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Mahinma Stratom
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. भापाटीका सहितम् । नुष्यों को अन्त में, एक आपसी प्राप्त होते हो जैसे नदियां टेढ़ी सीधी बहती हुई समुहमें मिलती हैं ॥ ७॥ महोक्ष खट्वांगं परशरजिन शसणि नःकपाल चेती यतव हलोपक रणम् ॥ सुरास्तांता मृद्धितिलाश बभूप्रणहिता नहिवालासमविष्य मृगतृणाभ्रमयति ।। हे भगवन ! महोक्ष याने हा वृषभ, र टिया को पावा परशु. गजवर्म, भहाबर्ष कपाल इत्यादि तो आपकी सामग्री है. परंतु हे वरद ! देवता लोग तांता दाग व अ. पनी २ समृद्धि.आपके पास से पता हुई को धारण करते हैं तो आप क्यों नहीं " २
श्रीगणेश पनमः
सला
कीशिवमहिम स्तोत्र
।
..
प्रारम्भः
..
श्लोकः।
श्रीगणेशायनमः ॥ पुष्पदन्त उवाच।।
महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यस-
दृशी,स्तुतिब्रह्मादीनामपि तदवसन्ना
स्त्वयिगिरः। अथावाच्यःसर्वः स्वम-
ति परिणामावधियण,ममाप्येषस्यो
ने हरनिरपवादः परिकरः ॥१॥
२७ शिवमहिम्नस्तोत्रम् पृथक र वागी कहते हैं।सो भलेही कहो परः नु हम नहीं जानते कि ऐशा कौन तत्व है जोकि आप नहीं हो ॥ २६॥ वतिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीन पिमरानकारावर्णेत्रिसरभिदधत्तीर्ण विकृतिया तरयिं ते धाम ध्वनिभिर व रुधानमणुभिःसमस्तव्यस्तत्वाशरण- दगुणात्योमितिपदम् ॥ २७॥ हे शरण देने वाले? ॐ यह ब्रह्मपद सम्पूर्ण व्यस्त यांने आउ म, सो आपहीं की तीनों वों करके त्रयी याने वेदत्रयी (ऋग, युगे, साम और तीनों प्रती अर्थात् । उदीच अं. नुदात्त स्वरित अथवा जाप्रदादि अवस्था इनका और स्वर्ग, मृत्यु पाताले और तीनों ----- शिवमहिम्न स्तोत्र ॥ हे हर! याने जातकी पीडाको हरने वाले महादेवजी आपकी महिमा के पालो किनि तूभी न जानते ऐसे अगानियों करले गाई हुई स्तुति यदि आपके असमानगोपाहोने तो ब्रमादिकों को भी बाणी गाई हुई स्तुति है वे सब निष्फल होजावेमी तिससे हमारा अधिकार न होगा तो उनका आदिका भी अधिकार न होगातो हम दोनों समान तथापि यह सर्वजन अपनी इति परिमाण याने परिणामों ही अवधि भावलीमा रहीं तक कहना स. है. इससे आपका वाच्य अनुग्रह करने योग्यही है, यदि ऐसाद तो मेरा भी इस स्तोत्रके दिये जो आरन बो निरपवाद होवै वह चाहता हूं ॥१॥ अतीतः एन्यानंतववाहमांवाड्मनस
.
शिवमाहितांवम ||
हो, प्रकर्ष से और तीनों गुणों से (सत रज
तम.) परे जो अनिर्वचनीय पद तिसमें जो
शिवरूप आपको बारम्बार नमस्कारहो।।३०॥
शपरिणतिचेताशवश्यं क्यवेद
क्वचतवगुणसी मोल्लंधिनशिश्ववद्धिः
इति चकितममंदीत्यमांभाले राधा
द्वरदचरणयोस्तेवाक्यपुप्पोपहारम३३
हे भगवान् ! कुशहै परिमाण जिसको पाने
अत्यन्त मन्द और क्लेझके आधीन ऐसा मेरा
चित्तकहाँ ! और गुणोंकी सीगाओ उरलपने
वाली ऐसी आपकी ऋधिकहां ऐसे पक्तिहुए
मुझको आपके चरण की शक्ति अमन्दकरके
हे वरदं ! वाक्य रूप गुप्य से पूजा बाबी
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सापाका सहितम् ॥ यो स्तव्याहत्यार्यचकित पालिकाले शुविरपि । सकस्यस्तोतव्यः सिविध गुणः कस्यविषयः पदेवाची पर- तिनमनः कस्यनवचः ॥२॥ हे भो आपकी महिमा कामी तौर तो घरे है जिससे वेदभी चलित हुये पाहोने अताचावृत्ति करके गाने सो नहीं . जुमानले आपकी महिमा को वेद अगले लो एवाश महिमाबालेआप किसीसेस्तुति लिने जाओ कौन जानें आप कितने गुम और आप किस करके प्रात्रहो परन्तु यह अापके स्थिति प्रलय करके विषय में, सिसका पाल अथवा नाणी न पड़े याने आपके गुण अपनी बुद्धि के अनुसार कहा चाहता तो भी कुछ प्रार्थना करता है-11-911. ---- --
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॥
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भायाज्ञासाहतम्:
गौलिक इसस्तान
--
.
असुरसुर मुनीन्द्रोकरके पूजित, औरविल्या
तमहिमा वालेऐसे ईश्वरचन्द्रम
को अलघुवृत्तयानेबड़े (शिखरिणी) यतीकरक
सकलगुणश्रेष्ठपुष्पदंतनामकगंधर्ववत्ताभया
अहरहरनवच धूर्जटेस्तोत्रमतत्पठति
परम भक्त्या शुद्धचित्तःपुमान्यः । म
भवति शिवलोके रुदतुल्यस्तथाना-
चुरतरधनायुः पुत्रवान् कीर्तिमान
शुद्ध चित्तहोइस अनवद्य महादेवजीकेस्तोत्र
कोजो पुरुष प्रतिदिनपरम भक्तिसे पढ़ताह सो
हसिलोकबहुत्वकोशाप्त होता है और पुत्रवाही
करकीर्तिमान होताहोरमेरेपी वालो में
शिवके तुल्य अर्थात् शिव स्वरूप होता है ।।
दीक्षादानंतपस्तीर्थज्ञानरोमांदिका वित
महिम्न स्तवपाठस्यकला माहीत पोलीस !
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T शिवमहिम्न स्तोत्रम् ॥ मधुस्फीता वाचः परमममृतंनिर्मित- इत,स्तवबहादकिंवागपिसुरगुरोविस्म 'य पदम् । समत्वेतांबाणी गुण कथन पुण्येन भक्तः, पुलामीत्यर्थस्मिल्पुरम- धनबुद्धिव्यवासिता ॥३॥ हे भगवन् ! परम अमृतरूप मधु सदृश मिः ट याने कोमल देवरूप वाणी रचते भये, आ' पको ब्रह्माजी की भी वाणी क्या विस्मयपद है यदि ब्रह्मादिकों की वाणी तुच्छ है तो पुनः मैं क्या स्तुति करता हूँ। तो ऐसा नहीं: हे त्रि पुरगथन ! मैं तो केवल आपके पवित्र करने वाले गुपीक कथन से अपनी बुद्धिको पवित्र करताहूं मेरी मति तो ऐसी निश्चित हुईहै । श्वर्ययत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयंकृत। ।। , - .
. . ... भापा टीका महितम्। वयोवस्तुव्यस्तं तिलघुगुणमितात सुषु ।। असल्यानामसिम्वरवानी याम रमणीं। विहतुव्याकोशीनिया इहै केजडधियः॥४॥ हे वरको देनबाले । जो जगवी वसति रक्षा प्रलय करने वाला ऐश्वर्य है मां जुगों से भिन्नगानी ब्रह्मा, विष्णु महेश इन तीन देवों में माना गया है वस्तुतः आप एक ही हो, आपका ऐश्वर्य, जैसा है. जो वेदत्रयों में सरा- भूत है हे भगवन ! कई एक जड़ बुद्धिवाले (मीमांसक) आपके ऐश्वर्यको न सहन करते हुये आपकी निन्दा करते हैं जो अभव्य पा. पियों कर के रमणीय आप के इस ऐश्वर्य में रमण न कर सकें ऐसा अरमणीय निन्दा करते है शिवमहिन्न स्तोत्रम्। कीहः किंकायः सखलुकिमुपाय त्रिभुवन । किसाधारोधातासृजतिकि- शुपादानाव्यतिच। अतक्र्यैश्वर्य पथ्य नवसरःस्थोहताधियः। कुतकायका- श्चिन्मुखरयतिमोहायजगतः ॥२॥ निश्चय करके विधाता जगत को सृजता है परन्तु किस चेष्टा में बजताहै । तैसेहीक्या आधार उसको है ? और क्या. उपादान है,हे सगवन् ! एतादृश जो संदेह करतेहैं, सो यह कुतर्क कोई मंदमति बालों को ही ठगता है याने तिनके ही मतमें सयाता है किस लिये कि जगत के मोहके लिये वह तर्क कैसाकि जोतक न किया जाये ऐसे एसय वाले आप है 171 मापार्टीका सहित अवसर को नहीं प्राप्त होसके ऐसे अतुल प्रतापी ऑफ हैं ॥५॥ अजन्मालोलोका-किमयातोपिज ता महालाई स्वविधिमा स्वभवति। अनीशो वा कुर्याभरनज मलकापरिकरोयलोरदात्या प्रत्यम हर संशेरताने ॥६॥ से अवयव वाले लोला हारि) क्यों अ- जन्मा जगत की रचना क्या रचना करने गले को निरादर करके होती है । और वों विधाता यदि ने समर्थ होगा तो क्या होगा और जग रखने में उसके पास कौनसा साधन है। ऐसे मदः मतिवाले आपके लिये है .
शिवमहिम्न स्तोत्रम् । जो संदेह करते हैं सो व्यर्थ है, हे अमरवर ।। (देव श्रेष्ट)। मुझे तो आपके विषे कुछ संदे- ह नहीं है ॥६॥ त्रयीसांख्ययोगः पशुपतिमतं वैष्णव मितिभिन्ने प्रस्थाने परिमिदमदःप थ्यामितिच ॥ रुचीनां वैचित्र्याजुक टिलनानापथजुटणामेकोगम्यस्त्व मसिपय सामर्णव इव ॥ ७॥ हे भगवान । वेदत्रयी, सांख्य योग, शै. चमतं वैष्णवमत, ऐसे भिन्न भिन्न मत होने उन मतों के विषे कोई कहते हैं वैष्णव अच्छा है कोई कहते हैं शवमत ऐसे रुचिकी विचित्रतासे सीधे टेढ़े भाग में प्रवृत हुए म 1-4 १० है शिवमहिम्नस्तोत्रम् ॥ भोगते हो तो कहते हैं कि स्वात्माराम यांने योगिजनों को विषयरूप अगतृष्णा नहीं भू- माती है ।। ८॥. सुव कश्चित्सर्व सकलमपरस्त्वदनुवामि इंपरोधौव्याघ्रौव्येजगतिपदविव्यस्त विषये। समस्ते प्येतस्मि पुरमथत तैविस्मितइव स्तुपजिहमित्या नसल ननुष्ठा मुखरता॥ ९॥ हे भगवत् १ कोई यह सम्पूर्ण जगत को ध्रुव कहते हैं कोई अधुर कहते हैं, कोई जगत विषय में ध्रुव अवध याने नित्य अनि त्य कहते हैं ऐसे यह विपरीत विषय बाले हवं जगत में तिल अनेक मंतिवादियों करके वि- स्मत हुआ मैं आपकी स्तुति करने में लजाता D
41
११..
तवश्य
भाषाटीका सहितम् ।
हूँ. यह वाचालता ढिठाई नहीं है किन्तुः वो
मुझको मेरणा करती हैं ।। ९ ॥
यत्नाबदुपरि रिचा हार.
रधापरिच्छेत्तुयातावमल गजलकर
सातताभक्तिभामरगुरुमा
मिरियायत स्वयं तस्येताम्मतसिंगन
हसिफलति । १० ॥
हे भगवर-अपर को विरषि, और नीचेको
विष्णु शो ये दोनों आएके ऐवर्यको टहराले
लो सो असमर्थ हुए,आप कैसे है अनल थाने
तेज रूप शरीर पुन हे देव ! अक्ति श्रद्धा करके
स्तवन करने से तिन दोनों के लिये आप
प्रत्यक्षदर्शन देते भये सो आप की सेवा क्या
नहीं फलती! अर्थीत फलती है।।२०।।
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१२ शिवमहिम्न स्तोत्रम् ॥ अयत्नादापाय त्रिभुवन सदैव्यतिकर दशास्यो याहून मृत रणकण्इपरवशा ॥ शिरः पना श्रेणीरचितचरणांभो सहबलेस्थिरायास्त्वहस्तलिपुरहरवि स्कर्जितामिदम् ॥ ११ ॥ हे त्रिपुरहर । जो रावण वैरियों के सिवाय त्रिभुवन के राज्यको प्राप्त होकर बाहुओं को धारण करता भया वे कैसे वाह रणकई के पर वश याने युद्ध को चाहते, सो यह आपकी स्थिर भक्ति काही बिलासमात्र है, वो भक्ती कैसी कि अपने मस्तककी पंकी आपके चरण में समर्पण करी ॥१॥ असुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजब-
मापा टीका संहिता ।
नावलात्कलासेपित्वदाधि वसती विकत
मयतः अलभ्या पातालप्यल्सचलि
तांगुष्ठाशिरसि। प्रतिष्ठात्वय्यासहिद
मुप चितोमहतिखलः॥
हे भगवन् ! आपके कैलास में रहते हुए
भी अपने भुजबलको अंदाज रहा ऐसे समय
की पाताल में प्रतिष्ठा न हुई वह मुजयल को
हैं कि आपके सेवाही से प्राप्त हुआ है परा-
क्रम जिनमें और सहजही चलाये हुए पैर
अंगुष्ठ से दवगया सारांश यह है कि जब रा-
वण कैलास पर्वत उठाने लगा तब आप ने
परका अंगूठा हिलाया लोही उसकी मुलायें
दव गई उस समय पातालके लोग हँसले लगे
इस प्रकार राणाकी श्रीनिंगडगई हक जो
१४ शिवमहिम्न स्तना॥ हैं सो ऐश्वर्य, बान होने से मोह को प्राप्त होते हैं ।। १२ ॥ यह शुनामोबद परमोच्दैषि सती । सघनके बाल परिजन विधे यवतः। न शशि तरिम परि- बसितरित्वच्चरणयोनकस्याप्युनत्यै अगतिशिरसस्तव्यवनतिः है.प्रयो ! जो वाणासुर मुत्रामा याने इन्द्र तिसकी वृद्धिगत हुई समृद्धि हाने श्वर्य) तिसको दबाता भया याने तुच्छ किया कैसा वह कि स्वाधीन है त्रिभुवन जिसके, सो तिस में आश्चर्य नहीं क्योंकि वह तो आपके चरण में रहता था तो आपको नमस्कार न किये हुए किसी की उन्नति नहीं होती हैं ॥३॥ .....
मापारीका लहितमः॥ अकांडलाहांड क्षय चकितदेवासुर कृपा विधेयस्यासोध विनयन विध सहतवतातफल्माप कठेतवनकुरुत मभिएसमाविकारोपिलाध्यो गुरु भयभागनिन । है चिनयन समस्तबहाण्डका क्षयझेने के हास बक्ति हाए देव तथा राक्षस तिनपरकपा करने वाले आप कालकूट विषको पीगर था, रणकिये हुए तिलका आएके कसमें जो नील सहुँ सो स्या नहीं शोमताहै किन्तु दह भी शोभता है क्यों कि त्रिभुवन के भगा हाल के भंगसे दुखित ऐसे आपके कण्ठ में कालापन वर्णन करने योग्य है, विस करके आप नील कण्ठ कहाते हैं ॥१४॥ :-
१६
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शिवमहिम्न स्तोत्रम
असिद्धार्थानव क्वचिदपि सदेवा
सुरनरोनिवततोनत्यं जगतिजायनोय.
स्य विशिखा। सपश्यन्नीशत्वामित
रसाधारणम भूता स्मरः स्मर्तब्या-
मानहि बशिषुपथ्यः परि भवः॥
हे ईश! सम्पूर्ण जगतको जीतने वाले जि-
से काम देवकें विशिख अर्थात् वाण. देव असुर
मनुष्य आदि सब संसार में कहीं भी अपने
अर्थ को सिद्ध किये बिना नहीं मुड़े ऐसावह
मदन आप को इतर देवताओं के समान देख
ता हुआ स्पर्तव्य हुआ इग्ध हो गया ।। १५ ॥
मही पादा पाताहजति सहसा संश
संपदोपदावष्णानाभ्यद् जपरिधरण
ग्रहमणमामाहादास्थ्ययोत्यानिभृतजटा
.
Imag भोपाटीका.सहितम् । १७ ताडितता जगदक्षायैवं नटासिननु वामैव विभुता ॥ १६॥ हे भगवन् ! आप जगत रक्षा के अर्थ ना- चते ही आपकी उलटी विभूती है, क्योंकि पृ. ध्वी जोहै सो आपके पदाघातसे पाने पर च- लानेसे संशय पदको प्राप्त होती है याने मैं धस न जाऊं । और आपकी भ्रमण करतीहुई दी ला सरीखी भुजाओं से डगमगाते तारागणों वाला आकाश दुखी होता और इचल ज- राओं करके ताडित हुआ स्वर्ग वारम्नास्थक जाता है ॥ १६॥ वियव्यापी तारागण पुणलिफेलोस मरुचिः, प्रवाहो वारायः पृपतलघुदृष्ट सिरसिते ।। जगदुद्दीपाकारंजलधिव- ...
१.८. शिवमान स्वोत्रम् । लयंतेन कृता मि त्यनेनेवोन्नेयं धृतम हिमदिव्यतवपुः ॥ १७ ॥ हे भगवन । जो जलका प्रवाह आकाशसा व्याप्त और तारागणों से गुणितयाने गिना हुआ फेन उठने की काति जिसकी सो आपक मस्त कपर विंडसमान छोटासा दीख पड़ा औरउस करके यह जगत द्वीपाकार समुद्रसे चिराहुआ कियागया इसकरके दीन महिमा धारी आप का शरीर उत्तम जान लेना चाहिये ।। १७॥ रथःक्षोणी यता शतधूतिरगेन्द्रोध नुरथो रथांगे चन्द्राको रवचरणपाणि शरइति । दिधक्षास्ते कोयं निपुरत गमाईबस विधि विधय व त्योनखः हुए परतंत्राप्रमाधयः .
! भाषाटीका सरितम || हे महादेवोतृणके समान त्रिपुरासुरलोभस्म करने की इच्छाकरतेहुए आपकाक्या यह डबरयाने बखेडा करना देखो पृथ्वी तो रय ब्रह्मासारथी अगेंद्र याने पूर्वनों का राजा धनुष सूर्य चन्द्र रथके. चक्र और चक्रपाणि (बाहै हाथमें जिसके ऐसा ) विष्णु सोही वाण बना या यहतो ठीक है क्योंकि भक्तोंके साथ क्रीडा करतीहुई प्रभुओंकी बुद्धियाँ निश्चयकरके पर तन्त्र यान पराधीन नहीं होती है ।।१८॥ हरिस्ते साहस्र कमलबलिमादाय पदयोर्यदेकोनेतरिमन्निजमुदहरक्षेत्र कमलम् ॥ गतो भवत्युदेका परिणत तिमसौ चक्रवपुषा त्यागारक्षायत्रिपु रहरजातिजगताम् ॥ १९ ॥ सध. "..
२० शिव महिम्न स्तोत्रम् ॥ है.त्रिपहर ! इरि पाने विष्णु आपके चरण में सहस्र कमलों को बलि याने भेट रखकर पूजन करतेथे सो तिनमें जब एक ऊन याने एक कम हुआ तवे अपने नेत्रकमलको निका: लतें भये तव भक्तिका उद्रेक याने वुद्धीक परि माणको प्रासहोताहुआ (यह भक्तकी सीमा हुई)सो सुदर्शनचक्र होकर स्वर्ग मृत्यु, पाताल ऐसे त्रिभुवनको रक्षाके अर्थ जागृत सो केवल यह आएका अनुग्रह है।॥ १९ ॥ ऋतौ सुप्तेजाग्रत्त्वमसि फलयोगेक- तुमतां च कर्म प्रध्वस्त फलति पुरु: पाराधनमृताअतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य ऋतुषु फलदानप्रतिभुवं श्रुतौश्रद्धांबध्वादृढप रिकर कर्म सुजन ॥ २० ॥ -
मापाटीका साइतम्
में भगवान | ऋतु अर्थात् यज्ञ सो किसी
उपद्रव से नक्ष्मय संत ऋतुमता याने यंत्र करने
वालों के फल आपही जागृत रहते हो नहीं तो प्र-
ध्वस्त ( नष्ट हुआ कम पुरुषके आराधन वि
जा फलीभूत होगा, इससे आपको यज्ञफलदैन
के प्रतिभू अर्थात् मध्यस्थ समझकर यह जन
समूह कर्म करनेमें इस परिकर यदि मजबूत
कमर बांधरहाहै, क्योंकि मुख्य फलदाता आ
पही हो ॥ २० ॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिराशस्त
नुभूतामृषीणामातिज्यशरणदंसदस्या
सुरगणाः ऋतु,शस्त्वतः ऋतुफलवि
धानव्यसनिनो धुवकर्तःश्राविधुरिमः
भिचारायाहिमखाः॥ २३॥
१२ शिमाहम्न सोत्रम हे शरणद! जो दक्ष किया कुशल और शरी रियोंमें पंज्ञपति था. कि जिस दक्ष प्रजापतिके यज्ञ में अपियोंको आत्विज्यथा, सुरगुण सद: स्प (सभ्य) थे. ऐसे दक्षके यज्ञके फलको दे ना यही है व्यसन (चिन्ता जिनको ऐसे आ पसे यज्ञका नाश हुआ इससे यह प्रगट हुआ कि श्रद्धा विना करने वाले के यज्ञ विपरीत पलदेने वाला होताहै ।। ३१ प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिके रखा. दुहितरंगतं रोहिदभूतारिरमयिषुमध्य स्यवपुषाधिनुष्पाणेर्यातं दिवसमपिस पत्रा कृतमसुत्रसंतते द्याऽपित्यजतिन मृगव्याधरमसः ॥ २२॥ हे नाथ ! आपका आखेट खेलना कसा है ..
२१ भोपाटीका सहितम कि डरहुए प्रजानाथ-याने ब्रह्माजी को स्वर्ग गयेहुए का अद्यापिभी नहीं छोड़ता, वे कैसे ब्रह्माजीकिवलात्कारसेरममाण होनकी इच्छा करते हुए तिससे डरीहुई हरिणीभइअपनी के न्यास हारणहोकरभीपुनःविषय करना चाहते भवें और आप धनुषडाय में लिये हुएमापसे डरता और कमाके स्वाधीना रहाई।। २३॥ स्वलावण्याशंसाधूतधनुक मन्हाय तृणवत पुरप्लष्टं हा पुरमथन पुरूपी युधमपि।।यदि स्त्रण देवी यमनिरत देहाई घटना दुवैति वामद्धावतवरद मुग्धा युवतयः ॥ ३२॥ हे पुरमथन । आपने पुष्पायुध याने मदन को तृमके समान शीघ्रजलाकरछार कियायह २४ शिवपहिम्नस्तोत्रम् ॥ प्रत्यक्ष देखतेभी पुनः देवीपार्वती,आपको स्त्रण याने अपने वश जानतीहै यह अत्यन्त खेदः कीवात वह देवी कैसीहै कि अपनी सुन्दरता को प्रशंसा करतीहै वह मदन कैसाहै कि धनुष को धारण करनेवाला किस हेतुसे! तो निरंतर देहाध घटना याने आधेशरीर में अपने को राखने सेहे वरदे? युवतिजन (स्त्रियां) प्रायः मूर्सही रहती हैं ॥ २३ ॥ स्मशानेष्वाक्रीडास्मरहरापशाचाः सहचरा श्चिताभस्मालेपःस्रगपिनक रोटीपरिकरः॥अमगल्यशीलंतवभवत नामवमखिलंतथापिस्मर्तृणांवरदपरम मंगलमास ॥२४॥ हे स्मरहर ! आपका स्मशानमें रहना, मृत -- Amiry Direpareer शिवमहिम्न स्तोत्र ॥ २५ --- ... IA प्रेत पिशाच ये आपके साथ रहनवाले, और शरीरमें चिताके भागका लेपन नरमुंडों माला इसप्रकार आपका स्वभाव अमंगल है, तथापि स्मरण करने वालोंक हे वद आप परम मंगल रूप हैं ॥ २४ ॥ मनः प्रत्यक्षात सविधसविधाया- तमस्त मनुष्यद्रोमाणामसालिलो- यालोल्यालादं हद इवनिमज्यामृतमयेधत्यंतस्तत्वदित मंपियमिनरवरिफल भवान् ॥२५॥ है भगवन् ! प्राणायमादि करने वाले विष यों से निवृत ऐसे जो यपि अर्थात् योगिजन अपने अंतःकरण में अपने मनको धारनेवाले यानोस्थिरकरनेवालेजोकुछतत्वकोदेखकरजि संगितदृशः २६ - भाप टीका सहिनम् ॥ नके रोमच खड़े होरहेहैं और आनन्द करके नेत्रमें जलभर आयाहै मानों वे अमृत के हृदय में गोतामें लगाय जो आन्दको प्राप्त होते हैं सोनिश्रय करके वह तत्तापही हो ॥२५॥ समस्तंसोमस्वमासिपवनस्त्वंहुत वहःखमापस्त्वंन्योमत्वमुधरणिरात्मा स्वामिविच परिछिन्नामेवत्वयिपरिणता विनतिमानविास्ततत्वयमिहतुय संजभवसि ॥ २६ ॥ हे भगवन् ! आपसूर्यहो,आप चन्द्रमाहों, आप वायूहो, आप अग्निहों, आप जलहो, आपसर्गहा, आप पृथ्वीहो और आत्मामी आहाही. हे देवाधिदेव ? इस प्रकार आप में जो ज्ञानी और भक्तजन परिच्छिन्न अति .
---
२८
और
भाषा टीका संहितम् ।
देवताओं को धारण करता हआ जो ओंकार
कैसाकि तीर्णविकृति अर्थात निर्विकार और
सूक्ष्म ध्वनियों से आपका जो तुरीय धाम
याने जाग्रदादि अवस्थाओं से परे जो चतुर्थ
दाम तिसे बता रहा है. ॥ २७॥
भवशारुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह-
यहाँ स्तथाभीमेशांना वितियद मिधा
नाटकमिदंअमुष्मिन्प्रत्येक विचरति
देवश्रुतिरपि त्रियायस्मैवाम्नेगणहि-
तनमत्यास्मिभेवते ॥२८॥
हे देव ! भव शर्व, रुद्र पशूपत्ति, उन महा
दव भीम, ईशान, यह जो आपके नामको
अष्टकहै इस प्रत्येक नाममें वतियां बिहार के
रती है इसलिये ऐसा.जो नियधाम आपतिन
के अर्थ में नमस्कार करता हूँ॥ २८ ॥
- २९ . शिवमहिम्नस्त्रोम्। नमो नेदिष्ठाय प्रियदरद विवायच नमो नमःलोभिष्टायस्मरहरसहिदाय चनमः नमो वषिष्टायत्रिनयन्यनिष्ठा यचनमो नमः सर्व देतदिदमतिस वायचनमः ।। २९ हे शिव निर्दिष्ट अर्थात् अत्यन्त समीप ऐसे आपके अर्थ नमस्कार है, और दक्छि अर्यात अत्यन्त दूर रहने वाले ऐसे भाप के अर्थ नमस्कारहै क्षोदिष्ठ अर्थात् परमसूक्षमा- पके अर्थ नमस्कारहै हेस्सरहर ! याने काम देवको जलाने वालेजो आप महिष्ठ याने अ त्यन्त वृद्ध आपके अर्थ नमस्कारहै. हे चिन- चन । यदिछ अर्थात् असन्त युवा ( ज्यान ) अवस्थावाले आपके अर्थ नमस्कार है और T: LTAH
-
३०
.
.
भ.पाटीका सहितम् ।
समस्तको उल्लंघके जाने वाले आपके अर्थ
नमस्कार है।।
पहलाजसेविश्वोत्पत्ती भवायनमो
नमः प्रचलतमले तत्संहारे हरायनमो
नमःजिनसुखकनेसत्वोदिक्तौमडाय
नमोनमः प्रमहसियदेनिस्त्रगुण्येशिवा
रानमो नमः ३.० ॥
शिवजी! जगत के पतिके अर्थ परम
रजो गुण रूप धारण कियें ऐसें जो आप भव
तिनका बारम्बार नमस्कार हो और उसकेंज
गट के) प्रहार करनेमें गुणको धारण करनेवाले
हर तिनके अर्थ पुनः २ नमस्कार हो जमंत्
के मुख के अर्थ सत्वगुणक उत्पन्न करने वा-
ले जो आप मूड विनको बारम्बार नमस्कार
L ३२ भापाटीका सहितम् ।। यसितगिरिसमस्यात्कन्जलसिंधु पाले सुरतरुवरशाखालेखनीपत्रमुर्वी। लिपति यदिग्रहिवाशारदा सर्वकालं वापतवगुणाना मीशपारंन याति३ हे ईश!-आसित. याने काले पर्वतके समान काजल स्याही समुद्र रूप पात्रमें होवे सुर- तरु कल्पवृक्ष के साखाकी उत्तम लेखनी हो और पत्र पृथ्वी हो इत्यादि साधनों कोलेकर यदि शारदा सबकाल लिखतीरहै तथापि आ. पंके गुणों का पार नहीं पाता में तो कौन पः दार्थ हूँ॥ ३२ ॥ असुरसुरमुनीन्द्ररचितस्यदुमाले य थितगणमहिम्नों निगुणस्यश्वरम् । सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ता भिधानो सचिरमलघुवतःस्तोत्रमेतच्चकार 3 -
How
शिवमहिम्न स्तोत्रम
हे शिवशादानतप, तीथ,यज्ञ योगादि
किया वे सब आपके उस महिम्न स्तोत्र पाठ
को सोली कलाको भी प्राप्त नहीं होते हैं ।
आसमाप्त भिहस्तोत्रे पुण्यगंधर्वभाषितम् ॥ अ
नुपर्भमनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम् ।। ३६ ।।
अनुपम और मनको हरने वाला और ईश्वर वर्ण
पाक और पनि पुति गंधर्न बाहा हुआ वह
सत्र समाप्त हुआ :१.६
महेशानापरीदेवी महिम्ना नापरस्तुतिः । अ
धारानापरी मंत्रोनास्तितत्वगुरोः परम ॥३७॥
महादेव जी से परे कोई देव नहीं:महिम्न से
कोई तो माँ बोर. सेपरेको मन्त्र, नहीं
और गुरले चाह में
कुममशननामासर्वगंधवराज शिशुशश
घरमालेवदेवस्यक्षासः सखुलनिजमाहिरनों
भ्रष्ट एवाम्म रोपा रस्तवनमिदमकाहित्यादि
व्यमहिम्नः ॥ ३८॥
भोपाटीका महितमा पुष्पदन्तावांव जो पाटि गंध यानि कमशन नाम गंधर्व थे किला :समय एकान्तमें शिवजी और पामी जी की आनन्द की बातें छिपकर सुनने लगे तो शिवनी ने देखतेही इनको यह भाप दिया कि जो तुम इस गधर्व पदव से पतित होकर मनुष्य लोक में जन्मठो तब इन्होंने पहा जन्म देकर परय-दिव्य इस महिम्न स्तोत्रसशिवजी का अत्यन्त प्रसन्न कर मनोवांछित फल प्राप्त किया ॥८॥ सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षकहेतुं । पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिनान्यचेताजतिशिवसमीपं किन्नरः स्तूयमानः । स्तवनामिदममोघ.पुष्प दन्त प्रणीतम् ।। ३९ ॥ पुंपदन्तामयिका कथित जो निय मदिन्न स्तोत्र का कैसा है कि देवता और मुनियों. करके पूजित और स्वर्ग:मोक्ष पाति का मूल कारण म तीनको जो मनुष्य रिशर चित हाके हाथ जोहार पाता है वह शिवजी के समान होता उसकी स्तुति किन्नर गर्व आदि जाते हैं ॥ ३९ ॥ श्रीपुष्पदन्तमुखपंकजनिर्गतेन । स्तोत्रणकि- लिपहरणहरप्रियेण ।। कंटस्थितनपठितैनसमा . सस 1 स . . . शिवमहिम्नस्तोत्रम् । हितेन सुप्रीगितोभवतिभूतपतिमहेशः ।।६।। श्रीपुष्पदन्ताचार्य के मुखारविन्द से कहा हुआ जो यह पाप नाशक पहिम्न स्तोत्र है चित्त लगाकर इसके कण्ठ 'पाठ करने से भूतपत्ति जी श्री महादेवजी अत्यन्त प्रसन्न होते हैं क्योंकि शिवजी को यह स्तोत्र अत्यन्त प्रिय है ॥ ४० ॥ एककालद्रिकालवात्रिकालन्नित्यमुत्पठेत् । भवपाश विनिर्मुक्ता शिवलोकंसगच्छति।।११॥ जो मनुष्य इस महिम्नस्तोत्र को एक बार वा दो बार वा तीनधार त्यि पहेगा यह संसार की फांसीसे छुटकर शिव जोक में मांगा ।। ४३ इत्येषावाङ्मयीपूजाश्रीमच्छरपादयोः। अर्पितातेनमेदेवप्रीयतांचसदौशिवः ॥ १२ ॥ यह स्तोत्र की पूजा श्रीमहादेवजी के चरण कमल पर मैं [ पुम्पदन्ताचार्य ] ने चाह | उस से श्रीसाम्ब सदाशिव मुझपर सन्तुष्ट हों। सबमहिम्न स्तोत्र हुमति पुस्ता ..-.
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