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Aashochpanjika

Surajandas Swamina · 2006/06/27

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CD समीक्षाचक्रवर्ति-विद्यावाचस्पति-महामहोपदेशक, वैदिकविज्ञानरहस्योद्घाटकविद्वद्वर्य- स्व. पं० श्रीमधुसूदनओझाजी चिराचिता 'आशौचपञ्जिका सेयं पं. श्रीसुरजनदासस्वामिना एम्. ए. साहित्य-व्याकरण-वेदान्त-सांख्ययोगाचार्येण सम्पादिता। ग्रन्थकर्तृ सूनुना पं० श्रीप्रद्युम्नशमणा प्रकाशिता! मूल्यम् ) द्वितीयावृत्तिः ५०० वि० सम्वत् २००८ सर्वधिकाराः प्रकाशकाधीना:

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॥ श्रीः ॥ * निवेदन * Tamasome के कुछ ही दिन हुए अर्थात् ता० २५-१२-५१ ई० को “पुराणोत्पत्ति प्रसङ्ग' पुस्तक द्वितीयावृत्ति के प्रारम्भ में निवेदन शीर्षक लेख में बहुत कुछ लिख चुका हूँ। कादम्बिनी तथा प्राशौचपत्रिका की प्रथमावृत्ति जो क्रमशः वि० सं० १९७६ वि•सं० १९७५ में प्रकाशित हुए थे उनके समाप्त हो जाने पर इन परम उपयोगी पुस्तकों की जब बहुत्र मांग होने लगी तब वि० सं० १६.६६ में इनके प्रकाशन का आयोजन कर कादम्बिनी की द्वितीयावृत्ति तो हिन्दीभाषानुवादसहित प्रकाशित करा दी। परन्तु आवश्यक होते हुए भी आशौचपञ्जिका की द्वितीयावृत्ति उस समय हम न करा सके । आज ठीक १० वर्ष बाद उसी आशौचपञ्जिका को द्वितीयावृत्ति बहुत समय से प्रतीक्षा करने वाले पाठकों तथा अन्य विद्यानुरागी महानुभावों के उपस्थित कर रहे हैं। उक्त ग्रन्थ का यद्यपि अक्षरशः हिन्दी भाषानुवाद तो नहीं हुआ है क्योंकि उसकी आवश्यकता भी प्रतीत नहीं होती है। परन्तु इसके विषयों को भली प्रकार समझने के लिये हिन्दी भाषा में इसका सारांश स्वामी सुरजनदासजी एम० ए० ने बड़े ही परिश्रम से इस प्रकार विस्पष्ट किया है कि हिन्दीभाषाभाषी इसके प्रत्येक विषय को करतलामलकवत समझ समक्ष सकेंगे। इस प्रकार प्रन्थों के भाषानुवाद या सारांश आदि से उसकी उपयोगिता तो वास्तव में बहुत बढ़ जाती है अर्थात् संस्कृन के विद्वानों के अतिरिक्त विद्या प्रेमी हिन्दी भाषा में विशेष रुचि रखने वाले भी इससे पूरा लाम उठा सकते हैं जिनकी गणना भी संप्रति संस्कृत जाननेवालों से अधिक है परन्तु हम पहले भी अन्य पुस्तकों में यह निवेदन कर चुके हैं कि इससे हमारे मुख्य उद्देश्य ( अमुद्रित ग्रन्थों के प्रकाशन कार्य ) में बहुन शिथिलता आजाने से बड़ी बाधा उपस्थित हो जाती है और कार्य क्षेत्र को बढ़ाने का साधन हम को नहीं है । अतः हम तो सर्वप्रथम अपने उद्देश्य को ही जहां तक हमारे जीवन काल में हो सके पूरा करने का विचार रखते हैं। meena

(२)
जैसा कि पहले हम कितनी ही बार यह प्रकट कर चुके हैं कि श्रीमान् अलवरेन्द्र
आदर्शनृपति की हमारे इस महान सत्कार्य में बड़ी सहानुभूति रहती है और श्रीमान् को भी
पुस्तकों के विशेष प्रचारार्थ यह इच्छा है कि हिन्दी भाषा का भी इसमें प्रायोजन रहा करे
अतः हमने श्रीमान् के आदेशानुसार पुराणोत्पत्तिप्रसङ्ग तथा श्राशौचपञ्जिका का यह
विस्पष्टीकरण हिन्दी भाषा में कराया है आगे भी परिस्थिति के अनुसार यथा साध्य श्रीमान
के आज्ञापालन का पूरा ध्यान रखेंगे। .
श्रीमान् के इस प्रोत्साहन के लिये हम चिरकृतज्ञ हैं साथ ही भगवान् से हादिक
सर्वदा यही प्रार्थना रहती है कि श्रीमान् को सपरिवार चिरायु तथा सुखी रक्खें और महाराज
का यह विद्यानुराग देशके लिए लाभप्रद हो।
-
निवेदक:-
SANARTHI
जयपुर
ता.३१-१२-५१ ई०
प्रद्युम्न शर्मा ओझा।

वेदविद्यासमुद्धारक स्वर्गीय पण्डित भीमधुसूदनशर्म मैथिनाः ।

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॥ भूमिका 1- वेदरहस्य प्रकाशक समीक्षाचक्रवर्ती स्वर्गीय पूज्य गुरुवर्ण पं० श्री मधुसुदनजी महाराज ने सहस्राब्दियों से विलुप्त वैदिक विज्ञान का पुनरुज्जीवन करने के लिए वेदों में आये हुए ब्रह्म, यज्ञ, धर्म, इतिहास, वेदाङ्ग आदि सभी विषयों पर उनके रहस्यों को प्रकाशित करने वाले.प्रन्थों का निर्माण किया। धर्मरहायसंबन्धी पुस्तकें उनने "वेदाङ्गसमीक्षा" प्रकरण के अन्तर्गत आत्मसंस्कारकल्पप्रकरण में रक्खी हैं, क्योंकि धर्म का सम्बन्ध शरीर सत्त्व चेतन भेद से त्रिधा विभक्त आत्माओं में से सहयात्मा से है और वह इस सत्त्वात्मा का ही प्रधानतया संस्कार करता है। धर्म मनुष्यसमाज के जीवन का अविच्छिन्न अङ्ग है । मनुष्य धर्म के.साथ ही पैदा होता है, जीता है तथा उसके साथ ही मृत्यु को प्राप्त होता है। उसके बिना, उसका जीवन अधूरा तथा संकटग्रस्त है । मनुष्यजीवन से यदि धर्म को पृथक कर दिया जाय तो मनु में मनुष्यता ही क्या रहेगी और उसका अन्य पशु श्रादि प्राणियोंसे भेद भी किस तरह किया जा सकेगा। इसी लिए तो नीतिकारों ने लिखा है कि- 7 धर्मो हि तेषामधिको विशेषो, धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ इति मनुष्य जब पैदा होता है उस समय अन्य प्राणियों की तरह प्राकृत व असंस्कृत रूप में ही पैदा होता है। फिर उस में संस्कार किये जाते हैं तब वह सस्कृत बनता है। तभी वह ममुख्य प्रामण, क्षत्रिय आदि कहलाने का वास्तविक अधिकारी बनता है । यह संस्कार ही धर्म है। और यह सरकार मनुष्य के दोषों को दूर कर उस में गुणों का प्राधान करता है। इसीलिए संस्कारों का प्रयोजन दोषापनयन व गुणाधान माना गया है। ऐसे इन संस्कारों को प्रत्येक मनुष्याचाहता है। ऐसी स्थिति में कोई भी मनुष्य धर्मविमुख होने की इच्छा नहीं करता। फिर भी जनता इस संमय धर्मविमुख क्यों होती जारही है। यदि इसके कारण की गवेषणा की जाय तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि आजकल का मनुष्यसमाज प्रत्येक वस्तु को विज्ञान व तर्क की कसौटी पर कस कर जानना चाहता है। यदि यह साधन नहीं मिलता तो उसकी डस बस्तु पर अश्रद्धा व महचि पैदा होजाती है ।

HEASTHAN LAINRITAMERA - धर्म के विषय में भी यही बोत है । आधुनिक धार्मिकम्मन्य सम्प्रदाय धर्म के विषय में किसी भी प्रकार के विज्ञान व तर्क को जनता के सम्मुख उपस्थित करने में असमर्थ हैं। यदि कोई धर्म के ज्ञान के लिए उनसे शङ्का व तर्क करता है तो उसे उसी समय नास्तिकता का प्रमाणपत्र देदिया जाता है। धर्मज्ञान के लिये तर्क तो साधन माना गया है फिर उसको नास्ति- कता का द्योतक कैसे माना जाय । हमारे शास्त्रों में तो यहां तक लिखा है कि जो तर्क द्वारा धर्म को जानता है वही वस्तुतः धर्म को जानना है और नहीं। फिर भी धार्मिकम्मन्यों का तर्क को धर्मके विषय में असंगत बतलाना, धर्म के विषय में उन के अज्ञान को सूचित करता है। वे स्वयं उस की उपपत्ति नहीं जानते अतः उत्तर देने में असमर्थ होते हैं। अतः उपपत्ति पूछने वालों को नास्तिकता का प्रमाण देने के अतिरिक्त उनके पास उससे पीछा छुडाने का और रास्ता ही क्या है। किन्तु यह प्रवृत्ति धर्मप्रचार के लिए घातक है । अतः धर्मप्रचारकों को स्वयं धर्म की उपपत्ति जाननी चाहिये और जनता के सामने वह उपपत्ति रखनी चाहिये जिससे जनता में उसका प्रचार हो सके । किन्तु आज तक के बने हुए मध्यकालिक धर्मग्रन्थों में इस बात की कमी मालूम पड़ती है। इसी से उनके अध्ययन करने वालों को धर्मसम्बन्धी विज्ञान व उपपत्ति का ज्ञान नहीं होता और इसी लिये वे दूसरे को भी बतला नहीं सकते। दूसरी बात यह है कि धर्म के ज्ञान के लिए जितने भी शास्त्र मध्यकाल में बने हैं वे सब ऐसे खण्डन मण्डन व मतभेद से परिपूर्ण हैं कि साधारण बुद्धि वाले व्यक्ति का, उनका अध्ययन कर, सिद्धान्त पर पहुँचना अत्यन्त कठिन होजाता है। यह बात भी धर्मके प्रति प्राधि व अश्रद्धा पैदा करने में कारण बनी है। इन सब बातों को ध्यान में रख कर श्रद्धेय पं० जी महाराजने सभी धर्मशास्त्रों का सम्यक् मन्थन कर के धार्मिक जनता के ज्ञान के लिए सार- भूत सिद्धान्त को प्रकाशित करनेवाला यह अपूर्व प्रन्थ बनाया है । इसमें जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त व उसके बाद भी होने वाले प्राशौच का अत्यन्त स्पष्टता व सरलता से वर्णन है। इसका अध्ययन करने के बाद आशौच के सम्बन्ध में किसी प्रकार का संशय नहीं रहता। इस ग्रन्थ में आधुनिक तर्कप्रधान जनता के लिए श्राशौच का स्वरूप, आशौच का कारण, आशौच. का प्रभव, सापिण्ड्य आदि वस्तुओं का विज्ञान भी प्रमाण व युक्ति के साथ बतलाया गया है। जिस से आशौच के विषय में उनकी शङ्काओं का समाधान सम्यक्तया हो जाता है। इस तरह यह ग्रन्थ आशौचविषय का अपूर्व प्रन्थ है । इसको यथार्थता पाठकों को इसको अध्ययन करने के बाद ही ज्ञात होगी। sau * आ धर्मोपदेशं च, वेदशास्त्राविरोधिना । यस्तकेंणानुसन्धत्ते, स धर्म वेद नेतरः॥

RESENAHI इस प्रन्थ में १ परिभाषाध्याय २ सूत्राध्याय ३ जन्माध्याय ४ मरणाध्याय ५ उत्तर- क्रियाध्याय ६ दोषाध्याय ७ पाताध्याय ८ अतीतकालाध्याय : अपवादाध्याय १० वाक्यसंग्रहा- ध्याय भेद से १० अध्याय हैं। ५-परिभाषाध्याय में प्राशौचासम्बन्धी पारिभाषिक विषयों का निरूपण किया है-जैसे पाशीच शब्द का क्या अर्थ है,आशौनका संपर्क किससे है?आशौच कितनी प्रकार का है?इत्यादि तत्वों का निरूपण किया है। २-सूत्राध्याय में आशौच की उत्पत्ति कैसे होती है, उसका आश्रय क्या है, उसका संक्रमण कैसे होता है इत्यादि विषयों द्वारा श्राशौच का रहस्य बतलाया गया है। ३-जन्माध्याय में जन्मसम्बन्धी प्राशौच का विचार किया गया है। ४-मरणाध्याय में मरणसम्बन्धी आशौच का निरूपण है। ५-उत्तरक्रियाध्याय में मरने के बाद होने वाली क्रियाओं ( शव का स्पर्श करना, उसे ले जाना, सजाना, जताना ) से उत्पन्न होने वाले आशौच का प्रतिपादन है। ६-दोषाध्याय में जन्म मरण आदि को छोड़ कर अन्य दोषों से उत्पन्न होने वाले आशौच का प्रतिपादन है । जैसे अन्यपरिणीता स्त्री घर में रखलेने के कारण व चन्द्रसूर्यग्रहणादि के कारण होने वाले आशौच का निर्णय है। ७-पाताध्ताध्याय में आशौच के काल में दूसरे श्राशौच के निमित्त के उपस्थित होजाने से परस्पर आशोचकारणों का संघात होजाने से जो आशौच होता है उसका निरूपण किया गया है। ८-अतोतकालाध्याय में आशौच के मुख्य काल के समाप्त होजाने पर उसका मालम होने पर जो प्राशौच होता है उसका निरूपण है। जैसे कि कोई व्यक्ति कलकत्ते में रहने लग गया है और उसके घरवाले शेखावाटी में रहते हैं। उस के घर पुत्र पैदा हुआ और तजन्य आशौच का समय समाप्त होगया, फिर उसके बाद उसके पास समाचार पहुंचे, उस समय उस पिता को कितना व कैसा आशौ । होगा इसका निरूपण अतीतकालाध्याय में किया है। " - अपवादाध्यय में श्र'शौचनिमित्त उपस्थित होने पर कैसे कैसे व्यक्तियों को प्राशौच नहीं लगतो, इसी तरह किन किन परिस्थितियों में आशौच नहीं होता इसका निरूपण है।

१०-वाक्यसंग्रहाध्याय में भिन्न २ स्मृतियोंके आशौचप्रतिपादक वचनों का संकलन है। इस तरह इस पुस्तक में आशौचसम्यन्धी सभी विषयों का पूर्ण निरूपण संक्षेप से कर दिया गया है। भूमिका में सब विषयों का निरूपण न कर श्राशौच का सम्बन्ध किस समाज से है, आशौच पदार्थ क्या है. आशौच कितनी प्रकार का होता है, आशौच का प्रभव क्या है, तथा आशौच का ध्यक्त्यन्तर में संक्रमण कैसे होता है एवं जन्म मृत्यु सम्बन्धी प्रधान श्राशौच का संक्रमण सपिण्ड में होता है अतः सापिण्ड्य ही इन दोनों श्राशीचों में संक्रमण का कारण बनता है । वह सापिण्ड्य पदार्थ क्या है इन्हीं विषयों का संक्षेप में निरूपण किया जा रहा है। १-आशौच - प्रत्येक व्यक्ति में प्रधानतया शरीरात्मा, अन्तरात्मा, व विशुद्धात्मा इन तीन आत्माओं की सत्ता मानी जाती है। इन्हीं को क्रमशः शरीर सत्व व चेतना तथा भूतात्मा, जीवात्मा व क्षेत्र भी कहते हैं । इन तीनों में अन्तिम विशुद्धात्मा सर्वथा विशुद्ध है, दोषरहित है, अत: उसके संस्कार की आवश्यकता नहीं । गीता में भी क्षेत्रज्ञ को सर्वथा विशुद्ध, क्षेत्र के धर्मों से असंस्कृष्ट बतलाया है । शेष दो शरीर व सत्त्व दोषसंपृक्त हैं अन एव असंस्कृत है। अतः उनके संस्कार की अपेक्षा होती है। उनमें शरीर के संस्कार दोषमार्जन व गुणाधान को प्रधान- तया आयुर्वेद शास्त्र बतलाता है। और सत्त्वात्मा के संस्कार का प्रधानतया धर्मशास्त्र बोधन करता है । यह बात दूसरी है कि शरीर व सत्त्व के परस्पर सम्बद्ध होने से एक के लिए संस्कार बतलाने वाला शास्त्र गौणतया दूसरे के संस्कारोंका भी बोधन करता है। जैसे शरीर के दोषमार्जन व गुणाधान का बोधक आयुर्वेदशास्त्र शरीर से सम्बद्ध अन्तरात्मरूप सत्व के भी संस्कार का बोधन करता ही है। इसी तरह अन्तरात्मरूप सत्त्व के संस्कारों का बतलाने वाला धर्मशास्त्र तत्सम्बद्ध उस सत्त्व के आयतनभूत भूत, भौतिक शरीर तथा प्राण समुदाय के संस्कारों का भी बोधन करता ही है । संस्कार के अन्तर्गत दोषमार्जन, गुणाधान,व स्वत्याधान ये तीन तत्त्व आते हैं । इसमें दोषमार्जन के बिना न गुणाधान हो सकता है और न स्वस्त्या- धान ही। अत: सर्वप्रथम दोषमार्जन की आवश्यकता होती है। प्रज्ञापराध के कारण आहार विहार आदि के लिए प्रयुक्त द्रव्यों के हीनयोग, मिथ्यायोग व प्रतियोग से सत्त्व के भीतर जो अशुभरूप मल संचित होते हैं उन मलरूप दोषों को हटाना ही दोषमार्जन है। दोषमार्जन ही शुद्धि संस्कार भी कहलाता है । किन्तु मल 'पांच प्रकार के हैं अता उनकी शुद्धि भी पांच प्रकार की है । शारीरिक मलमूत्रादि की शुद्धि ।

RA RANI शय्या, आसन, वसन, भोजन, पात्र आदि द्रव्यों की शुद्ध २ । सापिण्ड्यादिसम्बन्ध के कारण एक दूसरे में संक्रान्त होने वाले जनममाणादिनिमित्त* अघ की शुद्धि ३ । प्रशा- पराध के कारण चारित्र्यदोष से पैदा होने वाले पाप की शुद्धि ४ । रज व तमोगुण के अधिकता से दूषित भागों की शुद्धि ५ । इनमें जनममरणादिनिमित्तक अघ की शुद्धि बतलाना इस ग्रन्थ का विषय है और उस अघ का सम्बन्ध प्रधानतया सत्व ( अन्तरात्मा ) से है। इस तरह यह सिद्ध हो जाता है कि सवात्मा की शुद्धि ही प्रधानतया धर्मशास्त्र का लक्ष्य है, उसकी शुद्धि बिना शरीर व प्राणादि प्रायतनों के नहीं होती अतः उसकी शुद्धि भी यहां बोधन करनी पड़ती है। २-आशौचपदार्थ इस अघ की ही श्राशौच संज्ञा है । पर इस अघ में अपवित्रता क्या है इसमें मतभेद है। कोई ऐसा मानते हैं कि इस अघ से व्यक्ति विहित कर्मों का अधिकारी नहीं रहता अत: कर्मों में अनधिकारिता ही प्राशौच है। कितने ही ऐसा मानते हैं कि श्राशौच एक ऐसा पुरुष में रहने वाला मलिन अतिशय हैं जिससे कि पिण्डदान, उदकदान व अध्ययन आदि कर्मों में व्यक्ति का अधिकार नहीं रहता है। वस्तुतः संसर्ग संस्रव आदि कारणों से संसर्गी पुरुष एक अतिशय पैदा होता है वह अतिशय योनिसम्बन्ध व विद्यासम्बन्धवालों में अतिशय शीघ्रता से और विशेषरूप से पैदा होता है यह अतिशय ही आशौच कहलाता है। ३-आशौचविशेष । में उपर्युक्त श्राशौच के कितने ही भेद हो जाते हैं। जैसे इस प्राशौच के कारण जन्म, मृत्यु, उत्तरक्रिया तथा दोष ये चार है अतः निमित्तभेद से इस आशौच के भी जन्माशौच, मरणा- शौच, उत्तर क्रियाशौच, व दोषाशौच ये चार भेद होते हैं। किन्तु ये चारों दोष स्वरूपतः भी आशौच में कारण पड़ते हैं और ज्ञायमान होकर भी । अतः इस तरह से फिर भाशौच के दो * बेद में बतलाये हुए कर्मों की फल सिद्धि के प्रतिबन्धक जन्म मृत्यु आदि से पैदा होने वाले अपवित्र एक अपूर्वविशेष को अघ कहते हैं । अन्य मलों से सम्पर्कवाला व्यक्ति ही अपवित्र होता है, किन्तु इस मलका उस व्यक्ति के सम्बन्धियों पर भी प्रभाव पड़ता है, और वे भी अशुद्ध हो जाते हैं । .

EARNIMBRARIES मेद हो जाते हैं वस्तुसदाशौच और वासनाशौच । इनमें ज्ञायमानदोषनिमित्तक आशौच ही वासनाशौच कहलाता है। अधिष्ठान भेद से ( आश्रयभेद से ) यह आशौच तीन प्रकार का है। १-पशिौच, २-कर्मा शौच, ३-मङ्ग ज्ञाशौ च । जिस में केवल शरोरस्पर्शमात्र का निषेध है वह स्पर्शाशौच कहलाता है और उसका अाश्रय बहिः शरीर है । और जहां पर विहित वैदिक कर्मों का निषेध होता है वह कौशौच कहलाना है और उसका आश्रय अन्तःशरीर है। और जिस आशौच में विवाह, उपनयन, कन्यादान आदि माङ्गलिक कार्यों का निषेध होता है वह मङ्गलाशौच कहलाता है, और उसका आश्रय पुत्रादि का सत्वमात्र है । इस तरह अधिष्ठानभेद से यह श्राशौच तीन प्रकार का होता है। ৪-সননি। जन्मकाल व मृत्युसमय में आशौच क्यों होता है इसका विचार प्रस्तुत पुस्तक में 'प्रभव चन्ता" नामक प्रकरण में किया गया है। उस में बतलाया है कि शरीर में दो प्रकार के -प्रसादभूत व मलभूत गुरुव से लेकर द्रवान्त* २० गुणा जो कि श्रायुर्वेदशास्त्र में चरक, सुश्रुत वाग्भट आदि में बतलाये गये हैं, तथा रX असृक्, मांस अादि ७ द्रव्य, प्रसादभूत धातु माने गये हैं ! क्योंकि इनके द्वारा शरीर की पुष्टि होती है । इसके विपरीत शरीर ले पृथक् होने बाले तथा शरीर से बाहर की तरफ रुखवाले परिपक्व कफ आदि धातु मलभूत धातु कहलाते हैं. क्योंकि ये शरीर में हानि पहुंचाते है । उनले प्रतिवरूप यह स्त्री- रज, जिससे कि पुत्र-शरीर की उत्पत्ति होती हैं मलभूत धातु है । क्योंकि इसका शरीर से पृथक्करण होता होता है और इसका रुख भी बाहर की तरफ है । सभी वात्मा के लिए हानिप्रद होने से हो मल कहलाते हैं। यह पहिले बतलाया जा चुका है कि शरीर में चेतन,सत्व व शरीराग्नि इन तीन प्रकार के प्रात्मा की स्थिति है। उनमें जो मल जिस आत्मा के लिए हानिप्रद होता है, उसी आत्मा के लिए उस मल को अशुचिकर माना जाता है अन्य के लिए नहीं । जैसे शरीररूप आत्मा से परित्यक्त मूत्रपुरीषादि मल शरीररूप आत्मा प्रति हानिप्रद हैं, अत: उनसे शरीर अशुचि होता है न कि सत्त्वात्मा और उस शरीर का स्पर्श करने पर दूसरे के शरीर में ही वह आशौच संक्रान्न । है नहोल कि परकीय सत्वात्मा में। * गुर्वादयन्तु गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसरमृदुठिनविरादपिच्छिल श्लक्ष्ण खरस्थूलसूक्ष्म- सान्द्रद्रवाः विंशतिः । (चरक सूत्रः ११४८) गुरुमन्दहिमस्निग्धश्लक्ष्णसान्द्रमृदुस्थिर :, गुणा: सुसूक्ष्मविशदा: विशतिः सविपर्ययाः ॥ ( वाग्भट० सूत्र० ११६) ४ अन्नाद् रक्तं ततो मांसं मासान्मेदत्ततोऽस्थि च । अस्थ्नो मजा ततः शुक्रं शुक्राद् गर्भः प्रसादजः ॥

mayePIR गर्भस्राव व गर्भपात में डिम्भरूप से परिणत रजोमाग शरीर से परित्यक्त होकर शरीर से बाहर निकल जाते हैं : शरीर से परित्यक्त होने के कारण वे शरीर के लिए हानिप्रद हैं, अतः वे शरीर के आशौच को पैदा करते हैं। यदि गर्भस्राव व गर्भपात होने से पूर्व जीव भी गर्भ में पड़ चुका है तब तो गर्भस्राव व गर्भपात होने पर जीवात्मा का वियोग होने से भी उसमें अशुचित्व आजाता है क्योंकि अधिष्ठानभूत पृथयो, जल, तेज, वायु, आकाश ये पांच धातु तथा चेतना इन छहों का समुदाय पुरुष कहलाता है। गर्भस्राव व गर्भपात में पांचों भूत पञ्चत्व को प्राप्त हो जाते हैं और चेतना के अधिष्ठान नहीं रहते। अतः उस भौतिक शरीर में चेतना के वियोग के कारण शुचिपना अा जाता है और वह ३ रीर अपवित्रहो जाता है, और उसका स्पर्श करने वाले दूसरे व्यक्ति के शरीर में भी वह दोष संक्रान्त हो जाता है। . पुत्रका मातृगर्भ के साथ एक नाड़ीसे सम्बन्ध बना रहता है। उस नाड़ी का छेदन प्रसव- काल में कर दिया जाता है। उस नाड़ी के छेदनसे पुत्र सूतीके शरीराग्नि से परित्यक्त हो जाता है तथा उससे सर्वथा पृथक होजाता है और इसी तरह सूती भी जाकको शरीराग्निसे परित्यक्त व पृथक हो जाती है । अन्योन्य परित्याग के कारण वे दोनों ही मल कहलाते हैं तथा अशुचित्वके जनक है। उन दोनों में वर्तमान वह श्राशोच तत्-सम्बन्धी पुरुषान्तरों में भी संक्रान्त होता है जैसा कि ऊपर बताया जा चुशा है कि वह अशुचित्व सापिण्ड्यादि सम्बन्ध वाले व्यक्त्यन्तरों में भी संक्रान्त होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रसवकाल में चेतनाधिष्ठानभूत पृथ्व्यादि पञ्चधातुओं का चेतना धातु से पृथक्करण होता है और इससे जो दोषविशेष होता है वही अशौच है। अर्थात पुत्रोत्पत्ति से पूर्व गर्भस्थ पुत्र का एक नाड़ी द्वारा मातृगर्म से सम्बन्ध रहता है और इस तरह उत्पत्ति से पूर्व पुत्रका मातृशरीरस्थ शरीराग्निरूप चेतना से भी सम्बन्ध है । किन्तु उत्पत्ति के बाद नाडीछेदन कर के मातृचेतना का सम्बन्ध पुत्र से हटा दिया जाता है । इस तरह उत्पत्तिकाल में चेतना के अधिष्ठानभूत धातुपञ्च 6 का चेतना धातु से पृथक होना ही आशौच है। यह प्राशौच साक्षात् संबन्ध से माता तथा पुत्र में रहता है, क्यों कि के धातुपञ्चक का मातृचेतना से तथा माता के धातुपञ्चक का पुत्रचेतना से वियोग होता है। किन्तु परम्परा संबंध से यह आशौच माताके तथा पुत्र के सम्बन्धियों में भी संक्रान्त होता है। मरणकाल में भी मृतपुरुष के धातुपञ्चक का चेतना से सम्बन्ध नष्ट होजाता है अतः वहां भी वह चेतना के अधिष्ठानभूत धातुपञ्चक का चेतना से पृथग्भावरूप आशौच मृतपुरुष के शरीर में साक्षात् तथा तत्संसर्गियों में परम्परया संक्रान्त होता है। यह आशौच सम्बन्ध.

Paymened रूप सूत्र के द्वारा तत्सम्बद्ध सन्बन्धियों में भी संक्रान्त होता है। संबन्धसूत्रों का मागे निरूपण किया जायगा। उपर्युक्त रीति से चेतनारहित भूतविकार तथा चेतना के अपकर्षकधर्मवाला पदार्थ प्राशौच का प्रादुर्भावस्थान है । अर्थात् चेतनारहित भूतविकारों में चेतना के अपकर्षक धर्मवाले पदार्थ में आशौच का प्रादुर्भाव होता है । अतः ये ही प्राशौच के प्रभाव हैं अर्थात उत्पत्तिस्थान है। किसी एक व्यक्ति में वर्तमान यह आशौच जिन सम्बन्धों को लेकर दूसरे में संक्रार होता है वे सम्बन्ध ४ हैं-योनिसम्बन्ध १,विद्यासम्बन्ध २,यज्ञसम्बन्ध ३,तथा अन्य संसर्ग ४ । किसी एक पुरुष से प्रारम्भ कर आगे जो उसकी सन्ततिपरम्परा चलती है वह गोत्र कहलाती है । एक गोत्र में वर्तमान एक शाखा वाले अथवा भिन्न शाखा वाले पुरुषों का जो परस्पर सम्बन्ध होता है यह योनिकृत संबन्ध कहलाता है। किन्तु यह आशौच एक गोत्रवाले सभी पुरुषों में संक्रान्त नहीं होता, अपितु मुलपुरुष से २१ वीं सन्तान तक की इसकी संक्रांति होती है और उन २१ में भी वह दोष समान रूप से संक्रांत नहीं होता, किन्तु ज्यों ज्यों भूला- पुरुष से विप्रकर्ष होता जाता है वैसे वैसे उस प्राशौच में भी कमी पाती आती है। इसके लिए हम इन समान गोत्रवानों को तीन भागों में विभक्त करते हैं। उसीके अनुसार उनके आशौच में तारतम्य होजाता है, जैसे मूल पुरुष से 9 वें पुरुष तक की सम्तानपरम्परा सपिण्ड कह- लाती है, मूल पुरुष से १४ पुरुष त 5 को परम्परा सोदक कहलाती है तथा मूल पुरुप से २१ वें तक या उसके आगे की सगोत्र कहलाती है। इन में सुपिण्डों को अधिक प्राशौच. सोद को को उस से कम, और २१ तक के सगोत्रों को उससे भी कम, और आगे सगोत्र होने पर भी प्राशौच की संक्रान्ति नहीं होती। यह योनि सम्बन्ध भी १-मुख्य, आरोपित.३-तृतीय भेद से तीन प्रकारका है। १-जो अपने गोत्र में पैदा होकर यावजीवन अपने गोत्र में रहते हैं और गोत्रासर म.प्रवेश नहीं करते उनका अपने गोत्र वालों के साथ जो संबन्ध है वह मुख्य संवन्ध कहलाता है जैसे-सोदर (सगे) भाइयों और बहिनों का तथा पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रादि का परस्पर में मुख्य सम्बन्ध है। २-पारोपित-सम्बन्ध-सगोत्रीकरण विगोत्रीकरण व विगोत्रसापिण्ड्य भेदसे पुनः तीन प्रकारका है । जो दूसरे गोत्र में पैदा हुए हैं किन्तु बाद में उस गोत्र से हटाकर अपने गोत्र में प्रविष्ट कर लिए गये है उनका अपने सगोत्रीय पुरुषों के साथ सम्बन्ध सगोत्रीकरण कहलाता है क्यों किविगोत्रीय का भी यहां समोत्रीकरण होजाता है। अत: इसे सगोत्री करण इस अन्वर्थ नाम से व्यवहत किया जाता है। जैसे परगोत्र से आई हुइ विवाहिता पत्नी का श्वशुरकुल HORASAIRAAMS ARRIED वालों के साथ जो सम्बन्ध है वह यही सगोत्रीकरण है और इसी तरह दूसरे के कुल से श्राये हुर दत्तक पुत्रादियों का प्रतिप्रहोता (दत्तक रूप से लेने वाले पिता) के कुल के साथ जो सम्बन्ध है वह भी सगोत्रीकरण ही है। अपने गोत्र में पैदा होकर जो संस्कार द्वार। दूसरे गोत्र के बन गये हैं उनका स्वगोत्र वालों के साथ जो सम्बन्ध है वह विगोत्रीकरण कहलाता हैं। क्योंकि स्वगोत्रीय होते भी उनका संस्कार द्वारा विगोत्रीकरण कर दिया गया है जैसे स्वगोत्रीय दुहिता व दत्तक पुत्र आदि का विवाह व दूसरे के दत्तकरूप में चले जाने के बाद विगोत्रता होजाने पर अपने पितृकुल वालों के साथ संबन्ध विगोत्रीकरण होता है । भिन्न गोत्रवाले सपिण्डों का अपने गोत्रवालों के साथ जो सम्बन्ध है वह विगोत्रसापिएख्य नामक सम्बन्ध कहलाता है जैसे माता के भाई व पिता के भाई आदि का अपने मोजवानों के साथ । ३-तृतीय संबन्ध भी अनेक प्रकार का है। १-मुख्य सम्बन्ध से सम्बन्धित व्यक्तियों के मुख्य सम्बन्ध से सम्बन्धित जो व्यक्ति हैं उनका सगोत्र वालों के साथ सम्बन्ध इसी प्रकार का है। क्योंकि भाई का अपने गोत्रवानों के साथ मुख्य सम्बन्ध है और उसके पुत्रका उस भाई के साथ मुख्य सम्बन्ध है इस लिए भ्रातृपुत्र के साथ स्वगोत्रीय व्यक्तियों का सम्बन्ध इस तृतीय सम्बन्ध की प्रथम श्रेणि में पाता है। २-मुख्य सम्बन्ध से सम्बनिधित व्यक्तियों के जो आरोपित सम्बन्ध से सम्बन्धी हैं उनके साथ अपने गोत्रवालों का सम्बन्ध द्वितीय प्रकारका है। जैसे भ्रातृपत्नीका स्वगोत्रवालों के साथ संबन्ध । यहां भाई का स्वगोत्रवालों के साथ मुख्य सम्बन्ध है और इस तरह मुख्य सम्बन्ध से सम्बन्धी भाई के साथ पत्नीका बारोपित सगोत्रीकरण सम्बन्ध है । अतः भ्रातृपत्नी के साथ स्वगोत्रीय व्यक्तियों का सम्बन्ध तृतीय सम्बन्ध की द्वितीय कोटि में आता है। ३ -आरोपित सम्बन्ध से सम्बन्धित व्यक्तियों के जो मुख्य सम्बन्ध से सम्बन्धी हैं उनका श्वगोत्रीय व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध तृतीय श्रेणिका है । जैसे जामातृश्वशुर का स्वगो- त्रीय व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध । यहां पर जामातृपत्नी के साथ स्वगोत्रीय पुरुषों का सगोत्री. करणरूप आरोपित सम्बन्ध है और उस आरोपित सम्बन्ध से सम्बन्धवाली जामातृपत्नी के साथ उसके पिता का मुख्य सम्बन्ध है। इस तरह जामातृश्वसुर के साथ स्वगोत्रीय पुरुषों का सम्बन्ध तृतीय सम्बन्ध को तृतीय श्रेणि में आता है। -चारोपित सम्बन्ध से सम्बन्धित के साथ जो भारोपित सम्बन्ध से सम्बन्धी EMAINED १० EADHSS70 । Mdhan उसका स्वगोत्रीय व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध तृतीय सम्बन्ध की चतुर्थ श्रेणि में आता है । जैसे जामातृश्वशुर के भाई के साथ स्वगोत्रीय व्यक्तियों का सम्बन्ध । जामातृपत्नी का स्वगोत्रकालों के साथ सगोत्रीकरणरूर आरोपित सम्बन्ध है और उस पत्नी का भी अपने पिता के माई के खाथ विगोत्रीकरणरूप अथवा विगोत्रसापिण्ड्यरूप आरोपित सम्बन्ध है। सापिण्ड्यपदार्थ- यह पहिले कहा जाचुका है कि योनिसम्बन्ध भी आशौच के परपुरुष में संक्रान्त होने का कारण है। यद्यपि योनिसम्बन्ध सहस्रों पीढियों तक बना रहता है फिर भी प्राशौच २१ वीं पीढी तक ही संक्रान्त होता है उस से आगे नहीं। उन में भी ७वीं पीढ़ी तक के पुरुष सपिण्ड कहलाते हैं, और इन सपिण्डों में सबसे अधिक आशौच की संक्राति होती है । इस से प्रारो सोदक (१४ वीं पीढी सक)के पुरुषों में इसकी उत्तरोत्तर न्यून संक्रान्ति होती है । अतः आशौच की संक्रान्ति में प्रधानतया कारण सापिण्ड्य ही ठहरता है और यह सापिण्ड्य ७ वीं पीढी तक ही रहता है । इसी लिए शास्त्रों में “सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्" "सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते'' ऐसा कहा है । यह सापिण्ड्यपदार्थ क्या है इसी का यहां निरूपण करना है । यह सापिण्ड्य विवाह, दाय व 'अंशौच सभी में कारण पड़ता है । और ये तीनों सापिण्ड्य अर्थात् विवाहसापिण्ड्य, दायसापिण्ड्य तथा आशौचसापिण्ड्य परस्पर भिन्न भिन्न है । उनमें से यहां आशौच के उपयोगी आशौचसापिण्ड्य का निरूपण करना आवश्यक है अतः उसीका निरूपण सर्वप्रथम किया जारहा है:- आशौचसापिण्ड्य {-अवयवसापिण्ड्य, २-पुत्र में आधान करने योग्य सापिण्ड्या ३-पितृपितामहादि पितरों में प्राधान करने योग्य सापिण्ड्य, तथा ४-देहत्यागोत्तर पित्रादियों में प्रत्यर्पण करने योग्य सापिण्ड्य इस तरह४ प्रकार का है । इन सब सापिण्ड्यों का निरूपण भी पिए पदार्थनिरूपण के अधीन है । अतः सर्वप्रथम पिण्डपदार्थ . का निरूपण किया जाता है। पिण्डपदार्थ:- मूलपुरुष, मूलपुरुष के शरीर का अवयव, शुकनिवाप, शोणितनिवाप, अन्नपाक, सोमद्रव्य शोणित द्रव्य इस तरह से पिण्ड अनेक प्रकार का है। उन अनेक प्रकार के पिण्डों में यहां शुक्रमय पिण्ड का निरूपण किया जायगा। तथा पञ्चमहाभूतों का विकार व चेतना धातु शुक्र कहलाता है । इस शुक्र द्रव्य में सप्त- कोशात्मक सोमका प्राधान होता है । सात कोशों में २८ कला को एक कोश है, २१ कलाका GRADING AMDARI । दूसरा, १५ कला का तीसरा, १० कला का चौथा; ६ कलाका पांचवां, ३ कला का छठा, तथा १ कलाका सातवां कोश है। इस तरह मिलाने पर ८४ कला,का यह निवाप्य सोम होता है। यह ८४ कलात्मक सोमद्रव्य कूटस्थ शुक्र में श्राहित होकर उसके शरीरका अवयव बन जाता है । इस ८४ कलात्मक सोम द्रव्य के ३ भाग हैं। उन में २८ कला का एक भाग कूटस्थ का अपना है । तथा २८-२८ कला के दो भाग पितृपितामहादि से उस में आते हैं। इस प्रकार कुटस्थ पुरुष के शुक्र में ८४ कलात्मक सोमद्रव्य रहता है। जब कूटस्थ पुरुष (मूलपुरुष) पुत्र को पैदा करता है तब अपने २८ कलात्मक सोमकोश से ७ कलाये अपने में रखकर शेष २१ कलापों का, पितृद्वारा प्राप्त २१कलात्मक कोश में से ६ कलाएं रखकर शेष १५ कलाओं का, पितामह द्वारा प्राप्त १५ कलात्मके कोश में से ५ अपने आप में रखकर शेष १० कलाओं का, प्रपितामह द्वारा प्राप्त १० कलात्मक कोश में से ४ अपने में रखकर शेष ६ कलाओं का, वृद्धप्रपितामह द्वारा प्राप्त ६ कलात्मक कोश में से ३ अपने में रखकर शेष ३ कलाओं का, अतिवृद्धप्रपितामह द्वारा प्राप्त त्रिकलात्मक कोश में २ अपने आप में रखकर शेष १ कलाका अपने शरीर से माता के शरीर में शुक्रका आधान करते समय आधान कर देता है। अवशिष्ट परमोतिवृद्धप्रपितामह से प्राप्त कला का वह अाधान कर नहीं, सकता, क्यों कि उसका संतनन तभी हो सकता है जब, वह उसे अपने आप में रख कर आगे उसका आधान, कर सके । वह कम से कम एक कला तो अपने श्रार मैं स्कखेगा, उसके बाद संतनन आधान करने के लिए कुछ अवशिष्ट नहीं रहता। इस तरह क्रमशः २१,१५ १०,६,३,१ कलावाले ६ कोशों का ही मातृशरीर में अाधान व सन्तनन होता है। इसीलिए उन से उत्पद्यमान पुत्रशरीर षाट्कौशिक कहलाता है और पित्रादि से प्राप्त कला का आगे प्राधान द्वारा सन्तनन हे ता है। अतः उसे सन्तान कहा जाता है । इन ६. कोशों की कराओं को मिलाने से ५६ कलायें होती हैं । ये ५६ कलायें पित्रादि द्वारा पुत्र को शरीरारम्भ के साथ ही प्राप्त हो जाती हैं। शेष २८ सौम्यकलायें १६ वर्षों में जाकर २८ नक्षत्रों पर चन्द्रमा के संचार प्राप्त होती हैं । इस तरह इन २८ को मिला कर ८४ कलात्मक सोमद्रव्य का आधान संतान के शुक्र में पूर्ण हो जाता है । इन २८ कलाओं की प्राप्ति १६ वर्ष में ही जाफर होती है. । इसी, लिये संतान में शुक्र का परिपाक १६ वर्ष के बाद ही होना है पूर्व नहीं। उस से पहिले वह शुक्र अपरिपक्क व कच्चा रहता है । उससे बलिष्ठ संतान की उत्पत्ति नहीं हो सकती ! मन भी सोमस्वरूप चन्द्रमा से बनता है । इस लिए मनस्विता व विचारशीलता भी नुष्य में वर्ष से पूर्व नहीं आतो किन्तु इसके बाद ही आती है। से १६ १२ जैसे- अभियुक्तों का निम्नलिखित वचन भी इसी रहस्य को व्यक्त कर रहा है। लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि तायेत् । प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रपदाचरेत् ॥ इति १६ वर्ष में पुत्र के साथ मित्र की तरह समानता का व्यवहार करना चाहिये। जैसे मित्र से किसी विषय में मन्त्रणा की जाती है उसी तरह पुत्र से भी की जा सकती है. क्योंकि इस अवस्था में मन की १६ कलामो की परिपूर्णता से उसमें मनस्विता (विचारशीलता) की शक्ति पैदा होजाती है। इसी कारण से १६ वर्ष के बाद पुत्र को वयस्क (बालिग ) स्वीकार करलिया जाता है। इसी रहस्य को समझाने के लिए * छान्दोग्य उपनिषद् में १५ दिन भोजन न करने से मन की एक कला शेष रह जाती है और उसमें मनन करने की शक्ति नहीं रहती, किन्तु फिर भोजन करने से उसकी कलाओं की पूर्ति होजाती है और पूर्ण मननशक्ति व भानशक्ति पैदा होजाती है, एतदर्थक पाख्यान की कल्पना की गई है। मनका निर्माण सोममय अन्न से ही होता है । मुक्त अन्न के शरीर में वीन प्रकारके परिणाम होते हैं। जो सबसे स्थूल परिणाम है वह पुरीष बन कर शरीर से बाहर निकल जाता है। अन्न का मध्यम परिणाम रस रुधिर मांस आदि सप्तधातुमय होता है और इसी का सूक्ष्म परिणाम मन होता हैं । इस तथ्य का निरूपण भी छान्दोग्य उपनिषद् में किया गया है। the * षोडशकलः सौम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशी: काममयः पिब, आपोमपः प्राणो न पिबतो विच्छे- त्स्यते इति ।। १॥ स ह पञ्चदशाहानि नाश । अथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इति, ऋचः सौम्य- यषि सामानोति । स होवास न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥३॥ तं होवाच यथा सौम्य महतो- ऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यारोन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सौम्य ते षोडशानां कलाना- मेका कलाऽतिशिष्टा स्यात्तया एतर्हि वेदान्गनुभवसि, अशान, अथ मे विज्ञास्यसीति ।। ३ ।। Bह श्राश अथ हैनमुपसाद । तं ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वे ह प्रतिपेदे ॥ ४॥ तं होवाच यथा सौम्य महतोऽभ्याहत. स्यै कमजारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं । तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत् । तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥ ५ ॥ एवं सौम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाऽभूत्, सा अन्नेन उपसमाहिता प्राज्वलीत् तया एतर्हि बेदा- ननुभवसि । अन्नमयं हि सौम्य मनः, श्रापोमयः प्राणः, तेजोमयी वाक्, इति ॥६॥ छान्दोग्यश्र०७ख० । + अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति, यो मध्यमस्त-मांसम्, योऽणिष्ठस्त- न्मनः । छान्दोग्य ६ अध्याय, ६ खण्ड । एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ध्वः समृदीषति तन्मनो भवति । छान्दोग्य ६ अध्याय ५ खण्ड ।

Candya वस्तुतः हम जो अन्न खाते हैं वह धुलोक अन्तरिक्षलोक व पृथिवीलोक तीनों के रस से बनता है। हम जब अन्न खाते हैं तब जठराग्नि के द्वारा अन्न का परिपाक होने पर उसके प्रारम्भक पार्थिव श्रान्तरिक्ष्य व दिग्य तीनों तहों का सम्बन्धविच्छेद हो जाता है । और उसमें बर्तमान अमृत व मर्त्य भाग का विशकलन हो जाता है । मर्त्य भाग मलरूप में परिणत होता है और वह अपान द्वारा शरीर से बाहर कर दिया जाता है । अमृतभाग में भो विश- कलित शुद्ध पार्थिव भाग रस, असक, मांस, मेद, अस्थि. मजा व शुक्र रूप में क्रमश: परिणत हाता जाता है। इस तरह उस अन्न में से पार्थिव भाग के सर्वथा हट जाने पर जो आपोजावात्मक भान्तरिक्ष्य भाग व विद्युत्सोमात्मक दिव्य भाग अवशिष्ट रहता है वह ओज धातुरूप में परिणत हो जाता है। इसके बाद श्रान्तरिक्ष्य भाग का भी सर्वथा पृथकरण हो जाने पर जो शुद्ध विद्युत्कोमात्मक भाग बचता है वही मन बनता है ! इसलिए यह मन अन्नमय होता हुआ भी अन्न के प्रारम्भक सोम भाग से बनता है । अतः मन अन्नमय व सोममय दोनों शब्दों से व्यवहृत होता है । . , इस तरह पिता पुत्रशरीर का प्रारम्भ करते समय अपनी २८ कलाभों में से २१ का, पिता द्वारा प्राप्त २१ कलाओं में से १५ कलाओं का, पितामह द्वारा प्राप्त १५ वलाओं में से १० कलामों का, प्रपितामह द्वारा प्राप्त १० कलाओं में से ६ कलाओं का, वृद्धप्रपितामह द्वारा प्राप्त ६ कलाओं में से ३ कलाओं का, अतिवृद्धप्रपितामहं द्वारा प्राप्त ३ कलाओं में से १ कला का मातृशरीर में प्राधान कर देता है । शेष अपनी ७ कला, पिता की ६ कला, पितामह की ५ कला, प्रपितामह की ४ कला, वृद्धप्रपितामह की ३ कला, अतिवृद्धप्रपितामह की कला, तथा परमातिवृद्धप्रपितामहे की १ कला, इस तरह मिला कर २८ कला अपने भाप में रखता है। - उपयुक्त रीति से इस बीजी पुरुष का अपने से ६ पूर्वज पत्रादियों के साथ और ६ उत्तरभावी पुत्रादियों के साथ सम्बन्ध विद्यमान है क्योंकि पुत्र में प्राधान करने के बाद स्वयं बीजी पुरुष में २८ कलायें रहती है । जिनमें उस स्वयं बीजी पुरुष की सात कलायें हैं। शेष ६ पिता की, ५ पितामह की, ५ पपितामह की. ३ वृद्धप्रपितामह की, २ अ. तिवृद्धप्रपितामह की, व १ परमातिवृद्धप्रपितामह की कलाये हैं। अतः उन कलाओं के कारण उसका अपने पूर्वभावी ६ पुरुषों के साथ सम्बन्ध है । और इसी तरह उसने पुत्रोत्पत्ति के लिए जिन ५६ कलाओं का मातृशरीरद्वारा पुत्र में प्राधान किया है उनमें से २१ कलायें उस बीजी पुरुष की निजी कलायें हैं : उन कलाओं में से पुत्र स्वयं ६ रखता है और शेष १५ का पौत्र में प्राधान करता है। पौत्र भी १५ में से ५ स्वयं रखता है शेष १० का प्रपौत्र में सन्तwate PRATE . नन कर देता है। प्रपौत्र भी ४ रखता है शेष ६ का वृद्धप्रपौत्र में आधान कर देता है । वृद्ध- प्रपौत्र भी ३ रखता है शेष ३ का अतिवृद्धप्रपौत्र में आधान कर देता है । अतिवृद्ध- प्रपौत्र भी ३ में से २ रखता है शेष १ का परमातिवृद्ध प्रपौत्र में आधान कर देता है । इस तरह २१ कला का सन्तनन ६, ५, ४, ३, २, १ इस क्रम से पुत्र से लेकर परमातिवृद्ध- प्रपौत्र तक की रत्तरभावी ६ सन्तानों में होता है और इसीलिये इसका उत्तरभावी ६ पुरुषों से भी सम्बन्ध होजाता है। उपर्युक्त रीति से देहत्याग से पूर्व जीवित्तावस्था में पुत्रोत्पत्ति के बाद इस बीजी ( कूटस्थ ) पुरुष का ६ पूर्व पुरुपों से और ६ उत्तर पुरुषों से सौम्यकलाओं के द्वारा सम्बन्ध रहता है। पूर्व ६ पुरुषों के साथ अपने आपको मिलाकर 'सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम' की उपपत्ति होती है, और उत्तरभावी ६ पुरुषों के साथ भी अपने आपको मिलाकर 'सापिण्ड्यं साप्तपौ. रुषम्' की उपपत्ति होती है। पुत्रोत्पत्ति से पूर्व पिता आदि से इसको ऋणरूप में ५६ सौम्य कलायें प्राप्त हुई थीं। अतः वह पिनादियों का ऋणी होने से पितृऋणचाल! बन जाता है। पुत्रोत्पत्ति के बाद इसने २? अपनी, १५ पिता की. १०पितामह की. प्रपितामह की, ३ वृद्धपपितामह की, १ अतिवृद्धप्रपितामह को मिला कर ५६ कलाओं का पुत्र में प्राधान कर दिया है । अतः पितृऋण से मुक्त हो जाता है। फिर भी अवशिष्ट कलाओं में ७ को छोड़कर शेष २१ पित्रादि की है । अतः पुत्रादि की तरह पित्रादि ६ पुरुषों से भी अभी तक उसका सम्बन्ध बना हुआ है। इसलिए उनकी तृप्ति के लिए बह श्राद्ध द्वारा स्वधरूपा भोजन प्रतिवर्ष दिया करता है और तर्पण आदि भी किया करता है, किन्तु देहत्याग के बाद वह पित्रादि की २१ कलाओं का उनमें प्रत्यर्पण कर देता है । अत: उनसे उसका सम्बन्ध नष्ट हो जाता है। अपने में आगत पितृपितामहादि की कलाओं का व अपनी कलाओं का पुत्र में श्राधान करने से उसने अपना स्वयं का तथा पित्रादि का सम्बन्ध स्वपुत्रादि से कर दिया है। श्रत. वे उनके ऋणी बन गये हैं, और वह स्वयं उनके ऋण से मुक्त हो चुका है, इसीलिये उसका पुत्र ब पितरों को स्वधा देना है व श्राद्ध करता है। किन्तु जसा ऊपर बतलाया जा चुका है. देहत्याग से पूर्व इस व्यक्ति का अपने पूर्व . ६ पितरों से सौम्य कलाओं द्वारा सम्बन्ध था । कोकि ५६ कलाओं का पुत्र में प्रधान करने के बाद जो इसमें २८ कलाये बची थीं उनमें ७ इनकी स्वयं की थीं। शेष २१, में से १ परमातिवृद्धप्रपितामहः की २. अतिवृद्धप्रपितामह की, ३ वृद्धप्रपितामह .की, ४ प्रपितामह की, ५ पितामह की, व ६ पिता की थीं। देहत्याग के बाद इसने उन कलाओं . ६ tammaNaINS SHARMA वे का उन पितरों में प्रत्यर्यण कर दिया और वे कलायें उन में वापिस चली गई। परमातिवृद्ध- प्रपितामह का केवल १ कला को लेकर मय लोक से सम्बन्ध बना हुआ था । उसके वापिस मिल जाने के बाद अब वह सर्वथा इस मत्यलोक के बन्धन से मुक्त हो चुका है। अब वह निर्मुक्त है तथा पितर श्रेणी से पृथक् हो गया है और पुत्र का जिन ६ पितरों से सम्बन्ध इन सौम्य कलाओं को लेकर बना रहता है उनमें अब उस पुत्र का पिता सम्मिलित हो गया जिसने कि देहत्याग के बाद अपने पूर्वजों की कलाओं को वापिस लौटाया था। पुत्र के पिता ने परमातिवृद्धप्रपितामह को छोड़ कर शेष पितरों की कलाओं का आधान अपने पुत्र में किया है क्योंकि उसने पुत्र को जो ५६ कलायें दी हैं उनमें २१ अपनी हैं, १५ पिता की, १० पितामह की, ६ प्रपितामह को, ३ वृद्धप्रापतामह की तथा , अतिवृद्धप्रपितामह की है । अतः उन कलाओं को लेकर उनका सम्बन्ध पुत्र से व मर्त्यलोक से बना हुआ है । इसलिये पुत्र श्राद्ध व स्वधाकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। यही सौम्य कलात्मक श्रद्धासूत्र हैं जिस श्रद्धासूत्र के द्वारा पुत्रका अपने ६ पितरों से तथा पितरों का अपने पुत्र से सम्बन्ध बना हुआ है ! इसी श्रद्धासूत्र के द्वारा श्राद्धक्रिया में प्रदत्त भोजनादि पितरों के पास पहुँचता है। इस तरह ६ पितर और एक पुत्र को लेकर "सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्" की उपपत्ति निरन्तर बनती रहती है। पहिला पितर जैसे ही अपनो सौम्यकलाओं के पूरी वापिस मिलने पर मुक्त होता है वैसे ही नवीन पितर उनमें आकर सम्मिलित हो जाता है और ६ पितरों की संख्या पूर्ववत् बनी रहती है । ७ वां स्वयं पुत्र होता ही है । इस तरह सात संख्या में कोई बाधा नहीं, पहुँचती और न अधिक ही संख्या होने पाती है । इसीलिये श्राद्ध के पितरों को ही किया जाता है. इससे अधिक का नहीं क्योंकि ६ से ऊपर के पितरों के साथ सौम्यकला का सम्बन्ध टूट चुका है। न उन्हें श्राद्ध की आव: श्यकता है और श्रद्धासूत्र के अभाव से न उन तक वह पहुंच हो सकता है। इतने सन्दर्भ से निष्कर्ष यह निकला कि सोममय ८१ कलात्मक शुक्रनिवाप पिण्ड है और उन कलाओं का सम्बन्ध सात व्यक्तियों में ही रहता है अधिक में नहीं। जैसे ही उन कलाओं का सम्बन्ध आगे बढ़ता है अर्थात् उनका भावी सन्तानों में संतनन होता है वैसे ही पूर्व पूर्व, से विच्छिन्न होता जाता है और वह सम्बन्ध सात तक ही रहता है । अतः 'सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्' यह उति तथा 'सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते' यह उक्ति सर्वथा चरितार्थ हो जाती है। १-अवयवसापिण्डय इन ८४ कलाओं में २८ कनायें कूटस्थ बीजी पुरुष की हैं जिनका सम्बन्ध केवल More १६ INDIAN मूलपुरुष के शरीर से है। वह इनमें से ७ को रख कर शेषका क्रमशः ६-५-४-३-१-१ के अनुपात से पुत्र पौत्र, प्रपौत्र, वृद्धप्रपौत्र, अतिवृद्धप्रपौत्र, परमातिवृद्धप्रपौत्र में प्रधान करता है। और इस मुल पुरुष को उन कलाओं को लेकर उन ६ अपत्यों से सम्बन्ध बना - रहता है। इस तरह इस २८ कला वाले पितृरूप एक शरीर में वर्तमान पिण्ड का -६-५-४- ३-३-१ के भेद से ७ पिण्डों में विभाग हो जाता है तथा उस २८ कलात्मक पिण्ड के द्वारा पिता से लेकर परमातिवृद्धप्रपौत्र तक के सात व्यक्तियों का परस्पर में सापिण्ड्य सम्बन्ध बन जाता है। यही प्रथम अवयवसापिण्ड्य कहलाता है ! क्योंकि पितृरूप एक शरीर में वर्तमान २८ कलात्मक मूलपिण्ड के ही ७ भेद हो कर यह सापिण्ड्य सम्बन्ध हुआ है। २-पुत्र में निवाप्य सापिण्डय यह सापिएज्य जिस प्रिण्ड की अपेक्षा से बनता है वह मूलपिण्ड ८४ कला वाला है। परमातिवृद्धप्रपितामह से ले कर स्वयं कूटस्थ पुरुष तक के सात शरीरों के अषयव वाला यह मूपिएड कूटस्थ में रहता है। किसके कितने अवयव यह पहिले भी बतलाया जा चुका है और स्पष्ट प्रतिपत्ति के लिये यहां भी बतला दिया जाता है। इन ८४ कलाओं में से परमातिवृद्धपितामह की १, अतिवृद्धप्रपितामह की ३, वृद्धप्रपितामह को ६, प्रपितामह की १०, पितामह को १५, पिता की २१ व स्वयं कूटस्थ. की २८ कलाये हैं। इस ६४ कलात्मक सप्तशरीरावयव निवाप्य मूलपिण्ड के द्वारा ६ पितरों का कूटस्थापत्य से सम्बन्ध है। परमातिवृद्धप्रपितामह से प्रारम्भ कर स्वयं पीजी पुरुष तक • पुरुषों के सम्बन्ध का सूत्र यही ८४ कलात्मक मूलपिण्ड है। ३-पितरों में आधेय सापिण्डय- यह पहिले स्पष्ट किया जा चुका है कि ८४ कलात्मक पिण्ड में से पिता ( कूटस्थपुरुष) में ५६ कलाभों का निवाप (आधीन) कर देता है। उन ५६ कलाओं में २१ कला स्वयं की, १५ पिता की, १० पितामह की, ६ प्रपितामह की, ३ वृद्धप्रपितामह को तथा १ अति- वृतप्रपितामह की हैं। और २८ अपने आप में रखता है। जिनमें स्वयं की. ६ पिता की, ५ पितामह को, ४ प्रपितामह की, ३ वृद्धप्रपितामह की, २ अतिवृद्धप्रपितामह की, १ परमाति- वृद्धप्रपितामह की । इस प्रकार ८४ कलालों में से ५६ कमाओं का जो ऋण पितरों से प्राप्त किया था उसमें से ३४ कलामों का ऋण उसने भागे पुत्र में भाधान करके चुका दिया है 1 और वह उतने ऋण से अनृण हो गया है। फिर भी २१ कलायें पितरों की उसके पास अभी तक वची हुई हैं जिनका प्रत्यपण वह पितरों को देहत्याग के बाद करेगा। यद्यपि ५६ कलाओं का प्राधान उसने पुत्र में कर दिया है। किन्तु उनमें २१ स्वयं की ऋणरूप से उसने पुत्र को दो हैं और शेष ३५ पितरों की कलायें दो हैं । अत:, देहत्याग से पूर्व अपने पूर्वज पांच पितरों का ऋण पुत्रोत्पत्त के बाद भी २१ कलाओं के रूप से उसमें विद्यमान और इन कलाओं का देहत्याग से पूर्व वह पितरों को प्रत्यर्पण भी नहीं कर सकता, क्योंकि ये बची हुई २८ कलायें जिनमें २१ पितरों की हैं व ७ अपन' हैं शरीरधारण के लिये अपेक्षित हैं। अत: वह पुत्र ( कूटस्थपुरुष ) देहत्याग से पूर्व उसके बदले में पिएडभाग को चाहने वाले पितरों को श्राद्धक्रिया द्वारा पिण्डदान करता रहता है । देहत्याग के बाद पुत्र में आधान करने से बचे हुये पितरों के २१ कलात्मक भाग को वह अपने पितरों को देता है तब उसके पास पितरों का कोई धन नहीं बचता। अब वह निजी ७ कलाओं को ले कर ही अवशिष्ट रहता है। अतः उसे श्राद्ध करने की तथा तद्द्वारा पितरों को पिण्ड देने की आवश्यकता नहीं। अब उस स्वयं (बीजी पुरुष ) का तथा जिन पितरों का पिण्डभाग जिस उत्तरवर्ती मन्तान में गया है वह सन्तान उनकी ऋणी है। अतःतत्- परिहारार्थ पिण्डदान करना व श्राद्ध करना उस सन्तान का कर्तव्य हो जाता है। श्राद्धक्रिया द्वारा जो पितरों के आप्यायनार्थ पितरों को पिण्डदान दिया जाता है वह पिण्ड अन्नमय होता है और उन पिण्डों का प्राधान पितरों को होता है। इसी अन्नमय पिण्ड के द्वारा श्राद्धकर्ता पुरुष का अपने ६ पितरों से सम्बन्ध रहता है। इस अन्नमय पिण्ड द्वारा वर्तमान सापिएड्य सम्बन्ध ही पिनरों में आधेय सापिण्ड्य कहलाता है । यह श्राद्धकर्ता पुरुष जिन ६ पितरों को पिण्डदान करता है और उस पिण्ड द्वारा अपना सम्बन्ध उनसे रखता है, उन पितरों में ३ पिण्डभागी पितर हैं तथा ३ लेपभागी हैं। जिनका अधिक भाग बीजीपुरुष में है वे पिण्डभागी हैं तथा जिनका न्यून है वे लेपभागी हैं। अधिक भाग पिता, पितामह व प्रपितामह का है अतः वे पिण्डभागी हैं, तथा वृद्धप्रपितामह, अतिवृद्धप्रपितामह तथा परमातिवृद्धप्रपितामह का न्यून है अतः वे लेपभागी हैं । इसी लिये श्राद्ध में पित्रादि तीन को ही पिण्डदान दिया जाता है, शेष को नहीं। लेपभाजश्चतुर्थांद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः । पिण्डदः सप्तमस्तेषां, सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम् ।। । यह वचन भी इसी तथ्य को प्रमाणित कर रहा है।

BHASINDHERA ४-उत्तर-सापिण्डय- देहत्याग के बाद बीजीपुरुष पितरों को उनका बचा हुआ भाग भो लौटा देता है। और इस तरह अपनी वर्तमान २८ कलाओं में से सात कलाओं द्वारा अपने शरीर को धारण करता हुआ ६ पित्र्यकलाओं को पिता को दे कर पिता से, ५ पितामहीय कलाओं को पिता- मह को दे कर पितामह से, ४ प्रपितामहीय कलाओं का प्रपितामह में प्रत्यर्पण कर प्रपितामह से, ३ वृद्धप पितामहीय कलाओं का वृद्धप्रपितामह में प्रत्यर्पण कर वृद्धप्रपितामह से. २ अतिवृद्धप्रपितामह की कलाओं का अतिवृद्धप्रपितामह में प्रत्याधान कर अतिवृद्धप्रपिता- मह से, १ परमातिवृद्धप्रपितामह की कला को परमातिवृद्धप्रपितामह को वापिस देकर उससे अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। इस तरह उन २१ कलाओं के प्रत्यर्पण द्वारा उसका अपने ६ पितरों से जो एक प्रकार का सम्बन्ध होता है वह प्रत्यर्पणसापिण्ड्य कहलाता है। यह सापिण्ड्य भी सात पुरुषों में होने से साप्तपौरुष है। इस तरह पित्रादि से प्राप्त कलाओं का उनमें प्रत्यर्पण हो जाता है। और पुत्रादि में आधान के द्वारा विच्छिन्न कलाओं का पुन: अपने मूलपिण्ड के साथ एकीकरण हो जाता है इसी आशय से यह सापिण्ड्य कहलाता है। वस्तुतः कलाओं का पित्रादि में प्रत्यर्पण करने के बाद उनके किसी भाग का उसमें शेष न रह जाने से उसका पितरों से सम्बन्ध अब हट जाता है। उपर्युक्त रीति से चार प्रकार का सापिण्ड्य है और यह चारों ही प्रकार का आपिण्ड्य आशौचसंक्रान्ति में कारण पड़ता है अतः उसका यहां कुछ विस्तार के साथ निरूपण कर दिया गया है । इन ४ प्रकार के सापिण्ड्य को मूल कलाओं, आत्मनिधेय कलाओं व पुत्रादि में निवाप्य कलाओं का स्पष्टीकरण करने के लिए नीचे यह परिलेख दिया जाता है। सप्तकोशचक्र मूलकला आत्मनिधेयकला निवाप्याला परमातिवृद्धप्रपितामह कला अतिवृद्धप्रपितामहकला वृद्धप्रपितामहकला प्रपितामह कला पितामहकला १० पितृकला । १ १ AY २ १. ६ Rom do ४ une २१ स्वकला २८ सप्तकोशकलायोग २८ Ime दायसापिएडथ। ७ । . दायसापिण्ड्य में प्रथमत: दायके अधिकारी चार पुरुष होते हैं। १-२, २-पुत्र, ३-पितामह तथा ४-प्रपितामह । इन चारों के पुत्र पौत्र व प्रपौत्र भी दायके अधिकारी होते हैं । अतः इन चारों का एक एक वर्ग बन जाता है और इस तरह स्ववर्ग, पितृवर्ग, पितामह- वर्ग, और प्रपितामह वर्ग ये चार वर्ग दायविभाग में बन जाते हैं। प्रत्येक वर्ग में चार व्यक्ति होते हैं-जैसे स्ववर्ग में -१-स्व, २-स्वपुत्र, ३-स्वपौत्र, व ४-स्वप्रपौत्र । पितृवर्ग में १-पिता २-पितृपुत्र, ३-पितृपौत्र, व ४-पितृप्रपौत्र । पितामहवर्ग में- १-पितामह, २-पितामहपुत्र, ३-पितामहपौत्र, व ४-पितामह प्रपौत्र । प्रपितामहवर्ग में-१-प्रपितामह, २-प्रपितामहपुत्र. ३-प्रपितामहपौत्र, ४-प्रपितामहापौत्र । इस तरह मिलाकर १६ पुरुष दाय के अधिकारी हैं तो भी यह १६ व्यक्ति वंशक्रम के अनुसार सात पुरुषों में ही अन्तर्भत हो जाते है । जैसे प्रपितामह प्रथम पुरुष, पितामह व प्रपितामह पुत्र द्वितीय पुरुष, पिता, पितामहपुत्र व प्रपिता- महपौत्र तृतीय पुरुष, स्व ( कूटस्थ ) पितृपुत्र, पितामहपौत्र, प्रपितामहप्रपौत्र चतुर्थ पुरुष, स्वपुत्र, पितृपौत्र व पितामहप्रपौत्र पञ्चम पुरुष, स्वपौत्र व पितृप्रपौत्र षष्ठ पुरुष तथा स्वप्रपौत्र सप्तम पुरुष । इस तरह प्रपितामह कक्षा, पितामह कक्षा, पितृकक्षा, स्वकक्षा, पुत्रकक्षा, पौत्र- कक्षा व प्रपौत्र-कक्षा को लेकर सात ही कक्षा (पीढी ) बन जाती हैं। इसलिए-दायसा- पिण्ड्य भी सापिएज्य है, और सापिण्ड्य सम्बन्ध 'सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम् इस वचन के अनुसार सात पुरुष तक ही होना चाहिए, इससे अधिक १६ पुरुषों में कैसे है ? यह शङ्का नहीं करनी चाहिये। क्योंकि उपर्युक्त रीति से दायसापिण्ड्य का १६ पुरुषों से सम्बन्ध होने पर भी उन का सात कक्षाओं में अन्तर्भाव हो जाता है और यहां कक्षाओं को लेकर सापिण्ज्य के साप्तपौरुष सिद्धान्त की उपपत्ति हो जाती है। उपर्युक १६ पुरुषात्मक व सप्तकक्षात्मक दायाधिकारी पुरुष स्ववर्ग, पितृवर्ग, पितामहवर्ग व प्रपितामहवर्ग भेद से चार भागों में विभक्त हैं, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। इनमें सबसे प्रथम दायके अधिकारी स्ववर्ग के पुरुष होते हैं तदनन्तर क्रमशः पितृवर्ग, पितामहवर्ग 4 प्रपितामहवर्ग के पुरुष होते हैं। प्रतिवर्ग में भी सर्वतः प्रथम बारम्भक पुरुष का, सदनन्तर पुत्र का, उसके बाद पौत्रका और सबसे अन्त में प्रपौत्रका अधिकार है। 'इस पूर्वापरभाव का कारण सन्निकर्षतारतम्य है। जिसका अनपत्य व्यक्ति के साथ जितना अधिक निकट सम्पर्क होगा वही सर्वप्रथम उसके दायभाग का अधिकारी होगा। 'यरस्वासमतरस्तेषां सोऽनपत्यधन हरेत्' यह वचन भी इसी सिद्धान्त को प्रमाणित करता है। बायसापिण्ज्य का यही रहस्थ है। .

aramAHAN
संक्षेप से इस भूमिका में आशौच से सम्बन्ध रखने वाले कुछ मौलिक सिद्धान्तों
व प्रकरणों का निरूपण पाठकों की सुविधा के लिए कर दिया गया है। शेष प्रकरण केवल
भिन्न भिन्न विशेष प्राशौचों के प्रतिपादक हैं व स्पष्ट हैं अतः उनको यहां छोड़ दिया गया
है । मूल पुस्तक के अध्ययनमात्र से उनका स्पष्ट ज्ञान हो सकता है । आशा है पाठक महानुभाव
आशौचविषयक इस अपूर्व सरल व सर्वाङ्गपूर्ण ग्रन्थ का अध्ययन करके धर्मविषयक व विशे-
पतः श्राशौचविषयक भ्रान्ति को दूर करने में समर्थ हो सकेंगे। * इति शम् 2
सुरजनदास स्वामी
श्री दाद् महाविद्यालय
मोती इंगरी, जयपुर।
ति० पौष
शुक्ला
द्वितीया सं०२००८
ता. ३०-१२-५१

॥ श्रीः॥ विषयसूची अध्याय-अधिकार. संख्या संख्या विषयाः संख्या परिभाषाध्यायः १ २ ३ १ शाखसंग्रहः २-प्रतिज्ञा (शुद्धि-संस्कारादिस्वरूपम् ) ३-आशौचस्वरूपम ४-आशौचविशेषाः (भाशौचनिमित्तानि, स्पर्शाशौचादिभेदाश्च ) ५-विशेषाश्रयाः ( कस्य कस्य सम्बन्धिनः कुत्र कुत्र कीशमाशौचम्) ६-पर्शास्पर्शव्यवस्था ( आशौचे कस्य कियन्तं कालमापृश्यत्वम् ) ७-कर्तव्याकर्तब्यव्यवस्था ( श्रोशौचे किं किं न कार्यम् ) ८-आशौचारम्भहेतवः -आशौचारम्भकालः (मध्यरात्र-सूर्योदयादिमतभेदः) १०-आशौचनिवृत्तिहेतवः (केन केन निमित्तेन आशौचं नास्ति इत्यादि) ११-शुद्धिक्षौरम् . ५ ६ १२ सूत्राध्यायः १३ १३ . १५ १-प्रभवचिन्ता (अशुचित्वोपपत्तिः) ३-सम्बन्धसूत्रम् ३-योनिसम्बन्धाः (गोत्रमेरुः सगोत्रमेहश्च) (सपिण्डमेकः सापिड्यमेरुर्वा ) -योनिसम्बन्धप्रभेदाः Gana अध्याय-अधिकार- संख्या संख्या विषयाः संख्या २३ २४ ५-विवाहसापिण्ड्यम् (पितृ-मातृ-पक्ष्य-द्वन्द्वमेरुः) ( सन्ततिद्वन्द्व-प्रदर्शन मेहः) ६-दायसापिएड्यम् ( कक्षामेरुः ) ४-श्राशौचसापिंड्यम् (शरीरारम्भककलारहस्यम् ) ८-पिण्डरहस्यम् (श्राशौचस्य मुख्योपपत्तिः ) सप्तकोशचक्रम् सप्तदीपचक्रम् -विद्यात्विज्यसम्बन्धी १०-प्रेतसंसर्गः ११-खननदाही १२-उदकदानम् १३-निमित्तिसंसर्गः १४-श्राशौचतादात्म्यम् ( तारतम्यरहस्यम) २६ ३३ 200000 ३५ ३ जन्माध्यायः ३४ ३९ १-सूतिकाधिकार: (सूतिकाया गर्भस्रावे पाते प्रसबे च आशौचम् ) ३-सूतिकापितृकुलाधिकारः (१) पितुर्ग हे प्रसवादी (२) पतिगृहे प्रसपादौ ३-सूतिकामचुरधिकारः (१) मुख्यभार्यायाः प्रसवादी ४-सूतिकामत कुलाधिकारः (१) दसकादीनाम ५-सूतिकासंसर्गाधिकारः। ४२ Prastar अध्याय-अधिकार- संख्या संख्या विषयाः संख्या oc मरणाध्यायः- ४४ ४५ ४६ ४६ ५३ ५३ ५३ १-पुरुषाशौचाधिकारः [१] ब्राह्मणादीनां सामान्येन नियमाः [२] बालाशौचम् [३) दन्तजननात्प्राग बालमरणे पित्रादीनां विकल्पाः [२] पञ्चविंशान्मासाप्राग बालस्य खननदहनयोनियमाः [५] तृतीयाद्वर्षात्कृतचूडस्याकृतचूडस्य च नियमा: [६] अष्टमाब्दादुपनीतानुपनोतयोर्विकल्प: [७] प्रौढानां मृतानामाशौचम् [८] प्रौढाशौचम् [६] शूटबालकानां पृथगादेशः २-व्यशौचाधिकारः [१] मातापित्रोमरणेऽपत्यादीनाम् [२] कन्यामाणे पित्रादीनाम् [३] भार्यामरणे पत्यादीनाम् [४] परपूर्वाया भार्याया मरणे ३-विगोत्राधिकार [१] भगिनी-मातुल-मातृध्वस्स-श्वशुरादीनां विगोत्राणां योनिसम्बन्धिना- भाशौचम [२] गुरुशिष्यादीनां परम्परमाशौचम् ४-संसर्गाशौचाधिकारः [१] मित्रमरणे [२] श्रोत्रियादिमृतौ लगृहेऽन्यमरणे च [३] ऋत्विगादिमरणे [8] महाराजमरणे [५] अशौचिनामनभोजनादौ ५५ (घ ) CONN अध्याय- अधिकार- संख्या संख्या विषयाः संख्या उत्तरक्रियाध्यायः ५४ ५६ ६० १-रोदनाधिकारः २-पर्शनाशौचाधिकारः [1] अन्यजातीयशवस्पर्श ३-अलङ्करणाधिकारः ४-अनुगमनाधिकारः ५-६-वहनदहनाधिकारी ७ प्रतिदहनाधिकारः ( प्रतिकृतिदहने पुत्र-सपिण्डादौनामाशौचम) उदकदान-पिण्डदानाधिकारी ८-8-(उदकदानपिण्डदानयोरशौचं प्रायश्चित्तं च) ६१ ६१ ३ दोषाशौचाध्यायः- CHANGTOTHA ६३ wr ६३ १-संसर्गदोषान्नित्याशौचम् २-श्रात्मीयदोषान्नित्याशौचम ३-कालदोषाद् याप्याशौचम् ४-रजोदोषाद् याप्याशौचम् ६४ आशौचसङ्कराध्यायः (पाताध्यायः) ६५ ६५ १-गौड़ सम्प्रदायाधिकारः [9] सम्पातभेदाः [२] सजातीयसम्पाते व्यवस्थाः [३] विजातीयसम्पाते व्यवस्थाः २-द्राविड़सम्प्रदायाधिकारः [१] प्रथमभागे २] द्वितीयभागे ६७ ६८ अध्याय-अधिकार- संख्या संख्या विषया: [३] तृतीयविभागे [४] तृतीयचतुर्थविभागयोः ३-फकिकाधिकारः (द्विताचशौचसम्पाते विशेषाभिधानम् ) अतिक्रान्ताशोचाध्यायः- १- अन्तर्दशाहाधिकारः श्रवणे २-निर्देश-सूतिकाधिकारः ३-निर्देश-पूर्णशावाधिकारः ४-पूर्णशावाधिकारः ५-विदेशस्थशावाधिकारः -ছাবল ঘিন্টা [१] देशान्तरसम्बन्धे स्वीयमतम् आशौचापवादाध्यायः- ७१ ७६ ८१ १-कत भेदाधिकारः (कर्तृ विशेषादाशौचाभावः) [२] ब्रह्मचारिणां यत्यादीनां चाशौचव्यवस्था २-कर्मभेदाधिकारः [१] कर्मविशेषादाशौचाभावः [२] तीर्थे यज्ञविवाहादौ [३] भागमोक्ते स्मात वा मणि [४] आशौचे श्राद्धपाते [५] आशौचे सन्ध्यावन्दनम् [६] भोजनकाले आशौचप्राप्ती ३-द्रव्यभेदाधिकारः [१] अशौचिनः पण्यावस्तुग्रहणे [२] दण्यादिद्रव्यविशेष ८२ ८२ ८३ ८४ ( च । . 100 अध्याय- अधिकार- संख्या संख्या विषयाः [३] विवाहादौ भोजने [४] भोजनमध्ये प्राशौचप्राप्ती ४-मृतदोषाधिकार: (अपमृत्युमरणादौ पातक्रिमरण दिौ चाशौचाभावः) ५-वचनाधिकारः [१] वेदाग्निमदा दिवालणादीनां वचनादाशौचाभाव: [२] कर्मविशेषेष्वेवायमपवादो न सर्वत्र [३] नाडीच्छेदात्प्राक् प्रतिग्रहादिकम [४] आशौचान्तरे सत्यपि पिए दानम् ६६ ८६ ८६ ६४ १०३ प्रमाणसङ्ग्रहाध्याय:- १-स्मृतिसमहः [१] मनुस्मृतिः [२] मनुस्मृतौ क्षेपकवचनानि [३] अथ याज्ञवल्क्यस्मृति: [४] अथ पराशरस्मृतिः [५] अथ बृहत्पगशरस्मृतिः [६] अथ गौतमस्मृतिः [७] अथ वसिष्ठस्मृतिः [८] अथ दक्षम्मृतिः [२] अथ शङ्खस्मृतिः [१०] अथ लिखितस्मृतिः [११] अथ अत्रिस्मृतिः [२२] अथ यमम्मृतिः [१३] अथ संवर्तस्मृतिः [१४] अथ लध्वत्रिस्मृतिः [१५] अथ वृद्धानिस्मृतिः १०३ १०४ १०६ १०६ १०० १११ अध्याय-अधिकार- संख्या संख्या विषयाः ११२ ११२ ११४ [१६] अथाङ्गिरसस्मृतिः [१७] अथ आपस्तम्बस्मृतिः [१८] अथ विष्णुम्मृतिः [१६] अथ भौशनसस्मृतिः [२०] मथ कात्यायनस्मृतिः -अथ वचनसमहाधिकारः [२] नानामुनिवचनानि [२] पुराणवचनानि [३] निबन्धनामोल्लेखः ११८ SINHRSS ११६ १२० १

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॥ श्रीः ।। शुद्धिसिद्धान्तपञ्जिकायाम्- * माशोचपन्जिका * -- १-श्रीमच्छिवकुमारस्य पादमूलं जगद्गुरोः । विज्ञानभाण्डागारस्य दीपं स्वान्ते सदा दधे ॥१॥ विद्यावाचस्पतिः श्रीमान् महाय॑मधुसूदनः । समीक्षाचक्रवर्तीमां करोत्याशौचपञ्जिकाम् ॥२॥ सन्ति यद्यपि भूयांसो निबन्धाः किन्तु तेऽखिला: स्मृतिव्याख्योच्छलत्तकजटिला दुर्गमाशयाः ॥३॥ तनिर्णीतमर्थ ये जिघृक्षन्ति, पृथक् कृतम् येऽजमा प्रतिपित्सन्ते तेषामर्थेऽयमुद्यमः ।।४।। निर्मथ्य धर्मशास्त्राणि विमृश्य बिमतानि च । तत्सारभूतः सिद्धान्म: सिद्धवत् विह दर्श्यते ॥५॥ अत्राध्यायाः परीभाषा सूत्रं मन्म मृतिः क्रिया। दोषः पातोऽतीन कालोऽपवादो बाक्यसंग्रहः ।।६।। HDMARom १-अथ परिभाषाध्यायः। १-शास्त्रसंग्रहः। २-पत्र प्रवेऽध्यायाः । अध्यागे चाधिकाराः । अधिकारे सिद्धान्ताः । सिद्धान्ते * तत्प्रत्यंशवधनिकाः-इत्येवं विषयपरिच्छेदो भवन्ति ॥ तत्राध्याया दश (१०) अधिकाराचा षष्टिः (६४) ' सिद्धान्नास्तु त्रिसप्तत्यधिक नि त्रीणि शतानि ( ३७३)॥ - * महार्थेति 'मँहगू' इति भाषायाम् । एतेषां जन्मकाले अतीव महार्घता जाता । अतः पितरौ 'मटर इति शन्देन एतान ब्यबहरतः स्म ।

[२] आशौचपचिका ३ -- तत्र प्रथमे परिभाषाध्यायेऽशौचसम्बन्धिनो विज्ञाव्याः पारिभाषिकाः कतिचिः पृथक्कृत्य प्रदर्शिता:।।१।।द्वितीये सूत्राध्याये त्वाशौचप्रभवस्थानसंक्रमणद्वारादिभिरर्थजातैराशौर. रहस्यमुपपादितम।।२।। तृतीये जन्माध्याये जन्माशौच विचारः ॥३॥ चतुर्थे मरणाण्याये मरणाशौच विचार:॥४॥पञ्चमे क्रियाध्याये शवानुगमनाद्यौल देहिक क्रियानिमित्तकोशौचविचारः॥।॥ षष्ठे- दोषाध्याये साधारणमालिन्यरूपाशौचोत्पादका: केचन दोषा पाख्याता:। सप्तमे पाताण्याये मा- शौचसकर विचः५: ।। अष्टमेऽतीत कालाध्याये आशौचमुख्यकालोल्लङ्घनादतिक्रान्तकालाशौचानि विदेशस्थमरणा दनिमित्तकानि दर्शितानि ॥८॥ नवमेऽपवादाध्याये आशौचोत्पत्तिप्रतिबन्ध कस्थानान्युपदर्शितानि ॥ ॥ दशमे तु वाक्यसंग्रहाण्याये आशौचविषयका णि सर्वाण्यार्षप्र वचनानि संगृह्य दर्शितानि । एव यद्यप्रन्याल्लिखिततर्कप्रयोगविनिर्णीता भाशौचसिद्धान्ता इह पञ्जिकायामुपनिबद्धास्तेषां छन्थानां नामानि चेह प्रकाशितानि ॥१०॥ तदित्थं दशभिरण्यायैः सबै समीक्षिता आशौचविषयाः॥ ४-अथास्मिन् परिभाषाध्याये-शास्त्रसंग्रहः, प्रतिज्ञा, आशौ चस्वरूपम्, पाशौच- विशेषाः, निशेषाश्रयाः, स्पर्शास्पर्शव्यवस्था, कर्तव्याकर्तव्यब्यवस्था, प्रारम्भहेतवः, प्रारम्भ कालः, निवृत्तिहेतवः, शुद्धिक्षौरम्, इत्येकादशाधिकाराः प्रदर्श्यन्ते इति शास्त्र- संग्रहाधिकारः ॥ १ ॥ २-प्रतिज्ञा । (शुद्धि-संस्कारादिस्वरूपम् ) ५-प्रतिशरीरमात्मानस्त्रयो भवन्ति-शरीरारमा, अन्तरात्मा, विशुद्धाहमा चेति ।। तत्रैतं शरीरात्मानमधिकृत्य दोषांस्ततो निवर्तयितु गुणांस्तत्रापातु चेदमायुर्वेदशास्त्रं पथा प्रवर्तते, तथेवेदं धर्मशानं तमन्यं सत्त्वाख्यमन्तरात्मानमधिकृत्य दोषस्तितो निवर्तयितु गुणांश्च तत्रा- धातुमविशेषात् प्रवर्तते । अन्तरात्मशरीगत्मनोरन्योन्य घनिष्ठसंबन्धादेकत्र विकारप्राप्ती परत्रापि विकारोपसंक्रमणादायुर्वेदशास्त्रेऽप्यन्तरात्मनः संस्कारो यथाऽपेक्ष्यते तथैवेह धर्मशास्त्रे ऽपि शुद्धि- प्रकरणे भूयसाऽस्त्येव शरीरात्मनोऽषि संस्कारापेक्षा । यन्तु पुनरयं तृत यो विशुद्धात्मा विविच्यते स खलु सर्वेषां मुख्योऽपि विभुत्वादक्रियत्वाश्च न करोति न लिप्यते -इत्यत: स इह धर्मशास्त्रे चायुर्वेदशास्त्रे च माधिक्रियते । तस्य सगुणोपपन्नत्वादोषशून्यत्वाच संस्कारानपेक्षणादित्याहुः ।। ६-थान्तरात्मनः सत्त्वात्यस्य संस्कार विधानं धर्मशास्त्रम् । तत्र साक्षादातरात्मनः संस्कारस्य कर्तुमशक्यत्वादात्मायतनानां संस्कारेणात्मनः संस्कारः क्रियते स धर्मः अभ्युदयसाधक आशौ वपक्षिका [३] त्वानिःश्रेयससाधक्त्वाच्च । भूतभौतिकविग्रहः, प्राणसमुदायश्चात्मायतनानि । तेषां दोषमार्जनं वस्त्ययनं गुणाधानं चेति त्रिविधाः संस्कार: सम्पाद्यन्ते । प्रज्ञापराधनिषन्धना आहारविहारादि- व्यवहारोपनीतद्रव्याणां ये हीनयोगमिथ्यायोगातियोगातजनिता ये नियमेनात्मायतनेषु सत्त्वे. ऽन्तरात्मनि चाशुभातिशयाः सञ्चीयन्ते, तानि मलानि, ते दोषाः। श्रात्मायतनानामात्मनश्च प्रसादसिद्धौ तेषां प्रतिबन्धक त्वात ।। तत्परिमार्जन शुद्धिसंस्कार: स च मलानां पाञ्चविध्यात् पब्बधा विभज्य शास्त्रे निरूते-मलमूत्रादिशारीरशुद्धिः प्रथमा ! शय्यास स्थानवसनभोजन- पात्रादिद्रव्यशुद्धिर्द्वितीया । सापिण्यादिसम्बन्ध सूत्रबद्धानां जननमरणादिनिमित्तजनिताघ- शुद्धिस्तृतीया । प्रज्ञापराधनिबन्धनचारित्र्यदोषजनितैनःशुद्धिश्चतुर्थी । रजस्तमोगुणाधिक्यप्रयुक्त- परिदुष्टभावशुद्धिः पञ्चमी। पञ्चभिरेतैः शुद्धिसंस्कारैः प्रहीणदोषसत्त्वात्मके श्रीरात्मकेऽपि वा क्षेत्रे गुणाधानाय कृतो यत्नः फलवान् भवति, न त्वन्यथा । यज्ञतपोदानै स्त्रिविधैः कर्मभिर्य इह सत्त्वेऽन्तरात्मनि शुभातिशयाः सञ्चीयन्ते, तानि बलानि, ते गुणाः । आत्मायतनानामात्मनश्च प्रसादसिद्धौ तेषां प्रधानोपायत्वात् । तत्प-धानं देवसंस्कारः । स्वस्त्ययनं तु दोषोत्पादकसामयाः प्रतिबन्धेन स्वस्थस्यात्मनो निरुपद्रवमेकाकारतया स्थापनम ॥ तत्र देव संस्कारः स्वरत्ययनसंस्कारों वा शुद्धसंस्कारमन्तरेण नोपयुज्यते-इत्यतः प्रथमं निरूपणीये शुद्धिसंस्कारे शारीरशुद्धि-द्रप- शुद्धि-निरूपणानन्तरमिदान मघशुद्धिनिरूप्यते ॥ इति प्रतिज्ञा धिकारः ॥ २ ॥ ३-आशौचस्वरूपम् । । -वेहबोधितचातुर्वण्योचितकमफलसिद्धिप्रतिबन्धकोऽमेध्यत्वलक्षणो जननमरणादि- जन्यापूर्वविशेषोऽघमित्याख्यायते । अघभिन्नमल सम्बन्धात् कस्यचि देक व्यक्तिमात्रस्य देहमानं मलिनं भवति । अघात्मकमल सम्बन्धात्तु तत्कुलोत्पन्नानां सर्वेषां देहश्चात्मा चाशु चर्भवतीति विशेषः । अस्याघस्याशौचसंज्ञा शास्त्रे प्रसिद्धः। अशौचमाशौचं सूतकमघमत्यनर्थान्तरम् । सद पवादः शुद्धिः । तदुर्गायनिर्देश इह प्रकरणार्थः । -आशौच मित्यशुचेर्भारः कर्म चेत्याहुः। अशुचित्वं चामेध्यत्वं कर्मानधिधारमात्र- मित्याहुः । परे तु प्राशौचशब्देन कालस्नानाद्यपनोद्यः पिण्डदानोदकदानादिकर्माधिकारनिमित्त- भूतोऽध्ययनादिकर्माधिकार प्रतिबन्धकीभूतः पुरुषगतः कश्चनातिशयः कथ्यते न तु कर्मानधि- कारमात्रम् । स चातिशयोऽघशन्देन शास्त्रे प्रसिद्धः । वस्तुतस्तु संसर्गसंस्रवादिपरिशीलनाभ्या. सात् संसर्गिपुरुषेवप्रतिबन्धं कश्चनातिशयः समुत्पद्यते। सत्यपि समाने संसर्गे योनिविद्याद्य- भिसम्बन्धवत्सु पुरुषेषु सोऽतिशयोऽविलम्बितमुत्पद्यते। संसर्गोपरामप्रायत्वे तु तत् क्रमेण हसिया चिरेण सर्वथा निवर्तते । आश्रमविशेषसम्बन्धाञ्चित्तवैराग्यात कारणान्तराट्वा संस्रव- [४] आशौचपञ्जिका निवृत्ति निमित्त सन्निधाने त्वेकहेलयाऽसौ निवर्तते । तस्य चातिशयस्य कालभेदेन त्रैम्प्यं भवति । संसर्गिणि जीवति सत्यन्यथा । मृते किञ्चित्कालपर्यन्त मन्यथा। तदूर्ध्व पुनरन्यथा । तत्र मध्यमावाथायां सोऽतिशयोऽघशब्देन संज्ञायतेऽशौचशब्देन च। तस्य ताहगनस्था-निवृस्ति- रेव शुद्धिः । तत्कारणोपन्यासश्चेह प्रकरणार्थः । इत्याशौचस्वरूपाधिकारः ॥ ३ ॥ ४- आशौचविशेषाः । । - ( आशौचनिमित्तानि, स्पर्शाशौचादिभेदाश्च ) १- प्रधाननिमित्तानुरोधेनाशौचं द्वेधा-जन्मा माशौचं मरणाशौचं चेति । तयो. क्रमेण मृतकं शावमिति च संज्ञामाहुः । यत्तु मृताशौचेऽपि सूतकशब्दो दक्षादिभिव्यवहृतो दृश्यते, तदुभयत्राघस्वरूपस्यैक्याभिप्रायेण निमित्त राब्दभेदानादरादौपचारिकं द्रष्टकाम् । १०-परे त्वाहुः जन्ममृत्युझियादोषा आशौचे निमित्तानि, तेन निमित्तभेदादाशीचं चतुर्षा-जन्माशौचम. मरणाशौचम, उत्तर क्रियाशौचम, दोषाशीचं चेति । जातकस्य जन्मनि मातापित्रादिसम्बन्धिवर्गे कञ्चित्कालं शुद्धिर्जायते, तजन्माशौचम् । एवं मृतकस्य मरणे माता- पित्रादिसम्बन्धिवर्ग स्त्रीपुत्रादिसम्बन्धि वर्गे च कश्चित्कालमशुद्धिर्जायते, तन्मरणाशौचम् । तथा. मृतकस्य मरणे ये केचिदौर्ध्व देहिकं वाहदाहादिकमुत्तर क्रियाष्टकं कुर्वन्ति, तेषां तत्करणनिमि- तिकाऽशुद्धिः कश्चित्काल मुपजायते, तदुत्तर क्रियाशौचम् । अथ सन्ति बहवो दोषा मलिनी- करणारतत्सम्वन्यादप्यशुद्धिर्जायते, तहोषाशौचम् । ११-एते च जन्ममृत्युक्रियादोषाः स्वरूप सन्तो निमित्तानि भवन्ति, झायमानःश्च । तेनाशौचं द्वेधा-स्वरूपसदाशी चम्, वासनाशौचं चेति । १२- अथाधिष्ठानभेदादा शौचं त्रेधा स्पर्शाशौचम्, कौशौचम्, मङ्गलाशौच चेति । यत्र शरीरस्पर्शो निषिध्यते, तत्त्पशिौचम् । यत्र चैदिकानि कर्माणि निषिध्यन्ते, तत्काशौ- चम् । यत्र तु विवाहोपनयनकन्यादानादीनि मङ्गलकर्माणि गयाद्यपूर्वतीर्थयात्रादीनि च निषिधन्ते, तन्मङ्गलाशौचम्। तत्राद्यं संस्कारात्मकमपूर्व जायमानमिह भूतात्माधिष्ठितबहिः- शरीरे समवतिष्ठत इत्यतः शरीराशौचमङ्गाशौचं व कथ्यते । शरीरस्पर्श सति इदं परशरीरे संक्रमते, तस्मात्पर्शप्रतिषेधलक्षणं स्पर्शाशौचं च कथ्यते । अथ द्वितीयं तद पूर्व जायमानमिह क्षेत्रज्ञात्माधिष्ठितान्तःशरीरे समवतिष्ठते इत्यतस्तदात्माशौचं प्राणाशौचं च कथ्यते । तत्र सति स्वाण्यायो दानप्रतिप्रहौ देवकर्माणि प्रेतपिण्डक्रियावर्ज पितृकर्माणि च प्रतिषिचन्ते, अतः भौतस्मातकर्मप्रतिषेधलक्षणं कर्माशौचं च कथ्यते । धर्मशरीरे तस्याघस्यानवस्थानातू। - आशौचपञ्जिका अथ तृतीयमाभ्युदयिक मङ्गलकर्मप्रतिषेधलक्षणं त्वशौचमतिमात्रसारिएड्यवसि पुत्रे सत्वमात्राधिष्ठितमनुशयरूपं भवतीत्यतन्तदनुशयाशौचं प्रेताशौचं च कथ्यते । सपिण्डोकरणो- सरं प्रेतत्वं विमुच्यते । संवत्सरान्ते विहितम तस्तद्वर्षाशौचं च कथ्यते इत्याशौचविशेषाः ॥ ४॥ ५-विशेषाश्रयाः। ( कस्य कस्य संबन्धिनः कुत्र कुत्र कीदृशमाशौचम् ) २३-जन्मनि सूत्यां सूतीसपत्न्यां सूतीभर्तरि च स्पर्शाशौचं कौशौचं चोत्पद्यते । इतरेषां सपिण्डानान्तु कर्माशौचमात्रं न स्पर्शाशौचम् । अथ संसर्गिणि स्पर्शाशौ चमात्रं न तु कर्माशौचम, तृतीयाशौचं तु जन्मनि कस्यापि नास्ति । मरणे तु पुत्रे त्रिविधमशौचमुत्पद्यते। सपिण्डादौ तु द्विविधम-स्पर्शाशौचं कौशौचं च । संसर्गिणि त्वेक स्पर्शाशौचमात्रं न तु कर्माशौनम् ।। निर्हाररायुत्तरक्रियायां स्पर्शाशौचं कौशौचं चेति द्विविधाशौ चसम्बन्धः । दोष. विशेषाभिसन्याने तु कर्माशौचमात्रं न स्पर्शाशौच तृतोयाशीचं वा । तदित्थ जन्ममृत्यु क्रयादोष- निबन्धनेष्वाशौचेषु स्पर्शकर्मोत्सवप्रतिषेधलक्षणान्युपदर्शितानि । इत्याशौचविशेषाश्रयविचारः।। ६-स्पर्शास्पर्शव्यवस्था। (अशौचे कस्य कियन्तं कालमस्पृश्यतम् ) १४-कर्माशौचं कर्मप्रतिषेधसक्षणमधिककालेनापति, स्पर्शाशौचं स्वस्पृश्यत्वलक्षण- मस्पकालेन । तत्रासति विशेषाभिधाने कर्माशीचं यत्र यावदुक्कम, तस्य प्रथमे तृतीयांशे स्पर्शा- शौचमपि मातरि पितरि भ्रातरि तदन्येषु च सपिण्डेषु यथायथं समुच्चीयते । यथा मासे कर्माशौचे दशाहं स्पर्शाशौचम्, दशाहे तु कर्माशीचे व्यहं स्पर्शाशौचम् । व्यहे मशिौचे त्वेकाहं स्पर्शाशौचम् । ततो न्यूने कौशौचे स्नाना पाक स्पर्शाशौचम् - इत्येवं तारतम्येन सर्वत्रोह्यम् । अयमेव च तृतीयांशः सति सम्भवे अस्थिसञ्चयन कालो भवति । अत एवा स्थसञ्चयनदिने सर्वम्याम्पृश्यता निवर्तते । स च पूर्णाशीचेऽस्थिसञ्चवनकालो ब्राह्मणस्य चतुर्थाहः । क्षत्रियस्य पञ्चमाहः। वैश्यस्य षष्ठाहः। शूदस्य दशमाहः । व्यहाशौचे तु सर्वेषां द्वितीयाह. । अन्यत्राप्येवं सर्वत्रासति विशेषाभिधाने कशिौचत्रिभागकालेतास्पृश्यतानिवृत्तिरित्याह देवल ऋषः । अति- क्रान्ताशौचे तु सचैलस्नानमात्रेणास्पृश्यतानिवृत्तिः । इनि मरणाशौचविषय ऊः स्पर्शास्पर्श- कालः॥ ॥ ।

[३] आशौचालिका १५ -जननाशौचे तु पुत्रजनने कन्या जनने का शरीराशौचम पृश्यत्वलक्षणमेकस्याः सूतिकाया एव सम्पूर्ण दशरात्रकालापने य भवति । अथ चितुर्विमातृणां च तदत्यल्प पुत्रजनने स्नानमात्राप नेयं भवति । कन्याजनने तु पितुर्बिमातृणां च तावन्मात्रमपि नास्ति । मात.पितृ भ- मानां तु सपिए डानां पुत्र जनने कन्याजनने वा कुत्राप्य पृश्यत्वं नास्ति ॥ २ ॥ १६-सूतिकास्पर्श तु कृते स्पशनिमित्तकमस्पृश्यत्वप्रयोजकमघमनुवर्तते । तच सूतिका- महरि दशरात्र कालापनेयम् । सपिण्डादिषु तु स्नानमात्रापनेयमिति विशेषः । इति स्पर्शास्पर्श- विचारः ॥६॥ ७-कर्तव्याकर्तव्यव्यवस्था । ( अाशौचे कि किं न कार्यम् ) १७ - २ ण शौचे जन गशीचे वा सन्ध्योपासनं पञ्चमहायज्ञ न षट मर्माणि च वर्जयेत्। तबाचनम् प्राणायाम . अचमनम्, म जनम् आचमनम् सूर्यायदानम्, सूयर्थो स्थानम, गायत्री जपश्चेत्येतानि सन्ध्यावन्दनस्वरूपसम्पादकान्यष्टौ कर्माण गृइस्थानां नित्यनि । तानि च सर्वाण्यप्याशौच कालमध्ये प्रतिषिद्धानि । *पचैव महायज्ञाः-भूतयज्ञो मनुष्ययज्ञः पितृयज्ञो दे यज्ञ ब्रह्मज्ञ इति । अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । होमो देवो बलिभौंतो नृयज्ञोऽतिथिपूनम् ।। श्राद्धं वा पितृयज्ञः स्यात् पित्र लिस्थापि वा ।। इति (श्चमहायज्ञा गृहस्थानां नित्या: । ते वाशौच कातामध्ये प्रतिषिद्धाः । यजनं याजनमध्यापनमध्ययनं दानं प्रतिग्रहश्चेत्येतानि षटकर्माणि गृहस्थानां नित्यानि । तान्यपि सर्वाए शौच कालमध्ये प्रतिषिद्धानि-इत्ये के । १८ -परे त्वाहुः । आशौचे स ते सध्योपासनार्थमाचमनं सूर्योपस्थानं च न कुर्यात् ५॥ प्राणाय मं तु न कुर्याद्वा, विना मन्त्रेण कुर्याद्वा । मार्जनं गायत्री जपं च न कुर्याद्व। मानसमन्त्रेण कुर्याद्वा । सूर्णर्यदानं तु गायत्री सम्यगुश्चार्य कुर्यादेव, नत्वेव न कुर्यादिति दाक्षिणात्याः । गौडास्तु १ *छन्दोगपरिरिष्टे।

आशौचपञ्जिका [.] सूर्यायदानमपि नैष कुर्यादित्याहुः। प्रदिक्षणं कृत्वा सूर्य ध्यायन् नमस्कुर्यात् । सैषा कुशवारि- वर्जिता मानसी सन्ध्या कदाचित् न परित्याध्या---इति सम्ण्यावन्दने विशेषः । {-महायज्ञेषु वेदाध्ययनं वेदाभ्यापन च ब्रह्मयज्ञः । तमाशौचे सति नैव कुर्यात् । २०-अथ पिण्डदानमुद कदानं च पितृयज्ञः। पिण्डदानं श्राद्धशब्देनास्यायते, उदकदानं तु तर्पणशब्देन । तत्राभ्युदयिकश्राद्ध जननाशौचे सत्यपि कुर्यादेव । अथ मृताह मारभ्य दशाह. पर्यन्तं दशगात्रश्राद्धम, तथाद्यश्राद्धमारभ्य सपिण्डीकरणान्तं षोडशश्राद्धं चेत्येतद्वयं मरणा- शौचमध्ये कर्तव्यतया नियतत्वादशीचेऽपि कुर्यादेव । सपिण्डोकरणात्तर हि श्राद्धकर्ता पुत्राहि- ३ शौचेन विमुच्यते, न ततः प्राक । 'त्रविध हि माता पितृमरणे पुत्रज्याशौचं प्रवर्तते-शाह- व्याप्यं द्वादशाहव्याप्यं संवत्सर व्याप्यं च । तत्राय दशम्या रात्रेषसाने दशगात्रकावसाने च निवर्तते । द्विर्त यं द्वादश्या रात्रेरवसाने सपिएखीकरणावसाने च । तृतीयं तु चान्द्रसंवत्सरान्ते । अथ सपिण्डज्ञातीनां द्विविधमाशीचं भयंत । अहव्याप्यं दशाहव्याप्यं च । तत्राचं तृतीयरावे. रवसानेऽस्थिसञ्चयन मावसाने च निवर्तते, द्वितीय तु दशम्या रात्रेरवसाने दशगात्रकर्माबसाने चेति । तत्राशौचनिवर्तकानां कर्मणामाशौचे कर्तव्यता नाप्राप्तति न प्रतिषिभ्यन्ते तत्र तानि कर्माणि, किन्तु यद्येषामपि कर्मणां कर्तव्यदिने किञ्चिदशौचान्तरं प्रसज्ज्यते, तदा तदशौचे व्यतीते तच्छ्राद्धं कुर्यात्, नत्वाशौच कालमध्ये-इत्याह ऋष्यशृङ्ग ऋषिः। एवं सांवत्सरिक- श्राद्धदिनेऽप्याशौचप्राप्तौ तदशौचान्तद्वितीयदिने कुर्यात्, न त्वाशौच कालमध्ये । अथाशौचाम्त- द्वितीय दिने मलमासादिकाल दोषप्राप्तौ विघ्नान्तरमाप्तौ वा तदुत्तरं प्रथमोपस्थितायां कृष्णैकाद- श्याममावास्यायां वा भमणदिवसे था कुर्यादिति लघुहारीतः प्रचेताश्च । अमावास्यादिभाद्धजातं नाशौचे कुर्यात् । यद्यावश्यक स्यात्तदाशीचोत्तरं कृष्णैकादश्यां कामिति शिष्टाः ॥ इति पितुयशे विशेषः॥ . - २१-अथ यजनं याजनं च देवयशः। तत्र याजनं सत्याशौचे नैव कुर्यात् । होमस्तु यजनम् । तत्र नियमानियमानुरोधेन व्यवस्था । तथा हि-येषां बढ़चादीनां दशरात्रमहोमेऽपि नामिविच्छेदः कल्पेऽभ्युपगम्यते, तैरशौचे प्राप्तेऽमिहोत्रहोमो न कार्यः । अशौचोत्तरं तु तत्रैवानी होमसिद्धिन तु पुनराधानाद्यावश्यकता । अथ तैत्तिरीयादीनां चतूगत्रमहूयमानोऽनि- लौकिकः सम्पद्यते । तस्मात्तेषां होमस्यावश्यकत्वादशौचकालेऽपि शुष्कानेन फलादिना या आस- णद्वारा होमं कारयेत् । एवं स्मार्तहोमेऽषि कर्तव्यतया नियते सत्याशौचप्राप्तौ स्वयमकृत्वा पर- द्वारेणाकृतानं कृताकृतान्न वा हावयेत् । कृतानं तु परद्वारापि न हावयेत् । ओदनसक्तुलाजमो- इकलड्डुकादीनि कृतानानि । तण्डुलमाषमुद्गादीनि कुताकृताचानि, व्रीहियवगोधूमादीनि त्या-

[८]
आशौचपञ्जिका
a head and thanks to all
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तान नि। स्मात वैधरनानं नित्यदेवार्चनं च यजनम् । तदाशौचे न कुर्यात् । आगमोक्तं काम्-
पूजन नुष्ठानादिक नष्कामपूजना दकं च य जनमुच्यते, तत्रापि काम्ये संकल्प्य प्रवृत्ते यद्याशौची
स्यात् तदा मानश्या प्रक्रियया ध्यानयोगेन तत्कुर्यात् , न मन्त्रमुचारयेत् । निष्कामनियमे त्वाशी-
चेऽपि तत्कार्यम् । नियमाभावे त्वाशौचे तदुभयं न कुर्यात्। आशौचे निवृत्ते सति पुनः कुर्या-
दिति देवयज्ञे विशेषः॥
२२-अथ दानं प्रतिग्रहश्चत्यु भयं भूतयज्ञः । दीयमानं द्रव्यं बलिशब्देनाख्यायते। तहानं
तद्ग्रहणं च भूतयज्ञः । तत्र पुत्र जन्मनि नाडीच्छेदात् पूर्व हिरण्य-भूमि-चतुष्पद-धान्य-गुड़-
तिल-घृत-वस्त्र-तुरंग-रथ-च्छत्र-च्छाग-मत्स्य-शयना सन-गृ.दिद्रव्याणां दाने वा प्रतिप्रहे
वा दातुः प्रतिग्रहोतुश्च दोषो नास्तीति कूर्मब्रह्मपुराणयोः प्रतिज्ञायते। लवणमधुमासानां पुष्प-
मूमफलशाकानां काष्ठोष्टतृणपणनां दधिदुग्धघृततै लानामजिनौषधयोः सक्तु-तन्दुलादिशुष्का-
मानामशोचिस्वामिकानामपि तत्स्वाभ्यनुमत्या स्वहस्तेन ग्रहणे नास्ति दोषः । अशौचिना वा
गृह्यमाणे दातुः प्रतिग्रहीतुर्वा न दोष इति ब्रह्मपुगणम् । यद्यपि बलि रिति वैधं कर्म भवति,
तथापीह वैधमवैधं वा सर्व विधं व्याख्यातमविशेषात् । एतदन्यस्तु सर्वो
भूतयज्ञः
सत्यशोचे
प्रतिषिद्ध ।। इति भूतयझे विशेषः ।।
२३-अथ गृहे समागतानां भोजनदानाश्रयदानाद्या तिथ्यकरणं मनुष्ययज्ञः । तत्र
जनने मरणे चाशौचिनी कुलस्यान्नमशौच काले न भोक्तव्यम्, अशोचिगृहे कृतभोजनस्याशौचं
प्राप्नोतीत्यतस्ततिषिध्यते। अशौचं ग्रहीतुमच्छतान्त्वाशौचिकुलान्न भोजनेऽपि दोषो नास्ति ।
तदित्यं श्रौतेन महायझेन मान्यपि षटकर्माणि व्याख्यानानि ।।
२३-अथ त्रियिधमाशौचं पूर्वमाख्यातं स्पाशीच, कर्माशीचं, मङ्गलाशौचं चेति ।
तत्र भाद्धकर्तुः पुत्रस्य दशरात्रं सपिण्डानां तु वा स्पर्शाशौचकालः । तत्राशौचिना शुधिना-
स्थेयम् । परामस्पर्शादिकमशुचिस्पर्शस्तैलाभ्यङ्गादिकं च न कार्यम् । अथ कर्माशीचं दशरात्रम् ।
केषांवितु त्रिरात्रम् । तत्र-
NIOS
लाभ्यङ्गे बान्धवानामङ्गसंवाहनं च यत ।
तेन चाप्यायते जन्तुर्यञ्चाश्नन्ति स्ववान्धवाः ।।
इति मार्कण्डेयपुराणोक्तं कार्यम् । “स्यमांसादि न लक्षयेयुराप्रदाताद्" इति भगवान्
गौतमः प्राहः । अयं च मांसादिभक्षणनिषेधोऽशौचाभ्यन्तरेऽशौचिमानसाधारणः ॥ अथ तृती-
अमाशौचं संवत्सरेणापैतीति संवत्सरपर्यन्त पुत्रो विवाहोपनयनकन्यादानादीनि मङ्गलकर्माणि
तीर्थयात्रां गयाश्राद्ध च न कुर्यात् । इति कर्तव्याकर्तव्यविच रः ॥ ७ ॥

স্মামীৰণজিষ্টা [] ८-शौचारम्भहेतवः। ३५- जन्माशौचं जन्मकालात्, मालच्छेदकालात् , जन्मश्रवण कालाद्वा प्रवर्तते। तत्र जननस्याशौचे निमत्तत्वाजन्मकाला वारभ्याशौचप्रवृत्तिरिति दाक्षिणात्याः । नालच्छेदस्य - वाशौचे निमित्तत्वात्तदूर्ध्वमेवाशौचप्रवृत्तिनं तु पूर्वमिति गौडा: । नालच्छेदो नाडीच्छेदो नाभि- च्छेद-इत्येकार्थाः ॥ १॥ २६-मरणाशौचं तु मृत्युकालात्, दाहकालात, मृत्युश्रवणकालाद्वा प्रवर्तते । तत्राना- हिताग्नेर्मुत्युकालादारभ्याशौच दिनगणना कार्या, न तु दाहादारभ्य । तेषां मरणस्याशौचे निमि- सत्वात् । अहिताग्ने 'तु दाह कालादारभ्य दिनगणना कार्या, न तु मृत्युकालात । तेषां दाहस्या- शौचे निमित्तत्वात् । इष्टिमतामन्त्येष्टिनिमित्ताशौचसम्बन्धेऽपि मृत्युनिमित्ताशौचस्य तत्रा- प्रवृत्तः ॥२॥ ६७-एतच्च बस्तुसदाशौच प्रवृत्तो निमित्तमुक्तम् । प्राशौचनिमित्त विधिनिषेधव्यव- हारप्रवृत्तौ तु जनने मरणे वा श्रवण कलादारभ्यत्र गणना भवति, तेन ततः पूर्व स्पर्शकरणे कर्मकरणे था न दोषः । ज्ञानस्यैव व्यवहारे निमित्तत्वात् ॥ ३ ॥ इत्याशौचारम्भहेतवः ॥ ८॥ है-माशोचारम्भकालः । १ ( मध्यरात्र-सूर्योदयादिमतभेदः) २८-आशौचप्रारम्भकाल सम्बन्धेन मतनयं स्मयते। तथाहि-सूर्योदयात् प्राकालपर्यन्त रात्रौ जनने मरणे दाहे वा पूर्वदिनादारभ्य गणना कार्या, सूर्योदयोत्तर तूत्तरदिनादारभ्य---. इत्येक मतम् ॥ १॥ द्विर्विभक्ताया रात्रेनिशीथकालपर्यन्तं रात्री जनने मरणे दाहे वा पूर्वदिनादारभ्य गणना कार्या, निशीथोत्तरं तूत्तरदिनादारभ्य ---इति द्वितीयं मतम् ॥ २ ॥ निविभकाया रात्रेः प्रथमभाग यपर्यन्तं रात्रौ जनने मरणे दाहे वा पूर्व दिनादार* गणना कार्या, तृतीयभागे तून्तरदिनादारभ्य इति तृतीयं मतम् ॥ ३ ॥ २६-तत्र मिथलादिपौरन्त्यदेशेषु सूर्योदयविभागव्यवस्था । मत्स्यादिपाश्चात्य देश निशीथविभागव्यवस्थ । महाराष्ट्रादिदाक्षिणात्य देशेषु तु त्रिभागव्यवस्था । तदित्थं यत्र देशे भाचास्तत्र ल तथा कार्यों नान्यत्र देशे ॥ इत्यारम्भकालाधिकारः। ॥

[१०]] आशौचपच्चिका - १०-आशौर्चानवृत्तिहेतुविचारः । ( केन केन निमित्तेन आशौचं नास्ति इत्यादि ) ३०-ज्ञानं तपोऽग्निराहारो मृन्मनो वायुंपाञ्जनम् । वायुः कर्माकंकालौ च शुद्धक णि देहिनाम् ।। इत्येवं द्वादशैते शुद्धिहेतवो विष्ण्वादिभिराम्नायन्ते । तत्र ज्ञानतपसी, अग्निमनसी, कर्मकालौ, वादि चेति सप्ताशौचनिवृत्तिहे वो द्रष्टव्याः । तत्र तावजज्ञानतपोऽनमनसां प्रभा- वादेव तत्तदधिष्ठ ने समुत्पद्यमानमिदमाशौचं पात्रभेदान्न्यूनाधिक कालेन निवर्तते । तदित्थं स्थितिकालानुराने दमाशौचं द्वादशधः- अनाशौचम, सद्यःशौ यम् , एकाहः, द्वथहः, त्र्यहः, चतुरहः, षडहः शाहः, द्वादशानः पञ्चदशाहः, मासः, मरणान्त चेति । तत्र यः साङ्गसकल्पं सरहस्यं च सर्वः ख वेदमर्थतः सम्यग विजानाति अग्नमान् क्रियावांश्च भवति, तस्याशीचं नास्ति । १ । रात्विजा दीक्षितानां व्रतिना सत्रिणां बालानां देशान्तरस्थानां च सद्यः शौचम् ।२। साङ्गवेदावाम नमतां क्रियावतां च ब्राह्मणानामे काहः । ३ । अन्येषां च तथाविधानां द्वयहः। ४ । वे देनाग्निना क्रियया च यथा कथञ्चिद्धीनानां व्यहः ! ५ । हीनतराणां चतुरहः । । । अब्राह्मणानां नथाविधानां षडइः । ७ । जातिमात्रेण विप्राणां तु दशाहः । ८। क्षत्रियाणां द्वादशाह: । है । वैश्याना पञ्चदशाहः । १० । शुद्राणां मास: । ११ । अस्नात्वा, अनाचम्य, भजप्त्वा, बादा, अहुत्वा तु भुजापानी मायान्नम्। तथा व्याधिनस्य कदयस्य सर्वदा ऋण- प्रस्तस्य क्रियाहीत्य मूर्खन्य विशेषतः स्त्रीजितस्य व्यसना सकचित्तस्य नित्यशः पराधीनस्य श्रद्धा- त्यागविहीनस्य च सवस्य भस्मान्तं सूतक भवति । १२ । अत्र विशेषोऽपवादाध्याये वक्ष्यते ॥१॥ ३१-थ यदप्यधिष्ठानभेदात् त्रिविधमाशौचमाख्यानम् , तेषामपि तारतम्येन निवृत्तिकाला भवन्ति । तथा हि श्राद्ध कर्तुः पुत्रस्य तत्संसर्गिणश्व दशगात्रोचरं दशाहान्ते स्पर्शाशौचनिधीतः। सपिएखीकरणोत्तरं वर्षान्त द्वादशाहान्ते वा कर्माशौचनिवृत्तः । वर्षान्ते च मङ्गलाशौचनिवृत्तिः । अथ ज्ञातीनान्तु सपिण्डानां तसंसर्गिणां चास्थिसञ्चयनोत्तरं त्रिरात्रान्ते पशिौचनिवृत्तिः । दशगात्रोत्तर दशरात्रान्ते कर्माशौचनिवृत्तिः। मङ्गलाशौचंतु तेषां नास्ति ॥२॥ तदित्थं कालः कम चेत्युभयमाशोचनिवर्तक सिद्धम् । तत्र काल एवाशौचनिवृत्तौ मुख्यो हेतुः, कर्म गौण मिलाके । कर्मैव तत्र मुख्यो हेतुः कालो गौण इत्यन्ये । परे त्याहुः- दशमदिवसे दश- गात्रकर्मसमामाकपि दशम्या रात्रेव सानपर्यन्तमशौच न निवर्तते । येऽपि वा दशगात्रा देक किमपि कम न कुर्वन्ति, तेषामपीदमशौचं वे स्वे कालेऽतीते निवर्तते । यथा संवत्सरादुर्च : ।

आशौचपच्चिका [ ११ ] -- - मरणश्रवणे कर्मकरणाभावेऽप्यशौचनिवृत्ति मन्वादयः प्राहुः नरमात् काल एवाशौचनिवर्तको न तु कर्मकलापः । तस्य फलान्तरोद्देशेन विधानाद् इति । केचित्तु श्राद्वादिशुद्धिकर्मनिवर्तनीय- मशौचान्तर मिच्छन्ति । तेषां तादृशाशौचनिवृत्तौ कर्मव हेतुर्न कमॆति विशेषः ॥ ३ ॥ ३२-अथाशौचं द्वेधा-वस्तुसदाशौचं वासनाशौचं चेति । तत्र ज्ञाने सत्यसति वा निमित्तवशादुपजायमानमाशौचं यत्र सम्बन्ध सूत्रादुत्पद्यते तदाद्यम । यत्तु निमित्त श्रवणाद- शौच मुपजायते, तद्वितीयम् । तत्र वस्तु सदाशौचं स्वे स्वे नियते कालेऽतीते स्वयं निवर्तते । ज्ञायमानं तु वासनाशौचं वस्तु सदाशीच स्थिति क ल सन्निकर्षविपकर्षानुरोधान्न्यूनाधिकमात्रमु. सद्य न्यूनाधिककालेनैव निवर्तते । यथ अन्तर्दशाहे श्रवणे शेषदिवसैनिवृत्तिः । निर्दशस्य वर्षा- भ्यन्तरं श्रवणे त्रिरात्रान्निवृत्तिः । वर्षादृद्वन्तु श्रवणे स्नानमात्रानिवृत्तिः इत्येवं सर्वत्रोह्यम् । इत्याशौचनिवृत्तिहेतवः ॥ १ ॥ ११-~-शुद्धिनौरम् । ३३-आशौचोपक्रमदिने क्षौरं कार्यमिति दाक्षिणात्याः । तत्रापि दाहान प्रागेव श्राद्ध- का, दाहादूर्वन्तु सपिण्डादिभिरित्याहुः । श्राशौचावसानदिने क्षौरं कार्यमिति गौडाः । 'समाप्य दशमं पिएडं यथाशास्त्रमुदाहृतम् । श्मश्रु केशनखानां च यत् त्याज्यं तजहात्यपि ॥' इति ब्रह्मपुराणात् । 'श्मश्रुकेशनखान् वाप ये दक्षिलोमशिखावर्जम्" इनि वसिष्ठोक्त श्व प्रतिवर्ण मशौ वान् नदिने केशश्मश्रुला मनखाना यन्त्याज्य तज्जह्यात् । न कक्षोपायशिखाः न ध्रुवं न वाक्षिलोमानि व.पयेत् गौरसर्षपकरके न निलकल केन वा शिरःग्नानं करोति, वत्रशुद्धिं गृहशुद्धिं च करोतीत्याहुः ॥ १ ॥ ३४-अशौ वान्तदिने क्षौर करणे कारण द्वय मोद्दुः । केशश्मश्रुनखान्याश्रित्य पापं तिष्ठती- त्यनुशयनिवृत्त्यर्थमाशौच नवृत्तिदिने केशादित्यागः कार्य इत्ये कम् । एकोद्दिष्टादि श्रद्ध मकेशश्म- श्रुणा शुचिना कर्तव्यमित्याचक्षते । शरीरात्तु रुधिररावे पुरुषोऽशुचिर्भवतीत्यतः श्राद्धदिने श्राद्धतः पूर्व क्षौर करणे रुधिरनावमा भने श्राद्धव्याघातः संभाव्यते । तस्मादशौ बान्त द्वितीयदिने कर्तव्यमाद्यश्राद्धं लक्ष्य कृत्य, तत्पूर्व दिने दशमदिवसे क्षौर विधीयते । एवं कृते स ते श्राद्धदिने रुधिरस्रावाभावादशुचित्वं नापद्यते, केशश्मश्रुपरित्यागात् शुचित्वं तूपलभ्यते । नदिदं द्वितीयम् । ३५-'अनुभावनां च परिवापनम्" इत्यापस्तम्बोक्तः पुत्रादीनामेव मुए इनविधि : न्येषामित्येके । अनुभाविनः पुत्रादय इत्यभिमानातू । अथ प्रेतादल्पवयस्कानामेव मुण्डनविधिना

[१२]
आशौचपचिका
घिकबयस्कानामिति विज्ञानेश्वररत्ना करादयो दाक्षिणात्या:-अनुभाविनः कनिष्ठा इत्यभिमानात।
अशौचमनुभवतां पुंसां सर्वेषां सर्वाशीचे मुए डनमिति गौडा:-"अनुभाविनः स्वनिष्ठाशौचाभि-
मानिनः' इत्यभिमानात् । तत्र देशाचारतो व्यवस्था ॥ ३ ॥
३६-'केशश्मभू धारयतामया
भवति सन्ततिः' इत्युक्त हाश्रमिणो वृथामुण्डनं न
कुर्युरन्यत्र विहाराशी चादि नमित्तेभ्यः । “नी बकेशन वर मश्रुणा ब्राह्मणेन भवितव्यम्' इत्युक्तेः
पाच दशमे वा दिने नियमेन का केशकर्तनं कारयितव्यम । 'पञ्चमकं दशमकं वा प्रत्या-
युष्यम्" इति श्रुतिनिर्देशात् “त्रि:पक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहारयेत्' इत्यायुर्वेदाचार्य महर्षि-
घरकादिभिस्तथोपदेशाच्च । सुरेणभद्राकरणं तु मृतके सूत के बन्धमाक्षणे मखदीक्षणे राजनि-
देशे तीर्थप्राप्ती चेत्येवंविधे शास्त्र सिद्धे निमित्ते सत्येव कार्य नान्यथेति बहवः । इदानीं तु
लौकिका यथेच्छं चरन्ति । अस्माकं तु मैथिलानां सम्प्रदाये कृतोपनयनानां कर्या केशकर्तनं
व्यवहारविरुद्धम् । भद्राकरणं तु निमित्तमन्तरेणापि यथेच्छमाचारसिद्धं दृश्यते तत्र देशाचाराद्
व्यवस्था ॥ ४ ॥
३६-जननाचेऽपि श्मश्रुक्रर्म कर्तव्यमिति शुद्धितत्त्वादौ स्पष्टम् । इति शुद्धिक्षौराधि-
कारः॥११॥
३८-श्रीक्षेत्रादपि दक्षिणोऽधिमिथिलं यो भैरवादुत्तरः
पूर्वो यः खलु लक्ष्मणाख्यसरितो यो गौतमात् पश्चिमः ।
तस्मिन् संवसथेऽग्रहीद् बहुबुधे गाढ़ाभिधे जन्म यः
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ।। १ ।।
इति प्रथमः परिभाषाध्यायः ॥१॥

হাঁীষণঞ্জিকা [१३] २-अथ सूत्राध्यायः। ३६- अस्मिन् द्वितीयेऽशौचसूत्राध्याये । ६-अशौच प्रभवः,, २-सम्बन्धसूत्रम्, ३-योनिसम्बन्धाः, ४-योनिसम्बन्धभेदाः, ५-विवाहसापिण्ड्यम्, ६-दायसापिण्ड्यम, -ओशौचसा पण्ड्यम, ८-पिण्डरहस्यम्, १-विद्यार्बिज्यसम्बन्धः. १०-प्रेतसंसर्गः ११-खननदाहौ, १२-उदकदानम्. १३-निमित्तिसंसर्गः, :४-आशौचतादात्म्यम- त्येते चतुर्दशाधिकाराः प्रदर्श्यन्ते । १-प्रभव-चिन्ता। ( अशुचिन्वोपपत्तिः) ४० - चत्वारि तावन्निमित्तान्याशौचस्योक्तानि-जन्म, मृत्युः, क्रिया, दोष इति : तत्र जन्माशौचस्य प्रभवः नीरजः प्रतिपद्यते । तस्य च र सो मलत्वादियं रजस्वला स्त्री मलिनी भवति । द्विविधा हि शरीरधातवो भवन्ति-प्रसादभूता मन्तभूताश्च । तत्र गुर्वादयो द्रवान्ता गुणाः, रसामृङ्मांसमेदोऽस्थिमजशुक्राणि च द्रव्याणि प्रसादा उक्ताः । ये तु शरीरस्य बाधकराः स्युस्ते मला उच्यन्ते। यथा शरोरच्छिद्रेषूप देहाः पृथगजन्मानो बहिर्मुखाः परिपक्वाश्च धातवः, ये चान्येऽपि केचिद्भवाः शरीरे तिष्ठन्तः शरीरस्योपघातायोपपद्यन्ते तान् सर्वान मलानाचक्षते । अत एबेदमातवं मलं व्यवसीयते, पृथगजन्मत्वाद्वहिर्मुखत्वाच । मलानामशुचित्वं त्वात्मानिष्टजनकत्वादुपपद्यते । चेतना च सत्त्वं च शरीराग्निश्चात्मान उच्यन्ते । तत्र तज्जाती- येनात्मना परित्यक्तोऽर्थस्तज्जातीयायात्मने हितो न भवति, तस्मात्तस्य तदात्मसापेक्षमशुचित्वं प्रकल्प्यते । तस्य निःसरणसमये मूत्रपुरीषा दिनिःसरण समयवच्छरीरमशुचि प्रतिपद्यते। तत्काले स्पृष्टशरीरस्य परशरीरे स्वगतधर्मसंक्रामकत्वात् । तस्य शुद्धिः शौचप्रकरणेनाम्नाता ॥१॥ , ४१-अर्थतस्या मलिन्या: शरीर तश्चत्वारि दिनानि यावत् कमले समुञ्चतं पुराणं रजः प्रवर्तते । तच्चातिदुष्टं भवति, दग्थप्रायत्वात, व्यापन्न प्रायभ्रूणसंकुलत्वाच्च । तत्र सृस्थिता भ्रण कीटा म्रियमाणाः सन्तीत्यतस्तस्या असृजोऽशुचित्वं जायते तत्संसर्गे च युः प्रज्ञा-तेजो- बलाद्यपहीयते-इत्यतोऽयमन्यो विशिष्टो दोषः। तस्य शुद्धिरप्यन्यत्राम्नाता ॥ २ ॥ ४२-अथ स्रावपातयोडिम्भादिभावापन्ना रजोभागा श्रात्मना परित्यक्ता बहिनिःस- रन्ति । तेषामात्मना परित्यक्तत्वादेवात्मानिष्टजनकत्वमशुचित्वं चोपपद्यते । शुक्रशोणितजीव- संयोगे तु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति । तस्य स्रावे पाते च जीवो निवर्तते, तस्मादप्यशुचित्वं - [१४] आशौचपञ्जिक प्राप्नोति । किञ्च-शुक्रशोणितजीव संयोगरूपाऽयं गर्भो नाम काशवःयवग्नितोयभूमिविकारश्चेतना धिष्ठानभूतः पञ्चमहाभूत चेतना समुदायात्मकत्वात् षड्ध तु प्रतिपद्यते । तस्माञ्च षड्वातुसमुदा- यान्महाभूतविकारः पञ्चत्वं प्राप्य चेतनाधानोर धिष्ठानत्यान्नि तते, तेषु भूतविकारेषुपपद्यमान- मशुचित्वं सम्बन्धसूत्रोपगमादन्यत्रापि संक्रमते । तदिदमशौ वमेतत्पकरणार्थ. ।। ३ ।। ४३ - अथ प्रसबे र जीमूना मातृगमसन्धानकारिणी काचिद का नाडी छेद्यते । नाडी- च्छेद चायं जानक: सूनीशरीर।ग्निपरित्यक्तः पृथग् भवति । सूनी चेयं जातकशरीराग्निपरित्यक्ता भवन । अन्योन। परित्याग दियमशुद्धिः सूतिकायां जान के चोत्पद्य सम्बन्धसूत्रे यावत्सम्बन्धिनि सक्रमते । नदद शौचमेतत्प्रकरणाथः ॥ ४ ॥ ४३-1दित्थं जन्माशौच चेतनाधिष्ठानभूताय धातुपञ्चकस्य चेतनाधातुतः पृथग्भावो- पप दात्सञ्जातो दोषविशेष एवाशौच मित्युच्यते । एतेनैव मरणाशौचमपि व्याख्यातम् । तत्रापि चेनावा । पृथग्भावादधिष्ठान भूते पाञ्चभौतिकेऽस्मिन् शवशरीरे दोषत्पत्तन्तुल्यत्वात् । एत- दप्यशौचं ' नाङ्गे शवे सम्भूय सम्बन्धमत्रे यारत्सम्ब म्बनि सक्रमने कालेन चापनोद्यते। तदिदमशौचमेतत्प्रकरणार्थः ॥ ५ ॥ ४५ - एतेनैवोत्तर क्रियानिमित्तमप्याशौचं व्याख्यातम् । शनिष्ठामेध्यतायाः स्पर्शादि- सम्बन्धेनान्यत्र मंक्रमणात् ॥ ६॥ ४६-- थ चेतना, सत्त, शरीर चेत्येतत त्रिनयं पुरुष इत्युच्यते ! तायं चेतनाधातुः पर अत्मा निकिकार: सर्वभूतानां निविशेषश्च । सत्वशरीर योन्तु विशेष द्विशेषोप नब्धिः । सत्वे च द्वौ दोपी-रजस्तमश्च । ती सत्त्वं दूपयतः । तथा च विशुद्धं स्वत्त्व प्रसादः । तत्सम्बन्धाच विशुद्धा घेत नोपलभ्यते स प्रसार: । अथ तमःप्राधान्ये सनि सत्त्वमविशुद्धं विदृषितं भवति । तदिदं दृषणमात्मनः शरीरस्य चोपघानाय प्रभवनीत्यतस्तस्य तमसो मलत्व मिष्यते । तन्निबन्ध- नममेध्यत्वमेव दोषाशौचम् । तद्धि दोधिसत्त्वशरीरस्थं तसंसनिरिण व प्रवर्तते । न दिदमप्येतत- प्रकरणार्थः ।। ७ ॥ ५ ---- नदित्थं निवृत्तचेतना भूतविराश्चेतनापकर्षकधर्मवानर्थश्चाशौचप्रभव इति सिद्धम प्रादुभाव'थानं प्रभत्रशब्देनाख्यायते । इनि प्रभवबिचारः ॥ १ ॥ २-सम्बन्धमूत्रम् । ( अशुचित्वोपपत्तिः) १८ -व्यक्तिविशेषे कथं चदुत्पद्य मानमशोचं तत्र व्यक्तौ निभृतमवस्थाय व्यक्त्यन्त आशौचपञ्जिका [१५] . रेऽपि संक्रमते । तच्च नाविशेषेण सर्वासु मनुष्यव्यक्तषु यथेच्छं मक्रमते, किन्तु नियत किश्चित संक्रमणद्वारमपेक्षते तच्च हार चतुर्विधः सम्बन्धः-- योनिकृतः, विद्याकतः, यज्ञकृतः संसर्गकृतश्चेति । एषामन्यतमोपि सम्बन्धो यत्र नोपपद्यते, तत्र व्यक्तौ नेदमघ समासजते एतेषामेव चतुणी सम्बन्धानामघसंक्रामकत्वनियमात् । एतेषामेव च सम्बन्धानां तारतम्येनाशी- चसंक्रमणेऽपि तारतम्यं घटते । अशौचस्यैतन्मूलकत्वात् । तस्मादस्थितिज्ञान थं सम्बन्धसूत्रं याथातथ्येन विजानीयात् । इति सम्बन्धसूत्र विचारः ॥ २ ॥ ३-योनिसम्बन्धाः । (अशुचित्त्वोपपत्तिः) ४६-कुतश्विदेकरमात पुरुषादारभ्य प्रवृत्तः सतिपरम्परा गोत्रम् । एस्मिन् गोत्रे परिदृष्टानामेकशाखानां भिन्नशाखाना वा नन्सम्बन्धिनां वा पुरुषाणां परस्परं यः सम्बन्धः स योनिकृतः । यस्मात् पुरुषाद् गणनामारभ्य सद् गोत्रं निरूपयितुमिष्यते, तन्त्र गोत्रे स श्रीजी पुरुषो मूलपुरुषः कूटस्थ इति चोच्यते । तस्मान्मूलपुरुषादार भ्य प्रवृत्तायां संततिपरम्परायां शततमम, सहस्रतमम्, लक्षतमम वा ततोऽप्यूदुवतमं यावदुपलम्भ वा पुरुषमा व्याप्यायं गोत्र- व्यवहारः शक्यं कर्तुम् । किन्तु न तेषु सर्वेष्वविशेषेणेदमाशौचम भिसम्बध्यते । मूल- पुरुषदेकविशं पुरुषं यावदेव यथाकथंचिदाशौचाभिसंबन्धस्य नियतत्वात् । तत्रापि नाविशेषण सर्वत्र समानोऽभिसम्बन्धः, किन्तु यथा यथा मूलपुरुषाद् दिप्रकर्षों घटते, तथा तथा तद्द्वार के. ऽशौचादिधर्मानिसम्बन्धेऽपि तारतम्य मुपपद्यते ! तादृशतारतम्यानुरोधेनैवेदं गोत्रं सप्तसस्थं कृत्वा विभज्यते तथा हि- १-त्रिपुरुषं यावत् सन्निहिल पिण्डः सन्निकृष्टतमः ॥ ३ ।। २-सप्तपुरुषं यावत् सपिः स सन्निकटतरः ॥ ४॥ ३-दशपुरुवं यावत् सकुल्यः स सन्निकृष्टः ।। ३ ॥ ४. चतुर्दशपुरुषं यावत् लोदशः स मध्यमः ॥ ४ ।। ५-सप्तदशपुरुषं यावत् सन्निहितसगोत्र: स विप्रकृष्टः ॥ ३ ॥ ६-एकविशपुरुष यावत सगोत्रः स विप्रकृष्टवरः ॥ ४ ॥ ७-चतुर्विशं यावत्त दुवं च यथेच्छं ज्ञातिः स विप्रकृष्टतमः ॥ ३ ॥ इह हि सन्निहित दिए दूर सपिएडयोः सन्निहितसगोत्रदूरसगोत्रयोश्चाशौचे विशेषो न स्मयते! सकुल्यसोइयोरपि नातितरां विशेषः । तथाप्यन्यत्र धर्मप्रकरणे दृश्यते विशेष इती. हापि सुप्रतिपत्त्यर्थमित्थमुपदिष्टाः सप्त संस्थाः !

[१६] आशौचपञ्जिका सप्नाप्येताः संस्थाः मूल पुरुषा देवार भ्यन्ते । यथा हि मूल पुरुषात् त्रिपुरुष सपिएडास्तथा मूलपुरुषादेवै कविः यावत् सगोत्राः, . तु चतुर्दशादूर्द्धमेव सगोत्रत्वमास्थीयते । तथाप्या- शौचाभिसम्बन्धतारतम्यानुरोधेन व्यवहारसौहाथमेप मुत्तरोत्तर भेदेन व्यवहारः । तेन सप्तमपुरुषादूर्ध्व सकुल्यः । दशमपुरुषादृद्व सोदकः । तदृह्म सगात्र इत्येव नेयम् । जन्म- नम्नोः स्मरणास्मरणाभ्यामाशौचा दिधर्म विशेषो घटते । इत्यतर दनुरोधेन जग्मनामस्मृतिपर्यन्तं सोदकत्वव्यवहारस्तदस्मरणे त्वामत्कुलजोऽभित्येतावन्मात्रज्ञानसत्वे सगोत्रत्वव्यवहार इति. गन्वादयः स्मरन्ति ॥ यथाह बृहन्मनु:-~-सपिण्डता तु पुरुषे सप्लमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु निवर्तेताचतुर्दशात् ॥ जन्म नाम्नोः स्मृतेरे के तत्पर त्रमुच्यते ।। इति सप्तमं पुरुष यावत् सपिएडा: । चतुर्दशं यावत सोदकाः । एकविशं यावत् सगोत्राः। इत्येने त्यो विभाग एवाशौचधर्मे विशेषाधायका: । विशिष्यास्थेयाः। तत्र सपिण्ड: सनाभिरित्यनर्थान्तरम् । सगोत्रो गोत्र न इत्यनर्थान्तरम् । तेष मेषां सगोत्र-सोदक-सपिण्डानां यस्य येन यथा सम्बन्धरूद्विज्ञानार्थं गोत्रमेहः प्रदश्यते । गोत्रमेरुः सगोत्रमेझश्च । इत्थं व्यस्रो गोत्रमेरुः, तत्रैकाङ्कोपलक्षितेष्टकाश्रेणित्रिकोणस्य भुज इष्यते । एक- द्विघ्यायेक विंशत्यवसानाकोपलक्षितेष्ट कामयो वाम: स्तम्भः को टिः! कोटिगताङ्कारब्धो भुजगतै- कालावसानो दक्षिण: स्तम्भः कर्णः। स इह पिण्डिक शब्देन व्यदिश्यते . द्वयङ्कारब्धकर्णस्त. भः, दक्षिणपार्वे व्यङ्कारब्धकर्णस्तम्भ इत्येवमुत्तरोत्तरमेक कावद्धितः कर्णस्तम्भैः सन्निवेशितै- रत्र विंशतिच्यना अन्तर्भवन्ति । तेषां व्यस्राणामुपरितने काटिकणकोणे यः परमोऽङ्कः स मूलपुरुषः । इत्थं कोटिस्तम्भगता य एकविशतिरक्षास्ते प्रस्ये व्यस्राणां कूटस्थस्य भुजकोटिकोण- स्थैकाङ्कोपलक्षितस्य मूलपुरुषाः स्युः। तदारब्धाः कणस्तम्भगताङ्क पलक्षिताः पुरुषाः साध्याः । यत्प्रतियोगिक: सापिण्ड्यादिसम्बम्धो निरूप्यः रूकूटस्थः । यदनुयोगिकः स सम्बन्धः स साध्यः। यथा- सपिएडमेरुः । सापिण्ड्य मेरु ।। अस्मिन् सपिण्डपर्यवसाने गोत्रमेरौ ककारः कून स्था, स प्रथमः पुरुषः । स इह स्वशन्देनोच्यते, तस्य खकारः पिता स द्वितीयः पुरुषः, तदारब्धास्तम्भगतो गकारो द्वितीय 2

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Tagstory गोत्रमेरुः। सगोत्रमेरुश्व सगोत्राः EMPOROPOURS PREBIVORES ERG ૨૩૨૪૧ પર્ણવ १०/१९.९२६९३/९५९५ // ६/ १२/१९४९ १६९/४/१५ SERVारूपारावाचEN सोदकाः RTEREDPURपार EVEL/20 O Janmke ne Enguaranteereasantav Cana NawatFES Ca Sw ave RamanaKamsuariusaram IANasal 8 R amaka . Brea १ Ka , Kavatma awarmers ६AD न AND- LER N Hin NHERI -- twand . 4 4. PARUMP F wom. सपिाडा: Hawa th -- WAN २ d सपिण्डमा सापियामेरूवा।। 20/ 3/2h ah /22 Sh/ER // ३१/४फ/५ल थ/३/४श/ ६/२/३ष २ E P १६ Mainamance १- उपरितने परिलेखे '' एनाशनबमसंख्यास्थाने सर्वत्र १५ एतादृशी एकत्व संख्या प्रत्येक्तध्या 'सपिण्ड' स्थाने च सपिण्डति' इबोध्यम् । अधस्तने परिलेखे च 'व' इत्यस्य स्थाने 'ब' इति 'ब' इत्यस्य स्थाने च 'व' इति पाठ्यम् ।

गोत्रमेरु के परिलेख का स्पष्टीकरण १ अङ्क से A यह त्रिकोण परिलेख है। इस परिलेख में चिन्हित इंटी वाली इस त्रिकोण के नीचे की रेखा की भुज संज्ञा है। १० से २१ अङ्क वाली वामभाग की रेखा की कोटि संज्ञा है और कोटि के अर्थात् वामभाग को रेखा के ऊपरी भाग से (२१ अङ्कसे) आरम्भ कर भुज तक ( १ अङ्क की ) दाहिनी रेखा कर्ण कहलाती है। त्रिकोण को कर्णसंज्ञक दक्षिण पार्श्व की रेखा को पिरिडका भी कहते हैं। इस तरह त्रिकोण के नोचे को रेखा भुज, वामभाग की रेखा कोटि और दक्षिण भाग की रेखा कण शब्द से व्यवहा हुई है । इनमें ऊपर के कोण में अर्थात कर्ण रेखा व कोटिरेखा के संयोजक कोण मे जो २१ का अङ्क है उसे यहां मूल पुरुष मानना चाहिये । कोटि अर्थात् वामभाग में वर्तमान द्वितीय अङ्क से प्रारम्भ कर कोटि में ही वर्तमान २१ तक के अङ्क तक प्रत्येक अङ्क से २० त्रिकोण यहां धनते हैं। जैसे वाम भाग का २ अङ्क, भुज का १ अङ्क और कोटि तथा भुज के नीचे के कोने का १ अङ्क इन तीनों को मिलाने से एक त्रिकोण बनता है। इसी तरह कोटि के तोन अङ्क से प्रारम्भ कर कर्णश्तम्भ व भुजरेखा के कोण में वर्तमान १ अङ्क को द्वितीय कोण बनाता हुआ कोटि व भुज के कोण के १ अङ्क तक दूसरा त्रिकोण बनता प्रथम त्रिकोण स्वरूप है । इसी तरह ४-५ आदि से शुरू करके २१ तक २० त्रिकोण बन जाते हैं और वे त्रिकोण उत्तरोत्तर प्राकृति में भी बढ़ते जाते हैं। यहां तक कि २१ अङ्क से प्रारम्भ किये त्रिकोण में ऊपर के परिलेख का स्वरूप बनेगा। जिस त्रिकोण का प्रारम्भ ऊपर के कौने के २१ अत से होकर कर्ण के ( दक्षिण पार्श्व के ) नाचे के कोने के एक अङ्कको तथा कोटिक भुज के एक श्वङ्क को दूसरे व तीसरे कोरण बनाता हुआ वापिस उसी कार के कोण में समाप्त होजाता है । यहो ऊपर के परिलेख का स्वरूप है । इस प्रकार जो २० त्रिकोण बनते हैं उनमें कोटिस्तंभ में वर्तमान अर्थात कोटि रेखा के २ से लेकर २१ तक के अङ्क अपने से प्रारब्ध त्रिकोण में भुज व कोटि कोण में वर्तमान एक अङ्क से उपलक्षित कूटस्थ के मुलपुरुष पढ़ते हैं अर्थात् कोटि व भुज रेखाओं के कोण में वर्तमान १ अङ्कोप लक्षित पुरुष कूटस्थ कहलाला है जिसके कि वे कोटि- स्तम्भ रेखा में वर्तमान अर्थात् कोटि रेखागत २-३ आदि २१ अङ्क तक के अङ्कों से उप- लक्षित पुरुष मूल पुरुष होते हैं। भौर दक्षिण भाग अर्थात् त्रिकोण के कर्णस्तम्भ भाग में वर्तमान अङ्कों से उपलक्षित पुरुष साध्य कहलाते हैं। इस तरह प्रत्येक त्रिकोण में कोटि- रसम्म में विद्यमान अङ्क से उपलक्षित पुरुष मूलपुरुष, कोटि व भुज के कोण में वर्तमान १ अङ्क से उपलक्षित पुरुष कूटस्थ तथा कर्णातम्भ रेखा के अङ्कों से उग्लक्षित पुरुष साध्य कहलाते हैं। कूटस्थ से सापिण्ड्य सम्बन्ध का प्रारम्भ है तथा साध्य में उसका पर्यवसान ( समाप्ति ) है।

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सापिण्डयमेरुप्रदर्शक परिलेख का स्पष्टीकरण । । । इस सापिण्ड्यप्रदर्शक परिलेख में भी पहिले की तरह वाम भाग की कोटि संज्ञा दक्षिण भाग को कर्ण संज्ञा व पिण्डिका संज्ञा तथा नीचे की रेखा की भुज संज्ञा है । यहां भी कोटि व भुज के कोण में वर्तमान ककारोपलक्षित पुरुष कूटस्थ है जिससे सापिण्ड्य सम्बन्ध का प्रारम्भ होता है। और पिल्डिका में वर्तमान गकारादि से उपलक्षित पुरुष प्रत्येक त्रिकोण में साध्य कहलाते हैं जिनमें सापिण्ड्य सम्बन्ध का पर्यवसान होता है, और कोटि- स्तम्म में वर्तमान खकारादि वर्णोपलक्षित पुरुष मुलपुरुष कहलाते हैं। यहां भी पहिले की तरह 'ख' वर्ण से प्रारम्भ कर 'र' पण तह ६ त्रिकोण बनेंगे। पहिला त्रिकोण ख से प्रारम्भ कर ग वर्ण को कर्णातम्भ 'पिरिडका स्थान में रखता हुना और 'क'को कोटि व भुज के कोण में रखता हुआ वापिस ख में ही समाप्त होता है। इस त्रिकोण में'ख'मृजपुरुष अर्थात् क कार का पिता है उससे प्रारम्भ होने वाले कर्णस्तम्भ में वर्तमान 'ग' द्वितीयपिण्डिका में 'ख' पिता के पुत्र ककाररूप कूटस्थ का भ्राता कहलाता इसी तरह द्वितीय त्रिकोण 'घ' से प्रारम्भ होकर 'च' व 'छ' को पिरिड का भाग में 'ग' वर्ण को भुज रेखा में,'क' को को टि व भुज के कोण में तथा 'ख' को कोदि रेखा में ही रखता हुआ 'घ' में ही समाप्त होता है। इस में 'घ' मून पुरुष है जो कि 'ख' का पिता है । तृतीय पिण्डिका में वर्तमान चकार खकार का भाई है तथा उसी पिण्डिका में वर्तमान छकार ककार का भाई है । यही क्रम आगे के त्रिकोणों में भी रखना चाहिये। इस तरह भुजरेखा में वर्तमान गकारादि सब भिन्न भिन्न पिण्डिकाओं में ककार के भाई होते हैं। जैसे द्वितीय पिरिडका में गकार, तृतोय सिण्डिका में छकार, चतुर्थ पिरिडका में ठकार, पञ्चम पिरिडका दकार, षष्ठ पिण्डिका में यकार, तथा सप्तम मिएिडका में हकार उस कूटस्थ ककार का भाई पड़ता है। इस तरह कूटस्थ पुरुष का द्वितीय पिरिडका से प्रारम्भ कर ७ वीं पिरिडका तक के ६ पुरुषों से सम्बन्ध है। यहां कूटस्थ व ६ पिण्डिका के ६ पुरुषर्षा को मिलाने से साप्तपौरुष सापिण्ड्य की उपपत्ति हो जाती है । उपर्युक्त ६ पिण्डिकागत पुरुष क्रमशः पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्धप्रपितामह, अतिवृद्धप्रपितामह तथा परमातिवृद्धप्रपितामह हैं। तथा कूटस्थ पुत्रस्थानीय है । इस रीति से उन सातों का परस्पर सापिण्ड्य सम्बन्ध है। इस हे आगे ८ रुष में सापिण्ड्य सम्बन्ध नहीं बन सकता। आगे १४ वे पुरुष तक सोदक तथा इससे भी धागे के पुरुषों में सगोत्र सम्बन्ध होता है। यद्यपि सगोत्रशब्द लाखों पुरुषों तक जा सकता है फिर भी इसका प्रधानतया व्यवहार २१ वीं पीढी तक के पुरुषों में ही होता है, आगे नहीं। यही इस परिलेख का रहस्य है ।

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श्राशौचपञ्जिका । १७ ]] । -- पिण्डिकायां स्वस्य भ्राता । १। एवं धकारः स्वस्य पितामहस्तृतीयः पुरुषः । तदारब्धकर्णस्तम्भे चकारः स्वस्य पितृभ्राता, छकारस्तु तृतीय पिण्डिकायां वभ्राता ! २ । एवं जकारश्चतुर्थपुरुषः स्वस्य प्रपितामहः । तदारब्धकर्ण स्तम्भे झकार: स्वस्य पितामह भ्राता। टकार: पितृभ्राता । ठकारस्तु चतुर्थपिशिडकायां स्वभ्राता । ३। एवं डकार: पञ्चमपुरुषः स्वस्य वृद्धप्रपितामहः । तदा- रब्धकर्णस्तम्भे दकारः पञ्चमपिण्डिकायां स्वभ्राता । ४१ धकारः षष्ठपुरुषः स्वस्यातिवृद्धप्रपिता- महः। तदारब्धकर्णस्तम्भे यकारः षष्ठ्यां पिण्डिकायां स्वभ्राता । ५ । एवं सप्तमपुरुषो रकारी वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः, स बोजी पुरुषो मूलपुरुषः कूटस्थो नाभिरिति चोच्यते । तदारब्धकर्ण- स्तम्भे हकारः सप्तम्यां पिण्डि कायां स्वभ्राता । ६ । एताव दिदं साप्तपौरुषं सापिण्ड्यम् । एव- मेवोत्तरोत्तरं सोदकपर्यन्तं सगोत्रपर्यन्तं च व्यबसेयम् । परे तु एकः प्रथमः पिण्डदः पुरुषः तवं त्रयः पिण्डभागिनः पुरुषाः, तर्ध्वं त्रयः पिण्डलेपमागिनः पुरुवा:. इनोत्थं साप्तपौरुषं सा पण्ड्य निरूप्य पिण्डदापेक्ष या उपरितनैः षड्भः पुरुषैरारब्धारवेत्र पसु पि एउकासु प्रथमा- दिशब्दानुपचरन्ति । तन्मते पितुः पुत्रः, प्रथमपिरिडका स्वभ्राता। . ! पित्तामपौत्रो द्वितीय- पिण्डिकायां स्वभ्राता । २ । प्रपितामहप्रपौत्रस्तृतीयस्यां भ्रातः । ३ । वृद्ध प्रपितामहस्य वृद्धप्रपौत्र- चतुर्थ्यां भ्राता । ४ अतिवृद्धप्रपितामहस्यातिवृद्धप्रपौत्रः पञ्चम्यां भ्राता । ५। एवं वृद्धातिवृद्धः प्रपितामहस्य वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रः षष्ठयां भ्राता । ६ तदित्यं षट्स्वेव पिरिडकासु पिण्डदस्य सम्बन्धोऽनुवर्तते । सप्तम्यां तु पिरिक कायां निवृत्तोऽग्य सापिण्ड्यसम्बन्ध इति सिद्धम् ।। तत्रायं शब्दव्यवहारमात्रे विशेषो न वस्तुतत्त्वे-इत्युपेक्ष्यम् ।। इति योनि सम्बन्धविचारः ॥ ३ ॥ ४.-योनिसम्बन्धप्रभेदाः। ५० -योनिसम्बन्धस्त्रेधा-मुख्य भारोपित्तस्तृतीचश्नेन । ये खलु कस्मिँश्चिद् गोत्रे समुत्पच यावजीवनं तस्मिन्नेच गोत्रेऽगनिष्टन्ते, न तु गोवाल के नयन लेवां स्यगोन जातः सह परस्परं यः सम्बन्धः स मुख्यः । तत्र सादरलोनीनोमनायोश्च शारीसाधनवानुम मात्परस्पर यः साक्षात्सम्बन्धः, यो वा पुत्रपौत्रपौत्रादिपूतरोत्तरन्सेण पर रखा ः सोऽयमुभयनि- धोऽपि मुख्यः ॥ अधारोपितः पुनस्त्रेधा-सगोत्री कारणा, गिोलो, विगोत्रस्त एज्य चेति । परगोत्रे समुत्पन्ना अपि संस्कारद्वारा तगोत्राच्याव्य व खगोत्रे सम्पायन, नया खेन सगोत्रता नीतानां स्वगोत्रे यः सम्बन्धः स सगोत्रीकरणः। यथा परकुलादाजीतानां पत्नो नां श्वशुर कुलजः, यथा वा दत्तकपुत्रादीनां प्रतिग्रहीतृकुलजैश्च सम्बन्ध इति । एवं स्वगांने समुत्पन्ना अपि सरकार- द्वारा यत्र स्वगोत्रात् प्रच्याव्य परगोत्रे नीयन्ते, तेषां स्वेन लिगात्रता नलजयितमात्रजातैः सह यः सम्बन्धः स विगोत्रीकरणः । यथो विवाहितानां दुहितए दसकानादीनां च जनयितृ- कुन सम्बन्ध इति । अथ ये भिन्नगोत्राः सपिण्डः अात्मा बन्धुनाबन्धुपितृबन्ध्वादयस्तै: सह यः सम्बन्धः स विगोत्रसापिएब्याख्यः । कचित्त पितृमातुल पुत्रादीनां सापिण्ड्य - [१] प्राशौचपलिका । ने च्छन्ति । तदेतल्लोकव्यवहारसापेक्ष बोध्यम् । लोके तेषु सापिएज्यव्यवहारस्य लुप्तप्रायत्वात् । वस्तुतत्त्वावमर्श तु तेष्वपि सापिण्ड्यमतिषिद्धम् । अथ तृतीयोऽनेकधा-मुख्यसम्बन्धेन सम्ब- न्धिनां ये मुख्य सम्बन्धेन सम्बन्धिनो, ये वा तेषामारोपितसम्बन्धेन सम्बन्धिनः, अथवारोपि. तसम्बन्धेन सम्बन्धिनां ये मुख्यत्सम्बन्धेन सम्बन्धिनो ये वा तेषामारोपितसम्बन्धेन सम्बन्धिनः, तैरेतैश्चतुर्विधैः सह यः सम्बन्धः स तृतीयः । यथा भ्रातृपुत्रैः, भ्रातृपनीभिः, यथा वा जामातृ- श्वशुरादिभिस्तद्धात्रादिभिश्चेति । एवमेतेष्वपि त्रिविधेषु योनिसम्बन्धेषु प्रत्येकं सन्निकर्षविप्र- कर्षाभ्यां तारतम्यादने के सम्बन्धा उपपद्यन्ते, ते यथायथमूह्याः । सम्भवमात्रेणायं विभाग: कल्प्यते । अशौचसम्बन्धस्वेषु त्रिविधेष्मपि योनिसम्बन्धेषु भिन्ननियमो दृश्यते-कचिद्दशाह, कचिद्वा यहं, तदर्धमेकाहं स्नानमात्रं चेति । तस्मादनुपयुक्तोऽयं विभागः । इति योनिसम्बन्ध. प्रभेदाः॥४॥ विवाहसापिएज्यम् । ५१---पूर्व गोत्रमेरौ प्रदर्शितास्वेकविंशतिपुरुषारब्धासु पिरिडकासु त्रिसंस्थः सम्बन्धः सिद्धो भवति । सप्तमं यावत् सापिण्ड्यम, चतुदेश यावत् सोदकत्वम्, एकविंशं यावत् सगोत्र. त्वमिति । तत्र सापिण्ज्यसम्बन्ध व्याख्यास्यामः । सापिण्ड्यं त्रेधा-विवाहसापिड्यम, दायसापिडयम, श्राशौचसायिड्यं च । यद्यपि सापिड्यमेकधैव न त्रेधा सम्भवति । एक- पिण्डान्वयस्यैव सापिण्ड्यपदार्थतया पिण्डपदार्थान्धयकर्मणि विवाहादीनामप्रयोजकत्वात्, तदनपेक्षमेवैकपिण्डान्वयवत्सु सर्वेष्वेव पुरुपेषु सापिण्ड्यव्यवहारत्यैकेनैव रूपेण प्रवर्तनीय- स्वात् । तथापि सपिएडानां मध्याद् यावतां विवाहे प्रतिषेध्यत्वेनापेक्षा, तदनुगतं सापिण्ड्यं विवाहे निरूप्यते । यावतां तु दायक्रमे दायभागिल्लेनापेक्षा, नदनुगतमेव सापिण्ड्यं दाये प्रदश्यते । अथ यावतां सपिण्डानां परस्परमशीचभागित्वं प्रतिपद्यते, तायन्मात्रानुगतं मापिण्ड्य- माशीचे निर्दिश्यते । विवाहप्रतिषेध्यत्वं दायभागित्वमशौचभागित्वं च नतरां सर्वषु सपिण्डेषु समानम् । अतस्तदपेक्षा विशेपानुरोधेनेदं सापिण्ड्यं त्रेधा विभज्य निरूप्यते । ५२-तत्रादौ विवाहसारिण्ड्यं व्याख्यास्यामः-सगोत्र-विगोत्र साधारणं हीदं सापिण्ड्यम् । तत्र बीजिनमारभ्य पुत्रपच्छे सप्तमपुरुषमभिव्याप्य, कन्यापक्षे तु पञ्चमपुरुषम- भिव्याप्य, सर्वषा सन्तानानां सन्तानिनां च परस्परं सापिण्ड्यम् । एकस्यापि सप्ताधिकरवे तेन समं सप्तान्तर्गतस्यापि सापिण्ड्यं निवर्तते,संयोगवत् सापिण्ड्यस्योभयनिरूप्यत्वादिति वाचस्पति- मिश्रके शव मिश्रामृतनाथादयः स्वीकुर्वन्ति । एतच्च सापिण्ड्यमनेकधा निरूपयन्ति विद्वांसः। तत्र दाक्षि- णात्यानां निबन्धे अथेदं विवाहसापिण्ड्यमभ्युपेयते, तथेह प्रदर्शयिष्यामः । तच्चावरं कूटस्थमार- भ्योपरितनानां पितृतः सजस्थानानां द्वात्रिशपितृद्वन्द्वानां प्रत्येकस्य सप्तरधानान्येवापत्यद्वन्द्वानि - ।

आशौचपञ्जिका [१] त्रिषष्टिमितानि, तथा मातृतः पञ्चस्थानानां सप्तानां पितृद्वन्द्वानां प्रत्येकस्य पञ्चस्थानान्येवापत्य- द्वन्द्वानि पञ्चदशमितानि-इत्येवं गणनयैकविशत्यधिकैकविशतिशतद्वन्द्व्याप्यं भवति । तद्यथा- अथावशिष्टानां सप्तानां द्वन्द्वानां मातृपक्ष्याणां प्रत्ये कस्य पञ्चदशमितान्यपत्यद्वन्द्वानि प्रदर्शिते सप्तकक्षेऽपत्यद्वन्द्वचक्रेऽन्त्ययो यो: कक्षयोः परित्यागःवशेषादुपलभ्यन्ते । तेषामेषां जनकद्वन्द्वानां जन्यद्वन्द्वानां च यानि सम्बन्धक्लुप्तानि नामानि तान्यत अर्ध्व प्रयन्ते. वरसम्बन्धिनः प्रतिस्थान द्वन्द्वसंख्या जनक द्वन्द्वानां प्रतिजनकद्वन्द्वं समष्टिसंख्या जन्यद्वन्द्वसंख्या जन्यद्वन्द्वानां समष्टिसंख्या सप्तस्थानाः २ १२६ ३ १८६ प्रथमस्थाने वरः केवल:- द्वितीयस्थाने द्वन्द्वमेकम बरस्य पितरौ तृतीयस्थाने द्वन्द्वमेकम, १ पितामही चतुर्थस्थाने द्वे द्वन्द्वे- १ प्रपितामही २ पितृमातामही पञ्चमस्थाने चत्वारि द्वन्द्वानि- १ वृद्धप्रपितामही २ पितामहमातामही ३ पितृप्रमातामही ४ पितामहीमातामही षष्ठस्थानेऽष्टौ द्वन्द्वानि- १ अतिवृद्धप्रपितामही २ प्रपितामहमातामही ३ पितामहप्रमातामही ४ प्रपितामहीमातामही ५ पितृवृद्धप्रमातामही ६ पितृमातामहमातामही ६ ३७८ . human ६० ११ ६३ १२ ०५६ ८१६ ६३ ६३ १४ F८२ [२०] স্বাহীৰবঙ্কিা १४५ १०७१ ११३४ ११६७ २० १२६० ६३ १३२३ १३८६ * पितामहीप्रमातामही २५ ८ पितामहीमातृ मातामहौ १६ सप्तमस्थाने घोडशद्वन्द्वानि- १ परमातिवृद्धप्रपितामही २ वृद्धप्रपितामहमातामही ३ प्रपितामहप्रमानामही १६ ४ वृद्धपितामहीमातामही ५ प्रपितामहीप्रपितामही ६ प्रपितामही पितृमातामही २२ ७ प्रपितामहीप्रमातामही २३ क प्रपितामहीमातृमातामहौ २४ । पितामहीवृद्धप्रपितामही १० पितृप्रमातामहमातामही २६ ११ पितृमातामहप्रमातामही १२ पितृमातामहमातृमातामही २८ १३ पितामहोवृद्धप्रमातामहौ २६ १४ पितामहीमातामहमातामही ३५. १५ पितामहीमातामहीपितामही ३१ १६ पितामहीमातामहीमातामही ३२ ६३ ६३ ६३ १४४९ १५१२ १५७५ २ . ६३ १७०१ १७६४ १८२७ ६३ ६३ १८६० १६५३ २०१६ ६३ एवमुक्तानि पितृपक्ष्याणि जनकद्वन्द्वानि द्वात्रिंशन्मितानि । यानि त्वेषां प्रत्येकस्य जन्य. द्वन्दानि त्रिषष्टि मेतानि तान्यत अद्य प्रदर्श्यन्ते- प्रथम स्थाने कूट स्थद्वन्द्वमेकम्-- मातापितरौ Momsus द्वितीयस्थाने द्वन्द्वमेकम- १ कूटस्थस्य, पुत्रः, दुहिता च तृतीयस्थाने द्वन्द्वे द्वे- १ पौत्रः, पौत्री च স্বামীজ্জিা -[२१ १] JAP ६ Maupass ६ १० ११ १२ १३ २ दौहित्रः दौहित्री च चतुर्थस्थाने द्वन्द्वानि चत्वारि- १ प्रपौत्रः प्रपौत्री च २ पौत्रीपुत्रः पौत्रीपुत्री च ३ दौहित्रपुत्र: दौहित्रपुत्री च ४ दौहित्रीपुत्रः दौहित्रीपुत्री च पञ्चमस्थान्ने द्वन्द्वान्यष्टौ- १ वृद्धप्रपौत्रः वृद्धप्रपौत्री च २ प्रपौत्रीपुत्रः प्रपौत्रीपुत्री च ३ पौत्रीपौत्रः पौत्रीपौत्री च ४ पौत्रीदौहित्रः पौत्रीदौहित्री च ५ दौहित्रपौत्र: दौहित्रपौत्री च ६ दौहित्रदौहित्रः दौहित्रदौहित्री च ७ दौहित्रीपौत्रः दौहित्रीपौत्री च ८ दौहित्रीदौहित्रः दौहित्रीदौहित्री च षष्ठस्थाने षोडश द्वन्द्वानि--- १ अतिवृद्धप्रपौत्रः अतिवृद्धप्रपौत्री च १ प्रपौत्रदौहित्रः प्रपौत्रदौहित्री च ३ प्रपौत्रीपौत्रः प्रपौत्रीपौत्री च ४ प्रपौत्रीदौहित्रः प्रपौत्रीदौहित्री च ५ पौत्रीप्रपौत्रः पौत्रीप्रपौत्री च ६ पौत्रीपुत्रदौहित्रः पौत्रीपुत्रदौहित्री च ७ पौत्रीपुत्रीपौत्रः पौत्रीपुत्रीपौत्री च ८ पौत्रीपुत्रीदौहित्रः पौत्रीपुत्रीदौहित्री च ६ दौहिन्नप्रपौत्रः दौहित्रप्रपौत्री च १० दौहित्रपुत्रदौहित्रः दौहित्रपुत्र दौहित्री च ११ दौहित्रपुत्रीपौत्रः दौहित्रपुत्रीपौत्री च १२ दौहित्रपुत्रीदौहित्रः दौहित्रपुत्रीदौहित्री च १५ २० २१ २२ २३ २६ । २२] आशौचपञ्जिका २८ २६ १३ दौहित्रीपुत्रपौत्र: दौहित्रीपुत्रपौत्री च १४ दौहित्रीपुत्रदौहित्र: दौहित्रीपुत्रदौहित्री च १५ दौहित्रौपुत्रीपौत्रः दोहित्रीपुत्रीपौत्री च १६ दौहित्रीपुत्रीदौहित्रः दौहित्रीपुत्रीदौहित्री च ३१ सप्तमस्थाने त्वासामेव घष्ठस्थानानां द्वात्रिंशव्यक्तीनां पुत्रकन्यारूपाणि द्वात्रिशद्- द्वन्द्वानि । तान्येतानि सर्वाणि सङ्कलनया त्रिषष्टि मनालि द्वन्द्वानि भवन्ति । तत्र गताश्च तास्त्रिषष्टि- मिताः कन्यारतेन वरेणाविवाह्याः। तदित्थ पितृपक्षे सङ्कलनायां षोडशाधिकद्विसहस्रमिता: कन्या वय॑त्वेन सिद्धाः॥ (२०१६) । Septeg अथ मातृतस्तावत पञ्चस्थानानि जनकद्वन्द्वानि सप्त भवन्ति । तथा हि २ प्रथमस्थाने-वरः केवलः । जनकद्वन्द्वानां प्रति-जनक-द्वन्द्वं जन्यद्वन्द्वनां द्वितीयस्थाने-वरस्य माता। संख्या जन्यद्वन्द्वसंख्यां समष्टिसंख्या तृतीयस्थाने --मातामहौ। १५ चतुर्थस्थाने-प्रमातामहौ। १५ मातृमातामहौ। ३ ४५ पञ्चमस्थाने-वृद्धप्रमातामहौ । ४ १५ ६० मातामहमातामहौ। मातृप्रमातामहौ। ६ १५ मातामहीमातामहौ। १०५ ५ एषमुक्तानि मातृपक्ष्याणि जनकद्वन्द्वानि सप्तमितानि । एषामपि यानि प्रत्येकस्य अन्य- द्वन्द्वानि पञ्चदशमितानि तानि प्रदान्ते । प्रथमस्थाने-किञ्चिदेकं मूलद्वन्द्वं मातापितरौ कूटस्थम् । द्वितीयस्थाने -कूटस्थस्थ पुत्रो दुहिता च । तृतीयस्थाने-पौत्रः पौत्री च । दौहित्रो दौहित्री च। चतुर्थस्थाने-प्रपौत्रः प्रपौत्री च । पौत्रीपुत्रः पौत्रीपुत्री च ।

आशौचपञ्जिका [२३ ] दौहित्रपुत्रः दौहित्रपुत्री च । दौहित्रीपुत्रः दौहित्री पुत्री च । पञ्चमस्थाने-वृद्धप्रपौत्रः वृद्धप्रपौत्री च । प्रपौत्रीपुनः प्रपौत्रीपुत्री च। पौत्रीपौत्रः पौत्रीपौत्री च । पौत्रीदौहित्रः पौत्रीदौहित्री च दौहित्रपौत्रः दौहित्रपौत्री च । दौहित्रदौहित्र दौहित्रदौहित्री च । दौहित्रीपौत्रः दौहित्रीपौत्री च । दौहित्रीदौहित्रः दौहित्रीदौहित्री च । इत्यमेषां पजस्थानाम पदशानां जन्यद्वन्द्वानां पूर्वोक्तेषु सप्तसु कीनकद्वन्द्वेषु प्रत्येक निपाते पायोत्तरशतमितानि मातृपक्षे द्वन्द्वानि लभ्यन्ते । यत्र गताश्च ताः पञ्चोत्तरशतमिताः कन्याः मातृपक्षे वय॑त्वेन सिद्धाः। तदित्थं-पितृकुले घोडशाऽधिकद्विसाइस्री २०१६, मातृकुले तु पश्चोत्तरं शतम्(१०५ ) अनयोः संकलनायामेकविंशत्यधिकैकविंशतिशनसंख्या २१२१ सिद्धा भवति । एतावत्यः कन्या विवाहे वाः । एतावद्वयाप्यमेव च विवाहसापिएज्यम्-इत्याहुर्दाक्षि- णात्यानां केचित् ।। गौडास्तु नैतं प्रकार साधीयोऽनुमन्यन्ते ! इत्थं सापिण्ड्य स्य भ्रमपूर्णत्वात् । यत्तुखनु गौडमैथिला धनुगृहोतं विशुद्धं विवाहसापिण्ड्य तत्तद्ग्रन्थे दृश्यते तदन्यत्रा समीक्षायां विवाहसंस्कारनिरूपणप्रसङ्गे वैशयेन प्रदर्शयिष्यामः । इति विवाह सापिण्यम् ॥५॥ दायसापिएज्यम् । ५३-निरूपितं विवाहसापिण्डयम । अथ प्रसादाथसापिड्यं निरूप्यते । दाय- विभागे तावत्-स्वं. पिता, पितामहः, प्रपितामहः-इत्येते चत्वारः, तथैतेषां चतुणी प्रत्येकस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्राश्च-इत्येवमेते षोडश पुरुषा मिथः सपिण्डाः । तत्र स्वं, तस्म पुत्रपौत्रप्रपौत्राश्चेति चतुष्कं स्ववर्गः! एवं पितृधर्गः । एवं पितामहवर्गः । एवं प्रपितामहवर्गः । इत्थं वर्गभेदाच्चतुःपौरुषं सापिण्ड्यम् । वंशक्रमे तु प्रपितामहेन प्रथमपुरुषानुनमः, पितामहेन प्रपितामह पुत्रैश्च द्वितीय- पुरुषानुगमः । पित्रा पितामहपुत्रैः प्रपितामहपौत्रैश्च तृतीयपुरुषानुगमः । श्वेन पितृपुत्रैः पितामह- पौत्रैः प्रपितामहप्रपौत्रैश्च चतुर्थपुरुषानुगमः । स्वपुत्रैः पितृपौत्रैः पितामह प्रपौत्रैश्च पञ्चमधुरुषानु गमः । स्वपौत्रैः पितृपौत्रैश्च षष्ठप्पुरुषानुगमः । स्वप्रपौत्रैस्तु सप्तमपुरुषानुगमः तदित्थं-पिता, पितामहः, प्रपितामहश्चेति त्रयः पुरुषाः कूटस्थादुपरितनाः पुत्रः,पौत्रः, प्रपौत्रश्चेति त्रयः कूटस्था- दधस्तनाः, कूटस्थश्चैको मध्यम: पुरूष इत्येवं कक्षाभेदात साप्तपौरुषं सापिण्ड्यं सिद्धम् । यथा- [२४] पाशौचपञ्जिका (कक्षामेरुः) प्रपितामहवर्ग: पितामहवगैः प्रपिता ३ प्रपितामहकक्षा १ प्रथमपुरुषः पितृवर्गः पिता २ २ द्वितीय पुरुषः पुत्रः २ पितामहकक्षा महः स्ववर्गः पिता पुत्रः पौत्रः १ पितृकक्षा [ ३-३-३ | ३ तृतीयपुरुषः स्वं पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रः + कटस्थकक्षा 1 ४ चतुर्थपुरुषः पुत्रः पौत्र: प्रपौत्रः १ पुत्रकक्षा ५ पश्चमपुरुषः प्रपितामहबर्गः पौत्रः प्रपौत्रः २ पौत्रकक्षा ६ षष्ठपुरुषः पितामहवर्ग: प्रपौत्रः ३ प्रपौत्रकक्षा ७ सप्तमपुरुषः पितृवर्ग: स्ववर्ग: walpepar तत्र प्रथमं स्ववाः पुत्रादयः क्रमेण दायं भजन्ते । स्ववयोभावे पितृवाः । तदभावे पितामहवग्याः। तदभावे प्रपितामहवाः इति दायग्रहणक्रमः । प्रत्यासत्तिरेवात्र मूलम् । प्रपितामहवापेक्षया पितामहवाणां, तदपेक्षया च पितृवाणां, ततोऽपि स्ववर्याणां च प्रत्यासन्नत्वात् । प्रतिवर्गमपि प्रपौत्रापेक्षया पोत्रस्य, ततः पुत्रस्य ततोऽपि वर्गा- रम्भकस्य पित्रादेः प्रत्यासन्नत्वात् ॥ तदुक्तम्- "यस्त्वा सन्नतरस्तेपां सोऽनपत्यधनं हरेत् " इति तथा चात्र दायभागे पिता, पितामहः, पिनामः इत्येते त्रयः पूर्व, पुत्रः, पौत्रः, प्रपौत्र इत्येते त्रयः परे, मध्यमश्चैकः कूटस्थ-इति साप्तपौरूपं दायसापिण्ड्य व्याख्यातम् । इति दायसापिएडयम् ॥६॥ श्राशौचसापिएड्यम् । (शरीरारम्भककलारहस्यम्) ५४-अथाशौच-सापिण्ड्य चतुर्धा-अश्यवसापिण्ड्यम् , पुत्रे निवाप्य सापिण्ड्यम् , पितषु निवाप्यसापिण्ड्यम् , त्तरसा पिण्ड्य चेति । तथाहि-पुत्रे, पौत्रे, प्रपौत्रे, वृद्धप्रपौत्रे, - - গাছীৰৰচ্ছি। [२५] . अतिवृद्धप्रपौत्रे, परमातिवृद्धप्रपौत्रे च जनकैकशरीरावयवा अनुवर्तन्ते, नात ऊर्ध्वम् । तथा च पडपत्यानि, एकः कूटस्थो जनक- इति साप्तपौरुषमवयवसापिण्ड्यं भवति । तदुक्तम्- "स पिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते " इति । तत्राष्टाविंशतिकलास्तावत् पितृरूपैकशरीरस्थस्तदे- कशरीरावयवो मूलपिण्डः । तस्योत्तरोशरमनुवर्तमानानामेकशरीरावयवानां पिएडभागानामित्थं मात्राविभागा भवन्ति । सप्तकलः स्वस्मिन् , षट्कलः पुत्रे, पञ्चकलः पौत्रे, चतुष्कल: प्रपौत्रे, त्रिकलो वृद्धप्रपौत्रे, द्विकलोऽतिवृद्धप्रपौत्रे, एककलस्तु परमातिवृद्धप्रपौत्रे इति । तदित्थं सप्तसु स्थानेषु धिभक्ता एते निवाप्याः पिण्डभागा एवैतेषां सप्तानां परस्परं सम्बन्धसूत्रम्। एष चैक- पितृप्रतियोगिकः षडप त्यानुयोगिकः सम्बन्धः-इत्यवयवसापिण्ड्यम् ॥ १ ॥ ५५-यत्तु एकस्मिन् कूटस्थेऽपत्ये पूर्वेषां षण्णां पितृणां भिन्नभिन्ना अवयवा ऐक्य- भावाय समुच्चीयन्ते, तदिदं पुत्रे निवाप्यसापिण्ड्यं भवति । तत्र चतुरशीतिकलस्तावत् पुत्र- रूपैकशरीरस्थः सप्तशरीरावयवो मूलपिण्डः । तस्यैकत्र शरीरे समुच्चयमानस्यारम्भकाणां सप्त- शरीरावयवानां पिण्डभागानामित्थं मात्राविभागा भवन्ति-एककलः परमातिवृद्धप्रपितामहस्य । त्रिकलोऽतिवृद्धप्रपितामहस्य । षट्कलो वृद्धप्रपितामहस्य । दशकलः प्रपितामहस्य । पञ्चदश- कलः पितामहस्य । एकविंशतिकलः पितुः । अष्टाविंशतिकलस्तु स्वस्येति । तदित्थं सप्तस्थानेभ्यो लब्ध। एते निवाप्या: पिण्डभागा एवैतेषां सप्तानां परस्परं सम्बन्धसूत्रम् । स एष षटपितृपति- योगिक एकापत्त्यानुयोगिकः सम्बन्धः । इति पुत्रे निवाप्यसापिण्ड्यम् ॥ २ ॥ ५६-एतत्सम्बन्धद्वयमेवोपजीव्येदमे कैकम पत्यमपि पूर्वेषु षट्सु पितृषु पिण्डान्निवाप्य- विभागेन तानाप्याययति । तत्रेदमपत्यं तावदेकं पिण्डदं कूट स्थम् । तत ऊस्त्रियः पिण्डभा. गिनः। ततोऽप्यूस्त्रियः पिण्डलेपमागिनः-इत्येव साप्तपौरुषं पितृषु निवाप्यसापिण्ड्यम् । तदुक्तम्- लेपभाजश्चतुर्थांद्याः पित्राद्याः पिराइभागिनः ॥ पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्य' साप्तपौरुषम् " ॥ १॥ इति कथं चैतेऽपत्येन न्युप्ताः पिण्डा ऊर्ध्व पितृषु षट्स्वाप्यायका भवन्तीत्येतन्निवापतत्त्वं आद्धतत्त्वसमीक्षायामन्यत्रोपपादयिष्यामः ।। इति पितृषु निवाप्य सापिण्ड्यम् ।। ३ ।। ५७-प्रथोत्तरसापिण्ड्य, प्रेतसा पण्ड्यं, प्रत्यय॑सापिण्ड्यमित्येकार्थाः । इह हि मरणोचरं यदस्य सपिण्डीकरणं क्रियते, तन्निबन्धनो निवापक्रम: प्रदश्यते । सन्तानोत्पादनाचं तदुत्पादकशरीरे सप्तकोशावयवा अष्टाविंशतिकला अवशिष्यन्ते । स प्रेत्य पितृलोकं गत्वा ततः स्वीवाभिः सप्तकलाभिः पृथगिवात्मानं धारयमाणः, षट्कलाभिः पितृदत्ताभिः पित्रा, पञ्च- ।

[२६] স্বামীৰণঞ্জিকা कलाभिः पितामहदत्ताभिः पितामहेन, चतुकलाभिः प्रपितामहदत्ताभिः प्रपितामहे !, त्रिकला- भिवृद्धप्रपितामहदत्ताभिस्तेन, द्वाभ्याम तिवृद्धप्रपितामहदत्ताभ्यां तेन, तथैकया कलया परमा- तिवृद्धप्रपितामहदत्तया तेन सह सन्धत्ते । स इत्थं सपिण्डनात पूर्वैः षड्भिः पुरुषः स हैकभाव्यं गमितश्चन्द्रलोके कञ्चित्कालमवतिष्ठते तदेतदप्यन्यत्रोपपादयिष्यामः । इत्युत्तरसापिण्ड्यम् ॥ ४॥ इति आशौवसापिण्ड्याधिकारः ।।७।। -~-पिण्ड-रहस्यम् । (श्राशौचस्य मुख्योपपत्तिः ) -- - । ५८-प्रथैतेषां चतुर्विधानामप्याशौचसापिण्ड्य नामुपपत्तिज्ञानार्थ सापिण्ड्यगत- पिण्डपद र्थः पूर्वं प्रदर्शितो गोद नी वैशवेन पुनर्निरूप्यते । एकपिण्डान्वयः सापिण्ड्यम् । पिण्डस्तु मूनपुरुषो वा, तच्छर र वयत्रा वा, निवापो वा, अन्नपाको वा, सोमाग्निनयं शुक्र- शोणितद्रव्यं वेत्यनेकधा पश्यन्ति । शुक्रनिवःपो बोजपिण्डम् । शाणितनिवापस्तु क्षेत्रपिण्डम् । तत्र तावत् सोममयं शुक्रनिवापं व्याख्य स्यामः । चेतनाधातुषष्ठाः पञ्चभूतविकाराः शुक्रम् । प्रकारान्तरेण चेतनाधिष्ठितं तेजोऽबन्नमयं शुक्रम् । तत्र यावती पृथिवी, यावानग्निस्तदन्नम । यावज्जलं यावान वायुस्ता आपः। याबानाकाशस्तत्तेजः, स सोमः। स हि शुक्रगस: सप्तकोशी निवाप्यः लोमः । तत्र तावत् प्रथमकोशोऽष्टाविंशतिकलः । २८ । द्वितीय एकविशतिकलः । २१ । तृतीयः पञ्चदशकलाः । १५ ! चतुर्थो दशकातः । १० । पञ्चमः पटकलः । ६। षष्ठखिकल: । ३ । सम एकलः । १ । इत्थं चतुरशीति कलोऽयं निवाप्यः सोमः । स कूटस्थस्य शरीरावयवो भवति । तदिदं सोनद्रव्यम् । तत्रैकरतृतीयांशः स्वो शामः । द्वौ तृतीयांशी तु पूर्वेषां षण्णां पितृणां ना। इत्यलेयम् । अथान्न प्रथमा दष्टाविंशति कलात् कोशाच्चतुर्थांशामिकाः सप्तकला अतिरिच्यकविंशतिकाभिरन्यः कोश उत्पद्यते। द्वितीयादेविंशतिकलात साढतृतीयांशा त्मिका: षटकला अतिरिच्य पञ्चदशकलामिरन्यः । तृतीयात् पञ्चदशकलात् तृतीयांशात्मिकाः पञ्चकला शानिरिच्य दशकला भरः । चतुर्थाशकलात् सार्द्ध द्वितीयांशात्मकाश्चतुःकला अतिरिच्य बटालाभिरन्यः । पञ्चमात् पट कलाद् द्वितीयांशात्मिकास्तिस्रः कला अतिरिच्य त्रिकलाभिरन्यः। वष्टात् त्रिकलात् साढेकांशास्मिके द्वे कल अतिरिच्यै कया कलया चान्यः । सप्तमात् त्वेक- कलादेकांशामिकामेकांबलामलिरिच्य शून्य ललया चादयः तत्र शून्यकलस्य सप्तमस्यासस्वाय- स्यात् षट् कोशो नि वापः पृथ्वीस्थानादन्तरिक्षे संतानिनोऽङ्कुरोद्गम इन पितृशरीरान्मातरि संतानितः षट्को शकशरीरात्मना परिणमते । सोयमित्थं षटपंचाशत्कल: षट्कोशो निवापः पिण्डापरपर्यायः सुतशरीरस्योपादानं सम्पद्यते । तेन चतुरशीतिकलादात्मनो निवाप्य- आशौचपञ्जिका [२७] स्वशर रे सोमद्रव्यान्मूलराशिरूपादिदानी षट्पञ्च शकलाभिर्निवापरूपाभिः पत्नीशरीरे सुत्बा स्वयमष्ट विंशतिकलः पिता अवशिष्यते । सुतस्तु षट्पञ्च शत्कल एत्रादौ भूत्वा संचरता चन्द्रेण षोडशिना षोडशभिः संवत्सरैः सम्पादितेनान्ये नाष्टाविंशतिकलेन कोशेन संभूय चतुरशीतिकलः पूर्ण: पुरुषो भवति । यथा -- . २१२८ w १० १५. २१ २८ ३ ६ १० १५ २१ २८ १ ३ ६१० १५ २१ २८ = (५) १ २ ३ ४ ५ ६ ७ = (२८) ६१० १५ २१ २८ २ ३ ४ ५ ६ ७ १ ३६१० १५ २१ २८ ६ १० १५ २१ २८ १ ३ ६१. १५ २१ २८ ३ ६१० १५ २१ २८ १ ३ ६१० १५ २२ २८ ३ -- w स चायमेकः शरीरी स्वीयाभिरष्टाविशतिकाभिः समन्वितः पितुरेकविंशनिकलाभिः, पितामहस्य पञ्चदशकलाभिः, प्रपितामहस्य दश ललाभिः, वृद्धप्रपिता रहस्य षटकनाभिः अतिवृद्ध- प्रपितामहस्य त्रिकलाभिः, परमातिवृद्धप्रपितामहस्यै ककलया च संबद्ध उपनकोशं चतुरशीतिकलं शरीर लब्ध्वा पित्रादीनामृणो भवति । स पुन' स्वभागादे विंशतकलाः, पितुर्भागात् पञ्चदश- कलाः, पितामहभागादशकलाः, प्रपितामहभागात षट् पलाः, वृद्ध प्रपितामहभागात् त्रिकला:, अतिवृद्धप्रपितामहभागादेककलां च पुत्रे, ततो भूयस्तदनन्तरास्नास्ता: पञ्चदशादिकाः कला: पौत्रे, ततो दशादिकाः कलाः प्रपौत्रे, पुन: षडादका कत्ला वृद्धपोत्रे, पुनस्यादिकाः कला अतिवृद्ध प्रपौत्रे, पुनरेका कलां परमातिवृद्धप्रपौत्रे न्युष्य पितृलब्धभागानां पुत्रा देवन्यात् स्वयमनृणो भवति । स स्त्रीयाभ्योष्टाविशति कलाभ्यः सप्तकलामात्र मपरित्यज्य तद निशिकावे ऋविशति कलासु षट्कलाः पत्रे, पञ्च मला: पौत्रे. चतस्रः कनाः प्रपौत्रे, तिस्त्रः कला वृद्धापौत्रे, द्वे कले अनिवृद्ध- प्रपौत्रे. एका कलां परमा तिवृद्धापौत्रे-'युप्य तेन पितृभ्य स्वध कारण त्यर्थ नस्य पृ थव्यां द्वारान्तरमुत्पाद्य स्वयमृणात् पिच्यात् प्रमुच्यते अथवा अयं पुरुषायसष्टाविंश ते कलं सोमकोशं स्वतो हाभते । ततः सप्तकलमात्मन्यांधायकविंशतिकला अपत्येषु क्रमेण सुवति । ताः पुनः कालान्तरेणात्मनि लभते, तदा पुनः सम्पद्यते । तत्र पौत्रकर्तृ के सपिएड्ने -- -- [२८] आशौचपञ्जिका । पुत्रगताः षट्कला लभते । एवं प्रपौत्रकृते सपिएडने पौत्रगताः पञ्च कलाः । वृद्धप्रपौत्रकृते चतस्रः कला। अतिवृद्धप्रपौत्रकृते तित्रः कलाः। परमातिवृद्धप्रपौत्रकृते द्वे कले। अष्टमापत्यकृते तु सपिण्डीकरणेऽन्त्यामेकां कलामप्युपलभ्याष्टाविशतिकल स्य पूर्णस्यात्मीय-सोम-पिण्डस्यात्मन्येव समर्पणात्पूर्णो भूत्वा पृथिव्या त्यक्तसम्बन्धसूत्रो बन्धनाद्विमुच्यते ॥ स इत्थं विशुद्धो मुक्तबन्धनः स्वां गति प्रतिपद्यते । चन्द्र लोकादुस्थायादित्य लोकं गच्छनीत्याहुः स्मृतिविदः ॥ तथा चात्र प्रति- शरीरं चतुरशीतिकलं सोमद्रव्यं सिद्धं भवति । तत्राष्टाविंशतिकला यावज्जीवनमात्मन्येव निहिता देहत्यागोत्तर तेष्वेव पितृषु पुनः प्रत्यय॑न्ते । यथा परमातिवृद्ध प्रपितामहे एका कला, अतिवृद्ध प्रपितामहे द्वे कले, वृद्धे प्रपितामहे तिस्रः कला:, प्रपितामहे चतस्रः कलाः, पितामहे पत्र कलाः, पितरि षट् कला:-प्रत्यय॑न्ते। अवशिष्टाभिस्तु सप्तकलाभिरामानं पृथगिव धत्ते । तदित्थमेता अष्टाविंशतिकला यावज्जीवनमारमन्येव निधेयाः, न तु पुत्रेषु निवाप्या इत्युक्तम् । परास्तु षट्पञ्चाशत् कलाः सूयन्ते । स निवापः सपिण्ड इति सिद्धम । यथा- -- S सप्तकोशचक्रम् । श्रात्मनिधेयकलाः मुलकला निवाप्यकलाः Game woman ween ३ २ ३ ३ परमातिप्रपितामह कलाः अतिवृद्धप्रपितामहकलाः वृद्धप्रपितामहालब्धाः कलाः प्रपितामहालब्धाः कला: पितामहालब्धाः कला: पितुर्लब्धाः कला श्वतो लब्धाः कलाः १० an ६ WASNA १५ stam १० w musa २१ १५ २८ MAHI २१ सप्तकोशकलायोगः २८ आशौचपञ्जिका [२६] सप्तपदीचक्रम् परमातिवृद्ध अतिवृद्ध वृद्ध प्रपिता पितामहे पितरि | स्वस्मिन् प्रपितामहे | प्रपितामहे प्रपितामहे | महे १ २ ३ ३ ४ ५ ६ पितृषु निवापः ३ ६ १० १५ २१ कूटस्थमूलराशिः MAAMROPMITHAIRMALAImaste ३ ६ २१ अपत्येषु निवापः परमात्तिवृद्ध अतिवृद्ध- वृद्धः प्रपौत्रे प्रपौत्रे प्रपौत्रे प्रपौत्रे पौत्रे पुत्रे एवमयं चतुरशीतिकलात् सोमद्रव्यान्मूलराशेर निवाप्यभागेऽष्टाविंशतिकलेऽतिरेचिते- ऽवशिष्टः षट्पञ्चाशत्कलो निवापः पितृभागः । अथाष्टाविंशतिकलो वृद्धिराशिः स्वभागः । ताभ्या. मन्ववेताभ्यां पुनरम्यश्चतुरशीतिकलः सोम द्रव्यः सप्तकोशः संपद्यते । स उत्तरत्र निवापाय मूलराशिर्भवति । इत्थमावंशविच्छेदमुत्तरोत्तरक्रमो नेयः । यथा- पितृलब्धराशिः मूलराशिः पितृनिवाप्यराशिः अनिवाप्यराशिः- - सवनीयराशिः पुत्रनिवाप्यराशिः ५६ ८४ २८ पितृभागः स्वभागः ८४-२८=५६ पितृभागः २८ स्वभाग: ८४-२८-५६ पितृभागः २८ स्वभागः [३०] आशौचपञ्जिका तथा चेत्थमस्य सन्तानक्रम निष्कर्षः ।। प्रतिशरीरं सप्तकोशश्चतुरशीनिकलः सोमो द्रव्यम् । तत्राष्टाविशतिकलः सप्तमः कोशः स्वधनम् । तस्य सप्त कलाः स्वस्मिन् । षट् पुत्रे । पञ्च पौत्रे । चतस्रः प्रपौत्रे । तिस्रो वृद्धप्रपौत्रे । द्वे अतिवृद्धप्रपौत्रे । एका तु परमातिवृद्धप्रपौत्रे इत्थं सप्तपुरु- पविभागेन सर्वाः कलाः सन्तानिताः सत्यः परत्र निरवशेषा भवन्ति ॥१॥ यस्त्वेकविंशतिकलः षष्ठः कोशः पितृधनम् तस्य षट् कलाः स्वस्मिन् । पञ्च पुत्रे। चतस्रः पौत्रे । तिस्रः प्रपौत्रे । द्व वृद्धा,पौत्रे : एका त्वतिवृद्धप्रपौत्रे। इत्थं षट्पुरुषविभागेन संतानिता: सर्वाः कला निरवशेषा भवन्ति ॥ २ ॥ यस्तत्र पञ्चदशकल: पञ्चमः कोशः पितामहधनम् । तस्य पञ्च कलाः स्वस्मिन् । चतस्रः पुत्रे । तिस्रः पौत्रे । द्वे : पौत्रे । एका तु वृद्धप्रपौत्रे । इत्थं पञ्चसु पुरुषेषु संतानिना निरनशेषा भवन्ति ॥३॥ एवं यो दशकलश्चतुर्थः कोशः प्रपितामहधनम्, तस्य चतस्रः स्वस्मिन् । तिस्रः पुत्रे । द्वे पौत्रे । एका तु प्रपौत्रे ! इत्थ चतुर्यु पुरुषेषु संतानिता निरवशेषा भवन्ति ॥ ४ ॥ अथ यः षट् कलस्तृतीयः कोशो वृद्धप्रपितामहधनम्. तस्य तिस्रः स्वस्मिन् । द्वे पुत्रे । एका तु पौत्रे । इत्थ त्रिपु सतानिता निरवशेषा भवन्ति ॥५॥ तथा यस्त्रिकलो द्वितीयः कोशोऽतिवृद्धप्रपितामहधनम्, तस्य द्वे स्वस्मिन् । एका तु पुत्रे-इत्थं द्वयोः सन्तान्गन्निरवशेषम् ।।६।। यस्तु पुनरेककलः प्रथमः कोशः परमातिवृद्धप्रपितामहधनम्, तस्य सा कला स्वस्मिन्नेव परिसमाप्नोति न सा परत्र संतानिता भवति ॥ ७॥ तदित्थं सर्वसमष्टया सप्तकोशधनस्याष्टाविंशतिः कलाः स्वस्मिन् । एकविंशतिः पुत्रे । पञ्चदश पौने ! दश प्रपौत्रे । षड् वृद्धप्रपौत्रे। तिस्रोऽतिवृद्धप्रपौत्रे । एका तु परमातिवृद्धप्रपौत्रे संतानिता निरवशेषा भवन्ति । यथा- आशौचपञ्जिका [३१] पिएड-सन्तान-क्रम-चक्रम् । स्वस्मिन् पुत्रे पौत्रे प्रपौत्रे वृ०प्रपौत्रे अतिवृद्ध प्रपौत्रे परमाति वृद्धप्रपौत्रे HERDAN EHIMNamodana ८४ २८ २१ ० w BANDAR Ammamme Redia HOMERIOD Romarate - स्वस्थ २८ ३ ५ ३ pocumentamannamanna AMARIA SANDAR SUSHABAR पितुः ५ ३ २ imate mota RADIOMNIA wasaimamster RANDUSand पितामहस्य ५ ३ २ १ MEANIOS- -IAS RESS SABAR Rink- प्रपितामहस्य १० ४ ३ २ SCHOPY GHONAantan पाय- IAS Supm ANS वृद्धप्रपितामहस्य २ ur १ amouN 35ARRITORINGRED -DAMRIES धतिवृद्धप्रपितामहस्य ३ २ ६ KRISeadline Annapelamma On ! परमातिवृद्धप्रपितामहस्य १ KNORMANAS - . ५६-वस्तुतस्तु अष्टाविंशतिकलः सोमकोशः प्रतिशरीरमष्टाविंशत्यहर्गणभोग्याचन्द्रचारा- दुपपद्यते स मूलराशिः। तस्य संतानोत्पत्तिकाले राशिद्वयं भवति । एकविंशतिकलः संतानराशिः। स हि तच्छरीरात् संतानितः पुत्रशरीरेऽवतिष्ठते । अथावशिष्टः सप्तकलः स्वभुक्तराशिः। स हि स्वीयशरीर स्थि-युपयुकः शरीरत्यागोत्तरमपि स्वस्मिन्नव समासज्यते न परत्र संतन्यते । तस्मात् स सप्तशलः संतानशेषराशिः । १ । ततः पुत्रशरीरात् पुनः संतानोत्पत्तिकाले तस्यैक- विंशतिकलस्य राशिद्वयं भवति । पञ्चदशकलः संतानराशिः । षट्कलः सन्तानशेषराशिः।

[३२] आशौचपञ्जिका स हि पुत्रशरीर त्यागोत्तर स्वस्मिन् पुनः समासज्यते । २ । पञ्चदशकलस्यापि पूर्ववद् राशिद्वयं भवति । दशल: संतानराशिः । पञ्च फलः शेषराशिः। स हि पौत्रशरीरत्यागोत्तरं सपिण्डनात् स्वस्मिन् पुनः समासज्यते । ३ । दशकलस्यापि राशिद्वयं भवति । षट्कलः संतानराशिः । चतु:कलः शेषराशिः। ४ । षट् कलस्यापि गशिद्वयं भवति । त्रिकलः संतान:. त्रिकलः शेषः । ५। त्रिकलस्यापि द्वौ राशी- एककलः सन्तानो द्विकलः शेपः । ६। अथैककलस्य संतानाभावात् सतानशेष एवासौ भवति । ७ । तथा च संतानोत्पत्तेः प्राक् पूर्वक्रमागतराशिभिः सहितेन स्वराशिना प्रतिशरीरं चतुरशीतिकलः सोमकोशः सपद्यते । संतानोत्पत्तेः पश्चात् तु पूर्वक्रमागत. राशिभिः सहितेन स्वराशिना अष्टाविशतिकतोऽवतिष्ठते । यथा- संतानराशिचक्रम् सप्तमपुरुषः षष्ठपु० पञ्चमपु० चतुर्थपु० तृपुं० द्विपु० प्रथमपु. २८ om ३ १ २१ १० ६ ३ २८ १० ६ ३ १ ३ २८ १० ur or २१ २८ २१ १५ १० ६३१. २८ २१ १५ १०६ ३१० तदित्थं प्रतिशरीरोत्पन्नाप्टाविशति कल कोशस्योत्तरोत्तरं सप्तसु स्थानेषु संतानात् प्रतिशरीर चतुरशीतिकलं सप्तसोमकोशं संपद्यते । यथा-५६ पटपञ्चशतकलाः पित्र्योंशः ॥ २८ स्वांशः एतयोर्योगः १ ३ ६ अथ शेषराशिचक्रम् । सप्तमपुरुषः षष्ठपु० पञ्चपु० चतुर्थपु० तृतीयपु० द्वितीयपु० प्रथमपु० ६ २ ६ १५ २८ ३ १ ३ GME: ६ ५ ६ ६५४३२१ भाशौचपञ्जिका 1 - १ २ ३ ५ ६ A तहित्थ प्रतिशरीरोत्पन्नाष्टाविंशतिकलकोशस्योत्तरोत्तरं सप्तसु स्थानेषु सतानात प्रतिश रोरमष्टाविंशतिकलं सप्तसोमकोशमवतिष्ठते । यथा- २१ एकविशतिः कलाः पियोशः ७ वांशः एतयोर्योगः २६ अत्र विप्रतिपद्यते । ज्येष्ठ एवायं निवापः सूयते, उत कनिष्ठेष्वपि न्युप्यते । नाद्यः । ज्येष्ठे मृते वंशविच्छेदापत्तः, कनिष्ठकृते श्राद्धादिस्वधाकारस्य द्वाराभावेन पितृष्वप्रसक्तया नरर्थक्यापचेश्च । नाप्यन्त्यः । पितृद्रव्याणां षट्पञ्चाशतकलानां ज्येष्ठे न्युप्ततया कनिष्ठे निवापाय सामघ्यभावादिति । तत्र कनिष्ठेष्वपि निवापः सूयते इत्येव सिद्धान्तः श्राद्धतत्त्वस- मीक्षायां वैशयेन निरूपयिष्यते इति ॥ इदमन्यदप्यत्र बोध्यम-य: खलु प्रतिशरीरमष्टाविशति- कलः सोमकोशो व्याख्यातः स श्रुतौ श्रद्धाशब्देनाख्यायते । तस्य तरलपदार्थत्वादापोमयत्वं दृष्टव्यम् । 'श्रद्धा ना थाप:"-इति भूयसा श्रवणात् । पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति' इति पञ्चाहुतिश्रुतावपि तस्या एव श्रद्धाया आहुतयः क्रमेणोपपाद्यन्ते ! श्रद्धाया एव संतानः प्रजा । सप्तसु प्रजासु प्रागुक्तांदशा सन्तानिता सा श्रद्धा तुलतन्तुवच्छुद्धामयस्तन्तुर्भवति । तेन प्रजानां तन्तु संज्ञा । तथा च बह्वचश्रुतौ श्रूयते-यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः । तमाहुतं नशीमहीति । प्रजा वै तन्तुः । प्रजामेवारमा एतत् संतनोतीति' एवमेताभिः सप्तभि. प्रजाभिः संधार्यभाणत्वादियं श्रद्धा न पतति, नोत्सीदतीत्यतस्तान्यपत्यान्युच्यन्ते । श्रद्धापतनमेव पितृपतनं नाम । तेन भद्धायाः संधारणात् पितरो न पनन्तीत्यतोऽपि तान्यपत्यानि । सप्तै ते पुरुषा अष्टाविशतिकलेनैकेन श्रद्धामयेन तन्तुना संबद्धा न पतन्तीत्ययः स तन्तुरेवापत्य मिष्यते । तन्तुरेवाहिताः प्रजा इत्यतस्ताः प्रजा अपत्यानि अष्टाविंशति कलानामे कः पिण्डः सप्तस्वपत्यपुरुषेषु व्यासक्तोऽवतिष्ठते तेनैते सप्त पुरुषः सपिण्डाः । एकपिण्डयोग वितेषां सापिण्ड्यम् ॥ इति सापिएड्यविचारः॥८॥ 8-विद्याविन्यसम्बन्धौ। ६० --अथ स्वाध्यायसम्बन्धेनाचार्य-ब्रह्मचारि-परम्परासंप्रविष्टानां पुरुषाणां यः सम्बन्धः स विद्याकृतः एवमाविव्यसम्बन्धेन याज्ययाजकपरम्परासंप्रतिष्ठानां पुरुषाणां परस्परं यः संबन्धः स यज्ञकृतः ॥ तत्र चोपनीय साङ्ग-संकल्पः-सरहस्य-सोपनिषत्कवेदाध्यापके,कुलयाजके वाधिक सम्बन्धः ॥ ततो हीन-हीनतर-गुणेष्वनित्ययाबकेषु च तारतम्येन व्यवस्था । इति विद्यार्विव्यसम्बन्धौ ॥ ६ ॥ । -

[३४]
आशौचपञ्जिका
१०-प्रेतसंसर्गः ।
६१-रोदनं स्पर्शनमलंकरणमनुगमनं वहनं दहनमुदकदानं पिण्डदानं चेत्यष्टौ प्रेतसंसर्गाः
भवन्ति । एभिः कृतैः शवगतःशुद्धिः संलगिणि संक्रमते इति स्थितिः॥ इति प्रेतसंसर्गः ॥१०॥
११-खननदाहौ।
६२-नामकरणात्प्राक् शिशुमरणे खननमेव कार्यम् न तु दाहः । नामकरणोत्तरं तु
वर्षत्रयपर्यन्तमकृत चीलस्य द हखननयोर्विकल्पः । कृतचोलस्य तु
वर्षत्रयमध्येऽपि दाह एव कार्यो
न तु खननम् । वर्ष त्रयोत्तरं कृतवाग्दानाया अकृतवाग्दानाया वा कन्याया दाह व कार्यों न तु
खननम् ।
६३-तत्र खनने सति विशेषाशौचानुपदेशे सद्यः शौचं कार्यम् । दाहे तु यहाशौचमिति
सामान्यनियमः । यस्यापि वा खननमेव विधिसिद्ध न तु दाहस्तस्यापि य द बालिश्यादाहं करोति
तदा यहाशौचमेवानुरोद्धव्यं न तु सद्यः शौचम् । दाहस्य व्यहाशौचे निमित्तत्वादिति दिक् ।
इति खननदाहाशौचव्यवस्था ।। इति खननदाहौ।॥ ११ ॥
१२-उदकदानम् ।
यत्र खननं तत्रोद दानादिक न कार्यम् । दाहे तु कृते तत्साहित्यनियतमुद कदानाद्यप्यनुवर्तते ।
उपनयनात्प्राग बाल सस्य, तथा विवाहात्प्राक कन्याया दाहोदकदानादिकं तूष्णीमेव कार्यम् ।
न तु मन्त्रेण । उपनयना द्विवाहाचोर्ध्वं तु सर्वं समन्त्रकं कुर्यात् ।। इति उद कदाम् ॥ १२ ॥
१३-निमित्तिसंसर्गः।
६५--संसो नवधा-एक शय्याशयनमेकासनोपववेशनमेकपंक्ति भौजनमशौचिभ भाएडपकान-
भोजनमशौचिसंस्पृष्टान्न भोजनमे पात्रभोजनमाविज्यमध्यापनमशौचित्रोगमनमिति । उक्तं च
देवलेन--
आलापस्पर्शनिश्वासान् सहयानासनाशनात् ।
याजनाध्यापनाद् यौनात् पापं संक्रमते नृणाम् ॥ इति
त्रैकशय्याशयनादिपञ्चविध संसगैरे कैककृतैः स्वल्पकात्तापनेयमाशौचं संसृज्यते । एक-
पात्रभोजनादिभिन्तु चतुर्विधसंसगैरधि कालापनेयमाशीचं प्राप्नोतीति दिक् ॥
इति निमित्तिसंसर्गः ॥ १३ ॥

आशौचपञ्जिका [ ३५ ] १४-श्राशोचतादत्म्यम् । (तारतम्यरहस्यम्) ६६-इह हि मातृतः पितनः आत्मतः सात्म्यतो रसतः सत्त्वतश्च य पुरुषव्वक्तिः षड्भ्यो * योनिभ्यः संभूनाभ्य संभवति । तत्र यावदियं मातृतः पितृतो रसनश्च संभवतः संभवति. तदपच्छेदेन जन्मनो मरणाद्वा निमित्तात्म्यांचिद् व्यक्ताबुत्पद्यमानमाशौच योनिसं- बन्धाद्, विद्यासंबन्धाद्, यज्ञसंबन्धात्, संसर्गसंबन्धाद्वा परत्र संक्रमते । तच्च संक्रममाणं संबन्धमात्रां पात्र योग्यतां चापेक्षते । अत्यल्पमात्रे तस्मिन् सम्बन्ध सूत्रे सत्यल्पमात्रया सक्रममाणं पर व्यक्तौ स्वल्पेनैव कालेनापैति । अथ संबन्धसूत्राधिक्ये सत्यधिकमात्रया सक्रममाणं तदशौचं विलम्बनापैति । तदित्य मिदमाशौच सम्बन्धसूत्रतारतम्यनिबन्धनेन निवृत्तिकालतारतम्येन तात्कालि कैकाहपक्षिणीयहदशाहादिभेदादनेकधा भिद्यते । एवं पात्रयोग्यतातारतम्यादप्याशौच. संक्रमणे तारतम्यमुपजायते । साङ्गसकल्पसरहस्यमोपनिषत्कसर्वशाखवेद विदि, अग्निमनि विशष्टकर्मवति च पुरुषे संक्रममाणमप्याशौचं विलक्षणसंस्कारबिशिष्ठे तदात्मनि न समासजते, पुष्करपलाशे जल बिन्दुवदित्याहुः । ततो न्यूनयोग्य तात्यत्सु च वेदाग्निकर्मनिबन्धनयोग्यतातारत- म्यानुरोधेनैव मात्रातारतम्येन संक्रमणात् तात्कालिकैकाहपक्षिणीव्यहदशाहादिभेदादनेकधा भिद्यते तदित्थं यत्राधिकमात्रत्वादधिककालव्याप्यमाशौचं संक्रमते तत्रास्य भूतात्मा च सत्त्वात्मा चानेनाऽऽशौचेन संसृज्यते । तस्य सत्त्वात्मस्थमिदमाशौचं यावता मालेन रिवर्तने, भागकालेन तस्य बाह्याद् रसात्मनस्तदशौचमुपैति तदिदं बाह्यभूनात्मस्थमघं स्पशशिौ वशब्देन सत्त्वात्माथं तु तघं कम्मशिौचशब्देन व्यपदिश ते । परे त्याहुः~-प्रतिपुरुषमात्मत्रयं भवति भूतात्मा, क्षेत्रज्ञ त्मा, जीवात्माचेति । तदुक्तं मनुना-- थोस्यात्मनः कायिता तंत्रज्ञं प्रचक्ष्यते ।। यः करोति तु धर्माण स भूतात्मोच्यते बुधैः ।। १ ।। जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्व देहिनाम् ।। येन वेदयते सर्व सुखं दुःख च जन्मसु ॥ २ ॥ इति तत्रागं र यिरूपस्य भून भौतिक पिण्डस्याविष्ठाता प्राणो भूतात्मेत्युच्यते । तत्र भूभौतिक- पिण्ड वच्छेदेन समासक्तमचं तु कर्माशौचशब्देन व्यपदिश्यते । तदेतदुभयं वस्तुतो न भिश्ते । केवलमत्र मात्रातारतम्यादधिष्ठानभेदो याप्यकालभेदश्चाशौच प्रतिपत्ती निमित्तं दृष्टव्यम् । यथा जातीपुष्पेऽधिष्ठितो गन्धः केनचित् प्रक्रमेण गन्धले धिष्ठिनो भवति, स पुनर्गन्ध स्पर्श- * योनिशब्द: स्त्रियां पुंसि च वर्तते । तत्तृतीय- - WHATowevMAPuranmadrurumen greap emamaha TETratapmumar LAMAJHERI [३६] आशौचपञ्जिका वत्सु वायुवस्त्रादिद्रव्यजातेस्वपि संसृज्यते । स हि गन्धो जातीपुष्पे चिराय तिष्ठन ततोऽल्पेन कालेन गन्धतैलेऽवतिष्ठते । ततोप्यरूपेन कालेन स ततस्पर्शवत्सु वखादिषु संसको निवर्तने । तदित्थं पुष्पे तैले वस्त्रे च गन्धोत्पत्तेभियते निमित्तम, भियते चाश्रयो भिद्यते चावस्थानकाल:, मिद्यते चोपक्रमकालः । तत्र तैलादौ तावद् गन्धस्य पुष्पावयवोऽन्य एवाश्रयो मुख्यः । तैलावयवस्त्वन्य आश्रयो गौणः । पुष्पेऽप्यनयोर्यो गन्धाश्रयः । स निर्गन्धे पुष्पावयवेऽपि समासक्त एवानुभूयते, सोऽन्यस्तस्याश्रयः । गन्धाश्रितभागातिरिक्तोऽपि कश्चन भाग: पुष्पस्य जीविस्थायां मुकुलावस्थायां च प्रत्यक्षमगन्धोऽनुभूयते तरुणवस्थायां तूद्भुतो गन्धः सर्वत्रा- विशेषमुपलभ्यते । तत्र वायुवस्त्रा बादौ गन्धावयवा एव संक्रमन्ते, न परे पुष्पभागाः । पुष्पमर्दना. दिकर्माणि तु परे पुष्पभागा एव संक्रमिते, न गन्धावयवा इत्युपक्रमभेदः स्पष्ठमुपलभ्यते । स यथा एक पव गन्घोऽन्यत्राधिष्ठितोऽप्यन्यत्रोपसंक्रममाणो दृश्यते, एवमिदं जात कमृत कशरीर. स्थमघं परशरीरे भूतात्मनि यथायथं तारतम्येन संक्रमते । तच तत्र नत्रान्यथान्यथा संपद्यमान- मपि वस्तुतो नातिरिच्यते। अघवस्तुनि भेदाभावात् । तस्माजन्माशौचमरणाशीच वा, दोषा- शौच, क्रियाशौचं वा, सर्वमिदममिन्नमनन्तरमेव स्पष्टप्रतिपत्त्यर्थन्तु भेदेनात्र व्यवहारा: प्रवर्तन्ते इति दिक् । इति आशौचतादात्म्याधिकारः ॥ १४ ॥ ६७-पौत्रः प्राणपतेस्तु हीरकसुतो यो देवनाथः सुधीः । पौत्रस्तस्य हि वैद्यनाथतनयो गजीवनन्देन च ।। तातज्येष्ठसहोदरेण गुरुणा य पुत्रवत् पालितः । सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ।। इत्याशीचसूत्राध्यायो द्वितीयः ॥ २ ॥ Katta Mayapan प्राशौचपञ्जिका अथ तृतीयोऽध्यायः . अथ जन्माध्यायः। (१) ६८-अस्मिन् जन्माध्या ये सूतिकाया: १ सूतिका पितृकुलस्य २ सूतिकाभर्तुः ३ सूतिका- भत कुलस्य ४ तत्संसर्गिणश्चेति ५ पञ्चाधिकाराः प्रयन्ते । (२) ६६ --जम्माशीचं, जननाशौचं वृद्धयाशौचं, शुभा शौचं, सूना मित्येकार्थाः । १-सूतिकाधिकारः। ( सूतिकाया गर्भस्रावे, पाते, प्रसवे च शौचम् ) ७०-प्रथमादिषु चतुषु माषु नष्टस्य गर्भस्य योनिनो बहिर्भावो गर्भस्राव इत्युच्यते । पञ्चमादिषु चतुर्यु मासेषु नष्टस्य गर्भस्य योनितो बहिर्भावो गर्भपात इत्युच्यते । सप्टमादिषु चतुर्यु मासेषु पुष्टस्य गर्भस्य योनितो बह वो गर्भप्रसव इत्युच्यते । तदित्थं सप्तमाष्टमय मासयोद्वैधं भवति । नष्टगर्भोद्भवे गर्भपातसंज्ञा गर्भच्युतिसंज्ञा च, जीवद्गर्भोद्भवे तु प्रसवसझेति विशेषः । श्रादित्यपुराणवचनादिषु कचित्पञ्चमषष्ठमासयोरपि गर्भस्रावशब्दः प्रयुक्तो दृश्यते तदेकदेशिकम् ॥ १ ॥ माहेषु ३ ३ स्रावो हिम्भस्य मासेषु ५ पालो निर्जीवगभस्य ur मासेषु ६ प्रसबो जीवितगर्भय Assame ७१-तत्र ब्रह्मण्याः सूतिकाया प्रशममासे गर्भस्रावे द्वयहमाशौचम् । द्वितीयमासे तृतीयमासे वा गर्भस्रावे व्यहम्। प्रथमद्वितीयतृतीयमासेपु व्यहमिति दाक्षिणात्याः । चतुर्थमासे चतुरहम् । पञ्चममासे गर्भपाते पञ्चाहम् । षष्ठे मामे गर्भपाते षडहम् । तदिदं स्पर्शाशौचं च कर्माशौचं च तदूर्ध्व वैदिककर्माधिकारः प्रवर्तते ॥ २ ॥ ७२-क्षत्रियायाः सूतिकायाः प्रथममासे गर्भस्रावे व्यहम् । द्वितीये चतुरहम् । तृतीये पञ्चाहम् प्रथम द्वितीयतृतीयमासेषु चतुरहमिति दाक्षिणात्यानांकेचित। चतुर्थे षडहम्। पञ्चमे तु आर्भपाते सप्ताहम् । षष्ठे मासे त्वष्टाहमाशौचम ।। ३॥

[३८] पाशीचपञ्जिका ७३-वैश्यायास्तु प्रथमे मासे गर्भस्रावे चतुरहम् । द्वितीये पञ्चाहम् । तृतीये षडहम् । प्रथमद्वितीयतृतीयमा सेषु पञ्चाहमिति दाक्षिणात्यानां केचित् । चतुर्थे सप्ताहम् । पञ्चमे तु गर्भपाते अष्टाहम् । षष्ठे मासे नवाहमाशौचम् ॥ ४॥ ७४-शूद्रायास्तु प्रथम मासे स्रावे सप्ताहम् । द्वितीयेऽष्टाहम् । तृतीये नवाहम् । प्रथमद्वितीयतृतीयमासेषु अष्टाहमिति दाक्षिणात्यानां के चित् । चतुर्थे दशाहम । पञ्चमे तु पाते एकादशाहम् । षष्ठे मासे द्वादशाहमाशौचम् ॥ ५ ॥ --सप्त मेऽष्टमे मासे दोषवशादजीवद्गर्भपाते पि मातुः सम्पूर्णाशौचं वक्ष्यमाणवन्नेयम् ॥ ६॥ AURATOMORRIMINALPremALIDANutmam ARURNAuthentimoostixveDEmmamMMEmausamAILABINIRASAINA वर्णभेदेन प्रसूत्याः श्रावपातयोगशौच दिनानि MmsennaamTAMARHamam mastIMETANARASIMAMRAPARRORESUNDRANI मासे w १ २ ३ ब्राहाण्या: २ ३ or ६ क्षत्रियायाः ३ ur वैश्यायाः x ur है शूद्रायाः है १० १० इदं त्वत्र बोध्यम् । द्विविधं तावत् चातुर्वर्ण्यस्य पूर्णाशीचं व्याख्यास्य म.- शुध्ये द्विषो. दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति' । इत्येवं प्रतिवर्णनियता- शौचं प्रातिस्विकमेकम् । 'सर्वे वा स्युर्दशाहिनः' इत्येवं प्रत्याकृष्टाशौचं द्वितीयम् । तत्र येषां प्राति- विनाशौचं कुलाम्नायसिद्धं दृष्टं तेषामेव क्षत्रियवैश्यशूद्राणामिहापि गर्भस्राव-भपातयोरुक्त- रीत्या प्रातिस्विकाशौचं विधीयते । अथ येषां प्रत्याकृष्टाशौचिनां दशाहाशौचमेव पूर्णाशौच कुला चारप्राप्तं भवेत् तेषा मिहापि स्रावातयोर्ब्राह्मणवदेवाशौचं ज्ञेयम् । पूर्णाशौचानुसारेणे- वेहाप्याशौच प्रत्याकर्षात् । ७६ - सप्तमेऽष्टमे नत्रमे दशमे वा मासे गर्भ सवे तु ब्राह्मण्याः, क्षत्रियायाः, वैश्यायाश्च सूतिकायाः दशरात्रं स्पर्शाशौचम् । वशिौचं तु पुत्रोत्पत्तो मासम् , कन्योत्वत्तो चत्वारिंशदिना- नीति दाक्षिणात्याः । पुत्रोत्पत्तौ विंशतिरात्रम, कन्योत्पत्तौ मासमितिपैठीनसिः प्राइ, तदातिष्ठन्ते স্বামীঞ্জিকা [३६] गौडाः । देशाचाराद् व्यवस्था । सच्छूद्राया अश्येय मेव । सच्छूटत्वं च स्पृश्यशूद्राणां स्नानदाना. दिपवित्राचरणशीलत्वं विशिष्टगुणयोग्यताशालित्वञ्चेति दिक् ॥ ७॥ ७६---सामान्यतस्तु शूद्रायाः कन्यापुत्रजनने त्रयोदशरात्र स्पर्शशौचम, कर्माशौच मासमेवेत्याहुः सच्छूद्राया अप्येवमेवेति दाणिणात्यानां केचित् । तु - प्रसवे १५शिौचदिनानि काशौचदिनानि प्रसूतीनाम् पुत्रे कन्यायाम गौडलीणाम् १० २० ३० दाक्षिणात्यत्रीणाम् ३० असछूद्रस्त्रीणाम् २३ ३० इति सूतिकाधिकारः ॥ १॥ २-सूतिकापितृकुलाधिकारः। (१-पितृ हे प्रसवादी) ७८-ऊढाया औरसकन्याया दत्तकन्याया वा पितृगृहे सत्या मासचतुष्टयपर्यन्तं गर्भ स्रावे शयनाशनादिसंसर्गवतां पित्रादिसपिण्डानां यावत्संसर्गमशौचानुवर्तनात प्रसूतीसमकाल- मेवाशौचम् । संसर्गशून्यत्वे तु मातापित्रोरेकाहः । अन्येषां त्वशौचं नास्ति॥१॥ एव पञ्चमषष्ठमासयोगर्भपाते पुर्वोक्त संसर्गवतां पित्रादिसपिण्डानां संसर्गानुरोधात् प्रसूतीसककालमाशौचम् । संसर्गशून्यत्वे तु मातापित्रोरेकरात्रम् । सोहरभातु- रेकाहः, अन्येषां त्वशौचं नास्ति ॥ २॥ ८०-तस्या एव सप्तमाष्टमनवमदशमेषु मासेषु प्रसवें शयनाशनादिससंगैधता सवैषी पित्रादिसपिण्डानां पूर्णाशौचम् । 'संसर्गशुन्यत्वे तु मातापित्रोलिरात्रम । भ्रातादिवर्गस्यक ७६-तस्यो क

आशौचपल्लिका
रात्रम् । पितृव्यादीनामेकाइ., पित्रोप्येकाहः इति दाक्षिणात्यानां के चित् गौडानां च केचित् ।
कौशौचमेवेदं, स्पर्शाशौचं तु प्रसवे सूतिकातिरिक्तानां नास्ति ।
प्रसूत्याः
असंमनिणाम
संसर्गिणाम्
मातापितृ-
भ्रातृ- सपिण्डानाम मातापितृ-
भ्रातृ-
लपिण्डानाम्
२।३।४।२।३।४
नावे
पाते
प्रसवे
३
१.
DIRNESS
८१-पितृवेश्मन्यसंस्कृतैव या नारी रजः पश्यति, तस्याः प्रसवे पितुरशौचं यावज्जीवनं
नोपशाम्यति ॥ ४॥
(२-पतिगृहे प्रसवादी)
५२-पतिगृहे तु सत्या गर्भस्रावे गर्भपाते,प्रसवे वा पित्रादीनामशौचं नास्ति ॥ ५ ॥
इति सूतिकापितृकुलाधिकारः ॥ २ ॥
३-सूतिकाभर्तरधिकारः।
८३--मासचतुष्टपर्यन्तं गर्भस्रावे पत्र्लोमनखवापनपूर्वकात् सचैलस्नानाच्छुद्धिः
लोमनखवार नमिच्छन्त्येके, नेच्छन्त्येके ॥ १ ॥
८४--पञ्चमषष्ठमासयोर्गर्भपाते पत्युः सचैलस्नानात् प्राक् स्पर्शाशौचम् । कर्माशीचं
तु त्रिरात्रं निर्गुणस्य । सगुणस्य तु सूतीभत रेकरात्रं यमः प्राह । अशौचान्ते लोमनखचापनमि-
छन्त्येके, नेच्छन्त्येके ॥ २ ॥
(१-मुख्यभार्यायाः प्रसवादी)
८५-सप्तमादिमासचतुष्टये तु भार्याप्रसवे सति श्रवणोत्तरं पत्युः सचैलस्नानम् ।
पुत्रमुखदर्शनात्परं पुनः सचैलस्नानम् । तत्र प्रथमसचैलस्नानात् प्रागेव स्पर्शाशौचं भवति ।
कौशौचं तु पूर्ण दशाहम् । संसर्गे तु सति स्पर्शाशौचमपि दशाहमिति वक्ष्यते ॥ ३ ॥

आशौचपञ्जिका
[ ४१ ]
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८६-अत्र स्त्रीजन्मनि स्नानानुपदेशाद् विनैव स्नानं पितुरपि शुद्धिरित्याहुः तेन
कन्याजनने पितुः पशिौचं नास्तीत सिद्धम्।। कन्याजन्मन्यपि पितुः स्नानमिति दाक्षिणात्यानां
केचित् कर्माशौचं तु दशाहं भवत्येव ॥ ४ ॥
(२-परपूर्वायाः परंगताया वा भार्यायाः प्रसवादी)
८७-परपूर्वायाः भार्यायाः प्रसवे सर्ववर्णानां त्रिरात्रम् । असन्निधौ त्वेकरात्रमिति
केचित परपूर्वाः, पुनर्भूः, अन्यपूर्वा, आमद्धा, अन्यगता इत्येकार्थाः ॥ ५॥
८८-र्याद द्विजातेगृहाधिकारिणी होनवर्णा नारी स्यात् सा च तेन भुक्ता प्रसवं
गच्छति । तदास्य द्विजातेभस्मान्तं सूत कं भवति । यावज्जीवन तन्नोपशाम्यति ॥६॥
८६ -- पति त्यक्त्वा समानजातीयोत्कृष्टजातीयपरपुरुषेण अयुक्तायाः पुनर्वाः प्रसवे तस्य
स्वसंग्राहकस्य जारपुरुषस्य पूर्वकालिकस्य च पत्युस्विरात्रम् । हीनवर्णगामिन्यातु भार्यायाः प्रसवे
पत्युः पूर्वस्याशौच नास्ति ॥ ७ ॥
-क्षेत्रजादिषु पुत्रेषु जातेषु मातापिनोस्त्रिरात्रमित्याहुः । असन्निधौ त्वेकरात्रमिति
केचित् ॥ ८॥
प्रसूतिकाभर्तुः
निमित्ते
स्पर्शाशौचम्
कर्माशौचम
गर्भस्रावे
सचैलस्नानम्
गर्भपाते
सचैलस्नानम्
apne
पुत्रप्रसवे
सचैलस्नानम
कल्याप्रसवे
RAHAMANORAMRIHANI
क्षेत्रजादिप्रसवे
३
MANENTransHIARRIANDERaram
RE-
0
परपूर्वायाः प्रसवे
३
data-
परंगतायाः प्रसवे
नीचंगतायाः प्रसवे
०
Relmaratswana
इति सूतिकाभत्रधिकारः ॥ ३ ॥

[४२]
आशौचपञ्जिका
४-सूतिकाभर्तृ कुलाधिकारः।
६१-मासचतुष्टयपर्यन्तं गर्भस्रावे पुत्रस्य, सपत्न्याः, सपिण्डानां च स्नानाच्छुद्धिः
'लोमनखवापनपूर्वकं स्नानमिति' मैथिलाः ॥ १ ॥
-पञ्चमे षष्ठे वा मासे गर्भपाते सपत्न्याः सपिण्डानां च स्नानात् प्राक् स्पर्शाशौ-
चम् । कर्माशौचं तु त्रिरात्रम् | सगुणसपिण्डानां सद्यः शौचम् । निर्गुण सपिण्डानामहोरात्रम्।
यथेष्टाचरणशीलानां सपिण्डानां त्रिरात्रम् । अथवा सगुणानामे करात्रं निर्गुणानां त्रिरात्रमिति
केचित् ॥ २॥
६३-सप्तमेऽष्टमे नवमे दशमे वा मासे गर्भप्रलवे सपिण्डानां शुद्धिव्यवस्था वर्णभेदेन
भिद्यते। ब्राह्मणानां दशाहम्, बियाणां द्वादशाहम् वैश्यानां सच्छूद्राणां च पञ्चदशाहम्
निकृष्टशूद्राणां मा माशौचम् । स पिण्ड': सप्तमपुरुषावधयः स्ववंश्याः ॥ ३ ॥
६४-सप्तमपुरुषादूर्ध्वं दशमपुरुषं यावत् सकुल्याः । सकुल्य.नां त्रिरात्रम् ॥ ४ ॥
१५-सप्तमादृवं चतुर्दशपुरुषं यावत्सोदकाः । सोदकानां तु त्रिरात्र पक्षिणी वा ।
तत्र जन्मनाम्नोर्जायमानत्वे चतुर्दशपुरुषं यावत् त्रिरात्रमिति दाक्षिणात्याः । दशमपुरुषार्ष
जन्मना नोयिमान दे पक्षिणीति गौड़ाः॥५॥
६६-चतुर्दशपुरुषादूर्ध्व मेकविशतिपुरुषं यावत् सगोत्राः सगोत्राणां तु जन्मनाम्नोः
स्मरणे सत्ये हाहम् । पक्षिणीति गौड़ाना केचित् ग्नानमात्रमिति दाक्षिणात्यानां केचित् ।
जन्मनाम्नोर विज्ञाने तु आत्मकुल जोऽयमित्येतावन्मात्रज्ञानसत्त्वे स्नानमात्रेण शुद्धः । यथाकथं-
चिज्ज्ञानसत्वादन स्नानात्प्रागशौचम ! सर्वथा ज्ञानाभावे तु नाशौचम् । एकविंशतिपुरुष-
पर्यन्तमेवाशीचप्रवृत्तिर्न तदूर्ध्वमिति बहवः ॥ ६ ॥
-सर्व चैतत्प्रकरणे कर्माशौचमेव विधीयते । स्पर्शाशौचं तु नास्ति सपिण्डानां
सकुल्यानां सोदकानां सगोत्राणां वा ॥७॥
१-दत्तकादीनाम्।
१८८-दत्तकस्यासपिण्डकुलाद्गृहीतस्य पुत्रपौत्रादिजनने दत्तकजनयितृसपिण्डानां
च पुत्रपौत्रादिजनने दत्तकस्यासपिडकुजाद्गृहोतस्यैकाहः इत्यााह्यम् । एकमातृकयोभिन्नपितृक-
यात्रोरेकस्य जननेऽपरस्य स्वमातृजात्युक्तं पूर्ण माशोचम् । एकाहमेवाशौचमिति दाक्षिणात्यानां
केचिन् । पितृतस्योः प्रसवे त्रिरात्रम् । सपिण्डानां तु तयोर्जननादशौचामावः ।।८॥
इतिसृतिकाभर्तृ कुलाधिकारः॥४॥

श्राशीचपञ्जिका ५-सूतिकासंसर्गाधिकारः । । ( सूतिकासंसर्गे सपिण्ड ना भर्तश्चाशौचम् ) १६-संसर्गाशौचे सत्यस्पृश्यत्वमात्रं भवति न तु कर्मानधि कारः ॥ १ ॥ १००-जननाशौचिनां सूति कतिरिक्तानां स्पर्शो न प्रतिषिध्यते । प्रसूतीस्पर्श तु कृते सपल्या वा सपिण्डानां वा तदन्येषां वा सर्वपां स्नानाच्छुद्धिः । स्नान मात्रापने यस्यायस्य तेषु स्पर्शतः संक्रान्तत्वात् ॥ २ ॥ १०१-यदि 'तु जनक: पिता प्रसूत्याः पत्न्याः संपर्श सूनके करोति तदा तस्यापि प्रसूतीसूतकं यावदस्पृश्यत्तम् । तत्र संस्पर्शों मैथुनसंसर्ग इति केचित् । संसर्गान्तरेष्वपीति बहवः॥३॥ १०२- प्रशौचिनामन्नभोजनैकशय्यास नादिसहवासभूयस्वपरिशील ने यावत्तेषां लिमि- त्तिनामशौचं तावदेवैर्षा संमगिणाम प्यशौचमनुवर्तते ॥ ४ ॥ १०३ अशौचिगृह्याणामशौचिस्वामिकाना वा द्रव्याणामशौचिस्पर्शशून्यानां संसर्ग तु नाशौचसम्बन्धः, अशौचिस्पर्श तु द्रव्यशुद्धिकरणोक्ता व्यवस्था द्रष्टव्या ।।५।। इति सूतिकाससर्गावकारः ।।५।। वर्षे वेक्रमकेऽग्निहगग्रहमहीमाने (१६२.) हि यस्य द्भवः ! परतोऽष्टमी तिथि नशायामे 'द्वतीयेऽभक्त् ।। अस्मिन् वैक्रमवत्सरे रमाको: ( ६१७ ) मिते फाल्गुने । सोऽयं श्रे मधुसूदनो व्यत्तनुनाशीचे समक्षामिमाम् ।। १ ।। इति जन्माला यस्तृतीयः ।।३।। श्रावण्या: AL m

[४]
पाशौचपञ्जिका
अथ मरणाध्यायः।
१०५--अस्मिन् मरणास्याये पुरुषाणां स्त्रीणां विगोत्राणां संसर्गिणां चेति चत्वारोऽधि-
काराः प्रदश्यन्ते।
१८६-- मरणाशौचं शवाशौचं मृताशौचं मृतकं प्रेताशीचमित्येकार्थाः ।
(१) पुरुषाशौचाधिकारः।
आदन्तजननात् सद्य पाचूडान्नै शिको स्मृता ।
त्रिरात्रमावृतादेशाद्, दशरात्रमतः परम्-इत्याहुः ।।
सप्तमो मासो दन्तजननकालः । तृतीय वर्ष चूड़ाकालः । मासत्रयाधिकषड्वर्षादृवं
व्रतबन्धकालः । तेन मरणाशौचविषये सामान्यतश्चत्वारो विभागा उपपद्यन्ते-जन्मार भ्य
सद्यः शौचम् । दन्त जननमारभ्य करात्रम् । चौल संस्कारमारभ्य त्रिरात्रम् । व्रतबन्धसंस्कारमाध्य
दशरात्रम्-इति कर्मपाधा-यवादिना पक्षः। प्रथममाससमारभ्य सद्यःगौचम् । सप्तममासमार-
भ्यै करात्रम् । पञ्चविशमासमारभ्य त्रिरात्रम् । षट्सप्ततितममासमारभ्य दशरात्रमिति कालप्रा.
धान्यवादिनां पक्षः । एषां विभागानां सन्धिस्थानेषु त्रिषु पक्षद्वैविध्याद शौचद्व विध्यमापततीत्यु.
तरत्र प्रदर्शयिष्यते । अत्र प्रथम द्वतीयतृतीयविभागपर्यन्तं बालाशौचमित्युच्यते । चतुर्थ वभा-
गाशौचन्तु प्रौढ शौचम् । किञ्च अत्र प्रथम विभागे .वर्ण साधारण नयमाः । प्रतिज्ञायन्ते
द्वितीयतृतीयचतुर्थेषु वर्णभेदेन । तत्रै देकरात्रं दशरात्रमित्युपलक्षणं स्वस्ववर्णाशी ५.
कालानाम । तथा च वर्णभेदेन भिन्ना आशौच काला: प्रतिविभागं प्रदर्श्यन्ते-
MAANNA
ब्राह्मणादिनां सामान्येन नियमाः ।
१-ब्राह्मणानां जन्मतः षष्ठमासं यावन्मरणे भूमिनिखननम् । तत्र सम्बन्धिनानां सद्यः
शौचम् । केशनखच्छेदनपूर्वकस्नानाच्छुद्धिरिति गौडाः । अथ सप्तममा द तजननं वारभ्य
चतुर्विंशमासपर्यन्तं चौलसंस्कारयर्यन्तं वैकरात्रम । भूमिनिखननंश्मश्रकर्म च प्राग्वदिति गौड़ाः।
खननं दहनं वा विकल्पेनेति दाक्षिणात्याः । अथ पञ्चविंशमासं चौलसस्कारं पारभ्य पञ्चसप्त.
तितममासपर्यन्तं ब्रतबन्धपर्यन्तं वा त्रिरात्रम । तत्र दहं कृत्वा पिण्डदानम् । द्वितीयदिने
स्वस्थिसंचयनं कुर्यादित्येकः पक्षः। अथवा तृतीय दिने पिण्डदानमस्थिसंचयनं नम्वकेशच्छेदनं
च कृत्वा चतुर्थदिने ब्राह्मणभोजन कुर्यादित्यन्यः पक्षः । अथ षट्सप्ततितममासं व्रतबन्ध वारभ्य
दशरात्रादेशः ॥ १॥

आशौचपञ्जिका [४५ ] २-क्षत्रियाणां षष्ठमासपर्यन्त दन्त जननान्तं वा सद्यःशौचम्। चतुर्विशमासपर्यन्तं तदीयचौलकालान्तं चौलसंस्कारान्तं वा द्वयहम्। पञ्चसप्ततितम मासपर्यन्तं तदीयव्रतबन्धकाल- पर्यन्त वा व्रतबन्धान्तं पडहम् । तदूर्ध्व द्वादशाहम् ॥ २ ॥ ३-वैश्या मां षष्टमासपयन्त दन्तजननान्तं वा सद्यःशौचम । चतुर्विशमासपर्यन्तं तहीवचौलकालान्त चौलान्तं वा व्यहम् । पञ्चसप्ततितम मासपयन्त तदीयव्रतबन्ध कालपर्यन्तं व्रतबन्धान्तं वा नवाहम् । तदूर्ध्वं पञ्चदशाहम् ॥ ३ ॥ ४-निकृष्टशूद्राणां षष्ठभासपर्यन्तं दन्तजननान्तं वा सद्यःशौचम् । चतुर्विशमासपर्यन्तं पञ्चाहम् । पञ्चसप्ततितममासपर्यन्तं द्वादशाहम । तदृवं मासमाशौचम ॥५॥ । मरणाशौचदिनानि BARIMALA निमित्तमासाः - - वर्णभेदेन मरणा- ब्राह्मणानाम् सद्यः ३ शौचदिनानि। क्षत्रियाणाम २ ६ वैश्यानाम् " ३ १५ शुद्राणाम् १५ ३० " एष इ सामान्यादुक्तो नियमः । किन्तु प्रतिविभागमत्र निमित्तान्तरानुरोधेन चाशौचे तारतम्यमुपजायते न त्वविशेषेण सर्वत्र सद्यः शौचादिकं यक्तिमेवानुवर्तते । तस्मात् प्रति- विभागं तत्तदनुरोधेन यथायथाशौचे विशेष! जायन्ते तेऽत ऊर्ध्वमादितः प्रदर्श्यन्ते त एवानु- रोद्धव्याः ॥ इति चतुर्विभागाधिकरणम् ॥ २-बालाशौचम् । १०८-जन्मतः प्रागेव शिशुमरणे मृतजातस्य तस्य सम्बन्धेनाशौच द्वेधा सम्भाव्यते- मृताशौचं जाताशौचं च । तत्र मृताशौच कम्यापि नास्तीति नियम्यते। जाताशौचं तु मातुर्दशाह प्रागुक्तं भवत्येव । सम्येषां तु जननाशौचमपि नास्ति ।।

[ ४६ ] आशौचपञ्जिका । --नालच्छेदात् प्राक् शिशुमरणे जातमृतस्या तस्य सम्बन्धेनाप्यशौचं द्वेधा सम्भा- व्यते-जाताशौचं मृताशौच च । तत्र तावन्मृताशौच नास्ति। जननाशौचं तु मातुर्दशाहम् । सापत्न्यमातुः पित्रादिलपिण्डानाञ्च त्रिरात्र भवत्येव । अथवा पितुरेव त्रिरात्रम् । सोदरस्यै क- रात्रम् । अन्येषां तु सपिण्डानां जननाशौचमपि नास्तीति गौड़ानां के चित् ।। ११८-नालच्छेदादृवं दशाहात्प्राक् शिशुमरणेऽपि मातुः पितुः सपिण्डानां च मृताशीचं नाम्नि । जननाशौचं तु कर्मप्रतिषेधलक्षणं स्पर्शप्रतिषेधलक्षण च जन्माध्यायोक्त यथायथं भवत्येव । मातापित्रोदशाहम, सोदरस्य त्रिरात्रम्, अन्येषां तु सपिण्डानां जनना- शौचमपि नास्तीति गौड़ाना केचित् ।। १ ११-दशाहादूचं नामकरणात् प्राक् पुत्रमरणे भातापित्रोरेकरात्र मृताशौचम । त्रिरात्रमिति केचित् ॥ सपिण्डानां तु सद्यः शौचम, सद्यःशौचे सर्वत्र स्नानमात्रेण शुद्धिः । नामकरणं तु दशम्युत्तरकालमेकादशाहे द्वादशाहे वा विहित मतो नाम करणपदं द्वादशरात्रोप- लक्षणम् । तेन यद्यप मामोत्तरं नाम कुर्यात्, तथापि द्व दशाहादेव प्रागिदमाशौचं बोध्यम् । अथाहुः -नामकरणं न कालोपलक्षणम् । तेन द्वादशरात्रे वा मासोत्तरं वा यदेव नाम कुर्यात् तदैव तस्मान्नामकरणात्प्रागिदमाशौचमनुरोध्यमिनि दक्षिणात्य नां केचित् ।। १-दन्तजननात्माग् बालमरणे पित्रादीनां विकल्पः । - ११२ --नाम करणादूचं षण्मास त प्रगज तदन्तमरणे मातापित्रोरे रात्रम्, दन्तमरणे तु त्रिरात्रमिति दाक्षिणात्यानां के चित् । सपिण्डानां तु सद्यःशौचम् ।। ५१३-घरमा मादृध्य इन्तोत्पत्तेः प्राक पुत्रमरणे दाहे खनने वा मातापित्रोवित्रम् । सपिण्डानां व दाहे सत्ये काहः। खनने तु पद्यशौचम। सप्तमे मासे मनुष्याणां दन्तजननं प्रकृत्या सिद्धम् । किन्तु दीपवंशात्वचित् प्रागपि दन्ता जायन्ते पश्चाद्वा। तत्रैन स्मिन् वैकारि- केऽपि दन्तजनने तदनुरोधेन प्राग्वन्नियमा भवन्तीति बोध्यम् ।

আমীৰঞ্জিকা [४] wateTMITTARIUMRATRIOTICESSTORISPRINARENOMINORITara htanARRORONM शशुमरणेऽशौचदिनानि मातुः पित्रादीनाम् सपिण्डानाम् ७ १ जननात् प्राक २ नालच्छेदात् प्राक ३ दशाहात् प्राक ४ द्वादशाहात् प्राक १ सद्यः ५ षण्मासात् प्राक सद्यः ६ दन्तजननात् प्राक ३ इति प्रथमविभागाधिकरणम् । LamRRHAIRMANAND तृतीयवर्षेऽशौच दिनानि HINDIrrymastra uranamansamanartuparsawermecuthoanewwwmIHARIWARINAMum - अकृतचूड़मरणे कृतचूड़मरणे मातापित्रोः सपिण्डानाम् सर्वेषाम् ब्राह्मणानाम् ३ १ ६ २ क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम् शूद्राणाम् १२ १२ Masummam [ ४८ ] স্মাঘীৰ প্পি। २-पञ्चविंशान्मासात्याग बालस्य खननदहनयोनियमाः । ११४--षष्टमासादूर्ध्वं चतुर्विशमासपूर्तेः प्राग बालकमरणे खननमिच्छन्ति गौड़ाः । खननदहनयोविकल्पमिच्छन्ति दाक्षिण त्याः । तत्र खनने सत्येकरात्रं ब्राह्मणकुले द्विरात्र क्षत्रियकुले, त्रिरात्रं वैश्यकुले पञ्चरात्रं शूद्रकुलेऽशौचदिनान्यनुरोध्यानि । वेदाग्निमत्त्वे तु सर्वेषां ब्राह्मणवदेकरात्रम् । अग्निमतामनग्निमतां च सर्वेषां ब्राह्मण बहशाहाशौचमनुभवतामिहापि सर्व ब्राह्मणवदिति परे। ११५-षष्ठमासादृवं चतुर्विशमासपूर्तेः प्राङ् मृतस्य दहने कृते व्यहं ब्राह्मणकुले. षडहं क्षत्रियकुले, नवाहं वैश्यकुले, द्वादशाहं शूद्रकुलेऽशौचं भवति । सत्यग्निदाहे पित्रोरेव त्रिरात्रम, सपिण्डानां तु एकाहमेवेति केचित् । वेदाग्निमत्त्वे तु सर्वेषां ब्राह्मणवत् त्रिरात्रम् । दशाहाशौचं व्यवहरतां तु सर्वेषामिहापि सर्व ब्राह्मणवत् । ५१६-यत्तु केचिदत्र दाहकल्पे ब्राह्मणानां त्रिरात्रम्, क्षत्रियाणामेकादशरात्रम् वैश्यानां द्वादशरात्रम् शूद्राणां विशतिरात्रमशौचमाहुस्तदनादेयम् । क्षत्रियादिष्वाकस्मिकस्येत्थमाशौचा- धिक्यस्यानौजित्यात् । . षष्ठमासादा चतुर्विशमासं मरणेऽशौचदिनानि । खनने दहने ब्राह्मणानाम् ३ २ অভিযামু वैश्यानाम् ३ शूद्राणाम् । इति द्वितीयविभागाधिकरणम् । ११७ -तृतीयं वर्ष चूड़ाकालः । किन्तु कुलाचारवशादशक्यत्वाद् वा तृतीयं वर्षमारभ्य ब्रतबन्धकालपर्यन्तं कालविकल्पेन यथेच्छ चौलकर्माचरन्ति । तत्रैतस्माचौल विधानादाशीचे नियमा विशिष्यन्ते । तथाहि तृतीयवर्षे तावदरमाञ्चौलात प्राङ्मरणे मातापित्रोस्त्रिरात्रं षडात्र आशौचपञ्जिका [४] . नवरात्रं द्वादशरात्रं वा वर्णभेदेनाशौचमादिशेत । इतरेषां तु सपिण्डानामे करात्र, द्विरात्रं, त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा वर्णभेदेन स्यात् । तृतीयवर्षे कृतचूडस्य मरणे तु यहं, षडह, नवाहं. द्वादशाहं वा वर्णभेदेन सर्वेषां पित्रादिसपिण्डानामाशौचमनुवर्तते ! दशाहिनां तु सर्वेषां ब्राह्मणवत् । ३-तृतीयादूर्ध्वात् कृतचूडस्याकृतचूडस्य च नियमाः । १९८-अथ तृतीयवर्षाध्वं व्रतबन्धात् प्राक् कृतचूडस्याकृतचूडस्य वा मरणे तु पित्रादिसपिण्डानां सर्वेषां व्यहाशौचं ब्राह्मण कुले, षडाशौचं क्षत्रियकुले, नवाहाशौचं वैश्यकुले, द्वादशाहाशौचं शूद्रकुले नेयम् । दशाहिनां तु सर्वेषां ब्राह्मणवत् । ५- अष्टमाब्दादुपनीतानामुपनीतयोविकल्पः ११६-अथ मासत्रयाधिकषड्वर्षाद्यात्मात् स्वस्वव्रतबन्धका लादूर्ध्वमनुपनीतस्य मरणे द्वैमत्यं भवति । ये तावत् कर्मप्राधान्यमिच्छन्ति, तेषां गौड़दाक्षिणात्यानां व्यह, षडह, नवाह, द्वादशाहं वा वर्णभेदेन प्रारबदाशीचं विधीयते । अथ ये कालप्राधान्यमिच्छन्ति तेषां गौड़ानां दाक्षिणात्यानां च सम्पूर्णाशौचं प्रवर्तते । दशाह ब्राह्मण कुले, द्वादशाहं क्षत्रियकुले, पञ्चदशाहं वैश्य कुले, मासं शूद्रकुले इति । तत्रेत्थं मतभेदे कुलाम्नायात पारम्प-चारतः शिष्टा- देशतश्च व्यवस्था । दशाहिनां तु सर्वेषामिहापि ब्राह्मणवत् ।। - www पञ्चसप्ततिमासादूर्ध्वमनुपनीत मरणे । ParvatAAISATTIMERE कर्मप्रधानानाम कालाघानाम ArabiaadamsimauktaMERASACHINES LALREILLStammarAmATARA ब्राह्मणानाम १० ६ १२ क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम् ह १५ शूद्राणाम् १२ इति तृतीयविभागाधिकरणम् । बालाशौचं वृत्तम् ) [५] স্বামীবৃঞ্জিকা ३----प्रौढाशौचम् । (प्रौढानां मृतानामाशौचम् ) - १२०-उपनयनं व्रतादेशविविः । तत्र ब्राह्मणस्य ब्रह्मग्रहः, क्षत्रियस्य धनुर्ग्रहो, वैश्यस्य प्रतोदप्रहः, शूद्रस्य तु वस्त्र युग्मग्रहो व्रतादेशे मूलम् । १२१-उपनयनादृचं मरणे सर्वेषां सपिण्डानां स्वर्णोचितं सम्पूर्णाशौचम् । तच्च ब्राह्मणानां दशाहम्, क्षत्रियाणां द्वादशाहम्, वैश्यानां सच्छूद्राणाञ्च पञ्चदशाहम् । निकृष्टशूद्राणां वर्णसङ्कराणां च मासमाशोचम् । सर्वेषां वा दशाहमेवाशौचम् । प्रतिलोम जाता इह वर्णसङ्कर- शब्देनोच्यन्ते । अनुलोमजातानां तु स्वमातृजात्युक्तं द्वादशाहादिरूपमाशौचम् । १२२-~-'सर्वे वा स्युर्दशाहिन' इति नियममनुरुन्धानानां येषां क्षत्रियाणां कुन्ते दशाहा- शौचमेव कुलाचारसिद्धं तेषां ब्राह्मणव देवाशौचं जननमरणयोज्ञेयम् ।। अथ षट्पदाभिधा- नेन क्षत्रियत्वाभिमानिनां वैश्यानां तथा राजपुत्रपदाभिधानेन प्रसिद्धानां क्षत्रियबन्धूनां तथा देशविशेषे केषांचिच्छूद्राणां च कुले द्वादशाहमेवाशौचं पारम्पर्येण व्यवहारसिद्ध दृश्यते तेषां क्षत्रियजात्युक्ताशौचमेव सुधीभिरुपदेष्टव्यम् । पारम्पर्यसिद्धस्यापि व्यवहारस्यानुरोध्यत्वात्- इति गोकुलनाथामृतनाथादयो मैथिलाः । १२३-अथ सोदकानां तु सर्ववर्णानां त्रिरात्रम् । सगोत्राणां तु सर्वेषां सद्यः शौचे स्नानमात्रेण शुद्धिः इति दाक्षिणात्याः । सगोत्राणामेकरात्रमिति केचित् ॥ १२४-कूटस्थमारभ्य सप्तमपुरुषपर्यन्तं सपिण्डाः ! ततश्चतुर्दशपुरुषपर्यन्तं सोदकाः समानोदका: सकुल्या वोच्यन्ते। तत एकविंशपुरुषपर्यन्तं सगोत्रा गोत्रजा वा इत्येकेषां दाक्षिणात्यानाम् । १५-सप्तमपुरुषादूर्ध्वं दशमपुरुषयर्यन्तं सकुल्याः । तदृवं जन्मनामस्मृतिपर्यन्तं सोदकाः,तदूर्ध्वं गोत्रजाः। तत्र सकुल्यानां त्रिरात्रम् । सोदकानां पक्षिणी । गोत्रजानां स्नानमात्र- मिति गौदाः।

प्राशौचपञ्जिका [५] सपिण्डानाम् सकुल्यानाम् सोदकानाम् सगोत्राणाम् ब्राह्मणानाम् ३ १॥ १२ " क्षत्रियाणाम् वैश्यानाम १५ शूद्राणाम् ३० " इति चतुर्थविभागाधिकरणम् । शूद्रवालकानां पृथगादेशः। १२६-'गायच्या ब्राह्मणं निरवर्तयत्, त्रिष्टुभा राजन्यम्, जगत्या वैश्यम्, न केनचि- च्छन्दसा शूद्रं निरघर्तयत्' इति श्रुतेर्वर्णच्छन्दोविभागानुसारेण विभज्य येषां धर्मा व्यवस्थाप्यन्ते तेषु वर्णशब्दः प्रवर्तते । द्विविधश्च स धर्मो भवति-श्रौतः स्मार्तश्च । तत्र ब्राह्मणा- क्षत्रियवैश्यानां द्वविधा अप्येते धर्मा भवन्ति, तस्मात्ते वर्णां उच्यन्ते । शूदाणां तु स्मार्त एव धर्मो विधीयते न श्रौतः । तस्मादेषामापेक्षिकमिष्यते वर्णत्वं चावर्णत्वं च । स यस्मादयं चतुर्थों वर्णोऽवरवर्णश्चाख्यायते तस्मादेषां ब्राह्मणादिवर्णप्रसङ्गेन केचिदाशौचनियमाः प्रागुक्तप्रतिज्ञा- स्वाख्याताः॥ अथ यस्मादयमवर्णः केषांचिदिष्टस्तदनुरोधेनैषां शूद्रबालकानामशौचसम्बन्धेन कञ्चिद् विशेषमप्याहुः, स एष उत्तरप्रतिज्ञानुसारेण द्रष्टव्यः ॥ १२७-शूद्रा द्विविधः: - सच्छूद्रा निकृष्टशूद्राश्च । तत्र श्रद्धया द्विजशुश्रूषवः पञ्चयज्ञा- दिविहितक्रियानिष्ठ': साध्वाचाराः पर्यवदातगुणा विशिष्टयोग्यताशालिनः शूद्राः सच्छूद्रा: ते हि द्विजमण्डली संस्रवयुक्ता: पात्रादनिरवासिताः स्पृश्याश्चेष्यन्ते । ये तु प्रतिलोमजन्मादिविशिष- सांकर्यदोषदूषिता ये वान्त्यजान्त्यावसायिदस्युम्लेच्छभेदैश्चतुर्धा विभका यथेच्छाहार विहारा उन्मर्यादा दृश्यन्ते, ते निकृष्टा अस्पृश्याश्च ।। १२८ - सच्छूद्राणामविवाहितमृतानां षष्ठमासर्यन्नमशौचाभावः। ततः पञ्चमवर्षपर्यन्तं त्रिरात्रम् । ततः षोडशववर्षपर्यन्तं द्वादशरात्रम् । तवं पञ्चदशरात्रम ।।

[ ५२] धाशौचपञ्जिका - १२६-विवाहितमृतानां तु सच्छूद्राणां षष्ठमासपर्यन्तमशौचाभावः। ततः पञ्चमवर्ष यावत् त्रिरात्रम् । ततः षष्ठवर्ष यावद् द्वादशाहम् । तदूर्ध्वं तु पञ्चदशाहम् ।। १३०-अथ निकृष्टशूद्राणामविवाहित मृनानां षष्टमासपर्यन्तमशौचाभावः। ततो द्वितीय- वर्षपर्यन्तं पञ्चाहः । ततः षोडशवर्षपर्यन्तं द्वादशाइः, तदूर्ध्व मासमाशौचम् । अथवा षष्ठमासा- न्तमाशौचाभावः । ततस्तृतीयवर्षपर्यन्तं पञ्चाहः । ततः षष्ठवर्षपर्यन्तं द्वादशाहः । तदृवं मासमा- शौचमिति केचित् ॥ एतां व्यवस्थां नानुमोदन्ते दाक्षिणात्या गौडा के चित् ।। १३१---विवाहितमृतानां तु निकृष्टशूद्राणां पष्ठ मासपर्यन्तं सद्यः शौचम् । ततो वि वर्ष- प्र्तेः प्राक् खनने पञ्चाहम् । दाने द्वादशाहम् । तृतीये तु वर्षे मातापित्रोद्वादशाहम्। सपिण्डानां पञ्चाहम् । ततः षष्ठवर्षपर्यन्तं सर्वेषां द्वादशाहम् । ततः पोडशवर्षपर्यन्तं द्वादशाहं वा मास वेति विकल्पः । षोडशवर्षादूर्ध्व तु मासमेवेति सिद्धान्तः । एवमेव सर्वेषां शूद्राणामविशेषेणाशौ च- व्यवस्था बोध्येत्याहुर्बहव इति दिक् ।। सच्छूद्राणाम निकृष्टशूद्राणाम् अविवाहि- विवाहि-अविवाहि- विवाहितानाम् तानाम् तानाम् तानाम १ षष्ठमासान्तम् २ द्विवर्षान्तम ३ ३ ५ खन०१२ दह ३ त्रिवर्षान्तम् ३ ३ १२ ५सपिच १२मातापित्रोः ४ पञ्चवर्षान्तम ३ ३ १२ १२ १२ १२ १२ १२ षष्ठवर्षान्तम् ६ षोडशवर्षान्तम १२ १२ वा०३० वा. ७ यावज्जीवनम् १५ १५ ३० २ न इति शूद्राधिकरणम्! इति पुरुषाशौचाधिकारः प्रथमः ॥ १ ।

श्राशौचपञ्जिका [ ५३ ] २--स्त्यशौचाधिकारः। १-मातापित्रोमरणेऽपत्यादीनाम् १३२-मातापित्रोमरणे दशाहमध्ये मरणरणे सत्यूढायाः कन्यायास्त्रिरात्रम्, दशाहोल वत्सरान्ते कालान्तरे वा मरण श्रवणे पक्षिणी। अतिक्रान्ताशौचमत्रैवानुवर्तते ब्राह्मणवचनान्ना- न्यत्रेति दाक्षिणात्याः इति कन्यानुयोगिकाधिकरणम् ।। १ ।। २-कन्यामरणे पित्रादीनाम् १३३-कन्यास्तु जन्मावधि दन्तोत्पत्तिपर्यन्तं मरणे दाहे खनने वा मातापित्रोरेकाहः । त्रिपुरुषसपिण्डानां सोदरभ्रातुश्च सद्य शौचम् । अन्येषां त्वशौचं नास्ति ।। २ ॥ १३४-दन्तोत्पत्तेरूवं वर्षत्रयपर्यन्तं कन्यामरणे मातापित्रोखिदिनम् । त्रिपुरुषसपि- एडानां तु सद्यः शौचम् । अन्येषां त्वशौचं नास्ति ।। २ ।। १३५-वर्षत्रयादृवं वाग्दानात् प्राक न्याया मरणे मातापित्रोम्यहाशौचम् । त्रिपुरु- षसपि डानां त्वेकाहः। अन्येषां त्वशौचं नास्ति ॥ ३ ॥ १३६--वागढ़ानोत्तरं विवाहात् प्राक् कन्याया मरणे पितृकुले भर्तृ कुले च पित्रादीनां सर्वेषामासप्तमपुरुषं सपिण्डानामेकाहः इति दाक्षिणात्याः । त्रिरात्रमिति केचित् । १३७-गौडास्त्वाहुः-कन्याया जन्मावधि द्विवर्षाभ्यन्तरेण भरणे सर्ववर्णानां पित्रा- दिसपिण्डानां सद्यः शौचम् । द्विवर्षोपरि वाग्दानात् प्राग एकाहः । वाग्दानोत्तरं विवाहात् प्राक् कन्यामरणे भर्तृकुले पितृकुले च त्रिरानम् । यत्र तु वाग्दानं न जानं नत्र द्विवर्षानन्तरं विवा- हपर्यन्तमेकाहोरात्रम् । दाहकर्तुत्वत्रापि त्र्यहाशौच मेवेत्याहुः । अयमेव पक्षः सम्मतो मैथिल'- नाम् । तत्र देशाचाराद् व्यवस्था । १३८-विवाहोत्तरं तु पतिगृहे समाभिगृहे वा मरणे मातापित्रोः सापत्नमातुः सोदर- भ्रातुश्च त्रिरात्रम् । भ्रातुः पक्षिणीति केचित् । एकाश्रमवासिनां वैमात्रेयभ्रातृपितृव्यानत्पुत्रादीनां त्वेकाहः। पितुर्भिन्नाश्रमवासिनां तु भ्रानादीनामाशौचं नास्ति ! पित्रादीनामप्यशौचं नास्तीति केचित् । भर्तृ कुले तु स्त्रवर्णोचित सम्पूर्णाशौचम् । १३६-दत्तकन्यायाः पितृगृहे मरणे प्रसवे च पित्रोः संसर्गशून्ययोस्त्रिरात्रम् । सापत्न- मातुः, सापत्नभ्रातुः, सोदरभ्रातुश्च त्रिरात्रम् । इतरेषां तु संसर्गशुन्यानां बन्धुवर्गाणामेकरात्रम् ।

[ ५४ ] आशौचपञ्जिका ७ संसर्गिणां तु सर्वेषां पुर्णाशौचम् । एतत् सर्वं सर्ववर्ण साधारणम् । बन्धुवर्गास्तु एकक्रियापन्ना एकाश्रमस्था भ्रातृवैमाऽत्रेयपितृव्यतत्पुत्रादयो भवन्ति । इति कन्याप्रतियोगिकाधिकरणम् । ३-भार्यामरणेऽपत्यादीनाम् -~आर्यामरणे पत्युर्दशाहः । परपुर्वायास्तु भाया मरणे सर्वेषां वर्णानां त्रिरात्रम् । समानजातीयोत्कृष्टजातीयपुरुषान्तरसंगृहीतस्त्रभार्यामरणे सर्वेषां त्रिरात्रम् । हीनवर्णोपभुक्तायास्तु मरणे नाशौचम् । ४-परपूर्वाया भार्याया मरणे १४१- विवाहिता स्त्री स्वतन्त्रा भूत्वा यदि पाणिग्राहकादन्ये पुरुषमाश्रयति तदा यं यमाश्रयति तस्य तस्य पुरुषस्य तस्यां मृतायां त्रिरात्रमाशौचं भवति। किन्त्वस्य स्वयंप्राहकपुरुषस्य ये कुलजानाः सपिण्डादयस्तेषामाशौचं तत्र नास्ति । यदि च पाणिग्राहकेरण तस्याः संगमः कृतस्तदा तस्याः परपुरुषाश्रयणेऽपि पाणिग्राहकगोत्रमेव तिष्ठति न स्वयंग्राहकगोत्रमनुवर्तते । किन्तु यदि तस्यास्ते न सङ्गमो न कृतस्तदा येनान्येन प्रथमं सङ्गता ग्यात् तत्सगोत्रा सा संपद्यते । एवमपि तस्य स्वयंग्रहत्य व्यहमेव तत्राशौचं न तु सगोत्रत्वादशौचवृद्धिः । १४.---अथ पाणिग्रहणे वृत्ते सप्तपदीसमारोहणे त्वसमाप्ते यदि बलादपहता स्यात् तदा यावदेषा न प्रसूते तावत् पितृगोत्रावतिष्ठते । प्रसवान नरन्तु सा पौवि कस्यानिस्थाने पाणि- प्राहकस्य स्वामिनः सगोत्रा भवति न तु बलात्कारेण हतोत्रं सा गृह्णाति । तेन तर मरणेऽप- हर्तुस्विरात्रमेवाशीचं स्यात् । इति भार्याधिकरणम । इति स्त्र्यशौचाधिकारः ॥२॥ ३-विगोत्राधिकारः १४३-पुरुषस्त्र्यधिकारयोः सपिण्डसकुल्य सोदकगोत्राणा सगोत्रत्वमेवापेक्ष्याशौच. विधयः प्रतिज्ञाताः । अथोत्तरोबिंगोत्रत्वमपेक्ष्य वक्तव्याः। तत्र विगोत्राः सप्त भनिमित्तैराशौच- भाजो भवन्ति योनिसम्बन्धात, विद्यासम्बन्धात, प्रीतिसम्बन्धात्, सादेश्यसम्बन्धात कर्मसम्बन्ध त् धर्मसम्बन्धात्. स्पर्शसम्बन्धाच! तत्र योनिसम्बन्धाद्विसम्बन्धाच्चा सन्नविगोत्राः सम्बन्धनो बन्धश्चीच्यन्ते । तदितरे तु संसर्गिणः । तस्मादधिकारद्वैविध्येन विभज्य ते निरूप्यन्ते। १४४ --(१) भ्रातृभगिन्योः । (२) मातुलभागिने ययोः । (३) मातामह दौहित्रयोः । (४) जामातृश्वशुरयोः। (५) भामश्याज कयोः । (६) पितृष्वसृभ्रातृव्ययोः । (७) मातृष्वमृभागि आशौचपञ्जिका [ ५५ ] damad नेययोः । (८) पुंबन्धूनाम् । (६) स्त्रीबन्धूनाम् । (१०) दत्तकप्रतिग्रहीत्रोः । (११) गुरुशिष्ययोः । (१२) सहाध्यायिनोश्च । परस्परमशौचाधिकरणानि द्वादश। -भगिनी-मातुल-मातृश्वस-श्वशुरादीनां विगोत्राणां योनिसम्बन्धिनामाशौचम् १४५-भ्रातृभगिन्यो: परस्पर गृहमरणे परस्परस्य त्रिरात्रम् । गृहान्तरमृतौ तु परस्परस्य पक्षिणी। सर्वत्र भगिन्यां मृतायां पक्षिणीत्ये के। १४६-मातुलमरणे भगिन्यपत्यस्य पक्षिणी । उपकारादिसम्बन्ध विशेष स्वगृहग्थे वा मृते त्रिरात्रम् । पैतृष्वस्रीयगृहे मातुलपुत्रस्य मरणे पैतृष्वस्रीयस्य विरात्रम् । अन्यथा त्वेकाहः । मातृवैमात्रयस्य मरणे भागिनेयस्याहोरात्रम् । मातुलान्या मरणे भत भगिन्यपत्यस्य पक्षिणी । उपनीतभागिनेयमरणे मातुलस्य मातुल भगिन्याश्च त्रिरात्रम् । अनुपनोतभागिनेयमरणे तु मातुलस्य मातुल भागन्याश्च पक्षिणी । सर्वत्र भागिने यमरणे पक्षिणीत्येके । १४७---मातामहमरणे दुहित्रपत्यस्य त्रिरात्रम् । मातामहीमरणे दुहित्रपत्यस्य पक्षिणी । उपनीतदौहित्रमरणे मातामहस्य मातामह्याश्च त्रिरात्रम्। अनुपनीतदौहित्रमरणे तु पक्षिणी । सर्वत्र दौहित्रमरणे पक्षिणीत्येके । १४८-श्वशुरयोमरणे सन्निधौ सति जामातुखिरात्रम्। एकरात्रमित्ये के । सन्निधिस्त्वेक- गृहस्थितिः । असन्निधौ त्वेकग्रामस्थत्वे पक्षिणी। ग्रामान्तरस्थयोस्तु तयोमरणे रात्रिमात्रमहोरानं वा। श्वशुरयोमरणे निर्गुणजामातुः पक्षिणीत्यन्ये । जामातृमरणे तु श्वशुरयोरे काहः, सद्यः शौचं वा । १४६-श्यालकमरणे भगिनीभर्तु रेकदिनमात्रम् । अहोरात्रमित्येके । श्यालकसुतमरणे तु स्नानमात्रम्। १५०-पितृष्वसुमरणे भ्रात्रपत्यस्य पक्षिणी । भ्रातृपुत्रगृहे तु पितृष्वसुमरणे भ्रातृपुत्रस्य त्रिरात्रमा १५१-मातृष्वसुमरणे स्वस्रपत्यस्य पक्षिणी। भगिनीपुत्रगृहेतु मातृध्वसुमरणे भगिनी- पुत्रस्य त्रिरात्रम। १५२-पितृष्वस्रीय-मातृष्वस्रीय-मातुलपुत्रा बाधवाः । ते चैते त्रेधा-आत्मवान्धवाः, पितृबान्धवाः मातृबान्धवाश्चेति । तथा च पितृष्वसुः पुत्रो, मातुःध्वसुः पुत्रो, मातुलपुत्रश्चेत्यात्म. बान्धवाः । पितामहभगिनीपुत्रः, पितामहीभगिनीपुत्रः, पितामहीभ्रातृपुत्रश्चेत्येते पितृवान्धवाः । मातामहभगिनीपुत्रो, मातामहीभगिनीपुत्रो, मातामहीभ्रातृपुत्रश्चेत्येते मातृवान्धवाः । तत्रात्म.

[ ५६ ] आशौचपञ्जिका बन्धुत्रयमरणे पितृबन्धुत्रयमरणे च सर्ववर्णानां पक्षिणी । मातुलपुत्रे मृते एकरात्रमित्येके । मातृबन्धुत्र यमरणे तु सर्ववर्णानां पक्षिणी वाऽहोरात्रं वेति विकल्पः । १५३-पितृष्वस्रादिकन्यानां विवाहितानां मरणे सत्येकाहः । १५४-दत्तकपुत्रप्परणे पूर्वापरपित्रोस्त्रिरात्रम । सपिण्डानां त्वे काहः । पूर्वापरपित्रोमरणे दत्तकस्य दशाहम् । देशान्तरस्थे तु त्रिरात्रम् । दत्तकपुत्रस्यासपिण्डकुन्नाद्गृहीतस्य पुत्रपौत्रादीनां मरणे सपिण्डानामे काहः । सपिण्डे तु पुत्रीकृते सपिण्डानां दशाह एव ! १५५-क्षेत्रजादिष्वेकादश विधेषु पुत्रेषु मृतेषु मातापित्रोत्रिरात्रम् । क्षेत्रजादीनामपि मातापितृमरणे त्रिरात्रम्। १५६---एकमातृकथोभिन्नपितृकयोीत्रोरेकस्य मरणे परस्य स्वमातृजात्युक्तं पूर्णाशौ- चम् । पितुस्तु तयोमरणे त्रिरात्रम् । तत्सपिण्डानां तयोमरणे एक गत्रमाशौचम् । १५७-प्रथममन्येनोढ़ा तेनैव जनितपुत्रा च सा पुत्रसहितैवान्यमाश्रिता पश्चात्तेनापि जनितपुत्राभूत् । तत्र तयोः पुत्रयोर्यथासम्भव मरणे द्वितीयपुत्रस्य यः पिता तस्य त्रिरात्रम् । तत्सपिण्डानामे करात्रम् द्वितीयपुत्रस्य यः पिता तस्य मरणे तु तथाविधपुत्रयोरपि त्रिरात्रम् । तथाविधपुत्रयोस्तु परस्परं मरणे प्रसवेऽपि वा मातृजात्युक्ताशौचम् ॥ इत्थं योनिसम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः॥१॥ २- गुरुशिष्यादीनां परस्परमाशौचम् । १५५--आचार्यमरणे तत्संस्कारकतुः शिष्यस्य दशरात्रम्। यन्तु संस्कार न करोति तथाविधस्य शिष्यस्य त्रिरात्रम् । प्राचार्यपनिमरणे, आचार्यपुत्रमरणे च गुरुकुलस्थितस्य शिष्यस्य त्रिरात्रम् । समावर्तनोत्तरं स्वगृहस्थस्य शिष्यस्य तयोराचार्यपुत्रपल्योमरणे एकाहः । गुर्वङ्गना- मरणे पक्षिणीत्यप्याहुः । १५६ --उपनीय किञ्चिद्वेदाध्यापके, अनुपनीय सम्पूर्णवेदाध्यापके च गुरौ मृते पक्षिणी। तथाविधगुरुपत्न्याञ्च मृतायां पक्षिणी । १६०-यत्किञ्चिध्यापकोपाध्यायमरणे शिष्यस्यैकरात्रम् । तादृशोपाध्यायपन्याच मृतायामेकरात्रम् । तदुपाध्यायपुत्रे च मृते एक दिनमात्रं रात्रिमोत्रं वा । १६१ - उपनीयाध्यापक आचार्यः, वेदैकदेशाध्यापक उपाध्यायः । १६२--आचार्यगृहस्थितशिष्यमरणे आचार्यस्य त्रिरात्रम् । उपनीय वेदै कदेशमध्यापि- तस्य अनुपनीय सम्पूर्णशाखामध्यापितस्य शिष्यस्य मरणे उपाध्यायस्यैकाहोरात्रम् ।

श्राशौचपञ्जिका [५७ ] -वेदे सहाध्यायिनोमरणे पक्षणी । यत्किञ्चित्साठे सहायध्यायिनोमरणे एकाहः । सम नब्रह्मचर्ये एकस्माद् गुरोर धीयाने मृते इतरस्यैक रात्रम् । समानब्रह्मचर्ये भिन्नाद् गुरोरधीयाने अपरस्यकदिनमत्रं रात्रिमानं वा। इत्थं विद्यासम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः ॥ २ ॥ इति बिगोत्राधिकार ॥ ३ ॥ ४-संसर्गाशौचाधिकारः । (१- मित्रमरणे) १६४-- सन्निधिवासि मिन्नं यद्गृहे म्रियते तद्गृहस्थस्य त्रिरात्रम् । अन्यादृशं मित्र यद्गृहे म्रियते यस्य पक्षिणी । स्वमित्रस्य स्वगृहादन्यत्र मरणे एकराम्॥ इत्थं प्रीति सम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याता (३) (२-श्रोत्रियादिमृतौ स्वगृहेऽन्य मरणे च ) १६५.-श्रोत्रियो यद्गृहे नियते तस्य गृहस्थस्य त्रिरात्रम् । अश्रोत्रिय स्वगृहे मृते- करात्रम् | भगवानगिरावाई- गृहे यस्य मृतः कश्चिदस पिण्डः कथंच न. तस्याप्तशौचं विज्ञेयं त्रिरात्रमिति 'नश्चयः ।। विकल्पे त्वाचार: प्रभागमाप्नवचनं च । अथ एकग्रामे श्री यमरणे ग्रामवासिनामेक- रात्रम् । इत्थं सादेश्यसम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः ॥ ४ ॥ (३-ऋत्विगादिमरणे) १६६-यद्गृहे ऋविङ्गम्रियते तस्य यजमानस्य त्रिरत्र ! अन्यत्र मृते त्वेकरात्रम् । सदा याज्ये यजमाने मृते याजकस्य त्रिरात्रम् ॥ इत्थं कर्मसम्बन्धिना विगोत्रा व्याख्याता. । (५) (४- महाराजमरणे) १६७- स्वतन्त्रस्य महाराजस्य स्वकर्मस्थस्य मरणे प्रजानामे काहोरात्रम् । अस्वकमस्थे राजनि मृते एक दिनमात्रं रात्रिमात्रं वा ॥ इति धर्मसम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः ॥ (६) ( ५-श्राशौचिनामनभोजनादौ) १६६-श्राशौचिनामनभोजन कशध्यासनादिसहवासभूयस्त्वपरिशीलने यावत्तेषां निमिचिनामशौचं तावदेवैषां संसर्गिणामप्यशौचमनुवर्तते । अशौचिगृहाणामशौचिस्वामिकानां

[५]
भाशौचपञ्जिका
वा द्रव्याणां संसर्गे तु नाशौच सम्बन्धः । इत्थ मङ्गस्पर्शतः सम्बन्धिनो विगोत्रा व्याख्याताः (७'
इति संसर्गिविगोत्राः।
सप्तानाम येषां विगोत्रत्वा विशेषेऽपि योनिसंवन्धिनां विद्यासम्बन्धिनाचा सन्न विगोत्रत्वम्,
इतरेषां तु संसगित्वम् इत्येवं द्वेधाधिकारो विभज्यते इति बोध्यम् । इति संसर्गाशौचाधिकारः । ४
१६९-आद्या दक्षिण कालिका भगवती श्यामा कुले देवता
स्वाम्नायोऽपि च दक्षिण: शिवपथः स्मार्तोऽस्ति यस्यान्वये ॥
दीक्षा यस्य शिवागमे शिवतमे धर्मे च निष्ठाऽधिका
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षाभिमाम् ॥ १॥
इति मरणाध्यायश्चतुर्थः ॥ ४॥

प्राशौचपञ्जिका
[6]
५-अथोत्तरक्रियाध्यायः ।
१७.-तत्र रोदनं स्पर्शमलङ्करणमनुगमनं वहनं दहनमुदकदानम् पिण्डदानं चेत्यष्ठा-
बुत्तरकर्माणि भवन्ति । अत्रापि दहनं द्वेधा-शवदहन प्रतिकृतिदहनञ्च । तदित्थं नव कर्माणि-
तेषामेकैक कुर्वतो वैलक्षणण्येनाशौचमनुवर्तते इत्यतस्तद्विविच्यते ।
१-दनाधिकारः।
-
( रोदने श्राशौचम् )
१७१-शूद्रे मृतेऽस्थिसञ्चयनकालाभ्यन्तरे तद्गृहे गत्वाऽश्रुनिपातं कुर्वतो द्विजस्य
त्रिरात्रम् । स्थानान्तरे त्वश्रुनिपातं कुर्वतोऽहोरात्रम् । शूद्रस्य तु सर्वत्र नक्तेन शुद्धिः ।
१७२-शूद्रे मृतेऽस्थिसञ्चयनकालावं मासाभ्यन्तरे तद्गृहेऽश्रुपातने द्विजस्याहोरात्र-
मशौचं सचैलस्नानं च । शूद्रस्य तु सर्वत्र रोदने नन शुद्धिः ।
१७३-मृतशूद्राबान्धवैः सह रोदनहितविलापमात्रे ब्राह्मणस्याहोरात्रम् ।
१७४- अस्थिसञ्चयनकालस्तु पूर्णशौचे ब्रह्मणस्य चतुर्थीहः । क्षत्रियस्य षष्टाहः !
वैश्यस्याष्टमाहः । शूद्रस्य दशमाहः । व्यहा शौचे तु सर्वेषां द्वितीयाहः । अस्थिसञ्चयनदिनेष्वेव
तेषां तेषामस्पृश्यता निवर्तते । असति विशेषाभिधाने कर्माशौचत्रिभागकालेनास्पृश्यतानिवृत्तेः ।
सिद्धान्तात् ।
१७५-अथ वैश्यक्षत्रियगो हे रोदने द्विजस्य द्वथहेन शुद्धिः । शूदस्य नक्तेनैव शुद्धिः।
१७६-विप्रगृहेऽस्थिसञ्चयनात् पूर्व रोदने द्विजस्यैकाहेन शुद्धिः । शूद्रस्य तु नक्तेन ।
॥ इति रोदनाधिकारः ॥१॥
१-ए-दधिकारोक्ताः सिद्धान्ता शुद्धितत्त्वे प्रतिज्ञाताः ।
२-स्पर्शनाधिकारः ।
( स्पर्शने आशौचम्)
१७७-दिवा शवस्पर्शे नक्षत्रदर्शनाच्छुद्धिः । रात्रौ शवस्पर्श सूर्यदर्शनाच्छुद्धिः ।
१७८-असजातीयशवस्पर्शे शवजात्युक्ताशौचमनुवर्तते ।
इति स्पर्शनाधिकारः॥२॥

[ ६. ] प्राशौचपञ्जिका SCSmackermanJmdane ३-अलङ्करणाधिकारः। (असजातीयशवस्पर्श) १७६-नानादिविधानं सिन्दूराद्यर्पणं रथिसम्पादनं चेत्येतत् सर्व मलङ्करमा 'भागे गण्यते । १८...-अपिण्डालङ्करणे ज्ञानत पादकृच्छम। अजा पादुपक्षास अशक्तौ स्नानमात्रम्। इन्यङ्करणाविकारः। ४-अनुगमनाधिकारः। १८६-सपिण्डशबानुगमने दोषो नास्ति । असपिण्डेऽप्यनाथक्रियायां दोषो नास्ति । १८२-तुल्यवणस्योत्कृष्टवर्णस्य वा शवस्यानुगमने सचैल स्नात्वाऽग्नि स्पृष्ट्वा घृतं प्राश्य पुनः स्नात्वा प्राणायामशतं कुर्यात् । हीनवर्णशवानुगमने तु क्षत्रिये एकाहः । वैश्ये पक्षिणीति दाक्षिणात्याः । द्वयहमिति गौड़ाः शूद्रे त्रिरात्रम् स्नानादिकं च प्राग्वत् । प्रमादाच्छूद्रशानुगमने ब्राह्मणस्य सचैलस्नाग्निस्पर्शधृतप्राशनैः शुद्धिः । इत्यनुगमनाधिकारः। ५-६--वहनदहनाधिकारी। १५३ - यदि वहनमानं कुर्यात् न दहनम्, यदि वा दहनमात्रं कुर्यान्न वहनमः यदि वोभयं 'कुर्याद्वहनं दहनं च त्रेधाऽप्येवं तुल्यसेवाशौच प्रवर्तते । १८५--मातुन्नमातृवस्मृपितृष्वस प्रभृतीनां यदि वह नं दहनमुभयं वा क्रोति तञ्च स्नेहेना- स्नेहेन वा कोनि तदा सर्ववर्णानां त्रिरात्रमेवःशौचम् न तु पक्षिणी, अहोरात्रम्. एकरात्रं वा । १८५-मातुलादिसम्बन्धिभिन्नानां तु सवर्णनां स्नेहेन निहरिं कुर्वाणानां संस्रवविशेषा. भावे सद्गृहवासाभावे तदन्न भोजनामावे च सति निहरण मात्रेणैकाहमाशौचम् नद्गृह वा सामावे तदन्नभोजनाभावेऽपि संसव विशेष सत्त्वे त्रिरात्रम् । संस्रवविशेषाभावे तदन्नभोजनाभावेऽपि नद्गृहवाससत्त्वे निरात्रम् । विविक्ततद्गृहवाससत्त्वे त्वहोरात्रम् । आशौचिकुलान्न भोजने तु तद्गृहबासेऽस्सलद्गृहवासेऽपि तत्तुल्याशीचं दशाहादि भवति । भृतिग्रहण नोभं बिना स्कन्ध- दानं स्नेहेन. निहारः। १८६-भृनिग्रहणलोभातू सवरपेनिहारं कुर्वाणस्य मृतकजात्यशौचं दशाहादिकमनुवर्तते छाशौचपञ्जिका - १८८-स्नेहेन विजातीयनिहार कुर्वाणस्य मृतकजात्यशौचं दशाहादिकं स्यात् । भृप्तिग्रहणेन लोभाद्विजातीयनिहरिं कुर्वाणस्य तु मृतकजात्यशौचाद् द्वगुणसाशौचं प्रवर्तते । १८८-अनाथस्य तु सवर्णग्य धर्मबुध्यः निहारे सद्यः शौचम् । तत्र सचैतस्नानासि- पर्शघृतप्राशनैः प्राणायामशतोत्तरः शुद्धिः। धर्मार्थमनाथसवर्ण निर्हरणादावपि मातुनादिसम्बन्धे सति त्रिरात्रमेवाशौचम्, न तु सद्यः शौचं स्यात् असम्बन्ध एव बोदुः सद्यः शौचचम् । सम्बन्धे तु सति बोदुखिरात्रमिति पैठोमसिना नियमितत्वात् । १८६-६६नं कुर्वाणस्याप्येतत्सर्वं यथावन्नेयम् । चितायां करीन्धनदानं दहनम् । यस्तु चिताधूमं सेवते तस्य स्नानाच्छुद्धिः । इति वाहदाहाधिकारः। ७-प्रतिदहनाधिकारः । ६ ( प्रतिकृतिदहने पुत्र-सपिण्डादीनामाशौचम् ) ११०-दशाहमध्ये अपिताग्नेरस्थिदाहे प्रति कृतिदाहे वा सर्वलपिण्डानां शेषदिवसैरेव शुद्धिः । दशाहादूर्ध्व तु आहिताग्नेरस्थिदाहे प्रतिकृतिदाहे वा सर्वस पिण्डानां दशाहा- द्याशौचं स्यात् । ११-अनाहिताग्नेस्तु-अस्थिदाहे पर्णशराहे च पनी पुत्रयोः पूर्वमगृहीताशौचयोर्द- शाहादिकं पूर्णाशौचम् । गृहीताशौचयोस्तु पत्नीपुत्रयोः संस्कार कालेऽपि त्रिरात्रम् । पत्ने संस्कारे पत्युरप्येवम् । सनिसंस्कारे सपत्न्या अप्येवम् । १६२-अन्यसपिण्डानां तु पूर्वमगृहीताशोचानामना हिताग्निसंस्कारकाले त्रिरात्रम् । पूर्वगृहीताशौचानां तु सपिण्डानामनाहिताग्निसंस्कारकाले स्नानमात्रम् । इति प्रतिदहनाधिरः । ८,९ उदकदान-पिण्डदानाधिकारी। ( उदकदानपिण्डदानयोरशौचं प्रायश्चित्तं च) १६३ --शुदकदानं पिण्डदानं चेत्यौदे दकं कर्म । धसम्बन्धे सत्यौदेहिक क्रियाकरणे द्विविध कल्मषं संसज्जते-अचं च, एनश्चेति । तत्रावस्याशौच कालेन शुद्धिर्भवति । एनसस्तु

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श्राशौचपञ्जिका
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1
दुरितदुष्कृत दिपर्यायस्य विशिष्ठप्रतादिपुण्यकर्म करणादपने दनं भवति । अतस्तत्रो भयमादिश्यते-
अशौचशुद्धिश्च प्रायश्चित्तं चेति । तत्र प्रायश्चित्तं यथा-स्वस्मादुत्कृष्टानां सर्ववर्णानामौर्वदेहिक-
क्रियाकरणे मृतकजातीयमाशौचं प्रवर्तते । तदशौच निवृत्तौ च कृच्छत्रयं कुर्वात् ।
१६४-स्वरमा निकृष्टानां सर्ववर्णानामौलदेहि रुक्रिया करणे मृतक जातीयमाशौचं
भवति । तन्निवृत्तौ च कृच्छु-यं द्विगुण चतुर्गुणा वा वर्ण निकृष्टतातारतम्ये न कुर्यात् । अशौच.
शुद्धिप्रकरणे प्रसंगादियमत्र पातकशुद्धिरप्याख्यातेति दिक । इत्युदकपिण्डदानाधिकारः ।
१६५-शाण्डिल्यासित देवल प्रवरकः शाण्डिल्यगोत्रः सुधी-
श्छन्दोगः पथि कौथुमे चरति यो वेदस्य सामात्मनः ।।
कृत्यं गोभिलसूत्रत्तो हि कुरुते योनाहितानिदिजः
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुनाशीचे समक्षामिमाम् ।। ॥
इत्युत्तरक्रियाध्यायः पञ्चमः ॥ ५ ॥

স্বামীঞ্জি ६-अथ दोषाशौचाध्यायः। १६६-अत्राध्याये संसर्गदोषाधिकारः, आत्मीयदोषाधिकारः, कालदोषाधिकारः, रजो- दोषाधिकारः-इति चत्वारोऽधिकाराः प्रदर्श्यन्ते । १९७-अन्यपूर्वागृहे यस्य भार्या स्यात्तस्य नित्यशः । आशौचं सर्वकार्येषु गृहे भवति सर्वदा ॥ १ ॥ क्रियाहीनस्य मूर्खस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः ॥ २ ॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्य नित्यशः । श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तं सूतकं भवेत् ॥ ३॥ १-संसर्गदोषामित्याशौचम् । १९८-परपूर्वा पाणिगृहीता यस्य द्विजातेहाधिकारिणी भवति तस्य होमदानप्रतिप्र- हारिफलसिद्धिप्रतिबन्धकं सार्वकालिकमशौचं वाच्यम् । इति संसर्गदोषानित्याशौचम् । २-आत्मीयदोषान्नित्याशौचम् । १९६-यः कर्मकरणादावसामर्थ्यप्रयोजकदीर्घरोगेण सर्वज्ञा प्रस्तः स्यात् । योऽर्थसंप्रह- प्रवणो लोभादात्मानं पुत्रदारान् धर्मकृत्यं च परिपीडयन्नान् प्रचिनोति । यः सर्वदा ऋणप्रस्त- तया नित्यं धनिकासेधितः स्यात् । यो उपनयनादिसंस्कारहीनः स्यात् । यो गायत्रीरहितः स्यात् । यो भार्यावशंवदतया गुरुनिभर्सकः स्यात् । यो कार्यगतचित्ततया नित्यकर्माद्युपेक्षकः स्यात् । यः परायत्ततया निजावश्यकधर्मकर्मसु मित्यमलब्धावसरः स्यात् । यो वा श्रद्धा विहीनः स्यात् । यो नित्यं दानपराङ्मुख: स्यात् । ईदृशाना स्वविधेयधर्माचरणे मनो-योगालाभात्तत्कृतं कर्म नास्तीत्यशुचि साधर्म्यमर्थसिद्धं बोध्यम् । इदमाशौचं जननमरणादिनिमित्तकाशौचादिनमेव प्रतिपद्यते । तच भस्मान्तं मरणान्तं वाशौचमित्युच्यते ॥ इत्यात्मीयदोषाचित्याशौषम् । -

आशौचपलिका
३-कालदोषाद् याप्याशौचम् ।
२०.-चन्द्रसूर्योपरागादावपि पूर्व विलक्षणमशौचं दोषवशादुत्पद्यते ! तञ्च यावन्निमि-
त्तकालमवस्थाय निमित्तापायेन सह निवर्तते इति दिक !
इति कालदोषाद याप्याशौचम् ।
४-रजोदोषाद् याप्याशौचम् ।
(रजस्वलाशुद्धिः)
२०१-- रजस्वलाया: सप्तदशदिनात प्राकः पुना रजोदर्शने सद्यः शौचम् । तत्र स्नानमा-
त्राच्छुद्धिः । अष्टादशे दिने रजोदर्शने सत्येकरात्रम् । एकोनविंशदिने रजोदर्शने सति दिनद्वयम
विंशतेरुवं तु रजोदर्शने दिनत्रयमाशौचम् ॥ १ ॥
२०२~यस्यास्तु विंशतिदिनाांगेव प्रायेण रजोदर्शनं भवति तस्या दशमदिनात प्राक
पुनारजोदर्शने स्नानमात्रम् । एकादशे दिने सत्येकरात्रम् । द्वादशे द्विरात्रम् । त्रयोदशदिनादारभ्य
त्रिरात्रम् ॥३॥
इति रजोदोषाद याप्याशौचम् ।
--
२०३-राजद्वारमुपागतो जयपुरे वर्षे चतुर्विशके
यः संमानमवाप्य राजभवने मत्स्यप्रदेशप्रभोः ॥
श्रीमन्माधवसिंहभूपतिमणेर्धर्मोपदेष्टाऽभवत्
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥ १॥
इति दोषाध्यायः षष्ठः ॥६॥

आशौचपञ्जिका [६५ ] ७-अथ प्राशौचसंकराध्यायः । २०४-पातः । अघसङ्करः। अशौचसङ्करः । अशौचसम्पातः । अपरपातः। उपनिपातः । सपाताशौचम् । सकी शिौचम्-इत्येकार्थाः । अघवृद्धिमदाशौचं त्वस्यैकदेशः ।। २०५--अत्राध्याये गौड़संप्रदायो द्राविडसम्प्रदायः फक्किका चेति त्रयोऽधिकाराः प्रदान्ते। १-गौडसम्प्रदायाधिकारः । २०६-पूर्वानुक्रान्ताशौचस्य कालविभागेनाशौचान्तरपाते तद्विभागानुसारेण सङ्कीणा- शौचं प्रवर्तते । तत्र कालविभागः पञ्चधा-पूर्वाशौचस्य प्रथमन्दिनमेको भागः । १ । द्वितीयादिपञ्चमान्त दिनचतुष्क द्वितीयो भागः। २ । षष्ठादिनवमान्त दिनचतुष्कं तृतीयो भागः। ३ । दशमन्दिन चतुर्थो भाग: । ४ । दशम्या रात्रेरन्तिमः प्राचीप्रकाशात्मकोऽरुणोदयकाल: पञ्चमो भागः। ५ । एवं पञ्चभिर्भागैभिन्नाशौचव्यवस्था पञ्चधा भवति । (केचित्तु प्रथमादिनव- मान्तानां द्वितीयादिदशमान्तानां वा दिवसानां भागत्रयेण विभज्य प्रथमभागद्वये ऽन्यां तृतीये चान्यां व्यस्थामिच्छन्ति तदेतन्मतं बहुसंमतं नास्तीत्युपेक्ष्यते ) । १-संपातभेदाः। २०७-भाशौचद्वयसाम्पातिकस्वरूपं षोडशधा-मृतके मृतकम्। १ ।मृतके सूतकम । २। सूत के मृतकम् । ३ । सूत के सूतकम् । ४ । इति जातिकृताश्चत्वारो भेदाः प्रत्येक चतुर्द्धा-पूर्णे पूर्णम् । १ । पूर्ण खण्डम् । २ । खण्डे पूर्णम् । ३। खण्डे खण्डम् । ४ । इत्यवस्थाभेदात् ।। भोग्यकालोऽवस्था ॥ तेज षोडशैतानि सङ्कीर्णाशौचस्थानानि । तेषां च पूर्वोक्तकालविभाग- पाञ्चविध्यादशीतिः प्रकाराः ॥ २०८-तत्र मृतके मृतकं सुतके सूतकं च सजातीयं भवति । यत्तु मृतके सूतकं सूतके मृतकं वा तद्विजातीयम् । दशाह-द्वादशाह-पञ्चदशाह-मासात्मकमाशौचं पूर्णमित्युच्यते । सद्यःशौचैकाह-पक्षिणी-यह-त्र्यह-पञ्चाहाद्यात्मकं त्वपूर्णाशौचं खण्डमित्युच्यते । पूर्णे पूर्ण खण्डे खएडमिति वा समकालं, पूर्णे खण्डं खण्डे पूर्णमिति वा विषमकालम् । एषां भेदेनाशौ- चव्यवस्था भिरते। २-सजातीयसंपाते व्यवस्था । २०६ ---पूर्वाशौचप्रथमदिनेऽशौचान्तरोपनिपाते तन्त्रेणोभयोरेक एव शुद्धिकालः । -- [३६] प्राशौचपलिका तेनेकस्मिन्दिने जनने जननान्तरस्य, मरणे मरणान्तरस्य वा सन्निपाते दशरात्रादिकमेकमेवाशौचं यथायथमवतिष्ठते । नतु निमित्तद्वयनिबन्धनाऽशौचवृद्धिः। २१०-दशाहाशौचे द्वितीयं दिनमारभ्य पञ्चमरात्रिपर्यन्तं यदि सजातीयं द्वितीय दशाहाशौचमापतति तदा पूर्वाशौचव्यपगमेन शुद्धिः ! २११-षष्ठदिना दिनवमरात्रिपर्यन्तं द्वितीयाशौचप्राप्तौ द्वितीयाशौचव्यपगमेन शुद्धिः। -दशमेऽहोरात्रे पूर्णाशौधान्तरपोते सति तद्दिनानन्तरं दिनद्वयेनाधिकेन शुद्धिः । २१३ दशम्या रात्रे शेषेऽरुणोदयवेलायां पूर्णाशौचान्तरपाते सूर्योदयानन्तर त्रिरात्रे- णाधिकेन शुद्धिः ॥ १ ॥ “उदयात् प्राक् चतस्रन्तु नाडिका अरुणोदयः" इति स्कान्दे। अयमेव प्रभातकाल इति रत्नाकरः ॥२॥ २१४-वर्धिते द्वयहाशौचे वा यदि पुनः पूर्णाशौचान्तर पतति तदा यहव्ययोलघु- स्वाद्गुरुतरस्य पश्चिमाशौचस्या पगमेन शुद्धिः इत्येव ब्राह्मणसम्बन्धेन पूर्णे सजातीय समका लाशौचे व्यवस्था नेया। -क्षत्रि यवैश्यशूद्राणान्तु स्वस्वपूर्णाशौचपूर्वार्धे समानदिनव्यापक मशौचान्तरं यदि पतति तदा पूर्वाशौचव्यपगमेन शुद्धिः । उत्तरार्धे स्वशौचान्तरपाते द्वितीयाशौचव्यपगमेन शुद्धिः। २१६-पूर्णाशौचान्त्यदिने पूर्णाशौ चान्तरपाते सर्वेषां तदिनानन्तरं दिनद्वयेन शुद्धिः । २१७-पूर्णाशौचान्तदिनस्य रात्रिशेष प्रभातकाले पूर्णाशौचान्तरपाते सूर्योदयादा- रभ्याधिकेन दिनत्रयेण शुद्धिः । इति क्षत्रियादीना पूर्णे सजातीये समकाले चाशौचे व्यवस्था - नेया। २१८-व्यहादिखण्डाशौचाभ्यन्तरं व्यहादिसमकालोशौचपाते द्वितीयाशौचव्यपगमेन शुद्धिः । इति सजातीये खण्डे समकाले चाशौचे व्यवस्था । २१६-विषमकालव्यापकानामशौचानां सन्निगतेऽधिकदिनव्यापिनाऽशौचनातीतेन शुद्धिः । इति सजातीये पुणे खण्डे वा विषमकाले व्यवस्था । ३-विजातीयसंपाते व्यवस्था । २२०-सृत काभ्यन्तरे मृतकाशौचपाते तथा मृतकाभ्यन्तरे सूतकाशौचपाते वा मरणाशौचव्यपगमेनैव शुद्धिः । तेन जननाशौचमध्ये मरणनिमित्तकसद्यःशौचाद्यल्पकालिका शौचान्तरपाते तेनैव जननाशौचं बाध्यते ।

आशौचपञ्जिका [६७ ] - २२१ - व्यहादिशावमध्ये दशाहा दिसूतकपातेऽधिकमपि द्वितीयाशौचं नास्ति, किन्तु मरणशौचस्य बलवत्वात्पूर्वशेषेणैव शुद्धिः । यत्तु दाक्षिणात्याः-स्वल्पाशौचमध्ये दीर्घाशौचपाते दीर्घाशौचस्य बलवत्त्वात् पूर्वेण शुद्धि नेच्छन्ति, तदुपेक्ष्यम् । २२२-स्त्रीणान्तुवप्रसवनिमित्तमाशीचंप्रातिस्विकम् । अतस्तदन्येन न बाध्यते । तस्मात स्त्रीणां पतिमरणेऽपि पुत्रजन्मनिमित्ताशौचं विशतिदिनानि, कन्याजन्मनिमित्ताशौचं तु मासं यावदवतिष्ठते । तदूर्व कर्माधिकारः ।। २२३ पितृमातृभर्तृ मरणे सत्याशौचान्तरपाते कंचिद्विशेषमातिष्ठन्ते दाक्षिणात्याः । तन्नादर्तव्यम् । इति विजातीयाशौचे पूर्ण खण्डे वा समकाले विषमकाले वा व्यवस्था । इति गौडसम्प्रदायाधिकारः ।। २-द्राविडसम्प्रदायाधिकारः। २०४-सङ्कीर्णाशौ वनिर्धारणाथ पूर्वाशौचविभागश्चतुर्द्धा-पूर्वाशौचस्योपक्रमदिनं प्रथमभागः । १ । द्वितीयादिनवमान्तं दिनाष्टकं मध्यमो भागः ! २१ दशमी रात्रिरन्तिमो भाग: ३। दशम्या रात्रेरन्तिमः प्रहरःशेषभागः । ४ । श्वं चतुर्भिांगैः पूर्वाशौचकालं विभज्य द्वितीया- शौचपाते व्यवस्था कार्य्या । । २२५-सङ्कीर्णाशौच स्वरूपं द्वादशधा-मृत के मृतकम्. मृत के सूतकम् सूनके मृतकम सून के सूतकम् इति चत्वारो भेदाः। ते समन्यूनाधि पातभेदात्प्रत्येक त्रेधा-नदित्थमेते सम्पातिका द्वादशभावा आशौचभेदे निमित्तानि । १-तत्र प्रथमभागे। २२६-प्रथमदिने तावदुत्तर क्रियाशौच ध्याये रोदनस्पर्शनानुगमः बहनदहनादिभिनि- मित्तैरघोत्पत्तिर्या पृथक् पृथगाम्नाता तत्र यः सर्व करोति तस्य नेषु निमित्तेषु यदशोचमधि - कालव्यापि स्यात् तदनुरोद्धव्यम् यथा रोदनादेकाहम् । वहनात् व्यहम् । दह नाञ्च व्यहम् । अथ यो रुदित्वा वहनं कृत्वा च दाहयति तस्यापि व्यहमेव स्यात् , न तु प्रत्येकाशौच सङ्कलनया सप्त'हम् । समानोपक्रमेण सहैव प्रवृत्तानां तेषां स्वस्व काले निवृत्तो सर्वशेषे शुद्धिसिद्धेः । अयमेव न्यायः सर्वत्रानुक्ते द्रष्टव्यः । २२७-८ ये कस्मिन्नेव दिने समं न्यूनमधिकं वा युगपदशौचद्वयं प्रवर्तने, यदि वा प्रथमाशीचे प्रवृत्ते तस्मिन्नेव दिने पुनरपराशौचं प्रवर्तते तदा तन्त्रणान्यसिद्धिः, द्वयोरेक काल.

[८] . आशौचपञ्जिका स्वात् । अत एव यत्रापि स्त्रिया भर्ना सहानुगमनं तत्रापि दशाहमेवाशौच न त्वधिकवृद्धिः । तन्त्रेणोभयसिद्धेः । इति प्रथम दिनाशौचव्यवस्था ॥ २-द्वितीयभागे। । . २२८-द्वितीयादिनवमान्तेऽष्टाहात्मके मध्यमे भागे मृतकसजातीयविजातीय समन्यून. पाताः सुतकसजातीयसमन्यूनपाताश्च यद्यापतन्ति तदैतेषु षट्स्वपि पक्षेपूत्तराशौचं नास्ति । पूर्वाशौचकालेनैवोभयोः शुद्धे । यत्तु व्यहादिखण्डाशौचे संपाते उत्तरेणैव शुद्धिरि ति गौड़ा आहुः । तन्न । पूर्वाशौचे खण्डाशौचे चोभयत्रापि पूर्वशेषेणैव शुद्ध युक्तत्वात् । २२६-अथैतस्मिन्नष्टदिनात्मके मध्यमे भागे यदि मृत के सजातीयविजातीयाधिकपाताः स्युः। सूत के वा सजातीयाधिकपातः स्यात्, यदि वा सूतके विजातीयसमन्यूनाधि रुपाताः स्युः । तदैतेषु षट्वपि पक्षेषूतराशीचं समाप्य शुद्धि¥या। न तु पूर्वाशौचमात्रेण तत्र शुद्धिः। यत्तु मरणोत्पत्तियोगे मरणस्य बलत्वात् "शावेन शुद्धयते सूतिः” इति सिद्धान्ताच्च व्यहादिशाबमध्ये यत्र दशाहादिपूर्णसूनकपातस्तत्राप्युत्तराशौचं नास्ति, किन्तु पूर्वशेषेणैव शुद्धिरिति गौडा आहुः । तन्न। उत्तरस्य कालाधिक्येन बलवत्त्वात्। “अघवृद्धिमदाशौचं पश्चिमेन समापयेत्” इति सिद्धान्ताच्च। तेन ध्यहादिशावे दशाहादिपूर्णसूतकपाते पूर्वशेषेण शुद्धिर्नास्ति किन्तूत्तरं समाप्यैव शुद्धिर्नया ।। उत्तरेण सूत केन शावाशौचापवादेऽपि शाव निमित्तकमस्पृश्यत्वं नापोद्यते । एताव- देवात्र मरणाशौचस्य बलबत्वम् । एवमेव दशाहसूतकमध्ये तदन्ते वा यत्र व्यहादिशावप्राप्ति- स्तत्राप्यधिककालव्यापिना पूर्वेण सूतकेन शाबाशौचापवादेऽपि शावनिमित्तकमस्पृश्यत्वं भवत्येव। २३०-पूर्वानुवृत्ते मृतकाशीचे यदि मूल्यं गृहीत्या, कृश्विच्छवदाहं पर तः कुर्यात् तदा शवदाहनिमित्तकाशौचस्य न पूर्वेण शुद्धिः। किन्तु शवदाहस्यात्यधिका शौचप्रकर्तकत्वात्तन्निमि- त्तकाशौचं समाप्यैत्र शुद्धिः । मातुलादिसम्बन्धेन दाहमात्रकरणे तु त्रिरात्रमेवेत्युक्तम् । ६३१- सूतिकायास्तु प्रसवनिमित्त स्वाशौचं प्रातिश्विकम् । अतस्तदपरेण नोपोद्यते । तेन दशाहे व्यहे वा मरणाशौचे पश्चात् प्राप्तेऽपि तस्याः प्रसवनिमित्ताशौचोत्तरमेव कर्मा- धिकारः। २३२ - स्वपुत्रजननाशौचस्य पूर्वार्द्ध परार्द्ध वा ज्ञातिजनने तु पूर्वाशौच कालेनैव शुद्धिः। २३३-ज्ञातिजननाशौचस्य पूर्वार्द्ध स्वपुत्रजनने ज्ञातिजननाशौच कालेन शुद्धिः । परार्द्ध चेत स्वपुत्रजननाशौचकालेन शुद्धिः ।। २३४-पुत्रभार्याश्च सपिण्डाद्याशौचेन मातापित्रोभर्तुश्चाशौचापगमं नाहन्ति । सपिण्डाशौचापेक्षया तेषामशौचस्य बलषत्वात् । तेन तत्रेयं वक्ष्यमाणरीत्या व्यवस्था द्रष्टव्या । .

आशौचपञ्जिका [] २३५-ज्ञातिमरणाशौचत्य पूर्वार्द्ध पितृमातृभर्तृ मरणे पूर्वाशौचकालेन शुद्धिः । पराद्धे तु पराशौचकालेन । २३६-एवं पितृमातृभर्तृ मरणाशौचस्य पूर्वार्द्ध परार्द्ध का ज्ञातिमरणे पूर्वाशौचकाले- नैव शुद्धिः । -- २३७ - मातरि मृतायां तदशौचे यदि पश्चात् पिता म्रियते तदा पितुः शेषेण शुद्धिः । पितरि मृते तदशौचे यदि पश्चान्माता म्रियते तदा पित्राशौचान्ते मातुः पक्षिणीमधिकां कुर्यात् । यदि त्वात्मघातादिना पितृमरणं स्यात् तदा पितुरशौचाभावात् पितृमरणोत्तरं मातृमरणेऽपि न पक्षिणी-वृद्धिः । किन्तु मातुः पूर्णमाशौचम । केचित्तु पित्राशौचीयदशमदिनात् प्रागेव मातृमरणे पक्षिणीवृद्धिः । दशम्यां रात्रौ प्रभाते वा मातृमरणे तु द्वघहत्र्यवृद्धिसमुच्चिता पक्षिणी कार्ये त्याहुः । तदपरे नानुमोदने । मातुन्वारोहणे तु न पक्षिणीवृद्धिः। किन्तु पैतृकाशौचसमाप्त्यैव शुद्धिः, सहगमने द्वयोरपि सम्पूर्णाशौचयोस्तन्त्रेण सहैव शुद्धः। अथ यत्र पूर्व दिने पतिमृत्युः, परदिने तु पत्न्याः पतिशवेन सह चितारोहणं तत्रापि तन्त्रेण दशाहमेवाशौचं न तु वृद्धिः । पतिदाहानन्तरन्तु दिनान्तरे मृतायां पत्न्यां भिन्नचितादग्धायां सत्यां पित्राशौचानन्तरं पक्षिणी- वृद्धचा पुत्रस्यशौच नवत्तिः । न तु पूर्वाशौचनिवत्तिमात्रेण शुद्धिः। मातृमरणस्य महागुरुनिपा- तत्वात्।। २३८ -भर्तुरशौचोत्तरं पत्न्या अन्वारोहणे तु व्यहं मात्राशौचमिति पृथ्वीचन्द्रः, गौडाश्च ।। २३६-भर्तुर्ब्राह्मणत्वे क्षत्रियादिभार्याणामन्या मन्वारोहणे तु मात्राशौचान्ते मातुस्त्र्यहमित्य- परार्कः। २४०-युद्धहतस्य सद्यः शौचे प्राप्ते तदन्वारोहणे पुत्र त्रिरात्रं मात्राशौचमनुरुन्ध्यात् । पितुरपि तत्र व्यहेणैव पिण्डदानं कुर्यात् । एकचितौ दाहे उभयोः सःशौचमेवेति रघुनन्दना दयो गौडाः। २४१-गृहीताशौचानां पुत्राणां पितुः संस्कारे प्रक्रान्ते यदि माता सपिण्डो वा कश्चित् म्रियते तदा तु न पैतृकाशौचानुरोधः कार्यः । किन्तु मातृमृत्युनिमित्तं सपिण्ड मृत्युनिमित्तं च पूर्णमेवाशौचं कार्यम् । अतिक्रान्तकालात् विद्यनानिमित्तस्य बलवत्वात् । २४२--प्रोषितस्य पितुर्दादशवर्षोत्तरं पूर्णशरदाहा दिसंस्काराशौचे प्रक्रान्ते तन्मध्ये सपिण्डमरणेऽप्येवम सपिण्डमृत्युनिमित्तं पूर्णाशौचमेवानुरोध्यम् । नतु पित्राशीचेन तत्र सपिण्डाशौचबाधः । इत्यन्तर्दशाहे व्यवस्था । (२) ।

[ ७० आशौचपञ्जिका ३-तृतीयविभागे। २४३ --शावस्य सूतकस्य वा पूर्णाशौचस्यान्त्यरात्रौ शावे सूतके वा द्वितीये पूर्णाशौचे प्राप्ते तदन्यात्रेः पश्चादिनद्वयेनाधिकेन शुद्धिः। यत्तु गौडा:-दशमे दिनेप्यशौचान्तरप्राप्ती दिनद्वयवृद्धि मच्छन्ति तन्नादर्तव्यम् मनुवचनेऽन्तर्दशाहे भिन्नव्यवस्था करणात् गौनमशाता- तपादिवचने रात्रिशेषपदोपादानाच दशम्या रात्ररेव वृद्धिनिमित्तत्वात् । ४.-वृतं यचतुर्थविभागयोः । अथान्त्यरात्ररन्तिमे यामे द्वितीयाशौचप्राप्तौ तु तदन्त्यरात्रेः पश्चादिनत्रयेणा धिकेन शुद्धिः । यत्तु गौडाः-गौतमवचने प्रभातपदं दृष्ट्वा प्राचोप्रकाशात्मकस्यारुणोदयकाल स्यैव निमित्तत्वमिच्छन्ति तन्न । शातातपवचने यामशेषपदसत्वात् प्रभातपदस्यापि यामशेषो- Pana- पलक्षमत्व न॥ ४५ - यदि तु रात्रिशेषे यामशेषे वा ज्ञातिजननाशौचे स्वपुत्रजनन स्यात् , यदि वा ज्ञानिमरणाशीचे पितृमातृभर्तृ मरणं स्यात्, तद। तादृशजननमरणकालादारभ्य पूर्णमेव दशाहा- दिरूप मुत्तराशोचं प्रवर्तते न तु दिनद्वयमानं दिनत्रयमानं वाऽशौचवृद्धिः । २४६-- यदि वा स्वपुत्र जननाशौचान्त्यरात्री यामशेषे वा ज्ञातिजनन स्यात्, अथवा पितृमातृभत पर शाशौचान्त्यरात्रौ यामशेषे वा ज्ञातिमरणं ग्यात्,तदापि पूर्वाशौचालेनैव शुद्धिः । न तु दिनद्वरा दिनत्रयं वाशौचवृद्धिः । २४.४-- अथ यदि स्वपुत्रजननाशौचान्त्यरात्रौ यामशेषे वा स्वपुत्रान्तरजननं स्यात् तदा तु यह व्यह वा वृद्धिर्भवत्येव । २५८ -एवं मातृमरणाशौचान्त्यरात्रौ यामशेषे वा पितृमरणं स्यात्, अथवा पितृमरणा- शौचान्त्यराती यामशेषे वा मातृमरणं स्यात्, उभयत्रापि यहं व्यहं वा वृद्धिरेव भवति न तु पूर्णाशौचम् । २४ ६. ... संपूर्णाशौचान्त्यरात्रौ रात्रिशेषयामे वा त्रिरात्रादिखण्डाशौचपाते तु पृर्वशेषेणैव शुद्धिः । न तु द्विरात्रं त्रिरात्रं वा वृद्धिः । षडशीत्यादिमते तु तत्रापीष्यते द्वित्रदिनवृद्धिस्तदपरे नानुमोदन्ते। २५० ---यहाद्यल्पाशौचान्त्यरात्रौ रात्रिशेषयामे वा व्यहादिखण्डाशौचपातेऽपि पूर्व. शेषेणैव शुद्धिर्न तु द्विरात्रं त्रिरात्र या वृद्धिः । - আজিঙ্কা [१] पूर्वाशौचान्यवर्धित द्वित्रि'दनमध्येऽधिकाशौचान्तरपाते तु वर्धितस्याल्पत्वात् तेनोत्तर. स्याधिकस्य बाधानौचित्यादुत्तराशौचसमाप्त्यैव शुद्धः इति रात्रिशेषयामशेषयोर्व्यवस्था ।। (३४) इति द्राविडसम्प्रदायाधिकारः । ३–फक्किकाधिकारः। २५२-जननाशौचद्वयसन्निपाते पूर्वजातको यद्याशौचकालाभ्यन्तरे मृनस्ताह सपिण्डानां सद्यः शौचेन पूर्वाशौचनाशः । पूर्वाशौचनाशादेव तु परार्द्ध जातबालकसम्बन्धिभ्यां माता पितृभ्यां भिन्नानां सपिण्डानां पूर्वार्द्धजातचालक सम्बन्धिमातापित्रादिसकलसपिण्डानां च परजननाशौच- स्यापि निवृत्ति: सिद्धा भवति । जनननिमित्तकं स्पर्शाशौचं तु पूर्वजातबालकसम्बन्धिनोर्माता- पित्रोः स्वस्वजात्युक्तं तिष्ठत्येव । २५३-जननाशौचद्वयसन्निपाते प्रथमजननाशौचपूर्वाद्धजातवालकमरणे तन्मातापित्रोः पूर्वाशौचकालपर्यन्तं स्पर्शाशौचम् । प्रथमजननाशौचपरार्द्धजातबालकमरणे तु तज्जननकाल- मारभ्य तन्मातापित्रोः स्वजात्युक्त स्पर्शाशौचम्। ( द्वित्रायशौचसंपाते विशेषाभिधानम् ) २५४-वर्धिते द्वित्रिदिनमध्ये पुनरशौचान्तरपाते सति समन्यूनयोः पूर्वशेषेण शुद्धिः । अधिकस्य तु परशेषेण शुद्धिर्न तु पूर्वेण । २५५-तुल्यदिनप्रमाणयोजननमरणाशौचयोः सन्निपाते मरणाशौच कालेन शुद्धिः न्यूनाधिकदिनप्रमाणयोर्जननमरणाशौचयोः सन्निपाते तु दीर्घाशौचकालेन शुद्धिः । २५६-पूर्वोक्तसपिण्डद्वयजननवर्धिताशौचमध्ये पितृमातृभत मरणे वर्धित सपिण्डद्वय जननाशौचकालेन शुद्धिः । २५७-शूद्रेतराया भार्यायाः पुत्रजननप्रयुक्तविंशतिरात्राशौचाभ्यन्तरे पत्युमरणेऽपि पुत्रजननाशौचकालेन शुद्धिः। २५८-एकस्मिन् दिने पूर्णाशौचिसपिएद्वयमरणे यावदनुवर्तते कर्माशौचं, तावदेव च सर्वसपिण्डाना स्पर्शाशौचमनुवर्तते । २५६-समानोदकमरणे काशौच चैकरात्रम् । विद्युदादिना मरणेऽप्येवम् । अशौच मध्ये विदेशस्थासपिण्डमरणे तु कर्माशौचं त्रिरात्रम्, पशिौचं तु स्नानात् प्रागेव । तस्मात् पूर्वोक्तत्रिरात्राशौचद्वयापेक्षयैतत् त्रिरात्रं लघुभूतं प्रतिपद्यते । तेनैषां सन्निपाते गुरुणैव शुद्धिः ।

। ७२ ]
प्राशौचपलिका
२६० --विदेशप्रमीतज्ञातित्रिरात्राशौचस्य लघुभूनस्य गुरुणा विदेशप्रमीतपितृमातृभत-
त्रिरात्राशौचेन शुद्धिः।
२६१ -- कन्यापुत्रयमलोत्पत्तौ सर्ववर्णाया मातुर्मासेन शुद्धिः । पित्रादिसपिण्डानां तु
खजात्युक्ताशौचं निरूपितम् । तत्राशौचमध्ये तयोरेकतरमरणे सत्याशौचे कश्चिद्वशेषो विधीयते ।
तथाहि-शुद्र भिन्नमातुः कन्यामरणात् सद्यः शुद्धिः, न तु पुत्रमरणात् । पित्रादिसपिण्डानां तु
प्रथम जातमरणाच्छुद्धिः न तु परजातमरणात् । शूदायास्तु मातुर्यमलोत्पत्तौ प्रथमजातमरणा-
शौचेन शुद्धिः, न तु परजातमरणात् । पित्रादिसपिण्डानां तु प्रथमजातमरणाच्छुद्धिः न तु
परजातमरणात् । एवमन्यदप्युह्यम् ।
२६२–पूर्वाशौचमध्ये समुद्भूतमपि पूर्वाशौचोत्तरं यदि ज्ञातं स्यात्, तदोत्तरमप्यशौच-
मनुवत्तत एव, न तु पूर्वशेषेण शुद्धिस्तत्र भवति । पूर्वाशौचनिवृत्तेः पश्वाच्छुवणे नोत्तराशौ चस्य
प्रवर्त्तमानतया पूर्वेण तदनिवृत्तेः । इति फक्किकाधिकारः ।
२६३-लब्ब्वा रामभजात पुरा जयपुरे सारस्वताद् व्याकृति,
पश्चाच्छैवकुमारमध्रिकमलं काश्यां समासाद्य यः।
षट्शास्त्राणि च धर्मशास्त्रसहितान्यङ्गानि चाधीतवान्,
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामि माम् ॥ १ ॥
इति प्राशौचसंकरीध्यायः सप्तमः ॥ ७ ॥

স্বামীৰবঙ্কিা [ ७३ ] अथ अतिक्रान्ताशौचाध्यायः २६४-अत्राध्याये अन्तर्दशाहाधिकारः सूतकनिर्देशाधिकारः, शावापूर्ण निर्देशाधिकारः, सदेशस्थपूर्णशावातिक्रमः विदेशस्थपूर्णशावातिक्रम: देशान्तरलक्षणं चेति षडधिकाराः प्रदर्श्यन्ते ।। २६५-अतिक्रांताशौचा, व्यतीताशौचम्, अतिकालाशौचम्, आतिकालिकाशौचम, प्रोषिताशौचम, देशान्तराशौचम्, विदेशस्थाशौचम्, इत्येकार्थाः । २६६-पूर्णाशौचखएडाशोचयोर्वास्तविके प्रवृत्तिकालेऽतिक्रांते सत्यनन्तरं जन्ममृत्युश्रवणे यदाशौचं प्रवर्तते तदतिक्रांताशौच नाम । तत् तावद् द्वेधा-अन्तर्दशाहं निई शं चेति । आद्यमा- शौचप्रवृत्तिकालातिक्रमणात् । द्वितीयं तु आशौचनिवृत्तिकालातिक प्रणात् । तत्र दशशब्दो यावदाशौचकालोपलक्षकः । तेन पूर्णाशौचे खण्डाशौचे चेदं भागद्वयमाभ्यां शब्दाभ्यां व्यवह्रियते । दशाहो, द्वादशाहः पञ्चदशाहो, मास इति चत्वारि पूर्णाशौचानि । तदितराएयेकाहपक्षिणीच्य- हादीनि खण्डाशौचानि । १ अन्तर्दशाहाधिकारः। (अन्तर्दशाहे श्रवणे) २६७-सपिण्डजननस्य सपिएडमरणस्य वा पूर्णाशौचप्रयोजकस्य खण्डाशौचप्रयोजकस्य वा पूर्वोक्ताशौचकालाभ्यन्तरं श्रवणे शेषाहाशौचम् । तेन यावदशिष्टमाशौच कालस्य, ताबदाशौ- चमनुरोध्यम् । एतच्च मातापित्रादीनां पुत्रादीनां त्रिपुरुषसपिण्ड नां पुप्रादीनां त्रिपुरुषसपिण्डानां सप्तपुरूषसपिण्डानां सकुल्यानां सोदकानां सगोत्राणां विगोत्राणां च सर्वेषां समानम् । २६-मातापित्रोमरणश्रवणे पुत्रजननश्रवणे . वा श्रवणदिनादारभ्य दशाहं कार्यमिति केचिदाहुः । तन्नाद्रियते शिष्टः । अनिर्दशाहे शेषाहाशौचस्यैव सिद्धान्तात् । २६६-पारिभाषिकदेशान्तरे मृतस्य दशाहाभ्यन्तरमपि मरणश्रवणे मातापित्रोः पुत्रस्य सपिण्डादीनां च सर्वेषां सद्यः शौचमिति केचिदाहुः -तदेतत् प्रमाणवचनानुप लम्भादुपपत्ति विरोध शाज्ञानोपकल्पितत्वाच नुपादेयम् । सदः शोचविधायकवचनानां निर्दशाशौचविषयत्वात् । योत्सर्गतो. दशरापर्यन्तं यत्रत्या वार्ता न श्रूयते तत्र तह शान्ता मिति परिभाषणाद्देशान्तर- व्यवस्थाया अन्तर्दशाहमप्रसक्त:।

७४]] प्राशौचपलिका । २७० --माता पित्रोमरणे दशाहमध्ये मरणश्रवणे सत्यूढाया: कन्यायास्त्रिरात्रमाशौचं वाच्यमिति दाक्षिणात्याः । इत्यन्तर्दशाहाधिकारः ॥ २ निर्दश-सूतकाधिकारः। (दशाहान्तरे जननश्रवणे) २७१-दशाहादिपूर्णाशौचकाले एकाहा दिखण्डाशौचकाले वा यथायथं व्यतीते यदि पश्चाद्विदेशस्थ जननं श्रूयते तदा जननाशौचं नास्ति। प्रसवे अतिक्रान्ताशौचप्रत्याख्यानात् ।। २७२ --पुत्रजन ननवणे तु पित्रा सचैलस्नानं कार्यम् । यत्तु दशाहाशौचमनुरोभ्यमिति केचिदाहुः । तन्नाद्रियते शिष्टः । इति निर्दशजातकाधिकारः ।। ३ निह शापूर्णशावाधिकारः। (खएडाशौचे शावेऽतिक्रान्ते) २७३--त्रिरात्रादिखण्डाशौचप्रयोजकस्य सपिण्डमरणस्य त्रिरात्राद्याशौच कालावं दशाहमध्ये ज्ञानेप्याशौचं नास्ति । अाचारात्तु स्नानोदकमात्रं कार्यम् । २७४- अनुपनीतमरणादिनिमित्तकत्रिरात्रादिषु भगिनीमातुल दिमरणनिमित्तकत्रिरात्रादिषु चातिकातेषु अतिक्रान्तोशौच नास्ति । दशाहादिपूर्णाशौचातिक्रम एव विदेशस्थमरणश्रवणे व्यहादिरूपातिक्रांताशौचाभ्युपपत्तेः । महा गुरुनिपाते तु खण्डा शौचेऽप्येकरात्रमशौचमनुरो. ध्यमिति दाक्षिणात्याः। २७५-मातापित्रोमरणे दशाहोय वर्षा ते कालान्तरे वा मरणश्रवणे सत्यूढाया: अन्यायाः पक्षिणीति दाक्षिणात्याः । इति अपूर्णाशौचातिक्रमाधिकारः । ४ सदेशस्थपूर्णशावाधिकारः। (सदेशस्थशावाशीचे पूणे) २७६-अतिक्रान्ताशौचं द्वेधा प्रवर्तते-समानदेशेष्यश्रवणाद् देशान्तरस्थत्वाउच । पारिभाषिकदेशान्तरलक्षणानानान्तः प्रदेशः समानदेशः । स एव सदेशः । २७७- सदेशे मृताय तदुचिताशौचकालोत्तरं श्रवणदिनादारभ्याशौचं वक्ष्यमाणनियमानु. सारेण कार्यम् । तथाहि-- आशौचपञ्जिका [ ७५ ] २७८- मातापित्रोदशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं वर्षाद् द्विवर्षाद्वोधं च मरणश्रवणे श्रवण दिना- इशाहमाशौचं पुत्रस्येति पैठीनसि ऋषिः प्राह (१) एतच्च श्रेयसि कनीयसि वा श्राद्धकर्तरि पुत्रेऽवकल्पते इति पश्यामः () अहीनवर्णागः सपल्या अप्येवं दशावमिति केचित् (३) ।। २७४ --मातापित्रो. पतिपत्न्योश्च दशाहोसार वर्षाभ्यन्तरं माणश्रवणे त्रिरात्रम् पुत्रस्था पल्याः पत्युा कर्माशौचम। स्पशांशीचं तु सचैल स्नानान्निवर्शत {१) अथ वर्षोत्तरं द्विवर्षात प्राङ् मातापित्रोमरणश्रवणे पुत्रस्यैकाइमाशौचम् ( २ ) पत्तिमरणश्रवणे पल्या अपये काहम् । (३) द्विवर्षादूचं तु सद्यः शौमिति देवल ऋषिः प्राह (४ एतच्चाविभक्त कनीयसि कर्मकर्तृ- स्वाभावेऽवकल्पते इति पश्यामः (५) ।। २८० व प्रसूभिन्नायामहीनवर्णायां पितुः पन्यां प्रमीतायां दशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं वा वर्षाद्विवर्षाद्वोर्ध्वञ्च श्रवणे सापत्न्यपुत्रस्य त्रिरात्रमिति दक्ष ऋ पः प्राह (१) और से पुत्रे प्रमीते पितुरप्येवं त्रिरात्रमिति ब्रह्मपुराणम् (२) हीनवर्णायाः सपत्न्या अप्येव त्रिरात्रमिति केचित् (३)। २८१-केचित्पुनरेकदेशिनोर्मातापित्रोः पत्युश्चाशौचातिरेकमनिच्छन्तो वक्ष्यमाणसपिण्ड- नियमानुसारेणैव तदशौचमभ्युपगच्छन्ति । तनाव कल्पते मातापित्रादीनामितर सपिएडापेक्षया विशिष्ट सम्बन्धववाद शौच धिक्यस्यौचित्यात् । २८२-दशाहाशौचिनः सदेशे मृतस्य दशाहात्तरं वर्षाभ्यन्तर श्रवणे सपिण्डादे स्त्रिरात्रम् वर्षांदूचं तु सद्यः शौचमिति मनुशको महर्षी पाहतुः ( १ ) एतच्च माता पितृभ्यां पत्युः पुत्रात सपत्नीमातुश्च भिन्नेषु दशाहाशौचिषु सामान्यतो व्यवतिष्ठते इति पश्यामः (२) दशाहाशीचिन' पूर्णाशौचिनः इत्येकार्थम् । तेन क्षत्रिया दिष्वपि तत्तदाशौच कालानिक्रमे वर्षमध्ये सपिण्डमरण- श्रवणे त्रिरात्रम् । वर्षादूर्ध्वं तु स्नानमा.म (३) ॥ २-३--दशाहाशौचिनः सदेशे मृतस्य दशाहोत्तरं षण्मासात् प्राङ मरणश्रवण त्रिरात्रम्। ततो वर्षात् प्रागेकरात्रम् वर्षादूचं तु स्नानमात्र मिनि मैथिनरुद्रवरा अमनपाठभेदादेवल ऋषः प्राह (१) दशाहोत्तरं षण्मासात प्राक त्रिरात्रम । ततो नव ममासात् प्राक पक्षिणा । तनो वर्षात प्रागेकरात्रम् । तदृ ग्नानम मितिम भिलो रुद्रधर; स्वरूप नया प्राह । एत देव युक्रमित्यमृतना- थादयो मैथिला आतिष्ठते (२) दशाहोत्तर त्रिमासातू प्राक त्रिरात्रम ततः परमासात प्राक् पक्षिणी। ततो नवममा सात् प्रागेकरात्रम् । तदृवं स्नानमा त्रमिति वृद्धवसिष्ठ ऋषिः प्राह । एतदेव युकमिति कमलाकरादयो दाक्षिणाया अतिष्ठन्ते ( ३ ) दशा होत्तरं त्रिपक्षात् प्राक त्रिरात्रम्, षण मासात् प्राक् पक्षिणो। ततो नवममा सात् प्रागेकरात्रम् । तदूध स्नानमात्रमित्यपरो देवल ऋषिः प्राह । एतदेव युक्तमिति माधवादयो दाक्षिणात्या आतिष्ठन्ते (४) दशाहोत्तरं विपक्षात [ s६ ] प्राशौचपलिका प्राक् त्रिरात्रम् । ततो नवममासात प्राक दिवामात्रं निशामात्रं वा । तदूर्ध्व स्नानमात्रमिति विष्णुऋषिः प्राह । एतदप्यन्ये दाक्षिणात्या प्रतिष्ठन्ते ( ५ ) । विकल्पे त्वाचारः प्रमाणम् । आपदनापद्विषयत्वेन वा व्यवस्थेयम् । एवं ह्यनेकधा अघसङ्कोचविधानं सत्यावश्यकत्वे तदावश्य- कतानुसारेण पृथ गवतिष्ठते । अथवा सति विकल्पे देशाचाराद् व्यवस्था (६) । २८४-दशाहोत्तरं वर्षांभ्यन्तरे, वर्षादूर्ध्वं या मरणश्रवणे पक्षिणी ति गौतमो महर्षिः प्राह (१) । एतच्च चतुःपञ्चाहाशौचिनो तयोरतिक्रान्ता शौचमिति शुद्धिकौमुदीकारो गोविन्दो व्याचष्टे (२) । अथ सद्यःशौचिनामेकाह-द्वथह-यह-शौचिनाञ्चातिक्रान्ताशौचं नास्त्येवेत्युक्त प्राक् [२७०।२७१] अधिकरणयोः(३) ये तु खण्डाशौचिनां सर्वेषामतिक्रान्ताशौच नास्तीत्यभ्युप- गच्छन्ति तेषां मते चतुःपञ्चाहाशौचिनामप्यतिक्रान्ताशौचं न स्यात् । तथा चेदं गौतमोपदिष्टं पक्षिणी विधानं पूर्ववदघसङ्कोचपरमेवावश्यकत्वेऽव कल्पते इति पश्याम: (४) । (१-मरणमासादावज्ञाते) २८५-यत्र तु मरणमात्रं श्रुतं, मासादिकं तु विशिष्य न ज्ञातं तत्र श्रवणादिनादारभ्य स्ववर्णोचितं दशाहाद्याशौचं पूर्णमेवानुरोध्यम् इति सदेशस्थपूर्णशावाधिकारः । २---विदेशस्थशावाधिकारः । (विदेशस्थपूर्णशावाशौचम् ) २८६-देशान्तरस्थे प्रेते दशरात्रोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं श्रवणे सत्येकरात्रम् । वर्षादूर्ध्वन्तु स्नानमात्रमिति वशिष्ठविष्णू पाहतुः (१)। (एतच मातापित्रोः पतिपत्न्योश्चातिक्रान्ताशौचे नेयम् । सम्बन्धाधिक्येन तत्रैव तथौचित्यात ) (२) । २८७-देशान्तरस्थे ज्ञातिमरणे दशाहोत्तरं वर्षाभ्यन्तरं श्रवणे वर्षाव वा श्रयणे सद्यः शौचमिति मनुयाज्ञवल्क्यगौतमपैठीनसिपर शरबृहत्पाराशराश्च प्राहुः १)! मपिण्डाः सोदकाः सगोत्राश्च ज्ञातय उच्यन्ते (२) । २८८-मैथिशास्तु देशान्तरे मातापित्रोः पतिपत्न्योज्ञातीनां च मरणे वर्षादृषं वा वर्षाभ्यन्तरं दशाहाभ्यन्तरमपि वा श्रवणे सर्वत्र निर्विशेष सद्यःशौचमेवोचितं पैठीनसिगौतम- पराशरैस्तथोक्तत्वादित्याहुः (१) । वस्तुतस्तु-अन्तर्द शाहं मरणश्रवणे सर्वत्र शेषाहाशौचमेव सिद्धान्तः। मनुयाज्ञवल्क्याभ्यां निर्देशे ज्ञातिमरणे सद्यःशौचविधानात्तदेकवाक्यतया पैठी- नसिगौतमपराशरवचनानामपि निई शज्ञातिमरण विषयतयैवोपनेयत्वात् । अनिर्गते दशाई माशौथपलिका [७] त्वशौचशेषेण शुद्धेः सष्ट विष्णुबृहस्पतिभ्यामुतत्वात् (२)। निई शे सद्य शौचविधानमपि मोतापितृभिन्न विषयतयैव नेयम्, वचनान्तरसंवादादिति पश्यामः (३) । १८६-दाक्षिणात्यसम्प्रदाये स्वयं विशेषः । मातापित्रोः पतिपत्न्यो: सपल्याश्च समान- देशे देशान्तरे वा मरणे निर्विशेष दशाहोत्तरं वर्षोत्तरं वा श्रवणे पुत्रस्य पल्याः पत्युः सपत्न्या वा यथायथं दशाहादिपूर्णाशौचमेवानुवत्तते न तु तत्राघसङ्कोचः । २६०-सापन्यमातुरौरसपुत्रस्य च समानदेशे देशान्तरे ना मरणे दशाहोत्तरं वर्षोंत्तरं वा श्रवणे निर्विशेष पुत्रस्य मातापित्रोश्च त्रिरात्रम् ! न तु ततो न्यूनमित्य'हुः । तत्र देशाचाराद व्यवस्था। ६-देशान्तरलक्षणम्। २६१-देशान्तरलक्षणं चतुर्धा निरूप्यते योजनतः, गमनीयकालतः, व्यवधानतः, भाषाभेदतश्चेति । विप्रस्य विंशतियोजनान्तरं, क्षत्रियस्य चतुर्विशतियोजनान्तरं. वैश्य सच्छूद्रयो- लिंशयोजनान्तर, निकृष्टशूद्रस्य तु षष्टियोजनान्तरमित्येवं योजनान्तरितो देशो देशान्तर मिति दाक्षिणात्या: (१) : विप्रस्य चतुर्विशतियोजनान्तरं, क्षत्रियस्य त्रिशत. वैश्यसच्छूद्रयोश्चत्वारिंशत, निकृष्टशूद्रस्य तु षष्टिरिति परे केचित् (२)। षष्टियोजनान्तरितमेवोत्सर्गतः सर्वेषां देशान्तरम् । गिरिनदीव्यवहिते भिन्नभाषे वा प्रदेशे तु योजनानपेक्षणाचत्वारिशद्वा त्रिंशद्वा चतुर्विंशतिर्वेत. योजनसंख्याविशेषानादरे तद्ववचनानां तात्पर्य नेयमिति मैथिलाः । तदेतदेकं ओजनकृतं देशान्तरलक्षणमुक्तम् (३)। २६२-मैथिलानां केचिदित्थमाहुः । न भाषाभेदमात्रेण न वा गिरिव्यवधानमात्रेण नापि वा नदी व्यवधानमात्रेण देशान्तरत्वं कलप्यते। किन्तु यन्त्रितयं समुश्चितं भवति तत्र षष्टियोजनाभ्यन्तरेऽप देशान्तरत्वव्यवहारः कार्यः। भाषाभेदगिरिनदीव्यवधानाभावे तु षष्टि- योजनान्तरदेशे देशान्तरत्वव्यवहारः कार्यः । इति । अतएव कश्यां मृतस्य तीरमुक्तिदेशस्थितं प्रति, देशान्तरत्वव्यवहारो नास्ति मिथिलातः काश्या स्त्रिंशद्योजनमानान्तरितत्वात् । भाषाभेद- सत्वेऽपि महानदीगिरिव्यवधानाभावाच्च । सरयूगएंडक्यादीनामन्तहस्थत्वेऽपि तासां महा- नदीत्वाभावात् । गङ्गायमुनाशतद्रु सविधानामेव महानदीत्वेन व्यवहारात् । अथ प्रयागमरणे तु तीरमुक्तौ भवत्येव देशान्तरमृतत्व व्यवहारः। षष्टयोजनाभ्यन्तर- स्वेऽपि भाषाभेदसत्वाद् गिरिव्यवधानाद् गङ्गाव्यवधानाच्च । तेन प्रयागमरणे मिथिलास्थानां ज्ञातिनामन्तर्दशाहेऽपि श्रवणे सद्यःशौचमित्याहुः ।।

[]
आशौचपञ्जिका
१-देशान्तरसम्बन्धे स्वीयमतम् ।
।
२६३-वयन्तु ब्रुमः । इयं हि देशान्तरपरिभाषा लोकसिद्धा न त्वत्र शास्त्रेण कश्चिदर्थः
साम्यः । लोके यत्र यत्र येन येन निमित्तेन देशान्तरत्वं लौकिका: प्रति पश्यन्ते तत्तदनुवादेन तत्र
शास्त्राभ्यनुज्ञामात्रमेनत् क्रियते । अस्ति च लोके गिरिम्बन्धानदीसम्बन्धाद्भाषाभेदाद्विदृरत्वाच
देशान्तरत्वप्रतिपत्तिः । अतो यावता लौकिको नामाचारव्यवहाराद्याम्नायभेदसाधना प्रतिपत्तिभे-
दो देशान्तरत्वेऽनुभूतवरनावतैवाशौचनको चोऽप्यर्थसिद्धो भवति । दशरात्रादिपूर्णाशौचकाला-
त्ययकालश्चाशौच सकोचे मुख्यो हेतुः। सोऽयमशौच कालात्ययश्चतुर्विशतियोजनैस्त्रिंशद्योजनैश्च-
स्वारिंशद्योजनैः, पयोजनेर्वा, अन्तरितत्वेन संभाव्यते इति सम्भवाभिप्रायेण तथा प्रतिनिर्दि
श्यत इत्यूह्यम् । निञ्च समानदेशे देशान्तरे च भेदेने यमाशौचव्यवस्था मैथिलग्रन्थानुरोधेनोक्ता।
श्रार्षवचनानि तु सदेशविदेशाभ्यां पृथक विभज्य नोपल यन्ते । तस्मात स विभागश्चिन्त्यः ।
वस्तुतस्तु दशरात्रमध्ये यत्र वार्ता लभ्यते तत्र शेषाहाशौचमेव । दशरात्रोत्तरं तु वार्तालाभे
संबन्ध तारतम्यादशौचतारतम्य भवतीत्येव व्यवस्था इति देशान्तर लक्षणाधिकारः ।।
२६४ - अष्टौ यस्य समाः पितुः स्वविषयेऽतीताः पुरः शिक्षया,
वेदाङ्गस्य च शिक्षया जयपुरेऽतीतास्ततोऽष्टौ समाः ।
यस्याष्टी पुनरत्यगुः शिवपदे षट्शास्त्र शिक्षादिना,
सोऽयं श्रीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षाभिमाम ॥ ॥
-
इति अतिक्रान्ताध्यायोऽष्टमः ॥ ८॥

आशौचपञ्जिका CE ॥ अथ श्राशौचापवादाध्यायः । । । २६५ -अथ कर्तृ भेदात, कर्मभेदात्, द्रव्यभेदात्. मृतदोषात, वचनामाशोचं क्वचिद- पोयते । त एते पब्बा धिकाराः प्रदर्श्यन्ते । १ कर्तृभेदाधिकारः। ( क विशेषादाशीवाभावः) २६६-कार इहाशौचाहीतृत्वेन विवक्षिताः । तेशां षडविधा: स्ववैशेष्यादेव निमित्ता- दाशौचं नाहन्ति । तथा हि ब्रह्मचारिणो वनस्थाः संन्यासिनश्चेति त्रिविधा भिन्न श्रमा भिन्नाथ. मत्वादेव निमित्तादस्यामाशौचव्यवस्थायां नाधिक्रियन्ते । आशौचव्यवस्था गृहस्थाश्रमधर्मान- त्वात् । अथ कृतजीवच्छाद्धाः पतिताश्चेति द्विविधा धर्मच्युतः गृहस्थत्वेऽपि स्वधर्मच्युतिहेतोर- स्थामाशौचव्यवस्थायां नाधिक्रियन्ते । स्वधर्मस्थाधिकारेणाशौचव्यवस्थायाः प्रवृत्तत्वात् । अथान्यः षष्ठ आपन्नः। स च ऋष्टायामापदि स्वास्थ्यालाभादशक्तत्वा देवास्यामाशौचव्यवस्थायां नाधिक्रियते धर्मादेशस्य तदाचरणसमर्थाधिकारेण प्रवृत्तेः । तदित्थमेते षडप्यनधिकारिणो नाशौचमहन्तीति सिद्धम् । तेषां विभेदेन नियमा वक्ष्यन्ते। (१- ब्रह्मचारिणां यत्यादीनां चाशौचव्यवस्था) २६७-नैष्ठिकानामुपकुर्वाणानां च ब्रह्मचारिणामनुपनीतानां च द्विजातिबालकानां स्पर्शाशौचं कर्माशौचं वा द्विविधमपि जन्माशीचं नास्ति ! २६८-अथ ब्रह्मचारिणामनुपनीतानां च द्विजातिबालकानां सपिएडमरणेऽपि नाशौचं नापि तन्निहरिदाहाद्यौर्ध्वदेहिककर्मवेषामधिकारः । २१६-अथाज्ञानान् निर्हारदाहाद्यौर्ध्वदेहि के कर्मणि कथंचित् कृते सति तु ब्रह्मचारिणः पुनहरनयनं करछुपाय श्चत्तं चादिश्यते किन्तु पितृमांत्राचार्योपाध्यायमातामहानामन्तिम कर्म- करणेऽपि न ब्रह्मचारिणो दोषः । अतः एव तत्र कृते सति इशाहं पशिौचमनुवर्तते । कर्माशौचं तु नास्ति। ३००- अन्ये वाहुः। मातापित्रा हानामन्तिम कर्म करणेऽसि एहमेव स्पर्शाशौचं ब्रह्मची. रिणो भवति न त्वविकम्। किन्तु यद्य नाव शौचिना मन्नं भक्षयति तदेव ब्रह्मचारिणो दशाहाशौच- प्राप्तिने त्वन्यथा । अन्यको करणे तु ब्रह्मचारिणः पित्रादिमरणेऽण्याशौचं नास्त्येवेति ।

[८० মামীবঞ্জিকা ३०१-पित्राद्याशौचेऽपि ब्रह्मचारी नाशौचिनामन्नं भक्षयेत् । भक्षणे तु पुनरुपनयनम् । ३०२-समावर्तनोत्तरं तु पूर्वमृतानां मातापित्रादीनां त्रिदिनमाशीचं ब्रह्मचारिणा कार्यम् । वानप्रस्थानां संन्यासिनां च किमप्याशौचं नास्ति । तेषामपि मरणे पूर्वसंबन्धिनां मातापित्रादी. नामाशौचं नास्ति । तंत्रेह संन्यासिपदेन कदण्डिहंसपरमहंसा प्राह्या: । त्रिदरिप्रभृतीनां तु यतीनां पृथा नियमा उक्ताः ! ३०३-नैष्ठिकब्रह्मचारिणां चतुर्थाश्रमिणां च वानप्रस्थानां च प्रामादौ भिक्षामहणाय लब्धाधिकाराणां तथा अन्येषामपि सर्वप्रतिप्रहनिवृत्तानां भिक्षामात्रवृत्तीनां यतीनामाशौचि- भिक्षाप्रहणे दोषो नास्ति । उपकुर्वाणब्रह्मचारिणां तु गृहस्थानामिवाशौचिगृहाद् भिक्षाग्रहणे दोषः स्यादेव । एवमन्येषामपि केषांचिद् प्राग गृहीतनियमानां तत्तन्नियमानुरोधेनाशौचमवरुध्यते । ३०४-कृननीवछाद्धेन किमयाशौचं नानुरोध्यमित्ति हेमाद्रिः । कृतजीवछुद्धस्यापि योगाभ्यासमकुर्वतो गृहस्थवृत्ते शौचमनुवर्तत एवेयन्ये । योगिनामेव तेषामशौचनिवृत्तेरौचित्यात् । ३०५~यस्य तु घटस्फोटः कृतस्तस्यान्यस्य च तथाविधस्य जातिबहिष्कृतस्य पतितस्याशौचं नास्ति। ३०६-श्रातुराणां स्वदेशभ्रष्टानां कष्टापद्प्रस्तानामुपसर्गोपद्रवाद्यभिभूतानां च सद्यः शौचमाहुः । तत्रोपसर्गोऽत्यन्तनरका दिदैवभयम् उपद्रवस्तु स्वचक्रपर वक्रराष्ट्रभङ्गादिलोकभयम् तत्र विशेषविप्लवदशायामस्वस्थनायामशौचं नोपसर्पटीति दिक । इतिकर्तृ भेदाधिकारः। २ कर्मभेदाधिकारः। (१-कर्मविशेषादाशौचाभावः) ३.७-प्रथाशौचसम्बन्धप्रतिबन्धिविशेषवतामनन्यगतिकानामातिगृहीतानां च कर्मणां प्रारम्भे जाते तत्कर्मदीज्ञान्वितानां गृहीतनियमानां नाशोचमुपसर्पतीति द्वितीयाधिकारः प्रवर्तते । (२-तीर्थयाविवाहादी) 428 ३०८-तीर्थ यात्रायाम, उत्सवे, युद्ध प्रते, सत्रे, यो, विवाहे, श्रद्ध, प्रतिष्ठम्याम्: बजने, होमें, पर्चने, जपे, दाने, संस्कारे, तत्पाधर्म्यवति चान्यत्रापि नियतकालकर्तव्ये कमे- कै समस्यासमाते सति तत्राधिकृतानां दीक्षितानाम. ऋत्विजां, सत्रिणां, अतिनी-था hai, संजवत् संभ्रान्तानां रामभृत्यानां तथैव भिषजां, कारूणां, शिल्पिना, प्रामसाधारणकर्म- करवृत्याना, वाशीच सोचो अति । विशेषकर्मानुरोधात । तत्रैते विशिध्या नियमानुल्याः ।

आशौचपत्रिका [१] क ३०६-अपूर्वतीर्थ विशेषे प्राप्तौ सत्यां तन्निमित्तकावश्यकस्नानदानादिकर्मणि तीर्थादि- विशिष्टयात्रायां पूर्वप्रक्रान्तायां रथयात्राद्युत्सवसमारम्भे युद्धे च प्रवृत्ते नाशौचं सजते। ३१० - कृच्छ्चान्द्रायणादिवते, अन्नसत्रादिलघुसत्रे, दरापौर्णमासादियज्ञ, नगरदेवा- लयादिप्रतिष्ठाकमणि. तड़ागोत्सर्गकोटिहोमादियजने, होमे, अर्चने. पुरश्चरणस्तोत्रपाठादिजप- कर्मणि, अविच्छेदेन सकल्पितहरिवंशपारायणादिश्रवणकर्मणि व्रतबन्धोपनयनचूडाकर्मादि. संस्कारकर्मणि, विवाहे श्राद्धकर्मणि, प्रातुरव्याधिनाशार्थकतुलापुरुषादिदानकर्मणि-चारब्धा- समाप्ते यद्यन्तरा सूतकं मृतकं वा श्रूयते तदा तदारब्धकर्मणो निवृत्ति स्ति। न वा तत्कर्मकर्तृ भिस्तदाशौचमनुरोध्यम्। तदितरकर्मसु तु तदाशौचानुरोधः स्यादेव । भगवान् यमस्त्वाह-आ- शौचवता क्रियमाणे कर्मणि यदि किञ्चिदेवं भयमुत्तिष्ठते, प्रधानाङ्ग वा तत्र विनाशमाप्नोति, तदात्वे तदाशौचप्रयुककर्मप्रतिरोध एव कार्य्यः।आशौचनिवृत्तौ पुनः कुर्वीत । अथ व्रताद्यारम्भात प्रागेव तु श्रवणे तदाशौचानुरोधात् करिष्यमाणानामेषां व्रतादीनामपि यावदाशौचं निवृत्तिः स्यात् । व्रताधारम्भसमयस्त्वित्थं स्मयते। प्रारम्भो वरणं यज्ञे सङ्कल्पो व्रतसत्रयोः । (जापयो.) नान्दीश्राद्धं विवोहादौ श्राद्धे पाकपरिक्रिया। निमन्त्रणं तु वा श्राद्ध प्रारम्भः स्यादिति स्मृतिः । इह वरणशब्देन प्रार्थनामारभ्य मधुपर्कग्रहणान्तं कर्म ज्ञेयम् । न तु प्रार्थनामात्रम् । मधुपर्कग्रहणोत्तरमेवाशौचाभावस्य सिद्धान्तात् । अत एवाधानेष्टिपशुबन्धादौ यत्र न मधुपर्क- विधिस्तत्र सत्यपि प्रार्थनात्मके वरणेऽशौचं प्राप्नोत्येव एवं प्राप्ताशौचा ऋत्विजस्त्यज्यन्ते । अन्ये पुनर्वियन्ते । यत्र वा यज्ञे दीक्षाविधिस्तत्र दीक्षणो येष्ट्यनन्तरमशौचाभाव इत्यवधेयम् । समाप्तिस्तु यज्ञेऽवभृथस्नानम् । अन्यत्र विसर्जनादयो लोकप्रतिपन्नास्तत्र तत्र ते तेऽर्थाः प्रकरणाद् प्रायाः। ३-श्रीगमोक्ते स्मार्ते वा कर्मणि। ३११ -भागमोक्तकाम्यपूजनादिनियमे तु प्रक्रान्ते यद्याशौची स्यात् तदा भानस्या प्रक्रियया ध्यानयोगान मन्त्रम्मरणपूर्वक सर्वमावृत्त सम्पादयेत्, न मन्त्रमुच्चारयेन। निष्काम पूजनादिनियमे तु प्रकाते नाशौचानुरोधं कुर्यात् । सर्व पूर्ववदाचरेन् । ३१२-मात कर्म बंधा-त्याज्यमत्याज्यं च । तत्र यत् त्याज्यं तदाशौच प्राप्त सन्त्यजत्। श्राशौचनिवृत्तौ पुनः कुर्यात् । अथ यदत्याज्यं तदाशौचे प्राप्ते सत्यस गोत्रेण कारयेत् ।

[२] आशौचपञ्जिका . यावदाशौचं स्वयं न कुर्यात् । क्वचिद्वा होमादौ कर्मविशेषे कर्तव्यतया नियते सत्यकृतान्नेन ब्रीह्मा- दिना, कृताकृतान्नेन तन्दुलादिना वा, फलेन वा तत्कर्म कुर्यात कारयेद्वा अनियते तु न कुर्यात् । ३१३-ौतेऽप्येवं नियमानियमतो व्यवस्था । तेन येषा बह चादीनां दशरात्रमहो. मेऽपि नाग्निविच्छेदः कल्पेभ्युपगम्यते, तैरशौचे प्राप्तेऽनहोमो न कार्यः । आशौचोत्तर पुनस्तत्रैवाग्नौ होमसिद्धिर्न तु पुनराधाना द्यावश्यकता । अथ तैत्तिरीयादीनां येषां चतूरात्रमहूय- मानोऽग्निलौकिकः सम्पद्यते तेषां होमनियमाच्छुष्कान्नेन फलादिना वा तत् कर्मकुर्यादेवेति सिद्धान्तः । समारूढे त्वग्नौ नैरपि होमो न काय: । किन्तु पुनराधानमेव तत्र कृत्वा होमादि कुर्यात्। ४-पाशीचे श्राद्धपाते । ३१४-प्रेतश्राद्धप्रतिसांवत्सरिकश्राद्धयोराशौचकालमध्ये प्राप्तौ सत्यां तदाशौचे व्यतीते सत्याशौचान्तद्वितीये दिने प्रशस्तकालोपलक्षिततिथौ वा कार्यम्। तस्मिन्नपि दिने मलमासादिविघ्ने प्राप्ते मलमासाव्याप्तायामनन्तरकृष्ण कादश्यामेव कार्यम् ॥ १॥ समय प्रकाशकारस्तु मलमासे- ऽप्यशौचकालिकप्रथमतिथावेव कार्यमित्याह । आशौचेन सांवत्सरिकप्रतिरोधेऽशौचान्ते मलमा- सेऽपि कर्तव्यमिति कृत्यसारमुच्चयकारोऽमृतनाथो मैथितोऽप्याह । प्रतिसंवत्सरं श्राद्धमाशौचोत्पतितं च यत् । मलमासेऽपि कर्तव्यमिति भागुरिरब्रवीत् ॥ इति वचनं च तत्रोष्टम्भकतया प्रदर्शयति ॥ २॥ एतच्चान्ये बहवो गौड़ा द्रविड़ा वा नांनुमोदन्ते । श्राशीचेन तुल्यन्यायान्मल मासस्यापि कर्मप्रतिबन्धकत्वौचित्यात् । सपिण्डीकरणादूर्ध्वं यत्किञ्चिच्छाद्धिकं भवेत् । इष्टं वाप्यथवा पूर्तं तन्न कुर्यान्मलिम्लुचे ॥ इतिस्मरणाच||३||तथा चेशविप्रतिपत्तिस्थाने देशापारात कुलाचाराद्वा व्यवस्था नेया|४|| अथ पुनरपि यद्याशौचान्तरपातः स्यात् तदा तदशौचेऽपि व्यतीते सति तत्कार्यम् ॥ ५ ॥ ३१५--शूद्रस्य तु त्रिंशदिवसाशौचमध्ये प्रथममासिकप्रप्तौ तच्छाद्धमनन्तरकृष्णका- दश्यामेध कार्यम् नत्वशौचान्तदिने । अथ कृष्णैकादश्यामपि करणापाक्ती द्वितीयमासिकदिने प्रथममासिकविधानाभावात् कृष्णैकादश्यामेव तन्मासिकद्वयमेकन कार्यम् । ५-पाशौचे सन्ध्यावन्दनम् । ३१६-सन्ध्यावन्दनादिनित्यकर्मणस्त्वशौचे प्राप्ते केनचिदंशेन त्यागश्चात्यागश्च प्राशौचपक्षिका [ ८३ ] aarinamrika विबीयते । तथा हि प्राणायामादिविशिष्टस्य निर्दिष्टरूपस्य तु तस्य परित्याग एव । मानसी तु सन्ध्या कुशवारिविवर्जिता न कदाचित्परित्याज्या। तत्र प्राणायाम त्वमन्त्रकं कुर्याद्वा न कुर्याद्वा । माजैनमन्त्रं मन सोचार्य मार्जयेत, मार्जनं न कुर्याद्वा । अय॑न्तु सूर्याय गायत्रीं सम्यगुच्चार्य निवेदयेत् । प्रदक्षिणं कृत्वा सूर्य ध्यायन नमस्कुर्यात् , नपस्थानं तु न कुर्यात् । गायत्रीमन्त्र जपं मानसं कुर्यात, न कुर्याद्वति शिल्पः । सैषा मानसी सन्ध्या भवति । तत्र जलेन सूर्यादानं साविन्याः सम्यगुच्चारणं च कल्पसिद्धमपि नाचरन्ति बहवः शिष्टाः । ३१७-रज्ञां राजकर्मणि, राजभृत्य नां राजाज्ञासाधने भिपजां भैषज्ये, शिल्पिनां कारूणां दास दासानां च प्रतिनियतेष्वेव केषुचित् स्वरयकार्यषु शिल्गादिषु अस्पृश्यत्वादिलक्षणाशीचं नास्ति । नत्राभिषिक्तक्षत्रिया ऐन्द्रग्थानोपसन्ना राजानः । नानाद्रव्यगुणादिविद्यानिष्णाश्चिक रसावणा भिष: : । द्रव्योत्पादकाः सृर्पकारादयः कारव: । द्रव्ये गुणोत्पादकाश्चित्रकाररजमादयः शिलिनः । इतर साधारणा असाधारणा वा नापितादयो दासीदासाः कर्मविशेपेष्वेवाशौचप्रति- षेधादन्यत्र सन्ध्यावन्दनाद्यष्टमसुदानश्राद्धादिधर्मकृत्येषु चैषां स्वस्वजात्युक्तम शौचमवतिष्ठत - एवं। ३१८-अशौचिगृहे श्राशौचोपधायककर्म विशेष नियुक्ता अप्येते भिषः शिल्पिनः, कारवो दासीदासाश्चान्यत्र पुनरन्येषां देवकार्यादौ तत्तभिपगादयोग्यकर्मसु वा यथेच्छं नियोक्तुं शक्यन्ते । संसर्गाशौचश्य एतेवनभ्युपगमात् ।। ६ - भोजनकाले आशौचप्राप्तौ । ३१६ - भोजनकाले तु भुञ्जानस्याशाचप्राप्तौ तं पास भूमौ निक्षिप्य स्नात्वा शुध्येत तग्रासभक्षणे त्वहोरात्रेण शुद्धिः । अथाशौचं श्रुतमागणयित्वा यदि तत्सर्वमेवान्नमश्नीयाक्तदास्य त्रिरात्रेण शुद्धिः। अत्र कर्मणः प्रारब्धापरिसमाप्तविचारोऽशोचसंकोचको नाभ्युपगम्यते इति दिक । इति कर्मभेदाधिकारः। ३-द्रव्यभेदाधिकारः। १-आशौचिनः पण्याद्वस्तुग्रहणे- ३२० -पण्याधिष्ठातुरशौचित्वे पण्ये प्रसारितानां सर्वेषामेव द्रव्याणां पण्याधिष्ठात्रनुज्ञया स्वहस्तेन ग्रहणे दोषाभावः । तथाविधपण्याधिष्ठातृहस्ताद् ग्रहणे तु ग्रहीतरि तदशौचं संक्रमते । द्रव्यं च तद् दुष्ट देवकर्मणि नोपयुज्यते ।

[८४] आशौचपलिका २-दध्यादिद्रव्यविशेषे। ३२१-दधि-मधु-घृत-क्षीर-मद्य-मांसानि लवणं जलं तृणकाष्ठ शाकफलमूल पुष्पाणि तिलमौषधमजिनं पुस्तकादिकं च एतान्यशौच्यधिष्ठितानि स्वहस्ताद् ग्राह्याणि । अशौचिहत्ताद् प्रहणे तु तदशौचं प्रहीतरि सक्रमते । द्रव्यं च तद् दुष्टमकर्मण्यम् । ३२२-अपक्वं तन्दुलादिद्रव्यम । पर मोदका डडुकादि । एतदुभयभन्न पत्रप्रवृत्ता नामशौचिनामपि नदशौनिहातसम्पर्कष्यतिरे केगा स्वहस्ताद प्राह्यम । अन्नसत्रादन्यत्र त तद शौचिपकानं मोदकादिकं भुक्तवा त्रिरात्रव्रतेन शुध्यति । ३२३- उभाभ्यां भोजयितृभोक्तृभ्यां दातृग्रहीतृभ्यां वा व्यवहत म्यामपरिज्ञाते त्वशौच तदशौच्यन्नं भुक्तवतोऽपि न दोषः। श्राशौचसं कमणे ज्ञानस्यैव निमित्तत्वात्। तयोरे के नाप्य- शौचे परिज्ञाते तु भोक्तरि दोषः संक्रमते । ३-विवाहादी भोजने । ३२४-विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रवृत्तेषु यद्यन्तरा सूतकं मृतकं वा जायते तदाशौचिभिन्न- गोत्रैः परैरन्न तदशौचिहस्तासंपृक्तं प्रदातव्यम् । तत्र पूर्व संकल्पितान्ने दोषाभावात् नान्नभक्षणे भोकृणां ब्राह्मणानां दोषाप्रसक्तः । ४-भोजनमध्ये प्राशौचप्राप्तौ। ३२५-अथ भुञ्जानेषु ब्राह्मणेषु भोजनार्धे भुक्ते सत्यन्तरा सूतके मृतके वा प्राप्ते सलोच्छिष्टशेषं त्यक्त्वोत्थिता अन्यगेहे परकीयेन जलेनाचान्तास्ते ब्राह्मणा न दुष्यन्ति । अथ तत्रैवाशौचिनो गृहे कृताचमनानां तु दोषः स्यादेव । इति द्रव्यभेदाधिकारः ॥ ४-मृतदोषाधिकारः। १-अपमृत्युमरणादौ पातकिमरणादौ चाशौचाभावः । ३२६-यादृशेभ्यः प्रेतेभ्यः प्रदीयमानमुदकं पिण्डदानं ग केवलमन्तरीक्षे विलीयते न तु प्रेतेभ्य उपतिष्ठते ते प्रदर्श्यन्ते । ३२७-यो हि महापातकी गलत्कुष्ठी। यो वा कण्ठदेशोत्पन्नभगरोग: स्यात् । यो वा चर्मारथ्यादिमयपात्रनिर्माता ब्राह्मणादिः स्यात् । यो वा पुंकर्मासातनपुसका स्यात् । यो वा व्याधिजनकोषधदाता, विषदाता, अग्निदाता वा स्यात् । यो वा मनुष्यवधस्थानाधिकारी स्यात् । -- आशौचपञ्जिका [५] एवंविधानां पात किनां कालमृतानामपि न दाहो न श्राद्धं नाप्याशौचं प्रकल्प्यते । तत् कृत्वा तप्तकृच्छद्वयं कुर्यात् । ३२८-अथ यदि शृङ्गिनख्यादिपशुभिः स्त्रिया वा सह क्रीडां कुर्वन् प्रमादतो म्रियमाण: स्यात् । यदि वा मरणोद्देशप्रवृत्तो विद्यद्धतः स्यात् । यदि बा पारूण्डायितया नित्यपाद्वेषितया वा क्रोधादिना वा स्वयं प्रायविषाग्न्यादिशत्रोहन्धन जलगिरितम्प्रपतनादिप्रयो- गेण म्रियमाण: स्यात् । यथाकथञ्चिद्वा शास्त्राननुमन बुद्धिपूर्वकमा भघाती स्यात् । नत कृत्वा नातकृच्छद्वयं कुर्यात। ३२६ -- श्रथ यो ब्राह्मण विषयापराधकरणानिहत: स्यात् । यो वा बुद्धपूर्वक ब्रह्मणेन हतः स्यात् । परदारान् हरन् द्वेषात् तत्पतिभिनिहतः स्यात् । यो वा चौर्यादिदोषेण राजा हतः स्यात् । यो वा कलहं कुर्वाणो विप्रादः कदाचिदसमानवणश्चाण्डालायै निहतः स्यात् । यो वा नागप्रियकारितया नागहतः स्यात् । एवंविधानां बिशिष्टदोषनिमित्त कमृत्युमतामपि न दाहो न श्राद्धं नाप्याशौचं प्रकल्प्यते तत् कृत्वा तप्तकच्छुद्वयं कुर्यात् । ३३०-एतत्सर्वमवैधे दर्पकृते च मृत्युनिमित्त कर्मणि द्रष्टव्यम् । वैधे प्रमादकृते वा मरणे तु तेषामशौचमौलदै हिकादिकं च सर्वं यथायथमन्त्येव । एवमेव कृतप्रायश्चित्तस्य गलत्- कुष्टिनोपि दाहाशौचादिकं भवत्येव । तथा युद्धे स्वाम्यर्थं म्लेच्छतस्करादिभिरपि निहतस्य विप्रादेर्दाहाशौचादिकं भवत्येव । युद्धे शस्त्रेणाभिमुखह नस्य दाहादिकं प्रवर्तते सद्यः शौचं च । गोविप्रपालनेऽभिमुखयुद्ध हतस्य सद्यः शौचम् । पराङ्मुखहतस्य तु तस्य त्रिरात्रम ! गवार्थे ब्राह्मणार्थे वा दण्डेन युद्ध हतस्याहोरात्रमाशौचम् । नृपतिर हितयुद्ध ल गुहादिहलस्य च त्रिरात्रम्। ३३१-लौकिकपारिभाषिको भय विधशस्त्रधातेतरक्षतेन तु सप्ताहमध्ये मरणे सर्ववर्णानां त्र्यहम् । सप्ताहादूर्ध्वं तु मरणे सति स्वजात्युक्तं संपूर्णाशौचमेव । लौकिकेन पारिभाषिकेण वा शस्त्रघातेन व्यहमध्ये मरणे व्यहाशौचम, यहादूर्ध्व तु मरणे सर्ववर्णानां स्वजात्युक्तं प्रकृताशौचमेव । ३३२-खड्गशरच्छुरिकादिधातो लौकिकशस्त्रघात: । बज्रपाताद्, वह्निदाहात्, जलप्रवेशात्, उच्च देशप्रपतनात, संग्रामात, शृङ्गिनखिदंष्ट्रिव्यालादिघातात्, विषभक्षणात, चौरचाण्डाला दिभिर्घातात्, उद्वन्धनाद्वा, मरणं शासाननुमतम् । अनशनादिमरणं च पारिभा- षिकशनघात: । सेयं परिभाषा देवीपुराणे समाम्नाता । इति मृतदोषाधिकारः । - .

[६] माशौचपञ्जिका ५-वचनाधिकारः। ( वेदाग्निमदादिब्राह्मणादीनां वचनादाशौचाभोवः ) सागसार्थज्ञानवे वतः श्रौतस्मा ग्निद्वयवतो वेदविहिनसकल क्रियावतो विप्रस्य सपिण्डमरणादौ सद्यः शौचम् ॥ १॥ वेदार्थमविजानतस्तु साङ्गवेदवतोऽग्निद्वयवतः क्रियानिष्ठ स्यैकाहः ॥ २ ॥ साङ्गसार्थज्ञानवेदवतोऽग्निद्वयवतोविहितैकदेशक्रियावतोऽप्येकाहः ॥ ३ ॥ साङ्ग- सार्थज्ञानवेभवतः स्मार्तकाग्निम 1: श्रीताग्निहीनस्य क्रियानिष्ठस्य व्यहः ॥३॥ वेदशून्यस्याग्निद्वयवतः कियानिष्टस्य ग्रह. ॥ ५ ॥ साङ्गमार्थज्ञानवेदनोऽप्यग्निद्वयही नभ्य चतुरहः ॥ ६ ॥ अङ्गानभिज्ञम्य वेदवतोऽनिद्वयहीनस्य पञ्चादः ॥ ७॥ वेदेकदेशाऽध्या यिनो अग्नद्वयहीनस्य षडहः ॥ ८॥ अल- धीतवेदा अग्नयो जातिब्राह्मणा ब्राह्मणब्रुवा इत्युच्यन्ते । तेषां दशाहमाशौचम् । अधापकर्षक- वेदाग्निशून्यतया तत्रापवादाप्रसक्तावौत्सर्गिकाशोचप्रवृत्तेनिराबाधात् ॥ ६ ॥ सर्वे चैते सद्यः शौचादिका अपकर्षपक्षाः सपिण्डान्तराणामशौचिनां संसर्गाभावे सति बोध्याः । सति तु संसर्गे तेषां निमित्तिनामिवैषां वेदाग्निमतामयशौचं दशाहव्याप्यमेवोपधीयते नि त्वपकर्षः । ३३४ -- संसर्गश्चात्रैकत्रशयनासनभोजनादिलक्षणो नवविधो द्रष्टव्यः । तानाह देव नः-- आलापस्पर्शनिश्वासात् सहयानासनाशनात् । याजनाध्यापनाद् यौनात पापं संक्रमते विशेषश्चात्र त्रिषष्टितमे प्रतिज्ञा पाक्ये द्रष्टव्यः ।। ३३५-क्षत्रियस्य वेदाग्निमत्वे क्रियानिष्ठत्वे च दशाहो न तु द्वादशाहः ॥ १ ॥ वैश्यम्य वेदानिमत्वे क्रियानिष्ठत्वे च द्वादशाहो न तु पञ्चदशाहः ।। २ ।। श्रद्धया द्विजशुश्रूषां पञ्चयज्ञादीनि च शूद्रवि हितकर्माणि नियमेन कुर्वाणस्य न्यायवर्तिनः शूद्रस्य पञ्चदशाह शौचं न तु मासम् । २-कर्मविशेषेष्वेवायमपवादो न सर्वत्र । ३३६--सर्व चेतदाशौचसंकोचविथानं प्रतिनियतेष्वेव होमाध्ययनादिकर्मस्वनुज्ञा- लाभार्थ बोध्यम् । न तु सन्ध्यावन्दने पञ्चमहायज्ञे, मृत्तिकाग्रहणमार्जन-प्राणायाम तर्पणाधु- पेतप्रधानक्रियारूपरमानात्मकजियकर्मसु स्मार्तकर्मसु कुलान्नभोजने दानप्रतिग्रहयोः काम्यहोम- स्वाध्यायादिषु चानुष्ठानानुज्ञानार्थमयमाशौचसङ्कोच उपकल्प्यते । तेनेदं दशाहाद्यासौचं कुलान- भोजनादिनिवतकं स्वाध्यायहोमदा.. ग्रहादिविशिष्टकर्मप्रतिबन्धकमपि वेदाग्निमता क्रियानि- ष्ठानां नित्यकर्त्तव्यस्य वेदाध्ययनाध्यापना महोत्रादिक मणः केवल मेकाहादि क्षणमत्यल्पकानमेव नृणाम् ।। इति

आशौचपञ्जिका
[७]
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प्रतिबन्धकं भवति न तु दशाहादिपर्यन्तमधिककालमित्येतावन्मात्रे तात्पर्य नेयम् ।
३३७-यत्रापि वेदाग्निमतामघसंकोचो विहितस्तावाप्याशौचे सत्यग्निमता श्रौताग्नौ
शुभकामेन फलेन वा होमः कार्यः । स्मार्ताग्नौ त्वकृतान्नेन कृताकृतान्नेन वा परद्वारा होमः
कारयितव्यः। कृतान्नं तु पर द्वारा पि न हावयेत् । दिनसक्तुलाजमोद कल ड्डुकादिकं कृतान्नम् ।
तन्दुलमाषमुद्गादिक कृताकृतान्नम् । ब्रीहियवगोधूमादिकं त्वकृतान्नम् ।
३-नाडीच्छेदात्याक प्रतिग्रहादिकम् ।
३३८-कुमारप्रसवे नाडीच्छेदात्पूर्वं हिरण्यधान्य गोवस्त्रकम्बलादिप्रावरण तिलानगुड-
सर्पिषां दानं प्रतिमहं वा कुर्वन् न दोषेण युज्यते ॥ १॥ पुत्रोत्पत्ती नाडीच्छेदात् पूर्व जातश्राद्ध-
मप्यसिद्धानेन कुर्वन् न दुष्यति ॥ २ ॥ जननदिवसात् षष्ठेहनि च जन्मदानां षोडशमातृणां
पष्टिकासहितानां रात्रियागं कुर्वन् न दुष्यति ॥ ३॥
३३६-जन्माशौचे मरणाशौचेऽपि वा स्थिते यदि पुत्रजन्म स्यात् तदा पुत्रजन्मनि-
मित्तक जातेष्टिसंस्कारादिकं कुर्यादेव न त्वाशौचात्तन्निवृत्तिः ॥ ३ ॥
जन्माशौचे मरणाशौचेऽपि वा स्थिते यदि पित्रादिसपिण्डानां मरणं स्यात् तदा
मरणनिमित्तकमन्त्येष्टिकर्मादिकं कुर्यादेव न त्वशौचात्तन्निवृत्तिः ॥ १ ॥
४-आशौचान्तरे सत्यपि पिण्डदानम् ।
३४०-प्रारब्धे प्रेतपिण्डे यदि मध्ये जननं स्यात् तदा शेषानप्याशौचपिण्डान् यथाविधि
यथोपक्रमं दद्यादेव नत्वपूर्वाशौचात् तन्निवृत्तिः ।।
३४१-पित्राशौचमध्ये मातृमरणे पित्राशौचान्तरं पक्षिणीवृद्धिः पर्वमाम्नाता, सप्त-
त्रिंशदधिकद्विशततमे (२३७) प्रतिज्ञावाक्ये । तत्र तथापिधे मातुः पक्षिणीमध्ये पितुरेकादशाहश्राद्ध
कुर्यादेव न त्वाशौचानिवृत्तिरिति देवयाज्ञिकादयः प्राहुः । पक्षिणीपर्यन्ताशौचनिवृत्तौ सत्यां
ततः पितुरेकादशाहनिमित्तकमाद्यश्राद्धं कुर्यादिति मिताक्षराकारादयः । तेनात्र विकल्पः । विकल्प
त्वाचाराद् व्यवस्था । एवमन्यत्रापि यथायथमूह्यम् ।
इतिवाचनिकाधिकारः।
३४२ --श्रीपूर्णस्य रमेश्वरस्य मिथिलाधीशस्य विद्यानिधे-
भू वृन्दारकवृन्दवन्दितपदस्यात्यन्तसन्तुष्टये ।
वीरैर्भारतधर्मसंग्रहपरैः संप्राथितो मैथिलः
सोऽयं श्रीमधुसूदनों व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥१॥
इत्याशौचापवादाध्यायो नवमः ॥ ६ ॥

[१८] आशौचपञ्जिका १०-अथ प्रमाणसंग्रहाध्यायः॥ १-स्मृतिसंग्रहः । ~ . , । ३४३-अत्राध्याये स्मृतिसंग्रहो, वचनसंग्रहो, नामसंग्रहश्चेति त्रयोऽधिकाराः प्रदर्श्यन्ते । (१) तत्राद्य आशौचार्था विशतिस्मृतयो यथा मनुस्मृतिः १, प्रक्षिप्तमनुस्मृत्तिः २, याज्ञवल्क्यस्मृतिः ३, पराशरस्मृतिः ४, बृहत्पराशरस्मृतिः ५, गौतमस्मृतिः ६, वशिष्ठस्मृति: ७, दक्षम्मृतिः ८, शसस्मृतिः १. लिखितस्मृतिः १०, लध्वनिस्मृतिः ११, अत्रिग्मृतिः १२, वृद्धात्रि- स्मृतिः १३, यमस्मृतिः १४. संवतस्मृतिः १५, विष्णुस्मृति : १६, प्रौशनसस्मृतिः (६)७, अङ्गिरसस्मृतिः १८ श्रापस्तम्बस्मृतिः १६, कात्यायनस्मृतिश्चेति २०, । (२) द्वितीये त्वधिकारे नानामुनिवचनानि २१, पुराणवचनानि २२, च संगृहोतानि । (३) तृतीये तु आशौचनिबन्धानां नामोल्लेखः कृत इत्येवमादीन्यधिकरणान्यत्र भवन्ति । तत्रादौ मनुस्मृति:- ३४४-प्रेतशुद्धि प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धि तथैव च । चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ॥ १ ॥ दन्तजातोऽनुजाते च कृतचूडे च संस्थिते । अशुद्धा बान्धवाः सर्वे सूत के छ तथोच्यते ॥ २ ॥ दशाह शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । अाक् संचयनादस्थनां व्यहमेकाहमेव च ।। ३ सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरदेदने ॥४॥ यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । जलनेऽप्येवमेव स्थानिपुर्णा शुद्धिमिच्छताम् ॥ ५ ॥ सर्वेषा शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम् । सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ।। ६ ।। निरस्य तु पुमान् शुक्रभुपस्पृश्येव शुद्धयति । बैजिकादभिसम्बन्धादनुरन्ध्यादघं व्यहम् ॥ ७ ॥ ॥

आशौचपञ्जिका
[at]
बहिः ।
अन्हा चैकेन रात्र्या च त्रिरात्रैरेव च त्रिभिः ।
शवस्पृशो विशुद्ध्यन्ति व्यहादुदकदायिनः ॥ ८ ॥
गुरो प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन ।
प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुद्धचति ॥६॥
रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्रावे विशुद्धयति ।
रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥ १० ॥
नृणामकृतचूडानां विशुद्धि शिकी स्मृता ।
निर्वृ त्तचूद कानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ११ ॥
उनद्विवार्षिकं प्रेतं निदध्युन्धिवा
भलंकृत्य शुचौ
शुचौ भूमावस्थिसंचय नाहते ॥ १२ ॥
नास्य कार्योऽग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया।
भरण्ये काष्ठवन्त्यत्त्वा क्षपेयुस्म्यहमेव च
नात्रिवर्षस्य कर्तव्या बान्धवरुदकक्रिया ।
जातदन्तस्य वा कुर्यु नाम्नि वापि कृते सति ॥ १४ ॥
सब्रह्मचारिण्येकाहमतीते क्षपणं स्मृतम् ।
जन्मन्ये कोदकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ।। १५ ।।
स्त्रीणामसंस्कृतानां तु त्यहाच्छुद्धयन्ति बान्धवाः ।
यथोक्तेनैव कल्पेन शुद्धयन्ति तु सनाभयः ॥ १६ ॥
अक्षारलवणान्ताः स्युनिमज्जेयुश्च ते व्यहम् ।
मांसाशनं 'ध नाश्नीयुः शयीरँश्च पृथक क्षितौ ॥ १७ ॥
सन्निधादेव वैकल्पः शावाशौचस्य कीर्तितः।
असन्निधावय झेयो विधिः सम्बन्धिबान्धवैः ॥१८॥
विगतं तु विदेशस्थं शृणुयाद्यो झनिर्दशम् ।
यच्छेशं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ १६ ॥
अतिक्रान्ते दशाहे व त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्वैवापो विशुद्धयति ॥ २० ॥
निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य जन्म च ।
सवासा जलमाप्सुत्य सद्य एवं विशुद्धति ॥ २१ ॥

[१]
স্বামীন্দ্রিক্ষা
बाले देशान्तरस्थे च पृथक पिण्डे च संस्थिते ।
सवासा जलमाप्लुत्य शुद्धो भवति मानवः ।। २२ ।।
अन्तर्दशाहे स्यातां चेत्पुनमरणजन्मनी ।
तावत् स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तस्यादनिर्दशम् ।। २३ ।।
त्रिरात्रमाहुराशौचमाचार्य संस्थिते सति ।
तस्य पुत्रे च पन्यां च दिवारामिति स्थितिः ।। २४ ॥
भोत्रिये तूपसम्पन्ने त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
मातुले पक्षिणी रात्रिः शिध्यविम्बान्धवेषु च ॥ २५ ।।
प्रेते राजनि सज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितिः ।
अश्रोत्रिये त्वहः कृत्स्नमनूचाने तथा गुरौ ॥ २६ ॥
शुद्ध द्विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।
वश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धचति ॥ २७ ॥
न वर्द्धयेदघाहानि प्रत्यूहे नाग्निषु क्रिया ।
न च तत् कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ २८ ॥
दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा ।
शवं तत्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुद्धथति ॥ २६ ।।
आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने ।
सौरान्मन्त्रान्यथोत्साहं पावमानीश्च शक्तितः ॥३०॥
नारं स्पृष्ट्वास्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुद्धचति।
आचम्यैव तु निःस्नेहं गामालभ्यार्कमीक्ष्य वा ।। ३१ ।।
आदिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात् ।
समाप्ते तूदक कृत्वा निरात्रेणैव शुद्धचति ॥ ३२ ।।
वृथासङ्करजातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम् ।
आत्मनात्यागिनां चैव निवर्त्ततोदकक्रिया ॥३३ ।।
पाखण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः ।
गर्भभ द्रुहां चैव सुरापीनां च योषिताम् ॥ ३४ ॥
अचार्य स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् ।
निहत्य त्य तु प्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ ३५ ॥

आशौचपञ्जिका
[१]
पक्षिणेन मृतं शद्रं पुरद्वारेण निहरेत ।
पश्चिमोचर पूर्व स्तु यथायोगं द्विजन्मनः ॥ ३६ ।।
न राक्षामधदोषोऽस्ति बतिनां न च सत्रिणाम् ।
ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हि ते सदा ॥ ३७॥
राको महात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते ।
प्रजानां परिरक्षार्थमासनं चान्नकारणम् ॥३८॥
डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवेन च
गोब्राह्मणस्य चैवार्थे यस्य चेच्छति पाथिवः ॥ ३६ ।।
सोमाग्न्यको निलेन्द्राणां वित्ताप्पत्योर्यमस्य च ।
अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥४०॥
लोकेशाधिष्ठितो रोजा नगरयाशौचं विधीयते ।
शौचाशौचं हि मानां लोकेशप्रभवाप्ययम् ॥ ४१ ।।
उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्महतस्य च ।
सद्यः सन्तिष्ठते यज्ञम्तथाशौचमिति स्थितिः ॥ ४२ ।।
विप्रः शुद्धयत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो बाहनायुधम् ।
वैश्यः प्रतोदं रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृत क्रियः ॥ ४३ ।।
एतद्वोऽभिहितं शौचं सपिण्डेषु द्विजोत्तमाः ।
असपिण्डेषु सर्वेषु प्रेतशुद्धि निबोधत ॥ ४४ ।।
असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निहत्य बन्धुवत् ।
विशुद्ध यति त्रिरात्रेण मातुराप्ताँश्च बान्धवान् ।। १५ ।।
यद्यन्नमत्ति तेषान्तु दशाहेनैव शुद्धयति ।
अनदन्नन्नमन्हैव चेत्तस्मिन् गृहे वसेत् ॥ ४६ ।।
अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेब च ।
स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वा ग्निं घृतं प्राश्य विशुद्धथति ॥ १५ ॥
न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृतं शूद्रेण नाययेत् ।
अस्वग्र्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता ।। ४ ।।
ज्ञानं तपोग्निराहारो मृन्मनो धार्यपाञ्जनम् ।
वायुः कार्ककालौ च शुद्धेः कर्त णि देहिनाम् ॥ ४६ ॥
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योथै शुचिहि स शुचिन मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥ ५० ॥

[२]
आशौचपञ्जिका
क्षान्त्या शुद्धधन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः ।
प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥५१॥
मृत्तोयैः शुद्ध-चते शोध्यं नदी वेगेन शुद्धयति ।
रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तम ॥ १२ ॥
भद्भिर्गात्रागिण शुद्ध चन्ति मनः सत्येन शुद्ध यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धचति ॥५३ ।।
एव शौचस्य यः प्रोक्तः शारीरस्य विनिर्णयः ।
नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धः शृणुत निर्णयम् ॥ ५४ ।।
..
अथ मनुस्मृतौ नेपकवचनानि (२)
परम
३४५-उभयत्र दशाहानि कुलस्यान्नं न भुञ्जते ।
दानं प्रतिग्रहो यज्ञः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥ १ ॥
जननेप्येऽवमेव स्यान्मातापित्रोस्तु सूतकम् ।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥ २ ॥
प्राकसंस्कारप्रमीतानां वर्णानामविशेषतः ।
त्रिरात्रात्तु भवेच्छुद्धिः कन्यास्वह्वो विधीयते ॥ ३ ॥
आदन्तजन्मनः सद्य आचूड़ानैशिकी स्मृता ।
त्रिरामावतादेशात् दशरात्रमत:
परपूर्वासु भार्यासु पुन्नेषु प्रकृतेषु च
मातामहे त्रिरात्रं तु एकाहं त्वसपिण्डतः ॥ ५ ॥
पर पूर्वासु पुत्रेषु सूतके मृत केषु च
मातामहे त्रिरात्रं स्यादेकाहं तु सपिण्डने ॥ ६ ॥
मासत्रये त्रिरात्रं स्यात् षण्मासे पक्षिणी तथा ।
महस्तु नवमादागूवं स्नानेन शुद्धयति ॥ ७ ॥
पितरौ चेन्मृतौ स्यातां दूरस्थोऽपि हि पुत्रकः ।
श्रुषा तदिनमारभ्य दशाहं सूतकी भवेत् ॥ ८ ॥

आशौचपञ्जिका [३] सत्रविशूद्रदायादाः स्युश्चेद्विप्रस्य बान्धवाः । तेषामशौचं विप्रस्य दशाहाच्छुद्धिरिष्यते ॥ ६ ॥ राजन्यवैश्ययोश्चैवं हीनयोनिषु बन्धुषु । स्वमेव शौच कुर्वीत विशुद्धयर्थमिति स्थितिः ॥ १० ॥ विप्रः शुद्धय शाहेन जन्महानौ स्वयोनिषु । षड्भिस्त्रिभिरथैकेन क्षत्रविशद्रयोनिषु ॥ ११ ॥ सर्वे चोत्तमवर्णास्तु शौचं कुर्युरतन्द्रिताः । सरणं विधिवदृष्टे न तु शौचं स्वयोनिषु ॥ १२ ॥ ३४६-यानि वचनानि हेमाद्रिमाधवादिभिर्निबन्धकारैर्मनूक्तत्वेन स्वीक्रियन्ते किन्तु सम्प्रत्युपसन्धमुद्रितमनुस्मृतिपुस्तकेषु नोपलभ्यन्ते तानि श्राशौचविषयाणि प्रयन्ते । ३४४-मातुले श्वशुरे मित्रे गुरौ गुर्वङ्गनासु च । आशौचं पक्षिणी रात्रि मृता मातामही यदि ॥ श्वशुरयोश्च भगिन्यां च मातुलान्यां च मातुले । संस्थिते पक्षिणी रात्रि दौहिने भगिनीसुते ।। संस्कृते तु त्रिरात्रं स्यादिति धमों व्यवस्थितः । पित्रोः स्वसरि तद्वच पक्षणी क्षपयन्निशाम् ।। भगिन्यां संस्कृतायान्तु भ्रातर्यपि च संस्कृते । मित्रे जामातरि प्रेते दौहित्रे भगिनीसुते ।। श्यालके तत्सुते चैव सद्यः स्नानेन शुद्धयति । पित्रोरुपशमे स्त्रीणां मूढानां तु कथं भवेत् ॥ त्रिरात्रेणैव शुद्धिः स्यादित्याह भगवान् यमः । दशाहाभ्यन्तरे बाले प्रमीते तस्य बान्धवैः॥ शाबाशौचं न कर्तव्यं सूत्याशौचं विधीयते । श्वशूद्रपतिताश्चान्त्या मृताश्चेद् द्विजमन्दिरे ।। शौचं तत्र प्रवक्ष्यामि मनुना भाषितं यथा । दशरात्राच्छुनि मृते मासाच्छूद्रे भवेच्छुचिः ॥ द्वाभ्यां तु पतिते गेहमन्त्ये मासचतुष्टयात् । भस्यन्तं वर्जयेद् गेहमित्येवं मनुरब्रवीत् ।। द्विजस्य मरणे वेश्म विशुद्धधति दिनत्रयात् ।

[१४]
आशौचपञ्जिका
प्राममध्ये मृतो यावच्छवस्तिष्ठत स्यचित् ।
प्रामस्य तावदाशौचं निर्गते शुचिता भवेत् ॥
प्रामेश्वरे कुलपती श्रोत्रिये च तपस्विनि ।
शिष्ये पञ्चत्वमापन्ने शुद्धिनक्षत्रदर्शनात् ॥
महानद्यन्तरं यत्र गिरि व्यवधायकः
वाचो यत्र विभिद्यन्ते त्द्देशान्तरमुच्यते ॥
देशनामनदीभेदान्निकटेऽपि भवेद्यदि ।
तत्तु देशान्तरं प्रोक्त स्वयमेव स्वयंभुवा ।।
दशरात्रेण या वाता यत्र न भूयतेऽथवा ।
अथ याज्ञवल्क्यस्मृतिः (३)।
३४-ऊनद्विवर्ष निखनेन्न कुर्यादुदकं ततः ।
पाश्मशानावनुव्रज्य इतरो झातिभिमतः ॥१॥
यमसूक्ततथा गाथा जपद्धिलौकिकाग्निना ।
स दग्धव्य उपेतश्चेदाहिनान्या वृतार्थवत् ॥ २ ॥
सप्तमाहशमाद्वापि ज्ञातयोऽभ्युपयन्त्यपः ।
अयनः शोशुचदघमनेन पितृदिङ्मुखाः ॥ ३ ॥
एवं मातामहाचार्यप्रेतानामुदकक्रिया
कामोदकं सखिप्रत्तास्वस्त्रीयश्वशुरर्तिजाम् ॥ ४ ॥
सकृत्प्रसिञ्चन्त्युदकं नामगोत्रेण वाग्यताः ।
न ब्रह्मचारिणः कुर्यु रुदक पतितास्तदा ॥ ॥
पाखण्ड-यनाश्रिताः स्तेनाः भन्यः कामगादिकाः ।
सुराप्य आत्मत्यागिन्यो नाशौचोदकभाजनम् ॥ ६॥
प्रदेशनादिक कर्म प्रेतशंस्पर्शिनामपि ।
इच्छतां तत्क्षणाच्छुद्धिः परेषां स्नानसंयमात् ॥ ७ ॥
श्राचार्य पित्रुपाध्यायान्निहत्यापि व्रती व्रती ।
संकटानं च नाश्रीयान्न च तैः सह संवसेत् ॥८॥
त्रिरात्रं दशरात्रं वा शावमाशौचमिष्यते।
उद्विवर्ष लभया: सूतकं मातुरेव हि ॥ ६ ॥

श्राशौचपञ्जिका [६] पित्रोस्तु सूतकं मातुस्तदसृग्दर्शनाद् ध्रुवम् तदहनं प्रदुष्येत पूर्वेषां जन्मकारणात् ॥१०॥ अन्तरा जन्ममरणे शेषाहो भिर्विशुद्ध यति । गर्भस्रावे मासतुल्या निशाः शुद्धस्तु कारणम् ।। ११ ॥ हतानां नृपगोविप्रैरन्वक्ष चात्मघातिनाम । प्रेषिते कालशेषः स्यात् पूर्णे दत्वोदकं शुचि ॥ १२ ॥ क्षत्रस्य द्वादशाहानि विशः पञ्चदशैव त्रिंशहिनानि शूद्रस्य तदर्ध न्यायवर्तिनः ॥ १३ ॥ मादन्तजन्मनः सद्य आचूडानैशिकी स्मृता । त्रिगत्रमाव्रतादेशादशरात्रमतः महत्त्वदत्तकन्यासु बालेषु च विशोधनम् । गुर्वन्ते वास्यनूचानमातुलश्रोत्रिरेषु च ॥ १५ ॥ भनौरसेषु पुत्रेषु भार्यावन्यगतासु च । निवासराजनि प्रेते तदहः शुद्धिकारणम् ॥ १६ ॥ ब्राह्मणेनानुगन्तव्यो न शूद्रो न द्विजः कचित् । अनुगम्याम्भसि स्नात्वा स्पृष्ट्वाग्नि घृतभुक् शुचिः॥१७॥ महीपतीनां नाशौचं हतानां विद्युता तथा । गोवाभणार्थे संग्रामे यस्य चेच्छति भूमिपः ॥ १० ॥ ऋत्विजां दीक्षितानां च यज्ञियं कर्म कुर्वताम् । सत्रिवतिब्रह्मचारिदातृब्रह्मविदां ॥ १९॥ हाने विवाहे यज्ञे च संग्रामे देशविप्लवे । भापपि हि कष्टायां सद्यः शौचं विधीयते ।।२०।। उदक्या शुचिभिः स्नायात संपृष्टस्तैरुपस्पृशेत् । भनिनानि अपेञ्चैव गायत्री मनसा सकृत् ॥ २१ ॥ कालोऽग्निः कर्म मृद्वायुमनोज्ञानं तपो जलम् । पश्चात्तापो निराहारः सर्वेऽमी शुद्धिहेतवः ॥२२॥ अकार्यकारिणां दानं वेगो नद्याश्च शुद्धिकृत् । शोभ्यम मुच्च तोयं च संन्यासो वै द्विजन्मनाम् ॥ २३ ॥ तथा

[६]
श्राशाचपाजका
तपोवेदविदा शान्तिर्विदुषां वर्मणो जलम ।
जपः प्रच्छन्नपापानां मनसः सत्यमुच्यते ॥२४॥
भूतात्मनस्तपोविद्ये बुद्धानं विशोधनम् ।
क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञानाद्विशुद्धिः परमा मता ॥२५॥
ASHOMACHARHAA
अथ पराशरस्मृतिः (४)
३४६-अतः शुद्धिं प्रवक्ष्यामि जनने मरणे तथा ।
दिनत्रयेण शुद्धयन्ति ब्राह्मणाः प्रेतसूतके ॥१॥
क्षत्रियो द्वादशाहेन वैश्यः पञ्चदशाहकैः ।
शुद्रः शुद्धयति मासेन पराशरवचो यथा ॥ २ ॥
उपासने तु विप्राणामङ्गशुद्धिश्च जायते ।
ब्राह्मणानां प्रसूतौ तु देहस्पों विधीयते ॥३॥
जातो विप्रो दशाहेन द्वाहशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शुद्रो मासेन शुद्धचति ॥ ४ ॥
एकाहाच्छुद्धयते विप्रो योग्निवेदसमन्वितः ।
यहात् केवल वेदस्तु द्विहीनो दशभिर्दिनैः ॥ ५॥
जन्मकर्मपरिभ्रष्टः सन्ध्योपोसनवर्जितः
नामधारकविप्रस्तु दशाह सूतकं भवेत् ॥ ६ ॥
अजा गावो महिष्यश्च ब्राह्मणी नवसूतिका ।
दशरात्रेण संशुद्धय द् भूमिस्थं च नवोदकम् ॥ ७ ॥
एकपिण्डास्तु दायादाः पृथगदारनिकेतनाः ।
जन्मन्यपि विपत्तौ च तेषां तत्सृतकं भवेत् ।।८।।
तापत् तत् सूतक गोत्रे चतुर्थपुरुषेण तु ।
दायाद्विच्छेदमाप्नोति पञ्चमो वात्मवंशजः ॥ १ ॥
चतुर्थे दशरात्रं स्यात् षनिशाः पुंसि पञ्चमे ।
षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात् ॥१०॥
भृग्वग्निमरणे चैव देशान्तरमृते तथा ।
बाल प्रेतेच संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते ॥ ११ ॥

आशौचपञ्जिका [७]] श्रूयते यदि । देशान्तरमृतः कश्चित् सगोत्र: न त्रिरात्रमहोरात्रं सद्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥ १२ ॥ देशांतरगतो विप्रः प्रयासात् काल कारितात् । देहनाशमनुप्राप्तस्तिथिन ज्ञायते यदि ॥१३॥ कृष्णाष्टमी त्वमावास्या कृष्णा चैकादशी च या। उदकं पिण्डदानं च तत्र श्राद्धं च कारयेत्॥१४॥ अजातदन्ता ये बाला ये च गर्भाद्विनिःसृताः । न तेषामग्निसंस्कारो नाशौचं नोदकक्रिया ॥१५॥ यदि गर्भो विपद्येत स्रवते वापि योषितः । यान्मासं स्थितो गर्भो दिनं तावत्त सूतकम् ॥ १६ ।। आचतुर्थाद् भवेत्स्रावः पातः पञ्चमषष्ठयोः । अत ऊवं प्रसुतिः स्याद्दशाह सूतकं भवेत् ॥ १७ ॥ दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते । अग्निसंस्कारणे तेषां त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ १८ ॥ यादन्तजन्मनः सद्यः आचूडानशिकी स्मृतः । त्रिरात्रमावनादेशाद्दशरात्रमतः ब्रह्मचारी गृहे येषां हूयते च हुताशनः । सम्पर्क चेन्न कुर्वन्ति न तेषां सूतक भवेत् ॥ २० ॥ सम्पकौद् दुष्यते विप्रो जनने मरणे तथा । सम्पर्काञ्च निवृत्तस्य न घेतं नैव सूतकम् ।। २१ ।। शिल्पिनः कारुका वैद्यादासीदासाश्च नापिताः। राजानः श्रोत्रियाश्चैव सद्यःशौचाः प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ सव्रतो मन्त्रपूतश्च आहिताग्निश्च यो द्विजः । राज्ञश्च सूतकं नास्ति यस्य चेच्छति पार्थिवः ॥ २३ ॥ उद्यतो निधने दाने आतों विप्रो निमन्त्रितः। तदेव ऋषिभिष्ट यथाका लेन शुद्धयति ॥ २४ ॥ प्रसवे गृहमेधी तु न कुर्यात्सङ्करं यदि । दशाहाच्छुद्धथते माता त्ववगाह्य पिता शुचिः ॥ २५ ॥ परम

[८]
জাখীক্ষাঙ্কিা
--
सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम् ।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्यं पिता शुचिः ॥२६॥
यदि पत्न्यां प्रसूतायां सम्पर्क कुरुते द्विजः ।
सूतकं तु भवेत्तस्य यदि विप्रः षडङ्गवित् ॥ २७ ॥
सम्पाजायते दोषो नान्यो दोषोस्ति वै द्विजे ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सम्पर्क वर्जयेद् बुधः ॥ २८ ॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु
त्वन्तरा मृतसुतके
पूर्व सङ्कल्पितं द्रव्यं दीयमानं न दुष्यति ॥ २६ ॥
अन्तरा तु दशाहस्य पुनर्मरणजन्मनी ।
तावत् स्यादशुचिविप्रो यावत्तत् स्यादनिर्दशम् ।। ३०॥
ब्राह्मणार्थं विपन्नानां बन्दीगोग्रहणे तथा ।
आहवेषु विपन्नानामेकरात्रमशौचकम
द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डल भेदिनौ ।
परिवाड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥ ३२ ॥
अनाथं ब्राह्मणं प्रेत ये वहन्ति द्विजातयः ।
पदे पदे यज्ञफलमानुपुया लभन्ति ते ॥३३॥
न तेषामशुभं किश्चित् पापं वा शुभकर्मणाम् ।
जलावगाहनातेषां सद्यः शौचं विधीयते ॥ ३४ ॥
असगोत्रमबन्धु च प्रेतीभूतं द्विजोत्तमम् ।
वहित्वा च दहित्वा च प्राणायामेन शुद्धथति ॥ ३५ ॥
अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव वा ।
स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाग्नि घृतं प्राश्य विशुद्धचति ॥ ३६॥
क्षत्रियं मृतमज्ञानाद् ब्राह्मणो योऽनुगच्छति ।
एकाहमशुचिर्भूःवा पञ्चगव्येन शुद्धथति ॥ ३७ ।।
शवं च वैश्यमज्ञानाद् ब्राह्मणो ह्यनुगच्छति ।
कृत्वाऽऽशौचं द्विरात्रं च प्राणायामान षडाचरेत्।। ३८ ॥
प्रेतीभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
अनुगच्छन्नीयमानं त्रिरात्रमशुधिर्भवेत् ॥ ३६॥

আখীৰঞ্জিকা [ ] त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्धयति ।। ४०॥ विनिवर्त्य यदा शूद्रा उदकान्तमुपस्थिताः । द्विजैस्तदानुगन्तव्या एष धर्मः सनातनः ॥ ४१ ।। तस्माद् द्विजो मृतं शूद्रं न स्पृशेन च दाहयेत् । दृष्टे सूर्यावलोकेन शुद्धिरेषा पुरातनी ॥४२॥ SURESS अथ बृहत्पराशरस्मृतिः । (५) ३५०-अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शुद्धिं पाराशरोदिताम् । सूतकेऽप्यथवा शौचे यथावत्तां निबोधत ॥ १ ॥ प्रासवं सुतकं प्राहु: शावमाशौचमुच्यते । यावत्कालं च यन्मानं तथा तावन्निबोधतः ॥ २ ॥ केषांचितन वै स्यातां केषांचिन् मरणान्ति के । अपःशौचास्तथा चान्ये स्मृताश्चैकाह्निकाः परे ॥ ३ ॥ त्रिषड् दशद्वादशभ्यां दशभिः सह पञ्चभिः । तान्येव त्रिगुणान्याहुर्वदन्त्येवं मनीषिण: ॥ ४ ॥ वक्ष्यमाणं निबोधव्यमुक्तक्रमिदं बुधाः । शक्तिजो यन्मुनीन्द्राणां प्रागूचे किल धर्मवित् ।। ५ ।। विष्णुध्यानरतानां च सदैव व्रतचारिणाम् । गृहमेधिद्विजातीनां तथैव व्रतचारिणाम् ॥ ६ ॥ वेदतत्वार्थवेतृणां नित्यस्नानकृतामपि अनुसंसर्गिणामेषां नाशौचं नापि सूतकम् ॥ ७ ।। संसर्ग वर्जयेद् यस्मात संसर्गों दोषकारणम् । कुन्निानादिसंसर्ग वर्जयन्स्यादकिल्विषी ॥ ८ ॥ वदन्ति मुनयः प्राच्याः संसर्गो दोषकारणम् । असंसर्गः स्वकर्मस्थो द्विजो दोषैन लिप्यते ॥ ६ ॥ दानोद्वाहेष्टिसंग्रामे देशविप्लवकादिषु सद्यः शौचं द्विजातीनां सूतकाशौचयोरपि । १० ।।

[ १०० ] प्राशौचपञ्जिका . दातृणां व्रतिनामे के कवयः सुनृणामपि । सद्यः शौचमदोषाणामूचुर्धर्मविदः कलौ ॥११॥ सर्वमन्त्रपवित्रः स्यादग्निहोतृषडङ्गवित् राजा च श्रोत्रियश्चैव सद्यःशौचाः प्रकीर्तिताः ॥ १२ ॥ देशान्तरगते जाते मृते वापि सगोत्रिणि । (!) निवासे तु सद्यःशौचं विशोधनम् ॥ १३ ॥ सद्यः शौचं विधातव्यमग्विा दन्तजन्मनः । बान्धवादिषु विज्ञेयमन्यदृवं विधीयते ॥ १४ ॥ नाशौचसूतके स्यातां नृपतीनां कदाचन । यज्ञकर्मप्रवृत्तस्य ऋत्विजां दीक्षितस्य च ॥ १५ ॥ पृथक् पिण्डे मृते बाले निर्दशेन्यत्र च श्रुते । जातेनापि विशुद्धिः स्यात्सद्यः शौचादसंशयम् ।। १६ ।। सवेदः साग्निरेकाहाद् ब्राह्मणः शुद्धिमाप्नुयात् । तथैकाहो नृपे संस्थे तथैव ब्रह्मचारिणि ।। १७ ।। दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च विपत्काल उपस्थिते । उपसर्गमृते चापि सदाः शौचं विधीयते ॥ १८ ॥ गोद्विजार्थे विपन्नानामाइवेषु गतायुषाम् । ते योगिभिः समा ज्ञेयाः सद्यःशौचाः प्रकीर्तिता:।। १६ ॥ विप्रे संस्थे व्रतादर्वाक श्रोत्रिये च द्विजे मृते। अनूचाने गुरौ चैव प्राचार्य चापि संस्थिते ॥ २० ॥ स्त्रीणामसंस्कृतानां च श्रोत्रिये च नृपे मृते । त्रिरात्रमेव शौचं स्यात्तथैवोदकदायिनाम् ॥ २१ ॥ विद्वाननग्निको विप्रस्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् । मनीषिणोऽपरे युरसपिण्डे व्यहं व्यहम् ।। २२ ।। प्रेतीभूतं च यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥२३॥ षडानं नवरात्रं च शवस्पृशां विशुद्धिकृत् । त्र्यहं चैव विशुद्धचथं धर्मशास्त्रविदो विदुः ॥ २४ ।। ।

प्राशीचपञ्जिका [११] अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः । पदे पदे यज्ञफलमनुपूर्व लभन्ति ते ॥२५॥ अशुचित्व न तेषां तु पापं वाऽशुभ कारणम् । जलावगाहनात्तेषां सद्यः शुद्धिः प्रकीर्तिता ॥ २६ ॥ असगोत्रमसम्बन्धं प्रेतभूतं तथा द्विजम् । ऊढ़वा दग्ध्वा द्विजा सर्वे स्नातास्ते शुचयः स्मृताः।। २७ ।। एकरात्रं पदन्त्येके सद्यः स्नानमथापरे । गोगृहादिमृतानां च मुनयः शुद्धिकारणम् ॥ २८ ।। हतः शूरो विपद्येत शत्रुभिर्यत्र कुत्रचित्त । स मुक्तो यतिवत् सद्यः प्रविशन्परवेधसि ॥ २६ ॥ संन्यासी संस्थितो योगी संमुखो यो रणे हतः । सूर्यमण्डलभेत्ताराविति प्राहुर्मनीषिणः ॥३० ।। पराङ्मुखे हते सैन्ये यो युद्धाय निवर्तते । तत्पदानी'ष्टतुल्यानि स्युरित्याह पराशरः ।। ३१ ।। वदने प्रविशेद्येषां लोहितं शिरसः पतत् । सोमपानेन तत्तुल्या बिन्दवो रुधिरस्य वे ।। ३२॥ संन्यासेन मृता ये स्युर्य संग्रामे तनुत्यजः । युक्तिभाजो नरास्ते स्युरिति वेदोऽपि कीर्तयेत् ।। ३३ ।। सद्यः शौचं विधातव्यं शुद्धिरेवं विधीयते । तेनोच्यन्ते मृता लोकाः साद्या ब्रह्मवपुर्गताः ॥ ३४ ॥ सध्याचारविहीनानां सूनकं ब्राह्मणब्रुवाम् । अशौचं द्वादशाहं स्यादिति पाराशरो ब्रवीत् ॥ ३५ ।। राज्ञां च द्वादशाहं तु पक्षो वैश्यस्य पावनः । वृषलस्य तथा मासः ज्यहादेष्वपि धर्मतः ॥ ३६ ।। क्षपा च पक्षिणी सद्भिः मातुलादिषु कीतिता। गर्भस्रावे च पाते च रात्रयो माससम्मिताः॥ ३७॥ स्रावं गर्भस्य विद्वांसो मासादाक् चतुर्थकात् । पातमूद्धवं वदन्त्येते तत्राधिकं च सूतकम् ॥ ३८ ।।

1 १०२]
आशौचपञ्जिका
ये
ऋणप्रस्तनिरागारपराधीनकदर्यकाः
तृष्णावन्तो निराचाराः पितृमातृविवर्जिताः ॥३६॥
स्त्रीजिताश्चानपत्याश्च देवब्राह्मणवर्जिताः ।
परद्रव्यप्रहत्वान्ताः सदा सूतकिनः स्मृताः॥४०॥
सूतके सत्यशौचे वा अन्यदापद्यते यदि ।
पूर्वेणैव तु शुद्धयत जाते जातं मृते मृतम् ॥४१॥
एकपिण्डाश्च दायादाः पृथक्कृतनिकेतनाः ।
जन्मन्यपि मृते वापि तेषां वै सूतकं भवेत्॥ ४२ ॥
भृगुवह्निप्रपाते च देशान्तरमृतेषु च
बाले प्रेते च संन्यासे सद्यः शौचं विधीयते ॥४३॥
अजातदन्ता बाला ये च गर्भाद्विनिर्गताः।
न तेषामग्निसंस्कारो नाशौचं नोदकक्रिया ॥४४॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु अन्तरा मृतसूतके ।
पूर्वसंकल्पितानर्थान्मोज्यान्तानब्रवीन् मनुः ॥ ४५ ॥
शिल्पिनः कारुकाश्चैव दासीदासास्तथैव च ।
इत्यादीनां न ते स्यातामनुगृह्णन्ति यान् द्विजाः ॥ ४६ ।।
पिता पुत्रेण जातेन दद्याच्छुद्धं यथाविधि ।
तत्राप्यनन्तकं दानं कर्तव्यं पुत्रजन्मनि ॥ ४७ ॥
प्रसवे च द्विजातीनां न कुर्यात्संकरं यदि ।
दशाहाच्छुद्धथते माता अवगाह्य पिता शुचिः ॥४८॥
अतिमानादतिक्रोधात् स्नेहाद्वा यदि वा भयात् ।
उबध्य म्रियते यस्तु न तस्याग्निः प्रदीयते ॥ ४६॥
न स्नायान्नोदकं दद्यानापि कुर्यादशौचताम् ।
सण शृङ्गिणा वापि जलेन वह्निना तथा ॥ ५० ॥
न स्नानादौ विपन्नस्य तथा चैवात्मघातिनः ।
अर्वाग्वै हायनादग्नि व दद्यान्मृतस्य च ॥ ५१ ॥
किन्तु नान्निखने भूमौ कुर्यान्नोद कक्रियाम् ।
षणमासे तु गते कार्या मुनिः प्राह पराशरः ॥ ५२ ॥

शिौचपञ्जिका [ १०३ ] सर्पादिप्राप्तमृत्यूनां वह्निदाहादिकाः क्रियाः । शास्त्रदृष्ट द्विजैः कार्यमस्थिसंचयनादिकम् ॥ ५३ ।। तत्कृत्वा त्यक्तदिवसे शुद्धिमहति धर्मतः । अन्यायमृतविप्राणां ये बोढारो भवन्ति हि । अग्निदाश्चैव ये तेषां तथोद कादिदायिनः ॥ ५४ ॥ उद्वन्धने मृतस्यापि यश्छिन्द्यात्पाशरज्जुकम्। सर्वे ते पापसंयुक्ताः प्रायश्चित्तस्य भाजनाः ॥ ५५ ॥ सूतकाशौचयोरुता शुद्धिर्यथानुपूर्वशः । अथ गौतमस्मृतिः ॥ [६] ३९१--शावमाशौचं शरात्रमनृत्विम् दीक्षितब्रह्मचारिणां सपिण्डानामेकादशरात्रं, क्षत्रियस्य द्वादशरात्रं, वैश्यस्यार्द्धमासमे कमासं शूद्रस्य । तच्चेदन्तः पुनरापतेतच्छेषेण शुद्धधरन्, रात्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिः । गोब्राह्मणहतानामन्वक्षं राजक्रोधाच युद्ध प्रायोनाशकशस्त्रा- ग्निविपोदकोद्बन्धनप्रपतनैश्वेच्छताम् पिण्डनिवृत्तिः सप्तमे पञ्चमे वा । जननेऽप्येवं माता- पित्रोस्तनमातुर्वा गर्भमाससमा रात्रिः संसने गर्भस्य व्यहं वा श्रुत्वा चोद्धर्व दशम्याः पक्षिणी असपिण्डे योनिसम्बन्धे सहाध्यायिनि च सब्रह्मचारिण्येकाहं श्रोत्रिये चोपपन्ने प्रेतोपस्पर्शने दशरात्रमशौचमभिसंधापयेत् । उक्तं च वैश्यशूद्रयोः-आर्तवीर्वा पूर्वयोश्वाहं वा श्राचार्यस्तत्पुत्र-- खोयाज्यविशेषेषु चैष अवरश्चेद्वर्णः पूर्ववर्णमुपस्पृशेत् पूर्वोवावरं तत्र शावोक्तमाशौचं पतित- चण्डालसूतिकोदक्य शवस्पृष्टि ततस्पृश्युपस्पर्शने सचैलोरकोपस्पर्शनाच्छुद्धत् ! शवानुगमिनः शुनश्च यदुपहन्यादित्येके उदकदानं सपिण्डैः कृतचूडस्य तत् स्त्रीणां चानतिभाग एके प्रेतानामधःशय्यासनिनो ब्रह्मचारिणः सर्वे न माजयेरन् न मांस भक्षयेयुराप्रदानात प्रथमतृतीयसप्तमनवमेषदकक्रिया वाससांच त्यागः । अन्त्ये त्वन्त्यानां दन्तजन्मादि माता पितृभ्यां तु माता, बालदेशान्तरति प्रजितासपिण्डानां सद्यः शौचं राज्ञां च कार्यविरोधात् । अथ वसिष्ठस्मृतिः॥ [७] ३५१-उदकक्रियामशौचं-द्विवर्षात्प्रभृतिमृत उभयं कुर्यात् । दन्तजननादित्येके शरीरमग्निना संयोज्य अनवेक्षमाणा अपौभ्यवयन्ति । ततस्तत्ररथा एव सव्येतराभ्यां पाणिभ्या- मुदकक्रियां कुर्वन्ति । अयुग्मा दक्षिणामुखाः पितॄणां वा एषा दिक् या दक्षिणा गृहान् ब्रजित्वा

[१०४]
आशौचपञ्जिका
स्वस्तरे व्यहमश्नत आसीरन् अशक्तौ कोतोत्पन्नेन वर्तेरन् । दशाहं शामाशौचं सपिण्डेषु
विधीयते । मरणात्प्रभृति दिवसंगणना सपिण्डता सतपुरुषं विज्ञायते अप्रत्तानां स्त्रीणां त्रिपुरुषं
त्रिदिनं विज्ञायते प्रत्तानामितरे कुरिन् ताश्च तेषां जननेप्येवमेव निपुणां शुद्धिमिच्छतां
मातापित्रो/ जानि निमित्तत्वात्-अथाऽप्युदाहरन्ति !
नाशौचं सूतके पुंसः संसर्ग चेन्न गच्छति ।
रजस्तत्राशुचिज्ञेयं तच्च पुंसि न विद्यते ॥ १ ॥
ब्राह्मणो दशरात्रेण पक्षमात्रेण भूमिप: ।
वैश्यः विशतिरात्रेण शूद्रो मासेन शुद्धयति ॥२॥
अशौचे यस्तु शूद्रस्य सूतके वापि भुक्तवान् ।
स गच्छेन्नरकं घोरं तिर्यग्योनिषु जायते ॥३॥
अनिर्दशाहे पक्वान्ननियोगाद्यस्तु भुक्तवान् ।
कृमिर्भूत्वा स देहान्ते तद्विधामुपजीवति ॥ ४ ॥
द्वादशमासान्द्वादशार्द्धमासान्वाऽनश्नन्संहितामधीयानः पूतो भवतीति विज्ञायते ।
ऊनद्विवर्षे प्रेते गर्भपतने वा सपिण्डानां त्रिरात्रमाशौचं सद्यः शौचमिति गौतमः । देशान्तरस्थे
प्रेते ऊवं दशाहाच्चैकरात्रमाशौचं आहिताग्निश्चत्वसम्रियते पुनः संस्कारं कृत्वा शववच्छौ चमिति
गौतमः । भूपयतिश्मशानरजस्वला सूतिकाशुचीनुपस्पृश्य सशिरा अभ्युपेयादपः ।
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अथ दक्षस्मृतिः ॥ [-]
:
३५३-अथाशौचं प्रवक्ष्यामि जन्ममृत्युनिमित्तकम् ।
यावज्जीवं तृतीयं तु यथावदनुपूर्वशः ॥ १॥
सद्यः शौचं तथैकाही द्वित्रिचतुरहस्तथा ।
षट् दश द्वादशाहश्व पक्षो मासस्तथैव च ॥ २ ॥
मरणान्तं तथा चान्यद्दशपक्षास्तु सूतके ।
उपन्यासक्रमेणव वक्ष्याम्यहमशेषतः
प्रन्थार्थतो विजानाति वेदमङ्गैः समन्वितः ।
सङ्कल्पं सरहस्यं च क्रियावांश्चेन्न सूतकी ॥ ४ ॥

आशौचपञ्जिका
राजविग्दीक्षितानां च बाले देशान्तरे तथा ।
तिनां सत्रिलां चैव सद्यः शौचं विधीयते ॥ ५ ॥
एकाहस्तु समाख्यातो योऽग्निवेदसमन्वितः ।
हीने हीनतरे चैव व्यहश्चतुरहस्तथा ॥ ६ ॥
जातिविप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धयति ।। ७ ।।
अस्नात्याचम्य जप्त्वा च दत्वा हुत्वा च भुंजते।
एवंविधस्य सर्वस्य यावज्जीवं हि सूतकम् ॥ ८ ॥
व्याधितस्य कर्यस्य ऋणग्रातस्य सर्वदा ।
क्रियाहीनस्य मूर्खस्य नीजितस्य विशेषतः ॥ ६ ॥
व्यसनासक्तचित्तम्य पराधीनस्य नित्यशः ।
श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तं सूतकं भवेत् ॥ १० ॥
न सूतकं कदाचिस्याद्यावज्जीवन्तु सूतकम् ।
एवं गुणविशेषेण सूतकं समुदाहृतम् ॥११॥
सूतके मृनके चैव तथा च मृतसूतके ।
एतत् संहतशौचानां मृताशौचेन शुद्धथति ॥ १२ ॥
दानं प्रतिप्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्तते ।
दशाहात्तु परं शौचं विप्रोऽहं ति च धर्मवित् ॥ १३ ॥
दानं च विधिना देयमशुभात्तारकं हि तत् ।
मृतकान्ते मृतो यस्तु सूतकान्ते च सूतकम् ॥ १४ ॥
एतत्संहतशौचानां पूर्वाशौचेन शुद्धयति ।
उभयत्र दशाहानि कुलस्यान्नं न भुज्यते ॥१५॥
चतुर्थेऽहनि कर्तव्यमस्थिसञ्चयनं द्विजैः ।
ततः सञ्चय नादृर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते ॥ १६ ॥
वर्णानामानुलोम्येन स्त्रीणामेको यदा पतिः ।
दश षट् व्यहमे काहः प्रसवे सूतकं भवेत् ॥ १७ ॥
स्वस्थकाले त्विदं सर्वमशौचं परिकीर्तितम् ।
आपद्गतम्य सर्वस्य सूतकेऽपि न सृतकम् ॥ १८ ॥
यज्ञे प्रवर्तमाने तु जायेनाथ म्रियेन वा ।
पूर्व सङ्कल्पिते कार्य न दोपस्तत्र विद्यते ॥ १६ ॥

tes] স্বামীণজ্জিা यज्ञकाले विवाहे च देवयागे तथैव च । हूयमाने तथा चाग्नौ नाशौचं नापि सूतकम् ॥ २० ॥ अथ शङ्खस्मृतिः। (8) ३५४-जनने मरणे चैव सपिण्डानां द्विजोत्तमः । त्र्यहाच्छुद्धिमवाप्नोति योऽग्निवेदसमन्वितः ॥ १ ॥ सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । नामधारकविप्रस्तु दशाहेन विशुद्धथति ॥ २ ॥ क्षत्रियो द्वादशाहेन वैश्यः पक्षण शुद्धयति । मासेन तु तथा शूद्रः शुद्धिमाप्नोति नान्तरा ॥ ३ ॥ रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्रावे विशुद्धयति । अजातदन्तबाले तु सद्यः शौचं विधीयते ॥ ४ ॥ यहोरात्रात् यथा शुद्धिर्बाले त्वकृतचूड़के । तथैवानुपनौते तु व्यहाच्छुद्धयन्ति बान्धवाः ॥ ५ ॥ अनूढानां तु कन्यानां तथैव शूद्रजन्मनाम् । अनूढभायः शूद्रस्तु षोडशाद्वत्सरात्परम् ॥ ६ ॥ मृत्यु समधिगच्छेञ्चेन्मासात्तस्यापि बान्धवाः । शुद्धिं समधिगच्छेयुर्नात्र कार्या विचारणा ॥ ७ ॥ पितृवेश्मनि या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता। तस्यां मृतायां नाशौचं कदाचिदपि शाम्यति ॥ ८ ॥ हीनवर्णा तु या नारी प्रमादात्प्रसवं व्रजेत् । प्रसवे मरणे तज्जमाशौचं नोपशाम्यति ॥ ६ ॥ * समानं खल्वशौचं तु प्रथमेन समापयेत् । असमानं द्वितीयेन धमराजवचो यथा ॥१०॥ देशान्तरगतः श्रुत्वा कुल्यानां मरणोद्भवौ । यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥११॥ * समानाशौचसम्पाते-इति पाठान्तरम् ।

आशौचपञ्जिका [ १०७ ] अतीते दशरात्रे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् । तथा संवत्सरेऽतीते स्नात एव विशुद्धयति ॥ १२ ॥ अनौरसेषु पुत्रेषु भार्यास्वन्यगतासु च । परपुर्वासु च स्त्रीषु व्यहाच्छुद्धिरिहेष्यते ॥ १३ ॥ मातामहे व्यतीते तु आचार्य च तथा मृते । गृहे दत्तासु कन्यासु मृतासु तु व्यहस्तथा ॥ १४ ॥ निवासराजनि प्रेते जाते दौहित्रके गृहे । आचार्यपत्नीपुत्रेषु प्रेतेषु दिवसेन च मातुले पक्षिणी रात्रि: शिष्यविम्बान्धवेषु च । सब्रह्मचारिण्येकाहमनूचाने तथा मृते ॥ १६ ।। एकरात्रं त्रिरात्रं च षडात्रं मासमेव च । शूद्रे सपिण्डे वर्णानामशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १७ ॥ त्रिरात्रमथ षडानं पक्षं मासं तथैव च । वैश्यसपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ।। १८ ।। सपिण्डे क्षत्रिये शुद्धिः षडात्रं ब्राह्मणस्य च । वर्णानां परिशिष्टानां द्वादशाह विनिर्दिशेत् ॥ १६ ॥ सपिण्डे ब्राह्मणे वर्णाः सर्व एवाविशेषतः । दशरात्रेण शुद्धय युरित्याह भगवान्यमः ॥ २० ॥ भृग्वग्न्यनशनांभोभितानामात्मघातिनाम् । पतितानां च नाशौचं शस्त्रविद्युद्धताश्च ये ॥२१॥ यतिव्रतिब्रह्मचारिनृपकारुकदीक्षिताः नाशौचभाजः कथिता राजाज्ञाकारिणश्च ये ॥ २२ ।। यस्तु भुङ्क्त पराशौचे वर्णी सोऽप्यशुचिर्भवेत् । अशौचशुद्धौ शुद्धिश्च तस्याप्युक्ता मनीषिभिः ।। २३ ।। पराशौचे नरो भुक्त्वा कृमियोनौ प्रजायते । भुक्त्वान्नं म्रियते यस्य तस्य योनौ प्रज्ञायते ॥ २४ ॥ दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायः पितृर्म च । प्रेतपिण्डक्रियावर्जमाशौचे विनिवर्तते ॥ २५ ॥ amarparyavaram

[१०८]
पाशौचपञ्जिका
अथ लिखितस्मृतिः । (१०)
३५५ --बालश्चैव दशाहे तु पञ्चत्वं यदि
पञ्चत्वं यदि गच्छति ।
सद्य एव विशुद्धयेत नाशौचं नोदकक्रिया ॥
शावसुतक उत्पन्ने सूतकन्तु यदा भवेत् ।
शावेन शुद्धयते सूतिः न सूतिः शावशोधिनी ।।
षष्ठेन शुद्धथ तैकाहं पञ्चमे व्यहमेव तु ।
चतुर्थे सप्तरात्रं स्यात् त्रिपुरुषे दशमेऽहनि ॥
मरणारब्धमाशौचं संयोगो यस्य नाग्निभिः ।
भादाहं तस्य विज्ञेयं यस्य वैतानिको विधिः ॥
DammamanaSERIES
अथ अविस्मृतिः। (१२)
३५६-अतः परं प्रवक्ष्यामि सूतकस्य विनिर्णयम् ।
प्रायश्चित्तं पुनश्च व कथयिष्याम्यतः परम् ॥ ॥
एकाहात् शुद्धयते विप्रोयोऽग्निवेदसमन्वितः ।
व्यहात्केवल वेदस्तु निर्गुणो दशभिदिनैः ॥२॥
तिनः शास्त्रपूतस्य श्राहिताग्नेस्तथैव च ।
राज्ञांतु सूतकं नास्ति यस्य चेच्छन्ति ब्राह्मणाः ॥ ३ ॥
ब्राह्मणो दशरात्रेण द्वादशाहेन भूमिपः ।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धर्थात ॥ ४ ॥
सपिण्डानां तु सर्वेषां गोत्रजः साप्तपौरुषः ।
पिण्डाश्वोदकदानं च शावशौचं तथानुगम् ॥ ५॥
चतुर्थे दशरात्रं स्यात् षडहः पञ्चमे तथा ।
षष्ठे चैव त्रिरात्रं स्यात् सप्तमे त्र्यहमेव वा ॥ ६ ॥
मृतसूतके दासीनां पत्नीनां चानुलोमिनाम् ।
स्वामितुल्यं भवेच्छौचं मृते भर्तरि योनिकम् ॥ ७ ॥
शवस्पृष्टं तृतीये तु सचैलं स्नानमाचरेत् ।
चतुर्थे सप्तभिक्षं स्यादेवं शवविधिः स्मृतः ॥८॥

आशौचपञ्जिका [१०] एकत्र संस्कृतानां तु मातृणामे कभोजनम् । नामितुल्यं भवेच्छौचं विभक्तानां पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥ उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरं ५ञ्चान्नं मृतसूतके । पाचकानं नवश्राद्धं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ १० ॥ सूतकानमधर्माय यस्तु प्राश्नाति मानवः । त्रिरात्रमुपवास: स्यादे रात्रं जले वसेत् ॥ ११ ॥ महायज्ञविधानं तु न कुर्यान्मृतजन्मनि । होमं तत्र प्रकुर्वीत शुष्कानेन फलेन वा ॥ १२ ॥ बालश्चैव दशाहे तु पञ्चत्वं यदि गच्छति । सद्य एव विशुद्धिः स्यान्न प्रेतं नैव सुतकम् ॥ १३ ॥ कृतचूडे प्रकुति उदकं पिण्डमेव च । स्वधाकारं प्रकुर्वीत उदकं पिण्डमेव च ॥ १४ ॥ ब्रह्मचारी यतिश्चैव मन्त्रे पूर्वकृते तथा । यज्ञे विवाहे काले च सद्यः शौचं विधीयते ॥ १५ ॥ विवाहोत्सवयज्ञेषु मृतसूतके । पूर्वसंकल्पितार्थग्य न दोषश्चात्रिरब्रवीत् ॥ १६ ॥ मृतसजननोवं तु सूत कादौ विधीयते । स्पर्शनाचमनाच्छुद्धिः सूतिकाञ्चन्न संस्पृशेत् ॥ १७ ॥ पञ्चमेऽहनि विज्ञेयं स्पर्श क्षत्रियस्य तु । सप्तमेऽहनि वैश्यस्य विज्ञेयं स्पर्शनं बुधैः ।। १८ ॥ दशमेऽहनि शूद्रस्य कर्तव्यं स्पर्शनं बुधैः । मासेनैवात्मशुद्धिः स्यात् सूनके मृत के तथा ॥१६॥ व्याधितस्य कर्यस्य ऋणग्रस्तस्य सर्वदा । क्रियाहीनस्य मूर्खस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः ॥२०॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्य नित्यशः । श्राद्ध त्यागविहीनस्य भस्मान्तं सुतकं भवेत् ॥२१॥ अन्तरा MUMBANDome

[११]
आशौचपलिका
अथ यमस्मृतिः । (१४)
३५७-सूतके तु समुत्पन्ने द्वितीये समुपस्थिते ।
द्वितीये नास्ति दोषरतु प्रथमेनैव शुद्धयति ॥१॥
जातेन शुद्धयते जातं मृतेन मृतकं तथा ।
गर्भसंस्रवणे मासे त्रीण्यहानि विनिर्दिशेत् ॥ २॥
रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्रावे विशुद्धयति ।
रजस्युपरते साध्वी स्नानेन बी रजस्वला ॥ ३ ॥
अनूढा न पृथक् कन्या पिण्डगोत्रे च सुतके ।
पाणिप्रक्षणमन्त्राभ्यां स्वगोत्रात् भ्रश्यते ततः ॥ ४ ॥
येन येन तु वर्णेन या कल्या परिणीयते।
तत्सम सुतकं याति तथा पिण्डोदकेऽपि च ॥५॥
विवाहे चैव संवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु ।
एकत्वं सा व्रजेत् भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ॥ ६॥
प्रथमेऽहनि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थके ।
अस्थिसंचयनं कार्यं बन्धुभिर्हित बुद्धिभिः ॥ ७ ॥
चतुर्थे पञ्चमे चैव सप्तमे नवमे तथा ।
अस्थिसंचयनं प्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥८॥
दैवे भये समुत्पन्ने प्रधानाङ्गे विगशिते ।
पूर्वसंकल्पिते चार्थे तस्मिन्नाशौचमिष्यते ॥ १॥ (कृत्यसारसमुच्ये)
अथ संवर्तस्मृतिः (१५)
३५८---विप्रो दशाहमासीत दानाध्ययनवर्जितः ।
क्षत्रियो द्वादशाहानि वैश्यः पञ्चदशैव तु ॥ १ ॥
शूद्रः शुद्धयति मासेन संवर्तवचनं तथा ।
प्रेतायान्नं जलं देयं स्नात्वा तद्गोत्रजैः सह ॥ २ ॥
प्रथमेऽह्न तृतीये च सप्तमे नवमे तथा ।
चतुर्थेऽहनि कर्तव्यमस्थिसञ्चयनं द्विजैः ॥ ३ ॥

प्राशौचपञ्जिका [ १११] ततः सञ्चय नादूर्ध्वमङ्गपर्टी विधीयते । चतुर्थेऽहनि वित्रस्य षष्ठे वै क्षत्रियस्य च ॥ ४ ॥ अष्टमे दशमे चैव स्पर्शः स्याद् वैश्यशूद्रयोः । जातस्यापि विधिदृष्ट एष एव महर्षिभिः ॥ ५ ॥ दशरात्रेण शुद्धथत विप्रो वेदविवर्जितः । माते पुत्रे पितुः स्नानं सचैलं तु विधीयते ॥ ६ ॥ माता शुद्धथ द्दशाहेन स्नानात्तु स्पर्शनं पितुः । होमं तत्र प्रकुर्वीत शुष्कान्नेन फलेन वा ॥ ७ ॥ पञ्चयश विधानं तु न कुर्यान्मृत्युजन्मनोः । दशाहात्तु परं सम्यग्विप्रोऽधीयीत धर्मवित् ॥ ८ ॥ अथ जत्रिस्मृतिः (११) ३५४-सूतके मृतके चैव मृतान्ते च प्रसूतके । तस्मात्तु सङ्गताशौचे मृताशौचेन शुद्धर्थात ॥ सूतकाद् द्विगुणं शावं शाबाद् द्विगुणमार्तवम् । आर्तवाद्विगुणा सूतिस्ततोऽपि शवदाहकः ॥ अनुगच्छेद्यथा प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव CinemaNDARISMALAMI belone अथ वृद्धात्रि-स्मृतिः (१३) ३६०-शावे शवगृहं गत्वा श्मशाने वान्तरेऽपि वा । आतुरं व्यंजनं कृत्वा दूरस्थोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ भतिक्रान्ते दशाहे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् । संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट वैवापो विशुद्धचति ॥ अशुद्धःस्वयमप्यन्यानशुद्धांस्तु यदि स्पृशेत् । स शुद्धचत्युपवासेन भुङ्क्ते कृण स द्विजः ॥ सूतकं सुतके पृष्ट्वा स्नानं शाबे च सूतके । मुक्त्वा पीत्वा तदज्ञानादुपवासी व्यहं भवेत् ।। A [११२ आशौचपञ्जिका प्रयुक्तानां विधीयते ॥ एव मृण्मयानां च पात्राणां देहे. शुद्धिविधीयते । स्नानादिषु त्याग सूतके मृतके चैव मृतके च प्रसूतके । तस्मात्तु संहताशौचे मृताशौचेन शुद्धयति ॥ सूनकाद् द्विगुणं शावं शावाद् द्विगुणमार्तवम् । द्विगुणं सुतिस्ततोऽधिशवदाहकः ॥ अनुगम्येच्छया प्रेतमज्ञानो बन्धुमेव स्नात्वा सचैल स्पृष्ट्वाग्नि घृतं प्राश्य विशुद्धयति ।। रात्रिं कुर्यात् त्रिभागं तु द्वौ भागौ पूर्व एव वा । उत्तरांशप्रभातेन युज्यते ऋतुसूतके ॥ आर्तवाद् अर्थागिरसस्मृतिः (१८) ३६१-दशाहाच्छुद्धथते विप्रो द्वादशाहेन भूमिपः । पाक्षिक वैश्य एवाह शूद्रो मासेन शुद्धयति ।। अथ आपस्तम्बस्मृतिः (१९) अन्तरा ३६२-विवाहोत्सवयज्ञेषु मृतिसूतके । सद्यः शुद्धि विजानीयात् पूर्व संकल्पितं चरेत् ।। देवद्रोण्यां विवाहेषु यज्ञेषु यज्ञेषु प्रततेषु च कल्पितं सिद्धमन्नाद्यं नाशौचं मृतसूतके ॥ अथ विष्णुस्मृतिः (२०) ३६३. ब्राह्मणस्य सपिए दानां जनसमरणयोदशाहमाशौचम् । द्वादशाह राजन्यस्य । पञ्चदशाहं वैश्यस्य । मासं शूदस्य । सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । अशौचे होमदानप्रतिमहत्वाध्याया निवर्तन्ते । नाशौचे कस्यचिदन्नमश्नीयात् । ब्राह्मणादीनामशौचे आशौचपञ्जिका [ ११३ ] यासकृदेवान्नम भाति तस्य तावदाशौचं यावत्तेषाम् । अशौचापगमे प्रायश्चित्तं कुर्यात् । सवर्ण- स्याशौचे द्विजो भुक्त्वा स्रवन्तीमासाद्य तन्निमग्नस्त्रिर घमर्षणं जप्त्वोत्तीयं गायत्र्यष्टसहस्र जपेत् । क्षत्रियाशौचे ब्राह्मणस्त्वेतदेवोपोषितः कृत्वा शुद्धयति । वैश्याशौचे राजन्यश्च । वैश्याशौचे ब्राह्मणत्रिरात्रोपोषितश्च । ब्राह्मणाशौचे क्षत्रियः क्षत्रियाशौचे वैश्यः स्रवन्तीमासाद्य गायत्रीशत- पञ्चकं जपेत् । वैश्यश्च ब्राह्मणाशौचे गायत्र्यष्टशतं जपेत् । शूद्राशीचे द्विजो भुक्त्वा प्राजापत्यव्रतञ्चरेत् ॥ शूद्रश्च द्विजाशौचे स्नानमाचरेत् । शूद्रः शूद्राशौचे स्नान: पञ्चगव्यं पिवेत् । पत्नीनां दासानामनुलोमेन स्वामिनस्तुल्यमशौचम् । मृते स्वामिन्यात्मीयम् । हीनवर्णानामधिकवर्णेषु तद पगमे शुद्धिः ।ब्राह्मणस्य क्षत्रविद्शूद्रेपु षड्रत्रत्रिगत्रैकरात्रैः । क्षत्रियस्य विट्शूद्रयोः षड्रात्रत्रिरात्रा- भ्याम् । वैश्यस्य शूद्रेषु षड्रात्रेण । मासतुल्यैरहोरात्रैगर्भस्रावे । जातमृते मृतजोते वा कुलस्य सद्यः शौचम् । अदन्तजाते बाले प्रेते सद्य एव । नास्याग्निसंस्कारो नोदकक्रिया । दन्तजाते स्वकृतचूडे त्वहोरात्रेण कृतचूडे त्यसस्कृते त्रिरात्रेण । ततः परं यथोककालेन । स्त्रीणां विवाहः संस्कारः । संस्कृतासु स्त्रीपु नाशौच भवति पितृपक्षे। तत्प्रसवमरणे चेत् पितृगृहे ग्याता तदैकरात्रं त्रिरात्रं च । जननाशौचमध्ये यद्यपरं जननाशौच स्यात्तदा पूर्वाशोचव्यपगमेन शुद्धिः । रात्रिशेषे दि द्वयेन । प्रभाते दिनत्रयेण मरणाशौचमध्ये ज्ञातिमरणेऽप्येवम् । श्रुत्वा देशा न्तरस्थजननमरणे शेषेण शुद्धयत् । व्यतीतेऽशौचे संवत्सरान्तन्त्वेवरात्रेण । ततः परं स्नानेन । प्राचार्य्यमातामहे च व्यतीते त्रिरात्रेण , अनौरसेषु पुत्रेषु जातेषु च मृतेषु च , , परपुर्वासु भा-सु प्रसूतासु मृतासु च । आचार्यपत्नी पुत्रोपाध्यायमातुलश्वशुर श्वशुर्यसहाध्यायिशिष्येष्व- तीतेष्वे करात्रेण, खदेशरानि च असपिण्डे रखवेश्मनि मृते च । भृग्वग्न्यनाशकाम्बुसंग्रामवि- तुन्नपहतानां नाशौचम् । न राज्ञो राजकर्मणि । न वतिनां व्रते न सत्रिणां सत्रे । न कारूणां स्वकर्मणि । राजाज्ञाकारिणां तदिच्छया। न देवप्रतिष्ठाविवाहयोः पूर्वसंभृतयोः। न देशविप्लवे। आपद्यपि च कष्टायाम । आत्मत्यागिनः पतिताश्च नाशौचोदक भाजः । पतितस्य दासी मृतेऽन्हि पादाभ्यां घटमपवर्जयेत् । उद्वन्धमृतस्य य : पाशं च्छिन्द्यात् म तप्तकृच्छण शुद्धयति । अात्मघातिनां संस्कर्ता च । तदश्रपातकारी च । सर्वस्यैव प्रेतस्य बाम्धवैः सहाश्रुपातं कृत्वा स्नानेन । अकृते त्वस्थिसंचये सचैलानेन । द्विजः शूद्रप्रेतानुगमनं कृत्वा स्रवन्तीमासाद्य तन्निमग्नविरघमर्षणं जप्त्वोत्तीर्य गायत्र्यष्टसहस्रंजपेत् । द्विजप्रेतस्याष्टशतम् । शूद्रप्रेतानुगमनं कृत्वा स्नानमाचरेत् । चिताधूमसेवने सर्वे वर्णाः स्नानमाचरेयुः ।

1 ११४ ] आशौचपञ्जिका शवस्पृशं च स्पृष्ट्वा पञ्चनखशवं तदस्थि सस्नेहञ्च । गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरेत् । प्रेताहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुद्धयति ।। आचार्य स्वमुपाध्यायं पितरं मातरं गुरुम् । निहत्य तु व्रती प्रेतान्न व्रतेन वियुज्यते ॥ आदिष्टी नोदकं कुर्यादाव्रतस्य समापनात् । समाप्ते तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेण विशुद्धयति ।। ज्ञान तपोऽग्निराहारो मृण्मनोवायुपालनम् । वायुः कार्ककालौ च शुद्धिकर्तृ णि देहिनाम् ।। अथ औशनसस्मृतिः । [१७] ३६४-दशाहं प्राहुराशौचं सपिण्डेषु विपश्चितः । मृतेऽथवाऽथ जातेषु ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः ॥ नित्यानि चैव कर्माणि काम्यानि च विशेषतः । न कुर्यादहितं किञ्चित् स्वाध्यायं मनसापि च ॥ शुचिरक्रोधनस्त्वन्यान् कालेग्नौ भोजयेद् द्विजान् । शुष्कान्नेन फलैर्वापि पितरं जुहुयात्तथा ॥ न स्पृशेयुरिमानन्ये न भूतेभ्यः समाचरेत् । सूतके तु सपिण्डानां संस्पर्शो नैव दुष्यति ॥ सूतके सूतकाञ्चैव वर्जयित्वा तृणं पुनः । अधीयानस्तथा यज्वा वेदविच्चापि यो भवेत् ॥ चतुर्थे पञ्चमे वाह्नि संस्पर्शः कथितो बुधैः । स्पृश्यास्तु सर्व एवैते स्नानात्तु दशमेऽहनि ॥ दशाहं निर्गुणं प्रोक्तमाशौचन्दा सनिर्गुणे । एवं द्विगुणैर्युक्तं चतुश्चैकदिने शुचिः ॥ दशाहात्तु परं सम्यगधीयीत जुहोति च चतुर्थे त्वस्य संस्पर्शों मनुराह प्रजापतिः ॥ क्रियाहीनस्य मूर्खस्य महारोगिण एव च येषां मरणस्याहर्मरणान्तमशौचकम ॥

पाशौचपञ्जिका [ ५१५ ] ॥ त्रिरात्रं दशरात्रं वा ब्राह्मणानामशौचकम् । प्राक संस्कारात त्रिगत्रं स्याद्दशरात्रमतः परम् ।। जन्मद्विवर्षगे प्रेते मातापित्रोस्तदिष्यते त्रिरात्रेण शुचिस्त्वन्यो यदिहात्यन्तनिर्गुणः ॥ अदन्तनातमरणे मातापित्रोस्तदिष्यते जातदन्ते त्रिरात्रं स्यादन्तः स्यात् यत्र निर्णयः ।। जन्मद्विवर्षगे प्रेते मातापित्रोस्तदिष्यते त्रिरात्रेण शुचिस्त्वन्यो यदिहात्यन्त्य निर्गुणः प्रादन्तजन्मनः सद्य आचौलादेकरात्रकम् । त्रिरात्रमुपनयनाद्दशरात्रमुदाहृतम् जातमात्रस्य बालस्य यदि स्यान्मरणं पितुः । मातुश्च सूतकादि स्यात् पितास्य स्पृश्य एव हि ।। सद्यः शौचं सपिण्डानां कर्तव्यं सोदरस्य तु । उर्ध्व दशाहादे काहः सोदरो यदि निर्गुणः ।। अथोषं दन्तजन्म स्यात् सपिए डानामशौचकम् । एकरानं निगुणानां चौलादृवं विरात्रकम् ॥ आदन्तजातमरणं सम्भवेद्यदि सन्तमाः एकरात्रं सपिण्डानां यदि चात्यन्त निर्गुणः व्रतादेशात्सपिण्डानां गर्भच्युतावहोरात्रं सपिण्डेऽत्यन्त निर्गुणे यथेष्टाचरणाद् ज्ञातौ त्रिरात्रादिति निर्णयः । सुतके यदि सूतिश्च मरणे वा गतिर्भवेत् ॥ शेषेणैव भदेच्छुद्धिरहशेषे मरणोत्पत्तियोगे मरणेन समाप्यते ॥ अर्द्धवृत्तिमनाशौचमूर्ध्वमन्येन देशान्तरगतः श्रुत्वा सूनकं शाव एव वा तावदष्टप्रयतोऽन्ये वा यावच्छेपं समाप्यते अतीते सूनके प्रोक्तं सपिए डानां त्रिरात्रकम् ।। तथैव मरणे स्नानमूद्धर्वं संवत्सराद् व्रती वेदांश्च यस्त्वधीयानो न भवेत् वृत्तिकर्षितः ।। गर्भस्रावच पाततः । द्विराकम् --- तु शद्धयत --- श्राशौचपञ्जिका - सद्यः शौचं भवेत्तस्य सर्वावस्थासु सर्वदा स्त्रीणामसंस्कृतानां तु प्रदोनात् परतः पितुः ।। सपिण्डानां त्रिरात्रं स्यात् संस्कारो भर्तुरेव च । अहस्त्वदत्तकन्यानामशौचं मरणे स्मृतम् द्विवर्षजन्ममरणे शौचमुदाहृतम् । यादन्तात् सोदरः सद्यः पाचौखादेकरात्रकम् ।। श्रावृत्तानों त्रिरात्रं स्यादशमन्तु ततः परम् मातामहानां मरणे त्रिरात्र स्यादशौचकम् ॥ एकोदराणां विज्ञेयं सुतके चैतदेव हि । पक्षिणी यौनसम्बन्धे बान्धवेषु तथैव च ॥ एकरात्रं समुद्दिष्ट' गुरौ सब्रह्मचारिणि प्रेते राजनि सद्यस्तु यस्य स्याद्विषये स्थितः ॥ गृहे मातासु दत्तासु कन्यकासु व्यहं पितुः ! परपूर्चासु भार्यासु पुत्रेषु कुलजेषु च ॥ त्रिनं स्यात्तथाचार्ये भार्यासु प्रत्यगासु च आचार्यपुत्रपन्योश्च व्यहोरात्रमुदाहृतम् एकरात्रमुपाध्याये तथैव श्रोत्रियेषु एकरात्रं सपिण्डेषु स्वगृहे सस्थितेषु च त्रिरात्रं श्वश्र मरणे श्वशुरेण तथैव सद्यः शौचं समुद्दिष्ट सगोत्रे संस्थिते सति ॥ शुद्धयत् द्विजो दशाहेन द्वादशाहेन भूपतिः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्धथति ॥ क्षविटशूद्रदायादा ये स्युर्विप्रस्य सेवकाः तेषामशेष दशाहात् शुद्धिरिष्यते ॥ राजन्यवैश्यावस्येवं हीनवर्णासु योनिषु षड्रात्रं वा त्रिरात्रं वाप्ये करात्रं क्रमेण हि ॥ वैश्यक्षत्रियविप्राणां शद्रश्चाशौचमेव तु अर्द्धमोसोऽथ षड्रात्रं त्रिरात्रं द्विजपुङ्गवाः ॥ शूद्रक्षत्रियविप्राणां शद्रेष्वाशौचमिष्यते द्वादशाहं च विप्राणां वैश्यशूद्रयोः ॥ ॥ ॥ - विप्रस्य षड्रात्रं श्राशौचपञ्जिका [११] दशरात्रेण -- आशौचं क्षत्रिये प्रोक्त क्रमेण द्विजपुङ्गवाः । शूद्रविट क्षत्रियाणां तु ब्राह्मणे संस्थिते यदि ॥ शुद्धिः स्यादित्याह कमलोद्भवः असपिण्डं द्विजप्रेतं विप्रो निसृत्य बन्धुवत् ॥ अशित्वा च सहोषित्वा दशगत्रेण शुद्धयति । यदि निदहति क्षिप्रं प्रलोभालान्तमानसः ॥ दशाहेन द्विजः शुद्धयेत् द्वादशाहेन भूमिपः । अर्द्धमान वैश्यस्तु शूद्रो मासेन शुद्धयति ॥ षड्रात्रेणाथवा सप्तत्रिरात्रेणाथवा पुनः अनाथं चैव निर्वन्धु ब्राह्मणं धनवर्जितम् ॥ स्नात्वा संप्राश्य तु घृतं शुद्धयन्ति ब्राह्मणादयः । अपरश्चेत्पर वर्गमपरश्चापरो यदि एकाहात् क्षत्रिये शुद्धिर्वैश्ये तु स्यात् द्वथहे सति । शूद्रेषु च ज्यहं प्रोक्तं प्राणायामशतं पुनः ॥ छानस्थिसंचिते शूद्रे रीति चेत् ब्राह्मणः स्वकैः । নির্যন্ত स्यात्तथाशौचमेकाहं क्षत्रवश्ययोः अन्यथा चैव सज्योतिर्ब्राह्मणे स्नानमेव वा । अनस्थिसञ्चिते विप्रे ब्राह्मग्गो रीति चेत्तदा ॥ स्नानेनैव भवेच्छुद्धिः सचैलेन न संशयः यस्तैः सहान्नं कुर्याच्च पानादीनि तु चैव हि ।। ब्राह्मणो वा परो वापि दशाहेन विशुद्धयति । यस्तेषामन्नमश्नाति स तु देवोऽपि कामतः ।। तदाशौचनिवृत्तेपु स्नानं कृत्वा विशुद्धयति । यावत्तदन्नमश्नाति दुर्भिक्षाभिहतो तावन्त्यहान्यशुद्धिः स्यात् प्रायश्चित्तं ततश्चरेत् । दाहाद्यशौचं कर्तव्यं द्विजानामग्निहोत्रिणा ॥ सपिण्डानां तु मरणे मरणादितरेषु सपिएडता च पुरुषे सप्तमे विनिवतेते ॥ समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने पिता पितामहश्चैव तथैव ॥ नरः ॥ प्रपितामहः ॥

[ ११८ ] স্বামীণঞ্জিঃ >reneuCHAR । लेपभाजस्तु यश्चात्मा सापिण्ड्य साप्तपौरुषम् । उद्धयानां चैत्र सापिएज्यमाह देवः प्रजापतिः ।। ये चेह जाता बहवो भिन्नयोनय एव भिन्नवर्णास्तु सापिण्ड्य भवेत्तेषां त्रिपूरुषम् ॥ कारवः शिल्पिनो वैश्या दासीदासास्तथैव च राजानो राजभृत्याश्च सद्यःशौचाः प्रकीर्तिताः ॥ दातारो नियमी चैव ब्रह्मविद्ब्रह्मचारिणौ । सत्रिणो व्रतिनस्तावत् सद्यः शौचमुदाहृतम् ॥ राजा चैत्राभिषिक्तश्च प्राण सत्रिण यज्ञे विवाहकाले च देवयागे तथैव च । सद्यः शौचं समाख्यातं दुर्भिक्षे वायुपद्रवे । विषाधुपहतानाञ्च वित्ता पार्थिवे सद्यः शौच समाख्यातं सादिमरणेऽपि च अग्निमेरुप्रपतने विषो धान्यपराशने ॥ गोब्राह्मणान्ते सन्यस्ते सद्यः शौचं विधोयते । नैष्ठिकानां वनन्थानां यतीनां ब्रह्मचारिणां ॥ नाशौचं विद्यते सद्भिः पतिते च तथा मृते । एव द्विजैः ।। 1 कात्यायनस्मृतिः (२०] ३६५-सुतके कर्मणां त्यागः संध्यादीनां विधीयते । होमः श्रौते तु कर्तव्यः शुष्कानेनापि वा फलैः ।। अकृतं हावयेत् स्मार्ते तदभावे कृताकृतम। कृतं वा हावयेत अन्न मन्वारम्भविधानतः कृतमोदनसक्त्वादि तण्डुलादि कृताकृतम् । ब्रीह्यादि चाकृतं प्रोक्तमिति हव्यं त्रिधा बुधैः ।। सुतके च प्रवासेषु चाशक्तौ श्राद्धभोजने । एवमादि निमित्तषु हावयेदिति योजयेत् ॥ न त्यजेत् सूत के धर्म ब्रह्मचारी स्वकं कचित् । न दीक्षणात्परं यज्ञे न कृच्छादि तपश्चरन् । पितर्यपि मृते नैषां दोषो भवति कर्हि चित् । आशौचं कर्मणोन्ते त्याच्यह वा ब्रह्मचारिणाम् ।। इति स्मृतिसंग्रहाधिकारः।

স্বাধীঘঞ্জি। अथ वचनसंग्रहाधिकारे। १-नानामुनिवचनानि । [२१] यत् । गत्वा ३६६-देये पितृणां श्राद्धे वै आशौचं जायते यदि । आशौचे तु व्यतीते वै तेषां श्राद्धं प्रदीयते ॥ (ऋष्यशृङ्गः)-शुचिभूतेन दातव्यं या तिथि: प्रतिपद्यते । सा तिथिस्तत्र कर्तव्या न त्वन्या वै कदाचन ॥ ( श्रीदत्तः )--प्रतिसंवत्सरं श्राद्धमाशौचोत्पतितं मलमासेऽपि कर्तव्यमिति भागुरिरब्रवीत् ॥ (ज्यौतिषे)-पित्रा दत्ता तु या कन्या स्वातन्त्व्यादन्यमाश्रिता । यं यं श्रितवती भूयस्तस्याशौचं व्यहं व्यहम् ॥ ( स्मृतिः )-मृतीयां वा प्रसूतायां नान्येषामिति निश्चयः । कामादक्षतयोनिश्चेदन्यं व्यवस्थिता ॥ "तस्यान्यस्य सगोत्रा सा यं त्वाश्रितवती स्वयम्"। गर्भस्रुत्या यथामासमचिरे तूत्तमे व्यहम् ॥ राजन्ये तु चतूरात्रं वैश्ये पश्चाहमेव पञ्चाहमेव तु । अष्टावहानि शूद्रायाः शुद्धिरेषा प्रकीर्तिता ॥ ( मरीचिः)-संध्यां पञ्चमहायज्ञानत्यक स्मृतिकर्म तन्मध्ये हावयेत् तेषां दशाहान्ते पुनः क्रिया ॥ निमन्त्रणं तु वा श्राद्धे प्रारम्भः स्यादिति स्मृतिः । मरणे मधुमांसे च पुष्पमुलफलेषु च शाककाष्ठतृणेष्वेवं तैलोषध्यजिने चैव पक्कापक्क स्वयंगृहे ॥ पुरयेषु चैव सर्वेषु नाशौचं मृतसूतके - दधिसर्पिःपयासु ॥

[ १२०] श्राशौचपञ्जिका पुराणवचनानि । चूडान्तं ३६७-आजन्मनस्तु कन्या विपद्यते। सद्यः शौचं भवेत् तत्र सर्वत्रणेषु नित्यशः ॥ ततो वाग्दानपर्यन्तं यावदेकाह मेव हि । अतः परं प्रविद्धानां त्रिरात्रमिति निश्चयः॥ वाग्दाने तु कृते तत्र ज्ञेयं चोभयतस्यहम् । पितुर्वरस्य च ततो दत्तानां भतु रेव हि ॥ ब्रह्मपुराणे ॥ नारी पितुर्गेहे सुयते म्रियतेऽथवा । स्वमशौचं चरेत् सम्यक् पृथक् स्थाने व्यवस्थिता। तद्वन्धुवर्गस्स्वेकेन शुद्धयेत जनकस्त्रिभि. ॥ ब्रह्मपुः ।। षण्मासाभ्यन्तरं यावद् गर्भस्रायो भवेद् यदि । तदा मालसस्तासां दिवसः शुद्धिरिष्यते । अव ऊर्ध्वं स्वजात्युक्तमशौचं तासु विद्यते ! सद्यः शौचं सपिण्डानां गर्भस्य पतने सति ॥ ब्रह्मपुराणे॥ अनतीतद्विवर्षस्तु प्रेतो यत्रापि दह्यते अतिमोहाभिभूतैश्च देशसाधर्म्यमादरात् श्राशौचं ब्राह्मणानां तु त्रिरात्रं तत्र राज्ञामेकादशाह द्वादशाहकम। अपि विंशतिरानं तु शूद्राणां भवति क्रमात् ।। १।। भिन्नगोत्राः पृथक गोत्रकरास्तथा। सूतके मृतके चैव यहाशौचस्य भागिनः॥ गृहौतमधुपर्कस्य ऋत्विजः पश्चादशौचे पतिते भवेदिति निश्चयः॥ आद्यभागद्वयं थावत् सुतकस्य तु सूतके । द्वितीये .पतिते चाद्यात् सूतकाच्छुद्धिरिष्यते । अन उध्वं द्वितीयात्तु सूतकान्नाच्छुचिः स्मृतः ॥ ३६८-यान्येतान्यार्षवचनानि प्रदर्शितानि तेषां मध्ये कतिपयानां तात्पर्यार्थविनिण ये विद्वांसो विप्रवदन्ते । केचिदन्यथा तदर्थं मन्यन्तेऽपरेन्यथा । एवं षांचिद्वचनानामार्षत्वममि- प्रेत्य प्रामाण्यमभ्युपगच्छन्ति तदनुसारेणैव व्यवस्थामातिष्ठन्ते । विद्यते। तु वैश्यानां पिण्डाः पृथक यजमानाच आशौचपञ्जिका [ १-१ । - परे स्वनाषत्वं तेषामभिप्रेत्य तान्य नाहत्यान्यथा व्यवस्थापयन्ति || || एवं केषांचित् वचनानामेके ग्रन्थकाशः स्वअन्य स्थानं ददतेऽपरे पनः स्वग्रन्थे तान्य- पठित्वा तत् सत्वमेवारवीकृत्य यथेच्छमन्यथा व्यवस्थापयन्ति । एभिरेव कारणैरत्र शौचविषये प्रमाणव्यवस्थापकानां विदुषां परस्परविरुद्धतकैः प्रवर्तमानानां परस्परविरोधे युक्तमयुक्तं वा पश्यलां बहवो मलभेदा दृश्यन्ते । तत्र किं सत्यं किमसत्यमिति निर्धारयिष्यन्त्युत्तरे विशिष्टा विद्वांस-इत्यलम्। ३६६-हतोन्येऽप्याशौचसम्बन्धिनो बहको नियमास्तत्र तत्र प्रकरणान्तरेपूल्लिखिता दृश्यन्ते तथाविधानि च वचनान्य प्रस्तुतांशभूयस्त्वादिह पृथककृत्य नापदर्श्यन्ते । तदुक्ता निय- मास्तु पूर्वमिह प्रन्थे तत्र तत्र प्रकरणे प्रदर्शिता एवेति मुविमृश्य संतोष्टव्यम् । ३७०-अयं च ग्रन्थः प्रमाणभूतानां विधायकानामार्षवचनानां तथा प्रामाणिकानां व्यवस्थापकानां निबन्धग्रन्थानां चाधारेण मया संपादितः । तत्रै तान्यार्षवचनानि प्रदर्शितानि ।। ३७२-सन्त्याशौचविनिर्णये बहुविधा प्रन्था बुधैर्निर्मिता- स्ते तर्जहिला न संप्रतिसुखेनार्थावबोधक्षमाः । तत्सिद्धान्तसमुच्चयं, पृथगिवाकष्टाय सुस्पष्टयन् तस्माच्छीमधुसूदनो व्यतनुताशौचे समीक्षामिमाम् ॥१॥ ३७३-शुद्धिर्वाप्यषिदेवसपदिति वा संस्कारधर्मो द्विधा । सत्रैतां न विना विशुद्धिमपरो धर्मः कचित् सिध्यति ।। शुद्धिः पञ्चविधा हि सा निगदिता तासां तृतीयाधुना। सुख्याति लभतां चिरं प्रचरतादाशौचशुद्धि वि॥ २॥ * इति शुद्धिसिद्धान्तापञ्चिकान्तर्गता आशौचपन्जिका समाप्ता * RIP । MDMROR श्रीदत्तोपाध्यायस्य गोकुलनाथोपाध्यायस्य नरसिंहस्य अमृतनाथोपाध्यायस्य १४ द्वेतपरिशिष्टः- ५५ स्मृत्यर्थनिर्णयः-- ५६ नरसिहप्रसादः-- ५७ कृत्यसार समुच्चय- ५८ विधानपारिजात:- ५६ पराशरमाधव:- ६० निर्णयसिन्धुः- ६१ मिताक्षरा- ६२ चतुर्वर्गचिन्तामणिः- अनन्त दृस्य अHAARAMA सायणमाधवस्य Motus main कमलाकर भट्टस्य विज्ञानेश्वराय हेमाद्रसूरेः mo इति प्रमाणसंग्रहाध्यायो दशमः ।। १०॥

* श्री: * *38 अथ शुद्धयशुद्धिपत्रम् पृष्ठम् पंक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठम् पंक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् ३६ दोष १ प्रदिक्षणं ८ अहिताग्ने दोषे प्रदक्षिणं आहिताग्ने व्यवस्था ६ २४ व्यवस्थ ११ ३ कमव काल एवं ११८ यथ यथा पिण्डानाम ११ २१ श्रद्ध श्राद्ध १३ २१ दग्थप्रायत्वात् दुग्धप्रायत्वात १३ २२ चयुः चायुः १४ ७ त्यागदियं त्यागादियं १४ ११ चेतनाधा चेतनाधातो १४ १६ थ १४ १४ प्रसार प्रसादः १४ २१ दोविसत्व दोषिसत्व १५ १३ दुपलम्भ दुपलम्भ १५ १४ शक्यं शक्यः ३५ १५ पुरुषदेकविंश पुरुषादेकशि १६ १६ वद्धिते वर्द्धितैः १७ ३० केचित्त केचित्तु १६ २८ तामह पितृमातामह २२ १० द्वन्द्वनां द्वन्द्वानां २२ ११ संख्या संख्या ३२ ८ अष्टाविशति अष्टाविंशति ३४ १६ उदकदाम् उदकदानम् ४१ ६ अन्यपूर्वा,आरुद्धा अन्यपूर्वावरुद्धा जनयितसपिण्डानां प्रति- ग्रहीतसपिण्डानाचे- ४२ २३ जनयितृस- काहः । एवं प्रतिग्रहीत- सपिण्डानां दत्तकजन- (यितृसपिण्डानाम ४२ २६ पितुतस्योः पितुस्तयोः ४३ १७ रसाढोर्वी नगरसाङ्कोर्वी ४४ २४ कूर्यादित्येकः कुर्यादित्येकः ४६ २० दीपवंशात् दोषवशात् ४६ ८ मुपनीत नुपनीत ५४ २ वैमाऽत्रेय वैमात्रेय ५४ १. दकगोत्राणां दव सगोत्राणां ५४ २२ द्विसंबंधा द्विधा सम्बन्धा ५६ १८ आचार्यपनि आचार्यपत्नी मरणे गुरोः पक्षिणी । ५६ २७ मरणे वेदे यत्किञ्चिदध्यापितस्य शिष्यस्य मरणे ५७ १ सहायधयिनो सहाध्यायिनो ५७ १० श्रीत्रियादि श्रोत्रियादि ५७ १२ कर त्रम् एकरात्रम्

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पृष्ठमू पंक्तिः अशुद्धम् पृष्ठम् पंक्तिः अशुद्धम् ५८ ३ सप्तानामयेषां सप्तानामप्येषां ५६ २ पर्श स्पर्शन ६० ४ अज्ञादुपवासः अज्ञानादुपधासः ६१ १७ सपनि संस्कारे सपत्नीसंस्कारे ६१ २३ असबन्धे असम्बन्धे ६१२४ तत्राद्यस्या तत्राघस्या ६५ ३ सपाताशौचम् सम्पाताशौचम ६८११ बलत्वात बलवत्वात् ६९ १४ निवत्ति निवृत्ति ७५ १४ शौचधिक्य शौचाधिक्य ७५ २२ पक्षिण पक्षिणी ७६ ८ २७०२७१ २७३।२७४ ७७ २१ तीरमुक्ति तीरभुक्ति ७७ २५ तीरमुक्ती तीरभुक्तौ १२ १७ तत्रोष्टम्भक मन्त्रीपष्टम्भक ८५ , पतिभिनिहत पतिभिनिहन ८६ १६ त्रिषष्टितमे पञ्चषष्टितमे ८६ ३० दशाहशौचं दशाहमाशौचं ८६ २२ विथानं विधान ८६ २५ दशाहाद्य सौचं दशाहाद्याशौचं ८८ १४ दन्तजातो दन्तजाते ८६ २४ यच्छेशं यच्छेषं १.१ १८ प्रेतशुद्धि प्रेतशुद्धि १२७ एव एष ६५ ३ शुचि शुचिः ६६ ११ तावन्निबोधतः तावन्निबोधत १०३ ११ पते तच्छेषेण पतेत्तच्छेषेण १८३ १३ विपोहको विषोदको १०३ १४ स्तनमातुर्वा स्तन्मातुर्वा १०६ २३ धमराज धर्मराज ११० २१ दशाह दशाह ११५ २२ गति मृति ११५ २७ दष्टप्रयतो दप्रयतो ११६ ६ आचौखा ११७ १५ रीति रौति ११७ १८ रीति ११८ २ उद्ध्यानां अनि ११६ १८ हावयेत् हापयेत् १२० ५ प्रविद्धानां प्रवृद्धानां साधर्म्य १२१ १ त्वनाषत्वं त्वनार्षत्वं श्राचीन १२० १६ सामर्थ्य

Aashochpanjika

Author
Surajandas Swamina
Title
Aashochpanjika
File name
Aashochpanjika
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2006/06/27
Publisher
Granthkritsununa Pandit Sri Pradhunsharmane
Language
Sanskrit
Pages
165
Library
Allahabad University Allahabad
Classification
Literature
DLI number
485123
Barcode
5990010098199.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
C4Y7misd2Lx
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