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Apne Paraye

Rachna Prakash · 2011/03

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अपने-पराए सामाजिक उपन्यास

रचना प्रकाश
IBLEK1222
अपने पराये
thehie

अपने पराये
रचना प्रकाश
नालन्दा प्रकाशन, नई दिल्ली-110030

संस्करण
प्रथम 1991
मूल्य
5500
पचपन रुपये मात्र
प्रवाशक
नालन्दा प्रकाशन
33/1 महरौली नई दिल्ली-110030
साकेत फोटो टाइपसेटर्स
द्वारा
ताज प्रेस मायापुरी नई दिल्ली
कॉपीराइट सुरक्षित

M.VI- अपनी-बात वैज्ञानिक युग में भी आम आदमी के विचार पुरानी सीमा रेखा को पार नहीं कर पाये। उसकी सोच ने आज भी प्रगति नहीं की है। वह अभी भी धर्म व अपने-पराये के मकडी-जाल में जकडा हुआ है। यदि कोई अनवर और माधो जैसे होंगे भी तो इतनी कम सख्या में जिनको कुछ भी कहने व करने का अधिकार मिला ही नहीं है। औरत की पीडाये स्थायी रूप में आज भी मर्द के जुल्म का शिकार बनी हुई है। जिस पर गरीबी का वार होने से वह औरत न रह कर एक मर्द की गुलाम व उस के हाथों की कठपुतली होकर रह जाती है। "निर्धनता वेश्यापन से भी अधिक जुल्म बन कर रह जाती है। जिस कारण औरत न जी पाती है और न भर ही। "अपने-पराए" जीवन सत्य के रगमव पर मेरी यह रचना अपने उन सभी पाठकों से अवश्य सहयोग लेगी जिन की नजरी ने इस नये सत्य को पढा देखा सुना और भोगा भी होगा । मैं मानती हूँ कि धर्म ऊँच-नीच सब प्रेम-स्नेह से कहीं नीचे है। सव्या मित्र सासारिक बस्ती में सबसे अधिक बहुमूल्य-रिश्तों में रिश्ता और नातों में नाता है। मुझे लिखने का शौक तो ईश्वर ने शायद घुट्टी में ही दे दिया था और लिखने की प्रेरणा स्कूली दिनों से ही मिल गई थी। मेरी पहली छोटी कहानी "वाईट हाउस' नाम से मैने सातवीं कक्षा में पढ़ते समय लिखी जो मेरी मातृ-भाषा "पंजाबी" में थी। उस के छप जाने से ही मैं सही अर्थों में, आगे लिखने का साहस करने लगी। फिर मैने "पजायों में अनेक कहानियों लिखी जो लगातार छपती गई किन्तु शीघ्र ही कहानी के विचार उपन्यास में फैल गये और मैन लगभग नौ उपन्यास "पजाबी में ही लिखे जो यथासमय छप।

इस प्रकार मैं अपनी मातृ-भाषा की आभारी हूँ जिस ने मुझ काम से जोड़ कर लेखिका बना दिया। साहित्य से मुझे शुरु से ही विशेष स्नेह रहा है। जिस के फलस्वरुप मैने पजाबी भाषा के लिए ससार प्रसिद्ध महान् व्यक्तियों की जीवन रेखायें व ससार प्रसिद्ध कथायें की भी दो पुस्तक लिखी हैं जो शीघ्र ही पजाबी अकादमी व पजाबी भाषा विभाग से छप रही है। फिर दिल्लीवासी होने के नाते और उर्दू शायरी की शौकीन हाने पर अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति मैं अपना कर्तव्य कभी नही भूली थी किन्तु इस भाषा तक पहुँचकर उपन्यास लिखना तभी सम्भव हुआ जब मातृ-भाषा में लिखने से मुझे लेखिका होने का सर्वत्र अवसर मिला। आज मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि मैं अपनी राष्ट्र-भाषा के प्रति सेवा कर पा रही हूँ, अपने इस प्रथम उपन्यास अपने-पराए को ले कर जो मेरे प्रिय पाठकों की नजरों की भेंट है। मैं आशा करती हूँ आज स मेरे और मेर पाठकों के बीच का सम्बन्ध सदा-सदा के लिये बना रहगा। --रचना प्रकाश यह ससार एक सब से बडी बसती है। जिसमे प्राणी अपने दुखो-सुखो का लेखा देने आते है । वह लेखा कोई हस कर देता है, तो कोई रो कर । करमो का क्षेत्र किसी भी कुरुक्षेत्र से कम नहीं होता । सासों का भरा प्याला हर प्रकार के खट्टे-मीठे स्वादो का चलन अवश्य करता है । जीवन नाम ही कुछ इन स्वादो का है। एक छोटी सी बसती अपने काफी पुराने रूप में दिल्ली के मोतीयाखान से थोडी दूरी पर बसी हुई थी। जिसकी विशेषता यह थी कि वह बडे शहर से कटी-सी थी और जिसकी देख भाल अयोग्य रीति से की जाती थी । इसमे कोई भी नया व्यक्ति आ कर इस के अनुचित रास्तों का अनुभव अवश्य केरता। सबसे पहली मोहर इस पर लगी-गदी नालियों की । जिनमें पानी व कूडा-करकट रुका रह कर अपनी बदबू फैलाता । फिर आगे जाने के कच्चे व कम चौडे रास्ते भी यह बता रहे थे कि यहा पुराने समय से आ रही रीति बदली नहीं गई थी। इस बस्ती मे बहुत समय से एक ही प्रकार के लोग रहते ये । और वह प्रकार या गरीबी का जिसके कारण इस बस्ती में कोई परिवर्तन नहीं आ पाया था। । 7 यहा चारो ओर वही पुरानी नालिया कचडे और लोगों के वही पुराने काम । कोई लुहार था तो कोई दर्जी । कोई पीजा था तो कोई कसाई आदि आदि । यदि आज के समय कोई थोडा बहुत परिवर्तन रहा भी होगा तो वह यह है कि पहले सब झोपडीये और कच्ची कोठरिया थीं, जो आज पक्की ईटों के एक-एक कमरे व बरामदे रहे होंगे। इस बस्ती का नाम भी बस बसती ही था। जिसमे कुल मिला कर पचीस या तीस घर ही रहे होगे । जिनमे से कुछ तो पता नही कब के थे, और कुछ देश के बटवारे के पश्चात् ही बने थे और जिनमे लगभग सब ही हिन्दू थे। के मुसलमान लोगो मे पीजे थे कुछ जुलाहे व बाकी कसाई होगे । जिनका बहुत समय से चला आ रहा मुखिया अनवर खान ही था । इस बसती मे प्रवेश करते ही अजनबी को एक और अजीब चीज देखने को मिलती थी और वह थी कच्चे मास की अजीव बदबू व नगे जानवरो के मृत शरीर जो हाथ के ठेलो मे रखकर इधर से उधर व उधर से इधर पहुँचाये जाते थे । सही शब्दो मे इस बसती का एक हिस्सा मास की मडी था । जहा जानवरों को जीवित लाया जाता और मुरदा भेज दिया जाता यही कारण था कि इस हिस्से मे लहू ही फैला रहता । ओक प्रकार की मक्खिया भी भिनभिनाती रहतीं साथ ही साथ जगली कुतो की दावत हुई रहती थी। आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि यहा के सब से बडे कसाई अनवर खाा का हर कोई नाम जानता व उसकी बात मानता था । असली अर्थों मे वह सबका भाई रहा होगा। अनवर का अपना बड़ा परिवार तो नही या । एक वह स्वय था और एक उसकी पत्नी जिसका नाम था सलमा बेगम । ईश्वर ने इन्हे अपनी कोई औलाद तो दी नहीं थी । विवाह के एक वर्ष बाद ही डॉक्टर व हकीमो ने इन्हे यह कहकर सदा के लिए निराश कर दिया था कि सलमा कभी मा नहीं बन सकती । उस समय ये दोनो ही जवान थे । जीवन भर की निराशा इतनी आसानी से लेकर वह चुप भी तो नही बैठ सकते थे। क्योकि जीवा निराशा । 8 का नाम नहीं, और अनदर को उसकी दो-दो जवान सालियों के रिश्ते भी तुरन्त मिले यदि वह चाहता तो दोनों से एक ही समय पर विवाह कर सकता या । उसके धर्म मे कोई रोक भी नहीं थी । और सलमा भी चाहती थी कि अपने पति को बच्चो का पिता देख पाये । किन्तु यह स्वय अनवर ही था जो नहीं माना पा । वह तो अल्ला' की रजा को ही सबसे बड़ा मानता था। सलमा के बहुत जोर लगाने पर भी उसने उसकी एक नहीं मानी और कहा- "बेगम । अगर खुदा को मन्जूर होता तो मुझे तुम से ही औलाद मिल सकती थी फिर क्यो दूसरी शादी करें जब भरोसा नहीं कि औलाद होगी भी या नहीं। कुछ लोग अपनी ही किस्म के होते है इस अनवर की तरह जो केवल औरों के लिए जीते है । फिर ऐसे लोग ही फरिश्ते कहलवाते है । जो जीवन का सही अर्थ जानते है । औरों के कष्ट व उलझने काटने मे पूरा जीवन ही अर्पण कर देते है । वह कोई साधारण मनुष्य नहीं होते । अनवर भी ठीक ऐसा ही व्यक्ति था जो कसाई हो कर भी काजी-सा दिल रखता था । सच मे उसे अपना पेशा मन से पसन्द भी नही था । वह केवल एक बाप-दादों के समय से चली आ रही इस रीति व रस्म के रिश्ते को खीचे चला जा रहा था । और मन ही मन उसने यह भी ठान लिया था कि अगर खुदा ने उसे लडका दे भी दिया तो वह उसे कभी कसाई नही बनायेगा ! न चाहने पर भी वह यह काम सर्वत्र स्वय करता चला जा रहा था करता ही चला जा रहा या शायद अपने मरहूम अब्बा हजूर का हुक्म मानने के लिये । उसके अब्बा रहीम खाँ ।। अपने दूंचे के जाने माने कसाई थे जिनके हाथों से कटा गोश्त दूर-दूर चादनी चौक के नवाबों की खुराक हुआ करता था। रहीम खाँ भी एक दयालु स्वभाव का व्यक्ति था । इसने देश के बटवारे के समय आये हिन्दू शरणार्थियो की भारी सेवा की थी । एक बनवारी लाल हिन्दू व्यक्ति को तो इसने हृदय से जीवन मित्र स्वीकार कर लिया था । धामा के पश्चात् उसकी मित्रता का स्नेह उनके लडको को चला आया था । बस कुछ इसी शिक्षा ने ही अनवर को मजहब व धर्म से कही ऊँचा उठा दिया था । वह इन्सानियत को ही प्रथम धर्म 9 उत्पन्न मानने लगा या । विचारपूर्वक वह जीवन के पथ पर चल रहा था। वैसे भी वह ईश्वरवादी मनुष्य था । और यही उसका प्रमाण भी पा कि वह सही अर्थों मे हरमन पियारा व्यक्ति या । इस प्रकार वह अपनी अहाईयो से तो किसी भी शिल्पकार कलाकार या भारीगर को मात करता या । मानो वह भलाई के हिडोले में बचपन से आज तक झूलता रहा था। शराब,जुआ या किसी प्रकार का ऐब भी तो उसके पास नही फटक पाया था। उसका जीवन सही अर्थों मे जीवन था । हर कोई उसकी इज्जत करता उसे वह वृक्ष मानता जिसके नीचे दुखो व गमा से थका हारा मुसाफिर बैठ कर दो पल चैन के गुजार सकता हो। अनवर के मन में कभी देश धर्म अपने पराये की कोई बात नहीं हुई थी । यही कारण भी था कि उसका जान से भी प्यारा मित्र जो उसी बस्ती मे छोटी-सी दुकान चलाता मा । हिन्दू ही था। जिसके साथ अनवर खेला-पला व बड़ा हुआ। और वह मित्र जिसका नाम माधो या उसके अब्बा के मित्र बनवारी लाल की ही इकलौती औलाद या जिनकी दोस्ती पर लोग हैरान थे और उन दोनो की दोस्ती की कस्मे खाते थे। लागा का क्या है जा मुह मे आया वही कह दिया । जैसे, लोग तो यहाँ तक भी कहते थे कि एक म्यान मे दो तलवारे । असल में वह तलवारे तो थी ही नहीं वह तो सच्चे मित्र थे । किन्तु हाँ देखने व सुनने मे इनके भित्र-भित धर्म अदक्ष्य में ही तलवारे कही भी जा सकती है । जैसा कि इतिहास के पने कहते है। सही अर्थो मे वह तो स्वय झुक कर एक दूसरे को अमर उठा रहे थे। उनके स्वभावो मे भी अपसी समझौताया। वह एक ही डोर मे बधे हुऐ पे यदि न होते तो जीवन भर साथ निभाने का प्रश्न ही कहा उठता था मला' फिर सोने पर सुहागे की बात तो यह भी थी कि उन दोनो की पलिया भी आपस मे यूं मिली जुली थी मानो एक ही माँ की बेटिया हो । यही कारण था कि वे चारों ही अपने पुत्र मुरली के साथ दोनो धर्मों की इज्जत करते थे जैसा कि एक दूसरे के त्यौहारों में हिस्सा लेते । अनदर द सलमा भी होली मे रगो 10 से खेलते-दीवाली में दीये जलाते । लोडी को आग जला कर आग तापते आदि-आदि । इधर माधो द सीता भी अरफ व ईद के दिनो मे रोजो के दिनो में इस मित्र परिवार सहित मसजिद मे जाते । वे चारो जीव वर्तमान काल में रह रहे थे । भविष्य का स्वप्न देख रहे थे तथा भूत काल के समय को लपेटे हुये थे। उनको एक दूसरे पर गर्व था कि वह एक दूसरे के मित्र है। सबसे बड़ी बात तो यह भी थी कि अनवर न माधो सबके काम आते थे। उनका जीवन केवल एक दूसरे को सहारा देने तक ही सीमित नही या । जैसे बसती तो क्या अब जान पहचान के बाहर वाले लोग भी अनवर से अनेक बार उधार मागने आ जाते । जब भी उसके पास पैसा होता तो वह कभी इकार नहीं करता था । उसकी अपनी ही बसती के मुसलमान भाई तो अपनी बेटियो की शादियों के लिये अनवर से ही पैसे उधार लिया करते थे । बल्कि एक जुलाहा व एक पीजा तो अत समय तक भी अनवर के पैसे नहीं लौटा पाये थे । और उसकी कठिनाई का अहसास करते हुये अनवर ने तो उन दोनो को स्पष्ट भाव से कहा भी था- "अपने मन पर बोझ न रखो मेरे भाई कभी भी नहीं दे पाओगे तो न सही । तुम्हारी बेटियों मेरी भी तो बेटियाँ है । क्या मुझे उनके विदाहो पर कुछ खर्चने का अधिकार नहीं है ?" दे जब अनवर के पाव पर गिरकर धन्यवाद की भावना जाहिर करते तो वह उन्हें उठा कर अपने गले लगा कर कहता- 'अरे अरे यह क्या कर रहे हो मुझे भाई का रिश्ता भी न निभाने दोगे।" तव उन लोगो की आखो मे आँसू भर आते और वे कहते 'आप हमारे लिये फरिश्ता हो अनदर मियाँ । खुदा आपको सदा बनाये रखे । हम गरीबो पर आपका साया बना रहे ।" जीवन मे बात भी कुछ ऐसी है रिश्ते-नाते-सवध है ही तो सब गरजों के । यदि मनुष्य को एक दूसरे से गर्न न हो तो कभी न बचाते हो भी तो नही सकते। । J माधो का भी ठीक यही हाल था । लोग बस्ती वाले उसकी छोटी-सी दुकान पर से अनेको बार उधार ले जाते कई तो समय पर पूरा लौटा भी न पाते । जैसे गरीब पारो नाम की स्त्री थी जो पति के होते भी अक्सर उधार ले जाती और पति के मरने के बाद तो लेती ही उधार थी। पैसे तो वह दो या तीन महीनो के पश्चात् ही दे पाती थी । जब उसे नौकरी व मेहनत मजदूरी के पैसे मिलते । माधो ने भी एक बार भी ऐसे मजबूर लोगो को कभी दुखी नहीं किया था। हालांकि वह कोई अमीर साहूकार तो या नहीं । फिर भी एक निर्धन होने के नाते उसका हृदय अमीर था । अमीर भी तो सही अर्थों मे वही होता है जिसका हृदय अमीर हो । अनवर ने भी तो कभी सूद पर उधार नहीं दिया था। वह तो उधार देता था दूसरे की मजबूरी बेबसी पर दया करके । ऐसे कुछ ही गिनती के व्यक्ति होते है जो निजी लाभ को त्याग कर औरो के काम आते है। ये दोनो मित्र इसी लिये उपकार नहीं करते थे कि उसके अपने परिवार बहुत छोटे थे और यह मान लिया जाये कि यदि वह औरो पर पैसे न भी बचेंगे तो क्या करेंगे। सच तो यह था कि वे दोनों ही दयालु स्वभाव के थे । अच्छाईयों का वर्णन लम्बे शब्दो मे कहने की आवश्यकता नहीं हुआ करती । हर व्यक्ति ही अपने हृदय की तह से तो अच्छा कर्म ही करना चाहता है-किन्तु वह ही अच्छा कर पाता है जो सही व अच्छा होने का मार्ग जानता है। और वही ही अच्छा जानता भी है जो अच्छ सोचता है जो अच्छाई को मानता है, वही अपने पर ग्रहण भी करता है जैसे कि केवल खा लेना ही मतलब नहीं रखता खा कर उसे हजम कर लेना सही मतलब रखता है। कई लोग तो कुर्वानी व बलिदान को आत्महत्या का भी नाम देते है । पर वास्तव में यह ठीक नहीं है । बलिदान तो तपस्या होती है-फिर औरों के लिए स्वय मराा कोई आत्महत्या नहीं हुआ करती । यह तो विराग से चिराग चलाने की बात होती है । जो बहुत कम लोग ही तो समझ पाते है-कहावत भी बनी हुई है- चिडियों की मौत पर गदार व्यक्ति हैसा करते है। 12 बस ऐसा है हमारा समाज जो हम से ही बना है हमारे लिये ही बना है और हमारी ही चिन्ता और परेशानी का कारण बना हुआ है । समाज की सबसे बड़ी समस्या है गरीबी जो हर जुर्म की माँ होती है । यह बसती भी उसी समाज की एक छोटी सी बसती ही तो थी । जिसमे लोग उधार लेते और फिर लौटा भी न पाते । फिर भी जैसे तैसे ही उसके जीवन यापन की गाडी के ये दो पहिए अनवर व मुरली जो खींच रहे थे। तो इस प्रकार अनवर भी अमीर न होते हुए भी हिल के समान स्वभाव से तो अमीरो मे ही गिना जाता था । हर मनुष्य के अपने कर्म ही तो है जो उसे अच्छा या बुरा सिद्ध करते है । बुरा होना इस लिए आगन व सरल है, कि यह एक सस्ता सौदा भी है जो बहुत शीघ्र ही मनुष्य को तोड देता है किसी काच के गिलास के समान । और अच्छा होना इसलिए महगा व कठिन होता है कि यह चटटान के समान पक्का हाता है जो आसानी व सरलता से टूट भी नहीं पाता। अनवर माधो भी तो चटटान के समान ही थे-जो टूट नहीं सकते थे उनके जाने के पश्चात् भी उनकी भलाईयाँ जीवत रहेंगी और खडी ही रहेगी। - उसी बसती में कुछ हिन्दू परिवारों में सबसे अधिक जाना माना परिवार या माधो का जो अधिक जाना ही जाता था अनवर के कारण । वह उसका बचपन का मित्र जो था, जवानी का दोस्त या, और अब आधी उमर मे तो भाई से भी बढकर हो गया था। माधो पतला लबा गोरा और तीखे नैनों नक्शो वाला था। अनवर उससे कद में कहीं लबा, गोरा और थोडे मोटे नैन नक्श का व जिस्म में भी कुछ तगडा ही था । माधो का भी कोई बड़ा परिवार तो नहीं या एक वह स्वय था एक उसकी पली सीता और तीसरा उसकी इकलौती औलाद 'मुरली' था जो सच मे चारों का पुत्र था । वह बालक 13 जन्मष्टमी के दिन पैदा हुआ था शायद तभी उसका नाम "मुरली" रखा गया होगा । फिर उसके पैदा होने पर जहाँ मन्दिर मे जाकर भगवान जी के चरण स्पर्श किए गये वही अनवर और सलमा ने जामा मस्जिद जा कर खुदा की बन्दगी भी की थी । इस प्रकार ये दो परिवार 'मुरली" के आने से और अधिक एक होकर रह रहे थे । मन ही मन अनवर को सबर-सा हो गया था कि खुदा ने उसे औलाद मुरली" के रूप मे दी है । फिर मुरली भी तो चारों को समान ही मानता था । यही कारण था कि वह बचपन से ही अनवर को अब्बा और सलमा को अम्मी कहता था । लोग इन दोस्तो पर हैरान ये जिनको धर्म की परवाह न थी । प्रेम ही उनका धर्म था । अनवर और माधो के दो-दो कमरों एक-एक रसोई घर व एक एक बरामदे का एक से ही घर थे । एक दूसरे के आमने-सामने जिससे वह हर समय एक दूसरे की नजरो के सामने रहते थे । सही अर्थों मे वह एक दूसरे जीवन बेडी के मल्लाह थे। जब देश का बटवारा हुआ था तो अनेक मुसलमान परिवार हिन्दूस्तान छोडकर चले गये थे। बसती से भी चार परिवार जाने लगे तो अनवर के अब्बा ने उन्हे रोका था । वह रुके तो नही थे किन्तु उसको भी जाने के लिए जोर देने लगे थे। तो अनवर के अब्बा ने उन सबसे कहा या माई जान । अपना घर छोड़कर जाना समझदारी नही हुआ करती। तुम इस धरती पर पैदा हुये हो । बढे हुये हो और आज इसको ही अपनी माँ मान कर जाना तो ऐसा लग रहा है मानो तुम अपनी ही अम्मी की गोद से उठ कर जा रहे हो और कह रहे हो यह तुम्हारी अम्मी थी ही कब-इन्सान का सबसे बड़ा धर्म इन्सानियत होता है-पुदा ने तो सब बन्दे एक से ही पैदा किये है । हम ही उनको धर्मों देशों मे बाट कर दूर कर रहे है।' मगर फिर भी वे अनवर को छोड़ कर चले गये। 14 यह दिन भी देखे थे बचपन मे अनवर और माधो ने। जिन की मोहर छप कर आज तक उनके मनो की किताबो मे लगी साफ-साफ नजर आ रही थी। माधो का कारोबार उसकी वही एक छोटी सी दुकान थी। जिसमे बैठकर वह नमक मिर्च व आटा दाल बेचा करता था। उसकी पत्नी सीता लोगों से ऊन ला-ला कर उनके स्वेटर बुनती और इधर सलमा लडकियों व दुल्हनों की हथेलियों पर मेहदी लगाने का काम करती थी । बस इन दो परिवारो के चारो जीव कामो मे जुटे हुये थे । और मुरली उसको एक जगह शहर के स्कूल मे पढने डाल दिया था। आगे वह चारो ही मिलकर बच्चे को ऊँची विद्या प्राप्त कराने के स्वप्न देख रहे थे। उसे बड़ा अफसर बनाने को रात दिन मेहनते कर रहे थे । यही बस नहीं उनके विचार तो आकाश की बुलदियाँ देख रहे थे। जैसे कि वह चाहते थे अपने मुरली का विवाह किसी मुसलमान परिवार में करेगे । जहाँ के धर्म की दूरी भी दोनो परिवार के लिये सदा के लिए मिट जाये । शायद वह समय भले समय रहे होंगे । जबकि मनुष्य एसा सोच सकता था ऐसी आशा रख सकता था । तब धर्मों की दरारें इतनी गहरीन रही होगी कि भरी ही न जा सके। मुरली माधो व अनवर का साझा पुत्र सा होकर रह गया था । मुरली का अपना बचपन भी अधिक समय तक एक मुसलमान लडकी से खेलते ही गुजरा था । और वह लडकी थी 'बानो' । जो सलमा की सगी छोटी बहिन की इकलौती औलाद यी । जिसके माँ बाप तो शुरू से ही लाहौर पाकिस्तान में रहते थे, किन्तु यह बच्ची अपनी अम्मी के साथ बहुत बार हिन्दुस्तान आती और कई-कई महीने पहले भी अपनी मासी जिसे वह "खालाअम्मी कहा करती, के पास रहा करती यूँ इसकी जान पहचान बचपन से ही मुरली से हुई थी। सलमा की बहिन हमीदा को दूसरे बच्चे की आस भी थी उन दिनी । किन्तु विधाता को मानो यह मन्जूर न था और सातवे मास में उसका गर्भ 15 । जाता रहा था, जो कहते है कि लडका ही था । उधर उस के मियाँ ने इराक जा कर दूसरी शादी कर ली थी। तो इस प्रकार हमीदा अकेली रह गई थी। और अपनी बेटी को सलमा आपा के यहाँ से ले गई थी। नहीं तो हो सकता था कि वह बानो को अनवर भाई व सलमा आपा की गोद में ही डाल देती। इस प्रकार बानो सदा-सदा के लिए हिन्दुस्तान ही रह पाती । किन्तु अब बात और थी वैसे भी बानो जवान हो रही थी उसको छोडना अब उसकी अम्मी ठीक भी नही समझती थी। यदि छोडती तो बानो के पिता से उसे खर्चा भी कम मिलता तो यह सब बातो के कारण बानो भी लाहौर चली गई थी। फिर भी वह लोग एक-एक महीना आ कर तो रुकते कि जो सलमा को भी सहारा बना रहे। सच्चे मित्र एक प्रकार से एक दूसरे के लिए नाव होते है जो एक दूसरे को ससार के दुखो-सुखों के गहरे पानी मे डूबने से बचाते है। ठीक यूँ ही तो अनवर व माधो एक दूसरे से किये थे । एक सम्बन्धी तो मानो बने बनाये मिलते है किन्तु मित्र तो अपना सब कुछ देकर प्राप्त होता है । दुखों में मित्र का सहारा ही तो मनुष्य की रक्षा करता है । उसे टूटने नहीं देता । नहीं तो शायद आदमी कभी का टूट जाये । यह बात दोनो ही भली भाति जानते थे कि लहू का रिश्ता केवल सम्बन्ध का रिश्ता होता है किन्तु दोस्ती का रिश्ता ही असली और सच्चा रिश्ता हो सकता है । वह यह सब जानते थे और अनुभव भी कर रहे थे। सलमा की एक और व सबसे बडी बहिन जिनके एक बेटा ही औलाद थी शुरू से लाहौर मे अमीरी ठाठ से रह रही थी। वह तो कभी एक बार भी अपनी छोटी व गरीब बहिन को देखने हिन्दुस्तान नही आई थी । यदि आती भी तो दह कभी इस बसती मे सास भी न ले पाती जो असली और सही अर्यो में तो गरीबो और निर्धनों की ही बसती थी । इस प्रकार ले दे कर अनवर व सलमा की रिश्तेदार तो बस बानो की अम्मी हमीदा ही थी। जिस के वे मन से आभारी भी थे । उसकी बेटी बानो को मानो वे अपनी ही बेटी मानते थे। । । 16 अमीरी व गरीबी मे रात-दिन जैसा अन्तर होता है और अन्तर के होते हुये साथ निभाना बड़ी बात होती है । जैसे सलमा की छोटी बहिन हमीदा फिर भी अपनी निर्धन बहिन को साल में एक बार तो देख ही जाती थी। निर्धनता वैसे तो बेइज्जती की बात नही होती यदि इस मे ऐबो व बुराइयों का विष न घुला हो । ठीक ऐसा ही अर्थ गरीबी का हमीदा भी लेती थी । और यही कारण था कि वह हर वर्ष अपनी गरीब बहिन व बहनोई को मिलने आती । इनको भी वहा अपने घर लाहौर आने पर बहुत जोर देती किन्तु अनवर ही नही मानता या जाने के लिए तो सलमा अकेली क्यूँ जाती । न जाने क्यू मन से अनवर पाकिस्तान जाने तक को नही मानता था । इसका मतलब यह नहीं है कि वह उससे घृणा करता था । घृणा शब्द तो उस के जीवन में कभी आया भी नहीं था। हाँ वह यह मानता था कि उसका देश वही है जहाँ कि वह पैदा हुआ है बड़ा हुआ है। दूसरे देशों के समान वह पाकिस्तान को भी अलग मानता था अपने देश से । साथ ही साथ उससे यह भी बात तो छिपी नही रही थी-कि यदि वह कभी वहाँ जाने का विचार कर भी ले तो अवश्य मे वह यहाँ से कहीं वहा अमीर होगा । उसकी हमीदा आदि लोग अवश्य ही उसे अमीर बनाने में सहायता करेगे । किन्तु वह तो अपने देश की गरीबी को विदेश की अमीरी से बडा व भाग्यशाली मानता था । इसी सोच के मालिक ससार मे अधिक नहीं हुआ करते। मुरली एक सुलझे विचारों का नवयुवक था । जिसका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ और सही शिक्षा मुसलमान परिवार के अनदर अबू से मिली थी। उसको स्वयं कभी अपनी गरीबी से शिकायत नहीं हुई थी और न ही अपनी मजबूरी से कभी कोई गिला भी । वह अनवर के कदमों पर चलता या और माधो के विचारो से वह सन्तुष्ट या जो भी उसे मिला अपने भाग्य से मिला । वह भली-भांति जान या कि भाग्य एक शीशे के सामान होता है जो ऊचा उठने से अधिक चमकता भी है और सरलता पूर्व टूट भी जाता है। 17 फिर उसने देखा उसके बचपन मे प्रेम की वह चमक नहीं थी जो बडे हो कर उभरी किन्तु यह चमक मानो उसकी अपनी ही चमक-सी बनती जा रही थी। मन-ही-मन उसे यह गम भी तो खाने-सा लगा था-कि बचपन की दोस्त व मित्र वह लडकी जब उससे सदा के लिए दूर हो गई तो क्या होगा। मनुष्य की आवश्यकताए ही तो उस पर भारी पड़ने लगती है। जैसे प्रेम में मिलाप एक सुखद आवश्यकता होती है वह न हो तो जुदाई एक प्रेम रूपी माला की आशाओं के सभी मोती बिखेर देती है। प्रेम किसी रूप में भी क्यूँ न हो यदि वह वफादारी के धागे मे नहीं पिरोया गया तो वह कभी प्रेम हो ही नहीं सकता- वह तो फिर केवल एक अभाव का उबाल मतलब की लालसा या हवस की आग ही होती है। प्रेम शब्द का असली अर्थ अब मुरली जानने लगा था । वह बचपन से ही प्रेम का एक सच्चा रूप अपने ही पिता व अब्बू के बीच जो देखता आया था। ऊपर से सोने पर सुहागे का काम समझाने मे बानो ने किया था। जिसका वह बचपन अब जवानी बन चुका था, जिसकी वह कच्ची समझ पक्की समझदारी का रूप धारण कर चुकी थी। विद्या सबसे पहले घर की दहलीज से ही तो आरभ होती है । और जिसकी मनिल स्कूल व कॉलिज होते है । वैसे भी विद्या का राज उस्ताद ही के पास होता है - चाहे वह घर का हो या पाठशाला का तो ऐसे ही अनवर भी मुरली का प्रथम व घर का उस्ताद व गुरू ही या। माना जाता है कि जिस इमारत की नींव मजबूत हो वह इमारत स्वय भी मजबूत ही मानी जाती है । तो अनवर अपने मित्र के बेटे मुरली की भी वैसी ही नीव था जिसने मजबूत विचारों का मुरली बनाया था। देश के प्रति प्रेम कुर्बानी (बलिदान)भी तो सब उसी गुरू अनवर की देन ही थी जो मुरली को प्रकाशमान करने की सली रोशनी थी। इस प्रकार जहा अनवर ने औरों का भला किया वह अपनों के भी हर तरह काम आया । माधो से मिलकर उसने मुरली को ऊची विद्या दिलवाने के 18 सपने सजोये थे । वे दोनो मित्र हर कीमत पर मुरली को इस धरती पर पड़ी बसती से ऊँचा उठाने के इच्छुक ये । वह कभी भी गरीबी की डोर को मुरली द्वारा लम्बी नही होने देना चाहते थे। वे अपने हाथों अपने समय में ही यह एक सुधार तो करना ही चाहते थे अपने प्रिसे मिटे समान से जो कि उनके वश मे भी था करना। - - तीन बचपन से जवानी तक इकट्ठे एक ही राहपालना जीवन से प्रेम अर्पण कर ही देता है । ऐसा ही मुरली और बानो के जीवन में भी हुआ था । बडे हो कर उन्हें एक दूसरे से प्रेम अनुभव होने लगा । आज भी उन दोनों को बचपन की वह बात भूल न पाई थी जब एक बार उनकी बसती में कोई बायत आई थी। जिसे देख कर छोटी सी बानो ने सीधे भाव से मुरली से पूछा था। "मुरली ' यह दूल्हा घोडे पर क्यो बैठ कर आया है ? क्या चल नहीं सकता ? " मुरली ने बताया था- " नही ऐसा नहीं है यह दूल्हा हिन्दू है और इन मे ऐसा ही विवाह होता है । 'क्या सब दिवाह एक से नहीं हो हा, हो सकते है यदि सब धर्म देश और लोग एक हो जाये । " बानो का विचार था सब लोग रस्म-रिवाज एक होने चाहिये। ज्यो-ज्यो वे बड़े होते गये उन्हे जान पडता गया कि वह स्वय भी अलग-अलग है और नदी के किनारो के सामान ही तो है जो कभी मिल नहीं पाते । किन्तु प्रेम का रिश्ता जिस्मों का रिश्ता नहीं होता । यह तो मन व आत्मा का रिश्ता होता है । जो आसानी से कभी टूट नहीं पाता । प्रेम में विश्वास और निश्चय अटल हाता है । अब मुरली और बानो के बीच भी नया रिश्ता कायम हो चुका था। वे मोच की मंजिल पर एक साथ चल रहे थे। आज उन दोनों की आशाये द निराशाये एक हो चुकी थी। सकते?" 19 वे तो बचपन की कन्वी सोच से ही एक दूसरे को अपना मान चुके थे। उन्हे आज भी वे सब बातें याद है जब वे केवल अकेले आपस में खेलने में ही जीवन का सही आगन्द माना करते थे। बसती की एक और छोटी हिन्दू लड़की पारी की बेटी गौरी जब भी इन से खेलने आती तो वह कितनी आसानी से उसे भगा देया करते थे। और मुरली ने उसे एक बार कहा भी था। हम नही खेलते मि से । उसने पूछ या। क्यू ? तो मुरली का सरल उत्तर था । हमारी मरजी'। फिर जब वह नही हटी ता बानो ने उसे हल्का-सा धक्का देते हुए कहा था। भाग जा । हम नही खेलते किसी भी और के साय, बार-बार क्यो चली आती है। और वह वहा से रोती रोती अपनी निर्धन मा पारो की गोद में जा छिमी थी । जहा से उसे ममता की सच्ची सहानुभूति यह कहते हुये मिली थी। ना खिलाने दो बेटी । क्या रखा है खेलने में । चलो काम करो-- आओ तुम्हे मै कसीदा निकालना सिखाऊ । तुम्हारा कौन-सा पिता बैठा है जो काम नही करोगी । हम दोनो को तो काम करके ही पेट भरना है। गौरी के छोटे से दिमाग में मा की बात आ गई थी और वह उसी दिन से सचमुच कसीदा निकालने लगी थी। एक छोटा सा रूमाल उस ने बड़ी मेहनत से बनाया था। इस प्रकार प्रेम की मीठी सुगन्ध उन दानों की जीवन फुलवारी मे महक रही पी । जब बानो पाकिस्तान लौट आती तो मुरली को खेलना अच्छ नहीं 20 लगा करता था । वह दिन भर पढता ही रहता । शायद यही कारण भी होगा कि वह अपनी स्कूल की पढाई में बहुत अच्छा चला आ रहा था। उस ने दसवीं भी अब्बल दर्जे मे पास की थी। उस के चारो मा बाप बहुत प्रसन्न थे। उन को अपने सपनों की सुन्दरता निखरती नजर आ रही थी। मुरली बानो के जाने के बाद भी किसी और बच्चे से नही खेला करता था । उस के जीवन के चारों ओर मानो विधाता ने केवल बानो का ही नाम लिख डाला था। अनवर भली भाति जानता था कि बानो भी केवल मुरली को ही अपना मित्र मानती है । उधर भाधा भी बाना को मुरली की भाति ही प्यार करता था। सचमुच सब को बानो बहुत अच्छी लगती थी । यदि रेखाये उन चारो के वश मे होती तो बानो को कभी भी वह सदा के लिये अपने से दूर ना भेजते । फिर जाने से पहले मुरली ने बानो से कहा था। 'बानो क्या तुम अभी और नही रुक सकती 'अम्मी नहीं मानती कहती है बहुत दिन हो गये आये हुये अब जाना ही होगा। "तो जाने दो अम्मी को तुम तो रुक जाओ सलमा अम्मी के पास । ' अम्मी मुझे छोड कर अकेली हो जायेगी । अब मुरली ने साहस करके कह डाला-' और जब तुम्हारा विवाह हो जायेगा तो क्या तब अम्मी अकेली नही रहेगी भला ।' विवाह का नाम सुनते ही बानो के चेहरे पर लाल-सा रग आया और उस की आखे झुक गई। इस समय न जाने क्यो मुरली को बानो एक प्रकार की कुमुदिनी-सी जान पडी- और उस ने मुसकुराते हुए कहा -- बानो । तुम्हारे जाने के बाद मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता । किसी भी काम मे मन ढग का लगता ही नहीं। हर समय सोचता रहता है कि तुम फिर जल्दी से जल्दी लौट आओ बानो ने कहा- 1 " मेरे जीवन की सीमा भी तो तुम ही हो मुरली मै भी तो तुम्हारे बगैर कुछ ढग का कर नही पाती । मन ही मन सोचती रहती हू कि कब मै फिर आऊ और तुम से मिलू । मुरली की आखो मे एक प्रश्न था जो बानो साफ-साफ पढ सकती थी- और वह प्रश्न था- आगे क्या होगा? कैसे होगा?" और वह दबी आवाज मे बडबडाया- काश ।' उधर बानो भी बडबडाई - , काश - किन्तु उस की इस काश के पीछे क्या था वे जानते थे- तभी तो उन्होने एक दूसरे से पूछा भी नही था । मन की मन से राह होती है । ठीक ही कहा है किसी ने । फिर प्रेम एक वह पूजा है जो दिल को दिल से मिला कर एक कर देती है। फिर भी समय की धारा को कौन रोक पाता है भला? देखते ही देखते मुरली की आखो के सामने उस की बानो अपनी अभी के साथ आगे की तरफ पाकिस्तान लौट गई थी । किन्तु इस बार तो मुरली का मन आगे से कहीं अधिक व्याकुल था। क्योकि वह जानता था, यू ही कभी न कभी बानो सदा के लिये चली जायेगी । वह जीवन के चौराहे पर अकेला घडा उस की राह देखता रहेगा देखता रहेगा, किन्तु वह कभी नहीं लौट पायेगी । क्योंकि देश, धर्म, समाज, उस को निगल लेगे । जबरदस्ती निगल । लेगे। ऐसे विचार जब आते है तो दिल-दिमाग की चट्टानें भी हिलने लगती है । तब धर्म प्रचारक लोग एक धोखली दीवारें लगते है । सब सीमाये तोड़ कर उडने का मन चाहता है चाहे पैरों में बधी जजीरें मा बाप के हार्यों में भी क्यो न हों। 22 तो ठीक ऐसी ही दशा अब मुरली की भी थी। वह अकेला बैठा कई-कई घण्टे ना-जाने क्या-क्या सोचता रहता । अपने विचारो की गुफा के अन्धेरे मे मानो वह किसी देवी का बुत ढूढता हो जो उसे मिल नहीं पा रहा था । वह अपने आप से लड़ता रहता । यह जानते हुये भी कि वह स्वप्न को सच नहीं कर पायेगा यह मनुष्य के बस की बात नही यह तो जो होता है विधाता के हुक्म से ही होता है-रेखाओं के अनुकूल ही होता है। फिर भी जो व्यक्ति अपने आप पर काबू रख सकते है, वे औरो पर भी काबू रख लेते है । मुरली का एकान्त ही उसके जीवन का हिस्सा बन कर रह गया था। चिम्ता सही अर्थों में डर का साया होता है । मुरली को भी मन ही मन हर खाये जा रहा था- बातो के खो जाने का डर अपनी भारी असमर्थता का डर जो उस के अन्दर चिन्ता का रूप धारण किये हुये था । और कहते है चिन्ता चिता के बराबर होती है। चिन्ता ही तो क्रोध व बीमारी की मा होती है। किन्तु लाख न चाहने पर भी मनुष्य अनेक समस्याओं पर चिन्तित होने से बच भी तो नहीं सकता । प्रेम के दामन मे बधी चिन्ता मिलती है मनुष्य को। जिससे न तो वह बच पाता है और न ही उसे सहन ही कर पाता है। पदि मनुष्य कोई वस्तु उत्पन करे तो ही वह कुछ बन भी पाता है। इस प्रकार मुरली के दिमाग में अब कुछ बनने की किरन चमक रही थी वह प्रेम की असफलता मे से अपने नाम की सफलता खोज रहा था । उस के अन्दर बलिदान की भावना किसी चिगारी की भांति दहक रही थी। जिसे वह या बानो पर या फिर देश पर लुटा देना चाहता था । प्रेम करने मे प्रेमी योद्धा के समान होता है, और जग के क्षेत्र मे सिपाही । एक ओर से तो परिणाम स्वीकार कर सकता था किन्तु दोनों ओर से तो नहीं । अकेला बैठा-बैठा वह यही सब तो सोचा करता था कि अब उसे किस ओर किस्मत ले जाती है। यदि ससार मे प्रेम न होता तो करुणा भी न होती और यदि जग न होती तो हार भी नहीं । जीवन हार-जीत का ही नाम है । बागो चल नाचान मानो उस की आधी-हार तो हो ही चुकी थी जिसे वध मन ही मन स्वीकार भी कर चुका था । आदर्श से मनुष्य अपर उठता है - और न ऊचे आदर्श से गिरता है नीचे की ओर । मुरली आसानी से अपने आप को नीचे की ओर तो गिरने भी नहीं देना चाहता था । जिस में किसी शराब की बदबू आए । या जुए का कीचड हो । हालांकि ससार में तो सभी प्रकार के व्यक्ति होते ही हैं बुरे भी और अच्छे भी । यदि ससार में बुरे लोग 7 हो तो उच्च वक्ता के वकील भी नहीं हो सकते और यदि अच्छे व्यक्ति न हों, तो ससार नरक के समान सडने लगे। मुरली के मन पर उस की भावनाओं का बोझ तो अवश्य ही बना हुआ या। जिस की तपस्या का असर दूर अपने ही घर के किनारे पर बैठी पारो की निर्धन बेटी गौरी पर जरूर पड़ ही रहा था वह अकेले बैठे मुरली की वेदना भली-भाति समझ रही थी। किन्तु वह उस का दुख बाटने को असमर्थ थी- यह तो उस बेचारी की मजदूरी व बदकिस्मती ही थी। जवानी अवश्य ही बचपन से समझदार होती है और बुढापा जवानी से कहीं अधिक समझवान । मनुष्य तो भले वही बचपन वाला व्यक्ति होता है । किन्तु समय के फेर । उसे और से और कर दिया होता है । यूही तो यह बचपन वाली गौरी अब समझदार नौजवान लडकी बन चुकी थी। वह अब जीवन पीडियों को भली-भाति जानने लगी थी । यही कारण था कि वह मुरली की पीडा बाटना भी चाहती थी किन्तु प्रश्न था कि उस के अधिकार का जो मुरली उसे नहीं दे रहा था और न ही आगे के लिए कभी देने का उस का विचार ही याऋ । वही प्रेम की परिभाषा स्पष्ट रूप मे जाता या जो जीवन में एक बार एक व्यक्ति से ही किया जाता है । और इस परिभाषा के अनुकूल गौरी तो उस के जीवन में कभी और कहीं भी ठीक और सही बैठती ही नहीं थी। वह गौरी की सभी अच्छाइयो से अनजान भी न था। किन्तु प्रश्न तो भावनाओं का था जो मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन मे अपनी कलाकारी अदा करती है । भावनाओं के बस में मनुष्य बेबस भी हो जाता है । जैसे मुरली और गौरी दोनों ही अपने-अपने स्थान पर थे । वह बीते समय के आधार पर ही तो भविष्य बनाना चाहते थे जिसे करने की आज्ञा उनका 24 । वर्तमान दे नहीं रहा था । दोनो के दुख कितने मिलते-जुलते थे। किन्तु फिर भी एक दूसरे से अलग-थलग पड़े हुए थे । मनुष्य के भाग्य में किसी प्रकार की अपनी मर्जी काम नहीं करती । केवल उसके कर्मों का फल ही काम करता है । हाँ। जज्बाती हो जाने से मनुष्य निर्मल अवश्य हो सकता है, और वह अपनी यह से भटक भी सकता है भविष्य के कर्मों का बीज बोने के लिए। यह सब मुरली करना नहीं चाहता था । क्योंकि वह यह भी कभी नही भूला था कि वह माधो जैसे महान व्यक्ति का बेटा है और अनदर अबू जैसे महान फरिश्ते का भी। मगर हाँ वह जानता था इतना अधिकार तो उसे था ही वह अच्छी बात मे स्वय निर्णय ले सके । यही सब बातो की उलझनो मे फसा मुरली अकेले बैठा-बैठा सोचता रहा और अपने दाये हाय की उगली से धरती की मिटटी कुरेदता रहा । क्योकि घर पर बैठने की उस की इच्छा नहीं रही थी वहा जाते ही हर वसूल हर चीज में उसे बानो - ही बानो दिखाई दे रही थी जो कि वास्तव मे वहा थी ही नही । उस की याद की परछाइयाँ मुरली को चारों ओर से घेरे रहतीं । उसका दिमाग भारी सा होने लगता और वह अपने हृदय पर बोझ अनुभव करने लगता । मुरली के इस खालीपन को तो घर वाले भी अनुभव करने लगे थे। जब वह ढग से पेट भर रोटी न खाता तो उस की प्रिय मा सीता कहती. क्या बात है बेटा । तुम ने तो पूरी रोटी भी नहीं खाई - ? " . बस माँ।। मुरली का रूखा उत्तर होता तो मा फिर बडे ही लाड व प्यार से और रोटी देती हुई कहती - " ले ले बेटा । एक रोटी और ले ले - केवल एक ही रोटी खाने से क्या होगा माँ भगवान ने इस नए ही तो बनाई है कि वह स्वय हर जगह नही हो सकता। । 1 मुरली का उठते समय यह ही उत्तर होता). और भूख नही है माँ ।' .

मा मन ही मन भारी चिन्तित पी । उधर माधो व आवर भी तो देख रहे थे कि उन का प्रिय बेटा किता विवश सा फिरता रहता है । उस बेचारी गऊ के समान जो वास्तव मे अपना ही घर भूले इधर-उधर भटकती फिरती हो-अपने ही घर की तलाश में जो कि उसे मिल नहीं पा रहा था। चार गौरी एक अपने ही किस्म की नौजवान लडकी थी । जिस का जन्म गरीबी की गोद मे हुआ और जवानी बदकिस्मती में गुजरी थी। जब वह केवल तीन वर्ष की थी तो उस का बेकार आवारा शराबी व जुआरी पिता अपनी पत्नी को इतनी बेरहमी से मारता कि वह कई-कई दिन चारपाई से उठ भी न पाती थी । असल मे गौरी के पिता का एक दुरी प्रकार का मित्र होता था जिस का नाम था मगू जो शुरू-शुरू मे तो चाहे रिक्शा चलाता था किन्तु बाद मे वह एक प्रकार का व्यापारी हो गया था । ऐसा व्यापारी जो जिन्दा लाशों को बेचता था । सष्ट अर्थों मे लडकिया नवाबों और अमीरों तक पहुचाता और पैसे लेता । फिर वह भली-भाति जानता था कि पारो सुन्दर व जवान पी-उस की भूस का एक ही इलाज या कि वह विके- और उसके बेकार पति को पैसे मिला करे । किन्तु जब पारो नहीं मानी थी तो उसे धुरी मार सहनी पडती थी। अनेक बार उस अबला के मन मे तो आत्महत्या तक कर लेने की भी आयी । मगर एक छोटी-सी बेटी की गोद ने मा को ऐसा करने से सदा-सदा रोके रखा था। वह जीवित रही तो केवल अपनी बेटी के लिये । पारो का जीवन एक दुखित जीवा रहा था । फिर जब गौरी पाच बरस की हुई तो उस के पिता का इन्तकाल हो गया। बस जब से उस के लिये जो भी या ले देकर एक मा ही तो थी। 26 कोई न कोई शरारत करने से बाज नहीं आता था, मगू जिसे मगू विहारी' के नाम से जाना जाता-या-अभी भी वहा उपा बस्ती में और पारो के घर के सामने ही रहता था। आज जातं जोरो maker m- 8 पारो को मगू बिहारी की कई वर्ष पहले की वह बात कभी नहीं भूली थी जब उस के पति के मरने के बाद माने एक शाम उस की पहरोक क कहा था। " भाभी । क्यू अपनी जवानी बरबाद कर रही हो । अकेली रह कर । वो मर गया तो क्या हुआ - मै तो अभी जिन्दा हूँ। पारो ने लाल-पीली होकर कहा था बकवास बन्द कर कमीने जबान खींच लूगी।" इस पर मगू ने अपने काले रग मे और अधिक चमकते कहा था- 'तू नही समझेगी काम की बात । किसी ने ठीक ही कहा है, घी कभी सीधी उगली से नहीं निकला करता । ना मानना बडा भारी पडेगा तुम्हे । कसम शेरा वाली की । तू तो क्या तेरी लड़की को भी वेश्या बना कर छोडूगा ।" अब पारो तो क्या कोई भी मा यह सहन न कर पाती । और अगले ही पल न जाने उस में कहा से इतना साहस आ गया कि उस ने खेच के एक चपेट मगू के मुह पर मार ही दी। जिस से उस दुष्ट मगू के क्रोध को और भी भडकने का अवसर मिल गया और उस ने कहा- ' तो ठीक है । तू भी क्या याद करेगी कि मगू से पाला पड़ा था।" और वह चला गया । किन्तु उसी पल में गौरी के लिये और खतरा बन गया था। पारो तो अब तक एक पल भी बेटी को अकेला नहीं छोडती थी । पति की मौत के बाद पारो लोगों के बरता माजने और कपडा धोने का काम करने लगी थी। जहा वह काम पर जाती गौरी को साथ ले जाती और साथ ही दापस भी ले आती। वैसे भी सारी बसती में पारो का अपना तो कोई या ही नहीं । ले दे कर वह मुरली की मा सीता के पास जरूर कभी आ बैठती और वहीं से उस की । . 27 पहचान सलमा से भी हुई थी । फिर वहीं गौरी भी मुरली और बानो के साथ खेलने की लालसा करती किन्तु वह दोनों इस को हमेशा भगा देते । क्यों कि वह उमर मे उन दोनो से काफी छोटी थी । बस वह बचपन की पहचान की मोहर जवानी तक गौरी के सीने पर लगी हुई थी। और मन ही मन वह मुरली को बहुत चाहती थी। और मुरली था कि बचपन से जवानी तक कभी भी उस ने गौरी के प्रेम का स्वागत ही किया था। हैरानी की बात तो यह थी कि यह सब होते हुये भी तो गौरी ने कभी किसी प्रकार का असन्तोष नहीं दिखाया था। उसने रोगी हो कर भी कभी अपने रोग के दुख का इजहार नहीं किया था । वह अपने प्रकार की अलग सी लडकी थी।न उस ने कभी किसी प्रकार के आनन्द का अनुभव किया था और न ही कभी आशा ही की थी। वह किसी अजीब मिटटी की बनी थी शायद । अनेक बार वह बानो को मुरली के सग खडे हसते देखती- फिर भी उस के मन मे कभी बानो के प्रति घृणा उत्पन नहीं हुई थी। शायद वह मुरली की हर प्यारी वस्तु को प्यार करती होती। भी हो वह अपनी किस्म की खुद ही थी। अब वह जब भी सीता मौसी के यहा जाती तो उस की नजरे भी उस के मन की भाति मुरली को ही छोजा करती । और जब वह दूर से दिखाई दे जाता तो मानों उसके हृदय का कमल खिल उठता । अब वह बच्ची तो थी नहीं तो जान गई थी कि वह सचमुच मुरली को प्रेम करने लगी थी। क्योंकि यदि मुरली पर नहीं तो उसे अपने आप पर तो पूरा अधिकार था ही कि जिस को चाहे प्रेम करे। उधर मुरली की मा तो गौरी को मन से चाहने लगी थी । इसी कारण शायद उस का पारो से उठना बैठना भी बढता जा वैसे माधो अनवर और सलमा भी तो गौरी को कुछ कम नहीं चाहते । तो इस प्रकार गौरी का स्नेहपूर्दक सम्बन्ध इन सब लोगों से बराबर जुड़ा हुआ था। था। 8 हर मनुष्य का लाभजनक उसका अभाव ही तो होता है। जो दूसरो से जोडता और उसे यश देता है। हर कोई गौरी की अगवानी जरूर करता किन्तु उसके हृदय के सागर की तह तक न जा पाता । जहाँ अनेक प्रकार के गुण भरे हुये थे । जिन मे से सर्वश्रेष्ठ गुण था " कुर्बानी " का । वह वेदना को अपने हसते होठो मे समेट लेती । यहा तक कि बानो भी सही जान न पाई थी कि गौरी मुरली को केवल प्रेम ही नहीं करती, उस की पूजा भी करती थी। इस दुनिया मे कुछ लोग सीपियो के समान भी होते है जो अपनी बुराइया अपने अन्दर ही समेटे रखते है । बलिदान नाम है एक प्रकार की तपस्या का । जो हर एक के भाग्य में नहीं होता । जिन के होता है - वह साधारण व्यक्तियो से ऊपर उठ चुके होते है । बलिदान अमर की माग नही करता । यही क्या कारण था कि गौरी नौजवान लडकी होकर भी बलिदान की भावनाओं से मालामाल थी। बलिदान वही हो सकता है जहाँ सच्चा प्रेम सच्ची लगन हो । जैसे कि गौरी को मुरली से या । वह तो केवल देना जानती थी लेना नहीं। गौरी मुरली के जीवन पर बानो का महत्व जानती थी । उसे कभी भी किसी प्रकार की बानो से जलन व धृणा भी उत्पन नही होती थी। किन्तु साथ-साथ वह यह अवश्य मानती थी-कि जो भी हो दानो उस से कहीं अधिक भाग्यशाली रही-जिसे मुरली का प्रेम मिला और जिस से गौरी खाली व निर्धन थी। पारो गौरी की मा तो थी ही पीडा का पात्र जिसने जीवन में केवल पीडाओं के स्वाद ही चखे ये और वह प्रेम व हर्ष जैसे बडे-बडे शब्दो के तो नाम भी न जाने थी । जब वह स्वय वच्ची थी तो उस के माँ-बाप दोनो ही देश के बटवारे मे पाकिस्तान में मारे गये थे । और पारो को उस की किसी दूर की लगती मौसी ने शरण दी थी । और उस के पूरे जवान होने से पहले ही उस का सौदा एक बूढे व्यक्ति से कर दिया था- जो पारो के पैसे तो दे गया था- किन्तु उसे ले जा भी न पाया था और पहले ही मर गया । अब 29 मौसी ने लड़की के फिर पैसे उठाये इस बार पारो का सौदागर गौरी का पिता कालू था । जो उमर मे पारो से पन्द्रह वर्ष बहा था। जब से पारो कालू की पली बी थी तभी से तो वह मंगू को भी जानने लगी थी। जिस के स्वभाव से ही कालू के मन में पली की सुन्दरता का व्यापार करने की इच्छा प्रकट हुई थी । और पति की यह बात न मानने के कारण ही तो वह सदा मार भी खाती रही। स्त्री का हमारे समाज मे क्या स्थान है ? यह प्रश तो हर कोई जानता है किन्तु इस का उत्तर तो नही जानता । भगवान ने औरत को मर्द के बराबर का ही तो दर्जा दिया था और मान भी लिया जाय तो अवश्य ही मर्द से बढ कर ही । किन्तु औरत ही तो मर्द की जननी है । बहिन है प्रेमिका, पली व बेटी । इस सत्य के चेहरे पर हट की चादर डाल कर मर्द औरत को बराबर मानने को तैयार होता ही नहीं है। ऐसे हाल पारो जैसी निर्मल नारियाँ अपने सरो से करुणा के पखेरू हटा भी तो कैसे सकती है । उन का जीवन तो साधारण होता है । जो उन के लिए अपने अतिम सासों तक चलता रहता है चलता रहता है। विचारियो की बात तो यह होगी कि हमारे समाज में नारी भला कब तक आग की सेज पर सोती रहेगी। अपनी पीडा के वस्त्रो से कब तक अपने नगेपन को ढकती रहेगी ? और एक सराई रूप के समान भला कब तक जोर जुल्म की चक्की में पिसती ही रहेगी ? कौन दिलाएगा इसे रिहाई और मुक्ति और इन सभी प्रश्नो का उत्तर यह समाज ही है। जिसमे अनवर और माधो जैसे लोग भी रहते है , केवल दुख है तो यही कि ऐसे लोग बहुत कम है अभी । केवल दो चार ही- जो ससार की भेड चाल को रोकने का प्रयन तो करते है किन्तु सफल नहीं हो पाते । सिर्फ अपनी कम गिनती के कारण है। जैसे आवर व माधो दोनो ने ही कालू व मगू को जोर से थामा हुआ था नहीं तो वह कभी के बसती की सारी बहू बेटियों को ही बच खाते । उन को भी मन ही मन अनवर और माधो का डर बराबर बना हुआ या ) क्योंकि न . 30 होमर भी ता वह बसती के मुखियो की भाति ही थे। फिर मुखिया किस को माना जाता है - ? जो- अपने असूलो की पूर्ति करता हो । सही रास्ते पर ही चलता हो । जिस की कही बात मे विचार का सन्दर्भ हो । वही तो मुखिया होता है। आज्ञा न मानने वाले तो धुघली शक्ल व शक्ति रखते है । जिन्हे न ता अपनी पहचान होती है और न ही दूसरे की । एसे लोग तो खुदगर्ज होते है- जो जीते है तो अपने लिए और मरते है तो भी अपने लिए । मगू ठीक ऐसा ही तो आदमी था । जो सही माइने मे आदमी हो कर भी जानवर से बदतर था। उस की चपेट मे जो भी निर्बल नारिया आई वह ही निगली भी जा चुकी थी। और उन नारियों का समाज मे स्थान भी समाप्त हो चुका था । वह तो केवल मर्दो के मन बहलाने की कठपुतलियाँ ही बन कर रह चुकी थीं । मही था उन के प्रति समाज का नियम | अब मगू दादा पारो पर भी नजरे जमाये हुए था। पारो का होश या उस की छोटी-जवान आयु व सुन्दरता | अब इस प्रकार तो यह कह देना भी गलत नही होगा कि निर्धनता को सुन्दर होना ही नही चाहिए । यदि जो पारो के समान सुन्दर है भी तो उन्हे कठिन परिणाम भुगतने के लिए तैयार भी होना चाहिए। कितने अजीब रिश्ते है नारी के लिए कि वह किसी रूप भी अपने आप को सुरक्षित पा ही नहीं सकती। जननी होते हुए भी वह मर्द के पैर की जूती ही बनी रहती है । अजीब अन्याय है समाज का नारी पर । और नारी की मजबूरियों पर-1 ।

पाच
"
इस बार जब बानो पाकिस्तान गई थी तो उसका भी मन मुरली की भांति
भारी था । वह जानती थी कि उसकी मा कभी न कभी कोई अच्छा सा लडका
देखकर उसके हाथ पीले कर देगी। फिर स्वय वह यह भी जानती थी कि
उसकी सबसे अधिक जोर देने वाली सईदा खाला थी। जो चाहती थी कि
उसका विवाह अपने बेटे यूसुफ से कर दे।
किन्तु आने से पहले उसकी साला सलमा ने उसे कुछ और ही स्वप्न
दिखाये थे जो कभी पूरे नहीं हो सकते थे वह भी जानती थी । जव एक रात
अकेले में सलमा ने बानो से कुछ यूं कहा था -
बानो । क्या अगर खुदा मुझे एक बेटा नही तो बेटी ही देता ।
उस दिन उसको अपने बाझ होने का दुष बहुत ही सता रहा था । तो
बानो ने बडे लाड से कहा था-
"क्यो खाला अभी
क्या मै आपकी बेटी नहीं हो सकती।'
हो क्यो नही सकती बानो । चाहा तो मैने भी यही था कि तुम
मेरी
बेटी हो जाओ और हमेशा के लिये यहाँ मेरे पास ही रह जाती।"
तो अब रख लो अभी खाला।
कैसे रख लूँ बेटी । बेटिया तो पराया धन होती है।"
बानो ने नीची नजरे करते हुये कहा ।
अम्मी खाला । मै भी तो जाना नही चाहती।'
अब सलमा ने कहा था।
.
काश
।
क्या
1
32

" ot 'यही कि -कि तुम यहीं -इधर की ही दुल्हन हो सकतीं । तो मै तुम्हे रख भी लेती। अब न जाने बानो क्यो शरमाई थी । और सलमा को उसने दबी आवाज मे दो बार कहा था। रख लो अभी खाला । मुझे रख लो। " तो सलमा ने पूअ- अच्छा यह बताओ तुम-तुम्हे मुरली कैसा लगता है ? ' और " मुरली " का नाम आते ही बानो इतनी बुरी तरह उचकी थी मानो उसे किसी ने चोरी करते पकड लिया हो । और झट ही उसने सर झुका कर कहा था। "आई उई अल्ला फिर सलमा ने आगे पूछा " तो हमीदा से बात करू बेटी?" 'हा-हा-हा अभी खाला-करो"। और सचमुच ही पूरा साहस करते हुये सलमा ने हमीदा से अकेले में बात चलाई। हमीदा।। हाँ आपा।" मैं सोचती हूँ अपनी बानो का इधर ही विवाह हो जाता तो अच्छा था। जीवन भर के लिये मै उसे आख से देख पाती।" इधर - क्या कोई अच्छा -अमीर लडका है आपकी निगाह में यहाँ?' हो जायेगा वह भी एक दिन बड़ा आदमी और अमीर भी। कौन ?' 'हमारा मुरली " 10 " । ॥ " ११ - जब " "क्या कहा ? मुरली-?" हा हमीदा ! मै चाहती हूँ-बानो की मुरली से शादी कर दें-।" आपा । यह आप ने सोच भी कैसे लिया? कहा वह कहा हम- और फिर धर्म भी तो एक नहीं। 'मै जानती हूँ । किन्तु दोनो का धर्म एक भी तो हो सकता है बानो हिन्दू जो जाये। बस बस आपा । आप हद से बढ़ती जा रही है । क्योंकि बानो आप की बेटी नहीं तो आपा ने आसानी से ऐसा सोच लिया । अपनी होती तो यह स्वप्न मे भी न सोच पाती।" ' नही हमीदा । अगर बानो मेरी बेटी होती तो मै हस कर उसे हिन्दू बना देती।" हमारा धर्म इतना छोटा व सस्ता नहीं जो बदला जा सके । अगर यही बात है तो मुरली को ही मुसलमान क्यो नहीं बना देती भला हा, उसमे भी तो कोई हर्ज नहीं । किन्तु मै सोचती थी- रिश्तेदारी-लहू का रिश्ता दोस्ती के रिश्ते से बडा होता है- तो तुम जाओगी- किन्तु ।" जो भी हो मुझे यह विलकुल भी मजूर नहीं है।" यू यह बात यहीं रह गई थी। मन ही मन सलमा के दुख के पहाड टूटने लगे थे । उसे अनुभव सा होने लगा कि लहू का रिश्ता एक चली आ रही परम्परा के समान ही है । एक खोखला सच- - किन्तु मन से हर रिश्तेदार खुदगर्ज ही है चाहे वह सगी बहन या भाई ही क्यो न हो । और फिर वह अनवर के आगे फूट-फूट कर रोई थी। अनवर ने पत्नी को धीरज देते हुये कहा था- ' तो क्या हुआ बेगम । हर मा अपने बच्चे का अच्छा ही तो चाहती है। किन्तु सलमा ने फिर भी न जाने क्यो हट की थी कि उसका पति माधो से मुरली के मुसलमान होने की बात चलाये शायद वह मान ही जाये। ? - मान " - 34 अनवर जानता था कि माधो कभी इन्कार नहीं करेगा । फिर भी वह कहना उचित नहीं समझता था । और उसने सलमा को बहलाने के लिए "हा" कह डाली थी। अब एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी। कि मुरली और बानो प्रेम करते ये । अनवर जानता था यदि बात न चलाई तो क्या होगा? किन्तु साथ ही उसे पहले किये वायदे की भी याद आई जब इन चारो ने कभी सोचा था कि वह मुरली का विवाह मुसलमान घराने मे ही करेगे। इस बात से अनवर को आशा हाने लगी कि सब ठीक हो ही जायेगा। अगर हमीदा नही मानती तो सीता तो हट नहीं करेगी । अब वैसे भी जीवन के तजुर्ब से उसे रिश्तेदारो से कहीं अधिक दोस्त पर विश्वास होने लगा था। माधो उसका एक इष्ट मित्र या, जिसे पाने के लिये यदि उसे सब रिश्तेदार भी सदा के लिये छोड़ने पडेगे तो वह इस कर छोड देगा । जैसे कहावत है कि 'हाथी के पाव में सका पाव-'। अनवर इस विषय मे शीघ्र ही माधो से सब बात करने का पूरा विचार बनाये बैठा था। वह इस विषय मे माधो से पहले कही अकेले में बात करना चाहता था। इसी बहाने से वह अपने दोस्त के पास बैठेगा इस बात की भी उसे अधिक खुशी हो रही थी मन ही मन । मित्र के साथ बैठने का हर्ष तो वही जान पाता है, जो मित्र शब्द का सही अर्थ भी जानता हो। मित्र के पास बैठने से जिस प्रकार से मन हल्का व सुखी होता है वह अनेक सगे सवधियों के बीच बैठकर भी नहीं होता । मित्रो के बीच तो कभी कोई आकाक्षाये हुआ ही नहीं करतीं। यदि हों भी तो वह कभी मित्र रह ही नहीं सकते । जीवन की सही पहचान तो मित्रो द्वारा ही होती है। मनुष्य आदतो का पुतला है, और मित्रता तो उसकी आदत ही होती है। किन्तु मित्रता निभानी अलग व और बात होती है। जो हर एक बस का रोग 35 नहीं होता । केवल शब्द बोल लेने से सबका महत्व नहीं होता । उसका सही अर्थ जान लेना ही शब्द को जाना माना जाता है। अनवर माधो को मित्र मानता ही नहीं था बल्कि उसको मित्र अनुभव भी करता था। उसे अपने मित्र पर अन्धविश्वास था कि यदि वह माधो को चिगाढी पकडने को भी कह दे तो वह कभी पीछे नहीं हटेगा। फिर धर्म के प्रति तो माधो के भी वही विचार ये जो अनवर के 1 वे धर्म का आदर करते थे- किन्तु उसे भगवान नहीं मानते थे । भगवान तो स्वय धर्मों से ऊपर है- मुक्त है। बस इसी प्रकार वे दोनो मित्र एक ही साँचे में ढले हुये थे। इस प्रकार यह समस्या बडी अवश्य थी किन्तु कठिन व असभव तो नहीं थी। माधो का बेटा यदि मुसलमान बन भी जाये तो उसके कोई दो-चार भाग घट तो नही जायेगे । वे दोनों ही यह बात मानते थे । उधर कुछ नही बल्कि अधिक व्यक्ति तो हमीदा की भाति होते है । जो अपनी ही रेखा में बन्द रहना धर्म मानते है । यह इसाफ व निर्णय के तराजू में धर्म को डालकर तोलते और मापते रहते है । वह सदा ही अपना धर्म बडा और दूसरों का छोटा मानते है । हमीदा तो सचमुच ही यह किसी शर्त पर नहीं मान सकती कि उसकी बेटी जो मुसलमान का लहू है हिन्दू हो जाए। अब जीवन मे ऐसे लोगों के कारण ही प्रेम को बलि चढाना पडता है । यदि न चढे तो समाज मे उस का दर्जा गिर जाता है । समाज उसे कलकित व घटिया मानने लगता है । अजीव कठिन समस्या है प्रेम की इस धर्म व समाज के बीच कि वह न जी पाता है और न मर ही । यदि समाज और धर्म वालो का बस चले, तो वह प्रेम का नाम ससार से मिटा दें। किन्तु प्रेम एक वह पखेरू की भांति होता है जिसके पख होते है - और वह बस में नहीं किया जा सकता। उधर सलमा की भी तो मानसिक दशा तरस योग्य बनी हुई थी । जबसे उसकी अपनी ही मा-जाई बहिन हमीदा कुछ ऐसा कह गई थी। तो सलमा का मन बहुत दुखी था । उसको तो बार-बार अपने पर ही क्रोध भी आ रहा था कि क्यो वह एक लहकी भी म जन सकी । जिससे आज उसे हमीदा के 36 " बनने कोर शब्द तो न सुनने को मिलते । बानो का हाथ मुरली के लिए माग कर मानो वह हमीदा से कोई भीख माग रही थी। नारी के हृदय मा की लालसा तो शायद ईश्वर ने जन्म से ही भरी है । और जो नारियों को "मा" होने का सौभाग्य नहीं मिलता । तो वह या तो सौतेली होकर रह जाती है या फिर " अहलिया " के बुत बनकर । जो नारी होकर भी पूर्ण नारिया नहीं होती। वास्तव में मरना और पैदा होना तो किसी भी मनुष्य के हाथ में है ही नहीं । तो भला एक नारी के हाय मे " मा " होना कैसे सभव हो सकता है। ऐसा होना तो स्वप्न के समान होता है । जो एक निर्बल जीव कर ही सकता है। ऐसी ही तो इच्छा सलमा भी कर रही थी। वह जानती थी कि जिस बात के लिए वह स्वय जिम्मेवार है ही नहीं किन्तु देह भुगत रही है । वाझ होना तो अपने वश में नहीं हुआ करता । किन्तु इसकी देह तो खुद को ही भुगतनी होती है । बस कुछ इस प्रकार उसे अपने आप पर तरस आने लगा था। वह हमीदा के चले जाने के बाद भी अनेक बार जी भर-भर कर रोती रही थी। रोना तो हर नारी के भाग्य में ही लिखा है। चाहे वह किसी रूप में किसी समय भी क्यो न हो । जैसे सीता, द्रोपदी भी तो आँसुओं से मुक्त नहीं की थीं भगवान ने। फिर पारो और सलमा तो किस खेत की मूली थीं। फिर भी हीरे की पहचान तो जौहरी ही कर सकता है । सलमा का सही मूल्य तो अनवर ही जानता था । जो कि सलमा को एक ओर पीडा से तो मुक्त कर ही सकता था । और वह पीडा का नाम पा-सौतन । जिससे अनिवार्य अवश्य ही उसके पति अनवर ने उसे मुक्त ही रखा । मनुष्य तो उतना ही कर पा सकता है जितना कि उसके अपने अधिकार या वश मे हो । सो अनवर ने यह कर्तव्य तो निभा ही दिया । इससे आगे वह भगवान तो नहीं हो सकता था, जो सलमा को मौं होने का वरदान भी दे पाता। 37 " सलमा जब भी सीता के साथ बैठती तो अक्सर कुछ इस प्रकार की बाते ही तो उन दोनों के बीच चलतीं । और सीता सदा ही सलमा का साहस बढाते कहा करती थी- सलमा । मन छोटा न करो, मुरली भी तो तुम्हारा ही बेटा है क्या हुआ अगर वह तुम्हारे पेट से जन्म न ले पाया।' सलमा ने रोते रोते कहा था। तुम लोगो के सहारे ही तो मै जी रही हूँ सीता, नही तो शायद कभी की मर गई होती। अब इस प्रकार तो सलमा को सीता हमीदा से कही बढ कर थी । मनुष्य की परख भी तो समय आने पर ही होती है। चाहे वह अपना हो या पराया । और ससार की अजीब ही रीति है कि जो अपने होते है वह पल मे पराये हो जाते है और जो पगए होते है वह तो अपने से भी बढ कर होते है । हमीदा कोई बुरे दिल की तो नही थी किन्तु वह अमीरी गरीबी मे अन्तर मानती थी । अपने धर्म में दूसरे धर्म को भिन भी मानती थी । पर साथ ही साथ उसके हृदय मे सलमा आपा के लिए सहानुभूति थी । वह चाहती थी कि ये लोग भी पाकिस्तान चले आये । और इनको बसती से छुटकारा मिल सके । वह बसती और ऐसी बसती जिसके पास देने को रखा ही क्या है गरीबी व मुसीबत के सिवाय । फिर साथ ही साथ सलमा और अनवर बानो के भी पास हो जायेगे । उनके बुढापे मे बानो व उस :- पति उनके काम आयेगे । किन्तु यह बात और थी जो सलमा और अनवर दोनों को ही मजूर नही था कि वे अपना देश छोडकर नही जाना चाहते थे। 38

फिर एक शाम अनवर माधो की दुकान पर पहुंचा जब वह दुकान बन्द करने
की तैयारी में लगा हुआ था । मित्र को अपने सामने खडा देखकर वह जैसे
झूम उठा और बोला।
वाह-वाह । यह क्या ? कीडी घर भगवान कैसे?
अनवर ने बडे स्नेह से कहा।
अल्लाह। अल्लाह । यह क्या कह रहे हो मेरे दोस्त - ? मै तो उस खुदा
का ककर भी नहीं।
.
कहो कैसे आना हुआ
"
.
कुछ खास बात करनी थी तुम से, तो सोचा क्यो न अकेले में ही की
जाये पहले।"
हा -हाँ-पहले बैठ-फिर बात कह क्या है।"
"माधो-
" हाँ।'
तुम जानते ही हो मुहब्बत का दर्जा क्या होता है - चाहे वह माँ-बाप
औलाद की हो चाहे दोस्त की और चाहे प्रेम करने वाले दो दिलो की।"
बेशक
तो मैं सोच रहा या इस बार हमीदा बानो की शादी यूसुफ से करने
की सोच कर गई है।'
अच्छा।
माधो ने कुछ हैरानी से कहा।
हाँ । यही कारण है कि मै अधिक चिंतित हूँ।'
39

। . . "और सुनकर मै भी कम नहीं । मायो । मेरे दोस्त । याद है-हमने मुरली के पैदा होने पर निश्चय किया या कि हम इस के बडे होने पर इस का विवाह मुसलमान घराने ही करेगे, तो जो दो धर्मों के नाम की दीवार भी जो हम दोनों के बीच है वह भी सदा सदा के लिये मिट जाए।" मुझे बहुत अच्छी तरह याद है मेरे अनवर ।' 'तो अब वह समय आन पहुँचा है जबकि हम यह कर सके । मगर ।' मगर क्या सलमा ने हमीदा से बात भी चलाई थी। किन्तु सब हमारी तरह तो नहीं सोचते।' मतलब हमीदा बडी अजीब सी हट लिए हुए है ? ' वह क्या हमीदा कहती है कि मुरली को धर्म बदलना होगा ।' माधो पल के लिए तो सोचने लगा किन्तु फिर झट से बोल पडा । तो इस मे हर्ष भी क्या है?" माधो को अनवर बचपन से जानता था कि वह उसकी कोई बात मुठला नहीं सकता - किन्तु सीता भी मा थी- यदि वह मा चाहेगी तो क्या होगा- सोच रहा था और फिर बोला। ' माधो । तुम कोई साधारण आदमी नहीं मै जानता हूँ, किन्तु मुझे यह भी तो ध्यान है कि सीता भाभी की रजामदी भी उतनी ही जरूरी है जितनी तुम्हारी। 'मैं जानता हूँ मेरे दोस्त । मगर सीता भी समझदार है वह जानती है- धर्म बदलने से मुरली रहेगा तो हमारा मुरली ही। . 1 । 40 - आज अनवर को लगा कि वह इस सच्चे दोस्त को पाकर अगर सारे रिश्तेदार भी छोड दे - तो वह अपने आप को धन्य समझेगा । दोनो के विचार कितने एक थे- दोनो की समस्याए कितनी अपनी थीं । और फिर दोनों की अभिलाषा भी एक थी। दोनों इसी आस से बैठे थे कि वह मुरली और बानो के लिए सही शब्दो मे कुछ कर पायेगे। और जब मुरली घर लौटा तो सीता घर नहीं थी । वह उस दिन चान्दनी चौक उनके काम से गई हुई थी। माधो उसकी प्रतीक्षा करता रहा । उधर मुरली बानो के चले जाने के पश्चात् फिर बहुत अकेला-अकेला और खोया-खोया सा पीछे के मैदान में बैठा था । वह गौरी के घर के सामने था। गौरी चुपचाप कभी से मुरली को बैठे देखती रही। उसका जी चाहा कि वह उसके पास जाकर बैठ जाये और दुख बाट सके । किन्तु वह ऐसा कर नहीं पा रही थी। हा जब मुरली उसके घर की ओर चला तो अपने ही घर की दीवार के पास जा खड़ी हुई थी और पूछा था इतनी देर तक अकेले मैदान में क्या कर रहे थे - ?" मुरली का मन नहीं था कि वह किसी से भी बोले तो भी केवल वह यह कहके घर की ओर चला गया था। "यू ही। गौरी को आज फिर लगा कि मुरली उससे बात भी नही करना चाहता- उसके विचारो मे तो केवल बानो ही बानो है जिसे वह पा नहीं सकता, और इस दिशा मे मुरली बीच ही बीच टूटता जा रहा था। अजीब दशा थी इन दोनो की। जो अपनी अपनी राहो पर चले जा रहे थे मजिलों तक पहुँचेंगे भी या नः । यह सही है कि वह स्वयं भी नहीं जानते थे। और जब से बानो गई ६ वह अपने ही दुख से परेशान थी। न वह आगे बढ पा रही थी और न ही पीछे लौट ही सकती थी । इसी समय उसका । 41 अधिक शक्तिशाली होता जरूरी था । वह चाहती थी कि अपनी अम्मी से साफ-साफ कह दे कि वह यूसुफ से विवाह नहीं करेगी। किन्तु वह ये भी जानती थी कि उसकी अम्मी उसकी बात नहीं मानेगी। अजीब कहानी थी सबकी । जो चाहते थे वह हो नहीं सकता था और जो नहीं चाहते थे वही हो भी रहा था। उधर सलमा अब औलाद की सबसे अधिक कमी अनुभव कर रही थी। पूर्ण रूप से जीवन ही कुछ इसी समस्या में उलझा होता है । जिससे न वह निकल पाता है और न ही रह सकता है । प्रकृति का खेल ही कुछ ऐसा है, कि मनुष्यो को अनेक प्रकार के इम्तहानो से गुजरना पड़ता है। अपने लिये तो जानवर भी जीते है - औरो के लिये जीना ही तो मनुष्य का जीना कहलाता था इस बसती की दुनिया ही कुछ ऐसी थी जिसको समस्याओं से जूझना ही क्यो कि गरीबी पेशे से भी अधिक दुखित होती है। और इस नगे सच को वह कब तक झूठे सपनो या आशाओं के लिबास उठाये रहते। सब के बीच तो गभीरता की लहर दौड़ गई थी। किसी अजीब चुप का सनाटा । जैसे रात की काली खामोशी में हुआ करता है । वैसे रात हो चुकी थी- तो सारी बसती खामोशी में डूबी सो रही होगी। आकाश में एक चाद और अनेक सितारे मडरा रहे थे। बानो की अनेक छोटी से छोटी बाते मुरली को रात भर घेरे हुई थीं। चुप की भाषा मे वह सारी रात ही बाना की यादों से बाते करता रहा था। गौरी वो मुरली के विचारों मे कभी आई भी न थी । कितनी अजीब बात थी कि जो सामने और पास थी - वह दिखाई नहीं दे रही थी । और जो सामने नही थी वह ही दिखाई भी दे रही थी। प्रेम की भाषा भी सब भाषाओं से अलग होती है। ससार में नाम पैदा करना सबसे कठिन कार्य होता है और उसे कायम रखना तो और भी कठिना 42 किन्तु प्रेम मे नाम स्वय ही पैदा हो जाता है- और सदा सदा के लिये स्थिर भी होता है। मुरली को इसी प्रेम ने तो बाध रखा था - जिससे वह अलग होना भी नही चाहता था । प्रेम तो मानो अब उसका जीवन ही हो गया था। सच्चा प्रेम करने वालों का चरित्र भी सच्चा ही होता है । वह जिस्म की परवाह न करते हुए आत्मा के प्रेमी होते है । ऐसा ही प्रेम मुरली व बानो का भी था । वह चाहते तो अपनी मिलन घडिया जिस्मो से बाध लेते । चरित्रहीन होने में भी सकोच न करते । किन्तु वह तो एक दूसरे की आत्माओ से प्रेम करते थे। उनका ध्यान कभी जिस्मो की ओर गया भी नहीं था । वह जानते थे, यदि विवाहित रूप मे वह मिल भी न पायें तो क्या हुआ ? उनका प्रेम तो फिर भी बना ही रहेगा। प्रेमी एक दूसरे को हृदय से मानते है जिस्म से नहीं । वह तो प्रेम को आत्मा द्वारा जीतते है । और यह सबध प्रेम का सबध एक नही बल्कि अनेक जन्मो तक चलता है। जब तक उनकी प्रेम तपस्या पूर्ण न हो जाये । और वह जन्म मरण से मुक्त न हो जाये। इस प्रकार प्रेम की नाव मे तो मुरली बानो और गौरी तीनो की सदार ये। किन्तु अन्तर केवल इतना ही था, कि मुरली और बानो एक दूसरे से प्रेम करते थे । और गौरी केवल मुरली को जो उसे प्रेम नहीं करता था । एक ओर का प्रेम तो दुखात प्रेम होता है। जो केवल देता ही देता है । और ले नही पाता । गौरी को प्रेम के मीठे नाम व अभाव से केवल झाक की टीस कुछ क्षण ही तो मिली थी जिसे वह मधु मान कर खाये जा रही थी खाये जा रही थी। उसमे सहनशक्ति आम लडकियों से कहीं अधिक रही होगी । उसका सबर कुए की भाति गहरा था- जो कभी खतम होने मे ही नहीं आ रहा था । प्रेम छिपाने से नहीं छिपता और रोकने से नहीं रुकता । वह तो प्रेमियो की आखों मे धूए के समान ऊपर आ जाता है । और अपनी पहचान स्वय देता है । / 43 के चुनता है इसी प्रकार प्रेम का कोई अन्त नही हुआ करता । तो गौरी के प्रेम का अन्त भी कैसे हो सकता था। उधर माधो व अनवर की बात होने के पश्चात् माधो घर पर आ कर भी सोचता रहा। 'यदि मुरली धर्म न भी बदले और हमसे और अपने धर्म से मन बदल लेते तो क्या वह उचित होगा भला ? धर्म बदलना तो साधारण बात है। किन्तु मा बदल लेना तो बहुत बड़ी बात । जो सुननी तो कठिन है ही किन्तु सहन करनी तो असभव सी हो जाती है । जिसके भारी बोझ तले यदि कोई अभागा व्यक्ति आ ही जाये तो बच नही पाता । शीशे की भाति उसके सभी सपने व उम्मीदे चकनाचूर हो जाती है । फिर जो व्यक्ति मजिल की शरण वह किस्मत व भाग्य को भी चुा लेता है । माधो अपने पुत्र सबध मे उतना ही जानता था जितना कि वह अपने सबध मे। वैसे भी यह कहा जाता है कि बाप-बेटे मे अधिक अन्तर नहीं हुआ करता। तबही तो कहावत भी बनी है - मा पै पूत पिता पर घोडा बहुत नहीं तो थोडा थोडा-। फिर माधो तो मुरली को अपने स्वभाव से अलग व भिन्न मानता ही नहीं था । यही कारण भी था कि नि सकोच माधो ने अपने मित्र अनवर के सामो मुरली के धर्म बदल लेने की बड़ी बात बडी सरलता से कह भी डाली थी। जीवन का अर्थ उसकी तेज रफ्तार नहीं होता । उसके तत्व व उसके बीच पडी कीमत हुआ करती है । जीवन मनुष्य के वश में नहीं होता किन्तु जीवन के बीच पडे कायदे तो होते ही है। माधो और अनवर भी तो कुछ इस प्रकार के कारणों कोशिश कर रहे थे। महान और सही काम के लिये मरना भी मौत नहीं हुआ करती- वह तो बडे व सही कारण की युवती हुआ करती है । फिर मुरली के " ही निभाने की 44 धर्म बदलने में - माघो के धर्म की मौत कभी नहीं हो सकती- वह तो पूर्ति होगी । एक महान कार्य की। माधो यही सोच रहा था। दह सीता को भी कुछ ऐसा ही कहना भी चाहता था । जो यही धर्म बदलने के विचार से कुछ हैरान व चिन्तित हो भी जाये तो माधो उसे सही ग्रह दिखाना चाहता था। अब माधो के विचार उसके व सीता के लिए स्पष्ट ही थे। जिन मे किसी प्रकार की बदली नहीं हो सकती थी । वह एक सादा व साधारण व्यक्ति भले था, किन्तु विचारों का गुरू था । उसके विचार अनेक पढे लिखों के विचारो से कहीं पर थे । वह तेज हृदय का व्यक्ति न होकर एक विशाल हृदय का मालिक था जिस पर कोई भी मित्र व सबधी जितना चाहे गौरव कर सकते थे और साथ ही अपने आपको भाग्यशाली भी मान सकते थे जो माधो जैसे व्यक्ति के जीवन में आये और उस आदर्शवादी को अपना कह सके । सात अगली सुबह होते ही मुरली घर में आकर चूल्हे के आगे बैठी मा से बोला- . मा। हा बेटा।' मै फौज मे भर्ती होना चाहता हूँ। सीता को लगा जैसे उसे किसी ने ऊपर से जोर का धक्का दे दिया हो और वह बड-बडाई- "है-7 है- ? क्या कहा।' मुरली ने फिर त्याग भाव से घबराते हुए कहा- 45

मै फौज में भर्ती होना चाहता हूँ मा ।
सीता की पीडा की सीमा न रही और उसने अधिक बडबडाते हुये पूछा-
क्या-1
मुरली के कुछ भी और कहने से पहले न-जाने कैसे माधो आ गया था।
जो असल मे अपनी दुकान की चाबी कुरते की जेब मे छोड गया था । उसे
देखते ही मानो सीता और तडफ कर एक फरयादी के समान फरयाद करती
बोली-
सुनो जी। ये हमारा लाडला क्या कह रहा है। "
क्या
२
माधो ने साधारण भाव से पूछा तो सीता ने आखो मे पानी भर कर
उत्तर दिया-
कहता है मै फौज में भर्ती होना चाहता हूँ।"
माधो ने मुरली की ओर देखकर पूछा-
क्यो मुरली क्या बात है?'
मुरली नै जरा सी नजरे उठा कर कहा-
'मै फौज मे भर्ती होना चाहता हूँ।'
क्यो बेटा-
पिताजी । मै देश की सेवा करना चाहता हूँ।"
यह तो
बहुत अच्छी बात है बेटा । मै तुम्हारे ऊचे विचारों का आदर
"
करता
-
अब सीता को लगा मानो मुरली के भर्ती होने का निणय लिया गया हो
तो वह और अधिक घबरा कर बोली
" नहीं नहीं । ऐसा कभी नहीं हो सकता । मै मुरली को भर्ती नहों होने
दे सक्ती ।"
46

माधो ने पत्नी को धीरज बधाते हुये कहा-
'यह तो बहुत भाग्यशाली बात है कि हमारा बेटा सेग करने की सोच
रहा है, और वह भी देश की ।'
सीता ने धोती के पल्ले से आख पाछते हुए कहा-
"जो भी हो । देश की सेवा करने का एक यह ही तो रास्ता नही रह
गया । पढ़ लिखकर आगे नहा अफसर बन-और कर ले देश की सेवा ।
मुरली ने अब अपने विचारो की पुष्टि करते हुए कहा-
" मैने आगे और न-पढने का विचार बना लिया है मा।"
सीता ने कहा-
" तो ठीक है मत पढो आगे दुकान पर बैठ जाओ ।
माधो ने पली के दुख मे सवेदना प्रकट करते हुए कहा-
'सीता । फौज मे भर्ती होना कोई भयानक बात नही हुआ करती।"
सीता ने तेज आवाज मे उत्तर दिया
धुआ बिना आच नहीं होती । फौज मे ही जग लड़ी जाती है- और
जग नाम है मौत का | क्या यह भी आप नहीं समझते
"
.
॥
माधो ने कहा-
.
कौस न चले बाबा प्यासी । यह भी कोई बात हुई भला । और अगर
मौत की ही बात करती हो तो सुनो । मौत तो मनुष्य को अवश्य आनी ही है-
घर क्या और बाहर क्या । किन्तु जग की मौत साधारण मौत नहीं हुआ
करती भाग्यवान ! यह तो शहीदों की मौत होती है । वह उत्तम मौत । जो
शहीदों की होती है । और शहीद देश के लिये मरा करते है । जैसे लाला
लाजपत राय, और शहीद भगत सिंह ।
47

.
अब सीता ने अपनी वेदना के किवाड और खोलते हुए कहा
किसी
कीमत पर भी मै अपने बेटे को भर्ती नहीं होने दूंगी । मै मा हू, और मेरी
वेदना भगवान के बगैर और कोई नहीं जान सकता।"
माधो ने अधिक समझदारी से काम लेते हुये अपने बेटे को कहा-
'सरल रेखा मे तुम्हारी मा न समझ पायेगी । तुम भर्ती होने का कारण
और स्पष्ट कर दो तो अच्छा होगा बेटा।"
मा । मै तुम्हे समझा न पाऊँगा, किन्तु मेरे विचार स्पष्ट है कि मै फौज
मे ही भर्ती होना चाहता हूँ, और कुछ नहीं करना चाहता।
सीता ने बडे साहस से कुछ यूँ कहा क्योकि मरता क्या न करता-
बेटा | हम तो तेरा विवाह करने की सोच रहे है और तू है कि भर्ती
की रट लगाये हुये है। फिर भला जानबूझ कर कौन समझदार व्यक्ति जलती
आग मे कूदता है भला - ? परहेज सबसे बडी दवा है । जग से दूर रहने में ही
बडी समझदारी होगी।
अब मुरली ने भी बडे साहस कह ही डाला।
'मुझे विवाह भी नहीं करना मा ।
माधो ने बात को सभालते हुये कहा-
ठीक ही तो कह रहा है। अभी
विवाह की उमर भी तो नहीं हुई है इसकी।
सीता का उत्तर था-
'मै ने तो लडकी भी पसद कर ली है- वह पारो की बेटी गौरी- उसकी
मा से दादा भी कर लिया है तो कैसे नहीं करेगा विवाह ।
यह सुनते ही मुरली को लगा जैसे एक जोर का धक्स दे दिया हो उसे
किसी ने और बडबडाया-
' नहीं-नहीं । मुझे कहीं विवाह नहीं करना मुझे तो भर्ती ही होना है।
माधो ने बात को फिर सदारते हुये कहा-
॥
।
48

मुरली ठीक ही तो कहता है सीता - विवाह जब भी होगा, इसकी मर्जी से ही तो होगा ! घर घोडा नकास मोल' वाली बात करती हो तुम भी सीता।" फिर मुरली ने पलके उठा कर रोती मा को देखा- और बगैर कुछ और कहे-सुने वह दबे पाव बाहर आ गया था । वह जानबूझ कर मोटे और सशक्त मन का व्यक्ति बना हुआ था । मन-ही-मन उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा या । उसका कठोर मन उसकी मा के आसू भी न पिघला रहे थे। वह स्वय भी नहीं जानता था कि बानो के जाने के पश्चात् यह सब क्या हो रहा है । उधर सीता की दशा भी तरसयोग बनी हुई थी । उसके पति की समझदारी की बाते भी मानो उसे अच्छी न लग रही थी। और माधो या कि दो पडावो मे आये दाने के समान था। वह बिना मूल्य के अपने उत्तम सही विचारो की पूँजी सीता पर लुटा रहा था । सीता ने बडबडाते हुए कहा "तो ठीक है । आप भी कुछ नही कर पा रहे हो तो मै अनवर भाई से कहूँगी वह ही इसे सही रास्ते पर ला सकेगे। और इस विचार ने मानो सच में सीता की पीडा को ठडा किया था और माधो भी यह कहता हुआ दुकान की ओर चल दिया था । 'ईश्वर भला करेगा।" सीता आख पोछ कर सलमा के घर की ओर जल्दी-जल्दी जाने लगी जहा से उसे सकून मिलने की पूरी आशा बनी हुई थी । मित्र वही, जो मुसीबत मे काम आये । प्रेम के बगैर महल भी झोपडी समान होती है । और प्रेम भरी कुटिया महल के समान । ठीक ऐसा ही आज सीता भी अनुभव कर रही थी। उसे अपने घर से कहीं अधिक सलमा के घर मे सकून प्राप्त हो रहा था। वह यह भी जानती थी कि उसके पति से अधिक वह पीडा सलमा समझ पायेगी । क्योंकि उसके हृदय मे भी एक औरत का दिल है । स्त्री का इतिहास " 49 । हर स्थिति मे एक-सा तथा मिलता-जुलता-सा ही रहा है। हर मा अपने बच्चे को अपनी आखो के सामने देखना चाहती है । हर औरत के हृदय की तह मे औलाद का स्नेह दिया होता है । वैसे भी कहा जाता है कि औरते मर्दो से अधिक समझवान होती है क्योकि वह जानती कम और समझती अधिक है | फिर औरत के अन्दर का बोझ अधिक समय तक उसके अन्दर नहीं रह पता-चाहे वह उसकी निजी बात ही क्यो न । स्त्री के विचार दुनिया भर के विचारो से अधिक साफ भी होते है जिन्हे वह शीघ्र बदल भी लेती है । किन्तु इस हाल में सीता के विचार बदलने तो सभव नही थे, किन्तु हा अपनी मजबूरी से समझौता चाहे कर ले । सही अर्थों में समझना ही जीवन का मूल कर्तव्य है - जब कि मनुष्य को अनेक बार जीवन मे अपने गमों व मजबूरियों से समझौता करना ही पड़ता है । मा की ममता एक महान देन है मनुष्य को । यदि मा की स्नेह भरी ममता न होती तो ससार की गति जरूर रुक कर रह गई होती । मा ही स्नेह की सबसे बड़ी पहचान होती है। मा का चित्र सबसे बडा चित्र भी होता है । इसी कारण तो मा की तुलना सदा देवियो से की जाती है । उसके हृदय से अपनी औलाद के लिए जब भी कुछ निकलता है तो आशीर्वाद ही निकलता है। सीता मा होने के नाते सब विशेषताओं में निपुण थी । वह किसी कीमत पर भी पुत्र को आग को अर्पण नहीं कर सकती थी। फिर मा के अधिकार का रिश्ता सबसे बड़ा होता है। यही कारण था कि उसने मन ही मन अपने पुत्र के लिये लड़की पसद की हुई थी । उसे गौरी हर प्रकार से उचित जान पडती थी। इसका ये भी तो भाव नहीं था कि वह किसी कारण वश मानो को मन से नहीं चाहती थी । ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता था । जबकि उसने बानो को अपनी ममता के पालने में झुलाया था | छोटी से बडी होती देखा था। उसके स्वभाव को समझा व जाना था। कारण तो केवल रहा होगा कि सलमा व हमीदा की ओर से कभी बानो के लिये मुरली का हाय नहीं मागा गया था तो वह समझी थी कि शायर 1 50 उसके मुरली को वह अपने व बानो के योग्य ही न समझे होंगे। नहीं तो वह मन ही मन यदि यह भी भली भाति जानती थी, कि मुरली व बानो एक दूसरे को चाहते है । आज से नहीं, बचपन से ही । और जवानी तक उनकी भावनाओं के प्रति वह वाचती रही है । और जब भी उन दोनो की तुलना अपनी समझ की तराजू से करती तो जानती- वह दोनों एक समान ही तो थे। आज तक वह अपनी कही बात भी भूली नही थी- कि वह अपने मुरली का विवाह किसी मुसलमान घराने में करेगी । आज भी तो वह अपने कहे शब्दो पर अटल थी किन्तु कोई अवसर मिले भी तो। सीता ने अनेक बार सोचा भी या कि क्यो न वह ही सलमा से बानो का हाथ मागने की बात चलाये। किन्तु एक झिझक के कारण वह ऐसा कर भी तो न पाई थी-जो थी कि उसको व हमीदा को मुरली बानो के लिये पसद ही न होगा। नहीं तो वह कुछ भावना तो प्रकट कर ही देती । यूँ यह छादित बात न चल पाई थी । और मानो मुरली व बानो की प्रेम कहानी का काड खतम ही हो गया था। फिर ही तो सीता ने पारो के कहने और मागने पर गौरी को अपनी बहू बनाने के स्वप्न सजा लिये थे। उधर पारो भली भाँति जानती थी कि उसे माधा व सीता जैसे व्यक्ति तो चिराग लेकर दूढने से भी नहीं मिल पायेगे । और मुरली जैसा दामाद तो उस बेचारी सात जन्म भी नसीब नहीं होगा । उसने साहस करके सीता से अपने मन की बात कह ही हाली थी । वैसे भी वह मगू दादा जैसे दरिदों से यदि बेटी को बचा पा सकती थी तो केवल उसके हाय पीले करके ही । वह शीघ्र से शीघ्र गौरी को बियाह देना चाहती थी। आज समय बदल चुके थे, विचार बदल चुके थे और साथ साथ हालात भी । यही कारण था कि मुरली के बड़े होने पर उसका रिस्ता मुसलमान घराने में करने का प्रश्न अन्त तक नहीं हो पाया था। बसती में भी तो कोई घराना या ही नहीं । ऐसा जो माधो से पुत्र से रिश्ता बाध सकता । बाहर गले सभी मुसलमान तो धर्म की दल-दल में इतने गहरे उतरे हुए थे, कि 51 कोई एक भी न मानता । तो इस प्रकार ले दे कर तो हमीदा की बेटी बानो ही रह गई थी । वहा भी अब बात सदा के लिए समाप्त हो चुकी थी। फिर कोई भी बात समाप्त होने के पश्चात् दुबारा से आरभ करनी भी तो सरल नहीं हुआ करती। सीता के दुखी मन पर बेटे के फौज मे भर्ती होने का विचार जितना बोझल हो रहा ता उतना तो बानो के न मिलने का भी नहीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस भाषा में अपने बेटे को रोके, जो कि वह सचमुच एक जाये। फिर सीता को यह ध्यान तो आया भी नहीं था कि वह बानो के जाने व न मिलने के कारण तो भर्ती नहीं हो रहा । जब मनुष्य के निकलने के सब दरवाजे बन्द हो जाते है तो वह ऐसे ही कठिन राह से होकर निकलने की कोशिश करता है जिसमें वह अपनी जान की भी बाजी लगा देता है । बस यही हाल तो मुरली का भी था जिसने भर्ती होने की राह चुन ली थी। मार्यो की शराफत ही कुछ ऐसी थी, कि सबकी "हा "में "हा " मिलाता ही चला जा रहा था। वह बहे-छोटे सबके साय एक सा ही बर्ताव करता। उसने कभी एक बार भी अपने पुत्र मुरली से स्वय पिता होने का हक नहीं मागा पा । वह तो व्यक्ति ही किसी भिन्न प्रकार का था- जो औरों की इच्छापूर्वक ही हर कारण चला आ रहा था। विरोध नामी शब्द में तो उसका विश्वास ही नहीं रहा होगा । वह दूसरों के सुख के लिए इस कर बलिदान की काठी पर चढ जाता। अनवर और माघो की एकता तो यही कहती है कि वह जन्मों-जन्मों से शायद जुहवा भाई रहे होंगे । एकता नाम है अपनेपन का- जो विचारो के धागे व सूत्र में एक सर सब को बाये रखते है। 52

आठ
जब सीता सलमा के यहा पहुँची तो वह अपनी पटिआरी मे कुछ मेहदी व
छुट-पुट सभाल रही थी। क्योकि कल सुबह ही फिर उसे हनुमान मंदिर
मेहदी लगाने के काम से जाना या । सीता ने पहुंचते ही डबडबाई आखो से
देखते कहा-
ना
सलमा बहन ।"
'क्या हुआ सीता-तुम घरयई हुई क्यो हो ?"
सीता ने ठडी सास भरते हुए उत्तर दिया
"धरराऊ न तो क्या करूँ वो अपणी मुरली है
अब सलमा भी चौकी और बोली
" हाँ क्या हुआ हमारे मुरली को
अरी उसे तो कुछ नहीं हुआ मगर
मगर क्या ?'
वह फौज मे भर्ती होने की रट लगाये हुये है-."
फौज में भर्ती होने की-? मगर वह क्यो।
" उसी से पूछो- मै क्या जानूं ।'
अब सलमा ने हाथ का काम छोड कर चिन्तित होते हुए कहा-
'यह तो सचमुच भारी चिन्ता का विषय है।
समझ में नहीं आता क्या कर। वह उसका पिता तो बस मिटटी का
माधो ही है । तो सोचा आप लोगो से बात कर । मै मानती हूँ केवल अनवर
भाई ही उसे रोक पायेंगे और कोई नहीं।'
"
.
53

"हाँ-हो क्यो नहीं, उनके आते ही मै बात करती हूँ, और वह मुरली को समझापायेगे- सलमा का मन भी अब भारी हो गया था । उसकी और सीता की समस्या एक-सी ही थी। दोनों के हृदय एक से थे। जो निर्णय की देवी- और सहन शक्ति सर्वत्र होती है । कहते है औरत मर्द से कहीं अधिक समनवान होती है । इसलिए कि वह सह सकती है । झेल सकती है और साथ ही करिश्मा भी कर सकती है । शक्तिशाली औरत उस आटे की चक्की के समान होती है जो हर दाने के साथ रोडा पत्थर भी पीस जाती है। मगर साथ ही वह यह भी विश्वास रखती है कि आवश्यकता कानून नहीं मानती । और यही कारण भी था कि वे दोनों औरतें ही भली-भाति जानती थीं कि फौज में भर्ती होना खतरों से खाली नहीं है । वे फौज को कुछ ऊची दुकान फीका पकवान मानती थी। वे तो चाहती थीं, साप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे । यानि के मुरली बडा आदमी और अफसर भी हो जाये- और फौज में भी भर्ती न हो । अब उसे रोकने की पहाड-सी समस्या उनके आगे खड़ी थी। इधर मुरली अपने दृढ व नवयुवक विचारों का मालिक या । वह हर कीमत पर बानो की याद में ही लीन होकर अपने जीवन की आहुति देना चाहता था । बानो के बगैर तो उसका जीवन मानो तुच्छ पदार्थों का संग्रह से बढ कर और कुछ नहीं रहा था। वह एक खाली गिलास की भाति हो गया या । यही कारण था कि वह अपने जीवन की कुर्बानी व बलिदान देकर उसे एक नया मोड देना चाहता था । वह अपने इस जीवन को हस कर धरती मा-देश को अर्पण करने को तुला हुआ था । और रणभूमि मे सूरमाओं की भाति वीरगति को प्राप्त होना चाहता था । वैसे भी जब वह छोटा था स्कूल की पुस्तकों में इतिहास पढता था तो उसे महात्मा गाधी भगतसिह जैसे महान व्यक्ति अति प्रभावित करते । फिर उसके कोमल हृदय पर सबसे अधिक नेता सुभाष चन्द्र बोस की तो खास मोहर लग चुकी थी । बस जभी से उसे फौज बहुत अच्छी लगती थी। किन्तु बानो के जीवन में आने से वह उस 54

"
क्षेत्र मे प्रवेश नहीं कर पाया था पर अब चली जाने के पश्चात् वह जानता था
कि उसकी मजिल यदि है तो फौज ही है । उसके निजी दुख मे यदि कोई
सवेदना हो सकती थी तो वह फौज ही थी जो उसके दिल-दिमाग को पीडा से
क्षमा कर सकती।
दो दिन बाद ही वह अपने बिखरे हुये रूप को फिर एकत्र करता हुआ
पिता के पास पहुचा।
मै फारम ले आया हूँ पिता जी । और भर के जमा कर दूगा कल
तका'
ठीक है बेटा जैसे तुम्हारी मरजी।
मानो माधो तो पूरी तरह अपने आपको मुरली के आगे समर्पण कर
चुका था। अचानक ही अनवर भी आ गया क्यों कि सलमा ने उसे सारी बात
कह दी थी । अब अनवर को देखते ही माधो को साहस आ गया, जैसे एक
हूबने वाले को तिनके का सहारा होता है । माघो बोला-
" आओ अनवर आओ। बिल्कुल सही समय पर आये हो । बैठो । मुरली
फौज में भर्ती होना चाहता है । फारम ले आया है और कल भर के दाखिल
कर रहा है।
अच्छा । यह तो बहुत अच्छी बात है मुरली बेटा । किन्तु शायद तुम
नहीं जानते मा का हृदय बिल्कुल सूक्ष्म होता है । वह तुम्हारे फौज में जाने से
प्रसन्न नहीं है।
जी। मैं जानता हूँ अब्बू जी।"
फिर अनवर ने सुराही मे नदी भरते हुए कहा-
"फिर और जानकर भी अन्जान क्यो बनना चाहते हो बेटा।"
मुरली का उत्तर या-
इस के बगैर और कोई यस्ता भी तो नहीं है अबू जी।'
"
"
"
55

1 " 11 " " 'रास्ता बनता नहीं -सर्वत्र बनाना पडा है मनुष्य को । तुम आगे पढाई करके बडे अफसर बन कर देश की सेवा क्यो नहीं कर लेते ?" "जी मेरा आगे पढने का मन नहीं है। " तो दुकान का काम कर लो। वह भी मै कर नहीं पाऊगा । क्षमा चाहता हूँ। मनुष्य के जीवन पर यदि सबसे बडा कर्ज होता है तो " मा "का होता है जिसे चुकाना साधारण बात नहीं है। देश के काम आना मेरा सौभाग्य होगा। ' बेशक । मै मानता हूँ । पीछे साधारण पुरुष नही हुआ करते । देश के लिये प्राण देना सिर्फ पुन्न होता है। किन्तु मा की आखों का पानी भी साधारण वस्तु नहीं होती।' मेरा साहस ना तोडो अबू जी । मै-मै रुक नही पाऊगा । यह अब मेरे वश मे नहीं है।' अनवर का स्वर अन्तरया। तो ठीक है तुम समझदार हो-मै अधिक क्या कह पाऊँगा और कुछ कहा हो तो नवयुग रवि को दिया दिखाने की भाति होगा । खुदा तुम्हारी रक्षा करे। मुरली अनवर व माधो तीनों की आखे डबडबा रही थीं । माधो ने भी बेटे की भावनाओं को प्रशसादायक उत्तराप्त करते हुये कहा - 'ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे बेटे | जो ठीक मानते हो कर लो।' तब मुरली ने आखों से दोनों को धन्यवाद देते हुये देखा और फिर बाहर । चला आया। सीता ऊन लेने चादनी चौक गई हुई थी जो अभी तक लौटी नहीं थी और सलमा भी हनुमान मंदिर मेहदी लगाने गई हुई थी। 56 " " " - मुरली के चले जाने के बाद माधो और अनवर अकेले बैठे कुछ समय तक बाते करते रहे । अनवर ने कहा- " अनेक बार जीवन में मनुष्य सोचता कुछ है और हो कुछ और ही जाता है, जिस कारण निराशा का रग उभर आना सभव ही हो जाता । मै जानता हूँ कि मेरे समान ही तुम्हारे भी मन पर मुरली के विचारो के बादल घिरे हुए है । अनवर तुम तो जानते ही हो मा-बाप की सब आशाये औलाद पर ही तो होती है। हाँ मैं जानता हूँ किन्तु आज की पीढी व पिछली पीढी के विचारो में अतर आ चुका है, स्वाभाविक ही वह अधिक उन्नति के रास्ते में रह रहे है । और हम कम उन्नति की पीढी के हुए है । " 'मुझे स्वयं अपने को समझाना तो सरल है किन्तु एक मा के हृदय को समझाना बहुत ही कठिन है । मै अपने आपको मना लूँगा मगर सीता को मनाना भी कोई आसान बात नहीं। " हाँ माधो सीता भाभी हमारे यहाँ यही बोझ लेकर आई भी थी और उसने तो पूरी आशाओं की नजरे मुझ पर ही टिकाई हुई है- वह कुछ ऐसा मानती है कि तुम्हारे कहने पर मुरली रुके या न रुकै किन्तु मेरे अपने कहने से वह जाने से रुक जायेगा । हालाकि मै ऐसा नही मानता । तुम मे और मुझमे कोई अन्तर नहीं है। अनवर वह लडका आज के समय का लडका है और ऊपर से स्वय समझदार और जवान भी । उसकी इच्छा भी जवान है । अपने जीवन का निर्णय आप लेने का अधिकार भी है उसे । सीता यही बात समझने की कोशिश नहीं कर रही । वह आज के नव युवक को बीते कल का छोटा बालक माने बैठी है । जोकि कभी तुम्हारी व मेरी उगलिया थामे चलता था । " अनदर ने जमीन पर नजरे गडाते हुये कहा- 'बेशक यही बात है। मनुष्य ऋतु की बदली के समान स्वय भी तो बदलता है किन्तु पिछली पीढी के विचार इतने शीघ्र नहीं बदलते। . - 57

अनवर अब देखो सीता का भोलापन कि पुत्र का विवाह भी तो अपनी
पसद अनुकूल ही करना चाहती है। ऐसी बात कभी होती है भला ?"
हाँ मगर सीता भाभी की समझ में माँ का अधिकार बोलता है माधो
मित्र
11
"
जो भी हो अनवर यहा पर मै तो अपनी पत्नी से सहमत नहीं हूँ।
इतने मे ही सीता व सलमा दोनो इकटठी आ गई । सीता ने सुनते ही
पूछा-
'क्या बात है जी आप किससे सहमत नही है ?
तुमसे सीता-अपनी पत्नी से । "
किस बात
भला
7'
'मुरली के भर्ती होने के विषय मे ।"
सीता ने रोष प्रकट करते हुए कहा-
' लो जी लो आप क्यूँ होने लगे मुझसे सहमत भला । आप कोई माँ
योडा ही है - होते तो देखती कैसे सहमत न होते भला
"और सीता की
आँधे डबडबा आई । पास बैठी सलमा ने भी झट से सीता की वकालत करते
कहा-
" माधो भाई यह तो सीता सोलह आने सच कह रही है मा की पीडा
मा ही जानती है विचारी।
माधो का उत्तर था-
• इसमें कोई ऐसी बात नहीं जो सीता समझ न पाये सलमा भाभी
क्या वह यह नहीं जानती कि आज का मुरली कल का माधो नहीं है । वह
अपो जीवन का निर्णय स्वय लेने के योग्य है और ले रहा है फिर इसमें दुधी
होने की क्या बात है?
सीता रो रही थी तो अनवर ने कहा-
58

गो से तो पीडा की पूल मिट नहीं जाया करती भाभी । यह तो जीदा पीलाओं से समझौता करके ही मिट पायेगी । मै तुम्हारी पीड़ा से भली भांति परिचित हूँ और माधो के विचारों से भी । वह दूसरे शब्दों में यही तो कह रहा है तुम्हे भी हालात से सहमत होना चाहिये । पीडाओं से समझौता करा चाहिये। आप भी यह सब पाठ पमा रहे है मुह को इस लिये भाभी कि जो बात होगी आवश्यक है, उसे क्यूँ न इस कर स्वीकार कर लिया जाये। माधो और मै भी तो यही कर रहे है। M ॥ . सीता ने कहा- " . आप कहते है तो यह पीडा सहन कर भी सकते है किन्तु एक मा कैसे करेमला. जीवा में बहुत कुछ वह भी करना ही पड़ता है जिसे मन नहीं मानता। किन्तु हालात व समय तो मारता है। 'तो आप अब मुझ से क्या चाहते है अनवर भाई ।" यही कि माधो के विचारों की "हा" में "हा" मिला लो इसी में हम सब की भलाई है। है ईश्वर मुझे मा बनाते साथ ही क्यू न उठा लिया होता । आज मैं यह दिन देखने से तो बच जाती। अब फिर अनवर ने कहा- 'करमों का लेछा देने से तो कोई नहीं बच पाया भाभी आज तक । फिर मला तुम कैसे बच जाती ? सलमा भी बोल पडी- 'सीता गो-धोने से तो कुछ नही होगा हिम्मत रख ।" 'क्या करूं क्या करें ? कैसे हिम्मत रखू सलमा मै मै औरत हूँ । ॥ 59 " अनवर ने कहा- 'बस अब और करना ही क्या है ? सबर करो भाभी । दुआ करो कि हमारा मुरली देश का नाम ऊँचा करे सीता चुपचाप रोये जा रही थी रोये ही जा रही थी । सलमा उसके कयो को अपने हाथो से थामे हुये थी और कह रही थी- "खुदा सलामत रखे हमारे मुरली को, रहती दुनिया तक चिन्ता मत कर सीता अल्लाह सब भला करेगा । उस परवरदीगार के घर किसी चीज की कमी नहीं है गर देने पर आ जाये- तब फिर बडी ही मुश्किल से सीता अपने आप को कुछ समझा पाई थी। मानो सचमुच ही सीता ने आधी हार तो आज मान ही ली थी। फिर मनुष्य के हार मान लेने से साहस की अवश्य हानि होती है। किन्तु उस की आशाओं की तो नही । सीता की हालत भी ठीक ऐसी ही बनी हुई थी। वह अब किसी अनोखे करिश्मे की प्रतिकरण मे थी जबकि उसका बेटा पोज भर्ती होने से रुक जायेगा । और एक मा" के सपनों की पूर्ति होगी । उसका यह सरल व भोला मन ही उसके साहस की डोर बान्धे हुये था। नवयुवक जीवन तो सघर्षों की भूमि के समान होता है । जिस की मौत के तूफान का भय भी शीघ्रता व सरलता से नहीं होता | गरम लहू की गरमी इतनी होती है कि अनेक बार तो वह ममता ' की ड्योढी पर पैर रख कर भी चली जाती है चाहे इसके फलस्वरूप ममता सास भी तोड जाये । गरमी पर कुछ खास असर होता ही नहीं क्यूंकि वह इतनी गरम होती है जिसके ठडा होने के लिये भी समय तो चाहिये। 60 वह मनुष्य सबसे धनवान होता है जो ईर्ष्या से मुक्त होता है। मानो मुरली भी कुछ ऐसा ही अपो को अनुभव करने लगा था। फारम भर के वह जमा भी कर आया । उसके मा मे अजीब से पूरान की पसुडिया फूट रही थीं । फिर भी सोचना समझदारी नहीं होती। मन ही मा वह यह भी जानता था कि उसके कारण उसकी मा के हृदय की मौत हो रही है । मगर उसकी रगों में नव युवक रग की धारा बह रही थी जो आज के समय हर बन्धनों से मुक्त होती है । आप की पीढी उत्तम है किन्तु पिछली पीढी मे आगे नहीं । विचारों में बलिदान ही धनवान हीं है । निजी हट ही उसकी पृष्ठभूमि रहती है । वह अपने आपको ढकेलने का समर्थ भी करना चाहती है । मुरली बेचैनी से फौज में बुलावे की प्रतीक्षा कर रहा था। शायद भगवान ने उसकी आस सुनी थी कि उसको एक मास के याद बुलावा भी आ गया । उधर उसने सुना कि बानो की शादी युसूफ से पक्की हो गई । मानो एक अजीब रोष की लहर उसके हृदय में उठी । उसका मन चाहा कि वह बन्दूक की गोली किसी अनजाने यूसुफ के सीने में उतार दे । किन्तु ओरा चाटे प्यास नहीं बुझती और विचारो की पूर्ति नहीं होती। बस यही हाल मुरली का भी था। वह चुपचाप जाकर भर्ती होने की लाईन मे खड़ा हो गया । मेडीकल मुआइने के पश्चात् वह चुन भी लिया गया । एक ऊचे लवे मेजर अफसर ने । उसे देख कर कहा। 'बहुत कमजोर हो जवान । सेहत बनानी पडेगी।' दूसरे अफसर ने कहा था। "बाद में सब ठीक हो जाएगा। मेडीकली तो फिट है सर । "ओके - ओ के ।' 61

बस यूँ आज सचमुच मुरली चुन लिया गया था और उसने जीवन के
एक नवीन मोड में प्रवेश किया था । उसे तीन दिन का समय मिला था घर
पर जाकर तैयारी करने का । उसके बाद वह ट्रेनिग पर दिल्ली से बाहर जा
रहा था । उसे पैदल सेना में लिया गया था । जाने से एक रात पहले वह
सारा समय सो नहीं पाया था। उस के विचार मडल में सारा समय बानो की
याद ही मडरा रही थी।
उसे याद आया जाने से पहले उसने रोते हुये मुरली को कहा था-
"मुरली । मै कैसे जी पाऊगी तुम्हारे बगैर?"
मुरली ने कहा था-
'जैसे मै जिमगा।
तुम तो मर्द हो जी भी लोगो किन्तु औरत का जीना कहीं कठिन होता
"
-
"
मुरली का उत्तर था-
हमने एक दूसरे के हृदय से प्रेम किया है बानो- जिस्म से नहीं ।
हमारे दिलो को कोई देश कोई धर्म, कोई विवाह अलग नहीं कर सकता ।
मैं जानती हूँ, मगर यह भी तो सहन करना आसान नहीं होगा कि मै
अब शायद यहा कभी न आ पाऊगी।
दोनों की आधे भर आई । और खडे स्नेह पूर्व मुरली ने बानो का हाय
अपने हाथों मे लेकर कहा था-
यानो -हम फिर मिलेंगे अगले जनम में जहा कोई देश कोई धर्म
हमे मिलने से नहीं रोक पायेगा।
ऐसी ही ओक छोटी-छोटी बातें मुरली को याद आई और रात भर
उसकी आखों से पानी बहता रहा था।
"
62

इधर घर में और चारो लोग दुखी ये मुरली के जाने की सुनकर । किन्तु अनवर ने बडे साहस से सलमा और सीता की डूबती आशाओं को सहारा दिया था, यह कह कर- 'तुम भाग्यशाली हो जिनका बेटा फौज मे भर्ती हुआ है।" किन्तु सलमा व सीता के आसू तो रुक ही नहीं रहे थे । माधो की गभीरता का सही अनुमान उसके मित्र से अधिक और कौन लगा सकता था। सच तो यह था कि अनवर का अपना मा भी बहुत भारी हो रहा था । उसने खामोश माधो की ओर देखते हुये कहा- " मैं जानता हूँ, फौजी व कसाई मे अधिक अन्तर नहीं होता । एक जानवरों को मारता है और दूसरा इन्सानो को । किन्तु फौज का मारना साधारण मारना नहीं होता । देश की एकता हर कीमत पर करनी एक बड़े धर्म की बात है। माधो अपने मित्र का सही मूल्य जानता था वह यह भी जानता था कि मित्र वह जो समय पर काम आये और इस कसौटी पर उसका अनवर पूरा सोलह आने सही भी तो उतरा था। मित्र की मानसिक हालत का सही अनुमान लगाते वह बोला- 'मैं ईश्वर की हर देन को अपनी भलाई मानता हूँ अनवर । और उसके आगे प्रार्थना भी करता हूँ कि वह मुझे सही रास्ते पर चलने की सही बुद्धि देता रहे।" अब वे दोनों मित्र एक साथ ही मुस्कराये और उन्होंने सलमा व सीता से कहा- । 'उठो । तुम दोनो-मीठे चावल बनाओ और हम सब का मुह मीठा कराओ।" वे दोनों इस कठिन परेशानी से अपने आपको बहुत मुश्किल से ही निकाल पाई थी। एक-एक पल उनके लिये बडी पीडा ला रहा था। वे जात चुकी थी कि अब दिल्ली दूर नहीं । कल होते ही मुरली परदेश चला जायेगा 63 और जहाँ से वह न जाने कैसे और किस हाल मे लौट पायेगा । उन्हे लग रहा था मानो उनकी ममता की गोद के घोसले मे से वह चिडी का बच्चा उड जायेगा जिसके मानों पख निकल आये हों। उन दोनो औरतो का मन बैठा जा रहा था । वह फिर भी बडी बहादुरी से अपने टूटते साहस से लडती रहीं। आकाश मे काले-काले बादल मडरा रहे ये -मानो प्रकृति भी ममता के आसुओं मे अपने आसू मिलाने आई थी। सारी बसती मे मुरली के जाने की ही चर्चा हो रही थी। गौरी और पारो ने भी जब से सुना था मानो वे भी गुम-सुम सी हुई एक दूसरे को खाली-खाली नजरो से निहार रही थीं। गौरी की दशा तो निर्बल बालक के समान थी जिसका एक ही खिलौना हो और वह भी खो जाये । तथा पारो के जीवन की एक ही आशा थी गौरी का मुरली से विवाह करना जो अब जाती रही थी। जीवन में एक ओर का प्रेम तो ऐसा प्रेम है जो प्रेमियो को काटों पर से होकर ही गुजारता है और जिसका अत भी अवश्य दुखात ही हुआ करता है। फिर गौरी की वेदना का तो सब पीडाओं से बन्धे नाते के कारण डूब जाना सभव ही था। भूतकाल वर्तमानकाल व भविष्यकाल एक रूप मे आज ही है क्योंकि इतिहास के पन्ने कहते है कि गौरी जैसे दुखी जीव पहले थे, और है -द आगे भी होंगे । जीवन के दो अहम रग है एक हर्ष दूसरा वेदना । जीवन चली के वह दो पाटों के समान है जिन के बीच आ कर मनुष्य रूपी दाना पिस जाता है। मुरली की हालत ठीक ऐसी ही तो थी । वह भी भली-भांति जानता था कि गौरी उसे हृदय से प्रेम करती है। मगर प्रेम स्वीकार करने के लिये भी तो दय चाहिये जिसमे पहले ही एक प्रेम विराजमान हो वहा दूसरे प्रेम के आने की तो सभावना भी नहीं होती । फिर कहा जाता है कि प्रथम प्रेम संवेदनापरक होता है जो आ कर सौट नहीं पाता । तभी मुरली का प्रथम प्रेम वो था भी पानी का प्रेम । अब गौरी को वह स्वीकार किस हदप से करता। 64 प्रेम आसानी से बदला भी तो नहीं जा सकता यह वह व्यापार नहीं है जो भारी कीमत पर खरीदा जा सके । प्रेम तो प्रकृति का अश है जो मनुष्य हृदय की बेजोड धरती पर पौधा बन कर फूटता है । और जिसकी गहरी जड़ें बड के पेड की भांति फैलती ही चली जाती है फैलती ही चली जाती है। रहा सबाल मन का या मन के टूट जाने का यह तो निश्चित ही है कि मन के टूटने से पीडा के फवारे बहने लगते है । जैसा कि अपनी-अपनी पीडाओं के कारण गोरी व मुरली के साथ हो रहा था। इस मे तो वह दोनों ही विवश खडे थे उन दो किनारो के समान जो एक ही दरिया के होते हुये भी एक दूसरे से कभी मिल नहीं सकते थे । केवल उनकी एक सी भावनाये ही उन्हें दिये के रूप में समानता से मिला रही थीं। गौरी का मन तडप रहा था कि वह मुरली के जाने से पहिले एक पल के लिये उससे मिल पाती उसे देख पाती । प्रेमी का हृदय फूल से कहीं अधिक सूक्ष्म भी होता है जिसको तेज व रूखे हालात की पवन भी ठेस पहुँचा देती है। और मिलाप का एक क्षण भी उसके जीवन को सुखात कर सकता है । गौरी तो यह भी पूरी तरह नही जानती थी कि अगली सवेर होते ही मुरली फौज की ड्यूटी पर दिल्ली से भी बाहर दूर किसी अनजान स्थान पर जा रहा है जहा गौरी तो क्या कोई भी इस बसती का व्यक्ति उसे नही ढूँढ पायेगा । गौरी तो मन ही मन अपने स्वप्न कुछ इस प्रकार सजा व सवार रही थी कि वह जाने से पहले मुरली को अवश्य मिलेगी । उससे फिर कब लौट कर आयेगा, यह भी पूछेगी और मुरली के लौटने तक उसकी प्रतीक्षा करती रहेगी करती रहेगी फिर मिलने के लिये। प्रतीक्षा एक वह चीज व अनुभव होता है, जिसमे मनुष्य का समा लबा न हो कर भी लबा हो जाता है । बेचैनी के शोलों को हवा मिलती है, वह अधिक सुलगने लगते है । जीवन के ऊचे नीचे दर्द और ऊँचे नीचे लगने लगते है । इसको यदि कोई काबू कर सकता है तो वह है केवल मनुष्य का सवर । फिर गौरी में तो यह गुण भगवान ने शायद जन्म घुट्टी मे घोल कर ही पिला 65 रखा था । वह एक जन्म मुरली की प्रतीक्षा कर सकती थी- कर सकती थी- बगैर बेचैनी के अगारों पर लेटे हुये। जैसे-कैसे वह रात भी अजीब सी ख़ामोशी उदासी व खालीपन मे डूब रही थी। सारी रात ही मानो होने वाली सवेर के डर से सहमी हुई थी। जबकि रवि का प्रकाश उनके मुरली को ना-जाने किस प्रदेश में ले जायेगा और फिर मुरसी कर लौटे कब नही कोई नहीं जानता था । उन सबको भी तो जग फौज बडे बडे शब्दो से डर आता था । क्यूँ कि कई पुस्तों से इस बसती ने कभी देश की सेना को एक वीर पुत्र उपहार नहीं दिया था। वह तो सपने में भी नही सोच पाते थे कि मायो जैसे सीधे सादे व्यक्ति का पुत्र देश की सेना मे एक सिपाही हो सकता है । असल मे भगवान ने मायो की शराफत का मोल चुकाने के भाव से ही उसका पुत्र इस अहम व विशेष उत्तम कार्य के लिये चुना होगा । जिस पर बसती जितना भी गर्व व धन्यवाद करे वह कम ही होगा । क्यूकि देश के बहादुरो मे उनके मुरली का भी नाम लिया जायेगा और मुरली के नाम के साथ बसती का भी नाम जुड़ा होगा । इस प्रकार मानो वह पिछडी हुई एक छोटी सी बसती आज धन्य हो गई थी। अगली सवेरे होते ही मुरली जाने के लिये तैयार हुआ । आज उसकी आखे न-जाने फिर क्यो बानो को ही दृढ रही थी । जीवन की समस्याए कभी पुरानी नहीं होती । यू ही प्रेम की भी । जाने से पहले उसने घर मे चारो से वायदा किया था कि वह अपनी राजी-खुशी बराबर लिखता रहेगा और जाकर वर्दी मे एक फोटो भी खिचदा कर जल्दी से जल्दी भेज देगा । सबकी आखों में पानी भर आना भी स्वाभाविक ही था । घर से चलते समय मुरली ने सब के अलग-अलग पाव छू कर आशीर्वाद लिया था । दूर तक जाते मुरली को सब देखते रहे ये-देखते रहे थे। रास्ते मे खडी पारो और गौरी ने भी 66 देखा । मुरली ने रुककर पारो मौसी का भी आशीर्वाद लिया । और आज पहली बार वह गौरी से स्वय बोला. 'अच्छा गौरी । चलूँ ।' गौरी चुप रही किन्तु उसकी आखो से बहती धाराये अपना उत्तर स्वय दे रही थी। मुरली बसती पीछे छोड कर बहुत आगे निकल गया था । और फिर अपने जवान साथियो के साथ विशेष बुक रेल के डिब्बे मे जा बैठा था । जहा वह सचमुच सबको बहुत ही पीछे छोड आया था। उसके कई साथी उसी के समान गभीर बैठे थे, किन्तु कई तो मन से प्रसन थे । बार-बार मुरली की आखों के सामने मा का उदास चेहरा आ रहा था और बानो की आवाज, जिसमें वह साफ सुन रहा था वह कह रही थी न जा । मुरली । न जा। फिर कुछ देर के बाद मुरली सभला । तब गाडी पूरी रफ्तार से भागी जा रही थी, भागी जा रही थी। मानो वह अपने आदर्शों की ओर जा रही हो । मुरली अब अपने आपको शीशे का वह टुकहा मानने लगा जिस पर समानान्तर सुन्दर लकीरे खुदी हो । रहस्य की बात तो थी भी कुछ ऐसी ही कि अब वह कोई बसती का साधारण व्यक्ति तो रहा भी न था । अब वह एक फौजी था- देश का पुत्र और निधाम फों का पुतला। उसके चले जाने के पश्चात् बहुत दिन तक घर वाले सभल न पाये थे। विशेष तौर से सीता और सलमा । पारो जिसका अपना दुख भी इन्हीं की प्रकार या - मिल बैठती मुरली की बाते करतीं और रो लेतीं। मुरली के चले जाने के एक हफ्ते बाद ही हमीदा का पाकिस्तान से बत मिला कि अगले मास की आठ तारीख को बानो का यूसुफ से विदाइ निश्चित हो गया है और उसमे अनवर व सलमा को शादी आने का पूरा जोर दिया किन्तु अनवर और सलमा का तो जाने का कोई विचार न पा और न ही बन पाने की कोई सभावना थी। वह तो सब मानो शाख से टूटे हुये फल - की भाति थे। उन्हे तो अब उस ओर से संतुष्ट करने वाली कोई बात दिखाई ही नहीं दे रही थी। वे मन ही मन मुरली के चले जाने का जिम्मेदार हमीदा को ही मानते थे । यदि हमीदा बिना शर्त ही मुरली से बानो के विवाह की बात मान लेती तो यह सकट ही उत्पन्न न हो पाता । जो भी था । मनुष्य कई बार अपनी ही बदकिस्मती का दोष औरों के सर योप देता है । कुछ ऐसी ही इन की दशा थी । हर नई सुबह के रवि के प्रकाश में उन्हें सब खालीपन अनुभव होने लगा या । मानों चारों ओर से सब ने उन्हे एक कठिन समस्या में छोड दिया था। उधर मुरली ने एक महीने बाद ही घर पर अपनी वर्दी पहिन कर एक फोटो भेजी थी । जो उन लोगों ने अपनी घर की खाली दीवार पर लकडी के मेम मे जहवा कर टाग ली थी । जिसे वह दिन प्रतिदिन देखते और मन मे लगी चिन्ता की आग को कुछ अधर्म कर पाते । कहते है मरता क्या न करता। और इसके पश्चात् वह करते भी क्या । जब वह जाते मुरली को रोक भी न पाये तो और क्या कर सकते है। किन्तु उधर मुरली को तो अब फुर्सत ही कहा थी कि वह लौट कर देख सकता । घर की याद ताजा कर सकता । वह तो अपनी ट्रेनिग के दौरान कोल्हू के बैल के समान था। जिसकी आखों मे पट्टी हो और वह चक्कर चक्कर लगा रहा हो। सारी बसती बहुत बार "मुरली" को याद करती और उस की उपमा भी करती । क्योकि जब से यह बसती बसी पी- कोई भी नवयुवक देश की सेना में भरती न हो पाया था। फिर वैसे भी साँच को आँच नहीं होती। अनवर और माधो भी फुर्सत मे इकट्ठे बैठ कर हमेशा मुरली की ही बातें करके उसे याद किया करते थे। फिर सच्चे मित्र से बात करके जो मन हल्का होता है वह तो भाई से भी बात करके नहीं होता । शायद ईश्वर ने मनुष्य को दोस्त दिया ही इसलिए होगा कि वह अपना ही चेहरा मित्र-हृदय के आईने मे देख पाये । माधो बीच-बीच से टूट-सा गया था इसका भेद 68 अनवर को छोड और कोई नहीं जानता या। फिर अनवर यह भी जान रहा या कि माधो की सेहत पहले की-सी नहीं है। अनवर माघो का हाथ पकड कर कहता- " । अल्लाह पे भरोसा रख मेरे दोस्त । वह ही बच्चे की सभाल करेगा।" अनवर मेरे दोस्त । जीवन का सत्य बर्दाश्त करना कितनी कठिन समस्या है। 'मै जानता हूँ । मगर परवरदीगार ही वह ताकत भी देता है जिससे सच बर्दाश्त करने की ताकत आती है। " इस तरह वे दोनों एक उस बेडी के सवार थे जो न जाने कहा जा रही थी और कहा जा कर उसे रूकना था । अन्त में वे दोनो ही ईश्वर के हुकम के आगे झुक गये थे। और वह करते भी क्या ? सारा ससार ही एक समस्या है, जिसके हाथों मनुष्य अजीब खिलौना बना हुआ है । वह बुद्धिमान होते हुये भी अपनी बुद्धि का प्रयोग अपनी इच्छाओं के अनुकूल नहीं कर सकता। क्योंकि सारा ब्रह्माण्ड ही ईश्वर के हुकम से है -विधाता ही प्रकृति के रूप में सामने आता है। वह ही अनवर और माधो जैसे विवश प्राणियो को उठने की शक्ति देता है। वैसे तो एक हूबने वाले को तिनके का ही सहारा बहुत हुआ करता है । किन्तु मित्र का सहारा तो विशेष महान होता है। जिससे मनुष्य कभी हूब ही नहीं सकता। नाव से तो लोग पार उतरते है। बसती के सारे लोग बारी बारी से मायो व अनवर के पास आकर पूछते- ' कोई खत आया मुरली का ? कहाँ है वह आज कल ? कैसा है मुरली?" आदि आदि । मानो कोई बीमार का पता कर रहा है। इसलिए कि देश में चारों ओर जग के ही चर्च हो रहे थे। उन दिनों पडौसी देश पाकिस्तान अपनी जिद की कमाा कसे खडा या, भारत के विरुद । इस प्रकार हालात कुछ अच्छे नहीं चल रहे थे। एक अनपट से अनपट भी जानवा था कि ग' कभी भी छिड सकती है। जहा भी पार आदमी इकट्ठे होते चो मह जग का विषय अवश्य ही चलता । इस प्रकार दबी-सी एक अनोखे भय की लहर दौडी हुई थी हर-एक के मन व दिमाग । फिर जहा डर होता है, वहाँ प्रवाह अपने आप ही उत्पन्न हो जाता है। राजनीति की प्रथम सूझ व समझदारी एकता और ताकत की होती है। जहा सब लोग मिलकर एक ही समय पर एक ही बात का खडन करे वहा एकता उत्पन्न होती है । तो इस प्रकार अब छोटी सी इस बसती मे भी पहले से कहीं अधिक एकता-सी आ गई थी । दूसरे शब्दो मे यह कह लेना भी तो गलत नहीं होगा कि मुरली अब केवल माधो और अनवर का न होकर सारी बसती का ही मुरली था। जब से हमीदा का पत्र आया या मन ही मन अनवर और सलमा और भी दुखी थे। वे अपनी ही आशाओं के स्वप्न अपनी ही आखो से टूटते देख रहे । फिर बानो के विवाह पर जाने के तो हालात ही नहीं थे । जबकि माधो और सीता अकेले पड गये थे । अपने मुरली के बगैर उनको सभालने की जगह उनके हाल पर अकेले कैसे छोड़ा जा सकता या उनके इस खालीपन को तो मित्रों के सिवा कोई भर भी नहीं सकता था। वही भर सकता था जो उनके मन के अन्दर की बात जानता हो । मुरली के जाने के बाद तो अनवर और सलमा भी गभीरता की गहराईयो मे उतर चुके थे । वे भी जब इकटठे बैठते थे तो मुरली को ही याद किया करते । उन दोनों को भी मानो अपना भविष्य साफ दिखाई नहीं दे रहा था क्योकि यह तो कयन भी है- । मौत न जाने बूढा, न जाने जवाा। फिर मौत नाम तो सेना व जग से भी कई गुना अधिक भयानक है। यह तो कठोर सच्चाई का वह सागर है जिसमे एक बार डूब जाने से व्यक्ति दुबारा उसी रूप में उभर कर बाहर नहीं आ सकता । मौत बलवान है इतनी भारी बलवान कि जीवन रूपी उपन्यास के अन्तिम पन्ने पर लिखा ढाई अक्षरी का छोटा सा शब्द है अन्त 70 हर धर्म मे हर प्रकार के व्यक्ति मौत को तो मानते ही है, वह भगवान को भले ही न माने । इस अजीब समानता वाले शब्द को ही मौत कहा जाता है। अनवर और माधो अपने अपने प्रवाहो सहित, मन ही मन सबसे अधिक चिन्तित भी इसी शब्द के कारण थे । वह मुरली को जीवित देखना चाहते थे-अपनी अपनी मौत के बाद भी यही उन सबकी आशाये भी थीं। उधर मुरली कहा था, कैसा था इस सबध मे अब उसके एक फोटो और पत्र भेजने के बाद पता नहीं चल रहा था। फिर भी जो अपने लोग होते है वह तो सदा शुभकामना ही करते थे। उनकी आशाओं के चिरागों की रोशनी ही उन्हे राह भी दिखाती है । मनुष्य के जीवन मे यदि आशा नाम की कोई चीज न रही होती तो बहुत ही सरलतापूर्वक निराशा की कालस उसे एक ही सारगिल गई होती। फिर आशाओं से साथ बधे स्वप्न भी तो है जो हर व्यक्ति के जीवन में हर्ष का रग भरते है । यदि ये स्वप्न न हो तो जीवन फीका और बे-रगा-सा हो जाये। आज भी वह दो प्रवाह जाते मुरली के वैसे ही देख पाते जैसे कि वह वास्तव में गया था । और उसके लौटने की आशा आज भी नयी की लियो बनी हुई थी । उसके लौटने पर वह अपनी खुशियों का सिगार कर सपने सजाने मे लुप्त हो जाते । कल क्या होगा? यह तो कोई नहीं जानता । किन्तु वर्तमान का आज तो मनुष्य के वश में है ही । उसको जैसे चाहे सिगारे बनाये, सजाये यह तो हक उसको है ही ग्यारह अनवर अपने टूटते मित्र को खड़ा करने का साहस बनाए हुए था । फिर हमदर्दी मित्रता की पहली पहचान होती है । वह तो अपने मित्र के लिए कुछ भी कर सकता था । मुरली के जाने का गम अनवर को भी कोई कम तो था किन्तु यदि वह भी औरो के समान अपनी ही आसुओं की धाराओं में बह जाता तो बचाने या उठाने वाला उन चारो के बीच फिर रहता ही कौन ? औरो व दूसरों को हिम्मत देने वाला स्वय भी हिम्मती होता है। माधो का रंग फीका पडता जा रहा था । शरीर सूखता जा रहा था । न-जाने उसके अन्दर किस रोग की जहें फूट रही थीं । थोड़ी-बहुत दवा-दारू तो मानो कुछ कर भी न पा रही थी। इस समय अनवर से जो भी थोडा बहुत बन पा रहा था वह मन से कर रहा था माधो के लिए । मनुष्य के पास सदा कुछ भी करने के लिए दो ही कारण होते है एक तो अच्छा कारण दूसरा असली व सही कारण । फिर मनुष्य तो कर ही सकता है जो वह समय आने पर करता है किन्तु उसका फल तो ईश्वर के ही हाथ में होता है -चाहे बुरा हो या भला । प्रश्न मनुष्य की हार-जीत का नहीं होता । प्रश्न होता है उसके साहस व हिम्मत का ! फिर दुस व पीडा में किसी के भी काम आना मनुष्य को न भुला देने वाली याद के समान जाता है। अनवर की मानसिक दशा खुशियो के रग छोडती जा रही थी । वह दिन प्रतिदिन अपने मित्र के कष्ट को मानो अपने जिस्म पर सहन कर रहा था। किन्तु फिर भी वह ऊपर से माधो को बार-बार एक ही बात समझाता कि वह अपने मन पर कोई भी किसी प्रकार का बोझ न रखे। मुरली की कोई चिन्ता न करे । किन्तु आप ही अनवर यह भी भली-भाति जानता था कि एक पिता को यह सब कह देना आसान है- सही शब्दो मे पिता के लिए यह सब मान लेना या करना आसान व सरल नही हो सकता । पुत्र पिता के बुढ़ापे की वह लाठी मानी जाती है जिसके बगैर उसका सहस टूट जाता है और पिता स्वय भी टूटने लगता है। इस दशा में दह पिता होकर भी तो मा व औरत की कमजोरी के कन्धे से कन्धा मिला कर खडा था 1 अनवर माधो की ये सभी भावनाए बाप न होकर भी अनुभव कर रहा था- क्यो कि वह सच्चा मित्र था 72 । माधो की हालत दिन प्रतिदिन बिगडती ही रही। उसका बुखार टूट नहीं रहा था । अनवर बराबर उसकी दवा दारू में लगा हुआ था । डाक्टर के कहने अनुसार उसका निमोनिया बिगड गया था। और हकीम कहते थे कि उसे कोई अन्दर का बुरा मर्ज है । जो भी था- अनवर देख रहा था कि उसका दोस्त अवश्य तिल-तिल करके मर रहा था। फिर एक भयानक रात तो माधो का दाया पैर ही मारा गया। दूसरे अर्थों मे उसे लकवा हो गया था । उसकी जुबान भी बोलने से जवाब दे चुकी थी। अब तो मानो अनवर पर पहाड ही टूट पड़ा हो । वह रात-दिन अपने दोस्त के श्वासो की खुदा से भीख माग रहा था । माधो का दुख उससे सहन ही न हो पा रहा था । माधो की बीमार आखो से जब पानी के फव्वारे फूटते तो अनवर के रक्त की बूदे भी सूखने लगतीं । फिर आस-पास के लोगो ने माधो को कबूतर का शोरबा देने को भी कहा । किन्तु अनवर अपने अजीज को बचपा से जानता था कि वह वैष्णव है- तो उसे यह वस्तु तो दवा के तौर पर भी देना वह गुनाह मानता था । अनेक बार वह देखता या माधो कुछ कहना चाहता था पर कह नहीं पा रहा । अनवर यह भी जानता था कि माधो मुरली के बारे में ही पूछ रहा था। तो अनवर उसे धैर्य की एक किरण दिखाता हुआ कहता- 'मुरली को खत लिख दिया है दोस्त । चिन्ता मत कर, वह-- वह शीघ्र आ जाएगा। फिर अनवर ने सब कारोबार छोडकर धैर्य से अपने मित्र की सेवा भी की । सहू के घूट भी पिए । किन्तु अनेक बार वह बच्चो की भाति रोया भी था। और एक बार माधो ने अपने चलते हाथ मे दोस्त का हाथ लेकर चूमा भी था। दोनों की आखो में आसुओं की धाराए भी वही थी। अनवर देख रहा था, माधो स्वय जीने की इच्छा कर रहा है, किन्तु मौत दिन पर दिन उसे अपनी ओर खींचती हुई अनवर का दामन खाली किए जा रही थी। 73 दोनों की दोस्ती के जीवन मे शायद अब कुछ ही श्वास बचे थे । सीता की भी बुरी हालत थी। उसे भी न जाने जैसे-कैसे करके सलमा थामे हुई थी। फिर ससार मे मनुष्य मित्र बनाता नही पहचानता है । और यह पहचान कोई साधारण पहचान नही हुआ करती । मित्र की पहचान का मतलब है अपनी पहचान करना । अपना सारापन देकर ही मित्र प्राप्त होता है और एक सच्चामित्र सारा जीवन जी लेने के लिए काफी होता है। सारे जीवन की पूजी सच्चा मित्र ही होता है जिसे केवल मौत के बगैर कोई छीन भी नहीं सकता। फिर मित्र के खो जाने के पश्चात् मनुष्य सही अर्थों में निर्धन हो जाता है । मित्र एक सूत्र मे बन्धे दो मोतियों के समान होते है। अनवर ने माधो के जीवन की भीख न-जाते कहा-कहा मागी थी । इतनी भीख तो उसने खुदा से अपनी औलाद मागते समय भी न मागी होगी जितनी अब भागी थी। मगर उसकी हर दुआ और फरियाद शायद आकाश चादर को छू कर लौटती रही होगी और उसके परवरदीगर तक न पहुच पाई होगी। एक सुबह रवि का प्रकाश फैलते ही - अनवर की दुनिया मे सदा-सदा के लिए अन्धेरा छा गया था। उस दिन इत्तिफाक से दीवाली का दिन था - और उसके अपने मित्र का जन्मदिन भी । माधो जिसे पहले से ही हस्पताल में दाखिल किया हुआ था ने तो अपनी अन्तिम सास भी पूरी की । अनवर बाहर विवश बैठा रहा । और जाते दोस्त को रोक भी न पाया । मानो उसके अपने जीवन का मकसद ही खत्म हो गया हो। वह बुरी तरह टूट गया, खत्म हो गया या माधो के बगैर । मायो की लाश घर पर लाई गई । अब सवाल या मुरली का जो अभी नहीं आ पाएगा । न तो उसका कोई सही ठिकाना ही पता चल रहा था । जहा उसे यह खबर भेजी जा सकती फिर भी अनवर ने उसे खत व दो तार भी डाले थे जिनका कोई उत्तर नहीं आया था। फिर आता भी कैसे वह तो अपनी यूनिट के साथ ट्रेनिग के पश्चात् ही कश्मीर घाटी पर जा चुका था। 74 जहा जग की तैयारिया हो रही थी । पाकिस्तान जान बूझ कर हिन्दुस्तान से लड़ाई मोल लेने पर तुला हुआ था । आये दिन पाकिस्तान की धरती पर तो हिन्दुस्तान के प्रधानमत्री के पुतले जलाए जा रहे थे । राजनीतिक सबन्ध भी टूट चुके थे । जग के काले बादल दोनों देशो पर मडरा रहे थे । और कश्मीर की हद पर जग तो आरम्भ हा भी चुकी थी। अनवर यह बाते जान कर भी बीमार माधो के आगे अनजान बना रहा था । और करता भी क्या । यदि मित्र को बचा नही सकता था तो उसे चैन से तो मरने दे ही सकता है । अन्त समय तक एक झूठी आशा की लौ लिए वह दोस्त के सामो खड़ा रहा था। उसका धैर्य यह कह कर बधा रहा था - कि मुरली शीघ्र ही आने वाला है। किन्तु सच तो यह था कि वह नही आया था । प्रकृति का नियम भी कितना विचित्र है। कि जिस दोस्त से जीवन भर न कुछ छिपाया और न झूठ बोला उसे सदा के लिए जाते समय वह सब करना पड़ रहा था। इसलिए कि वह चैन से मर सके। यही बात अनवर को कांटे के समान चुभ रही थी । और शायद अन्तिम श्वास तक चुभती रहेगी। माधो की मौत ने अनवर की आशाओ की मौत भी कर डाली थी । अब वह आत्मा के बगैर पड़ी एक लाश के समान हो कर रह गया था। किन्तु साथ ही उसके कन्धा पर सीता व मुरली का पूरा बोझ भी तो आन पडा था । वह इस दोनो के लिए सलमा से भी अधिक जीना चाहता था। इन दोनों से उसके स्वर्गवासी दोस्त का नाम जीवित था, मानो उन दोनों के रूप में। तो वह जखमी शेर की भाति अपना साहस बनाए हुए था । और जहा चाह वहा राह होती है । जीवन स्वय एक जग है -जिसे हर मनुष्य अपने अपने क्षेत्र मे सडता है । इस जग का सब से बडा हाथियार ही साहस है । 75 निराशा का भाव लोगो को विद्या देना नहीं होता । भाव होता है, वह सब सिखाना जो वह नही जानते, नहीं करते । विद्या का सही अर्थ मन की सूझ (सोच) की उन्नति होती है न कि उसे रट लेना । मनुष्य को अपने विचार तो उनति की ओर सरकाने पड़ते है- उन्नति स्वय चल कर नहीं आती । अब अनवर के पास भी कुछ ऐसी ही समस्या थी । कि वह अपनी सोच को आशा नाम की उनति की ओर ले जाए । आशा थी- मुरली की- उस के ठीक ठाक लौटने की । खराब से खराब हालात में भी मनुष्य खडा रह सकता है – हर घडी लडाई का मुकाबला करने के लिए- यदि उसके हाथ में आशा का चिराग हो - || ? बारह अब एक और बड़ी समस्या जो अनदर के सामने थी कि माधो के मृतक शरीर को कब तक रखा जाए ? जब कि मुरली का कोई अता-पता भी नहीं लग रहा था । अन्त मे सबकी सलाह से फैसला हुआ कि अन्तिम रस्म कर दी जाए। अब अगला प्रश्न उठा कि उसकी अन्तिम रस्म कौन करे ? जब कि माधो का कोई रिश्तेदार न था और न ही सीता का । बस उसका तो जीवन मे ले दे के गर कोई था तो केवल अनवर । मगर अनवर उस के धर्म का व्यक्ति न था । और न ही अनवर के धर्म में लाश को जलाने का रिवाज ही है। तो सोचा गया कि सीता ही यह रस्म कर सकेगी। किन्तु सीता ने यह काम तो आवर के कन्धों पर डाल दिया था। जब कि अनवर को तो इसका इनकार न था किन्तु उस के धर्म वाले इस बात का विरोध करने लगे। उसके धर्म के ठेकेदार तो आग लगाना काफिरों की रस्म मानते थे । उपर हिदु धर्म भी दावा कर रहा था कि एक मुसलमान हिन्दु की अन्तिम रस्म हीं कर सकता। 76 । किन्तु अनवर इन सब झगडों से ऊपर का व्यक्ति था । वह तो प्रेम और इन्सानियत को ही अपना धर्म मानता था। उसने सीता की बात टाली नही थी। बसती के सारे मुसलमान नाराज होकर लौट गये और हिन्दू आपस में काना-फूसी करने लगे। पडित जी ने " राम राम " कहते हुए अनवर के हाय मे आग की लकड़ी यमा दी और अनवर ने अपनी जान से भी प्यारे दोस्त को आग के हवाले कर दिया । उस समय अनवर की मानसिक दशा तरस योग्य थी । आखो से पानी की धारायें बह रही थीं और मन से सास यह कह रही थी। या खुदा । या परवरदीगार । मेरे दोस्त को बहिशत नसीब करना । उसे अपनी दरगाह में जगह बख्शना । यह रस्म भी हुई । अब फूल चुनने पर तो कोई भी हिन्दु नहीं पहुचा था क्योंकि वे भी सीता और अनवर से नाराज थे। जैसे-कैसे करके सीता और सलमा के साथ अनवर ने माधो के फूल सभाल लिए । अब हरिद्वार मे डालने भी तो अनवर को ही जाना था। सारा रास्ता वह रोता रहा । उसकी नजरे दोस्त के फूलों से अलग न हो पाई थीं । जब वह हरिद्वार पहुंचा तो पंडित जी ने रस्म व पूजा करने से मना कर दिया और कहा- 'ऐसा भी कभी होता है भला कि एक हिन्दु के फूल मुसलमान लाए धर्म कोई मजाक है क्या ? तुम पूजा नहीं करवा सकते । किसी वेद शास्त्र में धर्म का ऐसा अपमान करने को नहीं लिखा गया । और यदि तुम जिद करके ऐसा कर भी लेते हो तो यह भगवान को कभी कबूल नहीं हो सकता- और जिससे उस आत्मा को शान्ति नही मिल सकती । अनवर की आखों में फिर पानी भर आया और वह पूछने लगा। ? 77 "क्या प्रेम-दोस्ती स्वय मे एक धर्म नहीं है पडित जी ? क्या इन्सानियत ही सबसे बड़ा धर्म नही?' पडित ने तेज आवाज मे कहा होगा ! तुम्हारी किताबो मे होगा । मै बहस नहीं करना चाहता-जाओ मै पूजा नहीं कर सकता। अनवर ने अब और किसी भी पडित के पास जाना उचित नहीं समझा और वह फूल लेकर हरेक मदिर मे जा जा कर सजदे करता रहा कुछ दान भी करता रहा । और अन्त में आने से पहले उस गगा मा की गोद में दोस्त के फूल अर्पण करते हुए हाथ जोड कर कहा ऐ । गगा मईया | यदि तू हिन्दुओं की पूज्य देवी है तो मुसलमानो की भी अवश्य है । मै तुम्हे प्रणाम करता हूँ, और रस्म अनुसार अपने दोस्त के फूल तुम्हे अर्पण करता हूँ । इन को अपने पवित्र चरणो मे स्थान देना । और यदि मुझ से कोई भूल हुई हो तो मुझे भी अपना ही बेटा मानते हुए क्षमा करना । मै भी उसी देश और पावन धरती का बेटा हू- जिस का मेरा माधो था। फिर एक बार उस की आखो से पानी बहने लगा । आने से पहले उसने गगा के पवित्र जल से मुह भी धोया और अपनी जान से भी प्यारे दोस्त के फूल तैरते हुए दूर तक देखता रहा । देखता रहा । लाल रंग की वह गठरी जिस मे वह पूरे माधो को समेट कर लाया था वह भी तैरती जा रही थी तैरती जा रही थी। एक पल तो अनवर को लगा आज माधो के शरीर के अन्तिम हिस्से भी उससे अलग हो गये । मगर दूसरे ही पल उसने अपने आप पर काबू डालते हुए सोचा। माघो की आत्मा तो नहीं मरी- उसने तो क्वल चोला बदला है । आत्मा तो नाशदा नहीं होती। जिस्म तो किराये के मकान की भाति होता 78 है। जो कभी-न-कभी हर व्यक्ति को छोड़ा ही होता है । चाहे वह किसी भी धर्म का क्यो न कहलाये। लौटते समय सारा रास्ता वह ऐसी बड़ी-बड़ी बाते ही सोचता रहा था। वह मानता था कि माधो की आत्मा अमर है वह तो कभी मर ही नहीं सक्नी। सारे रास्ते एक और भी आशा थी जो उसे बाघे रही कि मुरली भी जार अब तक आ गया होगा। किन्तु जब वह वापस घर पहुचा तो देखा कि मुरली नही आया था न ही उसका कोई खत ही । समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे । यदि पता करने किसी शहर मे जाए भी तो पीछे सीता और सलमा को कौन सभालेगा ? फिर सलमा भी बीमार रहने लगी थी। उसे दमे की शिकायत हो गई थी। अजीब उलझन मे अनवर फसा हुआ था । माधो के बगैर वह वैसे ही पूरा अकेला हो चुका था। बसती के कई लोग तो मन ही मन खुश भी ये कि मौत ने इन दोस्तो को अलग तो किया । उनकी दोस्ती पर लोग जलते थे। शायद इसलिए कि ऐसे सच्चे मित्र उन्होने कभी देखे-सुने नहीं थे। संसार कठोर हृदय वालों का एक वह घर है - जिसमे सहानुभूति कम और मतलबी लालसा अधिक होती है। यह समाज जो हमारा ही बनाया हुआ है- दुखो के सागर मे हमे ही डूबने से नही बचा पाता । सही अर्थो मे अनवर का अब कोई हमदर्द तो रहा भी न था । अब तो अनवर उस पल की इतजार मे या जब फिर वह किसी नयी धरती, नये जीवन व नये रूप मे अपने दोस्त से मिल पायेगा और कितनी अजीब सी बात होगी कि वह नये जन्म में भी झट से एक दूसरे को यू ही पहचान लेंगे जैसे उन्होने एक दूसरे को इस जन्म मे पहचाना था । वह अपने श्वासो की बजड भूमि आज ही समर्पण के लिए खुदा की भट कर देता यदि वह जानता कि उसे उसके माधो मित्र से अभी मिला दिया जायेगा | 79 माधो की मौत के पश्चात् अनवर को लग रहा था- मानो सारे नरक का दुख खाली होकर इसके अपने हृदय की सीमा मे समा गया हो, अपने दोस्त के बगैर । इधर विधवा सीता के आसू उससे देखे नही जा रहे थे-उधर मुरली की जुदाई बर्दाश्त नही हो रही थीं। जो अपने पिता के देहान्त पर भी न पहुच पाया-न जाने वह किस कठिनाई की जजीरो में जकडा होगा । सलमा स्वय पति को साहस नहीं बधा पा रही थी। इन सब समस्याओ का बोझ अब अनवर ने अपने मन के कन्धों पर ही तो सहन करना था । वह मानो जीवन मे कर्तव्य के टागे का टटू बन गया हो- जिसने तो बोझा खीचना ही था क्यो कि यह उसके भाग्य मे या। व्यावहारिक रूप से माधो के जाने के पश्चात् सब जिम्मेवारी पडनी भी तो अनवर पर थी क्योकि वह ही तो अब इस परिवार में सब से बडा तथा अकेला व्यक्ति था । लम्बे जीवन से कही अधिक अच्छा होता है वह छोटा जीवन जो कर्तव्यों से भरा हो । अनवर के सोच में एक ही विचार बार-बार मडराता रहा था कि वह किसी प्रकार भी अपने उन कर्तव्या से पीछे न जाए-जो जाते समय माधो की डूबती आखें कहना चाहती थी। जीवा का यह तजुर्बा इसे कुछ और ही दिखा रहा था कि मनुष्य के लये जीवन काल मे कैसी भी मंजिल आती है जब फर्ज- हार कर भी यह नहीं कह पाता कि वह चूक गया है । क्योकि कर्तव्य तो जीवन में कभी खत्म ही नहीं होते । और यदि खत्म हो भी जाए तो जीवन ही खत्म हो जाता है । फिर पढाने वाला तो स्वय सीखता है । जो सीखता नहीं वह सही शब्दों में पढता ही नहीं है। 80 उघर जब से भगू ने देखा कि मुरली फौज मे भरती हो गया, माधो मर गया और अनवर स्वय बहुत परेशान सा रहता है तो वह मानो और भी शेर हो गया था। वह उठते-बैठते यही ताकता था कि कब वह अकेले में गौरी से दो बात कर पाये । वह एक घटिया प्रकार का व्यक्ति होने के नाते घटिया कामो का भी कारीगर ही था। फिर एक शाम उसे कुछ ऐसा अवसर मिल ही गया । जब उसने देखा कि अपने घर के बाहर वाले चबूतरे पर बैठी गौरी कुछ वर्तन माज रही थी तो उसने पास जाकर खडे होकर कहा- 'कहो कैसी हो गौरी " . ठीक चाचा। क्या है तुम सदा अन्धेरी कोठरी में ही पड़ी रहती हो । बाहर निकला करो । दुनिया देखा करो । तुम्हारी मा ने तो तुम्हे सचमुच कुए का मेढक ही बना छोडा है । चलो तुम्हे सरकस दिखा लाऊँ तुमने तो कभी देखी-सुनी भी न होगी । यहा पास में ही लगी है -लालकिला मैदान मे | चलो दिखा ला" कहते है बुरे से डर नही होता उसकी बुराई से होता है । ठीक ऐसे ही हाल में मानो बिचारी गौरी धवराई और उसे लगा कि वह उसे उठा कर ही न ले जाए। तो इस डर से गौरी ने बर्तन वहीं छोडे और घर के अन्दर दौडती हुई बोली- मुझे नहीं देखनी कोई सरकस-वरकस ।' अब मन ही मन भगू जल कर राख हो गया था और अपने आप मुह से 1 बडबडाया- "ठीक है इसे भी देख लूगा । कहा तक भागेगी भला । सीधी उगली से घी नहीं निकलता। 81 वह अपने क्रोध में स्वय ही जलता हुआ बाहर चला गया था। जब से तो न-जाने स्यो गौरी का भय और भी बढ़ गया । उस दिन से तो गौरी वहा बर्तन माजने से भी डरने लगी थी। जब कभी उसकी मा को देर होने लगती, तो वह भाग कर सीता मौसी के घर चली जाया करती। मुरली के चले जाने से उसके स्वप्न तो छिन्न-भिन्न से हो ही चुके थे। किन्तु कहते है जब तक सास तब तक आस । वह यह भी जानती थी कि बानो जा ही चुकी है-उसका विवाह हो ही रहा है और अन्त में तो मुरली का विवाह कभी न कभी होगा ही । और मन ही मन उसकी पूर्ण आशा थी कि विवाह अन्तत गौरी से ही होगा। बस इसी आस के दिए की रोशनी में गौरी अपनी राह देखती चली जा रही थी। पारो मन ही मन तो निराश हो ही चुकी थी मुरली के जाने के पश्चात्-किन्तु वह अपनी पीडा के रोग से बेटी को रोगी भी नहीं करना चाहती थी- तो इसी कारण वह मुह पर निराशा के चिन्ह भी तो नही उभरने देती थी । उसकी बेटी को उसका आकार सदा सन्तुष्ट दिखाई देता था । यह तो मानने योग्य बात थी - कि एक मा अपने बच्चे की खुशी के लिए अपने ही घावो का लहू स्वय हस के पी जाती है । जैसे कि पारो कर रही थी। ससार के सभी लहू के रिश्तों मे बडा रिश्ता मा का ही होता है । गौरी यदि आज तक सुरक्षित रही भी तो केवल मा के कारण ही नहीं तो कभी का उसे मगू जैसा दरिदा निगल गया होता। मगू हरफनमौला तो था ही जो कभी विश्वास का पात्र तो हो ही नहीं सकता था । यही कारण था कि एक दिन जहा पारो काम करती थी उनके घर मे विवाह था । काम अधिक होने के कारण उसे उस रात विवाह के घर मे ही रहना था । जिससे वह गौरी को बोल गई थी कि उस शाम रात होने से पहले ही गौरी सीता मौसी के घर चली जाए। और वही वह रात भर रहे अगली सुबह होते ही वह लौटती हुई उसे वहा से ले आयेगी। 82 चीख या " कहते है दीवारों के भी कान होते है । जो भी था, किन्तु आश्चर्य की बात थी-कि मगू एक सप्ताह से अपने घर पर भी नहीं था । इस कारणवश गौरी का उत्साह भी बना हुआ था। सर्दी के दिन थे जो जल्दी ही ढल भी जाते है । गौरी ने शीघ्रता से रोटी बनाई- खाई-ऋऔर जाने की तैयारी की । किन्तु निकलते निकलते न जाने कैसे सात तो बज ही गये थे। उसने बाहर निकलते ही देखा चारो ओर अन्धेरा था और साथ ही जाडा व अजीब-सा सन्नाटा भी। पल भर के लिए तो वह हर सी गई किन्तु मगू के न होने की बात ने अवश्य उसे साहस दिया था। और वह तेज-तेज कदमो से घर के मोड तक पहुची ही थी । न जाने कहा से अन्धेरे का सीना चीर कर दो भयानक दरिदे पीछे से आए और गौरी पर यू लपके मानो बिल्ली चूहे पर । वह सहम सी गई और अभी उसके मुह से बचाओ " शब्द भी न निकला था, कि उसके मुह में कपडा दूस दिया गया और साय की साय गौरी बेहोश हो गई थी। उसके पश्चात् क्या हुआ वह नहीं जानती थी। किन्तु सारी रात वह न लौटी थी । सीता सोच रही थी कि पारो आ गई होगी तभी गौरी सोने नहीं आई । उधर पारो निश्चय पूर्वक विवाह के घर का काम किये जा रही थी । क्योंकि वह जानती थी, कि उसकी बेटी सुरक्षित सीता मौसी के घर मे पडी सो रही होगी। किन्तु मनुष्य सोचता कुछ और है और होता कुछ और ही । सुबह जब सीता के घर लौटी और बेटी को वहा न पाकर कापने लगी । उन दिनों सलमा बहुत ही बीमार चल रही थी। घर पर आ कर देखने से तो पारो के मानो प्राण ही निकल गये । गौरी नहीं थी । सारी सती मे गौरी के न होने की खबर फैल गई । अनवर ने पुलिस में भी रपट लिखाई । किन्तु गौरी की कोई खबर कहीं से नही लग रही थी । आधे लोग पारो के दुख में दुख मान रहे थे। वह तो गौरी को ही आचरण माद रहे थे और आधे तो तरह-तरह की बाते भी है ये कहते थे उसे दो | Aur गौरी ही किसी के साथ भाग गई है। वैसे दाल म काला भगू की ओर से तो था ही। किन्तु मगू का तो अपना ही पता नहीं चल रहा था। गौरी के गम मे पारो बीमार पड़ गई थी और दो मास मे वह मर भी गई थी । जीवा धारा ही कुछ ऐसी है- चलती है तो बड़ी-बड़ी वेदना पीडा मे भी चलती ही रहती है और जब रूकती है तो एक क्षण में ही एक भी जाती है। सलमा को सास की बीमारी तो थी ही - दवादारू भी असर नहीं कर रही थी । एक रात उसे ऐसा सास हुआ कि फिर ठीक ही न हो सका था । यह उसका जान लेवा सास था। जिसकी लहर मे वह बह गई और सदा के लिए सास के रोग से मुक्त हो गई। अनवर और सीता अकेले ही इन सब दुखो से जूझते रहे- लडते रहे और सहते भी रहे । बस्ती मे गौरी के जाने से अजीब सी गभीरता-सी छा गई थी-चारो ओर । सलमा की मौत का दुख भी अनवर के लिए कोई छोटी बात न थी । यदि सलमा ही कुछ और समय जीवित रहती तो निस्सदेह अनवर को सीता की चिन्ता से कुछ राहत मिलती । फिर जीवन साथी एक यह के वह दो मुसाफिर होते है जिन के इकट्ठे चलने से राह कुछ आसान सी अनुभव होने लगती है। बीता समय आने वाले समय का वर्तमान समय के समान होता है । अनवर के जीवन की वह ठडी छाव थी सलमा, जिसकी छतरी के नीचे वह अपनी परेशानियों की धूप का तपता हुआ पल दो पल चैन लिया करता था । आज सलमा के बगैर उसे ऐसा ही लग रहा था- कि मानो किसी ने वह सुख का वृक्ष ही काट डाला हो- जिसके नीचे बैठ कर उसने जीवन के अनेको वर्ष बिताये थे । पली के प्रेम व स्नेह की सीमा से दूर निकल कर वह आज सूखे जीवन का अनुभव चाख रहा हो - जिसमे अनवर को देने के लिए कुछ भी न बचा हो । देखते ही देखते सलमा भी उसके लिए एक बीती कहानी होकर रह गई थी। जिसे वह उठता-बैठता याद किया करेगा- उसकी हर बात याद आ कर अकेले रह गये अनवर को चुभा देती रहेगी। 84 जब से सलमा अनवर के जीवन में आई थी, उसके जीवन का रंग ही निखर आया था । इन के बीच भी एक ऐसे प्रेम की डोर बन्धी हुई थी जो इन्हे टूटने नहीं देती थी । औलाद के न होने पर भी एक दिन अनवर के मन में यह विचार नहीं आया था कि सलमा से या सलमा की बेट-बेरी से उसे किसी भी प्रकार का कोई गिला था । वह सही अर्थों मे सलमा को अपनी पत्नी से बढ कर एक मित्र मानता था। ऐसा मित्र जो उस के दिन-रात प्यार से रग देता था । आज वही मित्र भी अनवर को सदा सदा के लिए छोड़ कर चला गया था। सलमा अनेक बार अनवर को कहा करती थी- मेरे मरने के बाद आप उदास मत होना मै आप को कभी उदास नहीं देखना चाहती- उदासी तो निर्बलों के लिए होती है- आप जैसे बहादुरो के . लिए नहीं। आज भी अनवर को साहस की वह बात भूल न पा रही थी। चौदह उधर आठ तारीख का बानो का विवाह भी आ गया था । इस तरफ से कोई शादी में नहीं पहुंचा था । हमीदा मन-ही-मन जानती भी थी कि वे उससे क्तिना नाराज है। किन्तु वह औरों के सामने माधो की मौत का बहाना लगा कर अनदर व सलमा के न-आने का कारण स्पष्ट कर रही थी। उसे सलमा की मौत का तो पता भी न या । अनवर ने शादी की खुशी मे मौत का गम खोलना उचित न समझते हुए किसी को सूचित भी नहीं किया था । वह अपनी सलमा का गम अपनी ही जान पर सह रहा पा । माधो व सलमा की मौतों ने उसके दो टुकड़े कर डाले थे । फिर भी वह कार्य क्षेत्र से भागा नहीं या । वह सीता और मुरली की ओर अपनी जिम्मेवारिया निभा रहा था । वह अपनी वेदना के चेहरे को फर्ज की चादर से ढके सब काम किये जा रहा था। - 85 । माधो की दुकान भी सभालने की कोशिश करता-ताकि सीता के रोटी पानी का खर्चा न बन्द हो जाए । अब वह सीता का बाप भाई सब कुछ ही तो था। आठ तारीख को लाहौर शहर की एक कोठी में पूरी घूमधाम से यूसुफ मिया दुल्हा बने बानो को विहाने जा रहे थे । बडी-बही कारों की कतारें- बडे-बडे आदमी- अफसर यूसुफ की बारात के बाराती थे । वैसे ही हमीदा के घर पर भी पूरे जोर-शोर की रौनक जमी हुई थी । बानो का मन बेहद उदास था । वह अनेक बार रो चुकी थी। उसे आज दार-बार मुरली ही याद आ रहा था । वैसे भी जब मनुष्य का मन उदास होता है तो उसे कुछ अच्छा भी नही लगता । इराक से बेटी के हाथ पीले करने उसके अब्बा भी आये हुये ये। बानो की कई सहेलिया भी उसे घेरे हुए थीं । फिर भी वह इतनी उदास थी कि उसके आसू रूक न पा रहे थे। फिर उस की एक सहेली ने फे रन ही ब्यूटी पार्लर से बुलाई गई लड़की, जो आई हुई थी से कहा नरगिस आपा बानो का मेकअप रोने से खराब हो गया है इसे फिर से ठीक करो।" कुछ समय पश्चात् ही हमीदा ने आकर कहा । 'चलो चलो | बानो को निकाह के लिए लाओ, काजी साहिब याद फरमा रहे है। सहेलियों ने बानो को चारों ओर से घेरा हुआ था और देखते ही देखते वह परदे के पीछे हो गई । जहा बानो को लगा मानो वह अदालत में लाई गई है । जहा उसे उमर कैद की सजा सुनाई जाने वाली है। काजी साहब ने पूछा 'क्या तुम्हें यूसुफ मिया दुल्हा के रूप मे कबूल है ? बानो चुप रही उसका मन हुआ कि सबके बीच कह दे - 'नहीं। बिल्कुल कबूल नहीं मुझे। .

. किन्तु वह कह न पाई । और अन्त मे तीसरी बार पूछने पर उसने दवी आवाज मे मजबूरी के हाथो कह ही डाला- म न जूर ।' बस यह कहते ही भरी बिरादरी मे बह यूसुफ की बेगम बन गई । पूरे धूमधाम से उसकी डोली भी यूसुफ की चौखट के अन्दर जा पहुची थी। हर औरत की समस्या एक सी ही होती है, चाहे वह किसी देश या धर्म की भी क्यो न हो और वह समस्या है उसकी मजबूरी । वह समाज में अपने पति या शौहर से कभी आगे नही मानी जा सकती। वह सदा ही मर्द के हर रूप मे अधीन ही रही है चाहे वह बाप का रूम हो, भाई का प्रेमी का या पति का । जीवन-सीढी का वह हमेशा निचला डण्डा ही रहती है । चाहे वह कितनी अमीर पढी-लिखी या सुन्दर भी क्यो न हो । शायद यह कोई श्राप है औरत जाति को कि वह मर्द से पीछे ही रहेगी। बानो भाग्यशाली जरूर थी कि उसे यूसुफ जैसा सुन्दर नौजदान पति मिला । जो अमीर था और फौज मे डॉक्टर भी । बडे चाव से यूसुफ ने बानो को स्वीकार किया था। बड़े प्यार से उसने अपनी परी जैसी दुल्हन का घूघट उठा कर कहा था- " " सुभान अल्लाह । सचमुच जन्नत की हूर लग रही हो बानो तुम तो। वह चुपचाप आखे झुकाकर बैठी थी- युसुफ कह रहा या बात नही करोगी बेगम या बोलना नहीं आता।" और वह मुस्करा रहा था । बानो अभी भी गभीर भाव से चुप थी। यूसुफ ने हसा देने के यल से कहा- बचपन में तो तुम हम सबसे अधिक बोला करती थी तभी तुम्हाय नाम सबो चिडी रखा हुआ था । तुम मेरी चीजे छिपा कर मुझे तग किया करती थीं और लेकर भाग भी जाया करती थीं।" 27 बचपन की याद आते ही बानो के चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट फूट पड़ी थी । अगले ही पल यूसुफ ने अपने सच्चे हृदय से अपना सारा प्यार बानो पर उडेल दिया था। और वह उस प्यार को समेटने मे खो गई थी। दो दिन बाद ही यूसुफ बानो को इटली घुमाने ले गया था । जहा जाकर बानो हैरान रह गई थी । चारो ओर सुन्दरता ही सुन्दरता बिखरी हुई थी। गोरे-चिट्टे विदेशी वह देखती ही रह गई थी । यूसुफ ने फिर बानो को दहा की सभी अनेक मनभावन जगहे दिखाई थी। फिर एक दिन सुबह अखबार पढते हुए बानो को बताया था। 'बानो हमे जल्दी लौटना होगा । कश्मीर घाटी पर लडाई शुरू हो गई । सरकार डॉक्टरो को वापस बुला रही है । दुश्मन ने हम पर आक्रमण कर दिया । हिन्दुस्तान से हमारी जग छिड गई है।" जग का नाम सुनते ही बानो की तो जैसे जान झट से फिर मुरली की याद ने आ घेरा । जो जाने कहा होगा किस हाल मे होगा । और उसने बडी मुश्किल से अपने आसू स्वय पोछे । अनेक बार मन की दशा कुछ अजीब-सी हो जाती है- जैसे किसी ने दूध मे खटाई का छींटा मार दिया हो । जिससे वह फट कर फटीयो का रूप धारण कर लेता है। दो दिन बाद ही सचमुच वे लोग अपने देश लौट आये । सारे लाहौर में जग की ही चर्चा हो रही थी। जगह-जगह पर हिन्दुस्तान की बुराइयाँ हो रही थी-लोग धर्म के नाम पर आदमी को देश से भी नीचा मानने लगे थे। उधर हिन्दुस्तान में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था । जाति धर्म के नाम पर घृणा के फबारे फूट रहे थे और जग मे बहादुर सिपाही अपने कर्तव्य के लिए जाने वार रहे थे दोनो देशो से दानो को आते ही सलमा आपा की मौत का भी समाचार मिला । और वह अधिक दुखी हो रही थी। निकल गई हो । उसे । 88 इधर मुरली को माधो की मौत का समाचार भी रणभूमि मे ही मिला था जिससे मानो उसका साहस ट्टता जा रहा ता । उसके एक सरदार कर्नल ने कहा था- "जवान का सबसे प्रथम कर्तव्य उसके देश की ओर होता है फिर परिवार की ओर । तुम नही जानते मेरा अपना बेटा १९६२ मे अपने देश की जग मे देश के काम आया था । वह भी हमारी तरह फौजी था । मेरी पत्नी अघरग की शिकार पड़ी है मा अन्धी है । फिर भी मै अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ | जग बन्द होते ही तुम्हे दस दिन की छुट्टी पर भेज दूगा । घबराओ नहीं जवान । कर्म ही हमारा धर्म है-एक सिपाही को यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए । हिम्मत रखो साहस रखो और देश की रक्षा का कर्तव्य निभाओ।" इन शब्दो से मुरली मे फिर साहस आया था और वह सचमुच एक योद्धा के समान दुश्मन के मुकाबले के लिए जग मे कूद पड़ा था- और जब तक जग बन्द न हुई थी वह कर्तव्य निभाता ही रहा था । उसके सभी साथी उसके साहस व काम पर हैरान थे- वह किस प्रकार दुश्मन को पछाडने मे आगे ही आगे बढ़ता जा रहा था । वह सिपाही के नाम को सचमुच आभूषित कर रहा था । अब मुरली सही अर्थ मे सिपाही होने के नाते "कर्म ही धर्म है।' मानने लगा था। उसने तो बड़ी बहादुरी से अपने हर गम से एक समझौता-सा कर लिया पा। वैसे भी जग और प्रेम मे सभी कुछ उचित होता है । और मुरली तो इन दोनों मैदानो का पक्म खिलाडी बन चुका था। वह मन-ही-मन मानता था कि यदि वह प्रेम मे बाजी हार भी गया है तो युद्ध में अवश्य जीत कर दिखायेगा । यही कारण था कि मुरली के जीवन का अहम मकसद तो जग जीतना ही रह गया था अब 1 जिस मे वह तन मन से जान लडाई मे लगा हुआ था। हर व्यक्ति न्याय को उसी रूप मे न्याय मानता है जो उसके हक में 89 हुआ हो । हक में न्याय न होने को तो वह बेइसाफी व अन्याय ही मानता रहता है। फिर बही से यही कठिनाई के पीछे ही सफलता छिपी होती है। इस प्रकार मुरली जग में भुला देना चाहता था कि वह पीछे पडे अबू व मा को जाकर देखें जो स्वर्गवासी पिता की विदाई के बाद केवल मुरली की ही राह देख रहे है केवल मुरली की एक मलक से ही उसके दुषो के अन्धेरे में प्रकाश फैल पायेगा। पन्द्रह फिर एक मास पश्चात् कुछ काल के लिए युर बद करने की संधि हुई । युद्ध सामग्री जगबदी के बाद भी वहीं रखी हुई थी। मुरली सचमुच ही सेना की वर्दी पहा और हथियारो से लेस एक दुल्हा जान पड रहा था । मन ही मा वह प्रसन भी था कि उसने कुछ बड़ा काम किया है, दुश्मन का मुकाबला करके। जीवन के हर पात्र की वेदना अपनी अपनी होती है- किन्तु हर वेदना के रूप का चेहरा टीस ही होता है । चाहे वह किसी भी रूप मे क्यो न हो । मगर शायद यह प्रकृति का स्वभाव होगा कि दुख के बाद सुख भी आता है चाहे वह कुछ ही समय के लिए ही क्यो न हो । ऐसा ही आज अनवर के साथ भी हुआ-जब वह सुबह उठकर दातुन करने के बाद नाश्ता करने की तैयारी में था तो उसने देखा-दूर गली मे बसती की ओर कोई जल्दी-जल्दी चला आ रहा था । वह पल भर के लिए तो खो-सा गया और जैसे अपनी आखों पर आज पहली बार विश्वास नहीं हो रहा था। उसो समझा कि रो-रोकर उसकी आखें कमजोर पड़ गई है- तभी जैसे कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है । किन्तु जब वह व्यक्ति पास आ गया तो शका का कोई अर्थ भी न रहा और वह दोनों एक दूसरे से लिपट कर रोते हुए कह रहे थे- अबू जी। an - मुरली मेरे बेटे तू आ गया? अनवर की दशा तो मानो पहले से भी तरस योग्य हो गई थी- फिर वह बच्चो के समान चिल्ला कर बोला- सीता भाभी । जल्दी आओ बाहर आओ-देखो आया है - अपना बेटा मुरली आया है ।' सीता आटे मे सने हायो को लिए नगे ही पाव दौडती हुई आई - मुरली मा के पाव छूने के पश्चात् वह सीने से लग गया और छोटे बच्चे की भाति रोता हुआ बोला- मा - मेरी मा । मुरली | मेरे लाल । तू कहा खो गया था ? तेरे पिता भी तुझे देखने को तरसते ही चल बसे । हम अकेले रह गये उनके बगैर बेटा। कुछ क्षण इसी उदासी की धडियो में बीते थे । उन तीनो की हालत इतनी विवश बनी हुई थी कि देखने वाले का भी हृदय भर आ रहा था । फिर कुछ देर बाद वह सभला और बडी मुश्किल से उसने अपने आसुओं के दरिया को पार किया। जैसे-तैसे भी दो दिन ही बीते थे कि एक दोपहर जब वे तीनो अपने आगन मे बैठे जग की बाते कर रहे थे तो उनके घर के आगे एक रिक्शा आ कर रुकी। जिसमे से वे हमीदा को उतरते देख कर आश्चर्य में पड़ गये । और साप में दुरके मे लिपटी एक नवी नवेली दुल्हन भी यी । अन्दर आने पर पता चला वह दुल्हन और कोई नहीं बल्कि बानो स्वय थी। बानो और मुरली एक दूसरे को देख कर और भी हैरान हो रहे थे। क्योकि उनका मिलन एक अजीव घटना थी, किन्तु थी सच्ची जिस पर उनकी अपनी आखे भी विश्वास न कर पा रही थीं । मुरली ने देखा, बानो आगे से भी कहीं अधिक सुन्दर जान पड रही थी। उधर बानो को भी मुरली आज कुछ नया-नया बदला-बदला सा जान पड रहा था। फिर वह दोनो न जाने क्या सोचने लगे। विचारों की सीमा नही होती वह तो आकाश से पाताल 91

तक की धरती की छाती तक फैल जाते है, और मनुष्य के दिमाग को
किसी-न-किसी उलझन में घेर ही लेते है । फिर कुछ क्षण बाद वह सभले और
देखा हमीदा अनवर व सीता के साथ सलमा और माधो के लिए आसू बहा
रही थी । बानो भी रोने से रह न पाई और मुरली की आखों में भी आसू
उमडने लगे थे। एक बार फिर उन सबके बीच पीडा का ज्वारभाटा उठ रहा
था । चारों ओर अजीब उदासी का वातावरण छाया हुआ था।
कुछ समय बाद वे लोग अन्दर बैठ बातें कर रहे थे । मुरली को लगा
मानो वह घर नही बल्कि स्वर्ग मे छुट्टी आया था जहा वह बानो को पास से
देख सकता था।
दो दिन और बीते और तीसरे दिन अनवर व हमीदा के कहने पर
मुरली बानो को लेकर यूसुफ की किसी खाला से मिलवाने चादनी चौक ले
गया था।
रिक्शा से रास्ता कुछ लबा ही था-तो मुरली ने चुपके से चेहरे से
चादर उघडते हुए पूछा
और कैसी हो बातो?"
ठीक हू तुम कैसे हो मुरली?'
मरा नहीं जिन्दा ही हू जिन्दगी और मौत मे अधिक फासला तो
रहा भी न था। फिर भी बच गया - शायद तुम्हें देखना था।
बानो
चुप
थी । मुरली ने आगे कहा-
'कैसे है तुम्हारे यूसुफ मिया?
ठीक है।
तुम्हे प्यार करते है
-
"
बहुत ।'
और तुम
?"
92

" 11 " " ॥ वह मेरे वश मे ही नही। दोनों चुप हो गये बानो ने आगे पूछा- 'मुरली । तुम फौज छोड कर भला । विवाह कर लेना । 'वह तो मैो कर लिया।" अच्छा कब किस से? 'मौत से तभी तो पोज मे गया है। मुरली । खुदा के लिये अपनी जिन्दगी से मत खेलो - उससे विवाह कर लो जो जो तुम्हें मन से चाहती है - शायद मुझसे भी बढ कर गौरी चाहती है तुम्हे । गौरी ? तो क्या तुम्हे उसके दुखात की कहानी नहीं पता ?" " नहीं तो क्या हुआ गौरी को ? मुरली ने बात बताई जिसे सुनते ही बानो बडबडाई । 'तो तो मेरा शक ठीक ही है। " ॥ . . . क्या " . एक जश्न मे मैने लाहोर में किसी मदहोश जान नाम की तवाइफ को देखा था-उसकी शक्ल हू-ब-हू गौरी की थी। क्या कहा तवाइफ ?" हा हा यह वही है बिल्कुल वही है । मैं जाते ही उसका पूरा पता करूगी - और गर वही हुई तो उसे वापिस भेजूगी जरूर ।' " नही । नही बानो । अब एक और जुल्म तुम मत करना उस बेचारी पर । हमारा समाज वह गदला पानी है- जिस मे कोई भी चीज साफ नहीं मानी जाती चाहे वह कितनी भी निर्मल क्यो न हो। हमारा समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा अब उसे । उसे वही रहने दो जहा है। बानो ने पूछ- 93 , तो तो क्या तुम भी उसे स्वीकार नहीं करोगे मुरली ? जबर्दस्ती उठा कर गुनाहों के सागर में डाल देने से कोई जान कर गुनाहगार तो नहीं होता। 'मैने तो मैने तो उसे पहले ही स्वीकार करने से इनकार कर दिया - या बानो फिर अब मेरे स्वीकार करने का तो प्रश्न ही कहा उठता है । बानो की आखों मे उदासी के चिन्ह उभर आये । मुरली ने कहा- मैने तुम्हारी आत्मा और मन से प्रेम किया है बा । तुम्हारे जिस्म से नही । तुम्हारे चले जाने के बाद भी तुम हृदय से सदा मेरे साप हो ।" अब उसकी अपनी आखें डबडबा गई थीं। मौत और जन्म कर्मों का वह चक्र है जिस का मनुष्य कोल्हू बैल की भांति चक्क वाकर काटता है। वैसे ये दोनो भी काट रहे थे। न जाने कितने जन्मो से वह साप-साथ चल रहे थे-उनका मन व आत्मा से अलग होना कोई सभव बात नही थी । समय की धूल सी वे आज एक साथ चल रहे थे। दो जिस्म दो धर्म व दो देश होकर किन्तु मन से वे एक देश-एक धर्म के वासी ये और वह था प्रेम। इतने मे ही उनका ध्यान रिक्शावाले ने यह कह कर खींचा- लो फतेहपुरी आ गई।' और वह घर का नबर ढूढने मे लग गए। एक सन्यासी की भाति मुरली जीवन के रेगिस्तान मे फिर अकेला भटको लगा जब चार दिन बाद हमीदा बातो वो लेकर पाकिस्तान लौट गई। दूर तक जाती बानो को देख कर उसे लगा कि शायद उसकी इस जन्म में यह आखिरी मुलाकात रही होगी। मुरली स्वय भी और चार दिन बाद मा और अनवर अब्बू का आशीर्वाद लेकर जग बन्दी रेखा पर अपनी डयूटी पर लौट गया । । । 94 मुरली के चले जाने के पश्चात् एक बार फिर मानो अनवर व सीता के जीवन की घडी की सुइया रुक के रह गई थी । अनेक बार जीवन मे ऐसा भी तो करना पड़ता है । जो वह न चाहते हुए भी करता है क्योकि यह समय की माग होती है । आज का समय पिछले समय के अनुकूल नहीं है । और आने वाला समय आज के भी अनुकूल नहीं रहेगा । समय के साथ-साथ हमारी विचारधारा मे करवटे बदलती है । कुछ ठीक एक सा ही अनवर व सीता भी सोच रहे थे। उनके समय कितने भिन थे । आज के समय जब वह अपने माता पिता के आगे पूर्ण तौर से विचार भी न रख पाते थे या उन में साहस नहीं था कि वह माता-पिता की बात भी टाल सके । किन्तु आज के बच्चे अपनी मनमानी कर सकते है वह जो चाहे उन से अपने विचार भी मनवा सकते है । यदि ऐसा न हुआ होता तो क्या कारण था कि अनवर व सीता मुरली के बगैर जीवन के दुराहे पर खडे उसके फिर आने की इतनी बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे होते। अनेक आसू ऐसे भी होते है जो कभी आख के द्वार तक नहीं पहुच पाते और उन के पानी की बर्फ जम कर मन के बोझ का पहाड ढोह जाती है। मुरली की दशा कुछ ऐसी ही थी जब वह बानो को खो कर भी रो रही पा रहा था । किन्तु निश्चय उस के मन पर सदा-सदा के लिये पीठ का पहाड खडा हो चुका था जिस से 7 तो वह उतर ही पा रहा था और न ही बैठ ही पा रहा था । मानो वह अपने आप पर ही बन्दूक की गोली कसे बैठा हो । मुरली का जिस्म चला तो जरूर गया था वापस जग का कर्तव्य निभाने के लिए किन्तु उसकी आत्मा तो इसी बसती मे अपने बचपन के दिनों को खोजती फिर रही थी। जब कभी उन दिनो हर्ष ही हर्ष मढता फिर रहा होता या । और आज के दुख सागर की खारी बून्द उसने कभी चखी भी नहीं थी। 95 सोलह मुरली के लौटने के कुछ ही दिन बाद जग फिर आरम्भ हो गयी थी और इस बार तो पिछली बार से कहीं जोरों शोरों से हो रही थी। जिसकी आग देशो के अन्दर तक फैलने का भी खतरा बना हुआ था । दोनो ही देशों के निर्दोष नागरिक परेशानी में थे। धर्म के नाम वे भी मर मिटने के लिए व्याकुल हो रहे थे। इधर बसती मे भी बहुत परिवर्तन-सा आने लगा था । जो स्वाभाविक ही था । हिन्दू लोग मुसलमानो से और मुसलमान हिन्दुओं से सीधे मुँह बात भी न करते थे। किन्तु एक अनवर ही ऐसा व्यक्ति रहा होगा जिसके विशाल हृदय में नफरत की एक दृष्टि तक भी न पडी थी । वह धर्म से पहले अपने आपको मनुष्य मानता था और हिन्दू नारी सीता को बहन से भी बढकर मान रहा था जिससे बस्ती के मुसलमान भाई उससे प्रसन्न न ये । उधर हिन्दू भाई बातें बना रहे थे, कि माधो और सलमा के जाने के बाद अनवर-सीता के तालुकात अच्छे नही है । फिर भी अनवर ने लोगो की परवाह न करते हुए सीता की देखभाल करनी नहीं छोडी थी। वह इन शब्दो का सही अर्थ जानता था। " मित्र वही होता है जो, मुसीबत मे काम आये । ' आज भी वह स्वर्गवासी मित्र माधो की दोस्ती निभा रहा था। सीता पहले से बहुत बीमार थी । इतनी कि वह चारपाई से भी बहुत मुश्किल ही उठ पा रही थी । उसको सबसे बड़ा गम का मर्ज था । जिस मा का जवान व एक ही बेटा जग मे चला जाये तो उसकी दशा बिगडना सभव ही था । बार-बार वह मुरली की ही रट लगाये हुए पी । जब कि उसको गये 96

केवल दो ही मास तो हुए थे । असल में वह जग की बातें सुन-सुन कर और
भी चिन्तातुर थी।
वैसे जग का हाल भी बुरा ही था। अनेको जवान जस्मी होते मरते और
बन्दी भी बना लिए जाते । अब तो सेन्टरो पर सूचिया भी आने लगी थी- कि
कितने मरे कितने बन्दी बना लिए गये आदि-आदि ।
सीता के कहने पर अब अनवर भी सेन्टरो पर मुरली का पता चलाने
गया और उसने एक फौजी जो कि नाम पढकर बताने की ड्यूटी पर था, के
आगे दोनो हाथ जोडते हुए पूछा
बेटा । मेरे बेटे का भी बताओ कहाँ है कैसा है ?"
क्या नाम है मिया ?"
'जी । नाम है मुरली वल्द मायो ।
फौजी जवान ने सूची पूरी पढकर कहा ।
नही-मुरली वल्ड माधो का नाम शहीदो की सूची मे तो नहीं है ।
अब अनवर ने अपने दोनो हाथ ऊपर की ओर उठाये हुए इबादत करते हुए
कहा
.
शुक्र है अल्लाह तेरा लाख-लाख शुक्र है।'
फौजी ने फिर पूछा
क्या नाम बताया था मिया ?
'जी मुरली वल्द माधाराम।
अब फौजी ने उत्तर दिया
हाँ हाँ उसका नाम दूसरी सूची मे तो है । '
जी दूसरी सूची।
'हाँ घायल बन्दियों की सूची में नाम है।
क्या कहा ? घायल वन्दी?'
97

। हाँ मियाँ ।
'तो-तो बेटा वह कब आयेगा?
जब दोनो देशो मे सन्धि होगी।'
'कितना समय लगेगा?'
कुछ कह नही सकते- जाओ मिया जाओ मुझे काम करने दो मुझे
औरो को भी नाम बताने है।
अनवर की आखो मे पानी भर आया और वह मिनत करता हुआ
बोला-
बेटा । मुझ पर तरस करो मै बहुत दुखी हूँ, उसकी माँ मरने को पड़ी
है।' किन्तु फौजी ने फिर भी रौबीले लहजे में कहा-'मिया तुम्ही अकेले यहा
दुखी नहीं हो-जो आये है सभी तो दुखी है ।
और अनवर को अहसास हुआ सचमुच सभी तो दुखी थे वहाँ रो रहे थे,
पीट रहे थे। वह अपनी करुणा को अपने अन्दर ही समेटे चला आया।
आते ही सीता ने रोते रोते पूछा
कुछ पता चला मेरे बेटे का अनवर भाई ?
हाँ-
दहा कहाँ है ? कैसा है ? कब आयेगा?
वह ठीक है शीघ्र ही लौटेगा किन्तु अभी तो ।
अभी तो क्या
सीता बहिन वह अभी तो दुश्मन का बन्दी बना लिया गया है-वैसे
7
ठीक है।
अनवर भाई अब तो मै-मै और इतजार नहीं कर सकती-दो-वो
देखो मुरली का पिता दूर पहाडी पर बैठा मुझे बार बार बुला रहा है अब मेरे
पास वक्त नही । अपनी सरकार को कहो कि वह मेरा बेटा जल्दी बुला
दे
98

. मै मै और नहीं रुक सकती । मुरली का पिता मुझे कब से बार-बार बुला रहा है।' अनवर का भी रोना निकल गया और अगले ही क्षण में उसने देखा सीता की गर्दी एक ओर लुढक गई थी। अनवर ने जोर से कहा नहीं, नहीं । सीता बहिन-तुम-तुम भी मुझे छोड कर नही जा सकतीं।" किन्तु कडवा सच तो यह था कि सीता भी अटल सत्य मे घुल चुकी थी जिसका नाम है " मौत"- अनवर देखता ही रहा । एक तो वह बेटे का मुह देखने को तरसती ही मर गई । उसे लगा जीवन हमारी एक पोशाक ही तो है जिसे हर मनुष्य उतार देता है, और फिर कोई और नई पहिन लेता है। जीवन का पूर्ण व असली अर्थ कुर्बानी व बलिदान और कर्तव्य है-जो पूर्ण शब्दों में अनवर निभा रहा था। उसका हृदय ही एक मस्जिद थी जहाँ वह अपने हर अच्छे कर्मों की नमाज पढता था हर कुर्बानी व बलिदान का सजदा उतारता था। फिर जीवन का तजुर्बा ही तो मनुष्य का गुरु होता है जो उसे सही मार्ग पर चलने की राह दिखाता है। जीवन खुशी के बगैर उस दीये के समान होता है जिसमे तेल न हो । अब अनवर का जीवन भी तो एक वैसा ही दीया बन कर रह गया था । जीवन का मूल्य भी परीक्ष से गुजर कर उसमे पास होने पर ही तो पडता है । फिर भी उसकी विचार धारा मे कभी-कभी एक हल्की सी आशा की किरण दिखाई देती थी वह जब मुरली के ठीक-ठाक लौटने के बारे में सोचता । मानो एक टिमटिमाता-सा दीया उजाड जगल मे दिखाई पडता-वह दोनो हाथ ऊपर उठा उठाकर बडबडाता- या परदरदीगार मेरा मुरली जल्द से जल्द ठीक-ठाक लौट आये कुल मालिक अल्ला मेरा बेटा मुझे लौटा दो । मै उसके प्राणो के बदले अपने प्राण तुम्हे अर्पण करता हूँ। 99 और वह रोने लगता। बस यही तो उसके बस मे था। आशा की डोर के सहारे वह गिरता-उठता-बैठता अपने जीवन काल को पूरा करने मे लगा हुआ था। " जग नाम है बरबादी का वैसे आम कहावत है कि प्रेम व जग मे सब उचित होता है -1 अनवर को इस जग पर अधिक दुख व गम या तो इस बात का कि वह हमारा पडौसी देश ही हमे जग मे धकेल रहा था, जो कभी हमारा ही हार्दिक मित्र होता था । जिसने कभी हमारे ही कन्धे से कन्धा मिलाकर फिरगी शत्रु के विरुद्ध जग लड़ी थी। और उस महान जग का नाम था आजादी - की जग' जिसकी जीत के फलस्वरूप ही आज यह दोनों देश आजादी का सौत्रता भोग रहे ये । सही अर्यों में कोई भी अमीर नहीं होता यदि उसका पडौसी अच्छा न हो । जब इतिहास के पने भी इन दोनो देशो की गवाही देते है कि वह कभी एक थे । तो अब दो होकर अपने-अपने स्थान पर सन्तुष्ट होने मे इनको आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अब इस जग में कौन विजयी होगा यह तो केवल आओ वाला समप ही बता सकता है । किन्तु वह विजय इनके बीच सदा-सदा के लिए अमन व शान्ति लाती है या नहीं देखना तो यह होगा ? अनवर को तो दोगो के ही विचार कुछ ठीक नहीं बैठ रहे थे । जो न-जाने चप्पा भर घरती के टुकडो के लिए अनेक माओं की गोद सूती किए जा रहे थे। यह कोई समझदारी की चुनौती तो नही थी । उसके अपने विचारों के अनुकूल अनवर सोच रहा था। इस सत्य के अतिरिक्त कोई और सत्य है भी नहीं कि मनुष्य ही माष्य को मारता है जैसे जानवर जानवरो को । फिर मनुष्य व जानवरो में कैसे अनार हुआ? केवल बुटिका । और वह ही दुद्धि जब नष्ट होती है तो मनुष्य मनुष्य रहकर सचमुर जानवर की भांति ही हरकते करो लगता है। उसकी सही विद्या फीकी सी जान पडोसगती है। 100 दूसरे शब्दो में टैकनालॉजी तो गुणकारी होने की बजाय हानिकारक ही सिद्ध होती है। पिछले सभी में इतिहास कहता है - न बम्ब थे न रौकिट, न गोला ये न हवाई जहाज आदि । वह जग आज की जग से इस प्रकार इतनी हानिकारक भी नहीं थी, जितनी आज । "अनवर ने आगे सोचा- काश यह सब न होता तो उनके बेहोश नागरिक भी करने से बच सकते।' . सत्रह अब न जाने अनवर को क्या सूझी और उसने हमीदा को लिख दिया कि वह पाकिस्तान आना चाहता है । सचमुच अब अकेले मे उसका दम घुटने लगा था। सही अर्थों में यहाँ उसे कोई भी अपना नही जान पड रहा था । इधर जगबन्दी का भी ऐलान हो चुका था । लोगो को भारी राहत भी मिली थी। मुरली पूरी बहादुरी से मुकाबला करता रहा- जब उसे बन्दी बनाया गया था। जब दुश्मा ने छापे लगाकर पुल काट दिया था और उसके हाथ मुरली समेत चालीस जवान लगे थे । जिन्होंने दुश्मन की सीमा मे ही दुश्मन का मुकाबला किया और उसके दस फौजी मार भी डाले | "जग व प्रेम मे सब उचित ही होता है । किन्तु जब वह चारो ओर से घिर गये तो बन्दी होना सम्भव ही था । मुरली के दोनो बाजुओं मे काफी चोट आयी थी । वह रक्त से भरा बैठा था जब दुश्मन आए उठाकर ले गये । मुरली को जिस बडी गाडी मे डालकर भेजा जा रहा था उसका ड्राईवर एक निर्दयी हृदय का जवाा था जो अपने साथी से कह रहा था- क्या जरूरत है दुश्मन के मुह मे पानी डालने की ? और काफिरों की मरहम-पटटी करने की । यही छोड़ जाओ जगल मे । धक्का दे दो किसी खाई में भर जाएगे अपने आप ! कम्बस्त ।' । . . उसके साथी ने कहा था- 101 । " नूरदीन भाई हमारे भी तो जवान उधर है-वह कैसे लौटेंगे । गर हम इनको न बचायेगे?" नूरदीन ने कहा था - 'अरे कौन देखता है ? साथी का उत्तर था। खुदा तो देखता है यार नूरदीन - चाहे आदमी न भी देखे - -" इतने में ही वहा तबू आ गये थे । जहा घायल सिपाहियो को इलाज के लिए लाया गया था । वहाँ पर भी नूरदीन ने बडी बेरहमी से उतार-उतार कर जमीन पर पटका या । जहाँ उनके चीखने चिल्लाने की आवाज चारों ओर गूज रही थी। नीचे घास या - और ऊपर एक एक फौजी मोटा कबल जिसमे उन्हे रखा गया था। तबू के अन्दर मुरली आते ही बेहोश हो गया था। और जब उसे होश आयी तो डॉक्टर उसे देख रहे थे। वह सभी अपने साथियो के समान ' हाय-हाय 'कर रहा था । और फिर उसने सुना जो डॉक्टर उसे देख रहा था। उसे दूसरे डाक्टर ने बुलाते हुए कहा था- " डॉक्टर यूसुफ | आपका फोन है घर से बानो भाभी लाईन पर है।' मुरली दोनो का नाम सुनते ही बुरी तरह उचका और उसने जरा-सी गरदन उठाकर जाते हुए डॉक्टर यूसुफ को देखने की कोशिश भी की थी जो अब जा चुका था और वह फिर मानो दर्द के मारे बेहोश-सा होता जा रहा था। दूसरे डॉक्टर आपस मे बाते कर रहे ये 'मुशकिल है • जहर फैल चुका है । यदि ऑपरेशन न हुआ तो मरीज का बचना असम्भव होगा। 'धर्म आज एक व्यापार-सा बन गया है जिसके नाम पर देश लोगो का तरस-ईमान-मुहब्बत सभी कुछ खरीद लेते है । दूसरों को अच्छ बनाने के लिये स्वय अच्छा होना कितना जरूरी है-यह कोई धर्म के ठेकेदार नही जानते। किसी भी धर्म मे दूसरो को दुख देना नहीं लिखा । सभी धर्मों के लोग 102 ॥ एक ही बाप के तो बेटे है - 1 वे भूल जाते है सभी ईश्वर के बेटे है जो मुसलमा-हिन्दू सबका एक ही है । उन की एक ही मा है और वह है धरती जो सबकी एक ही है । फिर मनुष्य अपने आप को बुद्धिमान कहलवाता है । कितनी अजीब बात है। अनवर कुछ ऐसी ही बाते अकेले बैठा बैठा सोचता रहता है । अब तो उसने कसाई का काम भी छोड़ दिया था। जिस पर सारी बसती हसती और कहती- 'नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली। असल मे वह कोई साधू नही होना चाहता था - मगर हा वह अब इस को करना भी नहीं चाहता था। वह तो अब खामोशी से बैठ कर अपने बीते दिन याद करना चाहता था-जिनमे सुख सकून सभी कुछ तो था । जिन दिनो वह माधो के साय था-दे जीवन पथ पर एक साथ चलते थे। अनवर अपने काल को अपने ढग से बदला देखना चाहता था-1 किन्तु सच तो यह है कि जीवन में सामाजिक सुधार तो हो ही सकता है यदि मनुष्य के विचारों में परिवर्तन आये और वह केवल तभी हो सकता है अगर इसान धर्मों देशो के बन्धन से मुक्त होकर ऊपर उठ जाये। अनवर की सोच-विचार एक सुन्दर सपनो से बढकर कुछ नहीं थी। वह आकाश में उडती उस चिडिया को पकडना चाहता था जो उस के वश में न थी। वह चिडिया थी एकता जो असल रूप मे कभी भी तो नहीं आ सकती। फिर कोई न कोई उलझन तो मनुष्य के दिमाग को घेरे ही रहती ही है- जैसे अनवर को वे सब बाते और सोचें घेरे हुए थी । फिर भी एक बात उसके मन के पास कभी भी नहीं फटकती थी-वह थी घृणा और नफरत । उसे दुश्मन से भी उतनी ही सहानुभूति थी जितनी अपने देश से । इसलिए नहीं कि वे लोग अनवर के धर्म के थे बल्कि इसलिए कि वे भी इसान थे। अनवर अभी भी उठता-बैठता मुरली के बारे मे ही सोचा करता था । जो उससे कासो दूर किसी बे रुखी के माहौल मे होगा। 103 " " उसके घाव भरे भी होगे या नहीं अभी तक वह सोचता । किसी के पास वह अधिक उठता-बैठता भी न था । माधो की दुकान पर बैठकर नमक-आटा बेचा करता । वह ऐसा क्यो करता था-इसके पीछे भी एक विशेष कारण रहा होगा । वह अपने दोस्त माधो की दुकान बन्द नहीं करना चाहता था। वह मुरली के लौटो तक उसकी चीज सुरक्षित रखना चाहता था । और यह सब करने में वह अजीब सुध प्राप्ति कर रहा था जो हर कोई नहीं जान सकता था केदल कोई सच्चा मित्र ही जान पाता । जैसे कि इस विषय में कहा भी गया है- घायल की गति घायल ही जाने और न जाने कोई । दोस्त क्या होता है ? दो जिस्मो मे एक रूह | जिसे कोई दुनिया, रस्म धर्म देश या दुख सुरा हालात अलग नही कर सकते । माधो के मर जाने से अनवर के अन्दर का माधो आज भी जीवित था और सदा रहेगा । फिर बनाये नही जाते पहचाने जाते है। मनुष्य यदि अपने आपको सब से बहु-मूल्य व वडा उपहार दे सकता है तो मित्र ही है। सच्चा धर्म यही है हमारा जीवन जो हम जीते है । औरों पर उपकार करके औरो के लिये जीवित रह कर । अपने लिये तो हर कोई जीता है । असल मे जीवन वही है जो औरो के लिये जीया जाये। फिर अनवर का जीवन कुछ सही अर्थों मे ऐसा ही तो था । वह मित्रता की जडों को भी अपने लहू से सोच रहा था । जीवन के इस सार तत्व को यू भी कह सकते है कि कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते है अच्छे कर्म-जो हम औरो को दे सकते है । सबसे बड़ा उपहार यदि हम औरो को दे सकते है तो वह हमारी अच्छी धारणा ही है। करुणा का विष पी कर यदि औरो को हर्ष शर्बत मिलता है तो यह सौदा महगा नहीं है । फिर कोई भी मुशकिल समस्या कभी नई होती उसका नये ढग से परिणाम दूढ निकालना ही बड़ी चीज होती है । इधर अनवर ने तो अपनी समस्या का नया परिणाम यह ही निकाला था कि वह अपने मित्र के 104 रते परिवार को अपने साहस के कन्धो का सहारा देकर खडा रख सके । पी और को यदि तुम केवल एक ही उपहार दे सकते हो तो वह साहस व मत ही होना चाहिए । यही कारण था कि अनवर सीता को सही उपहार [ रहा था। यह सब सच्चे विचार व सही कर्म ही तो अनवर को आमलोगो वेभिन करते थे । नही तो शायद वह भी आम व्यक्ति की भाति खुद गर्न गो की भीड़ मे न जाने कहाँ खो गया होता । सचमुच ही वह कसाई होकर नवी ही था जिसमे अपनी निजी आवश्यकताओ और सुखो को औरों के { हसते हसते त्यागा हुआ था । सारी बसती अनवर पर हैरान थी जो लमान का जिस्म रखते हुए भी हिन्दू या और कठोर कार्यों को करते हुए सुखमय तबियत का दयालु व्यक्ति था। अनवर की हर सुबह नई आशा की किरण ले कर आती कि शायद आज मुरली के शीघ्र लौट आने का कोई सुखद समाचार कही से आये । पर IT तो केवल आशा ही होती है कोई पूर्ति तो नही । मनुष्य अक्सर हादसो ही दोषी ठहराता है अपनी किस्मत को भी कोसता है किन्तु जब भी वह । कहीं एक भी हादसे का पूर्ण अर्थों मे मुआयना कर पाता है । तो तब उसे । आप अपनी समझ ही दोषी मानने की इच्छा होती है। कुछ ऐसे ही ले बैठे अनवर भी सोचता- जब वह देखता कि उसकी अपनी ही गोरियों के कारण वह मुरली को भर्ती होने से रोक नही पाया था । शायद के समझाने मे ही कुछ ऐसी कमी द त्रुटि जरूर रही होगी । जो बचपन से नी की राह पर वह मुरली को कर्तव्य का अर्थ ही न बता पाया था । यदि पा होता तो वह अपनी माता पिता की इच्छा विरुद्ध फौज मे भर्ती न हुआ और यदि न होता तो यह हादसा भी न हो पाता और यदि हादसा न 'तो मुरली के माता-पिता इतना दुखद अत का मुह देखने से बच जाते। वे दोनों ही अपने जवान बेटे के हाथो मे चैन की मौत पर पाते और र को भी वह सब देखने को न मिलता जो उसने देखा थाहार -54 अटठारह और एक एक सुबह सूरज की किरणों के साथ अनवर को नया पैगाम मिला और वह या पाकिस्तान का वीजा । वह सचमुच मन ही मन आशावादी हो गया था। उसे बानो को फिर देखने का विचार बहुत अच्छा अच्छा लगने लगा था। सप्ताह मे वह सचमुच से लाहोर के बार्डर तक पहुच गया था । जहा उसके स्वागत के लिये यूसुफ स्वय और साथ मे बानो व हमीदा भी आई थीं। अनवर को सब से मिल कर मन ही मन बडा आनन्द आया था। वह सभी अनवर को देखकर मन से प्रसन हो रहे थे। फिर उसे फौजी जीप में बिठा कर वे घर ले आये थे। जहा पर अनवर को लगा मानो वह जनत मे पहुच गया हो । बडी कोठी लबी कार-आगे पीछे नौकर चाकर । घर मे बढिया से बढ़िया फीचर आदि । टेलीफून-पखे हर चीज ही तो थी । आज यह सब देख कर उसका मन हमीदा की समझदारी की दाद देने को चाहा था। वह मन ही मा अजीब सुख अशुभव कर रहा था कि उसकी बेटी बातो कितनी सुपी है। हमीदा ने कहा- मै तो आपको कब से आने को कह रही थी-किन्तु आप माने ही कहा ? सारी जिन्दगी उसी बसती में काट दी आपो तो । आज अगर सलमा आपा भी होती तो कितना खुश होतीं।' अब आवर ने कहा- हा मगर मै तो आज भी एक खास काम से आया हू हमीदा । यूसुफ मिया के पास ।' अब सबो कुछ हैराणी से एक दूसरे की ओर देखा । आवर ो बात को साफ करते इएकहा- यूसुर मिया 1 बेटा मेरा एक काम कर सकेगा क्या ?' एकम कीजिये अबूजाता 106 " हुकम नहीं बेटा यह तो एक मजबूर बाप की फरयाद है जो मै कहना ॥ चाहता हूँ। " "फरमाईये मै क्या कर सकता हू जी?" 'बेटा तुम तो फौज के अफसर हो । मेरी दरख्वास्त है जैसे कैसे भी हो मुझे एक बार सिर्फ एक बार मेरे बेटे मेरे बेटे मुरली से मिलवा दो । मै मरने से पहले उसे देखना चाहता हू । नहीं तो शायद मै चैन से मर भी न पाऊगा।' यह प्रश्न पहाड से भी अधिक बडा या यूसुफ के लिए और वह बोला- 'आजकल बहुत सख्ती है अबू जी दुश्मन के बदियों को मिलाने का हुक्म नही है फिर भी मै पूरी पूरी कोशिश करके देखता हूँ । वादा तो नही करता-मगर पूरी कोशिश करूगा । यह जरूर ईमान से कहता हूँ। अनवर की जान मे जान आई । और उसने ठडी साँस भर कर कहा- 'जुग जुग जियो बेटा यूसुफ मिया । थोडी देर के बाद ही यूसुफ को डयूटी पर लौटना था वह चला गया। हमीदा नौकर से चाय पानी को कहने चली गयी । तो बानो ने अबू के पास बैठ कर छोटे बच्चे के समान मिनतें करते कहा- " मुझे भी ले जाना अबू जी। जब जाओगे - मै भी मुरली को देखना चाहती हू ।" देखी जायेगी बेटी । क्या पता मै भी देख पाता हूँ या नही-वहाँ उसका नाम घायल बदी बना लिये गये सिपाहियो में है । घायल बदी?" बानो ने तडपते पूछा। हाँ बानो बेटी " इतने में ही हमीदा से वाये हुए बडी-सी ट्रे लेकर कमरे में आ गई थी। जिसमे बादामों का दूध, ताजा फल सेव व बढिया मिठायी और तब सब मिलजुल कर खाने लगे। साथ ही साथ छोटी छोटी हल्की फुल्की बाते भी - . करते रहे। 107

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जब अनवर शाम को अकेला पीछे से बडे बगीचे मे घूम रहा था तो
बानो भी उसके साग आकर घूमो लगी और कहने लगी।
'हाँ सच एक बात तो मै आपको बता ही नहीं पायी अबू जी ।
क्या बानो बेटी?
" यहाँ एक नई तवाइफ है मदहोश जान बहुत ही अच्छी गाती और
नाचती भी है मै उससे आपको जरूर मिलवाना चाहती हूँ।
मुझसे क्यो।
'अबू जी उसकी शकल हू-ब हूँ गौरी से मिलती है।
क्या कहा गौरी से?
हाँ -हाँ अबू जी गौरी से । गौरी से । मुझे तो शक है कि वह जरूर
गौरी ही है।"
नही नही यह कैसे हो सकता है भला कहाँ वह गौरी कहाँ यह
तवायफ?'
"तुम्हे जरूर धोखा जबरदस्त धोखा हुआ होगा बानो ।
" नहीं नही अबू जी मेरा मन कहता है मुझे कोई धोखा नहीं हुआ।
बानो अगर यह सच भी है तो जरूर कदर की बात है।'
मै मानती हूँ।'
जो भी कोई इस अपराध का जिम्मेदार है-सुदा उसे कभी नहीं
बखशेगा कभी नही।' बानो ने कहा-
' मै चाहती हूँ कि मै गजल सुनने के बहाने से यूसुफ मिया से कह कर
उस लड़की को यहाँ बुला कर आप से मिलवाऊँ ?'
यहाँ बुला कर -?क्यू यूसुफ मिया मान जायेगे?
हाँ जरूर मान जायेंगे-मो पहले ही उनसे कह रखा है । कि अबू जी
को गजले बहुत अच्छी लगती है-हम अबू जी के आने पर उसे घर पर
"
"
।
108

" . " ॥ बुलाएगे तो उन्होंने कहा था ठीक है बेगम, अबू जी के आने पर बुला लेगे अगर तुम कहती हो तो। तो ठीक है बुलाना उस लाचार बेबस लडकी को - मै भी देखू क्या उसकी सूरत गौरी से इतनी मिलती है या तुम्हे ही धोखा हो रहा है ?" अब बानो ने कहा- 'अबू जी मै मुरली से भी जरूर मिलना चाहती हूँ-आपको मेरी कसम आप मुझे भी साथ लेकर जाना । अच्छ-अच्छा देखी जायेगी पता नहीं तुम्हे औरतों को यहाँ की सरकार जाने की इजाजत देती भी है या नहीं। " आप यूसुफ मिया से कहना कि मुझे भी ले चले तो जरूर ले चलेगे।" आज बानो को सकून-सा अनुभव हो रहा था । जिससे वह इतना खुल के मन की बात मुरली के विषय में यह बात किसी और से कर ही नहीं सकती थी । वह आज तक मुरली की बात केवल अपने जीवा के बद चेहरे मे मन से ही कर पाती थी । किन्तु जब से उसे पता चला था कि मुरली भी लाहौर में है और बदी है वह भी घायल तो उसकी बेचैनी की आग के शोले कही अधिक भडक चुके थे । कहते है छोटा सा अवसर ही अहम बड़े नतीजों का द्वार होता है जिससे कोई भी व्यक्ति गुजर कर अपनी मजिल तक पहुँच पाता है । हर अवसर के माथों पर लिखा होता है मुझे अपनी ओर खीचो या बाहर " धकेलो। आज बानो भी इस मौके का पूरा पूरा लाभ उठाने के दाव मे थी। क्योकि वह यह पूर्ण स्पष्ट तौर पर जानती थी कि यदि इस बार वह मुरली को न देख पायी तो शायद जीवन मे दुबारा कभी भी नहीं देख पायेगी। उधर मुरली का मन भी बानो को देखने के लिए यों ही व्याकुल होगा। क्योंकि मन को मन से चाह होती है। 10 तो दोनो तरफ ही ऐसी परिस्थिति बनी हुई थी जो बडी बेताबी से एक दूसरे को देखने के लिए तडप रहे थे। प्रेम करने वाले जिस्मो की आत्माएँ एक हो जाती है । उन के विचार एक हो जाते है । उनकी आशाये एक हो जाती है । उन दोनों की करूणा एक प्रकार की हो जाती है। औरो के हृदयों मे घर करके मरना, मरना नहीं हुआ करता, वह तो अमर होना होता है। प्रेम एक वह तपस्या होती है जो महान ऋषि मुनि अपने प्रभु के लिये करते है। प्रेम मे ईश्वर होता है और ईश्वर मे प्रेम । मुरली जहाँ भी था या जिस हालत मे भी था उसके अन्दर प्रेम का दीया तो अभी भी जगमगा रहा था । ऐसा ही हाल इधर बानो का भी था। वह जैसी भी थी जहाँ भी थी उसके मन की तह मे मुरली के नाम का दीपक ही जगमगा रहा था । यह सचमुच उन दोनो का दुर्भाग्य रहा होगा कि वे एक ही देश की धरती पर एक ही शहर की गोद मे होकर भी, एक ही समय पर, एक दूसरे से कितने दूर होने के समान थे । मजबूरी में मनुष्य कितना बेवस हो जाता है कि अपनो को ही मिल नही पाता । किन्तु सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह भी तो है कि वह सदा ही यादो की धरती पर साथ-साथ घडे रहते । वह एक दूसरे से अलग न थे, न है और न ही हो ही पायेगे । चाहे उनको मजदूरियों का कानून कितनी भी सजा क्यो न सुनामे । बानो के जीवन का मुरली और मुरली के जीवन की दानो कभी अलग-अलग हो ही नहीं सकते। उधर गौरी की बात सुनकर तो मानो अनवर के सदेह पर भी यकीन का गहरा रग चढता जा रहा था। क्योकि वह ससार को भली भाति देख रहा या। जिसमें दुर कठोरता व पथरीलापन इतना अधिक था कि कोई भी मासूम व वेबस लडकी बड़ी ही आसानी से इस का शिकार हो सकती थी। आवर ने सोचा-"गौरी का तवाइफ हो जाना कोई इतनी आश्चर्यजनक बात उसे नहीं लगती थी। मजदूरी की चपेट में आये तो राजा हरिश्चन्द्र जैसे भी । 110 न बच पाये थे। उधर सीता व द्रोपदी जैसी देवियो को भी तो अग्नि-पथ से गुजरना पड़ा था। फिर भी एक छोटी सी गरीब बसती की वेबस लडकी क्यो आसानी से जुलम का शिकार न हो गई होगी ? चालाक कुत्ते की जाड के बीच आई एक चिडिया तो बड़ी आसानी से उसकी हवस का एक निवाला हो गई होगी। फिर भी अनवर आख से देखकर कोई भी बात मानने पर विश्वास रखता था । साथ ही साथ वह इस बात को भी भली भाँति जानता था कि बानो की नजरे भी कोई इतना बड़ा धोखा तो खा ही नहीं सकतीं। जरूर दाल मे कुछ काला तो है ही । और इस प्रकार अनवर मन-ही-मन आने वाले उस समय की प्रतीक्षा करने लगा जब वह उस लडकी को अपनी नजरो से देखेगा । कुछ समय तक अनवर अकेला ही इधर उधर बिताता रहा और आगे की सोचता रहा- मरद आरभ से ही नारी पर इतना कठोर क्यूँ बना रहा है ? क्या उसे आने वाले जन्म का कोई डर नही ? जिसमे वह एक एक जुल्म व अत्याचार का हिसाब देने के लिये मजबूर हो जायेगा । समझदार व्यक्ति सदा लबी सोचते है फिर क्यूँ मरद नारी से अधिक बलवान होते हुए भी यह बात समझ नहीं पाता? आज पहली बार मानो अनवर को अपने मरद होने का दुख-सा अनुभव होने लगा था । वह सोच रहा था, यदि वह नारी होता तो मरदो के जुलम की बदनामी से तो अवश्य वच पाता । उन्नीस यूसुफ ने अनवर को बताया कि वह अभी ईजाजत लेने की कोशिश कर रहा - मगर अभी कुछ समय लगेगा । साथ ही यूसुफ ने यह भी बताया कि आशा है कि आज्ञा मिल जायेगी । क्योकि उस के एक खास दोस्त के कोई नजदीकी रिश्तेदार है जो आज्ञा लेने में मदद कर रहे है । 111

इस प्रकार अनवर की आशा की डोर पक्की बन्ध गई थी। वह बडी
बेचैनी से उस घडी की प्रतीक्षा कर रहा था, जब वह अपने बच्चे मुरली को
देख पायेगा।
इधर उन दिनो यूसुफ से कह कर सचमुच ही बानो ने मदहोश जान को
अपनी कोठी पर गजल सुनाने बुलाया था। इत्तफाक की बात थी कि हमीदा
उस दिन किसी रिश्तेदार से मिलने कही गई हुई थी । और यूसुफ अपनी
डयूटी पर चला गया था।
अब घर मे केवल बानो और अनवर ही थे जब मदहोश जान को
बुलाया गया था। बानो ने नौकरानी से कह कर लडकी को अपने पीछे के
कमरे मे बुलवा लिया था । एक कुर्सी पर अनवर बैठा था और दूसरी पर
बानो स्वय ही।
से
एक लडकी चेहरे पर नकाब डाले अन्दर चली आई। और बडे अदद
अपने हाय उठा कर उन दोनो को कहा था-
आदाब बेगम साहिबा ।
आदाब नवाब साहिब।
अब अनवर ने बाई से कहा
मै कोई नवाब नबूब नहीं । इस दुनिया की बसती का मामूली सा
आदमी हू बेटी। बानो ने लड़की को कुरसी की ओर हाय का इशाप करते
कहा-
' बैठ जाओ मदहोश जान ।
लडकी पैरो मे बिछे बढिया गलीचे पर बैठती बोली
शुक्रिया हुजूर।
अब बानो ने कहा-
नकाब उठा दो मदहोश जान ।
112

लडकी के नकाब उठाते ही बानो और अनवर दोनों चौक पडे-- मगर उन से भी कहीं अधिक तो लडकी स्वय चौंकी थी । अनवर ने पूछा- - "तुम्हारा क्या नाम है बेटी ?" 'जी । नाचीज को मदहोश जान कहती है दुनिया।" अनवर ने और जुर्रत भाव से पूछा- नहीं मेरा मतलब है तुम्हारा अपना नाम पहिला नाम, तुम्हारे यानि बचपन का नाम 'तवाइफ के नाम नहीं होते बडे मिया हजूर । अनवर ने देखा लडकी राह नहीं दे रही थी तो भी उसने पूछ- क्या तुम शुरू से यहीं रह रही हो ? या- यहा कहीं बाहर से लाई गई हो?" नहीं जानती कहा से आई हूँ कहा जा रही हूँ, जब होश आया तो अपने आप को तदाइफ ही पाया है मैने तो बेगम साहिबा । " " अनवर ने पूछा- - " तुम किसी गौरी को जानती हो ?" सुनते ही लड़की के मानो होश उड गये और बडी ही मुश्किल से अपने आप को सभाल कर बोली- मैने तो यह नाम ही आज सुना है हुजूर । . ॥ अब बानो ने पूछ- ॥ 'अच्छा तुम पारो-सीता-माधो-अनवर और सलमा मे से किसी को भी नहीं जानती क्या ?" 'गुस्ताखी की माफी चाहती हूँ बेगम साहिबा । इनमें से किसी को भी नही जानती।' 113 - " जब मानो बानो के रोने का सारा सबब ही पिघल कर बहने लगा जब अनवर ने कुछ तेज और रोबीली आवाज मे पूछा- तो कह दो कि तुम किसी मुरली को भी नहीं जानती। अब मुरली का नाम सुनते ही लडकी मानो काप सी गई और उसे लगा आज वह रगे हाथो पकडी गई थी। घबरा कर उसने अपने दोनो हाथ अपने कानो पर रख दिये और आखे बद कर के वह बहुत धीमी आवाज मे बुडबडाई - उफ अल्लाह । आज फिर यह किस फरिश्ते का नाम सुना मैने-' बानो ने देखा लडकी की आखो से आसुओं की धाराए बहने लगी थी। बानो ने भाह से नीचे बैठ कर लडकी को प्यार से अपने सीने से लगा कर कहा- . तो तुम सचमुच गौरी ही हो ना?' अनवर ने पूछा- तुम कहा खो गई थी बेटी ? हम सब आज तक तुम्हारी तलाश कर रहे थे । तुम्हारी मा तुम्हारे गम से दम तोड गई बेचारी । अब लड़की ने अपनी कहानी सक्षिप्त शब्दो मे य बताई। मुझे मगू के आदमी उस रात जबरदस्ती उठा लाये थे । और मगू ने अपनी दिल लगी के लिये मुझ पर वह अत्याचार किये-जो खुदा दुश्मन पर भी न करवाये । फिर 7 जाने रात के अधेरे में वह मुझे कहा कहा ले गये फिर जब मगू का खेल पूरा हो गया तो उस ने मुझे एक ऐसे व्यापारी को बेच दिया -- जो यहा का था और वह मुझे यहा ला कर किसी कोठे पर बैठा गया। जहा पर मेरे पाव मे धूधरू बाध दिये गये । और आज मै हर मुारे पर मदहोश जान के नाम से जानी जाती हूँ।

अनवर ने देखा कि लड़की के एक-एक शब्द मे सचाई की महक आ रही
थी। उस पर सचमुच ही वह जुल्म हुआ था जो जानवर भी पर भी नहीं
किया जाता । अनवर की आखो मे आसू भर आये । वह बोला-
'मै तो यहा मुरली की तलाश में आया हू बेटी।
१
'तलाश में?"
म
.
हा उसे इस देश ने सेना का बदी बना लिया है - वह घायल है।
घायल है ? मुरली घायल है ? कहा है ? वह कहा है अबू जी"
मै
खुद नहीं जानता । यूसुफ मिया से दरख्वास्त की है वह मुरली का
पता लगाये और मुझे मिलवा दें - "
" मिलने के बाद मुझे जरूर बताना कि वह कहा है - मै भी- मै भी -
उसे मिलकर आऊगी जी । अबू जी।
हा हा जरूर मिलना।
बानो ने बडी गहरी नजर से गौरी की आखों में आखें डाल कर देखा,
और उसे लगा, आज भी वह बचपन की गौरी जो मुरली से प्रेम करती थी
मरी नहीं - वह तो आज भी अपू की पुजारनी बन कर मन का जोग केवल
मुरली के नाम का ही लिये छुपे है ।
अब बानो ने कहा-
" मै तुम्हें फिर मिलूगी गारी- मिलती रहूगी- तुम कोई चिन्ता मत
करना । मै यही हूँ - तुम्हारे पास हूँ - तुम्हे मिलती रहूगी यूसुफ मिया से
कह कर तुम्हे अपने घर बुलाती रहूगी ।'
गौरी चुप थी । और अब जाते समय फिर उसने अदब से हाथ उठा कर
खुदा हाफिज कहा और वह अपने पैरो मे बधे धुघरूओं की गूज में खो कर
बाहर चली गई।
अनवर और बानो सोचते रहे-
115

सजा तो इन्साफी का इनसाफ है । औरत की सजा हर क्षेत्र मे हर क्षेत्र से बढी होती है । उस के जीवन क्षेत्र का कुरुक्षेत्र कभी खत्म नहीं हो सकता कभी नही । जब तक वह मरद की भांति मरद सही न हो जाये । उस के जीवन की पखुडिया सदा यू ही कुचली जाती रहेगी चाहे वह किसी रूप में भी क्यो न हो। मरद का हृदय भगवान ने इतना कठोर क्यू बनाया है ? कि वह भी दूसरी औरत को अपनी मा या भाई मानने को तैयार ही नही होता । अगर ऐसा होता भी तो मनुष्य के जीवन में कारण नाम का कोई शब्द भी नही होता शायद। उन दोनो को लगा मानो गौरी अपनी पीडा की खट्टी व कडवी छीटे इन के जीवन दूध मे भी छोड गई हो -- जिस मे उनके अपने सकून का निर्मल जल गधला हो गया था । उनको गौरी की पीडा आज सहन करनी कठिन अति कठिन लग रही थी। वे दोनो वहीं चुपचाप बैठे गौरी के बारे मे ही सोचते रहे साचते रहे जब तक हमीदा कमरे मे न आ गई थी। किन्तु अगले ही दिन वह दोनो फिर एकात मे बैठे गौरी की ही बाते कर रहे थे । अनवर ने बड़े ही गभीर भाव से पास बैठी बानो को कहा था- बानो बेटी । गौरी आज भी निर्दोष है -पाक व पवित्र है - काश हम उसे इस गदी नाली से उठा कर ऊपर ला सकते।' मै भी यह सोच रही हू अबू जी।' ' सोचने व करने मे अतर होता है - सोच तो हर कोई लेता है किन्तु करता तो कोई कोई ही है। अबू जी । तो आप ही बता कि गौरी को इस कैद मे से कैस रिहा करवाया जा सकता है भला - " 7 116 ॥ बेटी ! हर कैद के दरवाजे इतने मजबूत होते है कि जो आसानी से उखाडे ही नहीं जा सकते - और जो हाथ उखाड भी दे वह कोई साधारण हाय नहीं बल्कि फौलादी हाथ होते है । तो उस बे-कसूर की आजादी व रिहाई के लिये अब पहले तो हमे कोई फौलादी हाथो की तलाश करनी होगी। अबू जी । मै मै सोच रही थी कि क्यो न हम गौरी को वापस भेज " । वापस कहा 71 " हिन्दुस्तान वहीं बसती मै 'मगर वह हिन्दुस्तान - वह समाज या वह बसती अब इस गौरी को कहा पनाह देगी ? नही कभी नही वहा भी इसे तवाइफ ही बन कर जीना होगा जैसे यहा भी जी रही है तो भेजने का मतलब ही क्या ? वहा अपने व जान पहचान के लोगो मे तवाइफ बनना तो यहा अजनबी लोगो के बीच तवाइफ होने से कहीं बुरा होगा । यदि यहा वह जी भी रही है तो वहा तो वह जी भी न सकेगी।" " तो फिर अबू जी ?" 'बानो बेटी | यदि तुम या मै ही उसे अपना मानने का साहस नहीं करेगे तो पराये लोग तो उसे अपना मान ही कैसे सकते है ? तो बेटी मै सोच रहा था यदि यह हो सके तो गौरी को मै अपनी बेटी व कानूनी बेटी बना लू, तो उस के पैरों के घुघरू तो उतर ही जायेगे यदि कुछ और नहीं हो सकता तो।" बानो का उत्तर था- अबू जी । आप कितने महान् है सचमुच । काश मै आप की बेटी होती-आप ही मेरे अबू होते-और-और कोई मुझे आप से अलग न कर " पाता। 'तुम तो अब भी मेरी बेटी हो बानो । मै तो ऐसा ही मानता हूँ।' 117 11 मगर दुनिया तो नहीं मानती अगर मानती होती तो मुझे हिन्दुस्तान से यहा क्यो लाया जाता?" अनवर बानो का भाव जानता था और उस ने ठडी सास भर कर रोती बानो के सर पर अपना हाय रख दिया था । और दोनो चुषी के जगल में खो से गये थे । विचारो मे खोया मनुष्य तो सोच के पानी मे तैरता हुआ कहा से कहा जा निकलता है। वे दोनो भी एक ही सोच के गहरे पानी मे मानो डूब रहे थे । और न जाने कब तक यू ही खोये भी रहते यदि नौकर आकर उन्हें न बुलाता यह कह कर- बडी बेगम साहिबा आप दोनो को खाने के मेज पर याद फरमा रही है हजूर। और वे सभले-फिर उठ कर दूसरे कमरे की ओर चल दिये थे । बीस और चार दिन बाद ही यूसुफ ने आकर अनदर से कहा- लो | अबू जी शुकर है अल्लाह का कि आपका काम बन गया । और मै खुश हूँ कि आपका एक छोटा सा काम कर पाऊगा जिसके लिए आप मन मे इतनी आशा लेकर यहाँ पर आये है। आवर को लगा मानो यह सारी खवर सुनाकर के यूसुफ ने उसकी दस बरस आयु और वढा दी थी- मनुष्य के लिए आशा से बडी कोई दवा है भी नही । अनवर की नजरों मे युसुफ एक साधारण व्यक्ति से उपर उठकर कोई देवता व पैगम्बर बन गया था। जिसने उसके बिछुड़े बेटे से मिलाया था। अनवर का मन चाहा कि वह यूसुफ के पाँव चूम ले किन्तु उमर के लिहाज से 118 - " " वह ऐसा कर नहीं पाया था । और उसने वहाँ से आगे बढ कर पास खडे यूसुफ के हाथ चूम ही लिये और बोला खुश रहो बेटा परवरदीगार तुम्हे कभी गम का सामना न करने दे । मेरे सब सजदों का फल तुम्हे ही बख्शे यूसुफ बेटा । मै ठीक तुम्हारे ही भरोसे आया था। और कौन कर सकता है। मेरी मदद यहा भला?' यूसुफ ने कुछ शरमयोग्य भाव से उत्तर दिया । "क्यो शरमिदा करते है अबू जी ? यह सब परवरदीगार की मेहर का सदमा है कि मै आपको आपके बेटे तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूँ। अनवर ने पूछा- " तो कब तक जाना होगा मुझे लेकर यूसुफ मिया ?' 'जी आज शाम को ही अबू जी सात बजे । 'ठीक है बेटा ठीक है। " और मन ही मन उसके अन्दर बेटे से मिलने की इच्छा वश से और बाहर होती जा रही थी। अनवर के लिए दोपहर के दो से लेकर साय के सात बजाना ही कठिन हो गया था । वह तो जाते समय तक खुदा की बदगी ही करता रहा था । उसका मन मानो मन मे नहीं था। यदि उसके वश में होता तो वह आज शायद समय की रेखा भी तोड कर समय से पहले ही सात बजा लेता। फिर हमीदा और बानो को भी पता चला और उन दोनो ने भी जैसे कैसे यूसुफ को मना कर साथ जाने की तैयारी कर ली। अन्त मे वही बात हुई कि समय कभी रुकता नही और सध्या के सात भी बजे । अनवर हमीदा बानो तीनो ही यूसुफ के साथ फौजी जीप मे बैठकर उस जगह पहुँचे जहाँ मुरली को रखा गया था। अनवर से कही बढ कर बानो के हृदय की धडकन आज तेज हो रही थी। वह उदास भी थी- और खुश भी । मानो उसकी खुशी की सकर उसके 119 गम के पानी मे घुल रही थी । अनवर सास-सास के साथ अल्लाह का शुकर कर रहा था। जिसने आज फिर उसे अपने मुरली को मिलाने का अवसर दिया था। जिस स्थान पर जग के बन्दी रखे गये थे । वह एक भारी जेल थी। जिसमे कई प्रकार के पहरे थे। किन्तु सब सरकारी मुलाजम यूसुफ को जानने के कारणवश रोक नहीं रहे थे-उल्टा हर कोई यूसुफ सलूट पर सलूट मारता जा रहा था । दरवाजे पर पूसुफ का एक और डॉक्टर दोस्त अहमद भी खडा था । जो इन सबको अपने साथ ही मुरली की ओर ले गया था। फिर एक बड़ा सा हॉल पार करके काफी आगे जाकर एक छोटी सी कोठरी आयी । जिसके फरश पर सब घास ही घास सी विछी हुई थी और उस पर वह सब बन्दी-फोजी लिटाए हुए थे । जो पकडे गये थे। और यहाँ उन सब का इलाज चल रहा था। हर फोजी पर एक-एक मोटा फौजी कबल डाल रखा था । और उस कोठरी मे दवाइयों व लहू की बदबू फैली हुई थी। और ऊपर से सब मरीजो की हाय-हाय की पीडा भरी आवाजें भी आ रही थीं। अन्दर आते ही मानो अनवर के आधे होश तो वहीं गुम हो गये । न जाने क्यूँ उसकी आशा भी जैसे निराशा मे बदलती जा रही थी। इतने मे ही यूसुफ ने एक किनारे से दूसरे किनारे तक उन सब लोगों को ले जाकर अन्त वाली दीवार के साथ लेटे एक बीमार व्यक्ति जो पौजी बन्दी था से मिलवाते हुए कहा-"लो अबू जी तो यह है । आपका मुरली। ने देखा मुरली की सूरत ही बदली पड़ी थी । वह बेहद दुर्बल हो चुका था। उसका चेहरा पिचक कर अन्दर घस चुका था । उसकी दोनो आखों के नीचे गहरे काले-काले दाग पडे हुये थे । उसके होठ सूजे व पते के समान सूखे रहे थे । और वह कबल में छोटा एक सीधी सी लकडी की भाँति अनवर जान पह रहा था। 120

अबू" शब्द सुनते ही मुरली ने जैसे कैसे अपनी बीमार आँखो को
खोला और सामने खडे अनवर को बड़ी मेहनत से पहिचानने का प्रयत्ल करने
लगा।
इतने मे ही अनवर ने घुटनो के बल झुककर मुरली के मुह व माथे को
अपने हाथों मे लेते हुए कहा-
'मेरे बच्चे ! मेरे मुरली।"
अब मुरली के कानो ने भी अपने अबू की आवाज पहचान ली थी और
वह चीख कर बच्चों की भांति रोता-रोता बोला-
'अबू जी । मेरे अबू जी"
फिर उसने सामने खडी बानो को भी पहिचानने की कोशिश की,
कोशिश करते धीरे से मुह ही मुह से निकला कौन
बा न
21
THEWS
L
॥
बानो की आखों से पानी की धाराये बह रही थी। हमीदा की आखे मी
डबडबा रही थी।
जैसे बुरा व खराब मौसम खिडकी से और अधिक खराब दिखाई देता
है ऐसे ही अनवर को मुरली की हालत जेल मे और भयानक दिखाई देने
लगी । और वह एक ही सास मे अपने मुरली का मुह माया सब कुछ चूर्मता
जा रहा था और चूमता जा रहा था । और बडबडॉ रहा था-
बच्चे?"
मुरली का सारा मुह भी अनवर ने अपने आसुओं से धो डाला था।
मुरली भी रो कर अपने अनवर अबू की हिम्मत की दाद दे रहा था जो उसे
देखने दूसरे देश की जेल की सलाखों के पीछे भी चला आया । वह जानता
या यदि आज माधो स्वय होता तो इतना साहस न कर पाता जितना अबू ने
किया था । अगर अब उसने भी अपनी कठोर सच्चाई को उधेड कर कहा-
अबू जी मै मै कही का नहीं रहा
121

अनवर ने उसका माथा फिर चूमते हुए कहा- अल्लाह सब ठीक कर देगा बेटा, हिम्मत रख जल्द ही तुम्हे वापस भेज दिया जाएगा । अब तो जग भी बन्द हो चुकी है।" मुरली ने पूरे जोर से अपना सर इधर उधर मार कर हिलाते हुए कहा- " नही अबू जी नही अब मै कही का नही रहा मै मैं नकारा हो चुका हूँ । अब मै कुछ नही कर पाऊगा । मेरी मेरी दोनो बा जुये खत्म हो गई। यह सुनते ही अनवर के मानो प्राण निकल गये हों और उसने बडी हिम्मत करके मुरली के ऊपर डाला कबल उठा कर देखा तो सचमुच वह बिना बाजू के जीवित लाश के समान था । अब अनवर की भी चीख निकल गई - वह बोला 'हाय अल्लाह यह क्या मेरे जवान बेटे के दोनों बाजू क्यो काट दिए। इसके बदले मेरे हाय काट दिये होते। और वह रो रोकर फिर मुरली का सर घूमने लगा था। पास घडी बानो से भी देखकर सहन न हुआ था । और उसके मुह से जोर की चीख निकली- 'मुरली । मुरली ने भी दबी व कमजोर आवाज मे कहा 'वानो ।' फिर नजाने कैसे बानो को जोर का चक्कर आया और उसकी आँखो के आगे अन्धेरा छाने लगा वह खडी-खडी लडखडाने लगी तो पास ही खडे उसके पति यूसुफ ने उसे सहारा दिया और देखते ही देखते जब बानो सभल न पाई तो यूसुफ ने उसे अपणी बाहो मे उठा लिया था । और वहा पास खडी हमीदा से बोला- 'बातो बेहोश हो गई अभी बानो बेहोश हो गई-इसे फौरन बाहर ले जाना होगा।" और वह पास घडे डॉक्टर दोस्त से यह कह कर बानो को बाहर उठा लाया " या- 122 . - " अहमद जल्दी से अबू जी को भी ले आओ बानो बे-होश हो गई है इसे डॉक्टर की सहायता की आवश्यकता है । तुम अबू जी को सभालकर जल्दी से जीप तक ले आओ।' 'अच्छा-अच्छा तुम चलो- मै इन्हे लाता हूँ। तुम बानो भाभी को जल्द से जल्द बाहर ले जाओ यहा से देखते-देखते तेज कदमो से यूसुफ बानो को उठाये बाहर चला गया। इधर डाक्टर ने भी अपने हाथो से अनवर को उठाते हुए कहा- अबू जी, बस अब मिलने का वक्त खत्म हो गया-बानो भाभी की तबीयत भी खराब हो गई है - चलो।" और उसने काफी जबरदस्ती से अनवर को मुरली से अलग किया था। आवर ने रोते हुए कहा- फिकर मत करना बेटा हिम्मत मत हारना तुम तो बहादुर सिपाही हो । मै यहीं हूँ - मै यही हूँ, फिर आऊगा मिलने तुम्हे ।" मुरली ने भी रोते रोते जाते अनवर को कहा- अबू जी अबू जी माँ को कुछ मत बताना, वह सहन न कर पाएगी अबू मा से मेरा कुछ मत कहना ।' अनवर ने एक बार फिर चलते-चलते पीछे मुह घुमाकर देखा-उसे लगा मानो मुरली की आवाज उसका दामन खीच कर रोक रही हो उसे । अच्छा बेटा नहीं कहूँगा ।" कहता कहता वह डॉक्टर अहमद के साथ बाहर आ गया था । मुरली को लगा मानो खुद भगवान अनवर के रूप मे मिलने आए हों उसे । इस मुलाकात से अनवर की हर चीज को भारी चीस (टीस) पन मिला था ढाढस नहीं मिल रही थी- वह अपने आपको हर पल भारी भारी सा अनुभव कर रहा था। जाते आवर को गहरी नजरों से देखता मुरली जान गया था- . . 123 कि अब फिर शायद अबू देवता के दर्शन उसके भाग्य मे न हों । आज पहली बार मुरली को अपने फौज मे भरती होने का भारी दुख अनुभव हो रहा था। जिसके कारण उसका अपने अबू से साथ छूटा जा रहा था । वह जाते अबू के चरण स्पर्श भी न कर पा रहा था। कितनी भारी मजबूरी के पहाड के नीचे वह दबा हुआ था । आज जीवन ने मानो मुरली को बे-दधल कर दिया था। वह एक कगाल की भांति टूट कर रह गया था । वह हूबती नजरों से अपना खड्डा स्वय खोद रहा या-जिसमे उसे अपने आपको दफनाना होगा । उसकी आवाज भी डूबती जा रही थी और शरीर का सारा पानी मानो उसकी आँखों के झरनो से बह उठा था। अनवर का हर आगे बढता कदम पीछे लौट जाने के लिए व्याकुल हो रहा था । जहाँ उसका मुरली अतिम सासो की भटठी मे दानों की तरह भुन रहा था । अनवर को बन्दिश की जकडन खींचे जा रही | उसकी अपनी आँखो से आँसुओं की धाराए बहती जा रही थीं। मुरली को फिर बानो के चेहरे की महक की याद आई मानो किसी जोर की बिजली की चमक से उसने बानो को आज फिर करीब से देखा हो । प्रिय को देख लेना ही, बहुत कुछ पा लेने के समान ही होता है । जिससे विशेष प्रकार का सकून मिलता | मानो किसी ने रूखी-सूखी रोटी के निवाले को पानी की घूट दे दी हो। और किसी ने सूखी धरती को पानी का छींटा । वह बानो से दो बोल भी न बोल पाया था। बानो भी तो मुरली के मर रहे शरीर को अपनी नजरों की ठडक भी नही दे पाई थी। यह भी उसकी बदकिस्मती का ही विशेष अग की देन थी। खाली पडा मुरली अपनी ही तडपन से उलझता जा रहा था । और अबू उसका शरीर मानो आग से कही अधिक भटठी के समान जलने लगा था । उसके सर की नसे फटी जा रही थी। उसके हाथो का रक्त और भी बहने लगा था ! उसके पैर जो पहले से ही ठडे थे, और भी ठडे हो रहे थे । उसके दोनो खोये बाजुओ की कमी मुरली को जिस्म में अब अगों से अधिक अनुभव 124 हो रही थी । जिनसे वह जाते अबू" व बानो को ' अलविदा" भी न कह पाया था । वह अपने आपको कोई सरायी सी रूह मान रहा था जो इस समय पीडा की टीसो व चोटों पर रखा हो कर अपने दुखात को अपनी ही डूबती नजरो से देख रहा था। मनुष्य जीवन मे कई बार इतना भाग्यहीन भी हो सकता है यह तो उसने कभी सोचा भी नही था कि वह अपनी ही आँखो से अपनी लाश को भी देख सके । मुरली की सास भी तेज होती जा रही थी । उसे अजीब प्रकार के चक्कर से आने लगे थे, और उसे लगा मानो वह अपने शरीर के वस्त्र स्वय उतारता जा रहा था -उतारता जा रहा था। इक्कीस उस शाम बानो को सीधा बड़े अस्पताल लाकर दाखिल कर दिया गया था जहा उसका तीन मास का गर्भ जाता रहा वैसे उसकी अपनी भी हालत चिन्ताजनक बनी हुई थी उसे अन्दर ऑपरेशन थेटर में ही रखा गया था। जहा रात में अनेक बार डॉक्टर यूसुफ आप बार-बार जा जाकर देख रहा था। बाहर वेटिंग रूम मे हमीदा और अनवर घबराए बैठे थे । वह दोनो एक ही समय पर अल्लाह से एक ही भीख माग रहे थे और वह थी बानो की जान की भीख। फिर आधी रात भी गुजर गई । सब डाक्टरों मे अजीब सी खलबली सी मच गई थी। सुबह के चार बजते ही एक डॉक्टर ने आकर वेदना प्रकट करते कहा- खुदा का कहर टूट पडा डॉक्टर यूसुफ पर पूरी कोशिश करने पर भी बेगम यूसुफ बच न पाई। हमीदा की चीख निकल गई । अनदर माया पकडकर फूट-फूट कर रोने लगा और बडबडाया। 125 1. - या अल्लाह । यह क्या हो गया n और एक घण्टे मे ही बानो की लाश को उसके घर पर लाया गया- जहा सब बिरादरी वाले उसके दफ्न की तैयारिया करने लगे। जीवन भी कितनी अजीब वस्तु है जब जन्म होता है तो खुशियाँ मनाई जाती है , और जब मरता है तो मातम मनाये जाते है | बानो की मौत से घर मे अजीब सा सन्नाटा छा गया था | हर कोई गम्भीरता के खरे समुद्र मे डूबा हुआ था । हमीदा आज बानो को खोकर सही शब्दो मे अकेली हो गई थी । बल्कि मौत का गम मा से बढकर और किसी को हो भी कैसे सकता है। यूसुफ तनहाईयो मे गुम सुम खडा बानो की याद मे आसू बहा रहा था। किन्तु सब जानते भी थे कि यूसुफ का गम अरजी है । कुछ क्षणो के लिए नहीं तो कुछ मास या सालो के लिए होगा । किन्तु अन्त में तो उसे दूसरी शादी करनी ही थी जिसकी खुशी उसकी बानो की याद व पीडा के को घुघला कर देगी । और फिर धीरे धीरे करके यूसुफ जब अबू बन जायेगा तो बानो की कभी याद भी न आयेगी उसे । और अनवर इसी प्रकार गम के अन्धेरे से गुजर रहा था जो हर बार एक नई पीडा लाता और उसके गमों के खजानो मे और इजाफा कर जाता । जैसे बानो की मौत वह उन आखो से देख रहा था । जिसे उसने कभी माधो- सलमा और सीता की मौतो सीने पर झेला या । जब से वह मुरली की दशा देखकर आया था वह मन ही मन भारी चिन्तित या । क्योंकि वह अपने जीवन के तजुरबे की समझदारी से समझ रहा था कि मुरली और मौत मे अधिक फासला न रह गया था। अब वह किसी भी कीमत पर अपनी पकी आखों से मुरली की मौत नहीं देखना चाहता था । मनुष्य प्रकृति के हाथो एक वह खिलौना है - जो न तो अपनी मरजी से जी पाता है और न मर ही। अनेक बार तो परमात्मा में अन्य विश्वास भी मनुष्य को उसके कर्मों से मुक्ति नहीं दिलाता ! किन्तु साधारण व्यक्ति तो इस 126 स्थिति में भटक जाते है । और अनवर जैसे पहाड व चटटान के समान खडे हर दुख को अल्ला का हुक्म मान कर सहते रहते है सहते रहते है। समय सबसे बडी मलहम है -दिन बीतते गये, और बानो की मौत अब दूसरा दिन हो गयी । लोग ~ बिरावदी वाले आते इन लोगों के पास बैठकर बानो की मौत के दुख मे शरीक होते और चले जाते। दस दिन तक बस इसी का माहौल बना रहा था। यूसुफ मिया ने भी इन दस दिनों तक अपनी दाढी भी न बनाई थी। अब उसका चेहरा किसी कवि के समान दिखाई देने लगा था। वह उ7 दिनों डयूटी से छुट्टी पर चल रहा फिर अब दो हफ्ते बाद वह जाने लगा तो भी अनवर का साहस नही पड़ रहा था कि वह उसे फिर मुरली के बारे मे जाने को कहे या पूछे ही । अनवर के मन मे अजीब सा भरम था कि जब से वह इस घर मे आया है मानो घर की खुशिया ही लुट गई थीं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं था। न वह भाग्यहीन था न उसके कारण ही बानो मरी थी । मौत तो केवल अपने निश्चित समय के लिए बहाने ही ढूढती है । और जहा उसे वार करना होता है करती ही है । एक नगी तलवार के समान । अनवर ने जो भी हो अभी यूसुफ से मुरली की कोई भी बात न पूछने का निर्णय सा लिया था । वह किसी प्रकार भी यूसुफ के घावों को कुरेदना नही चाहता था। अब एक दिन अनवर ने देखा वही मदहोश जान बानो बेगम का अफसोस प्रगट करने के लिए अनवर के पास आई । अनवर ने उसे देखा और बैठने को कहा "आओ बैठो बैटी लडकी चुपचाप सर झुकाये आस् बाती रही । अनवर की भी अपनी आखे भर आयी थी उसने ठडा सास करके पूछा- -- - 127

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कैसी हो बेटी?'
'ठीक हू अबू जी | बानो बेगम का सुनकर तो यकीन ही नहीं आया कि
वह सचमुच ही ।
हा बेटी । मुझे तो अब तक भी यकीन नहीं होता-उसे अपने हाथों
दफना कर भी ।
अब लडकी ने फिर कहा-
'काश ! उनकी जगह खुदा मुझे ही उठा लेता।"
अनवर ने कहा-
हर एक की मौत हर एक समय पर निश्चित होती है कोई किसी
की जगह नहीं जा सकता - यही कुदरत का असूल है बेटी।
फिर न जाने अनवर को कहा से सूझी उसका मन चाहा कि क्यो न वह
इस लडकी को गोद ले ले अपने ही समाज मे अपना नाम देकर उसके पैरों
मे बधी पाजेब धूघरो से उस निरदोष मासूम द पाक लड़की को विदाई
दिलवा दे।
लडकी का मन चाहा कि वह अबू से मुरली के बारे में पूछे कि वह कहा
है ? कैसा है ? यह उससे मिले भी या नहीं आदि-आदि।
किन्तु वह कुछ भी नहीं पूछ पाई थी, क्योकि ऊपर से यूसुफ आ गया था और
उस दिन पहली बार यूसुफ ने उसे इतने करीब से देखा था। लडकी ने झट ही
पलके झुका कर अनवर से कहा था-
'अच्छा अबू जी । अब मै इजाजत चाहूगी।'
अच्छा बेटी । जाओ । फिर मिलने आना दुबारा, मेरे जाने से
पहले ।'
जी ।
128

कह कर लडकी चली गई । यूसुफ बहुत हैरान था कि एक तवाइफ- लाहौर की मशहूर मदहोश जान-अनवर को 'अबू जी ' कैसे और क्यो कह रही थी, किन्तु उसकी समझ मे तो कुछ भी सही सही नहीं आ पाया था । और वह चुपचाप अपने कमरे मे लौट गया था। कुछ रिश्ते जीवन मे ऐसे भी तो होते है जो लहू के होते हुए भी जिनका न कोई नाम होता है न ही अन्त । वह तो बस मनुष्य की आत्मा से बधे होते है ऐसा ही रिश्ता उस लड़की व अनवर का भी था। कितनी अजीब सी बात थी कि वह उसका अबू न होते हुए भी अबू ही था । यूसुफ जानना भी चाहता था कि यह इस देश की लडकी अनदर को खुलेआम अबू कैसे सबोधन कर रही थी? इसी दबे से प्रश्न ने यूसुफ के भीतर एक जानकारी की एक लकीर सी खेच दी थी। जिसके बाद उस पार जाना चाहता था। जहा से वह सही उत्तर पा सके । किन्तु फिलहाल तो वह केवल इतना ही मान पाया था कि जरूर अनवर की ही माग होगी कि उसे अबू" कह कर बुलाया जाये । क्योकि सही अर्थो में वह सबका अबू था । और खास व विशेष तौर पर दुखियो का तो वह मसीहा था । अनवर को यूसुफ अभी तक बहुत समझ चुका था कि विशेष प्रकार से बानो ने अनवर की पूरी पूरी जानकारी यूसुफ को तो अनवर के आने से पहले ही दे दी थी। फिर सुगन्ध छिपती भी तो नहीं । सचाई की महक हर व्यक्ति को प्रभावित कर ही लेती है। वैसे भी अनवर के दामन में सबके जखमो की पीडा बन्धी हुई थी । चाहे वह किसी के भी क्यो न रहे होगे। जीवन का मूल्य तो बनता ही बलिदान से है । उसके बगैर तो मानो जीवन एक प्रकार बजर धरती के समान हो जाता है । जहा न तो किसी मदद न उपकार का ही कोई पौधा फूट पाता है । यूसुफ आज के पढे लिखे नवयुवक हाने के नाते भली भाति जाता था कि शुभ कर्म किसका नाम है । यही कारण रहा होगा कि वह अनवर को मुरली से मिलवाने का यह उपकार कर चुका था । चाहे उसे इस की भारी कीमत ही चुकानी पड़ी थी ! अपनी प्रिय बानो की जान खो कर यदि ऐसा न होता तो शायद बानो जीवित रह पाती 129 और न मरती। फिर उसे तो एक क्षण के लिए भी अनवर से किसी प्रकार का कोई गुस्सा व गिला नहीं था । क्योकि वह भी माता या । समझता था, कि जो होना होता है वह अवश्य होकर ही रहता है जिसे मनुष्य की तुछ शक्ति तो किसी भी कीमत पर रोक नही पाती । इस विचार ने मानो यूसुफ के दुखते दिल के दुख के जलते जिसम पर बर्फ की ठडी पटटी रखा जैसा काम किया था । अब वह बानो से कही अधिक उस तवाइफ लडकी के बारे में सोच रहा था जो अनवर को अबू कह गई थी किस रिश्ते से ? व किस नाते से ? यूसुफ यही सोचता रहा सोचता रहा। यूसुफ अनवर के बारे मे गलत तो सोच भी नहीं सकता था । अभी तक तो अनवर को वह एक फरिश्ता ही मानता था किन्तु | मदहोश जान से अनवर का किसी प्रकार का कोई भी सबध होने की बात उस की समझ में नहीं आ रही थी बडी अजीब सी परेशानी थी युसुफ की जो उसे बेचैन किए हुए थी। बाईस मदहोश जान के चले जाने के एक घंटे बाद यूसुफ अनवर के कमरे मे आया । जो उसी समय अनवर नमाज पूरी करके उठा ही था । अनवर ने देखा यूसुफ आज बहुत परेशान था । मानो उसकी नजरे अनवर को कुछ कहना चाहती थी किन्तु उसके होठ कह नहीं पा रहे थे । यूसुफ का उतरा चेहरा देखकर अनवर से रहा न गया और पूछा- क्या बात है यूसुफ मिया । कुछ परेशान से दिखाई दे रहे हो ? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है यूसुफ को लग रहा था कि उसकी सेवा तो फल के बगैर सजा बन गई थी। जिसे वह सच भी सहन नही कर पा रहा था। उसने झट से आधे नीची करते हुए दवी आवाज मे उत्तर दिया। 130 - " तबीयत तो ठीक है अबूजी । मगर मा बहुत भारी है।" मै जााता हूँ बेटा । तुम्हारा दुख मै आगव कर सकता हूँ । जीवन सायी का सो जाा कोई साधारण बात यहीं होती । शादियाँ बहिगत से बन कर आती है फिर उनके जीवन से पहले ही खो देता बडे भारी दुख की बात होती है । किन्तु निराशा के दामन से उठ कर ही इन्सा आशा की गोद में जाता है। हिम्मत से काम लो । अल्लाइ की यही मरजी थी । आगे भी तुम्हे वह ही रास्ता दिखायेगा । बालो अब लौट कर नहीं आ सकती बेटा।' अब यूसुफ ने भी कुछ कहो का साहस करते कहा वह बडबडाया 'अबूजी । अबूजी । वो-वो-मुरली। मुरली का नाम सुनते ही अनवर को लगा मानो यूसुफ ने उसकी दुखती नस पर हाथ रख दिया हो। और वह मट से बोला- " हाँ हाँ कैसा है मेरा बच्चा ? मेरा मुरली अव- उस दिन तो वह तेज बुखार में भी तप रहा था 1" यूसुफ के मुँह से एक पल मानो बोत ही न निकल पाये थे और फिर कुछ उसने बच्चों की भाँति सामने खडे अनवर का हाथ अपने हाथों में लेकर टूटी आवाज मे बताया- उसी रात उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी । और अगली सुबह वह वह भी खुदा को प्यारा हो गया । अनवर को लगा मानो किसी काली गहरी खाई में उसे धक्का दे दिया हो- और वह चिल्लाया "नही -नहीं- कहो कि यह झूठ है – मुरली ठीक है मुरली को कुछ नहीं हुआ । मेरा मुरली बिल्कुल ठीक है ।' यूसुफ की आँखें डबडबाई और वह धीमी आवाज में बोला- 'यह-यह ठीक है अबूजी । यह सच है। सच चाहे कितना भी कठोर नयो न हो सुनना पडता है सहन करना ही पडता है । अनवर को लगा उसे चक्कर आ रहा है - और वह वहीं पास विछे - 131 - पलग पर बैठ गया । उसका सारा शरीर काप रहा था । यूसुफ भी उसका हाथ थामै उसी पलग पर बैठ गया था । अब अनवर ने रोते हुए कहा- या खुदा । तेरा यह कहर मुझ बदनसीब पर क्या अभी बाकी था" यूसुफ उमे थामने की कोशिश कर रहा था । जैसे कोई गिरते पछी को हाथो से थामने की कोशिश करता हो। दिलो मे सदा जीवित रहना मरना नहीं हुआ करता । ऐसी ही मुरली की मौत भी थी। जो कभी अनवर के दिल मे भर नही सकती थी । अब कुछ होश सभालते अनवर। पूछा- और और उसकी ।' दह मुरली की के सबध मे पूछना चाहता था जो वह साफ लफ्जो व शब्दो मे कह 7 पाया था किन्तु यूसुफ उसका भाव भली भाँति जान गया था और बोला- वह तो अगले दिन ही सरकारी हुक्म के मुताबिक जला दी गई थी। लाश देने का हुक्म नहीं है । 'अब मानो अनवर के अन्दर मे जीवन भर की सहनशीलता की सिल फूट पडी हो वह अपनी ही पीडा के ज्वार भाटा में लिपटता बोला- क्या-क्या वह लाश क्या लावारिश थी जिसे इतनी आसानी से जला कर भस्म कर दिया गया ? और उसके अबू को मुँह भी न देखो दिया? यह सरकारी हुक्म था अबू जी। किस धर्म में ऐसा लिखा है कि कि एक बेटे की लाश उसके बाप को न दी जाए ? किस सरकार ने यह कानून बनाया है ? कि जो बाप विदेश में बेटे की तलाश में आया हो तो उसे बेटे की लाश भी न दी जाये ? और वह फिर फूट-फूट कर रोने लगा । अब हमीदा आ गई थी । और वह यूसुफ के साथ मिलकर टूटे हुये अनवर को समेटने में हाप बटा रही थी। - सका। अनवर कह रहा था। या ! खुदा मै कितना बदनसीब हूँ जो अपने बेटे को कन्या भी न दे । कैसा इन्साफ है तेरा मेरे परवरदीगार ? एक बाप बैठा देखता रहे और मौत उसी की आखो के आगे उसका बेटा निगल जाये ? और सरकार बेटे का मुह भी न देखने दे? बडी मुशकिल से अनवर को सभाल पाये ये हमीदा और यूसुफ । किन्तु उसी पल से वह सचमुच हिल गया था। उसका दिल बैठना शुरू हो गया था। उसका रंग भी पीला पड़ने लगा था। अब यूसुफ घबराया और वह झट से अनवर को कार में बैठाकर बडे से अस्पताल ले गया। जहा जाते ही उसे दाखिल कर लिया गया ।डॉक्टरो का कहना या अनवर को हार्ट अटैक हो गया था। वह उस अस्पताल में एक मास से भी अधिक देर दाखिल रहा था। कभी कभी जब वह आख खोलता तो न जाने क्यो उसे माधो का ही चेहरा नजर आता । जो उसे मुस्करा कर देख रहा होता। बीमार अनवर के होठ जब भी हिलते तो वह कह रहा होता। 'माधो- मेरे दोस्त । मुझे माफ कर देना मै मै मुरली का कुछ नही कर पाया। डॉक्टरो ने कहा था अनवर को सख्त ऐतीहात की जरूरत है उसे अभी पलग से उठना भी मना या । यही कारण था कि युसुफ ने अभी अनवर की अस्पताल मे ही रखा हुआ था । अनवर तिल तिल करके मर रहा था। कितनी आश्चर्य की बात है कि जब तक मनुष्य के श्वासो की पूजी पूरी खाली न हो जाये वह मर भी नहीं सकता चाहे वह कितना ही कष्ट क्यो न भोग रहा हो और चाहे वह स्वय ही कितना भरना भी क्यू न चाहता हो । ऐसी ही तरसयोग दशा अनवर की भी बनी हुई थी। " 133 . आश्चर्यजनक बात तो देखने वाले के लिये यह थी कि इतने अच्छे लोग इतना कष्ट क्यो पाते है ? शायद इसलिए कि ईश्वर उनकी परीक्षा लेता होगा । क्योकि किसी भी डिग्री की प्राप्ति के लिए परीक्षा से गुजरता आवश्यक होता है और प्राप्त करना भी । ईश्वर प्राप्ति के लिये और जो भी मनुष्य हस कर अपने कर्मों का लेखा देता रहता है हर कष्ट में भी प्रभु पर विश्वास व भरोसा बनाये रहता है, वही सही अर्थों में प्रभु प्राप्ति के अनुकूल भी होता है। अनवर पर जो कहर टूटा था उसका विवरण तो शब्दों मे दिया ही नहीं जा सकता । जो बाप होने के अधिकार से बेटे को देखने आया था और उसे बेटे की लाश भी देखनी नसीब न हो सकी थी इससे अधिक पीडा और हो भी क्या सकती है । जिसके बेटे की लाश को लावारिस लाश के समान फूक दिया हो तो वह बाप किस प्रकार आसानी से यह जुलम सह पाता भला ? अनवर के अन्दर अब कुछ बाकी न रहा था उसको तो मौत के सिवा अब प्रतीक्षा भी किसी चीज की न रही थी। अब तो अनवर के श्वास केवल एक ही बात पर अटके होगे और वह बात थी गौरी की चिन्ता । जिसे वह भली भांति जानता या कि उसके स्वय आँख मूदने के पश्चात् कोई भी उसे इस पेशे के की चड से बाहर नहीं निकाल पायेगा । क्योकि किसी का भी साहस न होगा कि वह कीचड मे गिरी और कीचड से लथ-पथ इस मूर्ति को निकाल लेगा । जिसको निकालो से किसी के भी हाय कीचड मे सन जायेगे । और फिर पेशा करने के पश्चात् तो मानो अब इस मूर्ति मे तरेड भी आ चुकी थी । जो जुड न पायेगी । और यदि एक प्रकार से जुड़ भी गई तो उसका बाल व दाग से तो वह कभी भी मुक्त हो ही नहीं सकती। और किसी अच्छे व ऊचे स्थान पर टूटी मूर्तियाँ रखी ही नहीं जाती । यदि कोई रख भी ले तो वह अशुभ ही मानी जाती है । तो इस प्रकार गौरी एक टूटी मूर्ति के समान होकर रह गई थी । जिसे कोई भी स्वीकार करने से खुले आम राजी नहीं होगा । यदि उसे कोई अपना - 34 सकता था तो केवल अबू अनवर जो तवाइफ का बाप तक बना स्वीकार कर सकता था। वह समाज के गहरे दरिया मे भी कूद पड़ने के लिए तुला हुआ था- यदि इस कीमत पर भी गौरी का गदा जीवन उसकी गदी मौत से बच सके। तेईस फिर छह हफ्ते के पश्चात् डॉक्टर ने घर ले जाने की सलाह दी । यूसुफ अबू को घर ले आया और स्वय बडी ही मेहनत से मरीज की भारी सेवा कर के देख भाल कर रहा था । मन ही मन यूसुफ और सब के समान अब अनवर को उतना ही चाहने ला था जितना और सब चाहते थे । अनवर का प्रभाव यूसुफ के सीने के शीशे में भी साफ-साफ उतर चुका था । मनुष्य औरों को अच्छा अपनी पढाई के कारण ही बना पाता है । ठीक ऐसा ही अनवर ने आज तक सबके लिये किया था। फिर भला यूसुफ ही अबू की भलाई व अच्छाई से मुक्त कैसे रह पाता भला? वास्तव मे कोई भी मनुष्य अच्छा या बुरा नहीं होता उसके विचार ही उसे यह सब बना देते है। अनवर मन ही मन यूसुफ की देखभाल व सेवा कर रहा था । यदि अबू के वश मे कुछ होता तो वह यूसुफ को अवश्य ही कोई न कोई उपहार दे देता। किन्तु अबू के पास किसी को भी देने के लिये था। क्या ? बचा ही क्या था? जो वह किसी को भी दे पाता । सही अर्थों मे तो वह औरो से ले ही रहा था और यही अबू की मजबूरी थी । और जब भी मनुष्य मजबूर हो जाए तो उस का दम घुटने लगता है। चाहे वह कितना भी पढ़ा लिखा क्यो न हो । वह भी घुटता है मन ही मन, अबू की हर समझदारी मानो उहे खोखली लगने लगती है। वैसे भी विद्या समझदारी नही होती । समझदारी तो आती है तर्जुदे से । अब अनवर स्वय न पढाने के बराबर ही था । उस ने केवल मौलवी जी से 135 अब " " अलिफ बे-पे आदि के कुछ अक्षर ही तो सीखे । किन्तु फिर भी उस की सूझबूझ बड़ी से बड़ी विषम पढाइयो का मुकाबला करती थी। यूसुफ के घर मे पडा-पडा अनवर अपने आप को यूसुफ पर एक बोझ सा मानने लगा था। किन्तु अपनी विवशता के कारण वह कर भी तो कुछ नही पा रहा था। यूसुफ भी अनवर के माथे की शिकन को मानो जानने लगा और बोला - अबू जी । आप कोई फिक्र न करे बहुत जल्दी ही ठीक हो जायेगा । चल फिर सकेगे जहा मरजी आ जा भी सकेगे-आप इस बात का अपने मन पर कोई बोझ न रखे। " अनवर ने ठडी सास भरते कहा 'बोझ क्या रखना है बेटा । मै तो एक बोझ बा गया पर। आप ऐसा क्यो सोचते है ? आप हमारे अबू है आप की देखभाल करना तो हमारा फर्ज है जी।' ' फर्ज भी तो कोई-कोई निभा पाता है आज की दुनिया में और जो निभाता है-वह इनसान से फरिश्ता बन जाता है जैसे तुम बेटा। " 'नही-नहीं । ऐसा कुछ नही है मुझ मे । आप खुद इतने अच्छे है तो सब को अच्छा मानते है। बेटा फल खाने वाले बीज भी बोते । अपनी खुशी की परवाह न करते हुए फर्ज निभाना ही फर्ज होता है।' फिर कुछ क्षणों के लिये वह दोनो चुप रह गये । अब तो जाने क्या हुआ कि अचानक सामने से वही तवाइफ लडकी आती दिखाई दी । अनवर का मन तो पहले ही इसे मिलने को न जाने क्यो कर रहा था । उसे देखते ही अनवर के मुह पर एक मीठी सी मुस्कराहट आ गई । मडकी ने बडे अदब से अनवर व पास बैठे यूसुफ को आदाब कहा । पिर अनवर के कहने पर वह पास रखी कुर्सी पर बैठ गई थी। न ही आज उस का - 136 - चेहरा पॉऊडर व लाली से चमक रहा था वह तो आज घर की साधारण लडकी बन कर आई थी । क्यो कि वह किसी और के लिये नही बल्कि केवल बीमार अनवर अबू को मिलने आई थी जो उसे पता चला कि अभी अभी दो रोज हुए वह हस्पताल से वापस घर लौटा है। पास बैठी लडकी को यूसुफ ने देखा सचमुच बहुत अच्छी लग रही थी। और मन ही मन वह सोचने लगा यह लडकी जन्म से तवाइफ खानदान की तो नहीं लगती। और वास्तव मे वह थी भी नही । मनुष्य के हालात ही उसे अच्छा या बुरा बना देते है नही तो वह जन्म से तो मनुष्य ही होता है । अनवर ने धीमे स्वर मे पूछा- कैसी हो बेटी ?" ठीक हू अबू जी । आप की तबीयत अब कैसी है ?" ठीक ही समझो जब जिन्दा हू लडकी ने देखा यूसुफ फिर उस की ओर देख रहा था तो उस ने झट से आखे झुका ली थीं । यूसुफ यह कह कर उठगया- क्या पीयेंगी आप-उडा या गर्म ? लडकी को मानो पलभर तो कोई उत्तर ही नहीं सूझ रहा था मगर फिर उत्तर न देना बतमीजी मानकर उसे इतना कहने के लिये मजबूर होना पडा या- 'जी। कुछ नहीं शुक्रिया । 'हुजूर ' शब्द आइए ।" उसकी आदत में शामिल हो चुका था। जिसमे वह डूब कर रह गई थी । यूसुफ इतना कह कर अन्दर आ गया था। ' गर्मी है कुछ ठडा ही मगदाता हूँ। हमीदा-अबू इस समय कोई मिलने आई हुई तो दूसरे कमरे मे बैठी थी - और न ही वह जानती थी कि यह लड़की अनवर को देखने आई है । यदि जानती और देखती तो जरूर आ . भी जाती। अनवर के जीवन में अब एक यह लडकी ही तो रह गई थी जिसे वो बसती की याद कह सकता था । यदि यह भी एक कारण रहा होगा कि 137

अनवर मन ही मन लडकी को पहले से कही अधिक प्यार करता था। वह
उसे न जाने क्यो अपनी ही बेटी मानो लगा था।
अनवर ने कहा-
'तुम आती हो बेटी तो मुझे बहुत अच्छा लगता है- तुम रोज आ जाया
करो।
॥
'जी अबू जी ! मुझे भी तो आप से मिलकर सुकून मिलता है।'
अनवर ने देखा गौरी की आखो मे पानी चमक रहा था अनवर का भी उसे
देख कर मन भर आया था। अनवर ने बड़े प्यार भाव से कहा-
"तुम यहीं क्यो नही आ जाती मेरे पास जब तक मै हू
अनवर एक क्षण के लिये यह तो भूल ही गया था यह उसका अपना घर
न था जहा वह रह रहा था यह तो यूसुफ का घर या । अनवर को यह कहने
का कोई अधिकार नही था। शीघ्र ही वह सभल कर फिर बोला-
हालाकि यह घर मेरा नही है । यूसुफ मिया का है।'
अब न जाने कैसे साथ के कमरे से यूसुफ नौकर से ट्रे मे तीन गिलास
बादाम का शरबत उठाये आ पहुचा और उस ने अनवर को यह कहते सुना-
बोला
यह घर तो आप ही का है अबू जी । अनवर ने बडे प्यार से मुस्करा कर
उत्तर दिया।
हा तुम्हारा घर मेरा ही तो हुआ जब तुम मेरे हो । यूसुफ ने
फिर एक बार लड़की को देखते कहा-
अबू जी ठीक ही कहते है - आप इा के पास क्यो नहीं आ जाती ।
इन का आप से मा भी लगा रहेगा और आप इनकी देखभाल भी कर
सकेंगी। फिर साथ ही मानो उसे कोई भूली बात याद आ गई
और वह
बोला- मगर मगर आप का काम हर्ज होगा शायद इसलिए कुछ दिक्क्त
.
बेटा।
.
138

पेश आये मगर वह तो वह तो सब ठीक हो सकता है-आप के अपवाद को जितनी रकम मागे दी जा सकती है उस लड़की ने सिर झुका कर कहा-जी जी मगर । और वह पूरी बात कह न पाई थी। किन्तु अनवर यूसुफ के अन्दर की बात भी भली भाति जान गया था । वह जानता या बद से बदनामी बुरी होती है । और गौरी किसी कीमत पर भी अनवर व यूसुफ को अपने कारण बदनाम नही करना चाहती । लोग तरह तरह की बाते बनायेगे । इज्जत वालो के घरो मे तवाइफ नहीं रहा करती और रहे भी तो वह घर न रह करके कोठा कहलवाया करता है । अब अनवर ने बात बदलते कहा-" कोई बात नहीं बेटी तुम-तुम वैसे ही मुझे कभी-कभी मिलने आ जाया करो । लडकी ने पूरे अदब व आदर से सर झुकाते कहा जो हुकम अबू जी । शरवत पीने के कुछ देर बाद लडकी ने कहा 'अब मै इजाजत चाहूगी जी फिर हाजिर हूगी। अच्छा बेटी जाओ फिर आना मै तुम्हारी राह देखूगा । लडकी उठी और धीरे-धीरे बरामदे की ओर चली गई जहा उस के साथ भेजा एक आदमी उसकी इतजार कर रहा था – जो लाया भी था और वापस ले जाने के लिये ही बैठा था । क्यो कि लडकी का अकेले आना तो असभव ही या । मगर आज वह यह बहाना लगा कर आई थी कि नवाब यूसुफ साहिब के अबू जी ने उसे बुलवाया है। लडकी के चले जाने के पश्चात् यूसुफ ने देखा फिर अनवर की आखों मे आसू भरे हुये थे । और वह दूर तक जाती लडकी को टिक टिकी लगाये देखता ही जा रहा था देखता ही आ रहा था। यूसुफ ने पूछा - क्या हुआ अबू जी । आप इतने उदास क्यो हो गये ?' अनवर ने वेदना भरे भाव से-पीडा को चीरते हुए उत्तर दिया. . - 139 . सोचता है । कई लोग कितो बदकिस्मत होते है इस लड़की के न चाहो पर भी उसे वह जहर पीना पड़ता है-जो वह पीते है हालात की वह कठोरता से उन का सारा जीवन ही जहर बना दिय जीवन ही काला कर दिया । यूसुफ ने पूछा- मै कुछ समझा नही अबू जी ।' " हाँ 1 यूसुफ मिया । बगैर जाने तुम समझ भी नहीं सकते । दुनिया मे बेशुमार धर्म है जो हमसे नफरत करवाते है । किन्तु वह ॥ है- जो हमें एक दूसरे से प्यार करना नहीं सिखला सके । इस ब लडकी की रगों मे गदा लहू नहीं है-न इस ने किसी तवाइफ के पेट जन्म लिया है - और न ही ये किसी कोठे की छत के नीचे ही पैदा हु यह तो यह तो इसकी बदकिस्मत इस की उम्र व रूप मे अतर क के जिस्म की रग-रग मे आ गई है । यूसुफ अति हैरानी से बोला- " तो क्या यह लड़की तवाइफ नर्ह है नहीं बेटा । बना दी गई है । यह तो हमारी बस्ती की भोली- नेक हिन्दू लडकी है गौरी जिसका नाम ही उसकी पवित्रता का पहला है। यह तो वहा के बदमाश मग नाम के एक हिन्दू बिहारी ने जो दिखा लिये रिक्शा चलाया करता था, असल मे तो वह दलाल या-जवान लर्डा के जिस्मो का दलाल जो कोठे की मेढी पर व्यापार करता था । वह जबरदस्ती एक रात उठा कर ले गया था और आज यह तुम्हारी जमीन उसी के कारण है । 'आपने शायद इसकी शक्ल की वह हिन्दू लडकी देखी होगी। ' नही बेटा । यह बात तो यही गौरी मेरे और बानो के सामने र चुकी है कि यह वही गौरी है जो हमारी बस्ती से गायब सारी कहानी उस ने हमे अपने ही लफ्जो मे बताई थी। गई थी और 140 । यूसुफ सुन कर परेशान हो गया था-फिर उस ने देखा अनवर- अबू का भी चेहरे का रंग पीला पढना शुरू हो गया था । उसने अपनी डॉक्टरी की समझदारी से भर अनवर को बिस्तर पर लिटा दया । वह समझ गया था कि अनवर को फिर दिल का दौरा पड रहा है । उधर से हमीदा भी अन्दर आ गई थी और वे दोनो ही अनवर को सभालने में लगे हुए थे । यूसुफ ने झट से अनवर को खास प्रकार की दवाईया देनी शुरू कर दी। अनवर को जान पड रहा था कि वह नीचे ही नीचे गिरता जा रहा है। फिर उसे यह भी लगा मानो अब उस का सम्भलना कठिन ही था और वह दबी आवाज मे पास बैठे यूसुफ को कह पाया था यूसुफ मि या । मै मै उस बच्ची के लिये कुछ भी नहीं कर पाया हो सके तो हो सके तो उसे अपना लेना अपना लेना बेटा वह निर्दोष है पाक है उसने कोई पाप नही किया हो सके तो उसे गदगी मे से उठा कर ले आना ले आना ।' फिर पास पड़ी हमीदा को देख कर बोला- " हमीदा गौरी वो बसती की गौरी मिल गई उसको उसको अपनी शरण मे । " यूसुफ ने देखा अनवर के हाथ पैर टेडे हो चुके थे। अबू के सारे जिस्म में एक कापनी सी डूबी हुई थी और अबू की आखे बार-बार अपने आप ही बन्द होती जा रही थी । अब यूसुफ की समझ में यह बात अलग न रह पाई कि आवर अबू जा रहे है - हमेशा-हमेशा के लिये इस ससार-बस्ती को छोड़ कर जा रहे है और जहा से वह फिर दुबारा कभी नही लौट पायेगे -कभी नही । क्योकि वह समझदार था वह जानता था ईश्वर के प्यारे जा कर ईश्वर में 'समा जाते है । अनवर बेहोश हो चुका था। अब उसे इस दशा मे अस्पताल ले जाने का भी कोई मतलब नहीं बनता था। वह और हमीदा रात भर अनवर की आधी मरी लाश के पास बैठे रहे थे। दो और बडे डॉक्टर यूसुफ ने घर पर ही बुला लिये थे । दवा दारु अपनी । 141

।
समझ से वह भी कर रहे थे। किन्तु मा ही मन वह जान गये थे कि अनवर
अबू आखें उही खोल पायेगा।
उस का चेहरा गिर भी कितना शान्त मानो कोई साधू अपनी समाधि में
लीन अपने ध्याा को श्वर के चरणों में जोडे हुए था।
रात के बाद प्रात का आगमन हुआ । उषा की लाली भी अभी फूट न
पायी थी कि यूगुप के देखते ही देखते अनवर की गरदन न जाो कैसे हिली
और फिर दूसरी अर लुढक गई थी।
यूसुफ घबरारा और झट से उस ने अनवर की नब्ज टटोली जो बन्द हो
चुकी थी । पूरा ग पूरा शरीर 3डा पड चुका था । और यूसुफ के मुह
से
पबराहट सेवा-
"अबू अबू जी।'
हदा भी स खडी रोती कह रही थी- 'भाई जान | आप भी हमे
छोड कर ले गये । हम क्या करेगे आपके बगैर । ' यूसुफ की आखों से
पानी कीराय बह रही थीं।
फि उगने और हमीदा ने माना घर के बाजू वाली गली की मसजिद
से-ऊँची ऊँची और मीठी-मीठी आवाज आ रही थी ।
अल्लाह हो अकबर ।
अल्लाह हो- अकबर ।
चारो ओर गूज के साथ मानो रात का अघेरा किसी उजाले मे बदलता
जा रहा या । यूसुफ मुह की ही मुह धीमा सा बोला-
अबू जी । इसान की जाति मे फरिश्ता ये । आज एर फरिश्ता इस
दुनिया की बस्ती से हमेशा हमेशा के लिये उठ गया। फिर अपूर्व कानों में दही
मधुर शब्द गूजने लगे जो बाजू की गली वाली मसजिद से आ रहे थे।
अल्लाह हो अकबर । अल्लाह हो-अकबर।
142

बसती भी वही की वहीं थी माधो और अनवर के चले जाने के बाद अन्तर केवल इतना ही था कि आज वही बसती उन दो मित्रों के बगैर सूनी पड गई होगी खाली पड गई होगी। फिर उन दोनो के वह काम काज, जीवन भर की कमाई निर्धन भाइयो मे बाट दी होगी उनके वह घर दुकाने आदि अब खण्डहर बन चुकी होंगी । या फिर गौरी व यूसुफ को मिले होगे । जिन्हे उन दोनो ने ही मुफ्त मे बसती को ही छोटे से उपहार के रूप मे दे दिया होगा। जो भी हो बसती रहेगी मगर आदर और माधो नही रहे थे । उनकी कहानी तो बसती से आरम्भ न हो कर बसती मे ही समाप्त हो गई थी । जिसे हर चाहने वाले याद करते रहेगे । कम से कम उनके समय के लोग तो । क्या हुआ यदि आने वाली नवयुवक पीढी भूल भी जाये उन दोनो को क्योकि ससार की रीति ही कुछ ऐसी होती है । ' सारे मुह के मुलाहिजे जीते जी ही होते है मरने वालो को तो हर कोई भूल जाता है।" 143

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Apne Paraye

Author
Rachna Prakash
Title
Apne Paraye
File name
Apne Paraye
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2011/03
Publisher
Nalanda Prakashan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551007
Barcode
4990010031791.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
CMw4vTIEHYJ
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