Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Shri Thanga Sutra�
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॥हाणं सूत्र। [ एगहाणं.] - श्री सुधर्मा स्वामी जंबूनामा शिष्य प्रते प्रकारनुं जीवतव्य भलुं ने घणु होवाथी हे आयुष्मन् शिष्य ? एम गुरुए शिष्यने आमंत्रण अर्थ-सु० सांभळ्यु मे० मे आ०हे आयुप्मन | वचन कहेल छे, त्यां महावीरदेवर्नु पुर्वोक्त तां आउपावंत शिष्य ते० ते श्री महावीर | जीवतव्य इच्छेल छे.) • ज्ञानवंते ए० एम अ० कर्तुं वार परिखदा अर्थ-ए० एक आ० आत्मा समुचय थकी १, एगे आया ॥ १॥ सुयं मे आउसं तेणं भगवया. एवं भावार्थ-चैतन्यलक्षण रुप तथा ज्ञानद- क्खायं ॥ र्शन चारित्ररुप आत्मा एकज छ। भावार्थ-सुधर्मास्वामि पोताना जंबू ना- अर्थ-ए० एक दं० दंड ना शिष्यने कहेता हवा के हे चीरंजीवी एगे दण्डे ॥ २॥ बू? श्रमण भगवंत श्रीमहावीर देवे ठाणां भावार्थ-दुष्ट मन वचन कायाये करी शास्त्रनो अर्थ आ प्रमाणे कहेल छे । जीव दंडाय ते रुप दंड एकज छे. हुं तुज प्रत्ये कहुंछं ते तुं सांभल ? (इहां अर्थ-ए० एक कि० किया रंजीवी शब्द कहेल छे ते जीवतव्य ना- एगा किरिया ॥३॥ दीक १० प्रकारे होय छे ते कहे छे. भावार्थ-मन वचन कायाथी पाप लाग- १ नाम जीवतव्य, २ स्थापना जीवत- वा रुप क्रिया एकज छे. य, ३ सचेतनादीक द्रव्य जीवतव्यना हेतु- अर्थ-ए० एक लो० एक चौद राजलोक णाथी द्रव्य जीवतव्य, ४ नारकीयादीनुं एगे लोए ॥ ४॥ शेष विना आयु ते द्रव्य मात्र सामान्य भावार्थ-छ द्रव्यतुं स्थानक चौद राज वितव्य, ५ नारकीयादीक भव ते विशेप रुप लोक एकज छे. हित जीवतव्य ते भवजीवतव्य, ६ पूर्वभ- अर्थ-ए० एक अ० अनंतो अलोक नुं तुल्य जातिपणे जीवीत ते तद्भव जीव- ष्य, ७ चक्रवादीकनुं भोग जीवतव्य, ८ एगे अलोए ।। ५॥ साधुनुं संयम जीवतन्य, ९ यशजीवतव्य, भावार्थ-जेहमां अनंतो आकाश छ एह- १० किति जीवतव्य, ए दश प्रकारनुं जीव- वो अलोक एकज छे. व्य कहेल छे, ते मांही इहां सुधर्मास्वामीए अर्थ-ए. एक ध० धर्मास्तिकाय नयूस्वामिनुं यश १ किर्ति २ संयम ३ ए त्रण एगे धम्मे ॥ ६॥ .
1 १ - (2.5 हाणं सूत्र १. भावार्थ-दरेक जीवाजीवने चलण सहा भावार्थ-जीवने आठ कर्म भोगववारुप यरुप धास्तीकाय एकज छे. वेदना एकज छे. अर्थ-ए० एक अ० अधर्मास्तिकाय अर्थ-ए० एक नि० कर्म टालवारुप निर्जरा एगे अवम्मे।। ७॥ एगा निज्जरा ॥१५॥ भावार्थ-सर्व जीवाजीवने स्थीर सहाय- भावार्थ-वार प्रकारनी तपश्चर्यावडे आ. रुप अधर्मास्तीकाय एकज छे. स्माना प्रदेशथी थोडा थोडां कर्मक्षय थवारुण अर्थ-ए० एक वं. वंध निर्जरा एफज छे. एगे बन्धे ॥ ८॥ अर्थ-ए० एक जी० जीव पा० प्रगट वादर भावार्थ -कपायादीक प्रकृतियोथी कर्म स० शरीरे प्रत्येके जुजूए शरीरे जीव वंधावा रुप बंध एकज छे. एगे जीवे पाडिकएणंसरीरएणं ॥ अर्थ-ए० एक मो० मोक्ष भावार्थ-प्रत्येक ( जुदां जुदां) शरीरनो एगे मोक्खे ॥ ९॥ धरनार प्राणधारी जीव एकज छे ( अहिओ प्रत्येक शरीर कहेवानुं कारण एटलुंज के सा- भावार्थ-सर्व कर्म क्षय रुप मोक्ष एकजछे. धारण शरीरी जीव तमाम कर्मक्षय करी शक- अर्थ-ए० एक पु० पुन्य ता नथी ने प्रत्येक शरीर जीव सर्व कर्मक्षय एगे पुण्णे ॥ १० ॥ करी शके छे तेथी प्रत्येक शरीरी जीव भावार्थ-तालीस प्रकारे शुभ कर्म प्रकृ- कहेल छे. ) ति भोगववारुप पुन्य एकज छे. अर्थ-ए० एक जी० जीवने अ० वाहिग्ला अर्थ-ए० एक पा० पाप पुदगल अणलाधे वि० विकुणा पुद्गल एगे पावे ॥ ११ ॥ एगा जीवाणं अपरियाइत्ता विउ- भावार्थ-व्याशी प्रकारे अशुभ कर्म प्रकृति व्वणा ॥१॥ भोगववारुप पाप एकज छे. भावार्थ-देवता बाहीरनां पुढगल ग्रद्या वि- अर्थ-ए० एक आ० कर्म आवे ते आश्रव ना भवधारणी गरीर बांधे ते प्रत्येके एकज एगे आसवे ॥ १२ ॥ बंधाय पण घणां बंधाय नहीं, ते आश्री जी- भावार्थ-बेतालीस प्रकारे अशुभ कर्म आ- वने एकज विकुर्वणा छे. ववारुप आश्रव एकज छे. अर्थ-ए० एक म० मन जाणीए जेणेते अर्थ-ए० एक सं० कर्म आवतां रोके ते एगे मणे ॥२॥ संवर भावार्थ-संज्ञी पंचद्री जीवना व्यापाररूप एगे संवरे ॥ १३ ॥ भावार्थ-अशुभ कर्म आवतां रोकवारुप अर्थ-ए० एक व० वचन समुचय थकी सनावन प्रकारे संवर एकज छे. अर्थ-ए० एक वे० कर्मनुं भोगवg ने वेदना भावार्थ-अनेक प्रकारे बालवा रुप वचन एगा वेयणा ॥ १२ ॥ - मन एकज छे. एगा वई ॥३॥ एकजछे. A हाण सूत्र १० - अर्थ-ए० एक का० काया वा व्यापार | विचार करवारुप वितर्क एकज छे. एगे कायवायामे ॥ ४॥ अर्थ-ए० एक स० संज्ञा भावार्थ-उदारीकादीक सात प्रकारे का- एगा सन्ना ॥ १३ ॥ याना व्यापाररुप काया एकज छे. भावार्थ-श्रवणादीक कर्या पछी विचार अर्थ-ए० एक उ० उपज फरवारुप संज्ञा एकज छे. एगा उप्पा ॥५॥ अर्थ-ए० एक म० बुद्धि भावार्थ-एक समये उपजq एकज छे. एगा मन्ना ॥१४॥ अर्थ-ए० एक वि० मर, भावार्थ-सुक्ष्म अर्थ विचारवानी बुद्धि ते एगा वियई ॥६॥ मति एकज छे. भावार्थ-एक समये विनाश एकज छे. अर्थ-ए० एक वि० पंडित अर्थ-ए० एक वि. विचर्चा ते मुवानुशरीर एगा विन्नु ॥ १५ ॥ एगा वियच्चा ।। ७॥ भावार्थ-पंडीतपणुं ते विज्ञान एकज छे. भावार्थ-जीवने परभवे उपजतां उदारीक अर्थ-ए० एक वे० वेदना ते कर्म भोगवई तथा वैक्रिय शरीर एकज छे. एगा वेयणा ॥१६॥ अर्थ-एक एक ग० गती भावार्थ--ज्वर प्रमुख कर्म वेदना (भोगव) एगा गई ॥८॥ एकज छे. भावार्थ-मनुष्यादीकमांथी नरकादीके ज- अर्थ-ए० एक छे० छेद वारुप गती एकज छे. एगे छेयणे ॥ १७ ॥ अर्थ-ए० एक आ० आगती भावार्थ-खडकादीक शस्त्रेथी करी शरीर एगा आगई ॥९॥ प्रमुखनुं छेदq ते एकज छे. भावार्थ--नर्कादीकमांथी मतुप्यादीकमां अर्थ-ए० एक मे० भेदई आववारुप गती एकज छे. एगे भेयणे ॥ १८॥ अर्थ-ए० एक च० मरण भावार्थ-भालादीकेकरी भेदवू ते एफजछे, एगे चयणे ॥१०॥ अर्थ-ए० एक म० मरण अ० चरम सा० भावार्थ-देवतानुं मर्ण ते चवळू एकज छे. शरीरने अर्थ-ए० एक उ० उपजवू एगे मरणे अन्तिमसारीरियाणं ।।१९।। एगे उववाए ।। ११ ॥ भावार्थ-डेल्लु शरिर मुकी तेहज भवे भावार्थ-देवता नारकीनो जन्म ते उपजदूं मोक्ष जाय ते जीवने एकजवार मर्ण छे. अर्थ-ए० एक सं० कपाय रहित संशुद्ध अर्थ-ए० एफ त विचारणा अ० यथाभूत प० पात्र शुद्ध चारित्रनुं पात्र एगा तका॥ १२ ॥ एगे संसुद्धे अहाभूए पत्ते ॥२०॥ भावार्थ-मस्तक प्रमुख खजवानवादीक भावार्थ-जे नत्वना गाण केवळी तीर्थ एकज छे.
एकज छे. (१) हाणं मूत्र १, करतेहज उत्तम पात्ररुप शुद्ध चारित्रीयो । तिपी ३. चैमानीक ४. ए चार जातीना दे- एकज छे. वता मनुप्यने दरेक समय समय प्रत्ये शुभ के अर्थ-ए० एक दु० दुःख जी० जीवने अशुभ मनोयोग एकज छ, अर्थात् एक समये एगे दुक्खे जीवाणं ।। २१ ॥ शुभ के अशुभ वेमांहीथी एकज मनोयोग होय भावार्थ-जे जन्मयां मोक्ष जवान होय ते । छे पण वे योग होय नहि. जीवने छेल्ला भवतुं दुःख एकज छे. अर्थ-ए० एकव० वचन दे० चेमानीक अ० अर्थ-ए० एक भू० भूत प्राणी भवनपती म० मनुष्यनुं तं० ते तं० ते बोल- एगे भूए ॥ २२॥ वाना सं० समयने विपे भावार्थ-सर्व जीवनो आत्मारूप स्वभाव एगा वई देवासुरमणुयाणं तंसि तं. सि समयंसि ॥ २६ ॥ अर्थ-ए-एक अ.अधर्मनी प० प्रतिज्ञा जं. भावार्थ-देवता मनुष्यने दरेक समय स- जेणे से० करी आ० आत्मा प० अतिथे क्लेश मय प्रत्ये शुभ के अशुभ वचनयोग एकज छे पामे (अर्थात एक समे शुभ के अशुभ एकज भाषा एगा अधम्मपडिमा जं से आया बोलाय पण वे भापा बोलायज नहि.) परिकिलेसइ ।। २३॥ अर्ध-ए० एक का० कायानो वा व्यापार दे देवता अ० भवनपती० म० मनुप्य तं० भावार्थ-जे अधर्मथी आत्मा क्लेश पामे ने ते तं ते० स० समयने विपे, दुःख भोगवे ते पापरुप अधर्म करनार शरीर एगे कायवायामे देवासुरमणुयाणं अर्थ-ए० एक घ० धर्मनी प० प्रतिज्ञा जं. तंसि तसि समयसि ॥ २७ ॥ जेणे क० करी आ० आत्मा जीव प० पर्याय भावार्थ-देवता मनुष्यने दरेक समयसमय उपना निर्मल थाय ते प्रत्ये शुभ के अशुभ काययोग एकज छे (अ- एगा धम्मपडिमा जं से आया प- थीत एक समये एकज काययोग होय पण वे योग होय नहि.) ज्जुबज्जाए ॥ २४॥ अर्थ-ए० एक उ० उठ, क० कर्म ते चालवू भावार्थ-जे धर्मे आत्मा ज्ञानादीक गुण प्रमुप व० शरीरनु सपर्यपणुं वी० वीर्य ते पामीने मुरवी थाय ते धर्म जे शरीरे करीये जीवधी उपर्नु पु० पुरुपकार अहंकार प० प- ते धर्मनुं शरीर एकज छे. राक्रम दे० देवता अ० भवनपती म० मनु- अर्थ-ए० एक म० मन दे० देवता अ० भव प्यने तं० ते तं ते स० समयने विपे. नपती म० मनुप्यनु नं० ते त० ते स० सम एगे उट्ठाणकम्मबलवीस्यिपुरिसका. यने विपे मन एक परकमे देवासुरमणुयाणं तमि तमि एगे मणे देवापुरमणुयाणं तामे ममयंमि ।। २८ ॥ तसि समयमि ॥ २५ ॥ भावार्थ-ठाण ते गमेने कार्य करना ब्यु भावार्थ-भवनपनी १. वाणव्यंतर २. जो- १, कर्म न प्रमाणादीक क्रीया २, बळ ते शु- एकज छे. ।
. + -- हाणं सूत्र १. (५) रीरनी समर्थाइ ३, विर्यने जीवनुं वळ एटले | परमाणु पुदगळ एकज छे. धारेलु कार्य पुर्ण करवानी हिंमत ४, पुरुषा अर्थ-ए. एक सि० सिद्धसिला कार पराक्रम ते, अहंकारथी उपन्युं पोतानुं एगा सिद्धी ॥१॥ पराक्रम ५, ए पांचे वस्तु देवता मनुष्यने द- भावार्थ-पीस्तालीस लाख जोजन प्रमाणे रेक समय समय प्रत्ये एकज होय छे ( अर्थात् सिद्ध सिल्ला एकज छे. एक समे वे होय नहीं.) अर्थ-ए० एक सि० सिद्ध अर्थ-ए० एक ना० ज्ञान एगे सिद्धे ॥२॥ एगे नाणे ॥ २९॥ भावार्थ-सर्व सरीखा स्वरूपे सिद्धना जीव भावार्थ-ज्ञानावर्णि कर्मना क्षय थकी उ एकज छे. त्पन्न थयेलं ज्ञान केवलज्ञान एकज छे. अर्थ-ए० एक प० अतिशे णि निर्वाणक अर्थ-ए० एक दं० दर्शन हेता स्वस्थ थापq. एगे दंसणे ॥३०॥ एगे परिणव्वाणे ॥१॥ भावार्थ-दर्शनावणि कर्मना क्षयथकी उ भावार्य-फरी दुःखमा आवई नही ने सर्वे त्पन्न थयेलू सामान्यथी जाणवु ते केवळ मुखनी प्राप्ति थवी केजे कर्मरूपी दावानल दर्शन एकज छे. ओलवी शितळी भुत थवा रूप निर्वाण पद अर्थ-ए० एक च० चारित्र एगे चरित्ते ॥ ३१ ॥ अर्थ-ए. एक प० अतिशे णि० दुःख भावार्थ-सामान्यथी देशविति सर्व विति | रहित था. रुप चारित्र एकज छे. एगे परिणिव्वुए ॥ २॥ अर्थ-ए० एक स० समयकाल भावार्थ-सर्व प्रकारे शरीर अने मननी एगे समए । अशांतार्नु रहितपणुं ते मोक्ष एकज छे, भावार्थ-जेहमां वीजो भेद नथी ने समय- अर्थ-ए० एक स० शब्द थी सुक्ष्मकाल मान वीजें नथी एवो समय एगे सद्दे ॥ १ ॥ काल एकज छे. भावार्थ-जीवनो शब्द १ अजीवनो शब्द अर्थ-ए० एक प० प्रदेश २ मिश्रनो शब्द ३ एत्रणे मळी काननो विषय एगे पएसे ॥१॥ ते शब्द एकज छे. भावार्थ-एक मांहीथी चीजो भाग थाय अर्थ-ए. एक रु० रुप नही ते धर्मास्ति काय १ अधर्मास्ति काय २ एगे रूबे ॥ २॥ आकास्तिकाय ३जीव ४ अजीव ५ ए पांचना भावार्थ-कालो. १ पीलो. २ धोलो. अवयवते प्रदेश एकज छे. ३ रातो. ४ लीलो. ५ ए पांचरंग मळी आं- अर्ध-ए० एक प० परमाणु खनो विषय ते रूप एकज छे. एगे परमाणू ॥ २॥ अर्थ-ए० एक ग० गंध भावार्थ-एकना चे भाग थाय नही ते एगे गन्थे ।। ३॥ एकज छे. . । - " । एकज छे. हाणं मूत्र १. भावार्थ-मुर्गध. १ दुर्गध. २९ चे मळी अर्थ-ए० एक र० टुंकु नाशीकानो विपय ते गंध एकज छे. एगे रहस्से ॥ ११ ॥ अर्थ-ए० एक र० रस भावार्थ-डैको आकार एकज छे. एगे रसे ॥ ४ ॥ अर्थ-ए० एक व० वाटल पुदगल भावार्थ-खाटो. १ मीठो. २ तीखो. ३ एगे वट्टे ॥ १२ ॥ कडवो. ४ कसायलो. ( हरम्यो.) ए पांचे मळी जीभनो विपय ते रस एकज छे. भावार्थ-लाडवाने आकारे गोळ आकार अर्थ-ए० एक फा० फर्श एगे फामे ॥ ५॥ अर्थ-ए० एक तं० त्रिषुणो भावार्थ-हळतो. १ भारे. २ टाढो. ३ एगे तसे ॥ १३॥ उष्ण ४ खरखरो. ५ मुहाळो. ६ लुखो.७ भावार्थ-सीधोडोने आकारे त्रीखुणीयो चोपडयो. ८ ए आटे मळी कायानो विपय आकार एकज छे. ते स्पर्श एकन छे. अर्थ-ए० एक च० चौपुणो अर्थ-ए० एक मु० मनोज स० शब्द एगे चउरंसे ॥ १४ ॥ पगे सुम्भिमद्दे ॥ ६॥ भावार्थ-चोरसाने आकारे चौखुणो आ- भावार्थ-मधुर वचन बोलवा रूप भलो कार एकज छे. शब्द एकज छे. अर्थ-ए० एक पि० पहोलं अर्थ-ए० एक दु० अमनोज्ञ स० शब्द एगे पिहुले ॥१५॥ एगे दुन्भिसद्दे ॥ ७॥ भावार्थ-विस्तारवंत पहोळो आकार भावार्थ-कडवू वचन बोलवारुप भुंडो शब्द एकज छे. अर्थ-ए० एक प० परिमंडल वलयाकार अर्थ-ए० एक मु० मनोज ० रूप एगे परिमण्डले ॥ १६ ॥ एगे सुख्खे ॥ ८॥ भावार्य-हायनी चुदीने आकारे गोल आ- भावार्थ-चित्तने हरण करे एवं भलं रुप कार एकजले. अर्थ-ए० एक कि० कालो अर्थ-ए० एक दु० अमनोझ रु० रुप पगे किण्हे ॥ १७॥ एगे दुरूवे ॥ ९ ॥ भावार्थ-चित्तने उद्वेग करे एवं सुई रुप भावार्थ-सर्व जातिनो कालो वर्ण (रंग) छे. एकज एकज हे. अर्य-१० एक दी. लांब अर्थ-ए० एक नी० लीलो एगे दीहे ॥ १०॥ एगे नीले ॥१८॥ भावार्थ-लाकडीनी परे लांब संस्थान भावार्थ-सर्व जातिनो लीलो वर्ण ए- (आकार ) एकन ले. एकज छे. एकज छे. कजले.
३ द्वाणं मूत्र-१. (७) अर्थ-ए० एक लो० रातो भावार्थ-लीबु प्रमुख सर्व जातिनो खाटो एगे लोहिए ॥ १९ ॥ रस एकज छे. अर्थ-ए० एक म० मीठो भावार्थ-सर्व जातिनो रातो वर्ण एकजछे. एगे महुरे ॥ २८॥ अर्थ-ए० एक हा० पीलो भावार्थ-शेलडी प्रमुख सर्व जातिनो मधुरो एगे हालिद्दे ॥ २०॥ रस एकज छे. भावार्थ-सर्व जातिनोपीलो वर्ण एकजछे अर्थ-ए० एक क. खरखरो फरस जा० अर्थ-ए० एक सु० धोलो यावत लु० लुखो. एगे सुकिले ॥ २१ ॥ एगे कक्खडे जाव लुक्खे ॥२९॥ भावार्थ-सर्व जातिनो धोलो वर्ण एकजछे. भावार्थ-पापाणांदिक सर्व कठण स्पर्श अर्थ-ए० एक सु० सुगंध एकज छे. एमज हळतो. १ भारे. २ टाहो. एगे सुभिगन्धे ॥ २२ ॥ ३ उष्ण. ४ खरखरो. ५ मुंहालो. ६ लुखो. भावार्थ-कस्तुरी प्रमुख सर्व जातिनी सु- ७ ए सर्व स्पर्श एकेकज छे. गंधी एकज छे. अर्थ-ए। एक पा० प्राणातिपात हिंसा. अर्थ-ए० एक दु० दुर्गध ए० एक मु० मृपावाद जू? ए० एक अ० अद- त्तादांन ते चोरी. ए. एक मे० मैथुन ते एगे दुन्भिगन्धे ॥ २३ ॥ स्त्रीसेवा जा० थावत् ए० एक प० परिग्रह ते भावार्थ-हींग प्रमुख सर्व जातिनी दुर्गधी एगे पाणाइवाए जाब एगे प- अर्थ-ए० एक ति० तीपो रिग्गहे ॥ १॥ एगे तिते ॥ २४ ॥ भावार्थ-प्राणातिपात जीवहिशा. १ मृपावाद भावार्थ-मरी प्रमुख सर्व जातिनो तीखो ( जुट्रं ) २ अदत्तादान अणदीधेडं लेषु ते रस एकज छे. चोरी ३ मैथुन (विपय ) ४ परिग्रह ५ ए सर्वे अर्थ-ए० एक क० कईओ एकेकज छे. एगे कडुए ।। २५॥ अर्थ-ए० एक को क्रोध ए. एक मा० भावार्थ-कालीजीरी प्रमुख सर्व जातिनो मान ए० एक मा० माया जा. यावत् ए० कडवो रस एकज छे. एक लो० लोभ अर्थ-ए० एक क० कसायलो एगे कोहे जाव लोमे ॥ २ ॥ एगे कसाए ॥ २६ ॥ भावार्थ-क्रोध (रिस) अंहकार कपट भावार्थ-हलदर प्रमुख सर्व जातिनो कसा लोम ए सर्व एकंकज छे. यलो रस एक छे. अर्थ-ए० एक पे० राग अर्थ-ए. एक अं० पाटो एगे पेज्जे ॥३॥ एगे अम्बिले ॥ २७ ॥ भावार्थ-स्नेह रूप प्रेम एकन छ, धन. एकज छे.
(८) हाणं मूत्र १. ३१ ३ अर्थ-ए० एक दो० द्वेष जा० यावत ए० एगे कोहविवेगे जाव मिच्छादसणा- एक प० पारको प० अपवाद सल्लविवेगे ॥२॥ एगे दोसे जाव एगे परपरिवा- भावार्थ-क्रोधनोत्याग करवो ते एकजछे. ए॥४॥ एमज मान. १ कपट, २ लोम. राग. भावार्थ-दोप रूप द्वेष ते एकज छे. एमज ४ द्वेष. ५ क्लेश. ६ कलंक. ७ चुगली. कलेश. १ अभ्याख्यान. ( आळदेवू ते) ८ निंद्या. ९ रती. १० अरती. ११ कपट २ पीशुन (चाडी करवीते) ३ पारकी नींद्या सहित जुटुं वाक्य. १२ मिथ्यात्व दर्शन ४ ए सर्व एकेकज छे. सल्य. १३ ए सर्वे पापथी नीवर्तg ते सर्वे अर्थ-ए० एक अ० अरती र० रती. एकेकज छे. एगा अरइरई ॥ ५॥ अर्थ-ए० एक ओ० अवसप्पिणी काल भावार्थ-अरति ( उद्वेग ) १ रती (आनं एगा ओसप्पिणी ॥१॥ दहर्ष )२ ए एकेकज छे. भावार्थ-जीहां आयुप प्रमुख सर्व भाव अर्थ-ए० एक मा० माया मो० मृपा दीनप्रतिठीन हांणी पामताजाय ते अवसर्पिणी एगे मायामोसे ॥६॥ ( पडतो) काळ एकज छे. भावार्थ-कपट सहित जुटुं बोलधु तेएकजछे अर्थ-ए० एक मु० सुपमा मु० मुपमा अर्थ-ए० एक मि० मिथ्यात्व द० दर्शन ' पेहेलो आरो जा० यावत ए० एक दू० दुपमा दु० दूपमा छठो आरो एगे मिच्छादसणमल्ले ॥ ७ ॥ एगा सुममसुसमा जाव एगा दू- भावार्थ-शल्य (कांटो) नीपेरे दुःखदाइ समदूममा ॥ २॥ ते मिथ्यात्वदर्शन शल्य एकन छे. (ए अहार भावार्थ-र अवसर्पिणी काळमा छ आरा पाप स्थानक जाणवा.) होय छे, ते मांही पहला आरामा मुखनी अं. अर्थ-ए०एक पा० प्राणनु पाडवो तेथी वे० दर पण अत्यंत मुख.१ वीजामां एकटं मु. विरमवू जा० यावत प०परिग्रहथी वे विरमधु खज. २ त्रीजामा मुख घj ने दुःख थोई. एगे पाणाइवायवेरमणे जाव परिग्ग- 3 चोथामा दुःख घj ने मुख थोइं. ४ पां- चमामांही एकलु हवेरमणे ॥ १॥ दुःखज. ५ छठामाही भावार्थ-जीवहिंगाची निवर्तव॒ ते एकज छे. दुःखनी अंदर पण अत्यंत दुःख. ६ ए सर्वे छ आरा एकेकज छे. एमन मृपावाद. १ अदत्तादान. २ मैथुन. अर्थ-ए. एक उ० उत्सर्पिणी काल . परिग्रह. ४ एहथी निबर्न ते सर्व एकेकज छे. एगा उस्माप्पिणी ॥३॥ अर्थ-ए० एक को क्रोधनो वि० त्याग भावार्थ-जीहां आयुप्य प्रमुख सर्वभाव जा व्यावत मि० मिन्ल्याव दं० दर्शन स० दीनमनिदीन चदनानाय ते उन्सपिणी काल सत्य वि० त्याग स० सल्य - ए x एकनछे.
- 1 - 4 है हाणं सूत्र १. (९) अर्थ-ए० एक दू० दुपमा दू० दुषमा पहेलो वायु. ४ वनस्पति. ५ वे इंद्रीजीव. ६ तेई- आरो जा० यावत ए० एक मु० सुपमा सु०द्रीजीव. ७ चौइंद्रीजीव. ८ तिर्यंचपचेंद्री. ९ सुषमा छठो आरो. मनुष्यपचेंद्री. १० वाणव्यंतर ११ जोतिपी. एगा दूसमदूसमा जाव सुसमसु- १२ वैमानीक. १३ नारकीथी मांडी वैमा- समा॥४॥ नीकसुधी चोवीस दंडकना सर्वे जीवनी व- गणा एकेकीज छे. भावार्थ-ए उत्सर्पिणीकाळमां छ आरा अर्थ-ए० एक भ० भन्यजीवनोव०समुदाय होय छे, ते मांही पहेला आरामां, दुःखमां अत्यंत दुःख. १ वीजामां एकलं दुःखज. २ एगा भवसिद्धियाणं वग्गणा ॥३॥ श्रीजामां दुःख घणुं ने सुख थोडं. ३ चोथा भावार्थ-जे अनंते भवे पण छेवट मोक्ष मां सुख घणुं ने दुःख थोडं. ४ पांचमामां जशे ते भव्य जीवनी वर्गणा एकज छे. एकलु सुखजः ५ छहामां मुखनी अंदर पण अर्थ-ए० एक अ० अभन्य जीवनो ३० अत्यंत सुख. ६ ए सर्व छ आरा एकेकज छे समुदाय. ('दर्श क्रोडाकोडी सागरोपमनो उत्सर्पिणी एगा अभवसिद्धियाणं वग्गणा॥४॥ काळ अने दश क्रोडाकोडी सागरोपमनो अ- भावार्थ-जे अनंतेभवे पण कोइ वखत पसर्पिणीकाळ ए वे मनी वीस क्रोडाकोडी सागरोपमनुं एक काळचक्र कहेवाय छे.) मोक्षनेवि नहि जाय एवा अभव्य जीवनी वर्गणा एकज छे. अर्थ-ए० एक ने० नारकीनो व० समुदाय. अर्थ-ए० एक भ० भव्यजीव ने० नार- एगा नेरझ्याणं वग्गणा ॥१॥ भावार्थ-साते नर्कना नारकी जीवनी व एगा भवसिद्धियाणं नेरझ्याणं व- गणा ( समुदाय ) एकम छे. ग्गणा ॥ ५॥ अर्थ-ए एक अ० असुर कुमारनो व० स- मुदाय च० चउवीस दंडकनो समुदाय जा० भावार्थ-भव्य सिद्धिक नारकीनी वर्गणा पावत ए० एक वे० वेमानीकनो १० समुदाय अर्थ-ए. एक अ० अभव्य जीव ने० ना- एगा असुरकुमाराणं वग्गणा | च- रकीनो व० समुदाय ए० एम जा० यावत ए. उवीसदण्डओ जाव एगा वेमाणि- एक भ० भन्यजीव वे० वैमानीकनो ३० याणं वग्गणा ॥२॥ समुदाय. भावार्थ--अशुरकुमार. १ नागकुमार. २ एगा अभवसिद्धियाणं नेरइयाणं व- सुवर्णकुमार. ३ विद्युत्कुमार. ४ अग्नीकुमार ५ द्वीपकुमार. ६ उद्धीकुमार. ७ दिशाकुमार गगणा । एवं जाव भवसिद्धियाणं ८ थायुकुमार. ९ स्थनीतकुमार. वेमाणियाणं वग्गणा ॥६॥ मकारना भुवनपति देवतानी वर्गणा एकेकी भावार्थ-अभव्य सिद्धिक नारकीनी वर्ग- ज छे. एमज पृथ्वी. १ पाणी. २ अन्नी.३ णा एकज छे.एम यावन् वैमानीक सुधी चौ- कीनो व० समुदाय. एकज छे.
जीवनो व० समुदाय. एफज छे. (१०) हाणं सूत्र १. विस दंडकना सर्व भव्यसिद्धिकजीवनी वर्ग- एगा सम्मदिट्ठियाणं नेरइयाणं व- णा एकेकीज छे. ग्गणा ॥ ११ ॥ अर्थ-ए० एक अ० अभव्य जीव वे० वै- मानीकनो व० समुदाय. भावार्थ-समकितद्रष्टी नारकीनी : वर्गणा एकज छे. एगा अभवसिद्धियाणं वेमाणियाणं अर्थ-ए. एक मि० मित्थ्यात्व दि० द्रष्टी वग्गणा ॥ ७॥ जीव ने० नारकीनो व० वर्गणा. भावार्थ-एमज चोविस दंडकना वैमानीक एगा मिच्छद्दिट्ठियाणं नेरइयाणं व- साथे सर्वे अभव्यसिद्धिक जीवनी वर्गणा एकेकीज छे. ग्गणा ॥ १२ ॥ अर्थ-ए० एक स० सम्यग दि० द्रष्टी भावार्थ-मिथ्यात्वद्रष्टी नारकीनी वर्गणा अर्थ-ए० एक स० सम्यग मि० मित्ल्या एगा सम्महिट्ठियाणं वग्गणा ॥८॥ दि० दरी ने० नारकीनी व० वर्गणां. ए. भावार्थ-मिथ्याल मोहनी कर्मना भयोप- शमथी जीनमणीत वचन सत्य करि जाणे | एम जा० यावत थनितकुमारनो समुदाय. ते सर्वे समकित द्रष्टि जीवनी वर्गणा एकजछे. एगा सम्मामिच्छद्दिट्ठियाणं नेरइ. अर्थ-ए० एक मि० मिथ्या दि. द्रष्टी | याणं वग्गणा । एवं जाव थणियकु- जीवनो व० समुदाय. माराणं ॥ १३ ॥ एगा मिच्छदिहियाणं वग्गणा ॥९॥ भावार्थ-मिश्रद्रष्टी नारकीनी वर्गणर ए- भावार्थ-मिथ्यात्व मोहनी कर्मना उदय कज छे. एमन दशे भुवनपति देवता सम- थी जीनप्रणीत वचनने विप्रीत रीते माने ते कीत. १ मिथ्यात्व. २ मिश्र. ३ एत्रणे मिथ्यात्वी जीवनी वर्गणा एकज छे. द्रष्टीवाला जीवनी वर्गणा एकेकीज छ. अर्थ-ए० एक स० सम्यग मि० मिथ्या दि० अर्थ-ए. एक मि मिल्याली पु० - द्रष्टी जीवनी व० वर्गणा समुदाय. थ्वीकार्डयानो व० समुदाय ए० एम जा० एगा सम्मामिच्छदिहियाणं वग्ग- यावत व. वनस्पतीकायना जीवने जाणतो. णा॥ १० ॥ एगा मिच्छद्दिहियाणं पुढविकाइया- भावार्थ-जेने जीनप्रणीत वचन उपर रागणं वग्गणा । एवं जाव वणस्सइकाइ- नहा तेम द्वेप पण नहीं ने सर्वे धर्मना कयन याणं ॥ १४ ॥ सत्य करि माने ते मियदष्ट्रि जीवनी वर्गणा भावार्य-मिथ्यान्वद्रष्टि पृथ्वीकाय जीवनी वर्गणा एकल छे. एमन मिध्यावष्टि पा. अर्थ-ए० एक० सः सम्यग हि० द्रष्टी णी, अग्नि, वायु, वनस्पनिकाय जीवनी जीय ने० नारकीनो समुदाय वर्गणा एककीन छे. - एकन है.
-- . - - . जाय छे.) हाणं सूत्र १, (११) अर्थ-ए०एक स० समकित दि० द्रष्टी वे. द्रष्टि ३ ए त्रणे भेदनी एकेकी वर्गणा छे. बेइंन्द्री जीवनो व० समुदाय. अने ए सर्वमा सम्यकदर्शन. १ मिथ्यात्वद- एगा सम्मद्दिहियाणे बेइन्दियाणं र्शन. २ मिश्रदर्शन. ३ ए त्रणे दर्शन छे. अर्थ-ए० कि०कृष्ण प० पक्षिया जीवनी वग्गणा ॥१५॥ भावार्थ-समकित वमतो घेइंद्रि मांही आवे | व० वर्गणा. ते वारे उपजती वेळाए छ आवळीका सुधी एगा किण्हपक्खियाणं वग्गणा ॥ सास्वादान समकित होय, ते समकितद्रष्टि ॥ १७ ॥ वेइंद्री जीवनी वर्गमा एकज छे. (छ आव भावार्थ-जेहने अर्ध पुदगल परावर्तनथी लीका पछी जरुर मिथ्यात्वद्रष्टि थइ | अधीको संसार परिभ्रमण करवानुं होय ए- टले व्होळा (घणा) संसारीजीव ए कृष्ण- अर्थ-ए० एक मि० मिथ्यात्वी वे० वेइ- पक्षीया जीवनी वर्गणा एकज छे. न्द्रीजीवनो व० समुदाय ए० एम ते तेइन्द्री ने वि० पण जाणवू च० चउरिन्द्रीनी वर्गणा ते आ प्रमाणे कहेवाय छे. (इहां अर्ध पुद्गल परावर्तन कहेल छे वि. पण एमज सेवीजा ज० जेमने नार- उदारीक. १ वैकेय. २ तेजश. ३ का- कीनी पेरे जाणवा जा० यावत ए० एक मण. ४ मन. ५ वचन. ६ सासोश्वास. ७ स० सम्यग मि० मिथ्या दि० द्रष्टी वे० वैमानीकनी व० वर्गणा त्रणेते एक. ए सात प्रकारना पुदगळ परावर्तन छे ते द्रव्य- थी. १ क्षेत्रथी. २ काळथी. ३ भावथी. ४ एगा मिच्छदिट्ठियाणं बेइन्दियाणं ए चार प्रकारे चौविस दंडकना सर्व प्राणी वग्गणा । एवं तेइन्दियाण वि चउरिन्दि- | करे ते चोवीस दंडके १३४ वर्गणा थाय ते याण वि । सेसा जहा नेरझ्या जाव ते. पृथ्वी. १ पाणी. २ अग्नी. ३ वनस्पती. हना नाम कहेछे. एकेंद्री जीवनी २१ वर्गणा एगा सम्मामिच्छादिट्ठियाणं वेमाणि- ४ ए चारेने उदारीक. १ तेजश. २ कार्मण याणं वग्गणा ॥ १६ ॥ ३ सासोश्वास. ४ ए चार वर्गणा तेथी चार भावार्थ-मिथ्यात्वद्रष्टि घेइंद्री जीवनी व- चोकुं १६ थइ अने वायुने पुर्वोक्त चार अने गणा एकन छे. (पेइंद्रीमा मिश्रद्रष्टी होय एक वैक्रेय ए पांच वर्गणा मली कुल २१ तथा नही. ) एमज समकीतद्रष्टि तेइंद्री जीवनी साधारण वनस्पतिने उदारीक. १ तेजस. एक वर्गणा. मिथ्यात्वद्राष्ट तेइंद्री जीवनी २ कार्मण. ३ ए त्रण वर्गणां, ए कुल मळी एक नर्गणा. समकीवद्राष्ट चाइंद्री जीवनी २४ एकेंद्रीनी वर्गणा. एक वर्गणा. मिथ्यात्वद्रष्टि चौइंद्री जीवनी बेइंद्री १. तेइंद्री २, चौइंद्री एत्रणेने उदा- पण एक वर्गणा हे. शेप ते गर्भन तिर्यंच रीक १. तेजश २ कार्मण ३. सासोबास४. पंचेंद्री. १ तथा मनुष्य. २ व्यंतर. ३ जो ए चार चार वर्गणा गणनां बार वर्गणा वि. तीपी. ४ वैमानीफ ५ ए सर्वमां नारकीनी गलेंद्रीनी (इटां विगजेंद्रीने मापा छे एण पेरे समक्तिद्राहि १ मित्यालद्रष्टि. २ मिथ । असंही होवायी गणी नथी.) -- . (१२) द्वाणं सूत्र १. नारकी १. दशभूवनपति ११. चाणव्यं योव याय. ४ सात थोवे एक लव (घासनी तर १२. जोतीपी १३. वैमानीक १४. ए पुळी पकडी तिक्षण दातरदाये अडपथी एक चौदेने उदारीक वर्जिने छ छ वर्गणा गणतां कडलो कापे ते) थाय. ५ चौदेछके ८४ थइ. मनुष्य १ तिर्यंचने २ सीतोतेर लवे एक मुहुर्त (वे घडी) सान सात वर्गगां गणतां १४ थइ कुल सर्वे थाय, अथवा ३७७३ श्वासोचासे एक मुहूर्त मनी १३४ वर्गणा जाणवी. (वे घडी) याय. ६ त्रीस मुहुर्ते एक अहो ए १३४ वर्गणाए करीने लोकमांही पु- (दीवस) रात्री थाय. ७ पन्नर अहो रात्रीए वोक्त सात प्रकारना जेटलां पुदगळछे तेटलां एक पखवाडीयु धाय. ८ वे पखवाडीये एक लइलइने मुके तेबारे एक द्रव्यथी वादर पुदगळ मास चाय. ९ वे महीने एक रुतु थाय. १० परावर्तन थाय, अने एज १३४ वर्गणाये क- त्रण रुतुये एक अयन याय ११ वे अपने रिने अनुक्रमे लोकमाहिथी पुदगळ ग्रहीग्रहीने एक वरस थाय. १२ पांच वर्षे एक युग मुके पण वचे वीजा पुदगल लीये ते न गणवां थाय. १३ विस युगे सो वर्ष थाय. १४ तेहने शुक्ष्म पुदगळ परावर्तन कहीये. ए द्रव्य- हवे पल्योपम सागरोपमनुं प्रमाण कहे छे. थी पुदगल परावर्तन कयु. ? अनंता मुक्ष्म परमाणुंए एक व्यवहार हवे क्षेत्रयी पुदगल परावर्तन कहे छे. परमाणु याय. १ अनंता व्यवहार परमाणु क्षेत्रयी पुदगळ परावर्तननावे भेद, शुक्ष्मने ए एक उस्नसण्डियो थाय. २ आठ उस्नसः वादर, तेमांही बादर ते जंबूद्वीपना मध्यभागे ण्डिये एक सण्ड सण्यिो थाय. ३ आठ सा मेरु पर्वत छे, ते मेरुना मध्यभागे आकाशना सहिये एक उर्द्धरेणुं थाय. ४ आठ उद्धरेणुंये आठ रुचक प्रदेश छे, ते रुचकप्रदेशयी दिशी | एक त्रसरेणुं थाय. ५ आठ त्रसरेणुंए एक ने विदिशी लोकना अंतसुधी मंडाणी निहां रघरेणुं थाय. ६ आठ रथरेणुये एक त्रण जेटला आकाश प्रदेश छे नेटला भव करे पत्योपमना आयुपवाला देवकुरु उत्तरकुरु तेहने क्षेत्रयी वादर पुदगल परावर्तन कहीये?. युगळीया मनुप्यनो एक वाळाय थाय. ७ अने जे रुचक प्रदेशयी माडीने अनुक्रमे दरेक आठ देवकुरु उत्तरकुरु युगलीया मनुष्यना प्रदेश प्रदेशे भव करे तेहज लेखांमां गणाय, वाळाग्रे, वे पल्योपमना आयुपवाला हरि- पण अनेरे अनेरे प्रदेशेभव करे ते गणत्रीमा वास रम्यक्वास युगळीया मनुष्यनो एक नहीं तेहने क्षेत्रयी शुक्ष्म पुदगळ परावर्तन वालाग्र थाय. ८ आट हरीवास रम्यक्वास कहीये २. युगळीआ मनुष्यना वालाग्रे एक पल्यापमना हवे काळयी पुदगल परावर्तन कहेछे. आयुपवाळा हेमवय, एरणवय, युगळीया इहां प्रथमकाननू प्रमाण कहे छे. झडपधी मनुप्यनो एक वाळाय थाय, ९ आठ हेमरय आंस विचीन स्याडे नेमांडी असंख्याता स एरणवय युगलीया मनुप्यना वाळा, पूर्व मय जाय. ते असंव्याना समयनी एक आ- पथिम महाविदेहनां मान दीवसनां जन्मेला वनीका थाय १. मंख्याती प्रावनीकाए एक मनुप्यनो एक वाळाय याय. १० नेहवा पूर्व उत्थान तथा नियाम वाय. २ एक उपवास । पश्रीमना मनुप्यना आठ वालाग्रे एक लीय निवासे पक प्राणु धाय.३ सात प्राणुए एक थाय. ११ आट लींचे एक याय. १२ 1 - - हाणं सूत्र १, (१३) - ३ - - आठ जुये एक जवनो मध्यभाग याय. १३ | असंख्यातां स्थानक छे ते अकेक प्रणामने आठ जवना मध्यभागे एक उत्सेधांगुळ | स्थानके भव करे तेहने भावथी वादर पुद्गल याय. १४ एवां छ उत्सेधांगुळे एक पगर्नु परावर्तन कहीये. १ अने सुक्ष्म ते जीवना पहोळपणुं थाय. १५ एवां वे पगे एक वेंत एहज प्रणामना स्थानके अनुक्रमे लगता भव थाय. १६ वे वेंते एक हाथ. १७ वे हाथे करे तेहज लेखामां गणाय पण अनेरे प्रणाम एक कुक्षी थाय. १८ वे कुक्षीए एक धनुष्य भव करे ते गणत्रीमां नही, तेहने भावथी थाय. १९ वे हजार धनुष्ये एक गाउथाय. सुक्ष्म पुद्गल परावर्तन कहीये. ४ २० चार गाउए एक जोजन थाय. २१ तेवा चौविस दंडकना सर्व जीवे अतीतकाळे साते एक जोजन प्रमाणे लांवो पोहोळो एक कुवो प्रकारना पुद्गल परावर्तन अनंतअनंतवार कल्पीए. एक वाळना असंख्याताखंड (कडका) कयो, अने आगळ कोइ करशे ने कोई नहीं कल्पीए. तेवाळाने ते कुवो ठांसीठांसी भरीए करे, करशे तेजधन्य एक वे ने त्रण उत्कृ- ते एटले सुधीके ते कुवाउपर चक्रवर्तिन सैन्य या अनंता करशे. ८४ लाख हाथी, ८४ लाख घोडा, ८४ लाख रथ, ९६ करोड पायदल जाय तोपण अनंताकाळचक्र जाय त्यारे एक कार्मण दवाय नहीं, पछी ते कुवामाथी सोसो वरसे | पुद्गळ परावर्तन थाय. १ अनंताकार्मण पु- अकेको वालाग्र काढतां जेवारे ते कुवो तद- द्गळ परावर्तन जाय त्यारे एक तेजस पुद्गळ न खाली थाय ते वारे एकपल्योपम थाय. परावर्तन थाय.२ अनंता तेजस पुद्गल परा- एवा दशक्रोडा क्रोडी पल्योमे वर्तन जाय त्यारे एक उदारीक पुद्गळ परा- एक पम थाय. एवा दशक्रोडा क्रोडी सागरोपमे वर्तन थाय.३ अनंताउदारीक पुद्गळपरावर्तन एक उत्सर्पिणी अने एक अवसर्पिणी काल जाय त्यारे एक वासोश्वास पुद्गल परावर्तन याय, एवां वीस क्रोडाकोडी सागरोपमे एक थाय. ४ अनंताश्वासोश्वास पुद्गळ परावर्तन कालचक्र थाय. हवे काळथी पुदगल परावर्तन जाय त्यारे एक मन पुद्गल परावर्तन थाय. तेहना वे भेद मुक्ष्मने वादर तेमाही वादर ते ५ अनंतामन पुद्गळ परावर्तन जाय त्यारे उत्सर्पिणीना पहेला समयथी ते अवसर्पिणी एक वचन पुद्गळपरावर्तन याय. ६ अनंता- ना छेल्ला समय सुधी एटले एक काळचक्र ना वचन पुद्गळ परावर्तन जाय त्यारे एक वैक्रेय जेटला समय थाय तेटला भवकरे तेहने | पुद्गळ परावर्तन थाय, ७ काळधी वादर पुद्गल परावर्तन कहीये. १ एक कार्मण पुद्गळ परावर्तनमांही अनंता- उत्सर्पिणीना जेसमे पहेलो भवकरे ने अवसर्पि- काळचक्र वहीजाय तथा तेमांज एक तेजस णीना वीजे समे भवकरे तेज लेखमां गणाय पुद्गल परावर्तन वहीजाय. ?एक श्वासोश्वास पण अनेरेसमे भवकरे ते गणत्रीमां नही तेहने पुद्गल परावर्तनमांहि अनंनाउदारीक पुद्गल फाळथी सुक्ष्म पुदगल परावर्तन कहीये. ३ परावर्तन तथा अनंता कारमण पुद्गळ परा- हवे भावथी पुद्गल परावर्तन कहे छे. वर्तन वहीजाय. २ एक उदारीक पुद्गल प- भावयी पुद्गल परावर्तनना वे भेद. मुख्मने । रावर्तनमांही अनंतातेजस पुद्गळपरावर्तन वही चादर तेमांही चादर ते जीवना प्रणामना जाय. ३ एक श्वासोवास पुद्गळ परावर्तन- सागरो- -- ५ - - - , (१६) हाणं सूत्र १. ओपश्चिन्दियतिरिक्खजोणियाणं मणु अर्थ-ए० एक कि० कृपणलेश्याना अ- स्साणं छ लेसाओ जोइसियाणं एगा भव्यजीवना व० वर्गणा. ए० एम छ० छ वि० विपे ले० लेश्याने विपे दो० वे दो० तेउलेसा वेमाणियाणं तिण्णि उवरिम- वे प० पद भव्य, अभव्यना भा० जाणवा. लेसाओ ॥ २३ ॥ एगा किण्हलेसाणं अभवसिद्धिया- भावार्थ-कृष्णलेस्यावालानारकीनी वर्गणा णं वग्गणा। एवं छसु वि लेसासु दो दो एकजछे. एमज निललेस्या, कापुतलेस्याळा पयाणि भाणियव्वाणि ॥ २५ ॥ नारकीनी पण एकेकीज वर्गणा छे. (नारकीने वीपे ए त्रणज लेस्या छे. भावार्थ-कृष्णलेस्यावंत अभन्य जीवनी एम जे दंडकमां जेटली जेटली लेस्या होय वर्गणा एकज छे. एम छए लेस्यामां भव्य अने तेटली तेटली एकेक नामे वर्गणा जा- अभव्य ववे भेदनी एकेकी वर्गणा जाणवी. णवी. भूवनपती. १ वाणव्यंतर. २ एहने अर्थ-ए० एक कि० कृष्ण लेश्याना विपे प्रथमनी चार लेस्या छे. पृथ्वी. १ भव्य जीव ने० नारकीनी ५० वर्गणा पाणी. २ वनस्पतीमां उपजती वेळाए अप- एगा किण्हलेसाणं भवसिद्धियाणं जाप्ता वेळाए प्रथमथी चार लेस्या छे अने प्रजाप्तामा त्रण लेस्या छे. १ तेउकाय. नेरइयाणं वग्गणा ॥ २६ ॥ २ वायुकाय. ३ बेइंद्री. ४ इंद्री. ५ भावार्थ-कृष्ण लेस्यावंत भव्य सिधिक चौइंद्रीमा प्रथमनी त्रण लेस्या छे. पचेंद्री नारकीनी वर्गणा एकज छे. त्रीयच अने मनुप्यमा छ लेस्या छे. जोती- अर्थ-ए० ० कृष्ण लेश्याना अ० पीमां एक तेजुलेस्या छे. वैमानिकमां तेजु. अभव्य जीवनाने. नारकीनी व० वर्गणा. १ पदम. २ शुकल ३ ए त्रण लेस्या ए० एम ज० जे दंडकन ज० जेटली ले० छे. तेमांही पहेले वीजे देवलोके एक लेण्याछे त० तेहने त० तेटली भा० जाणवी तेजुलेस्या छे. त्रीजे, चोथे ने पांचमे वर्गणा जा० यावत वे० वैगानीक लगे. देवलोके एक पदमलेस्या छे. छठा देव- एगा किण्हलेसाणं अभवसिद्धियाणं लोकयी नवनिवेयक सुधी एक शुक्ललेस्या छे. पांच अनुत्तरविमानमां पर्म शुक्ललेस्याछे. नेरझ्याणं वग्गणा । एवं जस्स जइ अर्थ-ए० एक कि० कृष्ण लेश्याना भ० लेसाओ तस्स तत्तियाओ भाणियच्या- भव्य जीवनी व० वर्गणा. ओ जाव वेमाणियाणं ।। २७ ।। एगा किण्हलेसाणं भवसिद्धियाणं भावार्य-कृष्ण लेस्यावन अभवसिधिक नारकीनी वर्गणा एकन छे. एम चोवीस दं- वग्गणा॥ २१ ॥ इफमुधी जेजे दंटकमां जेटली जेटली लेस्या भावार्थ-कृष्णलस्यावंत भन्य जीवनी होय तेटली तेटली भव्य सिधिक अने अभन्य वर्गणा एकन छे. सिधिनी एकेकी वर्गणा जाणी, एक कि० न । - - हाणं सूत्र १. ( १७ ) अर्थ-ए० एक कि० अर्थ-ए० एक कि० कृष्ण लेश्याना कि० ० कृष्ण लेश्यानो स० सम्यकदृष्टी जीवनी व० वर्गणा कृष्ण पक्षीयानी च० वळी व० वर्गणा. एगा किण्हलेसाणं सम्मद्दिट्ठियाणं एगा किण्हलेसाणं किण्हपक्खियाणं वग्गणा ॥२८॥ च वग्गणा ॥३१॥ भावार्थ-कृष्णलेस्यावाला समकितद्रष्टीवं- भावार्थ-कृष्णलेस्यावाला कृष्णपक्षीया तनी वर्गणा एकज छे. जीवनी वर्गणा एकज छे. अर्थ-ए० एक कि० कृष्ण लेश्याना मि० अर्थ-ए० एक कि० कृष्ण लेश्यानो सु० शुक्ल पक्षीया जीवनो व० समुदाय जा० यावत वे० मित्थ्यात द्रष्टीनी व० वर्गणा. वैमानीक लगे जाणवो ज० जेहने ज० जेटली एगा किण्हलेसाणं मिच्छहिट्ठियाणं के केश्याहोय तेटली वर्गणा ए० ए अ० वग्गणा॥ २९ ॥ आठ बोल च० चउवीसे दं. दंडके जाणवा. भावार्थ-कृष्णलेस्यावाळा मिथ्यात्वद्रष्टीवं एगा किण्हलेसाणं सुकपक्खियाणं तनी वर्गणा एकन छे. वग्गणा जाव वेमाणियाणं जस्स जइ अर्थ-ए० एक कि० कृष्ण लेश्याना स० समा लेसाओ एए अट्ठचउवीसदण्डया ॥ मित्थ्या द्रप्टीनो व० समुदाय. ए० एक छ० छ वि० पण ले० लेश्याने विपे जा. यावत ३२ ॥ वे. वैमानीक लगे जे० जेहने ज० जेटली भावार्थ-कृष्णलेस्यावाला शुक्लपक्षीया जी- दि० दृष्टी छे तेटली वर्गणा. वनी वर्गणा एकज छे. एम वैमानीकसुधी चौवीस दंडकमां जेहने जेटली जेटली लेस्या एगा किण्हलेसाणं सम्मामिच्छदिट्टि- होय तहमा तेटली तेटली कृष्णपक्षीया ने शु- याणं वग्गणा । एवं छसु वि लेसासु लपक्षीया जीवनी एकेकी वर्गणा जाणवी. जाव वेमाणियाणं जेसिं जइ दिट्ठीओ पहेलो समुचय चौवीस दंडकना नामरुपनो बोल १ भवी अभवीनो २. द्रष्टीनो ३ कृष्ण ॥ ३०॥ शुक्रपक्षीनो ४ लेस्यानो५ लेस्या साधे भव्य भावार्थ-कृष्णलेस्यावाळा मिश्रद्रष्टीवंतनी अभव्यनो ६ लेस्या साये द्रष्टीनो, लेस्या वर्गणा एफज छे. एमज नील १, कापुत २, साये पक्षीनो ८ ए आठ बोल चौवीस दंड- तेजु ३ पदम ४ शुकल ५ एलेस्याने विपे चौ फपर पूर्वोक्त प्रमाणे जाणवा. गिस दंडकसुधी त्रणे द्रष्टीमां जेड्ने जेटली जेटली द्रष्टी दोय तेइने तेटली तेटली वर्गणा अर्थ-ए० एक ति० संघथापना कीधा नाणवी. पांच एकेंद्रीमा एक मिथ्यात्वदृष्टी छ, पछी मुक्ति गया तेनी व०वर्गणा. त्रण विगलेंद्री नवग्रेवेगमां समकीत अने मि एगा तित्यसिद्धाणं वग्गणा ॥३३॥ ध्यान्व ए रे द्रष्टी छे, पांच अनुतरविमानमा भावार्थ-तिथैकरदेवने केवळज्ञान उत्पन्न एक समाकितहष्टी छे, बाकी तमाममां त्रणत्रण यया पछी साधु १ साध्वी २ श्रावक ३ श्रा- द्रटी छे. वीका ४ ए चार तीर्थनी स्थापना कर्यापछी । -- . -- .
(१८) हाणं मूत्र १. मुक्ति जाय ते तिर्थसिदधा कहीये. जेम रुष- | देवी प्रमुख ग्रहस्थलिंग सिंदनी वर्गणा एकन भदेव भगवंतने केवळज्ञान उत्पन्न थया पछी | छे. १३ (इहां अन्यलिंग तथा ग्रहस्थलिंग पुंडरिक त्रण गणधरादीक मुक्ती गया एवा | कहेल छे ते कोई जैनधर्मनो द्वेषी राजा जैन- तिर्थ सिदा जीवनी वर्गणा एकज छे. १ मुनीने कहे कांतो समारो धर्म छोडो नहींतो अर्थ-ए०एक अ०अतिर्थसिद्धनी व०वर्गणा जीवथी मारवा हुकम करेल होय ते वस्वते ए ए० एक जा० यावत ए० एक सि० सिद्धनी | उपचर्ग सहन करवा समर्थ होय ते मुनी तो व० वर्गणा अ० अनेक सिद्धनी व• वर्गणा प्राण जवा कुरवान करे पण संयमी डगे एगा अतित्थसिद्धाणं वग्गणा । नहि, पण जे मुनीथी ते सहन थइशके नहि एवं जाव एकसिद्धाणं वग्गणा अणे- ने संयमर्नु रक्षण करवा पूर्ण अभिलापा होय कसिद्धाणं वग्गणा ॥३४॥ ते मुनी माथे फॅटो वांधवो विगेर ग्रहस्थनो भावार्थ-तिर्थ स्थाप्यां पहेलां जाति स्म- वेश तथा अन्यधर्म तापस विगेरेनो वेश प- णादिक ज्ञान थये पुर्व जन्म नोइ केवलज्ञान | हेरि, अंदर मुनीनी क्रियामा प्रवर्ति ते राजा पामि ऋषभदेव भगवंतनी माता मरुदेवीनीपेरे ना राज्यनी सीमाओ वधी जतां ते रस्तामा मुक्तीजाय एवां अतिर्थसिद्धा जीवनी वर्गणा हीज केवळज्ञान उत्पन्न यये कोइ मुक्तिमा एकज छे. २ जाय ते आश्री ग्रहस्थलिंगे तथा अन्य लिंगे एम तिर्थंकर भगवंतसिद्धनी वर्गणा एकज सिद्धा कहेल छ, पण ग्रहस्थी तथा अन्य- छे. ३ अतिर्थकर ते सामान्य केवळी सिद्ध- लिंगि सिद्धा कहेल नथी. भगवतीमां संज्याने नी वर्गणा एकज छे. ४ पोतानी मेळे तत्व- अधीकारे अन्यलिंगे तथा ग्रहस्थलिंग पांच ज्ञान पामी मोक्ष जाय तेवा स्वयंबुधसिद्धनी | लाभे ते पण पुर्वोक्त अपेक्षायेज कहेल छे, वर्गणा छे. ५ काइपण वस्तु देखी त- तथा अशोच्या केवळी ते जीनेंद्रमणीत एक एकज त्वज्ञान पामी मुक्ति जाय एवा प्रत्येक बुद्ध- वाक्य पण वीलकुल श्रवण करेल न होय सिद्धनी वर्गणा एफज छे. ६ गुरुपासे प्रति- एवा अन्य धर्मना कोइ तापसादीक घणी वोध पामी मुक्ति जाय ते बुद्धवोही सिद्धनी / निर्वद्य कमाणी करतां विभंग ज्ञान उत्पन्न वर्गणा एकज छे. ७ स्त्रीलिंग (आकार)८ थाय तेमांयी समकीत पामवे अवधीमान उ. पुरुपलिंग ९ नपुंसकलिंग १०. ए त्रणे लिंगे पजे ने तेमांथी तत्काळ आयुप्यनी समाप्तीये सिद्धनी वर्गणा एकेकीज के. (इहां लिंग ते / केवळहान उपनवे मुक्तिमां जाय, आयुप्य खी पुरुष नपुंसकपणाना विषयविकारथी र- पुर्ण यवानी नैयारीये आ सर्व ज्ञान उत्पन हीत फक्त आकारमात्र जाणवू.जेम कोई नदी | थये मुक्तीमां जाय तेथी ते अन्य धर्मनो वेस माइयी पाणी सुकाइजवायी फक्त आकारमात्र बदलवानो वखत मळे नही ते आश्री पण नदी कडेवाय तेनीपेरे आपण समजबू) मुख. अन्य लिंगे मिदा कडेल. ई.) पक समे पती रजोइरणादीक जैनमुनीना वेस सहित एकज मुक्तिमां जाय ते सिंदनी वर्गणा ग- मुक्ति जाय ते स्वलिंगे सिद्धनी वर्गणा एकज फन छे. १४ एक समे उत्कृष्टा एकसोने आठ छे. ११ अन्य लिंग ते तापमवेशे वल्कलची मुक्तीमां नाय ते अनेक सिद्धनी वर्गणा ए- वरधारी सिद्धनी वर्गणा एकान छे. १२ पर कन छे. १५ ए. पन्नर भदे सिद्ध करा.
--- - 1 । 1 tte हाणं मूत्र १. (१९) अर्थ-ए० एक अ० अप्रथम स० समय एगा एगपएसोगाढाणं पोग्गलाणं सिद्धनी व० वर्गणा ए० एम जा० यावत वग्गणा जाव एगा असङ्ग्रेज्जपए- अ० अनंतसमय सिद्धातहनी व० वर्गणा. सोगाढाणं पोग्गलाणं वग्गणा ॥३७॥ एगाअपढमसमयसिद्धाणं वग्गणा। एवं जाव अणन्तसमयसिद्धाणं वग्ग- कहे छे. जे पुद्गल एक प्रदेश ज- भावार्थ-हवे क्षेत्र आश्री पुदगळ णा॥ ३५॥ ग्या रोकी रहेल एवा पुद्गलनी वर्गणा भावार्थ-विरहकाळ व्यतित थया वाद प एकज छे. एमज त्रण यावत् असंख्यात हेलो जे जीव मुक्तिमां जाय ते प्रथम समयना पुद्गळ जग्या रोकी रहेल एवा पुद्गळनी सिद्धनी वर्गणा एकज छे. तेमज वीजे बीजे वर्गणा एकेकीज छे. चौद राजलोक क्षेत्रना यावत् संख्याता असंख्याता अनंता समय असंख्यात प्रदेश छे तेथी अनंतप्रदेश रोकी सुधी जे जीव मुक्तिमां जाय ते अप्रथम सम- रहेल पुद्गळनी वर्गणा होय नहीं. यना सिद्धनी वर्गणा एकज छे. अर्थ-ए० एक ए. एक स० समयनी हि. अर्थ-ए० एक प० परमाणु पो० पुदग- स्थिति छे ते पो० पुदगलनी व० वर्गणा लनी ५० वर्गणा ए० एम जा० यावत ए० जा० यावत अ० असंख्यात समयनी हि एक अ० अनंत प० प्रदेशिक ख० खन्धनी स्थितिना पो० पुदगलनी व० वर्गणा. एगा एगसमयट्ठिझ्याणं पोग्गलाणं एगा परमाणुपोग्गलाणं वग्गणा । एवं जाव एगा अणन्तपएसियाणं याणं पोग्गलाणं वग्गणा ॥ ३८॥ वग्गणा जाव असलेज्जसमयट्टिइ- खन्धाणं वग्गणा ॥३६॥ भावार्थ-हवे काळथी पुद्गल कहे छे. भावार्थ-इचे द्रव्यथी पुदगल कहे छे जे परमाणुंपणे तथा क्षेत्रना एक प्रदेश आश्रीत- शखथी छेदाय नहि, अग्निमां वळे नाहि, पा पणे एक समयनी स्थितिवाळा पुद्गळनी वर्ग- णीमां पलले नहि, धर्म चक्षुनी नजरे आवे णा एकज छे. एमज चे; त्रण यावत् असं- नहि, एवा परमाणुं पुद्गळनी वर्गणा एकन ख्याता समयनी स्थितिवाला पुद्गळनी २. वेपरमाणुं भेगा थाय ते द्विप्रदेशी खंध- वर्गणा एकेकीन छे, नी तेमज श्रीप्रदेशी, चौप्रदेशी, यावत् सं अर्थ-ए. एक एक एक गु० गुणकाला ख्यात असंख्यात अनंत प्रदेशी खंधनी ए- पुदगलनी ५० वर्गणा जा० यावत ए० एक केकीज वर्गणा छे. अ० असंख्यान गुणकाला पुदगल व० वर्गणा अर्थ-० एफ ए एफ १० प्रदेशी गा० । एगा एगगुणकालगाणं वग्गणा जाव अवगाही रहा पो० ते पुदगलनी व० वर्गणा एगा असहेजगुणकालगाणं वग्गणा जा० यावत ए. एक अ० असंख्याता क्षेत्र ५० प्रदेश गा० आश्री रह्या ते पो० पुदग- ॥ ३९ ॥ लनी एक वर्गणा. भावार्थ-हवे भावथी पद्गल कहे थे, जेम व० वर्गणा. .
कज छे. (२०) हाणं मूत्र १. पाणीनुं वासण भरेल होय तेमाही काळा ए० एक उ० उतकष्ट १० प्रदेशिक ते अ- रंगनुं एक टीपुं नाखीये ते अल्पथी काळाश, नंता परमाणुआनो ख० खंध तेहनी व० व- होवाथी जणाय नही, पण अंदर काळोरंग गणा. छे, एवो एक गुण काळा पुदगलनी वर्गणा एकज छे, एमज वे गुण, त्रीगुण यावत् असं- एगा उक्कोसपएसियाणं खन्धाणं व- ख्यात गुण काळा पुदगळनी वर्गणा एकजछे. / ग्गणा ॥ ४२ ॥ अर्थ-ए० एक अ० अनंतगुणकाला पुद- भावार्थ-जेहमां अनंता परमाणुंआ प्रदेश गलनी व० वर्गणा ए. एम व० वर्ण ग० होय ते उत्कृष्ट प्रदेश स्खंधनी वर्गणा एकजछे. गंधर० रस फा० फरस ए आटेनी एकेकी अर्थ-ए० एक ज० मध्यम ५० प्रदेशिक वर्गणा भा० जाणवी० जा० यावत ए. ख० खन्धनी २० वर्गणा. एक अ० अनंत गुण लु० लुखा पो० पुदु- एगा जहन्नुकोसपएसियाणं खन्धा- गलनी व० वर्गणा. एगा अणन्तगुणकालगाणं वग्गणा। णं वग्गणा ॥ ४३॥ एवं वण्णगन्धरसकासा भाणियव्वा भावार्थ-मध्यम प्रदेश स्खंधनी वर्गणा ए. जाव एगा अणन्तगुणलुक्खाणं पोग्ग- अर्थ-ए० एम ज० जघन्य उ० अवगा- लाणं वग्गणा ॥ ४०॥ हनाना उ० उतकृष्टी अवगाहनाना अ० मध्य- भावार्थ-एक अनंतगुण कालां पुद्गळनी म प्रदेशावगाढ ज० जघन्य एक समय द्वि० वर्गणा एकेकीज छे. एमज एज रीते, पीळां, स्थितिना पंधनी एक वर्गणा उ० उतकृष्ट धोळां, रातां, लीलां पुद्गळ, सुगंधी, दुर्गंधी असंप्यातासमय हि स्थितिना वंधनी अ. ए वे गंधना पुद्गळ खाटो १ मीठो २ तीखो मध्यम हि० स्थितिना प्रदेशनी वर्गणा ज० ३ कडयो ४ कसायलो (हरम्यो) ५ ए जघन्य गु० गुण का० कालापरमाणुना उ० पांचे रसना पुद्गळ, हलको १ भारे २ टा- उतकृष्ट गुणकाला पुढगलनी अ० मध्यम ढो ३ उपण ४ लखो ५ चोपडयो ६ खर- गुणकाला प्रदेशनी एक वर्गणा ए० एम व. खरो ७ मुंहाळो ८ ए आठे स्पर्शना पुद्गळ वर्ण गं० गंधर० रस फा० फर्शनी एककी व० ए सर्वे पुद्गळनी काळां पुद्गळनी पेरे एके- । वर्गणा भा० जाणवी जा० यावत ए० एक कीज वर्गणा छे. थ० मध्यम गु० गुण लु० लपा पो पुदगल- अर्थ-ए० एक ज० जघन्य प० मदेशिकनी ० वर्गणा. स. खन्धनी व० वर्गणा. एवं जहन्नोगाहणगाणं उकोसोगाह- एगा जहन्नपएसियाणं खन्धाणं व- णगाणं अजहन्नुकोसोगाहणगाणं जह- गणा ।। ११ ॥ नद्विइयाणं उक्कासहिझ्याण अजहन्नुको- भावार्य-जेहमां परमाणुंपा थोडा होय ए. बां ये मदेशी मवंधादी जन्य प्रदेशमी व मट्टिइयाणं जहन्नगुणकालगाणं उकाम- र्गमा पकज द. गुणकालगाणं अजहन्नुकोमगुणकाल- . . ३ गया. हाणं सूत्र १. (२१) गाणी एवं वण्णगन्धरसफासाणं वग्गणा वालाग्र झाझेरी परिधी छे, एवो सर्व दीप भाणियव्वा जाव एगा अजहन्नुक्कोसगु- समुद्रने मध्यभागे जंबूदिप नामे दिप एकज छे. ( वीजा जंबूद्दीप तो घणाय छे पण आ- णलुक्खाणं पोग्गलाणं वग्गणा ॥४॥ टला प्रमाणवाळो सर्वेने मध्यभागे तो आ भावार्थ-एम जधन्य अवगाहना (थो- एकज जंबुद्वीप छे वीजो नथी.) हामां थोडा प्रदेश रोकी रहेल) ना स्खंधनी अर्थ-ए० एक स० श्रवण भ० भगवंत १ मध्यम अवगाहना सवंधनी २ उत्कृष्ट अ म० महावीर इ० आ ओ० अवसर्पिणीकाले वगाहनाना सवंधनी ३ वर्गणा एकेकीज छे च० रुपमादिक चोवीस ति० तिर्थकरमांही ए क्षेत्रधी कयु. काळथीजधन्य एक समय च० छेहला ति० तिर्थंकर सि० कृतार्थ थया स्थितिनां स्वंधनी वर्गणा एकज छे. एम वु० केवली मु० कर्मथी मुकाणा स० सर्व दु० मध्यम स्थितिना खंधनी २ उत्कृष्ट स्थिति- | दुःखथकी प० रहीत थया एकलाज मोक्ष ना स्वंधनी वर्गणा एकेकीज छे. एमजध- न्य एक गुण काला प्रदेश (पुदगळ) परमा- एगे समणे भगवं महावीरे इमीसे णुआनी १ मध्यम गुण काळा प्रदेशनी. २ उत्कृष्ट अनंत गुण काळा प्रदेशनी वर्गणा ए- ओसप्पिणीए चउवीसाए तित्थगराणं केकीज छे. एम शेप चार वर्णनी, वे गंधनी, चरिमतित्थयरे सिद्धे बुद्धे मुत्ते सबदु- पांच रसनी, आठ स्पर्शनी, ए सर्वेनी काला- क्खप्पहीणे ॥ नी पेरेजधन्य, मध्यम, उत्कृष्टनी वर्गणा एके भावार्थ-आ अवसर्पिणी काळमां ऋपभा- दिक तेवीस तिर्थकर निर्वाण पधार्या वाद अर्थ-ए० एक ज० जवूद्वीप नामे द्वीप स० चौथा आराना त्रण वर्ष अने साडाआठ मास सर्व दी० द्वीप स० समुद्रने जा० यावत मध्य वाकी रह्या त्यारेछेल्ला चोवीसमा तिर्थकर भागे अ० अर्द्ध अंगुल च० वळी कि० काइक वि०विशेषाधिक प० परिधि एहवो एक छ. श्रमणभगवंत श्री महावीरदेव तत्वज्ञान पामी कर्मथी मुक्त थइ कर्मरुप दावानळ ओळवी एगे जम्बुद्दीवे सव्वदीवसमुद्दाणं शीतळीभुत थइ, सर्व दुःखथी रहित थइ ए- जाव अद्धङ्गलगं च किंचिविसेसाहि- कलाज सिद्ध थया ( तेविस तिथैकरनीसाथे वीजा घणाय जीवो मुक्ति गया छे पण महा- परिक्खवणं ॥ वीरदेवनी साथे वीजु कोइ मुक्ति गयेल भावार्ध-जे सर्व छीपथी नानो जंयूक्षे नथी.) करीने सहित तेलना पुडलाने आकारे तथा अर्थ-० अनुत्तर वेमानना दे० देवतानी पुन्यमना चंद्रमाने आकारे गोळ, एक लाख । काया ए. एक र० हायनी उ० उर्व उ. जोजननो लांवो ने पहोळो, जेहनी त्रणलाख उंचपणे ५० कही. सोळ दनार बसेंने सतावीस जोजन, प्रण गाउ, एफसोने अठावीस धनुप्य, साडानेर अणुत्तरोववाइयाणं देवाणं एगार- आंगल, एक जब, एक जु, एक लींव, छ- 'यणी उर्ल्ड उचनेणं पन्नत्ता ।। . कीज छे. - ( २२ ) हाणं मूत्र २, उसो १. भावार्थ-पांच अनुत्तरविमान ते विजय १ यावत एक एक गुण लु० लुपा पो० पुदगल घेजयंत २ जयंत ३ अपराजीत ४ ए चार अ० अनंता प० का तिर्थकरे. विमानना देवतानी काया एक हाथनीज उं एगपएसोगाढा पोग्गला अणन्ता ची छे अने पांचमा स्वार्थसिद्ध विमानना दे- पन्नत्ता। एवं एगसमयट्टिइया एग- पतानी मुंढा हायनी काया छे. गुणकालगा पोग्गला अणन्ता पण्ण- अर्थ-अ० आद्रा न० नक्षत्रनो ए० एक तारो प० कटो. १ चि० चित्रा न० नक्षत्रनो त्ता जाव एगगुणलुक्खा पोग्गला अ. ए. एक तारोप० करो. २ सा० सांति न० णन्ता पण्णत्ता ॥ नक्षत्रनो ए० एकतारो प० कटो. ३ भावार्थ-एक क्षेत्र प्रदेशे आश्रीत रहेला अदानक्वत्ते एगतारे पन्नत्ते ॥१॥ परमाणुंरुप स्कंधरुप पुद्गळ अनंता छे. एम चित्तानक्वत्ते एगतारे पन्नत्ते॥२॥ एक समयनी स्थितीनां पुद्गळ, एक गुण का- कां पुद्गळ भगवंते अनंता कहेल छे. एम साइनक्वत्ते एगतारे पन्नत्ते ॥३॥ यावत् शेप चारे वर्णनां, वे गंधनां, पांच र- भावार्थ-आर्दा १ चित्रा २ स्वाती ३ ए सनां, आठ स्पर्शनां एक समयनी स्थितीना त्रणे नक्षत्रनो अकेकोज तारो छे. पुद्गळ अनंतां भगवंते कहल छे. अर्थ-ए० एक प० प्रदेश आश्री गा० ए. एक हा० ठाणुं नामे अध्ययन स० रह्या ते परमाणु पो० पुदगल अ० अनंता प० / संपूर्ण थयुं. कया ए० एम ए० एक स० समयनी हि० ॥ एगट्ठाणं समत्तं ॥ स्थितिना पुदगल एक एक गु० गुणकाला ( इतिश्री ठाणांगमूत्रना प्रथम ठाणांनो पो० पुदगल अ० अनंता प० कया छे. जा० / भावार्थ संपूर्ण थयो. ) १. ॥ दुहाणं॥ [दुट्ठाणस्स प्रथमो उद्देसओ।] अर्ध-ज० जे पदार्थ अ० छे. ण विपे मना शिप्यने कहेना हवा के हे जंबू ? आ लो० लोकने तं० ने स० सर्व दु० वे प्रकारे लोकने विपे सर्व पदार्थ ये प्रकारेछे ते कई छ. छेतं० ते वे प्रकार जल कहे छे. अर्थ-जी जीव चेतना लमण चे० निश्रे अ० अजीव चेतना रहिन चेनिथे. जदत्थि ण लोगे तं सव्वं दुपडो- जीवा चेव अजीया चेव ॥ २ ॥ यारं । तं जहा ॥१॥ भावार्थ-धनन्य सण स्प जीव अने थे- भावार्थ-मृधर्मान्वामी पोताना जंबू ना नन्य लक्षण नहीन अजीय.
भावार्थ-हरता जीव छे. हाणं मूत्र २. उद्देसो १. (२३) अर्थ-त० त्रस वेइन्द्री प्रमुप चे० निश्चे अर्थ-स० शरीर सहित संसारी जीव चे० था० थावर पृथ्वी प्रमुप चे निश्चे. निश्चे अ० अरुपी सिद्ध चे० निश्चे. तसा चेव थावरा चेव ॥१॥ सख्वी चेव अरूवी चेव ॥ ६॥ फरता वेइंद्रीयादीकत्र भावार्थ-एक शरीरादिके करी रुपी सं- सजीव १ स्थीर रहे ते प्रथ्वी १ पाणी २ सारी जीव. १ वीजा शरीरादिके रुप रहीत अग्नी ३ वायु ४ वनस्पति. ५ ए पांच स्था- सिद्धना जीव. २ एवा वे प्रकारे जीव छे. वर जीव. २ एवा वे प्रकारना जीव छे. अर्थ-स० पुदगल सहित संसारी चे० अर्थ-स० योनि सहित संसारी जीव चे० निश्चे अ० अपुदगली सिद्ध चे० निथे. निश्चे अ० सिद्धना जीव चे० निश्चे. सपोग्गला चेव अपोग्गला चेवा। सजोणिया चेव अजोणिया चेव ।२। भावार्थ-एक कर्मादिक पुद्गळ सहीत भावार्थ-एक योनी सहीत संसारी चौ- | संसारी जीव. १ वीजा कर्मादीक पुद्गल रहीत रासीलाख जीवा जोनीना जीव १ वीजा । सिद्धना जीव २ एवा वे प्रकारे जीव छे. योनीरहीत सिद्धना जीव. २ एवा वे प्रकारे अर्थ-सं० भवनुं कर छे ते जीव चे० निश्चे अ० नथी भव करवा ते सिद्ध चे० निश्चे. अर्थ-सा० आऊपा सहित चे० निश्चे संसारसमावनगा चेव असंसारसमा- अ० सिद्ध आऊपा रहित चे० निश्चे. वनगा चेव ॥ ८॥ साउया चेव अणाउया चेव ॥३॥ भावार्थ-एक संसारे आश्रीत् भवभ्रमण भावार्थ-एक आयुप्य सहीत संसारी रुप संसारी जीव. १ वीजा भवभ्रमण रहीत जीव. १ वीजा आयुप्य रहीत सिद्धना जीव । असंसारी सिद्धना जीव २ ए वे प्रकारे छे. २ एवा वे प्रकारे जीव छे. अर्थ-सा० सास्वतां सिद्ध चे० निश्चे अ० अर्थ-स० इंद्री सहित संसारी चे० निचे संसारी चे० निश्चे. अ० अनंदी कहेतां सिद्ध चे० निश्चे. सासया चेव असासया चेव ॥ ९॥ सइन्दिया चेव अणिन्दिया चेव ।। भावार्थ-एक जन्म मर्ण रहीत सास्वता भावार्थ-एक इंद्रीयो सहीत संसारी जीव : सिद्धना जीव. १ वीजा जन्म मर्ण सहीत १ वीजा इंद्रीयो रहीत सिद्धना जीव २ एवा ये प्रकारे जीव छे. असास्वता संसारी जीव ए वे प्रकारे छे. अर्थ-स. चेट सहित जीव चे.निचे अ० अर्थ-आ० आकाशस्तिकाय चे० नि वेद रहित सिद्ध चे० निश्चे. । नो० धर्मास्तिकायममुप पाच चे० निश्चे. सवेयगाव अवेयगा चेव ॥५॥ आगासे चेव नोआगामे चेव ॥शा भावार्थ-एक सी, पुरुप, नपुंसक ए त्रण प प्रमाणे जीवना भेट द्या, हवे अजी- वेद सहीत संसारी जीप १ वीजा वेद रहीत बना भेद कहे छे. सिद्धना जीव एवा ये प्रकारे जीव छ. भावार्थ-धर्मास्तिकाय. १ अधर्मास्तिकाय. ।
( २४ ) हाणं मूत्र २. उद्देसो १. २ पुद्गळास्तिकाय. ३ जीवास्तिकाय. ' १ जीव हिंसादीक अशुभ कृत्ये करी दुःसरुप काळ. ५ ए पांच जेहने विपे वीलकुल नथी अशुभ कर्मनां पुद्गळोनो संचय ते पाप. २ ते आकास्तिकाय. १ अने जेहने विपे धर्मा-ए वे भेट छे. स्तिकाय प्रमुख पांच छे तेनो-आकास्तिका अर्थ-आ० कर्मर्नु आवयु चे० निश्चे सं० य, एवा वे प्रकारे अजीव छे. कर्मनो रुंघवो चे० निश्चे. अर्थ-५० चालता आधार आपे तथा आमवे चेव संवरे चेव ॥५॥ विरतिरुप धर्म चे० निश्चे अ० स्थिर रापे ते भावार्थ-वीस तथा ताळीस प्रकारे क- अथवा पाप चे० निश्चे. मर्नु आवq ते आश्रव. १ वीस तथा सतावन धम्मे चेव अधम्मे चेव ॥ २ ॥ प्रकारे करी आवतां कर्मने रोकई ने संवर. भावार्थ-पाणीमां जग्या नहीं छतां म- २ ए वे भेद छे. च्छने जेम हरवा फरवानी मदद मळी शके अर्थ-वे० कर्मनी पीहा चे० निश्चेनि तपे छे तेज प्रमाणे आ चौदराज लोक जीव । करि कर्मनुं सडq ते चे० निश्चे. अने अजीवे करि संपूर्ण भरेला छे. कांइ पण वेयणा चेव निज्जरा चेव ॥६॥ जग्या खाली नधी तेनी अंदर जीव अजीवने भावार्थ-ज्वरादिक कर्मनी पीडार्नु भोग- हरवा फरवा वास्ते मदढ करे छे एवा प्रका- रनो आ लोकमां एक' पदार्थ छे तेनुं नाम वq ते वेदना १ वार प्रकारनी तपश्चर्याए- धर्मास्तिकाय १ अथवा विरतीरुप ते व्रत प. | करी आत्माना प्रदेशधी थोडा थोडां कर्मनुं चखाणरुप धर्म. १ सर्व वस्तुने स्थीर राखवा दूर थयु ते निर्जरा. २ ए वे भेद छे. अर्थ-दो वे कि० क्रिया प० कहीछे मदद करे तेवो आ लोकमां एक पदार्थ छे ते अधर्मास्तिकाय. २ अथवा पापने अधर्म०२ : तं० ने ज० कहेछे जी० जीवनो व्यापार एवा वे भेद छे. जिहाते जीव क्रिया च० निश्चे अ० अजीव अर्थ-व० कर्मनो बंध चे० निश्चे मा० क्रिया चे० निश्च. कर्मनो छोडवो चे. निचे दो किरियाओ पण्णनाओ।तं जहा। बन्धे चेव मोक्खे चेव ॥ ३॥ जीवकिरिया चव अजीवकिरिया चेच भावार्थ-जीवना असंख्यात पदो कर्म ॥१॥ पुद्गळना संचयर्नु मजबुत थर्बु ते बंध १ अने भावार्थ-जीहां जीवनो व्यापार छे ते ते कर्म पुद्गळ- आत्म प्रदेशयी मुक्त थर्बु ते । जीवक्रीया १ कर्म पुद्गलनु परगम ने अ- मोन. २ ए वे भेद छे. जीवक्रीया.२ एवी चे प्रसारनी क्रीया श्री अर्थ-पु० दानाठिक चे० निथ पा० हि- भगवने कही छे. माटिक चे० निये. अर्थ-जी जीवनी किया दु० वे प्रकारे पुण्णे वेव पावे चेव ॥2॥ ५० कही २० तेज क ले स० साचा नवन भावार्थ-दानादक शुभ कृत्ये करी मुग्य- सनायुं ते चे० निश्रे मि० पोटातत्व सदह- रूप शुभ कर्मनां पुद्गोनो संचय ने पुन्य. पुं ने च० निवे. - -- 1 । द्वाणं सुत्र २. उद्देसो १. ( २५) जीवकिरिया दुविहा पण्णत्ता । तं भावार्थ-वळी वे प्रकारची क्रिया अजीव छे पण वारमा गुण ठाणा सुधी जीवने ला- जहा । सम्मत्तकिरिया चेव मिच्छत्त- गे छे एम श्री भगवंते कहेल ते कहे छे, का- किरिया चेव ॥२॥ याना व्यापारथी लागे ते कायाकी क्रिया ? भावार्थ-जीवक्रिया (जीवनो व्यापार ते) धातु काष्ट पथरादिकनां शस्त्रोथी पापलागे वे प्रकारे श्री भगवंते कहेली छे ते कहे छे । ते अधीकरणनी क्रिया २ ए वे भेदछे. साचा तत्वनुं श्रद्धq ते सम्यक्त्वक्रिया १ खो अर्थ-का. कायानी कि० क्रिया दु० वे टा तत्वतुं श्रद्धq ते मिथ्यात्वक्रिया. २ एवी वे | प्रकारे पं० कही तं० तेज० कहुंछु अ० पापथी प्रकारनी जीवक्रिया जाणवी. निवर्त्या नथी ते चे० निचे दु० माठे परिणाम अर्थ-अ० अजीर क्रिया दु० वे प्रकारे पं० काया प्रवर्तावते चे० निश्चे. कही तं० तेज० कहे छे इ० मार्गे चालवानी काइया किरिया दुविहा पण्णत्ता । तं क्रिया चे० निश्चे सं० संजलना कपायनी जहा । अणुवस्यकायकिरिया चेव दु. क्रिया चे० निश्चे. प्पउत्तकायकिरिया चेव ॥ ५॥ अजीवकिरिया दुविहा पण्णत्ता । तं भावार्थ-काइया क्रियाना वे भेद श्री भ- जहा । इरियावहिया चेव संपराइगा गवंते कहेलछे ते कहे छे. आ काया गया चेव ॥३॥ जन्ममां घणा कालथी वोसीराव्या पीना आव्यो छे ते कायानां शस्त्रादीक वनवे जे जे भावार्थ-अजीवक्रिया (अजीवनो व्या- पार ) ते वे प्रकारे श्रीभगवते कही छेते कहे हिंसा धाय छे तेनी क्रिया लागे छे ते १ आ छे, मार्गे चालतानी क्रिया ते इर्या पधीकी निवर्तावीनी तेथी ते काइया क्रिया मि- काया हजु मिथ्यात्व अवतादीक पापथी क्रिया कहीए ( चालतां कर्म बंधाय ते कर्म यात्वीने तथा समकीतद्रष्टीने पण लागे तथा अजीव छे अने चालधुं ते जीवनो व्यापारछे पांच इंद्रीयोने आश्रीने इष्ट अनिष्ट वस्तुथी जे तो पण इहां अजीव प्रधान्य ( श्रेष्ट) पणुं । मुख दुःख उपजे अथवा मनना माठा संकल्प फयु ते माटे ए अजीवक्रिया एम सघळे जा- करवे प्रमत्त (ममादी) साधुने पण लागे छे. ण)१ संजलनी कपाययी उपनी क्रिया घणा काळयी गया जन्मनी कायाओ वोसी अजीच कर्म पुद्गळनी रासी ते संपराइ क्रि-गव्या वीना आव्यो छे ते कायाना शस्खादीफ या २ एवी वे प्रकारनी क्रिया जाणवी. वनवे जे जे हिसा शाय छेतेनी क्रिया लागे अर्थ-दो० वे क्रिया प० की तं० तेज० छे. २ ए वे भेद काइया क्रियाना जाणवा. कहे छे का कायाना व्यापारची लागे ते कि- अर्थ-आ० अधिकरणी कि० क्रिया दु० बेम- ० निश्चआ० हल प्रमुपथी पापलागे ते नि- कारे प०कही तंजल्कहुंसं० संयोजनाधि या चे. निथे. करणनी क्रिया पडगने मुठिए संजोगना चे० दो किरियाओ पण्णताओ। जहा। निवेनि० घंटी प्रमृग्य सजकरी राखे चेः निश्वे. काइया चेव आगिरणिया चेव ॥ ४॥ आहिगरणियाकिरिया दुविहा पण्ण- 7 - ( २६ ) हाणं सूत्र २, उद्देसो १. चा तं जहा । संजोयणाहिगरणिया चेव | थडाय त्यारे ते अजीव उपर द्वेष करे तेनी निव्वत्तणाहिगरणिया चेव ॥६॥ क्रिया लागे ए ये भेद छे. भावार्थ-अधीकरणनी क्रियाना वे भेद श्री अर्थ-पा० परने दुःख उपजेते कि० कि- भगवंते कहेल छे ते कहे छे. खडगने मुंट जो या दु० वे प्रकारे पं० कही तं० ते कहुं छु डवी, पाळीने हाथो जोडवो इत्यादीक शस्त्रोनो शरीरने दुःखदीए ते चेनिश्चे प० परने हलहाथे स० पोताने हा हाथे पा० परने त्या पोताना संयोग मेळघवो तेनी क्रिया लागे १ खडगा पोताना परना पा० प्राण हणे ते चे० निश्वे. दीक शस्त्रो नवां करावयां अथवा जुनां घंटी, मुसल (सांबलु) हळदीक फरी सज करा- पारियावणिया किरिया दुविहा प- वां तेनी क्रिया लागे छे २ ए वे भेद छे. न्नत्तातं जहा । सहत्थपारियावणिया अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० चेव परहत्यपारियावणिया चेव ॥९॥ से ज० कहे छे पा० मिश्र अदेखाइ करे तेचे भावार्थ-परने परिताप उपजावे ते पारिता निश्चे पा० परने दुःख उपजे ते चे० निश्चे. वणीया क्रियाना वे भेट श्री भगवंते कहेल दो किरियाओ पन्नत्ताओ।तं जहा। छे ते कहे छे पोताने हाथे पोते तथा परने प- पाओसिया चेव पारियावणिया चेव ७ तथा परने परिताप करेतेनी क्रीयालागे रिताप करे तेनी क्रियालागे १ परने हाथे पो भावार्थ-हवे अजीव पुद्गळनी वे प्रकारे २ ए वे भेदछे, क्रिया भगवंते कहेल छे ते कहे छे, कोइना अर्थ-दो वे कि० क्रिया पं० कही तं० ते उपर वेप करे तेनी क्रिया लागे १ कोइने ज. कहुँर्छ पा० जीवहिंसाधी पाप कर्म बंधाय ताडनादीके करी परिताप उपजावे तेनी क्रि-तेचे निये अ० अविरतियी कर्म बंधाय या लागे २ ए वे भेद छे. ते चे० निश्चे. अर्थ-पा० प्रखूप क्रि० क्रिया दु० वे प्र दो किरियाओ पन्ननाओ। तंजहा। प्रकारे प० कही त० ते ज० कहुं हुं. जी० पाणाइवायकिरिया चेव अपञ्चक्वाण- कोइ जीवनो द्वेष करे ते चे. निश्चे अ० भींत किरिया चेव ।। १०॥ थांभला प्रमुखे अवडाय ने ते उपर रास च- ढावे ते चे० निक्षे. भावार्थ-हवे वे दिया श्री भगवते फहेल हेते कहे जे माणानिपातनी क्रिया ? व्रत पाओसिया किरिया दुविहा पन्नत्ता । पचखाण नहीं करवाथी अमन्याख्याननी नि तं जहा। जीवपाओसिया चेव अजी. यालागे २ ए वे मदछे. चपाओसिया चेच ॥ ८॥ अर्थ-पा० प्राणातिपातकी क्रिया दु. ये भावार्थ-हवे कोइना उपर तप करे ने पा प्रकार पं० की नं० ने ज. कहुंछ म० पोताने उसीया नियाना ये भेद कोल ने कड़े के १० हाये पार पाणी दणेने १० निधे ५० कोई जीव उपर कर तो देनी मिया ला- परनं १० बाय पा० पानानापरना पाणदणे गे १ भान यांभले भया पापाण प्रमुवं अत चे.नि.
--- (२७) - - - हाणं मूत्र २, उदेसो १. पाणाइवायकिरिया दुविहा पन्नत्ता । आरम्भिया किरिया दुविहा पन्नत्ता । तं जहा । सहत्थपाणाइवायकिरिया चेव तं जहा जीवआरम्भिया चेव अजीव- परहत्थपाणाइवायकिरिया चेव ॥ ११॥ आरम्भिया चेव ॥ १४ ॥ भावार्थ-प्राणातिपातनी क्रियाना वे भेद, भावार्थ-आरंभीया क्रियाना वे भेद कहे- पोताना हाथे पोताना प्राणने तथा क्रोधेकरी ल छे ते कहे छे, जीवनो आरंभ करे तेनी परना प्राणने हणे तेनी क्रिया लागे १ तेम-क्रिया लागे १ जीव रहीत कलेवरने अग्नी- ज परना हाथे पोतानां तथा परना प्राणने ह संस्कार अथवा वखादी वणवानो आरंभ करे णे तेनी क्रिया लागे २ ए वे भेद छे. तेनी क्रिया लागे २ ए वे भेद छे. अर्थ-अ० अपत्याखानकी क्रिया दु० वे प्र- अर्थ-ए० एम पा० परिग्रहनी वे जीव कारे पं० कही तं० ते ज० कहुंछं जीव० सचित अजीव वि० वली. ना अ० पचखाण विना कि० कर्म वांधे ते एवं पारिग्गहिया वि ।। १५ ॥ चे०निश्चे अ० अजीव मदिरादिकना अ० पच भावार्थ-एमज परिग्रहनी क्रियाना वे भेद श्री खाण विना कि० कर्म वांधे ते चे. निश्चे भगवंते कहेलछे ते कहेछ, मनुष्यादिक जीव- अपञ्चक्वाणकिरिया दुविहा पन्नत्ता। नो परिग्रह मेळवे तो क्रिया लागे ? सुवर्ण तथा तं जहा । जीवापञ्चरखाणकिरिया चेव ग्रहादीक अजीवनो परिग्रह मेळवे तो तेनी क्रि- अजीवापञ्चक्वाणकिरिया चेव ॥१२॥ यालागे २ ए वे भेद छे. भावार्थ-अमन्याख्याननी क्रियाना वे भेद अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० ते कहेल छे ते कहे छे, जीवनां पचखाण की ज० कहूं हूं मा० कपट करवायी, लागे ते नथी तेनी क्रिया लागे १ अजीवनां पचरखा चे० वळी मि० मिथ्यात्व करणीथी कर्म वं- ण कर्या नथी तेनी क्रिया लागे २ ए वे भेद छे धाय ते चे० वळी अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं०ते दो किरियाओ पन्नत्ताओ। तं जहा। ज० कहुं छं आ० आरंभकी चे० निश्चे पा० मायावत्तिया चेव मिच्छादसणवत्तिया परिग्रहीकी चे० निशे. चेव ॥ १६॥ दो किरियाओ पन्नत्ताओ। तं जहा। भावार्थ-ये क्रिया श्रीभगवंते कहेलछे ते कहे आरम्भिया चेव पारिग्गहिया चेव।।१।।। छे एक कपटधी क्रिया लागे ते १ वीजी मिथ्या- भावार्थ-हवे वे क्रिया श्रीभगवते कहेलले त्व करणी करने किया लागे २ ए वे भेदछे. ते कहे छे एक आरंभनी १ वीजी परिग्रहनी अर्थ-मा० मायारूपटनी कि० निया दु० २ ए ये भेद छे. ये प्रकारे पं. कही तं. तेज० कई टुं आ० अर्ध-आ० आरंभफी कि क्रिया दुचे अभ्यंतर वांकां बाग रुडा परिणाम देखाडे ते प्रकारे पं० फही तं० तेजा कळुई जी०स चे० बळी प. परनेचे कुडा लेखादिरे ने चित्तनाआरंभधी फर्म बंधाय ने ने० बळी १० चे वली. अचिच वणवा प्रमुस भारंभनी क्रिया चेवळी, मायावत्तिया किरिया दुविहा पन्न- । - (२६) हाणं सूत्र २, उद्देसो १. त्ता तं जहा संजोयणाहिंगरणिया चेव | थडाय त्यारे ते अजीव उपर वेप करे तेनी निव्वत्तणाहिगरणिया चेव ॥६॥ क्रिया लागे ए वे भेद छे. अर्थ-पा० परने दुःख उपजे ते कि० क्रि- भावार्थ-अधीकरणनी क्रियाना वे भेद श्री भगवंते कहेल छे ते कहे छे. खडगने मुंठ जो या दु० वे प्रकारे पं० कही तं० ते कई डवी, पाळीने हाथो जोडवो इत्यादीक शस्त्रोनो शरीरने दुःखदीए तेचे निश्चे प० परने ह०हाथे स० पोताने ह० हाथे पा० परने त्था पोताना संयोग मेळवबो तेनी क्रिया लागे १ खडगा पोताना परना पा० प्राण हणे ते चे० निश्चे. दीक शस्त्रो नवां करावयां अथवा जुनां घंटी, मुसल (सांवेलु) हळदीक फरी सज करा- पारियावणिया किरिया दुविहा प- वां तेनी क्रिया लागे छे २ ए वे भेद छे. नत्ता। तं जहा । सहत्यपारियावणिया अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० चेव परहस्यपारियावणिया चेव ॥९॥ से ज० कहे छे पा० मिश्र अदेखाइ करे ते चे० भावार्थ-परने परिताप उपजावे ने पारिता निश्चे पा० परने दुःख उपजे ते चे० निश्चे. वणीया क्रियाना वे भेद श्री भगवंते कहेल दो किरियाओ पन्नत्ताओ।तं जहा। छे ते कहे छे पोताने हाथे पोते तया परने प- रिताप करे तेनी क्रियालागे १ परने हाथे पो पाओसिया चेव पारियावणिया चेव |७ ताने तथा परन परिताप करे तेनी क्रीयालागे भावार्थ-हवे अजीब पुद्गळनी के प्रकारे | २ ए व भेदछे, क्रिया भगवंते कहेल छे ते कहे छे, कोडना अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० ते उपर द्वेप करे तेनी क्रिया लागे १ कोइने ज. कहुंळु पा० जीवहिंसाथी पाप कर्म बंधाय ताडनादीके करी परिताप उपजावे तेनी क्रि- ते चे निथे अ० अविरतिथी कर्म बंधाय या लागे २ ए वे भेद छे. तेचे० निश्चे. अर्थ-पा० मढेप कि क्रिया दु० वे प्र दो किरियाओ पन्नचाओ। तं जहा। प्रकार प० कही त० ते ज० कई छ. जी० पाणाइवायकिरिया चेव अपञ्चक्वाण- कोई जीवनो द्वेप करे ते चे० निश्चे अ० भीत किरिया चेव ॥ १०॥ थांभला प्रमुखे अथडाय ने ते उपर रीस च- ढावे ते चे० निथे. भावार्थ-हवे वे किया श्री भगवंत कहेल हे ते कडे माणातिपातनी क्रिया ? व्रत पाओलिया किरिया दुविहा पन्नना। पचखाण नहीं करवायी अमन्याख्याननी कि तं जहा। जीवपाओसिया चेव अजी- यालागे २ ए वे मंछे. चपाओमिया चेच ॥ ८॥ अर्थ-पा० प्राणानिपानकी क्रिया दु. ये भावार्थ-हवे कोडना उपर लेप को नेपा प्रकार पं० का नं० ते ज. कहुं; म० पानाने उसीया जियाना व मंद कोट ते कडे रे ६० हाये पारमाणी रणने चानिये ५० कोइ जीव उपर टेप करे तो नेनी नियाला परने हाथे पा० पानानापरना प्राणदणे १ भान थांगले अथवा पापाण ममग्ने । ते चे.नि.
हाणं मूत्र २. उद्देसो १. (२७) पाणाइवायकिरिया दुविहा पन्नत्ता । आरम्भिया किरिया दुविहा पन्नत्ता। तं जहा । सहत्थपाणाइवायकिरिया चेव | तं जहा । जीवआरम्भिया चेव अजीव- परहत्यपाणाइवायकिरिया चेव ॥ ११ ॥ आरम्भिया चेव ॥ १४ ॥ भावार्थ-माणातिपातनी क्रियाना वे भेद, भावार्थ-आरंभीया क्रियाना वे भेद कहे- पोताना हाथे पोताना प्राणने तथा क्रोधेकरी ल छे ते कहे छे, जीवनो आरंभ करे तेनी परना प्राणने हणे तेनी क्रिया लागे १ तेम-क्रिया लागे १ जीव रहीत कलेवरने अग्नी- ज परना हाथे पोतानां तथा परना प्राणने ह- संस्कार अथवा वस्त्रादी वणवानो आरंभ करे णे तेनी क्रिया लागे २ ए वे भेद छे. तेनी क्रिया लागे २ ए वे भेद छे. अर्थ-अ० अप्रत्याखानकी क्रिया दु० वे प्र- अर्थ-ए० एम पा० परिग्रहनी वे जीव कारे पं० कही तं० ते ज० कहुंछं जीव० सचित ! अजीव वि० वळी. ना अ० पचखाण विना कि० कर्म वांधे ते एवं पारिग्गहिया वि ॥ १५॥ चे निश्चे अ० अजीव मदिरादिकना अ० पच भावार्थ-एमज परिग्रहनी रियाना वे भेद श्री खाण विना कि० कर्म वांधे ते चे० निश्चे भगवंते कहेलछे ते कहेछे, मनुष्यादिक जीव- अपच्चक्वाणकिरिया दुविहा पन्नत्ता। नो परिग्रह मेळवे तो क्रिया लागे १ सुवर्ण तथा तं जहा । जीवापञ्चक्खाणकिरिया चेव ग्रहादीक अजीबनो परिग्रह मेळवे तो तेनी कि- अजीवापञ्चक्खाणकिरिया चेव ॥१२॥ यालागे २ ए वे भेद छे. भावार्थ-अप्रत्याख्याननी क्रियाना वे भेद अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० ते कहेल छे ते कहे छे, जीवनां पचखाण को ज० कहुं छु मा० कपट करवाथी, लागे ते कहेल छे ते कहे छे, जीवनां पचखाण कयौं वली मि. मिथ्यात्व करणीधी कर्म बं- नधी तेनी क्रिया लागे १ अजीवनां पचखा ण कर्या नथी तेनी क्रिया लागे २ ए वे भेद छे धाय ते चे० वळी अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं०ते दो किरियाओ पन्नत्ताओ। तं जहा। ज० कई छं आ० आरंभकी चे० निश्चे पा० मायावत्तिया चेव मिच्छादसणवत्तिया परिग्रहीकी चे. निथे. चेव ॥ १६॥ दो किरियाओ पन्नत्ताओ। तं जहा।। भावार्थ-ये क्रिया श्रीभगवते कईलछे ते कहे आरम्भिया चेव पारिग्गहिया चेव।।१३। छे एक कपटची क्रिया लागे ते १ यीजी मिथ्या- भावार्थ-हवे के क्रिया श्रीभगवने कहेल व फरणी कररे निशा लागे २ ए ये भेदले. ते कहे छे एक आरंभनी १ नीजी परिग्रहनी अर्थ-मा० मायारूपटनी कि निया दु० २ ए पे भेदले. ये प्रकारे पं. कही तं० तेज. कई आ० अर्थ-आ० आरंभफी कि० क्रिया दु० ये अभ्यंतर वांकां याद रुडा परिणाम देखाढे ते प्रकारे पं० फटी तं. तेज० फहुं; जी स चे बळी ५० परनेच दा लेखादिके ने चित्तना आरंभयी फर्म बंधाय ते चेकवली जा अनिच गणना प्रमुख आरंभनी मिना चेवळी, मायावत्तिया किरिया दुविहा जेवळी. 1 (२८) हाणं सूत्र २. उद्देसो १. त्ता । तं जहा । आयभाववतणया चेव न्य पाप काइ भोगववानुं छेज नहीं, ए पंच- परभाववङ्कणया चेव ।। १७ ॥ भूतथी जुदो छठो आत्मा कोइ नथी इत्या. भावार्थ-मायावतीया ते कपटधी लागे । दीक विप्रित श्रद्धेने विमितपरुपे तेनी क्रिया ते क्रियाना वे भेद कहेल छे ते कहेछे, अंदर लागे २ ए वे भेद छे. पोते वांकां आचरण आचरे अने बाहीर रुडां अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० करी देखाडे तो पोताना आत्माने छेतरवा | तेज० कहुं हुं दि० दृष्टि जोवाथी कर्म बंधाय रुप क्रिया लागे १ पोते खोटा लेखादीके क ते पु० पाप कद्यानुं पुछयु त्था फरस. री परने छेतरे तथा पोते परनी पासे वांका दो किरियाओ पन्नत्ताओ। तं जहा। आचरण आचराये तो क्रिया लागे २ ए वे दिविया चेव पुट्ठिया चेव ।। १९॥ भेद छे. अर्थ-मि० मिथ्यात्व दर्शन कर्म कि० क्रि- भावार्थ-हवे वे क्रीया श्री भगवंते कहेल या दु० वे प्रकारे प० कही तं० तेज० कहुं छे ते कहे छे, इंद्रीये जोवाची क्रिया लागे १ छ उ० जिनवचनी ओछु अधिकमाने परुपे बीजी हाथ प्रमुख स्पर्गवाची क्रिया लागे २ ते त्या पोताना शरीर प्रमाणे आत्मा न माने | ए वे भेद छे. ते चे० वळी त० जीव न माने पंच भूत म- अर्थ-दि० द्रष्टिनी कि० क्रिया दु० वे ल्याछे एम कहे ते चे० वली. प्रकारे पं० कही तं तेज० कहुं छं जी० जीवनुं मिच्छादसणवत्तिया किरिया दुविहा मण जोतां पाप बंधाय ते चे० वळी. रुपादिक जोतांलागे ते चे० बळी अ०चित्रा- पन्नत्ता । तं जहा । ऊणाइरित्तमिच्छा- दसणवत्तिया चेव तवइरित्तमिच्छाद- तं जहा। जीवदिडिया चेव अजीव- दिट्ठिया किरिया दुविहा पण्णत्ता । सणवत्तिया चेव ।। १८ ॥ दिहिया चेव ॥ २० ॥ भावार्थ-मिथ्यात्वदर्शनवतिया क्रियाना भावार्थ-द्रष्टिये जोवाधी क्रिया लागे नेना वे भेद श्री भगवते कहेल छे ते कहे छे, जे जी वे भेद कहेल छे ते कडे छे. हाथी, घोडा, खी, वनुं जेटलं गरीर होय तेटलो जीव मानवानुं भगवंते कहेल छे, तेम छतां कोई अंगुठाना पुरुप, भवाझ्या प्रमुख जीवने जोयाथी तथा पर्व जेवडो जीव माने, कोड सामलीय धान- पापर्ने प्रश्न पुलवायी किया लागे १ चित्रा- मण प्रमुख अजीयने नोवायी क्रिया लागेर ना कण जेवडो माने. कोइ पांचसे धनुप्यथी ये भेद हे. पण मोटो माने, एवी रीते न्युनाघीक श्रद्धेने अर्थ-110 ० एम पु० जीर फरसनाची अ- न्युनाधीक परुपे तेनी निया लागे ? केटला- लाफ कहे जे न्युनाधीक आत्मा छेजनही जीव फरसनार्थी वि० पण. पृथ्वी ? पाणी अग्नी : वायु '४ आकागर एवं पुष्टिया वि ॥ २१ ॥ ए पांच भूत मल्यां के एयी आ टवाफवादी भावार्य-गमन पुठीया क्रियाना ये भेद सर्व क्रिया थार छे. प्यारे पंचभुत शिवगा कोल ने ने कोले, जीवन स्पर्शवाची क्रिया जह पोतपोताना स्वरूपमा मजी जयनारे ए. लागे । अनीवन मर्गवा नया गग हो तं हाणं सूत्र २. उसो १. ( २९) भेद छे. जीव अजीवनुं प्रश्न पुछे तेनी क्रिया लागे । खीने जेम जेम लोक वखाणे अथवा जोवे २ ए वे भेट छे. तेम तेम तेहनो धणी खुशी थाय अथवा एवा अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० जीवनो समुदाय मेळवे तेनी क्रिया लागे १ तेज० कहुंछं पा० प्राणाति प्रातित्यकी क्रिया तेमज घर प्रमुख नवां रमणीक वनावेल होय बाह्य वस्तु ने आश्रीने चे०वळी सा० सर्व प्रकारे तेने जोइ लोक वखाणे त्यारे तेनो धणी खु- लोकना मेलावाथी उपनी ते चे० वळी. शी थाय अथवा एवां घराकीक अजीवनो दो किरियाओ पण्णत्ताओ। तंज- समुदाय मेळवे तेनी क्रिया लागे २ ए वे हा । पाडचिया चेव सामन्तोवणिवा- अर्थ-दो० वे कि० क्रिया प० कही तं० इया चेव ॥ २२॥ तेज० कही सा० पोताने हाथेथी उपनी ते भावार्थ-हवे वे क्रिया कहेल छे ते कहेछ, । चे० वळी ने० नाखवाथी उपनी ते चेवळी कोइनुं भुंडु वांछे तो क्रिया लागे १ वरतुनो दो किरियाओ पन्नताओ। तं जहा। समुदाय मेळवबाथी क्रिया लागे २ ए वे भेदछे. साहत्थिया चेव नेसत्थिया चेव ॥२५॥ अर्थ-पा० प्रातित्यकी क्रि० किया दु० भावार्थ-हवे वे क्रिया श्रीभगवंते कहेल छे वे प्रकारे प० कही तं० तेज० कहुं हुं जी० ते कहेछे पोताना हाथथी पाप करे तेनी क्रि- जीवने आश्रीने कर्म बंधाय ते चे० वली अ० या लागे ? पापाणादीक नाखवाथी क्रिया अजीवथी राग द्वेप उपजे ते चे० वळी. लागे २ ए वे भेद छे. पाडुच्चिया किरिया दुविहा पण्णत्ता। अर्थ-सा. स्वहस्तकी कि० क्रिया दु० वे तं जहा । जीवपाडचिया चेव अजीव- प्रकारे पं० कही तं० तेज० कहुं छं जी. जीवने पोताने हाथे हणे ते चे० वळी १० पाडुचिया चेव ॥ २३ ॥ अजीव पोताने हाथे खडगादिक करी हणे ते भावार्थ-हवे परतुं सुंई बांछे ने क्रियानावे चे० वळी. भेद कहेलछे ते कहेछे. कोइ जीवन भुंई वाले साहस्थिया किरिया दुविहा पन्नत्ता। तथा स्त्रीयादिक जीवने आश्रीने कर्म बंधाय तेनी क्रिया लागे ? अजीवन भुई वांछे तथा तं जहा । जीवमाहस्थिया चेव अजी- घर सुपर्णादीक अजीब आधी रागद्वेषयी जे वसाहत्थिया चेव ।। २६ ।। फर्म बंधाय तेनी क्रिया लागे. २ प वे भेदले. भावार्थ-पोताना हाथथी पाप करे ते अर्थ-ए० एम सा. सामंत उपनीत कि क्रियाना ये भेद श्री भगवत कडेल छे ते कहे या जाणवी गीय अजीव आधीने वि० पण, छे, पोताना हाथे झाली जीवे करी जीवने हणे नेनी फ्रिया लागे , खड्गादि गन्धी एवं सामन्तोवणिवाइया वि ।। २४ ॥ अजीव करी जीवने रणे नेनी क्रिया लागेर भावार्थ-पयन वस्तुनो समुदाय मेळयवाची वे भेद हे. क्रिया लागे ना ये भेद कोल ने कोले अर्थ-T० एम ने नादर पाणी प्रमुख पाताना घाना, जावी. सी. ममग्न रुपन दे- अजीव वाण ममुख दि० पग. - (३०) हाणं सूत्र २. उद्देसो १. एवं नेसत्थिया वि ॥ २७॥ दो किरियाओ पन्नत्ताओ । तंज भावार्थ-एमज पापाणादिक नाखवाथी हा । अणाभोगवत्तिया चेव अणवकस क्रिया लागे तेना पण वे भेद श्री भगवंते क- वत्तिया चेव ॥ ३१ ॥ हेल छे कहेछे, राजादीकनी आज्ञाथी फुआरा भावार्थ-चळी वीजी वे क्रिया श्री भगवं प्रमुख यंत्रद्वाराए करी पाणी उछाळg तेम जीवने नाखीदीये तेनी क्रिया लागे १ नाळ कहेल छे ते कहे छे. अज्ञानपणाथी उपयोग प्रमुख मेळवीने धनुष्य वाणर्नु नाखवू, तेम विना निधंस (पापनी सुगरहीत ) पणे का कोइ जीवनी विराधना थाय एवी रीते अ- वंधाय ते अना भोगवतिया क्रिया १ पोतान जीवने नाखीदीये तेनी क्रिया लागे २ एने शरीरनी अपेक्षा विना क्रिया लागे ते अणव- सथियाक्रियाना वे भेद छे. कांक्षावतिया क्रिया २ ए वे भेद छे. अर्थ-दो० वे प्रकारे कि० क्रिया प०क- अर्थ-अ० उपयोग विना अज्ञानपणाथी ही तं० तेज० कहुं हुं आ० स्वामीनी आ- कर्म बंधाय ते कि० क्रिया दु० वे प्रकारे प० ज्ञाथी कर्म बंध ते चे० बळी वे० विदार कही तं० तेज० कहे छे अ० उपयोग विना छेदवू तेहथीकर्म बंध ते चे० वळी. वस्त्रादिकनुं लेबु ते चे० वळी अ० उपयोग विना पुजवू तेथी कर्म बांधे ते चे० वळी. दो किरियाओपन्नताओ ।तं जहा। अणाभोगवत्तिया किरिया दुविहा प आणवणिया चेव वेयारणिया चेव नत्ता । तं जहा । अणाउत्तआयणया ॥ २८-२९ ॥ चेव अणाउत्तपमज्जणया चेव ||३२|| भावार्थ-हवे वे प्रकारनी निया श्रीभगवंते भावार्थ-अनाभोगवतिया क्रियाना वेप्रकार कहेल छे ते कहे छे. स्वामी (मालीक) नी श्रीभगवंते कहेल छे ते कहे छे उपयोग विना आज्ञायी कर्म बंधाय ते आज्ञापनी क्रिया क- वस्त्रादीक लेवा मुकवाथी १ उपयोग विना हीए १ कोइने विदारे छेदे तो तेहथी कर्म पुंजवा प्रमार्जवायी २ ए वे भेद छ, वंधाय ते विदारणि क्रिया २ ए वे भेद छे. अर्थ-अ० पोताना शरीरनी अपेक्षा विना अर्थ-ज० जेम ने० नेसथिया कही तेम कि० क्रिया लागे ते दु० वे पं० कन्या तं० ते ज० कहुँ छ आ० आत्म शरीरथी पापलागे जहेव नेसत्थिया ।। ३०॥ । तेहवां कर्म करेने चे० वळी १० परना शरीर- भावार्थ-जेम नेसथिया क्रियाना वे भेद कहे- थी अं० पाप करतां क्रियालागे ते चे बळी लछे तेमजविदारणि क्रियाना पण वेभेदजाणवा अणवकडवत्तिया किरिया दुविहाप- अर्थ-दो वे कि० क्रिया पं० कही तं० तेज० कहुं हुं अ० उपयोग विना निस- भत्ता । नं जहा । आयसरीरअणवक- पणे अज्ञानपणाची कर्म वंशय तेचे बळी बत्तिया चेव परसीररअणवकाव- अ० पोताना गरीरनी अपेक्षा बिना क्रिया त्तिया चेव ॥ ३३ ॥ लागे ने चे० वळी, भावार्थ-प्रणवकांक्षावतिया क्रियाना वे एपण. 1 हाणं मूत्र २. उद्देसो १. . ( ३१ ) . भेद श्री भगवंते कहेल छे ते कहे छे पोताना भावार्थ-द्वेप करवाथी क्रिया लागे तेहना वे शरीर थकी पाप लागे तेहवां कर्म करे ? भेद श्री भगवंने कहेलछे ते कहेछे क्रोधथी कर्म परना शरीरथी पाप कर्म करतां पाप लागे २ बंधाय १ मानथी कर्म बंधाय २ ( अर्थात् ए वे भेद छे. जे वस्तु उपर द्वेप थाय त्यां त्यां क्रोधमान अर्थ-दो० वे कि० क्रिया पं० कही तं० ते करेज. जेम कोणिक राजाए विशाळानगरी ज० कहुं हुं पे० प्रेम स्नेहथी क्रिया चे० बळी भांगी ते निरीयावळीकासुत्रथी जाणवू ) ए दो० द्वेपकोपनी क्रिया चे० वळी. वे भेद छे. दो किरियाओ पन्नत्ताओ।तं जहा। अर्थ-दु० वे प्रकारे ग० गरहणा छे (पा- पनी निंदा) पं० कही तं० ते ज० कहुंछं पेज्जवत्तिया चेव दोसवत्तिया चेव ।। म० मनेकरी वे. एक ग० पापने निंदे व० ॥३४॥ । वचने करीने वे० एक पापने ग० निंदे. भावार्थ-वळी वे प्रकारनी क्रिया श्रीभग- दुविहा गरहा पण्णत्ता । तं जहा । वंते कहेल छे ते कहेछे. कोइना उपर प्रेम करवाची क्रिया लागे १ कोइना उपर द्वेप मणसा वेगे गरहइ वयसा वेगे गर- करवाची क्रिया लागे २ ए वे भेद छे. हइ ॥१॥ अर्थ-पे० मनी कि० क्रिया दु० वे प्र- भावार्थ-पुर्वोक्त सर्व क्रिया निदनीक छे कारे पं० कही तं० ते ज० कहुं हुं मा० मा- तेथी हवे वे प्रकारे गहरे ( निंद्या ) कहेल छे या कपटनी प्रेम किया चे० वळी लो० लो- ते कहेछे, एक करेल पापनो पस्तावो पोताना भयी रागधरे ते द्वेपनी क्रिया चे० बळी. मनधी करी ते पापने निंदे । एक लोकने पेज्जवत्तिया किरिया दुविहा पन्नत्ता रीझववा फक्त वचनथीन करेल पापने निंदे पण यनधी निदे नहीं ० ए वे भेद छे. । तं जहा । मायावत्तिया चेव लोभ- अर्थ-अ० अथवा ग० पापना निदा दु० वत्तिया चेव ॥ ३५॥ वे प्रकारे प० कही हे तं० ते ज० कहुंछंदी० भावार्थ-प्रेमथी लागे ने क्रियाना वे भेट जन्म पर्यंत पे० एक अ० कालना ग० पाप- श्री भगवंते कहेल छे ते कहे . कपन्धी कर्म निंदे र० थोडा पे० एक अ० कालनां पाप बंधाय १ लोभवी कर्म बंधाय २ ( अर्थात् : ग० निंदे. जे वस्तु उपर प्रिनि धड त्यां कपट लोभ करेज)। अहवा गरहा दुविहा पण्णत्ता । तं पये भेदले. अर्थ-दो टेप कोपनी कि० क्रिया दुवे पेगे अद्धं गरहइ ॥२॥ जहा । दीहं पेग अद्धं गरहइ रहस्सं मकारे पं. काही २० ते ज० कहुं हुं को मोधयी कर्म वध न ० वर्ग मा० मानवी भावार्थ-अथवा बळी वे प्रकारे निंद्या श्री कर्म बंधने बळी. भगवते कहेल के ने कह छे. एक प्राणी दीर्घ (लांबा ) काल ने जन्म पर्यंत अनुक्रमे करेल दोसवतिया किरिया दुविहा पन्नता। पापने निदे १.एफ. माणी थोढा कामना ने दश तं जहा । कोहे चेव माणे चेव ॥३॥ पंदर वर्षना काल मापने निंद २ एव भेटले.
हाणं मूत्र २. उहेसो १. अर्थ-दु० चे प्रकारे प० पचखाण० ५० कया दोहिं ठाणेहिं संपन्ने अणगारे अ- तं० तेज०कहुंछु म० मनथी शुद्ध वे० एक जीव ५० पचखाण करे (समकिति) व० वचनेक णाइयं अणवदग्गं दीहमद्धं चाउरन्तं वे. एकजीव ए० पचपे भाव विना ते. संसारकन्तारं वीतीवएज्जा । तं जहा। दुविहे पञ्चक्खाणे पन्नत्ते । तंजहा। विज्जाए चेव चरणेण चेव ॥ मणसा वेगे पञ्चक्खाइ वयसा वेगे प- भावार्थ-जेहनी आदी नथी अने अंत पण नथी एवि चार गतीरुप मोटी अटवीने साधु चक्खाइ ॥१॥ बे प्रकारे करी ओलंघी जाय ते ज्ञाने करी भावार्थ हवे वे प्रकारना पचखाण श्रीभग- | अने चारित्रे करी २ ए वे भेद छे. वंते कहेलछे ते कहे छे. एक समकीतद्रष्टि जीव अर्थ-दो० वे ठा० थानक अ० ए दुःखदाइ पोताना खरा मनथी भाव शुद्धिए करी पच- छ एम जाण्या विना नो० नहीं आ० आत्मा खाण करे ( इहां द्रव्ये भावे बन्ने प्रकारे पच- क० केवली प० भाप्यो ध० धर्म प्रते ल०पामे खाण जाणवा) १ एक मिथ्यात्वद्रष्टि मन विना स० सांभलवेकरी तं. तेज० कहुं छु आ० फक्त वचनथीज पचखाण करे (इहां द्रव्य प- आरंभ क्षेत्रादिकनो चे० वळी प० परिग्रह चखाण जाणवां) २ ए वे भेद छे. धन प्रमुख ए वे जे न तजे ते. अर्थ-अ० बळी प० पचखाण दु० वे प्रकारे दो अणाई अपरियाणित्ता आया पं० कहा तं० ते ज० कहुंटुं दी० जावजीवनां नोकेवलिपन्नत्तं धम्मं लभेज्ज सवण- वे. एक अ० कालना प० पचचाण करे र० थोडा वे एक अ० कालर्नु प० पचखाण करे. याए । तं जहा । आरम्भे चेव परि- अहवा पञ्चक्खाणे दुविहे पत्नत्ते । गहे चेव ॥ १ ॥ तं जहा । दीहं वेगे अद्धं पञ्चक्खाइ भावार्थ-वे स्थानक ज्ञानबुद्धिये अनर्थना कारण जाणीने छांडे नहीं तो ते जीव केव- रहस्सं वेगे अद्धं पञ्चक्खाइ ॥२॥ कीपरुप्यो धर्म सांभळयो पामे नहि ते वे भावार्थ-अथवा वळी वे प्रकारे पचखाण स्थानक कहे छ, क्षेत्रादीकनो आरंभ १ अने श्री भगवंते कहेल छे ते कहे छे. एक प्राणी धन धान्यादीक परिग्रह २ ए वे भेद छे. दीर्घ काळ ते जाव जीव सुधीनु पचखाणकरे ? अर्थ-दो० वे ठा० थानक अ० ए माठां एक थोडा काळदु पचखाण करे २ ए वे भैदछे. छे एहयु जाण्याविना आ० जीव णो० नही अर्थ-दो० वेठा प्रकारे सं० सहित अ०सा- के. केवलीनो वो० प्रतिवोध प्रति यु० पामे धुने अ० आदिनधी जेहने अ० नधी छेहडो | तं० तेज कहुं हुं आ० आरंभ चे वळी जेहनो दी० घणोकाल छे जेहने चा० चार प० परिग्रह चे० वळी. गतिना सं० संसार रूप कं० अठवी वी० अति दो गणाई अपरियाणित्ता आया । क्रमे साधु तं तेज० कहुं छुवि० सम्यकत्व ते ज्ञानेकरी चे वली च चारित्र करीमोपा णो केवलं बोहिं बुझेज्जा। जहा । चे० बळी. आरम्भे चेय परिग्गहे चेव ॥२॥ - . -- -- . हाणं सूत्र २.. उद्देसो १. (३३) भावार्थ-वे स्थानक ज्ञानबुद्धिये अनर्थना भावार्थ-छ काय जीवना रक्षण रुप शुद्ध हेतु जाणीने छांडे नही, तो ते जीन केवळीप, संयम पाळी शके नहीं. रुपेल समकितरुप बोधवीज पामे नहीं ते वे अर्थ-नो० नहीं के० शुद्ध सं० ‘संवर स्थानक कहे छे. आरंभ १ परिग्रह २ ए सं० पामे. वे भेद छे. नोकेवलेणं संवरेण संवरेज्जा ॥६॥ अर्थ-दो० वे ठा० थानक प्रते अ० ए वं- भावार्थ-शुद्ध संवरे करी आश्रवद्वार रुंधी धन छे एहवू जाण्याविना आ० जीव नो० शके नहीं, नही के० केवलीनो साधु मु० केशे तथा राग- अर्थ-नो० नहीं के० शुद्ध आ० मतिज्ञान द्वेषे रहित भ० थईने अ० घरमुकीने अ० सा | परिग्रह आरंभ छोड्या विना उ० पामे. धुपणुं प० पामे तं० तेज कहुं छं अ० आरं नोकेवलं आभिणिवोहियनाणं उ- भ चे वली प० परिग्रह ए वेन मुके चे०वळी. प्पाडेज्जा ॥७॥ दोगणाई अपरियाणित्ता आया नो भावार्थ-तेमज आरंभ परिग्रह ए वे छांडया केवलं मुण्डे भवित्ता अगाराओ अ- वीना शुद्ध सर्व वस्तु ग्राहक मतिज्ञान पामे नहीं णगारियं पवएज्जा। तं जहा। अरम्भे अर्थ-ए० एम सु० सूत्रज्ञान.' चेव परिग्गहे चेव ॥३॥ एवं सुयनाणं ॥ ८॥ भावार्थ-एम श्रुतज्ञान भावार्थ-वे स्थानक ज्ञानबुद्धिये अनर्थना अर्थ-उ० अवधिज्ञान. हेतु जाणीने छांडे नहीं, तो ग्रहस्थावास मुकी ओहिनाणं ॥ ९॥ द्रव्यभावथी मुंड थइ अणगार पणुं धारण भावार्थ-अवधिज्ञान करी शके नहीं ते वे स्थानक कहे छे, आ- अर्थ-म० मनना भाव जाणे तेज्ञान न पामे. रंभ १ परिग्रह २ ए वे भेद छे. मणपज्जवनाणं ॥१०॥ अर्थ-ए० एम वे थानक जाण्या विना भावार्थ-मनपर्यवज्ञान नो० नहीं के० शुद्ध वं० ब्रह्मचर्यने आ० से- अर्थ-के. केवलज्ञान न पामे ए ११ बोल. वी शके. केवलनाणं ॥ ११ ॥ एवं नोकेवलं बम्भचेवासं आव भावार्थ-केवळज्ञान पण पामे नहीं ए .?? सेज्ज॥४॥ भावार्थ-एमज ए वे स्थानकने अनर्थना अर्थ-दो० वे ठा० थानक प० ए छांडवा हेतु जाणीने छांडे नहीं तो शुद्ध ब्रह्मचर्य पाळी जोग एम जाणीने आ० जीव के. केवलीनो शके नहीं. १० भाष्यो ध० धर्म प्रते ल. पामे स० सां- अर्थ-नो० नहीं के० शुद्ध सं० छकायनी भलवे. करी तं० ते ज० कहुंछं. आ० आरंभ चे० वळी प० परिग्रह ० वळी ए० एम रक्षारुप सं० संजम पाली के. जा० यावत के. केवळ जान उ० पामे आ- नोकेवलणं संजमेणं संजमज्जा॥५॥ रंभ परिग्रह तजे ते ए ११ बोल पामे. , . .. - बोल थया.
(३४) हाणं भूत्र २. उद्देसो १. ते अ- दो ठाणाई परियाणित्ता आया केव- ढतो काल चे० वळी उ०, अवसर्पिणी काल लिपन्नत्तं धम्म लभेज्ज सवणयाए । उतरता आरा चे० वळी. तं जहा । आरम्भे चेव परिग्गहे चेव । दो समाओ पण्णत्ताओ। तं जहा । एवं जाव केवलनाणं उप्पाडेज्जा ॥ ओसप्पिणिसमा चेव उस्सप्पिणिसमा [१-११] ॥१॥ चेव ॥ भावार्थ-आरंभ ने परिग्रह ए वे अनर्थना भावार्थ-वे प्रकारे समयकाळ श्री भगवते हेतु जाणीने छोडे तो ते जीव केवळीपरुप्यो | कहेल छे ते कहे छे एक उत्सर्पिणी ते दस धर्म सांभळवो पामे १, समकित रुम बोधवीज | क्रोडा क्रोडी सागरोपम मुधी चडतो काळ पामे २, द्रव्य भावथी मुंड थइ अणगार थाय | वीजो अवसर्पिणी ते दस क्रोडा क्रोडी सागरो- ३, शुद्ध ब्रह्मचर्य पाळे ४, शुद्ध संयम पाळे | पम सुधी पडतो काळ २ ए वे भेद छे. शुद्ध संवरे करी ५, आश्रवद्वार रुंधे ६, शुद्ध अर्थ-दु० वे प्रकारे उ० उन्माद प० का सर्व वस्तु ग्राहक मतिज्ञान ७, श्रुतज्ञान ८, तं० तेज० कहुंछु ज० देवताधिष्टित चे० वळी नधिज्ञान ९, मनपर्यवज्ञान १०, केवळज्ञान । मो० मोहनी (पुन्य धन प्रमुपनी मुर्छा) *११, ए ११ वोल पामे. चे० वळी क० कर्म उ० उदय त० तिहां गं० अर्थ-दो० वे ठा० थानके आ० जीव के० वळी जे. जे से० ते ज० जक्षावेस ते यक्षनी केवलीनो प० भाष्यो ध० धर्म ल० पामे स० वलगण से० ते णं० वळी सु० सुपे वे० वे- सांभळवाथी तं० ते ज० कहुंछ सो० सांभ- दाय चे० वळी मु० सुपे वि० मुकावीए चे०, ळवाथी चे० वळी अ० सिद्धात ते भाव सद्द वळी तं० तिहां ण० वळी जे. जे से० ते हवाथी चे० वळी जा. यावत के० केवळज्ञान । मो० मोहनी क० कर्मनो उ० उदय से० ते उउपार्जे एटले पाछला११ वोल कह्या ते पामे. ० वळी दु० दुःखे भोगवीए चे० वळी दु. दोहिं ठाणेहिं आया केवलिपन्नतंध- दुःखे वि० मुकाय चे० बळी. म्मं लभेज्ज सवणयाए ।तं जहा। दुविहे उम्माए पण्णत्ते । तं जहा । सोचा चेव अहिसमेच चेव जाव के- जक्खाएसे चेव मोहणिज्जस्स चेव क- वलनाणं उप्पाडेज्जा ।। [१-११]||२|| म्मस्स उदएणं । तत्थ गंजे से जक्खा- भावार्थ-वळी वे स्थानके जीव केवळीप- एसे से णं सुहवेयतराए चेव सुहविमो- रुप्यो धर्म सांभळवाथी पामे ते कहे छे, सि- यतराए चेव । तत्य णं जे से मोहणि- द्धांत सांभळवाथी १ अने ते भाव धारीने श्रद्धवायी २ ए वे भेद छे, पुर्वोक्त केवळज्ञान जस्स कम्मस्स उदएणं से णं दुहवे- पर्यत ११ बोल ते सिद्धांत सांभळबाथी १ यतराए चेव दुहविमोयतराए चेव ।। अने ते भावधरीने श्रद्धवाथी पामे २ भावार्थ-ये मकारे उन्माद (चित्त विहवळ) अर्थ-दो० वे प्रकारे स० काल पं० परु- कहेल छे ते कहे छे, देवता अधिष्टित होवाथी प्या तं० ते ज. कडुंर्छ ओ० उत्सर्पिणी ब. गमे तेम नाचवं कुवँ के वोलत्रारुप उन्मादपणं - + - हाणं सूत्र २. उद्देसो १. (३५) , पामे १, बीजो मोहनी कर्मना उदयथी पुत्रने | अर्थ-ए० एम च० चउवीसे दं० दंडके पुत्री कहे तथा धन कुटुंबादिकने विषे अत्यंत । जाणवू जा० यावत वे० वेमानीकलगे. गृद्ध थाय २, एवे भेदछे. ए वेधकारना उन्माद एवं चउवीसा दण्डओ जाव वेमा- छे ते माही जे यक्षनो उन्माद ते मंत्र यंत्र मुळीया- णियाणं ॥ [२-२४ ] ॥ ३॥ । दीके करी.सुखे मुकाय १, वीजो मोहनी कर्म- ना उदयथी उन्माद ते मंत्रादीकथी पण छुटे भावार्थ-एमज वैमानीक मुधी चोवीस नहीं, अने अनेक भवभ्रमण करावे ने श्रुतधर्म | दंडकना सर्व जीवने अर्थ अने अनर्थ ए वे के चारित्रधर्म ए वे मांहेथी एक पण धर्म पामे | प्रकारना दंड जाणवा. नहीं ते मोहनी कर्मनी सीतेर क्रोडा क्रोडी अर्थ-दु० वे प्रकारे दं० दर्शन प० कह्या सागरोपमनी स्थिति छे तेहना क्षयोपशमथीज | तं० ते ज० कहुंछं स० जिन वचननी शुद्ध छुटे, तेथी दुःखे (घणी मुश्केलीथी) मुकाय २ सदहणाते चे० वळी मि० जिन वचनथी वि- अर्थ-दो० वे द० दंड पं० परुप्यां तं० परीत चे० वळी. तेज० कहुंछु अ० पांच इन्द्रीने अर्थे पाप करवं दुविहे दंसणे पन्नत्ते । तं जहा । स- ते चे० बळी अ० परने अर्थे पाप ते चे० बळी म्मइसणे चेव मिच्छादंसणे चेव ॥१॥ दो दण्डा पन्नत्ता । तं जहा । अ भावार्थ-वे प्रकारे दर्शनश्री भगवते कहेल, । हृदण्डे चेव अणट्ठदण्डे चेव ॥१॥ छे ते कहेछे, जीन वचनानुसारी तत्वनुं जाणवू भावार्थ-चे प्रकारना दंड श्रीभगवंते कहेल | ते समकित दर्शन १ जीन वचनथी विमित छे ते कहे छे. पांच इंद्रीयोने आश्रीने पोताना | अतत्वरुप जाणवू ते मिथ्यात्व दर्शन २ ए | स्वार्थ माटे पाप करवु ते अर्थ दंड १ पोताना | वे भेद छे. । स्वार्थ वीना पाप करवू ते अनर्थ दंड २ ए अर्थ-स० समकित द० दर्शन दु० वे प्र- बे भेद छे. कारे पं० कडं तं० ते ज० कहुंछु नि० स्व- अर्थ-ने० नारकीओने दो० वे द० दंड भावेज स० तत्वनी रुचि उपजे ते उपदेश पं० कया तं तेज० कहुंछु अ० पोताने अर्थेपरने | विना चे० वळी अ० गुरुना उपदेशथी स० हणे चे० वळी अ० द्वेष मात्रथी उपजे ते तत्वरुचि ते चे० वळी. चे० वळी. सम्म ईसणे दुविहे पन्नते । तं जहा। नेरइयाणं दो दण्डा पण्णत्ता । तंज- निसग्गसम्मइसणे चेव अभिगमस- हा । अट्ठदण्डे चेव अणट्ठदण्डे चेव म्मइंसणे चेव ॥ २॥ ॥ [१]॥२॥ भावार्थ-समकित दर्शन वे प्रकारे श्रीभग- भावार्थ-साते नारकीना जीवने वे दंड वंते कहेल छे ते कहेछे, मरुदैवी मातानी पेरे कहेल छे ते कहे छे पोताना शरीरनुं रक्षण स्वभावेज जाती स्मर्णादीक ज्ञानथी तत्वरुची करचा माटे परने हणे ते अर्थ दंड १ फक्त | आवे ते निसर्ग समकित १, भरतादिकना अ- ट्रेप उपजवायीज परजीवने हणे ते अनर्थ दंड २ ठाणुं भाइनी पेरे गुरुना उपदेशथी तत्वरुची आवे ते अभिगम समकित २, ए ये भेद छ, पा हाई ए वे भेद छे.
- ( ३६ ) हाणं सूत्र २, उदेसो १: अर्थ-नि० निसर्ग (स्वभावे) स० सम्यक हठ न मुके ते चे० वळी अ० हठ विना कुमत द० दर्शन दु० वे प्रकारे पं० कर्जा तं० ते ज० राखे ते चे० वली. कहुंछु प० आव्युं जाय ते चे० वळी अ० मिच्छादसणे दुविहे पन्नते।तं जहा। आव्यु जाय नहीं ते अप्रतिपती चे० वळी निसग्गसम्मइंसणे दुविहे पन्नत्ते । आभिग्गहियमिच्छादंसणे चेव अणा- तं जहा । पडिवाई चेव अपडिवाईचेव भिग्गहियमिच्छादसणे चेव ॥ ५॥ ॥ ३ ॥ भावार्थ-मिथ्यात्व दर्शन वे प्रकारे श्रीभगवंते भावार्थ-निसर्ग समकितना वे भेद श्रीभगवते कहेलछे ते कहेछ, कुमतिए करी खोटो पकडेलो कहे रछे ते कहेछ, एक प्रतिपाती ते आवेलुं जा हछ कदाग्रह मुके नहीं ते अभिग्रहिक मिथ्या- य ते उपशम भावनु उपशम समकित उत्कृष्टुं त्व १, हट विना हृदयमां सत्यने सत्य माने अंतर मुहुर्त सुधी रहे अने क्षयोपशम समकित अने असत्यने असत्य माने पण वाहीरथी कु- उत्कृष्टुं छासठ सागरोपम अंतर मुहुर्त अधीक / मतिए करी खोटो पकडेलो हट कदाग्रह (गो- सुधी रहे ते वारमा देवलोके उत्कृष्टी वावीस शाळानी परे) मुके नहीं ते अनाभिग्रहिक सागरनी स्थिति छ तेहना त्रण भव करे तथा मिथ्यात्व २, ए वे भेद छे. चार अनुतर विमानमा उत्कृष्टी तेत्रीस साग. अर्थ-आ० अभिग्रहित मि० मिध्यादर्शन रोपमनी स्थिति छे तेहना वे भव करे ते आश्री दु० वे प्रकार पं० कयुं तं० ते ज० कहुंछ स० प्रतिपाती जाणवू १, वीजुं अप्रतिपानी ते आ- अंत सहित भव्यनो चे० वली अ० छेहडोनधी बेलुं जाय नहीं ते क्षायक भावे होय ते क्षायक | ते अभव्यनो. समकित मोक्षे पहोंचे तीहां सुधी रहे पण जाय नहीं ते आश्री अप्रतिपाती जाणवू, ए वे भेदछे. नत्ते । तं जहा। सपज्जवसिए बेव आभिग्गहियमिच्छादसणे दुविहे प- अर्थ-अ० अभिगम स० सम्यक द० द- र्शन दु० वे प्रकारे पं० का तं० ते ज० कहुंठं अपज्जवसिए चेव ॥ ६ ॥ प० उपसमिक चे० वळी अ० क्षायिक ते भावार्थ-अभिग्रहिक मिथ्यात्व दर्शननावे चे० वळी. भेद कहेल छे ते कहे छे, जेहनो अंत ते छेहडो अभिगमसम्मइंसणे दुविहे पन्नत्ते । छे ते भवी जीव सयकित पामे त्यारे ते मिथ्या- तं जहा । पडिवाई चेव अपडिवाई चे- त्व जाय ते आश्री जाणवू १, जेहनी अंत नथी ते अभवी जीव कोइ काळे समकित पामनार व॥ ४ ॥ नधी ते आश्री जाणबु २, ए वे भेद छे. भावार्थ-अभिगम समकित वे मकारे कहे- अर्थ-ए० एम अ० अनभिग्रहित मि० ल छे ते कहे छे, प्रतिपाती ते उपशम भावनू मिथ्यादर्शन वे भेटे वि० वळी आवेलं जाय १, अप्रतिपाती ते धायक भाव- एव अणाभिग्गहियामिच्छादलणे वि न आवेलुं जाय नहीं २, ए वे भेद छे. अर्थ-मिथ्यादर्शन दु० वे प्रकारे पं० परु- ॥ ७॥ प्युं तं० ते ज० कहंछं आ० कुमतिनो मि. भावार्थ-एमज अनाभिग्रहिक मिथ्यान्वना , हाणं सूत्र २: 'उद्देसो १ . (३७) H पण उपर प्रमाणे अंत सहीत १, ने अंत रही-१, मोक्षमा गएला सिद्धनुं केवळज्ञान २, ए त २, एवा वे भेद जाणवा. वे भेद छे. अर्थ-दु वे ना० ज्ञानना भेद पं० कया अर्थ-भ० भव मनुष्य- केवळज्ञान दु० तं० ते ज० कहुंछ प० पांच इन्द्रीने मन सहित प्रकारे पं० कर्जा तं० ते ज० कहुंछु स० तेरमा ते चे० वळी प० इन्द्री मन विना ते चे० बळी गुण ठाणाना भ० जीवनुं केवलज्ञान चेवळी दुविहे नाणे पन्नत्ते । तं जहा । पञ्च- अ० चौदमा गुणठाणाना जीव थतान केवळ क्खे चेव परोक्खे चेव ॥१॥ ज्ञान चे० वळी. भावार्थ-चे प्रकारे ज्ञान कहेल छे ते कहे छे भवत्थकेवलनाणे दुविहे पन्नत्ते । तं एक प्रत्यक्ष ज्ञान ते पांच इंद्री अने मनविना जहा। सजोगिभवत्थकेवलनाणे चेव जणाय ते आत्म प्रत्यक्ष १, वीजुं परोक्षने मन ' अजोगिभवत्थकेवलनाणे चेव ॥४॥ अने इंद्री थकी जणाय ते २, ए वे भेद छे. भावार्थ-संसारमा रहेला जीवनुं केवळज्ञान अर्थ-प० प्रत्यक्ष ना० ज्ञान ते दु० वे प्र- वे प्रकारे कहेल छे ते कहे छे, सजोगी ते मन कारे पं० कां तं० ते ज० फहुंछ के० केवळ ज्ञान चे० वळी नो० अवधि, मनपर्यवज्ञान गावाला जीवनुं केवळज्ञान १, अजोगी ते चौ- वचन कायाना जोग सहीत ते तेरमा गुणठा- चे. वळी. दमा गुणठाणा वाळा जीवन केवलज्ञान ते पञ्चक्खनाणे दुविहे पण्णत्ते । तं ज- अ. इ. उ. ऋ. ल. ए पांच हस्व अक्षर उ- हा । केवलनाणे चेव नोकेवलनाणे चरतां जेटलो वखत लागे तीहां सुधी ते चेव ॥ २॥ जीव तीहां रहे २ ए वे भेद छे. भावार्थ-प्रत्यक्ष ज्ञान वे प्रकारे श्री भगवंते अर्थ-स० सजोगी केवळज्ञान दु० वे प्रकारे कहेल छे ते कहे छे, केवळज्ञान ते चौद राज- पं० कयुं तं० ते ज० कहुंछु प० उपजती वे- लोक संपुर्ण जाणे देखे १, अवधिज्ञान मनपर्यव । ळानो प्रथम समयनो स०१३मा गुणठाणाना- ज्ञानवडे जाणे ते २ ए वे भेद छे. भ० जीवनुं केवळज्ञान चे० वळी अ० वीजा समयना सजोगी जीवनुं केवळज्ञान चे० वळी अर्थ-के. केवळज्ञान दु० वे प्रकारे पं० कहुं तं० ते ज० कहुंर्छ भ० भव मनुष्यनो छे सजोगिभवत्थकेवलनाणे दुविहे प- तेहवें केवळज्ञान चे० वळी सि० मोक्षना जी-नत्ते। तं जहा। पढमसमयसजोगिभव- वर्नु केवळज्ञान चे० वळी. त्थकेवलनाणे चेव अपढमसमयसजो- केवलनाणे दुविहे पन्नते । तं जहा। गिभवत्थकेवलनाणे चेव ।। ५ ॥ भवत्थकेवलनाणे चेव सिद्धकेवलनाणे भावार्थ-सजोगी भवस्थ ( तेरमा चौदमा चेव ॥ ३॥ गुणठाणावाळा जीवनू ) केवळ ज्ञानना वे भेद भावार्थ-केवळज्ञान वे प्रकारे कहेल छे । कहेल छे ते कह छे, केवळज्ञान उपजती वेळा- ते कहे छे, संसारमा रहेला छे नेनु केवळज्ञान | ना प्रथम सनयनुं गजोगी भवस्थ केवळज्ञान - 1 r - t (३८) हाणं सूत्र २. उद्देसो १. १, एमज अप्रथम समयनुं ते केवळज्ञान उत्प- (वर्तमान) समय सिद्ध थयो ते अनंतर सिद्ध न थया पछी वीना त्रीजा चोथादीक समय तेहर्नु केवळज्ञान १, जेहने वे त्रण चार पांच सजोगी भवस्थ केवळज्ञान २, ए वे भेद छे. दश प्रमुख समय थया ते परंपर सिद्ध तेहतुं अर्थ-अ० अथवा च० छेला स० समयनो केवळज्ञान २, ए वे भेद छे. स० सजोगी भ० जीवनुं के० केवळज्ञान चे० अर्थ-अ० एक समयना सि० सिद्धना के० वळी अ० छेलो समय तेहथी पहेला समयनो केवळज्ञानना दु० वे प्रकार पं० कहुं तं० ते ज० स०सजोगी भ०जीवनोके केवळज्ञान चेवळी कहुंछ ए० एकज अ० एक समय मोक्ष गयो अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थके- तेसि सिद्धन के० केवलज्ञान चे० वळी अ० अनेक अ० एक समय सि० सिद्ध थया तेनुं वलनाणे चेव अचरिमसमयसजोगिभ- के केवळज्ञान चे० बळी. वत्थकेवलनाणे चेव ॥ ६॥ अणन्तरसिद्धकेवलनाणे दुविहे पन्न- भावार्थ-अथवा छेला समयना ते चौदमे ते । तं जहा। एक्काणन्तरसिद्धकेवल- गुणठाणे जातां तेरमा गुणठाणाना छेला सम- यतुं सजोगी भवस्थ केवळज्ञान १, छेहलो स- नाणे चेव अणेकाणन्तरसिद्धकेवलना- मय नहीं पण छेहलांनी पहेलां जेटलां समय णे चेव ॥ ९ ॥ होय ते अचरम समयनुं सजोगी भवस्थ के- भावार्थ-अनंतर सिद्धनुं केवलज्ञान तेहना वळज्ञान २ ए वे भेद छे. वे प्रकार कहेल छे ते कहेछे, हमणां एक स- अर्थ-ए० एम अ० १४ मा गुणठाणाना | मयने विपे एकज जीवमोक्षमा गयो ते एक भ० जीवनुं के० केवळज्ञान वे भेदे वि० वळी अनंतर सिद्ध तेहगें केवलज्ञान १, हमणां एक एवं अजोगिभवत्थकेवलनाणे वि ७ समयने विपे अनेक मोक्षमां गया ते अनेक भावार्थ-एमज अजोगी भवस्थ केवळज्ञा- अनंतर सिद्ध तेहगें केवळज्ञान २, ए वे भेद छे. नना वे भेद जाणवा, अर्थ-१० मोक्षगया पछी २-३-४ समे थया अर्थ-सि०सिद्धना जीवनुं के०केवळज्ञान दु० तेह केवळ ज्ञान दु० वे प्रकारे पं० कयु तं० वे प्रकारे प० कहुं तं० ते ज० कहुंछु अ० एक | तेज० कहुईं ए० एक प० परंपरासिद्ध→ के- समय सिसिद्ध थया तेनुं के केवलज्ञान चे० वल ज्ञान चे० वली अ० अनेक प० परंपर- वळी ५० वे तया उपरांत समय सि० सिद्ध सिद्धनुं केवलज्ञान चे० वली. धया तेनुं के० केवळज्ञान चे० वळी. परंपरसिद्धकेवलनाणे दुविहे पन्नत्ते । सिद्धकेवलनाणे दुविहे पन्नते । तं तं जहा । एकपरंपरसिद्धकेवलनाणे जहा । अणन्तरसिद्धकेवलनाणे चेव चेव अणेक्कपरंपरसिद्धकेवलनाणे चेव परंपरसिद्धकेवलनाणे चेव ॥ ८॥ ॥१०॥ भावार्थ-सिद्धना जीवनुं केवळजान तेहना भावार्थ-परंपर सिद्धन केवळज्ञान तेहना वे भेद श्री भगवते कहेल छे ते कहेछे, संप्रती के प्रकार कहेल छे ते कडे, एक परंपर सि. Arms हाणं मूत्र २. उद्देसो १. न केवळज्ञान १, अनेक परंपर सिद्धनुं केव- ५० पचिंद्रि तिर्यंच जो० जोनीने क्षयोपस- वळज्ञान २, ए वे भेद छे. समथी होय चे० वळी. अर्थ-नो० अवधि, मनपर्यवज्ञान दु० वे प्रकारे दोण्हं खाओवसमिए पन्नत्ते । तं पं० कयुं तं० तेज० कहुं छं ओ० अवधि ज्ञा जहा। मणुस्साणं चेव पञ्चिन्दियतिरि- न चे० वळी म० मनपर्यवज्ञान चे० वळी. क्खजोणियाणं चेव ॥ १४॥ नोकेवलनाणे दुविहे पन्नत्ते । तं ज- भावार्थ-वेने क्षयोपसमथी होय ते कहे हा। ओहिनाणे चेव मणपज्जवनाणे छे, संज्ञी मनुष्यने संज्ञीतिर्यंच पचेंद्री २ ए वेने चेव ॥ ११ ॥ होय ए वे भेद छे. भावार्थ-नो केवळज्ञानना वे भेद श्री भग- अर्थ-म० मनपर्यवज्ञान दु० वे प्रकारे पं० वंते कहेल छे ते कहे छे, अवधिज्ञान १ मनप- कहूं तं० तेज० कहुं छं उ० रुजुमती चेवळी र्यवज्ञान २ ए वे भेद छे. वि० विपुलमती चे० वळी. अर्थ-ओ० अवधिज्ञान दु० वे प्रकारे पं० का मणपज्जवनाणे दुविहे पन्नत्ते । तं तं० तेज० कयु छु भ० एक भव ताइज होय जहा। उज्जुमई चेव विउलमई चेव १५ ते चे० वली खा० ज्ञानावरणीकर्मना क्षय उ- भावार्थ-मनपर्यव ज्ञान वे प्रकारे कहेल छ पसमथी उपनो ते चे०वली. ते कहे छे एकलो मनमां घडो चिंतव्यो छे एम ओहिनाणे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा। सामान्यथी मननी बात जाणे ते रुजुमती १ भवपञ्चइए चेव खाओवसमिए चेव १२ अने सोनानो घडो नानो अथवा म्होटो पाड- भावार्थ-अवधिज्ञानना वे प्रकार कहेल छे | लीपुरनो आजनो कालनो अथवा घणा का- ते कहे छे एक भव प्रत्ययनुं जे ते भवमाहाज | ळनो करेलो चिंतव्यो छे इत्यादिक विशेषधी होय १, वीजुं ज्ञानावर्णीना क्षयोपशमथी उप जाणे ते विपुलमती २ ए वे भेद छे. जे २, ए वे भेद छे. अर्थ-प० परोक्ष ज्ञानने दु० वे प्रकारे पं० अर्थ-दो० वेने भ० भवप्रत्ययनु प० कर्तुं तं० | कहुं तं० तेज० कहुर्छ आ० मतिज्ञान चे. तेज कहुं दे० देवतानुं चे० वळी ने० वळी सु० श्रुतज्ञान चे० वळी. नारकीनुं चे० वळी. परोक्खनाणे दुविहे पन्नत्ते । तं ज- दोण्हं भवपञ्चइए पण्णत्ते। तं जहा। हा। आभिणिवोहियनाणे चेव सुयनाणे देवाणं चेव नेरइयाणं चेव ॥ १३॥ चेव ॥ १६ ॥ भावार्थ-वेने भव प्रत्यय, अवधिज्ञान होय भावार्थ-परोक्ष ज्ञानना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे देवता १ अने नारकी ए बेना भवने ते कहे छे, एकमति ज्ञान, वीजुं श्रुतज्ञान २ ए विपे होयज २ ए भेद छे. वे भेद छे. अर्थ-दो० वेने खा० क्षयोपसमथी पं० अर्थ-आ० मतिज्ञान दु० वे प्रकारे पं० कहां त० तेज० कहुंछ म० मनुष्यने चेवळी । कयु तं० तेज० कहे छे मु० श्रुत निश्रित चे० --- 1 1 (४०) हाणं सूत्र २. उद्देसो १. वळी अ० अश्रुत निश्रित चे० वळी. अङ्गपविढे चेव अङ्गबाहिरे चेव ॥२०॥ आभिणिवोहियनाणे दुहिवे पन्नत्ते । भावार्थ-एम श्रृंतज्ञानना वे भेद कहेल छे तं जहा । सुयनिस्सिए चेव असुय- ते कहे छे, आचारांगादिक इग्यार अंग ते अंग निस्सिए चेव ॥ १७ ॥ प्रविष्ट ? उत्तराध्यनादी मुळ सूत्र ते अंग भावार्थ-मतिज्ञानना वे भेद कहेल छे ते वाहीर ए वे भेद छे. कहे छे, श्रुतनिश्रित ? अश्रुतनिश्रित २ ए अर्थ-अं० अंग वाहिरना दु० वे प्रकारे पं० वे भेद छे. कद्या तं० ते ज० कहुं छु, आ० आवश्यक चे० अर्थ-सु० श्रुतनिश्रित दु० वे प्रकारे पं० वळी आ० आवश्यक विना श्रुतज्ञान चे० वळी. कडं तं० तेज० कहुं हुं अ० दूरथी प्रथम व अङ्गबाहिरे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा। स्तु देखीने कहे जे कोइक वस्तु छे ते चे० बळी व० पछी ओलखे जे ए पुरुष छे ते चे० आवस्सए चेव आवस्सयवइरित्ते चेव वळी. ॥ २१ ॥ सुयनिस्सिए दुविहे पन्नत्ते । तं ज भावार्थ-अंग वाहीरना वे प्रकार कहेल छ हा। अत्थोग्गहे चेव वञ्चणोग्गहे चेव ते कहे छे सामायक १ चउवीसथो २ वंदणां ३ पडीकमणुं ४ काउसग ५ पचखाण ६ ए ॥ १८ ॥ छ अध्ययनना समुहरुप आवश्यक ? आवश्य- भावार्थ-श्रुतनिश्रित वे प्रकारे कहेल छे ते क वीना वीजां सिद्धांत ते आवश्यक व्यतिरि- कहे छे, वेगळेयी वस्तु देखीने कहेजे कांइ व क्त २ ए वे भेद छे. स्तु छे एम प्रथम वस्तुनु सामान्यपणे ग्रह ते अर्थ-आ० आवश्यक विना श्रुतते दु० वे अर्थावग्रह १ पछी ओळखेजे ए पुरुष छे अ- प्रकारे पं० कया तं० ते ज० कहुं छं का थवा स्त्री छे एम विशेषथी इंद्री अने शब्दादि काल वेलाये भणाय ते प्रथमने छेली पोरसि. द्रव्यनो संबंध ते व्यंजनावग्रह २ ए वे भेद छे. एचे० वळी उ० सर्व काले भणाय ते. अर्थ-अ० अश्रुत निश्रितनापण ए० एमज आवस्सयवइरिते दुविहे पन्नत्ते । तं जहा । कालिए चेव उक्कालिए चेव ॥ असुयनिस्सिए एवमेव ॥ १९ ॥ ॥ २२॥ भावार्थ-एम अश्रुतनिश्रितना पण वे भेद भावार्थ-आवश्यक व्यतिरिकतना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे, दिवस अने रात्रिनी पहे- अर्थ-मु० श्रुतज्ञान दु० वे प्रकारे पं० क- ली ने चोधी पोरासिए भणाय ते उत्तराध्यय- हा तं० तेज० कई छ अं० ११ अंग मांहि नादीक कालीकमुत्र १ सवारनी, मध्याननी, लुं ज्ञान ते चे० बळी अं० उतराध्ययन प्र- संध्यानी, मध्यरात्रीनी वे वे घडी वर्जि गर्म ते मुन्च चे बळी. वखते भणाय ते दशवकालिक प्रमुख उत्का- सुयनाणे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा ।! लीक सूत्र २ ए ये भेद छे. १ बे भेद. जाणवा.
- वे भेद छे. हाणं सूत्र २. उद्देसो १. (४१) अर्थ-दु० वे प्रकारे धं० धर्म पं० कह्या तं० | दुविहे संजमे पन्नत्ते।तं जहा। स- तेज० कहुं छं सु० द्वादशांगी-तेइज श्रुतधर्मचे० रागसंजमे चेव वीयरागसंजमे चेव वळी च० चारित्र ध० धर्म पांच महावत रुप चे० वळी. ॥१॥ दुविहे धम्मे पण्णत्ते । तं जहा। सु- भावार्थ-वे प्रकारे संयम कहेल छे ते कहे यधम्मे चेव चरित्तधम्मे चेव ॥१॥ छे. जीहां मायानो संग छे ते सरागसंयम १ भावार्थ-दुर्गती पडतां धरी राखे ते धर्म वे सातमा गुणठाणां उपरांत माया (कपट) राग रहीत चारित्र ते वीतराग संयम २ ए प्रकारे कहेल छे ते कहे छे, द्वादशांगी रुप सि- द्धांत ते श्रुतधर्म १ चारित्र धर्म २ ए वे भेद छे. अर्थ-सु० सुत्रधर्म दु० वे प्रकारे पं० कह्या अर्थ-स० राग सहित संजम दु० वे प्रकारे तं० तेज० कई छ. सु० श्रुतपाठ ते सुत्र श्रु- पं० कह्यो तं० ते ज० कहुं छं सु० लो- तधर्म चे० वळी अ० अर्थ श्रुतधर्म चे० वळी. भरुप कपाय जेणे सुक्ष्म किया छे तेवा उप- सस तथा क्षपक श्रेणिनो साधू ते १० मे गुण- सुयधम्मे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा । ठाणे होय चे० वळी वा० मोटा कपाय छे सुत्तसुयधम्मे चैव अत्थसुयधम्मे चेव जिहांते चे० वळी. ॥ २॥ सरागसंजमे दुविहे पन्नत्ते । ते ज- भावार्थ-श्रुतधर्मना वे भेद कहेल छे ते कहे हा । सुहुमसंपरायसरागसंजमे चेव वा- छे, सुत्रपाठ ते सुत्र श्रुतधर्म १, अर्थ ते अर्थ श्रुतधर्म २ ए वे भेद छे. यरसंपरायसरागसंजमे चेव ॥२॥ अर्थ-च० चारित्रनो ध० धर्म दु० भावार्थ-सराग संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहेछे. जेणे लोभ रुप कपाय सुक्ष्म कुंथु प्रकारे पं० कह्यो तं० ते ज० कहुँ छं अ० देश रुप करेल छे ते उपशम श्रेणीनो तथा क्षपक- विरति च० चारित्र ध० धर्म चे० वळी अ० श्रेणीनो साधु दशमे गुणठाणे होय ते सुम साधूनो च० सर्व विरति ध० धर्म चे० वळी. संपराय सराग संयम १ जीहां मोटी स्थुल चरित्तधम्मे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा। कपाय छे ते वादर संपराय सराग संयम, २ अगारचरित्तधम्म चेव अणगारचरित- ए वे भेद छे. धम्मे चेव ॥३॥ अर्थ-सु० मुक्ष्म कपाय संजम दु० वे प्रकारे भावार्थ-चारित्र धर्म वे प्रकारे कहेल छ। पं० कह्या तं० ते ज० कहुं हुं प० प्रथम समयनो ते कहे छे. समकीत मुळ वार व्रतरुप देश वर- सुक्ष्म संपराय सराग संजम १० मा गुणठाणाना ती चारित्र ते ग्रहस्थनो धर्म १ जेहने घर थम समयनुं संजम चे० वळी अ० २-३ स- नयी एहवा साधुनो सर्व वरती पंचमहाव्रत मयना मुक्ष्म संपराय सराग संजम चे० वळी: रुप चारित्र धर्म २ ए वे भेद छे. अर्थ-दु० वे प्रकारे सं० संजम प० को न्नत्ते । तं जहा । पढमसमयसुहमसंप- सुहुमसंपरायसरागसंजमे दुविहे प- तं० ते ज० कहुं छं स० मायानो संग छ ज्यां ते संजम चे० वळी वी० माया रहित संजम रायसरागसंजमे चेव अपढमसमयसुहु- सातमा गुणठाणा उपरांतहोय चे बळी. मसंपरायसरागसंजमे चेव ॥३॥ वे -- . र ते -- (४२) हाणं सुत्र २, उद्देसो १. भावार्थ-सुक्ष्म संपराय सराग संयमना वे | प्रथम समयनो वादर संपराय सराग संजम भेद कहेल छे ते कहेछे. प्रथम समयनो सूक्ष्म अ० पहेला समय विना बादर संपराय सरा- संपराय सराग संयम. १ अप्रथम समय ते ग संजम. वीजा त्रीजादीक समयनो सूक्ष्म संपराय स वायरसंपरायसरागसंजमे दुविहे प- राग संयम. २ (केवळज्ञानना प्रथम भेद नत्ते । तं जहा । पढमसमयवायरसंप- कहेल छे ते प्रमाणे जाणवा) ए वे भेद छे. अर्थ- रायसरागसंजमे अपढमसमयवायरसंप- -अ० अथवा च० छेला समयनो सुक्ष्म संपराय सराग संयम अ० छेलाथी पे- रायसरागसंजमे ॥ ६॥ हेला समयनो सुक्ष्म संपराय सराग संजम. भावार्थ-वादर संपराय सराग संयमनाये अहवा चरिमसमयसुहुमसंपरायसरा- प्रकार कहेल छे ते कहे छे. प्रथम समयनो गसंजमे अचरिमसमयसुहुमसंपरायस- वादर संपराय सराग संयम १ अभपग सम- यनो वादर संपराय सरागसंयम २ (प्रथग. रागसंजमे ॥४॥ अप्रथम केवळज्ञाननी पेरे जाणg) ए वे भावार्थ-अथवा छेला चरम समय ते वा- भेद छे. रमा गुणठाणाना छेला समयनो सुक्ष्म संप- अर्थ-अ० अथवा च० छेहेला समयनो राय सराग संयम. १ अचरम ते छलाथी प- वादर संपराय सराग संजम अ० छेलाथी पेहे- हेला समयनो सुक्ष्म संपराय सराग संयम. २ लानो समयनो वादर संपराय सराग संजम. ए वे भेद छे. अर्थ-अ० अथवा सु० सुक्ष्म संपराय स- अहवा चरिमसमयवायरसंपरायस- राग संजम दु० वे प्रकारे पं० कयो तं० ते रागसंजमे अचरिमसमयवायरसंपराय- ज० कहुं छु सं० उपसम श्रेणिथी पडतानु ए सरागसंजमे ॥ ७ ॥ सुक्ष्म संपराय सराग संजम चे० वळी वि० उपसम तथा क्षपक श्रेणि चढतानुं मुक्ष्म संप- भावार्थ-अथवा चरम ते छेला समयनो राय सराग संजम चे० वळी. ते नवमा गुणठाणाना छेला समयनो १ अच- रम ते छेलाथी पहेला समयनो वादर संपराय अहवा सुहुमसंपरायसरागसंजमे दु. सरागसंयम २ ए वे भेट छे. विहे पन्नत्ते । तं जहा । संकिलिस्स- अर्थ-अथवा वा वाढर संपराय सराग माणए चेव विसुज्झमाणए चेव ॥५॥ संजम दु० वे प्रकार पं० करो तं० ते ज. भावार्ध-अथवा नुक्ष्म संपराय सराग सं- कहुं हुं प० उपसम श्रेणियी पडतानुं संजम प्रकार कहेल छे ते कहे छे. संकलेश -० वळी अ० सपक श्रेणिर्नु ते चे० बळी. मान ते उपगमश्रेणीधी पडतानो मुक्ष्म संपराय अहवा वायरसंपरायसरागसंजमे दुः सरागसंयम, १ विशुद्धमान ते उपशम श्रेणीये तथा भपकोणीये चडनानो सुक्ष्म संपराय स- विहे पन्नते । तं जहा । पडिवाई चेव रागसंयम. २ ए के भेद छे. अपडिवाई चेव ॥८॥ अर्थ-बाल बादर संपराय सराग संजम दु. भावार्थ-अथवा वाटर संपराय सराग सं- पे प्रकारे पं. कदा तं० ने ज० कहुं . प. यमना के प्रकार कहेल छे ते कहे छे उपशम यमना वे " हाणं सूत्र २. उद्देसो १. (४३) १ श्रेणीथी पडतानो ? क्षाकश्रेणीनो वादर सं अर्थ-अ० अथवा च० छेहला समयनुं उ- पराय सरागसंयम २ ए वे भेद छे. पशांत कषाय वीत राग संजम अ० छेहलाथी अर्थ-वी० रागरहित संजम दु० वे प्रकारे | पहेला समयनुं उपशांत कषाय वीतराग संजम. पं० कयुं तं० ते ज० कहुं हुं उ० उपसमाव्या अहवा चरिमसमयउवसन्तकसायवी- क० कपायजेणे वी०एवो राग रहित सं० सं. यरागसंजमे अचरिमसमयउवसन्तक- जम ते ११ मा गुणठाणाना साधूने होय चे० वळी खीण० क्षय पाम्या छे क० कखाय एवो सायवीयरागसंजमे ॥३॥ राग रहित संजम ते १२ मा गुण ठाणाना भावार्थ-तेमज चरम अचरम समयनो उ- साधूने होय चे० वळी. पशांत कषाय वीतराग संयम जाणवो. ए वे भेद छे. वीयरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते। तंज- अर्थ-खी० क्षय कर्या कपायनो ते १२ मा हा । उवसन्तकसायवीयरागसंजमे चेव गुण ठाणानो वीत राग संजम दु० वे प्रकारे खीणकसायवीयरागसंजमे चेव ॥१॥ ५० कह्यो त० ते ज० कहुंछु छ० चारघाति क- भावार्थ-वीतराग संयमना वे प्रकार क- म सहित छेतेनुं खीण कपाय वीतराग संज- हेल छे ते कहे छे. जेणे कषाय उपशमावेल छे म चे० वळी के. केवलीनुं खीण कसाय वति तेहनो सयम ते उपशांतकषाय वीतरागसयम राग संजम. १ जेहनी कपाय क्षय थइगयेल छे ते वारमा खीणकसायवीयरागसंजमे दुविहे प- गुणठाणाना साधुनो क्षोणकपाय वीतराग सं- पणत्ते । तं जहा। छउमत्थरवीणकसाय- यम २ ए वे भेद छे. वीयरागसंजमे चेव केवलिखीणकसाय- अर्थ-उ० उपसम श्रेणिर्नु कपाय वीतराग वीयरागसंजमे चेव ॥ ४ ॥ संजम दु० वे प्रकारे पं० कहा तं० ते ज० कहुं भावार्थ-क्षीणकषाय वीतराग संयमना वे छु प० पहिला समयनुं उपशांत कपाय वीत प्रकार कहेल छे ते कहेछे. छदमस्थ ते ज्ञाना राग संजम चे० वळी अ० प्रथम समय वि- वरणादी आठे कर्म सहित तेहनो संयम ते ना ११ मा गुण ठाणानुं संजमते चे० वळी. छदमस्थ क्षीण कपाय वीतराग संयम १ के. उवसन्तकसायवीयरागसंजमे दुविहे | वळ ज्ञान सहित केवळी तेहनो संयम ते केव- पण्णत्ते। तं जहा । पढमसमयउवसन्त- दीक्षीण कपाय वीतरागसंयम २ ए वे भेदछे कसायवीयरागसंजमे चेव अपढमसम- -छ० छदमस्थ खीण कपाय वीतराग वे प्रकारे पं० करो तं० तेज. कहुं यउवसन्तकसायवीयरागसंजमे चेव ॥ छ स० पोतानी मेळे प्रतिवोध पाम्याते स्वयं २॥ बुध छदमस्थ खीण फसाय वीतराग संजम भावार्थ-उपशांत कपाय वीतरागना वे बु० गुरुना प्रति वोध्या छदमस्थ खीण कसा प्रकार कहेल छे ते कडेछ. प्रथम समयनो उ. य वीतराग संजम. पशांत कपाय वीतराग संयम. १ अमयम स. छउमत्थखीणकसायवीयरागसंजमे दु- मयनो उपशांत कपाय वीतराग संयम. २ (प्रथम अप्रथम पूर्वनी पेरे जाणवू ) ए ये विहे पण्णत्ते । तं जहा । सयंबुद्धछउ- मत्थरखीणकसायवीयरागसंजमे वुद्धयो- । F अर्थ- संजम दु० Now पर भेद छ, ए वे भेद छे. ८॥ (४४) हाणं सूत्र २. उद्देसो १. हियछउमत्थखीणकसायवीयरोगसंजमे भावार्थ-अथवा चरम समयनो १ अचरम ॥ ५॥ समयनो. २ ए वे भेद छे. भावार्थ- छदमस्थ क्षीण कषाय वीतराग अर्थ-७० आचार्यना प्रतिवोध्या छदमस्थ संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे स्वयं- खीण कसाय वीतराग संजम दु० वे प्रकारे बुध ते तिर्थकरादी पोतानी मेळे प्रतिवोध पा- पं० कह्या तं० ते ज० कहुं छं प० प्रथम समय स्या ते स्वयंबुध छदमस्थ क्षीण कपाय वी- बुधयोहि छदमस्थ खीण कसाय वीतराग तराग संयमी. १ आचार्यादिकना प्रतिवोध्या | संजम अ० वीजा समयनो बुधबोहि छमस्य ते छदमस्थ क्षीण कपाय वीतराग संयमी. २ | खीण कसाय वीतराग संजम. बुद्धयोहियछउमत्थरखीणकसायवीय- अर्थ-स० पोतानी मेळे प्रतिबोध पाम्या रागसंजमे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा।प- ते छदमस्थ खीण कसाय वीतराग संजम दु० वे प्रकारे पं० कह्यो ते० ते ज० कहुं हुं प० प्र- ढमसमयबुद्धयोहियछउमत्थखीणकसा. थम समयना सं० पोतानी मेळे बुझेला छद- यवीयरागसंजमे अपढमसमयबुद्धवोहि मस्थ खीण कसाय वीतराग संजम अ० वी- | यछउमत्थखीणकसायवीयरागसंजमे ॥ जा समयनो स्वयंवुध छदमस्थ खीण कसाय वीतराग संजम चे० वळी. भावार्थ-बुद्धवोही ते आचार्यादीकना प्र- सयंबुद्धछउमत्थरवीणकसायवीयराग तिबोधेलां छदमस्थ क्षीण कपाय चीतगग संजमे दुविहे पण्णत्ते। तं जहा । पढ- | संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे. प्रथम मसमयसयंबुद्धछउमत्थखीणकसायवी- समयनो १ अप्रथम समयनो २. यरागसंजमे अपढमसमयसयंवुद्धछउ- अर्थ-अ० अथवा च० छहला समयनो यु. मत्थवीणकसायवीयरागसंजमे चेव ।। धवोहि छदमस्थ खीण कसाय वीतराग संज- म अ० छेहला समय विना बुधवोहि छदम ६॥ स्थ खीण कसाय वीतराग संजम. भावार्थ-स्वयंवुध छदमस्थ क्षीण कपाय अहवा चरिमसमयबुद्धयोहियछउम- वीतराग संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहे स्वखीणकसायवीयरागसंजमे अचरिम- छे. प्रथम समयनो. १ अप्रथम समयनो. २ अर्थ-अ० अथवा च० छेहेला समयनो स समयबुद्धबोहियडरमत्यखीणकसाय- यं बुध छदमस्थ खीण कसाय वीतराग सं- वीयरागसंजमे ॥ ९ ॥ जम अ० छेड्ला समय विनानुं सयंबुध छ. भावार्थ-अथवा चरम समयनां. १ अब दमस्य खीण कसाय वीतराग संजम. रम समयनो. २ ए वे वे भेद छे अहवा चरिमसमयसयंबुद्धछउमस्य अर्थ-के. केवली रवीण फसाय निगम खीणकसायवीयरागसंजमे अचरिमस- संजग दु० वे प्रकारे पं० फोन० ते ज० हंट मयसयंबुद्धछउमत्थखीगकसायवीयरा- स०१३ मा गुणटाणानानो केवली खीण कामाय वीतराग संजम अ० १४ मा गुणटाणना गसंजमे ॥ ७॥ फेवलीनो क्षीण फसाय वीतराग संजम, rr ---- हाणं सूत्र २. उद्देसो १. (४५) केवलिखीणकसायवीयरागसंजमे दु- भावार्थ-अथवा चरम समयनो. १ अचरम समयनो. २ ए वे भेद छे. विहे पन्नत्ते । तं जहा । सजोगिकेव- लिखीणकसायवीयरागसंजमे अजो- अर्थ-अ० १४ मा गुणठाणाना केवलीनुं खीणकसाय वीतराग संजम दु० वे प्रकारे पं० गिकेवलिखीणकसायवीयरागसंजमे ॥ ह्यो तं ते ज० कहुं छुप० प्रथम समयनो १०॥ अजोगि केवलिखीण कसाय वीतराग संजम भावार्थ-केवळी क्षीण कपाय वीतराग अ० बीजा समयनो अजोगि केवलिखीण संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे. सजोगी। कसाय वीतराग संजम. ते तेरमा गुणठाणाना केवळी क्षीण कपाय अजोगिकेवलिखीणकसायवीयराग- वीतराग संयमी १ अजोगी ते चौदमा गुण- संजमे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा । पढ- ठाणाना केवळी क्षीण कपाय वीतराग संयमी मसमयअजोगिकेवलिखीणकसायवी- २ ए वे भेद छे. अर्थ-स. १३ मा गुणठाणाना केवलीनो यरागसंजमे अपढमसमयअजोगिकेव- क्षीण कसाय वीतराग संजम दु० वे प्रकारे लिखीणकसायवीयरागसंजमे ॥ १३ ॥ पं० कह्यो तं० ते ज० कहुंछ प० प्रथम समयनो भावार्थ-अजोगी केवळी क्षीण कपाय वी- सजोग केवलि क्षीण कसाय वीतराग संजम तराग संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे अ० वीजा समयनो सजोगि केवलि क्षीण क- प्रथम समयनो १ अप्रथम समयनो २ साय वीतराग संजम. अर्थ-अथवा च० छेला समयनो अजोगि सजोगिकेवलिखीणकसायवीयराग- केवलिखीण कसाय वीतराग संजम अ० छेहे- संजमे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा । पढम- लाथी पेहेला समयनो अजोगि केवलिखीण समयसजोगिकेवलिखीणकसायवीय- कसाय वीतराग संजम. रागसंजमे अपढमसमयसजोगिकेवलि- अहवा चरिमसमयअजोगिकेवलि- खीणकसायवीयरागसंजमे ॥ ११ ॥ खीणकसायवीयरागसंजमे अचरिमस- भावार्थ-वीतराग सजोगी केवळी क्षीण मयअजोगिकेवलिखीणकसायवीयरा- कपाय संयमना वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे गसंजमे ॥ १४ ॥ मथम समयनो. १ अप्रथम समयनो. २ भावार्थ-अथवा चरम समयनो. १ अचरम अर्थ-अथवा च० छेला समयनो सजोगि समयनो. २ ए वे वे भेद छे. केवालखीण कसाय वीतराग संजम अ० छेह अर्थ-दु० वे प्रकारे पु० पृथ्विकायना जीव लाथी पहला समयनो संजोगे फेवलिखीण ५० कह्या तं ते ज० कहुं हुं सु० सुक्ष्म चे० फसाय वीतराग संजम निश्चे वा० बादर (मुष्टिमां आवे ते। चे० वळी. अहवा चरिमसमयसजोगिकेवालखी- दुविहा पुढविकाइया पन्नता । तंज- णकसायवीयरागसंजमे अचरिमसमय- हा। सुहमा चेव वायरा चेव ॥ १ ॥ सजोगिकेवालखीणकसायवीयरागसं भावार्थ-पृथ्विकायना जीव वे प्रकारे श्री भगवंते कटेल छे ते काहे ले, जे छदमस्थनी 4. -- 1 हाणं सूत्र २. उद्देसो १. . नजरे आवे नहीं अने सर्व लोकने विपे ठां- शरिर, २ इंद्रि, ३ श्वासोश्वास, ४ ए चारे सीठांसीने भरेल छे ते सुक्ष्म पृथ्विकाय. १ पुरी करी मरे ? अपर्याप्ति ते आहार, १ श- छदमस्थनी नजरे आवे ते वादर पृथ्विकाय, रीर २, इंद्रि ३. ए त्रण पर्याप्ति पुरी करी २ ए वे भेद छे. परभवनुं आयुष्य वांधी मरे, २ ए वे भेद छे. अर्थ-ए० एम जा० यावत दु० वे भेदे व० अर्थ-ए एम जा० यावत व० वनस्पतिकाय वनस्पतीकाय सुधी पं० कह्या तं० ते ज० कडं लगे जाणवो. छं.मु० सुक्ष्म चे० वळी वा० वादर चे निश्चे. एवं जाव वणस्सइकाइया ॥ [७-- एवं जाव दुविहा वणस्सइकाइया प -१०] ॥ ४ ॥ नता तं जहा । सुहुमा चेव वायरा भावार्थ-एमज पाणी १, अग्नी २, वायु ३ चेव ।। [२-५] ।। २॥ वनस्पति ४. ए चारेना पर्याप्ता १, अपर्या- प्ता २ ए वे वे भेद जाणवा. भावार्थ-एम पाणी, १ अग्नी, २ वायु, अर्थ-वे प्रकारे पु० पृथ्विकायना जीव पं० ३ वनस्पतिकायना सुक्ष्म ने वादर ए बे वे कह्या तं० तेज० कहुं छप० अचित थया ते भेट जाणवा. चे० निश्चे अ० सचित ते चे० निश्चे जा० (आहार, ' शरिर, २ इंद्रि, ३ श्वासोश्वास, यावत व० वनस्पतिकाय लगे. ४ भापा, ५ मन, ६ ए छ पर्याप्ति छे ते मांही एकेंद्रिने भापा ने मन ए वे वर्जिने चार दुविहा पुढविकाइया पन्नत्ता। तंजहा। पर्याप्ति छे, वेइंद्रि, ते इंदि, चौरिदि, असंज्ञि परिणया चेव अपरिणया चेव जाव पचेंद्रिने मन वर्जिने पांच पर्याप्ति छ, संज्ञि वणस्सइकाइया ॥ [११-१५] ॥ ५॥ पचेंद्रिने छ पर्याप्ति छे. जे जीवने जेटली प भावार्थ-वळी पृथ्विकायना जीव वे प्रकारे याप्ति छे ते मांही एक अधुरी होय तेवामां प- कहेल छे ते कहे छे. प्रणित ते स्वकाय पर- रभवतुं आयुष्य वांधी मरे ते अपर्याप्ति कहीये. काय शखे करी काळयी थोडे काळे अचित छ पर्याप्तिमा आहार पर्याप्ति एक समयमां थयेला १, शवे करी अचित्त थयेला नधी ते नीपजे, वीजी पांच पर्याप्ति असंख्याते अ- सचित्त २ ए वे भेद छे. संख्याते समये नीपजे, ए सर्वे अंतर मुहुर्त एम पाणी १, अग्नी २, वायु, ३, वन- मां निपजे) स्पति ४. ए चारे स्थावरमां शस्त्रेकरी मणित ? अर्थ-दु० वे भेदे पु० पृथ्विकायना जीव : अने शस्त्रेकरी अप्रणित २, एथे वे भेद जाणवा. पं० कद्या तं० ते ज० कहुं छ १० पर्याप्ति पुरी अर्थ-दु० वे भेदे द० पर्याय फेर थाय ते फरी मरे ते चे० निश्चे अ० अधूरी पर्याप्तिए : पं० कद्या तं० ते ज० कई छ प० पर्याय मरे ते चे० निचे. फर्या ते द्रव्य चे० निश्चे अ० नथी फर्या पर्याय दुविहा पुढविकाइया पन्नता। तं ज- : ने द्रव्य चे० निश्चे. हा। पज्जत्तगा चेव अपज्जत्तगा चेव दुविहा दवा पन्नत्ता । तं जहा । प- ॥६॥३॥ रिणया चेव अपरिणयाचेव ।।[१६]|| भावार्थ-वळी प्रश्चिकायना जीव वे प्रकारे भावार्थ- प्रकारनां पुद्गलम्प द्रव्य कडेल ले ते फहे छे, पर्याप्ति ते आहार, १ ले ते कहेछे, प्रणिन द्रव्य ते वर्ण, गंध, रस - हाणं सूत्र २. उद्देसो १. (४७) स्पर्श पलटाय, जेम धोळा वखने राते रंगे गति समापन्न १ जीहां छे तीहांज रहेल छे ने रंगवाथी रातुं थयु ने धोळाना पर्याय फर्या बीजी जग्याए द्रव्य जता नथी ते अगति स- एम सर्व द्रव्यने विपे जाणवू १ वीजां ,अप्र मापन्न २ ए वे भेद छे. णित द्रव्य ते जेहनी वर्णादिकनी पर्याय फरी अर्थ-दु० वे भेदे पु० पृथ्विकाय पं० कह्या नथी. २ ए वे भेद छे. तं० ते ज० कहुं टुं अ० एक समय जीव पृथ्वि- अर्थ-दु० वे प्रकारे पु० पृथ्विकाया पं० काय प्रदेशे उपनोते चे० निश्चे ५० वे त्रण कह्या तं० ते ज़० कहुं छै ग० विग्रह गतिए समय थया जीव पृथ्विकाय प्रदेशे उपनोते चे० करी उपजवाने थानके गमन स० करे ते चे० निश्चे जा. यावत द० द्रव्य स्वरुप. निश्चे अ० स० उपना ते थानके रह्या छे ते दुविहा फुटविकाइया पन्नत्ता । तं ज- चेनिश्चे. हा । अणन्तरोगाढगा चेव परंपरोगा- दुविहा पुढविक्काइया पन्नत्ता। तं ज- ढगाचेव जाव दवा ॥ [२३-२८] ॥१०॥ हा। गइसमावन्नगा चेव अगइसमावन्न- भावार्थ-वळी वे प्रकारे पृथ्विकायना जीव गा चेव ॥ [१७] ॥ ७॥ कहेल छे ते कहे छे. पृथ्विकायनो जीव हम- भावार्थ-वळी वे प्रकारे पृथ्विकायना जीव णाज समये कोइ आकाश प्रदेशे आवी रह्यो कहेला छे ते कहेछे पृथ्विकायना जीव विग्रह ते अनंतरो वगाढ १ जेहने आकाश प्रदेशे रयां गति करी उपजवाने स्थानके गमन करे ते बेत्रणादीक समय थया छे ते परंपरोवगाढ गति समापन्न १, जीहां आवीने उपना छ । २ ए वे भेद छे. तिहांज रह्या छे ने विग्रह गति करी नथी ते एम यावत् द्रव्यनुं स्वरुप कयुं. अगति समापन्न २ ए वे भेट छे. अर्थ-दु० वे भेदे का० काल पं० कह्या अर्थ-ए०एम जा० यावत व. वनस्पति- तं० ते ज० कहुं छु ओ० उतरतो आरो चे. निश्चे उ० चढतो आरोते चे० निश्चे. एवं जाव वणस्सइकाइया ॥ [१८- दुविहे काले पण्णत्ते । तं जहा। २१] ॥ ८॥ ओसप्पिणिकाले चेव उस्सप्पिणि- भावार्थ-एम पाणी १, अग्नी २, वायु ३, काले चेव ॥१॥ वनस्पति ४ ए चारेने विषे गति समापन १ भावार्थ-हवे काळर्नु स्वरुप कहे छे. वे अगति समापन्न २ ए वे वे भेट जाणवा. प्रकारे काळ श्री भगवंते कहेल छे ते कहे छे. अर्थ-दु० वे भेदे द० द्रव्य ग० गति गमन दसक्रोडाकोडी सागरोपम सुधी पडतो समय स० करता द्रव्य चे० निश्चे अ० स० उपना तेहना छ आरा तेमां पहेलो मुसम सुसमा ते धानके रह्या छे ते चे० निश्चे वीजो सुसम २ त्रीनो मुसम दुसम ३ चोथो दुविहा दवा गइसमावन्नगा चेव अ- दुसम सुसम ४ पांचमो दुसम ५ छटो दुसम दुसमा ६ ते अवसर्पिणि काळ. १ दश गइसमावन्नगा चेव ।। [२२] ॥ ९॥ क्रांडामोडी सागरोपप. मुधी पढतो भावार्थ-वे प्रकारे द्रव्य कहेल छे ते कडे. तेहना छ एक जग्याएवी पीजी जग्याए जना द्रव्य ते । मां . काय लगे. - m " म 14 (४८) हाणं सूत्र २. उदेसो १. दुःख. २ श्रीजो दुसम सुसमा ते दुःख घणुं वना प्रदेशथी अळगुं, काइक मळी रहेलं छे, ने सुख थोडं ३ चोथो सुसम दुसमा ते सुख पण परभवे साथे जाय नहीं वाहीर शरिर २० घणुं ने दुःख थोडं ४ पांचमो सुसम ते एकलं अभ्यंतर शरीर ते तेजसने काण १ अने मुख ५ छटो सुसम सुसमा ते सुखमां अत्यंत वाहीर ते वैक्रेयशरिर २ ए वे भेद छे एम सुख ६ ते उत्सर्पिणि काळ. २ ए वे भेद छे. देवताने पण अभ्यंतर ने वाहीर एवां वे श- अर्थ-दु० वे भेदे आ० अवकाश आपे रीर जाणवां. जीवने पं० कह्या तं० ते ज० कहुं छं लो० अर्थ-पु० पृथ्वि कायने दो० वे स० श- १४ राज प्रमाण लोकाकाश चे० वळी अ० रीर पं० कह्या तं० ते ज० कहुंछं अ० अभ्यंतर अलोक अनंतो चे० निचे. चे० निश्चे वा० वाह्य शरीर चे० निश्चे अ० दुविहे आगासे पण्णत्ते । तं जहा। अभ्यंतर क० कार्मण शरीर बा० वाह्य ते ओ० लोगागासे चैव अलोगागासे चेव ॥२॥ यलगे जाणवू. उदारिक शरीर जा० यावत व० वनस्पतिका भावार्थ-जीव अने द्रव्यने अवकाश आपे पुढविक्काइयाणं दो सरीरंगा पण्णत्ता। ते आकाश वे प्रकारे कहेल छे ते कहे छे. सातमी नरकथी मांडी सिद्ध लगी चौदराज तं जहा। अन्भिन्तरए चेव वाहिरए प्रमाणे उंचो जेहमां धर्मास्तिकाय ? अधर्मा- चेव । अभिन्तरए कम्मए वाहिरए स्तिकाय २ आकास्तिकाय ३ पुद्गळास्ति- ओरालिए जाव वणस्सइकाइयाणं ।। काय ४ जीवास्तिकाय ५ काळ ६ ए छ भावार्थ-प्रथ्विकायना जीवने वे श- द्रव्य छे ते लोक आकाश १ जेहमां एकलो रिर कहेल छे ते कहे छे अभ्यंतर १ अने आकागज छे, अने वीजां पांच द्रव्य नथी ते बाहीर २० अभ्यंतर ते हाड यांस विनानुं ते- अलोक आकाश २ ए वे भेद छे. जस ने कार्मण शरिर १ बीजु वाहीर ते अर्थ-ने० नारकीने दो० वे स० गरीर पं० उदारिक शरीर २ ए वे भेद छे. एमज पा- कया त० ते ज० कहुंछं अ० जीवना प्रदेश सं- णी, १ अग्नी, २ वायु, ३ वनस्पति, ४ ए बाते मळी रहां छे ते चे० निश्चे वा० जीव प्र- चारने अभ्यंतर तेजस ने कार्मण गरिर १ देशयी काईक मळ्यु काईक अळगुं चे० निचे बाहीर वायु वजि त्रणने उदारिक अने वायुने अ० अभ्यंतर शरीर ते क० कार्मण तेजस बा० उदारिक ने वैक्रेय शरिर २ एवां वे वे शरिर बाहिर वे० वैक्रिय शरीर ए० एम दे० देव- जाणवा. ताने भा० जाणवू. अर्थ-वे बेइन्द्रिने दो० स० शरीर पं० नेरझ्याणं दो सरीरंगा पण्णत्ता कया तं० ते ज० कहूंछ अ० एक अभ्यंतर शरीर चे०वळी वा० बाह्य शरीर चे० बळी अ० अभ्यं- तं जहा । अन्भिन्तरए चेव बाहिरए । तर ते क० कार्मण तेजस अ० हाड मं० मांस चेव । अन्भिन्तरए कम्मए बाहिरए सो० रुधिर ब० तेणे बांध्यु वा बाह्य शरीर वेटबिए । एवं देवाणं भाणियवं ॥शा ओ० उदारिक जा० यावत च० तेन्द्रि चौरि- भावार्थ-नारकीन थे शरिर कहेल केन्द्रिताट एमज. कह छे, जीवना प्रदेश खीर (दुध) नीरनी बेइन्दियाणं दो सरीरगा पण्णत्ता । पेरे मळी रहेल छे ते अभ्यंतर शरिर ? जी- ते जहा। अन्भिन्तरए चव बाहिरए चे- .
हाणं सूत्र २. उद्देसो १. ( ४९ ) व । अन्भिन्तरए कम्मए अट्ठिमंससो- ने० नारकीने दो० वे स० शरीरपं० कह्या तं० णियबद्धे बाहिरए ओरालिए । जाव चवळी नि निरंतर जा० यावत वे० वै- ते ज० कहुंछु ते० तेजस चे० वळी क० कामण चरिन्दियाणं ॥३॥ मानिक ताइ जाणवू. भावार्थ-वेइंद्रिने वे शरीर कहेल छे ते विग्गहगइसमावन्नगाणं नेरझ्याणं दो कहेछे. अभ्यंतर १, अने वाहिर २, अभ्यंतर तेजसने कार्मण शरिर १, बाहीर हाड मांस सरीरंगा पण्णत्ता । तं जहा । तेयए रुधिरे बांधेलु उदारिक शरिर २, ए वे भेदछे. चेव कम्मए चेव । निरन्तरं जाव वे- एम तेइंद्रि चौरिन्द्रिने पण जाणवू. माणियाणं ॥ ६॥ अर्थ-प० पंचेन्द्रि ति० तिर्यच जो० जो भावार्थ-उपजवाने स्थानके वांको चाली नियाने दो०वेस शरीर पं० कह्या तं० ते ज० जाय ते विग्रह गति समापन्न नारकीने वेश- कहुंछु अ० अभ्यंतर शरीर चे. निश्चे वा० रिर कहेल एक तेजस शरिर १ वीजु कार्मण वाह्य शरीर चे० निचे अ० अभ्यंतर क० का- शरिर २, एम यावत् आंतरा रहीत वैमानिक मण तेजस अ० हाड मं० मांस सो० लोही सुधी चौवीस दंडके वे वे शरिर जाणवा. रा० नाडी छि• शिरा व० तेणे वांध्यु बा० अर्थ-ने० नारकीने दो० वे ठा० थानके सा० बाह्य ओ० उदारिक. शरीरनी उ० उत्पती छे तं० ते ज० कहुंछं रा० पश्चिन्दियतिरिक्खजोणियाणं दो स- रागे करी चे निश्चे दो द्वेषेकरी चे० निश्चे रीरगा पण्णता । तं जहा । अभिन्तर- जा. यावत वे० वैमानिक ताइ जाणवू. ए चेव वाहिरए चेव । अन्भिन्तरए नेरझ्याणं दोहिं ठाणेहिं सारीरुप्पत्ती कम्मए अट्ठिमंससोणियराहारुछिराबद्धे सिया । तं जहा । रागेण चेव दोसेण वाहिरए ओरालिए ॥४॥ चेव । जाव वेमाणियाणं ॥ ७॥ भावार्थ-तिर्यच पचेंद्रिने वे शरिर कहेल छे भावार्थ-नारकीने वे स्थानके करी शरि- ते कहेछे, एक अभ्यंतर शरिर १, वीजुं वाहीर | रनी उत्पती ते शरिर बंधाय छे ते वे स्थानक शरिर २, अभ्यंतर तेजसने कार्मण १, अने कहेछे. रागे करीने १, द्वेपे करीने २ एम वै- वाहीर हाड मांस लोही नाडी शिराये करी मानिक सुधी चौविस दंडके जाणवू. वांधेलु उदारिक शरिर २ अर्थ-ने० नारकीने दु० वे ठा० थानके नि० अर्थ-म० मनुष्यने वि० पण ए० एमज अवयव पुरानीपना ते स० शरीरना पं० को छे चे० निश्चे. तं० ते ज० कहुंछ रा० रागधी नि० निवर्तना मणुस्साण वि एवं चेव ॥ ५॥ ते चे० बळी दो० द्वेष थकी निवर्तना चे० निचे जा० यावत वे० वैमानिक लगे. भावार्थ-एमज माणसने पण जाणवू ए वे भेद छे. नेरझ्याणं दुट्ठाणनिवत्तिए सरीरंगे अर्थ-वि० वांकि ग० गति स० करताने पण्णत्ते । तं जहा । रागनिवत्तिए चेव --
(५०)
हाणं सूत्र २. उद्देसो १.
दोसनिवत्तिए चेव। जाव वेमाणिया- | रहीने क०. कलपे नि० साधूने वा० तेमज
णं ॥ ८॥
नि० साधवीने वा० तेमज प० चेप आपवो ते
पा० पूर्वदिशि चे० निश्चे उ० उत्तर दिाश
भावार्थ-नारकीने वे स्थानके करी शरी-
चे० निश्चे.
रनी निवर्तना ते शरिरना अवयव पुरा निपना
ते कहेछे. एक रागथी निवर्तना १ वीजी द्वेपथी
दो दिसाओ अभिगिज्झ कप्पइ नि-
निवर्तना २, रागद्वेपे करी शरिर उपजे निव- ग्गन्थाणं वा निग्गन्थीणं वा पहावित्त-
तना होय एम वैमानिक मुधी चौविस दंडके ए। पाईणं चेव उदीणं चेव ॥
जाणवु.
भावार्थ-कल्पे साधु साध्वीने दिक्षादेवी
अर्थ-दो० (२४ दण्डके) वे का० कायाराशि | ओधो प्रमुख वेप आपवो.
पं० कह्या तं० ते न० कहुंछं त० वेइंद्रि प्रमुख
अर्थ-ए० एम मु० लोच करवो.
त्रस चे० निश्चे था पृथ्वि प्रमुख चे० वळी.
एवं मुण्डावित्तए ॥१॥
दो काया पण्णता । तं जहा। तस-
भावार्थ-मुंडन ते लोच करवो.
काए चेव थावरकाए चेव ॥ १॥
अर्थ-सि० शिषव, सूत्रादिक.
भावार्थ-वे काय ते राशी समुह कहेल छे सिक्वावित्तए ॥२॥
ते कहेछे, जे दुःख देखी त्रास पामी दुःखनी
भावार्थ-मूत्र अर्थ शिखबवा.
जग्याएथी चाली सुखनी जग्याए जाय ते
अर्थ-उ० पांच महात थापवां ते.
त्रस जीवनो समुह ते त्रसकाय ?, अने स्थीर
रहेते स्थावरकाय २. ए वे भेद छे. उवट्ठावित्तए ॥३॥
अर्थ-त० सकायना दु० वे भेद पं० क्ह्या भावार्थ-उटामण ते पंचमहावत आरोपवा.
तं० ते ज० कहुंछु भ० मोक्ष जास्येते चे० निश्चे
अर्थ-सं० जमवू ते.
अ० मोक्ष नहीं जायते चे० निश्चे.
संभुञ्जित्तए ॥ ४॥
भावार्थ-मांडले जमवं.
तसकाए दुविहे पन्नत्ते । तं जहा।
भवसिद्धिए चेव अभवसिद्धिए चेव ॥२॥
अर्थ-सं० संथारे वेसयुं ते
भावार्थ-सकायना ये प्रकार कहेल छे ते
संवसित्तए ॥ ५॥
कहेछे, मोक्षमा जगे ते भवसिद्धिया त्रस, कोई
भावार्थ-संधारे वेसवू.
काळे मोक्षमा जशे नहीं ते अभवसिद्धिया स.
अर्थ-स० सझाय नथा योग क्रियानुं उ०
अर्थ-ए०एम था० थावर काय वि० पण, कहेवं ते.
एवं थावरकाए वि ॥३॥
सज्झायं उहिसित्तए॥ ६॥
भावार्थ-एम स्थावर कायना पण भव्य
भावार्थ-सनाय नथा योगक्रियानुं कहे.
अभव्य एव भेद जाणवा.
अर्थ-
-स० साय स० परिचित कर ने.
अर्थ-दो व दि० दिशिने अ० साहमा-
सज्झायं समुहिमिनए ॥ ७ ॥
-- -- + करवू. हाणं सूत्र २. उद्देसो १. (५१) भावार्थ-योगनी सामाचारी स्थीर परि अकरणयाए अब्भुट्टित्तए ॥१५॥ चित्त करवी. भावार्थ-फरी पाप नहीं करवाने अर्थे उ- अर्थ-स. जोग क्रियान अ० धार, वी- घम करवो. जाने कहेवं ते. अर्थ-अ० यथाजोग पा० पाप छेदवाने सज्झायं अणुजाणित्तए ॥ ८॥ त० तप करवो प० आदरवो से पूर्व तथा भावार्थ-योग क्रिया धारवी तथा वीजाने | उत्तर सामा रहीने आदरवो. कहेवी. अहारियं पायच्छित्तं तवोकम्म पडि- अर्थ-आ० अपराध कहेवो गुरु आगल. वज्जित्तए ॥ १६ ॥ आलोइत्तए ॥ ९॥ भावार्थ-यथायोग अतिचारने अनुसारे भावार्थ-करेंला अपराध गुरुनी पासे कहेवा. प्रायश्चित लेवू पाप छेदवां टाळवाने तप कर्म अर्थ-प० पापथी ओसर पडिकम[करते. अंगिकार करवा. एटला उपरना १६ बोल पूर्व तथा उत्तर ए वे दिशा सन्मुख रहीने आदरवां. पडिक्कमित्तए ॥१०॥ अर्थ-दो० वे दि० दिशाए अ० सन्मुख भावार्थ-पडिकमणुं (पाप कर्मथी निवर्तवू) | रहीने क० कल्पे नि० साधूने वा० अने नि. साधवीने वा० अने अ० पाछली मा० मरण- अर्थ-नि० पाप निंदवु आत्मा साथे. ने सं० अणसण झु० तेहनी सेवा झु० सेवा निन्दित्तए ॥ ११ ॥ भ० भात पा० पाणीने प० तजे पा. वृक्षनी भावार्थ-पोतानां करेल पाप आत्मानी | डाल कापी तेनी परे थिर का० मरणने अ० साक्षीए निंदवा. अणवांछतो वि० रहे ते वे दिशाए तं० ते अर्ध-० गुरुसारखे पाप निंदवू. ज० कहुं छं पा० पूर्व दिशे चे० वळी उ० उ. त्तर दिशे चे० वळी. गरहित्तए ॥ १२ ॥ दो दिसाओ अभिगिज्झ कप्पड़ भावार्थ-करेल पाप गुरुनी साक्षीए निंदवा. अर्थ-वि० पापबंधनुं छेद. निग्गन्थाणं वा निग्गन्थीणं वा अप- विउट्टित्तए ॥ १३ ॥ च्छिममारणन्तियसंलेहणाझूसणाझूसि- भावार्थ-पाप बंधनुं छेटवू. त्ताणं भत्तपाणपडियाइक्वेत्ताणं पाओ- अर्थ-वि० आत्मा शुद्ध करवो पापथी. वत्ताणं कालं अणवककमाणाणं विह- विसोहित्तए ।। १४ ॥ रित्तए । तं जहा । पाईणं चेव उदीणं भावार्थ-अतिचारना मेलथी आत्माने शुद्ध चेव ।। करवो. भावार्थ-कल्पे साधु साध्वीने छेडलं मर- अर्थ-अ० फरी पाप नही करु तेहने अर्थे गर्नु मगळीक माटे अपछीम कहीए सलेखणा अ० उजमाल था, ते. ते अणसण, युसणा ते तेहनी सेवाए करी स- -- 7 (५२) ठाणं सूत्र २. उद्देसओ २. हीत, देह मुकता भात पाणीनुं जाव जीव ल अर्थ-वि० वे ठा० ठाणांनो प० पहेलो गि पचखाण करतां कापेली मनी डाल उ० उदेसो स० पृरो थयो. जिहां पडी तिहांज रहे तेहनी परे हाथ पगादी विट्ठाणस्स पढमो उद्देसओ समत्तो क नहीं हलावतां स्थीर रहेQ मरणने अणवांछवं ए रिते अणसण कर ते पूर्व अने उत्तर ए भावार्थ-इतिश्री चीजा ठाणांगना प्रथम वे दिशाए सन्मुख रहीने करवू. उदेशानो भावार्थ संपूर्णम्. (अह दुट्ठाणस्स बीयो उद्देसओ।) अर्थ-जे० जे दे० देवता उ० उर्ध लो० उपना छे तेहना वे प्रकार श्री भगवंते कहेल लोके उ० उपना छे ते वे भेदे छे. क. १२ | छे ते कहे छ, चार देवलोके उपना ते क- देव लोकना उ० उपना वि० ९ ग्रेवेक ५ ल्पवासी १ नव ग्रैवेयगने पांच अनुत्तर वि. अनुत्तर विमानना उ० उपना चा० चाले माने उपना ते कल्पातीत २ ए वे भेद छे. जो- भमे ते ज्योतिपी अढी द्वीपना उ० उपना | तिपीदेवता वे प्रकारे छे ते कहे छे. अढी द्वीपे चा० स्थिर ज्योतिषी अढी द्वीप वहारना ग० मनुष्य क्षेत्रमा जोतिपी छे ते चाले छे भी चालवाने विपे र० राता छे गइ० गमन स० छ १, अढी द्वीपनी बाहीर स्थीर छे २, पडिवा छे ते० ते दे० देवताने स० सदा- चालवाने विपे जेहने रती (खुशी) छे १, य स० नित्य जे० जे पा० पाप क० कर्म क० । मनुष्यक्षेत्रना गमनने पडी वा छे २ ए वे वंधाय छे त० तेज देवताने ग० भवे वि० / भेद छे, ते पुर्वोक्त देवताने सदाय नित्ये जे पण ए० केटलाएक वे० वेदना वे० भोगवे. पापकर्म उपजे छे, बंधाय छे ते पापकर्म केट- ५० भवांतरे ग० जइ वि० ने ए० केटलाएक लाएक देवता तो तेह देवतानाज भवने विपे वे. वेदना वे० भोगवे छे. वेदना वेदै छे भोगवे छे. १ केटलाएक देव जे देवा उड्डलोगोववन्नगां कप्पोवव- भवांतरे ते वीने भवे जइने कर्म वेदे छे भोग- वे छे २ ए वे भेद छ. नगा विमाणोववनगा चारोववन्नगा अर्थ-ने० नारकी स० सदा स० निरंतर चारद्विइया गइरझ्या गइसमावन्नगा जे. जे पा० पाप क० कर्म क० वांधे त. तेसिणं देवाणं सया समियं जे पावे | तेज ग० भवे वि० पण ए फेटलाएक वे० कम्मे कज्जइ तत्थगया वि एगइया वेदना वे० भोगवे अ० बीजे भवांनतरे ग० वेयणं वेदन्ति अन्नत्यगया वि एगइया पाप फळ एटले बेदना वे० भोगये छे गया थका वि० पण ए० केटलाएक नारकी वेवणं वेदन्ति ॥१॥ ए० एम जा० यावत पं० पंचेन्द्री तितियन भावार्थ-जे देवता उर्द्ध (चा) लोके । जो० जोनियाने. - हाणं सूत्र २. उहेसो २. नेरझ्याणं सया समियं जे पावे क मणुस्सवज्जा सेसा एक्कगमा ॥४॥ म्मे कज्जइ तत्थगया वि एगइया वे भावार्थ-मनुष्य वर्जिने शेष वीजा दंडक यणं वेदेन्ति अन्नत्थगया वि एगइया ते भवनपति, वाण न्यंतर जोतिषी वैमानिक वेयणं वेदेन्ति । एवं जाव पश्चिन्दिः एक गमा सरखां जाणवां. अर्थ-ने० नारकी जीवनी दु० वे ग० यतिरिक्खजोणियाणं ॥२॥ गति छे दु० वे आ० आववानी गति छे. पं० भावार्थ-नारकी जे सदा सर्वदा निरंतर कही छे तं० ते ज० कहुं छं ने० नरकनुं पापकर्म करे छे, वांधे छे ते पापनां फळ के- आउपुं वांध्यु ने० ते नरकमां उ० उपजतो टलाएक नारकी तो तीहांज नर्कमा रह्या वेदना थको म० मनुष्यथकी वा० अथवा प० पंचे- वेदे छे, भोगवे छे १ केटलाएक नारकी वीजे | न्द्रि ति० तिर्यंच जो० जोनि माहिथी ए वे- भवांतरे जइने पापनां फळ वेदे छे भोगवे छे । मांथी वा० वळी उ० नारकी थाय. २ ए वे भेद छे. एम यावत् पांच स्थावर, त्रण विगलेंद्रि, पचेंद्रि तिर्यच ते जे भवमां पाप नेरइया दुगइया दुआगइया पण्ण- करे तेहज भवमा भोगवे. १ अने वीजे भवे । ता । तं जहा । नेरइए नेरइएसु उव- पण भोगवे छे २ ए वे भेद छे. वज्जमाणे मणुस्सेहितो वा पश्चिन्दि- अर्थ-मनुष्यने एमज जाणवू स० सदा स० यतिरिक्खजोणिएहिंतो वा उववज्जे- निरंतर जे. जे पा० पाप क० कर्म क० करे छे ज्जा ॥१॥ ते इ० एज ग० भवे वि० पण ए० केटलाएक भावार्थ-नारकीने जावानी बे गति अने वे० कर्म फळ वे० भोगवे अ० वीजे भवान- तरे ग० गया थका वि० पण ए० केटलाएक जेणे नारकीनुं आयुष्य वांध्यु छे तेहने नार- आववानी वे आगति कहेल छे ते कहे छे. वे. वेदना वे० भोगवे छे. कीज कहीए ते नरकमां उपजे तो मनुष्यमांथी मणुस्साणं सया समियं जे पावे १ अथवा पचेंन्द्रि तिर्यंचमांथी २ ए वे माही- कम्मे कज्जइ इहगया वि एगइया वेयणं थीज नारकी थाय. वेदेन्ति अन्नत्थगया वि एगइया वेयणं अर्थ-से० तेहज चे० निश्चे पं० वळी ने० वेदन्ति ॥३॥ नारकीने ने० नारकीपणुं वि० मुकतो थको म० मनुष्यपणुं वा० अथवा पं० पंचेन्द्रि तिर्यंच भावार्थ-जे मनुष्य सदा सर्वदा पाप करे जो योनि ग० पामे. छे ते केटलाएक मनुष्य तेहज भवने विषे पापनां फल वेदे छे भोगवे छे ? केटलाएक से चेव णं नेरइए नेरइयत्तं विप्पज- मनुप्य बीजे भवांतरे जइने पापनां फळ वेदे हमाणे मणुस्सत्ताए वा पश्चिन्दियति- छे भोगवे छे, २ ए वे भेद छे. रिक्खजोणियत्ताए गच्छेज्जा ॥ २ ॥ अर्य-म० मनुष्य व० वर्जिने से०, बीजा भावार्थ-वळी तेह्ज नारकीपणुं मुकी न- ए० एमज जाणवा. रकमांधी निसरी मनुष्यमा १ अथवा पचेंन्द्रि । .
जाय. जाणवा (नारकी पेठे ) ण० एटलो विशेष पणत्ता । तं जहा । पुढविकाइए पुढ- (५४) हाणं सूत्र २. उद्देसो २. तिर्यंचमां आवी उपजे २. ए वे ठेकाणे आवे | अथवा नो० नारकी वर्जी वीजा सर्वमांधी वा० अथवा उ० उपजे ते. अर्थ-ए० एम अ० असुरकुमार वि० पण पुढविकाझ्या दुगइया दुआगइया से० ते चे० निश्चे गं० वळी अ० असुर- पण्णत्ता । तं जहा। पुदविकाइए पुढ- कुमार अ० अमुरकुमारनो भव वि० मुकतो विकाइएसु उववज्जमाणे पुढविकाइए- थको म० मनुष्यपणुं वा० अथवा ति० तिर्य- हिंतो वा नोपुदृविक्काइएहितो वा उव- च जो० योनी वा० अथवा ग० पामे. वज्जेज्जा ॥५॥ एवमसुरकुमारा वि । णवरं से चेव भावार्थ-पृथ्विकायना जीवने चे गति वे णं असुरकुमारे असुरकुमारत्तं विप्पज- | आगतिश्री भगवते कहेल छे ते कहे छे. प्र- हमाणे मणुस्सत्ताए वा तिरिक्खजोणि- विकायतुं आयुष्य वांधी पृथ्विकायमा उपजे यत्ताए वा गच्छेज्जा ॥३॥ ते पृथ्विकायमाथी वळी पृथ्विकायमां आवी उपजे १ पृथ्विकायमां नारकी वर्जि वीस भावार्थ-एम नारकीनी पेरे असुरकुमार दंडकना आवी उपजे २, पृथ्विविना वीजा जाणवा पण एटलो विशेष जे ते असुरकुमार सर्वनोपृथ्वि कहीए. देवता असुरकुमारपणुं मुकतो थको प्रचि १ अर्थ-से० ते चे० निश्चे पं० वळी पु० पाणी २ वनस्पती ३ संज्ञी मनुष्य ४ संज्ञी । पृथ्विकायनो जीव पु० पृथ्विकायपणुं वि० तिर्यच पचेंन्द्रि ५ ए पांचमां आवी उपजे. मुकतो थको पु० पृथ्विकायमां उपजे वा० अथवा अर्थ-ए०एम स०सघळा दे०देवता जाणवा. | नो नो पृथ्विकायपणे वा० अथवा ग० उपजे एवं सवदेवा ॥ ४ ॥ ए० एम जा० यावत मा० मनुप्य लगे. भावार्थ-एम दसे भवनपति, वाणव्यंतर जोति से चेव णं पुदविकाइए पुदविकाइ- पी वैमानिकमां वीजा देवलोक मुधी सर्व देवता- यत्तं विप्पजहमाणे पुढविकाइयत्ताए ने असुरकुमारनी परे जाणवू. [त्रीजाथी आठमा देवलोक सुधीना देवता संज्ञी मनुष्य ? संजीवा नोपुदविकाइयत्ताए वा गच्छेज्जा । तिर्यच २ ए वेमांधी आवी उपजे अने ए वे एवं जाव माणुस्सा ॥ ६॥ मांहीज जाय, नवमांधी स्वार्थसिद्ध मुधीना भावार्थ-चळी नेहज पृश्चिकायनो जीव देवता एक मनुष्यमांथी आवी उपजे अने मनु- पृश्किायपणुं मुकीने पृथ्विकामां जइ उपजे ? प्य माहीज जाय.] अथवा नोपृथ्वि ते देवता नारकी वजिने अर्थ-पु० पृथ्विकायना जीव दु० वे गति- बीजां सर्व म्यानके जाय, एम यावत् त्रण मांहि ग० जाय दु० वे आ० गनिमांची आवे । विगदिमां पांच स्थावर त्रण विगलेंदि मनु- ५० कया नं० ने ज० कई छ. पु. पृश्चि- : प्यने तिर्यंच पचेंद्रि ए दस दंडकनो आवे ने कायनु आरपुं बांधी पु० पृथ्विकायने विपे । ए उसमां जाय, निर्यच पचेंद्रिमा आठमा देव- ३० उपजतो यको पु० पृथ्विकाय मांहि वा० लोकधी स्वार्थसिद्ध वजि चोविस दंढकनो होणं सूत्र २. उद्देसो २. (५५) आवे ने चोवीसमां जाय. मनुष्यमां तेउ वायु दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा । ने सातमी नरक वर्जिने वावीस दंडकनो आवे गइसमावनगा चेव अगइसमावन्नगा ने चोवीस दंडकमां जाय. चेव । जाव वेमाणिया ॥३॥ अर्थ-दु० वे० प्रकारे ने० नारकी प० कह्या भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे तं० ते ज० कहुं छं भव० भन्यनारकी चे० ते कहे छे. नरकमां जता होय तथा नरकमां निश्चे अ० अभव्य नारकी चे० निश्चे जा० यावत वे० वैमानिक लगे २४ दण्डके जाणवू. तरत उपना ते गति समापन १ घणा काळना तीहां छे ते अगति समापन २ ए वे भेद छे दुविहा नेरइया पन्नत्ता । तं जहा। एम यावत् वैमानिक सुधी गतिसमापन १ भवसिद्धिया चेव अभवसिद्धिया चेव। अगतिसमापन २ ए.वे भेद जाणवा. जाव वेमाणिया ॥१॥ अर्थ-दु० वे भेदे ने० नारकी पं० कह्या तं० भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेलछे । ते ज० कहुंछु प० प्रथम समय उ० उपना चे० निश्चे अ० वीजा वीजे समये उपजा चे० ते कहे छे. एक भव्यनारकी १ वीजा अभ- व्यनारकी २ ए वे भेद छे एम यावत् वैमा- निश्चे जा० यावत वैमानिक लगे २४ दण्डके निक सुधी चोविस दंडके जाणवु. दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा । अर्थ-दु० वे प्रकारे ने० नारकी प० कया पढमसमओववन्नगा चेव अपढमसम- तं०ते ज० कहुं छं अ० एक समये घणा उपना ओववनगाचेवाजाव वेमाणिया ॥४॥ ते चे० निश्चे पं० एकेकी समे एकेको उपनो भावार्थ-वळी वे नकारे नारकी कहेल छे ते चे० निश्चे जा० यावत वे० वैमानिक लगे ते कहे छे. प्रथम समयना उपना १ अप्रथम २४ दण्डके. ; समयना उपना ते वीजा त्रीजादीक समयना दुविहा नेरइया पन्नत्ता । तं जहा। उपना २ एम यावत् वैमानिक मुधी वे वे अणन्तरोववनगा चेव परंपरोववन्नगा भेद जाणणा. चेव । जाव वेमाणिया ॥२॥ अर्थ-दुवे भेदे ने० नारकी पं० कह्या तं० ते ज० कहुं छं आ० आहारवंत चे० निश्चे भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे अ० विग्रहगति ते १-२ समे अणाहारी चे० ते कहे छे. एक समे घणा एकठा उपना १ निश्चेजा. यावत वे० वैमानिक लगे २४ दण्डके एक समे एक, वीजे समे वीजो एम परंपराए दुविहा नेरइया पन्नत्ता । तं जहा। उपना २ एम यावत् वैमानिक मुधी वे वे भेद जाणवा. आहारगा चेव अणाहारगा चेव । जा- अर्थ-दु० वे भेदे ने० नारकी पं० कहा। व माणिया ॥५॥ तं. ते ज० कहुंएं ग० नरकमां जाता अथवा भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे तरत उपना ते चे० निश्चे अ० घणा कालना ते कहेल छे. आहारिक ते केटला एक नारकी छे ते चे० निश्चे जा० यावत वे० वैमानिक हमेशां आहार लेछे १ अणाहारिक ते विग्रह गति करी नरकमां उपजे ते वारे. एक वे समे । - लंग जाणवा.
( ५६ ) हाणं सूत्र २. उद्देसो. अणाहारि होय एम यावत् वैमानिक सुधी वे पज्जत्तगा चेव अपज्जत्तगा चेव । जा- । वे भेद जाणवा. व वेमाणिया ॥८॥ अर्थ-दु० वे प्रकारे ने० नारकी पं० कह्या भावार्थ-चळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे तं० ते ज० कहुं छं उ० श्वासोश्वास लीए ते पर्याप्ताचे निश्चे नो जे श्वासोश्वास नथी लेता | ते कहे छे एक पर्याप्ता १ वीजा अपर्याप्ता २ ते अपर्याप्ता चे० निश्चे जा. यावत वे० एम यावत् वैमानिक सुधी थे वे भेद जाणवा. वैमानिक लगे. अर्थ-दु० वे प्रकारे ने० नारकी पं० कया दुविहा नेरइया पन्नता । तं जहा तं० ते ज० कहुंछ स० मन पर्याप्ति सहित चे० निश्चे अ० मन पर्याप्ति पुरी थइ नथी ते उस्सासगा चेव नोउस्सासगा चेव । निश्चे ए. एक पं० पचेन्द्रि स• सर्व जाव वेमाणिया ॥६॥ जाणवा वि० वेइन्द्रि, तेइन्द्रि, चउरिन्द्रि व- भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छ जीने जा० यावत वे० वैमानिक लगे. ते कहे छे. एक पर्याप्ता नारकी छे ते श्वासो दुविहा नेरइया पनत्ता । तं जहा । श्वास लेछे १ बीजा अपार्याप्ता नारकी छे ते सन्नी चेव असन्नी चेव । एवं पश्चि- श्वासोश्वास लेता नथी २ एम यावत् वैमा- निक मुथी वे वे भेद जाणवा. न्दिया सबे विगलिन्दियवज्जा जाव अर्थ-दु० वे भेदेने० नारकी पं० कद्या तं० ते माणिया ॥ ९ ॥ ज० कहुं स० इन्द्रि सहित चे० निश्चे अ० इन्द्रि भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे रहित चे० निश्चे जा० यावत वे. वैमानिक लगे ते कहे छे मन पर्याय सहीत ते संज्ञी १ मन दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा। पर्याय हजु नथी थइ ने असंज्ञी २ ए वे भेद सइन्दिया चेव अणिन्दिया चेव । जाव तेथीए आठ बजिने यावत् बाणव्यंतर सुधी छे. पांच स्थावर अने त्रण विगलेंद्रिने मननधी वेमाणिया॥७॥ (इहां वैमानिक पण लेवा) ए सर्व पचेंद्रिमां भावार्थ-बळी वे प्रकार नारकी कहेल छे। संज्ञी असंजी ए वे ये भेद छे (असंझी पचेंद्रि, ते कडे छे. जेणे पर्याय पुरी करी छे ते इंदि। मरीने नारकी भवनपति वाणव्यंतर सुधी सहीत छ. १ जेणे पर्याय पुरी करी नी ते उपजे छ अने जोतिपी वैमानिकमां एकला इंद्रि रहीत छे २ एम यावत् वैमानिक मुधी । संज्ञीज उपजे छे तेथी इहां वाणव्यंतर मुधी कहल छ.) वे वे भेद जाणवा. अर्थ-दु० वे भेद ने० नारकी पं० कगा अर्थ-दु० वे भेद ने० नारकी पं० कद्या नं० तं. ते ज० कहुंठं प० पर्याप्ता नाम कर्मयी ते ज० कहुं हुं भा० भासक चे० निश्चे अ. ० निश्च अ० पर्याप्ति पुरी नधी थइ ते चे० । अभासक चे निश्च ए० एम ए० एकेन्द्रि वर्जीनं निश्चे जा. यावन वे. वैमानिक लगे. दुविहा नेरड्या पन्नत्ता । तं जहा। दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा । स० सर्वने.
I - हाण सूत्र २. उद्देसौ २. (१७) भासगा चेव अभासगा चेव । एवं स० समय हि स्थितिनाचे निश्च अ० असं- ख्याता का० काल स० समय हि० स्थितिना एगिन्दियवज्जा सवे ॥१०॥ चे० निश्चे ए० एम प० पंचेंन्द्रि जाणवा एक भावार्थ-वे भेदे नारकी कह्या छे, भासक एकेंन्द्रि वि० विगलेन्द्रि व० वर्जीने जा० यावत अने अभासक एम वे भेद छे. एम एकेन्द्रि व- वां० व्यंतर लगे. जीने सर्व दंडके जाणवं. अर्थ-दु० वे भेदे ने० नारकी पं० कह्यातं. दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा। ते ज० कहुं छं स० समाकित दृष्टी नारकीचे संखेज्जकालसमयहिइया चेव 'अ- निश्चे मि० मिथ्यात्वी नारकी चे० निश्चे संखेज्जकालसमयट्टिइया चेव । एवं ए० एकेन्द्रि वर्जित स० सर्व दंडके. पश्चिन्दिया एगिन्दियविगलिन्दियव- दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा । सम्मदिट्ठिया चेव मिच्छद्दिविया चेव ज्जा जाव वाणमन्तरा ॥ १३ ॥ भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे ते एगिन्दियवज्जा सवे ॥ ११ ॥ कहेछे. एक संख्याता काळसमयनी स्थिति एटले भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे जघन्य दशहजार वरसनी स्थितिवाळा, बीजा ते कहे छे. एक समकित द्रष्टी, वीजा मिथ्यात्व असंख्याता काळ समयनी स्थिति ते पल्यो दृष्टी २ एम एकेंद्रिय वर्जिने सर्व १९ दंडकमां पम सागरोपमनी स्थितिवाळा २ ए वे भेद समकित द्रष्टीने मिथ्यात्व द्रष्टीए वे वे भेद छे. पांच स्थावर, त्रण विगलेदिना असंख्याता वरसनां आयुष्य नथी ते ए आठ वर्जि- अर्थ-दु० वे भेदे ने० नारकी पं० कह्या तं० ने मनुष्य तिर्यच भवनपति वाणव्यंतर सुधी ते ज० कहुं छं प० भव थोडाहोय ते चेनि वे वे भेद जाणवा. जोतिषी वैमानिकमां असं- थे अ० अनंत संसारी छेते चे० वळी जा० ख्याता वरसनां आयुष्य छे. यावत वे० वैमानिक लगे. अर्थ-दु० चे भेदे ने० नारकी पं० कह्या दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा । तं० ते ज० कहुंछु. सु० जिनधर्म पामवो सोहि- लोछे ते चे० निश्चे दु० जिनधर्मनी प्राप्ति दो- परित्तसंसारिया चेव अणन्तरसंसारिया हिली छे ते चे० निश्वे जा० यावत वे० वैमा चेव । जाव वेमाणिया ॥ १२ ॥ निक लगे जाणवा. भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल छे दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा । ते कहे छे. जे नारकीने थोडा भव करवाना होय ते परित संसारी १ जेहने घणा भव सुलभवोहिया चेव दुल्लभवोहिया करवाना होय ते अनंतसंसारी २ एम यावत् चेव । जाव वेमाणिया ॥ १४ ॥ वैमानिक सुधी वे वे भेद जाणवा. भावार्थ-वळी घे प्रकारे नारकी कहेल छे, अर्थ-दु० वे प्रकारे ने० नारकी पं० कद्या ते कहे छे. एक मुलभ वोधी ते जेहने जैनध- तं० ते ज० कहुंछ स० संख्याता का० काल में पायवो सोहिलो छे १ वीजो दुर्लभ बोधी जाणवा. -- -- (५८) हाणं सूत्र २. उद्देसो २. ते जेहने जैनधर्म पामवो दोहिलो छे २ एम अ० समुदघात विना चे० वळी अ० अवधि यावत् वैमानिक मुधी वे वे भेद जाणवा. ज्ञान दर्शने करी आ० जीव अ० अधो लो० अर्थ- दु० वे भेदे ने० नारकी ५० कह्या लोकने जा० जाणे पा० देखे अ० अवधिज्ञानी तं. ते ज० कहुं छु कि० भारे कर्मि चे० व- स० विक्रय समुदघाते करी स० विक्रय समुद्र- ळी मु० हलुआकमि चे० वळी जा० यावत घात विना पण चे० वळी अ० आत्मा स्व- वे. वैमानिक लगे. भाव ज्ञाने करी आ० जीव अ० अधो लो० लोक जा० जाणे पा० देखे. दुविहा नेरझ्या पन्नत्ता । तं जहा किण्हपक्खिया चेव सुक्कपक्खिया चे- दोहिं ठाणेहिं आया अहेलोगं जा. व । जाव वेमाणिया ॥ १५ ॥ णइ पासइ । तं जहा । समोहएणं चेव भावार्थ-वळी वे प्रकारे नारकी कहेल के अप्पाणेणं आया अहेलोगं जाणइ पास ते कहे छे. एक कृष्णपति ते जेहने घणो सं- इ असमोहएणं चेव अप्पाणेणं आया सार परिभ्रमण करवानुं छे ते भारे कर्मि. १ अहेलोगं जाणइ पासइ अहोहिसमो वीजा शुकलपक्षि ते जेहने कर्म थोडां छे संसा- हयासमोहएणं चेव अप्पाणेणं आया र अल्प छे ने हल्लवाकर्मि. २ एम यावत् वै- मानिक सुधी वे वे भेद जाणवा. अहेलोगं जाणइ पासइ ॥ १॥ अर्थ-दु० वे भेदे ने० नारकी प० कह्या तं० भावार्थ-चे प्रकारे आत्मा अघो (नीचो) ते ज० कहुं छं च० फरी नरकमां नही आवे | लोकने जाणे देखे ते कहेछ, विक्रय समुदाते ते चे० निश्चे अ० वळी नरकमां आवसे ते आत्मस्वभावे करी जीव अधो लोकने जाणे देखे चे० निश्चे जा० यावत वे. वैमानिक लगे. १, विक्रय समुदयात विना पण अवधिज्ञान अ- वधिदर्शने करी आत्म स्वभावेज अधोलोकने दुविहा नेरइया पन्नत्ता । तं जहा । जाणे देखे.२ अधोवर्ति अवधिज्ञानी जीव तथा चरिमा चेव अचरिमा चेव । जाव वे- परम अवधिज्ञाननो धणी विक्रय समुद्घाते करी माणिया ॥ १६॥ तथा विक्रय समुद्घात विना पण आत्म स्वभावे भावार्थ-वळी वे मकारे नारकी कहेल है करी अधोलोकने जाणे दिखे. ते कह छे. एक चरम ते फरी नरकमां नहीं अर्थ-ए० एम ति० बिछा लो० लोक प्रते आवे श्रेणीक कृष्ण प्रमुख १ वीजा अचरम ते जाणे देखे. वीजा भव करीने वळी फरी नर्कमां आवशे एवं तिरियलोग ॥ २॥ २ यावत् वैमानिक मुधी चे भेद जाणवा. भावार्थ-एमज विद्यालोकमते जाणे देखे. अर्थ-दो० वे ठा० प्रकारे आ० जीव अ० अधो लो० लोकने जा. जाणे प्रा० देखे तं० अर्थ-उ० एम उर्द्ध लो० लोक प्रते. ते ज० कई © स० विक्रय समुदधाते २० उडलोगं ॥३॥ बळी १० अवधिज्ञाने करी आ० जीव १० भावार्थ-एपज उर्द्ध लोकन पूर्वोक्त वे प्र- अघो लो० लोक प्रते जा० जाणे पा० देखे ! फारे कर्ग जाणं देखे. --- ३ - हाणं सूत्र २. उद्देसो २. अर्थ-के० ० एम १४ राज लो० लोक प्रते। करीने २ पर्म अवधिज्ञाने आत्मस्वभावे करी जाणे देखे. अधोलोक प्रत्ये जाणे. देणे. केवलकप्पलोगं ॥ ४॥ अर्थ-ए० एमति० त्रिछो लो० लोक जा- णे देखे. भावार्थ-एमज केवळलोक ते संपूर्ण चौद राजलोक प्रत्ये केवळज्ञान केवळदर्शने करी एवं तिरियलोगं ॥२॥ जाणे देखे. भावार्थ-एमज त्रिछालोकने जाणे देखे. अर्थ-दो० वे ठा० प्रकारे आ० जीव अ० अर्थ-उ० उर्ध लो० लोक प्रते. अधो लो० लोक प्रते जा० जाणे पा० देखे उड्डलोगं ॥३॥ तं. ते ज० कहुं हुं वि० विक्रय शरीर कीधु भावार्थ-तथा उर्धलोकने पूर्वोक्त चे प्रकारे जेणे एहवो चे० निश्चे अ० आत्मा स्वभावे करी जाणे देखे. करी आ० जीव अ० अधो लो० लोक प्रते अर्थ-के० समग्र लो० लोक प्रते जाणे, जा० जाणे पा० देखे अ० विक्रय शरीर विना केवलकप्पलोगं ॥ ४॥ पण चे० वळी अ० स्वभावे आ० जीव अ० अधो लो० लोक प्रते जा० जाणे पा० देखे भावार्थ-एमज समग्रलोक प्रत्ये जाणे देखे. अ० अवधि ज्ञानी वि० विक्रय करीने वि० अर्थ-दो० वे ठा० थानके आ० जीव स० विक्रय कर्या विना चे० वळी अ० स्वभावेज | शब्द प्रते सु० सांभले तं० ते ज० कहुं हुं दे० आ० जीव अ० अधो लो० लोकने जा० ना देशथी एक काने वि० बळी आ. जीव स० णे पा० देखे. शब्द प्रते सु० सांभले स० वे काने वि० अ- दोहिं ठाणेहिं आया अहेलोगं जा- थवा संभिन्न श्रोता लब्धिनो आ० धणी सर्व इन्द्रिए करी स० शब्द प्रते सु० सांभले. णइ पासइ । तं जहा। विउविएणं चेव अप्पाणेणं आया अहेलोगं जातं जहा। देसेण वि आया सद्दाई सु- दोहिं ठाणेहिं आया सद्दाइं सुणेइ । णइ पासइ अविउविएणं चेव अप्पाणे- तं जहा । देसेण वि आया सद्दाइं सु- णं आया अहेलोगं जाणइ पासइ अ- णेइ सत्वेण वि आया सद्दाइं सुणेइ ॥१॥ भावार्थ-वे स्थानके आत्मा शब्द प्रत्ये सां- होहिविउवियाविउविएणं चेव अप्पा- भळे ते, कहे छे. देश थकी ते एक काने वहे- णणं आया अहेलोगं जाणइ पासइ रो होय तेथी एकज काने आत्मा प्रत्ये शब्द सांभळे १, सर्वधी ते वे काने आत्मा शब्द म- भावार्थ-जेणे विक्रय शरीर करेलुं छे ते आत्म-सर्व इंद्रिये करी सांभळे २ ए वे भेद छे. त्ये सांभळे तथा संभिन्न श्रोत्र लब्धिनो धणी स्वभाव फरीजीव अधोलोक प्रत्ये जाणे देखे ? विक्रय शरीर का विनाज पर्म अवधिज्ञाननो अर्थ-ए० एम वे भेदे रु० रुप पा० देखे धणी आत्मखभावे करीअधोलोक प्रत्ये जाणे देशथी ने सर्वथी. देखे २, एमविक्रय शारीर करीने १ तथा अण. एवं स्वाइं पासइ ॥२॥ तं ए धी. ले तथा सर्वथी ले. १ (६०) हाणं सूत्र २. उद्देसो २. भावार्थ-एम वे प्रकारे रुप देखे ते कहे छे, अर्थ-ए० एम प० प्रकर्षे दीपेदेशथी सर्वथी. देशथी ते एक आंखे.काणो होय तेथी एकज एवं पभासइ ॥२॥ आंखे देखे १ सर्वधी ते वे आंखे देखे २, भावार्थ-एम देशधी ने सर्वथी आत्मा अर्थ-70 गंध नाके अ० ले एदेशथी स- प्रकाशे ए वे भेद छे. वधी एम वे भेद. अर्थ-वि० विकुर्वे देशथी सर्वथी. गन्धाइं अग्धाइ ॥३॥ विउच्वइ ॥ ३॥ भावार्थ-एम नाके गंध ले ते दशथी ने भावार्थ-एम वे प्रकारे विकुर्वे देशथी ते सर्वथी. हाथ प्रमुख वक्रेय करे १ सर्वधी ते काया सं. अर्थ-र० एम रस आ० ले देशथी स- पूर्ण विकुर्वे २ ए वे भेद छे. अर्थ-प० • एम मैथुन सेवे वे भेदे. रसाइं आसाएइ ॥ ४ ॥ परियारेइ ॥ ४ ॥ भावार्थ-एम जीभे रसले देशथी ते प- भावार्थ-एम वे प्रकारे मैथुन सेवे देशथी दजीभी प्रमुख रोगे करी देश (एक तर्फ) थी ते हस्तादिक अवयवे करी तथा मने करीने स्वाद सेवे १ सर्वथी ते मन वचन कायाए करी अर्थ-फा० फरस प्रते प० जाणे देशधी सेवे २ ए वे भेद छे. सर्वथी. अर्थ-भा० एम भापा भा० बोले वे भेदे. फासाइं पडिसंवेदेति ॥५॥ भासं भासइ ॥ ५॥ भावार्थ-एम स्पर्श पण देशथी ने सर्वथी भावार्थ-एम वे प्रकारे भापा बोले देशी कहे. ते जीव्हाग्रे बोले १, सर्वथी ते लब्धिपुरी भा- अर्थ-दो० वे ठा० धानके आ० आत्मा प्या वोले २, ए वे भेद छे. ओ० दीपे तेजे करी तं० ते ज० कहुं छं दे० अर्थ-आ० आहार ले वे भेदे. देशथी वि० पण आ० जीव ओ० दीपे पजु- आहारेइ ॥ ६॥ यानीपरे स० सर्वथी वि० पण आ० जीव ओ० भावार्थ-एम वे प्रकारे आहार ले, देशथी दीपे दीवानी परे. ते आहार प्रमुख मात्रा (मर्यादा) ए ले दोहिं ठाणेहिं आया ओभासइ । १, सर्वधी ते पूर्ण आहार लेकर ये भेदछे. तं जहा | देसेण वि आया ओभासइ अर्थ-प० परगमावे. सवेण वि आया ओभासइ ॥१॥ परिणामेड ॥ ७॥ भावार्थ-वे स्थानक करी आत्मा तेजयी भावार्थ-एम के प्रकारे आहार प्रमुखपर दीपे ते कडे छे, देशयी खजुया (आगीया- गमावे देशथी ते पेटमां पीओ होय तेणे करी जीव) नी पेरे दीप १ सर्वधी मूर्यनी परे। एक तर्फपरगमाव नधा हस्तादीक अवयवे परगमावे ?, सर्वी ते सर्व यंगे परगमा आत्मा दीपेन.
हाणं सूत्र २. उद्देसो २. २, एम देशयी आहार प्रमुख छांडे ते अधो मरुया देवा दुविहा पन्नत्ता। तं जहा। वायु नीकळे १, सर्वथी छांडे, आखे शरीरे एगसरीरी चेव बिसरीरी चेव ॥१॥ परसेवानी पेरे २, ए वे भेद छे. अर्थ-वे चेदे. भावार्थ-मरुत देवता वे प्रकारे श्री भगवंते कहेलछे ते कहेछे. जेवारे भवधारणीज शरीर होय वेदेइ ॥ ८॥ ते वारे एक शरीरछे १, अने जे वारे उत्तर वि- भावार्थ-एम वे प्रकारे आहारने वेदे दे- क्रय करे ते वारे वे शरीर छे २ ( सर्व देव- शथी १, सर्वथी २, ए वे भेद छे. ताने वे शरीरज होय पण आठमा देवलोक सु- अर्थ-नि० निर्जरे. धीना देवताछे ते मांही मरुत देवता सर्वथी निज्जरेइ ॥९॥ प्रधान ( उत्तम ) छे ते माटे इहां मरुत देवता भावार्थ-एम वे प्रकारे आहारने तजे देशथी कहेलछे ) ए वे भेदछे. ते एकासणुं करे १, सर्वथी ते उपवास करे २, अर्थ-ए० एम किं० किन्नरदेव. ए वे भेदछे. एवं किन्नरा ॥२॥ अर्थ-दो० वे ठा० थानके दे० देवता स० भावार्थ-एम किंनर देवता. शब्द प्रते सु० सांभळे तं० ते ज० कहुं छु. अर्थ-कि० कि० पु० पु० पुरुषदेव. दे० देशथी वि० वळी दे० देवता स० शब्द प्रते सु० सांभळे स० सर्वथा वि० पण दे० किंपुरिसा॥ ३॥ देवता स० शब्द प्रते मु० सांभळे जा० याव- भावार्थ-किं पुरुष देवता. त नि० छांडे. अर्थ-० गन्धर्व देवता. दोहिं गणेहिं देवे सदाइं सुणेइ । गन्धवा ॥४॥ तं जहा । देसेण वि देवे सदाइं सुणे- भावार्थ-गंधर्व देवता. अर्थ-ना० नागकुमार देवता, इ सवेण वि देवे सदाइं सुणेइ जाव निज्जरेइ ।। नागकुमारा ॥ ५॥ भावार्थ-नागकुमार देवता. भावार्थ-वे स्थानके करीदेवता पण शब्द प्रत्ये अर्थ-मु० सुवन कुमार. सांभळे ते कहेछे, देशयी देवता शब्द प्रत्ये सांभ- के एटले कांइक सांभळ्यु कांइक न सभिन्यु ?, सुवन्नकुमारा ॥६॥ सर्वथो देवता शब्द प्रत्ये सांभळे ते ते शब्द भावार्थ-मुवर्णकुमार देवता. वोले ते सर्वे सांभळे २, ए चे भेदछे, एम यावत् अर्थ-अ० अग्निकुमार. निर्जरावे छांडे त्यांमुधी ए सर्वे वोल आहारनी अग्गिकुमारा ॥ ७॥ पेरे देशथी सर्वयी ए वे वे भेद जाणवा. अर्थ-म० सर्वमा प्रधान दे० देवता दु० भावार्थ-अग्निकुमार देवता. वे भेदे ५० कन्या तं० ते ज० कई ई ए० अर्थ-बा० वायुकुमार देवता. भवधारिणि शरीरवंत चे० बळी वि. उत्तर वाउकुमारा ॥८॥ विक्रिय करे ते चे वली, भावार्थ-वायकुमार देवना ए सर्वेने भव धा- - - । . T .
(६४) टाणं सूत्र २. उद्देसओ भि० भेदाय पडे तं० ते ज० कहुं हुं. स० अ० अभिन्न मळेला छे चे० वळी. पोतानी वा० मेळे पो० पुद्गळ भि० भेदाय दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा। छे प० परे वा० करीने पो पुदगळ भि. भिन्ना चेव अभिन्ना चेव ॥१॥ भेदाय. भावार्थ-वे प्रकारे पुदगळ कहेल छे ते दोहि ठाणेहिं पोग्गला भिज्जन्ति । कहे छे. एक भिन्न ते जुदां जुदां पुदगळ छे तं जहा । सयं वा पोग्गला भिज्ज- १, एक अभिन्न ते भेलां पुदगळ छे २, ए वे न्ति परेण वा पोग्गला भिज्जन्ति ॥२॥ भेद छे. भावार्थ-वे थानके पुदगळ भेदाय छे ते अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुदगळ ५० कह्या कहुंछ पोतानी मेळे पुदगल भेदाय छे १, परे तं० ते ज० कई छं भि० पोतानी मेळे भे- करिने पुदगळ भेदाय छे .. दाय ते चे० वळी नो० न भेदाय ते चे० वळी. अर्थ-दो० वे ठा० थानके पो० पुदगळ दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा। प० सडे छे तं० ते ज० कहुं छं स० पोतानी भिउरधम्मा चेव नोभिउरधम्मा चेव वा० मेले पी० पुदगळ प० सडे छे ५० पर- थी पो० पुढगळ प० सडि पडे छे. ॥ २॥ दोहि ठाणेहिं पोग्गला परिसडन्ति । भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगळ कहेल छे ने कहे छे. एक पुदगळ पोतानी मेळे भेदाय तं जहा । सयं वा पोग्गला परिसड- छे ते भिदुर स्वभाव छै १, बीजा नोभिदुर न्ति परेण पोग्गला परिसडन्ति ॥३॥ स्वभाव ने वज्रादिक जाणवां २, ए वे भेद छे. भावार्थ-चे प्रकारे पुदगळ सडे छे ते कहे । अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुद्गळ ५० कहा छे. एक पोतानी मेळे पुदगल सडी पड़े छे, तं० ते ज० कई र्छ ५० परमाणुं पुढगळ चे० कोढ प्रमुख रोगे करी आंगळी प्रमुख १, एक वळी नो० घणानो समुह चे० वळी. परथी पुदगळ सडी पडे छे सोमलाढिके करी दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा । परमाणुपोग्गला चेव नोपरमाणुपोग्ग- अर्थ-ए० एम प० पहे छे पर्वतना शिपर ला चेव ॥३॥ ममुख वे भेदे. एवं परिवडन्ति ॥ ४ ॥ भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगळ कईल हे ने कहे छे. परमाणुं शुदगल ने छदमस्यनी भापार्थ-एम पढे छे पर्वतनां शिखर. नजरे आवे नही, तेहन केवळज्ञानीज जाणे अर्थ-ए० एम वि० विणसे छे व भेदे. देखे ?, बंध पुद: घणानो समुह ( जयो) विडंसन्ति ।। ५॥ तेनोपरमाणु पुढगक २, एबे भेद छे. भावार्य-एम विणसे छे वादळ प्रमुख. अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुढगळ पं० कमा अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुढगळ ५० कद्या तं० ते ज० कटुएं मु० मुमचे बळी वा० तं. ने ज० कादं मि० जढा छे चे० वली. वाटर वे० वळी. २, ए वे भेट छे. - - फरस्या छे ते ० वळी. - हाणं मूत्र २. उद्देसो ३ दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा। चेवळी अ० नथी अंगिकार कर्या ते चवळी. सुहुमा चेव बायरा चेव ॥ ४॥ दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा। भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगल कहेल छे अत्ता चेव अणत्ता चेव ॥ ७॥ ते कहे छे, एक सुक्ष्म पुदगळ ते भाष्याना भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगळ कहेल छे १, बीजां वादर पुदगळ २, (शित १ उज्न २ | ते कहे छे. जीवे परिग्रह शरीरपणे अंगिकार सनिग्ध ३ लुखां ४ ए चार स्पर्श मुक्ष्मने होय काँ ते १, परिग्रह शरीरपणे अंगिकार को १, अने वादर पुदगळने आठ स्पर्श होय २, नथी ते २, ए वे भेद छे. एचे भेद छे. अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुदगळ ५० कया अर्थ-दु० वे मेदे पो० पुदगळ प० कह्या तं० ते ज० कहुं हुं इ० इष्ट चे० वळी अ० तं० ते ज० कहुं हुं व० बंधाणा पा० एक | अनिष्ट चे० वळी. पासे पु० शरीरने फरस्या ते गंध चे० वली दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा। नो० नथी. व० बंधाणा पण पा० पार्थे पु० इट्ठा चेव अणिट्ठा चेव ॥ ८॥ शब्द चे० भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगळ कहेल छे दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा । ते कहे छ, एक इष्ट पुद्गल छे १, वीजा अ- बद्धपासपुट्ठाचेव नोवद्धपासपुट्ठाचेवा५॥ निष्टं पुदगल छे २, ए वे भेदछे. भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगल कहेल छे अर्थ-ए० एम क. कांतभलावर्गादिक ते कहे छे. वद्ध ते बंधाणां घणां शरीरने एक सहित. पासे फरस्या, नाक प्रमुख इंद्रि ग्रहण योग्य एवं कन्ता ॥९॥ पुदगळ १, नोवध ते बंधाणां नथी पण पासे भावार्थ-वेळी वे प्रकारे पुदगळ कहेलं छे फरस्या छे ते काने शब्द संभळाय २, ए भेद ते कहे छे. एक भलावर्णादी सहीत ते कांत इंद्रिने आश्री छे. पुदगळ १, एक भलावादी रहीत ते अांत अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुदगळ प० कया पुदगळ २, ए वे भेद छे. तं. ते ज० कहुं हुं प० समस्थ ग्रह्या ते चे० अर्थ-पि० मिय वळी अ० समस्त ग्रह्या नथी ते चे० वळी. पिया ।। १०॥ दुविहा पोग्गला पन्नत्ता । तं जहा। भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगल कहेल छे परियाइय चेव अपरियाइय चेव ॥६॥ ते कहे छे. इंद्रियोने प्रिय पुदगळ १,इंद्रियोने भावार्थ-वळी वे प्रकारे पुदगल कहेल छे । अमिय पुदगळ २, ए वे भेद छे. ते कहे छे. पर्यायातित ते जे समस्त ग्रह्या कर्म अर्थ-म० इन्द्रिने सुखकारी. पुदगलनी परे १, अपर्यायातित ते समस्त पुद- मगुन्ना॥ ११ ॥ गळ ग्रह्मा नधी २, ए वे भेद छे. भावार्य-बळी चे प्रकारे पुद्गळ कहेल छे अर्थ-दु० वे भेदे पो० पुदगल प० कद्या ते कहे छे, इंद्रियोने मुखकारी १ इंद्रियोने तं. ते ज० कहुं हुं अ० जीवे शरीरे गह्या ते दुखकारी २. -- 1 , . -- अर्थ-र० रस. रस ते (६६) धाणं सूत्र २, उद्देसो ३. अर्ध-म० मनोहर देखतां मनने मियलागे | कातरुप.१, अकांतरुप २, मिय रुप १, अमित मणामा ॥ १२ ॥ रुप २, सुखकारी १, दुखकारी २, मनोजरुप १, भावार्थ-वळी वे,प्रकारे पुदगल कहेल छे अमनोज्ञरुप २, ए सर्वे रुपमा पूर्वनी परे ते कहे छे, मनोहर देखतां मनने प्रिय लागे ते वे भेद जाणवा. अर्थ-ए० एम ग० गन्ध. मनोझ १, देखतां मनने प्रिय न लांगे ते अ- मनोज्ञ २, ए वे भेद छे. एवं गन्धा ॥ [१३-१८० ॥ ४ ॥ अर्थ-दु० वे भेदे स० शब्द प० कया तं० भावार्थ-एम गंध ते एक नासिकाए ग्रयो तेज० कहुंछु अ० जीवे गह्याछे चे० वळी अ० छे १, वीजो गंध नासिकाए ग्रयो नथी २ जीवे नथी ग्रह्या चे० वळी. एक इष्ट गंध १, एक अनिष्ट गंध २, कोतगंय १, अकांत गंध २, प्रिय गंध १, अप्रिय गंध, दुविहा सदा पन्नत्ता । तं जहा। मनोज्ञ गंध १, अमनोज्ञ गंध २, ए सर्वे गंधमा अत्ता चेव अणत्ता चेव ॥१॥ पुर्वनी पेरे वे वे भेद जाणवा. भावार्थ-वे प्रकारे शब्द कहेल छे ते कहेछे एक जीवे ग्रह्या छे १, एक जीवे नथी ग्रहेला रसा ॥ [१९-२४] ॥ ५॥ २, ए वे भेद छे. भावार्थ-एम एक जीभे रस प्रयो अर्थ-ए०, एम इ० इष्ट जा० यावत म० छे १, एक. जीभे रस ग्रह्यो नथी-२, एक इष्ट मनोहर - रस १, एक अनिष्टरस,२, कांतरस १, अका. एवं इट्टा जाव मणामा॥[२-६]॥२॥ तरस २, मियरस १, अमियरस २, मनोरस भावार्थ-एम इष्ट शब्द १, अनिष्ट शब्द २, | भेद जाणवा. १, अमनोज्ञरस २, ए सर्वेमा पूर्वनी पेरे वेने कांत शब्द.१, अकांतशब्द २, प्रिय शब्द. १, अर्थ-फ. फरस. अमिय, शब्द २, सुखकारी.१, दुखकारी २, मनोज्ञ शब्द १, अमनोज्ञ शब्द २, ए सर्वेमां फासा ॥ [२५-३०] ॥६॥ पूर्वनी पेर वे वे भेद जाणवा. भावार्य-एम स्पर्श ते एक स्पर्श इंदिए प्र- अर्थ-दु० वे रु० रुप पं० कह्या तं० तेज ह्यो छे १, एक स्पर्श ग्रह्यो नधी २, एक इष्ट कहुंछ अ० चक्षु ए गह्या चे०,वळी अ० अ- स्पर्श १, एक अनिष्ट स्पर्श २, कांत स्पर्श' १, ग्रहित चे० बळी जा. यावत म. मनोज्ञ. अकांत स्पर्श २, मिय स्पर्श ?, अमिय स्पर्श दुविहारूवा पन्नत्ता। तं जहा । अत्ता पुर्वनी परे वे वे भेद जाणवा. २, मनोज्ञ स्पर्श १, अमनोज स्पर्श २, ए सर्वेमा चेव अणत्ता चेव । जाव मणामा अर्थ-ए० एम ए. एकेकना आ० आ- ॥ [७-१२] ॥३॥ भावार्थ-वे मकारे रुप कहेल छेते कद्देछे, एक एवं एकेके आलावगा भाणियवा ।। चक्षुए ग्रां रुप १, वीजं चक्षुए रुप ग्रहुं नयी भावार्य-एम पूर्वोक्त प्रमाणे गंध स्पर्मना ने २, ए वे भेद छे. एम इष्टरुप १, अनिष्टरूप २, वे भेदले ने एकेकना छ छ आलावा जाणा, . +- लावा भा० जाणवा. -- -- corn . हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. (६७) 'अर्थ-दु० वे भेदे आ० आचार प० क आचार ते तप आचार प्रमुख .२, ए वे या त० ते ज. कहुंछ ना०. ज्ञानाचार चे भेद छे. वळी नो० दर्शनाचार चे० वळी. अर्थ-नो० नोचारित्राचार दु. वे भेदे दुविहे आयारे पन्नत्ते । तं जहा । ५० करो तं० ते ज० कहुं छु त० तपाचार चे० वळी वी० धर्मने विपे वळ फोरव, नाणायारे चेव नोनाणायारे चेव ॥१॥ चेवळी भावार्थ-वे ग्रकारे आचार कहेल छे ते नोचरित्तायारे दुविहे पन्नत्ते।तं जहा। की. कहे छे, काळथी १, विनयथी २, बहु मानथी तवायारे चेव वीरियायारे चेव ।। ४ ।। ३, , उपध्यानथी ४, अर्थ तथा गुरुने गोपवे नहि ५, अक्षर शुद्ध ६, अर्थ शुद्ध ७, अक्षरार्थ शुद्ध भावार्थ-नोचारित्र आचार वे प्रकारे क- ८, ए आठ भेदे ज्ञान आचार१, नोज्ञान आ- हेल छे ते कहे छे. छ अभ्यंतर, छ बाहिर ए चार ते दर्शनाचार २, ए वे भेद छे. वार भेदे तप आचार १, वळ वीर्य धर्म का- अर्थ-नो० दर्शनाचार दु० वे भेदे पं० । र्यमां गोपवे नहीं १, पूर्वोक्त छत्रीस भेदमां उ- फह्यो तं० ते जे० कहुंछु दं० दर्शनाचार चे० द्यम करे २, शक्तिने अनुसारे मन वचन का- वळी नो० चारित्राचार चे० वळी. यानो व्यापार एकाग्रचित्ते प्रयुंजे ३, एत्रण भेदे वीर्याचार २, ए वे भेदछे. नोनाणायारे दुविहे पन्नत्ते। तं जहा। अर्थ-दो० वे प० प्रतिज्ञा प० कही, छे. ॥ दंसणायारे चेव नोदंसणायारे चेव॥२॥ तं० ते ज० कहुं छु स० प्रशस्त भावरुप प० भावार्थ-नोज्ञानआचार वे प्रकारे कहेल | मनपरिणाम चोपाते चे० वळी उ० तपविशेष छे ते कहे छे, शंका नहि १, अन्य मतनी इच्छा प० १२ प्रतिमा साधूने, ११ प्रतिमा श्रावकने नहि २, करणीना फळनो संशय नहि ३, परना चे० वळी. आईवरे मुंझाय नहि ४, स्वधर्म प्रसंशा करे ५, दो पडिमाओ पण्णत्ताओ। तंजहा। धर्मथी पडताने आलंबनदीए ६, स्वधर्मिनी समाहिपडिमा चेव उवहाणपडिमा चेव।। भक्ति करे ७, जैन धर्मने दीपावे ८, ए आठ भेदे दर्शन आचार १, नोदर्शन आचार ते पांच भावार्थ-चे प्रकारे प्रतिमा ते प्रतिज्ञा विशेष समितिने त्रण गुप्ती ए आठ भेदे चारित्र नियमं कहेल छे ते कहेछे. एक समाधि पति- आचार २, ए वे भेद छे. मा ते प्रशस्त (भला) भाव रुप प्रतिमा मन अर्थ-नो० चारित्राचार दु० वे भेदे पं० परिणाम रुप पुद्गल चोखां होय १, वीजी कयो त० ते अ० कहुंछं च० चारित्राचार प्रतिमा १, श्रावकनी अगियार प्रतिमा २,.ए उपध्यान प्रतिमा ते विशेष तप साधुनी धार धे० पळी नो० चारित्राचार चे बळी. के भेद छ नोदसणायारे दुवि हे पन्नत्ते।तं जहाँ। अर्थ-दो वे प० प्रतिमा प० की सं० जो चरित्तायारे चेव नोचरित्तायारे चेव ।।३।। ते ज० कहुं हुं वि० कायममुपनो त्याग भावार्थ-नोदर्शन आचार घे मकारे कहेल। चे० वळी घि० फाउसग करवो ते चे० पळी. ले ते कई छे, चारित्र भाचार १, नोचारित्र। दो पडिमाओ पण्णताओ। तं जहा। -- 3. सर . - - (६८) हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. विवेगपडिमा चेव विओसग्गपडिमा अर्थ-दो० वे १० प्रतिमा प० कही तं० ते चेव ॥२॥ ज० कहुंछं. खु० नानी प्रतिमा चे० वळी मो० मोटी प्रश्रवण प्रतिमा म० द्रव्यथी मोटी चे. भावार्थ-वळी वे प्रकारे प्रतिमा कहेलछे ते वळी मो० मोटी प्रश्रवण पडिमा ते लघुनित कहेछ, विवेक मनिमा ते कपाय प्रमुख अयो- राखवी. ग्य वस्तुनो त्याग करवो १, व्युत्सर्ग प्रतिमा दो पडिमाओ पन्नत्ताओ । तं ज. ते काउसगढं कर २, ए वे भेद छे, अर्थ-दो वे प० प्रतिमा प० कही तं० हा। खुड्डिया चेव मोयपडिमा महलि. ते ज० कहुं छै भ० भद्रा प्रतिमा चेवळी या चेव मोयपडिमा ॥ ५॥ सु० सुभद्रा प्रतिमा च० वळी. भावार्थ-वळी चे प्रकारे प्रतिमा कहेलछे ते दो पडिमाओ पण्णत्ताओ । तं ज- मोकप्रश्रवण प्रतिमा चार प्रकारे, द्रव्यथी मळ कहेछे, नानी मोक प्रतिमाते मात्रु नकरे१, मोटी हा । भद्दा चेव सुभद्दा चेव ॥३॥ मात्रु करे नहीं १, क्षेत्रयी ग्रामादीक बाहीर भावार्थ-वळी वे प्रकारे प्रतिमा कहेलछे ते रहे २, काळधी शरद तथा ग्रिष्म काळे आहार कहेछे, भद्रा गतिमा ते पूर्वादि दिशाए चार पो- करीने आदरे तो चौद् भक्त ते छ दिवसे पूरी होर लगी काउसग करवो ( आ सिवाय वी- थाय अने आहार कर्या विना आदरे तो शोल जो प्रकार शास्त्रमा नथी ) १, सुभद्रा प्रतिमा भक्त ते सात दिवसे पुरी थाय ३, भावधी पण एमन देखायछे. वे दिवसे पुरी धायछे, देवादिकना उपसर्ग सहन करे४, ए नानी मोटी परीसह खमे २, ए वे भेदछे, पण एमज, पण एटलो विशेप जे आहार अर्थ-दो० वे प० प्रतिमा प० कही तं० करीने आदरे तो सोळ भक्ते पुरी धाय १, अने आहार कर्याविना आदरे तो अहार भक्ते पुरी ते ज० कहुं हुं म० महाभद्र प्रतिमा चे० वळी सर्वधी थाय २, ए वे भेद छे. भद्र अर्थ-दो० वे भेदे प० प्रतिज्ञा पं० कही दो पडिमाओ पण्णत्ताओ । तं ज -० ते ज० कहुंछं ज० जब म० मध्यनी हा महाभद्दा चेव सबओभद्दा चेव परे चै० वळी च० चन्द्रमांनी परे वधती पर ॥४॥ ती फला तपनी व० वज मध्यनी पर चेक वळी च० चन्द्र पतिमा. भावार्य-वळी ये प्रकारे प्रतिमा श्री वीत्त- दो पडिमाओ पन्नत्ताओ । तं ज. राग देवे कहेलछे ते कहे छे, महाभद्र प्रतिमा पण एमज, पण एटलो विशेपके एकेको दिशाए हा । जवमझा चेव चन्दपडिमा वर एकेकी अहोरात्रीनो काउसग करे एम चार रमज्झा चेव चन्दपडिमा ॥ ६॥ दिशानी चार अहो (दिवस) रात्रीतुं मान भावार्थ-वळी वे प्रकारे प्रतिमा कदल भाग १, सर्वतोभद्र प्रतिमा ते दशे दिशाए ते कडूछे, यव मध्य चंद्र प्रतिमा ते जब धानना एकेकी अहो रात्रीनो काउसग करे एटले दश सरखो मध्य भाग छ जेहनी अने चंद्रमा अहो रात्री मान जाणवू २, ए वे भेटले. पेरे वधती घटती कळा जेम शुक्रपतना . स० चे० वळी. . - । हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. (६९) - - - । -- -- दिवसे एक कोळीयो आहार करे, एम दिन अर्थ-दो० वेने उ० मरण रुप पं० कया दिन प्रत्ये अकेक कोळीयो वधारतां पुनमे | तं० ते ज० कहुंछु ने० नारकीर्नु मरण चे० पंदर कोळीया आहार करे, पछी वद पडवाने वळी भ० भवनपतीनुं मरण चे० वळी. दिवंसे पंदर कोळीया, एम दिन दिन प्रत्ये दोण्हं उच्चट्टणा पण्णत्ता । तं जहा। एकेक कोलीयो ओछो करतां अमावास्याए एक नेरइयाणं चेव भवणवासीणं चेवं ॥२॥ कोळीयो लीए, ए यव मध्य चंद्र प्रतिमा तप १, अंधारी पड़वे पंदर कोळीया पछी दिन दिन भावार्थ-वे प्रकारना जीवने उतनाते नि- प्रत्ये एकेक ओछो करतां अमावास्याए एक कळवू कहे ठ छे ते कहेछे, नारकीने उद्वर्तना १, कोळीयो, सुद पडवाने दिवसे एक कोळीयो, । भवनपति देवताने उद्वर्तना २, ए वे भेद छे. एम एकेक वधतां पुनमे पंदर कोळीया ए अर्थ-दो० वेने च० चवन पं० कयुं तं० रीते तप करवो ते वज्र मध्य प्रतिमा २, उस्न ते ज०कहुंछु जो० ज्योतिपीनुं चवन चे० वळी पाणी पीये, थाय तो चौविहार तथा तेविहार । वे० वेमानीक देवतुं चे० वळी. करे, वज्र सरिखं मध्य छे जेहनुं ते वज्र मध्य दोहं चयणे पण्णत्ते । तं जहा । प्रतिमा जाणवी २, ए वे भेद छे. जोइसियाणं चेव वेमाणियाणं चेव ॥३।। अर्थ-दु० वे भेदे सा० सामायय पं० कही भावार्थ-चे प्रकारना जीवने चवन ते मरण तं० ते ज० कहुंछु अ० ग्रहस्थनुं सामायक कहेल छे ते कहे छे, चंद्र सूर्यादिक जोतिपी देवताने चवन १, वैमानिक देवताने चवन २, दुविहे सामाइये पण्णत्ते । तं जहा ।। ए वे भेद छे. अगारसामाइये चेव अणगारसामाइये। अर्थ-दो० वेने ग० गर्भ व० उपजकुं छे चेव ॥ पं० कयु तं० ते ज० कहुंछ म० मनुष्यने गर्ने भावार्थ-वे प्रकारे सामायक श्री वीतराग । उपजकुं छे चे० वळी प० पंचेन्द्री ति० तिर्यंच देवे कहेल छे ते कहेछे, ग्रहस्थनुं सामायक देश । जो० जोनियाने गर्भे उपजवू चे० वळी. विरति रुप श्रावकने १, साधुन सामायक सर्व : दोण्हं गम्भवक्वन्ती पन्नत्ता। तं ज- विरति रुप २, ए वे भेद छे. हा। मणुस्साणं चेव पश्चिन्दियतिरिक्ख- अर्थ-दो० वे भेदे उ० उपजवू पं० कां । जोणियाणं चेव ॥ ४॥ तं० ते ज० कहुंछ दे० देवतार्नु चे० वळी । ने० नारकीन चे० वळी. भावार्थ-चे प्रकारना जीवने गर्भमां उपज. दोण्हं उववाए पन्नत्ते । तं जहा वायूँ कहेल छे ते कहे छे, मनुष्यमा गर्भपणे । उपजे १, पचेंद्रि तिर्यच योनिना जीव गर्भपणे देवाणं चेव नेरइयाणं चेव ॥१॥ उपजे २, ए वे भेद छे. भावार्थ-जेहने गर्भ स्थिति नधी ते वे प्रकारना अर्थ-दो० वे ग० गर्भमां था. यहां आ० जीवने उपपात ते उपज कहेल छ कहे छे. आहार करेछे पं० एम कई तं० ते ज० कई- चार जातिना देवताने उपजवानुं १, सात छ म० मनुष्यने चे० वळी प० पचेन्द्रि ति० नारकीने उपनवा, २, ए वे भेद छे, तिर्यंचने चे० बळी. . - -- ग 1 प्र (७०) हाणं मूत्र २. उसओ दोण्हं गमत्थाणं आहारे पन्नत्ते। अर्ध- मारणांतिकादिक समुदघातछे. तं जहा । मणुस्साणं चेव पश्चिन्दिय समुग्घाए ॥ १०॥ तिरिक्खजोणियाणं चेव ॥ ५ ॥ भावार्थ-एम मारणंतिकादि समुद्घात छ, भावार्थ-वेने गर्भमां थकांज आहार कहेल अर्थ-का० काळनी अवस्थाछे मरणनी. छे ते कहेछे, मनुष्यने गर्भमा रह्या आहार छे, कालसंजोगे ॥ ११ ॥ माता आहार करे ते आहार लीये छे १, पचेंद्रि भावार्थ-एम काळ ते मरणनी अवस्थाछे, तिर्यंचने पण गर्भमा रह्या आहार छे २, ए वे अर्थ-अ० गर्भमांथी निसर. भेद छे. अर्थ-दो वेने ग० गर्भमां थका ७० वृद्धि आयाई ॥ १२॥ पं० कहीछे तं० ते ज० कहुंएं म० मनुप्यने भावार्थ-एम गर्भ मांहीथी निसरवू ते जन्म. चे० वळी प० पचेन्द्रि ति० तिर्यंचयोनिने अर्थ-म० प्राणत्याग. चे० वळी. मरणे ॥ १३ ॥ दोण्हं गम्भत्थाणं चुड्डी पण्णत्ता । भावार्थ-एम मरण ते प्राण त्याग ए वे तं जहा । मणुस्साणं चेव पश्चिन्दिय- बोल गर्भमा छे. तिरिक्खजाणेयाणं चेव ॥ ६ ॥ अर्थ-दो० वने छ० चामडी प० अने पर्व भावार्थ-चेने गर्भमां थकांज वृद्धि कहेल नी सांधीना बंधन पं० कह्याछे त० ते ज० छे ते कहेछे, मनुष्य गर्भमा रह्यां वृद्धि पामे छे । कहुंछु म० यनुप्यने चे० वळी पं० पचेन्द्रि १, पचेंद्रि तिर्यच पण गर्भमा रह्यां वृद्धि पामे ति० तिर्यंच जोनीने चे० वळी. छे २, ए वे भेदछे. दोण्हं छविपचा पन्नत्ता । तं जहा । अर्थ-एम०नि० निहार नथी. मणुस्साणं चेव पश्चिन्दियतिरिक्खजो- एवं निव्वुड्डी ॥७॥ णियाणं चेव ॥ १४ ॥ भावार्थ-एम गर्भमां निवृद्धि ते निहार भावार्य-येने छवि अने पर्व ते संधिना - नधी, कधुनिति ( मात्रु) प्रमुख नधी. धन कहेल छे ते कहे छे, मनुष्यने १, पंचेंद्रि अर्थ-वि० विकुर्वणा छे. तिर्यचने २, ए वे भेट छे. विउवणा ॥ ८॥ अर्य-दो० वेन मु० वीर्य सो० रुधिरयी भावार्थ-एम चिकुर्वणा विक्रय लब्धिवंत. सं० उपना प० कया तं० ते ज. कहुंडूं म० अर्थ-ग० गर्भमांथो प० बहार गमन करे. यनुष्य चे० पळी ५० पचेन्द्रि ति० तिर्यंच योनि चे० बळी. गइपरियाए ।। ९॥ भावार्थ-पम गर्भमां हीरगमन करे, प्रदेश दो सुक्कमोणियसंभवा पण्णता । तं याहीर काही संग्राम करे, एहवे समे मरण पामे जहा । मणुस्मा चेव पचिन्दियतिरि- तो नरके जाय, एम श्रीभगवती मृत्रमाही कधुळे, क्खजोणिया चेव ॥ १५ ॥ -- - -- --- . -- -- . H 1 हाणं, मूत्र २. उद्देसो ३. (७१) भावार्थ-वे शुक्र ते पितान विर्य अने मा- | (अर्थात् मरीने वीजा अवतारमा वीजी गतिमा ताना रुधीरथी उपजे छे ते कहेछे, मनुष्य १, उपजे) ते कहेछे, देवता मरी फरी देवता थाय पचेंद्रि तिर्यंच २, ए वे पितानुं वीर्य अने मा. नहीं १, नारकी मरी फरी नारकी थाय तानुं रुधीर विना उपजे नहीं. नहीं २, ए चे भेद छे. अर्थ-दु० वे ठि० स्थिति पर कही तं० ते अर्थ-दु० वे भेदे आ० आयुष पं० करा ज० कहुंछ का० कायमा ठि० रहे, चे० व छे तं० ते ज० कहुंछु अ० काळ प्रधान आ ळी, भ० भवने विपे ठि० हहेवू चे० वळी. उषु चे. वळी भ० भव प्रधान आउयु 'चे० वळी. दुविहा ठिई पण्णत्ता।तं जहा। का- यहिई चेव भवट्टिई चेव ॥ १६ ॥ दुविहे आउए पण्णत्ते । तं जहा । चेव अद्धाउए भावार्थ-पृथ्विकाय प्रमुख छकायमा रहेढुं भवाउए चेव ॥ १९ ॥ ते स्थिति वे प्रकारे कहेल छे ते कहेछे, मरिने भावार्थ-वे प्रकारे आयुष्य कहेल्छे ते कहे तेनी तेज कायमां उत्पन्न थाय ते काय स्थिति | छे, काळ प्रधान आउखा कर्म १, भव प्रधान १, भवने विपे रहे, भव करवा ते भव स्थिति आउखा कर्म २, ए वे भेद छे. २, ए वे भेद छे. अर्थ-दो० वेने अॅ काळ प्रधान आउषु अर्थ-दो० वेने का० काय ठि० स्थिति पं० कयुं तं० ते ज० कहुंछ म० मनुष्यने चे० प० कही तं० ते ज० कहुंछु म० मनुष्यने चे० वळी पं० पचेन्द्री ति० तिर्यंच योनीने चे० वळी प० पचेन्द्रि ति० तिर्यंच योनीने चे० वळी. वली. । दोण्हं अद्धाउए पण्णत्ते । तं जहा । दोण्हं कायट्टिई पण्णत्ता । तं जहा मणुस्साणं चेव पश्चिन्दियतिरिक्खजो- मणुस्साणं चेव पश्चिन्दियतिरिक्खजो- णियाणं चेव ॥ २० ॥ णियाणं चेव ॥ १७॥ भावार्थ-चेने काळ प्रधान आयुष्य कहेल भावार्थ-वेने काय स्थिति कही छे ते को छे ते कहे छे, मनुष्यने १, पचेंद्रि तिर्यंचने छे, मनुष्य मरिने सात आठ भव सुधी माणस (एकेंद्रि तिर्यंच एहमां आव्या)२, ए वे भेदछे. थाय १, पचेंद्रि तिर्यच मरिने सात आठ भव अर्थ-दो० वेने भ० भव प्रधान आउ' सुधी पचेंद्रि तिच थाय २, ए वे भेद छे. पं० कां तं० ते ज० कहुंछ दे० देवताने चे० अर्थ-दो० येने भ० भव ठि० स्थिति पं० वळी ने नारकीने चे० वली. कही तं० ते ज० कहुंछ दे० देवताने चे० वळी दोण्हं भवाउए पण्णत्ते । तं जहा । ने० नारकीने चे० वळी. देवाणं चेव नेरझ्याणं चेव ॥ २१ ॥ दोण्हं भवट्टिई पण्णत्ता । तं जहा । भावार्थ-वेने भव प्रधान आयुप्य कहेलछे देवाणं चेव नेरइयाणं चेव ॥१८॥ ते कहें छे देवताने? नारकीने २ ए वे भेदछे. भावार्थ-वेने भव स्थिति ते एकज भव करे अर्थ-दु० वे भेदे क० कर्म प० कयां तं. - 1 - -- , चेव ॥ १॥ .- (७२) हाणं. मूत्र २. उद्देसो ३. ते ज० कहुंछु प० कर्मना दलते चे० वळी । एकथी ना० नथी व० वधता आ० लांबपले अ० कर्मना रस भोगवीएते चे० वळी. वि० पहोलपणे सं० आकार प० परिघि तं० दुविहे कम्मे पण्णत्ते। तं जहा। पदे- ते ज० कहुंछु भ० भरत चे० वळी ए० ए सकम्मे चेव अणुभावकम्मे चेव ॥२२॥ रवत चे० वळी. भावार्थ-चे प्रकारे कर्म कहेलछे ते कहेछे, जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्सं पवयस्स प्रदेश कर्म ते कर्मनां पुदगल १, अनुभाव कर्म जे उत्तरदाहिणेणं दो वासा पणत्ता बहु- कर्मनो रस भोगवीये ते २, ए वे भेद छे, समउल्ला अविसेसमणाणत्ता अन्नमनं अर्थ-दो० वे थानके अ० जेवू वाध्युं छे : नाइवट्टन्ति आयामविक्खम्भसंटाणप- तेहबुं पा० भोगवे तं० ते ज० कहुंछं दे० दे- रिणाहेणं । तं जहा। भरहे चेव एवए वता चे० वळी ने० नारकीपणे चे० वळी. दो अहाउयं पालेन्ति । तं जहा । भावार्थ-परिपूर्ण चंद्रमंडळने आकारे एक देवा चेव नेरइया चेव ॥ २३ ॥ लाख जोजननो लांवो पहोलो जंबुद्वीप छे भावार्थ-वे जणे जेवू आयुष्य वांध्युं छे, तेहमा एक लाख जोजननो उंचो मेरुपर्वत नेहबुंज भोगवे एटले निकाचित आयुष्यना धणी छे, तेहना उत्तरने वे पासे अने दक्षिण- अधुरे आउखे मरे नहीं ते कहेछे, देवता पूर्ण ' ना वे पासे वे वर्ष क्षेत्र कहेल छे. आउद्धं पाळे १, नारकी पण पूर्ण आउऱ्या ' ते प्रमाणथी घणा सरखां छे, काइपण एके- पाळे २, ए वे भेद छे. कथी विशेपाधीक नथी, तेमन पर्वत, नगर,न- अर्थ-दो० वेने आ० आउ' सं० सोपक्र- दीनो विशेप नथी. आरा प्रमुखना भावे करी मी पं० कयुं तं० ते ज० कहुंछ म० मनुप्यने । एकेकयी वधता नथी. लांबपणे, पहोळपणे, चे० वळी प० पंचेन्द्रि नि० तिर्यंच योनियाने संस्थान, आकार चढाव्या धनुप्यने आकारे, चे० वळी. परिघि इत्यादिके करी सरखाछे. पांचसेछविस जोजनने छकळा विस्तारपणे छे. जोजननो दोण्हं आउयसंवट्टए पणते । तं ज- ' एकवीसमो भाग ते कळा जाणवी. ते वे क्षेत्र हा । मणुस्साणं चेव पश्चिन्दियतिरि- ना नाम कहेछे, एक भरतक्षेत्र १, चीजें एर- क्वजोणियाणं चेव ॥ २४ ॥ वतक्षेत्र २, ए वे सरखां छे ए वे भेद छे. भावार्थ-वेने सोपकमि ते ढीलु आयुप्य कहेलं अर्थ-ए० एह ए० रीते अ० मानप्रमाण छे ते कहे छे, मनुप्यने १, एकॅद्रियी पचेंद्रि भाव सर्व एमज जाणवा ने० बळी बने क्षेत्र मुधी तिर्यचने २, ए वे भेद छे. सरखां छे हे. हमवंत क्षेत्र चे० वळी है। अर्थ-ज० जंबुद्वीप नामना दी० द्वीपमां हेग्णवय क्षेत्र चे० वळी, म० मरु ५० पर्वतने उ० उत्तर दा० दक्षिण एवं गाणं आमिलावणं नेयत्वं हम- ने पासे दो० व वा० वर्ष क्षेत्र ५० कगाछे वा चेव हेरगणवा चेव ॥ २॥ व० घणु स० सरवाई अ० विशेष अधिका भावार्थ-एगीने मान प्रमाण सर्व भाव ए- नयी स० समानछे एक एकी य० एक. , मज जाणवां, तेम वैये क्षेत्र सरखां छ कहे छ. , - --- - - - 1" 1 " 1 - हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. (७३) हेमवंतक्षेत्र दक्षीणदिशाए १, एरणवंत क्षेत्र बहुसमउल्लाओ अविसेसाओ जाव दे- उत्तरदिशाए २, ए वे क्षेत्र सरखां छे. वकुरा चेव उत्तरकुरा चेव ॥ ५॥ अर्थ-ह० हरिवास चे० वळी र० रम्यक भावार्थ-जंबुद्वीपना मेरुपर्वतथी उत्तर द- क्षेत्र चे० वळी. क्षिणदिशाए वे कुरु कहेल छे ते मान प्रमाणे हरिखासे चेव रम्मयवासे चेव ॥३॥ करी घणा सरखा छे, काइपण विशेपाधिक भावार्थ-तेमज हरिवर्प दक्षिणदिशाए १, नथी, तेह वे कुरुनां नाम कहे छे, देवकुरु द- रम्यकवपक्षेत्र उत्तरदिशाए २, ए वे क्षेत्र क्षिणदिशाए १, उत्तर कुरु उत्तरदिशाए २, सरखां छे. ए वे भेद छे. अर्थ-जं. जंबुद्धीप नामना द्वीपमां म० अर्थ-त० तिहांण० वळी दो० वे म० मोटा मेरु प० पर्वतथी पु० पुर्वदिशे प० पश्चिमदिशे म० मोटा विस्तारवंत म० मोटा दु० वृक्ष प० दो० वे खे० क्षेत्र प० कह्या व० घणे स० कह्या व० वहु स० सरखा उ० मान प्रमाणे सरखे प्रमाणे छे अ० विशेप नथी जा० या- अ० विशेष नथी स० किसो फेर नथी अ० वत पु० पुर्वविदेह क्षेत्र चे० वळी अ० पश्चिम मांहोमांहि ना० नथी वधता ओछा आ० लां- वपणे वि० पोहोळपणे उ० उचपणे सं० आ- विदेह चे० वळी. कारे प० परिधिपणे तं० ते ज० कहुंछ कू० जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स कुडसामली वृक्ष चे० वळी ज० जंबूटन चे. पुरथिमपञ्चत्थिमेणं दो खेत्ता पण्णत्ता वळी मु० सुदर्शन नामे. बहुसमउल्ला अविसेसा जाव पुत्वविदेहे तत्थ णं दो महइमहालया महा- चेव अवरविदेहे चेव ॥ ४॥ दुमा पण्णत्ता बहुसमउल्ला अविसेसम- भावार्थ-जंयुध्वीपना मेरुपर्वतथी पूर्व पश्चिमे णाणत्ता अण्णमण्णं नाइवन्ति आया- वे क्षेत्र घणाज सरखां प्रमाणे छे, काइपण वि. मविश्वम्भुच्चत्तोवेहसंठाणपरिणाहेणं । तं पाधीक नथी ते वे क्षेत्रनां नाम कहे छे, पूर्व जहा । कूडसामली चेव जम्बू चेव सु- महाविदेहक्षेत्र १, पश्चिममहाविदेहक्षेत्र २, ए वे भेद छे. दंसणा॥६॥ अर्थ-जंबुध्वीप नामना दी० द्वीपमा म० भावार्थ-तिहां देवकुरु उत्तरकुरु माही मेरु प० पर्वतने उ० उत्तर दा० दक्षिणदिशे मोटा महा तेजवंत रमणीक शोभायमान म- दो० वे कु० कुरुक्षेत्र प० कन्या २० बहु स० धान (उत्तम) ये वृक्ष प्रमाणे घणां सरखा सरखा उ० मान प्रमाणे अ० कोइ विशेष छे, कांदपण विशेषाधिक नथी, लांबा, पहोला, नधी जा० यावत दे० देवकुरु रे० वळी उ० विस्तार, उंचा धरतीमां, आकार, परथिए स- उत्तर कुरु चे० वळी. रखा छे. माहोमांही एकेकयी वयता नधी. लां- जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पदयस्म पणे, पहोलपणे, उंचपणे, उंडापणे, आकारे, परिधि एटला प्रमाणे सरखा छे. रत्नमय छ, उत्तरदाहिणेणं दो कुराओ पण्णत्ताओ एनुं मान चीजी जन्याएथी जाणवू. ते वे वृक्ष- --- - म ~ -- - - , है 1 4 -- । -- - -- ( ७४ ) हाणं सुत्र २. उद्देसो. नां नाम कहे छे, एक कुडशामलक्ष ते शि- उत्तरदाहिणेणं दो वासहरपवया पण्णता खरने आकारे छे १, वीजुं जंवूक्ष तेनुं वीजुं बहुसमउल्ला अविसेसमणाणत्ता अण्ण- नाम सुदर्शन ते जोवा योग्य छे. मण्णं नाइवठ्ठन्तिआयामविक्खम्भुञ्चत्तो अर्थ-त० तिहां ण० वळी दो० वे दे० देवता म० मोटी रुधिना धणी जा० यावत वेहसंठाणपरिणाहेणं । तं जहा । चुल- म० मोटा सो० मुखना धणी प० पल्योपम हिमवन्ते चेव सिहरी चेव ॥ ८॥ हि० आउपांवत प० वसे छे तं० ते ज० क भावार्थ-जंबुद्रीपे मेरु पर्वतथी उत्तर अने हुंछ ग० सुवर्णकुमारनी जातिना चे० वळी दक्षिण दिशाए वे वर्षधर (क्षेत्रनी मर्यादा वे. वेणुदेवनामे अ० अनाढिनामे चे० वळी करे ते) पर्वत कहेल छे ते वे पर्वत घणा स- ज० जंबुद्वीपना स्वामी छे. रखा छे, विशेष नथी, भेद नथी, एकेकथी तत्थ णं दो देवा महिड्डिया जाव वधता नथी, नहाना नथी, लावपणे, पहोल- महासोक्खा पलिओवमहिइया परिव- पणे, उंचपणे, उंडपणे, आकारे, परिधि एटले प्रकारे सरखा छे, तेहनां नाम कहे छे, भरत सन्ति । ते जहा । गरुले चेव वेणुदेवे | क्षेत्रथी उत्तर दिशाए सो जोजननो उंचो नानो अणादिए चेव जम्बुद्दीवाहिबई ॥७॥ हिमवंत पर्वत १, इरवत क्षेत्रथी आतर्फ शि- खरी पर्वत २, ए वे भेद छे. भावार्थ-ते वृक्षने विपे वे देवता म्होटी रुधिना धणी यावत् मोटा मुखना धणी एक अर्थ-ए० एम म० महा हिमवंत चे० व- पल्योपमना आउखानी स्थितिवाळा मुवर्ण- ली रु० रुपोपर्वत चे० वळी कुमारनी जातिनां रहछे, ते व देवतानां नाम एवं महाहिमवन्ते चेव रुप्पी चेव ॥९॥ कहे छे. एक गरुलदेव तेनुं वीचं नाम वेणुं भावार्थ-एम मेरुथी आ तर्फ महा हिमवंत देवछे १, वीजो अणाढीय नामे देव २, ए वे देव जंबुद्धीपना अधिष्ठाता ते मालीक छे, १, मेरुथी पेली तर्फ रुपी पर्वत २, अर्थ-ए० एम नि० निपटपर्वत चे० वली अर्थ-ज० जम्बु नामना दि० द्वीपमा म० मेरु प० पर्वनने ३० उत्तर दा० दक्षिणदिशे नी० नीलवंतपर्वत चे० वळी. टो० ये वा० वर्षधर प० पर्वत ५० कह्या व० एवं निसहे चेव नीलवन्ते चेव ॥१०॥ धणा स० सरखा ३० मानप्रमाणे अ० वि- भावार्थ-एम मेरुथी दक्षिणे निषध पर्वत शेप नयी स० भेट नर्थी अ० माहोमांही ना० १, मेस्थी उत्तरे नीलबंन पर्वत २, ए चे वे अधिक ओछा नथी आ० लांबपणे वि० पी- पर्वन सरखा है. कपणे १० उंचपणे सं० आकार प० परिध- अर्थ-ज. जंबुद्वीप नामना दी० दीपे म० पर्वत चे० वळी सि. सिखरीपर्वन ० मरु प० पर्वती उ० उत्तर दा० दक्षिणे २० हमवंतक्षेत्र ए० एरणवंतक्षेत्रने विषे दो० वे ३० वाटलावताहपर्वत प० कया व० यणा जम्बुद्दीवे दीये मन्दरस्म पदयस्स म० सरखा ३० मान प्रमाणे अ० विशेष नयी वळी. ..
---- हाणं सूत्र २. उद्देसों (७५) - 5 स० भेद नथी जा० यावत स० शब्दापाती | व० धणा स० सरखा उ० समान छे जा० चे० वळी वि० विकटापाती चे० वळी. यावत ग० गंधापती हरिवर्षमां चे० वळी मा० माळवंत पर्याय चे० वळी । जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स उत्तरदाहिणेणं हेमवएरन्नवएसु वासेसु जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स दो वट्टवेयड्डपवया पन्नत्ता वहुसमउ- उत्तरदाहिणेणं हरिवरिसरम्मएसु वासे- ला अविसेसमणाणत्ता जाव सदावई सुदो वट्टवेयड्डपव्या पन्नता बहुसमउ- चेव वियडावई चेव ॥ ११ ॥ ल्ला जाव गन्धावई चेव मालवन्तपरि- भावार्थ-जंबुद्वीपे मेरु पर्वतथी दक्षिण दि- याए चेव ।। १३ ।। शाए हेमवंत क्षेत्र अने उत्तर दिशाए एरणवंत भावार्थ-जंबुद्वीपे मेरु पर्वतथी दक्षिणे ह- क्षेत्र छे, ए वेने विपे वेतृत वाटला वैताढ्य प- रिवर्प क्षेत्र अने उत्तरे रम्यक वर्ष क्षेत्र छे. वंत पालाने आकारे कहेल छे, ते घणा सरखा तिहां वे वृत वैताढय पर्वत कहेल छे. घणा छ, विशेष भेद नथी. ते वेनां नाम कहे छे, | सरिखा वरावर छे, ते वे पर्वतनां नाम कहेछे शब्दा पाती हेमवंतमा १, विकटापाती एरण्य- हरिवर्प क्षेत्रमा गंधापाती छे १, रम्यक वर्ष वंतमां छे २. क्षेत्रमा मालवंत पर्वत छे. अर्थ-त० तिहांण० वळी दो वेदे० देवता अर्थ-त. तिहां ण० वळी दो० वे दे० दे- म० मोटी रुद्धिवंत जा. यावत प० पल्योपम / वता म० मोटी रुधिना धणी जा० यावत ५० आउपाए प० रेहेछे तं० ते ज० कहुंछ सा० पल्योपमनी हि० स्थितिना प० बसेछे तं० ते खातिनाम चे० वळी प० प्रभासनामे चे० ज० कहुंठं अ० अरुण नामे चे० वळी प. वळी. पद्मनामे चे० वळी. तत्थ णं दो देवा माहड्डिया जाव तत्य णं दो देवा महिड्डिया जाव प- पलिओवविइया परिखसन्ति । ते जहा। लिओवमट्ठिइया परिखसन्ति । तं जहा साई चेव पभासे चेव ॥ १२ ॥ । अरुणे चेव पउमे चेव ।। १ ।। भावार्थ-तिहां घ देवता म्होटी रुद्धिना भावार्थ-तिहां वे देवता म्होटी रुद्धिना धणी, पल्यापम आउखाना धणो रहे छे. धणी पल्योपमनी स्थितिवाळा वसे छे, तिहा तिहां सेहनां भवन छे, ते वे देवतानां नाम | तेहनां भवन-वास छे ते ये देवतानां नाम क- कहे छ. एक स्वाति नामे देवता १, बीजी हे छे, एक अरुण नामे देवता १, बीजो पन्न प्रभासं नामे देवता २, एघे भेद छे. नामे देवता २, ए ये भेद छे. मई-ज० जम्बुद्वीप नामना दी. द्वीपे । अर्थ-जजम्बुद्वीप नामना दी द्वीपे म० म० मेरु प० पर्वतयो उ० उत्तर दा० दक्षिण ! मेरु १० पर्वतधी दा दक्षिण दिने दे. देव पर दिशे ६० हरि वर्ष क्षेत्र र० रम्यक वा क्षेत्रे कुरुधकी पु० पुर्वने पासे अ० पश्चिमने पासे दो० च व० वाटला वेदनाहय पर्वत पकाए. इहां आ० घोडाना ख० खंध स० आदि 1 , न 1 । 1 t - 1 । ( ७६ ) हाणं मून २. उद्देसो ३. नीचा पछी उंचा सरिखा अ० अर्थ चं० चंद्र णं आसक्वन्धगसरिसा अड्ढचन्दसंग- सं० आकारे सं० रह्या दो० वे ३० वखारा प० णसंठिया दो वक्खारपवया पण्णत्ता पर्वत प० कया छे व० घणु स० सरख जा० यावत सो० सौमनस वि० विद्युत्मभ बहुसमउल्ला जाव गन्धमायणे चेव मा. चे० वकी लवन्ते चेव ॥ १६॥ जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स भावार्थ-जंबुद्वीप मेरु पर्वतथी उत्तरे अने दाहिणेणं देवकुराए पुवावरपासे एत्थ उत्तर कुरुनी पूर्व पश्चिमनी पासे तिहां घोडा. ना स्वंद सरखा अर्ध चंद्राकार तथा गजदं. णं आसक्वन्धगसरिसा अड्डचन्दसं- ताकारे वेवखारा पर्वत कहेल छे, ते वे घणा ठाणमंठिया दो वक्रवारपवया पन्नत्ता सरखा यावत् वरावर छे, ते बेनां नाम कहेछे, पश्चिमनी पासे गंधमादन १, पूर्वनी पासे मा- बहुसमउल्ला जाव सोमणसे विजुप्पभे लवंत २, ए वे भेद छे. वेव !॥ १५॥ अर्थ-जम्बुद्वीप नामना दी द्वीपे म० मेर भावार्थ-जंबुद्दीपना मेरु पर्वतथी दक्षिण प० पर्वतथी उ० उत्तर दा० दक्षिणे दो० वे दिशाए अने देवकुरुथी पुर्व पश्चिमनी पासे | दी० लांवा वे० वैताढय प० पर्वत प० कया तिहां घोडाना सबंध सरिखा आढी नीचा, व० धणा स० समान जा० यावत भा० भरत छेहडे उंचा, निपधनी पासे चारसो जोजन क्षेत्रमा चे० धनी दी० दीर्थ वे० वैनाढ्य ५० उंचा, मेरुनी पासे पांचसे जोजन उंचा, अर्ध पर्वत ए० एरवतमांचे० बळी दी० दीर्घवैताहय चंद्राकार संस्थित ( रहेला) वेवखारा पर्वत जम्बुद्दीके दीवे मन्दरस्स पवयस्म छे ने देवकुरुने अर्ध चंद्राकारे करेल छे तेथी बेवखारा पर्वत कहेल छे, ते वे घणा सरिखा उत्तरदाहिणे दो दीहवेयड्ढपत्वया प- यावत् बराबर छे, ने वेनां नाम कहे ले, एक नत्ता बहुसर पडला जाव भारहे चेव सोमनस १, बीजो विद्युत्प्रभ २, ए वे भेदले. दीहवेयड्ड एरा वए चेव दीहवेयड्डे||१७।। अर्थ-जम्बुद्वीप नामना ढो० द्वीप म० मेरु प० पर्वतने उ० उत्तरे उ० उत्तर कुरुक्षेत्रने भावार्थ-जम्बु दीपना नामना द्वीपे मेरु प- पासे पु० पुर्व पश्चिमने पासे ए० इहां आ० तथी उत्तर दक्षिण चे लांया वताहय पर्वत अपना खं० पंच स० सरिपा अ० अर्थ च० कया, घणा समान भग्नक्षेत्रमा नेमन एवम्तक्षेत्र चन्द्रने सं० आकारे सं० रह्या दो० वे व० व- ए धनेमां दीर्य वैतादृय पर्वत कया. पाग प० पर्वत प० कया छे व० घणा स० अर्थ-माभरतना ण० वळी दी० दोष सरखा छे जा० यावत गं० गन्धमादन नामे तान्यमा दो० वे गु० गुफा ५० कही ) पश्चिम च० वळो मा० मालवंत पूर्व चे० बळी व० बहु न० समा सरोयी छे, ० विशेष नयी स० भेट नयी ग० माहोमांही ना० ए. जम्बुढीव दीवे मन्दरस्म पवयम्म यो धो नया या लांरपणे वि० पहो. उतरेणं उत्तरकुगए पुबावरे पामे एत्य लपण ० उंचपणे मं० आकार प० परिप . वे .
- नटमाल चे० वळी । , - बे - हाणं सूत्र २: उद्देसो ३. (७७) त ते ज० कहुंछु ति० तिमिस गुफा चे. जा० यावत क० कृतमाल चे० वळी न० वळी खं० खंड प्रपात गुफा चे० वळी भारहे णं दीहवेयड्ढे दो गुहाओ प- एरावए णं दीहवेयड्ढे दो गुहाओप- ण्णत्ताओबहुसमउल्लाओ अविसेसमणा- पणत्ताओ जाव कयमालए चेव नट्ट- णत्ताओ अन्नमन्नं नाइवन्ति आयाम- मालए चेव ॥ २० ॥ विक्खम्भुच्चत्तसंठाणपरिणाहेणं । तं ज भावार्थ-एमज एरवतक्षेत्रमा पण दीर्घ हा । तिमिसगुहा चेव खण्डप्पवायगु- वैताढ्य पर्वत छे, तेमांही पण वे गृफाछे, या- हा चेव ॥ १८ ॥ वत् कृतमाळ १, नृत्यमाळ देवता सुधी भर- तक्षेत्रनी पेरे सर्व जाणवू. भावार्थ-भरतक्षेत्रमा दीर्घ वैताढय पर्वतमां अर्थ-ज० जम्बुद्वीप नामना दो० द्वीपमा गुफा कही छे ते वे समान सरखी छे, वि- म० मेरु प० पर्वतनी दा० दक्षिणे चु० नानो शेप नधी, भेद नथी, मांहोमांही एकेकधी व- । हिमवंत वा० वर्षधर प० पर्वतना दो० वे कृ० धती नधी, लांवपणे, पहोलापणे, उंचपणे, आ- कुट प० का व० घणा स० समान जा० कार परिघिए सरखी छे, ते वे गुफाना नाम फहे छ तिमिस गुफा तथा खंडप्रपात गुफा. यावत वि० पुहोलपणे उ० उंच सं० आकारे प० सरखी परिधि तं० ते ज० कहुंछ चु० अर्थ-तं० तिहा णं० वळी दो० वे दे नानो हिमवंत कुट चे० वळी वे० वेश्रमण कुट देवता म० मोटी रुद्धिना धणी जा० यावत चे० वळी प० पल्योपमनुं हि० आउ' छे ५० रहे छे जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स तं. ते ज० कहुंछ क० कृतमाल चे० बळी दाहिणेणं चुल्लाहिमवन्ते वासहरपवए न० नटमाल देव चे० वळी तत्थ णं दो देवा महिड्डिया जाव दो कूडा पन्नत्ता बहुसमउल्ला जाव वि- पलिओवमहिइया परिवसन्ति । तंज- स्वम्भुचत्तसंगणपरिणाहेणं । तं जहा हा । कयमालए चेव नट्टमालए चेव । चुल्लाहमवन्तकूडे चेव वेसमणकूड़े चेव ॥ २१ ॥ ॥ १९ ॥ भावार्थ-जंबुट्ठीपे मेरुपर्वतथी दक्षिणदिशाए भावार्थ-तथा वे देवता मोटी रुद्धिना ध. णी पल्योपमने आउखे रहे छे, तेना नाम कृत छे, ते घणा सरखा छे. पहोळपणे, उंचपणे, नाना हिमवंत वर्षधर पर्वनना वे कुट कहेल माल अने नट माल देवता. संन्धानपणे, परिधिए सररवां हे. कांडपण फेर अर्थ-ए० एरावत क्षेत्रमा ण. पण दो० नथी, ने वे कुटनां नाम कडे छ, चुटहिमवंत- दीर्थ वनाव्यमां दो वे गु० गुहाओ प० कही। कुट १, वश्रमणकुट २. ए वे थेट है, २ । - - - । ॥ २४ ॥ उत्तर दिनाए नी- यावत् वरावउत्तर दा० लकुट १, उप- (७८) हाणं सूत्र २, उद्देसओ३. अर्थ-जंबुद्वीप नामना दी० द्वीपे म० मेरु | वा० वर्षधर प० पर्वत दो० वे कू० कुट प० प० पर्वतनी दा. दक्षिणे म. महाहिमवंते । कह्या व० धणा स० सरखा जा० यावत तं० ते वा० वर्षधर प० पर्वतनी मर्यादा करे छे ते ज० कहुंछु नी० नीलवन्तकुट चे० वळी उ० दो० वे कृ० कुट प० कया व० घणा स० उवदर्शनकुट चे० वळी. सरवा छे जा० यावत म० महाहिमवंत कुर जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स चे० वळी वे० वेरुलियनामे कुट चे० वळी. उत्तरेणं नीलवन्ते वासहरपवए दो कूडा जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स दाहिणेणं महाहिमवन्ते वासहरपवए दो पण्णत्ता बहुसमउल्ला जाव । तं जहा नीलवन्तकूडे चेव उवदंसणकूडे चेव कूडा पन्नत्ता बहुसमउल्ला जाव म- हाहिमवन्तकूडे चेव चेव वेरुलियकूडे भावार्थ-जंबुद्वीपे मेस्थी चेव ॥ २२॥ ! लवंत वर्पधर पर्वतना वेकुट)... कहेल छ, घणा मिना। भावार्थ-जंबुद्वीपे मेरुथी दक्षिणदिशाए म- सरखा छे यावत् वराव, हाहिमवंत वर्षधर (वर्ष कहेतां क्षेत्र तेहनी दर्शन कुट २, ए वैताहय पर पर्यादा करे ) पर्वतना वे कुद ते शिखराकारे अर्थ-ए० ए० समान कहेल छे, घणा सरखा यावत् वरावर छे, ते । पर्वतना दो० वे प० कया व० घ- वे कुटनां नाम कहे छे, एक महाहिमवंतकुट णा स० सरखा ले जा० यावत तं० ते ज. १, वीजो वेरुलीय नामे कुट २ ए वे भेदछे, कहुंछु रु० रुपिकुट चे० वळी म० मणिकंचन. कुट चे० वळी. अर्थ-ए० एम नि० निपध वा० वर्षधर प० पर्वतना दो० वे कृ० कुट ५० कद्या व० एवं रुप्पिम्मि वासहरपवए दो कूड़ा घणा सरखा छे जा० यावत नि० निपधकुट पन्नत्ता बहुसमउल्ला जाव । तं जहा। चे. वळी रु० रुचककुट चे० बळी. रुप्पिकूडे चेव मणिकञ्चणकूडे चेव।।२५।। एवं निसहे वासहरपवए दो कूडा भावार्थ-एम रुपि वपंधर पर्वतना वे कुट पण्णत्ता बहुसमउला जाव निसह-: (शिखर) कहेल छे..पणा सरखा छे, यावद कडे चेव स्यगकूड़े चेव ।। २३ ।। बराबर छे, तेहनां नाम कहे छे, रुपी कुट १, मणीकंचन कुट २, ए वे भेद छे, भावार्य-एम निपध वर्पवर पर्वतना व कुट अर्थ-ए० एम मि० सिपरी वा० वर्षधर कहेल छे ते घणा सरखा छे, यावत् वरावर प० पर्वते दोघे कृ० कुट १० कया ३० , निषधकुट १, रुचकमभकृट २. ए वे भेद छे. धणा स० सरखा तं ते ज० कहुँ सि अर्थ-ज. जंबुद्धीप नामना दी हीरे मसिखरकुट चे० बळी ति० तिगिच्छकुट चे मेर प० पर्वतनी ३० उत्तरे नी० नीलवन बळी. राण, पोजा पधर प० । . . पा , - घणा सरखा छ हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. (७९) एवं सिहरिम्मि वासहरपवए दो कू- ने परिधिए सरखा छे, ते वे द्रहनां नाम कहे छे, एक पदम द्रह १, वीजो पुंडरीक द्रह २, डा पन्नत्ता बहुसमउल्ला । तं जहा । (ए वे द्रह एकहजार जोजन लांबा, पांचसे जो- सिहरिकूडे चेव तिगिच्छिकूडे चेव।।२६।। जनना पहोला छे, दश जोजनना धरतीमांहि भावार्थ-एम शिखरी वर्षधर पर्वतना वे| उंडा छे, तेमांही एककोड विसलाख पचास कुट कहेल छे. हजार एकसोने विस कमळ छे, सर्व रत्नमय यावत् वरावर छे. शिखरिकुट १, तिगिच्छकुट २, एवे भेदछे छे, पद्मद्रह माही एक म्होडं कमळ छे ते श्री देवीनुं छे अने एकसोने आठ कमळ श्रीदे- अर्थ-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे म० वीनां भंडारनां छे, चार कमळ महतरिकानां मेरु प० पर्वत उ० उत्तर दा० दक्षिणे चु० छे, सात कमळ अणिकानां छे, सोळहजार चुल हिमवंत सिखरी वा० वर्षधर पर्वते दो० कमळ आत्मरक्षक देवतानां छे, चारहजार क- वे म० मोटा द० द्रह ५० कह्या व० धणा मळ सामानिक देवना छ, आठहजार कमळ स० सरपा छे अ० विशपे स० भेद नथी अ० एकधी ना० वधे नहीं घटे नहीं आ० लाव- माहिली परिपदानां छे, दशहजार कमळ व- चली परिपदानां छे, वारहजार कमळ वाहि- पणे वि० पोहलपणे उ० उंडपणे सं० आकार रली परिपदानां छे. हवे कमळना त्रण कोट प० परिधिए सरपा तं० ते ज० कहुंछु ५० छे, वत्रीसलाख कमळ पहेला कोटनां छे, चा- पद्मद्रह चे० वली पो० पुंडरीकद्रह चे० वळीलीसलाख कमळ वचला कोटनां छे, अडता- जम्बुद्दीव दीवे मन्दरस्स पवयस्स उ- लोसलाख कमळ बाहीरला कोटनां छे. एम त्तरदाहिणेणं चुल्लहिमवन्तसिहरीसु वा- सर्वे थइने एककोड विसलाख पचासहजार ए- कसोने विस कमळ धयां तेमांही मोडें कमळ सहरपवयसु दो महदहा पन्नत्ता बहुस- एक जोजननुं लांचं अने पोहोलुं छे, अर्थ मउल्ला अविसेसमणणत्ता अन्नमन्नं ना- जोजन जाई छे, दश जोजननुं पाणीमांही इवट्टन्ति आयामविक्खम्भुवेहसंगण- उई छे, वे कोश पाणी थकी उंचं छे, दश परिणहेणं । तं जहा । पउमदहे चेव जोजन झालं मागे कहेलुं छे, ते कमळनुं वज्र रत्नमय मुळ छे, रिष्ट रत्नमय कंद छे, पोण्डरीयहहे चेव ।। २७॥ वैरुली रत्नमय निलबरणां वाहिरलां पानहीं भावार्थ-जंबुद्वीपना मेरुखी दक्षीणे चुल हि- छे, जंबुनंद राता रन्न सुवर्णमय माहिला पा- मवन पर्वत अने उत्तरे शिखरि पर्नत है, ए ये नडां छे, तपाच्या शोनामय केशरां छे, नाना पर्वतने विष चे म्होटा द्रह श्री भगवंत कल प्रकारना मणिमय जे उपरे पाखडीयुं छे, सो. छे, ते घणा सरखा छे, कांड पण विशेष भेद । नानी कर्णांकाछे, ते कर्णिका वे कोशनी लांबी नधी, एकेकधी वधता नथी, घटता पण नथी. . ने पहोली छे, एक कोगनो जाटपणे गेडो,, लांवपणे, पदोळपणे, उंचपणे, उंटपणे, संस्था- : ते उपर अj घणुं रमनील छे, नेला मान ܝ > (८०) हाणं सत्र २. उद्देसो ३. ३ , मध्यदेश भागे श्रीदेवी घर छे, ते एक को एवं महाहिमवन्तरुप्पीसु वासहरप- शर्नु लांबु अने अर्ध कोशनुपोहोळं छे अने वएसु दो महदहा पणत्ता बहुसमउला देश | कोश उचुंछ, अनेक स्तंभा छे, घठा- यो मुवणे करी ते जोवा योग्य छे, ते भुवनने जाव तं जहा । महापउमद्दहे चेव त्रण वारणां छे, पूर्वे १, दक्षीणे २, उत्तरे महापोण्डरीयदहे चेव । देवयाओ हिरि एत्रण वारणां पांचसे धनुप्यनां उंचां छे, अही-चेव बुद्धि चेव ॥ २९ ॥ से धनुष्यनां पहोळां छे, ते भुवनमां एक मणी भावार्थ-एम महावंत अने रुपीपर्वतने विप पीठीका छे, ते पांचसे धनुप्यनी लांबी ने प-वे म्होटा द्रह कहेलछे ते घणा सरखा छे यावत् होळी छे, अढीसें धनुष्यनी उंची छे, ते मणी- वरावर छे तेहनां नाम कहे छे, महाहिमवंत पीठीका उपरे एक देव सेज्या रहेवानो पल्यंग पर्वत उपरे महापद्मद्रह १, रुपी पर्वत उपरे छे, एवी रीतेज पुंडरीक द्रमा पण जाणवू.) महा पुंडरिकद्रह , तिहां पण वे देवी अर्थ-त० तिहां ण० वळी दो० वे दे० म्होटी रुद्धिनी धणियाणायु बसेछ तेहनां नाम देवी म० मोटी रुधिवंत जा० यावत ५० प- कहेछे. महापम द्रहमांही हिदेवी १, महापुंडरिक ल्योपम हि आऊपाना प० वसे छे तं० ते द्रहमा बुद्धि नामे देवी वसे छे. २, ए वे ज० कहुंछ सि० श्री चे० वळी ल० लक्ष्मो भेद छे. च० वळी अर्थ-ए० एम नी० निपध नी० नोलवते तत्थ णं दो देवयाओ महिड्डियाओ ति० तिगिच्छद्रह छे चे० बळी के० केसरी- छे च० वळी दे० देवीयो धि० धृती देवी जाव पलिओवमट्टिइयाओ परिवसन्ति। चेवळी कि० किति चे० वळी तं जहा। सिरि चेव लच्छिच्चेव ॥२८॥ एवं निसहनीलवन्तेनु तिगिच्छिदहे भावार्थ-तिहां वे देवीयु म्होटी रुधिनी थ- चेव केसरिइहे चेव । देवयाओ थिई णियाणीयुं यावत् एक पल्योपमना आउखा वाळीयुं बसे छ, ते वे देवीयुना नाम कहे छ, चेव कित्ती चेव ॥ ३०॥ पद्मद्रहमां श्री देवी १, पुंडरिक द्रहमां लक्ष्मी भावार्थ-एम निषध पर्वत अने नीलवंत प. देवी रद्दे छे २ ए वे भेद छे. बनने विप वे म्होटा द्रह कहेल छे, निषिध पर्वत उपर तिगि छ द्रह १, नीलवंत पर्वत अर्थ-ए, एम म० महा हिमवंत रुपी वा० उपरे केशरिद्रह २, तिहां वे देवीयु म्होटी रु- वर्पधर प० पर्वते दो० वे म० मोटा ढ० द्रह दिनी धणियाणीयुं वसे छे तहना नाम कहेछे प० कया व० धणा स० सरपा जा० यावत तिगिच्छद्रहमां धृतीदेवी १, केशरिद्रहमा कि- तं० ते ज० कहूंछ म० महा प्रमद्रह चे० वळी निदेवी बसेछे २, [ए सर्वे द्रनु उंडापणुं अने म. महा पुंडरीक द्रह चे० वळी दे० देवांगना कमन्नुं मान पद्मद्रहनी वरावर जाणषु अने हि हिन्दियी ० बळी बु. बुद्धिदेवी बीजं मान पाद्रहवी ठाम यम' जाग. ) चे० बळी ए वे भेद छ, द्रह हाणं १. (८१) पेहेला तथा वीजा हाणमां आवता परस्पर सूत्रोनो संबंध बतावनार मुळमां आपेल संस्कृत पाठनो तरजुमो. एक हाणं. ३ ११ (पुण्य प्रतिपक्ष पाप छे तेथी तेनुं पेरेग्राफ १ (सम्यक मिथ्याज्ञान श्रद्धान स्वरुप कहे छे.) अने अनुष्टानोवडे सर्व पदार्थोनो विषय उपयो १२ (उपर कहेल पुण्य पापकर्मोना च- गमा लाववाथी आत्मानुं सर्व पदार्थोमां प्राधा- धनुं कारण जे आश्रय ते कहे छे.) न्यपणुंछ तेथी आत्मानो विचार पेहेला कहेछे.) १३ (हवे आश्रवना विपरीत संवरनुं स्व- २ (केटलाएक मतवाळाओ आत्मानुं कि रुप कहे छे.) या रहीतपणुं माने छे तेथी ते मतनुं निराक- १४ (ते संवर वे प्रकारनो छे पण संव- रण करवाने माटे ते आत्मानुं क्रिया सहीत रना सामान्यपणाथी एक छे. विशेष संवरमां पणुं कहेवाने इच्छता क्रियाना करणभूत जे कर्मो वेदाय कर्मो वेदाय छे पण बंध थतो नथी तेथी वे- दंड तेनुं स्वरुप प्रथम कहेछे.) दना स्वरुप कहे छे.) (ते दंडवडे आत्मा क्रिया करे छे तेथी १५ (पन्ने प्रकारनी पण वेदना वेदनानी सा- ते क्रिया कहे छे.) म्यपणाथी एकज मकारनीछे. भोगवेला रसवाळू ४ ( उपर वतावेल स्वरुपवाला आत्मानो कर्म प्रदेशथी खरी पडेछे तेथी वेदना पछी कर्म आधार जे लोक तेनुं स्वरूप कह छे.) परिशाटनस्प निर्जरानुं निरुपण करे छे.) ५ (लोकनी व्यवस्था पण तेथी विपरीत जे पेरेग्राफ २ (संसारमा जीव जुदी जुदी अलोकना होवाधी थाय तेथी ते अलोक कहेछे.) निर्जरानुं भाजन प्रत्येक शरीरनी अवस्थामां ६ (लोक अने अलोकनो विभाग कर- थाय छे पण साधारण शरीरनी अवस्थामां नार धर्मास्तिकाय छे तेथी तेनुं स्वरुप कहेछे) यतो नथी तेथी मत्येक शरीरनी अवस्थावाला ७ (धर्मथी पण विपरित जे अधर्म तेनुं जीवना स्वरुपर्नु निरुपण करवा माटे " एगे स्वरुप कहे छे.) जीवे" ए विगेरेथी कहे छे अथवा प्रस्तुत ८ (आत्मा पण लोकमा रहेल धर्मास्तिकाय (चालता) शास्त्रमा कहेवाना जीव विगेरे नव अने अधर्मास्तिकायथी उपग्रहीत, दंड सहित, पदार्थो सामान्यथी काया. वे विशपथी जीव सक्रिय एवो छतो कर्मवढे बंधायछे ते बंध कहेछे.) पदार्य निरुपण कहे छे.) ९ (अनादि काळधी बंधनो सदभाव छत्ता पेरेग्राफ (बन्ध, मोक्ष विगेरे आत्माना पण कोई भवीजीव मोक्ष पामेले तेथी मो- धर्यो कया छे तेथी ते अधिकारधीन आ मनुं स्वरूप कहे छे.) पछी “एगा जीवाणं त्यांची मांडीने "गगे १० (मोक्ष पण पुण्य पापना क्षय थवा- चरिच त्यांमुधी प्रात्माना धनि कहे छे.) ययाधी धायछे तेथी पुण्य पापर्नु स्वरुप कहे पेरेग्राफ, ४ (ज्ञान विगेरे उत्पाद, व्यय, जोईए नेमां पण मोक्ष अने पुण्यनुं शुभ स्वरुपर्नु ववाला छे अने स्थिनि छे ते समय विगे- समान धर्मिपणुंद्रे तेधी पहेलं पुण्य को छे.) रेनी छे तेथी समयनी पल्पणा करे छ.)
, (८२) हाणं २. उसो १. पेरेग्राफ ५ (अंशरहित वस्तुओना अधि पेरेग्राफ १४ (जम्बुद्वीप कयो, हवे तेना कारवीज आ वे सूत्रो कहे छे.) परुपक भगवान महावीरनी एकता कहे छे.) पेरेग्राफ ६ (जेम परमानुं तेवा प्रकारना पेरेग्राफ १५ (वीर एकला निर्द्रत थया एम एकत्व परिणामना विशेपथी एकत्वपणुं यायछे । कयु. नितिक्षेत्रनी पासे अनुत्तर विमानो के तेवीन रीते अनंता अणुमय स्कन्धोर्नु पण थाय तेथी त्यांना रहेनार देवोनुं देहमान कहे छे.) एम वतावतां सकळ वादर स्कंध प्रधानभूत इप पेरेग्राफ १६ (देवोनो अधिकार चालतो माग्भार ए नामनी पृथ्वीनुंस्कन्ध परुपे छे.) होवाथी नक्षत्र देवोर्नु ताराओनी साथे एक- पेरेग्राफ६ (२)(सिद्धि पछी सिद्धवाला कहेछे.) पणुं कहे छे.) पेरेग्राफ ७ (१) कर्मक्षय सिद्धनो धर्म पेरेग्राफ १७ (पुदगल स्वरुप कहेवा इ. परिनिर्वाण छे तेथी ते कहे छे.) च्छता कहे छे.) पेरेग्राफ ७ (२)(परिनिर्वाण धर्मना योगथी दुट्ठाणं उद्देसओ १. तेज कर्मसय सिद्ध परिनिर्वृत (एटले मोक्ष पा- पेरेग्राफ १ ( हवे द्विस्थानक नामनुं बीजें मेला) केहेवायछे तेथी ते वतावतां कहे छे.) अध्ययन शरु करे छे. आनो विशप संबंध परेग्राफ ८ (अत्यार सृधीमां आ माये जीव आछे. जैनोना मतममाणे वस्तु सामान्य वि- धर्म एकतारुपे कह्यो, हवे पुदगलो जीवने उप-शेपे रुप छे. सामान्य आश्रीने प्रथम अध्य. ग्राहक (साधनभुत ) होवाथी पुदगल लक्षण यनमा आत्मा विगेरे वस्तुन एकत्ववणुं पर- जीवधर्मो (" एगे सद्दे " त्यांयी ते " जाव प्यु. आत्मानो विशेषनो आश्रय लईने तेज वे लुखे") त्यां सुधी एकतारुपे वतावे छे.) प्रकारे परुपीए छीए. आ संबंधे आवेल आ पेरेग्राफ ९ (पुदगल धर्मोनी एकता कही, हवे अध्ययनना उपक्रम विगेरे चार अनुयोगद्वार पुदगलने आलिंगीने रहेला १८ पापस्थानकना थाय छे तेपण पहेला अध्ययननी पेंट जाणवा अप्रगस्त (अशुभ ) धर्मोनी एकना कहे छे.) : अने जे फेर छे ते पोतानी बुद्धियी जाणी पेरेग्राफ १० (१८ पापस्थानक कह्या, हवे. लेवो. फकत चार उदेसावाला अध्ययन म्- तेना विपरीतोनी एटले प्राणातिपान वेरमण त्रानुंगमे प्रथम उद्देसकनुं आ आदि सूत्रछे.) इत्यादीना १८ सूत्रोवडे एकता कहे छे.) परेग्राफ २ (हवे त्रस ए आदि नव सूत्रबडे जीवतत्वनान समतिपक्ष (विरुद्ध सहित) परेग्राफ ११ (संसारी जीव द्रव्यना ध. भेदो वतावे छे.) मनु एकत्वपणुं को. हवे कालवें स्थितिरुप- परेग्राफ ३ (आम जीवनत्वना विपदा- पएं होपायी अने तद्धर्मपणाने लीधे तेनो वतार (वी हाणं) वतावीने अनीव तत्व विशेष कहे छे.) संबंधी ते बतावे छे.) परेग्राफ १२ (जीव, पुदगल अने काळ पेरेग्राफ ४ (क्रियाना सदमाचे आत्माने लक्षण द्रव्यांनी विविध धर्म विगपोनी एकत्व बंध विगेरे याय छे. क्रिया निरूपण करवाने परुपणा कही, वे संसारी नीवो, मुक्तजीवो अने माटे ३६ मत्र कहे हे.) पुदगल द्रव्य धिमेपोनो नारक परमाणु विगेरेनो परग्राफ ५ (आ क्रियाओमाये गणीय समुदाय लक्षण धर्मनी एकता बताव छ.) । नेयी गर्दा कडे छे.) + . हायं २, उद्देसो २. (८३) पेरेग्राफ ६ (प्रत्याख्यान कहे छे.) पेरेग्राफ २० (लोक अने अलोकना भेद- पेरेग्राफ ७ (ज्ञानपूर्वक प्रत्याख्यान विगेरे थी आकाशनुं वे प्रकारपणुं वताव्युं अने लोक मोक्ष फळदाता छे तेथी ज्ञान विगेरे कहे छे.) छे ते शरीरवाळाओगें अने शरीरोर्नु आश्रय पेरेग्राफ ८ (ज्ञान अने चारित्र आत्मा केवी स्वरुप छे तेथी नारक विगेरे शरीर दंडक बढे रीते पामे छे ते ११ सूत्रोथी कहे छे.) शरीर परुपणा कहे छे.) पेरेग्राफ ९ (१) (वळी धर्म विगेरे विद्या पेरेग्राफ २१ (१) (शरीरना अधिकारमां चरणस्वरुप केवी रीते पामे छे ते कहे छे.) जीवोनी वे राशीवडे परुपणा कहे छे.) पेरेग्राफ ९ (२) ( वळी धर्मादि लाभने पेरेग्राफ २१ (२) (सकाय स्थावर का- माटे वीजा वे कारणो कहे छे.) योनुज वे प्रकारे परुपणा करवाने वे सूत्रो पेरेग्राफ १० (केवळज्ञान पण काळविशेपे कहे छे.) थाय छे ते कहे छे.) पेरेग्राफ २२ (पूर्व सूत्रमा भव्य जीवो पेरेग्राफ ११ (केवळज्ञान मोहनीय उ कह्या. हवे तेना विशेपमांज जे जे कर, उ- न्मादना क्षएज थाय छे तेथी सामान्यथी उ- चित छे तेज वे स्थानकथी कहेछे.) न्मादनुं निरुपण कहे छे.) पेरेग्राफ २३ (हवेना १६ सूत्रो पूर्व सू- पेरेग्राफ १२ (१) ( उन्मादधी जीव प्रा- त्रनी पेठे वे दिशाओना आलावायी कहेवा.) णाति पातादि रुप दंडमा प्रवत छे अने दंडन भाजन थाय छे तेथी दंडनुं निरुपण करे छे.) ॥ दुट्ठाणं उद्देसओ २॥ पेरेग्राफ १२ (२) (कहेल स्वरुपवालो पेरेग्राफ १ (१) (पेहेला उद्देसामा जीव दंड सर्व जीवोमा २४ दंडकोमा फोरची व-धर्म अने अजीव धर्म विशेषेकरीने वे प्रकारे तावे छे.) कया. वीजा उद्देसामां पण वे प्रकारे जीव पेरेग्राफ १३ (सम्यक दर्शन विगेरे त्रण धर्म कहे छे. प्रथम उद्देसाना छेला सूत्र अने रत्नवाळाओनेज दंड होता नथी तेथी ते त्र आ वीजा उद्देसाना आदि सूत्रनो आ प्रमाणे गेर्नु निरुपण करवा इच्छता सामान्यथी दर्श- संबंध छे. पहेला उद्देसाना अंतना सुत्रमा पा- ननुं स्वरुप बतावे छे.) दपोगमन कहुं छे अने तेथी केटलाक देवपणुं पेरेग्राफ १४ (हवे ज्ञान कहे छे.) पामे छे तेथी देवा विशेष कहेवामां तेनो कर्म- पेरेग्राफ १५ ( हवे चारित्र कहे छे.) बंध अने घेदना कहे छे.) रेग्राफ १६ (चारित्र धर्म छे ते संयम पेरेग्राफ १ (२) (आ ये विकल्प ( भेद) छे तेथी संयम कहे छे.) वीजा ठाणामां मूत्रने आधीन फयो छे अने परेग्राफ १७ (सराग संयम फयो, इवे वी- आ रीते सूत्रमा कहेल बन्ने प्रकारनी सर्व तराग संयम कहे छे.) जोवीना चौबीसे दंडका परुपणा करे छे.) पेरेयाफ १८ (१) (संयम को ते जी- परेग्राफ २ (नारकीनी गनी तथा आ- चाजीव विषय छ तयी पृथ्वी आदि जीवन गती पताव है.) स्वरुप फहे छे.) पेरेग्राफ ३ (जौवाधिकार होवाने लोधे पेरेग्राफ १९ (काळ अने आकागनी में भव्य विगेरे एवा १६ विशेषणावटे दंडकनी सोयी परपणा करे .) परुपणा कहे छे.)
- (८४) हाणं २. उद्देसो - पेरेग्राफ ४ (पहेला वैमानिक चरमत्व । भूत्रनो संबंध नीचे मुजब छे. वीजा उद्देसाना अने अचरमत्व पण कह्या छे ते अवधिज्ञान : छेला सूत्रमा देवोना शरीर वताव्यां अने श- वडे अधोलोक विगेरे जुए छे, हवे ते जोवा- रीवाको शब्दादिनो ग्राहक होयछे तेधी श. मां जीवनावे प्रकार कहे छे.) ब्दनी निरूपणा करे छे.) पेरेग्राफ ५ (वैक्रिय शरीर आश्रीने अ पेरेग्राफ २ ( शब्दभेद कह्या, हवे तेना धोलोक विगैरेना ज्ञानमां वे प्रकार कहे छे.) कारणनी निरुपणा करे छे. ) पेरेग्राफ ६ (आज्ञानाधिकार छे तेथी ने परेग्राफ ३ ( पुदगर्नु एकठा थq ने जु- संबंधमां बीजूं कहे छे.) दा थ{ तेनुं कारण बताववाने कहे छे.) परेग्राफ ७ (गन्द श्रवण विगेरे जीवप पेरेग्राफ ४ ( १२ सूत्रोधी पुदगलोनीज रिणाम कहेवा तेनो संबंध चालतो होवाथी निरुपणा करे छे.) जीवना वीजा पण परिणाम कहे छ ) पैरंग्राफ ५ ( पुदगलना अधिकारने लीधे परेग्राफ ८ (सामान्यथी श्रवण विगेरे देश ज उपर कडेल सविपक्षना (विरुध पक्षना) अने सर्वयी कद्या छे. विशेप विविक्षामां दे-विगेरे छ विशेपणोथी विशिष्ट (विशेष ) श वोर्नु प्रधानपणुं होवाथी तेमने आश्रीने ते । दादी पुदगल धर्मों कहे छे.) कहे छे.) पेरेग्राफ ६ ( पुदगल धर्मो कया. धर्माना पेरेग्राफ ९ ( उपर कहेल भावो शरीर अधिकार होवाथी हवे जीव धर्मो कहे छे.) होय तोज संभवे छे तेथी अने देवोनुं प्रधान- पणुं छे तेथी व्यक्ति आश्रीने तेमनान गरी : माटे छ सूबो कहे छे.) परेग्राफ ७ (हवे वीर्याचारने विशेष कहेवा रोनी परुपणा करे छे.) पेरेग्राफ ८ (पडिमाओ सामायिकवाळा ॥ दुट्ठाणं उद्देसओ ३॥ नेज होय तेथी सामायिक कहे छे.) (वीजा उद्देसा अने जीजा उदेसानो संबंध पेरेग्राफ १ (जीवना धोनो अधिकारले नीचे मुजव छे. वीजा उदसामा जीव पदार्थ तेथी २४ सूत्रोथी वीजा धर्मो पण कहे छे.) अनेक रीते करो. आ उदेसामा जीवने उप परेग्राफ १० ( पयार्यनो अधिकार होवा. ग्राहक ( साधनभुन ) पुदगल जीव धर्म क्षेत्र 'धी अने ते नियत (अमुक) क्षेत्र आश्रित द्रव्यलक्षण पदार्थ परुपणा कहेशे. वीजा उद्दे- ' होवाथी क्षेत्रना व्यपदेगी (संबंधधी) पुद्रगल साना छेला भूत्र अने आ रहेमाना पेहेला : पर्यायने कडेवा इच्छता क्षेत्रप्रकरण कहे छे.)
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हाणं मूत्र २. उद्देसो ३.
(८५)
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अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी. द्वीपे | वत वा० वर्षधर प० पर्वतथी के० केसरिद्रह
म. मेरु प० पर्वतनी दा० दक्षिणे म० महा नामना म० मोटा द्रहथी दो० वे म० मोटी
हि० हिमवंत वा० वर्षधर प० पर्वतना म० महा न० नदीओ प० वहेछे तं० ते ज० कहुंछ सी०
प० पदम द० द्रह नामना द० द्रह थकी दो० वे सीता नदी चे० वळी ना० नारिकता नदी
म० मोटी न० नदीओ प० वहे छे तं० ते ज० चे वळी ॥ ३३॥
कहुंछ रो० रोहिता नदी चे० वळी हे० हरि जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स
कंता नदी चे० वळी ॥३१॥
उत्तरेणं नीलवन्ताओ वासहरपवयाओ
जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स केसरिबहाओ महादहाओ दो महान-
दाहिणेणं महाहिमवन्ताओ वासहरप- ईओ पवहन्ति । तं जहा । सीता चेव
वयाओ महापउमद्दहाओ दहाओ नारिकन्ता चेव ॥ ३३ ॥
दो महानईओ पवहन्ति । तं जहा । भावार्थ:-जंबुद्वीपना मेरथी उत्तर दिशाए
रोहिया चेव हरिकन्ता चेव ॥३१॥ नीलवंत वर्षधर पर्वतना केसरि द्रहथी वे म्हा
भावार्थ-जंबुद्वीपे मेरुथी दक्षिण दिशाए महा म्होटी नदीयुं निकली वह छे तेहनां नाम
हिमवंत वर्षधर पर्वतना महापद्म द्रहमांथी वे म्हा कहे छे, सीतानढी १, नारिकतानदी २, ए वे
म्होटी नदीयुं नीफली वहे छे तेहनां नाम भेद छे ॥३३॥
कहे छे, रोहिता नदी १, हरिकता नदी २, ए अर्थ:-ए० एम रु० रुप्पी वा० वर्पधर
वे भेद छे ॥३१॥
प० पर्वतना म० महा पो० पुंडरीक द० द्रथी
अर्थ:-ए० एम नि० निपध नामे वा० दो० वे म० मोटी न० नदीओ प. बहे छे
वर्षधर प० पर्वतना ति० तिगिच्छ द्रह ना तं० ते ज० कहुंछ न० नरकंता चे० वळी
मना द० द्रहथी दो वे म० मोटी न० नदीओ रु० रुप्पकुला चे० वळी ।। ३४ ॥
प० वहेछे तं० ते ज० कहुंछु ह० हरि नदी एवं रुप्पीओ वासहरपचयाओ महा-
चे० वळी सी० सीतोदा नदी चे० वळी ॥३२॥ पोण्डरीयबहाओ दो महानईओ पव-
एवं निसहाओ वासहरपवयाओ ति- हन्ति । तं जहा । नरकन्ता चेव रु-
गिच्छिद्दहाओ दहाओ दो महानई-
भावार्थ:-एम रूपी वर्पधरपर्वतना महा पुंड-
सीओय चेव.॥३२॥
रीक द्रहमांथी वे म्हा म्होटी नदी निकली वहे
भावार्थ:-एम निपध वर्षधर पर्वतना ति-ले तेहनां नाम कहे छे, नरकंतानदी १, रुप्प-
गिच्छ नामे द्रह मांहीधी वे म्हा म्होटी नदी ! कुलानदी २, ए वे भेद छ ॥३४॥
यु निकळी व छे तेहनां नाम कहे छे, हरि अर्धः-ज० जम्बुद्वीप नामना दी. डोपे
नदी १, सीनोदा नदी २, ए वे भेद छे॥३२॥ म० मेरु प० पर्यननी दा दक्षिणे भ० भ-
अर्थ:-ज० जम्बुट्टीप नामना दी. हीपे । रत वा क्षेत्र दोघे ५० प्रपात ८. द्रह
म० मेरु प० पर्वतनी उ. उत्तरे नी० नील- (दंगरी नीचो मवाद पढे ने) पं० कया
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ओ पवहन्ति । तं जहा । हरि चव पकूला चेव ॥ ३४ ॥
- (८४) हाणं २. उद्देसो ३. पेरेग्राफ ४ (पहेला वैमानिक चरमत्व मूत्रनो संबंध नीचे मुजब छे. वीजा उद्देसाना अने अचरमत्व पण कह्या छे ते अवधिज्ञान छेला सूत्रमा देवोना शरीर वताच्या अने श- बड़े अयोलोक विगेरे जुए छे, हवे ते जोवा- रीवाळो शब्दादिनो ग्राहक होयछे तेथी श. मां जीवनाचे प्रकार कहे छे.) व्दनी निरूपणा करे छे.) पेरेग्राफ ५ (वैक्रिय शरीर आश्रीने अ. पेरेग्राफ २ ( शब्दभेद कहा, हवे तेना धोलोक विगैरेना ज्ञानमां वे प्रकार कहे छे.) । कारणनी निरुपणा करे छे.) पेरेग्राफ ६ (आज्ञानाधिकार छे तेथी ने परेग्राफ ३ ( पुदगळy एकठा थर्बु ने जु- संबंधमां बीजूं कहे छे.) दा थर्बु तेनुं कारण बताववाने कहे छे. ) परेग्राफ ७ (गन्द श्रवण विगेरे जीवप पेरेग्राफ ४ (१२ सूत्रोथी पुदगलोनीज रिणाम कहेवा तेनो संबंध चालतो होवाथी निरुपणा करे छे.) जीवना वीजा पण परिणाम कहे छे ) पेरेग्राफ ५ ( पुदगलना अधिकारने लीधे पेरेग्राफ ८ (सामान्यथी श्रवण विगेरे देश ज उपर कहेल सविपक्षना (विरुध पक्षना) अने सर्वयी कद्या छे. विशेष विविक्षामां दे- । विगेरे छ विशेषणोथी विशिष्ट (विशेष) )भ वोर्नु प्रधानपणुं होवाथी तेमने आश्रीने दादी पुदगल धमी कहे छे.) कहे छे.) पेरेग्राफ ६ ( पुदगल धर्मो कया. धर्मोना पेरेग्राफ ९ ( उपर कहेल भावो शरीर अधिकार होवार्थी हवे जीव धर्मो कहे छे.) होय तोज संभवे छे तेथी अने देवोनुं प्रधान- ! पणुं छे तेथी व्यक्ति आश्रीने तेमनाज शरी- पेरेग्राफ ७ (हवे वीर्याचारने विशेष कद्देवा रोनी परुपणा करे छे.) माटे छ सूत्रो कहे हे.) पेरेग्राफ ८ (पडिमाओ सामायिकवाळा ॥ दुट्ठाणं उद्देसओ ३॥ नेज होय तेधी सामायिक कहे छे.) (वीजा उद्देसा अने त्रीजा उदेसानो संबंध परेग्राफ ९ (जीवना धर्मोनो अधिकार के नीचे मुजब छे. वीजा उदेसामा जीव पदार्य । तेथी २४ सूत्रोथी वीजा धर्मो पण कहे छे.) अनेक रीते कन्यो. आ उदेसामां जीवने उप परेग्राफ १० (पयार्यनो अधिकार होवा. ग्राहक (साधन मुत) पुढगल जीव धर्म क्षेत्र धी अने ते नियत (अमुक) क्षेत्र आश्रित द्रव्यलक्षण पदार्थ परुपणा कहेगे, वीजा उद्दे- होवाथी क्षेत्रना व्यपदेशी (संबंधथी) पुदगल साना छेला मूत्र अने आ उदेसाना पहला पर्यायने कडेवा उच्छता क्षेत्रप्रकरण कहे छे.) f
डाणं सूत्र २. उद्देसो ३.
(८५)
अर्यः-ज० जम्बुद्वीप नामना दी. द्वीपे | वत वा० वर्षधर प० पर्वतथी के० केसरिद्रह
म० मेरु प० पर्वतनी दा० दक्षिणे म० महा नामना म० मोटा द्रहथी दो० वे म० मोटी
हि० हिमवंत वा० वर्षधर प० पर्वतना म० महा न० नदीओ प० वहेछे तं० ते ज० कहुंछु सी०
प० पदम द० द्रह नामना द० द्रह थकी दो० वे सीता नदी चे० वळी ना० नारिकता नदी
म० मोटी न० नदीओ प० वहे छे तं० ते ज० चे० वळी ।। ३३ ॥
कहुंछु रो० रोहिता नदी चे० वळी हे० हरि जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स
कंता नदी चे० वळी ॥ ३१ ॥
उत्तरेणं नीलवन्ताओ वासहरपन्चयाओ
जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स केसरिबहाओ महादहाओ दो महान-
दाहिणेणं महाहिमवन्ताओ वासहरप- ईओ पवहन्ति । तं जहा । सीता चेव
चयाओ महापउमदहाओ दहाओ नारिकन्ता चेव ॥ ३३ ॥
दो महानईओ पवहन्ति । तं जहा । भावार्थ:-जंयुट्टीपना मेस्थी उत्तर दिशाए
रोहिया चेव हरिकन्ता चेव ॥३१॥ नीलवंत वर्षधर पर्वतना केसरि द्रइधी ये म्हा
भावार्थ-जंबुद्वीपे मेरुधी दक्षिण दिशाए महा म्होटी नदीयुं निकली वहे छे तेहनां नाम
हिमवंत वर्षधर पर्वतना महापद्म द्रहमांथी वे म्हा कहे छे, सीतानढी १, नारिकतानदी २, ए वे
म्होटी नदीयुं नीफली वहे छे तेहनां नाम भेद छे ॥३३॥
कहे छे, रोहिता नदी १, हरिकता नदी २, ए अर्थः-ए० एम रु० रुप्पी वा० वर्षधर
वे भेद छ ।॥३१॥
प० पर्वतना म० महा पो० पुंडरीक द० द्रहवी
अर्थः-ए० एम नि० निपध नामे वा० दो० वे म० मोटी न० नदीओ प० वहे छे
वर्षधर ५० पर्वतना ति० तिगिच्छ द्रह ना तं० ते ज० कहुंछं न० नरकंता चे० वली
मना द० द्रही दो वे म० मोटी न० नदीओ रु० रुप्पकुला चे० वळी ।। ३४ ॥
५० वहेछे तं० ते ज० कहुंछ ह० हरि नदी एवं रुप्पीओ वासहरपचयाओ महा-
चे० वळी सी० सीतोदा नदी चे० वळी ॥३२॥ पोण्डरीयदहाओ दो महानईओ पव-
एवं निसहाओ वासहरपवयाओ ति- हन्ति । तं जहा । नरकन्ता चेच रु.
गिच्छिदहाओ दहाओ दो महानई-
भावार्थ:-एमरुपी वर्षधरपर्वतना महापुंड-
सीओय चेव ।। ३२॥
रीक द्रहमांथी ये म्हा म्होटी नडीयुं निकली वहे
भावार्थ:-एम निपध वर्षधर पर्वनना ति-छे नेहनां नाम कहे छ, नरकनानदी १, रुप्प.
गिच्छ नामे द्रह मांहीथी वे म्हा म्होटी नदी । कुलानदी २, ए वे भेट छे |३४||
यु निकळी बद्दे के तेइनां नाम कहे छे, हरि अर्थ:-ज. जम्बुद्वीप नामना दी० होपे
नदी १, सीतोदा नदी २, ए वे भेद छे ॥३२॥ म० मेक प० पर्वननी दा दक्षिण भ० भ.
अर्थ:-जल जम्बुदीप नामना दी. हीपे । रत वा क्षेत्र दो० चे ५० प्रमा
म मेर ५० पर्वननी उ० उत्तरे नी नील- (दंगयी नीचो मवाद परे
ओ पवहन्ति । तं जहा । हरि व पकूला चेव ॥ ३४ ॥
-- (८६) हाणं सूत्र २, उद्देसो ३. मेरु प० स सरखा ए व० घणा स० समा तं० ते ज० कहुंछ ग० अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी द्वीपे म० गंगा प० प्रयात ६० द्रह चे० वळी सि. पर्वतथी दा० दक्षिणे ह० हरि वर्ष- सिन्धु प्प० प्रपात ६० द्रह चे० बळी ॥३५॥ क्षेत्रे दो० वे प० प्रपात ६० द्रह पं० कह्या व० जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स धणा स० समातं० तेज० कहुईं ह० हरिप्पा प्रपात ६० द्रह चे० वळी ह० हरिकान्त प. दाहिणेणं भरहे वासे दो पवायदहा प्रपान इ० द्रह चे० वळी ॥ ३७ ।। पण्णत्ता बहुसमउल्ला । तं जहा। जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स गङ्गप्पवायदहे चेव सिन्धुप्पवायदहे दाहिणेणं हरिवासे दोपवायदहा पन्नत्ता चेव ॥ ३५॥ बहुसमउल्ला। तं जहा । हरिप्पवायदहे भावार्थ:-जंबुद्वीपे मेरुथी दक्षीणे भरतक्षे- चेव हरिकन्तप्पवाय(हे चेव ॥ ३७॥ मां वे प्रपातद्रह छे, जेहमां पर्वतथी नदीनो भावार्थ:-जंबुद्वीपना मेरुथी दक्षीणे हरि- प्रवाह पडे छे ते वे घणा सरखा छ यावत वर्ष क्षेत्रमा वे अपातद्रह कहेल छे, ते वे घणा वरावर छे तेढ़ वेनां नाम कहे छे, जेमां गंगा- नदीनो प्रवाह पडे छे ते गंगाप्रपातद्रह ?, यावत बरावर छे, तेहनां नाम को सिंधु नदीनो प्रवाह जेहमां पडे छे ते सिंधु- छे, हरिपपातद्रह १, हरिकांता मपातद्रह २, ए वे भेद छे ॥३७॥ प्रताप द्रह २, ए वे भेद छे ॥३५॥ अर्थः-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे अर्थ:-ए० एम हे० हेमवंत वा० क्षेत्र मे मेरु प० पर्वतयी उ० उत्तर दा० दक्षिणे दो० वे प० प्रपात ६० द्रह प० करा. व०बहु म० महा विदेह वा० क्षेत्रे दो० वे प० प्रपात स० सरखा तं० ते ज० कहुंछ रो. रोहिता ६० द्रह पं० कद्या व० घणा स० सरपा जा० प्प० प्रपात ६० द्रह चे० वळी रो० रोहिनंस यावत सी० सीता प० प्रपात ६० द्रा प्प० प्रपात इ० द्रह चे० वळी ।। ३६ ॥ वळी सी० सीतोदा प० प्रतात ४० द्रह चे० एवं हेमवए वासे दो पवायदहा प- वळी ॥ ३८ ॥ एणत्ता बहुसमउला । तं जहा । रो- . जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पचयस्म हियप्पवायदहे चेव रोहियंसप्पवायदहे उत्तरदाहिणेणं महाविदेहे वासे दो प- चेव ।। ३६ ॥ वायदहा पण्णत्ता बहुसमउल्ला जाव भावार्थः-एम जंयुद्विषना मेरुथी उत्तरदि- सीयप्पवाय(हे चेव सीओयप्पवायबहे गाए हेमवंतक्षेत्रमा वे प्रपातद्रह (कुंड) कहल चेव ।। ३८॥ है, ने वे घणा सरखा छे यावत बरावर छे, भावार्थ:-जंबुद्वीपना मेरुयी उत्तरे अने द्र- तेहनां नाम कहे , रोहिना प्रपानकुंड नेहमां । क्षीणे महाविदेह क्षेत्रमा वे प्रपानद्रह करेस के म्हा म्होटा मकर (मघर) मुखप्रवाहे रोहिता- ते सरखा ले यावत वरावर २ तेहना नाम नदी पढे ले १, राहितांसां प्रपानद्रर २, कई छे, सीता प्रपातहर, सीतोटा पानद्रा एवं भेद ॥३६॥ २, एचे भेद छ ॥३८॥ मे० AN 1 . हाणं सत्र २. उद्देसो ३. ( ८७ ) छे अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे प० प्रपात ६० द्रह चे० वळी र० रक्तवजी म. मेरु प० पर्वतधी उ० उत्तरे २० रम्यक प्प० प्रपात ६० द्रह चे० वळी ॥ ४१ ।। वा० क्षेने दो० वे प० प्रपात ६० द्रह पं० क जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स ह्या व० घणा स० समा जा० यावत न० न- उत्तरेणं एरवए वासे दो पवायदहा प- रकन्त प्र० मपात १० द्रह चे० वळी ना० नारिकन्त प०प्रपात इ०दह चे०वळी ॥३९॥ एणत्ता बहुसमउल्ला जाव रत्तप्पवायदहे जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्स पवयस्स चेव रत्तवइप्पवायदहे चेव ॥ ४१ ॥ उत्तरेणं रम्मए वासे दो पवायदहा प- भावार्थ:-जंयुट्टीपे मेरुथी उत्तरे एरवंत क्षे- त्रमा वे प्रपातद्रह श्री तिर्थकरदेवे कहेल छे, ते पणत्ता बहुसमउल्ला जाव नरकन्तप्प- वे घणा सरखा यावत बरावर छे, तेहनां वायदहे चेव नारिकन्तप्पवाय(हे चेव नाम कहे छे, रक्तमपातद्रह १, रक्तावती मपा- ॥ ३९ ॥ तद्रह २, ए वे भेद छे ॥४॥ भावार्थ:-जंबुद्वीपे मेरुथी उत्तरे रम्यक्वास अर्थः-ज० जम्बुद्वीप नामना दी. द्वीपे क्षेत्रमा वे प्रपातद्रह कहेल छे ते वे घणा सर- म० मेरु ५० पर्वतथी दा० दक्षिणे भ० भरत खा छे यावत वरावर छे तेहनां नाम कहे छे, वा० क्षेत्रे दो० वे म० मोटी न० नदीओ प० नरकांत प्रपातद्रह १, नारिकांता प्रपातद्रह २, कही व० घणी स० समा जा० यावत गं० ए वे भेद छे ॥३०॥ । गंगा चे. वली सि० सिन्धु चे० बळी ॥४२॥ अर्थः-ए एम हे० रणवय वा क्षेत्रे दो० : जम्बुद्दीवे दीवे मन्दरस्म पवयस्स वे प० प्रपात ६० द्रह प० कन्ना ३० प्रणा दाहिणेणं भरहे वासे दो महानईओ स० समा जा० यावन सु. सुवर्ण कुल प० मपात १० द्रह चेयळी रू० रुपकृल प्प० प्र- पण्णताओ बहुसमउल्लाओ जाव गङ्गा पात ० द्रह चे० बळी ।। ४० ॥ चेव सिन्धू चेव ।। ४२॥ एवं हेरन्नवए वाले दो पवायदहा प भावार्थ:-जंबुढीपे मेरुथी दक्षीणे भरतक्षे- ण्णता बहुसमउला जाव सुवण्णकल- त्रयां वे म्होटी नदीयुं कहेल छ, घणी सरखी प्पवायइहे चेच रुप्पकूलप्पयायदहे चेव ' गानदी १, सिंधुनदी २, ए वे भेद छे ॥४२॥ छे यावत बरावर हे तेइनां नाम कहे छे, गं. ॥ ४० ॥ अर्थ:-ए० एम ज० जेम ५० प्रपात १० भावार्थ:-पम अरण्यवंत क्षेत्रमा ये प्रपात- द्रह ए० एम न० नदीओ भा० जाणवी ए० द्रत कहेल छ ते कहे ते वे घणा सरवा ले एम जा० यावत ए० एग्बन वा क्षेत्रे दो० यायत घरावर छे. सुवर्णकुला प्रपातद्गद ? चे म० महा न. नदीयो पं. कही व० धणी सायकुला मपातद्रह, २, एचे भेद ॥४॥ स० सभी ना याचन २० रक्ताचे वळी र० अर्थ:-ज० जम्हीप नामना दी. द्वीपे रक्तावनी ३० बळी ।। ४ ।। म. मेद प० पचनी उ. उत्तरे एक एरवत मा क्षेत्रे दो० ये पर प्रपात १० द्रह ५० एवं जहा पवायदहा एवं नईओ भा- का स० घणा ग० समा जा. यात २० रक्त णियवाओ एवं जार एरावए वासदा -- -- .
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(८८)
हाणं सूत्र २. उद्देसो ३.
महानईओ पन्नत्ताओ बहुसमउल्लाओ भावार्थ:-आ वर्तमान उतसर्पिणी काळे
जाव रत्ता चेव रत्तवई चेव ॥ ४३॥ सुसम दुसमा नामे ( चोथो ) आरो वे क्रोग
क्रोडी सागरोपम काळ प्रमाणे धयो. ॥२
भावार्थ:-एम जेम प्रपातद्रह कह्या छे तेम
अर्थ:-ए० एम० आ० आवती उ० उत
अनुक्रमे नदीयु पण जाणवी, यावत एरवंत
क्षेत्रमा वे म्होटी नदोयुं कही छे ते वे पणी सर्पिणी काले वे क्रोडाकोडी सागरोपमनो
जा० यावत भ० थाशे ॥३॥
सरखी छे यावत वरावर छे तेहनां नाम कहे
एवं आगमिस्साए उस्सप्पिणीए जा-
छे, रक्तानढी १, रक्तावती नही २, ए वे भेद
छ ॥४॥
व भविस्सइ ॥३॥
अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे भ०
भावार्थ:-एमज आवती उत्सर्पिणीनो
भरत ए० एरवत वा० क्षेत्रने विषे नी० गइ सागरोपम काळ प्रमाणे थशे एवं भेदछे ।।३।।
मुसम दुसमा नामे चोथो आरो वे कोडाक्रोही
उ० उतसर्पिणी काले सु० सुपम दु. दुपमा
स० समो दो० ये सा० सागरोपम को क्रो
अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे भ०
डा को क्रोडीनो का काल हो. थयो ॥१॥
भरत ए० एरवत वा० क्षेने ती० गइ उ० उत
११ पेरा (जंयुद्वीपना अधीकारने लीधे सर्पिणीए सु० सुपमा स० आरे म० म.
तथा क्षेत्रधर्म आश्रीने पुदगळ धर्माधिकारने नुष्य युगलीया दो० वे गा० गाउ या० प्र-
लीधे जंबुढीप संबंधी भरत वीगेरे लगता काळ वेयवळी प० पल्योपमर्नु प० उत्तकृप्ट आउषु
माण उ० उंचे उ० उंचपणे हो० थयां दो०
लक्षण पर्याय धर्मनुं अनेकपणुं वतावनारा
पा० पालता हुआ ॥४॥
अहार मुत्रो कहेछे.)
जम्बुद्दीचे दीवे भरहेरवएसु बासेसु
जम्बुद्दीवे दीवे भरहेरखएसु वासेसु
तीयाए उस्सप्पिणीए सुसमाए समाए
तीयाए उस्मप्पिणीए सुममदुस्समाए
मणुया दो गाउयाई उ8 उच्चत्तेणं हो
समाए दो सागरोवमकोडाकोडीओ
स्था दोणिय पलिओवमा ई परमाउंपा-
काले होत्था ॥१॥
लइत्ता ॥४॥
भावार्थ:-जंबुदीपना भरत अने एरवंत खे-
भावार्थ:-जंयुद्वीपना भरत अने एरवतो-
त्रमा अनिन ( गइ ) उत्सर्पिणी काले मुसम । मां गइ उत्सर्पिणीना मुसमा नामे आरामा
दुसमा नामे चोयो आरो वे क्रोडाकोडी सा- युगलीयां मनुप्यतुं शरिर वे गाउ उंचपणे ययु
गरोपम काळ प्रमाणे थयो ।। १ ।।
अने उत्कृटुं वे पल्योपमर्नु आउ पाळता
अर्थ:-ए० एम इ० वर्तमान उ० उन स.
पिणी काले मुपमदुःपमां चोथो आरो वे
अर्थ:-ए० एम इ. श्रा वर्तमान उ० इन
सागापम कोडा क्रोटीनी जा० यावत पं० सपिणी काले जा. यावत पा० (ये पन्यो-
महतो ॥२॥
पमनु आउ) पाले ॥५॥
एवं डमी उस्मणिणीप जाव प. एवं इमीसे उस्मप्पिणीए जाव पा.
नने ॥ २॥
वे
हुवा ॥४॥
।
लइत्ता ॥ ५॥
हाणं मूत्र २. उद्देसो ३. (.८९) -- भावार्थ:-एम आ वर्तमान उतसर्पिणीना भावार्थ:-ते एक भरतमां ने एक एरवतमा, सुसमा आरे युगळीयां मनुष्यनुं शरिर वे गाउ एम वे चक्रवर्तिना वंश, एम वे वासुदेवना वंश उंचपणे थयु अने उतक्रप्टुं वे पल्योपमनुं आ जाणवा, ए वे भेद छे ।। ८-९॥ ८ ॥ उखु थयुं ॥५॥ जंबुद्वीपना भरत एरवत क्षत्रमा एके अर्थ:-ए एम आ० आवती उ० उतस- समे अतितकाळे वे अरिहंत उपन्या, पिणी काले जा. यावत पा० पाळशे ॥६॥ वर्तमान काळे उपजे छे, अनागतकाळे उपज- एवं आगमिस्साए उस्सप्पिणीए जा- शे, एम वे चक्रवर्ति, एम वे वळदेव, एम वे व पालइस्सन्ति ॥ ६॥ वासुदेव यावत उपन्या, उपजे छे ने उपज- भावार्थ:-एम आवती उत्सर्पिणीना सुसमा शे, ए वे भेद छे. आरे युगळीयां मनुप्यतुं शरिरबे गाउ उंचपणे अर्थः-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे थशे१ अने उत्कृष्टुं वे पल्योपमनुं आउखु पालशे दो० वे कु० कुरुने विषे म० मनुष्य स० २ ए वे भेद छे ॥६॥ सदा सु० सुपम मु० सुपम पहेलो आरो उ० अर्थः-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे मोटी इ० क्रद्धि प्रते प० पाम्या प० मनुष्य- नो भ० भव सफल मा० मानना वि० भ० भरत ए० एरवत वा० क्षेत्रे ए० एक स० समये ए. एक जु० युगे दो० वे अ. विचरे छे तं. ते ज० कहुंएं दे० देवकुर अरिहंतनावं० मोटा वंश उ० उपना पुर्वे वा० क्षेत्र चे० वळी उ० उत्तर कुरुक्षेत्र चे० व- वळी उ० उपजे छे वा० वळी उ० उपजस्येली ॥ १०-१४ ।। ९ ।। वा० वली ॥७॥ जम्बुद्दीवे दीवे दोसु कुरासु मणुया जम्बुद्दीवे दीवे भरहेरखएसु वासेसु सया सुसमसुसमं उत्तमं इढेि पत्ता पञ्च- एगसमए एगजुगे दो अरहन्तवं- णुभवमाणा विहरन्ति । तं जहा। देवकु- सा उप्पग्जिसु वा उप्पज्जन्ति वा उ- राए चेव उत्तरकुराए चेव ॥[१०-११]॥९॥ प्पज्जिस्सन्ति वा ॥ ७॥ भावार्थ:-जंबुट्टीपे वे 'कुरुने विपे मनुष्य स- भावार्थ:-जंयुद्वीपना भरत एरवंत क्षेत्रमा दाय मुखम मुखमा पहेला आरानी रुद्धि भो- एक सम एक युगे (युगते चंद्र ? चंद्र २ अ- गवतां युगळीयां विचरे छे ते वे कुलना नाम भिवर्धित : चंद्र ४ अभिवति ५६ पांच कहे छे, देवकुरु १, उत्तरकुरु २, ए ये कुरुमा वर्पनो एक युग याय.) वे अरिहंत भगवती सदाय पहेलो आरो छे, ए वे भेद है. म्होटा वंश उपन्या, उपजे छे ने वर्तमान चो- (१०-१४)९ घिसी आश्रीन भावने काळे उपजशे. ॥७॥ अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी द्वीपे दो अर्थ:-ए० एम च. चक्रवतिना ५० वंग वेवा क्षेत्रे म० मनुप्य स० सदा मुगु- द० वामदेवना वं० वा जा० यावत उ. पमा चीजो आगे ३ मोटी ३० द्धि पत्रे उपजो चा० बळी ।। ८-९॥८॥ प० पाम्या प० मनुष्य भ० मत सफल मा० एवं चकवट्टिवंसा दसावंसा जाव मानना वि० विचरे हे तं ने जकहूंछ १० दारिवपक्षेत्र चे० पटी र. रम्बग वर्प- उपज्जिस्सन्ति या ॥८-९] ॥८॥ क्षेत्र चे बळी ॥ १५॥१०॥ १२ मुख भोगवता 4 - (९०) हाणं सूत्र २. उहेसो ३. जम्बुद्दीवे दीवे दोसु वासेसु मणुया जम्बुद्दीवे दीवे दोसु खेत्तेसु मणुया सया सुसमं उत्तम इड्डिं पत्ता पचणु- सया दुस्समसुसमं उत्तमं इड्डिं पत्ता प- भवमाणा विहरन्ति । तं जहा । हरि- चणुभवमाणा विहरन्ति । तं जहा। पुत्व- वासे चेव रम्मगवासे चेव।।[१५]||१०॥ विदेहे चेव अवरविदेहे चेव ।।[१७]||१२|| भावार्थः-जंबुद्वीपे वे क्षेत्रने विपे मनुष्य भावार्थ:-जंबुद्दीपमां वे क्षेत्रने विपे मनुष्य सदाय मुखमा नामे वीजा आरानी उत्तम युगळीयां नथी, सदाय दुखमां सुखमां चोथा रुद्धी पाम्या सुख भोगवतां विचरे छे, ते क्षे आरानी उत्तय रुद्धि पाम्या ते वनां नाम कहेछे, हरिवर्पक्षेत्रे १, रम्यक वर्षक्षेत्रे विचरेछे; ते वे क्षेत्रनां नाम कहेछे, पूर्व महावि- २, ए वे भेद छे ॥१५॥ १० ॥ देहमां, पश्चिम महाविदेहमा २, ए छ युगळी- अर्थ:-ज० जस्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे यांना क्षेत्रमा अने महाविदहमां आरा फरता दो० वे वा० क्षेत्रने विपे म० मनुष्य स० स- नथी, ए वे भेद छे ॥ १७ ॥ १२ ॥ दा सु० सुपम दु० दुखमा नामे उ० उत्तम अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामा दी० द्वीपे इ० ऋद्धि प० पाम्या प० मनुष्य भ० भव । दो० वे वा० क्षेत्रमा म० मनुष्य छ, छ प्र- मा० प्रतिमुख भोगवता वि० विचरे छे तं० । कारे पि० पण का० काल मते ५० मनुष्य ते ज० कहुंछ हे० हेमवंत क्षेत्र चे० वळी ए. भ० भव मा० प्रतिमुप भागवता वि० विचरे एरणवंत क्षेत्र चे० वळी ॥ १६ ॥ ११ ॥ छे तं० ते ज० कईछु भ० भरतक्षेत्रे चे० व. जम्बुद्दीवे दीवे दोसु वासेसु मणुया ळी ए० एरवत क्षेत्रे चे० वळी ।। १८॥१३॥ सया सुसमदुस्समं उत्तमं इड्डि पत्ता प- जम्बुद्दीवे दीवे दोसु वासेसु मणुया छविहं पिकालं पञ्चणुभवमाणा विह- चणुभवमाणा विहरन्ति । तं जहा। हेमवए चेव एरन्नवए चेव ॥[१६]|॥११॥ रन्ति । तं जहा । भरहे चेव एवए भावार्थ:-जंबुद्वीपे वे क्षेत्रने विष मनुष्य चेव ।। [१८] ॥ १३ ॥ युगळीयां सदाय सुरखम दुःखमां त्रीजा आरा- भावार्थ:-जंबुद्वीपमां वे क्षेत्रमा मनुव्य छए नी उत्तम रूद्धी पाम्याने ते प्रकारे आराना काळ प्रत्ये भोगवता विचरे विचरेछे ते वे क्षेत्रनां नाम कहेछे, हेमवंत क्षेत्रे छे ते वे क्षेत्रनां नाम कहे छ, भरतक्षेत्रमा १, १, एरण्यवंत क्षेत्रे २, ए वे भेद छे ॥१६॥११॥ एरवंत क्षेत्रमा २, ए वे भेद छे ॥१८॥१३॥ अर्थ:-ज० :-ज० जम्बुढीप नामना दी० द्वीपे अर्थ:-ज० जम्बुद्वीप नामना दी० द्वीपे दो० वे खे० क्षेत्रने विपे म० मनुष्य स० स- दो० वे च० चन्द्रमा ५० अजवालु करताहवा वा० बळी प० उद्योत करछे वा० बळी प० दादु० दुखम स० सुपमा उ० उत्तम इ० रुद्धि प्रने प० पाम्या ५० मनुष्य भ० भव उद्योत करस्ये वा० वळी ॥ १ ॥ मा० प्रति सुख भोगवता वि०विचरेछे तं ते १२ पेरा (जंबुद्वीपमां काळलक्षण द्रव्य- ज० कईछं. पु० पुर्व महा विदेहमा चे० बळी पर्याय विशेष कह्या, हवेतो जंबुद्वीपमांज काळ अपश्चिम महा विदेहमा चेवनी॥१७॥१२॥ पदार्थ यतावनार ज्योतिषीनी परुपणा करेले) मुख भोगवतां r - हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. ( ९१) जम्बुद्दीचे दीवे दो चन्दा पभासिंसु अदा य पुणवसू य पुस्सो य । वा पभासन्ति वा पभासिस्सन्ति वा।। तत्तो वि अस्सलेसा भावार्थ:-जंबुद्वीपे वे चंद्रमा अतितकाळे महा य दो फरगुणीओ य॥१॥ अनवाल्लू करता हता, वर्तमानकाळे करे छे, भावार्थ:-वे कृतिका १, वे रोहिणी २, वे अनागतकाळे करशे, ए वे भेद छे ॥१॥ मृगसिर ३, वे आदा ४, वे पुनर्वसु ५, वे पुष्य अर्थः-दो वे मू० सूर्य त० तप्या अती- ६, ते वार पछी वे आश्लेषा ७, वे मघा ८, तकाले वा० वळी त० तपेछ वा० बळी त. पुर्वाफाल्गुणी ९, वे उत्तराफाल्गुणी १०॥१॥ तपस्ये वा० वळी ॥२॥ अर्थः-ह० हस्त चि० चित्रा सा० स्वाति दो सूरिया तवइंसु वा तवन्ति वा य० वळी वि० विशाखा त० तेमज य० तविस्सन्ति वा ॥२॥ वळी हो० होय अ० अणुराधा जे० जेष्टा मू० भावार्थ:-एमज जबुद्वीपमा सूर्य अतित- मूल पु० पुर्वापाढा य० बळी आ० आपाहा उ० उत्तर चे० वळी ॥२॥ काळे तप्या, वर्तमानकाळे तपेछे, अनागतकाळे हत्थो चित्ता साई य तपशे, ए वे भेद छे ॥ २॥ अर्थः-दो० वे क० कृतिका नक्षत्र दो०वे रो० विसाहा तह य होन्ति अणुराहा। रोहिणी दो० वे मि० मृगशिर दो० वे अ०आद्रा जेट्ठा मूलो पुवा य नक्षत्र ए० एम २८ नक्षत्र भा० जाणवा. आसाढा उत्तरा चेव ॥ २॥ १३ पेरा (वीजुं ठाणुंचालतुं होवाथी चंद्रोना भावार्थ:-चे हस्त ११, वे चित्रा १२, वे तथा तेना परिवारना वेवडापणुं वतावे छे.) स्वाति १३, वे विशाखा १४, वे अनुराधा १५, दो कत्तियाओ, दो रोहिणीओ, वे ज्येष्ठा १६, वे मुळ १७, वे पूर्वापाढा १८, दो मिगसिरा, दो अदाओ एवं भा- वे उत्तरापाढा १९ ॥ २॥ अर्थ: -अ० अभिच स० श्रवण घ० ध- णियव्वं निष्टा स० शतभिषा दो० वे य० वळी हो भावार्थ:-एम जंबुद्वीपमां वे कृतिका नक्षत्र | होय भ० पूर्व ने उत्तर भद्रपद रे० रेवती अ० छे, वे रोहिणी नक्षत्र छे, वे मृगसर नक्षत्र छे, अवनि भ० भरणी ने० जाणवा आ० अनु- वे आर्द्रा नक्षत्र छे, एम अठावीस नक्षत्र गा- क्रमे छे ॥ ३ ॥ थाथी जाणवा. अभिई सवणधणिट्ठा अर्थ:-क. कृतिका रो० रोहिणी मि० मृ. गशिर अ० आद्रा य० वळी पु० पुनर्वसु य० सयभिसया दोय होन्ति भद्दवया। पळी पु० पुप्य य० वळी त० तेवार पछी खइअस्सिणिभरणी वि० वळी अ० अश्लेपा म० महा य० वळी नेयवा आणुपुबीए ॥३॥ दो० वे फ० पुर्व तथा उत्तर फालगुनी य० भावार्थ:-निश्वे वे अभिजीत २०, वे श्रवण वळी ॥१॥ २१, वे धनिष्टा २२, शतभिशां२३, वळी होय कत्तियरोहिणिमिगसिर वे पूर्वाभाद्रपद २४, वे उत्तरा भाद्रपद २५, वे , , वे , . (९२) हाणं सूत्र २. उद्रेसो ३. + - . . रेवती २६, वे अश्वनी २७, वे भरणी २८, एम अनुक्रमे वे वे जाणवा ॥ ३ ॥ अर्थः-ए० एम गा० गाथाने अ० अनु- सारे ने० जाणवू जा० यावत दो० वे भ० भरणी ए २८ नक्षत्र एवं गाहाणुसारेणं नेयव् जाव दो भरणीओ॥ भावार्थ:-एम गाथाने अनुसारे यावत भरणी लगी जाणवा ए सर्वे वे वे भेद छे अर्थः-दो० वे अ० अग्नी देवता ॥१॥ १४ पेरा (कृतीकाथी अठावीश नक्षत्रोनाक्रम वडे अग्नी आदी अठावीश देवता होय छे ते कहे छे.) दो अग्गी ॥१॥ भावार्थ:-हवे ए पूर्वोक्त अठावीस नक्षत्रना ताराना अठावीस देवता स्वामी छे ते कहे छे, वे अग्नीदेवता ॥१॥ अर्थ:-दो० वे प० प्रजापती देवता ॥२॥ दो पयावई ॥ २॥ भावार्थ:-त्रे प्रजापती देवता ॥ २॥ अर्थः-दो वे सो० सोमदेवता ॥ ३ ॥ दो सोमा ॥३॥ भावार्थ:-वे सोमदेवता ॥३॥ अर्थ:-दो० वे रु० रुद्रदेवता॥ ४ ॥ दो रुदा ॥४॥ भावार्थ:-वे रुद्रदेवता ॥४॥ अर्थः-दो० वे अ० आदित्यदेवता ॥५॥ दो अइई ॥ ५॥ भावार्थ:-ये अदिती देवता ॥ ५ ॥ अर्थ:-दो०वे व० वृहस्पती नामे देवता॥६॥ दो वहस्सई ॥६॥ भावार्थ:- बृहस्पतीदेवता ॥ ६ ॥ अर्थः-दो० वे स०सपि नामे देवता॥ दो सप्पा ॥ ७॥ भावार्थ:-चे सर्प ते नाग नामे देवता॥७॥ अर्थ:-दो० वे पि० पितर नामे देवता ||८|| दो पिई॥८॥ भावार्थ:-वे पितरनामे देवता ॥८॥ अर्थ:-दो वे भ० भन नामे देवता ॥९॥ दो भगा ॥९॥ भावार्थ:-वे भ्रग नामे देवता ॥९॥ अर्थः-दो० वे अ० अर्यमा नामे देवता ॥१०॥ दो अज्जमा ॥१०॥ भावार्थः-बे अर्थमाण नामे देवता ॥१०॥ अर्थः-दोवेस०सवितार नामे देवता।।११।। दो सविया ॥ ११ ॥ भावार्थः-चे सविता नामे देवता ॥११॥ अर्थः-दो० वे त० त्वष्टा नामे देवता ॥१२॥ दो तहा ॥ १२॥ भावार्थ:-वे त्वष्टा नामे देवता ॥१२॥ अर्थः-दो वेवा० वायु नामे देवता॥१३॥ दो वाऊ ॥ १३ ॥ भावार्थ:-चे वायु 'नामे देवता ॥१३॥ अर्थः-दो वेइ० इंद्राग्री नामे देवता ।।१४।। दो इन्दग्गी ॥ १४ ॥ भावार्थः वे इंद्राग्नि नामे देवता ॥१४॥ अर्थः-दो० वे मि० मित्र नामे देवता॥१५॥ दो मित्ता ॥१५॥ भावार्थ:-वे मित्र नामे देवता ||१५|| अर्थः-दो वे इ० इन्द्र नामे देवता।।१६।। दो इन्दा ॥ १६ ॥ भावार्थः चे इंद्र नामे देवता ॥१६॥ अर्थः-दो०वे नि निजृतीनाये देवता ॥१७॥ दो निरई ॥ १७ ॥ . 1 " -- हाणं सूत्र २. उद्देसो (९३) - भावार्थ:-बे-निरती नामे देवता ॥२७॥ अर्थः-दो बेय० यमदेव नामे देवता ॥२८॥ अर्थ:-दो०. वे आ० आऊ-जळ, (ब्राह्मण) दो यमा ॥ २८॥ नामे देवता ॥१८॥ भावार्थ:-वे-यम नामे देवता॥२८॥ दो आऊ,॥ १८॥ ए अठाविस नक्षेत्रना-स्वामी-ए-सर्वे वे वे भावार्थः वे आप ते जळ नामे देवता ॥१८॥ जाणवा. अर्थः-दो वे वि० विश्व नामे देवता॥१९॥ अर्थः-दो० वे इ० मगळ ॥ १ ॥ १५ पेरा (अंगारक आदी अठाशी ग्रहोना दो विस्सा ॥ १९ ॥ नाम दे छे. भावार्थ:-वे विश्व नामे ॥१९॥ दो इङ्गालगा ॥१॥ अर्थ:-दो० बेव० ब्रह्म नामे देवता॥२०॥ भावार्थ:-हवे अठयासी ग्रहनां नाम कहे दो बम्हा ॥ २० ॥ छे. वे अंगारक ते मंगळ ॥२॥ भावार्थ:-बे ब्रह्मा नामे देवता ॥२०॥ अर्थः-दो० वे वि० व्याल ॥ २ ॥ अर्थः-दो० वे वि०विष्नु नामे देवता ॥२१॥ दो वियालगा ॥२॥ दो विण्ह ॥ २१ ॥ भावार्थ:- वे व्याल ॥२॥ भावार्थ:-वे विष्नु नामे देवता ॥२१॥ अर्थ:-दो० वे लो० लोहितक्षा ॥ ३ ॥ अर्थः-दो० वे व० वसुनामे देवता॥२२॥ दो लोहियक्वा ॥३॥ दो वसू ॥ २२ ॥ भावार्थ:-बे लोहिताक्ष ॥३॥ भावार्थ:-वे वसु नामे देवताः॥२२॥ अर्थः-दो बे स० शनीश्वर ॥४॥ अर्थः-दो वेव० वरुण नामे देवता ॥२३॥ दो सणिच्छरा ॥४॥ दो वरुणा ॥ २३ ॥ भावार्थ:-वे शनिश्चर ॥४॥ भावार्थ:-वे वरुण नामे देवता:॥२३॥ अर्थः-दो वे आ-आहुनिकः॥ ५ ॥ अर्थ:-दो० वे अ० अजनामे देवता.॥२४॥ दो आहुणिया ॥५॥ दो अया-॥२४॥ भावार्थ:-वे आहुनिक ५॥ भावार्थ:-वे अजः नामे देवता ॥२४॥ अर्थः-दो० वे पा० माहुणिक ॥६॥ अर्थः-दो० चे वि० वृद्धि नामे देवता ॥२५॥ दो पाहुणिया ॥ ६ ॥ दो विविद्धीः॥ २५ ॥ भावार्थ:-वे पाहुणिक ॥६॥ भावार्थः-वे वृद्धि नामे देवता ॥२५॥ अर्थः-दो० वे क० काण ॥ ७॥ अर्थः-दो० वे पु० पुंषा नामे देवता ॥२६॥ दो कणा ॥७॥ दो पुस्सा ॥ २६ ॥ भावार्थ:-बे कांण ||७॥ भावार्थ:-चे पुंस नामे देवता ॥२६॥ अर्थ:-दो० वे क० कनक ।। ८॥ अर्थः-दो० वे अ० अश्व नामे देवता ॥२७॥ दो कणगा॥८॥ दो अस्सी ।। २७॥ भावार्थः-वे कनक ॥८॥ भावार्थ:-चे अश्व नामे देवता ॥२णा अर्थः-दो बेक कनकनक ॥९॥ . 1 h (९४ ) हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. - दो कणकणगा ॥ ९॥ भावार्थ:-वे कनकनक ॥९॥ अर्थः-दो० वे क० कनकवितानक ॥ १०॥ दो कणगवियाणगा ॥१०॥ भावार्थ:-वे कनकवितानक ॥१०॥ अर्थः-दो० वे क० कनकसंतानक ॥११॥ दो कणगसंताणगा ॥ ११॥ भावार्थ:-वे कनक संतानक ॥११॥ अर्थः-दो० वे सो० सोम ॥ १२ ॥ दो सोमा ।। १२॥ भावार्थ:-वे सोम ॥१२॥ अर्थः-दो० वे स० सहितनामा ॥ १३ ॥ दो सहिया ॥ १३॥ भावार्थ:-वे सहित ॥१३॥ अर्थः-दो० वे आ० अश्वासन ॥ १४ ॥ दो आसासणा ॥ १४ ॥ भावार्थ:-वे अश्वासन ॥१४॥ अर्थः-दो० वे क० कजावग ॥ १५ ॥ दो कज्जोवगा ॥१५॥ भावार्थः-वे कजजोवग ॥१५॥ अर्थः-दो० वे क० कर्बट ॥ १६ ॥ दो कवडगा ॥१६॥ भावार्थ:-वे कर्बट ॥१६॥ अर्थः-दो० वे अ० अयस्कर ॥ १७॥ दो अयकरगा ॥ १७ ॥ भावार्थःचे अयस्कर ||१७|| अर्थ:-दो० वे दु० दुंदुभग ॥ १८ ॥ दो दुन्दुभगा ॥१८॥ भावार्थ:-चे दुंदुभक ॥१८ अर्थः-दो० वे सं० शंख नामे ॥ १२ ॥ दो सङ्खा ॥ १९ ॥ भावार्थ:- शंख ॥१९॥ अर्थः-दो वे स० शंखवर्ण नामे ॥२०॥ दो सङ्घवन्ना ॥ २०॥ भावार्थ:- शंखवर्ण ॥२०॥ अर्थः-दो० वे स० शंखवर्णाभ नामे ॥२१॥ दो सङ्खवण्णाभा ॥ २१ ॥ भावार्थः वे शंखवाम ॥२१॥ अर्थः-दो० वे कं० कंस नामे ॥ २२ ॥ दो कंसा ॥ २२॥ भावार्थ:-वे कंश ॥२२॥ अर्थः-दो० वे कं० कंसवर्ण ॥ २३ ॥ दो कंसवन्ना ॥ २३ ॥ भावार्थः-वे कंशवर्ण ॥२३॥ अर्थः-दो० वे कं० कंसवर्णाभ ॥ २४ ॥ दो कंसवण्णाभा ॥ २४ ॥ भावार्थ:-वे कंशवर्णाभ ॥२४॥ अर्थः-दो० वे रु० रुप्पी ॥ २५ ॥ दो रुप्पी ।। २५ ॥ भावार्थ:-वे रुपी ॥२५॥ अर्थः-दो० वे रु० रुप्पाभ नाम ॥२६॥ दो रुप्पाभासा ॥ २६ ॥ भावार्थ:-वे रुप्याभ ॥२६॥ अर्थः-दो० वे नी० नीलग्रह ।। २७ ॥ दो नीला ॥ २७॥ भावार्थ:-वे नील ॥२७॥ अर्थः-दो० वे नी० नीलाभासानामे ||२८|| दो नीलाभासा ।। २८॥ भावार्थ:-वे नीलाभास ॥२८॥ अर्थः-दो० वे भा० भस्मग्रह ॥ २९ ॥ दो भासा ॥ २९ ॥ भावार्थ:-चे भस्म ॥२९॥ अर्थः-दो० वे भा० भस्मराशीग्रह |॥३०॥ दो भासरासी ॥ ३०॥ , .
1 हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. (९५) - भावार्थ:-चे, भस्मराशी ॥३०॥ दो वुहा ॥ ४१॥ अर्थः-दो० वे ति० तिल ॥ ३१ ॥ भावार्थ:-वे बुध ॥ ४१ ॥ दो तिला ॥ ३१॥ अर्थः-दो० वे सु० श्रुक्र ॥ ४२ ॥ भावार्थ:-वे तिल ॥३१॥ दो सुक्का ॥ ४२ ॥ अर्थः-दो० वे ति० तिलपुष्पवर्ण ॥३२॥ भावार्थ:-वे शुक्र ॥ ४२ ॥ दो तिलपुष्फवण्णा ॥ ३२॥ अर्थः-दो० वे व० बृहस्पति ॥ ४३ ॥ भावार्थ:-बे तिल पुष्पवर्ण ॥३२॥ दो वहस्सई ॥ ४३ ॥ अर्थः-दो० वे द० दक नामे ॥ ३३ ॥ भावार्थ:-वे बृहस्पति ।। ४३ ।। दो दगा ॥ ३३॥ अर्थः-दो० वे रा० राहु ॥ ४४ ॥ भावार्थ:-चे दक ॥३३॥ दो राहू ॥४४॥ अर्थ:-दो० चे द० दक पंचवर्ण नामे३४॥ भावार्थ:-चे राहु ॥ ४४ ॥ दो दगपञ्चवण्णा ॥३४॥ अर्थः-दो० वे अ० अगस्ती ॥ ४५ ॥ भावार्थ:-चे दक पंचवर्ण ॥३४॥ दो अगत्थी ॥ ४५ ॥ अर्थः-दो० वे का० काक नामे ॥ ३५ ॥ भावार्थ:-चे अगस्ति ॥४५॥ दो काका ॥ ३५॥ अर्थ:-दो० वे मा० मानवक ॥ ४६ ॥ भावार्थ:-वे काक ॥३५॥ दो माणवगा॥ ४६॥ अर्थः-दो० वे का कर्कध नामे ॥ ३६॥ भावार्थ:-बे माणवक ।। ४६ ॥ दो कायवञ्झा ॥३६॥ अर्थः-दो० वे का० काश्य ॥ ४७ ॥ भावार्थ:- ककुध ॥३६॥ दो कासा ।। ४७॥ अर्थः-दो० वे इ० इन्द्रीगी ।। ३७ ॥ भावार्थ:-वे कास ॥ ४७ ।। दो इन्दग्गी ॥३७॥ अर्थः-दो० वे फा० फर्श ।। ४८ ।। भावार्थ:-वे इंद्राग्नि ॥३७॥ दो फासा ॥४८॥ अर्थः-दो० वे धू० धूमकेतु नामे ॥३८॥ भावार्थ:-वे स्पर्श ।। ४८॥ दो धूमकेऊ ॥ ३८॥ अर्थः-दो० वे धु० धुर ॥ ४९ ॥ भावार्थःचे धुमकेतु ॥३८॥ । दो धुरा ॥ ४९ ॥ अर्थः-दो० वे ह० हरीनामे ॥ ३९ ॥ भावार्थ:-वे धुर ॥४९॥ दो हरी ॥ ३९॥ अर्थः-दो० वे प० प्रमुष ॥ ५० ॥ भावार्थ:-चे हरि ॥३९॥ दो पमुहा ॥५०॥ अर्थः-दो० वे पि० पिंगला ॥ ४० ॥ भावार्थ:-चे प्रमुख ॥ ५० ॥ दो पिङ्गलगा ॥ ४० ॥ अर्थः-दो० वे वि० विकट ॥ ५१ ॥ भावार्थ:-वे पिंगल ॥४०॥ दो वियडा ।। ५१ ॥ अर्थः-दो० वे बु० बुद्ध ॥ ४१ ॥ भावार्थ:-वे विकट ॥ २१ ॥ - 1 1 - (९६) हाणसूत्र २. उद्देसी' ३. अर्थः-दो० वे वि० विसंधी.॥ ५२ ॥ भावार्थ:-वे वर्धमानः।। ६२॥ दो विसंधी ॥ ५२॥ अर्थः दो वे प० लव ॥ ६३ ॥ भावार्थ:-चे विसंधी ॥ ५२ ॥ दो पलम्बा ॥ ६३ ॥ अर्थः-दो बे नि० नियल ॥ ५३॥ भावार्थ:-वे प्रलंब ॥६३ ॥ दो नियल्ला ॥ ५३॥ अर्थः-दो० वे निः नित्यलोक ॥ ६४।। भावार्थ:-वे नियल ॥ ५३॥ दो निचालोंगा ।। ६४॥ अर्थः-दो० वे प० पइल ॥ ५४॥ भावार्थः-वे नित्यालोक ॥ ६४ ॥ दो पयल्ला ॥ ५४॥ अर्थः-दो० वे नि० नित्याजोत ॥६५॥ भावार्थ:-वे पइल ॥ ५४॥ दो निचुज्जोया ॥ ६५ ॥ अर्थः-दो० वे ज० जडितालक ॥ ५५॥ भावार्थ:-वे नित्योद्योत ॥६५॥ दो जडियाइलया ॥ ५५ ॥ अर्थ:-दो० वे स० सयंप्रभः ॥ ६६ ॥ भावार्थ:-चे जडीतालक ।। ५५ ।। दो सयंपभा ॥ ६६॥ . अर्थ:-दो० वे अ० अरुण ॥ ५६ ॥ भावार्थः-वे स्वयंप्रभ ॥ ६६ ॥ दो अरुणा ॥ ५६ ॥ अर्थः-दो० वे ओ० उभासा ॥ ६७ ॥ भावार्थ:-वे'अरुण ॥ ५६ ॥ दो ओभासा ।। ६७॥ अर्थः-दो० बे अ० अगिला ॥ ५७ ॥ भावार्थ:-वे उभास ॥ ६७ ॥ दो अग्गिल्ला ॥ ५७॥ अर्थः-दो० वे से० श्रेयकार ॥ ६८ ॥ भावार्थ:-वे अगिल ॥ ५७॥ दो सेयंकरा ॥ ६८॥ अर्थः-दो० वे का० कालग्रह ॥ ५८ ॥ भावार्थः-वे श्रेयंकर ॥ ६८ ॥ दो काला ॥ ५८ ॥ अर्थ-दो० वे खे० खेमकार ॥ ६९ ॥ भावार्थ: चे काळ ॥ ५८ ॥ दो खेमंकरा ॥ ६९ ॥ अर्थ:-दो बे म० महाकाल ॥ ५९॥ भावार्थ:-चे खेमंकर ॥ ६९ ॥ दो महाकालगा ॥ ५९॥ अर्थः-दो० वे आ० आभंकर ।। ७० ॥ भावार्थ:-वे महाकाळ ॥ ५९॥ दो आभंकरा ॥ ७० ॥ अर्थः-दो० वे सो० स्वस्तिक ॥६० ॥ भावार्थ:-वे अभंकर ॥ ७० ॥ दो सोत्थियाः॥ ६०॥ अर्थः-दो० वे प० प्रभंकर ।। ७१ ॥ भावार्थ:-वे स्वस्तिक ॥६०॥ दो पंभंकरा ।। ७१ ॥ अर्थः-दो० वे सो० सोवस्तिक ॥६१ ॥ भावार्थ:-चे प्रभंकर ॥ ७१ ॥ दो सोवत्थिया ॥ ६१ ॥ अर्थः दो० वे अ० अपराजित ।। ७२ ।। भावार्थ:-वे सौवस्तिक॥ ६१॥.. दो अपराजिया ॥ ७२॥ अर्थ:-दो० वे व० वर्धमान ॥ १२ ॥ भावार्थ:-चे अपराजीत ७२ ॥ दो वद्धमाणगा ।। ६२-1. अर्थः-दो वे अ० अरज ॥ ७३ ।। . - -- ॥ ८७ हाणं मूत्र २. उढेसो ३. ( ९७.) दो अरया ॥ ७३॥ भावार्थ:-बे एक जडी ॥ ८३ ॥ भावार्थ:-बे अरज ॥ ७३.॥ अर्थः-दो० वे दु० द्वीजडी ॥ ८४ ॥ अर्थ:-दो० वे अ० अशोक ॥ ७४ ॥ दो दुजडी ॥ ८४॥ दो असोगा ॥ ७४॥ भावार्थ:-वे द्विजडी ॥ ८४ ॥ भावार्थ:-वे अशोक ॥ ७४ ॥ अर्थः-दो० वे क० करकरिक ॥८५ ॥ अर्थः-दो० वे वि० विगतशोक ॥ ७९ ॥ दो करकरिगा ।। ८५॥ दो विगयसोगा ।। ७५॥ भावार्थ:-वे करकरिक ॥ ८५ ॥ भावार्थ:-वे वित्तशोक ॥ ७५ ॥ अर्थ:-दो० वे रा० राजगल ॥ ८६ ॥ “अर्थ:-दा० - वि० विमल ॥ ७६ ॥ दो रायग्गला ॥ ८६॥ दो विमला ॥ ७६ ॥ भावार्थ:-चे राजगल ।। ८६ ॥ भावार्थ:-वे विमळ ॥ ७६ ॥ अर्थ:-दो० वे पु० पुप्फकेतु ॥ ८७ ॥ अर्थः-दो० वे वि० विततना ॥ ७७ ॥ दो पुप्फकेऊ १॥ दो वितत्ता ॥ ७७॥ भावार्थ:-वे पुष्पकेतु ॥ ८७॥ अर्थः-दो० वे भा० भावकेतु ॥ ८८ ॥ भावार्थ:-वे वितत ॥ ७७ ॥ दो भावकेऊ ॥८८॥ अर्थः-दो० वे वि० वित्रस्त ॥ ७८ ॥ दो वितत्था ॥ ७८॥ भावार्थः-वे भावकेतु ॥८॥ ए सर्वे ८८ भावार्थ:-वे वित्रस्त ॥ ७८ ॥ ग्रह वे वे जाणवा. अर्थ:- अर्थः-दो० वे वि० विसाल ॥ ७९ ॥ :-ज० जम्बुद्वीपणं० नामना दी० द्वीपे वे० वेदिका दो० वे गा० गाउ उ० उंची उ० दो विसाला ॥७९॥ उश्चपणे प० कही भावार्थः-वे विशाल ॥ ७९ ॥ १६ पेरा ( जंबुद्वीपना अधिकारने लोधे अर्थः-दो० वे सा० साल ॥ ८० ॥ आटलं वधारे ते संबंधमां कहे छे.) दो साला ॥ ८०॥ जम्बुद्दीवस्स णं दीवस्स वेइया दो भावार्थ:-चे शाल ॥ ८० ॥ गाउयाई उड्ठं उच्चत्तेणं पन्नत्ता ॥ अर्थः-दो० वे मु० सुवया ॥ ८१॥ भावार्थ:-जंबुद्विप नामे द्विपनी वेदिका दो सुवया ॥ ८१॥ कोट सरखी ते आठ जोजननी उंची ते उपर भावार्थः-वे (युक्तक) सुवया ॥ ८१॥ वळी घे गाउ उंची पांचसें धनुष्य पहोली अर्थ:-दो० वे अ० अणिवति ॥ ८२ ॥ नाना (विचित्र) रत्नमय पद्मवर वेदिका दो अणियट्टी ।। ८२॥ भावार्थ:-वे अनिवर्त ।। ८२॥ अर्थः-ल० लवण णं० नामनो स० समुद्र अर्थः-दो० वे ए० एकजडी ॥ ८३॥ दो० वे जो० जोजन स० सो स० हजार एटले दो एगजडी ।। ८३॥ वे लाख च० चक्रवाल वि० पोहोलपणे ५० १३ t 4 - । । कही छे. . T 4 (९८) हाणे सूत्र २. उदेसो को ल० लवण पं० नामना स० समुद्रनी अर्थ:-ए० एम ज० जेमा जब जन्धी वे. वेदिका दो० वे गा० गाउ“उ० उंची त० तेम ए० अहीपण भा० जाणवू जा० यावर उ० उंचपणे पं० कही दो० वे वा० क्षेत्रने विपे म० मनुष्य छ. १७ पेरा (जंबुद्वीप संबंधी कह्या पछी ल मकारना पि० वळी का० काल प्रते.प. मनुः वणसमुद्र संबंधी कहे छे.) ष्य भ० भव मा० मते सुख भोगवता' वि० लवणे णं समुद्दे दोजोयणसयसह- विचरे तं० ते ज० कहुंछु भ० भरत चे० वळी ए० एरवत चे० वळी न० एटलो विशेष कृ स्साई चक्कवालविक्खम्भेणं पण्णत्ते॥१॥ कूट सामली वृक्ष चे० वळी धा० धातकी रु० लवणस्स णं समुदस्स वेइया दो वृक्ष चे० वळी दे० देवता ग० गरुल नामे चे० गाउयाइं उ8 उच्चत्तेणं पण्णत्ता ॥२॥ वळी वे० वेणु देवता सु० सुदर्शन देवता चे० वळी ।। २.॥ भावार्थ:-लवणसमुद्र वे लाख जोजन प- होळपणे चक्रवाळ मंडळ तेहगें पहोळपणछे ए- एवं जहा जम्बुद्दीवे तहा एत्य भा- टले पूर्वथी पश्चिमने काटे दक्षीणथी उत्तरे वे | णियब्वं जाव दोसु वासेसु मणुया छ. लाख जोजन पोहोळपणे कहेलछे. लवण स- विहं पि कालं पञ्चणुभवमाणा विहर- मुद्रना कोटनी उपरली वेदिका वे गाउनी उं- न्ति तं जहा भरहे चेव एवए चेव। चपणे कही छे. अर्थः-धा० धातकी खं० खंड नामना दी० नवरं कूडसामली चेव धायइरुक्खे चेव द्वीपे पु० पूर्वाधने णं० विपे म मेरु प०५- देवा गरुले चेव वेणुदेवे सुदंसणे चेव तथी उ० उत्तर दा० दक्षिण दिसे दो वे ॥२॥ वा० क्षेत्र पं० का व० घणा स० सरपा भावार्थ:-एम जेम जंबुद्विपमा छे तेम इहा, जा० यावत भ० भरत चे० वळी ए० एरवत पण जागवू यावत वे क्षेत्रने विपे' मनुष्य उ चे० वळी ॥१॥ प्रकारना काळ प्रत्ये भोगवता विचरे छेते १८ पेरा (क्षेत्रना प्रस्तावथी लवणसमुद्र सं- क्षेत्रनां नाम कहे छे, एक भरतक्षेत्रे ? चीजें, बंधी कह्या पछी घातकीखंड संबंधी कहेछे.) एरवत क्षेत्रे २ ए वे भेद छे.. एटलो विशेष धायइस्खण्डे दीवे पुरथिमद्धे ण-म- तिहां कुट शामली वृक्ष छे १, वीजु घातात न्दर र पववत्स उत्तरदाहिणेणं दो वा-नामे देवता रहेछे १, अने घातकी दृक्षने विष २.तिहां कुट सामली इतने विषे गरुल सा एण्यत्ता बहुसमउल्ला जाव भरहे वेणुदेवता रहे के जेहनुं दर्शन मियकारी चेच एखए 'चव ॥१॥ तेधी तेहतुं वीजें नाम सुदर्शन पणछे २, एने भावार्थः-घातकी खंडना पूर्वार्धने विषे. मेरु | भेद छे ॥ २ ॥ पर्वतधी उत्तर अने दक्षीणे वे क्षेत्र तानीए क अर्थ:-धान्धातकी खदखद दीन्द्वीपे प०९ हेल छे ते घणा सरखा छे यावत वरावर-छे थिमार्धने विपे-म० मेरु प० पर्वतयी उ० उत्तर तेवे क्षेत्रनो नाम कहे, एक भरतक्षेत्र १, वीनुं दा० दलिणे दो० वे वा० क्षेत्र पं० कया व० एरवत, ए वे भेदं छे ॥१॥ घणा स०समाजा. यावत भ० भरत वे०वळी छ 1 + 1 ~ हाणं सूत्र २. उदेसो ३. (९९ ) ए०,एरवत चे० वळी जा. यावत छ०.छ प्र १९ पेरा ( पुर्वाध अने पश्चिमा मळीने कारना पि० वळी का० काल प्रते प० मनुष्य । घातकी खंड नामना संपुर्ण द्वीपने आश्रीने भ० भव मा०. प्रते सुख भोगवतो विचरे न० | बे सूत्रो कहे छे.) एटलो विशेष कू० कूट सामली वृक्ष चेवळी धायईखण्डे णं दीवे दो भरहाई॥१॥ म०महा धा०धातकी रु०वृक्ष चे० वळी दे०दे- भावार्थ:-घातकीखंड द्विपने विषे वे भर- पता ग० गरुल चे० वळी वे० वेणु देव पि० | तक्षेत्र छे ॥१॥ प्रिय दर्शन देवता चे० वळी ॥ ३ ॥ अर्थः-दो० वे ए० एरवत क्षेत्र ॥२॥ धायइक्खण्डदीवपच्छत्थिमद्धेणं म दो एरवयाई ॥२॥ न्दरस्स पचयस्स उत्तरदाहिणणं दो वा भावार्थ:-बे एरवत क्षेत्र छे ॥२॥ अर्थः-दो० वे हे० हेमवंतक्षेत्र ॥ ३ ॥ सा पण्णत्ता बहुसमउल्ला जाव भरहे चेव एवए चेव जाव छविहं पि कालं दो हेमवयाई ॥३॥ भावार्थ:-बे हिमवंत क्षेत्र छे ॥ ३ ॥ पञ्चणुभवमाणा । नवरं कूडसामली अर्थः-दो० वे हे० हिरणवंतक्षेत्र ॥ ४ ॥ चेव महाधायईरुक्खे चेव देवा गरुले दो हेरण्णवयाइं ॥ ४॥ चेव वेणुदेवे पियदंसणे चेव ॥३॥ भावार्थ:-चे हेरण्यवंत क्षेत्र छे ॥४॥ अर्थ:-दो० वे ह० हरिवर्षक्षेत्र ॥५॥ भावार्थ:-घातकीखंड द्विपना पश्चिमाधने विषे'मेरुपर्वतने उत्तर दक्षीणे वे वास कहेलांछे दो हरिखासाई ॥ ५॥ एटले क्षेत्र कडेलछे ते बे घणां सरखांछे यावत भावार्थ:-वे हरिवास क्षेत्र छे ॥५॥ । मान प्रमाणे करी सरखां छे, ते वे क्षेत्रनां अर्थ:-दो० वे र० रम्यकक्षेत्र ॥ ६ ॥ का नाम कहे छे, एक भरतक्षेत्र १, वीजें एरवत दो रम्मगवासाइं ॥ ६॥ क्षेत्र २, ए वे भेद छे, यावत तिहांना मनुष्य भावार्थः चे रम्यकवर्ष क्षेत्र छे ॥ ६ ॥ । छ आरानां मुख दुःख प्रत्ये भोगवता विचरे अर्थ:-दो वे पु० पुर्वमहाविदेहक्षेत्र ॥७॥ छे, फरता आरा आवे ते एक भरतक्षेत्रमा १, दो पुत्वविदेहाई ॥ ७॥ वीजें एरवत क्षेत्रमा २, ए वे क्षेत्रमा एकज इस फाळभाव वर्ते छे, एटलो विशेष छ, तिहां कुट भावार्थः-चे पूर्व महाविदेह क्षेत्र छ ॥७॥ शिामली नामे वृक्ष छे १, वीजुं महाघातकी नामे अर्थ:-दोव्वे अ०पश्चिम महाविदहक्षेत्र ॥८॥ 'दक्ष छे २: तिहां कुट शामली वृक्षने विषे दो अवरविदेहाई ॥८॥ । गरुल नामे देवता रहे छे १, महाघातकी - भावार्थी-वे पश्चिम महाविदेह क्षेत्र छे॥८॥ क्षने विषे वेणु नामे देवता रहे छे जेहनुं दर्शन [ए महाविदेहमा सदाय चोथो आरो छे], द मियकारी छे तेथी तेनुं वीजें नाम मितिदर्शन अर्थः-दोघे दे० देवकुरुक्षेत्र ॥ ९ ॥ इ छे २, ए वे भेद छ ॥ ३॥ दो देवकुराओ ॥९॥ शा. अर्थ:-धाब्यातकी ख०खण्ड पं०वळी दी. भावार्थ:-वे देवकृरु युगळीयांनां क्षेत्रछे ॥२॥ दीपने विषे दो० वे भ० भरतक्षेत्र ॥१॥ अर्थ:-दो० वे दे० देवकुरु म० मोटा दु० - नामे हत न (१००) हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. वृक्ष ॥ १० ॥ भावार्थ:-वे निषध पर्वत छे ॥ १७ ॥ अर्थः-दो० वे नि० नीळवंत ॥ १८ ॥ दो देवकुरुमहद्दुमा ॥ १० ॥ दो नीलवन्ता ॥ १८॥ भावार्थः-वे देवकुरु नामे म्होटां वृक्ष रत्न- भावार्थ:-वे नीलवंत पर्वत छे ॥१८॥ मय शास्वतां छे ॥१०॥ अर्थः-दो वे दे० देवकुरु म० मोटा दु० अर्थः-दो० वे रु० रुपीपर्वत ॥ १९ ॥ वृक्ष वा० रहेनार दे० देव ॥ ११ ॥ दो रुप्पी ॥ १९ ॥ दो देवकुरुमहद्दुमवासी देवा ॥११॥ भावार्थ:-वे रुपी पर्वत छे ॥ १९ ॥ अर्थः-दो० वे खि० शिषरीपर्वत ॥२०॥ भावार्थ:-वे देवकुरु म्होटा वृक्षना वासी दो सिहरी ॥२०॥ देवता छे ॥ ११॥ अर्थः-दो० वे उ० उत्तरकुराक्षेत्र ॥१२॥ भावार्थ:-चे शिखरी पर्वत छे ॥ २० ॥ दो उत्तरकुराओ ॥१२॥ अर्थः-दो० वे स० शब्दापाती, वैतादय छे.॥२१॥ भावार्थ:-वळी तेहज घातकीखंडमां वे उ- दो सद्दावई ॥२१॥ त्तरकुरु युगळीयांनां क्षेत्र छे ॥१२॥ अर्थः-दो वे उ० उत्तरकुरुनामे म०मोटा पर्वत छ ।,२१ ॥ भावार्थ:-वे शब्दापाती नामे वृत वैताप हु० वृक्ष ॥ १३ ॥ अर्थः-दो० वे स० शब्दापातीना वा० २- दो उत्तरकुरुमहद्दुमा ॥ १३ ॥ हेनार सा० स्वातीनामे दे० देवता ॥२२॥ भावार्थ:-तिहां उत्तरकुरु नामे वे म्होटां दो सद्दावइवासी साइदेवा ॥२२॥ वृक्ष छे ॥ १३ ॥ भावार्थ:-वे शब्दापाती वैतादयना वासी अर्थ:-दो वे उ० उत्तरकुरु म० मोटा। स्वाती देवता छे ॥ २२ ॥ दु० वृक्षना वा० रहेनार दे० देवता॥१४॥ अर्थः-दो वे वि०विकटापाती वैताढय ||२१ दो उत्तरकुरुमहद्दुमवासी देवा॥१४॥ दो वियडावई ॥ २३ ॥ भावार्थ:-वे उत्तरकुरु म्होटा वृक्षना वासी भावार्थ:-वे विकटापाती वैतादय पर्वत, देवता छे ॥ १४ ॥ छे ॥ २३ ॥ अर्थः-दो वे चु०चुल हि हिमवंतपर्वत ॥१५॥ रहना प० प्रभासनामे दे० देव ।। २४ ।। अर्थ:-दो० वे वि० विकटापातीना वा दो चुल्लहिमवन्ता ॥ १५ ॥ भावार्थः-वे लघु हिमवंत पर्वत छे ॥१५॥ दो वियडावइवासीपभासा देवा ॥२॥ अर्थः-दो० चे म० मोटा हिमवंत ॥१६॥ भावार्थ:-वे विकटापाती वैतादयना वासी दो महाहिमवन्ता ॥ १६ ॥ प्रमास नामे देवता छे ॥२४॥ अर्थः-दो० वे गं गंधापाती ॥ २५ ॥ भावार्थःचे म्होटा हिमवंत पर्वतछे ॥१६॥ दो गन्धावई ॥ २५ ॥ अर्थ:-दो० चे नि० निपध ॥ १७॥ भावार्थ:-वे गंधापाती नामे वृत दो निसहा ॥ १७॥ ढय छे ॥२०॥ बैंक ।
" हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. (१०१ ) . अर्थः-दो वे गं० गंधापातीना वावासी अर्थः-दो० वे ति० त्रिकूटपर्वत ।। ३४ ।। अ० अरुण नामे दे० 'देवता ॥२६॥ दो तिकूडा ॥ ३४ ॥ दोगन्धावइवासी अरुणा देवा ॥२६॥ भावार्थः-वे त्रिकुट पर्वत छे ॥३४॥ । भावार्थ:-गंधापातीना वासी अरुण नामे अर्थः-दो० वे वे० वेसमणकूट ॥३५॥ देवता छ ।॥ २६ ॥ दो वेसमणकडा ॥३५॥ अर्थ:-दो बे मा० मालवंत ५० पर्याय भावार्थ:-बे वैश्रमण कुट छे ||३५|| नामे 'वृत वैताब्य ॥ २७ ॥ दो मालवन्तपरियागा ॥ २७ ॥ अर्थः-दो० वे अ० अंजन पर्वत ॥ ३६॥ भावार्थ:-वे मालवंत पर्याय नामे वृत वै- दो अञ्जणा ॥ ३६॥ ताढय पर्वत छे ॥२७॥ भावार्थ:-ये अंजन पर्वत छे ॥३६|| अर्थ:-दो० वे मा० मालवंत प० पर्यायना अर्थः-दो० बे मा० मांतजनपर्वत ॥३७॥ वा० रहेनार प० पदमनामे दे० देवता ॥२८॥ दो मातञ्जणा ॥ ३७॥ दो मालवन्तपरियागवासी पउमा भावार्थ:-वे मातंजन पर्वत छे ॥३७॥ देवा ॥ २८॥ अर्थः-दो० वे सो० सौमनसगजदंता ॥३८॥ भावार्थ:-वे मालवंत पर्यायना वासी पदम दो सोमणसा ॥ ३८॥ नामे देवता छे ॥२८॥ भावार्थ:-देवकुरुथी पुर्व दिशाए वे सोम- अर्थः-दो० वे मा० मालवंत पर्वत ॥२९॥ नस गजदंताकार पर्वत छे ॥३८॥ दो मालवन्ता॥ २९॥ अर्थ:-दो० वे वि० विद्युत्प्रभ ॥ ३९॥ भावार्थ:-बे मालवंत नामे गजदंत पर्व दा विज्जुप्पभा ॥ ३९ ॥ त छे ।। २९॥ भावार्थ:-देवकुरु पासे वे विद्युत्मभ पर्व- अर्थ:-दो वे चि० चित्रकूट पर्वत ॥३०॥ ॥ ३९ ॥ दो चित्तकूडा ॥३०॥ अर्थः-दो बे० अ० अंकावतीनगरी॥४०॥ भावार्थ:-वे चित्रकुट पर्वत छे ॥३०॥ दो अङ्कावई ॥ ४०॥ अर्थ:-दो० वे प० पदमकूट ॥ ३१ ॥ भावार्थ:-तेहथी आगळ बे अंकावती न- दो पम्हकूडा ॥ ३१ ॥ गरी छे ॥४०॥ भावार्थ:-वे पदमकुट पर्वत छे ॥३१॥ अर्थः-दो० वे प० पद्मावतीनगरी ॥४१॥ अर्थ:-दो० वे न० नलिणकूट पर्वत ॥३२॥ दो पम्हावई ॥ ४१ ॥ दो नलिणकूडा ॥ ३२ ॥ भावार्थ:-वे पदमावती नगरी छे ॥४१॥ भावार्थ:-वे नलीनकुट पर्वत छ ।। ३२।। अर्थः-दो० बे आ० आसीविसा ।। ४२॥ । अर्थ:-दो वे ए० एक शैलपर्वत ॥३३|| दो आसीविसा ॥४२॥ दो एगसेला ॥ ३३॥ भावार्थः चे आशिविषा नगरी छे ॥४२॥ भावार्थ- एकशेल पर्वत छे ॥३॥ अर्थः-दो० वे सु० मुखावहा ॥ ४३ ।। - (१०२) हाणं सूत्र २. उदेसो ३. अर्थ:-दोवेचे वेसमणकूटपर्वत ॥५१॥ दो सुहावहा ॥ ४३॥ भावार्थ:-चे सुखावहा नगरी छे ॥४३॥ दो वेसमणकूडा ॥ ५१॥ अर्थ:-दो० वे चं० चंद्रपर्वत ॥४४॥ 'भावार्थ:-वे वैश्रमण' कुटना६१॥ दो चन्दपव्वया ॥४४॥ अर्थः-दो० म० महाहिमवन्तकूट ५२॥ भावार्थ:-ए चार नगरी सितोदानदीने 'ज दो महाहिमवन्तकूडा ॥ ५२ ॥ मणे पासे छे तिहांथी आगळ वे पूर्वे वे चंद्र भावार्थः वे महा हिमवंत पर्वतना कुट ॥५२॥ पर्वत छे ॥४४॥ अर्थः-दो० वे वे० वैडुर्यकूट ॥५३॥ अर्थः-दो० वे सू० सूर्यपर्वत ॥ ४५ ॥ दो वेरुलियकूडा ।। ५३ ॥ दो सूरपवया ॥ ४५ ॥ भावार्थः वे सूर्य पर्वत छे ॥ ४५ ॥ भावार्थ:-वे वैडुर्यकुट ॥५३॥ अर्थः-दो० वे ना० नागपर्वत ॥ ४६॥ अर्थः-दो० वे नि० निषधकूट ॥ ५४॥ दो नागपवया ॥ ४६॥ दो निसहकूडा ॥५४॥ भावार्थ:-चे नाग पर्वत छ ॥४६॥ भावार्थ:-चे निषध पर्वतना कुट ॥ ५४॥ अर्थः-दो० वे दे० देवपर्वत ।। ४७ ॥ अर्थः-दो० वे रु० रुचककूट ॥ ५५ ॥ दो देवपत्वया ।। ४७॥ दो रुयगकूडा ॥ ५५॥ भावार्थ:-ये देवपर्वत छे ॥४७॥ भावार्थ:-वे रुचकना कुट ॥ ५५॥ अर्थः-दो वे ग गंधमादन गजदंता ॥४८॥ अर्थः दो० वे नी नीलवंतकूट ॥१६॥ दो गन्धमायणा ॥४८॥ दो नीलवन्तकूडा ॥ ५६॥ भावार्थ:-ते वार पछी वे गंधमादन गज. भावार्थः वे नीलवंत पर्वतना कुट ॥५६॥ दंता पर्वत छे ॥४८॥ अर्थः-दो वे उ० उपदर्शनकूट ॥५७.॥ अर्थः-दो० वे उ० इक्षुकारपर्वत ॥ ४९ दो उवदंसणकूडा ५७ ॥ दो उसुगारपत्वया ॥ ४९ ॥ भावार्थ:-वे उपदर्शन कुट ।। ५७ ।। भावार्थ:-उत्तर कुरुने पश्चिम भागे एह अर्थ:-दो०-वे-रु० रुप्पिकूट ।। ५८ ॥ सर्वे घातकी खंडना पुवार्ध अने पश्चिमार्धमा दो रुप्पिकूडा ॥ ५८॥ छ ते माटे ये वे कया छे. भावार्थ:-चे रुप्यकुट ॥५॥ घातकी खंडना दक्षीण उत्तरे वे भाग कर्या अर्थ:-दो० वे म० मणिकंधणकूट ॥५९॥ छे ॥ ४९ ॥ अर्थः-दो० वे चु० लघु हि० हिमवंतना दो मणिकञ्चणकडा-५९॥ ० कूट ॥ ५० ॥ भावार्थ:-वे मणिकंचन कुट ॥५९॥ दो चुल्लहिमवन्तकूडा ॥ ५० ॥ अर्थः-दो०-वे सि०, शिपरीनाकूट ||६०॥ भावार्थ:-चे लघु हिमवंत पर्वतना कुट छे, दो सिहरिकूडा ।। ६०॥ वे पर्वत छे ने माटे एकेका पर्वत उपर वे भावार्थ:-ये शिखरिना कुट ॥६०॥ ये कुर छे ॥५॥ अर्थः दो० वे ति० तिगच्छकुट ॥६१|| वे इखुधार पर्वते * 2
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हाण सूत्र २. उद्देसो.३
दो तिगिच्छिकडा॥ ६१॥
६० द्रह ।। ६७॥
भावार्थःचे तिगिच्छ कट वे एम सर्व पर्वत दो गङ्गप्पवायदहा जाव 'दो
उपर वे वे कुटजाणवा।। ६१॥
रत्तवइप्पवायदहा ॥ ६७॥
अर्थ:-दो वे प० पदम ६०-द्रह ॥६२॥ भावार्थ:-वे गंगाप्रपात द्रह छे त्यां उंचाथी
दो पउमदहा।। ६२): गंगानो प्रवाह पडे छ एम यावत् वे रक्तवती
भावार्थ:-एम बे पदम द्रह छे ।। ६२ ॥ प्रपात द्रह छे ए सर्वे द्रह बेवे जाणवा ॥६७॥
अर्थः-दो वे प० पदम ६० द्रह वा० र-
अर्थः-दो० वे रो० रोहितानदी जा० एम
हेनारी सि० श्रीदे० देवीओ ॥ ६३ ।। दो० वे रु० रुप्प कु० कुला नदी ॥ ६८॥
दो पउमदहवासिणीओ सिरीओदे- दो रोहियाओ जाव दो रुप्पकु-
वीओ॥ ६३॥
लाओ॥ ६॥
भावार्थ:-बमणां क्षेत्र छे माटे त्यां बे पदम
भावार्थ:-बे रोहितानदी एम यावत वे
द्रहनी रहेनारी श्रीदेवी छे ॥६३॥
रुप्यकुला नदी ॥ ६८॥
अर्थः-दो बेम०महाप०पदम ६०द्रह॥६४॥
अर्थः-दो० वे गा० ग्राहवतीनदी ।।६९।।
दो महापउमदहा ॥ ६४ ॥
दो गाहवईओ ॥ ६९॥
भावार्थ:-चे महा पदमद्रह छे ।।६।।
भावार्थ:-चे ग्राहवती नदी ॥६९॥
अर्थ:-दो० बेम० महा प० पदम ६०द्रह
अर्थः-दो० वे द० द्रहवती नदी ॥७० ।।
वा० रहेनारी हि० ही दे० देवीओ ए० एम दो दहवईओ ।। ७० ॥
जा. यावत दो० वे पो० पुंडरीकद्रह ॥६५॥ भावार्थ:-वे द्रहवती नदी ए सर्वे पर्वतथी
दो महापउमदहवासिणीओ हिरी- नीकळी विजयमा आवी छे ॥७॥
अर्थः-दो० वे पं० पंकवतीनदी ।। ७१ ॥
ओ देवीओ । एवं जाव दो पोण्डरीय-
दो पङ्कवईओ ॥ ७१ ॥
भावार्थ:-वे पंकवती नदी ॥७१।।
भावार्थ:-त्यां वे महा पदमद्रहनी रहेनारी
अर्थः-दो० वे त० तप्तजलानामे ॥७२॥
वे ही नामे देवी छे एम यावत् वे पुंडरीक
दो तत्तजलाओ॥ ७२॥
द्रह छे ॥६५॥
अर्थ:-दो० वे पो० पुंडरीकद्रह चा० रहे-
भावार्थ:-वे तप्तजला नदी ॥७२॥
नारी ल० लक्ष्मी दे० देवीओ ॥६६ ॥
अर्थः-दो० वे म० मत्तजलानामे ||७३॥
दो पोण्डरीयद्दहवासिणीओ लच्छी- दो मत्तजलाओ ॥ ७३ ॥
ओ देवीओ ॥ ६६ ॥
भावार्थ:-ये मत्तजला नदी ॥७३।।
अर्थ:-दो० वे उ० उन्मत्तजलनामे ॥७४||
भावार्थ:-त्यां वे पुंडरिक द्रहनी रहेनारी
लक्ष्मी नामे देवीयो छे ॥६६॥
दो उम्मत्तजलाओ॥ ७४॥
अर्थः-दो० वे गं० गंगा प्रपात ६० द्रह
भावार्थ:-चे उन्मत्तजला नदी ॥७४॥
जा० एम दो० चे र०, रक्तावती प. प्रपात अर्थः-दो० वे खी० भारोदानामे ॥७॥
।
दहा ॥६५॥
. (१०४ ) हाणं सूत्र २. उसो ३. - । . दो खीरोयाओ ।। ७५ ॥ भावार्थः चे क्षीरोदा नदी ॥७॥ अर्थः-दो० वे सी सिहस्रोतानदी ॥७६।। दो सीहसोयाओ॥ ७६ ॥ भावार्थः चे सिंहश्रोता नदी ॥६॥ अर्थः-दोव्वे अ०अंतदाहिनीनामे ॥७७॥ दो अन्लोवाहिणीओ।। ७७ ।। भावार्थ:-चे अंतर वाहिनी नदी ॥७७॥ अर्थः-दो० वे उ० उर्मिमालणीओ।।७८॥ दो उमिमालिणीओ ।। ७८ ।। भावार्थ:-वे उर्मिमालिनी नदी ।।७८॥ अर्थः-दो ये फे० फनमालिनी नदी॥७९॥ दो फेणमालिणीओ ॥ ७९ ॥ भावार्थ:-ये फेणमालीनी नदी ॥७९॥ अर्थ:-दो० वे गं० गंभीरमालिनी ।।८०॥ दो गम्भीरमालिणीओ ॥८॥ भावार्थ:-चे गंभीरमालीनी नदी ए सर्वे नदी वे वे जाणवी ॥८० अर्थः-दो० चेक० कच्छाविजय ॥८॥ दो कच्छा ॥ ८१॥ भावार्थ:-घातकी खंडमांही वे महाविदेह क्षेत्र ले, एकेका महाविदेहमां वत्रीस वत्रीस विजय छे, एम चोसठ विजयछे तेहनां नाम वे थोकेछे, पकेक विजयमांव व नगरि छे. वे कच्छवि. जय ।। ८१ ॥ अर्थः-दो० वे मु० मुकच्छाविजय ॥८२॥ दो सुकच्छा ।। ८२॥ भावार्थ:-ये मुकच्छ ॥८२॥ अर्थ:-दो० म० महाकच्छाविजय ||८३।। दो महाकच्छा ॥ ८३॥ भावार्थ:-ये महाकच्छ ॥८॥ अर्थः-दो० वे क० कच्छावतीविजय ॥४४॥ दो कच्छगावई ॥ ८४॥ भावार्थ:-वे कच्छगावती ॥८४॥ अर्थः-दो वे आ०आववितीविजय॥८॥ दो आवत्ता ॥ ८५॥ भावार्थ:-वे आवर्त ॥८॥ अर्थः-दो बे मं० मंगलावतीविजय ॥८६॥ दो मङ्गलावता ॥ ८६॥ भावार्थ:-चे मंगळावर्त ॥८६॥ अर्थः-दो० वे पु० पुक्खला ॥८॥ दो पुक्खला ॥ ८७॥ भावार्थः-वे पुष्कलावर्त ॥८॥ अर्थः-दो० वे पु० पुकखलावती ॥८॥ दो पुक्खलावई ॥ ८८॥ भावार्थ:-वे पुष्फलावती ॥८॥ अर्थः-दो० वे व० वच्छा ॥८९।। दो वच्छा ॥ ८९॥ भावार्थः वे वच्छा ॥८९॥ अर्थ:-दो० वे सु० सुवच्छा ॥१०॥ दो सुवच्छा ॥ ९॥ भावार्थ:-वे सुवच्छा ॥९॥ अर्थः-दो० वे म० महावच्छा ॥२१॥ दो महावच्छा ।। ९१ ॥ भावार्थ-वे महावच्छा ॥११॥ अर्थः-दो० वे व० वच्छगावती ॥१२॥ दो वच्छगावई ।। ९२ ॥ भावार्थ:-चे वच्छगावती ॥१२॥ अर्थः-दो वे र० रम्या ॥१३॥ दो रम्मा ।। ९३ ॥ भावार्थ:-वे रम्मा ॥९॥ अर्यः-दो० वे र० रम्यका ॥१४॥ दो रम्मगा ॥ ९ ॥ . - r 1 1 हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. ( १०५ ) भावार्थ:-वे रम्मगा ॥१४॥ अर्थः-दो० वे र० रमणिजा ॥१५॥ दो रमणिज्जा ॥ ९५॥ भावार्थ:-बे रमणिजा ॥९॥ अर्थः-दो० वे मं० मंगलावती ॥१६॥ दो मङ्गलावई ॥ ९६ ॥ भावार्थ:-बे मंगळावती ॥९६|| अर्थः-दो० वे प० पदमा ॥ ९७ ॥ दो पम्हा ॥ ९७ ॥ भावार्थ:-वे पदमा ॥ ९७॥ अर्थः-दो० वे सु० सुपदमा ॥ ९८ ॥ दो सुपम्हा ॥ ९८॥ भावार्थ:-चे मुपदमा ॥ ९८॥ अर्थः-दो० वे म० महापदमा ॥ ९९ ॥ दो महापम्हा ॥ ९९ ॥ भावार्थ:-चे महापदमा ।। ९९ ॥ अर्थः-दो० वे प० पदमागावती ॥१००॥ दो पम्हगावई ॥१०॥ भावार्थः-वे पदमगावती ॥१०० ॥ अर्थः-दो० वे स० शंखा ॥१०१॥ दो सङ्घा ॥ १०१ ।। भावार्थ:-बे शंखा ॥१०१॥ अर्थः-दो० वे न० नलिणा ॥१०२॥ दो नलिणा ॥ १०२ ॥ भावार्थः-वे नलीना ॥ १०२ ॥ अर्थः-दो० वे कु० कुमुदा ॥ १०३ ॥ दो कुमुया ॥ १०३ ॥ भावार्थ:-वे कुमुदा ||१०३॥ अर्थः-दो० वे स० नलिलावती ॥१०४॥ दो नलिणावई ।। १०४॥ भावार्थ:-वे नलीनावती ॥१०४॥ अर्थः-दो० वे व० वमा ॥१०५॥ दो वप्पा ॥ १०५॥ भावार्थः-वे बना ॥१०॥ अर्थः-दो० वे सु० सुवमा ॥ १०६ ॥ दो सुवप्पा ॥ १०६ ॥ भावार्थः-वे मुवमा ॥१०६॥ . अर्थः-दो० वे म० महावप्रा ||१०७॥ दो महावप्पा ॥ १०७॥ भावार्थ:-वे महाक्पा ॥१०७॥ अर्थ:-दो० बे व० वप्रकावती ॥ १०८॥ दो वप्पगावई ॥ १०८॥ भावार्थः-बे वप्रगावती ॥१०८|| अर्थः-दो० वे व० वलगु ॥१०९।। दो वग्गू ॥ १०९ ॥ भावार्थ:-बे वल्गु ॥१०९॥ अर्थः-दो० वे सु० सुवलगु ॥११०॥ दो सुवग्गू ॥ ११० ॥ भावार्थ:-वे सुवल्गु ॥११०॥ अर्थः-दो० वे ग० गंधिला ॥१११॥ दो गन्धिला ॥ १११ ॥ भावार्थः-वे गंधीला ॥ १११ ।। अर्थः-दो० वै ग० गंधिलावती ॥११२॥ दो गन्धिलाबई ॥ ११२ ॥ भावार्थः-वे गंधीलावती ॥११२॥ अर्थः-दो० वे खे० खेमा ॥११३॥ दो खेमाओ ॥ ११३॥ भावार्थ:-वे खेमा ॥११३॥ अर्थः-दो० वे खे० खेमपुरा ॥११४॥ दो खेमपुराओ ॥ ११४ ॥ भावार्थः-वे खेमपुरा ॥११४॥ अर्थः-दो० वे रि० रिहा ॥११५।। दो रिट्ठाओ ॥ ११५ ॥ J
(१०६)
हाणं सूत्र २.. उद्देसो ३.
भावार्थ:-वे रिष्ट ॥ ११५ ॥
अर्थः-दो० वे रि० रिष्टपुरा ॥११६।।
दो रिट्ठपुराओ ॥ १६ ॥
भावार्थ:-चे विष्टपुर ॥११॥
अर्थः-दो० वे ख० पडगी ॥११७||
दो खग्गीओ ।। ११७॥
भावार्थ-वे खड्गी ॥११७॥
अर्थः-दो० ने म० मंजूसा ॥ ११८ ।।
दो मञ्जूसाओ॥ ११८ ॥
भावार्थ:-वे मंजसा ॥ ११८॥
अर्थः-दो० वे ओ० ओषधी ॥११९।।
दो ओसहीओ।। ११९ ॥
भावार्थ:-वे ओपधी ॥११९।।
अर्थः-दो० वे पु० पुंडरगिणी ॥१२०॥
दो पुण्डरिगिणीओ ।। १२० ॥
भावार्थ:-चे पुंडरकिणी ॥१२०॥
अर्थः-दो वे सु० सुसीमा ॥१२१॥
दो सुसीमाओ ।। १२१ ॥
भावार्थ:-ये मुसीया ॥१२१॥
अर्थः-दो० वे ० झुंडला || १२२||
दो कुण्डलाओ॥ १२२ ॥
भावार्थ:-चे कुंडला ॥१२॥
अर्थ:
-० अ०अपगजिन नामे॥१२३॥
दो अपराइमाओ ।। १२३ ।।
भावार्थ:-चे अपराजीना ॥१२३॥
अर्थः-दो० व पं० प्रथका ॥१२॥
दो पभराओ ।। १२४ ।।
भावार्थः- प्रभंकरा ॥१२॥
अर्थः-दो वे अ० अंकावनी ॥११५||
दो अलावईओ ।। १२५ ॥
भावार्थ:-वे अंकावनी ॥१२५॥
अर्थः-दो० व प० पदमावती ॥१२६॥
दो पाहावईओ।। १२६॥
भावार्थ:-वे पदमावती ।।१२६||
अर्थ:-दो० वे सु० मुभा ॥१२७||
दो सुभाओ ।। १२७ ॥
भावार्थ:-वे शुभा ॥१७॥
अर्थः-दो० वे र० रत्नसंचया ॥१२८॥
दो स्यणसंचयाओ ।। १२८ ।।
भावार्थ:-वे रत्नसंचया ॥१२८ ॥
अर्थः-दो० वे आ० आसपुरा ॥१२॥
दो आसपुराओ ।। १२९ ॥
भावार्थ:-ये आसपुरा ॥१२९॥
अर्थः-दो० वे सी० सीधपुरी ॥१३०॥
दो सीहपुराओ ।। १३० ॥
भावार्थ:-वे सिंहपुरा ॥१०॥
अर्थ:-दो वे ग० महापुरी ॥१३१॥
दो महापुराओ ।। १३१ ।।
भावार्थ:-ये महापुरा ॥१३१॥
अर्थ:-दो० वे वि० विजयपुरी ॥१३२॥
दो विजयपुराओ ।। १३२ ॥
भावार्थ:-वे विजयपुरा ॥१३॥
अर्थः-दो० वे अ० अपराजित ॥१३३॥
दो अवराइयाओ ।। १३३ ॥
भावार्थ:-चे अपराजीता ॥१३३।।
अर्थ:-दो० वे अ० अपराजात ॥१३४॥
दो अवराओ ॥ १३४ ॥
भावार्थ:-ये अवरायां ॥१३४॥
अर्थ:-दो० वे अ० अगोक ॥१३५॥
दो असोगाओ।। १३५ ।।
भावार्थ:-वे अगोमा ॥१३५||
अर्थ:-दो० व वि० विगतगोका ॥१३६||
दो विगयोगाओ ॥ १३६ ॥
हाणं सूत्र २. उदेसो ३. (१०७) भावार्थ:-वे विगतशोका ॥१३६॥ भावार्थ:-वे नंदन मेखला मध्ये छे ॥१४६।। अर्थः-दो० वे वि० विजया ॥१३७|| अर्थः-दो० वे सो० सोमनसवन ॥१४७॥ दो विजयाओ ॥ १३७ ॥ दो सोमणसवणाई ॥ १४७ ॥ भावार्थ:-वे विजयाय ॥१३७॥ भावार्थ:-वे सोमनसवन मेखला ए पर्व- अर्थ:-दो० वे वि. विजयंती ॥१३८॥ तने मध्ये छे ॥१४७॥ अर्थ:-दो० वे प० पंडुकवन ॥ १४८ ॥ दो वेजयन्तीओ ॥ १३८ ॥ भावार्थ:-वे वैजयंति-॥१३८॥ दो पण्डगवणाइं ॥ १४८॥ अर्थः-दो० वे ज० जयंती ॥१३९।। भावार्थः-वे पंडुगवन मेरुने शिखरेछे ॥१४८॥ दो जयन्तीओ।। १३९ ॥ अर्थ:-दो० वे प० पांडुकंवल शिला ॥१४९॥ भावार्थ:-वे जयंति ॥१३९॥ दो पाण्डकम्बलसिलाओ ।। १४९ ।। अर्थः-दो० वे अ० अपराजित ।।१४०॥ भावार्थ:-ए वनमां तिर्थकरने जन्माभिषेक करवानी चार चार शिला छे तेमा बे पांडुकं- दो अपराइयाओ ॥ १४०॥ वल शिला छे ॥१४९॥ भावार्थ:-वे अपराजीता ॥१०॥ अर्थ:-दोव्वेअ०अतिपांडुकंवलशिला।।१५०॥ अर्थः-दो० वे च० चक्रपुरी ॥१४१॥ दो अइपाण्डुकम्बलसिलाओ॥१५०॥ दो चक्कपुराओ ॥ १४१ ॥ भावार्थ:-वे अति पांडुकंबल शिलाछे।।१५०॥ भावार्थ:-वे चक्रपुरा ॥१४१॥ अर्थः-दो० वे र०रक्त कंवलशिला ॥१५॥ अर्थः-दो० वे ख० खडगपुरी ॥१४२॥ दो रत्तकम्बलसिलाओ॥ १५१ ॥ दो खग्गपुराओ ॥ १४२ ॥ भावार्थ:-वे रत्नकंवल शिला छे ॥१५१॥ भावार्थ:-चे खड्गपुरा ॥१४२॥ अर्थः-दोन्वे अ०आरक्त कंवलशिला॥१५२॥ अर्थः-दो० वे अ० अवध्या ॥१४३।। दो अइरत्तकम्बलसिलाओ ॥१५२॥ दो अवज्झाओ ॥ १४३ ॥ भावार्थ:-वे अतिरत्नकंवल शिलाछे ॥१५२॥ भावार्थ:-वे अवध्या ॥१४३॥ अर्थः-दो० वे म मेरु ॥ १५३ ॥ अर्थः-दो० वे अ० अयोध्या ॥१४४॥ दो मन्दरा ॥ १५३ ॥ दो अओझाओ ॥ १४४ ॥ भावार्थ:-वे मेरु छे ॥१५३॥ भावार्थः-वे अयोध्या ॥१४४॥ अर्थः-दो० वे म मेरुनी. चूलिका ॥१५४|| अर्थः-दो० वे भ० भद्रसालवन ॥४५॥ दो मन्दरचूलियाओ ॥ १५४ ॥ दो भद्दसालवणाई !! १५५ । भावार्थ:-चे मेस्नी वे चूलीकाछे ॥१५४|| भावार्थ:-ए चोसठ विजय ते सर्वे वे वे अर्थः-घा० घातकि ख० खण्ड णं०नामा दी० जाणवी.त्यां वे मेरु पर्वत छे तेथी वे भद्रशाळ-द्वीपमा वे० वेदिका दो० बे गा० गाउनी उ० वनधरतीये 'छे ॥१४॥ उर्द्ध उ० उंचपणे पं० कही ॥१५५ ॥ अर्थ:-दो० वे न० नंदनवन ॥१४६।। धायईखण्डस्स णं दीवस्स वेइया दो नन्दणवणाई ।। १४६॥ दोगाउयाईउड्डेउच्चत्तेणं पण्णत्ता।।१५५|| , कही छे (१०८) हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. भावार्थ:-घातकीखंड नामे द्वीपनी वेदिका | एरवए चेव । तहेव जाव दो कुराओ कोट रुपते वेगाउ उंची उंचपणे कहीछे ॥१५५॥ पन्नत्ताओ । तं जहा । देवकुरा चेव अर्थ:-का०कालोदधिणं० नामना स०समुद्र- नी वे० चेदिका दो० चे गा० गाउनी उ० | उत्तरकुरा चेव । तत्थ णं महतिमहा- उर्द्ध उ० उंचपणे पं० कही लया महद्दुमा पन्नत्ता। तं जहा । कू- २० पेरा ( घातकी खंड पछी. काळोद डसामली चेव पउमरुक्खे चेव । देवा समुद्र छे तेथी ते संबंधी कहे छे) कालोदस्स णं समुदस्स वेइया दो गरुले चेव वेणुदेवे पउमे चेव जाव गाउयाई उर्दू उच्चत्तेणं पण्णत्ता । छविहं पि कालं पचणुभवमाणा वि. भावार्थ:-काळोदधी समुद्र (तेनु घणु काळे हरन्ति ॥ १॥ वर्णे पाणी) नी वेदीका वे गाउ उंची उंचपणे भावार्थ:- पुष्करार्ध द्वीपथी पुर्वदिशाए मेरु पर्वतथी उत्तर दक्षीणे वे वर्पधर क्षेत्र कहेल छे, अर्थः-पु० पुखारा दी द्वीपथी पु०पुर्व दिशे ते वे घणा सरखा छे यावत वरावर छे, एक पं० वळी म० मेरु प० पर्वतथी उ० उत्तर भरतक्षेत्र १, वीजें एरवतक्षेत्र छे २, तेमन दा० दक्षिणे दो० वे वा० क्षेत्र प० कह्या व० ( यावत घातकी खंडनी पेरे पुष्कराध पण. घणा स० सरखा छे मान प्रमाणे जा० यावत जाणवू ) यावत वे कुरु छे, एक देवकुरु १, भ० भरत चे० वळी ए० एरवत चे० वळी | वीजें उत्तरकुरु २, त्यां देवकुरुमां वे म्होटा त० तेमज जा० यावत दो० वे कु. कुरु पं० महालय वृक्ष कहेल छ तेहनां नाम कहे छे, काया तं० ते ज० कहुंछु दे० देवकुरु चे० वळी कुटशामळी वृक्ष १, वीजु पदम वृक्ष २, त्यां वे उ० उत्तरकुरु चे० वळी त० त्यां गं० वळी देवता वसेछे ते गरुलदेव तेनुं वीजें नाम वेणुंदेव, म० मोटा म० महालय म० मोटा दु० व्रक्ष | वीजो पदमदेव२, यावत छए आरानां मुखदुःख पं० कया तं० ते ज० कहुंछु कू० कूट साम भोगवता विचरे छे त्यांसुधी जाणवू ॥१॥ ली वृक्ष चे० वळी प० पदमक्ष चे० वळी दे० अर्थः-पु० पुष्करवर दी० द्वीपथी प०पश्चिमे देवता ग. गरुल चे. वळी वे. वेणु दे० देव | पं० वळी म मेरु प० पर्वतथी उ० उत्तर ५० पदमदेव चे० वळी जा. यावत छ० छए दा० दक्षिणे दो० वे वा० क्षेत्र पं० कह्या त० आरानां पि० वळी का० सुखदुख प० भोगवता तेमज ना० विशेष कहेछे कू० कूटसामली वृक्ष वि० विचरे छे ॥ १॥ चे० वळी म० महा प० पदम रु० क्ष चेक २१ पेरा (काळोद समुद्र पछी तरतजवळी दे० देवता ग० गरुल नामे चे० वळी पुष्कर द्वीप आवेलो होवाथी तेना पुर्वाध प. वे० वेळु दे० देव पो० पुंडरीक नामे चे० श्विमा ए बन्ने प्रकरणो कहे छे) वळी ॥ २॥ पुवखरखरद्दीवद्धपुरस्थिमद्धे णं मन्द पुकखरखरद्दीवद्धपञ्चस्थिमद्धे णमन्द- रस्म पचयरस उत्तरदाहिणेणं दो वासा रस्म पवयस्स उत्तरदाहिणेणं दो वा- - पन्नत्ता बहुसमउल्ला जाव भरहे चेव ! सा पन्नता। तहेव नाणत्तं कूडसामली
हाणं सूत्र २. उद्देसो ३.
(१०९)
चेव महापउमरुक्खे चेव । देवा ग- सवेसि पि णं दीवसमुदाणं वेड्या-
रुले चेव वेणुदेवे पोण्डरीए चेव ॥२॥ ओ दो गाउयाई उड्ढे उच्चत्तेणं पन्न-
भावार्थः-पुष्करवर द्विपथी पश्चिमे मेरु पर्व-त्ताओ॥
तने उत्तर अने दक्षीणे बच्चे बे वर्षधर क्षेत्र भावार्थ:-एम सर्व द्विप समुद्रनी वेदोकाओ
कहेल छे, तेमज पुर्वनी पेरे सर्व जाणवू, एटलो (फरता कोटना कांगरा बिना ते वेदिका क
विशेष जे कुटशामळी वृक्ष १, बीजुं महापदम | हीए) ते वे गाउनी उंची उंचपणे ज्ञानीए
वृक्ष २, तिहां देवता गरुल नामे वेणुंदेव १, कहेली छे.
वीजो पुंडरिक नामे जाणवा ॥२॥
अर्थ:-दो० वे अ० असुरकुमारना इ०इन्द्र पं०
अर्थः-पु० पुष्करवर दी० द्वीप नामना गं० कह्या तं० ते ज० कहुंछ च० चमरेन्द चे०
वळी दी० द्वीपमां दो० वे भ० भरतक्षेत्र दो० । वळी व० बरेंद्र चे० बळी ।। १
वे ए० एरवतक्षेत्र जा० यावत दो० वे म० २३ पेरा ( आ द्वीप समुद्रो इंद्रोना उत्पात
मेरु पर्वत दो० वे म० मेरुनी चू० चूलि- ने माटे पर्वतना जेवा आश्रयभूत छे तेथी इंद्रो
काओ छे ॥ ३॥
विषे कहे छे.)
पुक्खरखरद्दीवड्डे ण दीवे दो भरहाई दो असुरकुमारिन्दा पन्नता । तं
दो एरवयाइं जाव दो मन्दरा दो म- जहा । चमरे चेव बली चेव ॥१॥
न्दरचूलियाओ॥३॥
भावार्थ:-ए पुर्वोक्त सघळाए द्विप समुद्र उ-
भावार्थः-पुष्करवर द्विपमां बे भरतक्षेत्र, वे त्पाद पर्वत इंद्र आश्रयी छे ते माटे इंद्रनो
अधीकार आव्यो ते कहे छे. वे असुरकुमारना
एरवतक्षेत्र एम यावत् वे मेरुपर्वत, वे मेरुपर्व-
इंद्र कहेल छे ते कहेछे चमरेंद्र १, बलेंद्र २ ॥१॥
तनी चुलीका ॥३॥
अर्थः-दो० वे ना० नागकुमारना इ०इन्द्र पं०
अर्थः-पु०पुष्करवर णवळी दीन्द्वीपमा वे०
वेदिका दो० वे गा० गाऊनी उ० उर्द्ध उ०
कह्या तं० ते ज० कहुंछु ध० धरणेंद्र चे०
वळी भू० भूतानेंद्र चे० वळी ॥२॥
उचपणे पं० कही ॥४॥
दोनागकुमारिन्दा पन्नत्ता।तंजहा। ।
पुक्खरखरस्स णं दीवस्स वेड्या दो
गाउयाई उ8 उच्चत्तेणं पन्नत्ता ॥४॥
धरणे चेव भूयाणन्दे चेव ॥ २ ॥
भावार्थः-वे नागकुमार जातिना इंद्र ते
भावार्थ:-पुष्करवर द्विपनी वेदिका बे गा-
उनी उंची उंचपणे कही छे ॥४॥
घरणेंद्र १ अने भूतानेंद्र २ ॥२॥
अर्थः-स० सघलाए पि० एम० वळी दी०
अर्थः-दोव्वे सु० सुवर्णकुमारना इ०इन्द्र पं०
द्वीप स० समुद्रनी वे० कांगरा कोट विना ते चे० वळी वे वणुदाली चे० वळी ।। ३ ।।
कह्या तं० ते ज० कहुंछु वे० वेणु दे० देव
वेदिका दो० वे गा० गाऊनी उ० उंची उ०
उंचपणे पं० कही
दो सुवन्नकुमारिन्दा पन्नत्ता । तंज-
२२ पेरा (पुष्करवर द्वीपनी वेदीकानी हा। वेणुदेवे चेव वेणुदाली चेव ॥३॥
परुपणा कह्या पछी वाकीना द्वीप समुद्रोनी भावार्थ:-चे सुवर्णकुमार जानिना इंद्र ते
वेदीकानी परुपणा कहे छे.)
वेणुदेव १ वेणुंदाली २ ॥३॥
(११०) हाणं सूत्र २. उद्देसो ३. अर्थः-दोव्वे वि०विद्युतकुमारना इ०इंद्र पं० वळी अ० अमितवाहन चे० वळी ॥ ८ ॥ कन्या तं० ते ज० कहुंछु ह० हरिकंत चे० वळी दो दिसाकुमारिन्दा पन्नत्ता । तं ह० हरिस्सनाम चे० वळी ॥४॥ जहा। अमियगई चेव अमियवाहणे दो विज्जुकुमारिन्दा पन्नत्ता । तं चेव ॥ ८॥ जहा । हरि चेव हरिस्सहे चेव ॥४॥ भावार्थ:-वे दिशाकुमारना इंद्र ते अमीत- भावार्थ:-वे विद्युतकुमार जातिना इंद्र ते गति १ अमीतवाहन २॥८॥ हरिकांत १ हरिसह २ ॥४॥ अर्थः-दो०वे वा०वायुकुमार इ०इंद्र पं० कह्या अर्थः-दोव्ये अ० अगनिकुमारना इ०इंद्र पं० कद्या तं० ते ज० कहुं; अ० अग्निशिर्प चे प्रभंजन चे० वळी ।। ९ ।। तं० ते ज० कहुंछं वे० वेलंब चे० वळी प० बळी अ० अग्नि मानव नामे चे० वळी ॥२॥ दो वाउकुमारिन्दा पन्नता तंज- दो अग्गिकुमारिन्दा पन्नता । तं जहा । अग्गिमिहे चेव अग्गिमाणवे हा । वेलम्बे चेव पभञ्जणे चेव ॥९॥ भावार्थ:-ये वायुकुमारना इंद्र ते वेलंब १ चेव ॥ ५॥ प्रभंजन २ ॥९॥ भावार्थ:-चे अग्निकुमारना इंद्र ते अग्नि अर्थ:-दो० वे थ० स्थनितकुमारना इ० इन्द्र शिर्ष १ अग्मिाणव २ ॥५॥ पं०कह्या नं०ते ज० कहुंछ घो०घोप चे बळी अर्थः-दोव्वे दीदीपकुमारना इ० इन्द्र पं० म० महाघोप चे० वळी ॥१०॥ क्या तं० ते ज० कहुंछ पु० पूर्णा नामे चे० दो थणियकुमारिन्दा पन्नत्ता । तं वळी व० वशिष्ट नाम चे० वळी ॥ ६॥ दो दीवकुमारिन्दा पन्नता। जहा। जहा । घोसे चेव महाघोसे चेव ।।१०।। भावार्थ:-ये स्तनीतकुमारना इंद्र तेहनां पुण्णे चेव वमिटे चेव ॥६॥ नाम कहे छे, घोप १, महाघोप २, दशभवन भावार्थ:-वे द्विपकुमारना दंद्र ते पुणे १ पतीनीकायना ए वीस इंद्र जाणवा ॥१०॥ अने वशिष्ट २ ॥६॥ अर्थः-दोव्वे पि० पिसाचना इ० इन्द्र पं० अर्थः-दाव्ये उ० उदधिकुमारनाइ० इन्द्र पं० कह्या तं० ते ज० कहुंठं का० काल चे. वळी कया तं० ते ज० कहुंएं ज० जलकता चे० म०महाकाल चे. वळी ॥११॥ वळी ज. जलमभ चे० वळी ॥ ७॥ दो उदहिकुमारिन्दा पन्नत्ता । तं दो पिसायइन्दा पण्णत्ता। जहा। काले चेव महाकाले चेव ॥ ११ ।। जहा । जलकन्ते व जलप्पमे चे- भावार्थ:-हवे व्यंतरनीकायना आठ इंद्र व ॥ ७॥ कहे छे. वे पीसाचना दंदना ते काळ १, महा. भावार्थ:-चे उदघीकुमारना इंद्र ते जल काळ २ ॥११॥ फोन जलमम २||७|| अर्थः-दोव्ये भू० भूतना इ०इन्द्र पं०वद्या तं० अर्थः-दोव्वेदि० दिसाकुमारना इ० इन्द्र पं० ने ज० कहुंछ मु० मुरुप चे० वळी प० प्रति नं० ते जल कहूं; अ० अमित गनि चे. रुप चे० बळी ॥ १२ ॥ m हाणं सूत्र २. उदेसो ३. (१११ ) . दो भूयइन्दा पन्नत्ता । तं जहा । सु अर्थः-दो० वे म० महोरगना. इ० इन्द्र रूवे चेव पडिरूवे चेव ॥१२ ।। पं० कह्या त० ते ज० कहुंछं अ० अतिकाय नामे चे० बळी म० महाकाय चे० बळी॥१७॥ भावार्थ:-वे भूतना इंद्र ते सुरुप १, प्रति- दो महोरगिन्दा पन्नता । तंज- “रुप २ ॥१२॥ अर्थः-दो० वे जव्यक्षना इ०इन्द्र पं० कह्या हा । अइकाए चेव महाकाए चेव ॥१७॥ तं० ते ज० कहुंछ पु० पुर्णभद्र चे० वळी म० भावार्थ:-चे महोरगना इंद्र ते अतिकाय १, माणिभद्र चे० वळी ॥ १३ ॥ महाकाय २ ॥१७॥ अर्थः-दो० वे ग० गधर्वना इ० इन्द्र पं० दो जविखन्दा पण्णत्ता । तं जहा। कह्या तं० ते ज० कहुंछु गी० गीतरती चे० पुन्नभद्दे चेव मणिभद्दे चेव ॥ १३ ॥ वळी गी० गीत जश चे० वळी ।। १८ ॥ भावार्थ:-बे यक्षना इंद्रना ते पुर्णभद्र ?, म दो गन्धविन्दा पन्नत्ता । तं जहा । णीभद्र २ ॥१३॥ गीयरई चेव गीयजसे चेव ॥ १८ ॥ अर्थः-दो० वे र० राक्षसना इ० इन्द्र पं०क- भावार्थः-वे गंधर्वना इंद्र ते गीतरती १, ह्या तं० ते ज० कहुंछ भी० भीग चे० बळी गीतयशा २ ॥१८॥ म० महा भीम चे० वळी ।।१४॥ अर्थः-दो० वे अ० अणपन्निना इ० इन्द्र दो रक्खसिन्दा पण्णत्ता । तं जहा। पं० कह्या तं० ते ज० कहुंछु सं० संनधी नामे भीमे चेव महाभीमे चेव ॥ १४ ॥ चे० वळी स० समान चे० वळी ॥ १९ ॥ भावार्थः-वे राक्षसना इंद्र, ते भीम १, म- ! दो अणवण्णिन्दा पन्नत्ता। तं जहा। हाभीम, २ ॥१४॥ संनिहिए चेव समाणे चेव ॥ १९ ॥ अर्थः-दोव्वे कि०किनरनाइ० इन्द्रपं० कह्या भावार्थ:-वळी इहा पृथ्वीथी दश जोजन तं० ते ज० कहुंठं किं० किंनर नामे चे० बळी ठे वीजी आठ उत्तम व्यंतर जाती छे तेहना. किं० किं पुरुप चे० दळी ॥ १५ ॥ इंद्र कहेछे, वे अणपन्नी कायना इंद्र ते सन्निक १, । दो किन्नरिन्दा पन्नता । तं जहा।। समान २ ॥१९॥ अर्थ:-दो० वे प० पण पनिना · इ० इन्द्र किन्नरे चेव किंपुरिसे चेव ॥ १५ ॥ पं० कहा तं० ते ज० कहुंछ धा धातीचे० भावार्थ:-चे किंनरना इंद्र ते किंनर १, वळी वि० विधाती चे० वळी ॥२०॥ किंपुरुप २ ॥१५॥ अर्थः-दोव्वे किं०कि पुरुपना इ०इन्द्र पं० दो पणवणिन्दा पन्नत्ता । तं जहा। कया तं० ते ज० कहुँछु सु० युपुरुषचे वळी धाए चेव विहाए चेव ॥ २० ॥ म० महापुरुष चे० बळी ।। १६ ॥ भावार्थ:-चे पणपन्नीकायना इंद्र ते..धाती दो किंपुरिसिन्दा पन्नत्ता । तं जहा। १, विधाती २ ॥२०॥ अर्थ:-दा- वे इ० इसिवाय निकायना सुपुरिसे चेव महापुरिमे चेव ॥ १६ ॥ इ० इन्द्र पं० कह्या तं० ते ज० पहुंछु इ० भावार्थ:-चे किपुस्पना इंद्र ते सुपुरुष १, | इसिनामे चे० वळी इ० इसीवाल- नाम महापुरुष २ ॥१६॥ वळी ॥ २१ ॥ - - -- । -- 4 ।
(११२ ) हाणं सूत्र २. उद्देसो. वे दो इमिवाइन्दा पन्नत्ता । तंजहा। अर्थः-दो० वे प० पतग इ० इन्द्र पं० इमि चेव इसिवाले चेव ॥ २१ ॥ कह्या तं० ते ज० कहुंछं प० पयग चे० वळी प० पयगवती चे० वळी ।। २६ ॥ भावार्थ:-वे इसीवायनीकायना इंद्र ते दो पयगिन्दा पन्नत्ता । तं जहा । इसी १, इसीवासी २ ॥२१॥ अर्थः-दो० वे भृ० भूतवायनिकायना इ० पयए चेव पयगवई चेव ॥ २६ ॥ इन्द्र पं० कद्या तं० ते ज० कहुंछ इ, ईश्वर भावार्थ:-वे पयगनीकायना इंद्र ते पयग चे. वळी म० महेश्वर चे० वळी ॥ २२ ॥ १, पयगपती २ ॥२६॥ दो भूयवाइन्दा पन्नत्ता । तं जहा। अर्थः-जो० ज्योतिषी दे० देवताना दो० इस्मरे चेव महिस्सरे चेव ॥ २२ ॥ इ० इन्द्र पं० कया त० ते ज० कहुं हुं च० चंद्रमा चे० बळी न० सूर्य चे० बळी |२७|| भावार्थ:-ये भतबाइ कायना इंद्र ते इश्वर १, जोइसियाणं देवाणं दो इन्दा प- महेश्वर २ ॥२२॥ अर्थः-दो० वे के० कंदीनिकायना इ० ण्णत्ता । तं जहा । चन्दे चेव सूर इन्द्र ५० काय तंते ज० कहुंछ सु० मुवत्थ चेव ॥ २७ ॥ चे० वळी वि. विसाल च० बळी ।।२३।। भावार्थ:-ए सर्वे मळी सोळ व्यतरना वत्रीस दो कन्दिन्दा पन्नत्ता । तं जहा। इंद्र थया, जोतिपी देवनाना वे इंद्र कहेलले ते करे सुबत्थे चेव विलासे चेव ॥ २३ ॥ छे, चंद्रमा १, मुर्य २ ॥२७॥ भावार्थ:-ये कंटीनीकायनाइंद्र ते मुवच्छ अर्थ:-सो० सौधर्म देवलोक इ० ईशान १, विशाळ २ ॥२३॥ णं० वळी क० देवलोकने विपे दो० वे इ० अर्थः-दो० चे म० महाकंदीना इ० इंन्द्र इन्द्र पं० कह्या तं० ते ज० कहुंछु सु० शक्रेद्र पं० कया तं० ते ज० कहुंएं हा० हस्स चे० चे० बळी इ० ईशानंद्र चे० बळी ॥ २८ ॥ वळी ह० हास्य रती चे० वळी ॥२४॥ सोहम्मीसाणेसु णं कप्पेसु दो इन्दा दो महाकन्दिन्दा पन्नत्ती । तं ज- पन्नत्ता । तं जहा। सुक्के चेव ईसाणे हा । हस्से चेव हस्सरई चेव ॥२४ ॥ चेव ।। २८ ॥ भावार्थ:-ये महाकंडीनीकायना इंद्र ते भावार्थ:-सौधर्म प्रथम देवलोक बीजं इशान हास १, हासरती ॥२४॥ देवलोक तेहना वेवेइंद्र ते शकेंद्र १, इशानेंद्र२॥२८॥ अर्थः-दो० वे कुछ कोहंडनिकायना इ० अर्थ:-ए० एम स० सनत कुछ कुमार इन्द्र पं० कद्या तं० ते ज० कहुंछं से० श्वेत मा० माहेंद्र क० देवलोकने विप दो० व इ० नाम चे० बळी म० महाश्वेत चे० बळी ॥२५॥ इन्द्र पं० कवा स० सनत कुमारेंद्र चे० बळी दो कुम्भडिन्दा पन्नत्ता। तं जहा। मा० मांहद्र च० वळी ॥ २९ ॥ सए चव महासेए चेच ॥ २५॥ एवं सणंकुमारमाहिन्देसु कप्पेमु दो भावार्थ:-ये कोएंटनीकायना इंद्र तेवत इन्दा पन्नत्ता । तं जहा । सणकुमारे १. महान २ ॥२६॥ वेव माहिन्दे चेव ।। २९ ॥ ' राहाणं सूत्र-२ उद्देसो ३. (११३ ) भावार्थ:-एमज सनंतकुमार. १, माहेंद्र २, भावार्थ:-नवमुं आणत २७ दशमुं प्राणत २, ए वे देवलोकना वे इंद्र ते सनत्कुमारेंद्र १, मा-- अग्यारसुं आरण ३, वारमुं-अच्युत ४, ए चार हेद्र २ ॥२९॥ देवलोक मळी.बे इंद्र कहेल छे, प्राणतेंद्र १, अर्थ:-ब० ब्रह्मदेवलोक ल० लांतक गं० नवमा दशमानो इंद्र छे, अच्युतेंद्र २ इग्यारमा वळी क० देवलोकने विषे दो० वे इ० इन्द्र | वारमानो इंद्र छे ए सर्वे मळी चार"जातीना पं० कह्या तं० ते ज० कहुंछं व० वींद्र चे० देवताना चोसठ इंद्र थया ॥३२॥ वळी लं० लांतकेंद्र चे० वळी ॥ ३० ॥ अर्थ:- :-म० 'महा-सु श्रुक्र स० सहस्रार बम्भलोगलन्तगेसु णं कप्पेसु दो पं० वळी क० देवलोकने विषे वि० विमान इन्दा पन्नत्ता । तं जहा । बम्भे चेव दु: वे व० वर्णना पं० कह्या तं० ते ज० क- हुंछ हा० पीला वर्णनुं चे० वळी सु० उज- लन्तए चेव ।। ३०॥ ला वर्णनुं चे० बळी भावार्थ:-पांच मुं ब्रह्मदेव १, छठे लांतकदेव २४ पेरा (देवनो अधिकार होवाथी ते- लोक २ ए वे देवलोकना वे इंद्र कहेल छे ते | मने रहेवाना विमानो विशे कहे छे.) ब्रौद्र १, लांतकेंद्र २ ॥३०॥ महासुक्कसहस्सारेसु णं कप्पेसु वि- अर्थः-म० महाशुक्र स०सहस्त्रार गं०वळी माणा दुवण्णा पन्नत्ता । तं जहा। हा- क० देवलोकने विषे दो० वे इ०इन्द्र पं०कह्या तं० ते ज० ऋहुंछं म० महाशुक्र चे वली लिदा चेव सुकिला चेव ॥ स० सहजेंद्र चे० वळी ॥ ३१ ॥ भावार्थ:-पुर्व देवतानो अधीकार- आव्यो सातमुं महासुक्कसहस्सारमु णं कप्पेसु दो ते माटे विमाननो अधीकार कहे छे. महाशुक्र, आठमुं सहसार ए वे देवलोकने विप इन्दा पन्नत्ता । तं जहा ।,महासुक्के चेव विमान वे वर्णनां कह्यां छे ते कहे छे, पीळां सहस्सारे चेव ॥३१॥ वर्णनां १, घोळां वर्णनां [ सोधर्म इशान ए भावार्थ:-सातमु महाशुक्र देवलोक १, आ- वे देवलोके पांच वर्णनां विमानछे, त्रीजा, चो- - मुसहस्रार देवलोक तेहना घे इंद्र ते महाशु- था देवलोके राताने लीलां विमान छे, पांचमे केंद्र.११. सहस्रारेंद्र २, बेना वोल माटे वे वे छठे देवलोके कानां ने निलां विमान छे, नव- "देवलोक एकठां कहेल छे ॥३१॥ माथी ते स्वार्थ सिद्ध विमान सुधी एक धोळा अर्थ:-आ० आणत पा० प्राणत आ० वर्णना विमान छे. , अर्थ:-गे० नव गैवैकना दे० देवने दो० 'आरण अ० अच्युत गं० वळी क० देवलोक- ने विपे दो० वे इ० इन्द्र ५० कह्या त० ते वे २० हाथनी काया उ उर्द्ध उ० उंचपणे पं० कही भगवंते ज० कहुंछं पा० प्राणतेंद्र चे० वळी अ० अ- च्युतेंद्र चे. “वळी ॥ ३२॥ २५ पेरा (देवोनो अधिकार होवाधी वे ठाणामां आवती देवोनी अवगाहणा (शरीरनुं "आणयपाणयारणच्चुएसु णं कप्पेसु मान ) कहेछे ) दो इन्दा पन्नत्ता तं जहा! पाणए चेव गेविज्जगाणं देवाणं दो रयणीओ अच्चुए चेव ॥३२॥ - उ8 उच्चत्तेणं पण्णत्ता॥ १५ - 7 1 (११४) झणं सूत्र २. उद्देसो ४. भावार्थ:-नव ग्रैवेयकमा देवतानीकाया वे विट्ठाणस्स तइयो उद्देसोसमत्तो । हाथनी उंची उंचपणे श्रीतिर्थकर देवे कहीछे. अर्थः-वि० वीजा हा० ठाणानो त० त्रीजो भावार्थ:-इतिश्री वीजा ठाणाना त्रीजा ने उ० उदेशो स० पुरो थयो. शानो भावार्थ संपूर्णम् ।। A न [अह दुट्ठाणस्स चउत्थो उद्देसओ। . ते - अर्थ:-ससर्वधी सुक्ष्मकाल ते समय इ०एम कह्यो छे. सर्वथी नानो काळ ते समय कहीद वा० अथवा आ० असंख्यात समयनो काल | समयथी मोटो काळमान ते आवळीकाका ते आवलिका इ० एम वा० अथवा जी० ए असंख्याता समयनो ए काळ जीवाश्रित महा काल जीवाश्रित माटे जीव कहीए इ० एम जीव कहीए १, अजीव पुद्गलाश्रीत मारे में वा० अथवा अ० अजीव पुदगल आश्रित माटे | जीव पण होय एम वे भेद छ ॥१॥ अजीव कहीए इ० एम वा० अथवा प० ए अर्थ:-आ० सासोश्वासनो काल म वे भेद कहीए ॥१॥ प्राण इ० एम वा० अथवा यो० सात मान १ पेरा (त्रीजा उद्देशामां पुदगळ अने जीव-नो काल ते थोव इ० एम वा० अथवा ना धर्म कया अने चोथा उद्देशामां तो सर्वे | ते कालने जीवाश्रित माटे जीव कडीए । चीज जीव अजीवरुप एम कहेवानुं छे. त्रीजा एम वा० अथवा अ० ते काल अजीव पुन उद्देशाना छेला सुत्रनो अने चोथा उद्देशाना लाथित माटे अजीव कहीए इ० एमवार पहेला सूत्रोनो नीच मुजब संबंध छ, त्रीजा अथवा प० ए वे भेद कहीए ॥२॥ उद्देशाना छेला सूत्रमा देवनी अवगाहणा ल- क्षणधर्म कह्यो हतो अने चोथा उद्देशाना पेहे- आणापाणू इ वा थोवा इ.वाजी ला सूत्रोमां धर्माधिकार होवायी जीव वाइवा अजीवा इवा पवुचन्ति । संबंधी समयादी स्थीतीनुं लक्षण धर्म अने भावार्थ:-आणपाणुं ते सासोश्वासनी काय धर्मिना अभेदपणे कडेवामां आवे छे.) एक सासोश्वासथी एक प्राण थाय, सातमा १, समया इवा आवलिया इवा जी- एक थोव थाय, एहने जीवाश्रीतपणा माटे वा इ वा अजीवा इवा पवुञ्चन्ति॥१॥ भेद कद्या छे ।।२।। काळज, अजीव ते माटे अनीव ते माटे || भावार्थ:-हवे काळ ते अजीव छे पण जीव अर्थः-ख० संख्यात प्राणरुप इ० एमबी आश्रयी छे, अजीव जे पुद्गळ स्थिती भावे अथवा ल० सात थोवनो एक लव १० आश्रयी छे, समयथी मांडी पुद्गळ तथा जीव वा० अथवा जी० ए कालने जीवाश्रित सागरोपमताइ एक स्थानके ए स्वभावे रहे जीव कहीए इ० एम वा० अथवा अ० ते काळ ने जीव अजीव वेने आश्रीत छे ते वाश्रिन माटे अजीव कहीए इ० एम माटे वे गणामां ए काळमाननो अधीकार । अथवा प० ए वे भेद कहीए ॥ ३॥ स - । J -- क ॥४॥ हाणं सूत्र २. उद्देसो ४. (११५) *खणा इ वा लवा इ वा जीवा इवा वाससयाइवावाससहस्साइवा।।दा अजीवा इ वा पवुचन्ति ॥३॥ भावार्थ:-वीस युगे सो वरस थाय, एम भावार्थ:-संख्यात प्राणे एक क्षण थाय, दश सो वरसे एक हजार वरस थाय ॥८॥ अर्थ:-वा० वरस स० सोस० हजार एटले सात थोवे एक लव थाय, एहने एमज जीव लाख वरस इ० एम वा० अथवा वा० वरस कहीए, अजीव पण कहीए ॥३॥ को० क्रोड एटले सो लाप वरस इ० एम अर्थः-ए० एम मु० वे घडी ते ३७७३ वा० अथवा ।। ९॥ सासोश्वास इ० एम वा० अथवा अ० त्रीस मु. हुर्त इ० एम वा० अथवा ॥४॥ वाससयसहस्सा इ वा वासकोडी एवं मुहुत्ता इ वा अहोरत्ता इ वा इ वा ।। ९ ।। भावार्थ:-एम सो हजारे एक लाख वर- स थाय, एम सो लाखथी एक कोड वरस है. भावार्थ:-एम मुहुर्त ते त्रणहजार सातसे थाय॥९॥ तोतेर शाशोश्वासनी वे घडी थाय, त्रीस मुहु- सैनी अर्थः-पु. चोरासीलाप वर्षे एक पुर्वाङ्ग एक अहोरात्री थाय ॥४॥ अर्थ:-प० पनर अहोरात्रि इ० एम वा० थाय इ० एम वा० अथवा पु० पुर्वांगने चो- राशी लाख गुणा करीए तो एक पुर्व थाय अथवा मा० वे पक्ष इ० एम वा०अथवा ॥२॥ इ० एम वा० अथवा ॥१०॥ का पक्खा इ वा मासा इ वा ॥ ५॥ भावार्थ:-पनर अहोरात्रीए एक पक्ष थाय, पुचङ्गा इ वा पुरा इ वा ॥१०॥ भावार्थ:-चोरासी लाख वरसनो एक पुर्वांग वे पक्षनो एक मास थाय ॥५॥ अर्थ:-उ० वे मासे १ रुतु इ० एम वा० थाय ते पुर्वांगने चोरासी लाखगणा करवाथी सीतेरलाख कोडी अने छप्नहजार कोडी वरसे "अथवा अ० त्रण रुतु इ०एम वा०अथवा ॥६॥ एक पुरव थाय ॥१०॥ उऊ इ वा अयणा इ वा ॥६॥ अर्थः-तु० चोराशीलाख पुर्वे एक तुटि भावार्थ:-चे मासनी एक रतु थाय त्रण तांग थाय इ० एम वा० अथवा तु० तुटितांगने हतुए एक अयन थाय, ते दक्षीणायन तथा चोराशीलाखे गुणीए तो त्रुटित थाय इ० एम उत्तरायन ॥६॥ वा० अथवा ॥११॥ अर्थः-सं० वे अयन्न इ० एम वा० अथ तुडियङ्गा इवा तुडिया इ वा ॥११॥ वा जु० पांच वरसे एक युग इ० एम वा० भावार्थ:-चोरासीलाख पुरवे एक त्रुहीतांग अथवा ॥७॥ थाय ते अहीतांगने चोरासीलाख गुणा करवा- संवच्छरा इ वा जुगा इ वा ॥७॥ थी एक त्रुटीत थाय, एमज पाछली संख्याने भावार्थ:-बे अयनधी एक संवत्सर ते वरस चोरासीलाख गुणी करवायी आगली संख्या याय, पांच वरसनो युग थाय ||७|| थाय एम सर्वत्र जाणवू ) ॥११॥ अर्थ:-वा० (वीस युगे ) वरस स० सो ३० अर्थः-अ०८४लाख त्रुटिते एक अडडांग थाय एमवा० अथवा वा० वरस स० हजार इ० एम वा० अथवा अ० ८४ लाख अहटांगे (दससो वरसे ) इ० एम वा० अथवा ||८॥ एफ अडड थाय इ० एम पा० अथवा ।।१२।। ८ . 11 ह ( ११८) हाणं मूत्र २. उद्देसो ४. भावार्थ:-जीहां धळनो कोट होयते खेड आरामा इ वा उज्जाणा इ वा कहीए, कुनगर ते कर्वट ॥३॥ ॥८॥ अर्थः-म० चार दिशे वे गाउए गामते इ० जीहां घणी जातीनां रक्ष वेली होय, केली- एम वा० अथवा दो० जलस्थलनो मार्ग होय ना घर होय, जीहां स्त्री पुरुष क्रीडा करे ते ते ३० एम वा० अथवा ॥४॥ आराम जीहां पत्र पुष्प फळ फुल छांयाए मडम्वा इ वा दोणमुहा इ वा ॥४॥ शोभित घणा लोक उजाणी करे ते उध्यान ॥८॥ भावार्थ:-जीहां चारे दिशाए वे वे गाउ अर्थः-व० एक जातिना वृक्ष होयते इ० गाम वेगळा होयते मंडप कहीए, जीहां जळनो एम वा० अथवा व० घणी नातिना वृक्ष तथा स्थळनो मार्ग होयते द्रोणमुख ॥ ४ ॥ होय ते इ० एम वा० अथवा ॥ ९॥ अर्थः-१० भला रतन वस्तु उपजेते इ० वणा इ वा वणखण्डा इ वा ॥९॥ एम वा० अथवा आ० लोह प्रमुपनी खाण भावार्थ:-जीहां एक जातिनां वृक्ष होयते होय ते इ० एम वा० अथवा ।। ५॥ वन, जीहां घणी जातिनां वृक्ष होयते वनखंड॥९॥ पट्टणा इ वा आगराइ वा ॥५॥ अर्थः-वा० चोषुणीवाव इ० एम वा०अथवा भावार्थ:-जीहां भली वस्तु रत्नादोक उप. पु० वाटली वाव इ० एम वा० अथवा ॥१०॥ जे तथा चारे दिगाए देशावरथी माल आवे । वावी इ वा पुक्खरिणी इ वा ॥१०॥ ते पाटण कहीए, जीहां लोढादिकनी खाण भावार्थ:-चौखुणी होयते वावडी, वाटली होयते आगर कहीये ॥ ५॥ (गोळ)तथा जीहां कमळ होयते पुष्करिणी॥१०॥ अर्थः-आ० तापसना ठाम इ० एम वा० अर्थः-स० सरोवर इ० एम वा० अथवा अथवा सं० समी भूमि वावे कठिन भूमि रापे स० सरोवरनी श्रेणि इ०एम वा० अथवा ॥११॥ इ० एम वा० अथवा ॥६॥ सरा इ वा सरपन्तिया इ वा ॥११|| आसमा इ वा संवाहा इ वा ॥३॥ भावार्थ:-जळाश्रयते सरोवर वे चार सरो भावार्थ:-जीहां तिर्थस्नान थाय अने तापस वरनी पंक्ति होय पाषाणे वरनी पंक्ति होय पापाणे करी पाळ वांधी प्रमुख रहेता होयते आश्रम. जीहां समी भूमी होय, चारे दिशाए सहकारादिकनी छांया होय वावी कठण भूमी राखे खाण प्रमुखमां ते ते सरोवरनी श्रेणी कहीए ॥ ११ ॥ संवाध ॥ ६॥ अर्थः-अ०कुवा इ० एम वा० अथवा त० • साथ आवी उत्तरे जिहां इ० तलाव इ० एम वा० अथवा ॥ १२ ॥ एम वा० अथवा घो० नदीने कांटे वास इ० अगडा इ वा तलागाइ वा ॥१२॥ एमवा० अथवा ॥ ७॥ भावार्थ:-अगड ते कुवा, जीहां माटीनी सनिवेसा इ वा घोसा इ वा ॥णा म्होटी पाल वांधी होयते तळाव ॥ १२॥ भावार्थ:-जीहां साथ आवी उतरे ते सनि अर्थः-१० द्रह उंडु पाणी इ० एम वा० चेश, नदीना कांठे वसे ते घोषगाम ॥ ७॥ अथवान० नदी इ० एम वा० अथवा ॥१३॥ अर्थः-पा० घणी जातना वृक्ष जिहां होग दहा इ वा नई इ वा ॥१३॥ र० एम या० अथवा ३० जिहां लोक उजाणी भावार्थ:-जीहां उंडपाणी होयते द्रह, नदी, * ने १० एम वा अथवा ।। ८ ।। गंगा प्रमुख, ॥१३॥ rIT अर्थ:-सं० - होणं सुत्र २. उद्देसो ४. ( ११९ ) 1 - 1 अर्थ:-पु० पृथ्वी रतनप्रभादिक इ० एम अर्थ:-दा० दरवाजा विजयादिक इ० एम वा० अथवा उ० समुद घनोदधि इ० एम वा० वा० अथवा तो० तोरण इ० एम वा० अ- अथवा ॥१४॥ थवा ॥१९॥ पुढवी इ वा उदही इ वा ॥ १४ ॥ दारा इ वा तोरणा इ वा ॥ १९ ।। भावार्थः-प्रथ्वी रत्न प्रभादीक, उदधी ते भावार्थ:-जंबुद्विप प्रमुखना द्वार विजयादीक, समुद्र धनोदधी ॥१४॥ दरवाजा उपर लगाडीए ते तोरण ॥ १९ ॥ अर्थः-वा० घनवात तनवात इ०एम वा० अर्थ:-ने० नारकी इ० एम वा० अथवा अथवा उ० अवकाशांतर आकाश प्रदेश जिहां ने० नारकीना पा० रहेवाना ठाम इ० एम सुक्ष्म पृथ्वीकाय जीव भरेला छे इ०एम वा० वा० अथवा जा० थाय ते वे० वैमानिक दे- अथवा ॥१५॥ वता इ० एम वा० अथवा वे० वैमानिकने वायखन्धा इ वा उवासन्तरा इवा उपजवाना वा० ठाम इ० एम वा० अथवा ॥१५॥ (२०-४३) ॥२०॥ भावार्थ:-वायुना खंध धनवात तनवात नेरइया इवा नेरइयावासा इ 'व प्रमुख, जीहां सुक्ष्म पृथ्वीना जीव भाछे, आ जाव वेमाणिया इ वा वेमाणियावास काश प्रदेशते अवकाशांतर ॥ १५ ॥ इ वा ॥ [२०-४३] ॥ २० ॥ अर्थः-५० पृथ्वीना घनवात तनवातना भावार्थ:-नर्कमा रहेते नारकीनारकीने रहेवान पंध इ० एम वा० अथवा वि० लोक नाडी नरकावासा एम यावत् चोवीस दंडव त्रस नाडी जीव ते इ० एम वा० अथवा ।।१६।। जाणवा.वैमानिक देवता जीव अने अजीव तेका वलया इ वा विग्गहा इ वा ॥१६॥ पुद्गळ सहीतछे ते माटे ते देवताने उपजवान भावार्थ:-जीहां पृथ्वीनां धनोदधी धनवा विमानते पृथ्वीकायनी अपेक्षाए जीव अजी तना खंधछे ते वलय, जीहां लोक नाडी त्रस सचित्तपणा माटे वे भेद ॥२०-४३॥ २० नाडी जीव रहाछे ते विग्रह ॥ १६ ॥ अर्थ:-क० देवलोक इ० एम वा०अथवा का अर्थः-दी. जंबुद्वीपादिक इ० एम वा० देवलोकना अंश इ०एम वा०अथवा ॥४४॥२ अथवा स० लवणादिक इ० एम वा० अ. कप्पा इ वा कप्पविमाणावासा थवा ॥ १७॥ दीवा इ वा समुहा इ वा ॥१७॥ वा ॥ [४४ ] ॥ २१ ॥ भावार्थ:-द्विपते जंचु द्विपादीक, समुद्र ते भावार्थ:-कल्प ते देवलोक, तेहना अंश कल्प विमान वास ते जीव अजीव पणा मा लवण समुद्रादीक ॥ १७ ॥ अर्थः-वे. समुद्रजलनी वेल इ० एम वा० वे भेदे ॥ ४४ ॥ २१ ॥ अथवा वे० द्विपनी वेदिका इ० एम वा० अर्थः-वा० मनुष्यना क्षेत्र इ० एम वा अधवा वा० हेमवंत प० पर्वत प्रमुख इ० ए अथवा ॥१८॥ वेला इ वा वेड्या इवा ॥ १८ ॥ वा० अथवा ॥४५॥ २२ ॥ भावार्थ:-क्ल समुद्रना जळनी द्विपनी वे- वासाइ वा वासहरपवया इ. दिकाते कोट कांगरा रहित ॥ १८ ॥ ॥[१५] ॥ २२॥ ठाम ते - -- H (१२० ) हाणं सूत्र २. उद्देसो ४. - भावार्थ:-चर्प ते भरतादी क्षेत्र, वर्पधर ते दोसिणा इ वाअन्धयारा इ वा ॥२॥ हीमवंतादी पर्वत ॥४५॥ २२ ॥ भावार्थ:-जोत्स्नाते कांती अथवा तेज अर्थः-कृ० शिखर इ० एम वा० अथवा अंधकार ॥२॥ कृ० तिहां देवताना घर इ० एम वा० अ अर्थः-ओ० अवमान ते क्षेत्रादि प्रमाण थवा ॥४६॥ २३॥ हाथ गज प्रमुख इ० एम वा० अथवा उ० कूडाइ वा कूडागारा इवा ॥[४६]||२३|| तुलादि कर्प मासो वाल इ० एम वा० अ- भावार्थ:-कुट ते हिमवंतादि शिखर, ज्यां थवा ॥ ३ ॥ देवतानां घर ले ते कुवागार ॥४२॥ २३ ॥ ओमाणा इ वा उम्माणा इ वा ३ अर्थ-वि०३२ महा विदहना पंडते इ० एम भावार्थ:-मानते हाथगज प्रमुप, उन्मान ते तु- वा० अथवा रा० राजा रहे ते इ. एम वा० लाप्रमुख, कर्प मासा वाल इत्यादीक ॥३॥ अथवा जी. जीवाश्रित इ० एम वा० अथवा अर्थः-अ० नगरना घर इ० एम चा० अ० अजीवाश्रित ३० एन वा० अधना प० अथवा उ० वाडीना घर इ० एम चा० ए वे बोल कहीए ॥४७॥ २४ ॥ अश्वा ॥ ४ ॥ -विजयाइ वा रायहाणी इ वा जीवा इ अइजाणगिहा इ वा उज्जाणगिहा वा अजीवाइवा पवुञ्चन्ति॥[१७]||२४|| इ वा ॥ ४ ॥ भावार्थ:-महाविदेह क्षेत्रनां खंड कच्छ म भावार्थ:-अतीतान ग्रह ते प्रवेशनां नगर, हाकच्छाढीक वत्रीस ते विजय, खेमादिक नग उद्यानगह ते वाडीनां घर ॥४॥ रिमां राजा रहे ते राजधानी, ए सघळा अर्थः-अ० अवलंब देश विशेप नाम इ० चोलमां जीव अने अजीव ए ये बोल कहेवा एम वा० अथवा स० सनिप्रपात ए पण ए- पुद्गळ आधी अजीव जीव, जीव सहित माटे | मज रुन्धिी जाणवू इ० एम वा० अथवा जीव जाणवा ॥ ४७ ॥ २४ ॥ जी. जीवाश्रित माटे जीव इ० एम वा० अर्थः-छा० छाया वृक्षादिकनी इ० एम अथया अ० अजीवाश्रित माटे अजीव इ० एम वा० अथवा आ० आतप मूर्यादिकनो इ० वा० अथवा प० वे भेद कहीए ॥५॥ एम वा० अथवा ॥१॥ अवलिम्बा इ वा सणिप्पवाया इवा ३ पेरा (जे पुदगल धर्मो छे ते पण तेमज जीवा इ वा अजीवा इ वा पच- छे एम कहे छे) न्ति ।। ५॥ छाया इ वा आतवाइवा ॥१॥ भावार्थः-अवालिंब देशविशेप, सनिप्रपान भावार्थ:-जे पुढगळ स्वभाव छे ते पण ए- तेपण एमज रुढीथी जाणवं. ए सघना बोल मज ये भेटे, वृक्षाटिकनी छाया ते अजीव जीवाश्रीतपणा माटे जीव अने पुढगळ माटे अने वृक्ष ते जीव ,सद्दीत, आतप ते सूर्यादी- अजीव कडेवा ॥५॥ फनो ॥१॥ अर्थ:-दो० वे रा० रागी प० कही नं० अर्थः-दो कांनि तेने दएप वा अथवा ते ज० कई ९ जी. जीव रासी चे० वळी अ० अंधकार ३० एम० अथवा ॥२॥ अ. अजीरगशी चे० बळी r । - ८ हाण मूत्र २: उद्देसो।४. (:१२१) १४ पेरा (हवे समयादी वस्तु पण जीवा- 1. :' अर्थः-जी० जीव णं० वळी दो वे ठा० जीव रुप कहेवानुं कारण ए छे जे ते सिवा- | थानके पा० पाप क० थानके पा० पाप क० कर्म उ. उदीरे छे यनी वीजी कोइ राशी नथी) तं० ते ज० कहुं छु अ० जाणीने लोच प्रमुख दो रासी पण्णत्ता । तं जहा। जी- करी चे० बळी वे० वेदनाए ओ० , उपक्रम ते रोगादिकनी चे० वळी वे० वेदनाए ॥ १ ॥ वरासी चेव अजीवरासी चेव ।। ६ पेरा (राग अने द्वेपथी चधेिला पाप भावार्थः-वे राशी कही छे ते कहेछे, एक | कर्मोनी जेवी रीते उदीर्णा वेदना अने निर्जरा जीवराशी १, वीजी अजीवराशी २ ए वेभेदछे. जीवो करे छे ते कहे छे) अर्थः-दु० वे ब० वन्ध पं० कह्या-त० ते जीवा णं दोहिं गणोहिं पावकम्म ज० कहुं छु पे० राग ते माया लोभरुष चे०. उदीरेन्ति । तं जहा । अभुवर्गमिया- वळी दो० द्वेष ते,क्रोध मानरुप चे० वळी।॥१॥ ५-१पेरा (जीवराशी पण बद्ध अने मुक्तना ए चेक वेयणाए ओवकमियाए चेव वे- भेदयी वे प्रकारे छे) यणाए॥१॥ दुविहे बन्धे पन्नत्ते । तं जहा । पे- भावार्थ:-जीव वे स्थानके करी पापकर्म ज्जबन्धे चेव दोसबन्धे चेव ॥१॥ उदीरेछे, अवसर आव्या विनो उदये आणे ते उदिरणा ते कहे छे, स्ववसे-जाणीने शिर- भावार्थ:-वे प्रकारे बंध कह्योछे ते कहे छे, रलोचन तप चारित्रादीक वेदना पीडा, भोगवे एक प्रेम ते रागनो वंध, माया लोभरुप १, १, वीजी उपक्रमीकी उपक्रयथी उपनी वेदना वीजो द्वेष बंध ते क्रोधमानरुप २, ए वे भेद ते. ताव अतिसारादी रोगी उपनी वेदना पीडा भोगवे २, ए वे भेद छे ॥१॥ अर्थ:-जी० जीवने पं० वळी दो० वे ठा० अर्थः-ए० एम वे० उदय आव्युं कर्म भो- थानके करी पा० पाप क कर्मनो व० वैधः | गवे ॥२॥ थाय छे तं० ते ज० कहुं छं रा० रागेकरी एवं वेदेन्ति ॥२॥ चे वळी दो द्वेषेकरी चे, वळी ॥२॥ भावार्थ:-एमज उदय आव्यु कर्म के प्रकारे ५-२ पेरा (प्रेम अने द्वेष लक्षण कर्मोनो उदय वेदे भोगवे ॥२॥ थवाथी जीवने- अशुभ कर्मबंध थाय छे. ते अर्थ:-ए० एम नि० निर्जरे क्षय करे कर्म वतावे छे..) अ० जाणीने लोच तप क्रियाए करीने चे० वळी जीवा णं दोहिं ठाणेहिं पावकम्मं वे० वेदनाए करी ओ० रोगादिनी चे० चली बन्धन्ति । तं जहा । रागेण चेव दो- वे० वेदनाए करी ॥ ३ ॥ सेण चेव ॥२॥ एवं निज्जरेन्ति अभुवगमियाए भावार्थ:-जीवने वे स्थानके करी पापक- चेव वेयणाए ओवकमियाए चेव वेय- मनो वैध छे, पाप बंधाय छे ते कहे छे, रागे | णाए ॥३॥ करी पाप वंधाय छे १, द्वेपे करी पाप बंधाय भावार्थ:-एम वे प्रकारे कर्म निर्जरेछे, भय छ २, ए वे भेदछे ॥२॥ करे छे ते शिरलोजनादिक क्रीयादिके १, छे ॥१॥ " । १६
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(१२२ )
हाणं सूत्र २. उदेसो ४.
उदय आवेल रोगादीकनी वेदना २, ए वे भावार्थ:-एम शरीरने फोडी जीव नीडले.
भेद छे ॥३॥
ते देशयी सर्वयी ॥३॥
अर्थः-दो० वे ठा० थानके आजीव स० अर्थः-ए० एम सं० संकोचीने शरीरने
शरीर प्रते फु० फरसीने परभवे गं० वळी | गं० वळी ॥४॥
नि० जाय तं० ते ज० कई छ दे० देशे पग एवं संवट्टित्ता णं ॥४॥
प्रमुख वि० वळी आ० जीव स० शरीर प्रते
भावार्थ:-एम शरीरने संकोचीने देशथी
फु० फरसीने गं० वळी नि० नीकले स० सर्वथी २, इलीका गतीये देशयी तथा दडानी
सर्वथी ते सघली काया वि० वळी आ०जीव गतीये सर्वथी नीकळे ॥४॥
स० शरीर प्रति फु० फरसीने णं०वळी नि०
अर्थः-ए० एम नि० जीव प्रदेशथी शरीर
नीकले ॥१॥
अलगु थाय णं० वळी ॥५॥
७ पेरा (कर्मनी निर्जणामां देशथी अथवा
सर्वथी भवांतरमा जवा अथवा मोसमां जता
एवं निवट्टित्ता णं ॥५॥
शरीरथी नीरीयाण थाय छे ते पांच सूत्रीयी
भावार्थ:-एम जीवप्रदेशथी शरिर अळ
बतावे छे)
थाय ते देशथी इलीकागतीये १, सर्वथी दहा-
नी गतीये २, ए वे भेद छे ।।०॥
दोहिं ठाणोहिं आया सरीरं फुसित्ता
अर्थः-दो० वे ठा० थानके आ० जीब
णं निज्जाइ । तं जहा । देसेण वि के केवलीनो प० भाष्यो ध० धर्म ल० पामे
आया सरीरं फुसित्ता णं निज्जाइ स- स० सांभलवे करीने त० ते ज० कहुंछे ख?
वेण वि आया सरीर फुसित्ता णं नि- कर्मना क्षययी चे० बळी उ० उपशमाव्याची
चे० वळी ॥१॥
ज्जाइ॥१॥
भावार्थः-वे स्थानके आत्मा शरिरने फर- परंपराए धर्म श्रमण लाभ विगेरेथी थायछे ते
८ पेरा ( उपर सर्व निर्याण कहयुं ते
सीने भवांतरे अथवा मुक्तिये जाय ते कहे छे
वतावेछे)
पगप्रमुख फरसीने जीव नीकले ते देशथी १,
सघळी काया फरसीने जीव नीकळे ते स-
दोहि ठाणोहिं आया केवलिपन्नत्तं
वधी २ ॥ १ ॥
धम्मं लभेज्ज सवणयाए । तं जहा ।
अर्थः-ए० एम फु० फरके देशथी सर्वयी | खएण चेव उवसमेण चेव ॥ १ ॥
णं० वळी ॥ २ ॥
भावार्थ:- वे प्रकारे आत्मा केवळी भाषीन
एवं फुरित्ता णं ॥२॥
धर्म सांभळवाथी पामे ते कहेछे, झानावर्णी तया
भावार्थ:-जीव निकळतां ते ठेकाणुं फरके
दर्शन मोहनीना क्षययी १, अथवा उपनमा
ते देशधी, जीवने शरिरने स्पर्शते फरके ते व्यायी पण धर्म पामे २, ए वे भेदछे ॥१॥
अर्थ:-ए० एम जा. यावत म० मन पर्यव
अर्थ:-ए० एम फु० फोडीने नीकळे पं. ना० ब्रान उ० पामे तंते ज० कहुंळुख०क्षयवी
वळी ||॥
चे० वळी 30 उपसमयी चे० बळी ॥२॥
एवं फुडित्ता णं ॥३॥
एवं जाव मणपज्जवनाणं उप्पाडे-
1
सर्वधी ॥ २॥
- हाणं मूत्र २. उसी ४. (१२३ ) - 7 ज्जा । तं जहा । खएण चेव उवस होज्ज निरन्तणिचियं मेण चेव ॥२॥ भरियं वालग्गकोडीणं ॥१॥ भावार्थ:-एम यावत् वे प्रकारे मतिज्ञान, श्रुत भावार्थः-ते पल्योपमनुं मान कहे छे, चार ज्ञान, अवधीज्ञान, मनपर्यवज्ञान उपजावे पामे ते गाउनो उंडो पहोलो पालो ते कुवो होय, ए वे स्थानक कहे छे, ज्ञानावर्णीना क्षयथी १, कदिनथी मांडी सात दिनना जण्या युगळीया अथवा उपशमथी २, ए वे भेद छे ॥२॥ तेहना माथाना केशथी ते कुवो आंतरा रहित अर्थ:-दु० वे प्रकारे अ० काळजें उ० उपमा ठांसीने भरीये ते वालाय द्रष्टिए पण आवे प्रमाण पं० का तं० ते ज० कहुंछु प० पल्यो- नहीं एवा झीणा होय ॥ १ ॥ पमनुं मान चे० वळी सा० सागरोपमनुं मान अर्थ:-स०सोवा०वरस ते वालाय वा०वरस चे० वळी ॥१॥ स० सोए ए० एकोको वाळान अ० काढे ते ९ पेरा (वे पदे सर्व साधारण क्षयोप- | कुओ ठालो थाय ते जो० जेटलो का० काल सम कह्यो अने ते बोधथी मतिश्रुत अने अव- सो० ते का० काल वो० जाणवो उ० ए उपमां धीज्ञान वधारेमां वधारे छासठ सागरोपम ए० एक प० पल्योपमनी ॥२॥ सुधीना होय छे ने सागरोपम छे ते पल्योप- वाससए वाससए मने आश्रीने रहे छे तेथी ते बनेनी प्ररुपणा एकेके अवहडंमि जो कालो। करे छे.) सो कालो बोधवो दुविहे अद्धोवमिए पण्णत्ते।तं जहा। पलिओवमे चेव सागरोवमे चेव ॥१॥ उवमा एगस्स पल्लस्स ॥ २॥ भावार्थ:-ते वाला सो सो वरसे एकेको काढे भावार्थ:-मतिश्रुत अवधीज्ञाननी उत्कृष्टी ते काढतां काढतां जेटले काळे ते कुवो खा- स्थिति छासठ सागरोपमनी छे ते सागरोपमनुं मान कहेवाने कहे छे, वे प्रकारे काळनुं प्रमाण ली थाय तेटला काळने एक पल्योपमनुं मान छे ते कहेछे, एक पल्योपमनुं मान छ १, बीजें जाणवू ॥२॥ सागरोपमनुं मान छ २, ए वे भेद छे ॥१॥ अर्थ:-ए० एकह्या जे प० पल्योपमनी को० अर्थ:-से. ते किं० शुं तं० ते ५० पल्योपम कोडाकोडि ह० होय द० दसगुणा तं० ते सा० प० पल्योपमनु मान कहे छे जं० जो जो० सागरोपमनुं उ० वळी ए. एक भ० होय प० प्रमाण ॥३॥ चार गाउ वि० उंडो पोहळो प० कुवो छे ए० एकदिनथी मांडी सात दिनना जण्या एएसि पल्लाणं युगळीयाना माथाना केशे करी भरेल हो होय कोडाकोडी हवेज्ज दसगुणिया। नि० आतरारहित णि ठसीने भ० भरीए तं सागरोवमस्स उ वा. वाळने अपनी को० कोडी गमे करी ॥१॥ से किं तं पलिओवमे । पलिओवमे एगस्स भवे परीमाणं ॥३॥ भावार्थ:-ए पल्योपमने दश जोडाकोटी जंजोयणवित्थिण्णं गुणा करवायी सागरोपम थाय एटले दश पल्लं एगाहियप्परूदाणं! मोडाकोदी पल्योपमे एक सागरोपम याय ॥३॥ 1 चेव ॥ प्र । . . - पशनको संसारी जीवोनाज होयळे तेथी जोः जोगी वे० सवेदी क० : कपायीले ( १२४ ) हाणं मूत्र २. उद्देसो ४. अर्थः-दु० वे भेदे को० क्रोध पं० कह्या नत्ता | तं जहा। तमा चेव थावस तं. ते ज० कहुंछ आ० आत्माथी उपनो ते क्रोध चे० वळी प० परना वचनथी उपन्यो भावार्थ:-वे प्रकारे संसारना जीव कहेल ते चे० वळी ॥१॥ १० पेरा (आ पल्योपमवडे जे क्रोध व- छे ते कहेछे, त्रसते वे. इंद्रिथी, मांडी पचेंद्रि गेरेना फळभुत कर्यानी स्थीती कहेवाय छे मुधीना जीव १, स्थावर ते प्रथ्वीयादीक एक तेनु स्वरुप निरुपण करवाने कहे छे) दिना जीव २, ए वे भेदछे दुविहे कोहे पन्नते । तं जहा । आ-पं०-कया तं० ते ज० कहुंछं सि० सिद्ध चे. अर्थ::-दु०-वे भेदे स० सर्व जी० ,जीव यपइट्ठिए चेव परपइट्ठिए चेव ॥१॥ वळी अ०.मोक्ष नथी गया ते. चे० वळी ॥१॥ भावार्थ:- वे प्रकारे क्रोध कहेलछे ते कहे १२ पेरा (शुं संसारीक जीवोछे के वीजा पण छ, आत्म प्रतिष्टित ने निष्कारणे आत्माथी जीवोछे ? एम उभयपणुं वताववाने तेरसुत्र कहेछे) शाय उपजे अथवा भीत प्रमुखे अथडायाथी. दुविहा सवजीवा पन्नत्ता । तं जहा। घि करी भिंतादीकने इणे १, पर प्रतिष्ठित ते परनां वचन सांभळीने क्रोध उपजे २, एं सिद्धा चेव असिद्धा चेव ॥१॥ व भेदछे ॥१॥ भावार्थ:-अथवा ३ प्रकारे सर्व जीव कहे- अर्थ:-ए० एम ने नारकीन जा.यावत लछे ते कहेछे, एक सिद्धना जीव मोक्ष पाम्या वे. वैमानिकने ॥२॥ ते १, वीजा असिद्धना जीव मोक्ष पाम्या एवं नेरइयाणं जाव वेमाणियाणं ॥२॥ अय-दु० वे भेदे स० सर्व जी० जीव पं० नथी ते २ ए वे भेदछे ।। १ ।। भावार्थ:-एम नारकीथी मांडी बैमानीककात ते ज० कहुंछ स० इंद्रि सहित चे? की चौबीस दंडके आत्म प्रतिष्टित १, परम- तिष्ठीत २, ए वे प्रकारे क्रोध जाणवो ॥२॥ वळी अ० अनेंद्रि ते सिद्ध चे० वळी ॥२॥ अर्थः-ए० एम जा० यावत मिमिया दुविहा सबजीवा पण्णता । तं जहा। ६० दर्शन स० सल्यना वे भेद जाणवा MT संइन्दिया चेव अणिन्दिया चेवः ॥२॥ एवं जाव मिच्छादसणसल्ले ॥ ३॥ 'भावार्थ:-अथवा वे प्रकारे सर्व जीव कहेलछे भावार्थ:-एम यावत मिथ्यात्वदर्शन शल्या ते कहछे, इंद्रिय सहीत ते एकेंद्रीयी-मांडी पचे. दिक अटार पापस्थानक लगी आत्म प्रतिष्टित द्री सुधीना जीव १, वीजा अनिंद्रीय ते इंद्रीय १, पर प्रतिष्ठित २, ए वे वे भेद जाणका ॥३॥ रहीत सिद्धना जीव.२, ए वे भेदछे ॥२॥ अर्थ:-दु० चे प्रकारे सं० संसार स०समापन्न अर्थ:-ए० एम ए..ए गा० गाथा फा० १३ वोलनी जाणवी जा० यावत स० भरीर उस चे० वळी या० थावर चे, वळी. सहित चे० वळी अ० मोसना जीव ने ११ पैरा (उपर कडेल विशेपणवाला पा- वळी सि० सिद्ध सं० सइंद्री का० सकामी नाज भेदी कर ले )- लेगी या वेळी ना जानी व 'ज्ञानोपयोगी दुविहा संमारममावनगा जीवा.- शग ने मसौरी ।। ० . - - - जी जीव पं० का तं० ते ज० कहुंछं त० " आ० आहारी भा० भाप्यांवंत च चरिम " T . 3 -- -- - हाणं सूत्र २. उद्देसो ४, (१२५) एवं एसा गाहा फासेयवा जाव अने प्रशस्त मरणथी थाय छे तेथी प्रशस्त सरीरी व असरीरी चेव । अने अप्रशस्तनी निरुपणा नव सूत्रथी करेछ) दो मरणाइंसमणणं भगवया महा- सिद्धसइन्दियकाए जोगे-वेए कसायलेसा य । वीरेणं समणाणं निगन्थाणं नो निचं नाणुवओगाहारे वणियाइं नो निच किर्तियाँई नोनि- भासगचरिम य सरीरी ॥३॥ चं पूइयाइं नो निचं पसत्थाई नों नि: भावार्थः-एम गाथाने अनुसारे तर बोल चं अब्भणुनायाई भवन्ति । तं जहा । जाणवा ते कहेछे, सिद्ध असिद्ध १, सइंद्री वलयमरणे चेव वसट्टमरणे चेव ॥१॥ अनिंद्री २, काया सहित काया रहित ३, योग भावार्थ:-शरिरिने मरण होय ते-माटे मरणनो सहित योग रहित ४, वेद सहित वेद रहित अधिकार कहेछ. श्रमण भगवंत महावीर देवे ५, कषाय सहित कषाय रहित ६, लेशा सहित , श्रमण तपश्वी निग्रंथते कर्मनी गांठ रहित एवा लेशा रहित ७, ज्ञान सहित ज्ञान रहित ८, । साधुने वे प्रकारना मरण नित्य सदाय वर्णव्या ज्ञानना उपयोगी दर्शनना उपयोगी ९, आहार नथी, वखाणां नथी, नित्ये किया नथी, नित्से अणाहारि ( विग्रह गतीवंत १, केवळी आदरवां कयां नथी, नित्ये पुजीत नथी, अर्थात् समुद् घात करे ते वखते २, चौदमे गुण ठाणे अ एथी पुजान पामे, नित्ये प्रसंस्या स्तव्यां नथी, योगी होयते वखते ३, सिद्ध ४, ए चार अणा- सदाय आज्ञा आपी नथी, जे करजो (कोइ हारिछे ) १०, भाष्या सहित भाष्या रहित शियलादि राखवाने 'कारणे वायर्या नथी) ११, चरमत तेहज भवे मोक्षजाय अचरमते मरे १, जम दीवो देखी पतंगीयो मरे एम ई- ११, चरमते तेहज भवे मोक्षजाय अचरमते वलयमर्ण ते संयमयी पडतो परिसंहथी भागी द्रियने परवश पणे मरे २॥१॥ वोलमां पूर्वोक्त प्रमाणे वेवे भेद जाणवा ॥३॥ अर्थः-ए० एम नि० नियाणु करी 'मरे अर्थः-दो वे म मरण स० श्रमण भ० भंगवंत म० महावीरे स० श्रमणने नि० नि- मरे चे० ते ॥ २ ॥ चे० वळी त० तेइज भवने योग्य ऑउषु वांधीं ग्रंथने नो० नथी नि० सदा ५० वर्णव्यां एवं नियाणमरणे चेव तव्भवमरणे वपाण्या नथी नो० नथी नि० सदैव कि० आदरवां कह्यां नथी नो० नथी नि नित्ये चेव ॥२॥ पू० स्तव्यां प्रसंस्या नथी नो० नथी नि० भावार्थ:-एम रिदिआदीक नियाj करी, नित्ये प० पुजा पामे नही नो० नथी नि० मरे ते माळु मर्ण कहेलछे.३, तेहिज भवन योग्य नित्ये अ० आज्ञादीधी नथी भ० भगवते तं० आउखू वांधीने मरे ते तद्भव मर्ण ए. संख्या ते ज० कहुंछ व० संयमथी पडतो जलमां ता धर्पना आउखावाला मनुष्य तिर्यंचने बुडी मरे चे० वळी व इंद्रिने परवश पणे होय ४. ॥ २ ॥ मरे चे० वळी ॥१॥ अर्थः-गि० पर्वत उपर पड़ी. मरेते चे०, १३ पेरा-( आ मरण अने अमरण धर्म-वळी त वृक्षथी पडी मरे,चे. ते ॥३॥ वाळा संसारी अने सिद्ध जीवो "अप्रशस्त गिरिपडणे चेव तरुपडणे चेव ॥३॥ -- - । - - .
( १२६ ) हाणं मूत्र २, उसो ४. , . भावार्थ:-पर्वतथी यंपापात खाइने मरे ५, वाने कारणे निपेध्यां नधी पण अन्यथा नि- वमयी पडीमरे ६॥३॥ पेव्यां छे, ए वार प्रकारनां अप्रशस्त ( नहीं अर्यः-ज. पाणीमां अंपावे चे० बळी जा वखाणवा लायक) मरण कयां छे ॥६॥ अग्नीमा अंपावी मरे चे० वळी ॥४॥ अर्थः-दो० वे म० मर्ण स० श्रमण भ० जलप्पवेसे चेव जलणप्पवेमे चेव॥४॥ भगवंत म० महावीरे स० तपस्वीने नि० नि- भावार्थ:-पाणीमां अंपावी मरे ७, अग्निमां ग्रंथने नि० नित्ये व० वर्णव्या छे जायावत पेसी मरे ८॥४॥ अ० आजा भ० दीधी भगवन्ते तं० ते ज. अर्थः-वि० विषपाई मरे चे० वळी स. कहुंछं पा० छेदी वृक्षनी डालनी पेरे चेष्टा र- गख लई आपघात करे चे० बळी ॥५॥ हित चे० वळी भ०भात पाणीना जावजीव सुधी विसभक्खणे चेव सत्योवाडणे चेव प०पञ्चरवाण करे पण हाले चाले ते चेवळी ॥७॥ अप्रशस्त मरण थया पछी ते भव्यने प्रश- ॥ ५॥ स्त पण थाय छे ते वतावे छे.) भावार्य:-विपखाइने मरे ९, कटारी तलवार दो मरणाई समणेणं भगवया महा- प्रमुख गस्त मारी मरे १० ॥५॥ अर्यः-दो वे म० मर्ण जा. यावत नो वीरेणं समणाणं निग्गन्थाणं निच्चं व- नयी नि० नित्ये अ० आज्ञादीधी भ० भग-णियाईजाव अब्भणुनायाइं भवन्ति। वते का० कारणे शीयलाटिक राखवा निमित्त तं जहा । पाओवगमणे चेव भत्तपञ्च- पु० वळी अ० वार्या नयी तं० ते ज० कहूंछु खाणे चेव ॥ ७ ॥ वे. आकाश मरण वृक्षनी शाखाए गलो वांधी चे० वळी गि० कलेवरमां पेसी गिध पंखी पासे भावार्थ:-हवे वे प्रकारनां प्रशस्त (वखा- काया खवरावी मर ते चे० वळी ॥६॥ णवा लायक मरण) भन्यने होय ते श्रमण ( अमशस्त मरण यया पछी ते भव्यने । भगवंत श्री महावीरदेवे श्रमण निग्रंथने सदाय प्रशस्त पण थाय ने बतावे छे) वखाण्यां छे यावत आज्ञा दीधी छे ने भलं हे ते करो ते वे मरणनां नाम कहे छे, एक दो मरणाइं जाव नो निबं अभ- पाटोगमन मरण ते वृक्षनी कापी डालनी गुन्नायाई भवन्ति कारणेण पुण अ- चेष्टारहीत रहेवू ते १, वीजुं भक्तपचखाण ते प्पडिकुट्ठाई । तं जहा। वेहाणसे चेव आहारपाणीनुं जावजीव सुधी पचखाण करवं गिद्धपट्टे चेव ॥६॥ पणहरवाफरवा चालवानी छटी २,एवेभेदछ।।७॥ भावार्थ:-वळी व मर्णनी भगवते आना अर्थः-पा० पाटोपगमन दुवे प्रकारे प० दीधी नयी पण शिगळादि राखवाने कारणे कन्या तं० ते ज० कहुंछं नी० शरीर संस्कार वायो नयी ते वेनां नाम कडे हे, आकाशमण नगर बाहेर काढे ते चे०वळी अगिरि गुफामा ते रक्षनी ग्राखाये गळं वांधी मरे ने आका- जड करे च० वळी नि० निश्शे अ० शरीरनी भमरण १, गृद्ध पृष्ट मरण ने इंट प्रमुखना मुथुपा गहत अने पडौकमणा रहितछे ॥८॥ क्लबरमा पेसी गृद पंवी पामे खवरावे. पाओवगमणेदुविहे पन्नत्ते।तं जहा। ए १२ प्रकाग्ना अकाममण मियलाटी राख- नीहारिमे चेव अनीहारिम चेव । ते . - हाणं सूत्र २. उद्देसो ४. ( १२७) नियमं अप्पडिकम्मे ॥८॥ भावार्थ:-गुरु.कहेता हवा के हे शिष्य बे भावार्थ:-पादोपगमन वे प्रकारे कहेलछे ते प्रकारे लोक कह्यो. ते कहे छे जीव १, अने कहे छे, नीहारिम ते वस्तीमांही संथारो करे अजीव २, छ द्रव्यरुप लोकछे एवे भेदछे ॥२॥ तो शवने गामनी वाहीर लइ जाय १, अनीहा- अर्थः-के. कयो सा० साश्वतो लो० लोक रिम ते गिरिगुफामां जइ करे तेहर्नु निहारण जी०जीव चेवळी अ०अजीव चे० वळी ॥३॥ थाय नहीं, ए वे पादोपगमन निश्चे शरीरनी के सापया लोए । जीव - च्चेव सुश्रुषा अने पडीकमणा रहीत होय ॥८॥ अजीव चेव ॥ ३॥ अर्थः-भ० भातपाणी दु० वे प्रकारे पं० भावार्थ:-गुरु पत्ये शिष्य पुछतो हवो के कहूं तं० ते ज० कहुंछं नी०, वसतिमां चे० वळी अ० अटवीमां चे० वळी नि० निश्चेस० हे गुरु धर्मास्तिकायादीक जेहनो अंत नथी ते कोयो लोक, गुरु कहेता हवा के हे शिप्य ? सुश्रुषा सहित अने पडिकमणा सहित छे ॥९॥ एहज जीव १, अने अजीव २, ए छ द्रव्यनो भत्तपञ्चक्खाणे दुविहे पन्नत्ते । तं अंत नथी, ए वे भेद छे ।।३।। जहा। नीहारिमे चेव अनीहारिमे चेव। अर्थः-दु० बे भेदे वो० धर्म प्राप्ति पं०कही नियमं सप्पडिकम्मे ॥९॥ तं. ते ज० कहे छ ना० ज्ञाननी प्राप्ति चे० भावार्थ:-भक्तमत्याखान मरण वे प्रकारे वळी दं० सम्यकत्वनी प्राप्ति चे० वळी ॥१॥ कहेल छे ते कहे छे एक नीहारिम १, बीजूं १५ पेरा (आजे अनंताशास्वता जीवोछे ते अनीहारिम २, ए निश्चे शरिरनी शुश्रुषा अने बोधीमोक्ष लक्षण धर्मना योगधी वद्ध अने मुक्त पडीकमणां सहीत होय ॥९॥ होय छे ते बताववाने चार सूत्र कहे छे.) अर्थ:-के० कोण अ० ए लो० लोक जी० दुविहा वोही पन्नत्ता । तं, जहा। जीव चे० बळी अ० अजीव चे० वळी ॥१॥ नाणवोही चेव दंसणबोही चेव ॥१॥ १४ पेरा ( आ मरण आदी स्वरुप भगवाने लोकनी अंदर परुपेलं छे तेथी लोक स्वरुपनी भावार्थ:-गुरु प्रत्ये शिष्य पुछतो हवो के ? शास्वतो लोक कीयो ? गुरु उत्तर मरुपणा करवाने माटे प्रस्न करीने कहे छे.) के अयं लोए । जीव.चेव अजीव अजीव २, ए वे सदाय शास्वता छे ए वे भेद | कहेता हवा हे शिष्य ? एहज जीव १, अने चेव ॥ १॥ छ. ए छ द्रव्यमां जीव द्रव्यवोधि (ते जीनध- भावार्थ:-ए मरणादी स्वरुप भगवंते लो- : मनी प्राप्ती) पामे ते वोधिना वे प्रकार कहेल कमांही कहेल छे ते माटे लोक- स्वरुप कहे 'छे ते कहे छे, ज्ञानवोधी ते ज्ञानावर्णि कर्मना छे, गुरु प्रत्ये शिष्य पुछतो हवो के हे गुरु ? : क्षययी अवधी ज्ञानादीकनी प्राप्ती १, दर्शन- कोण ए लोक कह्यो ।। १ ।। बोधी ते दर्शनमोहनी कर्मना क्षययी समकि- अर्थ:-के० कोण अ० अंत नथीते लो लोक । माप्ती २, ए वे भेद छे ॥१॥ जी०जीव चेवळी अ०अजीव चे०वळी ॥२॥ अर्थ:-दु० वे भेटे वु० बुद्ध पं० कया तं. के अणन्ता लोए । जीव चेव अ- ते ज० कहुंळु ना० शानबुद्ध चे० वळी दं० जीव चेव ॥ २॥ दर्शनबुद्ध चे वळी ॥२॥ हे गुरु
( १२८ )
हाणं मूत्र २, उद्देसो ४.
दुविहा बुद्धा पन्नत्ता । तं जहा ।
अर्थः-८० दर्शनावरणीय के० कर्म
नाणबुद्धा चेव दंसणबुद्धा चेव ॥२॥ एम चे० वळी ॥२॥
भावार्थ:-ज्ञानदर्शन सहित होय ते बुद्ध
दरिसणावरणिज्जे कम्मे एवं चेव ।।२।।
कहीये, ते बुद्ध वे प्रकारे कहेल छे ते कहे छे. भावार्थ:-एमज दर्शनावर्णिना पण वे भेद
एक ज्ञानबुद्ध १, बीजो दर्शनबुद्ध २, ए ज्ञान- कहेछे, देशथी ते चक्षु दर्शनावर्णिय अचक्षु दर्श-
दर्शन माटे ये कद्या पण जीवाश्री एकज ज्ञान नावर्णि, अवधी दर्शनावणि १, सर्वधी ते पांच
दर्शन एकमांज होय ए सहचारि(साथे) छे ।।२।। निंद्रा केवळ दर्शनावर्ण ए वे भेद छे. २ ॥२॥
अर्थः-ए० एम मो० ज्ञान मोह ॥३॥
अर्थः-वे. वेदनीय क० कर्म दु० वे प्र.
एवं मोहे ॥३॥
कारे पं० कह्या तं० ते ज० कहुंछं सा० सा-
भावार्थ:-एमज मोह तेहना वे भेद ज्ञान-
ता सुखर्नु कारण सर्व भातना चे० वळी अंक
गाह ते ज्ञानमा मुंझाय १, दर्शनमोह ते सम-
असाता वेदनी ते दुःख चे० वळी ॥ ३ ॥
कितमां मुंझाय २, ए वे भेट छे ॥३॥ वेयणिज्जे कम्मे दुविहे पन्नत्ते । तं
अर्थ:-मू० मर्पज्ञान मोह ॥ ४ ॥ जहा । सायावेयणिज्जे चेव असाया-
मूढा ॥४॥
वेयणिज्जे चेव ॥३॥
भावार्थ:-एमज मुढमुर्ख तेहना वे भेद मु- भावार्थः-एम वेदनी कर्म ते मध तथा अफीणे
खं ज्ञानमोह, मुख दर्शनमोह २ ॥४॥ खरडी खडगनी धारा जेवु तेह चे प्रकारे कलछे
अर्थः-ना०.ज्ञानावरणि क० कर्म दु० वे ते कहेछे, एक शाता वेदनी ते मुख ?, वीजें
प्रकारे पं० कह्या.तं. ते ज० कहुंछ दे० म-
अशाता वेदनी ते दुःख २, ए वे भेद छे ।।३।।
ति ज्ञानादिकने ढांक्या ते चे० वळी स० सर्व अर्थः-मो० मोहनी क० कर्म दु० वे प्र.
'नानानं ते केवलज्ञान ढांके ते चे०वळी ॥१॥ कारे पं० कया तं० ते ज० कहुंछ दं० दसण
१६ पेरा (घे प्रकारनो पण आ मोह ज्ञा-
मोहनी, मिथ्यात्व, मिश्रने समकित मोहनी चेक
नावरणाढी कर्म वांधवानुं कारण ते संव- । वळी च० चारित्र मोहनी ते चारित्रने मुझवे
बधी ज्ञानावरणाढी कर्मर्नु आठ मूत्रवडे द्वी
। १६ कपाय नोकपायरूप चे० वळी ॥४॥
विधपणुं कहे छे)
मोहणिज्जे कम्मे दुविहे पन्नत्ते । त
नाणावरणिज्जे कम्मे दुविहे पन्नत्ते । जहा। दंसणमोहणिज्जे चेव चरित्त-
तं जहा । देमनाणावरणिज्जे चेव मोहणिज्जे चेव ॥ ४ ॥
सबनाणावरणिज्जे चेव ॥१॥ भावार्थ:-मोहनी कर्म मदीरापान कर्या जेवू
भावार्थ:-मोह ( मुंझावं.) ते शानावर्णिधी ते वे प्रकारे कहेलछे ते कडे छे, एक दर्शनमो-
पंधाय हे, ते ज्ञानावर्णिनावे भेद ते फड़े छे, 'हनी ते सपकिनने मुंअवे तेहना त्रण भेद्र सम
एक देश झानावणि ने मति मानादिक टांके कितमोहनी, मिथ्यात्वमोहनी, मिश्रमोहनी १,
१. बीई मर्व ज्ञानावणि ते केवळनान - ढांके बीलु चारित्रमोहनी ते सामायकादीक चारित्रने
२. पये भंद ले ॥१॥
मुंभवे कपाय नोकपायरुप २, ए व भेदछे ॥४॥
-- -- -- हाणं सूत्र २. उद्देसी ४. (१२९ ) अर्थः-आ० आयु क० कर्म दु० वे भेदे अन्तराइए कम्मे दुविहे पन्नत्ते । तं पं० कया तं० ते ज. कहुंछ अ० कायस्थि- तिरुप नरतियंचने चे० वळी भ० भवस्थितिनुं आगामिपहं ॥ ८॥ जहा। पडुप्पन्नविणासिए चेव पिहइ य देव नारकीने चे० वळी ॥५॥ भावार्थः-अंतराय कर्म राजना भंडारी स- आउकम्मे दुविहे. पन्नत्ते । तं जहा। रिखं तेह वे प्रकारे कहेल छे, एक प्रत्युत्पन्न अद्धाउए चेव भवाउए चेव ॥५॥ विनाशी ते उपनो अर्थ विणसाडे १, पिहित भावार्थ:-आउखा कर्म ते राजानी हेडसमान | आगामी अंतराय ते आवतो अर्थ लाभ रुंधे. ते वे प्रकारे कहेलछे ते कहेछे, अधायु ते काय २, ए वे भेद छे ॥८॥ स्थितीरुप मनुष्य तिर्यंचने १, वीजुभवायु ते भव अर्थः-दु० वे भेदे मु० मुर्छा प० कही स्थितीरुप देवता नारकीने २, ए वे भेदछे ॥५॥ | त० ते ज० कहुंछं पे० रागनी मुर्छा पुत्रादि- अर्थः-ना नाम क०कर्म दुवे भेदे पं०कह्या तं० कनी चे० वळी दो० द्वेषथी मुर्छा वेरी प्रमुष तेज० कहुंछं सु०शुभ ना नाम कर्म तिर्थकरादि चे० वळी ॥१॥ चे० वळी अ० अशुभ ना० नाम कर्म अनादेय १७ पेरा ( आ आठ प्रकारनुं कर्म मुर्छा नाम जेनुं वचन सारुं न लागे चे० वळी ॥६॥ जन्य छे तेथी मुर्छानुं स्वरूप कहे छे) नामकम्मे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा। दुविहा मुच्छा पन्नत्ता। तं जहा । सुभनामे चेव असुभनामे चेव ॥६॥ पेज्जवत्तिया चेव दोसवत्तिया. चेव ॥१॥ भावार्थ:-नाम कर्म चितारा सरीखं तेहना भावार्थ:-ए आठ कर्म मुर्छा ते मोहथी उ- वे प्रकार कहेल छे ते कहे छे, एक शुभ नाम पजे ते माटे मुर्छानुं स्वरुप कहे छे, ते मुर्छा वे कर्म तिर्थकरादीक १, वीजु अशुभ नाम कर्म प्रकारे कहेल छे ते कहे छे, एक प्रेमरागनी मु- ते अनादेय प्रमुख २, ए वे भेद छे ॥६॥ छी (ते अविवेकीपणुं करे) ते पुत्र धनादीक अर्थः-गो० गोत्र क० कर्म दुबे भेदे पं०कडं उपरे १, वीजी द्वेषयी मुर्छा ते वैरि प्रमुख उ- तं० ते ज० कहुंछु उ० उच गो० गोत्र चे० परे २, ए वे भेद छे ॥१॥ वळी नी० नीच गो० गोत्र चे० वळी ॥७॥ अर्थ:-पे० प्रेमनी मु० मुर्छा दु० वे भेदे गोत्तकम्मे दुविहे पन्नत्ते । तं जहा। पं० कही तं० ते ज० कहुंछु मा० कपटनी उच्चागोत्ते चेव नीयागोत्ते चेव ॥७॥ चे० बळी लो० लोभथी धनादिकनी चे वळी ॥२॥ भावार्थ:-गोत्र कर्म कुंभार सरिखं तेहना वे प्रकार कहेलछे ते कहेछे, उंच गोत्र ते पुजनीक?, पेज्जवत्तिया मुच्छा दुविहा पन्नत्ता । नीच गोत्र ते नींदनीक २, ए चे भेदछे ॥७॥ तं जहा । माया चेव लोभे चेव ॥२॥ अर्थः-अ० अंतराय क० कर्म दु० वे भेदे भावार्थ:-प्रेमवती मुंी वे प्रकारे कहेल छे पं०कह्या तं० ते ज० कहुंछु प० उपजो अर्थ वि० ते कहे छे, एक माया कपटादीक १, वीजी विणसाडे (लाभनो नाश करे) चे० वळी पि० लोभधी धनादीकनी मुर्छा २, एवे भेद छ ।।२।। रुधे य०वळी आ०आवता अर्थ लाभने ॥८॥ अर्थः-दो० द्वेषवर्तिका मु० मुर्छा दु० वे भेदे १७ -- (१३०) हाणं सूत्र २. उद्देसो।४. . , - -- । पं० कही तं० ते ज० कहुंछ को क्रोधथी राधना १, चारित्र धर्म ते पंच महा व्रतादी- चे० वळी मा० मानथी चे० वळी-॥ ३ ॥ कनी आराधना सेवना २, ए वे भेद छे ॥२॥ दोसवत्तिया मुच्छा दुविहा पन्नत्ता। अर्थः के केवलीनी आ० आराधना दुवे तं जहा । कोहे चेव माणे चेव ॥३॥ प्रकारे पं० कही तं० ते ज० कहुंछं अ० भ- भावार्थः-देववती मुर्छा वे प्रकारे कहेल-छे वनो विछेद केवलज्ञानी मोक्ष जाय ते चे ते कहे छे एक क्रोधयी १, बीजी मानी २, वळी क० नवग्रीवेग, पांच अणुत्तर वि० विमाने ए बे भेद छे ॥३॥ उ० उपजे ते श्रृंत केवलि प्रमुषने चे० वळी ॥३॥ अर्थः-दुः वे भेदे आ० आराधना पं० केवलियाराहगा दुविहा पन्नत्तां । तं कही तं० ते ज० कहुंछु ध० चारित्र धर्म जहा। अन्तकिरियाचेव कप्पविमाणो- आ० आराधवो ते चे० बळी के० केवलिनी ववत्तिया चेव ॥ ३ ॥ आ० आराधना चे० वळी ॥१॥ भावार्थ:-केवळीनी आराधना वे प्रकारे १८ पेरा (मुर्छाथी उत्पन थएला कर्मनो नाश आराधनाथी थाय छे तेथी ते आराधना कहेल छेते कहे छे, अंतक्रिया ते भवनो-छेद करी केवळज्ञानी मोक्ष जाय १, कल्पविमानो त्रण सूत्र वडे कहे छे) ववतियाते जेहथी नव ग्रैवेयक, पांच अनुत्तर दुविहा आराहणा पन्नत्ता । तं जहा । विमाने उपजे ते केवळी प्रमुखने २, ए ये धम्मियाराहणा चेव केवलियाराहणा. भेद छे ॥ ३ ॥ चेव ॥ १॥ अर्थः-दो० वे ति० तिर्थकर नी० नीला भावार्थ:-नुर्छादिक कर्मनो क्षय कमल सरिषा सा० शाम व० वर्णछे पं० ते कहे राधनथी होय ते माटे आराधना कहे छे, आ छे तं० ते ज० कहुंछ मु० मुणिमुकृत वीसमा रावना ने प्रकारे कहेल छे ते कहे छे, चारित्र । तिर्थकर चे० वळी अ० नेमिनाथ वावीसमा रुप धर्म आराधवो ते धार्मिक आराधना १, | तिर्थकर चे० वळी ॥ १ ॥ केवळीने श्रुत, अवधी, मनपर्यव, केवळज्ञानरुप १९ पेरा (उपर ज्ञानादी आराधना कही श्रुत आराधना २, ए बे भेद छे ॥१॥ तेना फळभुत तिर्थकरो होयछे अगर तेमनेज ते अर्थी-५० धर्म आ० आराधना दु० वे भेदे रुही रीते कहेलीछे तेथी तिर्थंकरो विशे कहेछ) पं० कही तं० ते ज० कहुंछ शु० सिद्धांतनी दो तित्थगरा नीलुप्पलसमा वण्णे- आ० आरावना चे० वळी च० पांच महातनी सेवना ले० बळी ॥२॥ णं पन्नत्ता। तं जहा । सुणिसुवए चेव धम्मियाराहणा दुविहा पन्नत्ता । तं अरिहणेमी चेव ॥१॥ जहा । सुववम्माराहणा चेव चरित्तध- भावार्थ:-ए ज्ञान आराधनानुं फळ तिर्थ- कर पद पण पामे ते माटे तिर्थकरना वर्ण म्माराहणा चेव ॥ २ ॥ कहे छे, आ चौविसीमां वे तिर्थकर नीला क- भावार्थ:-धार्मिक आराधना वे प्रकारे क मळ सरिखा वर्णे शाम अंजनगिरि, शाम हस्ती, हेल छे ते कहे छे, श्रुत'धर्म ते सिद्धतिनी आ- 'मेघनी घटी, अळसीनां फुल तेहनां जेवा वर्णे धर्म आ- -~- हाणं मूत्र २..उद्देसो ४. , - 'कहेल छे, वीसमा मुनिसुव्रतस्त्वामी १, बावी भावार्थ:-वे तिर्थ कर चंद्र सरिखा श्वेत समा.अरिष्ट नेमीनाथ २, ए वे भेद छे ॥१॥ (धोळा) गोरा ते रुपी पर्वत, क्षीरसमुद्र, वैता- अर्थः-दो वेति तिर्थंकर पि० रायण वृक्ष ढयपर्वत, मुक्ताफळ (मोती), मचकुंढनां फल, सरिषा व० वर्णे लीला पं० कह्या तं० ते ज० मुक्तिसिल्ला सरिखा, उजवळ वर्ण कहल छे, कहुंछ म० १९ मा तिर्थकर चे० वळी पा० ते कहे छ, आठमा चंद्रप्रभु १, पुष्पदंत वीजुं २३ मा तिर्थकर चे० वळी ॥२॥ नाम नवमा सुविधीनाथ २, ए वे भेद छे ॥४॥ दो तित्थगरा पियङ्गुसमा वण्णेणं प- अर्थः-स० सत्यवाद छे जिहां पु० छटुं नत्ता । तं जहा । मल्ली चेव पासे पुर्वना पं० वळी दु० वे व० अध्यपन पं० कह्यां. २० पेरा ( उपर तिर्थकरतुं स्वरुप कह्यु चेव ॥ २॥ अने तिर्थकरोथीज तिर्थंकरो, तीर्थ अने प्रव- भावार्थ:-वे तिर्थकर (तिर्थना करनार ते) चन जणाय छे तेथी प्रवचनना एक देशनो जे पियंगु वृक्ष सरिखा, निलवंत पर्वत, शुक (पो- पुर्व विशेश'ते कहे छे) पट) अने निलबास पक्षी सरिखा नीलावणे सच्चप्पवायपुवस्स णं दुवे वत्थू प- कहेल छे ते कहे छे, ओगणीसमा मल्लीनाथ न्नत्ता॥ १, त्रेवीसमा पार्श्वनाथ २, ए वे भेद छे ॥२॥ अर्थः-दो वेति तिर्थकर प० राता कमल भावार्थः-छठं सत्यमवाद पुर्व तेहमां सत्य- सरिषा गो० गोरा व० वर्णे पं० कया तं० ते वाद छे ते प्रवचन तेहनो एक प्रदेश ते चउदह ज० कहुंछं प० छठा तिर्थंकर चे० वळी वा० छे ते वती पूर्वनो अधिकार कहे छे ते सत्य- वारमा तिर्थकर चे० वळी ॥३॥ प्रवाद पुर्वनां वे अध्ययन कहां छे. दो तित्थगरा पउमगोरा वणेणं प- बेता० तारा पं० कसा अर्थ:-पु० पुर्वभद्रपद न० नक्षत्रना दु० नत्ता । तं जहा । पउमप्पभे चेव वासु २१ पेरा (ए उपर छठा पुर्व स्वरुप पुज्जे चेव ॥ ३॥ कां. वे पुर्व शव्दना शाम्यपणायी पुर्वपद्पदा भावार्थ:-चे तिर्थकर राता कमळ सरिखा, नक्षत्रतुं स्वरुप कहे छे ) गोरा तथा निपधपर्वत, उगतो सूर्य, राता र पुत्वभवयान खत्ते दुत्तारे पन्नत्ते । तन, परवाळी, जामुना फुल ते सरिखा राता वणे भावार्थः -पुर्वाभाद्रपद नक्षत्रना वे तारा व तिर्थकर कहेलछे ते कहेछे छहायदमप्रभु १, कहेल छे. घारमा वासुपुज्य २, ए वे भेद छ ॥३॥ अर्थ:-उ० उत्तर भद्रपद न० नक्षत्रना अर्थ:-दो० वे ति० तिर्थकर च० चंद्रमा स- दु. वे ता० तारा पं० कद्या ।। १ ।। रिपा गोरा व० वर्ण पं० कया ते तेज. कहुंछु २२ पेरा (नक्षत्रना मलावधी मीना च० आठमा तिर्थकर चे० वळी पु० नवमा नक्षत्रोतुं स्वरुप प्रण सूत्रवडे कई छे ) तिर्थकर चे० वळी ॥४॥ दो तित्थगरा चन्दगोरा वणेणं प- ॥१॥ उत्तरभद्दवयानक्खत्ते दुत्तारे पन्नत्ते नत्ता । तं जहा । चन्दप्पमे चेव पु भावार्थ:-एपज उत्तराभाद्रपद नारना फदन्ते चेव ॥ ४॥ पण वे तारा कया छे ॥१॥ - - । " (१३२) हाणं सूत्र २. उद्देसो ४. अर्थः-ए० एम पु० पुर्व फालगुनीना वे दो चकवट्टी अपरिचत्तकामभोगा तारा का ॥२॥ कालमासे कालं किच्चा अहे सत्तमाए एवं पुवफग्गुणी ॥२॥ पुढवीए अप्पइट्ठाणे नरए नेरइयत्ताए भावार्थ:-एमज पुर्वाफाल्गुणी नक्षत्रना वे वे तारा कह्या छे ॥२॥ उववन्ना । तं जहा । सुभमे चेव बम्भ- अर्थः-उ० उत्तरा फ० फालगुनी नक्षत्रना वे दत्ते चेव ।। तारा कह्या ॥३॥ भावार्थ:-मनुष्यक्षेत्रना अधिकार माटे च- उत्तरफग्गुणी ॥ ३॥ क्रवर्तिनो प्रस्ताव आव्यो तेथी चक्रवर्तिनो भावार्थः-उतराफाल्गुणी नक्षत्रना वे तारा | अधीकार कहे छ, भरतक्षेत्रमा वे चक्रवर्ति उ. कह्या छे ॥३॥ त्तम पुरुष कामभोग छांडया वीना काढ़ने अर्थ:-अ० माहि णं० वळी म० मनुष्य अवसरे काळ करी (आउद्म पुर्ण करी ) हठे खे० क्षेत्रना दो० वे स० समुद्र पं० कह्या तं० सातमी नकं प्रथ्वीए अप्रतिष्टान नाम नका. ते ज० कहुंछ ल० लवण समुद्र चे० वळी वासाने विष नारकीपणे तेत्रोस सागरोपमने का० कालोधी चे० वळी आउखे उपना तेहनां नाम कहे छ, आठमो २३ पेरा (द्वीप समुद्र नक्षत्रवाळो होय छ । मुभुम चक्रवात १, अने वारमो ब्रह्मदत्त चक्र- तेथी समुद्रने विष कहे छे) वर्ति २, ए वे भेद छे. अन्तो णं मणुस्सखेत्तस्स दो समु- भ० भवनपति दे देवताने दे० काइक ऊणी अर्थः-अ० चमरेन्द्र बलेन्द्र न० वर्जिने हा पन्नत्ता । तं जहा । लवणे चेव दो वे प० पल्योपमनी ठि० स्थिति पं०कही ॥१॥ कालोदे चेव ॥ २५ (ते व तीर्थकरोनी नरकमां तेत्रीस भावार्थ:-नक्षत्र सहित दोपसमुद्र छे ते सागरोपमनी स्थीतो तेथो अने नारकोना सं- माटे पीस्तालीसलाख जोजन मनुष्यक्षेत्र के ख्याता काळ सुधीनी पण स्थीती होय छे तेहमां वे समुद्र छे ते कहे छ, एक लवणसमुद्र पांच सूत्रो कहे छे) तेथी भुवनपती वीगेरेनी स्थीती दरशावता १, वीजा काळोदधी समुद्र २, 'ए वे मेद छ. पांच सूत्रो कहे छे) अर्थः-दो० वे च० चक्रवति भरत क्षेत्रना असुरिन्दवज्जियाणं अ० छांडया नहि का० कामभोग का० आ- देवाणं देसूणाई दो पलिओवमाई ठिई व का० पूर्ण कि० करीने अ० हेठे स० सा- पन्नत्ता ॥१॥ तमी पु० पृथ्वीए अ० अपइठाण न० नरक भावार्थ:-नारकीनी असंख्यात काळनी वासे ने० नारकीपणे उ० उपना तं० ते ज० स्थीति छ तेम भवनपतिनी पण कहे छ, असु- कहुंछं सु० आठमो चक्रवर्ति 'चे० वळी व० रेंद्र ते चमरेंद्र अने वलेंद्र वर्जिने वीज़ा नाग- ब्रह्मदत्त वारमो चे० वळी, कुमारेंद्रादीकनी जघन्य दशहजार वर्षनी उ- २४ पेरा ( मनुष्यक्षेत्रनो प्रस्ताव होवाथो त्कृष्टी देशे काइकउणी वे पल्योपमनी आउ- भरतक्षेत्रमा उत्पन्न थएला उत्तम पुरुषोनुं नर- खानी स्थिति कही छे अने चमरेंद्र बलेंद्रनी कगामीपणुं होय के न होय ते विपे कहे छे) . उत्कृष्टी सागरोपम झाझेरी स्थिति छे ॥१॥ भवणवासीणं .. हाणं सूत्र २. उद्देसो ४. (१३३) अर्थ:-सो० सौधर्म क० देवलोक दे० दे २६ पेरा (देवलोकनो प्रस्ताव होवाथी वतानी उ० उतकृष्टी दो० वे सा० सागरो- स्त्री वगेरे द्वारोथी देवलोक संबंधी वीजुं ठाणुं पमनी ठि० स्थिति प० कही ॥२॥ सात सूत्रथी कहे छे) सोहम्मे कप्पे देवाणं उक्कोसेणं दो दोसु कप्पेसु कप्पत्थियाओ पन्नत्ता- सागरोवमाइं ठिई पन्नत्ता ॥२॥ ओ।तं जहा । सोहम्मे चेव ईसाणे भावार्थ:-एम सौधर्म देवलोके देवतानी चेव ॥१॥ उत्कृष्टी वे सागरोपमनी स्थिति छे ॥ २॥ भावार्थ:-देवताना अधीकार माटे देवीनो अर्थः-ई० ईसान देवलोक क० देवलोकना अधिकार कहे छे, वे देवलोकने विषे देवलो- दे० देवतानी उ० उत्तकृप्टी सा० झाझेरी दो० कनी स्त्री देवांगना छे ते कहे छे, सौधर्म वे सा० सागरोपमनी ठि० स्थिति पं०कही ॥३॥ देवलोके १, ईशान देवलोके २, ए वे देवलोके ईसाणे कप्पे देवाणं उक्कोसेणं साइरे- देवांगना छे ॥ १ ॥ गाई दो सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता ॥३॥ देवताने ते तेजु ले लेस्या पं० कही तं० अर्थः-दो० वे क० देवलोकन विपे दे० भावार्थ:-ईशान देवलोके उत्कृष्टी वे साग- त ज० कहुंछ सो० सौधर्म देवलोके चे० वळी रोपम आझेरी स्थिति कही छे ।। ३ ॥ ई० ईसाने चे० वळी ॥ २ ॥ अर्थः-स० सनतकुमारे त्रीजे क० देव- दोसु कप्पेसु देवा तेउलेसा पन्नत्ता । लोके दे० देवताने ज० जघन्य दो० वे सा० सागरोपमनी ठि० स्थिति पं० कही ॥ ४ ॥ तं जहा। सोहम्मे चेव ईसाणे चेव ॥२॥ भावार्थ:-वे देवलोके देवताने तेजुलेशा सणंकुमारे कप्पे देवाणं जहन्नेणं कहीछे, सोधर्म देवलोके १, ईशान देवलोके२॥२॥ दो सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता ॥ ४ ॥ अर्थः-दो० वे क० देवलोकने विषे दे० भावार्थ:-सनत्कुमार त्रीजे देवलोके देव- देवताने का० कायाए भोग छे स्त्री साथे पं० तानी जघन्य वेसागरोपमनी स्थिति कहीछे ॥४॥ कह्यो तं० ते ज० कहुंछ सो० सौधर्म देवलोके अर्थः-मा० चोथे क० देवलोके दे. देव- चे० वळी ई० ईसान देवलोके चे०वळी॥३॥ तानी ज० जघ्यन दो० वे सा० झाझेरी सा० दोसु कप्पेसु देवा कायपरियारगा सागरोपमनी ठि० स्थिति पं० कही ॥५॥ पन्नता । तं जहा । सोहम्मे चेव ईसा- माहिन्दे कप्पे देवाणं जहन्नेणं दो णे चेव ॥ ३॥ साइरेगाई सागरोवमाई ठिई पन्नत्ता भावार्थ:-वे देवलोकने विप देवता कायाये करी देवांगनानी साथे मनुप्यनी पेरे भोग ॥ ५॥ भोगवे छ ते वेनां नाम कहे छे, सौधर्म देव- भावार्थ:-चोथे माडेंद्र देवलोके देवतानी लोके ?, ईशान देवलोके २ ॥३॥ जघन्य वे सागरोपम झाझेरी स्थिति कहीछे।।५।। अर्थः-दो० वे क० देवलोके दे० देवने अर्थः-दो बे क० देवलोकने विपे क० फा० आलंगनादिके भोग स्त्रीनो पं० कयो देवांगना प० कही तं० ते ज० कहुंई सो० तं० ते ज० कहुं; स० बीजे चेक वळी मा० सौधर्म चे० वळी ई० ईसाने चे० वळी ॥१॥ चोथे चे० बळी ।। ४ ।।
. ( १३४ ) हाणं सूत्र २. उसो ४. - 1 1 दोसु कप्पेसु देवा फासपरियारगा। दो इन्दा मणपरियारगा पन्नत्ता । पन्नत्ता । तं जहा । सणंकुमारे चेव जहा ! पाणए चेव अच्चुए चेव ॥७॥ माहिन्दे चेव ॥ ४॥ भावार्थ:-वे इंद्रने मनथी देवांगनाना भो- भावार्थ:-वे देवलोकने देवताने फरसथी। गथी सेवा कही छे, नवमा, दशमा, इग्यारमा, ते आलींगनादीकथी स्वीनो भोग कहेल छे ते वारमा, ए चार देवलोके देवता मनथी भोग कहे छे, त्रीजे सनत्कुमार देवलोके १, चोथे भोगवे छे पण वे ठाणानो वोल छे तेथी इहां माहेंद्र देवलोके २ ॥४॥ वे इंद्र कह्या छे ते कहे छे, प्रणीतेंद्र ते नवमा अर्थ-दो० वे क० देवलोके दे० देवता दशमा देवलोकनो धणी १, अच्युतेंद्र ते इग्या- १० रूप टीठाथी भोग पुर्ण करे पं० कह्या तं० रमा वारमा देवलोकनो धणी २॥७॥ ते ज० कहुंछ व० पांचमे देवलोके चे० वळी अर्थः-जी० जीव णं० वळी दु० वे ठा० ल० छठे देवलोके चे० वळी ॥५॥ थानके नि० उपजे पो० पुदगल पा० पाप दोसु कप्पेसु देवा रूवपरियारगा प- कर्म चि० ग्रहता हवा अतीत काले वा० अ- थवा चि० ग्रहे छ वर्तमानकाले वा० अथवा नत्ता तंजहा । वम्भलोए चेव लन्तगे चि० आगमिकाले ब्रहस्ये वा० अथवा तं. चेव ॥ ५॥ ते ज० कहुंछ त० वे इंन्द्रियादिकमां नि० उ- भावार्थ:-चे देवलोके देवताने रुप दीठाथी उपजीने भोगवे पापकर्म चे० वळी था० पृ. भोग पुर्ण थाय छे ते देवांगनानुं रुप देखी थ्वी प्रमुख पांचमा नि० उपजीने भोगवे पापकर्म कामामिलापनी इच्छा पुरी थाय छे ते कहे चे० वळी ॥१॥ छ, पांचमे ब्रह्म देवलोके १, छठे लांतक देव- २७ पेरा (आपरीचारणा कर्मथी होय छे, लोके २ ॥५॥ अर्थः-दो वे क० देवलोके दे० देवता वस्थपणाथी करे छे तेथी छ सूत्रो कहे छे ) जीवो कर्म स्वहेतुथी त्रणे काळे चीतनी अव्य- स०- शब्दथी प० भोग सेवे छे पं० एम कडं तं० ते ज० कहुंछ म० सातमे चे० वळी स० जीवा णं दुट्ठाणनिवत्तिए पोग्गले आठमे चे० वळी ॥६॥ पावकम्मत्ताए चिणिंसु वा चिणन्ति दोसु कप्पेसु देवा सहपरियारगा प- वा चिणिस्सन्ति वा । तं जहा । तस- नत्ता । तं जहा। महामुक्के चेव सह- कायनिबत्तिए चेव थावरकायनिवत्ति- -स्सारे चेव ॥ ६॥ ए चेव ॥१॥ भावार्थ:-वे देवलोके देवता देवांगनाना भावार्थः-ए भोगादीकनी इच्छा ते जी- शब्दथी भोग सेवे छे, सातमे महाशुक्र देवलोके वने वे स्थानके उपकर्मथी उपजे छे ते माटे १, आठमे सहस्रार देवलोके २ ॥६॥ पापकर्मन स्वरुप कहे छे, जीव वे स्थानके करी अर्थः-दो० वे इ० इन्द्रने म० मनथी दे- पापकर्मनां पुगढळ अतित काळे चिण्यां (ग्रह्यां) वांगनाना भोग पं० कद्या तं० ते ज० कहुंछ । छे, वर्तमानकाळे चिणे (ग्रहे) छे, आगमीयशाळे पा० प्राणतेंद्रनो इंद्र चे० वळी अ० अच्युते-चिणशे (ग्रहण करशे) ते कहे छे. न्द्रनो इंद्र चे० वळी ॥७॥ निवर्तित ते जे वे इंद्रीयादीक त्रसकायमा उ- - 1. त्रसकाय हाणं सूत्र २. उद्देसो ४. (१३५ ) , .. पजीने पापकर्मनुं भोगवईं १, स्थावर कायनि भावार्थ:-जे कर्मउदय नथी आव्यां ते का- वर्तित ते पृथ्व्यादी पांच स्थावरमा अवतरी रणथी वलात्कारे उदय आणे ते उदारणा पापकर्मनुं भोगव, २, एवा कर्म घुदगळ ग्रह्यां कहीए, पुर्वोक्त वे प्रकारनां कर्म जीवे उदेयाँ ग्रहे छे ने ग्रहशे, ए वे भेद छे ॥१॥ उदिरे छे ने उदोरशे ॥४॥ अर्थ:-एम उ० एहवा पुदगल ग्रहे अर्थः-५० चेदवो ते भोगवळू ते वेदतो वो एम. ग्रहा कर्मनो अवोधाकाल मुकीने थापधुं वा० अथवा वे० वेदे छे वा० अथवा वे० वे- विशेपथी तेहमांथी हीन करQ एटले अबाधा | दशे वा० अथवा ॥५॥ काल जेटलं छे ते उपचय अतितकाले कीयो वेदिसु वा वेदेन्ति वा वेदिस्सन्ति वा० अथवा उ० वर्तमानकाले करेछे वा० अ-वा॥५॥ थवा उ० अनागतकाले करस्ये वा०अथवा ॥२॥ भावार्थ:-एमज पुर्वोक्त वे प्रकारनां कर्म उवचिणिंसु वा उवचिणन्ति वा वेदता ( भोगवता) हुआ, वेदेछे ने वेदशे ॥५॥ उवचिणिस्सन्ति वा ॥२॥ अर्थ:-नि० कर्म भोगव्या पछी उदय नही भावार्थ:-ग्रयां कर्मनो अबाधाकाळ मुकीने ते निर्जरतो हवो वा० अथवा नि० निर्जरे छे ते माहीथी होन कर, एटले अवाधाकाळ जे वा० अथवा नि० निर्जरशे वा० अथवा ॥६॥ टलं ओळु ते उपचय कहीए, पुर्वोक्त वे स्था निजरिमु वा निज्जरेन्ति वा नि- नो भोगवयां पडे एवां कर्म पुढगळनो अ- जरिस्सन्ति वा ॥६॥ तितकाळे उपचय कर्यो १, वर्तमानकाळे उप- भावार्थ:-एमज पुर्वोक्त वे प्रकारनां कर्मनी चय करेछे ने आगमीयकाळे उपचय करशे ॥२॥ निर्जरा जे कर्म भोगव्या पछी अकर्म थाय ते अर्थः-ब० ते कर्मवें कपाययी निकाचवू निर्जरता हुआ, निर्जरेछे ने निर्जरशे ॥६॥[चि- ते बांधतो वो वा० अथवा व० वांधेछे वा० णवू १, उपचीणबुं २, वांधवू ३, उदीरवू ४, अथवा व० बांधस्ये वा अथवा ॥३॥ वेदवू ५, निर्जर ६, ए छ बोल थया]॥६॥ वन्धिमु वा बन्धन्ति वा वन्धिस्स- अर्थः-दु० ने प० प्रदेशिया खं० पंध अ० न्ति वा ॥३॥ अनंता पं० कया ॥ १ ॥ भावार्थ:-अतितकाळे कियां कर्मनु कपायथी २८ (द्रव्यक्षेत्र काळभावथी पुदगळनीनी- निकाचवं (मजबुत करवू ) ते बंध कहीए, रुपणा कहे छे ) पुर्वोक्त वे स्थानके भोगवयां पडे एवां कर्म दुपएसिया खन्धा अणन्ता पन्नत्ता पुदगल वांध्यां, वांधे छ ने बांधशे ॥३॥ ॥ १ ॥ अर्थ:-उ० एमग उदीरणा जे उदय कर्म भावार्थ:-त्रण काळे ए जीवत्रसस्थावर- नवी आयुं ते कारणे बलातकार उदय आणे पणे कर्म ते पुढगळरुष छे ते पुदगळ- स्वरुप ते उदारणा उदीरना वो वा० अथवा उ० कहेछे, वे मदेशीया पुढगळना खंध अनंतछे।।१।। उदो छ वा० अथवा उ० उदीरस्ये ॥४॥ अर्थ:-दु० वे प० आकाशना प्रदेशने अ. उदीस्सुि वा उदीरेन्ति वा उदीरि- वगाही रया एडवा पो० पुटगळ अ० अनंता स्सन्ति वा ॥४॥ । प० कया ।।२।। - ( १३६ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. दुपएसोगाढा पोग्गला अणन्ता प- भावार्थ:-एम यावत वे गुण लुख्खा पुद- गळ अनंताश्री तिर्थकर देवे कयां छे) न्नत्ता॥ २॥ भावार्थ:-वे आकाशना प्रदेशने अवगाही अर्थः-दु० वीजुं ठा० ठाणुं स० पुरु थयु. त आश्रयी रह्यांछे एवां अनंता पुदगळ छे ।।२।। ॥ दुट्ठाणं समत्तं ॥ अर्थः-दु० वीजा ठा० ठाणानो च०चोथो भावार्थः-(इतिश्री वीजा ठाणाना चोया उ० उदेसो स० पुरो थयो. उदेशानो भावार्थ संपूर्णम्) दुट्ठाणस्स चउत्थो उद्देसओ समत्तो॥ इतिश्री वीजा ठाणानो भावार्थ संपूर्ण, 1 [अह तिहाणं । [ अह तिट्ठाणस्स पढमो उद्देसओ ।। अर्थ:-त० त्रण इ० इन्द्र पं० कह्यां त० ते द्रव्य इंद्र ते कोइ भव्यजीव आवते भवे इंद्र ज० कहुं छु ना० नायथी इंद्र ग० स्थापना थवानो होयते ३, ए त्रण भेदछे ।। १ ।। इन्द्र द० देवेद्र जे आवते भवे इन्द्र थाय॥१॥ अर्थ:-ते. त्रणइ० इन्द्र पं० कह्या तं० ते जा (वीजा अध्ययनना छेला उदेशामां कहुं छं ना० ज्ञानेन्द्र केवळी दं० दर्शनंद्र क्षा- जीव अने अजीवना पर्याय कह्या अने आ अध्य-यिक समकिति च० चारितेंद्र यथाख्यात चा- यनना पेहेला उदेशामां पण तेनाज पर्याय रित्रीयो ॥ २ ॥ कहे छे. छेला उदेशाना छेला सुत्रमा पुदगळ (नाम इन्द्र, स्थापना इन्द्र अने द्रव्य इन्द्र धर्म कह्या हता अने आ उदेशाना पेहेला सु- कह्या, हवे भाव इन्द्र कहे छे) त्रमा जीव धर्म कहे छे. आ प्रमाणे छेला ने आ उदेशानो संबंध छे.) तओ इन्दा पन्नता । तं जहा । १. तओ इन्दा पन्नत्ता । तं जहा । नाणिन्दे दंसणिन्दे चरित्तिन्दे ॥२॥ नामिन्दे ठावणिन्दे दविन्दे ॥१॥ भावार्थ:-वळी त्रण प्रकारे इंद्र कहेलछे ते भावार्थः-त्रण प्रकारना इंद्र श्री तिर्थकर कहेछे, ज्ञानेंद्रते पुर्ण ज्ञानवंत केवळी १, दर्श- देवे कहेलछे ते कहेछे, नाम इंद्र ते इंद्रना गुण नेंद्र ते क्षायिक समकितनो धणी २, चारितेंद्र ते रहित फक्त नामथोज इंद्र जेम गोवालणीये यथाख्यात चारित्रनो धणी ३, एत्रण भेदछे ।।२।। मोह घेलाइए पोताना पुत्रनुं नाम इंद्र पाडयु, अर्थः-त० त्रण इ० इन्द्र पं० कह्यां तं० ते गोपेंद्र, भुमीद्र, अक्षरथी इंद्र, सिंह इत्यादि नाम ज० कहुं छु. दे० वैमानिकना अ० भवनप- इंद्र १, स्थापना इंद्रते इंद्रनो आकार वनावे २, ! तिना म० चक्रवर्ति ॥ ३ ॥ M +- - हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. (१३७ ) (अध्यात्मिक ऐश्वर्यनी अपेक्षाए भावइन्द्र- त्रण प्रकारे विकुर्वणा कही ते कहेछे, भवधार- ना त्रण प्रकार कह्या. हवे ऐश्वर्यनी अपेक्षाए णी जे मुळ शरिर अवगाही जेटलं क्षेत्र रह्यु भाव इन्द्रना प्रण प्रकार कहे छे) छे तेहथी अलगा क्षेत्रनां पुदगल वैक्रेय समु- तओ इन्दा पन्नत्ता । तं जहा द्रघाते करी ग्रहीने जे नवा रुपनी विकुर्वणा करे ते एक विकुर्वणा १, जे वाह्यक्षेत्रना पुद- देविन्दे असुरिन्दे मणुस्सिन्दे ॥३॥ गळ लीधा विना मुळगाज शरिर माहिलां भावार्थ:-वळीत्रण प्रकारना इंद्र कहेलछे ते कहे | पुदगल विशिष्ट ग्रहीने विकुर्वणा करे ते वीजी छे, देवेंद्र ते जोतिषी वैमानिकना इंद्र १, असुरेंद्र विकुर्वणा २, वाह्य पुदगळ ग्रहीने केटलाएक ते भवनपती व्यंतरना इंद्र २, मनुष्यद्रे ते चक्रव मुळ शरिरनां पुदगळ ग्रहीने विकुर्वणा करते यादीक मनुष्यनो इंद्र ३, एत्रण भेदछे ॥ ३ ॥ त्रीजी विकुर्वणा ३, ए त्रण भेदछे ॥ १ ॥ अर्थ:-ति० त्रण भेदे वि० विकुर्वणा पं० अर्थ:-ति० त्रण भेदे वि० विकुर्वणा पं० कही कही तं० ते ज० कहुंछु वा० भवधारणी तं० ते ज० कहुं छं अ० मुलगे शरीरे जे क्षेत्र शरीरने अवगाहिने जेटलं क्षेत्र रह्यं छे तेथी प्रदेशे अवगाह्या पो० पुदगल प० लइने विकु- अलगा क्षेत्रना पो० पुदगल प० (विक्रय स- णा करे ते ए०एक वि०विकुर्वणा अ०अभ्यंतर मुदघाते करी) ग्रहीने नवा रुपनी ए० एक पो० पुदगल अ० अणग्रहे ए० एक वि० वि० विकुर्वणा ते वा० वाहिर क्षेत्रना पो० विकुर्णवा अ० अभ्यंतर पो० पुदगल प० पुदगल अ० अणलीधे ए० एक वि० विकुर्वणा कांइक ग्रहीने वि० वली अ० काइक अणा- चा० वाद्य क्षेत्रना पो० पुदगल प० लेइने वि० हीने वि० वली ए० एक वि० विकुर्वणा ॥२॥ वळी अ० लीधा विना एटले कांइक मुलगा तिविहा विउवणा पन्नता । तं जहा। शरीरना केटलाक वाह्य पुदगल लेईने वि० वळी ए० एक वि० विकुर्वणाकरे ते ॥१॥ अब्भन्तरए पोग्गले परियादिइत्ता एगा २ पेरा (आ रणनु इन्द्रपणु वैक्रिय कखें | विउवणा। अन्भन्तरए पोग्गले अपरि- विगेरे शक्ति सहितपणाने लीधेछे तेथी विकुर्व- यादिइत्ता एगा विउवणा। अब्भन्तरए णातुं स्वरुप कहे छे). पोग्गले परियादिइत्ता वि अपरियादिइत्ता तिविहा विउवणापन्नत्ता । तंजहा। वि एगा विउवणा ॥२॥ वाहिरए पोग्गले परियादिइत्ताएगा वि- भावार्थ:-वली त्रण प्रकारे विकुर्वणा श्रीभगवते उवणा।वाहिरए पोग्गले अपरियादिइत्ता कहेलछे ते कह छे,अभ्यंतर पुदगळ ते भव धारणी एगा विउवणा। बाहिरए पोग्गले परि- तथा उदारिक शरिरे क्षेत्र देशे अवगायां जे यादिइत्ता वि अपरियादिइत्ता वि एगा १, अभ्यंतर पुदगळ अणग्रहीने विकुर्वणा करे पुदगळ ते मांहिज विकुर्वणा करे ते एकविकुर्वणा विउवणा ॥१॥ ते वीजी विकुर्वणा २, एम अभ्यंतर पुदगळ भावार्थ:-ए ऋण प्रकारना इंद्रने वैकेय कांइक ग्रहीने काइक अणग्रहीने विकुर्वणा करे विकुर्वणा (धारे तेवू रुप बनाववानी शक्ति) त्रीजी विकुर्वणा ३ ए त्रग भेदछे ॥ २ ॥ होय ते माटे विकुर्वणानो अधिकार कईछे, अर्थ:-ति० त्रण भेदे वि० विकुर्वणा पं० १८ (१३८) हाणं सूत्र ३. उद्देसी १. कहीं तं ते ज० कहुं छु वा० बाह्य अ० अ एक समये एक वेत्रण यावत संख्याता मुंधी भ्यंतर पो० पुदगल प० ग्रहीने ए० एक वि० जेटला साथे उपना ते कति संचिंता नारकी विकुर्वणा वा० बाह्य अ० अभ्यंतर पो० पुद- १, एक समये असंख्याता सुधी जेटला सायें गल अ० अणग्रहीने ए० एक वि० विकुर्वणी उपनाते- अकति संचिंता नारकी २, समये वा० वाह्य अ० अभ्यंतर पो० पुदगल प० समये एकेको उपजे अवकतव्यं संचिता नारकी ग्रहीने वि० वळी अ० काइक अणग्रहीने 'वि० ३, एक समये ए ऋण प्रकारछे ॥ १॥ वळी ए० एक वि० विकुर्वणा ॥३॥ अर्थ:-ए० एम ए० एकेंद्रि वर्जीने जा. तिविहा विउवणा पन्नत्ता । तं जहा। यावत वे० वैमानिक लगे जाणवू ॥२॥ वाहिरुभन्तरए पोग्गले परियादिइत्ता (कति संचित विगेरे भेद असुर विगेरेना पणं होय तेथी ते पण वतायें छे.) एगा विउवणा।बाहिरब्भन्तरए पोग्गले अपरियादिइत्ता एगा विउवणा बाहिर- णिया ॥ २ ॥ एवं एगिन्दियवज्जा जाव वेमा- मन्तरए पोग्गले परियादिइत्ता वि अ- भावार्थ:-एम एकेंद्री वर्जिने वैधानीक सुधी परियादिइत्ता वि एगा विउवणा ॥३॥ चोविस दंडके कति संचिता १ अकति संचि. भावार्थ:-वळी त्रण प्रकारे विकुर्वणा कही ता २ अवकतव्य ३ ए त्रणे प्रकारेछे अने. छे ते कहेछे, वाह्य अने अभ्यंतर पुदगळ ग्रही | एकेंद्रीमा एक समये असंख्याता अनंता उपजे ने एक विकुर्वणा १, वाह्य अभ्यंतर पुदगळ पण वे यावत् संख्याता न बजे तेथी अफति । अणग्रहीने एक वीजी विकुर्वणा २, वाह्य अभ्यं- शब्द एकज आवे ।। २ ॥ तर पुढगळ काइक ग्रहीने कांइक अणग्रहीने अर्थ:-ति० त्रग भेदे प० देवतानी मैथुन एक त्रीजी विकुर्वणा, इहां केटलाएक भाव सेवा प० कही तं० ते ज० कहुंछ ए० कोइ बहुश्रुत गम्यछे ३, ए त्रण भेदछे ॥ ३ ॥ एक दे० देव अ० थोडी रुद्धिनो दे० धणी ते अर्थः-ति० त्रण भेदे न० नारकी प० अ० अनेरा दे० देवतानी दे० देवीने अ० वंश कह्या तं० ते ज० कहुँ छ क. एक समये करीने अ०. वश करीने प० भोगवे अ० पो- संख्याता उपना ते अ० एक समये असंख्याता तानी दे० देवीने अ० आलंगी अ० आलंगाने उपजे ते अ० समये एकको उपजे ते ॥१॥ प० भोगवे अ० पोतन अ० आत्माने वि० ३ पेरा (उपर विकुर्वणा कही ते नारकने पण विकुर्वी वि० विकुर्वीने ५० भोगवे' ए० कोई होय तेथी नारकोर्नु स्वरुप कहे छे). एक दे० देवता नो० नही अ० वीजा रुद्धि- तिविहा नेरइया पन्नता । तं जहा। वंत दे० देवता नो० नही अ० वीजा दे० दे. कइसंचिया अकइसंचिया अवत्तवग- वनी दे० देवीओ अ. आलंगी अ०, आलं- संचिया ॥ १॥ गीने प० भोगवे, अ० पोतानी दे० देवीने अ० आलंगी अ० आलंगीने प० भोगवे, अ० भावार्थ:-विकुर्वणा नारकीने होय ते माटे पोतानी मेळे अ० आत्माथी वि० विकुर्वी वि० नारकीनो अधिकार कहेछे, ग प्रकारे नारकी विकुर्वीने प० भोगवे ए० एक दे० देवता नो० कहेलछे ते कहेछे, नर्कमां उपजवानी वेळाए नही अ० अन्य दे० देव नो० नही अ० अन्य . हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. (१३९ ) दे० देवनी दे० देवी नो० नही अ० पोतानी तेज आत्माथीज विकुर्वि भोग योग्य देवांग अ० पोतेज अ० आत्माथी वि० विकुर्वी वि० नानु शरीर करी पछी तेनी साथे भोग भोगवे विकुर्वीने प० भोगवे. ३, ए त्रण वोल मलीने एक परिचारणा कही? ४ पेरा (उपरला सूत्रोमां वैमानिक दे- कोइक देवता वीजाथी रुद्धिवंत बीना देवता वनो कति संचित विगेरे धर्म कह्यो, हवे देवनो नी देवीने वश करीने भोगवे ए प्रथम प्रकार सामान्य रीते परिचारणा धर्म कहे छे.) नथी पण पोतानी देवांगनाने भोगवे १, अने तिविहा परियारणा पन्नत्ता । तं आत्माथी विकुर्विनें भोगवे २, ए वे प्रकारछे ए बीजी परिचारणा कही २, एक देवता वी- जहा। एगे देवे अन्ने देवे अन्नेसि जाथी रूद्धिवंतछे तो पण अन्यदेवतानी देवीने देवाणं देवीओ अभिजुञ्जिय अ- भोगववाने असमर्थ तेमन पोतानी देवीने पण भिजुञ्जिय परियारेइ, अप्पणिज्जिया- भोगववाने असमर्थ एटले ए वे भेद नथी पण ओ देवीओ अभिजुञ्जिय अभिजु- एबीजी परिचारणा ते मेथुन सेवा कही छे ।। आत्माथी विकुर्वणा करी देवांगनाने भोगवे ३, ञ्जिय परियारेइ, अप्पाणमेव अप्पणा अर्थः-ति० त्रण प्रकारे मे० मैथुन पं० विउविय विउविय परियारई। एगे कह्या तं० ते ज० कहुं छु दि० देवतानुं मा० मनुष्यनुं ति० तिर्यंचवें ॥१॥ देवे नो अन्ने देवे नो अन्नेसिं देवाणं ५ पेरा (विशेषथी मैथुन विपे कडं, हवे देवीओ अभिजुञ्जिय अभिजुञ्जिय सामान्यथी परुपणा करे छे.) अप्पणिज्जियाओ देवी- तिविहे मेहुणे पन्नत्ते । तं जहा । ओ अभिजुञ्जिय अभिजुञ्जिय परि- दिव्वे माणुस्सए तिरिक्खजोणिए।१।। यारइ, अप्पाणमेव अप्पणा विउविय भावार्थ:-देवताने पुर्वोक्त रीतीये त्रण प्र. विउविय परियारइ । एगे देवे नो कारे मैथुन सेवा कही ते माटे ते मैथुनना भेद कहेछे, त्रण प्रकारे मैयुन कहेल छे ते कहे अन्ने देवे नो अन्नसिं देवाणं देवीओ छ, देवतार्नु १, मनुष्यनुं २, तिर्यंच- ३, ए नो अप्पणिज्जियाओ अप्पाणमेव त्रण अने नारकी नपुंसक छे तेथी तेहने अप्पणा विउविय विउविय परियार ॥ मैथुन नथी ३, ए त्रण भेद छे ।। १ ।। भावार्थः-त्रण प्रकारे परिचारणा ते देव. छेत. ते ज० कहुं छं दे० देवता म० मनु- अर्थः-त० त्रण मे० मैथुनना ग० सेवनार मैथुन (विपय ) सेवा कहेलछे ते कहेछ, प्य ति० तिर्यच ॥२॥ सघळा नहीं पण कोइक देवता पोताथी घोडी (मैथुन सेवनार कहे छे.) रुद्धीवाला वीजा देवतानी देवीने वश करिने भोग भोगवे एटले पारकी देवीने वश करिने तओ मेहुणं गच्छन्ति । तं जहा! भोग भोगवे १, कोइक पोतानीज देवांगनाने देवा मणुस्सा तिरिक्खजोणिया ॥२॥ आश्रीने आलिंगी आलिंगीने भोगवे एटले भावार्थ:-जण मैथुनना सेवनारछे ते कडेठ, देवता देवता पोतानीन देवीने भोगवे २, अथवा पो- | १, मनुष्य २, तिर्यंच ३, ए त्रण भेदछे ।।२।। परियारेइ, (१४० ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. . अर्थ:-त० त्रण मे० मैथुन से० सेवे तं वचनप्रयोग का० कायप्रयोग ॥१॥ ते ज०कहुं हुं इ०स्वी पु० पुरुष ननपुंसक।॥३॥ ७ पंग (मन विगेरेना संबंधने लीधे आ (मैथुन सेवनारना भेद कहे छे.) प्रयोगनी वात कहे छे.) तओ मेहुणं सेवन्ति । तं जहा। तिविहे पओगे पन्नत्ते । तं जहा। म- इत्थी पुरिसा नपुंसगा ॥३॥ णप्पओगेवइप्पओगे कायप्पओगे॥१॥ भावार्थ:-चळी त्रणमैथुनना सेवनारछे, ते कहे भावार्थ:-त्रण प्रकारे प्रयोग प्रयुजवा रुप छे, स्त्री ?, पुरुप २, नपुसक ३, एत्रण भेदछ॥३॥ ते फोरवयूँ कहेल छे ते कहे छ मनप्रयोग १, अर्थ:-नि० ० त्रण जो० जोग (योग) पं० वचन प्रयोग २, काय प्रयोग ३, ॥१॥ कह्या तं० ते ज० कहुँ छु म. मनयोग व० अर्थ:-ज-जेम जो० योग वि० विगले- वचनयोग का० काययोग ॥१॥ न्द्रि व० वर्जीने जा. यावत वे. वैमानिक ६ पेरा (मैथुन सेवनार योगवाला होयछे लगे त० तेम प० प्रयोग वि० वळी ।। २ ।। तेथी योगनी परुपणा कहे छे.) जहा जोगे विगलिन्दयवज्जाणजा- तिविहे जोगे पन्नत्ते । तं जहा । व वेमाणियाण तहा पओगे वि॥२॥ मणजोगे वइजोगे कायजोगे ॥१॥ भावार्थ:-जम योग तम प्रयोग पण जाणवा, भावार्थ:-ए त्रग योगवंतछे ते माटे योग कहे। पांच स्थावर अनेत्रग विगलेंद्री एआठ वर्जिने छे, त्रण प्रकारे योग (ते आत्म वीर्य) कहेलछे | वैयानिक सुधी ए त्रणे प्रयोग कहेवा, ॥२॥ ते कहेछे, मननो योग ते मननो व्यापार १, अर्थः-ति० त्रण भेदे ककरण क्रिया करे वचननो योग ते वचननो व्यापार २, कायानो | ते पं० कही तं० तेज० कहुंछ म० मने करे ते योग ते कायानो व्यापार ३, ए त्रण भेदछे ॥१॥ व० वचने करे ते का० कायाएं करे ते ॥१॥ अर्थः-ए० एम ने नारकीने वि० वेन्द्रि ८ पेरा-(मन विगरे सबंधने लीधे करण- तेन्द्रि चउरीन्द्रि व० वर्जीने जा० यावत वे० नी वात कहे छे) वैमानिकने ॥२॥ तिविहे करणे पन्नत्ते । तं जहा । (सामान्यथी योगनी परुपणा करीछे, विशे- पथी नारक विगेरे २४ दंडकोमा ते फोरछे) मणकरणे वइकरणे कायकरणे ॥१॥ एवं नेरइयाणं विगलिन्दियवज्जाणं भावार्थ:-त्रण प्रकारकरण ते जेहथी कियादि करीएते कहेछे, मन करण ते मनथी पापपुन्य करे जाव वेमाणियाणं ॥२॥ १, वचन करण ते वचनथी पाप पुन्य करे २, भावार्थ:-एम नारकीने गे योग कहेवा काया करण ते कायाधी पाप पुन्य करे ३, ॥१॥ अने पांच एकेंद्री नथा विगलेंद्री-ए आठ वर्जिने अर्थ:-ए० एम वि० विगलेन्द्रि व वर्जीने वैयानीक मुवी त्रग-योग कहेवा, पांच स्थावर जा० यावत वे० वैमानिक लगे ॥२॥ ने एक कायानो योग छे अने त्रण विगलेंद्री एवं विगलिन्दियवज्जं जाव वे- ने वचन अने काया ए वे योग छे ॥२॥ अर्थः-ति० त्रण भेदे प० फोरवर्बु पं० क- माणियाणं ॥ २ ॥ युं तं० ते० ज० कहुं टुं म० मनप्रयोग व० भावार्थ:-एमन पांचस्थावर अनेत्रग विगलेंद्री - .
. - हाणं सूत्र ३. उदेसो १. ( १४१ ) ए आठ वर्जिने वैमानिक सुधीत्रण करणछे, सा० तंबोलादिक प० आपतोभ० थको इ० ए पांच स्थावरमां एक काम करणछे, त्रण विगले ति० त्रण ठा० धानके करीने जी० जीव अ० द्रीमां वचन अने काया ए वे करण छे ॥२॥ अल्प आउघु क० कर्म प० बांधे ॥१॥ अर्थ:-ति० त्रणक० करण प० कह्या तं०तेज. ९ पेरा-(आरंभादिक करणर्नु तथा वीजी कहुंछु आ०छ कायने हणवी ते सं० छकायने ह- क्रियानुं फळ वतावे छे) णवानो संकल्प करवो ते स. छकाय संताप तिहिं ठाणेहिं जीवा अप्पाउयत्ताए करवो ते ॥ ३ ॥ (करणना वीजी रीते त्रण प्रकार बतावेछे.) · कम्मं पगरन्ति । तं जहा। पाणे अइ- तिविहे करणे पन्नत्ते । तं जहा । वाइत्ता भवइ मुसावइत्ता भवइ त- आरम्भकरणे संरम्भकरणे समारम्भ- ' हाख्वं समणं वा माहणं वा अफासु- करणे ॥ ३॥ एणं अणेसणिज्जेणं असणपाणखाइ- भावार्थः-वळी त्रग प्रकारे करण कहेल छे मसाइमेणं पडिलामेत्ता भवइ । इन्चेए- ते कहे छे, आरंभ करण ते छकायना जीवने हिं तिहिं ठाणेहिं जीवा अप्पाउयत्ताए हणवू १, संरभ करण ते पृथव्यादीक छ कायना । कम्मं पगरेन्ति ॥ १ ॥ जीवने हणवानो संकल्प करवो २, समारंभ ते छकायना जीवने संताप करवो ३, ॥ ३ ॥ भावार्थ:-आरंभादी करणतुं फळ कहे छे, अर्थ:-नि० आंतरा रहित जा०यावत व० त्रण स्थानके करी जीव अल्प ते थोडं आउखें वैमानिक लगे २४ दंडके असंजीने पाछल्या । कर्म वांधे अने म्होटुं आयुष्य न पामे ते कहे छे, जीवने हणतो ?, जुटुं बोलनो २, तथा रुप भवनी अपेक्षाए ॥ ४ ॥ शुद्ध श्रमण माण हिंसाथी निवां एहवा (आ आरंभादिक त्रणे करण नारकीथी मांडीने वैमानिक सुधी होय छे ते वतावे छे) साधुने अफासुने सचित जीव सहिन एपणा शुद्ध नथी अल्पनीक अचित्त छे पण असुझतुं निरन्तरं जाव वेमाणियाणं ॥ ४॥ अन्न पाणी मेवो मुखवास ए चार प्रकारना भावार्थः-ए त्रण करण आंतरा रहीत वैमा आहार वोहरावे ते आपे ३, ए त्रग स्थानके नीक मुधी चौवोस दंडके कहेवा अने असंज्ञीने करी जीव अल्प आयुष्य कर्म बांधे एटले थोई पाछला भवनी अपेक्षाए होय, ॥ ४ ॥ आयुष्य बांधे, इहां चार गती मांही कई गतीनुं अर्थ:-ति० • त्रण ठा० थानके जी जीव अल्प आयुष्य वांधे ए केवळी गम्य छे ॥१॥ अ० अल्प थोडा आ० आउखाने क० कर्म अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके जी० जीव ५० बांधे तं० ते ज० कहुं हुं. पा. जीवने दी० मोटुं आ० आउपाने क० कर्म मते १० अ० हणतो भ० धको मु० जुलं क. बोलतो बांधे तं० ते ज० कहुंछ. नो० नही पा जीव भ० थको त० तथा रु० रुप शुद्ध स० क्षमा अ० हिस्यां भ० करे नो० नहीं मु० जुठं भ० वंत वा० अथवा मा० हिंसा रहित वा० वोलती थको त० तथा रू० रुप शुद्ध स० अथवा अ० सचिच अ० एपणा शुद्ध नहीं साधु वा० अधवा मा० दयावंतने वा० एहवे अ० अन्न पा० पाणी खा० सुखडी अथवा फा० अचित ए० निरवद्य अ० अन्न 1 1 हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. ( १४२ ) V । । पा० पाणी खा० सुपडी सा० तंबोल प० खा० सुपडी चा० अथवा सा० तंवोल वा० आपतो भ० थको इ. ए ति० त्रण ठा० अथवा प० आपनारो भ० थाय इ० एति. थानके जी० जीव दी. मोटुं आ० आउपा त्रण ठग० थानके जी० जीव अ० माटुं दी. क० कर्म प० वांधे ॥२॥ मोटुं आ० आऊपा क० कर्म प० वांधे (कडु ( अल्पायुशना कारण कयां, हवे दीर्घायु आ तुवडाथी नागसिरिनी माफक ) ॥३॥ गना उपर कह्याथी जुदा कारणोछे ते वतावेछे) ( उपर दीर्घायुशना कारणो वताव्या ते तिहिं गणेहिं जीवा दीहाउयत्ताए शुभ अने अशुभ वने प्रकारर्नु होय तेथी कम्मं पगरेन्ति । तं जहा । नो पाणे पेहेला अशुभ दीर्घायुशना कारणो वतावेछ ) अइवाइत्ता भवइ नो भुसावइत्ता भ- तिहिं ठाणेहिं जीवा असुभदीहाउ- वइ तहारूवं समग वा माहणं वा यत्ताए कम्मं पगन्ति । तं जहा। फासुएणं एसणिज्जेणं असणपाणखाइ- पाणे अइवाइत्ता भवइ मुसावइत्ता भ- मसाइमेणं पडिलाभेत्ता भवइ । इच्चेएहिं वइ तहारूवं समणं वा माहणं वा ही- तिहिं अहिं जीवा दीहाउयत्ताए लित्ता निन्दित्ता खिसित्ता गरहि- कम्मं पगरेन्ति ॥ २॥ त्ता अवमाणित्ता अन्नयरेणं अमगुन्नेणं भावार्थः-तेमज वळो त्रग स्थानके जीव लांबु अपीइकारएणं असणं वा पाणं वा आयुष्य कर्म वांधे ते कहे छे, जीव हिंसा नहीं खाइमं वा साइमं वा पडिलामेत्ता भ- करवाथी १, जुटुं नहीं वोलवाथी २, तथा रुप श्रमण माहणने फामुक ते अचित एपणीक वइ । इन्चेएहिं तिहिं गणेहिं जीवा शृद्धमान निर्वध्य अन्न पाणी मेवो मुपवास ए असुभदीहाउयत्ताए कम पगरेन्ति चार प्रकारना आहार वोहरावे एटले आपे ३, ॥३॥ ए त्रग स्थानके जीव दीर्घ ( लांबु ) आयु भावार्थ:-वळी त्रण स्थानके जीव अशुभ प्य वांधे ॥ २॥ ते दुःखनु लांबुं आयुष्य कर्म वांधे ते कहे छे, अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके जी० जोव जीव हिंसा करवाथी १, जुटं बोलवाथी २, अ० दुपर्नु दी० मोटुं आ० आऊपा क० कर्म तथा रुप श्रमण माहणने वचने करी हिलना ५० बांधे त० ते ज० कहुंछ पा० जीव अ० करतो निंदे ने जाती प्रमुखना दोप उघाडे, हीस्यां भ० करतो मु० मृपावाद व० बोलतो खीसना ते मने करीने द्वेष राखे, गरहा ते लोक भ० थको त० तथा रू० रूप (शुद्ध) स० समक्ष ढोप प्रगट करे, अपमान करे, ते साधुने साधु वा० अथवा मा० दयावंतने वा० अथवा देखी उभो न थाय तथा अन्यतर कोइ जातीनुं हीहीणुं कुवचन बोले निजाति उघाडे खि० अमनोज्ञ, रूपथी माहुँ, अप्रीति, असंतोपनो मने करी निंदे ग० दोप उघाडे लोक समक्ष करनार नागेश्री ब्राह्मणीए साधुने कडवा तुंव- अ० साधुने देखाने उभो न थाय अ० कोई । डान शाक आप्यु एहवू अशाता कारी अन्न जातनो अ० माठो अ० अग्रीतिना करणहार पाणी मेवा मुखवास ए चार प्रकारना आहार अ० अन्न वा० अथवा पा० पाणी वा० अथवा । वोहोरावे ३, ए त्रग स्थानके करी जीव अशुभ . -- - - हाणं सूत्र ३. उद्देसो १ (१४३ ) लावु आयुष्य कर्म बांधे ॥ ३ ॥ सन आमंत्रे अने हे स्वामी ? तमे कल्याण अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके जी० जीव (ते संपत्ती आपनार ) कारी छो, मंगळ मु० भलु दी० मोटुं आ० आउषा क० कर्म (विघ्न निवारण करनार ) कारी छो, धर्म ५० वांधे त तेज० कहुंछं नो नहीं पा०जीव देव छो, ज्ञानवंत छो, पुजवा योग्य छो इत्यादी अ० हीस्यां भ० करे नो० नही मु० जुठं व० स्तुति विनयकरी साधुनी सेवाकरे, बळी मनोज्ञ वोलतो भ० थको त० तथा रु० रुप (शुद्ध) प्रीतीकारी अन्न पाणी मेवो मुखवास ए चार स० साधु वा० अथवा मा० दयावंत वा० प्रकारना आहार प्रति लाभे ३, ए त्रण स्थान अथवा व० वांदे न० नमस्कार करे स. के करी जीव शुभ (सुखर्नु ) लांबु आयुष्य सत्कारे स० सन्मान करे क० कल्याणकारी कर्य बांधे, भरत चक्रवर्तिए पुर्व भवे पांचसो मं० मंगलकारी दे० देव चे० ज्ञानवंत करीए ' साधुने आहर आणी आप्यो तेना प्रतापे भ- तेम प० सेवा करवा योग्य म० मनोज्ञ पी० रत चक्रवर्ति थयो तथा मरुदेवी मातानी पर प्रीतकारी अ० अन्न पा० पाणी खा० सुपडी : मुखनु लांबुं आयुष्य वांधे ॥ ४ ॥ सा० मेवो प० आपतो भ० थकोइ० एति० अर्थ:-त० त्रण गु० गुप्ती पं० कही त० त्रण ठा० थानके जी० जीव सु० सुभ दी० . ते ज० कहुंछु म० मन गु० गुप्ती व० वचन मोटुं आ० आउखा क० कर्मने प० वांये ॥४॥ । गुप्ती का० काया गुप्ती ॥ १ ॥ (शुभ दिर्घायुशना कारणो वतावछे) ५० पेरा (प्राणानिपात न करg विगेरे तिहिं राणेहिं जीवा सुभदीहाउय- गुप्ती होयतो थायछे माटे गुप्ती कहेछे ) ताए कम्मं पगरेन्ति । तं जहा । नो तओ गुत्तीओ पन्नत्ताओ । तं पाणे अइवाइत्ता भवइ नो सुसाव- जहा । मगगुती वइगुत्ती कायगु- इत्ता भवइ तहाख्वं सुमणं वा माणं त्ती ।। १ ।। वा वन्दित्ता नमंमिता सकारेत्ता स भावार्थ:-जीव हिंसादी न करे ते गुप्ती म्भाणेत्ता कलाणं मङ्गलं देवयं चेइयं छे ते माटे गुप्ती कहे छ, त्रण प्रकारे गुप्ती क- पज्जुवासित्ता मणुन्नेणे पीइकारएणं हेल छे ते कहे छे, मनगुप्ती ते माठा योगथी मन रोक १, वचन गुप्ती ते पापकारी वचन असणपाणखाइमसाइमेणं पडिला- न बोलवू २, काय गुप्ती ते काया पापमां भेत्ता भवइ । इन्चेएहि तिहिं अणेहिं प्रवर्ताव नहीं ।। १ ।। जीवा सुभदीहाउयत्ताए कम्मं पगरे अर्थ:-सं० संयमवंत म० मनुप्यने त० न्ति ॥ ४॥ त्रण गु० गुप्ती पं० कही तं० ते ज० कहुं; भावार्थ:-वळी त्रण स्थानके जीव शुभते म० मन व० वचन का० काया ॥ २ ॥ सुखनु लाई आयुज्य कर्म वांधे ते कहे छे, जीव (आ गुप्तीओ २४ दंडकमां विचारीएतो हिंशा नहीं करवाथी १, जुठं नहीं बोलबाधीर, फक्त मनुष्यनेज होय ने ते पण संयत मनुष्यने तथा रुप श्रमण माहणने चंदन करे, नमस्कार होय पण नारक विगैरेने न होय.ते वतावेछे) करे, यम्बादीकथी सत्कार दीए, सन्मान ते आ- संजयमगुस्साणं तओ गुत्तीओ प- . (१४४ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. नत्ताओ। तं जहा । मणवइका- | होय, पांच स्थावरने एक काय अगुप्ती छ, त्रण विगलेंद्रीने वचन अने काय ए वे अगुप्ती छे ।।४।। यगुत्ती ॥ २ ॥ अर्थः-त. त्रण द० दण्ड पं० कह्या तं० भावार्थ:-चौविस दंडक मांही संयमवंत । ते ज० कहुंछ म० मनेकरी कर्म बंधायते व० मनुष्यने त्रण गुप्ती कहेल छे ते कहे छे, मन- वचन करी कर्म वांधेते का० कायाए करी गुप्ती १, वचन गुप्ती २, कायगुप्ती ३, ए त्रण पाप लागते ॥१॥ भेद छे ।। २॥ अर्थः-त० त्रण अ० पापने योगे प्रवर्ते ते ११ पेरा-(अगुप्तीयो पोताने अने पार- पं० कही तं० ने ज० कहुं छ म० मने करी | काने दंडभुत थाय छे तेथी दंडनी परुपणा पाप वाधे ते १० वचने पाप वांधे ते का० कहे छे) कायाए पाप वाधे ते ॥३॥ तओ दण्डा पन्नत्ता। तं जहा । म- (गुप्तीओ कही हव अगुप्ती कहे छे) णदण्डे वइदण्डे कायदण्डे ॥ १ ॥ तओ अगुत्तीओ पन्नत्ताओ । तं भावार्थ:-अगुप्ती वंतने त्रण दंड (कर्मे दं जहा । मणअगुत्ती वइअगुत्ती काय- डाय ते) कहेल छे ते कहे छे, मन दंड ते म- नथी पाप वांधवे दंडाय १, वचन दंड ते व- अगुत्ती ॥३॥ चने पाप वांधवे दंडाय २, काय दंड ते कायाए भावार्थ:-त्रण प्रकारे अगुप्ती कहेल छे ते पाप वांधवे दंडाय ३, ए त्रण भेद छे ॥१॥ कहे छे, मन अगुप्ती ते मनथी पाप बांधे १, अर्थ:-वि० विगलेंद्रिय व० वर्जीने जा० वचन अगुप्ती ते वचने करी पाप वांधे २, काय यावत वे० वैमानिक लगे ॥२॥ अगुप्ती ते कायाए पाप वांधे ३, ए त्रण भेद छ।।३।। अर्थः-ए एम ने० नारकीन जा० यावत विगलिन्दियवज्जं जाव वेमाणि- थ०स्तनितकुमारने प०पंचेद्रि तितिर्यंच जो० याणं ॥२॥ योनीने अ० असंजति ममनुष्यने वा० वाण भावार्थ:-नारकीने त्रण दंड कहेल छे ते व्यंतरने जो० ज्योतिपीने वे० वैमानिकने अ- | कहेछे, मन दंड १, वचन दंड २, काय दंड ३, गुप्ती होय ॥ ४ ॥ एम एकेंद्री अनेत्रण विगलेंद्री वर्जिने वैमानिक (हवे विशेषथी २४ ए दंडकना संबंधमां | मुधी त्रण दंड छे, एकेंद्रीने एक काय दंड छे, अगुप्तीयो विशे कहे छे) त्रण विगलेंद्रीने वचन अने काय एवेदंड छ।।२।। एवं नेरइयाणं जाव थणियकुमाराणं अर्थः-ति० त्रण भेदे ग० निंदा पं० क- पञ्चिन्दियतिरिक्खजोणियाणं असंजय- ही तं० ते ज० कहुंछं म० मने करो वे० एक आत्माने त्था परने ग० निंदे व० वचनें वे० मणुस्साणं वाणमन्तराणं जोइसियाणं एक ग० निंदे का० कायाए करी वे० एक वेमाणियाणं ॥ ४॥ ग० निंदे पा० पाप क० कर्मने अ० अण भावार्थ:-एम नारकी, दस भवनपती ति- करवे गर्हणा होय ॥१॥ र्यच पचेंद्री, असंजती मनुप्य, वाणज्यंतर जो १२ पेरा (दंडछे ते निंदवा योग्यछे तिषी, वैमानिक देवता ए सर्वेने त्रणे अगुप्ती । तेथी गर्दा विशे कहेछे.). . , हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. (१४५) तिविहा गरहा पन्नत्ता । तं जहा । एक प० पाप त्यजे व० वचनेकरी ३० एक प० पाप निषेधे का० कायाए करी २० एक मणसा वेगे गरहइ वयसा देगे गरहइ प० पाप न करे ॥१॥ कायसा वेगे गरहइ पावाणं कम्माणं १३ पेरा ( पचरवाण विषे कहेछे ) अकरणयाए ॥१॥ तिविहे पञ्चक्खाणे पन्नत्तेतं जहा! भावार्थ:-दंड ते गर्हणीय एटले निंदनीक मणसा वेगे पच्चक्खाइ क्यसा वेगे प- छे ते माटे त्रग प्रकारे गहीं कहेल छे ते को चक्खाइ कायसा वेगे पचक्खाइ ॥१|| छे, एक मनथी आत्माने तथा परने गर्दै एटले पापकर्म भुंडु छ तेथी हवे हुँ पाप- भावार्थ:-अनागत ( भविष्य ) काळनां कमे नहीं करु एहवो पोताना मन्मां पस्तावा पचखाण कहे छ, त्रण प्रकारे पचखाण क- करे तथा वीजाने पण कहे १, एक पोताना हेल छे, ते कहे छे, एक मनधी पचखाण करे मनमा पापकर्मनो पस्तावो करतो नथी पण छ १, एक वचनथी पचखाण करे छे २, एक फक्त वचनथीन आत्माने तया परने गई (निदे) कायाथी पाप कर्म अणकरवे पचखाण करे २, एक पाप कर्म अणकरवे कायाए ग्रहे ३, छे ३, ए त्रण भेद छे ॥ १ ॥ ए प्रण भेद छे ॥१॥ अर्थ:-ए० एम ज० जेम ग. गर्हणाकरी अर्थ:-अ० अथवा ग• गर्हणा ति० त्रण त० तेम प० पचखाणने विपे वि० पण दो० वे आ० आलावा भा० जाणवा ।।२।। पं० कही तं० ते ज० कहुंछु दी० घणा पे० एक अ० काळनी ग० गर्हणा करे ६० थोडा एवं जहा गरहा तहा पञ्चक्खाणे वि पे० एक अ० काळनी ग० गर्हणा करे का० । दो आलावगा भाणियबा ॥ २ ॥ कायाने पे० एक प० वर्तमान काळे गर्हणा भावार्थ:-एम जेम ग्रहणा कडेल तेम पच- करे पा० पाप क०कर्म अ० अणकरवेकरी ॥२॥ खाणने विपे पण वे आळावा कहेवा. पाप अहवा गरहा तिविहा पनता । तं कर्म पचखाण ते परोपकारी छे अने वृक्ष पण परोपकारी छे ते माटे वृक्षनं द्रष्टांत कहे छ।।२।। जहा । दीहं पेगे अद्धं गरहइ हस्मं अर्थः-त० त्रण रु० वृक्ष पं० सदा तं० पेगे अद्धं गरहइ कायं पेगे पडिलाह ते ज० कहुंछ प० पत्र सहित एक पु० एक रइ पावागं कम्मागं अफरणयाए॥२॥ फुल सहित फ० एक फल सहित ।। १ ।। भावार्थ:-चळी त्रण प्रकारे गहा कहेल छ १४ पेरा ( पाप कर्मनु पचावाण करनारा ते कहे छे. एक घणा काळनी गर्दा करे एटले परोपकारी होय छे तेथी उठाहरण रुप वृक्षोनुं घणों काळ उपर पाप कर्म करेल होय तहनो तथा तेना उपनय पुरुषोनी परुपणा करेछे) पस्तावो करे ?, एक थोडा काळनी गहीं करे तओक्खा पन्नत्ता । तं जहा। प- एक वर्तमान काळे पाप अण करवे कायाने गंबरी तोवए पुष्फोवर फलोवए ।। १ ।। (रोकी) राखे, एत्र प्रकारे गर्दा कही ॥२॥ भावार्थ:-नग प्रकारे वृक्ष कहेल छे ते कद्दे अर्थ:-ति० त्रण भेदे प० पचखाण पं० छे, एक पत्र सहित ?, एक फुल सहित २, एक कहया तं० ते ज० कहुंछ म. मनेकरी ० फळ सहित ३ ॥१॥ १९
(१४६ )
हाणं सूत्र ३. उद्देसो १.
-
अर्थः-ए० वृक्षनी ए० परे त० त्रण पु० । अर्थः-त० त्रण पु० पुरुषनी जा० जाती
पुरए जा० जात पं० कही तं० ते ज० कहुंएं पं० कही तं० ते ज० कहुंछं ना० ज्ञान स-
५० पत्र ३० सहित रु० वृक्ष स० सरिपाते विशेष हित पु० पुरुष दं० समकितवंत पु० पुरूप
उपगारी वचनादिके सूत्र सिद्धांत संभळावे पु० च० चारित्र सहित पु० पुरुप ॥२॥
पल उ० सहित २० वृक्ष स० सरिषा ते अर्थ तओ पुरिसज्जाया पन्नता । तं ज-
ना 10 फल सहित रु० वृक्ष स०
हा । नाणपुरिसे दसणपुरिसे चरित-
म. इत्र अर्थ वेना आपनारा ।। २॥
पुरिसे ॥२॥
एचाल ताशुरिसज्जाया पन्नत्ता ।
भावार्थ:-वळी त्रण भाव पुरुषनी जाति
; जहा :
पंक्ससमाणे पुष्फो- कहेल छे ते कहे छे, ज्ञान पुरुष ते ज्ञान सहीत
विक्सन लावगरुक्खसमा- १, दर्शन पुरुष ते समकित सहित २, चारित्र
पुरुष ते चारित्र सहित (३), ए त्रण भेद छे।।२।।
:॥ २॥
अर्थ:-त० त्रण पु० पुरुष जा० जाती पं०
हसना परे त्रण प्रकारना लो- कही तं० ते ज० कहुंछ वे० वेद ( पुरुप स्त्री
कोत्तर पुर" कहेल छे ते कहे छे, पत्र सहीत नपुंसक ) पु० पुरुष ( पुरुष वेदने अनुभवे
क्ष सरीला ते विशेष उपकारी वचनादिक ते चि० दाढी मुछ सहित स्त्री पु० पुरुष वेष
सुत्र संभळावे १, फुल सहीत वृक्ष सरिखा ते धरे अ० पुरुष नामे बोलावे ते पु० पुरुष
चा अर्थना आपनार २, फळ सहीत वृक्ष सरिखा | घडो कुओ इत्यादि ॥ ३ ॥
तसुत्रार्थ देना आफ्नार ३, ए त्रण प्रकारना तओ पुरिसज्जाया पन्नत्ता। तं ज-
उप कह्या ।। २ ॥
अथः-त० त्रण पु० पुरुष जा० जाती पं० हा । वेदपुरिसे चिन्धपुरिसे अभिलाव-
कही तं० ते ज० कहेछे ना० नाम पु० पुरुष
पुरिसे ॥३॥
नाम ठग० थापना पु० पुरुष ते पुरुषनी छवी
भावार्थ:-वळी त्रण जातिना पुरुप कहेल
द० द्रव्य पु० पुरुप ते पुरुपपणे उपजशेते ॥१॥ छे ते कहे छे, वेद पुरुष ते पुरुष वेदने अनुभव
१५ ५रा ( हवे पुरुपनो प्रस्ताव होवाथी चीन्ह पुरुष ते दाढी मुछ सहित स्त्री पुरुष वेप धरे
ते स्त्री पुरुष नपुंशक ए त्रणमां थाय छे १,
पुरुष विशे सात सूत्रो कहेछे )
पावइवत २, अभिलाप पुरुष ते पुरुषने नामे
तओ पुरिसज्जाया पन्नत्ता । तं ज- वोलाय ते घडो, कुवो, वो इत्यादि ३, ए
हा । नामपुरिसे अवणपुरिसे दवपु- | त्रण भेद छ, ॥ ३ ॥
अर्थः-ति० त्रण पु० पुरुप पं० कह्या
तं०
रित ॥१॥
ते ज० कहुंछ उ० एक उत्तम पु० पुरुष म०
भावार्थ:-पुरुपना प्रस्तावधी पुरुपर्नु लक्षण
कहे छ, त्रण पुरुपनी जाति कहेलछे ते कहेछे,
मध्यम पु० पुरुप ज० जघन्य पु० पुरुष ॥४॥
एक नाम दुरुप ते पुरुप नाम १, एक स्थापना
तिविहा पुरिसा पन्नत्ता । तं जहा।
(आकार)पुरुष२, एक द्रव्य पुरुष ते(भविष्यमा) उत्तमपुरिसा मज्झिमपुरिसा जहन्नपु-
पुरुपपणे उपजशे ३, ए त्रण भेद छे ॥ १॥ रिसा ॥ ४॥
, हाणं मूत्र ३. उद्देसो १. (१४७) भावार्थ:-वळी-त्रण जातिना पुरुष कहेल | प्रकारना पं० कहा तं० ते ज० हुँदा छे ते कहेछे, उत्तम पुरुष १, मध्यम पुरुष २, दास भा० मुलये काम करे ते भा० कमाणीमा जधन्य ( नानो) पुरुष ३, ए त्रण भेदछे ॥४॥ चोथो भाग लइ काम करे ते ॥७॥ अर्थः-उ० उत्तम पु० पुरुष ति० त्रण भेदे जहन्नपुरिसा तिविहा पन्नत्ता । तं पं० कह्या तं० ते ज० कहुंछु ध० धर्मना दातार जहा। दासा भायगा भाइल्लगा॥७॥ पु० पुरुप झो० भोगना भोगवनार पु० पुरुष भावार्थ:-जधन्य पुरुप त्रण प्रकारे कहेल क०आरंभकारी पु० पुरुप ध०धर्म पु० पुरुष अ० छे ते कहे छे, दास ते दासीना पुत्र १, भृतक अरिहंतदेव भो० भोग पु० पुरुष च० चक्रवर्ति ते मुल्यथी काम करे २, चोथो भाग भागन्ना क० कर्म पु० पुरुष वा. वासुदेव ॥५॥ काम करे ३, ए त्रण भेद छे ॥ ७॥ उत्तमपुरिसा तिविहा पन्नत्ता। तं अर्थः-ति० त्रण भेदे म० मच्छ प० कद्या जहा। धम्मपुरिसा भोगपुरिसा कम्म- | तं० ते ज० कहुं छ अ० इंडाथी उपन्या ने पुरिसा । धम्मपुरिसा अरहन्ता भो- पो० वस्त्र वीटया जेणे ते सं० गर्भ लिना उपजे ते ॥१॥ गपुरिसा चकवट्टी कम्मपुरिसा वासु- १६ पेरा (मनुष पुष्पना त्र, लार कया देवा ॥ ५॥ हवे सामान्यधी तिर्यचोना जलन किवा भावार्थ:-उत्तम पुरुपत्रण प्रकारे कहेल छ प्रकार कहे छे.) ते कहे छे, एक धर्म पुरुप ते क्षायिक समकिन- तिविहा गच्छा पनता - जहा ना उपार्जनार १, वीजा भोग पुरुष ने मनोहर भोगना भोगवनारा २, त्रीजा कम पुरुष ते महा अण्डया पोयया मंगछिया : आरंभना करनारा नर्कमा जानारा ३, ए त्रण भावार्थ:-ए मनुश्य वापयरगं को, भेद छे, धर्म पुरुप ते अरिहंन ?, ते अरिहंत १, भोग पुरुष तिर्यच जळचरन कहे छ. वन ते चक्रटर्ति २, कर्य पुरुष ते नियाणा बंध डेल छे ते कडे के अंडर वासुदेव ३, ए त्रण भेद छे ॥५॥ पोतन ते वस्त्रे दाट्या 17 २, स; अर्थः-म० मध्यम पु० पुरुष ति० त्रण गर्भ विना उपजे ३, ए त्रग भेद छे, ॥ १ ॥ भेदे ५० कद्या तं० ते ज. कहुंछ उ० उग्र- अर्थ:-अ० अंडज म० मच्छर नम. कुलना भो० भोगकुलना रा०राजन्यकुलना ॥६॥ कारे पं० कया तं० ते ज० कदं , ६० स्त्री मज्झिमपुरिसा तिविहा पन्नत्ता। ते पु० पुरुप न० नपुंसक ॥२॥ जहा । उग्गा भोगा राइन्ना ॥६॥ अण्डया मच्छा तिविहा पत्रला। नं भावार्थ:-मध्यम पुरुप त्रण प्रकारे कहेलछे जहा । इत्थी पुरिमा नपंसगा।॥ २॥ ते कडे छे, उग्र कुळना ते रुषभदवे कोटवाळ भावार्थ:-अंडज मच्छत्रण मकर सोल पणे स्थाप्या १, भोग कुळना ते गुरु स्थानके ने कहेले, स्त्री १, पुरुप २, नपुस । स्थाप्या २, राजन्य कुळना ते क्षत्रीय पोताना अर्थ:-पो० पोतन म. मन्छ ति० नग सरखा ३, एत्रण भेद छे॥६॥ भेदे पं० कया तं० ने ज० कहुं हुं इ० सी अर्थ:-ज० जघन्य पु० पुरुप ति० प्रण पु० पुरुष न० नपुंसक ३॥ anw . , (१४८ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. । . पोयया मच्छा तिविहा पन्नता । भावार्थ:-एम एणे अभीलापे करी हैया भेर चाले. ते उरपरी सर्प ते पण त्रण प्रकारे तं जहा । इत्थी पुरिसा नपुंसगा।॥३॥ कहेवा ॥ ७॥ भावार्थ:-एमज पोतन मच्छना पण त्रण अर्थ:-सु० भुजाए चाले ते वि० पण भा० भेद ते स्त्री, पुरुप, नपुंसक, समुर्छिम मच्छ एक जाणमा नोळीया प्रमुख (१०-१२) ॥८॥ नपुंसकज छे तेमांही स्त्री पुरुपपणुं नथी ॥३॥ अर्थ:-ति० त्रण प्रकारे ५० पंखी ५० भुयपरिसप्पा वि भाणियवा ॥ कया तं० ते ज० कहुं छु अ० हंस प्रमुख [ १०-१२ ] ॥ ८॥ पो० वागुल प्रमुख सं० खंजन प्रमुख ॥४॥ भावार्थ:-एमज भुजाथी चाले ते भुजपरी तिविहा परखी पन्नत्ता । तं सर्प ते पण त्रम प्रकारे जाणवा ॥ ८ ॥ जहा अर्थः-ए० एम चे बळी ति० त्रण भेदे अण्डया पोयया संमुच्छिमा ॥ ४॥ इ० स्त्रीभो पं. कही तं० ते ज० कहुं छु ति० भावार्थ:-त्रण प्रकारे पक्षी कहल छे ते कहे तिर्यचनी जो० योनीनी ३० स्वीओ म० मनु- छे, अंडज ते हंश प्रमुख १, पोजत ते बागुल प्यनी इ० स्वीओ दे० देवतानी इ० वीओ प्रमुख २, समुर्छिम ते खंजन प्रमुख ए सर्व १७. एवं चेव तिविहाओइथीओप- पंचेद्रो ३, ए त्रण भेद छे ॥ ४ ॥ अर्थ:-अ० अंडज प० पंखी ति० त्रण प्र- बताओ। तं जहा । तिरिक्खजोणि- कारे पं० कह्या तं० ते ज० कहुँ छु इ० स्त्री पु० स्वीओ म गुस्तित्थीओ देविस्थीओ पुरुष न० नपुंसक ॥२॥ भावार्थ:-एवीज गते त्रण प्रकारनी श्री अण्डया पक्ती तिविहा पन्नता। कहेछे ते कडे छे, तिर्यचनी खी १, मनुष्यनी तं जहा। इत्थी पुरिसा नपुंसगा।।५।। स्त्री २, देवनी स्त्री ३, ए त्रण भेद छे. भावार्थ:-अंडज पक्षी त्रण प्रकारे कहेलछे अर्थ:-तितिर्यचनी जो योनीनी इ०स्त्रीओ ति. ते कहे छे, स्त्री १, पुरुष २, नपुंसक ३ ॥५॥ त्रण प्रकारे पं० कही तं० ते ज० कहु छं ज. अर्थ:-पो० पोतज प० पंखी ति० त्रण प्र माछलीओ थ०गाय प्रमुख ख०पंखीगी भो ॥१॥ कार पं० कह्या तं० ते ज० कहुं हुं इ० स्त्री १८ पेरा (तिर्यचनात्र प्रकार कह्या, हवे स्त्री पु० पुरुष न० नपुंराक ॥६॥ पुरुष नपुंसकना त्रग प्रकार, कह छे.) पोयथा पक्खी तिविहा पन्नत्ता। तं तिरिक्खजोणिस्थीओतिविहाओप- जहा । इत्थी पुरिसा नपुंसगा ॥६॥ नत्ताओ। तं जहा । जलचरीओ थ- भावार्थ:-एमज पोतज पक्षीना पण त्रण लचरीओ खहचरीओ।।१।। भेद ते स्त्री, पुरुष, नपुंसक, ए त्रण भेदछे ।।६।। भावार्थ:-तिर्यंचनी स्त्री त्रण प्रकारे कलछे, अर्थ:-ए० एम ए० एणे अ० आलावे उ० जळ चरी ते माछली प्रमुख १, थलचली, हैर चाले ते वि०पणभा०जाणवा (७-२)॥७॥ गाय भैस घोडी प्रमुख २, खेचरी ते चकली, एवं एएणं अभिलावणं उरपरिसप्पा हंशली, मोरली प्रमुख ३, एत्रण भेडछे, ॥१॥ अर्थः-म० मनुष्यनी इ० स्वीओ ति०.त्रण वि भाणियबा [७-९] ॥७॥ भेदे पं० कही तं० ते ज० कहुंछं. क. भरत 4 हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. (१४९ ) - पांच एरणवय, ऐवत महाविदेह क्षेत्रनी अ० त्रीस अकर्म भु तिरिक्खजोणियपुरिसा तिविहा प- मिनी अ० छप्पन अंतर द्वीपनी ॥२॥ नत्ता । तं जहा। जलचरा थलचरा मगुस्सित्थीओ तिविहाओ पन्नत्ता- खहचरा ॥४॥ ओ। तं जहा । कम्मभूमियाओ अ- भावार्थ:-तिर्यच योनिना पुरुष त्रग प्रकारे कम्मथूमियाओअन्तरद्दीवियाओ॥२॥ कडेलछ, जळचर पुरुप ते मच्छ प्रमुख १, थळ भावार्थ:-मनुष्यनी स्त्री त्रण प्रकारे कहेल चर पुरूष ते हाथी, घोडा ममुस २, खेचर छे ते कहे छे, असी ते तरवार प्रमुख शस्त्र (पक्षी ) पुरुष सुडा, हंस, मोर प्रमुग्व ३, ए वांधीने आजीवीका करे ?, मसी ते लेखण त्रण भेद छे ॥ ४ ॥ रुशनाइए लखवानी आजीविका करे २, अर्थः-म० मनुष्य पु० पुरुष नि० जण कृषी ते कोप्स, कोदाळी, पावडो प्रमुखथी भेदे पं० कया तं० ते ज० कहुं९ क पनर खेतीनो धंधो करी आजीवीका करे ३, ए कर्म भुमिना अ० त्रीस अकर्म थुमिना युग- त्रण प्रकारे आजीवीका करे ते पांच भरत, लीया अ० ५६ अंतर द्वीपना युगलीया ॥५॥ पांच इरवत, पांच महावीदेह ए पंनर क्षेत्रना कर्म मगुस्सपुरिमा तिविहा पनत्ता । तं भूमी मनुष्यनी स्त्री १, पुर्वोक्त त्रण प्रकारना जहा ! कम्मभूमिया अकम्नभूमिया कर्महित अनेदश प्रकारनां कल्पवृक्षेकरी जीवे ते पांच हेमवय, पांच हरिवास, अन्तरद्दीवगा ॥ ५॥ पांच रम्यकवास, पांच देवकुरु, पांच उत्तरकुरु, भावार्थ:-मनुष्य पुरुष त्रण प्रकारे कहेल ए बीस क्षेत्रनां अकर्म भूमी युगळीयां मनु- छे, कर्म भुमिना १, अकर्म भुमिना २, अंतर प्यनी स्त्री २, छप्पन अंतर द्विपनां युगळीया द्विपना ३, ए त्रण भेद छ ॥ ५ ॥ मनुष्यनी स्त्री ३, ए त्रण भेद छे ॥२॥ अर्थः-ति० त्रग भेदे न० नपुंसक पं० अर्थ:-ति० त्रण भेदे पु० पुरुष पं० कह्या कद्या तं. ते ज० कहुं छं ने सात नरकना तं० ते ज० कहुंझं ति० तिर्यच जो० योनिना नपुंसक ति० तिर्यच जो० योनिना न० नपुं. पु० पुरुप म० मनुष्य पु० पुरुष दे० देवता | सक म० मनुष्य नपुंसक ॥६॥ पु० पुरुष ॥३॥ तिविहा नपुंसगा पन्नना। तं जहा। तिविहा पुरिसा पन्नत्ता । तं जहा । नेरझ्यनपुंसगा तिरिक्खजोणियनपुंस- तिरिक्खजोणियपुरिसा मणुस्सपुरिमा गा मगुस्सनपुंसगा ।। ६ ।। देवपुरिसा ॥ ३॥ भावार्थ:-त्रण प्रकारे नपुंसक कहेल छे, भावार्थ:-त्रण प्रकारना-पुरुष कहेलछे ति- साते नर्कना नारकी नपुंसक १. तिच योनि र्यच योनिना पुरुष १, मनुष्य पुरुष २, देव- ना नपुंसक २, मनुष्य नपुंसक ३, [देवता न- पुरुप ३, ए त्रण भेद छे ।। ३ ॥ पुंसक थाय नहीं] ए त्रण भेद छे ॥६॥ अर्थ:-ति० तिर्यंच जो० योनीना पु० पु. अर्थ:-तिः तिर्यच जो० यनीना न. न. रुप ति० ऋण प्रकारे पं० कया नं० ते ज० पुंसक ति० त्रण भेदे पं० कगा नं.ने जा कहुंएं ज० माछलांय० हाथी सपंखीया।। कई एंज जलचर यचलचर व परवीना||७|| ,
( १५० )
होणं सूत्र ३. उद्देसो १:
तिरिक्खजोणियनपुंसगा तिविहा प नेरझ्याणं तओलेसाओ पन्नत्ताओ।
नत्ता । तं जहा। जलचरा थलचरा तं जहा । किण्हलेसा नीललेसा काउ-
खहचरा ॥७॥
लेसा ॥१॥
भावार्थ:-तिर्यंच योनोना नपुंसक कहेल छे
भावार्थ:-स्त्रीयादीक वेद ते लेशाथी बंधाय
ते कहेछे, जळचर नपुंसक १, थळचर नपुंसक | ते माटे लेशा कहे छे, नारकीने त्रण लेशा क-
२, खेचर नपुंसक ३, ए त्रण भेद छे ॥७॥ ही ते कहे छे, कृष्ण १, नील २, कापोत ३,
अर्थः-मनुष्य न० नपुंसक ति० त्रण भेदे ए त्रण भेद छे ।। १ ॥
पं० कह्या तं० ते ज० कहुं हुं क० कर्म भु-
अर्थ: :-अ० असुरकुमारने त० त्रण ले०
मिना अ. अकर्म भुगिना अ०अंतरद्वीपना॥८॥
लेशा सं० माठी पं० कही तं० ते ज० कहे छे
क० कृष्णलेशा नी० नीललेश्या का० का-
मगुस्सनपुंसगा तिविहा पन्नता। तं
पातलेशा ॥२॥
जहा । कम्मभूमिया अकम्मभूमिया
असुरकुमाराणं तओ लेसाओ सं-
अन्तरद्दीवगा ॥८॥
किलिट्ठाओ पन्नत्ताओ। तं जहा।
भावार्थ:-मनुष्य नपुंसक त्रग प्रकारे कहेल
छे ते कहे छे, कर्म भुमीना नपुंमक १, अर्कम
किण्हलेसा नीललेसा काउलेसा ॥२॥
भुमीना नपुंसक २, अंतर द्विपना नपुंसक ३,
भावार्थ:-असुस्कुमारने प्रण लेशा संकि-
ए त्रण भेद छे ॥ ८॥
लष्ट ( झुंडो ) कहेल छे [चोथी तेजुलेशा
अर्थ:-ति० त्रण भेदे ति० तिर्यच जो अनुकुमारने छे पण ते संकिलष्ट नयी ] ते
योनी पं० कही तं० ते ज० कहुं छं इ० स्त्री
कहे छे, कृष्ण १, नील २, कापोस ३, एत्रण||२||
अर्थः-ए० एम थ० स्थनितकुमारने ॥३॥
पु० पुरुष न. नपुंसक ॥९॥
तिविहा तिरिक्खजोणिया पन्नत्ता !
एवं थणियकुमाराणं ॥३॥
भावार्थ:-एम यावत् स्तनित कुमार लगे
तं जहा । इत्थी पुरिमा नपुंसगा एत्रण संकिलष्ट लेशा जाणवी ॥ ३ ॥
अर्थः-ए० एम पु० पृथ्वीकायने आ० अ-
भावार्थ:-त्रण प्रकारे सामान्य भावे तिर्यंच पकायने व० वनस्पतीकायमे वि० पण
ते०
कहेल छे ते कहे छे, स्त्री ?, पुरुप २, नपुंसक | तेउकायने वा० वायुकायने वे० वेइन्द्रिने ते०
३, ए त्रण भेद छे ॥१॥
तेइन्द्रिने च० चरािंद्रेने वि. पण त० प्रण
अर्थः-ने० नारकीने त० त्रण ले० लेश्या ले० लेशा ज० जेम ने नारकीने ॥४॥
पं० कही तं० ते ज० कहुं हुं क० कृष्णलेशा एवं पुढविकाइयाणं आउवणस्सइ-
नी० नीललेशा का० कापोतलेगा ॥१॥
काइयाण वि तेउकाइयाणं वाउकाइया-
१९ पेरा (जीवोनी स्त्री विगेरे परिणीति
लेशाना वशपणाने लीधे थाय छे तेथी नारक
ण वेइन्दियाणं तेइन्दियाणं चउरिन्दि
विगेरे पढोमां लेशा त्रण स्थानकवड कहे- याण वि तओ लेसाओजहा नेरझ्या-
वामां आवे छे.)
1
.
-
णं ॥४॥
'हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. ( १५१ ) . भावार्थ:-एम पृथ्वी, पाणी, वनस्पतिकायने | भावार्थ:-एम मनुष्यने पण जाणवी [संज्ञी कृष्ण १, नील २, कापोत ३, ए त्रण लेशा तिर्यंच पंचेद्री तथा संजी मनुष्यने छलेशा जाणवी एहमां देवता आवी उपजे ते माटे ते पण इहां त्रणनो वोल होवाथी त्रण उत्तम लेशा जुलेशा पण छे ते माटे असुरकुमारना सु- कहेल छे]. वाणव्यंतरने असुर कुमारनी पेरे त्रमा कहां एम तेउकाय, वायुकाय, वेइंद्रीने त्रण संकिलष्ट ते माठीन लेशा होय ॥७॥ तेइंद्री, चोरिंद्रीने कृष्ण १, नील२, कापोत ३, अर्थः-चे. वैमानिकने त० त्रण लेशा पं० ए त्रण लेशा होय ॥४॥ कही तं० ते ज० कहुंछं ते. तेजुलेशा प० अर्थः-१० पंचेन्द्रि ति० तिर्यंच जो० यो- पदम लेशा सु० शुक्ललेशा ।। ८ ।। निनी त० त्रुण ले० लेशा सं० पापनी पं० वेमाणियाणं तओ लेसाओ पन्नत्ता- कही तं . ते ज० कहुं छं क० कृष्णलेशानी नीललेशा का० कापोतलेशा ॥५॥ ओ। तं जहा। तेउलेसा पम्हलेसा पनिदियतिरिक्खजोणियाणं तओ सुकलेसा ॥८॥ लेसाओ संकिलिट्ठाओ पन्नताओ। भावार्थ:-वैमानिक देवने त्रण असंकिलष्ट जहा । किण्हलेसा नीललेसा काउले- (मली ) लेश्या कही छे ते कहे छे, तेजुलेशा १, पद्मलेगा २, शुक्ललेशा ३, ए त्रण भेद छे. सा॥ ५॥ ए पूर्योक्त प्रमाणे चौविस दंडके लेगा कही भावार्थ:-पंचेद्री तिर्यंच योनियाने त्रण अने जोतिपीने एक तेजुलेशा छे ते माटे इहां लेल्या संकिलष्ट (सुंडी) कही ते कहे छे, कृ. कहेल नथी तेहने चालवानो स्वभाव छे ते प्ण १, नील २, ने कापोत ॥५॥ कहे छे ॥ ८॥ अर्थ:-पंचेन्द्रि ति निर्यच जो० योनिनी अर्थः-ति० त्रण ठा० थानके ता० तारा त० त्रण ले० लेगा अ० रुडी पं. कही तं० रु० रुप च० चले तं० ते ज० कहुंछ वि० ते ज० कहुंछं ते. तेजुलेशा ५० पालेगा विकुर्वणा करतो वा० अथवा प० मैथुन सेवा मु० शुरुलेशा ॥ ६॥ करवाने वा० अथवा ठा० पोताना थानकथी पञ्चिन्दियतिरिक्खजोणियाणं तओ वा० बळी ठा० बीजे थानके सं० जातो ता० लेसाओ असंकिलिहाओ पन्नताओ। तारा रु० रुपे ज्योतिषी च० चले तं जहा । तेउलेमा पम्हलेसा सुकले- २० पेरा ( उपर वैमानीकनुं लेश्या द्वार- वडे त्रण प्रकारे वर्णन कर्यु. जोतीपीयोने त्रण प्रकारे लेशा नही होवायी चलण धर्मवडे तेनुं भावार्थ:-पंचद्री तियेच योनीना जीवने वर्णन करेछे ) त्रण लेगा असंफिलष्ट ते रडी कहेल ले ते को तेजु १, पा २, शुक्र ३ ॥ ६ ॥ तिहिं अहिं ताराख्वे चलेज्जा । अर्थ:-ए० एम म० मायने वि. पण वा० तं जहा । विउवमाणे चा परियारेमाणे च्यंतरने विपण जजंग अ असुरकुमारने॥७॥ वाटाणाओ वा गं मंकममाणे ता- एवं मणुस्साण वि वाणमन्तराण वि राख्ने चलेज्जा ।। जहा असुरकुमाराणं ॥ ७॥ भावार्थ:-त्रणप्रकार स्वस्थानरूपी जोतिपी - -- ( १५२ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १: , तारा चले ने कहेछे, वैक्रेय विकुर्वणा करतां १, उध्यम ४, ए सर्व देखाडतो वीजळीनी पेरे उद्योत देवांगना साथे भोग करतां २, पोताना स्था• करे ३, ए त्रण भेद छे ।। नकथी बीजे स्थानके जातां अथवा कोइक अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके दे० देवता महर्षिक देवता वैक्रेयरुप करतो होय तेने मार्ग थ० मेघनीपरे गाजवूते क० करे तं० ते ज० आपवाने चले ३, ए अण भेद छे कहुंछ वि० विकुर्वणा करतो ए० एम ज. अर्थः-ति० त्रण ठा० थानके दे० देवता जेम वि० विध्युतकार त० तेम थ० गर्जारव वि० विजलीनी पेरे उध्योत क० करे तं० ते (गाजवू ) पि० पण ॥२॥ ज. कहुंछ वि० वैकिय रूप करतो वा० अथवा तिहिं ठाणेहिं देवे थणियसई करे- प. देवांगना साधे भोग करतो वा० अथवा त. तथा रु० रुप (शुद्ध) वा० अथवा स० साधुने ज्जा । तं जहा । विउवमाणे एवं जहा वा० अथवा मा० मोटा महानुभावने वा० विज्जुयारं तहेव थणियसई पि ॥ २ ॥ अथवा इ० रुद्धि जु० आभरणनी ज्योती भावार्थ:-त्रण प्रकारे देवता मेघनी पेरे ग- ज० कोर्नि व० वल वी० वीर्य पु० अभिमान | जना करे छे ते कहे छे, विकुर्वणा करतो १, प० पराक्रय उ० देपाडतो दे० देवता वि० एम यावत जेम वीजळी करे तेमज मेघनी पेरे वीजलीनीपरी झाटको विद्युतकार क० करे. ॥१॥ गर्जना पण त्रण प्रकारे जाणवी ॥२॥ २१ पेरा ( उपर ताराना देवनी चलण अर्थः-ति० त्रण ठा० थानके लो० लोकमा नी क्रीयाना कारणो कह्या, हवे देवोना विद्यु- अ० अंधकार सि० होय० तं० ते ज० कहुंछु तना ( वीजळीना) तथा स्तनीत ( गर्जना) अ० अरिहंत वो० मोक्षजाते अ० अरिहंत प० नी क्रीयाना कारणो कहेछे.) भाष्यो ध० धर्म वो० विछेद जाते पु० द्रष्टि तिहिंगणेहिं देवे विज्जुयारं करेज्जा। बाद प्रमुख सिद्धांत वो० विच्छेद जाते ॥१॥ २२ पेरा (लोकना अंधकार विगेरे दुर क- तं जहा । विउच्चमाणे वा परियारेमा- रवारुप उत्पात विगेरे पंदर सुत्रोथी कहे..) णे वा तहाख्वस्स वा समणस्स वा तिहिं ठाणेहिं लोगन्धयारे सिधा । माहणरस वा इड्डिं जुई जसं वलं वी-तं जहा । अरहन्तेहिं वोच्छिज्जमाणे- रियं पुरिसकारपरक्कम उवदंसेमाणे देवे हिं अरहन्तपन्नत्ते धम्मे वोच्छिज्जमाणे विज्जुयारं करेज्जा॥१॥ पुवगए वोच्छिज्जमाणे ॥१॥ भावार्थ:-त्रण स्थानेक देवता दर्पवंत भावार्थ:-त्रण प्रकारे लोकमां अंधकार थाय विजळीनी पेरे उद्योत करे ते कहे छे, वैक्रेय ते कहे छे, अष्टमहाप्रतिहार्यवंत, अतिशयवंत रुपाढी विकुर्वणा करतो ?, देवांगना साथे भोग एवा अरिहंत मोक्षमां जातां लोकमां अंधकार करतो २, तथारुप जे श्रमणने माहणने महानु- थाय, भावधी ज्ञानी गया माटे १, अरिहंतनो भावने रुद्धि, परिवार, विमानादीक, शरिर, . भाष्यो धर्म विच्छेदजाता२,भरत, ऐरवत आश्री आभरणादीकनी ध्युती ( कांती), जशकीर्ति, पुर्वगत द्रष्टीवादादी सिद्धांत विच्छेद जातां ३ चळ ते शरीरनी शक्ति १, वीर्य ते जीवनी अंधकार देखाय, ए त्रण भावथी कह्या अने हीमन २, पुरिमकार ते अभिमान ३, पराक्रम ते । द्रव्यथी पण राजानुं मर्णयाय तथा देश नग- होणं सूत्र ३. उद्देसो १. १५३ 1 ३ ४ रनो भंग थातां अंधकार देखाय ३, ए त्रण अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके दे० देवताने भेद छे ।। १ ॥ उ० उद्योत सि० थाय तं० तेज कहुंछ अ० अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके लो० लोकमां अरिहंतनो जा० जन्म थाते. अ० अरिहंत उ० अजवाछं सि० थाय तं० ते ज० कहुंछ प० दीक्षालेते अ० अरिहंतने ना० ज्ञान उ० अ० अरिहंतनो जा० जन्मथाते अ० अरिहंत उपजवाना म० ओछवने विषे॥४॥ १० दिक्षा लेता अ० अरिहंतने ना० ज्ञान तिहिं गणेहिं देवुज्जोए सिया। तं उ० उपजवाना म० ओछयने विपे ।। २ ॥ जहा। अरहन्तेहिं जायमाणेहिं अरह- तिहिं ठाणेहि लोगुज्जोए सिया। न्तेहिं पवयमाणेहिं अरहन्ताणं नाणु- तं जहा। अरहन्तेहिं जायमाणेहिं अ- | पायमहिमाम् ॥ ४ ॥ रहन्तेसु पवयमागेसु अरहन्ताणं ना भावार्थ:-त्रण प्रकारे देवताना भवनादिकने गुप्पायमहिमामु ॥२॥ वि उजवालं थाय ते कहे छे, अरिहंतनो जन्म थाय त्यारे १, अरिहंत दिक्षा लिये त्यारे भावार्थ:-त्रण प्रकारे मनुष्य लोक मांही अजवाळु थाय ते कहेछे, अरिहंतनो जन्म २, अरिहंतने ज्ञान उपजे ते महिमाने विपे,३, १, अरिहंत दिक्षा लिए त्यारे २, अरिहंतने एत्रण भेद छे ।। ४ ।। अर्थ:-ति०त्रण ठा० थानके दे० देवताने ज्ञान उपजवाना महोत्सरन विपे ३, एत्रण सं० एकठा मलवू सि० थाय मनुष्यमां तं० भेद छे ।। २॥ ते ज० कहेछे अ० अरिहंतनो जा० जन्म थाता अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके दे० देवता अ० अरिहंत प० दीक्षालेता अ० अरिहंतने ना भुवन प्रमुखने विपे अ० अंधकार सि० ना० ज्ञान उ० उपजवानाम० ओछवने विषे ॥६॥ थाय तं० ते ज० हुंछु अ० अरिहंत चो० तिहिं गणेहिं देवसंनिवाए सिया । मोक्षजाते अ० अरिहते प० परुपल ध० धर्म वो० विन्छेद जाते थके पु० द्रष्टिवाद सिद्धांत तं जहा । अरहन्तेहिं जायमाणेहिं अ- वो विच्छेद जाने धके ।।।। रहन्तेहिं पवयमाणेहिं अरहन्ताणं ना- तिहिं राणेहिं देवन्धयारे सिया । णुप्पायमहिमासु ॥ ५॥ जहा । अरहन्तेहिं वोच्छिज्जमाणहि भावार्थ:-त्रण प्रकारे पृथ्वीमा सर्व देवता अरहन्तपन्नते धम्मे बोच्छिज्जमागे पु. १, अरिन क्षिा लिए त्यारे २, आनन एकटा मळे ते कहे डे, अरिहंतना जन्म था। वगए वो लमाणे ॥३॥ केवळ ज्ञान उपने तेहना महोत्सवने दिये सत्र भावार्थ:- :-त्रण प्रकारे देवकाना भवनादिकने देवता एकठा थाय ३, ए त्रण भेद छ ॥५॥ वित्र अधकार धाय ने कहजे, अग्नि मोन अर्थ:-एम दे देवताउ• समयाय ॥ ६ ॥ जाता १, अदितनाथ विच्छे (नाम पां देवुकलिया ॥६॥ मतां) जानते भात पकान गात्री जाणवू भावार्थ:-हग देव समवाय ते उत्तनिता २. पुर्वगत द्रष्टीतादादी सिद्धांत विच्छेद जाता । विगत ॥ ६ ॥ ६, एत्रण भेद छे ।।३।। अर्थः-ए०एम दे देवतानो कर्पना शब्द।। २० -- ( १५४ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. एवं देवकहकहए ॥७॥ अर्थः-प० त्रण पर्षदाना दे० देवता ॥१३॥ भावार्थ:-देवतानो हर्पनो कलकल शब्द परिसोववन्नगा देवा ॥१३॥ थाय ते पुर्वोक्त त्रण प्रकारे जाणवू ॥ ७ ॥ भावार्थ:-त्रण पर्यदाना देवता ॥१३॥ अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके दे० इन्द्र मा० अर्थ:-अ० सातकटकना अधिपति दे० मनुष्य लो० लोकमांही ह० शिघ्र आ० आवे तं० देवता ॥ १४ ॥ वे ज० कहुंठं अ० अरिहंतनो जा० जन्म थाते अणियाहिवई देवा ॥ १४ ॥ अ० अरिहंत प० दीक्षाले तेवारे अ० अरिहंतने भावार्थ:-कटकना अधिपति देवता ॥१४॥ ना० ज्ञान उ० उपजवाना म० महिमानेविपे ॥८॥ अर्थः-अ० अंग र रक्षक दे० देवता मा० तिहिं ठाणेहिं देविन्दा माणुसं लोगं मनुष्य लो० लोकमां ह० शिघ्र आ० आवे ॥१५॥ हवमागच्छन्ति । तं जहा । अरहन्ते- अङ्गरक्खा देवा माणुसं. लोग हिं जायमाणहिं अरहन्तेहिं पवयमाणे हवमागच्छन्ति ॥ १५ ॥ हिंअरहन्ताणंनाणुप्पायमहिमासु॥५॥ भावार्थः-अंगरक्षक देवता ए सर्व इंद्रनो भावार्थ:-प्रण प्रकारे सर्व चोसठ देवेद्र म- परिवार ते पुर्वोक्त त्रण कारणे मनुष्य लोकमां नुष्य लोकमां आवे ते कहे छे, अरिहंतनो जन्म जलदी आवे ॥ १५ ॥ थाय त्यारे १, अरिहंत दिक्षा लीए त्यारे २, अर्थः-ति० त्रण ठा० थानके दे० देवता अरिहंतने केवळ ज्ञान उपजवाना महोत्सवने अ० सिहांसनथी उठे तं० ते ज० कहुंछं अ० विप ३, ए त्रण भेद छे ॥ ८॥ अरिहंतनो जा० जन्म थाता जा० यावत तं० तेम चे० वळी ॥१॥ अर्थ:-एम सा०इन्द सरिपारुद्धिना धणी ॥९॥ एवं-सामाणिया ॥ ९॥ २३ पेरा ( मनुष्य लोकमां देवोने आव- वाना कारणो कह्या ते कारणो देवोने नमस्कार भावार्थ:-एम सामानीक देवता ते इद्र स- विगेरे करवाना कारण रुपछे ते पांच सुत्रो कहेछे.) रिखी रुद्धीना धणी ॥९॥ तिहिं ठाणेहिं देवा अन्भुटेज्जा । अर्थः-ता० महत्तर सरिषा थानके ॥१०॥ तायत्तीसगा ॥१०॥ तं जहा। अरहन्तेहिं जायमाणेहिं जाव तं चेव ॥१॥ भावार्थ:-त्रायत्रींसक ते गुरु तथा पीता सरिखा ॥ १० ॥ भावार्थ:-त्रण प्रकारे देवता सिंहासनेथी अर्थः-लो०इन्द्रना लोकपाल दे० देवता ॥११॥ उठे ते कहे छे, अरिहंतनो जन्म थाय त्यारे १, अरिहंत दिक्षा लिये त्यारे २, अरिहंतने केवळ लोगपाला देवा ॥ ११ ॥ ज्ञान उपजे त्यारे ॥१॥ भावार्थ:-चार लोकपाळ ॥ ११ ॥ अर्थः-ए० एम आ० आसन्न च० चाले ॥२॥ :-अ० अग्र म० महिषीदे० देवीओ।।१२॥ एवं-आसणाई चलेज्जा ॥ २ ॥ अगमहिसीओ देवीओ ॥१२॥ भावार्थ:-एमज एह त्रण कारणे आसन भावार्थ:-अन महिषी ते इद्राणीयुं ॥१२॥ | चाले ॥२॥ अर्थ:-अ० हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. ( १५५ ) अर्थः-सी० सींहनाद क० करे ॥३॥ वयमाणेहिं अरहन्ताणं नागुप्पायमहि- सीहणायं करेज्जा ॥३॥ मासु ॥ भावार्थ:-एमज ए त्रण कारणे देवता वि भावार्थ:-पांचमा ब्रह्मदेव लोकनी पासे मानमां तथा पृथ्वीमां सिंहनाद करे ॥३॥ कृष्न राजी छे तिहां लोकांतिक देवता वसे छे, अर्थः-चे० वस्त्रनी उ० दृष्टि क० करे॥४॥ ते देवता त्रण कारणे मनुष्य लोकमां आवे ते चेल्लुकखेवं करेज्जा॥ ४॥ कहे छे, अरिहंतनो जन्म थाय त्यारे १, अरिहंत भावार्थः-एमज एत्रण कारणे देवता वस्त्रनी दीक्षा लीये ज्यारे२, अरिहंतने केवल ज्ञान उपजे दृष्टि करे ॥४॥ त्यारे ३, ए त्रण वखते महोत्सव करवा आवे अर्थ:-ति० ० त्रण ठा० थानके दे० देवता अर्थः-ति० त्रण दु० दुखे ओसिंगण थाय ना चे० चैत्य रु० वृक्ष च० चले तं० ते ज० स० हे श्रमण आ० आयुपमन तं० ते ज० कहेछ कहुं; अ० अरिहंतनो जा० जन्म थाता अ० माता पि० पितानो ओसिगण न थाय जा० यावत त० तेम चे० बळी ॥५॥ भ० भरणपोपण करे ते शेठ स्वामीनो घ० तिहिं ठाणेहिं देवाणं चेइयरुक्खा धर्मना दातारनो ॥१॥ चलेज्जा । तं जहा । अरहन्तेहि २५ पेरा (अरिहंत भगवान धर्माचार्य तथा महा उपकारी होवाथी अने तेमना उप- जायमाणेहिं जाव तं चेव ॥५॥ कारनो वदलो वाळी शकाय तेम नही होवाथी भावार्थ: -त्रण कारणे देवातानां वृक्ष चळे | भगवाननी पुजा विगैरे अर्थे देवो अत्रे आवेछे) ( हाले) ते वृक्ष मुधी सभाने वारणे होय ते तिण्हं दुप्पडियारं समणाउसो । तं कहे छे, अरिहंतनो जन्म थाय त्यारे १, अरिहंत दिक्षा लिये त्यारे २, अरिहंतने केवळ ज्ञान जहा । अम्मापिउणो भट्टिस्स धम्मा- उपजे त्यारे ३, ए त्रण वखते महोत्सव करवा । यरियस्स ॥१॥ आवे ॥५॥ भावार्थ:-भगवंत कहे छे ते श्रमण आयु- अर्थ:-ति० त्रण ठा० थानके लो० लो- प्यनत्रण जणाना उपकारनो बदलो मुस्केल कांतिक दे० देवता मा० मनुष्य लो० लोक- धी वाळी शकाय ! ते कहे छे माता पीतानों मां ह० शिघ्र आ० आवे तं० ते ज० कहुं । १, भरण पोपण करे ते (मालोक) स्वामीनो अ० अरिहंतनो जा० जन्म याता अ० अरि- २, जेणे धर्म पमाडेल होय ते धर्माचार्यनो ॥१॥ हंत ५० दीक्षा लेता धका अ. अरिहंतने अर्थ:-संपनत्ये प्रभाते वि०य०० बळी के. ना० ज्ञान उ० उत्तपननाम० ओवने विपे. । कोड कुळवंत पु० पुरुप अ० माता पि पिताने- २४ पेरा (ग्वास करीने लोकान्तीक दे- ; स० सो ओपधे पा० पाकुं स० हजार ओ. वता मनुष्य क्षेत्रमा आववाना कारणो कहेछ) पधे पा० पाईं ते. तेले करी अ० मदन करे तिहिं ठाणेहिं लोगन्तिया देवा माणु- सु० मुराभि ग० गन्ध उ० उगटण करे चो- मं लोगं हवमागच्छन्ति । तं जहा। कावीने नि० जण उ० पाणीए म० नारावीन स० सर्व अ० अलंकार वि० सोभिन फ. अरहन्तेहिं जायमाणेहिं अरहन्ताह प-करीने म० मनोज था० टांडलीए पा० नोपन -- (१५६) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. H --- मु० शुद्ध काचुं दाझेल नही अ० अढार जा पितानो ओसिंगण न थाय एम श्री भगवंते तिना व० शाक तेणे आ० सहित भो० भोजन ! कां ॥ २ ॥ भो० जमाडीने जा० जावजीव सुधी पि अर्थः-अ० हवेणं० वळी से० ते पुत्र तं० ते वांसे व० उपाडीने प० चाले एटला वाना अ० माता पि० पिताने के० केवलिनो ५० फरे ते० तोहि अ० पण त० ते पुत्र अ० मा- भाष्योध०धर्म आ० कहीने प० समजाविने प० ता पि०पितानो दु०ओसिंगण न भन्याय॥२॥ भेद भेदांतर कहीने ठा० धर्मने विपे स्थापीने संपाओ वि यणं केइ पुरिसे अम्मा- भ० थाय ते. ते धर्मनी करणीए त० ते अ० माता पि० पितानो सु० ओसिगण भ० थाय || पियरंसयपागसहस्सपागेहिं तेल्लेहिं अ- अहे णं से तं अम्मापियर केवलि- भनेत्ता सुरभिणा गन्धट्टएणं उबट्टि- पन्नते धम्मे आघवइत्ता पन्नवइत्ता त्ता तिहिं उदगेहिं मज्जावित्ता सवा- परूवइत्ता ठावइत्ता सवइ तेणामेव तस्स लंकारविभूसियं करेत्ता मथुन्न थाली- अम्मापिउस्स सुपडियारं भवइ ॥३॥ पागसुद्धं अट्ठारसवञ्जणाउलं भोयणं भावार्थ:-( ते वारे शिष्य पुछतो हो हे भोयावेत्ता जावज्जीवं पिट्ठिवडिंसिया- प्रभु ? ते पुत्र माता पिताना गुणनो ओसिगण ए. पविहेज्जा; तेणावि तस्स अम्मा- शीरीते चाय ? त्यारे प्रभु उत्तर कहता हवा पिउस्स दुप्पडियारं भवइ ॥२॥ के हे शिष्य १) हवे जो ते पुत्र माता पीताने कदापी केवळीनो भाग्यो धर्य कहे समझावे : भावार्थ:-( हवे केटलं करता छतां पण समझावीने परुपीने भेद भेदांतर कहने धर्यमां ओसिगण थाय नहीं ते कहे छे) कोइ कुळ- स्थापी धर्ममां स्थिर करी धर्म करावे तो तेणे करी पुरुष नित्य प्रभाते माता पीताने शतपाक ते ते पुत्र माता पितानो ओसिंगण धाय, ए प्रयम ( सो औपथ. मेळवी तेल काढेलं होय ते ) प्रकार कह्यो १ ॥ ३ ॥ सहस्ख पाक (ते हजार औषध मेळवी तेल का- :-सहेश्रमण आ० आखावंत के०को ढेलं होय ते) तेले करी मर्दन करी सुगंध उश्न इक म० मोटो धनवंत ढ० दरिद्रीने स० 3- शितळ ( ताढा ) पाणीए स्नान करावी पछी त्तकृष्टो करे धन आपीने त० ते वार गं० वावना चंदन सुगंध पवित्र पाणीमां घसी शरिरे पछी से० ते ढ० दरिद्री स० धने उत्तको विलेपन करे पछी सर्व अलंकार आभ्रणे स० थयो थको प० पछी पु० धन पाम्या करी विर्भुपा ( शोभा ) वंत शरिर करे, बहु कंडे च० ० वळी वि० घणा भो० भोगने मुख्य देवदुष्य वस्त्र पहेरावे इत्यादी भक्ति भाव स० समुदाए करी स० सहित थको या० ते सहित करीने पछी मनोज्ञ (मनने गमतुं ) वि. विचरे न० तेवार पं० पछी से० ते म० मनोहर हांडलीमां पाकेलं शुद्ध नीपजेलं पण स्वामी शेट अ० एकदा क० समये द० दरिद्री दाझेलं नहीं तेम काचुं नहीं एहवू अढार जा- हु० श्यो स० थको त. हे धनवंत थयो निगा व्यंजने ( नाके ) करी सहीत भोजन छे ते द० दरिद्रीने अ० पाये ह० शिन आ. जमाडीने जावजीव लगे वांसे (खभे )उपाडी आने त० ते ६० नारे से ते दरिद्री चाले एटलां वानां करे तो पण ते पुत्र माता | ते० ते भ० रवामीने स० सघळो द्रव्य अ० अर्थः-स० " हाणं सूत्र ३. उद्देसों १. (१५७ ) - à पण द० देतो थको एटले पोते काइ न पितो अहे णं से तं भट्टि केवलिंपन्नत्ते थको ते. ते स्वामीने अ०, वळी त० तेनो दु० ऑसिगण भ० थाय (नही)-॥४॥ धम्मे आघवइत्ता पनवइत्ता परूवइत्ता समणाउसो केइ महच्चे दरिदं समु- ठावइत्ता भवइ तेणामेव तस्स भट्टिस्स कसेज्जा तए णं से दरिदे सयुक्किट सुपडियारं भवइ ॥ ५ ॥ समाणे पच्छा पुरं च णं विउलभोग भावार्थ:-( ते वारे शिष्य पुछतो वो के समिइसमन्नागए यावि विहरेज्जा, तए कहता हवा हे शिष्य ) ते दरिद्री हे प्रभु तो ते शीरीते ओसिंगण थाय ? ते णं से महचे अन्नया कयाइ दरिद्दीहूए पोताना स्वामीनी पास केवळी परुष्यो धर्म समाणे तस्स दरिहस्सअन्तियं हवमाग- कडे, प्रज्ञाए करी समजावीने धर्मने विपेस्थापे, च्छेज्जा, तए णं से दरिदे तस्स भट्टिस्स द्रढ करी धर्म करावे एटले धर्म पंमाडे तो तेणे करी ते स्वामिनो ओसिंगण थाय, ए वीजो लवस्समविदलयमाणे तेणावि तस्स प्रकार कह्यो ।। ५ ॥ दुप्पडियारं भवइ ॥ ४ ॥ अर्थः-के० कोइक त० तथा रू० रुप पु- भावार्थ:-हवे बोजो अधिकार कहेछे, भग रुष स० साधु वा० अथवा मा० कोईने हेण- वंन कहेता हवा के हे श्रमण आयुष्मन, कोइक तो नथी तेहने वा० वळी अ० पासे ए० एक म्होटो द्रयवंत पुरुप होय तेणे कोडक दरिद्री अ० पण आ० आर्याने ध० धर्मनुं सु० भलुं पुरुपने द्रव्य दइने उत्कृष्टो धनवंत करे ने दरिद्री व० वचन सो० सांभळीने नि० इदए धारीने पुरुपने द्रव्य करो उत्कृष्टो कीधा पछी ते पूर्व का० आउनु पुर्ण थके का० काळ कि० करीने काले धन पाम्याधी घणा भोगने समुदाए क अ० कोडक दे० देव लो० लोकनेविषे दे० दे- गने विचरे रहे, तेवार पछी ते म्होटो स्वामी वतापणे उ० उपजे त० ते णं० वारे से० ते जणे दरिद्रीने धन दइने धनवान कीधो हतो दे० देवता तं० ते ५० धर्माचार्य प्रत्य दु० ते शेठ एकदा समए दुष्ट कर्मना योगे दरिद्री दुष्कालना वा० वळी दे० देशमाथी सु० मु- थयो. धन रहित थयो तेबारे ते निधन थइ गाल दे० देशमा सा० मुके कं० अटवीमांधी ते पोताना करला धनवाननी पासे आवे वा० वळी नि० वसतीगां क० मुके दी०घणा तेवारे ते दरिद्रो ते स्वामोने सघळं द्रव्य आपे का० काळना वा० वळी रो० रोगनी पीडाए पाते काइ नराखे तोपण ते दारेद्री ते स्वामीनो करीने अ० पराभव्यो छे ते रोग प्रति वि० ओसिंगण न थाय ॥ ४ ॥ मुकवे ते० एटले अ० प्रकारे त० ते ५० घ- अर्थ:-अ० हवे गं० जो स० ते तं० ते । मंना आ० आपनारने दु० ओसिंगण भ० न दरिद्री भ० शेठने के० केवळीनो प० भाख्यो थाय तो केम थाय ॥ ६ ॥ ध० धर्म आ० ते आगल कहीने प० भेद क केइ तहाँध्वस्त समणस्स वा माह- होने समनाविने प० परूपिने ठा० धर्मने विषे र पायनो भ० को ते. तेणे ए० करीनने णस्स वा अन्तियं एगमवि आरियं ध- भ० स्वामीनो सु० ओसिंगग भ० थाय॥५॥ | म्मियं सुक्यणं मोबा निसम्म का- - 1 ( १५८ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. लमासे कालं किच्चा अन्नयरेसु देव- | वि केवलिपन्नत्ते धम्मे आघवइत्ता जाव लोएसु देवत्ताए उववन्ने, तएणं से देवे ठावइत्ता भवइ; तेणामेव तस्स धम्मा- तं धम्मायरियं दुभिक्खाओ वा दे- यरियस्स सुपडियारं भवइ ॥ ७॥ साओ सुभिक्खं देसं साहरेज्जा क- भावार्थ:-[ ते वारे शिष्य पुछतो हवो के हे प्रभु त्यारे ते धर्माचार्यनो ओशीगण शी- न्ताराओ वा निकन्तारं करेज्जा दी- रीते थाय ? ते वारे प्रभु कहेता हवा के हे हकालिएणं वा रोगायङ्केणं अभिभूयं शिष्य ? ] जो कदापि ते धर्माचार्य केवळी विमोएज्जा; तेणावि तस्स धम्मायरि- भापीत धर्मथी पडया होय, भ्रष्ट थया होय तेहने फरी केवळी भापित धर्म हेतु युक्तिये करी यस्स दुप्पडियारं भवइ ॥ ६॥ समझावी पाछो धर्ममां स्थापे [जेम अपाढा- भावार्थः-हवे त्रीजो धर्माचार्यनो प्रकार चायने देवता थयेला चेलाए समझावी करी कहे छे, कोइक पुरुप तथारुप महोटा श्रमण धर्ममां स्थीर कर्या तेहनी पेर तथा तेतली प्र- साधु माहनने पासे एक पण आर्य निष्पाप ते धानने जेम पोटोलोए प्रतिवोध्या तेहनी पेरे] जीव दयामय धर्मनां शुभ वचन प्रत्ये सांभ- तो ते धर्माचार्यनो ओसींगण थाय, ए सिवाय ळीने सम्यक प्रकारे धर्म करी आयुष्य पुर्णकरी बाजी रीते थाय नहीं ३, ए त्रण भेद छे।।७।। काळ करीने अनेरा कोइक देवलोकने विपे दे अर्थ:-ति० त्रण ठा० स्थानके सं० सहीत वता पणे उपजे ते वारे ते धर्माचार्यने दुर्भिक्ष अ० साधु अ० (जे संसारनो ) अंत नथी दोहिली भीक्षा छे जे देशमा एटले दुकाळमाथी अ० जेहनी आदी नथी दी० मोटो म० मार्ग जीहां सुभिक्ष ते सुकाळ होय सोहीली भीक्षा- लेजेहनो चा० चारगतिरुप सं० संसार कं० लाभे ते देशमा आणी मुके अथवा अटवीमां अटवाने प्रते वी० अतिक्रमे तं० ते ज० कहे भुला पड्या होय तिहाथी वस्तीमा आणीमुकेले अ० (रुद्धीयादीकनुं ) न करीने णि अथवा घणा काळनो रोग होय ते रोगनी याj दि० समकीत सं० सहीत पणे जो० पीडाथी पराभव्यो होय तेवारे देवशक्तिये करी जोग वा वेहवे ( श्रुत समाधी रापवे ) ते रोगयी मुकावे तो पण ते धमाचार्यनो धर्मना २६ ( संसारमांधी तरवाने धर्मना त्रण आपनारनो ओसींगण थाय नहीं ॥६॥ अर्थः-अ० हवे णं जा से० ते देवता ते ते स्थान उतारी वतावे छे ध० धर्माचार्यने के. केवली ५० भापीत ध० तिहिं ठाणेहिं संपन्ने अणगारे अ. धर्मथकी भ० पडयो स. थको ते प्रते भु० णाइयं अणवयग्गं दीहमद्धं चाउरन्त- फरीने वि० वळी के ० केवळी ५० भापीत ध० संसारकन्तारं वीतीवएज्जातं जहा। धर्म आसमजावाने जाव्यावत ठा०धिर्ममांडी) अणियाणयाए दिद्विसंपन्नयाए जोग- स्थापतो भ० थको ते० तेणे ए० करी त० ते ध० धर्माचार्यनो मु०ओसिंगण भ० थाय ॥७॥ वाहियाए । अहे णं से तं धम्मायरियं केवलि- भावार्थ:-हवे संसार तादाना भेद कहे छ, त्रण स्थानके सहीत अणगार साधु, ते जेहनी पन्नत्ताओधम्माओभट्ट समाणं भुज्जो आदी नथी, जेहनो अंत नथी, जेहनो लांवो नि- हाणं मूत्र ३. उद्देसो १. ( १५९ ) म्होटो मार्ग छे एहवीचार गती संसार रुपणी जहा । उक्कोसा मज्झिमा जहन्ना अटवी अतिक्रमे ( ओलंघी जाय) पार पामे [८]॥३॥ ते त्रण स्थानक कहे छे, धर्म करी रुद्धि प्रमु- भावार्थ:-एम त्रण प्रकारे उत्सर्पिणी काळ खनुं निया' न करे १, समकित सहित कहेल छे ते कहे छे, उत्कृष्ट १, मध्यम २, पणे २, योग उपध्यान तप करे, श्रुत समाधी जघन्य ३॥३॥ राखे एहवा साधु होय ते संसारनो पार पामे अर्थः-ए० एम छ० छ प्पि० य० वळी ३, ए त्रण भेद छे, स० आरा भा० जाणवा जा० ज्यां लगे सु० अर्थः-ति० त्रणभेद ओ० अवसर्पिणी पं० सुपमा सु० सुप (९-१४)॥ ४ ॥ कही तं० ते ज० कहेछ उ० उत्कृष्ट म० मध्यम एवं छ प्पि य समाओ भाणियबा- ज० जधन्य ।। १ ।। पेरा २७ ( जुदा जुदा प्रकारनां काळ १४ ओ जाव सुसमसुसमा [९-१४] ॥४॥ सूत्रथी कहे छे) भावार्थ:-एम छए आरा चढता चढता तिविहाओसप्पिणी पन्नता। तंजहा। जाणका, पेहेलो वोजो आरो जघन्य १, त्रीजो, उक्कोसा मज्झिमा जहन्ना ॥ १॥ चोथो, पांचमो मध्यम २, सुखया सुखमा छठो भावार्थ:-संसार तरको ते भवस्थीति काळ आरो ते उत्कृष्टो काळ जाणवो ३, ए त्रण भेद छे ॥४॥ पुर्ण थयेल होय तो तेथी तराय ते माटे काळ अर्थ:-ति० त्रण ठा० स्थानके अ० अण- विपेपतुं स्वरुप कहे छे, त्रण प्रकारे अवसर्पिणी छेद्यो पो० काळ कहेल छे ते कहे छे, उत्कृष्ट १, मध्यम ० पुदगल (पोताना मेळे) च० चळे तं० ते ज० कहे छे आ० आहार लेता (जी- २, जघन्य ३ ॥ १ ॥ अर्थः-ए० एम छ० छ प्पि० य० बळी वि० विक्रीयरुप करता वा० वळी पो० वताणी ले) वा० वळी पो० पुदगल च० स० आराओ भा० जाणवा जा० ज्यां लगे दू०दुरखमां दृ० दुख (२-७ ) ॥२॥ पुदगळ च० चळे ठा० एक स्थानकथी ठा. वीजे स्थानके सं० संक्रामता वा० वळी पो० एवं छ प्पि य समाओ भाणिय- पुदगण च० चले ॥१॥ वाओ जाव दूसमदूसमा।।[२-७] ॥२॥ २८ पेरा (अचेतन द्रव्यना धर्मना समान- भावार्थ:-एवीरीते छए आरा पडता पडता पणाथी पुदगळ धर्म पांच सुत्रथी कहेछे) जाणवा, पहेलो आरो मुरुम सुखमा ते उत्त तिहिं ठाणेहिं अच्छिन्ने पोग्गले च- कृष्टो ओसर्पिणी काळ १, बीजा आराधी चोथा आरासुधी मध्या २, पांचमो, छठो आरो लेज्जा । तं जहा । आहारिज्जमाणे जघन्य ३, एत्रण भेद छे ।। २ ।। वा पोग्गले चलेज्जा विउवमाणे वा अर्थ:-तिक दण उ० उत्सर्पिणी पं० कही पोग्गले चलेज्जा गणाओ ठाणं सं- तं० ते ज० कहे छे उ० उत्कृष्ट म० मध्यम कामेज्जमाणे वापोरगले चलेज्जा ॥१॥ ज. जघन्य ८ ॥ ३ ॥ भावार्थ:-काळ ते अचेत करो, तेह्नां सर- तिविहा उस्सप्पिणी पन्नता । तं खाइपणामाटे पुदगल धर्म कहे छे, त्रण प्रकारे ने ( १६०) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १: खडगादीके अणछेलो पोतानी मेले समुदाय अर्थ:-अथवा ति० त्रण भेदे. उ० उपधी मांहीर्थी पुदगळ चळे ते कहे छे, जीव आहार पं० कही तं० ते ज० कहेछे स० सचित (पा- पणे लेते स्वस्थानकथी पुदगळ चळे ते जीव पाणादीक ) अ० अचित ( वस्त्रादीक ) मी० ताणीले १, देवता मनुष्य वेक्रेय करे, पुदगळ मिश्र ( शरीरादीक ) ए० एम ने० नारकीने ताणे ते वारे चळे, केयके वैक्रेयने वशवर्ति पुद जा. ज्यांलगे वे वैनानीक ॥ ३ ॥ गळ छे ते माटे २, एक स्थानकथी वीजे स्था अहवा तिविहा उवही पन्नत्ता। तं नके संक्रम ते हस्ताद के करी मुक्तांथकां घणां होय ते मांहीथी पुढगळ चले ३, एत्रण भेदछ।।। जहा। सचित्ते अचित्ते मीसए । एवं अर्थः-ति० त्रण भेटे उ० उपधी पं०कही नेरइयाणं जाव वेमाणियाणं ॥३॥ तं० ते ज० कहे छे क० आठ कर्म उ० उपधी भावार्थ:-वळी ऋण प्रकारे उपवी कहेल छ स० पांच शरीरनी उ० उपधी वा० बाह्य ते कहे छे, सचित्त उपधी १, अचित्त ते वस्या ( परिग्रह ) भं० पात्रां म० माटी प्रमुखनी दीक उपधी २, मिश्र ते सचित्ताचित्त उपधी ३, उ० उपधी ए० एम अ० अउर कुमारने भा० ए त्रण प्रकारनी उपधी आंतरा रहीत वैमानीक जाणवू ( एटले तेनेपण त्रण उपधी होय ) ए० चौवीस दंडके होय ॥३॥ एम ए० एकेन्द्री ने० नारकी व० वरजीने जा० अर्थ:-ति०त्रण भेदे प० परिग्रह पं० कया ज्यांलगे वे वैमानीकने त्रण उपधी होय ॥२॥ तं० तेज० कहे छे क० आठकर्मनो प० परि- तिविहा उवही पन्नता । तं जहा । ग्रह स० सरीरनो प० परिग्रह बा० वाह्य भं० कम्मोवही सरीरोवही बाहिरभण्डम- भांड म० पात्रादीक प० परिग्रह (वस्त्रादिक) ए० एम अ० असुरकुमारनो परिग्रह जाणको तोवही। एवं असुरकुमाराणंभाणियवं। ए० एम ए० एकेन्द्रीने ने० नारकी व० वर्जीने एवं एगिन्दियनेरइयवज्जं जाव वेमा- (एकेन्द्रीने नारकीने भांडादी नथी ) जा० णियाणं ॥ २॥ ज्यांलग वे० वैमानीक ॥ ४ ॥ भावार्थ:-पुदगळ ते उपधी ग्रहण रुप परि तिविहे परिग्गहे पन्नत्ते । तं जहा। ग्रह छे ते उपधीतुं स्वरुप त्रण प्रकारे कहेल छ कम्मपरिग्गहे सरीरपरिग्गहे बाहिरम- ते कहे छे, कोपधी ते आठ कर्म १, शरिर ण्डमत्तपरिग्गहे । एवंअसुरकुमारार्ण । उपधी ने उदारिकादीक पांच प्रकारे २, वा- हीर उपधी ते माटीनां कांसांनां पात्रादिक अ- एवं एगिन्दियनेरइयवज्जं जाव वेमा- थवा वस्खा भरणादिक उपधी 3, ए त्रण भेद णियाणं ॥४॥ छे, एम अमरकुमारादी दसने ए त्रण प्रकारनी भावार्थ:-त्रण प्रकारे परिग्रह कहेल छे ते उपधी होय, एम एकेंद्री अने नारकी दर्जि ए- कहे छे, कर्म परिग्रह ते आठ नकारे १, शरिर हने भांडादी उपधी नधी, वे, इन्द्रीयथी मांडी, परिग्रह ते पाच प्रकारे २, बाहीर भांड पान वमानीक मुधी त्रण प्रकारे उपधी जाणवी वस्त्र आभरणादीकनो परिग्रह ३, ए त्रण भेट नमांही एटलो विशेष जे कोडक वेइंद्रीयादोकने छे, एम अमरकुमारादी दसने त्रण नकारनो पत्रण प्रकाग्नी उपधी होय, ॥२॥ परिग्रह जाणवो, एम एकेंद्री अने नारकी वर्जि ते , । - हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. ( १६१ ) वे इंद्रीयथी मांडी वैमानीक सुधी त्रण प्रकारनो धान ते वचननुं एकाग्रपणुं २, काय प्रणिधान परिग्रह जाणवो ॥ ४॥ ते कायानुं एकाग्रपणु ३, एम वैमानीक मुधी अर्थ:-अ० अथवा ति० त्रण भेदे प० परिग्रह | चौवीस दंडक माही जेटला संज्ञी पंचेद्री होय पंकयो तं० तेज कहेछे स०सचित अ०अचित तेहने ए त्रणे प्रकार, प्रणिधान होय (एकेंद्री, मी० मिश्र ए० एम ने नारकीने नि० वीजो त्रण विगलेंद्री, असंज्ञी पचेंद्रीने त्रण पुरां मणि- एसर्वेने जा. ज्यांलगे वे० वैमानीक ॥ ५ ॥ धान न होय, तेहथी इंहा संज्ञी पचेंद्रीनेज त्रण प्रणिधान कहेल छे)॥१॥ अहवा तिविहे परिवरहे पन्नते। तं जहा। अर्थः-ति० त्रण भेदे सु० सुभ प० प्रणी सचित्ते अचित्ते मीसए। एवं नेरइयाणं धान प० कह्या तं० ते ज० कहे छे म० मन निरन्तरं जाव वेमाणिया णं ॥ ५॥ सु० शुभ प० प्रणीधान व० वचन सु० सुभ भावार्थ:-अथवा वळी त्रण प्रकारे परिग्रह प० प्रणीधान का० काय सु० शुभ प० प्र- णीधान ॥२॥ कहेल छे ते कहेछे, सचित परिग्रह १, अचित्त वस्त्राभरणादी परिग्रह २, मिश्र सचित्ताचित्त (प्रणिधान शुभ अने अशुभ एम वे भेदछे) परिग्रह ३, ए त्रण प्रकारनो परिग्रह आंतरा ति विहे ‘सुप्पणिहाणे पन्नत्ते । तं रहीत वैमानिक मुधी चोवीस दंडके होय ।।५।। जहा । मणसुप्पणिहाणे वइसुप्पणिहा- अर्थः-तिन्त्रण भेदे प० एकाग्रपणुं कर, ते णे कायसुप्पणिहाणे ॥ २ ॥ पं० कर्तुं तं० तेज० कहे छे ५० मननुं प० भावार्थ:-त्रण प्रकारे शुभ मणिधान कहेल एकाग्रपणुं व० वचननु प० एकाग्रपणुं का० छे ते कहे छे, मनसुप्रणीधान ते भटु धर्ममा कायार्नु प० एकाग्रपणुं ( कायाए पाप नकरे मन, एकाग्रपणु १, वचनसुमणीधान ते ए० एम.पं० पंचेन्द्रीने होय जा० ज्यांलगे वे० सत्य वचन बोलवामां एकाग्रपणुं २, कायम चैमानीक त्यांलगे (एकेन्द्रीने पूरी ३ नहोय) ॥१॥ प्रणीधान ते कायाए पाप नकरे अने धर्मा २९ पेरा (जीवधर्मनुं त्रिविधपणुं कहेछे ) प्रवर्ताववा एकाग्रपणुं ३, एत्रण भेद छे ।।२।। अर्थः-सं० संजमवंत म० मनुष्यने (सा- तिविहे पणिहाणे पन्नत्ते । तं जहा । धुने ) ति० त्रण भेदे सु० शुभ प० प्रणीधान मणप्पणिहाणे वइप्पणिहाणे कायप्प- पं० कया तं० ते ज० कहेछे म० मन मु०शुभ णिहाणे । एवं पश्चिन्दियाणं जाव वेमा- प० पणीधान व० वचन मु० शुभ प०वणीधान णियाणं ॥१॥ का० काया मु. शुभ प. प्रणीधान ॥३॥ भावार्थ:-त्रण प्रकारे प्रणिधान ते मन प्रमु- संजयमगुस्साणं तिविहे मुप्पणिहाणे खतुं एकाग्रपणुं कर कहेल छे ते कहे छे, मन पन्नत्ते । तं जहा । मणसुप्पणिहाणे प्रणिधान से मननु एकाग्र पणुं १, वचन प्रणि- वइसुप्पणिहाणे कायसुप्पणिहाणे ॥३॥ . --- 1 ( १६० ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. खडगादीके अणछेयो पोतानी मेले समुदाय अर्थ:-अथवा ति० त्रण भेदे उ० उपधी मांहीथी पुदगळ चळे ते कह छे, जीव आहार | पं० कही तं० ते ज० कहेछे स० सचित (पा- पणे लेते स्वस्थानकथी पुदगळ चळे ते जीव पाणादीक ) अ० अचित ( वस्त्रादीक ) मी. ताणीले १, देवता मनुष्य वेक्रेय करे, पुदगळ मिश्र ( शरीरादीक ) ए० एम ने० नारकीने ताणे ते वारे चळे, केयके वैक्रेयने वशवर्ति पुढ जा० ज्यांलगे वे० वैनानीक ॥ ३॥ गळ छे ते माटे २, एक स्थानकथी वीजे स्था अहवा तिविहा उवही पन्नता। तं नके संक्रम ते हस्तार्दाके करी मुक्तां थकां घणां होय ते मांडीथी पुढगळ चले ३, एत्रण भेदछ।शा जहा ! सचित्ते अचित्ते मीसए । एवं अर्थः ति० त्रण भेदै उ० उपधी पंकही नेरझ्याणं जाव वेमाणियाणं ॥३॥ तं. ते ज० कहे छे का० आठ कर्म उ० उपधी भावार्थ:-वळी ऋण प्रकारे उपधी कहेल छ स० पांच गरीरनी उ० उपधी वा० बाह्य ते कहे छे, सचित्त उपधी १, अचित्त ते वना ( परिग्रह ) भं० पात्रा म० माटी प्रमुखनी । दीक उपधी २, मिश्र ते सचित्ताचित्त उपधी ३, उ० उपधी ए० एम अ० अठर कुमारने भा० ए त्रण प्रकारनी उपधी आंतरा रहीत वैमानीक जाणवू ( एटले तेनेपण त्रण उपधी होय ) ए० चौवीस दंडके होय ॥३॥ एम ए० एकेन्द्री ने नारकी व० वरजीने जा० अर्थ:-ति०त्रण भेदे प० परिग्रह पं० काया ज्यांलगे वे० वमानीकने त्रण उपधी होय ॥२॥ तं० तेज० कहे छे क० तं० तेज० कहे छे क० आठकर्मनो प० परि- तिविहा उवही पन्नत्ता । तं जहा । ग्रह स० सर्गरनो प० परिग्रह बा० वाद्य भं कम्मोवही सरीरोवहीं बाहिरभण्डम- भांड म० पात्राढीक प० परिग्रह (वसादिक) ए० एम अ० असुरकुमारनो परिग्रह जाणको तोवही। एवं असुरकुमाराणंभाणियो। ए० एम ए० एकेन्द्रीने ने० नारकी ५० वर्गाने एवं एगिन्दियनेरइयवज्ज जाव वेमा- (एकेन्द्रीने नारकीने भांडादी नथी ) जा. णियाणं ॥२॥ ज्यांलग वे० वैमानीक ॥ ४ ॥ भावार्थः-पुढगळ ते उपधी ग्रहण रुप परि तिविहे परिग्गहे पन्नत्ते । तं जहा। ग्रह छे ते उपधीनु स्वरुप त्रण प्रकारे कहेल छे कम्मपरिगहे सरीरपरिग्गहे वाहिरभ- ते कहे छे, कोपी ने आठ कर्म १, शरिर ण्डमत्तपरिग्गहे उपधी ते उदारिकादीक पांच प्रकारे २, वा- । एवंअसुरकुमारार्ण । हीर उपधी ते माटीनां कांसांनां पात्रादिक अ- एवं एगिन्दियनेरझ्यवज्जं जाव वेमा- थवा वस्त्रा भरणादिक उपधी ३, ए त्रण भेद णियाणं ॥४॥ छे, एम अमरकुमारादी दसने ए त्रण प्रकॉरनी भावार्थ:-त्रण प्रकारे परिग्रह कहेल छे ते उपधी होय, एम एकेंद्री अने नारकी वर्जि ए- कहे छे, कर्म परिग्रह ते आठ प्रकारे १, गरिर हने भांडादी उपधी नथी, वे, इन्द्रीयथी मांडी परिग्रह ते पाच प्रकारे २, बाहीर मांड पात्र वमानीक मुधी त्रण प्रकारे उपधी जाणवी वस्त्र आभरणाकिनो परिग्रह ३, ए ऋण भेद नेमांही एटलो विशेप ने कोडक बेइंद्रीयादीकने छ, एम अमरकुमारादी दसने त्रण प्रकारनो एत्रण प्रकारनी उपधी होय, ॥२॥ परिग्रह जाणवो, एम एकेंद्री अने नारकी वर्जि .
-- + हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. ( १६१ ) चे इंद्रीयथी मांडी वैमानीक सुधी त्रण प्रकारनो। धान ते वचन- एकाग्रपणुं २, काय प्रणिधान परिग्रह जाणवो ॥ ४॥ ते कायानुं एकाग्रपणुं ३, एम वैमानीक सुधी अर्थः-अ० अथवा ति० त्रण भेदे प० परिग्रह चौवीस दंडक मांही जेटला संज्ञी पंचेद्री होय पंकयो तं० ते ज०कहेछे स०सचित अ०अचित तेहने ए त्रणे प्रकारचें मणिधान होय (एकेंद्री, मी० मिश्र ए० एम ने नारकीने नि० वीजो त्रण विगलेंद्री, असंज्ञी पचेंद्रीने त्रण पुरां प्रणि- एसर्वने जा० ज्यांलगे वे० वैमानीक ॥ ५ ॥ धान न होय, तेहथी इंहा संज्ञी पचेंद्रीनेज त्रण प्रणिधान कहेल छे) ॥ १ ॥ अहवातिविहे परिग्रहे पन्नते। तं जहा। अर्थः-ति० त्रण भेदे सु० सुभ प० प्रणी सचित्ते अचित्ते मीसए। एवं नेरइयाणं धान प० कह्या तं० ते ज० कहे छे म० मन निरन्तर जाव वेमाणिया णं ॥ ५॥ सु० शुभ प० प्रणीधान व० वचन सु० सुभ भावार्थ:-अथवा वळी त्रण प्रकारे परिग्रह १० ग्रणीधान का० काय सु० शुभ प० प्र- कहेल छे ते कहेछे, सचित परिग्रह १, अचित्त णीधान ॥ २ ॥ वस्त्राभरणादी परिग्रह २, मिश्र सचित्ताचित्त (प्रणिधान शुभ अने अशुभ एम वे भेदछे) परिग्रह ३, ए त्रण प्रकारनो परिग्रह आंतरा तिविहे सुप्पणिहाणे पन्नत्ते । तं रहीत वैमानिक सुधी चोवीस दंडके होय ॥५॥ जहा । मणसुप्पणिहाणे वइसुप्पणिहा- अर्थः-तिन्त्रण भेद प० एकाग्रपणुं करवू णे कायसुप्पणिहाणे ॥ २ पं० का तं० तेज० कहे छे म० मननु ५० भावार्थ:-त्रण प्रकारे शुभ मणिधान कल एकाग्रपणुं व० वचननु प० एकाग्रपणुं का० छे ते कहे छे, मनसुप्रणीधान ते भलु धर्ममा काया- प० एकाग्रपणुं ( कायाए पाप नकरे मनतुं एकाग्रपणुं १, वचनसुमगीधान ते ए० एम पं० पंचेन्द्रीने होय जा. ज्यांलगे वे० सत्य वचन बोलवामां एकाग्रपणुं २, कायम वैमानीक त्यांलगे (एकेन्द्रीने पूरी ३ नहोय)॥१॥ प्रणीधान ते कायाए पाप नकरे अने धर्ममा २९ पेरा (जीवधर्मनुं त्रिविधपणुं कहेछे) प्रवर्ताववा एकाग्रपणुं ३, ए त्रण भेद छे ।।२।। अर्थः-सं० संजमवंत म० मनुष्यने (सा- तिविहे पणिहाणे पन्नत्ते । तं जहा । धुने ) ति० त्रण भेदे सु० शुभ प० मणीधान मणप्पणिहाणे वइप्पणिहाणे कायप्प- पं० कद्या तं० ते ज० कहेछे म० मन मु०शुभ णिहाणे । एवं पञ्चिन्दियाणं जाव वेमा- ५० पणीधान व० वचन मु० शुभ पमणीधान णियाणं ॥१॥ का० काया मु० शुभ प. प्रणीधान ||३|| संजयमगुस्सागं तिविहे मुप्पणिहाणे भावार्थ:-त्रण प्रकारे मणिधान ते मन प्रमु- पन्नत्ते । तं जहा । मणसुप्पणिहाणे खनुं एकाग्रपणुं कर कहेल छे ते कहे छे, मन प्रणिधान ते मन एकाग्र पणुं १, वचन प्रणि- वइसुप्पणिहाणे कायसुप्पणिहाणे , ( १६२) हाणं सूत्र ३. उद्देसों भावार्थ:-संयमवंत मनुष्य ते साधुने त्रण तिविहां जोणी पन्नत्ता । तं जहा । प्रकारे सुप्रणीधान कहेल छै कहे छे, मनसु सीया उसिणा सीयोसिंणा । एवं ए- प्रणीधान १, वचन सुप्रणीधान २, कायसु गिन्दियाणं विगलिन्दियाणं तेउ- प्रणीधान ३, ए त्रण भेद छे ॥ ३ ॥ अर्थः-ति० त्रण भेदे दु० माटु प० प्रणी- काइयवज्जाणं समुच्छिमपश्चिन्दियति- ‘धान पं० का तं० ते ज. कहें छे म० मन रिक्खजोणियाणं संमुच्छिममगुस्सा- दु० मा ५० प्रगीधान व० वचन दु० माहुं ण य ॥ १॥ (असत्य ) प० प्रणीधान का० कायां दु०मार्छ भावार्थ:-जीवनो अधिकार माटेत्रण प्रकारे (पाप करे ते) १० प्रणीधान ए० एम प० योनी ( जीवने उत्पन्न थवानुं स्थानक ) शित पचेन्द्रिने जा० ज्यां लगे वेवैमानीकने ॥४॥ ( ताही ) योनी १, उस्न ( उनी) योनी २, तिविहे दुपगिहाणे पन्नत्ते । तं सितोस्न (काईक ताढी काईक उनी ) योनी३, ए त्रण भेदछे, अग्निने उस्न योनि, बीजाचार जहा। मणदुप्पणिहाणे वइदुप्पणि- स्थावर, त्रण विंगलेंद्री, नारकी, समुर्छिम तिर्यच हाणे कायदुष्पणिहाणे । एवं पश्चिन्दि- पचेंद्री, सुमुर्छिम मनुष्यं पचेंद्री, एटलाने ऋण याणं जाव वेमाणियाणं ॥ ४ ॥ योनी, सर्व देवता, गर्भज तिर्यंच पचेंद्री, गर्भज मनुष्य पचेंद्रीने एक शितोस्न योनी जाणवी ॥१॥ भावार्थ:-ग प्रकारे दुष्टं प्रणीधान कहेल अर्थः-ति० त्रण भेदे जो योनी पं० कही तं० छे ते कहे छे, मनदुष्ट प्रणीधान ते मन पापमा ते ज० कहेछे स० सचित अ० अचित मी० प्रवर्तावत्रामा एकाग्रपणुं १, वचन दुष्ट प्रणी-मिश्र ए० एम ए० एकेंद्रीने वि० विगलेंद्रीने धान ते असत्य वचन बोलवामां एकाग्रपणुं २, सं० समुर्छित पं० पचेन्द्रीने ति० तिर्यंच जो० काय दुष्ट प्रणीधान ते कायाए पाप करवामां योनीयाने सं० समुर्छित म० मनुष्यने य० एकाग्रपणुं ३, ए त्रण भेद छे, वैमानीक सुधी वळी ( नारकीने अचित होय, गर्भजने मि- चोविस दंडक मांही जेटला संज्ञी पचेंद्री जीव | योनी होय ) ॥ २ ॥ होय तेटलानेज ए त्रग प्रकारनां दुष्ट प्रणी तिविहा जोणी पन्नत्ता। तं जहा । धान होय, ( एकेंद्री त्रग विगलेंद्री असंज्ञी सचित्ता अचित्ता मीसिया । एवं ए- पचेंद्रीने मननयी तेथी इहां गणेल नधी)॥४॥ अर्थ:-ति० त्रण भेदे जो० योनी पं०कही गिन्दियाणं विगलिन्दियाणं संमुच्छि- त० ते ज० कहे छे सी० टाढी उ० उनी सी० मपश्चिन्दियतिरिक्खजोणियाणं संमु- मिश्र योनी ए० एम ए० एकेन्द्रिने वि० वे- च्छिममणुस्साण य ॥२॥ न्द्रियादीकने ते० तेर कायने व० वर्जीने (ते भावार्थः पीजी पण त्रण योनी कहेल छे उकायने १ उष्ण योनी होय ) सं० समुर्छिम ते कहे छे, सचित्त (जीव सहित ) योनी १, पं०, पंचेंद्री ति० तिर्यंच जो० योनियाने सं० अचित्त (जीव रहीत) योनी २, मिश्र (कांडक समुमि म० मनुष्यने य० संचये ॥१॥ जीव सहित ने कांइक जीव रहीत ) योनी३, ३० पेरा (योनी स्वरूप कहे छे) ए त्रण भेद छे, एकेंद्री, समुर्छिम तिर्यंच पचेंद्री , -- - मणे सूत्र ३. उद्देसो १ . ( १६३ ) सयुर्छिम मनुष्य पचेंद्री, एटलाने त्रण योनी कुम्मुन्नया णं जोणी, उत्तमपुरिस- होय, देवता नारकीने एक अचित्त योनी होय, माऊण । कुम्मुन्नयाए, ण जोणीए गर्भज मनुष्य तिर्यंचने एक मिश्र योनी होय॥२॥ अर्थः-ति० तिविहा उत्तमपुरिसा गभंवर्कमन्ति। ०त्रण भेदे जो० योनी पं० कही तं० ते ज० कहेछे सं० सांकडी वि० मोकळी तं जहा। अरहन्ता चकवट्टी बलदेव- सं० सांकडी वि० मोकळी ॥ ३॥ वासुदेवा ॥ ५॥ तिविहा जोणी पन्नत्ता । तं जहा । भावार्थ:-कुर्मोन्नत योनी ते उत्तम पुरुषने संवुडा वियडा संवुडवियडा ॥ ३॥ उपजवानुं स्थानक छे, ए कुर्मोनत योनीने भावार्थ:-वळी त्रण प्रकारे योनी कहल छे विषेत्रण प्रकारना उत्तम पुरुष गर्भमां उपजे ते कहे छे, संहत योनी ते संकीर्ण सांकडी | ते कहे छे,अरिहंत १, चक्रवर्ति २, बळदेव वा- घडीना घर सरखी १, विवृत योनी ते मोकळी सुदेव ए वे साथे उपजे ते माटे एकठां कह्यां ॥२॥ २, संतृत विवृत योनी ते काइक.सांकडी, अर्थ:-सं० संपावत्र णं० वळी जो० योनी- कॉइक मोकळी ३ एत्रणं भेदछे, एकेंद्रीने नार- नेविषे इ० चक्रतीनी पटराणी. स्त्री र० रतन- कीने,संवृत योनी १ देवंताने त्रण, विगलेंद्रीने ने होय सं० संपावत्त णं० वळी जो० योनीने वित्त योनी २, गर्भज मनुष्य तिर्यंचने संहत विषे वं० घणा जी० जीव य० वळी पो. विवृत्त योनी ३॥३॥ पुदगल य० वळी व० उपजे वि० विणसे च० अर्थः-ति० त्रणभेदे जो० योनी पं० कही तं० चवे उ० उपजे नो० नही चे० निश्चेणं० वळी ते ज० कहेछे कु० काछवानी माफक' उन्नत नि० नीपजे नहीं ।। ६ ॥ सं० संपनी माफक आहेत वं. वासना सङ्खावत्ता णं जोणी इत्थिरयण- पत्र सरिपी ॥ ४॥ तिविहा जोणी पन्नत्ता । तं जहा । जीवा य पोग्गला य वकमन्ति विउ- स्स । सङ्खावत्ताए णं जोणीए बहवे कुम्मुन्नया सङ्ख्यावत्ता वंसीवत्तिया ॥४॥ कमन्ति चयन्ति उववजन्ति नो चेव भावार्थ:-वळी त्रण प्रकारे योनी कहेल छे छे ते कहे छे, कुर्मोनत योनी ते काबानी परे णं निप्फज्जन्ति ॥ ६ ॥ उची १, शंखावर्त योनी ते शंखनी पेरे आ- भावार्थ:-शंखावर्त योनी चक्रवर्तिनी स्त्री वर्त ( वळीयां) फरती होय २, वंशी पत्ता रत्नने होय, ए शंखावर्त योनीने विपे घणा योनी ते वांसना पत्र सरखी लांबी होय ३, जीव अने जीवने ग्रहवा योग्य पुद्गळ ते जीव ए त्रण भेद छे ॥ ४ ॥ पुदगळ घणा उपजे अने विणसे चचे अने अर्थः-कु० काछवा सरीपी णं० वळी जो उपजे पण निपजे नहि एटले जन्म थाय नहीं ॥३॥ थोनी उ० उत्तम पु० पुरुपनी मा० माताने अर्थ:-५० वसीपत्र णं० वळी जो योनी कु० कुर्मोन्नत गं० वळी जो० योनीने विपे पि० सामान्य ज० पुरुपने होय वै० वंसीपत्र ति. त्रण भकारना उ० उत्तम पु० पुरुप ग० णं. वळी जो योनीने विर्षे वगा पि. गर्भे व उपजे ६० ते ज० कहेछे अ० अरिहं- सामान्य जन ग० गर्भ व० उपजे ॥ त च० चक्रवर्ती व० वलदेव वा० वासुदेव ॥२॥ वंसीवत्तिया णं जोणी पिहज्जण- 1 - (१६४ ) हाणं सूत्र ३. उद्देसो १. - स्स । वंसीवत्तियाए णं जोणीए बहवे भावार्थ:-जंबुद्विपना भरतक्षेत्रमा त्रण तिर्थ पिहज्जणे गम्भ वक्कमन्ति ॥ ७॥ कहेल छे ते कहे छे मागध १, वरदाम २, म. भास ३ ॥१॥ भावार्थ:-वशीपत्र योनी वीजा सामान्य अर्थ:-ए० एम ए० एरवते पण वि० ए तिर्थ ॥२॥ मनुप्यने होय, ए वंशीपत्र योनीने विपे घणा सायान्य मनुष्य गर्भपणे उपजे, ए त्रण योनी एवं एरावए वि ॥ २ ॥ मनुष्यने होय ॥७॥ भावार्थ:-एम एरवन क्षेत्रमा पण त्रण अर्थः- तित्रण भेदे त० तृण व० वन- तिर्थ जाणवां ॥२॥ स्पती का. काया प० कद्या तं० ते ज० कोछे अर्थ: -ज० जम्बुद्वीप नागना दी० द्वीपे सं० संष्यात जी०जीर त्रणयोनी अ०असंख्या म० महाविदेह वा० क्षेत्रे ए० एकेक च० तजी जीव त्राणयोनी अ० अनंत जी० जीवनी चक्रवर्ती वि० विजयने विपे त० त्रण नि० ३१ पेरा ( पहेला योनिथी मनुष्य कन्या अने तिर्थ पं० कह्या तं० ते ज० कहेछे मा० माग वाढर वनस्पति कायना अने मनुप्यना समान धव० वरदाम प० प्रभास ॥३॥ धर्मछे तेथी वादर वनस्पति काय प्ररुपेछे ) जम्बुद्दीवे दीवे महाविदेहे वासे ए- तिविहा तणवणस्सइकाइया पन्नत्ता। गमेगे चकवट्टिविजए तओ तित्था प- तं जहा। संखेज्जजीविया असंखेज्ज- नत्ता । तं जहा । मागहे वरदामे प- जीविया अणन्तजीविया॥ भासे ॥३॥ भावार्थ:-मनुष्यनां स्वरुप सरखी वादर भावार्थ:-जंबुद्विपना महाविदह क्षेत्रमा एक तण वनरपतिकाय छे ते कहे छे, त्रण प्रकारे चक्रवर्तिनी विजयमांत्रण तिर्थ कहेल छे ते वनस्पतिकाय कहेल छे ते कहे छे, संख्यात कहे छे मागध १, वरदाम २, प्रभास ३ ॥३॥ जीववाळी ते जाइनां फुल प्रमुख १, असंख्यात अर्थः-ए० एम धा० धातकीपंड दी द्वीपे जीववाळी ते कमळ प्रमुखनो कंद, मुळ, खंध, पु० पुर्वदीगे वि० वळी ए त्रण तिर्थ ५० छालगां असंख्याता जीव होय २, अनंताजी- पश्चीमदीशे वि० वळी ए त्रण तिथं पु० पु- बवाळी निल फुल प्रमुख ३, ए त्रण भेद छ. करवर दी० द्वीपने विपे पु० पुर्वदीसे वि० अर्थ:-ज०जन्बुद्वीप नानना दी० द्वीपने वळी त्रण तिर्थ प० पश्चीमदीसे वि० वळी विपे भा० भरत वा० क्षेत्रे त० त्रण ति० त्रण तिर्थ ॥४॥ निर्य पं० कया तं० ते ज० कहेछे मा० माग एवं धायईखण्डे दीवे पुरथिमद्धे धव० वरदाम ५० प्रभास तिर्थ ॥१॥ वि पञ्चस्थिमद्धे वि । पुक्खश्वरद्दीवड्ड- ३२ पेरा ( वनस्पतिकाय करा ते जला श्रयमा घणा होयछे ते संबन्धी जलाश्रय पुरथिमद्धे वि पञ्चस्थिमद्धे वि ॥४॥ वाळा तीर्थनी परुपणा करछे) भावार्थः-एम घातकीखंड द्विपमा पुर्व दी- जम्बुद्दीवे दीवे भारहे वासे तओ शाए तथा पश्चिम दीगाए पुर्वोक्त त्रण त्रण तित्था पन्नत्ता । तं जहा। मागहे व- निर्थ जाणवां, एम पुष्कराधने विषे पुर्वार्धमा मथा पश्चिमार्थमां पण पुर्वोक्त त्रण त्रण तिर्थ रदामे पभासे ॥१॥ जाणवां ॥४॥ -
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وو - ? ૬. જીવરાજ ઘેલાભાઈએ શ્રી હરમન જેકેબી પાસે સુધરાવી પ્રગટ કરેલાં પુસ્તક. ૧. શ્રી ઉત્તરાધ્યયન સૂત્ર (હાલ શાલીક નથી) ૨. શ્રી દશકાલીક સૂત્ર શી. ૩--- ૩. શ્રી બૃહદ કપ સૂત્ર, ૪. શ્રી વ્યવહાર સૂત્ર ૫. શ્રી દિપાસક દશાશ્રુત સ્કંધ ૬. શ્રી ઉત્તરાધ્યયન મૂળ પાઠ ૭ શ્રી દશકાલીક મૂળપાઠ ૮. શ્રી બૃહતકલ્પ મૂળપાટ આ સૂત્રો ઇંગ્રેજી કૂટનેટવાળા શ્રી હરમન જેકોબી સાહેબે સુધારેલા છે ભુજ ન રહી છે. તાકીદ મંગાવો. તે સિવાય -- - r - -- -- ૧. શ્રી નરચંદ્ર જન તિષ બીજી આવૃત્તિ ઘણાજ સુધારા વધારા સાથે બહાર પડેલ છે. કીંમત ૨. શ્રી ઉપદેશ સાગર ૩. શ્રી સુબોધ જૈન સ્તુતિ ૪. રકારનો નકશે .. ૫. શ્રી લક્ષ્મીદવી યંત્રને નકશે (સમજણ સાથે) ૧–૪– دستہ - ૦ પુસ્તક મંગાવવાનાં ઠેકાણાં– ૩ ત્રીવનદાસ રૂગનાથદાસ શાહ- આકાશે કુવાની પોળ–અમદાવાદ, ૧ ડૉ. જીવરાજ ઘેલાભાઈ દોશી. હા. સંઘવી મેહનલાલ પ્રાગજી. નવા દરવાજ અમદાવાદ ૨ સંઘવી વાડીલાલ કાકુભાઈ સારંગપુર, તળીઆની પળ-અમદાવાદ, ૪ ભાવસાર જમનાદાસ ઈશ્વરદાસ, વસે. (નડીઆદ,) આ પુસ્તકનો અંદરનો ભાગ શ્રી પ્રવાહીના પ્રીન્ટને પ્રેમ શાહપુર-અમદાવાદમાં પટેલ ડાહ્યાભાઈ ધપતરામે શા. -: [ -
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