Sanmati Library, Jaipur
Padmapuranantargat Kartik Mas Mahatmaya
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Tosladka Soft অস্বল্প-ইলা। महापा मुझणालये अषदादयो पेदा उपनिषदो पेदान्तगंथा महाभारतादातिहासाः श्रीमहायज्ञादिमहाशाजापान सादि धर्मशाहा कर्मकाण्मु-व्याकरण-न्याय-योग-सांस्य-मीमांसादिशास्त्रीयअन्याः | हाय नाहदापूम- कपो अन्याः सहनामाधनस्ताचप्रन्याय विविधभाषामन्याथ सौसफोत्तमयविध्यारैभनोहर युमिता आसले योग्यमूल्येन विक्रय्याः सन्ति तांश्च ग्राहका घथापुस्तफसूचीपत्रं धूल्यप्रेषणेन प्राप्नुयुः । श्रीधामस्मदीयसूचीपुरतफानां भिन्नभिन्न विषयाणां प्रापले "श्रीवेङ्कटेश्वरसमाचार पत्रिकामापणदारा चयमिति शाम् । जमराज श्रीकृष्णदास- "श्रीवेटेश्वर" स्टीय-अदृणालयाध्या PERIAGE - का.मा. भा. areen अ. उन्होंके तुम्हारी छोटी बहिन अर्थात् लक्ष्मी स्थिर होकेरहेगी औरस्त्रियों करिके नानाप्रकारकी भेंटदेके सदापूजने योग्यहो॥२७॥ पुष्प गंध आदिसे जे तुम्हारो पूजन करेंगे तिनपर लक्ष्मी प्रसन्न होगीसूत बोले, कृष्णको और सत्यभामाको और नारदको और पृथु को संवाद मैंने वर्णन कीनो॥२८॥और जो पूछो चाहो सो में विस्तारसो कहीं यह उनको वचन सुनतेही ऋषि मन्दहास्य होत तेष्वेवश्री कनिष्टातेसदातिष्ठत्वनामया॥अंगनाभिस्सदापूज्याविविधैलिभिस्तदा ॥ २७॥ पुष्पधूपादि भिश्चैवतेषांलक्ष्मी प्रसीदति।सूतउ०॥कृष्णसत्योश्चसंवादंनारदस्यपृथोस्तथा॥२८॥अन्यत्किंप्रष्टकामाः स्थवदामिचसुविस्तरम् ॥ इतितद्वचनादेवऋषयःसस्मितास्तदा॥२९॥ नोचुःपरस्प्रंकिंचित्तूष्णीमेवावत स्थिरे । जग्मुश्चबदरींद्रष्टुंसवैवैशांतमानसाः ॥३०॥ यइदंशृणुयाहापिश्रावयदानरोत्तमान्॥ सर्वपापैःप्रमु च्येतविष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ॥३१॥ इ०प०का कृष्णसत्यासंवादेएकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः॥२९॥ भये ॥२९॥और आपसमें कुछ न कहत भये चुपचुपानेही बेठे रहे फिर शांतमन हो सबके सबबदरीवनके दर्शनको जातभये॥३०॥ जो यह कथाको सुनैगोवा श्रेष्ठ मनुष्यनको सुनावेगो वह सब पापनसों छुटिजायगो और विष्णुकी सायुज्यको प्राप्तहोयगो॥३१॥ इति श्रीमत्पडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायांकार्तिक टीकायांभा०बो समाख्यायामेकोनत्रिंशोऽध्यायः२९॥समाप्तोऽयग्रंथः इद पुस्तक मुम्बय्या क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना( खेतवाडी ७ वी गली खम्बाटा लैन, ) स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) मुद्रणयन्त्रालये मुद्रयित्वा प्रकाशितम् मार्गशीर्षे सवत् १९७७ शके १८४२. lllcc
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तब पतिके त्यागनेसों दुःखित हो शोकसो रोदन करत भई वाके उस रोदनको लक्ष्मी वैकुण्ठभवनमें सुनत भई ॥ २२ ॥ तब
लक्ष्मी उद्विग्न मन होके विष्णुसों प्रार्थना करत भई ॥ लक्ष्मी बोली, हे स्वामी ! मेरी जेठी बहिन भर्ताके छोडनसों दुःखितहे
॥२३॥ तौहे दयालु ! जो मैं तुम्हारी प्यारी हों तो तुम वाको धीरज देने के लिये जाओ सूत बोले, ता पीछे कृपानिधि विष्णु
तदारुरोदकरुणंभर्तुस्त्यागेनदुःखिता ॥ तत्तस्यारुदितलक्ष्मीकुंठभवनेऽशृणोत् ॥२२॥ तदाविज्ञापया
मासविष्णुमुडिनमानसा ॥ लक्ष्मीरुवाच ॥ स्वामिन्मद्भगिनीज्येष्ठाभर्तुस्त्यागेनदुःखिता॥ २३॥ तामा
श्वासयितुंयाहिकृपालोयद्यहंप्रिया ॥ सूतउवाच॥ लक्ष्म्यासहततोविष्णुस्तत्रागच्छत्कृपानिधिः॥२४॥
आश्वासयन्नलक्ष्मीनामिदंवचनमब्रवीत्॥ विष्णुरुवाच॥ अश्वत्थमूलमाश्रित्यसदाऽलक्ष्मिस्थिराभव॥
॥ २५॥ ममांशसंभवोह्येषआवासस्तेमयाकृतः॥ प्रत्यब्दयेऽर्चयिष्यतित्वांज्येष्ठांग्रहधर्मिणः ॥ २६ ॥
लक्ष्मी सहित वहांजात भये ॥ २४ ॥ उस अलक्ष्मीको धीरज देते हुए यह वचन बोलत भये ॥ विष्णु बोले, हे अलक्ष्मी ! तुम
पीपलके मूलका आश्रय लेके सदा स्थिर रहो ॥ २६ ॥ यह निश्चय मेरे अंशसों उत्पन्न है याते मैंने तुमको यह वसनेके लिये
स्थान दियो और प्रतिवर्ष जे तुम्हारो पूजन करेंगे ॥ २६ ॥
- -- का, मा. ७॥ The भा. ths जहां वृद्ध मनुष्योंका और सज्जनोंको अपमान होताहै और कठोर भाषण होताहै वहां मैं सदा रहती हौं ॥१६॥ दुराचरण करते और पराई द्रव्यको हरलेतेहैं और पराई स्त्रियोंसों रत रहै हैं वा स्थानमें मेरी प्रीतिहै ॥१७॥ जहां सदा गोवध और मद्यपान होता है और ब्रह्महत्या आदि पाप होते हैं उस स्थानमें मेरी प्रीतिहै ॥ १८॥ सूत बोले, या प्रकार वा अलक्ष्मीके वचन सुनिके वृहसजनमित्राणांयत्रस्यादपमाननम्॥निष्ठुरंभाषणंयत्रतत्रनित्यवसाम्यहम् ॥ १६ ॥ दुराचाररतायत्र परद्रव्यापहारिणः॥परदाररताश्चापितस्मिन्स्थानेरतिर्मम ॥ १७॥ गोवधोमद्यपानंचयत्रसंजायतेऽनि शम् ॥ ब्रह्महत्यादिपापानितस्मिन्स्थानेरतिर्मम ॥ १८॥ सूतउवाच॥इतितद्वचनं श्रुत्वाविषण्णवदनोऽ भवत् ॥ उद्दालकस्ततोवाक्यंतामलक्ष्मीमुवाचह ॥ १९॥ उद्दालकउवाच॥अश्वत्थक्षमूलेऽस्मिन्नल क्ष्मीस्त्वंस्थिराभव॥आवासस्थानमालोक्ययावच्चायाम्यहंपुनः ॥ २०॥ सूत उवाच॥इतितांतत्रसंस्था प्यजगामोद्दालकस्तदा ॥ प्रतीक्षेतीचिरंतत्रयावतनददर्शसा ॥ २१ ॥ मलीनमुखहोता पीछे उद्दालक उस अलक्ष्मीको बोलतभये ॥ १९॥ हे अलक्ष्मी! जौलों मैं तुम्हारे रहनेको स्थान देखिके फिरि आऊँ तौलों तुम या वृक्षके नीचे स्थिर रहे ॥२०॥ सूत बोले, ऐसे वाको वहां बैठायके तब उद्दालक चल देत भये वहां बहुत देरताई उनको मार्ग देखती भई वह जब उनको न देखती भई ॥२१॥ - ॥८७ - ज्येष्ठा बोली, वेदध्वनिकरिके युक्त यह वास मेरे योग्य नहीं है हे महाराज ! मैं यहां नहीं आऊंगी निश्चय करि मोहिं अन्यत्र ले चलो ॥१०॥ उद्दालक बोले, हे कांते ! तू काहेसो नहीं आवै तेरी यही निश्चय है तौ तेरे योग्य कौनसो स्थान हे सो कथन कर ॥११॥ ज्येष्ठा बोली, जहां वेदनकी ध्वनि होय है और अभ्यागतनको पूजन होयहै और यज्ञ दान आदि होयहै वहां मैं नहीं ज्येष्ठोवाच ॥ नहिवासोऽनुरूपोऽयंवेदध्वनियुतोमम॥ नचागमिष्येभोब्रह्मन्नयस्वान्यत्रमांध्रुवम् ॥१०॥ उद्दालकउवाच ॥ कथनायासिकान्तेवैवर्त्ततेसंमतंतव ॥ तवयोग्याचवसतिःकाभवेचवदस्वतत्॥११॥ ज्येष्ठोवाच ॥ वेदध्वनिर्भवेद्यस्मिन्नतिथीनांचपूजनम् ॥ यज्ञदानादिकंवापिनैवतत्रवसाम्यहम्॥ १२॥ परस्परानुरागणदांपत्यंयत्रवर्तते ॥ पितृदेवार्चनंयत्रतत्रनैववसाम्यहम्॥ १३॥ उद्यमीनीतिकुशलोधर्म युक्त प्रियंवदः॥गुरुपूजारतोयत्रतस्मिन्नैववसाम्यहम्॥ १४ ॥रात्रौदिषागृहेयस्मिन्दंपत्योःकलहोभवेत्॥ निराशायांत्यतिथयस्तस्मिन्स्थानेरतिर्मम ॥ १५ ॥ वास करौ हौं ॥१२॥ जहां स्त्री और पुरुष परस्पर प्रीतिसों रहैं हैं और पितृ तथा देवतानको पूजन होयहै वहाँ मैं नहीं वास करौं हौं॥ १३ ॥ वहां उद्यम करनहारो नीतिमें चतुर और मधुर बोलनहारो गुरुपूजा करनहारो मनुष्य रहेहैं वहां मैं नहीं रहौं हौं : १४॥जा घरमें रात दिन स्त्री और पुरुषनमें कलह होयहै और अभ्यागत निराश होजाते हैं उस स्थानमें मेरी प्रीति है ॥१५॥ -
का.मा.
भा,
M८६॥
मेरी बडी बहिनि अलक्ष्मीको व्याह करिके पीछे मोहिं ले चलो यह सनातन धर्म है। सूत बोले, या प्रकार लक्ष्मीके वचन सुनि
लोकभावन भगवान् ॥५॥ बडो है तप जिनको ऐसे उद्दालक मुनिको अपने वचनके अनुरोधसों निश्चय उस अलक्ष्मीको देतभये
॥ ६॥ स्थूल है मुख जाको और श्वेत हैं दांत जाके जीर्ण शरीरको धारण किये है और फटेसे हैं कुछ लालहैं नेत्र जाके रूखे
विवाह्यनयमांपश्चादेषधर्मः सनातनः ॥ सूतउवाच ॥ इतितद्वचनंश्रुत्वासविष्णुर्लोकभावनः ॥ ५ ॥
उद्दालकायमुनयेसुदीर्घतपसेतदा ॥ आत्मवाक्यानुरोधेनतामलक्ष्मींददौकिल ॥६॥ स्थूलास्यांशुभ्र
दशनांजरठीविभ्रतींतनुम् ॥ विततारक्तनयनांरूक्षगात्रशिरोरुहाम्॥७॥ समुनिर्विष्णुवाक्यात्तामंगीक
त्यस्वमाश्रमम् ॥ वेदध्वनिसमायुक्तमानयामासधर्मवित् ॥८॥होमधूमसुगंधाढयंवेदघोषनिनादितम्॥
आश्रमं तंसमालोक्यव्यथितासाब्रवीदिदम् ॥९॥
हैं शरीर और बाल जाके ऐसी अलक्ष्मी है ॥७॥ ताहि वे मुनि विष्णुके वाक्यसों अंगीकार करिके वेदध्वनि युक्त जो अपनो
आश्रम है तामें वे धर्मज्ञ उद्दालक मुनि लावत भये ॥८॥ होमके धूमको सुंगधि करिके युक्त और वेदनके पढनेको है शब्द जामें dilai
ऐसे आश्रमको देखि दुःखितहो यह वचन बोलत भई ॥ ९ ॥
ऋषि बोले, हे तात ! यह बोधितरु अर्थात् पीपलको वृक्ष काहेसों छूने योग्य न होत भयो और तैसेही यह शनिवारको काहेसों छूने योग्य होतभयो सो कहो ॥१॥ सूतजी बोले, समुद्र के मथन करनेसों देवतानने जो रत्न पाये उनमेंसे जो देवता लक्ष्मी और कौस्तुभमणि विष्णुको देत भये ॥ २ ॥ जब वे विष्णु अपनी भार्याके अर्थ लक्ष्मीको अंगीकार करने लगे तबहीं ऋषयऊचुः ॥ अस्पृश्यत्वंकथंप्राप्त सूतवोधितरुस्त्वयम् ॥ स्पृश्यत्वंहिकथंयातस्तथायंशनिवासरे॥ १॥ सूतउवाच ॥ समुद्रुमथनाद्यानिरत्नान्यापुस्सुरोत्तमाः॥ श्रियंचकौस्तुभंतेषांविष्णवेप्रदुदुःसुराः ॥ २॥ यावदंगीचकारासौलक्ष्मीभार्यार्थमात्मनः ॥ तावहिज्ञापयामासलक्ष्मीस्तंचक्रपाणिनम् ॥ ३ ॥ लक्ष्मीरुवाच ॥ असंस्कृत्यकथंज्येष्ठांकनिष्टापरिणीयते ॥ तस्मान्ममाग्रजामेतामलक्ष्मीमधुसूदन॥४॥ लक्ष्मी उन चक्रपाणिसों प्रार्थना करत भई ॥ ३॥ लक्ष्मी बोली, जेठी बहिनका संस्कार अर्थात् विवाह किये विनाछोटीको कैसे व्याहते हो ताते हे मधुसूदन ! मेरी वडी बहिनी अलक्ष्मीको व्याह करो ॥४॥ 1 का. मा. भा. 1८५॥ अ. भोगके सुखमें विघ्न होनेसे क्रोधकरिके कांपती भई पार्वती क्रोधित हो देवतानको शाप देतभई ॥२४॥ पार्वती बोली ये कृमि कीट आदिभी भोगके सुखको जानेहैं ताते वा भोग सुखमें विघ्न करनहारे तुम सबदेवता वृक्षनके रूपको प्राप्त होउगे ॥२६॥ मत बोले, ऐसे वह पार्वती क्रोधित हो देवतानको शापदेत भई ताते निश्चय करिके सब देवतानको समूह वृक्ष होजातभये ॥ ततश्चपार्वतीक्रुद्धाशशापत्रिदिवौकसः॥ रतोत्सवसुखभ्रंशात्कंपमानारुषातदा॥२४॥पार्वत्युवाच॥ कृमि कीटादयोऽप्येतेजानंतिमुरतेमुखम् ॥ तहिनकारिणोदेवाशुद्भिदत्वमवाप्स्यथ ॥ २५॥ सूतउवाच॥ एवं सापार्वतीदेवाञ्छशापक्रुद्धमानसातस्माद्वक्षत्वमापन्नास्सवेंदेवगणा किल॥ २६ ॥ तस्मादिमौविष्णु महेश्वरावुभौवभूवतुर्बोधिवटीमुनीश्वराबोधिस्त्वगादार्किदिनंविनैवाऽसंस्पृश्यतामर्कजदृष्टियोगात्॥ ॥ २७ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये कृष्णसत्यभामासंवादे अष्टाविंशतितमोऽध्यायः॥२८॥ ॥२६॥हे मुनीश्वर । ताते ये दोनों विष्णु और महादेव पीपल और बडको रूप होत भये और बोधि जो पीपल है सो शनैश्च रके दिनको छोड़िके शनैश्चरकी दृष्टिके योगसों छूने अयोग्य होत भयो अर्थात् शनैश्चरको पीपल छूनो चाहिये और दिनोंमें नहीं ॥२७॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भाषा थबोधिनीसमाख्यायामशाविंशतितमोऽध्यायः ॥२८॥ ॥८५ me- इन सबनके अभावमें ब्राह्मणको और गौअनको पूजन व्रती न करै अथवा व्रतके पूरण होनेके निमित्त पीपल और बडको पूजन करै ॥१९॥ऋषि बोले, तुमने पीपल और वड कैसे गौ और ब्राह्मणनके समान कीन्हे सबरे वृक्षनमें वे दोनों काहेसे अधिक पू जने योग्यहैं ॥२० ॥सूत बोले, पीपलका रूप भगवान् विष्णु है यामें सन्देह नहीं है और रुद्रका रूप बड है तैसेही ब्रह्माका सर्वाभावव्रतीकुर्याद्राह्मणानांगवामपि॥सेवामश्वत्थवटयोव्रतपूरणहेतवे ॥ १९॥ ऋषयऊचुः॥कयंत्वया श्वत्थवौगोब्राह्मणसमौकृतौ॥सर्वेभ्यस्तुतसभ्यस्तोकस्मात्पूज्यतरौस्मृतौ ॥ २० ॥ सूतउवाच ॥ अ श्वत्थरूपीभगवान्विष्णुरेवनसंशयः॥ रुद्ररूपीवटस्तद्वत्पालाशोब्रह्मरूपधृक्॥२१॥ ऋषयऊचुः॥ कथंट क्षत्वमापन्नाब्रह्मविष्णुमहेश्वराःएतत्कथयधर्मज्ञसंशयोऽत्रमहान्हिनः ॥ २२॥ सूतउवाच॥पार्वतीशिव योदेवाःसुरतंकुर्वतोकिल ॥ अग्निाह्मणरूपेणगतश्चविघ्नकृत्पुरा ॥ २३ ॥ रूप धारण करनहारो ढाक है ॥२१॥ ऋपि बोले, ब्रह्मा और शिव वे कैसे वृक्षपनको प्राप्त भये हे धर्मज्ञ ! यह कहौ यामें निश्च य करिके हमको वडा सन्देह है ॥२२ ॥ सूत बोले, एक समय शिव और पार्वती भोग करि रहेहैं तब सब देवता और अग्नि ब्राह्मणको रूप धरिके जात भये और विघ्न करत भये ॥ २३ ॥ ॥ in का, मा. भा. 1८४॥ भ जो आपत्तिमें परो भयो मनुष्य कहूँ जल न पावै अथवा रोगीहोय विष्णुके नामसों मार्जन करे॥ १४ ॥जो व्रतमें स्थित मनु ज्य उद्यापन विधि करनेको न समर्थ होय तौ व्रतके पूरे होनेके लिये पीछे ब्राह्मणोंको जिमावे ॥१५॥ पृथ्वीमें ब्राह्मण जो अव्य क्त रूप भगवान हैं तिनको स्वरूप हैं ताते ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेसों भगवान् सदा संतुष्ट होय हैं ॥१६॥ यामें सन्देह नहीं हैजो आपद्गतोयदाप्यंभोनलभेत्कुत्रचिन्नरः॥ व्याधितोवायथाकुर्याद्विष्णोनाम्नापिमार्जनम्॥१४॥उद्यापन विधिकर्तुमशक्तोयोव्रतेस्थितः ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चातसदम्पूर्तिहेतवे॥ १५॥अव्यक्तरूपिणोविष्णोः स्वरूपोब्राह्मणोभुवि ॥ तत्संतुष्टयातुसंतुष्टःसर्वदास्यान्नसंशयः॥ १६ ॥ अशक्तोदीपदानायपरदीपंप्रबो धयेत् ॥ तस्यवारक्षणंकुर्यादात्यादिभ्यःप्रयत्नतः॥१७॥अभावेतुलसीनांचवैष्णवपूजयेट्विजम्॥ तस्मा त्सन्निहितोविष्णुस्स्वभक्तेष्वेवसर्वदा ॥ १८॥ दीपदान करनेको असमर्थ होय तौ दूसरेके दीपकको चैतन्य करदे वा बबूले आदिसों उसकी रक्षा यत्नसों करै॥ १७ ॥ जो तुलसीपूजन करनेको न मिले तो वैष्णव ब्राह्मणको पूजन करै काहेसे कि विष्णु अपने भक्तनके सदा निकट रहै हैं ॥ १८ ॥ -- 1c तौ वा मनुष्य करिके यह शुभकार्तिकका व्रत कैसे कियो जाय माते अत्यंत फलको देनहारो यह व्रत मनुष्यन करिके सर्वथा नहीं त्याग करने योग्यहै।॥८॥ सूत बोले, ऐसे सदा दृढव्रत करनहारो पुरुषजो अपवित्रमें परिजाय तो विष्णु वा शिवके मंदिरमें हरिको जागरण करे ॥९॥ जो शिव अथवा विष्णुकोहू मंदिर न होय तौ काहूदेवताके स्थानमें करै जो कठिनवनमें कथंतेनप्रकर्त्तव्यकार्तिकव्रतकंशुभम् ॥ इदमत्यंतफलदंनत्याज्यसर्वथानरैः ॥ ८॥ सूतउवाच॥एवमा पद्गतोयस्तुनरोनित्यदृढव्रतः॥ विष्णोःशिवस्यवाकुर्यादालयेहरिजागरम् ॥९॥ शिवविष्णुगृहाभावेस र्वदेवालयेष्वपि ॥ दुर्गाटव्यांस्थितोयस्तुयदिवापगतोभवेत्॥१०॥ कुर्यादश्वत्थमूलेतुतुलसीनांवनेष्वपि ॥ ११ ॥ विष्णुनामप्रबंधानांगायनविष्णुसंनिधौ॥ गोसहस्रप्रदानेतत्फलमाप्नोतिमानवः॥१२॥ वाद्यक त्पुरुषश्चापिवाजपेयफलं लभेत् ॥ सर्वतीर्थावगाहोत्थंनर्तकःफलमाप्नुयात् ॥१३॥ स्थित होय वा आपत्तिमें होय॥१०॥तौ पीपलके नीचे अथवा तुलसीके वनमें जागरण करौ॥११॥ विष्णुके समीप विष्णुके नामोंके प्रबन्धको गान करनेसों मनुष्य हजार गोदानके फलको प्राप्त होय है॥१२॥ बाजा बजानेवालो पुरुष वाजपेय यज्ञके फल को प्राप्त होय है और नाचनहारो संपूर्ण तीर्थनको स्नान ताके फलको प्राप्त होय है ॥१३॥ ॥
T ।.मा. भा. ८३॥ . हरिकोजागरण करना और प्रातःकाल स्नान करना तुलसीका सेवन करना और दीपदान करना ये कार्तिकके व्रत हैं ॥३॥ये पूर्व कहे भये जो पांच प्रकारके व्रत हैं तिनसो जो व्रत प्राप्त होय है वह भुक्ति तथा मुक्तिको देनहारो है॥४॥ऋपिबोले,विष्णुको प्यारो अत्यंत फलको देनहारो और सुननेसों रोमांचित करनहारो विस्मययुक्त यह कार्तिकमासको इतिहास आपने वर्णन कियो हरिजागरणंप्रातःस्नानंतुलसिसेवनम् ॥ उद्यापनंदीपदानंव्रतान्येतानिकातिके ॥३॥ पंचकैर्ऋतकैरेभिः संपूर्णकार्तिकव्रतम्॥फलमाप्नोतितत्प्रोक्तंभुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥४॥ऋषयऊचुः॥विष्णुप्रियोऽतिफलदः प्रोक्तोऽयंरोमहर्षणकार्तिकप्रभवस्सम्यक्सेतिहासोऽतिविस्मितः॥५॥ अवश्यचतथाकार्य पापदुःख निवृत्तये ॥ मोक्षार्थिभिनरैःसम्यग्भोगकामैरथापिवा ॥६॥ एवंस्थितोयदाकश्चिद्रतस्थस्संकटेस्थितः॥ दुर्गारण्यस्थितोवापिव्याधिभिःपरिपीडितः॥७॥ ॥५॥ यह कार्तिकमासको व्रत पापों के तथा दुःखके दूर करनेके लिये मोक्षके चाहनेवाले तथा भोगोंके चाहनेवाले पुरुपनक रिके अवश्य करने योग्य है ॥ ६॥ ऐसे व्रतस्थित कोई मनुष्य संकटमें परिजाय अथवा कठिन वनमें स्थित होय अथवा रोगन करिके पीडित होय ॥ ७॥ ॥८३
ऐसो है प्रभाव जाको ऐसो यह कार्तिकमास मुक्तिको देनहारो और करनहारो है जाते अनेक पापनको करनहारोह मनुष्यकार्तिक
वत करनहारेके दर्शनसों मुक्तिको प्राप्त होइहै ॥२८॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां
कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भापार्थबोधिनीसमाख्यायां सप्तविंशोऽध्यायः॥२७॥सूत बोले, वासुदेव अति प्यारी सत्यभामासों
एवंप्रभाव खलुकार्तिकेयोमुक्तिप्रदोभुक्तिकरश्चयस्मात् ॥ योहंत्यनेकाजितपातकानिकर्तुश्चसंदर्शनतो
ऽपिमुक्तिम् ॥ २८॥ इति श्रीपद्मपुराण कार्त्तिकमाहात्म्ये सप्तविंशोऽध्यायः॥२७॥सूतउवाच॥इत्युक्त्वा
वासुदेवोऽसौसत्यभामामतिप्रियाम्॥सायंसंध्याविधिकर्तुजगामचनिजगृहम् ॥१॥ एवंप्रभावःप्रोक्तोऽयं
कार्तिकः पापनाशनः॥ विष्णुप्रियकरोऽत्यन्तंभुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥२॥
या प्रकार कहिके सायंकालकी संध्याकी जो विधि ताके करनेको अपने घर जात भये ॥१॥ एसो है प्रभाव जाको और पापको
नाश करनहारो कार्तिक मास मैंने तुमसों कहो यह कार्तिकमास विष्णुभगवानकीप्रीतिको करनहारो है और भुक्तिमुक्तिरूपी
जो फल है ताको देनहारो है ॥२॥
मा.
८२॥
अं. २०
चौरासीकी गिन्तीमें नरकोंके जुदेरभेद हैं अप्रकीर्ण पक्तिय मलिनीकरण तैसेही जातिभ्रंशकर और उपपातक नाम, जाको सोभा, टी,
और अतिपाप महापापये सातप्रकारके पापहैं इन सातोंकरिके सात नरकमें पचाये जाते हैं॥२२॥२३॥और तुम्हारो जो कार्ति
क व्रत करनहारे पुरुषनसों संसर्ग भयो ताके पुण्यसमूहसों तुमकरिके नरक दूरि करेगये॥२४॥२५॥श्रीकृष्ण बोले,ऐसे नरकन
चतुराशीतिसंख्याकै पृथग्भेदानवस्थितान्॥ अप्रकीर्णतुपांक्तेयंमलिनीकरणंतथा ॥२२॥ जातिभ्रंशक
रंतहदुपपातकसंज्ञकम् ॥ अतिपापमहापापंसप्तधापातकंस्मृतम्॥ २३॥ एभिःसप्तसुपच्यतेनिरयेषुयथा
क्रमम् ॥ कात्तिकव्रतिभिःपुंभिर्यत्संसोंऽभवत्तव ॥२४॥ तत्पुण्योपचयात्तत्रनिहतानिरया खलु ॥२५॥
श्रीकृष्णउवाच ॥ दर्शयित्वेतिनिरयान्प्रेतपस्तमथाहरत् ॥धनेश्वरंयक्षलोकेयक्षेशोऽभूत्सतत्रह ॥२६॥
धनदस्यानुगस्सोऽयंधनयक्षेतिविश्रुतः॥ यदाख्ययाऽकरोत्तीर्थमयोध्यायांतुगाधिजः॥२७॥
को दिखायके प्रेतप वा धनेश्वरके यक्षोंके लोकमें लेजातभयो वहां वह यक्षोंको स्वामी होत भयो॥२६॥सो यह धनेश्वर धनयक्ष ॥८॥
या नामसों प्रसिद्ध कुबेरको अनुचर होतभयो जाके नामसों अयोध्यामें विश्वामित्र तीर्थ करत भये ॥ २७ ॥
-
जे अभक्ष्य वस्तुओंके खानेहारे हैं जे निन्दा तथा चुगुली करनेमें तत्पर रहेहैं वे मर्दन करे जाने और मारे जाने पर बड़े भयानक
शब्दनको कर रहेहैं ॥१७॥यहभी दुर्गन्ध आदिसों छः प्रकारको है और घोरहै दर्शन जाको ऐसोयह सातवों कुम्भीपाक ना.
म नरकहै।। १८॥हे धनेश्वर ! यह तैल आदि वस्तुओं करके छःप्रकारको है ताहि तुम देखो यामें महापातकी नर यमदूतनकरिके
अभक्ष्यभक्षकानिन्दापैशुन्याभिरताइमे॥ भज्यमानावध्यमानाःदंतेभैरवानवान् ॥१७॥ षट्प्रकारो
विगंधाधैरसावपिहिसंस्थितः॥ कुंभीपाकःसप्तमोऽयंनिरयोघोरदर्शनः॥ १८॥षोढातैलादिभिर्द्रव्यैर्धने
श्वरविलोकय॥ महापातकिनोयत्रपीड्यन्तेयमकिंकरैः॥१९॥बहून्यब्दसहस्राणि जंतेयमयातनाः॥
चत्वारिंशन्मितानेतान्यधिकान्पश्यरौरवान् ॥ २०॥ अकामात्पातकंशुष्कंकामादामुदाहृतम् ॥
आर्द्रशुष्कादिभिःपापैर्हिप्रकारानवस्थितान् ॥२१॥
दंड दिये जाते हैं अर्थात् तैल आदिमें औटाये जाते हैं ॥१९॥बहुतसी हजारों वर्षपर्यंत इनमें प्राणी यमकी यातनाओंको भोगैहैं।
दो ऊपर चालीस याने ४२हैं प्रमाण जिनको ऐसोजो येरौद्र नरक, तिनको देखो॥२०॥विना कामनाके जो होयहै वह सूखो कहावे
है और जो कामनासों होयहै वह आर्द्र अर्थात् गीला कहा जायहै ऐसे गीले और सूखेके भेदोंसे पाप दो प्रकारके हैं ॥२१॥
1. मा. भा. Sil अ. असिपत्र अर्थात् खड्गन करिके काटे गये और भेडियेके भयसूं भागे भये इतउत चिल्लाते भये पापी मनुष्य पचाये जायहैं अगल नाम यह महाघोर चौथो नरक है ॥ १२ ॥ देखो नाना प्रकारकी फांसियोंसों बांधिके यमदूत ताडना दे रहेहैं याकोभी मारनेके भेदनों छःभेद हैं ।। १३ ॥ कूटशाल्मलि नाम पांचवें नरकको देखो जामें अंगारों के समान सेमलकेसे काटे हो रहे हैं ॥ १४॥ पच्यतेपापिनःपश्यकंदमानाइतस्ततः ॥ अर्गलाख्योमहारौद्रश्चतुर्थोनिरयोह्ययम् ॥१२॥ पश्यनाना विधैःपाशैराबध्ययमकिंकरैः ॥ असावपिचषड्भेदोवधाभेदादिभिःस्मृतः॥१३॥ कूटशाल्मलिनामानं निरयंपश्यपंचमम्॥यत्रांगारनिभाह्येता शाल्मलीलोमसन्निभाः॥ १४॥ यत्रषोढाभिपच्यतेयातनाभि रिमेजनाः॥ परदारपरद्रोहपरद्रव्यरताश्चये ॥१५॥ रक्तपूयमिमंपश्यषष्ठंनिरयमुल्बणम् ॥ अधोमुखा विपच्यतेयत्रपापकृतोनराः ॥ १६ ॥ जामें पराई निन्दा पराये द्रोहके करनहारे और पराई द्रव्यके लेनहारे ये जन यमकी यातनाओंसे छःप्रकारकरिके पचाये जातेहैं। ॥ १५ ॥रक्तपूय अर्थात् जामें रुधिर और पीब भरोहै ऐसे इस छठे उल्बण नरकको देखो जामें पापी मनुष्य नीच मुहको करिके लटकाये जाते हैं ॥ १६॥ , ॥८१
जे अभक्ष्य वस्तुओंके खानेहारे हैं जे निन्दा तथा चुगुली करनेमें तत्पर रहेहैं वे मर्दन करे जाने और मारे जाने पर बड़े भयानक
शब्दनको कर रहेहैं ॥१७ ॥यहभी दुर्गन्ध आदिसों छः प्रकारको है और घोरहै दर्शन जाको ऐसोयह सातवों कुम्भीपाक ना
म नरकहै।।१८॥हे धनेश्वर ! यह तैल आदि वस्तुओं करके छःप्रकारको है ताहि तुम देखो यामें महापातकीनर यमदूतनकरिके
अभक्ष्यभक्षकानिन्दापैशुन्याभिरताइमे॥भज्यमानावध्यमानाःदंतेभैरवानवान् ॥१७॥ षट्प्रकारो
विगंधाधैरसावपिहिसंस्थितः॥ कुंभीपाकःसप्तमोऽयंनिरयोघोरदर्शनः॥ १८॥ षोढातैलादिभिर्द्रव्यैर्धने
श्वरविलोकय ॥ महापातकिनोयत्रपीड्यन्तेयमकिंकरैः॥१९॥वहून्यब्दसहस्राणि जंतेयमयातनाः ॥
चत्वारिंशन्मितानेतान्यधिकान्पश्यरौरवान् ॥ २०॥ अकामात्पातकंशुष्कंकामादामुदाहृतम् ॥
आर्द्रशुष्कादिभिःपापैडिप्रकारानवस्थितान् ॥२१॥
दंड दिये जाते हैं अर्थात् तैल आदिमें औटाये जाते हैं ॥१९॥बहुतसी हजारों वर्षपर्यंत इनमें प्राणी यमकी यातनाओंको भोगैहै
दो ऊपर चालीस याने४२हैं प्रमाण जिनको ऐसोजो ये रौद्र नरक तिनको देखो॥२०॥विना कामनाके जो होयहै वह सुखो कहावै
है और जो कामनासों होयहै वह आर्द्र अर्थात् गीला कहा जायहै ऐसे गीले और सूखेके भेदोंसे पाप दो प्रकारके हैं ॥२१॥
1. मा. भा. अ. S असिपत्र अर्थात् खड्गन करिके काटे गये और भेडियेके भयसू भागे भये इतउत चिल्लाते भये पापी मनुष्य पचाये जांयह अगल नाम यह महाघोर चौथो नरक है ॥ १२ ॥ देखो नाना प्रकारकी फांसियोंसों बांधिके यमदूत ताडना दे रहेहैं याकोभी मारनेके भेदनसों छःभेदहैं ॥ १३ ॥ कूटशाल्मलि नाम पांचवें नरकको देखो जामें अंगारों के समान सेमलकेसे कांटे हो रहे हैं ॥१४॥ पच्यतेपापिनःपश्यकंदमानाइतस्ततः ॥ अर्गलाख्योमहारौद्रश्चतुर्थीनिरयोह्ययम् ॥१२॥ पश्यनाना विधःपाशैराबध्ययमकिंकरैः ॥असावपिचपड्भेदोवधाभेदादिभिःस्मृतः॥१३॥ कूटशाल्मलिनामानं निरयंपश्यपंचमम्॥यत्रांगारनिभाह्येता शाल्मलीलोमसन्निभाः॥ १४ ॥ यत्रषोढाभिपच्यतेयातनाभि रिमेजनाः॥ परदारपरद्रोहपरद्रव्यरताश्चयें ॥१५॥ रक्तपूयमिमंपश्यषष्ठंनिरयमुल्बणम् ॥ अधोमुखा विपच्यतेयत्रपापकृतोनराः ॥ १६ ॥ जामें पराई निन्दा पराये द्रोहके करनहारे और पराई द्रव्यके लेनहारे ये जन यमकी यातनाओंसे छःप्रकारकरिके पचाये जातेहैं। ॥ १५ ॥रक्तपूय अर्थात् जामें रुधिर और पीब भरोहै ऐसे इस छठे उल्बण नरकको देखो जामें पापी मनुष्य नीच मुहको करिके लटकाये जाते हैं ॥१६॥ ॥८ ३ - या नरककेछः दहें यह नानाप्रकारके पापनसों मिले है तैसेही अंधतामिस्रनाम यह दूसरा बड़ा नरक है॥६॥ देखो सुईके । समान पैन, मुख जिनके और घोर मुख जिनके ऐसे तमोतक्यादि कीडों करिके पापी मनुष्यनके देह भेदन किये जाय हैं ॥ ७ ॥ यहभी छप्रकारको है कुत्ते गीध आदि पक्षियों करिके पराये मर्मके भेदन करनेवाले पापी पचाये जाते हैं ॥ ८॥ तीसरो षड्भदस्त्वषनिरयोनानापापैःप्रपद्यते ॥ तथैवांधतमिस्रोऽयंद्वितीयोनिरयोमहान्॥६॥पश्यसूचीमुखैदेहा भियंतेपापकर्मणाम् ॥ कृमिभिघोरवक्रैश्चतमोतक्यादिभिडिज ॥७॥ असावपिस्थितःषोढाश्वगृध्रपति भिस्तथा ॥ परमर्मभिदोमाःपच्यतेतेषुपापिनः॥८॥ तृतीयःक्रकचोह्येषनिरयोघोरदर्शनः॥यत्रेमेक कचैमा पच्यतेपापकारिणः॥९॥असिपत्रवनाद्यैश्चषट्प्रकारोऽप्ययस्थितः॥पत्नीपुत्रादिभिर्यवैवियो गप्रापयतिहि॥१०॥इष्टैरन्यैरपिनरान्पच्यतेतइमेनरा॥असिपश्छिद्यमानाकभीत्यापलायिता॥११॥ यह कचनाम घोरदर्शन नरक है जामें ये पापी मनुष्य क्रकच जो आरा है तिसकरिके चीरे जाय हैं ॥९॥ यह कचनाम हू नरक असिपत्रवनादिक भेदनसोछः प्रकारको है यामें ये मनुष्य स्त्री पुरुप आदिकनको वियोग कराय देयहै वे पचाये जाय है, ॥१०॥ औरप्यारी वस्तुसे तथा औरनसे वियोग करावै है वे मनुष्य पचाये जांय हैं ॥११॥ ११ .मा. भा.दी ८०॥ अ.२ श्रीकृष्ण बोले, ता पीछे यमकी आज्ञा करनहारो प्रेतपति है सो सब नरकनके दिखानेकी इच्छासों धनेश्वरको लेजायके वचन बोलत भयो॥१॥ प्रेतपति बोलो, हे धनेश्वर । ये जो भयावने नरक है तिन्हें देखो जिनमें पापी पाप करनहारो मनुष्य यमके दूतन करि पचाये जाय हैं ॥२॥ भयानक है दर्शन जाको ऐसो यह तप्तवालुक नाम नरक है जामें अंत समय जली है देह श्रीकृष्णउवाच ॥ततोधनेश्वरंनीत्वानिरयान्प्रेतपोऽब्रवीत् ॥ दर्शयिष्यस्तुतान्सर्वान्यमानुज्ञाकरस्तदा।। ॥१॥प्रेतउवाच॥ पश्येमान्निरयान्घोरान्धनेश्वरमहाभयान ॥ येषुपापकरानित्यंपच्यतेयमकिङ्करैः ॥२॥ तप्तवालुकनामायनिरयोघोरदर्शनः॥ यस्मिन्नतेदग्धदेहाः क्रंदतेपापकारिणः॥३॥अतिथीन्वैश्व देवान्तेक्षुत्क्षामानागतांश्चये ॥न पूजयंतितेह्येतेपच्यतेस्वेनकर्मणा॥४॥गुर्वग्नीन्ब्राह्मणान्गाश्ववेदान्मूर्दा भिषिक्तकान् ॥ ताडयंतिपदायेवैतेनिर्दग्धांघ्रयस्त्विमे ॥५॥ जिनकी ऐसे पापी चिल्लाय रहेहैं ॥३॥ बलिवैश्वदेव कर्मके अंतमें अर्थात् भोजन समय क्षुधासे पीडित आये भये अभ्याग तका पूजन नहीं करते हैं वे यहां नरकमें अपने कर्मकरिके पचाये जाय ॥४॥ गुरु अग्नि ब्राह्मण गौ वेद और क्षत्रियको जो पादसों ताडन करे हैं वे ये मनुष्य जरे भये पांवनके हैं ॥५॥ ॥८॥ ले.
ताते दूरि होगये हैं पाप जाके ऐसो यह धनेश्वर उत्तम गति पानेके योग्य है वैष्णवोंको वाके ऊपर अनुग्रह है याते यह नरकमें पचाने योग्य नहीं है ॥३४॥जैसे गीले सुख पापोंकरि नरक भोगना निकटवर्ती होता है ऐसेही सुकृत करके स्वर्गकी निकटता प्राप्त होती है ॥३५॥ ताते नहीं है आर्द्र पुण्य जाके ऐसो क्षययोनिमें स्थित यह पापोके भोगके दिखलाने वालेनौको देखिके तस्मानिर्गतपापोऽयंसद्धतिप्राप्तुमर्हति वैष्णवानुग्रहीयस्मान्निरयेनैवपच्यताम् ॥३४॥ आर्द्रशुष्कैर्यथा पानिरयेभोगसन्निधिः॥प्राप्यतेसुकृतेस्तहत्स्वर्गस्यसन्निधिस्तदा ॥३५॥ तस्मादनार्द्रपुण्योहियक्षयोनि स्थितस्त्वयम्॥विलोक्यनिरयान्सर्वान्पापभोगप्रदर्शकान्॥ ३६॥श्रीकृष्णउवाच॥इत्युक्त्वागतवतिना रदःससौरिस्तहाक्यश्रवणविवुद्धतत्सुकर्मा ॥ तंविप्रपुनरनयत्स्वर्किकोणतान्सान्निरयगणान्प्रदर्शयि ष्यन् ॥ ३७॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये धनेश्वरोपाख्याने षड्दिशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ मुक्ति पावै ॥३६॥ श्रीकृष्ण बोले, ऐसे कहिके जब नारद चले गये तव नारदके बचनोंके सुननेसों जाने हैं वाधनेश्वरके सुकर्म जिन्होंने ऐसे सूर्यके पुत्र यमराज अपने दूतके द्वारा वा ब्राह्मणको नरक दिखानेकी इच्छासों फिर बुलावत भये ॥ ३७॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यभापाटीकायांभाषार्थबोधिनीसमाख्या यांषड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥ AN .
भा,
भा.
.९॥
अ. २६
जो मनुष्य पुण्य करनहारे मनुष्यनको दर्शन और स्पर्श उनसों संभाषण करें हैं तो वह दर्शन आदिको करनहारो मनुष्य
पुण्य कर्म करनहारेके पुण्यमेंसे छठो भाग निश्चय करि पावै है ॥ २९॥ और धनेश्वरने तो अगनित कार्तिकत्रत करनहारे
मनुष्यनसों महीनाभरि संसर्ग कियो है ताते उनके पुण्यमें यह अंशको भागी है ॥३०॥ उनकी परिचर्या करनहारो यह संपूर्ण
यःपुण्यकर्मिणांकुर्याद्दर्शनस्पर्शभाषणम् ॥ ततःषडंशमाप्नोतिपुण्यस्यनियतंनरः ॥२९॥ संख्यातीतैस्तु
संसगैकृतवान्वैधनेश्वरः॥ कार्तिकव्रतिभिर्मासंतेषांपुण्यांशभागयम् ॥ ३० ॥ परिचर्याकरस्तेषांसंपूर्ण
व्रतभागयम्॥अतऊर्जव्रतोद्धृतपुण्यसंख्यानविद्यते ॥ ३१॥ कात्र्तिकवतिनापुंसांपातकानिमहान्त्यपि॥
प्रदहन्नात्ममहसाविष्णुःसद्भक्तवत्सलः ॥३२॥ अंतेचनर्मदातोयैस्तुलसीमिश्रुितैस्वयम् ॥ वैष्णवैःस्ना
पितोविष्णोन मसंश्रावितोऽपिच ॥ ३३॥
व्रतके अंशको भागीहे याही कार्तिकके व्रतसों उत्पन्न भयो जो पुण्यहै ताकी संख्या नहीं हैं॥३॥कार्तिक व्रत करनहारे पुरुष
नके बडे भारीहू पापनको भक्तवत्सल भगवान् अपने तेजसों भस्म करिदेत हैं॥३२॥और अंत समयमें यह धनेश्वर वैष्णवनसे
तुलसीदलन करि मिले भय नर्मदाके जलसों स्नान करायो गयोहै ॥३३॥
॥७९॥
वा कुम्भीपाकमें वा धनेश्वरके डारतेही वाकी अग्नि ऐसी शीतलताको प्राप्त होगई जैसे पहले प्रहाद के डारनेसों भई थी॥३०॥
यह बडा आश्चर्य देखिके प्रेतपति विस्मययुक्त हो वह आयके वा समय वह सब यमसों कहत भये॥२६॥ यमराज तौ प्रेतपति
करिके निवेदन कियो जो कौतुक है ताहि सुनिके आःयह कैसी बात है ऐसे कहि वाहि बुलाके विचार करत भये॥२६॥ तंबहीं
यावत्क्षिप्तश्चतत्रासौतावच्छीतलताययो॥ कुंभीपाकेयथावह्निःप्रहादक्षेपणात्पुरा ॥ २४ ॥ तदृष्ट्वामह
दाश्चर्यप्रेतपाविस्मयान्विताः ॥ वेगादागत्यतत्सर्वयमायावेदयंस्तदा ॥ २५॥ यमस्तुकौतुकंदृष्टाप्रेतपै
श्वनिवेदितम्॥आःकिमेतदितिप्रोच्यतमानीयव्यचारयत् ॥ २६ ॥ तावदभ्यागतस्तत्रनारदःप्राहसत्व
रम् ॥ यमेनपूजितःसम्यक्तंदृष्ट्वावाक्यमब्रवीत् ॥ २७ ॥ नारदउवाच ॥ नैवायंनिरयानभोक्तुमर्होह्य
रुणनंदन ॥ यस्मादंतेस्यसंजातंकर्मयन्निरयापहम् ॥२८॥
वहां आये भये और यमराज करि भली भांति पूजे गये नारद मुनि वाहि देखि हँसिके वचन बोलत भये॥२७॥हे अरुणनंदन। यह
नरक भोगन योग्य नहीं है जाते याको नरक दूरि करनहारो कर्म भयो है ॥२८॥
मा
भा. दी
७८॥
अ.२६
चित्रगुप्त बोले,याको बालपनसों लगायके कहीं कोई सुकृत नहीं दीखे हैं हे यमराज ! याके पापनको वर्णन एक वर्षहूँ में नहीं
हो सकैगो॥१९॥हे महाराज ! यह दुष्ट केवल पापहीकी मूर्ति दिखाई देय है ताते कल्प पर्यन्त नरकमें याहि पचानो योग्य
है ॥२०॥ श्रीकृष्ण बोले,ता पीछे यमराज वह अपनो कालसमान अग्निरूप दिखाके क्रोधसों अपने दूतनसों वज्रके समान
चित्रगुप्तउवाच ॥ नवास्यदृश्यतेकिंचिदावाल्यात्सुकृतं कचित् ॥ दुष्कृतंशक्यतेवक्तुंवर्षेणापिनमा
स्करे ॥ १९॥ पापमूर्तिरयदृष्ट केवलंदृश्यतेविभो ॥ तस्मादाकल्पमर्यादंनिरयेपरिपच्यताम् ॥ २० ॥
श्रीकृष्णउवाच॥वज्रतुल्यंवचःक्रोधाद्यमःप्राहस्वकिंकरान्॥ दर्शयन्नात्मनोरूपंतच्चकालाग्निसंनिभम् ॥
॥२१॥ यमउवाच ॥ भो प्रेतपतयस्त्वेनंवध्यमानंस्वमुद्रैः ॥ कुंभीपाकेक्षिपेच्चासौढुष्टाकल्मषदर्शनः॥
॥ २२॥ ततोमुद्गरनिर्भिन्नमूडनिंप्रेतपोनयत् ॥ कुभीपाकेचतंक्षित्वातैल कथनशब्दिते ॥ २३ ॥ .
वचन बोलत भये ॥२१॥ हे प्रेतपतियों ! याहि अपने मुद्रनसों मारत भये कुंभीपाक नाम नरकमें डारो यह दुष्ट है और
याको पापरूप दर्शन है ॥ २२ ॥ तापीछे मुद्गरसों फोरो गयो है मस्तक जाको ऐसे वा धनेश्वरको प्रेतपति लेके तेलके औटने
को है चिरचिराहट जामें ऐसे कुम्भीपाक नरकमें डारत भयो ॥ २३ ॥
॥७८॥
मोमें और रुद्र में जो कोई अन्तर मानगो वाकी संपूर्ण पुण्यकामोंकी क्रिया निस्संदेह निष्फल होजायँगी॥ १४॥ ता पीछे
प्रजा आदिको देखतोभयो वह ब्राह्मण धनेश्वर भ्रमण करतो भयो ता समय वह कारे सांप करि काटो गयो और व्याकुलहो
के गिरत भयो ॥१५॥ मनुष्यवाहि गिरो भयो देखि कृपायुक्त हो घेरि लेत भये और वा समय तुलसी युक्त जल वाके मुख में
ममरुद्रस्ययः कश्चिदन्तरंपरिकल्पयेत् ॥ तस्यपुण्यक्रियास्सर्वानिष्फलाःस्युर्नसंशयः॥१४॥ततःपूजादि
कंपश्यन्बभ्रामसधनेश्वरः॥ तावत्कृष्णाहिनादष्टोविह्वलः सपपातह ॥ १५॥ जनास्तंपतितंवीक्ष्यप
वित्रुकृपान्विताः॥ तुलसीमिश्रितंतोयंतन्मुखेसिषिचुस्तदा ॥ १६ ॥ अथदेहंपरित्यक्तंतंबद्धायमकिंक
राः॥ ताडयन्तःकशाघातैनिन्युःसंयमनीरुषा॥ १७॥ चित्रगुप्तस्तुतंदृष्ट्वायमायावेदयत्तदा ॥ आबाल
वात्तेनपुराकर्मयदुष्कृतंकृतम् ॥ १८ ॥
डारत भये ॥१६॥ या पीछे वाकी देह छूटि गई तब यमके दूत वाहि वांधिके कोडनसों मारत भये संयमनी नाम जो यमकी
पुरी है तामें क्रोधसों ले जात भये ॥१७ ॥ चित्रगुप्त वाहि देखिके बालकपनसों जो पहले दुष्कर्म किये हैं वा समय तिन सब
नको निवेदन यमराजसों करत भये ॥१८॥
मा.
भाग
७॥
अ. २६
.
नित्य वहां भ्रमण करतो भयो वह धनेश्वर वैष्णवनके दर्शन और स्पर्शन संभाषणसों विष्णुके नामको जो स्मरण है ताहि प्राप्त
होत भयो ॥९॥ ऐसे एक मास स्थित वह धनेश्वर करी जाती भई कार्तिकको उद्यापन विधिको और भक्तिसहित जो हरिको
जागरणहै ताहि देखत भयो॥ १० ॥ ता पीछे पौर्णमासीको ब्राह्मण और गौको पूजन आदि जो है ताहि और व्रत करनहारे पुरु
नित्यपरिभ्रमंस्तत्रदर्शनस्पर्शभाषणात् ॥ वैष्णवानांतथाविष्णोर्नामसंस्मरणलभन् ॥९॥ एवंमासंस्थि
तःसोऽथकात्र्तिकोद्यापनेविधिम् ॥ क्रियमाणंददासौभक्त्याजागरणंहरेः॥१०॥पौर्णमास्यांततोऽपश्य
हिप्रगोपूजनादिकम् ॥ दक्षिणाभोजनाद्यचदीयमानंव्रतस्थितैः ॥ ११॥ ततोऽस्तिमयेचैवदीपोत्सव
विधिंतदा ॥ क्रियमाणंददासीप्रीत्यर्थ त्रिपुरद्विषः॥ १२॥ त्रिपुराणांकृतोदाहोयतस्तस्यांशिवेनतु ॥
अतस्तु क्रियतेतस्यांतिथौभक्तैर्महोत्सवः ॥ १३ ॥
पनकी दी भई दक्षिणानको और भोजन आदिको देखत भयो ।॥ ११ ॥ ता पीछे सूर्यके अस्त होनेके समय शिवजीकी प्रसन्न
ताके निमित्त कीभई जो दीपदानकी विधि है ताहि वह धनेश्वर देखत भयो ॥१२॥ जाते उस तिथिमें शिवजी करिके त्रिपुरासुरके
रचित तीनों पुरनको दाह कियो गयो है याते वा तिथिमें भक्तनकरि बडो उत्सव कियो जाय है ॥ १३ ॥
॥७७॥
महिष करिके वह पहले बसाई गई ताते याको नाम माहिष्मती भयो पापनकीनाश करनहारी नर्मदा नदी नगरीको परकोटाहो
रही है ॥४॥ वहां वह धनेश्वर अनेक ग्रामोंसों आये भये कार्तिकके व्रत करन हारेनको देखि एक महीना वहां वास करत भयो
॥५॥ वह बेचनेके कारणसों नित्य नर्मदा नदीके तीर भ्रमण करतो भयो न्हाये और जप तथा देवताओंकी पूजामें लगे भये
महिषेणकृतापूर्वतस्मान्माहिष्मतीतिसा ॥ यस्यावप्रगताभातिनर्मदापापनाशिनी ॥४॥ कार्तिकवति
नस्तत्रनानाग्रामागतानरान् ॥ सदृष्ट्वा विक्रयंकुर्वन्मासमेकमुवासह ॥५॥ सनित्यनर्मदातीरेभ्रमन्वि
क्रयकारणात् ॥ ददर्शवाह्मणान्स्नाताञ्जपदेवार्चनेस्थितान् ॥ ६॥ कांश्चित्पुराणंपठतःकांश्चिच्चश्रवणे
रतान् ॥ नृत्यगायनवादित्रविष्णुश्रवणतत्परान् ॥७॥ विष्णुमुद्रांकितान्कांश्चिन्मालातुलसिधारिणः॥
ददर्शकौतुकाविष्टस्तत्रतत्रधनेश्वरः॥८॥
ब्राह्मणनको देखत भयो॥६॥ कोई पुराण पढरहे हैं औरकोई पुराणोंके सुननेमें लगेहैं और कोई विष्णु के नृत्य गान और बाजा
आदिके सुनने में लगे ऐसे देखत भये ॥ ७ ॥ काहूको विष्णुकी मुद्रानसों अंकित और तुलसीकी माला धारण किये भये वहां
धनेश्वर कौतुक युक्त मन होके देखत भयो॥८॥
मा.
भा.
७६॥
अ.२६
ऐसेविना दियेहू पराये इकडे करे भये पुण्य पाप मिले हैं परन्तु कलियुगमें यह नियम नहीं करनी चाहिये काहे सों किकर्ता
ही पुण्यपापको भोगे है॥२८॥ यामें पहिले व्यतीत भयो बहुत उग्र इतिहास पवित्र और मतिको देनहारोहे ॥२९॥ इति श्रीम
पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां कार्तिकमाहात्म्यभाषाटीकायां पंचविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
श्रीकृष्ण बोले, पहले उज्जैन नगरीमें ब्राह्मणकमसों रहित और पापयुक्तहैं कर्म जाके और अत्यन्त दुष्ट है बुद्धि जाकी ऐसोधने
इत्थंबूदत्तान्यपिपुण्यपापान्यायांतिनित्यंपरसंचितानि॥कलौत्वयंवैनियमौनकार्यकर्तेवभोक्ताखलपुण्य
पापयोः ॥ २८ ॥शृणुष्वचास्मिन्नितिहासमुग्रंपुराभवपुण्यमतिप्रदंच ॥२९॥ इति श्रीपद्मपुराणकार्तिक
माहात्म्ये पंचविंशोऽध्यायः ॥ २५॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ पुराऽवंतीपुरेकश्चिहिप्रआसीढनेश्वरः॥ ब्रह्मक
र्मपरिभ्रष्टःपापकर्मासुदुर्मतिः॥१॥रसकंबलचौद्यःसोऽसत्यान्तवृत्तिक॥स्तेयवेश्यासुरापानयुक्तःसंतप्त
मानसः॥२॥ देशाद्देशान्तरंगच्छन्क्रयविक्रयकारणात्॥ माहिष्मतीपुरीमागात्कदाचित्सधनेश्वरः॥३॥
श्वर नाम कोई एक ब्राह्मण होत भयो ॥१॥वह रस कंबल चर्म आदिको करिके वाणिज्यकीजीविका करै हो और चोरी वेश्या
गमन और सुरापान इनको सदा करै हो और वाको मन सन्तापयुक्त रहतो हो ॥२॥ और वह धनेश्वर ब्राह्मण खरीदने और बे
चनेके निमित्त देशदेशान्तरमें फिरतो भयोमाहिष्मती अर्थात् महेसरिनाम नगरीको जात भयो ॥ ३ ॥
बुद्धिको देनहारो अर्थात सिखावनहारो और सलाह देनहारो वा कर्मकी सामग्री देनहारो और प्रेरणा करनहारो मनुष्य पुण्य
पापक छठे भागको प्राप्त होय है॥२३॥प्रजाफे पुण्यपापको छठो भागराजा पावै है तैसेही शिष्यसों गुरुस्तीसों पति पुत्रसों
पिता छठो भाग पावैहै ॥२४॥ अपने पतिके पुण्यको आधो भाग स्त्री पावैहै जो उसकी आज्ञामें रहनहारी और प्रसन्न करन
बुद्धिदातानुमंताचयश्चोपकरणप्रदः॥ प्रेरकश्चापिषष्टांशंप्राप्नुयात्पुण्यपापयोः ॥ २३॥प्रजाभ्यःपुण्यपा
पानां राजाषष्टांशमुहरेत्॥शिष्यावसास्त्रियोभर्त्तापितापुत्रात्तथैवच ॥ २४ ॥ स्वपत्युरपिपुण्यस्ययोषिद
ईमवाप्नुयात्॥ चेत्तस्यानुव्रतासास्याद्भर्तुःसंतुष्टिकारिणी ॥ २५॥परहस्तेनदानानिकुर्वतःपुण्यकर्मणः।।
विनाभृतकपुत्राभ्यांकषिष्ठांशमुद्धरेत् ॥२६॥ वृत्तिदोरत्तिसभोक्तःपुण्यंषष्ठांशमुहरेत् ॥ आत्मनोवाप
रस्यापियदिसेवांनकारयेत् ॥ २७॥
हारी होय तौ अन्यथा नहीं भाग पावैगी ॥२५॥ जो पुण्यात्मा पुरुष पराये हाथसों दान करैहै तौ नौकर और पुत्रको छोडि
के करनहारो छठो भाग पावैहै।।२६॥जीविका देनहारो वाके खानहारके पुण्यको छठो भाग पावैहै जो अपनी वा और की सेवा
न करावै तौ अन्यथा नहीं ॥२७॥
.मा. भा. ७५॥ अ.२ - एक पंक्तिमें भोजन करनहारे मनुष्यनमें जो परोसनेका उल्लंघन करैहै अर्थात् नहीं परोसैहै तो वह उल्लंघन कियो मनुष्य वाके पुण्यके छठे भागको प्राप्त होयहै ॥ १८॥ स्नान तथा संध्या आदि करनेमें कोई जोछूले अथवा बातचीत करें तोवह करनेहारो मनुष्य अपने शुभकर्मको छठो भाग वाको निश्चय देय है ॥ १९ ॥जो पुरुष धर्मके निमित्त दूसरे मनुष्यसों धनकी याचना एकपत्त्यश्नतांयस्तुलंघेतपरिवेषणम्॥तत्पुण्यस्यषडशंतुलभेद्यस्तुविलंधितः ॥ १८॥ स्नानसंध्यादिकं कुर्वन्यःस्पृहाथभाषते ॥ तत्पुण्यकर्मषष्ठांशंदद्यात्तस्मैसुनिश्चितम् ॥ १९॥ धर्मोद्देशेनयद्रव्यमपरं याचतेनरः ॥ तत्कर्मजयस्यधनंतस्यदत्त्वाप्नुयात्फलम् ॥२०॥ अपहृत्यपरद्रव्यंपुण्यकर्मकरोतियः॥ कर्मकृत्पापभाक्तत्रधनिनस्तद्भवंफलम् ॥२१॥ नापकृत्यऋणंयस्तुपरस्यम्रियतेनरः॥ धनीतत्पुण्यमा दत्तेतहनस्यानुरूपतः ॥२२॥ करे है तो वह वाहि धन देके वाके कर्मके फलको प्राप्त होयहै ॥२०॥ पराई द्रव्यको लेके जो कोई पुण्य कर्म करै है तो कर्म कर नहारो पापभागी होय है और धनवालेको कर्मको फल मिलहै ॥२१॥ और जो मनुष्य दूसरेके ऋण दिये विना मृत्युको प्राप्त होयहै तो वह अपने धनके अनुरूप धनीको पुण्य ग्रहण करलेहे ॥ २२ ॥ '", ॥७
पढानेसों यज्ञ करानेसों और एक पंक्तिमें भोजन करनेसों मनुष्य पुण्य और पापनके चतुर्थांश फलको परोक्षमें प्राप्त होय हैं
॥ १३॥ देखने और सुननेसों तैसेही मनके ध्यानसों मनुष्यको पुण्य और पापनको सौवॉ भाग प्राप्त होय है ॥ १४ ॥ और
दूसरेकी निन्दा और चुगली और धिकार देना इन बातोंके करनेसों वाके करे भये पापोंको लेके अपने पुण्य देयहै ॥१६॥
अध्यापनाद्याजनाहाप्येकपंक्त्यशनादपि॥तुशिंपुण्यपापानांपरोक्षलभतेनरः॥ १३॥ दर्शनश्रवणा
भ्यांचमनोध्यानात्तथैवच ॥ परस्यपुण्यपापानांशतांशंप्राप्नुयान्नरः ॥१४॥ परस्यनिंदांपैशुन्यधिक्कार
चकरोतियः॥ तत्कृतपातकंप्राप्यस्वपुण्यंप्रददातिसः ॥ १५॥ कुर्वतःपुण्यपापानिसेवायः कुरुतेपरः॥
पत्नीभृतकशिष्येभ्योयदन्यःकोऽपिमानवः॥ १६ ॥तस्यसेवानुरूपंचद्रव्यंकिंचिन्नदीयते॥सोऽपिसेवानु
रूपेणतत्पुण्यफलभाग्भवेत् ॥ १७ ॥
पुण्य और पापनको करतो भयो जो पुरुपहै ताकी सेवा स्त्री नौकर तथा शिष्य इनको छोड़िके और दूसरो मनुष्य करैहै ॥१६॥
और वाकी सेवाके अनुरूप वाको कुछ धन न दियो जाय तो वह मनुष्य सेवाके अनुरूप वाके पुण्यमें अंशभागी होय ॥१७॥
मा.
७४॥
अॅ. २५
हे प्रभु ! जो परायो कियो पुण्यहै वह देने सों मिलसकै है और विना दियो हू काहू मार्गसो मिलसकै है कि नहीं सो कहिये॥८॥ भा, टी,
श्रीकृष्णजी बोले,विना दिये भये पुण्य तथा पाप जैसे मनुष्यनको और जा कर्म करिके मिलैहैं सो यथावत अर्थात् ठीक ठीक
सुनो ॥९॥ सतयुग आदि अर्थात् नेता और द्वापर में देश गांव और कुल पुण्य पापके अंशभागी होत हैं और कलियुगमें
दत्तंचलभ्यतेपुण्यंयत्परेणकृतंकिल ॥ अदत्तकेनमार्गेणलभ्यतेवानवेतिच ॥८॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ अद
तान्यपिपुण्यानिपापान्यपि तथानरैः ॥ प्राप्यतेकर्मणायेनतद्यथावन्निशामय॥९॥देशग्रामकुलानिस्य
र्भागभांजिकृतादिषु ॥ कलौतुकेवलंक फलभुक्पुण्यपापयोः॥१०॥ अकृतेऽपिहिसंस व्यवस्थेयमुदाह
ता॥ संसर्गात्पुण्यपापानियथायांतितथागृणु॥११॥ एकास्यामैथुनाद्योनेरेकपात्रस्थभोजनात्॥फलाई
प्राप्नुयान्मयोयथावत्पुण्यपापयोः ॥१२॥
तौ केवल करनेकालो पुण्य तथा पापको भागी होय ॥१०॥'संसर्ग न करके भी यह व्यवस्था कही गई और संसर्गसोंजैसे
पुण्य पाप दूसरेको मिले हैं सो सुनो ॥११॥ एक स्थानमें बैठनेसों भोग करनेसों विवाह आदि याने संबंधसों और एक पात्रमें
भोजन करनेसों मनुष्य पुण्य तथा पापको आधो फल पावैहै ॥ १२ ॥
ताते ये तीनों व्रत मोको बहुतही प्यारेहैं माघको तथा कार्तिकको और तैसेही एकादशीको ॥ २ ॥ वनस्पतियोंमें तुलसी और
महीने में कार्तिक और तिथियोंमें एकादशी तथा क्षेत्रों में द्वारका मोको प्यारी है ॥३॥इंद्रियोंको वश में करिके जो इनको सेवन
करंगो सो मोको जैसे प्यारो होयगो वैसो यज्ञादिकनसों नहीं होयगो॥४॥ वा पुरुषको नियम करिके पापनसों भय न करनो
तस्माद्रतत्रयोतन्ममातीवप्रियंकरम् ॥ माघकार्तिकयोस्तहत्तथैवैकादशीव्रतम् ॥२॥ वनस्पतीनांतुल
सीमासानांकात्तिकःप्रियः॥ एकादशीतिथीनांचक्षेत्राणांहारकामम ॥ ३ ॥ एतेषांसेवनयस्तुकरोतिनि
यतेंद्रियः ॥ समेवल्लभतांयातिनतथायजनादिभिः ॥४॥ पापेभ्योनभयंतेनकर्त्तव्यनियमादपि ॥ एते
षांसेवनकान्तकुर्वतांमत्प्रसादतः ॥५॥ सत्यभामोवाच॥ विस्मापनीयतन्नाथयत्त्वयाकथितंमम॥पर
दत्तेनपुण्येनकलहामुक्तिमागता ॥ ६॥ इत्थंप्रभावोऽयंमासःकार्तिकस्तेप्रियंकरः ॥ स्वामिद्रोहादिपा
पानिस्नानपुण्यैर्गतानियत् ॥७॥
चाहिये हे प्यारी!इन तीनोंके सेवन करनेहारे पुरुषनके पाप मेरे प्रसादसों दूरि होजाय हैं॥५॥ सत्यभामा बोली, हे नाथ ! जो
आप मोसों कही वह आश्चर्यके योग्य है कि पराये दिये भये पुण्यसों कलहा मुक्तिको प्राप्त भई ॥६॥ या कार्तिक मासको ऐसो
प्रभाव है और आपको ऐसो प्यारो है कि जासों स्वामीसों द्रोह आदिके पाप स्नानके पुण्यसों दूरि भये ॥७॥
1. मा. भा. ७३॥ अ. देवता आदिकोंके अंशसे उत्पन्न नदी पूर्ववाहिनीभई और उनकी स्त्रियोंके अंशसे सैकरों हजारों पश्चिमवाहिनी नदीभई ॥२८॥ और गायत्री और स्वरा दोनों पश्चिमवाहिनी नदी भई और सावित्री इसनामसों प्रसिद्ध भई ॥२९॥ ब्रह्माने वहां यज्ञमें विष्णु और शिव दोनोंकी स्थापना की वे दोनों महाबल और अतिबल नामोंसे प्रसिद्ध देवता होतभये॥३०॥ कृष्णा और वेणीके या उपाय देवांशैःपूर्ववाहिन्योबभूवुःपश्चिमावहाः।तत्पत्न्यशैःपृथक्तत्रशतशोऽथसहस्रशः॥२८॥गायत्रीचस्वराचै वपश्चिमाभिमुखेतदा ॥ योगेनाभवत्तानद्यौसावित्रीतिप्रथांगते ॥२९॥ ब्रह्मणास्थापितौतत्रयज्ञेहरिहरावु भौ॥ महाबलातिवलिनौनाम्नादेवौवभूवतु॥३०॥कृष्णोद्भवपापहरंपुमान्य शृणोतियःश्रावयतेचभत्त्या। स्यात्तस्यपुंसःसकलंकुलंयत्तदर्शनस्नानगमोद्भवंस्मृतम्॥३१॥इतिश्रीपद्मपुराणकार्तिकमाहात्म्येचतुर्वि शोऽध्यायः॥२४॥ श्रीकृष्णउवाच ॥इतितद्वचनं श्रुत्वापृथुर्विस्मितमानसः॥संपूज्यनारदंसम्यग्विससर्ज तदाप्रिये ॥१ ख्यानको जो भक्तिसों सुनेगो और सुनावैगो वाको उनके दर्शन और स्नानको फल प्राप्त होयगो ॥३१॥ इति श्रीमत्पण्डितप रमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादशर्मकृतकार्तिकमाहात्म्यभाषाटीकायां चतुर्विशोऽध्यायः॥२४॥श्रीकृष्ण बोले,हे प्रिये ! या प्रकार उनको वचन सुनि विस्मितहै मन जिनको ऐसे पृथुराज नारदकी विधिपूर्वक पूजाकरिके उनको बिदा करत भये ॥१॥ । ७
६ स्वरा बोली, सुरोत्तमो ! यज्ञकी आदिमें जो तुमने गणेशको पूजन नहीं कीन्होताते मेरे क्रोधसों उत्पन्न यह विघ्न भयो ॥२२॥
मेरो यह वचनहू झूठ न होयगोताते अपने अंशोंकरिजडीभूतहो तुम सब नदी होउगे ॥२३॥ हम दोनों सौत भी अपने अंशोंकार
पश्चिमवाहिनी नदी होंयगी ॥२४॥ नारद बोले, यह वा स्वराकेवचन सुनिके ब्रह्मा विष्णु महेश जडरूपहो अपने २ अंशोंकारि
स्वरोवाच ॥ नाचितोहिगणाध्यक्षोयज्ञादौयत्सुरोत्तमाः॥ तस्माहिघ्नंसमुत्पन्नंमत्क्रोधजमिदंखलु॥२२॥
नापिमहचनह्येतदसत्यंखलुजायत।तस्मात्स्वार्शजडीभूतायूयंभवतनिम्नगाः ॥२३॥आवामपिसपत्न्यो
चस्वांशाभ्यामपिनिम्नगे ॥ भविष्यावोऽत्रभोदेवाः पश्चिमाभिमुखावहे॥२४॥ नारदउवाच॥इतितद्वचनं
श्रुत्वाब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ जडीभूताभवन्नद्यस्वांशैस्सर्वेतदानृप ॥२५॥ तत्रविष्णुरभूत्कृष्णावेण्यादेवो
महेश्वरः॥ ब्रह्माककुमिनीचापिपृथगेवाभवन्नृप ॥२६॥ देवास्स्वानपितानंशाअडीकृत्वाविचिक्षिपुः॥
सह्याद्रिशिखरेभ्यस्तैपृथगासंस्तुनिम्नगाः ॥ २७ ॥
नदीरूप होत भये ॥२६॥ वहां विष्णु कृष्णा होत भये और महादेव वेण्या और हे राजा ! ब्रह्मा ककुमिनी नाम नदीभये ये सब
पृथक् पृथक् होत भये ॥२६॥देवता हू जडकरके अपने अंशनको देतभये वे सब ब्रह्मादि सह्यपर्वतके शिखरोंसे नदी हो पृथक
२ बहने लगे ॥२७॥
मा. भा.हो २॥ अ. २४ 9 मेरे आसनपर यह छोटी तुम करिके बैठाई गई ताते तुग सब जडीभूत हो नदीरूप होउगे ॥१६॥ तापीछे वाके शापकोसनिके कांपते हैं ओठ जाके ऐसी गायत्री देवताओंके रोकनेहूँ पर देवीको शाप देतभई ॥ १७॥ गायत्री बोली, ब्रह्मा जैसे तेरे पति है तैसेही मेरे हैं तेने वृथा शाप दीन्हा ताते तूभी नदी हो॥१८॥नारद बोले, तापीछे शिव विष्णु आदि सब देवता हाहाकार मदासनेकनिष्ठेयंभवद्भिःसन्निवेशिता ॥ तस्मात्सर्वेजडीभूतानदीरूपाभविष्यथ॥१६॥ ततस्तच्छापमा कर्ण्यगायत्रीकंपिताधरा॥ समुत्थायाशप(वैर्यिमाणापितांस्वराम्॥ १७॥गायत्र्युवाच॥तवम यथा ब्रह्माममाप्येषतथाखलु ॥ वृथाशापस्त्वयादत्तोभषत्वमपिनिम्नगा॥१८॥ नारदउवाच॥ततोहाहाकृता सर्वैशिवविष्णुमुखास्सुराः ॥ प्रणम्यदंडवद्भूमौस्वरांतत्रविजिज्ञपुः॥ १९ ॥ देवा ऊचुः ॥ देविसर्वेवयंश ताब्रह्माद्यायत्त्वयाऽधुना ॥ यदिसजडीभूताभविष्यामोत्रनिम्नगाः॥२०॥तदालोकत्रयंह्येतहिनश्यति हिनिश्चितम् ॥ अविवेककृतस्तस्माच्छापोऽयविनिवर्त्यताम् ॥ २१ ॥ करि दंडवत् प्रणाम करिके स्वरा देवीसों प्रार्थना करत भये॥१९॥देवता बोले, हे देवी! तैंने ब्रह्मा आदि हम सबको शाप दी न्हों जो सब जडीभूतहो नदी होजायँगे॥२०॥ तो ये तीनों लोक निश्चय करि नाशको प्राप्त होयगे तुमने विचार नहीं कीन्हा ताते यह शाप लौटनो चाहिये ॥२१॥ ॥ ॥७२॥ IN 1 - क्या यह पुण्यकाममें उनकी स्त्री नहीं है ?॥ नारद बोले,ऐसेही रुद् विष्णुके बचनको मानि लेत भये॥१०॥ उस भृगुके वचनको मुनिके तब गायत्रीको ब्रह्माके दक्षिणभागमें बैठाके दीक्षा विधिको करत भये ॥११॥ जौलौं मुनीश्वर उन ब्रह्माकी दीक्षा विधि , करें तौलौ उस यज्ञके स्थानमें स्वरादेवी आवत भई ॥१२॥ता पीछे वह ब्रह्माके साथ दीक्षित देखि सौतिकी ईर्षा में तत्पर क्रोध एषापिनभवेत्तस्यभार्याकिंपुण्यकर्मणि ॥ नारदउवाच ॥एवमेवहिरुद्रोऽपिविष्णोर्वाक्यममन्यत ॥१०॥ तच्छृत्वाचभृगोर्वाक्यंगायत्रीब्रह्मणस्तदा ॥ निवेश्यदक्षिणेभागेदीक्षाविधिमथाकरोत् ॥ ११॥ याव दीक्षाविधितस्यविधेश्चकुर्मुनीश्वराः ॥ तावद्भ्याययौतत्रस्वरायज्ञस्थलेप ॥ १२॥ ततस्तांदीक्षितां दृष्ट्वागायत्रीब्रह्मणासह ॥ सापत्न्येापराक्रोधात्स्वरावचनमब्रवीत् ॥१३॥ स्वरोवाच ॥अपूज्यायत्र पूज्यन्तेपूज्यानांचव्यतिक्रमः ॥ त्रीणितत्रभविष्यूतिदुर्भिक्षमरणंभयम् ॥१४॥ येयंचदक्षिणेभागेउपवि ष्टामदासने ॥ तस्माल्लोकैस्सदाऽदृश्यागुप्तरूपातुनिम्नगा॥ १५॥ सों वचन बोलत भई॥१३॥ स्वरा बोली, जहां नहीं पूजनेयोग्य पूजे जाते हैं और पूजने योग्य नहीं पूजे जाते हैं वही दुर्भिक्ष मरण भय ये तीनि बातें होयगी ॥१४॥जो यह दाहिने और मेरे आसन पर बैठी है ताते लोगन करिके सदा नहीं देखने योग्य गुप्त रूप नदी होयगी॥ १५ ॥ -
मा.
मा. दी
॥
अ. २५
॥
ताहू मैं उनकी उत्पत्ति कहूंगो तुम सुनो चाक्षुषमन्वंतरमें पहले देव पितामह रम्य सह्याद्रिके शिखरपर यज्ञ करनेको उद्यत होत
भये वे यज्ञकी सामग्री इकट्ठी करके देवगण सहित ॥४॥५॥ और विष्णु रुद्र समेत उस पर्वतके शिखरको जात भये भृगु
आदि मुनिगण ब्रह्म दैवत मुहूर्तमें ॥ ६॥ उनकी दीक्षा विधानके लिये बडी प्रीतिसों समाज करत भये और बडी पत्नी जो
तथापितत्समुत्पत्तिकर्तियिष्यामितांशृणु ॥ चाक्षुषेप्यंतरेपूर्वमनोर्देवःपितामहः ॥ ४ ॥ सह्याद्रिशिखरे
रम्येप्रजनायोद्यतोभवत् ॥ सकृत्वायज्ञसंभारान्सर्वदेवगणैःसह ॥५॥ युक्तोहरिहराभ्यांचतगिरेःशिखरं
ययौं । भृग्वादयोमुनिगणामुहूर्तेब्रह्मदैवते ॥६॥ तस्यदीक्षाविधानायसमाजंचकुराहताः । अथज्ये
ष्ठांस्वरांपत्नीमाहूयांचरंजसा॥७॥साशनैराययौतागुर्विष्णुमुवाचह॥भृगुरुवाच॥विष्णोस्वरावया
हूताप्यायातानकथंचन ॥८॥ मुहूर्तातिकमश्चवकार्योदीक्षाविधिःकथम् ॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ नायाति
चैत्स्वराशीघ्रंगायत्र्यत्रविधीयताम् ॥९॥
पाणीकी देवता है ताहि बुलावत भये ॥७॥ वह हौले २ आवत भई तब भृगु विष्णुसों बोलत भये भृगु बोले, हे विष्णु ! तुम
करिके बुलाई भी स्वरा कैसेहू नहीं आवै ॥ ८॥ और मुहूर्त निकला जाता है दीक्षाविधि कैसे की जाय ॥श्रीकृष्ण बोले, जो
शीघ्र स्वरा न आवै तो यहां गायत्रीकी दीक्षा करनी चाहिये ॥९॥
॥७॥
पहिले भयो जो यह इतिहास है ताहि जो कोऊ मनुष्य सुनेगो वह हरिके निकट प्राप्त करनहारी भक्तिको जगत्के गुरु जो भग
वान हैं तिनकी कृपासों प्राप्त होयगो ॥ ३२॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिवि. का.
त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ पृथु बोले, उसकृष्णा वेणीके तटसों शिव और विष्णुके गणन करिके वैश्यके शरीरसों कलहा
इतिहासमिमपुराभवंशृणुतेश्रावयतेचयापुमान् ॥हरिसन्निधिकारिणीमतिलभतेसकृपयाजगद्दरो॥३२॥
इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ पृथुरुवाच ॥ कृष्णावेण्योस्तटात्तस्मा
च्छिवविष्णुगणैःपुरा ॥ वणिक्छरीरात्कलहानिरस्ताकथितात्वया ॥ १ ॥प्रभावोऽयंतयोनद्यो किंवाक्षे
त्रस्यतस्यच ॥ तन्मकथयधर्मज्ञविस्मयोऽत्रमहान्मम ॥२॥ नारदउवाच॥कृष्णाकृष्णतनुःसाक्षादेण्यां
देवोमहेश्वरः॥ तत्संगमप्रभावंतुनालंयक्तुंचतुर्मुखः ॥ ३ ॥
निकाली गई वह तुमने मोसो पहले कही सो यह नदियोंको प्रभाव है अथवा वा क्षेत्रको है ? हे धर्मज्ञ ! मोसो कहो मोको बड़ो
संदेह है ॥१॥२॥ नारद बोले, कृष्णा साक्षात् कृष्णको शरीर है और वेणी महादेवको रूप है उन दोनोंके संगमके प्रभावको
चतुर्मुख ब्रह्मा हू कहनेको समर्थ नहीं है ॥ ३ ॥
मा भा. टी. 에 अ. २३ ऐसे तुमहूँ देहके अंत समय उस विष्णुके परमपदको प्राप्त होउगे।हे धर्मदत्त ! जैसे हम प्राप्त भये हैं॥२७॥जन्मसों लगाके किये गये विष्णुके प्रसन्न करनहारे या व्रतसों निश्चय करिके न तौ यज्ञ और न व्रत और न दान अधिक है अर्थात् यह व्रत सबन सों अधिक है ॥२८॥हे ब्राह्मणश्रेष्ठ!तुम धन्य हो जाते तुमनेजगत्को गुरु जो भगवान् तिनको प्रसन्न करनहारो व्रत कियोजा एवंत्वमपिदेहांतेतद्विष्णोःपरमपदम्॥प्राप्नोषिधर्मदत्तत्वंतद्भक्त्यैवयथावयम् ॥ २७॥ तवाजन्मत्रताद स्माद्विष्णुसंतुष्टिकारकात्॥नयज्ञानचदानानिनतीर्थान्यधिकानिच ॥२८॥धन्योऽसिविप्राययतस्त्वयै तद्वतंकृतंतुष्टिकरंजगहरोः ॥ यदईभागाप्तफलामुरारे प्रणीयतेऽस्माभिरियंसलोकताम् ॥ २९॥ नारद उवाच ॥ इत्थतीधर्मदत्तंतमुपवेश्यविमानगो तयाकलयासाईवैकुंठभवनंगतौ ॥ ३०॥ धर्मदत्तोऽप्य सौजातप्रत्ययस्तद्रतेस्थितः॥ देहांतेतद्विभोःस्थानंभार्याभ्यांसंयुतोऽभ्यगात् ॥३१॥ के आधे भागके फलको पावनहारी यह कलहा हम करिके विष्णुकी सलोकताको प्राप्त की जाती है।॥२९॥ नारद बोले, ऐसे उस धर्मदत्तसों कहिके विमानमें स्थित होके वे दोनो उस कलहा समेत वैकुंठभवनको जात भये ॥ ३० ॥ यह धर्मदत्त उत्पन्न है। विश्वास जाको ऐसो हो वा व्रतमें स्थित भयो और देहांतके समय दोनों स्त्रियों समेत उन विभुकहिये समर्थ जो विष्णु, तिन के स्थानमें प्राप्त होत भयो ॥ ३१ ॥ Va ॥७०॥ - तब चक्र चलायके वे दोनों उद्धार करे गये और अपने समान रूप देके भगवान् उन दोनोंको वैकुण्ठमें लेजात भये ॥२१॥ तब से लगाके वह स्थान हरिक्षेत्र नामसों प्रसिद्ध भयो जामें चक्रके स्पर्शसों पापाणहू चिह्नयुक्त होगये॥२२॥ लोकमें वे दोनोंजय और विजय नामलों विख्यात है।हे ब्राह्मणा जिनको तैने पूछौ हो वे दोनों सदा हरिके प्यारे द्वारपाल हैं॥२३॥हे धर्मज्ञायाते ततस्तौग्राहमातंगौचक्रंक्षिप्त्वासमुद्धृतौ ॥दत्त्वाचनिजसारूप्यंवैकुठमनयडिभुः ॥२१॥ ततःप्रभृतित स्थानहरिक्षेत्रमितिस्मृतम्॥चक्रसंघर्षणाद्यस्मिन्यावाणोऽपिहिलांछिताः॥२२॥ ताविमौविश्रुतालोके जयश्चविजयस्तथा ॥ नित्यंविष्णुप्रियौहाःस्थौपृष्टौयौहित्वयाद्विज ॥ २३॥ अतस्त्वमपिधर्मज्ञनित्यंवि ष्णुव्रतेस्थितः ॥ त्यक्त्वामात्सर्यदंभौहिभवस्वसमदर्शनः ॥ २४ ॥ तुलामकरमेषेषुप्रातःस्नायीसदा भव ॥ एकादशीव्रतेनिष्टस्तुलसीवनपालकः ॥ २५॥ ब्राह्मणानपिगाश्चैववैष्णवांश्चसदाभजामसूरिका मारनालताकान्यपिवैत्यज ॥ २६ ॥ तुमहू सदा विष्णुके मतमें स्थितही मात्सर्य और दंभको छोडिके समदृष्टि होजाउ ॥२४॥ तुला मकर और मेष इन राशियोंमें । सूर्यके आने पर सदा प्रातःकाल स्नान करनहारे होउ और एकादशी व्रतमें निष्ठा राखौ और तुलसीवनको पालन करो। २६॥ ब्राह्मण और वैष्णवनको सदा सेवन करो और मसूरी कांजी बैंगन इनका त्याग करो ॥२६॥ ॥
भ. २३
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मा.पहिले में महादके वचनसों निश्चयसे खंभमें प्रगट होतभयो और अंबरीपके वचनसों दश प्रकारसों में उत्पन्न होत भयो ॥१६॥
९॥
ताते तुम दोनों अपने हाथसों करे भये इन शापोंको भोगिके मेरे पदको प्राप्त होउगे ऐसे कहिके भगवान् अंतर्धान होतभये॥१७॥
गण बोले,ता पीछे वे दोनों गंडकी नदीके तटमें ग्राह और मातंग होत भये वाहु यो नमें जातिको स्मरण रहोताते विष्णुके व्रतमें
प्रहादवचसास्तम्भह्याविर्भूतोद्यहंपुरा॥तथांबरीषवाक्येनजातोऽहंदशधाकिल ॥ १६ ॥ तस्मायुवामिमौ
शापावनुभूयस्वयंकृता॥ लभेतांमत्पदंनित्यमित्युक्त्वांतर्दधेहरिः॥१७॥ गणावूचतुः॥ ततस्तौग्राहमा
तंगावभूतांगंडकीतटे॥जातिस्मरौचतद्योन्यामपिविष्णुव्रतेस्थितौ।१८।कदाचित्सगजस्स्नातुंकार्तिक्यां
गंडकींगतः॥ तावज्जग्राहतंग्राहस्संस्मरञ्छापकारणम्॥१९॥ग्राहग्रस्तोह्यसौनागस्सस्मारश्रीपतिंतदा॥
तावदाविरभूद्विष्णुःशंखचक्रगदाधरः ॥ २० ॥
स्थित रहत भये ॥ १८॥ काहू समय वह हाथी कार्तिकीके दिन गंडकी नदीमें न्हायबेकोजातभयोवाको ग्राहशापका कारण
स्मरण करके पकरिलेत भयो॥ १९॥ तब ग्राह करि पकरो गयो यह हाथी भगवान्को स्मरण करत भयो तबहीं शंख चक्र
गदाको धारण करे विष्णु प्रगट होत भये ॥२०॥
C
॥६९॥
ता पीछे जय मनमें क्षोभितहो क्रोधसों विजयको यह शाप देतभयो तू ग्रहण करिके या धनको नहीं देत है यातेतू ग्राह हो॥११॥ विजय वाको यह शाप सुनिके वहू वाहिशाप देतभयो कि मदसों भ्रांत हो तेने मोको शाप दीन्हों ताते तू मातंग अर्थात् हाथी के हो ॥ १२ ॥ तब वे दोनों नित्यके पूजनमें भगवानको देखिके उन विभुसों यह वृत्तान्त कहत भये और रमापति भगवानसों ततोऽशपज्जयाक्रोधाद्विजयक्षुब्धमानसः॥गृहीत्वानददास्येतत्तस्माद्गाहोभवेतितम्॥११॥विजयस्तस्य तंशापंश्रुत्वासोऽप्यशपचतम्॥मदभ्रांतोऽशपस्त्वंमांतस्मान्मातंगतांब्रज॥१२॥तत्तदाचख्यतुर्विष्णुंदृष्ट्वा नित्याच्चनेविभुम् ॥शापयोश्चनिर्तितौययाचातेरमापतिम्॥ १३ ॥ जयविजयावूचतुः॥भक्तावावांकथं देवग्राहमातंगयोनिगौ ॥ भविष्याव:कृपासिंधोतच्छापोविनिवर्त्यताम्॥१४॥श्रीभगवानुवाच ॥ मद्भक्त योर्वचोऽसत्यनकदाचिद्भविष्यति ॥ मयापिनान्यथाकर्तुशक्यतेतत्कदाचन ॥ १५॥ शापकी निवृत्ति अर्थात् लौटि जानो मांगत भये ॥ १३॥ जय विजय बोले, आपके भक्त हम दोनों कैसे ग्राह और मातंगी योनिमें जानहारे होयँगे हे कृपासिंधु ! ताते हम दोनोंकोशाप लौटि दीजिये ॥ १४ ॥ श्रीभगवान् बोले, मेरे भक्तनको वचन कबहूँ झूठ न होय और मैहूं कदापि वाहि अन्यथा करने को समर्थ नहीं हौं ॥१५॥ "
I.मा.
भा,
६८॥
अ.२
कबहूँ वे दोनों मरुत नाम राजाकरिके यज्ञमें बुलाये जात भये और यज्ञकर्म करानेमें चतुर देवता और ऋषियोंके गणकरिके
पूजित वे दोनों जात भये ॥६॥वहां उस मरुतके यज्ञमें जय तो ब्रह्मा होत भये और विजय याजक होत भये ता पीछे उसे
सम्पूर्ण करत भये ॥७॥ यज्ञके अन्तका स्नान करिके मरुत उन दोनोंको बहुतसो धन देत भयो और वे दोनों वा धनको
मरुतेनकदाचिहावाहूतौयज्ञकर्मणि ॥ जग्मतुर्यज्ञकुशलौदेवर्षिगणपूजितौ ॥६॥ जयस्तनाभवब्रह्माया
जकोविजयोऽभवत्॥ततोयज्ञविधिकृत्स्नंपरिपूर्णचचक्रतुः॥७॥ मस्तोवभृथस्नातस्ताभ्यांवित्तंददौ
बहु ॥ तत्समादायतौवित्तंजग्मतुःखाश्रमप्रति॥८॥ यजनायपृथग्विष्णोस्तुष्टयर्थतौतदामुनी॥तहनं
विभजतौतुपस्पतिपरस्परम् ॥ ९॥ जयोऽब्रवीत्समोभागःक्रियतामितितत्रसाविजयश्चाब्रवीनतद्य
ल्लब्धंयेनतस्यतत् ॥ १०॥
ले अपने आश्रमको जात भये ॥८॥ पृथक् कहिये जुदे विष्णुके पूजनके और तुष्टि अर्थात प्रसन्नताके लिये वा धनके बांटनेमें
परस्पर स्पर्धा करने लगे॥९॥जयने कहा कि समान विभाग करनोचाहिये विजयने कहा कि यह न होयगोजो जाने पायो
है सो ताको है ॥१०॥
॥६॥
धर्मदत्त बोला; जय अरु विजय मैंने विष्णुके द्वारपाल सुनेहैं उनकरिके पहले कहा व्रत नियम कियो गयो जाते वे विष्णुकेरूप के धारण करनेवाले भये॥१॥गण बोले,हे ब्राह्मणापहिले तृणबिंदुकी कन्या देवहूतीमें कर्दम ऋषिकी दृष्टिहीसे दो पुत्र उत्पन्न होतभये॥२॥जेठेका नाम जय और छोटेका नाम विजय हो पीछे वाही देवहूतीमें योगकर्मको जाननहारे कपिलमुनि उत्पन्न धर्मदत्तउवाच॥ जयश्चविजयश्चैवविष्णोडस्थिौश्रुतौमया॥ किंनुताभ्यांपुराचीर्णयस्मात्तद्रूपधारिणौ ॥ ॥१॥ गणावूचतुः ॥ तृणविदोस्तुकन्यायादेवहूत्यांपुराद्विज ॥ कर्दमस्यतुदृष्टस्तुपुत्रौ हौसंबभूवतुः॥२॥ ज्येष्ठोजयःकनिष्टोऽभूहिजयश्चेतिनामतः ॥ तस्यामेवाभवत्पश्चात्कपिलोयोगकर्मवित्॥३॥ जयश्च विजयश्चैवविष्णुभक्तिरतौसदा ॥ तस्मिन्निष्ठेद्रियग्रामोधर्मशीलौवभूवतुः॥ ४॥ नित्यमष्टाक्षरीजाप्यौ विष्णुव्रतकरावुभौ ॥ साक्षात्कारंददौविष्णुस्तयोनित्यार्चनेसदा ॥५॥ होत भये॥३॥ जय और विजय विष्णुकी भक्तिमें सदारत होत भये उन्हींमें हैं इन्द्रियोंके समूह जिनके ऐसे दोनों धर्मशील होत भये॥४॥ दोनों सदा अष्टाक्षरी विद्याको जप करै हैं और विष्णुके व्रत करनहारेजो वे दोनो हैं तिनको विष्णु सदैव नित्य के पूजनमें साक्षात् दर्शन देत भये ॥५॥ ३
.मा.
भा.
अ.१२
६७॥
परंतु अबलों वे विष्णु मेरे ऊपर निश्चयकरि प्रसन्न नहीं होतेहैं और विष्णुदासकी भक्तिही करिके हरिने साक्षात्कार दियो ॥२४॥
ताते दान और यज्ञनकरिके विष्णु नहीं प्रसन्न होयह ताते भक्तिही वा विभुके दर्शनमें मुख्य कारण है अर्थात् भक्तिहीसों प्रसन्नहोयहैं
॥२५॥गण बोले, ऐसे कहिके राजा अपने भानजेको राजगद्दीपर बैठावत भयोबालकपनहीसोंयज्ञकीदीक्षामेरहोहोतातेयाराजाके
नैवाद्यापिसमेविष्णु प्रसन्नोजायतेध्रुवम् ॥ विष्णुदासस्यभक्त्यैवसाक्षात्कारंददौहरिः॥ २४॥ तस्माद्दानै
श्चयज्ञैश्चनैवविष्णुःप्रसीदति ॥ भक्तिरेवपरंतस्यनिदानंदर्शनेविभोः ॥२५॥ गणावूचतुः॥ इत्युक्त्वाभागि
नेयस्वमभ्यर्षिचन्नृपासने ॥ आबाल्याहीक्षितोयज्ञह्यपुत्रत्वमगाद्यतः॥ २६॥तस्मादद्यापितद्देशेसदारा
ज्यांशभागिनः॥स्वस्रीयाएवजायतेतत्कृतावधिवर्तिनः॥२७॥ यज्ञवाटततोभ्येत्यवह्निकुण्डाग्रतःस्थितः॥
विरुचैर्व्याजहाराशुविष्णुंसंबोधयंस्तदा ॥२८॥ विष्णोभक्तिस्थिरादेहिमनोवाक्कायकर्मभिः॥ इत्युक्त्वा
सोऽपतहहौसर्वेषामेवपश्यताम् ॥ २९ ॥
पुत्र नहीं भयो हो॥२६॥ताते वा देशमें अबताई चोल राजाकी करी भई अवधिको वर्तनेवालेभानजेहीराज्यके अधिकारीहोयहे।
॥२७॥ता पीछे यह चोल यज्ञस्थानमें जाके अग्निके आगे खड़ो होके विष्णुको संबोधन देतो भयो॥२८॥ और यहकहतोभयो
कि हे विष्णु । मन वाणी और कायसो स्थिरभक्ति दीजिये ऐसे कहिके यह राजा सबके देखते अग्निकुंडमें गिरतभयो ॥२९॥
या पीछे उठे भये उसी चांडालको विष्णुदास शंख चक्र गदाधारी साक्षात् नारायण देवको देखत भयो॥ १४॥पीलेहैं वस्त्र जि
नके और चारिहैं भुजा जिनके और श्रीवत्सको है चिह्न जिनके मुकुटको धारण किये हैं और अलसीके फूलके समान है रंग
जिनको और कौस्तुभ मणि है वक्षस्थलमें जिनके ऐसे भगवान्को देखत भयो ॥१५॥ उनको देखिके वह ब्राह्मण सात्विकभाव
अथोत्थितंतमेवासौविष्णुदासोव्यलोकयत् ॥ साक्षान्ना रायणदेवंशंखचक्रगदाधरम्॥१४॥पीताम्बरंच
तुर्बाहुँश्रीवत्सांककिरीटिनम् ॥ अतसीपुष्पसंकाशंकौस्तुभोरस्थलंविभुम् ॥१५॥ तं दृष्ट्वासात्त्विकैर्भाव
रातोद्विजसत्तमः ॥ स्तोतुंचापिनमस्कर्तुतदानालंबभूवसः ॥१६॥ अथशकादयोदेवास्तत्रैवाभ्याययु
स्तदा ॥ गंधर्वाप्सरसश्चापिजगुश्चनऋतुर्मुदा ॥ १७॥ विमानशतसंकीर्णदेवर्षिगणसंकुलम् ॥ गीतवा
दिवनिोपंतत्स्थानमभवत्तदा ॥ १८ ॥
करिके युक्तहोवा समय स्तुति करनेको और नमस्कार करनेको नसमर्थ होतभयो ॥१६॥ या पीछे वा समय इन्द्र आदिक
देवता हू वहीं आवत भये और गंधर्व तथा अप्सग आनंदसों नाचत भये ॥१७॥वा समय वह स्थान सैकडों विमानों करि ॐ
परिपूर्ण और देवता तथा ऋषिके गण युक्त और गाने बजानेको है शब्द जामें ऐसो होत भयो ॥ १८ ॥
मा.
भा. टी.
अ.२२
ता पीछे विष्णु भगवान् सतोगुणी व्रत है जाको ऐसे अपने भक्तको छातीसे लगायके अपनी समानरूपता दे वैकुंठ लेजातभये ॥
॥१९॥ श्रेष्ठ विमानमें स्थित और विष्णुके समीप जाते भये विष्णुदासको यज्ञकी दीक्षा युक्त वह चोलराजा है सो देखत भयो
॥२०॥ वैकुंठभवनको जाते भये विष्णुदासको देखि वह राजा चोल अपने गुरु मुद्गलको बुलाके या प्रकार वचन बोलत
ततोविष्णुस्समालिंग्यस्वभक्तंसात्त्विकव्रतम् ॥ सारूप्यमात्मनोदत्त्वाऽनयद्वैकुंठमंदिरम् ॥१९॥ विमा
नवरसंस्थतंगच्छंतविष्णुसन्निधिम् ॥ दीक्षितश्चोलपतिर्विष्णुदासंददर्शसः ॥२०॥ वैकुंठभवनंयांतंवि
ष्णदासंविलोक्यसः ॥ स्वगुरुमुरलंवेगादाहयेत्थंऽवचोब्रवीत् ॥२१॥ चोलउवाच ॥ यत्स्पर्दयामयाचे
तद्यज्ञदानादिकंकृतम् ॥ सविष्णुरूपधृग्विप्रोयातिवैकुंठमंदिरम् ॥२२॥ दीक्षितेनमयासम्यक्क्षेत्रेऽस्मि
न्वैष्णवेबहु ॥ हुतमग्नौकृताविप्रादानाद्यैःपूर्णमानसाः ॥ २३ ॥
भयो ॥ २१ ॥चोल बोला, जाकी स्पर्धासों मैंने यह यज्ञ दान आदि कीनों वह ब्राह्मण विष्णुका रूप धरिके वैकुंठको जाय
रहो है ॥ २२॥ दीक्षित जो मैं हौं वहां ताकरिके वैष्णव क्षेत्रमें अग्निहोत्र कियो गयो और दान आदिकरके ब्राह्मणोंकी कामना
पूरण कीगई ॥२३॥
॥६६॥
।
ता पीछे मुद्गल क्रोधसों अपने शिखाको उखारत भये तबते अबताई उनके गोत्रमें मुद्गल शिखाहीन होते हैं ॥३०॥ तबही
भक्तवत्सल भगवान् कुंडकी अग्निमें प्रगट होतभये और चोलको छातीमें लगाके श्रेष्ठ विमानमें चढ़ावते भये ॥ ३१॥ वाको
छातीमें लगाके अपनी सरूपता दे वाहि समेत देवताओंकरि युक्त देवेश भगवान् वैकुंठ मंदिरको जात भये ॥ ३२॥जो विष्णुदा
मुद्गलस्तुततः क्रोधाच्छिखामुत्पाटयत्स्वकाम् ॥ ततस्त्वद्यापितद्वोत्रेमुद्गलाविशिखाभवन् ॥३०॥ ताव
दाविरभूद्विष्णुःकुण्डाग्नौभक्तवत्सलः ॥ तमालिंग्यविमानाश्यसमारोहयदच्युतः॥३१॥ तमालिंग्यात्म
सारूप्यंदत्त्वावैकुंठमंदिरम् ॥ तेनैवसहदेवशोजगामत्रिदशैर्वृतः॥३२॥ योविष्णुदासस्सतुपुण्यशीलोय
श्चोलभूपस्ससुशीलनामा ॥ एतावुभौतत्समरूपमाजोहाःस्थौकृतौतेनरमाप्रियेण ॥३३॥ इति श्रीपद्म
पुराणेकार्तिकमाहात्म्ये हाषिशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
स हो सो तौ पुण्यशील हैं और जो चोलराजा हो सो सुशील नाम है उनके समानरूपके पानेवाले ये दोनों उन भगवान् करिके
द्वारपाल किये गये ॥ ३३ ॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटी
कायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
भा. से
अ. २
मा. या प्रकार वह पाकको करिके वहांई छिपिके बैठत भयो तब पाकके अन्नको लेजानेको आये भये एक चांडालको देखतभयो ।
॥९॥क्षुधासों दुर्बल दीन है मुख जाको और हाड तथा चाम है वाकी जामें ऐसे वा चांडालकोदेखि वह श्रेष्ठ ब्राह्मण दयाके मारे मन
से दुःखी होतभयो ॥१०॥ वह ब्राह्मण उस अन्न लेजानेवालेको देखि ठहर ठहर ऐसे कहत दौरत भयो वह अन्न रूखो क्योंखा
इतिपाकंविधायाऽसौतत्रैवालक्षितःस्थितः। तावद्ददर्शचांडालंपाकान्नहरणोत्थितम् ॥९॥ क्षुत्क्षामंदीनव
दनमस्थिचविशेषितम् ॥ तमालोक्यविजाग्योऽभूत्कृपयाखिन्नमानसः॥१०॥विलोक्यान्नहरंविप्रस्ति
ष्ठतिष्ठेत्यधावत॥कथमश्नासितसंघृतमेतद्गृहाणभोः॥११॥ इत्थंबुवंतं विप्राग्यमायांतसविलोक्यच॥
वेगादधावत्तदूभीत्यामूच्छितश्वपपातह॥१२॥ भीतंसंमूच्छितंदृष्ट्वाचांडालंसहिजोत्तमः।वेगादभ्येत्यकृप
यास्ववस्त्रांतैरवीजयत् ॥ १३॥
यगो और यह घी ले ऐसो कहतो वह पीका पात्र ले बाके पीछे जात भयो ॥११॥ ऐसे कहतो भयो आवतो जो वह श्रेष्ठ
ब्राह्मण है ताहि देखि वह चांडाल वाके भयसों वेगसों भागो और मूच्छित होके गिरत भयो ॥१२॥ वह ब्राह्मण उस चांडाल
को भयभीत और मूच्छित देखि शीघ्र वनोंके अंचलों पवन करत भयो ॥१३॥
दूसरे दिन फिरि पाककरिके जब ताई वह विष्णुकोनैवेद्य लगावैतौलौं कोई अलक्षित पुरुष फिरि हरिलेजातभयो॥३॥हेराजन् !
ऐसे सात दिन पर्यंत कोऊवाको पाक हरिलेजातभयो ता पीछे विस्मय सहित वह मनमें ऐसो विचार करत भयो॥१॥ आश्चर्य
कीबात है कि नित्य आयके मेरो पाक कौन लेजायहै यह क्षेत्र संन्यासीका स्थान है मोको सर्वथा नहीं त्यागने योग्य है।॥५॥ जो
द्वितीयेऽह्निपुनःपाकंकृत्वायावत्सविष्णवे॥उपहाराप्पणकर्तुतावत्कोऽप्यहरत्पुनः॥३॥ एवंसप्तदिनंतस्यपा
कंकोऽप्यहरन्नप॥ ततःसविस्मयःसोऽथमनस्येवंविचार्यच ॥४॥ अहोनित्यसमभ्येत्यक-पाकंहरतेमम॥
क्षेत्रसंन्यासिनःस्थानंनत्याज्यममसर्वथा॥५॥ पुनःपाकंविधायात्रभुज्यतेयदिचेन्मया ॥सायंकालार्चनं
चैतत्परित्याज्यकथंभवेत्॥६॥यदिपाकंविधायैवभोक्तव्यंवैमयानतत्॥ अनिवेद्यहरेस्सर्ववैष्णवै:वभुज्य
ते ॥७॥ उपोषितोऽहंसप्ताहतिष्टाम्यत्रव्रतस्थितः ॥ अद्यसंरक्षणंसम्यक्पाकस्यास्यकरोम्यहम्॥८॥
दूसरो पाक बनाके मुझकारके भोजन कियोजाय तो यह सायंकालको पूजन कैसे छोडोजाय॥६॥ जो पाककरतेही भोजनकरें
तोमोसों ऐसो न होय क्योंकि हरिको विना अर्पण किये वैष्णवोंकरि भोजन नहीं कियो जाय है॥७॥ सात दिनको उपासी मैं
यहां व्रतमें स्थितही अब मैं या पाककी भले प्रकार रक्षा करौंगो ॥८॥
ना.
॥
ऐसे श्रीपति जो भगवान् तिनका आराधन करते और भगवान्हीमें निष्ठहै सब इन्द्रियोंके कर्म जिनके और व्रतमें स्थित जो भा. टी,
चोलेश्वर और विष्णुदास हैं जिनको आराधन करते बहुत काल व्यतीत होतभयो ॥ ३०॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनय
श्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायामेकविंशोऽध्यायः ॥२१॥
एवंसमाराधयतो श्रियःपतितयोस्तुचोलेश्वरविष्णुदासयोः॥ कालोव्यतीयायमहान्त्रतस्थयोस्तन्निष्ट
सवेंन्द्रियकर्मणोस्तदा ॥३०॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये एकविंशोऽध्यायः॥२१॥गणावूच
तुः॥ कदाचिहिष्णुदासोऽथकृत्वानित्यविधिद्विजः ॥ सूपकाकरोत्तावदहरत्कोऽप्यलक्षितः ॥१॥तम
दृष्ट्वाप्यसौपाकं पुनर्नवाकरोत्तदा ॥ सायंकालार्चनस्यासौव्रतभंगभयाद्विजः॥२॥
गण बोले, काहू समय विष्णुदास ब्राह्मण हैं सो नित्यविधि जो संध्योपासनपूजा आदि हैं ताहि करिके पाकविधि जो रसोई
है ताहि करत भयो तब कोई अलक्षित पुरुष वाहि चुराय लेजात भयो॥१॥ तब वह उस पदार्थोंको न देखिके भी सायंकालको ॥६॥
पूजन और व्रतको जो भंग ताके भयमूं वह ब्राह्मण फिरि पाक न करत भयो ॥ २॥
व्रती जो विष्णुदास है सोऊ विष्णुके सन्तुष्ट करनहारे यथायुक्त नियमोंको करतो भयो वा समय वहांई देवालयमें स्थितरहत
भयो ॥ २५ ॥ माघ और कार्तिकको व्रत और भलीभाँति तुलसीके वनका पालन करनो और एकादशीके दिन द्वादशाक्षर
मन्त्रसों हरिको जप इन सबनको वह करत भयो ॥२६॥ षोडश उपचारनकरिके और गीत नृत्य आदि मंगलनकरिके वह
विष्णुदासोऽपितत्रैवतस्थोंदेवालयेव्रती॥ यथोक्तनियमान्कुर्वन्विष्णोस्तुष्टिकरान्सदा ॥ २५॥ माघो
र्जयोव्रतंसम्यक्तुलसीवनपालनम् ॥ एकादश्यांहरेर्जाप्यहादशाक्षरविद्यया॥ २६॥ उपचारैःषोडश
मिर्गीतनृत्यादिमंगलैगनित्यविष्णोस्तदापूजांव्रतान्येतानिसोकरोत्॥२७॥ नित्यसंस्मरणविष्णोर्गच्छ
न्मुंजन्स्वपञ्छसन् ॥ सर्वभूतस्थितंविष्णुमपश्यत्समदर्शनः ॥ २८ ॥ माघकार्तिकयोनित्यविशेषनिय
मानपि ॥ अकरोहिष्णुतुष्टयर्थसोयापनविर्धितथा ॥ २९ ॥
नित्य विष्णुकी पूजाको और इन उक्त व्रतनको करतभयो ॥ २७ ॥ जाने भोजन करते और शयन करते भये सदा विष्णु भग
वानहीको स्मरण करत भयो और समदृष्टि होके सब भूतनमें स्थित विष्णु भगवानहीको देखत भयो ॥ २८॥ और वही
विष्णुकी प्रसन्नताके निमित्त माघ तथा कार्तिकके विशेष नियमोंको और उद्यापनविधिको करत भयो ॥ २९ ॥
मा.
भा.री,
अ.२६
३॥
विष्णुके तुष्ट करनहारे यज्ञ दानआदि तैंने नहीं किये और हे ब्राह्मण ! तैने कहूँ पहिले देवालय बनवायो?॥२०॥ ऐसे जोतू है
ताके यह भक्तिको घमंड हैहे ब्राह्मण ! ताते या समय वे सब ब्राह्मण मेरो वचन सुनें ॥ २१ ॥ अब तुम सब देखो कि यह
ब्राह्मण अथवा मैं विष्णुके साक्षात्कारको प्राप्त होउँगो हे ब्राह्मण ! तब तुम सब दोनोंकी भक्तिको जानोगे ॥२२॥ गण बोले,
यज्ञदानादिकंनैवविष्णोस्तुष्टिकरंकृतम्॥नापिदेवालयंपूर्वकृतविप्रत्वयाक्वचित् ॥२०॥ ईदृशस्यापिते
गर्वएषतिष्ठतिभक्तितः॥ तच्छण्वंतुवचोमेऽद्यसर्वेऽप्येतेहिजोत्तमाः॥२१॥ साक्षात्कारमहंविष्णोरेषवाद्य
गमिष्यति ॥ पश्यतुसर्वेऽपिततोभक्तिंज्ञास्यंतिचावयोः ॥२२॥ गणाऊचतुः ॥ इत्युक्त्वासनृपोऽगच्छन्नि
जराजगृहंतदा ॥आरेभेवैष्णवंसकृत्वाचार्यसमुद्गलम् ॥ २३॥ ऋषिसंघसमाजुष्टंबनंबहुदक्षिणम् ॥
यद्वतंचकृतंपूर्वगयाक्षेत्रेसमृद्धिमत् ॥ २४ ॥
ऐसे कहिके वह राजा अपने राजभवनको जातभयो और मुद्गल ऋषिको आचार्य करिके विष्णुसंबन्धी जो यज्ञ है ताको आरम्भ
करत भयो ॥२३॥ यह यज्ञ कैसोहै कि जामें ऋषिनके समूह स्थित हैं और जो बहुतसो अन्न हो बहुतसी दक्षिणा हो संपत्ति
युक्त या व्रतको संकल्प पहिले गयाक्षेत्र में कियो है ॥ २४ ॥
चोल बोलो यहां माणिक्य और सुवर्णकरिके जो पूजाशोभायुक्त मैंनेकीहै विष्णुदास तुम करिके वह तुलसीके दलनसोक्योंआच्छा दित करी गई अर्थात् तुमने क्यों ढकिदीनी ॥१॥विष्णुकी भक्तिको नहीं जाने है तू ढोंगी है यह मैं जानता हौं जो तू अति शोभा करिकै युक्त जो पूजा है वाहि ढकै है ॥१५॥यह वा चोलराजाके गौरवको नमानिवासमयवचनबोलतभयो॥१६॥ विष्णु चोलउवाच ॥माणिक्यस्वर्णपूजात्रशोभाढ्यायाकृतामया॥ विष्णुदासकथसेयमाच्छन्नातुलसीद्लैः ॥ १४ विष्णुभक्तिंनजानासिवराकोऽसिमतिर्मम ॥ यस्त्विमामतिशोभाढ्यांपूजामाच्छादयस्यहो ॥ ॥ १५॥ इतितहचनं श्रुत्वासक्रोधःसद्विजोत्तमः ॥ राज्ञोगौरवमुल्लंघ्यजगादवचनंतदा ॥ १६॥ विष्णु दासउवाच ॥ राजन्भक्तिलजानासिगवितोऽसिनृश्रिया ॥ कियहिष्णुव्रतंपूर्वत्वयाचीर्णवदस्वतत् ॥ १७॥ गणावूचतुः॥ तद्राह्मणवचःश्रुत्वाप्रहस्यसम्पोत्तमः ॥ विष्णुदासतदागर्वादुवाचवचनंद्विजम् ॥१८॥राजोवाच॥इत्थंवदसिचेहिप्रविष्णुभक्त्यातिगर्वितः॥भक्तिस्तेकियतीविप्रदरिद्रस्याधनस्यच॥१९॥ दास बोले.हे राजा! तुम भक्तिको नहीं जानौंही राज्यलक्ष्मी गर्वित हो रहे हो तुमने पहिले कितनो विष्णुको व्रतकीनोहैसो कहो? ।।१७॥ गणबोले.उस ब्राह्मणके वचनको सुनि वह नृपश्रेष्ठ हँसिके विष्णुदाससों गर्वयुक्त वचन बोलत भयो ॥१८॥राजाबोलो, हे ब्राह्मण ! जो तूविष्णुभक्तिसों अतिगर्वित हो ऐसे कहै है तौ दरिद्री और निर्धन जो तू है ताकी भक्ति कितनी ॥ १९ ॥ .
भा. टी.
मा.
१२॥
अ.२१
तहां देव श्रीपति भगवान्को दिव्य मणियों और मोतियोंसे शोभायमान सुवर्णके फूलनसों पूजन करत भयो ॥९॥ और
भूमिमें दण्डवत्प्रणाम करिके वहीं बैठत भयो तव वह देवके समीप आवते भये एक ब्राह्मणको देखत भयो॥१०॥और देवकी
पूजाके निमित्त हाथमें तुलसी और जलको धारण किये है और अपनी पुरी अर्थात् कांचीपुरीको रहनहारो हो और विष्णु
तत्रश्रीरमणंदेवंसंपूज्यविधिवन्नृपः॥ मणिमुक्ताफलौर्दव्यैःस्वर्णपुष्पैश्चशोभनैः ॥९॥प्रणम्यदंडवद्भूमावु
पविष्टःसतत्रवै ॥ तावद्राह्मणमायांतमपश्यदेवसन्निधौ ॥१०॥ देवार्चनार्थपाणौतुतुलस्युदकधारिणम् ॥
स्वपुरीवासिनतत्रविष्णुदासाह्वयं द्विजम् ॥ ११॥ सतत्राभ्येत्यविप्रर्षिर्देवदेवमपूजयत् ॥ विष्णुसूक्तेनसं
स्नाप्यतुलसीमंजरीदलैः ॥ १२॥ तुलसीपूजयातस्यरत्नपूजापुराकृताम् ॥ आच्छादितांसमालोक्यरा
जाक्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥ १३ ॥
दास वाको नाम हो ऐसे ब्राह्मणको देखत भयो ॥११॥वह ब्रह्मऋषि वहां जायके विष्णुमुक्तसोंस्नान करायके तुलसीकीमंजरी
और दल जो तुलसीपत्र हैं तिनकरिके देवदेवजे भगवान् हैं तिनको पूजन करत भयो ॥१२॥ वा ब्राह्मणकी तुलसी पूजाकरिके
पहिले करी भई अपनी रत्ननकीपूजाको ढकी भई देखि राजा क्रोधित हो वचन बोलत भयो ॥ १३॥ .
॥६॥
r
गण बोले,हे ब्राह्मण!तुमने अच्छो प्रश्न कियो हे अनघ ! अर्थात् पापरहित इतिहास करिके सहित जो पहिले वृत्तान्त हम
करिकह्यो जाय है वाहि तुम एकाग्रचित्त होके सुनो॥ ४॥ कांचीपुरीमें पहिले चोल नाम चक्रवर्ती राजा होतभयो जाकेही
नामसों चोल देश प्रसिद्ध होत भयो॥५॥ वा राजाके पृथिवी पालनके समय कोई मनुष्य दरिद्री वा दुःखी वा पापबुद्धि वा
गणावूचतुःसाधुपृष्टत्वयाविप्रशृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ सेतिहासपुरावृत्तंकथ्यमानंमयाऽनघ ॥४॥ कांची
पुर्यापुराचोलश्चक्रवर्तीपोऽभवत्।।यस्याख्ययैवतेदेशाचोलाइतिप्रथांगताः॥५॥ यस्मिञ्छासतिभूचक्र
दरिद्रोवापिदुःखितः॥ पापबुद्धिःसरुवापिनैवकश्चिदभून्नरः॥६॥ यस्याप्यनंतयज्ञस्यताम्रपण्यास्तटा
उभौ ॥ सुवर्णयूपैश्शोभाट्यावास्तांचैत्ररथोपमौ॥७॥सकदाचिदयाद्राजाह्यनंतशयनंडिज ॥ यत्रासौ
जगतांनाथोयोगनिद्रामुपाश्रितः ॥८॥
रोगी नहीं होत भयो॥६॥असंख्य यज्ञ करनहारे जिस चोलके यज्ञस्तंभ करिके ताम्रपणीनदीके दोनों तट शोभायुक्त चैत्ररथ
जो कुवेरको वन है ताके समान शोभित होतभये ॥७॥ हे ब्राह्मण ! काहू समय वह राजा जहां जगतोंके स्वामी विष्णु भग
वान् योगमायाका आश्रयलेके शयन करतेहैं उस अनंतशयन नाम स्थानको जातभयो ॥ ८ ॥
भा. टी.
अ.२१
. मा. यज्ञादिकनते अधिक है ॥२८॥ हे विद्र! तुम धन्य हो याते तुमकरि यह भगवान्को प्रसन्न करनहारोवत कियो गयो जा
व्रतके आधे भागके फलको प्राप्त भई कलहा हम करिके मुरारि जोश्रीभगवान हैं तिनके समीप प्राप्तकीजाय है।।२९॥ इति श्री
मत्पण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायांकार्तिकमाहात्म्यटीकायांभापार्थबोधिनीसमाख्यायांविंशतितमोऽध्यायः॥२०॥नारद
धन्योऽसिविप्रेन्द्रयतस्त्वयैतद्वतंकृतंतुष्टिकरंजगद्गुरोः ॥ यदर्धभागाप्तफलामुरारे प्रणीयतेऽस्माभिरियं
सलोकताम् ॥ २९॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये विंशतितमोऽध्यायः॥२०॥ नारदउवाच ॥
इत्थंतहचनं श्रुत्वाधर्मदत्तःसविस्मयः॥प्रणम्यदंडवद्रमौवाक्यमेतदुवाचह ॥ १॥ धर्मदत्तउवाच॥ आरा
धयंतिसर्वेऽपिविष्णुंभक्तातिनाशनम् ॥ यज्ञैर्दानैर्ऋतैस्तीर्थस्तपोभिश्चयथाविधि॥२॥ विष्णुप्रीतिकरतेषां
किंचित्सान्निध्यकारकम् ॥ यत्कृत्वातानिचीर्णानिसण्यपिभवंतिहि ॥३॥
बोले, या प्रकार उन विष्णुके पार्षदनको वचन सुनिके धर्मदत्त विस्मित होभूमिमें दंडवत्प्रणाम करि यह वचन बोलत भयो।
॥१॥ धर्मदत्त बोले, भक्तनकी पीडाके दूरि करनहारे विष्णुकी सब मनुष्य यज्ञ दान व्रत तीर्थ और तपोंसों विधिपूर्वक पूजनकरै
है ॥२॥ उनमेंसों विष्णुकी प्रीति करनहारो और सान्निध्यदेनहारो कोई है जाके करनेसों वे सब यज्ञादिक सफल होजायें॥३॥
॥६॥
पहिले ग्राहकरिके पकरोगयो गजेन्द्र जिन भगवान्के समीप प्राप्त भयो और जय नाम गण कहावत भयो ॥२३॥ जाते तुम करिके विष्णु भगवान् पूजन कियेहैं ताते तुम हूँ कई हजार वर्ष दोनों स्त्रियों समेत संसारमें भोग करिके उनके समीप प्राप्त होउगे ॥२४॥ ता पीछे पुण्य जब क्षीण होयगो तब पृथ्वी आयके सूर्यवंशमें उत्पन्न हो प्रसिद्ध राजा होउगे ॥२५॥ नाम दश ग्राहगृहीतोनागेन्द्रोयनामस्मरणात्पुरा विमुक्त सन्निधिप्राप्तो जातोऽयंजयसंज्ञकः॥ २३ ॥ यतस्त्वया चितोविष्णुस्तत्सान्निध्यप्रयास्यसि ॥ बहून्यब्दसहस्राणिभार्याहययुतस्यते ॥ २४॥ ततःपुण्यक्षयेजाते यदायास्यसिभूतले ॥ सूर्यवंशोद्भवोराजाविख्यातस्त्वंभविष्यसि ॥२५॥ नाम्नादशरथस्तत्रभार्याय युतःपुनः॥ तृतीययानयाचापियातेपुण्याईभागिनी ॥ २६ ॥ तत्रापितवसान्निध्यविष्णुर्यास्यतिभूतले॥ आत्मानंतवपुत्रत्वेप्रकल्प्यामरकार्यकृत् ॥ २७ तवोर्जस्यव्रतादस्माहिष्णुसंतुष्टिकारकात् ॥ नय ज्ञानचदानानिनतीर्थान्यधिकानिवै ॥ २८ ॥ रथ होयगो वहांहूँ दोनों स्त्रियोंकरि युक्त होउगे और तीसरी या कलहा करिकेहू युक्त होउगे जो तुम्हारे आधे पुण्यकी पावने वाली है ॥२६॥ वाहू जन्ममें विष्णु पृथ्वीमें तुम्हारी समीपताको प्राप्त होयँगे आप तुम्हारे पुत्र होकेदेवतानको कार्य करेंगे।॥२७॥ विष्णुके प्रसन्न करनहारे तुम्हारे या कार्तिकके व्रतसों न तो यज्ञ न दान और तीर्थ अधिक है अर्थात् यह कार्तिकको व्रत सब IA । . भा. ०॥ अ. २ और दीपदान जो कार्तिको तुमने किया नाके पुण्यनसों याको यह तेजोरूप प्राप्तभयो है और कार्तिकवतमें करेगये तुलसी आदिके पूजनसों ॥ १८॥ जो तुमने याको पुण्य दियो है तासों विष्णुके समीप जानहारी भई और हे कृपानिधि ! या जन्मके अंतमें स्त्रियोंसमेत तुमहू विष्णुलोकको जावोगे ॥ १९ ॥ विष्णुक वैकुण्ठ भवनमें भगवान्के समीप सरूपता मुक्तिको प्राप्त होउगे वे धन्य हैं और वे कृतकृत्य हैं और उनहींका जन्म सफल है ॥२०॥ जिनकरिके भक्तिसों हे धर्मदत्त ! तुम्हारी भाँति दीपदानभवैःपुण्यैस्तेजसांरूपमास्थिता ॥ तुलसीपूजनाद्यैश्चकार्तिकव्रतकैःशुभैः ॥ १८॥विष्णोस्सन्नि धिगाजातात्वयादत्तकृपानिधे ॥ त्वमप्यस्यमवस्यतिमार्याभ्यांसहयास्यसि॥१९॥ वैकुंठभवनविष्णोः सान्निध्यंचसरूपताम् ॥ तेधन्याःकृतकृत्यास्तेतेषांचसफलोभवः॥२०॥ यैर्भक्त्याराधितोविष्णुधर्मदत्त त्वयायथा ॥ सम्यगाराधितोविष्णुःकिन्नयच्छतिदेहिनाम् ॥ २१॥ औत्तानचरणियेनश्वत्वेस्थापितः पुरा ॥ यन्नामस्मरणादेवदेहिनोयांतिसद्धतिम् ॥ २२ ॥ विष्णु पूजा किये गये हैं भली भाँतिसों पूजन किये गये विष्णु मनुष्यनको क्या फल नहीं दिये हैं ॥ २१ ॥ जिन करिकै पहिले उत्तानपादका पुत्र ध्रुव कहिये निश्चल स्थानमें प्राप्त कियो गयो जिन भगवान्के नामके स्मरणहीसों देही जे मनुष्य हैं ते सद्गति अर्थात् उत्तम गति को प्राप्त होय हैं ।। २२ ॥ .
,
पुण्यशील सुशील नाम दोनों विष्णुके गण प्रणाम करते भये ब्राह्मणको उठायके वाकी प्रशंसा करि धर्मयुक्त वचन बोलत भये ।
॥ १३॥ गण बोले, हे द्विजश्रेष्ठ । तुम बहुत अच्छे हो और विष्णुकी भक्तिमें सदा रत हो दीननपर दया करनहारे हो धर्मज्ञ
हो और सदा विष्णुके व्रतमें तत्पर हो ॥ १४ ॥ बालकपनसे लगाके तुम करिके जो उत्तम कार्तिकको व्रत कियो गयो ताको
पुण्यशीलसुशीलौचतमुत्थाप्यानतंद्विजम्॥ समभ्यनंदयन्वाक्यमूचतुर्धर्मसंयुतम्॥१३॥ गणावूचतुः ॥
साधुसाधुद्विजश्रेष्ठयत्त्वविष्णुरतस्सदा ॥ दीनानुकंपीधर्मज्ञोविष्णुव्रतपरायणः ॥ १४ ॥ आबालत्वा
च्छुभंवेतद्यत्त्वयाकार्तिकव्रतम् ॥ कृतंतस्याईदानेनयदस्याःपूर्वसंचितम् ॥ १५ ॥ जन्मांतरशतोद्भूतं
पापंतहिलयंगतम् ॥ स्नानादेवगतंपायदस्याःपूर्वकर्मजम्॥१६॥ हरिजागरणाद्यैश्चविमानमिदमास्थि
तम् ॥ वैकुण्ठंनीयते साधोनानाभोगयुतात्वियम् ॥ १७ ॥
जो आधो फल है ताके देनेसों याको जो सौजन्मको संचित पाप है सो नाशको प्राप्त भयो ॥ १५॥ और याको पूर्वजन्मको
पाप तौ स्नानहीसों जातोरहो और हरिको जागरण आदि जो तुमने कियो है ताके फलसों यह विमान प्राप्तभयो है ॥ १६॥
हे साधो ! नाना प्रकारके भोगनसों युक्त यह वैकुंठको प्राप्त कीजाती है ॥ १७ ॥
मा
भा, टी.
५९॥
अ.२,
तबहीं प्रेतयोनिसो छूटीभई वह कलहाजलतीहुई अग्निकी ज्वालाके समान दिव्यरूप धारण करि सुन्दरतामें लक्ष्मीके समानहोत
भई ॥७॥ता पीछे वह ब्राह्मणको भूमिमें दंडवत प्रणाम करती भई और हर्षसों गद्गदवाणी हो वचन बोलत भई॥८॥ कलहा बोली
हब्राह्मणश्रेष्ठामैं तुम्हारे प्रसादसों नरकसों छूटी पापनके प्रवाहमें डूबीभई जो में होताको आपनिश्चय नौका भये॥९॥नारद बोले,
तावत्प्रेतत्वनिर्मुक्ताज्वलदमिशिखोपमादिव्यरूपधराजातालावण्येनयथेन्दिरा ॥७॥ ततःसादंडवभू
मोपणनामाथतद्विजम् ॥ उवाचसातदावाक्यंहर्षगद्गदभाषिणी ॥८॥ कलहोवाच ॥ त्वत्प्रसादाद्विजश्रे
ष्ट्रनिर्मुक्तानिरयादहम् ॥ पापौघमज्जमानायास्त्वंनौभूतोऽसिमध्रुवम् ॥ ९॥ नारदउवाच॥ इत्थंसावद
तीविप्रददर्शायांतमंबरात् ॥ विमानभास्वरंयुक्तं विष्णुरूपधरैर्गणैः ॥ १०॥ अथसातहिमानायंहाःस्था
भ्यामधिरोपिता ॥ पुण्यशीलसुशीलाभ्यामप्सरोगणसेविता ॥ ११॥ तहिमानंतदापश्यधर्मदत्तःसवि
स्मयम् ॥ पपातदंडवद्भूमौदृष्ट्वातौविष्णुरूपिणौ ॥ १२॥
ऐसे उस ब्राह्मणसों कहत भई वह कलहा भास्वर कहिये प्रकाशमान विष्णुकोसो है रूप जिनको ऐसे गणोंकरिके युक्त विमान देखत
भई ॥१०॥ वह कलहा पुण्यशील और सुशील नाम जो विष्णके द्वारपाल, तिनकरि श्रेष्ठ विमानमें बैठाईगई॥११॥ वा समय
वा विमानको धर्मदत्त विस्मय सहित देखत भये और उन गणोंको विष्णुका रूप देखि पृथ्वीमें दंडवत् प्रणाम करतभये ॥ १२॥
धर्मदत्त बोले ,तीर्थ दान व्रत आदिकोंसों पाप दूर होयहै परन्तु प्रेत देहमें स्थित जो तू है ताको उनमें अधिकार नहीं है ॥१॥
तेरी ग्लानिको देखिके मेरो मन खेदयुक्त भयो दुःखित जो तू है ताको उद्धार कियेविना मेरो मन सुखी न होयगो॥२॥तीनि
योनिको देनदारो तेरो पाप अति उग्र है और अतिनिदित प्रेतयोनिहूथोडे पुण्यनसो क्षीण न होयगी ॥३॥ ताते जन्मसोलगायके
धर्मदत्तउवाच ॥ विलयंयांतिपापानितीर्थदानव्रतादिभिः॥ प्रेतदेहस्थितायास्तेतेषुनवाधिकारिता॥१॥
त्वद्ग्लानिदर्शनादस्मात्खिन्नंचमममानसम् ॥ नैवर्नितिमायातित्वामनुदृत्यदुःखिताम्॥२॥पातकंच
तवात्युग्रयोनित्रयविपादकम् ॥ नैवाल्पाक्षीयतेपुण्यैःप्रेतत्वंचातिगहितम् ॥३॥ तस्मादाजन्मजनितंय
न्मयाकात्तिकव्रतम्॥तत्पुण्यस्याईभागेनसद्गतित्वमवाप्नुहि ॥ ४॥ कात्तिकव्रतपुण्येननसाम्ययांतिस
र्वथा ॥ यज्ञदानानितीर्थानिदत्तान्यपियतोध्रुवम्॥५॥नारदउवाच॥ ॥ इत्युक्त्वाधर्मदत्तोऽसौयावत्ताम
भ्यषेचयत् ॥ तुलसीमिश्रितोयेनश्रावयन्द्वादशाक्षरम् ॥ ६ ॥
जो मैंने कार्तिकको व्रत कीनोहै ताके पुण्यके आधे भागसों तू उत्तम गतिको प्राप्तहो ॥४॥ याते यज्ञ दान तीर्थ व्रत इन सबनके
पुण्यको कार्तिकवतके पुण्यकी समानताको नहीं प्राप्त होयहै ॥९॥ नारद बोले,ऐसे कहिके जौलों धर्मदत्त द्वादशाक्षर मंत्र
सुनावतो भयो तुलसीदलोंसे मिलेभये जलसों वाहि छिडकत भयो ॥६॥
।
मा.
भा, दी
अ. १६
तापीछे क्षुधासों पीडित जो मैं हौं सो हे उत्तम ब्राह्मण ! तुमकरिके देखी गई और तुम्हारे हाथमें जो तुलसीदलयुक्त जलहै ताके
संसर्गसों मेरे पातक दूर होगये ॥२९॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ । ताते कृपा करो जाते में आगे होनेवाली तीनि योनिसों औरया प्रेतयो
निलों कैसेहू मुक्तिको पाऊं अर्थात् छूटिजाऊं॥३०॥ श्रेष्ठ ब्राह्मण इस प्रकार कलहाके वचन सुनिवाके कर्मनके फलसे उत्पन्न
तताक्षुत्क्षामयाहित्वंगच्छन्दृष्टोद्विजोत्तम ॥ त्वद्धस्ततुलसीनीरसंसर्गगतपापया ॥२९॥ तत्कृपांकुरुवि
प्रेन्द्रकथंमुक्तिमवाप्नुयाम्॥ योनित्रयादग्रभवादस्माचप्रेतदेहत॥३०॥ इत्थंनिशम्यकलहावचनंद्विजा
श्यस्तत्कर्मपाकमवविस्मयदुःखयुक्तः ॥ तद्ग्लानिदर्शनकृपाचलचित्तवृत्तिात्वाचिरसवचनंनिजगा
ददुःखात् ॥३१॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९॥
वाकी ग्लानिके देखनसों उत्पन्न भई जो कृपा है तासों चलायमान है चित्तवृत्ति जाकी ऐसो वह ब्राह्मण बहुत देरमें सोचिके
दुःखसों वचन बोलत भयो॥३१॥इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां कार्तिकमाहारम्य
टीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायामेकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥
॥५८॥
याते अपने उत्पन्न भये बच्चनकी खानहारी बिल्लीकी योनिमें प्राप्त होय जासों याने भर्ताके ऊपर विप खायके आत्मघातकियो ॥२३॥ताते अतिनिंदित यह प्रेत शरीरमें स्थित रहे और याहीते यह तुम्हारे दूतों करिके मरु देशमें पहुँचाने योग्य है ॥२४॥ वहां प्रेत शरीरमें स्थित यह बहुत कालपर्यंत रहे ता पीछे अशुभ करनहारी यह और तीनि योनियोंको भोग करै ॥२५॥ तस्मादेषाविडालीतुस्वजातापत्यभक्षिणी ॥ भरिमपिचोदिश्यह्यात्मघातःकृतोऽन्या॥२३॥ तस्मात्प्रे तशरीरेऽपितिष्ठत्वेपातिनिंदिता ॥अतश्चैवमरौंदेशेप्रापितव्याभटैस्तव ॥२४॥ तत्रप्रेतशरीरस्थाचिरंति ष्ठत्वियं ततः॥ ऊर्ध्वयोनित्रयंचैषाभुनक्कशुभकारिणी ॥२५॥ कलहोवाच ॥ साहपंचशताब्दानिप्रेतदेहे स्थिताकिल॥क्षुत्तृड्भ्यांपीडितानित्यदुःखितास्वेनकर्मणा ॥ २६ ॥ भुत्तृभ्यांपीडिताविश्यशरीरंवणि जांत्वहम् ॥ आयातादक्षिणदेशकृष्णावेण्योश्वसंगमम् ॥२७॥ तत्तीरसंश्रितायावत्तावत्तस्यशरीरतः ॥ शिवविष्णुगणै रमपकृष्टावलादहम् ॥२८॥ कलहा बोली, सो मैं पांचसौ वोंसे प्रेतयोनिमें क्षुधापिपासासे पीडित और अपने कमसों सदा दुःखयुक्त स्थितहौं ॥२६॥क्षुधा पिपासासे पीडित में वैश्योंके शरीरमें प्रवेश करिके दक्षिण दिशामें कृष्णा और वेणी नदियोंके संगमपर आई ॥ २७॥ जब उनके तटमें पहुंची तवहीं उनके शरीरसों शिव तथा विष्णुके गणोंकरि में दूर निकारि दी गई ॥ २८ ॥ -
- मा.
भा. टी
५७॥
अ.
तब यम मोकों देखिके चित्रगुप्तसो पूंछत भये ॥ यम बोले, हे चित्रगुप्त ! याने कहा काम कियो है सो देखो ॥१८॥ याने भलो
वा उरोजो कर्म कियो होय ताको फल पावै । कलहा बोली तब वह चित्रगुप्त मोकौ धमकातो भयो वचन बोलत भयो ॥१९॥
चित्रगुप्त बोले, याने किंचित् मात्रहू शुभ कर्म नहीं कियो है मिष्टअन्नको खाती भई याने भर्ताको वह न दियो ॥२० ॥ याते
यमश्चमांतदादृष्ट्वाचित्रगुप्तमपृच्छत ॥ यमउवाच ॥ अनयाकिंकृतंकर्मचित्रगुप्तविलोकय ॥१८॥ प्राप्नो
वेषाकमफलंशुभवायदिवाऽशुभम् ॥ कलहोवाच ॥ चित्रगुप्तस्तदावाक्यंभ यन्मामुवाचसः॥ १९॥
चित्रगुप्तउवाच ॥अनयातुशुभंकर्मकृतंकिंचिन्न विद्यते ॥ मिष्टान्नं जमानेयंनभतरितदर्पितम् ॥ २० ॥
अतश्वावल्गुनीयोन्यास्वविष्ठादीचतिष्ठतु ॥ भर्तुर्दृषकरीह्येषानित्यं कलहकारिणी॥२१॥ विष्ठादाशूक
रीयोनौतस्मात्तिष्ठत्वियंहरे॥ पाकभांडेसदाभुक्तभुक्तंचैकायतस्ततः॥ २२॥
वल्गुनी नाम जो पक्षीहे ताकी योनिमें परिके अपनी विष्टा खाती रहै यह भर्तासों सदा द्वेप और कलह करन हारी है ॥२१॥
याते विष्ठा खाने वाली शूकरकी योनिमें प्राप्त होय सदा पाक करनेके पात्र अर्थात् कराही वटला आदिमें भोजन करतीथी और
अकेली भोजन करतीथी ॥२२॥
॥५॥
- M धर्मदत्त बोलो, कौनसे कर्मके फलसो तू ऐसी दशाको प्राप्त भई और कहांकी है कौन है कैसा तेरोशील है सो सब मोसों कह ॥१३॥ कलहा बोली, हे महाराज ! सौराष्ट्रनगरमें भिक्षु नाम ब्राह्मण होतभयो पहिलेमैं ताकी स्त्रीथी कलहामेरो नामथा और बहुतही निरथी ॥ १४ ॥ मो करिकै कबहूँ वचनसूभी भर्ताको शुभनकियो गयो और कबहूँ मीठो अन्न न दियो सदा पतिकी धर्मदत्त उवाच॥केनकर्मविपाकेनत्वंदशामीदृशींगता॥ कुतस्त्याकाचविंशीलातत्सर्वकथयस्वमे॥१३॥ कलहोवाच ॥ सौराष्ट्रनगरेब्रह्मन्भिक्षुर्नामाभवद्विजः॥ तस्याहंगृहिणीपूर्वकलहाख्याऽतिनिष्ठुरा॥१४॥ नकदाचिन्मयाभर्तुर्वचसापिशुभंकृतम् ॥ नार्पितंतस्यमिष्टान्नभर्तुर्वचनशीलया ॥ १५॥ कलहप्रियया नित्यं भयोहिग्नमनायदा॥ परिणेतुंतदान्यांतुपतिश्चक्रेमतिमम ॥१६॥ ततोगरंसमादायप्राणांस्त्यक्त्वामृ तिंगता ॥ अथ बद्धावध्यमानामांनिन्युर्यमकिकराः॥ १७॥ वंचनशील रही ॥ १५॥ कलह है प्यारो जाहि ऐसी मोसों जब उन्नि मन भयो तव मेरो पति दूसरी स्त्रीके व्याहनेको मन करत भयो॥१६॥ ता पीछे में विपको खायके प्राणनको तज मृत्युको प्राप्त भई तब यमके दूत मोको बांधिके मारते भयेयम लोकको ले जात भये ।। १७॥ ८
भा.
अ.
वाहि देखिके भयसं घबरायो भयो और कांपतहै सब अंग जाके ऐसो वह ब्राह्मण भयके मारे पूजाकीजो सामग्री है तिनसों और
पूजाके निमित जो जल हो तासों वा राक्षसीको मारत भयो॥८॥जाते हरिको स्मरणकरिके तुलसीयुक्त जलसों वह वाहिमारत
भयो ताते वा राक्षसीके सब पाप नाश होजाते भये॥९॥या पीछे वहपहिले जन्मके कर्मोंके परिपाकसों उत्पन्न भई अपनी
तांदृष्ट्वाभयवित्रस्त कंपितावयवस्तदा॥पूजोपकरणैस्सर्वे:पयोभिश्चाहनद्भयात् ॥ ८॥ संस्मृत्ययवरेना
मतुलसीयुक्तवारिणा।सोऽहनत्पातकंतस्यास्तस्मात्सर्वमगाल्लयम् ॥ ९॥ अथसंस्मृत्यसापूर्वजन्मकर्म
विपाकजाम् ॥ स्वादशामब्रवीग्रिंदंडवच्चप्रणम्यसा ॥ १०॥ कलहोदाच॥ पूर्वकर्मविपाकेनदशामेतां
गतास्म्यहम् ॥ तत्कथंतुपुनर्विप्रप्राप्नुयामुत्तमांगतिम् ॥ ११ ॥ नारदउवाच॥तांदृष्ट्वाप्रणतांसम्यग्वदमा
नांस्वकर्मतत् ॥ अतीवविस्मितोविप्रस्तदावचनमब्रवीत् ॥ १२॥
दशाको स्मरण करिके ब्राह्मणको दंडवत प्रणाम करिके बोलत भई ॥१०॥कलहा बोली,पहिले कर्मके फलसों में या दशाको
प्राप्त भई हो हे ब्राह्मण ! ताते में कैसे उत्तम गतिको प्राप्त होऊं ॥११॥ नारद बोले,भली भाँति प्रणाम करि अपने वा कर्मको
कहती भई जो कलहा है ताहि देखि वह ब्राह्मण बहुतही विस्मित हो वा समय वचन बोलत भयो ॥ १२ ॥
॥५६॥
नारद बोले,सह्याचल पवत पर करवीर पुरनाम नगरमें धर्मका जाननेवाला धर्मदत्तसो प्रसिद्ध कोई ब्राह्मण होत भयो ॥३॥ सदा विष्णुका व्रतकरनहारो और निरंतर विष्णुपूजामें तत्पर और द्वादशाक्षर मन्त्रके जपमें निष्ठ और अभ्यागतोंका सेवक ऐसो वह धर्म दत्त होत भयो ॥४॥ काहू समय वह कार्तिक महीनेमें पहरभर रातिरहे हरिके जागरणके निमित्त हरिमंदिरको गमन करत नारद उवाच ॥ आसीत्सह्याद्रिविषयेकरवीरपुरेपुरा ॥ ब्राह्मणोधर्मवित्कश्चिद्धर्मदत्तेतिविश्रुतः ॥३॥ विष्णुव्रतकर शश्वद्विष्णुपूजारतःसदा॥ द्वादशाक्षरविद्यायांजपनिष्ठोऽतिथिप्रियः ॥४॥ कदाचित्का त्तिकमासिहरिजागरणायसः॥ रात्र्यांतुशिशेषायांजगामहरिमंदिरम् ॥ ५॥ हरिपूजोपकरणान्प्र गृह्यव्रजतातदा ॥ तेनदृष्टासमायाताराक्षसीभीमदर्शना ॥ ६॥ वक्रदंष्ट्राललजिह्वानिममारक्तलोचना॥ । दिगंबराशुष्कमांसालंबोष्टीवर्धरस्वना॥७॥ भयो॥५॥हरिके पूजनकी सामग्री लेकरि जातो हुओ जो वह ब्राह्मणहे ताने वा समय भयंकर है रूप जाको ॥६॥वक्र कहियेटढी हँ डा जाकी और चलायमान है जीभ जाकी और भीतरको गडे भये लालहें नेत्र जाके और नंगीऔर सूखो है मांस जाको लंबे होठ जाके और घर्घराहटयुक्त है शब्द जाको एसी राक्षसी देखी।। ७ ..
भा. ."
मा.
अ.१९
५५॥
धात्री और तुलसीके माहात्म्यको भगवान्की महिमाके समान चतुर्मुख ब्रह्माहू कहनेको समर्थ नहींहै॥२७॥धात्री और तुलसीकी
उत्पत्ति के कारणजो मनुष्य भक्तिसों सुनैहैवा सुनावैहे वहपापरहितहो अपने पुरुषोंसमेत उत्तमविमानमें बैठि स्वर्गकोजाय ॥२८॥
इतिश्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायांकार्तिकमाहात्म्यभाषाटीकायांभाषार्थबोधिनीसमा
धात्रीतुलस्योर्माहात्म्यमपिदेवश्चतुर्मुखः॥नसमर्थोभवेढक्तुंयथादेवस्यशाङ्गिणः॥२७॥धात्रीतुलस्युद्भव
कारणंय शृणोतिय श्रावयतेचभक्त्याविधूतपाप्मासहपूर्वजैस्स्वैस्स्वर्गव्रजत्यग्यविमानसंस्थः॥२८॥
इतिश्रीपद्मपुराणकार्तिकमाहात्म्येधात्रीतुलस्योर्माहात्म्यकथनंनामाष्टादशोऽध्यायः॥१८॥पृथुरुवाच॥
सेतिहासमिदंब्रह्मन्माहात्म्यंकथितंमम ॥ अत्याश्चर्यकरंसम्यक्तुलस्यास्तच्छ्रुतमया॥१॥यदूर्जवतिनः
पुंसःफलंमहदुदाहृतम् ॥ तत्पुन—हिमाहात्म्यकेनचीर्णमिदंकथम् ॥२॥
ख्यायामष्टादशोऽध्यायः॥१८॥पृथु बोले, हे महाराज । इतिहासकरिके सहित अति आश्चर्यका करनेवाला तुलसीको माहात्म्य
और व्रत आपने मोसे वर्णन कियो सो मैंने भली भॉति श्रवण कियो ॥१॥ जो कार्तिकत्रत करनहारे पुरुषका फल है सो आपने
कहो अब फिरि माहात्म्य कहिये और यह व्रत पहिले कौनकार कियोगयो और कैसे कियो सो सब वर्णन करिये ॥२॥
॥५५॥
जो मनुष्य आमलेके पत्तों या फलों करिके देवताओंका पूजन करै है वह सुवर्ण मणि और मोतिनके समूहकरिजो पूजन है ताके ® फलको प्राप्त होय ॥२२॥ तीर्थ मुनीश्वर और देवता कार्तिकमें तुलाराशिके सूर्य होनेके समय सदा धात्रीका आश्रय लेके स्थित रहेहैं॥२३॥ जो मनुष्य द्वादशीको तुलसीदलका तथा कार्तिकमें धात्रीफलका छेदन करैहै वह अतिनिंदित नरकको प्राप्त होयहै देवार्चनंनर कुर्याद्धात्रीपत्रैःफलैरपि ॥ सुवर्णमणिमुक्तीधैरर्चनस्याप्नुयात्फलम् ॥ २२॥ तीर्थानिमुनयो देवायज्ञाःसर्वेऽपिकार्त्तिके ॥ नित्यंधात्रींसमाश्रित्यतिष्ठंत्यतुलाश्रिते ॥ २३॥ द्वादश्यांतुलसीपत्रंधात्री पत्रंतुकार्तिके ॥ लुनातिसनरोगच्छेन्निरयानतिगर्हितान्॥२४॥धात्रीछायांसमाश्रित्यकार्तिकेऽनभुनक्ति यः॥अन्नसंसर्गजपापमावर्षतस्यनश्यति ॥ २५॥धात्रीमूलेतुयोविष्णुंकार्तिकेपूजयेन्नरः॥ विष्णुःक्षेत्रे सर्वेषुपूजितस्तेनसर्वदा ॥ २६ ॥ ॥ २४ ॥ जो कार्तिकके महीने में आमलेके वृक्षके नीचे बैठिके अन्नका भोजन करैवाको अन्नके संसर्गसों उत्पन्न भयो एकवर्षपर्य न्तको पाप नाशको प्राप्त होयहै ॥२५॥ जो कार्तिकके महीनेमें आमलेके वृक्षके नीचे विष्णुको पूजन करेंहै वाको सब क्षेत्रों में जो विष्णुके पूजनका फल है सो सदा प्राप्त होय है।। २६ ॥
मा.
भा. टी.
२४॥
अ.१८
जो पुरुप तुलसी काप्टको चंदन धारण करे है वाकी देहको कियो भयोह पाप नहीं स्पर्श करै ।।१६॥हेराजा ! जहांरतुलसीक
वनकी छाया होय वहां २ श्राद्ध करनी चाहिये और पितरनको दियो भयो अक्षय होयहै॥१७॥हे राजा ! आमलेकी छायामें
जोपिंडदान करैहै तो नरकमें स्थितहू वाकेपितर तृप्तिको प्राप्त होय हैं॥ १८॥ हे राजाओंमें उत्तम ! मस्तकमें और हाथमें
तुलसीकाष्ठजंयस्तुचंदनंधारयेन्नरः॥ तद्देहंनस्पृशेत्पापंक्रियमाणमपीहयत् ॥ १६॥ तुलसीविपिनच्छा
यायवयत्रभवेन्नृप ॥ तत्रश्राद्धप्रकर्त्तव्यंपितॄणांदत्तमक्षयम् ॥१७॥ धात्रीच्छायासुयःकुर्यापिंडदानं
पोत्तम ॥ तृप्तिप्रयांतिपितरस्तस्ययेनरकेस्थिताः ॥ १८ ॥ मूर्भिपाणौमुखेचैवदेहेचनृपसत्तम ॥धत्ते
धात्रीफलंयस्तुसविज्ञेयोहरिःस्वयम् ॥ १९ ॥धात्रीफलंचतुलसीमृत्तिकाहारकोद्भवा ॥ यस्यदेहेस्थिता
नित्यंसजीवन्मुक्तउच्यते ॥ २०॥धात्रीफलविमिङ्ग्रस्तुतुलसीदलमिश्रितैः॥ जलै नातिनरस्तस्यगंगा
स्नानफलंस्मृतम् ॥ २१॥
और मुखमें और देहमें जोपुरुप आमलेके फलको धारण कर है वह साक्षात् विष्णुको रूप है ॥१९॥ आमलेका फल तुलसी
और द्वारिकाकी मृत्तिका ये जाकी देहमें नित्य स्थिर रहे हैं वहपुरुष जीवन्मुक्त कहो जाय है ॥२०॥ आमलेके फलों और
तुलसीके दलोंकरि मिले भये जलसों जो मनुष्य स्नान करै है उसे गंगास्नानका फल मिले है ॥२१॥
॥५४॥
नर्मदा नदीका दर्शन तसेही गंगाजीका स्नान और तुलसीके वनका संसर्ग ये तीनों समान कहे गये हैं ॥१३॥ लगानेसे पाल
नेसे सीचनेसे और दर्शनसे तुलसी मनुप्योकी वाणी मन और कायसे एकट्टे कर भये पापनको जलाय देय है ॥१२॥जो पुरुप
तुलसीकी मंजरीनसो हरि कहिये विष्णु और हर कहिये शिव इनको पूजन करहे वह गर्भ रूप वरमें नहीं आवैहे और निस्संदेह
दर्शनंनर्मदायास्तु गंगास्नानंतथैवच ॥ तुलसीवनसंसर्गःसममेतत्त्रयंस्मृतम् ॥ ११ ॥ रोपणात्पाल
नात्सेकादर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम् ॥ तुलसीदहतेपापंवाङ्मनःकायसंचितम् ॥१२॥ तुलसीमंजरीभिर्यः
कुर्यान्दरिहरार्चनम् ॥ नसगर्भगृहयातिमुक्तिभागीनमंशयः ॥ १३ ॥ पुष्करादीनितीर्थानिगंगाद्याःसरि
तस्तथा ॥ वासुदेवादयोदेवास्तिप्टंतितुलसीदले ॥ १२ ॥ तुलसीमृत्तिकालिप्तोयस्तुप्राणान्विमुंचति ॥
यमोऽपिनेक्षितुंशकोयुक्तःपापशतैरपि ॥ विष्णोःसायुज्यमाप्नोतिसत्यंसत्यनृपोत्तम ॥ १५ ॥
मुक्तिको पावनहारो होय ।।१३॥ पुष्कर आदिक तीर्थ और गंगा आदिक नदी और वासुदेव आदिक देवता तुलसी दलमें वास
करें हैं ॥१४॥ तुलसीके मूलकी मृत्तिका जाके अंगमें लगी भई हे ऐमो जो पुरुप प्राणनको छोड है ताहि सैकडों पापोंकरि युक्त
होनहॅपर यमराज देखनको हु समर्थ नहीं है, हे राजा : और वह विष्णुके समीप प्राप्त होयह यह वार्ता वारंवार सत्य हैं ॥१६॥
भा. 1 अ. का: मा.जो बीज पहिले लक्ष्मी करिके इर्ष्यासहित दियो गयो तातेवा बीजसे उत्पन्न स्त्री विष्णुमें ईर्ष्यापर होतभई॥६॥इस कारणअति ॥५३॥ निंदित वह बर्बरी या नामको प्राप्त होतभई और धात्री तथा तुलसी उनमे प्रीति करनेसे सदा उनकी प्रीति बढावनहारी होत भई ६॥ता पीछे भूलिगयोहै दुःखजिनकोऐसे सब देवताओकरिनमस्कारकियेगये विष्णुप्रसन्नहो उन दोनोंसमेत वैकुण्ठभवनको जात यञ्चलक्ष्म्यापुरावीजमीय॑यैवसमर्पितम्॥तस्मात्तदुद्भवानारीतस्मिन्नीापराभवत्॥५॥ अतःसाबर्बरी त्याख्यामवापातीवगर्हिता॥धात्रीतुलस्यौतद्रागात्तस्यप्रीतिप्रदेसदा॥६॥ततोविस्मृतदुःखोसौविष्णुस्ता भ्यांसहैवतु ॥ वैकुंठमगमवृष्टःसर्वदेवनमस्कृतः ॥७॥ कार्तिकोद्यापनेविष्णोस्तस्मात्पूजाविधीयते ॥ तुलसीमूलदेशेतुप्रीतिदासाततःस्मृता॥८॥तुलसीकाननंराजन्गृहेयस्यावतिष्ठते॥तद्वहंतीर्थरूपंतुनायांति यमकिंकराः॥ ९॥ सर्वपापहरंपुण्यंकामदंतुलसीवनमारोपयंतिनरश्रेष्ठास्तेनपश्यंतिभास्करिम् ॥१०॥ भये॥७॥ ताही सों कार्तिकके उद्यापनके समय तुलसीमूलके निकट विष्णुकी पूजा कीजातीहै और वह विष्णुकीप्रीति बढावन हारी कही गईहै।।८॥हे राजा!जाके घर में तुलसीवन स्थित रहै है वाको घर तीर्थरूप है वामें यमके दूत नहीं आवै हैं॥९॥सब पाप नके दूरकरनहारे और कामनाके देनहारे पवित्र तुलसीके वनको जे पुरुष लगावै है वे श्रेष्ठमनुष्य यमराजका दर्शन नहीं करैहैं।॥१०॥ અપરા
इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशर्मकृतकार्तिकमाहात्म्यभापाटीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां सप्त
दशोऽध्यायः॥१७॥नारद बोले,हे राजा ! वोये भये बीजनसों धात्री मालतीऔर तुलसी ये तीनों वनस्पति होत भई ॥१॥ जो
ब्रह्माकी स्त्रीके वीजनसों उत्पन्न भई वह धात्री कही गई और जो लक्ष्मीके दिये बीजनसों उत्पन्न भई मालती कही गई और जो
इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहाम्ये जलंधरवधोनामसप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ नारद उवाच ॥ क्षिप्ते
भ्यस्तत्रवीजेभ्योवनस्पत्यस्त्रयोऽभवन् ॥ धात्रीचमालतीचैवतुलसीचनृपोत्तम॥१॥धान्युद्भवास्मृताधा
त्रीमाभवामालतीस्मृता ॥ गौरीभवाचतुलसीरजःसत्त्वतमोगुणाः॥२॥स्त्रीरूपिण्योवनस्पत्योदृष्ट्वावि
ष्णुस्तदाटप॥उत्तस्थौसंभ्रमादन्दारूपातिशयविभ्रमः॥३॥ दृष्ट्वाऽऽशुतेनतारागात्कामासक्तेनचेतसा॥
तेचापितुलसीधान्यौविष्णुमेवावलोकताम् ॥ ४॥
गौरीके बीजनसों उत्पन्न भई वह तुलसी कहाई, ये तीनों क्रमसे रजोगुण सतोगुण तमोगुण रूपहोतभई॥२॥हे राजा! तब स्त्रीके
रूपमें जो वनस्पति हैं तिन्हें वृन्दाके रूपको अतिशय विलाप युक्त देखि विष्णु शीबही उठतभये ॥३॥ काममें आसक्त है चित्त
जिनका ऐसे विष्णु करिके वे प्रीतिसों देखी गई वे तुलसी और धात्रीहू विष्णुही को देखत भई ॥ ४ ॥
मा. भा. २॥ अ.१७ ता पीछे वाक्य करि प्रेरित जे सब देवता हैं ते गौरी लक्ष्मी तथा सरस्वतीको भक्ति में तत्पर होके प्रणाम करतभये ॥२७॥ ता पीछे भक्त हैं प्यारे जिनको ऐसी वे तीनों देवताओंको प्रणाम करते देखि उनको बीज देती भई और उस समय उनसों वचनहूँ कहत भई ॥२८॥ देवी बोलीं,इन बीजनको वहां जाइके बोइ देउ जहां विष्णु बैठेहैं ता पीछे तुम्हारो कार्य सिद्ध होयगो॥२९॥ ततःसर्वेऽपितेदेवागत्वातहाक्यनोदिताः॥ गौरी लक्ष्मीस्वरांचैवप्रणेमुभक्तितत्पराः ॥ २७ ॥ ततस्ता स्तान्सुरान्दृष्टाप्रणतान्भक्तवत्सलाः ॥ बीजानिप्रददुस्तेभ्योवाक्यान्यूचुस्तदाचताः ॥ २८ ॥ देव्य ऊचुः॥ इमानितत्रबीजानिविष्णुर्यत्रावतिष्ठते ॥ निवपध्वंततःकार्यभवतांसिडिमेष्यति ॥ २९॥ नारद उवाच ॥ ततस्तुहृष्टाःसुरसिद्धसंघाःप्रगृह्यवीजानिविचिक्षिपुस्ते ॥ वृंदाचिताभूमितलेसयत्रविष्णुःसदा तिष्ठतिसौख्यहीनः ॥ ३० ॥ इत्येतत्सत्यवाक्यस्यमाहात्म्यंसमुदाहृतम् ॥ यापठेच्छणुयाहापिस्वर्ग लोकंसगच्छति॥३१॥शृणुयादेकचित्तेनअविनेनापियुज्यते॥सुतैविमुक्तायानारीनरश्चापिपठेत्सदा ॥३२॥ नारद बोले, ता पीछे देवता और सिद्धनके समूह आनंदित हो बीजनको ले वहां बोवत भये जहां वृन्दाकी चिताभूमिमें सुखरहित विष्णुसदा विराजमानहैं॥३०॥यह हमने सत्यवाक्यकामाहात्म्य कहोयाको जोकोई पटैगोवामुनगोवह स्वर्गलोककोप्राप्तहोयगो ॥३१॥ और जोएकाग्रचित्त होके सुनैगोवाके विघ्न कभी न होंगे और जो पुत्रहीन नरनारी सुनैगेवापटेंगेउनको पुत्र होइगो॥३२॥ ॥५२॥ N 1 नारद बोले , जो पुरु या स्तोत्रका एकाग्रमन हो त्रिकाल पाठ करे है वाको दरिद्रता मोह और दुःख कभी नहीं स्पर्श करें हैं ॥२२॥या प्रकार स्तुतिको करते भये आकाशमें स्थित और ज्वालासे व्याप्त किये हैं दिशाओंक अन्तर जाने ऐसा तजोमंडल में स्थितदेखतभये ॥२३॥ वा तेजोमंडल क मध्यसे सब देवता आकाशमें विचरनेवाली वाणीको सुनत भये शक्ति बोली, में नारदउवाच॥स्तवमेतत्रिसध्ययःपठेदेकाग्रमानसः॥ दारिद्यमोहदुःखानिनकदाचित्स्पृशन्तितम् ॥२२॥ इत्थंस्तुवंतस्तेदेवास्तेजोमंडलमास्थितम्॥ददृशुर्गगनेतत्रज्वालाव्याप्तदिगंतरम् ॥२३॥ तुन्मध्याभार तीसर्वेशुश्रुवुयॊमचारिणीम् ॥ शक्तिरुवाच ॥ अहमेवविधाभिन्नातिष्ठामित्रिविधैर्गुणैः ॥ २४ ॥ गौरीलक्ष्मी स्वराज्योतीरजःसत्त्वतमोगुणैः ॥ तत्रगच्छतताःकार्यविधास्यतिचवःसुराः॥२५॥ नारद उवाच॥ शृण्वतामितितांवाचमंत नमगान्महः ॥ देवानांविस्मयोत्फुल्लनेत्राणांतत्तदानृप ॥ २६ ॥ ही तीनि प्रकारस व्यक्तियुक्त हो तीनों गुणोंकरिके स्थितरहूँ हूँ ॥२४॥ गौरी लक्ष्मी और सरस्वती इनके रज, सत्त्व, तम, इन तीनों गुणोंका आश्रय है । हे देवताओ ! वहां वे तुम्हारा कार्य करेंगी॥२५॥ नारद बोले, हे राजा ! विस्मयसों विकसित हैं नेत्र जिनके ऐसे देवताओंका वा वाणीके सुनत भये वा समय वह तेज अन्तर्धान होत भयो । २६॥ .
मा
११॥
अ.१७
नारद बोले ऐसे कहिके शिवजी तब सब गणोंसहित अंतर्धान हो जात भये और देवता भक्तहैं प्यारे जाको एसीजो मूल प्रकृति, भा. टी.
अर्थात् माया है ताकी स्तुति करत भये॥१८॥देवता बोले,जासे उत्पन्न भये सत्त्व रज तम ये गुण सृष्टि पालन और संहारके
करनहारे हैं और जाकी इच्छासों संसारकी उत्पत्ति और नाश होयहै वासूलप्रकृतिकूहम नमस्कार करै हैं ॥१९॥ निश्चयकरि तेईस
नारदउवाच॥ इत्युक्त्वांतर्दधेदेवःसहभूतगणैस्तदा ॥ देवाश्चतुष्टुवुर्मूलप्रकृतिभक्तवत्सलाम् ॥३८॥ देवा
ऊचुः ॥ यदुद्भवाःसत्त्वरजस्तमोगुणाःसर्गस्थितिध्वंसनिदानकारिणः ॥ यदिच्छयाविश्वमिदंभवाभवौ
तनोतिमूलप्रकृतिनताःस्मताम् ॥१९॥ याहित्रयोविंशतिभेदशब्दिताजगत्यशेषेसमधिष्ठितापरा।यद्रूप
कर्माणिजडास्त्रयोऽपिदेवास्तुमूलप्रकृतिनताःस्मताम्॥२०॥यद्भक्तियुक्ताःपुरुषास्तुनित्यंदारिद्रयभीमोह
पराभवादीन् ॥नप्राप्नुवन्त्येवहिभक्तवत्सलांसदैवमूलप्रकृतिनता:स्मताम् ॥ २१ ॥
भेदोंकरि उच्चारण की जाती है और संपूर्ण जगत्में अधिष्टित है और पर हैं जाके रूप और कर्मोक जानने में तीनों देवताभी
॥५॥
जड हैं वा मूलप्रकृतिको हम नमस्कार करैं हैं॥२०॥ जाकी भक्ति करिके युक्त पुरुष सदा दारिद्रय भय मोह और तिरस्कार
आदिको नहीं प्राप्त होयह ऐसी और भक्त जाके प्यारे हैं ऐसी मूलप्रकृतिको हम सदा नमस्कार करें हैं ॥२१॥
आकाश पृथ्वीको प्रज्वलित करतोभयो वह वेगसों पृथ्वीतलमें गिरतो और बडे विशाल हैं नेत्र जामें ऐसोजोजलंधरकोशिरदता हि शरीरसे हरि लेत भयो॥१२॥और या जलंधरको शरीर पृथ्वीको शब्दायमान करत भयो रथसे गिरत भयोऔर देहसे जोतेज निकसो सो रुद्रमें लीन हो जात भयो॥१३॥और वृन्दाके देहको जो तेज हो वह गौरीमें लीन होतभयो या पीछे ब्रह्मादिक सब देवता हर्षसे प्रफुल्लित हैं नेत्र जिनके ऐसे होत भये॥१४॥फिर वेशंभुको प्रणाम करि विष्णुका वृत्तान्त कहतभये॥ देवताबोले, हे प्रदहनोदसीवेगात्पपातवसुधातले ॥जहारतच्छिर कायान्महदायतलोचनम् ॥ १२ ॥रथात्कायापपा तास्यनादयन्वसुधातलम् ॥तेजश्चनिर्गतं देहात्तछद्रेलयमागतम॥ १३॥ वृन्दादेहोद्भवंतेजस्तद्वौर्यालय मागतम् ॥ अथब्रह्मादयोदेवाहर्षेणोत्फुल्ललोचनाः॥ १४॥ प्रणम्यशिरसादेवंशशंसुर्विष्णुचेष्टितम्।देवा ऊचुः॥ महादेवत्वयादेवारक्षिता शत्रुजाद्भयात् ॥१५॥ किंचिदन्यत्समुद्भूतंतत्रकिकरवामहे।वृन्दाला वण्यसंभ्रांतीविष्णुस्तिष्ठतिमोहितः॥१६॥ रुद्रउवाच ॥ गच्छध्वंशरणं देवाविष्णोर्मोहापनुत्तय॥ शर ण्यांमोहनीमायांसावःकार्यकरिष्यति ॥ १७ ॥ • महादेवातुमकरिके देवता शत्रुसों उत्पन्न जोभयहोताते रक्षा किये गये॥१५॥कुछ और भय उत्पन्न भयो वामें अव हमकहा करें वह यह है कि वृन्दाकी सुंदरतासे संभ्रममें पडे विष्णु मोहित हो वहीं अर्थात् वृन्दाकी चिताभस्ममें पडे हैं।। १६॥ रुद्र बोले हे देव ताओ विष्णुका मोह दूरि करनेके निमित्त शरण जानेयोग्य जो मोहिनी मायाहै ताकीशरणमें जाओ वहतुम्हारोकार्यकरेगी१७ है al
मा.
भा. टी
१०॥
अ.१०
उनका अत्यन्त महाभयानक रूप देखिके दैत्य सन्मुख स्थित होनेकोन समर्थ होत भये किन्तु वेदशों दिशाओंको भागिजात भये
॥६॥ता पीछे रुद्र उन शुंभ निशुंभ दोनों दैत्यनकोशाप देत भये कि तुम मेरे युद्धसे भागे हौइस कारण गौरी करिके मारने योग्य
होउगे॥७॥ फिरि जलंधर वेगसों पैने बाणोंकी वर्षा जो है ताहि करत भयो तब भूमंडल बाणरूपी बडे अंधकारसों आच्छादित
तस्यातीवमहारौद्ररूपंदृष्ट्वामहासुराः॥ नशेकुःसंमुखस्थातुंभेजिरेतेदिशोदश ॥६॥ ततःशापंदौरुद्रस्त
योः शुंभनिशुंभयोः॥ ममयुद्धादपक्रांतौगौविध्यौभविष्यथः ॥७॥ पुनर्जलंधरोवेगाहवर्षनिशितैः
शरैः ॥ वाणांधकारसञ्छन्नंतदाभूमितलंमहत् ॥ ८॥ यावद्वद्रश्चचिच्छेदतस्यवाणचयंजवात्तावत्सप
रिघेणाशुजघानषभंवली ॥९॥ वृषस्तेनप्रहारेणपरावृत्तोरणांगणात्॥ रुद्रेणाकृष्यमाणोपिनतस्थौरण
भूमिषु ॥ १० ॥ ततःपरमसंक्रुद्धोरुद्रोरौद्रवपुर्धरः॥ चक्रंसुदर्शनंवेगाचिक्षेपादित्यवर्चसम् ॥ ११ ॥
होत भयो॥८॥जेसे शिवजीवाके बाणोंके समूहको वेगसे काटत भये वैसेही वह बली परिचसोबैलकोमारत भयो॥९॥ वा प्रहार
सो रणभूमिते लौटो भयो वह बैल रुद्र करि बैंचोभी गयो परन्तु रणभूमिमें न ठहरत भयो॥१०॥ तापीछे भयानक शरीर धारण
करनहारे शिव अतिक्रोधित हो सूर्यके समान है तेज जाको ऐसे सुदर्शन नाम चक्रको वेगसों चलानत भये ॥ ११॥
॥५०॥
नारद बोले, ता पीछे जलंधर रुद्रको अद्भुत पराक्रम जानि शिवजीको मोहित करतो सो मायाकरिगौरीको रचत भयो॥३॥
रथके ऊपर बंधीभई वा गौरीको शिवजी रोती भई देखि निशंभ आदि दैत्योंकरि मारीजाती देखत भये ॥२॥ गौरीकी वह
दशा देखि शिवजी उद्विग्नमन हो अपने पराक्रमको भूलिके नीचा शिर करि स्थित होत भये ॥३॥ता पीछे जलंधर फोंक
नारदउवाच ॥ ततोजलंधरोदृष्ट्वारुद्रमद्भुतविक्रमम्॥चकारमाययागौरींत्र्यंबकंमोहयन्निव॥ १॥ रथोप
रिचतांबद्धारुदंतींपार्वतींशिवः॥ निशुंभप्रमुखाद्यैश्चवध्यमानांददर्शसः॥२॥ गौरींतथाविधांदृष्ट्वाशि
वोप्युहिनमानसः॥अवाङ्मुखःस्थितस्तूष्णींविस्मृत्यस्वपराक्रमम्॥३॥ ततोजलंधरोवेगात्रिभिर्विव्याध
सायकैः॥ आपुंखमग्नस्तंरुद्रशिरस्युरसिचोदरे॥४॥ ततोजज्ञेसतांमायांविष्णुनासंप्रबोधितः॥रौद्ररूप
धरो जातोज्वालामालातिभीषणः ॥ ५॥
पर्यंत घुसेभये तीनि बाणनसे शिवजीको शिरमें छातीमें और पेटमें वेगसों वेधत भयो॥४॥ तापीछे विष्णुकार चेताये शिव वा
मायाकोजानिजात भये और भयानक रूप धारण करिके ज्वालाकी मालाअर्थात् ज्वालाके समूहसों अतिभयंकर होत भये ॥५॥
मा.
२
वेही दोनों राक्षस होके तुम्हारी स्त्रीको हरेंगे और तुमहूँ स्त्रीके दुःखीहो वनमें वानरोंकी सहायतावाले होउगे ॥ २८ ॥ भा. टी.
सर्वेश्वरहू तुम भ्रमण करोगे और यह जो तुम्हारो शिष्य हो सो मृगरूप होयँगे ऐसे कहिके वह वृन्दा उस वृन्दामें आसक्त है मन
जिनको ऐसे विष्णुकरि वारण कीगई हू अनिमें प्रवेश करत भई ॥२९॥३०॥ ता पीछे हरि वृन्दाका बारम्बार स्मरण करतेहुए।
अ. १३
तावेवराक्षसौभूत्वाभातिवहरिष्यतः॥ वंचापिभार्यादुःखाविनेकपिसहायवान् ॥२८॥ भ्रमसर्वेश्वरै
णोऽयंयस्तेशिष्यत्वमागतः॥इत्युक्तासातदावृन्दाप्राविशद्धव्यवाहनम् ॥ २९॥ विष्णुनावार्यमाणापित
स्यामासक्तचेतसा ॥३०॥ ततोहरिस्तामनुसंस्मरन्मुहुदाचिताभस्मरजोवरांठितः ॥ तत्रैवतस्थौमु
निसिद्धसंधैप्रबोध्यमानोऽपिययौनशांतिम् ॥३१॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये वृन्दोपाख्याने
विष्णुसाक्षात्कारो नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६ ॥
उसकी चिताकी भस्ममें लेटते भये वहीं स्थित रहे और मुनियों तथा सिद्धोंके समूह करिके समझाये गये भी शान्तिको न प्राप्त
होत भये ॥३१॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां कार्तिकमाहात्म्यभापाटीकायां भाषार्थ
॥४९॥
बोधिनीसमाख्यायां षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
१ ताहू पर तेरेऊपर जो कृपाहे ता करिके युक्त में याहि जिवावौं हो॥ नारद बोले,ऐसे कहिकै ब्राह्मण अतर्धान होत भयो ताही समय वह सागरनंदन जीवतभयो ॥२३॥और वृन्दाको आलिंगन करिके प्रसन्न मनहो चुंबन करत भयो अनंतर वृन्दाहूपतिको देखि मनमें हर्षित होत भई ॥२४॥ वा बागमें रहिके वा पतिसमेत बहुत दिनों तक विहार करत भई नारद बोले, कभी भोगके अंतमें तथापित्वत्कृपाविष्टएनंसंजीवयाम्यहम् ॥ नारद उवाच॥ इत्युक्त्वांऽतर्दधेविप्रस्तावत्सामरनंदनः॥२३॥ वृंदामालिंग्यतहत्कंचुचुंवेप्रीतमानसः॥अथवृंदापिभरिंदृष्ट्वाहर्षितमानसा॥ २४ ॥रेमेतहनमध्यस्था तद्युक्ताबहुवासरम् ॥ नारदउवाच ॥कदाचित्सुरतस्यांतेदृष्ट्वाविष्णुंतमेवहि ॥ २५॥ निर्भय॑क्रोधसंयु तावृन्दावचनमब्रवीत् ॥ वन्दोवाच ॥ धिक्त्वदीयहरेशीलंपरदाराभिमामिनः ॥२६॥ज्ञातोऽसित्वंमया सम्यङ्मायीप्रत्यक्षतापसः॥ यौत्वयामाययाहाःस्थौ स्वकीयौदर्शितामम ॥२७॥ वाहीको विष्णु देखत भई ॥२५॥ फिरि क्रोधित हो धमकाके वृन्दा वोलत भई ॥ वृन्दा बोली, हेहरि ! पराई स्त्रीके साथके भोग करनहारे जो तुम हो तिनके शीलको धिकार है। प्रत्यक्षमें तपस्वी रूपके धारण करनहारे तुम भली भॉति मायावी जाने गये और जो तुम माया करि मोको दिखाये वे तुम्हारे द्वारपाल है ॥ २६ ॥ २७ ॥ ..
--
भा. टी.
अ. १६
कमंडलुका जल छिडकि वह उस समय मुनिकरि आश्वासित अर्थात् चैतन्य की गई फिरि वह अपने माथेको पतिके माथेपरधारके
दुःखी हो रोदन करती भई॥ १८॥वृन्दा बोले,हे प्रभु !जो तुम पहिले सुखमें आनंदित करते सो तुम निरपराधिनीजो में प्यारी,
वहाँ तासों क्यों नहिं बोलोहो॥१९॥जिन तुम करिके विष्णु सहित सब देवता और गंधर्व जीतेगये सो तुम तीनों लोकनके जीतनहारे
कमंडलुजलंसिक्त्वामुनिनाश्वासितातदा ॥ स्वभर्तृभालेसाभालंकृत्वादीनारुरोदह ॥१८॥न्दोवाच॥
यःपुरासुखसंवादे विनोदयसिमांप्रभो ॥ सकर्थनवदस्यद्यवल्लभांमामनागसम् ॥ १९ ॥ येनदेवाःसगं
धर्वानिजिताविष्णुनासह ॥सकथंतापसेनाद्यत्रैलोक्यविजयीहतः ॥२०॥ नारद उवाच ॥ रुदिवे
तितदावन्दातमुनिवाक्यमब्रवीतान्दोवाच ॥ कृपानिधेमुनिश्रेष्ठजीवयनंममप्रियम् ॥ त्वमेवास्यमुने
शक्तोजीवनायमतोमम ॥ २१ ॥ नारद उवाच ॥ इतितद्वाक्यमाकर्ण्यप्रहसन्मुनिरब्रवीत् ॥ मुनिरु
वाच ॥ नायजीवयितुंशक्तोस्द्रेणनिहतोयुधि ॥ २२॥
अब तपस्वीकार कैसे मारे गये ॥२०॥ नारद बोले, वा समय वृन्दा ऐसे रोदन करकै वा मुनिसों वचन बोलत भई वृन्दा बोली
हे कृपानिधि मुनिश्रेष्ठवर!मेरे पतिको जिवावो हे मुनि ! तुमही याके जिवाने में समर्थ हो यह मेरो मत है॥२१॥ नारद बोले, यह
वाको वचन सुनि हँसिके मुनि बोलत भये-मुनि बोले; रुद्रकार संग्राममें मारेगये याको हमको जिवानेकी सामर्थ्य नहीं है ॥२२॥
॥४८॥
वृन्दा बोली, हे कृपानिधि ! तुमने या घोर भयते मेरी रक्षा करी अब मैं कुछ प्रार्थना कराचाहौं सो कृपा करिके आप वाको सुनिय॥१३॥ हे प्रभु ! मेरा पति जलंधर रुद्रकेसाथ युद्ध करनेको गयो है सो वहां युद्धमें कैसेहैं हे उत्तम व्रतधारी महाराज ! यह मोसों कहिये ॥१४॥ नारद बोले, मुनि वाके वचनको सुनि कृपा करिके ऊपरको देखत भये इतनेमें दो वानर आके वा मुनीश्वर वृन्दोवाच ॥ रक्षिताईत्वयाघोराद्भयादस्मात्कृपानिधे ॥ किंचिडिज्ञप्तुमिच्छामिकृपयातन्निशम्य ताम् ॥ १३ ॥ जलंधरोहिमेभर्तारुद्रंयोद्धंगतःप्रभो॥ सतवास्वेकथंयुद्धेतन्मेकथयसुव्रत ॥ १४ ॥ ॥ नारदउवाच ॥ ॥ मुनिस्तहाक्यमाकर्ण्यकृपयोर्ध्वमवैक्षत ॥ तावत्कपीसमायातीतंप्रणम्याग्रतःस्थि तौ ॥ १५॥ ततस्तद्भलतासंज्ञानियुक्तौगगनंगौ ॥ गत्वाक्षणा दागत्यवानरावग्रतःस्थितौ ॥ १६ ॥ शिरःकबंधहस्तौचदृष्टाधितनयस्यसा ॥ पपातमूच्छिताभूमौभर्तृव्यसनदुःखिता ॥ १७ ॥ कोनमस्कार करिके आगे खडं होत भये॥१६॥ और उन ऋपिको भौंहकी संज्ञासों प्रेरणा करेगये दो कपि आकाशको जात भये और जायके आधेही क्षणमें फिरि आयके वे दोनों वानर मुनिके आगे स्थित होत भये ॥ १६॥ जलंधरका शिर और कबंध है हाथोंमें जिनके ऐसे उन वानरोंको देखि वृन्दा पतिके कष्टसों दुःखित हो मूच्छित होके भूमिमें गिरत भयी ॥ १७॥ G
मा.
भा. टी,
७॥
ता पीछे भ्रमण करती भई वह बाला सिंहको है मुख जिनको और डा तथा नेत्रोंसे भयंकर ऐसी डरावनी सूरतके दो राक्षसन
को देखत भई॥८॥ उनको देखि अतिव्याकुल होभागनेमें तत्पर होत भई वा समय शांत रूप मौन धारण करे भये शिष्य
समेत बैठे भये एकत्रतपस्वीको देखत भई॥९॥ता पीछे अपनी बांह उनके भयसे उस तपस्वीके गलेमें डारि कहत भई हे मुनि
ततःसाभ्रमतीबालाददर्शातीवभीषणौ ॥राक्षसौसिंहवदनौ दंष्ट्रानयनभीषणौ ॥८॥ तौदृष्ट्वाविह्वलाती
वपलायनपराभवत् ॥ ददर्शतापसंशांतंसशिष्यमौनमास्थितम् ॥९॥ ततस्तत्कंठमावृत्यनिजबाहुलतां
भयात् ॥ सुनेमारक्षशरणमागतास्मीत्यभाषत ॥१०॥ मुनिस्तांविह्वलांदृष्ट्वाराक्षसानुगतांतदा॥हुंकारेणैव
तौघोरौचकारविमुखौतदा ॥ ११॥ तौहुंकारभयत्रस्तौदृष्वातौविमुखौगतौ ॥ प्रणम्यदंडवभूमौवन्दावच
नमब्रवीत् ॥ १२॥
मैं तुम्हारीशरणमें आई हौ मेरी रक्षा करो॥१०॥तबमुनि राक्षसोंकरि खरेरी गई उस वृन्दाको व्याकुल देखि उन दोनों भयानक
राक्षसोंको हुंकारसे भगाय देतभये ॥ ११॥ हुंकार करके भयसू डरिके भाग गये उन राक्षसनको देखि वृन्दा दण्डवत्प्रणाम
करिके वचन बोलत भई ॥१२॥
॥४७॥
VON
और काले फूलकी माला पहिरे कच्चे मांसके खानेहारे जावोंकरि सेवित और दक्षिणदिशाको जात भयो मूड मुंडाये अंधकारकार
घेरो भयो ऐसो अपने पतिको स्वप्नमें देखत भई ॥३॥ और आपसमेत अपने पुरको सहसा समुद्र में डबोभयो देखत भई ।। वा
समय जगीभई वह या स्वानकोशोचने लगी॥४॥और उदय भये सूर्यको छिद्रोंकरि युक्त निश्चल देखत भई ॥ वह सब अनि
कृष्णप्रसनभूपाढचक्रव्यादगणसेवितम् ॥ दक्षिणाशागतंमुंडतमसाप्यावृतंतदा॥३॥ स्वपुरंसागरेमनं
सहसैवात्मनासह ॥ प्रवुद्धासातदावालादुःस्वप्नंप्रविचिन्वती ॥ ४ ॥ ददीदितमादित्यंसच्छिद्रनिष्प्रभं
मुड्डः ॥ तदनिष्टमितिज्ञावारुदंतीभयविह्वला ॥५॥ कुत्रचिन्नालभच्छमगोपुराट्टालभूमिषु ॥ ततःसखी
द्वययुतानगरोधानमागमत् ॥ ६॥ संत्रस्तासाभ्रमहालानालभत्कुत्रचित्सुखम्॥वनाहनान्तरंयातानैववे
दात्मनःसुखम् ॥५॥
जानि रोदन करनेलगीऔर भयसों व्याकुल होत भई ॥५॥ जो पुर और अटारी आदिकी भूमिनमें कहूँ सुखको न प्राप्त होत
भई। ता पीछे दो सखीनको साथ लेके नगरके समीप जो वाग है तामें आवत भई ॥६॥ भयभीत वह वाला भ्रमण करत भई
परन्तु सुखको कहें न प्राप्त होत भई एक बागसे दूसरे वागमें गई परन्तु अपनो सुख न देखत भई ॥७॥
--
मा.
भा. टी.
६॥
अ. १६
तब वे शिव मायाको अंतर्धान भई देख बोधको प्राप्त होत भये॥ ३० ॥ तापीछे शिव मनमें विस्मित हो क्रोधकरिके शुद्ध के
लिये फिरि जलंधर पर जातभये वह दैत्यह फिरि रणमें आये भये शिवको देखि बाणनके समूहसों आच्छादित करतभयो॥३१॥
इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भाषार्थबोधिनीसमा
अंतर्दानगतांमायांदृष्ट्वासबुबुधेतदा ॥ ३० ॥ ततोभवोविस्मितमानसःपुनर्जगामयुद्धायजलंधररुषा॥
सचापिदैत्यःपुनरागतंशिवदृष्ट्वाशरौधैःसमवाकिरद्रणे ॥३१ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये
शिवजलंधरसंग्रामोनामपंचदशोऽध्यायः ॥ १५॥ नारदउवाच ॥ ॥ विष्णुर्जालंधरंगत्वातदैत्यपुटभे
दनम् ॥ पातिव्रत्यस्यभंगायवंदायाश्चाकरोन्मतिम्॥१॥ अथर्सेदारकादेवीस्वप्नमध्येददशह ॥ भरि
महिषारूढंतैलाभ्यक्तंदिगंबरम् ॥२॥
ख्यायां पंचदशोऽध्यायः ॥१५॥ नारद बोले, विष्णु वा जलंधरके नगरमें जायके वृन्दाके पतिव्रताधर्म भंग करनेकी मति करत
भये ॥१॥ या पीछे वृन्दा देवी स्वप्नमें अपने पतिको भैंसेपर चढ़ो और तेल लगाये नंगेशरीर देखत भई ॥२॥
॥४६॥
ता पीछे दैत्य क्षणभरमें विजली समान जो पार्वती हैं ताहि नदेखके वेगसे वहां युद्ध में फिर भावत भयो जहां शिवजी विद्यमा
थे ॥ २६ ॥ पार्वतीह वा समयमें मन करिके विष्णुको स्मरण करत भई तबही उन देव अर्थात् विष्णुको समीपही बैठो देखत
भई ॥२६॥ पार्वती बोली, हे विष्णु ! जलंधर दैत्यने जो अद्भुत कर्म कियो सो कहा वा दुटको काम आपको नहीं
तामदृष्ट्वाततोदैत्यःक्षणाद्विद्युल्लतामिव ॥ जवेनागात्पुनदेयत्रदेवोटपध्वजः ॥ २५॥ पार्वत्यपिभयादि
[सस्मारमनसातदा ॥ तावद्ददर्शतदेवंसूपविटंसमीपगम् ॥ २६ ॥ पार्वत्युवाच ॥ विष्णोजलंधरोदैत्यः
कृतवान्परमाद्भुतम् ॥ तत्किनविदितंतऽस्तिचेष्टिततस्यदुमतेः॥ २७ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ तेनैवदर्शि
तःपथावयमप्यन्वयामहे ॥ नान्यथाऽसौभवेद्वध्यः पातिव्रत्यसुरक्षितः॥२८॥ नारद उवाच॥ जगा
मविष्णुरित्युक्त्वापुनर्जालंधरंपुरम् ॥ अथरुद्रश्चगंधर्वानुगतःसंगरेस्थितः ॥ २९ ॥
विदित है॥२७॥श्रीभगवान बोले,वाही करिक मार्ग दिखायो गयो अर्थात् छल करिक रूप वनावनो सो हमहूँ वाही मार्ग में चलेंगे
अर्थाद जैसो छल वान किया है ऐसो होहमह वाली स्त्रीसं करें अन्यथा प्रतिव्रताधर्मसंरक्षित वह मारने योग्य न होयगो ॥२८॥
नारद बोले,विष्णु ऐसे कदिक फिरि जलंधरके पुरको जात भये और रुद्र गंधर्वसमेत संग्राममें स्थित, रहत भयो ॥ २९ ॥
मा.
भा.
अ.१५
जलंघरदैत्य रुद्रको नृत्यगानकीओर एकाग्र मन भयो जानि कामसे पीडित हो जहां गौरी स्थित थीं वहीं शीघ्र जात भयो॥२०॥
शोर महाबलीजे शुंभ निशुंभ हैं उनको युद्धमें राखिके आप दशभुज पांचमुखे और तीनि नेत्र तथा जटाओंको धारण करि शिवका
रूप धारण करत भयो॥ २१॥ और वह जलंधर बड़े बैलपर चढत भयो या पीछे भवकी वल्लभा जो पार्वतीजी हैं सोशिवजीको
एकाग्रीभूतमालोक्यरुद्रंदैत्योजलंधरः॥कामार्त्तःसजगामाशुयत्रगौरीस्थिताऽभवत्॥२०॥ युद्धेशुंभनि
शुंभाख्यौस्थापयित्वामहावलौं ।दशदोर्दैडपंचास्यस्त्रिनेत्रश्चजटाधरः॥२१॥ महावृषभमारूढःसबभू
वजलंधरः॥ अथोरुद्रंसमायांतमालोक्यभववल्लमा॥ अभ्यायोसखीमध्यात्तदर्शनपथेऽभवत्॥२२॥
यावद्ददर्शचावंगीपार्वतीदनुजेश्वरः ।।तावत्सवीर्यमुमुचेजडांगश्चाभवत्तदा॥२३॥अथज्ञात्वातदागौरीदा
नवंमयविह्वला ॥ जगामांतहितावेगात्सातदोत्तरमानसे ॥२४॥
आवत देखि सखियोंके मध्यसों उठिके उनके दर्शनके मार्गमें आवत भई ॥ २२ ॥ वह दैत्यनकोराजा सुन्दर है अंग जाको
ऐसी पार्वतीको देखि वीर्यको छोडत भयो और वाको अंग जड होजात भयो॥२३॥ता पीछे गौरीवाको दानव जानि भयसों
व्याकुल हो अंतहित होके अतिशीघ्र उत्तरदिशामें मानससरोवरको जात भई ॥ २४ ॥
॥४५॥
कटि गयो है धनुप जाको और रथ रहित ऐसे जलंधर वेगसों गदाको उठायके शिवके ऊपर दौरत भयो तब शिवजी वाकी गदाको बाणनकरि दो खंड करि देत भये ॥ १५॥ ताहूपर वह घूमा उठायके मारनेकी इच्छासों शिवजीके ऊपर जात भयो तभी शिवजी वाणोंके समूहसो वाको एक कोस भरि हटायदेत भये ॥१६तापीछे जलंधर दैत्य शिवजीको अधिक बलवान् जानिके सच्छिन्नधन्वाविरथोगदामुद्यम्यवेगवान् ॥ अभ्यधावच्छिवस्तावद्दावाणर्दिधाऽकरोत्॥ १५॥ तथापि मुष्टिमुद्यम्ययोरुद्रजिघांसया ॥ तावच्छिवेनवाणोघःक्रोशमात्रमपाकृतः॥१६॥ ततोजलंधरोदैत्यो मत्वारुद्रंवलाधिकम् ॥ ससर्जमायांगांधर्वीमद्धतांरुद्रमोहिनीम् ॥ १७॥ ततोजगुश्चनन्तुगंधर्वाप्सरसां गणाः॥ तालवेणुमृदंगाचान्वादयंतिस्मचापर ॥ १८॥ तदृष्ट्वामहदाश्चर्यस्द्रोनादविमोहितः॥ पतितान्य पिशस्त्राणिकरेभ्योनविवेदसः ॥ १९ ॥ रुद्रको मोहित करनहारी अद्भुत गांधर्वी मायाको उत्पन्न करत भयो ॥ १७॥ तापीछे गन्धर्व जे हे ते गान करतभये अप्सरानके गण नाचत भये तथा और सब ताल वेणु मृदंग आदि वाजानको वजावत भये ॥ १८ ॥ वह बडा आश्चर्य देखिकै रुद्र नादसों मोहित होदाथनते गिरे भये शस्त्रनकोभी नजानत भये ।। १९॥ MARA H भा, री ४॥ अ.१५ मा.और घस्मर दैत्यको पाशसे बांधके पृथ्वीमें गिरावतभये कोई बैलके सींगनसे मारेगये दैत्य सिंहसे पीडित हाथियोंके समान संग्राममें ठहरनेको न समर्थ भये॥ १०॥ता पीछे क्रोधसों व्याप्त है शरीर जाको ऐसे जलंधर वचके समान शब्दोंसों संग्राम में रुद्रको बुलावत भयो॥११॥ जलंधर बोलो, अब मेरे साथ युद्ध करो तुमको इनके मारनेसे क्या प्रयोजन है ? हे जटाधारी बद्धाचघस्मरंदैत्यंपाशेनाभ्यहनद्भुवि ॥ वृषशृंगहता केचित्केचिदाणेनिपातिताः ॥ नशेकुरसुराःस्थातुं गजाःसिंहार्दिताइव॥१०॥ ततःकोपपरीतात्मावेगानंजलंधरः॥आह्वयामाससमरेतीवाशनिसमस्वनः ॥११॥जलंधरउवाच ॥युद्धयस्वाद्यमयासाईकिमभिनिहतैस्तव ॥ यचकिंचिद्वलंतेऽस्तितद्दर्शयजटाधर ॥ १२॥ नारदउवाच॥इत्युक्त्वादशभिर्वाणैर्जघानदृषभध्वजम् ॥सतान्प्राप्ताञ्छितैर्बाणेश्चिच्छेदप्रहस ञ्छिवः ॥ १३ ॥ ततोहयान्ध्वजंक्ष–धनुश्चिच्छेदसप्तभिः ॥ १४ ॥ तुममें जो कुछ बल होय सो दिखाओ ॥ १२॥ नारद बोले, ऐसे कहिके दश बाणनसे शिवको मारत भयो वे शिव आये भये उन बाणनको अपने पैने बाणनकरिके हॅसिकै काटि देत भये ॥ १३ ॥ता पीछे घोडाको ध्वजाको और छत्रको सात बाणनकरि काटत भये ॥ १४ ॥ - ॥४४॥ ...
या पीछे जलंधर दैत्यनको भागे भये देखि संग्राममें क्रोधसे हजारन बाणनको छोडतो भयो शिवजीके ऊपर दौरतभयो ।
॥५॥शंभ निशंभ अश्वमुख कालनेमि बलाहक खड्गरोमा प्रचंड और घस्मर आदि देत्य शिवके ऊपर दौरत भये ॥६॥
शिवीगणोंका सेनाको वाणरूपी अंधकारसे ढकी भई देखि देत्यनके वाणजालको काटि अपने वाणनसों आकाशको आच्छा
अथजालंधरोदैत्यान्विद्वतान्प्रेक्ष्यसंगरे ॥ रोपादधावचंडीशंभुचन्वाणान्सहस्रशः॥५॥ शुंभोनिशुंभोश्व
मुखःकालनेमिर्वलाहकः ॥ खड्गरोमाप्रचण्डश्चवस्मराद्याःशिवययुः॥६॥वाणांधकारसंच्छन्नंदृष्ट्वागणवलं
शिवः ॥ वाणजालमवच्छिद्यस्ववाणैराहतंनभः ॥ ७ ॥ दैत्यांश्चवाणवात्याभिःपीडितानकरोत्तदा॥
प्रचण्डवाणजालौघेरपातयतभूतले ॥८॥ खड्गरोम्णःशिरकोपात्तदापरशुनाच्छिनत् ॥वलाहकस्यच
शिरः खट्वांगेनाकरोविधा ॥९॥
दित कार देत भये ॥७॥ और वा समय देत्यनको वाणरूपी बबूलनसोंव्याकुल करि देत भये और प्रचंड वाणनके समूहसों
पृथिवी में गिराय देत भये ॥ ८॥ और खगरोमा नाम राक्षसके शिरको क्रोधसे फरस्सा करिके काटत भये और बलाहक नाम
दैत्यके शिरको खट्वांगसे दो टूक करदेत भये ॥ ९॥
मा.
भा. री
४३॥
अ.१५
नारद बोले,वह शीघ्रही जाके परिघसों वीरभद्रको मस्तकमें मारत भयो वह वीरभद्रहू शिर फूटनेसों रुधिरको डारत भयो पृथ्वी
में गिरतभयो ॥३१ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयपंडितकेशवप्रसादकृतायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भाषार्धबोधिनीसमा
ख्यायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ नारद बोले, वीरभद्रको शिरोभयो देखि रुद्रके गण भयसों रणको छोडि पुकार करते भये
नारद उवाच॥सवीरभद्रत्वरयाऽभिगम्यजघानदैत्य परिघेणमूर्द्धनि॥ सचापिवीर प्रविभिन्नमूपिपातभू
मौरुधिरंसमुगिरन्॥ ३१ ॥ इति श्रीपद्मपुराणकार्तिकमाहात्म्येचतुर्दशोऽध्यायः॥१४॥ नारदउवाच ॥
पतितंवीरभद्रंतुदृष्ट्वारुद्रगणाभयात् ॥ आगमँस्तेरणहित्वाक्रोशमानामहेश्वरम्॥१॥अथकोलाहलंश्रुत्वा
गणानांचंद्रशेखरः।अभ्ययावृषभारूढःसंग्रामंप्रहसन्निवारुद्रमायांतमालोक्यसिंहनादैर्गणाःपुनः॥
निवृत्ताःसंगरेदैत्यान्निजघ्नुःशरदृष्टिभिः ॥३॥ दैत्याश्चभीषणंदृष्ट्वासर्वेचैवविदुद्रुवुः॥ कार्तिकबतिनंदृष्ट्वा
पातकानीवतद्भयात् ॥४॥
शिवके समीप गये ॥ १॥ या पीछे कोलाहल सुनिकै चन्द्रशेखर वृषपर चढि हॅसते भये संग्रामको जात भये॥२॥रुद्रको आते
भये देखि लौटे भये गण सिंहनाद करिके फिरि बाणनकी वर्षासों दैत्यनको मारतभये ॥३॥ दैत्य शिवजीको भयंकर देखि
ऐसे भागतभये जैसे कार्तिकत्रत करनहारेको देखि वाके भयसे पाप भाग जाय हैं ॥४॥
.
॥४३॥
ऐसेही नंदीको वेगसे भूमिमें गिराय देत भयो तब गणेश क्रोधित हो वाकी गदाको फरसासों काटि देतभये ॥२६॥वीरभद्र वा
दानव के हृदय में तीनि वाण मारत भये और सात बाणनसों वाके घोडानको पताकाको धनुप और छत्रको काटि देत भये२७॥
ता पीछे दैत्यराज अतिकोधित हो दारुण शक्ति उठाके गणेशको गिराय देतभयो और फिीर दूसरे रथमें चढत भयो ॥ २८ ॥
तथैवनंदिनंवेगादपातयतभृतलो।ततोगणेश्वर क्रुद्धोगदांपरशुनाच्छिनत्॥ २६ ॥ वीरभद्रस्त्रिभिर्वाणैर्हदि
विव्याधदानवम् ॥ सप्तभिश्चहयान्केतुंधनुश्छत्रंचचिच्छिदे ॥२७॥ ततोऽतिकुद्धोदैत्येन्द्रःशक्तिमुद्यम्य
दारुणाम्॥ गणेशंपातयामासरथमन्यसमारुहत् ॥ २८ ॥ अभ्ययादथवेगेनवीरभद्रंपान्वितःततस्तौ
सूर्यसंकाशीयुयुधातेपरस्परम् ॥ २९ ॥ वीरभद्रस्ततस्तस्यहयान्वाणैरपातयत् ॥ धनुश्चिच्छेददैत्येंद्रःपु
प्लुवेपरिधायुधः॥ ३० ॥
तापीछे कोधित हो वीरभद्रपर दौरत भयो तापीछे सूर्यके समान है कांति जिनकी ऐसे दोनों परस्पर युद्ध करत भये ॥२९॥ ता
पीछे वीरभद्र वाणनकरिके वाके घोडानको गिराय देत भये और धनुपको काटि देत भये तव देत्येन्द्र परिव अर्थात् लोहांगी
लेके दौरत भयो ॥ ३०॥
मा.
भा.दी
अ. १७
तब वह बली सागरनन्दन अपनी सेनाको गणोंकरि विध्वंसको देखि बडी पताकायुक्त रथमें बैठि गणोंके सन्सुख आवत भयो।
॥२०॥हाथी घोडे और रथोंके शब्द तैसेही शंख और भेरीका शब्द और दोनों सेनाओंका सिंहनाद उस समय होतभयो॥२१॥
जलंधरके बाणसमूहोंसे आकाश और पृथ्वीका मध्य ढकगया जैसे कि कुहरके पुंजसे आच्छादित होजाताहै॥२२॥जलंधर पांच
प्रतिध्वस्तांतदासेनादृष्ट्वासागरनंदनः॥ रथेनातिपताकेनगणानभिययौवली॥२०॥हस्त्यश्वरथसह्रादाशं
खभेरीवास्तथा ॥ अभवत्सिहनादश्चसेनयोरुभयोस्तदा ॥ २१ ॥ जलंधरशरवातैर्नीहारस्यतलैरिव ॥
द्यावापृथिव्योराच्छन्नमंतरंसमपद्यत ॥२२॥ गणेशंपंचभिर्विद्धाशैलादिनवभिःशरैः।वीरभद्रंचविंशत्या
ननादजलदस्वनः॥२३॥कार्तिकेयस्तदादैत्यशक्त्याविव्याधसत्वरः॥जुघूर्णशक्तिनिर्भिन्नःकिंचियाकुल
मानसः॥२४॥ ततःक्रोधपरीतांग कात्तिकेयंजलंधरः॥ गदयाताडयामाससचभूमितलेऽपतत् ॥ २५ ॥
बाणनसो गणेशको और नवसों नंदीको और बीस बाणनसों वीरभद्रको वेधिके मेघके समान गर्जत भयो ॥२३॥तब कार्तिकेय
दैत्यको अतिशीघ्र शक्तिसे वेधत भये तब शक्तिके लगनेसे कुछ व्याकुल मन हो घूमने लगो ॥२४॥ ता पीछे क्रोधसे व्याप्त है
अंग जाको ऐसो जलंधर कार्तिकेयको गदासे मारत भयो तब वे तो भूमिमें गिरत भये ॥ २५ ॥
॥४२॥
तब महाबली वीरभद्र उनको पीडित देख करोड भूतो समेत उसपर दौरत भये ॥१४॥ कूष्मांड भैरव वेताल योगिनियोके गण
पिशाच योगिनियोके समूह और गण ये सब वीरभद्र के साथ चलत भये ॥१५॥तिस किलकिलाशब्दोसे और सिंहनादोसे तथा
है। अन्य शब्दोंसे भरी भई सब पृथिवी कांपने लगी॥१६॥ ता पीछे भूत दौरतभये और दानवोंको भक्षण करत भये उछलतेथे
तंपीड्यमानमालोक्यवीरभद्रोमहावलः ॥ अभ्यधावतवेगेनभृतकोटियुतस्तदा ॥ १४॥कूष्मांडाभैरवा
। श्चापिवेतालायोगिनीगणाः॥पिशाचायोगिनीसंघागणाश्चापितमन्वयुः ॥ १५॥ ततःकिलकिलाशब्दैः
सिंहनादैःसुघरैः॥निनादैर्भरितासर्वापृथिवीसमकंपत ॥१६॥ ततोभृताभ्यधावतभक्षयतिस्मदानवान्॥
उत्पतंत्यापतिस्मनन्तश्चरणांगणे ॥ १७ ॥ नंदीचकात्तिकेयश्चसमाश्वस्तोत्वरान्वितौ ॥ निजन्नतूर
णेदैत्यान्निरंतरशरव्रजैः १८॥ छिन्नभिन्नाहतेदत्यः पतितै क्षितस्तदा ॥ व्याकुलासाऽभवत्सेनाविषण्ण
वदनातदा ॥१९॥
कूदतेथे और रणभूमिमें नाचतेथे ॥१७॥ नंदी और कार्तिकेय स्वस्थ होके शीव्रतासे रणमें दैत्योंको अविच्छिन्न बाणोंके समूह
से मारतभये॥ १८ ॥ छिन्नभिन्न और मारंगये गिरेभये तथा खायेभये ऐसे दैत्योंसे मलिन है मुख जाको ऐसे सेना उस समय
व्याकुल होतभई॥ १९ ॥
HD मा. भा. टी इस पीछे शुभ और गणेश जिनके रथ और मूस वाहन हैं ऐसे दोनों युद्ध करते हुए आपसमें शरोंके समूहसों भेदन करत भये ॥८॥ तब गणेशजी बाणसे शुंभको हृदयमें वेधन करत भये और तीन बाणोंकरिके उसके सारथीको भूमिमें गिराय देतभये ॥९॥ ता पीछे शंभहू अति क्रोधित हो बाणोंकी वर्षासे गणेशको और तीनि बाणोसे मूसेकोवेधिके मेघके समान गर्जत अथशंभोगणेशश्चरथमूषकवाहनौ।युध्यमानौशरत्रातःपरस्परमविध्यताम् ॥ ८॥ गणशस्तुतदाशुभंह दिविव्याधपत्रिणासारथिंचत्रिभिवाण पातयामासभूतले ॥९॥ततोऽतिद्धःशंभोऽपिवाणदृष्टयागणा धिपम् ॥ मूषकंचत्रिभिर्विद्धाननादजलदस्वनः॥ १० ॥ मूषकःशरभिन्नांगश्चलितुनराशाकहालंबोदरः समुत्तीर्यपदातिरभवन्नृप ॥ ११ ॥ ततोलंबोदर शुभहत्वापरशुनाहृदि।अपातयत्तदाभूमौमूषकंचारु हत्पुनः॥ १२॥ कालनेमिनिशुंभश्चाप्युभोलंबोदरंशरैः॥युगपज्जघ्नतुःक्रोधात्तोत्ररिवमहाद्विपम् ॥१३॥ भयो॥ १०॥ हे राजा ! बाणोंसे विदीर्ण है अंग जाको ऐसो मूसा जब न चलसका तब गणेशजी उतरिके पावसे चलने लगे ॥११॥ता पीछे गणेशजीछातीमें फरसा मारिके शुंभको पृथ्वीमें गिरावत भये और फिर मूसेपर चढत भये॥१२॥ काल नेमि और निशुंभ दोनों एकसाथही गणेशजीको क्रोधकार बाणोसे मारत भये जैसे अंकुशसे कोई हाथीको मारै ॥ १३ ॥ --- ॥४१॥ -- निशुंभ पांच बाणोंकरिके स्वामी कार्तिकके मयूरको वेगसे हृदयमें वेधत भयोऔर वह मोर मूच्छित होके गिरत भयो॥३॥तिस पीछे कार्तिकेय क्रोधित हो जबतक शक्तिको ग्रहण कर तबतक निशंभ वेगसे अपनी शक्तिकरके उन्हें गिराय देत भयो ॥४॥ ता पीछे नंदी बाणोंके समूहसों कालनेमिको वेधत भयो और सात बाणोंसे घोडोंको तथा पताकाको और धनुषको काटत निशुंभःकार्तिकेयस्यमयूरपंचभिःशाहदिविव्याधवेगेनमूच्छितःसपपातह ॥३॥ततःशक्तिधर शक्तिया वजग्राहरोषितातावन्निशुंभोवेगेनस्वशक्त्यातमपातयत् ॥४॥ ततोनंदीशरवातःकालनेमिमविध्यत॥ सप्तभिश्चहयान्केतुंधनुःसारथिमच्छिनत् ॥ ५॥ कालनेमिस्तुसंक्रुद्धोधनुश्चिच्छेदनंदिनः ॥ तदपास्य सशूलेनतंवक्षस्यहनबली॥६॥ सशूलभिन्नहृदयोहताश्वोहतसारथिः॥अद्रेःशिखरमामुच्यशैलाद्रिंसो प्यपातयत् ॥७॥ भयो॥५॥ कालनेमिभी कोधित होके नदीका धनुष काटतभयोतब वह बलवान् उस धनुपको त्यागिके उस कालनेमिकी छातीमें शूल मारत भयो॥ ६॥शूलसे भेदन किया गया है हृदय जाको और मारे गये घोडा और सारथी जाके ऐसो जो कालनेमि है सो पर्वतके शिखरको उखाड़के वासे नंदीको गिरावत भयो॥ ७ ॥ wer
मा.
भाटी
200
ता पीछे शैलादि कहिये नंदी और गणेश और स्वामीकार्तिक अपनी सेनाको हारी भई देखि क्रोधयुक्त ये तीनों हठसे दैत्य
वरनको शीघरोंकत भये ॥३० ॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां कार्तिकमाहात्म्य
टीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ नारद बोले, वे दैत्य नंदी और इभमुख कहिये गणेश और
ततश्चमग्नंस्वबलंविलोक्यशैलादिलम्बोदरकार्तिकेयाः ॥ त्वरान्वितादैत्यवरान्प्रसह्यनिवारयामासुरम
पिणस्ते ॥३० इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ नारदउवाच ॥
तेगणाधिपतीन्दृष्ट्वानंदीभमुखषण्मुखान् ॥ अमर्षांदभ्यधावंतद्वंद्वयुद्धायदानवाः॥ १ ॥ नंदिनकालने
मिश्वशुंभोलंबोदरंतथा ॥ निशुंभ षण्मुखवेगादभ्यधावतदंशितः ॥ २॥
पण्मुख कहिये कार्तिकेय इत्यादि गणोंको देखि क्रोधसे द्वंद्व युद्धके लिये दौरत भये॥१॥ अब द्वंद्वयुद्ध वर्णन करै है--कालनेमि
दैत्य नंदीसे युद्ध करनेको आया और शुम्भ गणेशजीसे और निशुभ स्वामी कार्तिकेयसे ये सब कवच पहिरि २ इन सबोंसे
युद्ध करनेको वेगसे दौरत भये-॥२॥
॥४०॥
गणनके भयसों भागीभई सेनाको देख शुभ और निशुभ दोनों सेनापति और बलवान् कालनेमि ये तीनों क्रोधयुक्त हो युद्धको
जात भये ॥२५॥ ये तीनों महाबली वर्षाऋतुमें मेघनके समान बाणकी वर्षाको छोडतेहुए गणनकी सेनाको रोकत भये ॥२६॥
ता पीछे वे दैत्यके शरसमूह टीडी दलके समान आकाश और सब दिशानको रोकि लेतभये और गणनकी सेनाको
भग्नांगणभयात्सेनांदृष्ट्वामर्षयुताययुः ॥ निशुंभशुभसेनान्योकालनेमिश्चवीर्यवान् ॥२५॥ त्रयस्तेवारया
मासुर्गणसेनामहावलाः॥ मुंचंतःशरवर्षाणिप्रापीवबलाहकाः॥ २६ ॥ ततोदैत्यशरोधास्तेशलभाना
मिवव्रजाः॥ रुरुधुःखंदिशःसर्वांगणसेनांप्रकंपयन् ॥ २७॥ गणाःशरशतैभिन्नारुधिरासारवर्षिणः॥वसंते
किंशुकाभासानप्राज्ञायतकिंचन ॥ २८॥पतिता पात्यमानाश्चभिन्नाश्छिन्नास्तदागणाः॥त्यक्त्वासंग्राम है
भूमिते सर्वेऽपिविमुखाभवन् ॥ २९ ॥
कंपायमान करि देतभये ॥२७॥ सैंकडों बाणोंकरि वेधेगये इसीसे रुधिरकी धाराको छोडतेभये गण वसंतऋतुमें ढाकके वृक्षके
समान लाल रंगके सिवाय कुछ न जाने जातेथे ॥ २८॥ वा समय गिरे और गिराये गये छिन्नभिन्न सब गण संग्राम भूमिको
छोडिके भागत भये ॥ २९ ॥
,मा.
भा..
३९॥
अ.१
वाको देखि व्याकुल और भयभीत सब गण देवदेव जे शिव हैं तिनसों वह जो शुक्रचार्यकी करतूति है ताहि कहतभये॥२०॥
ना पीछे रुद्रके मुखसे अतिभयंकर ताडवृक्षके समान हैं जांधैजाकी और गुफाके समान है मुख जाको और स्तनोंसे पीडित कियेहैं
वृक्ष जाने ऐसी कृत्या प्रगट होतभई ॥२१ ।। वह युद्धभूमिमें आयकै बडे बडे असुरनको भक्षण करती भई शुक्राचार्यको अपनी
तंदृष्ट्वाव्याकुलीभूतागणाःसर्वेभयान्विताः॥ शशंसुर्देवदेवायतत्सर्वंशुक्रचेष्टितम् ॥२०॥ अनुरुद्रमुखा
त्कृत्याबभूवातीवभीषणा॥ तालजंघादरीवक्त्रास्तनापीडितभूरुहा ॥२१॥ सायुद्धभूमिमासाद्यभक्षयं
तीमहासुरान्॥ भार्गवस्वभगेधृत्वाजगामांतहितानमः॥२२॥ विधृतंभार्गवंदृष्ट्वादैत्यसैन्यगणास्तदा॥
अम्लानवदनाहान्निजघ्नुर्युद्धदुर्मदाः ॥२३॥ अथाभज्यतदैत्यानांसेनागणभयादिता ॥ वायुवेगेनाहते
वप्रकीर्णातॄणसंहतिः॥ २४॥
भगमें धारण करिके अन्तर्धान हो आकाशको चली जात भई ॥२२॥ तब शुक्रको पकडाहुआ देखि प्रसन्न हैं मुख जिनको ऐसे
गण युद्धमें दुर्मद हो दैत्यनकी सेनाको हर्षसे मारत भये ॥२३॥ या पीछे गणनके भयसों पीड़ित दैत्यनकी सेना ऐसे छिन्न
भिन्न होत भई जैसे पवनके वेगसों ताडित तृणोंको समूह बिखरजाय है ॥२४॥
.
॥३१॥
ता पीछे कैलासके समीप भूमिमें शिवको और दैत्यनको शस्त्रास्त्रनसों परिपूर्ण घोर संग्राम होत भयो ॥ १५॥ वीरोंके आनन्द देनेवाले भेरीमृदंग और शंख इनके समूहोंके तथा हाथी घोडे रथ इनके शब्दोंसे नादित पृथ्वी कांपनेलगी ॥ १६॥ शक्ति तोमर बाणोंके समृह मूसल प्रास और पट्टिश शस्त्रास्त्रोंकरिके व्याप्त आकाश ऐसो शोभायमान भयो मानो कि, उल्काओं ततःसमभवयुद्धकैलासोपत्यकाभुवि प्रमथाधिपदैत्यानांघोरंशस्त्रास्त्रमंकुलम् ॥ १५॥ भेरीमृदंगशंखौ घनिःस्वनैर्वीरहर्षणः ॥ गजाश्वरथशव्दैश्चनादिताभूळकंपत ॥ १६ ॥ शक्तितोमरवाणोघमुसलपासप ट्टिशैः॥ व्यराजतनभःपूर्णमुल्काभिरिवसंवृतम् ॥१७॥ निहतैरथनागाश्वैस्तदाभूमिळराजत ॥ वज्रा हताचलशिरःसकलैरिवसंता॥ १८॥ प्रमथाहतदैत्यौघान्भार्गवःसमजीवयत् ॥ युद्धेपुनःपुनस्तत्रमृत संजीवनीवलात् ॥ १९॥ करिके आच्छादित है ॥ १७॥ और मारे भये जो रथ हाथी घोडे हैं तिन करिके भूमि ऐसी शोभित होतभई मानो कि वज्रसे गिराये भये पर्वतके शिखरोके खंडनसों आच्छादित हो रही है ॥ १८ ॥ शिवके गणनकरिके मारेगये दैत्यनको वा युद्धमें शुक्राचार्य मृतसंजीवनी विद्याके बलसे बारबार जिवावत भये ।। १९ ॥
मा,
१८॥
अ.
नारद बोले, या पीछे विष्णुआदि सब देवता तब अपने २ तेजनको देतभये वे सब तेज इकट्ठे होगये यह देखि शिवने आपनोह।, भा
तेज छोडो॥ १०॥ शिवजीने वा तेजके समूहसों ज्वालाओंकी मालासे अतिभयंकर उत्तम शस्त्र सुदर्शन नाम चक्र बनायो
॥११॥वामेंसे जो कुछ तेज बचिरहो तासों इन्द्रने वज्र बनायो करोडों हाथी घोडे रथ पयादों करि युक्त जलंधरको कलास
नारदउवाच॥ अथविष्णुमुखादेवाःस्वतेजांसिददुस्तदा॥ तान्यैक्यमगमन्नीशोदृष्ट्वास्वंचामुचन्महः१०॥
तेनाकरोन्महादेवोमहसांशस्त्रमुत्तमम्॥ चक्रंसुदर्शननामज्वालामालातिभीषणम् ॥ ११ ॥ तेजशेष
णचतदावजंचकृतवान्हरिः॥ तावजलंधरोदृष्ट कैलासतलभूमिषु॥हस्त्यश्वरथपत्तीनांकोटिभिःपरिवारि
तः॥ १२ ॥ तंदृष्ट्वाऽलक्षिताजग्मुर्देवास्सर्वेयथागताः ॥ गणास्समरमायातायुद्धायातित्वरान्विताः ॥
॥ १३॥ नंदीभवक्रसेनानीमुखाःसर्वेशिवाज्ञया॥अवतेरुगणावेगात्कैलासाद्युद्धदुर्मदाः॥ १४॥
पर्वतके समीपकी भूमिमें देखो ॥१२॥ वाको देखतेही सब देवता जैसे आये हैं वैसेही छिप २ के चले गये और गण अति
शीघ्रतासे युद्धके लिये संग्राममें आवत भये ॥ १३॥ ता पीछे शिवजीकी आज्ञासों नदि गणेश स्वामिकार्तिक आदि गण
युद्धके लिये दुर्मद हों कैलासते शीघ्र उतरत भये ॥ १४॥
ॐ १ , देवता बोले,हे स्वामी! हे प्रभु! क्या आप इन देवतानकी आपत्तिको नहीं जाने हैं अर्थात् जानोहो तो तातें हमारी रक्षाके निमित्त या सागरनंदनको मारो॥६॥ यह देवताओंको वचन सुनिके शिवजी हॅसके महाविष्णु जो भगवान् हैं तिनको बुलाके यह वचन बोले ॥६॥ ईश्वर बोले, हे विष्णुजी! आपने सग्रामके बीच में जलंधरको क्यों नहीं मारोउलटे आपनो स्थान वैकुंठ छोडिके वाके ॥ देवाऊचुः॥ नजानासिकथंस्वामिन्देवापत्तिमिमांप्रभो ॥ तदस्मद्रक्षणार्थायजहिसागरनंदनम् ॥ ॥५॥ इतिदेववचःश्रुत्वाप्रहस्यवृषभध्वजः ॥ महाविष्णुसमाहूयवचनंचेदमब्रवीत् ॥ ६ ॥ ईश्वर उवाच ॥ जलंधरःकथविष्णोनहतःसंगरेत्वया ॥ तद्गृहंचापियातोऽसित्यक्त्वावैकुंठमात्मनः ॥७॥ विष्णुरुवाच ॥ तवांशसंभवत्वाचभ्रातृत्वाचतथाश्रियः॥ नमयानिहतःसंख्येत्वमेवजहिदानवम्॥८॥ ॥ ईश्वर उवाच ॥ नायमेभिर्महातेजाःशस्त्रास्त्रैर्वध्यतेमया ॥ देवःसहस्वतेजोंऽशंशस्त्रार्थेदीयतांमम ॥९॥ घरमें गये हौ॥७॥ विष्णु बोले, तुम्हारे अंशते उत्पन्न है यातें तथा लक्ष्मीको भाई है या कारणसों मैंनेवाको सग्राममें नहींमारो तुमही दानवको वधकरो॥८॥ ईश्वर बोले, यह महातेजस्वी इन अस्त्रनसों मोकरि न मारो जायगोताते देवतान समेत आप अपने तेजको अंश शस्त्र बनानेके लिये मोको दीजिये ॥९॥ l
मा.
भा. टी.
७॥
अ.६३.
ता पीछे या लोकमें आपको फिर उत्पन्न भयो मानतो हुओराहु जाके जलंधरसे वह वृत्तांत कहत भयो॥३१॥इति श्रीमत्परमसुख
तनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायांद्वादशोऽध्यायः॥१२॥
॥ नारद बोले,सो सुनिके क्रोधसों व्याकुल है शरीर जाको ऐसो जलंधर करोड़ों दैत्यन करिके युक्त शीघ्रही निकसत भयो ॥१॥
ततस्सराहुःपुनरेवजातमात्मानमस्मिन्नितिमन्यमानः॥समेत्यसर्वकथयांबभूवजलंधरायैवविचेष्टितंतत्॥
॥३१॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये जलंधरोपाख्याने दूतसंवादे हादशोऽध्यायः ॥ १२॥
नारद उवाच ॥ जलंधरस्तुतच्छ्रुत्वाकोपाकुलितविग्रहः ॥ निर्जगामाशुदैत्यानांकोटिभि-परिवारितः
॥१॥ गच्छुतोऽस्याग्रतःशुक्रोराहुष्टिपथेऽभवत् ॥ मुकुटश्चापतौवेगात्प्रस्खलितस्तदा ॥ २ ॥
दैत्यसैन्यातस्तस्यविमानानांशतस्तदा ॥ व्यराजतनभःपूर्णप्रादृषीवयथाधनैः ॥३।।तस्योद्योगंतदाह
वादेवाशक्रपुरोगमाः॥ अलक्षितास्तदाजग्मुःशूलिनंतविजिज्ञपुः॥४॥
जाते भए याको शुक्र और राहु दिखाई दिये और सुकुट भूमिमें गिर पड़ो और वेगके मारे आपहु गिरत भयो ॥२॥ दैत्यनकी
सेना करि युक्त वा समय सेंकडो विमानों करि आकाश ऐसे भरगयो जैसे वर्षाऋतुमें मेघनसों भरजाय है ॥३॥ वा समय वाके
उद्योगको देखि इन्द्रादिक सब देवता अलक्षित हो शिवजीके समीप गये और उनसे प्रार्थना करत भये ॥४॥
॥३७॥
ईश्वर बोले, तू शीघ्रही अपने हाथ पांवके मांसको भक्षण कर ॥ नारद बोले,शिव करिके ऐसे आज्ञा दियो गयो वह पुरुष अपने
हाथ पांवका मांस ऐसे खातो भयो कि जैसे शिरही शेष रह गयो ॥२६॥उसको शिरमात्र शेषरहो देखि उस समय अत्यंतप्रसन्न
शिव विस्मय युक्त हो उस भीमकर्मा पुरुपसों बोलत भये ॥२७ ॥ ईश्वर बोले, हे कीर्तिमुख ! तू सदा मेरे द्वारपर स्थित रह
ईश्वर उवाच॥भक्षयस्वात्मनःशीघ्रमांसत्वंहस्तपादयोः॥ नारदउवाच ॥ सशिवेनैवमाज्ञप्तश्चखादपुरुषः
स्वकम् ॥ हस्तपादोद्भवंमांसशिरःशेषयथाभवत् ॥२६॥ दृष्ट्वाशिरोऽवशेषतसुप्रसन्नस्तदाशिवः॥ उवाच
भीमकर्माणपुरुषंजातविस्मयः ॥ २७॥ ईश्वरउवाच ॥ त्वंकीर्तिमुखसंज्ञोहिभवमेहारगःसदा ॥ नारद
उवाच ॥ तदाप्रभृतिदेवस्यहारिकीर्तिमुखःस्थितः ॥ २८ ॥नार्चयंतीहयेपूर्वतेषामर्चाथाभवेत् ॥२९॥
राहुर्विमुक्तोयस्तेनसोपतहर्वरस्थले। अतःसवर्वरोभूतइतिभूमौप्रथांगतः ॥ ३०॥
नारद वोले, तबसे लगाके कीर्तिमुख शिवके द्वारपर स्थित है ॥ २८॥ जे प्रथम कीर्तिमुखको पूजन नही करै हैंउनकी पूजा वृ
था हो जाय है ॥२९॥ उस पुरुष करिके छोडे भयो राहु बर्बर स्थलमें गिरत भयो या कारण वह बर्बर भयो हुओ पृथिवीमें
प्रसिद्ध होत अयो॥३०॥
भा. टी
अ. १३
Call
मा.सिंहनकोसो है मुख जाको और चलायमान है जीभ जाकी और ज्वालासहित हैं नेत्र जाके और ऊपरको हैं केश जाके और मुखो
है शरीर जाको ऐसो पुरुष दूसरे नृसिंहके समानलक्षित होत भयो ॥२१॥ खानेको आते भये उसे देखि अतिवेगके भागता हुआ
॥
वह राहु उस पुरुप करिके बाहर पकडो गयो॥२२॥ पकडकरि जब खाने लगो तबरुद्रकरिके निवारण कियोगयो जिससे यह
सिंहास्यःप्रचलजिह्वःस ज्वालनयनोमहान॥ऊर्ध्वकेशःशुष्कतनुसिंहइवचापरः॥२१ सतखादितुमा
यांतंदृष्ट्वाराहुभयातुरः ॥ पलायन्नतिवेगेनवहिःसचदधारतम् ॥२२॥ धृत्वाखादितुमारब्धस्तावद्धद्रेणवा
रितः ॥ नैवासौवध्यतामेतितोऽयंपरवान्यतः॥२३॥संचेतिपुरुषःश्रुत्वाराहंतत्याजसोबरेराहुँत्यक्त्वा
सपुरुषस्तदारुद्रंव्यजिज्ञपत् ॥ २४ ॥ पुरुषउवाच ॥ क्षुधामांबाधतेऽत्यन्तक्षुत्क्षामश्चास्मिसर्वथा ॥
किंभक्षयामिदेवेशतदाज्ञापयमांप्रभो ॥२५॥
दूत पराये अधीन है तिससे यह मारने योग्य नहीं है ॥२३॥ छोडदे इस वचनको वह पुरुष सुनिके उसने राहुको आकाशमें
छोड दियो फिर राहुको छोडके उस पुरुपने तब शिवजीसे प्रार्थना की॥२४॥पुरुप बोला, क्षुधा मोकू अत्यन्त बाधा दे रही है
और सब भांति मैं क्षुधासे दुर्बल हो हे देवेश! क्या खाऊं सो प्रभु मोको आज्ञा दीजिये ॥२५॥
॥३६॥
राहु बोले, हे वृषभध्वज ! देवता और सोकरिके सेवन करने योग्य तीनों लोकनको स्वामी और सब रत्ननको ईश्वर जो जलंधर है ताकी आज्ञाको सुनो॥ १७ ॥ श्मशानके वासी और सदा हाडोंके भार उठानेवाले और दिगंबर अर्थात् नंगे ऐसे जो तुम हो तिनको हैमवती अर्थात् हिमाचलकी पुत्री काहेको स्त्री होनी चाहिये ॥ १८॥ में रत्नोंका स्वामी हूँ और वह स्त्री अर्थात् पार्व ॥राहुरुवाच ॥ देवपन्नगसेव्यस्यत्रैलोक्याधिपतेस्तथा ॥ सर्वरत्नेश्वरस्यत्वमाज्ञांशृणुवृषध्वज ॥ १७॥ श्मशानवासिनोनित्यमस्थिभारवहस्यच ॥ दिगंवरस्यतेभार्याकथंहैमवतीशुभा ॥ १८॥ अहंरत्नाधि नाथोऽस्मिसाचस्त्रीरत्नसंज्ञिका ॥ तस्मान्ममैवसायोग्यानैवभिक्षाशिनस्तव ॥ १९॥ नारदउवाच ॥ वदत्येवंतदाराहीभ्रूमध्याच्छ्रलपाणिनः॥ अभवत्पुरुषोतेंद्रस्तीवाशनिसमस्वनः ॥२०॥ तीभी स्त्रियोंमें रत्न है तिरसे वह मेरेही योग्य है और भीख मांगके खानेवाले जो तुम हो तिनके योग्य नहीं है ॥ १९॥ नारद बोले, ऐसे राहु कहिरहो हो वाही समय शिवजीकी भौंह के मध्यसों भयानक और तीव्र वज्रके शब्दके समान है शब्द जाको ऐसो पुरुष प्रगट होत भयो॥२०॥ M
भा
भा. दी।
३५॥
अ.१२
इसीसे स्त्रीरत्नके भोगनेवाले उन शिवकी वह समृद्धि श्रेष्ट है हे देत्येन्द्र ! सब रत्नोंके स्वामी जो तुम हो तिनकी समृद्धि वैसी
अर्थात् शिवकीसी नहीं है ॥१२॥ ऐसे कहिके उससे पूछिके जब में वहांसे चलो आयो तब वह दैत्यनकाराजा उस पार्वतीके
रूपके श्रवणसे कामज्वरकरिके पीडित भयो॥ १३ ॥ इस उपरांत उसने विष्णुको मायासे कुछ मोहित हो शिवजीके लिये
अतःस्त्रीरत्नसंभोक्तुस्समृद्धिस्तस्यसावरा ॥ तथानतवदैत्येन्द्रसर्वरत्नाधिपस्यच ॥ १२॥ एवमुक्त्वात
मामंत्र्यगतेमयिसदैत्यराद॥ तद्वपश्रवणादासीदनंगज्वरपीडितः॥१३॥ अथ संप्रेषयामासद्वतंतुसिंहिका
सुतम् ॥ त्र्यंबकायतदाकिंचिद्विष्णुमायाविमोहितः ॥ १४॥ कैलासमगमद्राःकुर्वञ्छुक्तेंदुवर्चसम् ॥
काष्ण्येनकृष्णपक्षंदुवर्चसंस्वांगजेनतम् ॥ १५॥ निवेदितस्तुदेवायनंदिनाप्रविवेशसः॥ त्र्यंबकभूलतासं
ज्ञाप्रेरितोवाक्यमब्रवीत्॥ १६॥
सिंहिकाका पुत्र जो राहु है ताहि दूत बनाके भेजो ॥१४॥राहु जो सो श्वेतवर्ण जो चन्द्रमाका तेज है ताहि अपने शरीरकी का
लिमासे कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान करतो हुओ कैलासको जातभयो ॥ १५ ॥नंदीकरिके शिवजीसे निवेदन कियोगयो
वह राहु शिवके समीप जातभयो और शिवजीकी भौहेकी संज्ञासे प्रेरण कियो गयो वह वचन बोलत भयो ॥ १६॥
॥५३॥
स्त्रीरत्न करिके रहित तुम्हारी इस समृद्धिको देखि निश्चय में तर्क करताहौ कि शिवके समान त्रिलोकीमें कोई समृद्धिवालो
नहीं है ॥७॥ यद्यपि अप्सरा और नागकन्या आदि तुम्हारे घरमें स्थित हैंतिसपरभी वे निश्चय पार्वतीके रूप समान नहीं
॥८॥ जिसके सौदर्यरूपी समुद्रमें डुबेहुए ब्रह्माने अपना वीर्य छोडा उसके साथ और किस स्त्रीकी उपमा दी जाय ॥ ९॥
त्वत्समृद्धिमिमांपश्यन्त्रीरत्नरहितांध्रुवम् ॥ तर्कयामिशिवादन्यस्त्रिलोक्यांनसमृद्धिमान् ॥ ७॥ अप्स
रोनागकन्याद्यायद्यपित्वद्गृहेस्थिताः॥ तथापितानपावत्यारूपेणसदृशाध्रुवम्॥८॥ यस्यालावण्यजल
धौनिमग्नश्चतुराननः ॥ स्वदीर्यममुचत्पूर्वतयाकान्योपमीयते ॥९॥ वीतरागोपिचयथामदनारिःस्वली
लया ॥ सौंदर्यगहनेभ्रामिशफरीरूपयापुरा ॥ १०॥ यस्याःपुनःपुनारूपंपश्यन्धातापिसर्जनेससर्जा
प्सरसस्तासांतत्समैकापिनोऽभवत् ॥ ११ ॥
तपस्वी भी शिव प्रथम मछलीका रूप धारण करनेवाली जिस पार्वती करिके अपनी लीलासे सौन्दर्यरूपी वनमें भ्रमाये गये
॥१०॥ सृष्टिके समय अर्थात् पार्वतीकी उत्पत्तिके समयमें ब्रह्मानेभी जिसके रूपको वारंवार देखि अप्सराओंको उत्पन्न किया
परन्तु उसके समान एकभी न भई ॥११॥
मा.
भा,
४॥
अ. १३
हे महाराज ! आपका कहांसे आगमन भयो ! हे प्रभु ! तुमने कहां कहीं कुछ देखो है ! जिसके लिये यहां आये हो हे मुनीश्वर ।
सो मुझे आज्ञा दीजिये ॥२॥ नारद बोले, हे दैत्येन्द्र ! मैं अपनी इच्छासे कैलास पर्वतपर गया वहां मैंने पार्वतीकरिके सहित
बैठे हुए शंकरको देखो ॥ ३॥ वह कैलास दसहजार योजन चौडा है और कल्पवृक्षोंका उसमें बड़ा वन है औरसैकडों काम
कुतआगम्यतेब्रह्मन्किचिदृष्टत्वयाप्रभो॥ यदर्थमिहचायातस्तदाज्ञापयमांमुने ॥२॥ नारदउवाच ॥
मत:कैलासशिखरेदैत्येंद्राहयदृच्छया॥ तत्रोमयासहासीनंदृष्टवानस्मिशंकरम् ॥३॥ योजनायुतवि
स्तीर्णेकल्पवृक्षमहावने ॥ कामधेनुशताकीर्णचिन्तामणिसुदीपिते ॥ ४ ॥ तदृष्ट्वामहदाश्चर्यवितर्को
मेऽभवत्तदा ॥ कापीदृशीभवेदृडिस्त्रिलोक्यांवानवेतिच ॥ ५ ॥ तदातवापिदैत्येंद्रसमृद्विःसंस्मृता
मया ॥ तद्विलोकनकामोऽहंत्वत्सान्निध्यमिहागतः ॥६॥
धनुओंसे भरा हुआ है और चिन्तामणियोंसे प्रकाशमान हो रहाहै ॥४॥ उस बडे आश्चयको देखिकै मेरे मनमे बडा वितर्कभयो
कि त्रिलोकीमें कहीं ऐसी ऋद्धि है कि नहीं ॥६॥ हे दैत्येन्द्र ! तब मैंने आपकीभी ऋद्धिको स्मरण कियो और उसके देख
नेको इच्छासे यहां तुम्हारे समीप आयोहौ ॥६॥
॥३४॥
1 . . या प्रकार जलंधर देवताओंको अपने वशमें करिके प्रजाओंको धर्मसे निजपुत्रके समान पालन करतभयो॥२६॥ इस जलंधरके धर्मराज्य करनेके समय कोई रोगीन था न दुःखीन दुर्बलनदरिद्रीदिखाई देता था अर्थात् जिस राज्यमें सब प्रजा आनंदमंगलसे समयको व्यतीत करतीथी ॥ २७ ॥ नारदमुनि कहते हैं, कि ऐसे उस दानवेन्द्रको धर्मसे राज्य करनेके समयमें उसकी वंजलंधरःकृत्वादेवान्स्ववशवर्तिनः॥ धर्मेणपालयामासप्रजाःपुत्रानिवौरसान् ॥ २६ ॥ नकश्चिद्ध्या धितोनैवदुःखितोनकृशस्तथा ॥नदीनोदृश्यतेतस्मिन्धर्माद्राज्यप्रशासति ॥ २७॥ एवंमहीशासतिदा नवेन्द्रेधर्मेणसम्यक्चदिदृक्षयाहम् ॥ कदाचिदागामथतस्यलक्ष्मीविलोकितुश्रीरमणंचसेवितुम् ॥२८॥ इति श्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये एकादशोऽध्यायः॥ ११ ॥॥ नारदउवाच ॥ ॥ समांसंपूज्य विधिवदानवेंद्रोऽतिभक्तिमान् ॥ संप्रहस्यतदावाक्यंजगादभुवनेश्वरः ॥ १ ॥ ; राज्यलक्ष्मी देखनेको और विष्णुका सेवन करनेको मैं वहां किसी समय गया॥२८॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनय श्रीपंडित , केशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां मापाथोधिनीसमाख्यायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ नारद बोले । अतिभक्तियुक्त वह भुवनेश्वर दैत्योंका राजा मेरी विधिपूर्वक पूजा करके उस समय हँसिके वचन बोलत भयो ।।१।। W .
मा.
भा. टी
३३॥
अ. ११
जलंधर बोला, हे भगिनीपति ! जो आप प्रसन्न भये हो तो मुझे एक वरदो वह यह है अब आप मेरी बहिनी अर्थात् लक्ष्मीजी
और अपने गणों समेत मेरे घरमें वास करो॥२१॥ नारद बोले,तथास्तु ऐसे कहिके भगवान्सब देवगणों और लक्ष्मी सहित
जलंधरके नगरको जातभये॥२२॥ महाबाहु जलंधर तो देवताओंके अधिकारोंमें दैत्योंको स्थापित करि फिरि पृथ्वीमें आवत
जलंधरउवाच ॥ ॥ यदिभावुकतुष्टोऽसिवरमेकंददस्वमे ॥ मद्भगिन्यासहाद्यत्वंमद्गृहेसगणोवसा॥२१॥
नारद उवाच ॥॥ तथेत्युक्त्वासभगवान्सर्वदेवगणैःसह ॥ तदाजलंधरपुरमगमद्रमयासह ॥ २२॥
जलंधरस्तुदेवानामधिकारेषुदानवान् ॥ स्थापयित्वामहाबाहुःपुनरागान्महीतलम् ॥ २३ ॥ देवगंधर्व
सिद्धेषुयत्किंचिद्रनसंज्ञितम् । तदात्मवशगंकृत्वाऽतिष्ठत्सागरनंदनः ॥ २४ ॥ देवगंधर्वसिद्धाद्यान्सर्प
राक्षसमानुषान् ॥ स्वपुरेनागरान्कृत्वाशशासभुवनत्रयम् ॥ २५॥
भयो ॥२३॥ देवता गंधर्व सिद्ध इन सबोमें जो कुछ रत्न अर्थात सर्वोत्तम वस्तु थीं उनको अपने वशमें करिके वह सागरनंदन
स्थित होत भयो ॥ २४ ॥ देवता गंधर्व सिद्ध आदिकोंको और सर्व राक्षस तथा मनुष्योंको अपने पुरमें नगरनिवासी करिके
तीनों लोकको जोराज्य है ताहि करत भयो ॥२५॥
॥३३॥
4 (} विष्णुने बाणनके समूहसों दैत्यके छत्र धनुष और घोडे काटिदिये और वाकेहू हृदयमें एक बाण मारो॥१५॥ता पीछे वह दैत्य गदा हाथमें ले अति शीघ्र उछल गरुडके मस्तकमें मारके उनको पृथ्वीमे गिराय देतभयो ॥१६॥ विष्णुने हॅसके वाकी गदाको अपने खड्गसों काटदीन्ही तब वह विष्णुके हृदयमें एक प्रबल चूंसा मारत भयो ॥१७॥ ता पीछे वे दोनों बली बाहयुद्धसों विष्णु!त्यस्यवाणौधैर्ध्वजंछत्रधनुर्हयान् ॥ चिच्छेदतंचहृदयेवाणेनैकेनचाहनत् ॥१५॥ ततोदैत्यःसमु त्पत्यगदापाणिस्त्वरान्वितः॥ आहत्यगरुडं मूनिपातयामासभूतले ॥१६॥ विष्णुर्गदांस्वखड्गन चि च्छेदगृहसन्निव ॥ तावत्सहृदयेविष्णंजधानदृढमुष्टिना ॥ १७॥ततस्तौवाहूयुद्धेनयुयुधातेमहावलौ ॥ वाहुभिमुष्टिभिश्चवजानुभिर्नादयन्महीम् ॥ १८ ॥ एवंतौरुचिरंयुद्धंकृत्वाविष्णुःप्रतापवान् ॥ उवाचदै त्यराजानमेघगंभीरनिःस्वनः॥ १९॥ ॥ विष्णुरुवाच ॥ ॥ वरंवरयदैत्येंद्रप्रीतोऽस्मितवविक्रमात् ॥ अदेयमपितेदमियत्तेमनसिवर्तते ॥२०॥ अर्थात् कुस्ती वा मल्लयुद्ध करनेलगे और बाहुओंसे घूसोंसे घोटुओंसे पृथ्वीको शब्दायमान करते भये युद्ध करतभये॥१८॥ ऐसे दोनों सुन्दर युद्ध करतभये तब प्रतापवान् विष्णु मेघके समान गभीर वाणीले दैत्यराजसों वोलत भये ॥ १९॥ विष्णु बोले, हे वेदैत्येन्द्र ! तू वर मांग मैं तेरे पराक्रमसे प्रसन्न हो, नहीं देने योग्यभी जो तेरे मनमें होय उसको मैं तुझे देताहूँ ॥२०॥ ॥
मा. भाटी, २॥ ifa अ.११ श्रीभगवान बोले, रुद्रके अंशसे उत्पन्न होनेसे और ब्रह्माके वरदानसे और तुम्हारी प्रीतिसे यह जलंधर हमारे मारने योग्य नहीं है ॥१०॥ नारद बोले ऐसे कहिं गरुडपर चढे भये शंख चक्र गदा और नंदक(तलवार) को धारण किये भये भगवान् जहां वे देवता स्तुति कर रहेथे वहां शीघ्र युद्धके लिये जात भये ॥११॥ इसके उपरांत अरुणके अनुज कहिये छोटे भाई जो गरुड़ तिनके प्रचंड श्रीभगवानुवाच ॥ रुद्रांशसंभवत्वाचब्रह्मणोवरदानतः ॥ प्रीत्याचतवनैवायंममवध्योजलंधरः ॥१० ।। नारद उवाच ॥ इत्युक्त्वागरुडारूढःशंखचक्रगदासिभृत् ॥ विष्णुवेंगाद्ययौयोड्डयत्रदेवास्तुवंतिते॥११॥ अथारुणानुजात्युग्रपक्षवातप्रपीडिताः॥ वात्यावितजितादैत्याबभ्रमुःखेयथाघनाः॥ १२॥ ततोजलंध रोदृष्ट्वादैत्यान्वातप्रपीडितान ॥ क्रोधादुत्पत्यगगनेततोविष्णुंसमभ्ययात् ॥ १३ ॥ ततस्समभवद्युद्धवि ष्णुदैत्येंद्रयोर्महत् ॥ आकाशंकुर्वतोणिस्तदानिरवकाशवत् ॥१ पंखोंके पवनसे पीडित और बबूलेसे उडाये गये दैत्य आकाशमें मेघोंके समान भ्रमनेलगे ॥ १२॥ तिस पीछे जलंधर दैत्यनको पवनसे पीड़ित देखि कोषसों आकाशमें उछलिकरि विष्णुके समीप गयो ॥ १३ ॥ता पीछे बाणनसों आकाशको अवकाश रहित अर्थात् बाणपूरित करत भयो जो वे दोनों हैं तिनको बडो युद्ध होत भयो ॥ १४ ॥ . ॥३२॥ ।
नारद बोले, जो मनुष्य इस संकटनाशन स्तोत्रको पढगो वह हरिकी कृपासे कदापि कष्टों करि पीडित न होगो॥ ५ ॥ या
प्रकार देवतानने जब दैत्यनके शत्रु जो मनवान हे तिनकी स्तुति करीत भगवान् करि देवतानकी विपत्ति जानी गई॥६॥
कोधित और खेदयुक्त है मन जिनको ऐसे इत्यों के अरि भगवान् शट ठिक शीश गरुड पर चढि लक्ष्मीलों बचन बोलत मये
नारद उवाच ॥ सकटनाशनस्तोत्रमेतद्यस्तुपठेन्नरः ॥ सकदाचिनसंकष्टैणीचतेकपयाहरेः॥५॥ इति
देवास्तुतियापकुतिदनुजाहिएः॥ तावत्सुराणामापत्तिर्विज्ञाताविष्णुनातदा॥६॥सहसोत्थायदैत्यारिः
सक्रोधाखिनमानसः॥ आरुढोगलडवेगालक्ष्मीवचनमन्त्रवीत्॥७॥श्रीभगवानुवाच ॥ जलंधरेणतेभ्रा
त्रादेवानांकदनंकृतम् ॥ तैराहतोगमिष्यासियुद्धायाधत्वरान्वितः ॥ ८ ॥ लक्ष्मीस्वाच ॥ अहंतेवल्लभा
नाथभक्ताचयदिसर्वदा।।तत्कतेममधातायुद्धवध्यःकृपानिधे ॥९॥
७॥ श्रीभगवान बोले, तुम्हारे भाई जलंधरने देवताओंको दुःख दियो है इससे उन देवताओं करि बुलायो भयो मैं युद्ध के लिये
शीघ्र जाउंगो ॥८॥ लक्ष्मी बोलीं, जो मैं तुम्हारी प्यारी और सदा भक्त हो तो हे कृपानिधि ! मेरा भाई युद्ध में तुम करिके
कैसे मारने योग्य होयगो ? ॥ ९ ॥
1.भा. १ ॥३१॥ - देवता बोले, मत्स्य कूर्म आदि नाना स्वरूपोंसे भक्तोंके कार्यके लिये उद्यत और दुःखके दूरि करनहारे जो आप हैं तिनको भा. टी, नमस्कार है विधाता आदि ब्रह्मा विष्णु शिव स्वरूप धारण करिकै जगतकी सृष्टि पालन तथा संहार करनहारे और गदा अ.११ शंख, पद्म तथा खग हाथों में धारन करनहारे जो आप हैं तिनको हम सबनको नमस्कार है ॥२॥ लक्ष्मीके प्यारे असुरोंके मारनहारे गरुड पर चढ़क चलनेवाले पीताम्बर धारण करनेवाले यज्ञादिक क्रियाओंके पाक करनेवाले विकारयुक्त होनेवाले देवाऊचुः ॥ नमोमत्स्यकूर्मादिनानास्वरूपैःसदाभक्तकार्योद्यतायातिहत्रे ॥ विधात्रादिसर्गस्थितिध्वंस करेंगदाशंखपशासिहस्तायतेऽस्तु॥२॥रमावल्लभायासुराणांनिहत्रेभुजंगारियानायपीताम्बराय॥ मखा दिक्रियापाककत्रविकशरण्यायतस्मनतास्मोनताःमः॥३॥ नमोदैत्यसंतापिताऽमर्त्यदुःखाचलध्वं सदंभोलयेविष्णवेते॥ सुजंगेशतल्पेशयानार्कचन्द्रहिनेत्रायतस्मैनतास्मोनताःस्मः ॥ ४॥ शरणागतकी रक्षा करनेवाले जो आप हैं तिनको वारंवार नमस्कार है ॥३॥दैत्योंकरिके तापित जो मनुष्य हैं तिनकं दुःखरू पी पहाडके ध्वराने लिये वरूप और शेषनामरूपी शय्यापर सोनेवाले और सूर्य चंद्रमारूप दो हैं नेत्र जिनके ऐसे आपको वारंवार गमरकार है॥४॥ PARICHODai
नगरीमें दैत्यके प्रवेश करनेपर इन्द्रादिक देवता दैत्यकरितापितहो सुमेरु पर्वतकी गुफामें जाके वास करते भये ॥३१॥वहदैत्य
ऐसे देवतानको जीतिकै अमरावतीमें राज्य करत भयो॥३२॥ता पीछे वह असुर इन्द्रादिक सब देवतानके अधिकारमें शुंभादिक
श्रेष्ठ दैत्यनको पृथक् २ स्थापित करि फिरि आप सुमेरु पर्वतकी गुफाको जात भयो ॥३३॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसु
प्रविष्टेनगरीदैत्येदेवाःशक्रपुरोगमाः ॥ सुवर्णाद्रिगुहांप्राप्तान्यवसन्दैत्यतापिताः॥३१॥ एवंदेवान्वि
निर्जित्यतत्रराज्यचकारसः ॥३२॥ ततस्तुसवेष्वसुरोऽधिकारेष्विद्रादिकानांविनिवेशयत्तदा ॥ शुंभा
दिकान्दैत्यवरान्पृथक्पृथक्स्वयंसुवर्णाद्रिगुहामगात्पुनः ॥ ३३ ॥ इतिश्रीपद्मपुराणकार्तिकमाहात्म्ये
दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥॥ नारदउवाच ॥ ॥ पुनदैत्यसमायांतदृष्ट्वादेवास्सवासवाः ॥ भयप्रकंपिता
स्सवेविष्णुस्तोतुंप्रचक्रमुः ॥ १॥
खतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यभापाटीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां दशमोऽ
ध्यायः ॥ १० ॥नारद बोले कि, इन्द्रादिक सब देवता फिरि दैत्यनको आवते हुए देखि भयसे कम्पित हो विष्णुकी स्तुतिकर
नेका आरम्भ करत भये ॥३॥
मा.
भा. टी.
३०॥
अ.१०
इस पीछे देवतानको मारे गये देखि बृहस्पतिद्रोणाचलको गये देवतानकरि पूजित बृहस्पति वहां द्रोणाचलको न देखत भये ।।
॥२६॥ दैत्यकरि हरो गयो द्रोणाचलको जानि भयसे व्याकुल बृहस्पति आकर श्वाससे व्याकुलशरीर हो दूरहीसों बोलत भये
॥२७॥ बृहस्पति बोले, भागो; रुद्रके अंशसों उत्पन्न यह दैत्य जीतने योग्य नहीं है इन्द्रके कामको स्मरण करो अर्थात् इंद्र
अथदेवान्हतान्दृष्ट्वाद्रोणाद्रिमगमद्रुः॥तावत्तगिरींद्रंतुनददर्शसुरार्चितः॥२६॥ज्ञात्वादैत्यहृतंद्रोणधिष
णोभयविह्वलः॥आगत्यरात्प्रोवाचश्वासाकुलितविग्रहः॥ २७॥ गुरुरुवाच॥पलायध्वंमहादैत्योनायं
जेतुंयतःक्षमः ॥ रुद्रांशसंभवोह्येषस्मरध्वंशक्रचेष्टितम् ॥ २८ ॥ श्रुत्वातद्वचनंदेवाभयविह्वलितास्त
दा ॥ दैत्येनवध्यमानास्तेपलायतेदिशोदश ॥ २९ ॥ सदेवान्विट्ठतान्दृष्ट्वादैत्यःसागरनंदनः ॥
शंखभेरीजयरवैःप्रविवेशामरावतीम् ॥३०॥
हीके उपद्रवसों उत्पन्न हुओ है ॥२८॥ वा समय देवतावह वृहस्पतिको वचन सुनिके भयसे व्याकुल और दैत्यकरि वध्यमानही
दशों दिशानको माग गये ॥२९॥ सागरको पुत्र दैत्य देवतानको भगे गए देखि शंख भेरी और जयका शब्द करता हुआ
अमरावतीमें प्रवेश करतो भयो॥३०॥
१
॥३०॥
॥ द्रोणाचलले दिव्य औषधि लाकर युद्धखें गारेगये और फिरि उठे गए देवताओंको देखि ॥ २२ ॥ जलघर कोधित हो शुक्रचा सोपान बोर भयो । जलधर बोला, गोकरिकै पारेगणे देवता पिरि रो उठे है ? तुम्हारी यह जीविनी विधा अन्यत्र नहीं है यह प्रसिद्ध है ॥ काचार्य बोले, द्रोणाचलसे दिव्य औषधि लादे से अंगिरा के पुत्र पृहस्पति जिया हैं ताते तु द्रोणा दिव्योपशी समाप्तीपद्रोणासपुनःपुतः ॥ शाददात्तथासुद्धपुनरेवसस्थितान् ॥ २२ ॥ जलंधरः कोशोधायलादयस्वनीत् ।। जलंधरउवाच ॥ जयादेवाहतासु उत्तिष्ठतिकथानः ॥ २३ ॥ तक्यंजीविनी विद्यारवान्यनेतिविश्रुतम् ॥ शुक्रउवाच ॥ दिव्योषधीसमानीरुद्रोणाने गिरासुरान् ॥ जीवयत्येषतच्छीमंद्रोणादित्वमपाहर ॥२४॥नारद उवाचइत्युक्त्यासतुदैत्येंद्रोनीत्वाद्रोणाचलंतदा॥ प्राक्षिपत्सागरेतूफपुनरागान्महाहवस २५॥ चलको शीन हरिलो ॥२३॥ २४॥ तब नारद वोले, ऐसे कहो गयो वह दैत्येन्द्र द्रोणागिरिको लेकै शीग्रही समुद्र में फेंकदेत भ यो और फिर महायुद्ध में आवत भयो ॥ २५ ॥ ॥
का.मा.
२९||
अ.'
वह दैत्य जलंधर स्वर्गमें जाक नंदनवनमें स्थित होत भयो तब पुरको घेरिके स्थित भयो बडी भारी दैत्यनकी सेनाको देखि
के देवता कवच धारण करि युद्धके अर्थ अमरावतीसे निकसत भये तापीछे देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंमें युद्ध होत भयो
॥ १६ ॥ १७ ॥ मूसल लुहांगी तीर गदा बरछी फरसा लेलेके वे दोनों सेना दौडी और आपसमें मार होनेलगी ॥१८॥ और
गत्वात्रिविष्टपंदैत्योनंदनाधिष्ठितोऽभवत् ॥ निर्ययुश्चामरावत्यादेवायुद्धायदंशिताः॥ १६॥ पुरमावृत्य
तिष्ठतंदृष्वादैत्यबलंमहत्॥ ततःसममवयुद्धंदेवदानवसेनयोः॥ १७॥ मुशलै परिधैर्वाणैर्गदाशक्तिपरश्व
धैः॥ तेऽन्योन्यसमधावतांजन्नतुश्चपरस्परम् ॥ १८॥ क्षीणेचाभवतांसैन्येरुधिरोधप्रवर्तिनी॥ पतितःपा
त्यमानैश्चगजाश्वरथपत्तिभिः॥ १९॥ व्यराजतरणभूमिःसंध्याश्रपटलैरिवाततोयुद्धेहतान्दैत्यान्भार्गवः
समजीवयत्॥२०॥विद्ययामृतजीविन्यामंत्रितैस्तोयबिंदुभिमादेवानपितथायुद्धेतबाजीवयदंगिराः॥२१॥
दोनों सेना गिरे भये और गिराये भये हाथी घोडे रथध्यादोंसे रुधिरके प्रवाहकी प्रवृत्ति करती भई क्षीणताको प्रातभई ।। १९॥
और संध्याके मेरसमूहोंसे मानो रणले भूमि शोभित होतभई ता पीछे सुद्धा मारेगो दैत्योंको शुभाचार्य पृतरांजीविनी विद्याको
पढो छिडभोजलो कुन्दनलों जिलाप गये तैसे वृहस्पतिजीमीतिसद्धिगे मरेतुए देवताओंको जिलातेमये ॥२०॥२३॥
॥२९॥
-
पहिले औरभी मेरे शत्रु दैत्य उस करिके रक्षा किये गये ताते वाके रत्नसमूह निश्चय मुझ करकेभी हरेगये ॥ १० ॥ पहिले
सागरको पुत्र शंखहू देवतानसे द्वेष करताभयो समुद्रके भितर धसत भयो वह मे छोटे भाई करि मारो गयो॥ ११ ॥ताते जाओ
और सब मथनेका कारण जलंधरसे कहो ॥ नारदबोले, तब इन्द्रकरि विसर्जन कियोगयो दूत पृथ्वीमें आवत भयो ॥ १२ ॥
अन्येऽपिमद्विषस्तेनरक्षितादितिजाःपुरा ॥ तस्मात्तद्रनजातंतुमयाप्यपहृतंकिल ॥ १०॥ शंखोऽ
प्येवंपुरादेवानद्विषत्सागरात्मजः॥ ममानुजेननिहतःप्रविष्टः सागरोदरे ॥ ११ ॥ तद्गच्छकथयस्वा
स्यसर्वकथनकारणम् ॥ नारद उवाच ॥ इत्थंविसर्जितोद्वतस्तदेंद्रेणागमद्भुवम् ॥ १२॥ तदिदंवचूनंसूर्व
दैत्यायाकथयत्तदा ॥ तनिशम्यतदादैत्योरोपात्प्रस्फुरिताधरः ॥ १३ ॥ उद्योगमकरोत्तूर्णसर्वदेवजि
गीषया॥ तदोद्योगेऽसुरेन्द्रस्यदिग्भ्यःपातालतस्तदा ॥ १४॥ दितिजाःप्रत्यपातकोटिशःकोटिश
स्तदा ॥ अथरांभनिशुंभाचलाधिपतिकोटिभिः ॥ १५॥
सो यह सब बचन दैत्यसे कहत भयो तब दैत्य उसे सुनिके क्रोधसे कांपता है ओठ जाको ऐसो हो सब देवतानके जीतनेकी
इच्छासे शीघ्र उद्योग करत भयो वा समय उस असुरेंद्र अर्थात् जलंधरके उद्योगमें दिशाओसे और पातालसे करोडों दैत्य
आगये और शुंभ निशुंभ आदि करोडों सेनाके अधिपति आवतेभये॥ १३॥ १४ ॥ १५ ॥
भा, दी
, मा.
अ.
२८॥
NA
तब वह जलधर अपने पिताका मथना सुनिके क्रोधसे लालनेत्र करि घस्मरनाम दूतको इन्द्रके समीप पहुंचावत भयो ॥४॥
दूत स्वर्ग में जायके सुधर्मानाम देवसभामें प्रवेश करतभयो अखर्वमौलि वह घस्मर देवेन्द्रसों अद्भुत वचन बोलत भयो ॥५॥
घस्मर बोलो,समुद्रको पुत्र जलंधर सब दैत्यनको स्वामी है उस करिके मैं दूत भेजो गयोहौ वाने जो कहो है सो सुनो ॥६॥
सश्रुत्वाक्रोधरक्ताक्षःस्वपितुर्मथनंतदा ॥ टूतसंप्रेषयामासघस्मरंशक्रसन्निधौ ॥ ४ ॥ दूतस्त्रिविष्टपंग
वासुधर्माप्राविशत्त्वरा ॥ जगादासर्वमौलिस्तुदेवेंद्रंवाक्यमद्भुतम् ॥ ५ ॥ घस्मरउवाच ॥ जलं
धरोऽब्धितनयःसर्वदैत्यजनेश्वरः॥ दूतोऽहंप्रेषितस्तेनसयदाहशृणुष्वतत् ॥ ६ ॥ कस्मात्त्वयाममपि
तामथितस्सागरोद्रिणा ॥ नीतानिसर्वरत्नानितानिशीघ्रप्रयच्छमे ॥७॥ इतिदूतवचः श्रुत्वाविस्मित
स्त्रिदशाधिपः ॥ उवाच घस्मरंरौद्रभयरोषसमन्वितः ॥ ८ इन्द्रउवाच॥ शृणुदूतमयापूर्वमथितः
सागरोयथा ॥ अद्रयोमदयादीता स्वकुक्षिस्था कृतास्तथा ॥९॥
मेरो पिता सागर तुमने पर्वतसे क्यों मथो ? और जो तुमने रत्न हरण किये हैं उन्हें तुम शीघ्र मुझे देदो ॥७॥ इस प्रकारदूतका
वचन सुनि विस्मित इन्द्र भयानक घस्मरसे भय और क्रोधयुक्त हो बोले ॥८॥ इंद्र बोले, हे दूत । जो हमलोगनकरि पहिले
सागर मथो गयो सो सुनो मेरे भयसों भीत पर्वत वाने अपनी कुक्षिमें स्थापित कियो ॥ ९॥
॥२८॥
तापीछे कालेनेमियादि अनुरोंने मसाज होके वा पुत्रीको दान कियो बली वह जलंधर अतिप्रीति करनेहारी और पशगे रहनेवा
ली वाको पाके शुभाचार्यकी सहायता पृथ्वीको पालन अर्थात् राज्य करनलागो॥ ३१॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्री
मत्पडितकेशवमलादशदिवेदिविरचितायांकर्तिमाहात्म्यटीकायों भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां नवमोऽध्यायः ॥९॥ नारद
तेकालनेमिप्रमुखास्ततोऽसुरास्तस्मैसुतांतांप्रददुःप्रहर्षिताः ॥ सचापितांप्राप्यसुहृदरांवशांशशासगांशु
क्रसहायवान्वली ॥३१॥ इति श्रीपद्मपुराणेकात्तिकमाहात्म्ये नवमोऽध्यायः॥९॥ नारदउवाच ॥
येदेवनिर्जिताः पूर्व दैत्याः पातालसंस्थिताः ॥ तेऽपिभूमंडलेजातानिर्भयास्तमुपाश्रिताः ॥ १॥
कदाचिच्छिन्नशिरसंदृष्ट्वाराइंसदैत्यराष्ट्र ॥ पप्रच्छभार्गवंतस्यशिरसश्छेदकारकम् ॥ २ ॥ सशशंस
समुद्रस्यमथनंदेवकारितम्॥रनापहरणचैवदैत्यानांचपराभवम् ॥३॥
बोले पहिले देवतानफरि जीते भये जे दैत्य पातालमें स्थित हैं वेहू जलंधरके आश्रयसों पृथ्वीमंडलमें निर्भय होगये॥१॥किसी
समय राहुको शिर कटो हुआ देखि वह दैत्यराज उसके शिर कटनेके कारणको शुक्राचार्यसे पूंछतभयो ॥२॥ सब शुक्राचार्यने
देवताओं करि करायेभये समुंद्रके मथनको कहो और रत्नोंके हरलेनेको और दैत्योंके पराभवको वर्णन कियो॥३॥
मा. भा. टी २७॥ अ.१ - बडी कठिनाईसे जब डाढी छुडा पाई तब ब्रह्मा समुद्रसों बोलत भये ॥ ब्रह्मा बोले, जाते या करिके हमारे नेत्रनते यह जल निकालो गयो है ताते यह जलंधर या नामसो प्रसिद्ध होइगो ॥२६॥ ॥ २७॥ अभी यह तरुण और सब शास्त्रोंके अर्थका पारगामी होयगो और रुद्रके विना सब जीवनको अवध्य होयगो अर्थात् रुद्रके बिना याको कोई न मारसकैगो ॥ २८ ॥ বিশ্বীলঙ্কামীশালুখাজ্জীবাত্মাগুঅালভানাইঘ৷৷নহাজ আশীল। লাবিত হওালনকাণহত্যার্থত্বাহাঃহাঃনালাবিলা भविष्यति॥२८॥नारद उवाच रत्वाशुक्रमाहूयराज्येतंचास्यषेचयत् ॥२९॥ आमंन्यसरितांना মানবৃহীeণ্ডভণত্বাহাফাতেলিনাকাঅর্থিলা৷াই और जहांले यह उत्पन्न भयो है वहीं शिरलीन होजायगो ॥ नारद बोले, ऐसे कहि शुक्राचार्यको बुलवाय उले राज्यमहीपर गयो॥ २९ ॥ सिर लाना आझ लेोसा अंतर्धान होत अये या पीछे उसके देखोरोशनल लेन जाके ऐसे सागरने वापी रबीके लिये कालनेलिकी जो शुता वृन्दा थी ताकी याचना करी ॥ ३० ॥ मा ॥२७॥ ।
.
और उसने स्वर्गको आदिले सत्यलोकपर्यन्त सकल लोक बहिरे करदिये रोनेकोशब्द सुनिके यह क्या है ऐसे विस्मित हो ब्रह्मा
वहां आवत भये ॥२०॥ आतेही समुद्रकी गोदीमें वा वालकको देखते भये ता पीछे ब्रह्मा बोले कि, यह अद्भुत बालक कौनको ।
हैं? ॥२१॥ यह ब्रह्माका वचन सुनिके समुद्र वचन बोला और ब्रह्माको आवते देखि समुद्रह हाथ जोरत भयो ॥२२॥और शिरसो
स्वर्गादिसत्यलोकांतास्तत्वनाधिराःकृताः॥ श्रुत्वाब्रह्मायौतत्रकिमेतदितिविस्मितः॥२०॥तावत्स
मुद्रस्योत्संगेतंतुवालंददर्शहाततोब्रह्माऽब्रवीदाक्यंकस्यायंशिशुरद्धतः ॥२१॥ निशम्येतिवचोधातुर्वा
क्यसिंधुरथाब्रवीत्।।दृष्ट्याब्रह्माणमायांतंसमुद्रोऽपिकृतांजलिः॥२२॥प्रणम्यशिरसावालंतस्योत्संगेन्यवे
शयत् ॥ भोब्रह्मन्सिधुगंगायांजातोऽयममपुत्रकः ॥२३॥ जातकर्मादिसंस्कारान्कुरुष्वास्यजगहरो॥
॥नारद उवाच॥इत्थंवदतिपाथोधीसवाल सागरात्मजः॥ २४॥ ब्रह्माणमग्रहीत्कू,विधुन्वस्तंमुहुर्मुहुः।।
धुन्वतस्तस्यकूतन्त्राभ्यामगमजलम् ॥ २५॥
प्रणाम करिके वह बालक उनकीगोदी में बैठाय दियो और कहो कि गंगासागरके संगममें उत्पन्न हुयो यह मेरो पुत्रहे॥२३॥हे जगत्
के गुरु! याके जातकर्म आदि संस्कार कीजियोनारद वोले,समुद्र ऐसे कहिरहेथे कि समुद्रको पुत्र यह बालक ब्रह्माकी डाढी पकड़
लेतभयो और वारंवार हिलानेलगोतब उसकीडाढी पकडके हिलानेसों ब्रह्माके नेत्रनते जलगिरो अर्थात् अश्रुपात हुओ२४॥२५॥
. मा.
मा,
२६॥
अ..
हे ब्रह्मन् ! तुम्हारी या स्तुतिसे मैं प्रसन्न हौं वर मांगो और इन्द्रेका जीवदान करनेसे तुम जीव या नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त होउ
॥१५॥ वृहस्पति बोले, हे देव । जो तुम प्रसन्न भये होउ तो शरणमें आयोजो इंद्र हैं ताकी रक्षा करौ और मस्तकके नेत्रसे
उत्पन्न हुई यह अग्नि शांतिको प्राप्त होय ॥१६॥ रुद्र बोले, मस्तकके नेत्रमें यह अग्नि फिरि कैसे प्रवेश करिसक्ती है ? याको
वरंवरयभोब्रह्मन्प्रतिस्तुत्याऽनयातव ॥ इंद्रस्यजीवदानेनजीवेतित्वंप्रथांव्रज ॥ १५॥ वृहस्पतिरुवाच ॥
यदितुष्टोऽसिदेवत्वंपाहींद्रशरणागतम् ॥ अग्निरेषशमंयातुभालनेत्रसमुद्भवः ॥ १६ ॥ रुद्रउवाच ॥
पुनःप्रवेशमायातिभालनेत्रेकथंशिखी ॥ एतत्क्षिपाम्यहंदूरेयथेंद्रनेवपीडयेत् ॥ १७ ॥ नारदउवाच ॥
इत्युक्त्वातंकरेधृत्वाप्राक्षिपल्लवणार्णवे ॥ सोऽपतसिंधुगंगाया सागरस्यचसंगमे ॥ १८॥ तावत्सबाल
रूपत्वमगात्तत्ररुरोदच ॥ रुदतस्तस्यशब्देनप्राकंपखरणी मुहुः ॥ १९॥
में दूरि फेंको हो जाते इन्द्रको पीडा न करै ॥ १७ ॥ नारद बोले, शिवजी ऐसे कहिके वा अग्निको हाथमें लेके खारी समुद्र में
फेंकदेत भये तब वह अग्नि गंगासागरके संगममें जाके गिरी ॥१८॥वह अग्नि वहां बालक होके रोने लगी तब रोतेहुये उस
बालकके शब्दसों वारंवार धरती कांपने लगी ॥ १९॥
॥ २६॥
देखिकर बृहस्पतिजी शीवही हाथ जोडले. इन्द्रको भूगि दंडवत् प्रणाम राय स्तुति करने लगे ।। १० । वृहस्पति बोले कि,
देवताओके अधिदेवता भिनेत्र तथा कपर्दी जी आप हैं तिनको नगरकार और मिरासुरने का कानहारे शर्व तथा
अंधकदैत्यद मारनेवाले जो आप है तिनको नमस्कार है ॥ ५१ ॥ विशष अतिरूप और बस.प जो आप हैं तिनको
नमस्कार हे दक्षकी यज्ञक विध्वंस करनहारे और यज्ञले फल देनहारे जी आप तिनको नमस्कार है ॥ १२ ॥ कालके नाश
दृष्ट्वासहस्पतिस्तकृताञ्जलिपुटोऽभवत् ॥इंद्रचदंडवमौकृत्वास्तोतुंप्रचक्रमे ॥ १०॥ दृहस्पतिरुवाच॥
नभोदेवाधिदेवायत्र्यंबकायकपर्दिने ॥ त्रिपुरनायशर्वायनमोधकनिदिने ॥ ११ ॥ विरूपायातिरू
पायवहुरूपायशंभवे ॥ ज्ञानविध्वंसकवैयज्ञानांफलदायिने ॥ १२ ॥ कालांतकालकालायकालभो
गिधरायच ॥ नमोवाशिरोहन्त्रवाण्यायनमोनमः ॥ १३ ॥ नारद उवाच ॥ एवंस्तुतस्तदाशं
भुधिपणेनजगादतम् ॥ संहरन्नयनज्वालांत्रिलोकीदहनक्षमाम् ॥ १४ ॥
करनहारे और कालस्वरूप कालेसॉपके धारण करनहारे और ब्रह्माका शिर छेदन करनहारे और ब्राह्मणांके हितकारी जोआप
हैं तिनको वारंवार नमस्कार है ॥१३॥ नारद वोले, या समय बृहस्पतिकारि ऐसे स्तुति किये गये शिवजी त्रिलोकीके जलानेका
समर्थ ऐसी नेत्रकी अग्निको शांत करतभये उनसे बोले ॥१॥
मा. भा, टी. |२५॥ अ.९ नारद बोले, पहिले सब देवतानकरिके युक्त और अप्सरानके गणकरिके सेवन कियेगये इन्द्र शिवजीके दर्शन के लिये कैलासपर्व तको जातभये ॥४॥ इन्दने शिवके स्थानमें जाके भयंकर हैं कर्म जाके और दाढतथा आंखोंसे भयानक एक पुरुष देखो॥६॥ वह इंद्र करिके पूछोगयो किरे तू कौन है ? जगत्के ईश्वर शिवजी कहां गये हे राजा!ऐसे वारंवार पूछोगयो वह जब कुछ न बोलो ॥ नारदउवाच ॥ पुराशनाशिवंद्रष्टुमगात्कैलासपर्वतश् ॥ सर्वदेवैःपरितोाप्सरोगणसेवितः॥४॥ यावदतःशिवग्रहंतावत्तत्रसदृष्टवान् ॥ पुरुषभीमकमाणदष्ट्रानयनसीपणम् ॥ ५॥ सपृष्टस्तेनकस्त्वंयोः वगतोजगदीश्वर गाएवंपुनःपुन:पृष्टस्सयदानोचिवान्नृप॥६॥ ततःसुद्धोषज्रपाणिस्तनिर्मय॑वचोत्रवीत्॥ इंद्रउवाचायन्मयाच्छयमानोऽपिनोत्तरंदत्तवानसि ॥७॥ अतस्त्वांहन्सियजेणकरतेत्रातास्तिदुर्मत। इत्युदीर्य ततोवजीवजेणास्यहनदृढम् ॥ ८ ॥ तेनास्यकंठनोलत्वपणाहजचमल्यताम् ॥ ततारुद्रः प्रजज्वालतेजसाप्रदहन्निव ॥९॥ ॥६॥ तब इंद्रकोधित होवाको धमकाके वचन बोले, इंद्र बोले, जो मेरे पूछनेगरमालले उत्तर नहीं दियोहै ॥७॥याते मैं तोकू वनसे मारतोही हे दुर्बुद्धी ! तेरा रक्षक कौन है ? ऐसे कहिके इंद्रने वजसे वाको हदमारो॥८॥वत्रके लगनेसो वा पुरुषके काठमें नीलता होगई और वह वज्र भस्म भावको प्राप्त भयो ता पीछेरुदतेजसे जलातेहुये ॥ ९ ॥ ॥२५॥ घ • या प्रकार कार्तिकव्रतके नियमोंको जो भक्तिसे श्रवण करै है और वैष्णवोंके आगे कहैहै वे दोनों जो फल कार्तिकवत नियमसे मिले है उन सब पापनके नाशकरनहारे उस फलको प्राप्त होयह ॥ ३५ ॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसाद शर्मद्विवेदिकृतायांकार्तिकमाहात्म्यभापाटीकायांभापार्थबोधिनीसमाख्यायामष्टमोऽध्यायः ॥८॥पृथु बोले कि, हे महाराज । जो इत्यूर्जव्रतनियमाञ्कृणोतिभक्त्यायोवैतान्कथयतिवेष्णवाग्रतोपि ॥ तौसम्यव्रतनियमात्फलंभवेद्यत्त सर्वकलुपविनाशनंलमेते॥३५॥ इति श्रीपद्मपुराणेकार्तिकमाहात्म्येऽष्टमोऽध्यायः॥८॥ पृथुरुवाच॥ यत्तयाकथितंब्रह्मन्बतमूर्जस्यविस्तरात् ॥ तत्रयातुलसीमूलेविष्णोःपूजात्वयोदिता ॥१॥ तेनाहंप्रष्टुमि च्छामिमाहात्म्यंतुलसीभवम् ॥ कथंसाऽतिप्रियाजातादेवदेवस्यशाङ्गिणः ॥ २॥ कथमेषासमुत्पन्नाक स्मिन्स्थानेचनारद । तब्रूहिमेसमासेनसर्पज्ञोऽसिमतोमम ॥३॥ तुमने कार्तिकका व्रत विस्तार सहित कहा उसमें तुमने जो तुलसीके मूलमें विष्णुका पूजन वर्णन किया॥ १॥ ताते में जो तुलसीका माहात्म्य है ताहि पूंछा चाहूहूँ-वह तुलसी देवदेव जो भगवान् हैं तिनको अतिप्यारी कैसी भई ? ॥२॥हे नारद! यह तुलसी कैसे उत्पन्न भई और कौनसे स्थानमें भई तुम सर्वज्ञ हौ ताते यह सब संक्षेपसे मोसों वर्णन करो ॥३॥ ४
मा.
भा. टी,
४॥
अ.८
तिस पीछे भक्तिमान पुरुष मित्रवर्गोसमेत आप भोजन करें कार्तिक में अथवा माघमें इसी प्रकारकी विधि कही है ॥३०॥
ऐसे जो मनुष्य कार्तिकका व्रत भली भांति कर है वह पापरहितसबकामनाओंसे युक्त हो विष्णुकेसमीप प्राप्त होय है ॥३१॥
सम्पूर्ण व्रत और सम्पूर्ण तीर्थ और सब प्रकारके दानों करिकै जो फल प्राप्त होयहै उससे कोटिगुण फलइस व्रतके भली भाँति
ततःसुहृद्गणयुतः स्वयंभुंजीतभक्तिमान् ॥ कार्तिकेवाथतपसिविधिरेवविधः स्मृतः॥३०॥ एवंयःकुरुते
सम्यकार्तिकस्यव्रतनरः॥विपाप्मासर्वकामाढयोविष्णुसान्निध्यगोभवेत् ॥३१॥सर्वव्रतैःसर्वतीर्थःसर्व
दानश्चयत्फलम् ॥ तत्कोटिगुणितंज्ञेयंसम्यगस्यविधानतः ॥ ३२ ॥ तेधन्यास्तेसदापूज्यास्तेषांचस
फलोभवः ॥ विष्णुभक्तिरतायेस्युःकात्तिकव्रतकारिणः॥३३॥ देहेस्थितानिपापानिकंपयांतिचतद्भयात्॥
क्यास्यामोभवत्येषयाजव्रतकृन्नरः ॥ ३४ ॥
विधानसे प्राप्त होयहै ॥३२॥ वे धन्य है और वे सदा पूज्य हैं और उनका जन्म सफल है जे विष्णुभक्ति में रत होके कार्तिक
मासका व्रत करेंहै ॥ ३३ ॥ देहमें स्थित पाप वा व्रतके भयसे कंपायमान होयहें और कहते हैं कि, यह मनुष्य जो कार्तिकवत
करनेवालो मनुष्य होयहै तो अब हम कहां जांय ॥३४॥
॥२४॥
ता पीछे नतीपुरुप भगवान्की पूजा करिके देवताओकी तथा तुलसीकी पूजा करेंता पीछे वहां विधिपूर्वक कपिला गोको पूजन करे ॥२४॥फिरि व्रतके उपदेश करनेराले गुरुको पत्नीसहित वस्त्र आभूषण आदिसे पूजिके उन ब्राह्मणसों क्षमापन करावे ॥२६॥प्रार्थनाको मंत्र ।। तुम्हारे प्रसादते देवताओंके रवामी भगवान् मेरे ऊपर सदा प्रसन्न होउ और इस व्रतसों सात जन्मके पुनर्देवंसमभ्यच्य देवांश्चतुलसीतथा ॥ ततोगांकपिलांतत्रपूजयहिधिनाव्रती ॥ २४ ॥ गुरूंबतोपदेष्टारंव स्त्रालंकरणादिभिः ॥ सपत्नीकंसमभ्यर्यतांश्चविप्रान्क्षमापयेत् ॥ २५॥ प्रार्थनामंत्रायुष्मत्प्रसादाद्देवे शःप्रसन्नोऽस्तुसदाममाव्रतादस्माचयत्पापं सप्तजन्मकृतमया ॥ २६ ॥ तत्सर्वनाशमायातुस्थिरामेचा स्तुसंततिः॥ मनोरथाश्चसफलाःसंतुनित्यममार्चया ॥ २७ ॥ देहांतवैष्णवंस्थानंप्राप्नुयामतिदुर्लभम्॥ ॥ २८॥ इतिक्षमाप्यतान्विप्रान्प्रसाद्यचविसर्जयेत् ॥ तामचर्चागुरवेदद्याद्वायुक्तांतदाव्रती ॥ २९ ॥ किये हुए जो मरे पापहें वे सब नाशको प्राप्त होय और मेरी संतति स्थिरहोय और मेरी पूजासों तुम्हारे मनोरथ सदा सफल होय ॥२६॥२७॥ और देहान्तके समयमें अति दुलभजो वैष्णव स्थान है ताहि प्राप्त होउ ।। २८॥ ऐसे उस ब्राह्मणनसेक्षमापन कराके और प्रसन्न करके उनका विसर्जन कर तव व्रती वा पूजाको गऊसमेत गुरुके अर्थ दान करें ।। २९ ॥ - .
का.मा. माह ॥२३॥ जो सुखसे बाजा बजाता है और स्वेच्छालाप अर्थात् वृथा बकवादको वर्जिन करै है इन भावोंसे जो नर हरिको जागरण करै है दिनदिन वाको पुण्य कोटि तीर्थयात्रा के समान कहो गयोहे ॥१९॥ ता पीछे पूर्णमासीको पत्नी सहित तीस उत्तम ब्राह्मणनको अथवा एकको अपनी शक्तिके अनुसारन्योतादे ॥ २० ॥ जाते विष्णु वर देके मत्स्यरूप भए ताते यामें दियो और होम मुखेनकुरुतेवाचस्वेच्छालापांश्चवर्जयेत्॥मावैरतैनरोयस्तुकुरुतेहरिजागरमादिनेदिनेतस्यपुण्यकोटिती थसमस्मृतम् ॥ १९॥ ततस्तुपौर्णमास्यांसपत्नीकान्हिजोत्तमान् ॥ त्रिंशन्मितानथैकंवास्वशक्त्याच निमंत्रयेत्॥२०॥वरान्दत्त्वायतोविष्णुमत्स्यरूपोभवत्ततः॥ अस्यांदत्तंहुतंजप्तंतदक्षय्यफलंस्मृतम्॥२१॥ अतस्तान्भोजयेहिप्रान्पायसान्नादिनाव्रती ॥ अतोदेवाइतिहाभ्यांजुहुयात्तिलपायसम् ॥ २२ ॥ प्रीत्यर्थदेवदेवस्यदेवानांचपृथक्पृथक् ॥ दक्षिणांचयथाशक्तिप्रदद्यात्प्रणमेच्चतान् ॥ २३ ॥ कियोहुओ तथा जप कियोहुओ अक्षय फल कहोगयोहै ॥२१॥ याहीते व्रती उन ब्राह्मणनको खीर आदि अन्नसे भोजन करावे और अतो देवा इत्यादि दोऋचाओंसे तिल और खीरको होम करै ॥२२॥ देवदेव जो विष्णु हैं तिनकी तथा देवताओंकी पृथक् पृथक् कर यथाशक्ति दक्षिणा दे और उनको प्रणाम करै ॥२३॥ ॥२३ -
हे राजा ! या प्रकार पूजा करिके वैकुण्ठ चतुर्दशीको व्रत कियो वह मनुष्य या चतुर्दशीके व्रतमात्रहीसों वैकुण्ठको प्राप्त होय है
॥ १३ ॥ वैकुंठ चतुर्दशीको माहात्म्य सैकडोवर्पन करिके देवता और विशेपकरि शेषनागह कहनेको समर्थ नहीं है ॥१४॥
जे मनुष्य भगवान्के जागरणमें भक्तिसे गान करें हैं वे सैकड़ों जन्मोंमें उत्पन्न हुए पापनकै समूहकरि मुक्त होयहैं ॥ १५ ॥
एवंयेनकृताराजन्वैकुंठाख्याचतुर्दशी ॥ यस्यामुपोषणेनैववैकुंठप्राप्नुयानरः॥ १३॥ वैकुंठाख्यचतु
दश्या माहात्म्यनवशक्यते ॥ ववर्षशतैर्देवै शेपेणापिविशेषतः॥ १४॥ गानंकुतियभक्त्याजागरे
चक्रपाणिनः ॥ जन्मांतरशतोद्भुतैस्तेमुक्ताः पापसंचयैः ॥ १५॥ नारायणाजिरेविष्णोर्गीतनृत्यंचकुर्व
ताम् ॥ गोसहस्रंचददतां यत्फलसमुदाहृतम् ॥ १६॥ गीतनृत्यादिकंकुर्वन्दर्शयन्कौतुकानिच॥ पुरतो
वासुदेवस्यरात्रीयोजागरेडरेः ॥ १७॥ पठन्विष्णुचरित्राणियोरंजयतिवैष्णवान् ॥ तस्यपुण्यफलंविष्णु
स्सालोक्यंचप्रदास्यति ॥ १८॥
नारायणके आंगनमे ज विष्णुके निमित्त गान और नृत्य करें हे उनको पुण्य हजार गऊ देने हारेके पुण्यके ससान कहोगयो
॥१६॥वासुदेव भगवान्के आगे गीत और नृत्य आदिको करतो हुओ और कौतुकको दिखातोहुओरात्रिमें जोजागरण करताहै
और विष्णुके चरित्राको पाठ करतोहुओ वैष्णवनको प्रसन्न करतोहै उनके पुण्यके फल सालोक्य मुक्ति देतेहैं ॥ १७ ॥ १८ ॥
मा. भा. टी. २२॥ अ. बती पुरुष मंडल में इन्द्रादिलोकपालनकी पूजा करै द्वादशीकोभगवान् जागे और त्रयोदशीको देवताओंकरि देखेगये और चतु दशीको पूजन कियेगये ताते या चतुर्दशी तिथिको शांत तथा सावधान मन हो भक्तिसेनत करै ।। ८॥९॥ शुरुकी आज्ञा लेके देवदेवेश जो श्रीभगवान हैं तिनकी सुवर्णकी प्रतिमा बनाके नाना प्रकारके भोजनकरि युक्त षोडश उपचारनसो पूजन करै॥१०॥ इन्द्रादिलोकपालांश्चमंडलपूजयेद्रती॥ हादश्यांप्रतिबुद्धोऽसौत्रयोदश्यांपुनःसुरैः॥८॥ दृष्टोऽचितश्चतु श्यां तस्मात्पूज्यस्तिथावसोतस्याशुपवसे कत्याशांतःप्रयतमानसः ॥९॥ पूजयेदेवदेवेशंसौवर्णगु वनुज्ञया॥ उपचारैःषोडशभिनानाभक्ष्यसमन्वितैः ॥ १०॥ रात्रौजागरणं कुर्याद्गीतवाद्यादिमंगलैः॥ ततःप्रभातेविमलेकुन्नित्यक्रियांनरः॥ ११॥ होमकुर्यात्ततोविप्रान्सतर्यप्रयतात्मनानाशक्त्यातुदक्षि णांदद्याहित्तशाठ्यविवर्जितः १२॥ रात्रिमें गीतवाद्य आदि मंगलनसे जागरण करे ता पीछे सुन्दर प्रभात होनेपर मनुष्य नित्यक्रिया अर्थात् स्नानध्यान संध्योपा सन आदि करे ॥ ११ ॥ फिरि होम करै ता पीछे सावधान हो ब्राह्मणको भोजन करावै और धनकी शठता वर्जिन अर्थात् लोभको त्याग करिकै अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे॥ १२ ॥ ॥२२॥ HEN व्रत पूर्णहोनेको जो फल है ताके लिये और विष्णुभगवानकी प्रसन्नताके लिये कार्तिक शुक्ल चतुर्दशीके दिन व्रतको उद्यापन करै ॥२॥तुलसीके ऊपर तोरणयुक्त चारिद्वारनको फूल और चमरोंसे शोभित ऐसो सुन्दर मंडप वनावै ॥३॥और उसके चारोंदा रनपर मृत्तिकाके बने भये पुण्यशील सुशील जय विजय इन चारों विष्णुळे द्वारपालनकी पूजा करै ॥ ४ ॥औरतुलसीके मूलके ऊर्जशुक्लचतुर्दश्यांकुर्यादुद्यापनवती॥व्रतप्रतिफलार्थचविष्णुप्रीत्यर्थमेवच ॥२॥ तुलस्याउपरिष्टात्तुकु यामंडपिदांशुमारासतोरणांचतुहीरापुष्णचामरशोभिताम्॥ ३॥ हारेपुढारपालांश्चपूजयेन्मृन्मयान्प थक्कू ॥ पुण्यशील सुशीलबजयविजयनेवच॥४॥तुलसीलदेशेचसर्वतोभद्रमुत्तमम्॥चतुर्भिर्वर्णकै सभ्य क्छौसाढयसमलंकृतम् ॥५॥ तस्योपरिष्टाकलशपंचरत्नसमन्वितमामहाफले संयुक्तंशुभंतत्रनिधा यच ॥६॥ पूजयेत्तत्रदेवेशशंखचक्रगदाधरः ॥ कौशेयपीतवसनंयुक्तंजलधिकन्यया ॥७॥ समीप चारों ओर रंगोसे भली भॉति सोभायुत अच्छे प्रकार अलंकृत उत्तम सर्वतोभद्रचक्र बनावै ॥५॥ ताके ऊपर पंचरत्न करिके युक्त और श्रीफल बोभित शुभ कलश स्थापन करें ।। ६ ॥ फिर वा कलशपर शंख चक्र गदाको धारण किये हुये : और पीले रेशमी वस्त्रोंको पहिरेहुये लक्ष्मीसहित जो देवदेवेश भगवान विष्णु हैं तिनकी पूजा करै ॥७॥ श
का. मा.
भा.
॥२१॥
अ.
विष्णुव्रतको करनेवाला जहां पूजितहो स्थित रहता है वहां ग्रह भूत पिशाव आदि निश्चय करि नहीं रहैं हैं ॥ २४ ॥ कहीहुई
विधिअनुसार कार्तिकवत करनेवाले मनुष्यके पुण्यको चतुर्मुख ब्रह्माभी कहनेको समर्थनहीं है।॥ २६॥ जो मनुष्य विष्णुका
प्यारा सम्पूर्ण पापोंका नाशकग्नहारा और अच्छे पुत्र पौत्र तथा धनधान्यकी वृद्धि करनहारा ऐसा जो कार्तिकका व्रतहैताहीजो
विष्णुव्रतकरोनित्यंयत्रतिष्ठतिपूजितः ॥ ग्रहभूतपिशाचाद्यानैवतिष्टंतितत्रवै ॥ २४ ॥ कार्तिकवतिनः
पुण्यं यथोक्तवतकारिणः ॥ नसमाभवेहसुब्रह्मापिहिचतुर्मुखः॥२५॥ विष्णुव्रतसकलकल्मषनाश
नंचसत्पुत्रपौत्रधनधान्यविद्धिकारि॥ ऊर्जनतंसनियमंकुरुतेमनुष्यःकिंतस्यतीर्थपरिशीलनसेवयाच
॥ २६ ॥ इति श्रीपद्मपुराणेकात्तिकमाहात्म्येसप्तमोऽध्यायः॥७॥ नारदउवाच ॥ अथोर्जवतिनः
सम्यगुद्यापनविधिए ॥ संशृणुष्वमयाख्यातसविधानसमासतः॥१॥
मनुष्य नियमसू करेहै ताळू तीर्थनकी यात्रा और सेवामू कहा प्रयोजन है॥२६॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशव
प्रमादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ नारदबोले,हे राजा।
यापीछे अब मैं कार्तिकत्रत करनेहारेकृ उद्यापनकी विधि भली भांतिसूं कहूं: ताहि तुम विधानसहित संक्षेपसू सुनो ॥ १ ॥
व्रत करनेवालो मनुष्य माघमेंहू ऐसेही नियम करें और उससेभीप्रबोधिनी एकादशीमें कहेभये हरिके जागरणको करै ॥१९॥ कहीभई विधिके अनुसार कार्तिकको व्रतकरनेवालो मनुष्यको देखि यमदूत ऐसे भागिजायहैं जैसे सिंहसे पीडित हाथी भागि जायहैं ॥२०॥ विष्णुको व्रतकरनेवालो एक श्रेष्ठ है और सौ यज्ञनसों यजन करनेवालो श्रेष्ठ नहीं है कासे कि, यज्ञनको एवमेवहिमाधेचकुय्यार्च नियमान्व्रती॥ हरेश्चजागरंतत्रप्रवोधोक्तंचकारयेत् ॥ १९॥ यथोक्तकारिणंह ट्वाकात्तिकनतिननरम् ॥ यमदूताःपलायंतेगजाःसिंहार्दिताइव ॥ २० ॥ वरविष्णुव्रती कोनयज्ञशतया जकः ॥ यज्ञकृत्प्राप्नुयात्स्वर्ग वैकुंठंकार्तिकवती॥ २१ ॥ भुक्तिमुक्तिप्रदानीहयानिक्षेत्राणिभूतले ॥ संति तानितदेहेकात्तिकव्रतकारिणः ॥ २२॥ कार्तिकनतिनःपुंसोविष्णुवाक्यप्रणोदिताः॥ रक्षांकुर्वति शकाद्या राजानंकिंकरायथा ॥ २३ ॥ करनेवालो त्वर्गको जायहै और कार्तिकवत करनहारे वैकुंठको जायहै ॥ २१ ॥ इस पृथ्वीमें भुक्ति और मुक्तिको देनेहारे जितने तीर्थ हैं वे सब कार्तिकत्रत करनहारे मनुष्यकी देहमे निवास करें हैं॥२२॥ विष्णुके वाक्यसे प्रेरणा कियेगये इन्द्रादिक देवता कार्तिकपत करनेवालेकी ऐसीरक्षा करते हैं जैसे सेवक अपने राजाकी रक्षा करते हैं ॥ २३ ॥ है मा. भा.दी ०॥ अ.५ N वाले इन सबोंसे कार्तिकत्रत करनेवाला बात न करै ॥ १२ ॥ इन पूर्व श्लोकनमें कहेहुये और कागोंकरि देखे हुये अन्नको तथा सूतकके अन्नको और दो बार पकाये हुये अन्नको औरजलेहुएको कार्तिक व्रत करनेवाला न खाय ॥ १३ ॥ व्रतकरने वाला सब व्रतोंमेंभी सदा वर्जित करै और अपनी शक्तिसे विष्णुकी प्रसन्नताके लिये कृच्छादिक व्रतोंकोभी करै ॥१४ ॥ क्रमसे एभिर्दष्टचकाकैश्चसूतकान्नंचयद्भवेत् ॥ द्विपाचितंचदग्धान्ननवाद्यात्कार्तिकव्रती॥१३॥एतानिवर्जयेन्नि त्यंबतीसर्वव्रतेष्वपि॥ कृच्छ्रादींश्चप्रकुर्वीतस्वशत्याविष्णुतुष्टये॥१४॥ क्रमात्कूष्मांडबहतीतरुणीमूलकं तथा ॥ श्रीफलंचकलिंगचफलंधात्रीभवंतथा॥१५॥नारिकेलमलाबुंचपटोलंबदरीफलम्॥चर्मरताकलव लीशाकंतुलसितथा॥१६॥ शाकान्येतानिवानिकमात्प्रतिपदादिषु ॥धात्रीफलरवौतहहर्जयेत्सर्व दाव्रती ॥ १७॥ एभ्योऽन्यद्वर्जयेत्किंचिहिष्णुव्रतपरायणः॥ तत्पुनर्ब्रह्मणदत्त्वाभक्षयेत्सर्वदाव्रती॥१८॥ कुम्हडा बृहतीफल तरुणीशाक मूली वेल कलींदा तैसेही आमला नारियल लौकी परवल बेर मूरी बैंगन लक्लीशाक तथा तुलसी शाक येशाक क्रमसे प्रतिपदा आदि तिथियोमें वर्जित हैं तैसेही रविवारको आमलेके व्रती सदा त्याग करै॥१५॥१६॥ ॥१७॥ इन वस्तुओंके सिवाय और वस्तुओंका जो व्रती त्याग करै तो उन्हे ब्राह्मणके लिये देके फिरि सदा भोग लगावै।। १८॥ ॥२०॥ .
. बकरी गौ भैसके दूधसे भिन्न दूध आदि, ब्राह्मणके बेचे हुए सब रस तैसेही भूमिमें उत्पन्न नोन इन सबोंको कार्तिकका व्रतीछोडदे क्योंकि ये भी मांसके तुल्य हैं ॥ ७॥ तांबके पात्रमें धरो हुओ पंचगव्य और छोटी तलैयामें भरोहुओ जल और अपने लिये सिद्ध कियो हुओ अन्न पंडितों करि मांसके समान कहो गयोहे ॥ ८॥ ब्रह्मचर्य रहना भूमिमें सोना पत्रावली में भोजन आजागोमहिषीक्षीरादन्यदुग्धाचमामिषम् ॥ द्विजकीतारसाःसर्वेलवर्णभूमिजंतथा ॥७॥ताम्रस्थित पंचगव्यंजलंपल्वलसंस्थितम् ॥ आत्मार्थपाचितंचानमामिपंतत्स्मृतंबुधैः॥८॥ ब्रह्मचर्यमधश्ाय्या पत्रावल्यांचभोजनम् ॥ चतुर्थयामेभुंजान कुर्यादेवंसदाव्रती॥९॥नरकस्यचतुर्दश्यांतैलाभ्यंगंचकार येत् ॥ अन्यत्रकार्तिकस्नायीतैलाभ्यंगविवर्जयेत्॥ १० ॥ अलावूचापिलुताकंकूष्मांडवृहतीफलम् ॥ कलिंगचकपित्थंचवर्जयेद्वैष्णवोवती ॥ ११ रजस्वलांत्यजेन्म्लेच्छपतितव्रतकैस्तथा ॥ हिजहिड्वेदबा श्चिनवदेत्कार्तिकव्रती ॥ १२॥ चौथे प्रहर भोजन इसप्रकार कार्तिकवती सदा करै ॥5॥ कार्तिकस्नान करनेवाला नरकचतुर्दशीको तेल लगावै और दिनोंमें तेल लगाना वर्जितकरै॥१०॥लौकी बैंगन धुला कुमडा बृहतीफल कलीन्दा कैथका फल इनको कार्तिकनत करनेवालावर्जित करै ॥११॥ रजस्वला स्त्रीका त्याग कर और म्लेच्छ पतित व्रत करनेवाले तथा बाह्मणनके द्वेषी और वेदसे बाहर चलने
भा. टी.
सब प्रकारके भोग्य वस्तु मांस सहत राई और उन्मादक वस्तु इन सबनको कार्तिकत्रत करनहारे पुरुष न खाय॥२॥ परायो
अन्न दूसरेसे द्रोह करना तैसेही तीर्थ विना परदेश को जाना इन सबनको कार्तिकत्रत करनेवालो सदा छोडदे ॥३॥ देवता वेद
बाह्मण गुरु गौव्रती स्त्री राजा इन सबनकी तथा बडेनकी निन्दाको कार्तिकवत करनेवाले मनुष्य छोडदे ॥४॥ द्विदल कहिये
सर्वामिषाणिमांसंचक्षौद्रसौवीरकतथा॥राजिकोन्मादकंचापिनवाद्यात्कात्तिकवती॥२॥परानंचपरद्रोहंप
रदेशागमंतथा॥तीर्थविनासदैवेहवर्जयेत्कातिकवती॥३॥देववेदहिजातीनांगुरुगोबतिनांतथा॥ स्त्रीरा
जमहतांनिन्दांवर्जयेत्कार्तिकनती ॥ ४॥ हिदलंचतिलतैलंपकानंमूल्यदूषितम् ॥ भावदुष्टंशब्ददुष्ट
वर्जयेत्कार्तिकबती॥५॥ प्राण्यंगमामिपंचूर्णफलंजंबीरमामिषम् ॥ धान्येमसरिका प्रोक्ता अन्नपर्यु
षितंतथा ॥६॥
चणा मटर आदि तिलका तेल मोल लियाहुआ पकान भावसे दूषित तथा शब्दसे दूपित इन सबोंको कार्तिकत्रत करनेवालो॥१९॥
विवर्जित करै ॥५॥ प्राणीके अंगका मांस चूनाजंभीरीका फल और अन्नोंमें मसूर मांसके समान कहे हैं तैसेही बुसा हुआ अन्न इन
सबोको कार्तिकवतवालो न खाय ॥६॥
4 . , तापीछे स्थिर मन हो पुराण संबंधिनी हरि की कथाको सुनि भक्तियुक्त व्रती मनुष्य फिरि उन ब्राह्मणनको पूजन करै॥३०॥ऐसे पहिले कही हुई सब विधिको जो भक्तिमान मनुष्य भलीभॉति करै है वह विष्णुकी सलोकताको प्राप्त होय है ॥ ३१ ॥ रोगनको दूर करनेहारो और पापनको नाशक उत्तम वुद्धिको दनहारो और पुत्र धन आदिको साधक तथा मुक्तिको कारणरूप ततोहरिकथांश्रुत्वापौराणीस्थिरमानसः॥ पुनस्तान्ब्राह्मणांश्चैवपूजयेद्भक्तिमान्व्रती ॥३०॥ एवंसर्वविधि सम्यकपूर्वोक्तभक्तिमानरः॥ करोतियःसलभतेनारायणसलोकताम्॥३॥रोगापहपातकनाशकृत्परंतु डिदंपुत्रधनादिसाधकमामुक्तर्निदाननहिकार्तिकत्रताद्विष्णुप्रियादन्यदिहास्तिशोभनम्॥३२॥ इति श्री पद्मपुराणेकातिकमाहात्म्ये पष्ठोऽध्यायः॥६॥ नारदउवाच ॥ कार्तिकवतिनापुंसांनियमायेप्रकीर्तिताः।। ताञ्छणुष्वमाहाराजकथ्यमानान्समासतः॥ १ ॥ ऐसे हरिके प्यारे जो कार्तिक व्रत है ताको छोडके और दूसरो नहीं है ॥३२॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशव प्रसादशमंद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भापार्थबोधिनीसमाख्यायां षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ नारदबोले हेमहाराज कार्तिकको व्रत करनहारे पुरुषनके जे नियम कहे हैं उनको संक्षेपसों सुनो॥१॥ क --
भा. टी.
अ.
. मा. तिसके पीछे चन्दन फूल तथा पानोंसे वेदपाठी ब्राह्मणोकी भक्तिसे पूजा करै और वारंवार नमस्कार करै॥ २५ ॥ ब्राह्मणोंके
दहिने चरणमें तीर्थ वास करैहैं और वेद उनके मुखमें स्थित हैं और सब अंगोंमें देवता रहे हैं या कारण उनकी पूजा करनेसो
१८॥
मैं पूजित होऊहूँ॥२६॥पृथिवीमें ब्राह्मण अव्यक्तरूप विष्णुके स्वरूपहैं या कारणसे कल्याण चाहनेवाले पुरुष करिके वे अपमान
ततश्वब्राह्मणान्भक्त्यापूजयेद्वेदपारगान् ॥ गंधैःपुष्पैःसतांबूलैःप्रणमेचपुनःपुनः ॥ २५॥ तीर्थानिदक्षिणे
पादेवेदास्तन्मुखमाश्रिताः॥सांगेष्वाश्रितादेवाःपूजितोऽस्मितदर्चया॥ २६॥ अव्यक्तरूपिणोविष्णोः
स्वरूपं ब्राह्मणाभुवि॥नावमान्यानोविरोध्या कदापिशुभमिच्छता॥२७॥ ततोहरिप्रियादेवींतुलसी
मर्चयेद्वती॥ प्रदक्षिणांनमस्कारान्कुर्यादेकाग्रमानसः ॥२८॥ देवैस्त्वंनिर्मितापूर्वमर्चितासिमुनीश्वरैः ॥
नमोनमस्तेतुलसि पापंहर हरिप्रिये ॥ २९॥
करने योग्य नहीं हैं और न कदापि विरोध करने योग्य हैं ।।२७॥ तापीछे व्रती मनुष्य हरिकी प्यारी तुलसी देवीको पूजन
करै और एकाग्र मन होके प्रदक्षिणा और नमस्कार करै ॥२८॥ देवताओंकरिके तू पहिले निर्मित कीगई और मुनीश्वरोंकरिके
पूजीगई है हे तुलसी । तोको वारंवार नमस्कार है हे हरिकी प्यारी! मेरे पापनको दूरि करो ॥ २९ ॥
॥१८॥
अविन आदि मान्यता यमःम भीनीनीकी औरती ओपना काली मनुयश्न मननसों नयमित विपिन नमामोनिकण । फनिकमा पित एनवाना सीमानय जलने बाहर निकलक पतित्रनाम्यदिन्यानायनामिमहामानगाः || ओपध्यःगर्वनाश्यागिमांगनंत त्रिलोकजाः ॥ १५ ॥ एभिमननाम्नात्वान्यातपवित्रकः ॥ देवपीन्मानवापिस्तपंचयथाविधि ॥ २० ॥ यावतः कानिकमाश्विनन्लेषितता ।। निलाम्नमध्यकाब्दानितिन पवनवामिनः॥ २१ ॥ ततोजलाहिनि कम्यशुचियवाची पात:कालोदिन माननपिनः ॥ २६॥ नाथांनिंदवान्मर मृत्य एनरपदात माना आमंत्रः ॥ तिनाकानिकमा निम्नानस्यविधितानमा या सामान.. २ ॥ को माओको मानविकमायो है M है + " ne न . * ।
का. मा.
भा.
सप्तमी अमावस नवमी दूज दशमी और तेरसि इन तिथियोंमें आमलेऔरतिल लगाके स्नान न करे॥१३॥पहिले मलका स्नान
करे तिस पीछे मंत्रोंसे स्नान करे स्त्री और शूद्रोंको वेदोक्तमंत्रोंसे स्नान नहीं कहोहै वे पुराणके मंत्रनसों करें॥१४॥स्नानके
मंत्र ॥ जो भक्तोंको आनंद देनहारे भगवान देवताओंके कार्यक निमित्त रूप धारण करतभये सब पापोंके नाश करनहारे वे
सप्तमीदर्शनवमीहितीयादशमीषुच ॥ त्रयोदश्यांनचस्नायाखात्रीफलतिलैःसह ॥१३॥आदौकुर्यान्म
लस्नानमंत्रस्नानंततःपरम् ॥ स्त्रीशूद्राणांनवेदोक्तैर्मत्रैस्तेषांपुराणजैः॥१४॥स्नानमंत्रः॥ विधाभूदेवका
र्यार्थं यःपुराभक्तभावनः। सविष्णुःसर्वपापन्नःपुनातुकृपयात्रमाम् ॥१५॥विष्णोराज्ञामनुप्राप्यकार्तिक
व्रतकारकान् ॥ रक्षतिदेवास्तेसर्वेमांपुनंतुसवासवाः॥ १६ ॥ वेदमंत्राःसबीजाश्चसरहस्यामखान्विताः॥
कश्यपाद्याश्चमुनयोमांपुनंतुसदेवताः ॥ १७॥ गंगाद्यास्सरितःसर्वास्तीर्थानि जलदानदाः॥ ससप्तसाग
राम्सर्वेमां पुनंतुजलाशयाः॥ १८॥
भगवान् कृपा करिके मोको पवित्र करै ॥ १५ ॥ विष्णुकीआज्ञा पाकै कातिकवत करनहारेनकी सब देवता रक्षा करै हैं वे सब
देवता इंद्रसहित मेरी रक्षा करें ॥१६॥बीज रहस्य और यज्ञसहित वेदमंत्र और देवताओं समेत कश्यपआदिमुनि मुझे पवित्रकरें
॥१७॥गंगा आदिक सब नदी और तीर्थ और जलके देनहारे नद सातों समुद्रोंसमेत ये सब जलाशय मोकू पवित्र करें॥१८॥
॥१७॥
- देवेश जो भगवान हैं तिनको ध्यान और नमस्कार करि या जलमें स्नान करनेको उद्यत हा ह दामादर । तुम्हारे प्रसादसेमेरो पाप नाश होय ॥८॥ अर्घ्य मंत्र ॥हे हरि । कार्तिक महीनेमें विधिपूवक नहायोहुओ जो में व्रती हौ ता करिकै दिये भये अर्घ्य को राधा सहित ग्रहण कीजिये ॥९॥हे दनुजेन्द्रनिपूदन अर्थात् हिरण्यकशिपुके वध करनहारे । पापके नाश करनेवाले कार्तिक ध्यात्वानत्वाचदेवशंजलेऽस्मिन्स्नातुमुद्यतः॥तवप्रसादात्पापमेदामोदरविनश्यतु ॥८॥अर्घ्यमंत्रावति नःकार्तिकेमासिस्नातस्यविधिवन्मम ॥ गृहाणाय॑मयादत्तंराधयासहितोहरे ॥९॥नित्यनैमित्तिकेकृष्ण कार्तिकेपापनाशने ॥गृहाणाय॑मयादत्तंदनुजेन्द्रनिषूदन ॥१०॥स्मृत्वाभागीरथींविष्णुंशिवंसूर्यंजलेवि शेत् ॥ नाभिमात्रेजलेतिष्ठन्व्रतीस्नायाद्यथाविधि ॥ ११॥ तिलामलकचूर्णेनगृहीस्नानसमाचरेत् ॥ विधवास्त्रीयतीनान्तुतुलसीमूलमृत्स्नया ।। १२ ॥ के महीने में नित्य तथा नैमित्तिक कर्ममें मुझ करिके दिये अर्यको ग्रहण कीजिये ॥ १० ॥ व्रती पुरुष गंगा विष्णु शिव तथा सूर्यका स्मरण करिके जलमें प्रवेश करै फिरि नाभिपर्यंत जलमें स्थित हो विधिपूर्वक स्नान करे॥१३॥गृहस्थ तिल और आम लोंका चूर्ण लगाके स्नान करें और विधवा स्त्री तथा संन्यासियोंका तुलसीकी जड़की मिट्टी लगाके स्नान करनो कहोहे॥१२॥ 3 भाटी, अ.६ मा. विष्णुका स्मरण करिकै फिरि स्नानका संकल्प करै फिरि तीर्थ आदिकोंके और देवताओंके अर्थ क्रमसे अर्घ्यआदिका दान २६॥करै ।। ३॥अर्घ्यमंत्र॥ कमलनाभ जो भगवान् हैं तिनको नमस्कार है और जलशायी जो भगवान् हैं तिनको नमस्कार है हे हृषीकेश ! तुमको नमस्कार है मेरे अर्यको ग्रहण करोतुमको नमस्कार है ॥४॥वैकुण्ठमें प्रयागमें तैसेहीबंदरिकाश्रममें विष्णुस्मृत्वाततःकुर्यात्संकल्पंसवनस्यतु ॥ तीर्थादिदेवताभ्यश्चक्रमादादिदापयेत्॥३॥ अयमंत्रः॥ नमःकमलनाभाय नमस्तेजलशायिने ॥ नमस्तेऽस्तुहृषीकेशगृहाणाय॑नमोऽस्तुते ॥४॥वैकुण्ठेचन यागे चतथावदरिकाश्रमे ॥ यतोविष्णुर्विचक्रमेत्रेधाचनिदधेपदम् ॥५॥अतोदेवाअवंतुनोयतोविष्णु विचक्रम॥ तैरेवसहितस्सम्यङ्मुनिवेदमखान्वितैः॥६॥ कार्तिकेऽहंकरिष्यामिप्रातःस्नानजनार्दन।प्रीत्य र्थतवदेवेशदामोदरयथाविधि ॥७॥ जहां विष्णु गये और तीन प्रकारसे पदस्थापित कियो॥५॥ इससे मुनि वेद और यज्ञ इन सबोंकरके सहित जहां विष्णुने तीनि प्रकारसे स्थान कियो वहां देवता मेरी रक्षा करै ॥६॥हे जनार्दन । हे देवदेवेश ! हे दामोदर ! मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये कार्तिकमें विधिपूर्वक प्रातःकाल स्नान करौंगो ॥ ७॥ ॥१६॥ है
3
३
ता पीछे प्रदक्षिण करिक दंडवत्प्रणाम करि फिरि भगवानसों क्षमापन कराय गानो आदि समाप्त करें ॥ ३०॥ जे
। मनुष्य कार्तिककी रात्रिमें विष्णुको तथा शिवको भली भांति पूजन करेंगेवेमनुष्य अपने पुरुषों समेत पाप रहित हो वैकुण्ठ
भवनको जायँगे॥३१॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादविरचितायांकार्तिकमाहात्म्यटीकायांभाषार्थबो
ततःप्रदक्षिणकृत्वादंडवत्प्रणिपत्यच ।। पुनःक्षमाप्यदेवेशंगायनाचसमापयेत् ॥३०॥ विष्णो:शिवस्या
} पिचपूजनंयेकुर्वतिसम्यनिशिकार्तिकस्य ॥ निर्धूतपापाःसहपूर्वजैस्तेप्रयांतिविष्णोर्भवनमनुष्याः
॥ ३१॥ इतिश्रीपदापुराणकार्तिकमाहात्म्येपंचमोऽध्यायः॥५॥ नारदउवाच ॥नाडीहयावशिष्टायां
रान्यां गच्छेजलाशयम् ॥ तिलदर्भाक्षतैःपुष्पैर्गधायैःसहित शुचिः॥ १॥ मानुषेदेवखातेचनद्यामथच
संगमे॥ क्रमाद्दशगुणस्नानंतीर्थतद्विगुणस्मृतम् ॥२॥
'धिनीसमाख्यायांपंचमोध्यायः॥५॥ नारद बोले, दो घडी राति रहे तिल कुश अक्षत फूल चंदन आदि लेके शुद्ध हो जलाशय
अर्थात् नदीतड़ाग आदिके समीप स्नानके लिये जाय ॥१॥ मनुष्यरचित और देवरचित नदीमें अथवा संगममें स्नानका
क्रमसे दशगुण फल है और तीर्थ में उससे दुगुना फल कहा है ॥२॥
भा.
का.मा.
अ.
॥१५॥
नहीं पूजने योग्य हैं अर्थात् इन सबोंको विष्णुकी मूर्तिपर न चढावै ॥२६॥गुडहर कुंद सिरस जूही चमेली और केतकीके फूलोंसे
शिवकी पूजा न करें॥२६॥लक्ष्मीकी वांछा रखनेवाला मनुष्य तुलसीदलसों गणेशकीपूजानकर और दूबसे दुर्गाकी पूजानकरै
तैसेही अगस्त्यके फूलनसों सूर्यकी पूजान करे॥२७॥पूजामें जिन देवताओंके लिये जो सदाउ त्तमहैं उनसे या प्रकार पूजा विधि
शिरीषोन्मत्तगिरिजामल्लिकाशाल्मलीभवैः॥ अर्कजैः कणिकारैश्चविष्णुर्नार्यस्तथाक्षतैः ॥ २५ ॥
जपाकुंदशिरीषैश्चयूथिकामालतीभवैः ॥ केतकीभवपुष्पैश्चनैवार्य शंकरस्तथा ॥ २६ ॥ गणे
शंतुलसीपत्रैर्नदुर्गा चैवदूर्वया ॥ मुनिपुष्पैस्तथासूर्यलक्ष्मीकामोनचार्चयेत् ॥ २७ ॥ येभ्योया
निप्रशस्तानिपूजायांसर्वदैवतु ॥ एवंपूजाविधिकृत्वादेवदेवंक्षमापयेत् ॥ २८ ॥ मंत्रहीनक्रियाही
नभक्तहीनंसुरेश्वर ॥ यत्पूजितंमयादेवपरिपूर्णतदस्तुमे ॥२९॥
करके देवदेव जो भगवान हैं तिनसुं क्षमा करावै॥२८॥हे सुरेश्वर अर्थात् देवताओं के स्वामी जो मैंने मन्त्रहीन क्रियाहीन औरया ॥१५
भक्तिहीन पूजन कीन्हो हे देव सो मेरो पूर्ण होय ॥२९॥
देवालयमें गानमें तत्पर होनेसे वे विष्णुका स्वरूप है सत्ययुग आदिमें तप यज्ञदान जगद्गुरु जे भगवान हैं तिन्हें प्रसन्न करतेहैं। २०॥कलियुगमें नहीं अब कलियुगमें केवल गानहीकी प्रशंसा है हे राजा ! मैंने भगवानसे पूछो कि, हे देवेश ! तुमकहां वास करो हो ?तब उन्होंने उत्तर दियो।॥२१॥हे नारद । न तो मैं वैकुण्ठमे वसताहूँ और न योगियोंके हृदय में मेरे भक्त जहां गान करै देवालयेगानपरायतस्तेविष्णुमूर्तयः॥तपांसियज्ञदानानिकृतादिषुजगद्गुरोः॥२०॥तुष्टिदानिकलौंयस्मा इत्यागानंप्रशस्यते॥कत्वंक्ससिदेवेशमयापृष्टस्तुपार्थिव॥२१॥नाहंवसामिवैकुण्ठेयोगिनांहृदयेन च॥ मदतायत्रगायति तत्रतिष्टामिनारद ॥२२॥ तेषांपूजादिकंगंधपुष्पायैः क्रियतेनरैः ॥ तेनप्रीतिपरांयामि नतथामत्प्रपूजनात् ॥ २३ ॥ मत्पुराणकथांश्रुत्वामहत्तानांचगायनम्॥निंदंतियेनरामूदास्ते मे द्वेष्या भवंतिहि ॥२४॥ हैं वहां मैं स्थित रहताहूँ॥२२॥ उन मेरे भक्तोंकी गन्ध पुष्प आदिसे जो पूजा मनुष्योंकरि को जाय है वातें जैसो मैं प्रसन्न होउहों तैसो अपने पूजनतें नहीं ॥२३॥मेरे पुराणकी कथाको और मेरे भक्तोंका गाना सुनिके जो मूढ मनुष्य निंदा करैहै वे निश्चय करि मेरे द्वेपके योग्य होयह ॥२४॥सिरस धतूरा कुरैया सेमल अकौआ अमलतास इनके फूलोंसे तथा अक्षतोंसे विष्णु they
भा.
भा. टी.
॥१४॥
अ.५
या मंत्रको पढके बारह अंशुल प्रमाण गुलरी आदि दूधके वृक्षकी देतूनी लेकर दाँत शुद्ध करै और क्षयाह तथा व्रतके दिननकरै॥१॥
और पडवा अमावास नवमी छठिरविवारको तथा चंद्र और सूर्यके ग्रहणमें दंतधावन न करे।। १६||कटोंका वृक्ष कपास समाल
पीपल बड अरंड तथा दुगंधयुक्त वृक्ष ये सब दंतधावनमे वर्जित हैं अर्थात् इनकी दंतून न करै।। १६॥ता पीछे प्रसन्न मन हो पुष्प
इतिमंत्रसमुच्चार्यद्वादशांगुलमानतः ॥समिधाक्षीरवृक्षस्यक्षयाहोपोषणविना॥ १४॥ प्रतिपद्दर्शनवमीष
ष्ठीचार्कदिनेतथा॥ चंद्रसूर्योपरागेचनकुर्याहंतधावनम॥१५॥ कंटकीयक्षकापासीनिर्गुडीब्रह्मवृक्षकान्॥
वटैरंडविगंधाद्यान्वर्जयेदंतधावने ॥ १६ ततोविष्णो:शिवस्यापिगृहंगच्छेत्प्रसन्नधीः॥ पुष्पंगंधा
न्सतांबूलान्गृहीत्वाभक्तितत्परः॥ १७॥ तत्रदेवस्यपाद्यादीनुपचारान्पृथक्पृथक्॥कृत्वास्तुत्वापुनर्नत्वा
कुर्याङ्गीतादिमंगलम् ॥ १८॥ तालवेणुमृदगादिध्वनियुक्तान्सनर्तकान् ॥ पुष्पैर्गधैस्सतांबूलैर्गायकान
पिचार्चयेत् ॥ १९॥
गंध तांबूल लेके भक्तियुक्त हो विष्णु अथवा शिक्के मंदिर में गमन करै ॥१७॥ वहां देवकै पाचार्य आदि उपचारोंको पृथकू २
कत्रिकै और फिरि स्तुति तथा नमस्कार करिकै गीतआदि मंगलकरै।।१८॥ताल वेणु मृदंग आदिकी ध्वनिसे युक्त नाचनेवालों
समेत गवैयोंको फूल चंदन पान आदिसे सत्कार करै ॥ १९॥
MAR
॥१४॥
लिगमें एकवार मृत्तिका लगावै और तीन बार गुदामें फिर दोनोंमें दो बार लगावे पांच बार गुदामें और दशदश बार एकरहाथमें
फिरि दोनों मिलाके सात बार मृत्तिका लगावै॥९॥ यह गृहस्थको शौच है और इससे दूनों ब्रह्मचारीको कहो है वानप्रस्थको
तिगुनो और संन्यासियोंको चौगुनो कहो है ॥१०॥जो शौच दिनमें कहोहै वाको आधो रातिमें कहो है वाको आधो रोगीको
एकालिंगेगुदेतिस्रउभयोम॒द्वयंस्मृतम्॥पंचापानेदशैकस्मिन्नुभयोस्सप्तमृत्तिकाः॥९॥ एतच्छौचंगृहस्थ
स्यहिगुणंब्रह्मचारिणः॥ वानप्रस्थस्यत्रिगुणंयतीनांचचतुर्गुणम्॥ यदिवाविहितशौचंतदई निशिकीर्ति
तम् ॥ १०॥ तदर्द्धमातुरेप्रोक्तमातुरस्याईमध्वजि॥ शौचकर्मविहीनस्यसकलानिष्फलाःक्रियाः॥११॥
मुखशुद्धिविहीनस्यनमंत्राःफलदाःस्मृताः॥दंतजिह्वाविशुद्धिंचततःकुर्यात्प्रयत्नतः॥१२॥आयुर्वलंयशो
वचःप्रजाःपशुवसूनिच ॥ ब्रह्मप्रज्ञांचमेधांचत्वन्नोदेहिवनस्पते ॥ १३ ॥
कहो, और रोगीको आधो मार्गमें कहो है शौचार्मिसे रहित मनुप्यकी क्रिया निष्फल होतीहै ॥११॥और मुखशुद्धिसे रहित
मनुष्यको मंत्र फलदायकनहीं होतेहैं ता पीछे दांतनकी और जीभकी शुद्धिहू यत्नसों करै ।। १२॥ दंतधावनके निमित्त वृक्षकी
प्रार्थना आयु, वल, यश, तेज, संतति, द्रव्य, वेदपठन, बुद्धि हे वनस्पति । तू हमको दे ॥ १३॥
भा
अ.५
गे. मा. नाग्द बोले,हेराजा। तुम विष्णुके अंशसे उत्पन्नहो तुमको कुछ अज्ञात नहीं है तोह पै कहतोजो मैं हूँ ताते भली भांति नियमोंको
१३॥
सुनो॥३॥आश्विन महीनेकी जो शुक्ल पक्षकी एकादशी होयहै वा एकादशीसों कार्तिक व्रतको आरंभ आलस्यरहित होके करे॥४॥
चतुर्थाश अर्थात् प्रहररात्रि रहेसे प्रति सदा उठे और प्रथम ग्रामसे उत्तर दिशाको जलका पात्र लेके जाय॥६॥दिनमें संध्याके समय
नारदउवाच ॥ त्वंविष्णोरंशसम्भूतोनाज्ञातंविद्यतेतव ॥ तथापिवदतःसम्यनियमानपिवैशृणु॥३॥
आश्विनस्यतुमासस्ययाशुक्लैकादशीभवेत् ॥ कार्तिकस्यव्रतारंभंतस्यांकुर्यादतंद्रितः॥४॥राज्यांतुयाँ
शशेषायामुत्तिष्ठत्सर्वदाव्रती॥प्रागुदीचीव्रजेद्वामाहहि सोदकभाजनः॥५॥दिवासंध्यासुकर्णस्थब्रह्म
सूत्रउदङ्मुखः॥अन्तर्वायतृणैर्भूमिशिरःप्रात्यवाससा॥६॥ वक्रनियम्ययत्नेनष्ठीवनोच्छ्वासवर्जितः॥
कुर्यान्मूपुरीपेचरात्रीचेद्दक्षिणामुखः॥७॥ गृहीतशिश्नश्चोत्थायमृद्भिरभ्युक्षितैर्जलैः ॥गंधलेपक्षयकरं
शौचंकुदितंद्रितः॥८॥
कानपर यज्ञोपवित स्थापित करि उत्तरको मुख करिके भूमिमें तृण बिछावै और शिरको वस्त्रसे ढांकिले॥६॥ मुखको यत्नसे बंध
करिके थूकने और श्वास लेनेसे रहित हो मूत्र तथा मलकात्याग करै जोरात्रिमें करे तो दक्षिणदिशाकी ओर मुखकरें॥७॥शिश्न
इंद्रीको हाथमें ग्रहण किये हुये उठके मिट्टीलगाके धोवै बास और लेपके दूर करनहारे शौचको आलस्यरहित होके करै ॥८॥
॥१३॥
AM
जे श्रेष्ट मनुष्य उस स्थानका दर्शन करतेहैं वे जीवन्मुक्तहैं और सदा उनमें पाप नहीं रहेहैं॥२८॥सूतबोले,देवनके देव श्रीभगवान्
ऐसे देवतानसों कहिके ब्रह्मासमेत वहीं अंतर्धान होतभये और इंद्रादिक सब देवताभी अंशोंसे वहां स्थित होके अंतर्धानहोगये।।
॥२९॥ जो उत्तम शुद्धचित्त हो या कथाको सुनैगो या सुनावैगोवह तीर्थराज अर्थात् प्रयाग और बदरीवनमें जाके जो फलमिले
स्थानस्यदर्शनंतस्ययकुर्वतिनरोत्तमाः ॥ जीवन्मुक्ताःसदातेषुपापनैवावतिष्ठते ॥ २८ ॥ सूतउवाच ॥
एवंदेवान्देवदेवस्तदुक्त्वातत्रैवांत नमागासवेधाः॥ देवास्सर्वेऽप्यंशकैस्तवृतिष्ठन्तोतानापुरिंद्राद
यस्ते॥ २९ ॥ इमांकथायःशृणुयानरोत्तमोयाश्रावयेहापिविशुद्धता सतीर्थराजवदरीवनयद्वाफल
तत्समवाप्नुयाच ॥३०॥ इति श्रीपद्मपुराणकार्तिकमाहात्म्येचतुर्थोऽध्यायः॥४॥पृथुरुवाच ॥ महत्फलं
त्वयाप्रोक्तंभुनेकार्तिकमाघयोः॥ तयोःस्नानविधिसम्यनियमानपिनोवद॥१॥उद्यापनविधिचैवयथा
वहतुमर्हसि ॥२॥
है उसे पाबैगो॥३०॥इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयपण्डितकेशवप्रसादविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां भापार्थबोधिनी
समाख्यायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पृथु बोले, हे सुनीवर महागज ! तुमने कार्तिक और माघको बहुत बडो फल कहो अब उन
दोनोंके नानकी विधि और नियमोंको हमसे भली भांतिसे कहो।।।और उद्यापन विधिको यथावत् कहनेके योग्य हो ॥२॥
भा.दी
अ.
. मा.प्रवेश करेंगे अर्थात् मुक्ति पावेंगे॥२१॥जे यहां आपके पितरों के निमित्त श्राद्ध करेंगे तिनके सब पितृगण मेरी सरूपताको
प्राप्तहोंयगे॥२२॥यह काला मनुष्यों के महापुण्यके फलको देनहारो होयगो और मकरके सूर्य आनेपर स्नान करनहारे पुरुपनके
१२॥
पापनको नाश करैगो॥२३॥माघमासमे मकरके सूर्य आनेपर प्रातःकाल स्नान करनहारे मनुष्यनके दर्शनहीसो पाप ऐसे दूर
पितॄनुद्दिश्ययेश्राद्धं कुर्वत्यत्रसमागताः ॥ तेषांपितृगणाःसर्वेयांतिमत्समरूपताम् ॥ ॥ २२ ॥ कालोप्ये
पमहापुण्यफलदस्तुसदाणाम् ॥ सूर्यमकरगेप्राप्तेनायिनांपापनाशनम् ॥२३॥ मकरस्थरवौमाधेप्रातः
स्नानप्रकुर्वताम्।।दर्शनादेवपापानियांतिसूर्याद्यथातमः ॥२४॥सलोकत्वंसमीपत्वंसारूप्यंचत्रयंक्रमात्॥
नृणांददाम्यहंस्त्रनिधेिमकरगेरवौ ॥२५॥ यूयंमुनीश्वरामसर्वेशृणुध्ववचनमम ॥ बदरीवनमध्येऽहंसदा
तिष्ठामिसर्वग॥२६॥अन्यत्रयच्छतर्वस्तपसाप्राप्यतेफलमांतत्रतदिवसकेनभवद्भिःप्राप्यतेसदा॥२७॥
होजायँगे जैसे सूर्यसे अंधकार दूर होजायहै॥२४॥माघमें मकरके सूर्य आनेपर स्नान करनहारे मनुष्यनको मैं सालोक्यसामीप्य
औरसारूप्य ये तीन प्रकारकी मुक्ति क्रमसे देतो हूँ॥२६॥हे मुनीश्वरो।तुम सब मेरा वचन सुनो सर्वव्यापी मैं बदरीवनके मध्य
सदा रहती हूँ॥२६॥और स्थानमें सौ वर्ष तप करनेसे जो फल प्राप्त होताहै वह तुम्हें वहां एक दिनमें सदा प्राप्त होयगो॥२७॥
॥१२॥
विष्णु बोले,हे देवताओ ! जो तुमने कहो यह मोको भी सम्मत है तथास्तु अर्थात् मैने तुमको वांछित वर दियो ब्रह्मक्षेत्रनाम से प्रसिद्ध यह स्थान सवको सुलभ होयगो।।१६।।सूर्यवंशमें उत्पन्न राजा भगीरथ यहां गंगालावेंगे वह गङ्गा यहां सूर्यकीकन्या जो कालिन्दी अर्थात् यमुनाजी तिससे संयोगको प्राप्त होयगी॥१७॥॥ब्रह्मादि तुम सब मेरे साथ वास करो यहतीर्थ तीर्थराज श्रीविष्णुरुवाच ॥ ममाप्येतन्मतंदेवायद्भवद्भिदाहृतम् ॥ तथास्तुसुलभत्वेतद्ब्रह्मक्षेत्रमितिप्रथम्॥१६॥ सूयर्वशोद्भवोराजागंगामत्रानयिष्यति ॥ सासूर्यकन्ययाचावकालिद्यायोगमेप्यति ॥ १७॥ ययंचसर्वे ब्रह्माद्यानिवसंतुमयासह ॥ तीर्थराजेतिविख्यातंतीर्थमेतद्भविष्यति ॥१८॥ दानंतपोव्रतहोमोजपपूजा दिकाःक्रियाः ॥ अनंतफलदाःसंतुमत्सान्निध्यकराःसदा ॥ १९॥ब्रह्महत्याद्विपापानिवहुजन्मकृतान्य पिादर्शनादस्यतीर्थस्यविनाशंयांततत्क्षणात॥ २० ॥ देहत्यागंचयेधीराःकुतिममसन्निधो।मत्तनुप्रवि शंत्यन्तनपुनर्जन्मिनोनराः ॥२१॥ या नामसों प्रसिद्ध होयगो॥१८॥और या क्षेत्रमें कियो हुओदान तपव्रतहोमजप पूजा आदि किया अनन्तफलकी देनहारी और मेरी समीपताकी करनहारी होयगी॥१९॥और अनेक जन्मोके करेभये ब्रह्महत्या आदिपाप या तीर्थके दर्शनसे तत्कालनाशको प्राप्त होंयगे॥२०॥जे धीर पुरुप मेरी सन्निधि अर्थात् मेरे समीप देहछोडेंगे तो फिर नाजन्मलेनेवाले वे मनुष्य मेरेशरीरमें भा. टों १११॥ अ. 1 . मा. संपूर्ण वेदनको पाके ब्रह्मा आनंदयुक्त हो ऋषिगणों समेत अश्वमेध यज्ञ करत भये॥१०॥ यज्ञके अंतमें देवतागंधर्व यक्ष सर्पऔर गुह्यक,ये सब भूमिमें दंडवत् प्रणाम करि शीघ्रही प्रार्थना करत भये ॥ ११॥ देवता बोले, हे देवनके देव ! जगत्के स्वामी प्रभु हमारी प्रार्थनाको सुनिये हमारो यह आनंदको समय है तासों आप वर देनेवाले होउ ॥१२॥ इन ब्रह्माने नष्टभये वेदनको या लब्ध्वावेदान्समग्रांस्तुब्रह्माहर्षसमन्वितः॥ अयजहाजिमधेनदेवर्षिगणसंयुतः॥ १०॥ यज्ञांतेदेवगंधर्व यक्षपन्नगगुह्यकाः॥ निपत्यदंडवद्भूमौविज्ञप्तींचकुरंजसा ॥ ११॥ देवाऊचुः ॥ देवदेवजगन्नाथविज्ञप्ति शृणुनःप्रभोपहर्षकालोऽयमस्माकंतस्मात्त्वंवरदोभव ॥१२॥स्थानेस्मिन्गृहिणोवेदान्नष्टान्प्रापपुनस्त्व यम् ॥ यज्ञभागान्वयंप्राप्तास्त्वत्प्रसादाद्रमापते ॥ १३ ॥ स्थानमेतदतिश्रेष्ठपृथिव्यांपुण्यवर्द्धनम् ॥ मुक्तिमुक्तिप्रदंचास्तुप्रसादाद्भवतस्सदा ॥१४॥ कालोऽप्ययंमहापुण्योब्रह्मनादिविशुद्धिकृत्॥दत्ताक्षय करश्वास्तुवरमेवंददस्वनः ॥१५॥ स्थानमें फिरि पायो और हे भगवन् ! हमने आपके प्रसादते यज्ञके भाग पाये ॥१३॥ ताते हे महाराज ! आपके प्रसादसे यह स्थान अर्थात् प्रयाग पृथ्वीमें अतिश्रेष्ठ पुण्यको बढानेवालो और भुक्ति मुक्तिको देनेवालो होय ॥ १४ ॥ और यह कालहू महापवित्र ब्रह्महत्या आदिको शुद्ध करनेवालो और दियको अक्षय करनेवालो होय यह वर हमको दीजिये ॥ १९॥ , ११॥
३ तापीछे मत्स्यस्प धारण करनहारे विष्णुने वा शंखासुरको बधकियों औरवाको अपने हाथमे धारण करिके बदरीवनकोजातभये ॥४॥और वहां नवनापियोको बुलाफ प्रभु यह आज्ञा देन भये विष्णु बोले जल के भीतर वेदविखरिगयह उनको तुम हूँठो ॥५॥ और बहुत शीमनायुक्त हो रहस्यसमेन वेदनको जलक मध्यसा लाभी तवताई म देवनाओक समृहसमेत प्रयागमें ठहरोहीं ॥६॥ ततोऽवधीत्मतेशंखविष्णुमत्स्यस्वरूपवृक ॥ अथतस्वकीकृत्वावंदरीवनमभ्यगात्॥४ातवाहूयनपी न्सानिदमाज्ञापयहिः॥ श्रीविष्णुम्बाच ॥ जलांतर विशीणास्तुवेदास्तान्परिमार्गथा॥५॥आनयध्वं वरायतासरतल्याजलांतरात्॥ तावत्प्रयागविटामिदेवतागण यतः॥ ६॥ नारद उवाच ॥ ततस्तैः मर्वमुनिमिस्तपावलसमन्वितः ॥ उमाश्यसवीजास्तवेदायनसमन्विताः॥७॥ तेपुयावन्मितंयनलब्ध तावद्धितम्यतन ॥ ससएषऋपिजातस्तदा प्रतिपाश्चि ॥ ८॥ अथसर्वेऽपिमंगभ्यायागंमुनयोययुः॥ विष्णवेमविधान तेलब्धावदात्यवेदयन् ॥ ५ ॥ नान्द बोले.ना पार कर गुमनी नगी वीज और यजमानहित मवेद निकालाये ॥ ७॥ उनमेंसे जितना जिसने पाया उतना उन नामम प्रतिद्धना.. समानाने लगा उस भागका वहीं ऋपि भवा ॥ ८॥ इस पछि सब मुनीश्वर मिलिग प्रयागकामा पानी नचाता मनि जोगियान दिन अर्थ निवेदन करत भो ॥ ९ ॥ STAR te
.मा.
भात दी।
अ.४
जैसे भली भांतिसे करेभये ये दोनों व्रत मेरी समीपताको प्राप्त करै हैं तैसे और नहीं हेदेवताओ। अन्य तीर्थ तप यज्ञ स्वर्गलोकके
देनहारे हैं वैकुंठके नहीं ॥ ३१॥ इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयपंडितकेशवप्रसादविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायां
भाषार्थबोधिनीसमाख्यायां तृतीयोऽध्यायः॥३॥ नारद बोले, ऐसे कहिके मछलीके समान रूप धारण करनहारे भगवान)
व्रतद्वयंसम्यगिर्दनरैःकृतंसान्निध्यकृन्मेनतथान्यदस्ति॥ नान्यानितीर्थानितपांसियज्ञाःस्वलॊकदास्तेन
यथासुरोत्तमाः॥३१॥ इतिश्रीपद्मपुराणकार्तिकमाहात्म्येतृतीयोऽध्यायः॥३॥ नारदउवाच ॥ इत्यु
क्वाभगवान्विष्णुःशफरीतुल्यरूपधृक् ॥ ययौतदांजलौविध्यवासिनः कश्यपस्यसः॥ १॥सतंकमंड
लौक्षिप्रकृपयाक्षिप्तवान्मुनिः ॥ तावत्सनममौतत्रततकूपेऽप्यवेशयत् ॥२॥तथापिनममौतावत्कासारे
प्रापयत्सतम् ॥ एवं ससागरेमत्स्यःक्षिप्तोऽसावभ्यवर्डत ॥३॥
विष्णु उस समय विंध्याचलके वासी कश्यप मुनिकी अंजलीमें आवत भये ॥ १ ॥ उन मुनीश्वरने उस मछलीको कृपाकरिके
कमंडलुमें डारली जब वह कमंडलुमें न समाई तब वाको कुआंमें डारत भये ॥२॥जब वह कुआं में भी न समाई तब तालाबमें
पहुंचावत भये ऐसे समुद्र में डारोभयो वह मत्स्य वृद्धिको प्राप्त होत भयो ॥३॥
॥१०॥
- जे मनुष्य कार्तिकके महीने में भली भांति सदाव्रत करैं हैं हे इन्द्र! वे देहांतसमय तुम करिके मेरे लोकमें पहुंचाने योग्य हैं॥२६॥ हे यम ! तुमकरिके उनकी विनोंसे भलीभांति सदा रक्षा करनी चाहिये और हे वरुण ! तुम करिके उनको पुत्र पौत्र आदि संतति देनी चहिये ॥२७॥ धनाध्यक्ष अर्थात् कुबेर ! तुम करिके मेरी आज्ञासे उनके सदा धनकी वृद्धि करनी चाहिये जातेमेरे । येकार्तिकवतंसम्यकर्वतिमनुजा:सदा॥तेदेहांतेत्वयाशक्रप्राप्यामद्भवनंसदा॥ २६॥ विघ्नेभ्योरक्षणंतेषां । सम्यकार्यत्वयायमादेयात्वयाचवरुणपुत्रपौत्रादिसंततिः ॥ २७॥ धनद्धिधनाध्यक्षत्वयाकार्याममा ज्ञया ॥ ममरूपधर साक्षाज्जीवन्मुक्तोभवेद्यतः॥ २८॥ आजन्ममरणयेनकृतमेतद्रतोत्तमम्॥यथोक्तवि धिनासम्यक्समान्योभवतामपि ॥ २९॥ एकादश्यांयतश्चाहंभवद्भिः प्रतिबोधितः॥अतश्चषातिथिर्मा न्यासतीवप्रीतिदामम ॥३०॥ रूपको धारण करनहारे साक्षात् जीवन्मुक्त होय हैं ॥२८॥जा करिके जन्मसे लगाके मरणताई कहीभई विधिके अनुसार भली भांति यह उत्तम व्रत कियोगयो है वह तुम्हारे हू मान्य है ॥२९॥ जाते तुमकरिके मैं एकादशीके दिन जगायो गयो याते मोको अतिप्रीति देनहारी यह तिथि बहुतही मानने योग्य है ॥ ३० ॥ ३ । . {"
1. मा.
भा. टी.
। ९॥
अ.३
नित्य तुम्हारे समान करै हैं वे मेरी प्रीतिके उपजावनवाले हैं और सदा मेरी समीपताको प्राप्त होय ॥२०॥पाय अर्घ्य आच
मनीय आदि जो तुम करिकै लायो गयो वाके गुणोंको अंत नहीं है और वही तुम्हारे सुखको कारण होयगो॥२१॥शंखासुर
करके आहरण किय गये सब वेद जलमें स्थित हैं उन्हें मैं शंखासुरकोमारिके लातोहौं॥२२॥ अबसे लगाके प्रतिवर्ष मंत्र बीज
कुर्वतिनित्यमनुजायभवद्भिर्यथाकृतम् ॥ तेमत्प्रीतिकरानित्यमत्सांनिध्यंव्रजतिहि ॥ २०॥ पाद्याा
चमनीयादियद्भवद्भिपाहृतम् ॥ तदनंतगुणयस्माज्जातंवःसुखकारणम् ॥ २१ ॥ वेदा शंखाहृताः
सर्वतिष्ठत्युदकसंस्थिताः॥तानानयाम्यहंदेवाहत्वासागरनंदनम् ॥ २२॥ अद्यप्रभृतिवेदास्तुमंत्रबीजस
मन्विताः॥प्रत्यब्दंकार्तिकेमासिविश्रमंत्यप्मुसर्वदा ॥२३॥ मत्स्यरूपोऽहमपिचभवामिजलमध्यगः॥
भवंतोऽपिमयासार्डमायांतुसमुनीश्वराः॥२४॥लोकेऽस्मिन्येप्रकुर्वतिप्रातःस्नाननरोत्तमाःगतेसर्वयज्ञा
वभृथैःसुस्नाताः स्युनसंशयः ॥ २५॥
समेत सब वेद कार्तिकके महीने भरि सदा जलमें विश्राम लेत हैं ॥ २३ ॥ जलके मध्यमें जानेवालो में भी मछलीका रूप
धारण करौं हौं तुम सब मुनीश्वरोंसमेत मेरे साथ आगमन करो॥२४॥ या लोकमें जे श्रेष्ट मनुष्य प्रातःकाल स्नान करें हैं
वे सब यज्ञांत स्नानके फलको निसंदेह प्राप्त होंयगे ॥२५॥
॥९॥
या पीछे ब्रह्मा सब देवतानसहित पूजाकी सामग्री ले वैकुंठभवन में प्राप्त हो विष्णुको शरणमें जात भये ॥१४॥ वहां सब देवता उनके जगाने के लिये गाने बजाने आदि काम करतभये और वारंवार गंध धूप दीप आदि देतभये ॥१५॥ या पीछे उनकी भक्तिसं प्रसन्न किये गये भगवान जगातभये और वहां देवता हजार सूर्यके समान है कांति जिनकी ऐसे विष्णुको देखतभये ॥१६॥ तब देवता पोडश उपचार अर्थात् धूप दीप नैवेद्य आदिसे पूजन करि पृथिवीमें दण्डवत प्रणाम करत भये ॥ १७ ॥ अथब्रह्मासुरैःसाविष्णुशरणमन्वगात् ॥ पूजोपहारमादायवैकुंठभवनंगतः॥१४॥तत्रतस्यप्रबोधायगी तवाद्यादिका क्रियाः ॥ चक्रदेवास्तदागंधधूपदीपान्मुहुर्मुहुः ॥१५॥अथप्रवुद्धोभगवास्तद्भक्तिपरितोषि तः॥ ददृशुस्तेसुरास्तत्रसहस्रार्कसमद्युतिम् ॥ १६॥ उपचारै षोडशभिःसंपूज्यत्रिदशास्तदा ॥ दंड वत्पतिताभूमौतानुवाचाथमाधवः ॥ १७॥ विष्णुरुवाच ॥ वरदोऽहंसुरगणा गीतवाद्यादिमंगलैः ॥मनो भिलषितान्कामान्सर्वानेवददामिवः ॥ १८॥ इषस्यशुक्लैकादश्यांयावदुबोधिनीभवेत्॥निशातुर्ययाम शेषगीतवाद्यादिमंगलम् ॥ १९ ॥ विष्णु बोले, हे देवताओ! वर देनहारो मैं तुम्हारे गाने बजाने आदि मंगलोंसे प्रसन्न हों तुम्हारे मनोवांछित सबही कामोंकोदेताहूं ॥१८॥ वारकी शुक्ल पक्षकी एकादशीसे लेजबताई देवउनठी एकादशी आवै तबताई पहरभर रात्रिरहेसे प्रातःकाल तक जे मनु ज्य गाना बजाना आदि मंगल करैं हैं। १९ ।।
.मा. ध टी ८॥ अ.३ जब देवता सुमेरु पर्वतकी गुफारूपी गढमें स्थित हो आसन बांधके बैठे तब दैत्य विचार करत भयो ॥८॥ छीनिलिये गयेहैं अधि कार जिनके ऐसे देवता यद्यपि मोकरिके जीते गये तो हू बल करिके युक्त दिखाई देत हैं यामें मोकू कहा करनी चाहिये।॥९॥ अब मैंने जानो कि देवता वेदमंत्रनको बलकरिके युक्त हैं ताते मैं उनके वेदमंत्रनकोहरिलेउंगोताते वे सब बलहीन होजाय।।१०॥ सुवर्णाद्रिगुहादुर्गसंस्थितास्त्रिदशायदा ॥ बद्धासनाबभूवुस्तेतदादैत्योव्यचिंतयत् ॥८॥हृताधिकारास्त्रि दशामयायद्यपिनिर्जिताःलक्ष्यतेबलयुक्तास्तेकरणीयमयाऽनकिम् ॥९॥अद्यज्ञातंमयादेवावेदमंत्रव लान्विताः ॥ तान्हरिष्येततः सर्वेबलहीनाभवंतिवे॥१०॥नारदउवाच ॥ इतिमत्वाततोदैत्योविष्णुमाल क्ष्यनिद्रितम् ॥ सत्यलोकाजहाराशुवेदानादिस्वयंभुवः ॥१॥नीतास्तुतेनतेवेदास्तद्भयात्तुनिराक्रमम्॥ तोयानिविविशुर्यज्ञमंत्राबीजसमन्विताः॥ १२॥तान्मार्गमाणःशंखोऽपिसमुद्रांतर्गतोभ्रमत् ॥ नददर्श तदादैत्यः कुचिदेकत्रसंस्थितान् ॥ १३ ॥ नारद बोले,तब दैत्य ऐसे मानिके विष्णुको सोते हुए देखि आदि जो स्वयंभू ब्रह्मा है तिनके लोकसू वेदनकू शीघ्र हर लेत भयो ॥११॥ वा दैत्य करिके लिये गये वेद उसके भयसे निकले और यज्ञके मंत्र और बीजमंत्रोंसहित जलमें प्रवेश करतभुये ॥१२॥ उनको ढूँढ़तो हुओशंखनाम दैत्यहू समुद्रके भीतर जाके भ्रमण करत भयो तब दैत्यने कहूँ एक स्थानमें स्थित वेद न देख॥१३॥ ८॥ । do
हे महाराज ! देवतानके स्वामी ! सब तिथियोंमें एकादशी और महीनों में कार्तिक आपको कैसे प्रिय भयो ताको कारण कहिये
है ॥२॥श्रीकृष्ण वोले, हे प्यारी ! तैंने भलो प्रश्न कियो एकाग्रचित्त होके घेनके पुत्र पृथु और महर्षि नारदका संवाद सुन ॥३॥
ऐसेही पहिले पृथुराजकरि पूछेगये सर्वज्ञ नारद मुनिने कार्तिकमासकी अधिकताको कारण वर्णन कियो॥ ४॥ नारद बोले
एकादशीतिथीनांचमासानांकार्तिकः प्रियः ॥ कथंतेदेवदेवेशकारणं तत्रकथ्यताम्॥२॥श्रीकृष्णउवाच॥
साधुपृष्टंवयाकतिशृणुष्वैकाग्रमानसा ॥ पृथोवैन्यस्यसंवादमहनारदस्यच ॥३॥ एवमेवपुरापृष्टोना
रदः पृथुनाप्रिये ॥ उवाचकार्तिकाधिक्येकारणंसर्वविन्मुनिः ॥४॥नारदउवाच॥शंखनामाऽभवत्पूर्वमसु
रः सागरात्मजः॥त्रिलोकीमथनेशक्तोमहावलपराक्रमः॥५॥ जित्वादेवास्तिरस्कृत्यस्वर्लोकात्समहासुरः
इंद्रादिलोकपालानामधिकारांस्तथाऽहरत् ॥६॥ तझ्यात्कंपितादेवाःसुवर्णाद्रिगुहांगताः ॥न्यवसन्ब
हुवर्षाणिसावरोधाः सबांधवाः ॥७॥
पहिले शंख नाम समुद्रका पुत्र असुर महावली और पराक्रमी तीनों लोकके मथनमें समर्थ होतभया ॥५॥ वह महासुर
स्वर्गसे तिरस्कार करि सबोंको जीति इंद्रादिक लोकपालोंके अधिकारको आपही हरि लेतभयो॥६॥ वाके भयसों काँपतेहुए
देवता सुमेरु पर्वतकी गुफामें जाके स्त्रियों और भाई बंधुओं समेत बहुत वातक वास करतभये ॥ ७ ॥
मा.
भा. टी.
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७॥
अ.'३
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-
लादेनेवाले होंगे ॥२९॥ और यज्ञ दान व्रत तथा तप करनेहरे मनुष्य कार्तिक व्रतकी एक कला अर्थात् षोडशवें भागको भी
नहीं प्राप्त होतेहैं ॥ ३० ॥ सूतजी बोले, भुवनाधिपति जो श्रीकृष्ण हैं तिनसूं इस प्रकार सुनिके पूर्व जन्ममें भयो जो पुण्य है
ताके वैभवसों हर्षित भई सत्यभामा विश्वके स्वामी और तीनों लोकके कारणरूप श्रीकृष्णजीकू प्रणाम करि वचन बोली॥३३॥
यज्ञदानव्रततपःकारिणोमानवाश्चये ॥ कार्तिकत्रतपुण्यस्यनाप्नुवंतिकलामपि ॥ ३० ॥ सूतउ
वाच ॥ इत्थंनिशम्यभुवनाधिपतेस्तदानींप्राग्जन्मपुण्यभववैभवजातहर्षा ॥ विश्वेश्वरंत्रिभुवनैकनिदा
नभूतंकृष्णप्रणम्य वचनंनिजंगादसत्या ॥ ३१ ॥इतिश्रीपद्मपुराणेकातिकमाहात्म्ये श्रीकृष्णसत्यासंवा
दे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥ सत्यभामोवाच ॥ सर्वेऽपिकालावयवास्तवकालस्वरूपिणः ॥ समानास्तुक
थनाथमासानांकार्तिकोवरः॥ १॥
इति श्रीमत्पण्डितपरमसुखतनयश्रीपण्डितकेशवप्रसादशमद्विवेदिविरचितायां कार्तिकमाहात्म्यटीकायांभाषार्थबोधिनीसमा
ख्यायो द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ सत्यभामा बोली, कालरूप जो आप हैं तिनके संपूर्ण कालके अवयव अर्थात् भाग समान
हैं तो हे नाथ ! कार्तिकको महीना सब महीनों से कैसे श्रेष्ठ भयो ? ॥१॥
और चन्द्रशर्माजोपूर्वको तुम्हारो पति हो वह अक्रूरभयो है और तुम कार्तिकके स्नानके पुण्यसू मरीप्रीतिकी बहुत बढ़ावनहारी वही गुणवती हो॥२४॥ और मेरे मन्दिरके द्वारपर पहिले जो तुमने तुलसी की बगीचीलगाई थीहे प्यारी ! कल्याणी! ताते यह कल्पवृक्ष तुम्हारे आंगनमें स्थित है ॥ २५ ॥और जो कार्तिकके महीने में पहले तुमने दीपदान करो हो ताते तुम्हारी देहमें यश्चन्द्रशर्मासोऽक्रूरस्त्वंसागुणवतीशुभे॥ कार्तिकस्नानपुण्येन बहुमेप्रीतिदायिनी॥ २४॥महारियत्त्व यापूर्वतुलसीवाटिकाकृता॥ तस्मादयंकल्पवृक्षस्तवांगणगतःशुभे॥२५॥कार्तिकेदीपदानंचत्वयावयत्कृ तपुरा ॥ त्वद्देहगेहसंस्थेयतस्मालक्ष्मी स्थिराऽभवत्॥२६॥यच्चव्रतादिकंसविष्णवेभर्तृरूपिणे॥ निवेदित वतीतस्मान्ममभार्यात्वमागता॥२७॥आजन्ममरणात्पूर्वयत्कृतकार्तिकवतम्॥कदाचिदपितेनत्वमद्वियो गंनयास्यसि॥२८॥एवंयेकार्तिकेमासेनराव्रतपरायणामसान्निध्यंगतास्तेऽपिप्रीतिदात्वंयथामम॥२९॥ और घरमें स्थित लक्ष्मीस्थिर होके वास करै है॥२६॥और जो तुम व्रत आदि सब स्वामीरूप विष्णुको अर्पण करती भई ताते तुम मेरे स्त्रीभावको प्राप्त भई ॥२७॥ जन्मसो लगाके मरणला जो तुमने कार्तिकको व्रत कीन्हों ताते मेरे विछोहको कबहूँ नही प्राप्त होउगी ॥२८॥ ऐसे जो मनुष्य कार्तिकके महीनेमें व्रत करने में तत्पर होयँगे वे मेरे समीप जाके तेरे समान प्रीति -
1,मा.
भा. टी.
६॥
अ.२
जलके भीतर धसतेही कांपने लगी और शीतसे पीडीत भई ताही समय वा व्याकुलने आकाशसे उतरतो हुओ विमान देखो,
॥१८॥ शंख चक्र गदा पद्म इन आयुधोंसे उपलक्षित विष्णुका रूपधारण करनहारे ऐसे गण गरुडकी है मूर्ति जामें एसीध्वजाका
है चिह्न जामें ऐसे विमानमें चढ़ाय अप्सराओं के समूह करि सेवा करी गई उस गुणवतीको चमर ढोरते भये वैकुण्ठको लेगये
यावज्जलांगतरताकंपिताशीतपीडिता॥तावत्साविह्वलापश्यहिमानंयांतमंबरात्॥१८॥शंखचक्रगदापद्म
रायुधैरुपलक्षिताः ॥ विष्णुरूपधरास्सम्यग्वैनतेयध्वजांकिते ॥ १९॥ आरोहयन्विमानेतामप्सरोगण
सेविताम् ॥ चामरैर्वीज्यमानांतविकुण्ठमनयन्गणाः ॥ २०॥ अथसातहिमानस्थाज्वलदग्निशिखो
पमा॥ कार्तिकन्नतपुण्येनमत्सांनिध्यंगताभवत् ॥२१॥अथब्रह्मादिदेवानांयदाप्रार्थनयाभुवम् ॥ आग
तोऽहंगणाःसर्वेयातास्तेऽपिमयासह ॥ २२॥ एतेहियादवास्सर्वेमद्दणाएवभामिनि॥पितातेदेवशम्माऽभू
सत्राजिदभिधोह्यथ॥ २३॥
॥१९॥२०॥ ता पीछे जलतीभई अग्निकी ज्वालाके समान विमानमें बैठी भई वह गुणवती कार्तिक व्रतके पुण्यसों मेरे
समीप आवत भई ॥२१॥ या पीछे ब्रह्मा आदि देवताओंकी प्रार्थना सूं जब मैं पृथिवीमें आयो तब वे सब गणहू मेरे साथ
आये॥२२ ॥ हे प्यारी! वे सब यादव मेरे गणही हैं और तुम्हारे पिता देवशर्मा सत्राजित नाम यादव हैं ॥ २३ ॥
॥६॥
जो कार्तिकके महीने में तुलाराशिके सूर्य होनेपर प्रातःकाल स्नान करेंगे वे बडे पापी होनेपरभी मोक्षको प्राप्त होगे॥ १२॥
जो मनुष्य कार्तिकके महीनेमें स्नान जागरण दीपदान और तुलसीके वनका पालन करें, वे मनुष्य विष्णुके स्वरूप हैं ॥१३॥
विष्णुके मन्दिरका झारना और स्वस्तिक(सथिया) आदिका अर्पण और विष्णुकी पूजा कर है वे जीतेही मुक्त हैं ॥ १४ ॥
कार्तिकेमासियेनित्यंतुलासंस्थेदिवाकर॥प्रातःस्नास्यतितेमुक्तामहापातकिनोऽपिच ॥ १२॥स्नानजागर
गंदीपंतुलसीवनपालनम् ॥ कातिकेमासिकुर्वतितेनराविष्णुमूर्तयः॥१३॥संमार्जनंगृहेविष्णोःस्वस्तिका
दिनिवेदनम् ॥ विष्णोः पूजांचयेकुर्युर्जीवन्मुक्तास्तुतेनराः ॥ १४॥ इत्थंदिनत्रयमपिकार्तिकेयेप्रकुर्वतादे
वानामपितेवद्या कियैराजन्मतः कृतम् ॥१५॥इत्थंगुणवतीसम्यक्प्रत्यब्दंवतिनीह्यभूतानित्यविष्णो
श्वपूजायभित्त्यातत्परमानसा ॥ १६॥ कदाचिज्जरसासाऽर्थकृशांगीज्वरपीडिता ॥ स्नातुंगगांगताका
तेकथचिच्छनकैस्तदा ॥१७॥
ऐसे तीन दिनहू जे कार्तिकमें करें हैं वे देवताओंकोभी नमस्कार करने योग्य हैं और जिन्होंने जन्मभर किया उनका तो फिर
क्या कहना है ॥१५॥ ऐसे गुणवती प्रत्येक वर्षमें व्रत करती भई और नित्य विष्णुकी पूजामें भक्तिसे तत्परमन होत भई॥१६॥
हे प्यारी ! किसी समय बुढ़ापेसे दुर्बल वह गुणवतीज्वररोगसे पीडित हो कैसेहू हौलेहौले गंगास्नानको जात भई ॥ १७॥
प. मा.
भा.दी
५॥
अ.
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वह फिर बहुतदेरमें श्वास ले शोकसे अत्यन्त रोदन करि शोकरूपी समुद्र में डूबी भई दुःखसे पीडित होत भई॥७॥वह गुणवती घरकी
सब सामग्रां बचक उन दोनोंका परलोक सबन्धी शुभकर्म शक्तिके अनुसार आलस्यरहित हो करत भई ॥ ८ ॥ और अपने
जीते जो शांत हो विष्णुभक्तिमें लगीभई सत्य बोलनहारी शौचयुक्त जितेंद्रिय हो वाहीपुरमें वास करती भई॥९॥ उस करके
चिरादाश्वस्य साभूमौविलप्यकरुणंबहु ॥ निमनाशोकजलधौदुःखार्तासमवर्तत॥७॥ सागृहोपस्करा
न्सर्वान्विक्रीयशुभकर्मतत् ॥तयोश्चक्रेयथाशक्तिपारलोक्यमतंद्रिता॥ ८॥ तस्मिन्नेवपुरे चक्रेवासंप्रभू
तिजीविनी ॥ विष्णुभक्तिरताशान्तांसत्यशौचाजितेंद्रिया।।९॥ व्रतयंतयासम्यंगाजन्ममरणात्कृ
तम्॥एकादशीव्रतसम्यक्सेवनंकार्तिकस्य च ॥ १०॥ एतद्वतहयंकांतममातीवप्रियंकरम् ॥ भुक्तिमुक्ति
करपुण्यपुत्रसम्पत्तिदायकम् ॥ ११ ॥
जन्मसे लगाके मरण पथ्यंत दो व्रा भली भांति किये गये एक तो एकादशीको व्रत और दूसरो कार्तिक मासको सेवन
॥ १० ॥ श्रीकृष्ण कहें हैं कि, हे प्यारी ! ये दोनों व्रत मोंको बहुतही प्यारे और मुक्ति अर्थात् भोग और मोक्षके करनहारे
और पुण्य तथा पुत्र और सम्पत्तिके देनेहारे हैं ॥११॥
॥५॥
गुणवती बोली कि, हाय स्वामी हाय पितामोको छोडके मरे विना कहां गये अनाथ बाला मैं तुम्हारे विना अब क्या करूं॥२॥ घरमें बैठीभई और कहूँ काममें चतुर नहीं और पतिकरिके दूपित ऐसी मोकू स्नेहपूर्वक भोजन वस्त्र आदिसे कौन पालन करेगो ॥३॥ भाग्य सुख भाशा और जीवन ये सब जाके नष्ट भये हैं ऐसी में कौन की शरण जाऊंजेब मेरे दुःख को दूरि करे॥४॥ कहां गुणवत्युवाच ॥ हानाथहापितस्त्यक्त्वांगच्छथाक्वमयाविना॥ वालाहकिकरोम्यद्यह्यनाथाभवतोविना ॥२॥ कोजुमामास्थितांगहेभोजनाच्छादनादिभिः॥ अकिंचित्कुशलांस्नेहात्पालयेत्पतिदूषिताम् ॥३॥ हतभाश्याहतसुखाहताशाहतजीविता ॥ शरणकंत्रजाम्यद्ययोमेदुःखंप्रमाजयेत्॥ ४॥ वगच्छामिक तिष्ठामिकिंकरोमियथावृणम् ॥ विधानाहाहताम्म्यद्यार्थजीवामिवालिशा॥ ५॥ श्रीकृष्णउवाच ॥ एवंबहुविलप्याथकुररीवभृशातुरा ॥ पपातभूमौविकलारंभावातहतायथा ॥६॥ जाऊकहां ठहरूं और क्या करूं ! घृणापूर्वक हाय विधाता करि मारीभई भोली मैं कैसे जीऊ॥६॥श्रीकृष्णबोले,बहुत घबराई भई वह ऐसे कुररीक समान बहुत विलाप करिके पवन करि ताड़ित केलेके समान व्याकुल हो पृथ्वीमें गिरत भई ॥६॥ Iiá :
मा. भा. दी] ३॥ अ. एक मैं क्रिया तथा नामसे पांच प्रकारका अर्थात् शिव सूर्य गणेश विष्णु शक्तिरूपसे होताहूँ जैसे देवदत्त एक पुत्र भ्राता आदि नामों से अनेक प्रकारका होता है ॥३७॥ ता पीछे वे दोनों मेरे भवन अर्थात् वैकुण्ठमें वास करनहारे और विमानमें चलनहारे और सूर्यके समान कान्तिवाले मेरे समान रूप हो मेरे निकट स्थित हो दिव्य स्त्री और चन्दनके भोगोंके भोगने एकोऽहंपंचधाजातः क्रिययानामभिः किल ॥ देवदत्तोयथाकश्चित्पुत्रभ्रात्रादिनामभिः॥३७॥ ततस्तुतौ मद्भवनाभिवासिनौविमानयांनौरविवर्चसावुभौ ॥मत्तुल्यरूपौममसन्निधानगोदिव्यांगनांचंदनभोगभो गिनौ ॥ ३८॥ इतिश्रीपद्मपुराणे कार्तिकमाहात्म्ये कृष्णसत्यांसंवादे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ श्रीकृष्णउ वाच ॥ ततोगुणवतीश्रुत्वारक्षसानिहतावुभौ ॥ पितृभर्तृजदुःखातकिरुणंपर्यदेवयत् ॥ १॥ वाले भये ॥ ३८॥ इति श्रीमत्पंडितपरमसुखतनयश्रीपंडितकेशवप्रसादशमद्विवेदिकृतायां भाषार्थबोधिन्यां कार्तिकमाहात्म्य भाषाटीकायांप्रथमोऽध्यायः ॥१॥श्रीकृष्णजी बोले तापीछे गुणवती दोनोंको राक्षसकरि मारे गये सुनिके पिता तथा पतिसे उत्पन्न भयो जो दुःख ताते पीडित हो शोकसे रोदन करतीभई ॥१॥ .
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वाहीको पुत्रके समान मानत भयो और वह ब्रामणकू पिताके समान जानतभयो वे दोनों कभीकुश और समिध लेनेके निमि
त्त वनको जातभये ॥३१॥और हिमालय पर्वतके वनमें जहां तहां विचरन लगे तब उन दोनोंने आवतो हुभो ॥३२॥ एक भया
। वनो राक्षस देखो भयसू सष अंग व्याकुल होगये और भागनेकोभी सामर्थ्य न रही तव यमराजके समान रूपवाले वा राक्षस
तमेवपुत्रवन्मेनेसचतंपितृवहशी॥ तोकदाचिहनंयातौकुशेध्माहरणार्थिनी॥ ३१ ॥हिमाद्रिपादोपवनेचे
रतुस्तावितस्ततः ॥ तौतस्मिनाक्षमघोरमायांतसंप्रपश्यतः ॥ ३२॥ भयविह्वलसर्वांगावसमर्थांपलायि
तुम्॥निहतौरक्षसातेनकृतांतसमरूपिणा॥३३॥तीतत्क्षेत्रप्रभावेणधर्मशीलतयापुनः ॥ वैकुंठभवननीतीम
द्गणैर्मत्समीपगैः॥ ३४ ॥ यावजीवंतुयत्ताभ्यांसूर्यपूजादिकंकृतम् ॥ तेनाहंकर्मणाताभ्यांसुप्रीतोह्यभवं
किल॥३५॥शैवाः सौराश्चगाणेशावैष्णवाः शक्तिपूजकाः॥मामेवप्राप्नुवंतीहवर्षांभः सागरंयथा ॥ ३६ ॥
करि वे मारेगये ॥३३॥ये दोनो वा क्षेत्रके प्रतापसू और धर्मात्मा होनेसू मेरे समीपवासी मेरे गणोंकरि वैकुण्ठलोकमें प्राप्तकिये
गये ॥३४॥ उन दोनोंने जीतजी सूर्यको पूजा आदि करी ता कर्मसं में उन दोनोंपर निश्चय अति प्रसन्न भयो ॥ ३५ ॥ शिव
सूर्य गणेश विष्णु शक्ति अर्थातदेवी इन सब देवताओके उपासक मोकोही ऐसे प्राप्त होते हैं जैसे वका जल समुद्र में पहुँचेहे ॥३६॥
मा.
भा. टी.
॥
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और अगले जन्ममें मेरो कैसो स्वभाव हो और कौनकी पुत्री हो सो सब कहोश्रीभगवान् बोले कि, हे प्यारी ! जो तुमने पूर्व
जन्ममें कियोहै ताहि मन लगाके सुनो ॥ २६ ॥ जो तुमने पुण्य व्रत और कर्म कियेहें और जाकी तुम कन्याहो सोसब मैं
तुमसूं कहूहूँ ॥ २७॥ पहिले कृतयुगके अंतमें मायापुरी अर्थात् देववन में वेदवेदांगका पढ़नेवाला अत्रि गोत्रमें उत्पन्न ब्राह्मणोंमें
भवांतरेचकिशीलांकावाहंकस्यकन्यका ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ शृणुष्वैकमना कांतेयत्कृतंपूर्वज
न्मनि ॥ २६॥ पुण्यव्रतंकृतवतीतत्सर्वंकथयामिते ॥ यत्कर्मतकृतंपूर्वयस्यत्वंकन्यकाप्रिये ॥ २७ ॥
आसीत्कृतयुगस्यांतेमायापुर्याद्विजोत्तमः ॥ आत्रेयोदेवशमैतिवेदवेदांगपारगः ॥ २८॥ आतिथे
योऽग्निशुश्रूषींसौरव्रतपरायणः ॥ सूर्यमाराधयनित्यंसाक्षात्सूर्यइवापरः॥ २९ ॥ तस्यातिवयसश्वासी
नाम्नागुणवतीसुता ॥ अपुत्रःसस्वशिष्यायचन्द्रनाम्नेददौसुताम् ॥ ३० ॥
उत्तम देवशमा॑नाम ब्राह्मण होत भयो ॥ २८ ॥ अभ्यागतोंका सत्कार तथा अग्निहोत्र करनहारोऔर सूर्यके व्रतमें तत्पर सदा
सूर्यकी सेवा करता हुआ साक्षात दूसरे सूर्यके समान हो॥२९॥वाके वृद्ध अवस्थामें गुणवती नाम कन्या उत्पन्नभई फिर उस
पुत्रहीनने पुत्रीको विवाह अपने चन्द्रनाम शिष्यके साथ कर दियो॥३०॥
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॥ ३॥
जो फल गरुडजीके दर्शन में मिले है वह इसतीनोंके दर्शन मात्रसू प्राप्त होय हैं और ता पीछे मेरो धाम मिहे ॥२१॥हे प्यारी। जो न देनेयोग्य न करने योग्य और म कहने योग्य सो सब मैं उत्तम बातें करोंगो और तुमसे कहोंगो ॥२२॥जो तुम्हारे मनमें होय सो सब पूछो सत्यभामा बोली कि, मैंने पूर्वजन्ममें दान व्रत अथवा तप क्या कीन्होंहे ? ॥२३॥जाते में मनुष्यनमें जन्म सुपर्णदर्शनाच्चैवयत्फलं लभतेनरः ॥ तत्फलं प्राप्नुयात्तेपदर्शना?ममालयम् ॥ २१ ॥अदेयमपिवाकार्य मकथ्यमपियत्पुनः॥ तत्करोमिकथंप्रश्नंकथयामिनमत्प्रिये ॥ २२॥तत्पृच्छसर्वकथयेयत्तेमनसिवर्तते॥ सत्योवाच ॥ दानंव्रतंतपोवापिकिंनुपूर्वमयाकृतम् ॥ २३ ॥ येनाहंमर्त्यजामर्त्यभवानीताऽभवकिल ॥ तवांगाईहरानित्यंगरुडासनगामिनी ॥ २४ ॥ इन्द्रादिदेवतावासमगमंयात्वयासह ॥ अतस्त्वांप्रष्टुमि च्छामिकिंकृतंतुमयाशुभम् ॥ २५॥ लेके या लोकमें आई और आपकी अद्धांगी हो गरुड़पर चढिके चलनहारी भई ॥२४॥और आपके साथ इन्द्र आदि देवता ओंके लोकनमें गई याते में आपसे पूंछती हूँ कि, मैंने पूर्वमें कहा सुकृत कियो है ॥२५॥ श न. मा. भा. ॥ २ अ.१ और रुधिरहू भूमिमें गिरत भयो इन तीनों सों तीनिवस्तु उत्पन्न भई अर्थात् कानसूं तमाल पूछतूं गोभी और रुधिरतूं मेंहदी भई ॥१६॥तातें मोक्षकी इच्छावारो पुरुष इनकू दूरही से तज दे हे प्यारी! तातें इन तीनोंको मनुष्य कबहूँ न सेवनकरै ॥१७॥ पीछे गायोंने भी गरुड़जीको सींगनसों मारो हे प्यारी ! तब गरुड़जीके तीनि पंख धरतीमें गिरे ॥ १८॥ उनमें पहिलेसू रुधिरञ्चपपातोत्रिीणिवस्तून्यतोऽभवन्॥कर्णेभ्यश्चतमालंचपुच्छादोभीबभूवह॥१६॥ रुधिरान्मेहदी जातामोक्षार्थीद्रतस्त्यजेतातस्मादेतवयंचैवनहिसेव्यनरैःप्रिये ॥ १७॥ गावस्तागरुडंशृङ्गेप्रजःकुपि तास्तदा॥गरुत्मतस्त्रयःपक्षा पृथिव्यामपतन्प्रिये ॥ १८॥ पक्षात्प्राथमिकाज्जातोनीलकंठ शुभात्मकः ॥ द्वितीयाचमयूरोवैचक्रवाकस्तृतीयकः ॥ १९॥ दर्शनाद्वैत्रयाणांतुशुभफलमवाप्नुयात्॥ तस्मादिदमुपा ख्यानंवर्णितंचमयाप्रिये ॥२०॥ नीलकंठ उत्पन्न भयो दूसरे मोर तीसरतूं चकवा चकवी ॥ १९ ॥ इन तीनोंके दर्शनसे शुभ फल मिलैं हैं हे प्यारी ! याते मैंने या उपाख्यानको वर्णन कीनो है ।। २० ॥ ॥२॥ ar श्रीकृष्णजी बोले कि हे प्यारी! मोकों तोसे अधिक और कोई स्त्री प्यारी नहीं है सोलह हजार स्त्रियोंमें तूही प्राणके समान प्यारी है ॥११॥ तेरे लिये देवताओं समेत इन्द्रसोंभी विरोध कीन्हो और तैंने जो याचन कीन्हो सोमहाअद्भुत हे प्यारी । मोते श्रवण कर ॥ १२॥ सूतजी बोले कि, एक समय भगवान कृष्ण सत्यभामाका प्रिय करनेकी इच्छाकर गरुडपर चढे हुये इन्द्रके ॥श्रीकृष्णउवाच ॥॥ नमत्वत्तःप्रियतमाकाचिदन्यानितंबिनी ॥ षोडशस्त्रीसहस्राणांप्रियाप्राणसमा ह्यसि ॥ ११॥ त्वदर्थदेवराजोऽपिविरुद्धोदैवतैस्सह ॥ त्वयायत्प्रार्थितंकांते शृणुतञ्चमहाद्भुतम् ॥१२॥ सूतउवाच ॥ एकदाभगवान्कृष्णस्सत्यायाःप्रियकाम्यया।वैनतेयंसमारूढइन्द्रलोकंतदाऽगमत्॥१३॥ कल्पवृक्षयाचितवान्सोऽवदन्नददाम्यहम् ॥ वैनतेयस्तदाक्रुद्धस्तदर्थयुयुधेतदा ॥११॥ गोलोकेगरुडोगो भियुद्धचैवचकारसः॥ गरुडस्यतु]डेनपुच्छकर्णास्तदाऽपतन्॥ १५॥ लोकको जाते भये ॥१३॥ वहां जायके कल्पवृक्षको मांगते भये तब इन्द्रने कही कि, मैं नहीं देऊगो तब गरुडजी क्रोधित हो वा कल्पवृक्षके लिये युद्ध करतेभये ॥१४॥ और फिरि गरुड़जी गोलोकमें गौअनसों युद्ध करते भये तब गरुडजीकी चोंचकी मारसों उनकी पूछ और कान कटिके गिरे॥१५॥ . । 3 मा. भा. टी. अ घरमें अब वर्तमान है ॥६॥ त्रिलोकीके नाथ श्रीपति जो तुम हो तिनकी मैं अतिप्यारी हूँ सोहे मधुसूदन ! याते मैं आपसे कुछ प्रश्न करनेकी इच्छा करती हूँ ॥६॥ जो आप मेरे प्रिय करनहारे हो तो विस्तारसों कार्तिकमाहात्म्य कहो ताको सुनिके फिरि मैंहूँ अपनो हित करूं ॥७॥ और हे देव! प्रत्येक कल्पमें आपसे मेरो वियोग न होय ।।८।। सूतजी बोले कि ऐले प्यारीके वच त्रैलोक्याधिपतेश्चाहं श्रीपतेरतिवल्लभाअतोऽहंप्रष्टमिच्छामिकिंचित्त्वांमधुसूदन॥६॥यदित्वंमत्प्रियक रकथयस्वात्रविस्तरम् ॥ श्रुत्वातचपुनश्वाहंकरोमिहितमात्मनापायथाकल्पवयादेववियुक्तास्यांनक हिचित्॥८॥सूतउवाच ॥ इतिप्रियावचः श्रुत्वास्मेरास्यःसबलानुजासत्याकरकरेधृत्वाऽगमत्कल्पतरो स्तलम् ॥ निषिध्यानुचरलोकंसविलासः प्रियान्वितः॥ ९॥ प्रहस्यसत्यामामंत्र्यप्रोवाचजगतांपतिः॥ तत्प्रीतिपरितोषोत्थलसत्पुलकितांगकः ॥ १० ॥ न सुनि श्रीकृष्णजी मुसुकुराय सत्यभामाको हाथ अपने हाथसों पकरिके कल्पवृक्षके नीचे जातभये और सेवक लोगनको निषेध करके विलासयुक्त प्रिया समेत बैठे ॥ ९॥ ता पीछे जगत्पति श्रीकृष्णजी प्यारीकी प्रीतिसे उत्पन्न हुये आनन्दसे । पुलकित हो प्रियाको सम्बोधन दे मुसुकुरायके बोलतभये ॥ १० ॥ - ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥॥अथ भापार्थबोधिनी टीका लिख्यते ॥ श्लोकः॥ध्यात्वा श्रीगुरुपादपद्ममनिशं नत्वा गिरां देवता माहा त्म्यं खलु कार्तिकस्य निखिलं देशीयया भापया भक्तानन्दकरं कथाऽमृतरसास्वादास्पदं शृण्वतां श्रीमत्केशवशर्मणाद्यविवृतं श्रीकृष्णभक्तिप्रदम् ॥३॥ नैमिपारण्य क्षेत्रमें सूतजी अट्ठासी हजार शौनकादि ऋषियोंसों कह हैं कि, जब नारदजी भगवानका दर्शन करिके चले गये तब सत्यभामा प्रफुल्लितमुख हो लक्ष्मीके पति श्रीवासुदेव भगवानसों सम्बोधन देके बोलत भई ॥१॥ श्रीगणेशाय नमः॥सूत उवाच॥ श्रियःपतिमथामंत्र्यगतेदेवर्षिसत्तम॥होत्फुल्लाननासत्यावासुदेवमथा ब्रवीत् ॥ १॥ सत्योवाच ॥ धन्यास्मिकृतकृत्यास्मिसफलंजीवितममामजन्मनोनिदानेचधन्यौतौपि तरौमम ॥ २॥ यौमात्रैलोक्यमुभगांजनयामासतुव॑वम् ॥ पोडशस्त्रीसहस्राणांवल्लभाऽहंयतस्तव॥३॥ यस्मान्मयादिपुरुष कल्पवृक्षसमन्वितः ॥ यथोक्तविधिनासम्यनारदायसमर्पितः॥४॥यहामिपि जानंतिभूमौसंस्थानजंतवः ॥ सोऽयंकल्पद्रुमोगेहेममतिष्ठतिसांप्रतम् ॥ ५॥ सत्यभामा वोली कि, धन्यहूँ मैं मेरो जन्म सफल है मेरे जन्मके देनेवाले माता पिताहू धन्य हैं जिन्होंने तीनों लोकोंमें सुन्दर मुझको उत्पन्नकिया जो मैं सोलह हजार स्त्रियों में आपकी प्यारी हूँ॥२॥३॥जारो मोकरिके आदिपुरुप कल्पवृक्ष सहित यथो क्तविधिसे नारदमुनिके अर्थ समर्पण किये गये ॥४॥ जाकी वार्ताको भूमिमें स्थित जीव नहीं जाने हैं सो यह कल्पवृक्ष मेरे on श्रीविष्णवे नमः। शेषशायी
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॥अथ पद्मपुराणोक्तं कार्तिकमासमाहात्म्यं भाषार्थबोधिनीटीकासमेतम्॥
WOBADOODOBADisao
वामन JAAवालबाट
पुनर्मुद्रणादिसर्वाधिकाराः "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षा धीनाः सन्ति,
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राम
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XLC EXPERT
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