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Vaidhyachandrodaya Vol Ii
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श्रीः॥ कविवरश्रीत्रिमल्लभद्दविरचितः वैद्यचन्द्रोदयः। (निदानप्रकाशापरनामधेयः।) माधुरकुलकमलदिवाकर- वडेचौबेश्रीकल्याणचन्द्रात्मज- भिषकविश्रीराधाचन्द्रविरचितया भाषाटीकया विभूषितः संशोधितश्च। मुम्बय्याम् पाण्डुरङ्ग जावजी इत्यनेन स्वकीये निर्णयसागरयत्रालये मुद्रयित्वा प्रकाशितः । द्वितीयावृत्तिः । संवत् १९८६, सन १९३०.
अस्य सर्वेऽप्यधिकाराः प्रकाशकेन खाधीना एव रक्षिताः ।
Publisher:-Pandurang Jawaji,
Printer:-Ramchandra Yesu Shedge,
Nirnaya-sagar Press,
26-28, Kolbhab Lane, Bombay.
श्रीः । सम्मतिपत्रम् । श्रीमत्कल्याणचन्द्रान्वयदिनमणिना राधिकाचन्द्रकेण भापाटीका कृतेयं सरलशुभगुणा वैद्यचन्द्रोदयस्य । अन्थोऽयं तेन जातोऽनुपमबहुगुणः सम्मतिं ह्येतदर्थे विप्रोऽहं कृष्णदासः समनिगमपटुः सन्ददामि प्रहर्षात् । १ । युग्माङ्गाङ्कब्रह्ममाने ह्यब्दे तपोऽसिते षष्ठथाम् । वाचामारे व्यलिखत्सुशेवधिकार्णिरौदीच्यः । २ । खिलचीपुरस्थ- महाकविश्रीयमुनादासात्मज- श्रीकृष्णदासस्य । राधाचन्द्रो भिषग्वर्यो गीतवाद्यविशारदः । वडेचौवे भुवि ख्यातो गुरुर्वन्द्यो हि भूभृताम् । १ । भाषाटीका कृता तेन वैद्यचन्द्रोदयस्य वै । अत्युत्तमा वैद्यहिता तस्यां वै सम्मतिं ददे । २ । खिलचीपुरस्थ- महाकविश्रीसरयूदासात्मज- नवनीतप्रियदासस्य। वैद्यचन्द्रोदयग्रन्थाः श्रीमत्रैमल्लकल्पितः । तस्य दीका कृता योग्या राधाचन्द्रेण धीमता । १ । तस्यां हि सम्मतिर्दत्ता श्रीयुतोद्धवशास्त्रिणा । फाल्गुनस्य सिते पक्षे चतुर्दश्यां भृगोदिने । २ । मधुसूदनगढनिवासिउद्धवशर्मणः ।
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श्रीः॥ भूमिका। आयुर्वेदके आठ अंगोंमें निदान आदिकारण है । इसके विना वैद्य सर्वथा यशलाभ नही कर सक्ता है। इस अभावके दूर कर- नेको माधवआदि निदानग्रन्थोंके मतानुसार आयुर्वेदोक्त संपूर्णरोगों- कां निदान व्यासी अवलोक और ३२६ स्रग्धराछंदोंमें कविवर श्रीत्रिमल्लभट्टने वैद्यचंद्रोदयनामक अद्वितीय काव्य रचा है । और अंतमें ग्रंथोक्त संपूर्ण रोगोंकी, १४ अनुष्टुभोंमें संख्या कही है। केवल संस्कृत मूल ग्रंथ वडे तपाससे पाया है। परंतु इसपर टीका टिप्पणी कुछमी नही थी। अतएव निघण्टुहृदय माथुरभास्कर वैद्य- हृदय तीन पुस्तकोंको मूल संस्कृतमें निर्माण करता और काव्यरसमंजरी विदग्धमुखमण्डन राधाकृष्णगणोदीपिका अनंगरंग रतिमंजरी वैद्यवल्लभ- घेरण्डसंहिता वृत्तरत्नाकर, वृत्तरत्नावली, शंकरीययुग्म श्रीयमुनाष्टक, मथुरामाहात्म्य, श्रीयमुनामाहात्म्य, श्रीयमुनापूजा, श्रीयमुनापंचांग प्रभृति पुस्तकोंके भाषानुवादक चारों संप्रदायके आचार्य और ५२ राजा आदिके मथुरातीर्थपुरोहित वडेचौबे श्रीराधाचंद्रजी वैद्य कविसे इसकी भाषाटीका बनवाई है। यह ग्रन्थ संस्कृत आयुर्वेदीय पाठशालाओंमें विद्यार्थियोंको पढाने योग्य है । और सर्वसाधारणके उपयोगी भाषा- नुवादसंयुक्त होनेसे होगया है । द्वितीयावृत्ति बहुत शोधन कर दीगई है। यह पुस्तक वैध कवियोंके हितार्थ मेनें अपने निजनिर्णयसागर यंत्रालयमें सच्चिक्कण कागजपर सुंदर सीसकाक्षरोंसे छापदिया है । इसे एकवार मंगाकर आद्योपांत पढकर मेरे व्यय और श्रमको सफल करोगे। और प्रमादसे जो मुद्रणादि दोष रहगये हों उसे विज्ञजन क्षमा करें । आपका पांडुरंग जावजी, निर्णयसागर यंत्रालय, कालिकादेवीरोड, मुम्बई.
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अथानुक्रमणिका। पृष्ठं. पृष्ठं. ६ ... ... " ... ... ... १ २ ... ... ... ... ... ... विषयः. मङ्गलावलोकः।। देवप्रणाम ग्रन्थप्रयोजन दुष्टमुखछेदन दूतावलोकः । २। उत्तम दूत अशुभ दूत दूतके वचनोंसे शुभाशुभ शकुनावलोकः । ३। ... ... " २ ... ... २ ३ " ... विषयः. दोमासको गर्भ तीन मासको गर्भ चार मासको गर्भ ... पाँच मासको गर्भ छ मासको गर्भ . सात मासको गर्भ आठ मासको गर्भ नो वा दश मासमे उत्पत्ति... योनिकी दशनाडी नाभिके ऊपर दश नाडी दश नाभिके नीचे नाडी पाँशूमें दो दो तिरछी नाडी सौ छोटे छेद ... आरोग्यता पुष्टता होना रोग होनेका वर्णन कालावलोकः । ५। ७ ... ... " ... ... " ६ ... ... ... ग :: ... ... ... ... " ७ ... ... .... समीप मृत्युलक्षण ... ... " " ... " " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " " शुभ शकुन शारीरावलोकः । ४॥ सृष्टि उत्पत्ति पंचतत्व वात पित्त कफ ... सप्तकला मलयुक्त धातु उपधातु त्वचा मर्म (कोमलाङ्ग) स्नायु (नश) जोड हड्डी आशय (स्थान) शिरा (नाडी) पेशी (मांसपिण्डी) कंडरा (गुहा) नाडी छोटे छेद ... जीवोत्पत्ति ... ... एकदिन रातका गर्भ पाँच रातका गर्भ दश दिनका गर्भ चौदह दिनको गर्भ ... एकमासको गर्भ ... ... ... ... " ... ... ... ... ९ ... ... ... एकदिनमें मौत दो दिन में मौत तीन दिन मौत चौथे दिन मौत पाँच दिनमें मौत छे दिनमें मौत सात दिनमें मौंतलक्षण भाठ दिनमें मौत नौ दिनमें मौत दश दिनमें मौत ग्यारह दिनमें मौत बारह दिनमें मौत तेरह दिनमें मौत चौदह दिनमें मौत पंद्रह दिनमें मौत सौलह दिनमें मौत सत्रह दिनमें मौत ... अढारह दिनमें मौत... उन्नीसवे दिन मौत बीशवे दिन मौत ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... " पृष्ठं. विषयः. पृष्ठं. ... ... १४ ... ... अजीर्णको मल माँतकारी मल दृष्ट्यवलोकः । ८॥ ... ... ... ... " ... . ... ... ... ... ... ... ... " ... ... " । ... " विषयः. इक्कीशवे दिन मौत बाईशवे दिनमें मौत... तैईश दिनमें मौत ... चौबीस दिन में मौत. पच्चीस दिनमें मौत छब्बीस दिनमें मौत एक मासमें मौत तीसरे मास मौत चौथे मासमें मौत पाँचमें मास मौत छटे मास मौत सातवे मास मौंत आठवे मास मौत नौवे मास मौंत दश मासमें मौत निश्चय मौत लक्षण मूत्रावलोकः । ६ । मूत्रदेखने के नियम ... ... ... " " ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... " . ... " ... ... ... ... ... " .." " वातज दृष्टि पित्तज दृष्टि कफज दृष्टि .... द्विदोषज दृष्टि... त्रिदोषज दृष्टि... असाध्य दृष्टि ... नाड्यवलोकः । ९। स्त्री पुरुषके वॉमे दाँमे हाथकी नाडी वातनाडी पित्तनाडी कफनाडी ज्वरनाडी कामनाडी द्विदोषजनाडी... त्रिदोषजनाडी मृत्युनाडी मंदाग्निजनाडी धातुक्षीणजनाडी रक्तजनाडी आमकी नाडी... दीप्ताग्निवारेकी नाडी... सुखकी नाडी.. चिंताकी नाडी ... शोककी नाडी दुर्बलकी नाडी मलपातकी नाडी वेगवारेकी नाडी तीन दिन में मोतकी नाडी क्रोधकी नाडी... १३ तृप्तिकी नाडी असाध्यावलोकः । १०॥ ... ... ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... " " " ... ... ... ३ ... ... ... ... ... ... R साध्य मूत्र कष्टसाध्य मूत्र असाध्य मूत्र वात मूत्र पित्त मूत्र कफ मूत्र रक्त मूत्र रोगीको मूत्र आरोग्यको मूत्र द्विदोषी मूत्र ... त्रिदोषी मूत्र अजीर्णको मूत्र साध्यासाध्य मूत्र ... मृत्युकारी मूत्र जीवनदाता मूत्र मलावलोकः ।। वातको मल ... पित्तको मल कफको मल रक्तविकारज मल द्विदोषज मल त्रिदोषज मल ... ... ... ... " ... ... ... " " ... ... " ... ... , ... ... ... ... ... R ... ... असाध्यलक्षण मृत्युदो नक्षत्र ... . ... ... मृत्युदा वारतिथि ... ... ... सामान्य असाध्य लक्षण ... ...
३ पृष्ठं. ... ... ... २४ " ... " ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... २५ ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ११ ... २६ ... ... ... । ... ... विषयः. पृष्ठं. विषयः. वर्णस्वरावलोकः । ११ । १७ | कंठकुब्ज तन्द्रिक... कोष्टक बनानेकी रीत ... जिन्हक... बालकोष्टक रुग्दाह सुकुमारकोष्टक अंतक युवाकोष्टक प्रलापक वृद्धकोष्टक चित्तभ्रम मृत्युकोष्टक कर्णक सुखकोष्टक अभिन्यास याप्यसाध्यावलोकः । १३ । १८ सन्निपातजोपद्रव याप्यलक्षण साध्यसन्निपात साध्यलक्षण कष्टसाध्यसन्निपात वातकोपकारणावलोकः कारणावलोकः।१३। १९ असाध्यसन्निपात वातकोपकारण मलपाकावधि पित्तकोपकारणावलोकः । १४ । १९| धातुपाकावधि... पित्तकोपकारण रसगतविपमज्वर कफकोपकारणावलोकः । १५ । रक्तगतसततक मांसगतइकांतरा कफकोपकारण २० मेदोगततृतीयक त्रिदोषकोपलक्षणावलोकः । १६ । २० मज्जागतचौथैया त्रिदोषकोपलक्षण अथवातिजारी. निदानपंचकावलोकः । १७ । २१ प्रलेपक ... रसगतके उपद्रव रक्तगतके उपद्रव पूर्वरूप मांसगतके उपद्रव उपशय भेदगतके उपद्रव संप्राप्ति अस्थिगतके उपद्रव मज्जागतके उपद्रव ज्वरावलोकः । १८॥ शुक्रगतके उपद्रव उत्पत्ति ... .... आगंतुजमेदाः... आठ मेद २२ आभिघातज पूर्वरूप... अभिपंगज वातज्वरलक्षण अभिशापज पित्तज्वरलक्षण २३ अभिचारज कफज्वरलक्षण इनके विकार वातपित्तज्वरलक्षण ज्वरके उपद्रव... वातकफज्वरलक्षण पच्यमानज्वर कफपित्तज्वरलक्षण प्रणहारीज्वर सन्निपातलक्षण २४ गंभीरज्वर रक्तष्ठीवी ... असाध्यज्दर नेत्रभुन... दोषपाकज्वरलक्षण शीतान धातुपाकज्वरलक्षण संधिग ... ज्वरमुक्तलक्षण " 7 निदान ... ... ... ... "" ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... " ... २७ ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... 3 ... ... " ... ... ... ... १ ... " ... ... ... " ... २७-२८ ૨ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... " ...
४ ३० वातज ... ३ ९ ... ... ... " " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... " ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " " ... m mr ... ... ... ... ... Rm ... ... ... " तिनके लक्षण... ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... " विषयः. पृष्ठं. विषयः. पृष्ठं. अतीसारावलोकः । १९॥ पित्तज अतीसारोत्पत्ति कफज छे भेद ... रसज पूर्वरूप बांतातीसार एक दिन में पकनेवाला पित्तातीसार नित्याजीर्ण कफातीसार अजीर्णोत्पत्तिः रक्तातीसार ३१ अजीर्णको रूप... सन्निपातातीसार अलसक असाध्यातीसार दंडाजीर्ण प्रवाहिकालक्षणभेदाः विलंबी ग्रहण्यवलोकः । २०। विशूची... जीवदाजीर्ण ३७ संग्रहणीको कारण मृत्युदाजीर्ण चार भेद कृमिरोगावलोकः । २४॥ वातजग्रहणी ... दो और चार भेद पित्तजग्रहणी कफजग्रहणी त्रिदोषजग्रहणी कारण वातपित्तजग्रहणी स्थान ... ... मौतकारीके लक्षण पाण्डुरोगावलोकः । २५॥ ३७ आमजग्रहणी ... लक्षण ... अावलोकः । २१॥ ३३ पाँच भेद अर्शके छे भेद ... वातज अशोत्पत्ति वातज ३५ कफज पित्तज त्रिदोषज कफज मट्टी खानेसे त्रिदोषज सहज रक्तज कामला... साध्य कुम्भकामला कष्टसाध्य हलीमक असाध्य पानकी... मृत्युकारी रक्तपित्तावलोकः । २६ । अग्निरोगावलोकः । २२। ... विषमानि पूर्वरूप ... तीक्ष्णाग्नि कफज मंदाग्नि ३५ वातज समाति पित्तज भसकरोग त्रिदोषज अजीर्णावलोकः । २३॥ ३५ अधोगामी छे भेद. ऊध्र्वगामी ... ... ... " ... ... " ... .:. ... ... ... ७ ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... उनके लक्षण मोंतकारीके लक्षण ... ... " " ... ... ... ... ... ... ... " ... ... :: ::: ... ... ... ... " ... " ... ... " ... " १ . ३५ कारण ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... " ...
विषयाः. पृष्ठं. विषयाः. पृष्ठं. ३९ ... १ " ... ... " ... ... ... " ... " ... ... " द्विमार्गों ... साध्य याप्य असाध्य उपद्रव यक्ष्मावलोकः :। २७ । उत्पत्ति साध्य असाध्य ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... ताके लक्षण ... ... " ... " ... " ... " ... ... ... " ... " ... " वातज पित्तज कफज शोष मैथुनशोषी शोकशोपी जराशोषी मार्गशोषी श्रमशोषी व्रणशोषी ... श्वासावलोकः । ३०। उत्पत्ति पाँचमेद महाश्वास ऊर्वश्वास छिना क्षुद्रा तमक याप्य स्वरभेदावलोकः । ३३ । ४५ उत्पत्ति साध्य असाध्य कष्टसाध्य अरोचकावलोकः । ३२ । ४५ पाँचभेद वातज पित्तज कफज त्रिदोषज भयाधजनित वमनावलोकः । ३३ । पाँचभेद ... वातज पित्तज कफज त्रिदोषज कृमिज असाध्य पाँचोंके लक्षण तृषावलोकः । ३४ । ... ... ... " ४२ ... ... " ... ... ... " ११ ताके स्वप्न " " दीनताको कारण यक्ष्मावंशवर्णन ... कासावलोकः । २८॥ ३ ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... उत्पत्ति भेद पाँच वातज पितज कफज रक्तज यक्ष्मज असाध्य ... " ... ... ... ... " ... ... ७ ... ... ... A ... ... हिक्कावलोकः । २९॥ ४३ " लक्षण सात भेद वातज ... ... " ४४ ... ... ... ... " ... ... ... ... " पाँचमेद अन्नजा (यमला) क्षुद्रा गंभीरा महती ... कफज क्षतज आमज ... " ... ... " ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... ... " ... ... " " ... " ... " ... " " " ... ... " " ... " ... ... ... " " ... ... ... ... ... " युक्तसे गुण " " ... " ... ... ... " ... " ... ... ... विषयाः. पृष्ठं. विषयाः, पृष्ठं. क्षयज ... ४६ / पिशाच .... ५० असाध्य असाध्यके लक्षण मूर्छावलोकः । ३५। अपस्मारावलोकः । ३९। ५० लक्षण लक्षण छे भेद चारमेद वातज वातज पित्तज पित्तज कफज ... कफज त्रिदोषज त्रिदोषज विषज पूर्वरूप मद्यज ... ताके काल ... संन्यास (तंद्रा) असाध्यके लक्षण निद्रा वातरोगावलोकः । ४० ।५० मदात्ययावलोकः । ३६ । ४७ अस्सी भेद ४८ रुरुस्तंभ अयुक्तसे दोष ... अंगभंग प्रथम मद कृशता द्वितीय मद पावशूल तृतीय मद अंगशूल चतुर्थ मद पक्षाघात तिनको अजीर्ण अपतानक ... दाहावलोकः । ३७ । बलहानि औषधकारण गद्द ... मिन्मिनत्व (कृशता) उन्मादावलोकः । ३८ । ४० कंप. उत्पत्ति জায় के मेद ४९ प्रलाप वातज कठोरता पित्तज अतिशुक्र वहाना कफज गंधनाश सन्निपातज वादनाश विषज अफरा ताके लक्षण दिवोन्माद).. खुजरी ... दैत्योन्माद विश्वाची गंधर्वज ... क्रोष्टशीर्ष यक्षज मुखपाण्डुत्व पितृज अतिमूत्र ... नागज निद्रानाश राक्षसज पसीना आना भूतज अंगगौरव ... " ... ... " ... " ... " ... ११ ... " ... ... ... ... ... ... ... " ... ... " ... ... " ... ... ... " " " " ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... ... ... " " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ११० पृष्ठं. विषयाः. पृष्टं. ... ... ५२ ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... १ ... ... " ... ... ... " ... :: खंजत्व... ... डकार. देहसंकोच बाह्यायाम अंतरायाम ब्रणायाम उत्संग (तूणी) प्रत्यूणी पित्तरोगावलोकः । ४१॥ " ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... " ... 1... ... ... ... ... . ... ... ... ... " ... ... ... " धूआँयुक्त डकार अंगपीडा मुखकटुता मुखलोहगंध पसीना,... अल्पनिद्रा दुर्बलता कांतिहानि तेजद्वेष (शीतेच्छा) अदृढता फट्योमल क्रोध रक्तस्त्राव ... ... " ... ... ... ... ... ... ... " विषयाः. शब्द न सुननो वीर्यकी कठोरता उवाशी... अति वायुगति. दृष्टिक्षय सुप्तिता ... चित्तचंचलत्व वीर्यक्षय कटिग्रह कुब्जत्व गृध्रसी आक्षेप तूनी अतिशीत वामनत्व भीरता जिव्हास्तंभ अपतंत्रक मुखतुवरता पाण्डुता पादहर्ष प्रत्याध्मान रूक्षता हनुस्तम्भ रोमहर्ष... ... मन्यास्तंभ मूर्धास्तंभ ... धनुस्तंभ वातकंप खंजत्व अष्ठीला... मलरोध... अवयवभ्रंश दंडापतानक अत्यष्ठीला अपबाहुक स्फुरण ॲत्रकूजनो मूकत्व बद्धविट् ... ... शिरापूर्णत्व प्रलाप ... " ... ... ... ... ... ... .... ... " ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... " ग्लानि'... ... ... " " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " " ... .. ... " " ... ... " ... ... ... ... .. ... ... ... ... " अंधता नखपीतत्व नेत्रपीतत्व मलपीतत्व दुर्गन्धि भौर अतृप्ति (हरितता) अदृढता (दाह) उष्णता अंधेरेमेदेखे उष्णद्वेष.. कंठशोप मुखशोष ५२ / पीतदेखनो अल्पशुक्र मूत्रपीत... अतिश्वास ... ... ... " " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " " :: ... ... ... ... ... ". ... ... . " ... ... ... ... " ... ... ... ११ ... ... . ... .... " पृष्ठं. पृष्ठं. ... " आठ भेद ... ... ... " ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... ... ... ... " ... ... " " ... ... " " ... ... "" ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... . ... " ... विषयाः. विषयाः. मुखगरमहोना ५२ शूलावलोकः । ४७। चंद्रसूर्यमंडलपीलादेखना कफरोगावलोकः । ४२। वातज आलस्य ५३ पित्तज मुखलेप कफज ... देहगौरव द्विदोषज मुखतिक्तता त्रिदोषज उष्णेच्छा (तृप्तिता) आम (अजीर्ण) ज मंदबुद्धित्व साध्य मुखमधुरता असाध्य... पसीना उपद्रव दिश्वेतदर्शी मौतकारी अतिनिद्रा पंक्तिशूल मूत्रशुक्ल अन्नद्रव... जिव्हाशुक्ल ज्वरत्पित्त अंगश्वेत उदावर्तावलोकः । १८॥ वीर्याधिक्य मलाधिक्य उत्पत्ति... घर्घराट ... जृम्भारोधज अचैतन्यता मूत्ररोधज बहुमूत्र मलरोधज छिकारोधज पिडिकावलोकः। ४३॥ वमनरोधज पिपासारोधज लक्षण वीर्यरोधज वातरक्तावलोकः । ४४॥ ५३/ डकाररोधज उत्पत्ति... असाध्य... उपद्रव. ५४ पूर्वरूप ऊरूस्तम्भावलोकः । ४५। गुल्मावलोकः । ४९। लक्षण उत्पत्ति... ... आव्यवात पाँच मेद वातज आमवातावलोकः । ४६। ५४ पित्तज उत्पत्ति .. कफज लक्षण त्रिदोषज बातज पित्तज असाध्य कफज द्विदोषज हृद्रोगावलोकः । ५०। त्रिदोषज उत्पत्ति... असाध्य पाँच मेद ... ༩ རྒྱུ རྒྱུ རྒྱུ རྒྱུ " ... ... ... " ... " ... ... " उत्पत्ति ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... " ... ... " ... ... ... ... " ... ... 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विषयाः. पृष्ठं. ... ... .." ... आठ भेद ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " R ... ... ... ... ... " " ... ... ... ... A ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... " मलाधिक्य ... ... ... " ... ... ... ... १ ... विषयाः. पृष्ठं. मुखगरमहोना ५२ शूलावलोकः । ४७॥ चंद्रसूर्यमंडलपीलादेखना ... ... ... कफरोगावलोकः । ४२। ५२ वातज आलस्य ... पित्तज मुखलेप कफज ... देहगौरव द्विदोषज मुखतिक्तता त्रिदोषज उष्णेच्छा (तृप्तिता) आम (अजीर्ण)ज मंदबुद्धित्व साध्य मुखमधुरता असाध्य... पसीना उपद्रव दिश्श्वेतदर्शी मौतकारी अतिनिद्रा पंक्तिशूल मूत्रशुल अन्नद्रव. जिव्हाशुक्ल ज्वरत्पित्त ... ... अंगश्वत उदावावलोकः । १०॥ बीर्याधिक्य उत्पत्ति ... घर्धराट ... जृम्भारोधज अचैतन्यता मूत्ररोधज बहुमूत्र मलरोधज पिडिकावलोकः। ४३॥ छिकारोधज वमनरोधज उत्पत्ति .. पिपासारोधज लक्षण वीर्यरोधन वातरक्तावलोकः । ४४॥ ५३ डकाररोधज उत्पत्ति... असाध्य... उपद्रव ... ... ... पूर्वरूप .. ऊरूस्तम्भावलोकः । ४५॥ गुल्मावलोकः । ४९। ५८ लक्षण उत्पत्ति... ... आट्यवात पाँच भेद वातज आमवातावलोकः । ४६। पित्तज उत्पत्ति. कफज लक्षण त्रिदोषज वातज पित्तज असाध्य कफज ... द्विदोषज हृद्रोगावलोकः । ५०। त्रिदोषज उत्पत्ति... ... असाध्य ... ... पाँच मेद ... ... ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ” ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... . " ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... " ५५ द्विदोषज ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... " ... ... " विषयः. पृष्ठं. विषयः. पृष्ठं. ६२ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... वातज पित्तज ... कफज त्रिदोषज कृमिज ... मूत्रकृच्छ्रावलोकः ।५१॥ उत्पत्ति ... " ... ... " ... ... " ... ... " ... ... ... ... ... " आठ भेद ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ६० ... ... ... " ... ... ... ... " " ... ... " ... ... ... " " ... " ५८ कष्टसाध्य असाध्य पूर्वरूप... वीशभेद इक्षुमेह वारिमेह ५९ सांद्र (गाढो) मेह सुरामेह. 'पिष्टमेह... शीतमेह शुक्रमेह मेदमेह ... ... लालामेह सिकतामह क्षारमेह ६० । उदकमेह नीलमेह कालमेह हारिद्रकमेह मांजिष्ठमेह रक्तमेह... वसामेह मज्जामेह मधुमेह ... ६१ हस्तिमेह पित्तजउपद्रव कफजउपद्रव वातजउपद्रव (प्रमेह पिटिका) शरावी विदारी विनता सर्पपी संवृता पुत्रिणी ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... ६४ ... ... ... ... वातज पित्तज कफज शाल्यज ... त्रिदोषज (अश्मरीज) वीर्यज .. मूत्राघातावलोकः । ५२ । मूत्राघातोत्पत्तिः वातकुण्डली अष्ठीला... वातबस्ति मूत्रातीत कुक्षिमूत्र मूत्रोत्संग मूत्रक्षय. मूत्रग्रन्थि मूत्रशुक्र उष्णवात मूत्रासाद विडिघात .. बस्तिकुण्डली असाध्य अश्मर्यवलोकः । ५३। उत्पत्ति ... ... " ... ... " ... ... ... " ... ... " ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... " " ... ... ... ... चार भेद ... " अलजी ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... वातज पित्तज कफज शुक्रज प्रमेहावलोकः । ५४। उत्पत्ति... साध्य ... विद्रधि कछपी जालनी मसूरी मेदावलोकः । ५५। उत्पत्ति... ... ... ... ... " ६२ ६५ -.. १ R १० ... ६: ... ६५ वातज " ... ... ... ... ... ... ... ... " ७० ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... - ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ५. ... ... ... ... ... .. " ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... विषयः. पृष्ठं. विषयः. पृष्ठं. लक्षण ... ६५ आगंतुजव्रण उदररोगावलोकः । ५६। पित्तज लक्षण कफज वातज पित्तज रक्तज द्विदोषज कफज वृष्योदर त्रिदोषज़ प्लीहोदर ६६ सुखसाध्य बद्धोदर याप्य जलोदर... असाध्य मौतदाई उदररोग ६७ सद्योत्रण शोथश्लीपदांत्रावलोकः । ५७ । छिन्न ६७ ... विद्ध उत्पत्ति नो मेद.... पिच्चित वातज घृष्ट 'पित्तज ... शल्य कफज अरुणाख्य चोटज सद्यन्त्रणोपद्रव विषज विषमोपद्रव ... ७२ औषधजनित भन्न (टूटेके पूर्वरूप) उपद्रव श्लीपद नाडीपूय असाध्य कुरंड साध्य आँतरोग व्रणशोथावलोकः । ५८॥ भगंदरावलोकः । ६०॥ ७३ पूर्वरूप ताकी उत्पत्ति... छे भेद शतपोनक वातज उष्ट्रग्रीव पित्तज परिस्रावी कफज जम्बूकावर्त रक्तज ... उन्मागी आगंतुज असाध्यलक्षण बिनापकी पकी गलगंडगंडमालाऽपचीग्रंथ्यर्बु- पीडाकारण दावलोकः । ६। पाककारण गलगण्ड पीवकारणं गंडमाला सद्योव्रण भग्नव्रण नाडी- अपची व्रणावलोकः । ५९॥ ६९ ग्रंथि ७४ शारीरव्रण अर्बुद ... ... ... " ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... ... 2 ... " ... ... ... ... ... ... १ ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ६९ ... ... ... .... ... ... " ... 8 ... ... ... ... ... " " ... " ... ... ... ... ... ... ... R ११ पृष्ठं. विषया. पृष्ठं . ७७ ... .... ... ... ... ... ७४ सिध्म ... विपादी किटिभ. काकण " ... ... ... ... ... ... ... ... " ... " ... विषयः, विद्ध्यवलोकः । ६२। छे भेद विद्रधिलक्षण विद्रधिस्थान असाध्य कष्टसाध्य ... उपदंशावलोकः । ६३। उत्पत्ति ... ... पाँचभेद ... ७५ पुंडरीक... ... ... ... ... ... " ... ... ... चर्मस्फोट एककुष्ट... अलसक चर्मदल ... ... ... ... " ... ... .. ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... पामा विचचिका शतारु ... ... ... लिंगार्श लिंगावर्त असाध्य " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... शूकावलोकः :।६४॥ उत्पत्ति'... ... ७८ पूर्वरूप सबके लक्षण ७६ वातज पित्तज ... ... ७९ सर्पपी ... ... ... ... " ... ... ... ... " कफज रक्तज मांसज :: ... ... ... ... " ... मेदोज ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... अष्ठीला... कुम्भीका अलजी.. मृदित संमूढपिडिका अवमन्थ त्वक्पाक स्पर्शहानि उत्तमा पुष्करणी अर्बुद शतपोनक विद्रधि . तिलकालक उन्नीश भेद ... A.. ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... मज्जागत शुक्रगत साध्य असाध्य.. किलास श्चित्र भेदी कुष्ठीका संगत्याग उदर्दशीतपित्तोत्कोठावलोकः।६६।८० उत्पत्ति ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... " .. ... " " . ... ডও ... ... कुष्ठावलोकः । ६५। उत्पत्ति. ... अठारह भेद फिर दो भेद कापालक उदुम्बर मंडलक ऋष्यजिव्ह ... ... ... ... " शीतपित्त उत्कोठ... अम्लपित्तावलोकः । ६७ । उत्पत्ति... वातज कफज सन्निपातज ... ... ... ... .... ... ... ... ... " ..
१२ विषयः. पृष्ठं. विषयः. पृष्ठं. ... ८१/ चिप्प ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ८४ ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... विदारी ग्रन्थि इंद्रलुप्त केशनाश अरुषिका पलित पमिनीकंटक कदर निरुद्धप्रकाश अहिपूतना गुदभ्रंश वाराहदंष्ट्र " .. .. ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... लक्षण विसावलोकः । ६०॥ उत्पत्ति... आठ मेद वातज पित्तज कफज त्रिदोषज अंथिक आग्नेयसंशक कर्दम वणज ... मसूर्यवलोकः । ६९॥ उत्पत्ति... पूर्वरूप सातमेद स्वगत.. " ... ... ... " ... " " ... ... ... " .. " ... ... ... ... ८२ ... ... ... " ... ... " ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... ... ... " . ... " मुखरोगावलोकः । ७१। मुखरोगोत्पत्ति जिव्हाके छे रोग ओष्ठके ग्यारहरोग दंतावलीके दशरोग दंतमूलके दशरोग मुखमें आठरोग गले में अठारहरोग तालुमे नोरोग... ... सबमिलके पिचत्तररोग वातजिव्हा पित्तजिव्हा कफजिव्हा जिव्हाशोथ खंडोष्ठ ... ... ... ... ... ... .. ... " " ... ... " " ... ... " ... ... १ " ... ... ... ... " " ... ... " ८२ अर्बुद ... ... मसिज मेदोज अस्थिज... मज्जागत वीर्यगत... दो साध्य दो कष्टसाध्य और असाध्य मृत्युकारी ... क्षुद्ररोगावलोकः । ७०। हरिवेल्लिका पनसिका कच्छपी यवाख्या अलजी गर्दभी पाषाणगर्दभी इंद्रवृद्धा बल्मीका कक्षा (कखराई) अग्निरोहिणी (प्लेग) ८३ ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... मांसाबुंद मेदोर्बुद.. रक्तज ... अवघातज दालन वातदंत कृमिदंत दंतपंक्ति दंतहर्ष कराल दंतशर्करा ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ...
विषयाः. विषयाः- पृष्ठं. ९० ... ... ... " ... ... ... " कापालिक श्यावदंत दंतवक्र दंतमंजक दंतोन्नति हनुस्तंभ हनुमोक्ष शीताद दंतपुप्पुट ... ... ... ... " " ... ... ... ११ ... ... ... ... " ... ... १ ... ... " ... " ... ... दंतवेष्ट ... सौषिर... महासौषिर ... ... " ... " ... ... ... ... ... 0. ... ... " ... 3 ... ... ... ... ... ... ... " 7 ... पृष्ठं. कर्णरोगावलोकः। ७२ । कर्णनाद बाधिर्य. ८७ कर्णवेड कर्णस्राव कर्णशूल कर्णगूथ प्रतीनाह कृमिकर्णक कर्णार्श. कर्णशोथ विद्रधिः... पूतिश्रुति कीटकर्णक नासारोगावलोकः । ७३ । पाँच भेद वातज पित्तज कफज ... सन्निपातज अंपकलक्षण नासास्त्राव স্ময় ८९ दुष्टप्रतिश्याय ... दग्धवात पूतिनस्य अर्बुद नासार्श नासाना नासाशोष नासापाक पूयरक्त... नासादीप्ति नासापुष्टक नासापाक " ... ... " ... ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... ... " ... ... " ... ... ... " ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... 7 ... ... ” ... ... ... ... ... ९२ ... ... ... ... अवकुश वैदर्भ विद्रधि... तीनोदोपोंके शोथ पाँचपाक ऊर्ध्वगद पाँचरोहिणी तिनकी अवधि कंठशालूक .अधिजिव्हा वलय वलास वृन्द शतनी एकवृन्द गलायुः... गलविद्रधि गलौघ ... अवलंबी विदारी ... तालुशुंडी अष कच्छपी अर्बुद मांसघात पुप्पुट विदारी तालुपाक " ... ... ... ... " " ... ... ... " ... ... " ... " ... ... " ... ... " ... ... ... ... " ... ... 7 ... ... ९० | तेरह भेद " ... " ९२ ... ... ... नेत्ररोगावलोकः । ७४ । उत्पत्ति छिहत्तर भेद चौदह सर्वगत ... ... " ९३ ... " ... ... ...
पृष्ठं. ... ... ९७ ... ... ... ... ... ... " पृष्ठं. विषयाः. ९३ | राव्यंधकारण दिवांधकारण हस्वदृष्टिकारण नकुलांध संकुचितदृष्टि गंभीरदृष्टि श्यावाम शुक्लार्म ... " ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... रक्तार्म ... ... ... ... " " ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... " ... ... " ... ... ... " ९४ ... ... " :: ... " ... " ... ... " ... " ... " " ... ... ... ... ... मांसाम... स्नायुवर्म बिंदुशुक्तिका अर्जुन पिष्टक शिराजाल कफग्रंथि ... वोत्संग पूयालस उपनाह.. जलस्त्राव पूयमांस वर्णिका... अलजी कृमिग्रंथि वोत्संग कुंभिका गुहेरी पोथकी वर्मशर्करा ... " ... विषयाः. चार कालेभागमें चार दृष्टिमें ताके सम पंद्रह दो आगंतुज ग्यारह शुक्ल भागमें नौ संधिमें इक्कीश वर्ममें. वाताभिष्यंद यित्ताभिष्यंद कफाभिष्यंद रक्ताभिष्यंद अधिमंथ ... ताकी अवधि हताधिमंथ वातपर्यय शुष्काक्षिपाक अन्यवात अम्लोषित अपक्क उपनाह अक्षिपाक शिरोत्पात शिराहर्ष व्रणशुक्र शुद्भशुक्र अजिकाजात ... सो असाध्य सो कष्टसाध्य प्रथम पटलदोष द्वितीय पटलदोष तृतीय पटलदोष चतुर्थ पटलदोष तिमिर विद्धतिमिर वाततिमिर पित्ततिमिर कफतिमिर सन्निपाततिमिर राव्यंध. दिवांध पीतदी ... ... ... ... " ... ... " ... ९५ ... ... " " ... ... ... ... . ... ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... " ... १ ... ... " ९६ पिडिकार्श ... ... ... " ... ... १०० .... ... ... ... ". " ... ९७ ... " " ... ... ... ... अंजनी... वर्मनाडी वर्मबंध... क्लिष्टवत्म कर्दमवर्म श्याववम प्रक्विन्नवम अर्बुद रक्तराग... नगण विसवमै कुंचन " " ... ... " ... " ... ... " ... ... 4.. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ११ ... ... ...
... ... ... ... ... १०१ / पूर्वरूप ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... " ... ... ... " " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... ... " ... " ... ... " ... ... चार भेद १ ... ... ... ... ... ... " 8 ... विषयाः. पृष्ठं. विषयाः. पृष्टं. पक्षशात १०० मूढगर्भावलोकः ।। पक्षकोप १०१ उत्पत्ति... शिरोरोगावलोकः । ७५। १०१ गर्भपात वातज मूढगर्भ... पित्तज प्रतिखुर कफज बीज त्रिदोषज परिष क्षयज चारभेद कृभिज मृतगर्भलक्षण ... सूर्यावर्त सूतिकावलोकः । ७९ । अर्धभेद... शंखक उत्पत्ति... अनंतवात लक्षण प्रदररोगावलोकः । ७६ । बालरोगावलोकः । ८० । उत्पत्ति... प्रदरोत्पत्ति समीरालस १०२ पित्तालस लक्षण कफालस योनिरोगावलोकः । ७७ । १०२ कुकूणक पारिगर्भ वातजयोनि पद्मविसर्प १०५ पित्तदूषितयोनि महापम कफदूषितयोनि अजगल्ली त्रिदोपदूषित योनि पूर्वरोगोंका होना क्षयजयोनि ... ग्रहग्रस्तलक्षण... विप्लुता स्कंदग्रस्त प्रप्लुता स्कंदापस्मार कर्णिका... शकुनिग्रस्त ... अतिचरणा रेवतीग्रस्त १०६ उदावृता पूतनाग्रस्त वामिनी... अंधपूतनाग्रस्त जातघ्नी. शीतपूतनाग्रस्त सूचीवक्रा मुखमुण्डितकाग्रस्त अनुचरणा विषावलोकः । ८१ । पादखंडिता १०६ खण्डिता विषके दो भेद... परिप्लुता स्थावरलक्षण शुष्का सर्पविषलक्षण १०७ वीश भेद मूलविषलक्षण ... योनिकंद पत्र विषलक्षण ... ... " ... ... " ... ... " ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " ... " ... ... ... " ... " ... ... ... " ... ... " ... ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... ... " " ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... " " ... ...
... ... ... ... " ... ... " ... ... ... ... विषयाः. पुष्पविषलक्षण फलविषलक्षण छालविषलक्षण सारविषलक्षण... गुन्द्रविषलक्षण दुग्धविषलक्षण.. धातुविषलक्षण... भोगीदंशलक्षण राजिलदंशलक्षण मंडलीकदंशलक्षण दंशितोंके मरनेके स्थान वृश्चिकदंशलक्षण लूताविषवर्णन... ... ... पृष्ठं. विषयाः. पृष्ठं. १०७ मूषकविषलक्षण पिपीलिकदंशलक्षण मण्डूकविषलक्षण शतपदी (काँतर) विषलक्षण दूषीविषलक्षण... फुस्कारी (दीवड) विषलक्षण धीविषवर्णन मधुविषवर्णन पयोविषवर्णन... निम्बविषवर्णन ग्रन्थोक्करोगसंख्यावलोकः ॥४२॥ १०८ ग्रंथके रचनेका आधार १०८।२१० और कहे रोगोंकी अनुक्रमणिका " " ... ... " ... ... ... ... " ... १ " ... ... ... " "
श्री।
वैद्यचन्द्रोदयः।
भाषानुवादसमेतः।
अथ मङ्गलावलोकः ॥१॥
श्रीमत्सिन्दूरपूरारुणतनुरतनुद्योतितांशो गणेशो
दानाम्भःपानलोभात्पपतमधुकरश्रेणिमुच्चैर्दधानः।
दूरीकृत्वान्धकारं दिनमणिरिव यः संस्थितः सिद्धिदाता
निर्विघ्नं विघ्नराजो वितरतु विपुलं सर्वदा मङ्गलं नः॥१॥
बडेचौबे प्रसिद्धोऽहं राधाचन्द्रो भिषक्कविः ।
कुर्वे सुबोधिनी टीका वैद्यचन्द्रोदयस्य वै ॥१॥
सुंदर सिन्दूरकर पूर्ण लाल अंग शोभायमान है अंश जि-
नके ऐसे गणेश गण्डस्थलके मदजलके पानके लोभसे भ्रमरसमूह
जोरसे पड रहेहे तिन्हे धारण किये अंधकारसमूहको नाश करके
ऐसे सिद्धिकों देवेवारें विनराज निर्विघ्नपूर्वक हमको अति मङ्गल
दो ॥१॥
आविर्भूता हिमाद्रेरतिनिपुणतया मेनया स्वैः पयोभिः
सिक्ता बालारुणश्रीकरचरणतलद्योतिता स्मेरपुष्पा ।
न्यञ्चद्वक्षोजगुच्छधुतिरतुलशिवस्तम्भमालम्वमाना
नित्यं वाञ्छानुरूपं मम फलतु फलं पार्वती कापि वल्ली ॥२॥
हिमाचलके अत्यन्त चतुरतासे पैदाभई मेनाने निज दुग्ध-
रूपी जलसे सीची प्रातसूर्यसरीखे अरुण करचरणके तल शोभा-
यमान सुंदर पुष्पवारी मिलेभये स्तनरूपी गुच्छ हे जामे
मोटे महादेवरूपी स्तंभसों लिपटी ऐसी पार्वती कोई एक लता
मेरेकू नित्य इच्छानुकूल फलको दो ॥२॥
२
भाषानुवादसमेतः ।
नानातन्त्रानभिज्ञस्य च भिषज इह स्वल्पबुद्धेः सुखेन
व्याधिज्ञानार्थमुच्चैर्मुनिवचनचयं सार्थक क्षिप्य सर्वम् ।
अज्ञानध्वान्तधारापृथुदलनकृते वैद्यचन्द्रोदयाख्यम्
ग्रन्थं सत्कीर्तिबीजं सकलसुखकरं निर्मलो निर्मिमीते ॥३॥
में त्रिमल्लभट्ट संपूर्ण तत्रोंको न जानवेवारे अल्पबुद्धिवारे वैद्यन-
को सुखसे रोगोंके ज्ञान होनेके लिये बहुभाँति मुनिजनोंके सब
सार्थक वचनसमूहको संक्षेप कर अज्ञानरूपी अंधकारकी अति-
धारा (प्रवाह ) नाशकरवेके लिये सुकीर्तिको कारण सकल सुख
करवेवारो ऐसो वैद्यचन्द्रोदयनामक ग्रंथको रचोहौं ॥ ३ ।।
चापल्यं यत्कृतं मे किमपि शिशुतया पण्डितास्तत्क्षमध्वम्
कुर्वे बद्धाञ्जलिं विचरणयुगलयोः कोटिदण्डप्रणामान् ।
ये दुष्टाः स्वस्वभावादिह किमपि मृषा मन्वते दोषभावात्
तद्वक्रेषु प्रसह्य प्रपततु महतामेव वाणीकृपाणी ॥४॥
जो लडकपनसे मेने चपलता करी हो तो उसे पण्डित जन
क्षमा करें, मे आपके चरणयुगको हाथ जोडके कोटि प्रणाम कर्ता
हूं और जो दुष्ट अपने दोषभावसे कुछभी झूठ मानेंगे उनके मुख में
बलात्कारसे महात्मान्की वाणीरूपी तलवार पडे ॥ ४ ॥
अथ दूतावलोकः ॥२॥
स्वज्ञातिः श्वेतवस्त्रो द्रविणयुतकरः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा
ताम्बूलाब्यः सुशीलः शुभवदनवदः स्यात्प्रशस्तोऽत्र दूतः।
शस्ता योषिन्न दौत्ये न च जनयुगलं नाङ्गहीनो न रोगी
शोका? वा रुदन्वाऽऽगतहतपतितभ्रष्टशब्दान् ब्रुवाणः ५
रोगीकी निज जातिको सुपेद वस्त्र पेहरें हाथमें द्रव्य लियें ब्राह्मण
वा क्षत्रिय ताम्बूल खायें सुंदर स्वभाव सुमुख मृदुभाषी ये उत्तम दूत
है, और स्त्री दूतकार्य में अच्छी नहीं है और न दो मनुष्य और न अंग-
हीन और न रोगी न शोकपीडित और रोतो नजाय और न जात
बाहर और भ्रष्ट शब्दोंको न कहे ऐसो दूत उत्तम है ॥ ५ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। आगत्योपाश्रयेद्यो बलमथनदिशं पश्चिमामुत्तरां वा शम्भोः काष्ठां स शस्तोऽपरदिशिन तुषांगारभस्मास्थिसंस्थः। रक्तस्रग्गन्धवस्त्रास्तृणलकुटदलच्छेदिनः पङ्कतैला- भ्यतावक्षोजनासाशिरनिहितकरा ये च विक्षिप्तचित्ताः॥६॥ जो दूत आकर वायव्यकोण पश्चिम उत्तर ईशानकोणप्रति बैठे सो उत्तम है और जो अन्य दिशामें बैठे तुष अंगार राख हड्डीपर स्थित हो लालमाला लाल चंदन लाल वसनबारो तृण लक्डी पत्र तोडवेवारो कीच और तैल लगायें छाती नाक माथेपर हाथ धरे और जाको भ्रमित चित्त होय सो दूत अच्छो नहीं हे ॥ ६ ॥ दूतस्योदितवर्णवृन्दमखिलं द्वेधा विधाय त्रिभि- भक्ता व्योमनि मृत्युमाशु विवदेदन्यत्र संजीवनम् । पग्रामद्विचतुस्तुरंगमरसच्छन्दोग्निभूदिइनवे- मानंकांस्तदधोक्षराणि विलिखेदादीनि हान्तानि च ॥७॥ दूतके कहे सबरे अक्षरसमूहको दूने करे उनमें तीनको भाग दे शून्य बचे तो रोगीकी मृत्यु होय और अंक बचे तो रोगी जीवे एसो कहै. ऊँचे कोठे पाँच और आडे कोठे ग्यारह लिखे ऊपरके प्रथम ग्यारह कोठोंमें छे, तीन, दो, चार, सात, छे, चार, तीन, एक, दश, नो, ये अंक लिखनो नीचेके ग्यारह कोठोमें अकारादि खर लिखे बाँकी ३३ कोठोंमें ककारसे हकारतक वर्ण लिखें ॥७॥ पंढान्त्यस्वरवर्जितान् खलु पृथक्कृत्वाऽज्झलो रोगिणो दूतस्यापि च नामवर्णनिचयादङ्केऽष्टमिः शोधिते । न्यूने वापि समे मियेत न तथाधिक्येऽक्षराणां नरो दैवज्ञैर्गदवानितीरितमिदं चक्रं च दूताभिधम् ॥ ८ ॥ ऋवर्ण स्वर्ण यह हवदीर्घभेदसे ४ ओर अंत्यवर्ण जो अये पांच वर्ण स्वरमेंसे कम लिखना ऐसे अच् ओर हल् इनकों पूर्वोक्त- रीतिसे भिन्न भिन्न कोष्टकमें लिखके रोगी ओर दूतके नामाक्षरको एकत्र करवेसे जो स्वर ओर हल्की संख्या होय तामे एकबेर आ- ठके अंकको शोध देनो बाकी बचे भये अंक जो आठसे न्यून अ.
20
भाषानुवादसमेतः।
थवा आठही होय तो वह रोगी मरे, ओर जो आठसे अधिक बचे
तो वह रोगी मनुष्य नही मरे, या प्रकार ज्योतिपियोंने यह दूत-
नामक चक्र प्रश्नके वास्ते कह्यो हे॥८॥
४
१ १० ९
अ आ इ ई उ
ऊ ए ऐ ओ औ अं
दूतचक्रम् ।
क ख ग
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ठ ड ढ ण त थ द
द ध
न प फ
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भ म य र ल
अथ शकुनावलोकः ॥३॥
याने मातङ्गविप्रास्तुरगफलवृषच्छन्नमांसोदकुम्भा
योषित्पुत्रान्विता वा सुरभिरपि तथा खञ्जरीटा मयूराः।
वीणाभेरीमृदङ्गाम्बुजपटहरवा वेदमाङ्गल्यघोषा-
श्चाषः सिद्धानभूभृत्कुसुमपुरवधूचन्दनाद्याः प्रशस्ताः॥९॥
चलतेसमय हाथी विप्र घोडा फल बैल छत्र मांस जल कुम्भ
पुत्रको लिये स्त्री तथा गौ खंजन मोर वीणा भेरी मृदंग कमल ढो-
लके शब्द वेदध्वनि मंगलगीत पपैया पक्वान्न राजा फूल वेश्या
चंदन आदिक उत्तम हे ॥९॥
काणः काकोऽपसव्ये शुभ इह कथितः सव्यतः सारमेय-
श्चक्री श्येनाखुबधूशफरदधिपयोरूप्यगोमायुमेषाः ।
प्रेतो नीरोदनश्च ज्वलदनलशिखः श्वेतवस्त्रध्वजा वा
चित्ते शस्तेऽथ सिद्धिःप्रभवति भिषजो नान्यथाकिंबहूक्तैः१०
वायें कानों और कौआ शुभ दायें ये शुभ कहे हैं, कुत्ता कुमार-
शिकरा मूषो न्योरा मत्स्य दही दूध चाँदी श्यार मेंढा मुरदा रुदन-
रहित जाज्वलअग्नि श्वेतवस्त्र ध्वजा और प्रसन्नचित्त ये सब वैद्यको
सिद्धिदाता हे यासें विपरीत बहुत कहवेसे क्या प्रयोजन है ॥१०॥
वैद्यचन्द्रोदयः। ५ अथ शारीरावलोकः ॥४॥ छायेवार्कस्य नित्या प्रकृतिरिह चिदानन्दरूपस्य पुंसः पूर्व स्वीयैः प्रपञ्चैः समसृजदखिलं विश्वमेतत्सतत्त्वम् । कर्मायत्तोऽत्र जीवो निवसति च मनोदूतवान्कश्चिदंहः- पुण्याभ्यां विन्दमानो गदमपगदतां सञ्चिताभ्यां पुरैषः ११ चिदानंदरूपवारे परमेश्वरसे सूर्यकी छायासी नित्यप्रकृतिबारी माया पैदा होके वाने पहले सत्व रज तम जो अपने प्रपंच हे तिन- करके तत्त्वयुक्त या सब जगतको पैदा कियो या जगतमें मन जाको दूत हे एसो कर्मके आधीन कोई जीव निवास करेहे सो पहलेसे संचित जो पाप पुण्य हे तिनकरके रोग और आरोग्यताको प्राप्त होवेहे ॥ ११॥ भूतैर्दोषैः कलाभिर्निजमलसहितैर्धातुभिश्चोपधातु- त्वमर्मस्नायुसन्ध्यस्थिभिरपि विविधैराशयैस्तैः शिराभिः । पेशीभिः कण्डराभिर्धमनिभिरभितो रन्ध्रकैः सोऽतिसूक्ष्मैः साकं तत्राविरास्ते किल सपदि रजःशुक्रयोःसङ्गकाले ॥१२॥ पंच तत्त्व वात पित्त कफ सप्त कला और अपने मलके सहितधातु उपधातु त्वचा मर्म स्नायु जोडी हड्डी नानाप्रकारके आशय शिरा येशी कण्डरा नाडी ओर चारोंओरसे अतिछोटे छेदके सहित शी- ब्रही वीर्य रुधिरके संगकालमें वहां जीव निश्चय पैदा होय है॥१२॥ एकाहोरात्रतः स्यात्कललमथ भवेहुद्भुदं पंचरात्रात् प्रोक्तं पिण्डं दशाहान्मनुभिरिह दिनैर्जायते मांसपेशी। मासाद्गर्भो घनः स्यात्तदनु च परतो मूर्धशाखांकुराः स्यु- स्तार्तीयीकेऽखिलाङ्गान्यपि रसहृतये नाभिदेशे च नाला १३ एक रात्रिदिनमें कलल होय और तापीछे पाँचरातमें वुलवुला और दश दिनमें पिण्ड और चौदह दिनमें मांसकी गाँठ होजाय हे एसे एक महीना वो गर्भ गाढो होय हे, दूसरे मासमें मस्तक हाथ ६ भाषानुवादसमेतः। पावके अंकुर होते हैं, तीसरे मासमें संपूर्ण अंग उत्पन्न होय हे, और रसहरणकरवेको नाभिदेशसे नाल होय हे ॥ १३ ॥ स्वल्पा बुद्धिश्चतुर्थे जठरगुदयकृल्लीहवस्त्यंत्रवृक्कम् हृत्पक्कामाशयास्याद्यमपि शरमिते सूर्ध्वमन्यच्च षष्ठे । केशस्त्रावस्थिपण्यपि नखरशिरश्चेतनात्वं तुरंगे धातूनां सारमोजः प्रविशति हृदयं गर्भगस्याष्टमे च ॥१४॥ चौथे मासमें अल्पबुद्धि और पांचवे मासमें पेट गुदा यकृत प्लीह बस्ति आँत वृक्क हृदय पक्काशय आमाशय मुख पैदाहोके ओर आगे छटे मासमें केश स्नायु हड्डी जोड और सातवे मासमें नख पेदा होय, शिरमें चैतन्यता और अष्टम मासमें धातुओंका सार ओज हे सो गर्भमें प्राप्त बालकके हृदयमें प्रवेश करेहे ॥ १४ ॥ गर्भात्संसारभीरुनिपतति नवमे मासि मासेऽग्रिमे वा मातुर्योनेश्च मुख्या इह चतुरधिका विंशतिर्नाडिकास्ताः। ऊर्ध्व नाभेर्दशाधो दश च धमनयः पार्श्वयोश्चापि तिर्यक् द्वे द्वे याभिर्यथेच्छं वपुषि च परितस्ते प्रसर्पन्ति दोषाः ॥१५॥ संसारसे डरवेवारो जीव नवमे मास वा दशमें मासमें गर्भसे पैदा होय माताकी योनमें मुख्य चौवीस नाडी हैं वे एसे दश नाभीके ऊपर और दश नाभीके नीचे हैं, पार्श्वमें तिरछी दो दो नाडी हे इन नाडियोंकरके देहमें यथेच्छ चारों ओरसे वातपित्तकफ फेले हैं॥ १५॥ तत्रस्थैः सूक्ष्मरन्धेर्मुनिभिरिह शतैरन्नतोयं वहद्भिः पुष्टिं प्राप्नोति देहो विपुलमपि बलं प्रत्यहं वर्धतेऽत्र । दोषाः सत्वादियुक्ता नृवपुषि कुपिताः कुर्वते हेतुभिः स्वै रोगान् देहे च चित्ते त इह पृथगथो द्वन्द्वशः सर्वशश्च १६ ता देहमें छोटे छेद सौ अन्न जलको पहानेवाले मुनियोंने कहे है उनसे देह पुष्टिता और अति बलको भी प्राप्त होय है दिन२ बढे वातादि दोष हैं वे अपने कारणसे कुपित हो देहमें और चित्त में वैद्यचन्द्रोदयः। रोग करे हे वो रोग यहां मनुष्यके देहमें सारादियुक्त जे दोष अल- ग २ और दो दोषसे और तीनोंसे होय हे ॥ १६ ॥ अथ कालबोधावलोकः ॥५॥ यद्युत्तिष्ठत्यनामा भुवि निहितशिरस्युन्नमन्मध्यमस्य प्रायो मृत्युः समीपे वपुरपि च भवेद्यस्य वा वस्तगंधि । हुंकारो यस्य शांतो हुतवहसदृशी फूत्कृतिः सोऽपि तद्वन् नाभिस्थानं गुदं वै नियत इह नरः कम्पते यस्य तालुः॥१७॥ यदि अनामा उठे और पृथ्वीपर निःसार गिरे माथो झुकायें रहे बहुधा उस्के समीपमें मृत्यु है, जाके देहमें वकराकीसी गंध आवे जाको कठोर भाषण हो जाके अग्निके समान फूत्कार शब्द होवे नाभिस्थान और गुदा तालु जाके का वो मनुष्य मरे ॥ १७ ॥ अरुन्धती विष्णुपदं च गङ्गां ध्रुवं न यः पश्यति मातृविम्बम्। स याति शीघ्रं परलोकयात्रां कर्तुसमुत्सृज्य सुतादिमान्१८ जो अरुन्धती विष्णुपद गंगा और 'ध्रुव मातृविम्ब नहीं देखे सो शीघ्रही पुत्रादिक सब मनुष्यन्को छोड मरणयात्राको प्राप्त होवे ॥ १८॥ नेत्राग्रस्थितया कराङ्गलिकया नो दृश्यते पूर्णिमा- चन्द्रो येन दिनावसानसमये जीवत्स एकं दिनम् । संरक्तोलविलोचनो हुतवहस्पर्शोऽलिदेहच्छवि- स्थूलोष्ठो दिवसद्वयेन मरणं धत्ते सुधापाय्यपि ॥ १९॥ नेत्रके आगे स्थित हाथकी अंगुली और पूर्णिमाको चन्द्र सायं- कालके समय नहीं देखे सो एक दिन जीवेगो ओर ऊंचे लाल नेत्र छूनेसे अग्निके समान देहछबि मोटो होट वाने अमृतभी पीयो होय तोभी मरेगो ॥ १९ ॥ शोणास्यः स मनोभ्रमो हृदयरुग् यः श्यावजिह्वातलो घूर्णो घर्घरनिस्वनस्त्रिदिवसान् मृत्योर्वशः स्यान्नरः । नासायं रसनाग्रमोष्ठयुगलं पश्येन्न यश्चक्षुषा मृत्युं याति चतुर्थकेऽह्नि मनुजः पीतामृतोऽपि भुवम् २०॥
८ भाषानुवादसमेतः। जाको लाल मुख हो मन भ्रमसहित हो हृदयमें पीडा हो जाकी जिव्हाको तलकारो हो और घूमें घर्राटे भरे सो मनुष्य तीन दिन में मृत्युके वश होगा और जो नेत्रसे नाकका अग्रभाग जिव्हाका अग्र- भाग दोनो होठ न देखे सो मनुष्य अमृतभी पियो होय तौभी चौथे दिन अवश्य मृत्युको प्राप्त होगा ॥ २० ॥ अम्भःसेकसमीरतोपि पुलको नो यस्य पञ्चक्षपा जीवेत्सोथ हृदंध्रिपाणिसहसा स्नातस्य शुष्येत्परम् । षष्ठे सो म्रियते ह्यथो मुनिदिनेऽपश्ये वोरन्तरम् नो यः कर्णयुगं च यस्य चलितं स्वस्थानतः किञ्चन ॥२१॥ जिस्के रोमांच जलसीचवेतें और पवनसेभी पैदा नहिहों सो पाँ- च रात जीवेगो और एकाएकी स्नान करवेतें हृदय पाँव हाथ शीघ्र सूखजाँय सो छटे दिन मरेगो जाको भोहनको वीच बिलकुल नहीं दीखे और दोनो कान जाके स्थानसे चलित हो सो सात दिनमें मरजायेगो ॥ २१ ॥ शैत्यं यस्य न हन्ति चण्डकिरणः सन्तापकारी शशी नो वा वेत्ति हिमाहिमेऽष्टमदिने प्राणानसौ मुञ्चति । कर्णे दण्डविघाततो नहि भवेद् राजी निमित्तं विना बाधियं भवतीह यस्य नवमे घने स गच्छेन्मृतिम् ॥ २२॥ सूर्य जाके शीतको नाश नहीं करसके और चंद्रमा जाके दा- हको नाश न करे और जाको शीत उष्ण इनको ज्ञान न हो वो आठमें दिन प्राणको छोडे और कानमें दंडा मारवेसों भी जो चैतन्य न हो और विनाकारण जाके बहरापन होजाय वो नवमे दिनमें मृत्युको प्राप्त हो ॥ २२ ॥ आत्मानं सकृदीक्षते विशिरसं तैले जले वा घृते- प्यादर्शादिषु वासरे स दशमे लोकान्तरं गच्छति । आकृष्टा अपि न स्फुटंति च करांगुल्यो यदीयाश्च नो यदत्तं बलिमाहरन्ति करटास्तस्येशघने मृतिः ॥ २३ ॥ जो जलमें तेलमें वा घृतमें दर्पणमें अपने अंगको मस्तकरहित
वैद्यचन्द्रोदयः।
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देखे सो दश दिनमें दूसरे लोकको जाय और जाकें एचनेसेमी हा-
थकी अँगुलीन्के शब्द न हों और काक जाके हाथके दिये बलि-
को मुखमें न धरे वो ग्यारह दिनमें मरजाय ।। २३ ।।
अन्येषां वपुरीक्षते गतशिरोऽकस्माद्विलोमाथवा
प्राणान्मुञ्चति निश्चितं गदयुतः स द्वादशे वासरे।
विच्छायः सहसा त्रयोदशदिने स्यान्मृत्युवश्यस्तदा
गच्छेत्पंचदशे मृति यदि विधुं पश्येत्समस्तासितम् ॥२४॥
औरको अंग देखवेमेंभी शिर न दीखे अथवा कभी वालरहित देह
दीखे वह रोगी निश्चय बारह दिनमें प्राण छोडे और जाकों अपनी
छाया एकाएकी न दीखे तो वो तेरहवे दिन मृत्युके वश हो और जो
संपूर्ण चन्द्रमाकों कारो देखे वो पंद्रहवे दिन मरे ॥ २४ ॥
यांतीं व्युत्क्रमतो नदी च कलयेऽद्योसौ कलावासरे
घने सप्तदशेथ पश्यति तरुं यः शुष्कमाईच्छदम् ।
मोष्टादशके दिने व्यसुरहो बुद्धिर्यदीया निशि
स्याध्यत्यासतया तदग्रिमदिने मृत्योर्वशे मानवः ॥२५॥
जो उलटी नदी वहती देखे सो सोलवे दिन और वृक्ष सूखो
तथा पत्ता हरे देखे वो सतरहवे दिन और जा मनुष्यकी बुद्धि
दिनमें विपरीत हो सो अठारहवे दिन वा जाकी बुद्धि रातमें
विपरीत हो सो उन्नीसवे दिनमें मरे ॥ २५ ॥
यस्तारा न समीक्षते स समये घसाँस्तथा विंशतिम्
पश्येद् व्योमधरामिव व्यसुभवेद्यश्चैकविंशं दिनम् ।
यः पश्येत्सहसा रविं सविवरं द्वाविंशतिं वासरान्
जीवेत्सोऽथ विलोमगं च कलयेद्योसौ त्रयोविंशतिम् ॥२६॥
जो तारानको नही देखे सो वीस दिनमें और तैसे जो पृथ्वीकी
नाई आकाशको देखे वो इक्कीसदिनमें और जो सहसा सूर्यको
छेदयुक्त देखे सो बाईसदिनमें और बृहस्पतिके ताराको विपरीतवर्ण
देखे वह तेईसदिनमें ( मरे)॥ २६ ॥
१० भाषानुवादसमेतः। यो ह्रस्वः सहसा भवेत्स तु चतुर्विंशेऽथ दीर्घोऽग्रिमे मृत्यु याति तदग्रिमेषु च दिनेष्वाराच्छवं वीक्षते । धूली दिक्षु समीक्षते दिवि दिवा तारास्तथा विद्युतम् व्यचायां धनुरैन्द्रमस्य मरणं मासद्वये निश्चितम् ॥ २७ ॥ जो एकाएकी छोटो होजाय को चौवीसवे दिन और जो एकाएकी लंबो होजाय वो पञ्चीसवे दिन मरे और जाकों मुर्दा पास दीखे सो छवीसवे दिन मरे । और जो दशोंदिशानमें धूल देखे और दिनमें तारा देखे तथा विनामेघके विजली देखे वो दो महिनामें मरे २७ दीपे वा समुपागते न लभते गन्धं च संप्रेक्षते स्वां च्छायागतमस्तकामथ शृणोत्युद्दामघण्टारवम् । मासे याति तृतीयके यमपुरं लोकं चतुर्थेऽथ य- च्छीर्षे न्यञ्चति चित्रवर्णसरठः कुर्वन्विचित्रां क्रियाम् ॥२८॥ और जाके निकट दीपक लायतें भी वाकों गंध न आवे और देखेभी नहीं और अपनी छाँयाकों माथोरहित देखे अथवा एकाएकी जोरतें घंटाको शब्द सुने वो तीसरे मासमें मरे और जो शिरके वालोंको ऐंचे और देहरंग जाको किरकेटाके भांति बदले अटपटे कार्यकरे वो मनुष्य चौथे मासमें मरे ॥ २८ ॥ मार्गे पंकयुतेऽथवा सरजसि स्यात्खण्डितं यत्पदम् मर्त्यः पंचममास्ययं मरणतामाप्नोति निःसंशयम् । ज्योतिर्यस्य न दीप्यते नयनयोईन्ढेङ्गुली पीडिते षष्ठे मासि विपद्यते स नियतं पीतामृतोपि ध्रुवम् ॥२९॥ अथवा कीचयुत मार्ग में और धूसयुक्त मार्गमें पाँय खण्डित दीखें सो मनुष्य निस्संदेह पाँचवे मासमें मरणको प्राप्त हो । और जाके नेत्रकी ज्योति घटजाय दो अंगुली हलती न दीखे वाने अमृतभी पी लीयो होय तौभी वह छटे मासमें निश्चय मरे ।।२९ जीवं विष्णुपदत्रयं सुरपदं सन्मातृकामण्डलम् तारापुञ्जमरुन्धतीमहिमगुं शुक्र ध्रुवं लाञ्छनम् ।
वैद्यचन्द्रोदयः। एतेष्वेकमपि स्फुटं तु पुरुषः पश्येन्न यः प्रेक्षितं सोऽवश्यं विशतीह कालवदने संवत्सरादर्धतः ॥ ३० ॥ बृहस्पति तीनों विष्णुपद सुरपद शुभ मातृकामण्डल तारासमूह अरुंधती सर्प राहु शुक्र ध्रुव लांच्छन इनमेंसे जो कोई मनुष्य एक- कोभी न देखे तो वो छै महीनाके भीतर कालके मुखमें प्रवेश करै३० पीत्वा वारि तृषा न याति सहसा वृद्धिर्वराङ्गे भवेद् भुक्तान्नस्य न यस्य तृप्तिरसकृन्मासे व्यसुः सप्तमे । यः पश्येद्विविधं हिरण्मयतरं वन्यं स मास्यष्टके- ऽथो शूरो भयवाँश्च धर्मनिपुणोऽशांतो विकारी पुमान् ॥३१ स्थूलांगोपि कृशः कृशोऽपि सहसा स्थूलत्वमालम्बते श्यामो वा कनकप्रभो यदि भवेद् गौरोऽपि कृष्णच्छविः । इत्येवं प्रकृतेरुशंति चलनं मासेऽष्टमे मृत्युदं सूर्य श्यामहृदं विचित्रमथवा जीवेत्स मासान्नवा ॥ ३२ ॥ जल पीनेसे भी प्यास न जाय और अकस्मात् माथो भारी होजाय अन्न खानेसे भी तृप्ति न हो सो सात मासमें मरे । जो नानाप्रकारके वनके वृक्ष सोनेके देखे सो आठमे मासमें शूर भय- वान हो धर्मनिपुण अशांत विकारी नर हो ॥३१॥ मोटे अंगवाला कृश और कृशभी शीघ्र मोठो होजाय यदि कारो सोनेके वर्ण और गौर कालो होजाय ये प्रकृतिविपरीतभावको प्राप्त हो तौ आठमें मासमें मृत्यु देवे । सूर्यको मध्य कालो अथवा विचित्र दीखे वो नौ मास जीवे या न जीवे ॥ ३२ ॥ शावौ स्तः श्रवणौ करौ सचरणौ नासा च मेदूं मुखं पायुश्च स्फुटमेष जीवति जनः स्वास्थ्येन मासान्दश । यस्यांगादुपयाति फुल्लकुसुमस्तोमोपमः प्राणिनो गंधः संयति मृत्युरस्ति नियतं स्वल्पैर्दिनैः खड्गतः॥ ३३ ॥ जाके कान हाथ पाँय नाक लिंग मुख गुदा काले होजाय सों नर निश्चय दश मास नहीं जीवे जाके अंगमें फूले पुष्पगु-
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भाषानुवादसमेतः ।
१२
च्छके सम गंध आवे उस प्राणकी थोडे दिनमें खड्गसे निश्चय
मृत्यु हो ॥ ३३ ॥
वैकृत्यं स्वरवर्णकेशनयनं त्वङ्मांसबुद्धीन्द्रिय-
घ्राणेषु प्रपतंति यस्य सहसा मंत्राणि वस्तून्यपि ।
यः पश्येत्प्रतिबिम्बमात्मवपुषश्छिन्नं जलादिष्वसौ
रोगी जीवति नेति किंचिदुदिता नृणामरिष्टा मया ॥३४॥
जाके स्वर वर्ण केश नेत्र त्वचा बुद्धि इन्द्रिय बिगड जाँय । जाके
नाकमें नानाप्रकारकी सुगंध और सब वस्तु विपरीतसे देखे । जो
अपने अंगको जल काच आदिमें खंडित देखे । वो रोगी मनुष्य
रोगके अरिष्टसे थोडो भी नही जीवेगो ॥ ३४ ॥
अथ मूत्रावलोकः॥६॥
धारामाद्यां विहायोषसि विमलतरे भाजने रोगितो-
धृत्वेत्थं धैर्ययुक्तो भिषगतिनिपुणः संपरीक्षेत मूत्रम् ।
बिंदु तैलस्य दत्वा तदुपरि वितते तत्र साध्योऽथ कृच्छ्रात्
साध्यापिण्डायमाने तदनु तलगते स्याच्च साध्योप्यसाध्यः३५
निर्मल काचके पात्रमें प्रातःकाल रोगी मनुष्यके मूत्रकी प्रथम
धारा छोडके ताके ऊपर तैलकी बूंद पटकके अति धीरे निपुण वैद्य
मूत्रकी परीक्षा एसे करै । यदि मूत्रमें तैल फैलजाय तौ साध्य । बिंदु
पिण्डाकार होजाय तो कृच्छ्रसाध्य । जौ बूंद नीचे बैठ जाय तो अ-
साध्य है ॥ ३५ ॥
नीलं रूक्षासितं वा प्रभवति कुपिते मारुते चाथ पित्ते
पीतं तैलप्रभं वारुणमथ कफतः स्निग्धशुभ्रं धनं च ।
उष्णं स्निग्धं सरक्तं भवति रुधिरतश्चाथ सामेऽम्बुकल्पं
सौवीराभं निरामे विमलमतिसितं ज्ञेयमह्नाय मूत्रम् ॥३६॥
वायुकोपसे नीलो कारो रूखो होय और पित्तसे पीलो तैलसो
लाल और कफसे चीकनो गाढो सुफेद और रुधिरसे गरम चीकनो
लाल होय रोगीको कांजी जलसो और आरोग्यको निर्मल अतिश्वेत
कांजींसो वा मदिरासो मूत्र जाननो ॥ ३६ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। द्वन्द्वेतद् द्वन्द्ववर्ण भवति बहुविधं सन्निपातात्प्रवृद्धा- दन्नाजीर्णाच्च मूत्रं भवति बहुतरं तण्डुलांभासदृक्षम् । बिन्दुस्तैलस्य मूत्रे प्रसरति च यदा दिक्षु साध्यो विदिक्षु स्यान्नो साध्यो मनुष्यो भ्रमति तरति वा मजति भ्रंशते च ३७ दो दोषसे दोवर्णबारो मूत्र होय त्रिदोषके वढेते अनेक रंगको और अन्नके अजीर्णतें बहुत मूत्र चाँवलके जलसो होयहे जो तैलकी बूंद फैल जाय तौ साध्य और भ्रमण करे तिरे डूबे टूक २ होजाय तो वो साध्य नहीं है ॥ ३७ ॥ वस्त्रं खङ्गं शरं वा लकुटमपि हलं सैरभं गात्रखण्डं कूर्म निर्मूर्द्धमर्त्य मुसलमपि चतुर्मार्गकं चानुकुर्यात् । मूत्रं तैलं न जीवेदिह यदि मनुजश्चाथ जीवेत्सुधांशु हंसेभच्छत्रहवें सरसिरुहसरस्तोरणं चामरं वा ॥ ३८ ॥ जो मूत्रमें तैलकी बूंद वस्त्र खड्ग बाण लकडी हल भैंसा और शरीरके दूंक कछुआसी मनुष्यके माथे सी मूसल चोरायेके आकार होजाय सो नहीं जीवे । और जाके मूत्रमे चन्द्रमा हंस हाथी छत्र कमल महल सरोवर तोरण चमरसदृश तैलबूंद होजाय सो • मनुष्य जीवे ॥ ३८ ॥ अथ मलावलोकः ॥७॥ बद्धं श्यामं सशब्दं मरुति च कुपिते पित्तकोपेतिपीतम् पानीयाभं सफेनं सरुषि कफमले सान्द्रमायांकुरं च । रक्त क्रुद्धे सरक्तं जलनिभमथ तद्वन्द्वकोपे द्विलिंगम् सर्वैर्दोषैः सकोर्भवति किल मलं रोगिणः सर्वलिङ्गम् ॥३९॥ वातकोपसे मल वध्यो कारो शब्दसहित होयहे और पित्तकोपसे अति पीरो और कफकोपसे जल सो फेनयुक्त गीलो अंकुरित और रक्तकोपसे लाल जलसो और दो दोषके कोपसे दो चिन्हवारो सब दोषके कोपसे रोगीको मल सब लक्षणवारो होय है ।। ३९ ॥ दुगंधि श्यामवर्ण मलमरुणनिभं पाण्डुराभं विचित्रम् मांसाभं चोष्णमेतत्प्रभवति मरणायैव रोगान्वितस्य। वै. चं. २ भाषानुवादसमेतः। विनं शैथिल्ययुक्तं मुहुरपि च मुहुनिःपतत्स्यादजीर्णा- द्व)दिङमात्रमेतन्निगदितमगदैर्लक्षणं वर्चसोपि ॥ ४० ॥ दुर्गधि श्याम लाल पीलो विचित्र मांससो गरम मल रोगीको मरणके लियेही होवे हैं, टूट्यो शिथिलतायुक्त वार २ अजीर्णते मल होयहै और मललक्षण ये वैद्यनको दिक्प्रदर्शन मात्रही कहेहैं ॥ ४०॥ अथ दृष्ट्यवलोकः ॥८॥ रूक्षं धूमाभमंतवलदनिलरुषि स्याच्चलं चक्षुरुग्रम् पित्तात्पीतं हरिद्रानिभमरुणनिभं दीपविद्वेषि दाहि । श्वेतं संस्रावि तेजोरहितमतिकफावन्द्वकोपे द्विलिङ्गम् निर्भुग्नं रक्तवर्ण कलुषमसितभं भीषणे सन्निपातात् ॥४१॥ वायुके कोपसे रूखे धूमसे भीतर जलें चलायमान अति टेढे नेत्र हों और पित्तसे पीले हर्दीसे लाल दीपक न देखसके दाहकर्ता हों कफसे श्वेत स्रावी तेजरहित दो दोषसे दो चिन्हयुक्त हों सन्नि- पातसे खंडित लाल बुरे कारे डरावनेसें हों ॥ ४१ ॥ 'एक रौद्रं च भुग्नं विकसितमपरं मीलितं यस्य चक्षु- स्तारावा यस्य पश्येन किमपि कुटिलं चोर्ध्वगं यस्य वा स्यात् रौद्रं यः प्रेक्षते वा भ्रमयुतमथवा कंपयुक्तारका वा दृष्टिर्यस्यात्र साध्यो न भवति मनुजो रोगयुक्तः कदाचित् ४२ एक नेत्र भयानक टेढो उलटो खुल्यौ और दूसरो नेत्र मिच्यो जाकी पुतलीको तारो न दीखे और कुटिल ऊंचो देखे अथवा जाकी पुतली भयानक दीखे भ्रमयुक्त अथवा कंपयुक्त ये लक्षणयुक्त दृष्टि होय वो रोगी कभी साध्य नहीं है ॥ ४२ ॥ अथ नाब्यवलोकः ॥९॥ धृत्वा वामेन हस्तेन च लघिमयुजा कूर्परं रोगिजन्तो- रन्येनालंब्य वैद्यः कलयतु धमनीमंगुलीनां त्रयेण । वामे हस्तेऽङ्गनानां यदि च तदपरे हस्तके पूरुषाणाम् मूलेऽङ्गुष्ठस्य दूतीमिव सुखमसुखं देहवृत्तं वदंतीम् ॥ ४३ ।।
वैद्यचन्द्रोदयः। रोगीके दाँये हाथकों वैद्य अपने वाये हाथसे पकड दाँये हाथकी तीन अंगुलीयोंसे नाडी देखे स्त्रीन्के वाये हाथको देखे और मनुष्य- के दाँयेही हाथकी देखे अंगुठाके मूलमें नाडी मनुष्यके सुख दुःखको दूतीसी कहनेवाली है।। ४३ ॥ वाताद्वक्राथ पित्तात्प्रभवति चपला श्लेष्मतः स्थैर्ययुक्ता नाडी सोष्णा सवेगा ज्वर इह कुपिते कामरुङ्भ्यां सवेगा। वाते क्रुद्धे जलौकाभुजगगतिमती पित्तकोपे कुलिंगा- ध्वांक्षाभ्यां भेकवद्वा कफरुषि च समं हंसपारावताभ्याम् ४४ नाडी वातसे टेडी चले पित्तसे चपल होय कफसे धीरी ज्वर- कोपसे गरम वेगयुक्त कामबाधासे वेगवारी वो वायुकोपसे जोक सर्पकी गतिवारी पित्तकोपसे कुलिंग काग मेडकासी और कफ- कोपसे हंस वा परेवाके समान गतिवारी होय है ॥ ४४ ॥ मंदा काले कदाचित्वचन झटितिगा द्वंद्वकोपेऽथ नाडी- लावैवत्तीरकैर्वा चरति सममसौ तित्तिरैर्वा त्रिदोषे । स्थित्वा स्थित्वा वहेद्वा मुहुरपि च मुहुर्विच्युता स्थानतो या याति क्षीणातिशीता हरति शिवशिव प्राणमह्नाय नाडी ४५ और दो दोषके कोपसे नाडी कोई समय मंद और कोई समय तेज चले. त्रिदोषमें लावा तीतर वतकसरीखी चले. जो वेर २ ठेर २ के स्थानको छोडके अति क्षीण शीत चले हे शिव २ वह नाडी प्राणको नाश करेहे ॥ ४५ ॥ मंदाग्नेः क्षीणधातोरपि चरति तथा मंदमंदैव नाडी कोष्णा गुर्वी सरता वहति गुरुतरा चापि सामा च मंदा । दीप्ताग्नेर्वेगयुक्ताप्यतिलघुरथ सा सौख्ययुक्तस्य सुस्था चिंताभीशोकयुक्तस्य च भवति कृशा हीनवेगा च नाडी ४६ मंदाग्नि क्षीणधातुसे नाडी मंद २ चले रक्तविकारसे गरम भारी चले और आमसे अति भारी मंदी चले दीप्ताग्निसे वेगयुक्त अति सुखयुक्तकी सुस्थ और चिंता भय शोकवारेकी दुर्बल हीनवेग नाडी चले ॥ ४६ ॥ हलकी चले भाषानुवादसमेतः। मध्याह्ने वह्नितुल्या ज्वरयुतमनुजस्यातिवेगा मलानाम् याते पाते चलाम्बु यदि भवति तदा स्यात्तृतीयेह्नि मृत्युः। सक्रोधस्यातिवेगा प्रभवति धमनी सुस्थिरा तृप्तिभाज- स्तज्ज्ञानात्तत्तदन्नं कलयतु निपुणः पण्डितो जंतुके तु ॥४७॥ ज्वरयुक्त नरकी मध्यान्हमें अतिवेगवती और मलके पात तथा वेग होनेसे वहते जलके सम चले वाकी तीन दिनमें मृत्यु हो. क्रोधवान्की अतिवेगवती नाडी होयहे और तृप्तिताकी स्थिर निपुण पण्डित वैद्य या ज्ञानसे मनुष्यकी नाडीको देखे ॥ ४७ ।। अथासाध्यावलोकः ॥१०॥ निद्रानाशो निशायां प्रभवति च तथा कंठकूपे बलासो देहे दाहोऽतिसूक्ष्मा लघुरथ धमनी प्रस्खलंती च जिह्वा । हीयंते यस्य शीघ्रं बलदहनमनःशक्तयः सेन्द्रियाङ्गा- स्तझैषज्यं वदंति स्मरणमिह बुधाः केवलं रामनाम्नाम् ॥४८॥ रात्रिमें निद्रानाश और कंठमें कफ होय देहमें अतिदाह धीरे हलकी नाड़ी चले जीभ चिपके जाकी शीघ्र बल मन इंद्रियशक्ति अंगहीन हों उसको पण्डित वैद्य केवल रामनामस्मरणरूपी औषध कहते हैं ॥४८॥ ये कौलाः कर्मजा ये चिरसमयभवा ये च ये सर्वदोषा ये वा सोपद्रवा ये बहुदुरितवतो ये च मंदाग्निभाजः। येत्युग्राद्ये सरोषादपि च निजकृतोत्कर्मणः कायचेत:- संजाता ये च येति हुतबलजनयस्तेप्यसाध्या गदाः स्युः ४९ जो रोग कुलपरंपरासे चले आये हों जो पापकर्मसे पैदा और बहुतकालके पैदा और जो सर्व दोषसों भये वा जो उपद्रवसे युक्त बहुत पापनसे भये मंदाग्नि वा देह मनके अति उग्र कुपित निजकर्मसे भये और जो भस्मक रोगसे भये वोही रोग वैद्यनको असाध्य कहनो ।। ४९ ॥ रक्तास्यो दृष्टरोमोच्छसिति च हृदयाद् ग्रंथिशूली च यः स्यात् मूढो विभ्रांतनेत्रो वियत इह नरः क्षण्यहिकातृषावान् ।
वैद्यचन्द्रोदयः । संक्षिप्ते यद् ध्रुवौ स्तः शिरसि कचचया यस्य सीमंतवंतो यो रोगी दीर्घरात्रौ स्वपिति च दवथुस्त्रेदवैवर्ण्ययुक्तः॥५०॥ जाको लाल मुख रोम खडे और हृद्यसे श्वास ले गांठोमें दर्द होय मूढतासे नेत्र भ्रमें क्षीणता हिचकी प्यास जाकी भौं सुकड गई हों केशसमूहकी गाँठ बंध गई हो जो रोगी बहुत रात सोवे कंप पसीना देहको रंग विगड्यो होइ वो मनुप्य मरे ॥ ५० ॥ यः स्वमे प्रेतयुक्तः पिवति च मदिरां यः खरोष्ट्रादिरूढः तैलाभ्यक्तो यमाशामनु च चलति यो यांत्यमी प्रेतभावम् । यो ढुंचेत्केशसंघान्नखरमपि मुखेनाधरांश्च द्विजागः खादेद्विभ्रांतनेत्रःस्खलिततमवचाः क्षिप्रमानोति मृत्युम् ५१ जो स्वप्नमें प्रेतके संग मदिरा पीये और गधा ऊंट आदिपर चढे तेलसे न्हाय दक्षिणदिशाको चले वो मृत्युको प्राप्त हो जो अपने केशसमूहको नौचे मुखसे नख और दाँतोंसे होठनको खाय जाके नेत्र अति भ्रमें टूटे वचन कहे वो जल्दी मृत्युको प्राप्त हो ॥५१॥ उरगशतमिषा स्वातिमूलेन्द्रपूर्वा- भरणिषु किल वारे भानुभौमार्कजानाम् । प्रतिपदि च चतुर्थीद्वादशीषष्ठिकासु द्रुहिणहरिहरोक्तो रोगिणां मृत्युकालः ॥ ५२ ॥ आश्लेषा शतभिषा आर्द्रा स्वाती मूल ज्येष्ठा पूर्वा भरणी आदि नक्षत्रमें सूर्य मंगल शनिवारमें और परवा चौथ द्वादशी छट्ट इनमें ब्रह्मा विष्णु शिवको कह्यो रोगीको मृत्युकाल है ॥ ५२ ।। असाध्यलक्षणं चैतत्सामान्यमभिवर्णितम् । अभिधास्ये विशिष्टं तु तत्तद्रोगविनिश्चये ॥ ५३ ।। ये असाध्य लक्षण सामान्यतासे मेनें वर्णन किये अव वांकी जा जा रोगके निश्चयार्थ विशेष कहूँ हूँ ।। ५३ ॥ अथ वर्णस्वरावलोकः ॥११॥ बाणांकात्मनि मंडले अइउएओकादि वर्ण लिखे- दायुर्वेदादिकर्ता कथयति तदधस्तिथ्यादिपंक्तिक्रमात् ।
भाषानुवादसमेतः। अर्कग्लौगुरुशुक्रसौरिकुजविच्छून्यान्यथाधः क्रमात् पौष्ण्यादीन्यथ सप्तभानि च पुरावत्पंच पंचाग्रतः॥ ५४ ॥ आख्यायाः प्रथमाक्षरं भवति यत्कोष्टे ततः कोष्टका बालाख्यः सुकुमारकोप्यथ युवा वृद्धो मृतश्च क्रमात् । भं वारश्च तिथिस्त्रयं भवति चेदेतन्मृताख्यं तदा मृत्युनिश्चयतोऽन्यथा सुखमिति प्रोक्तो नृणां निश्चयः॥५५॥ वाण५अंक९आत्मनि १० कोष्टकोंमें अ इ उ ए ओ और ककारादि अक्षर लिखने उन्के नीचेके कोष्टकोंमें आयुर्वेदादिके कर्ता कहे परवा आदि तिथि क्रमसे लिखनो सूर्य चन्द्र गुरु शुक्र शनि मंगल बुध उस्के नीचे क्रमसे लिखे फिर शून्य लिखे उस्के नीचेके कोष्टकोंमें रेवती आदि पच्चीस नक्षत्र लिखने ॥५४॥ नामको प्रथम वर्ण जिस कोष्टकमें हो उनमें प्रथम कोष्टकको नाम बाल दूसरेको सुकुमार तीसरेको युवा चौथेको वृद्ध पाँचको मृत नक्षत्र वार तिथि ये तीनोंही होय तो मृताख्य कोष्टक जाननो वाकी मृत्यु हो इनसे विपरीत हो तो निश्चय मनुष्यको सुख कहनो ॥ ५५ ॥ वर्णस्वरचक्रम् । 15 Trow to lo १० ० Sax | ० v a ध. रि. पू. शु. श. ज्ये. ज. रे. पुन. उ.फा. अनु. श्र. १२ भ. च. मं. बु. श. म. स्वा. पू.षा. पू.भा. रो. पू.फा. वि. उ.पा. उ.भा. o ० . म . म आ. FR0Eoorur अथ याप्यसाध्यावलोकः ॥ १२॥ ये शांता भैषजैः स्युः पुनरपि च विना तैरकस्माद्भवेयु- र्ये वारोगा द्विदोषा मुनिभिरभिहिता रोगिणस्तेऽत्र याप्याः। दीक्षाग्ने रिवित्तस्य च भवति पृथूपद्रवाश्चैकदोषा रोगाः साध्याः सपथ्यस्य च हितमगदं सेवमानस्य जंतोः५६ जो रोग औषधसे शांत होजाय और फिरभी अकस्मात् पैदा वैद्यचन्द्रोदयः। होजाय जो रोग दो दोषज मुनियोंने कहे वो रोगीको यहाँ याप्य हैं. दीप्ताग्नि और धनवान् पुरुषके अति उपद्रव और एक दोषसे होय वो और जो पथ्यसे हितकारी दवा सेवन करवेवारे मनुष्य- को रोग साध्य हें ॥५६ ॥ अथ वातकोपकारणावलोकः ॥ १३ ॥ रूक्षैरन्नैश्च तोयैरतिकटुकतया भूरिभुक्तैः कषायै- निद्रानाशव्यवायप्रतरणबलवद्विग्रहातिश्रमैश्च । अन्ने जीणे निशांतेपि च दिनविगतौ वार्धके भोजनेन कंगूश्यामादिभुक्तैरपि भवति नृणामत्र वातप्रकोपः ॥५७॥ रूखे अन्नसे जलसे अति कटु कषाय बहुत खानेसे न सोयवेसे मैथुनसे पैरवेसे बलवानसे युद्ध करनेसे अतिश्रमसे और अन्न न पच- वेसे प्रातःसंध्याकालके भोजनसे वृद्धावस्थामें भोजनके अंतमें कांगनी शमा आदिके भोजनसे सकल मनुष्यको वातकोप होयहै ॥५७॥ अथ पित्तकोपकारणावलोकः ॥ १४ ॥ मध्याह्ने चार्धरात्रे तरणिकरनिभो भोजने स्याद्विदाहः क्षाराभ्यां चारनालैर्दधिकटुकसुरामैथुनाम्लरशीतैः । जीर्यत्यन्ने प्रकोपैर्बहुभिरनशनैश्चामिषैर्वा तिलैश्च ग्रीष्मे पित्तं विधत्ते शरदि च सहसा प्राणकायेषु रोगम् ५८ मध्यान्हमें और आधी रातमें सूर्यको किरण सेवनसे भोजनके पीछे विदाही क्षार और कांजी दही चिरपिरे मदिरा मैथुन खट्टो गरम इनके सेवनसे अन्न पचने में और बहुत मांस तिल खानेसे वो मनुष्य ग्रीष्मकालमें पित्तको धारण करे और शरदकालमें एकाएकी कोपकर प्राणदेहीमे रोग करेहै ।। ५८ ॥ अथ कफकोपकारणावलोकः ॥ १५॥ दना दुग्धेन शैत्यालघुमधुरदिवास्वप्ननव्यानतोयै- स्तैलैरिक्षुप्रभेदैरपि समविषमप्राशनाध्यासनैश्च । बाल्ये वै पूर्वरात्रे दिवसवदनके भोजनादौ वसन्ते पिष्टान्नैः पायसैर्वा नृवपुषि च बहुलः स्याद्बलासप्रकोपः ५९ २० भाषानुवादसमेतः। दही दूध ठंडो भारी मीठो दिनमें सोनों नवीन जल अन्न तेल ईखभेद सम विषम भोजनादिसे बैठे रहनेसे बाल अवस्थामें साँझ पीछे प्रातसमें भोजनके पहले वसंत ऋतुमें पीठीके अन्न वा पाय- ससे मनुष्यके देहमें बहुत कफ प्रकोप होयहै ॥ ५९ ।। अथ त्रिदोषकोपलक्षणावलोकः॥ १६॥ शंखश्रोत्रांघ्रिमूर्द्धभृकुटिहनुहृदि स्कंधमन्यासु पीडा रात्रौ स्याद्वासरेल्पा वचन च भुजयोः स्तः सुसंकोचदैर्ये । क्लोमप्लीहाक्षकक्षाकटिविटपयकृद्धस्तिपृष्ठत्रिके स्या- दुच्चैः शूलं च नाभीगुदजठरगुदोपांतवक्षोण्डकेषु ॥ ६॥ नार कान पाँय माथो भौंह डाढी हृदय कंधा नाडी इनमें पीडा रातमें और दिनमें वाहनको संकोच या कभी दीर्घता क्लोम प्लीह नेत्र कांख कटी विटप यकृत् बस्ति पीठ और पीठको हाड ढूँडी गुदा पेट गुदाके पास छाती आँड इनमे जोरसे पीडा ॥ ६०॥ वर्चःकार्कश्यमुच्चैर्वदनविरसता रात्रिनिद्रानिवृत्ति- स्त्वक्पारुष्यं सहाग्नेरपि विषमतया स्यात्समीरप्रकोपः। पीतत्वं मूत्रविट्त्वनखनयनमुखे स्वेदसंतापतोषा- तीसारभ्रांतिमूर्छाप्रलपनमरुचिः पैत्तिके शीतवांछा॥६॥ मलमें कठोरता मुखमें बहुत विरसता रातमें नींदनाश त्वचाकी कठोरता अग्नियुक्तविषमता वातकोपमें हों मूत्र मल त्वचा नख नेत्र मुखमें पीलापन स्वेद संताप शांति अतीसार भ्रांति मूर्छा वक्रवाद अरुचि ठंडकी इच्छा पित्तसे होती है ॥ ६१ ॥ हृत्केशास्यप्रसेको वदनमधुरता पाण्डुताक्ष्णोश्च कण्डू- स्तन्द्रावक्रमलेपो वपुषि च गुरुता मांद्यमग्नेश्च कासः। प्रज्ञानाशोतिनिद्रा चुलुचलुकरणं श्लेष्मणः स्यात्प्रकोपे कंठोष्ठघ्राणकर्णे क्षणरदरसनामूलतालुस्थलेषु ॥ १२ ॥ हृदय केश मुखमें पसीना मुखमें मीठापन नेत्रमें श्वेतता और खुजरी तंद्रा मुखमें प्रलेप और अंगमें भारापन मंदाग्नि और कास बुद्धिनाश अतिनिद्रा कंठ होठ नाक कान नेत्र दाँत जीभकी जड तालु स्थान इनमें पीडा कफकोपसे होयहै ।। ६२॥
वैद्यचन्द्रोदयः। अथ निदानपंचकावलोकः ॥ १७॥ सामान्यं दोषचिहं निगदितमिह तद्धेतुसंयुक्तमेतज् ज्ञेयं सर्वेषु रोगवनभिहितपृथग्धेतुचिह्नेषु वैद्यैः । हेतुमाग्रूपरूपैरुपशयसहितैस्ते च संप्राप्तियुक्तै- ज्ञेयाःप्राधान्यसंख्याबलसमयविकल्पैःसमेता भिषग्भिः ६३ यहां सामान्य रूपसे दोषनके चिन्ह कहे हैं। अब जिन रोग- नके अलग २ दोष चिन्ह नही कहे, तिनको वैद्यलोग निदान पूर्वरूप रूप उपशय संप्राप्ति तथा प्राधान्य संख्या बल आदि संप्रा- प्तिके भेदयुक्त या प्रकार वैद्यलोग निदान पंचकको जाने ॥ ६३ ॥ रोगो रोगस्य कश्चिद्भवति भवकरः सोपि पूर्व स्वतंत्रः पश्चाद्धेत्वर्थकर्ता तदुभयजनकः कश्चिदेकार्थकृञ्च । हेतुर्भूत्वा प्रशाम्येत् कचन च न गदोऽन्यस्य हेत्वर्थकृत्स्याउ ज्ञेयः कायेन तस्मादगदनिगदितो निश्चयोयं ज्वरादेः ६४ रोगको कारण रोगभी होयहे सोभी पहिले स्वतंत्र होयहे पीछे बल प्राप्त करके वोही हेत्वर्थकारी (रोगके पैदा करने में कारण) होजायहे जैसे ज्वरसे रक्तपित्त तथा बवासीरसे उदर रोग इत्यादि इनमेंभी कोई रोगरोगको पैदा कर शांत होजायहे जैसे ज्वरकी गरमीके कारण रक्तपित्त होयहे तव ज्वर शांत होजायहे तथा रक्त- पित्त रह जायहे और कोई रोगरोगको प्रकट करके बन्यो रहे है जैसे बवासीर नहीं जाय और गुल्म आदि उदर रोगनकोभी पैदा करे है या प्रकारही ज्वरादि सकल रोगनको निश्चय कह्योहै ॥६४॥ अथ ज्वरावलोकः ॥ १८ ॥ दोषाः संजातरोषाः समधिगतरसाः संग्रविश्यामकोष्ठम् रुवा स्रोतांसि सर्वाण्यपि बहिरनलं पक्तिकोष्ठानिरस्य । सर्पतस्तेन साकं नृवपुषि परितस्तापमुच्चैर्दधानाः कुर्वत्यष्टौ ज्वरांस्ते पृथगथ सकलद्वंद्वजागंतवश्च ॥ ६५ ॥ दोष रोषकरके, रसयुक्त आमाशयमें जायके सब द्वारोंको रोक बाहर अग्निको पकाशयसे निकारके नरके अंगमें चारों ओर
२२
भाषानुवादसमेतः।
फैलके अति ताप वढायके वातपित्तकफज त्रिदोषज द्वंद्वज आगंतुज
आठ प्रकारके ज्वर पैदा करेहै ॥ ६५ ॥
द्वेषेच्छा वह्निशीतातपमरुचितृषागौरवं गात्रमर्दो
वैवर्ण्य शांतिनेत्रप्लवपृथुपुलकारत्यहर्षाविपाकाः ।
वैस्वयं क्लांतिज़ंभाशयनबहलतावल्यशीतं विरागो
बाल्ये वाण्यां हितायामपि मधुररसे पूर्वरूपं ज्वरस्य ॥६६॥
गरमी शरदी और घाम इनमें कभी रुचि कमी अरुचि होय
प्यास भारीपन अंग टूटनो विवर्णता थकावट नेत्रस्राव वार २ रोमांच
खडेहोना पीडा हर्षनाश अजीर्णता शब्द बिगडनो आलस्य जमाई
निद्राकी अधिकता बलहीनता शीत लगनो बालककी वाणी हित-
कारीभी अछी न लगे मुखमें मधुरता ये ज्वरके पूर्वरूप हैं ॥६६॥
कंपः कंठोष्ठशोषो वदनविरसताध्मानशूलप्रलापा
रौक्ष्यारुण्ये मलाक्षि त्वचि शमनमथो संधिभेदो विरामः।
शंखVबस्तिवक्षःकटिविटपशिरोवंक्षणस्कंधबाधा-
वेगक्षोभस्तनूष्मादिषु च विषमता विक्षवस्तंभमुंभाः॥६५॥
कंप कंठ होठ सूखनो मुखमें विरसता अफरा दर्द बकवाद
रूखापन लालता गीजडयुक्तनेत्र त्वचाकी शून्यता जोडोंमें दर्द
अंगकी स्थिरता नार भृकुटी मूत्राशय वक्षस्थल कमर पीठ कोहाड
माथो वगल कंधामें पीडा गरमीको वेग और क्षोभ शरीरमे गर-
माई आदिक और मलकी विषमता छीक उवासी रूकनो ॥६॥
धर्मेच्छाकर्णनादावरुचि वमति यः पिंडिकोद्वेष्टनं च
क्लान्त्यश्रद्धे समीरज्वरजननमिदं लक्षणं लक्षणीयम् ।
वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारो वमिमुखकटुता शोषमोहातितर्षाः
पायूर्वकोष्ठनाशोऽप्यरुचिरपि मदो विप्रलापो भ्रमौ च ॥६८
घामकी इच्छा कर्णनाद अरुचि वमन देह जकडनो आलस्य
अश्रद्धा वातज्वरके लक्षण हे इन्हेदेखनो । बहुत वेग अतिसार
वमन मुखमें चिरपराहट और शोष मोह अतिप्यास गुदा मुख होठ
इनको नाश अरुचि और मद वकवाद भौर ॥ ६८ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। २३ पीतत्वं मूत्रविट्त्वइनखनयनमुखे स्वेदसंतापदाहा निद्राल्पत्वं भवंति ज्वर इह विषमाः पैत्तिकेमी विकाराः। स्तैमित्यं वेगहानिर्वदनमधुरतोदर्दतंद्राश्च तृप्तिः शौक्लथं विण्मूत्रनेत्रेऽरुचिहिमबहुता रोमहर्षातिनिद्राः॥१९॥ मूत्र मल त्वचा नख नेत्र पीले मुखमें पसीना और संताप दाह अल्पनिद्रा इतने विषमविकार पित्तज्वरमें होयहें। गीले कपडेसे देहको जडकनासा मालूम होना वेगनाश मुखमे मीठापन उदर्द तंद्रा और भूखनलगनो विष्ठा मूत्र नेत्र सुपेद अरुचि ठंड अतिलगनो रोमांच खडे होना अतिनिद्रा ।। ६९ ॥ अंगानां गौरवं च ग्रथनमिव हृदः सप्रतिश्यायभावाः कासः क्लेदो बलासज्वरजनितमिदं लक्षणं लक्षणीयम् । देह में भारीपन और हृदय वध्योसो हो प्रतिश्याययुक्त कास आलस्य इतने लक्षण कफसे पेदा ज्वरमें देखनों। तृणमूर्छादाहमोहनमवमिपुलकोन्निद्रता पर्वभेदो- मुंभा कंठास्यशोषः शिरसि रुगरुचिर्वातपित्तज्वरे स्यात् ७० प्यास मूच्छी दाह मोह भ्रम वमन रोमांच हर्ष निद्रानाश जोडोंमें दर्द जंभाई कंठ मुख सूखनो माथेमे पीडा अरुचि वात- पित्तज्वरमें होयहे ॥ ७० ॥ तैमित्यं भ्रांतितंद्राहिमतिमिरशिरःपर्वरुक् पीनसाति. श्वासश्चाथो विबंधोऽरुचिरपि पवनश्लेष्मतापस्य लिंगम् । गीले कपडेसे देहको जडकनासा मालूम होना भ्रांति तंद्रा ठंड अँधेरो माथोजोडमे पीडा अति पीनस श्वास और मल न उतरनों अरुचि ये वातकफज्वरके लक्षण हैं। तृड्दाहस्तंभशीतवममदकसनं लिप्ततिक्तास्यताति- स्वेदोऽहल्लासतंद्रारुचिगदितमिदं श्लेष्मपित्तस्वरूपम् ॥७१॥ तृषा दाह स्तंभ शीत भ्रम मद कास लिप्यो कडुओ मुख, अतिपसीना उत्साहभंग तंद्रा · अरुचि ये कफपित्तज्वरको स्वरूप कहो हे ॥ ७१॥ - २४ भाषानुवादसमेतः। तंद्रा गीतादिनानाविकृतिरबलता श्यावरक्ताभकोष्ठाः पित्तास्रश्लेष्मवांतिः शिरसि हृदि च रुक् कंठशूकत्वमोहौ । कौँ सस्वानपीडौ तृडरतिकसनं शीतदाहातिनिद्राः स्वेदानामव्यवस्था प्रलपनमरुणे सास्रमुग्ने च नेत्रे ।। ७२ ॥ जिह्वा दग्धेव रूक्षा स्वरलघिममुखास्निग्धता विट्विबंधाः स्वल्पा वाचि प्रवृत्तिश्चिरमलपचनं सन्निपातस्य रूपम् । तंद्रा गीतादि नानाविपरीतभाव दुर्बलता काली लाल कांति कोठ रोग पित्त रक्त कफकी वमन माथे और हृदयमें दर्द कंठमें कॉटेपडनो मोह कानमें शब्द, और पीडा प्यास, , दर्द कास ठंड दाह, अतिनिद्रा पसीनाकी विषमता वकवाद रक्तसे लालआंसूयुक्त फटे नेत्र ॥७२॥ जलीसी रूखी जीभ अल्पवर मुखमें रूखापन मलअवरोध कम- बोलनों देरसे दोष' पचनो ये सन्निपातको स्वरूप है। रक्तष्ठीव्यस्रवान्त्यैकनयनविकृतेर्भुननेत्रोऽतिशैत्यैः शीतांगः संधिगः स्यात् सहितगलरुजाकंटकः कण्ठकुजः। रक्तकी वमन करे सो रक्तष्ठीवी एक नेत्र टेडो होजाय सो नेत्र भग्न बर्फके समान ठंडो अंग होजाय सो शीतांग गांठ २ में दर्द करे सो संधिग गलमें कांटे युक्त दर्द करे सो कंठकुब्ज होता हे ।। ७३ ॥ तंद्राद्यस्तंद्रिकाः स्यादथ रसनहतेर्जिबको दाहरुग्भिः रुग्दाहोऽथांतकस्तैः प्रभवति सकलैर्विप्रलापैः प्रलापः । भ्रान्त्या चित्तभ्रमोऽथ श्वयथुरुगुदयैः कर्णकः कर्णमूले-. मिन्यासः सर्वचेष्टारहित इति सदा विश्वभेदास्तदीयाः ७४ तंद्रा आदिकवाला तंद्रिक होयहे और जीभको नाश करनेवाला जिह्वक होताहे और दाह तथा दर्दवाला रुग्दाह होताहे सकल चिन्हवाला अंतक होताहे विशेष बकवानेवाला प्रलापक होताहे भ्रांति करनेवाला चित्तभ्रम होताहे और कानकी जडमें सूजन तथा दर्द करे सो कर्णक होताहे सवरी चेष्टा बिगाडनेवाला अभिन्यास होताहे इस तरह तिस संनिपातके १३ भेद होते हैं ॥ ७४ ।। - वैद्यचन्द्रोदयः । वृद्ध दोषे गतेऽग्नौ सति सकलपृथूपद्रवाः संनिपाताः साध्यः कृच्छ्रस्ततोऽन्यो भवति लघुचतुःपंचषड्लक्षणैर्यः । तद्भेदः संतताख्यस्तदनु सततको नामतोऽन्येधुरन्यो नाम्नाऽथोक्तस्तृतीयाभिध इह गदितः किंच चातुर्थिकाख्यः॥ दोष वढजांय अग्नि मंद होजाय तब ये सब महासन्निपातज उपद्रव होयहैं. चार लक्षणयुक्त साध्य पांच चिन्हवारो कष्टसाध्य छे लक्षण मिलें तो असाध्य । वाके भेद संतताख्य दूसरो नाम वारो सततकहे । (दिनरातमे जो एकवार, आवे) सो, अन्येशुष्क इका- तरा नामक हे, और जो एक दिन छोडके आवे सो तृतीयक नाम कर कह्योहे दो दिन छोडके आवे सो, कौई वाकों चातुर्थिकनामा कहैं हैं ।। ७५ ॥ वातोत्थः सप्तघौरथ दशदिवसैः पित्ततो द्वादशाहैः श्लेष्मोत्थो याति शांतिं रसरुधिरगतो यो ज्वरः संतताख्यः सप्ताहाबादशाहैव्रजति शममयं दोषपाकाश्च धातोः पाकाः केचित्तु तत्तद्विगुणदिवसतः शांतिनाशौ वदन्ति ७६ वातज ज्वर सातदिनमें और पित्तज ज्वर दशदिनमें कफज ज्वर बारहदिनमें शांत होंय हे और रसरुधिरगत जो ज्वर सो संतताख्य है वे सातदिन बारह दिन कर वात पित्त कफ दोषोंको पचावे या धातुको पचावे यह एकको मत है और कोई दूने दिनमें इन दोषोंकी शांति और देहका नाश कहै हैं अर्थात् दोष पाकसे आरोग्यता और धातु पाकसे मृत्यु होयहे ॥ ७६ ।। मुक्तस्यापि ज्वरेणाऽहितसमशनतो जातरोषो हि दोषो- sल्पोपि प्रौढं करोति ज्वरमिह विषमं केपि भूतं तमाहुः। दोषो रक्तास्थितश्चेजनयति सततं स द्विकालप्रकोपम् धत्तेहोरात्रमध्ये ह्यथ सपिशितगोहर्निशं चैककालम् ॥७७॥ ज्वर छूट जाने पर भी अति अहित भोजनसे फिर दोष कोप कर थोरेभी दोष अधिक ज्वरको करेहैं, कोइ मनुष्य उसे विषमज्वर कहे हैं, दोष रक्तमें स्थित होकर दिनरातके वीच दोसमयज्वरको वै. चं. ३
२६
भाषानुवादसमेतः।
कोप करे सौ सतत कहे और दिन रात्रिके वीच एकसमे आवेसो
मांस गत हे के ॥ ७७ ॥
अन्येधुष्कं प्रकुर्यादथ स विरचयेत्प्राप्तमेदास्तृतीयं
धत्ते स श्लेष्मपित्तात्रिकमनिलकफात्पृष्ठमू|श्चदाहम् ।
दोषो मज्जस्थितश्चेद्विरचयति चतुर्थाभिधं सद्विघस्री-
मुलंध्य स्यात्समीराच्छिरस इह कफाजंघयोश्चाविरास्ते ॥७८॥
इकांतरेको करे और सो ज्वर मेदामें प्राप्त तृतीयक होयहे और
कफ पित्तसे और वायु कफसे पीठ और माथेमें दाह करे और
मजामें स्थित होकर दोष चौथेया नामक दो दिन छोडके आने-
वाला ज्वर पैदा करे वायुसे शिर और कफसे जंघाओंमें प्राप्त
होयहे ॥ ७८॥
मज्जास्थिस्थश्चतुर्थाद्रचयति वियुतं पर्ययं स्यात्रिघनी
घस्रद्वंद्व समेति व्रजति दिनमथैकं च भूरिप्रतापः ।
धर्माभोभिः प्रलिंपन्निव निखिलवपुर्गौरवेणाथ वायो-
मंदः शीतः प्रलेपी प्रतिदिवसमसौ दुश्चिकित्स्यः प्रलेपः ७९
मज्जा और हड्डीमें स्थित हो चातुर्थिक हो या तिजारी हो अथवा
दो दिन रहे वा एक दिन रहे और बहुत संताप दे नित्य मंद
(वेग) रहे शीत और गरमीसे देह लिपा और भारी वातसे रहे
वो प्रलेपकज्वर वडे प्रतीकारसेभी आराम नही होताहे ॥ ७९ ॥
दैन्यं दाहो गुरुत्वारुचिवमथुतमः स्याज्वरश्चेद्रसस्थो
दाहो मूर्छा प्रलापो रुधिरवमिमदभ्रांतयो रक्तगे स्युः।
मांसस्थे ग्लानितृष्णाभ्रमदवथु तथा पिण्डिकोद्वेष्टनं स्यात्
स्वेदो दौगंध्यमूर्छा प्रलपनलपनग्लानि मेदोगते च ॥८॥
दीनता दाह भारापन अरुचि बमनवा थुकथुकी अँधेरो आनो
रसगतज्वरमें होयहे दाह मूर्छा वकवाद रक्तवमन मद् भौंर
रक्तगतमें होय हे । ग्लानी प्यास भ्रम वमन वा थुकथुकी पींडरी
बँध जानो ये मांसगतमें होय हे और पसीना दुर्गधि मूछी
बकवाद मुखमैं ग्लानि मेदगतमें होय हे ॥ ८ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। अस्थिस्थोऽस्थिप्रभेदभ्रममदनिनदश्वासवेगांगघाता मजस्थे मोहहिकादवथुशिशिरतामर्मघाता वमिश्च । शुक्रस्थे शोफमूर्च्छ मुहुरपि पतनं रेतसः स्तब्धतांगे पंचत्वं चेति किंचिद्विषमगदयतेर्दूष्यगस्थानमुक्तम् ॥ ८१॥ हाडनमें ठहरनेसे हाडोंमें अति भडकन भौंर मद वकवाद श्वास चलनों अंगपीडा, और मोह हिचकी वमन वा थुकथुकी ठंड लगनो मर्मपीडा और वमन, मजागतमें होयहे शुक्रस्थमें शोफ मूर्छा वार २ वीर्यपात अंगमें जकडन इन विषमरोगसे दूषित हो पूर्वोक्त स्थानको विगाड कभी मृत्यु करे है ॥ ८१ ॥ आदौ शीतं दधाते किल कफमरुतौ त्वग्गतौ पाप्मनोंते पित्तं दाहं विधत्ते तदनु विनिमयाज्जायते वैपरीत्यम् । आगंतुः स्याच्चतुर्की दुरधिगमतमिस्राऽभिघाताभिषंगी जातौ द्वौ चाभिशापादपर इह मतोन्योभिचारादुदीतः ८२ निश्चय कफवातसे त्वचामें प्राप्त ज्वर प्रथम शीत करे हे और पित्तसे दाह करे हे और याके विपरीतभावसे विपरीतता होयहे और आगंतुज ज्वर चार प्रकारको होय है दुरधिगमतमिस्र अभि- घातज अभिषंगज और आभिशापज इसके पीछे अभिचारज कह्यो है ॥ ८२ ॥ दाहच्छेदक्षताद्यैः प्रथममभिवदंत्यत्र वातानुबंधो- थाऽन्योभीशोकरोषौषधिगरलमनोजग्रहावेशतश्च । भीशोकोत्थे ज्वरे स्युः प्रलपनहृदयाऽस्थैर्यचिंतातिसारा वायोः कोपश्च रोषोत्थित इह चलनं मूर्धरुक् पित्तकोपः ८३ दाहसे छेदसे घाव आदिसों पहले ज्वर वात विकार करे हे और भय शोक रोष औषध विष काम ग्रहावेश और भयशोकसे उठे ज्वरमें बकवाद हृदयमें अस्थिरता चिंता अतीसार वायुकोपसे और पित्तरोषितके कोपसे माथेमें दर्द और माथेका हिलाना होता है ८३ औषध्याघ्राणजाते क्षववमथुशिरोदुःखमूर्छादिरोगाः श्वेडोत्थे चातिसारो वदननिरसतादाहमूर्छात्रिदोषाः ।
२८
भाषानुवादसमेतः।
कामोत्थे भ्रांतिदाहारतिमदबहुताधैर्यस्वमा भवन्ति
मोरोदित्यकस्माद्वदति च विकृतःस त्रिदोषो ग्रहोत्थे ८४
औषधघ्राणसे पैदा ज्वरमें छींक वमन वा थुकथुकी शिरमें पीडा
मूर्छा आदिक रोग होय हे और विषसे अतीसार मुख में निरसता
और दाह मूर्छा ये, होते हे और कामसे उठे ज्वरमें भ्रांति दाह
पीडा मद बहुत अधैर्यता, अति सोना होता हे मनुष्य अक-
स्मात् रोवेलगे विकृत बोले वो त्रिदोष और ग्रहसे उठे ज्वरमें
होय हे ॥ ८४॥
शापोत्थे चाभिचारोत्थित इह कुपिता स्यात् त्रिदोषी च पूर्व
चेतः संतप्यतेंगं पुनरथ पिडिकाः स्फोटरूपाः सतर्षाः ।
जायते दाहमूर्छारतय इह शिवाराधनैर्मत्ररक्षा-
होमायैस्तनिवृत्तिर्भवति न भवति कापि कर्मातिरेकात् ८५
शापसे पैदामै और अभिचारसे पैदामे पूर्व में त्रिदोष कुपित हो
चित्तमें संताप अंगमें विस्फोट फुन्सी प्यासयुक्त दाह मूर्छा होय हैं
पीडा इससमे शिवजीका आराधन मंत्र और रक्षा होमादिसे
निवृत्ति होय कभी अपने कर्मोंके अतियोगसे निवृत्त नहीं भीहोय
है॥ ८५॥
शारीरो मानसाख्यो लघुरलघुतरः स्यान्निरामश्च सामो
बाह्यांतर्वेगिनौ द्वौ भवत इह तथा प्राकृतो वैकृतश्च ।
साध्योऽसाध्यो द्विधा स क्रमत इति गदे मानसे स्यात्रिदोषा-
दादौ तापोऽथ तत्तन्मलविकृतिरतिप्रस्फुटांतर्न बाह्ये ॥८६॥
शारीरक मानसक छोटो बडो होय हे आरोग्य और सरोग बाहर
भीतर वेग दोनो होय हे तैसे प्राकृत वैकृत और साध्य असाध्य
क्रमसे दो भेद होय हैं मानसरोगमें होते हे त्रिदोषसे आदिमें
ताप और तिस २ दोषकी विकृती अति बाहर न भीतर फूटे ॥८६॥
स्वापस्तंभप्रसेकारुचिहृदयगुरुत्वाग्निमांद्याविपाका-
लस्यास्याशुद्धितंद्रारतिगरिममनस्तंभतापातिमूत्रैः।
सामश्चास्मान्निरामस्त्वथ तिमिरतृषालापशूलक्रमैः स्या-
दंतर्वेगी प्रयुक्तः क्षवमलपवनस्तंभनैरन्यथान्यः ॥ ८७॥
वैद्यचन्द्रोदयः । २९ निद्रा स्तंभ पसीना अरुचि हृदयभारी मंदाग्नि अजीर्ण आलस्य अशुद्धि तंद्रा पीडा मनकी स्थिरता संताप अतिमूत्र और रोगी और निरोगी तदनंतर तिमिर प्यास वकवाद शूल ग्लानि भीतर वेगको प्राप्त छीक पवन मलबंध होय हे ॥ ८७ ॥ छर्दिमूर्छातिसारारतिसकलवपुर्भेदविड्बंधतृष्णा- हिक्का श्वासातिकासा इति वपुषि दशोपद्रवाः स्युवरस्य । वातो वर्षासु पित्तं शरदि च सुरभौ श्लेष्मकः प्राकृतोथो वेगस्तृष्णाप्रलापभ्रममलपतनं पच्यमाने ज्वरे स्यात् ॥८८॥ वमन मूर्छा अतीसार पीडा सर्वांगमें दरद मलबंध प्यास हिचकी श्वास अतिकास याप्रकार सब देहमें ज्वरके दश उपद्रव होय हैं वर्षा में वात शरदमें पित्त और वसंतमें कफ स्वाभाविक वेग करे हैं प्यास प्रलाप भ्रम मलपात ये पच्यमानज्वरमें होय हे ॥ ८८॥ सर्वैः स्याल्लक्षणैर्यो बलिमददमकः स ज्वरः प्राणहारी शीघ्रं यश्चेन्द्रियाणां शमयति पटुतां यश्च गंभीरसंज्ञः । क्षीणो रूक्षो विसंज्ञो विकल इह बहिग्लानिशीतार्दितोन्त- स्तापा प्रस्विन्नकंठालिकमिह कथितः स्यादसाध्यो ज्वरातः८९ जो सर्व लक्षणयुक्त बलवानको निर्बल करे वो ज्वर प्राणहारी हे जो शीघ्र इंद्रियादिकी चंचलता नाशकरे सो गंभीरनामा हे, क्षीण रूक्ष बेचेत विकल यामे बाहर ग्लानि भीतर शीत पीडा ताप पसीना ठंडसे कंठ रुकनो होय वो ज्वरपीडितरोगी असाध्य है ८९ दोषाणां कोपहानिर्वपुषि च लघुता स्याज्ज्वरस्यापि शांति- वैमल्यं चेन्द्रियाणां पृथगिति गदितो लक्षणैर्दोषपाकः । निद्रानाशो गुरुत्वारुचिहृदयपृथुस्तंभभावोरतिश्च हुन्नाभीष्वर्तयस्तृश्वसनबहुलता धातुपाकस्य चिह्नम् ॥१०॥ स्वेदः कंडूलघुत्वं क्षवथुरथ पृथक्पाटवं चेन्द्रियाणा- मन्ने वांच्छास्यपाकः प्रकृतिरपवने रूक्षता विज्वरे स्यात् । दोषोंके कोपको नाश होनेसे देहमें लघुता ज्वरकी शांति में होवे हे अलग २ इन्द्रियनकी निर्मलता ये लक्षणसे दोषपाकवर को है ३० भाषानुवादसमेतः । और निद्रा न आनो भारापन अरुचि हृदयको भारीपन स्तंभको होनो पीडा और हृदय नाभिमें दर्द अंधेरो आनो प्यास श्वासकी अधिकता धातुपाक ज्वरके चिन्ह हैं ॥ ९०॥ पसीना खुजरी हलकापन छींक और अलग २ इन्द्रियनकी चंचलता अन्नमें इच्छा मुखपाक प्रकृती वातका नाश चिकनापन ये उतरगये ज्वरमे होय हे। अथातीसारावलोकः ॥ १९ ॥ अत्यर्थस्निग्धरुक्षद्रवगुरुशिशिरासात्म्यभुक्तैरजीण- रम्बुक्क्रीडांबुदोषासवविषमरुषैः शोकवेगाभिघातैः ॥ ९१ ॥ संशम्याग्निं रसोऽधः सविडतिसरति प्रेरितो वायुनासौ पोढा रोगोऽतिसारः पृथगथ मिलितैरामतश्चाथ रक्तात् । विडूभंगाध्माननाभीजठरगुदहृदातोदमस्याग्ररूपं वायोर्व!ल्पमल्पं सरुगरुणमरं रूक्षमाम सशब्दम् ॥ ९२॥ अति चीकने रूक्ष पतले भारी अहित ठंडे भोजनसे अजीर्णसे जलक्रीडा और जलदोषसे आसव विषम क्रोधसे शोकके वेगसे अभिघातसे अग्निको नाश करके रसको विलोय वायुसे प्रेरित अति मल निकले, वो अतीसार रोग छे प्रकारको है, वात पित्त कफसे अलग २ और त्रिदोषसे आमसे और रक्तसे दस्त न होनो अफरा नाभि पेट गुदा हृदयमें दर्द याको पूर्वरूप हे । अधोवायु और मलको गमन अल्प २ पीडायुक्त शीघ्र रूखो आम शब्दयुक्त वातसे होय है ॥ ९२ ॥ पीतं शुभं च रक्कं हरितरुचि सकृद्दाहमूछे च पित्तात् शुक्लं सांद्रं च विस्रं सकलमिह कफादृष्टरोमांचरोगी। नानावर्णः सपीडः समुदयजनितः सः सकृच्छोषकः स्यात् बाष्पोष्मा शोकयुक्तो रुधिरमनुगतः सारयेद्रक्तवर्णम् ॥१३॥ पीलो अथवा सुफेद लाल हो मल अरुचि दाह मूर्छा ये पित्तसें होय हे सुपेद गाढो फट्यो कफमिल्यो रोगीके रोमांच खडेसे हो सो कफसे होय हे और तेसेही अनेक वर्ण वारो पीडायुक्त ,
वैद्यचन्द्रोदयः।
धुआंसहित गरम लोहू सो लाल मल निकले और एकदम
मनुष्य सूख जाय सो रक्तातीसार हे॥ ९३ ॥
अन्नाजीर्णाच्च धातूनखिलमलमपि क्षोभयंतत्रिदोषा-
नानावणं सशब्दं द्रवमुदरकटी वेदनं सारयन्तः ।
वाराहस्नेहमेदःपलसलिलसहर जंबुमज्जाज्यकल्पं
चित्रं दुर्गन्धिचन्द्रं विडरति स महामोहदाहास्थिशूलम् ९४
अन्नके न पचवेसे और सब धातूनको सब दोष विगाडे हैं
त्रिदोषसे नानावर्ण शब्दयुक्त पतलो पेटकमरमें पीडा करतो
मल निकले, सूकरकी चर्बी मेद सो मांसजलसो ऐसेही जामु-
नकी मीगी सो घीसो विचित्र दुर्गधि चमकदार मल पीडा महा-
मोह दाह हड्डीमें शूलयुक्त निकले ॥ ९४ ॥
हिक्कामूर्छाप्रलापज्वरजठररुगाध्मानविण्मार्गपाकै-
श्चिकैरेतैरसाध्यो भवति स करपच्छोथकाश्यांगभंगैः ।
वातो वृद्धो बलासं तुदति चिरचितं स्वाहितान्नाशनाच्च
स्वल्पं भूयो मलाक्तं प्रवहति स तदा वाहिका स्यात्प्रपूर्वा ९५
वाताच्छूलान्विता सा पृथुदवथुमती पित्ततः श्लेष्मतस्तु
श्लेष्माकारा त्रिलिंगा त्रिभिरपिच मलैर्लक्ष्मयुक्ता पुरावत्।
हिचकी मूर्छा वकवाद ज्वर पेट पीडा अफरा गुदापाक हाथ
पावमें शोथ दुर्बलता अंगभंग इन चिन्होंसे युक्त असाध्य होय हे,
वातके बढनेसे पीडा, अति अपथ्य अन्नखानेसे बहुत दिनको इकट्ठो
कफको प्रेरणाकर फिर अल्प दोष बहुत मलयुक्त गुदा वह्यो करे
तब प्रवाहिका होय हे ॥ ९५ ॥ वो वातसे शूलयुक्त सो पित्तसे
बहुत वमनवारी, कफसे कफाकार और तीन दोषसे तीनो लक्ष-
णयुक्त पहलेकी भांति होयहे।
अथ संग्रहण्यवलोकः ॥२०॥
नष्टे रोगेऽतिसारेऽप्यहितसमशनैर्मदवः स भूयो
वहिं दुष्टीकरोति ग्रहणिमतिगुरुः संग्रहण्यामयोयम् ॥१६॥
३२
भापानुवादसमेतः ।
पक्षान्मासाद्दशाहादनुदिनमथवा सा विदुष्टा विमुंचेत्
यामं व ऽथ पकं द्रवमथ निविडं भूरि चाल्पं सशूलम् ।
वातापित्तात्कफाच त्रिभिरपि च भवेत्सा चतुर्धात्र वायो-
दुःखादंतस्य पाकात्तृडपि परुपता कंठशोषो विषूची ॥९७॥
जव अतीसाररोग नाश होजाय और फिर अपथ्य भोजनसेही
अग्नि मंद हो और अग्नि विगडके अति वहनेवारी बडीभारी संग्र-
हणी रोग होय हे वो संग्रहणी बहुत विगडी भई पक्ष मास दश
दिन और नित्यप्रति बहुतया अल्प शूलयुक्त मलको छोडे वात
पित्तकफसे तीन प्रकारकी और त्रिदोषसे चौथी होयहे वो इस
ग्रंथमें वातसे भीतर पकेके समान राध वहावे प्यास लगावे कठोर
मल वहावे कंठ शुखावे हैजा करे ॥ ९७ ॥
कर्णध्वानो हृदर्तिर्वदनविरसता कार्यपाश्र्वोरुपीडा-
ऽजीर्णे चाध्मानमन्ने पचति च भवति स्वास्थ्यमाशु प्रयुंक्ते ।
गुल्मप्लीहाभिशंका श्वसनकसनके चाथ पित्तेन वर्ची
नीलं पीतं च पूति द्रवमरुचितृषाच्छर्दितिक्तास्यता च ॥१८॥
वहरापन हृदयमें पीडा मुखमें विरसता दुर्बलता पांशू जाँघोंमें
पीडा अजीर्ण और अफरा अन्नपचनेपर फिर शीघ्र अन्न पहुँचनेसे
खस्थता होयहे गुल्म प्लीहकी शंका श्वास कास युक्त और पित्तसे
मल नील पीत और दुर्गधि पतरो अरुचि प्यास वमन और
मुखमें कडुवापन ॥ ९८॥
मूर्छाम्लोद्गारदाहौ भ्रमिरथ कफतः स्निग्धसश्लेष्मव!
वके माधुर्यलेपो हृदयजठरयोर्गाढता वह्निमांद्यम् ।
नैर्बल्यं स्त्रीष्वहर्षः कफवमिमधुरोगारतान्नाविपाकाः
सर्व लक्ष्म त्रिदोषे भवति जलघटीशब्दयुक्तं च वर्चः ॥१९॥
मूर्छा खट्टीडकार दाह भौर करे हे और कफसे चीकनो कफ-
युक्त मल मुखमें भीठो लेप हृदय पेटमें कठोरता मंदाग्नि दुर्बलता
स्त्रीमें अरुचि कफकी वमन मीठी डकारआना अन्न न पचनो और
ये सब लक्षण त्रिदोषमें होवे फिर गुदा शब्दयुक्त जल घडीके
समान मलत्याग करेहे ॥ ९९ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः । ३३ सुप्तिः शूलं सपार्श्वव्यथमनलहतिः शब्दमूर्छाप्रलापाः शोथः शाखासु लिंगं गदितमिह बुधैर्मृत्यवे संग्रहण्याम् । अन्या सा संग्रहाद्या ग्रहणिरतिचितादामवातात्सकष्टा- हुर्विज्ञेया दिवामं विसृजति निशि वाथोभयोर्वा मुहुर्वा १०० क्षिप्रं मज्जाजलाभं द्रवमथ निबिडं श्वेतशोणं पिशंगं पीतं वा शब्दपूर्व सकटिरुगसकृत्प्राहुरामं पुरीषम् । शून्यता शूल पाँशूमें व्यथा मंदाग्नि खेद मूर्छा वकवाद गुदामें शोथ ये चिन्ह संग्रहणीमें विद्वानोंने मृत्युके कहे हैं और सो सम्यक् प्रकार ग्रहण आदिसे ग्रहणी अति इकठ्ठी आमवातसे कष्टयुक्त दुर्निवार आदि आम दिनरात वार २ पड़े ॥ १०० ॥ हालकी मज्जाके धोये जलसो पतलो मल सुफेद लाल हरो पीलो वा शब्द- युक्त कमरमें दर्दयुक्त ऐसो मल आमयुक्त कह्यो हे। अथार्शावलोकः ॥ २१॥ दोषभिन्नैरभिन्नै रुधिरजसहजैश्चैवमशासि पोढा जायतेऽपानमार्गे त्रिवलिषु पललस्यांकुरा दुर्निवाराः॥१०१॥ वात पित्त कफकरके सन्निपातसे रक्तसे जन्मसे ऐसे छे प्रका- रको अर्श रोग गुदामार्गकी त्रिवलीमें मांसके दुर्निवार अंकुर होवे हे ॥ १०१॥ श्यावाः शोणाः कठोरा विशदसरुचयोऽन्योन्यमुज॑भितास्या वक्राः खजूरबिंबीबदरफलनिभा नीपसिद्धार्थभासः । विष्टंभोगारहिमाक्षवहृदवधृतिस्तोकविकृष्णरूक्ष- त्वमूत्रादित्वगुल्मारुचिसदनकराः पार्श्वकव्यादिपीडाः॥ कारे लाल कठोर श्वेत कांतवारे फटेमुखके टेढे खजूर बिम्बी और वेरफलसे कदंब वा सरसोंसे कबजियत डकार हिचकी छीक हृदयकी अधीरता अल्पपीडा मल त्वचा मूत्रादिक काले रूखे गुल्म अरुचिको स्थान करवेवारे पाशू कमर आदिमें पीडा ।। १०२॥ वातात्पित्तात्तु पीताः शुकरसननिभा रक्तपावक्रतुल्याः श्यामाः शोणाश्च विस्रास्तनुरुधिरवहा दाहपाकेऽतिदुःखाः।
३
३४
भाषानुवादसमेतः।
मूर्छामोहभ्रमार्तिज्वरमदतृडतिस्वेददाः सामविट्त्वङ्-
नेत्रप्रस्वेदमूत्रपि च नखमुखयोः पीततामादधानाः॥१०॥
वातसे और पित्तसे पीले तोताकी जीभसे जोकके मुखके
समान काले और फटे रुधिर वहानेवाले दाह पाक अतिदुःख
देवेवारे मूर्छा मोह भ्रम रोग ज्वर मद प्यास अति पसीना देनेवाले
आमयुक्त विष्ठा त्वचा नेत्रमें पसीना मूत्र नख मुखमें पीलापन
धारण करवेवारे होय हैं ॥ १०३ ॥
श्लेष्मस्थाः स्थूलमूलाः सितधनलघवः स्पर्शलाः पिच्छलास्ते
कंडूला गोस्तनाभा अपि पनसफलास्थ्याभवंशांकुराभाः।
शुक्लत्वान्यास्त्वगादिष्वपि बहुलवसावर्चसौ मेहकृच्छ्र-
क्लैब्याग्निःण्यकासश्वसनविरुचिदाः स्रावभेदव्यपेताः १०४
कफसे पैदा मोटी जडवारे श्वेत कठोर छोटे वार २ हाथ लग-
वानेवारे भारी खुजरीयुक्त गौके स्तनसे और पनसफलकी मींगीसे
बाँशके अंकुरसे सुफेद त्वचा आदिवारे और बहुत नीकनो मल
प्रमेह मूत्रकृच्छ्र क्लीबता क्षीणाग्नि कास श्वास अरुचि देवेवारे
सावभेदयुक्त ॥ १०४॥
सर्वैर्लिंगैस्त्रिदोषोत्थितमपि सहज रक्तजातं तु पित्तो-
त्थार्शः प्लक्षप्ररोहप्रतिममथ समं चोच्चटाविद्रुमाभ्याम् ।
भेकाभं पीज्यतेसस्रुतिभिरतितरामुष्णविवः सकष्टं
क्वापि घ्राणास्यलिंगेष्वपि भवति च तद्रक्तजं रक्तवाहि १०५
सब लक्षणयुक्त सन्निपातज और सहज रक्तज पित्तसे पैदा
प्लक्षप्ररोहसे और रत्ती मूंगासे मेंडकासे ये पीडादायक स्राव अति
गरम मल कष्टयुक्त कभी नाक मुख लिंगमें होनेवारे रक्त वहावे
तो रक्तज होय ॥ १०५ ॥
साध्या बाह्यांकुरा ये गुदवलिवलये मध्यमे कृच्छ्रसाध्या-
श्वान्तेऽसाध्याश्च कौला अपि कृशवपुषः शोफभाजो नरस्य ।
तृष्णाहत्पार्श्वशूलैररुचिवमिमहामोहशोफातिसारैः
पाकेनापानमार्गस्य चनयति नरं दीर्घनिद्रामिहार्शः॥१०६॥
वैद्यचन्द्रोदयः।
गुदाकी अवलीमें बाहर अंकुर हों सो साध्य बीचमें हो सो
कृच्छ्रसाध्य भीतर हो सो असाध्य, और कुलपरंपरासे कृश देह
शोथवारे नरके प्यास हृदय पांशूमें शूल अरुचि वमन महामोह
शोथ दस्त गुदापाकसे मनुष्यको ये अर्श दीर्घनिद्रा ( मौत ) को
प्राप्त करे हे ॥ १०६ ॥
अथामिरोगावलोकः॥२२॥
औदों वीतिहोत्रः सृजति स विषमो वातरोगाननेकान्-
तैक्ष्ण्यं पित्तप्रभावाजनयति कफजान्मंदसंज्ञं करोति ।
अन्यो धन्यः समाख्यः पवनमनुगतः पित्तमग्निं च तीव्र
कुर्यात्क्षीणं वलासं स च भवति तदा दुःसहो भस्मकाख्यः
उदरकी अग्नि विषम हो तो अनेक वात रोगोंकों करे हे तीव्र
हो तो पित्त रोगोंको करे हे मंद संज्ञावाली कफ रोगोंको करे हे
और समान अग्नि अर्थात् प्रकृतिके बराबर रहनेवाली धन्य हे
अर्थात् रोग रहित रखनेवाली हे वातमें पित्त प्राप्त होके अग्निको
बढायके और कफको घटायके वडो कठिन भस्मक नाम रोग
पैदा करे हे ॥ १०७ ॥
अथाजीर्णावलोकः ॥२३॥
वाताद्विष्टब्धमामं कफजनितमथो पित्ततस्तद्विदग्धम्
तुर्य शेषाद्रसस्य प्रभवति च पुनः पंचमं धनपाकि ।
षष्ठं चाजीर्णयुक्तं प्रकृतिपरिगतं चेति षोढाप्यजीर्णम्
रोगानीकस्य मूलं भवति च विविधासात्म्यभुक्तेन जंतोः।।
वातसे कबजियतवारो अजीर्ण होय हे, कफसे आमवारो होय
हे और पित्तसे मलको शुखायवे वारो होय हे रसके न पचवेसो
चोथो अजीर्ण होयहे और फिर एक दिनमे जिसका पाक हो सो
पांचवो अजीर्ण हे और प्रकृतिसे संबंध रखनेवाला नित्य अजीर्ण
रहे सो छठा अजीर्ण हे याप्रकार अजीर्ण रोग छे भ्रांतिको होवे हे
नानाप्रकारके अपथ्य भोजनसे नरके अजीर्ण रोगकी सेनाकों
मूल होवे है ॥ १०८॥
३६ भाषानुवादसमेतः । अत्यंभःपानतश्चाऽशनविषमतया स्वप्नवैषम्यभीति- क्रोधैः शोकाश्रुचिंताकदशनरजनीजागरैर्भूरिभुक्तैः । वेगारोधाद्विरोधासमयविहरणक्षेण्यदैन्यातिलोभैः प्राज्यैराज्यैश्च मांसैर्भवति गुरुतरैमत्स्यभोज्यैरजीर्णम् १०९ अतिजलपान और विषम भोजन होनेसे और विषमताके सोनेसे भय क्रोध शोक आंसू चिंता दुष्ट भोजन रातमें जगनेसे अतिभोजनसे वेग रोकनेसें विपरीत समय विहार करनेसे क्षीण- तासे दीनतासे अतिलोभसे माखन घी मांस बड़े मत्स्य खायवेसे अजीर्ण होय है ॥ १०९ ॥ उद्गारोऽम्लः सधूमो भ्रमवमितिमिरं मूत्रविसंनिरोधो- ऽतीसारश्चांगपीडा धरणिनिपतनं शूलमेतस्य रूपम् । ऊर्वाधोवातरोधादलसक उदितः सालसे ह्यामकोष्ठे दंडाख्यः स्यात्स एवं प्रसृतकरपदस्तब्धता दंडवच्चेत् ११० धूंआयुक्त खट्टी डकारआनो और भौंर वमन तिमिर मूत्र मल रुकनो अतीसार और अंगपीडा पृथ्वीमें गिरनो शूल ये याको रूप है। ऊंचो नीचो वायु रुकनोसे अलसक पैदा होता हे निश्चय अलसयुक्त आम कोष्टमें फेले तव हाथ पाँव लकडीसे जकडे एसो दंडाजीर्ण होय हे ॥ ११० ॥ नो धो याति भुक्तं यदि च कफमरुद्भ्यां विलंबी विदुष्टं सूचीवक्रेरिवांगान्यनिल इह नुदेद्यत्र सा स्याद्विषूची। मूर्छातीसारशूलभ्रमवमथुतृषाकंपवैवर्ण्यजूंभा- नेत्रश्चैत्यांगभंगरपि कपिशतया दंतदंतच्छदानाम् ॥१११॥ जो भोजनऊपर न जाय और न नीचे जाय और कफ वात के बिगडनेसे विलंबी होयहे सूईके मुखके समान अंगमें चुभेसो विषूची होय हे मूर्छा अतीसार शूल भोर और वमन प्यास कंप विवर्णता उवासी श्वेत नेत्र अंगभंग और निश्चय दंत मसूठोंमें भूरापन ॥ १११ ॥ हृत्पीडादाहतंद्रारतिमिरतितरां मूत्रविसंनिरोधे- ऽन्ताजीर्णी जीवतीह क्षणमथ लघुमिर्लक्षणैस्तत्तथोह्यम् ।
वैद्यचन्द्रोदयः। . हृदयपीडा दाह तंद्रा खेद अतिशय मूत्रमलको रुकनो इन कम चिन्हसे अजीर्णी क्षणमात्र जीवे अधिक लक्षणसे मरजाय । अथ कृमिरोगावलोकः ॥ २४ ॥ द्वेधांतर्बाह्यभेदात्कृमय इह तथा ते चतुर्द्धा कफासृग्- विप्रस्वेदोद्भवत्वान्नृवपुषि निखिला नामभिर्विंशतिः स्युः ॥ भीतर बाहरके भेदसे कृमि दो प्रकारके हैं तैसेही वो कफ रक्तमल पसीनासे होनेके कारण चारप्रकारके मनुष्यके देहमें सब नामोंसे वीस तरेके होय हैं ॥ ११२ ॥ अव्यायामैरजीणमधुरतिलदधिक्षीरभाषाम्लसूतैः पिष्टैर्दुष्टैश्च भोज्यैः पललचणदिवास्वप्नशाकैः कृमिः स्यात् । शूलश्वासातिसारज्वरवमथुगुदद्वारकंड्वास्ययुक्ताः भ्रांतिच्छद्यग्निमांद्यं कृमिजमिति बुधा लक्षणं व्याहरंति ११३ विना महनतके अजीर्णसे मीठो तिल दही दूध उर्द खट्टो दु- गंधी कठोर पीठीके दुष्टभोजन मांस चना आदिके खानेसे दिनमें सोनेसे शाक पत्र खानेसे कृमि होय हैं । शूल श्वास अतीसार ज्वर वमन गुदाके द्वारमें और मुखमें खुजरी सहित भौंर वमन मंदाग्नि ये लक्षण वैद्य कृमिसे पैदा कहे हैं ॥ ११३ ॥ ते सप्तामाशये स्युः पृथुकफजनुषोऽस्राशयेऽस्राच्च षट् ते पंचांते विंशतिर्हि बहिरिति विविधास्तत्तदर्तिप्रदाश्च । वो सात आमाशयमें होय हैं और अति कफके होनेसे रक्त स्थानमें रक्तसे छे होवें हैं पाँच बाहर होवें हैं वीस भीतर होवें हैं। और ये तहाँ २ नाना प्रकारकी पीडा देवेवारे है । अथ पांडुरोगावलोकः ॥२५॥ देहः सश्वासकासश्वयथुवमियुतः पीतविण्मूत्रनेत्रः क्षीणाग्निः क्षीणशुक्रो भवति गतबला पांडुरोगी मनुष्यः । ते स्युः पंचैव दोषैः पृथगथ मिलितैर्मृत्स्नया चात्र वायो:- पीतश्यामारुणत्वं त्वचि च परुषतानाहकंपो सतोदौ । वै.चं. ४ भाषानुवादसमेतः । , पित्तात्पीतं त्वगादि ज्वरदहनतृषः श्लेष्मतः शुक्लभावो मूत्रादेर्वक्त्रसेकः श्वयथुरलसता वह्निमांद्यं गुरुत्वम् ११५ पीलो अंग श्वास कास शोथ वमनसे युक्त मल मूत्र नेत्र पीले मंदाग्नि क्षीणवीर्य और बलहीन नर पांडुरोगी होयहै ॥ ११४ ॥ वो पांच प्रकारको होवें हे, वात पित्त कफके विकारसे और सन्नि- पातसे मट्टी खानेसे, तहाँ वायुसे पीत श्याम लाल त्वचामें कठोरता और अफरा कंप पीडायुक्त होवेहे, पित्तसे पीली त्वचा आदि ज्वर दाह प्यास, होवेहे कफसे मूत्रआदि सुफेद मुखमें पसीना शोथ आलस्य मंदाग्नि भारापन ॥ ११५ ॥ सर्व लक्ष्म त्रिदोषे मृदपि च तुवरा मारुतं चोषरो वै पित्तान्माधुर्ययुक्तं कफमनुवितनोत्येनमुक्तिश्य धातून् । गंडधूनेत्रकूटप्रपदकरयुगे मेहने नाभिदेशे शोथाढ्यः सातिसारः क्लमदवथुयुतः पीतदर्शी खरांग: ११६ त्रिदोषमें सब लक्षण होय हे कषेली मट्टी खानेसे वात बिगडे हे खारीमट्टी खानेसे पित्त बिगडे हे मीठी मट्टी खानेसे कफ बढके धातूनको बिगाडे हे कपोल भौंह नेत्र भाग पगतली हथेली शिश्न ढूँडीस्थलमें, शोथयुक्त अतीसारसहित ग्लानि वमन युक्त पीलो देखे और कठोर अंग ॥ ११६ ।। तृष्णामूर्छावमीयुत् गतवति समये पांडुसंघातदर्शी पांडुत्वग्दंतनेत्रो गतबलदहनः पांडुरोगी न जीवेत् । पित्तं दग्धासमांसे रचयति कुपितं कामलां पैत्तिकान्नैः पाण्डुव्याघेर्हरिद्रानिभनयननखत्वक्शकृन्मूत्रभाजः ॥११७ कुंभाद्या सैव वृद्धा तरुणकपिहरिद्राभनेत्रा सपित्ता- द्वातात्कांतो हलीमस्तदनु स च पृथूपद्रवैः पानकी स्यात् । प्यास मूर्छा वमन युक्त चलतेसमें पीलो समूह दीखे त्वचा दंत नेत्र पीले बलहीन दाहवालो पांडुरोगी नही जीवे, पित्तसे अति बिगडे रक्तमांस कोप करके कामला पैदा करे है, पैत्तिक अन्नसे पांडुरोग हरदीसे नेत्र नख त्वचा मल मूत्र वारो होय हे , वैद्यचन्द्रोदयः। ३९ सो याके वढवेसे कुंभकामला होय है, पित्तसे लाल शरीर और हरदीसे नेत्र, वातसे हलीमक होय हे वाके पीछे बहुत उप- द्रवसे पानकी होय है॥ अथरक्तपित्तावलोकः ॥ २६ ॥ धर्मव्यायामशोकाध्वगमनसुरतैः क्षारकवम्लतीक्ष्णौ- दग्धं पित्तं च रक्तं दहति वहति तच्चाधरोबैर्बिलस्तैः ११८ घाम परिश्रम शोक रस्ता चलनो मैथुन क्षार कटु अम्ल तीक्ष्ण पदार्थोंके सेवनसे पित्तरक्तको विगाडके नीचे ऊपरके छिद्रोंसे रक्त दाहयुक्त वहावे हे ॥ ११८ ॥ निश्वासो धूमगंधो वमनमपि हिमाकांक्षता स्याग्ररूपम् श्वेताभं श्लेष्मतस्तत्कपिशमनिलतः कृष्णशोणं च पित्तात् । मिश्रं चिह्नः समस्तैरधरगमनिलादूर्ध्वगं श्लेष्मवंतम्- वातश्लेष्मान्वितं चोभयगमनमिदं वापि लोमादिजं च ।। श्वास रुकनो धूमगंध आनो वमन और ठंडकी इच्छा याको पूर्वरूप है. कफसे श्वेतकांतिवारो तैसेही वायुसे भूरो पित्तसे कारो लाल सर्व चिन्होंसे युक्त त्रिदोषी और वातसे अधोगामी और कफसे ऊर्ध्वगामी और वातकफसे दोनों मार्गगामी और कभी वालआदि खानेसे होनेवाला ॥ ११९ ॥ साध्यं स्यादेकदोषं गदितमिह बुधैर्याप्यमन्यविदोष दोषैः सर्वैरसाध्यं विगतहुतवहस्याविमार्गानुगं च । जंबालाभं सजंबूफलनिभमथवा पूयमेदोस्रकल्पं- मांसप्रक्षालनांभःसममसितसकृन्नीलशोणप्रभं वा ॥ १२० ।। पंडितजन एकदोषसे भयेको साध्य कहें, और द्विदोषीको याप्य, सर्व दोषसे होनेवालेको असाध्य, तथा मंदाग्नि वारेके दोनों मार्गसे वहें और काईसो जंबूफलसो अथवा पीव मेद रक्तसो मांसप्रक्षालनके जलसो कालो नीलो लाल प्रभावारो ॥ १२० ॥ नो साध्यं रक्तपित्तं यदि वमति नरः श्वासकासज्वरातः क्षीणो दाही सपांडुः सवमथुरधृतिर्भूरितृष्णोऽतिपीडः।
भाषानुवादसमेतः। श्वासकास ज्वर पीडित क्षीणता दाह सहित पांडुरोग युक्त अधैर्यवान और प्याससे दुखी जो मनुष्य रक्तपित्त वमन करे सो साध्य नहीं है। अथ राजयक्ष्मावलोकः ॥ २७ ॥ क्षेण्याद्धेगावरोधाद्विषमसमशनात्साहसाद्वातकोपात् यक्ष्मा दोषः ससाध्यः सति पृथुलकफैस्तैरसाध्यः प्रकोपे १२१ क्षीणतासे वेग रोकनेसे विषम भोजनसे साहसके कार्य कर- नेसे वातकोपसे ये यक्ष्मरोग साध्य हैं, सो अतिकफकोपहोनेसे असाध्य हैं ॥ १२१॥ क्षीणे शुक्रेऽथवोच्चैरतिनिधुवनतो धातवः सर्व एव क्षीयंते शुष्यतीह प्रतिदिवसमतो मानवो मंदवह्निः। रक्तष्ठीवी ज्वरातः कफवमिरलसो मूर्धहृत्पार्श्वपीडा- मांसस्त्रीमद्यतृष्णाश्वसनकसनवान्विस्वरः शुक्लनेत्रः॥१२२॥ अति शुक्र क्षीण होनेसे अति मैथुन करनेसे सब धातु क्षीण होय हे और या कारणसें मंदाग्निवारो नर नित्य सूखे रक्त थूके ज्वरपीडित कफ वमन करे आलसी माँथो हृदय पांशूमें पीडा मांस स्त्री मद्यमें इच्छा श्वास कासवारो स्वरहीन सुफेद नेत्र १२२ क्षीणाग्निः क्षीणचित्तो व्रजति च समये क्षीयमाणस्तृषावान् पूत्यास्यः शुष्कतालुः कृशबलधिषणः पीनसी यक्ष्मणातः। स्वमे तं बर्हिशाखामृगकलभशुकाः शल्लकीध्वांक्षगृध्रा भूयांसः क्लेशयंति द्रुममपि कलयेद्वातधूमावधूतम् ॥१२३॥ मंदाग्नि क्षीणचित्त होके फिर क्षीयमाणसमयमें प्याससे पीडित मुखमें दुर्गधि तालुशोष कृश दुर्बलबुद्धिवारो पीनसी यक्ष्मायुक्त स्वप्नमे वानरके बच्चा मृग हाथीका बच्चा शूआ शेह कौआ गीध वार २ क्लेश देवें वृक्षों चडे वायु धूमयुक्त देखे ॥ १२३ ॥ वातात्पार्थासशूलं स्वरविकृतिरुजौ पित्ततश्चातिसारो- सृग् वांतिर्दाह उच्चैः करचरणतले सज्वरोऽथो बलासात् ।
वैद्यचन्द्रोदयः । कंठध्वंसश्च कासोऽरुचिरपि च शिरः पूर्णतैकादशैता- न्याहुर्लक्ष्माणि यक्ष्मामयिनि मुनिवराः षविधःस्यादथो वा वातसे पाशूमें शूल स्वर बिगडनो पीडायुक्त, और पित्तसे अ- तीसार रक्तकी वमन अति हाथ पावके तलमें दाह, ज्वर युक्त और कफसे कंठनाश और कास अरुचि और शिरमें भारापन ये ग्यारह चिह्न मुनीनमें श्रेष्ठ यक्ष्मरोगीके कहे हैं और वो छैप्रकार- कोही लक्षण होय हे ॥ १२४ ॥ व्यायामाध्वव्यवायक्षतयुगलजराशोकतः शोषिणः स्यु- र्धातूनां शोषणात्तु प्रतिदिन मिहतुः शोषमाहुर्मुनीन्द्राः । युक्तः शुक्रक्षयांकरहरहरपि च क्षीयमाणोऽति पीतो दग्धास्यःसंधिहढुक्कृशतनुरलसः स्याद् व्यवायप्रशोषी१२५ मेहनत मार्गगमन मैथुन दोप्रकारके घावसे वुढापेसे शोकसे शोष होनेसे धातूनके शोपणसे प्रतिदिन मनुष्य शूखे सो मुनीन्द्र शोष कहे हैं वीर्यक्षययुक्त दिन २ क्षीयमाण अतिपीलो दाहयुक्त मुख संधी और हृदयमें पीडा कृश देह आलसयुक्त मैथुन शोषी होय हे ॥ १२५॥ शुक्ररेण्यं विना यः प्रभवति च तथा पुत्रवित्तप्रियादे- शादाशोषमानोऽनवरतसबलः शोकशोषी स उक्तः । मंदोऽतिस्वल्पबुद्धीन्द्रियरुचिरबलो भिन्नकांतिस्वरोऽथो- निष्ठीवेच्छेष्महीनं कृशतनुरनवः स्याजराशोषिसंज्ञः १२६ जो वीर्यक्षीण विना बलवारो पुत्र वित्त आदिके नाशके शोकसे एकदम शूखे वो शोकशोषी कह्यो है मंद अतिस्वल्पबुद्धि दुर्बल इन्द्रियवारो कांतिहीन फूटे कांसेके सो स्वर और कफहीन थूके कृश देहवारो बुढो होय वो जराशोषी संज्ञावारो हे ॥ १२६ ॥ सस्तांगो भृष्टरूक्षत्वगतिकृशमुखक्लोमकण्ठोऽध्वशोषी स्याघ्यायामप्रशोषी पृथुभिरिह नरः शोकशोषिस्वरूपैः । लिंगैर्वक्षःक्षतीयैः क्षतमिह च विना वेदनास्रक्षयाभ्या- माहारस्यापि मांद्याद्रणवत उदितः शोष एष व्रणान्यः ॥
भाषानुवादसमेतः।
ढीलो अंग रूखी त्वचा अति कृश मुख और प्यासका स्थान
कंठ शूखेसो मार्गशोपी होय हे और श्रमशोपी मनुष्य शोक-
शोषीके वहुतसे लक्षणवालो होय हे और रक्तके क्षीण होनेसे
विना घावके पीडा हो हृदयमें घावसो मालूम होय और आहारकी
अल्पतासे घावके समान शूखे सो व्रण शोषी कह्यो हे॥१२७॥
चंडं कोदंडदंडं सकृदपि च बलात्कर्षणो धावतो वा
धावंतौ
वाहगावावनु च वलवता युध्यमानस्य पुंसा।
वोढुर्वा भूरिभारस्य च झटिति परान्निघ्नतो नृत्यतो वा
तूर्ण दीर्घानदीर्घा तरत उरुतरोत्फालमातन्वतो वा ॥१२८॥
प्रचंड धनुषकी तांत जोरसे खेचे दौडे और दौडते घोडा तथा
बैलको पकडे बलवान नरसे युद्ध करे जल्दी बहुत बोझ उठावे
दूसरेको मारे नृत्य करे शीन बडे वृक्ष4 चढे कुदारीसे भूमि खोदै ॥
अत्युच्चैः पाठिनो वा नवरतसुरतासंगिनोडल्याशिनो वा
क्रूराण्यन्यानि कर्माण्यपि च जनयतो दाहि वक्षःक्षतःस्यात् ।
पीड्येते चास्य पार्थे कृशतरवपुषः क्षीणवीर्याग्निसत्व-
स्योच्चैर्जायेत दैन्यं ज्वरहृदयरुजा जातवेदो वधश्च ॥१२९॥
अति जोरसे पाठ करे अथवा सदा नई २ स्त्रीनसे संग करे
अल्प भोजन करे और अनेक क्रूरकर्म करनेसे दाहकारक वक्ष-
स्थलमें घाव होय हे मुख और पाँशूमें पीडा अतिकृश देह अग्नि
सत्व वीर्य क्षीण ज्वर हृदयपीडा अग्निनाशसे दीनता होयह १२९
श्यावो दुष्टश्च पीतो ग्रथितइव बहुः पूतिगंधिवलासः
सास्रोऽभीक्ष्णं विनिर्यात्यपि मुखकुहरात्कासमानस्य तस्य ।
दीपाग्नेः पथ्यभाजोऽचिरसमयभवः सत्वयुक्तस्थ कृच्छ्रो-
ऽसाध्यः सांवत्सरोऽसौ तदवधिरुदिता वासराणां सहस्रम्
कालो दुष्ट और पीलो गुथ्योसो अति दुर्गधि कफ रक्तयुक्त
निरंतर मुखकुहरसे खासनेके समय पडे सो असाध्यहे दीप्ताग्निवारे
पथ्यभोजन करनेवारेकी थोडे दिनकी पैदा सत्ववारेकी कष्टसाध्य
है वर्ष या हजार दिन ताकी अवधी है ॥ १३०॥
वैद्यचन्द्रोदयः।. कासश्वासौ पुरोगौ दुरधिगममहाव्याधयोऽष्टौ च योधाः शोषाः पुत्रस्तथोचैरपिच गुरुतरा यस्य योषिद् विषूची । मंत्री मंदाग्निरुपः सहजसुरचरास्ते त्रिदोषाः सरोषा- स्तृष्णावाहाधिरूढो हृदयभुवि नृणां राजते राजरोगः १३१ कास श्वास अंगुआ दुरधिगम महाआठ व्याधि जाके योद्धा शोष जाके बडे देहवारे पुत्र वडी और भारी विषूची जाकी स्त्री उग्र मंदाग्नि जाको कामदार कुपित त्रिदोष जाके मित्र हैं प्यासरूपी वाहन बेठ्यो मनुष्यके हृदयमें, आरूढ धरतीपैं राजरोग विराजेहै ॥ १३१ ॥ अथ कासावलोकः ॥२८॥ प्राणोन्वेति दानं मरुदिह कुपितः प्रैति वात्सघोषः कासोसौ पंचधा तैः पृथगथ रुधिराद् यक्ष्मतश्चात्र वातात्। श्यावं कासेत्सपार्श्वव्यथ इह विदलत्कांस्यवद्धोषपित्तात् पीतःपीनः सदाहः कफत उरुसितो मंदवन्हिः सपाण्डुः१३२ शुष्कं वक्षः क्षतस्रात्सहृदयरुगथो यक्ष्मतो यक्ष्मचिन्हः पूयास्रो नैष साध्यः प्रभवति बहुलोपद्रवस्त्वन्यथान्यः । प्राणवायु यहाँ उदानवायुयुक्त कुपित होके प्रेरणा करे तो मु- खसें शब्द पैदा होय वो कास पाँच प्रकारको है, वातपित्तकफसे रक्तसे क्षयसे, तहाँ वायुसे कारो कफ खासे जब पांशूमें पीडायुत यहाँ फूटे कांसेकोसो शब्द होय हे, पित्तसे अति पीलो कफ कठिन दाहयुक्त होय हे, कफसे हृदयमें श्वेतता पांडुयुक्त मंदाग्नि होय हे ॥ १३२ ॥ रक्तसे पैदा कासमें वक्षस्थल सूखे और हृदयमें घाव और पीडा होय हे तथा क्षयजन्य कासमें क्षयीके लक्षण होयहै । जिस कासमें अनेक उपद्रव होंय और रक्तपीव वहे सो साध्य नही होय हे ॥ अथहिकावलोकः ॥ २९ ॥ आस्यादुत्सन्निवांत्रादुदयति पवनोऽसात्म्यतो दीर्घघोषो हिका सा पंचधास्यादुपरि हि तुदती हिकतीसान्नजा स्यातू३३ भाषानुवादसमेतः। युग्मैवेंगैश्चिरेण प्रभवति यमले क्षुद्रिका जंतुमंदा गंभीरा नाभिकष्टा चलयति महती मृत्युदा सर्वगात्रम् । आंतसे वात कुपित हो मुखसे दीर्घ शब्द पैदा करे सो हिचकी पांचप्रकारकी होय हैं अन्नसे पैदा ऊपरको व्यथा करे सो अन्नजा हिचकी होयहै ॥ १३३ ॥ दो दोषोंके वेगसे बहुत कालसे प्रकट या दो दो वार देरसे चलने वाली यमला होय हे और मंद मंद चलने वारी क्षुद्रा होय हे तथा नाभिसे कष्ट देके चले वो गंभीरा होय हे सब अंगीको कष्टदाता मृत्युकारक महती होय हे ॥ अथ श्वासावलोकः ॥ ३०॥ वायुः स्रोतांसि रुध्वा कुपित उरुकफोऽनेकरुद्धश्च विष्वक् यात्यायात्यूर्ध्वतोऽधो मुहुरयमुदितः पंचधा श्वासरोगः१३४ कुपित वात कफयुक्त होके चारों औरसे छिद्रोंको और हृदयको रोकके ऊपर नीचे वार २ आवे जाय यह श्वासरोग पाँच प्रका- रको है ॥ १३४॥ दीर्घ श्रांतो हि मत्तर्षभ इव महता निश्वसत्यस्तसंज्ञः श्वासेनाधोर्ध्वमूर्वेण च न पुनरधो जंतुरस्ताखिलेहः । छिन्नोनार्ध नवार्तो मरुदुरुरुगमी स्यान्नसाध्यश्रमोत्थ- क्षुद्रेह्यल्पः सरूक्षोऽयुतितलघुमरुत्सैषसाध्योऽल्पबाधः१३५ जो अति अमित मतवारे बैलके समान श्वास लेके और ज्ञान नष्ट हो जाय वो महा श्वास होय है और जो श्वास नीचेसे ऊपर और ऊपरसे नीचे आवे संपूर्ण इंद्रियोंके व्यापार भंग करदेय सो अर्ध्व श्वास होयहे और जो रुक २ के श्वास लेवे नई २ हृदयमें वातपीडाकरे सो छिन्न श्वास साध्य नही हे और श्रमसे उठी सूखे पदार्थ खानेसे भई थोडी पीडा करने वारी अल्पवातयुक्त क्षुद्र श्वास यह साध्य होय हे ॥ १३५ ॥ मन्या मूर्धातिभारी श्वसिति तमकतस्तीव्रवेगं सहृद्रुक चण्डश्लेष्मैष याप्यः प्रतमक उदितः सैष पित्तोपसर्गात् । मन्यानाडी माथो अति भारी हृदयमें अतिवेगश्वास, और दर्द वैद्यचन्द्रोदयः। ४५ अधिक कफ होनेसे याप्य पित्तके कारणसे प्रतमकश्वास होताहे। अथ स्वरभेदावलोकः ॥ ३१॥ अत्युच्चानल्पजल्पैरपि विषविषमाघातसंदूषणाद्यैः क्रुद्धाः कुर्वति दोषाः स्वरसरणिगता भेदमाशु स्वरस्य १३६ प्रत्येक तैः समस्तैः क्षत उत पवनं मेदसस्तत्र पातात्- षष्ठश्चांतर्गतस्तत्तदनुकृतियुतोऽसावसाध्यास्त्रयोत्याः । अति ऊंचो बहुत बोलवेसे और विष तथा विपम चोट सो और दोषोंके विगडने सो स्वरस्थानमें प्राप्त वात पित्तकफ कुपित होके शीघ्र स्वरको तोड देवे हें ॥ १३६ ॥ वात पित्तकफसे त्रिदोषसे घावसे अथवा वात भेदमें जायके मेदसे उन २ दोषोंके विकारोंके समान पीडा करनेवारो साध्य कष्टसाध्य असाध्य स्वररोग करेहे । अथारोचकावलोकः ॥ ३२॥ स्वादप्यन्नं मुखेन स्वदत इति मतोऽरोचकः पंचधासौ दोषैस्त्रेधा समूहादपर इह पुनः पंचमो रुग्भयादेः ॥१३७॥ द्वेषं स्मृत्वापि दृष्ट्वाऽशनमयमुदितो भक्तविद्वेषसंज्ञो भक्तच्छन्दस्त्वनिच्छासरुष उरुभियो वाशने भक्तरोधात् । स्वाद अन्नकोभी मुखमें स्वाद नहीं लगे उसे अरोचक कहैं सो पाँचप्रकारको है, वात पित्त कफसे और त्रिदोषसे याके परें यहां फिर पाचमो पीडा भय आदिसे ॥ १३७ ॥ वैरसो यादसो देख- वेसो यह भोजनप्रकट विद्वेषसंज्ञक है भोजनके रोकनेसेभी इच्छा नहीं होय क्रोध होय और हृदयमें भयसे वा भोजनमें अनिच्छासे अरोचक होयहै। अथ वमनावलोकः ॥ ३३॥ अन्नाद्यैश्छादयन्नाननमखिलतनू मर्दयन्दोष ऊर्च यातीति च्छर्दिमूचुर्वमिरियमुदिता पंचधातैःपृथक् त्रिः १३८ भाषानुवादसमेतः। अन्न आदि सब देहके दोष मुखमें ऊपर आके अन्नको निकाले उसे छर्दि कहें और याहीको नाम वमन है वो पाँचतरेकी है वात- पित्तकफसे और त्रिदोषसे ॥ १३८ । सर्वैस्तुर्याथ पंचम्यनुपशयकृमिप्रायबीभत्सगर्भाद् वातात्तु श्यावमल्पं वमति सरुगथो पित्ततस्तिक्तपीतम् । श्वेतं सांद्रं कफेन त्रितयमखिलतः स्यात्कृमेः शूलहृद्रुक् या विट्पूयासमूत्रप्रतिनिधिरलघुः सेंदुरेषा न साध्या १३९ त्रिदोषसे चौथी और कृमिके उपद्रवसे पाँचभी प्राय डरावने- पदार्थ और गर्भके होनेसे होयहै वातसे काली थोडी पीडायुक्त वमन करे ओर पित्तसे कडुवी पीली और कफसे सुफेद गाढी तीनदोषसे सबलक्षणवारी होय हे कृमिसे शूल हृदयमें पीडा मल पीव रक्त मूत्र इनसी भारी चमकयुक्त साध्य नही होयहै ॥१३९॥ अथ तृषावलोकः ॥ ३४॥ पीत्वा पीत्वांबु तृप्तिं व्रजति न च पुनः कांक्षतेसौ तु तृष्णा पित्ते सा तालुपातं रचयति समरुत्तद्भिदा सप्तधा स्यात् । दोषभिन्नः क्षतामक्षयसमशनतश्चात्र वाते हिमाद्भि- वृद्धिः पित्ते तु शांतिः कफउरुजडतारुष्यसृड्नाशरुग्भ्याम् जल पीपीकेभी तृप्ति नहीं होय फिर जलकी इच्छा करे उसे प्यास कहे हैं. पित्तसे तलुआ लटकायदे पवनयुक्त ताके सात भेद होय हैं । वातपित्तकफसे घावसे आमसे क्षयसे भोजनसे तहाँ वातसे ठंडसे बढे पित्तसे घटे कफमें जडता रक्तकोपकी पीडासे तृषानाश होय हे। आमेऽसौ स्यात्रिदोषाक्षयतनुतरसःण्यचिह्नाथ भुक्त- तिक्ताद्याधिक्यतस्तृट्कुशिमवमिमहोपद्रव व साध्या । आमसे यह त्रिदोषसे क्षयसे देहमांस क्षीण इन चिह्नोंसे भोज- नके पीछे कडुए अधिक भोजनसे प्यास रोकनेसे उल्टीके अति उ- पद्रवयुक्त ये वमन साध्य नही है।
वैद्यचन्द्रोदयः। अथ मूर्छावलोकः ॥ ३५॥ संज्ञास्रोतांसि रुध्वा यदि करणगणे ते विशंतीद्धपित्तान्- मो ध्वांतं तदैत्याधिभु पतति गतप्रज्ञ एषा तु मूर्छा १४१ संज्ञाछिद्रोंको रोकके जो इन्द्रियगणमें प्राप्त हो पित्तके बढनेसे नर अंधेरेको प्राप्त हो निर्बुद्धि धरतीपें गिरे सो मूर्छा ॥१४॥ षोढासौ वातपित्तक्षतजकफविषान्मद्यतश्चात्र वातात् ध्वान्तं यातीक्षमाणो वियदसितमथाग्निर्हरित्पीतरक्तम् । गंधाद्रक्तस्य चैवं ह्यथ कफजनितायां तु तत्राब्दयुक्तम् तन्मिश्रं सन्निपातादथ विषजनुषि स्वमहत्कंपमोहाः॥१४२॥ ये मूर्छा वात पित्त घाव कफ विष मद्यसे छे प्रकारकी हे तहां वातसे देखते २ अंधेरो होजाय आकाश कारो दीखे अग्नि हरी पीली लाल दीखे लोहूकी गंधसे और ऐसेही कफसे पैदा वर्ष में भई होय तामे सुफेद दीखे सब लक्षण मिले सो सन्निपातसे और विष देहमें होनेसे सोवे हृदयकंप मोह होय हे ॥ १४२ ॥ मद्योत्थायां तु सौम्यः प्रलपनलपनामोदयुक्तो नरः स्यात् संन्यासः सर्वचेष्टोपरत इदमतस्तेन ना प्रेतकल्पः । मूर्छाध्वांतात्सपित्ताद् भ्रम इह तु रजः पित्तवातेन तंद्रा श्लेष्मध्वांतानिलोत्था तिमिरकफभवा चापि निद्रा नराणाम् नशासे पैदा मूर्छामें सौम्यता हो मुखसे वकवाद हर्षयुक्त नर होय हे सब चेष्टायुक्त संन्यास इनसे परे यहां कह्यो, तासो मनुष्य प्रेतकेसमान होय मूर्छा तिमिर पित्तसे भ्रम यहाँ चौथे पित्तवातसे तंद्रा कफसे अँधेरो वातसे तिमिर कफसे पैदा निश्चय मनुष्योंको निद्रा होय है ॥ १४३ ॥ अथ मदात्ययावलोकः ॥ ३६॥ युक्त्या मद्यं निपीतं भवति बहुगुणं ह्यन्यथा रोगदं स्यात् दाहोल्लासस्तदीयः स्मृतिपचनसुखप्रीतिबुद्धिप्रदाता ।
४८
भाषानुवादसमेतः।
अव्यक्तज्ञानचेष्टावचननिपतितोन्मादनिद्राकरोऽन्य-
स्तातीयीकस्त्वगम्यागमनबहुविधानहगुह्यप्रकाशी ॥१४॥
युक्तिसे मद्य पीयेतें अति गुण होय हे अयुक्तसे रोग देवेवारो
होय हे प्रथम मदसे दाह आनंद स्मृति पचनमें सुख प्रीती अति
बुद्धिको देवेवारो होयहे दूसरेसे ज्ञाननाश चेष्टानाश टूटे शब्द
निकलें उन्माद निद्रा करवेवारो होयहे तीसरेमदसे न जानेकी जगे
चलो जाय वहुत गुप्त वातको विस्तारसे प्रकट करवेवारो होयहे ॥
तुर्यों भूपातनष्टस्मृतिवमनमहामोहवैकल्यकारी
तस्याऽजीर्ण ज्वरार्तिश्रमवमनकफामानदाहाद्विकारी।
क्रुद्धे भीते सशोके श्रमसुरततृषासूग्रतापादि कुर्यात्
पानाद्येत्वात्ययांस्तश्चतुर इह गदान्दोषरूपस्वभावात् १४५
चौथेसे पृथ्वीपर गिरे नष्टस्मृति वमन महामोह विकलता कर-
वेवारो ताके अजीर्णसे ज्वर श्रम कफ वमन अफरा दाहसे विकार
हों क्रोधसें भयसे शोकसे श्रम मैथुन प्यास अति गरमी करे, पा-
नादिकमें विशेषताको चतुर पुरुष यहां दोषरूप स्वभावसे कहें १४५
अथ दाहावलोकः ॥ ३७॥
पानोष्मा त्वक्प्रयातो रचयति विपुलं पित्तरक्ताभिवृद्धो
दाहं वाद्येति चांत कथितमिह महद् भेषजं पित्तहारि ॥
नशापानकी गरमी त्वचामें प्राप्त हो पित्त रक्तसे वढके भीतर
बाहर अति दाह करे उस दाहकी बडी औषध पित्त हरण कर्ता
है
अथोन्मादावलोकः ॥ ३८ ॥
दुष्टैर्भुक्तैर्विरुद्धैरशुचिभिरपि च ब्राह्मणामर्त्यपूज्या
दोषैरुन्मार्गगास्ते मन उरु मदयंतीति तून्मादमाहुः ॥१४६॥
मनुष्यकर पूजित विपके कोपसे बुरे और विरुद्ध भोजनसे
अपवित्रतासे दोष वातपित्तकफ मन मार्ग में प्राप्त होके हृदयको
हर्षित करे सो उन्माद कह्यो है ॥ १४६ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः । .. , दोषैर्व्यस्तैः समस्तैरपि भवति विषाच्छोकतश्चेति षोढा ऽथास्थाने हास्यगीताभिनयनयनवाग्वैकृताद्यस्य रूपम् । श्यावा पीता सिता विट् क्रमश इह मलैः सन्निपातेन मिश्रा रक्ताक्षःक्षीणसत्वेन्द्रियरुचिरधृतिः श्याववको विषात्स्यात्॥ बिगडे भये वातपित्तकफसे त्रिदोषसे और विषसे शोकसे उन्मादरोग छ प्रकारका होय है। असमय हास्य गीत नृत्य नयन वाणीको विगडनो याको रूप हे, वातसे कारो पित्तसे पीलो कफसे सुफेद क्रमसे ऐसो मल होय यहां सन्निपातसे मल मिश्र- लक्षणवारो विषसे लालनेत्र सत्व इन्द्रिय कांति क्षीण अधैर्य- वारो कारो मुख होवे है ॥ १४७ ॥ त्यप्राप्तित्रासवित्ताद्यपहरणहतेर्मानसे स्याद्विकार- स्तेन ब्रूते रहस्यं हसितमयमती रोदनं वा करोति । छायेवादर्शमाशु प्रविशति मनुजं पूर्णिमायां ग्रहान्त्यो देवस्तेनातिपूतो ह्यवितथसुरवाग्ब्राह्मणेष्टः स्थिराक्षः १४८ स्त्री न मिलनेसे डरसे धनादिक चोरी होनेसे हत्यासे मनमें विकार होनेसे गुप्त वात कहे हसे वा अतिरुदन करे छायाकी भांति शीघ्र दर्पणमें पूर्णिमा और संक्रांतिको मनुष्यमें देव प्रवेश होनेसे अति पवित्र सत्यबोले विप्रप्रिय स्थिर नेत्र जिस्के हों उसे देव उन्माद कहनो ॥ १४८ ॥ दैत्याद् देवद्विजद्विवपुषि च महारोषवांश्चाथ मयों गंधर्वोह्यष्टमीतः पुलिनवनगतो नृत्यगीतप्रियः स्यात् । यक्षास्ताखाननाक्षः प्रतिपदुपगतः शीघ्रगोऽथो पितृभ्यः प्राप्ते वै दर्शघने रचयति स कुशःश्राद्धकर्मातिभक्तः १४९ दैत्योन्मादसे देव और विप्रसे द्वेष करे और दोनो संध्या समय मनुष्यके देहमे क्रोध होय गंधर्वोन्मादसे अष्टमीके दिन नदीके किनारे वनमे जायके नाचना गाना जिसे प्यारा होय यक्षोन्मा- दसे प्रतिपदा के दिन लाल मुखनेत्र और शीघ्रगामी होय पित्रो- न्मादसे अमावास्याके दिन पायके ही कुश युक्त अति भक्तिसे श्राद्ध कर्म करता होय ॥ १४९ ।। वै. चं. ५
भाषानुवादसमेतः।
नागानागोपमं संसरति भुवि सरुट पंचमीतोह्यथासौ
रक्षस्तो रात्रिपातेपलरुधिरवसालालसः क्रोधनश्च ।
भूतप्राप्तात्पिशाचाबहुभुगतिकृशोऽपूतिसेवी वनस्थो-
ऽथ प्रासादात्पतेद्यो द्रुतिगतिरुरुदृक् फेनवामी न साध्यः॥
नागोन्मादसे पंचमीको दिन पायके सर्पकी तरह पृथ्वीपर खूब
सरके क्रोध सहित और राक्षसोन्मादसे रात्रिको पायके मांस रक्त
चर्षी इनके लाभकी इच्छा करे और भूतोन्मादसे क्रोध करे तथा
पिशाचोन्मादसे प्राप्त
भयो बहुत खाय और अति दुर्बल रहे अप-
वित्र पदार्थोंका सेवन करनेवारो वनवासी महलसे गिरे शीघ्र गती
क्रूर दृष्टी फेन वमन करे उसे भूतोन्मादीजाने साध्य नहीं है १५०
अथापस्मारावलोकः ॥ ३९ ॥
दोषाद्वेगात्प्रयाति स्मृतिरिह गदितापस्मृतिस्तैश्चतुर्धा
व्यस्तैः सर्वैस्तमोऽक्षिभ्रमवमनवपुर्वैकृताद्यस्य रूपम् ।
तेषां कोपस्य कालंसतत प्रतिपदे पक्षमासौ च सर्वो-
ऽथ क्षीणश्चञ्चलभूरखिलमलमहामोहवान्ना न साध्यः १५१
विगडके उठे वातपित्तकफ ज्ञानबलको नष्ट कर अपस्मृति प्रकट
करे सो चार प्रकारकी अज्ञानतासे कही है वात पित्तकफसे
संनिपातसे नेत्रमें अंधेरो भोर वमन देह विगडनोसो इसको रूप
है ताके कोपको काल नित्यप्रति और प्रतिपदा और सब तिथि
क्षीणभाव चंचलनेत्र सर्व दोपी महामोहवारो साध्य नही है १५१
अथ वातरोगावलोकः ॥४०॥
नामस्थानानुरूपान् रचयति पवनो हेतुना स्वस्य दुष्टो
व्याधीनुच्चैरशीति हुतभुगपि कफोऽसक्कचोर्द्धक्रमेण ।.
ऊरुस्तंभांगभंगौ ह्यतिमतिकृशतापार्श्वशूलांडगभेदौ
पक्षाघातापतानासृजति बलहतिं गद्गदो मिन्मिनत्वम् १५२
अपने हेतुसे दुष्ट पवन नाम स्थानके अनुरूप वडी २ अस्सी
व्याधियोंको पैदा करे हे पित्त और कफ रक्त ऊर्ध्व क्रम करके
अरुस्तंभ अंगभंग अति कृशता पांशूमें शूल अंगपीडा पक्षाघात
अपतानक और बलहानि गद्गद मिन्मिनत्व ॥ १५२ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। कार्य कम्पोऽङ्गशोषः प्रलपनकठिनत्वेऽतिशुक्रप्रवृत्ति गंधासत्वांगशूले विरसवदनताऽध्मानतोदौ च कण्डूः। विश्वाची क्रोष्टुशीर्ष वदनकपिशिता क्षिप्रमूत्रत्वनिद्रा- नाशौ च स्वेदतांशो वपुषि च गुरुता ज्ञायते नैव शब्दः॥ कृशता कंप अंगशोष वकवाद कठोरता अति शुक्रप्रवृत्ति गंध न जाननो अंगशूल मुखमें विरसता अफरा पीडा और खुजरी विश्वाची क्रोष्टुशीर्ष मुखमें फीकापन जल्दी २ मूतनो निद्रानाश और पसीना कंधा और देहमें भारापन और शब्द न जागनो वहरापन ॥ १५३ ॥ रेतःकार्कश्यजूंभेऽप्यतिपवनगतिइक्क्षयश्च प्रसुप्ति- श्चित्तास्थैर्य च रेतःक्षयमथ च कटिग्राहकुजौ च तोदौ । गृध्रस्याक्षेपतुल्योऽप्यथ हिमबहुता भीरुता वामनत्वं जिह्वास्तंभापतंत्रौ तुवरवदनता पांडुता पादहर्षः ॥१५४॥ वीर्यकी कर्कशता उवासी और अति वायुगति दृष्टिक्षय और प्रसुप्ति चित्तमें अस्थिरता वीर्यक्षययुक्त और इसके पीछे कटिग्रह कूवडोपन गृध्रसी आक्षेप तूनी फिर बहुत ठंडता डरपोकता वा- मनत्व जिव्हास्तंभ अपतंत्रक मुखमें कषेलापन पांडुता पादहर्ष ॥ प्रत्याध्मानं च रोक्षं तदनु ननु हनुस्तंभता रोमहर्षो मन्यास्तंभश्च मूर्द्धग्रहणमथ धनुस्तंभिता वातकंपः । खंजत्वाष्ठीलकाविग्रहणमवयवभ्रंशदंडापतानौ प्रत्यष्ठीलाऽपबाहुः स्फुरणमति तथा कूजनं चांत्रतस्तु १५५ प्रत्याध्मान और रूक्षता ताके पीछे निश्चय हनुस्तंभ रोमहर्ष मन्यास्तंभ और माथेको जकडनो और धनुस्तंभता वातकंप खंजत्व अष्ठीला मलग्रहण अवयवभ्रंश दंडापतानक प्रत्यष्ठीला अ- पबाहुक अतिस्फुरण तथा आंतोंका कूजना ॥ १५५ ॥ मूकत्वं बद्धविट्कत्वमपि किल शिरापूरणत्वं प्रलापः पंगुत्वोद्गारतोक्का तदनु निगदिता देहसंकोचता च । बाह्यायामोंतरायाम इह निगदितोऽन्यो व्रणायामसंग: प्रत्यादिस्तूणिकश्चेदनिलजनिजुषोऽशीतिसंख्या गदाः स्युः॥
५२ भाषानुवादसमेतः। मूकत्व मलका वंधना फिर निश्चय शिरापूरणत्व प्रलाप खंजत्व डकार तापीछे देहसंकोचता कही और बाह्ययाम अंतरायाम यहां फिर कही और ब्रणायाम उत्संग प्रतूणी यह वातज अस्सी संख्यावाले रोग मनुष्यके होते हैं ॥ १५६ ॥ अथ पित्तरोगावलोकः॥४१॥ धूमोगारोऽङ्गसादोऽपि च मुखकटुता लोहगंधास्यता च स्वेदः स्रावोल्पनिद्रत्वमरतिरपि निःसत्वता कांतिहानिः । तेजोद्वषो हिमेच्छाप्ययघनदरणं भिन्नविकत्वकोपौ रक्तद्राकः क्लमांधे नखनयनवपुर्दतविट्पीतता च ॥१५७॥ डकारमें धूआआनो अंगपीडा फिर मुखमें चिरपिरापन और मुखमें लोहगंध आनो पसीनास्राव अल्पनिद्रा पीडा फिर दुर्ब- लता कांतिहानि तेजसे द्वेष ठंडकी इच्छारहनो और अदृढ़ता फट्योमल क्रोध रक्त वहनो ग्लानि अंधता और नख नेत्र अंग द्रांत मलमें पीतता ॥ १५७ ॥ दौर्गध्यं भ्रांत्यतृप्ती हरिदपघनता दाहता चोष्णता च ध्वांतालोकोष्णविट्ते तनुपरिपचनं कंठशोषास्यशोषौ । पीतालोकोऽल्पशुक्रत्वमपि च गदितं पीतमूत्राश्वमूत्रे तूष्णोच्चासत्वमेवं वपुषि च वदने पीतबिंबावलोकः॥१५८॥ दुर्गधि भ्रांति अतृप्ति हरितता दृढतानाश दाह और गरमी अँ- धरेमें देखनो गरमसे द्वेष देहमें पचे कंठशोष मुख सूखे पीलो देखे अल्पशुक्रत्व कह्यो और मूत्र पीलो घोडाके मूत्रसो गरम अति श्वास देह ओर मुखका गरम होना पीलो चंद्रसूर्यमंडल देखे १५८ अथ कफरोगावलोकः॥४२॥ आलस्यं वक्रलेपो वपुषि च गुरुता तिक्तवांछोष्णवाञ्छे तृप्तित्वं मंदधीत्वं वदनमधुरता सेकता चाननस्य । दिक्षु श्वेतावलोकः शयनबहुलता मूत्रशुक्लत्वजिह्वा- शुक्लत्वे चांगशौक्लयं तदनु निगदिता दीधितिश्वेतता च ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। - रेतोभूयस्त्वमन्यत्किल मलबहुता घर्घरध्वानताऽन्या- निश्चैतन्यं समूत्रप्रथिमकफभवा विंशतिव्याधयोऽमी। आलस्य मुखमें लेप और देहमें भारीपन कडुई ओर उष्णताकी इच्छातृप्तिता मंदबुद्धिता मुखमें मीठापन और मुखमें पसीना दि- शामें मुफेदाई दीखे अतिनिद्रा मूत्रमें सुफेदाई जिव्हामें सुफेदता पीछे कही अंग सुफेदाई मंडल स्थान सुफेद दे खे॥१५९॥ वीर्य और निश्चय मलकी अधिकता घर्घराट शब्द और अचैतन्यता ब- हुमूत्रता कफसे पैदा ये वीस रोग हैं। अथ पिडिकावलोकः ॥४३॥ उष्णत्वं पूतिगंधित्वमपि च गरिमा रक्तनिष्ठीवनत्वं रक्तालोकोक्षिरक्तत्वमपि मुहुरसृमंडलालोकनं च १६० पीडापाकः शरीरे वचिदपि च मुहुर्मूत्रताऽन्या तथासृक्- पिंडीका चेति रोगाः कुपितरुधिरतः स्युः शरीरेषु नृणाम्। गरमी दुर्गधि और भारीपन थूकमें रक्त गिरे लाल दीखे लाल नेत्र और वैर २ लाल मंडल दीखे ॥१६॥ पीडा अंगपाक और कभी २ वेर २ रक्त मूते ये फुन्सीरोग रक्तकोपसे नरके देहमें होय हैं। अथ वातरक्तावलोकः ॥४४॥ हस्त्यश्वोष्ट्रप्रयातस्य च भवति विदाह्यश्नतोऽन्नं समस्तं रक्तं दुष्टं विदुष्टेन च युतमनिलेनेति तद्वातरक्तम् ॥१६॥ हाथी घोडाऊँट चलवेसे और संपूर्ण विदाहीअन्न जल, खानेसे विशेषदुष्ट वायुसे रक्त विगडे सो वातरक्त पैदा करे हे ॥ १६१ ॥ गंभीरोत्तानभेदाद्विविधमिदमिहांतर्गतं स्याद्गभीरं झुत्तानं त्वक्पलस्थं गुरुलघु च पुरा चीयतेदः करांध्योः । स्वेदोऽत्यर्थ न वा स्यादरुणिमगुरुता कण्डुतोदातिशूला- स्तत्प्राग्रूपं स्वरूपं कथितमिह बुधैर्दाहसंकोचभावः ॥१६२॥ गंभीर उत्तान भेदसे अनेक सो प्रकारको है भीतर गयो भयो होय सो गंभीर हे ऊंचो त्वचामांसमें स्थित भारी और हलको पह- भाषानुवादसमेतः। लेको इकठ्ठो हाथ पांवकी अंगुलीसे अतिपसीना वहे या न वहे अरुणता हलकापन खुजरी पीडा ताको पूर्वरूपहैं अतिशूल दाह संकोचभाव यह बुद्धिवानोंने ताको रूप कह्यो है ॥ १६२ ॥ स्पर्शाज्ञत्वं च कार्य गरिमपरुषता मंडलं संधिपीडा चैतत्कालक्रमेण प्रभवति च महत्कुष्टमत्रापि दोषैः । स्पर्श न जाने और कृशता भारीपन कठोरता चकत्ता संधिमें पीडा यह कालके क्रमकरके पैदा होय है और इन दोषोंसे भारी कुष्ठभी होय है। अथोरुस्तंभावलोकः ॥४५॥ वातः सश्लेष्ममेदाश्चिरसमयचितं पित्तमुत्सार्य सामं युक्तश्चैषो बलेनोरुयुगलमुरुणा श्लेष्मणा पूरयित्वा ॥१६॥ वातकफयुक्त मेद बहुतकालको इकठो आमयुक्त पित्तको उठा- यके घोंटुके ऊपरके भागकी हड्डी दोनी जांघोंमें कफ भर करके ॥ तौ स्तः स्तब्धौ तदानीं हिमगुरुसरुजौ स्नेहनं नात्र सात्म्यं स्यादूरस्तंभ एषः क्वचिदपि गदितस्त्वाब्यवाताभिधानः । दोनो जांघ जकडजावे ता समेमें अतिठंडसे पीडासहित तहां चिकने पदार्थ गुणदायक नही होय हे इसे उरुस्तंभ कहें और कोइ २ आढ्यवातनामक कहें हैं। अथामवातावलोकः ॥४६॥ आमो वातेन नुन्नो ब्रजति कफगृहान दूषितोऽनेन तत्रा- प्यत्यर्थ सोऽथ दुष्टो मरुदनलकफैरातनोत्यंगमर्दम् ॥१६४॥ वातसे प्रेरित आम कफके स्थानमें जाके तासो दुष्ट तहां फिर सो अतिविगड वातपित्तकफसे अंग जकडनको बढावे हो ॥१६४॥ मांचं वह्नेः कृशत्वं ज्वरहृदयगुरुत्वग्विपाकं च तृष्णां दोष्णोः संध्युग्रपीडा श्वयथुकटिरुजे चामवातोऽयमुक्तः । वातोत्कर्षेण देशं यमिह स लभते वृश्चिकेणेव विद्धः स स्यादत्यर्थपीडो ह्यथ हुतवहतो दाहरागौ कफात्तु १६५ मंदाग्नि कुशता न्वर हृदय भारी त्वचापाक और प्यास हाथके वैद्यचन्द्रोदयः। जोडमें अति पीडा शोथ ओर कमरमें दर्द याको नाम आमवात कह्यो हे। वातसे वढनेसे अंग देश वीके डंकलगेकेसो दुःख होय और अतिपीडा और पित्तमें प्राप्त होनेसे दाह राग और कफसे ॥ १६५॥ स्तमित्यं चापि कंडूमिलितमिह भवेलक्षणं द्वित्रिदोषम् ज्ञेयोऽसाध्यस्त्रिदोषः स तु सकलवपुःशोषरुग्वह्निमांद्यैः। गीले कपडासे बधेके समान जकडन और फिर खुजरी यह दो लक्षणयुक्त द्विदोषज और सब लक्षण जामें मिले सो त्रिदोषज हे सब देहको शुखाय पीडा मंदाग्नि देवेवारो असाध्य जाननो। अथ शूलावलोकः॥४७॥ अष्टौ शूलानि दोषैः पृथगथ युगतः सन्निपातात्तथामात् प्रायः सर्वेषु शूलेष्वनिल इह वली वच्मि चिह्नान्यमीषाम् ॥ शूल आठ प्रकारको है वातपित्त कफसे और द्वंद्वज सन्निपा- तसे तथा आमसे प्रायः सब शूलोंमें इहाँ वायुही बलवान् हे इन सबसे लक्षण कहें हैं ॥ १६६ ॥ अन्ने जीर्ण प्रदोषे रजनिपरिणतौ मेघकाले हिमत्तौं बस्तौ हृत्पार्श्वपृष्ठे रचयति पवनः शूलमानाहतोदौ । मूर्छाप्रस्वेदमेहनमदवथुतृषाकृन्निदाघेऽर्द्धरात्रे मध्याह्ने प्रावृडते विरचयति तु तन्नाभिदेशे च पित्तम् १६७ अन्नके अजीर्णमें संध्याके समे रातमें वर्षाकालमें हिमऋतुमें मूत्राशय हृदय पाँशू पीठमें वातसे शूल करे अफरा पीडा मूर्छा पसीना भोर प्रमेह और बमनकी प्यास पैदा करे गीष्मऋतु आ- धीरातमें और मध्यान्हमें बर्षाके अंतमें वो नाभिदेशमें पित्तसे पैदा ॥१६७ ॥ हल्लासश्वासकासारुचिजठरशिरोगौरवास्यप्रसेकि स्याच्छूलं श्लेष्मजातं सुरभिशिशिरयोः पार्श्वयोश्चापि कुक्षौ । द्वंद्वोत्थं द्वंद्वलिंगं सकलमलभवं सर्वलिंगं सशूलं साध्यं साध्यो न दाहो वमिररुचितृषा कुक्षिहृद्गौरवानि१६८ भाषानुवादसमेतः। हृदयकी चंचलता श्वास कास अरुचि पेट माथो भारी मुखमें पसीना होय ये शूलकफके पैदा हे । वसंत शिशिर दोनो ऋतुमें दोनो पांशू और फेर कूलमें शूल करे द्विदोषजमें दोचिन्ह सन्नि- पातमें सब लक्षणयुक्त समझनो । साधारणशूल साध्य और दाह वमन अरुचि प्यास कूख हृदयमें भारीपन सो शूल साध्य नहीं है ॥ १६८ ॥ मूर्छानाही गुरुत्वं तृडपि च कसनं वेदना श्वास हिक्का वांतिधांतिः कृशत्वं ज्वर इति मृतिदा शूलजोपद्रवाः स्युः । श्लेष्मा स्थानात्स्खलित्वा मरुतमुपगतः पित्तदोषेण साकं वृद्धो निर्माति शूलं पचति यदि शिते पक्तिशूलं तमाहुः १६९ मूर्छा अफरा भारीपन प्यास और कास वेदना खास हिचकी वमन भौंर कृशता ज्वर यह सब उपद्रव शूलसे पैदा मृत्यु देवेवारे होयहें । पित्तदोष युक्त कफ स्थानसे गिर करके वातमें प्राप्त हो वढके शूलको पैदा करे जो भोजन पचनेपर हो वाको पक्तिशूल कहे हैं ॥ १६९॥ बस्तौ नाभ्यां हृदंतः सजठरपिठरे पृष्ठवंशेऽथ कव्यां सर्वेष्वेतेषु वा स्यादथ पुनरशितेऽन्नेथ जीर्णे प्रशाम्येत् । दोषभिन्नैरभिन्नैरपि च युगलशो ह्युल्बणैकोल्बणैश्च प्राहुर्भेदानमुष्य व्यधिकदशविधानुक्कलिंगान्मुनीन्द्राः १७० मूत्राशय ढूँडी हृदयके भीतर पेट पीठ पीठको हाड कमर सवमें पीडा होय और फिर अन्न पचेपें शांत हो वातपित्तकफसे और सन्निपातसे और द्वंद्वज उल्वणादि भेदसे इसके मुनीन्द्र तेरह नाम और चिन्ह कहे हे ॥ १७ ॥ जीर्णेऽजीर्णेऽशिते यत्समुदयति तथा पथ्यतोऽपथ्यतो वा भुक्तेऽभुक्तेऽथवान्नद्रवमिति जगदुस्तज्जरत्पित्तमन्ये । पचवे न पचवे खानेसे जो पैदा करे अथवा तैसेही पथ्य अ- पथ्य भोजन अभोजनसे उसे अन्नद्रव कहें और उसेही कोई जर- त्पित्तभी कहें हैं।
वैद्यचन्द्रोदयः। अथोदावर्तावलोकः ॥४८॥ जृभाविण्मूत्रवातक्षुतवमनतृषोदारनिद्राविधृत्यो- दावतः स्यात्समस्तेन्द्रियविकलतया लिंगितो वातमुख्यः ७१ जभाई विष्ठा मूत्र अधोवात मूंख वमन प्यास डकार निद्रा इनके रोकवेसे उदावत होयहै सब इन्द्रियनकी विकलतासे यामें वातमुख्य है ॥ १७१॥ Mभाया रोधतः स्युर्गलशिरसि रुजो मूत्रतो वस्तिशुलं विड्रोधादूर्ध्वविट्त्वं रुगपि च मरुतो वातजाता विकाराः। छिकायाः पीनसोः शिरसि च गुरुताऽथो वमेः शोफकंडूः पांडूत्कोष्टास्तृषायाः सृजति च शयनस्यातितंद्रा सजृभा ७२ उवासी रोकनेसे गले में और माथेमें पीडा होयहे मूत्र रोकनेसे मूत्राशयमें शूल होय मल रोकवेसे मुखसे विष्ठा वमन करे और वायुसे पैदा पीडा आदि विकार होयहें छीक रोकवेसे पीनस आ- घेमाथेमें भारीपन और वमन रोकवेसे शोथ खुजरी पीलिया उ- कोठ प्यास रोकवेसे निद्रा और अतितंद्रा अँभाई पैदा करे १७२ रेतोरोधेऽण्डशोफोऽश्मरिरुगथ रुजोगाररोधेऽनिलोत्था तृड् विडू वांतिश्च शूलक्लमकलित उदावर्तरोगी न साध्यः। पक्कं वर्षोथ वामं चिरसमयचितं गंधवाहेन दुष्टं नाबद्धं नैति कष्टादपि च यदि बहिः स्यात्तदानाहरोगः १७३ वीर्य रोकवेतें आंडोंमें सूजन पथरीरोगकी पीडा और डकार रोकवेसे वातसे पैदा प्यास विष्ठाकी वमन और शूल ग्लानि युक्त उदावर्तरोगी साध्य नही होयहे वातसे दुष्ट बहुत कालको इकट्ठो पक्यो मल अथवा नही पक्यो नही वध्यो कष्टसे थोरो मल वा- हर निकले तो अफरा रोग करे है ॥ १७३ ॥ क्षण्यैर्विणमूत्ररोधैः कटिजठरहदः स्तंभनैर्विविवांत्या तृणमूश्विासशूलैरिति भवति बहूपद्रवैर्नैष साध्यः । क्षीणतासे मलमूत्र रोकवेसे कमर पेट हृदयके स्तंभनसे मल वांति- से प्यास मूछी श्वास शूल ऐसे बहुत उपद्रवसे साध्य नही होय है।
५८ भापानुवादसमेतः। अथ गुल्मावलोकः॥४९॥ हृन्नाभ्योरंतराले चलमचलमथो दोषवृद्धिक्षयाज्यं ग्रंथिं मांसासमेदोविकृतिसमुदितं वर्तुलं गुल्ममाहुः १७४ हृदय नाभिके वीचमें चल अचल और दोषसे वढे घटे ऐसी मांस रक्त मेदके विकारसे पैदा गोल गाँठको गुल्म कहे है १७४ ते स्युः पंचैव दोषैः पृथगपि सकलैः पंचमो रक्तजातः पार्श्वे हन्नाभिबस्तिक्रमत इह मता भूमयः पंच चैषाम् । साध्यो नोद्गारभूयस्त्वमरुचिगुरुता विड्विबंधत्वमेषां प्राग्रूपं चांत्र वातान्मलमरुदगतिः स्थानपीडा विकल्पः १७५ वो पाँचही दोषसे होयहै वातपित्तकफसे और सन्निपातसे पाँचवो रक्तसे पाँशू हृदय नाभि मूत्राशय क्रमसे इहा कहे पाँचोके पाँचस्थान है डकार अरुचि भारीपन मलबंधसे यह साध्य नही है तहाँ वातसे पूर्वरूप मल और वायुको न फिरनो स्थान पीडा के समान जाने ॥ १७५ ॥ पित्तात्स्पर्शासहिष्णुव्रण इव सतृषादाहरोगज्वरात्यः श्लेष्णोत्थे तत्र शैत्यं श्वसनकसनहल्लासकाठिन्यमाढ्यम् । सर्व चिह्न त्रिदोषादहितसमशनादामसूत्या ऋतौ वा रक्तं संदूष्य वध्वा विरचयति मरुत्पित्तचिह्नं च गुल्मम् १७६ पित्तसे स्पर्श नहीं सह्यो जाय घावसरीकी प्यास दाहरोग ज्वर- युक्त होय है कफसे पैदा तहां शीतलता स्वास कास हृदय चलाय- मान कठोरतायुक्त ये सब चिन्ह हो वो त्रिदोषसे अहित भोज- नसे कच्चो गर्भहोनेसे ऋतूमें रक्तको बिगाडके वाकी गांठ वाधके पैदाकरे वातपित्तके चिन्हवारो गुल्म पैदाकरे हे ॥ १७६ ॥ शोफैर्हन्नाभिहस्तांघ्रिषु वमिगुरुते तृड्ज्वरश्वासकासा- तीसारारोचकार्तिकृशिमरुर्गुदयैगुल्मरोगी न साध्यः । हृदय नाभि हाथ पाँवमें सूजन वमन भारीपन प्यास ज्वर खास कास अतीसार अरुचि पीडा कृशता अधोवायुयुक्त गुदा- गुल्म रोगी साध्य नहीं है। स्थान ऐसो
वैद्यचन्द्रोदयः।
५९
अथ हृद्रोगावलोकः ॥५०॥
गुर्वत्युष्णाम्लतिक्ताशनचिरसुरताघातचिंताश्रमायै-
हृद्रोगः पंचधा स्यात्पृथगथ मिलितैस्तैः कृमिभ्योपि चान्यः
भारी अतिउष्ण खट्टो कडवो भोजन करवेसो अतिमैथुनसे चोट
लगवेसो चिंता श्रम आदि करवेसों हृदय रोग पाँच प्रकारको होयहे
वातपित्तकफसे और सन्निपातसे और दूसरो कृमिसेमी ॥ १७७ ॥
वातात्पीडादि पित्तादवथुरथ कफागौरवं सन्निपातान्
मिश्रं चिन्हं कृमिभ्यो नयनकपिशता चारुचिस्तोदउच्चैः ।
वातसे पीडा आदि पित्तसे वमन और कफसे भारीपन सन्नि-
पातमे सव चिह्न मिलें और कृमिसे नेत्रमें भूरापन और अरुचि-
जोरसे पीडा होयहे।
अथ मूत्रकृच्छ्रावलोकः ॥ ५१ ॥
रूक्षव्यायामतीक्ष्णौषधसुरतसुरानूपमत्स्यातिपाना-
जीर्णात्संरुध्य बस्तिं कुपिततममलान्मूत्रयंतीह कृच्छ्रात्१७८
रूखो खानेसो परिश्रम करनेसो तीक्ष्णऔषध सेवनसो मैथुन
करवेसो मदिरा पीवेसो अनूपदेशके मत्स्य खानेसो अतिजल-
पीवेसों अजीर्णसे मूत्रस्थानको रोकके अति कुपितदोषसे यहाँ इस
योगमें कष्टमें मूते ॥ १७८ ॥
एतत्स्यान्मूत्रकृच्छू पृथगथ सकलैस्तैः क्षताद्वेगरोधा-
च्छुक्रस्तंभाश्मरीभ्यामपि वपुषि नृणामष्टधा कष्टधात्री ।
कृच्छ्रे मेहेऽतिपीडां प्रथयति पवनो दाहमूछे तु पित्तम्
श्लेष्मा मंदत्वमग्नेरुजमपि गुरुतां सर्वलिंगं त्रिदोषी ॥१७९॥
यह मूत्रकृच्छ्र होयहे वातपित्तकफसे और सन्निपातसे घावसे वेग
रोकनेसे वीर्य रोकनेसे अश्मरीसे निश्चय मनुष्यके देहमें आठ प्रका-
रके कष्टदेवेवारी कष्टसे मूते वातसे गुंतवे में अति पीडा पित्तसे दाह
मूर्छा कफसे मंदाग्निरोग और भारीपन और यह सब चिन्ह
होय सो त्रिदोषी जाननो ॥ १७९ ॥
. ६० भाषानुवादसमेतः। शल्यं वातस्य चिन्हें शकृदुदररुजाऽध्मानदाहाश्महेतून शुक्रं मूत्रं सशुक्रं रुजमपि महतीमश्मरीरूपमेतत् । शल्यज मूत्रकृच्छ्रमें वात कृच्छ्रके लक्षण और वार २ पेटमें दर्दअफरा पथरीवाले मूत्रकृच्छ्रमें होय हे शुक्रज मूत्रकृच्छूमें मूत्रके साथ वीर्य गिरे और पथरी सो अतिदर्द याको रूप हे। अथ मूत्राघातावलोकः ॥ ५२॥ मूत्राघातास्त्रयः स्युर्दश च किल मलैमूत्ररोधादिभिश्च क्रुद्धो मूत्रेऽनिलश्चेञ्चरति विगुणतः कुंडलीमूय मूत्रम् १८० निश्चय मलमूत्र आदिके रोकनेसे मूत्राघात तेरह प्रकारका होयहे जब वात कोपकर विगडे तव वात कुण्डलीआदि मूत्र- रोग होयहे ॥ १८० ॥ अल्पाद्यं वा सपीडं समुदयति तदा वातकुण्डल्यसौस्या- दष्ठीलं मूत्ररोधि युदयति मरुतः कुर्वतो वातरोधम् । यो रुन्ध्यान्मूत्रवेगं वदनमथ मरुत्तस्य बस्तेः पिधाय क्रुद्धो मूत्रस्य रोधं रचयति स तदा वातबस्तिः स कष्टः १८१ जो थोडी वा अधिक पीडायुक्त पैदा होय सो यह वातकुंडली हे और मूत्रको रोकमेवारो वायुसे पैदा होय वातको रोके वो अष्ठीला है जो मूत्रके वेगको रोके और वात वा मूत्राशय के मुखको कुपित होके मूत्रको रोंके सो तहां वातबस्ति कष्टदायी हे ॥ १८१ ॥ मूत्रातीतस्तु मंदं मुहुरपि च मुहुर्मूत्रयेन्मेहयेद्वा ऽपानं बस्तिव्यथाकृज्जठरमुपगतः कुक्षिमूत्रं करोति । बस्तौ नाले मणौ वा सरुगनिलवशाद्रक्तमूत्रं स्रवेच्चेन्- मूत्रोत्संगोऽथ मूत्रक्षयमनिलकफात्सव्यथाद् दाहमाहुः१८२ मंद २ वार २ मूत्र मूते सो मूत्रातीत हे अपानवायु मूत्राशयमें पीडाकरे पेटमें प्राप्त हो ठूखसे मूत्र करे वो मूत्रजठर हे मूत्राशयकी नाल वा. मणिमें पीडायुक्तवातसे लालमूत सवे सो मूत्रोत्संग है और वात कफसे व्यथायुक्त दाह होय सो मूत्रक्षय हे ।। १८२ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः । मूत्रग्रंथिः स्थिरोऽल्पोऽइमरिवदतिरुजो बस्तिवक्रांतरस्थः स्त्रीरंतुर्मूत्रितस्य प्रथयति पवनो मूत्रशुक्रं यथार्थम् । पित्तं बस्तिं सवातं दहदिव रचयेन्मूत्रमापीतरक्तं कृच्छ्रात्स्यादुष्णवातो ह्यथ कफदहनो बस्तिभाजानिलेन ८३ स्थिर अल्प पथरीसी अतिपीडा मूत्राशयके मुखमें होय वो मूत्रग्रंथिहे स्त्रीसे मैथुन करकेसो वातसे जैसेकोतेसो वीर्यसो गाढो मूत्र उतारेताकों मूत्रशुक्र कहे हैं पित्त मूत्राशयमें वातयुक्त दाह यहां मूत्रको पीलो करे लाल कष्टसे मूत्र उतरे सो उष्णवात हे और मूत्राशयमें कफपित्तवातसे पैदा ॥ १८३ ॥ हन्येतासौतदाल्पारुणसितघनतो मूत्रतो मूत्रसादो विज्ञेयो विड्विघातो यदि भवति शकृवंधि मूत्रं सकृच्छ्रम् । स्वस्थानध्वस्तवस्ते?तगमनमुखैः कर्मभिर्मूत्रकोशः पुंसोऽन्यत्र प्रयातः स्रवति लघु पुनः पीडितो भूरि मूत्रम् ८४ अल्पलाल सुपेद् गाढौ मूते सो मूत्रासाद नाशकारी होय है मूत्रमें विष्ठाकीसी गंधि आवे पीडाहोसो विड्विघात जाननो मू- त्राशयको अपने स्थानसे मुख उलटा हो जाय जल्दीगमनसे पुरु- षको मूत्रकोश और स्थानको चलो जाय थोरो वहे फिर पीडायुक्त बहुत मूत्र वहे ।। १८४ ॥ शूलोदावर्त्तयुक्तः प्रभवति स तदा कुंडलं बस्तिपूर्व सोदावर्त्तातिशूलो भ्रमतिमिरमरुत्कुंडलीको न साध्यः। शूल अफरा युक्त हो तो बस्तिकुंडली कहनो अफरा अतिशूल भौंर अधेरो हो तौ वातकुंडली वारोनर साध्य नही है। अथाश्मर्यावलोकः ॥ ५३॥ दोषैः शुक्रेण वाश्मयुदयति कफकृद्भक्षभाजां चतुर्द्धा- मूत्राद्वस्तौ विशुष्का क्रमश इह गवां पित्ततो रोचनेव १८५ वीर्यके दोषसे कफकारी भोजनसे पथरी पैदा होयहे सो क्रमसे चारप्रकारकी हे यहां मूत्र मूत्राशयमें पित्तसे शूखे जो गौके रोचनसी ।। १८५ ।। वै. चं.६ . भाषानुवादसमेतः। हुन्नाभीसीवनीबस्तिषु तदतिशयाविविभागंतु मूत्रम् मार्गे रुद्ध क्षते तु क्षतजरुगुदयो मूत्रमार्गे तया स्यात् । वातात्तोदादिदाहायुदयति परतः श्लेष्मतो गौरवादि प्रायो वालेष्ववालेषु तु भवति पुनः शुक्रजा शुक्ररोधात् ८६ हृदय नाभि सीवनी मूत्राशयमें पीडा ताके, अतिशयसे मूत्ररुक २ के मूते जब मार्ग रुकजावे तो गुदा मूत्रमार्गमें घाव होयजा- यहे ताकरके मूत्रमार्गमें घावसे पीडाहो वातसे दर्द आदि पित्तसे दाह पैदा करे कफसे भारीपन आदि बहुधा बालकवृद्धको फिर शुक्र रोकनेसे शुक्रजा पथरी पैदा होय है ॥ १८६ ॥ स्थानाद् भ्रष्टं न यातं बहिरनिल इदं शुक्रमाशोष्य कुर्यान् मुष्कांतस्तां च सा तु क्षपयति नितरां शुक्रमुत्पन्नमात्रा ॥ वीर्यस्थानसे भ्रष्ट होकै बाहर नही आवे वाकों वायु सुखाके वो वीर्य उत्पन्न मात्रसे आँडोके भीतर निरंतर जायहे ।। अथ मेहावलोकः ॥ ५४॥ संदूष्य क्लेदमेदःपलमिह कुपितान्तानुदग्रप्रभावान् साध्या याप्या असाध्याः समविषममहान्यक्रमात्ते हि सर्वे ॥ मेद रक्त इहाँ कुपित होके जो भारीप्रभाववाले प्रमेहको पैदा- करे वो साध्य कष्टसाध्य असाध्य क्रमसे उनको सम विषम महान क्रमसे कहें ॥ १८७ ॥ देहे स्वैग्ध्यं विशेषात्करचरणतले दाहिता स्वादुतास्ये तृष्णा मूत्राविलत्वं रदपृथुमलता पांडुता चाननस्य । क्षुन्नाशो दुर्बलत्वं सुरतविमुखता संधिरुग्वैमनस्य- मालस्य कांतिहानिर्ग्रहणमपि मलस्याग्ररूपं प्रमेहे ॥१८८॥ देहमें चीकनापन विशेषतासे हाथ पाँवके तलमें दाह मुखमें भीठापन प्यास मूत्र उतरवेमें देर दाँत बहुत मैल होना और मुख पीलापन क्षुधानाश दुर्बलता मैथुनमें अरुचि जोडोंमें पीडा मनको न लगनो आलस्य कांतिनाश मलको रुकनो यह प्रमेहमे पूर्वरूप होवे हे ।। १८८ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः।
इश्वंभःसांद्रशुक्रासवहिमसिकतामंदपिष्टं च लाला
मांजिष्ठक्षारहारिद्रकरुधिरमथो नीलकालेवसेचः।
मजा क्षौद्रं च तेषामिति पृथगभिधास्तत्तदाकारभावाः
प्रोक्ताः सर्वे क्रमेण स्फुटमिह तु भिदा मूत्रवर्णप्रभेदात् १८९
ईखजल सो गाढो शुक्र सो
सुरा
सो शीत सो रेत सो शनैः
पीठीसो और लाला सो मंजिष्ट सो क्षार सो हरदी सो रक्त सो
और नीलो कालो वसा सो हाथीके मदसो मज्जा सो क्षौद्र सो तिनमें
याप्रकार अलग २ नामसे उनके वर्णके आकारके भाववाले सर्व-
भेद मूत्रके क्रम पूर्वक प्रकट कहेहे ॥ १८९ ॥
मेहेत्स्वाद्विक्षुमेहीक्षुरसवदथ नव्याम्बुवद्वारिमेही
मूत्रं सांद्रं यदा पर्युषितमिह भवेत्सांद्रमेही तदा स्यात् ।
ऊर्ध्व स्वच्छं सुरावकिमपि धनमधस्तात्सुरामेह्यथैतत्
पिष्टाभं पिष्टमेही भृशशिशिरबहु स्वादुशीतप्रमेही ॥१९॥
गाँडेके मीठे रससो मूते सो इक्षुमेही और नये मैले जलसो मूते
सो वारिमेही जो मूत्र गाढो वासोसो होय सो सांद्रमेही हौ यहे
ऊपर निर्मल मदिरा सो और नीचे गाढौ मूत्र होय सो सुरामेही हे
पीठी सो मूते सो पिष्टमेही अतिठंडो बहुतमीठो मूते सो शीत-
प्रमेही हे ॥ १९॥
शुक्राभं शुक्रमेही लघुलघु सततं मंदमेही च लाला-
मेही लालप्रतानप्रभमथ सिकतामेहिकः सैकताभम् ।
सक्षारं क्षारमेही जलमिव विमलं नीलमेही तु नीलम्
कालाभं कालमेही रजनिजलनिभं दाहि हारिद्रमेही ॥१९॥
वीर्यसो मूते सो शुक्रमेही थोरो २ निरंतर मूते सो मंदमेही और
लारकोसो तारदार होय सोलालामेही और रेतसो मूते सो सिक-
तामेही क्षारयुक्त मूते सो क्षारमेही निर्मल जलसो मूते सो उदक-
मेही नीलोमूते सो नीलमेही कालोसो मूते सो कालमेही जो
दीके जलसो दाहकारी मूते सो हारिद्रमेही ॥१९१ ॥
भाषानुवादसमेतः। विनं शोणं समंगासलिलमिव मुहुर्दाहि मांजिष्ठमेही- रक्तं रक्तप्रमेही सरजमथ वसामेहिकस्तद्वसाभम् । मज्जाभं मजमेही मधुरमतिविडं क्षौद्रवत्क्षौद्रमेही दानाभं सालसीकं स्रवदनुसमयं पूतितद्धस्तिमेही ॥ १९२ ॥ फट्यो लाल मजीठके जलसो वार २ दाहकारी मूते सो मांजि- ष्ठमेही लाल मूते सो रक्तमेही और पीडायुक्त चर्वी सो मूते सो वसामेही हड्डीसो मूते सो मज्जमेही मीठो शहतसो मूते सो क्षौद्र- मेही अलसीके दानेके जलसो स्रवे निरंतर दुर्गंधीसो हस्तिमेही १९२ रुग्बस्ती मेहने चावदरणमुभयोर्मुष्कयोर्विड्विभंगो मूर्छा दाहो ज्वरस्तृट् क्लम इह सहसोपद्रवाः पित्तमेहे । श्लेष्मोत्थे तत्र निद्रारुचिवमिकसनापतयो वातजे तु श्वासः कासो हृदर्तिः शयनहतिरुदावर्तरुक्कंपशोषाः १९३ बस्तिमें पीडा मूततेसमें होय और दोनो ऑडोंमें पीडा होय मलको भंग होय मूर्छा दाह ज्वर प्यास ग्लानी यह सहसा उप- द्रव पित्तसे पैदा प्रमेहमें होय हे कफसे पैदामें तहां निद्रा अरुचि वमन कास पंक्तिशूल होय हे वातसे पैदामें श्वास कास हृदय पीडा निद्रा नाश अफरा पीडा कंप शोष होयहे ।। १९३ ॥ मध्ये निम्नाधऊवं प्रभवति पिडिका सा सरावी विदारी कंदप्रख्या विदारी सरुगथ विनता स्थूलमूर्द्धाल्पमूला । सिद्धार्थाभा तु सर्षप्यथ लघुपिटिका संवृता स्थूलदेहा पुत्रिण्युक्तालजी तु क्षतजवदरुणा विद्रधिस्तूक्तरूपः॥ १९४॥ प्रमेहके उपद्रवमें नीचे ऊपर फुन्सी होवे सरावसी सरावी विदारीकंदसी विदारी और पीडायुक्त विनता मोटो माथो छोटो मूल सरषोंसी सरषपी और छोटी फुन्सी संवृता बडी देहवारी पुत्रिणी धावकेसी लाल अलजी पहलेरूपसी विद्रधि होयहे ॥ १९४ ॥ कच्छप्यच्छाल्पकूर्माकृतिरथ सरुजा जालिनी मांसजाला वैद्यैः प्रोक्ता मसूरप्रतिमतनु सरुग्दारणात् स्यान्मसूरी।
वैद्यचन्द्रोदयः ।...
जायंते मेहदेहेष्विति दश पिटिकाः संधिमर्मस्थलेषु
स्पष्टाः कष्टाः कलाभिस्त्वधिकरसमयोपेक्षणान्मेदसोवा १९५
साफ छोटे कच्छपसी आकृति वारीकच्छपी और पीडायुक्त
मांस जालसी जालनी जो मसूरसी आकृतिवारी वैद्योंने कही
फटनेकेसी पीडा होय सो मसूरी हे प्रमेहवालेके देहमें जोड मर्म-
स्थलमें होय हे प्रकट कष्टदाता अधिकरसमय मेदके उपेक्षासे होय
हे ॥ १९५ ॥
अथ मेदावलोकः ॥ ५५॥
मेदोवक्षोजकुक्षिस्फिजि भवति चितं श्लेष्मलान्नैः प्रवृद्धम्
तत्तस्माखंबमानं तदवधृतगतिर्वर्द्धतेऽन्योऽन्यधातुः ।
कोष्ठे वातेपि वहि वहलयति तथैतौनु देहांतको स्तः
सत्वप्राणव्यवायैर्लघुभिरपि जनः स्याच्च कर्मासमर्थः॥१९६॥
कफकारी अन्नसे पैदा वक्षस्थलमें कुंख कमरमें मेद वढे हे तासो
पेट लटक जायहे तेसेही और २ धातु नही वढे हैं अग्नि प्राप्त
करनेवाली और अग्नि नाश करवेवारी वायु से कोष्ठ रुकजाय तौ
पीछे देह नाश करे हे सत्व प्राण मैथुन छोडवेमें मनुष्य समर्थ
होय हे ॥ १९६ ॥
अथोदरामयावलोकः ॥ ५६ ॥
वैवर्ण्य कुक्षिशोफस्त्रिवलिहतिरुगाध्मानताऽबल्यदाही
कार्य शाखासु शोफः करचरणगतो मूत्रविड्वातसंगः।
तंद्रा चैतत्समस्तोदरजममिहितं लक्ष्म तत्रानिलात्तु
श्यावारतत्वगाद्यं तदसितधमनीव्याप्तमापूर्णवातम् १९७
विवर्णता कूँखमें शोफ त्रिवलीमें नाश पीडा अफरा अबलता
दाह कृशता शाखाओंमें हाथ पाँवमें प्राप्त शोफ मूत्र मल वायु रुके
तंद्रा यह सब उदर रोगसे. पैदा के लक्षण हे वहाँ वातसे काली लाल
त्वचा आदि तेसेही काली पूर्ण वायुसे व्याप्त नसें होयहें ॥१९॥
भाषानुवादसमेत।
पित्तात्पीतं त्वगाद्यं सरुजमपि हरित्पीतताः शिराणाम्
बन्दैा बलासात्त्वरुचिसितधमन्यादिसश्वासकासम् ।
दंतैर्दुष्टांगनाद्यैर्नखरकचविकार्यन्नपानादिभिस्तैः
क्रुद्धैर्दूषीविषाद्वा दधदखिलभवं लक्ष्म दृष्योदरं तत् ॥१९८॥
पित्तसे त्वचा आदि पीली पीडायुक्त हरी पीरी तामेसी नाडी.
नके समूहसो व्याप्त होय हे कफसे अरुचि सुफेद नसे आदि श्वास
कासयुक्त होय हे दुष्टस्त्रीआदिकेदिये दाँत नख वाल विकारी अन्न-
पान आदिसे कुपित दूषीविषसे पैदा तथा वातपित्तकफ तीनोंसे
पैदाहो तो दूष्योदरके चिन्ह जानने ॥ १९८ ॥
दुष्टे मांसासृजी संरचयत उदरे वामतः प्लीहवृद्धिं
पाहुः प्लीहोदरं तत्समुपचितमरुच्छ्ष्मपित्तात्सतोदैः ।
नाड्यां रुद्धे पुरीषे त्रिभिरपि च मलैर्दूषितेऽपानमार्गात्
कृच्छ्राल्पाल्पप्रवृत्तौ हृदय उपचितं दाहि बद्धोदरं स्यात् १९९
मांसरसके विगडनेसे पेटके वाये ओर प्लीह पैदाकर वढावे
उसे प्लीहोदर कहें, यह अधिक पीडायुक्त वात पित्त कफ और
त्रिदोषसे होय हे विष नाडीमें रुकवेते त्रिदोष विगडवेतें अपान-
मार्ग दूषित हो दुःखसे मलकी अल्प अल्प प्रवृत्ति हो हृदयमें
इकठ्ठो दाह होय उसे बद्धोदर कहें ॥ १९९ ।।
शल्यं संप्राप्तमन्नैः सह महदुदरं नाभितोऽधः सतोदं
कुर्याद्भित्वांत्रमस्मात्स्रवति जलमिवाधः परिस्राविकं तत् ।
पीतस्नेहो विरिक्तः कृतवमनविधिः सानुवासो निरूही
स्नेहाकोष्णांबु शीतं बहु पिबति यदा स्यात्तदांबूदरं तत् २००
अन्नमें शल्य चल्योजाय वो अधिकपीडायुक्त उदरमें नाभिके
नीचे आंतकों काटके जलकीनाई विकारको नीचे की तरफ स्राव
करे वो परिस्रावी हे चीकनो घृतादि पीयेतें दस्त रहित वमनविधि
करेतें ओर अनुवासन व निरूहणसे स्नेहयुक्त गरम वा ठंडो बहुत
जल पीये तो जलोदर होवे हे ॥२०॥
वैद्यचन्द्रोदयः ।। स्निग्धं पानीयपूर्ण हतिवदतिबृहत्पीडनात्कंपमानं सध्वानं तुल्यनाभिप्रततसितहरित्पीतशोणाभराजि । शूनाक्षो जिह्मलिंगः कृशदहनतनुत्वक् सपार्थासभंगः शोफातीसारयुक्तो रुधिरविरहितो नोदरी जातु जीवेत् २०१ चीकनो जलकरके पूर्ण नाशक हे और वडी पीडासे कंपाय- मान निरंतर मार्गश्रमी सुफेद हरे पीले लाल से वाल आखे जीभ लिंग कृश हो देहमें जलन त्वचा पांशूमें कंधामें भंगता शोफ अती- सारयुक्त रक्तरहित एसो उदररोगी कभी नहीं जिये ।। २०१॥ अथ शोफश्लीपदांत्रामयावलोकः ॥ ५७ ॥ क्रुद्धो वातोऽस्रपित्ते कफमपि धमनीर्वाह्यगा लंभयित्वो- त्सेधं तैः साकमेव प्रथयति भिषजः शोफमेनं वदंति । प्रत्येकं तैर्दिशश्च त्रिभिरपि विषतो घाततः स्युस्तथैतत् भेदाः सोमानवस्युर्गरिमपुलकितोत्सेधनाडीकृशत्वात्२०२ कुपित वायु रक्तपित्त कफको बाहरकी शिरामें लेजाके गतिको रोक दोष युक्त त्वचासे ऊपर उठे याको वैद्य शोफ कहे हैं । वातपित्त- कफसे द्विदोषसे त्रिदोषसे और विषसे चोटसे तेसेही यह नौ भेदसे नौ प्रकारकी छोटी वाडीनको भारी करके होयहे ।। २०२ ॥ रूक्षायामारुणत्वक् स भवति पवनास्निग्धसश्यामपीता- रक्तत्वक् पित्ततोऽथो गुरुमृदुलसितत्वक् कफादन्य एतैः । शस्त्राद्याघातजोऽन्यः श्वयथुरथ विषाद्दुष्टकीटौषधादेः पित्तप्रख्या विसर्पाकृतिरयमलघूपद्रवः स्यादसाध्यः ॥२०॥ पवन विकारसे रूखी लाल त्वचा और पित्तसे काली चिकनी लाल पीली त्वचा होय हे और कफसे भारी नर्म सुफेद त्वचा होय हे और इन करके शस्त्र आदिकी चोटसे पैदा और शोथ और विषसे दुष्टकीट औषध आदिसे पित्तप्रख्याविसर्पकी आकृतिवारी यह बहुत उपद्रवसे असाध्य होय है ॥ २०३ ।। मेदः श्लेष्मोत्थितं तत्प्रभवति पदयोः श्लीपदं शोफरूपं नासाकर्णाक्षिहस्तांगुलिषु च रदने कुत्रचिन्मेहनेऽपि ।
६८ भाषानुवादसमेतः। दोषः क्रुद्धोऽण्डकोशौ विशति यदि तदा सप्तधा स्यात्कुरण्डो वताद्रुग्दाहकंवोनलजकफजवद्रक्तमेदोभवौ च ॥ २०४॥ कफसे उठ्यो मेद तेसेही पांवमें सूजनरूपी श्लीपद करे है नाक कान नेत्र हाथकी अंगुली और दंत और कभी लिंगमेंभी कोइ जगे वर्तमान यह दोष कुपित होनेसे अंडकोशमे प्रवेश कुरंड सात प्रकारको होयहै वातसे पीडा पित्तसे दाह कफसे खुजरी रक्तसे पैदामे दाह और मेदसे पेदामे खुजरी होय हे ॥ २०४ ।। रोधान्मूत्रस्य मौत्रो गतमुदयति तद् हन्ति नेत्रांडजास्तु क्षुद्रांत्रं वंक्षणं चेद्रजति निखिलरुक् पीडितेंत्रे तु दुष्टः । मूत्रके रोकवेसे मूत्रमें गई वातविकार पैदा होके दोनो अंडकोषों में पैदा हे छोटी आंत वंक्षणमें प्राप्त हो अति बिगडी आंतोंमें पीडा करे। अथ व्रणशोथावलोकः ॥ ५८ ॥ प्राग्रूपं स्याद्णस्य श्वयथुरिह तनौ वापि षोढा स उक्तो दोषैर्व्यस्तैः समस्तैरपि च रुधिरजागंतुजौ चात्र चिह्नम् २०५ घावके पूर्वरूपमें सूजन या देहमें कोइ जगे हो सो छै प्रका- रकी कही है वात पित्त कफसै त्रिदोषसे और रक्तसे आगंतुजसे यह चिन्ह होय हें ॥ २०५ ॥ यत्प्रागुक्तं विशेषात्त्वथ विषममिहापच्यते गंधवाहात् पिताच्छीघ्रं बलासाच्चिरमथ रुधिरागंतुजौ पित्तचिह्नौ । मंदोष्मत्वाल्पशोफत्वमतिकठिनता त्वक् सवर्णत्वपीडा- मंदत्वं चालघुत्वं कथितमिह बुधैरामशोथस्य लिंगम् ॥२०६॥ जाको पहले विशेषतासे यहा कहे हों और वायुसे विषम पके पित्तसे शीघ्र पके कंफसे बहुत दिनमें पके और रक्तसे तथा आगंतुजमें पित्तकेसे चिन्ह होय हे छोडीगरम अल्प शोथ अति कठोरता त्वचामें सवर्णता मंद पीडा या अतिपीडा यह पंडितोंने कच्ची शोथके चिन्ह कहे हैं ॥ २०६ ॥...
वैद्यचन्द्रोदयः। ६९ तत्रास्यात्पच्यमानेरुगतिकठिनता चापि सौवर्ण्यसूची निःस्तोदत्वाग्निपातत्वमतनुतनुतातृडूज्वरारोचकत्वम् । पक्के पीडाविरामः श्वयथुरपि लघुः शोफकंडूबलित्वं पाकेऽस्रस्य त्वगुर्वी रुगतिकठिनता कंडुसावर्ण्यतोदम् २०७ तहां पकेहुए शोथमें पीडा अति कठोरता और निश्चय सूईसी चुभनो पीडारहित जलन हलकामन प्यास ज्वर अरुचि और पके (फूटे) शोथमें पीडा हटनो और शोथ घटनो खुजरी सलवट पडनो रक्तपाकमें भारीपीडा अति कठोरता खुजरी सव- र्णता दर्द ॥ २०७॥ पाकः पित्तं विना न प्रभवति न रुजा गंधवाहं न पूयः श्लेष्माणं तेन कुप्यत्यनुवपुपरुषः पाककाले त्रिदोपी । वायु विना पीडा नही होय है पित्त विना पके वढे नही है कफ बिना पीव नही पडे ताकारण कोप पीछे देहके पाकसमय तीनही दोषसे होय हे। अथ सद्योव्रणभमवणनाडीव्रणावलोकः॥५९॥ शारीरागंतुभेदागण इह कथितो द्विप्रकारोत्र पूर्वो दोषैरन्यस्तु शस्त्रादिभिरथ पवनात्स्तब्धता चातिपीडा २०८ शारीरक आगंतुज भेदसे व्रण यहां दो प्रकारको कह्यो है यहां पहलो शारीरक व्रण और वातपित्तकफसे और आगंतुज शस्त्र आदि लगनेसे और वातसे अतिपीडा जकडन ॥ २०८॥ तीक्ष्णस्पर्शश्च तोदः सुतिरगुरुरपि श्यावता पित्ततस्तु क्लेदस्तृण्मेहदाहज्वरदरणमसक् पूयपूतित्वमुच्चैः। स्निग्धत्वं स्याद्वलासालधुरुगलघुता पांडुता क्लेदमांचं रक्तात्पित्ताकृतिः स्यादलघुररुणभाद्वित्रिजा द्वित्रिलिंगाः॥ तीक्ष्ण स्पर्श और पीडा वहनो हलकापन और कालापन होयहे और पित्तसे ग्लानि प्यास मेह दाह ज्वर फटनो रक्त दुर्गधित होनो अति पीव होयहे कफसे चीकनापन थोडी पीडा अति
७०
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भाषानुवादसमेतः।
पांडुता ग्लानि मंदाग्नि होयहे रक्तसे पित्तके चिन्ह और भारी
लालता होय हे दो दोषसे दो के और त्रिदोषसे तीनोंके लक्षण
होय हें ॥ २०९॥
त्वमांसोत्थश्च यूनः सुखकृतविषमे चापि काले सुवृद्धे-
युक्तो नोपद्रवैर्यः पृथगचिरभवः सौख्यसाध्यो व्रणः स्यात् ।
कैश्चिच्चिद्वैर्ऋणो यो भवति निगदितैः प्राग्द्विदोषः स याप्यः
सर्वैस्तैर्यः सुयुक्तो रुधिरकफमरुत्पित्तरुग्भागसाध्यः॥२१०॥
त्वचा मांससे उट्यो और जवानकों सुखकार्यमें और विषमका-
लसे अति बढ्यो और उपद्रवयुक्त नही एक दोषसे थोडे कालको
पैदा घाव सुखसाध्य होय है कहे भये कोई चिन्हसे वो व्रण
द्विदोषी होय सो याप्य है सब लक्षणोंसे युक्त रक्त कफ वात
पित्त तिनकरके पीडावारो रोगी असाध्य है ॥ २१०॥
दुष्टासृक्पूतिपूयश्चिरसमयभवः पूत्यसकलेददिग्ध
श्चोत्संगी शीर्णमांसः पृथगतिरतिरुग्दुष्टसंज्ञोन्यथाऽन्यः।
यस्य प्रांते कपोताकृतिरपि विगतक्लेदपीडः स्थिरश्च
रक्तं मध्यं प्ररोहत्ययमिति निगदे तुल्यदेहं तु रूढम् ॥२१॥
बिगडा रक्त दुर्गंधी पीव वहे बहुत कालको पैदा दुर्गधी
रक्त ग्लानि युक्त और ऊंचो फट्यो मांस भारी गति अति पीडा
होय वो दुष्ट व्रण हे और प्रकारको नही व्रण जाको प्रांत कपो-
ताकृति और सो केदरहित स्थिर लालमध्यमें चढे यह या प्रकार
कहे देहतुल्य रूढ रहे ॥ २११ ॥
मोनोर्वाऽज्यपुष्पाम्बुजमलयरहैश्चंपकैर्ये च गंधाः
किंवा ये दिव्यगंधा असुमृदवयवे तेप्यसाध्या व्रणाः स्युः।
छिन्नं भिन्नं तु विद्धं क्षतमपि च तथा पेषितं घृष्टमाभिः
संज्ञाभिः षविधं तन्मुनिभिरभिहितं सामिसद्योव्रणंच २१२
मदिरा भू घी कमल पुष्प चंदन चंपाकीसी गंध आवे औरभी
दिव्य माटीकीसी गंध धारणसे असाध्य व्रण होय है, छिन्न भिन्न
विद्ध घाव तथा पिस्यो घिस्यो इन संज्ञासे मुनीने निरंतर सद्यव्रण
छे प्रकारको को है ॥ २१२ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः। तिर्यक् छिन्ने समं वा व्रण इह तु भवेदायतो गात्रपाती छिन्नाख्यो भिन्नसंज्ञस्त्विपुलगुडमुखैराशयेषु क्षतेषु । भित्त्वायं निःसृतं यदहिरिति लघु वा सूक्ष्मशल्यं विनांतः कोष्ठं विद्धाभिधानं जगुरिह भिषजः किंचिदुच्छूनितं वा २१३ तिरछो छिन्न समघाव यहां होय देरसे गातपात करे यह छिन्ननामा है वडो गोल मुखसे आशयनमें घाव होनेसे इनको भेद न करके जो बाहर निकले छोटो बडो शल्यके बिना कोठेके भीतर कुछ उंचो भिधे उसे वैद्य विद्ध कहें ॥ २१३ ॥ नातिच्छिन्नं न भिन्नं तदुभयजनितैर्लक्षणैर्युक्तमेनं प्राहुर्वैद्याः क्षताख्यं पृथुमथ हननोत्पीडनैः पिच्चिताख्यम् । अंगं यत्त्वविहीनं प्रभवति महतो घर्षणाद्धाततो वा- सौघृष्टाख्यः सशल्यं त्वतिकपिशमहद्बुद्धदाभं सपीडम् २१४ न अति छिन्न न भिन्न सो इन दोनो लक्षणोंसे युक्त पैदा वैद्योंने झतनामक कहा है और मारनेकी पीडासे भारी पिच्चित नामक अति खुजायवेसों चोटसों जो अंग त्वचाहीन होजाय उस्का नाम घृष्ट है, शल्ययुक्त अति भूरो बुद्भुदासो पीडायुक्त उसे शल्य कहें ॥ २१४ ॥ शीतोच्छ्वासोऽरुणाख्यः शिशिरकरपदो भ्रांतिमूर्छाप्रलापी साध्मानोऽश्याववको ज्वररुगभियुतो याति सद्योत्रणीतः। मेहोन्मादौ विसर्पश्वसनकसनतृदछर्दिहिध्मातिसार- पीडायुक्पक्षघातज्वरदहनहनुस्तंभनं चापतानः ॥ २१५ ॥ ठंडोऊपर श्वास चले सो अरुणाख्य हे हाथ पांवमे ठंड भ्रांति मूर्छा वकवाद अफरायुक्त कालो मुख ज्वरपीडासहित सद्योत्रण- वालो या भावको प्राप्त होते है, प्रमेह उन्माद विसर्प श्वास कास प्यास वमन हिचकी अतीसार पीडायुक्त पक्षाघात ज्वर दाह हनु- स्तंभ और अपतानक ॥ २१५ ॥ नाडीस्तंभो व्रणानामिति नृषु विषमाः षोडशोपद्रवाः स्यु- भग्नं संध्यस्थिभेदाद्विविधमिह किमप्यालपाम्यस्य चिह्नम् ।
भाषानुवादसमेतः। सामान्यात्संधिभग्नस्य तु भवति रुजा कुंचनाकुंचनेषु स्पर्शद्वेषश्च शोथस्तृडरुचिशयनध्वंससंतापमोहाः ॥२१६॥ नाडीस्तंभ यह व्रणी नरनको विषम सोलह उपद्रव होय हे भग्न टूट्यो जोड हड्डीभिदवेसे नानाप्रकारको व्रणस्थानको लक्षण है सामान्यतासे संधिभग्नको आकुंचन और कुंचन करके पीडा हो- वेहे स्पर्शमें द्वेष और शोथ प्यास अरुचि निद्रानाश संताप मोह ॥ २१६॥ भने त्वस्थिप्रकांडे चटवडितिवचः पाणिना पीडिते स्या- दुच्चैस्तोदः सशूलस्त्वचि च कपिशिता पूर्वचिह्नानि चापि । अज्ञानादामबुद्ध्या श्वयथुरथ चिरोपेक्षितो यः सुपक्क- स्तस्यांतर्याति भित्त्वा निजनिलयमसृग्वाँश्च नाडी च पूयः॥ अस्थि शाखा टूटेंभयसे मछरीपकरवेके काँटेके समान हाथमें पीडा होय जोरसो तोद शूलयुक्त त्वचामें पीलापन यह पूर्व चिन्ह है अज्ञानसे कच्चीबुद्धिसे शोथ और बहुतराहसे जो सुपक्क भीतर भेदन करे और स्वयं वातरक्त सो नाडीपूय होवे हे ॥ २१७ ॥ सः स्यान्नाडीव्रणोसौ पृथगथ सकलैस्तैस्तथा शल्यतोऽन्यः प्रायः सर्वेप्यसाध्यास्तदपि च कथितोऽसाध्य एव त्रिदोषः। गंभीरः शूरताढ्यश्चिरसमयभवः पूयपानीयरक्त- स्रावी सोष्णं सफेनं कथित इह सरुक् यस्तु नाडीव्रणः सः॥ यह नाडीव्रण वातपित्तकफसे और त्रिदोषसे और शल्यसे और यह सब प्रायः असाध्य है ताके पीछे कहे इन लक्षण करके हीन सो साध्य है गंभीरशूरतासे अतिसमयसे भयो पीव पानीय रक्त- स्रावयुक्त गरम फेनयुक्त ऐसी पीडायुक्त सो नाडीव्रण कहा है ॥ २१८॥ लक्ष्म प्राग्वत् त्रिदोष्यादुरधिगमतमं शल्यजातं तु फेन- क्लेदामृग्वाहि पूतिः पलभवमतिरुनाहिशल्याध्वतोदः। पूर्ववत् लक्षण त्रिदोषके है दुरधिगमतमशल्यसे पैदा फेन ग्लानि रक्त वहे दुर्गंधी मांससे पैदा अतिपीडा दाह शल्यमार्गमें पीडा ।
वैद्यचन्द्रोदयः। ७ अथ भगंदरावलोकः ॥६०॥ मूलाधारे व्रणो यः स च भवति भगव्याधिरस्मादनेक- च्छिद्राद्रेतो मलश्च स्रवति यदि शतापोनको वातजः स्यात्॥ गुदामें जो व्रण होवे वो भगंदर अनेक प्रकारको है छेदसे वीर्य और मल वहे सो वातसे पैदा शतपोनक होय है ॥ २१९ ।। उष्ट्रग्रीवस्तु पित्तादरुणिमदरणापायुमार्गे प्रयातं श्लेष्मोत्थे मंदपीडास्रुतिरमृदुसितः स्यात्परिस्राविकाख्यः। जंबूकावर्तकोन्यस्त्रिभिरपि च मलैस्तद्वदुन्मार्गकाख्यो- न्यश्चोपेक्षापराणां गुदमथ दलयेऽदंगिनामंगनाशी ॥२२०॥ पित्तसे गुदामें लाल विनामुखवारी फुन्सी ऊंटकी नाडके समान होवे सो उष्ट्रग्रीव कहे कफसे पैदा मंद पीडा कठोर खेतवहे एसो परिस्रावी नाम कहे और जो तीनदोषसे होय सो जंबूकावर्त हे जो स्त्रीइच्छाके परायणके गुदाके मार्गको विदारण कर मार्ग करे सो उन्मार्गी नामक अंगनाश करवेवारो है ।। २२० । प्रायः सर्वेप्यसाध्या यदपि भगभवा व्याधयो व्याधिभाजां तत्राप्युन्मार्गगो यस्त्रिभिरपि च मलै व साध्यावमूस्तः । प्रायः भगंदर रोग सगरेही असाध्य हे जो कामसे भयो व्याधी रोगीको तीनोही मलसे भयो उन्मार्गी साध्य नही है। अथ गलगंडगंडमालाऽपचीग्रंथ्यर्बुदावलोकः ६१ आहुर्गडं गलोत्थं गलपदवदनं गंडमालानुगंडै- भूयोभिः कंठकक्षाहृदयसमुदितैः स्याच्चिरस्थापचीयम् २२१ गाल और गलेमें होय सो गलगंड हे और गालगलेमें पांयमे मुखके पास होय सो गंडमाला होय हे कंठ काँख हृदयमें होय और बहुत कालतक रहे सो अपची हे ॥ २२१॥ ग्रंथिः कुत्राप्यपाकी वपुषि पृथुपलग्रंथिरूपोथ तद्वत् स्यात्संपाकोऽव॒दं तैस्त्रिभिरपि रुधिरान्मेदसोऽन्यैश्च बीजै। वै. चं. ७ भाषानुवादसमेतः। बडी अपकनेवारी मांसकी गांठ कहींभी अंगमें होय सो ग्रंथी जाननी ताके समान पकवेवारी त्रिदोषसे पैदा अर्बुदसो रक्त- मेदसे होते है। अथ विद्रध्यवलोकः ॥ १२॥ दोषाः शोकं सदाहं चिरमभिजनयन्यापयन्त्यर्तिकां वा वल्मीकाभां प्रदूष्य त्वचमतनुमसृङ्मांसमेदांस्यपक्कः ॥२२२ अस्थिमें प्राप्त होके दोष त्वचा याके पीछे रक्त मांस मेदको दूषित करके दाहयुक्त लंबो गोल विलेसरीको अपक्क सूजन बहुत- कालतक रहवेवारो पैदा करे ॥२२२ ॥ पको वा विद्रधिस्तैः पृथगथ मिलितैरस्रतश्च क्षतेन प्राग्वच्चिह्नान्यमीषां रुधिरजनिरयं त्वंगनांगेव बोध्यः। बस्तौ नाभ्यां च कुक्षौ हृदय इह गुदे वृक्कयोवंक्षणे च प्लीहि लोम्नि प्रकुर्वत्यमुमतिकुपिता विद्रधि गुल्मवर्तम् २२३ अथवा पकवेवारी वो विद्रधी रोग वातपित्तकफसे और संनि- पातसे रुधिरसे और घावसे छ प्रकारकी हे पहले सरीखे इनके चिह्न है रुधिरसे पैदा ये योनिसरीको जाननो मूत्राशय नाभि कूख हृदय गुदा रसाशय वगल प्लीह पेटको जलाशय इनमें कुपित हो गुल्मके समान गोल विद्रधी करे है ॥ २२३ ॥ बस्तौ चेदेष कृच्छ् जनयति जठराटोपहिके तु नाभ्यां कुक्षौ वातप्रकोपं हृदि कसनमथ क्लोन्नि दीर्घामुदन्याम् । पायौ वातावरोधं यकृति तु कसनं वृक्कयोः पार्श्वबंधं प्लीह्नि श्वासावरोधं ग्रहणमपि कटीपृष्ठयोर्वक्षणोत्थः ॥२२४॥ ये वस्तिमें हो तौ मूत्रकृच्छ्र पैदा करे, नाभिमें हो तो पेट फुलावे, हिचकी करे ।खमे हो तौ वातकोप करे हृदयमें हो तो कास करे और उदरके जलाशयमें हो तो अति प्यास बढावे गुदामें हो तो वायु रोके, हृदयमें हो तो कास करे रसाशयमें हो तो पाच- वैद्यचन्द्रोदयः। बंध करे, प्लीहामें हो तो श्वास रोके, कटिग्रहण करे और वगल में पैदा हो तौ पृष्ठमें पीडा करे ॥ २२४ ॥ नाभेरूज़ तु पक्कं सवति स तु परिष्टादधस्तादधश्चेन् नाद्यं साध्यं च मर्मोत्थितमपि निगदंत्येनमन्यन्तु कृच्छ्रम् । नाभिके ऊपर पक्योसो ऊपर अथवा नीचे वहे आदिको साध्य नही है और मर्ममें पैदा और दूसरेको कष्टसाध्य कह्यो है । अथोपदंशलिंगावर्त्यवलोकः ॥ ६३ ।। घातादक्षालनाद्वा दृढनिधुवनतो योनिदोषाच्च पुंसां मेढ़े पंचोपदंशाः पृथगथ सकलैस्तैर्भवंत्यसतश्च ॥ २२५ चोटलगनेसे न धोनेसे वा बहुत मैथुन करनेसे स्त्रीके योनिके दोषसे पुरुषोंके लिंगमें पांच प्रकारको उपदंश होवेहैं वातपित्तकफसे सन्निपातसे और रक्तसे ॥ २२५ ॥ त्वच्यग्रे शेफसः स्यादरुणमतिरुजाशोफि वक्रं समं वा नैकं वैकं विसर्पाकृति पृथु लघु वा चोपदंशस्य रूपम् । मध्ये कोशस्य संधौ प्रभवति परितश्चैकदेशेऽथवाधो- वर्तिर्मासस्य दोषैस्त्रिभिरपि शिखया कुक्कुटस्योपमेया ॥२२६॥ लिंगकी त्वचाके आगे विदीर्णता होय अतिदर्द सूजन टेढी या सम अनेक वा एक विसर्पाकृति फुन्सी मोटी वा छोटी होय यह उपदंशको रूप है लिंगके वीच संधिमें एकदेशमें ऊंचे मांसकी वर्ती तीन दोषसे मुर्गाकी शिखासी लाल होय ॥ २२६ ॥ स्निग्धा पीडाविधात्री जगुरिह विबुधास्तां तु लिंगार्श एके प्रायोऽन्ये मेदूवर्ति कथमपि भिषजां नैति साध्यत्वमेषा । चीकनी पीडाकरवेवारीको यहा कोई एक पंडित उसे लिंगार्श कहे हैं बहुधा और कोई उसे लिंगावर्ति कहें वैद्योंको कोईभी प्रकारसे यह साध्य नहीं है । अथ शूकावलोकः ॥ ६४॥ यो मूढो मेवृद्धिं कलयति सहसा तस्य शूकामयाः स्यु- लिंगे या सर्षपाभा प्रभवति पिडिका सर्षपी श्लेष्मवातातू२२७ भाषानुवादसमेतः । जो मूढ एकाएकी लिंग बढावे उसे शूकरोग होवै हे लिंगमें सरषोंसी फुन्सी कफवातसे होयहे सो सर्षपी हे ॥ २२७ ॥ वातादष्ठीलका स्यादथितमिह कफाच्छूकपूर्ण सशोथं कुंभीकाजांबवास्थि वरसरुधिरजाचालजी स्फोटरूपाः। संरब्धाद्वातकोपादृढनिधुवनतश्चाथ संघर्षणेन प्रास्तत्रैव वैद्या मृदितमिह मुहुः पीडनात्पीडितं स्यात् २२८ वातसे अष्ठीला होय है यह कफसे गुथेसी सूजन पूर्ण काटे होय हे रक्तपित्तसे जामुनकी गुठलीके समान कुंभिका होय हे और रस- रक्तपित्तसे फटी अलजी होय है वातकोप होनेसे अतिमैथुनसे और लिंगघर्षणसे तहाँ वैद्योने कहाहै इहा वार २ मीडवेसे और पीडित करनेसे पीडित हो सो मृदित है ॥ २२८ ॥ संमूढा गंधवाहात्प्रभवति पिडिका चावमंथः पृथुः सा त्वक्पाकः पित्तकोपादथ च रुधिरजा स्पर्शहानिश्च सा स्यात्। मुद्गाभातृत्तमा स्यात्कमलमिव पुनः पुष्करीका ह्यनेक- छिद्रः पोनः शताद्योबुंदयुगलमसृङ्मांसजं चोक्तरूपम् २२९ वातसे संमूढपिडिका होवे हे और मोटी अवमंथ होवे हे पित्त- कोपसे त्वचापाक और रक्तसे स्पर्शहानि और रक्तपित्तसे पैदा मूगसी उत्तमा होयहे और पद्मकर्णिकासी अनेक पुष्करिका होवेहे और छिद्रयुक्त दोनो मांसरक्तसे पैदा अर्बुद और शतपोनकका रूप कहा है ।। २२९॥ प्राग्वत्स्याद्विद्रधिस्तु प्रभवति तिलकालोस्रपाकस्तिलाभ- शूकातंका इति स्युर्दश नवच निजैर्नामरूपैः सदृक्षाः । पहले कहीसी विद्रधि होइहे रक्तसे त्वक्पाक तिलके समान तिलकालक होयहे याप्रकार शूकरोग उन्नीस निजनामरूपके समान होय है। अथ कुष्ठावलोकः ॥६५॥ तिर्यग्गाः प्राप्य गाडीबहुवृजिनजुषोनुत्रयस्ते प्रदूष्य त्वङ्मांसासृग्लसीकास्त्वचि च विदधते श्वित्रमेतत्तु बाह्यम् ॥
वैद्यचन्द्रोदयः।
तिरछी नाडीनमें प्राप्त होके बहुत दुःखको भोगवेवारे तीनो
दोष त्वचा मांस रक्तको दूषितकर वाहर श्वित्रकुष्ट पैदा करै
है ॥ २३०॥
अंतःकुष्ठं तु चाष्टादशविधमखिलान्प्राप्य धातून्प्रदूष्या-
शेषं देहस्य मध्यं दधति बहुरुजं चेति कुष्ठं द्विधा स्यात् ।
कापालौदुम्बराख्ये तदनु निगदितं मण्डलं ऋष्यजिह
सिध्मं चाथो विपादी किटिभमपि तथा काकणं पुण्डरीकम् ।।
भीतरके कोढ अठारह प्रकारके हैं देहकी सब धातूनको विगा-
डके अंगमें बहुत पीडाको देवे है वो दो प्रकारको कष्ट देवेवारो
साध्यासाध्य भेदसे है कपालक उदुंबरनामक तापीछे कह्यो
मंडलक ऋष्यजिव्ह सिध्म और विपादी किटिभ तथा काकण
पुंडरीक ॥ २३१ ॥
चर्मस्फोटेककुष्ठं त्वलसकमपरं चर्मपूर्व दलाख्यं
दद्रूपामाविचर्ची शतवदनमरुश्चेति नामान्यमीषाम् ।
कण्डूर्दाहः सतोदस्त्वचि च परुषता नावकोठोन्नतित्वं
स्रावस्वेदानवस्थाबहुरुषितपृथुः स्थापितो दीर्घकालम् २३२
चर्मस्फोट एककुष्ठ अलसक तापीछे चर्मदल नामक दाद पामा
विचर्चिका शतारु यह इनके नाम हैं खुजरी दाह पीडा त्वचामें
कठोरता स्राव कोठ वढनो साव पसीना न आनो पीडा बहुत
कुपित चिर समयको स्थित ॥ २३२ ।।
रूढे रोक्षं निमित्ते लघुनि च रुधिरे कृष्णता रोमहर्षो
वारंवारं गुरुत्वं वपुषि च गदितं सर्वकुष्ठाग्ररूपम् ।
वातात्कापालमाहुः शिर इव परुषं श्यावशोषं सतोदं
पित्तादौदुम्बरं स्यादतिदरणरुजं लोहितौदुम्बराभम् ॥२३३।।
रूढता रूखापनके थोरे निमित्तसे पीडारहित रक्तसे पैदा काला-
पन लोमहर्ष वार २ देहमें भारीपन यह सब कुष्टनको पूर्वरूप कह्यो
है, वातसे पीडायुक्त माथेके समान कठोरता कालापन सूजन-
वारो कापालक कह्यो हे पित्तसे लाल गूलरकेसो अतिफट्यो
पीडायुक्त उदुंबर होय है ॥ २३३ ॥
भाषानुवादसमेतः। कंडूलं मंडलं स्यादरुणसितरुचिश्लेष्मतो मंडलाभ रक्तांतश्यावमंतः सकृमि सपिडिकं ऋष्यजिहूं तदाभम् । शोणप्रान्तातथाब्जच्छदमिव सकफात्पित्ततः पुंडरीकं सिध्मं स्यादूर्वदेहे कषणततरजोलाबुपुष्पप्रभं च ॥२३४॥ कफसे मंडलसरीको खुजरीयुक्त लाल सुफेद शोभावारो वो मंड- लक होय हे लाल भीतर कारो कृमि फुन्सीयुक्त मृगकी जिह्वा ता- सरीको ऋष्यजित होय है श्वेतलाल प्रांतवारो तथा कमलपत्र सो कफसे, और पित्तसे पुंडरीक होय है तूंवाके पुष्पसी आभा काली कसोटी तापे स्वर्णरेपासी सिध्म होय है ॥ २३४ ॥ गुंजावद्रक्तमंतः सितमतिरुजदं काकणं सन्निपाताद् ज्ञातव्यं चैककुष्ठं झपशकलरुजस्वेदनं स्थूलवत्तु । चर्माख्यं हस्तिचर्मप्रभमथ किटिभं श्यावरूक्षं किणाभं स्यात्तोदाब्या विपादी करचरणतलस्फोटनं संदधाना २३५ सन्निपातसे सुफेद वा लाल गुंजा सो अति पीडा देवेवारो काकण होय हे और मछरीकी फारसो पीडायुक्त मोटो पसीनारहित एककुष्ठ जाननो और हाथीकी चामसो चर्मदलनामक होयहे और कारो रूखो व्रणसो किटिभ होय है हाथ पाँवके तल फाडे पीडा- युक्त होय सो विपादी होय है ॥ २३५॥ कंडूमद्भिर्बणैः स्यादरुणिमकलितैर्मडलैर्वालसाख्य- मेतानि श्लेष्मवातादथ कफदहनात्तत्र दद्रूः सकण्डूः। संसर्पन्मंडला चाप्यतिलघुपिडिका श्यावशोणा सतोदा ज्ञेयं तच्चर्मपूर्वं दलमिह दलनाचर्मणो भूरिपीडम् ॥२३६॥ घाव खुजरीयुक्त लाल मंडलसो होय सो अलसकनामक है यह कफवातसे और तहाँ कफपित्तसे खुजरीयुक्त दाद होय है चारों ओर अतिछोटी फुन्सीयोंका मंडल कालो लाल पीडायुक्त फेले उसे चर्म फाडवेसे चर्मदल अतिपीडा देवेवारो जाननो ॥२३६॥ पामा सनावदाहा बहुलघुपिडिका भूरिकण्डूश्च पायोः कच्छुः सैवाथ धूम्रारुणपृथुनिलयाः स्फोटकाः सर्वतोऽङ्गे ।
वैद्यचन्द्रोदयः।
श्यावा रक्तैररुग्भिर्बहुभिरतिरुजैः स्याच्छतारुः सदाहै:
श्यावाः सस्रावकडो लघुलघुपिडका वातपित्ताद्विचर्ची २३७
छोटी नावयुक्त बहुत फुन्सी हाथमें दाह खुजरी करे सो पामा
होयहें और एडीमें सोई तीब्रदाहयुक्त फटे काले अरुण बडे स्थान
सब अंगमें फुन्सी होय सो कच्छू होयहे और काले अरुण पीडा-
रहित या बहुत अतिपीडा दाह करे सो शतारु होय है काली स्राव
खुजरीयुक्त फुन्सी छोटी २ वातपित्तसे विचर्चिका होवे है २३७
रूक्षः श्यावारुणत्वादुदयति पवनादुल्वणात्पित्ततस्तु
स्रावो दाहास्ररागाद्यथ कुपितकफात्स्नग्ध्यकंड्दादि कुष्ठे।
द्वित्रिभ्यो द्वित्रिलिंगं त्वचि च निगदिता तत्र वैवर्ण्यसुप्ति-
प्रस्वेदा लोमहर्षोप्यसृजि परुषता शोथकंडूतितोदाः॥२३८॥
रूखो कालो अरुण वातसे पैदा होवेहे और उल्बण पित्तसे रक्त
स्राव दाह राग होयहे और कुपित कफसे चीकनोपन खुजरी आदि
युक्त होयहे कुष्ठ में दो और तीन दोषमें दो और तीनो चिह्नवारौ
होयहे तहाँ रक्तसे त्वचामें कठोरता विवर्णता सुप्तिता अति पसीना
लोमहर्ष रक्तमें कठोरता शोथ खुजरी अति पीडा कही है ॥२३८॥
मांसे स्फोटः कराङ्योरपि च परुषता संधिपीडास्यशोषो
मेदस्थः कोण्यभंगा प्रदरगतिहती पूर्वलिंगानि च स्युः ।
मज्जास्थस्त्वक्षिरागस्वरहननमरुः कीटता घ्राणभंगः
शुक्रे कुष्ठे सति स्त्री शिशुरपि सरुजस्तत्र तत्साध्यमाद्यम् ।।
मांसगतकोढसे हाथ पाँवको फटनो और कठोरता संधिपीडा
मुखशोष होयहे मेदमें प्राप्तसे हाथभंगसो वेग गतिनाश पहलेके
चिह्न होयहें मज्जामें प्राप्तसे आंखमें रोग स्वरस्थानको नाश कीडा
पडनों घ्राणभंग होयहे शुक्रकुष्ठमें होनेसे कन्या और पुत्रकोभी
कुष्ठित करेहै तहां यह आदिको साध्य है ॥ २३९ ॥
कृच्छ्रादन्यत्त्वसाध्यं द्विमलमपि च यत्तत्रयोत्थं च कुष्ठं
कुष्ठे कुष्ठं किलासं ब्रणमुखरुगविनावि च श्वित्रसंज्ञम् ।
मेदोसृग्मांसभेदित्रिभिरपि च मलैस्तत्तु वातेन रूक्षम्
रक्तं पित्तेन ताम्र सकफमतिसितं वीतलोमातिपाण्डुः॥२४०॥
भाषानुवादसमेतः। दो मलवारो कृच्छ्रसाध्यतासो अन्य और त्रिदोषोद्भव कुष्ठ असाध्य है कुष्टमें कुष्ठ किलास है व्रण मुख में पीडा स्रावयुक्त श्वित्रसंज्ञक है. त्रिदोषके विकारसे मेदरक्तमांससे और भेदी होताहे तहाँ वातसे रूखो पित्तसे लाल रक्तसे ताम्र कफसे युत अतिसुफेद लोमरहित अतिपांडु ॥ २४० ॥ श्वित्रं पाण्यंघ्रिगुह्याधरगमनलजं चातिशुक्लं पुराणं नो साध्यं कुष्ठिसंगाद्यपि च परिहरेत्तेन संचारि यत्तत् । हाथ पाँव गुदा अधरमें अग्निज और, अतिशुक्ल पुरानो साध्य नही है और तासों कुष्ठीको संग छोड देनो यह संचारी रोग है। अथोदर्दशीतपित्तोत्कोठावलोकः ॥ ६६ ॥ दुष्टौ शीतात्समीरादरिकफपवनावत्र पित्तेन साकं संभूयांतर्वहिस्तु त्वचि पृथुवरटीदंशतुल्यं दधाते ॥ २४१ ॥ शीतवायुसे कफवातदुष्टपित्तके साथ पैदा होकर भीतर बाहर त्वचाके मोटी चेटीदंशके तुल्य चकत्ता करे है ॥ २४१ ।। शोथं वैद्या उदर्द जगुरमुमधिकश्लेष्मकं शीतपित्तं त्वन्ये वाताधिकत्वात्कफहुतवहतस्त्वेनमुत्कोठसंज्ञम् । कण्डूरुग्दाहवांतिभ्रमहृदलघुतारक्तदृक्तस्य रूपं पित्तश्लेष्मानिलानामिह बहुलतया दाहकण्डूतितोदाः २४२ एसे शोथको वैद्य उदर्द कहेहें जो कोईक अधिक कफसे शीत- पित्त कहेहें और वाताधिक होनेसे उदर्द कहेहे कफपित्तसे भयो उस्की उत्कोठसंज्ञा हे खुजरी पीडा दाह वमन भौंर हृदय भारी लाल दृष्टि उत्कोठको रूप है पित्तकफवातकी अधिकतासे दाह खुजरी अतिपीडा होयहे ॥ २४२ ॥ अथाम्लपित्तावलोकः ॥ ६७ ॥ पित्तं त्वम्लादिदग्धं चिरचितमतिपृथ्वम्लपित्तं तदेत- दोषैरूह्यं यथास्वं पृथगथ सकलं प्रायशश्चिह्नमस्य । तिक्ताम्लोद्गारकण्डूवमनविरसता तांतदाहाविपाका- टोपप्रस्वेदमूर्छातृडरुचिकृशता पीतता वह्निमांद्यम् २४३ वैद्यचन्द्रोदयः । - बहुतदिनको इकठ्ठो पित्त खटाई आदि खानेसे दग्ध अतिभारी उसे अम्लपित्त कहेहें जो दोषनकरके पैदा जेसे वातपित्तकफसे और सन्निपातसे बहुधा याके यह चिह्न हे कडवी खट्टी डकार खुजरी वमन गलेमें घाव विरसता हृदयदाह अपाक अफरा पसीना मूर्छा प्यास अरुचि कृशता पीलापन मंदाग्नि ॥ २४३ ॥ अथ विसावलोकः॥ ६८॥ संदूष्यासृग्लसीकामिषरसनिलयं कुर्वते ते विसर्प क्रुद्धाः सर्वत्र सर्पल्लघुबहुपिडका मंडलं चाष्टधासौ । वातात्तोदादिवातज्वरवदिह परीसर्पसंज्ञोऽथ पित्ता- दन्यादिः स्याद्विसर्पो ज्वलदनलनिभः सज्वरः श्लेष्मजस्तु । रक्त मांस मेदरसके स्थानको दूषित कर जो विसर्प करे है कुपित सवरे देहमें छोटी बहुत फुन्सीनको मंडल करे सो आठ- प्रकारको है वातसें पीडा आदि वातज्वरके समान इहां विसर्प- संज्ञक होय हे और पित्तसे जलन आदि विसर्प जाज्वल्य अग्निसो ज्वरयुक्त कफसे पैदा ॥ २४४ ॥ कण्डूलः स्नग्धमंदज्वरयुगथ मतः सर्वतः सर्वरूपी ग्रंथ्याख्यः श्लेष्मवातात्पवनहुतवहात्कष्ट आग्नेयसंज्ञः। श्लेष्माग्नेः कर्दमाख्यो गदित इह बुधैश्चिह्नमेषां तु मिश्रं तत्तन्नामानुरूपं क्षतज उरुमरुत्पित्तरक्तात्स उक्तः॥२४५॥ खुजरीयुक्त चीकनो मंदज्वरयुक्त त्रिदोषसे सर्वरूपवारो कह्यो हे कफवातसे ग्रंथिकनामा होयहे वातपित्तसे कष्ट देवेवारो आग्नेयसंज्ञक होवेहे कफपित्तसे कर्दमनामक इहां पंडितोंने कह्योहैं इनके पहिले चिन्हसे मिश्र तिन २ नामोंके अनुरूप होय है. वात पित्त रक्तसे जांधमें पैदा घाव कह्यो है ॥ २४५ ॥ अथ मसूर्यावलोकः ॥ ६९॥ साम्रा दोषा मसूरोपमबहुपिडिकास्तन्वते ता मसूर्यः कंडूपाप्मांगभंगभ्रमदृगरुणता शोफवैगंध्यमोहाः।
भाषानुवादसमेतः । इत्याचं रूपमासां रुधिरमलभवं लक्षणं तु व्रणोक्तं वक्ष्ये तासां तु धातुस्थितिविकृतभवं लक्षणं सप्तधा स्यात् ॥ रक्तयुक्त दोष मसूरसी बहुत फुन्सीको विस्तार करे वो मसूरि- कारोग हैं. खुजरी ज्वर अंगभंग भौंर लाल नेत्र सूजन गंधनाश मोह यह याको पूर्वरूप है. रक्तमलसे पैदा यह व्रणमें कहे लक्षण हे इनके लक्षण कहे है. धातुस्थिति विकृतसे पैदा चिन्ह सात प्रकारके होय हें ॥ २४६ ॥ चर्मोत्था बुद्धदाभा अथ रुधिरगतास्तास्तु गुंजासदृक्षा मांसस्था भूरिकंडूज्वरगरिमरुजः स्निग्धवर्णा दृढाश्च । मेदोजा मंडलाभा मृदव उरुरुजश्चास्थिजाः सास्थिशूला मर्मभ्यश्चर्मतुल्याः किमपि समुदितामजजास्त्वंगतुल्याः २४७ त्वचासे पैदा वुद्भुदासी और रक्तमें प्राप्त दोषसे गुंजाके समान होयहे मांसमें स्थित अति खुजरी ज्वर भारी पीडा चीकनो रंग और कठोर होयहे मेदसे पैदा मंडलसी नरम जाँघोंमें पीडा होयहे और अस्थिसे पैदामें हाडोंमें दर्दयुक्त मर्मनी त्वचाके समान कहीहै यासे परे सो मज्जासे पैदा अंगके समान होयहे ॥ २४७ ।। शुक्रस्थाः शुक्रतुल्याऽप्यतिलघव उरून्मादमोहांगभंगा द्वे साध्यौ द्वे च कृच्छ्रे क्रमश इह मते नैव साध्यास्तदन्या । रक्तं वाक्षिनस्तो रतिरतिकसनं घुर्पुरत्वं च कण्ठे निःश्वासोतीव मोहः प्रभवति मरणायेति चिहं मसूर्याम् ॥ वीर्यस्थित वीर्यसी अति छोटी और जाँघ उन्माद मोह अंग- भंग करेहे दो साध्य और दो कृच्छ्रसाध्य क्रमसे इहां कहीं और अन्य साध्य नहीं है मुख नेत्र नाकसे पीडायुक्त रक्त वहे और कंठमें घुघुरता अतिकास निःश्वास अतिमोह होवे तौ मसूरीमें मरणके चिन्ह होय हैं ॥ २४८ ॥ अथ क्षुद्ररोगावलोकः ॥ ७० ॥ सर्वैर्दोषैः सपीडा प्रभवति पिडिका जांबवाभेरिवेल्ली- श्रुत्यंतः श्लेष्मवाताद्भवति पनसिका कच्छपी कूर्मवत्सा ।
वैद्यचन्द्रोदयः। ८३ वृत्ता स्यात्यारिमंडल्यतिरुगनलतोऽथो यवाख्या यवाभा स्यात्पक्कोदुम्बराभानिलकफजनिरंधालजी वक्रहीना ॥२४९॥ सब दोषकरके पीडायुक्त फुन्सी जामुनसी इरिवेल्लिका होयहे कानके भीतर कफवातसे होय सो पनसिका हे और कच्छुआसी कच्छपी जो गोल मंडलसी अतिपीडायुक्त जोसी पित्तसे यवाख्या होय हे पके गूलरसी वातकफसे पैदा मुखहीन अंधी अलजी होयहे ॥ २४९ ।। शोफश्चक्रीव दण्डप्रतिनिधिरुदिता गर्दभी स्थैर्यरुग्युग् जालाद्या सैव सर्पत्यथ कठिनतरा सैव पाषाणपूर्वा । पद्मांतःकर्णिकामा सरुगनलकफादिन्द्रवृद्धा गुरुः सा वल्मीकाभस्तु वल्मीक इह निगदितोऽनैकवक्रो व्रणो यः२५० सूजन गोल दण्डासी स्थिर पीडायुक्त गर्दभी कहीहे जाल आदिसे फेलनेवारी अतिकठिन सो पाषाणगर्दभिका है कम- लके भीतरकी केशरसी पीडायुक्त पित्तकफसे पैदा भारी इंद्रवृद्धा हे विलेसो अनेक मुखवारो जो व्रण है सो वल्मीक इहां कह्यो है ॥ २५० ॥ कक्षाख्या साधिकक्षं हुतभुज उदिताथ त्रिदोषाग्निदग्ध- स्फोटाभा वह्निरोहिण्यसुखकृदसुहृत्तत्प्रदेतीति दाहा । चिप्पं तु स्यान्नखाधः पलजमरुरथो वंक्षणे स्याद्विदारी सर्वैर्दोषैः सरक्तैरथ सकफमरुन्मेदसो ग्रन्थिरुक्तः ॥ २५१॥ पित्तकोपसे पैदा वगलकेपासमें कक्षा (कखराई) नामक होयहे और त्रिदोपसे अग्निदग्ध फटीसी दुःख करवेवारी अतिदाह देवेवारी प्राणनाशकारी अग्निरोहिणी होय है नखके नीचेके मांसमें प्राप्त होके पाकहोवे वो चिप्प होय है सो वातज है, बगलमें स्थित विदारीकंदसी विदारी सब दोषयुक्त रक्तमेद कफवातसे युक्त प्रन्थि कही है। अग्निरोहिणीको प्लेग कहे हे ॥ २५१ ॥ संधौ पादांगुलीनां मलसमयकृतात्कर्दमादिन्द्रलुप्त पित्तात्केशप्रणाशि कचिदथ पवनामृकफारुषिका स्यात् ।
भाषानुवादसमेतः। देहोष्मा पित्तयुक्तो जनयति पलितं वक्रदूष्यस्तु यूनां वक्त्रेषु श्लेष्मवातादपरिपचतयः पद्मिनीकंटकास्ताः॥२५२॥ जो पादकी अंगुलीनमें होयहे त्रिदोषसे शिरमें कीचसी जम जाय वो इंद्र लुप्तहे पित्तसे केशनाश होयहे और कभी कफवात रक्तसे अरुषिका होतीहे देह की गरमीसे पित्तयुक्त मनुष्यके माथेमें प्राप्त होके वाल श्वेत होते हैं जवानीमें मुखको बिगाडनेसे ज्वानीकी फुसी होती हैं और वातकफसे कांटेयुक्त मुखपाक होवे सो कमलनीसरीको पद्मिनीकंटक हे ।। २५२ ।। न्यच्छं स्याच्चित्रवर्ण त्वचि च तदपरं व्यंगमीषत्पिशंगं श्यामौ नीलीतिलाख्यौ मषक इह तथा स्यात्कुरंडाभिघर्षात्। लाक्षाभो मांसकीलो जतुमणिरुदितोऽथ ध्वजेधः प्रदिष्टा वर्तिः पर्यादिरक्तं कदरमपि हते पित्तलैः शर्करायैः ॥२५३॥ खालके ऊपर काला या सुफेत दाग होय सोन्यच्छ हे ताके पीछे त्वचापर मंडलाकार काला डाग होय सो व्यंग हे एसाही काला दाग नीलिकाऔर तिलनामक एसाही काला मषक होता हैं अति घिसजानेसे कुरंड रोग होता हे लाखके समान लाल मांसकीलक होता हे इसको लहसनभी कहते हे और लिंगको बहुत भीडनेसे लिंग ढकनेकी चर्म सूजजाय या लटक जाय सो परिवर्तिका है कंकड कांटे आदिके लगनेसे रक्तपित्तसे नष्ट होकर जो हाथ पांवमें ठेक पड जाय सो कदर है ॥ २५३ ॥ चर्माभं चर्म मेढ़े दृढनिधुवनतो वेगरोधान्निरुद्धा- द्यत्तज्ज्ञेयं गुदाख्यं यथ गदितमहेः पूतना बालकानाम् । पायौ कंडूतिरागश्रुतिकृदथ भवेत्कार्यभाजो गुदाद्यो भ्रंशो वाराहदंष्ट्रस्त्वनिलहुतवहाद्भूरिकण्डूव्रणोङ्गे ॥२५४॥ अतिमैथुनसे लिंगमें चर्ममणिको ढाक देवे मूत्रवेग रोकवेसे उसे निरुद्ध प्रकाश जाननो तथा गुदाके रुकवेसे बालकोंके अहिपूतना रोग कह्यो है दुर्बलको गुदाआदिमें अति खुजरी रोग करे वो वैद्यचन्द्रोदयः। गुंभ्रंश हे बहुत खुजरीवारे अंगमें व्रण हों जिस्को वातपित्तसे सो वाराहदंष्ट्र होवे है ॥ २५४ ॥ अथ मुखरोगावलोकः ॥ ७१ ॥ क्षारैरम्लैश्च मापैर्दधिघृतमधुरैः पिष्टभेदैः सशाके स्तैलैर्वातार्कपुष्पैरपि कफबहुलैरास्यरोगा भवन्ति । जिह्वायामामयाः स्युः षडिह तनुभृतामोष्ठयो रुद्रसंख्या दंतावल्यां दशैव त्र्यधिकदश तथा दंतमूलोद्भवाश्च ॥२५५॥ खारो खट्टो और उर्द दही घृत मीठो पीठीके भेद शाकयुक्त तेल वेंगनके पुष्पकरके और कफ वढवेसे मुखरोग होवे हैं इहां देह- धारी नरके जिह्वाके रोग छे होवे हैं और होठके ग्यारह एसेही दंतावलीके दश तथा दंतमूलमें पैदा तेरह होवे हैं ॥ २५५ ॥ वक्रे त्वष्टावथाष्टादश गलकुहरे तालुमध्ये नवेत्थं प्रोक्ता सद्भिर्मिषग्भिः सकलमुखगदाः सप्ततिः पंच चोग्राः। श्यामा वातेन शाकच्छदरुचिररुचिश्चाथ पित्तात्सदाहा- शोणात्विट्वंटकाढ्याप्यथ कफजनितामंदमासातिगुर्वी २५६ मुखमें आठ और गलकुहरमें अठारह तालुमध्यमें नौ या प्रकार सज्जन वैद्यकरके सकल उप मुखरोग पिचत्तर कहे हैं वातसे काली शाकपत्रसी अरूचि दाता और पित्तसे दाहयुक्त रक्तसे विष्ठा कंटकयुक्त और कफयुक्त मंद अति भारी (जिह्वा) ॥ २५६ ॥ जिह्वाधः शोथयुक्तः कफरुधिरकृतोथाग्रणेथादिजिह्वा- कण्डूतिश्चोपतापो मुनिभिरिह मता लंबमानोपजिह्वाः। खंडैः खंडोष्ठमाहुर्बहुभिरथ रसाद्यवृंदं बुद्धदाभं सामान्यं पूर्ववच्चावुदमथ पललग्रंथिमांसार्बुदं स्यात् ॥२५७॥ जिव्हाके नीचे कफरक्तसे पैदा जो शूजन है । वाके उपरांत जीभमें खुजरी चोपताप यह रोग मुनियोंने कहेहै और जीभ मोटी हो लटके और होठ फटें सो खंडोष्ठ कह्यौ हे और रससे १. गुदभ्रंशवत् योनिभ्रंश होता है। वै.चं.८ ८६ भाषानुवादसमेतः। बुद्बुदाकार होठ हो सो अर्बुद हे ये अर्बुद पूर्ववत् सामान्य है और रक्तकी जो गाँठ बँध जाय सो मांसार्बुद होय है ॥ २५७ ।। अन्यन्मेदोर्बुदं तद् वृतवदथ पृथक्तैः समस्तैश्च रक्ता- दाघाताच्छीघमित्थं स्युरधरविषया आमया रुद्रसंख्याः। दंतेवादीर्यमाणेष्विव बहुलरुजो दालनः स्यात्समीरात् कृष्णच्छिद्रोऽतिपीडः पवनरुडुदितो दंतकः स्यात्कृमेश्च२५८ और जो मेदकी गोल गाँठसी बधे सो मेदोर्बुद होयहे ये दोष सब न्यारे २ होके इन सबसे और रक्तसें चोटसे शीघ्र याप्रकार होयहे नीचेके होठके ग्यारह रोग होवे हैं दंत मानो फटते हों से बहुत पीडा देवेवारो वातसे दालन होय है और दांतमें कालो छेद होजाय अतिपीडा होय सो वातसे पैदा और कृमिसें कृमिदं- तक रोग होवें हें ॥ २५८ ॥ शीतादिस्पर्शभावं यदि नहि सहते दंतपंक्तिः सपित्ता- द्वातात्स्याईतहर्षोऽप्यथ विकटतया मारुतात्स्यात्करालः । श्लेष्मप्राणप्रशुष्को यदि भवति मलः शर्करा शर्कराव- दीर्णेपूच्चैः कपालेष्विह सकलमला सैव कापालिका स्यात् ।। शीत आदि पदार्थको दाँतसे स्पर्श नही सह्यो जाय सो पित्तसे पैदा दंतपंक्ति रोग है वातसे दंतहर्प होय है और वातसेही विकट अति एसो कराल रोग होय है कफ प्राणवायुसे जो सूखजाय और शर्कराके समान विखरे सो दंतशर्करा होय है जो कपालमें जोरसें फटवेकीसी पीडा हो तो यह त्रिदोषसे पैदा भयो कापालिक होय है ॥ २५९ ॥ पित्तात्राभ्यां विदग्धः कपिशरुचिरिति श्यावदंतः प्रदिष्टो वक्रो वक्रश्च भंगः कफपवनकृतश्चेद्रदां भंजको यः। वातात्स्यादुन्नतो यत्पृथुरुगथ हनुस्तंभ इत्युग्रपीडो जन्वादेः स्थानमोक्षाद्भवति किल हनोर्मोक्ष एषोऽनिलेन२६० पित्तरक्तसे दग्ध दाँत काले होजाय वो श्यावदंत कह्यो है और दाँत टेडे हो जाय सो दंतवक है कफवातसे पैदा जो दाँतको वैद्यचन्द्रोदयः । ८७ काट डारे ये दंतमंजक है वातसे ऊंचे दाँत हो जाय सो दंतोन्नत होय है सो अति पीडाकारक है आगे वातसेंही अति पीडाकारक हनुस्तंभ होय है जीवआदिके स्थान हटवेतेंही डाढी लटक परे हे याको हनुमोक्ष होय हे येभी वातसे होय है ॥ २६० ॥ शीतादो नाम रोगः प्रवहति यदि चेदंतवेष्टादकस्मा- द्रक्तं दुर्गधिमांसं स्फुटति च बहुधा श्लेष्मरक्तोद्भवोयम् । शोथः स्याहंतमूलेष्विह यदि स भवेत्युप्पुटः श्लेष्मरक्तात् स्याद्रक्ताहंतवेष्टः सवति च रुधिरं चेदमुष्णं सपूयम् ॥२६१॥ जो अकस्मात् मसूढोमेंसे दुर्गधियुक्त रक्त वहे सो शीताद नामक रोग है कफरक्तसे पैदा ये बहुधा मांसको फाडवेवारो दाँतकी जड (मसूढों) में शोथ होवे यह कफरक्तसे पैदा दंतपुप्पुट है जो मसूढोंमेंसे रक्त गरम पीव वहै सो रक्तसे पैदा दंतवेष्ट है ॥ २६१॥ लालास्रावी च शोथः कथित इह बुधैः सौषिरः श्लेष्मरक्ता- च्छैथिल्यं दंतपंक्तिः प्रभवति च महासौषिरस्तालुभेदी । मर्त्यः ष्ठीवत्यकस्मात्प्रवहति रुधिरं शीर्यते चापि मांसं दंतानां मूलदेशे यदि स परिदरः श्लेष्मपित्तास्रजातः २६२ जो शोथमें लार वहे कफरक्तसे पैदा इहां पण्डितोंने सौषिर कहाहै और दंतपंक्ति ढीली हो जाय तौ तालुभेदन करवेवारो महासौषिर होय हे मनुष्यके थूकवेमें अकस्मात् रक्त वहे मांस गलजाय दाँतोंकी जडकी जगह कफपित्तरक्तसे जो पैदा हो सो परिदर होय है ॥ २६२ ॥ पित्तासृक्संभवः स्यादपकुश इह तद्दाहचांचल्यपाकै- रस्रस्रावैश्च विज्ञेय इह गुरुरुजः पूतिगंधेन युक्तः । वैदर्भोल्पाद्विधातादपि वहति रजः पाकशोथातिपीडा दंतोद्भूतात्सलालाद्रुधिरकफभवो विद्रधिः शोथयुक्तः २६३ दाह चंचलता पाक रक्तस्राव इन चिह्नकरके जान्यो जाय एसो दुर्गंधियुक्त बहुत पीडा देवेवारो पित्तरक्तसे पैदा अपकुश होय है ८८ भाषानुवादसमेतः । थोडीसी चोटसेभी मसूढोंमेंसे रक्त वहे पाकशोथ अति होवे वो वैदर्भ हे दाँतमेंसे पैदा लार वहाय वेसे जान्यो जाय एसो रक्त- कफसें पैदा शोथयुक्त विद्रधि होय है ॥ २६३ ॥ वातापित्तात्कफाच त्रय इति गदिताः केवलादामया वै तत्तद्रूपा भवंति श्वयथुयुज अतिक्षोभदा दंतमूले । पाकाः स्युः पंच पित्तानिलकफरुधिरात्सन्निपाताच्च वृद्धात् पूत्यास्यत्वेऽर्बुदे चोर्ध्वगद इतिविधः शोषमास्यांतरे चेत्२६४ केवल वातसे पित्तसे कफसे तीन रोग इहां कहे ये अपने २ दोषानुरूप शोथयुक्त दंतमूलमें अतिक्षोभ देवेवारे होय हे वढे भये पित्त वात कफ रक्त सन्निपातसे ये पाँचोंसे पाँच पाक होवे है ये मुखमें दुर्गधि जब आवे तब मुखके भीतर अर्बुदमें शोष हो सो ऊर्ध्वगद कहा है ॥ २६४ ॥ दोषाः संदूष्य मांसं रुधिरमपि खरानंकुरान्कंठरोध कुर्वाणास्ते विकारं पृथगथ मिलिताः पंच रोहिण्य उक्ताः। हंत्येषा सप्तरात्रात्प्रकुपितपवनात्पंचरात्रात्तु पित्तात् प्राधान्याच्छेष्मरक्तात्रिभिरपि दिवसैः सद्य एव त्रिदोषात्॥ दोष हे सो मांसरक्तको दूषित करके बडे कठोर अंकुर पैदा करे कंठको रोके हे ये विकार वात पित्त कफ रक्त और सन्निपा- तसे पैदा पांच रोहिणी कही हे वातकोपसे हो तो सात दिनमें मारडारे पित्तसे पाँच रातमें रक्तसे तीन दिनमें कफकी अधिक- तासे तीनही दिनमें त्रिदोषसे शीघ्रही सो प्राणनाशक है ॥२६५।। शोथः कोलास्थिमात्रः कफजनिरुदितः कंठशालूकनामा जिह्वाग्रो योधिजिह्वोप्यथ वलयमिह श्लेष्मजं मंडलाभम् । श्वासघ्नं श्लेष्मवातप्रभवमभिवदंत्यल्पशोथं बलासं वृंदः स्यादल्पदाहो ज्वरकृदतिरुजः पित्तरक्तानिलेभ्यः २६६ वेरकी गुठलीके समान शोथ कफसे होय सो कंठशालूक नामा हे जीभके आगेके भागमें अधिजिव्ह और कफसे पैदा मंडलाकार वलयमी यहाँ कह्यो है कफवातसे पैदा जो अतिअल्प शोथ होके वैधचन्द्रोदयः। श्वासको नाश करे सो बलास है पित्तरक्तवातसे पैदा अल्प दाह ज्वरकर्ता अतिपीडायुक्त वृंदरोग होय है ॥ २६६ ॥ दोषैः सर्वैः शतघ्नीतनुसदृशतनुर्जीवितघ्नी शतघ्नी व्याधिः स्यादेकवृन्दः कफरुधिरभवो वृत्त उच्चैः सदाहः । श्लेष्मासृग्भूर्गलायुर्वदरफलनिभो विद्रधिस्तु त्रिदोषात् कंपः कंडूश्च रक्तचुतिरधिकरुजः शोथ उच्चैर्भवेच्चेत् ॥२६॥ सर्व दोषसे तो पके अंगके समान अंगवारी शतघ्नी प्राणना- शिनी होय है कफरक्तसे पैदा कंठमें सब ठोर शोथ अतिदाहयुक्त ऊँची व्याधि होय सो एकवृंद है कफरक्तसे पैदा वेरफलके समान गलायु होय हे त्रिदोषसे पैदा कंप खुजरी और रक्तस्राव अति पीडावारी ऊंची शोथ हो तो गलविद्रधि है ॥ २६७ ।। शोथो वाताध्वहंता सरुधिरकफजः स्याद्गलौघो ज्वरादि- शुष्कश्वासः स्वरघ्नो विसदृशनिनदः श्लेष्मवातप्रभूतः । शोथो मांसप्रतानैर्ग्रथित इव भवेत्सर्वजः सोवलम्बी पित्तोत्थो मांसखण्डी करणपटुरयं पार्श्वतः स्याद्विदारी २६८ रक्तकफसे पैदा ज्वर आदियुक्त कंठमार्ग रुके सो शोथ गलौघ होय है कफवातसे पैदा एसो जो स्वरनाशके समान सूखी श्वास- कर्ता मांससमूहसे गाँठसी शोथ त्रिदोषसे हो सो अवलंबी होय है और ये मांसको टूक २ करवेमें चतुर कंठके वगलमें पित्तसे पैदा विदारी होय है ।। २६८ ।। संधौ स्यात्तालुशुण्डी कफरुधिरभवो गर्दभाण्डाभशोधः शोथस्तस्मात्पटोलाकृतिरिह गदिता तुण्डिकेरी सतोदा । रक्तात्स्यादध्रुषाख्यः स बदरवदथ श्लेष्मतः कच्छपः स्यात् कूर्माम्भोथार्बुद प्रागिव रुधिररुषः पद्मसत्कर्णिकाभम् २६९ गधाकी आँडसी शोथ रक्तसे पैदा संधिमें होनेवारी तालुशुण्डी होय है पटोलसी आकृतिवारी पीली शोथ पीडायुक्त होय सो ये तुण्डिकेरी कही हे रक्तसे वेरसी (गाँठ) हो सो अध्रुष नामा ९० भाषानुवादसमेतः। होय हे और कफसें कछुआसी शोथ होय सो कच्छपी होय हे रक्तरोषसे पैदा कमलकर्णिकासी शोथ सो अर्बुद होय हे ॥२६९॥ दुष्टं मांसं किमप्युन्नतमिह गदितो मांसघातः कफान्यो नीरुग्यः श्लेष्ममेदोजनितबदरवत्पुप्पुटस्तालुदेशे । उक्तो वाताद्विदारी सरुगथ गदितस्तालुपाकस्तु पित्ता- दुक्ता रोगा नवैते निजजननमलभ्राजितास्तालुदेशे २७० दुष्ट मांस कछु ऊंचो हो जाय सो कफसे पैदा मांसघात कह्यो है, तालुदेशमें वेरसी शोथ हो वह पीडारहित कफमेदसे पैदा पुप्पुट कहा है वातसे पीडायुक्त विदारी कही है, पित्तसे तालुपाक कहाहै याप्रकार तालुदेशमें होनेवारे रोग अपने २ पैदा करवेवारे दोषके मलकरके प्रकाशित हैं ॥ २७० ।। अथ कर्णरोगावलोकः ॥ ७२ ।। स्याद्वातात्कर्णनादः कफपवनकृतं चापि बाधिर्यमाहुः कर्णक्ष्वेडस्तु वेणुस्वन इव च तथाऽथाव॒दं तूक्तरूपम् । कर्णस्रावोऽम्बुघातादिभिरनिलकृतो वातजं कर्णशूलं श्लेष्मा पित्तोष्मदग्धः प्रभवति यदि चेत्कर्णगूथस्तदा स्यात् ॥ वातसे कर्णनाद होवे है और कफवातसेही वहापन कह्यो है कानमें वाँसुरीसी वजे वो कर्णक्ष्वेड कही है एसेही अर्बुदके रूप कहे है कानमें जल गिरवे आदि और वातसे भयो कर्णस्राव कह्यो है और वातसेही पैदा कर्णशूल है, पित्तकी गरमीसे कफ जल- जाय तासो कर्णगूथ होवे है ॥ २७१ ।। पीडाकृद्थ एव स्रवति च शिररुक्स्यात्प्रतीनाहनामा कंडूः श्लेष्मानिलोत्था कृमय इह यदा स्युः कृमेः कर्णकः सः कर्णास्तु त्रिदोषाच्छयथुरिह कफाद्विद्रधिः पक्षघातात् पाकः पित्ताच्च पूतितिरनिलकृता कीटतः कीटकर्णः २७२ एसेही गूथ पके वहे शिरमें पीडा करे तो प्रतीनाहनामा होय है कफवातसे पैदा खुजरी हो तथा कानमें कीडा पडजाय तो यह
; वैद्यचन्द्रोदयः।
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कृमिकर्णक होय है, त्रिदोषसे कर्णाश होता हे कफसे शोथ होता
हे पक्षघातसे विद्रधि होता हे पित्तसे पाक होता हे वातसे भयी
पूतिस्रुति होती हे कीट घुसवेसे कीटकर्ण होताहे है ॥ २७२ ।।
अथ नासारोगावलोकः ॥७३॥
दोषैभिन्नैरभिन्नैरपि च रुधिरतः स्यात्प्रतिश्यायसंज्ञ-
स्तत्रामे तत्तदंका शिरसि च गुरुता सज्वरारुण्यमक्ष्णोः ।
नासानावश्च भोज्येऽरुचिरथ लघुता सर्वशस्तत्र पके
तन्मूलं स्रावसंज्ञं व्रणमगुरुमलस्त्रावयुक्तं सरुक ॥ २७३ ॥
अलग २ वातपित्तकफसे औरभी त्रिदोषसे रक्तसे प्रतिश्याय-
संज्ञक रोग होय है तहाँ इन पाँचोंके न्यारे लक्षण कहते हैं वातसे
शिरमें भारीपन पित्तसे ज्वर रक्तसे लाल आँख कफसे नासानाव
भोजनमें अरुचि और सन्निपातसे लघुता ये सब कच्चेके लक्षण
हैं, ताकी जड नासाव्रण होके हलका मलस्राव पीडायुक्त हो वो
नासास्त्रावसंज्ञक है ॥ २७३ ॥
पूर्व शीर्षे चितो यः कफ इह लवणो अश्यते नासिकायां
सान्द्रो दग्धार्कतापैः स तु मुनिगदितो भ्रंशथुःश्लेष्मपित्तात्।
नासायां पूतिगंधिर्विषयविरहिता या बलासास्रवातैः
क्लिन्नायां पीनसः स्यात्स च चिरमुषितो दुष्टपूर्वप्रदिष्टः २७४
पहले माथेमें इकट्ठो कफसे लवण सो खारी (पानी) नाकसे
गिरे सूर्यतापसे जल्यो कफपित्तसे पैदा गाढो मुनियोंने भ्रंशथु
कह्यो है, और कफरक्तवातसे पैदा दुर्गधि गंधज्ञानरहित नासामें
खेददाता पहलेके सब लक्षणयुक्त बहुत दिन रहवे ते दुष्ट प्रतिश्याय
होवेहै ॥ २७४ ॥
पित्ताच्छेष्माभिदग्धो मरुदिह वदनान्नासिकायाश्च विस्रो
निर्गच्छेत्पूतिनस्यं तदमुमुपदिशेदर्बुदं तूतरूपम् ।
नासामर्मस्थितो यो बहिरभिसरति श्लेष्मयुक्तः समीरो
वारंवारं सशब्दं क्षवथुरिति भवेदर्श उक्तं पुरावत् ॥२७५॥
९२. भाषानुवादसमेतः। पित्तरक्त गरमीसे दुग्धवात सो मुखनाकमेंते कफ निकले सो पूतिनस्य कह्यो है, और अर्बुदको पहले कह्यो हे सोही रूप जाननो, कफयुक्त वात है सो नाकके मर्मस्थानमें स्थित हो बाहर निकले और वार २ शब्द हो छीक आवे तो यह पूर्ववत् अर्श जाननो ॥ २७५ ॥ नासानाहस्तु वातैः सकफ इह यदोच्छ्रासमार्ग निरुंध्या- नासाशोषस्तु कृच्छ्राच्छ्सति यदि नरः शुष्कनासः समीरात् । सातापित्तानसश्चेत्स्रवति च रुधिरं दाहयुक् पूयरक्तं नासा दीवेव पित्ताद्यदि रुधिरयुताद्भूमभावेतिदीप्तिः २७६ वातकफसे युक्त जब श्वासमार्गको रोकदे तौ नासानाह जाननो वायुसे नाक सूके और वो नर कठिनतासे श्वास लेवे सो नासा- शोष है रक्तपित्तसे नाकमें पाक होके दाहयुक्त रक्त पीव वहे सो पूयरक्त है, जो रक्तयुक्त पित्तसे नाक जलीसी मालूम हो और नाकसे धूआँसो वायु निकले तो नासादीप्ति है ॥ २७६ ॥ नासाया एकभागे व्रण इह पुटको नामतस्तीव्रतापो नासापाकस्तु पित्तादिति नसि तु वसुक्षोणिसंख्या गदाः स्युः । नाकके एक भागमें जो व्रण हो अतिपीडावारो सो नासापुटक नामक है, पित्तसे नासापाक होता हे ये नासाके अठारह रोग होय हैं॥ अथ नेत्ररोगावलोकः ॥ ७४ ॥ धूलीधूमाम्बुलीलादधिशफरसुराशाकशोकारनाल- स्वेदात्स्वमाव्यवायाम्लहतिवमिकटुस्नेहतीक्ष्णोष्णमाषैः २७७ धूल छुआँ जलक्रीडा मछरी मदिरा शाक शोक आरनाल पसीना सोनो मैथुन खटाई चोट वमन चिरपिरो चीकनो तीक्ष्ण गरम उर्द ॥ २७७॥ विण्मूत्राश्रुअरोधैश्चिरमतिलघुनो वस्तुनो दर्शनेन यक्षादेः प्रेक्षणैश्च स्युरिह नयनयोः सप्ततिः षट् च रोगाः ।
वैद्यचन्द्रोदयः। सर्वमिंल्लोचने स्युस्तुरगशशिमिता व्याधयः कृष्णभागे चत्वारश्चाथ दृष्टौ खरकिरणमितास्तद्वदागंतुजौ द्वौ ॥२७८॥ मल मूत्र आँसू रोकवेसे बहुत देरतक छोटी चीज देखवेसे भयानक देखवेसे नेत्रमें छिहत्तर रोग होवेहैं तामें सर्वनेत्रमें चौदह रोग और काले भागमें चार और दृष्टिमें पंद्रह ताके समान दो आगंतुज होयहें ।। २७८ ॥ शुक्ले त्वेकादशैते नव पुनरुदिताः संधिजा वर्त्मजास्तु ग्लौदोःसंख्याः समस्ता इति नयनगदाः सप्ततिः षट्च नृणाम्। सुस्तोदस्तंभरौक्ष्यस्रुतिभिरनिलजो दाहपाकोष्णबाष्पैः पित्तोत्थः शौक्ल्यशोथप्रचुरजलभरस्वैग्ध्यजाड्यैः कफोत्थः॥ शुक्लभागमें ग्यारह संधिमें पैदा होनेवाले नौ वर्ममें इक्कीस ये सब संख्या मिलके मनुष्यके नेत्रमें छिहत्तर रोग होवेहें वातसे पैदा अति पीडा स्तंभ रूखापन स्राव करे पित्तसे पैदा दाह पाक गरम धूआँयुक्त कफसे पैदा सुफेदाई शोथ जलभरे चिकनापन जडता इनसे युक्त होय है ॥ २७९ ।। ताम्रप्रांतारुणाश्रु तिबहुलरुजातोदपाकैरसृग्जो नेत्राभिष्यंद उक्तस्त्विति चिरसमयादेष एवाधिमन्थः । श्लेष्मोत्थश्चाधिमन्थः क्षपयति नयनं सप्तरात्रादथासक् प्रादुर्भूतः शराहात्तदनु पवनजो वासरैर्वह्निसंख्यैः ॥२८॥ नेत्रप्रांत लाल लाल आँसू बहें बहुत पीडा तोद पाक रक्तसे पैदा नेत्राभिष्यंदमें होय है और ये बहुत दिनतक ठेरे तौ अधि- मंथ होय है कफसे पैदा अधिमंथ सातदिनमें आँखको नाश करै और रक्तसे पैदा पाँच दिनमें वातसे पैदा तीन दिनमें ॥ २८० ।। पित्तोत्थः सद्य एव प्रणिगदितमिदं रूपमेषां चतुणों नेत्रं प्रायः समूलं पतदिव रुजया निःक्रियं सार्धमूर्ध्वम् । नेत्रे वाताधिमंथो व्यथयति नितरां चेदुपेक्षापराणां प्रोक्तोऽसाध्यस्तदानी मुनिगणकथितोऽसौ हताद्योऽधिमन्धः भाषानुवादसमेतः। पित्तसे पैदा शीघ्र दृष्टिनाश करेहे ये इन चारोंके रूप कहे ऐसी पीडा हो मानो नेत्र जडसे गिर परेंगे आधो, माथो बहुत दूखे वे काम होजाय यह नेत्रमें वाताधिमंथ जो है सो भूलराख- वेते अतिदुख देवे असाध्य होवे है सो मुनियोंने हताधिमंथ कह्यो है ॥ २८१ ॥ वारंवारं ध्रुवौ चेन्नयनयुगलकं चाथ पर्येति वातः पीडा शोथो रुणश्च स्रवति निगदितः पर्ययो वातपूर्वः । नेत्रं स्यादाविलं चेदरुणममृदुलं दाहि रूक्षं च वा- तस्तत्प्रोन्मीलने रुङ्-मुनिभिरभिहितश्चेति शुष्काक्षिपाकः ८२ वार वार भ्रकुटी वा नेत्रोंमें वायु पीडा करै शोथ अरुणता और स्राव होय तौ वातपर्यय है नेत्रसे देख्यो नही जाय लाल रंग होजाय कठोर दाह रूखापन पलकके भीतर दुःख उघारवेमें पीडा याको मुनिलोगोंने शुष्काक्षिपाक कह्यो है ॥ २८२ ॥ मन्यास्थो वाऽवटुस्थोऽप्यथ शिरसि गतः कर्णगो वा हनुस्थो वातः संपीडयेद्यद् ध्रुवमथ नयने सोऽन्यतोवात उक्तः। नेत्रं स्यादम्लभक्ष्यादि कपिशतमं प्रांततः शोणशोणं सस्रावं दाहि शोथान्वितमपि च तदाम्लोषिताख्यो गदः स्यात् मन्यामें माथेमें और ग्रीवाकी संधीनमें कानमें डाढीमें भृकुटीमें नेत्रमें वात पीडा देवे सो अन्यवात कह्यो है, खटाई खानेसे काले पीले नेत्र हों आसपास लाललाल स्राव दाह शोथयुक्त जो हो तो अम्लोषित नामक रोग होय हे ॥ २८३ ॥ नेत्रे शोथः सशूलः पृथुरुगरुणता नावयुक्तः सतोदो दोषस्यामस्य लिंग ह्यथ भवति पुनर्लब्धदस्तत्र पक्के । कण्डूलः सोपनाहः श्वयथुरुगरुणो लोहितोदुम्बराभः सस्रावो नेत्रपाकः श्वयथुविरहितैस्तैस्त्वशूलोऽक्षिपाकः २८४ नेत्रमें शोथ शूलयुक्त बहुत पीडा लाल साव तोदयुक्त ये तो अपक्कके चिन्ह हैं और पकजाँय तब लाभदाता खुजरी शोथ पीडा ललाई लाल गूलरके समान उपनाह रोग है स्रावयुक्त नेत्रपाक शोथरहित पीडायुक्त अक्षिपाक है ।। २८४ ।।
वैद्यचन्द्रोदयः। ९५ राज्यक्ष्णोर्यस्य ताम्रा मुहुरपि धवला स्युःशिरोत्पात एषो व्याधिनीरुक् सरुग्वा स तु चिरसमयः स्यात्प्रहर्षः शिरायः। सूच्यग्रेणेव विद्धं व्रणमरुणतमं तीव्रपीडं कदुष्ण- सावं नेत्रासितेंतर्गतरुगिव बुधाः शुक्रमाहुर्बणाद्यम् ॥२८५॥ जाके नेत्र कभी लाल कभी सुफेद कांतिवारे होय तो यह शिरोत्पात होयहे, पीडारहित वा पीडायुक्त बहुत दिन रहवेवारी व्याधि सो शिराप्रहर्ष होय है, सूईके अग्रभागके वेधवेकीसी पीडा घाव बहुत लाल तीव्रपीडा गरम स्राव नेत्रके सुफेद भागमें ये रोग पीडावारो विद्वानोंने व्रणशुक्र कह्यो है ॥ २८५ ॥ कृष्णोऽभिष्यंदमूलः शशिरुचिरमलश्चावणः शुद्धशुक्रो- ऽथाक्रामत्यंशकं तैरसितमिह सितोंशोऽक्षिपाकात्ययः स्यात् । मांसं शोणं समुत्थाप्यजड इव महञ्चाजकाजातमाहु- नैतत्साध्यं त्रिकं तु प्रथममिह रुजां कष्टसाध्य कदाचित् २८६ अभिष्यंदके आदि काले भागमें सुफेद रंगवारो जौ मेल व्रण- रहित होय है वो शुद्ध शुक्र है आँख पाकसे सुफेद कारो जल वहे मांसरत्तको उठायके बहुत जडकी नाई जो रोम वढे सो अजका- जात कह्योहै, यह रोग त्रिदोषसे साध्य नहीहै प्रथम ये वात पित्त कफसे होय सो कभी कष्टसाध्य है ॥ २८६ ॥ आद्यं दृष्टिः प्रविष्टे पटलमिह मले वीक्षते व्यक्तमर्थ द्वैतीयीकं तु दूरांतिकमलघुगुरुं मन्यते वैपरीत्यात् । पश्येच्चाविद्यमानानपि मशकमुखान्पक्षिणश्चापि जालं सूचीपाशं न यत्नादपि तिमिरमिदं वृत्तरूपे त्रिदोषे ॥२८७॥ आदि पटलमें दोष भरेतें दृष्टि हे सो साफ नहीं देखे, दूसरे पटलमें वस्तु विपरीततासे देखे अविद्यमा- नको देखे विद्यमानको न देखे, मच्छर आदिको देखे पक्षीजाल- कोभी देखे यत्नसे भी सूईको छेद नही देखे त्रिदोषसे पैदा याप्र- कार तिमिर कह्यो है ॥ २८७ ।। दूर पास छोटी मोटी भाषानुवादसमेतः। वृत्तं वस्त्वीक्षते तत्पुनरुपरि गते तत्र दूरस्थितं वा- ऽधःस्थानस्थे समीपस्थितमपि च तथा पार्श्वगे पार्श्वगं वा । द्विस्त्रिःस्थे द्वित्रिरंतःस्थितवति तु बृहस्वमेकं द्विधा च वातान्याविद्धमेषां कलयति कलुषा शोणशोणा चला च २८८ गोलवस्तुको देखे वह फेर ऊपर चलीजाय दूरस्थित होय तोभी देखे नीचे होय समीपकी भी देखे वगलमेंकी वस्तुको भी देखे दो तीनजने स्थित हो तो भीतर तीनजनेको देखे वडीको छोटी देखे एकको दो देखे याप्रकार वायुसे विद्ध जो ये तिमिर है सो लाल- लाल और अचल है ॥ २८८ ॥ पित्तान्नीला च नीलं जगदमरधनुर्दण्डखद्योतविद्युत् विद्योतिव्योममन्यत्कलमपि शिखिनांश्लेष्मतः स्निग्धशोचिः श्वेतांशं खेन्दुकुंदैरिव समुपचितं रक्ततो रक्तरोचि- नानावण समूहादितरदपि तथा तैक्ष्ण्ययोगात्कृशस्य ॥२८९॥ पित्तसे नील तिमिर सो वस्तु नीली देखे इंद्रधनुष देखे पट- वीजना विजली आकाशवान् प्रकाश और मोरशब्द नृत्य देखे कफसे स्वेत और चीकनी स्वेत वस्तु शंख चंद्रमा कुंदपुप्पयुक्तसी देखे रक्तकांतिवारी रक्तसे देखे और सन्निपातसे नानावर्गवारी वस्तु और अलग २ भी कृशताके अतियोगसे देखेहै ॥ २८९ ॥ दोपे प्राप्ते तृतीयं व्रजति च तिमिरं काचताहक्तदोवं पश्यन्नाधोच्छसूक्ष्माम्बरपरिपिहिते वान्वहं हीयते च । वातादारक्तकाचद्युतिरनृजुमृनुं मन्यतेऽल्पं बहुत्वं दीपेन्द्वादेरभावं मुखमपि दहनान्नीलकाचप्रभा सा ॥२९०॥ तृतीयपटलमें दोष जानेसे अँधेरो प्राप्त हो दृष्टिनाश हो ऊपर न दीखे सूचीको छेद न दीखे दिन २ हीन होवे वातसे पुतली लाल मोटी चीज छोटी दीखे दीपक पूरो न दीखे मुख में दाह पुतली- प्रकाशहीनसी होवें ॥ २९० ॥ व्योमेक्षतेन्द्रचापाद्युपचितमधिकं श्लेष्मतस्त्वदीप चन्द्राद्यैः कांस्यरोचिभिरिव परिगतं कांस्यकांतिश्च दृक् स्यात् वैद्यचन्द्रोदयः । रक्तात्कृष्णारुणाभा मिलितमिह भवेल्लक्षणं सन्निपातात् संसर्गाच्चाथ दोषे गतवति पटलं लिंगनाशश्चतुर्थम् ॥२९१॥ चौथे पटलमें दोष आनेसे आकाश इंद्रधनुष न दीखे कफसे सूर्य दीपक चंद्र कांसो इनकी शोभा न दीखे, दृष्टिमें अशोभा रक्तसे होयहे काली लालसी आभा सन्निपातसे होयहे सब लक्ष- णयुक्त संसर्गसे लिंगनाश होय है ।। २९१ ॥ तत्संख्यस्तत्तदंकाधिक इह दृगनालोकना धूमधूली- पूर्णे वा रक्तरोचिर्भवति निजमितेः किंचिदल्पा पृथुर्वा । व्यक्तं पित्ताल्पकत्वात् निशि पुनरहनि प्रेक्षतेतो बृहत्त्वा- दव्यक्तं पीतरोचिर्जगदपि च तथा रक्तदा पित्तदग्धा २९२ तिस २ रोगकी संख्यावाले रोगमें देखवेसे धूआँ धूल नेत्रसे न दीखे बहुत देखवेसे लाल दीखे कोई जगे अल्प कोई जगे बहुत बहुधा पित्त अल्प होनेसे रात्रि में नहीं दीखे और पित्तके वढनेसे दिनमें नही दीखे दृष्टिमें पित्तसे दग्ध रक्तसे जगत्को पीलो देखे ॥ २९२ ॥ स्पष्टं श्लेष्माल्पभावादहनि नतु निशि प्रेक्षते श्लेष्मदग्धा दृष्टिः शुक्ला च दोषे गतवति पटलेषु त्रिषु स्यान्निशांधा। शोकाद्यैर्धूमदर्शिन्यहह विनिहता भूस्तु धूमाविलेव स्थूलं ह्रस्वं तु पश्येड्रमरवदसिता पित्ततो इस्वदृष्टिः॥२९॥ बहुधा कफके अल्प होनेसे रात्रिमें नहीं दीखे सो श्लेष्मदग्ध होय है. दृष्टि सुफेद और तीसरे पटलमें दोष प्राप्त होनेसे निशांध होय है शोक आदिसे धूआ दिनमें देखे नही मोटो छोटो दीखे भोंरासो दीखे पित्तसे छोटी दृष्टि होय हे ॥ २९३ ।। चित्रं पश्येजगञ्चेन्नकुल इव दिवा नाकुलांध्यं त्रिदोष्या- विच्छाया संकुचंती सरुगपि मरुतः सा तु गंभीरदृष्टिः । अन्यावागंतुसंज्ञौ भवत इह गदौ द्वावभिष्यंदमूलै- स्त्वेको गंधर्वपक्षोरगसुरमिहिरादीक्षते नापरः सः॥ २९४ ।। नोलासरीखो जगतको विचित्र देखे सो नकुलांध त्रिदोषसे होय है छायारहित या छायायुक्त संकुचित दृष्टि हो पीडायुक्त वातसे गंभी- वै.चं.९ भाषानुवादसमेतः। रदृष्टि होय है दो आगंतुक संज्ञक हैं दो अभिष्यंदके प्रथममें हैं एक गंधर्वपक्षमें है दूसरो सर्वपक्षमें हैं ॥ २९४ ।। श्यावार्मा स्यादयं चेत्कपिशमिह भवेदर्म शुक्लं त्रिदोष्या शुक्लार्मा श्लेष्मतः स्यात्पृथुभवदिह चेदर्मशुक्लेति शुक्लम् । रक्तार्मा रक्तजोम्भोरुहरुचिमृदुलं स्रावि तच्चीयमानं मांसार्मा सन्निपाताद्यकृदिव मृदु चेदर्म तद्वर्धमानम्॥२९५॥ पीलो होय सो श्यावार्म होय है और सुफेद होय सो त्रिदो- षज शुक्लार्म कफसे होय है वडो ये होय तौ सुफेदसे अति सुफेद रक्त कमलसो रक्तार्म है स्राववारो संचय होय वढे सो सन्निपा- तसे हृदयसो नरम मांसार्म होय है ॥ २९५ ॥ स्नायवर्मा च त्रिदोष्या स्थिरमिह पृथुलं स्वायुतल्पं यदर्म द्वित्राश्चेच्छुक्तिसंस्था विदधति पृषताःपित्ततःशुक्तिका स्यात्। शुक्ले स्यादिदुरेकः शशिरुधिरनिभो रक्तजातोऽर्जुनाख्यः पिष्टाभंगंधवाहात्प्रसरति सकफाच्चेत्पलं पिष्टकं तत् ॥२९६॥ ये स्नायवर्म त्रिदोषी होय है स्थिर मोटो छोटो स्नायुसो शुक्तिमें पित्तसे बिंदु शुक्तिका होय है एक शुक्लबूंद चंद्रमासी लाल सो रक्तसे पैदा अर्जुननामक होय है, वायुसे पिट्टीसो शोभवारो फेले सो कफयुक्त मांससे पिष्टक होय है ॥ २९६ ॥ लूता जालायमानाः स्युरिह यदि शिराः स्याच्छिराजालकोसौ तास्युः सर्वास्त्रिदोष्या लघुलधुपिडिका नामतस्ताःशिराद्याः। मुक्काकारो बलासात्प्रभवति पृषतो यः कफग्रंथिकः सः वर्मोत्संगोभिधानात्प्रभवति पिडका पूयगंधा सपाका २९७ मकडीके जालेसो नेत्रमें डोरा रक्तसे शिराजाल होता है तामें छोटी २ फुन्सी नामसे शिरादिक त्रिदोषसे होयहें कफसे मुक्तासमान जो बिंदु होय सो कफग्रंथि है रक्त पाकसे पीव गंधवारी फुन्सी होय वो वर्मोत्संगनामक है ॥ २९७ ।। नेत्रेभ्योप्यश्रुधारा प्रवति यदि दश ह्येष पूयालसः स्यात् कंडूलो ग्रंथिरुच्चैरपगतपवनो भण्यते तूपनाही ।
वैद्यचन्द्रोदयः। ९९ वारिस्रावोश्रुनाडीगतवति कुपिते सन्निपाते मलानां पूयनावः स एव स्रवति यदि मुहुः पूयमांसाद्यपाकम् २९८ नेत्रसे दश बूंद पडे तौ पूयालस होय है खुजरी ऊंची गाँठ होय सो वातसे उपनाह कह्यो है, नाडीमें जल प्राप्त होनेसे जल- स्राव होय और त्रिदोष मलके कोपसे पीव वहे सो पूयमांसादि पाक है ॥ २९८॥ श्लेष्मस्रावस्तु सांद्रं स्रवति यदि ततो रक्तमीपत्कदुष्णं ताम्रा तन्वी सदाहा प्रभवति पिडका वर्णिकाख्या सपाका । कृष्णश्वेतांतरासस्नुतिरिह पिडका गोस्तनाभालजी स्यात् कंडूदाः सूक्ष्मसूक्ष्माः कृमय इह यदा स्युःकृमिग्रंथकः सः२९९ गाढो कफस्राव होय थोडो गरम रक्त वहे तामेसी लाल दाह पाकयुक्त फुन्सी होय सो वर्णिकानामक है काली भीतर सुफेद गौके थनसी फुन्सी वहे सो अलजी होय है, खुजरीदाता छोटी छोटी कृमि होय वो कृमिग्रंथिक होय है ॥ २९९ ॥ वर्मोत्संगाभिधानात्प्रभवति पिडका वर्त्मनोऽके गुरुर्या द्वित्रास्ताश्चास्रवत्यो लघव उरुरुजः कुंभिका स्यात्रिदोष्याः। पोथक्योऽस्रात्स्रवंत्योऽरुणकटुसदृशास्ता अनेकाः सपीडाः स्थूला सूक्ष्मा शिराभिर्यदि भवति वृता वर्मनः शर्करा सा॥ रक्तसे मोटी फुन्सी होय सो वर्मोत्संग होय है त्रिदोषसे दो तीन स्राववारी छोटी फुन्सी होय पीडा देवे सो कुंभिका (गुहेरी) होय है लाल कडवीसी पीडायुक्त अनेक बिंदु नवे वो पोथकी होय है मोटी छोटी शिरासे होवे सो वम॑शर्करा होय है ॥ ३०० ॥ इलक्ष्णो ह्यल्पास्थिरूपोऽल्परुगिह पिडकार्शस्रवद्वाथ शुष्कः ताची तन्वी सदाहा सरुगपि पिडका चांजनी श्लेष्मरक्तात् । व्याप्तं ताभिः सवर्णाभिरिह बहुलकं वर्त्मनाडी समंतात् शोथाद्वाल्पतो नोन्मिपति यदि समं वर्त्मबंधः सकंडूः३०१ चीकनो हड्डीसो छोटो पीडायुक्त सूखो जो स्रवे सो पिडकार्श है रक्तकफसे तामेसी लाल छोटी दाह पीडायुक्त फुन्सी होय सो
१००
भाषानुवादसमेतः।
अंजनी है चारों ओर फुन्सीसी दीखे सो वर्त्मनाडी है शोथसे
अल्प समान देखे खुजरीयुक्त सो वर्त्मबंध है ॥ ३०१ ॥
तामं मृद्धल्पपीडं सममिह सहसा वर्त्म चेक्लिष्टवमा
पित्तास्रात्कर्दमा स्रवदिव परितो वर्त्म चेत्कर्दमः स्यात् ।
बाह्येऽन्तश्चासितं चेजनयति पवनो वर्त्मनः श्याववा-
थांतः क्लिन्नं बहिः स श्वयथुगतरुजं तत्तु प्रक्किन्नवा ॥३०२॥
ताम्रसी लाल नरम अल्पपीडा समान नेत्र भागमें हो सो क्लिष्ट-
वा होय है कीचडसो जलपित्तसे चारों ओर स्रवे सो कर्दम-
वा होय है भीतर बाहर कारो मार्ग होय वो वातसे पैदा श्याव-
वा है भीतर बाहर गीलो सूजनयुक्त पीडासहित सो प्रक्लिन्न-
वी है ॥ ३०२ ॥
धौतं वाधौतमेतद्गतमिह तु मुहुर्दह्यते क्लिन्नवा
निश्चेष्टं मुक्तसंधीव यदि निमिषति स्यात्समीराहतं तत् ।
वन्तिग्रंथिले चेद्रुधिरमरु भवेदव॒दं नाम नीरुक्-
वायुः कुर्यान्निमेषं मुहुरतिलघुरुक् रक्तरागः ससंधिः॥३०३॥
सुफेद काले भागमें प्राप्त होयके वार २ दाह करे सो क्लिन्न-
वा है चेष्टारहित पलक अच्छे न मिचें वर्मके भीतर गाँठ पडे वो
वाताहत होयहे रक्तसे पैदा होनेवारो पीडारहित अर्बुदनामक होय
है निमेषको थोडी पीडा देवे ये संघिमें होनेवारो रक्तराग है ॥३०३॥
ग्रंथिश्चापाकिनी रुग् न गण इह मतः कोमलचाल घुश्चे-
दंतश्छिद्रं सबाह्यं श्वयथु च बिसवम॑ स्रवद्वा बिसाभम् ।
दोषैः संकुच्य वर्त्म प्रसरति न तथा कुंचनं स्यात्तदानीं
पित्तं पक्ष्मानि हन्यात्प्रतुददिव यदा पक्ष्मशातःसकण्डूः ३०४
और जो नेत्रमें विनापकी गाँठ पीडारहित मोटी कठोर होय
सो नगण कह्यो है भीतर छेद बाहर शोथ कमलतंतुसो पाक वहे तो
बिसवम होय है दोषोंसे पलक मिचके उघडे नहीं ताको कुंचन
कह्योहे पित्त जो है सो पलकको नाश करे भीतरसे खुजरी दर्द
हो सो पक्ष्मशात है ॥ ३०४ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः।
१०१
पक्ष्माण्यंतर्विशति प्रसभमिह मुहुर्वक्रतां प्राप्य वातात्
घृष्टान्यक्षिप्रकोपं दधति यदि गदः पक्ष्मकोपोऽतिकष्टः।
और वायुके कोपसे पलक जबरदस्ती भीतरसे खिचें और टेढे
हो जाय और घिसवेसे नेत्रमें कोप होय ये अतिकष्टदायक पक्ष्म-
कोप है।
अथ शिरोरोगावलोकः ॥७५॥
वातः पीडां विधत्ते निशि शिरसि दिवा पित्तरतेऽभितापं
श्लेष्मा भूयो गुरुत्वं त्रितयमपि पुनः सन्निपातः क्षयञ्च ३०५
रात्रिको वायुसे माथेमें पीडा होय और दिनमें पित्तरक्त घामसे
कफसे भारी रहे सन्निपातसे ये तीनों लक्षण होय और क्षयसे ॥३०५
निस्तोदः कीटरक्तस्रुतिरपि च नसः स्यात्कृमेश्चाथ सूर्या-
वर्ताख्यस्तीब्रदुःखो यदि सह रविणा वर्धते हीयते च ।
वातश्लेष्मान्विताध व्यथयति शिरसः सोधभेदोऽथ पित्तात्
सृग्वाताः शंखदेशे दधति यदि रजोभूयसीःशंखकः स्यात् ॥
पीडारहित कृमिसे रक्त वहे और नाकमें कीडा काटे ओर
अति दुःख देवे सूर्यको किरण वढेसे वढे घटेसे घटे सो सूर्या-
वर्तनामक होय हे वातकफसे
युक्त
जो आधे माथेमें पीडा करे सो
अर्धभेदक होय है और पित्तसे रक्तवातसे शंखदेशमें अतिपीडा करे
तौ शंखक रोग होय है ।। ३०६ ॥
यो वातं बंभ्रमीति भ्रकुटिनयनयोः शंखयोगडयो
मन्यायां भूरि पीडां विदधति ह मुहुःस स्मृतोऽनंतनामा ।
भ्रकुटी और नेत्रों में माथेमें गाल मन्यामें जो वायु भ्रमण करे
बहुत पीडा देवे सो अनंतनामा रोग है ।
अथ प्रदररोगावलोकः॥ ७६ ॥
वाताद्या गर्भपातादिभिरतिकुपिता योषितां योनयश्च
रक्तस्राव स्रवंति प्रदरमिति बुधास्तं जगुस्ते चतुर्धा ॥३०७॥
१०२ भाषानुवादसमेतः। प्रत्येकं तैः समस्तैरपि रचितपृथूपद्रवैः स्वानुरूपं रक्तं त्वत्यंतरक्तं शशिजमिह भवेद्गर्भ ह्यन्यथान्यत् । वात आदि वा गर्भपात आदिसे जो स्त्रीकी योनि रक्तस्त्राव करै तौ याको पण्डित प्रदर कहें ये प्रदर चार प्रकारको है । ३०७ । वात पित्त कफसे सन्निपात कोपसे अपने २ निजरूप पैदा करे अति उपद्रवयुक्त अधिक लाल और सुफेद वहे ये पीडा गर्भसे वा और कारणोंसे होयहै। अथ योनिरोगावलोकः ॥७७ ॥ वातात्कार्कश्ययुक्ता भवति जवभुजो भूरिदाहा बलासात् पैच्छिल्यान्या त्रिलिंगा त्रिभिरपि रुधिराहाहकण्डूसमेता ॥ वातसे योनि कठोरतायुक्त होय हे पित्तसे अतिदाहवारी होयहे कफसे चीकनाईयुक्त होयहे सन्निपातसे तीन लक्षणवारी और रक्तसे दाह खुजरीसमेत होय हे ॥ ३०८ ॥ क्षीणा योनिस्तु रक्तात्क्षयजनिरुदिता विप्लुतोपप्लुतांत- मुख्याख्या कर्णिकाख्या पुनरतिचरणोदावृता वामनी च । जातनी सूचिवक्त्रा तदनु च चरणा प्राक्पदात्खंडितान्या पर्यादिस्तु प्लुतान्या प्रभवति च महायोनिशुष्काभिधेया ३०९ योनीके रक्त क्षीण होनेसे क्षयसे विप्लुता उपप्लुता कही है और अंतरमुखी नामक होयहे कर्णिका नामक और अतिचरणा उदा- वृता वामनी और जातघ्नी सूचीवका तापीछे अनुचरणा तथा पाद- खंडिता और खंडिता परिप्लुता और शुष्का नामक होय हैं ॥३०९॥ स्त्रीणां नामानुरूपा इति किल गदिता विंशतिर्योंनिरोगा दोषभिन्नैः समस्तैरपि लकुचनिभो योनिकंदश्चतुर्धा । या प्रकार स्त्रीनके नामके अनुरूप योनिके वीस रोग कहे हैं लकुचफलकी नाई वात पित्त कफसे न्यारे २ और सन्निपातसे योनिकंदनामक चार रोग कहे हैं।
वैद्यचन्द्रोदयः। अथ मूढगर्भावलोकः ॥ ७८ ॥ भीतीक्ष्णोष्माभिघातादिभिरभिलभते कामिनी गर्भबाधां तत्प्राग्रूपं रुगर्ने स्रवति स पृषतैराचतुर्थात्तु मासात् ॥३१०॥ भयसे तीक्ष्ण गरम खानेसे चोट आदिके लगनेसे स्त्रीके गर्भ- बाधा होय है ताके पूर्वरूपमें दर्दसे रक्त वहै जलबिंदु गिरे यह चौथे माससे ॥ ३१०॥ षष्ठे वा पंचमे वाप्यतिविषमतरैः कर्मभिर्गर्भपातो मासेऽश्वे मूढगर्भ रचयति पवनः संचरंस्तत्र मूढः। भग्नः स्थानाच्चिरं चेत्कथमपि स तदा योनिवकं कराभ्यां पद्भ्यामंगेन वान्येन च बहुलरुजा तिष्ठदर्धापिधाय ॥३१॥ पाँचवे छठे महीनामेंभी विषमकर्मते गर्भपात होय है सातवे मासमें वातगर्भ में फिरके गर्भको विगार करे सो गूढगर्भ हे और स्थानसें बहुत देरसे निकल्यो बाहर नहीं निकल सके योनि- मुखमें हाथमात्र आवे या पावही आवे वा शिरही आवे अति पीडा होय आधो निकले और वैसोही रह जाय ॥ ३११ ॥ कीलस्तब्धांघ्रिपाणिः प्रतिखुर उदितैस्तैः खुरैर्बीजम?- न्मीलत्पाण्युत्तमांगं परिघ इव परः स्याच्चतुर्धेति मूढः । अस्पंदश्यावपांडुः श्वसनबहुलता पूतिता विप्रशांति- गर्भस्थोच्छूनतांतर्मरणमुपगते बालके चिह्नमेतत् ॥३१२॥ हाथ पाँव जकडजाय सो कीलक होयहे जो हाथ पाँव निकल आवें सो प्रतिखुर हे जो हाथ माथो निकल आवे सो वीज हे आधो भीतर आधो बाहर सो परिघ हे ऐसे चार प्रकार मूढगर्भ कहे हैं हिले चले नहीं कालो पीलो अति श्वास ले दुर्गधि हो अशांति होग- र्भमें शून्यता हो ये बालक गर्भ में मरजाय ताके चिन्ह हैं ॥३१२॥ कंपातीसारतृष्णा ज्वरमसितशिरोच्छूनतांघ्रिश्च शोथः शैत्यं दाहं कदाचित्कथितमिति बुधैर्गर्भिणीनाशलिंगम् । कंप अतीसार प्यास ज्वर काली नस शिर वा पाँवमें शून्यता १०४ भाषानुवादसमेतः । और सूजन कभी शीत कमी दाह एसे लक्षण होय तौ गर्भिणी कभी नही वचे एसे पण्डित कहें हैं। अथ सूतिकावलोकः ॥ ७९ ॥ मिथ्याचारादिभिः स्यात्कफपवनकृतः सूतिकाव्याधिरुनः शोथश्वासज्वराग्निक्षयबहुलतृषानाहरुकंपरेकैः ॥ ३१३ ॥ मिथ्या आचार आदिसे कफवातसे पैदा सूतिकानामक उग्र रोग होय है सूजन श्वास ज्वर मंदाग्नि और प्यास अफरा कंप अतीसार याके लक्षण हें ॥ ३१३ ॥ अथ बालरोगावलोकः ॥ ८० ॥ मातृस्तन्यानुरूपो भवति बहुविधो वालरोगोऽथ तत्र क्षामः शब्दः कृशांगो दृढमपि समलः स्यात्समीरालसाख्यः। तृड्दाहस्वेदपीतद्युतिमलशिथिलत्वादिपित्तालसे स्याद् दुग्धप्रक्षेपनिद्रा ननु गरिमकफाः स्युर्वलासालसेऽपि ॥३१४॥ माताके दूधके अनुसार बहुत तरहके बालरोग होवै हें तहां दुर्बल शब्दवारो कृशांग मलका रुकना वायुके विकार युक्त होनेसे समीरालस नामक रोग होय है प्यास दाह पसीना पीरी कांति मलकी शिथिलता आदि पित्तालसमें होय है दूध और गाढो कफ गेरे निद्रा आवे सो कफालसमेही होय हैं ॥ ३१४ ॥ शूलाध्मानाविधर्मादिभिरपि च तथा दृग्निपातैः खलस्य डिभो रोदित्यकस्मादिह मतिचतुरेणेंगितैरूहनीयम् । दाहो ह्यक्ष्णोः कुकूणः प्रभवति जननीगर्भदोषात्प्रसह्य श्लेष्माद्यस्तालुमांसौ विरचयतिशिशोः पारिगर्भःसतापौ३१५ शूल अफरा पसीना आदिकरके दुष्टकी दृष्टि पातसे अकस्मात् रोवे बालक तो बुद्धिमानोंने विचारनो चाहिये माताके गर्भदोषसे नेत्रपलकमें बलात्कारसे पीडा होय सो कुकूणक है कफसे पैदा तालुकंटक मांसमें पीडा देनेवारो ज्वरयुक्त पारिगर्भ होय है ३१५ बस्तौ वा मूर्ध्नि भूत्वा सरसिरुहनिभश्चेद्विसर्पो विसर्प- न्स्यादस्मिन्वर्षभागे प्रभवति स महापद्मनामा शिशूनाम् ।
वैद्यचन्द्रोदयः। १०५ स्निग्धा नीरुक् सवर्णोदयति च पिडका मुद्गतुल्याऽजगल्ली- पूर्वोक्तास्ते ज्वराद्या अपि शिशुवपुषि स्युः प्रसूदुग्धदोषैः ३१६ मूत्राशय वा माथेमें होके फेले कमलपुष्पके समान सो पद्म- विसर्प होय है दो वर्पके हिस्से में बालकोंके महापद्मनामा रोग होवे है चीकनी पीडारहित मूंगके समान फुन्सी होय सो अज- गल्ली है. माताके दूधदोषसे पहले कहे ज्वरादिकभी बालकके अंगमें होते हैं ॥ ३१६ ॥ यो दंतान्खादतीह क्षिपति करपदं भ्रूकुर्टि वीक्षते च क्षामो जागर्ति रोदित्यपि कपिशरुचिः स्याद्रहग्रस्त एषः। नेत्रेणाऽर्धेन पश्यद्विसृजति च पयो लोचनादेकतोऽसृग् गंधस्तन्यं पिबेन्नो स किल कवलितः स्कंदनाना ग्रहेण ३१७ जो दाँतको कटकटावे हाथ पाँवको पटके भृकुटीको देखे दुर्वल कम सोवे रोवे काली पीली आकृति हो सो ग्रहग्रस्तलक्षण होय हे और आधे नेत्रसे देखे दूध गेरे एक नेत्रसे रक्त गिरे गंधसे दूध न पिये एसे लक्षणसे युक्त जो बालक हे सो स्कंद- नामा ग्रहपीडित होय है ॥ ३१७ ॥ स्कंदापस्मारजुष्टो भवति गतमतिर्जातसंज्ञश्च रोदि- त्युच्चैः पूयास्रगंधो वमति च बहुलं फेनिलं वारि बालः । स्रस्तांगः पक्षिगंधश्चकित इव मुहुः स्फोटपूर्णः सदाहः संसद्वक्षाःसपीडो यदि भवति शिशुः स्याच्छकुन्या गृहीतः॥ बुद्धिभ्रष्ट होय और होसमें आवे तब रोवे सो स्कंदापस्मारयुक्त हे और जोरसे पीव रक्तकी गंध आवे ऐसी अतिजलयुक्त उलटी करे अंग शिथिल हो जाय पक्षीकीसी गंध आवे चकित होरहे फुन्सीयुक्त छाती गिरीसी मालूम पडे दाहपीडायुक्त दिनमें पीडाविशेप हो तो वह बालक शकुनीगृहीत होय हे ॥ ३१८॥ यद्गानं शादगंधि व्रणगलदसृजा भिन्नवज्वरा” दाहादैन्याच खिन्नः स इह निगदितो रेवतीगीर्णगानः।
१०६ भाषानुवादसमेतः। तृष्णातीसारयुक्तः क्षणरुदितनिशाजागरैः पूतनाप्तो बालोन्धः पूतनाप्तोऽपि च भवति तृषा पूति वै रोदनञ्च ३१९ जाके अंगमें कीचकी गंध आवे व्रण गले भये नमेसे रक्त वहे कांतिरहित ज्वरपीडित दाह दीनतासे खिन्न सो बालक रेवतीग्रहसे दुःखित कहो हे प्यास अतीसार टेढो देखे, रात्रिमें सोवे नही रोवे सो पूतनापीडित है तृषा दुर्गधि रोनेकर युक्त जो बालक हे सो अंधपूतनाकर युक्त होयहे ॥ ३१९ ॥ कंपातीसारकासैरपि नयनरुजा शीतनापीडितः स्या- द्वाशी वीर्यवक्रो विकृतिबहुशिरोवक्रमुंडप्रपातः । मूर्छाकंपास्यशोषी सवमिरुपरिदृङ् नैगमेषादथ स्यु- दंतोझेदादिलालानुतिगुदपरिपाकापशीर्षादयोऽन्ये ॥३२०॥ कंप अतीसार कास और नेत्र दर्दयुक्त शीतपूतनापीडित होय है बहुत भोजन करे वीर्यमें और मुखमें विकृति बहुनशे टेडी, और मुखटेडो हो सो मुख मुंडितका पडनेसे होयहै मूी कंप मुख शोषवाला वमनयुक्त ऊपर दृष्टि नेगमेष ग्रहपीडित होय है दंतके निकरवेमें लार गिरे गुदापाक माथेमें पीडा होयहे ॥ ३२० ॥ अथ विषरोगावलोकः ॥ ८१॥ द्वेधा प्रोक्तं भिषग्भिर्विषमतिविषमं स्थावरं जंगमं चा- धं मौलञ्च सार्प ह्यपरमथ वदेलक्षणैरायमेतैः । हिक्काकंपावरोधज्वरकफवमना, रोचकश्वासमूर्ची- धर्षातिभ्रांतिनेत्रात्यरुणिमदशनद्वारदाहप्रसेकैः ॥ ३२१॥ विष अति विष वैद्योंने दो प्रकारको स्थावर जंगम कह्यो है सर्प आदिके माथेमें इनके प्रथमको लक्षण कहनो हिचकी कंप अवरोध ज्वर कफ वमन अरुचि श्वास मूर्छा अतिभ्रांति नेन अति लाल मद सो (मुखादि) द्वारोंमें दाह पसीना ॥ ३२१ ॥ सार्प तु धासशोथक्कमदवथुतमोदंशवैवर्ण्यसेका- तीसारास्याक्षिरागभ्रमसहितशिरोदाहजिहातिमौढ्यैः।
वैद्यचन्द्रोदयः।
१०७
मौलादुद्वेष्टनं स्यादपुषि दलविषाजूंभणं पुष्पजाता-
च्छर्दिः शोथोण्डयोः स्यात्फलविषत इह त्वग्विषादंगरौक्ष्यम्
श्वास शोथ ग्लानि वमन अंधेरो पसीना विवर्णता सर्पदंशसे
अतीसार मुखनेत्रमोह भोर और शिरमें दाह जिह्वामें अतिमूढता
होयहे जड विषसे अंगबंधन होय है, पत्रविषसे जंभाई पुष्पजात
विषसे उल्टी अंडशोथ होय है फलविषसे वमन दोनो ऑडों में
शोथ छाल विषसे अंग रूखो होवे है ।। ३२२ ॥
सारोत्थादास्यपूतित्वमथ कफवमिः स्याच निर्यासजाता-
द्रेकः स्यादुग्धजातादथ हृदयरुजा धातुजाता चिरनी।
श्यामः स्याद्भोगिदंशः समरुदतिकर्फ राचिलश्चंद्रचारुः
संरंधे सोऽतिपित्तं नवकनकनिभं मंडली तंतनोति ॥३२३॥
सारज विषसे मुखमें दुर्गधि और गोदज विपसे कफ वमन
होय है
दुग्धज
विषसे
दस्त और हृदयरोग होवे धातुविषसे पैदा
विषसे शीघ्र नाश होवे भोगीको दंशकारौ होय है अतिवात युक्त
कफ करे राजिलको (दंश)चंद्रसो सुफेद होवे अति पित्त रोके
नयो स्वर्ण सो मंडलीकको दंश होय हे ॥ ३२३ ॥
रोमांचो यस्य न स्यादतिशिशिरजलैर्यस्तु दष्टः श्मशाने
वल्मीके लेख्यगेहे यमदिशि वसतेः संध्ययोर्मर्मदेशे।
कुक्षौ वा मूर्ध्नि यो वा स्खलिततमवचाः सप्रसेकः सकंठ-
घ्राणध्वंसो हि दष्टो व्रजति यमपुरं कूर्मवद्यस्य दंशात् ३२४
श्मशानमें शीतल जलमें काटे रोमांच खडे होय वाँवीमें शून्य
गृह दक्षिणदिशामें दो संधियोंमें मर्ममें कूखमें माथेमें काटे तो पसीना
होय टूटे वचनोंको कहे और घ्राणनाश होय एसो काठ्यो कछु-
वाको दंश जाके सो यमपुरीको जाय ॥ ३२४ ॥
भेदः सूचीभिरंगेष्विव भवति महामोहदाहातिपीडा
विभंगे वृश्चिकेन ज्वलदनल इव श्यामलः स्याद्धि शोथः।
लूतामूत्रादिजातं विषमनलविसर्पोपमं मूषकोत्थं
सर्वाङ्गे पिप्पलीवद्गण इव सरति च्छर्दिवैवर्ण्यकारि ॥३२५॥
१०८
भाषानुवादसमेतः।
अंगमें सूईसी चुभनो होय महामोह दाह अतिपीडा मलनाश
अतिजलनसी काली सूजन विच्छूके काटेसे होयहे मकरीके मूत्र
आदिसे पैदा विष पित्तविसर्प सो होयहे भूपेको विष सब अंगमें
चेटियोंका
समूह
सारेगें वमन विवर्णता करे ॥ ३२५ ॥
मांडूकाच्छर्दिनिद्रे तृडथ शतपदीदंशतः शोथपीडा
दाहं दूषीविषात्तु ह्यथ वमथुडानाहकेशप्रणाशाः ।
अन्यत्संयोगजातं विषमिह गदितं प्रस्फुटं स्थावरान्त-
भूतत्वात्तत्तु बुद्ध्या घृतमधुशशिनिंबादि विज्ञेयमुच्चैः॥३२६॥
मेडकाके विषसे वमन निद्रा प्यास और काँतरके दंशते शूजन-
पीडा दूषीविपसे दाह और वमन प्यास उदर अफरा केशोंका नाश
फुसकारी ( दीवड )से स्थावर बहुत दिनको घी मधु पय निम्बादि
येभी महाविष होजाय हैं एसा प्रकट कहाहे ।। ३२६ ॥
अथ ग्रन्थोक्तरोगसंख्यावलोकः ॥८२॥
एषा श्रीमाधवोक्तक्रमत इह मया भट्टत्रैमल्लनाम्ना
छंदोभिः स्कंदवक्रस्वरनयनमितैः स्रग्धराख्यैरवाचि ।
एतजन्येन पुण्येन तु भवतु भवः श्रीभवान्याभिजुष्ट-
स्तुष्टस्त्रैलोक्यसर्गस्थितिलयघटनाव्यग्रहक्कोणपातः ॥३२७
ये मे त्रिमल्लभट्ट नामाने माधवनिदानके क्रमसे तीनसो छब्बीस
स्रग्धरा छंदोंकरके कह्यो यासे पैदा पुण्यसे जगतको पैदा पालन-
संहारकी घटनामे चंचल हे नेत्रकोणको पात जिनको एसे श्रीपा-
र्वतीकर सेवित महादेव प्रसन्न होय ॥ ३२७ ॥
देवप्रणामो ग्रंथस्य प्रयोजनमथो नतिः ।
विदां दुष्टमुखच्छेदो दूतलक्षणशाकुने ॥ ३३८ ॥
देवताको प्रणाम ग्रंथप्रयोजन विद्वानसे नम्रता दुष्टमुख छेदन
दूतलक्षण और शकुनमें ॥ ३२८ ॥
शारीरं काललोकश्च मूत्रांकं मललक्षणम् ।
नेत्रांक नाडिकाज्ञानमसाध्यस्वरवर्णकम् ॥ ३२९ ॥
वैद्यचन्द्रोदयः । १०९ शारीर और काल ज्ञान देखनो मूत्र मललक्षण नेत्रलक्षण नाडीज्ञान असाध्यलक्षण स्वरवर्णविचार ॥ ३२९ ॥ याप्यसाध्यौ च दोषाणां निदानं लक्षणं ततः। निदानपंचकं तापातीसारग्रहणीगदाः॥ ३३० ॥ याप्यसाध्य दोषनिदान निदानपंचक ज्वर और अतीसार संग्रहणी रोग ।। ३३० ॥ अर्थोऽग्निरुगजीर्णान्यलसोऽन्यो दण्डसंयुतः। विलंबी सूचिकाजंतुपाण्डुरोगांश्च कामला ॥ ३३१ ॥ ववासीर अग्निरोग अजीर्ण अलसक दूसरा दण्डालसक विलंबी विपूचिका कृमि पांडुरोग और कामला ॥ ३३१ ॥ कुंभाद्या सैव क्रमतोऽथो हलीमकपानकी । रक्तपित्तं राजयक्ष्मा कासहिक्कासश्वासकम् ॥ ३३२ ॥ कुंभादिकसो एसे क्रमसे हलीमक पानकी रक्तपित्त राजयक्ष्मा कास हिचकी श्वासयुक्त ॥ ३३२ ॥ स्वरभेदो हि रोगश्वारोचकच्छर्दितृड्रगदाः। मूर्छा च पानरोगाश्च अजीर्णात्ययसंज्ञकः ॥ ३३३ ॥ स्वरभेद रोग और अरुचि वमनप्यासरोग मूर्छा और पान- रोग और अजीर्णात्ययसंज्ञक ॥ ३३३ ।। दाहोन्मादा ग्रहोन्मादापस्मारत्रिमलामलाः । रक्तरुग्वातरक्तोरुस्तंभश्चामानिलव्यथाः ॥ ३३४ ॥ दाह उन्माद ग्रहोन्माद अपस्मार त्रिदोषरोग रक्तरोग वानरका ऊरुस्तंभ आम और वातव्याधि ॥ ३३४ ॥ शूलपंक्त्यर्तिकेऽन्नाद्यं द्रवं पित्तं जरन्मितम् । उदावतस्तथानाहो गुल्महृद्रोगकृच्छ्रकम् ॥ ३३५ ॥ शूल पंक्तिशूल अन्नद्रव शूल आदि जरपित्त उदावर्त तथा अफरा गुल्म हृद्रोग मूत्रकृच्छ्र ॥ ३३५ ।। मूत्राघातोऽश्मरी मेहं मध्वाक्षो पिडकास्तथा । मेदोदोषोदरं शोथं व्रणशोथो व्रणोद्भवः ॥ ३३६ ॥ वै. चं. १० भापानुवादसमेतः। मूत्राघात अश्मरी प्रमेह मधुमेह पिडका तथा मेददोष उदरशोथ व्रणसे पैदा व्रणशोथ ॥ ३३६ ॥ भगंदरगलव्याधिगंडमालाऽपची ततः । ग्रंथ्यर्बुदे विद्रधिश्च उपदंशश्च शूकरुक् ॥ ३३७ ॥ भगंदर गलरोग गंडमाला अपची ग्रंथ्यर्बुद विद्रधि और उप- दंश तथा शूकरोग ॥ ३३७ ॥ कुष्टोदर्द शीतपित्तमम्लपित्तविसर्पता । विस्फोटाश्च मसूर्यश्च क्षुद्ररोगास्यकर्णजाः ॥ ३३८ ॥ कुष्ट उदर्द शीतपित्त अम्लपित्त विसर्प विस्फोट और मसूर्या और क्षुद्ररोग मुखरोग कर्णसे पैदा रोग ॥ ३३८ ॥ नासानेत्रशिरोरोगाः प्रदरो योनिजा गदाः। मूढगर्भप्रसूती च शिशुजा हि विषामयाः ॥ ३३९ ॥ नासारोग नेत्ररोग शिरोरोग प्रदररोग योनिरोग मूढगर्भ- . प्रसूतरोग और बालरोग विषरोग ॥ ३३९ ।। नेत्राशीत्यवलोकान्यो ज्वराद्यञ्च विषांतकम् । कृतं त्रिमल्लभट्टेन निदानं वैद्यहेतवे ॥ ३४० ॥ इति श्री-वैद्यचंद्रोदयः- कविवरत्रिमल्लभट्टविरचितः समाप्तः । व्यासी अवलोकोमें ज्वरसे आदिलेके विषरोगपर्यंत निदान वैद्योंके हितार्थ त्रिमल्लभट्टने कह्यो हे ।। ३४० ॥ श्रीमत्कल्याणचन्द्रो निखिलगुणनिधिर्माथुराणामधीश- स्तत्पुत्रोऽहं हि वैद्यो मधुपुरनिलयो राधिकाचंद्रनामा । भाषाटीका मनोज्ञामनुमतिकृतवान्वैद्यचंद्रोदयस्य षट्यां वै सौम्यवारे द्वयरसनबभूवत्सरे पौषशुक्ले ॥१॥ इति श्री-वैद्यचन्द्रोदयस्य बडे चौवे श्री राधाचंद्रजी वैद्य कवि- विरचिता भाषाटीका समाप्ता। । समातोयं ग्रन्थः।
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