Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shri Jin-pooja

Sharad Kumar · 2011/02

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श्री जिन-पूजा
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निर्वन्च प्रकाशन
नरहरपुरा, वाराणसी

siksatta विश-वर्शन श्री जिन मन्दिर दर्शन- ? H १३ गायती पर भीगीनामा प मेरी मान W64 म : मार मान श्री जिन मन्दिर दर्शन विधि घर से स्वच्छ वस्त्र पहन कर चावल, बादाम, मिश्री, फल, नैवद्य वगैरह के साथ श्री जिन मदिर के लिए प्रस्थान करना चाहिए । मदिर के पास पहुँच कर निसिही' कह कर मदिर में प्रवेश करें और फिर प्रभु को हाथ जोडकर 'नमो जिरणाएं' कहने के बाद 'निसिही' कह कर श्री भगवान के मूल गभीरे की दाहिनी तरफ से तीन प्रदक्षिणा लगायें। प्रदक्षिणा देते समय 'रनाकर पच्चीसी' बोलना चाहिए। फिर प्रभु के सन्मुस सड़े होकर भावना के लिए हाथ जोड- कर ये दोहे पढ़ें प्रभु दरसन सुख सम्पदा, प्रभु दरसन नवनिद्ध । प्रभु दरसनथी पामिए, सरल पदारथ सिद्ध ॥१॥ भावे जिनवर पूजिए, भावे दोजे दान | मावे भागना माविए, भावे केरल ज्ञान ||२|| जोबडा ! जिनार पूजिए, पूजाना फल होय । राजा नमै प्रजा नमै, प्राण न लोपे कोय ||३|| फूलडों केरा बागमां, वेठा श्री जिनराज । जिम तारामा चन्द्रमा, तिम सोहे महाराज ॥४॥ जग में तीरथ दोय बड़ा शत्र जय गिरनार । इण गिर ऋषम समोसरे इण गिर नेम कुमार ॥शा . - विधि-पाट या पाटीया के ऊपर अक्षत याने चावल से ज्ञान, दर्शन और चारित्र छोटी- छोटी तीन ढगलियाँ करके नीचे के भाग में एक साथिया करके उस पर नैवद्य रखें। फिर ऊपर के आकार में चन्द्रमा की तरह सिद्ध-शिला का मंडाण मांडे । (साथिया करते समय ये दोहे बोलें) दर्शन ज्ञान चरित्र ना, आराधन था सार । सिद्ध शिलानी ऊपर, हो मुझवास श्रीकार ॥१॥ चहुँगति भ्रमण संसार मां, जन्म-मरण जंजाल | पंचम गति विण जीव ने, सुख नहीं तिहुँकाल ||२|| अक्षत स्वस्तिक पूरता, श्री जिन आगल सार । अक्षय फलने पामिये, अक्ष्य सुख दातार || विधि-'निसीही' कह कर तीन बार खमाममण देवे-'इच्छामि खमासमणो ! वंदिर जावणिज्जाप निसिही आए मत्थएण वंदामि ।' फिर दाहिना घुटना जमीन पर और वायां धुदना उठाकर चैठे और दोनों हाथ जोड़ कर नीचे का पाठ कहे- "इच्छा कारेण संदिस्सह भगवन् । चैत्यवंदन कर इच्छं।" ॥ चैत्यवंदन ॥ सिद्ध बुद्ध चोवीस जिन, पभ अजित भगवान । संभव 'अभिनन्दन मुगति, पा सुपार्श्व मदान ॥

जय
नय
जय
।
चन्द्र प्रभ सुविधि शीतल, श्री श्रेयास जिनेश ।
वासुपुज्य प्रभु विमल जिन, अनन्त धर्म विरोप ॥
शाति कुथु अर मल्लि विभु मुनि सुत्रत नमि नेम ।
पार्य वीर हरि पूज्य ए नित बदू घर प्रेम ॥
(अथवा)
जय नाभि नरिंद नन्द, मिद्वाचल मडल ।
प्रथम जिणद चद, भव दुक्ख विहरण ।
जय जय ! साधु सुरिंद वृन्द चदि परमेसर ।
जय जय जगदानंद कद श्री ऋपम निणेसर ।
अमृत सम निज धर्मनो ए दायक जग मे जाण ।
तुम पद् पकज प्रीत धर निश दिन नमत कल्याण ॥
(यहा अन्य चैत्य वदन भी बोल सकते हैं)
॥ज किचि ॥
ज किंचि नाम तिच्थ सगे पायालि माणुसे लोए ।
जाइ जिण - निंबाइ ताइ सम्बाइ वदामि ।।

४ ] -॥ नमोत्थुणं ॥ नमोत्थुणं, अरिहंताणं, भगवंताणं, आइगराणं, तित्त्थयराणं, संयसबुद्धाणं, पुरिमुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवर पुंडरियाणं, पुरिसवर गंधहत्यिणं, लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोग हियाणं, लोग पईवाणं, लोग पज्जो अगराणं, अभय दयाणं, चक्व दयाणं, मग्गदयाणं, सरण- दयाणं, योहिदयाणं, धम्म दयाणं, धम्मदेसियाणं, धम्म नायगाणं, धम्म सारहीणं, धम्मवर चाउरंत- चक्कवट्टीणं, अप्पडिहय वरनाणदसणधराणं, विअट्ट छ उमाणं, जिन्नाणं जावयाणं, तिन्नाणं, तारयाणं, बुद्धाणं वोहियाणं, मुत्ताणं मो अगाणं, सन्यन्नूणं, सव्वदरिसिणं, मिव मयल-मान- मणंत-मक्खय मव्वाबाह-मपुणरावित्ति सिद्धि गड नामधेयं ठाणं संपत्ताणं नमो जिणाणं जिअ भयाणं। जे अ अईया, सिद्धा जे अ भविस्संति अणागए काले । संपई अ वट्टमाणा सव्वे तिविहेण वंदामि ।। ॥ जाति चेई आई। जावंति चेइआई, उड्ढे अ अहे अ तिरिअ लोए अ। सवाई ताई बन्दे, इह संतो, तत्थ संताई ।।

-
|| जावति केवि साहू ॥
इन्छामि समा समणो | वंदिउ जावणिज्जाए निसिहियाए मत्थएण वंदामि।
भगवन् ! जावत के वि साहू भरहेर वय महाविदेहे अ।
सवेसि तेसि पणओ, तित्रिहेण तिदड रियाण ||
विधि-"नमोऽईसिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्य ' ऐसा बोल कर यहाँ 'उवसग हर स्तोत्र बोले-
॥ उपसग्गहर स्तोत्र।
उवसग्गहरं पास पास वदामि कम्मघण मुक्कं ।
विसहर विसनिन्नास, मगल-कल्लाण-आवास ||१||
विहसर फुल्लिंगमते कंटे धारेइ जो सया मणुओ।
तस्स ग्गह रोग मारी दुजरा जति उक्साम ।गा
चिट्ठउ दूरे मतो तुज्म पणामो नि बहुफलो होड ।
नरतिरिएसु वि जीवा, पावति न दुक्खदीराच ॥३॥
तुह सम्मते लद्धे, चिंतामणि कम्पपायवमहिए।
पाचति अविग्घेण जीवा अयरामर ठाएं ॥४॥

[ ६ ] इन संथुप्रो महायस भत्तिभरनिभरेण हि अपण । ता देव दिज्ज बोहिं भवे"भवे पासजिणचंद ।।। (इसके बाद स्तवन पढ़ें) राखू० ॥१॥ ।। स्तवन । जिन राज नाम तेरा राखू हमारे घट में । टेर । जाके प्रभाव मेरा, · अज्ञान का अंधेरा, भाग्या भया उजेरा, मुद्रा प्रमोदकारी, ऋपभजी तिहारी, लागत मोहे प्यारी, रास्तू० ॥२॥ रागे, देख्या विभावत्यागे, अध्यात्म रूप जागे, राखूद ॥३॥ निकोक्यनाथ तुम ही हम हे अनाथ गुन ही, करिये सनाथ हमहीं', राखू० ॥४॥ जिनजी तिहारी शाखे, जिन हर्प सूरि भाख, दिलमा जगां राखे, राख० ॥५॥ . सूरत तेरी अथवा भज भज रे मन श्री भगवान आत्मा का होगा कल्याण | दुनिया में बसेरा कुछ दिन का, सत्संग करो प्राचार्य मुनि का, भज भज० । इस दुनियाँ में न कोई किसी का, और तू भी है न किसी का, भज भज० । सब अपने-अपने स्वारथ के, भक्ति की धार नहाप्रो जमके, भज भज० । दिल पर ज्याति मधुर चमके, आँखों रोशनो दमके, भज भज० ।

m- [*७ ] प्रात्मा की कली कली खिले, भक्ति से ही मुक्ति मिले, भज भन०1 काम-क्रोध, माया-मोह दुनियाँ में 'इसका उहापोह, भज भज। में आया हूँ द्वार तेरे शक्ति दो प्रभु मेरे, भज भज । 'राय सुराण' पावे ज्ञान, प्रात्मा का होरे फल्यारण, भज भज। (चा में दोनो हाथ जोड करके मस्तक में अनली लगाकर 'जय वीयरॉय पढे ) ॥ जय पोयराय॥ " जय ! गोयराय जगगुरु ! होउ मम तुह प्पभानो भयर । मामानियेओ मग्माणुसारिआ इट्टफल सिद्वि ॥ लोग विरुद्धच्चाओ गुरु जनपूआ परत्यं करण च । सुहगुरु जोगो तम्बयण सेरणा आमरमसडा ॥२॥ (फिर सडे होकर हाथ जोडे गोले) ॥ अरिहत चेड आए॥ प्ररहत चेइ भाप करेमि काउस्मग्ग। बदणवत्ति आए, पूप्रणयत्तिाए, मक्कारवत्तिाए, सम्माणपतिश्राए, चोहिलाभवत्तिमाए, निस्वसग्ग वत्तिमाए, सिद्धाए मेहाए धीईए, धारणाए, अणुप्पेदाप पड्ढमाणीरा, ठामि काउस्सग । - . 1 १] ॥ अन्नत्थ ऊससिएणं ॥ अन्नत्थ अससिएणं नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उड्डुएणं, वायनिसग्गेणं, भमलीए, पित्तमुच्छाए, सुहुमेहि अंगसंचालेहि, सुहमेहिं खेल संचालेहि, सुहमेहिं दिट्ठिसंचाले हिं । एवमाइएहि आगारेहिं अभग्गो अविराहाहिओ, हुजमे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।। (यहां एक नवकार का कार्योत्सर्ग करें) णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं । णमो आयरियाणं । णमो उवज्भाया। णमो लोए सत्र साहूणं ।। एसो पंच णमुक्कारो, सव्यपाव पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसि, पढगं हवइ मंगलं । बाद में कार्योत्सर्ग पार 'णमो अरिहंताणं' कहकर 'नमोऽहत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः' बोलने के बाद स्तुति पाठ करें- ॥ स्तुति ॥ अष्टापदे श्री आदि जिनवर वीर जिन पावापुरे । वासुपूज्य चम्पा नयरी सिद्धा नेम रेवा गिरिवरे ॥

[]
सम्मेद शिखरे वीस जिनवर मोक्ष पहुँता मुनिवरूँ।
चौबीस जिनवर नित्य वन्दै सयल सघे सुख करूं।
इसके बाद खमासमण देकर नवकारसी आदि का यथाशक्ति पक्चसाण करें।
। नरकारसी पच्नक्खाण ॥
उग्गए सूरे नमुक्कार सहिम मुट्ठिसहिअ पन्चयाइ चउन्विहपि आहार-असणं, पाणं,
साइम, साइम एणत्थरणा भोगेणं सहसागारेण महत्तरागारेणं वोसिरामि ।
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जिनेश्वर स्तोत्र सर्वज्ञं त्यक्त रागं प्रचुर गुण भरं सर्वलोकेषु वन्द्यम् । विम्बानन्दं सुमान्यं परम पद धरं दिव्यरूपं जिनेन्द्रम् ।। सौम्याऽकार प्रसन्नं जगति हितकरं शान्त मुद्राऽभिरामम् । आनन्दाब्धि सुधम्यं सुखद जिनवरं नौमि तं पूज्यपादम् ।। । अथ शत्रुञ्जय तीर्थ स्तोत्रम् . पूर्णानन्दमयं महोदयप्रदं कैवल्य चिहड् मगम् । रूपातीतमयं स्वरूप रगणं स्वाभाविक श्रीमयम् ॥ ज्ञानोद्योतमयं कृपारस मयं स्याद्वाद विद्याललम् । -श्री सिद्धाचल तीर्थ राजमनिशम् वन्देऽहमादिवरम् ।। अथ श्री जिन पूजा सत् प्रथम श्री मजिन पूजा करने वाले अन्छे स्थान में स्नान कर वोटी के पेश वॉच शुरू कर पहन के उत्तरासन कर मुखकांश बाँध । पीछे इस मंत्र से वासक्षेप तीन-तीन बार मंत्र के प्रष्ट द्रव्य को शुद्ध करें । सोही "आचार दिनकर" से लिखते हैं।

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[ ११ ]
ओम् प्रसरूपोई संसारिजीपः सुगसनः सुमेधा एकचित्तो निरपधाईपूजने निर्वत्तो
निष्पापो भूयासं निरुपद्रवो भूयास सत्सश्रिता अन्येपि जीवा निरवद्यार्हपूजने निर्व्यथा
निम्मापाः भूयासुः साहा।
. [ यह मत्र पढकर अपन ललाट म तिलक करें -
॥ अथ जल मन्त्र ।
ओम् आगे अकाया एकेंद्रिया जोवा निरययाहत्पूजाया नियथाः निष्पापाः शुभगतयः
सन्तु न मेस्तु सघट्टनहिंसापापमहदचने स्वाहा ।
|| चंदन पुष्प धूप फन अक्षत शुद्वि मन्त्र ।।
ओम् वनस्पतयो वनस्पतिकाया जोवा एकेंद्रिया निरवद्याहत्पूजाया निन्यथा निष्पापा:
शुभगतयः सन्तु न मेस्तु सघट्टनहिंसापापमहदचने साहा।
॥ अग्नि और दीपक शुद्धि मन्त्र ।।
ओम् अग्नियोऽनिकाया जोया एकेंद्रिया निरवद्यार्हत्पूजाया निळयाः सन्तु निरसाया
सन्तु शुमगतयः सन्तु न मेस्तु संघट्टनहिंसापापमहदच ने स्वाहा ।

- । श्री जिनाय नमः - 4 .. ३ ॥ स्नान पूजा अथ मङ्गलाचरणम् नमो अरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं । नमो उवज्झायाणं । नमो लोए सव्वसाहूणं । एसो पंचणमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसि, पढ़मं हवइ मंगलं ॥ पांखडी गाथा-चौंतीसे अतिशय जुओ। वचनातिशय संजुत्त । सो परमेसर देखि भवि । सिंघासण संपत्त ॥१॥ ढाल-सिंहासन बैठा जगभाण । देखि भवियण गुण मणि खाण ॥ जे दीठे तुम निम्मल झाण । लहिये परम महोदय ठाण ॥ १॥ कुसुमांजलि मेलो श्री आदि जिणन्दा ॥ तोरा चरण कमल चोवीस श्री पूजोरे चोवीस सोमागो चोवीस वैरागी चोवीस जिएवंदा ।। कुसुमांजलि मेलो श्री आदि जिणन्दा । [हाथ में कुसुमांजलि लेकर श्री चरणों में टीकी दीजिए ] - - " [ १३ ] गाथा जो नियगुण पन्जव रम्यो । तसु अनुभव " गत्त॥ सुह पुग्गल आरोपता । ज्योति सुरंग निरत्त ॥२॥ ढाल-जो निज आतम गुण आनन्दी । पुग्गल सगे जेह अफटी॥ जे परमेश्वर निज पद लीन । पूजो प्रणमो भव्य अदोन ॥ कुसुमांजलि मेनो श्री शांति जिणदा ।। तोरा चरण कमल चोपीस, पूजोरे चोचोस, सोमागो चोमोस, वेरागो चोगेस, जियादा । कुसुमाजलि मेलो श्रीशाति जिणदा ॥ २॥ [घुटने मे दीकी दीजिए] गाथा-निम्मल नाण पयासकर। निम्मल गुण सपन्न | निम्मल धम्मो वयस कर । सो परमप्पा धन्न ।। ३॥ ढाल-लोकालोक प्रकाशक नाणी । भपि जण तारण जेहनी वाणी ।। परमानद तणी नोसाणो । तसु भगते मुझ मति ठहराणी ॥ कुसुमाजलि मेना श्री नेमि जिणदा। तोरा चरण कमल चोवीस, पूजीरे चोवीस, सोमागो गेवोस, पैरागी चोवीस जिणंदा ।। कुसुमाजलि मेलो श्री नेमि जिणन्दा ॥ ३ ॥ [ कन्धे पर टीकी दीजिए] - . F । - [ १४ ] गाथा-जे सिद्धा सिजन्ति जे । सिजिरसन्ति अणंत ॥ जसु आलंबन ठविय मन । सो सेवो अरिहंत ॥४॥ ढाल-शिव सुख कारणजेह त्रिकाले । सम परिणामें जगत निहालें । उत्तम साधन मार्ग दिखालें। न्द्रादिक जसु चरण पखालें ॥ कुसुमांजलि मेलो श्री पार्श्व जिणन्दा, तोरा चरण कमल चौबीस, पूजोरे चोवीस, - सोभागो चोचीस, वैरागी चोवीस जिणन्दा। कुसुमांजलि मेलो श्री पार्श्व जिणन्दा ॥ ४ ॥ [ मस्तक पर टीकी दीजिए] गाथा-सम्मदिट्ठी देसजय । साहू साहुणी सार ॥ आचारिज उवझाय मुणि । जो निम्मल आधार । चोविह संधै जे मन धार्यो । मोक्ष तणों कारण निरधार्यो । विविह कुसुम वर जात गहेवी । तसु चरणै प्रणमन्ति ठवेवी ॥ कुसुमांजलि मेलो श्रीवीर जिणन्दा, तोरा चरण कमल चोवीस, पूजोर चोवोस, सोभागो चोवीस, वैरागी चोवीस जिणन्दा ॥ कुसुमांजलि मेला श्रीवोर जिणंदा ॥ ५ ॥ [ ललाट में टीकी दीजिए .

नमोहन सिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुम्यः ।। (पीछे चमर हाथ में लेकर इस प्रकार पढे) सयल निनवर सपल जिनपर नमिस मनरग । कल्लाणकविह संथविज॥ परिय सुनम्म सुपपित्त सुन्दर । सय इक सत्तरि तित्यकार । इक्क समे विहरत महियल । चाण समय इनीस जिण। जन्म समय एपचीस । भत्तिय भारे पजिया । करो सप सुजगोस ॥१॥ ।। एक दिन अचिरा हुलरावती-ए देशी ।। भव तीजे समकिन गुण रम्या । जिन भक्ति प्रमुख गुण परिणम्या ।। तजि इन्द्रिय मुस आससना । करि थाना गोसनी सेना ॥ अतिराग प्रशस्त प्रमापता । मन भावना एहवी भावता ।। सवि जोर कर शासन रसा । इसि भार दया मन उल्लसी ।। लहि परिणाम रहा मनुनिपजारो जिनपद निरमलु।। आऊ बंध निच इक भव करी । श्रद्धा सवेग थी घिर धरी ॥

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तिहाथी चविय लहैं नर भव उदार । भरते जिम ऐरवतेज सारः॥
महा विदेह विजय प्रधान | मझ खंडै अवतरै जिन निधान ।।
ढालं-पुण्ये सुपना ए देखें । मन में हर्प विशेषे ।।
गजवर उजल सुन्दर । निर्मल वृषभ मनोहर ।।
निर्भय केसरी सिंह । लखमी अतिहि अबीह ।।
अनुपम फूलनी माल | निर्मल शशि सुकमाल ।
तेज तरण अति दीपै । इन्द्र ध्वजा जग जी ।।
पूरण कलस पंडूर । पदम सरोवर पर ॥
इग्यार में रयणायर । देखे माताजी गुण सायर ।।
बारमें भुवन विमान । तेरमें रत्न निधान ।।
अग्नि शिखा निरधूम । देखें माताजी अनुपम ।।
हरखी रायने भासे । राजा अर्थ प्रकाशे ॥
जगपति जिनवर सुखकर । होस्य पुत्र मनोहर ।।
जसु
नमस्ये
। सकल मनोरथ फलस्य॥
4
इन्द्रादि

1
वस्तु-पुण्य उदय पुण्य उदय जाना जिण नाह । माता तब रयणी समें देखि सुपन
हरपत जागिय । सुपन रही निज कतने सुपन अरथ सामलो सोमागिय ।
त्रिभुवन तिलक महा गुणी। होसे पुन निधान ।।
इन्द्रादिक जसु पय नमि । करसे सिद्ध विधान ॥
[ इसके बाद हाथ में चावल लेकर खडे रहे ]
॥ ढाल चंद्रा उल्लालानी ॥
सोहम पति श्रासन कपियो । नेई अवधे
मन पाणंदियो।
मुझ श्रातम निर्मल करण काज । भव जल तारण प्रगट्यो जिहाज ।।
भव अटवि पारग सत्स्यवाह ! केवल नाणाइय गुण अगाह ।।
शिव साधन गुण अकुर जेह । कारण उलट्यो अपाढि मेह ।
हरसे 'निकमै तर रोमराय । वलयादिकमा निज तनु न माय ॥
मिहासन थी उठ्यो सुरिंद । प्रणमन्तो जिण आनन्द कन्द ।।
सग श्रडपय पमुहा आवि तत्व । करि अञ्जलि प्रएमिय मत्त्य सत्य ॥
२
1

। [ १८ ] मुख भाखें ए खिण आज सार । तियलोय पहु दीठो उदार ॥ रे रे निसुणों सुर लोय देव । विपयानल तापित तनु समेव ॥ तसु शांति करण जलधर समान । मिथ्या विप चूरण गरुड़वान ।। ते देव सकल तारण समत्स्थ । प्रगट्यो तसु प्रणमी हुवा सनत्त्य ॥ इम जम्पी सक्रस्तव करेवि । तव देव देवी हरखै सुणेवि ।। गावें तब रंभा गीत गान | सुर लोक हुवो मंगल निधान । नर खेने आरज वंश ठाम । जिनराज वधै सुर हर्ष धाम ॥ पिता माता घरे उच्छव अलेख । जिन शासन मंगल अति विशेष ॥ सुरपति देवादिक हर्प संग। संयम अरथी जनने उमंग।। शुभ वेलां लगने तीर्थ नाथ । जनम्यां 'इंद्रादिक हर्प साथ ॥ सुख पाम्यां त्रिभुवन सर्व जीव । वधाई बधाई थई अतीव ।। (फूल अक्षत से बधावै, तीन प्रदिक्षणा देवे । शकस्तव कहे। पीछे केशर का हाथ में साथिया करके धूप रखे और चैत्यवंदन करें। इसके बाद नमोत्थुणं का पाठ कह कर सव्वे तिविहेण वंदामि कहें, हाथ में स्वस्तिक करें, मौलि बांधे और फिर कलश पढ़ें।)

[ १६ ॥ ॥ श्रीशांति जिननों कनश कहिसु- देशो॥ घोटक- श्रीतीर्थपतिनों कलश मनन गाइये सुग्यकार नर खेत मडन दुह विहएडण भविक मन अाधार ।। तिहा राव राणा हर्ष उन्चर थयो जग जय कार । दिमि कुमरि अवधि विशेप जाणी लह्यो हर्ष अपार ॥ निय अमर अमरी सग कुमरी गावती गुण छंद । जिन जननि पासे आवि पोहती गहगही प्राणन्द ।। हे माय ते निनराज जायो शुचि उधायो रम्भ । अम जम्म निम्मल करण कारण फरिस सुइय कम्म । तिहा भूमि शोधन दीप दर्पण वाय विजण धार । तिहाफरिय कालीगेह जिनपर जननी मज्जनकार।। वर रायडी जिन पाणि योवी दिये इम प्रामीस । जुग कोड़ कोडी चिरंजीवो धर्म दायक ईश ।। ॥ दाल इक मिसानी॥ नग नायकजी त्रिभुवन जन हितकार ए । परमातमजी चितानन्त घन सार ए॥ निन रयणीजी दश दिस उज्जलता धरै । शुभ लगनेजी ज्योतिष चक्रते सचरै ॥ जिन जनम्याजी जिन अवसर माता धरै । तिण अवसरजी इन्द्रासन पिण यरहरै ॥

-- . । ढाल- [२० ] नोटक- थरहरें आसन इन्द्र चितें कवण अवसर ए बण्यो। जिन जन्म उच्छच काल जाणी अतिही आनंद ऊपन्यो । निज सिद्ध संपति हेतु जिनवर जाणि भगते उमयो । विकसंत वदन प्रमोद वधते देव नायक गहगह्यो। तव सुरपतिजी घंटानाद करावए । सुर लो जी घोपणा एह दिरावए ॥ नर खेāजी जिनवर जन्म हुवो अछ । तसु भगतजी सुरपति मन्दर गिर गर्छ । त्रोटक- गछै मन्दिर शिखर ऊपर भुवन जीवन जिन तणों जिन जन्म उच्छव करण कारण आवज्यो सवि सुर गणों । तुम शुद्ध समकित थारये निर्मल देवाधिदेव निहालतां । आपणा पातिक सर्व जासे नाथ चरण पखालतां ।। ढाल इम सांभलिजी सुरवर कोड़ी वहु मिली । जिन वन्दनजी मंदर गिर साहमी चली ।। सोहम पतिजी जिन जननी घर आविया । जिन माताजी वंदी स्वामी बधाविया ॥ त्रोटक वधाविया जिनवर हर्प बहुलै धन्य हूँ कृत पुण्य ए। त्रैलोक्य नायक देव दीठो मुझ समो कुण अन्य ए॥ -

[ २१ ]
हे जगत जननी पुन तुमचो मेरु मन्चन वर करी।
उन्छग तुमचे रलिय थापित श्रातमा पुण्ये भरी ॥
दाल-सुर नायक जी तिन नित कर कमल ठव्या । पाचरूपेजी अतिशय महिमायें स्तव्या ।
नाटक विध जी तर बत्तीस थागल वहै। मुर कोडी जी जिन दरशनणे ऊमहे ।।
पोटक- सुर कोड़ कोडी नाचती वलि नाथ शुचि गुण गावती।
अपछरा कोडी हाथ जोड़ी हाव भाव दिसावती।।
जय जयो । जिनराज जग गुरु एम दे अासीस ए।।
ग्रम बाण शरण आधार जीवन एक तू जगदीस ए॥
ढाल-मुर गिरवरजी पाइप जनम चिहूँ दिसैं । गिरि शिल पर जी सिंहासन सासय वसे ॥
तिहा प्राणीजी शक्रे निन सोले ग्रह्या। चउस जी तिहा सुरपति आवी रहा ।
घोटक
श्राविया सुरपति सर्व भगत कलश श्रेणि वणावए ।
सिद्वार्थ पमुहा तीर्थ श्रीपरि एवं वस्तु अणावए ।
अचुयपति तिहा हुकुम कोनों देव कोडा कोडिने ।
जिन मजनारथ नीर ल्यावो सबै मुर कर जोडिनें ॥
[जलका कलश लेकर सड़े रहें और पढ़ें]

ढाल- [ २२ ] ॥ शांतिनें कारणे इन्द्र कलशा भरे----ए देशी । आत्म शाधन रसी देवकोड़ी हसी। उल्लसीने धसी खीर सागर दिसी ॥ पउमदह आदि दह गंग पमुहा नई । तीर्थ जल अमल लेवा भणी ते गई। जाति अड़ कलश करि सहस अठोत्तरा । छन्त्र चामर सिंहासणे शुभतरा ॥ उपगरण पुष्फ चंगेरि पमुहा सवें । आग में भासिया तेम आणि ठवें ॥ तीर्थ जल भरिय करि कलश करि देवता । गावता भावता धर्म उन्नतिरता॥ तिरिय नर अमरने हर्प उपजावता । धन्य श्रम शक्ति शुचि भक्ति इम भावता ।। समकितें वीज निज अात्म आरोपता । कलश पाणी मिसै भक्ति जल सींचता ॥ मेरु सिहरोवरे सर्व आव्या वहीं । शव उच्छङ्ग जिन देखि मन गहगही ।। गाथा-हंहो देवा अगाइ कालो। अदिट्टपुचो तिलोय तरणो । तिलोय बंधू मिच्छत मोह विद्ध सणो । आणाइ तिहा विणासणो । ॥ देवाहिदेवो दिवो हिमयकामेहि ।। दाल-एम पभणंत वण भुवन जोइसरा। देव वेमाणिया भत्ति धम्मायरा ।। केवि कप्पट्टिया केवि मित्तागुगा । केवि वर रमण वयणेण अइ उच्छगा ।। - डाल- [ २३ । वस्तु-वस्य अचुय तत्य अच्चुय इन्द्र आदेश । कर जोडो सर"देवगग लेइ कलश आदेश पामिय !! अद्भुत रूप सरूप जुय करण एह पुन्छत सामिय । इन्द्र कहे जगतारणो पारग अम्ह परमेस । नायक दायक धम्मनिधि करिये तसु अभिषेक ।। [जल की थोडी धारा ३] ॥ तीर्थ कमलबर उदक भीने पुष्कर सागर आ4-ए देशी ॥ . पूर्ण कलश शुचि उदयनी धारा, निनवर अर्गे नाम । ओतम निर्मल भाव करता, वधते शुभ परिणाम ॥ प्रच्युताटिक सुरपति मजन, लोकपाल लोक्न्त । सामानिफ इ द्राणि पमुहा, इम अभिषेक करत ।। पू०। [चरणों पर थोडा जल चढाना ] गाथा-वर ईशाण सुरिन्दो, सस्क पमण्ड करिय सुपसाउ । तुम अंगे महनाहो, सिणमित्त अम्ह अप्पेह ।। ता सक्किदो पभणेइ, साहम्मि बच्छलम्मि बहुलाहो । आया एव तेण गिन्हइ होउ त्यत्या भो॥ [ ममरत कलश-जल से स्नान करायें ] - [ २४] ढाल- सोहम सुरपति, वृपभ रूप करि न्हवण करे प्रभु अंगे। करिय विलेपण पुष्फमाल ठवि वर आभरण अभंगे ॥सो० १ । '... तब सुरवर बहु जय-जय रव कर नाचे धरि आणन्द । मोक्ष मारग सारथ पति पास्यों भांजस्युं हिव भव फन्द । सो० २ ॥ कोड़ि वत्तीस सोवन्न उवारी वाजते वरनाद। सुरपति संघ अमर श्री प्रभु ने जननी ने सुप्रसाद ॥ आणि थापी एम पयंपे अम्ह निस्तरिया आज । पुत्र तुमारो धणिय हमारो तारण तरण जिहाज ॥ सो० ३॥ मात जतन करि राखज्यो एहने तुम सुत हम आधार। सुरपति भक्ति सहित नन्दीश्वर करे जिन भक्ति उदार ॥ सो०४॥ निय-निय काप गया महु निर्जर कहता प्रभु गुण सार । दीक्षा केवल ज्ञान कल्याणक इच्छा चित्त मझार ।। सो०५॥ खरतर गछ जिण आणा रंगी राज सागर उवझाय । ज्ञान धर्म दीपचंद सुपाठक सुगुरु तणे सुपसाय ।। ।

देवचद निज भक्तं गायो जन्म महोन्छव छई।
बोध योज अउरो उलस्यो सघ सकल पाणंद ॥सो०६॥
[अभिषेक के बाद शुद्ध जल से प्रक्षाल अग लहणा करना चाहिए ]
|| राग- वेलावल ॥
इम पूजा भगर्ने करो, आतम हित काज । तजिय रिभाव निज भावना, रमता शिव राज ! इम० १॥
काल अनन्ते जे हुआ, होस्य जेह जिणंद । सपई श्रीमधर प्रभु, केवल नाण दिणन्द ॥ इम? २॥
जन्म महोच्छव इण पर, श्रावक चिवंत । विरचे जिन प्रतिमा तणों, अनुमोदन खत ।। इम०३ ॥
देवचन्द लिन पूजना, करता भव पार । निन पडिमा जिन सारपी, कही सूत्र मझार । इम० ४ ॥
॥ इति स्नात्र-पूजा विधि सम्पूर्णम् ।।
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॥ अथ अष्टधकारी पूजा
॥अंगा पूजा॥
।। अथ जल पूजा ॥
दुहा ॥ गंगा मागध क्षीरनिधि, ओपध मिश्रित सार।
कुसुमे वासित शुचि जले, करो जिन स्नात्र उदार ।।
दाल-मणि कनकादिक अडविध करि भरि कलरा सफार ।
शुभ मचि जे जिनवर नमें तशु नहीं दुरिय प्रचार ।।
मेरु शिखर जिम सुरवर जिनवर न्हवण अमान ।
करता वरता निज गुण समकित वृद्धि निधान ॥ १ ॥

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हर्प भरि अपसरा वृन्द पाये । स्नात्र करि एम श्रासीस भावै ॥
जिहा लगे सुरगिरी अधुदीयो । अमतणानाय जीवो तु जीवो ॥३॥
श्लोक:-विमलफेालभासनभास्कर । जगति जंतुमहोदयकारण ।।
जिनर बहुमानजनौषतः शुचिमनः स्नपयामि विशुद्धये ॥ १ ॥
ओं ह्रीं परमपरमात्मने अनवानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमजिनेन्द्राय
जल यजामहे स्वाहा ॥ १॥ इति जल पूजा ।।
[दाहिने चरण पर अङ्ग लूणा रयकर जल चढायें]
॥ अथ चन्दन पूजा॥
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दुहा ॥ बावना चन्दन कुमकुमा । मृग मद ने धनसार ॥
जिन तनु लेप तमु टले । मोह मन्ताप विकार ||१|
सकल सताप निवारण तारण सह भविचित्त । परम अनीहा अरिहा तनु चरची भवि नित्त ।।
निज रूपे उपयोगी धारी जिन गुण गेह । भार चन्दन सुह भावथी टाले दुरति अछेह ॥२॥

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[ २८ ]
चाल-- 'जिन तनु चरचतां सकल नाकी। कहै कुग्रह उष्णतां आज थाकी ।।
सफल अनिमेपता आज म्हांकी। भव्यता अह्म तणी आज पाकी ॥३॥
श्लोकः सकलमोहतमिश्रविनाशनं । परमशीतलभावपुतं जिनं ।।
विनयकुकुमचंदनदर्शनेः सहजतत्वविकाशकृतेचये ॥१॥
ओं ह्रीं परमपरमात्मने अनन्तानन्तनानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमञ्जिनेन्द्राय चन्दनं
यजामहे स्वाहा ॥२॥
॥ इति चंदन पूजा ॥
[ केशर चन्दन चढ़ावें]
।। अथ नव अङ्गि भाव पजा ।।
दुहा ॥ पर उपगारी चरणयुग अनन्त शक्ति स्वयमेव ।
यातें प्रथम पूजिये आतम अनुभव सेव (चरणों में टीकी ) ॥ १ ॥
जानु पूजा दूसरी, समाधि भूमिका जान ।
आतम साधन ज्ञान ले, शुद्ध दशा पहिचान ।। (गोड़ में टीकी)॥२॥

[ २६ ]
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कर पूजा जिन राज को लिये सम्पयरी दान ।
ते कर मुझ मस्तक ठवू पहुँचे पद निरवाण ॥ (हाथों में टीकी) ॥ ३ ॥
भुज बल शक्ति जानके, पूजाकरूं चित लाय ।
रागादि मन हटाय के, श्रातम गुण दरशाय ।। (कधों में टीकी)॥ ४ ॥
मिर पुजा जिन राज की, लोर शिरोमणि भाव ।
चउगति गमन मिटायके, पचम गति सम भाव ॥ (मस्तक मे टीकी)॥५॥
लिलवट पूजा सार है, तिलक विधि विश्राम ।
वदन' कमल वाणी सुनें, पहुँचे निज गुण वाम ।। (ललाट मे टीकी)॥६॥
फठ पूजा है मातमी, वचनातिशय वृद।
सप्त भेट पयचिश श्रुत, अनुभव रस नो कट ॥ (कठ मे टीकी)॥७॥
हत्य कमलनी पूजना, सदा यसो चितमाह ।
गुण विवेक जागे सदा, ज्ञान कला घट छाय ॥ (हृदय मे टीकी)||
नामी मडल पुज के, पोडश दल को भाव ।
मन मधुकर मोही रहयो, आनन्न धन हरपाय ॥ (नाभि मे दीफी) ॥६॥

[ ३० ] ॥ पुन: - दुहा ॥ जल भरि संपुट पत्रमां, युगलिक नर पूजंत । ऋपम चरण अंगुष्ठडे, दायक भवजल अन्त ॥१॥ जानु बले काउसग रह्या, विचऱ्या देश विदेश । खड़ा-खड़ा केवल लह्या, पूजो जानु नरेश ॥२॥ लोकांतिक वचने करी, वरस्या वरसी दान । कर कंडे प्रभु पूजना, पूजो भवि बहुमान ॥३॥ मान गयू दो अंश थी, देखी वीर्य अनन्त । पूजा वलें भवजल तऱ्या, पूजो खंध महंत ॥४॥ सिद्ध शिला गुण ऊजली, लोकांतिक भगवन्त । वसिया तिण कारण वही, शिर शिखा पूजन्त ॥५॥ तीर्थकर पद पुण्य थी, त्रिभुवन जिन, सेवन्त । त्रिभुवन तिलक समा प्रभु, भाल तिलक जगवंत । सोल पहर देई देशना, कंठ विवर वरतूल । मधुर ध्वनि सुर नर सुने, तिम गले तिलक अमूल ।। हृदय कमल उपशम वलें, बाल्यो रागने द्रुप। हेम दहै वन खंइने, हृदय तिलोक संतोप || रत्नत्रय गुण उजली, सकल सुगुण विश्राम । नाभि कमलनी पूजना, करता अविचल धाम ॥६॥ उपदेशक नवतत्वना, तिम नव अङ्ग जिनन्द । पूजो बहु विध भाव थी, कहे सह वीर मुनिंद ॥१०॥ ।। इति ना अनि भाव पूजा ॥

[ ३१ । ।। अथ पुष्प पूजा ॥ शतपतो वर मोगरा, चम्पक जाइ गुलाव । केतकी दमणो वोलसिरि, पूजो जिन भरी छान ॥१॥ ढाल-अमल असण्डित विकसित सुभ सुमनी धन जाति, लारसीनो टोडर ठयो अङ्गी रचो बहुभाति । गुण कुसुमें निज प्रातम मडित करना भव्य, गुणरागी जड़त्यागी पुष्प पडावो नव्य ॥२॥ जगधणी पूजता विविध फुले, सुरवरा ते गिणे क्षण अमूले । खन्ति धर मानवा जिनपर' पूजे, तसुतणा पाप सताप धूजै ॥ ३ ॥ श्लोक विकचनिर्मलशुद्वमनोरमैः रिशदचेतनभावसमुद्भवः । सुपरिणामप्रसूनघनैर्नवैः परमतत्वमय हि यजाम्यहम् ॥१॥ ओं ह्रीं परमपरमात्मने 'प्रनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मनरामृत्युनिवारणाय श्रीमञ्जिनेन्द्राय पुष्पं- यजामहे स्वाहा ॥३॥ ॥ इति पुष्प पूजा ॥ [पुष्प चढायें] । ३२ ] " 16 ढाल- -- - चाल- ॥ अग्नपूजा। ॥ अथ धूप पूजा ॥ कृष्णागर मृगमद तगर, अम्बर तुरक लोबान । मेल सुगन्ध . धनसार धन, करो जिननेधूपदान ॥ १ ॥ धूपवटी जिम महमहै, तिम दहै पातिक वृन्द । आर्ति अनादिनी जावै, पावै मन आनन्द। जे जन पूजै धूपै, भवकृपै फिर तेह । नावै धुवधर, आवे सुक्ख अछेह ।। २॥ जिनघरे वासतां धूपपूर, मिच्छत दुर्गन्धता जाई दूरै । धूप जिम सहज ऊर्द्धगत स्वभावे, कारिका उच्चगति भाव पावै ॥३॥ श्लोक सकलकर्ममहेंधनदाहनं, विमलसंवरभावसुधूपनम् । अशुभपुद्ग वसंगविवर्जितं जिनपतेः पुरतोस्तु सुहर्पितः ।।१।। ओं ह्रीं परमपरमात्मने अनन्तानन्त ज्ञान शक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमजिनेन्द्राय धूपं यजामहे स्वाहा ॥ ४ ॥ ॥ इति धूप पूजा ॥ [धूप अगरबती खेवै] - . - ।

L [ ३३ J ॥ अथ दीपक पूजा ॥ मणिमय रजत तानना, पात्र करी घृत पूर। वत्ती सूत्र कसु बनी, करो प्रदीप सनूर । १ । ढाल मगल दीप वधावो गायो जिन गुणगीत, टीप थकी जिम प्रालिका मालिका मङ्गलनीत । दीपतणी शुभज्योती द्योती जिन मुखचन्द, निरसी हरसो भविजन जिम लहो पूर्णानन्द । २ । निन गृहे दीपमाला प्रकास, तेहती तिमिर अज्ञान नासै। निजघदै ज्ञानज्योति विकामे, तेहथी जगतणा भाव भासे ॥ ३ ॥ श्लोक भविक निर्मल बोधविकाशक, जिनगृहे शुमदीपकदीपन । सुगुणरागपिशुद्धसमलित, दधतु भावविकासकते जनाः ॥१॥ ओं,सी परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्री मजिनेन्द्राय दीपं यजामहे स्वाहा ॥ ४॥ ॥ इति दोपक पजा॥ [मङ्गलदीप चढावै] चाल- [ ३४ ] । । चाल- ॥ अथ अक्षत पूजा ॥ अक्षत अक्षत पूरसु, जे जिन आगे सार । स्वस्तिक रचतां विस्तरै, निजगुण भर विस्तार ।। ढाल- उज्जल अमर अखंडित मंडित अक्षत चङ्ग, पुञ्जत्रय करो स्वस्तिक आस्तिक भावै रङ्गः । निज सत्ता ने सन्मुख उनमुख भावे जेह, ज्ञानादिक गुणठावै भावे स्वस्तिक एह ॥२॥ स्वस्तिक पूरतां जिनप प्रागै, स्वस्ति श्री भद्र कल्याण जागे । जन्म जरा मरणादि असुभ भागे, नियत शिव सर्व रहै तासु आगे ॥३॥ श्लोक सकलमंगलकेलिनिकेतनं, परममंगलभावं मयं जिनं । श्रयति भव्यजना इति दर्शयन्, दधतु नाथपुरोदातस्वास्तिकं ॥१। ओं ह्रीं परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्री मजिनेन्द्राय अक्षतं यजामहे स्वाहा ॥६॥ ॥ इति अक्षत पूजा ॥ [अखंड चावल चढ़ावै] [ ३५ 1- ।। अथ नैवेद्य पना॥ सरस सुचि पकवान बहु, शालि दालि घृतपूर । धरो नैवेद्य जिन पागले, क्षुधा दोप तसु दुर ॥ १ ॥ लपाश्री वर घेचर मधुतर मोतीचूर, सीहकेसरिया सेविया दालिया मोदक पूर । साफर दास सीघोड़ा भक्ति व्यञ्जन घृतसा, रो नैवेद्य जिन ागलै जिम मिले सुर अनवद्य ।। ढोवता भोज्य पर भाव त्यागे, भविजना निज गुण भोज्य भागे । श्रम्हभगि अम्हतो मरूप भोज्य, नापज्यो तातजी जगत पूज्य ।। ३ ।। श्लोक सकलपुद्गलसगविवर्जनं सहजचेतनभावविलासक । सरसभोजननव्यनिवेदनात, परमनितिभागमह स्पृहे ॥१॥ श्रा ही परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय 'श्री मजिनेन्द्राय नैवेन यजामहे स्वाहा ॥७॥ ॥ इति नैवेद्य पूजा ॥ [मिठाई पकवान चढावे] [ ३६ ] - ॥ ॥ अथ फल पूजा॥ पक्व बीजोर जिन भेट' कर, ठवतां शिवपद देइ । सरस मधुर रस फल गिणों इह जिन भेट करइ ॥ १॥ ढाल- श्रीफल कदली सुरंग नारंगी आंबा सार, अजीर वजीर दाडिम करणा पटबीज सफार । मधुर सुखादिक उत्तम लोक आनंदित जेह, वर्ण गंधादिक रमणीक बहुफल ढोवै तेह ।२। फलभर पूजतां जगत स्वामी, मनुजगति ते लहै सफल पामी। सकल मनुध्येय गतिभेद रंगै, -ध्यावतां फल समाप्ति प्रसंगै ॥३॥ श्लोक- कटुककमविपाकविनाशनं, सरसपक्वफलबजढौकनं । वहति मोक्षफलस्य प्रभोः पुरः कुरुत सिद्धिफलाय महाजनाः ॥१॥ ओं ह्रीं परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणायश्री मजिनेन्द्राय फलं यजामहे स्वाहा ॥८॥ ॥ इति फल पूजा॥ [श्रीफल सुपारी नीला फल प्रमुख चढ़ावै] चाल-- [३७ ॥ अथ अर्घ पूजा ॥ दोहाइम अडविधि जिन पूतना, विरचे जे थिर चित्त । मानवभव सफलो क्रै, बाथै समकित वित्त ॥ १ ढाल-अगणित गुणमणि श्रागर नागर वन्दित पाय, श्रुतधारी उपगारी श्री ज्ञानसागर उवज्झाय। तासु चरणरज सेवक मधुकर पय लयलीन, श्रीजिन पूजा गाई जिनवाणी रसपीन ।। २ ॥ सम्वत गुणयुत अचल इन्दु, हर्ष भरी गाइयो श्रीजिनेदु । तासु फल सुकृत थी सफल प्राणी, लहै ज्ञान उद्योत धन शिव निसाणी ॥३॥ श्लोक- इति जिनवरवृन्द भक्तितः पूजयन्ति, सकलगुणनिधान देवचन्द्र स्तुवन्ति । प्रतिदिवसमनन्त तत्वमुद्भासयन्ति, परमसह नरूप मोतसौख्यं श्रयन्ति ॥१॥ ओं ही परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्री मजिनेन्द्राय अर्घ यजामहे स्वाहा। ॥ इति अर्थ पूजा ] [चार कोणें धार दीजै] [ ३८ ] ॥ अथ वस्त्र पूजा ॥ • - -- शको यथा जिनपतेः सुरशैलचूला, सिहासनोपरि मितस्नपनावसाने । दध्यक्षतैः कुसुमचन्दनगन्धधूपैः कृत्वार्चनन्तु विदधाति सुवस्त्रपूजां ॥१॥ तद्वत् श्रावकवर्ग एप विधिनालङ्कारवस्त्रादिकं, पूजां तीर्थकृतां करोति सततं शक्त्यातिभक्या हतः। नोरागस्य निरंजनस्य विजितारातेस्त्रिलोकीमते, जनस्य निवृतिकृते क्लेशक्षयाकांक्षया । स्वस्यान्यस्य ओं ह्रीं परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्री मजिनेन्द्राय वस्त्रं यजामहे स्वाहा । ॥ इति वस्त्र पजा ॥ [ वस्र चढ़ावै] . [ ३६ ] ॥ अथ निमा उतारण पजा ।। अह पडिभग्गापसर, पयाहिणं मुणिवय करिज्ण । पडइ सलूणत्तण लजियश्च, लूणहू अवहरति ॥१॥ पिक्खेविगु मुह निण वरह, दीहर नयण सलूण । न्हावइ गुरु मच्छह भरिय, जलण पइस्सइ लूण ॥२॥ लूण उतारिह जिएवरह, तिन्नि पयाहिरिण देव । तड तड शद्ध करन्ति ये, विजा विजजलेण ॥३॥ ज जेण विज्जव युई, जलेण त तहइ अत्थसहस्स | जिनरूवा मच्छरेणवि, फुट्टइ लूण तड तडस्म ।। ४॥ [ऐसा कह कर लूण अग्निशरण करै, पीछे लूण पाणी ले गाथा कहै ] गाथा- सव्ववि मुणवइ जलविजल, तन्तह भमण्इ पास। अहवि कयन्तस्स निम्मलउ, निग्गुण बुद्धि पयास | ५॥ d - । ४० ] जलण अणें विरण जलणहि पाम, भरवि कयलल भावहि पान । तिन्नि पयाहिणि दिन्निय पास. जिम जिय हुदै भव दुहपास ॥ ६ ॥ जल निम्मल कर कमलेहि लेविणुगुरवर भावहि मुरिणवाई सेवणु। पभणई जिणवर तुहपः मरणं, भन नु लभा सिद्रि गमणं ॥ ७ ॥ ।। इनि निमक उतारण पजा ।। [ऐसा कहकर लग उतारी जल सरग कीजै] M ॥ अथ पुष्पमाला पहरावण पूजा । उन्नय पयय भ तारा, निगठाणे मंठिग नांवन्न । जिण पाने मिग जगाम, पिता,यवहे पदणं ॥१॥ सव्वों जिणपभावी, सरिता मरिसेगा जेगा रगनी। रावन्नूग अपामा जनम भमा न महमण ||२|| अनन्त दुःकरं पिहू, हुगवह निवदेन देन का। प्राणा गयन्नयां, न का मुख्यत्व मूलमिण ॥३॥ ॥ इति पुष्प माला पहरावण पूना ।। [ गाला गढ़ावै] .

। ४१ ] ॥ अथ छुठी फूल पूजा ॥ उवणेव मङ्गलेवो जिणाण मुह लालि सवलिया। तित्यपवत्तम समई तियसे विमुक्का कुसुगबुढी ॥ ॥ इति छुठी फूल पूजा ॥ [ऐसा कहकर 'फूल उछाली जे प्रभु भागे'] ॥ प्रभात की आरती ॥ जय जय आरती शानि तुम्हारी, तोरा चरण कमल की मैं जाउ वलिहारी । टेर। विश्वसेन अचिराजी के नन्दा, शान्तिनाम मुस पुनिम चन्दा । नय० १ । चालिप धनुप मोक्नमय काया, मृग लाछन प्रभु चरण सुहाया । जय०२] चक्रवर्ति प्रभु परम सोहै, सोलम जिनवर जग सहु मोहै । जय०३ । मगल प्रारति भोरे कीजे, जनम जनम को लाहो लीजै । जय०४। कर जोड़ी सेवक गुण गावे, सो नर नारी अमर पद पावै । जय०५।

[ ४२ ]
॥ संध्या की आरती ॥
ऋपभ अजित सम्भव अभिनन्दन, सुमति पदम सुपासकी,
जय महाराज की दीनदयाल की आरती कीजै । टेर।
चन्द सुविवि शीतल श्रेयांस, वासु पज्य जिनराजकी । जय० १ ।
विमल अनन्त धर्म हितकारी, शांतिनाथ सुखकारकी । जय० २ ।
कुंथुनाथ अर मल्लि मुनि सुव्रत, नमि नमुं सोवन कायकी । जय० ३ ।
नेमिनाथ प्रभु पार्श्व चिन्तामणि, वर्द्धमान भव रारकी । जय० ४।
कञ्चन आरती बहुविध सझकर, लीजै अङ्ग उछाहकी । जय० ५।
सकल संघ मिल आरती करत हैं, आवागगन निवारकी । जय० ६ ।
॥ इति ॥
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श्री नवपद-पूजा n ॥पहली पूजा॥ एमो अरिहताण, एमो सिद्धाणं, एमो पायरियाण, एमो उवझायाण णमो लोए सब साहरण । एसो पश्चणमुकारो सव्व पावप्पणासणो । मगलाण च सम्वेसिं पढम हवइ मगल ।। परम मंत्र प्रयमी करी, वास घरो उर ध्यान । अरिहंत-पद पूजा करो, निन निन शक्ति प्रमान । गाथा उत्पन्न सन्नाण महो मयाण । सप्पाडि हेरासण सहियाणं ।। सद्देसग पदिय सजणाण नमो नमो होउ सया जिणाण ||१|| जिए शुद्वभा निजात्मा पिछान्यो, स्वबोधे छए द्रव्यनों भेटजान्यो। निज प्राश्नवे सत्तर कर्म साध्यो, विपाकोदयी तीर्थकृन्नाम वाघ्यो ॥१॥ - [ ४४ ] , यदीय प्रभाव जगत सुप्रसिद्धा वसुप्रातिहा-दि सम्पत्ति सिद्धा । परानन्द मग्ना सदा जे विशोका, नमो ते जिना सर्वदा भव्य लोका ॥२॥ नमो नन्त सन्त प्रमोद प्रदानं, प्रधानाय भव्यात्मने भास्वताय । थया जेहना ध्यान थी सौख्यभाजा, सदा सिद्ध चक्राय श्री पालराजा ॥३॥ करया कर्मदुर्मम चकचूर जेणे, भला भव्य नवपद ध्यानेन तेणें । करी पूजना भव्य भावै त्रिकालैं, सदा वासियो प्रातमा तेण कालें ॥४॥ जि के तीर्थंकर कर्म उदमें करीने, दियै देशना भव्यने हित धरीने'। सदा आठ महा पाडिहारे समेता, सुरेसे नरेसै स्तव्या ब्रह्मपता ॥५॥ कर्या घातिका कर्म च्यारे अलग्गा, भवोपग्रही च्यार छ जे विलग्गा। जगत् पंच कल्याण के सौख्यपामे, नमो तेह तीर्थकरा मोक्षगामे ॥६॥ तीरथपति अरिहा नमु अरिहा नमु धर्मधुरंधर धीरोजी । देशना अमृत बरसता निज वीरज बड़ वीरो जी ॥१॥ वर अखय निर्मल ज्ञान भासन सर्व भाव प्रकासता, निज शुद्ध श्रद्धा आत्म भावै चरण थिरता वासता । ढाल-- त्रोटक- ढाल- जिन नाम कर्म प्रभार अविशय प्रातिहारज शोमता, जग जन्तु करुणावंत मगवत मविक जननें थोमता ।। तीजे भव पर थानक तपकरि, जिण योध्यु जिन नाम । चौसठ उद्रे पूजित जे जिन, कीजे तास प्रणाम रे ॥१॥ भविका सिद्धचक्र पद वन्दो, निम चिर काले नन्दो रे ॥ भ०॥ उपशम रसनों कन्दो रे । म० } रन त्रयीनो वृन्दो रे ॥ भ० ] वन्दी ने 'आनन्दो रे । भ० । सेवे सुर नर इन्दो रे भवि ॥ १ ॥ जेहने होय कल्याणक दिवस, नरकै पिण अजयालु' । सफल अधिक गुण अतिशय धारी ते जिन नमि श्रघटालु रे॥ भ० २ ॥ जे तिहुँ नारण समग्ग उपन्ना, भोग करम क्षीण जाणी। लेइ दीक्षा-शिल्पा दिये जगने, ते नमिये जिन नाणी रे ॥ भ० ३॥ महा गोप महा माहण कहिये नियमिक सत्यवाद । उपमा एहवी जेहने छाजे, ते निन नमिये उछाह रे ॥ भ०४॥ पाठ महा प्रातिहारज जसु छाजे, पतीस गुण युत पाणी । जे प्रतिसोध करे जग जन ने, ते जिन नमिये प्रायो रे ॥ भ० ।) - . [ ४६:] ॥ ढाल श्री सीमंधर स्वामी उपदिसे-~-ए देशी ॥ अरिहंत पद ध्याता थकॉ, दव्वह गुण पाय रे। भेद छेद कर आतमा, अरिहन्त रूपी थाये रे ॥२॥ वीर जिणेसर उपदिसे साम्भल ज्यो चित लाई रे। आतम ध्याने आतमा, रिद्धि मिलें सव आई रे । वी० ॥ ॐ ह्रीं परमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमत्सिद चक्राय पंचामृतं, चंदनं, पुष्पं, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेद्यं, फलं, वस्त्रं, वासं यजामहे स्वाहा । ॐ स्तवन प्रभु पार्श्व पाच रत्न मिला मोहे लोहे से कंचन रूप मिला। जलते हुए भी नाग को नकार मंत्र सुना दिया । धरणीधर पदवी दहे फिर स्वर्ग का सुख दे दिया। मेरा हृदय कमल जिन देख खिला। कमठ-हठ-तप फन्द को फाड़ा जिन्होंने ज्ञानसे । उपसर्ग होने पर चले नहीं जो कि अपने ध्यान से । जिन जित लिया है मोह-किला। कोर्ति पूज्य प्रभु पारसनाथ का प्रसाद ही संसार में । वश्चलेश्या हमेशा पहुँचा मुक्ति के दरबार में । मुझे आज उसी का दर्शमिला प्रभु० ॥

॥दूसपी पूजा।
दूजी पूजा सिद्ध को, कीजै दिल खुसियाल ।
अशुभ करम दूरे टलै, फलै मनोरथ माल । ।
छन्द- सिद्वाण माणन्द रमालयाणं । नमो नमो जन्त चउक्याण ।
समग कम्मक्खय कारयाण जम्म जरा दुक्स निपारगाण ॥ २ ॥
निजानादि कर्माष्टके, छय करीने । जस मृत्यु जन्मादि दूरे हरीने ।
स्थिता सर्व लोकाग्र भागें विशुद्धा, चिदानन्द रूपा सरूपें प्रसिद्धा ।। ३ ॥
निजानन्त बोधादि युक्ता प्रदेशा। निराधत निर्वृता जे अलेशा।
निराकार साकार भावे महता । भजो ते प्रमोदे सदा सिद्ध सता ॥४॥
करी आठ कर्मक्षये पार पाम्या । जरासन्म मरणादि मय जेण वाम्या।
निरावर्ण जे आत्मरूप प्रसिद्धा । थया पार पामो सदा सिद्ध सिद्धा ॥ ५ ॥
त्रिमागोनदेहानगाहात्म देसा। रह्या ज्ञान मय जाति वर्णादि लेशा।
सदानन्द सौख्या श्रिता जोति रूपा । अनानाध अपुनर्भवादि स्वरूपा ॥६॥

[ . ५० ]
॥तीसरी पूजा॥
हिव आचरज पदतणी, पूजा करो विशेष ।
मोहतिमिर दूरे हरे, सूझै भाव अशेप ।।
काव्य-
सूरीण दूरीकय कुग्गहाणं नमो नमो सृरिसमप्पहाणं।
सद्दे सणा दाण रामायराणं, अखंड छत्तीसगुणायराणं ॥१॥
नमू सूरि राजा सदातत्वताजा, जिनेन्द्रागमे प्रौढ़ साम्राज्यभाजा।
पड़ वर्गवर्गित गुणे शोभमाना, पश्चाचारने पालवै सावधाना ॥ २ ॥
जिके पश्च प्राचार पाले सुभावं, अनित्यादि सम्भावना नित्यभावें ।
जिनेन्द्रागमे ज्ञान दाने सुरत्ता, बहूभन्यमें जे रहें
रहें. अप्रमत्ता ॥ ३॥
छतीसे गुण दीप्यमाना गणेशा, सदाशासनाधारभूता सुलेशा।
वहूभव्य लोका सुमार्गी नयंता, ज्योसूरि मुष्मा सदा तेजवन्ता ॥ ४ ॥
'भविप्राणिने देशना देशकालें, सदा अप्रमत्ता यथासूत्रपालें।
जिकेशासनाधारदिग्दंतकल्पा, जगत्ते चिरंजीव जो शुखुजल्पा ॥५॥

त्रोटक- - [ ५१ ] श्राचारज मुनिपतिगणी, गुणवत्तीसेंधामोजी। चिदानन्द रसस्वादता, परमा निकामोजी ॥ १ श्रा०॥ नि कामनिर्मलशुद्धचिदघन, साध्यनिज निरधारथी। वरज्ञान दरसण चरएचीरज, साधनाच्यापारथी । भविजीक्योधक तत्वशोधक, सयलगुण सपतिधरा। सम्बर समाधिगति उपाधि, दुविध तपगुण भादरा ॥ पचअचार जे सूधापाले, मारगभा साचो। ते प्राचारज नमियेनेहसु, प्रेम करीने जाचोरे भ० ११ ११ वर छत्तीस गुणकरिशोम, युगप्रधान जगमोहै। जगमोहे न रहै सिणु कोहै, सूरि नमु ते जोहे रे भ० ॥२॥ नित अप्रमत्त घरमउवएसें, नहि विफ्था न कयाय । जेहने ते आचारज नमिये, अक्लुस श्रमलश्रमायरे भ० ॥ ३ ॥ जेदियेसारण वारण चोयण, पदिचोयण बलिजनने। पदधारी गम भाचारज, तेमान्या मुनि मनने रे भ० ॥ ४॥ , ढाल- [ ५२ ] अत्यमियें जिन सूरज केवल, चन्दीजै जगदीवो। भुवन पदारथ प्रकटन पटुते, आचारज चिरजीवो रे भ०॥५॥ आचारजभला, महामंत्र शुभ ध्यानीरे। पंचप्रस्थाने आतमा, आचारज होयप्राणीरे। वी० ॥३॥ ॐ ह्रीं परमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमसिद्धचक्राय पञ्चामृतं, चन्दनं, पुष्प, धूप, दीपं, अक्षतं नैवेदां, फलं, वस्त्र, वासं यजामहे स्वाहा । - ध्याता र स्तवन आया-आया मैं आज, तेरे शरणे सिरताज, प्रभु रखना जी लाज, करूँ विनती तुम्हें । मैं हूँ अनाथ, कोई नहीं है साथ, बस तेरा आधार, मुझे अब तो है नाथ ॥प्रभु०॥ कीर्ति पज्य प्रभु धार, दया करके दातार, देदो मुक्ति मनोहार, |प्रभु०॥

गाथा- - [ ५३ ] ॥ चौथी पूजा। गुण अनेक जग जेहना, सुन्दर शोभित गार। उवझाया पद अरविये, अनुभर रसनो पार ।। सुत्तत्थ वित्थारण तप्पराण । नमोनमो वायग कुजराण। गणरस सधारण सायराणं । सधप्पयाजिय मच्छराणं ॥१॥ महा सूत्र सिद्धान्त शुद्धे करीने । पढावे सुशिष्या अनुग्रह धरीने। करें पूजेना लोक मध्ये तदीया । स्फुरन्ती द्रशी जास शक्ति स्वकीया ॥ २ ॥ गणे सारशुद्धि सहर्ष करन्ता, मुनी वर्ग मध्ये प्रमादं हरन्ता । पचीसे गुणे युक्तदेहा सुधूर्या, सदा वन्दिये ते उपाध्याय पूर्ध्या ॥ ३॥ नहीं सरि पण सरिगुण ने सुहाया, नमु वाचकात्यक्त मद मोह माया । बलीद्वादशागादि सत्रार्थ दाने, जिके सारधाने निरुद्धामिमाने ॥ ४ ॥ घरे पंच ने वर्ग वर्गित गुणोघा, प्रवादी द्विपोच्छेदने तुल्य सिंघा गुणी गच्छ सन्धारणे स्तम्भपूता, उपाध्याय ते बन्दिये चित् प्रभूता ॥ ५ ॥ - ढाल- . त्रोटक- ढाल- [ ५४ ] खंतिजुवा मुन्तिजुआ, अजय मदव जुत्ताजी। सच्चंसोय अकिचणा, तव संगम गुणरत्ताजी ॥ १ ॥ जे रम्या ब्रम्हगुप्तगुप्ता, सुमति समता शुभ धरा। स्याद्वाद वादे तत्वसाधक, आत्म पर विभंजन करा ।। भव भीरु साधन धीर शासन, बहनधोरी मुनिवरा । .. सिद्धान्त वायन दान समरथ, नमो पाठक पदधरा ॥२॥ द्वादशअंग सिज्झाय करे जे, पारग धारग तास । सूत्र अरथ विस्तार रमिक ते. नमो उबझाय उलास रे भ० ॥ १ ॥ ने दान विभागे, आचारज उवमाय । भवतिन्ये जे लहे शिवसम्पद, नमिये ते सुपसाग रे भ० ॥२॥ मूरख शिष्यनीपाये जे प्रभु, पाहण' पल्लव प्राण । ते उवज्झाय सकल जन पूजित, सूत्र अरथ मनिजाणेरे भ० ॥ ३ ॥ राजकुमर सरिखागण चिनक, आचारज पद योग । जेऊवज्झाय सदा ते नमतां, नावे भवभयसोगरे भ० ॥ ४ ॥ वावना चंदन रस सग वयण, अहित नाप सविटाले। ते उवझाय नमीजे जे बलि, जिनशारान अजुवाले रे भ० ॥ ५ ॥ अर्थ सूत्र - ढाल- + - [ ५५ ] तप सिफाये रत सला, द्वादश अंगतो ध्यातारे। उपाध्याय ते प्रातमा, जगवन्धय जग भ्राता ॥रे वी०॥ ॐ ह्री परमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमसिद्धचक्राय पञ्चामृत, चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, फल, वन्त्र , वास यजामहे स्वाहा । " स्तवन सिद्धगिरि तीरथ जैसा और नहीं घाम है। अनादि अनन्त चीते, काल नही काम जोते, अब तो तू चेत प्राणी यह तेरा काम है। तन का तमीज करना, क्रोध लोभ दूर हरना, मान माया त्याग तेरा मुक्ति मे मकान है। रात दिवस किये पूरे सभी हैं काम अधूरे, मानले अब कहना तारक देव गुरु नाम है। जीवा योनि लास चौरासी फिर आया। हारा नहीं जीती वाजी चाहता यदि रहना राजो, राग द्वेष काट प्यारे तुही आत्मारामहै । जब मिले कारण निमित्त सिद्ध होय कारजचित्त, तोरयशुभ मान जिनमुक्ति पद ठाम है ।। -

1
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[५]
॥पांचवी पूजा।
मोक्ष मारग साधन भणी, सावधान थया जेह ।
ते मुनिवर पद बन्दता, निर्मल थाय देह ॥
साहूण संसाहिय
संयमाणं, नमो-नमो शुद्ध दयादमाणं ।
तिगुत्त गुत्ताण
समाहियाणं, मुणीण आणन्द पयट्ठियाणं ॥१
जिके दर्शनज्ञान चारित्र रत्ने, करी मोक्ष साधै प्रधानप्रयत्नें।
सुमत्तो गुपत्ती धरे सावधाना, शुभाचार पाले हरॆ मोह माना ॥ २ ॥
विवर्जे विकत्था प्रमादादि दोपा, जितेन्द्रो पर्णे जे महा ज्ञान कोसा ।
शुभ ध्यानध्यावें गुणौ ये समिद्धा, नमो तै सदा सर्व साधु प्रसिद्धा ॥ ३ ॥
करें सेवना रिवायग गणीने, कस वर्णना तेहनो श्री मुणीने ।
समेता सदा पंच सुमति त्रिगुप्ता, त्रिगुप्त नहीं काम भोगेषु लिप्सा ॥ ४ ॥
बली बाह्य अभ्यंतरे ग्रांथि टाली, ऊइ मुक्ति ने योग चारित्रपालो ।
शुभाष्टांग योगे में चित्त वालो, नमुं साधने तेह निज पाप टाली ॥ ५ ॥

ढाल- प्रोटक- . ढाल- [ ५७ ] सकल विषय विपारिने, निक्कामी निस्मगीजी। भवदव ताप समाचता, आतम साधन रङ्गी जी ॥५॥ जे रम्या शुद्ध स्वरूप, रमणे देह निर्मम निर्मदा। काउसग्ग मुद्रा धीर थासन ध्यान अभ्यासी सदा। तप ते। दीपे कर्म जीपै नै छीपै परभणी। मुनिराज करणा सिंधु त्रिभुवन वधु प्रणमो हित भणी ॥ २॥ जिम तर फ्लै भमरो नसे, पीडा तसुन उपाय । लेई रस आतम सन्तो, तिम मुनि गोचरि जाय रे भ० ॥ १ ॥ पचेन्द्रीय ने जे नित जीपे, पट् काया प्रतिपाल । सयम सतर प्रकार आराध, वन्द दीन दयाल रे भ०१२॥ 'अढार सहस्म मौवागनाधोरी, अचल श्राचार चरित्र । मुनि महत जयणा युत वी, कीजे जनमपवित्र रेभ० ।।३।। नवरिधि ब्रह्मगुपत जे पालें, बारह विह तप सूरा । एहवामुनि नमियै जो प्रगटे, परव पुण्य अकरा रे भ० ॥ ४॥ सोना तरणी पर परीक्षादीसें, दिनदिन चढतेवाने । संयम सपकरता मुनि नमिये, देश काल अनुमाने रेभ० ॥५॥ -- -- ढाल- [ ५८ ] अप्रमत्त जे नित रहै', नवि हर- नविसो, रे। साधु सुधा ते आतमा, स्यू मूड़े स्यूं लोचें रे॥ वी० ॥ ॐ ही परमात्मने अनन्तानन्त ज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्री मत्सिद्धचक्राय पंचामृतं, चंदनं, पुष्प, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेद्य, फलं, वस्त्र, वासं यजामहे स्वाहा । - ६ स्तवन ३ निज अंतरंग अरि जै डंका बजा दिया चोर जिनेश्वर ने । है दान शील तप भाव सदा शुभ मारन उसमें चलने से । भविजन शिवपुर को जाते हैं फरमा दिया वीर जिनेश्वर ने ॥ जहाँ कर्म मेल नहीं रहता है आतम परमातम होता है। आओ, ज्योति से ज्योति मिलाते हैं फरमा दिया वीर जिनेश्वर ने ॥ कीर्ति पूज्य जिनेश्वर देव नमो भवि काल अनादि की चाल गमो । फिर मुक्ति रमण के संग रमो फरमा दिया वोर जिनेश्वर ने ॥

+
दाल-
[ 8 ]
॥ठवाँ पूजा॥
जिनपर भाषित शुद्धनय, तत्त्वतणी परतीत ।
ते सम्यग् दर्शन सदा, आदरिये शुभरीत ।।
-जिणुत्त तत्ते रुइलक्सणस्स, नमोनमो निम्मल देसणस्स ।
मिछत्त नासाइ समुग्गमस्स, मूलस्स सद्धम्म महा दुमस्स ॥ २॥
अनतानुबंधी क्षयाति प्रकारे, महामोह मिध्यात्वने जेह वारे ।
इगध्यादिभेदें फ्री वर्णवीजे, समसद्विभेर्दै वली जे युणीजे ॥३॥
जिनेन्द्रोक्त तत्वार्थश्रद्वान रूपो, गुणासर्व मध्ये प्रवत्तंअनूपो।
विना जेण नाण चरित्त न शुद्ध, मुह दशण तं नमामो विशुद्ध ॥ ४ ॥
विपर्य्या सहोवासना रूपमिश्या, टलें जेअनादि अछे जे कुपथ्या ।
जिनोक्त हुइ सहजथी शुद्ध ध्यान, कहीयें दर्शन तेह परमनिधान ॥ ५॥
विनाजेहवीशान मज्ञानरूप, चरित्र विचित्र भवारण्य कूप ।
प्रकृतिसातमे उपसमई क्षयतेहहोवे, तिहासापरुपपे सदानापजोवै ॥६॥

.
[ ६२ ]
दीन-दोन दुखिया मैं जगमें अड़चन होती है पगपग में ।
दूर
करो सम्भालो स्नामो करुणा के अवतार ॥
पापी हूँ पण सेनक थारो चरणशरण लोनो सुखकारो।
मत मुझ को बिसारो स्वामी करुणा के अवतारः ।।
श्री कीर्तिपूज्य उड़ीके थाणे दर्शन देदो अब तो म्हाने ।
खोलो मुक्ति को दरवार स्वामी करुणा के अवतार ॥
महावीर वीर मुझको जल्दी बनाइयेगा, हे आठ कर्म दुश्मन उनको भगाइयेगा ।
हे रतन का खजाना इस आत्म भूमिका में, मुझको ये लूटते हैं स्वामी बचाइयेगा।
कीर्ति पूज्य मुक्ति गामी जिन वीतराग सुनलो, मैं दास हूँ तुम्हारा स्वामी बचाइयेगा।

- ६३ ] ॥सातवीं पूजा॥ सक्षम पद श्री ज्ञाननों, सिद्ध चक्र तप माह । आराधी जे शुभ मर्ने, दिन दिन अधिक उछाह ।। अन्नाण समोह तमो हरस्स, नमो नमो नाण दिवायरस्स। पंचप्प यारस्सु वगारगरस सचाण समत्य पयासगास ॥१॥ होरे जेहथो सर्च अज्ञानरोधो, जिनाधोयर प्रोक्त अर्थावपोषो । मतिआदि पञ्च प्रकारप्रसिद्धो, जगासने सर्वदेवा विरुद्धो ॥२॥ यदीय प्रभाचे सुभक्ष अभक्ष, सुपेयं अपेयं सुकृत्य अकृत्यं । जिणे जाणिये लोकमध्ये सुनाणं, सदा मे विशुद्ध तदेव प्रमाण ॥३॥ होईजेहथी ज्ञान शुद्विप्रयोयें, यथावर्णनासे विचित्रा विबोधे । तिणे जाणिये वस्तुण्ड् द्रव्यमाना, न हो निकथा निजेच्छास्तभावा ॥ ४ ॥ होडपच मत्यादि सुज्ञानभेदें, गुरूपास थी योग्यता तेह वेदै । बलिज्ञेय्हैया उपादेय रूपै, लहें चित्त मा जेम ध्यानेनदोपै ॥ ५॥ .

ढाल-
स्वपरप्रकाशक
+
त्रोटक-
1
3
ढालन
[ ६४ ]
भव्य नमो गुण ज्ञाननें,
भावेजी।
पर्याय धर्म अनन्तता, भेदाभेद स्वभावेंजी भ० ॥१॥
जेमोक्षपरणति सकल ज्ञायक, बोधवास विलासता!
मति आदि पंचप्रकारनिर्मल, सिद्धसाधन लंछना।
स्याद्वादसंगी तत्वरंगी, प्रथम भेद अभेदता।
सविकल्पने अविकल्प वस्तु, सकल संशय छेदता ॥२॥
भक्ष अभक्ष न जे विन लहिये, पेयअपेय विचार।
कृत्य अकृत्य न जे विन लहिये ज्ञान ते सकल आधार रे भ० ॥ १ ॥
प्रथम ज्ञान ने पीछे अहिंसा, श्री सिद्धांतेभाख्यु।
ज्ञानने वंदो ज्ञान म निदो, ज्ञानीये शिवसुख चाख्यु रेभ०॥२॥
सकल क्रियानो मूलजेश्रद्धा, तेहनूं मूल जे कहिये ।
तेहज्ञान नितनित बंदीजे, ते विण कहो किम रहिये रेभ०॥३॥
पांचज्ञान मांहे जेह सदागम, स्वपर प्रकाशक तेह ।
दीपक पर त्रिभुवन उपकारी, वलिजिम रविशशि मेह रे भ०॥ ४॥

[६५ ] लोक उरघ अध तिर्यग ज्योतिष, वैमानीक ने सिद्वि । लोक अलोक प्रगट सब जैथी, ते ज्ञाने मुझ शुद्धि रे भ०॥५॥ शानावरणी जे कर्म छ, क्षय उपशम तमु थायरे। तो होय पहिज प्रातमा, ज्ञान अवोधता जाय रे वी० ॥५॥ ॐ ही परमपरमात्मने अनन्तानन्तज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिचारणाय श्रीमसिद्ध चनाय पचामृत, घटन, पुष्प, धूप, दीप अक्षत, नैवेदा , फल, वस्त्र, वास यजामहे स्वाहा । ॐ स्तवन प्रसु पूजा है प्यारी भव पार उतारी करो शास्त्र अनुसारी। ( मेरे प्यारे सुजान ) मनोती सुजान “प्रभु पूजा बनाओ। पूजन शिव पाओ करो पूजा भगवान धरो सुमती का ध्यान, होय आतम कल्याण प्रभु ।। - मेरे जान।

[ ६६ ] ॥ प्रात्री पूजा॥ - - । छंद- - अष्टम पद चारित्र नों, पूजो धरी उमेद । पूजत अनुभव रस मिले, पातिक होय उछेद ॥ आराहिया खंडिअ सक्कियस्स, नमो नमो संयम वीरियस्स । समावणा संग विवट्टियस्स, निव्वाण दाणाइ समुज्झयस्स ॥१॥ फजै जेह संपूर्ण थी तत्तकालं, सुणाणंपि सर्वात्मभावे विशालं । जिणें आदिरयो जे प्रयत्ने करीने, दियो लोकनें जे अनुग्रह धरी ने ॥२॥ होवेजेहथीं रंकलोकोपि पूज्यो, गुण श्रेणि दीपतो जेम् सूर्यो । स्वकीये सुभेदै करी जे विचित्रं, जयो ते सदा लोक मध्ये चरित्रं ॥ ३ ॥ बली ज्ञान फल ते धरिये सुरंगें, निरासंसता द्वार रोधै प्रसंगे। भवांबोधि संतारणे यान तुल्यं धरू तेह चारित्र अप्राप्त मूल्यं ॥ ४ ॥ होइं जास महिमा थकी रंक राजा, वली द्वादशांगी भणी होइ ताजा। वली पापरूपोपि निःपाप थाये, थई सिद्ध ते कर्म ने पार जावे ॥५॥ -- . . ढोल- नोटक- [ ६७ ] पारिन गुण वलि बलि नमो, तत्व रमण जसु मूलो जी। पर रमणीय पणो दले, सकल सिद्विअनुकूलोजी ।। प्रतिकूल श्राश्रम त्याग सयम तर थिरता दमे मयी। शुधि परम खंती मुनींद सपढ पञ्च सर उपचयी। सामायिकादिक भेद धर्मे - ययाख्याते पूर्णता । अफपाय अकुलुप अमल उज्जवल काम करमल चूर्णता ॥ १ ॥ देश विरत ने सर्व विरतजे, गृही यती ने अमिराम । ते चारित्र जगत जयवन्तो, कीजे तास प्रणाम रे भ० ॥१॥ तृण पर जे पट् संड सुस छडी, चक्रवर्तिगण वरिऊ । -ते चारित अखय सुख कारण, ते मैं मनमाहि धरिऊ रे भ० ॥२॥ हुषा रॉक पण जेह प्रादरि, पूजित इन्द नरिन्द । अशरण शरण चरण ते दु, रिंऊ ज्ञान आनन्द रेम० ॥३॥ वारमास पर्याये जेहनें, अनुत्तर सुस अतिक्रमिये । शुक्ल मुकल अभिजात्य ते उपर, ते चारित्रने नमिये रे भ०॥४॥ ढाल- गल- [ ६८ ] चैते आठ कर्मनो संचय, संचय, रिक्त करै जे तेह । चारित्र नाम निरुक्ते भाल्यू, ते बंदू गुणगेह रे भ० ॥५॥.. जाणी चारित्र ते आतमा। निज स्वभावमांहि रमतोरे । लेश्या शुद्धअलंकर्यो, मोह बने नवि भमतो रे बीर० ॥ १३ ।। ॐ ह्रीं परमात्मने आनन्तानन्तज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमत्सिद्धचकाय ञ्चामृतं, चंदन, पुष्प, धूपं, दीपं, अक्षतं, नैवेद्य, फलं, वस्त्र, वासं यजामहे स्वाहा । ॐ स्तवन तूं ही है स्वामी आधार। निपट कपट मोहे राज महाराज मुझे देवत दुख अपार तूं हो है स्वामी मेरे प्राणाधार । कर्म लूटेरे लूटत मुझको फिर रहे संसार । तूंही है स्वामी . मेरे • प्राणाधार । हारा हूँ कीर्ति पूज्य प्रभु मुझे मुक्ति पद सार। मेरे प्राण .

[६] ॥नवी प.जा॥ करम काट प्रति जालवा, परतिस अगनि समान। ते नवपद पूजो सदा, निर्मल घरियै ध्यान || कम्मदुमोन्मूलन कुतररस, नमो नमो तिन तवोयरस्स। अणेग लद्धीण निरवणस्स, दुस्सम अत्याणय साहणस्स ॥१॥ श्य नवपय मिद्वि लद्धि विनासमीद्ध, पयडिय सरवग ह्रीं तिरेहासमग्ग। दिसिस्य मुरसार गोणि पोढारयार तिनय विजय चक मिद्व चक्क नमामि ।।२।। त्रिफालक पणे कर्म कपाय टालें, निकाचित पणे वाधिया तेहवाले। फ्यो तेह तप पाहा अभ्यतर दुभेदे, क्षमा युक्ति निर्हेत दुर्ध्यान छेदै ॥३॥ होई जास महिमायकी लन्यसिद्वि, आवाछक पणे कर्म आचरण शुद्धि। तपो तेह तपजे महानंद हेते, होइ सिद्धि सोमतनी निज सकेते ॥ ४ ॥ इम नवपद व्यावै,परम आनद पावै,नव भव शिव जावे,देवनर भवज पावै। ज्ञानविमल गुणगावै सिद्धचक्रप्रभा,सवदुरति समा विश्व जयकार पावै ॥शा . । [ ७० ] ढाल- . त्रोटक- - ढाल- इच्छारोधन तप नमो, बाह्य अभ्यंतर भेदेजी। आतम सत्ता एकत्वता, परपरणित उछेदेजी ॥ उच्छेदकर्म अनादि संतति, जेह सिद्ध पणो वरें। शुभयोगसंग आहारटाली, भाव अकृयता करें। अन्तर महूरत तत्वसाधै सर्व सम्बरता करी । निज आत्म सत्ता प्रकटभावे, करो तपगुण आदरी ।। १ ।। इम नवपद गुण मंडलं, चनिक्षेप प्रमाणंजी। सात नये जे आदरें सम्यग जाने जाणे जी । निरधार सेती गुणें गुणनो करें जे बहु मान ए। जसुकरण ईहा तत्व रमणे थायं निर्मल ध्यान ए। इम शुद्ध सता भलों चेतन सकल सिही 'अनुसरें। अक्षय अनन्त-महन्त चिदधन परम आनन्दता बरें ॥१॥ इम सयल मुखकर गुण पुरन्दर सिद्धचक्र पदावली। सविलब्धि विजा सिद्धि मंदिर भविक पजो मनरली । त्रोटक - कलश-

.
[ ७१ ]
समार पर श्री गत मागर मारा धर्म सुराजता ।
गुरदीपचन्द सुचरण सेवक देवचन्द मु शोभता 100
जाणता ग्रिजमाने मयुत, ते भय मुगति लिनन्द ।
जेह प्रादरें गर्म स्पेवा, ते तर सुरता बंदरे भ० ॥१}}
पर्म नियाचिन पण पर जा, अमा मदित परता।
ते तप नमिये तेह दीपायें, जिन शासन उजरता रे भ० ॥ २ ॥
श्रामोसही पमुहा ऊ लद्वी, होई जास प्रभावें।
अष्ट महानिधि नव निधि प्रगट, नमिये ते तप मारे भ० ॥३॥
फन शिव सुप मोटू सुर परवर, सपति जेहनु ल।
ते तप सुरतर सरितो ब९, सम गफग्न अमूल रे भ० ॥४॥
सर्व मगल माहें पहलो मगल, परणपियो जे थे।
ते तप पर निहु काते मिये, घर सहार शिव पथेरे म०॥५॥
इम नवपद पुणतो तिहा लीनो, हुवो तनमय श्रीपाल ।
मुजस विलासे चोथे संडे, एह इग्यारमी ढाल रेभ० ॥६॥

ढोल- - [ ७२ ] इच्छारोधन संबरी, परणित समता योगे रे । तप ते एहिज आतमा, वरतें निज गुण भोगे रे । वी० १ ॥ आगम नोआगमतणो, भाव ते जाणो साचो रे। आतम भावे थिर हुओ, पर भावे मत राचो रे।। वी०२॥ अष्ट सकल समृद्धिनी, घटमाहें रिद्ध दाखी रे। तिम नवपद रिद्ध जाणज्यो, आतमराम , साग्वी रे॥ वी० ३ ।। योग असंख्य जें जिन कया नवपद मुख्य ते जाणेरे। एह तणे अवलंब ने, पातम ध्यान प्रमाणे रे।। वी०४॥ ढाल बारमी एहवी, चौथे खंडे पूरी रे । वाणी वाचक जस तणी, कोडय न रही अधूरी रे॥ वी०५॥ ॐ ह्रीं परमात्मने अननन्तज्ञानशक्तये, जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमत्सिद्धचकाय पंचा. मृत, चन्दनं, पुष्प, धूपं, अक्षतं, नैवेद्यं, फल, वस्त्र, वासं यजामहे स्वाहा । ६ स्तवन नवपद की सेवा क्यों न वरे ||१०॥ नवपद पूजा शिवसुख पावे, ध्यान धर्यो दुख सब टलेरे || न० १ ।। आंबिल को क्रिया तुम करके त्रिधि गुरु मुखसे चित लहेरे ॥ न० २॥ .

[ ७३ 11 नवपद महिमा उत्तम दासी, श्रीपाल चरित्र में महिमा वडीरे। न० ३॥ साढ़े चार बरस तप कोरिया, उद्यापन मन रंग रली रे ।। न० ४ ॥ श्रीअक्षयराज सूरी की कृपा से, अजय अमर पद सुख घरे रे।। न० ५ ॥ ॥ अथ नवपदजी की आरती ॥ जय जय जग जन वाछित पूरण सुरता अभिरामी। पातम रूप विमल कर तारक अनुभव परिणामी ज० ॥१॥ जय जय जग सारा, भविजन आधारा । प्रारति पार उतारा, सिद्ध चक्र सुस कारा जा ॥ जग नायक जग गुरु निणचन्दा, भज श्री भगवन्ता आतमराम रमा सुस भागी सिद्धा जयवन्ता ॥३॥ पश्चाचार दिये प्राचारज युगवर गुण धारी, धारक वाचक सूत्र अरथना पाठक भव तारी ॥४॥ समदम रूप सकल गुण धारक, मोटा मुनि राया। दरसण नाण मदा जय फारक सक्षम तप गाया॥ नवपद सार परम गुरु भाप, सिद्वयक जयकारी। इह भर पर भव रिधि सिधि दायक भव सायरवारी।६ कर जोडी सेवक जस गावे मन वाछित पावे। श्री जिन चन्ट चरण परि पजक शिव कमला पावे ॥७॥ ॥ इति नवपद भारती सम्पर्ण ॥ , -- [ ७६ ] ॥वित्तीय विलेपन पूजा। ॥ राग रामगिरी॥ गान लूहे जिन मनरंगसुं हो देवा । गा० । सखर सुधूपित वाससु हारे देवा वाससुं। गंधक सायसुं मेलिये, नंदन चंदन चंद मेलिये रे देवा ॥ नं० ॥१॥ माहे मृगमद कुंकम भेलीये, कर लीये रयणपिंगाणी कनोलीये ॥२॥ पग जानु कर बंधे सिरे रे देवा, भाल कंठ उर उदरंतरे। दुख हरे हारे देवा सुख करे, तिलक नवे अंग कीजिये ॥३॥ दूजी पूजा अनुसरे श्रावक, हरि विरचे जिम सुरगिरे। तिम करे करे जिणपर रंजीये ॥४॥ || राग ललित॥ करहुँ विलेपन सुखसदन, श्रीजिनचंद शरीर । तिलक नवे अंग पूजतां, लहे. भवोदधि तीर । मिटे ताप तसु देहको, परम शिशिरता संग । चित्त खेद सवि उपरामे, मुख में सगरसी रंग ।। मन [s] ॥राग पिलावल ।। रिलेपन कीजे श्री जिपर अगे, जिनवर अग सुगंधे। युसुम चंदन मृगमद यक्षाईम, अगरमिश्रित मनरगे । वि०॥१॥ पग नानू फर मधे सिर, भालकंठ उर उदरं तर सगे। विलुपति अप मेरो करत विलेपन, तपत बुझति निम अगे। वि000॥ नवरंग नव नय तिलक करत ही, मिलत नवे निधि चगे। कहे साधु तनु शुचि करो, मुललित पूजा जैसे गंगतरगे । वि० ॥३ [ .७८ ] ॥तृतीय वस्त्रयुगल पूजा ।। वसनयुगल उज्वल विमल, आरोपे जिण अंग। लाभ ज्ञान दर्शन लहे, पूजा तृतीय प्रसंग ॥ ॥राग गोडी॥ कमल कोमलघनं, चंदनं चर्चितं, सुगंधगंधे अधिवासिया ए हां रे अइ०। कनकमंडित हये, लालपल्लव शुचि वसनजुग कत अतिवासिया ए॥१॥ जिनप उत्तम अंगे, सुविधि शक्रो यथा, करिय पहिरावणी ढोइये ए हां रे । पाप लुहण अंग लूहणु देवने, वस्त्रयुग पूज मल धोइये ए हां रे अ० ॥ २ ॥ ॥ राग वैराडी॥ देवदुष्य जुग पूजो बन्यो हे जगतगुरु, देव दुख हर अब इतनो मागुं। तुहिज सव ही हित तुहिज मुगतिदाता, तिण नमि नमि प्रभुजीके चरणे लागुं॥१॥ कहे साधु त्रीजी पूजा केवल दसण नाण, देवदुष्य मिश देहुं उत्तम वागुं। श्रवण अंजली पुट सुगुण अमृत पीतां, सविराडि दुख संशय धुरम भांगु दे० ॥२॥ प -

[ ]
॥ चतुर्थ वासचंपपूजा ।।
पूज चतुर्थी इण परे, सुमति पधारे वास ।
कुमति कुगति दूरे हरे, दहे मोह दल पास ॥
| राग सारग ॥
हाहो रे देवा गवा चदन घसि कुमकुमा चरण विधि विरचे वासु ए हा ।।
कुमुम चरण चदन मृगमदा, कफोल तणो अधिवासु एहा ॥१॥
पास दशोदिशि वासती, पूजे जिन अग उवगु ए । हा०॥
लाछि भुवन अधिवामिया, अनुगामी की मरम अमंगु ए॥२॥
॥राग गौडी तथा पर्छ।
मेरे प्रभुजीकी पूजा प्राणंद मेले, । मे०।
वास भुवन मोगो सर लोए, संपदा भेले की पूजा० ॥ १ ॥
सतर प्रभारी पूजा, विजय देवा तत्ता येई।
गुण तोरा चरण सेना की पूजा० ॥२॥
कुतुम चदनयासे, पूनीचे जिनराज तत्ताथेई ।
चतुर्गति दुस गौरी चतुर्थी धनकी पूजा० ॥३॥

भ 4 [८०] । ॥पंचम पुष्पारोहण पूजा। मन विकसे तिम विकसतां, पुष्प अनेक प्रकार । प्रभुपूजा ए पंचमी, पंचमि गति दातार ॥ । राग कामोद ॥ पाडल चंपक केतकी हां रे अ० ए, कुंद किरण मचकुंद्र। सोवन जाइ जूईका, विउलसिरी अरविंद ॥१॥ जिनवर चरण उवरि धरे ए हां रे अ०, मुकुलित कुसुम अनेक । शिव रमणी से वर वरे, विधि जिन पूज विवेक ॥ २ ॥ ॥ राग कानडो॥ सोहेरी माई वरणे मन मोहेरी माई वरणे, विविध कुसुम जिनचरणे ॥ सो०॥ विकसी हसी जंपे साहिवकु, राखि प्रभु हम सरणे ॥ सो० १॥ पंचमि पूज कुसुम मुकुलित की, पंचविपय दुख हरणे ॥ सो० ॥ कहे साधुकीरति भगति भगवंतकी, भविक नरा सुखकरणे ॥ सो० २ ॥ - - [१] दाठी मालासोल पूजा॥ छठी पूजा ए छतो, महासुरभि पुफमाल । गुण गूथी थापे गले, जेम टले दुखजाल । ॥ राग रामगिरी गुर्जरी॥ हे पाग पुन्नाग मदार नव मालिका, हे मल्लिकासोग पारधि क्ली ए। हे मक दमक बकुल तिलक वासतिका, हे लाल गुल्लाल पाडल मिली ए ॥ १॥ हे जामुमणि मोगरा येउला मालती ए, हे एच वरणे गुथी मालती ए। हे माल जिन कंक पीठ ठवी लहलहे, हे जाण सताप सहु टालती ए॥२॥ - ।। राग आशावरी।। देखी दामा ठनिन अधिक ए पति नदे, चकोरकु देसि देसि जिम चदे ।। दे०१॥ पचविध चरण रची कुसुमाकी जेसी रयणावलि सुहमदे ।। दे०२ ॥ छठी रे तोडर पूजा तव इर धूजै, सब अरिजन हुइ हुइ तिम छन्दे ॥ दे० ३॥ कहे साधुकीरति सक्ल श्राशा सुस, भविक भगत जे जिण वदे ।। दे०४॥

[ २ ] . ॥ सप्तम वर्ण पूजा ॥ केतकि चंपक केवड़ा, शोमे तेम सुगात । चाढो जिम चढतां हुवे, सातमिये सुखसात ॥ ॥ राग केदारो गोडी॥ कुंकुम चर्चित विविध पंच वरणक, कुसुममु ए ॥ हारे अ०॥ कुंद गुल्ला लशु' चंपको दमणको, जासुसुए।॥ १ ॥ सातमी पूजमें अंगिए अंग आलंगिये ए। अंगि आलंग मिश मानवी, मुगति प्रालिंगिये ए॥२॥ ।। राग भैरवी ॥ पंच वरणी अंगी रचि, सुकुमनी जाती। फूलन की जाती ॥ ५० ॥ कुंद मचकुंद गुलाव शिरोमणी, कर करणी सोवन जाती॥ पं०॥ दमणक महक पाडल अरविंदो, अंस जूई बेउल वाती ॥पं० १॥ पारधि चरण कल्हार मंदारो, विण पटकूल बनी भांती ॥ पं०॥ सुर नर किन्नर रमणी गाती, भैरवी कुगति व्रतती दाती ॥ पं० २॥

[ ८३ ]
|| अष्टम गधवटी पूजा ॥
॥ दोहा सोरठ रागमा ॥
सोरठ राग सुहामणी, मुसेन मेली जाय । ज्यु ज्यु रात गलतिया, त्युत्यु मीठी थाय ॥ १ ॥
सोरठ धारा देश मा, गढा डो गिरनार । पित्त उठ यादव पादस्या, स्वामी नेम कुमार ॥२॥
जो हूती चपी विरस, वा 'गिरनार पहार । फूलन हार गुथावती, चढती नेम कुमार ॥३॥
राजमती गिरवर चढी, उभी कर पुकार ! स्वामी अवहु न बाहुडे, मो मन प्राण अधार ॥४॥
रे ससारी प्राणिया, चढ्यो न गढ गिरनार । गगा न्हाये न गोमती, गयो जमारो हार ॥५॥
धन वा राणी राजेमती, धन वे नेम कुमार । शील सयमता दरी, पोहता भव जल पार ॥६॥
दया गुणा की वेलडी, दया गुणा को सान । अनन्त जीव मुगते गया, दया तणे परमाण ॥ ७॥
जग मे तीरथ दोय वडा, शनुजय गिरनार । इण गिरऋपभ समोसरे, उणगिरनेम कुमार ॥८॥
अगर सेल्हारस सार, सुमति पूजा आठमी।
गधवटी धनसार लावो जिन तनु भावशुं ॥१॥

[ ८४ ] ॥राग सोरठी॥ कुद किरण शशि ऊजलो जी देवा, पावन घन घनसारो जी। . आछो सुरभि शिखर मृग नाभिनो जी देवा, चुन्नरोहण अधिकारो जी |आ० १॥ वस्तु सुगंध जब मोरियो जी देवा, अशुभ करम चूरी जै जी॥ आ० ॥ आंगण सुरतरु मोरियोजी देवा, तव कुमति जन खीजै जी। ( पाठांतरे) सुमती रीम जी ॥२॥ तब जन ॥ राग सामेरी॥ पूजोरी माई जिनवर अंग सुगंधै। गंधवटी घनसार उदारे, गोत्र तीर्थंकर बांधै ॥ पू० १ ।। आठमी पूजा अगर सेल्हारस लावे जिन तनु रागै। धार कपूर भाव धन वरपत, सामेरी मति जागे ॥ १०२॥ - [५] || नरमी धज पूजा ।। मोहन ध्वज घर मस्तके, सहब गीत समूल । दीजै तीन प्रदक्षिणा, नवमी पूज अमूल ।। ॥ राग मेघ गोडी वस्तु छद ॥ सहस जोयण सहस जोयण हेममय दड, युतपताक पाचे वरण घुम घुमत घूधरी वाजे । मृदु समीर लहके गयण जाण कुमति दल संयल भाजे । सुरपति जिम निरचे धजा ए, नवमी पूज सुरग । तिण पर श्रावक ध्वज वहन, आप दान अभंग ॥१॥ ॥राग नट्टनारायण ॥ जिनराजको धज मोहना, धज मोहना रे ध्वज मोहना । जि०॥.. मोहन सुगुरु अधिवासियो, करि पच सनद त्रिप्रदक्षिणा । शिरसोहणा |जि०१॥ माति वसन पाच वरण बन्यो री, विध करि ध्वजको रोहणा। साधु भणत नवमी पूजा नव पाप नियाणा सोहणा ॥ शिव मदिर कु अधिरोहणा, जन मोह्यो नट्टनारायणा ॥जि०२॥ सघव वधू , [ ८६ ] ॥ दशमी आभरण पूजा ॥ । , ॥राग केदारा दोहा॥ दशमी पूजा आभरण, रचना यथा अनेक । सुरपति जिम अंगेरचे, तिम श्रावक सुविवेक । शिर सोहे जिनवर तणे, रयण मुकुट झलकत । तिलक भाल अंगद भुना, श्रवण कुडल अतिकंत ।। ॥ राग अधरास वा गुंडमल्हार ॥ पांच पिरोजा नीलू लसणीया, मोती माणक लाल रसणीया, हीरा सोहे रे, मन मोहे रे। धुनी चुनी पुलक करकेताना, जातरूप सुभग अंक अंजना, मन मोहै रे ॥१॥ मौलि मुकुट रयणे जड्यो, काने कुडल हारे अति जुगते जुड्यो, उरहारू रे मनवारू रे ॥ २ ॥ भाल तिलक बांहे अंगदा, आभरण दशमी पूजा मुदा, सुखकारू रे, दुखहारू रे ॥३॥ ॥ राग केदारो॥ प्रभु शिर सोहै, मुकुट मणि रयणे जड्यो। अंगद वांह तिलक भालस्थल, यहु नीको कोन घडयो प्र०॥१॥ श्रवण कुंडल शशि तरणि मंडल जीपे, सुरतम्सम अलंकर्यो। दुखके दार चमर सिंहासण, छत्र शिर उवरि धरन्यो, अलंकृत उचित वरन्यो ।। २ ।। .

[७ ]
I
-
॥ एकादश फूलघर पूना ॥
फूलघरो अति शोभतो, दे लहके फूल ।
महकै परिमल महमदा, ग्यारमी पूज अमूल ।।
}} राग रामगिरी कातकिया ।।
कोज अंकोल रायवेलि नर मालिका, कुद मचकुद वर विचिकलू हारे अइ० वि० ए।
तिलक टमणक दुलं मोगरा परिमल, कोमल पारधि पाडलू हा रे अ० पा० ए॥१॥
प्रमुस कुसुमे रचे विभुगा स्चै, कुसुम गेह विच तोरण, हा रे अ० तो०ए।
गुन्छ चद्रोदय मुनका उन्नय, जालिका गोग्य चित चोरणं हा रे श्री चो० ए ॥२॥
" राग रामगिरी॥
मेरो, मन मोयो माईरी, फलघर श्राणद मिले।
असत उसत दाम वघारी मनोहर, देखत तनही सब दुरित खिले । फूः ॥१॥
कुसुम मडित थमगुच्छ चन्द्रोदय, कोरणि चार विनाण सम ।
इग्यारमी पज भणीहे रामगिरी विवुध विमाण जसे तिपुरि भजै । फू० ॥ २ ॥

। [ ८८ ] . ।। द्वादश पुष्पवर्षा पूजा ॥ वरण बारमो पूजमें, कुसुम बादलिया फूल । हरण ताप दुख लोकको, जानु समा बहु मूल ।। (राग भीममल्हार गुंडमिश्र, देशी कड़खानी) मेघ बरसै भरी, पुप्फ वादल करी, जानु परिमाण करि कुसुम पगरं । पंच वरणे वन्यो, विकच अनुक्रम चण्यो, अधोवते नही पीड पसरं ।। मे० ॥ १ ॥ वास महके मिले, भमर भमरी भिले, मरस रसरंग तिण दुख निवारी । जिनप आगे कर, सुरप जिम सुन्य वरे, बारमी पूज तिण पर अगारी । मे ॥२॥ ॥राग भीम मलार॥ पुप्फ बादलीया बरसे ॥ अहो पु०॥ योजन अशुचिहर बरसे गंधोदक, मनोहर जानु समा । पु०॥१॥ गमन आगमन की पीर नहीं तसु, इह जिनको अतिशय मुगुण। गुंजत गुंजत मधुकर इम पभणे, गधुर वचन जिन गुण थुणे पु० ॥ २ ॥ कुसुम सुपरि सेवा जो करे, तसु पीर नहीं सुमणे । समवसरण पंचवरण अधोवृत, विबुध रचे सुमना सुसमा पु० ॥ ३ ॥ बारमी पज भविक निम करे, कुसुम विकसी हसी उमरे। तमु भीम बंधण अहरा हुवे, जे करे जै जै जिन नमा गु० ॥४॥ सुसमां

! "
॥ त्रयोदशाष्टमागलिक पूजा ॥
तेरमो पूजा अवसरे, मगल अष्ट विधान।
युगति रचे सुमते सहो, परमानन्द निधान ।।
राग वसन्त।
अतुल विमल मिल्या, अग्पड गुणे भित्या मालि रजत तणा तंदुला ए।
श्लपण समानक, पचविध वर्णक, चन्द्रकिरण जेसा उनला ए॥ १॥
मेलि मगल लिसे, सयल मगल अखे, जिनप आगे मुथानक घरे ए ।
तेरमी पूजविधि, तेरमी मन मेरे, अष्टमगल अष्टसिद्धि करे ए ॥२॥
॥ राग कल्याण ॥
हाहो पूजा वणी तेरी
मे।
अष्ट मगल लिखे, कुशल निधान है, तेज तरणके रममे । हा०॥१॥
दप्पण भद्रासण नंद्यावर्त पूर्णकुंभ, मन्छयुग श्रीवच्छ तसुमे ।
वर्धमान स्वस्तिक पूजमगलफी, आनद कल्याण सुखरसमे ॥ हा० ॥२॥

*
-
पंचे पूर।
घनसार॥
[१०]
॥ चतुर्दश धूप पूजा ॥
गंधवटी मृगमद अगर, सेल्हारस घनसार । धरि प्रभु आगल धूपणा, चउदमि अरचा सार ।।
[॥ राग वेलावल ॥
कृपणागर कपूर चूर, सोगंध
कुदरक सेल्हारस सार, गंववटी
गंधवटी घनसार चंदन गृगमदा रस भेलिये।
श्रीवास धूप दशांग अंबर, सुरभि बहु द्रव्य मेलिये ।।
बेमलिय दंडं कनक मंडं, धूपधाणी कर घरे।
भववृत्ति धूप करंति भोग, रोग सोग अशुभ हरै ॥ १ ॥
॥ राग मानवी गोडी॥
सब अति मथनमुदार धूपं, करति गंध रसाल रे ॥ देवा, कर० ॥
धाम धूमावलीय धूसर, कलुप पानिक गाल रे ।। देवा, स० ॥ १ ॥
ऊर्ध्वगति सूचंत भविक, गधमधे करनाल रे॥ दे ॥
चौदमी वामांग पूजा, दीये रयण विशाल रे।
आरती मंगल माल रे, मालवी गौडी ताल रे ।। दे० स० ॥२॥

-
--
।। पचदश गीत पूजा ॥
कंठ भले आलाप करि, गायो जिनगुण गीत।
भावो अधिकी भागना, पनरमी पूजा प्रीत ।।
॥ श्री रागे आर्यावृतं ॥
यद्वदनतकेवल मनत फल मम्ति जैनगुणगान ।
गुणवर्णनादवाये, र्मानाभापालयेर्युक्त ॥१॥
सप्त सरसगीते स्थानैर्जयतादि तालकरणैश्च ।।
चचुरचारी चार, गीत गान सुपीयूपं ।। २ ।।
।। श्री राग॥
जिनगुण गान श्रुत अमृत, तार मद्रादि अनाहत तान ।
केवल निम तिम
अमृत ॥ नि० ॥२॥
विध कुमार कुमरी बालापे, मुरज उपाग नाद जनित ।
पाठ प्रबंध धुमाप्रतिमान, आयति च्छद सुरति सुमित ॥ २॥
शब्दसमान सन्यो त्रिभुवनकु, सुर नर गावे जिन चरित।
सप्तस्वर मान शिवश्री गीतं, पनरमी पूजा हरे दुरित ॥ जि० ॥३॥

[ २ ]
|| पोडस नृत्य पूजा ।।
कर जोडी नाटक करे, सनि सुन्दर सिणगार।
भव नाटक ते नवि भमे, सोलमो पूजा सार ।।
|| राग शुद्ध नह॥
काय । शलनितीनिन वृत्तं ।।
मावा दिपवणा सुचारू चरणा, पुन नंदानना,
सपिम्मासम व बेस क्यसी, मत्तम मत्सम्या ।
लावएमा सगुगा
पिकास रखई, रागाइ आलारथा,
कुम्मारी कुमरावि जैनपुरओ, ननति सिंगारया ।।

- [ ६३ ] ॥गद्य। .... तएणं ते अठमयं कुमार कुमरीओ सूरियामेण देवेणं संदिट्ठा। रंग मडचे पविट्ठा निणं नमता गायता वायता नव्चति ।। ॥ रागनट्ट त्रिगुण॥ नाचति कुमार कुमरी, द्रागडदि तत्ता थेइय। द्रागडदि द्रागडदि थोंगनि थॉगनि मुखे तत्ता थेइय || ना० ॥ १॥ वेणु वीणा मुरज पाजे, सोलही सिणगार साजे।। तनन्न नन्नानेइय, घणण घूधरी धमके, रएफएणण णा णेइय ॥ ना० ॥२॥ कसती कंचुकी तरणी, मजरी झकार करणी। सौमति कुमरीय, हस्तकृत हावादि भावे, दटति भमरीय ।। ना० ॥ ३ ॥ सोलमी नादक पूजा, सुरीयाभे गवण सुगध तत्ता त्थेईय, जिनप भगते भविक लीणा, प्राणद तत्ता येईय ॥ना०॥४॥ कीनी।

[६४ ] . ॥ सप्तदशमी वाजिन पूजा ॥ ततधन सुपिरे आनधे, वाजिन चउविध चाय । भगति भली भगवंतनो, सतरमो ए सुखदाय ।। गाहा ॥ सुरमद्दल कंसालो, महरय मदल सुवजए पथयो । सुरनारि नंदि तूरो, पभणेइ तू नंदि जिणनाह ।। ॥ राग मधुमाधवी ॥ तू नंदिआनंदि बोलत नंदी, चरण कमल जसु जगत्रय वंदी। ज्ञान निर्मल बापत मुग्य वेदी, त्रिवलि नीले रंग अनिही प्रानंदी ।। तूं० ॥१॥ भेरी गयण वाजंती,कुमति त्यानंती प्रभु भक्ति पसाये अधिक गाजती। जैन जयणावंती, जैनशासन, जयवंत नंदंती। उदय संघ परिगरिय वदन्ती ॥ ॥२॥ सेवि भविक मधु माधी आंखें इन फेरी, भविक न फेरी पभरणती। कहे साधु सतरमी पूज वाजित्र सब, मंगल मधुर धुनिकर कहती। तूं ॥३॥ सेवे

[ ६५ ]
॥ कलश-राग धनाश्री॥
भवितु भण गुण जिनके सब दिन, तेज तरणि मुख राजै ।
कवि शतक आठ पुणत शास्तर, युय युय रंग हम छाजै॥म० ॥१॥
अणहिलपुर शातिशिव सुपदाई, नानिधि रिवि सिद्धि वाजै ।
सतर सुपूज सुनिधि श्रारफकी भणी मैं भगति हित काजै ॥ भ० ॥२॥
', श्री निनचन्द्रमरि सरतर पति, धरम वचन तसु राजै ।
सवत सोल अढार श्रावग धुरि, पचमो दिवस समाजै ॥ म० ||३||
दयाकलश गुरु अमरमाणिस्य वरे, तासु पसाये सुरिध हुइ गाजै।
कहे साधुकोरति करत जिन संस्ता, सम लीला सुख साजै ॥ भ० ॥४॥

श्री गौतम स्वामी का बड़ा रासस । asna वीर निणेसर चरण कमल कमलाकय वासो, पणमवि पणिसु सामो साल गोयम गुरु रासो । मण तण वयणे एकंद करवि निसुणहु भा भविया, जिमनिवसे तुमदेह गेह गुण गण गह गहिगा। जंबुदीव सिरि भरहखित्त खोणी तलमंडण, मगह देस सेणिय नरेस रिउदल बल खंडण । धणवर गुबर गाम नाम जिहां गुण गण सजा, विप्प वसे वसुभूइ तस्थ तसु पुहवी भजा ॥२॥ ताण पुत्त सिरहंद भूय भूवलय पसिद्रो, चादह विजा विवहरूप नारी रस लुद्धो। विनय विवेक विचार सार गुण गण मनोहर, सात हाथ सुप्रमाग देह रूवहि रंभावर ॥३। नयण वयणकर चरणजणवि पंकजल पाड़िय, तेजहि तारा चन्द सूरि आकास भमाडिय । रूवहि मयण अनंग करवि मेल्यो निरधाडिय, धीरम मेह गंभोर सिंधु चंगम चय चाडिय ॥४॥ .

, [७] पेखवि निरुतम रूल जास जण जपे किंचिय, एकाकी किलभोत्त इत्य गुणमेच्या सचिये। अहवा निचय पुन्य जम्म जिणवर इण अचिय, रमा पउमा गरि गगरतिहा, विधि वंचिय।।५।। नय बुध नय सर कविणकोय जसु आगल रहियो, पच सया गुण पारावहीडे परवरियो । करय निरन्तर यज्ञ करम मिथ्यामति मोहिय, अण चल होसे चरम नाणदंसणह रिसोहिय ।।६।। वस्तु-जबूदीव जचूदीव भरहवासम्मि खोणी तल मडण, मगह देम सेणिय नरेसर, वर गुन्धर गाम तिहा, विप्प कसे वमुइ. सु दर तसु पुहवि भज्जा, सयल गुण गण रूव निहाण, ताण पुत्त विजा निलो गोयम अति ही मुजाण ॥ ७ ॥ चरम निनेसर केरल नाणी, चौविह मघ पइट्ठा जाणी । पावापुर सामी सपत्तो, चउविह देव निकायहिं जुत्तो ।। ८ देवहि समयसरण तिहा पोजे, जिरण दोठे मिथ्यामत छोजे। त्रिभुवन गुरु सिंहासण बैठा, ततग्विण मोह दिगत पइट। क्रोध मान माया मदपूरा, जाये णाठा जिम दिन चोरा देव दुन्दुभि श्रागासे बाजी, धरम नरेसर आव्यो गाजी ।। १० ॥ भास- 1

.
.
[ १०० ]
इण अनुक्रम गणहर रयण थाप्या वीर इग्यार तो,
तो उपदेशे भुवन गुरु संयम शुं व्रत बार तो।
बहुँ उपवासे पारणो
पारणो ए आपण पे विहरंत तो
गोयम संयम जग सयल जय जयकार करत तो ॥ २२ ॥
वस्न-इन्द्रभूइ इन्द्रभूइ चढियो .बहुमान हुँकारो करि कंपतो, समवसरण पहुँतो तुरंतो।
जे संसा सामि सवे, चरम नाह फेड़े फुरंत तो । वोध बीज सज्जायमने, गोयम भवहि
विरत्त । दिक्ख लेई सिक्खा सहो, गणहर पय संपत्त ॥ २२ ॥
आज हुओ सुविहाणाजपचेलिमां पुण्य भरो, दीठा गोयमसामी जो नियनयणे अमियझरो ।
समवसरण मंझार जे जे संसा ऊपजे ए, ते ते पर उपगार कारण पूछे मुनि पवरो ॥ २३ ॥
जिहां दीजे दीख तिहां केवल उपजे ए, आप कनें अणहुंत गोयम दोजे दान इम ।
गुरु ऊपर गुरु भक्ति सामी गोयम ऊपनिय, अणचल केवल नाण रांगज राखे रंग भरे॥ २४ ॥
जोः अष्टापद सेल वंदे चढ़ चविस जिण, आतम लब्धि वसेण चरम सरीरी सोज मुनि ।
इय देसणा निसुणेइ गोयम गणहर संचरिय, तापस परसएण जो मुनि दीठो आवतो ए ॥ २५ ॥

,
[१०१ ]
तपसी सियनिय अग अह्रा सगति न ऊपजे ए, किम चढसे दृढ काय गज जिम दीसे गाजतो ए।
गिरओ ए अभिमान तापस जो मन चिन्तवे ए, तो मुनि चढियो वेग पालववि दिनकरकिरण ॥२६॥
कंचण मणिनिप्पन्न दुड कलश ध्वज वण सहिय, पेखवि परमाणद जिणहर भरतेसर महिय ।
नियनियकायप्रमाण चिहु दिसि सठियजिणहविम्य, पणमविमनउल्लासगोयमगणहरतिहा पसिय।
वयर सामिनो जीव तिर्यक् जृभक देव तिहा, प्रतियोध्या पुडरीक कुडरीक अध्ययन भणी ।
वलता गोयम सामी सवि तापस प्रतियोध करे, लेई आपण साथ चाले जिम जथाधिपति ॥ २८ ॥
सीर थाण्ड घृत प्राण अमिय यूठ अगूठ ठवे , गोयम एकण पान कराचे पारणो सके।
एचसया शुभ भाव उज्ज्वल भरियो सीर मिसे, साचा गुरु सयोग कवल ते केवल रूप हुआ ॥ २६ ॥
पच सया जिण नाह समवसरण प्राकार त्रय, पेखवि केवल उपन्नो उज्जोय कर ।
जाणे जणवि पीयूष गाजती घन मेघ जिम, जिन वाणी निसुणे वि नाणी हुआ पचसया ॥ ३० ॥
वस्तु-इण अनुक्रम इण अनुक्रम नाग पन्नरे से उप्पन्न परिवरिय, हरिदुरिय जिएनाह बदइ,
जाणेनि नग गुरु क्यण, तिहिं नाण अप्पाण निंदइ । चरम जिनेसर इम भणे, गोयम म
करिस खेव, छेह जाय आपण सही, होस्या तुल्ला वेव ॥ ३१ ॥

भास , , [ १०२] सामियो ए वीर जिणंद पूनम चंद जिम उल्लसिय विहरियो ए भरह वासंमि बरस बहत्तर संवसिय । ठवतो ए कणय पउमेण पायकमल संघे सहिय आवियो ए नयनान्द नयर पावापुर सुरमहिय ।। ३२ ।। पेखियो ए गोयमसामी देवसमा प्रतिबोध करे , आपणो ए त्रिशलादेवी नंदन पुहतो परम पए। 'वलतो ए देव आकाश पेखवि जाण्यो जिण समे तो मुनि ए मन विखवाद नाद भेद जिम ऊपनो ए ॥ ३३ ॥ इण समे ए सामिय देखि आप कनास्टालियो ए, जाण तो एतिहु अपनाह लोक विवहार न पालियो ए। अतिभलोप कीधलो सामी जाण्यो केवल मांग से ए चिन्तव्यो ए बालक जेम अहवा केडे लाग से ए॥ ३४ ॥ हूं किम ए वीर जिणन्द भगत हिं भोले भोलव्यो ए आपणो ए ऊँचलो नेह नाह न संपे साचव्यो ए। सांचो ए ए वीतराग नेह न हेजें टालियो ए तिण समे ए गोयम चित्त राग. वैरागे वालियो ए॥ ३५॥ । . . - [१३] . श्रावतो ए जो उत्लट्ट रहिनो रागे साहियो ए, केरल ए नारण उत्पन्न गोयम सहज उमाहियो ए। तिहुश्रण ए जय जयकार केरल महिमा मुर करे गणवर - कग्य पसाण भविया भर जिम निस्तरेए ॥३६॥ वस्तु-पढम गणहर पढम गणहर वरस पच्चास, गिहवासे सबसिय तीस बरस सजम विभूसिय, सिरि केवल नाण पुण, चार वरस तिहु अण नमसिय, राजगृहो नयरी उव्यो, वाणवइ 'वरसाउ, सामी गोयम गुण निलो होसे सिवपुर ठाउ ॥ ३७॥ जिम सहकारे कोयल टहुके, जिम कुमुमावन परिमल महके, जिम चदन सौगध निधि । जिम गंगाजल लहरयो लहके, जिम क्णयाचल तेजे मलके, तिम गोयम सौभाग निधि ॥ ३८ ॥ जिम मान-सरोवर निवसे हसा, जिम मुत्त तस्वइ कर्णयपतसा, जिम महुयर राजीव बने। 'जिम रयणायर रयण विलसे, जिम अवर तारागण विक्से, तिम गोयम गुरु केल घने । ३६ पूनम निसि जिम ससियर सोहे, सुर तर महिमा जिम जग माहे, पूरव दिसि जिम सहस करो। पचानन जिम गिरिवर राजे, नर वइ घर जिम मगल गाजे, तिम जिनशासन मुनि पवरो॥४०॥ भास- , t [१०४ ] जिम गुरु तरुवर सोहे शाखा, जिम उत्तम मुख मधुरी भापा, जिम वन केतकि महमहे ए। जिम भूमीपति भुयबल चमके, जिम जिन मंदिर घंटा रणके, गोयम लब्धे गह गयो ए ॥ ४१ ॥ चिन्तामणि कर चढियो आज, सुर तरु सारे वंछिय काज, काम कुभ सहुवशि हुआ ए । काम गवी पूरे मन कामी, अष्ट महा सिद्धि आवे धामी, सामी गोयम अणुसरी ए ॥ ४२ ॥ प्रणव अक्षर पहलो पभणीजे, माया वीजो श्रवण सुणीजे, श्रीमिति साभा संभवो ए। देवा धुर अरिहंत नमीजे, विनय पहू उवझाय थुणीजे, इण मंत्रे गोयम नमो ए॥ ४३ ।। पर घर वसतां काय करीजे, देश देशान्तर काय भमोजे, कवण काज आयास करो ए। प्रह उठी गोयम 'समरीजे, काज सम्मंगल ततखिण सीझे, नव निधि विलसे तिहांघरे ए॥ ४४ ॥ चवदय सय बारोत्तर बरसे, गोयम गणहर केवल दिवसे, कीयो कवित उपगार परो। आदहिं मंगल ए पभणीजे, परव महोच्छव पहलो दीजे, रुद्धि, वृद्धि कल्याण करो ॥ ४५ ॥ धन माता जिण उयरे धरियो, धन्य पिता जिण कुल अवतरियो, धन्य सुगुरु जिण दीखिो ए। विनयवंत विद्या भंडार, तसु गुण पुहवी न लभइ पार, बड़ जिम शाखा विस्तरो ए । गोयम स्वामी नो रास भणीजे, चउविह संघ रलियावत कीजे मद्धि वृद्धि कल्याण करो ॥ ४६॥ .

[१०५] कुकुम चदन छडी दिवरायो माणक मोती र चोक पुरायो, रयण सिहासन वेसणो ए। तिहा वेठो गुरु देशना देशी, भविक जीवना काज सरेसी, नित नित मगल उदय परो ।। ४७ ।। राग प्रमाती जे करे, प्रह ऊगमते सूर । भूख्या भोजन सपजे, कुरला करे कपूर ॥ १ ॥ अगूठे अमृत बसे, लब्धि तणाभंडार, जे गुरु गौतम समरिये, मन गछित दावार ॥२॥ पुडरोक गोयम पाहा, गणधर गुण सम्पन्न । प्रह उठीने प्रणमता, चरदेसे पावन ॥ ३ ॥ संविखमगुणकलिय, सुपिणिय सम्बालादिसंपएण नीरस्सपढमसोस गोयमसामी नमसामी ।। ४ ।। सर्वानिष्ट प्रणाशाय, सामिष्टार्थ दायिने । सर्नलब्धि निधानाप गौतमशामिने नमः ।।५।।

* W दादा गुरुदेव की पूजा यदि . . . '( पहले स्थापना करके नीचे लिखा आह्वान का श्लोक पढ़े) सकलगुणगरीष्ठान्सत्तपोभिर्वरिष्ठान्, शम दमयमयुष्टांचारुचारित्रनिष्ठान् । निखिल जगत पीठे दर्शितात्म प्रभावान्, मुनिपकुशल* सूरीन्स्थापयाम्यत्रपीठे ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीं श्रीजिनदत्त श्रीमणिधर जिनचन्द्र श्री जिनकुशल श्री जिनचन्द्रसूरि गुरौ अनाव- तरावतर स्वाहाः ॥ ॐ ह्रीं श्रीं श्री जिनदत्त श्री श्री मणिधर जिनचन्द्र श्री जिन कुशल श्री जिन- चन्द्रसूरिः अत्र तिष्ठः ठः ठः ठः स्वाहाः ॥ इति प्रतिष्ठापनं ।। ॐ ह्रीं श्रीं श्री जिनदत्त श्री मणिधर जिनचन्द्र श्री जिनकुशल श्री जिनचन्द्रसूरि गुरौ अत्रमम संनिहितो भववपद् ( इति संनिधि करणं)। * दत्त

1
करो सुजान
.
[ १०७ ]
॥ अथ न्हवण पूजा ।
(नात्रिया शुचि होकर जल का कलश लेकर सडा होवे)
ईश्वर जग चिन्तामणि , कर परमेष्ठी ध्यान। गणधर पद गुण वर्णना, पूजन
॥१॥
सौधर्मा मुनिपति प्रगट, वीर जिनेश्वर पाट । मिथ्या मत तम हरन से, भव्य दिखावन वाट ॥२॥
मुस्थित सुप्रतिवद्ध गुर, सूरि मत्र को जाप । कोटिकियो जब ध्यानधर, कोदिक गन्छ सुथाप ॥३॥
दश पूनी श्रुत केली, भये वज्रधर स्वाम । तादिन से गुरु गच्छ को, वन शाख भयो नाम ||४||
चन्द्रसूरि भये चन्द्रसम, अतिही बुद्वि निधान । चन्द्रकुनी सर जगत मे, पसरयो बहु विज्ञान ||
वर्तमान के पाट पद, सूरि जिनेश्वर भाम । चैत्यवासि को जीत कर, सुविहितपक्ष प्रकाश ॥६॥
अहिलपुर पाटण सभा, लोक मिले तहाँ लक्ष । सरतर विस्त सुधा निधि, दुर्लभ राज समक्ष ॥७॥
अभयदेवसूरि भये, नव अग टीका कार। यभण पारस प्रगट कर, कुष्ट मिटावन हार |
श्री जिनवल्लभसूरि गुर, रचना शास्त्र अनेक । प्रतिगोधे श्रावक बहुत, ताके पट्ट विशेष IIEI
हुरड श्रावक वागड़ी, अट्ठारे हजार । जैन दया धर्मी किये, बरते जय जय कार ॥१०॥
दादा नाम विख्यात जस, सुर नर सेवक नाम ! दत्त सूरि गुरु पूजता, आनन्द हर्ष उल्लास ॥११॥
मदनपाल दिल्लीश ने, हुक्म उठाया शीस ! मणिधारी जिनचन्द्र गुरु, पूजो विश्वा बीस ॥१२॥

[ १०८ ] ताके पट्ट परम्परा, श्री जिनकुशलसुरिद | अकवर को परचा दिया, दादा श्री जिनचन्द ॥१३॥ ऐसे दादा चार को, पूजो चित्त लगाय । जलचन्दन कुसुमादिकर, ध्वज सौगन्ध चढ़ाय ॥१४॥ (चाल-दादा चिरञ्चीवो) गुरुराज तणी कर पूजन भवि सुखकर मिलसी लच्छि घणी ॥ टेक ॥ गुरुदत्त सुरिंद जग उपकारी, गुरु सेवक ने सानिधकारी। गुरु चरण कमलनी बलिहारी, गु० ॥१॥ 'संवत इग्यारे बार शशि, बत्तीसे जनम्या शुभ दिवसी। श्रावक कुल हुम्बड ने हुलसी, गु०॥॥ जसु बाछगसा पितु नाम भणे, बाहडदे माता हर्ष घणे। इकतालीसे दीक्षा पभणे, गु० ॥३॥ गुणहतरे वल्लभ पाटधरी, गुरु माया बीजनो जाप करी । गुरु जग में प्रगट्या तरण तरी, गु० ॥४॥ मणिधारी जिनचन्द उपगारी, जिनदत्त सुरिंद के पटधारी। भये दादा दूजा सुखकारी, गु० ॥५॥ राशल पितु देल्हणदे माता, श्रीमाल गोत्र बोधन शाता | दिल्लीपति शाह सुगुण गाता, गु० ॥६॥ जसु चौथे पाट उद्योतकरी, जिनकुशलसुरिंद अति हर्प भरी। तेरे सैंतीसे जनम धरी, गु० ॥७॥ जमु जिल्ला जनक जगत्र जियो, वर जैतश्री शुभ स्वप्न लियो। छाजेहड गोत्र उद्धार कियो, गु० ॥८॥ धन सैतालीसे दीक्षा धरी, जिनचन्द सुरीश्वर पाट वरी । गुणहतरे सूरि मन्त्र जापकरी गु० ॥६॥ १. ११३२ चंद्रवार ३. १३४७ २. ११३७ [१०] सेवा में सावन वीर यरा, जोगनियों चीमठ हुक्म धरा । गुरु जग मे कई उपकार करा, गु० ॥१०॥ माणिक्सूरीश्वर पर छाजे, निनचन्द्रसूरि जग मे गाजे । भये दादा चौथा मुसकाजे, गु० ॥११॥ जिन चाँद उगायो उनियालो, अम्मारस की पूनम वालो। सब आवक मिल पूजन चालो, गु०॥१२॥ पिन अरुनर को परचा दीना, काजी की टोपी उस कीना। करी का भेद कहा वीना, गु० ॥१३॥ गंधोदकसुरभि फलश भरी, प्रक्षालन सद्गुरु चरणपरी, या पूजन कवि र द्धिसार करी, गु० ॥१४॥ श्लोक सुरनदीजलनिर्मल धारकैः, प्रबलदुष्कृत-दापनिवारकैः । सकल मङ्गलवॉच्छित दायक, कुशलसरिगुरोरचरणौयजे ॥ १ ॥ ॐ हीं श्रीं परमपुरपाय परमगुरुदेवाय भगवतेश्री जिनशासनोद्दीपकाय श्रीजिनदत्तसूरीश्वराय मणिमण्डित मालस्थल श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनाशल सूरीश्वरायं अकवर असुरगाणप्रति- वोधकाय नी जिनचन्द्रसूरीश्वराय जल निर्वपामिते स्वाहा E- - " - [६११०१] ॥ अथ केशर चन्दन पूजा ॥ केशर चंदन मृगमदा, कर धनसार मिलाप । परचा जिनदत्तसूरि का, पूज्यां छूटे पाप ॥ १॥ 7 (चाल विन वाजे की) दीन के दयाल राज सार सार तं ॥ टेर ।। आये भरुअच्छनन धाम धूम धूं । वाजते निशान ठौर, हर्प रंग हू॥१॥ मुसलमान मुगलपत, फौज मौज मू । फौत मौत हो गया, हायकार सूं ! सन्न विघ्न देख' श्राप, हुक्म दीन यूं । लाओ मेरे पास आस जीव दान'दू ॥ ३ ॥ मृतक पत मंत्र से उठाय दीन तूं । देख के अचंभ रंग दास खास • ॥ ४ ॥ करत सेव भाव पूर, तुरक राज जू । छोड़ के अभक्ष खाण, हाजरी भरू ॥५॥ बीज खीज के पड़ी, प्रतिक्रमण के मूं। हाथ से उठाय पात्र ढांक दीन ॥६॥ दामनी अमोल बोल, सिद्ध राज तूं । देॐ वरदान छोड़, बन्द कीन क्यूं ॥७॥ ܝܢ । १११ ] दत्त नाम जपत जाप, करत नाहिं च । फेर में पड़गी नाहिं छोड़ दीन ॥८॥ फरोगे निहाल आप, पाय पलक नू । राम ऋद्धि-सार दास, चरण छाँह लू ॥६॥ मलयचन्दनकेशरवारिणाः निखिननाड्य रुजातपहारिया। सकलमङ्गलगाँच्छितदायक कुशलसूरिगुरोश्चरणौयजे ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीं परमपुरपाय परम गुग्देवाय भगवतेश्रो जिनशासनोहीपकाय श्रीजिनदत्रासूरी- श्वराय मणिमण्डित भालस्थल श्री निनचन्द्रसूरीश्वराय श्री निनकुशल सूरीश्वराय अकर असुर- गाणप्रतिनोधकाय श्रीनिन चन्द्रसूरीश्वराय केशरचननिर्विपामते साहा । - - । ११२ ] ॥ अथ पुष्प पूजा ॥ चंपा चमेली मालती, मरुआ और मचकुन्द । जो चाढ़े गुरुरु रण पर, तिन घर होय आनन्द ।। (राग माड, चाल-नींद तो गई रे वादोला म्हारी) गुरु परतिक सुरतरु रूप सुगुरुसम दूजो तो नहीं । दूजो तो नहीं, म्हारा दूजो तो नहीं । गुरुपरतिखसुरतरुरूप, सुगुस्ने पजो तो सही ॥ टेर ॥ चित्तौड़ नगरी बज्र खम्भ में, विद्या पोथी रही । मन्त्र यन्त्र विद्यासे पूरी, गुर निज हाथ नहीं ॥ १ ॥ पुर उज्जयनी महाकालके, मन्दिर थम्म कही । सिद्धसेन दिनकर की पोथी, विद्या सर्व लही ।। २ ॥ उज्जयनी व्याख्यान बीच में श्राविका रूप ग्रही । जोगनियाँ छलणे कू आई, सबकू कोल दई ॥३॥ दीन होय जोगनियाँ चौसठ गुरु की दास भई । सात दिया वरदान हरप सें,पसर्या सुयश मही ॥४॥ पुष्प-माल गुरु गुण की गूंथी, चाढो चित्त चही । कहे 'राम ऋद्धिसार' सुयश की, बूंटी आप दई ॥५॥ कमल चम्पक केतकी पुष्पकै, परिमलाहृतपटपदवृन्दकैः । सकल मङ्गलगाँच्छितदायक, कुशलसरिगुरौश्चरणौयजे ॥ १ ॥ ॐ हों श्री परमपुरपायपरमगुरुदेवाय भगवते श्रीजिनशासनोद्दीपकाय,श्रीजिनदत्तसूरीश्वराय मणिमण्डित भालस्थल श्रीजिनचन्द्रसूरीश्वराय श्रीजिनकुशल सूरीश्वराय अकवर असुर त्राणप्रति- बोधकाय श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय पुष्पंनिर्विपामिते स्वाहाः।

।
११३ ]
॥ अथ धूप पूजा।
धूप पूज कर सुगुरु की, परसे परिमल पूर । यशसुगन्ध जग में बढ़े चढ़े सवाया नूर ।। १ ।।
॥राग सोरठा॥
(चाल-कुरजाने जादू डारा)
अम्विका विरद बसाने, गुरतेरो अम्बिका विग्द चखाने । तुम युगप्रधान नहीं छाने, गुरु तेरो॥टेक॥
गढ़ गिरनारसे अम्बड श्रावक, ऐसो नियम चित्त ठाने ।
युगप्रधान इस युग मे कोई, देसू जन्म प्रमाने । गु० १ ॥
कर उपवास तान दिन वीते, प्रगटी अम्बा ज्ञाने ।
प्रगट होय कर मे लिख दीना, सुवरण अक्षर दाने ॥ २ ॥
या गुण संयुत अक्षर वॉचे, ता. युगवर जाने ।
अम्बड मुलक मुलक मे फिरता, सूरि सकल पतियाने ॥ ३ ॥
पाया पास तुम्हारे सद्गुर, कर पसार दिलाने ।
वासक्षेप कर उपर डाला, चेला बाँच सुनाने ॥ ४॥

१ [ ११४ ] सर्व देव हैं दास जिन्होंके, मरुधर कल्प प्रमाने। युगप्रधान जिनदत्तसूरीश्वर, अम्बड शीश झुकाने ॥ ५॥ उद्योतनसूरीने निज हाथे, चौरासी गच्छ ठानें । वह सब तुमरी सेवा सारें, अान तुम्हारी मानै ॥ ६ ॥ भद्रबाहु स्वामी तुम कीर्तन, कीनो ग्रंथ प्रमाने । युगप्रधान प्रकीर्ण गंडिका, गणधर-पद-वृत्ति म्याने ॥ ७ ॥ जो जन तुमको भक्ति से पूजे, हों उनके मनमाने । कहे 'राम ऋद्धिसार' गुरु की पूजा धूप कराने ॥ ८ ॥ श्लोक अगरचन्दन धूपदशांगजैः, प्रशरिताखिलदिनुसुधूम्रकैः । सकलमंगलवांच्छित दायकं, कुशलसूरिगुरौचरणौयजे ।। १ ।। ॐ ह्रीं श्रीं परमपुरुपाय परमगुरुदेवाय भगवते श्रीजिनशासनोद्दीपकाय श्रीजिनदत्तसूरीश्वराय मणिमण्डित भालस्थल श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनकुशलसूरीश्वराय अकबर असुर त्राणप्रति- बोधकाय श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय धूपंनिर्विपामिते स्वाहाः ॥ ४॥ .

1 ११५ ] ॥ अथ चीप पूजा ॥ दीप पूजकर सुगुण नर, नित नित मगण होत । उजियालो जगमें जुगत, रहे असंडित जोत ।। (राग कालिगडा) पूजन कीजोजी नर नारी, गुरु महाराज का हो । टेर । मिधु देश में पच नदी पर, साधे पाचो पार । लोई ऊपर युरुप तिराये, ऐसे गुरु सधीर ॥१॥ प्रकट होय कर पाच पीर ने, सात दिये वरदान । सिंधु देश मे सरतर श्रावक, होवेगा धनवान 1॥ सिंधु देश मुलतान नगर में, बडा महोत्सव देस। अम्नड औरगन्छ का श्रावक, गुम्से कीना द्वेष । "प्रणहिलपुर पत्तन मे पात्रो, तो मै जान सन्चा। धर्मजा फहराते आवे, देखलीजियो वना ।४। पत्तन बीच पधारे दादा, डका धर्म बजाया। निर्धन अम्बड़ सन्मुस आया, अहंकार फलपाया ।। मन मे क्पट किया अवडने, खरतर महिमाधारी । जहरदिया उन अशनपानमे, गुरु विधिजानिसारी। भणसाली मुग्पवर श्रावकसे, निर्विपमु द्री मगाई । जहर उतारा तवलोगों में अम्बड निंदा पाई । मरकरव्यतर हुश्रा वो अम्वड, रजोहरणहरलीना । भनशाली व्यतरवचनों से गोत्रउतारा कीना। न होयगुरु श्रीधा लेकर, गोत्र बचाया सारा ।'ऋद्धिसार'महिमा सद्गुरु की, दीपकका उजियारा । रलोक-- । अतिसुदोप्तमयखलुदीपकैः, विमलकंचन भाजनसंस्थितैः । सकलमङ्गलयाँच्छितदायक, कुशलमरिगुरोरचरणोयजे ॥१॥ ॐ ह्रीं श्री परमपुम्पाय परमगुरुदेवाय दीपंनिर्विपामिते स्वाहा ॥५॥ -" -

.
[ ११६ ] .
॥ साथ अक्षत प जा॥
अक्षत पूजा गुरुतणी, करो महाशय रङ्ग। क्षति न होवे अंग में, पाओ सुक्ख अभङ्ग ।
(राग-आसावरी)
रतन अमोलक पायो, सुगुरू सम रतन । गुरु संकट सब हीं मिटायो॥ टेर ॥
विक्रमपुर नगरी लोकनको हैजा रोगसतायो । बहुत उपायकिया शांति का जरा फरक नहिं आयो।
योगी जंगम ब्रह्म संन्यासी, देवी देव मनायो । फरक नहीं किनही ने कीना, हाहाकार मचायो ।।
रतन चिंतामणिसरिखो साहिब, विक्रमपुर में आयो । जैन संघका कष्ट दूर कर जयजयकार करायो।
महिमा सुन माहेश्वर ब्राह्मण,सब ही शीस नमायो। जीवितदान करो महाराजा गुरु तवयों फरमायो।।
जो तुम समकित व्रत को धारो, अवही कर, उपायो ।तहत्तवचनकर रोग मिटायों, आनंदहर्ष वधायो।
जो कोई श्रावकव्रत को न धार्यो; पुत्री पुत्र चढ़ायो। साधु पाँचसौ दीक्षित कीना, साधवियाँ समुदायो।
मंत्र कला गुरुअतिशय धारी, एमो धर्म दिपायो ।'ऋद्धिसार' पर किरपा कीनी, सांचो पथ बतलायो।
श्लोक सरल तन्दुलकैरति निर्मलैः, प्रवरमौक्तिक पुञवदुज्वलैः ।
सकलमङ्गलवाँच्छितदायकं, कुशलसरिगरोवरणीयजैः ॥ १॥
ॐ ह्रीं श्रीं परमपुरुपाय परमगुरूदेवाय भगवते श्रीजिनशासनोद्दीपकाय श्री जिनदत्तसूरी-
श्वराय मणिमण्डितभालस्थल श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनकुशलसूरीश्वराय अकबर असुर.
त्राणप्रतिबोधकाय श्रीजिनचन्द्रसूरीश्वराय अक्षतं निर्विपामिते स्वाहाः ॥ ६॥

[११७ ]
॥अथ नोबूथ पूजा।
नैवेद्य पूजा सतमी, करो भविक चित चाप । गुरुगुण अगणित किम गिने, गुरुभव तारणनाव ।१।
॥ राग-कल्याण ॥
(चाल-तेरी पूजा बनी है रस मे)
हो गुर फिया असुर को वश में ॥ टेर ।
बडनगरी मे आप पधारे, सामेला धसमसमे ।
नाह्मणलोग करी पञ्चायत, मिलकर आया सुस मे ॥१॥
महिमा देस सके नहीं गुर की, भर गये वह तो गुस मे }
मृतक गऊ जिन मन्दिर आगे, रख दी सन्मुख चम मे ॥ २॥
श्रावक देय भये आकुलता, कहे गुरू से कस मे !
चिता दर फरी है सघ की, गऊ उठ चाली इस मे ।।३।।
मरी गऊ को जीती कीनी, लोग रहे सर हॅस में।
जाके गाय पड़ी रद्रालय, सघ भया सर खुश मे ॥४॥

- [ ११८ ] ब्राह्मण पाँच पड़े अव गुरू के, देख तमाशा इसमें । हुक्म उठावेंगे सिर ऊपर, तुम संतति की दिश में ॥५॥ नमस्कार है चमत्कार को, कीनी पूजा रस में। कहे 'राम ऋद्धिसार' गुरू की, आनन्द मंगल यशमें ॥६॥ बहुविधैश्वरुभिर्वटकैर्यक, प्रचुरसप्पिपिपक्वसुखजकैः । सकलमङ्गलवांच्छितदायक, कुशलसरिगुरौश्चरणौयजे ।। १ ।। - ॐ हीं श्रीं परमपुरुपाय परमगुरूदेवाय भगवते श्रीजिनशासनोद्दीपकाय श्रीजिनदत्तसरीश्व- राय मणिमण्डितभालस्थल श्रीजिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनकुशलसूरीश्वराय अकबर असुरत्राण- प्रतिबोधकाय श्रीजिनचन्द्रसूरीश्वराय नैवेद्य निर्विपामिते म्वाहाः ॥ ७ ॥ ।

[ ११६ ]
॥ अथ फल पूजा ।।
फल पूजा से फल मिले,प्रगटे न निधान । चहुँ दिश कीरत विस्तरे, पूजन करो सुजान ||१||
॥राग-ठुमरी।
(चाल-रथ चढ यदुनन्दन श्रावत है)
चलो सघ सब पूजन को, गुरुसमर्या सन्मुख आवत है ॥ टेर ॥
पानन्दपुर पट्टन को राजा, गुरू महिमा सुन पारत है।
भेजा निज प्रवान बुलाने, नृप अरदास सुनावत है ॥ १॥
लाम जान गुरू नगर पधारे, भूपत आय वधावत है।
राजकुमार को कुष्ट मिटायो, अचरज तुरत दिखावत हैं॥२॥
दस हजार कुटम्म सग नृप को, श्रावक धर्म धरावत हैं।
प्रतापगढ़ को पमार राजा, पुर मे गुरू पधरावत हैं।॥३॥
या मूल आज्ञा जिनवर की, बारह व्रत उचरावत है।
चौहान भाटी पमार ईदा, पुन राठौड़ सुहावत है ॥ ४ ॥

- [ १२० 1 शिशोदिया सोलंकी नरवर, महाजन पदवी पावत हैं। ऐसे सात राज समकितधर, खरतर संघ बनावत हैं ॥५॥ कुष्ट जलन्धर क्षयन भगन्दर, कइ एक लोक जीवावत हैं। ब्राह्मण क्षत्री अरू माहेश्वर, ओसवंश पसरावत हैं ॥६॥ तीस हजार एक लख श्रावक, खरतर संघ रचावत हैं। कहत 'राम ऋद्धिसार' गुरूकी, फल पूजा फल पावत हैं ॥ ७॥ पनस मोचसदाफलकर्कटः, सुसुखदैकिलश्रीफलचिर्भटेः। सकल मङ्गलबाँच्छितदायकं, कुशलसरिगुरौश्चरणौयजै ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीं परमपुरुपाय परमगुरूदेवाय भगवतेश्री जिनशासनोद्दीपकाय श्रीजिनदत्त सूरीश्वराय मणिमण्डितभालस्थल श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनकुशलसूरीश्वराय अकबर असुर त्राणप्रतियोधकाय श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय फलंनिर्विपामिते स्वाहाः ॥ ८ ॥ " [११] ॥ अथ वस्त्र पूजा ॥ वन इत्र गुरुपूजना, चोका चन्दन सम्पेल । दुश्मन सब सजन हुए, कर सुरंगा खेल ॥१॥ ॥ देशी (चाल-मनडो किमही न वाजे)॥ लक्ष्मी लीला पारेरे सुन्दर, ल° । जे गुरु नत्र चढावेरे सुन्दर, ल॥' सुयश अतर महकायेरे मुन्दर, ल०। दुश्मन शीस नमावेरे सुन्दर, ल० ॥टेर ।। दरिया बीच जहान श्रावक की, इवन सतरे आवे । सोचे मन सुमरे सद्गुरु को, दुस की टेर सुनावेरे सुन्दर ॥ १ ॥ पाचौँ सूरीश्वर, पॅखीरूपे थावे । जाय समुद्र मे जहाज तिरायो, फिर पीछा जव आवेरे सुन्दर ॥२॥ पूछे संघ अचरज मे भरिया, गुरु सब बात सुनावे । ऐसे दादा दत्त कुशल गुरु, परचा प्रगट दिखावेरै सुन्दर ॥३॥ बोथरा गूनरमल श्रावक को, दादा कुशल तिरावे । सुरमसूरि गुरु समयसुन्दर का, जहाज अलोप दिसावेरे ॥ ४॥ वारह सौइग्यारे दत्त सूरि, अजमेर अणसण ठावे । उपज्या सौधर्मा देवलोके, श्रीमधर फरमावे रे सुन्दर ॥५॥ व्यारन्यान -- [ १२२ ] इक अवतारी कारज सारी, मुक्ति नगर में जावे । ऐसे दादा दत्त सूरीश्वर, तारण तरण कहावे रे सुन्दर ॥ ६ ॥ मणिधारी दिल्ली में पूज्यां, संकट सपने न आवे । रथी उठी नहीं देख नरेश्वर, वॉही चरण पधरावेरे सुन्दर ॥ ७ ॥ कुशलसूरी देराउर नगरे, भुवनपति सुरथावे । फागुन बदि अम्मावस सीधा, पूनम दरश दिखावेरे सुन्दर ॥ ८ ॥ जल चन्दन फल फूल मनोहर, आठों द्रव्य चढाये। वस्त्र इतर पूजा सद्गुरू की, 'ऋद्धि सार' मन भावे रे सुन्दर ।। ६ । श्लोक अखिल होर शुचिः नवचीरकै, प्रवर प्रावरणे खलु गंधतः । सकलमङ्गलवाँच्छितदायक, कुशलसरिगुरौश्चरणौयजै ॥ ॐ हीं श्री परमपुरूपाय परमगुरूदेवाय भगवते श्री जिन शारानोदीपकाय श्रीजिनदत्त- सूरीश्वराय मणिमण्डितभालस्थल श्री जिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनकुशलसूरीश्वाय अकवर असुर त्राणप्रतिवोधकाय श्रीजिनचन्द्रसूरीश्वराय वस्त्रं चोवा चन्दनं पुष्पं फलं निर्विपामिते स्वाहाः ॥६॥ १. भाद्रपद कृष्ण १४ वि० सं० १२२३ २. वि० स० १३८६ फागुन कृष्णा ३० .

[ १२३ ] || अथ ध्वज पूजा ॥ ध्वज पूजा गुरुराज को, लहके परन प्रचार । तीन लोक के शिखर पर, सो पहुँचे नर नार ।। (चाल-निनगुणगान श्रुति अमृत) ध्वन पूजन कर हरप मरी रे, ध्वज टेर। सज सोलह शृङ्गार सहेल्या, श्री सद्गुरु के द्वार खडी रे। अपघर रूप सुतन सुकलोनी, ठम ठम पग भरणकार करी रे ॥१॥ गारत मगल देत प्रदक्षिणा, धन धन श्रानन्द अाज घडी रे। निर्धन को लक्ष्मी ससावत, पुत्र विना जाके पुन करी रे ॥२॥ जो जो परतिष परचा देया, मुणो भविक चित चाय धरी रे । फतहमल्ल भडगतिया श्रावक, पहली शंका जोर करी रे॥३॥ देस परतिम तव में जान, प्रगट्या तत्क्षण तरण तरी रे। पुष्पमाल सिर केशर टीका, अधर श्वेत पोशाक करी रे॥४॥ , [११२४ ] 'मांग मांग वर' बोले बानी, फरक बताओ गुरु मेघ झरी रे । फरक उगायो दोय लाख पर, तेरी महिमा नित्य हरी रे ॥ ५ ॥ ज्ञानचन्द गोलेच्छा को गुरु, प्रत्यक्ष दीना दरस फरी रे। बीकानेर में थुभ तुम्हारा, चित्र करावत सुरसुन्दरी रे॥६॥ थानमल्ल लूनियां पर किरपा, लक्ष्मी लीला सहज बरी रे। लक्ष्मीपति दूगड़ की साहिब, हुण्डी की भुगतान करी रे ॥ ७ ॥ जो उपकार करा तुम मेरा, दीनी सन्मुख अमृत जड़ी रे। तेरी कृपा से सिद्धि पाई, जागे यश अरु भागे मरी रे ॥८॥ भूखा भोजन तिसियाँ पानी, भरत हाजरी देव परी रे। विगम समय पर सहाय हमारे, 'ऋद्धिसार' की गरज सरी रे ॥ ६ ॥ श्लोक मृदु मधुर ध्वनि किङ्कणी नादकैः, ध्वज विचित्रितविस्तृतवासकैः । सकलमङ्गलवाँच्छितदायक, कुशलसूरिगुरौश्चरणौयजे ॥ ॐ ह्रीं श्रीं परमपुरुपाय परमगुरुदेवाय भगवते श्री जिनशासनोद्दीपकाय श्रीजिनदत्तसूरी- श्वराय मणिमण्डित भालस्थल श्रीजिनचन्द्रसूरीश्वराय श्री जिनकुशलसूरीश्वराय अकबर असुर- त्राणप्रतिबोधकाय श्रीजिनघन्द्रसूरीश्वराय शिखरोपरि ध्वजां आरोपयामि स्वाहा ॥१०॥ + २ t " [१५] ।। अथ अर्घ पूजा ॥ "भट्टारक पदवी मिली, जीते वादो वृन्द । कंठविराजे सरस्वती, जग में श्रीजिनचन्द ॥१॥ (राग आसावरी तथा धन्याश्री) पूजन जग सुरसकारी मुगुरु तेरो पु० । तेरे' चरन कमल लिहारी मुगुरु० ॥ टेर ।' साह सलेम दिल्ली को बादशाह, सुनी है शोभा तिहारो । भट्ट हरायो चर्चा करके भट्टारकपदधारी । अम्मावस की पूनम कीनी, चद उगायो भारी । चढके गगन करी है चर्चा, सूरज से तपधारी ।। उगणीसौ चौदह सवतमे, लसनऊ नगरमझारी। गोरा फिरगी टोपीवाला, दिलमे ये बातविचारी।।' जैन श्वेताम्बर देव जो सच्चा, परे मनसा हमारी। वाणी निकल सौ वर्षों तक होवेगा अधिकारी। अंधे की खोली आँख सूरत मे, पूजे सब नरनारी । कहाँ लग गुण वरन मैं तेरा तू सुरतर जयकारी ।। उगणी सो सवत्सर त्रेपन, मॅगसिर मास ममारी । शुक्ल दृजजिनचदसूरीश्वर खरतर गच्छाचारी ।। कुशलसूरिके निजसतारी, क्षेमकीर्ति मनुहारी। प्रतियोध्या जिनक्षत्री पॉचसौ, जान महित अणगारी ।। क्षेमधाडशाखा जवप्रगटी, जगमे श्रानदकारी। धर्मशील साधु गुण परे, कुशलनिधान उदारी ।। ये पूजा करता सुसानद, धन लक्ष्मी सारी। कहत रामऋद्धिसार' गुरू की जय-जयशब्द उचारी॥ (यह पूजा पढकर चागें दिशा मे अर्घ दीजिये) १ वि० स० १९१४ ( सन् १८५७ ईस्वी) [ १२८ ] ॥ गुरुदेव की स्तुति ॥ श्री विलसे ऋद्धि समृद्धि मिली, शुभयोगे पुण्य दशा सफली । जिनकुशलसूरि गुरु अतुल वली, मन वाञ्छित आपे दादा रहरली ॥१॥ मङ्गल लील समय विपुला, नव नवे महोत्सव राजेला। सुपसाय गुरु चढ़ती कला, सुकुलीनी पुत्रवती महिला ।। २ ।। सवही दिन थाये 'सवला, सदवास कपूर तने कुरला । ह्य गय रथ पायक बहुला; कल्लोल करे मन्दिर कमला ॥२॥ वीजे चमर निशान घुरे, निर्भय दरवार खड़ा पहुरे । जय जय कर जोड़ी उचरे, सानिद्ध गुरु नब काज सरे ॥ ३ ॥ सरसा भोजन पान सदा, दुख रोग दुकाल न होय कदा। अविचल ऊलट अङ्ग मुदा, गुरु पूरण दृष्टि प्रसन्न सदा ॥ ४ ॥ घम घम 'मादल नाद घुमे, बत्तीसे नाटक रंग रमे । प्रगट्यो पुण्य प्रताप हमें, सबला परिगण ते पाय नमे ॥ ५ ॥ तन सुख मन सुख चीर तने, पहिरे वेलाउल होय रने। ध्यावो ध्यावो कुशल गुरु एक गने, जृम्भक सुर मन्दिर भरे धने ॥६॥ ततखिन घत खेंचो आवे, करि श्याम घटा मेह वर्षावे । तिसियां तोय तुरत पावे, जल दाता निजग सुयश गावै ।। ७ ।।

भय
[ ११ ]
लहयों जल कल्लोल करे, प्रवहण भव सायर ममि डरे ।
वूडता वाहन जे समरे, ते आपद निश्चय थी उपरे ।। ८॥
सब खड़ पड़ग प्रहार रहे, तो ढामिनि जिम समसेल सहे।
कुशल कुशल गुरु नाम कहे, ते नेम कुशल रण मध्य लहे ॥४॥
थुम्म सकल
परचा पूरे, श्री नागपुरे सकट चुरे।
मगलौर अधिके नृरे, देराउर टाले दूरे ॥१०॥
बोरमतुर पाने सुधरे सभाइतपुर विक्रम नपरे ।
जिनचन्द्रमूरि पाटे पपरे, जसु कीरति महिमण्डल पसरे ॥ ११ ॥
पूरब पश्चिम दक्षिण आगे, उत्तर गुरु दोपे सौभागे।
दश दिशि जन सेवा मागे, श्री सरतर गन्छनो महिमा जागे॥ १२ ॥
पुर पट्टण जन पद ठामे, गाईजे कुशल नयर ग्रामे ।
पूजे जे नर हित कामे, ते चक्रपती पदवी पामे ॥१३॥
श्री जिनकुशलसरि साखे, सेरक नन ने सुखिया राखें ।
समयाँ गुरु दरशन दाखे, श्री साधुकीरत पाठक माखे ॥ १४ ॥

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PF मेरी समयमा
܀
५
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जिसने . राग-द्वप कामादिक, जोते सब जग जान लिया ।
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया ।।
बुद्ध, बोर, जिन, हरिहर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।
भक्ति भाव से प्रेरित हो यह, चित्त उसो में लीन रहो ।
विषयों की आशा नहिं जिनके, साम्य-भार धन रखते हैं।
निज पर के हित साधन में जा, निशदिन तत्पर रहते हैं।
स्वार्थ-त्याग का कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं ।
एस ज्ञाना साधु जगत के, दुःख समूह को हरते हैं ।।.
रहे सदा सत-संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन हो जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे ।।

-
[२३१
नहीं सताऊ किसो जीप को, झूठ कमी नहिं कहा करूँ।
पर-धन वनिता पर न लुमाऊँ, सतोपामृत पिया करूँ।।
अहवार का भाव न रक्खू, नहीं किसी पर क्रोध करूँ।
देस दूसरों की बढ़तो को, कमी न ईप्या भाव धरूँ॥
रहे भावना गेसो मेरो, सरल सत्य-व्यवहार करू।
गने जहाँ तक इस जीवन मे, औरो का उपकार कहें।
मैत्री-भाष जगत मे मेरा, सर जीनों पर नित्य रहे ।
दीन-दुखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा श्रोत रहे ।।
दुर्जन करे कुमार्गरतों पर, क्षोभ नहीं मुझ को आवे!
साम्य भार रक्खू म उन पर, ऐसौ परिणति हो जावे।
गुणीजनों को देस हृदय मे, मेरे प्रेम उमह आवे ।
बने जहा तक उनकी सेगा, करके यह मन सुस पावे ॥
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होऊ नहीं कृतघ्न कमी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे ।
गुण ग्रहण का मान रहे नित, दृष्टि न दोपों पर जावे ।।
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[ १३२ ]
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।
लाखों वर्षों तक जीऊ या, मृत्यु आज ही आ जावे ॥
अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे ।
तो भी न्याय मार्ग से मेरा, कभी न पद डिगने पावे ॥
होकर सुख में मग्न न फूलं, दुख में कभी न घबराऊ
पर्वत-नदी-श्मशान-भयानक, अटयो से नहिं भय खाऊ ।
रहे अडोल अकम्प निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जाये ।
इष्टिवियोग - अनिष्टयोग में, सहनशीलता दिखलावें ।।
सुखो रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घारावे ।
वैर-पाप - अभिमान छोड़, जग नित्य नये मङ्गल गावे ।।
घर पर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत दुष्कर हो जावें ।
ज्ञान चरित उन्नतिकर अपना, मनुष जन्म फल सर पावें ॥
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Shri Jin-pooja

Author
Sharad Kumar
Title
Shri Jin-pooja
File name
Shri Jin-pooja
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/02
Publisher
Varanasi, Nirgranth Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549909
Barcode
99999990030750.00
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Banasthali University
Digital publisher
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