गवाचाम्बिके गवालविनि - ३३६ विन्ध्यगिरि पर्वत के ३४१ (२११) सवत १८०८ वनवरलल दन ३४२ (२१२) सवत १८१२ बलरम रमक ल सर [वग गढय वसह... [सवत् ११२ वैसाख मुदि वार : का बेटा अगरवाला केसोराय गोकलगढिया वैत्र ३४३ (२१३) सवत १८४३ मत । -रयकबद तइरम मल गनरम धन.... दज परप......नरकर, [संवत् १८४३ मिती माह वदि ३ लक्ष्मणराय नरठमवाला (१)[नत ][मल गनीराम धन... ३४४ (२१४) सयत १८१२ मत वसई सठ रजएम रमकरसन म. गयल गत..........सरपल नय......क बढ़। ३४५ (२१५)............मद मगल वर , नरयनज वहड.... रथप जहतय रमदनमल कसद..........

विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट संस ३५३ (२२८).. .क-संवत्मर प्राययमु ५ .. ... सि......पान. मा-मामधिना कियना. य...मामकमलु म.. का...बारम्भ-नीमरम्म-स-मुबा. दाय-पकल- दमादाय भा.गर मा-माम . ..११....बरहनु। [सय में मगर माजी बामनी futanA हामारले .. .. ३५४ ( २३०) फ...... फाल अनु. की ... यसमिंग कर ...मा-माम...नु नी भा-यामचिननगे मतुबपकिनु YIRENT WITH सावियाग भनुमतिसि बी १.यपापन......बी-मरर वस्थापन माग-गरम ....... सा... .............या म नगर ... ......

३३८ विन्ध्यगिरि पर्वत के अवशिष्ट लेख पुट्टिदर पम्पराज हरिदेवं मन्त्रि-यूधाप्रति गुणि बल. (पूर्व ) देवण्णनेन्दिन्तिवम्वरुमुर्ती-ख्याव-कनाटिक कुल-तिलक चि-राजङ्ग मान्दिररात्यु च्चण्ड-शक्तर- (दक्षिण) जिनपति-पद-भक्तर्महाधारयुक्तर ।। सफल-सचिव-नायः माधिवाराति-युधः । परिहत-पर-दारो (पश्चिम).........भारती-कण्ठ-हारः । विदित-विशद-कोतिर्विश्रुतादार-मूर्ति म्स जयतु बलदेवः श्री जिनेन्द्रालि, सेवः ।। [अरसादित्य (व नृप आदित्य) और भाचाम्बिके को मुख याले तीन पुत्र स्पच हुए-पम्पयन. हरिदेव और मन्त्रि-समूह में भनगण्य, गुणी यलदेव । ये साफ-प्रसिद्ध कपाटक कुल के तिउम माचिरान के पितृभ्य, शत्रुओं के लिए प्रचण्ड-शक्ति, जिन-पर-भा महा साहसी थे। समस्त मन्त्रियों के नाय, शयों को यश करनेवाले, पालो-स्यागी, सरस्वती देवी के कण्टहार, विराद कीर्ति, प्रमिरी शर-मूर्ति जिनेन्द-पद-सेवी बलदेव उपवान् हो। ३५२ ( २२२ ) कालायुक्त संवत्मरद माप व १२ गुम्मि सेहि मग... ...सहि दर्शनर प्रादनु ॥ कालायुक्त संवत्मरममाघय १२...पुण्य मग पिकपमनु दर्शनव मादक ।।

विन्भ्यगिरि पर्वत के प्रशिष्ट नेत्र ५३ (२२८).. .क-संवत्सर श्रावय स ५... सि......पान... . मा-मामदधि ना.. कियना...य...प्रामफे मलु . दलु... .. कदु...डारम्भ-नीरारम्भ-सकल-सुवा- दायन्सकल-स्वमादाय प्रा......गह मा-ग्राम .. ..ग११... ..वरगनु । [ इस देश में मय नगद धार भनाज की भामदनी रिसी प्राम न का स्लेख सा] .... ३५४ ( २३०) फ... ...फाल.........भनुभ... को .....य सीमेगे पेश.द......काय ..पूनि . ...मा-मामधे...पनु नीचे संत्तुकोण्ड... मा-मामालिन नमगे मनुव पतिगयनु पारपारम्पर प्रा-पन्द्रा स्थायियानि अनुभविसिको रुप यी .........कय-साधन......यो-मर्यादि -मयसाधन या ...... नाग-गयुग्म......... स्थानीक...... ......माधिगजुन......अलिय...या मल्ने देवरु नम्जंगयुर हिन्दछ...... ....

३४० विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख कोत्तनगवुड बसट्टर गबुड......इलिय तिवन मुयि मर्या........ [ यह किसी प्रामा यैनामा साशात होता है। ३५५ ( २३१ ) पण्डित देवरु मादित्तु माहाभिषेकदोलगे हाल-मसरोगे २ पुजारिगे १ भागि के. सिगलिगे कलुकुटिगरिंगे भागि २ भण्डि- कारङ्गश्वप्पिदवर कै सास्ति पर हरियायो [बेन का भावार्थ कुप संदिग्ध है। शायद इसमें महाभिषेक के लिए व पुजारियो, कारीगरो और मजदूरों को पण्डित देव के वान का उरलेस है। ३५६ ( २३२ ) श्रीमतु ध्यय संवत्सरद माग सुर १३ नेय प्रयोदसियल करिय-फान्वयसेट्टिया मा करिय-विक्षमण सेट्टियर सम्म करियगुम्मट मट्टियरु यिडितियिन्य सङ्गप फुरिमाणु बेलगुलदल गुम्मटनायन पारद मुन्दे रखा यद नाम्पिय उद्यापनेय मादि सहारपूजेय माडि कीर्तिपुण्यवनु पार्जिसिकोणी। [निधि कोरिय कान्तय महिपुर व करिय विमण मी भाता गुम्मटार ने एक संघ सहित बेलुगर की बन्दना को गोम्मटनापना कीनियर पुण्य का पान पिा।] ३५० ( २५३ ) मोमतु करिय योग्मणगे गुम्मटनाग ने गति के।

विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख ३१८ (२३८)संवत १८०० कत सद६ सवत १८०० (नागरी लिपि में) पह-स २ पत दव पनपय दनचद परपस कप। ३५६ (२४८) सर १८०० मत १६ सद६ मगलवर (मागरी लिपि में) कटाव गरधर लल वजमल कबट व मगतरय कदस्यक बट वसमत गमद ममजत कर। ३१० (२५१ ) ( यह लेख, शिलालेस न०६० (२४०) के प्रथम १५ पद्यों को हपहू कापी मात्र है) ३६१ ( २५२ ) स्वस्ति श्रीमतु वड्व्यवहारि मोसलेय... वि-सैट्टियरु ठावु मारिसिद पवीसतीर्घ- कर पाटविधार्चनंगे वरिपनिषन्धियागि मायियनकर......पस-नकरनाल कोट्ट पडिप...गं हाग।...व-सेष्टि बाचिसेहि चिक याचिसैट्टि प२ सम्मेजय केटि सट्टि चन्दिसहि गुम्मिट्टि चिकतम्म, पर शादिसति चोदिसहि वापिसद्धि मयिविसेटि जमयमैदुन पोरिसद्धि बाचि सैट्टि मारिहि वम्मिहि ५२ माधि सेट्टिनम्थिमेट्टि मसपिसहि केदि- संहिप २ केविसंहि रेविसेहि हरियम- सेहिकोम्मिहिनादिमोह शिक-केति ३४२ विन्ध्यगिरि पर्वत के भवशिष्ट लेख सेहिप २ पट्टण स्वामि चन्देसेट्टि सोम- सेट्टि फेलिसेट्टि ५२ सोडलिसे सेट्टि वाकवेचट्टि.........केमि सेट्टि प १... .द......चि...हेगाडिति पट्टण- स्वामि मलिसेट्टि कामवे १२ बम्मेय नायक दोपवे नायिकित्ति चिफ पट्टण स्वामि प २ यातुयलिसेट्टि पारिपट्टि बमविसेट्टि वरत बातुबलि प २ सङ्कः सेट्टि एचिसहि चौडिसेट्टि पारिसेहि सपिट्टि प २ नागिसैट्टि करियशान्ति- सेट्टि वरणसेहि घोप्पसेट्टि ५२ मेलि. सेहि महदेव सैट्टि हारुबसेहि ५१ काविसट्टिय पारिपसेट्टि दिसत प १ हिंयस्यसेट्टि जफिसेहि प १ तिप्पसेट्टिय वमयिसेटि चिक तिप्पि. सेहि प १... . ...य पदुगनसामि- सट्टि यमच्चि पदुम प १ देसिसहि कलिसहि फेतिसहि यस्मिसेहि प १... यदप राषमसंहि यह पण स्वामि जसरमा होमस सेट्टि यीमहि पण मामि मनियहि पाकिसहिदासिपेट्टि प३ नेमिट्टियद प २ नाविसहि दे.

विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेस ३४३ सट्टि चट्टिसहि कातवेसेट्टिवि ५२ पट्टयस्वामि घोप्पिसेट्टि घोकिसेट्टि सम्म घोप्पिसेट्टि बसविसेहि शाहुयलिसेटि जमवे सत्तियक प २ मङ्गरिक कालि. सेट्टि सोमिसेहि चन्दिसेट्टि देविसेष्टि चिमकालिसेट्टि पर सोविसैट्टि चङ्गिसेट्टि यम्मिसेटि ५१ होनिटि पारिप सेहि कुपवे प २ माचिसहि चट्टिसहि गङ्गि- सटि कान्तिसहि मारिसैट्टि प २ मङ्गि- सट्टि पर्द्धमानसाट्ट पारिपट्टि प २ फापिसट्टि देविसैट्टि वम्मसेहि ५१ गुम्मिसेटि माकिसहि गोम्मटसेहि माचिसेहि प १ ममणिसहि लकुमि- सट्टि प १ याचिगेय यम्मवेय केदि- सहिप १दनट्टिय म... वसहि देमि- सहि चामवे प२ याचिकवेय चम्मि. सेट्टि पारिपट्टि चिक पारिपट्टि लि. सेट्टिसोमटिगोम्मट सेटि केविसंहिपर सहदेवसेट्रिप पेटिसहिरामिसेट्टि घटि- संहिप २ पदुमसहि होनसट्टि गोम्मट. सेष्टि लकुमिसेट्टि पोषम्म नाकिसेहि महदेवसहिप २ नागर-नविलय केति.

जगिरि १४ापित ग संगिय मा याम्मो गुमरे पर मई ममापिसी मसint वासनायक रामप41. वासु २ सेवामा जापिम पम र पामिया मिना ॥२ मारमा महिमा मासमा तमणि पासप १......... . ....मग eratunu... MITHIERSITY माना नाग rintain गानुर Kall in nान न काम पाnti +-- mutantan" ... 4RituRisit ...m at Animat . बिन्यगिरि पर्वत के अवशिष्ट प्रेम ३४५ भोमतु पारुकीर्ति पति देवरु-गलु प्रधर शिष्या अभिनव-पण्डिव-देवरूगल पंगुलद नार गयुगल माविम्य नस- रदलरुपण्डितु स्थानिकर वैधरु..... ... पाखभा। इसमें रेलगुल के पाएकीति पण्डितदेव अभिनव पण्डित देवका रम] ३६३ (२६०) सके १६५५ माधीज यदि ७...खेरा. मागरी लिपि में मामा पुत्र......मसोमा........ मो सक.... ...पानापासा.. ...गया सफल भो। ३६४ ( २६१) सके १६५३ पावोज-वद ७ खेरामासा ( नागरी विपि में पुत्र हीरासादा पोतुपसा जा सफल। ३६५ ( २६२) सके १६६३ माघोज यद ७ सेरामासा (मागरी लिपि में) पुत्र धरमासाबा पात्र जागा......... जात्रामफ॥ ३६६ (२६३) सफे १६५३ पाम वदि १२ एकवारे (भागरी शिक्षि) भण्डवेश कीचि सहित उपरवल जाती होरासाइ सुख हाससा सुत पागंवा सोनाबाई राजाई गोमाई रापाई ममाई सहित जात्रा सफरी कारज कर।

पीड पर) विन्भ्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख ३६७ (२६४) वेय नाम संवत्सरद फार्सिक सुख प्रष्टमी (प्रसादवागिन के यि गुरुवार ।। परानो में) ३६८ (२६५ ) स्वस्ति श्री मूळ मा देखियमय (रे पास भुज पुस्वागच्छ भोगण्डविमुक्त सैरान्तरेगा गुड भरतेश्वर दण्डनायक मारिसि। ३६८ (२६६) [जेसन.केही समान] (सरे के पास भरते. थाके पारपी3 पर) ३७० (२७०) श्रीमतु प्रामैन मुरसल बेगर गामेष नरसप्पसहियर मग घेयपतु स्वामि-दा- मना मालिक निलिसिन॥ [निधि गागामेव नासपति पण ने स्वामी दर्शन मित्र पहनाया पर सपा पप्पा मारा। २७१ ( २.१) माममेन वर गुरु गोप्य रेषम ३०२ ( २०२ ) . भुयनकीर्तिर शिष्य......ानि. निगिधा (61)यनासिबा ................... २४ (२१) मिहनन्दि भागा। (२) पूनापाई. .....जगापा मारा 14th) Nat कहिय प्रपति ।

३४. विभ्यगिरि पर्वपशिट नंग ३७६ (२५) पूननाई पुत्र पण्डि...१.. (मारी धिपि में) ३७७ (२८०) श्राम माग्ने बस । प भारीय नामर-मटर मा जिममनु पनुगुपय पारुकीर्ति भार श्रीपादव लिमि- [Antim Rarand fair में..] ३८(२८) पीतामनारामार ३७६ (८) म १९४२ सापपरी पुगामा धर्मामा मायामानांकामा (कनाडी लिपि मे) माविका १८०(२८५) १९४२. कपदी १३ मरिनोरा आधार २८१ (२८) काम ॥ २८२ (२८७) शक १७पावि-नाम सहार मा ५८ पो RETATE. मा पाक्ष जताय गाया सरदी सार्थ आनinst औपचम भासामा कक्षा मय सीमा महा सहस पाjitten सम्म Last सरा प ER नाम की 1- 41 ३४८ विन्ध्यगिरि पर्वत के प्रवशिष्ट लेख द्वौ विट्ठमार्या कमलाजा पुत्र एशोजा पदाजी सडवो द्वितीय पुत्र गेसाजीति सम्प्रणमवि हीरासाधरमासामाडगडी। ३८३ (२८८) साके १५७४ चैत्र सुधी ५ पाल्पा । जगस वाल्वान्त-पुसा त्याचे भाऊ गौनसा समसनी धर्म वष्टल मा॥ ३८४ ( २८६ ) सक १५७४ चैत्र वद १०प। जीनासा सुव जीनदास ३८५ ( २६०) चैत्र वदी ६५ । सक १५७४ सा। लीसा जात्रा सफल ।। २८६ ( २६१) श्री काटसङ्घ माड वगही १५७७ मनमय नाम संवदसरे काक वदी १५ हीरासा घुमाईछ पुत्र धरमासा ईराई पुत्र सानसा व हीरासा वपतगडेसा वप दमा काषे जात्रा सफल माताई चे जात्रा। ३८७ (२८२) सके १५७७ मनमय नाम संवत्सरे कार• तिक वदी पाबिर १ बलीची मारमा काक्षावा मारमा जीनामा जीवाजी पाही घानयजी वानदाफा जामखेडकर साता कावीमा करका जत्रा। ३८८ (२९३) मके १६७४ चै. वदी धपाउसा मानीकमा जामफली ॥

विन्यगिरि पर्वत के भवशिष्ट लेख ३४६ ३८८ (२९४) १७६४ सुरजन साफ ३६० ( २८५) सके १७५४ चैत्र वदी ५ जत्र करी सफल ३६१ ( २८६ ) मुपुनीश नेमाजो सामजी सरत योगोई ३९२ ( २६७) सके १६४० फालगुन सदी १ गु. दे. मामा मानोकसा गविल (फनाड़ो में) देमामा रजा ३९३ (२८८) सके १५८४ वैशाष सुदो ७ श्री फाटा- मईपीठलागोत्रे लपसा पु हीरासा रामामा जापा सफल। ३६४ (२९६) प्रमाण सागर पं। असवन्त । ३६५ ( ३००) प गोविन्दा माय गनाई ३९६ ( ३०१ ) संवत् १७१८ वर्षे पेशाप सुदि ७ चन्द्र श्री काशसई पण्डित ३९७ ( ३०२) सके १५६८ सावरे फागुन यदि वदा... .स......पुत्र धीवक...... यायमा.....पवार... ............ छा घोषक...... ३८६ (३०३)साम्माजी का जन्माजी का हर २८६ (३०४) माघ सुदि पेक...त्रा पहे...मात्रा सफत्र॥

श्रवण वेल्गुल नगर के अवशिष्ट लेख ४२६ ( ३३१) अक्कन वस्ति में पार्श्वनाथ की मूर्ति पर श्री.मूजसह-देशिगण-पुस्तकगच्छ-कोण्डकुन्दान्वयक सिद्धान्त-चक्रवर्ती नयकीर्ति-मुनीश्वरो भाति ॥१॥ तस्छिन्योत्तम-बालपन्द्र-मुनिप-श्री-पाद-पप-प्रिया मानी नुत-चन्द्रमौलि-सचिवम्यान पमीरियं । सानाम्या रजतादि-धार-हर-हासागयो-मपरी- पुनीभूत-जगप्रया जिन-गृई भमा मुदाकारया ॥२॥ ४२७ ( ३३२)...तातीराव सदोपरा...पमपोच ५५८ ( ३३७ ) प्रामत्पपिवताचार्य गुद्धि देवराय महारापर रापि भीमादेरि माविसिर शान्तिनाथ म्यामिश्रा ।। ५२४ ( ३३८) श्रीपपिडतर गहि यसनापि माहि. गि पईमान सामि भी। मनापि पति के द्वितीय दरवाजे की पाखट पर थति TF देगियान पुगकोणन्दा मार श्राम-भिन-नायकीर्तिगालामा शिव नगर में प्रवशिलेख २५५ सम्यक्त्वचूड़ामणि गयपाय-चूड़ामणि पेलुगुलद मङ्गापि मादिसिद धिभुवनचूड़ामणि येम्ब चैत्यालयफे मङ्गल-महा श्री श्री श्री ॥ [भी मूलादेशिय गण. पुस्तक गाय, कोण्यकुम्दाम्बय अभिनव वारुकीर्ति पगितामा शिप्य रेलुगुलवामी सम्पत्य पूडामणि मनायि द्वारा निर्मापित त्रिभुवन चूरामणि नामक ग्याटया मालो। ४३१ । ३४८) .. ........शामन...परोध ..."स्य . गु......नुडि... लान्तरफ...मायदेवरु तरिमध्य......ग्य ...सिम्य अभेयनन्दि. सिद्धान्ति दंवर ...शान्दिदेवरु..... मुरकीर्ति वि... पन भट्टा . ..गुणमन्द्र ...दाता . भट्टारक. रकर....टका. ... कमज.........प्रा ..यासत्पाप पासु ५.........सिथति...मी... ..दु......यागि वित नगर में के प्रवशिष्ट लेस दं श्रीमा.........तया त्मक वत्प्र......॥ोकू.........पर ...ताय........ रमख...... प्रन्ययाभिधान प्रभिनर स्वार प पतु... घरवर्ति ...अमे... .मार.. गु ...कपति......... ४३२ ( ३५० ) पिल-स....... ५ स स......... गय पुस्त.........यान्वयन..... सिं पण्हिताना......तरकसगु....... मरचलिग कि......रिपूर दन......... मि संण्डियर......... उगुलकप ५३३ (३५) पुर्णया को मनद ओ कागज पर लिपी पूर्व परगुल के मठ में गा-संयत्मस फारगुन १८ युधधार पाम! KI for सामाanthणे मालिश

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३५८
नगर में के भवशिष्ट नस
[ धर्मस्थल के कोमार डेग्गडि ने प्राकर कृायरा वडर के
समय की एक सनद पेश की जिसमें विशर तासुका के कराल नामक
ग्राम का येल्गुल के निकाय के समीप की दानशाला के हेतु दान
दिमे जाने का उल्लेख था।
इसी सनद के अनुसार उक्त तिथि को
पूर्णग्य ने यह सनद दे दी कि उक्त प्राम की पाय, जो उस समय.
चाह थी, उक्त दानशाला और बेल्गुल के मठ के हेतु काम में वायो
जाय। भविष्य में प्राय में जो पि हो वह भी इसी हेनु सर्च की ज्ञाव
यह सनद उक्त तिथि को सरकारी दफ्तर में नकल कर ली गई।
४३४ (३५४)
मुम्मडि कृष्णराज प्रोडेयर की सनद उसी
मठ में कागज पर
श्रीकाठाच्युत पानादि-द्विपद्-वक्रोद्ध-ज:छटा-
सम्भूवामतिभीषण-प्रहरण-प्रोद्भासि बाहाटका ।
गर्जत-सैरिभ-दैत्य-पातित-महा-शूला विनोको-भय-
प्रोन्माथ-व्रत-दीक्षिता भगवती चामुण्डिका भावये ॥११॥
निदान सिद्धानां निखिल जगतां मूलमनचं
प्रमाण लोकानां प्रणय-पदमप्राकवगिरी ।
पर वस्तु श्रीमत् परम-करुणासार-भरिव
प्रमादानस्माकं दिशतु भवतामप्यविकल ॥२॥
घरेलीला-वराहस्य दंष्टा-दादरस पातु नः ।
हेमाद्रि-फखशा या धात्री छत्र-भियं दधौ ॥३॥

नगर में प्रशशिष्टय नमस्तु राहाय बोजयादा महीं। मुर-मध्य-गता परय महः कणकवायते ॥ ४॥ पातु प्रापि जगन्ति सम्वमकूपारारामुरम पांडा-मार-जयरस भगवान्यस्यक-दष्टापूर । धर्मः कन्दति नाजति द्विरमन. पप्रन्ति दिग्दसिना मेरकाशति मंदिनी जबादि म्यामापिगम्यति ॥५॥ पति श्री विजया गुप-शानि-शफ पगार १७५२ मन्द पर्वमान-विकृति-नाम-संयमरद प्रावण १०५ सोमवार, पाप-गगात्र भाभाम- Bal. नुपसिंगलाद विम्मरि-काम-वस्या का परामग. रस्परपरपुरा बामत सुमत भूमण्यम-मानापमान-fafte. देवारतम-कारक-अनपद-सम्पदधिष्ठान सामन्महार-मा. संस्थान-मध्य-दाप्यमान- कनिधि-ka.sax. धिविधास-प्रमुगमा निखिम-राजाधिरा-महा-NEAff-मा. सानुमा-विम्य-a-franमनाम बाबदORI. परमेधार-प्रतापाप्रतिम-और-जरत बिदे.mi.. पौर पदु-कुख-RINIT-विधि Avant-ten. मसर-मप-रम-पास-TOR-US- भानु-tier. पठीसायन-AFAI महारका कृष्पराजा. पास्कोति-RARINA RANE **9** *2974974 sfrac-r1910144 6*? *if* पदमागम बाय-बान-सRAantो।

नगर में के प्रवशिष्ट लेख किरि-तालुकु श्रवणबेलगुल दलिरुव दाइ-देवरु १ अधिक चिल्लरे-देवस्थान ७ चिक्कबेट्टद मेले यिरुख देवस्थान १६ माम- दविरुव देवस्थान सहा देवस्थान ३२ फे सह पडितर-दीपा- राधने-वग्गे नडेयुव नगदु तस्वीकु १२०-शिवायि चारुकीर्ति पण्डिताचा मठक्के नहयुव कन्यालु-माम १ यिदरधि पवितर- दीपाराधनेगे मालुवदितवादरिन्द मठक्के नडेयुव कबालु-माम १ यिदरधि पडितर-दीपाराधनेगे मालुव-दिखनादरिन्द मठमके नईयुव च्यालु प्राम मात्र कार्य माडिसि पडितर दोपाराधने नहेयुव बग्ये प्रवण बेलगुन ग्राम १ उत्नहति प्राम १ हौसा ल्लि पाम १ यो-गुरु-मामवन्नु सर्व मान्यपागि मापने कार. सुर्यकेन्दु परमने समुखद लक्ष्मी-पण्डितरु उजूगल्लरिक-माft. कोण्यररिन्द मह नगदु तम्तीकु मोसीप मारिसि मिटु यो. मुग-याम-गलनु मद मदरि देवयानगन पवितर-दोपाराने मुन्नाद यग्य चारुकीर्ति-पण्तुिनापार मठद यानु-मालिका -प्रामगड येरीजु पथमा वलि पटि कलुदिमुथनो ठानु मजर मामीलगं निरूपमप्पणे काहिर मरे मामीलनातु मोहर दप्तर वासने नोमि प्रतिल्लि मापागि बन्द पांड पराम्परिमि रो-माहिसिमर विवर येरोनु ( श्य लगान प्राम प्रमाल र वास कोषलु २ को । २ महा रीनु ) पैकि बना भारि पिना-मति- (या ने काम का प्राय का पाव मात्र का पूरा प्यारा दिया रे) - नगर में पाशिलेस यो मेरे यिस्र प्रामगनु यिदर दानवे प्राम फेरे कहे मुन्तागि मदरि पंगुलदविरुव दीड-देवरु मुन्नागि ३२ देवस्थान ममयूरु-पडद मे यिरुव देवस्थान १ सहा मूवन-मूरु-देवस्थानद पढिवर दीपाराधनं घात्मव मुन्ताद बग्य यी-देवस्थान गलिग वर्षप्रति दागदाजि मागतककर, मादिसतक पाये सहा प्राय-सगात्र साधनायन-सूत्र एक-यासानुवति गजाद रिमवि-पाराज-वडयरवर पौत्रसद चामराज-पत्यश्वर पुराद आमत्समस्त-भूमर-मण्डलायमान-निसिख-देशायसंस- कर्नाटक जनपद मम्पदधिष्ठानभूत श्रीमन-महीसूर महासंस्थान- मध्य-देदीप्यमानायिकाल कलानिधि-कुल-क्रमागत-राज-सिति- पान-प्रमुम्ब-निस्सिल-राजाधिराज महाराज पकववि मसानु- भूत-दिव्य-रव-सिहासनारूद श्रीमद् राजाधिराज राज परमेश्वर प्रौद-प्रवापाप्रतिम-वार-रपति विदन्तम्बर मायक-वीर यदु-कुल-पय:-पारावार-कमानिधि र चारश-कुठार-मफर- मस्य-शरभ-शाल्व.गण्डभमण्ड-धरणीवराह दमदनगर-कण्ठीर- वायनेक-विरुदाहितराद महासूर श्रीकृष्णराज-वश्यरवह मर्यमान्यवागि प्रपण-कोरिमि-धवेयाद कारख योपामगलन् सी-पिकृति-संपत्सरदारभ्य मदद वासु-माटिकोट निरूपा. पिक-मर्वमान्य-वागि नडसिाहु बरुवन्त तालुकु मजकूर भामोजगं सन्न प्रपण-कोडिसिधोठागि सदरि मनदिन मेरे या मूक-मामगल यो धतुम्सीमा-वगण मरे परतु मने इस कंम्पु-नल स्पिन मालं याचलु-पैर पुर वर्ग पह-कायिक नाम- ३६२ नगर में के प्रवशिष्ट लेख फाणिक गुरु-कायिके कायि के बेडिके कब्मिणद पोम्मु मारे. पोम्मु हट्टि-पोम्मु मार्ग-करगपडि सङ्घ पाम्मु जाति-कूट समया चार हुल्लु इण घरादाय हारादाय सोगे महि पवन पोपनि गिड-गावलु ब्राह्मण-निवेशन शूद्र-निवेशन सारिपन ताट तिपे- इल्ल श्रोगन्ध हारताद मर वलि फल-यच महिक मुन्ताला मफल स्वाम्यवन्नु रूहिसि कोल्लुत्ता प्राण बेलगुल-मामालि नेरेयुग मन्ने-सुङ्कद तुट्ट, वलियन्नु तेग दुमोल्लुत्ता यो-ऐवजिनति देवर सेवेगे उपयोग-माडिकोल्लुत्ता यरुबदु योन्मामालि घामदागि करे कट्टे काल्वे प्रणे मुन्नागि कहिसि बार मुन्नागि याव याधिनलिज येनु हेच्यु हुद्द वलि माहि-कोणाम मदरि देवर सेवे मुन्ताहक उपयोग-मारिकोस्लुबदु ययानि श्रयण घेलगुलद चारुकीर्ति-पण्डिताचार मठको प्राय-मगार प्राधलायन-सूत्र एक-शारानुवर्तिनगलाद यिम्मान कृष्णराय पडयरवर पोयराद नामराज-बडेयरवर पुनराद श्रीमत्सम भूमण्डल-मण्डनायमान-निखिल दशायम-कर्नाटक जना सम्पदधिष्ठानभूत-प्रामन्महाशूर-महासस्थान-मध्य-देदीप्यमान फन. कलानिधि - कुन-क्रमागत-राज-शिविपास-प्रमुख निमित राजाधिराज-महाराज चक्रपति भण्डलानुभूत-दिन्य Afitti सनारूल श्रीमद्-राजाधिराज राम-परमेश्वर प्रौर-प्रतापाप्रति वार नरपति निरन्तम्बरमा बाम-गोर यदु-कुल-पय: पाth वार कलानिधि शाकामुरा-कुठार मा-मप-शरभन्मान गण्डयरमोनराइजन्महा-भण्ठारापने कविता नगर में प्रवशिष्ट लेख तराद महाशुर मोफप्पराज-वरयर वरुप गुलद देवस्थान गल्ल परितर दीपाराधने रघोत्सव वर्ष प्रति मागतकक दाग-दोजि- समद पम्प सहा परसि फोटू सर्वमान्य-ग्राम-साधन सहि ।। मादित्यचन्द्रावनिलाऽनलभ धोभूमिरापो दृदयं यमश्च । प्रदयरात्रि उमेर सन्ध्य धर्मच जानाति नरस्य वृत्तं ॥ ६॥ स्वदचाद्विगुण पुण्य परदसानुगलन । परदत्तापहारण वदत्तं निष्फलं भवेत् ॥ ७॥ स्वदचा पुत्रिका धात्री पितृ दया सहोदरी। अन्यदत्ता तु माता स्याद् दत्ता भूमि परित्यजेत् ।।८।। स्वदत्ता परदत्ता वा यो रेत वसुन्धराम् । पष्टि वर्ष-सम्रापिविष्टाया जाय कमिः ॥७॥ मग्रजाः परमहीपतिवंशजावा ये भूमिपास्सततमुनवधर्मपित्ता: । मधर्ममेव सतत परिपालयन्ति तसादपरायुगलं शिरमा नमामि ॥ १० ॥ व तारीख टन माहे सागिए सन् १८२० ने पिसाव खत्त प्ररमने मुवराय मुनशि इजरु पुराना सदर भपये कोहि सिरुख मेरिग प्रसलि-माम मूल दासल-प्राम यर करे पन्दु कटे मुरम्म सह जारि रिनामति सिगयि सालियाना इण्ठि- गपि भैनर-प्ररुवतार वरहाउ व्याने पेरोनु गल्ल यी-मामst : {{\t,ነ :% {44 • '{ . ! { 'የ \ + + · : 4 ች, ቆብ , * * :* : :: ፡ # ን नगर में प्रवशिष्ट लेख श्री चारुकीर्ति-गुरुगान्तवासित्तमायुपाम् । मनोरघ-समृद्ध सन्मतिसागर बर्णन ॥ ६ ॥ धरणेन्द्र शास्त्रिया शुम्भकुम्भकार्य उपयुषा । मनन्तनाथ-पिम्मोऽयं स्थापितम्मन्प्रतिष्ठितः ॥ ७ ।। श्री-पथगुरुभ्यो नमः । ४३६ (३५६) उसी मठ में गोम्मटेश्वर की मभावलि की पीठ पर (शक स०१५८०) (प्रन्य पार वामिन) श्री मा-गामटेशाय नमः पशीत्यधिक-तम-शतात्तर-महस-मणित-शालिवाहन- शक- एकविंशत्यधिक-पञ्चशतासर-दिसध्य-प्रमित श्रीमद्दति महावीर-वर्तमान वीयर मागता एफपचाराद्गुणित-प्रभ. वादि-संवस्मरे-नति प्रवर्तमान- बायुगि नाम-सवत्सरे दचिणा. यने प्रोप्मकाजे पापाढ-गु-पर्णिमाया शुभविथी श्री-दक्षिण कायो-निर्विशेप-श्रीमद्-पेल्गुन-भण्डार-श्रीजिनलालये नित्य- पूजा-श्रीविहारमहोत्मवार्य श्रीमचारुकीर्ति पाताचार्य- वर्योपान्तवासि-धो-सन्मतिसागरबर्थिना प्रभार संसिद्धाय आमद्-गोमटेश्वर-स्वामि-अविकविरिय श्रीसम्जरीमभिसा ३६६ नगर में कं प्रवशिष्ट लेग्य गोपाल-पादिनाथ-आवकाम्या प्रतिष्ठापूर्वक स्थापित ॥ भद्रं भूयात् ।। ४३७ ( ३१७) नवदेवता मूर्ति के पृष्ठ भाग पर (प्रन्थ मोर वामिल ) श्री शालीवाहन शकाब्दाः १७८० प्रभवादि गवान्दाः ५१ ल् शेल्लानिन कालयुक्ति नाम संवत्सर सापाढ़ शुद्ध पूर्णिमा-तिधियिल् श्रीमद् बेल्गुलमठत्तिल श्रीमन् नित्य पूजा निमित्तं श्रीमत्पञ्चपरमेष्ठि प्रतिविम्यमानदु तखनगरं पेरुमाल श्रावकराल संवित्त उभयं ॥ वद्धता नित्य मङ्गलं ॥ [येगुल के मठ में विश्य पूजन के लिए ता नगर के पेरमाल श्रावक ने यह पचपरमेष्ठी की मूर्ति इन तिथि को अर्पित की।] ५३८ (३५८) गणधर मूर्ति के पृष्ठ भाग पर (प्रन्ध और तामिल) वृषभसेन गणधरन भरनेश्वर चक्रवर्ति गौतमगणधरन श्रेणिक महामण्डलेश्वरन् (फमड में)कजसदल्लिरुव पदुमैय्यन धर्म।

नगर में के प्रवशिष्ट लेंस ४३८ ( ३५८) पञ्चपरमेष्ठि मूर्ति पर (अन्य और वामिल) बेलिगुल मटत्तुस्कु मन्नार्कोविल सिन्नु मुरलियार पेण्यादि पप्राववियम्माल उभयं शुभं। [ माऊबिल के मिन्नुमदलियार की भार्या पावनियामाल नेल्गुल मन को अर्पित की ] ४४०(३६०) चतुर्विंशति तोयङ्करमूर्ति के पृष्ठ भाग पर (प्रन्य पीर तामिल) स्वस्ति ओ बेल्गुलमठस्य तच्चूरू-मजिकाधर्मः ४४१ ( ३६१) अनन्ततीपंकर प्रभावली के पृष्ठभाग पर (पन्ध और तामिल) श्री शालिवाहन शकाग्दा १७८० श्रीमत् पश्चिमोत्य कर मोक्षगवान्दः २५२१ प्रभवादिगवान्दः ५१ल शेल्लानिनर कामयुफिनामसवत्सर आपायुद्धपूर्णिमाविधियि मीमरबे. खानगरभण्डारजिनालयत्तिल मनन्तकृताधापनानिमिपं को २४ ३६८ नगर में के प्रवरिष्ट लेख वृषभाधनन्वतीयकरपर्यन्वचतुर्दशजिनप्रतिविम्यमानदु ता. नगर शतिर सप्पावु श्रावकराल शेखित उभयं वद्धता नित्यमङ्गलं ॥ [वेगुल नगर की भण्डार पनि में मनन्तयत के पूर्ण न पर अक्क तिथि को तञ्जनगर के शत्तिाम् अप्पाज धावक ने प्रथम पतुरंग तीर्थंकरों की मूर्तियां भर्पित की।] ४४२ ( ३६३) श्री चामुण्डरायन बस्तिय सीमे । ४४३ (३६४ ) प्रो नगर जिनालयद करे। ४४४ (३६५) चिकदेवराजेन्द्रमहास्वामियवरकल्याषि ४४५ ( ३६६ ) स्वस्ति श्रीमन्महामण्डलेश्वर त्रिभुवनमन्च वलकाडुगोण्ड भुजबलवीरगन विष्णु- वद्धन होयसलदेवर विजयराज्यमुत्रा- तराभिवृद्धिप्रवर्द्धमानमाचन्द्राक... ४४६ ( ३६७) जकिफट्टे के दक्षिण में एक चट्टान पर जिन- मूर्ति के नीचे श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वापामाघ-लान्छन । जीयात्रैलोक्यनाघस्य शासनं जिनशासनं ।। ओमूखसहर देशियगय पुस्तकगच्छद शुभचन्द्र-सिद्धान्त. देवर गुडि दण्डनायक-गङ्गराजनचिगे दण्डनायक बोपदेवन

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नगर में के भवशिष्ट लेख वृषभायनन्तवीर्यकरपर्य्यन्तचतुर्दशजिनप्रतिविम्यमानदु तव- नगर शचिर अप्पाबु श्रावकराल शेवित्त उभयं वद्धता नित्यमङ्गलं ।। [ वेल्गुळ नगर की भण्डार वस्ति में भगन्तवत के पूर्ण होने पर उक्त तिथि को तञ्जनगर के शत्तिरम् अप्पाउ प्रावक ने प्रथम चतुर्दश तीर्थंकरों की मूर्तियां अर्पित की। ४४२ ( ३६३) श्री चामुण्रायन बस्तिय सीमे । ४४३ ( ३६४) श्री नगर जिनालयद करे । ४४४ ( ३६५ ) श्री चिकदेवराजेन्द्रमदाखामियवरकल्याणि ४४५ ( ३६६) स्वस्ति श्रीमन्महामण्डलेश्वर त्रिभुवनमत तलकाडुगोण्ड भुजबलवीरगम विष्ण- वर्द्धन होरसलदेवर विजयराज्यमुत्री- तराभिवृद्धिप्रवर्द्धमानमाचन्द्रा... ४४६ ( ३६७) जक्किफी के दक्षिण में एक चट्टान पर जिन- मूर्ति के नीचे श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वापामोप-लाब्दनं । जीयात्रताम्यनाथस्य शासनं जिनशामन ।। ओमूखसहर देशियगयद पुस्खकगच्छद शुभचन्द्र-सिद्धान्त. देवर गुडि दण्डनायश्च-गङ्गराजनतिगे दण्डनायक मोपदेवन

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३६८ नगर में प्रशिष्ट नस वृषभागनन्ततीत्यकरपयन्वनाई राजिनप्रतिविम्यमानदु ता. नगर शतिर अप्पावु श्रावकराल गेमिरा उभयं वद्धता नित्यमङ्गलं ।। [के गुळ नगर की भगार यति में समाप्रत पूर्ण गने पर इस तिथि को तमनगर के शसिम् अप्पाउमाकने प्रथम बरंग तीर्थंकरों की मूर्मियो अर्पित। ४४२ (३६३) श्री चामुण्डरायन बस्तिय सीमे । ४४३ ( ३६४) श्री नगर जिनालयद करें। ४४४ ( ३६५) श्री चिफदेवराजेन्द्रमहाखामियवर कल्याणि ४४५ ( ३६६ ) स्वस्ति श्रीमन्महामण्डलेश्वर त्रिभुवनमध तलकाडुगाण्ड भुजबलवीरगम विष्णु- वर्द्धन होसलदेवर विजयराज्यमुत्तरो. त्तराभिवृद्धिप्रवर्द्धमानमाचन्द्राक... ४४६ ( ३६७) जकिकट्टे के दक्षिण में एक चट्टान पर जिन- मूर्ति के नीचे श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामोघलान्छन । जीयात्रैलोक्यनाथस्य शासन जिनशासन । प्रोमूहसहर देशियगषद पुस्तकगच्छद शुभचन्द्र-सिद्धान्त देवर गुद्धि दण्डनायक-गङ्गराजनतिगे दण्डनायक बोपदेवन नगर में के अपशिष्ट संख सायि मम्वे मार- विम्म मान्नु नाम्बरे नयणद-देवर मारिसि प्रविष्ठेय मामिसिदा मङ्गलमहा श्री श्री। ४४७ (३६८) स्वस्ति प्रोमत्सुभचन्द्रसिद्धान्तिदेवर गुछ प्रोमनु महाप्रचण्डदण्डनायक गङ्ग- पन्यगचिग शुभचन्द्र देवर गुडिजकि- मब्वे फेरेय कट्टिसि नयणन्द देवर माडि. सिदह मङ्गलमहा श्री श्री ।। ४४८ ( ३६६) पुट्टसामि घेनापन कोजद मार्ग । ४४८ (३७०) चेन्नयन कालद मार्ग । ४५० ( ३७१ ) पुटमामि सदर मग चेन्नयन घालुगोल । ४५१ ( ३७२) चेन्नयन प्रमूवकोल । ४५२ ( ३७३) घेनान गड बारनी कोख । ४५३ ( ३७४ ) मा पुट्टसामि सदर मकउ चिकपन तम्म चेनणन प्रदि-वद कोल जय जया। ४५४ (३७१ ) श्री गोम्मट देवर भष्ट विधार्चनेगे.. हिरिय ...यिकूल..........लजन कपिकन्विय ...ज बिट्ट दचिय श्रीमन्महा...चार्यक दिरिय भयकीर्ति-देवर चिकनय- कीर्ति देवर भाचन्द्रपंताग्यरं सलिसु- चिहरु मङ्गसमहाश्री श्री मो सयसंवत्सरद चैव मुद्रा। श्रीमन्महामण्डसाधार्य हिरियनयकीर्चिदेवर सिप्या पन्द्रदेवर. .

नगर में मागितलय m साना पारिरिंग......स रगतमामना मारिने...... [अंगमा मारिन afra रेख में infritvsitो पर न लिए विपिन दान में मे मीनियर न मायाint नियत । ४५(४८०) मठ में वर्द्धमान स्वामी को प्रभावली के पृष्ठ भाग पर (प्रर और तामिन) प्रोपर्वमानायनम । शाजोगदन काम्दः १७०० श्री- मत्पधिमवीरमाधगतामः २५२१ प्रभवादिगवान्दः ५१ रोशानिन फालयुक्ति नाम सबस्मर सापाद शुद्ध पूचिमा विधि- यिल श्रीमद् बेल्गुमठत्तिल नित्यपूजा-निमित्तमाग श्री सन्नति- गागरवखिगलुदेय प्रभोटसिदार्थ प्रोबार-बर्द्धमान स्वामिप्रादे चिम्बं कश्चिदंशं योग्णयम्याक सपामामियाल सैविच उभयं एधता नित्यमङ्गलं ।। ४५६ (४८१) चन्द्रनायस्वामी की प्रभावली पर (घलिपि में) (शक स. १७७८) श्री चन्द्रनाधाय नमः। मष्टा सप्तत्यधिकारसप्त-शतोत्तर-सहस्रकाद्गुपिते ।

नगर में कं भवशिष्ट लेस
शालीवाहन-शनृप-संवत्मरके ममाया ॥१॥
एकान-विंशवि-युतात्पमतसहस्रयुग्मकाद्गुपिते ।
श्री-बर्द्धमान-जिनपति-माह-गताप सजावे ॥२॥
एकन्यूनरावार्धात्मवादिगणार व संगुपिते ।
एवं प्रवसमान नानामा ममायाते ॥३॥
मीने मासि सिते पच्छे पर्णिमायान्तिची पुनः ।
प्रवा-काशीतिविख्यात बताने नगरे मठे ॥४॥
मोचारकीर्ति-गुहराइन्वेवासित्व ईयुषा ।
मनारध-ममृदा सन्मतिसागर-वर्थिनां ॥५॥
कुम्भकोय-पुरस्था मी-नेकका श्रावकी शुमा ।
स्थापयामास सहिम्मे पन्दनाप-जिनशिनः ॥६॥
प्रविष्ठा-पूर्वकाग्नित्य-पजाय म्वापसन्धये ।
पथ-ससार-कान्दार पहनाय शिवाय ॥७॥
भदं भूयाना
४५७ (४८२)
नेमिनाथस्वामी की प्रभावली के पृष्ठ भाग पर
(अन्य अवरों में)
(शक स०१७)
श्रीनेमिनाथाय नमः।
प्रशासप्तत्यधिकारमप्शवासरसइनका पित
शालीवाहनशकनृपसवत्सरकं समायादे ॥१॥

नगर में भवशिष्टर सवालयप पतुम्मिशतीर्थ करिये......tr कम्पनु सासन सारिगे...... [प्राइस पर नारे भाग ही शिम गया।श में पार्विशति तोकी पनि विपतिपि भूमिरान, गलेगा। मेर नीतिमा नीति माया ति) ४५५ (४८०) मठ में पर्वमान स्वामी को प्रभावती के पृष्ठ भाग पर (प्रय और तामित) भारमानायनमः । शालोमाइन गुफाम्दः १२० ओ. मभिमनो मागताः २१२१ प्रभागितामा andit कातना र सायपूnि fhra यत् श्राम बेगुमति निसपूजा-निमिममा मा मम्मति पागमगिय प्रमोसan भारतमाtatunt गि Times Inमिया Afterat पवना नमन। मन्दनायस्यामी को प्रभावती पर (nिa) (ग...ic) श्री.सावादनम" MarrianRRENati

नगर में कं प्रवशिष्ट लेस
शालीवाहन-शकनृप-संवत्मरकं ममाया ॥१॥
एकाम-विशति-गुतात्परावसम्रयुग्मकाद्गणिते
मी-बर्द्धमान-जिनपति-माध-गवान् प सम्मात ॥ २॥
एकन्यूनरावार्धात्मवादिगवाद प सगुपिते ।
एवं प्रसमान नानामा समायावे ॥३॥
माने मासि सित परे पर्णिमायान्निधौ पुनः ।
भवाक-काशी विविख्यात-बेगुने नगरे मठे ॥४॥
भोपारुकीर्ति-गुरुरान्वेवासित्व ईयुपा ।
मनारघ-ममृदा सन्मतिसागर-वर्णिन ॥५॥
कुम्भकोय-पुरस्पा श्री-नेका श्रावकी शुभा।
स्थापयामाम महिम्य चन्दनाघ-जिनशिनः ॥६॥
प्रतिष्ठा-पूर्वकप्रित्य-पुजार्य म्वोपलम्धये ।
पष-समार-कान्तार-बहनाय शिवाय प॥७॥
भद्रं भूयात् ।
४५७ (४८२)
नेमिनाथस्वामी की प्रभावली के पृष्ठ भाग पर
(पन्ध प्रतरों में)
(शक स०१७)
मानमिनाथाय नमः।
प्रष्टासप्तत्यधिकारमप्शवोचरसहनका पिवे।
घालीवाहनशकनृपसवत्सरकं ममायावे ॥१॥

विम्ब कचिदंशंपियम्याकं अपामामियाल समिती ३७० नगर में के प्रवशिष्ट लेख मुवालयद चतुर्विंशतीर्घकरिगे......रिप कय्यतु सासनद सारिगे...... [यह लेख अधूरा है । इसके ऊपर और नीचे का भाग रिकार ही पिस गया है। लेख में चतुर्विशति तीर्थंकरों की अष्टविध पूर लिए उक्त तिथि को कुछ भूमि के दान का उल्लेख है। इस दान ज्येष्ठ नीति और लघु नपफीति भावनातारं नियत रखें। ४५५ (४८०) मठ में वर्द्धमान स्वामी की प्रभावली के पृष्ठ भाग पर (प्रय पार तामिल) ओर मानायनमः । शालीवाहन शकाब्द: १७८० मत्पधिमतीर्थदूरमागताब्दः २५२१ प्रभवादिगतामा १९ रोधानिन फालयुक्ति नाम संवत्सर मापाद पूधिमा तिथि थिल श्रीमद् बेल्गुमठत्तिल नित्यपूजा-निमित्तमाग श्री सन्मति सागरपिगलुदेय प्रभीष्टसिद्धार्थ श्रीवार-वईमान पामियाते. एयता नित्यमनलं ॥ ४५६ (८१) पन्द्रनाथस्वामी की प्रभावती पर (पंघलिपि में) (सं० १७७८) श्री पन्द्रनाथाय नमः ॥ भामप्रत्यविकारमत-गतापरमायुषित।

नगर में प्रविष्ट खेस
पालीवाहन-कनृप-संवत्सरके ममाया ॥१॥
एकाम-शिवि-पुतापरातसहमयुग्मकाद्गुपिते ।
मोबमान-जिनपति-मोच-गता र समावे ॥२॥
एन्यूनगवात्प्रभवादिगवारे व सगुपिते ।
एवं प्रबर्चमाने नमनामा समायावे ॥३॥
मोने मासि सि पते पर्णिमायान्दियो पुनः।
पवार-काशीविविख्यात बताने नगरे मठे ॥४॥
भोपारुकीर्ति-गुरुरादन्तेवासित्व युपा ।
मनारय-ममृद्ध सन्मतिसागर-वर्थिना ॥५॥
कुम्मकोय-पुरस्था मो-नेका श्रावका शुभा।
स्थापयामास सहिम्मं पन्द्रनाम-जिनेशिनः ॥6॥
प्रतिर-पूर्ववनित्य-पूजाय म्योपसम्धये ।
पश-समार-कान्वार-पहनाय शिवाय च ॥७॥
भद्रं भूयात् ।
४५७ (४८२)
नेमिनास्वामी की प्रभावली के पृष्ठ भाग पर
(प्रन्ध प्रतरों में)
(शक स.१७७८)
श्री मिनाथाय नमः।
प्रशासनस्पधिकात्सप्तशतीत्तरसहयका स्ति।
शालीवाहनशनृपसंवत्सरकं ममायावे ॥१॥

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नगर में प्रवशिष्ट देख ४५८ (४८४) गरगट्टे विजयराज्यम्प के घर जिनमूर्ति के पाद पीठ पर भीमद् देवन्दि भट्टारकर गुहि मालने कडसववादिय तोत्यद अमदिन काल गज ४१० (४६५) गरगहे पन्द्रप्य के घर जिनमूर्ति के पादपीठ पर श्रीमत्कन फन्तिया कसतवादिय तीत्यंद . F दिगं कोहर ४६१ (४८) मलिपंप । ४१२ (४८७) वीरमः ४६३(४८) चिन तम्म चेन्नयन कोल । ४६४ (४८८) पुटमामि चेमान मण्डप काल ताट । ४६५ (४८०) चिकन त .....चेन्नयन कोल । ४६६ (४८३) हालोरति । ४१७ (४६४) प्रोजिननाय पुरव सीमे । ४५८ (५००) मठ के दायीं ओर तेरिन मण्डप में रप पर शालिवाहन शक १८०२ ने विक्रमनामसंवत्सरद माप एट ५ ल्लु वीराजेन्द्रप्याटेयल्ज़ इरुव रायनशेट्र मचिगे जिम मन शंवर्स। [ वीर राजेन्द्रप्याटे देरापनसहि की भावय ने प्रदान किया] ३७२ नगर में के प्रवशिष्ट लेंस एकानविंशतियुतात्पश्चग्रवसहस्रयुग्मका पिते । श्रीवर्द्धमानजिनपतिमाचगताब्दे व सञ्चावे ॥२॥ एकन्यूनशवार्धात्प्रभवादिगवान्दकं च सङ्ग पिते । एवं प्रवर्त्तमाने नलनामाब्दे समायाते ॥ ३ ॥ मीने मासि सिते पक्षे पाणमास्यान्तिधी पुनः । अवाक काशीतिविख्यातवेल्गुले नगरे वरे ॥४॥ भण्डारश्रीजैनगेह प्रोविहारोत्सवाय च । अनन्तभवदावाग्नीशमनाय शिवाय च ॥ ५॥ ओचारकीर्त्तिगुरुराइन्तेवासित्वमीयुषो । मनोरथसमृद्ध सन्मतिसागरवर्थिनां ॥६॥ शाचण्नश्रेष्ठिना शुम्भत्कुम्भकोयमुपेयुषा । श्रीनेमिनाथविम्बोऽयं स्थापितस्स प्रविष्ठितः ॥७॥ ४५८ (४८३) पण्डित दौर्वलिशास्त्रि के घर शान्ति- नाथ मूर्ति के पृष्ठभाग पर (नागरी अक्षरों में) सं १५७६५० था. १४४१म० कर प्र० कु. सदित पौ. मासे ओउस०ज्ञा० सोनीसीहा भार्या धम्माई नाम्ना पुत्र मो सिडारीया श्रेयोह। वि...मासे० ४० प० ६ सेमे ओ शीवलनाय विम्य कारितं । प्र० श्री. वृ० १० पाप । प्रोवि- असामुस्कृरिभिः।

RI _ wait HD पियारसय के पानि * पादपीठ पर पाcिumerg मा फाante मा ulta का t. Yav) मग पप्प ॐ पर जिनमुति पारपीट पर NATIVE ARE Twitter स (Y८ मा AREK) Arvi ४.(c) पिन। ४ (८) Tenlawe Her strates wr (.) कि.. पन (४२६) दान | t.(४२)जिना पुर। vc..) मठ कदापी घोर तरिन मजप में रप पर Unान गफ १८०२ मिनायसेवासरण माप, पसल पीnaiय र नट्र प्रतिगं भिम मन बी {IKetinuefteria fau] ....श्रमति कर्म काम म......वामी भासपास प्राम के प्रवशिष्ट लेग प्रयणवेल्गुल के पासपास के ग्रामों के शिलालेख। जिननायपुर के लेख ४६९(३७८) शान्तोश्वर यस्तो के द्वार पर स्वस्ति श्रीजगनज...पलिय पुनकालर मग जूनिकान तम्म गोत्र पेमडियर महतारद गण्ड...सावितरर...स...10 ..रि............लरनडि...र कादि कान्तुजाज..... गार योडिन रपेयर भु...समर मुरिगेट कलगमेनिनु रि... तिमि मफे कसया नि...वन मोमकल...TA.farai. १...मल गुलिय...गकान्त......गाल मरि मसनेमा पनि सि........................मा......पर गुलम.........लसभी गर ५... . जिनतीचंद था...स्तम-अप्रगम्यनु...1 पोर....पहरिगं ॥ ...मन्दनाग........... ...पानपचन्दम... [ANIL मा...मगधित .....तनग............. न , लिमहमन्यमन गरयनिप...नम...itiati नाल..तमनु.. गु......ागि......Ariate .... ..नि......म... नारि...spm...alist, 4 . 44 पन्नागिन...सनिति......... .....नि......

Alternal witteriram Non tet elme Int सपी मीरप में एक सम्म पर mutth milaange पक पास tutमान्य ५ पास पान un पामा ८14-Nov in [artan at nine stiaure infanter Fealheatesentatest मातीखा बलियालोरफी पीठिका पर actreal tula ranational HTRIYAAR faternमापनन्दि. fasiarat fuRE शुभचन्द्र-refunu साग. रणन्दि-Insiritin AIRNER मिय. raat गाना-सानिए माया- कर ४.६ (२८१) मममनियम ४.1 (२८.) झामनु धिकासयोगिगर मठ मोदी- ... ..अमरिद बेम काम मलं..... रद सन्यासनदि ....दिरन......म...प नन्दरदि...सनि...अर्पिले... भासपास के ग्राम के प्रवशिष्ट लेख श्रवणवेल्गुल के प्रासपास के ग्रामों के शिलालेख । जिननायपुर के लेख ४६८ ( ३७८) शान्तीश्वर बस्ती के द्वार पर खस्ति श्रीजगनज...यलिय पुनकालर मर्ग जूनिकश्न तम्भ चोल पेमेडियर मरुलारद गण्ड...सावितरदेव...स...मग .. ..रि............लरनडि...रं कादि कोन्दुजाल...न्द्र गङ्गर वोडिन उर कचेयरं भु...सेमर सुरिगेत कलगमेनितु रि... यिसि जसक्के कपन्दद नि...वन्न माम्मक्कलु...गसु "सिदिन, व...मल तुलिद...गेकान्त......गोल मरि सत्तलेकर अन्द पेकिनम्ब सि......गिङ्ग... ...........सा......र परि ...गुल तब्ब...क......ललनदे गार प......जिनतीर्त्यद बा...स्तनु-अप्रगण्यनु..... चोल-स...पटवरिगे ॥ ...सन्दनाग......निजेगजन...इव ...लु यवनल्प चन्दम ... . पूजेयनेरदे माडिदं ।।...लगचित्र .....वनग...... ल स......न . दि महसन्यसनं गम्यनिप्प...वन...दिन बर यह...गाविगलात्म यन्तल् चित्त...कुड़दयनिरि......मोद... ......विदे...... ..... गु......दागि......यदि जिन. ...विद...... नेरय...त मनु...

३७७ भासपाम के प्रामो के प्रशिष्ट लेख उसी ग्राम में एफ पट्टान पर .....सि......भो......भन...... ..गिरे मालि... ...यतिय..... मुनिराजरिन्द .....विलु ......भरदिन्द ममाधि...मुं नाडु प्रभुबातमु । नरदिन्तसमिर कोहरमनाम्भोराशियु मेरु भूः धरमुं पन्द्रनुमान वायुं निल्योग सल्विने ॥१॥ पन्न ई-धर्ममं फिनिसिदवा गड्डेय नहियरकोटिमुनीन्द्रर कविनंयुं प्राणम्म कॉन्द प्रह्मत्तियलु होहरू । [इस टूटे हुए बस में किसी दान का उलेस है जिसके विदेद से गाना पर सात करोपियों, कपिला गायों गा मामयों की हरया का पाप होगा ] ४७७ ( ३८०) श्रीमतु सिह ग्यप नायकर फोमरन निरू- [भा गोड की भूमि में] पदिन्द येक्कन गुरुवप सोवपनालगाद प्रभुगबुचामुण्डरायन पस्तिगे समर्पिसिद सीमे श्री। हमियप नाय की मात्रा में बहन के गुस्वप वर मादि प्रभुषों' ने यह भूमि चामुण्डाय मि से अर्पण की।] ४७८ ( ३८८) श्रीविष्यवर्धन • देवर हिरियण्डनाय गडपम्य स्वामिद्रोह पर श्रीमेलगुरू बाल पनि [ifferi Asleelaite प्रासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेस लिरु श्रीमूलसवाद अभयदेवरु नान.. दे सम्मुचिपदव...र ३॥ ४७४ ( ३८३ ) स्वस्ति श्री विजयाभ्युदय शालिमा शक बरुष १८१२ नेय विरोधि ना सवत्सरद वैशास श्रीमद् येल्गुल निवासियागिर मेरुमिति गोत्रजराद श्री पुजययनपरिगे निध सुपाभ्युदय प्रात्यर्य-वागि प्राप्यर्थ-वागि प्रति माडिसिदं॥ [पास भोगा बम्ति की प्रतिमा पा) ४७५ (३८५) जिननायपुर में तालाब के निकट एक चट्टान पर माधारण-मात्मरण प्राण स १ । मा। श्रीमन्मयाम पालामा राज-गुरुगनुमप्प हिरिय-नमकीर्सिा गिया नय कीर्तितम्म गुरुगनु मेननु मानिमित विस मनारिया पट-रिवाना हिरिय-wिily.in हिन्वयनबन-बन गई समय....is माfringi मनमा श्री श्री श्री ।। for sthit gemstantt sistt. to rule in singindia sarita प्रासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेप वण्यन मचरित्र... . गदालु ॥ जन-जिन-मयि.. निहा ......... नियवे ..न रूप-यौवन-गुणसम्पत्तिविन्दात पचिगु......भुवन-भूषण-यालचन्द्र...रुद्दक... प बदल-बदु.. . गजराज.. तीन-चरी.. कायः प्रतिका...रिय...सक-वर्षद ११३६ नेय श्रीमुखसंवत्म- रद काकि शुद्ध ५मो । प्रभाव-समयदोलमन्यमन- ममन्वितं ।। ..... पथ-नमस्कार मन मधलिसदन्वाप्पुदु सकल... ...बदु......गरह ......र दिविज-वधुग वल्लभनाई। ...यम्म...सादरक. . ...य यस्ता । पन्तु ..देवर धि ..पर दहन-सानदाल परीत.. निमित्तवागि राजनि मारिसिद पालमन्द्र देवर मग.. न शिलाट । मात... .....सोस-यत... ...भूतनदान कामयं सोग सम्मिलिग रतिगमरि दारे मम......निसिदा-महासति सवि......सानमनारिद.........भार-संबसर जंह- दि। निगान्वदान सलेखन-विधियि समाधिप दु मां-प्राया गाविनाराय...॥ गुण......६ विभव प्रामपाम के प्रामों के प्रशिटनेस नोज जिननाघ-पुररमादि य...ne ...पर......-पान... जगलबाहिर......विम्यान र... की परिहार ॥ प्रोपरासर । [मरेदए लेख में विपक्ष के प्रभार पा "mn गरम निनामारमिया गाने mat] ५.४(३८६) गिननापपुर में गासिनाप यस्ति में पश्चिमाता को जोर पकत में ममाभिमपप पर (An०११३१) नम मिय। aft प्राममहामनामा गुनिया 4. श्री-मिगन्द्र पnिititil MarIRI-सामनारमममा. -twiनुमान माना vratrintaitri-att ., .... t. मन मानना Muffpune मा ud at ."

प्रासपास के ग्राम के प्रवशिष्ट लेख ३७८ वण्वन मस्चरित्र... ..गदा ॥ जन-जिन-मणि.. निहा .........नियवे.. न रूप-यौवन-गुणसम्पत्तियिन्दात वचिगु......भुवन-भूषण-वालचन्द्र...महक. ल. प बहल-पदु... गजराज.. .तोत्र-वरो.. कशः प्रतिका...रिय...सक-वर्षद ११३६ नेय श्रीमुखसंवत्स. रद कार्तिक शुद्ध ५मो। प्रभाव-समयदोलसन्यसन. समन्वितं ॥ ... पश्च-नमस्कार मन मधलिसदन्तीप्पुदु मकल... ..बदु......गरुह ......र दिविज-वधुगं वल्लभनाई।। ...यम्म...सादरक... ...य यल्सर ॥ मन्तु ..देवर घि...यर दहन-स्वानदोल परोक्ष...निमित्तवागि बैंगजनि माडिसिद पालचन्द्र देवर मग...न शिलाकूट । मात.........योज-मत... गुण......द विभव......भूतजदाज कालवेयं सांग रुग्मिधिगं रतिमे मरि दौरे मम......बेनिसिदा-महासवि चयि......स्वानमनरिदे.........भाव-संवत्सरद जेष्ट- ५५ द्वि । निशान्तदाल सल्लंखन-विधियि समाधिय पहेंदु स्वर्ग-प्राप्नयादल ।। श्रीशान्तिनाचाय...॥

मामपाम के प्रामों के प्रशिष्ट मेस तोक्नु जिननाय-पुसमारिय...स ... ..रपल......इ-परमनंग... जगजगारिय......विम्यान देगा... को परिहार ॥ द्रोपावर कात। [मरे हुए लेख में विष्णु नरेश प्रभार ITLE सतगुरमें निनावर निर्माण काman rist) ५.८ (३८) मिननापपुर में शान्तिनाप पस्ति से परिषमातर को मार एक पेत में ममाधिमपप पर (०११) निम nिn. afप्राम-महामानवाना गुणनि' it F40 प्रा नेमिगन्द्र पhिiti l MARATHI II गायनाममा t-नुमान सुधाnिti antestfits finition ..... मा. 10. मानना * .dot., महाबाद HRA att .. 1 मामपास के ग्राम के भवशिष्ट लेख ३८१ चिसय...प्र...न घरकोट कोडग... ....ला समन मङ्गल महा श्री श्री। [इस टूटे हुए लेख में एक स्थान के दान का उहे है] ४२३ (३९३)दे... ..य-नायकन मग मादेय नायक मारिसिद नन्दि [मादेय नायक ने ननि निर्माण कराई। कएठीरायपुर ग्राम के लेख ४८४ (३८५ ) श्रीमतु परिडतदेवगढ़ गुडू गन घेल- गुलद नाद चेन्नण-गोण्डन मग नागगोण्ड मुत्गदहोन...लिय कालगोण्ड बैर गोण्ड- नानगाद गौडगलु मङ्गायि माडिसिद बस्विगे कोट्ट बोकुर कट्टेय गर पाल यि-धर्मके वपिदवरु वारणासियलु.. इसकपिलंय कोन्द पाप होह......ल-महा श्री श्री श्री। [ पण्डितदेव उस्त शियों में महायि भी बनवाई दुई सम्ति को बगरका की भूमि प्रदान की। जो कोई इस दान का विधेदरे से बनारस में एक हजार कपिट गाणे की या पा] ४८५ (३८६) श्री चामुणरायन पस्ति सीमे।

३८० आसपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेख (इस टूटे हुए लेख में लिपुत्र के महामलाचार्य नेमिय पण्डित देव के प्रिय शिष्य व बालसन्द्रदेव के तनय के उप fari समाधिमरथ का उलंस है। उनकी स्मशानभूमि पर पा शिलाहर बनवाया गया। सके मन्तिम भाग में anी का समाधि माणका उलेख जिन्नेनहल्लिग्राम के लैस ४८० ( ३६० ) प्रा शकवर्ष १५८६ प्रमादी प संपत्स. वैशाय यहुल ११ यछि समुद्राकोपर स्वामियर निससमाराधन नित्यारसा कोसताट मण्टपद सेवेगे पुटमामि सहिपर मग घेनपतु शिट्ट जिमयन इशिय ग्राम मङ्गल महा श्री श्री श्री। (बह विधि पुस्पामिरे पुत्र यंत्रय ममुद्यारीया (य. नाप)स्वामी के निरय साप, पपन tama पिन हलि प्रामाnि) ४८१ (३६१) श्राचामुण्डारापन यस्लिप मोमे ॥ हानुमतिगह ग्राम के लेख ४८२ (१२) इस............स...न कागि ताट......ामिासान...... बरय मि...बन... ..... NEPAL प्रासपास के ग्राम के भवशिष्ट लेख ३८१ चिपसरण...प्र...न घरकार फोडग... .........ला समन मङ्गल महा श्री श्री। [इस टूटे हुए बेख में एक उचान के दान का रहस] ४८३ (३६३ ) दं......य-नायकन मग मादेय नायक मारिसिद नन्दि [मारेय नायक ने नन्दि निर्माण कराई ] फराठीरायपुर ग्राम के लेख ४८४ ( ३६५ ) श्रीमतु पण्डितदेषरुगल गुडू गलु बेलु- गुलद नाह चेन्नण-गोण्डन मग नागगाण्ड मुनगदहान...जिय काण्ड पर गाड नालगाद गौडगलु मनायि माखिसिद बस्विगं कोट्ट पोइर कट्टेय गई बदलु यि-धर्मक वपिदवरु चारयासियलु... इसकपिलंय कोन्द पाप इंद......ल-महा श्री श्री श्री। [पण्डितदेवमत गियों में महापि भी बनवाई हुई गम्ति को पाक की भूमि प्रदान की। सन का विछेद को उसे बनारस में एक हजार पिटागामी की दया का पाप ।।] ४८५ (३६) श्री चामुणरायन बस्ति सीमे ।

३८२ प्रासपास के ग्राम के प्रविष्ट लेस माणेन हल्लियाम के लेप ४८६ (३८७) (शक सं० १०४१) भामरम-गम्भीर स्याद्वादामोप-लाडने । जोयालोक्यनाथस्य शामने जिन-शामने ॥१॥ भामस्तु जिनसामनाय सम्पगताम्मतिविधान-हतरे। पन्यादि- मस्ति-मतरफादनाय पदने पटोरमे।।। नम मिभ्य ॥ नमो धोतरागाय ॥ नमो मान्दार ॥ स्ति पा-कोडनाये विख्याने देशि के गये। सिंहयान्दि-मनोनय गहनराम्य विनिर्मित ॥ ३ ॥ पीये.. पाहता गो M...मीयर में Min" पापा 41 भामा मगित पञ्चमायम .... नम्मी ५.ant . भन्नु भा In Tigniumsiri मक वर्ष 2014 विप्लम्पिमा फागुष गद पनि प्रयास मन . astra nitranfe Femant iassttar it.. नाना manti मासपास के मामों के प्रवशिष्ट लेख ३०३ दिय सारण हुनुमारिय गति तेल पहनहल्लियिन्दा... मदिपुरक हिरिय-देवर घट्ट होद इन्सट्टेये गांड इडुवलु हिरिय...हल्ल नजुगर बेकननिप...पडकल गडसमुद्रक्के पत्यद इडुक्स दियि पदुवात गडि यिन्तो-चतुस्सोमेयं पनि ...अक्कन., नुप्रत्यधिवासद...पदु. ...गोम्मदपुरद पट्टण- स्वानि मत्ति सेट्टियरु...सट्टि गण्डनारायण-सेटियु मुख्त्यवाद मकर-समूहलुमि माडिद मर्यादे यिन्तीधर्ममें प्रतिपालिम- समें महा-पुण्य माकुं॥ प्रियदिन्दिन्विदनंयदे कार पुरुषायु महा-श्रीयुम- यिद कायदे कान पापिणे कुरुक्षेत्रोलियोल वारया- पियानकोटि-मुनीन्दर कविलेय वेदाइपर कोन्दुदो. न्दयसमाग्मेनुन मारिदपुदी-शैलासर मन्तवं ॥ १६ ।। विरुद-रूवारि-मुख-तिलक गङ्गापारि खंडरिसिद। [इस लेख में लेस ने...(२.) समान समाज के कीसिंदर्यन के पश्चात् रहे है कि हॉने विषदन नरेश से गोविन्दवादिग्राम को पार उसे पारव देव और कुटेश्वर की पूजा तुरस्त निविपद मिरान्त वा पाइपालन म दान परिया। जो कोई हम द्वारा पालन करेगा या दीर्घायु और वन भोगेगा पर गाई इसका विर भंगा से पुरपत्र बनारस में सात र अपिणे, पिटा गौधों व पगिकी वापार होगा। देश से गारि के समीप किया। ४८७ (३८८ ) ...रिसिदेवगे रिट्ट दलिय गय...... 1] 1114 पाintainturi २७२ भासपास के ग्राम के प्रशिष्ट लेख माणेन इल्लिग्राम के लेरा ४८६ (३६७) ( शक सं. १०४१) श्रामरम-गम्भीर स्यावासामोप-चायने । जोयालानाम्यनापम्य शाम जिन-शास॥१॥ भ:माजिनामनाय मम्पराताम्मतिविधान हो। मन्म- मस्ति-मस्ताफादनाय पाने टोयो । म. मि ॥ नमो गोरागाय ॥ मी भानाय । स्थति प्रा-कोण मामय जिस्या दोश गये। भिंडणन्दि-मुनीयम्य ग-निम्॥ि indi पनि Anant तीमा पसे भागे ... या गाना ग्रामममित मिशागत म ११ वितस्विकार गा- Uranuarest *." ना Invents नाममा tirsitik . . .intine test tr" नम्मी vrttri प्रामपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेख ३८३ दिन्द्रय सारण हुनुमाडिय गडि तेल मनहल्लियिन्दा... मदिपुरस्क हिरिय-देवर बेरकं होद इंन्सट्टये गड हबलु दिरिय...इल्त नजुगेरे बेस्कननिप...यटकलु गङ्गसमुद्राके पल्या हवय दिनयि पडुबलु गडि यिन्ती-पतुस्सीमेयं पूर्वि ...अन.. नुप्रत्यधिवासद...पा. ...गोम्मटपुरद पट्टण- स्वामि मल्लि सहियरु...सष्टि गण्डनारायण-सेटियु मुल्यवाद नार-समूहनुमिरमाडिद मर्याद यिन्तीधर्ममं प्रतिपालिम- पर्गे महा-पुण्य प्रस्तुं ।। निपदिन्दिन्तिदनंयदे काव पुरुषर्गायु महा-श्रीयुम- संयि कायदे काय पापिगे कुरुक्षेत्रोत्रियोल वारया- निलिमाटि-मुनोन्दर कविलेयं वेदान्यर कोन्दुदो- न्दयसमाग्गुमेनुन सारिदपुदी-शैजाधर मन्तः ॥१६॥ विरुदरूवारि-मुग्य-तिलक गङ्गापारि संडरिमिद। [इस लेख में लेख...(..) समान राज कातिवर्णन परमार नखरे कि उन्होंने विरम नरेश से गोविनवाट प्रामको पाम संडारदेव धीर कुमारवर की पूजा नुसत तिथि को शुभसा सिद्धान्त देवका पाइमाननादान कर दिया। जो कोई इम दान पाउन करेगा वा दीर्घायु और वैभव भौगंगा परा कोई इमा विश्वेद मेगा उसे करना बनारस में सात रोई अपियो, कपिला गौधों व पटियो की हत्या का पाप होगा। ओन से गारि ने ही किया। ४८७ (३८) ...रिसिदेवगे विट्ट दत्तिय गोय...... २५ भामास के प्रामी पशि प्रेस माणेन इलिग्राम के सेरा ४८१३९.) (सं. १०५) प्रामम-गम्भोर स्पातासामोप-नाम। ओनाया शाम बिन-शाम Hinामनाय सम्पयनापतिविधान-हेलो। wount-HTIMATKARIपाने को Mruit ||नमा तयार पाना। ram श्रा-फोजना यादग गई। सिंगादि मुनामाग-InfattitutM ful mom organiline 12.html FEMALE Usi iran . Entential intensit Rat Far* प्रामपाम के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख दिग्य सारण हुनुमाडिय गहि तेच मनहल्लियिन्दा... मदिपुरक्क हिरिय-देवर बेट्टकं होद पट्टये गडि हडबलु हिरिय ..इस्ल नजुगैरे वेशननिप...पढकलु गड्डसमुद्रको पल्यद बडवय दिमयि पदुबलु गरि यिन्ती-पतुस्सीमेयं पूर्चि ...पक्कन . नु प्रत्यधिवासद...पहु .....गोम्मटपुरद पट्टया- स्वामि मस्ति संष्ट्रियरु...सैट्टि गण्डनारायण-सेट्टियु मुख्यवाद नार-मबमुनिर माहिद मर्याद यिन्तीधर्ममं प्रतिपालिसु. पग्गे महा-पुण्य मकुं॥ प्रियदिन्दिन्तिदनंयदे काव पुरुषायु महा-श्रीयुम- कयि कायदे काख पापिगे कुरुक्षेत्रोबियालु वारया- विमानकोटि-मुनीन्दर कविनयं वेदाव्यर कोन्दुदो- दयसमागुमेनुन मारिदपुदो-शार मन्तः ॥ १६ ॥ बिरुद-रूवारि मुरर तिलगङ्गापारि संहरिसिद। [इस लेख में खेसन...(..) समान बराज के श्रीनिवर्णन के पश्चात ग्लेख है कि इन्होंने विगुवन मरेश से गोविनगर ग्राम को पार उस पार देव और कुटेश्वर की पूजा निशिशुभम सिदान्त देव का पादपालन का दान परिण। जो कोई इस पान का पालन करेगा वा दीर्घायु और भागेगा पर कोई हमका विश्लेर करेगा से कुरुक्षेत्र नारस में सात करोड ऋषियों, पिटा गौधों व पणित की स्था का पाप होगा। खेत को गासारि ने समीणं किया है। ४८७ (३८८) ...रिसिवगं विट्ट दक्षिय गोय.....

भन्नु भा पारा Higinnini २८२ भासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेख साणेन हल्लियाम के लेरा ४८६ (३७) (शक सं० १०४१) प्रोमत्सरम-गम्भोर स्याद्वादामोप-ताजने । जोयालय लोक्यनाघस्य शासन जिन-सामने ॥ १ ॥ भामस्तुजिनगामनाय सम्पाताम्प्रतिविधान-इतरे । प्रन्यादि-मद इस्ति-मस्तक-रफादनाय घटने पटोयसे ।। नमः मिलेभ्यः ॥ नमो वोतरागाय ॥ नमो भगहन्ताय॥ म्वस्ति प्रो-कोडदाम्ये विख्यात देशि गरे। मिहयान्दि-मुनीन्द्रस्य गा-राम्य विनिर्मित ॥ ३॥ (पा.. मिता गरा की न.. तीसरे पवमे पागे पता पापा बाना। यति ममधिगत पचमहाराम सिममय १०५१ ने विसम्यिनमा फागुयः गुदा मान प्रयास मन-मन-4It ari wal rains infertifi sun insattle ". AMIR निनाan alter नम्मी 4 पामपाम के प्रामों के प्रवशिष्ट सेख दिल्य मारय हुनुमाडिय गी तेल मनहल्लियिन्दा. मदिपुरक हिरिय-दवर बेक छोद हम ये गडि दिरिय .. नजुगेरे बेक्कननिप...याल गङ्गसमुद्र पल्या इवय दिनयि पदवलु गरि यिन्ती-पतुस्सीमेयं पूर्वि ..पकन नुप्रत्यधिवासद...१.. ...गोम्मटपुरद पट्टय- खामि मल्लि सट्टियरु...सष्टि गणनारायण सेट्टियु मुख्यवाद नार-ममूहमुमि माहिद मर्याद पिन्नीधर्ममें प्रतिपालिस- पर्गे महा-पुण्य मातुं ... प्रिपदिन्दिन्तिदनयदे काव पुरुषायु महा-श्रीयुम- यि कायदे कान पापिगे कुरुक्षेत्रोबियालु वारणा- शिवानकोटि-मुनीन्दर कविलेय वेदायर कोन्दुदो- दयममाग्गुंमनुन मारिदपुदी-शैशाचर मन्ततं ॥ १६ ॥ बिरुद-रूवारि-मुग्य-तिलक गङ्गापारि खंडरिसिद। [इस देश में सेम...(.) समान नाराज कीधिवर्णन के परधान उहब है कि इन्होंने विरगुवन नरेश से गोविन्यादि माम को पास उसे पादेव और उमटेश्वर की पूजा हेतु गत निर्विको शुभ सिरान्त देव का पासालनदान ररिया। जो कोई इम दान का पालन करेगा वा दीर्घायु और वर गुन भागेगा पर जो कोई इसका विधेव करेगा उसे कुरुक्षेत्र इनारस में माता पितो, कपिटा गौधों व वेद पति की का पाप होगा। बेन को गाचारि ने हरकीर्य रिया है।] ४६७ (३९) ...रिसिदेवगे बिट्ट दत्तिय गरेय......

अन्न वारा पार aalunil ३८२ प्रासपास के ग्रामों के प्रवरिष्ट लेस साणेन हल्लिग्राम के लेप ४८६ (३७) (शक सं० १०४१) प्रीमत्परम-गम्भोर स्याद्वादामोप-जान्छन । जोयात्न लाग्यनाधाय शासन जिन-सामने ॥१॥ भ:मम्तुजिनगामनाय मम्पद्यताम्मतिविधान-हतरे। पन्याश्मिद इस्ति-मस्तक-फादनाय पटने पटोरमे ।। नमः मिभ्य ॥ नमो पोतरागाय ॥ नमो प्राइन्वाय ।। बस्ति प्रो-कोण्डमान्ये विख्याने देशिक गये। मिंहन्दि-मुनीन्द्रम्य गङ्गाग्य-विनिर्मित ।। ३ ।। भागे मागे.. पन्द्रित र ...बेनीमो मे पाये. पाया जाता। धलि मविगत पमहाशाम . .. नम्मी virt समें पागins मकवर्ष १०४१ नग विसम्यिम कारण गुद मन प्रशासन एम.मि.-Mati in विनि frreni K14 141 Mit. तो निaaritr kt' मपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट नेत्र दिय सारण हुनुमादिय गति नेल मनहल्लिविन्दा... मदिपुरक्कं हिरिय-वर घट्ट होद नये गरि हालु हिरिय...इत नजुगरे पेननिप...पहलु गङ्गसमुद्राक पल्या इषय दिनवि पदुवलु गरि यिन्तो-पतुम्सीमेयं पूर्चि ...अक्कन . नुप्रत्यधिवासद...पड ...गोम्मटपुरद पवृष- स्वामि मस्ति संटियरु...सेष्टि गणनारायण-सेहियु मुल्यबाद नहर-समूहममि माहिद मर्याद यिन्तीधर्ममं प्रतिपानिस पर्गे महा-पुण्य मा॥ प्रियविन्दिन्तिदनयो कार पुरुषायु महा-भीयुम- यि कायदं कार पापिगे कुरुक्षेत्रोलियोनु वारया. शिवानकोटि-मुनोन्दर कविनय वेदायर कोन्दुदी- न्दयसमाग्गुमेनुन मारिदपुदी-शक्षाएर गन्त ॥१॥ विरुद-रूवारि-मुग्ग-विलक' गहापारि संहरिसिद। [समें संस..(.) मा राज सव पर गांव किये बिसे माम को पार से पारसदेवर मरमा Emमित का पारा पाओगई दम पागायु भारोगा पर किया इमे दर मेमा पिपिरागीको infeat -पापोगा। बरिया। (३८८) ...रिसिवर्ग विद पतित गरय......

अन्तु यदि काण्ड भी पार्वदेवर पूजेगं कुस्कुटेश्वर देवा फरिच वि-दत्तिय गोविन्दवाडिगे मूडण-सोमेशा-पियर ३८२ प्रासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख साणेन हल्लिग्राम के लेख ४९६ (३७) (शक सं० १०४१) प्रीमत्परम-गम्भीर स्याद्वादामोध-लान्छन । जीयात्र लोक्यनाघस्य शासनं जिन-शासनं ॥१॥ भद्रमस्तुजिनशासनाय सम्पद्यताम्प्रतिविधान-देवो । धन्यवादि-मद-हस्ति-मस्तक-स्फाटनाय घटने पदीयसे ।।२।। नम: सिद्ध भ्यः ॥ नमो वीतरागाय ॥ नमो प्ररुहन्ताय । स्वस्ति श्री-कोण्डकुन्दाख्ये विख्याते देशिने गये । सिंहणन्दि-मुनीन्द्रस्य गणराज्य विनिर्मितं ।। ३ ।। [ मागे लेस की ५ से १. पति तक गङ्गाराम वही बर्मन है जो लेखन १० (१.) के नीसरे पद्य मे भागे । पयसा पाया जाता है। स्वस्ति समधिगत पञ्चमहाशब्द......नूमडि धन्यनन्य इमसे प्राग- विहर मक-वर्ष १०४१ नेय विलम्यि संमत्सरब फाल्गुण शुद्ध ममि ग्रहवाबन्दु शुभचन्द्र-सिद्धान्ति-देवा बाई परेय ग...ताण्टिगैरेय निम्ह लाइन हल्लिग होइ पहुंच ३५३ प्रामपाम के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख दिप सारय हुलुमारिप गति तंदूर मनहल्लियिन्दा... मदिपुर हिरिय-देवर घट्ट होद हम ये गांड हवलु हिरिय...ल्ल नजुगेरे बेकननिप...यसकल गङ्गसमुद्राके पल्या हायव दियि पदुवलु गहि यिन्ती-पतुस्सीमेयं पूर्चि ...न . नु प्रत्यधिवासद...पड . ...गोम्मटपुर पट्टण- स्वामि मल्लि सहियरु...सहि गानारायख-सेहियु मुख्यवाद मकर-समूहमुनि माग्दि मदि यिन्तीधर्ममं प्रतिपालिसु- वर्गे महा-पुण्य प्राकुं॥ प्रिपदिन्दिन्तिइनेयदे काय पुरुषायु महा-श्रीयुम- कायदं कायदे कारख पापिगे कुरुसत्रोबियालु वारया- चिनिकोटि-मुनीन्द्रर कविलयं वेदान्यर कोन्दुदो- दयसमाग्गुमेनुन मारिदपुदो-शैलाधर मन्तः ॥ १६ ॥ बिरुद-रूवारि-मुग्न-तिलक गङ्गापारि संहरिसिद। [इस लेख में बने... (४.) समान राज के सीनियन के परमात म्हख है कि हाँने विष नरेश से गोविराम को पार से पारवदेव पीर कुमारवर की जा तुत निशिशुभपद मिदान्त देव पावपालन का दान कर दिया। जो कोई म दान का पालन करेगा वर दीर्घायु और ma भागेगा पर जो कोई इसका विरुदेर करेगा इसे करपत्र बनारस में मात करोड अषियो, कपिला गौत्रों पर पति की या पाया। खेप से गहरवार ने किया ४८७ (३८८)...रिसिदेवगे बिट्ट पत्तिय गरेय......

अन्नामा पार पniti २८२ प्रासपास के प्रामे के प्रवशिष्ट लेर माणेन हल्लिग्राम के लेस ४८६ (३७) (शक सं० १०४१) श्रोमारम-गम्भोर स्याद्वादामाघ-तान्छने । जोया नायनाघस्य शामनं जिन-गासने ॥१॥ भद्रमस्तुजिनासनाय सम्पद्यताम्प्रतिविधान हेतवे । प्रन्पादि-मद हस्ति-मस्तकरफाटनाय पटने पटीयसे ।। नमः सिद्ध भ्यः ॥ नमेर वीतरागाय ॥ नमो अमदन्ताय । बस्ति प्रो- कोकुन्दाध्ये विल्याने देशि गये। सिंहन्दि-मुनीन्द्रस्य गङ्ग-राग्य-विनिर्मित ॥ ३ ॥ | भागीर पनि ता गराई म... योग मे पागे । पाया जाना बक्षित मधिगत पचमहारा मम प्रार- Trite पसल रिम-वर्ष १०५१ नय विक्षम्य 41 फागण गुड ममि ग्रहयारान्ड एमपन-मिनिना sist -निय mfa.ins मुग- ints free १५६ ... ना निनास्ति sit int पामपाम के प्रामों के प्रवशिष्ट पेम्ब २८२ विमीय सारण हुनुमाडिय गरि नेल मनहल्जियिन्दा... मदिपुरस्क दिरियावर घट्टा छदमय गरिनु हिरिय...इन नगरे कननिप...या गइसमुद्रपके पल्या सुपथ दिण्नंयि परतु गरि पिन्टो धतुम्मीमयं पूर्थि ...परून . नुप्रत्यपिवासद...प ...गोम्मटपुराण पख- सामि मलि सेहियरु...सेहि गणनारायण-मदर मुल्यबार कर समूहमुमिमादि मम्मद यिन्तीधर्म प्रतिपानिए. चार्ग महा-पुण्य भा॥ प्रिनिन्दिन्तिदनयर कार पुरुषायु महा-भीयुम. पिद कायदे काय पापिगे कुरसंधार्मियाच बाया. सिगरमाटि-मुनीन्दर कविजय परापारा- दयसमाग्र्युमेनुन मारिदपुदी-सेवार Radi हिद-रूवारि-माज-तिस गहापारि सानिय॥ [समें जेल 4. (..) मा un. finisteria पर पर गाEि प्राम परपुरा imatioभरात IEI परिणाम आगामी मागंगा पाit wu far.in में rit म. Unitel is fortn Munrial Ratia fort १८. (३८) ...रिसिवर्ग विशतिष परंप..... - मामा पार Hippinni - Ifnaif.! मानसा-naitik ३८२ भासपास के पानी के प्रवरिष्ट लेख माणेन इल्लिग्राम के लेरा ४८६ (३६७) ( शक सं० १०४१) प्रीमत्रम-गम्भोर स्याद्वादामाप-नाम्जने । जोयान नाम्यनाथम्प शामनं जिन-यामनं ।।१।। भःमस्तुगिनगामनाय मस्पताम्वविविधान-हतो। अन्यमाधि-मन-स्ति-मस्ता-रफादनाय पटने पटोयमे ।। नमः मिरभ्य' ।। नमो पोतरागाय || नमी पाहता ॥ स्वस्ति भी-कोण्डानाम्य विम्याने देशि गये। मिहयान्दि-मुनोन्द्राय गणनाम्यविनिम्मिते ॥ ३॥ माम.. पनि त ...नीयोपभाग या ant पति मधिगत पचमहाम मम वर्ष ११ वितबिमाण गुद मन प्रवास Unalist-al " नम्मर va+ Ur. तानिuttt मासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेख ३८३ दिग्धेय सारस हुलुमाडिय गडि तेलु मनहल्लियिन्दा... मदिपुरस्क हिरिय-देवर वेट्टक्कं होद हेमट्टये गांड हडवलु हिरिय...हल्ज नजुगैरे बेस्कननिप...बडकल गङ्गसमुद्रक्के चल्यद हडवख दिनेयि पदुवलु गडि यिन्तो चतुस्सीमेयं पूर्वि ...अक्कन..नु प्रत्यधिवासद...पदु......गोम्मदपुरद पट्टण- स्वानि मल्लि सहियरु...सटि गण्डनारायण-सेट्टियु मुख्यवाद नकर-समूहमुमि माडिद मर्याद यिन्तीधर्ममं प्रतिपालिस- पर्गे महा-पुण्य प्रस्कुं॥ प्रियदिन्दिन्तिदनंयदे काव पुरुषार्गायु महा-प्रोयुम- कयि कायदे काब पापिगे कुरुसेत्रोधियोलु वारणा- शिवलिंककोटि-मुनीन्दर कविलंय वेदायर कोन्दुदो- न्दयसमाग्गुमेनुन मारिदपुदो-शैलाधर मन्तवं ॥ १६ ।। विरुद-रूवारि-मुरस-ठिला गडाचारि खंडरिसिद। [इस लेख में खख ने...(१४.) समान राज के कीतिवर्षन के परचा उल्लंग है कि उन्होंने विष्णुवरन नरेश से गोविन्नवाति प्राम को पाश उसे पारवंदेव और कुम्पुटरवर की पूजा तु उस्त विधिको शुभ सिदान्त देवका पादरपालनर दान परिण। जो कोई हम दान काशन रेगा या दीर्घायु और वैभव सुख भोगेगा पर जो मे इसका लिम्र करेगा उसे कुरुत्र वरवार में सात करोड अपियों, कपिला गौमों व पणितो की हवाम पार होगा। लेख को गारि ने सीखं रिया है। ४८७ (३८) ...रिसिदेवगे बिट्ट पचिय गद्देय......

भन्तु येटिकापड प्रो पाचदंवर पूजेगं कुस्कुटेश्वर देवा कच्चिं वि-दत्तिय गोविन्दवाडिग मूहए-सोमे यास-विशेष ३८२ भासपास के ग्राम के प्रवशिष्ट लेख साणेन हल्लियाम के लेख ४८६ (३७) (शक सं० १०४१) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामोघन्लान्छन । जीयात्र लोक्यनाघस्य शासनं जिन-शासन ॥१॥ भद्रमस्तुजिनशासनाय सम्पद्यताम्प्रतिविधान हेतवे । भन्यवादि-मद इस्ति-मस्तक-स्फाटनाय घटने पटीयसे ॥२॥ नम: सिद्ध भ्यः ॥ नमो वीतरागाय ॥ नमो मरुहन्ताय । स्वस्ति श्रो-कोण्डकुन्दाख्ये विख्याते देशि के गये । सिंहणन्दि-मुनीन्द्रस्य गग-राज्य-विनिर्मित ॥ ३ ॥ [भागे लेस की । मे। पंकि त गजरात वही बर्यर है जो लेखन १० (२५. ) के नीमरे पच से भागे व पता पाया जाता है। स्वस्ति समधिगत पञ्चमहाशब्द......नमडि धन्यनन्द ॥१५॥ इमसे मागे- विहर मफ-वर्ष १०४१ नेय वितम्यि संग्त्सरद फारगुणः शुद्ध ममि ग्रहवारदन्दु शुभचन्द्र-सिद्धान्ति-देवा बाई परंय का...तोष्टिगरेय नि लाइन इल्लिग हो गई प्रासपास के मामों के प्रवशिष्ट लेख ३८३ दिव्य सारण हुलुमाडिय गडि तेङ्कल प्रहनहल्लियिन्दा... मदिपुरक हिरिय-देवर चेट्टकं होद इन्पदृये गडि घडवलु हिरिय...दल्ल नजुगरे बेस्कननिप...यडकल गडसमुद्रक्के चल्यद इवण दिनंयि पडुवलु गडि यिन्तो चतुस्सीमेयं पूर्वि ..घकन..नु प्रत्यधिवासद...पडु......गोम्मटपुरद पट्टण- स्वामि मल्लि सहियरु...सेटि गण्डनारायण-सेट्टियु' मुख्यवाद मकर-ममूहमुनि माहिद मर्यादे यिन्तीधर्ममं प्रतिपालिस- वर्गे महा-पुण्य प्राकुं॥ प्रियदिन्दिन्तिदनयदे काय पुरुषायु महा-श्रीयुम- कयिद कायदे कान पापिणे कुरुक्षेत्रोवियोलु वारणा- शिवलिकोटि-मुनीन्द्रर कविलेय वेदायर कोन्दुदो. न्दयसमाग्गुमनुने सारिदपुदो-शैक्षाधर मन्तः ॥ १६ ।। विरुद-रूवारि-मुग्य-तिलक गडापारि खंडरिसिद।। [इस लेख में खेखन...(२.) समान राज के कीर्तिवर्णन के पश्चात् उन्लेख है कि इन्होंने विष्णुपरम नरेश से गोचिन्नवाहिमाम को पार उसे पारव देव पीर कुष्कुटरग की पूजा तु न विधिको शुभ सिदान्त देवका पादमचालनमान कर दिया। जो कोई हम दान का पालन करेगा पर दीर्घायु पार बमव भागेगा पर जो कोई इसका विरोगा से कुरक्षेत्र व बनारस में मात कराह अपिणे, पिटा गोर्चा बवेश पण्डितों की हत्या ग पार होगा। बेश को गहापारि ने सहीणं किया है। ४८७ (३८)...रिसिदेवगे रिह दतिय गरेय......

३८४ प्रासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेख अडेत्ति कवि सेटियु मडना विट गरे सलगे भोन्दु कालग। [ इसमें कवि मेहि के कुछ भूमि के दान का उलंस.] ४९८ ( ३८६) श्री वृषभखामि (खण्डित मूर्ति के पादपीठ पर) ४८६ (४०० ) श्री मूलसङ्गद देशिगणद पोस्तक गन्छर श्री सुभचन्द्र सिद्धान्त देवर गुडिज- क्कियवे दण्डनायफिति साहलि...... ८ देवग प्रतिष्टय माडि जक्कियो..., ...डर मग पयमगद स......चुनरेय . ..दवालिय......यलु सलगे येरसे कालगं ५ गोविन्द-पडिय कालग १ वेदले फण्डुग। शुभचन्द्र सिद्धान्तदेव की शिष्या जविप ने मूति' की स्थापना कराई और गोविन्द याह की क्त भूमि अर्पण की। ] मुएउहल्लिग्राम का लेख ४६० (४०७) संवत्सरद मार्गशिरशु १०माबार ......न्महामण्डलापाग्य नेमिचन्द्र पतिदेवरु ......पट्टयस्वामि नागदेव हेगडेवुकेधौ...... .. नमगमार भासपास के ग्रामों के प्रदरिष्ट दस ३८५ गौर रेय कहिदन येन्दु पात हारिसुवुदिस्त ता वेरक प्रयदु इयविन दी वाले इवण मुरि सीमे भावन म..... पश्यन्त सलुवन्वागि काट पतले प्रतिदिन कविलय कोन्द।। [ पक्ष भूमि ॥ पट्टा है। इसमें महामण्डलाचार्य मिन्द तिवाव का कारा गया है कि मारगीर ने एक नारामापा इमरिए नागदेवगारे भार फेवगर मे उसे सदा वेटिए मत भूमि का परदे दिया। बैकग्राम में रस्सी के सन्मुख एक पाषाण पर (शक सं० १०१५) श्रीमत्परमगम्भीरस्यावादामोधशाइन । जीयात् घलोक्यनाथस्य शासन जिनयामनं ॥ १॥ श्रीकान्तापीनवचोरगिरिशिखरोग्जम्भमान विशालं लोकायत्तापजोपप्रवणविलसिवं वीर विद्विड महीपा- नंकल्यामुक्तस सोवनबटुलिवोधगुणस्तोममुक्ता. नीकं निकण्टकं निश्चलमेनलेस होरमलमत्र- वंशं ॥२॥ प्रदराल्मीक्तिकान्वे पुट्टिदनिलापाजीपचूडामणि- त्वदिनुद्यद्गुणशोभेयिं स्वरचियि सचराराजिव- प्रासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेस त्वदिनत्युनवजातिथि सममेनल्स ड्रामरकामवाल मदद्वैरिकुलप्रतापिविनयादित्यं पराधीधरं ॥ ॥ विनयादित्यन तनयं जननुवन एरेयजभभुजं तसनुभं । पिनुन विष्णुनृपाझं मनम्यि तापत्यं नेग.. नरसिंहं ॥४॥ 1 ॥ नतनरपाज जालक विशाजविजम्भितघालभासुरो- ततिज..... .. गलनाहवरजरामन जिंतनिजपुण्यपुपयलसाधितसर्च......... .........महोन्नति झपिन्स नरसिंह भुनं ॥५॥ * ॥ प्रा-नरसिंहनुपात भनुत पहमपि तस्मतिपादन । मानिनिय एगल नविय वानगुणग्यानबलपलतंयोग मा.. ...॥६॥ || ललनातील मुमोन्तु मानं पहिना-गुर्ग मध्यांक विक्षन नासिहमाधिपाए. मप्रिय परायपरिन पुण्यापि पर लात जयनुजयलाल भुषा तक। • ॥ गत ना मानानाम्यतmi prit मग गोमतYARNI पन। बाबाना नाना भार uratistry पोयमान भासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख रिपुराजद्राजिमम्पत्सरसिरु शरत्कालसम्पूर्णचन्हें रिपुभूपापारदीपप्रकरपटुरोद्भवभूतिप्रवाव। रिपुराजन्यौप...सलसा......लामप्रताप रिसपथ्वीपालजाज भिवयमनिवं धोरमल्लालदेव ॥ स्वस्ति समधिगत पञ्चमहाशब्द महामण्डलेश्वर द्वारावसी- परपराधीश्वर । तुलुक्वल जलपविलयानिल। दायाददुर्ग- दावामन। पाण्यकुलकुलकुघरकुलिशदण्ड । गण्डभेरुण्यं । मालिकयेण्टंकार । चोलकटकसुरकार । मामभीम । कलि- কামুগ্ধ। বন্ধৱসিলমনববর্ণ মনিঅবিনা। यामन्तिकादेवीजधवरप्रसादं । यादवकुलाम्यरतु मयि । मण्डलिकरामणि। कदनप्रपण्ड । मनपराल गर नामादि प्रशस्विसहित । श्रीमन त्रिभुवनमछ साहु-केगु-नधि- नोखम्यवादि-पनवसे-हानुलगा मुजपलवीरगङ्गप्रतापहो. रमबदाळदेवरु दक्षिणमहीमण्यम दुष्टनिप्रह-शिष्टप्रविपासन- पूर्वक सुखसयाविनाददि दोरसमुद्रतल राज्यं गम्युतिः ।। बपितामहविष्णुभूपालपादपयोपजीवि ।। ॥ नुने लोकाम्बिके मावे रूढजनक श्रीयारा यशो- विद यो-पालदेषि बलभे जगदिल्यावपुण्याधि । मुखनी श्री नरसिहदेवमपिवानी जिलाधीशनी. मित वनगेन्दो विदिखना श्रीजुल्लहण्याधिपं ॥१०॥ ॥ जनमतनुजामयिन् पनापबनितमिन्दवागलपंनिप।

प्रासपामपामा प्रारिष्टग जननुन पनलदेखिय- नुन पनित्रतादिनमलगतुरतयिनं ॥ ११ ॥ वत्पुत्र। विनुन-नयकीर्ति-मुनिपर वनकहभूत विदग्धवनिना। कनकाचजगुपनु चनवेरिमदेभसिंहनी-नरसिंह ॥ १२ ॥ स्वस्ति श्री मूलमहनिलयमूलम्तम्भ निरवविद्यावष्टम्मा देग्रियगण गजेन्द्रमान्द्रमधारावभासी परममयसमुत्पादि- सन्त्रासरूं । पुस्तकगच्छवच्छसरसीसराजविराजमाना। कोण्डकुन्दान्त्रयगगनदिवाकरम् । गाम्भीरनाकरकं । तपस्त्रीरुन्द्ररुमार गुणभद्रसिद्धान्तदेवर शिष्यर् महामण्डन चार्य नयकीर्ति सिद्धान्तदेवरेन्तप्परन्द ।। ॥ स्मररात्राम्युजदण्डचण्डमदवेतण्डं दयासिन्धु बन्धुरभूभृद्वग्नद्धमादबहलाम्भारासिकुम्भोद्भव। धरयोल्ता नेगल्दं भयक्षयकर लाभारिशोभाहर स्थिरनो-श्री-नयकीर्तिदेवमुनिपं सिद्धान्वचकेवरं ॥१३॥ तच्छिष्यर् ॥ उरगेन्द्रतीरनीराकररजवगिरिश्रीसिवच्छत्रगड्डा- हरहासैरावतेभस्फटिकवृषभशुभ्राभ्रनोहारदारा. मरराजश्वेतपङ्कहहलधरवाक्शाईसेन्दुकुन्दो- प्रासपाम के प्रामों भवशिष्ट लेख ३८६ स्करचन्चकीसिकान्त बुधजनविनुनं भानुकीर्ति- प्रवीन्द।।१४।। सिद्धान्तोद्धववाद्धिवर्धनविधी शुक्लकपर्योदत. स्वाराणामधिपी जितस्मरशरः पाराय॑पारगतः । विख्याता नयकीर्तिदेवमुनिपश्रीपादपद्मप्रिय- स्स श्रीमान्भुवि भानुफीति मुनिपी जीयादपारायधि॥१५॥ शफ वर्षद १०६५ नेय विजयसवस्मरद पौप्यपाल घोतिमङ्गलबारदन्दु उत्तरायण सझान्तियखि भानुफीति सिद्धान्त देवरनधिपतिगलागि मादि सद्गुरुगलप्प नयकोति. सिद्धान्तकवर्तिगांधागपूर्वकं मादि ।। पृ॥ मधळायुवगोम्मटेशविभुग श्रीपार्वदेवग- दू-धनुर्विशतिवीर्यकर्गवेमवी-मत्पूजेगं भाग । रुचिरानोकरदानकं मुददे बिट्ट येशनम्यूनु. चरित्र सले मेरुयुखिनेगयो-यालालभूपाचौ ॥ १६ ॥ प्रमादि गोम्मटदीत्यपूजेगवशंपाहारदान. तमा मुख्यानाति मारि विदित श्री भानुकोधिर। विमरजा-नयकीतिरेक्यतिगाकल्प मस्येपन सुमनस्क विभुम्लप विदिमिदं भी पीरयलालनि ॥१॥ माम मामे ।। (यहां सीमा का पर्सन) बेन घरधीमे ॥ वाचा परतावा (इत्यादि) जिन के . मण्डलेश्वर द्वारावदीपुरवराधोश्वर यादवकुलाम्बर मषि ३० प्रामपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख [चनरायपट्टन १४६] [ लेख नं. १२५ के समान होरपल वंश परिचय व वीरवठाउ- देव के प्रतापवर्णन के पश्चात् दलाल नरेश के दण्डाधिपति हुलका परिचय है। हुल यक्षराज श्री लोकाम्बिके पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम पद्मलदेवी और पुत्र का नरसिंह मचिवाधीश था। हुल पदभक्त थे। इसके पश्चात् कहा गया कि उक्त तिथि को गुणभद्र शिष्य नयकीर्ति के शिष्य भानु की प्रतीन्द्र को बहाल नरेश ने पारवं और चतुर्विंशति तीर्थंकर के पूजन के हेतु मारहल्लि ग्राम का हाल दिया। इसके कुछ पश्चात् हुलप ने बलालदेव से या ग्राम का भी दान दिलवाया ।] ४९२ हले बेल्गोल में ध्वंस बस्ती के समीप एक पापाण पर। (शक सं० १०१५) भद्रमस्तु जिनशासनाय मम्पद्यतां प्रतिविधानहेतवे । मन्यवादिमदहस्तिमस्तकस्फाटनाय घटने पटीयसे ॥१॥ स्वस्ति ममस्तभुवनाश्रय-श्री-पृथ्वीवल्लभ महाराजाधिराज पर मेश्वरपरमभट्टारक सत्याश्रयकुलतिलकं चालुक्याभरणं श्रामन धिभुवन-मल्लदेवर राज्यमुत्तरोत्तराभिवृद्धिप्रवर्द्धमानमाचन्द्रार्थ सलुत्तमिरे उत्पादपद्मोपजीवि। समधिगतपञ्चमहाशन्द महा पामपास पामो के प्रशि लंम्ब नम्पनर्माण मजपाण्डायनामावलीममात श्रीमन विभुवनमम्ल-विनयादिस्य-पोसलं ।। श्रामवादशमनमा जोगीहरचामदि- संमोहरामपिनराशिर प्रोनङ्गम्भन्मयिः। जीपानाविपचदर्पणमयिकचिन्तामणि श्रोधिष्णुनियास्तिो गुणमणिसम्याहामणिः एवंद मनु मुरभः मिदं शरमेन्दवा कृलिशागार। परवनितंगनियं धुरदाल्पागद मित्त विनयादित्यं ।। ३ ।। रक्कम-पोरमलनेम्बा- रकारमं यरेदु पटमनत्तिदहिदिराल । लक्कदममक मह. वक्कं निन्दपुर्व ममरमाणदात् ।। ४ ।। बलिदडे मजेदई मनपर वहंयाल्बालि वनुदिनभयरसवसदि। बलियद मलयद मलपर नयाल्कयिडुक्नोडने विनयादित्यं ॥ ५ ॥ मा-पोरमलभूप म. होपालकुमारनिकरचूडागरन ।

३९२ ग्रासपास के प्रामा के अवशिष्ट लेख श्रीपति निजभुजविजय-म- हीपति जनियिमिदनदटन एरेया नृपं ॥६॥ वृत्त । अनुपमकीर्ति मूरनय मारुति नाल्कनेयुप्रवद्वियय- देनेयसमुद्रमारेनेय पूगणेयेलनेयुरेशनेय टनेय कुलाद्रियाम्भत युद्ममेहस्ति पत्तेने. य निधानमूर्तियेने पीत्ववरार एरेयङ्गदेवनं ॥ ७ ॥ प्ररिपुरदास्धगद्धगिलु धन्धगिजेन्बुदराति-भू... र शिरदालु...ठगिल्ल .....एम्बुदु वरिभूतजे. श्वरकरुलोलु चिमिल्चिमिचिमिल्चिमिजेम्बुदु...पलिहि दुः ईरतरमेन्दोडल्कुरदं पालुवरामलेराजराजनं ॥८॥ कन्द । मुररिपुर पिडिव चक्रद हतिगं कमरिगमा-फणिध्वंसिय वि- प्फुरितनखद्दतिगमेरेगन करवाल्गमिदिर्चि बर्दुलार्परुमालरे ॥ ६॥ इमडि दधीचिमुनिगे प. दिमडि गुत्तर्ग चारुदत्तगत्तल । नुमडि रविसूनुगे सा- सिमडि मेलु दानगुणदिन एरेयङ्गनृपं ॥ १० ॥ मा-महामण्डलेश्वरन गुरुगलंन्तप्परेन्दई ।। श्लोक || श्रीमतो बर्द्धमानस्य वर्द्धमानस्य शासने । श्रीकाण्डकुन्दनामाभून्मूलसद्धामणो [गणी] ॥ ११ ॥ तस्यान्वये जनि ख्याते विख्यात देशि के गणे।

प्रामपापप्रामा के प्रवशिष्ट लंग गुणी देयेन्द्र सदासयी देवेन्द्रवन्दितः ।। १२ ।। जयति चतुर्मुपदेवो योगीश्वरदयवनजवनदिननाधः । मदनमदम्भिकुम्भरपदलनायकपक्षिनिष्ठुरसि ।।१३।। सखिया गोपनन्दवाल्या बभूव भुवनम्तुतः । वाणीमुग्याम्पुमालाकमाजिपामणिदर्पणः ॥ १४ ॥ जयति भुवि गोपनन्दी जिनमतलसम्मनधितुदिनकरः । देषिपगलामाया भक्ष्याम्युअप उपकरः ॥ १५ ॥ इच ।। जयाभिरामनभिमानमुवीधराधर वपी- मङ्गलमहिमवष्यभनिनबावजवन्दित गोपनन्दिया. वनय-साभ्यमप्प प कालदं निन्द जिनेन्द्रधर्मम गानृपाशान्दिन मिभूविय रूढियनेन्दे माहिदं॥१६॥ जिनपादाम्भोजभृङ्ग मदनमहरं कर्मनिम्मूलने वा. म्वनितारितप्रियं वादिकुल कुधरवसायुध घारु विद्ध- जना भध्यचिन्तामणि सकलकलाकाविद काम्यकसा. मननन्वानन्दादिन्द पोगलं नगल्दनी-गोपनन्दि. प्रठीन्द्र ॥१७॥ मयदे साहस मट्टमिरु भौतिक पाणि कडङ्गि पागदि. चोद ताज बुर चौद्ध तनदारद वैष्णय जावा- ग्भरद पाणु वेड गड पायंक चाक निम्म दर्पम सलिपने गोपनन्दिमुनि पुङ्गवनंम्य मदान्धसिन्धुर ॥१८॥ तीय जैमिनि तिप्पिण्ड परियवशेषिकं पोगटु- ण्डिगे याचस्मगलं काणि योगायल्क तपाद विडल ।

३६२ प्रासपास के प्रामी अवशिष्ट लेख ..एम्बुदु परिभूतजे- श्रोपति निजभुजविजय-म. हीपति जनियिसिदनबटन एरेयज नृपं ॥ ६ ॥ वृत्त । भनुपमकीर्ति मूरनेय मारुति नाल्कनंयुमतिपय देनेयस मुद्रमारेय गयेयेलनेयुरेशने टनेय कुलाद्रियाम्मतनयुद्गममेवदस्ति पत्तेने- य निधानमूर्तियेने पोल्सवरार एरेयङ्गदेवनं ॥ ७ ॥ भरिपुरदोल्धगद्धगिलु धन्धगिोम्बुदराति-भू... र शिरदालु...गिल्ल श्वरकरुलोलु चिमिल्चिमिचिमिल्चिमिम्बुदु...पलिदिए। चरतरमेन्दोडाकुरदं पालुवरामलेराजराजन ॥६॥ कन्द ॥ मुररिपुर पिडिव चक्रद हतिगं केसरिंगमा-फरिपध्वंसिय वि. एफुरितनखतिगमेरेगन करवाल्गमिदिचि बर्दुलार्परुमालरे ।। । इमडि दधीचिमुनिगे प- दिमडि गुत्तगे धारुदत्तगत्तल । नमडि रविसनुगे सा. सिर्मडि मेलु दानगुणदिन एरेयानृपं ॥ १० ॥ मा-महामण्डलेश्वरन गुरुगन्तप्परेन्दडे । रलोक ।। श्रीमती वर्द्धमानस्य वर्द्धमानस्य शासने । श्रोकारउकुन्दनामाभन्मन्नसनामयो [गयो] ॥ ११ aस्यान्वयऽनि ख्याते विख्याते देशिक गये।

भासपाम के प्रामो के मशिष्ट लेख गुणी देवेन्द्र महान्दयो देवेद्रवन्दितः ।। १२ ।। अयति चतुर्मुखदेवो पागोवाइयवनजक्नदिननाघः । मदनमदम्भिकुम्भस्यदलमायणपटिष्टनिष्ठुरसिह ॥१३॥ सखिभ्या गोपनन्याल्यो बभूव भुग्नस्तुतः । कापीमुम्बाम्जालकमाजिपामपिदार्पणः ॥ १४ ॥ जयति भुवि गोपनन्दी जिनमतजसनधितुहिनकर. । देशियगयामाण्यो भन्यायुद्धपादेवण्डारः ॥ १५ ॥ पत्त ॥ तुझयाभिरामनभिमानमुवमेघराघर' वपी- मालमिषभनिनावमन्दिन गोपनन्दिया- वाम-माध्यमप्र पत्रकालदं निन्द जिनेन्द्रधर्ममें गनपाकरन्दिन विभूतिय रूढियनेम्द माहिदं ॥१६॥ जिनपादाम्भोजभृङ्गमदनमहरं कर्मनिम्मूलनं वा. बनिठाचितप्रियं वादिकुलकुधवनायुध चारु विदू- जनपात्रं भव्यचिन्तामपि सकलकलाकाविद' कान्यकवा- मननन्तानन्दादिन्द पोगलं नेगल्दनी-गोपनन्दि- प्रवीन्द्र१७॥ मलेयदे सार मट्टमिह भातिक पालि कडशि यागदि. चोल व युद्ध बौद्ध सलेदारद वैष्णव गावा- भरद पार वेद गड पायक चार्वक निम्म दम सलिपनं गोपनन्दिमुनि पुड्नवनेम्ब मदान्धसिन्धुरं ॥१८॥ वगेयज जैमिनि तिप्पिकोण्डु परियल्वैशेषिकं पोगदु- ण्डिगं यात्तत्मगतं कहलि बनेगोयल्क प्रतपादं विटल।

. भामपाम पामों के प्रशिक्षक पुगे लोकायतने मानसम्मम्म परवाना भियनान्वित गोपनन्दिगिभोगासिग- मां ॥1 frefuयगरिमुसमुतिस्मादिगावली. যwখানখানাবাধি टिविलपमेयमावाभियरनेन्दु • Pavin frailej पाप गोपनन्दिर ।। MINIन सुधगम्य जनशासना. पनि मबागमतपदाधिशा-- HIHIगुणासमा गोपनन्दि नि. Mufilivness iगलि गानिमा १३१।। Hardillirtun. जानना Pानिमालकि. inf-मापनन्दिप ॥ २२ ।। HIT PRESI.1 भागमा पनि नेपयोमुपवार hamar आदिवार Hife ift-int 4414the start twit st... Mait attitut ...* Hit wiRI * * 118 Ent+fristiane मासपास के मामा के प्रवशिष्ट लेरा (स्वदत्ता परदत्ता वा-इत्यादि श्लोकों के पश्चात् ) श्रीमन्महाप्रधान हिरियण्डाधिप... ..मम्यश.. [ चमरायपट्टन १४८] [इस खेल में हारसल मोश विमयादिस्य और उनके पुत्र एरेया की कीतिक पान कहा गया है कि त्रिभुवनमल एरेया ने उक्त विधि को करवा पांत की बस्तियों के जीयोबार तथा माहारदान वन वन प्रादि के लिए अपने गुरु मूरमंघ देशीगण कुन्दकुन्दाम्दय के देवेन्द्र मानिक व मम्मुखदेव के शिष्य, गोपनन्दि पण्डितदेव राधनहाल व बोलिरका दान दिया। लेब में गोपनन्दि भाषाय्य की कीति पर्णित है। उन्होंन ओ जैनधर्म स्थगित हो गया था रमकी गानांशों की सहायता से विभूति बढ़ाई। गन्होंने मातुर, भातिक, शेषिक, बौद्ध, बार, चाम्यांक जैमिनि मादि सिमान्तवादियों को पराम किया इत्यादि। घल्लग्राम के पिरेदेव मन्दिर में एक पाषाण पर (शक सं० १०४७) श्रीमत्परमगम्भीरस्यावादारपसाधने । जोया लायनाघस्य शासने जिनशासन ॥१॥ स्वस्ति समधिगतपथमहारान्द महामणालेश्वर द्वारावती- पुरवरंधा यादवकुलाम्बर मणि मध्यपूडामपि मलप.

नयल्पापचयं नाहिदाखभिमत ससिद्धि मशिपिन ३६ प्रासपास के प्रामा के प्रवशिष्ट लेख रोलु गण्डनुरण्डमण्डलिकशिरोगिरिवनदण्ड तलकाडुगोग वीर-विष्णुवर्द्धनदेवनातनन्वयकम' यदुमोदलादनेकराम सन्वानदि पलिक्के । यदुकुलकुल्लादिशिखरदोल उदियिसिद दुनिरीक्षतेजोहत स- मदरातिराजमण्डल- नुदात्तगुणरत्रवाद्धि विनयादित्य ॥२॥ पातन तनय सफल-म. बोतल साम्राज्य लदिमयुं तनगेक. श्वेतानपत्रमागे पु- रातननृपरेणेगे पन्दन एरेया नृपं ।। ३ ।। मा-विभुर्ग नगर्द एचल- दविगमादत्तनुभयघल्लाल- श्रीविष्णुवर्द्धन- राविक्रमनिधिगलनुजन उदयादित्य ॥ ४ ॥ मनमाल्याराधिमाकादवनवेल्बुदम्यग्नेगमु- मिन पुण्य वीररपानलनपरोसन्यूननाय जगपा• नपत्यत्यागयोपापरणपरियत वारयिष्णुचिनीय ॥४ • निर व मावितरंनिए महाविया जाना मरमुन श्रीदिनीपं दास्यतनय कृप्यरालिका पहा ५० पनिमी भासपास के ग्रामा के प्रवशिष्ट लेख घर साटश्य बन्दं यदुकुलतिलक' वीर विष्णु नितीश ॥६॥ अदियमनाडिदेटिमने रोडिसि कल्तु नृसिंहधर्मने- हिदनवनोटमगुपिसि चेगिरि चेलिरियछि कल्तु को. दटिन कौरा नेगर्द कारनीतिसि पाण्ड यनोविदं यदुतिलका विष्णुधरणीपतिगोडदराद्धरित्रयोल ॥ ७ ॥ व ॥ अन्वदियमनदटसंदु नृसिंहवर्मसिहम कदनोलेच्चट्टि वैरिगल शिरागिरिगलं दारण्डवमदण्डदिन्दसरे पायदु फल पाल कुलमं कलकुलं माद्धि दगुल्दङ्गरन सप्ताङ्गमुमनेलकुलि- गोण्ड दक्षिणममुद्रवीर पर ममस्तभूमियुमने कच्छमछाथि प्रतिपालिमुच तलवनपुरदासुखसङ्कघाविनोददि राज्य गरयुतमिरे ।। ओवरविष्णुपद्धन- देवं पटवर्क पमुख श्रीपाल- विद्यप्रतिगी-जे. नावसवमनधिकभत्तियि माडिसिदं ।।८।। पासतेनेवा माडिसिदी- धमदियुमं वाडमिदरमम्बन्धियन- सेवा........ बमदियुम तीर्घदलि कोर्ट मुददि ।। पाकुलतिलक गुरुकुलमाद श्रीमद्रमियगवद नन्दिस- हद-रु.जान्वयदापार्यावनियन्वेन्दोडे । कम...महावीर- प्रामाम मामा भागिदम्म मामिग तो गोतमार्गधरान । पा-मुनियि निमारम- हामहि मानि..... ॥१०॥ गलिगनु पया मनांतराविम्यनिक वमन्तानी- प्रतियं ममन्तभद्र प्रतिपदिक ममस्तविद्यानिधिगल ॥ १ ॥ प्रवरिपनि कम एकसन्धि-मुमति-भट्टारकरवरि बनि वादीभसिंह प्रामकलदेवरवरि चक्रग्रीवाचापरवरि श्रीणन्याचार्य . यो राम्यवामुदि सिंहनन्द्याचार्य- रवरि श्रीपालमट्टारमरवरि प्रोकनकसेन वादिराजव. वरि बनि ।। इवर व्या .लेक म...मनिनुमिसु...प्रभा-सं- इतिचिन्दै वरसुतिपद्धनद्.. प्रधिकमे- रिखद किश्चित्करकिञ्चिन्यूनमंन्दु. ..नाप्पद... . जगत्पूतमाश्वयंभूतं ॥ १२॥ प्रवरि प्रोविजय वनविनूतरु शान्तिदेवर वरि...... वनद..... न ब्रतिपरु ।। भा-पुष्पसेन सिद्धान्तदेवरि बलिक ।। गतसर्वाभिमानंसुगतनपगतालप्रपाद कयादं कव..... नतनामयमात्रङ्गल नुडिगताल...नेनसत्पचि डोको- ... पादा- मासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट क्षेत्र नवनावहन्मताम्भानिधिविधुविभवं यादिराज...॥१३॥ ...शान्तिपेणदेवरवरिं बलिक्क ।। परतें सप्तर्टि यिं सम्भविकुमोदबुगुं प्राविहार्यगलेलं नरदिक्कु रोतियिन्दे-समवसिवियुमो-कष्टकालप्रभाव। पेरपिङ्गको महायोगियोलेने तपमुं योग्यतालत्मियुं कण- दरेपन्नागिप्पुदिन्दन्दनुपममपराठीवदिन्यप्रभाव । १४ ।। कन्तुवनान्तुमरद...यदोडिसि दुर्मदकर्मवरि-कि- कान्तमनेर ललिसि महापुरमाग दि ...ना-तीत्यनाधरेने रूढियनान्त कुमारसेन सै- दान्तिकरादमुज्वलिसिदर्जिनधर्मयशोविकासमं ॥ १५ ॥ मलं सन्द योग्यतय... संद दुर्दस्तपोविभूतिय पम्मि । कलियुगगणधररेम्बुदु नजना मल्लिपेण मलधारिगद ॥ १६ ॥ हास्याद्वादभूभृद्धवननुपमषट्-तर्कभास्वानसम्पा- दुधापान्धवादिद्विरदनपटेयं विक्रमौदियिन्दै विद्यासिहारविन्याप्तियाजे मुखियिसतिदु उत्साहदि विय-ग्रीपाल-योगीश्वरनंनिप महावादिमभसिहं ॥१७॥ प्रावन विषयमा पटत. काविलयभनिसवं प्रीपाल- .... .. प ४०० भासपास के प्रामो के प्रवशिष्ट लेख विद्यगद्यपद्य-व- चोविन्यासं निसर्गविजयविलास ॥१८॥ तमगाझावशमादुदुन्नवमहीभृतोटि यि. प्पमर्दत्ती-धरेगेयदे तम्म मुखदोल्पट-तर्कवारासि-के- भ्रममापोशनमात्रमादुदेनलीमातेनगत्य प्रभा. वमुमं फील्पडिसित्तु पेम्पि...ोपाल-योगोन्द्रना। वर्गत्यागद सूचिव- माग्र्गोपन्यासदलवु मार्कोलसन्ता. भग्गंङ्गमरिदेनल्के नि- रर्गलमादत्त ..वोर्य प्रतियोल ॥ २०॥ इन्तु निरवद्यस्याद्वारभूषणलं गणपोषणसमेतरुमागि वारी. भसिंह वादिकोलाहल तायिकार्तियेय निजान्वयनाममा नोलकोण्दु प्रन्ययनिस्तारकर श्रीमफल-मतावलम्बन पट तर्फपण्मुखरुममारसंसारब्यापारपरामुग्पकमाव भीपास विधवग्गे ॥ गल्यत्रयरहित. शत्यप्राममनुपमं घोहरिनुपर- पाल्यं मल्लकनान्वय- कल्यापिणभत्तिय वा मे ॥२१॥ मन्ती-बसदिय सटिव होण्यकारकी-म्य रिपिममुदायहाहाकानई कविगो वोग विष्णुन पोरसव सकपीरियलNIRRITY देव, पादिराज, शान्तिसेनदेव, कुमारसेन मैदान्तिक, महिपेड मन्दधारि प्रासपाम के मामों के प्रविष्ट लेख ४०१ कावेरी पारद हुयहाजेयजु शल्यदुरुषं सोयति तम्म पम- दियुम प्रीपाल विद्यदेव केधारे यरेटु भोधीर-विष्णु- बर्द्धनं काहिर सीमा सम्बन्धमेन्तेन्दोडे (पहां सीमा का वर्णन है) इन्वोपतुम्सीमयिन्दोगुष्ठदं मयाधापरिद्वारमागि बिटु को श्री वीरपिप्णुवर्द्धनदेव कोट श्रीपाल विद्य- देवरु तम्म मारिसिद होमल जिनालय के विट्ट तलवृत्ति बेल्दले पर मुन्दा हादरिवालोनगागि मत्ता नाल्कु अत्तिकैरेयुम' हिरियकरय फेज गरे मनगं ए मोण्ट प्रोन्दु दाइगर करे वोलगागि पतुस्सीमैयुम यसदिगं माटि बिटु कोट्ट भूमि पिदर सीमे मुग्लु फेमरकंगिनिद मराज हल नेक होन्नमरके दहे व दिरियरेयोलगरे बहग होमेमरक्क हाद {चरायपट्टन ४] [इम संस में होप्सल वंशविनयादिन्य, पायल और विष्णुवर्दन प्राप-चन के पातका गया कि विष्णुरदन पोसळदेव ने गतिथि को बस्तियों में जीणांसर तथा ऋषियों को माहारदान लिए श्रीपालविघदव ने यस्य नाम ग्राम का दान दिया। श्रीपाल अविद्यदेव अमिय संघ व पालाम्बय के प्राचार्य थे। इस अम्बय की पम्मा इस प्रकार से हुई है। महावीर स्वामी के पश्चात् गौतम प्रपर हुए। फिर कई अतरवलियों के पात्र समन्तभर प्रतीप ए । म पश्चान् कम से एम्सधिमुमति भट्टारक, वादीभासह प्रकटदेव, पथ्योराचार्य, धीनन्दाचार्य, सिनन्दाचार्य, भोपाल महारक, नाव, पादिराजदेव, श्रीविजय, शान्तिदेव, पुष्पसेनसिदान्तः दालंय बढे।

मदम्म परिपालिमुन दोरगर नेगोस्निान्सुनाम प्रासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेम्ब इंसरुच्चङ्गियकोटेय- नसदशभुजबलदे मुन्ने कोण्डरसुगला- रसहायशूरशनिवा- रसिद्धिगिरिदुर्गमष्यबल्लालनवाल ॥ १० ॥ एकाङ्गवीर शूद्रुक नाफारमनोजनयिसुरतरु तुरगा. नीकन्वर-वत्स-राजन- नेकपभगदत्तनस्ते बल्लालनूपं ॥ ११ ॥ गद्य ॥ यस्ति ममधिगतपञ्चमहाशब्द महामण्डल द्वारा वती पुरवराधीश्वर। तुलुप पलजलधि यावानन। पाय- कुन दावानल। मण्डलिकयेण्टकार चोलकटकसूरकार। वामन्तिकादेवीजयवरप्रसाद । विवस्यविनोदं । पा कुलाम्बर मणि। मण्डलिकमुकुटचूदामपि। प्रहार गूर नृपगुणाधार । शनिवारसिति । सदर्माधि। परि. दुर्गमध। रिपुररयसैध । पन्नाराम। रणभीम। वानप्रचण्ड । मनपरोलगण्ड कोनङ्गलिसलका नोडम्यवाहि पनवासहान माग भुजबलपोरगङ्गप्रताप होयसलबलालदेव सिमडोमा नामादिक्षित पिनी राम्यं गेग्युसमिर वसाद पोप मोरि ॥ नरवागमवरच्या- परपोपनिषतपनादाग्यो.

भागासामीप्रस मनुग्ननिप. farपुण्य पन्द्रमौलिमन्त्रिजामं ॥ १२ ॥ नुतनालन रानपिनुमा पयःपूरहा. -गुणामरिकन्दुकनकमनीयाएपो. fear पनपा पुनिल निरिमन- मनुसनापी-पन्द्रमालिसपि पन्य परयर भा-पन्द्रमौलिगसि जापायलागिपरणविभा. जापाम्बिक गुरुवागि रापारममेवे विभेयार ॥ १४ ॥ परियोनापने परमानने पनगापिस्सनामामा- मुर पिम्बाधर काबिलस्वने मुगन्धवासे पथचन- रवि शारकिनांनशं बसईसीयान सत्कम्युक. चपापसांविफन्तु सतियं सौन्दर्यदिन्दलिपल ॥१५॥ कि । मुविमुतायिना पक पन्द्राम्पिय मगर्मनिप सोपण ना- यकनग्य ठापियाना- विदेशिदण्डनायकं हिरियण्यं ॥१९॥ भयनामदुर्घभ यम्मय- नायकनिकी किरियपणे मा.

पासपास के प्राम के प्रवशिष्टलेस
रेयनायकं भगिनि च-
लियब्यरसि कामदेवनागिन वम्म ॥१७॥
भूविनुतनात्मजावं
सोवण्यं चन्द्रमौलि पति वनगे कला-
कोविदनेन्दन्दाचल-
देवियवोल्लोन्त सतियरासुमतियोल ।। १८ ।।
गौरितपङ्गलं नगन्दुतुं नरेदलाल चन्द्रमोलियो-
नारियर्गिनवे सोवगु पेल्पलवु भवदानिरन्तरम्
सारवपङ्गलं पडेदु वाम्तेरेदं गड चन्द्रमौलिग-
म्भीरेयेनिप्प वन्ननेनिपाचलेवोल्साबगिों नान्तरार,
॥१६॥
उद्गुरुकुल श्रीमूलसव देशियगण पुस्तकगच्छ काण्ड
कुन्दान्वयदोल ॥
क । विदित गुणचन्द्रसिद्धा-
न्तदेव सुवनात्मवेदि परमतभूभृ-
द्विदुर नयकीर्तिसिद्धा-
न्वदेवनेसेदं मुनीन्द्रनपगववन्द्र ॥ २० ॥
परमागमवारिधिहिम.
किरणं राद्धान्तचक्रिनयकीर्तियमी-
स्वरशिध्यनमलनिजचि-
परिणवनध्यात्मिबालचन्द्र मुनीन्द्रं ॥ २१ ॥

मामपाम मामा मशिर मंग मार गुनासनिपत्रिपारदम- दिर माडिदिनून नरकीर्तिम्यामागील भारशिप्याराम पालपाद्रमनिपादाम्भाजिनामा inৎৰি ৰিয়হায়াখ নথি ॥२२॥ ॥ कवर सिदनूरनाकय प्लपबमरद पोप. दिगे रामदुत्तरायमास्तियन्दु ।। Ther पन्द्रमौलिमा निज याचिकना- पोखमा मारिसित पायजिनेश्वरंगदुद्रपू. आनिगम्भयमहथियनिधनुरि कौर-प. सातनपास परंयुमषियुमुखिनमे मस्तिन ।। २३॥ वश्वनिपनियरिया नदनाचले पालचन्द्रमुनिराजमो- पदयुगम पूजिसि चतु. रुदधिवरनिमिरे कार्मि जिनपतिगिल ॥ २४ ॥ भन्तु धारापूर्वकमागि काह वयामसीमे (यहां मा पनिया में मामा पारायंच) मामन्महामण्डतापार्यनयकीर्तिदेवा यम्मेयनशियनु पवमादिप मारिसि श्रीपारवनायप्रविष्ठेय माडि देवराट- विधायनंगे सोमसमुद्रव फेरेय फेसगे मोदलंरियलिज गरे सलगे योड परगय हालिन पंदल नान्हवं नयीतिदेवर मारेय ४०८ मासपास के प्राम के प्रवशिष्ट लेख नायकन मग सेवण्नु गौड गोडनालगाद प्रजेगलं पाचन्द्रवाई पर सत्वन्तागि चिट्ट दत्ति मडुल महा भो । [अमरापान) [ इस लेप में लेख न.१ समान होयसळ वशी पखेरा ने. १२५ के समान होम्सलनरेशों का मान । बलालदेव के मंत्री पदमौलि भार उनकी धर्मपसी भारळरंग के और भादि का वर्णन है। सरपरधान कहा गया कि attो गड़ो भनि से बेल्गुल तीर्थ पर पार्वनाम मन्दिर निर्माण कराया और हमके लिए साउदेर से सम्मेपनाधि माम प्राप्त कर से अपने एक नपीति' मिलान्तरेव शिप पाउपत्रमुनि की पारपूजा " मन्दिरको दान कर दिया। मोगा के भाभाग में संरक महामणापा सवि सम्मेपनति में पहनती निर्माण माईपोर उसमें पायर भी प्रतिमा की मार कृय भूमि का दान दिया। ४९५ कुम्बन दल्लि ग्राम में सजनेय मन्दिर के ममीप एक पाषाण पर (लगभग स० ११२२) प्रामसरम-भोर-स्याद्वारामाध-साधने । यावास्यनाथस्य शासन जिन-गासने नमोस्तु॥ निरन्मदिनमा यागोडा लिया. बांपनियापनो माग पं पथि ift Y. प्रामपामग्रामों पर संग विपनाना मुनि पाएनन्द पामु गरि मापियन पारमानेमनामरि॥२॥ बनादियान बभनयाभूपनातन पुर्व बनकायमा यि प्णुरपास...नाम ॥३॥ परम-म. खामाश्यास्पिय वापनागपु. गन नृपर्गेखिसिद...सनातनपं ।।४।। २ पिनासम् वादिराजसमंतः। गौरव र गुनायामुप्रतिः कर्ष ॥५॥ पसंद योग्यतायन- सिद दुवपाविभूतिय पेम्पिं । पनि गुगगमरम्मुद्ध अगर मल्लिपेणमधारिगलं ॥ ६॥ वमगामायमाद्दुमतमहीभृतोटि सम्मिन्द वि. ०पमर्दची-परंगेयदे सम्म मुखोल्पतवारासिनि. भ्रममापाशनमात्रमादुईनडि मावनगस्त्यप्रभा- मुमकाल्परिसित पम्पिनेस श्रीपालयोगीन्द्रना। प्रवरमणियह भी वादिराजदेवरु सम्म सत्या पुम्वयन दक्षिय वाम गुरुगलिंग परोविनयमागि परवादिमजिनाल ४१० प्रासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख यमेन्दु कन्वसदिय माडिसि देवरष्टविधार्चनंग माहारदाना हिरियफेरेय गोडियदलिगद मनगे एरडु कोलग हत्तु प्रति तो विट्टि सेट्टियोरेयं प्रदर केलद यह सला एरवं समाया परिवारमागि विदति ॥ (समता परदा मादिरखोर) श्रीमन्महाप्रधानं माधिकारि तन्वाधिष्ठाय करमटा मापम्पनु माव बनग्यतुं देवर नन्दादीविगंग गायरा विहरु ॥ कण्डनायकन मदवलिगे रावनामिविय मम कुन्दारदग्गडे नवपळदेवर पेसरिमादिसिर यमदि । खति श्रामन्मदाप्रधान प्राधिकारि दिरियभण्डारि हुयल मेनन भधाभ्यसप हंगडे हरियाणा काह॥ भोपाल वियर शिष्या पार शान्तिमि पनि यभार पुत्र परवादिमन्नारण्डितयं भवर तम्म उमेयान मानन तम्म वादिराजोर पादिरास पारावी माधिकार कुम्पयन हायर देगर माडिसि [पापा [सस में पूर्ववत मान 40. 101 fnaमाह- मानिन गं पता भीपापी iist। aftattimein t unfrast frientiHOURana पnिe प्रासपास के ग्रामों के भवशिष्ट लेख महामभान पर्याधिकारी सभ्याधिधायकम्मर माषय्य तमा बनके रगर बलय ने जिगाउब में दीपक के लिए सेल रेस का दान दिया। उपनायक की भायां राम तपा नापकिति पुन कुन्दारहे ने नयरादेवी से बस्ती निर्माय कराई। इसी प्रकार महाप्रधान वांधिकारी रिय भण्डारी हुरूप में साले प्रश्वाध्या राय ने कुमपनष्ठि के देव की प्रतिष्ठा कमाई। शादिराजय ने ये दान श्रीपाल प्रेविर के शिष्य शान्तिसिंग- पण्डित व पावादिमतपति व स्मेयाद व वादिराजदेव को दिये। ] - ४९४ चन्द्ररायपट्टन में गद्द रामेश्वर मन्दिर के सन्मुख एफ पापाय पर (शक सं० १९०८) [ ऊपर का माग टूट गया है] ..अंगुरा पागचे सत्ययुधिष्ठिर......नवसंकाररधि- प्रायक..... यण्यन युधनिधियं ।। सागयिमुव गवाडिगे मागमन न . पुददराल । मिग दिण्डिगूर गावा- नगर पोट्रेनिपुहल्ले मोनेगनकहूं ॥१॥ फनकापलटदेशानु पनपथमं मुहिनहनमविनं।

४१० भासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट लेख यमेन्दु कन्नेक्सदिय माडिसि देवरष्टविधाने मारहाना हिरियकरय गोडियावधिगई मलगे एरडु कोलग हत्तु पनि । बिहि सेट्टियोरेयं प्रदर केलद यह सलो एवं सम्मान परिहारमागि बिट्ट दत्ति ॥ (सदता परता प्रादि श्लोक) श्रीमन्महाप्रधान मवाधिकारि तन्वाधिष्ठायक कम्मदा मायग्यतुं माव बलय्यनुं देवर नन्दादीविगेगे गागर मा विट्टर ।। कण्डनायकन मदवलिगे राचनायझितिय मा कुन्दार देगडे नपचकदेवर येसरि माडिसिद यमदि | स्ia आमन्मदाप्रधान सर्वाधिकारि हिरियभण्डारि हुम्ल पल मैमुन अधाध्यक्ष हेगडे हरियण्य फुम्बयनहतिय दंगर मारिस मोह॥ भोपाल विद्यदेवर शिष्यह पदम शान्तिपिङ्ग fuut गर्गोयुमार पुत्र परवादिमनमण्डितर्गयु भयर तम्म उमेयाणा भानन तम्म पादिराजन याविराज पायी माद्धि काह॥ [ पान सम में पवन बहार तक का it ifruas मारिन જૂન ખંના મા વળાવ છે , पिने गुरु वास होने पर परिan inst Fridarithish अनिता प्रामपाल के पामोशित लंग माधी सरप्राधिEमर मासपा राan में दीपक लिए जमादान रा पुसमा भात भाति के पुत्र कारगर AMAnबानी wिinा। Ram Ram RIMIn aired भण्डारी REPRENEU पतिदेवी मनिता राई परिसर रिचय शिष्यामिसिग. पमित पावामिcिa मेपादिराप दिये।] चतरायपट्टन में गहरामेश्यर मन्दिर के सन्मुख एक पापाण पर (शक सं०१९०८) [ अपर का भाग टूट गया है] गुण पागले सत्ययुधिष्ठिर......नवसंकाररधि- प्रायक..... याने धुधनिधियं ।। गयिमुब गङ्गलागि मागर्मन न ..पुदरील । मिग दिण्डिगूर शाखा नगर बानिपुरस्ते मोनेगनकटं ॥१॥ फनकापलटवानु धनपथमं मुट्टि नट्टनमोविनं ।

भासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ठ लेख यमेन्दु कन्नेसदिय मारिसि देवरष्टविधार्चनंग माहारा हिरियोरेय गोडियइनिगदे मलगे एरडु कोलग हत्तु धिता विट्टि सेहिया मेरेयुं भार फेलद याने सलगे पर सका परिहारमागि पिट दत्ति ॥ (सागो परदता भादि रखक) श्रीमन्महाप्रधान मोधिकारि सन्वाधिष्ठाय करना माचम्यनु माव पलभ्यर्नु देवर नन्दादोविगंगे गाया पिहरु ॥ कण्डपनायकन मदलिगे रावेनातिर मन फुवार हेगडे नययमदेवर पंसदमाडिसिद पमति ॥ बार श्रामन्महाप्रधान साधिकारि हिरियभण्डारि हुन पान भरपुर भधायगर हेगडे हरियण्ण कुम्वेयनहालय र माथि कार। प्रोपाल श्रेषियावर शिष्या पर शान्तिमित पर मार पुत्र परयादिमन्नगणित, भवर तम्म उमेगा" प्रानन नम्म पादिराजार मारि॥ पादिरास in [Hin {matain मा sna . Hit fusilamualit 4 पा tra internat ndian ifruain swimmine After all frientinue rela int भासपास के प्रामों प्रवशिष्ट लेश महाप्रधानमधिकारी सम्माधिनायकम्मर मारय सपा उनके रसार पारख ने विशालय में दीपक लिए तेवरेस का दान दिया। रचना की भार्या सर्व तथा नापकिति के पुत्र कुन्दार गरे मावीमाशा में बस्ती निर्माण कराई। मी प्रकार महासंधान बांधिकारी शिरिष भण्डारी हुन्छपके साने भरपापी मानष्ठि के देव की प्रविधा काई। वादिराजवनदान धीरार प्रवियय के शिष्य शान्तिसिंग- पति व पाषामितपति व रमेपार वादिराजदेव को दिये। चन्नरायपट्टन में गद्दरामेश्वर मन्दिर के सन्मुख एक पाषाण पर (शक स०११०८) [ ऊपर का भाग टूट गया है] ..अष्टगुणं पागने सत्ययुधिष्ठिर......नवसंकाररधि- प्रायक..... यण्यन घुनिधियं ।। स्रोगयिसुव गङ्गादिगं मोगमेने न ..पुदगल मिग दिण्डिगूर गावा. नगर बानिपुदस्ते मोनेगनकटुं॥१॥ फनकालकूटवाल पनपधर्म मुहि नट्टनम मुविनं।

...अध्येता श्रीपाळ योगीन्द्र का नत्र है। इन शिप वादिराजदेव ने अपने गुरु के स्वर्गवास होने पर 'परवादिमाल जिनाल ४१० भासपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लेख यमेन्दु फन्लेवमदियं माडिसि देवरएविधाच्चनगं माहारदाना हिरियोरेय गोडियहविगरे मनगएर कोलग हत्तु प्रति तु विहि सेट्टियरेयुं प्रदर केलद अहचे सलग पादुचं सम्यगाया परिहारमागि विट्ट दत्ति। (स्वदत्ता परदत्ता भादि रखक) श्रीमन्महाप्रधान मवाधिकारि तन्त्राधिष्ठायक कामटा माचव्यनुं माव बलय्यनुं देवर नन्दादाविगगे गाणद सुवं विट्टरु ॥ कण्डसनायकन मदवलिगे रावेनामिविय नम कुन्दाउदग्गडं नयचक्रदेवर बसदि माडिसिद यमदि ।। स्वखि श्रामन्मदाप्रधान सर्वाधिकारि हिरियभण्डारि हुम्लयङ्गल मेग्दुन प्रश्वाध्यक्षद हेग्गडे हरियण्ण कुम्वयन इल्लिय देवर मादिति श्रीपाल विद्यदेवर शिष्यरु पदद शान्तिमिङ्ग पण्डित गर्गेयुप्रवर पुत्र परवादिमल्लपण्डितर्गेयुं भवर तम्म उमेयाण्डग भातन वम्म वादिराजदेव वादिराजदेवर धारापूर्वक माडि कोट्टरु॥ [ इस लेख में पूर्ववत् वहालदेव तक होय्मल वंश के वर्णन वादिराज मष्टिपेण मलधारि की नीति का वर्णन है और किर निर्माण कराया और उसकी मावि जन तया आहार-दान के विरे कुछ भूमिका दान दिया। कोह॥ [चरायपहन ] मामपाम पामीप्रyिam महाप्रपामधsth सत्राधिय माया Matarika दीपक meam TAMIL मा Utailsinterem MARATHI fanient PMHAN REIRNM wailwaun elte kare. पा ArumerouTRaatmaniamant. सिlaterpinter uferefunylvan Mn.10atmauni ] पापम में गई रामet fers मृण एक पापाथ पर Dj Nium eight vak Twitter allujangaller m tmt fetuarse dritto - ४१२ प्रासपास के प्रामों के प्रवशिष्ट वेग मोनेगनापार्जन- जिन गृहमं रामदेव विनु माडिसिदं ॥ २ ॥ वद्गुरुकुलमेनेन्डे। श्रीनमकीर्तिसिद्धान्तकाचिस शिष्य। विदिवाध्यात्मिकबालचन्द्रमुनिराजेन्द्राशियश- स्तिदवन्यम्मुनिमेषचन्द्ररनपावरयामागरा- भ्युदयोसकगच्छदेशिकगय पोकोग्डकुन्दान्वया- स्पददीपकरमाप्पुवसुधयोलान्यतपादिमयिं ॥३॥ शकवर्ष ११०८ नेय विश्वावसु संवत्सरदुत्तरायण संक्रान्ति- यादिवारदन्दु बनबसेकारर मोत्तदनायकरु दिग्डियूरवृत्तिय गावुण्डप्रभुगलं मेलिनासिर शान्विनाथदेवरष्टविधाच्चने खण्डस्फुट जीर्णोद्धारक्कं ऋषियरादारदानम् मावावपरिहार- मागि मेघचन्द्रदेवर्ग धारापूर्वकं माडि विट्ट गदेबंदलेसल लेन्तेन्दडे। (यहां दान का विवरण है) [चवायपहन १६६] [......गनवादि के मोनेगन का दिण्डिगर एक शास्त्रा नगर था। मोनेगनकट्टे में रामदेवविभु ने एक विशाल जिनालय निर्माण करारा। रामदेव के गुरु, नरकीर्तिपिदान्चचक्रों के शिष्य मध्या- मिक पाउचन्द्र मुनि के प्रधान शिष्य मेवचन्द्र थे। वनस्से के कर्मचारी मोचद नायक तथा दिण्डियूरवृत्ति के गौण्ड पर प्रभुभों ने शान्तिनाथ भगवान अष्टविधार्चन तथा जीर्णादार व माहारदान के हेतु भूमि का दान मेघचन्द्रदेव को कर दिया।] उछ वियि ने घामपामग्राभीक माशिम सय ग्राम में पुरानी मगरी घनपा एफपापाण पर (समगध...) MAN-भाषामने। पायवाय ma HAIRA IN safirg श्री. मा untun 41. विw Iments बिभुषunt ifetailHHIvasini Mult Rv.in vitatulaviamentina Nit ५.सा. पnal 4. ५E HINo. sapta Musing ingat Inter naitin ....sina... Numtvnistruguantitati to take amitiet#*********** ". {५६ पास... ..kter anemes . .

माम पाम भागिर भीमाानुन-नागास PREETA Pirit....... धारमारमा राम भतmfNnnn प्रोयिष्णु पनि पानिप.. .. ...........ानिमि...। fulta मा पकिन ...पुरेनापमुगुमतिपोरन 11 ५ ॥ मारमा मेरे रायमाविताम मेरययुगी- मरिपान नरगु.......... ......मरे हानेगुमाई ॥ ५॥ पावन मति मुन्न नेगदा- मांतगहन्धतिगग.. दारयनत्रवाई भुवनदाने जम्फरगुनिवरिये ॥६॥ ......याने दण्यायनरयन...न जकिय सुतरत्र... ......एरगु... ...भरवशावलिगनिपा ॥७॥ अन्तवरन्टेन ॥ प्रोमलेगडे माचिराजगिरियोत्पुष्टुत्ते सन्मादि- न्दामात्रामादेवियम्ब नलिनीवासको सन्दाजन- मामपाम प्रामा कशि अंमें श्रीजिनमागवाहilt unlim पाम..... manarthi gatwalk wit ....... पाभियतन पारधारा पदमी ......सोन्यूvिarjitl.rs... । .. 4infi sairat auntihist vilai Awritainaliswaltime परमानमा !! patan in.4 a graitsa akck Alluata. RATHIMRAN 14-1. SATYAlist.gameli... Ramtirting titaneesthet wringtone प्रासपास के ग्रामों के भवशिष्ट लेख धारापूर्वकादि वग- दूरं वग्गलबम्मगट्टवं बसदिगे सले । धारिपियरियल्बिट्ट- भूरविशशिवारमेरुगनिलिनेगं ॥ १३ ॥ परमजिनेवरपूजेगे पिरिदु सद्भक्तियिन्दे फोडियकरय । वरगुणरायगवुण्डं निरुतं कल्याणकीर्तिमुनिपत्तिं ॥ १४ ॥ भूविनुतं कलि-बोप्पं दवङ्ग चरुगिों नेमवेडेय मर्ग। भूविदितमागे कोर्ट वावरेगरयल्लि गई खण्डग वान्दं ॥ १५ ।। फल्याणफीति कीर्तिम. वल्ल्युदय मूहजोकम भ्यापिसि फै. वल्यदोडगाड सले मा. पाल्यमुमादत्तु चिन्ने चिन्त्यालयोल ॥१९॥ (स्वदत्ता परदता वा प्रादि श्लोक) [Unान 101 [इम पेत्र में चालुक्यधिभुवनमत बस्विरन परिसर राय में यही मारे जाने पर पराम में शिवाय निर्माण कराये जाने व भविभागबामदाता धामपापक पार्मा र nि बापदायतु] श्री मRRC RIsm angr in 'राम'म मा । my - मथिए erarmiliun. भगta भी सम Meramani #ram यि ग्राम के भदाणपिनापन एक Int. (ग.....। भy IMAMATA Multय निमाल भो प...mmuta Intensin nav net गुलाब ARE - Min ! दुग बम Ngangal... 4 ४१८ भासपास के ग्रामों के अवशिष्ट लेख ४९६ मललकेरे ग्राम में ईश्वर मन्दिर के मन्मुख एक पापाण पर (शक सं० ११७०) श्रीमत्परम-गम्भीर-स्याद्वादामोप-लान्छन । जायात्रैलोक्यनाघस्य शासनं जिन-शामन ॥१॥ भभूयाजिनेन्द्रायां गासमायापनाशिने । कुतात्यध्वान्तसहातप्रभिन्नधनमानः ॥ २॥ पृ।। यदुवंशनितिपालक शरापुरी वासन्तिका...... मदनागिर्पिन......युराजित...मेल्पायेशा ल... ...जैन मुनीश्वर पिडित.. .....पो......॥३॥ मा होरमलान्वयदोल ॥ । भूनायासेव्यपा निसिलरिपुमहोपात्रविषम लो- कीनारा वैरिभूभृन्मगगहनावन्ताने दुर्गप्र...... .ना...रामनंघामया......श्रीजनाम वानेन्दोविश्वलोक...मलिसि वीरयरसालभूपं ... गोपटिगानपनिया गांपति......वाग मास पाम पामा % wiftem ifaiदा., गोपनि घरलालगाम नरगिट ॥ । 1॥ जिया पनि पागज HIREE .. stallenius in , पर mangingRH या. आगामप्रयासपा नामा-पाज haili Cale माम Hamullani rat are it . 104lmunliminatri" Janut lagvilm मा.10auritvanvant 4 .. म '। धाniaTalMonies 14 . "a-heirth ४२० आसपास के ग्रामों के प्रवशिष्ट लस श्वरदेवरु दक्षिणमण्डलम दुष्टनिप्रहशिष्टपरिपालनपु. व राज्य गेवुत्तमिरे। तत्पादपोपजीवि सेनानायशिरोमथि वन्दिजन-चिन्तामणि सुजनवनजवनपतङ्ग राजदलपव...सलिग फलिगल दुश स्वामि- दण्डेशनेन्तप्पनेन्दडे ॥ ॥ श्रीयं विस्तीर्णवक्षस्थलनिलयदो...... श्रीय कूलि केलीसदनदोलोलविं तादि विख्यातकीर्ति- श्रीयिन्दाशान्तम रखिसे निजविजय...स्वान्तजा... ...य्यि सैन्याधिनाय नेगल्दनुरुगुणस्तोमनु/ललान मातननुजं ॥ फ।।...देत्त......... ...सिरम ब्रह्मसैन्यनाय सिप्रं। धुरदोलतिचतुर निज- "वीर""तिगे सिरदा'"तिय||| मामन्त्रि॥ मालिनी || मनुचरितनुदार वत्समन्त्रिप्रगल्भ जिनसदनसमूहाधारसारानुशा...म् । वनगे... .. . प्पिद पूर्णपुण्यं जननुतविजयण्णं मन्त्रिगोत्राममण्यं ॥१०॥ क॥ कामं कमनीयगुणं धोमन्तसिराजगन्धनलित....... .

प्रापपाम * प्रामा unforum श्रामजिनपदमिनuygyntzianteita छाननी ।। VITAftemalnira grmiliasingi गाफाय्य if any healtite TAImunintmमान भvaluattrist.tit " मायामा । ५HANN काpिitainmeHIRin म स...tituals .........

२ अभयचन्द्रक ३३३ भू. १६१. इन्दनन्दि ५४, २०५भू.७७,१२- अभयनन्दि पण्डित २२ भू. ११८, १२८, १३, १४५, १४८, १५२. १५३. | इन्द्रभूति (देखो गौतम) ५४, १.५ अभयदेव ४७३ भु. १५६. भू. १२५. अभयनन्दि,त्रै यो के शिष्य ४७,५०. | इन्द्रभूषण, लक्ष्मीसेन के शिष्य, ११९. अभयसूरि १०५. भू. १६१. अभिनववारुकीर्ति प.आ. १३२, भू. | ईशान १९४. ४६, १६०. अभिनव पं० पंडितदेव के शिष्य, | उग्रसेन गुरु, पहिनिगुरु के शिष्य, ' १०५, ३६२. भू. १३५, १६१. भू. १५.. अभिनव प. आ०४२१ भू. १६.. उत्तरपुराण, गुणभद्रकृत, भू.३.. अभिनव श्रुतमुनि १०५ भू. १३५. उदयचन्द ४२,१०५,१३७.भू.१५९ अमरकीर्ति, धर्मभूषण के शिष्य, १११ उपवासपर, वृपभनन्दिके शिष्य, 10. उल्लिकलगुरु ११ भू. १५०. अमरनन्दि १०५. ऋ भरिटनेमि पं. २९७ भू० ११८ ऋषभसेनगुरु १४. अरिद्वोनेमि २५भू. १४. अरिष्टनेमि गुरु १५२११११,१४९. | एकत्वसतति पयनन्दिकृत भू. ११२ अफलान्वय ४१३ भू.१३६,१४८. एकसंधिसुमतिभधारक ४९३, भू. अर्जुनदेव १.५. भईहास कवि १.५ भू. ३८. अइंदालि १.५ भू. ५९, १३४. अविदकर्ण, पद्मनन्दि व कुमारदेव गोला- चार्य के शिष्य ४. भू. १३३. अविनीत भू. १२८. भाजीगण २०७. भायंदेव ५. भू. १३९. बगुलेशनति १.५, १.८, ११९५० कनरसेन वादिराज ४९१२ ॥ कमउभद्र ५४ भू.१." कष्णन् कन्ति (आर्यित्र).. कनकचन्द १३भू. १३. कनकनन्दि ४०, ४४, २५१५०" १५५, १५८. | कनकनी कन्ति (मारिका). कनकसेन, पदेवमंत्री गुरु, " 4 h• • • • •ા, wash મમે ૧. મનન, ધn: 1, ", છે, પાAિ, કાળદેશિક, શ્વ મbણામ ૧૦ ૫ ૧૧૬ હમ છે u : “' thક, બઢાળખાં ! પ્રમ કદનના : વાત (ઇ, ૧૮ અ ૧૧ 14 t" - પૂ. mandu j • • was 59,, ,, ૧ ( બsus, 1+ study + 1) • બ( In - ४ गम्हविमुक, मापनन्दिके शिष्य, ४०, बाहुबलि ४५, ५९, ८०-९६, २४१,३६८,३६९, भू. १३२, १०३,१०५-१०७,११,११, १५५. ११५, ११८, १९, २२, गण्डविमुफ म-कुक्कुटासन म०, १३१, १३४, १३५, १४, दिवाकरनन्दिके शिष्य ४३. १४३, ३१६, ३२२, ३२९, गण्डविमुक्त गोलमुनि-म. हेमचन्द, ३३०, ३५६, ३५५, ३५, ५५, भू० १३३. ३६., ४१५, ४२1, ४२५, गण्डविमुफ (वादि चतुर्मुख रामचन्द्र) ४३३, ४३६, ४५४,४८६. देवकीर्तिके शिष्य, ४. भू. ११२. | गृद्धपिञ्छ ४०,४२,४३,५०, १०५, गण्डविमुक्त सि० दे०५.. भू. ३९, १०८, २२९ भू. १४० ९३, १४, ११.११८,१५३. | गोपनन्दि, चतुर्मुखके शिष्य ५५, गुणकीर्ति ३. भू. १५१. ४९२ भू.५३,७५, ८७,१११ गुणकीर्ति १०५. १४२, १५३. गुणचन्द ('भद) ४२, ५५,७०, ९०, | गोम्मटसारवृत्ति ( अभयचन्द्रकृत) भू० १२४,१३५,४९१,४९४, भू. ७२. १६.९७, १३३, १४६. गोम्मटेश्वरचरित (अनन्तकविकृत) गुणचन्द्र ४३१ भू. १५९. २३, २७, ४८,१.५ गुणचन्द्र म. दे., शान्तीश के शिष्य, गोशाचार्य ४०, ४७,५०, भ." भू.८२. १३२, १४२. गोवर्धन १, १.५, भू• ५६, ५, गुणदेवसरि १६. भू. १५१. ६.६२,१२५. गुणनन्दि, बलारपिञ्चके शिष्य ४२, गौतम 1,.,४२,४१,४०,५०० ५४, १०५.१.८,14 गुणभा, जिनसेनके शिष्य १०५ भू० भू० ११, १२९-131, पुणभूषित २१ भू. १५.. गौलदेव, 'मुनिम- हेमचन्द, मो. गुणसेन १,५४ भू.१४., १५..। नन्दिके शिष्य, ५५० गुप्ति गुप्त भू.६५, १२८. गुम्मट, देव, नाय, 'स्वामी, "टेश्वर, चामुंश (भनन्नि) ५५, ११, गोमट, देव, 'टेश, टेभर इत्यादि भू.११. गुणदेव ४७.

पास ५. भ. 11, Lifignifiten ... vertild rt, 1, ५, ११, पाA ... ...१५, ११.म.utt - 11 1"., 11, 1, १५,mith. १५.१५१. ... ५. ५४-.,. ,,, Retri, .. पायु mait.1 Air, Rataun hain...। -- Kuw, NRS 100 . १ ६ जयभा १.५ भू. १२६, १२५. विठोबार (नेनिचन्दत).३.. जठजस्व १.५. विठोक प्राप्ति (प्रय).३.. उसकीर्ति यश-कीर्ति, गोपनन्दि के ग्रत्तयोगी ४३१५६. शिन, ५५, १२३. चैनलयोगी गोडाचा केशिन, जिनचन्द ५५, १.५ भू. १३३, ५.भू.१३,१४१. 1४२. विय ५,५०,५४, ५६० जिनन्द, कुन्दकुन्द के गुरु. १२८. वियदेव ॥४. जिनसेन ७,५०,१०५, ४२२ भू. २४, ७६,१३४,१६१. पतिप्पारा-भदभाहु भू. ५९... जिनेन्दबुदि-देवनन्दि ४., १.५, दक्षिमकुक्कुटेश्वर-गुम्नट १. १.८ भू.१४१. दापाठ, मनिसामरके शिघ,५४. जैनाभिरेक (पूज्यादात). भ. दयापात पं. (महापूर) ५४म. बनेद (म्पारण पूज्यपादस्त) ४., ५५, भू.11. | दर्शनसार ( देवसेनाव) भू. ४. a दामनन्दि, रविचन्दके शिम ४१ तयारल गच्छ ५..भू. 16. तत्वार्थसूर ( उमास्तातिहत ) १.५ | दामनन्दिदारनन्दि, ( नरौतिक भू.१४.. पि)१२, १... तत्वार्थसूत्रटीश (स्विोरिहत) १.५ | दमनन्दि, सुखदेव लिप्य, ५१० भू.11. भू .. पोभूवन 1.4 रिभिरणमा १०... anाई ३.४९६. दिवाकरमन्दि, पदनिधि तोवंद गुरु १२. १११५.११४. त्रिदिवेशनम् देवमप १.५ देखत्रीति, विमुच किया, त्रिभुवनदेव, देशदि के मित्र, .-.५६.१५.. विनुदेश, मोपनान्दथि, ५५, दिन .......... सनिन्दिर मा... विरानन्द, मानन्दनिय ५५, मू. 1१३.

भी कान (भाnि). | भमण, ourfu १.५, १.८ भ.४५ ... बिसेन (दर्शनगार ) m. vt. 'ukar Use' fra येन, मादक fort,.., धर्म ... " ... न, मनुषINMn. items ... । ... भ ... म मा uTRAM. भून १०५. wptta kim, Hum.............." .. . 4 . - . । ६ ..

गालग्न, अभरपद शिपाभरमाहुबलिस्वामी it. भरत र भरतेवर ५.14 गावरन्न, मानन्दि सिप, ५५ भू.भानुधति, गाविमुपदेस गिध. बाससरस्सो उ., ५५ भू .. गानु (देमो बासरन्य, अभयर- भानुप्रीति, नीति शिष्य . जादुगर (भुस्पति, दोलि,) देसो २२९, ११, भू... " गुम्मर ५,६५. १५.१५४,१५५,१५. बागी पनि भू. १० .. भानुमति, मापनन्दिस्यि, ९, दिन.५ ५.११,११६. पा (मरणात) भू.५६ भानुचर, त्रिभुरानामगु, ir.4. गोमोम्मोपा नरित भू. ५. पण दि.५५. २२. भुत्रपरिचरित ( पण ). वाम्यन..." बमाणमार, अमर विभ्य, भुवि शतम् (ोपाल).. सस (ONIL) न.२, गुनी.11. भनि मनगमम...insfor 1.५ - मा11111.4.1. Muke) ५१, मामा......11. HTI.. ALAN, 4, १९. Atit, ARAN . ....:MiA1 को (4} " { MARATrust मउधार देव भू. ११७. महेन्द्रचन्द्र ५५ भू.१३. मलयानि देव, धीवरदेवके शिष्य ४२, महेश्वर ५४ भू.12. ४१. माधनन्दि १.५भू. १३४. मलभारि, नयनन्दिविमुफके शिष्य, माघनन्दि, कुमुदचन्द्र के शिष्य ११९ ३.४ भू. १५२. माधनन्दि, कुलचन्द्र के निप्प ४.म. मटवारि महिषेण, अजितसेनके शिष्य, ५४, ४९१, ४९५ भू. ११६, मापनन्दि, कुलभूषण के शिष्य ... भू. १३५,१४,१५८. मलभारि रामचन्द्र, अनन्तकीर्तिके शिय, माघनन्दि, प्रमिगुप्त के शिष्य • १३८. मापनन्दि, पतुर्मुसके क्षिप्य ... मउभारि स्वामी 10 भू. १५ मलपारि हेमचन्द, गोपनन्दिके शिम्य, माधनन्दि, पारीत पिष्प " ५५भू. १२३. भू.12.. मापनन्दि, नीतिक aur महिरेण भू. १५८. मारिन भारत भू. 16 मापनन्दि, धीर fram. भारनदि भारक, भानु11tom मबिसेन, लक्ष्मीनके शिष्य १. भू. मापनदी.१५.1.. महरे भू.१५1. भाधना..भू..." महाममालाबार्य ... .९, ११, साधना..." १९९.11.20,४०५,४४५, मान1ि.५ माRAAT, मुषetter .. पहावीर.५५.११४. | माण, देवतtee. महावीराचार्य (तिसार). मविदेव १५1. . महाब (देखो माक्षेत्र) feet.५५ .. मा. () ११.

मुनिग्न्द्रदेव, उपपचन्द्र के शिष्य १३७ मौनीगुरु २, ९ भू. १४९. | मौर्य १.५भू. १२५. मुनिशाभ्युदर चिदानन्दहत) य यशोपाहु १.५. मूलसंप ४., ४१, ३, ४५-५०, ५३, ५५, ५६, ५९, ३, ४, यशकीर्ति, गोपनम्बिके सिय ५५ ५. ५.,१.५,११,१२,१२, ११२,११५.१४३. १३.११२,३७,१३,१४४, यशपाल भू. १२१,११५. २२१,१७,11-३२०,२४, यशोबानु भ.१३. यशोभा भू. ११,१२. १४३२,11,114,३१, 01....,.1,४९१, १४ रनकर भागनार (समन्तभाग) .१९,५..भ.१.१, १२९, १.१५,111..| रत्ननधि, सरितमीनिशिय. अपचन्द्र, गुणचन्दो सपने, .२ अपनन्न, नयीनिके शिष्य, २. रएनमालिसा (भमोपात).... मेषत बालरी शिष्य, विचन्य, कलावना विप मेषचन, मारमान्द शिष्य, ५५ भू. रविन्ध ५. १५. राधापानीय (युत महत).. पचयरामगु... पन, मरण...' Tam.111 ११, ११, ११, ११, mantran (Tast) . मी मन (मा)... मेलन २९.1..,11 बकर... 14 माम 11 हासमदेव १२२ भू.11. लक्ष्मीसेनभधारक २४७. वादीभसिंह ४९.. वायुभूति १.५ भू. १२५ उसणन्दि, देवकीति प..विष्य | घासदचन्द्र, चतुर्मुख देवके शिष्य, ५१ २४.भू.५६, १५७. भू.८१,१६,१४३ लक्ष्मीसेन, राजनीतिक शिष्य १९, विजय १.५ भू. १२६. विजयधवल (प्रथ). विद्याधनप्रय उ• ५४ भू .. कविवधर्ति, अनन्तीति के शिभ्य भू. विद्यानन्द १.५ २४,५०. विनीत १.५ भू.10 डोर (लोहा), १.५, भू.११ विमलवन ५४ ५.१९ ११५, १११,१२५. विद्याख,..५५.५०,५९.६१, ध वरुपय ५५, भू. ११५,४६. विशोक भारक.५.१५.. कमीष ५४, १७.१७ 10. विष्णु १.५ भू...१,१५. अनम्दि ५४ भू.14. | विष्णुदेव 1.१५ पदेर ५५भू .. पोरनन्दि, भंपन्न.tou, 1... मानदेव ५१ भू.१५५. समानारायं. ५. बीरबन्दि, महेन्रfit tow, ... दीप,५.. पदेश १.५ भू.10. रसुदि.५. सदियोलाहल,५४,१. पादिगण १.५. IN 4. पादिfar... .. पादित viv. .. (EUR).... 7 पारिराज, रिसामा५४,५. vasi.५४... 6 (THERea).

शशिमति गन्ति ( आर्यिका) ३५. शुभचन्द्र, गं• वि. म. दे. के शिष्य, शाकटायन सूचन्यास भू. १४१. शान्तकीर्ति, अजितकीर्तिके शिष्य ७२ ९., १३९, १४४,३६,४१, भू. १६२. ४४७, ४८६, ४८९ भू.४६, शान्तनन्दि २२४. ९१,९२, १५३, १५५. शान्तराज पं. भू. १९, २१, ३३. शुभचन्द, माघनन्दिके शिष्य, ४१ शान्तिकीर्ति ११२, ११३ भू. १३७ भू.९५,१३०,१५८. शान्तिदेव ५४, ४९३ भू.८६,१३५, शुभचन्द, म. रामवन्दके शिम ४१ १४०. भू. ११२. शान्तिनाथ, अजितसेनके शिष्य, ५४ श्रोसीर्ति १०५, भू.१४०. श्रीदेव १४५. शान्तिभारकाचार्य ११३ भू. १३७. श्रीदेवाचार्य २१३ भू. १५२. शान्तिसिंग पं.४९५ भू. १५८. धीधरदेव, दामनन्दिके मिष्य,४२,४३. शान्तिसेन १५-१८ भू०५६, १४९. श्रीनन्दाचार्य ४९३ भू. १३५. शान्तिसेनदेव ४९३ भू. १३५. श्रीपाल ५४,४९१.४९५, भू.८० शान्तीश, गुणचन्द्र म के गुरुभू.०२. ११,१३,१३९,१५८. शानसार (य) १२९ भू.१... श्रीपूरान्वर ( देखो प्रान्वर) २१. शिवकोटि, आचार्य, "सूरि, समन्त. भू.१४७. भरके गुरु, १.५भू.१३४,४१. श्रोभूषण १.५. शुभकीर्ति, चतुर्मुखदेवके मिष्य, ५५ धोवर्धदेव ५४ भू. १३०. श्रीमति मन्त्रि (भार्षिभ) घोविजय ५४,४९२९. ७५,१५, शुभकीर्ति, देवकीर्ति के शिष्य, ४. भू. श्रीविहार ( उत्सर) ४१५, १६. शुभकीर्ति, देवेन्द्र विद्याकीर्ति के सिम्य, श्रीसंघ १३.. १५. १३१. श्रुतगति..., १.५, १. भू. शुमकीर्ति, बालचन्दक शिष्य, ५०, ११५, १४१. १८८५.१५५. युतमेवरि ४.,५४, 1.५, 1.6. धमनन, रीतिमिष, .. भक्ति (म) ५. भ.

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१४१. सिंहनन्दि ५४, ३५४, ४८६, भू-सोमसेनदेय ३१ भू. १६०० ७१, ७२, १३८. स्थलपुराण (प्रथ) भू. २३, २५. सिंहनन्दिभावायं ११३ भू.१३७. स्थलगद भू.५७. सिंहनन्यावार्य ३५४, ४९३, भू० २६ स्वामी ५४ भू. ८३. १३५, १६.. स्वास्थ्यशान ( पूजंपादकृत) ... सिंहणाय १०५. सिंहसंघ १०५, १०८ भू० १४५. सुजनोत्तंस-बोप्पकवि ८५. हनसोगे शाखा ७. भू. १४६. सुधर्म १०५ भू. १२५-१२५. (हरिषेण (कथाकोपकता) भू. ५६. सुभद्र १०५ भू०१२६. हलधर १०५ भू. १२८. सुमति देव ५४ भू. १३८. हिरिय नयकीर्ति ८९,४५४,४७५. सुमतिशतक (सुमति देवकृत) ५४. हरिवंशपुराण भू०३०, १२५, १२५. 'सुरकीर्ति ४३१ भू. १५८. सेनसघ १०५,१०८. हेमचन्द्राचार्य (०) भ• ६६. सोमदेव भू. ७. हेमचन्दौर्ति, शान्तिकीर्तिके सिय सोमचन्द्र ११३ भू० १३५ ११२.भू. १६.. सोमश्री (आर्यिका) ११३. हेमसेन ५४ भू०१३..

अनुक्रमणिका २ इस अनुक्रमणिकामें जैन मुनि, आर्यिरा, रवि प्रकार के नामोंचा समावेश किया गया है। नाम के पथा- भू. पचा असे भूमिकामा दापर्य है। इस अनुममियमें निप्रळियित संताक्षरोका प्रयोग: उपाधिको..काजामनरेगा.म. गंग राजमार | T.ग्रंथ पापाम। 4. म.गाव बालश्य नरे। पामुपामुणराय । पो. रा. बोरा पोउ सेनापति । जा.आतिजे. मग मदिरा विका दुन्दुग। विद्वतीय । न. निगर-14 नोरम नो । पा.राज्य सरकार पु--पुष बिकपि। पी.न.पारापिक नरे। प्रअपमा मे..- मैसूर नरेश मी..ीय मरेपा । (रा.न.पार मरेप। एरामार। रा.भाजा। विजयनगर न अंगुनाग नरेश । सर-मादार सरो सेनापति हो..होप्सउ नरेश। अपालमा. सपलसर्प-कप्पदि. रा.न., भू. बबितायी मुभा मनास्तिपाना मदिर भू. १, सर परेर मध्यपपु.100. बरना.माता १ मार, पा.,.1.1 WARN, 'बारे अपराउपराभू.१८. प, मा. ९. भReो. अपागपु., ...

अदियम चो• से. ५३, ९०, १३८, | अल्ल, सर०, ३८. ३६०,४८६, १३ भू. ९.. | अवधदेश, भू. ११९. अध्याटिनायक पु. ४. अवरेहाल प्रा. १२२. अनन्तपुर, जिला, भू. १११. अचोक, न., भू•६. अन्दमासल, स्था०२४. अहमदनगर भू.१.१. अन्धामुरचीव दु. ५६. अहितमार्तण्ड, उ. ३८. अगडि, प्रा. ३६१ भू.८३. अन्याय (एक टैक्स) १२८. अंगरिक-कालिसेहि, पु. ३.१. भप्रतिमवीर उ• ४३४. आइने अकबरो प्रे., भू. १८. अभ्यागते (एक टैक्स) १३५. आगरा नगर, भू.१९. अमर, हुस म के भ्राता १३८५.९५. आवलदेवि, आचले, आचाम्या, आदि अमोपवर्ष प्र., रा.न.,भू• ७६. पर चन्द्रमौलि में. को भागी, अमोपात-वरंग, रा. न., भू. १.७, १२४,४२६, १४ भू. ४४,९७,१८. अम्मेले, प्रा. ३१ आरलदेवि, हेम्माटिदेवो भायां ११४. भकन, स्था• ५९. आचाभिक,भरसादिस्यीभायां,१५.. अभ्याबोळे, प्रा. १८. आग्रेयम गोत्र ॥४. भरकरे, प्रा. १२. भू.१.१. भादितोय, कुम, १२३, ५१. अल्गुर तालुका, भ.१.१. आदिलशाहभ... अरसारित्य, म. ३५१. आनेयगोन्दि, प्रा. . बरिराय विभाग, उ.11. आन्वं, प्रा. ९. भरेगलबस्ति भू.५१. | आगोम्नु ( एक रेस). बरेयोरे, सरो• ५१. आगुरु (एक). मंति, २.१.५ मात्पुरतम्मलिंगड, पु. १५५. बनधीतप्राम, ३८३. आपलायनपूर • अर्थर वंगली साहब.14. भारसमा......... अनइंच, प्रा.41, . भारतमा-मोमेशा, पा..... भलमानार, पु. १.५५.11.. अनधिसभू.५. एसो, मुमारानी, .. बलियरने... । सामा• ११.

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ओम्मातिगेपहाड, स्था• ५१. कम्बिगइपोम्नु, एक टैक्स ४१४. ओरेयूर, चो• रा. ५..,भू.११., कमतपुर, कमुठपुर 14, ४.५. कम्पिता, रानो १५२. फ रम्पराबरुमार,गे.रा.भू..",t. जग्गेरे, प्रा. ९. भू .. कम्मम्प,रा-.१९. पिनदोगे, कुम, भू.1. कम्मट, टकसाल २२४. घटकलेसे (एक टैपस) १३५. कम्मनेन्य लोहित गोत्र.. स्टवर wिो २५-२९, १३, करवध, स्पा... १५२, १५९, १९ भू. १, करहाटक, स्था• ५४ भू .. करिमाल चोत न.,.111. साल, कुण्ड १२४. कराज, रा.न.,.,.. कासतात, प्रा. ४५९,... कोर, कर्नाटक, देश, 1.1.1. मार,दा. १३. त्ति बस्ति भू.५.११.१. बांट: कुल ३५.. पन चउ.३८. कलनुरि नरेश भू.५.१०. प्लनामा १५१. रहम, 4.१८, २०३, म. बमपाल,.१.१३. १.८. कल, स्था.१२. एम्नति, प्रा.भू.1.1. बलिंगडोलगण्डउ.५.. .. बरा, वादिर ........ मंति, देश १.१. ब्दाचारी ९८. डिगुमं मामुण, गु .. प्रेमाल, स्पा... ८२, १...ना, at ५६, ५६. मानकर fe ju,.,.१५-11. RITIRT-पान श्रीर, 7.1.. 66C3.प्रा... नुवा, १.१९९. मासुभाष,ता.. म.1.11.1.

प्रचोदेश ४५५. मसाप्पी, चो• राजधानी भू... किनर कीर्तिपुर पाएकनाय ५९. किरात्र, जा०३८. पह, प्रा. . किरियालन सेटि, पु. ४२४. किरिय बाण्डेय, पु. ८५. पाचारि, लेखक ५१. किरकरे स्था• २४. रवि सेषि,प्र.८९ भू.१२.. कीर्तिनारायण, उ• ५७ भू. ७९ मनोपुर ५४, ९०,११८, ३६, कीर्तिवमा, चा० न०, भू. ७५,८०, ४८६, भू. ७६,१४१. ८१. कुक्कुटसर्प ८५. पदर,प्रा. २४. कुन्यनाथ जिनालय, भू. १.५, पारम्भ, एक टैक्स ३५३. कुम्भकोण, स्था० ४३५, ४५६,४५७. बादम्बरी (नागदेवत) भू.१५. कुम्मट, स्या. १३० भ० ९५. काडकर, पाश्व नरेशोंकी 3.10. कुम्बेयनहल्लि, प्रा. ४९५. कापुर जिला भू.८३ कुरुक्षेत्र ५३, ५६,५९, ८३, ४८६. कान्यकुन्जनगर-कमीज भू.५९. कुर्ग नगर, भू. ८३, ११.. कुलोतु चङ्गाल्व भदेव, च. न. काम, (देखो नृप काम) १.३ भू. १११. मानदेव, उच्छति सर.., १०, | गेब्रह्मदेव बस्ति, भू. १२. | कृष्ण (प्र.)रा. न., भू० ७५. १२४, २.भू. ११२. अमलदेवी, नागदेव म. की पुत्री ४२ | कृष्ण (द्वि०) रा• न०, भू०७६, ८.. कृष्ण (४०) 'राज, "राजेन्द, रा.न. १३.. ३८,५४,५५भू. ७२,७६-८.. कारकल, प्रा., भू. ३४. | कृष्ण, 'नृप, 'राज, ओडेयर (प्र.) काठमूर, स्था, मै० न. ८३ भू०४८,१०५. काठमटिगे, एक टेक्स ४३४. कालन्बे, स्त्री, भू.५२. कृष्णराज ओडेयर (४०) म.न.९८, काललदेवी, चामु० को माता भू• २४. ४३३,४३४,भू.२०, २१,३३, कावेरी, नदी, ५९ भू. १०१. काशी नगर ८४,४३५, ४३६. कृष्णराज बहादुर वर्तमान मै..भू. काश्यप गोत्र ९८,११५. ३३१.८. किकोरि, स्था• ४३३, ४३४. कृष्णवेण्णा कृष्णा नदी १३८. कापालिक ३८. भू. ११६.

देवरे, सरो• १२४. कोपमपुर, स्था• ३३. केशिनी पु९५, १.४, १३., ओमर, दु. ५१, ५, ", २१, भू. १२२. पार नामरस सर• ४.भू. १२ कोलार, कुपलाल, राजधानी भ... केन्तरिसर, एकनाला १३४. कोलात प्रा. ५. देम्पम्मामि श्री भ.. कोरिपाके, स्था..... मरेपास, एनाला ११४. कोजापुर-कोलापुर ४., ४१३, ४७१. प्रियसी, सनरधि, विनयारियर, स्था• १४. हो•म• रानी, १४, १५, कोविरा-धीरणम् . 11.९४,५.८७. कौण्डिन्य गोत्र .,m,४५, ५१. जरेमा.४.१०भ०५५,११. १०,१४,३६.,41. प्रतिमा.४६. धानाथ, महादेश.न.मे. पररपति-जीमूतवाहन, 1.1.. टिभ, पराग ३८ सण्डलि0,.. माण (पाप).. नाश सामकल, पु. 11. रायपुर.114 गुमरो, बनावासार.... ल, प्रा. ५.. घेरामामा, पु.11-11५. साल .. ५.......बारिश...... ५. 11.3.1.16५,५१,५ . । H.सा.. मा, मन, RAgrint.

1 .. . .. Amrew reak ... terheg *** . tureran10 . Poetry ty.... ymnite- Neeti tial... ५. Jeelam.ndt. ... ."* गेडेगलाभरण, उ., भू० ७९. घ गरवाल वपेरवाल ११८, ११९, पहरुवाट,स्था० १३८. ३८२. घेरवाल-वघेरवाल. गेरसोप्पे, स्था• ९७, ९९, १००- चकगोह, तु. ५३, ५६, १३८. १०२, १३४, १३५, ३३४ म. चगभक्षण चक्रवर्ती, उ. ३३५ भ. . गेसाजी, पु०, ३८२. चानादु-हुणसूर तालुका, भु. 11. गोम्गि, सर० ३३७. चाल्व, रा.व. १०३, भू•४, गोणूर, प्रा. ३८. १.१,११. गोदावरी नदी ५९. चतुस्समयसमुदरण, उ• ५३ गोनासा, पु. ३८२, ३८३, भू.चतुर्मुस कल्कि, न., भू. ३.. १११. चन्दले, चन्दाम्बिके, चन्दने, नागदे. गोम्मटपुर, प्रवण बेल्गुल ९२, १२०, ककी भार्या, ४२, १३.. १३७, १२८,.८६. चन्दाचारिग ( लोहगार) २८१. गोम्मटसेटि, पु. ८१, ३६१, भू. ५९. | चन्दिकन्वेचन्दले ५३. गोम्मटेभर मूर्ति भू.१७ चयप्रभ पस्ति, भू०८. गोबिल गोत्र ३०, २०, ५० १२.. | चन्द्रमौलि, मे. १.७, १२४, ४२६, गोला, राजधानी, भू.1.1. मोल देश. ५,५.. चरेशस्य, पु. १.१.भू.१16. गोविन्द, पु. ३९५, ४... चलपगलि, उ• ५७. गोबिन्द (दि.) रा.न., भू. ७५. | चलाकार, उ. ५. भू. १२५ गोपिन्द (तृ.) रा. ना... चलनाराक, ३.११, ९, भू. गोपिन्दवाति, स्था• २४, ५३,८९, चलतर, उ., १८. बलर अरण, पु. १८. गदिमे, पु. ९७ चासे, पु.११. पागदम्बस्वागतम.. मीर, मीठ, देश 136 १२८, १०, १५,४१,भू.१०२. पागल देवी, नारमिद... गास्थान, . हनी,

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जीमूतवाहन, न. ५१. छन्दोम्नुधि,नागवर्मकृत,.H०१७. जीवापेठ, स्था... जनमठ, .४७. जहणजे, जकमन्ने, ( महराजकी जैमिनि, दा०५५, ४९१. भावज)४३, mt, ४४v, भू. जोगवे, जोगाम्बा, बम्मदेवकी भाषा, ५४, १२. जारसूर होयसलसेरी, पु.३६१. ट किको, सरो., भू.४९. टाकरी लिपि, भू .. अधिराज, हुनके पिता,३८,०९५. टामस साइर भ• ६५, ६५. जगदेशवीर, उ. ३८, १०९. ४ अगदेश, वेग सर, म. १०६. स, दे.५४, भू .. जगन, चो० से. १३८. त बतला, अतुला ( पोषा) ४३, ५३. तरचूह मा.... जनपुर, प्रा. १२७११८. तप्रनगरम्, तपुरीतशोर 16 जय, मिह (प्र.) चा•न० ५४५० ४३५,४१. 41,१३,१५. तागेरे, स्था• १४. जाविष्ट, एकटंग, १८. सरिइति, मा .. जातिमणिय, एकटेकम तरेला, बु. ११. जानक, माप.की भायां, इमपको तलाह, तमानपुर ..५, ५, माना ३, भू.१०.. जायसवाल, भू.16. जिमय, मरो..... दिननाथपुर, प्रा., ५.५०,५२. विद, गु• ॥ निदेश(क) गमु.पु...पूर, प्रा. ५६, .. ताला, समान, ५.1.1. मियायपुर, पा...,,, तारे, म.न.५१. निनातिन...५,५१. शिरपु..... ९.11.1... frare. . लिपेर, 2011 लिरिकुल, परिया जा., १२६. जिम्मराज, एनर मूर्ति प्रतिष्ठापक, भू. द दकि, कवि, ५४ भू. १५८ दधीति, पौ.१.४९ लियनारायणपुरम्भेल्लोटे, प्रा. ११६. दम्तिदुर्ग, रा.न.,भू. ७५,..,41. वार्षद सदि, लसतवादिनमरण, पी. न. ११भ• ४९६, ४५५,४६.. दाविरभद्रा नदी, १२५ दागोदाजिम्मीर्णोद्धार अलर, देश, ५३, १४, १५., ५.,दामचन्दपुरवाल, पु. १५८. १५,४१,४९४. दानमल, पु.३५ हेरगति, मा.१८५. दानशाले बस्ति, भू.4 वरदाल, प्रा., भू." दाम-दामोदर, पो.से......, वेरिन मस्ति, पाहुपति बस्ति, भू .1, १,८८. सोम, मूर्तिकार, ५., . . दरेयूर, प्रा. ५६,५६," | दिxिs, दिरा, १५१, ५. लर तलर, पा.न., भू....., दिगि गाभुगपु. ४ गोय, देश ५. दिप, मो....भू.... स्पागदपस्तम्भबागर.. Reी, पो... विभुस्न पूणमणिमेगामिस्ति बसमा पु ..." ४३.भू.. दुबिनीत, ......" त्रिभुवनमा ..५, ५६, ५६, ५९, मही, यति देना १,११ 11. ४५. , 11, बोरस, भू.५. ११. भू. १,दि. करीन, .. Fayai देर, मारिए | tो.. (पु)... ५ ... r,भू .. Arsha...काय ... ... . पाय, 1.1.. Ke देवराट, देवराय, द्वि., वि.न. १२५, ध्रुव, रा. न०, भू० ७५, ७८, ७९. भू.१०४,१०५. देवराजै अरमु, म० ९८. नकुलार्य, म. ५.०, भू.१०. देवराय महाराज, भू.४६, नगर जिनालय १०८, १२९-१३१, देवीरम्मणि, नी भ० ६. २५२,४४३, भू. ४५. देशकुलकर्णि, उ., ११६. | नलि, दु. ५६, १२४, १३०, १३. दोड कृष्णराज वडेयरैय (प्र.) मै. १३७, १४४, ४९१,४९४४९७. न.८६. नजरायपण, प्रा० १०३, भू. ३६. दोडनकडे, प्रा० १३३. | नदि (राष्ट्र) ३४. दोदेवराज ओडेयर,मै० न०,५०४५. नन्द, रा. व., भू. ६९. दोरसमुद्र-द्वारावती ९६, ४९१,४९४. ननि, नो.न., भू. १.९. द्रोहघरट, उ. ४४, ५९,९०, १४, नरग, सर० ३८. ३६०, ४७८,४८६. नरसिंग, सिंह वर्म, चो. सर• ९. द्वारावती, द्वारावतीपुर (दोरममुद्र) १३८, १४४, ३६.,४८६, भू. १२४, १३०, १३, १४, | नरसिंहाचार रायबहादुर, भू-१२,५०. ३६०,४८६,४९१-४९४,४९५, नविकर, प्रा. २४. ४९५, भू.८१,८४,८६. | नहुप, पो.न. ५६. नाग, 'देव, रम्मदेव म. के पुत्र ४२, धनायी, बी ११९. १२२, १३.१३७,४९०. धरणेन्द्र शालो पु. ४३५. नागकुमार, पौ.न., भू.४७. धरमचन्द,पु. ११८, भू.४१. नागति, स्था• २९१ भू.११८. घरमासा, पु.३८६. नागदेव, म. बलदेवके पुष ५१, भू. धर्मस्तल-धर्मस्थल ४३३. धमांसा, पु. ३६५, ३७९. नागनाय सर.1, भू. १०२. धवलसर, पवल सरोवर ५४, १.८, नागरनाविले त्या• ३११. नापले, दूर्वण म. को माता,.. धारा नगरी ५५, १३८. नागवन, नरसिंहमा मातोभ०७५. नागव, मूर्तिकार, २४१, भ.11 ११.

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पातालमत, सर.१८,१.१. पोम्मुर, पोम्पुर्ण, दु. ५,५11. पानीपप १३८, ३., it, ३४४, पोराल, रा. . ५३, ५४, ५६, २२१. पाभते,.३८. पोसलसे, भू. १२,6. पानाय गस्ति भू. ४, 16,1, पौण्ड्रकन देश, भू.५९. पौरनपुर, भू. १४, २९. पाराराक. एम्स १४. प्रचण्ड दण्ड नाया, उ. ५२,५१. लित, पिगुग, योधा ५८ भू. ७१. प्रताप पति, उ..... पिरियड नायर, उ. ४.. पीतजा गोत्र ३०.11. प्रताप नारसिंह-नारसिंहप्र. हो. पायशि भ• ५. न .. पुनार देशा, भू. ५५. प्रतापपुर,मा... पुरवर्ग, एकग ४१४. फ तुका-१५०. सीर, नरभू.११.१५.... गुरपान,स्था- २१ प गुमली... ५.. शपुरनगर,५५,110. पु.मी. पा.न.भू.... भय, राज.मे... |लोरनगर, भ..1, .. बरसम... २५१,१५. माता UNIनाभू.1. बनरो (वनगाणे), am पेनाल, प्रा.. पं. अनिय, कानयाबा.... irs, स्वा.. पन्नांन... सम्मम...11. ..... antaw, ANM, सन 14 माता 144,21.1.1 बना देश 11८. बलगुल (बेल्गुल) बदर, पत्र, पाइप, • ५१-५३, ३५१, भू.१५,१३. पति, बलीन्द, पी. न.५३,11८. बलिपुर ५५, भू. ८१. बयपरण, पाय, दु. ५६. पत्रदेव म. ५.. समभ्याम रा.न.२४. बारम्नूर, प्रा. १४ बालकिसनजो, पु. १३९, ३४.. बालादित्य, सर• २९६, भू. ११% १८. बालराम, पु. ३४२ बास, पु. २०, २१, २९२. बाहुबति, पु.११. बाहुबलि बस्ति तेरिनबस्ति, भू.१३ बाहुरलिसेहि, प्र. ७८,८६, ३९१- ल,प्र., हो.३.१.५, १.८, विटेयनहल्लि, प्रा. १३.. १२५, १६,४९१,४९१ | विधिदेव-विष्णुवर्धन, हो. न. ५: बाल, दीर बहाल, दि., हो. • विनिति, प्रा. ३५६. ९.१२४,१३०,४९४,४५५, भू. बिदर राज्य, भू.१.१. mv५, ५१, ४, ८५, १५, | विदियमसेहि, पु. ८६, १२७. बिन्दुसार, मौ. न., भू.६८. रडेय, से. ३१९, १२.. विम्बसार ग्रेणिक मो.न., भू.६. बदेयकेरे, सरो.१७,१८. विम्बसेहिमकेरे, सरो• १३५, १६ बसदि, एक टैक्स, १३५. | विदरूवारि मुखतिलक, उ.४३,४ बसविसेशिपु. ७५,८६,८५,116, ४७,५३,५९,४८६. ३२७, ३१.१६,३५,१२१. विरुदेन्तेम्मर गण्ड, उ. ४३४. बस्तिहडि, ग्रा.१.७. बिलिकेरे, प्रा. ९८. बहणिगे, प्रा.३९१. बिल्हण कवि, भू.01. बहमनी राज्य भू.1.1. बीजापुर राज्य भू..,1.1. गागडेगे, ग्रा. ८५. बोरक्षन केरे सरो-११५,१३८. वागणदे, बी१४४, ३५१. | बीररगर, उ• ५५. •८२ भू. १.४. चाणारवि (कानीपुरी) ५१, ५६, बुस्राय, वि.न. ८२, १३, भ , रागियूर, प्रा... पुरानन साहा, भू. १८. सायिक, योषा..

३ २ चूचण, बूचिमय्य, चिराज, म. ४., । वोम्मिसेहि, पु. ८४; १०४, १३७. ४६, ४९, ११५ भू०९१,११२. बोम्यण, म.८४,१०३. बेक, प्रा० ९०, १०७, १२४, २१२, | बोम्मण, बोम्यप्प कवि ८४ भू० १०५, १०६. बेकनकेरे, सरो• १४४. बोयिग, योधा ६.. बेगूरु, प्रा० ३५०,भू. १२२. | बौद ३९, ४०, ४९२. बेंडिगे, एक टैक्स, ४३४. बौरिंग साहब, भू. १८. बेडुगनहल्लि, प्रा० १३७, १३८. १८. ब्रह्मक्षत्रकुल १.९भू. ७३. बे-बक, प्रा. ५०,४९१. ब्रह्मदेव मदिर, भू. ४२. बेलगोल, बेलगुल, बेल्गोल, २४, ४४, ब्रह्मदेव स्तम्भ, भू. ३५. ५६, ५९, ६५, आदि. भ बेलिकुम्ब, स्था० ४७९, भू०५२. | भगदत्त, पौ० न०५३, २३५, ४१४. बेलुकरे, बेलकेरे, स्था० ४१, भू. भगवानदास, पु. ३३८. ११२. भण्डारि बस्तिम्भन्यबामनि १२ बेलगुलनाडु प्रदेश, ४८४. ४३५, ४३६,४१,४५७,भू.४२, बेलर राजधानी, भू. ८४. ४३,४१,१४,१.६. वैच, बचप. से. ८२, १०४. भू. .. | भण्डेवाड, प्रा. ३६. भद्रगहुको गुफा, भ• १५, ५५. वैयण, पु. ३७० भू. १२२. | भरत, 'मप्य, वर, से .., रोज, मूर्तिकार. ४७९, भू. ५२. ११५.३६८,३१९भू. ३५, १६, बोरवे हेग्गइिति श्री ३६१ बोकिमय्य, छेसक ५३. भरवेभर मूर्ति, भू. १३. बोकिसेष्टि, पु. ७८, ८६,८७,३11. | भातमीपुर, भू. 1.६. बोगाच, सनिक .. भव्यचूडामणि, उ• ११८. बोगार राज, सर• ४.. बोगेय, योधा .. बोण, "देव, से• 166,... भार, दर 1.५. बाप्पण त्यालय त्रलोक्यापक भारत, स्था... ५८, भानुदेव हेगडे, यु. ३१५ १२,११२ भम्यचूडामणिभण्डारिस्ति .

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महासामन्ताधिपति, उ० ४३, ४४, 1 मारुहल्लि, प्रा०, भू. ९५. १७,१४४, मारेयनायक, पु०४९४. महीपाल कमीज न., भू. ७६. मागेंडेमल्ल-पिटुग, सर० ५८ भू. ४९. माकणन्त्रे, गगराजकी मातामह, ४४, मालव, देश, ५४, १३८, ४९९ भू. ७६,१४१. भू०८९. मावन गन्धहस्ति, उ०५८ भू• ९. माचिकन्चे, पोप्सलसेटिकी माता, २२९ | मासवाडिनाङ, प्रदेश, १२४. भू.८८. मुण्डा लिपि भू० ११९. माचिकन्चे, शान्तलदेवीको माता, ५०, | मुत्तगदहोनहानि, प्रा• १३३. ५३, ५६, भू०१२,९३. मुदगेरे तालुका, भू. ८३. माचिराज, पु. ३५१, ४९७ मुद्राराक्षस,०, भू०६८,६९. माडगढ, माडवगढ, ३८२, ३८६, भू. मुनिगुण्ड सीमे, प्रदेश, ११६. ११९, १२.. मुल्दर, प्रा.४४,५४, भू. १.. माडिगूर, प्रा० ११६. मुहम्मद तुग़लक, भू.१.१. माणिकदेव, सर• १०५ भू. ११२. | मूडविद्री, प्रा., भू.४४. माणिक्य भण्डारि, उ•४०, १२८, मूलभद्र कुल, १२८, ११०. मातूर, वरा, ३८. मेकगिरि कुल ४७४. मानगप, इरुगपके पिता, ०२ भू. मैगस्थनीज़, भ.६५. | मैसूर, मैयिसूर, महिसूर, महीसूर, 41, मानभ पु., भू. १५. ८४,१८,१४०,४३४, भू.७१, मान्यखेट, न., भू .. १.५,११.. मार, मारमय्य, गगराजके पितामह) मोहनविले, प्रा., ५६, ५९. १४,४५,५९, १०, १४४,३९.मोतीचन्द, पु. १३५, मोनेगनको, प्रा., ४.६. मार, सोवन नायकके पुत्र १२४. मोरयूर, मा. ४.८. मारगोपनहनि, प्रा. ८६. मोरिने, स्या-५१,५.११. मारलिंग, 'गप्य, पान्तलदेवीके पिता, मोराडे, प्रा. ६, २, ३१. ५३,५६,३11,.१५,11 मारसिंग-गंगवा, गं. न., भू.७४. मौर्य, रा.पं., म ... मारसिंह, ग.न.२०,भू.१,७२, १.41,000९,११५. यक्षराजपिता,.,10.

यतिलक, उ•४९३. यबरेपोत्र 11. यशस्वती, भरतकी मावा, भू. २४. विहार साप, ८२. संगलिय, प्रा. ८९. | रायनइडि, रायनहल, प्रा. १२९, या पी.न.५६,१३७, १३८. ४९२, भू. ५.. राजकीर्ति, पु. ११९. | राजडामणि मार्गेडेमल, रा.न.इन्द चतुर्यके मुर ५७, ५८ भू. ७९ | राजतरंगिणी, प्र., भू.६८. पादन, कुल, ४५, ५३, ५६, ५९, राजमार्तण्ड, उ.५७,४९. भू• ७९ 1.., १२४, १३०, १३, राजादिस्य, यो• न., भू• . - १३, ४, ३६.४८६, राजादित्य, बा.न.१८, ५.१ १-४९५, ४१७,४९, भू. राजेन्द्र चोल, ना, भू.1.1. ८१,१.. राजेन्द्र चोल को म., भू .. राजेन्द्र पृशुबी, को..५... पेरुयापिके, एक टैक्स, ४३४. | राम, पौ.न. ४९९. योगन्धरायण, म.१८,भू.१५. रामचन्द्र प.पु.३९१. रामदेवनायक, सोमेश्वर के मंत्री ११८, रक्सननि-गवन ६. भू .४,७७, | रामराय, वि.न., भू.1.1. खग्य, पु., भू.४१. रामानुज, गणवाचार्य भू.१४. परन्दर्प, ३. ५. भू.७९. रामेश्वर, हिनतीर्थ ४. रणभीम 3.४१४. रायपात्रामपि 3.1.. रणरासिंग 3.1.1. रामरायपुर,.५१,११५.११.. रणसिंग, म.... राष्ट्रकार, रा....भू. ७५,41. रसावलोक कम्पप्य, रा.म. १४. एग्मिणीदेवी, कपीरावी ५६. अमित, न.भू.४१. | सपनारारच बसदिम्योपुर.. रलसापर पु.४.. रास साहर, भू.११.६८. स्मार, सेय५४. राक्षस, मे, भू .. रामनहडि, मा.. रापमा...५,१५, रो.५१.

२ २ वहव्यवहारि, उ०८६, ३६१. लकले, लकब्वे, लक्षिदेवि, लक्ष्मीदेवी, वड्डेग, रा• न० अमोघवर्ष तृ• ६०,भू० गंगराजकी भायां, ४५-४९,५९, ७४. ६३, भू. ११,११,१२. | वत्सराज, न. ५३, १४४, २३५, लक्कि, स्त्री भू. १५. ४९४,४९९, भू. ११८. लकिदोगे, कुण्ड, भू० १५. वनगजमत, उ०३८. लक्ष्मण, हुल्लके भ्राता १३८, भू. ९५. वनवासि वनवसे, राज्य ३८, १३८. लक्ष्मणराय, पु०३४३. वरुण, ग्रा०, भू०८२. लक्ष्मादेवी, लक्ष्मीदेवी विष्णुवनकी वर्धमानाचारि, लेखक ४३, ४, ५९. रानी १२४, १३७, १३८,४९४, | वलभ गोत्र ४०५. भू०१४. | वल्लभराज-कृष्ण द्वि०, रा. न., भू. लक्ष्मीधर लक्ष्मण, रामके भ्राता ५१. लक्ष्मीपण्डित, पु. ४३४. वल्लूर, प्रा. १३८. ला, डाक्टर, भू. ६३. | वमुधैवान्धव, उ० ४४१. वस्तियग्राम ८३. लकापुरी १०९ वाजि वश ४., १३५, १३८ भू. लाडदेश १२४, १३.,४९१. लाट-गुजरात, भू. ७६. वालापि-बदामी, राजधानी भू. ... लोकविद्याधर, पु. ६१, भू०७४, वाराणसी-बनारस १३३, १४.,४८६. लोकायत दर्शन ४९२. वासन्तिमदेवी १२४, १३.१३७. लोम्बिका, हुसकी माता ४., १३, | विक्रमापदेव चरित, प्रे., भू.61. १३८,४९१, भु.९५. विक्रमादित्य, चा. न.४९४५.८०, लोकिगुण्डि, प्रा. ५३,१३,१४. स्यूमन साहब, भू.६७. विजयनगर, भू... य | विजयमल, पु. ३५१. वापुरबशपुर ५५. | विनयादित्य, हो-न-५४,५६, ११४, वडिव, को.न., भू.". बमल, न०३८. ४९१-४१५ भू. ४-५,१४, ववरदेव, दखिग्देव, चान... भू. ७८. विनेयादित्य विनयासिय, दोन. ५६ ललितसरोवर ७९ भू. ३५. १३., १२७ १२, १४, ९८,१४..

। विष्णु, 'वर्धन, होन-11-४५,४७, । शारनायक, सर• 1.1., it. ३७ वैशेषिक, दर्शन ३५. वैष्णर, सम्प्रदाय , ४९२, ५. श घाराजा, भू... ५., ५२,५३,५६,५९, ६१, भू.१.१. ५०, १२, 10.1016, शत्रुभयकर म. ५४. r, ३०,४५,४४८, ४, । पानिवार fufe . १५४, ..., विन्ध्यगिरि ३८. विराट पो.न. १३८. दिउसनकर, परो. ५१,५६. पिशाला (राज्य) पिठाच पंडित, म., भू. ३३. ८५-१५.१..,". साम्मुकाममा ना. विष्णुभा, भू. १४१. धम्नान, पु.1. पौरा, उ.४५, ५६, ५६, ५.REENato.... ५. ११४,१.१ ३.पापुर-wilm, 47. ५१,४५.... ४५,४६,४९१. कीर नारमिह (1)हो...1.jra NIR५.५ वीर नारEि (1.).. ... ... .. पीर पसराय १.भ.1.1. entation बीर पाणय, कारक भूतिया. angal, Natok,000 औरास {{x.).......... रा• 11. Aria-10-16 Geeta- Atu.

पौ. न. ४९४. शाह कपूरचन्दपु० ३३७. ४९२,४९७. शाह हरखवन्दपु.१३६. सन्तोपराय, पु. ३४०, ३५.. शिकारपुर प्रा०, भू. ८२. समधिगवरच महारान्द, उ.४३,४, शिवि, पौ• न० १३८. ४७,५६,९०, ११३, १२४,' शिवगा, स्था. ५३ भू. ९३. १३., १३, १४४, ३०, शिवमार (द्वि०) म.न. २५६ भू०८, ४९२,४१४, ४९७, भू. ८२, ११.,११८. शिवमारन बसदि भू• ७४. | समयाचार, एक टैक्स, ३४. शिशुपाल, पौ० न• ३८. | सरावगो, जा. ३४०, ३५०, भू. शुभतुन, कृष्ण (वि.)रान्न., भू०७६ १२.. सपंचूडामनि, पु. १३७. शैशुनाग, रा.व., भू.६९. | सर्वणन्दि, पु. १६२. प्रवण बेल्गुल ४३३, ४३४. सल, हो.न. ४९४,४१५,भू.८३, त्रियादेवी, सिंगिरस्यकी भायां, ५३. श्रीकरणद हेम्गडे, उ०, ४.. सल्य, मा. ५९,४९३, ४९५, भू. श्रीकरण रेचिमप्य, मं. ४७१. ८८. श्रीधरवोज, मूर्तिकार, २४१, भू. २४१, भू. सवगेरु, मा. ८०,९०, १३, १३८, ११८. श्रीनिलयनगर जिनालय, भू.४५. सवतिगंधवारण बस्ति, ५३, ५६, श्रीपुरुष, गं. न., भू०८,७१. भू.११,१२,१३. धोपृथ्वीवरभ उ., भू. ७६. सागर, प्रा. १२४. प्रेषिक, न.४३८. सानहल्लि, प्रा०, भू.४५, ५४. सावन्त बसदि, कोमपुरका • • षड्दर्शनस्थापनाचार्य, उ., ८४. . ४७१. पधर्मचकेश्वर, उ• १४.. साविमले, गिरि, ५३. साहस तुग (दन्तिदुर्ग, रा.न.!). न.१२४. ५४, भू. ७१,८०,१३९. सभाम उत्तला, 3.४५, ५३, १४४. विधिमप्य, पु., भू. ९३. सत्यमगज, मा. १८. सिद्धरबस्ति, भू.३८,.. सत्पात्रयकुलतिलक, उ., १४, सिमरागड-विसपिठा, भू.३९.

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४० हीरासा, पु. ३६४, ३६६, ३८२ | होम्नल्लि, प्रा. ४०४. ३८६, ३९३. होनिसेहि, पु. ८५, ३.. हुलिगेरे, प्रा. १३१. होनेनहल्लि, प्रा.१.७. हुक, 'राज, बल्लाल द्वि. के से०, ४०, होनेय, पु० ८५. ४२, ८०, ९०, १२४, १३५, होय्सल, रा. व. ४४, ४, २६ १३८, ३१६, ४९१, भू. ४३, १२९, १३०,१३७,३०१ ४९२,४१४,४९५,४९ हुवघाट, प्रा. १२४. भू.८१-८३, 1.1. हुउदण, एक टैक्स, ४१४. होयसल सेहि, पु. ८६, ३१. हुडेय, पु. ८५. होयसलाचारि, लेखक, . हेजेरु, प्रा. ५३. होलिटि, पु. ६. हेजीय, पु. १४३. होडेसेशि, पु•३६१. हेमवतो नदी, भू०१०९. होसगेरे, सरो• ५९. हेम्माडिदेव, सर०, १२४, होमपण, प्रा.१३. इगंडेशन, पु., भू.... होमवोलल, प्रा. . होनगेरे, मा. ९६. दोसहालि, प्रा.८३, ८४.

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Jain Silalaksanghar

Author
Shree Hiralal Jain
Title
Jain Silalaksanghar
File name
Jain Silalaksanghar
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2011/07
Publisher
Banaras,indiyan Press
Language
Sanskrit
Pages
701
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313417
Barcode
99999990311117.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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