Sanmati Library, Jaipur

Havan Mantra Arth Sahit

Dayanand · 2009/10

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Front matter

समाज -- की करतूत हरिशय गायन उपयोगी पुस्तकें तथा वेदमंत्रादि स्थलाक्षरों में सनातन धर्म तया भार्य- तेत्रो प्रतिक : 1) मनुष्य के जीवन तथा অযুম্বন বলে मृत्यु के प्रश्न -1 भाजकल के साधुनों मद्रकोमिः 3) यथेमामांवाचं. 3) सर्वेषामेव दाना .. पुत्री शिक्षक 1) मोम झंडं घाखा: प्रायश्चित्त विधि 1) | प्राणायाम मन्त्र ऋग्मन्त्र व्याख्या तिमीडे० 1-) :) मानव धर्म सार ॥) अभय मित्रा क) गुरुमन्त्र अर्थ सहित ) भो३म देवनागरी ०.) विश्वानि देव तस्वीर स्वामी जी समाधि हिरण्य गर्भ ", ) चाबी जंगल के रश्य पाकी रंगीन भार्यसमाज के नियम-) नोट बेदमन्त्र-) वार प्रो३म उई सथानंग्रेजी) कपड़े तथा रागन पावे ॥). 1) एक के हिसाबसे दिये जाते. यमनियम गोलदायरे में हैं तथा तस्वीर और यम सभांवान प्रवेष्टव्यं -) नियम १) व =) मति के अहिंसा परमो धर्मः तथा हिसाव से है। यतीधर्म स्ततोजयः | व्याख्यान मालासंस्कृत १!- उपरोक्त तथा अन्य वैदिकधर्म मबंधी पुस्तकें मिलने का पं० वजीरचन्द्र शर्मा अध्यक्ष वैदिक पुस्तकालय लाहौर धर्मफे दस बक्षण, 2. नमस्ते देवनागरी A 13

अथेश्वर स्तुति पानी उपासना
ओं विश्वानि देव सवितरितानि परा-
सुव. । यद्न्तन्न पासुव ॥१॥यजु.म. ३०
अर्थ-डे (सवितः) सकल जगत के उत्पत्ति कर्म
समग्र ऐश्वर्ययुक्त (देव) शुद्ध स्वरूप, सब सुखों के
दाता परमेश्वर ! भाप कृपा करके (नः) स्मारे (विश्वानि)
सम्पूर्ण दुर्गुण दुर्व्यसन और दुःखों को (परा, मप)
दूर कर दीजिये (यत) मो (मद्र) कल्यामकारक गुण
कम स्वभार भौर पदार्थ हैं (तत्) या सप हमको
(प्राइव) प्राप्त कीजिये |
ओं हिरण्यगर्भः समवर्तताने भूतस्य
जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृषिवीं
द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।२।।
यजु० १० १३ मं० ४

[ २ ] अर्थ-(हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाश स्वरूप और जिस ने प्रकाश करनेवाले सूर्य चन्द्र आदि पदार्थ उत्पम करके धारण किये हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध (पतिः) स्वामी (एक) एक ही चेतन स्वरूप (भासीव) था, जो (अग्रे सर जगद के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्तत) वर्तमान था (स.) सो (इमाम) इस (पृथिवीम् भूमि को (उत) और (घाम) सूर्यादि को (दापार) धारण कर रहा है, हम लोग उस (कस्म) मुख स्वरूप देवाय ) शुद्ध परमात्मा के लिए (हविषा ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अति प्रेम से (विधेम) विशेष भक्ति किया करें ॥२॥ ओं यात्मदा बलदा यस्य विश्व उपा- सते प्रशिषं यस्य देवाः। यस्य च्छाया ऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥ यजु० भ० २५ मं० २३ ॥ अर्थ-(या) जो (प्रात्मदा) आत्म-ज्ञान का दावा [1] (बलदा) शरीर मामा और समाज के बल का देने द्वारा 'यस्य) जिस की (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् माग (उपासते) उपासना करते हैं भौर (यस्य जिस का मशिष) प्रत्यक्ष सत्य स्वरूप शासन और न्याय अर्यात शिक्षा को मानते हैं (यस्य) जिसका (छाया) भाभय ही (अमृतम्) मोक्ष मुखदायक है (यस्य) जिस का न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः) पत्यु मादि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्म) मुख स्वरूप (देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए (इविषा) मात्मा और अन्ताकरण से ( विधेम ) भक्ति अर्थात् माझापालन में तत्पर से॥३॥ ओं यः प्राणतो निमिपतो महित्वैक इदाजा जगतो बभूव । य ईशेऽस्य द्विपदश्व- तुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥ यजु० अ० २.३ मं०३ अर्थ-(प.) जो (पाणतः) प्राणवाले और (निमि- पतः) प्रमाणि रूप (जगतः) जगद का (महित्वा) अपनी [४] अनन्त महिमा से (एक, इत) एकही (राजा) विराज- मान राजा (बभूव) है (यः) जो (अस्य) इस (द्वि,पदः) मनुष्यादि और (ननुष्पदः) गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है। हम उस (कस्म) मुख स्वरूप (देवाय) सकलचर्य के देनेडारे परमात्मा के लिये (हविपा) अपनी सकल उत्तम सामग्री से (विधेम) विशेष भक्ति करें ॥४॥ ओं येन चौख्या पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्ष रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम।।५ य० प्र० ३२ । मं०६ अर्थ-(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण 'स्वभाववाल (बौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भामे का दृढा) धारण, (येन) जिस जगदीश्वरने (स्व:) सुख को (स्तमितम्) धारण, और (येन) जिस ईश्वर ने [नाकः] दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है (य:) जो [अन्तरिते] आकाश में रजसः] लम लोक लोकान्तरों [ ५ ] . को [विमानः] विशेप मानयुक्त अर्थात् जैसे आकाश में पक्षी उड़ते, वैसे सब लोकों का निर्माण करता और भ्रमण कराता है, हम लोग उस [कस्मै] मुख- दायक [देवाय] कामना करने के योग्य परब्रह्म की माप्ति के लिये [इविषा] सब सामर्थ्य से [विधेम] विशेष भक्ति करें। ओं प्रजापते न वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव । यत्कामास्ते जुहु- मस्तन्नो अस्तु वयं स्याम.पतयो रयीणम् ॥६ ऋ• मं० १० सू० १२१ मं० १० अर्थ-हे [प्रजापते] सब प्रजा के स्वामी परमात्मन् ! [त्वत् ] आप से [अन्यः] भिन्न दूसरा कोई [ता] उन [एतानि] इन [विश्वा] सव [जातानि] उत्पन्न हुए जड़ चेतनादिकों को [न] नहीं [परि, बभूव] तिरस्कार करता है अर्थात् माप सर्वोपरि हैं [यत्, कामाः] जिस २ पदार्थ की कामना वाले हुए हम लोग [ते] अापका [जुहुमः] माश्रय लेवें और वाञ्छा करें [तव [६] उस २ की कामना [न] हमारी सिद्ध [प्रस्तु] होने जिस से [वयम्] हम लोग [रयीणाम] धन ऐश्वर्यो के [पतयः] स्वामी [स्याम] होवें ॥६॥ ओं स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥७ यजु० भ० ३२ मं० १० अर्थ-हे मनुष्यो! [:] वह परमात्मा [नः] अपने लोगों को [बन्धुः] भ्राता के समान मुखदायक [जनिता] सकल जगत् का उत्पादक [स:] वह [विधाता] सब कामनाओं को पूर्ण करनेहारा [विश्वा] सम्पूर्ण [भुव- नानि] लोकमात्र भौर (धामानि) नाम स्थान और जन्मों को (वेद) जानता है और (यत्र) जिस (तृतीये) सांसारिक सुख दुःख से रहित नित्यानन्द युक्त (धामम्) मोक्ष स्वरूप धारण करनेहारे परमात्मा में (अमृतम्) मोक्ष को (आनशानाः प्राप्त होके (देवाः) विद्वान लोग (अध्यैरयन्त) स्वेच्छा पूर्वक विचरते हैं । वही परमात्मा . [७] अपना गुरु प्राचार्य राना और न्यायाधीश है । अपन लोग मिलकर सदा उसकी भक्ति किया करें ॥१॥ ओं अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहु- राणमेनोभूयिष्ठान्ते नम उक्ति विधेम ।।८।। प० भ० ४०म० १६ अर्थ-हे (भने) स्वप्रकाश ज्ञान स्वरूप सब जगत के प्रकाश करने हारे (देव) सकल मुखदाता परमेश्वर! आप जिस से (विद्वान) सम्पूर्ण विद्या युक्त है, कृपा कर के (अस्मान् ) हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (सु, पया) अच्छे धर्म युक्त भाप्त लोगों के मांग से विश्वानि) सम्पूर्ण [वयुनानि] ज्ञान और उत्तम कर्म [नय] प्राप्त करायें और [अस्मत्] हम से [जुहुराणं] कुटलतायुक्त [एनः] पाप रूप कर्म को [युयोधि] दूर कीजिये इस कारण हम लोग [ते] आपकी [भूयिष्ठां] बहुत प्रकार की स्तुति रूप निमा उक्तिम्] नम्रतापूर्वक प्रशंसा[विधेम] सदा किया करें और सर्वदा आनन्द में रहें ॥८॥ .

[८] स्वस्तिवाचनम्। अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमंत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥१॥ मापार्थ-जो इस संसार का धारण कर्ता वांछित पदार्थों का दाता पृज्यों का पूज्य दानादि गुणयुक्त सवका ग्रहणकर्ता रमणीक पदार्थों का धारक अत्यन्त प्रसिद्ध अग्नि परमेश्वर है उससे हम याचना वा स्तुिति] करते हैं ॥१॥ स नः पितेव सूनवेऽने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥२॥ ३० म० ५। सू० १ ० 11 भाषार्थ-हे अग्ने परमेश्वर ! आप हमारे लिये पिता पुत्र के सदृश अच्छी पीति से युक्त हो हमार कदापि नाश मत करो ॥२॥ स्वस्ति नोमिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः स्वस्ति पूषा असुरो दधा- तु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना ।।३।। .

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भावार्थ-धौभौर पृथिवी का धारक परमेश्वर हम
सब का मंगल करे, पविध ऐश्वर्यवान् देवी प्रका-
शक खण्डित चितशक्ति सर्वत्र व्यापक [पूषा] पुष्टि
कारक धुलोक भूलोक यह सम्पूर्ण प्रज्ञानघन परमेश्वर
की कृपा से हम सब के स्विस्ति] अविनाशकारी हों ॥३॥
स्वस्तये वायुमुपद्रवामहै सोमं स्वस्ति
भुवनस्य यस्पतिः । बृहस्पतिं सर्वगणं स्व-
स्तये स्वस्तय श्रादित्यासो भवन्तु नः ॥४॥
भाषार्थ-वायु का वायु, स्वामियों का स्वामी,
बड़ों का बड़ा, आदियों का प्रादिस जो परमेश्वर है,
उससे हम सब योगक्षेम के लिये प्रार्थना करते हैं॥४॥
विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो
वहरग्निःस्वस्तये। देवा अवन्त्वभवःस्वस्तये
स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः ॥५॥
मापार्थ-सम्पूर्ण विद्वानों का प्राधार वैश्वानर
अग्नि नामक तथा देव विशेष ऋभुरुद्र इन सब का
वाच्य जो ईश है, उसकी कृपा से हमारे सम्पूर्ण पाप
विजय को प्राप्त हों ॥५॥

। [ १० ] स्वस्ति मित्रा वरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति । स्वस्ति न इन्द्रश्वामिश्च स्वस्ति नो अदिते कृषि भाषार्थ-सर्व मित्र सर्व सुखदाता धर्य धनखरूप जगत्लष्टा सर्व प्रकाशक है [मदित] अखण्डित स्वरूप परमेश्वर आप हमारा मंगल करें || स्वस्ति पन्थामनुचरेमं सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनर्ददतानता जानता संगमेमहि ॥७॥ ऋ० मं० ५ सू०५१ माषार्थ-हे परमेश्वर आपकी दया दृष्टि से सूर्य चन्द्रमा के समान अच्छे मार्ग में आपका स्मरण करते हुये हम सब मानन्द मंगल पूर्वक विहार करें अनेक देश देशान्तरों में दान तथा स्वधर्म रक्षा करते हुये निज पन्धुजनों से पुनः सम्मिलित हों ॥७॥ ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः । ते नो रासन्तामुरुगाय- मद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ ० नं. ७ ३६ mar [ ११ ] भाषार्थ-हे परमेश्वर ! भाप के अनुग्रह से पुज्य देवों के पूजनीय तथा मननशील मनु के भी याजक मरण रहित सत्य के ज्ञाता जो देव हैं वे सम्पूर्ण विपुल कीर्तियुक्त पुत्रादि पदार्थों के लाभ में महकारी तथा कल्याण युक्त पदार्थों की रक्षा में भी युक्त हा॥८॥ येभ्यो माता मधुमपिन्वते पयः पीयूषं औरदितिदिवहींः । उक्थशुष्मान् वृषभरा- स्वप्नसरतां आदित्या अनुमदा स्वस्तये॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर ! [माता] माता पृथ्वी तथा मेघों से प्रसन्त दृढ़ [:] द्युलोक पिता ये दोनों [पीयूपम] माधुर्य युक्त [पयः] अमृत इन्य पदार्थ को उत्पन्न करते हैं । असन्त बलिष्ठ घष्टि के दाता शोभन कर्म अदिति पुत्र मूर्य लोक हमारे सब के कल्याण कारक आपके अनुग्नह से हो ॥६ नृचक्षसोअनिमिपन्तोअहणाबृहदेवासो अमृतत्वमानशुः । ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वाणं वसते स्वस्तये ।।

[ १२ ] मापार्य-रे परमेश्वर ! मापके अनुग्रह से मनुप्यों के दबानेवाले, जागरणशील, पूज्यतम, विद्वान,दीप्य- मान स्ययुक्त ज्ञानी] अकुरित बुद्धिवाले पापररित उन्नत देश को संसार के कल्याणार्य स्वबुदिपमा से परिपूर्ण करते हैं ॥१०॥ सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिवृता दधिरेदिवि क्षयम् । तां श्राविवास नमसा सुवृक्तिभिर्महो आदित्यां अदिति स्वस्तये।। भाषार्थ-स्वतेज से सम्यक् प्रकाशमान, अत्यन्त हद दिव] विद्वान सर्व प्रकार से अर्हिसित होकर या में उपस्थित होते हैं, वहीं मुख स्थान में निवास करते है, तथा गुणाधिक्य से प्रसिद्ध उन देवों को इवि-रूप अन्न से और परमेश्वर की स्तुति से तुम सब उपा- सना करो ॥१२॥ को वास्तोमं राधति यं जुजोषय विश्वे देवासो मनुषो यतिष्ठन । को वोऽध्वरं तुवि- जाता अरंकरद्यो नः पर्षदंत्यंहा स्वस्तये ॥१२॥ भाषार्थ-परमेश्वर देवताओं को तर्क पूर्वक उपदेश

[ १३ ।
है कि के विद्वानो! हे मननशील ! तुम सब की जो
संख्या है उस में कौन विद्वान स्तुति समूहका साधन
करता है, जिस का तुप सब सेवन करते हो अर्थात्
घेद वाक्य, वहीं वेद है वह जन (देवों) तुम सब को
यज्ञ में अत्यन्त शोभित करता है तथा (यज्ञ पुष्कल)
मानन्द के लिय वैदिकमार्ग में आप सब ये मैं प्रवृत्त
करता हूँ॥१२॥
येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुःसमिद्धामिर्म-
नसा सप्तहोतृभिः। तत्रादित्याअभय शर्म
यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये ॥१३॥
भाषार्थ-हे जगदीश ! सम्पर देदीप्यमान
मननशीलों के उपदेशक माप ही ने विद्वानों को सप्त
होतामों के द्वारा मन से प्रथम यज्ञ का उपदेश कियावही
प्रादित्य परमेश्वर के पुत्र स्थानापम हम सब को
निर्भय मुखदान करें तथा मुख का कारण जो मार्ग
है वह भी बतावें ॥१॥
य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्था-
तुर्जगतश्च मन्तवः । ते नः कृतादकृतादे-
नसस्पयुद्या देवासः पिपृता स्वस्तये॥१४॥

[ १४ ]
भाषार्थ-डे परमेश्वर ! स्थावर वृक्षादि, जंगम
मनुष्यादि विविध जीवों के आधाररूप सम्पूर्ण लको
के स्वामी जो विद्वान्, सत्र के ज्ञाता, प्रकृष्ट ज्ञानवान,
हैं वे स्वशिक्षा वा उपदेश से कायिक, वाचिक,मानसिक
पापों से बचा कर हमको सदैव आयु वृद्धि के लिये
परिपूर्ण करें ॥१४॥
भरेष्विन्द्रं सुहवं इवामहेंऽहोमुचं सुकृतं
दैव्यं जनम् । अग्नि मित्रं वरुण सातये
भगं द्यावापृथिवीमरुतः स्वस्तये ॥१५॥
भाषार्थ-पापमोचक परमैश्वर्यवान् शोभन मा-
हानयुक्त परमेश्वर को हम अपनी रक्षा के लिये
अाह्वान करते हैं तथा अन्न लाभ और अविनाश के
लिये परमेश्वर कृत अग्नि सूर्य जल ऐश्वर्य [लोक,
भूमि, वायु, इनको भी स्वरक्षार्थ याचना करते हैं॥१५॥
सुत्रामाणं पृथिवी द्यामनेहसं सुशर्माण-
मदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरिशम-
नागसमस्रवन्तीमा रहमा स्वस्तये ॥१६॥

[ १५ ]
भाषार्थ-हे स्वयम् अविनाश स्वरूप परमेश्वर!
माप की दया से हम लोग शोभन रक्षा युक्त, पाप
रहित, पृथ्वी पर, शोभन सुरथ युक्त (स्थान युक्त)
परमेश्वर कृत अखण्डित मुख स्थान पर, पाप रहिस
नौका के सदृश युनोक में प्रानन्दकैलिये मारूद हो १६
विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं
नो दुरेवाया अभिहतः। सत्यया वो देवहू-
त्या हुवेम वणवतो देवा अवसे स्वस्तये१७
भाषार्थ-हे परमेश्वर ! पाप की दया से सम्पूर्ण
यजनशील विद्वान्, हिंसायुक्त दुर्गनि से बचा कर
रक्षा का उपाय दरशा तथा शत्रुओं से रक्षा कर
जीवन वृद्धि के लिये परमेश्वर की यथार्थ भूत (देव-
हूती) वाणी श्रवण करते हुए हम आप का आह्वान
करते हैं। १७॥
अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपाराति
दुर्विदत्रामघायतः पारे देवा द्वेषो अस्मद्यु
योतनोरुणः शर्म यच्छता स्वस्तये ॥१८॥

।
भाषार्थ-हे परमेश्वर ! रोगवत वाधक, विद्वानों
के महाशत्रु, यज्ञ इवि के प्रदाता, लोभ बुद्धि तथा
पापियों की दुष्ट बुद्धि, सम्पूर्ण द्वेष्टा, इन सब को
हम से पृथक् करो और विस्तीर्ण मुख, भोग के
लिये दान करो ॥१८॥
अरिष्टःस मत्तों विश्व एधते प्र प्रजाभि-
र्जायते धर्मणस्परि । यमादित्यासो नयथा
सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये ।१३।
भाषार्थ-परमेश्वर का उपदेश है, कि सम्पूर्ण
मनुष्य हिंसा रहित धर्मिक प्रथम धन भांदि से बढ़ता
है, उसी धर्म के अत्यन्त धारण करने से पुत्रादि वर्ग
से प्रसिद्ध होता है। वह कौन है कि जिसको विद्वान्
लोग सम्पूर्ण दुष्ट मार्गों से बचाकर मुख भोग के
कारण शोभन नीति से सन्मार्ग में प्राप्त करते हैं।
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता
मरुतो हि ते धने । प्रातर्यावाण स्थमिन्द्र-
सानसिमरिष्यन्तमा रहेमा स्वस्तये ॥२०॥

[१७] भाषार्थ-परमेश्वर का उपदेश है, कि विद्वानों! मन लाभ के कारण उस रथ को तुम तथा मनन- शील जन संग्राम में रक्षा करो। ई इन्द्र ! जो युद्ध का का.स, हिसित बैठने के योग्य स्थ है, उसी पर आप भार भाप के सहायक सब भारूढ होवें ॥२०॥ स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यमु वृजने स्वर्वति । स्वस्ति नः पुत्रकृथेषुयोनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन ॥२१॥ भापाथ-वे परमेश्वर ! सजल निर्जल देव, वया केवल जल शत्रुवजित शत्रधारी सेना बल, पुत्रोत्पादक स्त्री गर्भ, इन सब को आए कल्याणार्थ युक करें तथा भोगार्थ धन का दान दीजिये ॥२१॥ स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णावत्यभि या वाममेति । सा नो श्रमासो अरणे निपातु स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥२२॥ ऋ०म० १०॥ मू०६३॥ .

में
[ १८ ]
भापार्थ-हे परमेश्वर ! पाप की दया से जो
पृथ्वी, गमनशीनों के अच्छं मार्ग दान में क्ल्यान
स्वरूप, अत्यन्त श्रेष्ठ धन पाली, यज्ञ का आधार
भूमि है तथा हमारे सब के गृहरक्षा कारण, वही
पृथ्वी रमण करने योग्य देशों के हेतु तथा भ्रमण
रक्षक सब के शोभन निवास का कारण है।
इषेत्रोजे त्या वायवस्थ देवा यः सविना
प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण प्राप्यायध्वमध्न्या
इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमी वा अयक्षमा मा
वस्तेन ईशत माघशसो ध्रुवा अस्मिन
गोपतौ स्यात् बहीर्यजमानस्य पशुन् पाहि॥
यजु० अ०१ म० १॥
भाषार्थ-संहार में प्राणीमात्र सुख क अर्थी
हैं सुख बिना, कारण के नहीं होता अतः मुख का
कारण प्रथम जानना चाहिये । प्रत्यक्षतः सुख का कारण
भोजन आच्छादन है। परन्तु चे कार्य पदार्थ हैं,
कार्य पदार्थ का बिना कारण के होना असम्भव
है, अतएव इस मंत्र में कारण पदार्थ का निरूपण
-

[ १६ ] किया जाता है। वेद में तीन प्रकार के विषय हैं, बर्म, ज्ञान, उपासना । उन में प्रथम कर्मकाण्ड ( यज्ञ का वर्णन ) सम्पूर्ण कार्य पदार्थों का कारण है। (अनी प्रस्ताहुतिः सम्यक् श्रादित्यमुपतिष्ठते आदिसा- ज्जयत हटः वृष्टेरनं ततः मजा) , इसका अर्थ यह है कि अग्नि में हुत पदार्थ सूर्य रश्मि द्वारा आदिस में उपस्थित होता है, प्रादिस से दृष्टि, दृष्टि से अन्न पन्न से वीर्य, वार्य से प्रजा, अतएव यज्ञ का करना परोपकार के द्वारा सम्र्ण सुखों का मुख्य कारण है। इसी से परमेश्वर ने प्रथम वर्मकांड का निरूपण कर पश्चात ज्ञान उपासना का निरूपण किया है। कर्म चार प्रकार के हैं, १ संसार के विरुद्ध वधवन्धन के हेतु चाादि कर्म निन्दित हैं २ प्रशंसा के हेतु बन्धु- वर्गादि का पोषण रमणीय है, आदि का बनाना श्रेष्ठ है ४ वेद विहित योगादि रूप कर्म श्रेष्ठतम हैं अतः वैदिक कर्म करने को वद से परमेश्वर मनुष्यों के लिये विधान करता है। अतएव उचित जानकर, परपदयालु परमेश्वर से जीव- नोपाय की हम सब प्रार्थना करते हैं। उस प्रार्थना वापी कप तड़ाग ह . । २० ] अनुसार परमेश्वर इस सब वो श्रेष्ठकम करने की आज्ञा देता है। उसी वैदिक अमिष्ठोमादि यज्ञ के करने से हम सब को परमेश्वर की प्रानानुसार रोग रहित मनावाले स्त्री पुत्र पवा.दे सकल पदार्थ दृद्धि के कारण उपलब्ध होंगे। चौर, व्याघ्रादिक पदार्थों से संदव रक्षित रहेंगे। यज्ञ के साधक यावत् पदार्थ पश्चादिको की वही परमेश्वर रक्षा करेगा। प्रतएव उसी परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं। श्रा नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽद- ब्धासोऽअपरीतास उद्धिदः । देवा नो यथा सदमिवृधेऽसन्नप्रायुवो रक्षितारो-दिवेदिव।। भाषार्थ-हे ईश्वर ! अन्य यज्ञ के कारण फल से अनुमित, सर्वतो निर्विन समाप्त, कल्याण कारक या वा सङ्कल्पों के हम सब अनुष्ठाता भर्थात् करनेवाले हो। अतएव उक्त कर्म का फलदाता परमेश्वर सदैव हम सब अनालसियों का वृद्धिकारक वा रक्षक है ।।२४ देवानां भद्रा सुमतियतां देवाना रातिरमि नो निवर्तताम् ।देवाना सेख्य- मुपसेदिमा वयंदेवा न आयुः प्रतिरन्तु जीयसे [ २१ ] भाषार्थ-हे परमेश्वर ! उत्तम कर्म करनेवाले विद्वानों की कल्याणकारिणं, बुद्धि तथा दानशक्ति भी मुझको दे हम सब उक्त विद्वानों के सखा होकर आप के उपदेशों से चिरजीवी हो पायु को बढ़ावें ॥२॥ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पति धियन्जि न्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेद सा मसदवृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥२६॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर ! स्थावर जंगम के पति, बुद्धि संतोषक आग हमारे खामी हैं । अतएव हम सब रक्षा के लिये आप ही का आह्वान करते हैं (पृषा) पुष्टिकारक ज्ञान वा धन के रक्षक, सर्व पालक, स्वयं अहिंसित आप हमारी वृद्धि वा मंगल के कर्ता हो ॥२६ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति ना पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्ट- नेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥२७॥ भाषार्थ-प्रसन्त कीर्ति युक्त इन्द्र, विश्ववेद वा घन का ज्ञाता, (पूषा अरिष्ट नेमि) अहिंसित मर्यादा [ २ ] (ताक्ष्य) वृहस्पति, देव, पालक इनका वाच्य जो पर- भेश्वर है, वह हम सब कागल करे ।। २७ ।। भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पर्य माक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा मस्तनू- भियंशमहि देवहितं यदायुः ॥२८॥ यजु० अ०२५०१४।१८1१६॥२१॥ भाषार्थ-हे जगदीश ! अापके कृपाकटाक्ष से कल्याण कारक अनुकूल वाक्यों को सुने, तथा प्रिय पदार्थों को नेत्रों में देखें, बढ़ अंगहस्त आदि शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, पूर्गायु होकर विद्वानों के समान आपको पास हो ॥२८॥ २३ ११ ३ १२ ३१२ ३२ ३१२ श्रम आयाहि वीतये गृगानो हव्य दातये १२३ निहोता मत्सि बहिपि ॥२९॥ भाषार्थ-हे अग्ने, परमेश्वर ! आप की में प्रार्थना करता हूं। मैंने जो कुछ हवनीय पदार्थ यज्ञ में दान किया है, उसको यथावत स्वीकार का, मेरी मार्थना को फल-दान से सफल कीजिये [ २३ ] ३२ ३ २२ ३२ ३ २ ३२ त्वममे यज्ञाना होता विश्वेषा ७ हितः । । देवेभिर्मानुषे जने ॥ ३०॥ साल छन्द प्रा०प्रपा० १ मं० २२ भापार्थ-हे अग्ने, परमेश्वर ! अनिष्ठोमादिक सम्पूर्ण यज्ञों के भापही ता अथात् उपदेष्टा तथा ऋतिजों के द्वारा मनुष्यमात्र के, उक्त यज्ञों से, आप ही प्रिय कर्ता हैं॥०॥ ये त्रिषप्त : परियन्ति विशा रूपाणि बिभ्रतः। वाचस्पतिवला तेषां तन्वो अद्यदधातु मे ॥३१ अथव० का०सू. वर्ग:अनु०११पा०१०१ भाषार्थ-विज्ञानेन्द्रिय,पञ्चकर्मेन्द्रिय,पञ्चतन्मात्रा, पञ्चधारा, इक्कीसवां जीव, यही इक्कीस सम्पूर्ण रूपों के धारण पोपण की, सर्वत्र गमन करते हैं, इन सब का स्वामी परमेश्वर है, वही परमेश्वर हमारे सम्पूर्ण शरीरों को सुरक्षित को ॥३१॥ इति स्वस्तिचनवाम P L ५४ ) अथ शान्तिप्रकरणम्। शन्न इन्द्रामी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रा वरुणागतहव्या । शमिन्द्रा सोमा सुविताय शंयोः शन्न इन्द्रा पूषणा वाजसातौ ॥१॥ भाषार्थ-हम सब के लिए (इन्द्र) परमेश्वर्यवान (अग्नि) व्यापक रक्षा के द्वारा शान्तिदायक हों, यज- मानों के हव्य ग्राहक इन्द्र तथा वरुण तथा इन्द्र सोम शान्ति और कल ाण के दायक हों । इन्द्र और पूषा भी युद्ध व अन्न लाभ में सुखद हों ।।१।। शन्नो भगः शमु नः शन्नो अस्तु शन्नः पुरन्धिःशमु सन्तुरायः। शन्नः सत्यस्य सुय- मस्य शंसः शन्नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु ।। भाषार्थ-सृष्टिकर्ता परमेश्वर सुखद हो, उसीकी कृपा से (भग) एश्वर्य, मनुष्यों के उपदेश, अधिक बुद्धिमान, धन शोभन यथोक्त सत्य का वोधक वचन ये सभी मुखदायक हों ।।२ -

हो ॥३॥
[२५]
शत्रो धाता शमु धी नो अस्तु शन्न
उरूचीभवतु स्वधाभिःशं रोदसी बृहती शं
नो अदिः शन्नो देवानां सुहवानि सन्तु ॥३॥
भाषार्थ-(पाता) जगत् का धारणकर्च (पी)
नया विशेष रूपसे धारण पोषणादि करदेवाला पर-
मेश्वर तथा वृहत् (रोदसी) आकाश, भन्न सहित
पृथ्वी पर्वत विद्वानों को और इम सक को भलीभांति
सुखदायक
शन्नो अमिज्योतिरनीकोअस्तु शन्नोमित्रा
वरुणावश्विनाशम् । शन्नः सुकृतां सुकृतानि
सन्तु शन्न इपिरो अभिवातु वातः॥४॥
भाषाय-ज्योतिप्रधान अमि, मित्र, वरुण,झुलोक,
मूलोक मुवतियों के पुस्य गमनशील वायु परमेश्वर
की कृपा से ये सब सुखदायक हो ॥४॥
शन्नो द्यावापृथिवी पूर्वहृतौ शमन्तरिक्ष
दृशयेनोअस्तु । शन्न ओषधीवनिनो भवन्तु
शन्नों रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः ॥५॥

[स
भाषा-सब के कारण घौ, भू देखमे का कारण
अन्तरित भौषधि वृक्ष लोक रक्षक (इन्द्र) सूर्य या
सब परमेश्वर की दया दृष्टि से मुखदायक हो ॥५॥
शन्न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्ये-
भिर्वरुणः सुशंसः शन्नो रुद्रो रुदेभिर्जलापः
शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु ॥६॥
भाषार्थ-स्वकीतियों से पोतनादिगुणयुक्त (इन्द्र)
सूर्य जीवों के सहित शोभन स्तुति युक्त (परुष)
मुखदाता प्राणोंसे (रुद्र) दुःखदायक यज्ञ में विदुखियों
के सहित विद्वान परमेश्वर की कृपा से मुखदायक हों
और परमेश्वर हमारी स्तुति को श्रवण करे ॥६॥
शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नःशंनो
ग्रावाणःशमुसन्तु यज्ञाःशनःस्वरूणां मित
यो भवन्तु शं नः प्रस्वः शम्बस्तु वेदिः॥७॥
भाषार्थ-हे परमेश्वर ! सोपस्तोत्र, सोमरस निका-
सने के पाषाण यज्ञ खम्भों के परिमाण मोषधि बेदी
यह.सब आपकी कृपा से यम के साधन भूत पुस .
दायक हो ॥७॥

[ २७ ].
शं न सूर्य उरुषक्षा उदेतुशं नश्वतत्रः
प्रदिशो भवन्तु । शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु
शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः ॥८॥
मापाय- परमेश्वर ! असन्त तेजस्वी सूर्य हम
सब कस्पाणार्य पदय को प्राप्त हों तथा चारों
दिशा दतर पर्वत नदी जल यह भी सुखदायक हो।।८।।
शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिःश नो भवंतु
मरुतः स्वः शं नो विष्णुः शमुपूषा मो
अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः ॥४॥
भाषार्थ-योमन कर्मों से भदिति सर्वात्मक पर-
पेपर मुखकारक हो तथा भसन्त प्रशस्त महान व्या-
पक विष्णु पुष्टिकारक पूषा लोक भन्तरिक्ष अल
पा. यह भी शुभकास हो ।
शं नो देव सविता त्रायमाणः शं नो
भवंतूपसो विभातीः ।शं नः पर्जन्यो भवतु
प्रमाभ्यः शं नःक्षेत्रस्य पतिरस्तुशम्भुः॥१०॥

[२६] - 1 मापार्य-रक्षक सर्वोत्पादक क्रीडादि गुणयुक्त पहोवर तथा परमेश्वरीय प्रकाशमान प्रातःकालामुख- कारी हो सुखोत्पादक हो (क्षेत्रपति) कारणों का कारण ईश तथा मेष यह मजामात्र को मुखदायक हों ॥१०॥ शं नो देवा विश्वदेवा भवंतु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु । शमभिषावःशसु रातिषाचः शनो दिव्याः पार्थिवाशं नो अप्याः॥११॥ भाषार्थ-अत्यन्त स्तुति युक्त देव विद्वान अर्थ सहित परमेश्वरीय वाणी यज्ञकादाता, धुलोक,भूलोक अन्तरिक्ष में जो उत्पन्न हुए तथा पूर्वोक्त पदार्थ सब सुखदायक हों॥११॥ शं नः सत्यस्य पतयो भवंतु शं नोवतः शमु संतु गावः। शं न ऋभव सुकृताः मुहस्ताः शं नो भवंतु पितरो हवेषु ॥१२॥ भाषार्थ-ससवादी अश्व मौ [मुकृती] शोमन परतयुक्त विद्वान तथा पूर्वज ये सब हमारी पियवाणी श्रवणं कर सुखदायक हो ॥१२॥ 14 [ २६ ] शं नो अज एकपाद्देवो अस्तुशं नोऽहि- बुनयः शं समुद्रः। शं नो अपानपात्पेरुरस्तु शं नः पृश्निर्भवतु देवगोपाः ॥१२॥ ऋ० म० ७ ० ३५ मं०.१-१३ मापार्य-प्रज एकपात अहिर्बुध्न्य समुद्र उपद्रवों से रक्षक (अपां नपासदेवगोपा) विद्वानों की रक्षा करने वाली पनि अर्थात वायुओं का कारण ये सव मुख दायक हो ॥२३॥ इंद्रो विश्वस्य राजति शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदें ॥१४॥ भाषार्थ-मननशीलपाणिमात्र सर्वस्वामी परमेश्वर से पुत्रं पश्वादिकों के मुख की प्रार्थना करते हैं ॥१४॥ शं नोवातः पवता ७ शं नस्तपतु सूर्यः। शंन कनिक्रदहेवः पर्जन्योऽअभिवर्षतु ।। भाषार्थ-हे परमेश्वर ! वायु, सूय्य प्राणिमात्र को मुखदायक हों क्या अत्यन्त्र गर्जनशील मेघ मच्छी रवि करें ॥ १५॥ ..

[३] . . अहानि शं भवन्तुनः श रात्रीः-प्रति- धीयताम् । शं न इन्द्राग्नी भवतामवोमिः शन इन्द्रा वरुणा रातहव्या । शन्न इन्ना पूषणा वाजसातो शमिन्द्रा सोमा सुविताय शंयोः ॥ १६ ॥ भाषार्थ- परमदयालो! भापकी कषा में रक्षा युक्त दिन रात्रि इन्द्र पनि गृहीत इम्य इन्द्र परुन मन दान के सहकारी इन्द्र पूपा कल्याणदाता इन्द्र सोब। ये सब रोग भय नाश पूर्वक हम सबके करयाणवर्ग में। मन्त्र में इन्द्र शन्द कई पार भाया है। इन्द्र से मेष, सूर्य, जीव ब्रह्म राजा का ग्रहण पथा सम्भव संघटित कर लेना ।। १६॥ शं नो देवीरभिष्टयऽभापो. भवंतु पीतये। शंयोरभिस्रवन्तु नः ॥ १७॥ भाषार्थ-रे जगदीश्वर ! पाप हमारे रोग भव नाश करते हुए हम सब को पूर्णानन्द मदान करो। अथवा भाप के माये हुए दिव्य गुण विशिष्ट जन्म वा अन्तरिक्षीय पदार्थ रोग भव मात्र पूर्वक मुख साधक हो॥२७॥ -। - ३ [ ३१ । द्यौः शांतिरंतरिक्ष शांतिः पृथिवी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः। वनस्पतयः शांतिर्विश्वेदेवाः शांतिब्रह्म शांतिः सर्व शांतिः शांतिरेव शांतिः सामा शांतिधि ।। भाषार्थ-चौ, मन्तरित, पृथ्वी, जल, भोपधि, बनस्पति, सम्पूर्ण वेद, प्रम वेद, परमेश्वर, सम्पूर्ण अगर शान्ति और इनका स्वरूप भो शान्ति पा इनमें रहनेवासी जो शान्ति । वह शान्ति परमेश्वर के कृपा कटाव से हम सब को भी उपलब्ध हो ॥१८॥ तच्चतुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदःशत भृणु- याम शरदः शतं प्रबवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥ यजु० म०३६ । मं०८१।११।१२।१७१२४ मापार्थ-जो सूर्य सर्व प्रकाशक नेत्र स्थानापन्न भासमान पूर्व दिशा में अर्थात् पूर्व दिशा का कारण भूत उदय कर्ता है, उसका रचनेवाला वा उसका भी 4 - 4 [ ३२ ] प्रकाशक परमेश्वर अपनी दया दृष्टि से हम सर्व को सौ वर्ष देखना, जीना, सुनना, कहना इनका सामर्थ्य दे तथाइम सब सौ वर्ष से अधिक पराधीन न हों॥१॥ यजाग्रतो दूरमुदति दैवं तदु मुप्तस्य: तथैवेति दूरंगमंज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥१॥ शापार्थ-(जाग्रतः) अनिन्दित पुरुष का जो मन विषय वासना द्वारा दर देशों में चला जाता है वहीं भकाशक मन सुषुप्त पुरुष के स्वन काल में विषय वासना जाल को त्याग कर पुन: अपने नियत स्थान पर भा जाता है अतएव उक्त मन (ज्योतिः) भकाशक सम्पूर्ण इन्द्रियों का भी प्रकाशक दूरगामी वही हमारा एक मन सदैव धर्मानुष्ठान वा परमेश्वर के बान में समग्न हो ॥२॥ येन कर्माण्यपसोमनीषिणो यज्ञे कृण्वंति विदथेषु धीराः। यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां . लन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२॥ , - 1

मापार्य-कर्मफर्ता मनीपी मनको वश करनेवाले
मानवान् विचार पूर्वक निस मन से यज्ञानुष्ठान करते
है, वही हमारा मन सम्पूर्ण इन्द्रियों का प्रवर्तक श्रेष्ठ
मना के भन्तः शरीर में वर्तमान सदैव परमेश्वर के
ज्ञान या धर्मादिशुम कमा में संलग्न हो ॥२॥
यत्मज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिर-
न्तरमृतं प्रजासु । यस्मान्न ऋतकिञ्चन धर्म
क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।२२||
मापार्य-जो मन चेतः स्वरूप धैयत्पित्ति का
कारण प्रभा वर्ग के भन्तःकरण में मरण धर्म रहित
प्रकाशित है, मिस मन के बिना कोई भी क्रिया नहीं
होती है, वही हमारा मन संसारोच्छेदक ब्रह्मज्ञान वा
मुख प्राप्ति के कारण में सन्निविष्ट हो ॥ २२ ॥
येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतम-
मृतेन सर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्तहोता
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२३॥

. - ३० ] भाषार्थ-जिस अमरणधर्मा मन ने भूत भविष्यत् वर्तमान काल के सम्पूर्ण पदार्थों का अनुभव किया है तथा सप्त होता साध्य अग्निष्टोम यज्ञ का भी विस्तार किया है, वही हमारा मन सर्वदा धादि अनुष्ठान वा ईश्वर भक्ति में संलग्न हो ॥ २३ ॥ यस्मिनृचः सामयजूषि यस्मिंप्रतिष्ठिता स्थनाभाविवाराः । यस्मिंश्चित्त सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२४॥ भाषार्थ-जैसे रथ के चक्र नाभि अर्थात् पहिया के मध्य स्थूल काष्ठ में आस पास दंडे. चारों तरफ से छिदे होते हैं वैसे ही मन में ऋक् यजुः साम भी चारों : तरफ ओत प्रोत भाव से स्थित हैं । वस्त्र में जिस प्रकार प्रोत प्रोत भाव से मृत विद्यमान है, वैसे ही प्रजाओं के मन में ज्ञान वर्तमान है, वही हमारा मन वेद प्रतिपाद्य शुभ कर्म तथा सत्य ज्ञानानन्तरूप परमेश्वर में संलग्न हो॥२४॥ सूषारथिरश्वानिव यन्मनुष्याननीयतेऽभी- . 1 ३५ ] शुभिर्वाजिन इव । हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ट तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥२५।। य० अ० ३४। मं० १-६॥ भाषार्थ-जिस प्रकार सारथ्य क्रिया युक्त सारथी 'अश्वों को बागडोरि के सहारे से वांछित देश को ले जाता है तथा उसी बागडोरिके रथ युक्त श्रश्चों को निस 'तरफ को घुमाना चाहता है उसी तरफ़ को घुमा देता है, वैसे ही अत्यन्त धेगवान हृदिस्थ जरा अवस्था रहित मन रूपी बागडोरि से जीव मन के साथ सम्बद्ध होकर घुमा कर संपूर्ण इन्द्रियरूपी घोड़ों को विषय रूपी सड़कों पर घुमा कर वांचित अर्थ को ग्रहण करता है, वही इस सत्र का मन परमेश्वर सम्बन्धी श्रषण मनन निदिध्यासनमा (यज्ञ) यागादिशुम कौमें सदैव परमेश्वरकी कृपासे अभिरमण करे। , स नः पवस्व शङ्गवे शं जनाय शमवते श राजेनोषधीभ्यः ॥२६॥ साम० उत्तराचिके. पपा १ मं१॥ '.

३६ भावार्थ-डे राजन् ! प्रकाशमान भाप हमारे गौ पुत्रं घोड़ा ओषधियों को मुख युक करो ॥२६॥ अभयं नः करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावाप- थिवी उभे इमे। अभयं पश्चादभयं पुरस्ताद- चरादधरादभयं नो अस्तु ॥२७॥ भापार्थ-हे जगदीश्वर! अन्तरिक्ष द्युलोक भूलोक तथा पूर्व, पश्चिम, उत्तर, अधर इन्हों से हम सब को भय शून्य करो ॥२७॥ अभयं मित्रांदर्भयमामित्रादमयं ज्ञाताद भयं परो यः । अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु ॥२८॥ अथर्व० का १६सू० १५ ०५।६॥ भाषार्थ-मित्र शन्तु प्रत्यक्ष दिन रात्रि हम सब को भय शून्य हों तथा सम्पूर्ण दिशामों में हमारे पित्र हो, शाह न हो ॥२८॥ ॥ इति शान्ति प्रकरणांम् ।।

[ ३७ )
अथ प्राचमन मन्त्राः।
ओ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा
अर्थ-डे (अमृत) मुखमद जलतू (उपस्तरणम)
प्राणियों का प्राश्रय भूत (असि) है (स्वाहा) यई
३मारा कथन शोभन हो ।
श्रों अमृतापिधानमसि स्वाहा।
अर्थ-हे (अमृत) अमृत तु (अपिधानम्) निश्चय
पोषक (मसि) है।
ओं सत्यं यशः श्रीमयि श्रीः श्रयतां स्वाहा
अर्थ-(माये) मुझ में (सयं सच्चाई (यश)
कीर्ति (श्री) शोमा [श्री:] लक्ष्मी (श्रयताम) स्थित
हो।भों यह परमात्मा का सर्वोत्तम नाम है।
अथ अंग स्पर्श मन्त्राः।
ओं वाङ्मश्रास्येऽस्तु ।
अर्थ-(मे) मेरे (पास्ये) मुख में (वाक् ) वाद
इन्द्रिय, मुस्थित (प्रस्तु) हो।
मओं नसो में प्राणोऽस्तु ।

( ३८ )
अर्थ-(मे) मरे (नसो.) दोनों नासिका के छिद्रा
में (पाण:) प्राण वायु वा प्राणेन्द्रिय स्थिर (मस्तु)
हो।
'ओं अक्षणो, चतुरस्तु ।
"अर्ध- मे। मेरे (अक्ष्णोः) नेत्र गोसकों में (बहु)
चक्षुरिन्द्रिय सुस्थित (अस्तु) हो।
ओं कर्णयोमें श्रोत्रमस्तु ।
'अर्थ-(मे)मेरे (कर्णयोः दोनों कानों में श्रोत्रम)
'श्रवणेन्द्रिय मुस्थित [अस्तु हो ।
ओं बाबा बलमस्तु ।
अर्थ-मे] मेरे [वाहोः] दोनों भुजाओं में बलमा
दक्ष शक्ति [अस्तु ।
ओं ऊोंमें प्रोजोऽस्तु ।
अर्थ-मे मेरी [जों:] जवाओं में [भोजः
वेग [प्रस्तु] हो।
ओं अरिष्टानि मे अंगानि तनूस्तन्वा
मे सह सन्तु।

( ३९.),
अर्थ-मे] मेरा [तन्ः] देह, और मै तन्वाः]
मेरे देह के [अंगानि] अववव [सह] साथ ही [अरि-
शानि] अनुपहत अबाधित [सन्तु] हों।
विधि-इन मन्त्रों से दहने हाथ से जल स्पर्श.
करके मार्जन करना फिर विधि पूर्वक समिधा चुने ।
अथ हवन मन्त्राः।
ओं भूर्भुवः स्वः।
विधि-इस मन्त्र का उच्चारण करके ब्राह्मण,
क्षत्रिय वा वैश्य के घर से अग्नि लाकर अथवा घृत.
का दीपक जलाकर उससे कपर लगाकर किसी पक,
पात्र में घर उस में छोटी २ लकड़ी लगा के यजमान.
वा पुरोहित उस पात्र को दोनों हाथों से उठाकर
यदि गर्म हो तो चिमटे से पकड़कर अगले मन्त्र से
अग्न्याधान करे, वह मन्त्र यह है।
ओं भूर्भुवः स्वधोरिव भूना पृथिवी-
वन्यरिम्णा । तस्यास्ते पृथिवी देययजनी
पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाधायादधे १
य० अ०३ । ०५
.
.

.
( ४० )
अर्थ-हे [देवयजनी] विद्वान लोग जिस में या
करते हैं ऐसी [पृथिवी] पृथिवी [तस्यास्ते] असिष्ट
सिरी [पृष्ठे]पीठ पर [भूः भुवः स्वः] पृथिवी, अन्तरिक्ष
और स्वर्ग लोक में स्थित [भूम्मा, द्यौरिच] नक्षत्रों के
बाहुल्य से जैसे प्राभाष विराजमान है ऐसे ज्वाला
बाहुल्य से विराजमान [परिम्णा, पृथिवीच अपने
बड़प्पन से जैसे पृथिवी सयका प्राधार है, वैसे सर्वा-
• श्रय.भूत [अनादम्] यवादि अन्नों को भस्म करने
पाले [अग्निम् अग्नि को [अन्नाद्याय] शुद्ध भक्षण
योग्य प्रश्नोत्पत्ति के लिये [भाद] मैं यजमान
स्थापित करता हूं।
विधि-इस मन्त्र से वेदी के बीच में भनि
को घर उस पर छोटे २ काष्ठ और थोड़ासा.कर्पूर
या घी डालकर अगला मन्त्र पढ़कर व्यजन से भाग्नि
प्रदीप्त करे ॥
षों उबुभ्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टा-
पूर्ते ससृजेथा मयं च । अस्मिन्सधस्थे

[ ४१ ] अध्युत्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत्।। य० अ० १५ । मं० ५४ । अर्थ-[अ] अग्ने हे तु [उत्रुध्यस्व] प्रकट हो, और प्रतिनाहि] सब प्रकाशित हो [अयम्,त्वं च] यह यजमान और तू [इष्टापूर्ते] यज्ञादि कार्य और धर्मार्थ स्थान बनाना भादि शुभ कार्यों को संस्थाम] उत्पन्न करो [आरमन सधस्थे] इस अग्नि सहित स्थान में तथा [अधिउत्तरस्मिन्] इस से भी उत्तम स्थान में ईश्वर करे कि विश्वे देवाः] सव विद्वान लोग [यज- मानश्च] और यजमान [सीदत] बैठे। विधि -जब भन्न समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे तब चंदन की अथवा पलाश प्रादि की तीन लकड़ी आठ र अंगुल की चूत में डुबोकर उग में से एक २ ले नीचे लिखे प्रथम मन्त्र से एक और दुसर वा तीसरे मंत्र से दूसरी समिधा धरे और चौथे से तीसरी धरे 'तत्पश्चात् । ओं अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्ते- मध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्द्धय । चास्मान् प्रजया - ( ४२ ) पशुभिब्रह्मवर्चसेनानायेन समेधय स्वाहा।? इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम। इस मंत्र से एक समिधा अग्नि में डाले। अर्थ-[जातवेदः] हे अग्ने [अयम्, इध्मः] यह काष्ठ [ते, आत्मा] तेरा प्राधार है [तेन] इस काष्ठ से [इध्यस्क] प्रदीप्त हो [वर्द्धस्व च] और बढ़ [अस्मान च] और हम को [इः] बढ़ा हुआ [प्रजया] पुत्रादि से [वय] बढ़ा और [पशुभिः] पशुओं से [ब्रह्मवर्च- सेन] बड़ी कान्ति से [अन्नाचन] अन्न आदि से हमें [सम्, एधय] अच्छे प्रकार बढ़ा [स्वाहा] यह हमारा दिया हुआ बहुत हो। (इदमग्नये, जातवेदसे इदन्न मम) यह दिया हुभ्र पदार्थ जातवेदा (उत्पन्न हुए सब पदार्थों के साथ सम्बन्ध करनेवाले) अग्नि के लिये है, मेरे लिये नहीं अन्त्य वाक्य का अर्थ सर्वत्र ऐसा ही समझ लेना चाहिये। ओसमिधानि दुवस्यत घृतबोधयतातिथिम् [ ४३ ] श्रास्मिन हव्या जुहोतन स्वाहा ॥२॥ इदमग्नये इदन्न मम। विधि-इस मन्त्र से और अगले से । नों सुसमिद्धाय शोचिपे घृत तीव्र जुहोतन। अग्नये जातवेदसे स्वाहा ॥३॥ इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम विधि-इस मन्त्र से अर्थात् इन दोनों मन्त्रों से दुसरी घरे। अर्थ-हे मनुष्यो ! (मुसमिद्धाय) पाच्छे प्रकार जलाये हुए (शोचिपे) दीप्तिवाले, शुद्ध (जातवेदसे) सब में विद्यमान (अग्नये) अग्नि के लिये (तीव्र घृतं) सब प्रकार से शुद्ध किये हुए घृतको (जुहोतन) होमो। श्रोतन्त्वासमिद्भिरगिरो घृतेन वर्द्धयामसि । बृहच्छोचा यविष्ठय स्वाहा। इदमग्नयेऽगिरसे-इदन्न मम। यह तीनों मन्त्र य० अ०३।० १-२ । इस मन्त्र से तीसरी समिधा को परे। ~

[ ४४ ]
अर्थ-हे (अङ्गिरः) सब को प्राप्त होनेवाले वा
गमनशील अग्न तम्,वा) गाईपत्य, आहवनीय आदि
रूप से प्रसिद्ध तुझ को (सुसमिद्भिः) समिधामों से
और (घृतेन) घृत से (बर्द्धयायसि बढ़ावें । हे अग्ने
(वृहत) प्रकाश, दनादि गुणों के कारण बड़े और
(यविष्ठय अति बलवान तुम शोच) प्रकाशित होनो ।
विधि--इन मन्त्रों से समिक्षाधान करके होम.का
शाकल्य जो कि यथावत् विधि से बनाया हो, सुवर्ण
चांदी कांसा आदि धातु के पात्र में अथवा काष्ठ में
बेदी के पास सुरक्षित धरें. ऊपर लिखित घृतादि
जो कि उष्ण कर छान पूर्वोक्त सुगन्ध गादि पदार्थ
सहित पात्रों मेंरक्खा हो, उस घृत, अन्य मोहन भोग
आदि जो कुछ सामग्री हो) उन में से कम से कम
६ मासाभर अधिक से अधिक छटांक भर की आहुति
देवे, यही आहुति का प्रमाण है। उस घृत में से
चमचा कि जिस में ६ मासा घृत पाच ऐसा वनवाया
हो भर के नीचे लिखे मन्त्र से पांच आहुति देनी ।

[ ४५ ]
ओं अयन्त इध्म अात्मा जातवेदस्ते-
मध्यस्थ वर्द्धस्व चेद्ध बर्द्धय । चास्मात् प्रजपा
पशुभिर्बलवर्चसेनान्नान समेश्य स्वाहा ।।
इदमनये जातवेदसे इदच्च मम ।
विधि-तत्पश्चात् ममाल में जल लेके हवन कुंड
के चारों ओर छिड़कावें । वे मन्त्र निम्न लिखित हैं।
ओं अदितेऽनुमन्यस्व ।
अर्थ-(अदिते ) हे प्रखण्डनीय परमात्मन् !
आप हमें अहिंसादि सम्पादनार्थ (अनुमन्यस्व). अनु-
कृल मात दीजिये।
ओं अनुमतेऽनुमन्यस्व ।
अर्थ-(अनुमते) हे अनुगत व्यापक ज्ञानस्वरूप
अनुकूल
मति दीजिये।
ओं सरस्वत्यनुमन्याव ।
अर्थ-सरस्वति ) हे प्रशस्त ज्ञानस्वरूप !
(अनुमन्यस्त्र अनुकूल मतिः दीजिये ।
ओं देव सवितः प्रसुव यज्ञः प्रसुव
.
(अनुपन्यस्त्र

[ ४६ ]
यज्ञपति भगाय दिव्यो गन्धर्वः केतपूः
केत नः पुनातु वाचस्पतिवाचं नः स्वदतु ।।
यः १०३० मं० १
अर्थ-हे देव) प्रकाशक (सक्तिः) सर्वोत्पादक
ईश्वर ! आप (भगाय) ऐश्वर्य के लिये (यज्ञम्)
शिल्पादि विविध यज्ञों को प्रामुव उत्पन्न कीजिये
और (यज्ञपतिम्) यज्ञों के पालक राजा को (अ,आमुव)
उत्पन्न कीजिये (दिव्या) शुद्ध (गन्धर्वः) पृथ्वी के
धारक (केत,पू:) विज्ञान क पवित्र कर्चा हो (नः)
हमारी (केतम्) बुद्धि को (पुनातु) पवित्र करो और
आप (वाचस्पतिः) वाणी के स्वामी हो अतः (नः)
इमारी (वाचम्) वाणी को (स्वदतु) मधुर बनायो ।
विधि-इस मन्त्र से वेदी के चारों ओर जल
छिड़कावें। इस के पश्चात सामान्य होमाहुति गर्भाधान
श्रादि प्रधान संस्कारों में अवश्य करे। इस में मुख्य
होम के आदि और अन्त में जो आहुति दी जाती है
उनमें से यज्ञ कुण्ड के उत्तर भागमें जो एक पाहुति
और यज्ञ कुण्ड के दक्षिण भाग में दूसरी आहुति
देनी होती है । उनका नाम आधारावाज्याहुति

[४७ ] कहते हैं, और जो कुण्ड के मध्य में आहुतियां दी जाती हैं उनको प्राज्य भागाहुति कहते हैं। सो घृत पात्र में से सवा को भर अंगुष्ठ, मध्यमा और अनामिका से सवा को पकड़ कर- ओं अग्नये स्वाहा ।। इदमन्नये-इदन्न मम । अर्थ-(अग्न) प्रकाशक परमात्मा के लिये वा भौतिक अग्नि के लिए ( स्वाहा ) मुहुत हो । ओं सोमाय स्वाहा ॥ इदं सोमाय इदन्नममा अर्थ-(सोमाय ) सोमरसादि के लिये वा पर- मात्मा की प्रीत्यर्थ ( स्वाहा ) मुहुत हो ! ऑप्रजापतये स्वाहा। इंदप्रजापते-इदन्न मम अर्थ-(प्रजापतये) प्रजामों के पालक के लिये। ओं इन्द्राय स्वाहा । इदमिन्दाय-इदन्न मम अर्थ-(इन्द्राय) ऐश्वर्य सम्पन्न परमात्मा के लिये विधि-इन में से प्रथम से अग्नि के उत्तर भाग में आहुति डालें । द्वितीय मन्त्र से दक्षिण भाग में प्राहुति' डालें तृतीय वा चतुर्थ मन्त्रों से मध्य में आहुति देखें।

[ ४८ ] ओं भूरनये स्वाहा ।। इदममये इदन्न मम । ओं भुवर्वायवे स्वाहा ।। इदं वायचे-इदन्न मम । श्री स्वरादित्याय स्वाहा । इदमा- दित्याय इदन्न मम । ओं भूर्भुवः स्वरमिवारवादित्यभ्ये स्वाहा इदमाग्नि वाय्वादित्यभ्य इदन्न मम । अर्थ-(१) (अग्नि अग्नि स्वरूप ईश्वर के लिए। (२) (वायु ) व्यापक ईश्वर के लिए। (३) आदित्यवर प्रकाशक ईश्वर के लिए। (४) सर्व गुण सम्पन्न ईश्वर के लिए। विधि-यह चार घृत की आहुतिये देकर स्विष्ट कृत होमाहुति एक ही है । यह घृत की अथवा भात की देनी चाहिए। ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यदा न्यूनमिहाकरम् । अमिष्टत् स्विष्टकाविद्या- सर्व स्विष्ट सुहृतं करोतु मे । अमये स्विष्ट- [४६ ] सुहृतं करोतुमे । अग्नये स्विष्ट कृते सुहृत- हुने सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनौकामानांसमर्द्ध- यिन्ने सर्वान्नः कामान समर्द्धय स्वाहा ।। इदमग्नये स्विष्टकृते-इदन्न मम । अर्थ-(यत् ) जो (अस्य कर्मणः) इस कर्म के दिपय में (प्रत्यरीरिचम) मैं ने अधिक किया। (यद्वा) अथवा ( न्यूनम् इह) यहां थोड़ा (भकरम् ) किया गया ( सवै, स्विष्टम् ) सव इष्ट वस्तुओं को (विद्वान) जानने वाला और (स्विष्टकत ) अच्छे इष्ट पदार्थों का करने वाला अग्निः ) परमात्मा (तद) उस सब को ( मे ) मेरे लिए (मुहृतम् ) अच्छे प्रकार ( करोतु ) करे और (स्विष्टकृते ) शोभन यज्ञ सम्पादक ( मुहुतहुते ), मुहुत को ग्रहण करने वाले (कामानां ) इण्य माण (सर्व प्रायश्चित्ताहुनीनाम् ) सर्व प्रायश्चित्त की प्राहुतियों को ( समर्द्धयित्रे ) बढ़ाने वाले (अग्नये ) भौतिक अग्नि के लिए (मुहुत हो) हे ईश्वर ! (नः) हमारे ( सर्वान कामान ) पाखिल हितकार्यो को (समय) बढ़ाओ। ।

. (५०) इस से एक आहुति करके प्राजापत्याहुति नीचे लिखे मन्त्र को मन में बोल कर आहुति देनी चाहिए। ओप्रजापतयेस्वाहा।।इदं प्रजापतये इदन्न ममा विधि-इस से मौन होकर आहुति देकर चार भाज्या- हुति घृत की देवें । परन्तु जो नीचे लिखी पाहुति चौल समावर्तन विवाह में मुख्य हैं वे चार मन्त्र यह हैं। ओंभूर्भवःस्वः। अग्न अायूंषि पवसासुवो- जमिषं च न ारे बाधस्वदुच्छनां स्वाहा।। इदमग्नये पवमानाय इदन्न मम । अर्थ-हे (अग्ने अग्ने तू (आयूषि) जीवनों को (पवसे) रक्षा करता है तू (न) हमारे लिए ऊर्जम पल को (च) और (इषम्) अन्नादि को (आसुत्र) प्राप्त कराये। हमारे (दुच्छनान् ) राक्षसों को हम से (पारे) दूर (चाधस्त्र ) पीड़ित कीजिए ॥१॥ ओं भूर्भुवः स्वः । अग्निषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः । तमीमहे महागयं स्वाहा ॥ इदमग्ने पवमानाय-इदन्न मम ।

[११]
अर्थ-(अग्निः । अग्नि (ऋषिः) सर्वत्र व्याप्त
है, (पवमानः ) शोधक हैं, (पाञ्चजन्यः ) चारों
वर्णाश्रमी, और तदितर जन एवं पांचों प्रकार के
मनुष्यों में कार्य साधक हैं । (पुरोहितः ऋत्विगा-
दिकों से अपने सन्मुख इष्ट सिद्धि के लिए रक्खा
जाता है । (तम्, महागयम् ) उन विद्वानों से स्तुति
के योग्य अग्नि से हम ( ईमहे ) धनादि की याचना
करते हैं ॥२॥
ओ भूर्भुवः स्वः । अग्ने पवस्व स्वपा
अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधयिं मयि पोषं
स्वाहा ॥ इदम ग्नये पवमानाय-इदन्न मम
अर्थ-[३] [अग्रि] हे अग्ने तू [स्वपाः ]
मुन्दर काम करने वाला है, [अस्म ] हम में [मुवी-
यम् ] अच्छे वल वाले [ वर्चः ] तेज को [ पवस्व ]
माप्त करामो [ मयि ] मुझ में [ रयिम् ] धनादि
को और [ पोपम् ] गवादि की पुष्टि को [ दधत् ]
धारण करो॥३॥

ओं भूर्भुवः स्वः। प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणां स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये-इदन्न मम । अथ-[प्रजापत यस मन्त्र का भय पूर्व कर पाये। विधि-इन मन्त्रों से घृत की चार माहुति करके नीचे लिखे आठ भाज्याहुति सर्वत्र मङ्गल कार्यों में देखें। नों त्वन्नोऽने वरुणस्य विदान देवस्य हेडोऽवयासिसीष्ठाः । यजियो वह्नितमाशो- शुचानो विश्वा देपांसि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा ।। इदमग्निवरुणाभ्यां-इदन्न मम अर्थ-हे [अग्ने] प्रकाशमान राजन [विद्वान] हमारे सब कार्यों को जानने वाला है [ देवस्य] दिव्य गुणों वाले [वरुणस्य ] परमात्मा के [हेडः] अनादर से [ त्वम् ] तू [नः ] हम को [अवयास- सीष्ठाः ] पृथक् रख अर्थात् भाप ऐसी कृपा करें

1
.
[५३ ]
जिस से हम ईश्वर की भाज्ञानुकूल चलें [ यजिष्टः ]
तुम यज्ञ करने वालों में श्रेष्ठ हो और [ वह्नितमः ]
पविगदि उपयोगी पदार्थों के पैदा करने वाले हो
[शाशुचानः] अत्यन्त तेज वाले दो,भतःतुम [अस्मत् ]
हम से [ चिचा, द्वेपांसि ] सर द्वेष के कारण पापों
को [ प्रमुमुग्धि ] अच्छी तरह से हटायो ।
ओस त्वन्नोऽग्नेऽवमोभवोती नेदिष्टोस्या
उपसो व्युष्टौ । अवयक्ष्व नो वरुणं रराणो
वीहि मृडीकं सुहवो न एधि स्वाहा ॥
इदमग्नीवरुणाभ्याम्-इदन्न मम ।
अर्थ-[अग्गे] हे प्रकाशमान राजन स त्वन्नः]
पूर्वोक्त गुणों वाला तू (प्राती) अपने आगमन से (नः)
हमारा (अवमः) रक्षक(भवः) हो और (अस्या उपस:)
इस प्रभात काल के (व्युष्टी) अग्नि होत्रादि कामों में
(नेदिष्टः) निकट हो (न.) हमारे (वरुणम्) आचरण
करने वाले पाप को (अवयत्व) नष्ट करो और (रराणः)
यज्ञ करने वालों के लिये अत्यन्त फल देने वाले आप
(मृड़किम् मुख करने वाले इविः शेप भाग का (वीनि

[१४] स्वीकार कीजिय भार (न:) हमारे लिये [मुवा सुन्दर माहान से युक्त ऐधि] हो। ओइमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडयत्वाम- वस्युराचके स्वाहा ।।इदं वरुणायइदन्नमम । अर्थ-वरुण] प्रशंसनीय परमात्मन [में] मेरे [इमम, इवम] इस स्तुति समूह को अधि] आप सुन [च] और [अद्य] भान यज्ञ दिन में मृदय] हम सब को मुखी करें [अवस्युः] अपनी रता की इच्छा करता हुआ में [त्वाम) पाप को [भाचक] सन्मुख स्तुति करता हूँ। ओं तत्त्वा यामि ब्रह्मणावन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो इविभिः । अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मा न श्रायुः प्रमोपीः स्वाहा ।। इदं वरुणाय-इदन्न मम । अर्थ-वरुण] हे जगदीश्वर [ब्रह्मणा वेद से [वन्द- मानः] स्तुति करता हुआ मैं [तत्] उस भायु को [हविभिः] शाकल्य भादि से [यजमानः] यह करने वाला [प्राशास्त] चाहता है [३] इस यज्ञ आदि कर्मों में

[मोठमाना] हमारा नादर न करता हुमा त् [पोधि]
हमारी इच्छा को समझ, हे [उरुशंस] बहुतों से स्तुति
करने के योग्य निः) हमारे [मायुः] जीवन को
[मा प्रमोपी:] मत नष्ट करें ॥४॥
श्राये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा
वितता महान्तः । तेभिनों अद्य सवितोत
विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वकीः स्वाहा।।
इद वनणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो
देवेभ्यो मरुभाः स्वकेंभ्यः-इदन्न मम ।
भर्थ--[वरुण] हे स्वीकार करने योग्य जगदीश्वर
येते) जो वे (शतम) सैकड़ों और (ये,सहस्रम्) जो हजा-
रों (यज्ञियाः) यज्ञ सम्बन्धी [हान्तमः] बड़े (पाशा) मति
बन्धक रूकावट (वितताः) फैले हुए हैं (तभिः) उन से
[:] डम को [प्रय] भाज [सविता, उत, विष्णुः]
सर्वोत्पादिक और व्यापक पाप और विश्वे, स्त्रकाः
[मरुतः] सब अच्छे पूजनीय देवता विद्वान् लोग
[मुञ्चन्तु] छुड़ावें ॥५॥

[ ५६ ] ओं अयाश्चानेऽस्व नभिशस्तिपाश्च सत्य मित्त्वमयासि। अयानो यज्ञ वहास्यया नो धेहि भेपजस्वाहा ॥ इदमग्नये श्रवसे-इदन्न मम । अर्थ-[अग्ने] हे भौतिक अग्ने [त्वम्] तुम [अयः] वाहर और भीतर .सर्व स्थित [असि] हो च] और [अनभिशस्तिपाः] जिन का दोष नरहे ऐसे प्रायश्चित्त योग्य पुरुषों के पालक हो [च] और [] तुम [प्रया, असि] कल्याण कारक माने, तुम हमारे आश्रम होकर यज्ञ के साधन चरु आदि को जलादि देवताओं के लिये वहसि] ले जाते हो इस लिये नः] हमारे लिये भेपनम्] दुःख नाश रूप मुख को [धेहि] देशो ॥६॥ ओं उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधम विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य बते तवानागसेोऽदितये स्याम स्वाहा ।। इंदवरुणायाऽऽदित्यायादितये च इदन्न ममा प्रयः [२७] अर्थ-[वका] हे स्वीकार करने योग्य ईश्वर [अस्पत] हमलोगों में [भयपग] छोटे और मध्यमम] विचले दर्जे कउन] और [श्चमम् ऊंचे दों के [पाशम] बन्धन को पिपश्रयाय) अच्छे प्रकार नष्ट कीजिये [अथ] मौर (श्रादित्य ) हे शाविनाशी ईश्वर (तव, व्रते । तेरे भाज्ञा पालन रूपी व्रत में स्थित (वयम् ) हम लोग ( अनागमः ) उपद्रव रहिन होकर (अदितये) मुक्ति सुख के लिये ( स्याम् ) नियत होवें ॥७॥ नों भवतन्नः समनसौ सचेतसावरे- पसी । मा यज्ञहिणसिष्ठं मा यज्ञपति जातवेदमो शिवा भवतमच नः स्वाहा ।। इदं जातवेदोभ्यां-इदा मम । अर्ध-(न: ) हम लोगों के बीच में (अरेपसौ) पाप रहित ( सपनसौ । समान गनवाले अर्थात एक दुसरे के सहायक ( सचेतसौ ) समान बुद्धि वाले स्त्री पुरुष ( भवतम् ) हों और वे दोनों ( यज्ञम ) यज्ञ का (मा हिंसिष्टम , लोप न करें और (मा, -

[ ५८ ]
यज्ञपतिम्) यज्ञों के पालक को भी पीड़ा न पहुंचावें
(अद्य) आज यज्ञ के दिन, ऐसे ही स्त्री पुरुष (न:)
हमारे लिये (शिवा) शान्त रूप ( भवतम् ) हो।।।
विधि-सब संस्कारों में मधुर स्वर से मन्त्रोच्चा-
रण यजमान ही करे न शीघ्र न विलम्ब से उच्चारण
करे, किन्तु मध्य भाग जैसा कि जिस वेद का उच्चा-
रण हो, करे । यदि यजमान न पढ़ा हो तो इतने
मन्त्र तो अवश्य पढ़ लेवे । यदि कोई कार्य कर्ता जड़
मंद मति काला अक्षर भैंस बराबर जानता हो तो वह
शुद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो तो पुरोहित और
ऋत्विज् मन्त्रोच्चारण कर और कर्म उसी मूढ़ यजमान
के हाथ से करवावें । पुनः निन्न लिखित मन्त्रों से
मातःकाल हवन करे ।
अथप्रातःकालहविडालनेकेष्ठमन्त्र ।
ओं सूर्यों ज्योतिज्योतिः
सूर्यः स्वाहा।
अर्थ-(सूर्य:) चराचर, सकल संसारका आत्मा
सर्व व्यापक परमेश्वर (ज्योतिज्योतिः) चमकने वाले
लोकों का भी प्रकाशक है (सूर्यः, वह सब के भीतर

[ ५. ] स्थित हुमा २ प्राण जीवन का हेतु हो रहा है ऐसे परमात्मा की आज्ञा पालन करके सारे जगत के उप- कारार्थ यह दयन करता हूं। ओं सूर्यो वर्ची ज्योतिर्वचः स्वाहा । भर्य-(गर्यः तेजोमय परमेश्वर (वर्चः) विद्य मकान के देने वाला है ( ज्योतिः ) जैसे मूय क प्रकाश एक स्थान पर नहीं रहता, सर्वत्र फैल रह है। वैसे परमेश्वर (वचः ) ब्रह्म तेज देने वाल विधाओं का प्रचार हम से कराने वाला हो । ओं ज्योतिः सूर्यः सूर्योज्योतिः स्वाहा। भर्थ-( ज्योतिः ) जो ईश स्वयं प्रदाशमय (मूर्यः) और सकल संसार का ईश्वर है। (ज्योतिः) और प्रकाश तथा ऐश्वर्य का देने हारा है ऐसे अद्वितीय ब्रह्म की प्रसन्नता के लिये हम प्रेम करते हैं। ओं सजूदेवेन सवित्रा सजरुषसेन्द्रवत्या जुषाणः सूर्यों वेतु स्वाहा ।

, अर्थ-दिन] प्रकाश डालने वाला [ सवित्रा ] ब्रह्म बुद्धि से (उपता+इन्द्रवत्या) मुन्दर ऐचर्य युक्त रंग वरङ्गी उपा के साथ ( सजः ) मिला हुआ (सूर्य) मूर्य लोक (सजा) सर्वत्र समान (जुपाणः) सेवन करना हुआ वा व्याप्त हो कर इवन किये हुए पदार्थों का मानन्द से (वेतु ) देश देशान्तरों में पहुंचाने के लिये ग्रहगा करे । अथसायकालआहुतिडालनेकेटमल ओं अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा ।।१।। ओं अग्निव! ज्योतिर्वः स्वाहा ॥२॥ ओं अमिज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा ॥३॥ ओं सदेवेन सवित्रा सजूराजेन्द्रवत्या जुषाणो अग्नितु स्वाहा। अर्थ-सूर्य के स्थान पर यहां अनि शब्द प्रयुक्त किया गया क्योंकि सायकाल सूर्य अस्त होने के बाद यदि कोई ज्योति होती है तो वह भौतिक अग्नि ही होती है।

[६] अथ सायंप्रातः दोनों समय के मंत्र ओं भग्नये प्राणाय स्वाहा । इदमग्नये प्राणाय-इदन्न मम । अर्ध-[३अनि भौर माण वरूप परमात्मा है। उसका नाम भूः है। उन्हें हवि देकर भानन्द पूर्वक बुलाता हूं, वह मुख- दाई हो। [4] अगि स्वरूप परमात्मा प्राण है [ माण स्प प्राणः परमेश्वर प्राणों का भी पाण है और माण से प्रिय है उसे हवि देता हूं। ओं भुवयवे अपानाय स्वाहा । इदं वायवेपानाय-इदन्न मम । प्रथ-भुवः ) जो वायु तथा अपान है इन दोनों के समान जो हमारे शरीर में से रोग पाप तथा दुष्ट विचार दूर करने वाला वल दाता पिता है उस को नमस्कार हो।

- ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा । इदमादित्याय व्यानाय -इदन्न मम ॥ अर्थ-मुख स्वरूप परमात्मा को नमस्कार हो। हम उस आदित्य को जो व्यान के समान है, आहुति देते हैं । मानवी शरीर में जैसे व्यान रसों को सब अगों में ले जाता है, खून को गर्दिश देता है। ओं भूर्भुवः स्वरमिवावादित्येभ्यः प्राणा- पानव्यानेभ्यः स्वाहा ॥ इदमनिवारवा- दित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः-इदन्न मम अर्थ-शरीर में जो पांच माण और पांच उप- प्राण हैं, संसार के जो तीन लोक भूमि अन्तरिक्ष और घौ तथा तीन विधायें ऋक् यजुः साम हैं, जन सब का जो अधिपति परमात्मा है, जो कि सारे संसार और उसके पदार्थों से ही प्रकट होता है, उस ईश की स्तुति और पूजा सब लोग करें। ओं आपो ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः . स्वरों स्वाहा।

"
[ ६३ ]
अर्थ-[पापः] जल के समान सर्वत्र गामी सब
न्यापक और शान्तिदायक प्रभु है [रसः] जो ईश्वर
मन्यु रूप हो कर दुष्टों कोदगड देने वाला प्रत्येक पदार्थ
में रत रूप दो कार विराजमान हो रहा है । (अमृतम)
जो अजर, अमर, अविनाशी, शाश्वत, पुरागा, अनादि,
अक्षा, अजन्मा, नित्य, शुद्ध, बुद्ध स्वरूप, अनन्त
ध्रुव परमात्मा है । ब्रह्म, दृह, वृद्धि, धातुओं से ब्रह्म
शब्द सिद्ध होता है, जो सब के ऊपर विराजमान सबसे
बड़ा नन्त बल युक्त परमात्मा है उसे ब्रह्म कहत हैं।
ओं यां मेधां देवगणाःपितरश्चोपासते तया
मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ।।
अर्थ- [यां] जिस [मधां] अनेक विद्याओं के
धारगा करने की शक्ति वाली तत्काल दातों को ग्रहण
करने वाली बुद्धि को [ देवगगाः ] देवता लोग
[पितरश्च ] पितर लोग [उपासते] धारण करते हैं।
नया, मेधया ] उस सात्विकी बुद्धि से [ मामद्य ]
मुझ को आज [अग्ने] प्रकाश प्रदाता परमात्मन
[ मेधाविनं ] मेधा युक्त [ कुरु ] कीजिये ।
श्री विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद्भद्रं तन्न पासुव स्वाहा ।

[ ६४ ] ओं अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्य- स्मज्जुहुराणमेनो भूगिष्ठान्ते नम उक्ति विधेम स्वाहा इन दोनों मन्त्रों के अर्थ पहिले ईश्वर स्तुति, प्रार्थना, उपासना विषय में कर दिय हैं वहां देख लेवें। ओं सर्वं वै पूर्ण ॐ स्वाहा ।। अर्थ-सब निश्चय रूप से पूर्ण हो । इस मन्त्र से तीन पूर्णाहुति अर्थात् एक २ वार पढ़ के एक २ करके तीन आहुति देनी । इति शुभं भूयात् । 2 वनुकूल हवन सामग्री। समस्त १-बलीरा, २ सावीस पत्र, ३ पत्रज, ४ दान ५प्रावती, ६ गतल धोनी, ७ कपूर, चीड़, देव- बार, १. गियोय, १६ प्रगर, १२ नगर, १३ केसर, १४ एवजी, १५ गुग्गुल, १६ कस्तूरी, १७ तीनों चन्दन, १८ आषिनी, १६ आयफम, २० घूप सरल, २१ पुष्कर मूल, १२ कमलगट्टा, २३ मजीठ, २४ घनकचूर, २५ दालचीनी, ११ गुवरका शाख, २७ तेजफल, २८ शहापुष्पी, २६ चिरा- यमा 40 बस, ३१ गोसा, ३२ साण्ड, ३३ गोघृत, ३४ अनुफन, ३५मान या मोहनभोग, ३६ जड समिधा मुशक बामात्र शास्त्र] प्री-मुरा, बायडिंग, कपूर, चिरोंजी, नागरमोथा पायाचन्दन, सारा, निर्मवी, सतायर, मस, गिलोय,धूप दामचीनी, अवंग, कस्तूरी, चन्दन, तगर, भोजपत्र, भात कुशाफी जड़,नालीस पत्र, पमान, दारूहल्दी, लालचन्दन मजीठ, शिधारस, फेसर, जटामांसी, नेत्रपाला, लायची वही, उन्नाध, प्रामले, मुंगके लाडू, ऋतुफल, चन्दनचूर ज्यप्ठ मापाद ध-काबा अगर, पीली अगर, जौ, चीद, धूपसरल. मगर, देवदारु, गुग्गुल, नफछोकनी, रान, जायफल, मुंडी गोला, निमनी, कस्तूरी, मखाने, तेजपत्र, कपूर, धनकचूर घेल, जटामांमी, छोटी इलाची, बच, गिलोय, तुलसी के बीज, पायविडंग, फमन डन्डी,शहद, चन्दन रेवतका चूरा ऋतुफल, नागफेसर, ब्राझी. चिरायता, उड़द के लडडे Mon , - । छुहारे, सङ्खगहुली, मोचरस, विष्णुक्रांता, ढाक की समिधा गोघृत, खाण्ड, भात ॥ [श्रावण, भाद्रपद] शरद-चन्दन सफेद,चन्दन लाल,चन्दन पीला गुग्गुल नागकेसर, इलायची बड़ी, गिलोय, चिरौंजी, विदाग- फन्द, गूलरकी छाल, ब्राह्मी, दालचीनी, कपूर, कची, मोचरस, पित्त पापड़ा, अगर, भारङ्गी, इन्द्रजी, रेणुका, मुनका, असगन्ध, सीतलचीनी, जायफल, पंत्रज, चिरायता केसर, कस्तूरी, किशमिश, खाण्ड, जटामांसी, तालम- खाना, सहदेवी, ढाक की समिधा, धानको खाल, खीर, विष्णुशान्ता, कपूर, गोघृत, ऋतुफल, [आश्विन कार्तिक हेमन्त-कुट, मुसली, गन्ध काकिता, धुवाच्छ, पित पापड़ा, कपूर, कपूर कचरी नचिकनी, गिलोय, पटोल- पत्र, दालचीनी, भारङ्गी, मौंफ, सुनक्का, कस्तूरी, चीड़, गुग्गुल, अखरोट, गसना; शहद,पुष्करमूल, केसर, छुहारे गोखरू, कोंञ्चके बीज, फांटेदार गिलोय, पर्पटी, बादाम मुलहटी, काले तिल, जावित्री, लाल चन्दन, मुश्क बाला, तालीसपत्र, रेणुका, खोपा, विना नमक की खिचड़ी, ग्राम याखेर की सामधा, गोघृत, देवदारू, [मागशीर्ष पौष] शिशिर-अखरोट, कचूर, वायबिडंग, राल, मुण्डी, मोवरस, गिलोय, मुनक्का, रेणूका, काले तिल, कस्तूरी तज़, केसर, चन्दन, चिरायना, छुहारे, तुलसी के बीज, गुग्गूल, चिरौंजी, काकडासींगी, खाण्ड, सतावर, दारू हल्दी, शङ्खपुष्पी, पद्मास, कौंच, के वीज. जटामांसी, भाज पत्र, गुलर, बड़ समिधा, मोहन भोग (कड़ाह) गाघृत [माघ फाल्गुन] .. -

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Havan Mantra Arth Sahit

Author
Dayanand
Title
Havan Mantra Arth Sahit
File name
Havan Mantra Arth Sahit
Text
OCR done
Citation
1923
Published
2009/10
Publisher
Lahour, Vaidik Pustakalaya
Language
Sanskrit
Pages
68
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Sanskrit mantra
DLI number
345556
Barcode
99999990233891.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
C7tR8V2jpFy
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