Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Rajasthani Sahitya Ka Itihas [ Madhyakal ]
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राजस्थानी साहित्य का इतिहास
(आरम्भकाल-मध्यकाल)
लेखक
वी० एल. ० माली 'प्रशांत'
विवेक पब्लिशिंग हाउस
धानाणी मार्केट, घौड़ा रास्ता
जयपुर-302003
प्रकाशक:
नरेन्द्र कुमार बाहरी
विवेक पग्लिशिंग हाउस
धामाणी मार्केट, चौडा रास्ता,
जयपुर-302003
लेखक:
बी. एल. माली 'प्रशांत'
प्रथम सम्करण
सन् : 1990
@ लेखकाधीन
मूल्य : 75 - (रुपये पचहत्तर मात्र)
मुद्रक :
श्री क्षीरसागर प्रिण्टर्स
4001, नाहरगढ़ रोड़, मोहन नगर मोड
जयपुर-302001
डॉ. विद्यानिवास मिश्र
को
सादर ।
--'अशांत
विषय-सूची
विषय-प्रवेश
(1-30)
1. राजस्थान मोर राजस्थानी
2. राजस्थानी की विशेषताएं
3. काल विभाजन
प्रारम्भ काल
(31-51)
1.जन शैली
2. चारण शैली
3.लौकिक शैली
4. प्रवाह एवं प्रवृत्तियाँ
मध्यकाल
(52--123)
1. चारण काव्य
2. पौराणिक और धार्मिक काव्य
3.माख्यान काव्य
4. संत साहित्य
5.जन काव्य
6. लौकिक प्रेम काव्य
7. छन्द शास्त्र
8. लोक साहित्य
6. मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य : प्रवाह और प्रवृत्तियों
लेखकीयं किगी भाषा को प्रतिष्ठा उन लोगों पर निर्भर करती है जो उसको मातृ भाषा के म्प में मंगीकार करते हैं, उनमें अपनी मातृभाषा में प्रति अभिमान योप है या नही । मगर भाषाभिमान उस भाषा के बोलने वालो में नहीं है तो फिर उस भाषा का पनपना और समृद्ध होना मुश्किल हो जाता है। बंगला जैसी भाषानों के प्रति जितना अभिमान वोध बोलने वालों का रहा है, उसकी तुलना में राजस्थानी इतने सचेत नही थे। इसी वजह से राजस्थानी माज अपनी अस्मिता के लिए छटपटा रही है। जैसे-जैसे जागरुपता प्राई है वैसे-धमें ही राजस्थानी साहित्य नवयुग के साथ उत्तरोत्तर समृद्ध होता गया है । यहाँ यह तय्य उल्लेखनीय वन पहना है कि जो गजस्थानी मध्यकाल में समस्त राजम्यान को राजभाषा थी, प्राधुनिा काल मे भापाभिमान के प्रभाव मे पहचान गोचठी । अाज उमके अपने ही पूछते हैं-गजस्थानी फौन सी ? जो जोधपुर के. कुछ हल्कों में बोली जाती है वह राजस्थानी है, कि शेखावाटी के इलाके में बोली जाती है, वह राजस्थानी है ? हाटीती में योती जाती है वह राजस्थानी है या ढूंढाड मे बोली जाती है यह राजस्थानी है ? राजस्थानी मारवादी है या मेवाडी ? राजस्थानी वागड़ी है या मेवाती ? कौनसी राजस्थानी है ? जिस भाषा के सामने इतने सारे प्रश्न हो उसकी स्थिति का भान आसानी से हो जाता है। इन प्रश्नों के बावजूद भी राजस्थानी एक भाषा है, एक समृद्ध भाषा है । हर भापा को उपभाषाएं होती है, वैसे ही राजस्थानी की उपभाषाएं हैं। मारवाड़ी, मेवाडी, मेवाती, हाडौती, बागडी, ढूढाडी प्रादि राजस्थानी की उप- भाषाएं हैं । परन्तु इस तथ्य को भी नही नकार सकते कि राजस्थानी को महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे सत्पुरुप की तलाश है। मध्यकाल में राजस्थानी का समस्त राजस्थान प्रान्त मे एक रूप था। आधुनिक काल में स्वतन्त्रता आन्दोलन को मध्य नजर रख राजस्थानी लेखक हिन्दी में लिखने लगे। परिणामस्वरूप राजस्थानी की गति अवरुद्ध हो गई। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि राजस्थान शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए प्रान्तों में से एक था। शिक्षक भी यहां बाहर के प्रान्तों से पाए। उन्हें राजस्थानी नहीं पाती। उनकी श्पनी परिसीमाएं भी उन्हे जाने-अनजाने राजस्थानी हितों के विरुद्ध ले गई। यहां तक कि उन्होंने जनगणना मे बिना-बूझे मातृभाषा के पालम में हिन्दी लिखकर समस्त राजस्थानी भापियों को हिन्दी-भाषी बना दिया भौर मजे की बात तो यह है कि सरकार ने इस बात को सही . मान लिगा।
राजस्थानी इन्ही गलतियो, भूलो एवं हठधर्मिताओं से जूझ रही है। पाठ करोड़ कण्ठों की भाषा को मविधान ने भी नकारा है । राजनेता उदासीन हैं। सबसे बड़ी गेडा युक्त बात तो यह है कि राजस्थान सरकार भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है। यही इस भापा की सबसे बड़ी त्रासदी है। राजस्थानी भाषा-भाषियों ने भव- हेलना का एक युग जीया है। इस युग से सम्पूर्ण राजस्थानी साहित्य प्रभावित हुमा है। राजस्थानी भाषा की स्थिति का प्रभाव राजस्थानी साहित्य के इतिहास लेसन पर भी पड़ा। इस दिशा में धीरे-धीरे लोगों का ध्यान जाने लगा। प्रारम्भ में यह विश्वविद्यालयों की डिग्री का विषय बना और कुछ सार्थक प्रयास भी हुए। डॉ हीरालाल महेश्वरी का शोध प्रबन्ध इस हेतु उल्लेख करने योग्य है। इसके बाद डॉ मोतीलाल मेनारिया व पुरुषोत्तम मेनारिया ने इतिहास लिखे जो पुराने पड़ गए हैं और पुनलेसन की स्थिति में आ गए है । कुछ लेसो को एकत्रित कर इस दिशा में रामप्रसाद दाधीच ने भी कुछ कार्य किया है। डॉ. गोरधन सिंह शेखावत ने एक सक्षिप्त प्रयास इस क्षेत्र मे किया है। डॉ. कल्याण सिंह शेखावत ने भी राजस्थानी साहित्य का इतिहास लिखा है। 'साहित्य का इतिहास' विषयक कुछ विषयों को लेकर कुछ शोध प्रबन्ध सामने आए है जिनमे से डॉ. किरण नाहटा का शोध प्रबन्ध उल्लेखनीय बन पड़ा है। डॉ नाहटा ने आधुनिक राजस्थानी साहित्य पर सराहनीय कार्य किया है। वेलि साहित्य पर डॉ. नरेन्द्र भानावत ने अच्छी मामग्री प्रस्तुत की तो वचनिका पर मालमशाह खान ने भी कुछ प्रयास किया । ऐसे ही श्याम महर्षि ने भी राजस्थानी कविता पर कुछ प्रयास किए । इसी तरह भनेकानेक शोध प्रबन्ध लिखे गए। परन्तु स्वतन्त्र रूप से इतिहास लेखन का कार्य राजस्थानी में नहीं हुमा। प्रो. नरोत्तम स्वामी ने कुछ पुराने पृष्ठो में प्रति मंक्षिप्त रूप में साहित्य का इतिहास लिखा जो पाठको के लिए पर्याप्त नही था। सर्वप्रथम डॉ. हीरालाल महेश्वरी ने अंग्रेजी मे ही मही परन्तु स्वतन्त्र रूप से इतिहास सेगन का काम, विश्वविद्यालयी शोध प्रबन्धों से हटकर किया। डॉ. होरालाल महेश्वरी इस प्राचीन साहित्य के विद्वान हैं. परन्तु सन्त-माहित्य इनका प्रिय विषय रहा है। इस क्षेत्र में डॉ. महेश्वरी हिन्दुस्तान में जाने जाते है। इसी वजह से सन्त-साहित्य पर अधिक सामग्री संकलित हो गई। माधुनिक काल इनकी अधिक रुपि का विषय नहीं होने के कारण तुलनात्मक रूप से मावश्यक लेखन इस प्रन्य में नही मा गगा। गन्त-साहित्य एवं यैलि साहित्य पर सविस्तार लिसने से मन्म विपर्यो पो पर्याप्त विस्तार नहीं मिल सका, क्योकि पृष्ठों को परिसीमा भी सक *गमा पी। फिर भी यह एक स्तुनि योग्य प्रयास था। इसके याद राजस्थानी गाहित्य के इतिहास मेगन का ऐसा प्रामालिक एवं स्वतन्त्र रूप से निराने का प्रयास नहीं हुपा।
(iii) यहाँ पर 'परम्परा पत्रिका का उल्लेख करना बहुंतावश्यक है। इस पत्रिका के तीन प्रक राजस्थानी साहित्य का आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । इन प्रकों में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग विषयों पर लेख लिखे हैं जो प्रचुर सूचना देने वाले हैं। परम्परा के राजस्थानी साहित्य का प्रादिकाल अंक में अगर चन्द नाहग के तीन लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। डॉ. महेश्वरी ने भी इन लेखों का इतिहास में प्रचुर प्रयोग किया है । प्रादिकाल पर 'फागु' एवं 'रास' कृतियों पर भी अच्छा कार्य मिलता है । 'फागु' एवं 'रास' कृतियों का मूल पाठ एवं उनका विवेचन इतिहास लेखन में काफी सहायक है। इनके अतिरिक्त 'अनूप संस्कृत लाइब्रेरी' बीकानेर में उपलब्ध हस्त प्रतियां भी काफी महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं। मध्यकाल एवं आधुनिक काल पर भी अनेक लेखों का संकलन कर 'परम्परा' ने इतिहास लेखको के लिए एक मार्ग दर्शन प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त शोध पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित सामग्री भी इतिहास पर अच्छा प्रकाश डालती हैं। राजस्थानी साहित्य के पुनप्रंकापान में राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, राजस्थानी शोध संस्थान, वरदा पत्रिका आदि का अभूतपूर्व योगदान है । साहित्य के इतिहास सम्बन्धी सामग्री चारण शोध संस्थान अजमेर, सादुल रिसर्च इन्स्टीट्यूट बीकानेर, भारतीय विद्या मन्दिर शोध संस्थान बीकानेर, बिड़ला शोध संस्थान पिलानी, सरस्वती पुस्तकालय फतेहपुर (शखावाटी), शारदा सदन पुस्तकालय लक्ष्मणगढ (सीकर), पोथीखाना जयपुर, अगरचन्द नाहटा का संग्रहालय बीकानेर, हाड़ौती शोध संस्थान कोटा, पुरातत्व विभाग अलवर, मे संग्रहित हैं। परन्तु इन सबको संग्रहित कर क्रमबद्ध रूप मे लिखना और एक दृष्टि के साथ लिखना एक समस्या बनी रही। राजस्थानी भाषा में राजस्थानी साहित्य का इतिहास प्रकाशन का प्रयास राजस्थानी भाषा बाल साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट तक्ष्मणगढ़ (सीकर), ने किया है । वह मंक्षिप्त होते हुए भी सराहनीय है। आधुनिक साहित्य पर इस छोटे से प्रयास में जिस क्रमबद्धता के साथ आलोच्य दृष्टिकोण लिए सामग्री प्रस्तुत की गई है वह सराहनीय है । असलियत में देखा जाय तो यह पहला प्रयत्न है जो छात्रोपयोगी, लघु, परन्तु संतुलित प्रयास है । हां, इसमे कुछ छोटी-मोटी कमियां रही हैं परन्तु प्रूफ शोधन की त्रुटियां अखरती हैं। इस इतिहास लेखन में विद्वानों एवं चिन्तकों का पूर्ण मार्ग दर्शन एवं सहयोग प्राप्त हुआ है । लेखकों, मालोचकों, शोध विद्यार्थियों एवं मित्रों का मैं ऋणी हूँ। मैं उन सब ज्ञात-अज्ञात लेखकों को भी नमन करता हूँ जिनको कृतियों एवं कार्यों का उल्लेख व सन्दर्भ इस कृति में लिया गया है । मैं अपने समकालीन लेसकों के प्रति भी अपना पाभार प्रकट करता हूँ जिनकी कृतियों एवं कार्यों का सन्दर्भ मन (iv) इस कृति में किया है । अध्ययन पश्चात् जैसा लिखा, वह परीक्षण हेतु प्रापक प्रस्तुत है । प्रापको पारखी आंखें इस कार्य का सम्पूर्ण मूल्याकन करेंगी। मापके विचार मुझे मार्ग दर्शन देंगे और आपकी प्रतिक्रिया मुझे बृहत् प्रयास हेतु प्रेरित करेगी। यहां पर अपने दो अभिन्न बुजुर्ग विद्वान मित्रों का नामोल्लेख का लोभ में छोड़ नहीं पा रहा हूँ। श्री उमराव सिंह मंगल मुझे इस कार्य हेतु हमेशा प्रेरित करते । श्री चम्पालाल जी रांका जय भी मिलता कार्य की प्रगति पूछते । उनकी सप्रेरणा से ही यह कार्य सम्पन्न हो सका है। इनके प्रति आभार प्रकट कर मैं उनके सम्मान को न्यून नही करना चाहता। अन्त में, मैं श्री नरेन्द्र जी बाहरी के प्रति अपना प्राभार प्रकट करता हूँ। जिन्होने इस कृति को पूरे मनोयोग के साथ प्रकाशित कर आप तक पहुंचाया। आपके विचार मुझ तक पहुंचें, इसी विनय के साथ प्रापका ही बी. एल. मालो प्रशांत' विषय-प्रवेश राजस्थानी राजस्थान प्रदेश की भाषा है । यह भारोपीय (इंडो-यूरोपीय) भाषा परिवार की सदस्य है । यह प्राचीन है, विशाल है, और भांति-भांति के विपयो से भरी-पूरी एक जीवन्त भापा है। इसकी इस अन्तिम विशेषता ने कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर और महामना पं० मदनमोहन मालवीय जैसे महापुरुषों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया है। प्रसिद्ध गुजराती भाषा के विद्वान झवेरचन्द मेधारणी कहते है-~~-अपनी मातृभाषा का नाम राजस्थानी था। मेडता की मीरां इसी में अपने पदों की रचना करती और गाया करती । इन पदों को सौराष्ट्र की सीमा तक लोग गाते और अपना कर मानते । चारणों के दोहे भी राजस्थान की किसी सीमा मे से उतरते और कुछ भेष बदल कर काठियावाड़ में घरघराक बन जाते । नरसी महता गिरनार की तलहटी में प्रभु पदों की रचना करता और ये ही पद यात्रियों के कंठों पर सवार हो जोधपुर, उदयपुर, पहुँच जाया करते । इस युग से भी पहले दो कदम दूर रखें तो कच्छ-काठियावाड़ से लेकर प्रयागराज तक एक भाषा लम्बे-चौडे भूमि-खंड पर फैली हुई मिलेगी। अनगिनत लोगो की बोल-चाल की इस भाषा का नाम राजस्थानी है । इसकी बेटियां फिर ब्रजभाषा, गुजराती और आज की राजस्थानी नाम धारण करती स्वतन्त्र भापा बनी। राजस्थानी का विकास अपभ्रंश से हुअा है । इसका प्राचीन नाम मर-भाषा था। सन् 778 (सं. 835) में रचित 'कुवलयमाला' मे मर-प्रदेश की योली की विशेषताओं की प्रयम जानकारी मिलती है। कई विद्वानों का मत है कि राजस्थानी भाषा का जन्म पांचवी शताब्दी के प्रास-पास हो गया होगा परन्तु उस वक्त की कोई विशेष रचनायें अभी तक मिली नहीं है । राजस्थानी बोलने वालों की संख्या चार करोड़ से भी अधिक है। हिन्दी बंगला, तेलगू, तमिल और मराठी के वाद इस दृष्टि में राजस्थानी का ही नाम माता है । राजस्थानी और राजस्थान नाम नये, अंग्रेजो के जमाने के । इससे पूर्व समस्त राजस्थान का कोई एक नाम नहीं था। रियासतों के युग में जो अलग- अलग नाम होते, उससे मिलते-जुलते नाम हो अलग-अलग हिस्मों के होते । ये कुछ तो जमीं की किस्म से, कुछ वहां बसने वाली जातियो के नामो से पहचाने 2 जाते । मरु, जागळ, धाट, भाड, मत्स्य, साल्व, मेदपाट, त्रवणी, बल्ल प्रादि नाम अति प्राचीन युग के है । मध्यकाल, मे मेवाड, टू ढाड़, हाडौती, गोठवाड़, मेरवाडा शेखावाटी, जगळधर, मेवात प्रादि नाम शुरू हुए । जेम्स टॉड की पुस्तक 'एनाल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान' में सर्वप्रथम राजस्थान का नाम पाया। उन्होने उस वक्त 'राजपूताना' नाम से जानी जाने वाली उस वक्त की रियासतो की प्राचीन बातें लिखी। राजस्थानी की प्राचीन 'ख्यातो' और 'वातो' मे 'रायथान', 'राजस्थान', 'राजथान' आदि नाम राजधानी के रूप में काम मे लिए गए है । टॉड का दिया हुआ नाम समस्त राजपूताना के लिए चल पडा और लोकप्रिय हो गया । यही कारण है कि आजादी मिलने के पश्चात् इस प्रदेश का का नाम 'राजपूताना' की जगह 'राजस्थान' रखा गया। राजस्थान के स्थान- वाची नाम से यहां की भाषा का नाम 'राजस्थानी' रखा गया। इस तरह यह स्पष्ट है कि राजस्थानी अति प्राचीन भाषा है । इसका राजस्थानी नाम नया है। पहले यह मरुभाषा के नाम से जानी जाती । मध्यकाल में यह मारु-- गुर्जर कहलाई और स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् इसका नाम राजस्थानी पडा। सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने जब लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' नामक महान् ग्रन्थ लिखा तो उन्होने राजस्थान बोली जाने वाली इकसार व्याकरण के ढांचे को सभी बोलियो का एक कुटम्ब, एक परिवार माना, और जैसे गुजरात की 'गुजराती' है वसे ही राजस्थान की भाषा को 'राजस्थानी'' नाम दिया । ग्रियर्सन के सामने भी संभवतः टॉड की पुस्तक ही प्राधार था। जार्ज ग्रियर्सन ने मालवा की कई बोलियो की विगत लिखी और उनको राजस्थानी की बोलियाँ ही माना। भाषा भूगोल की दृष्टि से राजस्थान के पूर्व में (उत्तर-दक्षिण तक) अजभाषा, दक्षिण में (वं से पश्चिम तक) बुन्देली, मराठी, भीली, खानदेशी और गुजराती, पाश्चम में (दक्षिण से उत्तर तक) सिंधी, लहंदा और उत्तर में (पश्चिम से पूर्व तक) लहंदा, पंजावी और बांगरू है । विंध्याचल और भावूपर्वत के बीच के पर्वतों में "मीली' बोली जाती है। राजस्थान प्रदेश का नाम तथा उसकी हदबंदी अंग्रेजो ने वुछ तो अपने राजकाज को सुविधा और कुछ राजनीतिक कारणों को सामने रख कर की। इसी कारण से उन्होंने मालवा को राजस्थान से अलग कर दिया। परन्तु लोक के संस्कारों, रहन-सहन, बोलचाल, वेश भूषा प्रादि की दृष्टि से वह राजस्थान का स्वाभाविक अंश है । उसमें बोली जाने वाली भापा मालवी, राजस्थानी को ही एका शाया है। राजस्थान पौर मालवा गजकाज की दृष्टि में अलग होते हुए भी यावी मच भांति से एक है। मध्यप्रदेश के सात जिले-जैसे मदसोर, रतलाम, राजगढ़, उज्जैन, देवास, इन्दौर आदि को मध्यप्रदेश सरकार आज भी मालवी-भापी जिले मानती है। ऐसे ही हरियाणा के नौ जिले-जैसे रोहतक, सोनीपत, हिसार, सिरसा, गुड़गाँव, जोद, महेन्द्रगढ, नारनोल आदि की भाषा बांगडू बोली राजस्थानी भाषा का ही एक रूप है। राजस्थानी भाषी हरियाणा और राजस्थान के दो अलग-अलग राज्य बनाए गए हैं। इस तरह यह बात स्पष्ट रूप से सामने प्राती है कि राजस्थानी भाषा का विस्तार कई दूसरे प्रदेशी तक भी है । परन्तु भौगोलिक दृष्टि से राजस्थानी के विराट विस्तार को विखण्डित कर दिया गया । राजनैतिक व्यवस्था और व्यवस्था के स्वरूप ने इस भाषा के विस्तार-क्षेत्र को कुंठित कर दिया । स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राजनैतिक तौर पर मनचाहे ढग से इसे हिन्दी की उपभाषा मानकर इसके विकास को बहुत बड़ी क्षति पहुँचाई गई जो आज भी पूरी नहीं हो पा - आज के राजस्थान में सत्ताईस जिले है जो वाईस छोटी-बड़ी रियासतों की साक्षी देते है । सर्वप्रथम, अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करोली रियासतो को मिलाकर 'मत्स्य' संघ 28 फरवरी, 1948 में बना। फिर 25 मार्च, 1948 में उसमें बांसवाडा, दूदी, डूंगरपुर, भालावाड, कोटा, किसनगढ़, कुशलगढ़, लावा, प्रतापगढ़, शाहपुरा और टोक रियासतें शामिल हुई। 1 अप्रैल, 1948 में उदयपुर मिला । 30 मार्च, 1949 में जयपुर, जोधपुर, बोवानर और जैसलमेर रियासतें संघ में मिली । 15 मई, 1949 मे मत्स्य सघ और 7 फरवरी, 1950 में सिरोही रियासत इसमें मिली । सबसे अन्त में 1 नवम्बर, 1956 को अजमेर जो सीधा अंग्रेजों द्वारा शासित था, प्राबू जो बम्बई रियासत का हिस्सा था और सूने न जो मध्य भारत के मंदसौर जिले की भानपुरा तहसील में था, वे सब इस संघ में मिले । इस तरह अाज के राजस्थान का स्वरूप सामने आया। अरावली पर्वत श्रखलायें राजस्थान को दो प्राकृतिक भागों में बाँटती हैं --उत्तरी:श्चिमी राजस्थान और दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान । राजस्थानी समस्त राजस्थान की अपनी भाषा है । राष्ट्रभाषा हिन्दी की इस बहिन या कहो किसी तरह का विरोध नहीं है । अन्तर इतना ही है कि राजस्थानी राजस्थान की धरती के वासियों को मातृभापा है और हिन्दी समस्त राष्ट्र की राष्ट्र भाषा। मातृभापा से राष्ट्रभाषा का हमेशा मान बढा है, परन्तु राजस्थान में बाहर से पाए शिक्षित लोगों ने जो कि इस धरती की प्रकृति और भाषा से अनजान थे, हिन्दी को मातृभाष बतलाना और पटाना शुरू कर दिया। बिना इस अन्तर को जाने या जानते हुए भी सरकारी सर्वेक्षणों में मातृभाषा के हाशिये में हिन्दी को भर शुरू से ही राजस्थानवासियों को भ्रमित करना शुरू कर दिया । बाल-मानस पर 'धरी यह छाप राजस्थानी भाषा की महत्ता को राजस्थान की नई पीढी को निरन्तर न समझने के लिए तैयार कर दिया। इसके फलस्वरूप' राजस्थानी भाषा की गति और 4 विकास को भारी धक्का पहुंचा। आज इस गलती को सुधारने में राजस्थान- वासियों को प्रान्दोलनो का सहारा लेना पड़ रहा है ताकि राजस्थानवासी अपनी भाषा की सम्पन्नना और महत्ता को समझे। इन सब प्रयासो का ही परिणाम है कि राजस्थानी विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाई जाने लगी है। इसे पाठ्यक्रमों में स्थान मिला है। सबसे बड़ी उपलब्धि इन प्रयत्नों की यह रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थानी को साहित्यिक भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ, और देश की 22 साहित्यिक भाषाओं में राजस्थानी को सम्मान-जनक स्थान मिला है। देश में ही नहीं विदेशों में भी राजस्थानी भाषा पढाई जाती है । अमेरिका की शिकागो यूनिवसिटी में राजस्थानी का एक स्वतन्त्र विभाग है । दुनियाँ अन्य कई देशों में भी राजस्थानी पढाई जा रही है। पुरातत्त्व विभाग प्राचीन शिलालेखो, जूनी पाण्डुलिपियो में रचे-बसे भारतीय इतिहास की समुचित जानकारी के लिए राजस्थानी भाषा की अनिवार्यता को स्वीकार करता है। इतिहासविदों एवं शोध विद्वानो ने इसी वजह से राजस्थानी की महत्ता को समझा है । अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विद्वान राजस्थानी सोखने में लगे हैं। भारतवासी राजस्थान और राजस्थानी के गौरवपूर्ण इतिहास से सुपरिचित है । इन्ही सब बातों को राजनीतिक स्तर पर भी एक दिन समभा जायेगा और राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता प्राप्त होगी। भाषा विकास और उपभाषाएं राजस्थान बहुत ही मनोखा प्रदेश है। समस्त विश्व में यह वीरता का पर्याय माना जाता है। सदियों तक यह भारतीय संस्कृति, शौर्य, साहित्य मोर कता का केन्द्र बना रहा । विद्वानों का मानना है कि ऋगवेद जैसे प्राचीन मंच की रपना भी इमी प्रदेश में रहने वाली गरस्वती नदी के तट पर हुई थी। ऋगवेद में प्रयुक्त पनेक प्राचीन शब्दों के मूल रूप को सुरक्षित रखने का श्रेय राजस्थानी भाषा को प्राप्त है। गजम्यान अपने धर्म, मान-मर्यादा और देश गौरव पर मर मिट जाने वामी की जन्मभूमि है। अनगिनत नर नारियों के लहू से मीनी यह धरती प्रयाग- राजकीरद पवित्र है। कर्मस टॉडका मानना है कि राजम्यान का कोई छोटा मा राप भी ऐगा नहीं है त्रिम में 'पमापोली' जमी रणभूमि न हो पोर न कोई गंगा नगर रिपोनिसाग' जगा मोर पुग्ण नती जन्मा से। जितना महान पा प्रगानीमो म्यानि। उगमापरिमाप में उपरिकामा मारिया गालि गम्थानी भाषा में है वो मतपीपी में मो और पो।। मरपोर भापा शास्त्रियों का मानना है कि अपने पूर्व पुरुष प्राचीन प्राय जो भाषा बोलते, उसके एक रूप से वैदिक संस्कृत की उत्पत्ति हुई। इसी वैदिक संस्कृत का परिवर्तित साहित्यिक रूप 'संस्कृत' कहलाया और जनसाधारण को बोलचाल की भाषा 'प्राकृत' नाम से प्रसिद्ध हुई । कालक्रम की दृष्टि से इन प्राकृत भापात्रो को विद्वान लोग दो भागों में बांटते है । पहती प्राकृत भापाए और दूसरी प्राकृत भापाए । पहली प्रकृति भाषाओं का प्रतिनिधित्व पाली और अद्धमागधी ने किया जिनमें बौद्ध और जैनियों के ग्रंथ लिखे गए, दूसरी प्राकृत भाषाओं में शौरसेनी, मागधी और महाराष्ट्री मुख्य हैं । धीरे-धीरे इन प्राकृत भापानों के भी साहित्य-संस्कार बनने लगे और ये भी प्रतिष्ठित भाषाएं बन गई । जन साधारण की भाषा का जो प्रवाह इनके साथ-साथ अबाध रूप से चल रहा था वह दिनों दिन बढता गया और कालान्तर में एक नई भाषा के रूप में ढल कर 'अपभ्रंश' नाम से प्रसिद्ध हुमा । विक्रम संवत् की छठी-सातवी शताब्दी से लेकर दसवी-ग्यारहवी शताब्दी तक इन 'अपभ्रंश' भाषाओं का देश के अलग-अलग भागो में प्रचार प्रसार रहा परन्तु कालान्तर में इनके साथ भी वही बात हुई जो प्राकृत भाषाओं के साथ हुई । यानि इनके अन्दर भी साहित्य रचना होने लगी मोर विद्वान लोगों ने इनको भी व्याकरण के अस्वाभाविक नियमों में बांधना शुरू कर दिया जिससे इनके दो रूप हो गए । एक तो वह जिसके अन्दर साहित्य रचना होती थी और दूसरा वह जिसका कि लोगों में प्रचार था । पहला रूप तो व्याकरण के नियमों में बंध कर स्थिर हो गया परन्तु दूसरा रूप निरन्तर विकसित होता रहा और उसी तरह जिस तरह पहले प्राकृत भाषाएं अपभ्रंश भाषाओं में परिवर्तित हुई उसी तरह अपभ्रंश भी आधुनिक आर्य भाषाओं में रूपान्तरित हुई । अपभ्रंश के सत्ताइस भेद-उपभेद है, इनमें से शौरसनी 'अपभ्रंश के प्रचार का दायरा बहुत व्यापक रहा । यह भाषा राजस्थान के बहुर से भागो में बोली जाती थी। इसके दो रूप थे-'पश्चिमी अपभ्रंश' और 'पूर्वी अपभ्रंश' । इन्ही दो रूपो मे राजस्थानी का विकास हुअा । इस तरह से वैदिक संस्कृत से संस्कृत, संस्कृत में प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रश से शौरसेनी और शौरसेनी में पश्चिमी और पूर्वी अपभ्रंश और इन्ही से राजस्थानी का विकास भापा यात्रा का उज्ज्वल स्वरूप है। राजस्थानी का जन्म कब हुआ, यह ठीक-ठीक कहना तो मुश्किल है । परन्तु अनुमान है कि ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में अपभ्रंश से अलग होकर राजस्थानी भाषा के रूप में विकसित होना शुरू कर दिया होगा। राजस्थानी शौरसेनी अपभ्रंश की पहली सन्तान है । इसकी बेटियाँ ब्रजभाषा, गुजराती और आधुनिक राजस्थानी नाम धारंण कर स्वतन्त्र भापाएं बनी। राजस्थानी भापा को पश्चिमी हिन्दी से अलग कर एक अलग भाषा का रूप देने का यश 'भारत का भाषा सर्वेक्षण' नामक ग्रंथ के लेखक सर जा ग्रियर्सन को है ।
j - 3 शौरसेनी अपभ्रंश के बारे में जानकारी मुख्य रूप से हेमचन्द्र को प्राकृत याकरण (41329-446) के सूत्रों के उदाहरणों और नियमों पर माधारित है। हेमचन्द्र 12वी ईस्वी (स. 1144-1228) में हुए थे। उन्होंने जिम अपभ्रंश को जानकारी दी वह उनके पहले की है । इसलिए इस प्रमाण के माधार पर हेमचन्द्र वरिणत शौरसेनी अपभ्रंश की पूर्ववर्ती सीमा 10-11वी शताब्दी निर्धारित की जा सकती है। आधुनिक भापानों को अपभ्रंश से अलग करने वाली कुछ विशेषताएं निम्न प्रकार हैं-- 'प्राकृत' और अपनश के तदभव शब्दो की जगह संस्कृत तत्मम् शब्दों का प्रयोग। 2 संस्कृत के तत्मम् शब्दों से मीधे नये तद्भव शब्दों का निर्माण, जैसे- प्राचीन तद्भव 'करन-बाज' के साथ नया तद्भव 'कारज' । अपभ्रश के द्विन (दुहरा) व्यंजनों का मरलीकरण और पूर्व स्वर का (हस्व हो तो) दोर्षीकरण (दोहरा व्यंजन, व्यंजन इकहरा हो जाता है और मात्रा पूरी करने के लिए पूर्व स्वर को दीर्घ कर दिया जाता है) । जैसे अपभ्रंश 'कम्म' का राजस्थानी, हिन्दी प्रादि में काम । अपभ्रंश में अनुस्वार की जगह प्रानुनासिक का प्रयोग और पूरी मात्रा करने के लिए पूर्व स्वर का दीर्धीकरण, जैसे 'पंच' का 'पांच' । विभक्ति प्रत्ययो का घिस जाना और उनकी जगह दोनो वचनों में समान पर-सर्गों का (नउ, रउ, सउ, मउ आदि) प्रयोग। संयुक्त क्रियाओं और संयुक्त कालो (Tenses) का विकास । वर्तमान काल में सहायक क्रिया का प्रयोग । जैसे अप. 'जाई-जवई' के स्थान पर राजस्थानी में 'जाव है', गुजराती में 'जाय छ', वंगला में 'जाइते छे' । 8. प्रवर्धमान विश्लेषणात्मक प्रवृत्ति । प्रो. नरोत्तम स्वामी ने इन विशेषताओं को सम्वत् 1200 के आस-पास की रचनाओं में देखा है। मारु-गुर्जर : राजस्थानी विभाजन गुर्जर अपभ्रंश-धारा देश के पश्चिमी भागो में वर्तमान राजस्थान और गुजरात प्रदेशो में बहती रही है। 11वी शताब्दी के दौरान राजस्थानी एक निश्चित 'भापा के सांचे में ढली। प्रारम्भिक राजस्थानी और गुजराती 1450 ई. तक प्रायः एक तरह ही चली। विभाजन इसके बाद शुरू होता है । इस सामान्य भाषा के कई नाम जैसे-'मार-सोरठ', 'प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी', 'प्राचीन गुजराती', 'प्राचीन राजस्थानो' और 'मारु-गुर्जर' दिए गए। इनमें से अन्तिम नाम मारु-गुर्जर उचित नाम जान पड़ता है। माम प्रदेश राजस्थान का द्योतक है और गुर्जर 5 6 7. .
7 4. गुजरात प्रांत का । इस तरह प्रारम्भ काल का साहित्य इन दोनों भाषाओं की सम्मिलित सम्मत्ति है। प्राचीन राजस्थानी साहित्य के काल में गुजरातो और राजस्थानी एक ही भाषा थी। 15वी सदी के प्रथम प्रभाग में ये दोनों भापाएं स्वतन्य रूप से विकासमान हुई । परिणामस्वरूप माघुनिक राजस्थानी का प्रादुर्भाव हुमा और उधर माधुनिक गुजराती का । आधुनिक राजस्थानी को प्राचीन राज- स्थानी से अलग करने वाली विशेषताएं निम्नलिखित है-- 1. दो नये स्वरों का विकास-'म' और 'नौ'। ये संस्कृत के संयुक्त शब्द म+ई और अ+उ से अलग है। 2. नपुंसक लिंग या तो छोड दिया गया है या फिर पुल्लिग में मिल गया है । नान्यान्तर जाति के कुछ रूप तो बने रहे परन्तु उनमें और नर जाति ने कोई अन्तर नही रहा। 3. अन्त में आने वाले 'प्र' का मिटना । उच्चारण में 'मा', 'ई' और 'उ' वा शब्द में प्राना। 'अ+इ' और 'अ+उ' की जगह'' और 'श्री' का प्रयोग । 'अ+इ' और 'अ+उ' का प्रयोग प्राचीन राजस्थानो की सामान्य प्रति रही है। 15वी शताब्दी के प्रारम्भ · में '' और 'नो' का प्रयोग विकासित होने लग जाता है। 5. शब्दों के अन्त में 'इ', 'उ' और 'म' के उच्चारण का लोप (यद्यपि लिखने में इनकी जगह 'अ' लिखा जाता है) जैसे--'करि' का 'कर', 'गति' का 'गत' और 'मति' का 'मत' । सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक सुनीति कुमार चाटुा ने राजस्थानी के कुछ विशेष लक्षण गिनाए हैं। इनमें से मुख्य निम्नलिखित है- उच्चारण सम्बन्धी 'अ' का उच्चारण 'इ' । जमे 'मनुष्य' का मिनख, 'सरदार' का 'शिरदार' 'पंडित' का पिडत प्रादि। इसके विपरीत, 'इ' तथा 'उ' वी जगह 'अ' का उच्चारण । ज से, "दिन' का 'दन', 'किनार' का 'कनार' 'मानुप' का 'माणस', 'हाजिर' का 'हाजर', 'कुमार का 'कंवर', 'रुपया' का 'रप्या', 'मिलाप' का 'मलाप' आदि। 3. 'ऐ' तथा 'यो', खास करके प्राकृतज (तद्भवज) शब्दों मे, यथाक्रम अंग्रेजी hat और hot के 8 और '० के सदृश उच्चारित होते है । जैसे जेण, कोण आदि। पुरानी राजस्थानी और उसके पूर्व की अपभ्रंश भाषा के अइ, अउ से, तथा संस्कृत (तत्सम्) शब्द के ऐ, ओ से, ये विव्रत,'' तथा"ौ' राजस्थानी में पाए है। 2.
8 4. मूर्धन्य 'ण' और '' राजस्थानी की दो विशिष्ट ध्वनियां है । मूर्धन्य 'ड' और 'ड' ध्वनियों की तरफ राजस्थानी का विशेष आकर्षण है। 5. कई राजस्थानी वोलियों मे 'च, छ, ज, झ' इन तालव्य ध्वनियो का दन्त्य उच्चारण सुनाई देता है, साथ ही इन बोलियो में 'स' का उच्चारण 'ह', हो जाता है। 6. राजस्थानी वर्गों महाप्राण अघोष वर्णो का अर्थात् "घ, झ, ढ, ध, भ" का, विशेष उच्चारण तथा 'मौलिक 'ह' का विकृत उच्चारण मिलता 7 अघोप महाप्राण स्पुष्ट ध्वनियाँ-"ख, छ, ठ, थ, फ" बदलती नहीं है। ज से वेत, मुख छ, आछो ठाकर, पीठ, थळ, रथ, फळ, सफा । 8. घोप महाप्राण "घ, झ, ढ, ध, भ" शब्द के प्रादि में रहने से वे कंठ- नालीय रपर्श से मिलित हो जाते है । जैसे, घोडा, भूठ, ढाई, धन, भलो के क्रमश गो' डा, जू' ठ, डा' ई, द' न, ब' लो। 9. घोष महाप्राण, शब्द के मध्य अथवा अन्त में रहने से उनका असर शब्द के आद्य अक्षर पर पड़ता है। जैसे जोध का 'जो' द', बाघ का 'बा' ग', पढरणो का 'प' 'डणो' साँझ का 'साँ' 'ज', लाभ का 'ला' ब। 10. बहुत सी जगह देखा जाता है कि 'ह' लिखा तो नही जाता परन्तु उच्चारण में 'ह' का अवस्वान सूचित होता है । जैसे-कयो-कह्यो, बार-बाहर । व्याकरण सम्बन्धी 1. पुल्लिग विशेष्यो में संस्कृत अ-कारान्त विशेष्य की प्रथमा विभक्ति के प्रत्यय को अपरिवर्तित रूप में जीवित रखा है, जैसे घोटक >घोड़ो> घोडाघोडी >घोडो । 2. नाम के रूप में प्रयुक्त रूप--प्रत्ययों में पष्ठी के 'रो', 'रा', 'री', प्रत्यय लगते है । पण्डी के लिए पुरानी राजस्थानी प्रत्यय 'तरणों', 'हंदो' प्रत्यय भी विचार करने योग्य है। उत्तम तथा मध्यम पुरुष के सर्वनामो की पप्ठी के एक-वचन में "मारो या म्हारो-थारो" रूप गुजराती-राजस्थानी को विशिष्टता है । 4. बहुवचन में दो रूप -'म्हे'--जिसमे सुनने वाला अलग और 'पापा'-जिसमे सुनने वाला भी शामिल है। 5. निकट तथा दूर वाचक प्रथम पुरुप के सर्वनाम 'यो, यो' और 'वो' के स्त्री रुप 'मा, या' तथा "वा"। नामिक्य ध्वनि का प्रागम,-"ई, इगा, इणी, ॐ, उरण, उगी।" 3. उत्तम पुरुष 6.
- 7. राजस्थानी म संख्यावाचक शब्दों में अन्त्य "ह"--कार का उच्चारण सम्भवतः नही है । जैसे, ग्यारह--ग्यारा, बारह-बारा, तेरह-तेरा प्रादि। वाक्य रीति 1. उक्ति-वाचक क्रियाओं का अन्वय हिन्दी में तृतीया या पचमी से होता है, राजस्थानी में चतुर्थी से 2. सकर्मक क्रिया के भूतकाल में जो भावे-प्रयोग होती है, हिन्दी की रीति के अनुसार, 'को' लगाकर जब कर्म को सम्प्रदान बना दिया जाता है, तब क्रिया-पद कर्तृ-निरपेक्ष तथा कर्म-निरपेक्ष रहता है । वह पुल्लिग का हो रूप लेता है । ज से--'उसने स्त्री को मारा' । परन्तु गुजराती में क्रिया उसी अवस्था में कर्म-सापेक्ष रहती है, कर्म अगर स्त्रीलिंग का होता है तो क्रिया में भी स्त्री प्रत्यय लगाया जाता है; जसे-"तेने स्त्री-ने "- पुल्लिग का "मारो" या नपुंसक का "मारू" नहीं। राजस्थानी में ये दोनों रीतियां चालू है-संभव है कि गुजराती में संरक्षित यह रीति किसी समय की पुरानी राजस्थानी की जैसी ही है । 3. नवर्यक अव्यय का स्थान राजस्थानी में कभी क्रिया के पहले, कभी पश्चात होता है। राजस्थानी में तथा इसके पूर्वरूप पुरानी पश्चिमी राजस्थानी में एक प्रौढ साहित्य विद्यमान है । अतः इसकी वाक्य रीति सुनियन्त्रित होनी ही स्वाभाविक है। शब्द विषयक राजस्थानी में स्वार्थे 'ड' प्रत्यय का कुछ प्राधिक्य है । यह 'ड' प्रियता अपभ्रंश की ही देन है । कुछ शब्दों के अन्त में एका 'क' या 'स' प्राता है, जैसे 'कतरो' या 'कतरोक'---कितने; वहां (खां) गयो' या 'गयोस'--कहां गया जिवरणो (दाहिना), सारू (गन्य), डावड़ो (पुत्र), धीवडी (बेटी) मगरी (पहाड़ी), डूगर (पहाड़), लुगाई (नारी), गंडक (कुत्ता), टावर (बालक) ऐसे हजारो शब्द है जो खास करके राजस्थानी के है। राजस्थानी की उपभाषाएं या बोलियाँ भारतीय भाषा के तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक विवेचन के सम्बन्ध में सबसे पहला ग्रंथ जॉन बीमज (John Beames) ने लिखकर तीन खंडों में सन् 1872, 1875 और 1879 में प्रकाशित किया था, उसमें राजस्थानी का विचार नही हुआ और भूल ते इसे हिन्दी के अन्तर्गत समझ लिया गया । इसके तीस- गलीस वर्ष बाद कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थानी का अच्छा परिचय प्राप्त ? .
10 - 1 किया, परन्तु उन्होंने राजस्थानी भाषा पर कुछ नही रिता बीमज । के बाद रामकृष्ण गोपाल भंडारकर और स्टोल्फ होनीने (Rudolf Heerric) ने भारतीय भापात्रो के इतिहास विषयक ग्रंथ लिमे परन्तु उनमें भी उन्होंने राजस्थानी की विशेष चर्चा नही को । के लॉग (Kcllogg) में प्रपन हिन्दी व्याकरण में राजस्थानी बोलियों में से मारवाड़ी और मेवाड़ी और कही-वह जयपुरी का कुछ विचार किया। राजस्थानी बोलियों का प्रथम वर्णनात्मक दिग्दर्शन सन् 1907 और 1908 में सर जाज प्रवाहम ग्रियसन ने अपने माथ निक-भार- तीय भापा-विषयक विश्ववोप में किया। डॉ. प्रियसन ने लिग्विस्टिक सर्वे मॉफ इण्डिया' की नौवी जिल्द के दूसरे भाग में राजस्थानी को पांच उपभापाएं बताई- पश्चिमी, मध्यपूर्वी, उत्तरी-पूर्वी और दक्षिणी-पूर्वी के दो भेद । इनके भी उपभेद डॉ. ग्रियर्सन ने बताए । इनकी खोज से राजस्थानी वोलियो के पारस्परिक सम्बन्ध तथा संयोग के विषय में कुछ स्पष्ट रूपरेखा सामने प्राई । 'पुरानी पश्चिमी राजस्थानी' (गुजराती और मारवाडी का पूर्वरूप) के ऐतिहासिक विश्लेषण आधार पर सन् 1914 मे 1916 तक मूल्यवान गवेषणा मम्पूर्ण की । उसमे राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति तथा विकास पर अभूतपूर्व प्रकाश पड़ा। 'राजस्थानी' नाम से प्रियर्सन ने भौगोलिक संयोग और कुछ स्यूल विशिष्टताओं के वारण, जिन बोलियों को एकत्र गूथ दिया, वे सचमुच दो पृथक शाखाएं थी : एक पूर्व की शाखा, जो पछांही हिन्दी से (बृजभापा प्रादि से) ज्यादा सम्बन्ध रखती है, और दूसरी पश्चिम की शाखा, जिसका गुजराती से मौलिक संयोग है। ग्रियर्सन द्वारा बताई गई पाँच उपभाषामो में सबसे महत्त्वपूर्ण पश्चिमी उपभाषा है, जिसे साधारणतया 'मारवाड़ी' कहा जाता है। यह अपने अलग- अलग रूपो में मारवाड, मेवाड, पूर्वी सिंध, जैसलमेर, बीकानेर, दक्षिण पंजाब और पुरानी जयपुर स्टेट के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से के शेखावाटी क्षेत्र में बोली जाती है। बाकी सभी उपभाषामो के क्षेत्रफलों का योग करने पर भी अकेली मारवाडी का क्षेत्रफल उन सबसे अधिक है। दूसरी, मध्य-पूर्वी उपभाषा दो मुख्य नामो से जानी जाती है--जयपुरी और हाडौती । इनके भी कई भेद है। जयपुरी बोली को इनका प्रादर्श माना जा सकता है । यद्यपि जयपुरी पूर्वी राजस्थान मे बोली जाती है परन्तु फिर भी इसका गुजराती से घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। मारवाडी मे इसका पश्चिम स्थित सिंधी से अधिक सम्बन्ध है। उत्तर-पूर्वी, राजस्थानी मे अलवर, भरतपुर और गुडगांव को मेवाती तथा दिल्ली के दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम के महीर प्रदेश को 'अहोरवाटी' शामिल 11 है । राजस्यानी के इस रूप में मध्य समूह (Central Group) की शुद्धतम प्रति- निधि पश्चिमी हिन्दी से अधिक साम्प है । कुछ लोगों को तो यहाँ तक मान्यता है कि उत्तर-पूर्वी राजस्थानी कहलाने वाली उपभाषाएं राजस्थानी की उपभाषाएँ न होकर हिन्दी को उपभापाएं बहने योग्य है । वास्तविकता यह है कि यह इन दोनों के बीच का एक समूह है । इसका विवेचन विशेष अहमियत नहीं रखता, फिर भी इसे राजस्थानी में रखना उचित है। दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी की मुख्य उपभाषा 'मालवी' है । यह मालवा एवं उसके आसपास के प्रदेशो में बोली जाती है । इसके पूर्व में बुन्देली और पश्चिम में गुजराती है । असलियत में यह इन दोनो के बीच की बोली है। इमीलिए इस पर राजस्थानी वी छाप उतनी नही दिखाई पडती जितनी कि जयपुरी पर दिखाई पड़ती है। दक्षिणी पूर्वी राजस्थानी की दूसरी बोली 'नीमाड़ी' है। उद्गम की दृष्टि से यह मालवी का ही एक रूप है । परन्तु यह एक ऐसे पर्वतीय प्रदेश की कई जातियों के मुह से बोली जाती है जो कि मालवी के बाकी हिस्से से अलग-सा पड़ता है । नीमाड़ी पर पड़ोस की 'भोली' और 'खान देशी' का यहाँ तक असर पड़ा है कि वह एक अलग बोली बन जाती है । जिसकी अपनी निजी विशेषताएं है । डॉ० ग्रियर्सन वा वर्गीकरण निम्नलिखित है-~- (1) पश्चिमी राजस्थानी--जोधपुर की खड़ी राजस्थानी ढटकी, थळी, बीकानेरी, बागडी, शेखावाटी, मेवाडो, खराड़ी, सिरोही की बोलियां, गोड़वाड़ी और देवड़ावाटी। (2) उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी-अहीरवाटी और मेवाती । (3) मध्य-पूर्वी राजस्थानी (ददाड़ी)-तोरावादी, खड़ी जयपुरी, काठेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किसनगढी, चौरासी,नागरचाल, हाड़ौती । (4) दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी या मालयी-इसके कई रूप भेद है । जिनमें रांगडी और सोडवाडी प्रमुख है । (5) दक्षिणी राजस्थानो--नीमाड़ी। डॉ. ग्रियर्सन ने 'भोली' और 'खानदेशी' को राजस्थानी से अलग माना है परन्तु डॉ. सुनीति कुमार चाटुया ने व्याकरण की दृष्टि से भीली को राजस्थानी के अधीन रखना उचित माना है। 'भोली' बोलियों का गुजराती से काफी सादृश्य है, और 'खानदेशी' बोलियां राजस्थानी अथवा गुजराती और मराठी इन दोनों के मिश्रण से उत्पन्न हुई है। संभव है कि ये प्राचीन मराठी के ऊपर राजस्थानी के गहरे प्रभाव का फल हो । यह प्रभाव दक्षिण में कोंकणी भापा तक पहुँचा है- कोंकणी में ऐसी कुछ विशेषताएं हैं जो राजस्थानी से मिलती हैं मराठी से नहीं । इस तरह राजस्थानी भाषा ने दक्षिण में कोकणी तक को प्रभावित किया है । इसके - 12 अलावा पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त, कश्मीर की गुजरी बोली और तमिलनाडु की सौराष्ट्री भी राजस्थानी के अन्तर्गत प्राती है । डॉ. ग्रियर्सन द्वारा स्वीकृत इस वर्गीकरण को एल.पी. तेस्सितोरी ने ऐतिहा- सिक विचार एवं वैयाकरण दृष्टि से कुछ रद्दोबदल किया है । उनके अनुसार राजस्थान-मालवे को बोलियों को दो ही मुख्य भागों में विभाजित किया जाना चाहिए । ग्रियर्सन को पश्चिमी राजस्थानी और मध्य-पूर्वी राजस्थानी (ढाडो) को एक साथ एक वर्ग मे लेकर केवल उन्हे ही 'राजस्थानी' नाम देना ठीक होगा। तेस्सितोरी कहते है कि ग्रियर्सन को (1) को पश्चिमी राजस्थानी कहना चाहिए और (2) को "पूर्वी राजस्थानी" । वाकी श्रेणियों को भापानों को या घोलियो को कितनी दूर तक हम 'राजस्थानी' मे शामिल कर सकते हैं, यह विचारणीय विषय है । अहीरवाटी, मेवाती, मालवी पौर नीमाड़ी-ये पछांही हिन्दी से ज्यादा प्रभावित है या खास राजस्थानी से, इस विषय में निष्कर्षात्मक ढंग से कुछ नहीं कहा जा सकता । राजस्थान की बोलियों पर मध्य प्रदेश की बोली का गहरा प्रभाव बहुत प्राचीनकाल से पड़ता पाया है। प्रो. नरोत्तम स्वामी राजस्थानी की निम्नलिखित मात्र चार बोलियां हो मानते है-- 1. पश्चिमी राजस्थानी या मारवाड़ी-उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर और शेखावाटी क्षेत्र 2. पूर्वी राजस्थानी या ढाडी-जयपुर और हाडौती इलाका 3. उत्तरी राजस्थानी-मेवाती और अहीरी बोलियाँ । 4. दक्षिणी राजस्थांनी या मालवी-मालवा और नोमाड़ की गोलियां । डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने राजस्थानी की पांच बोलियों का जिकर किया है । जिनमें परस्पर विशेष अन्तरं नहीं है । मात्र अलग-अलग क्षेत्रो मे बोली जाने की वजह से इनके अलग-अलग नाम पड़ गए है । ये पांच बोलियां-मारवाडी, ढूंनाडी, मालबी, मेवाती और वांगडी है । डॉ. मेनारिया ने वागड क्षेत्र हूंगरपुर- बासवाडा के आस-पास की बोली को अलग से एक बोली मानकर अपने वर्गीकरण में शामिल किया है। वागडी राजस्थानी की बोती उपभाषाएं या बोलियां निम्नलिखित है- मारवाड़ी-मारवाड़ी का प्राचीन नाम 'मरुभाषा'. है । प्राठवी सदी के ग्रंथ 'कुवलयमाला' में भारत की 18 देश-भाषाओ मे मरुदेश की भाषा का भी उरलेख है। अबुल फजल ने अपनी पुस्तक 'पाइने-अकबरी' मे भारत की प्रमुख भाषाओं में मारवाडो गिनाया है। विस्तार और साहित्य दोनों दृष्टियो से मारवाडी राजस्थानी मरमेयमहत्वपमा उपभाषा है। मारवाडी मदा sticla । साररूप में राजस्थानी को .
13 से राजस्थानी की साहित्यिक भाषा रही है। यह जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और सिरोही मे प्रचलित रही है । यही नहीं अजमेर-मेरवाड़ा, किशनगढ़ और पालन- पुर के कुछ भागों मे, जयपुर के शेखावाटी इलाके मे, सिंधु प्रांत के थोड़े अंश और पंजाब के दक्षिण में भी यह उपभाषा बोली जाती है । साहित्यिक मारवाडी का शुद्ध रूप जोधपुर और उसके आस-पास के भागों एवं शेखावाटी क्षेत्र में देखने को मिलता है । यह एक प्रोज-गुण विशिष्ट भाषा है । इसका साहित्य भी काफी बढ़ा- चढा है । इसमे संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के शब्द विशेष रूप से मिलते है । कुछ अरबी-फारसी के शब्द भी इसमे आत्मसात् हो गए हैं। मारवाडी की अपनी कई निजी विशेषताएं हैं । जैसे छंदो में सोरठा और रागों मे मांड जितनी अच्छी इस भाषा में रुचती-खिलती है, भारत की किसी अन्य भाषा में नही रुचति-खिलती। मेवाड़ी-मेवाडी दक्षिणी-पूर्वी मेवाड के भाग को छोडकर समस्त मेवाड और उसके आस-पास के कुछ क्षेत्रों मे बोली जाती है । मेवाडी का शुद्ध रूप मेवाड के गांवों मे देखने को मिलता है। शहरों में इस पर हिन्दी, उर्दू का असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है । इसी वजह से इसका मिठास जाता रहा है और यह अटपटी सी लगने लगी है। मेवाडी में रचित साहित्य मिलता है । इसकी साहित्यिक पर- म्परा भी प्राचीन दिखाई पड़ती है । चितौड के 'कीति-स्तम्भ' की प्रशस्ति में लिखा है कि महाराणा कुम्भा (स. 1490-1525) ने चार नाटक लिम्बे, जिनमें मेवाडी का भी प्रयोग किया गया । मेवाडी मे नाटक लिखने का यह मबसे पहला ऐति- हासिक उल्लेख है। दुदाडी-भूतपूर्व जगपुर रियासत के शेखावाटी क्षेत्र को छोडकर समस्त जयपुर रियासत क्षेत्र मे ढूढाटी बोली जाती है । इस पर गुजराती और मारवाडी का प्रभाव समान रूप से मिलता है । साहित्यिक भाषा में प्रजभाषा की भी कुछ विशेषताएं देखने को मिलती है । दूढाडी में प्रचुर साहित्य रचा गया है । संत दादू और उनके शिष्यों-प्रशिष्यों की रचनाओं में इस भाषा की झलक है । ढूढाडी में गद्य और पद्य दोनो लिखे गए है । ईसाई धर्म-प्रचारकों ने वाइबिल आदि अपने धर्म-ग्रन्थों का अनुवाद ढाडी मे करके इस भाषा की बढ़ोतरी की है। हादौती-ढूंढाड़ी का जो रूप कोटा-बूंदी में प्रचलित है, वह हाड़ोती नाम मे जाना जाता है, पडौस के झालावाड़ और धवडा क्षेत्रों में भी हाड़ोती बोली जाती है। इसमे और दूढाड़ी में घोड़ा ही अन्तर है। परन्तु पाज हाड़ौती राजस्थानी को स्वतन्त्र उपभाषा बन सामने माई है । 'ढाड़ी मोर हाडौती में शब्दों को उच्चारण-शैली में थोडी भिन्नता है । हाडौती में कई ऐसे शब्द देखने को मिलते है जिनका सम्बन्ध किसी प्रायं या मेमेटिक भाषा में स्थिर नहीं होता । उच्चारण- 14 शैली में भी कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो न तो संस्कृत और न ही अरबी-फारसी में मिलता है । इस इलाके पर हाडा राजपूतों का प्राधिपत्य रहा है । इसी वजह से इस उपभाषा का नाम हाड़ौती पड़ा है। डॉ. कन्हैयालाल शर्मा ने हाड़ौती भाषा और साहित्य पर विशिष्ट कार्य कर इसकी भापागत् एवं साहित्यिक महत्ता को उजागर किया है। मेवाती--मेवाती अलवर-भरतपुर के उत्तरी-पश्चिमी भाग और दिल्ली के दक्षिण में गुडगांव मे बोली जाती है । इस भाषा के उत्तर में बांगड,, पश्चिम में मारवाडी और ढूढाढी, दक्षिण मे डांगी और पूर्व में अजभाषा का प्रचार है । इस पर ब्रजभाषा का प्रभाव बहुत अधिक देखने को मिलता है। इसमे ज्यादा साहित्य नही है। चरणदासी पंथ के जन्मदाता चरणदास और उनकी दो शिष्याएं दयाबाई और सहजोबाई की रचनाएँ इसी भाषा में रची गई है परन्तु इस वक्त का साहित्य अब अपने मौलिक रूप ने नही मिलता । मुद्रको एवं प्रका• शकों के हाथो इसका रूप विकृत हो गया है । वागड़ी-'वागड' क्षेत्र की भाषा वागडी नाम से जानी जाती है । डूंगरपुर और बाँसवाडा के सयुक्त क्षेत्र का प्राचीन नाम 'वागड' है । इसी वजह से यहाँ वी भाषा वागडी कहलाती है । यह मेवाड़ के दक्षिणी क्षेत्र और सूथ के उत्तरी भाग में बोली जाती है । वागड़ी पर गुजरती का बहुत अधिक प्रभाव है । इसके अन्दर 'च' और 'छ' का उच्चारण प्रायः 'स' और 'स' का उच्चारण प्रायः 'ह' होता है । इसमे भी कुछ साहित्य रचा गया है जो अप्रकाशित है । नव लेखन की लहर इस उपभाषा मे उठती दिखाई दे रही है । मालवी--मालवी समस्त मालवा की भाषा है और मेवाड़, मध्यप्रांत मादि के कुछ भागों में भी बोली जाती है । अपने समस्त क्षेत्र में इसका एक ही रूप देखने को मिलता । इसमे मारवाडी और ढूंढाड़ी दोनो की विशेषताएं देखने को मिलती है, कही-कही मराठी का असर भी झलकता हो मधुर और कोमल भाषां है । औरतो के मुह, यह बहुत अच्छी लगती है, मालवा के राजपूनों में इसका एक विशेष रूप प्रचलित है, जिसे 'रागडी' कहा जाता है परन्तु रागडी इतनी मधुर और मीठी नही है जितनी कि मालवी है। मालवी में ज्यादा साहित्य नही लिखा गया । परन्तु चन्द्रसखि, गटनागर आदि की रचनाओं में इसका बहुत सुन्दर रूप देखने को मिलता है। प्राचीन पट्टे-परवानो में भी इमके मौलिक रूप पर अच्छा प्रकाश पड़ता है, इसमें काल (Tense) को बताने के लिए 'हो', 'ही' के स्थान पर 'यो', 'यो' का प्रयोग होता है । जैसे-"एक मूजी र करें' योडो माल यो । वणी ने हाई प्रो डर लाग्यो रेतो पो के पापी दुनिया रा चोर डाकू म्हाजन धन पर पोरया लगाया थवा है, नी मालम कदी पाई ने । यह एक बहुत चो लूटी लेगा" उदाहरण से सष्ट है कि 'स' की जगह 'ह', 'लेसी' की जगह 'लेगा का प्रयोग इस उपभाषा में होता है। उपरोक्त उपभापामो मे रची-बसी राजस्थानी भाषा का समस्त राजस्थान मैं इकसार रूप था, मुंहणोत नैणसी जालोर के निवासी, कविराजा बांकीदास जोधपुर के रहने वाले, दयालदास ने अपनी ख्यात बीकानेर में बैठकर लिखी और कविराजा सूर्यमल्ल वूदी के निवासी थे परन्तु इनके लिखे गद्य में कोई खास फर्क नही था। राजस्थानी का एक रूप स्वरूप इनको भाषाओं में मिलता है । इस प्राधार पर हम कह सकते हैं कि राजस्थानी एक भापा है । यह बोलियों का एक समूह मान नहीं । जहाँ तक उपभाषामों या बोलियों का प्रश्न है, हर भाषा में बोलियाँ या उपभाषाएं हैं जो मिलकर भाषा को समृद्ध बनाती हैं। राजस्थानी की बोलियाँ राजस्थानी भाषा की समृद्धता को परिचायक है । राजस्थानी भाषा है, और भाषा है। राजस्थानी के काव्यगत रूप-डिगल और पिंगल राजस्थानी साहित्य तीन शैलियो में लिखा गया है-जैन शैली, चारण शैली और लौकिक शैली । जैन शैली के लेखक जैन साधु थे या उनमे सम्बन्ध रखने वाले लोग थे । इस शैली मे प्राचीन युग की झलक मिलती है। जन लोगो का सम्बन्ध गुजरात से विशेष रूप से रहा है, इसी वजह से जैन शैली म गुजराती का भी असर मिलता है । दूसरी शैली चारण शैली कहलाती है, इसके लेखक चारण या दूसरे लोग थे । यह जैन शैली से अलग अन्य तरह की थी। जैनियों को अपभ्रंश रचनामो में भी विशेष तौर से युद्ध वर्णन में इसका मूल रूप देखा जा सकता है, चारणी को डिंगल शैली अपभ्रंश का ही विकसित रूप है। तीसरी और अन्तिम शैली लौकिक शैली है, इसने हमेशा अपने समय की भाषा का प्रयोग किया है। साधारण जनता ने साहित्य संरचना इसी शैली में की है। डिंगल-डिगल शब्द का प्रयोग कभी तो राजस्थानी की चरण शैली के लिए किया जाता है और कभी पूरी राजस्थानी के लिए । असलियत में राजस्थानी माहित्य का एक रूप डिंगल नाम से जाना जाता है । यह नाम चारण कवियो ने मारवाड़ी के साहित्यिक रूप को दिया है। डिंगल नाम का सर्वप्रथम प्रयोग कवि कुगललाम रचित "पिंगल शिरोमणि' (1618-1635) ग्रन्थ में देखने को मिलता है, जो निम्न प्रकार है- डिगळिया मिलियां कर पिंगल तो प्रकार संस्कृती ह्र कपट सन पिंगल पढियां पास संवग मंदाराम ने डिगल गीतों का विवेचन करने वाला अपना अन्य रघुनाथ- स्पक डिंगल में लिखा परन्तु उन्होंने डिंगल शब्द का प्रयोग कही नही किया। बाकीदास के बाद दिगल शब्द का प्रयोग करने वाले रचनाकारों में मवसे महत्त्व 16 पूर्ण नाम सूर्यमल्ल का है। अपने 'वश भास्कर' नाम के महाग्रन्थ मे प्रयुक्त भाषाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है-- डिंगळ उपनामक कहुँक मरुवानी हूँ विधेय । अपने पिता थी का नामोल्लेख करते हुए कवि ने लिखा है-- पिंगळ-डिंगळ पटु भये धुरंधर चंडीदान । आगे उन्होंने एक जगह फिर लिखा है- मरुभापा डिगळ भाषा इत्येके । डिंगल शब्द को ध्यत्पत्ति--डिगल शब्द की व्युत्पत्ति के बारे मे विद्वान लोग एकमत नहीं है। अलग-अलग विद्वानो ने अपने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए है । परन्तु सभी विद्वानों के मत अनुमानो के ऊपर आधारित है । कुछ महत्त्वपूर्ण विद्वानो के मतो का उल्लेख निम्न प्रकार है- श्री हरप्रसाद शास्त्री का मत है कि डिंगल शब्द की व्युत्पत्ति 'डगर' या 'डगळ' शब्द से हुई है। उनके मतानुसार 'डगळ 'पहले 'जंगल' या मरु देश की भाषा का नाम था । अपने मत को पुष्ट करने हेतु उन्होंने एक दूहा उद्धृत किया है जिसे वे चौदहवी सदी का बताते है । दूहा नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है- दी जगळ डगळ जेथ जळ वगळ चाटे'! अनहुँता गळ दिये गळा हुँता गळ काटे । परन्तु इस पद्य के अन्दर जंगल देश की भाषा का वर्णन नहीं है । अपितु उसके लोगो का वर्णन है । डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने इस पूरे पद्य का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अगर शास्त्री जी को पूरा पद्य मिल जाता तो वे डिंगल शब्द को व्युत्पत्ति 'डगल' शब्द से नही बताते न ही यह 14वी शताब्दी का पद्य है। यह पद्य अल्लू जी चारण का लिखा हुआ है जो 16वी शताब्दी में हुए थे । इस सम्पूर्ण पद्य मे सर्वशक्तिमान ईश्वर का वर्णन किया गया है । पूरा छप्पय इस तरह है- दीम जंगळ डगळ, जेथ जल बगला चाद। अरणहूँतां गळ दिये, गळा हूँता गळ काढे ॥ मच्छ गळा गळ माहि, ग्वाल हुय गली दिखाल । गळी डाळ फळ गहै, गहर डाळी फळ गाळ ॥ मगळं अमूर-सुर नाग नर, प्रापण चे कुळ ऊपर । अनंत र हाय अमंगळ-मंगळ, ई मगळ विद्या कर ।। श्री हरप्रसाद शास्त्री डिंगल को भाषा नहीं एक काव्य-शली मानते हैं परन्तु डॉ. मोतीलाल मेनारिया इसे एक उन्नत भाषा कहते है । डॉ. होरालाल महेश्वरी इस बात की पुष्टि करते हुए लिखने हैं कि मरुभाषा को डिंगल भी 1 17 कहा जाता है। 19वी शताब्दी तक दोनो एक जैसी मानी जाती थी । परन्तु रावत सारस्वत डिंगल को भाषा स्वीकार नहीं करते । वे इसे एक काव्य-शैली ही मानते है। मसलियत भी यही है कि डिंगल एक काव्यगत-शैली है । इस शैली में रचित ग्रंथों में प्रयुक्त शब्दो का एकत्रीकरण कर डिंगल-कोश भी प्रकाशित हुए है। इनसे एक भ्रम सा पैदा हो गया है। पाम लोग कोश भाषा का ही जानते हैं, शैली के कोशों से उनका विशेष परिचय नही है। ऐसा भी हुआ है कि शैली शब्द कालान्तर में छूट गया और डिंगल रह गई । जिसे डिंगल कहते-कहते भापा और शैली का अन्तर मिट गया और जन साधारण लोग डिंगल को भाषा कहने लगे। डिंगल में लिखने का मतलब डिंगल शैली में लिखना न रहकर डिंगल भाषा का अर्थ देने लगा। इसी से भापा और शैली का भ्रम पैदा हुप्रा। - डॉ. एल. पी तेस्सितोरी डिंगल शब्द का अर्थ 'अनियमित' अथवा 'गंवारू' से लेते हैं । उनके मतानुसार, 'प्रजभाषा' परिमार्जित थी और साहित्य शास्त्र के नियमों का अनुसरण करती थी, परन्तु डिंगल इस सम्बन्ध में स्वतन्त्र थी। इसी वजह से इसका यह नाम पड़ा । वे इसे पढ़े-लिखो की भाषा नहीं मानते। परन्तु तेस्मितोरी का मत स्वीकार नहीं किया जा सकता । प्रथम तो इसलिए कि डिंगल पढे-लिखे चारणों की भाषा थी और चारण लोग 'गवारू' नहीं थे। द्वितीय यह कि यह अनियमित भी नही थी । इसमें व्याकरण की विशुद्धता के साथ-साथ छन्द, रस, अलंकार प्रादि काव्यागो का उतना ही ध्यान रखा जाता था जितना कि ब्रजभाषा की कविता में । बल्कि हिंगल के छन्दों मे शास्त्रीय नियमों का अत्यधिक ध्यान रखा जाता । डिंगल अपनी विशिष्टता से इतनी चर्चित हुई मौर यह शैली भारतीय साहित्य को प्रमुख शैली बनी। श्री गजराज प्रोझा के मतानुसार, "डिगल में 'ड' वर्ण का ज्यादा प्रयोग होता है। इसी वजह स पिंगल की तरह इसका नाम डिगल रखा गया । जिस तरह बिहारी की ल-कार प्रधान भापा है उसी तरह डिगल में 'ड' वर्ण प्रधान है।" परन्तु असलियत में, डिगल मे ऐसी कोई बात नहीं है । दो-चार पद्यो में 'डकार: ध्वनि की प्रधानता हो जाने से समस्त डिगल 'ड-कार' प्रधान नहीं कही जा सकती। श्री पुम्पोतम स्वामी डिंगल शब्द की व्युत्पत्ति 'डिम + गळ' शब्द से बताते है । 'डिम' का अर्थ है-डमरू की ध्वनि और 'गळ' का अथ चे 'गला' बताते है । उनका मानना है कि "डमरू की ध्वनि रणचंडी का आह्वान करती है और वीरो को उत्साहित करने वाली है। डमरू वीर-रम के देवता महादेव का वाद्य है । गले से जो कविता निकलकर डिम्-डिम की तरह वोरो को उत्साह से भरदे' .
18 उसे ही डिगल कहा जाता है।" परन्तु पुरुषोत्तम स्वामी का मत सही जान नहीं पडता। न तो महादेव वीर-रस का देवता है और न ही डमरू की ध्वनि उत्साहवर्धक मानी जाती है। एक बात इस सम्बन्ध में और कही जाती है । वह यह कि प्रो. नरोत्तम स्वामी विभिन्न नामों से लिखते रहे है । कुछ विद्वानों का कहना है कि 'स्वामीजी' ने यह मत प्रस्तुत किया है। पुरुषोत्तम, स्वामी उस वक्त जब यह मत व्यक्त किया गया, राजस्थानी में इतनी रुचि नही लेते थे और न ही राजस्थानी के आदमी थे । विज्ञान विषय इनका प्रिय विषय था। इमी में वे लिखते थे। श्री उदयराज ऊजल और श्री किशोर सिंह वाहस्पत्य डिंगल को उड़ने वाली भापा बताते है। और ऊजल तो पिंगल को 'पांगली' भाषा बताते है । उनका मानना है कि पिंगल की बजाय डिगल की व्याकरण, छन्दशास्त्र आदि के नियम अधिक सरल है और कवि को शब्दों का मनचाहा प्रयोग करने की अधिक सुविधा है । वे कहते है कि 'डंगळ' शब्द जो कि डिंगल को उक्त विशेषतामो का सूचक है, से डिंगल शब्द बना है। वे कहते है, 'डग'-पंख और 'ळ'-ली हुई । डगळ-पंख ली हुई यानि उडनेवाली यानि स्वतन्त्रतापूर्वक चलने वाली यानि सरलता से काम में आने वाली भापा । परन्तु डिगल को पिंगल से सरल मानकर की हुई ऊजल की व्याख्या उज्ज्वल नही है। डिंगल व्याकरण और छन्दशास्त्र के नियम पिंगल से सरल नही बल्कि कठिन है। डिंगल में 'वरण मगाई' नियम इतने कठिन है कि जिनके सामने पिंगल काव्य के सब नियम- वन्धन मिलकर भी कम पड़ते है । फिर भापा शास्त्र के अनुसार किसी शब्द में मात्रा और अनुस्वार दोनो की वृद्धि एक साथ नहीं होती। इनका लोप अवश्य होता है । जैसे "डिंगल' अथवा 'डीगल' से 'डगल' तो हो सकता है परन्तु से 'डिंगल' या 'डीगल' नही हो सकता। इस तरह यह नियम भाषा शास्त्र के सामान्य सिद्धान्तो के भी विपरीत है। कई लोग 'डिम+गळ' से, कई लोग 'डिग्गी + गळे' से और कई लोग 'डांग' से डिंगल शब्द की व्युत्पत्ति बनाते है । पं. गमकरण आसोपा और किशोर सिंह बारहठ ने इमको उत्पत्ति क्रमशः 'डगि' और 'डीड' धातुप्रो से बताई है। डॉ. नियमन और डॉ. श्यामसुन्दर दाम डिंगल की व्युत्पत्ति के लिए मानते है कि जो लोग प्रजभाषा में कविता लिखते उनकी भापा पिंगल थी और इससे भेद करने के लिए मारवाड़ी भाषा का उसी की ध्वनि के ऊपर गढ़ा हुग्रा "हिंगल' नाम पडा। डॉ. मोतीलाल मेनारिया या मत है कि "डिंगल शब्द "डिग्गी-गळ' शब्द में बना है। डिंगल का सम्बन्ध 'डीग' से है। उनके मत में डिंगल का अर्थ है 'डगळ' 19 डीग हांकने वाली भापा । चारण लोग अपने ग्राश्रयदातामों के सम्बन्ध में बड़ी- बड़ी बातें कहते करते और अतिशयोक्तिपूर्ण रचनाएं करते । डॉ. मेनारिया का मानना है कि वृद्ध चारण आज भी डिंगल को डिंगल न कहकर 'डीगल' कहते हैं । अतिशयोक्तिपूर्ण रचनाएं पिंगल में भी है और वृद्धजन 'पिंगल' को भी 'पीगल' कहते हैं । परन्तु मूल शब्द डिंगल और पिंगल ही है ।" डॉ. मेनारिया ने चारण कान्य की विशेपतामों को ध्यान में रखकर अनुभव के आधार पर अपना मत प्रस्तुत किया है । इसमे भी अधिक सन्देह वाली बात नहीं है कि चारणों ने अतिशयोक्तिपूर्ण रचनाएं' कर लोक में अपने को 'चारण'-एक प्रतीकात्मव' कहावत के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया; भले ही वे अपना शास्त्रीय या ऐतिहासिक स्वरूप कुछ भी बताएं परन्तु लोक मे वे आज भी इसी रूप में जाने जाते है। इसमें भी दो राय नहीं कि उनकी डीग हांकने की प्रवृत्ति रही है, परन्तु डिंगल का जो अच्छा साहित्य है, वह डीग-डाग से परे है । अतः इसे डीग होकने वाली .रचनामो से सम्बद्ध करके इसके सम्मान को न्यून करना ही कहा जाएगा। डिगल का साहित्य भारतीय साहित्य में प्रतिष्ठित स्थान रखता है । इसकी शब्द व्युत्पत्ति तलासते समय इस साहित्य को अपनी अनुपम अद्वितीय प्रतिष्ठा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। कुशललाभ रचित 'पिंगल-शिरोमणि' ग्रन्थ में उडिगल नागराज के एक छन्द का शास्त्रकार के रूप में उल्लेख हुआ है। छन्दो का सबसे पहले विवेचन करने वाला पिंगलनाग हुअा। जब अपभ्रंश में नये से नये मात्रिक छन्दो का प्रयोग होने लगा तो उनका आविष्कारक भी पिंगल ही माना गया, और उसी के नाम पर 'प्राकृत पंगलम्' ग्रन्थ बना । इस तरह पिगल कविता में प्रयुक्त छन्दों का आविष्कारक "पिंगत नागराज' प्रसिद्ध हुअा। जब डिंगलं गीतो का आविष्कार हुआ तो उनका सम्बन्ध भी किसी प्राचीन महापुरुष से जरूर लगा होगा और पिगल नागराज के समान 'उडिंगल नांगराज' की कल्पना की गई होगी । यह 'उडिंगल' शब्द ही डिंगल का मूल शब्द है और इसके अर्थ करने को कोई आवश्यकता नहीं लगती । परन्तु सबसे प्रमुख बात यह है कि डिंगल भाषा न होकर एक काव्य-शैली है। हिंगल और पिंगल पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ आदि के पश्चिमी क्षेत्रों में चारणों. का जोर रहा है और पूर्वी राजस्थान, ब्रजमण्डल आदि के पूर्वी क्षेत्र में ब्रह्मभट्टों का । ब्रह्मभट्टों को भाट भी कहा जाता है, परन्तु ये वंशावली प्रादि रखने वाले भांटों से अलग है । चारण शैली लेकर पश्चिमी राजस्थान की भाषा मारवाडी में चारण लोगों ने काव्य रचना की और ब्रह्ममट्टों ने पिंगत के छन्दों में और पदों 20 - को लेकर प्रजभाषा मे रचना की। दोनों ही तरह को. रचनाएं' वीर-रम प्रधान थी। ब्रजभाषा में ये रचनाएं पिंगल शैली को . रचनाएं मानी गई और राजस्थानी में यह डिंगल शैली की रचनाएं' कहलाई। चारणों एवं भाटो में कई दिनो तक प्रतिद्वन्द्विता रही । अभी भी एकदम यत्म नहीं हुई है। आगे चलकर चारणों ने भी पिंगल को अपनाया । सूर्यमल्ल और स्वरूप दास मरीखे प्रमुग्य चारण कवियों ने पिंगल में रचनाएं की। मूर्यमल्ल के 'वंश-भास्कर' का तीन-चौथाई से भी अधिक हिस्सा पिंगल में रचा हुआ है । इसमें डिंगल का प्रयोग बहुत ही कम हुमा है । कालान्तर में पिंगल में धीरे-धीरे कृत्रिमता पाने लगी । अनुस्वार का प्रयोग पृथ्वीराज रासो (जो पिंगल को प्राचीन रचना है और जिसकी रचना प्रकवर के काल में हुई होगी) में भी दिखाई देता है । पीछे की रचनायो में यह और भी मिलता है । डिगल साहित्य डिंगल साहित्य में राजस्थान के सैकड़ों वर्षों के संस्कार, उसका संघर्षमय लोक-जीवन और उसका इतिहास प्रतिबिम्बित है। यह देशप्रेम, जातीय-गौरव और आजादी के सन्देशो से लबालब भरा हुआ है । इस साहित्य मे रणक्षेत्र के लिए उतावले होते वीरो, मरने के लिए अधीर होती वीरांगनाओं और रणखेतो के भावमय चित्राम चित्रित है । यह साहित्य जीवन का साहित्य है । यह ऐसे लोगों का साहित्य है, ऐसे लोगो द्वाग रचा हुअा साहित्य है, जिन्होने तलवारो की चोटें अपने सिरो पर झेली और रणक्षेत्रो में जूझ कर अपने प्राण त्यागे । डिंगल रचनाओ मे साहित्य का ही नहीं अपितु इसमे इतिहास विषयक सामग्री भी विपुल मात्रा में मिलती है। 15वी शताब्दी के उतराद्धं से लेकर 19वी शताब्दी के मध्य तक के चार सौ वयों मे हिन्दू मुसलमानों के बीच कई युद्ध हुए और उनके कारण राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारों में जो फ्रान्ति हुई, उनका सविस्तार वर्णन अगर कही मिलता है तो यह डिंगल माहित्य में ही मिलता है । गद्यात्मक सामग्री अधिकतर स्याल, बात, विगत और. पीढ़ी- वंशावलियों में मिलती है । स्यालो में सिसोदिया री ख्यात, राठोडा री ख्यात, मुहणोत नणसी रो ख्यात ग्रादि । विगतों में मेवाड़ रा भाखरां री विगत, सिसोदिया चुंडावतां री माख री विगत, जोधपुर-बीकानेर टीकायता रो विगत, आदि । पीढियो मे-ईडरधनी राठोडीग पीढ या, राठोडां री खांपा' री पीढ यां, भायना री पीढया प्रादि । वंशावलियों मे-राठोड़ा री वंशावली, झालोरी वंशावली, बीकानेर के राठोड राजानो की वंशावली प्रादि । पद्यात्मक सामग्री क्रमवद्ध काव्य ग्रन्थों के रूप में मिलती है और फुटकर कवितायो में भी। क्रमबद्ध ग्रन्यो मे रामो, प्रकास, विलास, रूपक, वनिका प्रादि चरित्र नायको के साथ 21 जुड़कर नामकरण पाते रहे है । जैसे-रायमल रासी, मगतसिंह रासौ, रतन रासो आदि; राज प्रकास, सूरज प्रकास, भीम प्रकारा, कीरत प्रकास प्रादि; राज विलास, जग विलास, रतन विलास, अभय विलास आदि; राज रूपक, जोगादे रूपक, रतन रूपक आदि अचलदास खीची री वचनिका, राठौड़ रतन महेसदासौत री बचनिका प्रादि । छन्दो के प्राधार पर भी ग्रन्थों के नामकरण हुए है; जैसे नीसाणी-गोगाजी चहुँवाण री नीसाणी, राठौड़ अजबसिंह गंगासिंघोत री तीसाणी, नीसारणी धीरमाण री प्रादि, मूलणा-सोढा रा गुण मूलपा, राजा गजसिंह •रा मूलणा, अमरसिंहजी रा मूलगा आदि; वेल-राजकुमार प्रनोप सिंघजी री वेल, राजा रायसिंघजी री वेल, जैतावतां री वेल, राजा मूरजमलजी री वेल आदि, झमाळ-बीदावा करमसेण हिम्मतसिंघोत री झमाळ, झमाळ जोरसिंह, चापावत री आदि; गीत-सीपला रा गीत, पंवारा रा गीत, राजा रायसिंघजी रा गीत आदि; कवित्त-महाराजा अभसिंघजी रा कवित्त, पंवार अखेराज राठौड रतनसी रा कवित्त, चहुँवाण सावलदासजी करमसिंघजी रा कवित्त आदि; दहा-पाबूजी रा दूहा, राव अमरसिंघजी रा दूहा, लाख फूलाणी रा दहा आदि; इनके अलावा पाधडी, दवावंत, भोटक आदि छन्दों में भी ग्रन्थ रचे मिलते है। ये ग्रन्थ अलग-अलग समयावधि में अलग-अलग स्थानो में लिखे हुए है, परन्तु इनके लिखने वालों का ढंग एक-सा था । सर्वप्रथम मंगलाचरण और प्रमुख देवी-देवता तथा गुरु की स्तुति है, . इनके बाद राजवंशावली प्रारम्भ होती है, जिसमे सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी से लेकर ग्रन्थ नायक तक के राजाओं के नाम लिए जाते । मुस्य कया चरित्र नायक के जन्मदिन से शुरू होती है। इसके बाद फिर उसके युद्ध, उसको वीरता, उसके पराक्रम, बाहुबल और सैन्यबल का वर्णन किया जाता है। प्रायः ग्रन्थ प्रमुख विजय या फिर नायक की मृत्यु के साथ सम्पूर्ण होता है। फुटकर कविताएँ दोहा, छप्पय और गीत छन्दो मे लिखी हुई मिलती है । गीतबद्ध कवितापो को गजस्थान में 'साख की कविता' कहा जाता है, क्याकि यह किसी प्राचीन घटना ग्रादि के मच्ची होने का प्रमाण अथवा गवाही देती है । फुटकर दोहा, कवित्त और गीत, वीर और दानी पुरुषो तथा ऐतिहासिक घटनामों के छोटे-छोटे फोटोग्राफ है। वे थोडे समय के लिए उनके अमली रूप को अपनी आँखों के समक्ष लाकर खड़ा कर देती है । इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों के अलावा धर्म, नीति, तत्त्वज्ञान, 'वृष्टि-विज्ञान शालिहोत्र आदि कुछ अन्य विषयों पर रचे ग्रन्थ भी डिंगल में मिलते है । ये ग्रन्थ भाषाशास्त्र की दृष्टि से बडे काम के है और राजस्थानी भाषा के ऋमिक इतिहास का ज्ञान कराने में बहुत सहायक सिद्ध होते है । .
22 डिंगल कविता प्रधानतः वीर रस से सराबोर है, परन्तु इसमें शृंगार रम, करुण रस, हास्य रम, भयानक रस, भद्गुन रस, रौद्र रग, वीभत्स रस, शांत रस प्रादि भी मिलते हैं । डिंगल कविता सीधी-सादी है परन्तु फिर भी अर्थालंकार, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा भादि सादृश्यमूलक प्रलंकार भी टिंगल में मिलते है । शब्दालंकारो में 'वण मगाई' लोकप्रिय रहा है। 'वण सगाई, 'वण' और 'सगाई'--इन दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ है वर्ण का सम्बन्ध या वर्ण द्वारा स्थापित सम्बन्ध । 'वण सगाई' का साधारण नियम यह है कि छन्द के किसी चरण में प्रथम शब्द का प्रारम्भ जिस वर्ण से होता है, उसके अन्तिम शब्द का प्रारम्भ भी उमी वर्ण से होना चाहिये । जैसे- सम्यो समीणो साहियो, मूर धीर समरस्थ । जुब में वामण डंड जिम, हेली वाथै हत्य ।। पिंगल पिंगल शब्द का अर्थ है, छन्दशास्त्र । परन्तु राजस्थान में इससे तात्पर्य है-राजस्थानी मिथित ब्रजभाषा । ब्रजभापा को शुद्ध ब्रजभाषा कहा जाता है। 'पृथ्वीराज रासो' और 'वंश-भास्कर' इसके प्रमुख ग्रन्थ है । पिंगल माहित्य भी राजस्थानी में लगभग उतना ही रचा गया है जितना हिंगल साहित्य । खुमाण रासी, पृथ्वीराज रामो, हमीर रासी, अवतार चरित्र, राज विलाम यादि ग्रन्थ पिंगल शैली के हैं । इनके अलावा पिंगल में फुटकर रचनाएं भी प्रचुर मात्रा में मिलती हैं । मध्यकाल मे डिंगल और पिंगल अत्यधिक लोकप्रिय रही है। आधुनिक काल के प्रारम्भ में भी कवियों ने इनमे अपनी रचनाएं की हैं परन्तु अब पाते-आते इस शैली का प्रचार बहुत कम हो गया है। नवयुग को साहित्यिक प्रवृत्तियों में डिंगल और पिंगल शैली अपना स्यान खो बैठो है । परन्तु इनके साहित्यिक महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। राजस्थानी मादमो ने सबसे पहले बोलना सीसा और फिर लिखना । अक्षरों की बनावट बोली का ही शांत रूप है । बोली के तदनुकूल लिपि कभी भी पूर्ण भोर उसके समान नहीं हो सकती। जो बोला जाता है, उसे पैसा को खा लिपि में नहीं ढाला जा सकता । यह तो निकटतम उच्चारण का एक सामाजिक इशारा प . समस्त विश्व की सभी भाषाओं के उच्चारण करने के समान स्थान है। कंठ, तालवा, मूर्धा, दांत मोर होंठ,। इन सभी स्थानों से जीभ के संयोग से 23 ('प' वर्ग को छोड़कर) अलग-अलग ध्वनियां निकलती है। संसार की सभी भाषाएं बिन्दुओं पर लीकटियो के योग से बनी है। बिन्दुयों और लोकटियों में समानता के पश्चात् भी लिपियों में अनेकानेक विभिन्नताएं और लिपि में अगर समानता भी है तो उनके उच्चारण ध्वनि में भिन्नता है। संसार की सभी व्याकरणों का मूल सिद्धान्त लगभग समान होने पर भी हर भाषा की नई व्याकरण व्याकरणों के इतिहास में एक नई उपलब्धि है। मूल सिद्धान्त को समानता के कारण सभी व्याकरणे समान और एक नही होती परन्तु अपनी अलग विशेषताओं के दावे के थाधार र हर भाषा की व्याकरण अपना अलग अस्तित्व रखती है। राजस्थानी भाषा की लिपि देवनागरी से मिलती है । कुछ अक्षरों की बनावट में अन्तर अवश्य है । परन्तु यह अन्तर अब दिन-ब-दिन मिटता जा रहा है। देवनागरी के अलावा 'महाजनी' भी राजस्थानी की लिपि रही है, जिसे व्यापारी लोग काम में लेते रहे हैं । इसके अक्षर 'मुड़िया' कहलाते थे । इस लिपि में मात्राएं नहीं होती । 'महाजनी' या 'पणियावाटी' कहलाने वाली यह लिपि विराज- व्यापार में काम आती रही । इसके अलावा एक लिपि और थी जिसे कामदारी लिपि कहा जाता है। यह लिपि दपतरों में प्रायः कर काम में पाती थी। डॉ. मोतीलाल मेनारिया मुडिया लिपि का आविष्कारकर्ता मुगल सम्राट अकबर के अर्थ सचिव टोडरमल को मानते है। राजस्थानी भाषा की वर्णमाला मे 49 वर्ण ध्वनियां हैं, जिनमें 11 स्वर और 36 व्यंजन है। स्थर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, अ, अ, मो, औ, ऋ व्यंजन :कखगघड पफ ब भ म च छ ज झा य र ल व टड दण श प स ह तथदधन (१) अनुस्वार और (:) विसर्ग चर्णमाला की ग्यारह स्वर ध्वनियों में अं, इ, उ, आ, हस्प कहलाते है भोर आ, ई, ऊ, श्रे, ओ, मे, औ-ये मात दीर्घ स्वर कहे जाते है । स्वर व्यंजन के पागे प्राता है तो वह व्यंजन में मिल जाता है। मिलने से उसका रूप बदल जाता है । इस बदले हाए रूप को मार कहा जाता है। मात्राएं इस तरह है-- 24 'अ' को कोई माया नही होती । 'अ' व्यंजन के प्रागे प्राता है तो भंजन के हल का चिन्ह आधा कर देता है । जैसे-+- च मात्राओं से व्यंजन के जो रूप बनते है, यह 'वारसड़ो' कहलाती है। अर्थात् मात्रामों महित व्यंजनो के स्पों को 'यारखड़ो' कहा जाता है । जैसे 'क' की बारखडी निम्न तरह है-या, का, कि, की, कु, कू, के, के, को, को, कृ । राजस्थानी में व्यंजन शिक्षा को 'कक्का' कहा जाता है। इसे सीखने के लिए प्राचीन पद्य भी है। जमे-फरको कोटकड़ो, परको गग्गा गोरी गाय, घग्गो घटूलियो आदि । राजस्थानी लिपि की कुछ विशेषताएं निम्नलिखित है-- (1) 'ल' और 'ळ' की अलग-अलग ध्वनियों है। अगर 'ल' को 'ळ' उच्चारित करें या 'ळ' को 'ल' उच्चारित करें तो प्रथं ही बदल जाता है । जैसे- पुन चोरट्यो, ल ळ गाल वाळ -- - गाळ कुल कुळ खाल सूल सूळ (2) 'व' दो तरीकों से लिखा जाता है । एक 'व' देवनागरी की तरह और दूसरा लाइन के नीचे डोट लगाकर-''। यह 'व' प्राचीन हस्तलिपियों में सब जगह मिलता है। परन्तु अब इसका प्रयोग पुराना पड़ गया .. है। करीब- करीब 'व' ही काम में लिया जाने लगा है। उदाहरण के तौर पर-वचियो- वचियो, वाळ-वाळ आदि। (3) 'ड' और 'ड' की भी अलग-अलग दो ध्वनियां है। हिन्दी में यह अलग-अलग जगह प्रयोग में ली जाती हैं। राजस्थानी में इनका प्रयोग एक जगह भी हो सकता है, परन्तु अर्थ में हर जगह अन्तर होता है । जैसे- ड़ मोडो मोडो नाडी नाडी पाडो पाड़ो (4) राजस्थानी में एक रूप परन्तु अलग-अलग अर्थ देने वाले बहुतायत में शब्द हैं । जिनके बोलने के ढंग से अर्थ बदल जाते है। जैसे- नानो ना'नो ड कद 6 25 सा'रो -- . नार नार कोड़ कोड़ सारो (5) म, श, प में से सादा ,स' ही राजस्ानी में काम में लिया जाता है । कहीं-कहीं 'प' की जगह 'ख' का प्रयोग होता है। (6) 'ढ' और 'मः' का प्रयोग राजस्थानी में नहीं होता। (7) राजस्थानी में ऋ की ध्वनि है परन्तु इसका अलग लिपि संकेत नहीं है। इसे 'रि' करके ही लिखा जाता है । जैसे- ऋतु रितु ऋपि रिसी पृथ्वी, सृष्टि और दृष्टि आदि शब्दों में जो'' का चिह्न है उसे आधा 'र' और कभी-कभी आधा 'र' के साथ में 'T' की मात्रा से लिखा जाता है। जैसे-प्रिथ्वी या प्रथवी, सिस्टी या स्रस्टी और द्रिस्टी या द्रस्टी आदि । (8) राजस्थानी में , ल मोर दीर्घ ल. की ध्वनियां नहीं है । (9) राजस्थानी में 'उ', 'ऊ' के लिपि-सकेत थोडे अलग है परन्तु राष्ट्रीय पैमाने पर लिपि की एकता को ध्यान में रखते हुए 'उ', 'ॐ' को स्वीकारा गया है । 'अ' और 'भू' कम्पोज मे भी कठिन है । (10) 'ए', 'ऐ' को ध्वनियां है परन्तु उनके संकेत 'प्रे', 'अ' है । संस्कृत के अन्तिम स्वर 'मः' की राजस्थानी में कोई ध्वनि नही है । (11)'' (नानियो खांडो चंदरमा) अव अनुस्वार में बदल गया है। इस व्यंजन की अब कोई उपयोगिता भी नहीं है। (12) 'ख' 'ध' 'च' 'झ' 'ड' '' 'म' की ध्वनियों के लिपि संकेर संस्कृत से काफी भिन्न है परन्तु अब कम्पोज की सुभिधा के कारण संस्कृत संकेतों को ही मान लिया गया है। (13) तालव्य 'श' और मूर्धन्य 'प' को ध्वनियां तो है परन्तु लिपि में दंती 'स' ही प्रयोग किया जाता है । (14) 'ज्ञ' की जो लिपि ध्वनि है, उसका स्वतन्त्र संकेत नहीं है। इसे 'ग्य' के रूप में लिखा जाता है । जैसे-ज्ञान-ग्यान । (15) संयुक्ताक्षरों की ध्वनि राजस्थानी में नहीं है । 'स' का राजस्थानी मे 'छ', 'क' या 'ख' में रूप परिवर्तन होता है । जैसे लक्षण-लखण, · लक्ष्मण- लिछमण और राक्षस-राकस आदि । (16) राजस्थानी में रेफ का प्रचलन बोली में नही है। या। तो पूरा 'र' हो जाता है या फिर पहले अक्षर में पागम हो जाता है। जैसे-धर्म- घरम या प्रम । अधिकांशतः रेफ का पूरा र' ही राजस्थानी म होता है । । । , 26 :- (17) 'क्त' की सयुक्त धनि राजस्थानी में नहीं है । 'क्त' का. पूरा 'ग' या 'क' हो जाता है। जैस रक्त-रगत, शक्ति- सगती और वक्त का वकत या बगत आदि। (18) 'ड, , , , ' बोली में होते हुए भी इनके अलग संकेत नही है। इन सबको अनुस्वार से ही लिखा जाता है । चन्द्र विन्दु का प्रयोग भी नही होता । राजस्थानी भाषा और साहित्य : काल विभाजन जैसा कि पहले वताया जा चुका है, राजस्थानी का प्राचीन नाम मरुभाषा था । पाठवी सदी के ग्रन्थ 'कुवलयमाला' में मरुभाषा का उल्लेख इस बात की साक्षी भरता है कि इसका साहित्य पाठवी सदी से भी पहले का है । इस ग्रन्थ में "अप्पा तुप्पा भणि रे, ग्रह पेच्छई मारू ए तत्तो" पद्य है । 'अप्पा तुप्पा' उस वक्त की भाषा का नाम है । 'कुवलयमाला' की एक 'चरी रास' मे मरुभाषा (जूनी राजस्थानी) का रूप नीचे द्रष्टव्य है कसिण कमळ दळ लोयण चल हंत श्रो पीण पिहुल थण कडियल-भार किलंत प्रो ताल चलित वरिणप्रावलि कलयल सह प्रो रास यमि जइ लव्मइ जुवइ मत्य ओ परन्तु आठवी शताब्दी से लेकर 10वी शताब्दी तक का बहुत कम साहित्य उपलब्ध है। 11वी शताब्दी से 13वी शताब्दी तक का भी ज्यादा साहित्य नहीं मिलता। 13वीं शताब्दी के पश्चात् को अनेकों रचनाएं इस भाषा में मिलती है। 16वी शताब्दी तक आते-आते राजस्थानी काफी समृद्ध हो जाती है। भापा की दृष्टि से इस काल को डॉ. तेस्सितोरी ने पुरानी पश्चिमी राजस्थानी नाम दिया है । डॉ. तेस्सितोरी के मतानुसार, '16वी शताब्दी तक का समय पुरानी राजस्थानी का है। यहां से गुजराती अपना स्वतन्त्र रूप विकसित करती है, और कालान्तर मे वह एक अलग भाषा बन जाती है । उधर आधुनिक राजस्थानी अपना अलग रूप ले लेती है । कई विद्वानो ने डॉ. तेस्सितोरी के. इस मत पर शंका' की है । वे 15वी शताब्दी तक की अवधि को ही जूनी पश्चिमी राजस्थानी का समय मानते है । आधुनिक राजस्थानी का समय 16वी शताब्दी से मानते है । परन्तु 16वी शताब्दीकी भाषा जूनी राजस्थानी के ही ज्यादा निकट है । सन् 1455 में पदमनाभ रचित 'कान्हड़दे प्रबन्ध' को गुजराती भाषा के विद्वान जूनी गुजराती का ग्रन्थ मानते है । इस वजह से इसे ही जूनी राजस्थानी ..का ग्रन्थ माना जाना चाहिये, माधुनिक राजस्थानी का नहीं 116वी शताब्दी में राजस्थानी साहित्य- को विस्तार मिला है। इस समय मे कई प्रसिद्ध कृवि हुए: है, परन्तु साहित्य को नया मोड़ देने वाले कवियों का प्रादुर्भाव 17वी शताब्दी में ही हुमा 27 है । डिंगल के सर्वश्रेष्ठ कवि पृथ्वीराज राठोड, दुरसा पाढा, ईसरदास, सांइया झूला प्रादि सब इसी शताब्दी के कवि हैं। यह काल ऐतिहासिक दृष्टि से भी संघर्ष का काल रहा है। 11वीं शताब्दी के प्रारम्भ में शक्तिशाली पड़िहार राज्य का पतन महमूद गजनी के हामो 1018 में होता है। 1000-1200 तक मपनी सत्ता स्थापित करने के लिए गजपूतों में संघर्ष चलता है । जिनमें चालुक्य, परमार और चहुँवारण प्रमुख है । इसके पश्चात् यहां के हिन्दू राजाओं को अल्लाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद तुगलक, पठानों, सैयदो और लोदी वंश के शासकों से निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। संग्रामसिंह के साथ खानवा के मैदान में बाबर का अन्तिम युद्ध होता है और संग्रामसिंह की पराजय के साथ मुगल साम्राज्य की नींव भारतवर्ष में पड़ती है । परन्तु इसके पश्चात् भी राजस्थान के लोग मुगल सना के सामने, एकदम हथियार नही डालते । महाराणा प्रताप सरीखे प्रतापी योद्धा संघर्ष जारी रखते है। 18वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मुगल साम्राज्य का पतन होता है और मराठों का राजस्थान में पदार्पण होता है। सन् 1818 में अंग्रेजों की राजस्थान की रियासतों पर राजनैतिक सत्ता स्थापित होती है जो 1947 तक चलती है । इस बीच माजादी के स्वर राजस्थान और राजस्थानी कविता में गूजते हैं। 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद होता है । राजस्थान का एकीकरण होता है । प्राजादी के पश्चात् नव-सृजन नये तेवर लेकर पाता है । नये-नये आयाम खडे होते हैं और नये-नये चेलेन्ज । राजस्थानी इन सबको स्वीकारती है। राजस्थानी पद्य स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारती स्तर पर अपनी साख स्थापित करता है, तो गद्य इस तरफ संघर्षरत स्पष्ट दिखाई देता है । साहित्य के इतिहास लेखन की दष्टि से सम्पूर्ण राजस्थानी साहित्य के अध्ययन के लिए काल विभाजन की आवश्यकता होती है । काल विभाजन काल विभाजन किसी भी साहित्य के अध्ययन की सुविधा हेतु किया जाता है । क्योकि सम्पूर्ण साहित्य का अध्ययन एक ही अध्याय में किया जाना न तो सम्भव है और न ही वैज्ञानिक । काल विशेष में साहित्य की अलग-अलग प्रवृत्तियां होती है, और कई प्रवृत्तियां पीछे छूट जाती है, कई नई प्रवृत्तियां देखने को मिलती है और कई प्रवृत्तियां किसी काल खण्ड तक निरन्तर चलती रहती है। फिर सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भी होते हैं जिनसे साहित्य प्रभावित होता है। हालांकि एक सही विभाजन रेखा खीचकर एक काल को दूसरे काल से अलग करना तो मम्भव नहीं है, क्योंकि सामाजिक-राजनैतिक बदलाव के माय भापा और साहित्य में भी ऋमिक विकास.होता है। यह विकासक्रम कही टूटता नहीं है। एक युग की भाषागत् और साहित्यिक विशेषताएं किसी न किसी रूप में दूसरे.युग की रचनाओं को भी प्रभावित करती रहती हैं। परन्तु साहित्य के विकास का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से ठीक तरह हो जाए, इस हेतु समस्त कालक्रम .
28 को किसी न किसी आधार पर कई भागों में बांटा जाता है । राजस्थानी साहित्य के विकास को भी विद्वानों ने अपने-अपने मतों के अनुसार अपने-अपने ढंग से कई कालखण्डों में विभाजित किया है। उनके काल विभाजन की चर्चा करना उचित होगा ताकि आगे सही दिशा निर्धारित की जा सके । डॉ. एल. पी. तेस्सितोरी ने भापा के रूप को आधार मा कर दो स्थूल विभाजन किये है-प्राचीन रूप (स.1357 से 1657 तक) नया रूप (1657 से आगे)। डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने क्रम को ध्यान रखकर समस्त साहित्य को चार काल-भागों में विभाजित किया है--प्रारम्म काल (स. 1045 से 1460 तक), पूर्व मध्यकाल (स. 1460 से 1700 तक), उत्तर मव्यकाल (स. 1700 मे 1900 तक) और आधुनिक काल (स. 1900 से आगे)। प्रो. नरोत्तम स्वामी ने इस क्रमिक विकास में थोड़ा अन्तर मानकर तीन भागो में बांटा है-प्राचीन काल (स. 1150 से 1550 तक), मध्यकाल (स. 1550 से 1875 तक) और अर्वाचीन काल (स. 1875 से आज तक)। श्री गजराज अोझा ने विकासात्मक अवस्था को मान कर इस काल विभाजन में थोडा और अन्तर किया है-प्रारम्भ काल (स. 1000 से 1400 तक), मध्यकाल (स. 1400 से 1800 तक) और उत्तरकाल (स. 1801 से आज तक)। डॉ. हीरालाल महेश्वरी ने अपने शोध प्रबन्ध 'राजस्थानी भाषा और साहित्य' में सुपुष्ट प्रमाणों के साथ प्रारम्भ के दो कालो का विभाजन इस तरह किया है-(i) विकास काल (स. 1100 से 1500 तक) और (ii) विकसित काल (स. 1500 से 1650 तक)। परन्तु इस काल विभाजन को इन्होने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ राजस्थानी लिटरेचर' में बदल दिया है । जो इस प्रकार है- 1. प्रारम्भ काल (सन् 1050 से 1450 तक) 2. मध्यकाल (सन् 1450 से 1850 तक). .3.प्राधुनिक काल (सन् 1850 से आगे) आधुनिक काल के फिर दो उपभाग किए है- (1) म. 1850/57 से 1947/50.तक (ii) म..1947/50 से आगे। इन उपरोक्त काल विभाजनो से एक बात स्पष्ट होती है कि विद्वान लोग राजस्थानी साहित्य को परम्परा दसवींनयारहवी शताब्दी से मानते है। परन्तु राजस्थानी का उद्गम इससे भी प्राचीन है । कई विद्वानों का मानना है कि राजस्थानी का उद्गम 5वी शताब्दी में हो गया होगा। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने दसवी पतादी के राजस्थान में भरपूर साहित्य को यात कही तया । - ..
29 राजस्थानी में जो चरित्र याव्य लिसे जाते थे उनका प्रचलन भी सातवी. शताब्दी बनाया है। यह भी सत्य है कि महमूद गजनी ने राजपाल को हराकर 1018 में प्रतिहार राज्य को समाप्त किया था, और उसके पहले भी राजस्थानी का. अस्तित्व था। प्रतिहारों का मूल घर गुर्जर प्रदेश था और इस वक्त भी इनके भीनमार और जालोर केन्द्र थे । मिहिरभोज 9वी शताब्दी में प्रतिहारी का प्रतापी राजा हुआ है । गुर्जर शब्द भौगोतिक भू-खण्ड को बताता है, कोई जाति मादि को नही । जब गुर्जर देश चालुक्यों के कटजे में पा गया, तो भी उसका नाम वही रहा। जूनी राजस्थानी का प्रादुर्भाव सम्भवतः यही से हुआ होगा। मायुनिक राजस्थानी और प्राघुनिक गुजराती के प्राचीन रूप प्रापस में गहरे ये हुए है और इनमें प्राकृत-अपभ्रंश को भी विशेषताएं मिलती है। गुजराती के मुप्रसिद्ध विद्वान झवेरचन्द मेघाणी प्राचीन राजस्थानी को गुजराती की जननी मानते है । उक्त सन्दर्भ में भी राजस्थानी का प्रारम्भ काफी पहले हुआ होगा, परन्तु उस वक्त का साहित्य उपलब्ध नहीं है। राजस्थानी के प्राचीन साहित्य में जैन साहित्य की प्रधानता रही है । प्राचीन जैन ग्रन्यों में उनके रचना काल, रचना स्थान प्रादि के उल्लेख नहीं मिलते । इस वजह से सातवीं शताब्दी से पहले के अन्यों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वे कव रचे गये और कहां रचे गये । पाठवी शताब्दी के प्राचार्य हरिमद्र मूरि ने 'पूर्ताख्यान' को रचना चित्तौड़ में की, इस बात का स्पष्ट उल्लेख इस ग्रन्थ के अन्त में मिलता है। पांचवी शताब्दी के महान दार्शनिक जन विद्वान मिद्धसेन दिवाकर मालवा प्रदेश में विचरे थे। हो सकता है कि वे राजस्थान प्राए हो। उद्योतन सूरि का ग्रन्थ 'कुवलयमाला' जैन ग्रन्थों में राजस्थानी के बारे में पुख्ता जानकारी देने वाला ग्रन्थ है। 16वी शताब्दी में 'उपमिति भव प्रपञ्च कथा' नाम से रूपक ग्रन्य सिद्धपि ने श्री मालनगर में रचा। 11वी शताब्दी में जिनेश्वर सूरि, बुद्धिश्वर सूरि ग्रादि विद्वानों के ग्रन्थ भी सामने आते है। कवि धनपाल रचित 'सच्च उरिय महावीर उत्साह' में अपभ्रंश में राजस्थानी के विकास के चिन्ह मिलने लग जाते है । ऐसे ही प्रागे भी जैन साघु अपनी रचनाओं से राजस्थानी के भण्डार भरते है । इस अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि राजस्थानी के विकास का एक युग अंधेरे से ढका हुआ है। पांचवी शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक की साहित्यिक परम्परा राजस्थानी मे अवश्य रही होगी। परन्तु यह साहित्य कालक्रम में कही खो गया है। जन लोगो ने अपने साहित्य को मम्भाल कर रखा, इसलिए उमसे कुछ प्रकाश मिलता है । परन्तु राजस्थानी का काल विभाजन इम पूरे कान खण्ड को छोड़कर नहीं किया जाना चाहिए । भले ही इमे 'अन्धकारमय युग' ही कहा जाय या और किसी नाम से अभिप्रेत किया जाए परन्तु 5वी शताब्दी से लेकर वी शताब्दी के कालखण्ड को एक युग ध में बांधना 30 आवश्यक प्रतीत होता है । वह इसलिए भी कि शोध विद्वानों के सामने एक शोध का विषय उपस्थित रहे और इस दिशा में प्रयास जारी रहें । इस तरह से राजस्थानी साहित्य की सम्पूर्ण विकास-यात्रा को चार भागों में ही बांटना श्रेयस्कर होगा । (1) अन्धकारमय युग (2) प्रारम्भकाल (3) मध्यकाल और (4) माधुनिक काल । आधुनिक काल को दो शीर्षको में विभाजित करना भी उपयुक्त रहेगा । यथा (i) सन् 1857 से 1947 और (ii) सन् 1947 से प्राग । परन्तु विद्यमान सूचनामों एवं स्थिति को मध्यनजर रखें तो फिलहाल साहित्य के इतिहास के अध्ययन का प्रारम्भ ! वी शताब्दी से ही शुरू करना सही प्रतीत होता है । इस सदी में जन- साहित्य प्रचुर मात्रा में सामने आ जाता है । परन्तु पांचवीं सदी से 10वी सदी में राजस्थानी के विकास क्रम द्वानों का निरन्तर ध्यान प्रापित करती रहेगी। बात राजस्थानी साहित्य का एक युग अंधकार में है अतः प्रारम्भकाल वहां से शुरू होता है जहां से राजस्थानी के बारे में रचनाएं मिलनी शुरू हुई अर्थात् वहाँ से शुरू होता है जहाँ से राजस्थानी साहित्य की रचनाएं मिली हैं । यह फाल राजस्थानी की प्रतिस्थापना का काल है यह राजस्थानी के प्रारम्भिक इतिहास की खोज का काल है । यह काल शोधपूर्ण प्रयासों का परिणाम है । राजस्थानी की पहचान का एक युग इससे पूर्व अवश्य होगा जो अपूर्व साबित हो एवं काल विभाजन को एकदम ही बदल दे । परन्तु यह भी शोध का विषय है । इस स्थिति की तरफ इंगित करना आवश्यक है। राजस्थानी साहित्य के विकास का प्रारम्भ काल 11वी शताब्दी से शुरू होता है । वो इसलिए कि इस काल मे जैन साहित्य काफी तादाद में मिलने लग जाता है । यह साहित्य राजस्थानी की प्राचीन स्थिति और उसकी प्रवृत्ति को बत- लाता है और परम्परा को प्रतिस्थापित करता है । राजस्थानी का इस समय का स्वरूप आज के स्वरूप से काफी भिन्न था । इसलिए विद्यार्थियों के लिए तो यह बात अटपटी-सी हो सकती है परन्तु प्रारम्भिक स्थिति सभी भाषाओ की ऐसी ही रही है । हिन्दी का प्रारम्भिक रूप आज की हिन्दी से काफी भिन्न है। ऐसी ही अंग्रेजी की स्थिति रही है । शेक्सपियर और उसके पहले की अंग्रेजी माज की अंग्रेजी से कितनी भिन्न है, पढने से पता लग जाता है । राजस्थानी की अस्मिता का प्रारम्भ यही से स्थापित होता है । यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि राजस्थानी के प्रारम्भ काल में जितनी रचनाएं मिलती हैं उतनी किसी भी भाषा के साहित्य के प्रारम्भ काल मे नहीं मिलती। इस युग में राजस्थानी और गुजराती गूथी हुई मिलती है । इसलिए राजस्थानी का यह माहित्य राजस्थानी और गुजराती दोनों की समान धरोहर या बपौती है। सन् 1050 से लेकर कोई सौ वर्षों तक वैयक्तिक रचनाएं देखने को नहीं मिलतीं । इन सौ वर्षों मे फुटकर रचनाएं लिखी गई, जिनकी भाषा मारु-गुर्जर थी। यही मार-गुर्जर प्राचीन राजस्थानी का स्वरूप है जिससे आगे चलकर दो स्वतन्त्र भाषाएं बनती है । परन्तु 12धी शताब्दी के उत्तराद्ध में वैयक्तिक रचनाए, भले ही वे आकार में छोटी हों, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने लगती है.। ये मुख्यतया जैनियों की रचनाएं है जो उनके धर्म प्रचार के साथ-साथ उस समय के सामाजिक और 32 मांतिक जीवन पर भी प्रकाश डामतीराम काल में कोई 50 नगभग जन साहित्यकारों के अन्यों का पता पपना है। जिनमें गे नियम गि, यसगेन मूरि, शालिमद मूरि, नेमीचन्द मंडारी, विजयमेन मूरि, मिनर गरि, विजयनन्द गरि राजसर भूरि, विनयम, तरणम मूरि, गान कारग, पृथ्वीगार पाक्षिप्रमुग हैं। 'अयमेन मूरि' या 'मरतेश्वर बाहुबलि पोर' राजस्थानी पो प्राचीनतम रचना है जो 1168 के प्रामपाग रची गई, इसकी भाषा मार-गुजर है। यह रचना 48 पर्दा फा एक छोटा परन्तु एक पच्या वीर पोर शांत रम मा काम गरे पश्चात् 'भरत-बाहुबलि रास' अन्य निमा गया। जिसमा नाकार राजस्थानी का सबसे पहला महत्त्वपूर्ण कवि शालिमद मूरिया । प्रो. नरोत्तम मामो इगका रचनाकान' मंवत् 1241 बनाते हैं। यह एक गड काय्य है । यह देगी छटी एवं राग-रागनियों में लिखा हुप्रा है। इन रचनामों में गात होता है कि अपभ्रंग का मार-गुर्जर पर प्रभाव 12वी शताब्दी तक रहा । पारम्भ काल पोर मध्यकाल के बीच विभाजन रेगा वहा मेसीनी जाती है जहाँ से मरु भाषा यानि राजस्थानी गुर्जर मापा से अलग होती है । इसके अलावा साहित्य की दृष्टि में भी इन दोनों कान मण्डों के बीच विभाजन रेमा गीची जाती है। प्रारम्भ काल में धर्मनिरपेक्ष रचनाएं जैनियों मोर पारणों को मिलती है परन्तु मध्यकाल के मूत्रपात से दो नई धागए मास्मान-काव्य मोर मन्न-गाहित्य प्रगट होतो हैं, फलती-फूलती हैं । 'कथा प्राहमनी' राजस्थानी प्रास्यान काव्य को पहली रचना कही जाती है नो जाम्भोजी राजस्थानी सन्त साहित्य के प्रथम चिन्दु बनते हैं । 'वचनिका प्रचलदास खीचोरी' मध्यकाल की प्रमुरा रचना है। इसमे राजस्थानी गद्य का भी अच्छा उदाहरण मिलता है। इग काल में देवो करणी पोर पोच पीरों के प्रादुभाव से भक्ति काथ्य की अच्छी रचनाएं सामने आई है । ये सब तथ्य इम विभाजन की पुष्टि करते है, इमे पुस्ता करते है। मध्यकाल यानि 1450 से. लेकर 1850 नक जो माहित्य लिखा गया उमने हर क्षेत्र मे नये प्रायाम दिए है। प्राधुनिक काल ग्रिटिश राज और उसके प्रभाव से शुरू होता है। जिस प्रकार से मध्यकाल में मुगल साम्राज्य राजस्थानी साहित्य को प्रभावित करता रहा उसी तरह से ब्रिटिश राज ने राजस्थानी साहित्य को प्रभावित किया। इस वक्त पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार से बाहरी जगत से सम्बन्ध जुड़ने लगा और विज्ञान तथा तकनीकी को नई-नई जानकारी मिलने लगी । ग्रिटेन में हुई प्रौद्योगिक क्रांति ने यहां के जन-जीवन को झकझोर दिया। इससे सोचने के तौर-तरीको में पौर विचारधारा में तेजी से बदलाव आया। ब्रिटिश राज के तौर-तरीके 1850 के प्रामपाम राजस्थानी कविता को प्रभावित करने लग जाते है । यही से आधुनिक फाल की शुरूपात चिन्हित होती है। इम तरह प्रारम्भ काल राजस्थानी रचनायो की प्राप्ति और पहचान से शुरू होकर साहित्यिकता को परखने के साथ शुरू होता है। यह वहाँ तक कदम भरता ।
33 चलता है जहाँ तक राजस्थानी और गुजराती साथ-साय चलती हैं और यही अपने पर रोक लेता है जहां वे एक दूसरे से अलग हो जाती हैं । मध्यकाल की शुरूपात यही से चिन्हित होती है। मध्यकाल अपनी विशेषताओं को लिए वहाँ तक चलकर अपने पर रोक लेता है जहाँ तक राजस्थानी अपने मूलरूप को पहचाने रखती है और पाश्चात्य ढंग से परे, अप्रभावित रहती है। जहां से यह प्रभाव अंकित होता है मध्यकाल रुक जाता है और आधुनिक काल अपने कदम भरने शुरू कर देता है । जहां राजस्थानी अपनी प्राचीन एवं मध्यकालीन प्रवृत्तियो को अलग रखकर नवीन प्रवृत्तियों में ढलने लग जाती है, नवयुग की शुरूपात होती है। इस वक्त गद्य-पद्य दोनों मे नवीन प्रवृत्तियां साफ दृष्टिगोचर होने लग जाती है । रचनाकारो ने अपनी कलम से, भाषा ने अपनी मांठ-मरोड़ और मीट के बदलाव से और युग ने अपने प्रभाव से इन कालखण्डों की विभाजन रेखाएं दी हैं । राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भ काल का साहित्य तीन अलग-अलग शैलियो में मिलता है : जैन शैली, चारण शैली और लौकिक शैली। जैन शैली, जन साहित्य- कारो की अपनी रचनाओं में अपनाई गई एक विशिष्ट शैली है । चारण-शैली, चारण साहित्यकारो द्वारा अपनाई गई अपनी शैली है, जिसकी अपनी पहचान भाषा और वर्णन के तौर-तरीकों तथा छंद आदि से है । लौकिक-शैली, इन दोनो से भिन्न शैली है जो कि लौकिक रचनाओं के रचनाकारों ने अपनाई है । सरसता, सरलता और सादापन इसकी अपनी विशेषताएं है। प्रारम्भ काल का अध्ययन हम इन्ही तीन शैलियों के शीर्षकों के अन्तर्गत करेंगे। जन साहित्य जन साहित्य मुख्यतया धार्मिक साहित्य है । यह साहित्य गद्य और पद्य दोनों में मिलता है । इस वक्त का गद्य दो तरह का था। प्रथम मूल और दूसरा व्याख्या । इसी तरह इस काल के जैन पद्य साहित्य को चार भागो मे देखा जा सकता है-चरित-काव्य या कथा-काव्य, उत्सव-काव्य, नीति-काव्य और स्तुति-काव्य । चरित काव्यों में प्रसिद्ध पुरुषों के चरित्र और जीवनवृत्त को सामने रखकर रचना की जाती है । ऐसी रचनायो को इस काल में कई नाम दिए गए, यथा-रास, चौपाई धवल, चर्चरी, प्रबन्ध, चरित, कथा ग्रादि । उत्सव काव्य विशेष आयोजनों और उत्सवों से सम्बन्धित है, जिन्हे फाग, धमाल, वारहमासा, चौमासा, व्याहलो, मंगल आदि नाम दिए गए है । नीति काध्य की कविताएं नैतिक व्यवहार और प्रावरण से सम्बन्धित है, जिनके नाम संवाद, कक्का, मातृका, बावनी, छत्तीसी प्रादि रमे गए है । स्तुति काव्य तीयं करो की प्रशंसा में लिखे हुए काव्य है। ऐसी रचनाएँ माध्यात्मिक पुरुषो और पवित्र स्थानो पर रची मिलती है, जिनको स्तुति, स्तवन, विनती, नामकार, बीसी, चौबीसी आदि नाम दिए गए हैं ।
- जैन कवियो का मूल उद्देश्य प्राध्यात्मिक और धार्मिक रहा है। इनका मुख्य ध्येय नंतिक नव पीढ़ी का निर्माण रहा है । 'राम' जन कवियों का मुस्य काव्य रहा है। इस वक्त रास काव्य राग-रागनियो और अपभ्रंश वंदों में लिखा जाता था। कही कही शृंगार और करुण रास भी मिलती है। राजस्थानी के उद्भव और विकाम में जन माहित्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यह प्रारम्भ काल से लेकर प्रद तक निर्वाध प में मिलता है। 11 वी से 34 वी शताब्दी तक के साहित्य के इतिहास लेखन हेतु इमी साहित्य पर निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि दूसरा प्रामाणिक साहित्य नहीं मिलता। जन लोगो ने अपनी रचनाओं को नष्ट होने से बचा लिया परन्तु जने तर रचनाएं बिना सहारे और सुरक्षा के काफी मात्रा में नष्ट हो गई, जो थोटी-बहुत वची वे भी प्रकाश में नहीं पाई। इस तरह से प्रारम्भ काल में जैन साहित्य ही राजस्थानी को स्थिति, भाषा प्रवाह और प्रवृत्तियो को अंकित करता है, और अपना प्रमुख स्थान रखता है । इस काल की प्रमुग्न जैन कृतियो का परिचय नीचे दिया जा रहा है- सच्च उरिय महावीर उत्साह-इस रचना का रचयिता कवि धनपाल था। इस उत्साह मंजक रचना में मारवाड के मांचोर में भगवान महावीर की जो मूर्ति है, उसे महमूद गजनी ने तोड़ने का प्रयास किया था परन्तु वह सफल हो मका, इस घटना का ऐतिहासिक उल्लेस इस रचना में हुमा है, जो बहुत महत्त्वपूर्ण है । यद्यपि इसमें महमूद गजनी के नाम का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं किया गया है परन्तु इसके वर्णन के पूर्व के पद्यों मे 'तुरक्क' शब्द आता है, जो इमी हेतु से युक्त हुआ है । यह 15 पदो की रचना है । इसमें प्राचीन जैन तीर्थ और मूर्ति सम्बन्धी ऐतिहासिक घटना का उल्लेख होने की वजह से इस रचना का विशेष महत्त्व है । वैसे भी धनपाल महाकवि हुए है। उनकी रचना तिला मंजरी' 'कादम्बरी' के टकार की कृति मानी जाती है। कवि धनपाल-विद्या-विनासी महाराजा भोज के सभा. पंडित थे । मूल रूप में ब्राह्मण थे, परन्तु जैन मुनियों की सतसग से जैन बन गए यताए जाते है। जिन दत्त मरि स्तुति-इस ग्रंथ की रचना 12 वी शताब्दी में हुई है। इसके रचयिता कवि पल्ल थे। इस ग्रंथ की कई ताडपत्रीय प्रतियां प्राप्त हुई है। इसमे 10 घणय छंद है । भापा अपभ्रंश प्रधान है। भरतेश्वर बाहुबलि घोर-इस कृति के रचयिता वचसन सूरि है जो देवमूरि के शिष्य थे। इस कृति में 48 पद्य है। इसका रचनाकाल 1168 ईस्वी के प्रास- पाम रहा है । इसके पद्यों में भरतेश्वर वाहुबलि के युद्ध प्रादि का वर्णन है । इस ग्रंथ को कथा इस तरह है-~-प्रथम तीर्य कर रखवदेव के भरत और बाहुबलि सहित सो पुर । मृत्यु नजदीक जान रिखदेव अपना साम्राज्य अपने पुत्रो में बांट साधु बन गए। चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा में भरत ने अपने 98 भाइयो का थे 35 भरत देश साम्राज्य तो छीन लिया परन्तु वाहुबलि उसके बस में नहीं पाया। उसने खुले रूप से भरत का विरोध किया । भरत ने इस पर बाहुबलि पर पाक्रमण किया परन्तु वह उसे पराजित न कर सका । भरत ने बाहुबलि को मारने के लिए 'चक्र' चलाया परन्तु वह चक्र ऐसा कि एक ही कुल के आदमी पर असर नही करे। फिर द्वन्द्व युद्ध हुआ। जिसमें बाहुबलि के काफी चोटें आई परन्तु उसने अपने छोटे भाई से हार नहीं मानी । परन्तु इस युद्ध से उसे विरक्ति सी पैदा हो जाती है और वह मुनि बन जाता है । अहंकार को छोड़ सब मंशानो को त्याग देता है। पर शासन करता है और वह आत्म-अनुमति की अवस्था पर पहुँच जाता है। इस कथा पर सर्वाधिक मशक्त और स्पर्श करने वाला काव्य 'भरतेश्वर बाहुबलि रास' है । जिसकी रचना वनसेन सूरि के पट्टधर शालिभद्र सूरि ने की। यह रचना 1184 में लिखी हुई संवतोल्लेख वाली सबसे पहली राजस्थानी रचना है। इसमें 203 पद्य है । वस्तु, ठवणि, धवल, गटक आदि इस रचना में पाए हैं। राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भ काल में वीर काव्यों मे यह रचना बहुत महत्त्वपूर्ण रचना मानी जाती है । भापा प्रवाह और भाषा वैभव की दृष्टि से भी यह एक महत्त्वपूर्ण रचना है। बुद्धिरास-~-शालिभद्र सूरि रचित 'बुद्धिरास' लोकोपयोगी होने की वजह से काफी प्रचारित हुई है। इसमें भोले-भाले लोगों के लिए 'सिखामण' दी गई है। इसमें 63 पद्य है । लोक मे प्रशंसित होने की वजह से इसकी भाषा में कुछ परिवर्तन पा गया है । अम्बिका और गौतम स्वामी को नमस्कार करके कवि ने सद्गुरु के वचन से यह कृति बहुत ही सरल भाषा में रची है । कवि इसके लिए लिखता है कि इसके बोल लोक प्रचलित है, कुछ सद गुरु के उपदेशो से लिए गए है । इसके पद्य यह शिक्षा देते है कि गहरे पानी में मत जाओ, अन्जान घर में वास मत करो, महानता के लिए स्पष्ट मत बोलो, रास्ते चलती औरत से झगडा मत करो। इस तरह से इस कृति में लोकोपयोगी शिक्षाओं को कवि ने पद्यबद्ध किया है तो गुरु के उपदेशों को भी काव्यगत रूप दिया है । इसके पद्य की बानगी द्रष्टव्य है-- जारिणउ धरमु जीव विणसु, अणजारिए ई परिय करिसि वासु । चोरी कारु चडई अगासीधी, वस्तु सु किमइ म लेसी अदीची ॥ परिघरि गोठि किमड म जाइसि, कुडउ आलु तु महिया पामिसि । जे घर हुइ एकलि नारि, किमइ न जाइसि तेह घरवारि ॥ घर पच्छोकडि रामे छोडी, बरजे नारि जे वाहिरि हीडी। पर-स्त्री वहिनि भरणीनई माने, पर स्त्री बयरग मे धरजे काने । कृति की पद्य रचना सरस और सरल है । भाषा में प्रारम्भकाल की मरु- भाषा को लाक्षरिएकता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। पद्य-बंध भी गेयता लिए 36 जीवदयारास-भरतेश्वर वाहुबलि रास के पश्चात् मंवतोल्लेख वाली रचना कवि 'ग्रासिगु' रचित 'जीवदयारास' है। यह रचना 1200 ईस्वी मे लिखी गई। इसमे 53 पद्य है। इस रचना का कवि आसिगु जालोर का निवासी था, या फिर यहाँ उसका ननिहाल था, जिसकी वजह से वह जालोर आ गया था। इस कृति का कवि भक्त था । अपने नाम के प्रागे वह 'कवि' विशेषण लगाता। 'आसिगु' रचित 'चंदन बाला रास' नाम से एक और रचना मिलती है । 'जीवदया- रास' मे कवि ने अपना जो परिचय दिया है वह इस तरह है- वाला मगि तणइ पाछोपड, वेहल महि नन्दन महिरोपाइ । तसु सखहं कुलचंद फलु, तरउ कुलि प्रासाइतु अच्छतु । तसु वलहिय पल्ली पवर, कवि आसिगु बहुगुण सजुतु ॥ जीव दया के प्रभाव को बताने के लिए इस रास की रचना की गई है। परन्तु कवि ने इसमें जैन तीर्थों का भी वर्णन किया है । जिनमे साचोर, चड्डावलि, नागदह, फलवद्धि, जालोर आदि राजस्थान के है । कवि कहता है--संसार के सब मनुष्य समान है । जो दीन दुखियो को दान नही देते उन्हे दूसरों के यहाँ नौकरी करके अपना गुजर-बसर चलाना पडता है। यह कवि की अपनी धार्मिक प्रतिस्थापना है जो अपने काल के मनुष्य के सोच को बताती है । 'चंदनबालारास'-इसमें 35 पद्य है । इसमे सती चन्दन बाला और उसकी तरफ से भगवान महावीर को किए गए आहार-दान का प्रसंग वरिणत हुआ है । यह रास भी जालोर मे ही रचा गया था। 12 वी शताब्दी मे अधिक रचनाएं नही आई परन्तु 13 वी शताब्दी और उसके आगे काफी संख्या मे तरह-तरह की रचनाएं मिलने लग जाती है। उनमे से कुछ प्रमुख रचनायो की चर्चा करना ही समीचीन होगा। ये प्रमुख रचनाएं निम्न लिखित है- जम्बूस्वामीरास-~संवतोल्लेख वाली यह तीसरी राजस्थानी रचना है। महेन्द्रसूरि के शिष्य 'धर्म' ने 1209 मे इसकी रचना की । इसमे 41 पद्य है । इन पद्यों में भगवान महावीर के शिष्य जम्बूस्वामी का चरित वणित है । जम्बूस्वामी की कथा बहुत ही मार्मिक है। शादी की पहली रात ही उन्होने अपनी पाठ पलियो को 'प्रनियोध' दिया परन्तु 'प्रभव' नामक चोर ने भी इन्ही के साय यह प्रतियोच सुन लिया और वह भी प्रतिबुद्ध हो गया । सुनने वालो मे उसके 500 चोर सायो और थे, वे भी सब प्रतियुद्ध हो उसके अनुयायी बन गए । मजे की बात तो यह है कि ये चोर उनके घर में चोरी करने के इरादे मे पाए मानस एकदम बदल गया और वे सब इनके अनुयायी हो गए। नेमिनाय बारह मासा-अपभ्रंश में सबसे प्राचीन वारहमासा "जिन धर्म मूरि' कृत 'बारहन विउ' 13 वी शताब्दी को रचना है । परन्तु इससे भी महत्त्वपूर्ण थे । परन्तु उनका कृतियाँ 'पाल्हण' कवि रचित 'नेमिनाथ बारहमासा' और 'बाबूराम' है। नेमि- नाथ बारहमासा में 16 पद्य है । इमको रचना 1233 ईस्वी में हुई। नेमिनाथ 22 वें तीर्थकर हुए है । वे महाराजा समुद्र विजय के पुत्र थे । उनका विवाह उग्रसेन की पुत्री राजमती मे होना त हुआ था, परन्तु जब बारात उग्रसेन के महल में पहुँची तो नेमिनाथ को बंदी जानवरो और पक्षियों की करुण अावाज सुनाई दी, जिसका अर्थ पा-बारात को भोजन करायो । नेमिनाथ इन बेजुबान, निरपराध जानवरों व पक्षियों पर मनुष्य की क्रूरता से अत्यधिक दुःखी हो गए और गहरी मंवेदना में इब गए । उनको इन जानवरों व पक्षियो पर बहुत दया आई। इस घटना का प्रमर उन पर यह हुआ कि वे सावु बनकर गिरनार पहुंच गए। राजमती को जब इस बात का पता लगा तो उसके दिल को भी बहुत ठेस लगी और उसने भी वही रास्ता अपनाने का विचार कर लिया। नेमिनाथ बारहमामा मार-गुर्जर कविता का पहला बारहमासा है । राजमती कभी नेमिनाथ से नहीं मिली । यह बारहमासा नायिका के साध्वी बनने के साथ मम्पूर्ण होता है। मारास-पाल्हण कवि रचित यह 53 पद्यों की रचना है । आबूरास के 53 वें पद्य के अन्त में 'पाल्हण' नाम प्राता है । इमको रचना भी 1233 में हुई है । इसमे आबू पर्वत पर मन्दिर निर्माण का वर्णन हुअा है । शांतिनाथ देवरास-~-इम कृति के रचयिता लक्ष्मी तिलक उपाध्याय है। इसका रचनाकाल 1256 के प्रासपाम है । इस कृति में जैन धर्म के 16 वें तीर्य कर शांतिनाथ के जीवन-वृत्त का संक्षिप्त वर्णन हुआ है। इसमें कई ऐतिहासिक तथ्य भी उद घाटित हुए हैं। कृति में खेडनगर में उद्धरणकारित शाति जिनालय की प्रतिष्ठा जिनपति सूरिजी ने की, जालोर मे उदयसिंह के राज्य में शांति जिनालय की प्रतिष्ठा जिनेश्वरसूरि ने की प्रादि तथ्य पाए हैं। दोनो 'प्रनिष्ठायो सम्बन्धी गद्य भी इन रचनामों प्राया है। उपरिलिखित ग्रंथों के अलावा "जिनेश्वरसूरि संयम श्री विवाहवर्णनरास' नामक कृति भी एक उल्लेखनीय कृति है । जिम की रचना कवि 'सोममूर्ति' ने की । जिसमे जिनेश्वरमूरि के दीक्षा प्रसंग का वर्णन किया हुआ है। यह रास 33 पद्यो का है । कवि सोममूर्ति ने ही 'जिनप्रबोधसूरि चर्चरो' नाम से 16 पद्यो को कृति की रचना की जिसमे जिन प्रबोध सूरि के प्राचार्य पद-स्थापन का उल्लेख है। 'चर्चरी' सज्ञाक रचनाएं बहुत कम मिली है। कवि सोममूर्ति रचित दो रचनाएं और प्राप्त हुई है.---'गुरावली रे लुप्री' और 'जिनप्रबोधसूरि बोलिका' ये क्रमशः 13 और 12 पद्यों की रचनाएं है । फागु काव्य--इस काल में कई फागु काव्य लिखे गए। इसी काल में 'राजशेखरसूरि' ने 'नेमिनाथ फागु' की रचना की। इस कृति में राजमती के के शि शृंगार का वर्णन कवि ने काफी विस्तार से किया है । जिनपद्मसूरि ने फाग' की रचना की। अगरचन्द नाहटा इसके रचनाकार का नाम 'हलराज' बताते है। इस वक्त औरते फाग खेलती और फागु काव्य रचे जाते । स्यूरिट फाग की रचना 1333 में हुई। इस काल में काफी मात्रा में फागु काव्य रचे गा 'पंचपांडवरास' और 'गौतमस्वामीरास'-पूणिमागच्छ 'शालिभद्रसूरि' ने 'पचपाडवगग' को रचना की। इग कृति का रचनाकाल स 1353 है । सन् 1335 में 'उपाध्याय विनय प्रभ' ने 'गौतम स्वामी रास' रचा इसमे 45 पद्य है । ये दोनो ही रचनाएं अपने काल की विशेष कृतियां मानी जाती इस काल को जैन रचनायो की चर्चा के पश्चात् अगरचन्द नाहटा ने 11वी से 15 वी शताब्दी तक के काल को राजस्थानी साहित्य का प्रारम्भ काल माना है । उनका मत है कि 16 वी शताब्दी से राजस्थानी और गुजराती में अन्तर काफी स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लग जाता है। इसलिए यही से ही मध्य काल का प्रारम्भ माना जाना चाहिए । लौकिक प्रेम काव्य राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भ काल मे लौकिक विषयो को लेकर रचनाएं सामने आई है। कवियो ने लौकिक विषयों को भी काफी छुपा है प्राचार्य हेमचन्द्र' रचित सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन' में, 'सोमप्रभसूरि' रचि 'कुमारपाल प्रतिबोध' मे, प्राचार्य 'मेरुतुग' रचित 'बढवान' मे, 'प्रभाचन्द्र मूरि रचित 'प्रबंध चिन्तामणि मे और 'राजशेखर' रचित 'प्रबंध कोप' में विविध पद्य मिले है जो अपभ्रंश मिश्रित देशी भाषा अथवा मारु गुर्जर के है जिनकी विषयवस्तु विविध है । प्रेम-भावना, दूरी, वीरता, बहादुर औरतो के स्वाभिमान और वैभव, विद्वत्ता आदि प्रचुर मात्रा मे वरिणत हुए है । 'सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन' के कुछ दोहे नीचे उद्धत किए जाते है- भल्ला हुआ जु मारिया, बहिरिण महारा क तु । लज्ज जति वयसि पहु, जइ भग्गा घर जनु ।। वायसु उडडा वंतिपए, पिउ दिट्ट सहसत्ति । अद्धा वळया महि हिगय, उद्धा फुट्ट तडत्ति । प्रथम दोहे में वीरता की भावना वरिणत है जो प्रागे चल कर राजस्थान बता में काफी पल्लवित-पुष्पित हुई है। दूसरे दोहे मे शृगार की अतिशयोकि 'जमका पोषण भी राजस्थानी दूहाकारो ने अपने दूहो मे मध्यकाल में खूब 'कुमारपाल प्रतिबोध' के दोहो की वानगी भी द्रष्टव्य है- पिउ हउ पक्कि सयलुदिलु, तुह विरहग्गि किलत। थोड़ई जल जिम मच्छलिय, तल्लो विल्लि करत ॥
अम्हे धोड़ा रिउ यहुय, इउ कायर चिंतति । मुद्धि निहालहि गयणलयु, कई उज्जोड करति ।। प्रथम दोहे में शृंगार और दूसरे दोहे मे रुकमणी-हरण के वक्त कृष्ण की तरफ से रुकमणी को दिया गया आश्वासन परिणत है। बीसलदेव रास-यह जन साधारण की भाषा में रचित छोटा सा प्रेम काव्य है । 'नरपति नाल्ह' इसके रचयिता है । नरपति नाल्ह ने अपने इस ग्रंथ की रचना-तिथि का वर्णन इस तरह किया है- वारह सं बहोतरां मारि। जेठ वदी नवमी बुधवारि ।। नाल्ह रसायण पार भई। सारदा तूठि ब्रह्म कुमारी ।। परन्तु फिर भी इसके रचनाकाल पर मतभेद है। कई विद्वानों का मानना है कि इस ग्रंथ की रचना चौदहवी शताब्दी के प्रथम अखें भाग में हुई है। विद्वानों का मन है कि दोहे में वर्णित नवमी बुधवार का योग भी सही नहीं बैठता । इस ग्रंथ के चीर खण्ड हैं । इन खण्डों में बीसलदेव का वर्णन किया गया है। इस रास को हिन्दी जगत में भी बडी चर्चा है। परन्तु इसके रचयिता 'नरपति नाल्ह' के बारे में जानकारी नहीं के बराबर है । कोई उसे राजा मानते है तो कोई उसे भाट बनाते है । परन्तु ये सब अनुमान ही अनुमान है । कोई सुदृढ ऐतिहासिक आधार अभी तक नहीं मिला है। अपने ग्रंथ में नरपति नाल्ह ने एकाध जगह 'व्यास' शब्द का प्रयोग किया है । व्यास जाति राजस्थान में ब्राह्मण जाति में मानी जाती है । इसरो नरपति नाल्ह का ब्राह्मण होना स्पष्ट होता है। इससे सम्बन्धित पद्य नीचे उद्धत किया जाता है- व्यास वचन इम कचरई, दिन-दिन प्रतिष वीसलराई। नरपति व्यास कहइ कर जोड़ी, तो तूठा तैतीसा कोडि ।। इन पंक्तियों से नरपति नाल्ह का व्याम होना स्पष्ट है। वीसलदेव रास की कथा मरल है । राजा भोज की पुत्री राजमती अजमेर के राजा वीसलदेव को ब्याही थी। प्रथम वतलावन में ही एक अनहोनी घटना घट गई । बीसलदेव को अभिमान था कि उसके जैसा दूसरा राजा नही है। यह सुनकर राजमती ने कहा कि आप जैसे राजा बहुत है। उनमें से एक तो उड़ीसा में है, जिसके राज्य में हीरे पैदा होते है और आपके राज्य की सांभर झील • नमक । यह सुनकर बीमलदेव उड़ीसा चला जाता है । बारह वर्षों तक वहाँ रहकर हीरे इकट्ठे करता है । अन्त में रानी राजा को बुलाने के लिए एक पुरोहित को भेजती है और राजा वापस पा जाता है । बीसलदेव रास मे वीसलदेव की उड़ीसा यात्रा और रानी का विरह वणित हुआ है। इसके चार खण्डों में कुल खारा
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41 । मृत्यु हो गई थी। फिर बच्छराज भी हंसराज के पास आ जाता है और वे सुख से रहने लग जाते है। हंसावली का यह कथ्य एक अद्भुत विचार तत्व लिए हुए है । प्रादमी के नाम से घृणा करने वाली हमावली में प्रेम का जागना और उसके पुत्र का चित्रलेखा से प्रेम करने लगना, पटरानी का युवराज को प्रेम-प्रस्ताव आदि उस काल को सामाजिक व्यवस्था की तरफ भी इशारा करते है। लौकिक रचनाओं में हंसावली अपनी इन्हीं विशेषतामों की वजह से लोकप्रिय बनी है । प्रोस्तिक रचनाएं-ये वे रचनाएँ हैं जिनका मूल रूप तो संस्कृत में रचित है परन्तु उदाहरण तथा शब्दो और प्रयोगों के अर्थ मरु भाषा में दिए गए है । ऐसी रचनात्रों को प्रोक्तिक कहा गया । 'मुग्धाव बोध प्रौक्तिक' प्रोक्तिक रचनाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । इन रचनाओं मे इम काल की भाषा पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। भड्डली-आरम्भकालीन लौकिक काव्यों मे भड्डली का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । भड्डली का रचनाकाल 14वी शताब्दी माना जाता है । डाक और भड्डली के नाम से प्रसिद्ध वर्षा-विज्ञान सम्बन्धी पद्यों का प्रचार भारत के अनेक प्रान्तों में रहा है । बंगाल और प्रासाम में भी डाक के पद्य लोकप्रिय है । कहीं-कही पद्यों में डाक को औरत का नाम 'भडली', 'भडरी', 'भड्डरी' आदि रूपान्तरो मैं भी मिलता है । कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किए जा रहे हैं- डक्क कहै सुण भड्डली, जळ बिन प्रिथमी जोय । और कही मात्र भलि नाम से ही मिलते है । जैसे- तो प्रासाद में भडुलि, बरखा चोखी होय । 'डाक' की जगह कही 'घाघ' भी प्रयुनत हुआ है । जैसे--- उल्टा बादर जो चढे, विधवा खड़ी नहाय । घाघ कहे सुन धानि, वह बरसै वह जाय ।। डाक और भड्डली के पद्य आज भी लोक में प्रचलित है। वर्षा-विज्ञान सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाने एवं वर्षा होने के अनुमानो हेतु लोगो के कंठो में अब भी ये पद्य उतर पाते है । परन्तु कालान्तर में इनकी भापा मे अन्तर आ गया है और कुछ रूप बदल गया है । जमे- तितर पंखी बादळी, विधवा काजळ रेख । वा बरसै वा घर कर, इग्ग में मीन न मेख ।। डाक भड्डली के पद्य वर्षा वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का अच्छा खासा विषम है । जिनके वैज्ञानिक अनुसन्धान से चमत्कारिक, तथ्य सामने आ सकते हैं। .
को क्रातिनगर का राज्य मिल जाता है जो किसी राजा का था परन्तु उसकी 216 छन्द है । हिन्दी के विद्वानो ने इसे वीररस को कृति मान कर इसको गणना बीरगाथा में की है। परन्तु दम कृति में एक पंक्ति भी वीररस को नहीं है। विरह की ये पक्तियां उल्लेरा करने योग्य हैं- मूनि रोज विदेस पिय, दोइ दुरा 'नाह' क्यु मईहरणा जाइ। प्रामोजां धन मडीय प्राग माया मन्दिर धरि कविलास ।। माझ्या घोग चउपडी, मांड्या सांभरि का रणियास । एक बलाय याहुड या, नाह उतरी गयो गंगा के पार ॥ गनी के विरह और राजा के बुलाने की बात इन पंक्तियों से उद्घाटित होती है। बीसलदेव गम अपने समय उत्कृष्ट प्रेमकाव्यों में से है। हमावली-1370 ईस्वी में 'मसाइत' रचित यह एक कविता है असाइत का जन्म सिद्धपुर में हुआ था। मौदिच्य ब्राह्मण थे । इनके पिता का नाम राजाराम था, जो स्वय ख्याति प्राप्त कथाकार हुए है। हंसावली एक छोटी सी काव्य रचना है। इसमें मुख्यत चौपाई छन्द प्रयुक्त हुमा है। परन्तु बीच-बीच मे कही-कही दोहा भी काम मे लिया गया है। इसमे तीन अलग-अलग स्थितियो के तीन विरह गीत भी है। यह रचना बहुत ही सरस रचना है । कुछ बानगी नीचे दी जा रही है- किलकिलती बन विचरती, बेलि दर बीसास । सधि सामी साहस कोउ, हूँ एकली निरास ॥ भरिण असाइत भव अतरि, समरि सामणी कंत। हंसाउलि धरती ढळी, पीउ पिउ मुखि भणति । हसावली राजा की पुत्री का नाम है । इसके पिता का नाम सनकबहम था । राजा 'नरवाहन' ने हंसावली को एक दिन स्वप्न में देखा। उसी दिन से उसमे उसे अपनाने की चाह जगी, परन्तु हंसावली को तो आदमी के नाम से घृणा | शादी इस दशा में कठिन काम । परन्तु नरवाहन के मन्त्री ने कैसे हंसा- वली को राजा से विवाह के लिए राजी कर लिया । उमने दो कुमारो बच्छराज और हंसराज को जन्म दिया । एक वार युवराज हमराज को पटरानी लीलावती ने प्राग्रहपूर्ण प्रस्ताव भेजा। युवराज ने उसे अस्वीकार कर दिया। इस पर पटरानी ने युवराज के लिए मृत्यु दण्ड का आदेश भेजा। परन्तु प्राण दण्ड नहीं दिया जाता बल्कि उसे देश निकाला दे दिया जाता है। युवराज वन-वन भटकता बहुत दुख झेलता है। उधर उसका भाई युवराज बच्छराज सनकवहम की पुत्री चित्रलेखा से प्रेम करने लग जाता है। किसी तरह भाग्य से हंसराज 41 मृत्यु हो गई थी। फिर बच्छराज भी हंसराज के पास प्रा जाता है और वे सुख से रहने लग जाते है। हंसावली का मह कथ्य एक अद्भुत विचार तत्व लिए हुए है। आदमी के नाम से घृणा करने वाली हमावली में प्रेम का जागना और उसके पुत्र का चित्रलेखा से प्रेम करने लगना, पटरानी का युवराज को प्रेम-प्रस्ताव आदि उस काल की सामाजिक व्यवस्था की तरफ भी इशारा करते है। लौकिक रचनामों में हंसावली अपनी इन्ही विशेषतानों की वजह से लोकप्रिय बनी है। पौक्तिक रचनाए-~ये वे रचनाएं है जिनका मूल रूप तो संस्कृत में रचित है परन्तु उदाहरण तथा शब्दो और प्रयोगों के अर्थ मा मापा में दिए गए हैं । ऐसो रचनामों को प्रोक्तिक कहा गया। 'मुग्याय वोध पौक्तिक पौक्तिक रचनामों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इन रचनाओं मे इम काल की भाषा पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। मड्डली-प्रारम्भकालीन लोकिक काव्यों में भड्डली का भी महत्त्वपूर्ण स्पान है। भड्डली का रचनाकाल 14वी शताब्दी माना जाता है । डाक और भइडली के नाम से प्रसिद्ध ध-विज्ञान सम्बन्धी पद्यों का प्रचार भारत के अनेक प्रान्तों में रहा है । बंगाल और प्रासाम में भी डाक के पच लोकप्रिय है । कहीं-कहीं पद्यों में डाक की औरत का नाम 'भडली', 'भडरो', 'भड्डरी' प्रादि रूपान्तरों में भी मिलता है । कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किए जा रहे है-- डक्क कहै सुरण भड्डली, जळ बिन प्रियमी जोय । पौर कही मात्र भडुलि नाम से ही मिलते है । जैसे- तो प्रासाद में भडुलि, बरपा पोखी होय । 'शक' की जगह कही 'पाप' भी प्रयुनत हुआ है । जैसे- उल्टा बादर जो चढे, विधवा खड़ी नहाय । पाप कहे सुन पानि, वह परमं वह जाय । डाक मोर भड्नी के पद्य आज भी लोक में प्रचलित है। वर्षा-विज्ञान सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाने एवं वर्षा होने के अनुमानों हेतु लोगो के कंठों में पर भी ये पय उतर पाते है । परन्तु कालान्तर में इनकी भाषा में अन्तर पा गया है और कुछ रूप बदल गया है । जमे-- नितर पंनी वादळी, विधवा काजळ रेन । था परम वा पर कर, रण में मीन न मे ।। द्वार मनी के पद्य वर्षा यज्ञानिकों के लिए अध्ययन का अच्छा खासा विषय है । जिनके बजानिक अनुमन्धान मे चमत्कारिका, तथ्य सामने प्रा 44 चारण काव्य 11वी शताब्दी से लेकर 14वी शताब्दी तक चारण काव्य के पद्य छडे. विछुडे हेमचन्द्र को अपभ्रश व्याकरण और जन प्रबन्ध काव्यो में मिलते है। इन पद्यो में दूहा और सोरठा प्रमुख है। 'पुरातनपद्य प्रबंध' में रामचन्द्र धारण के दो पद्य यहा द्रष्टव्य है--- का भति विभंतड़ी, अजीय मरिणअड़ा गुणेह । अखय निरंजण परम पथा, अजय जय न लहेह ।। अम्हे थोडा रिपु घणा, इम कायर चितं हि । मुद्धि निहालउ गयणयलु, के उज्जोड करंति ॥ 'प्रबंध चिन्तामणि' से भी यह पद्य उल्लेखनीय है-~~ देव अम्हारी सीख, कीजइ अवगरिण अइ नही । तू चालती भीख, इणि मंगिहिं हुस्यइ सही ॥ रणमल छंद और श्रीधर व्यास-श्रीधर व्यास इस काल का विशिष्ट कवि हुआ है । जिसने चारण काव्य में ऐतिहासिक और वीरत्व की कविताएँ लिखी । यह ईडर के राठौड राजा रणमल का समकालीन था। श्रीधर व्याप्त ने 'रणमत छन्द' नामक छोटे परन्तु प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की है । इस अन्य मे पाटण के सूबेदार जफरसा और रणमल के बीच हुई लड़ाई का वर्णन हुप्रा है । 'रसमल छन्द' मे 70 पद्य है । इसकी भाषा अलंकारमयी और सजीव है। यह वीर रस की उत्कृष्ट रचना है, इस रचना के पद्य की बानगी नीचे दी जाती दमदमकार दमाम दमक्काइ, ढमढम ढमढम ढोल ढमक्कई । तरवर तरवर वेस पहट्टर, तरतर तुरक पड़ई तलहट्टई ।। विसर विरंग पसरइ, रहि रहिमान मनन्तररि ममरइ । गह गुज्जार निमाज कराणी, हथमर भौज फिरइ सुरताणी।। श्रीधर व्यास ने इन पंक्तियों में चारण शैली में उत्कृष्ट युद्ध वर्णन किया है । 'रामल छन्द' इस कार की उच्चकोटि की रचनाओं में से है। चौरमायण-कही इस कृति को 'वीरमाण' कही 'वीरवाण' कहा जाता है, परन्तु इसका मही नाम 'वीरमायण' है। इसका रचयिता 'बादर' जाति से मुसलमान ढाढी था। इसमें मंडोवर के राव मल्लिनाथ के पुत्र जगमाल और उसके भतीजे 'वीरम' को वीरता का बसान है । इममें वीरम और जोइयों के चीच हुई लडाई का वर्णन है जो 1390 ईस्वी के प्रासपास लखधेरा नामक रणदात्र में लड़ी गई थी। इस नाई में वीरम वीरतापूर्वक लड़ता हुआ घोरगति को प्राप्त होता है । इस कृति में 'नौगाणी' पद काम में लिया गया है । इमा दूगरा नाम 'नीसाणी वीरमायण री' है। इस कृति में 285 पद्य है । यह वीर 43 रंस की बहुत ही सजीव कृति है। कृति की भाषा फड़कती हुई है । कुछ वानगी यहां द्रष्टव्य है- सुत च्यारू सळमैस रे, कुळ में किरणाळा । राजस बंका राठचड़ वर वीर बड़ाळा ॥ साथ लियां दळ सामग, विरदां रखवाळा । भिड़िया भारय भीम सा, दळ पारथ वाळा ॥ देस दसू दिम दाबिया, कोषां धक चाळा । प्ररि प्रौदाहां उड गया, कई ताळ विभाळा ।। इस रचना का रचनाकाल 15वी शताब्दी के प्रामपाम माना जाता है। इसमे दोहा का बहुत ही सुन्दर प्रयोग हया है। इस ग्रन्थ के पद्य राठौड़ों के इतिहास का स्त्रोत है । इस कृति की कविता में राठौड़ो के उत्थान, विस्तार और जोहियो के पतन का 'रिकार्ड' सुरक्षित है । प्रमुस कथा 'धोरम' और जोहियों के करतबो के चारों तरफ चलती हुई रची है । वोरमायण के अतिरिक्त 'सप्तमती' नाम में भी एक काव्य-रचना मिलनी है । जिसमे वीरता की कविताएं है । यह कृति 'दुर्गा सप्तमती' पर आधारित स्वयं मार्कण्डेय पुराण का एक भाग है । इस तरह इसमें कोई मौलिक कथानक नही है । फिर भी प्राचीनता, भाषा, शेनो और परम्परा की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण कृति है । कवि ने कथा के वजाय तरह-तरह के वर्णन करने में बहुत दिलचस्पी इस काव्य-कृति में दिखलाई है । कथा का जुडाव कमजोर प्रतीत होता है । परन्तु ये ही विशेषताएं आगे चलकर 'वेलि क्रिमन रूकमणी री' में आई है। । चारण शैली 'कवित्त भागवन्' में भी देखी जा सकती है । यह कृति भागवत पुराण के दसवे स्कन्ध पर प्राधारित । ये कविताएं चारण शैली की प्रारम्भिक रचनाएँ कही जा सकती है । अचलदास खींची री वनिका चारण शिवदाम गाडण इंग वचनिका का रचयिता है । उन्होंने राजाश्रय में रहकर इस कृनि की रचना की है। कोटा रियासत में 'गागरूण' का शासक अचलदाम इम वनिका का नायक है । इग में पद्य और गद्य के 119 'सेट्म' है । भाषा, माहित्य परम्परा की दृष्टि में यह एषः बहुत ही महत्त्वपूर्ण कृति है। 'प्रगलदाम पीची री वचनिका' - शौर्य और मान-मर्यादा मे अनुप्राणिन योर रग प्रधान कारय है। जिममें शिवदाम, गाडण ने खुद युद्ध में उपस्थिती ययायं गे गहग गम्याध राने याना प्रांखों देखा रोमांचकारी दृश्य दरिया कियारागाह में गुगलमाग गुल्तान होशंगगाह घोरी और गागरोनगढ़ के राजा चारण काध्य 11वी शताब्दी से लेकर 14वी शताब्दी तक चारण काव्य के पद्य छडे- विछुड़े हेमचन्द्र की अपभ्रंश व्याकरण और जन प्रवन्ध काव्यो में मिलते है । इन पद्यो में दूहा और सोरठा प्रमुख हैं। 'पुरातनपद्य प्रबंध' में रामचन्द्र चारण के दो पद्य यहां द्रष्टव्य है- काहूं भति विभंतड़ी, अजीय मणिग्रड़ा गुणेह । प्रखय निरंजण परम पथा, अजय जय न लहेह ॥ अम्हे थोडा रिपु घणा, इय कायर चितं हि । मुद्धि निहालउ गयणयलु, के उज्जोड करति ॥ 'प्रबंध चिन्तामणि' से भी यह पद्य उल्लेखनीय है- देव अम्हागे सीख, कीजइ अवगणि अइ नही । तू चालती भीख, इणि मंगिहि हुस्यइ सही ॥ रणमल छंद और श्रीधर व्यास-श्रीधर व्यास इस काल का विशिष्ट कवि हुआ है । जिसने चारण काव्य में ऐतिहासिक और वीरत्व की कविताएँ लिखी । यह ईडर के राठौड़ राजा रणमल का समकालीन था। श्रीधर व्यास ने 'रसमल छन्द' नामक छोटे परन्तु प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की है । इस ग्रन्य में पाटण के सूबेदार जफरखा और रणमल के बीच हुई लड़ाई का वर्णन हुआ है । 'रणमल छन्द' मे 70 पद्य है । इसकी भाषा अलंकारमयी और सजीव है । यह वीर रस की उत्कृष्ट रचना है, इस रचना के पद्य की बानगी नीचे दी जाती -1 - दमदमकार दमाम दमक्कइ, ढमहम ढमढम ढोल ढमक्कई । तरवर तरवर वेस पहट्टइ, तरतर तुरक पड़ई तलहट्टई ॥ विसर विरंग पसरइ, रहि रहिमान मनन्तररि समरइ । गह गुज्जार निमाज कराणी, हथमर भौज फिरइ सुरताणी ।। श्रीधर व्यास ने इन पंक्तियो में चारण शैली में उत्कृष्ट युद्ध वर्णन किया है । 'रगामल छन्द' इस काल की उच्चकोटि की रचनाओं में से है । वीरमायण-कही इस कृति को 'वीरमाण' कही 'वीरवाण' कहा जाता है, परन्तु इसका सही नाम 'वीरमायण' है । इमका रचयिता 'बादर' जाति मुसलमान ढाढी था । इसमे मंडोवर के राव मल्लिनाथ के पुत्र जगमाल अ उसके भतीजे 'वीरम' की वीरता का बखान है। इसमे वीरम और जोइयो बीच हुई लडाई का वर्णन है जो 1350 ईस्वी के अासपास लखवेरा नार रणक्षेत्र मे लड़ी गई थी। इस लड़ाई में वीरम वीरतापूर्वक लड़ता हुआ वीरग को प्राप्त होता है । इस कृति में 'नीमाणी' छन्द काम में लिया गया है । इम दूसरा नाम 'नीगाणी वीरमायण री' है। इम कृति में 285 पद्य है । यह वं 43 रंस की बहुत ही सजीव कृति है। कृति की भाषा फड़कती हुई है । कुछ बानगी यहां द्रष्टव्य है- सुत च्यारू सळमैस २, कुळ में किरपाळा । राजस बंका राठयड़ वर वीर बड़ाळा ॥ साथ लिया दळ सामठा, विरदां रखवाळा। भिडिया भारथ भीम सा, दळ पारथ वाळा ।। देस दसू दिस दाबिया, कोधां धक चाळा । अरि प्रौदाहां उड गया, कई ताळ विभाळा ॥ इस रचना का रचनाकाल 15वी शताब्दी के आसपास माना जाता है। इसमे दोहा का बहुत ही सुन्दर प्रयोग हुग्रा है । इस ग्रन्थ के पद्य राठौड़ों के इतिहास का स्त्रोत है । इस कृति की पाविता में राठौड़ो के उत्थान, विस्तार और जोहियो के पतन का 'रिकार्ड' सुरक्षित है। प्रमुख कथा 'धोरम' और जोहियों के करतबो के चारो तरफ चलती हुई रची है। वीरमायण के अतिरिक्त 'सप्तसती' नाम से भी एक काव्य-रचना मिलनी है । जिसमें वीरता की कविताएँ है । यह कृति 'दुर्गा सप्तसती' पर आधारित है । जो स्वयं मार्कण्डेय पुराण का एक भाग है । इस तरह इसमे कोई मौलिक कथानक नहीं है । फिर भी प्राचीनता, भाषा, शैली और परम्परा की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण कृति है । कवि ने कथा के बजाय तरह-तरह के वर्णन करने में बहुत दिलचस्पी इस काव्य-कृति मे दिखलाई है। कथा का जुडाव कमजोर प्रतीत होता है । परन्तु ये ही विशेषताएं आगे चलकर 'वेलि क्रिमन रूकमणी री' में पाई है। चारण शैली 'कवित्त भागवत्' में भी देखी जा सकती है । यह कृति भागवद् पुराण के दसवें स्कन्ध पर आधारित है। ये कविताएं चारण शैली की प्रारम्भिक रचनाएँ कही जा सकती है । अचलदास खींची री वचनिका-चारण शिवदाम गाडण इस वचनिका का रचयिता है । उन्होने राजाश्रय में रहकर इम कृति की रचना की है । कोटा रियासत में 'गागरूण' का शासक अचलदास इस वचनिका का नायक है । इस में पद्य और गद्य के 119 'सेट्स' है । भाषा, साहित्य-परम्परा की दृष्टि से यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कृति है। 'अचलदास खीची री वचनिका' शौर्य और मान-मर्यादा से अनुप्राणित वीर रस प्रधान काव्य है। जिसमें शिवदास गाडण ने खुद युद्ध में उपस्थित हो यथार्थ से गहरा सम्बन्ध रखने वा प्रांतों देवा रोमांचकारी दृश्य उपस्थित किया है । मांडू के मुसलमान मुल्तान होशंगशाह घोरी और गागरोनगढ़ के राजा 44 - -- भोज के पुत्र अचलदाम खोची के मृत्यु-पर्यन्त युद्ध का वर्णन इस यचनिका में है बहादुर राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया, उसका बहुत ही रोचक वर्णन इस बचनिका मे हुआ है । गागरोन पर यह आक्रमण 1423 मे हुआ था। इस वनिका का रचनाकाल 1430-35 के आस-पास रहा है। वनिका में कथानक दो भागों में बंटा हुआ है । एक भाग युद्ध का है और दूसरा जौहर का। इतिहास से तो कई भ्रम फैके जा सकते है परन्तु शिवदास गाडगा ने जगह-जगह ऐतिहासिक सत्य की रक्षा की है, और ऐसा कर इस कृति का महत्त्व बढ़ाया है। पूरी कृति 'कविता' और 'बात' दोनो शैलियों में लिखी गई है । रचना का प्रारम्भ कवि ने युद्ध की स्वामिनी महादेवी भैरवी और विद्या की देवी सरस्वती-दोनो को नमस्कार कर, किया है । कवि ने सरस्वती के पूर्व दुर्गा को शीश नवाया है। इससे इम कृति की युद्ध-प्रधान प्रवृति और चारण शैलीपन साफ स्पष्ट हो जाता है। हाथी और सिंह की तुलना का एक पद्य उल्लेख करने योग्य है- प्रय दूहा प्रेक कुण्डलिया प्रक अकइ बनि वसंतडा एवड़ अन्तर काइ सीह कबड्डी नाल है गेवर लाखि बिकाइ गवर गळिइ गळथियो जइ खंचे तंह जाइ सीह गळथरण जे सहै तउ दह लाखि बिकाइ तउ दह लाखि विकाइ मोल जाणवि महगेरा कडवा का रणि कथिन कोपि खड दालिम केरा वेढि कीध पडिय रनि हसि कटारउ दुहुकर राइ न ग्रहण नरसंघ गळह गळहथ जड गेवर । कवि ने योद्धाओं की वीरता और मारकाट के अनेकों साकार और रोमांच कारी दृश्य खेचे है । वर्णन की चित्रात्मकता और सजीवता 'रसावला' और 'गाहा' छंदो में देखते ही बनती है । उदाहरण द्रष्टव्य है- प्रथ रसावला बिहु छेडि बाणावळी, सर पुडिंग सळळी अशी प्रणी अतुली रण खगांखळी रूधिर धार रळतळी, बहु नाचे कुम ध महाबली आळझे प्रांगावळो, आलम अचलेसर पड़या विन इम संगमळी सहै कुरण सुभरी, अंक अंक ऊपरी लागइ लागइ खरी, ढाह नह ठाठरी दिन रात न जाणइ दूसरी, नीद भुख त्रिस बीसरी खौदाळि खीची खरी सन विबे इम संमिरी।
प्रय गाह - इण पडि सहन देई सूट पग पग अंडे पण अवहट्ट पालम अचलमन अवहट्ट कनक जिहि रहि रहि कसव इस भयंकर मारकाट और प्राण-प्रगण मे लड़ते राजपतों के सामने इस युद्ध मे सुल्तान की सेना की जीत होती नहीं दिखी। परन्तु अंत में इंगरसिंह, मोरल सिंह, पालसिंह जैसे विकट योद्धानों को सुल्तान के युद्ध-तरीकों के सामने झुकना पडा और अचलेश्वर स्वयं वीर गति को प्राप्त हुमा । परन्तु भरते वक्त भी उनके कानों में ये हो स्वर थे ~राजपूत पुरुष और वीरांगनाएं जीवित रूप में मुसलमानो के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे । कवि ने समस्त रानियों को जौहर की धधकती पला में स्नान कराया। हरि-हरि' और 'विसन-बिसन' कह वे ज्वाला में कूद पड़ी- जउहर जालणहारि अजइ जळई ताइ ऊपर हरि हरि हरि होई रह्यो बिसन-बिसन तणि वारि । वनिका का यह बहुत ही मार्मिक स्थल है। अग्नि-स्नान का यह दृश्य हुत रोमान्चकारी है। बहुत ही हृदयस्पर्शी है यह वर्णन-वचनिका का यह परमोत्कर्ष है। वनिका का पद्य ही नहीं गद्य भी बहुत सुन्दर और कलात्मकता लिए हुए है। एक बानगी अवलोकनीय है-- प्रय बात अक सीह नै पाखर्यो । सूर सिहा इति आदर्यो । पंचामृत अमी परगस्यो। महादान पाछधड़इ । दूध माहि साकर पड़े। सोनो अर सुवास अक अचळ कथे सिवदासु मैन्य वर्णन भी उल्लेखनीय है--- इरत्यो खडदानम गोरी राजा बारह लख माळवा रो चकरवरती । तर तेपाण लाख माळवा रा कटक बंधे । ते कटकबंध रउ ग्रारंभ पारंम गरवातन गडावर। तइ कटक बंध मांहि त उ कहि दिखाळइ । महाधर तउ कडकडण- भीयां उसमाखान, फतहखान............! वनिका की शेली डिंगल है । 'प्रचलदाम खीची री वचलिका' चारण काव्य मे एक मी? का पत्थर है। इसी समय से राजस्यानी गुजराती से अलग होकर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाती है। पृथ्वीराज रासो-~-पृथ्वीराज रासो के रचयिता 'चन्दरबरदाई' की जीवनी इतिहास में उलझी एक पहेली बन गई है। कवि को विशाल ख्याति को देखकर राजस्थान में कई ऐसे व्यक्ति हो गए जो अपने प्रापको 'चंद' की सन्तान बताने लगे। कइयों ने तो फाड़ने योग्य वंशावलियां भी बना ली है। - 46 'चंद' जाति में राव था। इसका जन्म, रासा में, लाहौर, में होना लिसा है । रासी में यह भी लिखा है कि पृथ्वीराज और चन्द का जन्म एक ही दिन हुमा था। इतिहासकार पृथ्वीराज का जन्म 1163 ईस्त्री (सं. 1220) के आस-पास और मृत्यु 1192 (म, 1249) निश्चित करते है । पृथ्वीराज रामो के अनुसार यह ही समय चद का सही बैठता है। पृथ्वीराज रासो कर रचा गया था, यह तो ठीक-ठीक नहीं कहा जा समता, परन्तु इस सम्बन्ध में प्रथम प्रामाणिक उल्लेख 'राज प्रशस्ति' महाकाव्य में मिलता है। राज प्रशस्ति की रचना सं. 1715 में शुरू हुई और पूर्ण सं. 1738 में हुई है। इसलिए यह ही समय पृथ्वीराज रासो का रहा होगा। परन्तु डॉ. गोरी शंकर हीराचन्द प्रोभा इसका रचनावाल 1600 के ग्रासपाम बताते हैं । डॉ. मोती लाल मेनारिया इसका रचनाकाल 1700 और 1732 के बीच बताते है। परन्तु इसके रचनाकार के विषय मे अभी टोस प्रमाण नहीं मिले हैं जिनमे कि कृति का रचनाकाल स्थिर किया जा सके। इतिहासकार तो 'चद' के अस्तित्व पर भी शका रखते है। कइयों का मानना है कि 'चंद' नाम का कोई कवि हुआ ही नही । परन्तु पृथ्वीराज रासो अमर काव्य है । 'चंद' का नाम इस अमरत्व से जुड़ा हुआ है और जुडा रहेगा। पृथ्वीराज रासो मे चहुं वाण महाराजा पृथ्वीराज का जीवन चरित वणित है । ऐतिहासिक संदिग्धता होते हुए भी साहित्यिक दृष्टि से पृथ्वीराज रासो अपूर्व ग्रंथ है । यह एक महाकाव्य है। इसमें एक लाख छंद और 69 प्रस्ताव है। पृथ्वीराग रासी पिंगल शैली का महाकाव्य है। इसमे दहा, साटक पद्धरि, गाहा, तोमर, भुजगी आदि अनेकों छद प्रयुक्त हुए है । पृथ्वीराज रासो में वीर रस प्रधान और बाकी रस गौण है। एक बानगी यहाँ प्रस्तुत है- वीर हक्क वर वज्जि थम फट्टयों घर फट्टिय । निडर जोन निब्बरिय लयो मृगकस्य दवसिय ॥ घरनि धूरि धुंधरिय तीन भुवनं परिभग्गिय । भयो सद्द हंकार जोग, माया ते जग्गिय ॥ 'रासो' में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, अरबी, फारसी, तुर्की आदि भाषानी के शब्द भी काफी मात्रा में पाए है । पृथ्वीराज रासो में संध्या, रात्रि, प्रभात, चन्द्रमा, मृगया, वन, ऋतु, संभोग, विप्रलम, विवाह, रगा-प्रयाण प्रादि का यथा स्यान सुन्दर वर्णन हुआ है । चन्द की प्रतिभा इसमें बहुत ही विलक्षण स्प मे उजागर होती है । कथा को लड़ी में पिरोने और पानी के सजीव चित्र चित्रित करने मे चन्द को 'महारत' हामिल थी । रासो मे महाकाव्य को भव्यता और दृश्य काव्य को गजीवना विद्यमान है।
47 रासो में मुसलमानों को धर्मान्धता, और वर्वरता, राजपूतों के शौर्य, उनकी डावांडोल राजनैतिक स्थिति और उनके पत्तन प्रादि का जैसा मार्मिक, स्वाभाविक और क्षोमपूर्ण वर्णन हुआ है वैसा दूसरी जगह दुर्लभ है । कहने को तो रासौ पृथ्वी- राज का जीवन-चरित्र है परन्तु अमलियत में यह हिन्दू-मुसनमानो के संघर्ष की अमर कहानी है। खुर्माण रासो-खुमाण रासो दलपत विजय द्वारा रचित है । इस ग्रंथ में बप्पा रावल से लेकर महाराणा राजसिंह तक के मेवाड के राजाओं का वर्णन है । खुमाण का वृतांत अधिक विस्तार मे होने की वजह से इसका नाम खुमारण रासौ रखा गया है । यह 'रामो' पाठ खण्डो में विभाजित है । इसकी रचना पिंगल शैली में हुई है। विजयपाल रासी-जल्हसिंह के नाम से प्रचलित विजयपाल रासो में यह उल्लेख मिलता है कि इसका रचयिता नल्हसिंह सिरोहिया शाखा का भाट था और यह विजयगढ (करोगी रियासत) के यदुवंशी नरेश विजयपाल के ग्राश्रित था। विजयपाल रामो पूरा उपलब्ध नहीं है। जितना उपलब्ध है उसमें विजयपाल को विजय और पग की लडाई का वर्णन हुआ है । इस ग्रंथ में विजयपाल के राज्य का विस्तार गजनी, ईरान, कावुल, दिल्ली, ढूंढाड, अजमेर आदि में होना बताया गया है जो एकदम गलत है। इससे लगता है कि यह विजयपाल के समय की रचना नही है । मिश्र बंधु इसका रचनाकाल 1298 (सं. 1355) के पास-पास बताते है। इसको भापा-शैली पर पृथ्वीराज रासौ और वंश-भास्कर दोनों का प्रभाव है । इससे लगता है कि यह 1853 के पास-पास रचा गया होगा । इस ग्रय मे 42 छंद है, 8 छप्पय, 18 मोती दाम, 8 पद्धरि, 6 दोहा और 8 चौपाइयां है। वीर रस का इसमे अच्छा वर्णन हुआ है। राल वेल--राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भ काल में वेलि परम्परा इस वेलि से देखी जा सकती है । 'राउल वेलि', वेलि साहित्य की पहली साहित्यिक वेलि है। इस वेल में छ नायिकामो के नख-शिख वर्णन है । ये नायिकाएं कुलचूरि वंगा के किसी सामन्त की स्त्रियां थीं । ग्यारहवी-बारहवी शताब्दी में कुल चूरि वंश के राजाओं का राज्य था । 'राउल वेल' के रचयिता का नाम 'रोडो' नामक कवि था (रो. राउ नवे न वखाणी)। यह कौन था, इम सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त नही है । परन्तु इस रचना का रचनाकाल अवश्य 11वी शताब्दी रहा है । इस वेल में 46 पद्य है। इसकी नायिकाएं नव विवाहित स्त्रियों या फिर दासियाँ है । इसकी एक से पांच तक की पंक्तियों में पहली नायिका का चित्रण है, दूसरी नायिका कोई 'हरिण' है, नीसरी नायिका 'राउन' नाम की कोई कन्या है, चौथी नायिका का नाम 'टिक्कणी' है, पांचवी कोई 'गोड़ो' है और छठी नायिका कोई 'मालवीया' नाम की ।
48 औरत है। इस वेल को भाषा अलंकृत है। इसमें उपमा, उत्प्रेक्षा, संदेह भादि अलंकार पाए है । नरा-शिरा को कवि ने जो कल्पना की है वो बहुत ही अनूठी है। जिनचंद्रसरि फागु--यह फागु काव्यो में सबसे पहली रचना है इसमें 25 पद्य है । संवत् और रचनाकार का नाम अशात है। 'फागु' शीर्षक से भागे चलकर काफी रचनाएं देखने को मिलती है । ऐसी रचनाएं इस काल में काफी रची गई है। प्रारम्भकाल पर एक नजर-- जन माहित्य में रचता-बसता पारम्भकाल पाम जनता से जुड़कर और चारण शैली को स्पर्श करता साहित्य को सारी धरोहर मध्यकाल को दे देता है । मध्यकाल कैसे-कैसे इसका उपयोग करता है, सजाता-संवारता है, आदि बातो का अध्ययन करने से पहले प्रारम्भकाल पर एक नजर डाल लेना समोचीन होगा। अगर सम्पूर्ण प्रारम्भकाल पर दृष्टिपात करें तो कुछ मुख्य प्रवृत्तियां स्पष्ट नजर पाने लगेगी। ये प्रवृत्तियां प्रारम्भयालीन साहित्य की विशेषतायें वनी भी दिखेंगी और कई साहित्यिक परम्पराग्रो वा प्रारम्भ भी प्रारम्भकाल की जमी पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होगा जिनसे राजस्थानी साहित्य विश्व में प्रसिद्ध हुआ। यही नही कई साहित्यिक परम्पराएं भी स्पष्ट दिखाई देगी जिन्हें मध्यकाल ने बड़े चाव से अपनाया और सजाया, संबारा । इन प्रवृत्तियो का अध्ययन एक-एक कर नीचे किया प्रारम्भकाल पर दृष्टिपात करे तो प्रथम प्रवृत्ति तो यह दिखाई पड़ेगी कि इस काल में जैन कवियों ने प्रबन्ध-ग्रन्थ रचने मे काफी रूचि दिखाई। 1133 ईस्वी में उदयप्रभसूरि ने 'प्रबंधावली' नाम से प्रबन्ध ग्रन्थ रचा, फिर 1297 में प्रभाचन्द सूरि रचित 22 प्रवन्धो का 'प्रभावक-चरित' प्रबन्ध-ग्रन्थ सामने आता है। 1304 ईस्वी में 'प्रवन्ध चिन्तामणि' रचा जाता है तो 1348 मे राजशेखर 'प्रबन्ध-कोस' की रचना करते है । इन चारो ग्रन्थों को मुनि जिनविजयमूरि नै सम्पादित कर प्रकाशित करवाए है । महाराजा कुमारपान के सम्बन्ध में कई ऐतिहामिक प्रबन्ध व चरित ग्रन्थ मुनि जिनविजय सूरि प्रकाश में लाये है। उन्हें प्रकाशित करवाया है । इन सभी ग्रन्थों मे राजस्थानी के पद्य उद्धत है। इन ग्रन्थों में अपभ्रंश से राजस्थानी के विकास सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है। प्रारम्भकाल में प्रबन्ध ग्रन्पों में प्रभावक चरित, प्रबन्ध चिन्तामणि, प्रबन्ध कोस, पुरातन प्रवन्ध संग्रह, कुमारपाल प्रतिबोध, उपदेश शप्तति प्रादि प्रमुख प्रबन्ध ग्रन्थ है । इस सम्पूर्णकाल में प्रबन्धो की रचना होती रही है । जैन कवि इनमें निरन्तर अपनी रचना करते रहे है। दूसरी प्रवृति जो प्रारम्भकाल में देखने को मिलती है, वह यह कि इस काल में 'रास' नाम मे काफी ग्रन्यों की रचनाएं देखने को मिलती हैं। के रचनाकारो मे यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई पड़ती है। राम रों काल 50 तीसरी प्रवृति राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भकाल मे देखी जा सकती है, वह यह कि इस काल मे 'फागु' काव्य में काफी साहित्य सृजन हुआ। काफी मात्रा में कृतियाँ इम शीर्षक से देखने में आती हैं । "जिनचन्द्रसूरि फागु'.फागु काव्य मे सबसे पहली रचना है। संवत् और इसके रचनाकार का नाम अज्ञात है । इसमें 25 पद्य है । यह रचना संभवतः 13वी शताब्दी की है । इसके अतिरिक्त जिन पद्मसूरि रचित 'स्थूलिभद्र रास' 27 पद्यों की रचना मिलती है । इसके अलावा पद्म कवि का 'नेमिनाथ फागु' भी मिलता है। डॉ० भोलानाथ द्वारा मम्पादित 'प्राचीन फागु' नामक ग्रन्थ महाराज सयाजीराव विश्वविद्यालय वड़ोदा में प्रकाशित हुआ है। इसमें 35 फागु काव्यों का विवरण दिया गया है । नेमिनाथ फागु में राजमतो के शृंगार का वर्णन विस्तार से किया गया है । इस काल में औरते मिलकर फाग खेलती और फागु काव्य गाए जाते । इसका उल्लेख कवि हलराज ने इस तरह किया है---- वरन तरुणी मिलि दयई, रास एक फागु खेलाव इं तसु अंगरिंग नव निधि रमई, संपति घर पावई। फागु काव्य मे प्रारम्भकाल का सांस्कृतिक जीवन भी झलकता है तो प्राध्यात्म को झलक भी मिलती है । फागु साहित्य प्रारम्भकाल से रचा जाता प्रारम्भकाल में जो चौथी प्रवृत्ति देखने को मिलती है वह यह कि इस काल मे 'वचनिका' शीर्षक से गद्य-पद्य को सम्मिलित रचनाएं जो अपने आप में लिखने की शैली का रूप धारण कर सामने आती है, में लिखना शुरू होता है । वनिका शैली में लिखी जाने वाली रचनानो को शुरूयात प्रारम्भकाल में हो जाती है । शिवदाम गाडण रचित 'वनिकर अचादाम खीची री' इस शेती का प्रथम सशक्त ग्रन्थ है । युद्ध और जौहर दो भागों में बेटी यह वचनिका युद्ध प्रधान खण्ड काव्य है । बचनिका जहाँ काव्य ग्रन्थो में स्थान पाती है वहाँ गद्य के विकास में भी इसने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है । 'अचलदास खीची ये वचनिका' राजस्थानी गद्य-सौन्दर्य को मुह मे वुनाने वाली अन्ठी कृति है। वनिका कथा वर्णन करने की एक विशिष्ट शैली है। इस शैली में 1396 में जाखो मणियार ने 'हरिचन्द पुराण' को रचना की है, जो महागजा हरिशचन्द्र की पौराणिक कथा पर आधारित है। कवि ने इमे 'प्याडो' (पाडा) महा है। वनका ने राजस्थानी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान पाया है । वनिका लिखने की प्रवृत्ति मध्यकाल में भी जारी रही। पाचवी प्रवृत्ति प्रारम्भकाल में यह देखने को मिलती है कि इस काल में 'वैरि' संबन प्रारम्भ हुमा पोर मकाल में यह प्रवृत्ति अपनी पराकाष्ठा पर पत्नी । 'वैलि किसन रकमलो री सी उत्कृष्ट बलि मध्यकाल में सामने 51 आती है जिसने भारतीय साहित्य में अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाया है। राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भकाल में जैन वेलि देखने में प्राती है, जिनमें 'ढालो' को प्रधानता है । चारण वेलि-वेलियो, सोहणो, खुड़द, सागोर गीत छन्द में लिखी गई है । वेलियो छन्द में सबसे पहली वेलि 'राउलवेल' है। इसके पश्चात् प्रारम्भ- काल में हरजी भाटी रचित दो वेल मिलती है-'रामदेवजी री वेल' और 'रूपादे री वेल'। प्रथम वेल में 'भैरू राक्षस' के वध का वर्णन है और दूसरी में मारवाड़ के राजा मल्लिनाथ और रानी रूपादे के जीवन प्रसंगो का संवेदनशील चित्रण किया गया है । इसके अलावा कवि तेजो ने 'रत्नादे वेल' लिखी। इसमें रत्नादे का वर्णन किया गया है । रत्नादे को उसकी सास उसके पुत्रो सहित घर से निकाल देती है । वह जंगल में पाकर भक्ति करने लग जाती है, जंगल में उसकी भक्ति देखकर देवतादि प्रगट होते है, और अन्त मे गणा के परिवार के सब लोग आ जाते है । 'आई पंथ' के गोगो मे यह वेल बहुत लोकप्रिय है। तोलादे और जैसल की कथा को लेकर लिखी गई 'तोलादे वेल' भी मिलती है। इस वेल में जैसक तोलादे के सम्पर्क में आकर डाकू से भक्त बन जाता है । इस तरह हम देखते हैं लि वेलि साहित्य की परम्परा प्रारम्भकाल में पड़ी है तथा मध्यकाल में यह समृद्ध बनी है। छठी प्रवृत्ति प्रारम्भकाल में देखने को मिलती है वह यह है कि इस काल- में 'रासो' नाम से कई ग्रन्थ लिखने शुरू हुए और मध्यकाल तक यह सिलसिला चमता रहा । यह प्रवृत्ति आरम्भकाल में पहली दफा दृष्टिगोचर होती है। खुमारण रासी, पृथ्वीराज रासो, विजयपाल रासो आदि इस प्रवृत्ति के परिचायक है । रामौ साहित्य राजस्थानी साहित्य की बहुत बड़ी धरोहर है जो कि हिन्दी साहित्य के वीरगाया काल का आधार बना है। सातवी प्रवृत्ति जो इस काल में देखी जाती है वह इस काल क पौक्तिक रचनाएं हैं, प्रारम्भकालीन गद्य साहित्य इन पौक्तिक रचनामों में ही लिखा गया । ऐसी रचनाओ मे संग्रामसिंह रचित 'बाल शिक्षा' संस्कृत की एक बालोपयोगी व्याकरण है, परन्तु इसमे उदाहरण तथा शब्दो और प्रयोगो का अर्थ राजस्थानी में दिया हुआ है। ऐसी रचनाएँ औक्तिक कहलाई। ऐसी रचनायें प्रारम्भकाल में बहुत मिली है । प्रोक्तिक रचनात्रों में सबसे महत्त्वपूर्ण कुलमण्डल का 'मुग्धाव बोध प्रौक्तिक' है जिसकी रचना 1393 (सं. 1450) में हुई । प्रौक्तिक रचनाओ से इस काल की भाषा का अच्छा ज्ञान होता है । प्रारम्भकान की उपरोक्त प्रवृत्तियों में से कई प्रवृत्तियाँ आगे मध्यकाल तक चली और समृद्ध हुई, कई छूट गई। इस तरह विभिन्न प्रवृत्तियों में से राजस्थानी मध्यकाल के दरवाजे खटखटाती है।
इस काल में राजपूतो के कई वशो का उत्थान, मुगल साम्राज्य की स्थापना, अकबर मध्यकाल (1450 से 1850) मध्यकाल राजस्थानी साहित्य का समृद्धि का काल है । इस काल में - गए साहित्य की प्रतिष्ठा भारतीय साहित्य में भी स्थापित हुई है, इसे राजस्थान साहित्य का चरमोत्कर्षकाल या स्वर्ण काल भी कहा जा सकता है। यही से मारू गुर्ज का विभाजन प्रारम्भ होता और राजस्थानी राजस्थान की राजभापा बनती है और इसका साहित्यिक एकरूप सामने पाता है। राजस्थानी साहित्य का मध्यकाल हिन्दी साहित्य को अपनी देन देता है । इस काल का साहित्य भी अपनी सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियो और राजनैतिक उथल-पुथल से प्रभावित प्रारम्भकाल मे चित्तौड के गुहिलोत और सिसोदिया और नागौर, अजमेर के मुसलमान शासको का प्रभाव राजस्थान के इतिहास पर रहा। मध्यकार मे कुछ और राजपूत वशो का उत्थान हुआ, जिनमे से मारवाड़ के गठौड प्रमुख है । की तीखी-तरारी राजनैतिक-धार्मिक नीतियाँ, ब्रिटिश राज और उनकी कई देशी रियासतो से सधि ग्रादि ने राजस्थान के इतिहास को प्रभावित किया है। राठोडो का उदय 14वी शताब्दी से ही शुरू हो जाता है। 1394 में चूडा मारवाड़ पर कब्जा करता है । परन्तु इसके उत्तराधिकारी अयोग्य निकलते है, और राव जोधा 1458 में म डोवर पर कब्जा कर लेना है। 1485 में राव बीका अपना प्रभाव बढाने है और 1488 मे बीकानेर को स्थापना करते है। (ग्राखा बीज थरपियो बीके बीकानेर)। अकबर के शासनकाल में कछवाहो का प्रभुत्व बढता है, जब भारमल 1562 में अपनी बेटी का विवाह अकबर से करता है । बाद में प्रतापसिंह जो कि मोहबतसिंह का पुत्र था, अलवर राज्य की स्थापना करता है। - नरूका कहलाते है जो कि कछवाहो की ही एक खाप है । उधर चहुँवारण वंश एक खाप हाडो का रावदेवा 1343 में बूदी राज्य की स्थापना करता है ! 'टा पहले तो वूदी राज्य का ही एक हिस्सा था, परन्तु 1631 में शाहजहाँ योगिह को कोटा का एक अलग शामक मान लेता है, और कोटा दो से अलग जाता है। मिरोही इस यया चहुँवाणो की देवड़ा शासा के कब्जे में थी। 'पुर को रियासत 1713 में सामने प्राती है जो जाटो के प्राधिपत्य में रही। मेर मे भाटी शासक रहे। 1350 के प्रासपास इंगपिह रंगरपुर राज्य की 53 यापना करत है। बाद में हूँगरपुर मोर यांगपारा पृप्वीरान पोर जगमान को मलते है जो कि महागपळ उदमिह रे पुत्र थे । यह 1514 की बात है। 1526 वावर पोर रागामांगा के बीर गानवा के रणक्षेत्र में गुर होता है। इग गुरु में वापर को जीत के साथ गत्रस्थान में मुगन मामाग्य की स्थापना होती है। प्रायर की कुटनीनि मोर बुद्धिमानी में मवार को छोड़ एक-एक कर ममत रियागर्ने मुगन माग्राग्य के पन्तर्गन मा जाती है । परन्तु यी मनामी के मन में मुगलों का की पनन पा जाता है और मगठी का पम्मुम्ब होता है। अंमलमेर पोर यो मानेर को छोड मराठा ममग्न राजधान ममा जमने हैं। पापगी यमान पोर ई की वजह में एक-एक कर ममम्र राजपून मराठो को मना म्यो कार कर लेने है। जब अंग्रेजो को मना दंग पर कायम होती है तो ये इनमे भी ममझौता कर लेते है । 1818 तक मिगेही को छोड़कर ममम्न देशी रियासतें अंग्रेजो को मत्ता स्वीकार कर लेती है। इस तरह 1819 तर अंग्रेजों की देशी रियामती पर राजननिक सत्ता कायम हो जाती है जो 1947 नर चलती है । यहाँ परवान उल्लेरा करने योग्य है वो यह है कि 1857 में इन्ही देमी रियासतों ने अंग्रेजी का विरोध करने वालों का माध न देकर अंग्रेजी शासन के हाध मजबूत किए, हालाकि गाई जागीरदारी ने गदर का समर्थन भी किया । दम काल में कई ममकालीन चाराण पोर मन्य करियों ने गदर पर कविताएं लिखी है। इस काल में वीरता मोर पोरस्य का साहित्य रचा गया जिसने मारे विश्व में अपनी प्रतिष्ठा कायम की है । इग काल के ऐतिहागिक महत्त्व के लिए भी कोई इन्कार नहीं करता । इसके अतिरिक्त नीति, नैतिकता, मव्यवहार, मदनाचरण, पोर बुद्धिमत्ता की रचनाएँ भी रची गई । 'राजिया रा दूहा ऐमी रचनामों में प्रमुख है। 'वेलि फिमन रुकमणी री' जमी सशक रचना भी मामने प्राई है। मध्यकाल में पहले प्रारम्भकाल में राजस्थान पोर गुजरात की भाषा एक थी । परन्तु मध्यकाल में पात-पाते इन दोनों प्रातों को दो अलग-अलग भाषाएं वन जाती है। मारु-गुर्जर का विभाजन हो राजस्थान को राजस्थानी और गुजरान की गुजराती भापा बनती है । इस काल में राजस्थानी की उपभाषा ढाड़ी प्रादि मभी उपभाषाम्रो में वाहित्य रचना होती है, परन्तु मारवाड़ी उपभापा को अधिक स्पाति प्राप्त होती है । इस काल में डिगन शैली में समस्त राजस्थान मे रचना रनी जाती है। इसी काल में मीराबाई और ईमरदास अपनी पद्य रचना करते है । चारणों की रचनामों की प्राचीन परम्परा इस काल में भी कायम रहती है व राजभकि, वौर पूजा का प्राधान्य ज्यो का त्यो वना रहता है । इमी युग म मंत दादूदयाल होते है, और इनके अनुयायी राजस्थानी माहित्य का भण्डार भरते है । पांच पीर और करणीजी, तेजाजी प्रादि भी इसी काल में होते है । नाय सम्प्रदाय को समृद्ध रचनाएं भी इसी काल में सामने ग्राती है । सत साहित्य इस युग को पहचान प्रदान करता है। राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली में भी इसी काल में रचनाएं रची जाती हैं । पाख्यान काव्य मध्यकाल में रचंता रहत है और अपनी पहचान कायम कर इस युग की प्रमुख विशेषता बन सामने आता है। कई महत्त्वपूर्ण लौकिक रचनाएं इस काल में सामने आती है । मध्यकाल में गद्य और पद्य दोनो लिखे जाते है । पद्य साहित्य में चारण काव्य, ग्राख्यान काव्य, सत साहित्य, जैन काव्य, लौकिक प्रेम काव्य और विविध रचनाएं प्रचुर मात्रा मे सामने पाती है । गद्य साहित्य में धार्मिक गद्य, ऐतिहासिक गद्य और सृजनात्मक गद्य सामने प्राते है। इस काल का साहित्य बहुत ही समृद्ध साहित्य है । इसका सविस्तार अध्ययन विभिन्न शीर्षको में बांट कर किया जाएगा। राजस्थानी का पद्य साहित्य मध्यकालीन राजस्थानी पद्य साहित्य बहुत मात्रा में और विविध रूपों में रचा गया है। इसे निम्नलिखित भागो में बांट कर अध्ययन करना वैज्ञानिः होगा- 1. चारण कान्य 2. पौराणिक और धार्मिक काव्य 3.पाख्यान काव्य 4. संत साहित्य 5. जैन काव्य 6. लौकिक प्रेम काव्य इन शीर्पको मे राजस्थानी काव्य का क्रमवार अध्ययन नीचे दिया जा चारण काव्य- मध्यकालीन चारण काव्य की शुरूपात गाडण पसाइत से होती है। इस काल में गाडण पसाइत, खिडिया चानण और सिढायच चौभुजा प्रारम्भिक कवि हुए है जो राठौड़ राव रणमल और मारवाड़ के जोधा के समकालीन थे । इन तीनो ने ही चित्तौड़ मे रहकर 1438 में रणमल की मुत्यु पर काव्य रचना की है । गाडण पसाइत का जीवन-वृत्त उपलब्ध नहीं है। परन्तु पसाइत का रचनाकाल (1400-1487/88) रहा है। इनकी 'राव रिणमल रो रूपक' और 'गुण जोधायण' नामक रचनाएं मिलती है । कई छोटी-मोटी और रचनाएँ भी गाडण पसाइत ने लिखी है । इन दोनो रचनायो में दूहा छन्द का प्रयोग हुआ है। एक बानगी नीचे दी जाती है- वधवाणी ब्रहमाणी, कौमारी सुरसत्ति । कीरत रिणमल न करूं, देवी देहि मुमत्ति ।। पसाइत लोकप्रिय कवि हुआ है। नणसी ने अपनी ख्यात में अपनी बात के साक्ष्य के रूप पमाइत के पद्यो का उल्लेख किया है।
खिडिया चानण मारवाड़ के पाघाड़ी गांव का रहने वाला था। राणा, कल और राव जोधा के समय में इनकी बहुत प्रसिद्धि थी। अच्छा नाम और बान-सम्मान था । राव बीका ने इन्हें 'लाख पसाव दिया, चानण ने ही रणमल, की मृत देही को अग्नि दी थी और उसके 'फूल' गंगाजी 'घाले थे। इन पदों में 'दूहा राव रणमल रा', 'दूहा राव रणधीर रा' और 'डिंगलगीत' आदि है । मिढायच ने भी रणमल पर एक डिंगल गीत की रचना की थी। इस तरह प्रारम्भिक चारण काव्य में रणमल और राव जोधा पर 'रिणमल रो रूपक', 'गुग्ण जोधायण', 'दूहा राव रणमल रा', 'दूहा राव रणधीर रा' और कई डिंगल गीत सामने आते है। इसके पश्चात् मध्यकाल में चारण काव्य काफी तादाद में सामने आता है । इस काल की प्रमुख रचनाओं का अध्ययन निम्न प्रकार है-- हम्मीरायण-~-इस ग्रंथ की रचना 1481 में हुई। इसमे 327 पद्य है। जिनमें अल्लाउद्दीन खिलजी और चहुँवारण वीर हम्मीर के युद्ध का वर्णन है। यह युद्ध शरणागत की रक्षा के लिए प्राण उत्संग करने का बहुत महत्त्वपूर्ण अलौकिक उदाहरण है । इस युद्ध मे हम्मीर रणमल और राजपाल की धोखाधड़ी की वजह से हार कर वीरगति को प्राप्त होता है । राजपूत वीरागनाएँ जौहर करती है, और योद्धा युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते है । हम्मीर स्वयं अपने हाथ से अपना सर काट लेता है। वह शत्रु के हाथों पद्-दलित होना स्वीकार नहीं करता । जौहर और हम्मीर के सिर काटने की घटना का बहुत मर्मस्पर्शी वर्णन इस काव्य कृति में हुअा है । हम्मीरायण के इस भाग में सर्वोत्तम काव्य-सौन्दर्य देखने को मिलता है। भांड़ उ व्याम इम कृति के रचयिता हैं। हम्भीरायण हम्मीर पर प्रारम्भिक रचना है। राव जंतसी रो छंद-'राव जैतसी रो छन्द' मध्यकाल की प्रमुख काव्य कृतियों में से एक प्रमुख काव्य कृति है । इसके रचयिता सूजाजी वीतू थे । बीर चारणों की एक खाप है। इस काव्य कृति में वावर के पुत्र कामरान और बीकानेर के राव जैतमी के बीच हुए युद्ध का वर्णन है । कामरान इस वक्त पंजाब और काबुल का हाकिम था । इस युद्ध में राच जैतसी की विजय होती है और कामरान हार जाता है। इस युद्ध के विषय में मुसलमान इतिहासकार मौन हैं परन्तु सूजाजी ने इसका विस्तार से वर्णन किया है । इस वजह से इस ग्रन्थ का, ऐतिहासिक महत्त्व भी है । इस ग्रन्थ में 401 पद्य है । पाधड़ी छन्दो, गाहो, हो, और कवित्तों में यह ग्रन्थ रचा गया है । यह डिंगल शैली में रचा गया है। इसमें वर्णन बहुत ही सजीव ढंग से हुआ है । एक वानगी यहाँ प्रस्तुत की जाती 56 धहड़े ढोल पूजे परत्ति, पड़िया लगि वरम मेढ़ पत्ति। बीकाहर राजा ईद पग्गि, साफगं सिर मिविया गड़गि ॥ पतिसाह फौज फूटन्ति पाळि, ब्रह्म जंत गाज विचाळि। अंबहर जैत वरसं प्रचार, धड़किया मोर मुहि मग्गधार ।। राव जैतसी पर 'राप जंतसी रउ छन्द' अथवा 'राव जंतसी री पघाड़ी छन्द' नाम मे 485 पद्यों की रचना और भी मिलती है। इसी तरह 'राव चतमी रासो' नाम से भी एक रचना मिली है। इनके रचनाकारों के नाम ज्ञात नहीं 'भटियाणी उमादे रा कवित' : 'बाधा रा दूहा'-चारल प्रासोजी इन कृतियो के रचयिता है। प्रासोजी मध्यकाल के पहले कवि है जिन्होने मध्यकाल में चारण शैली में अपना अच्छा खासा योगदान दिया। उमादे पर उनके कवित्त और बाधा पर पिसे हुए उनके दोहे भावना भरी गहराई तक पहुंचते है । ये जोधपुर राज्य के भड़ेस गांव के रहने वाले थे । इनका पूरा नाम ग्रासानन्द था। ख्याति प्राप्त चारण कवि ईसरदास इनका भतीजा था। ग्रासोजी के नाम पर ही आसावत् चारण हुए है जो अपने पापको बारठ ग्रासोजी के वंशज बताते हैं । बारठ प्रासोजी जोधपुर नरेश राव मालदेव के कृपापात्र थे। राव मालदेव ने बीकानेर पर चढाई की तब वे उनके साथ थे। मालदेव ने उन्हें ही उमादे को लाने के लिए जैसलमेर भेजा था। उमादे शादी की पहली रात ही मालदेव से नाराज हो गई थी, क्योंकि उमादे ने मालदेव को उसकी दासी भारमली से कामासक्त देख लिया था। इतिहास में उमादे 'रूठी राणी' के नाम से प्रसिद्ध है । मालदेव ने अनेक प्रयत्न किए परन्तु वह मानी नहीं । प्रासोजी उसे समझा कर जोधपुर के निकट कोसाणा गांव तक ले पाए थे परन्तु फिर उसका मान जगा और वह वापस जैसलमेर चली गई। पासोजी ने उसे कहा- यदि तुम अपने प्रण पर दृढ़ रही तो मैं तुम्हें अमर कर दूंगा। पासोजी ने 14 कवित्त (छप्पय) कहे जो 'उमादे भटियाणी रा कवित्त' नाम से विख्यात हुए । इस तरह आसोजी ने अपने कथन को सत्य सिद्ध किया। एक वानगी यहाँ दी जाती है- सझसोळ सिणगार, सतव्रत अग सना है । अरकवार मुख ऊग नीर गगाजल नाहै ॥ चीर पहर अस चढ, मुकुट वैरणी सिर खुल्ल । देती परदिखणांह, हंमगत राणी हिल्ले ॥ सर भूषण पंस लिधो सरग, सामंतणो मन संजियो। रूसणो मालदे राव सू, भटियाणी इम भंजियो । .
डो राव मालदेव ने मासोजी को ही भारमली को लाने के लिए भेजा था जिसे उन्होने बाद में वाघा को सौप दिया था। कारण यह था कि भारमली बाधा से प्रेम करती थी। उसने पूर्ण पुरुप के दर्शन वाघा में किए थे राजा मे नहीं । बाधा आसोजी का मित्र था । पासोजी द्वारा अपने मित्र वाधा की मृत्यु पर लिखे करुण-रस से लबालब भरे हुए दोहे इतने मर्मस्पर्शी है कि कई लोग तो सुनकर प्रश्न वा करने लग जाते है । ये दोहे 'वाघा रा दूहा' नाम से लोकप्रिय आसोजी के द्वारा लिखी पाठ रचनाएं प्राप्त हुई है जिनमे लक्ष्मरायण, गुण निरंजन प्राण (पुराण), गोगाजी री पेडी, वाघा रा दूहा, उमादे भटियाणी रा कवित्त प्रादि प्रमुख है। 'हालां-झालां रा कुंडळिया-कवि ईसरदास रचिन 'हालां-झाला रा कुंडळिया' वीर रस की एक विशिष्ट रचना है। यह ध्रोन के स्वामी हाला जसा और हळवद के स्वामी झाला रायसिंह के बीच संवत् 1620 या 1621 ई. में हुई लड़ाई पर आधारित है। इसमें 50 कुडळिया छन्द है। हालां-झालां साला- बहनोई थे। कई लोग इन्हे मामा-भानना मानते है परन्तु यह सही नही है । कुंडळिया कथात्मक रचना नहीं है अपितु भावप्रधान रचना है । कथा तो प्राधार मात्र है । यह जसा की प्रशंसा में लिखी गई ईसरदास की फुटकर कुडळियों का संकलन है, जिसका प्रत्येक पद अपने आप में पूर्ण है । इसमें दो प्रकार के छन्द है--वर्णनात्मक और भावात्मक । वर्णनात्मक छन्दो की संख्या बहुत कम है । यह वीर रम को प्रोजस्वी कृति है । कुछ अन्य वीर-काव्यों की तरह इसमें द्वित्व वर्गों का प्रयोग और शब्दों की तोड़-मरोड़ न होकर सरल, सहज और स्वाभाविक भाषा का प्रयोग हुया है । प्रसग के अनुकूल भापा का प्रयोग वीर रम के अद्भुत भाव और उनका प्रकाशनलाघव, सकेतात्मक उल्लेख और चित्रोपम वर्णन इस कृति की विशेषता है । कवि ने जिम भाव की व्यंजना की है, उम पर मानी अपनी मुहर लगा दी । इसमें अधिकांश पद्य जमा की राणी से कहलाए गए है जिनमे वह अपने पति, अपनी सहेलियो ग्रादि के सामने अपने हृदयोद्गार प्रकट करती है । भावो में कोमलता और स्वाभाविकता का अनूठा समावेश है। इस रचना अनेक परवर्ती कवियों को प्रभावित किया है । रचना के भावों की वानगी द्रष्टव्य है-- धीरा धीरा कुरा गुम्मर किया मजाह । महुँगा देसी झूपड़ा जे घरि होसी नाह । नाह महँगा दियण झूपड़ा निम्र नर । जावसौ कड़नळा केमि जरसो जहर ।
रुक-हथ पेखियो हाथ जसराज रो । ठिवता पाव धीरा दियो ठाकुर ॥ इस पद्य मे जसा की स्त्री ने झाला रायसिंह को सम्बोधित किया है कि 'धीरे-धीरे चलो, गर्व मत करो, यदि मेरे पति घर हुए तो वे अपने भोंपड़े को बहुत महंगे मोल पर देगे। युद्ध में जाकर तुम कैसे जहर को पचानोगे । वहाँ तुम खड़ गधारी जसराज के पराक्रम को देखोगे। इसीलिए हे ठाकुर ! अपने पैरों को धीरे-धीरे रखो और पैरो की आहट मत होने दो।' हालां-झालां पर एक रचना और प्राप्त हुई है-'कुंडळीया जसराज हरधीलाणी रा। 'किरतार वावनी' और 'विरुद्ध छिहतरो'-~~-'किरतार वावनी' और 'विरुद्ध छिहतरो' अकबर के दरवार के सम्मानित कवि दुरसा आदा रचित है । विरुद्ध छिहतरी के बारे में कुछ मतभेद है। कई विद्वानो को यह स्पष्ट राय है कि विरुद्ध छिहतरी दुरसाजी की रचना नहीं है। दुरसा जी चारणो की पादा गौत्र के थे। अपने समकालीन शास इन्हें अपनी कविता के लिए कई इनाम-इकराम मिले । अकबर के दरव रहकर भी उन्होने अपनी आवाज बुलन्द रखी । उनको कविता के स्पष्ट स्वर उल्लेख करने योग्य है- अकबर घोर अंधार, अन्धाणा हिन्दू अवर। जाग जग-दातार, पोहरै राण प्रताप सी।। अकयर संमद अथाह, तिहं डूबा हिन्दू-तुरक । मेवाड़ो तिण माह, पोयण फूल प्रताप की ।। लोप हिन्दू लाज, सगपण रोई तुरक मू। प्रारज कुळ री लाज, पूंजी राण प्रताप सी।। प्रकवर पथर अनेक, के भूपत भेळा किया। हाथ न पायो हेक, पारस राण प्रताप सी ॥ अकबर हिय उचाट, रात-दिवम लागी रहै । मजवट-पट समराट, पाटगा रागए प्रताप मी ॥ सुरसा प्रादा के स्वर राजस्थानी कविता में काफी चचित है। 'किरतार धावनी' 51 छन्दी को रचना है। इसके प्रत्येक छन्द में विभि पवमायो के लोगों की पीड़ा का वर्णन किया गया है। किमान, मलाह, महापर पायाहरु, नोर, पामोगर, पट्टेवार, येग्या, भिक्षक, पहरेदार, भार, मरतीय महार लोहार, माधु, याजीगर, मदारी, लाह हारा, कमाई म पाया पोर गरीब लोगो की पीड़ा का यो हो महानुभूतिपूर्ण ।
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55 ने किया है । अकबर के राज-वभव में रहकर कवि ने इन लोगों पर अपनी र चराकर कवि धर्म का सच्चा परिचय दिया है। छणय छन्द रचित रवना दुरमा के उत्कृष्टतम काव्य में से कही जा सकती है। एक लकड़हारे चित्र यहाँ द्रप्टव्य है- जेठ महीना जोर, तप सिंह दरिणयर तातो! धरली वयदे धन्ये, महाबळ लूये मानो ॥ काळा गिरवर कहर, जोइ तिहां निरधन जावे। मिर माटो ले सरळ, धर्म पर सामों पावै॥ भार मंजोगे भेदीयो, भूमि पाव पादा भरै । करसार पेट दूभर किया, सो काम एह मानव करे ।। भगवान ने पेट को कठिनता से भरने वाला बनाया है इसलिए मानय को ऐसे कठिन-कठिन काम करने पड़ते है । यह रचना राजस्थाना की डिंगल शैली में लिखी गई है। विरुद्ध छिहतरी' में महाराणा प्रताप की प्रशंसा में कहे गए छिहत्तर सोरठे है। कई विद्वानों ने हाल ही मे इम रचना को 'दुरसा' कृत होने में सन्देह व्यक्त लिया है और इसे कमरदान लालम रचित माना है। इस कृति के कुछ दोहे यहाँ उल्लेखनीय है- गढ़ ऊंचो गिरनार, नीचो ग्राबू ही नहीं । भावर अघ अवतार, पुन अवतार प्रताप सी॥ मनस पुरष प्रादेश, देश बचाय यानिये। वरतन करू विशेप, मुहृद नरेश प्रताप सी। भाभा जग उदार, भारतवरस भवांनभुज । मानम सम प्राधार, पीतम राणा प्रताप सी ॥ कवि प्रारपना कोन, पंडित हूँ न प्रवीन पद । दुरमो पाहो दोन, प्रभु नव मरन प्रताप सी॥ दुरमा मादा ने प्रायर के दरबार में रहकर भी मानसिक रूप गे पाने मार राणा शामिह को शरण में माना है और अपनी दीन स्थिति पनि दायर में सवार की स्थिति को भी अपत्यक्ष रूप से बताया है । इन गोदी में पकानेक तरही में प्रतापगिह की विशिष्टता बताते हुए उनकी प्रान्तरिक मारना होगन्ति पार पावर की निंदा की गई है। 'm' मा प्रयोग कर दुरगा मादा ने बुद्ध अन्धो कृतियां रची हैं उनमें राम मुसा रा नगा', 'मुलगा राय पपरमिध गमिषोत रा' र पा रा' और 'राजा मानमिह राणा' इम लाat nात' 59 कवि ने किया है। अकबर के राजे-वभव में रहकर कवि ने इन लोगों पर अपनी कलम चलाकर कवि धर्म का सच्चा परिचय दिया है। छप्पय छन्द में रचित यह रचना दुरसा के उत्कृष्टतम काव्य में मे कही जा सकती है। एक लकड़हारे का चित्र यहाँ द्रष्टव्य है-- जेठ महीना जोर, तप सिंह दरिणयर तातो । धरती वसदे धव, महावळ लूये मातो ॥ काळा गिरवर कहर, जोइ तिहां निरधन जावै । सिर भाटो ले सबळ, धस घर सामों पार्व। भार संजोगे भेदीयो, भूमि पाव पाद्या भरै । करतार पेट दूभर किया, सो काम एह मानव करै ।। भगवान ने पेट को कठिनता से भरने वाला बनाया है इसलिए मानव को ऐसे कठिन-कठिन काम करने पड़ते है । यह रचना राजस्थाना की डिंगल शैली में लिखी गई है। 'विरुद्ध छिहतरी' में महाराणा प्रताप की प्रशंसा मे कहे गए छिहत्तर सोरठे है। कई विद्वानो ने हाल ही में इस रचना को 'दुरसा कृत होने मे सन्देह व्यक्त किया है और इसे ऊमरदान लालस रचित माना है। इस कृति के कुछ दोहे यहाँ उल्लेखनीय है- गढ़ अंचो गिरनार, नीचो पावू ही नहीं । अकबर अघ अवतार, पुन अवतार प्रताप सी ॥ अलख पुरुष प्रादेश, देश बचाय दयानिधे । वरनन करू विशेप, सुहृद नरेश प्रताप सी ॥ ग्राभा जग उदार, भारतवरस भवानभुज । प्रातम सम आधार, पीतम राण प्रताप सी ॥ कवि प्रारथना कीन, पडित हूँ न प्रवीन पद । दुरसो आढो दीन, प्रभु तव सरन प्रताप सी ॥ दुरसा आढ़ा ने अकबर के दरबार मे रहकर भी मानसिक रूप में अपने पापको राणा प्रतापसिंह की शरण में माना है और अपनी दीन स्थिति यानि अकवर के दरवार की स्थिति को भी अप्रत्यक्ष रूप से बताया है। इन सोरठों में अनेकानेक तरहों से प्रतापसिंह की विशिष्टता बताते हुए उनकी प्रान्तरिक भावना की प्रशस्ति और अकबर की निंदा की गई है। 'मुलणा' छद का प्रयोग कर दुरसा पाढ़ा ने कुछ अच्छी कृतियां रची है उनमें 'राव सुलताण रा मुलणा', 'मुलणा राव अमरसिंघ गजसिंधोत रा' "मुलगा राव मेधारा' और 'राजा मानसिंह रा मुलणा' । इसके अलावा 'गजगत' छंद का प्रयोग करके भी आढ़ा ने रचना लिखी है ।
56 कवि ने किया है। अकबर के राज-वभव में रहकर कवि ने इन लोगों पर अपनी कलम चलाकर कवि धर्म का सच्चा परिचय दिया है। छप्पय छन्द में रचित यह रचना दुरमा के उत्कृष्टतम काव्य में से कही जा सकती है। एक लकड़हारे का चित्र यहां द्रष्टव्य है-- जेठ महीना जोर, तयं तिह दणियर तातो। धरती वसदे धव, महाबळ लूये मातो ॥ काळा गिरवर कहर, जोइ तिहा निरधन जावै । सिर भाटो ले सबळ, धस घर मामों पावै ॥ भार संजोगे भेदीयो, भूमि पाव पाडा भरै। करतार पेट दूभर किया, सो काम एह मानव करै ।। भगवान ने पेट को कठिनता से भरने वाला बनाया है इसलिए मानव को ऐसे कठिन-कठिन काम करने पड़ते है । यह रचना राजस्थाना की डिंगल शैली में लिखी गई है। "विरुद्ध छिहतरी' में महाराणा प्रताप की प्रशंसा में कहे गए छिहत्तर सोरठे है । कई विद्वानो ने हाल ही में इस रचना को 'दुरसा' कृत होने मे सन्देह व्यक्त किया है और इसे ऊमरदान लालस रचित माना है । इस कृति के कुछ दोहे यहाँ उल्लेखनीय हैं- गढ़ अंचो गिरनार, नीचो आबू ही नहीं । अकबर अघ अवतार, पुन अवतार प्रताप सी ॥ अलख पुरुप आदेश, देश बचाय दयानिधे । घरनन करू विशेप, मुहृद नरेश प्रताप सी ।। याभा जग उदार, भारतवरस भवांनभुज । प्रातम सम प्राधार, पोतम राण प्रताप सी ।। कवि प्रारथना कीन, पंडित हूँ न प्रवीन पद । दुरमो आढो दीन, प्रभु नव सरन प्रताप सी ।। दुरसा आढ़ा ने अकबर के दरबार में रहकर भी मानसिक रूप मे अपने आपको राणा प्रतापसिंह की शरण में माना है और अपनी दीन स्थिति यानि अकबर के दरवार की स्थिति को भी अप्रत्यक्ष रूप से बताया है । इन सोरठों में अनेकानेक तरहो मे प्रतापसिंह की विशिष्टता बताते हुए उनकी प्रान्तरिक भावना की प्रशस्ति और अकवर की निंदा की गई है। 'मुलणा' छंद का प्रयोग कर दुरसा प्रादा ने कुछ अच्छी कृतियां रची है उनमें 'राव सुलताण रा मुलगा', "मुलणा राव अमरसिंघ गजसिंधोत रा' 'मुलगा राव मेघा रा' और 'राजा मानसिंह रा मुलगा'। इसके अलावा 'गजगत' छंद का प्रयोग करके भी आढ़ा ने रचना लिखी है।
कवि ने किया है। अकबर के राज-वभव में रहकर कवि ने इन लोगों पर अपनी कलम चलाकर कवि धर्म का सच्चा परिचय दिया है। छप्पय छन्द में रचित यह रचना दुरसा के उत्कृष्टतम काव्य मे से कही जा सकती है। एक लकड़हारे का चित्र यहां द्रष्टव्य है-- जेठ महीना जोर, तप तिह दरिणयर तातो। धरती वसदे धस, महाबळ लूये मातो ॥ काळा गिरवर कहर, जोइ तिहां निरधन जावे। सिर भाटो ले सबळ, धसे घर सामों पावै ।। भार संजोगे भेदीयो, भूमि पाव पाधा भरे । करतार पेट दूभर किया, सो काम एह मानव करै ।। भगवान ने पेट को कठिनता से भरने वाला बनाया हे इसलिए मानव को ऐसे कठिन-कठिन काम करने पड़ते है । यह रचना राजस्थाना की डिंगल शैली में लिखी गई है। 'विरुद्ध छिहतरी' में महाराणा प्रताप की प्रशंसा मे कहे गए छिहत्तर सोरठे है । कई विद्वानो ने हाल ही में इस रचना को 'दुरसा' कृत होने में सन्देह व्यक्त किया है और इसे ऊमरदान लालस रचित माना है । इस कृति के कुछ दोहे यहाँ उल्लेखनीय है- गढ ऊंचो गिरनार, नीचो पावू ही नहीं। अकबर अध अवतार, पुन अवतार प्रताप सी ।। अलख पुरुप प्रादेश, देश बचाय दयानिधे । वरनन करू विशेप, सुहृद नरेश प्रताप सी। ग्राभा जग उदार, भारतवरस भवानभुज । मातम सम प्राधार, पीतम राण प्रताप सी।। कवि प्रारथना कीन, पंडित हूँ न प्रवीन पद । दुरमो प्राढो दीन, प्रभु तव सरन प्रताप सी॥ दुरसा आढ़ा ने अकबर के दरबार में रहकर भी मानसिक रूप में अपने पापको राणा प्रतापसिंह की शरण में माना है और अपनी दोन स्थिति यानि अकबर के दरबार की स्थिति को भी अप्रत्यक्ष रूप से बताया है। इन सोरठों में अनेकानेक तरहो से प्रतापसिंह की विशिष्टता बताते हुए उनकी आन्तरिक भावना की प्रशस्ति और अकबर की निंदा की गई है। 'मुलगा' छंद का प्रयोग कर दुरसा पाढ़ा ने कुछ अच्छी कृतियां रची है उनमें 'राव सुलताण रा मुलणा', 'मुलणा राव अमरसिंघ गजसिंधोत रा' "मुलणा राव मेघा रा' और 'राजा मानसिंह रा मुलणा' । इसके अलावा 'गजगत' छंद का प्रयोग करके भी आढ़ा ने रचना लिखी है।
53 - गर-हर पेगियो हाय जगराज ग ठिया पाप धीरा दियो दारी ॥ इम पर मेसमा की स्त्रीने माला गनिक को गम्बोषित मिया कि 'धीरे-धीरे चली, गवं मन फरी, यदि मेरे पति पर हए तो पपने माँ को बहुत महगे मोल पर देंगे। गुरु म गाकर तुम कंगे जहर को पचामोगे । वहाँ तुम राड गधारी जगराज के पराक्रम को दंगोगे । गीलिए हे ठाकुर ! मापने परों को धीरे-धीरे समो प्रोर वर्ग की माहट मन होने दो।' हालां-माला पर एक रनना पोर प्राप्त हुई है-'डळीया जमराज हरधोलागी रा।' "फिरतार वायनी' और "विण्य पितरो'-'किरतार यायनी' और 'विरत बिहारी' प्रकार के दरबार के सम्मानित कपि दुरमा मात्रा रचित है । विष्ट छिहतरी के बारे में कुछ मतभेद है। कई विद्वानी पी यह स्पष्ट राय है कि विरुख दिहतरी दुरमाजी गो रणना नही है। दुरसा जो चारों को प्रादा गोत्र थे। अपने समकालीन शासको से इन्हे अपनी कविता के लिए कई इनाम-इकराम मिले । मकबर के दरवार में रहकर भी उन्होंने अपनी मावाज बुलन्द रमी । उनको कविता के स्पष्ट स्वर यहाँ उल्लेस करने योग्य है-- अकबर घोर अंधार, अन्धाणा हिन्दू पवर । जाग जग-दातार, पोहर राण प्रताप सी ।। अकवर संमद अथाह, तिहं इवा हिन्दू-तुरक । मेवाड़ो तिरण माह, पोयण फूल प्रताप सी। लोप हिन्दू लाज, सगपण रोई तुरक मू। पारज कुळ री लाज, पूंजी राण प्रताप सी।। प्रकवर पथर अनेक, के भूपत भेळा किया। हाथ न पायो हेक, पारस राण प्रताप सी ॥ अकवर हिय उचाट, रात-दियम लागी रहै। अजवट-वट समराट, पाटगा राण प्रताप सी।। दुरसा पाढा के स्वर राजस्थानी कविता में काफी चर्चित है। 'किरतार बावनी'51 छन्दो की रचना है। इसके प्रत्येक छन्द में विभिन्न व्यवसायो के लोगों की पीड़ा का वर्णन किया गया है। किसान, मल्लाह, महावत, पत्रवाहक, चोर, पासीगर, पट्टेवाज, वेश्या, भिक्षुक, पहरेदार, भाट, मरजीया, कहार लोहार, साधु, बाजीगर, मदारी, लकड़हारा, कसाई अदि विभिन्न अभावग्रस्त और गरीब लोगों की पीड़ा का बड़े ही सहानुभूतिपूर्ण तरीके से वर्णन ।
39 ॥ कवि ने किया है । अकवर के राज-वभव में रहकर कवि ने इन लोगों पर अपनी कलम चलाकर कवि धर्म का सच्चा परिचय दिया है। छप्पय छन्द में रचित यह रचना दुरसा के उत्कृष्टतम काव्य में मे कही जा सकती है। एक लकड़हारे का चित्र यहां द्रष्टव्य है-~- जेठ महीना जोर, तप सिंह दणियर तातो। धरती वसदे धख, महाबळ लूये मातो काळा गिरवर कहर, जोइ तिहा निरधन जावे । सिर भाटो ले सबळ, धस घर मामों पावै॥ भार संजोगे भेदीयो, भूमि पाव पाछा भरै । करतार पेट दूभर किया, सो काम एह मानव करें। भगवान ने पेट को कठिनता से भरने वाला बनाया है इसलिए मानव को ऐसे कठिन-कठिन काम करने पड़ते है । यह रचना राजस्थाना की डिंगल शैली में लिखी गई है। "विरुद्ध छिहतरी' में महाराणा प्रताप की प्रशंसा में कहे गए चिहत्तर सोरठे हैं । कई विद्वानो ने हाल ही में इस रचना को 'दुरसा' कृत होने मे सन्देह व्यक्त किया है और इसे ऊमरदान लालस रचित माना है । इस कृति के कुछ दोहे यहाँ उल्लेखनीय है- गढ ऊंचो गिरनार, नीचो पाबू ही नहीं। अकबर अघ अवतार, पुन अवतार प्रताप सी ।। अलख पुरुप प्रादेश, देश बचाय दयानिधे । वरनन करू विशेप, सुहृद नरेश प्रताप सी।। प्राभा जग उदार, भारतवरस भवांनभुज । प्रातम सम प्राधार, पीतम राण प्रताप सी ।। कवि प्रारथना कीन, पंडित हूँ न प्रवीन पद । दुरमो ग्राढो दीन, प्रभु तव सरन प्रताप सी ॥ दुरसा आढ़ा ने अकबर के दरवार मे रहकर भी मानसिक रूप मे अपने पापको राणा प्रतापसिंह की शरण में माना है और अपनी दीन स्थिति यानि अकबर के दरबार की स्थिति को भी अप्रत्यक्ष रूप से बताया है । इन सोरठो में अनेकानेक तरही से प्रतापसिह की विशिष्टता बताते हुए उनकी प्रान्तरिक भावना को प्रशस्ति और अकवर की निंदा की गई है। 'मुलणा' छंद का प्रयोग कर दुरसा पाढ़ा ने कुछ अच्छी कृतियां रची हैं उनमें 'राव सुलताण रा मुलणा', 'मुलणा राव अमरसिंघ गजसिंधोत रा' 'मुलणा राव मेघा रा' और 'राजा मानसिंह रा मुलणा' । इसके अलावा 'गजगत' छंद का प्रयोग करके भी आड़ा ने रचना लिखी है।
60 । 'सूजा बालेघा रा कवित्त'मध्यकाल के चारण साहित्य में प्रासिया करमसी रचित 'सूजा वालेछा के कवित्त' उल्लेरनीय है । 'गूजा बालेघा रा रवित्त' में हरमाड़ा युद्ध का वर्णन है । इस युद्ध मे मूजा पालेदा काम ग्राता है। यह युद्ध 1556 ई. में लड़ा गया था। करमसी ग्रामिया का पूरा नाम ग्रामिया करममी दूदो था। करमसी दूदो ने 'मरमिया राव सिरोही रा' नाम में एक और कृति की रचना की है। इन्ही की लिखी राठौड़ रतनसिंह को वेलि भी मिलती है। इसमें राठौड़ रतनसिंह और कुलीया के बीच हुए युद्ध का वर्णन है । इम कृति में दुश्मन की मेना को विप कन्या और रतनसिंह को वीद बताया गया है। 'गुण रूपक'-गुग पक की रचना केमोदास गाडण ने की है । कसोदास गाडण 17 वी शताब्दी के प्रारम्भ में सर्वाधिक सम्मानित कवि हुए हैं। इनका रचना. काल 1583 ई और 1644 ई. रहा है । केसोदास सोजत के पास 'चिडिया' नामक गांव के रहने वाले थे। ये गाडण शासा के चारण कवि थे। केसोदास गृहस्थी थे परन्तु गेरुवा वस्त्र पहिनते । इनकी प्रशमा में कहा हुअा राठौड़ पृथ्वीराज का यह दूहा बहुत लोकप्रिय है- केसो गोरपनाथ कवि, चेलो कियो चकार । सिध रूपी रहता सवद, गाडण गुण भडार ।। केसोदास ने अपनी रचनाएं राजस्थानी को डिंगल शैली में की है। इनके तीन ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध है- 'गुण रूपक', 'राव अमरसिंह रा दूहा' और 'विवेक वार्ता' । 'गज गुण प्रकाश' भी इन्ही की लिखी हुई कृति है । इन ग्रथो मे 'गुण रूपक' सबसे बडा ग्रंथ है। इसमे जोधपुर के महाराजा गजसिंह के राजवैभव, उनको तीर्थ यात्रा और उनके युद्धो का वर्णन मिलता है। दूहा, कवित्त, गाहा, अडिल्ल आदि सब मिलाकर एक हजार छंदो में यह ग्रंथ सम्पूर्ण होता है । 'राव अमरसिंह रा दूहा' में नागौर के राव अमरसिंह की वीरता का वर्णन किया गया है। 'विवेक वार्ता' वेदान्त का ग्रथ है। 'राज प्रकास'-इम ग्रंथ के रचनाकार किशोरदास जाति मे भाट थे । इसका रचनाकाल 1658-59 ई के आस-पास रहा है । इसमें 132 रूपक तथा 377 पद्य है। राज प्रकास में महाराणा राजसिंह ने मालपुरा पर जो अाक्रमण किया था उसका और उदयपुर में उनके स्वागत सम्मान का वर्णन है । इसमे राणा प्रताप और मान- सिंह, अमरसिंह और जहागीर और राजसिंह के मालपुरा पर आक्रमण के बहुत ही सजीव चित्राम है, किशोरदास 'रासी' मे प्रभावित थे और इसी से प्रभावित होकर उन्होने 'रासो' की शैली अपनाई। कवि और कविता का परिचय निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता है- राणो प्रतप राजसी, धर गिरपाट उधोर । राज प्रकासित नाम गहि, कहि कहि राव किसोर॥
खांची - 'वनिका राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री-यह वर्चनिका खिडिया जगा द्वारा रचित मध्यकाल की उत्कृष्टत्तम रचनायो में से एक है। अचलदास को वचनिका के पश्चात् वचनिका शैली पर सिड़िया जग्गा ने यह एक - बहुत ही उत्कृष्ट वनिका लिखी है। इस कृति का रचनाकाल 1658 ई के आस-पास रहा है। यह वचनिका वर्णनात्मक शैली में लिखा एक वर्णनात्मक काव्य है। इसमें जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह और मुगल सम्राट शाहजहा के विद्रोही पुत्र औरंगजेब तथा मुराद के बीच उज्जैन के रणक्षेत्र में हुए युद्ध का वर्णन है। इस युद्ध में रतलाम का राजा रतनसिह लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त करता है। खिड़िया जग्गा रतलाम नरेशर राठोड़ रतनसिंह के ही प्राथित थे। रतासह के इर्द-गिर्द कथानक होने की वजह से इस वचनिका को 'रतन रासौ' भी कहा जाता है। (परन्तु 'रतन रासो' नाम से एक अलग ग्रंथ भी मिलता है जो राजस्थानी की पिंगल शैली में रचा गया है।) यह एक वीर रस का काव्य है और राजस्थानी की हिंगल शैली मे लिखा हुआ है। इस ग्रंथ मे वनिका शैली का निर्वाह पूर्णरूपेण हुआ है । पद्य के साथ गद्य भी कथा के साथ-साथ चलता है। गद्य की बानगी नीचे द्रष्टव्य है-- "इणि भाति सू च्यारि राणी त्रिण्हि खवासि द्रव्य नाळे र उचाळि वळण घाली । चंवळा चढि चढ़ि महासरवर रो पाळि प्राइ ऊभी रही। किसड़ा हेक दोस । जिसड़ी किरतियां रो झूबको । के मोतिया रो लड़ी न पवगां सू ऊतरि । महापवीत ठोड़ि ईसर-गौरज्या पूजी । कर जोड़ि कहण लागी । जुगि-जुगि औ होज धरणी दोज्यौ । न मांगा वात दूजी । पछै जमी आकास पवन पाणी चंद सूरिज नू प्रणाम करि। प्रारोगी ढोळी परिक्रमा दीन्ही ।...." वच निका में राजस्थानी गद्य का सुन्दर उदाहरण मिलता है। खिड़िया जग्गा ने गद्य लिखते वक्त उपमानो का भी सुन्दर प्रयोग किया है। भाषा प्रसगानुकूल काम में ली है । मध्यकाल में रची यह वचनिका राजस्थानी गद्य के विकास में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। 'राज रूपक' और 'सूरज प्रकास'-जोधपुर के महाराजा अभयसिंह और गुज- रात के सुवेदार शेर बिलंदखा के बीच हुए युद्ध पर ये दोनों ग्रंथ लिखे हुए है। वीरभाग रतनू ने 'राज रूपक' और करणीदान ने 'सूरज प्रकास' की रचना की है। ये दोनों ही अभयसिंह के ग्राथित थे । 'राज रूाक' में युद्ध के अतिरिक्त अभयसिंह के पिताथी महाराजा अजीतसिह और दादा महाराजा जमवंत सिंह के जीवन की घटनायो पर भी प्रकाश पड़ा है। इस युद्ध में वीरभारण अभयसिंह के साथ था । इस वजह से इस ग्रंथ में पाखों देखा वर्णन चित्रित हुआ है। इसके अतिरिक दग ग्रंथ को एक बड़ी विशेषता और भी है । वह यह कि इस ग्रंथ में इस युद्ध मे लड़ने वाले सरदार-सामन्तो प्रादि के नामो का उल्लेख भी हुमा है । संवत् जिममें यह युद्ध लड़ा गया उसका भी उल्लेख किया गया है । ऐतिहासिक दृष्टि से ये सब बहुत 62 महत्त्वपूर्ण है । यह ग्रंथ 46 प्रकासो में वैटा हुआ है । घटनामों के सही-सही संवत् 'सूरज प्रकास' 7500 छंदो का ग्रंथ है । इसकी रचना से खुश होकर महा- राज अभयसिंह ने इसके रचयिता करणीदान को 'लाख पसाव' दिया। कवि को हाथी के प्रोहदे बैठाकर स्वय घोड़े पर सवार हो उनकी 'जलेब में चले और उनको उनके घर पहुँचा कर पाए । इसका उल्लेख निम्न प्रकार है- अस चढियो राजा प्रभो, कवि चा गजराज । पोहर अंक जलेव में, मोहर चले महाराज ।। 'सूरज प्रकाग' राजस्थानी को डिंगल शैली की उत्कृष्ट रचना है । चारण परम्परा को यह एक प्रतिनिधि रचना कहलाती है। इसका कथ्य वही है जो 'राज रूपक' का है परन्तु भाषा, साहित्य और विषय विस्तार की दृष्टि से यह जादी पूर्ण है । महाराजा अभयसिंह को सुनाने के लिए करणीदान ने सूरज प्रकास का साराश एक दूसरे छोटे ग्रंथ में लिखा जिसका नाम उन्होने 'विड़द सिणगार' रखा। इसमे 138 पद्य है। करणीदान ने 'जैन जवार', 'जतीरासो' नामक ग्रंथ भी रचे । वीरभाग ने भी 'अकाक्षरी नाममाला' तथा 'भागवत प्रकास' नाम से दो और ग्रंथों की रचना की। करणीदान चारणों की कविया शाखा का कवि था और वह मेवाड़ के सूलवाड़ा गांव का रहने वाला था। वीरभाण जोधपुर के हाड़ोई गाँव का रहने वाला था। माधव यश प्रकाश-मानसिह पासिया इस ग्रंथ का रचयिता है। इस ग्रंथ में कानोड़ (मेवाड़) के रावत माधवसिंह और शाही सेना के सेनापति रणबाजखा के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। इस युद्ध मे रणबाजखा मारा जाता है । इस ग्रंथ की रचना 1731-1714 ई के पास-पास हुई है । भीम विलास-इस ग्रथ के रचयिता किसनाजी दुरसा पाढ़ा की वंश परम्परा के कवि थे। ये महाराणा भीमसिंह के आश्रित थे। 'भीम विलास' की रचना उन्होने महाराणा भीमसिंह को प्राज्ञा में 1822 ई. में की । इसमे महाराणा का जीवन-वृत्त वणित हुआ है । इतिहास को दृष्टि से यह ग्रथ बहुत उपयोगी है। कर्नल टॉड जब इतिहाम सम्बन्धी सामग्री इकट्ठी कर रहे थे तो किसनाजी उस वक्त उनके साथ थे। इस ग्रंथ के अलावा किसनाजी का लिखा 'रघुवर जस प्रकास' एक और ग्रंथ मिलता है। इसमें डिंगत छद शास्त्र का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया 'भीम प्रकास'- इस ग्रथ की रचना रामदान लालस ने की। 'लालस' भी चारणों की एक शाखा है । 'भीम प्रकास' ने मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह के राज- महल, राजदरबार, राजवंभव, गणगौर की सवारी प्रादि बहुतेरा बहुत ही सुन्दर ।
63 वर्णन मिलता है। इहा, कवित्त मिलाकर इसमें 175 छद है। वीच-बीच में कहीं गद्य भी पाया है। इस ग्रंथ के शुरूपात के 70 छंदो मे मेवाड़ का इतिहास बताया गया है। 'भीम प्रकास' भी राजस्थानी की डिगल शैली का अथ है। रामदान लालस द्वारा रचित इसके अतिरिक्त 'करगी-रूपक' और 'सीचियों का इतिहास' भी मिलता है। 'देसलजी री वनिका'--इस वचनिका में देसलजी और वुलंदखाँ (गुजरात का सूबेदार) के बीच हुए युद्ध का वर्णन हुआ है । यह युद्ध 1728 ई. में हुआ था। 'देमलजी री वचनिका' एक वर्णनात्मक काव्य है। कवि महारावळ देसलजी और उनके पुत्र लखपत, जो कि कच्छ में था, के आश्रित थे। अठारहवी शताब्दी के प्रथम श्रद्ध' भाग में मारवाड़ के घड़ोई गाँव में कवि का जन्म हुआ था। यह कवि प्रतिभा का धनी था। 'देवगुण प्रकास'-इस ग्रन्थ में 536 पद्य है। इसका रचना काल 1780 और 1795 ई. के बीच रहा है। सीकर के राव देवीसिंह ने नजफ कुलीखां मे सिरोही (सीकर) मे और शाही मेनापति मुर्तजा अली से खाटू में जो युद्ध किए उनका शानदार चित्रण 'देवगुण प्रकास' मे पाया है । 'हमोर रासो'-'हमीर रासो' की रचना जोधराज ने की । यह 1728 मे रचकर पूर्ण हुमा । यह ग्रन्थ 1000 छन्दों का ग्रन्थ है इसमें चहु वाणों की वंशावली, अल्लाउद्दीन से दुश्मनी, हम्मीर की वीरता, उसके युद्ध में लड़ने के तौर- तरीके, उसकी मृत्यु आदि के कथानक पाए है । कथानक ऐतिहासिक महत्त्व का है । परन्तु इसमे हम्मीर के बारे में कई घटनाएं विना प्रमाण के भी दी गई है। जैसे हम्मीर का खुदखुद सिर काट लेना, अल्लाउद्दीन का समुद्र में कूद के मर जाना प्रादि । इस ग्रन्थ मे हम्मीर, अल्लाउद्दीन और महिमाशाह-तीन चरित्र कवि ने चित्रित किए है । परन्तु हम्मीर जैसे वीर का जिस ढंग मे चरित्र-चित्रण होना चाहिए था वैसा नही हो पाया है। कवि ने हम्मीर और अल्लाउद्दीन को स्वर्ग में मिनाया है । इससे शायद कवि हिन्दू-मुस्लिम एकता की तरफ लोगो का ध्यान खेचना चाहता होगा । परन्तु ऐसी घटनाएं मात्र काल्पनिक है । हाँ काव्य-कौशल कवि ने इसमे अवश्य दिखाया है। ग्रन्थ मे शृंगार की छटा भी विखरी है । कही-कही प्रकृति वर्णन भी बहुत अच्छा बन पड़ा है। 'केसरी सिंह समर'-इस ग्रन्थ की रचना 1683-97 ई. के आस-पास हुई है। हरिनाम शाडिल्य इसके रचयिता है। वे खंडेना के राजा केसरीसिंह के आश्रित थे। इस ग्रन्थ मे गेखावत् वंश चलाने वाले राव शेखाजी से लेकर केसरीसिंह तक शेखावतों का इतिहास बताया गया है। ग्रन्थ में औरंगजेब ने अपने सेनापति अब्दुलखां को केसरीसिंह से युद्ध करने के लिए भेजा, उसका वर्णन भी हुआ है । इस युद्ध में केसरीसिंह वीरगति को प्राप्त होता है और रानियाँ । - 64 सती हो जाती है । यह युद्ध संडेला के पास हीरपुर के रणक्षेत्र में लड़ा गया । युद्ध का कारण यह था कि केसरीसिंह ने औरंगजेब की हिन्दू-विरोधी नीति का विरोध किया था। यह ग्रन्थ राजस्थानी की पिंगल शैली में लिखा गया है। इस ग्रन्थ में छप्पय, हणूफाल, मोतीदान प्रादि कई छन्दो का प्रयोग हुआ है। ग्रन्थ में 459 पद्य है । ग्रन्थ वर्णनात्मक शैली में लिखा गया है। परन्तु कवि ने कई सुन्दर चित्राम भी दिए है। युद्ध का वर्णन और सती चरित्र वर्णन बहुत ही सशक है । सती-परी मवाल-जवाब में कवि ने अपनी कुशल काव्य शक्ति का परिचय दिया है। 'राण रासो'-यह ग्रन्थ ऐतिहासिक महत्त्व का ग्रन्थ है । इसके रचयिता दयाराम राव ने इसमें मेवाड का इतिहास दिया है । ग्रन्थ का रचनाकाल 1680 और 1698 ई. के बीच रहा है । यह ग्रन्थ भी राजस्थानी की पिंगल शैली में लिखा गया है । सरस्वती और गणपति को वन्दना कर कवि ने सृष्टि रचयिता ब्रह्मा लेकर महाराणा जयसिंह तक मेवाड की वंशावली दी है। इसमे कई नाम सही और कई गलत पाये है । वप्पा रावल और अजयसिंह के बीच कई नाम गलत माए है । इस ग्रन्थ में महाराणा कुम्भा और महाराणा उदयसिंह, महाराणा प्रताप और अमरसिंह का वर्णन विस्तार से हुआ है। इनके युद्धो का भी कवि ने सशक्त वर्णन किया है। 'जगवितास'-इस ग्रन्थ के रचयिता का नाम नंदराम है। यह ब्राह्मण कवि था । जगतमिह (द्वितीय) का प्राधित था। इस ग्रन्य की रचना 1745 में हुई है । इसमें मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह (द्वितीय) के राज-काज, राज वैभव जग विलाम महल को प्रतिष्ठा प्रादि के वर्णन हुए है । यह भी राजस्थानी की पिंगल गली में रचा गया था। साहित्यिक दृष्टि से यह एक सशक ग्रन्थ है। ऐतिहामिक दृष्टि में भी यह काफी महत्त्व रखता है। नन्दराम रचित 'शिकार भाव' नाम से एक ग्रन्थ और मिलता है। इसमें जगतगिह के शिकारी का उल्लेग हुमा है। 'भापा भारय'-~यह तेरह हजार के लगभग छन्दी का बड़ा अन्य है। इसको रचना साद गागा रे चारण कपि गंतमी ने की थी। इसमे महाभारत के भट्ठारह पर्यो का गाराम राजस्थानी को उिगल गली में निगा गया है। इसमें दोहा, पुषय, मोगीदान प्राधिकई . काम में लिए गए हैं। हम अन्य की रपना 1737६. मेहुई है। 'रपनाय पक-यह ग्रन्थ राजस्थानी से मिल नंगी के पद का प्रत्य है।गर रररिता मंधाराम गंगवाया । यह 1506 में गिर गम्पूर्ण इपा । इस पन्य में नो शिाम है। प्रपन दो विनामों में पर्ण 30, TUTT *1 65 । । अक्षर त्याग, फळाफळ, वयण-सगाई, काव्य दोप, अखरोट, रसो के नामभेद आदि का वर्णन हुआ है । शेष सात विलासों में 72 भाति के गीतो की विशेषताएं उदाहरण सहित बताई गई है। उदाहरणों में भगवान राम की कथा कही गई है, इसी वजह से इस ग्रन्थ का नाम रघुनाथ रूपक रखा गया है । राजस्थानी की डिंगल शैली के अध्ययन के लिए यह ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण है । 'रतन रासो'-चारण कवि कुम्भकर्ण सांदू ने इस 'रासो' की रचना को है । इसमें शाहजहा के पुत्रो की आपस की लड़ाई का वर्णन हुआ है । 'राजविलास' और 'बाहुविलास' की रचना किशनगढ के महाराजा राजसिह ने की है । 'बल्लभ विलास' की रचना वृन्द कवि के पुत्र वल्लभजी ने की । करौली राजघराने में जन्मे महाराज जानसिह ने 'सुजान-विलास' रचा। इसी काल मे छत्र कंवरि बाई, ब्रजदामी, बरगीटणीजी, चन्द्रसखि, प्रतापबाल जैसी कवित्रियां भी हुई है जिन्हें अपनी रचनामो से कापी ख्याति प्राप्त हुई है । 'चंद्रनखि' के भजन मेवात के जन- मानस में प्रतिष्ठित हुए है। 'चगलमुख चपेटिका', 'मावड़िया मिजाज,' 'कृपण दर्पण' और 'संतोष बावनो'-बाकीदास रचित ये रचनाएं चारण कविता को कुछ अलग स्वर देती है । अब तक रचनाए" राजामो के गुणगान या ईश्वरभक्ति मे डूबकर लिखी गई। कवियों ने अपना ध्यान ग्राम जनता से अलग रखा । अपने असमर्थ और निर्बल राजाओं को भी कविता छोड़ नही पाई थी। बांकीदास राजामो की दुर्वलता और असमर्थता से भली-भाति परिचित थे। इसलिए उन्होने आम जनता की तरफ ध्यान केन्द्रित किया । 'चुगलमुख चपेटिका', 'मावड़िया मिजाज', 'कृपण दर्पण' आदि उनकी रचनाएं आम आदमी मे व्याप्त किसी न किसी कमी की तरफ इशारा करती है । 'संतोप बावनी' में नैतिक व्यवहार की शिक्षाएं है । ये रचनाएं राजस्थानी की डिंगल शैली में रची गई है। भाषा मे तत्सम और तद्भव शब्दो का प्रयोग भी देखने को मिलता है । वाकीदास के बारे में विस्तृत अध्ययन मध्यकाल के प्रमुख कवियों के साथ यथास्थान किया जाएगा। पौराणिक और धार्मिक काव्य राजस्थान जहाँ वीरता का पर्याय रहा है वहाँ इस धरती पर धर्म को जड़े भी बहुत फन्नी-फूली है। वीरो ने धर्म की रक्षा के लिए जहाँ अपने प्राण न्यौछावर किए है वहाँ रानियों-पटरानियों ने धर्म के लिए जौहर किया है। राजस्थान को धरती का साहित्य 'जहाँ वीरता का साहित्य है वहाँ 'शक्ति' को उपासना भी समर्पण भाव से देखी जा सकती है । मध्यकाल के कवियो ने धरती और धर्म से जुडकर भी अपनी रचनाएं की है । मध्यकाल के चारण कवि स्वयं धार्मिक भावनामो से सराबोर थे। इस युग में 'रासो' साहित्य में वीरता और . " 66 भक्ति का सांगोपांग रचाव हुआ है । यह साहित्य वीरता और भकि से 'जड़ाजन्त' है। शृंगार और भक्ति का भी इसमें सम्मिश्रण मिलता है । पृथ्वीराज राठोड (प्रिथीराज राठौड़) को 'वेलि' इसका अनुपम उदाहरण है। खिडिया जग्गा और ईसरदास की रचनाओं में जहाँ इतिहास विषयक वातें रची गई है वहाँ वीरता और उपासना भी सुपुष्ट तरीके से आई है । ईसरदास तो मध्यकाल के महान् भक्त कवियों में से गिने जाते हैं । चारण कवि ने पौराणिक और धार्मिक विषयों को वीरता के वर्णन के साथ मुन्दर ढंग से संजोया है और अपनी काव्य रचनाएँ की है । चारण तो अपना उद्भव 'शक्ति' से मानते है । वे अपनी जाति में शक्ति की देवी के चौरासी अवतार मानते है, जिनमे आवडजी, महामाया, करणीजी आदि प्रमुख है । इन देवियों को लेकर चारण कवियो ने अपनी सशक्त रचना। रची है। राजस्थान की धरती पर अनेक उपासक हुए है । राजपूतों में भी शा की उपासना बहुत लोकप्रिय रही है । शक्तिपूजा पर इसीलिए राजाश्रय में रहक काफी तादाद में साहित्य रचा गया है । भगवान शिव और सती सावित्र राम-कृष्ण, पाण्डवो आदि को विषयवस्तु बनाकर बहुत सी अच्छी रचनाए सामने पाई है । अभिमन्यु, प्रहलाद को लेकर भी कई राजस्थानी रचनाएं इर युग मे सामने प्राई है । सगुण-निर्गुण भक्ति की रचनाएँ भी इस काल में कार्फ मात्रा में रची गई है । केसोदास गाडण ने निर्गुण भक्ति के छन्द लिखे है। 154 शताब्दी मे श्रीधर व्यास ने सप्तसदी रा छन्द' और खिडिया चारण ने 'माताजी र छन्द' सरीखी कृतियों की रचना की है । इसी काल में तेजोजी चारण औ कान्होजी बारठ ने धार्मिक भावनात्रों मे डूबकर अपनी रचनाएं की है। 1621 शताब्दी मे जयसिंह ने 'हरिरासो' लिखा जिसमे उच्च स्तर की भक्ति भावना उजागर हुई है। अल्लूजी कविया राजस्थान के चारण कवियो में ख्याति प्राप्त भक्त कवि हुए है। उन्होने छप्पय और डिंगल गीत लिखे है, जिन्हें वे राम-कृष्ण और सिद्ध गोरख नाथ की प्रशंसा मे स्वयं गाया-सुनाया करते थे। वारठ पासानंद के 'गुण-निरगुण प्राण' मे निगुण ब्रह्म की कविता लिखी गई है तथा धर्म निरपेक्षता के स्वर इनकी कविता में पाए है। डोजी दड़िया ने 'गुण भाखड़ी', 'रामलीला', 'गुण चाणक वेलि' सरीखी रचनाएँ लिखी है । नाभादास ने अपनी पुस्तक 'भक्तमाल' में 14 चारण कवियों का उल्लेख किया है, जिनमे डोजो और अल्लूजी कविया का भी उल्लेख हुअा है । 'करममी सांसलो' ने1540 ई. के ग्राम-पास 'क्रिसनजी री वेलि' रची है, जिसमें रुकमणी के रूप का वर्णन बहुत ही प्रभावी ढंग मे हुना है। इस वेलि के पद्य बहुत ही उत्कृष्ट है । पृथ्वीराज को अपनी वेलि लिखने की प्रेरणा सम्भवतः इन्ही पद्यों में मिली है । कुशल- लाभ ने दुर्गासप्तशदी के आधार पर 'दुर्गा साताई' लिखी जिमकी कथा मार्कण्डेय 67 + पुराण में पाई है । चारण कवियों में बारठ ईसरदास बहुत बड़े भक्त कवि हुए हैं। इन्हें सिद्धियां प्राप्त थी, ऐसा लोगों का मानना था और वे 'ईसरा सो परमेसरा' कहकर उन्हे पूजते । ‘हरिरस', 'गुण भागवत् हंस', 'गुण रास लीला', 'गुण बाल लीला', 'गुण सभापर्व', 'गुण आगम' और 'गरुड़ प्राण' जैसी पोरा- गिक विषयों को लेकर रचनाएं को तो डिगल गीतों में धार्मिक भावनाएं प्रगटी । मध्यकाल वास्तव मे भक्ति भावनामो का युग है । इस युग मे रचित प्रमुख कृतियो की विवेचना नीचे दी जा रही है- 'माताजी रो छंद'--यह प्रसिद्ध चारण देवी 'पावड़' की प्रशस्ति में रची गई कृति है । इन्हे देवी दुर्गा के अवतार के रूप में माना जाता है । कृतिकार दुरसा पाढ़ा ने इसे 'छन्द चालकनेस माताजी रो' भी कहा है । 'चालक' नामक राक्षस का संहार करने के कारण देवी 'पावड़' का 'चालकनेस' नाम प्रसिद्ध हुआ है । 'प्रावड़ नामक चारण कन्या 'मामड़' नामक चारण की सात पुत्रियो मे सबसे बड़ी थी। सिंध के शासक 'हमीर सूमरा' ने इनके रूप पर आसक्त होकर उनसे शादी करना चाहा था, पर प्राजीवन कौमार्य व्रत धारण करने वाली इस देवी ने सूमरा के राज्य का अन्त करके वहाँ भाटियों का प्राधिपत्य करवाया, ऐसी दन्त कथा है । तब से ही यह भाटियो की कुल देवी के रूप में पूजी जाती है । 'पावड' तूठी भाटियां' (अर्थात प्रावड़ भाटियो पर प्रसन्न हुई)-ऐसी उक्ति राजस्थान में लोकप्रिय है। प्रस्तुत रचना में कवि ने इस देवी के पराक्रम और महात्म्य का वर्णन भक्तिपूर्वक किया है। प्रायः हरेक चारण कवि ने चारण देवियो को प्रशसा में गीत, कवित्त, दूहा प्रादि की रचना अवश्यमेव की है । दुरसा ने भी इसी प्रास्था की परम्परा का निर्वाह इस कृति में किया है । रचना का छन्द डिंगल छन्द शास्त्र का 'रोमकद' नामक प्रकार है । हरिरस-हरिरस भक्त कवि ईसरदास बारहठ की प्रसिद्ध और चर्चित रचना है । राजस्थान और गुजरात में आज भी अनेक लोग इसका दैनिक पाठ करते है। इसका कारण इसकी सरल राजस्थानी भाषा और भक्ति तथा प्राध्यात्म- परक रचना होना है । यह लगभग 162-165 छन्दो की मुक्तक रचना है । इसमे परब्रह्म के निर्गुण और विशेषत. सगुण रूपावतारो का अनेकाविध गुणगान और प्रात्मनिवेदन किया गया है। जिसका उद्देश्य 'प्रेमा भक्ति' और 'कर्मबन्धन' से मुक्ति पाना है । विषय को मध्य नजर रखकर दृष्टिपात करें तो हरिरस के छन्द दो प्रकार के है । एक तो वे जिनमे भक्त कवि ने रचना के उद्देश्य तथा कर्म, जीव प्रादि विषयक कतिपय तात्त्विक प्रश्न उठाये है । दूसरे वे जो इस उद्देश्य के साधन स्वरूप है-अर्थात् भगवद्-गुणगान विषयक । ईसरदास ने अवतारो का नामोल्लेख करते हुए प्रारम्भ में सिद्धान्त को वात कही है कि भक्तों के दु.स निवारण हेतु 68 प्रभु ने अनेक रूप धारण किए हे | उनके चरित-वर्णन योर गुणगान से मनुष्य का मसार से उद्धार हो सकता है, उसको जन्म एवं कर्मवन्धन मे मुक्ति मिल सकती है- माहरा क्रम मेटिवा माहव, क्रम हूँ कथिस तुहारा केसव । नाम तुहारउ हूँ घणनामी, सास-सास मभारिस सामी ॥ कवि का यह प्रात्मनिवेदन है, जिसमे कवि कहता है, "मैं अपने कर्म-बन्धन नष्ट करने के लिए तेरे कर्मों का कथन करूंगा और श्वास-श्वास में तेरा नाम स्मरण करुंगा।" 'किसन रुकमणी री वेलि'- -इस विश्व प्रसिद्ध वेलि के रचयिता राठोड़ पृथ्वीराज (प्रिथीराज) बीकानेर के राजवंश के थे। 'किसन रुकमणी री वेलि' का विश्व साहित्य में बहुत ऊँचा स्थान है । इस वेलि की प्रशंसा देश-विदेश के अनेको विद्वानो ने की है। तेस्सितोरी ने इमे 'होरेश इन डिगल' कहा है। कर्नल टॉड ने इसमें 'दस सहस्त्र घोडो का बल' बताया है। इस वेनि की काफी प्रतियाँ जूने पोथीखानों में सुरक्षित है । वेलि की कथा कृष्ण और रुकमणी के विवाह से जुडी हुई है। इसमें रुकमणी के बाल्यकाल, वयःसंधी, विवाह के लिए बातचीत, शिशुपाल की बारात का आना, रुकमणी का कृष्ण को संदेश भेजना, कृष्ण और बलराम का कुन्दनपुर जाना, रुकमणी शृंगर का वर्णन, रुकमणी देवी पूजने जाती है उसका वर्णन, रुकमणी हरण और शिशुपाल तथा रुक्म कुमार मे युद्ध का वर्णन, वर-वधु का अलग मे मिलना और निशपगमन के शब्द चित्राम, ऋतु वर्णन और ऋतु विहार, कृष्ण के परिवार और गृहस्थी का वर्णन, वेलि का महात्तम आदि इस वेलि में वरिणत हुए है । कथा का मूल आधार भागवत्-पुराण है। भागवत् के दसवे स्कन्ध के अध्याय 52, 53 और 54 मे रुकमणी की कथा आई है, परन्तु कवि ने इस कथा को बीज रूप में ही स्वीकार किया है। कथा सयोजन में कई रूढ़ियो का प्रयोग भी कवि ने किया है । जैसे रुकमणी लक्ष्मी का अवतार, मनचाहे वर हेतु गौर व शंकर की पूजा, मगाई हेतु घर मे बातचीत, रुकमणी का हरण प्रादि । 17 हालाकि वेलि एक खण्ड काव्य है परन्तु यह कोई छोटा-मोटा खण्ड काव्य नहीं है, इसको काया का विस्तार महाकाव्य तक की ऊँचाई तक भले ही न हुना हो परन्तु इसमे वह शक्ति है जो पाठकों को चकित कर देती है। कृपण वेलि का नायक है । कवि ने इसे परब्रह्म और मनुष्य-दोनो रूपो में देखा है। रुकमणी वेलि की नायिका है । रुकमणी अनन्य प्रेमिका है । वह लक्ष्मी है, और सीता है । विष्णु को शक्ति और माया है ।
वेलि में हरि महिमा, नगर वर्णन, स्वागत वर्णन, रुकमणी के रूप के चित्राम, युद्ध का वर्णन, प्रकृति चित्रण में सन्ध्या और प्रभात का वर्णन, षट् ऋतु वर्णन-बहुत ही सशक्त रूपो मे हुए है । वेलि का छन्द छोटो सांपोर है। इसके तीनो भेद-वेलियो, सोहणो यौर खुड़द सागोर-का प्रयोग वेलि मे हुआ है। खुड़द सागोर का प्रयोग अधिक हुमा है । वेलि का रचना काल 1580 ईस्वी है इसमें 305 पद्य है । निंदा स्तुति--इस कृति मे कवि ईसरदास बारहठ द्वारा परब्रह्म और उसके अवतारों की निन्दा में स्तुति की गई है । यह निन्दा अनेक प्रश्न, व्यंग्य, निष्कर्ष, स्पष्टोक्ति के रूप में है। इसमें कवि की भगवद् भक्ति, ईश्वर में निस्सीम विश्वास, उसके गम्भीर शास्त्र ज्ञान और चिन्तन का स्पष्ट बोध होता है, साथ ही इसमें समकालीन लोक-व्यवहार और मान्यताप्रो के संकेत, धर्माचरण की शिथिलताओं का चित्रण, हिन्दू-मुस्लिम एकता और समन्वय का प्रशंसनीय प्रयास है । ईसरदास की अन्य रचनाओं में ही नहीं, समस्त राजस्थानी काव्य में यह एक अनुपम एवं अनूठी रचना है । इस कृति में ईश्वर के निगुण और सगुण रूप विषयक अनेक प्रसंगों एवं कथानो के उल्लेख है जिनमें नृसिह, राम, कृष्ण, कलियुग आदि प्रमुख हैं । यह विश्व किसलिए बना है, क्यो नष्ट करता है, क्यों किसी को नरक और किसी को स्वर्ग देता है, आदि कई गूढ बातो की चर्चा कर ईश्वर को सम्बोधित किया गया है। "तूं नौकरी के हाथो मालिको को मरवाता है । तूंने हुमन को मरवाया""मरने वानों को तूं कुमौत मरवाता है, जगत की रचना कर तुम खुद ही दुःखी हुए हो, अपनी बुद्धि में तुम स्वयं ही बंधे हो "तुम पान चरते हुए ही खाल निकलवाते हो । देवो ने जव मंथरा को कैकेयी की मति पलटने हेतु भेजा तो तूंने उसकी मति ठीक नहीं की. फिर तूने कैकेयी की मति भी फेरी""उडीसा में तूं जगन्नाथ कहलाता है । परन्तु वहाँ भी तूं बिना अपनी स्त्री के ही विराजमान है ।""तूं जैन धर्म में जा मिला और लोकागच्छ, तपागच्छ, खरतरगच्छ आदि सामने पाए"तूं नए-नए नाम धारण करता है। तूं मरों को जिलाता है और जीवितो को मारता है।" इस प्रकार भक्ति मोर प्राध्यात्म की वाते इस कृति में पाई है। 'वसदेरावउत रा दहा', 'दशरथ देवउतरा दहा', और 'वल्लनदेवउत रा वहा'--ये तीनो कृतियां पृथ्वीराज राठोड़ रचित है। 'वसदेरावउत राहा' मे कृष्ण के विभिन्न प्रसंगों का वर्णन मिलता है और कृष्ण-भक्ति की महिमा गाई गई है । इस कृति को "दशम भागवत रा दूहा', 'ठाकुरजी रा दूहा' 'किसनोजी रा दूहा' नाम से भी कहा गया है। कृष्ण को राजस्थानी ढंग से 'वसदेरावउत' कहना राजस्थान को सास्कृतिक विशेषता है । कृति में दूहे न होकर सोरठिया दूहे अथवा सोरठे है । पृथ्वीराज ने दूहे कम ही लिखे हैं । अन्य रचनाएं भी प्रायः सोरठी में ही .
हैं । इस कृति मे हर सोरठे के अन्त में 'वसदेरावउत' पाता है। ऐसे सोरठो की प्राचीन परम्परा रही है। ऊजळी-जेठवा के प्रसिद्ध सोरठे भी इसी शैली के है । उनमे भी हर सोरठे के अन्त में 'जेठवा' शब्द आता है। इसी शेती पर आगे चल- कर 'राजिया', 'मोतिया', भरिया' आदि सम्बोधनों से नीति विषयक सोरटे रचे गएं । इस कृति का एक सोरठा द्रष्टव्य है- तू पायो तू ग्राइ, सब ही दिन भगतां संगठ। सिमरीजतां सहाइ, विलव न वसदेरावउत ।। 'दशरथदेवउत रा दूहा' जिसे 'रामचन्द्रजी रा दूहा' नाम से भी कहा गया है मे दशरथ पुत्र राम के महान कार्यों को स्तुति गाई गई है, और विष्णु अवतार के रूप में देखकर राम को साक्षात् ब्रह्म मानकर समर्पण किया गया है । जन्म, बाल्य- काल, धनुष-भंग, अहिल्या उद्धार, लंका पर अाक्रमण, रावण वध और विभीषण को राज्य देने तक का वर्णन इस कृति मे हुअा है। राम और कृष्ण में विभेद करते हुए कवि ने अपना साहित्य उन्हें ही समर्पित कर आत्म सुख पाया है- प्रभुताइ किया प्रवीत, जाइ समरपिया सरवनर । गाह कवित छंद गीत, दूहा दसरथदेवउत ।। 'वल्लभदेवउत रा दूहा' मे कवि ने सोरठों में अपने गुरु विट्ठलनाथ की वन्दना की है। 'रुकमणी हरण', 'नागदमण'-कृष्ण भक्त कवि सायांजी ने अपने इष्टदेव की भक्ति में ‘रुकमणी हरण' और 'नागदमण' की रचना की । 'रुकमणी हरण' में कृष्ण-रुकमणी के विवाह का वर्णन है। लोक में 'रुकमणी हरण' को 'वेलि कृष्ण रुकमणी री' से अधिक अच्छा माना गया है। परन्तु साहित्यिक दृष्टि से 'वेलि' का कोई मुकाबला नही है । 'वेनि' काव्य कला की दृष्टि से भी अनूठा काव्य-ग्रंथ है । 'रुकमणी हरण' काव्य कला की दृष्टि से साधारण ग्रंथ है। हाँ, दोनो में कथ्य की समानता है । देश काल को समानता है। दोनो कवि समकालीन थे। सायाजी भी अकबर के समकालीन थे। 'नागदमरण' सायांजी का छोटा खंड-काव्य है। इसमे कालिय-दमन की कथा पाई है । इसमें कृष्ण की किशोरावस्था, यशोदा का वात्सल्य, गोपियो का प्रेम और कृष्ण कालिय युद्ध के सुन्दर शब्द चित्राम है। सायांजी ने 'अंगद-विष्टि' नाम से भी पौराणिक कथानक लेकर एक अन्य रचना लिखी है। 'महादेव पारवती री वेलि'-16 वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में किसन नामक एक ब्राह्मण कवि ने इस वेलि की रचना की है। इसमे 382 पद्य हैं। गंगावतरण और शिव-पार्वती के विवाह पर यह एक वर्णनात्मक काव्य-ग्रंथ है। मंगाचरण, हरि महिमा, राजा सगर की अश्वमेघ रचना, भागीरथ की तपस्या मोर गंगावतरण, सती का जन्म और उमका रूप वर्णन, सती के विवाह के लिए 71 दक्ष की तरफ से नारियल भेजना, विवाह की तैयारी, बारात, सती के शृंगार, सती और शिव का विवाह, दक्ष का यज्ञानुष्ठान, सती का यज्ञ में जाना और भस्म हो जाना, शिव और दक्ष की सेना में युद्ध, पार्वती का जन्म, विवाह की चर्चा, विघ्न- वाधाएं, पार्वती का श्रृंगार, विवाह और सुर-असुर युद्ध का वर्णन इस वेलि मे पाए है । रावत सारस्वत ने इस वेलि का संपादन करते वक्त इसके रचयिता का नाम दुरसा पाढ़ा के पुत्र 'किमना आढ़ा' को बताया है। "राम रासो'-राम रासो की रचना 1595 ई. में हुई थी। इसमें 1034 पद्य है। इसके रचयिता कवि माधौदास दधवडिया जाति से चारण थे। दधवड़िया चारणों की एक खाप है। यह एक महाकाव्य है। माधौदास भक्त कवि हुए है। अपने इष्टदेव राम की कथा पर उन्होने इस रासौ की रचना की है। मध्यकाल में पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में यह एक उल्लेख करने योग्य कृति है। 'देवी स्तुति'-यह कृति करणी देवी की स्तुति में रची पृथ्वीराज राठौड़ की अनूठी कृति है । भगवती करणी बीकानेर राजवंश की अधिष्ठात्री देवी रही है। वैसे 'नागणेची' राठौड वंश की इष्ट देवी रही है परन्तु करणी ने राव बीका को राज्य स्थापना में जो मदद को तथा राव जैतसी को कामरान से हुए युद्ध में विजय दिलाई, उन घटनाग्रो के प्रति नन-मस्तक बीकानेर राजवंश में करणी माता को सर्वाधिक मान्यता रही है । पृथ्वीराज जैतसी के पौत्र ही थे । अत. यह स्वाभा- विक ही था कि पृथ्वीराज भी करणी के प्रति उच्चस्तरीय श्रद्धा रखते । पृथ्वीराज के जीवन में भी देवी की मदद का प्रसंग आया बताया जाता है। यह कृति एक स्तुति है। 'गुण प्रागम'-इस ग्रंथ में भगवान के भविष्य में होने वाले कल्कि अव- तार । वर्णन किया गया है। कवि ने बताया है कि भगवान प्रजा-पालन, देव धर्म की रक्षा और साधु-पुरुषो के उद्धार के लिए कल्कि रूप में अवतरित होगे और "किलंग' का वध करेंगे । उनके साथ सभी देवता, पाँचों पाडव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, अंगद, सिद्ध, नौ नाथ सहित हुसैन और उनके अनुयायी आदि भी होगे.. दुनिया पर दया करेंगे, मेध कन्या-वसुधा से विवाह करेंगे, दुष्टों का दमन कर 'निकळक नाथ' कहलायेंगे तथा पुनः सत्य-युग का प्रारम्भ करेंगे। इसमे कवि ने प्रकारात्मक में हिन्दु-मुस्लिम एकता, कर्मफल की अनिवार्यता और दीन दयालु, जन-रक्षक, दुष्ट-संहारक प्रभु के एक भावी अवतार का वर्णन कर लोक को आश्वस्त किया है। कुछ छंद इस प्रकार है- पाचइ पांडव पड़ा पासे, पड़े पंड पुरसाण । मिलि सतरि सहस हुसैनीयां बलिवंत जोध जुग्राण। माहव माही मेघमंडलि, प्राविस एकार। वाणिया बांभणा कावि, वहिस हुइस एकूकार । यह कृति भक्त कवि ईसरदास बारहठ रचित है।
'भागोरयो रा दूहा'- '-~-इस कृति के अन्य नाम 'गंगाजी रा दूहा' 'जाहनवी रा दूहा है। समस्त विश्व में एक ही ब्रह्म को व्याप्त देखते हुए पृथ्वीराज ने भागीरथी और भगवान को समान रूप में देखा है। इसमें कवि को उच्चकोटि की दार्शनिक दृष्टि का प्रमाण मिलता है। गंगा का पापनाशक माहात्म्य, तीनो भुवनो में व्याप्ति, अवगाहन का प्रताप, मुक्ति प्रदायिनी महिमा, भवसागर-उद्धारक- परम्परा, जल-पान से पाप-क्षरण, अपराधक्षमापन, सकलतीर्थ-फल-प्रदान आदि परम्परागत उक्तिमा इन हो के विषय है। शिव की जटाम्रो ने इसका प्रादुर्भाव तथा राजा सगर के साठ हजार पुत्रो के उद्धार की बात भी कही गई है। 'राजिया रा दूहा'-ये दूहे मध्यकाल के लोकप्रिय कवि कृपाराम खिड़िया रचित है तथा अपने नौकर राजिया' को सम्बोधित हैं । ये नीति-प्रधान दूहे है । लोक में ‘राजिया रा दूहा' नाम से लोकप्रिय है। इनकी संख्या 165 के लगभग है । इसमें प्राचारविचार, लोक-व्यवहार सम्बन्धी बातें पाई है। दूहो की भाषा सरल और भाव सरम है । राजस्थानी के मूल शब्दो का प्रयोग बहुतायत में हुआ है । मध्य- का नीन रचनाओं में 'राजिया रा दूहा' का ऊँचा स्थान है। 'गुण गोबिन्द' ' इस कृति की रचना 1643 ई. में हुई है। कृति राजस्थानी को डिंगल शैली में लिखी गई है। कृतिकार कल्याण दास राव जाति से भाट थे। कषि मेवाड के 'समेला' गांव के रहने वाले थे। इस कृति में भगवान राम और कृष्ण की लीलामो का बहुत ही सरल और भावपूर्ण वर्णन मिलता है। इस प्रथ 197 छद है। एक बानगी यहाँ द्रष्टव्य है- रवर वलंब कदंब, अम्ब, मदमत्त मत्तसरि कर मोदक उद्र लंब, करत प्रणाम कृपा करि । कृति की रचना कवि ने समर्पण भाव से की है। पौराणिक और धार्मिक अन्य रचनामों में बालकाड पर आधारित भगवान राम के चरित्र को लेकर महेशदास राव (1644-1698) ने 127 पद्यों की 'रघु- नाथ चरित' नामक रचना लिसी। भगवान राम की कथा पर ही मुहता रघुनाथ ने 1668 में 'ध रासो' रचा । कृष्ण को समक्ष रख विठ्ठलदास ने 1643ई. और 1670 ई. के मध्य 'हकमणी हरण' लिखा । आईदान गाडण को अपूर्ण कृत्ति 'श्री भवानी शंकर रो गुण शिव पुराण' मिलता है । परन्तु केसरीसिह जैतावत को कृति'पंलो पुराण' बहुत लोकप्रिय हुई है । इसमे पशु-पक्षियो के प्रतीको के माध्यम से संसार का ज्ञान कराया गया है । करणीदान (1693-1783) ने 'सूरज प्रकास' में भगवान का चरित वर्णन करते हुए राठौड़ों को राम से सम्बन्धित बताया है। 18 वो शताब्दी के प्रथम प्रभाग में पौरदान लालस ने 'नारायण नेह', 'परमेश्वर पुराण', "हिमळाज रासो' रचे जो भक्ति प्रधान प्रथ हैं। महाराणा अजीतसिंह योदा के साप-साथ अच्छे कवि भी हुए है । उन्होंने 'गुणसार' और 'गज उदार ग्रंथ' सरीखे काव्य ग्रंथ लिये है। 'गुणसार' में ये विविध, रचनाएं संकलित है परन्तु 'गज उद्धार ग्रंथ' में 'गज' और 'ग्राह' की पौराणिक कथा लेकर इस काव्य-ग्रंथ की रचना हुई है । इसी तरह 1719 ई. मे 'माताजी री वनिका' 'जती जयचन्द' रचित्त मिलती है । जती जयचंद एक जन कवि हुए है । उन्होंने इस ग्रंथ मे दुर्गा की कथा प्राचलिक भावों में कही है । 1718 ई. में वारहठ मुरारिदान ने 'गुण विजय व्याव' 250 पद्यो मे लिखी। इसमें कृष्ण-रुकमणी की पौराणिक कथा पाई है। हरिदास लानम ने महाभारत के सभापर्व को लेकर 'गुण क्षमाप्रब' लिखा । 'गुण रामावतार नीसांणी' वारहठ नरहरिदास रचित भक्तिभावपूर्ण रचना भी सामने आती है । भक्त कवियों में प्रोपा माढा का नाम भी उल्लेखनीय है। इन्होंने कई डिंगल गीत रचे हैं। ये गीत भक्ति का मार्ग दर्शाते है । मध्यकालीन पौराणिक एवं धार्मिक चारण काव्य के ये अन्तिम कवि है। इस तरह मध्यकाल मे पौराणिक कथानको को लेकर मध्यकालीन कवियो ने सरस, सरल और लोकप्रिय रचनाओं की रचनाकर मध्य- कान को प्रोजस्वी, अनुपम और अनूठे पौराणिक धार्मिक काव्य से सजाया है । प्राख्यान काव्य पाख्यान काव्य मध्यकालीन राजस्थानी कविता की एक प्रमुख विशेषता है। इस काल में कई आख्यान काव्य रचे गये। प्रमुख पाख्यान काव्यो की चर्चा नीचे की जा रही है। 'कथा अहमनो'-~-अभिमन्यु को मध्य नजर रखकर इस काव्य कृति की रचना की गई है। अभिमन्यु महाभारत में एक वीर पुरुष के रूप में वर्णित एक अनूठा पात्र है। वही इस पाख्यान काव्य का नायक है । मारु सोरठ आदि कई रागों में लिखा गया यह काव्य ग्रंथ लोगो के गाने के लिए रचा गया। इस काव्य कृति में 717 पद्य है। जिनमे दोहा, चौपई और छंद प्रयुक्त हुए है। कथा में प्राचलिक पुट ने इस काव्य कृति को बहुत भव्य रूप प्रदान किया है। इसमें कई प्रमंग पाए हैं जैसे कृष्ण पौर प्रहदानव, सुभद्रा और कृष्ण, कुती, सुभद्रा प्रोर अभिमन्यु मादि । इसमें पारिवारिक वातावरण चिषित हुना है तथा साधारण पादमी की भावनामों की घभिव्यक्ति मिलती है। कुती-सुभद्रा का प्रसंग बड़ा मार्मिक है जिसमें मभिमन्यु को युद्ध में भेजने हेतु अनुमति देने की बात पाई है। 'किसनजी रो न्याहलो' (कमशी मंगळ)--उत्तरी एवं पश्चिमी राजस्थान क्षेत्र में यह कृति बहुत लोकप्रिय हुई है। इस क्षेत्र की इसे भागयत भी कहा जा सकता है। इसके रचयिता पदम भगत थे। इसका रचना काल संभवतः 1493 पोर 1005 ई. के बीच रहा है। यह 265 पद्यो का एक प्रास्यान काध्य है । यह लोगों द्वारा गाए जाने के लिए लिसा गया है। इसमें मारु सोरठ, हंसो, रामगिरि पादि कई रागों का प्रयोग किया गया है ताकि लोग संगीतात्मक रूप में इसे गा सकें। यह भक्ति रचना है परन्तु वहाँ-तहां वीर रग भी पाया है। इसमे कृष्ण-गकमगी 14 के विवाह की कथा काव्य में संगीतात्मक शैली में चित्रित हुई है। परन्तु वंस सारी कथा में छाया-सा रहता है और एक नायक के रूप में प्राता-सा दिखाई देता है। मेहोजी कृत रामायण (1483-1544)-महोजी ने इस कृति की रचना 1518 ई. के पास-पास की थी। इसमें 261 पद्य है। इसमें दूहा और छप्पय का प्रयोग हुआ है । इस कृति में राम कथा लोक भाषा में पांचलिक रंग में रंग कर लिखी गई है । राम कथा पर यह एक प्रारम्भिक प्रास्यान काव्य है । इसमें कई रागों का प्रयोग हुअा है । जैसे-रामगिरि, मल्हार, हंसो ग्रादि । कृति के काव्य मे अभिव्यक्ति का स्वरूप अवलोकनीय है- कोटे सोहै कागरा, भीते सोहै चीत । रावळ देवळ टाल्य के, काय सराही सीत ॥ स्वर्ण मृग का छल इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है- सुण्य मीतां लक्षमण कहे, सोवंन मिरप न होय । राम विछोहण तंम छळण, दाणो हंडे कोय ।। सीता-हरण के पश्चात राम की मनोदशा का चित्रण भी अवलोकनीय है-- एकल काठी ना जग, नां उजियाळी होय । सीता गई लछमण मारिय, राम अकेलो होय ॥ हनुमान पाकर सीता को मुदरी देता है तो सीता आश्चर्य कर-कर कहती प्राडा डूंगर चीझवण, विच माळा गयंद । सीत कहै रे बंदरा, किण विधि रे नरक लोपिया समंद ।। लोकभाषा में लिखा गया यह एक बहुत ही सुन्दर प्राख्यान कान्य है । संगीतात्मक गेय शैली में होने की वजह से लोक कठो मे इसकी भाषा मे भी परि- वर्तन आया है । जैसे- इकली लकड़ी ना जळे, ना उज्याळो होय । लिछमण भाई को मारता, राम अकेलो होय ।। ऐसे ही 'राम खुदाई वावड़ी सीताजी पणिहार' आदि कई पद्यो का रूप परिवर्तित हुआ है । शेखावाटी क्षेत्र में इसके दोहे ढ़ाने मे चड़स पकड़ते माली राग मे अक्सर बोलते है। इससे पता चलता है कि यह पाख्यान काव्य काफी लोकप्रिय 'प्रहलाद चरित'-केसोदास गोदारा (1573-1679) ने चार पाख्यान काव्य लिखे है-'कथा भीव दुसासणी,' 'कथा सुरगारोहिणी,' 'कथा बहसोवाणी' और 'प्रहलाद चरित' । ये भी लोगो के गाने के लिए विभिन्न रागो में लिखे गए है।
75 मारु धनाक्षरि, के डारो, सोरठ, हंसो, मल्हार आदि रागों का प्रयोग इनमें किया गया है तथा दोहा और छप्पय में ये कृतियां लिखी गई है। 'कथा भीव दुसासणी' में दुशासन की मृत्यु का प्रसग भीम के हाथो वरिणत है। इसमें 66 पद्य है । कथा में द्रौपदी के अपमान का बदला दिखाया गया है। 'कथा सुरगारोहिणी' मे पाडवों के स्वर्गारोहण को बताया गया । 'कथा वहसोवाणी' में पाडू राजा के नरक में जाने और स्वर्ण यज्ञ का वर्णन प्राया है । 'प्रहलाद चरित' में प्रहलाद की कथा कही गई है। 'प्रहलाद चरित' केसोदास की उत्कृष्ट रचना कही जा सकती है । इस रचना का काव्य सौन्दर्य अनूठा है तथा अपनी लोकप्रियता के कारण यह कृति केसोदास की अन्य रचनामी की अपेक्षा अधिक ऊँचा स्थान रखती है। इसमे पशुओं के प्रेम और शंकर-पार्वती के अनेकानेक वरदानों के साथ हिरएकश्यप के जन्म का पौरा- णिक किस्सा भी परिणत हुअा है, साथ ही कथा मे मानवीय भावनाओं के साय प्रहलाद का चरित वरिणत हुप्रा है। 'कया उपापुराण'-मध्यका नीन आख्यान काव्यो मे 'कथा उपापुराण' अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। लोकप्रिय धुनों में गाने हेतु सुरजनदास पूनिया ने इसकी रचना को है। इसमें 232 पद्य है। इसमें उपा और अनिरुद्ध के प्रेम-प्रसंग का वर्णन लोकप्रिय धुनो में किया गया है। पौराणिक कथानो के अनुसार कंस और शिव के मध्य जो युद्ध हुघा उसका भी वर्णन इस रचना में पाया है। उपरोक्त प्रमुख मास्यान काव्यों के अतिरिक्त मध्यकाल मे कवि परशुराम ने 13 लीला कविताएं लिखी। ये कविताएं 16वी शताब्दी में लिखी गई। इनमें से 'अमरबोध', 'नामनिधि' बहुत लोकप्रिय हुई। ये वर्णनात्मक पाख्यान काव्य है । 18 वी शताब्दी में इसे गोरधनजी जो नूरू जिले के जसनाथी परम्परा के राजपूत कवि हुए है, ने 'गोर न्याहलो' नाम से 121 पद्यों का माख्यान काव्य लिखा। इसमें पौराणिक ढंग से शिव और पार्वती के विवाह का वर्णन किया गया है । लोक भाषा में लिखा हुमा यह लोक परम्परामों को उजागर करता सुन्दर प्राख्यान काव्य है । इमी तरह उदोजी रचित 'हरिचंद पुराण' और 'प्रहलाद पुराण' भी मिलते है। 17 वी शताब्दी में 'किसन व्यावलो' रस्तमजी का लिखा मिलता है तो 18 वी शताब्दी मे ससनी के 'सीत पुराण' और 'हरकीरत पुराण' सामने माते है । इन मास्यान काव्यो ने मध्यकाल को एक काव्यगत् पहचान दी है मोर ऐसो ही पहचान इस काल को मंत-साहित्य ने दी है। जिनमे मध्यकाल जगम- गाता है। मध्यकाल के प्रमुख रचनाकार राजस्थानी साहित्य के मार्ग का मध्ययन शुरू करने से पूर्व यह पावश्यक प्रतीत होता है कि पहो हम प्रम्पकान के उन प्रमुय रचनाकारों का परिचय प्राप्त करलें जिन्होने रचनाधर्मिता का निर्वाह कर राजस्थानी के साहित्य को भारतीय साहित्य मे ऊँचा स्थान दिलाया है। यही उन लेखकों की भी चर्चा की जाएगी, जिन्होंने राजस्थानी के लेखन को एक मोड़ दिया है। उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व का अध्ययन निम्न प्रकार है- बांकीदास-राजस्थान के कवियों ने विशेषतः चारण कवियों ने अपनी मीमाओं का अतिक्रमण करके भी देशकाल में व्याप्त अपमानजनक स्थिति के प्रति विद्रोह किया है । अकबर के दरवार में दुरसा आढ़ा ने ऐसे स्वर उगले थे। अंग्रेजी राज्य को ललकारने में अपने विकट साहस और प्रचंड मनोवल का परिचय भी चारण कवियों ने दिया है । इन विद्रोही कवियो में कालक्रम की दृष्टि से पहला नाम वाकीदास ग्राशिमा का है जिन्होने जोधपुर नरेश का काव्य-गुरु होते हुए भी देश की जनता को अंग्रेजी राज के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए ललकारा था। बांकीदास का जन्म मारवाड मे भाडियावास ग्राम में सन् 1781 में हुआ था । इनके पिता फतेहसिह भी काव्य मर्मज्ञ थे। प्रायस देवनाथ के माध्यम से इनकी पहुँच मानसिंह तक हो गई थी। वे स्वयं एक सिद्ध कवि थे । वे बाकीदास की काव्य प्रतिभा और वाक्चातुरी से इतने प्रभावित हुए कि इन्हें राजकवि के साथ ही अपना काव्यगुरु भी बना लिया। वे स्वछंद स्वभाव के थे । मानसिह के आश्रित होते हुए भी खरी कहने से कभी नही डरते थे। सम्भवतः वांकीदास की प्रेरणा से ही महाराज मानसिंह ने कई बार सधि की शर्तों का उल्लघन करके कम्पनी सरकार को चुनौती दी थी। चारण कवियों को जो दिशा दुरसा आदा ने दो वांकीदास ने उस कविता को जनता से जोड़ने की चेष्टा की । राजाथय में रहते हुए एक स्वर दुरसा पाढ़ा मे प्रस्फुटित हुअा तो दूसरा वाकीदास की कविता में, फिर ओपाजी अमरदान लालस संकर सामोर के साथ राजस्थानी कविता अपने उज्ज्वल भेप में ग्रा जाती है। बाकीदास ने अपने गांव में ही पढ़ना-लिखना सीखा। जब वे सोलह वर्ष के थे तभी जोधपुर आ गए थे। अपनी योग्यता और व्यक्तित्व के बलबूते पर ही वे राजघराने तक पहुँचे । मानसिंह ने इन्हे 'कविराजा' की उपाधि से सम्मानित किया और पग में सोने का कड़ा और 'बाह पसाव देकर कवि का मान बढ़ाया। बाकीदास संस्कृत, फारसी और ब्रजभाषा के अच्छे जानकार थे। डिगल में वे सिद्धहस्थ थे। बाकीदास माशुकवि हुए हैं। 'जसवन्त जसो-भूपण' के रचयिता मुरारीदान इन्ही के प्रपोत्र थे। इनका स्वर्गवास 1833 ई. मे हुमा है। वांकोदास डिंगल के प्रसिद्ध कवियों में से एक है। सौभाग्य सिंह शेखावत ने इनकी रचनायो का सम्पादन कर 'बांफोदास, मन्थावली' बनाई है। वैसे ।
77 - . , बांकीदास ग्रन्थावली नाम से और कई विद्वानों ने भी कुछ कार्य कवि वाकीदास पर किया है। वांकीदास राजाश्रय मे रहकर भी सामाजिक बुराइयों के प्रति सचेत थे। 'चुगल-मुख चपेटिका', 'वैसकवार्ता', 'मावडिया मिजाज', 'कृपण- दर्पण', 'कुकवि बत्तीमी', 'कायर बावनी' इनकी सामाजिक बुराइयों पर लिखी रचनाएँ है । 'जेहड़ जस जड़ाव', 'भुरजाळ-भूषण', 'हमरोट छत्तीसी', 'सिद्धराव छत्तीसी' आदि के अतिरिक्त कई ऐतिहासिक रचनाएं भी बांकीदास ने रची है, जिनमें नगरों और स्थानों का वर्णन हुअा है । इनके अतिरिक्त 'गंगा लहरी', 'राविका शिख-नख', 'मोह-मर्दन' जैसी धार्मिक पुस्तकें भी सामने आई है। 'नीति मंजरी', 'मोह मंजरी', 'वचन विवेक पच्चीसी', 'संतोप बावनी' आदि मे नेतक-व्यवहार की शिक्षाएं है। नीति और उपदेश सम्बन्धी कविताओं मे वांकीदास ने दुर्जनो, कायरों, मूजियों, कुकवियों, चुगलखोरो प्रादि के स्वभाव का सुन्दर वर्णन किया है। उनकी निंदा की है । कही-कही भावुकता वश उन्होने अति भी की है। वांकीदास को अलंकारों का बहुत अच्छा ज्ञान था। इस वजह मे रचनाएं इनमे अलंकृत हुई है । बाकीदास राजामों की असमर्थता और दुर्वलता से भली-भांति परिचित थे। इसलिए उन्होने आम जनता की तरफ अपना ध्यान केन्द्रित किया। उनकी 'चेतावनी रा गीत' राजस्थानी ही नहीं सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध खुनी ललकार का पहला दस्तावेज है- आयो इंगरेज मुलक रै ऊपर, ग्राहस लीधा खैचि उरा । धरिणया मरे न दीधी धरती, धणिया ऊभा गई धरा ।। फौजा देख न कीधी फौजा, दोयगा किया न खता डळा । ख्वा खाँच चूड खावद रे, उणहज चूड़े गई यळा ॥ बाकीदास के एक-एक शब्द में अथाह का और असीम अाक्रोश का ममुद्र उमड़ता दिखाई देता है। बाकीदास का अंग्रेजों के प्रति आक्रोश उनके कतिपय डिंगल गीतों में और भी स्पष्टता और प्रखरता से मुखरित होता है । कुछ अन्य नरह की रचनाएं भी कवि ने की है जिनमे एक विशेष दृष्टि सादूनो वन माहिवो, साट पग-पग खून । कायरड़ा इण काम नू, जवूक कहै बवून ।। मपंद घपावं मोतिया, हंसा लापणियाह । रहे नहीं जुध रोकियो, प्रो धारा अभियाह ॥ नर कायर मारणे नही, लूण पिहाज लगार। धो दिन छोडे धणी, मणी मिल उण वार ॥
78 वादळ ज्यू सुर धनुष पिण, तिलक बिना दुज पूत । बनौ न सोभे मोड विण, पाव बिना रजपूत ॥ इस तरह से बाकीदास ने जहाँ नीति, प्राचार, व्यवहार ग्रादि की रचनाएं लिखी वही साम्राज्य विरोधी रुस भी कविता को दिया और जनता को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खडा होने का आह्वान किया। डॉ. कन्हैयालाल सहल ने उनके राष्ट्रीय व्यक्तित्व को उजागर करते हुए लिखा है कि वर्तमान हिन्दी कविता में राष्ट्रीय भावना का श्रीगणेश भारतेन्दु हरिशचन्द्र के काल मे होता है, किन्तु भारतेन्दु को देशभक्ति राजभक्ति के साथ चलती थी और उनकी राष्ट्रीयता भी जातीयता की पोषक थी। किन्तु यह जानकर किसे प्राश्चर्य न होगा कि भारतेन्दु से भी बहुत पहले वाकीदास नामक एक राष्ट्रीय कवि ने जातीयता की भावना से ऊपर उठकर हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य की राष्ट्रीय भावना को व्यक्त किया था । बाकीदास भारतेन्दु के जन्म के सतरह वर्ष पूर्व हो स्वर्ग सिधार गए थे । हिन्दू और मुसलमानो दोनो को ललकारते हुए कि कोई तो पागे पाकर अपनी मर्दानगी का सवत दें कि वे अंग्रेजो को कुचलने के लिए कमर कसेंगे- "राखो कि हिक रजपूती, मरद हिन्दू की मुसनमान' । बाकीदास का चारण कवियो में बहुत ऊँचा स्थान है। दुरसा प्राढ़ा-दुरमा पाढा का जन्म भूतपूर्व जोधपुर राज्य के धू दला गाँव मे 1538 ई. में हुआ था। छोटी उमर मे ही इनके पिता का स्वर्गवास हो गया । तत्पश्चात् बगडी गांव के ठाकुर प्रतापसिंह ने इनको पाला और बड़ा किया। फिर अपने पास ही नौकर रख लिया । यह बात दुरसा के दोहे से स्पष्ट होती है- माथे मावीताह, जनमतणो क्यावर जितो। सोहड़ सुध पातांह, पाळणहार प्रताप सी ।। दुरसाजी अकबर के दरबार में प्रकवर के प्रिय कवि थे। उन्होने मात्र कविता ही नहीं की, अकवर की तरफ से युद्धो में भी गए । कविता से जितना धन, यश और मान दुरसाजी को मिला उतना सम्भवत. किसी अन्य कवि को नहीं मिला है। दुरसा जी का पूरा नाम दुरगाणद था । पाढा चारणो की एक शाखा है जिसका नामकरण उनके मूल निवास भूतपूर्व जोधपुर राज्य के मालानी परगने के गांव 'माढा' के कारण हुअा है। कहा जाता है कि दुरसा के जन्म के समय जव 'थाळ' बजाया जा रहा गुजरात में दिल्ली की तरफ जाते हुए एक मौलवी उधर में गुजरे मोर 79 उन्होने उस सायत को शुभ देखकर दुरसा के भाग्यशाली होने की भविष्यवाणी की। यह भी मान्यता है कि वाल्यकाल में दुरसाजी एक 'सीरवी' किसान के यहाँ नौकर थे । एक दिन उस किसान ने, सिंचाई करते समय नाले की मिट्टी बह जाने के कारण, दुरसा को मिट्टी के स्थान पर लिटा दिया और सिंचाई करने लगा। उसी समय समीपवर्ती बगड़ी के ठाकर प्रतापसिंह उधर से निकले और वे दुरसा को अपने साथ ले आए। एक दंत कथा के अनुसार 'करणी' देवी दुरसाजी के कुल में ही जन्मी थी । दुरसाजी के दो विवाहित सजातीय स्त्रियाँ और एक 'केसर वाई' नामक पासवान थी। दुरसाजी का घटनापूर्ण जीवन है । अकबर तक पहुंचने की भी एक घटना है । सन् 1571 ई. में अकबर प्रागरे से अहमदावाद जाते वक्त पाली परगने के 'गूदोज' गांव में ठहरे। बगडी के ठाकर प्रतापसिंह ने अकबर के ठहरने का प्रबन्ध-भार दुरसाजी को सौपा । वगडी के ठाकुर दुरसाजी को साथ लेकर यहाँ मुजरे के लिए हाजिर हुए। इस अवसर पर दुरसाजी ने अकबर की प्रशंसा में एक छन्द सुनाया जिमसे खुश होकर अकबर ने इन्हें एक हाथी और 'लाखपसाव' (एक लाख मूल्य का दान) दिया। जोधपुर का लक्खाजी अकबर का दरबारी कवि का। उन्होने ही दुरसाजी की अकबर से सलामी करवाई। दुरसाजी ने लक्खाजी को प्रशंसा में एक दूहा बनाया है- दिल्ली दरगाह अंब तरू, ऊंचो फळद अपार । चारण लक्खो चारणां, डाळ नमावणहार ॥ अकवर तक पहुंचने में ऐसे ही बैरामखां को दंत कथा है। एक बार दुरसाजी 'पुष्कर' स्नान करने के लिए गए । उसी समय बरामखां (उस समय अकबर का अभिभावक) अजमे प्राया हया था । दुरसाजी ने उससे मिलने का प्रयास किया परन्तु वैरामखां के लोगो ने उन्हे मिलने नही दिया। इस पर उन्होने एक युक्ति सोची। एक दिन जब वैरामखा बाहर जा रहा था तो दुरसाजी ने उनके मार्ग से थोड़ी दूर जाकर ये पंक्तियां जोर-जोर से पढनी शुरू कर दी- आफताब अधेर पर, अगनी पर ज्यू नीर । दुरसा कवि का दुक्ख पर, है वहाम वजीर ।। इस पर बैरामखा ने हाथ के इशारे से दुरसाजी को निकट बुलाया तो उन्होंने तीन दोहे कहे- तू बन्दा अल्लाह का, मै बन्दा तेराह । तेरा है मालिक खुदा, तू मालिक मेराह॥ पीर पराई मेटना, एह पीर का काम । मेरो पीड़ा मेट दे, वड़ा पीर वहाम ॥
80 विभीषण कूवारिधितट, भेटे वो एक राम । अब मिलिया अजमेर मे, दुरसा कूवराम ।। बरामखां ने इन्हें अपने डेरे में बुलाकर एक लाख रुपया पुरस्कार में दिया। यही दुरसाजी ने बैरामखा से विनती की कि वे उसे अकवर से मिला दें। बरामखा ने उन्हें मिलाने का वचन दिया। दुरमाजी अकबर से मिले तो अफवर ने उन्हें पूछा-तुम कौन हो, नो दुरसाजी ने उन्हें एक छन्द सुनाया जिसमें दुरमा ने अकबर से प्रश्न किया था कि तुम कौन हो । लक्ष्मण, अर्जुन, राम और कृष्ण इन चारों में तुम कौन ? अकबर दुरसाजी से बढ़त प्रभावित हुए और उन्हे अपने दरबार में रख लिया। दुरसाजी को अपनी कविता के बल पर कई मान-सम्मान. और जागीरें मिली । कहा जाता है कि दुरसाजी को नो 'कोड पसाव' मिले, जिनमें से तीन अकबर ने दिए थे। इनके अतिरिक्त धूदला, पाचेटिया, नातल कुडी, हीगोला (समस मारवाड) पेशुपा, झाकर, अड, लूगिया, दागला (समस्त सिरोही) रायपुरिया, दूठाडिया और कागडी (समस्त मेवाड). नामक गाँव इन्हें प्राप्त हुए । इनके अतिरिक्त अनेक 'लाग्न पसाव' और अन्य पुरस्कार प्राप्त हुए। दुरमाजी का स्वर्गवास 1651 ई.(संवत् 1768) में हुमा । दुरसाजी ने अनेक डिंगल छदो मे रचनाएं की है जिनसे छद शास्त्र सम्बन्धी उनकी बहुज्ञता का प्राभास होता है। दुरसाजी की रचनायो मे-'विरुद छिहत्तरी', ‘राव सुरताण रा झूना', 'भूगणा राय अमरसिध गज सिधोन रा', 'राव सुरताण रा कवित्त', 'झूनणा रावत मेघा रा', 'कुमार अज्जाजी नी भूचर मोरीनी गजगत' "राजा मानसिंह रा मूलणा', 'दूहा सोलंकी वीरमदे रा', 'किरतार बावनी', 'माताजी रा छंद' आदि प्रमुख है। "विरुद्ध छिहतरी' महाराणा प्रताप की प्रशसा में कहे गए छिहत्तर सोरठो का सकलन है । भूणा एक छंद है जो विभिन्न प्रमुख वीर पुरुषो के चारित्रिक गुणों व अन्य बातो को लेकर लिखे गए है। ऐसे ही कवित्त का प्रयोग किया है, जो कि एक मुक्तक छद है जिसके 'धनाक्षरि', 'मनहर' आदि नौ भेद है। "गजगत' भी छदो की एक प्रकार है । इसमे गुजरात के जामसत्ता के पुत्र 'अज्जा' की वीरता का बखान किया गया है । दूहा अपभ्रंश काल का प्राचीन छंद है इसमे अनेक नाम व भेद कहे गए है जैसे-सोरठो, खोडो, चोटियाळो, तूरी, साकळियो, बड़ो, डोढो प्रादि । 'दुहा सोलंकी वीरमदे रा' मे वीरमदे सोलको ने शाही सेनायो तथा महाराणा प्रताप और अमरसिंह के बीच हुए युद्धो में बड़ी वीरता का प्रदर्शन किया था इसी को दुरसाजी ने अपने दूहो में परिणत किया है । 'किरतार बावनी' लोक काव्य है । इसका विषय 'ग्राम यादमी' है । 'माताजी रा छंद' चारण देवी 'पावड़' को प्रशस्ति मे रची कृति है। -- 81 उपरोक्त प्रमुख रचनापी के प्रतिरिक कई फुटकर रचनाएं भी सामने पाई हैं जैम-कवित्त देवीदास जतायन रा, कुंदळिया देवीदास जंतावत रा, नीसारणी हाथीसिंह गोपालदासांत रो, नोमाग्गी राव मुरलारण रो मादि । दुरसा द्वारा रचित गीतों में अनेक प्रसिद्ध गीत-प्रकारों का प्रयोग हुमा है जिनमे सागोर, नीसांगी, पंजाळो, परटियो, पालवणी, भासढ़ो, सावझड़ो, वेलियो मादि। विश्वकारि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कमात्ता में एक चारण कवि के मुख से इन गीतो का पाठ मुनकर प्रारम विभोर होकर यह कहा था कि "ये गीत अपनी सरलता, सरसता पोर भावुकता में संत गाहित्य से भी उत्कृष्ट हैं। ये गीत संसार को किसी भी भाषा के श्रेष्ठत्तम माहित्य मे टक्कर ले सकने है।" दुरसाजी ने राजस्थानी की डिंगल ली में अपनी रचनाएँ को । राजस्थानी को "मारवाड़ी' उपभाषा को कवियों ने डिंगल काव्य के मशक्त वाहन के रूप में विक- सित किया था । भाषा की विशिष्ट शैली के अतिरिक दुरसाजी की काव्य भाषा में संस्कृत, फारसी, परवी, तुर्की मादि के तत्सम् व तद्भव शब्दो तथा शुद्ध देशी शब्दो को भी भरमार है। कहावतें एवं मुहावरों का भी मुन्दर प्रयोग हुमा है। दुरमाजी के काथ्य में संबोधनात्मक विरुद प्रधान शैली, सामान्य प्रशस्तिपरक शैली, मरसिया (मोक काव्य) शैली, रूपकात्मक शैली, परिगणनात्मक शेलो, उद्बोधनात्मक शैनी मादि मनोगत प्रयोग हुए है। काव्य में कवि की अभिव्यक्ति ही प्रमुख होती है । दुरसाजी को प्रात्पीय अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप सबोधनात्मक शैली में है । राजदरबारी पोर युद्धों में समान रूप से अपनी प्रोजस्वी वाणी में वीर कृत्यों का अभिनंदन करने वाले और क्षत्रिय धर्म की प्रतिष्ठा के लिए मर मिटने की प्रेरणा देने वाले उनके विस्ददायक स्वरूप का प्रकाश जहां-तहाँ प्रतिविम्बित हुआ है, और वे ही स्थल डिंगल के चारणी साहित्य को प्रात्मा बन गए हैं । दुरमा के काव्य सौन्दर्य में उनके गन्द चित्रों को विशाता, व्यापकता और उदारता अत्यधिक प्रभावोत्पादक है। दुरसा को कल्पनाएं बड़ी भव्य है उनका मन्द सयोजन भी बड़ा मार्मिक है । 'भिखारी' का चित्रण द्रष्टव्य है-- एक टूक कारणे, भमे घर-घर भिस्यारी, दोन वचन दाखवे, भणे मुहि लब्बर भारी, अगदेगे अगादत्त, अडे दे उत्तर प्राडा, तो ही रग रग तेथि, मागि अन मेले माडां, पिंड रो मान भूके........धर मूधि भिक्षा धरे । दुरसा को पालोचको ने एक राष्ट्र कवि के रूप में उभारने का प्रयास किया है । उनका अाधार विरुद्ध छिहत्तरो' नामक रचना है। कुछ शोध विद्वानों ने 'विरुद्ध छिहत्तरी' को प्रमाणिकता पर प्रश्न लगाया है क्योकि कुछ प्रसंग ऐसे पाते है जो कुछ भिन्न स्थिति को जताते है परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि दुरसाजी मध्यकाल के प्रति विशिष्ट कवियों में से थे।
ईसरदास-ईसरदास मध्यकालीन कवियों में अपना प्रमुख स्थान रखते है। इनका जन्म जोधपुर राज्य के भद्रेस गांव में सन् 1538 (सं. 1595) में हुआ था इनके जन्म के सम्बन्ध मे एक दोहा बहु-प्रचलित है- पनरासौ चिच्चारणवे, उपन्या ईसरदास । चारण वरण चकार में, उप दिन हुयो उजास ॥ इनके पिता का नाम सूजाजी और माता का नाम अमर बाई था। ईसर: दास पीताम्बर भट्ट को अपना गुरु मानते थे। इन्होंने प्रारम्भिक 21-22 वर्ष भद्रेस में ही अपने चाचा ग्रासोजी (प्रसिद्ध चारण कवि) के सान्निध्य में बिताए फिर भद्रेस छोड़कर जाम नगर चले गए। यहाँ के शासक रावळ जाम की सभा में उन्होने एक डिगल गीत पढ़ा था । इस गीत को सुनकर रावळजाम और उसके राज- पंडित पीताम्बर भट्ट बहुत प्रभावित हुए । पीताम्बर भट्ट ने ही उनको नर-काव्य न रच कर भगवद्-काव्य रचने को प्रेरणा दी थी। उनसे ही ईसरदास ने भागवत- पुराग और धर्म-शास्त्रीय ग्रथो का अध्ययन किया। 'गुण-वैराट' और एक हरजस में ईसरदास ने पीताम्बर भट्ट को गुरु के रूप मे श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है। ईसरदास ने दो शादियां की थी। इनकी प्रथम पत्नी का नाम देवलवाई था जिनसे दो पुत्र हुए-जगोजी और ओजी । शीघ्र ही इनकी इस पत्नी का देहान्त हो गया, और उनमे विरक्ति सी मा गई, परन्तु संवत् 16 17 में जाम नगर के रावळ जाम ने अवूसरा शाखा के चारण पेथाभाई गढवी की पुत्री राजबाई से उनका विवाह करवा दिया और संचाणो, रंगपुर, वीरदारकर गूढो आदि कई गॉव जागीर में दिए। रावळ द्वारा उन्हे 'कोड़पसाब' देने का भी उल्लेख मिलता है। लगभग 65 वर्ष की उम्र तक गुजरात-काठियावाड रहने के पश्चात् ईसर- दासने अपनी जन्मभूमि को याद किया और वे काठियावाड से भद्रेस पा गए । कुछ समय यहाँ रहकर उन्होने लूणी नदी के तट पर एक कुटिया वनाई और मृत्युपर्यन्त यही रहे । लगभग 80 साल की आयु मे सन् 1618 (म 1675) में इसी युटिया में अपना शरीर छोड़ा। ईसरदास के समय में केन्द्रीय शक्ति के रूप में शेरशाह सूरी और मुगल वश के हुमायू, अकबर और जहागोर दिल्ली के सम्राट हुए है। ईमरदास की अधिकाश पोर प्रमुख रचनाएं राजस्थानी । ईसरदास की रचनानी का उल्लेख करने में पूर्व यह भी उल्लेस करना आवश्यक है कि इन ईमरदास के अतिरिक्त इस नाम के 13 नारणों का उल्लेख मिलता है। जिनमे मे कई कवि भी हुए है । श्री मौभाग्य- सिंह शेखावत ने इनका नामोल्लेख अपने एक लेख में किया है । अत. इनकी रचनानी का उल्लेख बड़ी सावधानी से करना आवश्यक है। ईमग्दास की अनेक हस्त प्रतियाँ राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जयपुर, सिटी पलम पोथी माना (माम मोहर मंग्रह) जयपुर, मेठ मूरजमल जालान पुस्तकालय, कलकत्ता प्रादि में समाहित हैं।
. ईसरदास चमत्कारी पुरुप थे। इनके भक्ति-भाव के चमत्कार की अनेकों दंत कथाएं प्रचलित है। लोगो का मानना था कि उन्हें अलोकिक सिद्धियां प्राप्त थी। इसलिए लोग उन्हे 'ईसरा सो परमेसरा' कह पूजते । ईसरदास की भक्ति-भाव की रचनामो मे 'हरिरस' बहुत प्रसिद्ध और प्रमुख है । इसके अलावा 'गरुड़ पुराण', 'गुण भागवत-हस', और 'गुण प्रागम' भी उल्लेखनीय है । इनके अतिरिक्त निन्दा स्तुति', 'देवियाण', 'गुण वैराट', 'गुण रास कोला,' 'सभापर्व' जैसी रचनाएं भी उन्होंने लिसी । 'हाला-भाला रा कु डळिया' भी बहुत लोकप्रिय हुयी है। 'हरिरस' ईश भक्ति का काव्य है और 'कुटळिया' वीर रस का। हाला-झाला साले-बहनोई थे । इन्ही पर 'हाला-झाला रा कुण्डळिया' रचा गया है । हरिरस के विषय में केशवदास गाडण की यह उक्ति बहुत लोकप्रिय है--- जग प्राजळतो जाण, अघ दावानळ परां । रचियो कोहड राण, ममद हरी रस सूरवत ।। राजस्थान और गुजरात में आज भी कई लोग इसका नित्य-पाठ करते है । इसके कई संस्करण प्रकाशित हुए है । 'गुण रास कोला' में श्री कृष्ण की विभिन्न रास क्रीड़ानों का वर्णन किया गया है । इनमे कालिय-दमन, पूतना वध, वस-वध, धेनु-चारण, गोवर्द्धन-धारण, द्रौपदी का चीर वढाना, पाडवों को सहायता, जरासंध वध, शिशुपाल वध, रुकमणी-हरण प्रादि प्रसंगो का उल्लेख वर्णन है। 'गरड़ प्रांरिण' (गरुड़ पुराण) में प्रमिद्ध गरुड़ पुराण का अाधार लिया गया है । 'देवियाण' मे 85 छंद 'अडल' और 'भुजंगी' तथा अन्त मे तीन छप्पय है। इसमें महाशक्ति देवी की शकिमता और महिमा गाई गई है । 'गुण प्रागम' भविष्य में होने वाले भगवान के कल्कि अवतार का वर्णन है । “भगवंत हंस' में भगवान और हंस अर्थात् प्रात्मा दोनो को एक मानकर मन-मन्दिर में ही ईश्वर को प्राप्त करने का उल्लेख है । 'गुण वैराट' में गुरु पीताम्बर का उल्लेख किया और श्रीमद् भागवत का प्राधार उल्लेख इमके प्रारम्भ में किया है। हस, मच्छ, कच्छ, वराह, नृसिंह वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, राम, कृष्ण, बलवीर आदि का तथा भविष्य में होने वाले कल्कि अवतार का उल्लेस वर्णन किया गया है । 'निन्दा-स्तुति' में परब्रह्म और उसके प्रवतारो को निन्दा में स्तुति की गई है। यह निन्दा अनेक प्रश्न, ज्यंग्य, उपालम्भ, निस्कर्ष, सप्टोक्ति के रूप मे है और कवि की भगवद्-भक्ति, परमेश्वर पर निस्मीम विश्वास, प्रात्म निवेदन, उसके गम्भीर शास्त्र-ज्ञान और चिन्तन को द्योतक है। रचना में परब्रह्म के तिगुरण और सगुण रूप विषयक अनेकशः प्रसंगी और कथानो का उल्लेख है। ईसरदास को भाषा राजस्थानी है। जिसके कई स्तर लक्षित होते है । टिगल गीतो पोर 'हाला-भाला रा, कुडळिया' की भाषा साहित्यिक है। हरिरस, 84 गरड़ पुराण प्रादि की भाषा सरल बोलचाल राजस्थानी है। जिसमें कहीं-कही बज और सड़ी बोनो का पुट भी है। जहां तक शैली का प्रश्न है, ईसरदास ने निषेधात्मक, विधात्मक, व्याजस्तुतिपरक, प्रश्नात्मक, स्तुतिपरक, प्रशस्तिपरक, प्रात्मनिवेदनापरक, सम्बोधनात्मक और वर्णनात्मक ग्रादि प्रकारों का प्रयोग किया है। इस प्रकार हम देखने है कि ईसरदास की रचनाएँ मुख्यतः दो प्रकार की---- वीररसात्मक और भकिपरक है । 'हाला भाला रा कुडलिया' की कोटि की रचनाएं राजस्थानी में बहुत ही कम मिलती हैं और 'हरिरस' जंसा कि काव्य भी बहुत कम देखने को मिलेगा। ईसरदास इसी वजह से अपने युग पर अपनी छाप छोड मध्यकाल के प्रमुख कवि के रूप में सामने आते है । वह उत्माह भाव और प्रखर जीवन-मूल्यों का प्राशावादी कवि है । निर्भीकता, स्पष्टता और संवेदनशीलता उनकी लेखनी के गुण है। वे समन्वय के प्रस्तोता, पूर्ण के उपासक और शिवम्' के गायक है। 1 पृथ्वीराज राठौड़ (प्रियोराज)-पृथ्वीराज राठोड़ अकबर के समकालीन थे। पृथ्वीराज का युग यह युग है जिसमें बीकानेर के राव कल्याणमल पौर जयपुर के भारमल ने अपनी लड़कियों मुगल सम्राट अकबर को देकर बादशाही मेहरबानी हासिल की थी, और यह वह युग है जिसमे राजपूत दहेज के कारण मार्थिक स्थिति से डरकर अपनी कन्याग्रो का वध कर देते थे और सती प्रथा के कारण साधारण राजपूतो के परिवार छिन्न-भिन्न होते जा रहे थे और सती न होने पर परिवारो में विधवामी को कारुणिक जीवन विताना पड़ता था। समूची क्षत्रिय जाति एक झूठे दम्भ और सामाजिक अहकार में जी रही थी। पारस्परिक ईया-प, मान-सम्मान, ऊँच-नीच, कुलगत वैमनस्य और प्रतिगोध उनकी संगठित शक्ति में बाधक बन गए थे। इसी बेपरवाह शान अंधे होकर वे अपनी बेटियो को विधवा भी बनाने लगे थे। पिता-पुत्रोभाइयो की हत्या करने और कुटिल नीति में निम्नतम स्तर पर भी उतरने मे वे हिचकिचाते नहीं थे। यह वह युग था जिसमें राजपूत परिवारों ने मुगलो का संरक्षण पाकर अपने प्रतिशोध की ज्वाला को शान्त करने के लिए इतिहास को अपमानित करने वाले प्रयास किये थे । और यह वह युग भी था जिसमे स्त्रियो की कोई सामाजिक स्थिान नहीं थी। उनका पर ही उनका संसार था। उनमें शिक्षा का निताना प्रभाव था और परदे का रिवाज व्यापक था । सामाजिक असुरक्षा, व्यावसायिक शिक्षा का अभाव और पारस्परिक न्यायविधि ने उन्हे पुरुष के हाथ की कठपुतली बना दिया था और वह मिर्फ भोग्या के रूप में जी रही थी। यह वह युग था जिसमें बलात् धर्म परिवर्तन होता या मोर ऐसे वने मुमतमान क्रमशः बढते जा रहे थे । और वह युग रामभक्ति और कृष्ण भक्ति के अभ्युदय का संक्रमण काल था । बीकानेर में जसनाथी और विष्णोई सम्प्रदायों के प्रभाव का युग था। तत्कालीन साहित्य इसका प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था। ऐसी युगीन स्थितियों में पृथ्वीराज का जन्म हुआ था। वे बीकानेर के राजवश से सम्बन्धित थे । इनके पिता बीकानेर राजवंश के संस्थापक राव बीका से चौथी पीढ़ी में अकवर के समकालीन राव कल्याणमल थे और माता मोनगरा वंश की रानी भक्तमती थी। पृथ्वीराज का जन्म मार्गशीर्ष कृष्णा प्रतिपदा संवत् 1606 को हुआ था। जन श्रुतियो के अनुसार पृथ्वीराज के तीन विवाह हुए। इनकी पहली पत्नी जैसलमेर के रावल हरराज की पुत्री लालादे वताई जाती है । कहा जाता है कि, जब लालादे का स्वर्गवास हो गया तो रावल हरराज की ही अन्य कन्या 'चंपादे' से पृथ्वीराज का विवाह किया गया । एक और जनश्रुति के अनुसार पृथ्वीराज का विवाह महाराणा उदर्यासह की पुत्री से भी हुअा था । कुछ विद्वान उसे महाराणा की पुत्री न मानकर उनके पुत्र शक्तिसिंह की पुत्री मानते है । इसका नाम 'किरणादे' अथवा 'किरणवती' बताया जाता है। किरणांदे के विषय में एक बात आती है कि एक बार अकबर ने नवरोज के जश्न में लगे मीना वाजार मे पृथ्वीराज की पत्नी किरणादे को देखा तो वे उसके रूप-लावण्य पर मोहित हो गए। उन्होने उसके साथ अभद्र-व्यवहार करने की चेष्टा की तो क्षत्राणी कटार निकाल कर उसकी छाती पर चढ़ बैठी और प्रकवर को क्षमा-याचना करनी पड़ी। पृथ्वीराज के दो पुत्र और दो पुत्रियाँ थी । पुत्रो का नाम सुन्दर सिंह और गोकुलदास तथा पुगियो का नाम 'पुहपावती' और 'रक्मावती' बताया जाता है। जन-धु तियो के अनुसार पृथ्वीराज अकवर के 'नवरत्नो' में से एक थे । यद्यपि ऐसा मानने का कोई प्राधार नहीं है । एक लोकोक्ति में यह बात इस प्रकार कही गई है- पीथल सों मजलिस गई, तानसेन सों राग। हसवो रसवो मेलबो, गयो बीरबल साथ ।। अकबर और महाराणा प्रताप का प्रसंग बहुचचित्त है। जब अमर तथाकथित आत्म समर्पण का पत्र पृथ्वीराज को पढ़कर सुनाया मी व बालक यह पत्र जाली है, महाराणा प्रताप ऐसा नहीं कर सकते । यो प्राकामा हो तो पत्र लिख पूरू। कहा जाता है कि पृथ्वीराज ने उk fairfufurg लिख कर भेजे- 'पालल' जो 'पतसाह', बोले गुणा मिहिर पिछम दिस माह, ऊ MAR 1 ov पटक मूंछा पारण, के पटक निज तन करद । दो लिख दीवाण, इण दो मंहली बात इक ॥ कहते हैं कि महाराणा प्रताप ने उक पय के पहुंचने पर निम्नलिखित दोहे उत्तर में लिखकर भेजे- तुरक कहासी मुस पतं, इणतन सू इकलंग । ऊग ज्याही जगमो, प्राची बीच पतग ॥ खुशी हूँत पोथल कमध, पटको मूंछा पाए । पछटण है जेते पतो, कलमा मिर केवाए। साग मूंड महसी सको, समजस जहर सवाद । भड़ पीथल जीतो भला, वैरण तुरक संवाद | प्रकवर को जब यह पत्र पढाया तो उसे स्वभावतः बड़ी निराशा हुई। ऐसे ही एक प्रसंग वेलि के सम्बन्ध में है । साया- मूला-कृत 'रुकमणी' हरण' को सुनकर उन्होंने पृथ्वीराज को कहा कि 'साई वावा' की 'हरणी' तुम्हारी 'वेल' को . कवि के रूप में प्रकवर तथा पृथ्वीराज के सम्बन्ध के अलावा 'अकबर नामा' और 'मुहता नैरासी री ख्यात' से यह भी पता चलता है कि उन्होने अकबर की तरफ से काबुल और गागरोण के युद्धों में भी भाग लिया था। पृथ्वीराज एक कुलीन भत्रिय थे परन्तु उनके काव्य को मुख्य प्रेरक शक्ति उनको भक्ति भावना थी । 'करणीमाता' तथा 'लक्ष्मीनाथ उनके इष्टदेव थे। परन्तु कृष्ण के प्रति उनका समर्पण सर्वोपरि था। उनके सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'क्रिसन रुकमणी री वेलि' और 'वसदेरावउत रा दुहा' इस तथ्य को साक्षी है । नाभादास ने अपने भक्तमाल' नामक ग्रन्थ में पृथ्वीराज की चर्चा कविराज और भक्तराज बताकर की है। अपने समकालीन कवियो में पृथ्वीराज काफी चचित रहे। वे वीर, भक्त, और सशक्त कवि के अतिरिक्त अनेकानेक विषयों के भी ज्ञाता थे । ज्योतिष, वैद्यक, सगीत, छन्द शास्त्र, व्याकरण, काव्य शास्त्र, पुराए और लोक-व्यवहार की इनकी जानकारी 'वेलि' में जगह-जगह देखी जा सकती है। पृथ्वीराज की चहुँ दिस स्याति 'क्रिमन रुकमणी री वेलि' से है। इसके अतिरिक उन्होने, 'वादेरावत रा दूहा', 'दसरथदेवउत रा दूहा', "भागीरथी (जाह्नवी) रा दूहा', 'वल्लभदेवउत (वीठळ) रा दूहा', 'देवी स्तुति', भक्ति तथा प्राध्यात्म की अन्य रचनायें, 'यशगीत', 'प्रताप प्रशस्ति', प्रकीर्णक माहित्य, पिंगल व्रजभाषा की रचनाएं लिखी। 'वेलि' कृष्ण और रुकमणी के विवाह से जुड़ी अनेकानेक घटनाको पर लिखी अजोड़ काव्य कृति है । 'वसदेरावउत रा दूहा' में कृष्ण के नाना प्रसगी का 87. वर्णन किया गया है । 'दशरथदेवउत रा दूहा' का दूसरा नाम 'रामचन्द्रजी रा दूहा' भी मिलता है । इसमें दशरथ पुत्र राम के महान कार्यों की स्तुति की गई है । भागीरथी रा दूहा' के दूसरे नाम 'गंगाजी रा दूहा' और 'जाह्नवी रा दूहा' भी है । इसमे भागीरथी को भगवान के रूप में देखा गया है। इसमें उच्चकोटि की दार्शनिकता परिलक्षित हुई है । 'वल्लभदेवउत रा दूहा' में प्राचार्य वल्लभ के पुत्र विट्ठलनाथ की वन्दता है । ये पृथ्वीराज के दीक्षा गुरु थे । 'देवीस्तुति' में भगवती करणी की स्तुति है । 'भकि एव प्राध्यात्म की रचनाएँ" मे डिगल गीत, छप्पय, भारती, मोहलो तथा दूहे है । 'यशगीत' साख की कविता के पारम्परिक नाम से जाने गए डिंगलगीत है । प्रताप प्रशस्ति में प्रताप सम्बन्धी दूहे व गीत है। 'प्रकीर्णक' फुटकर राजस्थानी रचनाएं है जिनमे लालादे तथा चम्पादे विषयक दूहे, कूट दूहे, सज्जन-भाव के दोहे तथा कुण्डलियां यादि है। समकालीन कवियो में जिस स्तर की शिक्षा का प्रचलन था उसकी तुलना में पृथ्वीराज को अधिक उच्चस्तरीय शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य मिला था। उनके काव्य में प्रयुक्त शब्द रूप यह प्रकट करते है कि उन्हे संस्कृत, प्राकृत तथा ब्रज भाषा की समुचित शिक्षा मिली थी। वेलि में एक छन्द तो पूरा का पूरा मस्कृत में ही दिया है । पृथ्वीराज की भापा अन्य कवियो की तुलना में अधिक संस्कृत गमित थी । पिगल अथवा प्रजभापा की रचनाएं नगण्य है परन्तु जो कुछ लिखा है वह मिद्धहस्त कोटि का है । डिंगल की अपनी परम्परा पृथ्वीराज के रक्त में समाई है । डिंगल की शब्द योजना उनके पाडित्य की साक्षी है। मस्कृत शब्दो का डिंगलीकरण भी बड़ी कारीगरी से किया हुआ वेलि मे स्थान-स्थान पर मिलता है । पृथ्वीराज ने शृंगार, वीर, शांत, करुण प्रादि रसों के वर्णनी में अपनी क्षमता को भलीभाति प्रकट किया है । भापा सौष्ठव में लोक प्रचलित मुहावरो का प्रयोग अपनी विशेषता रखता है । पृथ्वीराज की भाषा में इनका सुन्दर प्रयोग हुआ है । मुहावरो की छटा समचे काव्य में व्याप्त है जिससे प्रमाद गुण की वृद्धि हुई है, जो पाठक के लिए काव्य को सहज वोधगम्य बना देता है । कवि का भाव सौष्ठव, रुकमणी की बाल्यावस्था, वय संधि, रुकमणी की आतुरता, नस-शिख वर्णन, पालकी में बैठी रुकमणी, मुच्छग्रस्त सैनिक, मिलन रात्रि मे पूर्व संध्या में रुकमणी का मनोभाय, रत्यन्त में रुकमणी, ऋतु वर्णन यादि मे देसा जा सकता है, एक प्ठ कवि, आदर्श भक्त और क्षत्रियोचित वीरत्व के धनी के रूप में पृथ्वीराज का व्यक्तित्व डिंगल साहित्य में सर्वदा अभिनन्दनीय रहेगा । 'वेलि' ने उन्हें मध्यकाल के महान कवियो में स्थान दिलाया है।
कृपाराम खिड़िया (1743-1833) मध्यकाल के कवियों में कृपाराम खिड़िया का नाम लोक में बहु प्रशंसित है। ये सीकर के राव राजा देवीसिह के मरजीदान कवि थे। मूल रूप से भूतपूर्व रियासत के 'खराडी' गांव के रहने वाले थे परन्तु बड़े होने पर वे राव राजा लक्ष्मणसिंह के पास पा गए थे और अन्त समय तक यही रहे । इनको एक गांव मिला जो वर्तमान में लक्ष्मणगढ (सीकर) तहसील में है। यह गाँव उनके नाम से 'कृपाराम की ढाणी' कहलाता है। कृपाराम ने सरल सुवोध शब्दो मे नीति सम्बन्धी पद्य लिये है जोकि 'राजिया रा दूहा' नाम से लोकप्रिय है। इनकी संख्या 165 के आस-पास है। ये दूहे (सोरठे) 'राजिया' को सम्बोधित है । राजिया कपि का नौकर था । उसके कोई बाल-बच्चे नही हुए थे, इस वजह से वह बड़ा दुःखी रहता। उसे वंश खत्म होने चिन्ता सताती । परन्तु कवि ने उसे इन दो से अमर कर दिया और ये दूहे 'राजिया रा दूहा' कहलाते है । राजिया का नाम ही लोक में प्रचलित है । कवि का नाम तो रचयिता के रूप में है। परन्तु है राजिया का नाम । “राजिया' पहले और कवि बाद में प्राता है । लोक में ये दूहे 'राजिया' के नाम से ही जाने जाते है। कुछ दूहे यहाँ द्रष्टव्य है- रोटी चरखो राम, इतरौ मुतलब पाप रो। की डोकरिया काम, राज-कथा सू राजिया ॥ मूसा नै मंजार, हितकर बैठा हेकठा । सौ जाणे ससार, रस नह रहसी राजिया ।। गरण-पोगण जिरणमाय, सुर्ण न कोई सांभळे । मच्छ गळागळ माय, रहलो मुसकल राजिया ।। कारज सरं, न कोय, बल प्राम हीमत विना। हलकार्या की होय, रग्या स्याळा राजिया ॥ लावा तीतर लार, हर कोई हाका करें। सिंघा तणो सिकार, रमणो मुसकल राजिया ॥ मुख ऊपर मीठास, घट माही खोटा घड़े। इसड़ा सू इखळास, राखीजे नंह राजिया ॥ काळी घणी कुरूप, कसतूरी काटा तुलै । 'साकर बडी सरूप, रोड़ा तुलै राजिया॥ 'राजिया रा दूहा' सरल भाषा मे होने के कारण लोक में बहुत लोकप्रिय हुए है । नीति सम्बन्धी बातचीत में इनके उद्धरण देते लोग आज भी देखे जा सकते हैं। प्रोपाजी (1752-1843 के आस-पास)-मध्यकालीन कवियो मे प्रोपाजी के स्वर चारण कविता में कुछ भिन्नता रखते है। इन्होने अपनी कविता को 80- जनमानस से जोड कर अपना ऊँचा स्थान चारण कवियों मे बनाया है। इनके पिता का नाम चारण बताजी था। इनका जन्म सिरोही के पेसवा ग्राम में हुआ था। यद्यपि इनका कोई ग्रंथ रचा हुआ नहीं मिलता परन्तु फिर भी ये अपने डिंगल गीतों के कारण मध्यकाल में लोकप्रिय रहे है। राजस्थानी की डिंगल शैली में अपनी रचनाएँ कर इन्होने ख्याति अजित की। अपने गीतों में प्रोपाजी ने मुगल माम्राज्य के पतन और मराठो के उत्थान को बताया है। प्रोपाजी ने ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हुए मानव अाचरण सम्बन्धी बातें भी अपनी कविता में ली है । स्वयं को संबोधित कर लिखा यह पद्य द्रष्टव्य है- मन जाणं चढू हाथिया माथै, खुर रगडतां जनम हुवै । नर की चीती वात हुवै नह, हर को चीती बात हुदै । चित में जाणे हुकुम चलाऊ, हुकुम तण वम नार न होय । सांचा लेख लिख्या उण साई, काचा करण न दीसे कोय ।। धाप मन बैढां धौळाहर, ताप सूखा हूंठ तठे। प्रादू रीत असी है प्रोपा, कुटी लिखी सो महल कठे । प्रोपाजी की भाषा में ग्राकर्षण है, भावो में गाम्भीर्य है । सरल भाप की वजह से इनकी रचना सप्रेषणीयता बढ़ा सकी है। मोपाजी पौराणिक एवं धार्मिक परम्परा के चारण कविता के अन्तिम कवि है।
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912 12. अलखिया लालगिरि जी 13. ग्राई पंथ जीजी देवी (आई जी) इन सम्प्रदायो का संक्षिप्त परिचय क्रमशः निम्न प्रकार है- नाथ सम्प्रदाय-नाथ सम्प्रदाय समस्त राजस्थान में प्रचलित था। इस सम्प्रदाय के मंत शिव उपासक है और शिव ही ग्रादिनाथ माने जाते है। इस सम्प्रदाय का सर्वाधिक प्रचार 11 वी शताब्दी में गोरखनाथ ने किया। नाथ सम्प्रदाय हठ योग पर ज्यादा वल देते है । नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख उद्देश्य जीवन मुक्ति हेतु जीते जी शरीर से स्वतन्त्र होना है। नाथ संप्रदाय के योगियो के 12 पंथ है · सत्यनाथी, रामनाथी, पाकलनाथी, गगानाथी, नातेश्वरी, पावनाथी, धर्मनाथी, माननाथी, कपिलनाथी, प्राय पंथी, वैराग्य पथी। इनके अलावा और भी कई पंथ नाथो में पाए जाते है । नाथ सम्प्रदाय के कवियो ने खड़ी बोली में अपने पद्यो की रचना की है। परन्तु नाथो का राजस्थानी की तरफ अधिक बल रहा है। इनकी कवितायो में साधना का वर्णन है । नाथ कवियों में पृथ्वीनाथ (1450 मे 1550 ई.) ने 'निरंजन निरवाण' और 'भक्ति बैकुण्ठ' नामक ग्रथो की रचना की । इनकी कविता नाथ सम्प्रदाय के विभिन्न पक्षों को उजागर करती है। भापा खडी बोली है परन्तु राजस्थानी का मिश्रण अधिक है । नाथ सम्प्रदाय के दूसरे उल्लेखनीय कवि जोधपुर के महाराजा मानसिंह (1742 से 1843ई.) हुए है । इन्होने कई तरह की रचनाएँ की जो नाथ सम्प्रदाय मे वहु। महत्त्व रखती है । मानगिह के लिखे हुए संगीत वद्ध पद्य भी बहुत लोकप्रिय हुए है। नाथ भक्त, नाथवाद और नाथ दर्शन पर इनकी कोई 37 रचनाएं सामने आई है । 'नाथ चरित्र', 'जलंधर चरित्र', 'नाथ पुराण', 'जलंधर ज्ञान सागर', 'अनुभव मंजरी' 'सरूपण रा दूहा', 'नेग मंजरी' आदि इनके ग्रंथ काफी लोकप्रिय हुए है । 'अनुभव मंजरी' और 'सरूपण रा दूहा' राजस्थानी में लिखे हुए है । मानसिह ने वचनिका शैली पर 'रतना हमीर री वारता' नामक एक वनिका ग्रंथ भी लिखा है। यह एक प्रेम कथा है। नाथ सम्प्रदाय में बनानाथ भी एक प्रमुख कवि हुए है, इनके द्वारा रचित 'अनुभव-प्रकास' नाथ परम्परा मे बहुत अच्छी कृति मानी जाती है। इस कृति की रचना 1851ई. में हुई है । बनानाथ के बाद नवलनाथ, उत्तमनाथ, विवेकनाथ जैसे कवि हुए जिन्होंने नाथ परम्परा की रचनाएं की। रसिक सम्प्रदाय रसिक सम्प्रदाय की गद्दी रेवासा (सीकर) में है। रामानंद (1299 से 1410ई.) इस प्रगतिशील विचारधारा के प्रेरक हुए हैं । इनकी विचारधारा उत्तरी भारत में बहुत लोकप्रिय हुई। रामानन्द ने भक्ति के द्वार बिना किसी जाति-पाति के सबके लिए खोल दिए । ज्ञान और भक्ति पर इन्होंने बल दिया। अनन्तानंद, सुखानन्द, पीपा,. कवीर सरीखे इनके शिष्य हुए जिन्होने मागे चलकर संत साहित्य प्रास्यान काव्य की तरह संत साहित्य राजस्थानी साहित्य के मध्यकाल की एक प्रमुख विशेषता बन मामने पाता है। राजस्थानी का जितना समर्थ लोक साहित्य है उतना ही समर्थ संत साहित्य । राजस्थान की धरती पर ऐसे अनेकानेक सन कवि अोर सत सम्प्रदाय हुए है जिन्होने यहाँ के लोक मानस को भक्ति-भाव से सरावोर किया है। इस युग में सगुग्ग एवं निर्गुण-भक्ति दोनो तरह का साहित्य रचा गया। भक्त कवियों ने अपने-अपने तरीके से ईश्वर की पाराधना में अपने पद रचे, गाए । परन्तु इस काल मे रचा गया नाथ सम्प्रदाय की योग साधना का साहित्य संत साहित्य में अपनी अलग ही पहचान रखता है । नाथ सम्प्रदाय के सतो ने अपने तरीके से प्रादिनाथ को महिमा गाई और अपने साहित्य की रचना की है। समूचे सत साहित्य में कलापक्ष की बजाय भावपक्ष प्रधान रहा है। कई सत कवियो ने विचारों की प्रधानता के साथ काव्य चमत्कार और लालित्य भी अपने काव्य में भरा है परन्तु ऐसे सत कवि बहुत कम हुए है। राजस्थानी में संत साहित्य विपुल मात्रा में रचा गया है। डॉ. हीरालाल महेश्वरी सत साहित्य के अधिकारी विद्वान है जिन्होने मध्यकाल मे फले-फूले विभिन्न सम्प्रदायों की एक सूची बनाई है जो निम्न प्रकार है- सम्प्रदाय प्रवर्तक या प्रचारक 1. नाथ गोरखनाथ 2. रसिक अग्रदास जी रामावत वैरागी अनन्तनंदी जी 3. विस्णोई जाभोजी 4. जसनाथी जसनाथ जी 5. निरंजनी हरिदास जी 6. निम्बार्क दादूदयाल जी 8. लालदासी (लाल पंथ) लालदास जी 9. चरणदासी चरण दास जी 10. गुदड पंथी सत दास जी 11. (i) राम स्नेही राम चरण जी (ii) राम स्नेही दरियाव जी (ii) राम स्नेही राम दास जी (iv) राम स्नेही हरिराम दास जी परसुराम देव जी 7 दादूपर्थ 912 . 12. अलखिया लालगिरि जी 13. प्राई पंथ जीजी देवी (माई जी) इन सम्प्रदायो का संक्षिप्त परिचय क्रमशः निम्न प्रकार है- नाथ सम्प्रदाय-नाथ सम्प्रदाय समस्त राजस्थान में प्रचलित था। इस सम्प्रदाय के मंत शिव उपासक है और शिव ही ग्रादिनाथ माने जाते है। इस सम्प्रदाय का सर्वाधिक प्रचार 11 वी शताब्दी में गोरखनाथ ने किया। नाथ सम्प्रदाय हठ योग पर ज्यादा वल देते है। नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख उद्देश्य जीवन मुक्ति हेतु जीते जी शरीर मे स्वतन्त्र होना है। नाथ संप्रदाय के योगियों के 12 पंथ है । सत्यनाथी, रामनाथी, पाकलनाथी, गगानाथी, नातेश्वरी, पावनाथी, धर्मनाथी, माननाथी, कपिलनाथी, प्राय पंथी, वैराग्य पथी। इनके अलावा और भी कई पथ नाथो में पाए जाते है । नाथ सम्प्रदाय के कवियो ने खडी बोली में अपने पद्यों की रचना की है। परन्तु नाथो का राजस्थानी की तरफ अधिक बल रहा है। इनकी कविताओं में साधना का वर्णन है । नाथ कवियो मे पृथ्वीनाथ (1450 मे 1550ई.) ने 'निरजन निरवाण' और 'भक्ति वैकुण्ठ' नामक ग्रथो की रचना की । इनकी कविता नाथ सम्प्रदाय के विभिन्न पक्षों को उजागर करती है। मापा खडी बोली है परन्तु राजस्थानी का मिश्रण अधिक है । नाथ सम्प्रदाय के दूसरे उल्लेखनीय कवि जोधपुर के महाराजा मानसिह (1742 से 1843ई.) हुए है । इन्होने कई तरह की रचनाएँ की जो नाथ सम्प्रदाय में बहुर महत्त्व रखती है । मानसिह के लिये हुए संगीत बद्ध पद्य भी बहुत लोकप्रिय हुए है । नाथ मक, नाथवाद और नाथ दर्शन पर इनकी कोई 37 रचनाएं सामने आई है । 'नाथ चरित्र', 'जलंधर चरित्र', 'नाथ पुराण', 'जलंधर ज्ञान मागर', 'अनुभव मंजरी' 'सरूपण रा दूहा', 'नेग मंजरी' प्रादि इनके ग्रंथ काफी लोकप्रिय हुए है । 'अनुभव मजरी' और 'सरूपण रा दूहा' राजस्थानी में लिखे हुए है । मानसिह ने वनिका शैली पर 'रतना हमीर री बारता' नामक एक वनिका ग्रंथ भी लिखा है। यह एक प्रेम कथा है । नाथ सम्प्रदाय मे बनानाथ भी एक प्रमुख कवि हुए है, इनके द्वारा रचित 'अनुभव-प्रकास' नाथ परम्परा में बहुत अच्छी कृति मानी जाती है। इस कृति की रचना 1851 ई. में हुई है । बनानाथ के बाद नवलनाथ, उत्तमनाथ, विवेकनाथ जैसे कवि हुए जिन्होने नाथ परम्परा की रचनाएं की। रसिक सम्प्रदाय--रसिक सम्प्रदाय की गद्दी रेवासा (सीकर) में है। रामानद (1299 मे 1410ई.) इस प्रगतिशील विचारधारा के प्रेरक हुए है । इनकी विचारधारा उत्तरी भारत में बहुत लोकप्रिय हुई। रामानन्द ने भक्ति के द्वार विना किसी जाति-पाति के सबके लिए खोल दिए । ज्ञान और भक्ति पर इन्होने बल दिया। अनन्तानंद, सुखानन्द, पीपा, कबीर सरोसे इनके शिष्य हुए जिन्होंने आगे चलकर - इस विचारधारा का व्यापक प्रचार किया। अनन्तानंद के शिष्य कृष्णदास ने पहली दफा गलता (जयपुर) में रामानन्द सम्प्रदाय को गही को स्थापना की। यह गद्दा पहले कनफटा योगियों के करने में थी परन्तु कृष्णदास ने उनको अपनी योग साधना हराकर इस पर अधिकार कर लिया । कृष्णदास के शिष्य अपदासजी हुए। उन्होंने रेवासा (सीकर) में एक अलग गद्दी की स्थापना की। रसिक सम्प्रदाय मधुर-भाव की उपासना पर बल देता है । इस विचारधारा का प्रचार अयोध्या, जनकपुर और चित्रकूट तक था। राजस्थान में इसका अधिक प्रचार नही हुमा परन्तु देश के अन्य स्थानो पर इसका प्रचार था। रसिक मम्प्रदाय की परम्परा 17 वी शताब्दी तक बहुत धीमी गति से चली परन्तु औरंगजेब को मृत्यु के पश्चात् 18 वी शताब्दी में काफी फली-फूली। इस परम्पग की अन्तिम कवयित्री रूपदेवी हुई है जिन्होंने 1861 में 'राम राम' नामक ग्रंथ की रचना की । विस्णोई सम्प्रदाय-इस मम्प्रदाय की स्थापना जाभोजी ने बीस और नौ जीवन-व्यवहार की बातें लेकर सन् 1485 में को। विस्णोई (यानि वीस प्रो नौ) सम्प्रदाय उत्तरी भारत में पहला मंत सम्प्रदाय है । सिकन्दर लोदी जाभोजी के उपदेशो से बहुत प्रभावित थे । जामोगी ने प्राचीन यज्ञ परम्परा को पुनर्जीविन किया । मुकाम (नोखा-बीकानेर) मे इस सम्प्रदाय का पवित्र स्थान है। जाभोजी की मवदवाणी में इम सम्प्रदाय के जीवन दर्शन और जीवन-व्यव. हार को बताया गया है । इनकी वाणी में इस मम्प्रदाय की मंरचना है। जाभोजी की सवदवाणी बहुत लोकप्रिय हुई है। इस परम्परा में तेजोजी चारण (1423-1518), समसदीन (1433- 1493), सिवदास, (1443-1531), जैसे कवि हुए है जिन्होने इम सम्प्रदाय को लेकर फुटकर रचनाएं लिखी । विहोजी (1532-1616) ने इस सम्प्रदाय को काफी बत दिया । इन्होने जाभोजी के जीवन की घटनाग्रो को लेकर सात कथाएँ लिखी । इनकी कविताएं भावनायो मे भरे गहरे भक्ति-भाव को प्रदर्शित करती है। इसी तरह इस परम्परा के कवि केसोदास गोदार (1573-1679) हुए। उन्होने चार पाख्यान काव्य लिये । इन्होने भी जाभोजी के जीवन को लेकर कथाएं लिखी। और 'साखी', 'हरजस' और कवित्त रचे । सुरंजनदास पूनिया (1583-1601) ने 'रामरासो', 'गजमुख', और 'उपापुराण' लिखे । इन्होने भी कई कथाएं लिखी । इनकी 'कथा हरिगुण' बहुत लोकप्रिय हुई । इनकी भाषा सरल साहित्यिक राज- स्थानी थी। इनके अलावा भी विस्णोई सम्प्रदाय में कई कवि हुए जिन्होने इस सम्प्रदाय के प्रचार हेतु रचनाएं लिखी। जसनाथी सम्प्रदाय--संत जसनाथजी ने 1500 ईस्वी के आस-पास कतरि- यामर (बीकानेर) में जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना की। इम सम्प्रदाय के 35 सिद्धान्त हैं । जसनाथजी ने भी नित्य होम की बात कही पौर अवतारवाद में प्रपना विश्वास व्यक्त किया। इन्होने प्णव विचारधारा और योग को अपनाया। जसनाथियों का नंगे पैर अग्नि पर नृत्य बहुत लोकप्रिय है। जसनाथजी ने लोक- प्रिय राजस्थानी में अपने पद्य लिमे । इनके पद्य 'वाणी' कहताते है । जसनाथजी की वाणी में 50 मवद है । इसी परम्परा के कवि करमदास हुए है जो कि नागौर मे 'खरडिया' गांव के रहने वाले थे । इनकी पुस्तक 'हरिकथा' काफी लोकप्रिय रही है । इस पुस्तक में 116 'कड़ी' है । इम सम्प्रदाय के अन्य प्रमुख कवियों मे देवोजी, लालनाथजी, चोखनाथजी, हारोजी, सोभोजी, सोनी ग्रादि प्रमुख है । निरंजनो सम्प्रदाय-इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक हरिदासजी थे। इनके अनुयायी भगवान को निरंजन-निराकार मानते है । हरिदासजी साखला राजपूत थे । निरंजनी पथ के अनुयायो मूर्तिपूजा में विश्वास नही रखते । डीडवाना (नागौर) के पास 'गाढा' नामक गांव है जहाँ निरंजनपंथी साधु फागुन सुदी अकम मे द्वादशी तक इकट्ठे होते है, विशाल मेला भरता है । हरिदास ने 1499 में शरीर छोडा । इनके 'व्याहला', 'साखी' 'नाम निरूपण ग्रंथ', 'चालीस पदो', 'चौदह पदो' और 'जोग समाधी' आदि बड़े लोकप्रिय हुए है । हरिदासजी और इस परम्पग के अन्य कवियों की भापा राजस्थानी, ब्रज और खड़ी बोनी का मिश्रण है । जगजीवनदास, ध्यानदास, नागरीदास, सेवादास, भगवानदास निरंजनी, मनोहरदारा निरंजनी प्रादि इस सम्प्रदाय के ख्याति प्राप्त रचनाकार हुए है । जिन्होने इस सम्प्रदाय के प्रचार हेतु पद्य-रचना की। निम्बाकं सम्प्रदाय-यह एक सगुण भक्ति सम्प्रदाय है। इसकी मुख्य गद्दी सलेमावाद (परसुराम पुरा) राजस्थान में है। इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक परमुराम देवजी थे जो सीकर जिले के ठीकरिया गाँव के गुर्जरगौड़ ब्राह्मण थे । इनके पद 'वाणी' कहलाए । इनके काव्य में 2225 साखी, 15 चरित, 13 लीला कविता और कोई 600 के लगभग पद है । इनके पद्य विरह और भगवत्-प्रेम के पद है। निम्बार्क सम्प्रदाय के लोकप्रिय कवि 'तत्त्ववेता' (टिकमदास) 16वी शताब्दी में हुए, इनकी गद्दी जैतारण (पाली) मे है । इनका काव्य संकलन 'तत्त्ववेता री वाणी' कहलाता है । भगवत्-भक्ति और उपदेश वाणी का प्राधार है । इनके काव्य को भापा ब्रज मिश्रित राजस्थानी है। वादू सम्प्रदाय-दादू सम्प्रदाय को सत दादू दयाल ने चलाया । इस पंथ में चार तरह के साधु मिलते है । प्रथम तरह के साधु 'खाकी' कहलाते है। साधु शरीर पर भस्म रमाते है और सिर पर जटा रखते है। दूसरी तरह के साधु 'विरक्त' कहनाते है जो 'कोपीन' बांधते है और हाथ में 'बी' रखते है। ये साधु भजन-कीर्तन करते है। तीसरी पोर चौथो तरह के साधु 'नागा' और 'थामा- धारी' कहलाते है । ये श्वेत वस्त्र पहनते है, और सेती, नौकरी, वंदगी मादि कर - 94 अपना गुजर-बसर करते है । नागा साधु वीर, हिम्मत वाले और रण-कुशल होते हैं । शादी सभी तरह के साधुग्रो के लिए मना है। ये न तो तिलक गिकालते है और न ही चोटी रसते है । ये गले में कठी भी नही पहनते । ये साधु हाथ में माला रखते हैं और आपस में मिलते है तो 'सत्तनाम' बोनते है । दादूपंथी निरंजन- निराकार व परब्रह्म को मत्ता मानते है। इनका मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं है । 'भेराणा' की इंगरी (जयपुर) इनका पवित्र स्थान है जहाँ दादू दयाल ने शरीर छोडा । दादू को वाणी बहुत ही लोकप्रिय हुई है । इममे उन्होने प्रेम, गुरु-भक्ति, सत्सग, माया, जीव, ब्रह्म प्रादि गूढ विषयों पर अपने विचार दिए है । दादू सम्प्र- दाय में वसनाजी, रज्जवजी, गरीबदास, जगन्नाथदास, जनगोपाल, दामोदरदास, भीखजन, सतदास, सेमदास, राघवदास, वाजिदजी सरीसे भक्त कवि हुए हैं जिन्होने इस रथ का अपनी रचनायो द्वारा काफी प्रचार-प्रसार किया । चरणदासो सम्प्रदाय-इस पंथ को चरणदासजी ने चलाया । इस पंथ के अनुयायी गुरु को भगवत् प्राप्ति का साधन मानते है । चरणदासी भी मूर्तिपूजा में विश्वास नही रखते । चरणदासी साधु पीले वस्त्र पहिनते है और मस्तक पर गोपीचन्दन का टीका लगाते है । इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक चरणदासजी ने 14 ग्रंथ लिखे है जिनमे 'अष्टाग योग', 'भक्ति सागर', 'भक्ति पदारथ', 'सबद', 'ब्रह्मज्ञान- सागर' आदि प्रमुख है। चरणदासजी के दो शिप्याए-दयावाई और सहजोवाई हुई है, जिन्हें अपनी रचनायो के बल पर काफी लोकप्रियता मिली है । दयाबाई ने 'दयाबोध' रचा साथ ही इनकी कृति 'विनयमालिका' भी काफी लोकप्रिय हुई है । दयावाई चरणदासजी के गाँव मे ही जन्मी थी। सहजोवाई ने अपने गुरु चरणदास की महिमा गाई है और पद रचे है । लालदासी सम्प्रदाय इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक लालदासजी थे जो एक मेव मुसलमान परिवार में जन्मे थे। इनका जन्म 1540 में हुअा था । । ये गृहस्थ थे और कामदारी करके अपना गुजर-बसर चलाते थे। साधना और भक्तिभाव इनके मूल विचार है । हरीदास, इंगरसी साध, प्राणी माध, भीखण साध, इनके शिष्य हुए है । लालदासजी जन्म से मुसनमान थे। परन्तु वे वैष्णव धर्म को मानते थे । इनके अनुयायी मेव मुसलमास और हिन्दुरो की हर जाति के हुए है। लालदासजी के बाद लालादास जो कि जाति से माली थे, इनको 'गद्दी पर बैठे । इस सम्प्रदाय में 'सुमरण' और 'किरतन' साधना के मुख्य मार्ग है । लालदासी अधिकतर अलवर और उसके पास-पाम ही मिनते है। हरीदास इस सम्प्रदाय के ख्याति- प्राप्त कवि हुए है जिन्होने 'प्रात्मा ध्यान जोग मंवाद' और 'अजपाजप' सरीखे ग्रंथ लिसे। गुबह पंय-संतदासी गूदड़ यानि फटे-पुराने कपड़े पहिनते, इसी वजह से उनके अनुयायी गूदड़ पथी कहलाए। इनको गद्दी भीलवाड़ा में 'दातडा गांव में है । संतदासजी ने वाणी, साखी (दूहा) रेखता पद रचा जो निगुण भक्ति से सम्ब न्धित है । राम सुमरन पर ये जोर देते है। इनकी विचारधारा, रामस्नेही सम्प्रदाय की शाहपुरा शाखा से काफी प्रभावित है। संतदास जी अग्रदासजी के शिष्यो की. पांचवी पीढी में से एक थे । रामस्नेही-रामस्नेही सम्प्रदाय के तीन प्रमुख गढ़ है : शाहपुरा, खेडापा और रैण । शाहपुरा के रामस्नेही सम्प्रदाय को रामचरणजी (1719-1798) ने चलाया, इनके अनुयायी निगुण परमेश्वर को राम नाम से मानते है और उसी का ध्यान करते है । ये भी मूर्तिपूजा मे विश्वास नहीं रखते । रामस्नेही साधु रामद्वारे में रहते है और भिक्षा माँगते है। ये साधु लँगोटी के सिवाय शरीर पर कोई वस्त्र धारण नहीं करते । विवाह नहीं करते । अग्रवाल और महेश्वरी बनियो मे इस सम्प्रदाय का अधिक प्रचार । इसके साधु शाहपुरा को अपना पवित्र स्थान मानते है । सिंथ का रामस्नेही सम्प्रदाय हरिरामदासजी से निकला है । ये सिथल (बीकानेर) में जन्मे और 1743 में रामानन्दी साधु जैमलदासजी से दुलचासर (बीकानेर) मे दीक्षा ग्रहण की । शाहपुरा वालो की तरह ये भी मूर्तिपूजा में विश्वास नही रखते । इस सम्प्रदाय के साधु किसी तरह का नशा नही करते और रात को भोजन नहीं करते है और पानी को छानकर पीते है । साधु लोग भजन-कीर्तन और 'पंच- वाणी' की कथा कहते है। रेण (मेड़ता) का रामस्नेही सम्प्रदाय दरियावजी को अपना आदि गुरु मानता है । यहाँ दरियावजी का एक चित्र है। जिसके दर्शन हेतु लोग चैत. सुदी पूर्णिमा को इकट्ठे होते हैं । दरियावजी ने 'वाणी' नामक एक विशाल ग्रंथ रचा है जिसमें 10,000 के लगभग पद और दोहे आदि है । खेडापा शाखा रामस्नेही सम्प्रदाय रामदासजी से सम्बन्धित है । इन्होने 1752 मे सिंथल शाखा के हरिरामदासजी से दीक्षा ग्रहण की । इन्होने 1763 में खेड़ापा शाखा को स्थापना की । हालाकि यह सिंथल की एक शाखा मानी जाती है परन्तु इसकी अपनी अलग परम्परा है । रामदासजी की 'वाणी' जोकि सरल राजस्थानी में है, में यह परम्परा दिग्दशित है । इममे 1700 साखी (दूहा) है जो लगभग 90 प्रसंगो पर कही गई है । 72 'हरजस' और 24 कविताएँ है । इनका विषय निर्गुण भक्ति है। इनके बाद इनके पुत्र दयालुदास प्राचार्य बने। इनकी वाणी में 19 कविताए. है । परसुराम, पिथोदास, पूरनदास, मुरारीराम प्रादि इस परम्परा के अन्म कविगण है। अलखिया सम्प्रदाय-इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक लालगिरि थे, जो चुरू के पास 'सुलखरिणया' गांव के रहने वाले थे। 1829 में जब ये कोई पन्द्रह साल के थे, बीकानेर पा गए । यहाँ इनकी प्रेरणा से एक विशाल कुआ 'अख सागर' बना। लालगिरि ने एक बार महाराजा रतनसिंह को लक्ष्मीनारायण के मन्दिर जाते हुए , रोक कर कहा--अलख का सुमरन करो, मूर्तिपूजा बेकार है । इससे महाराजा नाराज हुए और उन्हे देश निकाला दे दिया, इसके पश्चात् लालगिरि जयपुर श्रा गए और जब तक जीवित रहे गलता में रहे। इनकी 'वाणी' सरल राजस्थानी में है । इसमे 29 सबद है । इनकी वाणी में स्वरूप साधना से भगवन् प्राप्ति नाम मुमरिन का विचार हुआ है । इस पंथ के अनुयायियो के लिए अलख निराकार निर्लेप और निरंजन है और यही अन्तिम सत्य है। अलखिया सम्प्रदाय भी नाथी की योग साधना और हठयोग को मानते है । जब वे आपस में मिलते है-तो 'अलख- मौला' कहकर अभिवादन करते है। आईपंथ-इस पंथ के अनुयायी सीखी जाति के लोग है जो छड़े-बिछुई पाली और जोधपुर में मिलते है। आईजी का विशाल मन्दिर बिलाडा (जोधपुर) में है । इस पंथ को जीजी वाई ने चलाया। जीजी देवी का दूध राजपूत का था। जीजीवाई 15वो शताब्दी में हुई, 1504 में इनका स्वर्गवास हुआ । प्राई पथी मास-मदिरा से एकदम दूर रहते है। जीजी देवी ने सन् 1500 में अपनी गद्दी अपने शिष्य गोपन्द को सौपी और आग्रह किया कि वह इस पथ के सिद्धान्तों का प्रचार करे । यही से आई पंथ का उद्भव होता है । भगवान दास (जोधपुर) व्यास ने सरल राजस्थानी मे 1736 में 'आई प्राणद प्रकाम' नामक ग्रंथ की रचना कर इस का प्रचार किया। इसमे इस पंथ की विशेषताओं का भी वर्णन है । तागचन्द व्यास ने 'आई उग्र प्रकास' की रचना की, इनके अलावा लूम्बा बाबा का नाम आई पंथी कवियों में उल्लेख करने योग्य है जिन्होने आई पंथ को लेकर अपनी सशक्त रचनाएँ की । संत साहित्य के प्रमुख कवि राजस्थानी साहित्य मे संत कवियो की एक सशक्त परम्परा रही है। यहाँ के संत-साधुनो ने जो साहित्य सावना की है वह राजस्थानी साहित्य की अमूल्य धरोहर है । यहाँ पर सत परम्परा के ख्यातिप्राप्त प्रमुख कवियों का उल्लेख उनकी रचनायो का उल्लेव करते हुए किया जाएगा- दादू दयाल-सत कवि दादू दयाल का जन्म 1543 में अमदाबाद में हुया था । करड़ाला (जोधपुर) और साभर में इन्होने अपनी साधना की। आमेर, आंध्र नारैणा में ये कई दिन ठहरे, इनका स्वर्गवारा 1663 में नारैणा मे हुआ। दादू की वाणी बहुत ही लोकप्रिय हुई है। उनके शिष्य रज्जबजी, जगन्नाथ दास एवं संतदास ने इनके वचनो को संग्रहित कर व्यवस्थित रूप दिया। रज्जवजी के संग्रह का नाम 'अंग बन्धु' कहा गया है। इसमें साखियो को अग तथा पदों को राग को संज्ञा दी गई है । जगन्नाय और संतदास द्वारा संकलित वाणी संग्रह को 'हरड़े बानी' कहा गया है।
97 दादू दयाल अकबर के समकालीन थे । दादू मछूत धुनिया थे, बाद में वे संत हो गए और समाज में उन्हें प्रतिष्ठित स्थान मिला। दादू मोर पन्य निगुण संतो ने राजा या सम्राट को सत्ता को कही भी चुनौती नहीं दो, और न हो उन्होंने समाज के किसी वर्ग-विशेष के उच्छेद का कोई नारा दिया। उनकी रचनामों में राजदरवार के चित्रण नहो मिलते । राज- दरवार में जुड़े हुए लोगों के जीवन के बारे में ये कवि मौन ही है । उन्होने अपने लिए एक मर्यादा अवश्य निश्चित की थी जो निम्न पक्तियों में झलकती है-- साध न कोई पग भरे, कबहु राज दुवारि । दादू उलटा पाप में, बैठा ब्रह्म विचारि ।। मुसलमान शासको और मुल्लामो के अत्याचागे पर दादू कहते है- दादू नाहर सिंघ सियाल मय, केते मुसलमान । मास पाय मोमिन भए, बडे मिया का ग्यान ।। सच्चा मोमिन तो वह जिसका दिल मोम जैसा कोमल हो । हिन्दू-मुसलमान का विवाद उन्हें अच्छा नहीं लगता था । वे कहते है- दादू ए सव किसके पथ, धरती पर असमान । पाणी पवन दिन यति का, चंद मूर रहिमान ।। हिन्दू हो या मुसलमान सबको अपने कर्मों का हो फल मिलेगा। इन दोनो के वीच से ही साधुप्रो का रास्ता निकलता है । जहाँ ईश्वर रहता है वहां न तो हिन्दुओ का देहरा है और न ही मुसलमानो को मस्जिद । वे ईश्वर को एक और सृष्टि के कण-कण में व्याप्त मानते है । 'होदू तुरक न जानों दोई-दोनो एक है। दादू दयाल के अनुसार दुनिया और दुनिया का सम्बन्ध मिथ्या' है। यह दुनिया सत्य प्रतीत होती है परन्तु सत्य होती नहो । सत्य तो ईश्वर है जो निराकार एवं रहस्यमय है । दुनिया माया के कारण सत्य प्रतीत होती है । माया का प्रावरण हट जाने मे सत्य प्रकट होता है । दादूं झूठो काया, झूठा घर, झूठा यहु परिवार । झूठी माया देपि करि, फूल्यो कहा गंवार । दादू सोये हुए व्यक्ति की भावी मौत मे संतप्त और शोकातुर है अत. वे उसे जगाने का प्रयास करते 1 जागने का अर्थ ज्ञान प्राप्त करना है। उनका मानना है कि जोय को मुक्ति यह तन ही दिना सकता है । वे कहते है-- वार-बार यहु तन नहो नर नाराण देह । दादू बहुरि न पाईये, जनम अमोनक एह ॥ दादू भक्त है, दार्शनिक नही । उन्होने उन दार्शनिक सवालों का जवाब नहीं दिया है जो एक अध्येता के मामने खड़े होते है । दादू ने विना विवाद किए परम्परा मे प्राप्त दार्शनिक विचारो को ग्रहण कर लिया है और उन्हें ही प्रस्तुत कर दिया है। उन विचारों के समर्थन में स्थान-स्थान पर दाद ने मोनिक तक भी प्रस्तुत किए है । राम को बाजीगर के रूप में दगार प्रपनी काव्य दृष्टि का परिचय दादू देने है। दादू का अभिव्यकि पक्ष सादगी में भरा है। उनमें तरह-तरह की उपमाए पोर नमस्कार में भी उलटवागियो लगभग नहीं है। दादू का पोध मीमा में वाहर नही है, और भगवान मामने भी ये गिडगिराने नहीं है। ये प्रास्वान करके हो जाते है। दादू के वध पद्य नीचे उत किए जाते है- पीय दूध में रमि रहा, व्यापक मय ही ठोर । दादू वस्ता यहुन ३, मपि गई तं पोर ॥ दादू दिया है भला, दिया करो मय कोय । घर में धरा ने पाये, जो कर दिया न होय ॥ दादू देस दयात को, एकल रहा भरपूर । रोम-रोम में रमि रह्यो, नू जिनि जान दूर ॥ कहतां सुनता देखता, लेता देता प्रान । दादू मो कन हूं गया; माटो घरी मसान ।। गरल-गुलझी भाषा में अपनी 'बागी' निसकर दादू ने पद दलितों एवं अनपढ लोगो को गास्कृतिक नेतृत्व प्रदान किया है । वखनाजी (1553-1623 लगभग)-दादू दयाल के प्रमुख शिष्यों में से वगनाजी एक थे। ये नारेगा के रहने वाले थे। कोई इन्हें हिन्दू बताता है, कोई मुमतमान । यह एक दादू थी साधु थे । बखनाजी की 'वाणी' में 167 पद्य है । कहा जाता है कि वखनाजो की आवाज बहुत मधुर थी, और वे स्वय बहुत अच्छा गाकर अपनी वाणी सुनाते। इसी वजह से उन्होने गेय पद्य अधिक लिखे। कुछ नगी यहाँ द्रष्टव्य है- वखना हरि जळ वरखिया, जळ-थळ भरे अनेक । करम कठोरा मागामा, रोम न भीगो ओक । पाणी में पत्थर रह्यो, भूपरि वध्या सिवाळ । वखना ढाच्या नीकली, माहि अगन की भाळ । वपना जी को भापा ग्राम जनता की भाषा थी। भाव प्रकट करने की शैली बहुत मरल और प्रासानी में समझ में आने वाली थी। रज्जबजीदादू दयाल के प्रमुख शिष्यो मे रज्जवजी का नाम भी प्रमुखता में लिया जाता है। ये जाति गे पठान थे और जयपुर के निकट सागानेर कस्य के रहने वाले थे। शादी के लिए ये अामेर गए थे जहाँ इन्हे दादू दयाल मिल गए भोर वे शादी का विचार त्याग कर उनके शिस्य बन गए । तत्पश्चात् वे दादू दयाल 99 के पास ही रहे। परन्तु इनका स्वर्गवास सागानेर में सन् 1689 में हुना । रज्जवजी अधिक पढे-लिखे नहीं थे परन्तु इन्होने अपनी 'वाणी' में अपने गहरे चिंतन का परिचय दिया है। इन्होने 'वाणी' और 'सर्वगी' नामक दो ग्रथ लिसे जिनमें इनको कविता-शक्ति, ज्ञान-गरिमा और गुरु-भक्ति का अच्छा परिचय मिल जाता है। कुछ पद्य यहाँ अवलोकनीय है- रज्जव पारस परस ते, मिटगो लोह विकार । तीन वात तो रहि गई, वाक, धार अरु मार ।। भलो कहत मानत बुरी, ये है प्रकृति है नीच । रज्जब कोठी गार को, ज्यू धो ज्यू कोच ।। प्रथम दोहे में पारस स्पर्श से लोहे के विकार के मिटने के साथ प्रतीकात्मक ढंग से अपनी बात कहने की कला रज्जयजी ने सुन्दर ढग से बताई है। दूसरे दोहे में 'रज्जव कोठी गार को, ज्यू धोवै ज्यू कोच' मे भी उच्चस्तरीय प्रतीक आया है। रज्जबजी ने बहुत ही सरल भाषा में अपनी रचनायो को रचकर अपनी बात कही जो लोक में बहुत प्रशंसित हुई। सुन्दरदास-सुन्दरदास भी दादू दयाल के शिष्य थे। छ वर्ष की छोटी उम्र में ही दादू ने इन्हें अपना चेला बना लिया था। कुछ दिनो वे अपने माता- पिता के पास आए, कुछ पढाई-लिखाई को और बाद में काशी चले गए। काशी में सुन्दरदास जी 30 वर्ष रहे । यहाँ उन्होंने व्याकरण, साहित्य, वेदान्त, योग और पडदर्शन प्रादि ग्रंथों का अध्ययन-मनन किया। फिर काशो से वे अपने गुरुभाई प्रयागदास के साथ फतेहपुर आकर रहने लगे। सुन्दरदास का जन्म सन् 1595 में दौमा (जयपुर) मे हुआ था, वे बाल ब्रह्मचारी थे। शृगार रस की कवितायो को वे विप समान मानते। केसव कृत "रसिक प्रिया' उन्हें अच्छी नहीं लगती- रसिक प्रिया रस मंजरी, और सिगारहि जानि । चतुराई करि बहुत विधि, विष वनाई पानि ।। सुन्दरदासजी को घूमने-फिरने का बहुत शौक था। समस्त उत्तरभारत, गुजरात, मध्यप्रदेश, मालवा आदि प्रदेशो मे वे कई बार गए-धूमे । दादू पथियो के स्थान देखे । धूमने-फिरने से उनके ज्ञान में काफी वृद्धि हुई । सुन्दरदासजी कभी फतेहपुर, कभी मोरा, कभी कुरसान, कभी ग्रामेर पाते-जाते रहते । अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वे सागानेर रहे, जहाँ 1689 में उनका स्वर्गवाम हुअा। मुन्दरदास जी ने राजस्थानी की पिगल शैली में अपनी रचनाएँ को। व्रज का प्रभाव उनकी रचनाप्रो में दृष्टिगोचर होता है। परन्तु राजस्थानी शब्दो का काफी प्रयोग हुया है।
100 पीपाजी-पीपाजी का जन्म संभवत 1383 के आस-पास हुआ होगा । इनके पद्य कई रागो में गाए हुए है ! पद्यो की भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रज है । 'खिलजीपुर री ख्यात' में पता चलता है कि पीपाजी गांगरोनगढ (कोटा) के अचलदास खीची के वंशज थे । एक अन्य मतानुसार पीपा अचलदास खीची के भाई थे । यही मत सही प्रतीत होता है क्योकि इस मत की साम्यता उनके द्वारा रचित पद्यों से होती है । परन्तु 'अचलदाम खीची री वचनिका' में पीपा का कही सन्दर्भ नहीं पाया है । यह अनुमान किया जा सकता है कि पीपा माडु युद्ध के पूर्व जो कि सुल्तान होशंग धोरी और अचलदास के बीच लडा गया, साधु बन गए होगे । उस समय वै चालीस के आसपास थे इस दृष्टि से उनका जन्म 1383 के आस-पास ही स्थिर होता है। पीपा रचित, फुटकर पद्य विभिन्न हस्त-प्रतियो में मिलते है । ये पद्य कई संत-परम्पराओ को हस्त-प्रति में भी है। गुरु ग्रन्थ साहब में भी एक पद्य मिलता है। ये पद्य संगीत की अनेक रागो में गाए जाते। इनके अतिरिक्त 13 माखी भी इनकी लिखी मिलती है । पीपा के पद्यो मे निर्गण राम भक्ति का निरूपण मिलता है । इन्हें रामानन्द के 12 प्रमुख शिष्यो मे से माना जाता है। काजी महमूद-काजी महमूद प्रारम्भिक संत कवियो में से एक प्रमुख कवि हैं जिनके पद्य राजस्थानी मे ग्राज भी लोकप्रिय है। इनके 45 के लगभग पद्य मिलते है जो विभिन्न हस्नप्रतियो में बिखरे पडे है । इनके पद 16 वी शताब्दी के प्रारम्भ में बहुत लोकप्रिय रहे है । इनके पद्यो की भाषा सरल राजस्थानी है जिनमे खड़ी बोली का भी प्रभाव है । मीरबाई (1498-1547)-मीरां का मध्यकालीन सत साहित्य में उच्च स्थान है। समस्त भारत में इनके पद्यों का प्रचार हुआ है। मेडता के राब रतनसी की पुत्री मीरा का जन्म 1498 में डेगाना के पास वाजोली ग्राम में हुआ था । अपने पिता को मृत्यु के पश्चात् मीरा मेड़ता में पली और गणा सागा के पुत्र भोजराज को ब्याही गई। भोजराज की मृत्यु 1522 मे होती है और मीरा 1531-32 के पास-पास वापस मेडता आ जाती है। 1534 मे मीरा तीर्थ यात्रा पर निकल पडती है। जीवन के अन्तिम दिनो मे मीरा द्वारका में रहती है और यही अपना दैहिक शरीर छोडती है । मीरा के रचे हुए पांच ग्रन्थ और कुछ फुटकर रचनाएं बताई जाती है : 'गीत गोविन्द को टीका', 'नरसी जी रो माहेरो' 'सत्यभामाजी न रूसणो', "गि सोरठ' और 'राग गोविन्द' । परन्तु एक मान्यता है कि 'गीत गोविन्द की टोका', 'नरसी जी रो माहो' और 'सत्यभामा जी ने रूसो' ग्रन्थ मीरा रचित नहीं है। गग सोरठ' और 'राग गोबिन्द' भी स्वतात्र ग्रन्थ नही माने जाने। निष्कर्ष यह निकलता है कि मीरा ने मात्र पद्यों की रचना की है कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नही लिखे। वैसे भी मीरा को लोकप्रियता उनके पद्यों में ही है । ये पद्य समस्न भारतवर्ष में गाये जाते है । ये पद्य इतने सरल और भावपूर्ण है कि गुजराती, ब्रज आदि कई 'भापात्रों में ढल गए है । मीरा के पद्य गुजराती, मराटी और हिन्दी में भी प्रकाशित हुए है जिनका अनुवाद बंगला, अंग्रेजी प्रादि अन्य भाषाओं में भी हुग्रा । मोरां की भाषा बोलचाल को राजस्थानी है, जिस पर ब्रजभापा, गुजराती और खड़ी बोली का प्रभाव है । मीरां के पद्य सरत स्वाभाविक और भकि- भाव से सराबोर है । भक्त हृदय को मुग्ध करने में ये अजोड हे । मीरा के पद्यो में उसका हृदय वोलता है। जानो हरि निरमोहडा रे, बाणो थारी प्रीत', 'राणोजी म्हाने या बदनामी लागे मोठी', 'म्हारे सिर पर साळगराम, राणोजी म्हारो कोई करसी' सरीखे पद्य भक्ति भावनामो से लबालब भरे हुए है । मीरा की भक्ति पति-पत्नी के भाव को भकि थी। श्रीकृष्ण के प्रति मीरा की साधना अपने पति के रूप में थी। इसी वजह से मोरा के पद्यो में भकि और शृंगार दोनों आए है । परन्तु मोरा का शृगार अलौकिक 2 गार है। इसमे न तो विद्यापति जैसा खुलापन है, न ही मूर जंसी ठिठोली और न ही विहारी जैमी मादकता है । मोरां का श्रृंगार पवित्र शृंगार है। मीरा को कविता भक्ति भावना की सच्ची कविता है । कविता में कवि हृदय की यथार्य अनुभूति है। एक पद्य बतौर वानगी यहाँ उद्धन किया जाता है- दरस बिन दूखग लागै नैण । तुम बिछुरे प्रभु मोरे, कवहुँ न पायो चैन । स्वद सुरणत मेरी छतियों काप, मोठे-मीठे बैन । बिरह व्यथा कादं कहूं सजनी बहगई वखत अन । फल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रंग। मीरा के प्रभु कव रे मिलोगे, दुख मेटण सुख देण ।। दोनजी (1753-1833 के लगभग) -उदयपुर के गुडाली गाँव में जन्मे, सपुरी उदयपुर) में रहे, दोनजी महाराणा भीमसिंह के बहुत प्रिय थे । ये जाति से लुहार थे । महाराणा भीमसिह जब तक जिदे रहे वे मेवाड मे रहे, तत्पश्चात् कोटा चले गये। वहाँ एक दिन स्नान करते वक्त चम्बल में डूब गए । दीनजी प्रतिभावान कवि और योग सिद्ध पुरुष थे। इनकी भाषा बोलचाल को राजस्थानी थी। इनकी कवितायें-दीन प्रकाश, परमार्थ प्रसंग, चितावरण सार, ईसर स्तुत, राज चेतावणी, कक्का बत्तोसी गगड नोसांणी पद्य और फुटकर रचनाएं है । इन्होने लोकप्रिय जकड़ी, बारहमासा, फाग आदि का प्रयोग किया है। इनकी कवितामों में ब्रह्म-ज्ञान, जाति-पांति का मूग भेदभाव, योग, वैराग्य ईश्वर से प्रति समर्पण अादि अनेकानेक विषय प्राए है। इनकी साधना निर्गुण- जव से 102 भक्ति की तरफ अधिक रही है । इनकी रचनायो के कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किये जा रहे है- जितना दीस थिर नही, थिर है निरंजन नाम । ठाट-पाट नर थिर नही, ना ही थिर धन धाम ।। ना ही थिर धन-धाम, गाम घर हस्ती घोडा । नजर पात थिर नाहि, नाहि थिर साथ सजोडा ।। कहे दोन दरवेम, कहा इतने पर इतना ।। थिर निज मन सत सवदांनाही थिर दीमें जितना ॥ . इनके गीत कृष्ण की लीलामो में प्रयुक्त हुए है। इनकी कुडलियां काफी लोकप्रिय रही है। गवरी बाई (1758-1808) ~गवरी वाई का जन्म इंगरपुर में एक नागर ब्राह्मण परिवार मे हुया । इनका विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था। परन्तु विवाह के एक वर्ष पश्चात ही इनके पति का स्वर्गवास हो गया । इस वक्त का विधवा जीवन बहुत कठिन था। भावी विधवा जीवन को देखकर गवरी बाई ने पढना लिखना गुरू किया। बाद में भगवत् गीता का अध्ययन किया और भगवत्-भक्ति को समर्पित हो गई । भगवत्-भक्ति से गवरी बाई की ख्याति चारो तरफ फैलने, लगी और महा- रावल शिवसिंह ने उन्हे एक मन्दिर बनाकर दिया। बाद में गवरी बाई काशी चली जाती है और वही उनका स्वर्गवास होता है । गवरी बाई ने फुटकर पद्य लिखे जिनमें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य को महिमा गाई गई है। गवरी बाई की भाषा राजस्थानी, गुजराती और ब्रज का मिला-जुला रूप है। इनकी रचना की एक बानगी यहाँ प्रस्तुन की जा रही है- होरी खेलत मदन गोपाल । मोर मुगट कर कछनी कार्छ, चंचळ नेण विमाल ! सब मखियन में मोहन सोहत, ज्यूं तारन विच चाँद उजाल । नोवा. चन्दन और कुम कुमा, उडत अवीर गुलाल. ताल मृदंग भांझ डफ, वाजे,, गावत वसंत धमाल । गवरी के प्रभु नटवर नागर, निरखी भई . निहाल ।। गवरी बाई के पद्यो को संख्या 610 के लगभग है, जो बहुत लोकप्रिय मध्यकाल में कुछ अन्य कवि भी जैसे दुली वाई, नामदेव, श्रीकृष्णादाम प्राद भी हुए हैं, जिनका मंत माहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है ।
103 जैन काव्य जैसा कि नातव्य है जैन काव्य, काव्य के लिए नहीं अपितु ज्ञान-वृद्धि, धर्म प्रसार और चरित्र निर्माण का उद्देश्य लेकर लिखा गया है। जैन कवियों ने कई वर्णनात्मक कविताएं इस उद्देश्य को लेकर रची है। इसी तरह चरित कथा और पाख्यान काव्य भी जैन कवियो द्वारा रचित सामने आये है। ब्रह्म जिनदास (1388-1468) वी शताब्दी के महान् विद्वान और कवि हुए है । कई दर्जन सस्कृत कवितायो के अतिरिक इन्होने पचास में भी अधिक वर्णनात्मक कविताएं हिन्दी एव गुजराती मिश्रित राजस्थानी में 'रास' लिखी है । इनका पदम पुराण' पर ग्राधारित 'राम सीता राम' अपनी तरह का प्रमुख ग्रन्थ है। मध्यकाल के जैन कवियो मे छोहल एक ख्याति प्राप्त कवि हुए है । 'पच सहेली रा दुरा' इनका लोकप्रिय ग्रन्थ है । इसको रचना उन्होने 1518 में की । छोहल की भाषा बोलचाल की गजस्थानी है। जिन पांच सहेलियो का वर्णन छोहल ने अपने दूहों में किया है वे पांच महे ती मालिन, तम्बोनिन, छीपन, कलाली और सोनारी है। इन पांचों सहेलियों के पति परदेश, है । छोहल ने इनकी मनोभावनामो को अपने दोहो में व्यक्त किया है- पहिलो वोली मालिणी, मोगे दुक्ख अनन्त । वाला जोवन छडि करि, गए देसाउरि कंत ॥ तन तरवर फळ लागिया, दोई नारंग रमपूर । मूकरण लागी वेलडी, सीचरण हारा दूर ॥ छोहल का एक ग्रन्थ 'नामबावनी' नाम से भी मिलता है। इसमें कवि ने, गहरी भावनामो का निरूपण किया है । इनके अतिरिक्त 'पथी गीत, 'उदरगीत' भी इन्होंने लिये है। फुशललाभ-कुशललाभ के समय विदेशी प्राक्रमणों का सदियों तक सामना करने वाला भारतवर्ष खण्ड-दण्ड होकर पूरी तरह विदेशी दासता के चंगुल में फेंस गया था गजस्थान और उसके चारों तरफ फलती-फूलती संस्कृति हासोन्मुख हो गई थी। धर्म गुरो ने जन-सामान्य के फंसाने के उपक्रम, जादू-टोना, तात्रिक और मांत्रिक अभिचार, भूत-प्रेत, यक्ष-यंतरो का अातंक तथा ग्रहगोचरों की उल्टी सीधी गति से ग्रस्त मानवो के भाग्य का दिग्दर्शन ग्रादि कुशललाभ को कृतियों के अभिन्न अंग बने है । कुशललाभ के समकालीन प्राय सभी सुयोग्य साहित्यकार, कवि या लेखक को किसी न किसी सेठ साहुकार, शासक, सामन्त या सम्राट का आश्रम प्राप्त था। उनमे से अधिकाशतः जन साधारण के जीवन से बहुत दूर - थे। अपने प्राश्रयदातामों के काल्पनिक गुणों का बनान और चाटुकारिता उन जीवन का अभिन्न अंग बन चुके थे ! इस गुग में साधु प्रकृति के ऐगे नाहित्यकार में विद्यमान थे, जिन्होंने जीवन-यापन के साथ-साथ लोक के नंतिक मोर अध्यात्मिक उत्थान हेतु अपना जीवन मस्ति कर दिया था। कुशललाम इमी कोटि के साहि स्यकार थे। वे एक विशाल गज्य के शासक के गाहित्यिक और नैतिक पापाय घे। मासकीय जीरन का उन्होंने प्रत्यन्त ममीर में अध्ययन किया था। गांव. गांव घूम कर, जन मामान्य के मम द्वारा उन्होंने लोक-जीवन का भी सम्यक्- रूपेण ज्ञान प्राप्त किया था। फुगललाभ ने मंभवत मन् 1543 (मं 1600) में साहित्य कर्म शुरू किया था। उनके जन्म और जीवन-नत के सम्बन्ध में कोई विशेष ज्ञातब तथ्य उपलब्ध नहीं है । कुशललाभ की मायु मंवत् 1660 मे 20 में 25 के मध्य रही होगी। ऐमी स्थिति में मं 1575 में 1550 के मध्य कही उनको जन्म तिथि स्थिर की जा सकती है। कवि को अन्तिम रचना 'गुण मुन्दरी चौपई है जिसका रचना- काल में 1648 स्थिर होता है। इस प्राधार पर 1650 वि. या उसी के प्राम- पाम उनके स्वर्गवास को कल्पना की गई है। कुशललाम के जन्म के कुल, जन्म स्यान, माता-पिता ग्रादि में मम्बन्धित जानकारी किसी भी सोन में उपलब्ध नहीं है। हाँ, अपनी रचनामों में उन्होने अपने गुरु का नाम अभय धर्म बताया है। कुशल लाभ की प्रारम्भिक शिक्षा कहाँ हुई, इस सम्बन्ध में भी कुछ कहना कठिन है । हाँ वे एक योग्य गुरु के योग्य शिष्य, उच्चकोटि के विद्वान और स्वयं भी एक सुयोग्य गुरु थे। 'माधवानल कामकदला चौपई', 'ढोलामारवणी री चौपई', और 'पिगल मिरोमणि' में वे स्वय को जैसलमेर के राजकुमार हरराज के गुरु व्यक्त करते है। धार्मिक ग्रन्यो के पठन-पाठन के साथ-साथ उन्होने छंदशास्त्र, कामशास्त्र, मंगीतशास्त्र और लोक साहित्य का भी अध्ययन किया था। 'शत्रुजय यात्रा, सवन' से उनके भौगोलिक ज्ञान का भी परिचय मिलता है। उनको सामन्ती शिष्टाचार और प्रादेशिक इतिहाम की भी जानकारी थी। 'माधवानल कामकंदला चौपई', "ढोला मारू 'चौपई', 'अगडदत रास' प्रादि में ऐसी जानकारी विपुल मात्रा में देखने को मिलती है। पिंगलशास्त्र जैसे दुरूह विषय के ज्ञान के लिए उन्हें कितनी साधना करनी पडी होगी, यह उनकी रचना "पिंगल सिरोमणि' से पता चलता है । कुशललाभ द्वारा रचित एवं सपादित अवतक अठारह रचनाएं प्रकाश में पाई हैं जिनमें, माधवानल-कामदला चौपई, दोला-मारू चौपाई, जिनपालित जिनरक्षित रास, तेज सार रास, अगडदत्त रास, पिगल सिरोमणि, तंमन पाश्वनाय स्तवन, भीमसेन राजहंस चौरई जय तीसंथापा स्तवन, गुण मुन्दरी चौपई, नवकार छंद, गौडो पाचनार सवन, यो पूज्य-पाहणगीन, पाश्चनाथ दशमव ससवन, महामाई दुर्गा सावसी, भवानी इंद, स्यूलिभद्र छत्तीसी, मोर कवत्ति मर्वया । इन जात रवनामों में कालम की दृष्टि में माघवानन कामकंदला प्रथम रचना है। इस रचना का मूल स्रोत "सिंहासन द्वात्रिशिका' को इक्कीसवीं कया है, जिन अनुरोयवती पुनसी ने सुनाया है । ढोला मारवणी चौपई को कपा का मूल लोककथानों में निहित है । 'तेज सार रास' का माधार भी कोई प्राचीन जैन-कथा हो रहा होगा, 'भीमसेन हंसराज चौपई' भी कथाकाय्य है, ऐमें ही विभिन पाधारों को लेकर कुशललाभ ने कई रचनाएं लिखी। 'स्यूलिभद्र छत्तीसी' माचायं म्यूलिभद्र को प्रशंसा में रचा गमा काव्य है । दुर्गा-सातमी को रचना मार्कण्डेय पुराणगन दुर्गा सप्तशदी के प्राधार पर की गई है। "पिंगल सिरोमणि' राजस्थानी भापा का प्रथम लक्षण ग्रंथ है, जिनमें पंद, अलंकार, कोश (नाममाला), डिंगल गीत-चंद, प्रहेलिका मादि विषयों को समा- विष्ट किया गया है। सम्पूर्ण सामग्री प्राठ अध्याय) में विभक्त है। इसके रचयिता के बारे में विद्वान मतभेद करते है । कुशललाभ रचित 'उडिगल नाममाला' को राजस्थानी भाषा का प्राचीनतम नाम संशक कोप या पर्यायकोप कहा जा सकता है, जिसमें 389 शब्दों के एकाधिक पर्याय नाम दिए गए है। कुशललाभ का अपभ्रंश साहित्य का अध्ययन मूक्ष्म और व्यापक था। 'ढोला-मारू री चौपई' में दोहो के अनुरूप भाषा के निर्वाह का प्रयत्न किया गया है । भाषा मे देशज शब्दो का बाहुल्य है प्रोर पाश्र्ववर्ती वोलियो के नाना रूपों से भाषा मे विशेष माधुयं भरा है। कहावतों का भी प्रयोग भाषा में हुआ है। कुशललाभ की शैली में चारणी, जैन और लौकिक तीनों शैलियों के दर्शन हो जाते है। अपने काव्य में चौपई, छप्पय छंद, वस्तुरूंद, मालिनी छंद, श्लोक, दूहा, सारसी, त्रिभंगी, कोटक, सोरठा प्रादि का प्रयोग किया है । इसके अतिरिक्त लौकिक और शास्त्रीय संगीतात्मक बंधो को भी अपनाया है, इसके लिए शास्त्रीय रागो और ढालों का आश्रय लिया है । कुशललाभ की काव्य-कृतियां आध्यात्मिक और प्रेमाख्यान दो रूपों में आई है । प्रेमा- ख्यानो मे शृंगार रस का प्रास्वाद है, माध्यात्मिक रचनामो में शात रस की प्रधानता है । शृंगार के संयोग और वियोग दोनो पक्षों का चित्रण हुआ है । कही- कही करुण, रोद्र, वीर, वीमत्स, भयानक, वात्सल्य प्रादि रसो के भी चित्रए देखे जा सकते हैं । दोला-मारू की संयोग वेला को वार्ता तथा मारवणी-माजवर्ण संवाद मे और 'स्यूलिभद्र छत्तीसी' मे योजीका कोशा वेश्या की चित्रशाला में प्रार स्यूलिभद्र को देखकर कोशा की सखियों द्वारा ली गई चुटकियों में हास्य रस में 106 -- दिखाई देता है। प्रकृति चित्रण को छटा 'भीमसेन हंसराज चौपई' में मिलती है । 'ढोला-मारवणी चौपई" मे कुरजा का बोल सार की तरह सालता है । आकाश मे चमकती विजलियाँ, प्रियतम की प्रतीक्षारत रमणियां, चातक को पीउ-पीउ की निरन्तर टेर, वर्षा की निरन्तर रसझडी से रसमय वातावरण कुशललाभ की कवितायो मे चित्रित हुआ है । वास्तव में इन्ही विशेषगो ने कवि को अपने काल के प्रमुख कवियो में लाकर खडा किया है। समय सुन्दर (1533-1646)~-समय सुन्दर प्रसिद्ध कवि और विद्वान हुए हैं। इनकी रचनात्रो को सख्या अत्यधिक है और ये विविध प्रकार की है। इन्होने सस्कृत मे कई कृतियाँ लिखी है। राजस्थानी में 'गस' और 'छप्पय' में 24 के लगभग इनकी वर्ननात्मक कविताएँ मिलती है । इनके अलावा पद्य के नौ सग्रह मिलते है जिन्हें छत्तीसी के रूप में जाना जाता है। इनके अलावा 550 गीत एव फुटकर रचनाएं भी मिलती है। इनमे में बहुत सी कविताएँ ऐसी है जो किसी विशेष राग में गाई जाती है। ममय सुन्दर का काव्य अपने कथ्य प्रकार, प्रमाप लोकप्रिय धुनो एवं भाषा की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है । इन्होने कविता के जरिए लोगो में सास्कृतिक एवं धार्मिक समृद्धि हेनु महत्त्वपूर्ण सेवा की है। इन्होने कई स्थानों पर अपने युग के यथार्थवादी चित्र ग्वीचे । सन् 1630 (वि सं 1687) में गुजरात में जो भीपण अकाल पडा उसका हृदय-स्पर्शी चित्र खंचा है। इस अकाल मे कवि खुद भी पीडाग्रस्त हुया था। अकाल की भयावह स्थिति का यथार्थवादी चित्रण अपनी कविता मे किया है। दौलत विजय-जैन कवियो मे दौलत विजय (1643-1743) का नाम काफी लोकप्रिय रहा है । 'खुमाण रासो' इनका लिखा ग्रंथ है । यह ग्रथ काफी लोक- प्रिय हुपा है । दौलत विजय ने इस ग्रंथ की रचना 1712 ई मे की परन्तु इस प्रथ की जो हस्तप्रति प्राप्त हुई है वह पूर्ण नहीं है। इसमे 3576 पद्य है । जिसमें 'बप्पा रावल से लेकर रतनसिंह तक मेवाड के शासको , का विवरण दिया गया है। दौलत विजय ने इसमें खुमाण और पद्मावती पर दो स्वतन्त्र कविताए' दी है । इम न थ के अाठ भाग है। भाग 2, 3 एव 4 म खुमाए और उसके विवाह का वर्णन पाया है। शेष भाग अलग-अलग घटनाग्रो से जुड़े हुए है जो मेवाड के शासको के साथ घटी हैं । इस ग्रंथ की भाषा बज मिली राजस्थानी है। ग्रंथ से खुमाण का वर्णन अधिक विस्तार में होने की वजह से इसका नाम 'युमारण रामौ' रखा गया है। कुछ उद्धरण यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे है- प्रसन होय सुरमाय, वाचा.वर दी। बालक वेलें वाह, प्रीन पर प्यालो पोज ।। पुहप धूम प्रग्भल, मेस रुळ' वळं जीह लळ । धूम प्र परजळे, अग अळ वळं प्रतुळ बळ ।। ।
कविताको इष्टिम पय में पाया गमाग मोर पदमावती को घटना निए भाग यहती नुसार नमक है। मम गम्मान के तार जीवन के चियाम मई है । गणगोर, नाज, सापणी, पौरतो कभंगार प्रादि का दगंन बहुत ही गुन्दर पोर माहिरिन सा महमा है । गुमांग का विवाह दिल्ली के गजा की बेटी 'ति मुनदरी' मे होता है। फिर यह शिकार पर जाता है तो नलयर में 'निलोत्तमा' में प्रेम कर ठगा जो अपने पनि अग पग्रियना पौरन धी। ननवर का गया भी अपनी बेटी नामा' की गमाग में शादी करता है । इन गव में 'रति मुन्दगे' बहन दुःको होगी है। गुमाग 'नागा' पोर निलोत्तमा' को लेकर चितोड माना है । उधर निकीतमा का पूर्व पनि महमूद गजनो मे मिलता है। पर होता है, परन्तु पुर में गुमाण की विनय होती है। पदमलो पल्लाउदीन को घटना 'गोरा-बादल पमणी एप्पय' में कवि हेमरतन मूरि में प्रभावित प्रतीत होता है। तोला-माम, शिवदाम गाडण मोर गिरिया जग्गा को वननिका, पृथ्वीराज रामो का प्रभाव भी कपि पर दिखाई परना है । 'गुमाग गमो' इस काल की प्रतिनिधि रचना है। विनय चन्द्र-पिनयनन्दन 1648 पोर 1712 के मध्य प्रपनी भक्ति भाव- नापों को रचनाए: 'पोखमी' और 'योगी' निमो। 'उत्तम कुमार चरित चौपई' इनकी प्रमुग वर्णतारमा कविता है। इसमे उत्तम कुमार के गेमास मोर माहमिक कार्यों वणूक हपा है। उत्तम कुमार बनाग्म के गजा मकरध्वज का पुत्र था जिसने बाद में जन धर्म को स्वीकार किया। जयमालजी-जयमालजी कृत काफी रचनाएं मिलती है । इनकी कविताएं समांग, भाव पोर कुछ स्तुति घ.माम्यान तरह को सनाए है, जिनमे 'पात्मिक यतीमो', 'उपदेश तोमी' 'उपदेश वत्तीगी', 'जीव चेतावनी', 'चौरामी स्तवन', 'चार मंगम', 'पोमठ जातियों की मज्जहाय', 'मानिजिन स्तवन' प्रादि प्रमुख है । पाख्यान कायों में पर्जुनमाली, उदईगजा, मेपकुमार, नेमीनाय, परदेसी राजा, महारानी देयको, मती द्रौपदी प्रादि है जिनमें इन कथानो को जैन तरीके में कहा गया है । सभी गपिनाए मरल गजस्थानी में लिखी गई है। कवि का उद्देश्य जैन धर्म और दगंन और उगमे विश्वाम को प्रगान करना है। भोसणजी-भोयगजी को जन मास्त्र में गहरी पंठ थी। इन्होंने नेरापंथी (भ्यताम्बर) जन मंप्रदाय चलाया | काव्य कौशल के कवि थे । इनकी एक स्पष्ट कविता दृष्टि थी। 1726 में इनका जन्म हुआ और 1803 में स्वर्गवास । 1760 ई. में इन्होंने तेरापंथ की स्थापना की ! इनकी रचनाएं दो तरह एक तरह को रचनाएं मंदान्तिक और आधारभूत पक्ष को उजागर करती है और दूसरी तरह की कविताएं वर्णनात्मक है । इनमे 'गोमालरी चौपई' और 'उदई गजा रो यसागा' प्रादि प्रथम तरह की रचनाए है और 'नव पदारथ' 'श्रावक वराह वरात' प्रादि दूमरी तरह की रचनाओं में गिनी जा 106 दिखाई देता है। प्रकृति चित्रग्ग को वटा 'भीमसेन हंसराज चौपई' में मिलती है । 'बोला-मारवणो रोपई' में कुरजा का बोल मार की तरह मालता है। प्राकाश मे चमकती विजलियां, प्रियतम की प्रतीक्षारत रमणियां, चातक की पीउ-पीउ की निरन्तर टेर, वर्षा की निरन्तर रसझडी से रसमय वातावरण कुशललाभ की कवितायो में चित्रित हुआ है । वास्तव में इन्ही विशेषताओं ने कवि को अपने काल के प्रमुख कवियो में लाकर खड़ा किया है । समय सुन्दर (1533-1646)-समय सुन्दर प्रसिद्ध कवि और विद्वान हुए है। इनकी रचनाम्रो की सख्या अत्यधिक है और ये विविध प्रकार की है । इन्होने सस्कृत में कई कृतियां लिखी है। राजस्थानी मे 'गस' और 'चप्पय' में 24 के लगभग इनकी वनात्मक कविताएं मिलती है । इनके अलावा पद्य के नो मग्रह मिलते है जिन्हें छत्तीसी के रूप में जाना जाता है। इनके अलावा 550 गीन एवं फुटकर रचनाएं भी मिलती है। इनमें मे बहुत मी कविताएं ऐमी है जो किमी विशेष गग में गाई जाती है । ममय मुन्दर का काव्य अपने कथ्य प्रकार, प्रमाप लोकप्रिय धुनी एवं भाषा की दृष्टि मे काफी महत्वपूर्ण है। इन्होने कविता के जरिए लोगो में मास्कृतिक एवं धार्मिक ममृद्धि हेतु महत्त्वपूर्ण सेवा की है। इन्होने कई स्थानों पर अपने युग के यथार्थवादी चित्र बीचे । मन् 1630 (वि. म 1687) मे गुजरात में जो भीषण प्रकाल पडा उमका हृदय-म्पर्शी चित्रचा है। इस प्रकाल मे कवि गुद भी पीडाग्रस्त हुमा था। अकाल की भयावह स्थिति का यथार्थवारी चिपण अपनी कविता में किया है। दौलत विजय-जन कवियो में दौलत विजय (1643-1743) का नाम काफी लोकप्रिय रहा है । 'गुमाग गमो' इनका लिमा ग्रथ है । यह ग्रंथ काफी नोक- है । दोलत विजय ने इस ग्रंथ की रचना 1712 ई. में की परन्तु इस प्रप को जो सप्रति प्राप्त हुई है वह पूर्ण नहीं है। इसमें 3576 पद्य है । जिसमे बप्पा गयन में लेकर रतननिह तक मेवाड के शामको का विवरण दिया गया है। दोलन पिजय ने इनमे गुमाग पोर. पदमावती पर दो रतन्ध कविताए दी है। हम ध के पाट भाग है। भाग 2, 3 एव 4 म गुमाग पोर उमरे विवाह पा वर्णन पाया है। गैप भाग प्रलग-प्रमग पटनामी में जुटे हुए है जो मंयाड नामको के मान पटी।। दम ग्रंपनी भापा न मिनी गम्पानी है। प्रय में गुमाग गया पति विस्तार में होने की पजह इमरा नाम 'गुमाग गमो' गा गया है। कुछ पता नुनिएजारहे है- प्रगन हाय मुग्माय, याबा.गी। पासावार, पी. भर पानी पी TR प्रानन, मंग म्ट र बीर,मंड। प्रम पर, अग प्रपनु पर। प्रिय हमा - 19 माधव द्वारा उसका और विवाहित जयन्ति माधर के विरह में व्याकुल रहने लगी मोर छिर-विप कर पृथ्वी लोक में माने लगी । भेद गुल जाने पर उसने पाना बन्द कर दिया तो माधव स्वय इन्द्रपुरी पहुंचने लगा। एक दिन इन्द्र सभा में प्रायोजित नाटक हेतु प्रस्थान के समय जयन्ति ने माधव को 'भ्रमर' बनाकर अपनी कंचुको में छिपा लिया। नृत्य करती जयन्ति की मनःस्थिति में इन्द्र को जव जयन्ति को कनुको में प्रसर रूप में माधव की उपस्थिति का ज्ञान प्रा तो उसने पुनः जयन्ति को पथ्वी लोक में देश के घर जन्म लेने का श्राप दिया । फलस्वरूप जयन्ति ने राजा काममेन की नगरी कामावती में 'कामा' नामक वेश्या की पुत्री के रूप में जन्म लिया और उसका नाम 'कामकदला' रखा गया । इधर विरहातुर माधव के अतिशय रूप-सौन्दर्य और वीणावादन से प्राक- पित पुष्पाकी नगरी को युवतियां और अन्त पुर की राज-महिपियाँ कामासक्त होने लगी। नागरिकों द्वारा शिकायत किए जाने पर गजा गोविन्द चन्द्र ने माधव को देश निकला दे दिया । पुष्पावती से निष्कासित माधव इतस्ततः भ्रमण करता कामावती नगरी में पहुंचा। यहां के राजा कामसेन के दरबार में खेले जा रहे नाटक 'इन्द्र महोत्सव नाटक' में संगीत की विसंगतियो को सुना और अपना सिर धुनने लगा। पूछे जाने पर उसने स्वर भंग की बातें बताई । जब ये बातें राजा तक पहुँची तो राजा ने राज सभा में बुलाकर उसे सम्मानित किया। कामकंदला पौर माधव ने राज सभा में एक-दूसरे को देखा । नृत्यरत कामकदला को अपने कुच पर या बैठे भवरे को पवन न्यास के बल पर उड़ाते देख माधव की स्मृति लौट पाई । कंदला के कौशल पर मुग्ध हो उसने राजा द्वारा पुरस्कार में दी गई समस्त भेंट कदला पर न्यौछावर कर दी। राजा ने इसे अपना अपमान समझ कर उसे देश निकाला दे दिया। जब वह नगर 'छोड़ रहा था तो कामकदला ने रात भर उसके साथ रहने का निवेदन किया । माधव ने उसकी बात स्वीकार कर ली। दोनों गहरे प्रेमपाश मे डूब गए । माधव यहाँ मे उज्जन चला गया । कंदला के विरह से संतप्त माधव ने उज्जन स्थित महाकाल शिव के मन्दिर में एक विरह गाथा दिवारों पर लिखकर छोड़ दी । सम्राट विक्रमादित्य ने इमे पढ़ा तो वे अत्यन्त दुःखी हुए । भोग विलासिनी नामक वेश्या की सहायता से राजा विक्रमादित्य ने गाथा-लेखक माधव की खोज करवाई और उसको व्यथा का कारण ज्ञात किया । माधव के इस प्रेम की परीक्षा लेने के लिए राजा ने एक से एक बढकर रूप-पौन्दर्य गर्विता कामिनियों देने का प्रलोभन दिया, परन्तु जयन्ति के विरह में पातुर माधव ने उनकी उपेक्षा कर दी । प्रेम प्रसंग में को परा मानकर विक्रमादित्य ने कामावती नगरी के राजा को सन्देश भेजा दला को देने की बात कही । जव राजा नही माना तो विक्रमादित्य ने पर चढाई कर दी और काममेन को पराजित कर काम कंदला को प्राप्त 108 हैं। इनकी कविताओं का उद्देश्य जन धर्म और दर्शन को जनसाधारण तक पहुँचाना था। ज्ञानसार--(1774-1841) ज्ञानसार ने भक्ति भावनामो की रचनाए कई ,रागों में लिखी हैं। 1820 में इन्होने 413 पद्यो को रचना 'चन्द चौपई समालोचना' लिखी । 'माला पिंगल' छंद शास्त्र पर इनका ग्रन्थ है । 'पुरषदेस वर्णन' में बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की प्रया, परम्परा, जीवन के तरीके ,ग्रादि बहुत ही वास्तविक ढग से वरिणत हुए है । इस ग्रथ की भाषा बज मिधित राजस्थानी है। उपरोक्त कवियो के अलावा धर्मवद्धन (धरमसी), जिनहर्ष (जसराज), जिनराज मूरि आदि जैन कवि हुए हैं जिन्होने जैन काव्य को समृद्ध बनाया । लौकिक प्रेम काव्य मध्यकाल मे प्रचुर मात्रा मे लौकिक प्रेमकाव्यो की रचना हुई है । इनमें से कइयो के लेखक ज्ञात है और कइयो के अज्ञात । कुशललाभ सरीखे ज्ञात लेखक ने 'माधवानल-कामकंदला' जैसी प्रसिद्ध प्रेमकथा लिखो तो अज्ञात लेखकों में जेठवा-ऊजळो के सोरठे प्रसिद्ध हुए। कुशललाभ की ढोला-मारू चौपई भी मध्यकाल में काफी लोकप्रिय हुई । इन कथानको को लेकर मध्यकाल में कई ख्याति- प्राप्त रचनाएं सामने आई है। 1527 में गणपति कायस्य ने 'माधवानल- कामकंदला प्रबंध' महाकाव्य शैली में लिखा । इस ग्रंथ के आठ भाग है जिनमें 2565 दुहे है। माधवानल-कामकंदला की कथा इस तरह है--राजा इन्द्र की रूप गविता अप्सरा जयन्ति को इन्द्र सभा मे अभिनीत नाटक मे अनुपस्थिति के कारण कुपित होकर इन्द्र ने थाप दिया। परिणामस्वरूप वह पृथ्वी लोक की पुष्पावती नगरी मे शिलारूप में अवतरित हुई । उसका उद्धार अब इन्द्र के वचनानुसार माधव नामक ब्राह्मण कुमार के द्वारा पत्नी-रूप में वरण से ही हो सकता था। एक वार कैलाश पर्वत पर समाधिस्य भगवान शंकर के मन मे उद्भूत कामेच्छा के परिणामस्वरूप उनके रेतस् का स्खलन हो गया । विष्णु ने इससे पृथ्वी लोक में सम्भावित उत्पातो के निवारणार्थ स्खलित रेतस् को अंजली मे ग्रहण कर गंगा में स्थित एक कमलनाल मे सुरक्षित रख दिया । इस कमलनाल से रेतस् के परिणामस्वरूप एक योजस्वी बालक का जन्म हुआ। गगा तटवर्ती पुप्पावती नगरी के राजा गोबिन्द चन्द्र का संतानहीन पुरो- हित स्वप्न में भगवान शिव से प्ररणा पाकर सपत्नीक गंगातट पर जाकर उस वालक को अपने घर ले आया। बालक का नाम 'माधवानल' रखा गया। बारह वर्ष की अवस्था मे नदी तट पर क्रीडारत माधव के मित्रों ने शिला रूप में शापित अप्सरा जयन्ति से उसका विवाह करा दिया और वह इन्द्र के वरदान अनुसार शाप-मुक्त हो उड़कर ईन्द्रलोक पहुंच गई।
169 माधव द्वारा उकृत और विवाहित जयन्ति माधर के विरह में व्याकुल रहने लगी और छिप-छिप कर पृथ्वी लोक में आने लगी । भेद खुल जाने पर उसने अाना बन्द कर दिया तो माधव स्वयं इन्द्रपुरी पहुंचने लगा। एक दिन इन्द्र सभा मे प्रायोजित नाटक हेतु प्रस्थान के समय जयन्ति ने माधव को 'भ्रमर' बनाकर अपनी केचुकी मे छिपा लिया। नृत्य करती जयन्ति की मनःस्थिति मे इन्द्र को जब जयन्ति की कंचुकी में भ्रमर रूप मे माधव की उपस्थिति का ज्ञान हुआ तो उसने पुन' जयन्ति को पृथ्वी लोक में वेश्या के घर जन्म लेने का श्राप दिया । फलस्वरूप जयन्ति ने राजा काममेन की नगरी कामावती में 'कामा' नामक वेश्या की पुत्री के रूप में जन्म लिया और उसका नाम 'कामकंदला' रखा गया । इधर विरहातुर माधव के अतिशय रूप-सौन्दर्य और वीणावादन से प्राक- पित पुष्पावती नगरी की युवतियों और अन्त पुर की राज-महिपियाँ कामासक्त होने लगी। नागरिको द्वारा शिकायत किए जाने पर राजा गोबिन्द चन्द्र ने माधव को देश निकला दे दिया । पुष्पावती से निष्कासित माधव इतस्ततः भ्रमण करता कामावती नगरी में पहुँचा । यहाँ के राजा काममेन के दरवार में खेले जा रहे नाटक 'इन्द्र महोत्सव नाटक' में संगीत की विसंगतियो को सुना और अपना सिर धुनने लगा। पूछे जाने पर उसने स्वर भंग की बातें बताई । जब ये बातें राजा तक पहुँची तो राजा ने राज सभा मे बुलाकर उसे सम्मानित किया। कामकदला और माधव ने राज सभा में एक-दूसरे को देखा। नृत्यरत कामकदला को अपने कुच पर आ बैठे भवरे को पवन न्यास के बल पर उड़ाते देख माधव की स्मृति लोट पाई । कंदला के कौशल पर मुग्ध हो उसने राजा द्वारा पुरस्कार में दी गई समस्त भेंट कंदला पर न्यौछावर कर दी। राजा ने इसे अपना अपमान समझ कर उसे देश निकाला दे दिया। जब वह नगर छोड रहा था तो कामबंदला ने रात भर उसके माथ रहने का निवेदन किया । माधव ने उसकी बात स्वीकार कर ली। दोनों गहरे प्रेमपाश मे डूब गए । माधव यहाँ में उज्जैन चला गया । कंदला के विरह से संतप्त माधव ने उज्जैन स्थित महाकाल शिव के मन्दिर में एक विरह गाथा दिवारो पर लिखकर छोड़ दी । मम्राट विक्रमादित्य ने इमे पढा तो वे अत्यन्त दुःखी हुए । भोग विलासिनी नामक वैश्या को सहायता से राजा विक्रमादित्य ने गाथा लेखक माधव की खोज करवाई पोर उसकी व्यथा का कारण भात किया। माधव के इस प्रेम की परीक्षा लेने के लिए राजा ने एक से एक बढ़कर रूप-पौन्दर्य गविता कामिनियां देने का प्रलोभन दिया, परन्तु जयन्ति के विरह में पातुर माधव ने उनकी उपेक्षा कर दी। प्रेम प्रसंग माधव को बरा मानकर विक्रमादित्य ने कामावती नगरी के राजा को मन्देश भेजा और कंदला को देने को बात कही। जब राजा नही माना तो विक्रमादित्य ने कामावती पर चढ़ाई कर दो प्रोर काममेन को पराजित कर काम कंदला को प्राण किया।
110 । कदला के प्रेम को परीक्षा करने हेतु विक्रमादित्य ने उसके पास माधव की मृत्यु की मिथ्या सूचना पहुँचाई, जिसे सुनते ही कंदला के प्राण-पखेरू उड गए। कदला की मृत्यु की सूचना पाकर यही दशा माधव को हुई। विक्रमादित्य ने अपने मित्र वेताल की सहायता से पाताल लोक मे अमृत प्राप्त कर दोनों को पुनर्जीवित किया । विक्रमादित्य के प्रादेश से कामसेन ने कदला माधव को भेंट कर दी । इस प्रकार अपनी प्रियतमा को प्राप्त कर माधव पुष्पावती लौट आया। माधवानल-कामदला प्रबंध में नायक-नायिका के शृगार का काफी विस्तृत वर्णन हुग्रा है । शृंगार, सयोग और वियोग इस ग्रन्थ की विशेषताएं है । छठे भाग मे कामकदला के वियोग का वर्णन काफी सशक्त ढग से हुआ है । इस ग्रन्थ की भापा मारु-गुर्जर है। कुशल लाभ ने 'मावानल कामकंदला चौपई' इसी कथानक पर लिखी है । कुशललाभ की भापा सरल गजस्थानी है। कही-कही सस्कृत के शब्द भी पाए है । गणपति कायस्थ की कथा ही कुशललाभ ने अपनाई है । परन्तु कुशल लाभ ने अपने लेखन मे मौलिकता को प्रदर्शित किया है । इसी कथानक पर 793 दूहो की दामोदर की 'माधवानल कथा' नामक कृति भी मिलती है । इसका रचना काल 17वी शताब्दी का प्रथम अद्ध भाग है । ढोला मारू रा दूहा-'ढोला मारू रा दूहा' एक श्रेष्ठ प्रेम काव्य है । इसको रचना 15वी शताब्दी के मध्य मे हुई है । कवि का नाम अज्ञात है । इसकी कथा इस तरह है-किसी समय पूगल देश में पिंगल नाम का कोई राजा राज्य करता था । उसी वक्त नरवर पर नल नामक राजा का राज्य था। पिंगल के एक कन्या थी। उसका नाम मारवणी था और नल के बेटे का नाम ढोला था। एक बार पूगल मे भारी अकाल पडा नो राजा पिगल कुछ दिनो के लिए पुष्कर चले गए। इन्ही दिनो राजा नल भी तीर्थ यात्रा करता हुआ पुष्कर पहुँचा । यहाँ पर दोनो मिले तो उनमे मित्रता हो गई और पिगल ने अपनी बेटी मारवणी का विवाह नल के बेटे ढोला से कर दिया । इस वक्त ढोला की उम्र तीन वर्ष और मारवणी सिर्फ डेढ वर्ष क थी। इसी वजह से उसे ढोला के साथ नरवर नहीं भेजा । कई वर्ष बीत गए । ढोला जवान हुा । उधर नरवर में पूगल काफी दूर था। अत. नल ने ढोला का दूसग विवाह मालवे के राजा की वेटी मालवणी से कर दिया । ढोला को अपने पहले विवाह के बारे में कुछ पता न था। और उससे यह बात छुई भी गई। इधर जव मारवणी जवान हुई तो पिंगल ने ढोला को बुलाने के लिए मदेश वाहक भेजा परन्तु मालवग्गी ने पूगल और नरवर के मार्गों के बीच ऐसे प्रबन्ध कर रसे थे कि कोई दूत ढोला तक पहुंच ही न सके।
111 एक घोडो एक गत मारवणो को डोला स्वप्न में दिखाई दिया। इससे तो उसकी विरह वेदना दुगुनी हो गई । इसी वक नरवर की तरफ का व्यापारी पूगल आया। उसने ढोला के दूसरे विवाह की वात पिगल को बताई। जब इस बात का पता मारवणी को चला तो उसकी हालत पागल जैसी हो गई । उसने ढाढ़ियो को प्रेम-संदेश देकर ढोला के पास भेजा जो मानवणी के आदमियो को छलकर को ही ढोला तक पहुंच गए। वहाँ तमाम रात उन्होंने अपनी मुरीली और दर्द भरी आवाज से गागा कर मारवणी का प्रम-सदेशा ढोला को सुनाया । यह मुन ढोला माग्वणी से मिलने के लिए आतुर हो उठा । एक दिन ढोला घोड़े पर सवार हो मारवणी से मिलने के लिए जाने लगा तो मालवणी को पता चल गया। उसने भाग कर घोड़े की लगाम पकड ली। उस दिन तो वह वापस मुड गया, परन्तु कुछ दिनों बाद एक रात मालवणी को निद्रा में सोई छोड चुपके से ऊँट लेकर पूगल की तरफ चल पडा । कुछ दिनो वाद ढोला पूगल पहुँचा तो वहाँ उसके बहुत लाड-चाव और आदर-सत्कार हुआ। पाँच-सात दिन यहाँ रहकर वह मारवरणी को लेकर नरवर के लिए रवाना हुआ ! रास्ते में वह एक जगह ठहा तो वहाँ मारवरणी को एक साँप ने काट खाया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। ढोला विलाप कर उमकी चित्ता के साथ जलने को तैयार हो गया । इतने में जोगी- जोगिन के वेश में शिव-पार्वती प्रकट हुए। उन्होने माग्वणी को जीवन-दान दिया। । यहाँ से आगे चले तो एक और घटना घटी। ऊमर नामक एक आदमी नै मारवणी को छीनने हेतु अपने दल बल सहित उनका पीछा किया। उसने अपना घोडा. ढोला के पास लाकर उसे अपने काट-जान में फसा लिया । और पानी में मिली अफीम (कसूबा) पिलाने लगा । मारवणी ऊँट की मुहरी पकडे एक तरफ खडी थी। ऊमर के साथ मारवरणी के पीहर को एक ढोलन थी। उसने गा-गा कर ऊपर के कपट-जाल की बात मारवणी को सुनाई । यह सुन मारवणी ने अपने ऊँट को छडी मारी और ऊँट हडबडा कर उछलने लगा । ढोला ऊँट को सभालने हेतु मारवणी के पास आया तो मारवती ने सारी बात ढोला को बता दी । ढोला यह मुन कर मारवरणी को ऊँट पर बैठा निकल भागा। ऊमर ने उनका पीछा किया परन्तु वे उसके हाथ नहीं पाए, हारकर उसे वापस मुइना पड़ा और ढोला मारवणी को ले कर अपने महलो मे या गया और वे मुव से रहने लगे । कवि ने इस कया को बडे ही कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया है । जैसे पजाव में ही झि की कहानी घर-घर में प्रसिद्ध है वैसे ही ढोला-मारू राजस्थान के लोगो के गले का हार है। यह रचना राजस्थानी के प्रारम्भ काल की महत्त्वपूर्ण रचना है। इसके कुछ पद्य नीने प्रस्तुत किए जा रहे है--- बावहियो नै विरहणी, दृहूया एक सुभाव । जव हा बम घण घणो, तब कहै प्रि-प्राव।
112 पपीहे और विरहिन का साम्य अवलोकनीय है-~ विज्जुळियाँ नीळज्जियाँ, जळहर तूही लज्जि । सूती सेज विदेस प्रिय, मधुर मधुरै गज्जि ॥ राति सखि इण ताळ मइ, काहज कुराळि पंखि । उदै सरि हूँ घर प्रापर्ण, विहूँ न मेळि अंखि ॥ पंथि हाथ संदेसडौ, धण विळळ ति देह । पग सू का लोहटी, उर प्रसुवा भरेह ।। अकथ कहाणी प्रेम की, किरण सू कहो न जाय । गूगा का सुपना भया, सुमर-सुमर पिछताइ ।। चंदा तो किण वडियो, मो खंडी किरतार । पूनिम पूरी ऊगसी, आवंत अवतार॥ 'ढोला मारू रा दूहा' एक भावनात्मक प्रम काव्य है जिसमे विरह प्रधान रूप से चित्रित हुग्रा है । मारवरणी द्वारा विरह सदेश मानवीय दूत ढाढी और प्रकृति दूत वादलो और पक्षियो द्वारा भेजा जाना इन दोहों में बड़ी भव्यता से चित्रित हुआ है । यह प्रेम काव्य में एक अनूठी काव्य रचना है । ढोला मारवणी चौपई-कुशललाभ ने कुछ परिवर्तित ढग से ढोला-मार- वपी की कथा को अपनी 'चौपई' मे लिया है। उन्होने मारवणी का जन्म रानी उमा देवडी से अपनी कथा में बताया है, राजा नल से मिलने का प्रसंग खरगोश का पीछा करते वक्त बताया है । तथा विवाह के साक्षी रूप मे पुष्कर सरोवर में एक शिलालेख स्थापित करने की बात का भी उल्लेख किया है । "भाऊ भाट' के माध्यम से ढोला से मिलने का जिक्र किया गया है, तथा ढोला-मरवण को पनघट पर मिलाया है । ऐसे ही कुछ परिवर्तन के साथ आगे की कथा कही गई है। जेठवा-ऊजळी-जेठवा-ऊजली की कथा अपने किस्म की संभवतः विश्व में एक ही | इस कथा पर 100 के लगभग पद्य मिलते है, जो लोक में 'जेठ रा सोरठा' (दूहा) नाम से जाने जाते है । ये ऊजली द्वारा अपने प्रियतम जेठवे को सम्बोधित है । वे मोरठे 17वी शताब्दी और उसके बाद की हस्तप्रतियो मे बिखरे हुए हैं । मूल सोरठो की रचना 1500 ई. के आस-पास हुयी है । जेठवे- ऊजली की कथा इस तरह है--- राजकुमार जेठवा एक बार शिकार करने हेतु गया । मेह-गाँधी मे यह रास्ता भूल गया और तूफान की वजह से वह बेसुध हो गया। उसका घोडा उसे एक चारण जिसका नाम अमरा था, के भोपडे के पास ले पाया। अमरा की बेटी ने राजकुमार को होश में लाने हेतु बहुत प्रयत्न किए परन्तु उसे होश नहीं पाया । बमरा बहुत गरीव था । उसके पास राजकुमार जेठवा को टड में बचाने हेतु पर्याप्त कपड़े भी नही थे। इसलिए उसने अपनी बेटी में कहा कि यह 113 अपना मेहमान है, इसको बचाना अपना धर्म है। इसलिए अपने शरीर से गर्मी दे ताकि इसके प्राण बच सके । अमरा ने अपनी युवा वेटी से कहा कि हो सकता है, यह युवक अपनी जाति का ही निकल पाए और उसमे तुम्हारा विवाह भी कर दूं। अपने पिता को पाना मानकर ऊबली ने उसे अपने गरम बदन को पाच दी तो जेठवा को होश पाया । जेठवा ने ऊजली को ग्राश्वासन दिया कि वह उसमे शादी कर लेगा । ऊजली ने जेठवे का अाश्वासन मान लिया योर ये एक-दूसरे को प्रेम करने लगे । परन्तु जब जेठवे को पता लगा कि ऊजली चारण को बेटी है तो, वह बदल गया। क्योकि लोक परमरा के अनुसार राजपूतो एवं चारणों में शादी सम्बन्ध नहीं हो सकते । जेठया ने ऊजली से विवाह का विचार बदल दिया और वह अपने महलों में वापस या गया । ऊजली इसके पश्चात् उससे मिल न सकी । ऊजली के पद्य उमके विग्ह को कई ढग में व्यक करते है । सोरठों में ऊजली की विरह-व्यथा है । कुछ उदाहरण नीचे उद्धत किए जाते है- अंगूठे री माळ, लोभी लगाई गयो । रूनी सारी रात, जक न पड़ी ₹ जेठवा ।। आंख्या उणियारो, निपट नही न्यारो हुवं । प्रीतम मो प्यागे, जोती फिरू ₹ जेठवा ।। मोरा मन मान, झड लोरा प्राव जट । जिवड़ो मो जावे, जाऊँ किण दिस जेठवा ।। इन सोरठो के रचनाकार का नाम प्रज्ञात है परन्तु इनमे उच्चस्तरीय विरह-वेदना साहित्यिक ढग से चियित हुई है । दोहो की भाषा सरल राजस्थानी संगो योजाएंद-रणो वोजागद के 80 के लगभग पद्य ग्रट्ठारहवी शताब्दी और उसके बाद की पाडुलिपियो मे मिलते है । परन्तु इनकी रचनाएँ सम्भवतः 16धी शताब्दी में हुई प्रतीत होती है । मंगो-वीजाणंद को क्या इस तरह है- वीजाणंद एक गरीव चारण था । बहुत अच्छी वीणा बजाता । सेरणी एक धनवान चारण वेदा की बेटी थी। वह वीजाणंद से वीणा सुनने उसके पास पाती। धीरे-धीरे दोनो में प्रेम बढने लगा। वीजाणंद मन से सभी को अपना नुका था और मैणी वीजारांद को । वीजाणंद ने एक दिन दोनो के विवाह को बात सैगी के पिता के सामने चनाई । परन्तु मेणी के पिता को यह शादी पसन्द नही थी। उसने शादी के लिए एक ऐमी शर्त रखी जो बहुत ही मुश्किल से पूरी होती । शर्त थी-वीजाणंद 101 भैसे ऐसी साकर देगा जिनके काले शरीर पर चोट जैसे सफेद-सफेद चकते हो, ऐसी भैस यह एक वर्ष के भीतर लाकर देगा । वीजाणंद यह शर्त निश्चित अवधि में पूरा नहीं कर सका और शादी की बात टल गई। परन्तु मरगी ने वोनाणद के सिवाय अन्य किसी से विवाह न 114 करने की शपथ ले ली थी । जब वीजागंद निश्चित अवधि में नहीं पाया तो वह निराश होकर हिमालय की तरफ चली गई। उसने यह निश्चित कर लिया था कि वह हिमालय में जमकर मर जाएगी। वीजाणंद को जब इस बात का पता चला तो वह हिमालय की तरफ भागा। जव वीजाणंद हिमालय पहुँचा तो संगी मृत्यु की अन्तिम घडियां गिन रही थी। उसने उसे वापस च नेि को कहा परन्तु संगी नही मानी। उसने वीजाणंद से अर्ज की कि जब तक उसकी सासे शरीर से न निकले वो वीणा बजाये । वीजाणंद ने ऐसा ही किया। उसने पल-पल सासें छोडती मैणी को देखा और पागल हो गया। फिर वह अधिक दिन नहीं जी सका । नागजी-नागवंती-18वी शताब्दी और उसके बाद की हस्त प्रतियो में इस कथा से सम्बधित 50 के लगभग पद्य मिलते है। मूल पद्य सम्भवत. 16वी शताब्दी के बाद के है । कथा सार इस तरह है-नागजी नागमती से प्रेम करते थे । परन्तु नागमती के भाई ने उसका चुपके से विवाह रचा दिया। नागमती के पिता को इस बात का ज्ञान नहीं था। अत: उसने एक ऐसे व्यक्ति उसका विवाह कर डाला जिसे वह एक दफा अस्वीकार कर चुकी थी । नागजी नागमती में मिले तो उन्हे उसके दूसरे विवाह का वहत दुःख हुअा। कागजी से वात सहन नही हुई और उन्होने अात्महत्या कर ली। नागमती नागजी को टू ढ रही थी, तलाश मे फिरती-फिरती नागमती ने नागजी को मरे हुए को ढूढ लिया । वह बहुत निगरा हुई । घर पहुँच वह अपने पति को छोड अपने पौहर की तरफ चल पड़ी। रास्ने में उमने नागजी की मृत देह को श्मशान भूमि मे जलते हुए देख लिया । वह गाडी से उतर 'दाग अगन' में कूद पड़ी। पद्यो मे नागजी की मृन-देह, नागमती की निगशा, अश्रुयुक्त उसका दुख प्रादि का भावनापूर्ण वर्णन मिलता है। बोझा सोरठ-~-1661 में रचित हान प्रतियों में पीझा-सोरठ की कथा के 41 पद्य मिले है और बाद में मिली पाडुलिपियो में 76 पद्य । मूल छन्दो की रचना सम्भवत' 16वी शताब्दी में ही प्रारम्भ हुई प्रतीत होती है । प्राचीन दोहो से' यह कथा निक नती है । सोरठ का वास्तविक नाम सोनल था। राव खंगार ने वीझा और मोनन को प्रेमपाश में बंधे देखा परन्तु अपना क्रोध दवाया तथा दोनो को वस्त्र से ढक दिया । इस कथा के और भी कई प्रकार है। राजस्थान में प्रच- लित यह ख्याति प्राप्त कथा इस तरह है-सोरठ एक अति मुन्दर औरत थी जो दफा एक धनवान राजारूड को ब्याही थी। गिरनार का राजा बंगार मोरठ की मुन्दरता पर मुग्ध था और वह उनसे शादी करना चाहता था। उसने राजास्ड को एक बार जमा खेलने के लिए बुलाया। जुए में राजा रूड़ हारने नगा और उमने अन्त म सोरठ को भी दांव पर लगा दिया। इस तरह वह सोरठ साहन सब कुछ हार गया। प्रथम 1.15 वीमा राव गार का सम्बन्धी था । वह भी मोरठ को-सुन्दरता पर मुग्ध था। राव गंगार ने उसे ही सोरठ को लाने भेजा था। और इस दौरान वह उनके प्रेम में फंस गया । सोरठ मह नो में रहती परन्तु वीमा गुप्प रूप मे उससे मिलता रहना। एक दिन खेगार ने उन्हें प्रेमपाश में बंधे देख लिया। खंगार ने बीमा को देश निकाला दे दिया। बीमा ने पाटण के नवाव से सहायता मांगी। युद्ध हुग्रा पोर गुद्र में राव मंगार काम याया। परन्तु वोझा सोरठ को प्राप्त नही कर सका। मोग्ठ को नवाव ले गया। बीमा मोरठ के बिना रह न सका और मर गया । गोरठ को वीझा को मृत्यु का पता चला तो वह कसे ही वीझा के दाग में आ गई पोर दाग-अग्नि में जल कर अपने प्राण त्याग दिए कि अगले जन्म में मिलेंगे। जलाल-चूचना-16वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध या फिर 17वी शताब्दी के पूर्वाद्ध के लिये पद्य मिलने है, जिनमें यह कथा पाई है। यह एक ऐसे प्रेमी- प्रेमिका की कहानी है जिसमे काजी को काली करतून का दर्द भरा हुआ है। काजी ने उन्हें शादी सम्बन्ध में तो नहीं मिलने दिया परन्तु यह युगल-गोडी गुप्त रूप से मिलती रही परन्तु दोनो साथ न रह सके । बूबना और मूमना दो वहिने थी । जलाल बूबना ये प्रेम करता था और उसी में शादी करना चाहता था। परन्तु जब विवाह को घडी पाई तो काजी ने घून खाकर बूचना का विवाह जलाल स न करवाकर उसकी वहिन मूमना से करवा दिया । इस धोखे का पता निकाह होने के बाद चला । परन्तु उनका प्रेम कनी कम न हया । काजी ने उन्हे शादी बन्धन में नही बंधने दिया और वे विना शादी के ही मृत्यु को प्राण हुए। लोक प्रचलित कथा का अन्त बहुत दर्द भग है । परन्तु लिखी हुई कथा मे शिव-पार्वती उन दोनो को वापग जिन्दा कर देते है । मुस्लिम प्रेमी-प्रेमिका को शिव-पार्वती द्वारा जीवन-दान से ज्ञात होता है कि उस वक्त हिन्दू-मुसलमानो में काफी सद्भाव था। छंद शास्त्र राजस्थानी माहित्य के मध्यकाल में छंद शास्त्र के भी कई ग्रंथ लिखे गए। छंद शास्त्र पर प्रारम्भिक रचना कुशललाम रचित 'पिंगल-सिरोमणी' मिलती है। 1664 मे चारण जोगीदान ने 'हरि-पिंगल-प्रबन्ध' को रचना की। चारण हमीरदान रतनू ने "पिंगल-प्रकास', 'लखपत पिंगल' और 'हमीर नाममाला' अठ्ठारहवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध मे लिखी। 1806 में मंडागम ने 'रघुनाथ रूपक' लिखा 1 पाढा किमना का लिखा 'रघुबर जम प्रकास' मिलता है । उन्होंने 1822 में “भीम प्रकाम' की रचना की । उदयगज की 'कवि कुलबोध' इसी परम्परा की उल्लेखनीय कृति है।
116 कविगजा मुरारिदान का "डिंगलकोश', हिंगळाज दान कविया रचि 'प्रत्यय पयोधर', सावळदान प्रासिया का 'महाभारत-रूपक' और नागराज 4 "डिंगलकोश' आदि इस काल की प्रमुख रचनाएं है । गद्य साहित्य चौदहवी शताब्दी राजस्थानी मे गद्य-रचना की परम्परा स्पष्ट रूप से सामने आती है। 1421 मे माणिक्यचन्द्रसूरि ने 'पृथ्वीचन्द चरित (वाग्विलास) लिखा । इस में बहुत ही सुन्दर कथात्मक वर्णन मिलता है। इसमें पृथ्वीराज के चरित्र को अपेक्षा उसका वागविलास रूप चमत्कारिक वर्णनो की प्रधानता सहित होने के कारण ही इसके रचयिता ने इस कृति का नाम वागविलास रखा है । यह ग्रंथ तुकान्त गद्य में लिखा हुआ । इसके गद्य को वानगी नीचे द्रष्टव्य है--- "जिण देसि ग्राम अत्यन्त अभिराम । भला नगर जिहा न मागीयइ कर । दुग्ग जिसा हुई स्वरग। धान्य न निपजइ सामान्य । सागर सोना रूपा तणा सागर । जेइ देस माहि नदी वही ई, लोक सुखहनिरवहई" इसी तरह जीतमालजी तेरापंथी प्राचार्य (तेरापंथ के चौथे प्राचार्य) बहुत प्रभावी लेखक हुए है। उन्होने बड़ी संख्या में कथाएं लिखी है। 'प्रचलदास खीची री वनिका' 1430 और 1435 के मध्य किसी ममय लिखी गई है, इसमें गद्य बहुत सशक्त एवं मुन्दर है। मध्यकाल में ऐतिहामिक गद्य प्रचुर मात्रा में लिखा गया । वंशावली, पीढ़ियावली, पट्टावली, ख्यात, वान, विगत, हकीगत, हाल, वचनिका, दवावंत और कई प्रकार है जिनमें ऐतिहासिक गद्य के नमूने मिलते है। मारवाड के परगनो की विगत, मुहता नैणसी री ख्यात, ऐतिहासिक कृतियों में उल्लेखनीय कृतियां है। शिवदास गाडण रचित 'अचलदास खीची री वचनिका', खिडिया जग्गा रचित 'वनिका राठौड़ रतनसिंह महेशदासोत री', जती जयचन्द रचित 'माताजी री वचनिका' महत्वपूर्ण वचनिकाएं है। 'दवावत नरसिंह गौड़ गे', माली- राम भाट द्वारा लिखित, द्वारकादास रचित 'महाराजा अजीत सिंह की दवावत' मुख्य दवावत है। ख्यानों में मुंहता नेणसी, बाकीदास प्रासिया, सिंढायत दयाल- दास के नाम उल्लेखनीय है । अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों में दलपत विलास प्रमुख है जिसकी रचना 1600 के लगभग हुई है। राजस्थानी का वात साहित्य वडा वैभवशाली और विशाल है। हरराज नंगसी री वात, महाराजा पदमिह री वान, कंवर रणमल री वात, राजा भीम री बात, अकाल रौ वात, रामद तंवर री वात प्रादि वातों में उल्लेखनीय वात है। मुख्य बातो के नायक ऐतिहासिक, पर्द्ध ऐतिहामिक और काल्पनिक रहे है। 1 11- राजाभोज और खापरिये चोर की बातें काल्पनिक बातो के उदाहरण है। बात शैली बड़ी दिलचस्स, विवरणत्मक और वर्णनात्मक है। मध्यकालीन राजस्थानी गद्य अपनी समकालीन गद्य शैली में लिखा जाता रहा और समृद्ध बना। राजस्थानी में नई विधाएं अंग्रेजो के सम्पर्क से शुरू होती है और कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध प्रादि लिखे जाने शुरू होने है । लोक साहित्य राजस्थानी का लोक साहित्य बहुत समृद्ध है । इसे निम्न भागो में बाँटा जा मकता है : लोकगीत, लोकगाथा, लोकनाट्य और लोक सुभापित । लोकगीतो मे जहाँ सवद और भजनों (हरजस) में गोरखनाथ, भतरी, कबीर, हरजी भाटी, रूपादें, मीरा, चन्द्र सखि की रचनाएं गूजती है वहाँ जैनगिरि लिखमो जी माली, वगमोजी खाती के पद्य लोक कंठो में रम गए है। गोगाजी और पाबूजी के लोकगीत लोक-स्वरो में रमे हुए है । लोकगीतो मे मीरा लोक जीवन मे रची-बसी है । वनडा, जवांई, पोळ , जलो, घोड़ी, गणगोर, भात और रतजगे के गीत जहाँ राजस्थानी औरतो के गले के हार बने है वहाँ यमाल, गोरवद, पनिहारी, विणजारो बहुत ख्यातिप्राप्त है। वर्षा के दिनों में तीज के गीत गाये जाते है तो 'सपना' भी गुनगुनाया जाता है । मूमल, धूधरी ग्रादि वहुत प्रतिष्ठित हुए है । 'लोकगीतो पर नरोत्तम स्वामी, ठाकुर रामसिंह, मूर्य करण पारीक, डॉ. मनोहर शर्मा आदि विद्वानो ने बहुत ही उल्लेखनीय कार्य किया है। गणपति स्वामी, लक्ष्मी कुमारी चूडावत, स्वर्णलता, अग्रवाल आदि ने लोक गीतों का अध्ययन कर सराहनीय कार्य किया है। लोककथामो में वीरता की कथा, रोमान्टिक कथाए', पौराणिक कथा, ऐतिहासिक कथा और प्रेम आदि को कथाएं मिलती है । 'पाबूजी रा पवाडा' आज भी भोगो के मुंह से मुखरित होते हैं। उनको ऊंची आवाज कानो मे मुनाई देने लग जाती है। भोपियो के मोठे गले वोन उठो है । ऐसे ही 'तेजा' किसान के मुह अच्छा लगता है । हल चलाता किमान, निनान करती किरमनियों मुह से निकलती 'तेजा' को सुरीली धुन मन मोह लेती है । 'गजी-जवारजी' शेखावाटी क्षेत्र में लोक जीवन में रमा हुअा है । 'वगड़ावत देवलीला काव्य', 'निहालदे सुल्तान' रोमान्टिक लोक साहित्य के उदाहरण हैं । रानी लक्ष्मी कुमारी नूडावत ने देवनारायण बगडावत की कथा का सम्पादन किया है। पौराणिक गाथामो में आवारास, द्रपद पुराण, भीमो भारत आदि प्रमुख है । ये कथाएं पौराणिक घटनामों पर आधारित है। ये कथाएं क्रमशः ऋषि दुर्वामा, द्रौपदी चीरहरण और महाभारत के पात्र भीम और अभिमन्यु पर आधारित है। 'नरसो रो माहेरो' श्रीकृष्ण द्वारा नानी वाई के भात भरने की बात को ताजा कर देता है । लोक में वह बहुत लोकप्रिय है। गोपीचन्द भतरी की गाथा राजस्थान में अत्यन्त लोकप्रिय है।
लोककथा जिमे वात कहा जाता है, ने आधुनिक कई रचनाकारों को प्राक- पित किया है । विजयदान देथा ने 'वातारी कुलवाड़ी' में लोक-कथानो का ही मंग्रह किया है । गोविन्द अग्रवाल ने भी लघु लोककथानों का संकलन प्रकाशित करवाया है। रानी लक्ष्मी कुमारी चूडावत ने लोक कथानों को फिर से कहा है । हूंकारो दो मा', 'टावरां री बाता' लोककथापो के संग्रह हैं। डॉ. मनोहर शर्मा, मूलचन्द 'प्राणेश', नानूराम सस्कर्ता, देवकिशन राजपुरोहित ने भी लोककथानों के संकलन तैयार किए है । अाधुनिककाल के कई कथाकारो ने अपनी कई कहानियों के कथानक लोककथानो पर आधारित किए है । लोकनाट्य मे ख्याल वहुत लोकप्रिय है। शेखावाटी के 'दुल्हो' और 'नानूराणो' ने ख्यालो में बहुत नाम कमाया है। स्वाग और लीलाएं भी लोक- नाट्यो में ही गिने जाते है। लोक साहित्य में कहावतें, मोबाएँ और 'कंवत' आदि भी प्रमुख स्थान रखते है। अगरचन्द नाहटा, नरोत्तम स्वामी, डॉ. कन्हैयालाल सहल और गोविन्द अग्रवाल आदि विद्वानो ने इन पर उल्लेखनीय कार्य किया है। कहावत कोश प्रकाशित हुए है । गोविन्द अग्रवाल ने अपने कहावत कोश मे इनमे सम्बन्धित लघु कथाएं भी दी है। लोक प्रवाद में लोकहित भरा है और हास्य पाया है। लोक सुभापितों मे लोक व्यवहार की बातें कही गई है । इस तरह राजस्थानी साहित्य को डोर आश्रयदाताओ के बडे बोलो से निकलती, जनता को जोडती, पाख्यान काव्य और संत साहित्य के मनियो से निकलती लोक साहित्य को पिरोती है । लोकगीत, लोककथानों से निकलती हुई आधुनिक मृजन को पिरोने हेतु अपना सिरा आधुनिक रचनाकारों के हाथ मे थमा, मध्यकाल को प्रणाम कर आधुनिक काल के दरवाजे खटखटाती है। परन्तु, अपना कदम आगे बढ़ाने से पहले मध्यकाल का मूल्याकन कर लेना उचित प्रतीत होता है। मध्यकालीन राजस्थानी साहित्या प्रवाह और प्रवृत्तियाँ मध्यकाल के अध्ययन के पश्चात् समूचे साहित्य पर एक नजर डाल कर देखें तो प्रथम तो हमें यह बात दिखाई पडेगी कि इस काल में राजस्थानी 'मारु-गुर्जर' से अलग होकर अपने सुन्दर स्वरूप में मामने आती है, और राजस्थान की राजभाषा बनती है । इस काल में गद्य और पद्य दोनो उन्नत प्रकृति के लिखे जाते है । चूँकि इस काल में भक्तिकाल भी समाहित है : अतः विपुल मात्रा में संत साहित्य मामने आता है । पाख्यान काव्य ,लिम्ने जाते है और वे अपनी एक पहचान बनाते है ! इस काल के रचनाकारों में "प्रकास', 'विलास' 'रासो' आदि शोपंको में अपनी रचनाओं को रखने की प्रवृत्ति भी बखूबी देखी जाती है ।
119 वनि का शैली प्रारम्भकाल में शुरू हुई, वह मध्यकाल में प्रवामान रही । अचलदास खीची को वचनिका से कई वारण कवि प्रभावित हुए । उन्होने मध्यकाल में इस विद्या को अपनाकर गद्य और पद्य मिश्रित रचनाएं इसी शैली में लिखी । सडिया जग्गा ने वचनिका लिखी जिसमे उन्होने इसी शैली को अपनाया । उनकी लिजी वचनिका 'वचनिका राठौड़ रतनसिह महेशदासोन री' मध्यकाल की एक प्रमुन कृति बनी। इस तरह जती जयचन्द ने 'माताजी री वचनिका' लिखी । प्रांतिक पुट के साथ इसमें उन्होने माताजी का वर्णन किया । ऐसे ही हमीरदान रतन ने 'देसलजी री वचनिका' लिखी। इसमे 1728 मे हुए देसलजी और बुलंदखों के बीच हुए युद्ध का वर्णन हुआ है । इन वचनिकायो ने मध्यकाल में पद्य के साथ गद्य के प्रवाह को निरन्तर बनाए रखा है । मध्यकाल में एक प्रवृत्ति और देखने को मिलती है, वह यह कि इस काल में रचनाकारो में 'छन्द' नाम से अपनी रचनाप्रो के शीर्षक रखने का दिलचस्प चाव रहा है । इस प्रवृत्ति के बल पर राजस्थानी साहित्य में कई उत्कृष्ट रचनाएँ पाई है। 'रामल छन्द' और 'छन्द राव जेतसी रो' ग्रादि प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रयत्ति में सामने आई है । 'रणमलछन्द' को रचना 'पसाइत' ने की तो राव जेतसी के छन्द का रचनाकार 'सूजोजी' को बताया जाता है। कवि ने इस ग्रन्थ में राय जेतसी के पूर्वज राव चूंडा, रणमल, जोधाजी, विकोजी, लूणकरण की प्राप्तियो का वर्णन किया है और तत्पश्चात् जेतसी का । भटनेर जीतकर कामरान जव बीकानेर पर चढ़ाई करता है तो जेतसी अपने विश्वासी लेफ्टीनेट को किना सौप कर किले मे वाहर या जाता है और प्राक्रमण की तैयारी करता है। रात के वक्त राव जनसी कामरान की सेना पर माक्रमण करता है और विजय प्राप्त करता है ! परन्तु इस कृति के रचयिता के नाम पर अभी भी मतभेद है। कई विद्वान अाज भी सूजोजी को राव जैतसी के छंद का रचयिता नहीं मानते । परन्तु ऐसी प्रवृत्ति मध्यकाल में चलती रही । चारण कवि नायक की वीरता, उसकी विजय, उसकी उपलब्धियो को लेकर इस तरह की रचनाएँ करते रहे है । 'राव माला रो गुण' ग्रन्थ भी इसी प्रवृत्ति पर आधारित है। बारठ आसोजी इस ग्रन्थ के रचयिता है । इस ग्रन्थ म राव मल्लीनाथ के अठ्ठारहवे उत्तराधिका । मेघराज की वीरता का वर्णन है । वीठू मेहोजी ने 'पाबूजी रो छन्द' इसी शैली पर लिखा । मेहोजी का 'भाटी सोमसी रतनावत रो छन्द' भी लिखा मिलता है। केसोदास गाडण रचित 'छन्द महादेवी रा' दूसरी तरह का ग्रन्थ है । इसकी रचना 1583 और 1644 के मध्य हुई प्रतीत होती है। प्रारम्भकाल में 'वेलि' परम्परा शुरू हुई वह मध्य कान में काफी फली- फूली । 'लि क्रिमन रुकमगीरी' इस काल की ख्याति प्राप्त वेलि है । इसी 120 - - तरह 'आई माता री वेल', 'चिहुँगति री वेलि', 'जम्बूस्वामी री वेलि', 'गरभ वेलि,' 'श्रोध वेलि' छोहल कृत वेलि, भरत वेलि आदि कई वेलि 16वी शताब्दी में रची गई । वीठू मेहोजो ने 'चूंडाजी री वेल' लिखी । ऐसे हो "राठौड़ रतनसिंह रो वेलि दूदोजी को लिखी मिलती है । इसमे रतनसिह और कुलोखां के बीच हुए युद्ध का वर्णन हुआ है। कल्याणदास ने जहांगीर और दो के राव रतन के युद्ध का वर्णन करते हुए 'राव रतन री वेलि' लिखी । 'क्रिसन री वेलि' सांखालो करम सी रुरणेचा ने 1540 के पास-पास रुकमणी के रूप का वर्णन करते हुए बहुत ही सुन्दर तरीके से इस वेलि की रचना की। 16वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध मे किसनोजी रचित 'महादेव पारवती री वेलि' मिलती है । इसमे गगावतरण और महादेव पार्वती के विवाह का प्रसंग पाया है। इस तरह से वैलि साहित्य ने अपनी छाप अपने युग पर छोड भारतीय साहित्य मे अपना प्रमुख स्थान बनाया है। 'रासौ' साहित्य मध्यकाल में अपनी विशिष्टता अंकित करता प्रतीत होता है । 'पृथ्वीराज रासो' के अतिरिक्त खुमारण रासौ, राम रासी, बुद्धि रासौ जैसे ग्रन्थ लिखे जाते है तो इसी रासौ माहित्य में "सिंह वानर रासो' जैसी बाल साहित्य की रचना सामने आती है। गिरधर ग्रासियाँ (1633-1718) 'सगत रासौ' लिखता है । इममे वह राणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह की चीरता का वर्णन करता है। उसके पुत्र अचलसिंह और प्रपौत्र नरहरि की वीरता का वर्णन भी कवि ने इस रासौ मे किया है। 'रामरासौ' माधोदास दधचड़िया (1533-1621) का 1034 पद्यो का बडा ग्रन्थ है। ऐसे ही मुहता रघुनाथ ने वाल्मीकि रामायण की कथा पर आधारित कर 'रुघरासो' लिखा । पीरदान ने (18 वी शताब्दी के पूर्वाद्ध में) 'हिंगलाज रासो' लिखा । दलपत विजय (1643 1743) ने 'खुमारग रासौ' रचा । यह ग्रन्थ 1712 के आस-पास लिखा गया । इसमें मेवाड का इतिहास है । वप्पा रावल से लेकर महाराणा राजसिह तक और खुमाण पर स्वतन्त्र कविताएँ है। इसमे 3576 पद्य हैं। ग्रन्थ पाठ भागो में बँटा हुआ है । इसमें खुमाण और पद्मावती को कथा कविता के बहुत ही सशक रूप में कही गई है । यह ग्रन्थ अपने युग की प्रतिनिधि रचना है। महेम ने दास राव जो अर्जुन गौड़ (शाहजहाँ का विश्वासी अधिकारी) का ग्राश्रित था, 17वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध मे 'बिन्हाय रासो' की रचना की। इसमे गौड वीरो का विस्तृत वर्णन हुआ है । कुम्भाराम सादू ने 'रतन गमौ' और 'जयचन्न रासौ' रचे। ये दोनो ग्रंथ क्रमश: 1663 एवं 1723 के पास-पाम रचे गए । तत्कालीन वीरो का वर्णन इसमे गीत और दूहों में किया गया है । कविया करणीदान (1693-1783) ने 'छति रमो' नामक ग्रंथ लिखा । इसमें काठियावाड के जैन यतियो का वर्णन हुग्रा है।
121 मध्यकाल में एक प्रवृत्ति और दिखाई पड़ती है, वह यह कि इस काल में मायक के नाम के आगे 'प्रकास', 'विलास' जोड कर रचनायो का नामकरण करने की कवियों में एक प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है, जिसके अन्तर्गत कई सुन्दर रचनाएं सामने आई है। किसोरदास राव (भाट) ने 'राज प्रकास' लिखा । इस ग्रंथ की रचना (1658-59) के अासपास हई है । ऐसे ही 3317 पद्यो की रचना 'सूरज प्रकास' है । इसके रचयिता करणीदान ने ऐतिहासिक घटनामो का उल्लेख कर इसका महत्त्व बढाया है। रामदान लालस (1761-1825) ने महाराणा भीमसिंह की ख्याति में 'भीम प्रकास' लिया । चिमनजी ने 'देवगुण प्रकाश' की रचना की, जिसमें सीकर के राव देवीसिंह की नफज कुलीखा और मुर्तजा अली मे लडाई का वर्णन हा है। ग्राठा किसना ने महाराजा भीमसिंह की यशगाथा 'भीम बिलास' में लिली । देननोक का वीरू भोमो ने 'रतन विलास' लिखा। यह बीकानेर के महाराजा रतनसिंह और उनके पुत्र सरदारसिंह के वक्त मे रचा गया । 18 वी शताब्दी के अन्त तक कविया करणीदान की कविता के साथ यह प्रवृत्ति अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई । मध्यकाल के सन्त कवियो मे भी यह प्रवृति देखने को मिलती है। जोधपुर के नाथ संप्रदाय के ख्याति प्राप्त कवि वन्नानाथ ने 19वी शताब्दी के पूर्वाद्ध में 'अनुभव प्रकाश' रचा जो कि नाथ सम्प्रदाय में काफी लोक- प्रिय हुमा । हमीरदान रतन ने 'पिगल प्रकाश' नाम से छन्दशास्त्रीय विवेचन किया। किसना पाढा द्वितीय द्वारा रचित 'रघुवीर जस प्रकास' ग्रंथ भी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है। इसके अतिरिक्त 1600 ई. के आस-पास का लिखा एक ग्रंथ 'दलपत विलास' मिलता है । जिसमें दलपतसिंह (बीकानेर नरेश) का प्रार- म्भिक जीवन वणित हुआ है। इस तरह से यह प्रवृत्ति समस्त मध्यकाल में कमोवेश रूप से प्रवाहित रही। मध्यकाल में, कवियों में नायक की वीरता मे कवित्त लिखने की प्रवृत्ति भी देखी जा सकती है । गाडण पसाइत(1400-1487/88) ने 'कवित्त राव रणमल' लिखा। 16वी शताब्दी में बीठू मेहो ने 'कवित्त चौहान करमसी और सावलदास रा' लिखा। ग्रासिया करमसी ग्वीवसरोत ने 'सूजा वालेछा रा' कवित्त लिखा। इसमे सूजा वालेछा के तीन युद्धों का वर्णन है। देसनोक का बीठू भीमो ने 'महा- राणा गणपतमिह रा कवित्त' लिखा । कवित्त लिखने को यह प्रवृत्ति पूरे मध्यकाल मे देखने को मिलती है।
122 . बत्तीसी, तीसो, वावनी, वीसी आदि रचनाएँ पद्यों की संख्या के आधार पर लोकप्रिय वनी । जैसे 'किरतार वावनी', 'सन्तोष वावनी' आदि । ऐसे ही संत कवियो में 'दया वोध', 'ममरथ वोध' 'अचल वोध' आदि नामों से ग्रंथ लिखने की परम्परा मिलती है। दुरमा पाढा ने 'झूलणा' लिखना शुरू किया तो आगे जाकर यह कधियों का प्रिय वना । ऐसे ही पाढा किसना प्रथम ने प्रथम दफा 'नीसागी महेग दलपनोन री', 'नीसारगी शाहजहाँ पतिसाह री', 'नीसारणी रतन महेशदासोत गे' लिची नो ग्रागे जाकर यह कवियों में काफी प्रिय बनी और नोमा गोलंद में अपनी रचनाएं लिव अपने ग्रंयों का नामकरण किया । सायां- झूना ने 'नोमाणी राधिका जी री' (अपूर्ण) लिखी । इसमें राधिका और चन्द्रावली के माथ कुज लोला का वर्णन हुअा है । माधोदास दधवड़िया ने 'नीसांणी गज- मोष' लिखी । यह भागवत में पाई घटना पर आधारित है। बारठ नरहरिदास (1723-1763 के लगभग) ने 'गुण राम वार नीसांणी' में सरल भाषा में राम कथा का वर्णन किया है। बात साहित्य मध्यकाल में काफी फला-फूला । राजस्थानी गद्य में बात साहित्य मध्यकाल की देन है। इसके बाद 'वान' बदल जाती है और पाश्चात्य जगत के प्रभाव के साथ कहानी का प्रादुर्भाव होता है। मध्यकाल में ऐतिहासिक ग्रंथों में 'ख्यात' मध्यकाल की सबसे बड़ी देन है। पातो में राजस्थान का इतिहास समाया हुआ है । 'मुहता नेणसी रो ख्यात' (1610-1670) रूपातों में बहुत ही प्रामाणिक ख्यात मानी जाती है । ख्यातकारों मे वाकीदास और सिंदायच दयालदास के नाम लोकप्रिय है। प्रारम्मकाल में जैसे जैन साहित्य प्रधान रूप से मिलता है वैसे ही मध्य- काल में चार माहित्य को प्रधानता देखी जा सकती है। समस्त मध्यकाल में चारण कवियों को प्रमुखता सष्ट दृष्टिगोचर होती है। परन्तु चारण प्रवृत्ति ने कई बातों को सही रूप में समझने में भ्रम पैदा किया है। फिर भी चारणों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। सम्भवतः यह चारणो का स्वर्णयुग था। परन्तु एक बात यहाँ उल्लेख करने योग्य है, वह यह कि चारण साहित्य को प्रधानता प्रोर चारण शैली में प्रतिशयोक्ति को वजह से राजस्थानी को निंदा के रूप मे 'चारणों को मापा' कहने का दुस्साहस भी हुआ है। वात्पर्य यह कि 123 चारणों ने जहाँ राजस्थानी साहित्य को समृद्ध किया है वहां राजस्थानो को स्थिति को कहीं-कुछ न्यून भी किया है। रासो, पाख्यान, वेलि, संतसाहित्य मध्यकाल को मोटो धरोहर हैं जिसने. भारतीय साहित्य को काफी समृद्ध बनाया है। हिन्दी साहित्य में भी इस साहित्य को प्रमुखता से चर्चा है । इस तरह मध्यकाल में से गुजरतो राजस्थानो आधुनिक काल में प्रवेश करती है।
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