Adarsh Library, Jaipur
Peyro Tale Ki Zamin
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पैर तले की ज़मीन
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ખેતીમાન, मोहन राकेश
इस नाटक के अभिनय-प्रदर्शन, नाट्य-पाठ, अनुवाद, प्रसारण तथा फिल्मी-
करण आदि के लिए निम्नलिखित पते पर पूर्व-अनुमति लेना अनिवार्य है।
श्रीमती अनीता राकेश
सी-७१५७, ईस्ट माफ कैलाश
नई दिल्ली-११००२४
दो शब्द "पैर तले की जमीन' को अपनी आखें मुद जाने से बरसों पहले राकेश जी ने लिखा था (उमके पहले अंक के तो एकाधिक मसविदे तैयार हुए थे) और जिस दिन वे मुझे एकाएक धोखा देकर सदा के लिए चले गये, तव भी टाइपराइटर पर इनी नाटक का एक पृष्ठ-आधा टाइप हुआ, याधा घालो-लगा रह गया था और कई पृष्ठ, दो-तीन पंक्तिया टाइप और फिर रद्द किये हुए, वेस्ट-पेपर बास्कट में पडे मिले । 'आधे-अधूरे' की मंचीय और साहित्यिक सफलता के बाद उनके नाटककार की कोई महत्त्वाकांक्षा इमी नाटक में केन्द्रित और निहित हो रही थी-उनके नाटकों के पाठकों और दर्शको की भाशाएं भी। यह नियति को विडम्बना है कि समूचे नाटक को संयोजना को पका लेने के बाद राकेश जी 'पैर तले की जमीन को अधूरा छोड़ गये-शोधा, मांना अंतिम मसविदा केवल पहले अंक का ही कर पाये। दूसरे अंक को परिकल्पना, उसके दृश्यबन्ध में खाके, इस अंक के आधे संवाद, उनको नोट-वुक्म में ही मिले। राकेश जी ने नाटक को पाडुलिपि प्रकाशकों को सौंपने की तारीख भी तय कर रखी थी जो काल यदि उनमे और हमसे इस वीच यह क्रूर खिलवाड़ न करता तो एक-दो महीनो में अधिक न टलती । अपने भीतर वह 'पर तले की जमीन के रिहर्मल ही नही, पूरा नाटक, पूरी साज-सज्जा के माय अंतिम रूप में खेल
चुके थे-एक माने में अब केवल टाइपराइटर पर कागज़ चढ़ा
कर उसे उतारना ही वाकी था और विश्वनाथ जी को उसे
प्रकाशनार्थ दे देना।
किसी कृती की अधूरी छूटी रचना को पूरा करने के लिए
वड़े साहस और रागात्मक तद्रूपता की आवश्यकता होती है।
कमलेश्वर जी ने राकेश जी से अपने कितने गहरे लगाव के नाते
इस चुनौती को स्वीकार किया होगा, इसका कुछ अनुमान
लगाया जा सकता है। परिणामस्वरूप, 'पैर तले की जमीन की
प्रति आज आपके हाथों में है। इसे इस आकर्षक रूप से छापने
का श्रेय विश्वनाथ जी को है जो इस नाटक को राजपाल से
प्रकाशित करवाने के लिए राकेश जी को भी कभी प्रतिवद्ध करवा
चुके थे।
इतना कहकर ही अव आपके और नाटक के बीच से मैं
हटती हूं।
अनीता
पात्र
अब्दुल्ला : बार का काउंटर क्लर्क
नियामत: बार का चपरासी
पण्डित : जुआरी, पलव का सदस्य
मुनझुनवाला : जुआरी, क्लब का सदस्य
नीरा : टेवल टेनिस को अल्पवयस्क खिलाड़ी
रीता:नीरा की सखी
अयूब : एक युवक
सलमा: अयूब
की पत्नी
चुके थे----एक माने में अब केवल टाइपराइटर पर कागज़ चढ़ा
कर उसे उतारना ही वाकी था और विश्वनाथ जी को उसे
प्रकाशनार्थ दे देना।
किसी कृती की अधूरी छूटी रचना को पूरा करने के लिए
वड़े साहस और रागात्मक तद्रूपता की आवश्यकता होती है।
कमलेश्वर जी ने राकेश जी से अपने कितने गहरे लगाव के नाते
इस चुनौती को स्वीकार किया होगा, इसका कुछ अनुमान
लगाया जा सकता है । परिणामस्वरूप, 'पैर तले की ज़मीन' की
प्रति आज आपके हाथों में है । इसे इस आकर्षक रूप से छापने
का श्रेय विश्वनाथ जी को है जो इस नाटक को राजपाल से
प्रकाशित करवाने के लिए राकेश जी को भी कभी प्रतिबद्ध करवा
चुके थे।
इतना कहकर ही अब आपके और नाटक के बीच से मैं
हटती हूं।
-अनीता
पात्र
अब्दुल्ला : वार का काउंटर क्लक
नियामत: वार का चपरासी
पण्डित : जुआरी, क्लब का सदस्य
झुनझुनवाला : जुआरी, क्लब का सदस्य
नीरा : टेबल टेनिस की अल्पवयस्क खिलाड़ी
रीता: नीरा की सखी
अयूब : एक युवक
सलमा: अयूब की पत्नी
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अनुवर्तन एक परदा उठने पर भटकती रोगनी मे बार, लाउज और लान तीनो खाली नजर आते हैं । जहां-तहा पड़ी जूठी प्लेटो,साली और भरे हुए गिलासो तथा बिखरे हुए ताश के पत्तों से लगता है कि लोग अभी-अभी अफरा- तफरी में वहां से उठकर गए हैं । उस बिखराव और खालीपन को रेखावित करता संगीत, जिसके मद्धिम पड़ने तक टेलीफोन को घण्टी बजने लगती है। तीन- चार बार घण्टी बज नुरने के बाद अब्दुल्ला हड़बड़ी में स्टोर में निकलकर आता है । अपनी घबराहट में टेलीफोन तक पहुचने में वह एकाध जगह हल्की ठोकर खा जाता है। उसके रिमोधर उठाने पर टेलीफोन भी गिरने को हो जाता है. पर वह किसी तरह उसे संभाल लेता है। आदुल्ला : टूरिस्ट क्लब आफ इण्डिया "कौन शफी साहब ? सलाम साहब । जी हां, भेज दिया है अयूब साहब को। "नहीं, अब कोई नहीं रहा यहा । पुल में दरार पड़ने की खवर पाते ही सब लोग क्लव खाली कर गए हैं । "हम भी वम चला ही चाहते हैं । स्टोर का सामान मैने चैक कर लिया है, सिर्फ हिसाब को कापी चेक करनी रहती है। नियामत जब तक दरवाजे बन्द करता है, तब तक में क्या ? ।
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अनुवतन एक - परदा उठने पर भटकती रोशनी मे वार, लाउंज और लान तीनोवाली नजर आते हैं । जहां-तहां पड़ी जूठी प्लेटों,साली और भरे हुए गिलासो तथा बिखरे हुए ताश के पत्तो से लगता है कि लोग अभी-अभी अफरा- तफरी में वहां से उठकर गए हैं । उस बिखराव और सालीपन को रेखावित करता संगीत, जिसके मद्धिम पड़ने तक टेलीफोन को पाटी वजने लगती है। तीन- चार चार घण्टी बज चुकने के बाद अब्दुल्ला हड़बड़ी मे स्टोर से निकलकर आता है। अपनी घबराहट में टेलीफोन तक पहुंचने में यह एकाध जगह हल्की ठोकर खा जाता है। उसके रिमोवर उठाने पर टेलीफोन भी गिरने को हो जाता है, पर वह किसी तरह उसे संभाल लेता है। मादुल्ला : टूरिस्ट क्लब आफ इण्डिया ।"कौन शफी साहब ? सलाम साहव । जी हां, भेज दिया है अयुव साहब को।"नहीं, अब कोई नहीं रहा यहां । पुल में दरार पड़ने की खवर पाते ही सब लोग क्लव खाली कर गए हैं। हम भी बस चला ही चाहते हैं। स्टोर का सामान मैंने चेक कर लिया है, सिर्फ हिसाब की कापी चेक करती रहती है। नियामत जब तक दरवाजे बन्द करता है, तब तक मैं"क्या? दरार डेड
फुट की हो गई है ? तब तो "जी मैं डर नहीं रहा। सिर्फ
इतना बता दीजिए कि दोनों दरियाओं के वीच का
फासला 'अच्छा "हां, हां.. और पानी का रंग ?...
नहीं, अभी तक मैं बाहर नहीं निकला । हौसला न पड़ने
की बात नहीं, यहां काम ही इतना था कि 'वह मैं देख
लूंगा। पर आपने बताया नहीं कि पानी का रंग...?
उधर से रिसीवर रख दिया जाता है ।
हलो 'हलो''हलो'..
परेशान-सा पल-भर रिसीवर को देखता रहता
है। फिर आसपास के विखराव पर एक नजर
डालता है । रिसीवर रखते हुए उसे आभास
होता है जैसे उसने कोई आवाज़ सुनी हो । वह
थोड़ा ठिठकता है, रिसीवर को फिर कान से
लगाता है और रख देता है। फिर हल्के
संदेह की दृष्टि से केविन की तरफ देखता हुआ
काउंटर पर आ जाता है। वहां रुककर भी
पल-भर आवाज़ की टोह लेता रहता है। फिर
जैसे यह निश्चय करके कि यह सिर्फ उसका
वहम है, जल्दी-जल्दी काउंटर की दराजें
खोलने-बन्द करने लगता है
(दराजों में ढूंढ़ता हुआ) अव यह हिसाव की कापी कहां
गई ? (एक दराज से कापी निकालकर) रखो कहाँ,
मिलदी कहां से है।
जल्दी-जल्दी कापी के पन्ने पलटता हुआ उसमें
पेंसिल से निशान लगाने लगता है।
एक और एक दो.. दो दो दो-दो-दो-दो-दो.. दो और
तीन पांच.. पांच-पांच-पांच.. पांच और ढाई साढ़े सात ।
विक्री साढे सात पेग । और बाकी (एक बोतल उठाकर)
होनी चाहिए छह पेग और हैं नहीं यह चार पेग भी।
घबराहट मे कभी आगे और कभी पीछे की
तरफ पन्ने पलटता है।
जैसे खुद बोतलें ही पी जाती हैं अपने अन्दर से । या कोई
नुपके से इनके लेवल बदल देता है ! (फिर एक बोतल
उठाकर) सोलन का हिसाब...
फिर जैसे आवाज सुनकर ठिठकता है और
केबिन की तरफ देखता है । केविन के साथ
की खिडकी का दरवाजा हवा में चरमराता
है, फिर एकाएक बन्द हो जाता है। बोतल
उसके हाथ से गिरते-गिरते वचती है । वह
उसे काउटर पर रखकर फिर कापी में व्यस्त
हो जाता है।
सोलन का हिसाव उलैक एण्ड ह्वाइट से मेल खाता है
और उलंक एण्ड ह्वाइट का हिसाब "बह तो मेल खाता
ही नहीं। खुदा की भी जैसे अब्दुल्ला से ही दुश्मनी है ।
जो भी गडबड करनी होती है. मेरी ही कापी मे करता
है। (पल-भर सोचता रहकर) मेरा क्या है मैं यहां
हिंदसे बदल देता हूं। हिदसे बदलना कोई वेईमानी नहीं ।
बेईमानी हो जो मैंने खुद पी हो और हिसाव न रखा
हो । (वदने हिंदसो को गौर से देखता हुआ)मालिक बस
वापी देखता है । यह मही कि दूसरा कितनी जानमारी
से काम करता है। और मब लोग तो जान बचाकर
पुल के उस तरफ जा पहुंचे हैं और मियां अब्दुल्ला अव
तक यहां बोतलों में शराव नाप रहा है। कापी मे हिंदसे
ठीक कर रहा है ! बगर कही...
६३
इस वार केविन से बहुत साफ आवाज़ सुनाई
देती है: गिलास से मेज़ पर ठक-ठक करने
की । उसकी पेंसिल लिखते-लिखते टूट
जाती है।
ओफ्फोह ! (केविन की तरफ देखकर) तो कम्बख्त
नियामत ले नहीं गया मियां अयूब को अब तक यहां से ?
और मैंने शफी साहब से कह दिया है कि ' (काउंटर
से आगे आकर ऊंची आवाज़ में) नियामत ! ..'ओ
मियां नियामत अली खां !
नियामत चावियों का गुच्छा हाथ में लिए
सामने की तरफ से आता है।
नियामत : आहिस्ता ! तुझसे कितनी बार कहा है इस तरह मत
चिल्लाया कर !
अब्दुल्ला : मैंने तुझसे क्या कहा था ? अगर तुझसे नहीं हो सकता
था वह काम, तो तू मुझसे साफ कह देता।
'नियामत : तुझे एक चीज़ का पता है ?
अन्दुल्ला : किस चीज़ का पता ?
नियामत : कि तू, जिसका नाम अब्दुल्ला है, दुनिया में अपनी तरह
का एक आदमी है ?
अब्दुल्ला : मैं कहता हूं...
नियामत : एक ही आदमी जो वोलता भी ज़बान से है और सोचता
भी जवान से है।
अब्दुल्ला : देख...
नियामत : वह जो होती है न छोटी-सी चीज़ दिमाग नाम की...
वह चीज खुदा ने तुझे दी ही नहीं।
अन्दुल्ला : हां, एक तुझीको तो दी है खुदा ने वह चीज़ !
नियामत : अगर जरा-सी भी दे देता न तुझे "बस इतनी ज़रा-
१३
सी...
अब्दुल्ला : मैं तुझसे पूछ रहा हूं कि (बात याद न आने से) वह
क्या था जो मैं तुझसे पूछ रहा था अभी ?
नियामत : अभी तू सिर्फ चिल्ला रहा था 1 पूछना अभी बाकी था।
अन्दुल्ला : (याद करने की कोशिश में) में वहां में यहां आया था
... क्यों आया था ? तुझे मैंने आवाज़ दी थी किसलिए
दी थी?
नियामत : (चलने को होकर) मैं दरवाजे बन्द कर रहा हूं। तू
सोच ले तव तक, किमलिए दी थी।
अब्दुल्ला : रुक-रुक-रुक-रुक-रक । (दिमाग पर जोर डालता हुआ)
वहा से यहां आया, यहां आकर आवाज दी आवाज
दी कि कि कि कि तू हमेशा यही करता है ।
कोई न कोई उलटी बात छेड़कर मुझे अमली वात भुला
देता है।
:
नियामत : अमली बात तेरे लिए होतो ही वह है जो तुझे भूल जाती
है । जो याद रह जाए, वह सिर्फ बात होती है, असली
बात नहीं।
चल देता है
अब्दुल्ला : (उतावली में) ए ए ए"अब चल कहां दिया तू?
नियामत रुककर गहरी नजर से उसे देखता है।
अच्छा हादरवाजे बन्द करने पर देख... (थूक निगल
कर) मैं कह रहा था कि "कि हम लोग साथ ही चलेंगे
बाहर । कहो ऐसा न हो कि.. कि तुझे याद न रहे और...
मेरा मतलब है कि तू"तू दरवाजे बन्द करके उधर से
ही चला जाय और और...
नियामत : और तू अन्दर बन्द होकर शराब की बोतलें सूघता रह
जाय । च-च-च-च-च-च-च !
१४
अब्दुल्ला : मेरा यह मतलब नहीं है...
नियामत : तेरा यह मतलब नहीं है मगर इसके सिवा कुछ और
मतलव भी नहीं है:: मतलब-मतलव तो तेरा कुछ है ही
नहीं।
अन्दुल्ला : मैं तुझसे सिर्फ इतना कह रहा था कि...
नियामत : जरा कोशिश कर सोचने की.. कि जब तक एक भी
आदमी क्लव के अन्दर है, मैं यहां से कैसे जा सकता हूं?
बड़े साहब के सामने जवावदेही किसकी है-मेरी या
किसी और की?
अब्दुल्ला : तू और तेरा बड़ा साहब । जो भी झूठ-सच उससे कह
देता है, उसीपर वह सिर हिला देता है ।
नियामत : हांsss हिला देता है सिर! वार का ठेकेदार मुहम्मद
शफी है न वह, जो कापी में गलत हिंदसे देखकर भी चुप
रह जाय।
अब्दुल्ला : देख. आगर तेरा मतलब है कि...? . .
नियामत : . उसका नाम है सोमनाथ । दूरिस्ट अफसर सोमनाथ ।
छड़ी और टोपी में से एक चीज़ हर वक्त अपने साथ
रखता है। रात को सोते वक्त भी।
केविन से फिर ठक्-ठक की आवाज़ सुनायी
देती है-पहले से ऊंची। अब्दुल्ला एक बार
केविन की तरफ देखकर फिर पलभर सीधी
नज़र से नियामत को देखता रहता है।
अब्दुल्ला : अव आया याद तुझे?
नियामत : यानी कि जो तुझे भूल गया था, वह मुझे याद आना था।
खूव।
अब्दुल्ला : मैंने कहा नहीं था तुझसे कि मियां अयूब को जल्दी से
वाहर पहुंचा दे, शफी साहब नाराज़ हो रहे हैं।
: : नियामत : शफी साहब नाराज हो रहे हैं। यहां तो कम्बख्त को ढोकर ले जाने में कन्धे टूटने को आ गए और शफी साहब है कि नाराज हो हुए जा रहे हैं। अब्दुल्ला : (असमंजस मे केविन की तरफ देखता हुआ) तो तेरा मतलब है कि तू मियां अयूब को सचमुच उम पार छोड़ आया है.. नियामत : नाम मत ले उस आदमी का । पी-पीकर इस तरह धुत हो हो रहे थे जनाब कि ठीक दरार पार करते वक्त कन्धे से लुढक गये। अब्दुल्ला : लुढ़क गये? नियामत : और क्या ? दरिया की तरफ लुढ़क गये । अब्दुल्ला : (आतकित) यानी कि "लुढ़क ही गये ? निपामत : मैं वक्त से संभाल नहीं लेता, तो अब तक सात टुकडों में बंटकर पानी में सात मोल निकल गये होते। अब्दुल्ला : (आश्वस्त) कह रहा है लुढक गये । जब संभाल लिया, तो लुढक कैमे गये ? लुढक जाने का मतलव तो होता है कि... केविन में जोर की ठक-ठक् । साथ गिलास टूटने की आवाज। "तू मियां अयूब को अगर छोड़ माया है बाहर, तो यहां केबिन में यह कौन आदमी है ? नियामत : केविन में एक नहीं, दो आदमी हैं । अन्दुल्ला : दो यादमी? नियामत : पण्डित और झुनझुनवाला। अब्दुल्ला : (पस्त) ये दोनो यही है अब तक ? निपामत : ताश खेल रहे हैं । फिर चलने लगता है।
अब्दुल्ला : ठहर ठहर ठहर । (उसके काफी नज़दीक आकर धीमे
स्वर में) बता ये इत्ती बड़ी-बड़ी लाशें 'इन्हें साथ लेकर
पुल कैसे पार करेंगे ?
नियामत : चलकर 'उड़कर नहीं तो डुबकी लगाकर। आ गया
समझ में ? मैं जब तक दरवाजे बन्द करता हूं, तब तक
तू इन्हें साथ लेकर...
अब्दुल्ला : (जैसे कोई अनहोनी वात कह दी गयी हो) मैं इन्हें साथ
लेकर ? (काउंटर पर लौटता हुआ) न-न-न-न-न-न-न ।
मुझे अभी बहुत काम है यहां ।
जल्दी-जल्दी अपनी चीजें संभालने लगता है।
मैं इन्हें साथ लेकर ! हः।
केविन से पण्डित की आवाज़ :
पण्डित : यहां किसीको ''सुनता नहीं क्या ? मुझे चाहिए...
एक ब्लैक एण्ड ह्वाइट 'वड़ा।
नियामत : तो?
अब्दुल्ला : (वांह खुजलाता हुआ) सवाल यह है कि..
नियामत : कि पैदायशी बुज़दिल' 'इतना बड़ा होकर भी बुज़दिल
बना रहे तो सिवा खरगोश के "उसे क्या कहा जा
सकता है ?-बस यहीं एक सवाल है। इतना ज़रा-सा ।
जाकर केविन का परदा हटा देता है। पण्डित
और झुनझुनवाला रमी के पत्ते हाथों में लिये
आमने-सामने की कुरसियों पर बैठे हैं । पण्डित
की शेरवानी और कमीज़ के आधे वटन खुले
हैं जिससे उसकी बनियान और काले डोरे का
तावीज़ बाहर नज़र आ रहे हैं। चेहरे से
लगातार हारने वाले आदमी की परेशानी
' झलकती है। झुनझुनवाला उस आदमी के
पै-१
अंदाज मे, जो मुमकराने से लेकर जुआ खेलने
तक हर काम नाप-तोल के साथ करता है,
कुरसी की पीठ से टैक लगाये पण्डित के पत्ता
चलने की राह देख रहा है। आखो मै जीतने
वाले आदमी का आत्मविश्वास है।
पण्डित : (पत्तों की जोड-तोड करता हुआ, विना नियामत की
तरफ देखे) सुन गया अब तुम्हे ? "एक लंक एण्ड
ह्वाइट 1 वड़ा।
एक पता चलता है, जिसे उठाकर झुनझुनवाला
अपने पते सोल देता है।
तुनझुनवाला : हिक्लेयर।
पण्डित : (कुछ खीझ के साथ अपने नंवर गिनता हुआ) दस सात
सनह दस सत्ताईस "सत्ताईस और पन्द्रह बयालीस ।
(पत्ते खोलता हुआ, नियामत की तरफ देखकर) नहीं सुना
अब भी?
नियामत : माफ कीजिए, साहव । बार बन्द हो गया है।
पण्डित : बन्द हो गया है ?..'क्यो ?
नियामत : क्योकि...
पण्डित : मुझे एक ही और चाहिए। आखिरी।
अब्दुल्ला
भी अब काउंटर से हटकर वहां आ
जाता है।
मन्दुल्ला : आखिरी पेग अब पुल के उस तरफ चलकर मिलेगा,
साहब !
पण्डित : क्यों ?.."उस तरफ चल कर क्यो मिलेगा?
मन्दुल्ला : क्योंकि पुल टूट गया है, बार बन्द हो गया है ।
पण्डित : क्या कहा ?.."पुल टूट गया है ?
मुनमुनषाला : (कागज पर हिसाव जोड़ता हुआ) वयालोस और एक सौ
तीरा पहले के एक सौ बहत्तर । (हल्की हंसी के साथ) कहता है पुल टूट गया है और आखिरी पेग मिलेगा पुलल के उस तरफ चलकर एक सौ बहत्तर के सत्रह वीस और दो सौ अस्सी कल तक के। कुल दो सौ सत्तानये वीरा। .. अब्दुल्ला : आपने शोर नहीं सुना था ? पण्डित : सुना तो था कुछ शोर मगर झुनझुनवाला : उससे क्या होता है ? शोर तो यहां होता ही रहता है कभी इस चीज का, कभी उस चीज का । 'दो अस्सी कग तीन सो। नियामत : वह शोर इसी चीज़ का था। सब लोग पांच मिनट में गलब खाली करके चले गये थे, सिवाय... अब्दुल्ला : मियां अयूब के...और आप लोगों के । मियां अयूब का तो खैर मुझे पता था, पर आप लोगों का नियामत : ये लोग पहले टैरेस पर थे। मैं टैरेस पर पहुंचा, तो यह लान में थे। मैं लान में आया, तो ये... पण्डित : हम हवा की वजह से जगह बदल रहे थे। वहां पत्ते उड़ जाते थे। मगर''पुल क्या सचमुच टूट गया है ? सुनशुनवाला : कुछ और वजह होगी 'पुल कैसे टूट सकता है ? अगर टूट ही गया होता सचमुच, तो लोग यहां से कसे जाते ? नियामत : पुल दर-असल अभी टूटा नहीं... अब्दुल्ला : .' 'मगर टूटने वाला है। नियामत : उस में एक जगह दरार पड़ गयी है... अब्दुल्ला : .. डेढ़ फुट बड़ी। नियामत : (अब्दुल्ला से) दरार अब तक दो फुट से भी बड़ी है चुकी है। अब्दुल्ला : (थूक निगलकर) दो फुट से भी बड़ी ?
१ नियामत : यह भी तव की बात है जब मैं अयूब साहब को छोडकर उधर में आया था। (पण्डित से) इमलिए सारा क्लब खाली करा लिया गया है। इस वस सिर्फ हमी चार आदमी हैं यहा। तभी मंच के बाहर बायी तरफ से देवल-टेनिस खेलने की आवाज मुनाई देने लगती है । अब्दुल्ला : (स्तन्ध) और ये कौन लोग हैं उपर टेबल-टेनिस रूम में? नियामत : कौन लोग हो सकते है ? मैंने अभी थोड़ी देर पहले एक- एक कमरा देख लिया था। अन्दुल्ला : देख लिया था, तो ये खेल कोन रहे है उधर ? हम लोगों के साये? नियामत गहरी नज़र मे अब्दुल्ला को देखकर उधर को चल देता है। पण्डित अपनी शेरवानी के यटन बन्द करने लगता है। झुनझुनवाला मेज़ मे कागज-ताश समेटता है। अब्दुल्ला काउंटर पर आकर अलमारी में ताला लगाने को कोशिश करता है पर बदहवासी में वह उससे लग नहीं पाता। पण्डिस : (उठता हुआ) अगर चलते-चलते एक मिल जाता न आखिरी... टेबल-टेनिम की नावाज रत जाती है। निकलने लगता है कि उघर से तेजी से आती नीरा उममे टकरा जाती हाय मे छूटकर परे जा गिरता नियामत बाहर । उसका रैकेट नीरा : दिखता नही कोई सामने से आ रहा है ?
.
झुनवाला : (एक कागज़ पर रकम लिखकर पण्डित की तरफ बढ़ाता
हुआ) दो सौ सत्तानवे रुपये वीस पैसे।
पण्डित : दो सौ कितने...?
फिर बैठकर कागज़ चैक करने लगता है।
झुनझुनवाला
सिगरेट सुलंगा लेता है। नीरा
रैकेट उठाकर उसी तेजी के साथ काउंटर के
पास आ जाती है।
नीरा : (रैकेट काउंटर पर पटककर) एक गिलास पानी ।
अब्दुल्ला : तू इस वक्त यहां क्या कर रही हैं ?
नीरा : तुझसे पानी का गिलास मांग रही हूं.. क्या कर रही है !
अब्दुल्ला : उधर और कौन था तेरे साथ टेवल-टेनिस रूम में ?
नीरा : था नहीं, श्रीं । रीता ! गुड्डो दीदी ।
अब्दुल्ला : (शब्द चवाकर) गुड्डो दीदी ! (नियामत को काउंटर
की तरफ आते देखकर) तू इधर क्या चला आ रहा है
अव ? जाकर. ले आ न उसे जल्दी से इसकी गुड्डो
दीदी को । रीता 'गुड्डो दीदी ।
नीरा : गुड्डो दीदी वहां नहीं हैं अब ।
अब्दुल्ला : वहां नहीं है अव ? तो वहां से वह
नीरा : उधर गयी हैं स्वीमिंग पूल पर ।
नियामत : (पास आकर) स्विमिंग पूल पर? पर स्विमिंग पूल का
गेट तो मैं आजकल खोलता ही नहीं।
नीरा : तभी तो रोज़ दोपहर को हम नहा लेती हैं वहां टूटी
दीवार फांदकर । (अब्दुल्ला से) तुझसे मैंने पानी का गिलास
मांगा था?
नियामत : तुम लोग रोज़ दोपहर को नहाती हो वहां ?
नीरा : रोज़ ।
नियामत : तो मैं कल से...
अन्दुल्ला : हा, कल तक यही न बैठे रहना है तुझं । अब जाकर लाना
नही है उसे "इसकी गुड्डो दीदी को ...स्विमिंग पूल से ?
नीरा : वह खुद ही आ जाएगी अभी। गीले कपडे बदलने गई है
वहा।
अन्दुल्ला : तो अब तक क्या वह गीले कपड़ों में ही...
नीरा : तुझं मतलब ? तू मुझे पानी का गिलास क्यों नहीं देता?
अब्दुल्ला : पानी-पानी का गिलाम नहीं मिल सकता इस वक्त ।
नीरा : पानी का गिलास क्यो नहीं मिल सकता?
नीरा पल-भर अब्दुल्ला को देखती रहती है,
फिर नियामत की तरफ देखती है, फिर गिलास
खुद ही खोजने लगती है।
पण्डित : मुना झुनझुनवाला पुल टूट गया है ! (हल्की हंसी
के साथ) तव तो मौका ही इपर बैठकर पीने का है।
.
नहीं?
अब्दुल्ला इस बीच ताले को ठोंक-पीटकर बन्द
करने की कोशिम करता है, पर वह नही बन्द
होता, तो उमे लटकता छोड़कर काउटर से
आगे आ जाता है।
अब्दुल्ला : मौका तो है साहब, पर पीने को कुछ नहीं है। बार बन्द
हो चुका है । आपको जो कुछ चाहिए, वह अब उधर चल
कर ही मिल सकता है।
पण्डित : मौका इघर बैठकर पीने का है, और जो कुछ पीना हो,
वह उधर चलकर ही मिल सकता है । इघर बार बन्द हो
चुका है, उधर पुल टूट गया है। वाह !
अखबार समेटकर शेरवानी के बटन बन्द करता
हुआ केबिन से बाहर आ जाता है।
पर अभी वार वन्द कहा हुआ है ? वाला ६
२२ ? लटक रहा है। नियामत : वह इस आदमी की बदहवासी की वजह से है। ऐसे व इसके होश-हवास ठीक काम नहीं करते। बन्दुल्ला खिमियाने ढंग से मुस्कराकर अपनी उंगलियां चटकाने लगता है। झुनझुनवाला : होश-हवास तो इसके किसी भी वक्त ठीक काम न करते-खास तौर ने जब इसे. घर से चिट्ठी आयी हो क्यों मन्दुल्ला अब्दुल्ला पहले से ज्यादा खिसियाना होकर अपने हाथों को देखता रहता है। कितने दिन का हो गया जब तेरा लड़का ? चार दिन : कि पांच दिन का? अब्दुल्ला : चार दिन का ही समझिए अभी । आज रात को पूरे पां दिन का होगा। पण्डित : कितनी बीवियों के बाद यह पहला लड़का हुआ है ? ती वीवियों के बाद चौथी बीवी से न ? अब्दुल्ला : (एकाएक) व्हरो... उसके स्वर की आकस्मिकता से पल-भर सव लोग स्तब्ध हो रहते हैं। कुछ हो रहा है। नियामत : तेरा मतलब है कि... अब्दुल्ला : तुझे नहीं सुन रहा? नियामत : (पल-भर सुनता रहता है) हां । लगता यही है । पण्डित : सचमुच नियामत : लगता यही है। झुनझुनवाला : तो क्या इतनी जल्दी... अब्दुल्ला : मैं कब से कह रहा था। ?
३ पल-भर सब लोग खामोश रहते हैं। दूर मे सुनायी देती हिलती चूलों की आवाज अधिक स्पष्ट होती जाती है । नीरा अचकचायी-सी एक से दूसरे की तरफ देखती रहती है। नीरा : बात क्या है ? यह आवाज़... पुल की कुछ कड़ियों के एक-साय टूटने की आवाज । इसके बाद, अनुवर्तन के अन्त तक, बीच-बीच में एक-एक कडी के टूटने और पानी में बह जाने की आवाज सुनायी देनी रहती है। रीता चेहरा हायों से ढके यब- रायी और हाफनी हुई लान की तरफ में आती रोता : होह ! मोह ! ओह । नीरा : गुड्डो दीदी। दौड़कर उसकी तरफ आती है, पर रीता उसके पास से गुजरकर आगे आ जाती है । पण्डित और झुनझुनवाला केविन से उठ आते है। नीरा, जैसे कुछ भी ममा पाने में असमयं भौंचकी-सी उन सबके बीच लोट आती है। रीता : ओह! हाय हटाकर उन मवको देखती है और एक बार सिहरकर चेहरा फिर हाथो से ढक लेती है। नोरा : (बांह खीचकर उसका हाय चेहरे से हटाती हुई) क्या बात है, गुड्डो दीदी? बताती क्यों नहीं ? रीता : (किसी तरह बात कह सकने की कोशिश में वही आदमी ...और उसके साथ वह औरत" २४- • अब्दुल्ला : क्या? : नियामत : कौन आदमी ?... कौन औरत ? पण्डित : क्या हुआ उनका ? झुनझुनवाला : कहां पर? रीता : वहीं.. वे दोनों थे वहां पर । अब्दुल्ला : वहाँ 'पुल पर ? कौन ? रीता सिर हिलाती है। रीता : वे दोनों थे वहां पर मैं स्विमिंग पूल से लौट रही थी। अब्दुल्ला : लेकिन कौन ? पण्डित : आदमी कौन था ? रोता : वही वह मिस्टर शफी का दोस्त... अब्दुल्ला : मिस्टर अयूब ? चुभती नज़र से नियामत को देखता है । नियामत : वह नहीं हो सकता । उसे तो मैं बहुत पहले उस पार छोड़ आया था। रीता : हां, वही । और उसके साथ वह औरत... अब्दुल्ला : उसके साथ औरत ? झुनझुनवाला : वात तो सुनने दो। औरत... पण्डित : औरत ! झुनझुनवाला : उसके साथ ? नियामत : पर हुआ क्या उनका ? रीता : वे दोनों थे वहां पुल पर ''जब पुल एकाएक हिलने लगा 'बुरी तरह हिलने लगा मैं स्विमिंग पूल से लौट रही थी... नीरा : पुल हिलने लगा ? रीता : और जब पुल टूटाः" रीता : हां, एक : .. - २५ . तीन . नीरा : पुल टूट गया ? रोता : पूरा नहीं; पर किसी भी वक्त पूरा टूट सकता है । नीरा : जरा देखें... रीता को लिये-लिये उसी ओर जाती है, जिधर से रीता आई थी। पण्डित : तव तो जरूर डर की बात है। क्यो अब्दुल्ला ! कम से कम तेरे लिए तो है ही। क्योकि किसी भी वक्त पुल पूरा टूट सकता है। अब्दुल्ला : क्यों, सिर्फ मेरे लिए क्यों? पण्डित : क्योंकि तुझे अपने लडके को देखने जाना है। यहा कोई देखने को है, न दिखाने को। उम पार पहुंच गए, तो वहा पडे रहेगे। न पहुचे, तो यहा भी कुछ बुरा नहीं है । अच्छा-खासा वार है। अगर ज्यादा नही, तो दस- बीस दिन बैठकर पीने का सामान तो मिल ही जाएगा। अब्दुल्ला : (अलमारी पर नजर डालकर) दस-बीस दिन ? नही, सामान तो यहा इतना है कि " (सहसा रुककर) पर मैं भी क्या बात सोवने लगा? दस-बीस दिन हम लोग यहा थोड़े ही न पडे रहेगे? हा, इस बात का अफसोस जरूर है कि इतना सामान जो हम लोगो ने अभी-अभी मंगवाया था—यह सोचकर कि सीजन में काफी बिक्री होगी-वह सब ज्यों का त्यो पड़ा रहेगा। न जाने कितने दिन । शफी साहब का यह पहला साल है ठेके का, और अगर इसी साल उन्हें घाटा उठाना पड़ा, तो"तो अगले साल फिर अपने पर वही बेकारी आ जाएगी । चार साल वेकार रहने के बाद इस साल शफी साहब की मेहरवानी से यह नौकरी मिली थी-अब आगे इसका भी पता नहीं कि रहेगी या नही।
-
पण्डित : तेरी एक बड़ी खूबी है अब्दुल्ला कि तू दूर की बात पहले
सोचता है, और नज़दीक की बाद में।
नझुनवाला : वल्कि कहना चाहिए कि नज़दीक की बात तो ये कभी
सोचता नहीं । क्यों अब्दुल्ला, पुल के दो तस्ते निकल गये,
तो तुझे पूरा पुल टूटता नज़र आने लगा। एक दिन के
लिए वार वन्द हो गया, तो उससे शफी को घाटा भी
पड़ गया, और तुझे अगले साल की वेकारी भी सूझने
लगी।
अब्दुल्ला : मेरा दिल कमज़ोर है, इसलिए हाथ की मेहनत नहीं कर
सकता साहब । जो कुछ आसरा है, वह वस नौकरी का
ही है-और वह भी बारमैन की। ज़िन्दगी में और कोई
काम, कोई हुनर नहीं सीखा-पच्चीस साल से सव यही
काम करता आ रहा हूं। एक बार पहले भी इसी क्लव
में वारमैन था, जव इसी तरह वाढ़ आयी थी। उस साल
जो
कुछ यहां हुआ, वह अगर आपको बताने लगू, तो...
नियामत : तुझे वह किस्सा फिर से शुरू करना है, तो मैं बाहर से
ताला लगाकर जा रहा हूं। तू यहां इत्मीनान से बैठकर
किस्सा सुना। साथ इन्हें ब्लैक एण्ड ह्वाइट की बोतल भी
खोल दे।
-
अब्दुल्ला : ब्लैक एण्ड ह्वाइट की वोतल ! हंह ! पहले ही मेरा ब्लैक
एण्ड ह्वाइट का हिसाव मेल नहीं खा रहा । अभी जाकर
शफी साहब को आज का हिसाब दूंगा, तो इसकी डांट
और खानी पड़ेगी ।"ठहर, हिताब की कापी मैंने यहीं
दराज़ में डाल दी है। वह तो मुझे साथ ले जानी चाहिए।
जल्दी से जाकर दराज खोलता है।
यह रही कापी, और यह... (अचानक पण्डित की तरफ
देखकर) अरे ! आपके विल का पेमेंट तो अभी हुआ ही
नहो ।
कुछ
स्वेटर को जेब टटोलकर उममे से एक विल
निकालता है।
यह आपका विल है-तेरह रपये कुछ पैने का।
नियामत विल उसमे लेकर पण्डित को देता है।
नियामत : बिल तेरह रुपये कुछ
पैसे का नहीं, सत्रह रुपये पैसे
का है।
अदुल्ला : सवह या तेरह जितने का भी है, जल्दी से इसका पेमेंट
कर दें। (कापी निकालकर उसमें काट-छांट करता हुआ)
मैं भी कहूं कि हिमाव में इतना फर्क कैसे पड़ रहा है ।
पण्डित : (विल लेकर) फर्ज कर डग वक्त इतने पैसे मेरी जेब में
न हों।
मदुल्ला : आपकी जेव में, और पैसे न हो. यह कैसे हो सकता
।
पण्डित : जब और इतना कुछ हो सकता है, एक अच्छा-खासा पुल
टूट सकता है, तो यही क्यो नही हो सकता?
नियामत : (चिडकर अब्दुल्ला से) अब खामसाह वक्त क्यों बरवाद
कर रहा है ? विल का पेमेंट वाद में नहीं हो सकता ?
उघर पहुंचकर नहीं हो सकता?
पण्डित : क्यों हो सकता है न उधर पहुचकर ? तो बस अभी चल
रहे हैं.."एक मिनट में।
शेरवानी की सलवटें निकालता हुआ
वरामदे
® की तरफ चल देता है।
नियामत : देखिए मिस्टर पण्डित..
पण्डित : कहा है न अभी एक मिनट में चल रहे हैं। बस अब आ
ही रहे हैं जरा उधर गुसलखाने तक होकर । आओ
झुनझुनवाला, तुम भी हल्के हो लो......
हल्के से मुस्कराकर दोनों की तरफ देखता है
'और
झुनझुनवाला के साथ वरामदे के वायीं
तरफ से निकल जाता है। .
नियामत : वस अव आ ही रहे हैं जरा उधर गुसलखाने तक होकर !
जैसे यही गुसलखाना एक गुसलखाना है, और गुसलखाना
मिलेगा इन्हें कहीं पर? (अब्दुल्ला की तरफ देखकर)
और तुझे क्या माठ मार गया है, इस तरह खड़ा है जैसे
किसी ने जिस्म से सारी हवा निकाल दी हो
अब्दुल्ला : मैं सोच रहा हूं कि...
नियामत : सोच रहा है कि लड़के को देखने किस दिन पहुंच सकेगा?
एक तू ही तो है जिसके लड़का हुआ है । और लोगों के
भला लड़के-बच्चे होते हैं ?
अब्दुल्ला : नहीं, मैं इस वक्त लड़के की वात नहीं सोच रहा कैश
की वात सोच रहा हूं।
नियामत : इस विल का पेमेंट अभी नहीं हुआ, बस इसीसे मरा जा
रहा है ?
.
अब्दुल्ला : नहीं, इसके पेमेंट की ही बात नहीं है वात यह है कि
जो विल मैंने इसे दिया है, वह मुझे लगता है कि इसका
विल नहीं है। इसका विल यह है (स्वेटर की दूसरी
जेब से एक और बिल निकालकर) तेरह रुपये सत्रह पैसे
का। अभी यहां खडे-खड़े मुझे याद आया कि तेरह रुपये
सत्रह पैसे का विल मैंने अपनी बायीं जेब में डाला था,
दायीं जेब में नहीं। अब मुझेयह समझ नहीं आ रहा
कि जो दायीं जेब से निकला है, वह किसका विल है।
नियामत : तेरे साय हमेशा यही होता है, यह कोई आज नयी बात
नहीं है। हर वार तनखाह कटने की नौवत आती है, हर
वार वास्ते देकर माफियां मांगता है, पर हाल तेरा फिर
२६
भी वही का वही रहता है । अमी परसो जो घपला किया
था, उसीकी वजह से तो शफी साहब ने तुझे श्रीनगर
जाने की छुट्टी नहीं दी।
इसी बीच नीरा और रीता बाहर से आती
हैं, अपने वीच कुछ बातें करती हुई।
अन्बुल्ला : पर बता अव में इसमें क्या कर सकता हू ? वोतलो का
हिसाब ठीक रखता हूं, तो किसी न किसी बिल में गड़बड़
हो जाती है। विलो का हिसाव ठीक रखता हूं, तो वोतलो
की नाप-जोख में फर्क पड़ जाता है । (दराज से एक
पोस्टकार्ड निकालकर) इन्हीं सब उलझनो में घर से
आयी चिट्ठी का जवाब भी अब तक नहीं दे पाया। वे
लोग वहा न जाने क्या सोच रहे होंगे ! कि कैसा आदमी
है-खुशखबरी पाकर मिलने आना तो दूर, चिट्ठी की
पहुंच तक का पता इसमे नही दिया गया।
नीरा : अब इमे घर की याद सताने लगी!
तू
पानी का गिलास
देगा या नहीं? कब से माग रही हूं।
अन्दुल्ला : अव कुछ नहीं मिलेगा। गिलाम भी अलमारी में बद
किए जा चुके है।
निपामत : (पास आकर) तू इमसे झकझक करना बाद में, पहले मुझे
कोहली साहब का नम्बर माग दे ।
नीरा : क्यों.."डंडी का नंवर तुझे किसलिए चाहिए ? उनसे तुझे
क्या बात करनी है ?
नियामत : मुझे उनसे कहना है कि वे खुद यहा तशरीफ ले आएं,
और तुझे आकर यहा से ले जाएं।
नीरा : क्यो, डंडी क्यो मुझे आकर ले जायें ? मैं जब अपने पैरों
चलकर यहा आ सकती हूं, तो उसी तरह चलकर यहां से
जा नही सकती? सुन रहा है अन्दुल्ला' 'गिलास निकाल
कर पानी दे।
पण्डित इस बीच आता है और लाउंज की
एक कुरसी पर पसरकर अपना अखवार खोल
लेता है। फिर जेब से सिगरेटकेस निकालकर
देखता है कि उसमें कोई भी सिगरेट नहीं है।
झुनझुनवाला भी आता है और दूसरी आराम
कुर्ती पर पैर फैलाकर लेट-सा जाता है, वेखबर
सा, जैसे उसे नींद आ रही हो ।
पण्डित : अब्दुल्ला, गिलास निकालने के लिए अलमारी खोले, तो
उसमें से मेरे लिए गोल्ड फ्लैक का एक पैकेट भी निकाल
लेना । बड़ा वाला।
अब्दुल्ला : (थोड़ा झुंझलाकर) मैंने आपसे कह नहीं दिया मिस्टर
पण्डित, कि आपको जो कुछ भी चाहिए, वह अब उधर
चलकर ही मिल सकता है। छोटा वाला हो या बड़ा
।
वाला।
पण्डित : अच्छा रहने दे। नाराज़ क्यों होता है ?
माचिस की तीलियां जलाता-बुझाता हुआ
अखबार पड़ने लगता है।
अब्दुल्ला : (अब्दुल्ला का हाय अलमारी की तरफ चला जाता
है) इसे इस वक्त पानी के गिलास की पड़ी है, जबकि
इतने लोग यहां सिर्फ इत्तीकी वजह से अटके हुए हैं।
पण्डित : अब्दुल्ला, अगर गिलास निकाले, तो पैकेट भी जरूर
निकाल लेना, हां।
नियामत : (अब्दुल्ला से) दे इसे पानी का गिलास, नहीं तो वाद में
यह प्यासी ही दरिया में गोते खाती नजर जाएगी।
मैं तव तक पुल की तरफ देख आऊ.." वह अयूब
साहब"
फिर बरामदे की तरफ चल देता है। अब्दुल्ला
त्योरी के साथ अलमारी सोलकर उममे मे
गिलास निकालता है, और पानी भरकर उसे
गुस्से मे काउटर पर रखता है।
अब्दुल्ला : यह ले पानी..
पण्डित : (अखबार में मिर उठाकर ) अब्दुल्ला, सिगरेट का
पैकेट ।
अब्दुल्ला : ओह ! मिगरेट का पैकेट ।
फिर में अलमारी सोलार उममे मे पैकेट
निकाल लेता है।
यह रहा आपका पैकेट पर इमके पैसे...
पण्डित : पैसे तुझे बिल के माय ही वमूल हो जाएगे । जहां सवह
रपये कुछ पैसे हैं, वहा साय ढाई रुपये और जोड लेना।
मन्दुल्ला : (कुछ हडबड़ाहट के साथ जेवें और दराज टटोलता हुआ)
बिल के साथ पर हा 'देखिए बात यह है कि वह
जो विल है न... दूसरा विल निकालकर देखता है, पर
कुछ
सोचकर उसे फिर जेब में रख लेता है) पर, यह
वात इस वक्त नहीं, बाद में करने की है। ये पैमे अगर
आप"खर में इन्हें बिल में ही जोड देता हूं।
बिल फिर से निकालकर उसपर मिल से
लिखने लगता है ।
पण्डित : (उठकर उसकी तरफ आता हुआ) बिल तो तेरा मेरे
पास है । यह तू किसके दिल में परो जोड रहा है ?
अग्दुल्ला : मैंने आपसे कहा है न "यह बात मैं आपसे बाद में
करूंगा । अभी, बाहर चलकर । इस वक्त पहले मैं...
नीरा इस बीच दोनों को देखती रहती है।
फिर अचानक वहां से चल देती है ।
२ नीरा : अरे दीदी, उन लोगों का क्या हुआ? वे लोग अब तक इधर आए नहीं अन्दुल्ला : ओ लड़कियो ! तुम यहीं रहो, तुम अब कहां जा रही हो ? हम सब अब वाहर चल रहे हैं। नीरा : अभी आ रहे हैं । आओ दीदी' 'कहीं वो वह तो नहीं गये ? पण्डित पैकेट खोलकर सिगरेट सुलगा लेता है। एक क्षण गुड्डो को गौर से जाते देखता है। नीरा और रीता (गुड्डो) चली जाती हैं। पण्डित : यह बड़ी वाली लड़की वही गुड्डो है न''वह लड़की...? अब्दुल्ला : (अलमारी बन्द करके ताला लगाता हुआ) कौन लड़की ? (ताला अचानक वन्द हो जाने से) लो, अव देखो कैसे अपने-आप ही लग गया ! पण्डित : (कश खींचकर) वहो-मिस रीता दीवान-जिसने, सुना है, कल तुम्हारे उस आदमी को पीटने में कसर नहीं उठा रखी थी-क्या नाम है उसका- करके किसी और के साथ आया है ? अन्दुल्ला : पीटा होगा, मुझे कुछ मालूम नहीं। पण्डित : तुझे सव मालूम है । शफी ने मुझे खुद बताया था कि तू इस बात से इतना धवरा गया था कि तेरे हाथ से ब्रांडी की वोतल गिरते-गिरते मुश्किल से संभली थी। अब्दुल्ला : शफी साहब की बस यही आदत मुझे पसन्द नहीं । मुझे तो मना कर देंगे कि किसीसे वात न करूं, और खुद हर- एक से बात करते फिरेंगे। मुझसे उन्होंने कसम खिला- कर कहा था कि... पण्डित : यह वात किसीसे नहीं कहनी है, यही न? मुझसे भी प.-२ -वह जो अभी पुल पार ,
उसने कसम खिलाकर यही कहा था। वह बता रहा था
कि उस आदमी ने उसका नाम क्या है, मैं भूल रहा
अन्दुल्ला : मुहम्मद अयूब अयूब साहब।
पण्डित : हां, कि अयूब ने गुमलखाने के बाहर गुड्डो का हाथ
पकड़ लिया और कहा कि...
अब्दुल्ला इशारे से उसे वात करने से रोकता
है। नीरा पहले ही की तरह जल्दी से बरामदे
से आती है।
नीरा : (आती हुई) मेरा रैकेट यहां तो नही रहा ? हा, यही
तो है।
रकेट उठाकर फिर चलने को होती है।
अन्दुल्ला : नीरा!
नीरा : (रुककर) क्या बात है ?
अब्दुल्ला : तुझसे कह दिया है न कि यव तुझे उघर नहीं जाना है ?
अपनी गुड्डो दीदी को भी ले मा। सब लोग अभी बाहर
चल रहे हैं । आज के लिए क्लव वन्द हो गया है।
नीरा : बन्द कैसे हो गया है ? क्लब कभी इस वक्त भी बन्द
होता है ?
अब्दुल्ला : ऐसे बात कर रही है जैसे तुझे कुछ मालूम ही नहीं...
कुछ सुना ही नहीं"वह भी नहीं सुना जो तेरी गुड्डो
दीदी सुद कह रही थी "हद है ! यह इतनी थैफिक्र बन
रही है ! अयूब माहव और औरत कहा है ?
नीरा : वही वाहर होंगे"मैंने नहीं देखा."
मन्दुल्ला : पुल पूरा टूट गया है क्या? तूने पुल तो देखा ? नहीं ?
नोरा : टूट भी गया हो तो इसमें इतना घबराने की क्या बात
है ? बरे हेढ-दो फुट की दरार पडी है"वस, चार-पाच
फुट तक तो आदमी कूदकर ही पार कर सकता है।
पण्डित : पर यह आदमी पार नहीं कर सकता । इसका नाम
अब्दुल्ला है । यह दुनिया का सबसे बुजदिल आदमी है ।
अब्दुल्ला : आप लड़की से मज़ाक कर रहे हैं, मिस्टर पण्डित । यह
वक्त मज़ाक करने का नहीं है।
पण्डित : तू बुज़दिल आदमी है, यह तेरे ख्याल में मजाक की बात
है ? (नीरा से) अच्छा, तुम बताओ बेटे, यह आदमी
चेहरे से ही बुज़दिल नज़र नहीं आता ?
अब्दुल्ला : यह वहुत बुरी बात है, मिस्टर पण्डित ! इस तरह एक .
बच्चे के सामने आप...
नीरा : वच्चे के सामने से तुम्हारा मतलव ? वच्चा यहां कौन
है ? मैं ? मैं बच्चा नहीं हूं।
अब्दुल्ला : नहीं, तू वच्चा नहीं है, मैं बच्चा हूं। यह तो ठीक है ?
नीरा : मुझसे इस तरह बात करने की ज़रूरत नहीं।''तू वच्चा
नहीं, मैं बच्चा हूं ! तेरा ख्याल है मैं हम तरह की बात
समझती नहीं?
अब्दुल्ला : (हल्की हंसी के साथ) तू सव तरह की बात समझती
है । मैंने कहा है कि तू नहीं समझती ? (पुचकारने के
स्वर में) अच्छा, तो अव अच्छी लड़की वनकर यहीं
खड़ी रह, तेरी गुड्डो दीदी भी घूम-फिरकर यहीं आ
जायगी, इस वक्त अकेले और जाएगी कहां !
नीरा : (फिर वहां से चलती हुई) मैं अच्छी लड़की नहीं हूं."
सुन लिया तूने ? मैं बिल्कुल भी अच्छी लड़की नहीं
1. अच्छी लड़की बनकर यहीं खड़ी. रह: "क्यों खड़ी
-
..
-
रहूं मैं ?
वरामदे में पहुंचकर फिर एक बार मुड़कर
उसकी तरफ देखती है।
६ देख लिया कितनी अच्छी लड़की हूं मैं ? बायी तरफ से चली जाती है। अन्दुल्ला मुंह में कुछ बडबड़ाता हुआ काउटर से आगे आने लगता है कि तभी टेलीफोन की घण्टी वज उठती है। घण्टी मुनकर झुनझुनवाला भी नीद से जैसे जागता है, और झोक में उठकर फिर वायरूम की ओर चला जाता है। अब्दुल्ला : (जाकर रिसीवर उठाता हुआ) यह पाचवी दफा शफी साहब का फोन आया है। (रिमीवर में) हलो. शफी साहब ?. 'वया ? "कौन ?.."मिसेज हल्दवानी ?.. यहां की मेम्बरशिप फीस ?.."आज यहा की मेम्बरशिप फीस कुछ नही है । "मैं कौन है ? .. मैं कोई नही हू... जी, मैं क्लव में कुछ भी काम नहीं करता, आप कल फोन कीजिएगा। (झटके से रिसीवर रखकर) कहती है बम्बई से आयी हूं. मेम्बर बनना चाहती हूं। वस आज ही तो एक दिन है जिस दिन इसे मेम्बर बनना है। टेलीफोन से हटकर आते हुए एकाएक जैसे कुछ सुनने के लिए रुक जाता है। यह आवाज पहले से ऊंची नही हो गयी? पण्डित: कौन-सी आवाज ? अन्दुस्ता : दरिया के पानी की। पण्डित : तेरे वहम का भी कोई इलाज नहीं । अव और कुछ नही, तो दरिया की आवाज ही तुझे ऊंची सुनायी देने लगी। अग्दुल्ला : वहम की बात नहीं है, आप ज़रा ठीक से मुनिए । मुझे लगता है कि दोनों दरियानों में पानी बढ़ रहा है । मैं दोनो की आवाजें अलग-अलग सुन सरता हूं। (लान के
३६
:
पार टैरेस की तरफ इशारा करके) यह लिद्दर की
आवाज़ है, और (खिड़की की तरफ इशारा करके)
यह आवाज़ शेषनाग की है। मैं इन आवाजों से अच्छी
तरह वाकिफ हूं क्योंकि "क्योंकि आपको पता है मुझे
दिल का दौरा कब से पड़ना शुरू हुआ है ?
पण्डित : मेरा तो ख्याल है कि पैदा होने के दिन से पड़ना शुरू हो
गया होगा।
अब्दुल्ला : नहीं साहब, मुझे दौरा पड़ना शुरू हुआ है तबसे जब
पहले भी इसी तरह एक बार बाढ़ में यहां फंस गया था।
तव क्लब का ठेका एक किश्तवारी के पास था, और
मैं इसी तरह यहां वारमैन था । बाढ़ में क्लव के अन्दर
चार आदमी फंसे रह गए थे-ठेकेदार, मैं और दो वैरे।
इधर से लिद्दर का पानी यहां बरामदे तक आ गया था,
और उधर से शेपनाग के पानी ने आधी गैलरी तोड़ दी
थी। हम लोगों ने रसद का सामान साथ लेकर पूरी रात
तव इस हाल की छत पर काटी थी। पानी जिस तरह
वढ़ रहा था उससे लगता था कि घण्टे दो घण्टे के अन्दर
वह हमारे सिरों के ऊपर से होकर बहने लगेगा । उफ् !
वह रात और उसके बाद आज की शाम ---मुझझे तब
से इस छत की तरफ आंख उठाकर देखा भी नहीं जाता।
मुझे दिल का पहला दौरा उसी रात छत पर लेटे-लेटे
पड़ा था।
पण्डित : खैर, आज तुझे दिल का दौरा नहीं पड़ेगा क्योंकि उससे
पहले ही हम लोग तुझे लेकर क्लव से बाहर पहुंच
जाएंगे।
अब्दुल्ला : वह तो ठीक है साहब, मगर कहने की बात सिर्फ इतनी
।
है कि...
नियामत घबराया हुआ बरामदे की तरफ से
आता है।
नियामत : (पाम आकर अब्दुल्ला से) पता है अब और क्या हुआ
अब्दुल्ता : क्या हुआ है?
नियामत : बस कुछ पूछ नही ।
दायी तरफ गैलरी के दरवाजे से जाने लगता
है।
अब्दुल्ला : (घबराए हुए स्वर में) आखिर कुछ बनाएगा भी कि
क्या हुआ है?
नियामत : (जाते-जाते) अयूब माहब सचमुच फिर पुल पार करके
अन्दर चले आये हैं अपनी बेगम को साथ लेकर ! मैं
तो मजाक समझ रहा था “पुल के पार छोडकर आया
था उन्हें...
अब्दुल्ला : अपनी वेगम को साथ लेकर ! उनको बेगम इस वक्त
यहा क्या करने आई हैं ? मच-मच बता...
नियामत : यकीन नहीं है तो खुद आकर देख ले.. गुड्डो ठीक यह
रही थी "वह आ गया है । मैं उधर, उस तरफ भी देख
लूं.""क्या हाल है। शायद दरार..... अब निकलना
मुश्किल होगा।
परेशान-सा चला जाता है।
पण्डित : इसका मतलब है कि पुल से आने-जाने में कोई खास
दिक्कत नहीं है।
अब्दुल्ला : हम यहा से उम पार जाएंगे या उम पार में आनेवालों
के लिए यहा रकेंगे? यह भी कोई बात हुई ! हम उपर
जाने की तैयारी में हैं, लोग इधर आ रहे हैं !
पण्डित : लेकिन हम लोग चलेंगे तो तभी न जब वे दोनों
३८
लड़कियां आ जाएंगी, अयूब साहब और उनकी बेगम आ
जाएंगी और जव नियामत आकर तुझे उधर की खबर
देगा ? तब तक तू जल्दी से मुझे एक पेग डाल दे।
अब्दुल्ला : ठहरिए ज़रा गौर से सुनिए । सुन रहे हैं ?
पण्डित : क्या?
अब्दुल्ला : वही दरिया की आवाज़ । ऐसा नहीं लगता जैसे कोई
बड़े-बड़े पत्थरों को
पहाड़
से नीचे ढकेल रहा हो?
पण्डित : मुझे ऐसा कुछ नहीं लग रहा । पानी की आवाज है-
वैसी ही जैसी हमेशा सुनायी देती है।
अब्दुल्ला : हमेशा यह आवाज़ ऐसी सुनाई देती है ?
पण्डित : दरियाओं में पानी ज्यादा होने से कुछ ऊंची सुनाई देती
होगी-बस इतना ही फर्क है ।
अब्दुल्ला : इतना ही फर्क है ? पर आप शायद इस फर्क को नहीं
समझ सकते। आपने वह रात मेरी तरह यहां काटी होती,
तो आप भी इस फर्क को समझ सकते थे। मुझे लगता है
कि अब और यहां रुकना खतरे से खाली नहीं है।
पण्डित : तो तू चाहता क्या है ? तू अभी कहे, अभी यहां से चल
अब्दुल्ला : चल तो दें पर वे दोनों लड़कियां ? और वो अयूब
साहब और उनकी वेगम । इन सबको छोड़कर कैसे जाया
जा सकता है ? आप थोड़ी देर यहीं ठहरें, मैं अभी सबको
जमा करके लाता हूं। (चलते-चलते) पर आप तब तक
यहीं ठहरेंगे। कहीं जाएंगे नहीं. मैं अभी आ रहा हूं-
बाहर सब लोग साथ-साथ चलेंगे। ठीक है न ?
पण्डित : हां, ठीक है। मैं तेरे आने तक यहीं हूं-तू फिक्र मत
कर।
अब्दुल्ला बरामदे में पहुंचकर फिर एक वार
-
AU U पीछे की तरफ देख लेता है। अनुल्ला : बस, मैं अभी आ ही रहा हूं। वायी तरफ से चला जाता है। पण्डित अपना छोडा हुआ अखबार फिर से उठाकर काउंटर पर कुहनी रसे उसमें से समाचार पढने लगता पण्डित : आदमी अन्तरिक्ष में एक सौ नब्बे घण्टे पचपन मिनट । अन्तरिक्ष में आदमी की उडान के चार नये रिकार्ड।.. चढ़ती कीमतों को नीचे लाना असम्भव । वित्त मन्त्री की नयी कर-योजना।.. उत्तर प्रदेश के वैधानिक संकट के 'सम्बन्ध में अभी कोई निर्णय नहीं । "दो-दो रुपये के नये नोट .. चीफ कमिश्नर का धयान-नल के पानी के कीड़े नुकसानदेह नही। इम बीच पीछे लान में अयूब की दुबली-मी आकृति नजर आती है। जमा-जमाकर पर रखता हुआ बरामदा पार करके वह हाल में आता है । वह चौवीस-पच्चीस साल का नव- युवक है-चेहरे की हड्डिया निकली हुई हैं। गहरे रंग का सूट पहने है। टाई और कालर मुचड रहे हैं। हाय में ह्विस्की का आधा खाली गिलास है जिममें से वह अन्दर आकर एक हल्का-सा घूठ भरता है । वात करते हुए हर वक्त उसकी आवाज से नशे का अमर झलकता है। अपूर्व : (पण्डित के पास पहुंचकर) क्या कह रहे हो क्या नुक- सानदेह नहीं? पण्डित चौककर उमकी तरफ देखता है और .
! अखवार तह करने लगता है। पण्डित : नल के पानी के कीड़े। चीफ कमिश्नर का यह कहना है। अयूब : वेचारा चीफ कमिश्नर ! और वेचारे कीड़े ! (एक और चूंट भरकर) अब्दुल्ला यहां नहीं है ? पण्डित : यहीं है, अभी आ रहा है। तो नियामत आपको नहीं मिला... अयूब : यह मैं कैसे कह सकता हूं कि वह मुझे नहीं मिला । या मिला था तो कब मिला था. मिलना होगा तो फिर मिल जाएगा.. और एक बात और । मेरा ख्याल है, मैं उम्र में तुमसे काफी छोटा हूं। पण्डित : हो सकता है। कम-से-कम देखने में तो ऐसा ही लगता .. अयूब : तो आप-वाप मत करो। आज तक किसीने मुझे आप करके नहीं बुलाया । सिवाय नौकरों के । सुनने में अजीब- सा लगता है। पण्डित : तो तुम तुम्हें कुछ देर पहले नियामत पुल के पार छोड़- कर आया था और तुम अभी-अभी फिर पुल पार करके अन्दर आए हो? अयूब : अभी-अभी नहीं। थोड़ी देर पहले। यही दस-बीस मिनट एक आदमी को यहां देखना था। डाक्टर को। पण्डित : डाक्टर को देखना था ? इस वक्त ? यहां, ? अयूव : और नहीं तो मैं लौटकर क्यों आता ? उसीको देखने लिए आधे क्लब का चक्कर लगा आया हूं। इधर के र टेरेस, सब कोर्ट, मैंने देख लिये हैं । पर वह नहीं मिल मिला सिर्फ यह ह्विस्की का गिलास-आधा पिया हुद गिलास में से फिर पूंट भर लेता है। पण्डित : पर डाक्टर तो शायद यहां चार-पांच बजे के वा - ।
आया ही नहीं। कम-से-कम मैंने उसे नहीं देखा।
अयूब : यही नियामत भी कहता था-कि वह नहीं आया । पर
मैंने सोचा कि अब आये हो हैं, तो एक बार देख तो लेना ही
चाहिए। पर डाक्टर तो डाक्टर, और भी कोई आदमजाद
कहीं आसपास नजर नहीं आया । नजर आये कुछ ताश के
विखरे हुए पत्ते, कुछ मूगफली के छिलके, कुछ चूरा हुए
वेफर्ज, कुछ मपली हुई प्लास्टिक की यलिया, और यह
गिलास । इनके अलावा एक फिमले हुए पाव का निशान
है, और एक संडल का वायां पर। आदमी सब कितने
डरपोक होते हैं ! नहीं ?
पण्डित : नियामत कह रहा था कि कोई और भी शायद तुम्हारे
साय पुल पार करके आया है ।
अयूव : आया है ? आया नही, आयी है। और आने-आने में ही
अभी दरिया में गिर गयो होती।
पण्डित : दरिया में गिर गयी होती? पर कौन थी वह जो...?
अयूव : थी नहीं, है । वह मेरी बीवी है सलमा आज मुझे यहीं
उमे डाक्टर में मिलाना था।
पण्डित : पर अगर टूटा पुल पार करने में सचमुच उतरा था,
नो
ऐसे में उसे पार कराना ''यह बहुत जरूरी या क्या?
अयब : खतरा-अतरा कुछ नहीं था। मैं एक छलाग मे उम तरफ
से इस तरफ आ गया था। पर बेगम वैचारी डर रही
थी, इमलिए ऐसा हुआ। कहा न, डाक्टर में उसे मिलाना
:
था)
पण्डित : डाक्टर से मिलाना था! कुछ तबियत खराब है ?
अपूर : नहीं, कुछ रिश्ते पराब हैं। मेरे और मेरी बीवी के...
हमें कुछ गहरी वा डाक्टर ने करनी थी। डाक्टर मेरी
बीवी का वचपन का दोस्त है."अब समझे कुछ तुम ?
४२ न । पण्डित : शायद नहीं। • अयूब : समझने की ज़रूरत भी नहीं होनी चाहिए। मियां-बीवी के रिश्ते में किसी तीसरे को पड़ना भी नहीं चाहिए. पण्डित : लेकिन तुम तो खुद डाक्टर को बीच में डाल रहे हो। डाक्टर को सिर्फ तुम्हारी वेगम जानती हैं या तुम भी... अयूब : (चूंट भरकर) जानने और जानने में भी फर्क होता है। नहीं ? डाक्टर को जितना मेरी बीवी जानती है उतना शायद यहां और कोई नहीं जानता । यों डाक्टर और मैं-हम दोनों एक मोहल्ले में रहे हैं, एक कालेज में पढ़े हैं और एक ही खैर छोड़ो। यह मसला तुम्हारी समझ में नहीं आएगा आना भी नहीं चाहिए... अब्दुल्ला बड़बड़ाता हुआ वरामदे से आता है, और सीधा टेलीफोन की तरफ बढ़ता है। पण्डित उसे देखकर अपनी बात बीच में ही छोड़ देता है। अब्दुल्ला : किसीको किसी चीज़ की फिक्र नहीं । अपनी जान की भी फिक्र नहीं। अव उनमें से एक का तो कहीं पता ही नहीं चल रहा है। न वह कार्ड रूम में है, न टेवल-टेनिस रूम में, और न ही स्विमिंग पूल पर । कब से कह रहा हूं कि यह वक्त किसी तरह जान-बचाकर यहां से निकल चलने का है। पर कोई सुनता ही नहीं। अयूब : क्यों अब्दुल्ला. क्या बात है ? इतना परेशान क्यों हो रहा है? अब्दुल्ला : (अचकचाकर) आप आप साहब ? तो उस वक्त नियामत आपको पुल के पार छोड़कर नहीं आया था ? आप फिर... अयूव : वह मुझे छोड़ आया था। पर एक बार पार जाकर आदमी फिर वापस नहीं आ सकता क्या? अब्दुल्ला : जी हां, वापस आने के लिए इसमे अच्छा वक्त और कोन सा हो सकता था ! (जाकर रिसीवर उठाने लगता है, रिसीवर उठाकर) हलो एक्मज -मुझे ग्रीटू वन चाहिए-हलो हलो हलो-ग्री टू वन नहीं, यो वन टू चाहिए-ग्री, वन, टू--स्का हुआ है ? (रिसीवर रख- कर) अब यह नंवर ही नहीं मिलने का। पण्डित : तू किमे फोन कर रहा था ? अब्दुल्ला : शफी साहब को, और किने करूगा? पण्डित : नंदर मिल जाय, तो जरा मुझे भी देना। मुझे भी उममें एक बात करनी है। अब्दुल्ला : आपको भी इमी वक्त बात करनी है ! इसके बाद भला कभी बात करने का वक्त मिलेगा? अपूब : मिया अब्दुल्ला, तू मुफा किम वात पर हो रहा है ? दै जब तू खफा होता है, तो तेरे चेहरे पर मजद-मी रौनकः या जाती है । योर जब वह रौनक आ जाती है, तो तू पफा नहीं जान पड़ता। सर, शफी मे पूछ लेना कि यगर डाक्टर वहां उसके पाम हो, तो एक बात उने वता दे। कह दे कि हम दोनों यहां पहुंच गये हैं, और उसका इंतहार कर रहे हैं। मदुल्ला : कह दूं कि आप और आपको वेगम यहां डाक्टर का इंत- जार कर रहे हैं ? और इस तरह हाक्टर को और यहा बुला लू? अयूब : डाक्टर को हमने यहां मिलने का वक्त दे रसा था। योर हमारा मिलना बहुत जरूरी है "ययोकि अंगम नीम- बेहोगा-मी वाहर पोटिको में पड़ी है... अगदुल्ला : (टेलीफोन के पास में हटकर आता हुआ) येगम
-
बेहोश-सी वाहर पोटिको में पड़ो हैं ? और यह बात
आप इतने इत्मीनान से मुझे बता रहे हैं ?
'अयूब : इस तरह घबराने की ज़रूरत नहीं। बाहर नियामत
उसकी देखभाल कर रहा है।
अब्दुल्ला : यह वात आपको पहले ही मुझे नहीं बतानी चाहिए थी ?
अयूब : पहले कव ? तुझे देखने से भी पहले ?
अन्दुल्ला : मिस्टर पण्डित, आप ज़रा टेलीफोन का ख्याल रखें। हो
सकता है शफी साहब का, या मिस्टर सोमनाथ का कोई
फोन आए । मैं तव तक ज़रा वाहर देखकर आता हूं।
दायीं तरफ से चला जाता है।
अयूव : (पण्डित से) एक सिगरेट दोगे ?
पण्डित सिगरेट का पैकेट उसकी तरफ बढ़ा
देता है । अयूब एक सिगरेट लेकर सुलगाने
की कोशिश करता है, पर दो-तीन तीलियां
जला चुकने पर भी सिगरेट सुलगने में नहीं
आता।
अयूब : (हाथ की तीली तोड़कर) या तो तीलियों में आग नहीं
रही, या शायद अपने में ही खींचने का दम नहीं रहा ।
पण्डित : (अपना सिगरेट सुलगाने की कोशिश करता हुआ) हवा
में नमी बढ़ जाने से हमेशा यही होता है । कई-कई
तीलियां वेकार चली जाती हैं, और मुंह से एक कश
धुआं नहीं निकलता। तुम्हारा ख्याल है तुम्हारी वीवी
की तबियत कुछ ज्यादा खराब है ?
अयूव : लो, इस वार सुलग गया। हमेशा तभी सुलगता है जब
आदमी हिम्मत हारने लगता है।''तुम कुछ कह रहे
थे ?
पण्डित : मैं तुम्हारी बीवी के वारे में पूछ रहा था कि क्या
४५
उनकी तबियत ज्यादा सराव है ?
अयूब , उसको तबियत उतनी खराव नही है जितना वह डर गयी
है । डर गयी है क्योकि उसका पाव फिसल गया था ।
अगर किसी तरह संभल न जाती, तो हो सकता था
पण्डित : हा, तुमने बताया था कि वह दरिया मे गिरते-गिरते बची
अयूव : अब मैं सोच सकता है कि वह क्यो इतना डर गयी है।
वह डाक्टर को शायद फेस नहीं करना चाहती।
पण्डित : फेस नही करना चाहती?
अयूब : इस बात को छोडो । क्या तुम सोच सकते हो कि मियां-
बीवी के रिश्तो के बीच अगर कोई छाया भी आ जाए,
तो क्या में क्या हो सकता है गलत मत समझना...
मेरी बीवी की जिंदगी मे और कोई नहीं है, पर मेरे लिए
वह एक कब्रिस्तान बन गई है. औरत कब्रिस्तान क्यो
बन जाती है?
पण्डित : क्यों बन जाती है ! शायद उसके भीतर कुछ मर जाता
अयूब : लेकिन क्यो मर जाता है ?
पण्डित : इसके लिए हर आदमी की अपनी अलग वजह हो सकती
है। उसकी अपनी वजह होगी।
अयूब : हां, वह तो होगी ही।"शफी बता रहा था कि कलकत्ते
मे तुम्हारा ऊन का कारखाना है ?
पण्डित : हां, है तो मही। पर उसका इस बात से क्या ताल्लुक
अयूब : ताल्लुक यह है कि तुम सिर्फ ऊन का काम कर सकते
हो। आदमी के अकेले रहने की बात नहीं समझ
सकते । "हर आदमी की अपनी अलग वजह हो सकती
है, पर हर आदमी के उस वजह तक पहुंचने की भी तो
कोई वजह होती है।
पण्डित : हूं।''कौन कह रहा था कि कल आते हुए तुम्हारी कार
की कहीं टक्कर-अक्कर हुई थी ?
अयूब : टक्कर नहीं हुई थी। सड़क टूटी थी, इसलिए गाड़ी
धचका खाकर एक पत्थर से जा टकरायी थी। क्यों?
पण्डित : और, कि घर में सख्त लड़ाई-झगड़ा हुआ था, इसीलिए
तुम गाड़ी लेकर आधी रात को श्रीनगर से निकल पड़े
थे ?
अयूव : तो इसका मतलब है कि शफी तुम्हें ये सब बातें बताता
रहा है । वह सचमुच बहुत डरपोक आदमी है।
पण्डित : डरपोक ! क्यों ?
अयूब : सिर्फ डरपोक आदमी ही इस तरह हर बात के लिए
गवाह जुटाता रहता है। वह डरपोक न होता, तो तुम्हें
मेरे वारे में और मुझे तुम्हारे बारे में इतनी बातें न
बताता । (गिलास पण्डित की तरफ बढ़ाकर) तुम लोगे
थोड़ी-सी?
पण्डित : नहीं, अभी नहीं।
अयूब : ओ ! तुम शायद जूठी शराव पीना पसन्द नहीं
करते । “तुम मेरे घर के लड़ाई-झगड़े का जिक्र क्यों कर
रहे थे?
पण्डित : इसलिए कि तुमने खुद इसका ज़िक्र मुझसे किया था 'तुम
अपनी बीवी की वात मुझसे कर रहे थे । नहीं ?
अयूब : मैं अपनी बीवी की वात तुमसे कर रहा था. कौन-सी
वात ?
पण्डित : यही-औरत के कब्रिस्तान बन जाने की बात' 'शफी
४७
यह
भी
कह रहा था कि उसे डर है कि कही...
अयूब : कि कहीं मेरी बीवी खुदकगी न कर बैठे ? (हंसकर)
यह बात उमने एक वार होले मे मुझसे कही थी। तब
मुझे लगा था कि यह वह इसलिए कह रहा है कि शायद
मेरी बीवी को मुझसे पिण्ड छुडाने का यही एक रास्ता
नज़र आता है । लेकिन शफी मेरा दोस्त है, और भला
आदमी भी है। इसलिए उसने बहुत हौले से यह बात
मुझसे कही थी मेरे साथ दोस्ती निभाने के माथ-साथ
वह अपनी भलमनसाहत को भी खतरे में नहीं डालना
चाहता । (एक घूट मे गिलाम खाली करके) और वह
जानता है कि मैं भला आदमी नहीं है ।
गिलाम को काउंटर पर लुढका देता है जिसमे
वह काउंटर के अन्दर की तरफ गिरकर टूट
जाता है।
पर तुम जो वात कह रहे थे, मैं उमीको लेकर पूछना
हूं—यह नही हो सकता कि आदमी शिद्दत मे मोचने
का आदी हो, इसीलिए उसका घर में लड़ाई-झगडा हो ?
इसीलिए वह सामने के गड्ढे को न देख सके, और उसकी
गाड़ी एक पत्थर से जा टकराए ?
पण्डित : और उसका हाथ एक गिलास को भी ठीक में न रख
सके, जिससे वह दूसरी तरफ गिरकर टूट जाए।
अयूब : मैं गिलास की कीमत अदा कर सकता हूं, उसकी तुम
फिक्र मत करो।
पल भर खामोश रहकर का पीचता रहता
। फिर लाउंज में तिपाई की तरफ जाकर
उसपर रखी ऐशट्रे में अपना सिगरेट बुझा
देता है।
: तुम एक काम कर सकते हो ? पण्डित : वताओ। अयूब : खिड़की से यह देख सकते हो-कि वह अब तक यहीं है, या ये लोग उसे बाहर छोड़ आए हैं ? पण्डित : किसे-तुम्हारी बीवी को ? अयूब : हां, उसीको। पण्डित : तुम खुद खिड़की तक जाकर क्यों नहीं देखना चाहते ? अयूव : यह मैं भी नहीं जानता कि मैं खुद जाकर क्यों नहीं देखना चाहता। पण्डित : यह इसलिए नहीं कि तुम मन में कहीं अपने को गुनाहगार महसूस करते हो? अयूव : गुनाहगार? किस चीज़ का गुनाहगार पण्डित : उसे साथ लाने का। अयूब : मैं नहीं जानता । लेकिन मुझे अफसोस ज़रूर है। अगर डाक्टर उसे यहां मिल जाता, तो मुझे अफसोस न होता। पर अब मुझे लगता है कि... अब्दुल्ला पहले से भी घबराया हुआ दायीं तरफ से नाता है, और सीधा काउंटर की तरफ जाने लगता है। अब्दुल्ला : मैं ही हूं जो हरएक की वात सुन लेता हूं। पर मेरी बात-मेरी वात कोई नहीं सुनता । कोई तब तक नहीं सुनने का जब तक कि पानी सिर से ही... (जवान काट- कर) एक तो मेरी यह काली ज़वान नहीं रहती। कितना अपने को टोकू कि ऐसी बात मुंह से न निकालूं, पर बात निकलेगी, तो बस ऐसी ही। पण्डित : ध्यान से जाना, उधर कांच के टुकड़े विखरे हैं । अब्दुल्ला : (अलमारी की तरफ देखकर) कांच के टुकड़े ? कांच के
टुकड़े कर के खिर९:
पति : कन भी बिखर गए-तू व मंमार साहले
मी तू यह पिनी चाल है कि ने किया पर
:
अब्दुल्ला पैर मालदा हुआ कार केले
जाकर जल्दी से जलमारी खोए है. और
उसमें से दांडी की बोर और कnिe
निकालता है।
अन्दुत्ला : कहा नहीं था मैंने आपसे कि पानी को मार देर हो
जा रही है ? पर आपका रूपाल पाकिर मेरा र
है मेरे कान अपने अन्दर से ही ऐसी द्वारा सुगरहे
हैं। अब चलकर देख लीजिए न कि दोनो दरित ITE
में मिल रहे हैं या नहीं-यह आवार रोज इस तरह
सुनायी देती है ?
गिलास में थोड़ी-सो ग्रांडी डालता है। फिर
उसमें से थोड़ी वापस बोतल में आता है।
पण्डित : यह ग्राडी किसके लिए ले जा रहा है ?
अब्दुल्ला : अयूब साहब की बेगम के लिए।
पण्डित : उनकी तबियत सचमुच ज्यादा पराय है क्या ?
मन्दुल्ला : (गिलास लिए काउंटर मे आगे आता हुआ) राम गुगो
पता नहीं । मह बात या अल्लाह मियो जानता है, या
नियामत मियां । एक तरफ मुझसे कह रहा है कि जल्दी
से उनके लिए वाडी ले था और दूसरी तरफ मह रहा
है कि...
सिर हिलाकर सुप कर जाता है।
पण्डित : क्यों, चुप क्यो कर गया ?
अम्दुल्ला : क्योंकि दूसरी तरफ के बाद एक तीमरी तरफ भी है, और
..
तीसरी तरफ का ख्याल रखना सवसे ज़रूरी है। दायीं तरफ से जाने लगता है। दायीं तरफ से चला जाता है । अयूव इस बीच लाउंज के सोफे पर आ बैठता है। पण्डित काउंटर के पास स्टूल पर बैठकर पल भर ब्रांडी की खुली वोतल को हल्के-हल्के हिलाता रहता है । पण्डित : (अयूब से) तुम अपनी बीवी को देखने नहीं जाओगे ? सोच क्या रहे हो ? अयूब : (सिर उठाकर) मैं ?.. मैं कुछ भी नहीं सोच रहा। पण्डित : तुम बाहर जाकर उसे देखना भी नहीं चाहते ? अयूव : नहीं, अभी नहीं।... देखो, तुम यहां से डाक्टर को फोन कर सकते हो? पण्डित : (दूसरा सिगरेट सुलगाता हुआ) पर डाक्टर की डिस्पें- सरी में तो फोन है ही नहीं । न ही उसके क्वार्टर में है। अयूब : और कहीं फोन कर सकते हो ? पण्डित : यह तुम खामखाह की वात नहीं सोच रहे ? अयूब : हां, है तो खामखाह की बात ।... पर मुश्किल यह है... कि आदमी ज्यादातर "खामखाह की बातें ही सोचता है। फर्क इतना है कि मैं अपनी तरह से सोचता तुम अपनी तरह तरह से सोचते हो .. और जो समझता है कि वह नहीं सोचता "वह खामखाह अपने को धोखा देता . है। पण्डित : (बोतल हाथ में लेकर) यह कौन-सा लेबल है ? एक्शा नंवर वन ! बहुत गर्म ब्रांडी होती है । नहीं ? अयूब : हां, वहुत गर्म होती है. अगर आदमी पी ले, तव । तुम्हारा मन है तो क्यों नहीं थोड़ी-सी गिलास में डाल लेते ?
पण्डित : वह आदमी यहा नही है। अब्दुल्ला। वह यहा होता,
तो.
अयूब : (हल्के से हंसकर) यह भी सामयाह की बात नहीं है ?
(उठकर उधर आता हुआ) लाओ, मैं तुम्हें डाल देता
हू
वह अभी काउंटर के पास नहीं पहुंचता कि
टेलिफोन को घण्टी बज उठती है। पण्डित
जाकर रिसीवर उठाता है । अयूब तब तक
जाकर उसकी जगह स्टूल पर बैठ जाता है
और वोतल हाथ में ले लेता है
पण्डित : (रिसीवर में) हलो..... कौन बोल रहा है ?
पाफी ? ...मिस्टर मोमनाथ ?... हा-हा, यही है.''जरा
बाहर गया है।"वह और
अब्दुल्ला
दोनो हाल में नहीं
है।... मैं पण्डित योल रहा हू"वस शुत्रिया 'जी नहीं,
तीन-चार और लोग भी है .."हा, वह भी यही है.'' यस
अव चलने को ही हैं.."जरा इसलिए रक गए थे कि...
मिस्टर अयूब डाक्टर को खोज रहे थे। मैं फोन करने
ही वाला था. हां.."अगर किसी तरह आप डाक्टर को
सवर भिजवा दें.. क्या"हा.. क्या? सेफ नहीं है ?...
किसने, एक्स० ई० एन० ने कहा है ?...कि कोई भी पुल
पर न जाए? तो कब तक इन लोगो को यहा...?... आप
फिर फोन करेंगे? कितनी देर में ? "हां, मैं ख्याल
रखंगा । आप जरा जल्दी ही पता दें।"नहीनही-नही,
मेरे यहां रहते आपको फिक्र करने की ज़रूरत नहीं।"
हां, ठीक है।""ठीक है।"ठीक है । अच्छा । (रिमीवर
रखकर) इन लोगो ने पुल पर से जाने की मनाही कर दी
है
तीसरी तरफ का ख्याल रखना सबसे ज़रूरी है।
दायीं तरफ से जाने लगता है। दायीं तरफ
से चला जाता है। अयूब इस वीच लाउंज के
सोफे पर आ बैठता है। पण्डित काउंटर के
पास स्टूल पर बैठकर पल भर ब्रांडी को खुली
वोतल को हल्के-हल्के हिलाता रहता है ।
पण्डित : (अयूब से) तुम अपनी बीवी को देखने नहीं जाओगे ?
सोच क्या रहे हो ?
अयूव : (सिर उठाकर) मैं ?.."मैं कुछ भी नहीं सोच रहा।
पण्डित : तुम बाहर जाकर उसे देखना भी नहीं चाहते ?
अयूव : नहीं, अभी नहीं।'' देखो, तुम यहां से डाक्टर को फोन
कर सकते हो ?
पण्डित : (दूसरा सिगरेट सुलगाता हुआ) पर डाक्टर की डिस्पें-
सरी में तो फोन है ही नहीं । न ही उसके क्वार्टर में है।
अयूब : और कहीं फोन कर सकते हो ?
पण्डित : यह तुम खामखाह की बात नहीं सोच रहे ?
अयूव : हां, है तो खामखाह की वात ।... पर मुश्किल यह है...
कि आदमी ज्यादातर' 'खामखाह की बातें ही सोचता
है। फर्क इतना है कि मैं अपनी तरह से सोचता हूं.
तुम अपनी तरह से सोचते हो .''और जो समझता है
कि वह नहीं सोचता' 'वह खामखाह अपने को धोखा देता
Y
है।
पण्डित : (वोतल हाथ में लेकर) यह कौन-सा लेबल है ? एक्श
नंबर वन ! बहुत गर्म बांडी होती है । नहीं ?
अयूव : हां, वहुत गर्म होती है। अगर आदमी पी ले, तव
तुम्हारा मन है तो क्यों नहीं थोड़ी-सी गिलास में डा
लेते ?
५१ पण्डित : वह आदमी यहा नहीं है। अब्दुल्ला। वह यहा होता, तो... अयूब : (हल्के-से हंसकर) यह भी खामखाह की बात नहीं है (उठकर उधर आता हुआ) लाओ, मैं तुम्हें डाल देता हूं ..... दोनों हाल में नहीं वह सभी काउंटर के पास नहीं पहुचता कि टेलिफोन को घण्टी बज उठती है। पण्डित जाकर रिसीवर उठाता है। अयूब तब तक जाकर उसकी जगह स्टूल पर बैठ जाता है और बोतल हाथ में ले लेता है। पण्डित : (रिसीवर में) हलो...." कौन बोल रहा है ? शफी ? ...मिस्टर मोमनाय ?... हा-हां, यही है.. जरा वाहर गया है। वह और अब्दुल्ला हैं।" मैं पण्डित बोल रहा हूँ."वस शुक्रिया "जी नही, तीन-चार और लोग भी है ''हां, वह भी यही है... वस अव चलने को ही हैं। ज़रा इसलिए रुक गए थे कि... मिस्टर अयूब डाक्टर को खोज रहे थे। मैं फोन करने ही वाला था. हां.. अगर किसी तरह आप डाक्टर को खवर भिजवा दें"क्या."हा.' 'क्या ? सेफ नही है ?... किसने, एक्स० ई० एन० ने कहा है ? ...कि कोई भी पुल पर न जाए? तो क्ब तक इन लोगों को यहा..?.. आप फिर फोन करेंगे? कितनी देर मे ?.."हां, मैं ख्यात रगा। आप जरा जल्दी ही पता दें।"नही नहीं-नही, मेरे यहां रहते आपको फिक्र करने की जरूरत नहीं।" हा, ठीक है ।""ठीक है।"ठीक है । अच्छा । (रिसीवर रखकर) इन लोगों ने पुल पर से जाने की मनाही कर दी है
पण्डित :
अयूब : राख झाड़ दो 'नहीं तो कपड़ों पर गिर जाएगी।
पण्डित हाथ के सिगरेट को देखता है। पर
उसकी लम्बी राख झाड़ने से पहले ही उसकी
शेरवानी पर गिर जाती है।
देखा. गिर गयी न!
(शेरवानी से राख झाड़ता हुआ) तुम क्या समझते हो...
डेढ़-दो घण्टे में पुल ठीक किया जा सकता है ? मिस्टर
सोमनाथ कह रहे हैं कि एक्स० ई० एन० अभी मजदूर
लगा रहा है "उसने अपना आदमी गांव में मजदूर जमा
करने भेजा है।
अयूब : तुम जानते हो यहां का एक्स० ई० एन० कौन है ? ...,
मिरजा ! ...वी० के० मिरजा। उसे हमेशा पुल तुड़वाने
का काम दिया जाता है। 'पुल वनवाने का नहीं।
पण्डित : पर मिस्टर सोमनाथ कह रहे हैं कि...
अयूब : मिस्टर सोमनाथ । 'ह-हा ! मिस्टर सोमनाथ का
मिनिस्ट्री में खासा हत्या न होता, तो वे आज जेल में
होते । 'मिस्टर सोमनाथ ।
पण्डित : तो तुम्हारा मतलब है कि...
अयूव : (गिलास में ब्रांडी डालता हुआ) ब्रांडी पियो थोड़ी-सी
... मेरा मतलव कुछ नहीं है।
पण्डित : ठहरो, मैं पहले जाकर इन लोगों को बता दूं. अब्दुल्ला
और नियामत को। (चलते हुए) ये लोग इतनी देर से
जाने वाहर क्या कर रहे हैं !
दायीं तरफ से जाने लगता है।
अयूब : सुनो।
पण्डित हल्की त्योरी के साथ उसकी तरफ
देखता है।
यह ब्रांडी मैंने तुम्हारे लिए डाली है। पण्डित कुछ कहने को होता है, पर जैसे अपनी वात चबाकर बाहर निकल जाता है । अपूब स्टूल से उठकर लाउंज के बीचोबीच आ जाता टेलीफोन को घण्टी फिर बज उठती है। यह गिलास से एक घूट भरकर उसे तिपाई पर गत देता है, और जाकर रिमीवर उठा लेता ... अयूब : (रिसीवर में) हलो हा-हां हलो हा-हां हूं, यही पर हूं... सतरा ? पतरा कोई नही है..कौन ? डाक्टर ?... वह वही है ? ... तुम्हारे पास .... हा हा, आयी है। वह भी यही है क्या? वह आना चाहता था?.... तो उससे कहो न, अब भी आ जाय' आरगर अच्छे नहीं हैं"नहीं हैं, तो क्या हुआ? वह आना चाहे तो क्या ? किसका ख्याल ?...अपना?... दूसरो का? दूसरा इस वक्त यहां कोई नहीं है... सहसा उसको नजर बरामदे से आती गुडो पर पड़ती है । गुड्डो के चेहरे और हाव- भाव मे वह ताजगी है जो तरने के बाद शरीर में आ जाती है। उसके कपडे बिलकुल नयी तरज के हैं, पर भीगने से उनकी फ्रीज मर चुकी है। बाल फटे हुए हैं, पर चेहरे पर सिवाय हल्की लिपिस्टिक के कोई भी मेक- अप नहीं है । यह अपना पसं हिलाती हुई हाल में आकर कुछ परेशानी के माय घर-घर देसती है।
रीता : नीरू ओ नीरू । अयूब : (रिसीवर में) 'मतलब उन लोगों में से कोई नहीं है... जिनका तुम जिक्र कर रहे हो। और कौन है ? आवाज़ (हल्के से हंसकर). आवाजें बहुत धोखा दे सकती हैं । तो भी ? 'तो भी कुछ नहीं 'वस खास बात कुछ नहीं हुई, तो मैं खुद तुम्हें फोन कर लूंगा 'वाई- वाई। लगता है दूसरी तरफ से अभी कुछ और कहा जा रहा था जब वह बीच में ही रिसीवर रख देता है। रीता : (पास आती हुई) यहां किसीने उस लड़की को तो नहीं देखा.. नीरा को? अयूव : यह नीरा कौन है ? वही छोटी-सी लड़की जो कल.: रीता : (सहसा अयूब को पहचानकर) आप "तुम यहां और कोई आदमी नहीं है ? अयूब : कई आदमी और हैं. पर वे सब बाहर हैं । (दायीं तरफ इशारा करके)वाहर पुल के पास । गुडो विना कुछ कहे उस तरफ से बाहर जाने लगती है। पर वह लड़की वहां नहीं है। गुडो पल भर के लिए ठिठक जाती है । । मेरा ख्याल है वह तो शायद यहां क्लब में ही नहीं है । रीता : (कुछ तीखी आवाज़ में) वह यहीं है । मुड़कर बरामदे की तरफ जाने लगती है। अयूव : कम-से-कम मैंने उसे नहीं देखा । पर सुनो गुड्डो रुककर तीखी नज़र से उसकी तरफ .. देखती है।
रोता: क्या बात है?
अयूब : तुम्हे शायद "मुझमे डर लग रहा है। मैं कहना चाहता
था कि अच्छा होगा."अगर"तुम...
रीता: अगर मैं...
अयूब : अगर तुम कल को "आज के साथ मिलाकर न देखो...
हो सकता है कल की वजह से...
रोता : कल का जवाब तुम्हें कल ही नहीं मिल गया था ?
अयूब : वही तो में भी कह रहा है कि कल की बात' कल के
साय थी। और जहा तक आज का सवाल है. आज के
लिए "मुझे तुमसे इतना ही कहना है कि...
रीता : आज के लिए मुझसे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है।
अगर कोशिश करोगे कहने की, तो मैं अभी बाहर चल
कर..
अयूब : वह तो खैर मुमकिन ही नही 'मतलब बाहर चल
सकना । "क्योकि अभी-अभी अब्दुल्ला कह गया था कि
फिलहाल किमीको भी उधर न आने दिया जाए।
रीता : (रुककर) क्यों ? अब्दुल्ला कौन है हमें रोकने वाला ?
...और तुम कौन हो मुझमे यह कहने वाले ?
अयूय : मैं कौन हूं? कोई भी आदमी कौन है, यह क्या वह कभी
ठीक से बता सकता है?
रोता : तुम्हारा मतलब?
अयूब : मतलव हर आदमी अलग-अलग वान और अलग-अलग
जगह पर अलग-अलग आदमी होता है। किमी एक
वक्त और किसी एक जगह पर वह कौन है, क्या यह
वह आसानी से बता सकता है ?
रौता : (तुनककर) मुझमें इस तरह की बातें करने की जरूरत
नहीं। मुझे लगता है कि कल जो तुम्हारे साय हुमा.."
और होने को था, वह तुम्हें अब तक याद नहीं रहा । अयूब : मैं वही तो कह रहा पा कि मैं आज अपने बारे में कुछ भी कहूं, तुम मुझे वही आदमी समझोगी जिसे तुमने कल एक खास वक्त पर, एक खास शक्ल में देखा था। वहर- हाल, तुम शायद किसीको खोजती हुई यहां आयी थीं। यह नीरा वही छोटी-सी. लड़की है न जो कल बैडमिंटन 'कोर्ट में ऊधम मचा रही थी ? मेरा ख्याल है वह यहां क्लब में नहीं है। रीता : वह यहीं है । अभी थोड़ी देर पहले तक मेरे साथ थी। अयूब : यह नीरा किसकी लड़की है ? रोता : क्यों ? कोहली साहब की... अयूव : ये वही कोहली साहव है न जिसका ऊपर एक मन्दिर भी है? रीता : हां, वही। अयूव : और जो रोज़ क्लब में आकर मंदिर के चढ़ावें की शराब पीता है। रीता : (मस्ती से देखकर) यह मैं नहीं जानती। अयूब : (पीछे से) खैर छोड़ो, तुम्हें पता है कि यहां से बाहर जाने का पुल टूट गया है ? रोता : हां, मुझे पता है, उसमें दो-ढाई फुट की दरार पड़ गयी है। अयूब : यह खवर पहले की है । नयी खबर यह है कि पुल पर आने-जाने की बिलकुल मनाही हो गयी है । रीता : यह तुमसे किसने कहा है ? अयूब : टूरिस्ट अफसर मिस्टर सोमनाथ ने ! अभी थोड़ी दे पहले। टेलीफोन पर। रीता : क्या कहा है उन्होंने ?
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। . - पर वह विगड़ खड़ी हुई, और गुस्से में वहां से भाग गयी । मेरा ख्यालं था, भागकर वह इधर आयी होगी, पर.. अयूब : ना. 'इधर वह नहीं आयी। कम-से-कम मेरे सामने नहीं आयी। रीता : यह अभी की ही तो वात है. पांच-दस मिनट पहले की। अव एक तो अंधेरा उतर रहा है, और ऊपर से फिर वारिश के आसार नज़र आ रहे हैं । इस आधे मील के टापू में कहीं उलटी-सीधी तरफ निकल गयी तो और मुसीबत खड़ी होगी। बरामदे की तरफ जाती है । रीता दायीं तरफ से चली जाती है। अयूब उससे को होता है, पर अपने को रोक लेता है। ब्रांडी की वोतल से एक बूंट भरकर वह लाउंज के वीचोंबीच आ जाता है । दो-एक मैगज़ीनें उठाता है और उन्हें वापस रख देता है। फिर पल-भर खिड़की की तरफ देखता कुछ कहने रहता है। अयूव : फिर वही उतरती हुई रात और वही आवाजें—झींगुरों, झिल्लियों और मेढकों की। वही एक आदम-सी दहशत, वही अकेलापन और वही अपने-आपसे सामना ! (टेली- फोन के पास जाकर उसके रिसीवर को हल्के-से छेड़ता हुआ) क्या चाहता हूं ? किसीसे वात करना ? पर किसीसे वात करना ही तो नहीं चाहता ? (टेलीफोन के पास से हटकर) तो क्या चाहता हूं ? इस तरह यहां अकेले खड़े रहना ? बाहर की तरफ देखते जाना ? (सिर को हल्के से झटका देकर) कुछ समझ में नहीं
को हो
आता । कुछ समझ मे नही आता कि क्या चाहता हूं-
खास तौर से जब रात उतरती है, ये आवाजें सुनाई देती
हैं, तो क्यों इतना छटपटाने लगता हूं?
धीरे-धीरे आकर तिपाई पर बैठ जाता है ।
परसो रात भी एक ऐसी ही छटपटाहट के बाद वह सब
हुआ था। अब्बाजान और दूसरे लोगों को ख्याल होगा
कि मैं अपने हिस्से के लिए लड रहा हू, जमीन-जायदाद
और रुपये-पैसे के लिए चखचख कर रहा हूं-मगर
क्या मैं उनमे से किसीको भी समझा सकता था कि मैं
उन सबसे अलग होकर क्यो रहना चाहता हूं? ये परसो
शाम को सुनी हुई आवाजें ही थी और परसों शाम
नहीं, उससे पहले हर शाम को मुनी हुई
आवाजें जिन्होंने यह सोचने के लिए मुझे मजबूर कर
दिया था कि जो जिन्दगी मैं जी रहा हू, वह मेरी अपनी
जिन्दगी नही है-मैं चाहे जितने साल उसे ढोता रहूं,
फिर भी कभी उसे अपना नही सकूगा ।
सोचता-सा तिपाई से उठकर टहलने लगता है।
कहने को सब कुछ है-घर है, बीवी है, दो बच्चे हैं,
फिर भी मैं जानता हूं कि यह सारा ताना-बाना एक न
चाहते मन के चारों तरफ वुना गया है, हालांकि वुनने
वाले सिर्फ दूसरे ही नहीं है, मैं भी हूं। बल्कि जब कभी
ताना-बाना ढीला होता नजर आया, मैंने खुद उसमे और
धागे वुने हैं, खुद अपने को उन धागों मे और जकड़ लेना
चाहा है, और इसीसे मन की छटपटाहट और बढनी
गयी है।
टहलता हुआ केविन की तरफ से होकर
काउंटर के पाम आ जाता है।
-
इस वक्त यहां मैं क्यों हूं? यहां से बाहर जाकर भी फिर लौट क्यों आया हूं ? क्या सिर्फ इसीलिए नहीं कि...? नहीं, इस बात का सामना मैं नहीं कर सकता। क्या सचमुच मैं इतना छोटा, इतना ओछा हूं कि मैंने...? पर असलियत क्या यही नहीं है ? क्या सलमा को साथ ले आने का सीधा-सा मतलब एक बार डाक्टर की आंखों में आंखें डालकर देखने की चाह नहीं थी? क्या मैंने यही नहीं चाहा था कि एक वार मुस्कराकर डाक्टर से पूछ सकू -'कहो डाक्टर, क्या हालचाल है ? मेरे यह पूछने का मतलब सिर्फ वही समझ सकता था या मैं ! क्योंकि सलमा से शादी करने के बाद डाक्टर से यह मेरी पहली मुलाकात होती । डाक्टर अपनी बीवी सकीना को पाकर खुश नहीं हो सका-उसी तरह जैसे मैं सलमा से शादी करके । सिर्फ वह अपना खोल बनाये रखना चाहता है-उसका शायद ख्याल है कि उसका खोल किसीको नज़र नहीं आएगा। पर किसका खोल किसे नजर नहीं आता ? सब एक-दूसरे के खोल से वाकिफ हैं, एक-दूसरे का खोल उतरते देखना चाहते हैं---मगर अपना खोल बनाए रखते हुए। क्योंकि सिर्फ एक ही खोल है-अपना-जोकि लगता है किसी तरह निभाया जा सकता है---कुछ और दूर तक, और दूर तक । (ब्रांडी का एक और धूंट भरके हल्की- तुर्श हंसी के साथ) और कल का वह हादसा ! क्या समझा होगा इन लोगों ने कि कितना खबीस हूं मैं ! राह चलते एक नावाकिफ लड़की का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचना-इससे बड़ी हिमाकत क्या हो सकती थी ? पर क्या सचमुच वह हादसा शराब के नशे में ही हुआ फिर कुछ !
लाता
पासा हिशोगस लाप
ऐसा नहीरिया मा भिसे श्रीन
मुझे चलोल होना पड़े ! जिससे किसी भीnt
पहुंचे और ये लोग भाग TILEntr. It ime
गिसे ये मनामे मा भादसेतो"
सभीटरेसकी भोरगे भागोजी
रोता : गुड्यो दीदी ! गुटो बोकी | ial on FRE
उफ."
अयूय : यह यही ती जिसे गुरुपयोग रही
गुष्यों को प्रोग रही है (यो hotu
हुआ) ओलीमा नाम rt 1
मीरा पार कर ली
है, और ream iit in
भाग ari
भी लरकी किधर जा रही है
yant
था। गुन नहीं रही औ... RK
मुत
प्लान में गहरी गा
चला जगासन m
है। यादमागरमा
गर गुनायी देसाना है।
बंधेरा गमग गा.
फोन की की x amitLITar
यरने के बाद दीवार*1741
कैमोmentary
डाली।
रीता : कितनी फिजूल की कोशिश कर रहे हैं ये लोग-कि जैसे पत्थर रखने से अब भी किसी तरह टूटते पुल को संभाला जा सकता है। (अपनी खाली कलाई पर नज़र डाल- कर) पता नहीं क्या वजा होगा । 'बड़ी ममी को पता चलेगा कि उनकी घड़ी आज मुझसे खो गयी है, तो आधी रात तक न वे खुद सोएंगी, न किसी और को सोने देंगी। (कलाई को उंगली और अंगूठे की चूड़ी में लेकर) पर पता तो उन्हें तव चलेगा न जव जव हम वाहर पहुंच सकें । लगता है उस आदमी की कही बात ही सच होने जा रही हैआज रात-भर हम सबको शायद यहीं रहना पड़ेगा। (वाहर की तरफ देखकर) अंधेरा हो गया है, वारिश उतर आयी है, और नीरा जाने अब तक बाहर कहां घूम रही है ? (आसपास देख- कर) पर वह आदमी' 'वह भी तो नज़र नहीं आ रहा । कहीं ऐसा तो नहीं कि नहीं, ऐसी बात मुझे सोचनी भी नहीं चाहिए। पर शायद उससे उतनी बात करना भी ठीक नहीं था। ऐसे आदमी का कुछ भरोसा है ? बड़ी ममी अक्सर कहा करती हैं कि भीड़ में आदमी आदमी होता है, और अकेले में.. पर मैंने क्या हमेशा इस बात का मज़ाक नहीं उड़ाया है ? बिजली कौंधने से बरामदे के पार का हिस्सा वीच-बीच में पलभर के लिए चमक जाता है। वर्षा की आवाज़ पहले से तेज़ हो जाती एक तो बारिश को भी वस इसी वक्त शुरू होना था। अब मैं चाहूं भी तो जाकर उसे देख नहीं सकती। और अंधेरे में क्या पता है.. कल उस आदमी ने जो हरकत
६
AU
को यी, उसे नजर में रखते हुए "मुझे उस आदमी से
बिलकुल बात ही नहीं करनी चाहिए थी।
कुछ कदम वरामदे की तरफ जाकर लौट
आती है । तभी अब्दुल्ला वायी तरफ से सलमा
को साथ लिए हुए आता है। मलमा दरम्याने
कद की महिला है। रंग गेहुआ है । वड़ी.
घडी आखो के अलावा भी चेहरे का अपना
आकर्पण है। हल्के रग की माड़ी उसके शरीर
पर बहुत फबती है। देखने में दुबली नहीं है,
पर भारी भी नहीं कहा जा सकता। उम्र
वाइस और तेइस के बीच है। चेहरे पर
स्वाभाविक सौम्यता के अलावा विपाद की
भी हल्की छाया है । अब्दुल्ला उसका रेनकोट
उठाए हुए है।
अब्दुल्ला : (आगे आकर रेनकोट सोफे की वाह पर रखता हुआ)
यहा वैठिए-योड़ी देर और आराम करने से तवियत
ठीक हो जाएगी।
सलमा : मेरी तबियत अब पहले से काफी ठीक है।
कहती हुई हल्के कदमो से खिडकी की तरफ
चली जाती है।
अब्दुल्ला : मैं कह रहा था कि आप कुछ देर यहां वैठ जाती, तो...
सलमा : (खिड़की से बाहर देखती हुई) मैंने कहा है न, मैं ठीक
हूं-अब बैठने की ऐमी जरूरत नहीं है।
अब्दुल्ला : खर, आपकी मर्जी है । वैसे वेहतर यही था कि
रीता इस बीच उसके पास आ जाती है।
रोता : देख, अभी-अभी वह एक आदमी यहां या न...?
अब्दुल्ता : मैं अमी-अभी बाहर से आ रहा हूं। कौन आदमी यहा
६४ : था, कौन नहीं था, इसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। रीता : (तीखे स्वर में) वह आदमी अभी नहीं था यहां, जिसकी वजह से कल...? (सलमा रीता को ताकती है) अन्दुल्ला : ज़रा आहिस्ता बोलो, आहिस्ता। (दिल पर हाथ रखे हुए) तुम्हें पता नहीं मुझे दिल का दौरा पड़ता है ।... तुम्हारा मतलब मिस्टर अयूव से है ? रीता : देख, वह लड़की है न नीरा ? अब्दुल्ला : तुम अयूव साहव की बात कर रही हो, या नीरा की बात कर रही हो? रीता : मैं दोनों की बात कर रही हूं। अब्दुल्ला : दोनों की ? तो तुम्हारा मतलब है कि रीता : तू बात सुन तो सही। मैं उधर गई थी. मेरी घड़ी नहीं मिल रही थी, इस वजह से भी परेशान थी. अब्दुल्ला : अब तुम उन दोनों की वात छोड़कर अपनी बात करने लगीं। ? : रीता : (फिर तीखे स्वर में) तू बात सुनेगा भी या खामखाह टोकता ही जाएगा अब्दुल्ला : आहिस्ता । आहिस्ता । हां, बताओ, क्या बात है । रीता : नीरा उधर आई, तो मैं परेशान थी। वह इधर से झल्लाई हुई गई थी-शायद तूने ही उससे कोई बात कह दी थी। वहां आते ही मुझसे पूछने लगी कि क्या वह देखने में वच्चा नज़र आती है ? मैंने उसे जवाब नहीं दिया, तो अपने को मुझे दिखाकर और मेरा कन्धा झिंझोड़कर पूछने लगी कि क्या मैं भी उसे बच्चा समझती हूं? मैंने गुस्से में इतना कहा कि यह बात भी, जो वह पूछ रही है, यह बच्चों की-सी नहीं है ? और कि अभी चौदह की तो वह हुई नहीं, फिर अभीसे उसे अपने को बड़ी समझने का पै-४
..
:
मोम का परी आग है| इकार
खड़ी हुई, और गुने पार करती
मेरा मान पा कि वह इधर कई होगेर
आकर पता चला कि वह इसर नहीं आई।
सम्दुल्ता : पता विना बला? मिस्टर पुरते:
रोता : हां, जाने। वह जादनी जन वायरसे
इनुना बताया था कि वह सहोरिसर
किम तरफ निकल गई है।
अन्दुल्ला : फिर?
रोता : फिर क्या ? फिर मैं पोड़ी देर के शिरगई।
लौटकर आई हूं, वो न त सड़की है. अग
ही वह आदमी यहां पर है। सर से पारित कर rt
है । अब एक तो मुझे डर है कि इस आ मोर के र
में वह लड़की जाने इस परत रहा भटक रही होयो, और
दूसरे वह आदमी
सन्दुल्ला : हूं.""तो इस बस तुम मुझसे क्या पाहतो हो ?
रोता : क्या चाहती हूं ? क्ग तुम पुद नही समयते कि हम से
किसीको जाकर उन्हें देखना चाहिए?
मन्दुल्ला : हममें से किसीको ?""तुम्हारा मतलब है कि मुझे जाकर
देखना चाहिए?
रोता : अगर तुम नहीं जा सकते, तो यह रेनकोट मुझे दे दो। मैं
चली जाती हूं।
अनुल्ला : मैंने कहा है मैं नहीं जा सस्ता ? अब सो मेरे पास
फुरसत हो फुरसत है । जर तक पुल ठीक नही होना
तब तक सिवाय फुरसत के और रह ही पा गया है ।
काउंटर के अन्दर से हार स्टोर । गा।
लगता है।
६६
܀
रीता : ये लोग क्या करने की सोच रहे हैं। पुल विलकुल टू
गया है, तो उसकी जगह नया पुल बनने में तो कई दिन
कई हफ्ते लग जाएंगे।
टेलीफोन के पास जाकर रिसीवर उठा
लेती है।
टूटा है क्या ?
हलो एक्सचेंज 'हलो, हलो, हलो... (कमानी को कई
वार खटखटाकर) हलो, हलो, हलो
वाहर से पानी में किसी चीज़ के गिरने की
आवाज़ सुनाई देती है।
यह कुछ
और
सलमा : (विना मुड़कर उसकी तरफ देखे) टूटा कुछ नहीं,
नियामत ने किनारे का एक बड़ा-सा पत्थर शायद पानी में
लुढ़का दिया होगा।
रीता : (टेलीफोन की कमानी को लगातार खटखटाती हुई)
हलो एक्सचेंज 'हलो, हलो | टेलीफोन विलकुल
वेजान है। मेरा ख्याल है इसकी लाइन कट गई है।
(फिर उसी तरह खटखटाती हुई) हलो, हलो हलो
..
एक्सचेंज...
वत्तियां दो-एक वार जल्दी-जल्दी झिलमिला-
कर एकाएक गुल हो जाती हैं। अंधेरे में
सिर्फ रीता की आवाज़ सुनाई देती रहती है :
हलो एक्सचेंज' "हलो, हलो, हलो
परदा
अनुवर्तन दो
1
मच में कोई परिवर्तन नहीं है, गिवाय कि
विजली की बत्तिया गुल होने गे चार-छः जगा, यही
वढी मोमबनिया जला दी गई है। अगीटी में परिया
मुलग रही हैं : उनसरी धान में भी हल्की गंगनी है।
पुल टूट नुरा है। नेज बारिश हो रही है। पर्दा
उठता है तो अब और अगरी पत्नी मलमा ही नजर
आते हैं। पण्डित और नीरा कहीं बाहर हैं । अब्दुल्ला
और नियामत भी बाहर है। नंग बहते पानी और
चरनी तेज हवा का म्बर । अब और गलमा फायर
प्लम के पाम गुनमुन बंटे है। पोय गे अब्दुल्ला
और नियामत की आवाजें आ रही हैं।
अदुला : नियामत हो! पर पानी आ गया..
निशान्त : घर मब टूट रहा है हो"मभर के कार निकट
जात्रो...
अब : मनमदा ,हर पहा विरपुर और चीं।
मनमा : मद मदन आटी है दो मठ और ही हं...
मुमीवर की गरी अटग-उन ही नाती है। कार
टना मानानना नहीं।
अब : दुन्द्र टम बाद का अन्नंनदष्ट दृटान
१८ हाथ खींचकर पीछे क्यों हटा लिया "खुद छुटकारा चाहते हुए तुम्हें क्यों बचा लिया ? सलमा चुप रहती है। वह उठकर बाहर को ओर चल देती है। (उसका हाथ पकड़कर) कहां जा रही हो ? सलमा : जहां सचमुच अकेली हो सकू। अयूब : आदमी कभी कहीं भी अकेला नहीं हो पाता। सलमा : मुझे अपने चारों तरफ अंधेरे का ऐसा गार चाहिए जिसमें... अयूब : अंधेरे में क्या चेहरे नहीं होते ? सलमा : कैसे चेहरे? अयूव : नाज के चेहरे, कल के चेहरे 'वरसों पहले देखे और भीगे हुए चेहरे और कभी न देखे हुए चेहरे... सलमा : तुम कहना क्या चाहते हो ? अयूब : यही कि चेहरों से बचना आसान नहीं है। मन में जो ख्याल आते हैं, उन ख्यालों के भी चेहरे होते हैं । सलमा : मुझे तुम हमेशा चेहरों को लेकर मिदा कर सकते हो। खुद भी अगर मिदा हो सकते तो शायद हम एक- दूसरे के चेहरों को ज्यादा पहचान पाते. 'तुमने कल यहां उस लड़की रीता के साथ जो कुछ करने की कोशिश की वह भी तो एक चेहरा है। उसके लिए भी तुम शर्मिदा नहीं हो सकते अयूव : सिर्फ इसलिए शर्मिदा महसूस करूं कि कल जो कुछ हुमा या किया वह औरों के सामने हुा । क्यों ? औरों के सामने न हुआ होता तो तुम्हें तकलीफ न होती... सलमा : मुझे नहीं मालूम... वाहर की ओर जाती है।
अयूब : (चोखकर) तुम्हें मालूम होना चाहिए...
सलमा : (कमरे में पण्डित और झुनझुनवाला को देखकर लोट
आती है) तुम धीमे नहीं बोल सकते । यहां वो लोग
भी है।
प्रपूर : लोग 'लोग "लोग। मैं तुममे बात कर रहा हूं. लोगों
से नहीं।
..
सतमा : लेकिन और लोग भी सुन रहे हैं...
अयूब : सुन भी लें तो क्या होगा पुल टूट चुका है: "बाढ़ का
पानी बढता जा रहा है यह जगह कभी भी डूब मकती
है और हम सब मौत के मुंह में किसी भी पल समा सकते
हैं। उसके बाद कौन-सी बात कोई कहीं लेकर जा
सकेगा. सब बातें होकर भी यही खत्म हो जाएंगी."
पण्डित और झुनझुनवाला आते हैं । पण्डित
हाथ
में ताश को गड्डी है। झुनझुनवाला
हिमाव का कागज देख रहा है । एक कुत्ते के
भौंकने की आवाज आती है।
पण्डित : (सलमा से) आप हमे देखकर डर गई थी?
सलमा : नही तो "पुल टूटने के वक्त आप वही पर थे?
मुनमुनवाला : हा.."खुशकिस्मती में हम बच गए।
पण्डित : कितनी देर के लिए ? (गड्डी फेंटता है) जो वक्त वचा
है उसमें दो हाथ और हो जाएं. (वैठ जाता है)
आओ...
सब वैठ जाते हैं । बाढ़ को आवाज, शहतीरें
टूटने और बहने की आवाज़, कुत्ते के भौंकने
की आवाज, कुछ क्षणों को भयानक खामोशी।
सलमा : (भय के बाद कुछ आश्वस्त होकर) आप लोग ताश
नहीं खेल रहे खेलिए।
झुनझुनवाला : नहीं "हम लोग ताश नहीं खेल रहे हैं।
एक क्षण की खामोशी।
पण्डित : (सलमा-अयूब को देखकर) आप लोग बात नहीं कर
रहे, कीजिए.
अयूब : नहीं, हम लोग बात नहीं कर रहे। .
पण्डित : तो?
सलमा : कुछ न करने के लिए भी तो आदमी को जगह और वक्त
चाहिए।
झुनझुनवाला : पर जगह वची कहां है । एनेक्सी आधी डूब चुकी
सब जगह पानी भर चुका है
सलमा : जगह न हो पर वक्त तो है।
अयूब : कितना?
:
पण्डित : देखता हूं (झुनझुनवाला से) आओ देख पाएं।
झुनझुनवाला : क्या ? (चलते हुए)
पण्डित : ववत ! कितना वक्त है।
उसे पकड़कर खींच ले जाता है। तभी रीता :
और नीरा आती हैं। दोनों वहस करती चली
आ रही हैं।
नीरा : मैं कहती हूं."धार में जो वहा जा रहा था वह पुतला
घा।
रीता : आदमी था।
नीता : पुतला था। आदमी था, तो उसकी चमड़ी का रंग
आदमियों जैसा क्यों नहीं था ?
रीता : आदमी था। पुतला था, तो उसके हाथ-पैर आदमियो
जैसे क्यों थे?
अयूव : आदमी और पुतला ! झगड़ा क्या है? भादमी और
पुतले में फर्क क्या होता है ?
:
रीता : आदमी और जानवर में क्या फर्क होता है ?
सलमा : आदमी के लिए जानवर और औरत में फर्क क्या होता है ?
भन्दुल्ला और नियामत भागते हुए आते हैं।
दूसरी ओर से पण्डित और झुनझुनवाला आने
अब्दुल्ला : (धवराया हुआ) अब कोई रास्ता नहीं है । या खुदा ।
पण्डिन : क्या कहा""
नियामत : पानी चारो तरफ मे घेरकर बढ़ रहा है...
सुनसुनवाला : इधर पोहे में कोई रास्ता...
नियामत: कहा का?
पण्डित : जहन्नुम का । ये जिन्दगी से भागने और जिन्दगी में घुमने
के लिए हमेशा पीछे का रास्ता ही खोजता रहा है."
मुनझुनवाला : बकवास मत करो."
अदुल्ला : (टेलीफोन बार-बार मिलाता है और रख देता है) हिश
" (फिर मिलाता है। सब चुप हो जाते हैं, फिर रख देना
है) पा गुदा ! मैं क्या कर सकता हूँ, जो होना होगा,
होगा। (फिर टेलीफोन का नम्बर मिलाकर हताश भाव
से बोलता है) या सुदा
नियामत : खुदा को टेलीफोन कर रहा है ।
अन्दुल्ला : या खुदा - (टेलीफोन का रिसीवर उनके हाथ में झूल
जाता है।
पण्डित : जुदा से बात करनी है तो झुनझुनवाला को करने दे.''
ये खुदा के यहा भी पीछे के दरवाजे में घुमने की तैयारी
बहुत दिनों से कर रहा है।
अमुल्ला : हिश..
तभी एनेक्सी टूटने की भयानक आवाज...
और रोते हुए भागते कुत्ते को आधाज। रोते
-
७२
भागते कुत्ते की आवाज़ तेज़ी से आती है और
एकाएक खत्म हो जाती है। सव पीछे की
ओर जाकर बढ़ते पानी को देखते हैं।
एनेक्सी टूट रही है।
अयूव : हां लगता तो यही है...
सलमा : कुछ किया नहीं जा सकता, उसे बचाने को ?
झुनझुनवाला : एनेक्सी को ?
पण्डित : नहीं, कुत्ते को !
सलमा : जब ज़मीन ही नहीं बचेगी, तो कुत्ते का बचाव कैसे
होगा !
नीरा : वेचारा कैसा छटपटा रहा है !
सलमा : कुछ देर में यही हश्र यहां होने वाला है ।।
झुनझुनवाला : यहां भी !
पण्डित : हां, यहां आठ-आठ कुत्ते इसी तरह छटपटाएंगे...
झुनझुनवाला : यहां कुत्ते...
रीता : हां, हम सब लोग। चल नीरा' 'मरना है तो हम अपनी
तरह मरेंगे...
नीरा को लिए हुए टेविल-टेनिस वाले कमरे में
चली जाती है।
पण्डित : कुत्ते .. मैं, तू''वह'
अयूब की तरफ इशारा करता है।
अब्दुल्ला : (जैसे अपने में डूबा हुआ है) मैंने शफी साहब से छुट्टी
मांगी थी. "नहीं दी ज़ालिम ने।
नियामत : अव फोन पर मांग ले, मिल जाएगी।
अब्दुल्ला : मैं एक वार सिर्फ एक बार अपने लड़के का मुंह तो
देख लेता । फिर चाहे जो हो जाता
नियामत : यहां का हिसाव तव कौन देखता ! अव लड़के की बात
७३ मत सोच । रमद को फिक्र कर। यहां खूराक कितनी अयूब : हा, कुछ है यहा? आपिर रात तो काटनी ही है... सलमा सुपचाप किचिन की तरफ चली जाती : . पण्डित : और मरना भी है तो सा-पीकर मरना है।''झुनझुनवाला तो भूखा मर भी नहीं पाएगा। है कुछ खाने-पीने का सामान' अब्दुल्ला : पीने का मामान बहुत है। पर खाने का दो वक्त का चावल, एक वक्त की गदुम । गोरत साग मड़ गया है । मैंने शफी साहब से कहा था... अयूब बाहर की ओर देखने चला जाता है। नियामत : दो वक्त का चावल, एक वक्त की गदुम पर जब तक शफी साहब का हुक्म न मिले। पण्डित : खैर, सब ठीक हो जाएगा... अनझुनवाला : खाक ठीक हो जाएगा... पण्डित : नम्बर ट्राइ करो... अब्दुल्ला : नम्बर नहीं मिल रहा है। पण्डित : (नम्बर ट्राइ करके) घंटी बज रही है । सब लोगों में हलचल। नीरा : घंटी बज रही है. "मुझे ममी से कहलाना है कि मैं यहां चली आई थी. वे फिकर कर रही होगी। मुनझुनवाला : टूरिस्ट अफसर से कहो, बचाने का इन्तजाम जल्दी किया जाए" भी वह दीजिए कि दरवाजे तो हमने मव बन्द कर लिए थे पर निकलने से पहले पुल टूट गया है। अब हम क्या करें। नियामत : यह
७२
भागते कुत्ते की आवाज़ तेज़ी से आती है और
एकाएक खत्म हो जाती है। सव पीछे की
ओर जाकर बढ़ते पानी को देखते हैं।
एनेक्सी टूट रही है।
अयूब : हां लगता तो यही है...
सलमा : कुछ किया नहीं जा सकता, उसे बचाने को ?
झुनझुनवाला : एनेक्सी को ?
पण्डित : नहीं, कुत्ते को !
सलमा : जब ज़मीन ही नहीं बचेगी, तो कुत्ते का बचाव कैसे
होगा !
नीरा : वेचारा कैसा छटपटा रहा है !
सलमा : कुछ देर में यही हश्र यहां होने वाला है।
झुनझुनवाला : यहां भी !
पण्डित : हां, यहां आठ-आठ कुत्ते इसी तरह छटपटाएंगे."
झुनझुनवाला : यहां कुत्ते...
रीता : हां, हम सब लोग । चल नीरा मरना है तो हम अपनी
तरह मरेंगे...
नीरा को लिए हुए टेबिल-टेनिस वाले कमरे में
चली जाती है।
पण्डित : कुत्ते .. मैं, तू वह"
अयूब की तरफ इशारा करता है ।
अब्दुल्ला : (जैसे अपने में डूबा हुआ है) मैंने शफी साहव से छुट्टी
मांगी थी. 'नहीं दी ज़ालिम ने।
नियामत : अव फोन पर मांग ले, मिल जाएगी।
अब्दुल्ला : मैं एक वार सिर्फ एक बार अपने लड़के का मुंह तो
देख लेता । फिर चाहे जो हो जाता
नियामत : यहां का हिसाव तव कौन देखता! अव लड़के की बात
.
मत सोच । रसद की फिक्र कर। यहां खूराक कितनी
।
अयूब : हा, कुछ है यहा? आखिर रात तो काटनी ही है...
सलमा चुपचाप किचिन की तरफ चली जाती
..
पण्डित : और मरना भी है तो खा-पीकर मरना है। 'झुनझुनवाला
तो भूखा मर भी नहीं पाएगा। है कुछ खाने-पीने का
सामान
अब्दुल्ला : पीने का सामान बहुत है । पर खाने का दो वक्त का
चावल, एक वक्त की गंदुम । गोश्त सारा सड गया है।
मैंने शफी साहब से कहा था."
अयूब बाहर की ओर देखने चला जाता है।
नियामत : दो वक्त का चावल, एक वक्त की गदुम पर जब तक
शफी साहब का हुक्म न मिले...
पण्डित : सर, सब ठीक हो जाएगा."
मुनझुनवाला : खाक ठीक हो जाएगा...
पण्डित : नम्बर ट्राइ करो..
अब्दुल्ला : नम्बर नहीं मिल रहा है।
पण्डित : (नम्बर ट्राइ करके) घंटी बज रही है।
सब लोगों में हलचल।
नौरा : घंटी बज रही है. मुझे ममी में कहलाना है कि मैं यहा
चली आई थी. वे फिकर कर रही होगी।
सुनझुनवाला : टूरिस्ट अफसर से कहो, बचाने का इन्तजाम जल्दी किया
जाए
निपामत : यह भी कह दीजिए कि दरवाजे तो हमने सव वन्द कर
लिए थे पर निकलने से पहले पुल टूट गया है. अब हम
क्या करें।
...
७८
...
अब्दुल्ला : शफी साहब मिल जाएं तो कह दीजिए...
पण्डित : (काटकर) कोई उठा नहीं रहा ।
झुनझुनवाला : फिर से डायल करो...
पण्डित : नहीं, घंटी बज रही है. शायद कोई उठा ही ले ।
ठीक से सुनने दो...
सब खामोश हैं, तभी अयूब लौटता है ।
अयूव : (खामोशी देखकर)ये काठ क्यों मार गया है सबको !
पण्डित : ग्श्श् श्"घंटी बज रही है
अयूब हंसता है।
श् श्यह हंसने का वक्त नहीं है।
अयूब : हंसने का वक्त नहीं है ? बाहर देखा है क्या हो रहा है
झुनझुनवाला : लोग दूरवीन लिए इधर देख रहे हैं। हाथ हिला
हैं...
अन्दुल्ला : जैसे हम लंबे सफर पर जा रहे हों
झुनझुनवाला : कौन-कौन लोग हैं ?
अयूब : कौन-कौन है और कौन नहीं है, इसका कुछ पता चल
सकता है, यहां से?
पण्डित : श्श्श् श्
झुनझुनवाला : उधर से उठाया किसीने ?
पण्डित : नहीं, अभी घंटी बज रही है...
नियामत : सिर्फ घंटी ही वजती रहेगी।
अयूब : हां, सुननेवाले इस वक्त दूरबीनों से देख रहे हैं: "हाथ
हिला रहे हैं।
सुनझुनवाला : उन्हें रस्से फेंकने चाहिए।
अयूब : रस्सा पकड़कर दरिया कौन-कौन लांवेगा?
पण्डित : श्श् श् श्"
नझुनवाला : रस्सा इतने लोगों का बोझ एकसाथ संभाल पाएगा?
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:
सलमा हाथ में खाने की खाली प्लेटें लिये
आती है।
सलमा : अरे सब कहां हैं । कोई प्लेटें तो लगा लो...
इधर-उधर देखकर चली जाती है, प्लेटें रख
जाती है।
पण्डित और झुनझुनवाला लड़ते-झगड़ते आते
हैं।
झुनझुनवाला : अव पानी का रुकना और इस इमारत का वचना मुश्किल
है।
पण्डित : तो मैं क्या करूं?
नियामत : (एकदम आकर, वेहद घबराए स्वर में) चलकर पत्थरों
की बाड़ वनाइए पानी को रोकने की कोशिश कीजिए।
पण्डित : यह सब वेकार वात है। जो पानी नीचे से ज़मीन को
काट रहा है, क्या पत्थरों के रोके से रुकेगा?
झुनवाला : तुम इसका हौसला पस्त क्यों कर रहे हो ? तुम्हें पत्थर
नहीं रखने हैं तो तुम चले क्यों नहीं जाते ?
पण्डित : कहां? जाने की जगह कहां है ?
सब्दुल्ला : (आकर) आइए, हाथ बटाइए । जल्दी आइए...
पण्डित : ठीक है । चले चलते हैं। पर वो वेगम साहिवा, वे दोनों
लड़कियां और अयूव साहब कहां हैं ?
यामत : दोनों लड़कियां और वेगम खाना बना रही हैं
पण्डित : ठीक । बहुत ठीक । पानी को रोकेंगे, नम्बर एक । नम्वर
दो-खाना खाएंगे और नम्बर तीन-कुत्तों की तरह मर
जाएंगे।
वाला : सवाल फलसफा बघारने का नहीं, सवाल जिंदगी और
मौत का है।
डत : सवाल ज़िन्दगी और मौत का भी नहीं, मौत और उसकी
७७ टाइमिंग का है। झुनझुनवाला : (चीखकर) ये मौत की बात बन्द करो, नही तो मैं तुम्हारी जान ले लगा। पण्डिन : (हंसकर) देख और सोच लो दोस्त, हम दोनो में से मौत के ज्यादा नजदीक कौन है । मुनझुनवाला . (पण्डित पर झपटकर गला पकडते हुए) मैं अमी तुम्हें बताता हू, ज्यादा नजदीक कौन है। अब्दुल्ला : अरे रे रे''आप लोग यह क्या कर रहे हैं ? नीरा एक प्लेट में टबलरोटी के स्लाइस लेकर आती है, पण्डित और झुनझुनवाला को इस हाल में देखकर चीखती भागती है । नीरा : दीदी.. दीदी.."देखो.. दीदी... पण्डित और झुनझुनवाला, गुस्से में हाफते हुए एक-दूसरे के मामने खडे है, नियामत उन्हें अलग कर देता है। नियामत : (दोनों की वाहे पकड़कर) आज आइए हमारे साथ.." पानी अगर ऊपर तक आ गया तो कोई नहीं बचेगा... (अब्दुल्ला से) तू क्या सोच रहा है ? आ ! नियामत दोनो को साथ लिये चला जाता है। पीछे-पीछे अब्दुल्ला भी जाता है। तभी किचिन के पास वाले दरवाजे से अयूव आता है । वार के पास आकर खाली शीशी मार- कर वार का ताला तोड़ता है । उसमें से एक बोतल शराव निकालता है और सील तोड़- कर घूट भरता हुआ उसी ओर चला जाता उसके जाते ही नीरा कुछ खाने का सामान लेकर आती है, मेज़ पर है जिधर से आया था,
:
लगाती है । सलमा भी आती है, वह कु
खाने का सामान लिये हुए है।
नीरा : दीदी तो यहां भी नहीं हैं। कहां चली गई ?
सलमा : (सामान रखते हुए) उन लोगों का हाथ बंटा रही है
(इशारा उस तरफ है जहां अब्दुल्ला वगैरह पत्थर
गये हैं) तुम खाने के लिए बुला लो सवको मैं तब
सालन ले आऊं...
जाती है।
नीरा : बुलाने कौन जाएगा हुं...
किचिन में चली जाती है।
तभी लस्तपस्त भीगा हुआ झुनझुनवाला आता
है । पीछे-पीछे पण्डित हांफता हुआ।
झुनझुनवाला : मेरी वाहें जवाब दे गई हैं 'मुझसे पत्थर नहीं उठाए ज
सकते।
पण्डित : मौत उठा पाओगे ?
झुनझुनवाला : कहता हूं बकवास बन्द करो। मौत.. 'मौत'' मौत ।
तभी अब्दुल्ला और नियामत भीगे हुए आते हैं।
अब्दुल्ला : आप लोग यहां आ गये ? इसका मतलब है बचाव का
इंतजाम करना छोड़ दिया जाए !
नझुनवाला : कोई और रास्ता सोचो अब्दुल्ला।
अब्दुल्ला : कोई और रास्ता और क्या रास्ता हो सकता है ?
पण्डित : एक रास्ता हवा में है (झुनझुनवाला की ओर इशारा
करके) इसे मालूम है । इससे पूछो"जिंदगी-भर गलत
काम करके यह हवा में से रास्ता निकालकर आज तक
वचता रहा है।
सुनवाला : पण्डित!
मैं
झुनझुनवाला का चीता
७३ .. आती मलमा और नीरा ठिटक जाती है। टिठककर आगे बढ़ती हैं। सलमा : (सालन रखकर एक क्षण मबको देखती है) आप लोग खाना खा लीजिए नियामत : (अब्दुल्ला मे) चल, तब तक कोने पर दो-चार पत्थर और डाल दें... अब्दुल्ला और नियामत चले जाते है। मोराः . (पण्डित और झुनझुनवाला मे) रीता दीदी कहा हैं ? आप लोगो के साथ नहीं थी ? पण्डित : अयूब साहब कहा है ? तुम लोगो के साथ नहीं थे... सलमा: आप लोग खाना साइए। जो कही हैं, वे भी आ जाएगे अभी। (पण्डित की ओर तश्तरी बहाती है) लीजिए." पण्डित : मुझे भूख नहीं है। सलमा : सचमुच नहीं है ! पण्डित : (प्लेट झपट लेता है) है भूख । है भूख ' भूख ही भूख ! सिर्फ प्लेट मे वेतहाशा खाना शुरू करता है । तभी रीता किचिन के पाम वाले दरवाजे से हाफता, कुछ लड़खडाती और वेहाल-सी आती है। उमको कमीज़ छाती पर फटी हुई है, बटन टूटा हुआ है। वह आकर एक कुर्सी पर बेहाल वैठ जाती है । कोई कुछ नहीं कहता, सिर्फ उमे सब लोग तारते रह जाते हैं । सलमा चुपचाप एक क्षण उसे देखती है। फिर प्लेट में खाना डालकर देती है । रीता पागलो की तरह खाने को, फिर मवको देखती है। फिर प्लेट को देखती है। भूख..
-- ( पण्डित : (उसकी तश्तरी की तरफ इशारा करके) भूख ! ... खाओ. "भूख रीता : हां.. (हंसती है, और हंसते-हंसते रो पड़ती है) हां... हां हां.. नीरा : (अवाक्) दीदी 'रीता दीदी ! सलमा : (रीता को संभालकर) यहां आओ मेरे साथ आओ रीता को उठाकर किचिन में ले जाती है। नीरा पीछे-पीछे चली जाती है। पण्डित : (एकटक उन्हें जाता देखता रहता है । फिर झुनझुनवाला से) देखा! अयूव : (शराब के नशे में धुत्त)हां देखा और देखूगा' झुनझुनवाला : क्या? अयूब : औरतें। झुनझुनवाला : कहां हैं ? अयूब : उधर... वाहर की ओर इशारा करता है। झुनझुनवाला : उधर कहां? अयूब : उदर''मुझे एक औरत चाहिए। औरत जो मौत के खतरे के बावजूद मेरा साथ दे सके। समझे । नहीं समझे.. कोई बात नहीं कहता हुआ बाहर की ओर लुड़कता चला जाता है। पण्डित हाथ पोंछता हुआ उठता है। पण्डित : वो आदमी ठीक कहता है। झुनझुनवाला : क्या ठीक कहता है ? पण्डित : ऐसी औरत चाहिए जो मौत के खतरे के बावजूद साथ दे ... सके।
:
-
यार का टूटा हाताला देखता है।
मुनानगला . ऐमी औरत होती है...
पण्डित : होती है।
मुनमुनवाला · कहा देवी है...
पण्डित: अपने घर मे | मेरी औरत
झुनझुनवाला : क्या मतलय ?
पण्डित : मेरी औरत ! मेरी योधी । जो गीत व तर . पावन
तेरा साप दे सकती है।
मुनझुनवाला : (इधर-उधर देयकर) या पा रहा है।
पण्डित : तुझे मेरी योगी की नहीं, इस बार भी पानीमा
स्याल है...
सुनझुनवाला: यह इजाम
पण्डित : तुझ पर नहीं 'गुर अपन पर या विदी।'
(बार के पास आकर शादी की बात है)
पिओगे। (गुद एक पुट गीता है)।
अपने पर
पण्डित यहता हा बारा ।
सुनझुनवाला क्वाक दा fa
पण्डित के पीछे चला जाता है। दमदार
और नियामा याने हैं।द्वारा।
अब्दुला बार का ताला टूटा हवा
यापुल्ला : या मुदा "ये ताला"और यांन"
नियामत : बोतलें। एक बोनण तो पति के बाद में
यदुल्ला : तो ताला उमीन नांडा हंगा
नियामत : मैं उधर गया था, एक बोतल अयुव मा.
..
भी।
यदुन्ला : दो दन्हान नोटा होगा।
नियामत : और गुड्डो भी मुझे लगता है कि
अब्दुल्ला : कोई भी पिये मेरी बला से, पर हिसाव के ये पैसे कहां है
आएंगे?
नियामत : पैसे वसूल करना तेरा काम नहीं, तेरा काम है कापी
हिसाव लिखना।
अब्दुल्ला कापी निकाल लेता है।
लिस दो बोतल !
अन्दुल्ला : सब एक ही के नाम ?
नियामत : एक ही के नाम ।
अब्दुल्ला : किसके नाम ?
नियामत : खुदाई कहर के नाम !
अब्दुल्ला : खुदाई 'नहीं, नहीं...
'नहीं, नहीं. इस कहर से कौन पैसे वसूल कर
सकता है?
नियामत : बार का मालिक, तेरा शफी साहव । जो हरेक से पैसे
वसूल कर सकता है।
अब्दुल्ला : तुझे हंसी सूझ रही है ?
नियामत : मैं हंसी नहीं कर रहा । बल्कि दो की जगह तीन बोतल
लिख...
अब्दुल्ला : तो एक बोतल और भी...
नियामत : एक बोतल खुद खोल ले । आधी तेरे लिए; आधी मेरे
लिए।
अब्दुल्ला : हंसी छोड़ (कुछ सामने देखते हुए) इस वक्त मैं एक
चेहरे को अपनी आंखों से ओझल कर लेना चाहता हूं।
नियामत : कौन-से चेहरे को ?
अब्दुल्ला : वो जो मुझे सामने नजर आ रहा है।
नियामत : मेरे चेहरे को?
अब्दुल्ला : नहीं, एक बूढ़े चेहरे को 'जो उस पार की भीड़ में कहीं
:
८३
खोया हुआ है।
नियामत . यहा मे तो कोई चेहरा नजर नहीं आता...
मुडकर वाहर की ओर देखता है।
अब्दुल्ला : सिर्फ वह चेहरा नजर आता है। वो मेरो मा के बूढ़े
चेहरे जैसा है।
नियामत : अमल में वह चेहरा मौत का चेहरा है।
अब्दुल्ला : (गुस्से से) तू चला जा यहा से.. मैं इस वक्त मौत का
जिक्र नहीं सुनना चाहता एक बार अपने लड़के का
चेहरा देखे वर्गर मैं हरगिज नही मर सकता, हरगिज़
नही...
नियामत : दाहर निकलकर उस पार की भीड़ पर नजर डाल । वह
चेहरा भी तुझे उस भीड में ही कहीं नज़र आ जाएगा
आ में दिखाऊ तुझे।
कहते-कहते नियामत बाहर निकल जाता है ।
अब्दुल्ला : ओ खुदा तेरा कोई नजर आनेवाला चेहरा क्यो नहीं
है ? (वह भी नियामत के पीछे-पीछे चला जाता है)
ओह खुदा
रोता थको और बदह्वास-सी आती है । पोछे-
पोछे नौरा है । नेपथ्य में अब्दुल्ला
की अज़ान
को आवाज सुनाई दे रही है। रीता और
नीरा करीव-करीव झगड़ती हुई आ रही हैं ।
नीरा : तुम कुछ बात क्यों नहीं करती दीदी? तुम्हें हुआ क्या
है
अजान की आवाज आती है।
रोता : हट जा.'तू भी चली जा यहा से "मुझे अकेला रहने
नीरा : कहा चली जाऊं, किसके पास'..
. सुबकती-सी है। रीता : कहीं भी, किसीके भी पास. (नीरा चलने लगती है) अच्छा मत जा, यहीं वै० मेरे पास." (नीरा बैंक जाती है) मैं तुझे यहां जानवरों के वीच अकेला नहीं छोड़ सकती नीरा : यहां जानवर भी हैं ? रीता : हां, यहां सब जानवर ही हैं। नीरा : सव जानवर रीता : हां, एक को मैंने जान से मार दिया होता, क्योंकि उसने.. क्योंकि उसने कोशिश की थी. मुझे... नीरा : नहीं-नहीं, तुम किसीको जान से नहीं मार सकती... : - तुम तो... रीता : नहीं मार सकी मैं उसे क्योंकि 'क्योंकि मेरे हाथ दहशत से कमज़ोर पड़ गए थे. नोरा : दहशत थे। रोता : ओह ! यह दहशत मुझे उससे नहीं थी। एक और जान- वर से थी जो मेरे अपने अन्दर से..ओह ! नीरा : तुम क्या कह रही हो दीदी... रोता : (अपने में डूबी हुई) मैं उसे अपने से परे हटा रही थी और वह जानवर उसे अपने पास बुलाना चाह रहा था। वह चाह रहा था कि मरने से पहले एक बार "चाहे.. कुछ भी हो सिर्फ एक बार... नीरा किन जानवरों की बात कर रही हो दीदी ? रीता : अच्छा है, उन जानवरों की बात तु अभी नहीं जानती। शायद तू अब कभी जान भी नहीं पाएगी, क्योंकि थोड़ी देर में अव... नीरा : थोड़ी देर में अब.."योड़ी देर में क्या होने वाला है ? रोता : तू इतना भी नहीं सोच सकती कि क्या होने वाला है ? : तुम
८५
अच्छा ही है, अगर सोच न मके "तेरा यह भोलापन हो
सबसे बड़ी ताकत है तेरी...
नीरा : मेरी समझ में कुछ नही आता दीदी "चलो, चलकर
म्यूजिक सुनेंगे. रिकार्ड लगाएगे आनी पसंद के...
अज्ञान की आवाज फिर आती है।
यह अब्दुल्ला चुप क्यो नही करता? चीखता ही चला
जा रहा है?
रोता: वो अपनी इस आवाज के सलाव में अपने अन्दर की
किसी चीज को डुबो लेना चाहता है, शायद"
नोरा : मुझे यह आवाज बहुत डरावनी लग रही है "चलो दीदी,
लाउंज मे चले.. रिकार्ड सुनगे...
तभी
अयूब
और सलमा आते हैं । अयूब
पी
रहा है वोतल से ही । सलमा उसे पकड़ने की
कोशिश करती हुई पीछे आती है ।
अयूध : कहा है.. कहां है वह छोटी लडकी !
सलमा : (उसे पकड़ लेती है) होग में आओ.."मैं कहती हूं होश
मे आओ..
गता और नीरा भय से एक और दुवक जाती
अयूब : मैं होश में हूं सलमा" बिलकुल होश मे 'दरिया में वह
जाने से पहले एक बार पानी यहा तक (गले तक)
बढ़ आने से पहले एक बार मैं उसके भोलेपन के माय',
उसकी इन्नोसस के साथ...
सलमा : तुम उसकी तरफ देख भी नही सकते।
अयूब : क्यों?
रोता : (एकदम आगे आकर) इसलिए कि वह अकेली नहीं है।
सलमा : और तुम जो चाहते हो, वह नही कर सकते।
६
अयूब : (सलमा से) अब सुनाई दी तुम्हें अपने अन्दर से कुछ
आवाज़.. अपने कब्रिस्तान में कोई मुरदा तुम्हें अचानक
जागता लगा?
सलमा : मैं सोचती भी नहीं थी कि तुम इतने नाकारा हो सकते
हो. अगर तुमने कुछ भी कोशिश की तो मैं उसे...
हम दोनों (रीता को आगे खींच लेती है) उसे बचाने के
लिए...
अयूब : मैं उसे "हम दोनों उत्ते''आज पहली वार तुम्हारे मुंह
से सुना है कि तुम किसीके साथ किसीके साथ एक
होकर अपने बारे में सोच सकती हो।
सलमा : मुझे तुम्हारी दलीलबाज़ी से नफरत है !
रीता : मुझे तुम्हारे इन इरादों से नफरत है
अयूब : नफरत, तुम्हें "तुम्हारा-मेरा कोई रिश्ता नहीं सिवा
उन अधूरे लमहों के और नफरत का सवाल बिना
रिश्तों के नहीं उठता और रिश्ते कायम होते देर
लगती है ( रीता की वांह पकड़ता है) पर अब इस मौत
के साये में कुछ रिश्ते तय होकर रहेंगे।
रीता को अपनी तरफ खींचता है।
नीरा देखती हुई लाउंज में भाग जाती है।
रीता : मुझे छोड़ दे, नहीं तो मैं कहती हूं."
उससे छूटने की कोशिश करती है।
सलमा : (एकदम उसपर झपटकर) वदजात ! नाकारा"इते
छोड़ दे, नहीं तो खून हो जाएगा!
अयूव से रीता छूट जाती है, तीनों हांफते
खड़े रहते हैं। आग बरसाती आंखों से सलमा
और रीता उसे देखती रहती हैं।
रीता : मुश्किल सिर्फ यह है कि यहां से कहीं जाया नहीं जा
समता.. सलमा : तुम जधर जाओ जाओ (रीता से कहती है) रीता भी लाउंज में चली जाती है । अयूब : (लाउंज की तरफ देखकर) वह छोटी लडकी कहां है ? उम तरफ एक कदम वढता है तो सलमा उसे पकड लेती है। सलमा : नही... तुम कही नहीं जा मक्रते... अयूब : क्यो ? मैं तुम्हे मौका देना चाहता हूं कि तुम मुझसे और नफरत कर सको... जाना चाहता है। सलमा : (सामने आकर) तुम उम लड़की के पास हरगिज-हर- गिज नहीं जा सकते । अयूब : लेकिन क्यों? सलमा: क्योकि वह क्योंकि मैं... अयूब : ओह ! तुम अपनी वजह से कह रही हो तो मतलव है कि तुम अब भी कही अन्दर से मुझे यह अन्दर की आवाज़ क्या है ? सलमा : अन्दर बिलकुल खामोशी है। अयूब : है नहीं, थी! अभी कुछ पल पहले तक । अव वह सामोशी नहीं है.''वहां अब कुछ और है." सलमा : क्या है ? अयूब : एक खौफनाक आवाज । एकसाय हंसने और रोने की... चीखने और गुस्मा होने की। सलमा : हंसना और रोना! कैसा हंमना और कैसा रोना... चीखना और गुस्मा होना" अयूब : मैं तुम्हें तुम्हारे अन्दर की इन्हीं आवाजो का एहमास कराना चाहता हूं कि फला वक्त तुम्हारे अंदर हंसी उबल रही थी 'फलां वक्त तुम अन्दर से चीख रहीं थीं। फलां वक्त तुम्हारे अन्दर कुछ वेतरह टूट रहा था। सलमा : तुम खामख्वाह यह सब सोच-सोचकर अपना जी खुश रखना चाहते हो। अयूब : नहीं सलमा'तुम एक कब्रिस्तान हो, जिसमें यह यह-यह- यह सव दफन है। सलमा : तुम'''लेकिन तुमने उस लड़की को... अयूव : ओह ! वह बड़ी लड़की रीता ! वह भी तुम्हारी ही तरह एक कविस्तान बन रही है। क्योंकि उसका भोला- पन, उसकी इंनोसेंस भी मर चुकी है। जिसके बाद आदमी-औन्त के भीतर सब कुछ दफन होता जाता है। कुछ भी भीतर से नहीं फूटता । सलमा : फूटता है 'गुस्सा और... अयूव : और ? सलमा : नफरत... अयूब : पर तुम्हारे अन्दर की आवाज़ नफरत की नहीं है।" सलमा : है ! अयूव : नहीं''यह नफरत की नहीं ऊब की आवाज़ है। सलमा : जिसने मुझे खुदकुशी के कगार तक पहुंचा दिया था ! अयूब : वह कगार अब भी मौजूद है। मुझे जहां जाना है, मैं चला जाता हूं । तुम्हें जहां जाना हो, तुम जा सकती हो। सलना : तुम इस वक्त मेरे पास से नहीं जा सकते । अयूव : पर तुम तो मुझसे ऊब चुकी हो... सलमा : हां, ऊब तो चुकी हूँ! अयूब : तो? ...
सलमा पर खुदकुशी और अनचाही मौत मे बहुत फर्क है ! अयूब : तो तुम चाहती हो कि मैं... सलमा : कि इस अन वाही मौत के वक्त तुम मेरे पास रहो। अयूब । लेकिन क्यो? सलमा : क्योंकि मैं चाहती हूं। मैं तुमसे मिर्फ इतना ही चाहती हूं."सिर्फ इतना ही... कोमल हो उठती है। अयूब सिर्फ चाहती हो, या मुझे भी चाह सकती हो शायद वह रिश्ता हमारे बीच कव का टूट गया . सुनो, तुम सलमा : मैं नहीं जानती.. मैं चाहती हूं कि तुम एक वार मुझे अयूब : नहीं नहीं नही क्योकि तुम्हारी इनोसैम मर चुकी ' है ''तुम्हारा भोलापन कही तो गया है। उसके बाद भीतर मव कुछ सिर्फ दफन हो सकता है और मैं मिर्फ दफन नहीं होना चाहता''मैं तुम्हारे भीतर भी जीना चाहता हूं... लाउंज से रिकार्ड की धीमी-धीमी आवाज आती है। सलमा : तो तुम समझते हो कि तुम कि तुम मुझे जलील करके... अपूव : यही-यही बिलकुल यही कि मैं तुम्हे जील करके... या तुम मुझे दफन करके जिंदा तो हम दोनों रह सकते हैं, जी नहीं सकते। सलमा : तो तुम मुझे जलील करोगे.. करते जाओगे? अयूब : और तुम मुझे दफन करोगी और करती जाओगी? सलमा : मैं तुमसे नफरत करूगी और करती जाऊगी ! अयूब : तो मैं भी तुम्हें जलील करूगा और करता जाऊंगा!
६० सलमा : (चीखकर) चले जाओ यहां से हट जाओ मेरे पास से ''मैं तुमसे नफरत करती हूं'नफरत'नफरत ! अयूब : सचमुच ! (वह चला जाता है) रिकार्ड की आवाज तेज़ हो जाती है । रिकार्ड के गीत का कथ्य जिंदगी को हलचल का है।'उसमें शब्द न भी हों, उसकी लय से यह ध्वनित हो सकता है । जाज म्यूजिक का तेज़ लय का कोई रिकार्ड हो सकता है। सलमा अपना मुंह ढांपे एक कोने में पड़ी रहती है । अयूब चला गया है। तभी पण्डित . और झुनझुनवाला भीतर आते है । झुनझुन- वाला अपना पोर्टफोलियो लिये हुए हैं। पण्डित : (कुछ नशे में) बहुत अच्छे ! यहां तो फेस्टिवल चल रहा है। (संगीत की आवाज़ सुनकर) रीता और नीरा की हंसी की आवाज़ और यह आभास कि वे म्यूज़िक कि लय पर नाच रही हैं। । बहुत अच्छे ! सुनझुनवाला : पानी पहले से और ज्यादा नज़दीक आ गया है पण्डित : हां, बढ़ता हुआ पानी "हंसी, नाच, संगीत। यह फेस्टि- वल तो है ही। मौत का समारोह ! नुनझुनवाला : लगता है सब लोग डर और दहशत से पागल हो गए पण्डित : पागल ! अरे झुनझुन" सुनझुनवाला : झुनझुनवाला कहो। पण्डित : हूं, अरे वाला, अव दोनों को मिला लो, जो तू अपने को पुकारता है वह हो जाएगा. हां, पागलपन अपने-आप
।
अपने-आप के भीष की दीपाt fotuला
• मि है। गुनगुग भोर पापीनी पार
जाने का। समा।
सिगरेट निता है।
झुनझुनवाला : तुम्हारे सिगरेट तो होगा।
पण्डित : हा, मगर अब यस ।।
झुनझुनवाला : यहां से आए ?
पण्डित • अन्दर स्टोर कीपेटीग।
झुनझुनवाला . यिना पूछे गे भाए ?
पण्डित : आग यहा गिी भी पी rhittor intram
नहीं है । frगी भी तिमी मोimal
मुनझुनवाला : एक गिगरेट गरी यो।
पण्डित : तुम पियोग ?
गिगांट देगा।
मुनमुनयाला : मैं पुरा गौचना पाया।
मिगाट गुना
पण्डित : मारने की कारग tamiy?
मुनझुनवाला : दिमाग पी गया मtantIMAM
डागांमना गाया।
पनि पानी भर गया Tirtant
मनमनदाला : गांव में AM
पति: का?
मनातवाला कि आदी titanARAM
भी नहीं पाया
पनि : दुम पर timrikimtirt
मंगामzmanity
मुनमुना मांxnxrisk.fm
..
कुछ न हो सकता हो!
पण्डित : कुछ न कुछ होता हर स्थिति में है। यह और वात है कि
वह वह न हो, जो
तुम चाहते हो।
नवाला : एक बाढ़ एक भूचाल और आदमी का किया-धरा सब
वेकार हो जाता है।
पण्डित : इतिहास यही है । पर झुनझुन''अव इतिहास का भी
वंटवारा होगा "तुम्हारा इतिहास और तुम्हारे विरुद्ध
एक इतिहास ।
झुनवाला : इतिहास एक रद्दी की टोकरी है जो जव कागज़ की
गेंदों से भर जाती है तो खाली कर दी जाती है।
पण्डित : फिर भी इतिहास से ही एक समाप्ति और दूसरी शुरुआत
का एहसास होता है।
सुनझुनवाला : यह भी कोई शुरुआत है क्या ?
पण्डित : किसी न किसी रूप में तो है ही तुम्हारे लिए न सही।
सुनझुनवाला : मेरे पास इतना कुछ है.. मेरी इतनी-इतनी योजनाएं हैं,
इतनी शुरुआतों की रूपरेखा मेरे दिमाग में है...
पण्डित : हैं नहीं, थीं।
झुनझुनवाला : थीं नहीं, हैं । जिस क्षण तक आदमी जिन्दा है'..
पण्डित : यही तो त्रासदी है कि जब तक आदमी जिंदा रहता है,
तव तक समझता है कि है, और जब वह 'था' हो चुकता
है, तब वह ज़िदा नहीं होता। वह अपने से पीछे के इति-
हास को ही देख पाता है, अपने को इतिहास होते नहीं
जाने का साक्षी नहीं होता।
झुनझुनवाला : (विगड़कर) तुम अन्दर से पस्त हो चुके हो, मैं अब में
पस्त नहीं हूं।
पण्डित : तुम पस्त नहीं हो, ऐसा नहीं है. "तुम अपनी पस्ती
देख पाता।
अपने गुज़र
करते हरते हो...
.. : : मुनझुनवाला : तुम बहुत पी गए हो ! "चुप करो। मुझे सोचने दो... कोई न कोई रास्ता जरूर होना चाहिए जिससे... पण्डित : जिसमे इतिहास में बचा जा सके. एक रास्ता है." मुनझुनवाला : कौन-सा किधर.. पण्डित : सीधा समदर की तरफ । झुनझुनवाला तुम होश में नहीं हो। पण्डित (ताश की गड्डी निकालकर) आओ, दो हाथ हो जाएं, अभी पता लग जाएगा कि कौन होश में नहीं है... ताश फेंटता है। मुनझुनवाला : ताश छोड़ो 'मुझे कुछ जरूरी काम करने हैं... (पोटं- फोलियो सोलकर चैकबुक निकालता है) मैं सब कर्जे अदा करके मरना चाहता हूं। पण्डित : अदा करके या वमूल करके ? झुनमुनवाला : वमूल भी करना है। रमी में दो मौ सत्तानवे रपये वीम पैसे तुम्हारे ऊपर हैं."याद है ? पण्डित : याद है। लेकिन मैंने यह कव कहा कि मैं कर्जा अदा करके मरना चाहता हूं। झुनझुनवाला : खर(एक चैक लिपकर) ये दो लाख पाँच हजार को चक लालनद बालकचंद को दे देना.. उनका कमीशन देना था। ये एक लाख मत्ताइम हजार पाच सौ ठेकेदार गुरनानी का (तीसरा लिखता है) और तीन लाख चालीस हजार लोहेवाले टेकचन्द को। ये पैतीस हजार इंजीनियर चटर्जी का कमीशन... पण्डित : लेकिन चटर्जी तो चैक लेगा नही । कैश लेगा... मुनझुनवाला : (सारे चक फाड़कर पण्डित को देते हुए) इस वक्त और कुछ नहीं किया जा सकता. कैश कहां है ? पण्डित : लेकिन क्या तुम वह सब कर्जे भी उतार सकते हो जो ..
तुम्हारे खून को अदा करने हैं ?
झुनवाला : हवाई वातें वाद में करना...
पण्डित : और ये चैक मुझे दे रहे हो जैसे यह सब हवाई नहीं हैं...
कि मैं इस तैरती मौत से वचकर जाने वाला हूं !
नझुनवाला : (जैसे समझकर) हैं ।
तभी अब्दुल्ला बदहवास चीखता आता है
पीछे-पीछे नियामत भी है, पर काफा पीछे ।
अन्दुल्ला : वह अन्दर आ गया है। अन्दर आ गया है ।
झुनझुनवाला : क्या ?
.
पण्डित : अब्दुल्ला
नियामत एक क्लाक पकड़े घवराया भीतर
आता है।
नियामत : (चीखता हुआ) पानी अन्दर आ गया है। पानी अन्दर
आ गया है(क्लाक दवाए हुए) जो-जो चीजें बचान
हों, वो लीजिए । अरे सव यहां हैं ?
नियामत इधर-उधर देखता है। फिर आवाज़
लगाता है
अयूब साहव ! सैलाव भीतर आ गया है ! गुड्डो
नीरा' 'वेगम साहिवा...
सब भौंचक्के रह गए हैं । सलमा आंखें खोल
है।
झुनझुनवाला : मुझे सिर्फ यह पोर्टफोलियो बचाना है. इसमें वह स
जो औरों के हाथ पड़ गया, तो मैं कुत्ते की मौत
जाऊंगा...
पण्डित : (अपने ताश की गड्डी) मुझे सिर्फ ताश ।
नियामत : (अपनी क्लाक दिखाकर) मुझे यह घड़ी इमकी
के मुताविक मुझे क्लब खोलना-वन्द करना पड़ता
अब्दुल्ला (हिसाव की कापी उठाकर) मुझे यह हिताव को कापी ''नही तो शफी साहब कभी माफ नहीं करेंगे... रीता भागी हुई आती है। रीना : (तमाम रिकार्ड लिए हुए) मुझे ये मगीत । सलमा गुपचाप आगे आ गई है और वह खामोश खडी है। नियामत • आपको देगम ? आपकी कोई चीज अन्दर हो तो... सलमा : मेरा ? अदर | कुछ भी तो नहीं है । अन्दुल्ला : आपके वो? सलमा : मेरे वो? मेरे वो कौन? रोता : वही अयूब । मैं लाउंज मे खडी आईने में अपने को देव रही थी तो वह पीछे आकर खड़ा हो गया और बोला- किसे देख रही हो इसमें । पण्डित : मैं जब बाहर था तो अयूब मेरे पास आया या "मुहाने बोला-ताश के मेल देखोगे? परमने गड्डी उसे नहीं थे। झुनझुनवाला : मेरे पास भी आया था."पूछ रहा ण, यहां कहीं नहीं मिल सकता ? शायद दरिया पार करने की को तरकीव मूझी यी उमे... नियामत : लाउंज के बाहर अयूब माह मुझने कार और उन्न माग रहे थे। अब्दुल्ला : और मुझसे शराब को एक और बोतल । सलमा : उन्हें सबसे कुछ न कुछ चाहिए। टिनी के, किसीको कुछ देना। मि मुझमे ही न्दै ने चाहिए। नियामत : लेकिन वो हैं कहां! सलमा : वो किमीकी तलाश में हैं। अनामनवाला : किमकी तलाश में ? : ।
सलमा : एक लड़की की तलाश में ।
नयामत : कौन लड़की यहां नहीं है? नीरा'..
तभी अयूब आता है। शराब की बोतल लिए
हुए।
अयूव : अरे यह क्या ? (सवको देखकर)
सलमा : नीरा कहां है ?
अयूव : मुझे क्या मालूम ?
पण्डित : (उसे कालर से पकड़ता है) नहीं बताओगे ?
सलमा : अगर तुमने उसे खराव करके पानी के हवाले कर दिया
है तो वना क्यों नहीं देते ?
(पण्डित का हाथ कालर से आसानी से हटा देता है)
तुममें से कोई नहीं बता सकता, इसका नतीजा यह तो
नहीं निकाला जा सकता कि मैं बता सकता हूं। (शराव
का चूंट लेने की कोशिश करता है)
पण्डित : (झटके से अयूव
की वोतल दूर गिरा, देता है) बताता
है कि नहीं? (उसकी गर्दन थामता है)
सलमा : (जैसे कुछ आहट लेकर) छोड़ दो इसे ।
पण्डित : यह बताता क्यों नहीं ?
सलमा : मैं बताती हूं
झुनझुनवाला : तुम्हें पता है ?
सलमा : सब लोग खामोश हो जाओ. एक पल के लिए."
सब लोग खामोश होकर सुनते हैं : नीरा के
सुवकने की आवाज़ आती है । वह आवार
पास आती जाती है । फिर नीरा ग्रंदर आती
है। रोती, सुवकती।
रोता : नीरा''नीरा क्या हुआ है तुझे ?
नीरा : (एक क्षण रीता को देखकर उससे लिपट जाती है,
। .. पानी का हुई) मुझे बहुत डर लग रहा है दीदी... रीता : किस चीज से... नोरा : हर चीज़ से । अधेरे से, पानी से, तुम सबसे ''मुझे तुमसे भी आज डर लग रहा है, दीदी। तुमसे भी। (कहते हुए वह अयूब की ओर फटी-फटी आंखों से देखती है और एकदम चोख पडती है) इस"इस दरिदे से, दीदी.. (और रो पड़ती है) तभी कुछ और गिरने की आवाज; वेतहाशा शोर। सब लोग अवाक्, हताश, सहमे-डरे खड़े रह जाते हैं । फिर ऐसा अभि- नय कि जैसे पानी का रेला वहां भी आ गया हो, जहा मब लोग खड़े हैं। सव पानी से बचने की कोशिश करते है। झुनझुनवाला: -पानी पानी "आ गया "ओह "अब क्या होगा ! . निपामत: रीता: पण्डित : ! : अब्दुल्ला : या खुदा""या खुदा"या खुदा नियामत : खुदा को पीछे छोडकर आगे चलो अव... अब्दुल्ला : खुदा को पीछे छोड़कर तो आगे दोजख ही दोजख है। अपूव : हम इस वक्त जहा है, वह दोजख ही है। पण्डित : सबने इतनी चीजें जमा की थी, एक लालटेन भी रख ली होती तो कितने काम आती ! मनझुनवाला : यह पता नहीं था कि बिजली भी दगा दे जाएगी। पण्डित : यह कहो कि यह पता नहीं था कि रोशनी तुम्हें भी दगा दे जाएगी... मुनमुनवाला : क्या?
पण्डित : हां।
अयूव : इस वक्त उस विजली की फिक्र करो जो अपने भीतर
गुल होने को है...
पुनवाला : आदमी की बनाई सभ्यता ऐन वक्त पर दगा दे जाती
है
।
पण्डित : आदमी की सभ्यता। अपनी सभ्यता कहो''जो यहां-
वहां कुछेक जगहों पर ही रोशनी दे रही है और किसी
भी वक्त दगा दे सकती है।
नियामल : अव यहां से निकलने की तरकीब कीजिए.''नहीं तो यहीं
घिर जाएंगे और ये इमारत हमें दफन कर लेगी...
अब्दुल्ला : या खुदा ।
पण्डित : सब लोग एक-दूसरे की बांहें थाम लें और बाहर निकलने
की कोशिश करें...
सब एक-दूसरे की बांहों में वांहें डाल लेते हैं ।
अंत में अयूव और सलमा की कड़ी टूटी रह
जाती है। पर सलमा संभलती हुई चल रही
है । नीरा थकी है । अंधेरे में पानी के वीच
से रास्ता टटोलता ग्रुप ।
नियामत : होश । साहवा. (जैसे गहरे पानी में चला गया हो) ।
पण्डित : संभाल के...
झुनझुनवाला : वहुत अंधेरा है । कुछ दिखाई नहीं देता...
अब्दुल्ला : या खुदा ! शफी साहब ने छुट्टी नहीं दी...
रीता : (नीरा से) तू ठीक से चल क्यों नहीं रही ?
नियामत : होश होश...
सलमा : (अयूब से) हम लोग इस वक्त कहा जा रहे हैं ?
अयूव : किसे पता है ! सिर्फ इतना पता है कि जा रहे हैं।
पण्डित : झुनझुन'' 'वो चक कहां है ?
६६ . मुनमुनवाला बरे मरा"वचाओ ! (एकदम जैसे गहरे मे चला गया । रोता • (नीरा से) मेरी वजह से और लोग भी ठीक से नहीं चल पा रहे हैं । कायदे से चल । नोरा : मुझमे नहीं चला जाता । तुम लोग मुझे छोड़कर आगे जा मकते हो। रुकती है। रीता . रुक नहीं, चलती चल । नीरा : नहीं। रीता : क्यों ? नौरा : पानी से चलकर पानी मे आगे जाने की क्या तुक है ? रीता : सब लोग सूखी जमीन तलाश कर रहे है। नौरा : मुझे उन सबसे क्या लेना-देना ! मुझे नीद लग रही : : : रोता : सोओगी कहाँ ? नौरा : पता नहीं, जहां भी हो । रोता : तुझे पता है, वगैर सूखी जमीन के सोया नहीं जा .. सकता! : नीरा : मैं तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर सो लूगी। झुनझुनवाला : ओ साली.."मछली ने काट लिया। पण्डित : अभी क्या हुआ है, अभी तो तुझे नन्हे-नन्हे कोडे-मकोड़े तक काटेंगे... अब्दुल्ला : वो देखो. 'सामने पत्थर है. मुनमुनवाला : हम लोग कुछ देर पत्थर पर बैठ सकते हैं । पण्डित: ये पत्थर कितनी देर टिकेगे... नियामत : होश"होश साहवा । झुनझुनवाला : लगता है मेरे पैर से लहू बह रहा है।" :
०० अब्दुल्ला : या खुदा 'शफी साहब से पूछना परवरदिगार कि मुझे छुट्टी क्यों नहीं दी । मैं लड़के का मुंह तक नहीं देख पाया। तभी सलमा वैठ जाती है। जैसे पत्थर मिल गया हो और पैरों तले पानी बह रहा हो। रीता भी नीरा का सिर कंधे से लगाए बैठ जाती है-दूर, दूसरे पत्थर पर । बाकी लोग आगे बढ़ गए हैं। अयूव उसे बैठा देखकर आता है। अयूब : तुम रुक क्यों गई ? सलमा : क्योंकि मुझे अंत नज़र आ रहा है। अयूब : वह नज़र सबको आ रहा है, मगर अभी आया नहीं है। चलो... सलमा : नहीं ! अयूव : तो तुम्हें जबरदस्ती घसीटकर ले चलना पड़ेगा। सलमा : जवरदस्ती ! आज भी! अयूब : तुम्हें आत्महत्या नहीं करने दी जाएगी। सलमा : मैं आत्महत्या तो कव की कर चुकी हूं। आज तो सिर्फ... अयूब : दूसरों की हत्या करने जा रही हो? सलमा : मैं किसी दूसरे के लिए जिम्मेदार नहीं हूं। अयूब : (अब्दुल्ला से) इसे उठाकर ले चल सकते हो सलमा : मैं नींद में या बेहोश नहीं हूं। अब्दुल्ला : लेकिन मैं तो खुद ही यहां बैठ जाना चाहता हूं। रीता : (वहीं से बैठे-बैठे) अब्दुल्ला 'मैं भी यहीं रुक रही .. ! ... अयूब : (अब्दुल्ला से) तुम नहीं बैठ सकते. शफी साहव को
का जवाब दोगे?
वाकी लोग चलते जा रहे हैं । रीता कुछ दूर
पर नीरा को लिए बैठी है । अब्दुल्ला भी चल,
पड़ा है। सलमा स्की हुई है। अयूब उनके
पास खडा है।
अयूब : (सलमा से) तुम चलोगी नहीं ?
सलमा : नहीं।
अयूब : तुम जानती हो मैं तुम्हारा हठ छुड़ा
सलमा : छुडा सकते हो।
अयूब : हा।
सलमा : अपने हठ से
अयूब · नहीं।
सकता है।
मलमा. तो
अयूब : (अनुरोध से उसका हाथ हाथ में लेकर) चलो • मैं वह
मलमा : (आधी पिघलकर) नही...
उठ खड़ी होती है।
अयूब : तुम मरना क्यों चाहती हो?
रालमा : कोई जीना क्यो चाहता है ?
अयूब : जीना सिर्फ जीने के लिए।
सलमा : मरना सिर्फ मरने के लिए।
अयूब : जिद नही करते देखो, मैं तुमसे कुछ माग रहा हू इस
दक्त।
सलमा : तुमने पहले भी कितना कुछ मागा है, मगर हर बार
तुम्हारी माग स्वीकार कर लेने का कुछ भी फल नहीं
मिला।
अयूब - देखो, तुम मुझे जानती हो"
.
मा : मैं ? तुम्हें ? मैं तुम्हें विलकुल नहीं जानती।
ज्यूव : नहीं जानतीं? कितनी बार कह चुकी हो कि जितना तुम
मुझे जानती हो
पलमा : वह मैं अपने को धोखा देती रही हूं । अपने को झुठलाती
रही हूं और अपने साथ तुम्हें भी' 'मैं तुम्हें विलकुल नहीं
जानती।
अयूब : अगर ऐसा ही है तो एक वार जान लेने की एक और
कोशिश कर लेना वुरा नहीं है।
सलमा : एक और कोशिश ? कव, कहां, किस वक्त ?
अयूब : आज, यहीं, इसी वक्त !
सलमा : पर क्यों?
अयूब : क्योंकि मैं खुद एक बार अपने को जान लेने की कोशिश
कर लेना चाहता हूं।
अयूब खुद भी बैठ जाता है । सलमा को भी
वंठा लेता है। दोनों ऐसे बैठते हैं जैसे पानी
पहले से बढ़ गया हो।
सलमा : तुम आगे नहीं जाओगे ?
अयूव : नहीं।
सलमा : फिर शायद वक्त भी नहीं रह जाएगा। पानी बढ़ रहा है।
अयूव : पानी को बढ़ने दो । तुम्हारा मुझे जान लेना जीते र
से ज़्यादा जरूरी है। तुमने कहा-तुम मुझे बिल
नहीं जानतीं, और मैं भी जानता हूं कि नहीं जानती
सलमा : मैं तुम्हें सचमुच नहीं.. पर तुम चले जाओ अव ।
अयूव : नहीं।
सलमा : तुम्हारा हठ किसलिए है ?
अयूब : यह ह नहीं है।
सलमा : नहीं है ?
१०३ . 1 . अयूब . तुम्हें लगता है यह हठ है ? सलमा जितना मैं तुम्हे जानती हूं अपूर्व : जानती हो। सलमा : पता नही... अयूब . और मैं तुम्हें सलमा . तुम मुझे बिलकुल नहीं जानते ? अयूब : मैंने कहा न, जानने की एक बार और कोशिश की जा सकती है। सलमा यहा वक्त नहीं है। अयूब : तो फिर... सलमा । वे लोग कहा पहुच गए हैं ? अयूब पता नही, अधेरे में कुछ पता नहीं चलता। सलमा (सडी होती है । अयूव का हाथ पकडती है) आओ चलें... अयूव : जानने के लिए रुकोगी नही ? सलमा : (मुसकराकर) मुझे नहीं लगता कि रुककर भी जान पाऊंगी... अयूब : लेकिन मैं... सलमा : आओ, चलो... उसे घसीटकर ले चलती है । दूमरी चट्टान पर बैठे अब्दुल्ला, नियामत, झुनझुनवाला पास की चट्टान पर नीरा को लिए बैठी रीता । अब अयूब और सलमा कुछ दूर चलकर अंधेरे में गुम हो गए हैं। पण्डित : (रीता से) यह सो गई है क्या ? रोता : नहीं. वेहोश हो गयोऽऽ है- पण्डित : अच्छा है। और पण्डित, वाला : क्या ? ण्डित : कि वह वेहोश है। उसे पता नहीं लगेगा कि पानी अव भी बढ़ रहा है। नयामत : यह भी पता नहीं लग रहा कि यह कौन-से दरिया क. पानी है, और ये कौन-से का है अब्दुल्ला : लिद्दर और शेपनाग का है... पण्डित : पर कौन-सा पानी किसका है ? नझुनवाला : ये दोनों दरिया-लिद्दर और शेपनाग--आज तक एक- दूसरे से दूर और अलग बहते थे... पण्डित : और तुम्हारे पैर तले इनके बीच की ज़मीन थी। झुनझुनवाला : (तेज़ जलती आंखों से उसे ताकता है) पानी और बढ़ रहा है। पानी की आवाज़ ज़रूरत पड़ने पर जगह-जगह आती रहती है। अब्दुल्ला : अब कोई तरीका नहीं है ! नियामत : है। आंखें मूंदकर उस पल का इंतज़ार किया जाए। पण्डित : क्योंकि खुली आंखों से उस पल को नहीं देखा जा सकत रीता : (वहीं से) पर मैं "इंतजार नहीं करूंगी। इससे प कि पानी मुझे आ ले, मैं खुद ही इसमें" नीरा को लिटाकर खड़ी होती है । जब तक रीता नीरा को लिटाकर खड़ी है तब तक अयूब और सलमा पानी पार उस पत्यर तक आ गए हैं । रीता कूदने होती है कि अयूब उसे पकड़ता है। नीरा को संभालती है। अयूब : यह क्या कर रही हो ? उसे पकड़ता है। .
१०४
..
रोता : मुझे छोड दो। मैं अपने निर्णय से अपना अल कर लेना
चाहती हूं। मैं एक जानवर की तरह यहा मी जाना नहीं
चाहती। तुम सब लोग जानयर हो, जो यहा तिए जाने
का इन्तजार कर रहे हो...
अयूब : तुम बैठ जाओ मैं कहता हू बैठ जाओ।
रोता: क्यो?
अपूर : क्योकि मभावना जीने को भी हो सकती है।
रोता : अब भी हो सस्ती है ।
अयूब : सम्भावना कोई भी कभी तक हो सकती है।
रीता : तुम मब लोग झूठे हो। योयले हो । अपने कोशूठी आमा
और खोखले विश्वास में रखकर जी सरने हो । सेकिन
मैं यह स्वीकार नहीं कर सकती “मुझमें अब शाव नहीं
अयूब : तुम्हारे पास आशा के लिए बहुत कुछ है। तुम जयान
रीता : मैं जवान हू । इसलिए मुझमे अन्न यो स्वीकार लेने का
साहस है । तुम लोग साहसहीन हो ! नपुगक हो ।
अब्दुल्ला, नियामत, झुनझुनवाला और पण्डित
अब तक वीच या पानी पार करके रीता वाली
चट्टान तक आ गए हैं।
पण्डित : तुम ठीक कहती हो।
रीता : अगर तुम लोग अन्दर से बिलकुल मिट्टी नहीं हो गए हो,
तो सब अपनी-अपनी इच्छा और अपने गुनाव में अपना
अन्त तय करो।
मनझुनवाला : यह चुनाव नहीं, मजबूरी को मुनाय का नाम देने की
कोगिश है।
पण्डित : नही, रीता विलकुल ठीक कहती है.""मेरी आज तक
-
.
जिंदगी एक नपुंसक आदमी की जिंदगी नहीं रही ?
रही है ! किसलिए ? सिर्फ जिंदा रह सकने के लिए ?
नहीं ! नहीं ! नहीं ! जिंदा रह सकने के लिए
नहीं , दूसरों की तरह जिंदा रह सकने के लिए। इस
दोगले दौर में मैं खुद अपना आप वनकर अपने लिए
नहीं रह पाया.. मैं एक साया बनकर रह गया, जो
कभी इससे, कभी उससे चिपक जाना चाहता था। कभी
इस जैसा या उस जैसा हो सकने के लिए स्वांग बदलता
रहता था। घर था। पर घर की जिंदगी नहीं थी।
बीवी है पर बीवी नहीं है.."उसकी तस्वीर औरों के
वटुओं में वन्द है (झुनझुनवाला को आग उगलती आंखों
से देखता है) महीनों वाहर भटकना यह और यह और
यह हासिल करके खुश होना चाहना, पर उदास होते
जाना यही मेरा प्राप्य था । पीछे घर में क्या होता
था, पता नहीं । एक झूठा खेल । एक-दूसरे को विश्वास
दिलाते रहने का। कुछ था, जिससे मैं अपनी हर
जीत के साथ हारा हुआ महसूस करता था । कुछ
था, जिससे मैं हर वक्त भागना चाहता था"
और इस बार इस झुनझुन के साथ यहां आया था,
तो भी भागकर 'इसीसे भागकर इसीके साथ ।...
इस आदमी के साथ, जिसके चेहरे से मुझे नफरत है।
इसने हमेशा एक कठपुतले की तरह मुझे साय रखा
। मैं इसके लिए ताश की वाजी का वह हाथ
जो इसके हाथ में है। मैं इस वक्त भी इसका मुंह जोहता
हुआ, इसीके ताशों की गड्डी हाथ में लिए नहीं मरना,
चाहता'(ताश जेब से निकालकर विखराकर फेंक देता
है) यह रही इसके ताशों की गड्डी जिसे खेल-खेलकर,
मैं खोखला हो चुका है । यह कमीज़ (कमीज़ उतारता है) यह भी इसकी पसद की है। (उतारकर फर देता है) यह पतलून(पतलून उतारता है) यह भी इमको पमद की है . (फेंक देता है) में यह मद पहन-पनर खुश होता रहा हूं क्योकि ये खुश होता था। मैं इसरी खुशी से जीता रहा हूँ, पर मरते वक्त इसी खुनी माय नहीं रणगा. मैं महंगा अपने नगेपन के साय'. हालाकि यह नंगापन भी विलकुल मेरा अपना नहीं है। कूदना चाहता है। झुनझुनवाला : (चीखकर) ठहरो' पण्डित, टहरो। पण्डित : (ठिठक जाता है) देवा तुमने, तुम्हारा हुक्म गुनने का कितना आदी हो गया हूँ कि तुम्हारे 'टहरो' ने इस वक्त भी मेरे पाव रोक दिए है। झुनझुनवाला : मुनो पण्डित.."तुम आए थे मेरे साथ । मेरे कहने से। पर अब तुम्हारे फंमले को स्वीकार करके मैं तुम्हारे साथ ही चल देना चाहूंगा" अब्दुल्ला : या खुदा"या खुदा" नियामत मुह बनाकर पाखें और कान वन्द कर लेता है। बाकी लोगों की प्रतिक्रियाए- आश्चर्य की। पण्डित : तुम पृष्ठे हो "तुम फिर कोई साजिश कर रहे हो। झुनझुनवाला : अभी तक ऐसा ही था, पर अब इस क्षण के बाद ऐसा नहीं है। मेरा इतिहास सिर्फ मैं नहीं हूं." पण्डित : हा, सिर्फ तुम नही हो। एक गलत इतिहास ने तुम्हे बनाते-बनाते, तुम्हे ही इतिहास बनाने का हक दे दिया... मे अनसुनवाला : हाँ "मैं पैदा हुआ तो पहला मंत्र मेरे कान का गया
मूल्य दिये...
था कि दुनिया में बड़ी मछली छोटी मछली को खाकर
ही जी सकती है । और बड़े होने के साथ-साथ मैंने
जाल बुनने सीखे। हर जाल में सैकड़ों मछलियों को
उलझाया और खुश होता रहा । दूसरे लोग कहते थे
पैसों के पेड़ नहीं लगते । पर मेरे लोग कहते थे, लगते
हैं और खूब लगते हैं । मैंने पैसों के पेड़ लगाकर देखे...
वे लगे, फले-फूले. "जब पेड़ फूल-फल गए तो मैंने धर्म,
नैतिकता, विज्ञान, राजनीति-सवको अपने
मूल्य (हंसता है)। सीधे-सीधे कहूं तो सबको अपना व्यापार
बनाया। इसका दाम इतना । उसका दाम उतना । हर
चीज़, हर बात का प्रतिनिधि में था। मैं सबसे बड़ा
मछलीमार था जिसके कारखाने में बड़ी से बड़ी मछलियां
डिब्बों में बन्द की जाती थीं। बड़ी से बड़ी हल
मछली के लिए मैंने चारा ईजाद किया.. पर आज इस
वक्त मैं देख रहा हूं कि मैं खुद भी एक मछली हूं।
पानी में तैरती मछली नहीं, अपने ही जाल में फंसकर
तड़पती, अपने ही डिब्बे में बन्द । मैं आज तक सैकड़ों
जवान लड़कियों के साथ सोया हूं.. उनकी मर्जी से
नहीं, अपनी मर्जी से। अपने दोस्तों के घरों को भी मैंने
नहीं छोड़ा (पण्डित को हताश भाव से देखता है) मैंने
सैकड़ों कत्ल कराए । करोड़ों का माल स्मगल किया ।
लाखों रुपये रिश्वत में दिए, करोड़ों का टैक्स बचाकर
काला धन जमा किया इस देश के भीतर एक और
अपना ही, अपनी सुविधाओं का देश बनाया, मैं अखवारों
में पढ़ता था. 'लोग वातावरण के दूपण के इलाज ढूंढ़ने
की कोशिशें कर रहे हैं। आबोहवा में मर गए जहर को
साफ करने की तरकीबें खोज रहे हैं। कमेटियां बन रही.
है। कमीशन बैठाए जा रहे है. सब पढ़ार मुझे हंसी
आती थी। क्या कोई भी कमेटी, कोई भी कमीशन इग
वातावरण को मुझसे साफ कर साता है ?..किन,
लेकिन आज में जान सका हूं कि मैं दूसरो की ही
मौत नहीं, खुद अपनी मौत भी हरा पा पर मेरा
वश नहीं है । यह दरियाओ के मिल जाने में आई बार
जिसने बीच की जमीन को, मेरे द्वीप, मेरे टापू को
नेस्तनावृद कर दिया है. पण्डित ! आग एका चार मुझे
अपना साय दे लेने दो। मैं तुम्हारी तरह पाहते हुए भी
अपने को बिलकुल नगा नही कर पाऊंगा गयोति
अपने नंगेपन को देखने लायक भी नहीं रह गया है। अय
जो भी, जैसा कुछ भी है उमी के साथ मुझे भी मर सेगे
दो...
नियामत आखें और यान गोल लेता है।
है । सब अवार देख रहे हैं।
मदुल्ला : या युदा । मेरी ममम में कुछ नहीं आता...
नियामत: युदा
की ममझ
में
कुछ आ रहा है ! हम उगो बगर
भी बच मरते हैं।
सलमा : लेकिन पानी तो अब भी बन रहा है। दाना पानी पा
आया है । इसमें वचने-बचाने पुछ गानी नहीं है।
अब्दुल्ला : पिर. मी एकदंमानी कांगित...
पण्डित : इंमानी "यह जद कितना बेमानी...
अयूब ; तोटि आहy"हम गय एकगाय मिठार. आरमहापा
कर लेंगर-दूसरे के हाय पारकर रोज यही पानी
--
नियापत : मन्त्र
यन : हां, की तुम मद माय नहीं मना पाहो
?
नियामत : नहीं, मेरे पास अपने कारण हैं।
पण्डित : अब्दुल्ला तुम
अब्दुल्ला : जी. मैं नहीं..
पण्डित : क्यों?
अब्दुल्ला : मुझे अपने लड़के का मुंह देखना है और शफी साहब का
हिसाव देना है।
पण्डित : क्यों नियामत, फिर सोच ले।
नियामत : नहीं. मेरी बूढ़ी मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं
है । और क्लब की चाबियां मेरे पास हैं. सोमनाथ जी
को देनी हैं. पर मां का ख्याल...
पण्डित : (हंसकर) मां ! लड़का ! लड़का क्या है ? मां क्या
है ?, लड़के से यह-यह-यह होगा। मां यह-यह-यह
करेगी। इसके अलावा ? खैर छोड़ो''अयूब साहब
आप ? आपने ही सामूहिक आत्महत्या की बात सुझाई
थी...
अयूब : हां, अब्दुल्ला और नियामत के कारण और हो सकते
हैं। पर हम दोनों अपने ही कारणों से आत्महत्या करने
आए थे। यह सलमा यह'यह और वह चाहती थी।
पर इसे यह और वह जिंदगी और मुझसे नहीं मिला।
मैं यह, यह और वह चाहता था। पर मुझे यह और वह
जिंदगी और इससे नहीं मिला।
सलमा : मैंने तुम्हें सब कुछ दिया, फिर भी तुम्हें कुछ नहीं मिला।
अयूव : मैंने भी तुम्हें अपना सब कुछ दिया, फिर भी तुम्हें कुछ
नहीं मिला।
पण्डित : यह झगड़े का वक्त नहीं है। हां रीता...
रीता : मैं अपनी मर्जी से मर सकती हूं। मुझे आप लोगों वे
साय की ज़रूरत नहीं है । और चाहूं तो अपनी मर्ज
से तब तक जी सकती हूं जब तक जी सकने के सिल.
मिले बाकी हैं।
झुनझुनवाला अब देर मत करो "देर होने से कप्ट बढ़ता है।
अयूव । पर ये लडको (नीरा की ओर इशारा करता है)।
झुनझुनवाला इमे हम पानी में धकेल सकते हैं।
अयूय : लेकिन उसकी अपनी मर्जी का पता कैमे लगेगा? यह तो
वेहोश है।
झुनझुनवाला : तो पहले इसे होश मे ले आना चाहिए। ओह'''क्या
क्या यझट है?
पण्डित : हां, आती हुई मौत भी नहीं आती।
झुनझुनवाला : अब मौत को किस बात का इतज़ार है ? क्या मौत भी
अपना पूरा खेल दिखाकर अपने वक्त मे आना चाहती
नीरा बेहोशी से जागती है।
नीरा : दीदी. (बहुत पीड़ा से) तुम मब अभी जिंदा हो। ओह
ओह ओह...
नियामत और मन्दुल्ला सहमा महसूस
करते
हैं कि पानी कम हो रहा है।
नियामत : (उछलकर खड़ा होता है) पानी कम हो रहा है !
अब्दुल्ला : हां देखिए देखिए "पानी घट गया है"वाढ उत्तर
रही है । (एकदम मुड़कर) उधर देखिए 'टार्च को
रोशनियां और रस्मिया । वे हमे बचाने के लिए रस्मों
के सहारे आ गए हैं।
दूर से आवाजें होशियार अब्दुल्ला"तुम
लोग कहा हो"हम लोग आ गए हैं और
टाचं की रोगनियां। सोटियां। दूर पर ने
आती कोलाहल की मादाज ।
पर चढ़ नियामत : पानी एकदम उतर गया है। हम लोग क्लब की जमीन चलें... सव जैसे पानी से निकलकर सूखी ज़मीन पर आ जाते हैं। अपने कपड़े निचोड़ते हुए। अब्दुल्ला : हा ! ...अव जान में जान आई. 'या खुदा... नियामत : अब कोई खतरा नहीं है. "म वच गए हैं। उधर से मदद भी आ रही है। खतरा टल जाने पर सव एक-दूसरे से कतराते हुए लोग। सब लोग अपने कपड़े और तौर- तरीके ठीक-करते हैं। सलमा अयूब को देख- कर रीता को देखती है । रीता जलती आंखों से अयूव को देखती है। पण्डित : झुनझुन" बताओ क्या ? शुनझुनवाला : तमीज़ से बात करो' 'झुनझुन नहीं झुनझुनवाला । अपनी औकात का कुछ ख्याल है तुम्हें ? नीरा : (एकदम अवाक्) क्या हुआ ? क्या हुआ दीदी मुझे हुआ रीता : कुछ नहीं "एक नाटक पूरा होते-होते रह गया । एक इतिहास घटित होते-होते रुक गया। टेलीफोन की घंटी अब्दुल्ला बेतहाशा भागता है। अब्दुल्ला : (रिसीवर उठाकर) हल्लो' 'जी''टूरिस्ट क्लब आफ इण्डिया' कौन, शफी साहव ! जी''सलाम साहब" सलाम साहब''जी हां' 'जी हां."जी, जी, जी हां.. .
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