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Yogasar
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श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमाला
ॐ
श्रीयोगीन्दुदेवका
योगसार
अपभ्रंश मूल, संस्कृत छाया और
पं. जगदीशचन्द्र शास्त्रीकत हिन्दी अनुवाद
संशोधक और संपादक
आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्याय
अर्धमागधी प्रोफेसर, राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर
प्रकाशक
सेठ मणीलाल, रेवाशंकर जगजीवन जौहरी
ऑ० व्यवस्थापक, परमश्रुतप्रभावकमंडल
जौहरी बाजार, बंबई नं० २
धीर संवत् २४६३, विक्रम संवत् १९९३
मूल्य चार आना
प्रास्ताविक निवेदन जोइन्दु या योगीन्दु उच्चश्रेणीके आध्यात्मिक गूढ़वादी हैं । इन्होंने जैन-अध्यात्मवादके ऊपर अपभ्रंश भाषामें दो ग्रंथ लिखे हैं। इनमें परमात्मप्रकाशसे तो जैनसमाज काफी परिचित है। दूसरा ग्रंथ योगसार है। यह मूल और संस्कृतछायासीहत माणिकचन्द जैन- ग्रंथमालामें (ग्रंथ नं० २१) सन् १९२२ में प्रकाशित हुआ था। परन्तु उसका मूल पाठ और छाया जितनी चाहिये उतनी शुद्ध नहीं छपी थी। सन् १८९९ ई० में स्व० मुन्शी नाथूराम लमेचूने इस ग्रंथके दोहोंका हिन्दीपद्यानुवाद करके हिन्दी अनुवादसहित प्रकाशित किया था, और उसे स्वानुभवदर्पणके नामसे प्रसिद्ध किया था। तत्पश्चात् सन् १९०६ ई० में यही स्वानुभवदर्पण माणिकलाल घेहेलामाईके गुजराती अनुवाद और पं० फतेहचन्द कपूरचन्द लालनके विवेचनसहित बम्बईसे प्रकाशित हुआ था । अब यह योगसारका मूल अधोलिखित चार हस्तलिखित प्रतियोंके आधारसे तैय्यार किया गया है- अ—यह प्रति जैनसिद्धांतभवन आराकी है, जो पं० के० भुजबली शास्त्रीके अनुग्रहसे प्राप्त हुई। यह देवनागरी प्रति दिल्ली भंडारकी प्रतिके आधारसे संवत् १९९२ में लिखी गई है । इसमें मूल और गुजराती शब्दार्थ ( टब्बा ) भी दिये हैं । प–पाटन भंडारकी यह हस्तलिखित प्रति श्रीपुण्यविजयजी महाराजके अनुग्रहसे प्राप्त हुई। 'अ' प्रतिकी अपेक्षा यह प्रति अच्छी है। इसमें भी गुजराती टब्बा है। यह प्रति संवत् १७१२ की लिखी हुई है। व-यह प्रति पं० नाथूरामजी प्रेमीके अनुग्रहसे प्राप्त हुई। यह देवनागरी प्रति बहुत प्राचीन है, इसलिये इसके पृष्ठ त्रुटित हो गये हैं। चारों हस्तलिखितं प्रतियोंमें यह प्रति प्राचीन, स्वतंत्र और शुद्ध है। झ-यह प्रति पं० पन्नालालजी सोनीके अनुग्रहसे श्रीऐलक पन्नालाल दि० जैन- सरस्वती भवन झालरापाटनसे प्राप्त हुई है । यह आधुनिक है, और इसमें लेखकके प्रमादसे बहुत-से दोष रह गये हैं। इन चारों प्रतियोंमें ' अ.', 'प', और 'झ' प्रतिमें बहुत कुछ साम्य है, और 'व' प्रति स्वतंत्र जान पड़ती है । प्रस्तुत संस्करणमें मूल के साथ दी हुई संस्कृतछायामें संधि नहीं की गई छाया शब्दशः ही रक्खी गई है । इससे पाठकोंको लाभ होगा। इसका हिन्दी अनुवाद हमारे मित्र पं० जगदीशचन्द्रजी शास्त्री एम० ए० ने किया है। उक्त प्रतियोंके प्रेषक सज्जनोंका तथा अनुवादक महाशयका हम बहुत आभार मानते हैं। राजाराम कालेज, कोल्हापुर. आपाढ़ शु०८ आ. ने. उपाध्ये सं० १९९३. . -
ॐ
श्रीमद्-योगीन्दुदेव-विरचितः
योगसारः
हिन्दीभाषानुवादसहितः।
णिम्मल-झाण-परिठ्ठयो कम्म-कलंक डहेवि ।
अप्पा लद्धड जेण पर ते परमप्प णवेवि ॥१॥
[ निर्मलध्यानप्रतिष्ठिताः कर्मकलईदग्ध्वा ।
आत्मा लब्धः येन परः तान् परमात्मनः नत्वा ।।
पाठान्तर-१) अपझ-°परहिया.
अर्थ-जो निर्मल ध्यानमें स्थित हैं, और जिन्होंने कर्म-मलको भस्म कर परमात्म-
पदको प्राप्त कर लिया है, उन परमात्माओंको नमस्कार करके-॥ १ ॥
घाइ-चउहँ किउ विलउ गंत-चउर्छ पदिङ ।
तह जिणइंदहँ पय णविवि अक्खमि कन्, सु-इं? ॥२॥
[(येन) घातिचतुष्कस्य कृतः विलयः अनन्तचतुष्कं प्रदर्शितम् ।
तस्य जिनेन्द्रस्य पादौ नत्वा आख्यामि काव्यं मुदिष्टम् ॥ ]
पाठान्तर-१) अपझ-चउक्क. २) प-ताह, व-तहि. ३) प-सुट्ट.
अर्थ-जिसने चार घातिया कर्मोंका नाश कर अनन्तचतुष्टयको प्रकट किया है,
उस जिनेन्द्रके चरणोंको नमस्कार कर, यहाँ अभीष्ट काव्यको कहता हूँ ॥२॥
संसारह भय-भीयहँ मोक्खहँ लालसयाहूँ।
अप्पा-संबोहण-क्रयई कय दोहा एकमणाहूँ ॥३॥
[संसारस्य भयभीतानां मोक्षस्य लालसकानाम् ।
आत्मसंवोधनकृते कृताः दोहा एकमनसाम् ।।]
पाठान्तर-१) अपय-भयभीतह, ब-भयभीयाहं, २) झ-लालसियाहं ३) अझ-अप्पा कयह
संबोहण, पव-संबोहणकयहं. ४) वर-दोहा एकमणाह. ५) अप-एकमणाई.
अर्थ-जो संसारसे भयभीत हैं और मोक्षके लिये जिनकी लालसा है, उनके संबोधनके
लिये एकाग्र चित्तसे मैंने इन दोहोंकी रचना की है ॥ ३ ॥
काल अणाई अणाइ जिउ भव-सायर जि अणं ।
मिच्छा-दसण-मोहियउँ णवि सुह दुक्ख जि पत्तु ॥ ४ ॥
२ - रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला [ दो० ५-८ अर्थ- [ काल: अनादिः अनादिः जीवः भवसागरः एव अनन्तः । मिथ्यादर्शनमोहितः नैव सुखं दुःखमेव प्राप्तवान् ।।] पाठान्तर-१) अपझ-सायर. २) अप-मणतो. ३) अ-मोहि, पझ-मोहिउ. -काल अनादि है, जीव अनादि है, और भवसागर अनन्त है। उसमें मिध्यादर्शनसे मोहित जीवने दुःख ही दुःख पाया है, सुख नहीं पाया ॥ ४ ॥ जइ वीहउँ चउ-गइ-गमणां तो पर-भाव चएहि । अप्पा झायहि णिम्मलउ जिम सिव-सुक्ख लहेहि ॥५॥ [यदि भीतः चतुर्गतिगमनात् ततः परभावं त्यज । आत्मानं ध्याय निर्मलं यथा शिवमुखं लभसे ।।] पाठान्तर--१) व-वीहइ. २) झ-गमणु. ३) अझ-तो...चएवि, प-तो...चएदि, व-तो... चवेहि. ४) अवझ-लहेवि. अर्थ-हे जीव ! यदि तू चतुर्गतिके भ्रमणसे भयभीत है, तो परभावका त्याग कर, और निर्मल आत्माका ध्यान कर, जिससे तू मोक्ष-सुखको प्राप्त कर सके ॥ ५॥ ति-पयारो अच्पा मुणहि परु अंतरु बहिरप्पु । पर झायहि अंतर-सहिउ बाहिरु चयहि णिभंतु ॥६॥ [त्रिप्रकार आत्मा (इति) जानीहि परः आन्तरः वहिरात्मा । परं ध्याय आन्तरसहितः बाह्यं त्यज निर्धान्तम् ।।] अर्थ-परमात्मा, अन्तरात्मा और बहिरात्मा इस तरह आत्माके तीन प्रकार समझने चाहिये । हे जीव ! अन्तरात्मासहित होकर परमात्माका ध्यान कर, और भ्रान्ति रहित होकर वहिरात्माको त्याग ॥ ६॥ मिच्छा-दसण-मोहियउँ पर अप्पा ण मुणेई । सो वहिरप्पा जिण-भणि पुण संसार भमेह ॥७॥ [मिथ्यादर्शनमोहितः परं आत्मा न मनुते । स वहिरात्मा जिनभणितः पुनः संसारं भ्रमति ॥] पाठान्तर-१) अ-मोहियओ, झ-मोहिओ. २) अपव-परु (रो) अप्यणो (णु) मुणइ. अर्थ-जो मिथ्यादर्शनसे मोहित जीव परमात्माको नहीं समझता, उसे जिनभगवान्ने बहिरात्मा कहा है। वह जीव पुनः पुनः संसारमें परिभ्रमण करता है ॥ ७॥ जो परियाणइ अप्पु परु जो परभाव चएइ । सो पंडिउ अप्पा मुणहुँ सो संसारु मुएइ ॥८॥ [ यः परिजानाति आत्मानं परं यः परभावं त्यजति । स पण्डितः आत्मा (इति) जानीहि स संसारं मुञ्चति ॥] पाठान्तर-अपझ-अप्प. २) अप-पिंडउ अप्पा मुणह; झ-मुणिहिं.
दो० ९-१३ ]
योगसारः
३
.
अर्थ-जो परमात्माको समझता है और जो परभावका त्याग करता है, उसे पंडित-आत्मा
( अन्तरात्मा) समझो। वह जीव संसारको छोड़ देता है ॥ ८॥
हिम्मलु णिकल सुद्ध जिणु विण्डे बुद्ध सिव संतु।
सो परमप्पा जिण-भणिउ एहउँ जाणि णिभंतु ॥९॥
[ निर्मल निष्कलः शुद्धः जिनः विष्णुः वुद्धः शिवः शान्तः।
स परमात्मा जिनभणितः एतत् जानीहि निर्धान्तम् ॥]
पाठान्तर-१) व-किण्हु. २) अ-एहो, झ-एहवउ.
अर्थ-जो निर्मल, निष्कल, शुद्ध, जिन, विष्णु, बुद्ध, शिव और शान्त है, उसे जिन-
भगवान्ने परमात्मा कहा है-इसमें कुछ भी भ्रान्ति न करनी चाहिये ॥९॥
देहादिउँ जे परि कहियां ते अप्पाणु मुणेइ ।
सो बहिरप्पा जिणभणिउ पुणु संसारु भमेइ ॥१०॥
[ देहादयः ये परे कथिताः तान् आत्मानं जानाति ।
स वहिरात्मा जिनभणितः पुनः संसारं भ्रमति ॥]
पाठान्तर--१) अपझ-देहादिक जो. २) व-पर कहिय. ३) प-णं.
अर्थ-देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, उन पदार्थोको ही जो आत्मा
समझता है, उसे जिनभगवान्ने बहिरात्मा कहा है। वह जीव संसारमें फिर फिरसे परिभ्रमण
करता है ॥१०॥
देहादिउ जे परि कहिया ते अप्पाणु ण होहिं।
इउ जाणेवि' जीव तुहुँ अप्पा अप्प मुणेहि ॥ ११ ॥
[ देहादयः ये परे कथिताः ते आत्मा न भवन्ति ।
इति ज्ञात्वा जीव त्वं आत्मा आत्मानं जानीहि ।।]
पाठान्तर-१)अप-अप्पणा. २) पझ-जाणिविण (पिण).
अर्थ-देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, वे पदार्थ आत्मा नहीं होते—यह
जानकर, हे जीव ! तू आत्माको आत्मा पहिचान ॥ ११ ॥
अप्पा अप्पउ जइ मुणहि तो णिव्वाणु लहेहि ।
पर अप्पा जई मुणहिं तुहुँ नो संसार भमेहि ॥१२॥
[ आत्मन् आत्मानं यदि जानासि ततः निर्वाण लभसे ।
-परं आत्मानं यदि जानासि त्वं ततः संसारं भ्रमसि ।।]
पाठान्तर-१) व-तौ (तउ १).२) अ-जो,झ-जउ. ३) पझ-मुणिहि. ४) अप-संसारुमुवेहि.
अर्थ-हे जीव ! यदि तू आत्माको आत्मा समझेगा, तो निर्वाण प्राप्त करेगा । तथा
यदि तू पर पदार्थीको आत्मा मानेगा, तो तू संसारमें परिभ्रमण करेगा ॥ १२ ॥
इच्छा-रहियां तव करहि अप्पा अप्पु मुणेहि ।
तो लहु पावहि परम-गई फुड संसारु ण एहिं ॥१३॥
- रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला ४ [ दो० १४-१७ [इच्छारहितः तपः करोपि आत्मन् आत्मानं जानासि । ततः लघु प्रामोषि परमगतिं स्फुटं संसारं न आयासि ।।] पाठान्तर:-१) अ-रहिओ, पझ-रहिउ.२) अ-पहु पावइ,पझ-पावइ. ३)व-लहु संसार मुएहि. अर्थ-हे आत्मन् ! यदि तू इच्छा रहित होकर तप करें और आत्माको समझे, तो तु शीघ्र ही परमगतिको पा जाय, और तू निश्चयसे फिर संसारमें न आवे ॥ १३ ॥ परिणाम' बंधु जि कहिउ मोक्ख वि तह जि वियाणि । इउ जाणेविणे जीवे तुहुँ तहभाव ई परियाणि ॥ १४ ॥ [ परिणामेन वन्धः एव कथितः मोक्षः अपि तथा एव विजानीहि । इति ज्ञात्वा जीव त्वं तथाभावान् खलु परिजानीहि ।।] पाठान्तर-१)पव-परिणामि, अ-परिणाम बंधु ज कहियो. २) अपझ-जि. ३) अपझ-वियाण. ४) झ-जाणेविण. ५) पझ-जीउ. ६) अप-तहि भावह, व-तहु भाव हु, झ-तह भाव हि. अर्थ-परिणामसे ही जीवको बंध कहा है और परिणामसे ही मोक्ष कहा है-यह समझकर, हे जीव ! तू निश्चयसे उन भावोंको जान ॥ १४ ॥ अह पुणु अप्पा णविं मुणहि पुण्णु जि करहि असेस । तो वि पावहि सिद्धि-सह पुणे संसारु भमेर्स ॥ १५ ॥ [अथ पुनरात्मानं नैव जानासि पुण्यं एच करोषि अशेपम् । ततः अपि न पामोपि सिद्धिमुखं पुनः संसारं भ्रमसि ॥] पाठान्तर-१) झ-अप्पाणु वि. २) चंझ-असेसु. ३) अपवझ-वि णु. ४) पावहु. ५) व-फुडु. ६) वझ-भमेसु. अर्थ- हे जीव ! यदि तू आत्माको नहीं जानेगा और सब पुण्य ही पुण्य करता रहेगा, तो भी तू सिद्धिसुखको नहीं पा सकता, किन्तु पुनः पुनः संसारमें ही भ्रमण करेगा ॥१५॥ अप्पा-दसणु एके पर अण्णु ण किं पि वियाणि । मोक्खह कारण जोइयां णिच्छइँ एहउ जाणि ॥ १६ ॥ [ आत्मदर्शनं एक परं अन्यत् न किमपि विजानीहि । मोक्षस्य कारणं योगिन् निश्चयेन एतत् जानीहि ॥] पाठान्तर-१) व-इक्क. २) अझ-जोईया. ३) अपझ-णिच्छय एहो जाणि. अर्थ:-हे योगिन् । एक परम आत्मदर्शन ही मोक्षका कारण है, अन्य कुछ भी मोक्षका कारण नहीं, यह तू निश्चय समझ ॥ १६ ॥ मग्गण-गुण-ठाणइ कहिया विवहारेण वि दिहि । णिच्छय-ण. अप्पा मुणहि जिम पावहु परमेहि ॥१७॥ [मार्गणगुणस्थानानि कथितानि व्यवहारेण अपि दृष्टिः। निश्चयनयेन आत्मानं जानीहि यथा प्राप्नोषि परमेष्ठिनम् ॥] पाठान्तर-१) च-ववहारेण हु दिह. २) प-मुणिहि, व-मूणहु. ३ व-परमेह.
दो० १८-२२] योगसारः - ५ अर्थ-मार्गणा और गुणस्थानका व्यवहारसे ही उपदेश किया गया है। निश्चयनयसे तो तू आत्माको ही (सब कुछ ) समझ; जिससे तू परमेष्ठीपदको प्राप्त कर सके ॥ १७ ॥ गिहि-वावार-परिट्टियो हेयाहेउ मुणंति । अणुविणु शायहिँ देउ जिणु लहु णिबाणु लहति ॥ १८ ॥ [गृहिव्यापारमतिष्ठिताः हेयाहेयं जानन्ति । अनुदिनं ध्यायन्ति देवं जिनं लघु निर्वाणं लभन्ते ॥] पाठान्तर-१) अपक्ष-परष्टिया. अर्थ-जो गृहस्थीके धंधे में रहते हुए भी हेयाहेयको समझते हैं और जिनभगवान्का निरन्तर ध्यान करते हैं, वे शीघ्र ही निर्वाणको पाते हैं ॥ १८ ॥ जिणु सुमिरहुं जिणु चिंतवहु जिणु झायहु सुमणेण । सोझायंतहँ परम-पउ लगभइ एक-खणेण ॥ १९ ॥ [जिनं स्मरत जिनं चिन्तयत जिनं ध्यायत सुमनसा । तं ध्यायता परमपदं लभ्यते एकक्षणेन ॥] पाठान्तर-१) व-समरहु. २) अपझ-जिण. ३) व-जे. अर्थ-शुद्ध मनसे जिनका स्मरण करो, जिनका चिन्तवन करो, और जिनका ध्यान करो; उनका ध्यान करनेसे एक क्षणभरमें परमपद प्राप्त हो जाता है ॥ १९ ॥ सुद्धप्पा अरु जिणवरहँ भेउँ म किंपि वियाणि । मोक्खहँ कारणे जोइया णिच्छइँ एउ विजाणि ॥ २० ॥ [शुदात्मनां च जिनवराणां भेदं या किमपि विजानीहि । मोक्षस्य कारणे योगिन् निश्चयेन एतद् विजानीहि ॥] पाठान्तर-१) व-अहु (१). २) अ-भेद. ३) व-कारणि, अझ-कारणिं. अर्थ-हे योगिन् ! मोक्ष प्राप्त करनेमें शुद्धात्मा और जिनभगवान्में कुछ भी भेद न समझो-यह निश्चय मानो ॥ २० ॥ जो जिणु सो अप्पा मुणहु इहु सिद्धतहँ सारु । इउ जाणेविणु जोइयहीं छंडहुँ मायाचार ॥ २१ ॥ [ यः जिनः स आत्मा (इति) जानीत एप सिद्धान्तस्य सारः। इति ज्ञात्वा योगिनः त्यजत मायाचारम् ॥] पाठान्तर-१) पझ-सिद्धतहु. २) अपझ-जोइहु. ३) ब-ठंडउ. अर्थ-जो जिनभगवान् है वही आत्मा है-यही सिद्धांतका सार समझो। इसे समझकर, हे योगीजनो ! मायाचारको छोड़ो ॥ २१॥ जो परमप्पो सो जि हउँ जो हउँ सो परमप्पु । इउ जाणेविणु जोइया अण्णु म करहु वियप्पु ॥ २२ ॥ ,
रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला
[ दो० २३-२६
ur
[ यः परमात्मा स एव अहं यः अहं स परमात्मा ।
इति ज्ञात्वा योगिन् अन्यत् मा कुरुत विकल्पम् ।।]
पाठान्तर-१) ब-परअप्पा. २) अ-हुं. ३) अपझ-जोईया.
अर्थ-जो परमात्मा है वही मैं हूँ, तथा जो मैं हूँ वही परमात्मा है-यह समझकर,
हे योगिन् ! अन्य कुछ भी विकल्प मत करो ॥ २२ ॥
सुद्ध-पएसहँ पूरियउ लोयायास-पमाणु ।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहुँ पाव? लहु णिव्वाणुं ॥ २३ ॥
[ शुद्धपदेशानां पूरितः लोकाकाशप्रमाणः ।
स आत्मा (इति) अनुदिनं जानीत प्राप्नुत लघु निर्वाणम् ॥]
पाठान्तर-१) अ-पूरीयो. २) व-सो अप्पा मुणि जीव तुहुं. ३) व-पावहि.
अर्थ-जो शुद्ध प्रदेशोंसे पूर्ण लोकाकाश-प्रमाण है, उसे सदा आत्मा समझो, और
शीघ्र ही निर्वाण प्राप्त करो ॥ २३ ॥
णिच्छइँ' लोय-पमाणु मुणि ववहार सुसरीरु ।
एहउँ अप्प-सहाउ मुणि लहु पावहिँ भव-तीरु ॥ २४ ॥
[निश्चयेन लोकप्रमाणः (इति) जानीहि व्यवहारेण स्वशरीरः।
एनं आत्मस्वभावं जानीहि लघु पामोपि भवतीरम् ॥]
पाठान्तर-१) व-णिच्छय. २) अप-लोइपमाणु. ३) अ-एहो. ४) अपझ-पावहु.
अर्थ-जो आत्मस्वभावको निश्चयनयसे लोक-प्रमाण, और व्यवहारनयसे स्वशरीर-
प्रमाण समझता है, वह शीघ्र ही संसारसे पार हो जाता है ॥ २४ ॥
चउरासी-लक्खहिँ फिरि कालु अणाइ अणंतु ।
पर सम्मत्तु ण लटु जिय एहउँ जाणि णिभंतु ॥ २५ ॥
[ चतुरशीतिलक्षेषु भ्रामितः कालं अनादि अनन्तम् ।
परं सम्यक्त्वं न लब्धं जीव एतत् जानीहि निर्धान्तम् ॥]
पाठान्तर-१) अ-चोरासी. २) अपझ-लक्खह. ३) अ-फिरियो. ४) अ-एहो.
अर्थ-यह जीव अनादि अनन्तकालतक चौरासी लाख योनियोंमें भटका है, परन्तु
इसने सम्यक्त्व नहीं पाया हे जीव ! यह निस्सन्देह समझ ॥ २५ ॥
सुद्ध सचेयणु बुद्ध जिणु केवल-णाण-सहाउ ।
सो अप्पा अणुदिणु भुणहु जइ चाहहुँ सिव-लाहु ॥ २६ ॥
[ शुद्धः सचेतनः वुद्धः जिनः केवलज्ञानस्वभावः ।
स आत्मा (इति) अनुदिनं जानीत यदि इच्छत शिवलाभम् ॥]
पाठान्तर-१) अ-निसदिण. २) ब-चाहहि, अ-जो चाहहु.
अर्थ-यदि मोक्ष पानेकी इच्छा करते हो, तो निरन्तर ही आत्माको शुद्ध, सचेतन,
बुद्ध, जिन, और केवलज्ञान-स्वभावमय समझो ॥ २६ ॥
दो० २७-३१]
- योगसारः
-
जाम ण भावहिं जीव तुहुँ णिम्मल अप्प-सहाउ ।
ताम ण लगभइ सिव-गमणु जहिँ भावई तहि जाउ ।। २७ ।।
[ यावत् न भावयसि जीव त्वं निर्मलं आत्मस्वभावम् ।
तावत् न लभ्यते शिवगमनं यत्र भाव्यते तत्र यात ॥]
पाठान्तर-१) अपझ-जाव. २) अपझ-भावहु. ३) अझ-भावहु, प-भावहि.
अर्थ-हे जीव ! जबतक तू निर्मल आत्मस्वभावकी भावना नहीं करता, तबतक
मोक्ष नहीं पा सकता। अब जहाँ तेरी इच्छा हो वहाँ जा ॥ २७ ॥
जो तइलोयह झउ जिणु सो अप्पा णिरु वुत्तु ।
णिच्छय-णइ एमइ भणिउं एहउँ जाणि णिभंतु ।। २८ ।।
[यः त्रिलोकस्य ध्येयः जिनः स आत्मा निश्चयेन उक्तः।
निश्चयनयेन एवं भणितः एतत् जानीहि निर्धान्तम् ॥]
पाठान्तर-१) व-अप्पाणु वृत्तु. २) अ-णिच्छइणइ एमई भणियो, प-णिच्छइणइ एमइ
भणिउ, झ-णिच्छइणए इम मणिउ. ३) अ-एहो जाणि, झ-एहो जाण.
अर्थ-जो तीनों लोकोंके ध्येय जिनभगवान् हैं, निश्चयसे उन्हें ही आत्मा कहा है-
यह कथन निश्चयनयसे है । इसमें भ्रांति न करनी चाहिये ॥ २८॥
वयन्तव-संजम-मूल-गुण मूढहँ मोक्ख ण वुत्तु ।
जाव ण जाणई इक पर सुद्धउ भाउ पवितु ॥ २९ ॥
[व्रततपासयममूलगुणाः मूढानां मोक्षः (इति) न उक्तः।
यावत् न ज्ञायते एकः परः शुद्धः भावः पवित्रः॥]
पाठान्तर-१) अझ-संयय. २) झ-जाणे.
अर्थ-जबतक एक परम शुद्ध पवित्र भावका ज्ञान नहीं होता, तबतक मूढ़ लोगोंके
जो व्रत, तप, संयम और मूलगुण हैं, उन्हें मोक्ष (का कारणनहीं कहा जाता ॥ २९ ॥
जई णिम्मल अप्पा मुणई वय-संजम संजुत्तु ।
तो लहु पावई सिद्धि-सुह इउ जिणणाहहँ उत्तु ॥ ३० ।।
[ यदि निर्मलं आत्मानं जानाति व्रतसंयमसंयुक्तः ।
तहि लघु पामोति सिद्धिसुख इति जिननाथस्य उक्तम् ॥]
पाठान्तर-१) झ-जो. २) अपझ-मुणई, ३) अ-तौ लहु पावै.
अर्थ-जिनेन्द्रदेवका कथन है कि यदि व्रत और संयमसे युक्त होकर जीव निर्मल
आत्माको पहिचानता है, तो वह शीघ्र ही सिद्धि-सुखको पाता है ॥ ३० ॥
वउ तव संज, सील जिय ए सवइँ अकयत्थु ।
जांव ण जाणइ इक पर सुद्धउ भाउ पवितु ॥ ३१ ॥
८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला [ दो० ३२-३५ . [व्रतं तपः संयमः शीलं जीव एतानि सर्वाणि अकृतार्थानि । यावत्.न ज्ञायते एकः परः शुद्धः भावः पवित्रः ॥ पाठान्तर-१) अप-वयतवसंजमु सील, य-वउ तवसंजमसीलु, झ-बउ तउ संजम सील. अ-ए सन्च, व-एउ सन्बुइ. ३) व जहि लभइ सिवपंथु. अर्थ-जबतक जीवको एक परम शुद्ध पवित्र भावका ज्ञान नहीं होता, तबतक व्रत, तप, संयम और शील ये सब कुछ भी कार्यकारी नहीं होते ॥ ३१ ॥ पुणेि पावइ सग्ग जिउ पावएँ णरय-णिवासु । वे छंडिवि अप्पा मुणइ तो लगभइ प्लिववातु ।। ३२ ।। [पुण्येन प्राप्नोति स्वर्ग जीवः पापेन नरकनिवासम् ।। द्वे त्यक्त्वा आत्मानं जानाति ततः लभते शिववासम् ॥ ] पाठान्तर-१) अप-पुण्णई, झ-पुण्णइ. २) अप-पावये, व-पावै, झ-पावय. ३) झ-छंडवि. अर्थ-पुण्यसे जीव स्वर्ग पाता है, और पापसे नरकमें जाता है । जो इन दोनोंको (पुण्य और पापको ) छोड़कर आत्माको जानता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ३२ ॥ घउ तउ संजनु सील जियो इउं सव्वई ववहारु । मोक्खहँ कारणु एकु झुणि जो तइलोयह सारु ॥ ३३ ।। [व्रतं तपः संयमः शीलं जीव इति सर्वाणि व्यवहारः। मोक्षस्य कारणं एकं जानीहि यः त्रिलोकस्य सारः॥ पाठान्तर-१) अव-जिय. २) झ-इय. ३) अपझ-तहलोयहु. अर्थ-व्रत, तप, संयम और शील ये सब व्यवहारसे ही माने जाते हैं । मोक्षका कारण तो एक ही समझना चाहिये, और वही तीनों लोकोंका सार है ॥ ३३ ॥ अप्पा अप्पइँ जो मुणइ जो परभाउ चएइ । सो पावइ सिवपुरि-गमणु जिणवरु एम भणेइ ॥ ३४ ॥ [आत्मानं आत्मना यः जानाति यः परभावं त्यजति । स प्राप्नोति शिवपुरीगमनं जिनवरः एवं भणति ॥] पाठान्तर-१) च-अप्थे. २) वझ-परभाव. ३) अपझ-एउ. अर्थ-जो आत्माको आत्मभावसे जानता है और जो परभावको छोड़ देता है, वह शिवपुरीको जाता है-ऐसा जिनवरने कहा है ॥ ३४ ॥ छह दव्वइँ जे जिण-कहिया णव पयत्थ जे तत्त । विवहारेण य उत्तिया ते जाणियहि पयत्त ॥ ३५ ॥ [ षड् द्रव्याणि ये जिनकथिताः नव. पदार्थाः यानि तत्त्वानि ॥ व्यवहारेण च उक्तानि तानि जानीहि प्रयत: (सन्)।] पाठान्तर-१) अ-व्वा पझ-दव्वह. २) व-ववहारे जिणउत्तिया, ३) अ-जाणीयहि एयत्य, प-जाणीयहि पयत्य,.झ-पत्थु. .
दो० ३६-४०] योगसारंः ९ अर्थ-जिनभगवान्ने जो छह द्रव्य, नौ पदार्थ, और (सात) तत्व कहे हैं, वे व्यवहार- नयसे कहे हैं, उनका प्रयत्नशील होकर ज्ञान प्राप्त करो ॥ ३५ ॥ सव्व अचेयण जाणि जिय एक सचेयणु सारु । जो जाणेविणु परम-मुणि लहु पावई भवपारु ॥ ३६ ॥ [सर्व अचेतनं जानीहि जीव एकः सचेतनः सारः । यं ज्ञात्वा परममुनिः लघु प्राप्नोति भवपारम् ॥] पाठान्तर-१) झ-अचेयणि. २)ब-पावहि. अर्थ-जितने भी पदार्थ हैं वे सब अचेतन हैं; चेतन तो केवल एक जीव ही है, और वही सारभूत है। उसको जानकर परममुनि शीघ्र ही संसारसे पार होता है ॥ ३६ ॥ जइ णिम्मलु अप्पा मुणहि छंडिवि सह ववहारु । जिण-सामिउ एमई भणइ लहु पावई भवपारु ॥ ३७॥ [ यदि निर्मलं आत्मानं जानासि त्यक्त्वा सर्व व्यवहारम् । जिनस्वामी एवं भणति लघु प्राप्यते भवपारः ॥] पाठान्तर-१) अ-एवई, प-एवइ, श-सामीऊ एव. २) अपझ-पावहु, अर्थ-सर्व व्यवहारको त्याग कर यदि तू निर्मल आत्माको जानेगा, तो तू संसारसे शीघ्र ही पार होगा-ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं ।। ३७ ॥ जीवाजीवहँ भेउ जो जाणइ तिं जाणियउ। मोक्खहँ कारण एउँ भणइ जोइ जोइहिँ भणिउँ ॥ ३८॥ . [ जीवाजीवयोः भेदं य: जानाति तेन बातम् । मोक्षस्य कारणं एतत् भण्यते योगिन् योगिभिः भणितम् ॥ ] पाठान्तर-१) अप-दोहरा II, झ-दोहा सोरठा. २) अप-जाणे ते, झ-जाणइ ते. ३) च- कारणु एह. अर्थ-जो जीवाजीवके भेदको जानता है, वही (सब कुछ) जानता है तथा हे योगिन् ! इसीको योगीजनोंने मोक्षका कारण कहा है ॥ ३८ ॥ केवल-णाण-सहा सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ। जइ चाहहि सिव-लाहु भणइ जोइ जोइहि भणिउँ॥ ३९ ॥ [ केवलज्ञानस्वभावः स आत्मा (इति) जानीहि जीव त्वम् । यदि इच्छसि शिवलाभ भण्यते योगिन् योगिभिः भणितम् ॥] पाठान्तर-१) व-केवलणाणु सहाउ. अर्थ-हे जीव ! यदि तू मोक्ष पानेकी इच्छा करता है, तो तू केवलज्ञान-स्वभाव आत्माको पहिचान, ऐसा योगियोंने कहा है ॥ ३९ ॥ को(?) सुसमाहि करउ को अंचउ छोपु-अछोपु करिवि को वंचउ । हल सहि कलहुँ केण समाण जहिँ कहिँ जोवर्ड तहिँ अप्पाणउ॥४०॥ २ १० रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला - [ दो० ४०-४४ [का (अपि) सुसमाधि करोतु का अर्चयतु स्पर्शास्पर्श कृत्वा कः वञ्चयतु । मैत्री सह कलहं केन समानयतु यत्र कुत्र पश्यतु तत्र आत्मा ॥] पाठान्तर-१) झ-चौपइ ।. २) अपवझ-का सुसमाहि. ३) अपझ-कलहि. ४)व-ससाणउ. ५) पवझ-जहिं जहिं. ६) अप-जोवहु, अर्थ-कौन तो समाधि करे, कौन अर्चन-पूजन करे, कौन स्पर्शास्पर्श करके वंचना करे, कौन किसके साथ मैत्री करे, और कौन किसके साथ कलह करे-जहाँ कहीं देखो वहाँ आत्मा ही आत्मा दृष्टिगोचर होती है ।। ४० ॥ तामै कुतित्थई परिभमह धुत्तिम ताम करेइ । . गुरुहु पसाएँ जाम णवि अप्पा-देउ मुणेई ॥४१॥ [ तावत् कुतीर्थानि परिभ्रमति धूर्तत्वं तावत् करोति । गुरोः प्रसादेन यावत् नैव आत्मदेवं जानाति ॥] पाठान्तर-१) झ-दोहा ।. २) अपझ-तामु (अन्यत्र ताम). ३) घ-पसायहि. ४) अपझ- देहहं (देहहिं १) देउ मुणेइ. अर्थ-जबतक जीव गुरु-प्रसादसे आत्मदेवको नहीं जानता, तभीतक वह कुतीर्थो में भ्रमण करता है, और तभीतक वह धूर्तता करता ह ॥ ११ ॥ तित्थहिँ देवलि देउ णवि इम सुइकेवलि वुत्तु । देहा-देवलि देउ जिणु एहउ जाणि णिरुतु ॥ ४२ ॥ [ तीर्थेषु देवालये देवः नैव एवं श्रुतकेवल्युक्तम् । देहदेवालये देवः जिनः एतत् जानीहि निश्चितम् ।।] १) अपव-तित्यहँ. २) च-देउ जि णवि. ३) व-इउ सुइकेवली. अर्थ-श्रुतकेवलीने कहा है कि तीर्थोंमें देवालयोंमें देव नहीं हैं, जिनदेव तो देह-देवालयमें विराजमान हैं-इसे निश्चित समझो ॥ ४२ ॥ देहा-देवलि देउ जिणु जणु देवलिहिँ णिएई। हासउ महु पडिहाइ इहुँ सिद्ध भिक्खं भमेइ ॥४३॥ [ देहदेवालये देवः जिनः जनः देवालयेषु (तं) पश्यति । हास्यं मम प्रतिभाति इह सिद्धे (सति) भिक्षा भ्रमति ॥] पाठान्तर-१) अ-जिणि देवालहि गएइ, प-जिाणि देवलिहि गएइ, झ-जिणदेवलिहि णएई. २) अ-परिहाइ हु, पझ-परिहोइ इहु. ३) अ-भक्ख, व-सिद्धा-भिक्ख, झ-सिद्धाभक्ख. अर्थ-जिनदेव देह-देवालयमें विराजमान हैं। परन्तु जीव (ईंट पत्थरोंके) देवालयोंमें उनके दर्शन करता है-यह मुझे कितना हास्यास्पद मालूम होता है । यह बात ऐसी ही है, जैसे कोई मनुष्य सिद्ध हो जानेपर भिक्षाके लिये भ्रमण करे ।। ४३ ॥ मूढा देवलि देउ णवि णवि सिलि लिप्पइ चित्ति । देहा-देवलि देउ जिणु सो बुज्झहि समचित्ति ॥४४॥ पाठान्तर दो०४५-४८] - योगसारः ११ [ मूढ देवालये देवः नैव नैव शिलायो लेप्ये चित्रे । देहदेवालये देवः जिनः तं युध्यस्व समचित्ते ।।] पाठान्तर-1) अपय-सिल. २) अपझ-I (उ)च्चा. अर्थ- मूद ! देव किसी देवालयमें विराजमान नहीं है, इसी तरह किसी पत्थर, लेर अथवा चित्रमें भी देव विराजमान नहीं । जिनदेव तो देह-देवालयमें रहते हैं-इस वातको तू समचित्तसे समक्ष || ४४ ॥ तित्वह देउलि देड जिणु सन्चु वि' कोइ भणेइ । देहा-देउलि जो मुणइ सो बुद्ध को वि हवेह ॥ ४५ ॥ [ नीर्थे देवकुले देवः जिनः (इति) सर्वः अपि कश्चित् भणति । देहदेवकुले यः जानाति स बुधः कः अपि भवति ॥] पाठान्तर-१) यसोधर (1). २)प-देवादगल, च-देशादेवलि. अर्य-सब कोई कहते हैं कि मिनदेव तीर्थमें और देवालयमें विद्यमान हैं। परन्तु जो जिनदेवको देह-देवालयमें विराजमान सगाता है देसा पंडित कोई शिरला ही होता है ॥ १५॥ जइ जर-मरण करालियो तो जिय धम्म करेहि। धम्म-रसायण पियहि तुहूँ जिम अजरामर होहि ॥ ४६ ।। [यदि जरामरणरालितः तहि जीव धर्म कुरु । धर्मरसायनं पिव त्वं यथा अजरामरः भवसि ॥ पाठान्तर--1) अप-फटिगी, मगलिभी. २) अ-तो-तउ. अर्थ- जीव ! यदि तू जरा मरणसे भयभीत है तो धर्म कर, धर्मरसायनका पान कर; जिससे तु अजर अमर हो से || ४६ ॥ धम्मु ण पदिय होह धम्मु ण पोत्था-पिच्छियहै। धम्मु ण मढिय-पासि धम्म ण मत्था-लुचियाँ ॥४७॥ [ धर्मः न पठिन भवति धर्मः न पुस्तकपिच्छाभ्याम् । धर्मः न मठमवेशेन धर्मः न मस्तकलुञ्चितेन ॥ पाठान्तर-1) पद्म-पहिया. २)प-पाजिगरप्र-पिछयद. ३) अपय-पुस्तकेय द्वितीयचतुर्थ. पादयोः 'भामुल नासि । अर्थ-पद टेनेसे धर्म नहीं होता; पुस्तक और पिन्छीसे भी धर्म नहीं होता, किसी मठमें रहनेसे भी धर्म नहीं है तथा केशलोंच करनेसे भी धर्म नहीं कहा जाता ॥ ७ ॥ राय-रोस ये परिहरिवि' जो अप्पाणि बसेछ । सो घम्म वि जिण-उत्तियां जो पंचम-गह णेई ।। ४८॥ [रागरोपी द्वी परिहत्य यः आत्मनि वसति । स धर्मः अपि निनोक्तः यः पत्रमगति नयति ॥] पाठान्तर-१) अपन-गरिदद. २) अपन-उत्तियो. ३) अपान-दे.
१२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला
[ दो० ४९-५२
अर्थ-जो राग और द्वेष दोनोंको छोड़कर निज आत्मामें वास करना है, उसे ही
जिनेन्द्रदेवने धर्म कहा है । वह धर्म पंचमगति (मोक्ष) को ले जाता है ॥ १८ ॥
आउ गलइ णवि मणु गलइ णवि आसा हु गलेई ।
मोहु फुरइ णवि अप्प-हिउ इम संसार भमेइ ।। ४९ ॥
[आयुः गलति नैव मनः (मानः १) गलति नैव आशा खलु गलति ।
मोहः स्फुरति नैव आत्महित एवं संसारं भ्रमति ॥]
पाठान्तर-१) व-गलेहु.
अर्थ-आयु गल जाती है, पर मन नहीं गलता, और न आशा ही है गल्ती ।
मोह स्फुरित होता है, परन्तु आत्महितका स्फुरण नहीं होता-इस तरह जीव संसारमें
भ्रमण किया करता है ॥४९॥
जेहउ मणु विसयहँ रमई तिमु जई अप्प मुण्ड् ।
जोइउ भणइ हो जोइय? लहु णिवाणु लहेइ ॥५०॥
[ यथा मनः विषयाणां रमते तथा यदि आत्मानं जानाति ।
योगी भणति भो योगिनः लघु निर्वाण लभ्यते ॥ ]
पाठान्तर-१) अप-रमै. २) झ-तिम जे. ३) अपझ-जोइउ भणइ रे जोइहु.
अर्थ-जिस तरह मन विपयोंमें रमण करता है, उस तरह यदि वह आत्माको जाननेमें
रमण करे, तो हे योगिजनो ! योगी कहते हैं कि जीव शीघ्र ही निर्वाण पा जाय ॥५०॥
जेहउ जनरु णरय-घर तेहउ बुज्झि सरीरु ।
अप्पा भावहिं णिम्मल लहु पावहि भवतीरु ॥ ५१ ॥
[ यथा जर्जरं नरकगृहं तथा बुध्यस्व शरीरम् ।
आत्मानं भावय निर्मलं लघु प्राप्नोषि भवतीरम् ॥]
पाठान्तर-१) अपझ-भावहु.
अर्थ-हे जीव, जैसे नरकवास सैकड़ों छिद्रोंसे जर्जरित ह, उसी तरह शरीरको
भी (मल मूत्र आदिसे) जर्जरित समझ.। अतएव निर्मल आत्माकी भावना कर, तो शीव्र ही
संसारसे पार होगा ॥ ५१ ॥
धंधइ पडियउ सयले जगि णवि अप्पा हु मुणंति ।
तहिँ कारणि ऐ जीव फुड ण हु णिव्वाणु लहंति ॥५२॥
[धान्धे (1) पतिताः सकला जगति नैव आत्मानं खलु जानन्ति ।
तस्मिन् कारणे (तेन कारणेन) एते जीवाः स्फुटं न खलु निर्वाणं लभन्ते ।।]
पाठान्तर-१) व-सयलु. २) प-तिहि कारणिए, अझ-तिहि कारणए.
अर्थ-सब लोग संसारमें अपने अपने धंधेमें फँस हुए हैं, और अपनी आत्माको नहीं
पहिचानते । निश्चयसे इसी कारण ये जीव निर्वाणको नहीं पाते, यह स्पष्ट है ॥ ५२ ॥
दो० ५३-५७ ] योगसारः १३ सत्य पढ़तह ते वि जड अप्पा जे ण मुणति । तहि कारणि ऐ जीव फुडण हु णिव्वाणु लहंति ॥५३॥ . . [ शास्त्रं पठन्तः ते अपि जडाः आत्मानं ये न जानन्ति ॥ तस्मिन् कारणे (तेन कारणेन) एते जीवाः स्फुटं न खलु निर्वाणं लभन्ते।] पाठान्तर-१) अ-तिहिं कारणए, प-तिहि कारणि, झ-तिह कारणए. अर्थ-जो शास्त्रोंको तो पढ़ लेते हैं, परन्तु आत्माको नहीं जानते, वे लोग भी जड़ ही हैं। तथा निश्चयसे इसी कारण ये जीव निर्वाणको नहीं पाते यह स्पष्ट है ॥ ५३ ॥ मणु-इंदिहि वि छोडियई (१) बुहु पुच्छियइ ण कोइ । रायहँ पसरु णिवारियइ सहज उपज्जइ सोइ ॥ ५४ ।। [ मनइन्द्रियेभ्यः अपि मुच्यते बुधः पृच्छयते न कः अपि । रागस्य प्रसरः निवार्यते सहजः उत्पद्यते स अपि ॥] पाठान्तर-१) अपझ-छोइयइ, व-छोहियइ. २) पव-सहजि. अर्थ-यदि पण्डित, मन और इन्द्रियोंसे छुटकारा पा जाय, तो उसे किसीसे कुछ पूछनेकी ज़रूरत नहीं । यदि रागका प्रवाह रुक जाय, तो वह (आत्मभाव) सहज ही उत्पन्न हो जाता है ॥ ५४॥ पुग्गल अण्णु जि अण्णु जिउँ अण्णु वि सहु ववहारु । चयहि वि पुग्गल गहहि जिउ लहु पावहिं भवपारु ॥५५॥ [ पुद्गलः अन्यः एव अन्यः जीवः अन्यः अपि सर्वः व्यवहारः। त्यज अपि पुद्गलं गृहाण जीवं लघु प्राप्नोपि भवपारम् ॥] पाठान्तर-१)अ-अणु जियउ, प-अणु जीउ. २) अपझ-पावहु. अर्थ-पुद्गल भिन्न है और जीव भिन्न है, तथा अन्य सब व्यवहार भिन्न है। अतएव पुद्गलको छोड़ और जीवको ग्रहण कर-इससे तू शीघ्र ही संसारसे पार होगा ॥ ५५ ॥ जे णवि मण्णहिँ' जीव फुड जे णवि जीउ मुणंति । ते जिण-णाहहँ उत्तिया उ संसार मुचंति ॥५६॥ [ये नैव मन्यन्ते जीवं स्फुटं ये नैव जीवं जानन्ति । ते जिननायस्य उक्त्या न तु (नैव?) संसारात् मुच्यन्ते ॥] पाठान्तर-१) अबझ-मणहि. २) य-उणिव्याणु लदंति. ३) अ-मुच्चंति. अर्थ-जो जीवको स्पष्टरूपसे न समझते हैं, और जो उसे न पहिचानते हैं, वे संसारसे कभी छुटकारा नहीं पाते-ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥ ५६ ॥ रयण दीडे दिणयर दहिउ दुध्दु धीवे पाहाणु । सुण्ण रूउँ फलिहड अगिणि णव दिटुंता जाणे ॥ ५७ ॥ [ रत्नं दीपः दिनकर दधि दुग्धं घृतं पापाणः । मुवर्ण रूप्यं स्फटिकं अमिः नव दृष्टान्तान् जानीहि ॥]
१४ रायचन्द्रजैनशालमाला [ दो० ५८-६२ पाठान्तर-१) अपझ-दियउ.२)अपर-घाउ. ३)प-सेगा,झ-सुग्ण, ४)अ-स्व, पझ-रूप. ५) व-जाणि. अर्थ-रत्न, दीप, सूर्य, दही दूधं घी, पाषाणे, सोना, चांदी, स्फटिकमणि, और अग्नि ये (जीवके) नौ दृष्टान्त जानने चाहिये ॥ ५७ ॥ देहादिऊँ जो पर मुणइ जेहउ सुण्णु अयासु। सो लहु पावई (3) वंभु परु केवल करइ पयासु ॥५८॥ [ देहादिकं यः परं जानाति यथा शून्यं आकाशम् । स लघु प्राप्नोति ब्रह्म परं केवलं करोति प्रकाशम् ॥] पाठान्तर-१) अपझ-देहादिक. २) अपवझ-पावहि. अर्थ-जो शून्य आकाशकी तरह देह आदिको पर समझता है, वह शीव्र ही परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है, और वह केवल प्रकाश करता है ॥ ५८ ॥ जेहड सुद्ध अयासु जिय हिर्ड अप्पा वुत्तु । आयासु वि जड जाणि जिय अप्पा चेयणुवंतु ॥ ५९॥ [ यादृक् शुद्धं आकाशं जीव तादृशः आत्मा उक्तः। आकाशं अपि जई जानीहि जीव आत्मानं चैतन्यवन्तम् ।।] पाठान्तर-१) सप-तेहो. अर्थ-हे जीव ! जैसे आकाश शुद्ध है वैसे ही आत्मा भी शुद्ध कही गई है। दोनों में अन्तर केवल इतना ही है कि आकाश जड़ हैं और आत्मा चैतन्यलक्षणसे युक्त है ॥ ५९॥ णासन्गि' अभितरह जे जोवहिँ असरीरु । वाहुडि जम्मि ण संभवहि पिवहिण जणणी-खीरु॥३०॥ [ नासाग्रेण अभ्यन्तरे (१) ये पश्यन्ति अशरीरम् । लज्जाकरे जन्मनि न संभवन्ति पिवन्ति न जननीलीरम् ।।] पाठान्तर-1) अप-णासगि. २) अपझ-नम्न ण संभवइ, ३) व-पियहि. अर्थ-जो नासिकापर दृष्टि रखकर अभ्यंतरमें अशरीरको (आत्माशो) देखते हैं, वे इस लज्जाजनक जन्मको फिरसे धारण नहीं करते, और वे माताने दूधका पान नहीं करते ॥६॥ असरीरु वि सुसरीरु मुणि इहु सरीरु जडु जाणि । मिच्छा-मोहुँ परिच्चयहि मुत्ति णियं वि ण माणि ॥ ६१ ॥ [ अशरीरं अपि मु(सशरीरं जानीहि इदं शरीरं जडं जानीहि । मिथ्यामोहं परित्यज मूर्ति निजां अपि न मन्यस्त्र ॥] पाठान्तर-१) -मिच्छामोहि. २) अपवझ-विगिमाणि. अर्थ-अशरीर (आना)को ही सुन्दर शरीर समझो, और इस शरीरको जड़ मानो मिथ्यामोहका त्याग करो और अपने शरीरको भी अपना मत मानो ॥ ६१॥ अप्पई अप्यु मुणतयह किं हा फल होह । केवल-णाणु वि.परिणवइ सासय सुक्खु लहेइ ।। ६२॥
दो० ६३-६७]
- योगसारः
१५
[ आत्मना आत्मानं जानता किं न इह फलं भवति ।
केवलज्ञानं अपि परिणमति शाश्वतसुखं लभ्यते ॥]
पाठान्तर-१) अपझ-अप्पय.
अर्थ-आत्माको आत्मासे जाननेमें यहाँ कौनसा फल नहीं मिलता ? और तो क्या
इससे केवलज्ञान भी हो जाता है, और जीवको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है ॥ १२ ॥
जे परभाव चएवि मुणि अप्पा अप्प मुणंति ।
केवल-णाण-सरूवं लइ (लहिः) ते संसारु मुचंति ॥६३ ॥
[ये परभावं त्यक्त्वा मुनयः आत्मना आत्मानं जानन्ति ।
केवलज्ञानस्वरूपं लावा (लब्ध्वा ) ते संसार सुश्वन्ति ॥]
पाठान्तर--१)व-सरूवि.
अर्थ-जो मुनि परभावका त्याग कर अपनी आत्मासे अपनी आत्माको पहिचानते हैं,
वे केवलज्ञान प्राप्त कर संसारसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६३ ॥
धण्णा ते भयवंत वुह जे परभाव चयंति ।
लोयालोय-पयासयरु अप्पा विमलं मुणंति ।।६४॥
[धन्याः ते भगवन्तः वुधाः ये परभावं त्यजन्ति ।.
लोकालोकप्रकाशकरं आत्मानं विमलं जानन्ति ॥]
पाठान्तर-१)व-धम्मा. २) व-अप्पा अप्यु.
अर्थ-उन भगवान् पण्डितोंको धन्य हैं, जो परभावका त्याग करते हैं, और जो
लोकालोक-प्रकाशक निर्मल आत्माको जानते हैं ॥ ६४ ॥
सागारु वि णागारु कु वि' जो अप्पाणि वसेइ ।
सो लहु पावइ सिद्धि-सुहे जिणवरु एम भणेई ॥६५॥
[ सागारः अपि अनगारः कः अपि यः आत्मनि वसति ।
स लघु प्राप्नोति सिद्धिसुखं जिनवरः एवं भणति ॥]
पाठान्तर-१) अप-णागार वि. २) प-सिद्धसुहु.
अर्थ-गृहस्थ हो या मुनि हो, जो कोई भी निज आत्मामें वास करता है, वह शीघ्र ही
सिद्धिसुखको पाता है, ऐसा जिनभगवान्ने कहा है ॥६५॥
विरला जाणहि तत्तु वुहे विरला णिसुणहि तत्तु ।
विरला झायहि तत्तु जिय विरला धारहि तत्तु ।। ६६ ।।
[विरलाः जानन्ति तत्त्वं बुधाः विरलाः निशृण्वन्ति तत्त्वम् ।
विरलाः ध्यायन्ति तत्वं जीव विरला धारयन्ति तत्वम् ॥]
पाठान्तर-१) व-जाणइहिं. २) अपझ-बुहु. ३) अपझ-णिसुणहु.
अर्थ-विरले पण्डित लोग ही तत्त्वोंको समझते हैं, विरले ही तत्त्वोंको श्रवण करते
हैं, विरले ही तत्वोंका ध्यान करते हैं, और विरले जीव ही तत्त्वोंको धारण करते हैं ॥६६॥
इहु परियण ण हु महुतण इहु सुहु-दुक्खहँ हेउ ।
इम चिंतंतह किं करई लहु संसारह छेउ ॥ ६७॥
- रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला [ दो० ६८-७१ [ एप परिजनः न खलु मदीयः एप सुखदुःखयो हेतुः। एवं चिन्तयतां किं क्रियते लघु संसारस्य छेदः ॥] पाठान्तर-१) अझ-महतणो. प-महनगो. २) व-इउ चिंता किं करय. अर्थ यह कुटुम्ब परिवार निश्चयसे मेरा नहीं है, यह मात्र सुखदुःखका ही हेतु है-इस प्रकार विचार करनेसे शीघ्र ही संसारका नाश किया जा सकता है ।। ६७॥ इंद-फणिंद-णरिंदय वि' जीवह सरणु ण हॉति । असरणु जाणिव मुणि-धवला अप्पा अप्प मुणंति ॥ ६८॥ [इन्द्रफणीन्द्रनरेन्द्राः अपि जीवानां शरणं न भवन्ति । अशरणं ज्ञात्वा सुनिघवला: आत्मना आत्मानं जानन्ति ॥] पाठान्तर-१) अझ-णरिंद ण वि. प-गरिंद वि. २) अप-जाणवि. अर्थ-इन्द्र, फणीन्द्र और नरेन्द्र भी जीवोंको शरणभूत नहीं हो सकते; इस तरह अपनेको शरणरहित जानकर उत्तम मुनि निज आत्मासे निज आत्माको जानते हैं ॥ ६८॥ इक उपज्जई मरइ कु विदुहु सुह भुंजइ इक्कु । णरयहँ जाइ वि इक्क जिउ तह णिब्वाणहँ इकु.॥ ६९॥ [ एका उत्पद्यते म्रियते एकः अपि दुःखं सुखं भुनक्ति एकः । नरकेभ्यः याति अपि एकः जीवः तथा निर्वाणाय एकः॥] पाठान्तर-१) व-उप्पनउ. २) अ-इक्क मरह इक वि, प-मरइ इक्क वि, व-मरइक वि. ३) व-तहिं. अर्थ-जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरता है और वह अकेला ही सुखदुःखका उपभोग करता है। वह नरकमें भी अकेला ही जाता है और निर्वाणको भी वह अकेला ही प्राप्त करता है ।। ६९ ॥ एकुलर्ड जइ जाइसिहि तो परभाव चएहि । अप्पा झायहि णाणमड लहु सिव-सुक्खं लहेहि ॥७० ॥ [ एकाकी यदि यास्यसि तर्हि परभावं त्यज । आत्मानं ध्यायस्व ज्ञानमयं लघु शिवसुखं लभसे ॥] पाठान्तर-१) अप-इक्कल्लड, झ-इक्कलऊ. २) प-जइसहि. ३) पवझ-सिवसुख. अर्थ हे जीव ! यदि तू अकेला ही है तो परभावका त्याग कर और आत्माका ध्यान कर, जिससे तू शीव्र ही ज्ञानमय मोक्षसुखको प्राप्त कर सके ॥ ७० ॥ जो पाउ वि सो पाउ मुर्णि सव्वु इ को वि मुणेइ । जो पुण्णु वि पाउ वि भणइ सो वुह (1) को वि हवेइ ।।७१॥ [ यत् पापं अपि तत् पापं जानाति (2) सर्वः इति कः अपि जाना। यः पुण्यं अपि पापं इति भणति स वुधः कः अपि भवति ॥] पाठान्तर-१) अपझ-भणि. २) अपझ-सच (सन्च) इक्को वि. ३) अपवझ-बहु.
. दो० ७२-७६ ] योगसारः १७ अर्थ-जो पाप है उसको जो पाप जानता है, यह तो सब कोई जानता है । परन्तु जो पुण्यको भी पाप कहता है, ऐसा पंडित कोई विरला ही होता है ।। ७१ ॥ जह लोहम्मियं णियड वुह तह सुण्णम्मिय जाणि । जे सुहुँ असुह परिच्चयहि ते वि हवंति हुँ णाणि ॥७२।। यथा लोहमयं निगडं बुध तथा सुवर्णमयं जानीहि । ये शुभं अशुभं परित्यजन्ति ते अपि भवन्ति खलु ज्ञानिनः॥] पाठान्तर-१) अ-लोहम्मय. २) व-णिलय (णियल ? ). ३) अपझ-सो सुह. ४) अपझ-हवंति ण. अर्थ-हे पण्डित ! जैसे लोहेकी साँकलको तू साँकल समझता है उसी तरह तू सोनेकी साँकलको भी साँकल ही समझ । जो शुभ अशुभ दोनों भावोंका परित्याग कर देते हैं, निश्चयसे वे ही ज्ञानी होते हैं ॥ ७२ ॥ जइया मणु णिग्गंथु जिय तइया तुहुँ णिग्गंथु । जइया तुहुँ णिग्गंथु जिय तो लब्भइ सिवपंथु ॥७३॥ [ यदा मनः निर्ग्रन्थः जीव तदा त्वं निर्ग्रन्थः । यदा त्वं निर्ग्रन्थः जीव ततः लभ्यते शिवपन्थाः॥] पाठान्तर-अपझ-तो. अर्थ-हे जीव ! जब तेरा मन निम्रन्थ हो गया तो तू भी निर्ग्रन्थ हो गया और जब तू निर्ग्रन्थ हो गया, तो उससे मोक्षमार्ग मिल जाता है ॥ ७३ ॥ जं वडमज्झहँ बीउ फुड बीयहं वड वि हुँ जाणु । तं देहहँ देउ वि मुणहि जो तइलोय-पहाणु ॥७४॥ [ यद् वटमध्ये वीजं स्फुट वीजे वटं अपि खलु जानीहि । तं देहे देवं अपि जानीहि यः त्रिलोकप्रधानः ॥] पाठान्तर-१) अपझ-बीज. २) अपझ-वड विह. ३) अप-देउ मुणहि. अर्थ-जैसे बड़के वृक्षों बीज स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, वैसे ही वीजमें भी बड़वृक्ष रहता है। इसी तरह देहमें भी उस देवको विराजमान समझो, जो तीनों लोकोंमें मुख्य है ॥७४॥ जो जिण सो हउँ सो जि हॉ' एहउ भाउ णिभंतु । मोक्खहँ कारण जोड्या अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥ ७९ ॥ [ यः जिनः स अहं स एव अहं एतद् भावय निभ्रान्तम् । मोक्षस्य कारणं योगिन् अन्यः न तन्त्रः न मन्त्रः॥] पाठान्तर-१) अ-णिरु. अर्थ-जो जिनदेव हैं वह मैं हूँ, वही मैं हूँ इसकी भ्रान्तिरहित होकर भावना कर । हे योगिन् ! मोक्षका कारण कोई अन्य मन्त्र तन्त्र नहीं है ।। ७५॥ ये ते चउ पंच वि णवहँ सत्तहँ छह पंचाहँ । चउगुण-सहियां सो मुणह एयइँ लक्षण जाहँ ॥७६॥ ३ १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला [ दो० ७७-८० [द्वित्रिचतुःपश्चापि नवानां सप्तानां पट् पश्चानाम् । चतुर्गुणसहितं तं जानीहि एतानि लक्षणानि यस्य 1] पाठान्तर-१) अप-सहियो. २) अप-एहो, झ-एहउ. अर्थ-दो, तीन, चार, पाँच, नौ, सात, छह, पाँच, और चार गुण, ये (परमात्माके ) लक्षण समझने चाहिये ।। ७६ ॥ ये छंडिवि' घे-गुण-सहिउ जो अप्पाणि वसेई। जिणु सामिउ एम. भणइ लहु णिव्वाणु लहेई ।।७७॥ [ द्वौ त्यक्त्वा द्विगुणसहितः यः आत्मनि वसति । जिनः स्वामी एवं भणति लघु निर्वाणं लभते ॥] पाठान्तर-१) अप-छंडवि. २) अपझ-विसेइ. ३) अपझ-जिणसामी एवं. ४) व-लहेहि. अर्थ-जो दोका (राग द्वेप) परित्याग कर, दो गुणोंसे (सम्यग्ज्ञान दर्शन) युक्त होकर आत्मामें निवास करता है, वह शीघ्र ही निर्वाण पाता है, ऐसा जिनेन्द्रभगवान्ने कहा है ||७७|| तिहि रहियर्ड तिहि गुण-सहिउ जो अप्पाणि वसेइ । सो सासय-सुह-भायणु वि जिणवरु एम भणेइ ॥७८॥ [ त्रिभिः रहितः त्रिभिः गुणसहितः यः आत्मनि वसति । स शाश्वतसुखभाजन अपि जिनवरः एवं भणति ॥] पाठान्तर-१) अप-रहियो, झ-रहिउ तिह. २) व-अप्पाण. ३) व-सुहु भायणु. अर्थ-जो तीनसे ( राग द्वेष मोह ) रहित होकर तीन गुणोंसे ( सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र) युक्त होता हुआ आत्मामें निवास करता है, वह शाश्वत सुखका पात्र होता है, ऐसा जिनदेवने कहा है ॥ ७८॥ चउ-कसाय-सपणा-रहिउ चउ-गुण-सहियउं वृत्त। सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ जिम पर होहि पवित्त ।। ७९॥ [चतुकपायसंज्ञारहितः चतुर्गुणसहित उक्तः। स आत्मा (इति) जानीहि जीव त्वं यथा परः भवसि पवित्रः॥] पाठान्तर-१) अप-सहियो, झ-सहिउ. २) अपझ-पर. अर्थ-हे जीव ! जो चार कपायों और चार संज्ञासे रहित होकर चार गुणोंसे (अनन्त दर्शन, ज्ञान, सुख, वीर्य ) सहित होता है, उसे तू आत्मा समझ; जिससे तू परम पवित्र हो सके ॥ ७९ ॥ बे-पंचहँ रहियउ मुणहि बे-पंचहँ संजुत्तु । बे-पंचहँ जो गुणसहिउ सो अप्पा णि वुत्तु ॥ ८०॥ [ द्विपञ्चानां (-पञ्चभिः) रहित (इति) जानीहि द्विपञ्चानां संयुक्तः। द्विपश्चानां यः गुणसहितः स आत्मा निश्चयेन उक्तः ॥] पाठान्तर-१) अपझ-सो. २) अपझ-णर. अर्थ-जो दससे रहित, दससे सहित और दस गुणोंसे सहित है, उसे निश्चयसे आत्मा कहा है।। ८०॥
दो० ८१-८५] योगसारः अप्पा सणु णाणु मुणि अप्पा चरणु वियाणि । अप्पा संज, सील तउ अप्पा पच्चक्खाणि ॥४१॥ [ आत्मानं दर्शनं ज्ञानं जानीहि आत्मानं चरणं विजानीहि । आत्मानं संयमं शीलं तपः आत्मानं प्रत्याख्यानम् ॥] पाठान्तर-१) अझ-संयम, २) अ-पञ्चकोणु, व-पञ्चष्पाणु, प-पच्चक्खाण, झ-पचखाणि. अर्थ-आत्माको ही दर्शन और ज्ञान समझो; आत्मा ही चारित्र है, और संयम, शील, तप और प्रत्याख्यान भी आत्माको ही मानो ॥ ८१॥ जो परियाणइ अप्प परु सो' पर चयई णिभंतु । सो सण्णासु मुणेहि तुहुँ केवल-णाणि उत्तु ॥ ८२॥ [ यः परिजानाति आत्मानं स परं त्यजति निर्धान्तम् तत् सन्न्यासं जानीहि त्वं केवलज्ञानिना उक्तं ॥] पाठान्तर-१) व-जो. २) अपझ-चयहि. ३) अपझ-केवलणाणिय, अर्थ-जो निजको और परको जान लेता है वह भ्रान्तिरहित होकर परका त्याग कर देता है। हे जीव ! तू उसे ही सन्यास समझ-ऐसा केवलज्ञानीने कहा है ।। ८२ ॥ रयणत्तय-संजुत्त जिउ उत्तिमु तित्थु पवितुं । मोक्खहँ कारण जोइया अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥ ८३ ॥ [ रत्नत्रयसंयुक्तः जीवः उत्तम तीर्थ पवित्रम् । मोक्षस्य कारणं योगिन् अन्यः न तन्त्र: न मन्त्रः॥] पाठान्तर-१)व-उत्तम तित्य. २) अपझ-पउत्तु. ३) अपझ-८४. अर्थ-हे योगिन् ! रत्नत्रययुक्त जीव ही उत्तम पवित्र तीर्थ है, और वही मोक्षका कारण है। अन्य कुछ मन्त्र तन्त्र मोक्षका कारण नहीं ॥ ८३ ॥ दसणु जं' पिच्छियइ वुह अप्पा विमल महंतु । पुणु पुणु अप्पा भावियए.सो चारित्त पवित्तु ॥ ८४ ॥ [ दर्शनं यत् प्रेक्ष्यते बुधः (बोध:) आत्मा विमल' महान् । पुनः पुनर आत्मा भाव्यते तत् चारित्रं पवित्रम् ।।] पाठान्तर-१) व-जहिं. २) व-एहु णिभंतु. ३) अप-भावियइए, च-झाइयइ, झ-भावियइ. ४) अझ-८३. अर्थ-जिसके द्वारा देखा जाता है वह दर्शन है, जो निर्मल महान् आत्मा है वह ज्ञान है, तथा आत्माकी जो पुनः पुनः भावना की जाती है वह पवित्र चारित्र है ॥ ८४ ॥ जहि अप्पा तहि सयल-गुण केवलि एम भणति । तिहिं कारणएँ जोई फुड अप्पा विमल मुणंति ॥ ८५॥ [ यत्र आत्मा तत्र सकलगुणाः केवलिनः एवं भणन्ति । तेन (1) कारणेन योगिनः स्फुटं आत्मानं विमलं जानन्ति ।।]
२०
रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला
[ दो० ८६-९०
पाठान्तर-१) अपझ-तिहि. २) अझ-केवल. ३) व-तहि कारणिए. ४) अपझ-जीव.
अर्थ-जहाँ आत्मा है वहाँ समस्त गुण हैं-ऐसा केवलियोंने कहा है। इसलिये
योगी लोग निश्चयसे निर्मल आत्माको पहिचानते हैं ।। ८५ ॥
एकल इंदिय-रहियउँ मण-वय-काय-ति-सुद्धि ।
अप्पा अप्पु मुणेहिँ तुहुँ लहु पावहिं सिव-सिद्धि ।। ८६ ॥
[ एकाकी इन्द्रियरहितः मनोवाकायत्रिशुद्धया।
आत्मन् आत्मानं जानीहि त्वं लघु माप्नोपि शिवसिद्धिम् ॥]
पाठान्तर-१) अपझ-इक्कलउ. २) बझ-रहिउ. ३) घ-सूधि. ४) अपझ-मुणेइ.
५) अपझ-पावहु. ६) अपझ-सुद्धि.
अर्थ-हे आत्मन् ! तू एकाकी, इन्द्रियरहित और मन वचन कायकी शुद्धिसे
आत्माको जान; उससे तू शीघ्र ही मोक्षसिद्धिको प्राप्त करेगी ॥ ८६ ॥
जइ बद्ध मुक्कउ मुणहि तो वंधियहि णिभंतु ।
सहज-सरूवई जइ रमहि तो पावहि सिव सन्तु ।। ८७।।
[ यदि वद्धं मुक्तं मन्यसे ततः वध्यसे निर्धान्तम् ।
सहजस्वरूपे यदि रमसे ततः प्राप्नोपि शिवं शान्तम् ॥]
पाठान्तर-१)अपझ-बद्धो. २) व-बंधिहि. ३) व-सरूविं. ४) अ-रमइहि, पवझ-रमइ.
अर्थ-यदि तू बद्धको मुक्त समझेगा तो निश्चयसे तू बंधगा । तथा यदि
तू सहज-स्वरूपमें रमण करेगा तो शान्त निर्वाणको पावेगा ।। ८७ ॥
सम्माइट्ठी-जीवडहँ दुग्गइ-गमणु ण होइ ।
जइ जाइ वि' तो दोसु णवि पुन्व-किउँ खवणेई ॥ ८८ ॥
[सम्यग्दृष्टिजीवस्य दुर्गतिगमनं न भवति ।
यदि याति अपि तर्हि (तत: १) दोषः नैव पूर्वकृतं क्षपयति ॥]
पाठान्तर-१)व-जाइसि. २) व-पुबुकिउ, झ-पुन्वकियउ. ३) अपझ-खउणेह.
अर्थ-सम्यग्दृष्टि जीव कुगतियोंमें नहीं जाता। यदि कदाचित् वह जाता भी
है तो इसमें सम्यक्त्वका दोप नहीं । इससे वह पूर्वकृत कर्मका ही क्षय करता है ॥ ८८ ॥
अप्प-सरूवहँ (-सरुवइ ?) जो' रमइ छंडिवि सहु ववहारु ।
सो सम्माइट्ठी हवइ लहु पावई भवपारु ॥ ८९॥
[ आत्मस्वरूपे यः रमते त्यक्त्वा सर्व व्यवहारम् ।
स सम्यग्दृष्टिः भवति लघु प्राप्नोति भवपारम् ।।]
पाठान्तर-१) अपझ-जइ. २) अपझ-छंडवि. ३) अपझ-पावहु, व-पावहि.
अर्थ-जो सर्व व्यवहारको छोड़कर आत्मस्वरूपमें रमण करता है, वह सम्यग्दृष्टि
जीव है, और वह शीघ्र ही संसारसे पार हो जाता है ॥ ८९ ॥
जो सम्मत्त-पहाण वुहु सो तइलोय-पहाणु ।
केवल-णाण वि लहु लहइ सासय-सुक्ख-णिहाणे ॥९०२॥
दो० ९१-९४ ]
- योगसारः
२१
[ यः सम्यक्त्वप्रधान: बुधः स त्रिलोकप्रधानः।
केवलज्ञानमपि लघु लभते शाश्वतसौख्यनिधानम् ।।]
पाठान्तर-१)व-सासइ सुबल होइ (१). २) अपझ-९१.
अर्थ--जिसके सम्यक्त्वका प्राधान्य है वही पण्डित है और वही त्रिलोकमें प्रधान
है । वह जीव शाश्वत सुखके निधान केवलज्ञानको भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ ९० ॥
अजर अमरु गुण-गण-णिलउ जहि अप्पा थिरु ठाई ।
सो कम्मेहिँ ण बंधियां संचिय- वै विलाइ ॥९१ ।।
[ अजरः अमरः गुणगणनिलयः यत्र आत्मा स्थिरः तिष्ठति ।
स कर्मभिः न वद्धः संचितपूर्व विलीयते ॥
पाठान्तर-१) च-थिर हाइ, झ-थिर थाई. २) अ-ण वि बधियउ, झ-कम्महिंण वि बंधियउ,
व-ण परिणमह ३) व संचउ पुव्व. ४) अपझ-९०.
अर्थ-जहाँ अजर अमर तथा गुणोंकी आगारभूत आत्मा स्थिर हो जाती है, वहाँ जीव
कर्मोंसे बद्ध नहीं होता, और वहाँ पूर्वमें संचित किये हुए कर्मौका ही नाश होता है ॥९१॥
जह सलिलेण ण लिप्पियई कमलणि-पत्त कया वि।
तह कम्मेहि ण लिप्पियई जइ रई अप्प-सहावि ॥१२॥
[ यथा सलिलेन न लिप्यते कमलिनीपत्रं कदा अपि ।
तथा कर्मभिःन लिप्यते यदि रतिः आत्मस्वभावे ॥]
पाठान्तर--१) अप-लिप्पयइ, झ-लिप्पइ. २) अपझ-कहा वि. ३) अपझ-कम्मेण.
४) अप-लिप्पयद, झ-लिप्पइ. ५) अपझ-जह रहइ, व-जह,
अर्थ-जिस तरह कमलिनीका पत्र कभी भी जलसे लिप्त नहीं होता, उसी तरह
यदि आत्मस्वभावमें रति हो, तो जीव कर्मोंसे लिप्त नहीं होता ।। ९२ ॥
जो सम-सुक्ख-णिलीणु वुहु पुण पुण अप्पु मुणेइ ।
कम्मक्खड करि सो वि फुड लहु णिव्वाणु लहेई ॥१३॥
[यः शमसौख्यनिलीनः बुधः पुनः पुनः आत्मानं जानाति ।
कमक्षयं कृत्वा स अपि स्फुट लघु निर्वाणं लभते ।।
पाठान्तर-१) अपझ-लहेवि.
अर्थ-जो शम और सुखमें लीन हुआ पण्डित वारवार आत्माको जानता है,
वह निश्चय ही कर्मोका क्षयकर शीघ्र ही निर्वाण पाता है ॥ ९३ ॥
पुरिसायार-पमाणु जिय अप्पा एहु पवितु ।
जोइज्जइ गुण-गण-णिलउँ णिम्मल तेय-फुरंतु ॥९४ ॥
[पुरुषाकारप्रमाण: जीव आत्मा एष पवित्रः।
दृश्यते गुणगणनिलयः निर्मलतेजास्फुरन् ।।]
पाठान्तर-१) अप-य बंभु, व-पउत्तु. २) अपझ-गुणणिम्मलउ. ३) अपझ-फुरंति.
अर्थ-हे जीव ! पुरुषाकार यह आत्मा पवित्र है, यह गुणोंकी राशि है और यह
निर्मल तेजको स्फुरित करती हुई दिखाई देती है ॥ ९४ ॥
२२ • रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला [ दो० ९५-९९ जो अप्पा सुद्ध वि मुणइ असुइ-सरीर-विभिन्नु । सो जाणइ सत्थई सयले सासय-सुक्खहँ लीणु ॥१५॥ [यः आत्मानं शुद्धं अपि जानाति अशुचिशरीरविभिन्नम् । स.जानाति शास्त्राणि सकलानि शाश्वतसौख्ये(१) लीनः ॥] पाठान्तर-१) अपझ-सत्य य सयलु. अर्थ-जो शुद्ध आत्माको अशुचि शरीरसे भिन्न समझता है, वह शाश्वत सुखमें लीन होकर समस्त शास्त्रोंको जान जाता है ॥ ९५ ॥ जो णवि जाणइ अप्पु परु णवि परभाउ चएई। सो जाणउँ सत्थई सयले ण हु सिवसुक्खु लहेहे ॥९६ ॥ [य: नैव जानाति आत्मानं परं नैव परभावं त्यजति । स जानातु शास्त्राणि सकलानि.न खलु शिवसौख्यं लभते ॥] पाठान्तर-१) व-परभाव. २) अप-चएवि, झ-चहेवि. ३) व-जाणइ. ४) अपझ-सत्य य . सयलु. ५) अपझ-लहेवि. अर्थ-जो न तो परमात्माको जानता है, और न परभावका त्याग ही करता है, वह भले ही समस्त शास्त्रोंको जान जाय, परन्तु वह मोक्षसुखको प्राप्त नहीं करता ॥ ९६ ॥ वज्जिय सयल-वियप्पहूँ परम-समाहि लहंति । जं विंदहि साणंदु क वि सो सिव-सुक्ख भणंति ॥ ९७ ॥ [ वर्जितं सकलविकल्पेन परमसमाधि लभन्ते । यद् विन्दन्ति सानन्दं कि अपि. तत् शिवसौख्यं भणन्ति ॥] पाठान्तर-१) अपझ-वियप्पह. २) अ-विदवि, प-विददि, झ-वेददि. ३)अ-साणंद क्कुवि, प-साणंद फु वि, झ-साणंद फुड. अर्थ-जो समस्त विकल्पोंसे रहित होकर परम समाधिको प्राप्त करते हैं, वे आनन्दका अनुभव करते हैं, वह मोक्षसुख कहा जाता है ॥ ९७ ॥ जो पिंडत्थु पयत्थु वुह रूवत्थु वि जिण-उत्तु । रूवातीतु मुणेहि लहु जिम परु होहि पवित्तु ॥ १८ ॥ [ यत् पिण्डस्थं पदस्थं बुध रूपस्थं अपि जिनोक्तम् । रूपातीतं जानीहि लघु यथा परः भवसि पवित्रः ॥] पाठान्तर-१) प-बुहा, व-बहु. २) अपझ-मुणेहु. अर्थ हे बुध ! जिनभगवान्के कहे हुए पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ध्यानको समझ; जिससे तू शीघ्र ही परम पवित्र हो सके ।। ९८ ॥ सव्वे जीवा णाणमयां जो सम-भाव मुणेइ। सो सामाइड जाणि फुड जिणवर एम भणेइ ॥९९ ॥ [ सर्वे जीवाः ज्ञानमयाः (इति) यः समभावः ज्ञायते । तत् सामायिक जानीहि स्फुटं जिनवरः एवं भणति ॥]
दो० १००-१०४ ] योगसारः २३ पाठान्तर-१) अझ-णाणमय. अर्थ-समस्त जीव ज्ञानमय हैं, इस प्रकार जो समभाव है, उसे निश्चयसे सामा- यिक समझो, ऐसा जिनभगवान्ने कहा है ॥ ९९ ॥ राय-रोस वे परिहरिवि जो समभाउ मुणेइ । सो सामाइउ जाणि फुड केवलि एम भणेइ ॥ १०० ॥ [राग-रोपौ द्वौ परिहत्य यः समभावः मन्यते । तत् सामायिक जानीहि स्फुटं जिनवरः एवं भणति ॥] पाठान्तर-१) अप-वि. २) अपझ-परिहरवि. अर्थ-राग और द्वेप इन दोनोंको छोड़कर जो समभाव होता है, उसे निश्चयसे सामायिक समझो ऐसा जिनभगवान्ने कहा है ॥ १०० ॥ हिंसादिउँ-परिहारु करि जो अप्पा हु ठवेइ । सो वियऊं चारित्तु मुणि जो पंचम-गइ णेई ॥१०१॥ [हिंसादिकपरिहारं कृत्वा यः आत्मानं खलु स्थापयति । तद् द्वितीयं चारित्रं जानीहि यत् पञ्चमगतिं नयति ॥] पाठान्तर-१) अपझ-हिंसादिक. २) पव-बियउ, झ-बिउ. ३) व-लेइ. अर्थ-हिंसादिकका त्याग कर जो आत्माको स्थिर करता है, उसे दूसरा चारित्र छेदोपस्थापना) समझो-यह पंचमगतिको ले जानेवाला है ॥ १०१॥ मिच्छादिङ जो परिहरणु सम्मईसण-सुद्धि । सो परिहार-विसुद्धि मुणि लहु पावहि सिव-सिद्धि ॥१०२॥ [ मिथ्यादेः (१) यत् परिहरणं सम्यग्दर्शनशुद्धिः। तां परिहारविशुद्धिं जानीहि लघु प्राप्नोपि शिवसिद्धिम् ॥] पाठान्तर-१) अपझ-मिच्छादिक, व-मिच्छादिकु (१). २ अपझ-सिवसुद्धि. अर्थ-~-मिथ्यात्व आदिके परिहारसे जो सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि होती है, उसे परिहार- विशुद्धि समझो, उससे जीव शीघ्र ही मोक्षसिद्धिको प्राप्त करता है ॥ १०२ ॥ सुहुमहँ लोहहँ जो विलउँ जो सुहुमु वि परिणाम ।। सो सुहुमु वि चारित्त मुणि सो सासय-सुह-धामु ॥ १०३ ॥ [मूक्ष्मस्य लोभस्य यः विलयः यः सूक्ष्मः अपि परिणामः । तत् सूक्ष्म अपि चारित्रं जानीहि तत् शाश्वतसुखधाम ॥] पाठान्तर-१) व-सुहुमुहं. २) अप-विलसो (विलयो १). ३) अपझ-सुहमु हवे परिणाम. अर्थ सूक्ष्म लोभका नाश होनेसे जो सूक्ष्म परिणामोंका अवशेष रह जाना है, वह सूक्ष्मचारित्र है; वह शाश्वत सुखका स्थान है ॥ १०३ ॥ अरहंतु वि सो सिद्ध फुड सो आयरिउ वियाणि । सो उवझायर्ड सो जि मुणि णिच्छ. अप्पा जाणि ॥१०४॥ [ अर्हन् अपि स सिद्धः स्फुटं स आचार्यः (इति) विजानीहि । स उपाध्यायः स एव मुनिः निश्चयेन आत्मा (इति) जानीहि ॥]
२४
रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला
[ दो० १०५-१०८
.
३
पाठान्तर-१) झ-अरिहंतु. २) अप-सो उज्झाउ वि, झ-सो उज्झावो.
अर्थ-निश्चयनयसे आत्मा ही अर्हत् है, वही निश्वयसे सिद्ध है, और वही आचार्य
है, और उसे ही उपाध्याय तथा मुनि समझना चाहिये ॥ १०४ ॥
सो सिउ संकरु विण्हु सो सो रुद्द वि सो युद्ध।
सो जिणु ईसरु बंभु सो सो अणंतु सौ सिद्ध ॥ १०५।।
[ स शिवः शङ्करः विष्णुः स स रुद्रः अपि स बुद्धः ।
स जिनः ईश्वरः ब्रह्मा स स अनन्तः स सिद्धः॥]
पाठान्तर-1) अपझ-फुडु.
अर्थ-वहीं शिव है, वही शंकर है, वही विष्णु है, वही रुद्र है, वही युद्ध है, वही जिन
है, वहीं ईश्वर है, वही ब्रह्मा है, वही अनन्त है और सिद्ध भी उसे ही कहना चाहिये ॥१०५॥
एव हि लक्खणं-लक्खियउ जो परु णिकल देउ ।
देहहँ मज्झहि सो वसइ तासु ण विजई भेउ ।। १०६ ।।
[ एवं हि लक्षणलक्षितः यः परः निष्कल: देव:
देहस्य मध्ये स वसति तयोः न विद्यते भेदः॥
पाठान्तर-१) अप-एयहि, झ-एहि य. २) व-लक्खणि. ३) व-देहहिं मन्झिहिं.
४)ब-किज्जइ.
अर्थ-इन लक्षणोंसे युक्त परम निष्कल देव जो देहमें निवास करता है, उसमें और
आत्मामें कोई भी भेद नहीं है ।। १०६ ॥
जे सिद्धा जे सिज्झिहिहि जे सिज्झहि जिण-उत्तु ।
अप्पा-दंसणि ते दि फुड एहउँ जाणि णिभंतु ॥ १०७॥
[ये सिद्धाः ये सेत्स्यन्ति ये सिध्यन्ति जिनोक्तम् ।
आत्मदर्शनेन ते अपि स्फुटं एतत् जानीहि निर्धान्तम् ॥]
पाठान्तरं-१) अप-सिज्झहहिं, झ-सिज्झसिहि. २) अपझ-दसण. ३) अपझ-एहो.
अर्थ-जो सिद्ध हो चुके हैं, भविष्यमें होंगे और वर्तमानमें होते हैं, वे सब निश्चयसे
आत्मदर्शनसे ही सिद्ध हुए हैं-यह भ्रान्तिरहित समझो ॥ १०७ ॥
संसारह भय-भीयएण जोगिचंद-मुणिएण ।
अप्पा-संबोहण कया दोहा इक-मणेण ॥ १०८॥
[संसारस्य भयभीतेन योगिचन्द्रमुनिना ।
आत्मसंवोधनाय कृतानि दोहकानि एकमनसा ॥]
पाठान्तर-१) व-संसारूभयभीतेन, झ-भयभीवएह. २) अप-जोगचंद, व-योगचंद.
३) व-कवमिसण.
अर्थ-संसारके दुःखोंसे भयभीत ऐसे योगीन्द्रदेव मुनिने आत्मसंबोधनके लिये
एकाग्रमनसे इन दोहोंकी रचना की है ॥ १०८ ॥
योगसारदोहादीनां वर्णानुक्रमसूची दोहा पृष्ठ ३७ ९ ८७ २० २ अजर अमर गुणगण- अप्पर अप्पु मुणतयाँ अप्पसरूवह (सरूवा १) जो अप्पा अप्पइँ जो मुणह अप्पा अप्पउ जइ मुणहि अप्पासणु एक्कु परु । अप्पा दंसणु णाणु मुणि अरहंतु वि सो सिद्ध असरीक वि सुसरीरु मुणि अह पुणु अप्पा णवि मुणहि ७२ १७ ९२ २१ ८५ १९ १७ २७ ५ ३८ ९ ५६ १३ आउ गलह णवि मणु . ३ इक उपज्जइ मरद कुवि इन्छारहियउ तव करहि इंदफर्णिदरिंदय वि इहु परियण णहु महुतणउ एकलउ इंदियरहिट एक्कुलउ जइ जाइसिहि एव हि लक्खणलक्खियउ दोहा पृष्ठ २१ जइ णिग्मलु अप्पा मुणहि ६२ १४/ जइ बद्धउ मुक्कउ मुणहि ८९ २० जह बीहउ चउगइगमणा ३४ ८ जंइया मणु णिगंथु जिय १२ ३ जह लोहम्मिय णियड वुह १६ ४| जह सलिलेण ण लिप्पियइ १९ जहिं अप्पा तर्हि सयलगुण १०४ २३ २३ | जं वडमझह बीउ फुडु १४/ जाम ण भावहि जीव १५ ४/ जिणु सुमिरहु जिणु जिवाजीवह भेउ जो ४९ १२ जे णवि मण्णहिं जीव जे परभाव चएवि मुणी जे सिद्धाजे सिज्ससिहि १३ जेहड जज्जर णरयघर ६८ १६ जहउ मणु विसयहँ रमह ६७ १५ जेहउ सुद्ध अयासु जिय ८६ २० जो अप्पा सुद्ध वि १६ / जो जिण सो हउँ सो १०६ २४ जो जिणु सो अप्पा मुणहु जो णवि जाणइ अप्पु १] जो तइलोयहँ झेउ जिणु ३९ ९| जो परमप्पा सो जि हउँ ९ जो परियाणइ अप्प पर जो परियाणइ अप्पु परु १८ ५ जो पाउ वि सो पाउ मुणि जो पिंडत्थु पयत्यु २ जो समसुक्खणिलीणु बुहु १८ जो सम्मत्तपहाण बुहु २५ ६ णासम्गि अन्भितरह णिच्छ. लोयपमाणु मुणि ४६ ११ णिम्मलमाणपरिया ७] जिम्मलु णिका सुध्दु १०७ २४ १२ १२ १४ ९५ २२ १७ ५ २२ ७ कालु अणाइ अणा जिउं केवलणाणसहाउ सो को सुसमाहि करउ ९६ २८ २२ ८२ ५ १९ २ गिहिवावारपरिडिया घाइचउक्कह किउ विलउ ९८ २२ २१ ९० २० or Cmm . चउकसायसणारहिउ चउरासीलक्खहि फिरिउ छह दवइंजे जिणकहिया ६० २४ १ १४ ६ १ ३ जह जरमरणकरालियर जइ णिम्मल अप्पा मुणइ ३० ९ २३ -- योगसारः दोहा :पृष्ट : दोहा पृष्ट ४१ १० नूदा देवळि देउ गति ४२. १० सणचयनुच निड ६ .२ मग दाउ दिगयर हिड ५८. १८ रायरोन दे परिहरिव; उययेन दे परिघरित्रि ८४ १९ १०० २३ . ४८ तम कृतित्यइँ परिमनइ नित्यइ देउलि देउ विणु तित्यहि देवलि देउ पति : तिपयारो अप्पा नुणहि तिहिं रहियउ तिहिं गुग- दंगु नं पिच्छियह देहादिड जे परि कहिया देहादिड ले परि ऋहिया देहादिउ जो पर मुणइ देहादेवलि देइ जिगु घण्या ते मयंवंत वह धम्मु ण पहियइँ होइ घंवइ पडियउ सयल ३ ८ Mr mor 3 ਤੇ ਰਚ ਦਫਲੂ ਦੀ ३ ५८ वउ तव ननु जीटु बदिय न्यलवियप्पई वयनवसंजमनूलगुण ६४ १५ बिरला नागहि तनुह ४७ ११ १२ दत्य पढन्ह विजह सन्नाइहीजीवह सन अयन जानि १५ ८८ २० or ५५ १६ रब्बेनीवा मागमया ८ mo संसारह भयभीयएण २१ चाहँ मयनीयह १०८ २४ ६ १८ परिणाम बंधु नि कहिउ पुग्गल अण्णु नि अण्णु पुणिं पावइ सग जिउ पुरिमायारपमाणु निय वे ठंडिवि देगुणताहिक वे ते चड पंच विणवह वे पंचहँ रहियउ नुहि मग्गगगुणठाणइ नहिया मणुइंदिहि वि छोडिया मिच्छादनणमोदिया मिच्छादिल तो परिहरणु ६ ८० ६ नागार विणागार कृत्रि १७ दुपएनहँ परियड १८ दप्पा अर निगवरहूँ दसवेगु बुद्ध निशु नहुमहँ लोहह दो ५४ १३ सो निउ संकर २ १०२ २३ हिनादिड परिहाउ ४ प्रकाशक-मणीलाल, रेवाशंकर जगजीवन जौहरी, मॉ० व्यवस्थापक-परमश्रुतप्रमावकमंडल, खारावा जौहरवानार, बबई नं. २ मुद्रक-रघुनाथ दिपाजी देसाई, न्यू नाव प्रिंटिंग प्रेस, छेवाडी, बबई नं. ४
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श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालाके प्रकाशित ग्रन्थोंकी सूची। १ पुरुषार्थसिद्धयुपाय-श्रीअमृतचन्द्रसूरिकृत मूल और पं० नाथूरामजी प्रेमीकृत सरल और विस्तृत भाषाटीका । इसमें श्रावकाचार और अहिंसाके स्वरूपका विशद वर्णन है। मूल्य सजिल्दका ११) २ पंचास्तिकाय-श्रीमत्कुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल गायाय, अमृतचन्द्राचार्यकृत तत्वदीपिका, जयसेनाचार्यकृत तात्पर्यवृत्ति ये दो संस्कृतटीकायें, और स्व. पं. पन्नालालजी बाकलीवालकृत भाषाटीका, जीव अजीवादि पाँच अस्तिकायोंका वर्णन है । मूल्य सजिल्दका २) ३ ज्ञानार्णव - श्रीशुभचन्द्राचार्यकृत मूल, स्व. पं० जयचन्द्रजीकृत भाषाटीका, योगके विषयका, अपूर्व ग्रंथ है । महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रस्तावना भी है । मूल्य सजिल्दका ४) ४ सप्तभंगीतरंगिणी-श्रीविमलदासकृत मूल और स्व० ५० ठाकुरप्रसादजी शर्मा व्याकरणा- चार्यकृत भाषाटीका । नव्यन्यायका महत्वपूर्ण ग्रंथ है । मूल्य १) ५ बृहद्व्यसंग्रह-श्रीनेमिचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्तीकृत गाथायें, श्रीब्रह्मदेवकृत संस्कृतटीका, और पं. जवाहरलालजी शास्त्रीकृत भापाटीका । पड् द्रव्योंका वर्णन है। सजिल्दका मूल्य २) ६ गोम्मटसार-कर्मकांड-श्रीनेमिचन्द्राचार्यकृत गाथायें, और स्व. पं० मनोहरलालजी शास्त्रीकृत संस्कृतछाया और भाषाटीका सहित । मूल्य सजिल्दका २॥) ७ गोम्मटसार-जीवकांड-श्रीनेमिचन्द्राचार्यकृत मूल गाथायें, और पं. खूबचन्द्रजी सिद्धांतशास्त्रीकृत संस्कृतछाया और भाषाटीका सहित । मू० सजिल्दका २॥) ८ लब्धिसार-श्रीनेमिचन्द्राचार्यकृत मूल गाथायें, और स्व. पं. मनोहरलालजी शास्त्रीकृत संस्कृतछाया और हिन्दीटीका सहित । मूल्य सजिल्दका १॥) ९ प्रवचनसार-श्रीमत्कुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल, अमृतचन्द्र जयसेनकी दो संस्कृत टीकायें, स्व० पांडे हेमराजकी हिन्दीटीका, प्रो. ए. एन. आध्याय एम० ए० की अंग्रेजीटीका और अंग्रेजीमें महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना है । सजिल्दका मूल्य ५) १० परमात्मप्रकाश और योगसार-श्रीयोगीन्द्रदेवकृत अपभ्रंश भाषाके दोहे, श्रीब्रह्मदेव- सूरिकृत संस्कृतटीका, स्व. पं. दौलतरामजीकृत भाषाटीका है। प्रो० ए० एन० उपाध्याय एम० ए. की लिखी महत्त्वपूर्ण अंग्रेजी प्रस्तावना है, अंग्रेजी प्रस्तावनाका हिन्दी सार भी हैं । मूल्य सजिल्दका ४॥). ११ समयसार-श्रीमत्कुन्दकुन्दाचार्यकृत गायायें, अमृतचन्द्राचार्य जयसेनाचार्यकृत दो संस्कृत टीकायें और स्व. पं. जयचन्द्रजीकृत हिन्दीटीका सहित । मूल्य सजिल्दका ४॥) १२ द्रव्यानुयोगतर्कणा णा-श्रीभोजसागरकृत, अप्राप्य है । मूल्य २) १३ स्याद्वादमंजरी-श्रीमल्लिपेणसूरिकृत मूल और पं. जगदीशचन्द्रजी शास्त्री एम० ए० कृत हिन्दी अनुवाद सहित । न्यायका अपूर्व ग्रंथ है। बड़ी खोजसे लिखे हुए १३ परिशिष्ट हैं । मूल्य सजिल्दका ४॥). १४ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र-श्रीमत् उमास्वातिकृत मूल सूत्र और संस्कृतभाष्य, पं. खूबचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्रीकृत विस्तृत भाषाटीका । मूल्य सजिल्दका ३) १५ पुष्पमाला मोक्षमाला और भावनावोध-श्रीमद्राजचन्द्रकृत, अनुवादक -पं. जगदीशचन्द्रजी शास्त्री एम० ए०, मू० ॥1) १६ उपदेशछाया और आत्मसिद्धि-श्रीमद्राजचन्द्रप्रणीत । अनुवादकर्ता-पं० जगदीश- चन्द्रजी शास्त्री एम० ए० मू. 1) १७ योगसार-श्रीयोगीन्द्रदेवकृत दोहा, पं० जगदीशचन्द्रजी एम० ए• कृत भाषानुवाद मू.) १८ श्रीयोगीन्द्रदेव और परमात्मप्रकाश-प्रो० ए०एन० उपाध्याय लिखित महत्वपूर्ण अंग्रेजी ग्रंथ, मू. १) गुजराती ग्रंथ- १ श्रीमद्राजचन्द्र-तत्वज्ञानपूर्ण महान् ग्रन्थ, महात्मा गांधीजीकी लिखी महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना सहितका मूल्य सिर्फ ५) है। इसका हिन्दी अनुवाद भी बहुत जल्दी प्रकाशित होगा-छप रहा है। २ भावनावोंध-श्रीमद्राजचन्द्रकी अपूर्व रचना, मूल्य सजिल्दका सिर्फ 1) नोट-सभी ग्रंथों का मूल्य बहुत सस्ता-लागतके लगभा रखा गया है। मँगाकर आत्मकल्याण कीजिए। विशेष.विवरण बड़े सूचीपत्रसे जानिये । -श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडल ( रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला) खाराकुवा जौहरी बाजार, बम्बई नं. २ मिलनेका पता-
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