Adarsh Library, Jaipur
Apne Apne Char Baras
Front matter
प्रबोध कुमार सान्या
कमला दास
अजीत कौर
डॉ. लक्ष्मीनारायण
कृष्णा सोबती
मन्नू भण्डारी
राजेन्द्र यादव
दलीप कौर
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गोविन्द मिश्र गुरदयाल सिंह अपने-अपने चार वरस
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अमृता प्रीतम
मूल्य : बारह रुपये (12.00)
प्रथम संस्करण, 1978
© अमृता प्रीतम 1978
प्रकाशक : सरस्वती विहार
मुद्रक : शब्दशिल्पी
21, दयानन्द मार्ग,
द्वारा, प्रगति प्रिंटर्स,
दरियागंज, नई दिल्ली
नवीन शाहदरा, दिल्ली
APANE-APANE CHAR BARAS (Collection of Dreams)
Amrita Pritam
बाने वाले कल के किसी मायड और किसी जंग के नाम ।
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अपने-अपने चार वरस यह बात उन सपनों को नही, जो चिन्तनशील मनुष्य जागती आंखों से देखते हैं, और अपने चेतन यत्नो से कला के माध्यम के द्वारा उन सपनो को घरती की हकीकत बनाना चाहते हैं—यह सिर्फ अचेतन मन के अंधेरे में किसी ज्ञान को टटोलते सपनों की बात है; और जो माइंसदानों के कथनानुसार हर इंसान को हर रात को नौद का पांचवां हिस्सा होते हैं। बीम फोमदी। और हर इंसान रोज रात को हेढ घण्टा मपनो की दुनिया में गुजारता है, यानी पूरी उम्र के बरमों में से करीब चार वरम । इन सपनों के अर्थ पता नहीं किन-किन चिह्नों और इशारों में लिपटे होते हैं। इनकी गांठे साधारण उंगलियो से नहीं सुलती। इनके आलिम फाजिल कोई फायह और जुग हो सकते हैं, पर इनकी अहमियत से कोई मुनकिर नही होसकता, क्योंकि इनके वजूद में बीती सदियो के साये होते हैं, और शायद एक कानून में बंधे हुए भविष्य के इशारे भी। दुनिया का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सी० जी० जुंग अपनी आत्मकथा में अपने एक सपने के बारे में लिखता है : "जिन दिनों मैंने यूनिवर्सिटी में दाखिल होने के लिए अर्जी भरी थी, लगभग उसी समय की बात है-मुझे एक सपना आया, जिसने मुझे डराया भी, और जिसने मुझे हौसला भी दिया। वही रात थी और कोई अनजान जगह, जहां मैं अंधेरी सरीखी हवा में बड़ी मुश्किल से चल रहा था। देसा, चारो और बड़ी गहन धुंध है, और मैंने दोनों हाथों में एक रोशनी
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पमान की यात्री हानता पा भी मपनो में दगार होता है, और जिम्मानी रिमी पीडामाभी, या उन यापी रिमी यानी चिलारा भी। और इनमें अलावा पंतन मा अमेनन अपम्पा में रिलीये दिए सुझाय पा भी यही सर अगर पाना है, इमरी एक बड़ी अच्छी मिनाल हारटर पत्रीगिया गारपोर ने अपनी पिलाय 'त्रिएटिव होमिग' में दी है, जो एक दलालवी नेगम गुमोगनी गुभारेमची यो आत्मरथा मे मे नी गई है कि एक पवन पा, जब मेगा की पत्नी को लगा था कि यह सपनों को दी है। वह रोज परछाइयो, ग्गाहिलो, और हरों-फिरो रो दुनिया में उमरी कभी न मम होने वाली मनियों में पूमनी रहती है, और तमाम रात घसती, पर घमीटतो ग तरह पक जाती है कि मुबह उटार उममेदम नहीं एता। उगरे डॉस्टर मानिन्द ने उगी मदद परनी पाही और मुहाव दिया कि वह सपने में पंदन पनने के यमाय माइपिन पर पूमा करें। पुरु दिनो बाद मगमुन यह हो गया कि उने गपने में मामिल मिल गई, और कुछ दिन यह बहन पुग रही। अब यह जागकर पहनेगी परी नहीं होनी पी। पर एछ दिनो बार सपने को माइपिन पंचर हो गई, और गानों के वीगने में मास्मि से ठीर मरवाने के लिए कोई जगह नहीं पी। पत्नी फिर पाने और हाफने सगी सो सरदर ने उमती जागती हालत में उमै मातरिम के पहिये मोपचर मगाना मिमाया । कुछ दिन भीगने के बाद औरत ने दया, यह मपमुप मापने में अपनी गादपल को टोक कर मी पी। जागी तो वही गायी। अब उगो माइरिन टीर परती घो।ई महीने पहहामन दी, पर फिर एक बार उनके सपने पी रिमी पहानी में उमरी माइपिस फिमन गई, और यह जम्मी होर पापा में गिर गई । और फिर हर रान यह सपने में उम्मी एक गहा में पड़ी होती थी। उगे मगा, अब उगका अन्न आ गया है। अब यह कभी (गपने री) गहरी पदर में गे नही निम्न मकेगी। उग साविन्द गटर ने उसे पहर में में निपसने के पाई सगेके मिपाए, पर उसकी दलील पोति उमके हाप बिनाल मह-महान है, वह पिगी पत्पर, पड़ मा हाप से महारा लेकर अब गहा में में नहीं निरन मरती । और उसगने सगा कि यह दग गहर में पड़ी-पी मर जाएगी। यह बड़ा निरागामय वक्त पा, जब टॉस्टर पलिन उगे दिया कियह एषमन होरर उगे (अपने पति मो) शोर मे आवा दिया परे। वह । ६ । उसकी कोई आवाज़ जरूर सुन लेगा और वहां पहुंचकर उसे खड्ड में से निकाल लेगा। कुछ दिन बाद सचमुच यह हो गया कि उसकी आवाज़ सुनकर उसका खाविन्द खड्ड के सिरे पर पहुंच गया और उसने रस्सी लटकाकर उसे खड्ड में से निकाल लिया। और इस सपने से वह भयमुक्त हो गई। उसे यकीन हो गया कि आगे यदि कुछ घटा तो वह अपने खाविन्द को आवाज़ दे लेगी। और वह चाहे कहीं हो, ज़रूर उसके पास पहुंच जाएगा" इस तरह सपनों पर आदिकाल से विचार होता आ रहा है और हो रहा है। पश्चिम में सपनों का अध्ययन पहली वार १८६१ में शुरू हुआ था, और फिर जव १६०० में फ्रायड की किताव छपी थी, सपनों के विश्लेपण के बारे में, तो खोज और गहरी हो गई थी। अव १९५० से सोए हुए इंसान की आंखों की हरकत से, उसके दिल की धड़कन में आई तबदीली से, और उसकी सांस की चाल में आए फर्क से सपनों का अध्ययन और भी गहरा हो रहा है। पर इस विषय में मेरी दिलचस्पी सिर्फ यह है कि दुनिया के कुल कलाकारों की ज़िन्दगी में कैसे सपने उनके अचेतन मन का प्रकटीकरण होते हैं, और सपनों का उनकी कला में या उनकी कला का उनके सपनों में क्या और किस हद तक कुछ दखल होता है। दुनिया के प्रसिद्ध चित्रकार पाब्लो पिकासो ने अपना एक सपना अपनी महबूबा फेंकाइस को सुनाया था, जो उसने 'लाइफ विद पिकासो' में लिखा है : “जव मैं वच्चा था, मुझे एक सपना कई बार आता था, जिससे मुझे डर लगता था। सपने में मैं देखता था कि मेरी बांहें और टांगें बहुत बढ़ गई हैं, और फिर उसी तरह अन्दर की ओर मुड़ गई हैं। इतनी कि मेरे गिर्द लिपट गई हैं। और यह क्रिया मेरे आसपास के सभी लोगों के साथ हो रही है-वे पहले फैलते हैं, फिर जुड़कर बिलकुल छोटे-से हो जाते हैं। यह सपना मुझे जब भी आता था, मैं एक भयानक पीड़ा में से गुज़रता था।" और फकाइस लिखती है : "जब मुझे पाब्लो ने यह सपना सुनाया, मैं जान गई कि उसकी प्रारम्भिक पेंटिग्ज़ की बुनियाद यही सपना थी, जिनमें बड़े-बड़े हाथों- परों वाली औरतें होती थीं और उनके सिर बहुत छोटे होते थे..." फ्रायड ने सपनों को सेक्स से इतना ज्यादा जोड़ दिया था कि उसकी थ्योरी वाद में बड़ी हद तक नकारी गई। जुंग ने एक बार हैरान होकर लिखा: "फ्रायड ने कभी अपने-आपसे यह नहीं पूछा कि उसके अन्दर सेक्स के बारे में - - १०
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* 'मेरी बीवी की और उसकी बहन की गोत', आखिर किसीका नाम लेना था, वही नाम ले लिए। तब मेरा नया-नया व्याह हुआ था और ऐसी कोई रुचि मुझमें नहीं थी। पर मैं फ्रायड से झगड़ना नहीं चाहता था। इसलिए झूठ वोला । क्योंकि यही झूठ उसकी थ्योरी को रास आता था। और देखा---यह सुनकर फ्रायड को तसल्ली हो गई..." इस तरह कई सपनों की तशरीह गढ़ी-गढ़ाई थ्योरियों में जवरदस्ती ढाली जाती है। सो, मैं अपनी ओर से किसीके किसी सपने की तशरीह नहीं करूंगी, सिर्फ समय के मनोवैज्ञानिकों के लिए कुछ लेखकों, कलाकारों के सपने इकट्ठे करके दे रही हूं, कच्चे माल की तरह। इनकी तशरीह करना मेरा नहीं मनोवैज्ञानिकों का हक बनता है। मैक्सिम गोर्की अपनी जीवनी में लिखता है कि एक बार लीयो तालस्ताय ने उससे सपनों के बारे में पूछा, तो उसने कहा, "मुझे बहुत कम सपने आते हैं, जो आते हैं वे याद नहीं रहते। पर दो सपने मुझे याद हैं, और दोनों शायद सारी ज़िन्दगी नहीं भूल सकूँगा।" और गोर्की ने जो अपने दो सपने तालस्ताय को सुनाए, वे ये थे: "सपने में मैंने ऐसा आकाश देखाजो बीमार था। सड़ा-सा । उसका रंगहरा- पीला था और उसमें गोल-भद्दे-से तारे थे-वेकिरण-वेचमक, जैसे किसी भूखे मर रहे आदमी के बदन पर फोड़े हों। उस सड़े-से आकाश के इन तारों में लाल- सी विजली चमचमा रही थी। वह विजली किसी हद तक एक सर्पिणी जैसी थी, और जब भी किसी तारे को छूती तो तारा आकाशमंडल में फैल जाता, और वेआवाज़ फटकर सड़े पानी सरीखे आकाश में लोप हो जाता। फिर एक-एक करके सारे के सारे तारे फट गए। आकाश और भी काला और डरावना हो गया, और मुझे लगा कि जैसे सब कुछ एक ही जगह इकट्ठा होकर उबल रहा हो, , और पानी-पानी होकर एक लपसी की तरह मेरे सर पर गिर रहा हो" और गोर्की ने अपना दूसरा सपना जो सुनाया था, वह यह है : "वर्फ से ढका एक मैदान कागज़ की बड़ी-सी शीट की तरह दिखता है । ऊपर कोई टीला नहीं, कोई पेड़ नहीं, कोई झाड़ी नहीं, वस कहीं-कहीं बर्फ में गड़ी हुई कोई-कोई टहनी दिखाई देती है। इस वीराने के पार दूर क्षितिज तक एक सड़क का टुकड़ा दिखता है, जो मुश्किल से दिखाई देता है। और उस सड़क पर सफेद-सफेद बूट १२ अनायास हीचनते जाते हैं।" ये सपने सुनकर तालस्ताय ने जवार में एक बूढे जमीदार का सपना सुनाया कि एक वार वह जंगल मे घूमता-घूमता वाहर वीराने में निकल गया। वहा उसने देसा कि उस उजाड मे दो टीले है। फिर अचानक वे टीले छातियां बन गए, और उनके बीच में एक काला चेहरा उभर आया-जिसके ऊपर दो आसो की जगह सफेद उभरे हुए फूले थे। उसने देखा कि वह स्वयं एक औरत की टागो के बीच में सडा है, मामने एक बडी-सी साई है जो उसे अपनी ओर खीच रही है। इसके बाद उसके अपने बाल सफेद होने लगे और हाथ कापने लगे और तालस्ताय ने कहा, "वह भादमी विपयो था, यह सपना उस जैसे आदमी को ही आ सकता था। पर तू न पारावी है, न विपयो, तुझे ऐसे सपने क्यो शाते है ?" और फिर उसने खुद ही गहरी मास लेकर कहा, "हमे सचमुच अपने बारे में कुछ पता नहीं होता, कुछ भी नहीं।" सचमुच हमें किसीको भी अपने बारे में कुछ पता नहीं होता। हम सिर्फ इतना जानते हैं कि इनकी कंपकपाहट कई बार हमारी हड्डियों तक उतर जाती है, इनका सौफ हमारे पिघले हुए सून में जम जाता है, और इनकी सुमारी हमारे माथे की झनझनाहट बन जाती है। इस संग्रह के लिए जिन भी कलाकारों ने अपने निजी भेदों जैसे सपने मेरे सामने उधारकर रख दिए हैं, मैं उन सबकी शुक्रगुजार हूं--अपनी ओर से भी और पाठकों की ओर से भी। ---अमृता प्रीतम
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प्रबोधकुमार सान्याल
कमलादास
कृष्णा सोबती
अजीत कौर
डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल
२३
मन्नू भण्डारी
४२
राजेन्द्र यादव
दलीप कौर टिवाणा
फंकाइस
गुरदयाल सिंह
गोविन्द मिश्र
देवेन्द्र
हरकिशनलाल
वणजारा बेदी
आविद सुरती
६१
इन्दु जैन
७८
गुरवस्वामिह
८५
पद्मा सचदेव
६२
मनमोहनसिंह
चन्दन नेगी
मेरे अपने सपने
काजान शाकिस
अन्तिका
१३८
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प्रवोधकुमार सान्याल प्रबोधकुमार सान्याल बंगला माहित्य के प्रसिद्ध लेखक हैं। उनका एक यात्रा-वर्णन 'महा प्रस्थान के पथ पर' १६३३ मे छपा था। उसकी मुख्य पान सान्याल को बदरीनाय की एक दुकान पर मिली धी--और उस दिन से लेकर मान्याल को उसका सपना लगातार पन्द्रह वरम तक आता रहा। किनाव में उसका नाम सान्याल ने 'रानी' लिखा था, पर बाद में जब सान्याल ने अपनी जिन्दगी की यादें लिखी 'बनमपतिर बैठा', १९७४ मे, उममे विस्तारपूर्वक रानी के बारे में लिखा, जिसका असल नाम माविनी था, और लाड का नाम 'टुनु' था। इस यात्रा-वर्णन को बंगला में एक फिल्म भी बनी थी १६५२ में, और हिन्दी में भी 'यान्त्रिक' नाम से । इस साविनी के बारे में आज मान्यालजी बताते हैं : "मैंने जिन्दगी में सिर्फ एक बार उसके होंठ चूमे थे, और वह होंठ भी मामुओ से घोए गए थे, पर इस औरत ने मुझे वडा दुःख दिया। जिन्दगी में पूरे पन्द्रह बरस वह मेरे सपनों में मेरे साथ रही-हर रात को अब भी मेरी उम्र के ७३३ वरस में वह किसी-किसी रात मेरे मपने में आ जाती है।" 'आज सान्याल साहब ने मेरे पास बैठकर अपने उस पन्द्रह बरस लम्चे सपने की बात इस तरह सुनाई है : "सपने में--पूरा हिमालय पर्वत मुझे उसकी आंखों में दिखता था." "चीड़ के वृक्ष उसकी आंखों में हिलते थे."उसने सपने मे कभी मेरा अंग नहीं छुआ, सिर्फ उमकै होंठ हिलते थे---आहिस्ता मे मेरे कानों मैं हवा की तरह सरकते कहते थे, मैं कितनी देर तक सामाजिक बन्धनों में बंधी रहूंगो? "तुम मुझे इनसे स्वतंत्र नहीं करा सकते प्रबोधकुमार सान्याल /१७ ।
कभी वह कहती, 'मैं मौत के बाद भी तड़प रही हूं...' सपने में भी एक वंगाली विधवा की तरह उसके बाल कटे हुए होते, सके चेहरे का रंग गंगा के पानी की तरह होता, और वह हमेशा सफेद वोती लिपटी हुई होती थी..." सान्याल के शब्दों में : "उसके हज़ारों सपनों में कभी भी मेरा घर या शहर नहीं होता था, वह हमेशा मुझे हिमालय पर्वत पर मिलती, जहां से गंगा निकलती है-उस गंगोत्री के किनारे । और वह सपने में हमेशा रो रही होती। मैंने आज तक सपने में भी उसका अंग नहीं छुआ था। सिर्फ कभी-कभी उसके वोल कानों से सुने हैं, 'मुझे इस ज़िन्दगी में से निकाल लो! तुम मुझे दुःख देने के लिए पैदा हुए हो ? देखो! (तुम हो, मैं हूं, पर तुम मुझे बाहों में नहीं थाम सकते पर मैं तुमसे दूर नहीं, तुम्हारे साथ हूं) 'तुम्हें पुनर्जन्म में विश्वास है कि नहीं? तुम्हारा क्या ख्याल है-हम अगले जन्म में मिलेंगे?'.. और मैं हर सपने से चौक-चौंककर जाग जाता था।" -१५ दिसम्बर, १६ कमलादास कमला दास अंग्रेजी और मलयालम पाठको के दिलो में उत्तर जाने वाली शायरा और कहानीकार है। पिछले वरस (१९७७ में) उसने एक साइको- एनालिस्ट के कहने पर अपने सपनो से कोई अग्रवाई लेने के लिए एक डायरी मैं हर रोज सवेरे पांच बजे जागकर अपने सपने लिगे थे। ये सपने कमला दास को उसी डायरी में से हैं: "देखा में एक बड़े-से हाल में बैठी हुई हूं। चाहर की गली की ओर से तकड़ी के पहियों को आवाज आई। एक ऊंची-सी-~~चरर-चरर् ! मैं जल्दी से उठकर दरवाजे की ओर गई। बाहर देसा, एक बहुत बडा लकड़ी का घोड़ा है, एक बड़े-मे मकान जितना, उसके पहिये गली में से गुजर रहे हैं।" "अप्रैल के महीने मुझे चार सपने आए-जो एक-दूसरे से कुछ मिलते-जुलते- से थे। देखती-मैं किसीको विदा करने के लिए गई हूं,पता नहीं हवाई जहाज़ के अड्डे पर कि गाडी के स्टेशन पर । इन्तजार कर रही है. पतामही हवाई जहाज का या गाड़ी का परोके पास बहुत-सा सामान पड़ा हुआ है। मेरी मां भी पास हैं । हमेशा वाली सफेद सद्दर को धोती पहने हुए । पर यह पता नहीं हम दोनों किसे विदा करने आई हैं। एक सपने में में कुली से कह रही हूं कि यह जिसका सामान है, उसका वह इन्तजार करे, और उसीसे वसशीश के पैसे ले। तीस अप्रैल को कालीकट से ट्रक कॉल आई कि मेरा बाप बीमार है, और दिल के एक दौरे के बाद उन्हें नसिंग होम में ले जाया गया है। मैं पहली मई को काली- कमला दास/१६ कट पहुंची। वहां बाप के पास रही-१२ तारीख तक, उनकी मौत तक | सोचती हूं-मेरे वे चारों सपने शायद मुझे उनकी विदाई का इशारा दे रहे थे।" भारतकरीबन सभी सपने किसी सफर से सम्बन्धित होते हैं । अकसर । तकरीवन सभी सपने किसी सफर से सम्बन्धित होते हैं। अकसर देखती हूं कि मैं किसी खुली कार में बैठी, किसी पहाड़ी राह पर जा रही हूं। मेरे सपने में देखा गया चांद बहुत बड़ा होता है, चांदी-रंगा। घर, जो सपनों में देखती हूं,वह कभी भी वह फ्लैट नहीं होता, जहां रहती हूं। कोई बहुत बड़ा घर होता है, ऊंची-ऊंची छतों वाला। घर में बड़े गोल थम्बे होते हैं, और गमलों में लगे पाम के पौधे। वहां अक्सर मेरी दादी रह रही होती हैं (जो मर चुकी हैं) और मेरे दादा का भाई, जो शायर था। अब जिन्दगी में मैं उन्हींकी डिक्श- नरी का प्रयोग करती हूं। मैंने कभी सपनों में अकेलापन महसूस नहीं किया; यह एक अजीव वात है, क्योंकि वास्तविक जीवन में मैं दुनिया के बिलकुल अकेले लोगों में से एक हूं। मैं सपनों का इंतज़ार करती रहती हूं, और खुशी के उस समय का जो मुझे मेरे सपने ला देते हैं। "किसी सपने से जागकर मैं सीधी चौके में जाती हूं, काली कॉफी बनाती और उसमें कुछ चीनी डालकर पीती हूं। फिर अपनी लिखने वाली मेज़ पर बैठकर उसकी ओर ऐसे देखती हूं जैसे वही मेरा मित्र हो। यह मेज़ वह है- जो मेरा सबसे बड़ा बेटा इस्तेमाल करता था, जब हमारे पास रहता था। उसने जव अलग घर बनाया, अपनी मेज़ मुझे दे गया। मेज पर एक टाइप- राइटर है, चार पुरानी डिक्शनरियां, और एक मेरे छोटे बेटे की तसवीर' - .. २०/ अपने-अपने चार बरस
कृष्णा
सोबती
कृष्णा सोबती हिन्दी की वह कहानीकार हैं जो अपनी एक-एक पंक्ति से
अपने पाठक के मन की तहों मे उतरती जाती हैं। इस संग्रह के लिए आज
कृष्णा सोबती ने अपना वह सपना बताया है जिसके बारे में अपने निजी सत
में लिखा है : "अमृता ! बन्द आंखो मे कई वार, बार-बार देखे हुए इस मपने
को अपने ने अलग करते हुए बहुत बड़ी रेजिस्टेन्म थी। तुम नहीं मानी और
आखिरकार लिखवाकर छोड़ा""वह सपना यह है :
सपने में घोड़ा दौड़ाते-दौड़ाते सीधी सपाट राह पर कही चली जा
छोटे पहाड़ो के सिलसिले पोछे छूटते चले जा रहे हैं।
घोड़े की रफ्तार तेज होती चली जा रही है। घोडा है। हवा है । मैं हूं।
मांखों के आगे अव ऊंची बर्फीती चोटिया उभरती हैं।
पहाड़ी रास्ता पतला और संकरा होता चला जा रहा है।
चढाई पंजे-सी सीधी है।
घोड़ा दौड़ाती हूं-सेज और तेज और घोड़े के अगले पाव ऊंची,फिमलवां
ढलान पर।
खुद को मजबूती से टिकाती हूं।
लगाम सोचती हूं और संभालते-संभालते नोचे देखती हूँ।
दाहिनी ओर नीचे । देखती हूं और दहल जाती हूं।
गहरी अंधेरी खड्डो से भी गहरी खाइया । मैं घबराहट मे रकाबो में से
कृष्णा सोबती/२१
पांव निकालना चाहती हूं."
मैं गई ! बच नहीं सकती।
नहीं ! खवरदार !
तुरंत आंखें खोलती हूं और संभालने की कोशिश में आगे देखने लगती हूं।
चट्टानें, चोटियां और आसमान।
वर्फीले मस्तक पहाड़ों के।
ऊपर-ऊपर----सामने दीखने लगी हैं नीली धाराएं पानी की।
मैं लगाम से थपथपाती हूं घोड़े को और पानी की धार में खड़ा कर देती
-इतने लम्बे सफर के बाद मेरे गाजी बादशाह पानी पियो।
घोड़ा सिर झुकाता है पानी की धार में...
मैं लाड़ से सहलाती हूं।
यह क्या-घोड़ा क्या हुआ ! कहां गया! क्या गुम हो गया! मगर
•hch
कहां!
सिर्फ मैं खड़ी हूं। और खुद ही अपने को उठाए हुए हूं।
झाड़कर देखती हूं। घोड़े के पांव मुझे तो नहीं लग गए।
लग गए होंगे
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ खोते चले जाने पर मैं जिस तरह
अपने को वहला लिया करती हूं कि भूल जाओ-जाने दो-उसी तरह ऊंचे
पहाड़ों की ओर देखती हूं और अपने को दिलासा देकर कहती हूं:
यहीं कहीं घोड़ा होगा!
न भी होगा तो क्या."
पांव तो हैं न अपने।
अपने पांव
..
-कृष्णा सोबती"
२२ / अपने-अपने चार वरस
- अजीत कौर याद नही आता किसको पंक्ति है, कहां पड़ी थी, पर वह मेरे स्मृति-पटल पर अंकित है : "Man ts literally a God, a God suffering from nightmares" और आज यह पंक्ति अजीत कौर के सपने पढकर मुझे बार-बार याद आ रही है। अजीत कौर पंजाबी की एक बहुत अच्छी कहानीकार है, उसके सपने ये है: "सलासे वेइन्तहा सलाखें । पिंजरे बहुत बडे । पिंजरों की सलाखें जैसे इधर से धरती मे और ऊपर से भासमान में गडी हुई हो। पीली-भूरी मिट्टी में धंमी हुई, और नर्म नीले गुंधे हुए मैदे सरीखे आसमान मे गड़ी हुई । और सलाखों के पीछे चीखती हुई मैं 'नहीं, में पागल नही । मैं बिलकुल ठीक हू । मैं तो बिल- कुल ठीक हूं।' पर लगता है जैसे बहुत-से लोग लोगों की भीड़ को भीड़, जो सलाखों के उस और खड़ी है, चल रही है, हंस रही है, वातें कर रही है, बैनियाज़ मेरे दर्द मे, उस भीड़ में से कोई भी मेरी बात पर एतवार नहीं करता। और मेरी जान जैसे अकुला रही है। अजीव येवसी । वेबस तिलमिलाहट । अकुलाहट । उमस- भरी बौखलाहट । मेरी जान जैसे फैसला करके चीख रही है कि अगर इन मलासों में से मैं नहीं निकल सकती तो बेशक मौत आ जाए। अगर ये सलाखें जरूर रहनी हैं, तो फिर पसलियों की सलासे मंजूर नहीं । मंजूर नहीं। अजीव वेवसी में, और गुस्से में, और वौखलाहट में, और रोप में मैं सलाखों से सिर पटक रही हूं, सलाखों को मुक्के मार रही हूं। अजीत कौर/२३ अजीब बात है, बाहर की भीड़ में किसी भी मनुष्य का चेहरा ठोस नहीं। चेहरे जैसे पारदर्शी पानी के बने हों, या ज्यादा से ज्यादा पानी में घुले हुए सफेद वादलों जैसी रुई के। पिलपिले, पतले, किसी-किसी समय पारदर्शी जाते हैं, किसी समय पतले पानी की तरह फैलकर विखर जाते हैं, किसी सय पानी की सतह पर तैरते तेल की तरह अजीव शक्लों में फैलते और सुक- ते हैं । ठोस चेहरा सिर्फ एक है-मेरा। पर वे सब चेहरे मेरे पर या तो हंस हे हैं-अपने पतले पानी जैसे, फलूदे सरीखे दांतों से और या विलकुल वे- नियाज़ लापरवाह मेरी चीखों से वेखबर आगे गुज़रते जा रहे हैं। पर मुझे लगता है, वे सिर्फ हिल रहे हैं, चल नहीं रहे-जिस तरह किसी कम गहरी झील के नीचे से वीडस नज़र आती हैं, हिलती-सी लगती हैं, पर चलती नहीं, वहीं अपने पैरों को झील के कीचड़ और काई में धीरे से टिकाकर पानी के हिलने के साथ-साथ हिलती रहती हैं, और ऊपर सतह पर से यही लगता है कि जैसे चल रही हों। तभी भीड़ में से आवाजें आती हैं, 'यह पागल है । खतरनाक है। इसे मार दो। पत्थर मार-मारकर मार दो! मार दो! मार दो!' मैं चीखती हूं अजीव दशहत में । और अपनी ही चीखों से नींद खुल जाती है। देखती हूं तकिया भी और मेरा चेहरा भी मांसुओं से गीला है।" । "कैण्डी, मेरी छोटी वेटी, के मरने के वरस-भर वाद एक रात देखा । ' प्रेगनैण्ट है। शायद पूरे दिनों से है। उसके पेट की गोलाई पर नीले रं की साड़ी की कन्नी बहुत खूबसूरत लग रही है। मुझे उसके पेट की ओर देख कर डर लगता है। छोटी-सी, कली सरीखी लड़की, और ज़मीन-आसमान कंपा देने वाली प्रसूति की पीड़ाओं को कैसे झेलेगी? मैं डर से सहमी हुई पर कैण्डी हंसे जा रही है। पहाड़ी नदियों सरीखी अपनी हमेशा वाली हं बेसाब्ता, बहुत ही सच्ची, बड़ी ईमानदार और सावुत हंसी। निश्छल हंसी 'कण्डी, तुझे डर नहीं लगता?' 'काहे का डर?' वह हंसे जा रही है-छन-छन । उसकी हंसी जै बचपने का मजाक उड़ा रही है। वावरी मां के वावरे सवाल का। मैं थोड़ी-सी नाराज़ हो जाती हूं। कमाल है, मेरी चिन्ता ले जान रही है, और यह मज़ाक कर रही है।
'अंमु!' वह मुझे मनाने के लिए इल्तिजा-भरी बहुत ही कोमल नावाज में लाह करती है। 'नहीं, मुझे नहीं पता, वन । तू जव हस्पताल जाएगी, मुझे न बुलाना। मुझसे तेरी पीढ़ा न सही जाएगी।' वह फिर हसती हैं। आकाग में एक जो कुदरत की और कादर की हंसी धीमे-धीमे गूजती है, ऐसी ही हमी। 'अच्छा, नहीं बुलाऊगी।' वह जैसे मुझमे समझौता करना चाहती है। 'पर तू अकेली इतनी पोहा कतै महेगी?' और मेरी रुलाई निकल गई। "फिर क्या हुआ? तुम्हें पता है, यह मेरी कितनी सुन्दर वैटी है। वह अपने पेट को लाड़ से महलाती है । पर मै रोए जा रही है । और रोने की आवाज से जाग जाती हूं। "मेरी पीठ की ओर कमर में दोनो तरफ तेज़ पीड़ा की कसक उठ रही है। और छाती में भी तीखा ददं टीम रहा है दोनों ओर । मेरे गिर्द मफेद कपडों वाले कुछ लोग हैं । शायद डॉक्टर हैं । कहते हैं, 'ऑपरेगन मे पहले ये गोलियां खा ले। वेहोश हो जाएगी तो ऑपरेशन की पीड़ा नहीं मालूम होगी।' पर यह मव कुछ वह वोलकर नहीं कहते । इमारो से कहते हैं । शायद इम- लिए नहीं बोल रहे, क्योकि उनके मुंह के आगे भी सफेद कपड़े हैं। और हायों मैं सफंद दस्ताने। मफेद दस्तानों वाला एक हाय मुझे पानी का गिलास देता है, और दूसरा हाय सफेद गोलियां । मैं गोलिया खाए जा रही हूं। एक के बाद एक; पानी के धूटों के साथ । पर वेहोग ही नहीं हो रही। पहले एक-एक गोली खा रही थी, फिर फंका मारने लगी। पर वेहोश ही नहीं हो रही। पेट पानी से भरकर पटने को हो रहा है। एक भी और गोली बन्दर नहीं जा रही। पर मैं बिलकुल होग मेहूं। वे मफेद कपड़ी वाले लोग मुझमे बहुत नाराज हो रहे हैं । 'या तो गोलियां साए जा"या वेहोग हो, हम अपना काम खत्म करें।' और मुझे, जिसे हमेशा अपने से ज्यादा दूसरों के नाराम का ख्याल रहता मजीत कौर/२ शर्म आती है, कोफ्त भी होती है कि मैं क्यों इन सबको दुःखा बेहोश क्यों नहीं हो रही ताकि ये अपना काम खत्म करके फुर्सत पा फेद कपड़े वाले लोग झुंझला रहे हैं। नाराज हो रहे हैं। आखिर में कहती हूं, 'तुम नाराज न होओ, गोलियां मेरे अन्दर नहीं जा रही मैं अन्दर निगलती हूं, वे बाहर आती हैं। तुम इसी तरह मेरा ऑपरेशन लो।' और वे चाकू-छुरियों से मेरी छाती और पसलियों में से मांस काटने ते हैं। मांस के कटने की किरच-किरच की आवाज़ मैं सुनती हूं। दर्द की लख लहरों से जूझ रही हूं। आखिर एक चीख मेरे सारे जन्त के बांध को ड़कर वल खाती वाहर आ जाती है। ज़ोर से चीखती हुई मैं जाग जाती हूं।" ("कहीं बड़े जरूरी सफर पर जा रही हूं। पता नहीं कहां पर ! जहां भी जाना है, वह बहुत ही जरूरी और ज़िन्दगी-मौत के सवाल जैसी खास जगह है। जाने के लिए तैयार हो रही हूं। पर कोई भी चप्पल पूरी नहीं आती। सब चप्पलें या तो बहुत ही छोटी हैं, सोचती हूं दो कदम चलने पर ही छाले पड़ जाएंगे, या बहुत बड़ी हैं-पहनकर दो कदम भी चलना मुश्किल है। घसीट- घसीटकर दो पैर चलती भी हूं, तो लगता है गिर पडूंगी। बस, एक जूती उतारती हूं, एक पहनती हूं। कई जूतियां बिखरी पड़ी हैं । इधर-उधर कमरे में-चप्पलें, सैण्डिल, गुरगावियां, स्लीपर, पिशोरी जूतियां पर कोई भी मेरे पैर में पूरी नहीं आती। और वक्त गुज़रता जाता है। पर नहीं गाड़ी पर या काहे में जाना है। पर जिसपर भी जाना है, उसका व बीतता जा रहा है। और घवरहाहट और बौखलाहट से मेरा गला सूखा रहा है, और हाथों की हथेलियों में पसीना आ रहा है। हड़बड़ाकर जागर्त और दो गिलास पानी के भरकर पीती हूं।") "लगता है, जिस जहाज़ में सफर कर रही थी, वह डूब गया है। की वाकी बची हुई लकड़ियां और शहतीरें पानी की लहरों पर तैर रही ने चार वरस असीम पानी के शोर में पाकर अकड़े हुए हाथ-पैरों को हिला-हिताकर पानी की सतह पर रहने की कोशिश कर रही हूं। लहरें पहुत तेज हैं। हो साता है, तूफानी हाँ। पता नहीं। पर दूर-दूर तक कही जमीन नहीं दिखाई देती। समुद्र है, और समुद्र में तूफानी सहरों का शोर है । और लगता है, यरा, अभी डूप जाऊंगी। छोटी-छोटी किस्तियों में कुछ लोग बैठे हैं । शायद ये लाइफ बोटा होंगी। बहुत जोर लगाकर, रही-सही हिम्मत को बटोरकर जिरा भी किरती पर हाथ डालती हूं, वे लोग मेरी उगलियां काट देते हैं, जिन उगलियों से मैंने उनको विस्ती के किनारे को पकड़ा हुआ था। सायद उनको किश्तियों में मेरे लिए जगह नहीं। शायद वे सोच रहे हों कि मेरे बोझ मे उनकी छोटी-सी किश्ती उलट जाएगी। पर अजीब बात है, एक किश्ती के लोग जब मेरी उंगलियां काट देते हैं, तो मैं बेसहारा पानी में पीछे गिर पड़ती हूं, फिर तैरती हुई, तैरती हुई भी नही, डूबती-सी सतह पर उभरती, हिचकोले खाती, दूमरी किश्ती के किनारे को जा पकडती है। फिर नई उंग- लियां पता नहीं किस तरह उग आती हैं और फिर ये दूसरी किश्ती वाले लोग वे उंगलियां भी काट देते हैं। फिर तीसरो किस्ती वाले भी। फिर चौथी किश्ती वाले भी। " "सपने से पहले। करनाल । एक घर की बरसाती। दो चारपाइया। मैं और मेरा पति । नीचे के हिस्से में, यानी असली घर में मेरी सास, मसुर, देवर, ननद और एक विधवा वुआजी, यानी कि मेरे पति की वुआ थी। रान अभी शुरू ही हुई थी। नीद का भी पहला ही दौर शुरू हो रहा था, कि लगा नीचे किसीने दरवाजा थपथपाया है । मैं तो चिड़िया के पंख हिलने पर भी जाग जाती हूं। सो उठकर अपने पति को जगाया। (तब मुझे उनसे सौफ आना शुरू नहीं हुआ था, मैं उन्हें 'राजजी' कहती थी) 'राजजी, कोई नीचे का दरवाजा खटखटा रहा है।' दरवाजे के बाहर मोटी लोहे की जंजीरी कुण्डी थी, उसे पकड़कर कोई दरवाजे मे बना रहा था। राजजी नीचे गए। कुछ थोड़ी-मी यातचीत हुई, फिर रसोई का दरवाजा खुलने की आवाज आई, फिर वाहरला दरवाजा अंदर से बन्द होने की। और फिर वह ऊपर या गए ।आसीर अजीत कौर -- की सीढ़ी पर खड़े होकर पाहा, 'जरा नीचे आना', और फिर वापस गीठियां उतर गए । मैं नीचे आई। वह रसोई में थे। एक टोकरी में कोई पन्द्रह-बीस मच्छियां पढ़ी थीं। कहने लगे, 'इन्हें थाली में डालकर नमक लगा दो।' में बवराकर, टोकरी की ओर देख रही थी। मेरे माययों में बररा में एक-आध वार, वह भी मेहमानों के लिए, गोश्त रांधा जाता था। मैं बीजी से अपने वास्ते एका आलू उरामें डलवाती थी। बस एक आलू और गोश्त का थोड़ा-सा शोरबा ! इसके अलावा न कामी हमारे घर कोई नानवेजिटेरियन आता था, और न पकता था। क्योंकि मेरी मां नहीं खाती थीं, इस कारण मेरे पिताजी ने भी खाना बन्द कर दिया था। और इस तरह की मच्छियां मने सिर्फ पानी में तैरती देखी थीं, इस तरह खामोग, मौत के सन्नाटे में चुपचाप लेटी हुई कभी नहीं देखी थीं । मुझे लगा, उनकी सुर्ख काली आंग्वें खुली थीं। आंखें खोलकर किस तरह मर गई, मेरे कलेजे में कचोट-सी हुई। उनके चांदी रंग के बदन टोकरी में चमक रहे थे। और मैं थरथर कांप रही थी। मेरे पति ने मेरी ओर देखा, 'जल्दी कर ना भई !' उन्होंने थोड़ी बेसवरी से कहा । 'मुझे नहीं आता।' मैंने सहमकर कहा । 'कमाल है, तूने कभी मच्छी को नमक नहीं लगाया ?' 'नहीं', मेरा सिर ज्यादा हिला, जबान पाम । 'चल थाल पाड़ा', और वह खुद छुरी ढूंढने लगे। टोकरी के पास पैरों के भार बैठकर उन्होंने एक मछली उठाई और उसके पेट को लम्बाई की ओर से चीरा-जिस तरह करेले को । चीरते हैं। मेरी पीठ की तरफ, एका कंपकंपी बिजली की तरह सारी रीढ़ की हड्डी में से भीर उसके आसपाग के सारे मसल्ज़ को काटती हुई गुजरी। घण्टे-भर पहले की खाई हुई रोटी पेट में कुलबुलाई। दिल की धड़कन या तो रुक गई थी और या ढोल-नगाड़े की तरह बज रही थी-कुछ याद नहीं। सिर्फ यह याद है गुछ जबरदस्त गड़बड़ थी। (आज भी वह दृश्य याद पारयो उसी तरह की गवड होती है।) 'नमकला! मैंने लकड़ी की बड़ी नमकादानी उठाकर उनके पास रख दी, कांपते हाथों से। 'मैं काटे जाता हूं, तू इसमें नमक भरे जा!' मैं अभी भी सहमी-सी खड़ी थी। । २८/ अपने-अपने चार वरस तभी उन्होने छुरी की नोक से एक सुखं लाल मास का टुकडा मच्छी के अन्दर से निकालकर ऊपर किया। बच्चों सरीखी एक्साइटमेण्ट से कहने लगे, ('देख-देख । इसका दिल अभी भी धड़क रहा है !') और मैंने देखा, वह छोटा-सा मास का टुकडा धक् धक् धड़क रहा था, और किसी धागे जैसों के साथ अब भी मछली के जिस्म से जुड़ा हुआ था। मैं गुसलखाने की तरफ दौडी । पर रास्ते में ही अंधेरे की वाढ ने मुझे डुबो दिया। उस रात सपना बाया कि 'मैं वैबस लेटी हुई हू । होग में हूँ, सब धुछ देख रही हूं, पर हाथ हिलाना चाहू, हाथ हिता नहीं सकती, लात हिलाना चाहू, लात हिला नहीं सकती। लगता है, टागो और वाही के साथ भारी चट्टानें वांयी गई हों। और या फिर टागे, वाहे ही जमकर पत्थर हो गई थी। सारा जिस्म एक चट्टान बन गया था, पर चट्टान को पता था कि वह असल में एक मासूम जिस्म है। मेरे पति एक बड़ी-सी छुरी लेकर खड़े हुए थे। उनका चेहरा ऐमा था जैसे वह मुझे काटना चाहते तो न हों, पर और कोई चारा भी न हो; मानो यह बहुत जरूरी हो, वह छुरी को एक कपड़े से पोंछ रहे थे। ( मैं चौखकर कहना चाहती थी, 'नही, मुझे न काटो!' पर लफ्ज सिर्फ छाती के अन्दर शोर मचाते थे, गले के इस तरफ नहीं आते थे। मैं उठना चाहती थी, उठ नहीं मकती थी। हिलना चाहती थी, हिल नही सकती थी। एक छोटी-मी जुम्बिग भी नहीं। पूरा जोर लगा रही थी, सारी दाक्ति बटोरकर, पर एक उंगली भी नहीं हित रही थी। सो मेरे पति ने छुरी की नोक मेरे गले के बीचोबीच-दोनो हंमली की हड्डियों के दरम्यान, जहा मुझे पता था कि घुग्गी की तरह कुछ धक-धक् धड़क रहा होगा-धापी और फिर गले से नीचे की और चीरते चले गए। खून नहीं वहा । सिर्फ मांस की किरच-किरच को आगज़ आई। और फिर एक लाल माम के लोयडे को उन्होंने छुरी की नोक पर कार खीचा, 'कमाल है, इसका दिल तो अभी भी धड़कता है। वह मास का लोयड़ा पक्-या करता मैंने स्वयं देखा। मुख मोटे धागों के माथ वह मेरी छाती के बन्दर यही जुड़ा हुआ था। वे धागे भी मैंने देखे, मोटी, लिजलिजी, मुर्ख रस्सियों अजीत कौर/२६ । । जैसे । मैं उन्हें कुछ कहना चाहती थी, पर बोल नहीं सकती थी। चीखना चाहती थी, पर चीख गले में ही जम गई थी। और इस अजीव बदहवास नकुलाहट में मेरी नींद खुल गई। मेरे पति ने कहा, मैं चीखी थी। साथ ही । पूछा, 'क्यों?' मैंने कहा, 'कुछ नहीं! , "एक सपना जो बार-बार आता."रेत तपती हुई। जहां तक नज़र जाती है वहां तक फैली हुई। सीधी-सपाट नहीं, ऊंची-नीची। और मन में यह अह- सास, कि आसमान के किनारे तक ही नहीं, यह रेत उससे भी आगे तक फैली. है। सिर पर तपता सूरज, सफेद नहीं, सुर्ख-सा । रेत के तपते कण जमीन से लेकर सूरज तक एक सुर्ख गुब्बार में लटके हुए। और प्यास से छटपटाती मैं। रेत पर कभी दौड़ती, कभी तेज़ चलती, कभी सिर लटकाकर पैर घसीटती। यह पता नहीं रेत के कण हैं जो सूरज की तरफ परवाज़ कर रहे हैं या सूरज के टुकड़े हैं जो धीरे-धीरे तैरते हुए मुझ तक आ रहे हैं-मैं आंखें खोलकर सामने ऊपर देखती हूं तो गोल-गोल लाल रंग के, पीले और जर्द, काशनी, नीले और भाग जैसे रंग के नारंगी गोले, छोटे-बड़े सव आकारों के गोले, मेरी आंखों के सामने शून्य में तैर रहे हैं । आहिस्ता-आहिस्ता। कभी लगता है ठोस हैं, कभी लगता है महज़ हवा सरीखी किसी चीज़ के बने हुए हैं। पर उनके रंग से, और उनके आहिस्ता-आहिस्ता शून्य में तैरने से दहशत होती है। प्यास से जैसे जिवह हो रही हूं। गले में, जीभ पर, और होंठों पर बहुत- से कैक्टस उग रहे हैं । अजीव वेवसी, अकुलाहट, पागल कर देने वाली प्यास । आहिस्ता-आहिस्ता जिवह होने का अहसास। पर न खून गिरता है, न चीख निकलती है। सिर्फ बहुत-सी चीखें खामोश छाती के अन्दर फड़फड़ाती हैं- वड़े-बड़े पंखों वाले घायल परिन्दों की तरह। एक जगह पर घुटनों के बल बैठ जाती हूं, प्यास से बौखलाई हुई, और नाखूनों से, उंगलियों से रेत को खोदने लगती हूं, मिट्टी की तरह। पता नहीं क्यों, मुझे बहुत ज़ोर लगाना पड़ रहा है। रेत, रेत की तरह परे नहीं हटती, मिट्टी की तरह जिद करती है, जोर से खुद रही है। ३०/ अपने-अपने चार वरस मैं जल्दी-जल्दी, जैसे जिन्दगी-मौत का फैसला इसी बात पर निर्भर हो, और जैसे कोई बस नासिरी साम किसी काम के लेखे लगावे-वैद बेसबरी और हड़बड़ाहट से रेत खोद रही हू । रेत खोदती हुई मैं अपने-आपको देख सकती हूं। एक जबरदस्ती से चुप कराई हुई चीख से जरा-सा टेडा टुआ चेहरा। रोके आमुओ और वेवसी से अधमुंदी आखें, बालों में रेत, झुकी हुई कमर, हायों से लगते जोर के कारण कन्धं भी हिलते हुए, मैले कपड़े । अजीव बदसूरत शक्ल । गढ़ा काफी गहरा हो जाता है तो नीचे से गीली रेत निकलती है। मेरा दिल जैसे उछलकर गले में आकर खड़ा हो जाता है..."पानी !' गीली रेत सख्त बैमवरी मे परे करती हूँ। नीचे से पानी रिसकर ऊपर को आता है । मैं अपनी अंजुली उस पानी के ऊपर रस देती हू। पानी-जिसमे रेत के कण भी घुले हुए हैं--मेरी उगलियों की विरतों में ऊपर आ रहा है मेरी अंजुली मे। मेरी प्यास पागल होकर शोर मचाती है-पानी-पानो! अंजुली मेपानी आहिस्ता-आहिस्ता भर रहा है, अंजुली के नीचे की ओर से । तभी मेरी होती के उलटी तरफ, जो पानी और गीली रेत की तरफ है, कोई गोली-सी चीज घसरती है। घबराकर मैं अंजुली ऊपर करती हूं। गोली रेत और वित्ता-भर रेत घुले पानी के चह- बच्चे के नीचे से एक मिट्टी रंगा, चिपचिपा-मा चमकता हुआ सिर और दो आधी सोई-सी आखें बल सातो हुई रेंगती हुई वाहर रही हैं। मेरे कलेजे में जैसे डर का एक तेज़ कांटा है, 'साप ?' वह वल साती हुई चीज़ धीरे-धीरे सरकती हुई बाहर की और घिसट रही है। नही, सांप नही। साप तो हसीन होता है। यह तो महज गंडोये जैसी कोई चीज है, डर से सिकुड़ती हुई, कुल• खुलाती, बल खाती, गीली गुंधी हुई मिट्टी के रंग की, चिपचिपी, लिजलिजी। मन में घिन आती है। प्यास से भी बड़ी । और मितलाहट, और नफरत । पानी में अंजुली से गिरा देती हूं। लिजलिजे गंडोये के जिस्म से छुआ हुआ पानी में पी नहीं सकती। और मैं फिर आगे चल पड़ती हूं। फिर वही डगर, वही मफर, वही प्यास, वही थकावट। लगता है जैसे मूरज की तपिश को भी आवाज़ है-- हुंकार जैसी। फिर उसी तरह रेत सोदती ! पागल वेकनी में। प्यास मे छाती के अन्दर अजीत कौर/३१ की ओर भी कैक्टस का जंगल । छाती के अन्दर जैसे कोई दोनों हाथों से सांस को पकड़कर अन्दर को खींचता है-रस्सी की तरह । गीले रेत पानी की चुल्ली- सी, रेत में घुली हुई। मेरी अंजुली के नीचे फिर वही गीली-सी सरसराहट । एक और गंडोया, वित्ता-भर पानी में से निकलता हुआ..." - "एक और सपना । सपना जो वहुत वार आता है। एक अजीव दरिया है। न पता लगता है कि कहां से आ रहा है, न पता लगता है किधर जा रहा है; क्योंकि चारों तरफ सीधे ऊपर की ओर उठे हुए पहाड़ हैं-दीवारों की तरह काली, सख्त, पथरीली दीवारों की तरह। यह पानी कोई झील भी हो सकता था पर नहीं; क्योंकि बहुत वेग वाली रवानी है इसमें । थोड़ा-थोड़ा लहरों का शोर है । और लहरें ऊपर जाती झाग फेंकती नजर आती हैं, जैसे पहाड़ी दरि- याओं में नज़र आती हैं। उन लहरों के ऊपर किसी गोल चौड़े थाल जैसी गोल लकड़ी पर मैं बैठी । उस लकड़ी पर मेरा कोई कण्ट्रोल नहीं। यह कभी सीधी चलती है, कभी लहरों में ऊपर-नीचे जाती हुई। मैं चाहती हूं वह पहाड़ों के पैरों से न टकराए फिर चाहे टूट ही जाए। पहाड़ खौफनाक हैं, सीधे ऊपर की ओर जाते हुए। पर मैं सोचती हूं, और यह सोच सपने में बहुत साफ नजर आती है, कि इस पार्न में ड्रिफट करने सेतो पहाड़ों की खूबसूरती के साथ सर पटककर मर जाना में वेहतर है, क्योंकि वह कम अज़ कम ठोस तो होंगे ही। परों के नीचे इस ठोर अहसास को महसूस करने के लिए मैं सहक रही हूं। लगता है, कोई किनारा मेरै मंजिल नहीं (शायद इस करके कि किनारा कोई नजर ही नहीं आता) सिर्फ हाथों से उन पत्थरों का ठोस और सख्त स्पर्श महसूस करना और पैरों के नीचे उनके खुरदरेपन को जरना; वस, यही मेरी मंज़िल है, मेरी सबसे बड़ स्वाहिश । पर वह गोल थाल जैसी चीज़ वस या तो लहरों पर हिचकोले खाए ज रही है और या गोल-गोल घूमे जा रही है। और मेरे हाथों की हथेलियां और पैरों के तलुवे, बस, उन पत्थरों के लिए तड़प रहे हैं।" - ३२/ अपने-अपने चार वरस एक और बहुत बार आने वाला सपना-एक सड़क पर चल रही हूं। पता नहीं कब से। पर लगता है बहुत साल चल चुकी हूं। मीलो के मील। क्योंकि टांगों मे गाउँ पड़ी हुई हैं और पैरों के नीचे गहरे सख्त, जैसे परों के तलुवों में कील ठुके हुए हो। सड़क पर एक मरा हुआ परिन्दा पड़ा हुआ है बडे-बडे पंख चौपट खुले हुए, चोंच जरा-सी खुली, आंखें वेजान-सफेद, और खून की एक छोटी-सी तलया पेट के पास । यस कडठी भर खून। सडक के बीच मे परिन्दे को लाश पड़ी है। मैं परे से फेर खाकर निकल जाती हू । पास से बचकर निकलने से मन बहुत दुखता है। पर मुझे तो चलना है। सो चले जाती हूं। थोडा आगे जाती हूं तो सड़क पर बहुत-सी टूटी हुई जूतियां पडी हैं । बेतरतीब बिखरी हुई। 'ये किमकी जूनिया हैं ?' मैं हैरान होकर सोचती हू । वडी जानी-पहचानी जूतियां लगती हैं । पहले वहुत बार देखी हुई। तभी मैं अपने पैरो की ओर देखती हूं। खूब गदं से भरे हुए । 'ओहो, ये तो मेरी ही जूतियां है । पर इतनी सारी वहां से आ गई ? पहनी हुई तो मैंने एक ही जूती थी। कुछ समझ में नहीं आता । सिर्फ पर नंगे हैं, गर्द से भरे हुए, मले, और पैरों के तलुओ मे कील युके हुए, जिनमें से आहिस्ता-आहिस्ता खून रिसता है। नहीं, अपने पैरो पर तरस नही खाना, मैं सख्ती से सोचती हूं और उटकर चल पडती हू, टूटी-विखरी जूतियो से बचकर। और फिर आगे मुझे सड़क पर फटे हुए कपडे मिलते हैं । दूर से यही लगता है जैसे बहुत-से लोग सोए पड़े हों, पर पास जाकर देखती हू, कपड़े हैं। चारों तरफ बिखरे हुए । सफेद, पुराने, फटे हुए, धुले हुए । 'ये भला किमके कपडे हैं ?' हैरान होकर सोचती हूं। तभी मैं अपने जिस्म की ओर ताकती हू। नगी हूं। सारा जिस्म नहीं सिर्फ घड़। मैं अपनी बांहों से छाती ढांपती हू---एकदम घबराकर आस- पास देखती हूं । कोई नही। सिर्फ सपाट और वीरान सडक है, कोई मनुष्य तो क्या जीव-जन्तु भी नही । थोड़ी तसल्ली होती है-शुकर है, मुझे इम हालत में किसीने नहीं देखा। 'पर मेरे कपड़े कहां गए ?' फिर मैं सड़क पर पड़े फटे- विसरे हुए कपड़ों को देखती हूं। वे पड़े हैं। जो कपडे में पहने हुए थी, वे फट- कर वहा परे सड़क पर चौफाल पडे है बेसहारा । बड़े बेचारे-से लग रहे हैं। अपने में ज्यादा कपडो पर तरस आ रहा है। पर बाकी के इतने सारे कपड़े कहां से आ गए ? फिर धान से देखती हूं। वाकी सब कपडे भी मेरे ही थे जो अजीत कौर ३३ मैं सालों पहले पहना करती थी। और उदास, नंगी, छाती के आगे बांहें लपेटे, तेज़ कदमों से, थकावट से निढाल, और बेहद उदास आहिस्ता-आहिस्ता फिर चल पड़ती हूं। सड़क पर विखरे कपड़ों वाला रास्ता छोड़कर। सिर्फ एक बात का फिकर है मुझे, 'कोई मुझे इस तरह चलते हुए न देख ले, कोई देख न ले...।'
डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल ये सपने हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक और चिन्तक डॉक्टर लक्ष्मीनारायण लाल की १९७७ को डायरी में से हैं। उन्होंने इस किताब के लिए, अपनी समूची डायरी मेरे हाथ में थमा दी । ये सपने उसी डायरी मे मे चुनकर दे रही हूं : "पटियाला में लेक्चर देने आया हूं। पत्नी के साथ सोया था, पर सपने में एक दूसरी स्त्री थी। वह स्त्री कौन थी, उसका नाम, पता क्या है, नहीं जानता। पहले उसने मेरे होंठों का चुवन किया, फिर मैंने किए। फिर हम इन दोनों एक- दूसरे को देखकर मुस्करा पडे।" -२६ जनवरी, १९७७ "तमाम सुन्दर-सुन्दर साप, तरह-तरह के रंगों और शक्लों मे-जैसे क्यारी में फूल खिले हों। हरे रंग के साप को मैं प्यार करता हूं। उसके सिर को सह- लाता हूं। एक साप अचानक हंसने लगा। धीरे-धीरे और सांप भी हंसने लगे, जैसे बच्चो की एक टोली हंस पड़ी। मैं भी हंसने लगा।" --२ मार्च, १९७७ "वंबई का समुद्र है-मैं अपने इसी शरीर, इमी रूप में उसपर उड रहा हूं । वडे आनन्द से । कहीं कोई डर नहीं है। कहा उड़कर जाऊंगा; यम यह प्रश्न करते ही मपना टूट गया। पर नींद आते ही फिर वही मपना। इस वार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल/३
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मैं सालों पहले पहना करती थी।
और उदास, नंगी, छाती के आगे वाह लपेटे, तेज कदमों से, थकावट से
निढाल, और बेहद उदास आहिस्ता-आहिस्ता फिर चल पड़ती हूं। सड़क पर
विखरे कपड़ों वाला रास्ता छोड़कर। सिर्फ एक बात का फिकर है मुझे, 'कोई
मुझे इस तरह चलते हुए न देख ले, कोई देख न ले।''
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डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल ये सपने हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक और चिन्तक डॉक्टर लक्ष्मीनारायण लाल की १६७७ की डायरी में से हैं। उन्होंने इस किताब के लिए, अपनी समूची डायरी मेरे हाथ में थमा दी । ये सपने उसी डायरी में से चुनकर दे रही हूं : "पटियाला में लेक्चर देने आया हूं। पत्नी के साथ सोया था, पर सपने में एक दूसरी स्त्री थी। वह स्त्री कौन थी, उमका नाम, पता क्या है, नहीं जानता। पहले उसने मेरे होठों का चुबन किया, फिर मैंने किए । फिर हम इन दोनों एक- दूसरे को देखकर मुस्करा पड़े।" --२६ जनवरी, १९७७ "तमाम मुन्दर-मुन्दर सांप, तरह-तरह के रंगों और शक्लों मे-जैसे क्यारी में फूल खिले हो। हरे रंग के सांप को मैं प्यार करता है। उसके सिर को सह- लाता हूं। एक साप अचानक हंसने लगा। धीरे-धीरे और साप भी हमने लगे, जसे बच्चों की एक टोली हंस पड़ी। में भी हंसने लगा।" -२ मार्च, १९७७ । "वंबई का नमुद्र है-मैं अपने इसी शरीर, इसी रूप में उमपर उड़ रहा हूं । बडे आनन्द से । कहीं कोई डर नहीं है। कहा उड़कर जाऊंगा; बस यह प्रश्न करते ही मपना टूट गया । पर नींद आते ही फिर वही मपना। इस बार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल/३५ नंत समुद्र-मैं उसपर उड़ रहा हूं-उड़ रहा हूं।" -२१ अप्रैल, १९७७ आज रात एक विचित्र सपना देखा । एक पेड़ पर चढ़ा कोई फूल तोड़ने। क्या हूं कि पेड़ पर एक बहुत ही खूबसूरत चिड़िया बैठी हुई है। उसने 'चलो मेरे साथ उड़ चलो।' मैं उसके साथ उड़ चला। मैं यह भी देख हूं कि मैं सपना देख रहा हूं; यह सच नहीं है। पर मैं सो रहा हूं यह नहीं पता चिड़िया के साथ मैं एक पहाड़ की चोटी पर जा बैठा। देखने गा कि पहाड़ की चोटी चींटियों से ढकती जा रही है और वहां हमारा बैठे हना असंभव होता जा रहा है।" -२८ मई, १९७७ "रात का सपना भोजन बनाने से शुरू हुआ। पहले बर्तन मांजे और फिर सब्ज़ियां काटीं। चूल्हा जलाया। भोजन बनाता रहा । तरह-तरह के भोजन । फिर मेहमान आए; मेरे कुछ अभिन्न मित्र--प्रमोद शुक्ल, शिवसागर मिश्र, अमृताजी, इमरोज़, शोभा वहन आए। खाते रहे हम सब साथ, बस खाते रहे सारी रात । फिर सपना खत्म । और गहरी नींद।" -१६ जून, १९७७ "देखा-एक नन्ही-सी चिड़िया एक डाल से दूसरी डाल पर फुदक-फुदक- कर गा रही है । और मैं देख रहा हूं। थोड़ी देर बाद मैं ही पेड़ हो जाता हूं फिर मैं ही जंगल हो जाता हूं और वह चिड़िया, वही एक चिड़िया पूरे जंगल उड़-उड़कर, वैठ-वैठकर गा रही है। फिर अन्त में मैं ही वह चिड़िया भी जाता हूं।" -२४ जून, १ "मेरी स्वर्गीय मां से मेरी भेंट होती है। वह मुझसे बातें करती है कितनी खुश है ! मैं पूछता हूं, 'मां, तुम अब तक कहां थीं?' वह का 'यह कैसा सवाल है रे?' मां कितनी सुन्दर लग रही थी, विलकुल अपनेचार बरस अनिंद्य मुन्दरी ! 'मां, कोई गाना सुनाओ।' मा शरमाकर भाग गई! -२६ जून, १९७७ । "जलालपुर पहुंचा । गाव मे मछली मारने का सपना देखा। मछलियां पेडों पर चढ़ गई हैं । हंसी-मज़ाक कर रही हैं। खेल कर रही हैं । में भी उनके साथ खेलने लगा। मछली मारना भूल गया।" -१५ जुलाई, १६७ - "वही हूं जलालपुर में। दूसरी रात को स्वर्गीय भाभीजी का स्वप्न देखा। उन्हें बहुत कष्ट है वह कराह रही हैं और मैं रो रहा है। फिर देखता हू, उन्हें भयंकर चेचक हो गई है। वह पानी-पानी चिल्ला रही हैं । में पानी भरने जाता हूं, पर पानी कुएं से निकालते-निकालते स्वयं कुएं में गिर पडता हूं।" -१६ जुलाई, १९७७ "पिछली रात काफी देर से सोया, पर सोते ही एक सपने से लग गया। नदी के किनारे एक बहुत बडा मेला लगा हुआ है। लाखों लोगों की भीड़ है। उम मेले में मैं घूम रहा हूं। चीजें देख रहा हूँ। फिर गाने लगता है। मारा मेला मेरे साथ गाने लगता है। मेले में अचानक आग लग जाती है। लोग गा रहे हैं। आग फैलती जा रही है। मैं अकेले आग बुझाने लगता हूं। और माग के बीच में फंस जाता हूं। मैं लोगों को आवाज देता हूं, पर कोई वचाने नहीं आता । तब मैं उसी आग पर चलने लगता हूं। आग पर चलते चलते मैं कही दूर चला जाता हूं। वहां देखता क्या हूं कि एक राक्षस जैसा आदमी न जाने कर से सोया पड़ा है। उसपर घास उग आई है। मिट्टी चढ गई है। पर उसका मुंह खुला हुआ है। सासें ले रहा है। मैं उसको जगाता हू। फावड़े से खोदकर उसपर की मिट्टी हटाता हूं। वह उठना है। बहुत भूखा है। कहता है, 'खाना लाओ।' खाना लाता हूं। और मागता है। फिर मुझे खाने को कहता है । कहता है, 'क्यों जगाया मुझे? मैं इसीलिए तो सोया था।' में उसे समझाता हूं। नहीं मानता।लड़ाई होती है । मुझे घायल कर देता है । बेहोश हो जाता हूं। वेहोश
कर मैं फिर सपना देखने लगता हूं। सुबह हो जाती है।"
-११ अक्तूबर, १९७०
"परिचित-अपरिचित लोगों के बीच में एक बड़े घर के बड़े कमरे में में
बैठा था। वार्ते करते-करते मैं कमरे में उड़ने लगा। चूंकि मुझे उसी कमरे में
रहकर बातें भी करनी थी, इसलिए दीवारों ने पैर चिपकाकर जमीन के नमा-
नांतर हवा में उड़ता-झूलता हुला बातें कर रहा था। कभी-कभी कमरे से बाहर
उड़ जाता, कभी कमरे में आ जाता!
-१० नवन्वर, १९७७
मन्न भण्डारी मन्नू भण्डारी आज एक चेतन कलाकार के तौर पर हिन्दी के प्रमुख कहानीकारों में हैं। चेतन दृष्टि से वह सिर्फ अपनी नहीं, अपने पात्रों की जिन्दगी के गहरे अधेरो में भी झाक सकने की सामयं रखती हैं । मन्नू भण्डारी के सपने उन्हीकी कलम से इस प्रकार हैं : "गहरी नीद मुझे नहीं आती, इसलिए आधी रात सपने देखने में तो आधी रात देखे हुए सपनो पर विचार करने में ही बीत जाती है। लेकिन सवेरा होते ही सपना और उसका सब दिन की रोशनी में विला जाते हैं । शायद यही कारण है कि आज जब अपने देखे हुए दो सपने लिखकर भेजने की बात सामने आई तो समझ ही नहीं आ रहा कि क्या लिखू । हजारों देखे सपनों के बीच से दो का चुनाव "थोड़ा मुश्किल तो है, फिर भी लिख रही हूं। एक बहुत पुराना सपना है, जिसकी बहुत गहरी छाप मन पर छूटी थी और जिसकी कई-कई व्याख्याए दूसरा अभी कुछ दिन पहले का देखा हुआ, जो देसने पर बड़ा ऊलजलूल लगा था, पर सोचने पर लगा कि इस जलजलूलपने का भी एक गहरा अर्थ है। करीब चार साल पहले यह सपना देखा था। मैं अपनी वडी वहन और सात साल की बच्ची के साथ बीहड़ जंगल मे से जा रही हूं। चारो ओर धूल ही धूल उड़ रही है और पानी का कहीं नामोनिशान नहीं। प्यास से मेरा गला चुरी तरह सूस रहा है और होंठ पपड़ा गए हैं। एक-एक कदम चलना मेरे लिए भारी हो गया है। पर मेरी बहन को कोई परेशानी नहीं हो रही। वह मुझे मैंने की थी; और मन्नू भण्डा बंधाती जा रही है, 'अरे चल मन्नू, कोई प्यास-व्यास नहीं। इस सोच ही मत और बढ़ती चल । बस, अभी पहुंच जाएंगे।' तभी मुझे दिखाई दे जाता है। मैं बच्ची का हाथ छोड़कर उसी ओर दौड़ पड़ती बिना यह देखे कि उसमें पानी है या नहीं, छलांग लगा देती हूं। पर जाते ही पानी तो नहीं मिलता, ढेर सारे सांप-विच्छू, केकड़े बुरी तरह कर मेरा शरीर नोचने लगते हैं। भयंकर यातना। मेरा सारा मांस नुच और अब हड्डियां कुतरी जा रही हैं । असह्य पीड़ा। तभी मुझे अपनी बच्ची रोती हुई आवाज़ सुनाई देती है: "ममीऽ...' और झांकता हुआ उसका हरा दिखाई देता है। मैं अपनी वची-खुची सारी ताकत लगाकर ज़ोर से खती हूं..."सुशीला, टिंकू को यहां मत आने देना।' और इस चीख के साथ हो मेरी नींद खुल जाती है । मैं केवल नींद में ही नहीं चीखी थी, बल्कि सचमुच ही मेरी चीख निकल पड़ी थी। धौंकनी की तरह सांस चल रही थी और सारा वदन पसीने में नहाया हुआ था। जाग जाने के बाद भी अजीव-सी दहशत ने मुझे जकड़ रखा था और राजेन्द्र पूछ रहे थे कि आखिर क्या हो गया क्या देख लिया मैंने? बड़ा विचित्र था उस प्यास का एहसास और वेहद भयंकर थी वह यातना, जो उस प्यास को बुझाने के प्रयत्न में मिली थी। इससे अधिक इस बारे में कुछ नहीं लिखूगी। इसकी तरह-तरह की जो व्याख्याएं कीं, वे सब मेरे अपने पास, और सपना ज्यों का त्यों आपके सामने।" - "यह सपना अभी कुछ दिन पहले का ही है। कॉलेज में स्टाफ-कौंसिल की मीटिंग हो रही है। दरी पर गोल बनाकर हम लोग बैठे हैं (सूचनार्थ यह वत दूं कि हमारे यहां स्टाफ कौंसिल की मीटिंग कुर्सियों पर बैठकर होती है) मेरे हाथ में एक तानपूरा है, जिसमें से कोई आवाज़ नहीं निकल रही, पर जि मैं लगातार बजा रही हूं और सब मुझे देख रहे हैं। तभी मुझसे नाचने के कहा जाता है । मैं बड़ी दुविधा में, क्योंकि नाच मुझे विलकुल नहीं आता कहती हूं कि मैं नाच नहीं सकती। इसपर मेरी एक कुलीग कहती है, 'f भण्डारी! नाचना तो आपको पड़ेगा। चलिए नाचिए।' दूसरी कह 'लो मैं गाती हूं, तुम नाचो।' और वह वेसुरा-सा लोकगीत गाने लगती हैं। नारवरस बेचारनी के भाव ने खडी होकर नाचने लगती हूं."निहायत हो येताला होर। नाच खतम होने पर मुझने कहा भाता है कि मैं दुबारा नानू । गाने की पंकियो मेरे दिमाग में मे निकल गई हैं और बहुत जोर लगाने पर भी याद नहीं आती। मैं उनने कहती हूं कि मैं गाना एकदम भूल गई, आप दुबारा गाइए । इसपर हमारी प्रिसिपल मुझसे तो कुछ नही कहती, पर एकदम उठकर अपना सारा संभालती हुई बाहर चली जाती हैं। एक सीनियर कुलीग कुछ आरोप-भरे स्वर में कहती हैं, "मिमेज भण्डारी! लगता है आजकल आपका कॉलेज से कोई इनवॉल्दमेण्ट नहीं रह गया। अभी गाना गया और आप अभी भूल गई। देखिए, मिसेज सिंह आपके घर के पास रहती है, इतने साल आपको यहां रहते हो गए, आप कभी उनके घर भी नहीं गई। अब आपको नापने के लिए कहा तो यह भी आपको वोझ लग रहा है।' मैं एकदम गुस्मे से भभक उठी, 'कमाल है, मैं किसके घर जाऊं, किसके घर नहीं जाऊं, यह भी आप लोग तय करेंगे..." और इतना कहने के साथ ही मेरी आख खुल गई। पहले तो वही देर तक हंसी आती रही। ऐसा तो न हमारे कॉलेज में होता है न मेरे साथ कुछ हुआ, पर बाद में लगा कि सपना बडा सटीक है। सचमुच पडाना आजकल बिना स्वर निकाले निरन्तर तानपूरा बजाते रहने जैमा ही यानिक और नीरस हो गया है ! कॉलेज में होने वाली मीटिंगरा और उनकी लम्बी-लम्बी वहमें वेसुरे गाने और चैताल नाच जैसी एब्सई नही हो उठी या कि अनकहे, अनजाने और अनचाहे ही नौकरी ने जिन्दगी के पूरे पैटर्न को अपनी गिरपन में नहीं ले लिया है ? लगा, जैसे नौकरी को लेकर रात-दिन चेतना के किसी न किसी स्तर पर उठने वाली बेचनी और विरक्ति ही इस सपने में प्रतिविम्बित हुई है। पर यह तो मेरी व्यास्या है। आप चाहें तो बिलकुल अलग ढग से अलग तरह के अर्थ भी इसमें में निकाल सकते हैं।"
राजेन्द्र यादव राजेन्द्र यादव हिन्दी के एक नामवर कहानीकार हैं। मैंने उनसे एक ही में दो चीज़ों की मांग की थी-एक, उनके सपनों की; दूसरे, उनकी स्वयं की हुई मुलाकात की, जिसकी मुझे एक पृथक् संग्रह 'मैं और मैं' के लिए वश्यकता थी। उनका एक ताज़ा सपना इन्हीं दो मांगों के फलस्वरूप आया आ सपना है, जो अपने-आपमें किसी जाग्रत् अवस्था के विचारों के नींद के पह दाखिल हो जाने के पहलू ते एक अध्ययन है । इसके और इनके एक और ब प्रतीकात्मक सपने का जिक्र उनकी जवानी इस तरह है : "प्रिय अमृता जी, मेरी याददाश्त बहुत कमजोर है। पढ़ी, देखी-सुनी-सभी कुछ भूल जाता हूं। कभी-कभी तो यह भी याद करना मुश्किल होता है कि कोई वात सचमुच मेरे साथ हुई थी या सिर्फ सोची थी। दार्शनिक लोग तो इसे वहुत ऊंची स्थिति कहते हैं कि ज़िन्दगी मात्र एक सपना है, और 'वहां' या 'यहां' वैठकर तय करना मुश्किल है कि सच क्या था 'कहां था? वहरहाल, सपना तो मुझे कभी भी याद नहीं रहता। उस समय ज़रूर सोचता रहता हूं कि इसे याद रखना है, या यह तो इतना महत्त्वपूर्ण है कि ज़रूर याद रहेगा। दो-एक दिन रहता भी है, मगर फिर गायब''हां, इतना अपनी तरफ से कह सकता हूं कि 'कुवलाइखां' या कहानियां-उपन्यास लिखने का मुझे कभी सपना आया हो, याद नहीं पड़ता मेरे सपने अक्सर शालीन भी नहीं होते वैते अभी-अभी आपके दबाव में आकर मैंने एक शुद्ध साहित्यिक सप - ४२ / अपने-अपने चार वरत .. देख डाला है : एक बड़ी-सी गोल मेज है, उसपर घड़ेनुमा विमनी वाला सम रखा है । नीची-सी त की कुर्सी पर मैं बैठा हू और विश्ने आटं पेपर पर पी एक बडी-सी पत्रिका खुली रखी है। वाकी कई लोग झुके हुए एक पत्रिका को देख रहे हैं। जैसे पास ही के प्रेस से छपकर अभी-अभी आई हो । हो सकता है, डाक से पहुंची हो।हम सब लोग जिस लेख को बडी उत्सुकता से देख रहे हैं, वह दोनों खुले हुए पन्नों पर फैला है और ऊपर मोटे-मोटे अक्षरों में छपा है 'मैं और 'मैं"। इसमें दूमरा 'मैं' इकहरे उद्धरण-चिह्नों में है। लेखक का नाम है 'मैक्सिम गोकी। यह पत्रिका निश्चय ही 'सोवियत भूमि' है, लेकिन पन्नों का सारा 'ले आउट' 'म्पन' का है । मैं यह देखकर आश्चर्य और सुशी से भर जाता है कि जो व्यक्ति एकदम झुका हुआ उंगली से मुझे एक-एक कालम दिखा रहा है वह खुद गोी है। पच्चीस-तीम वर्ष की उम्र वाला, जैमा मने तस्वीरो में देखा है' बड़े-बड़े बालों के पट्टे, चिकनी मफाचट दाढी, दुबला शरीर "मैं इस बात से बेहद प्रसन्न हूं कि अब मेरा काम कितना आसान हो गया है। अब मैं आपको 'मैं और मैं' लिखकर दे सकता हूँ। मैं जानता हूं, यह सपना मुझे क्यो दिखाई दिया। आपका आग्रह । अब यह गोर्की और कोई नहीं है, पकज सिंह हैं जिमसे एकाध दिन पहले व्यक्तिगत बातें करते हुए मुझे हल का-सा ध्यान आया था कि इसकी शक्ल-मूरत युवा गोर्की से बहुत मिलती है । पत्रिका शायद योगेग गुप्त वाली है जिसे निकालने के मसूबे हम लोग अक्मर वाचते रहते हैं। माहौल वही उन्नीसवी शताब्दी के अन्त या चीमवी के प्रारम्भ का है, जब साहित्य या राजनीति इसी तरह का सामूहिक सरोकार होता था और एक-एक चीज पर सब मिलकर प्रतिक्रियाएं करते थे। मगर गोर्की ही क्यों ? इधर तो वरसों में मैंने उसकी कोई चीज भी नहीं पढी। आप जानती ही है, जैसे दूसरे महायुद्ध के आसपास उर्दू मे समरसेट मॉम हुआ करते थे, हिन्दी मे हमेशा से गोकी होते आए हैं। प्रेमचन्द अपनी मूछो के कारण गोर्की हैं तो जैनेन्द्र इसलिए कि प्रेमचन्द ने उन्हें गोर्को बताया था। शिवदान- सिंह चौहान ने भी कभी अश्क और रेणु (या रागेय राघव) को गोर्की होने के पिताय दिए थे। स्वतंत्रता के बाद मजदूर-वर्ग से सम्बन्धित होने के कारण शिवनारायण श्रीवास्तव नाम के गोर्की हुए और इधर नवीनतम कमलेश्वर को गोर्की का चोला प्राप्त हुआ"मगर यह पंकज तो कवि हैहो साता है देकारी के कारण उसकी आवारागर्दी, तथाकथित क्रान्तिकारिता और हुलिया, सबने मेरे सपने में यह घपला पैदा कर दिया हो" इसका मतलब कतई यह नहीं है कि मैं 'अज्ञेय' जी और विनोवा की तरह सिर्फ आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सपने देखता हूं। अजी, राम का नाम लीजिए. 'मुझे तो ऐसे ऊल-जलूल, अश्लील और आपत्तिजनक सपने आते हैं कि फ्रायड के जमाने में होता तो सत्यानाश हो जाता। हां, उनके ऐसे साफ अर्थ मैं नहीं जानता। बाद में उनपर सोचता भी हूं। तीन-चार साल पहले मैंने लगा- । तार दो दिन एक सपना देखा था और याद इसीलिए है कि उसे मैंने अपनी कहानी 'वहां तक पहुंचने की दौड़ में ज्यों का त्यों लिख डाला है। सपना काफी टेक्नीकलर था। विना किसी टिप्पणी के सपना यों है: रिंग रोड पर जहां विजली का श्मशान है, वहां से एक टैक्सी अन्तर्राज्यीय वस अड्डे की तरफ जा रही है। रात हो गई है, लेकिन आसमान ऐसा सिलवर ग्रे (चमकदार सलेटी) है जैसे अभी-अभी सांझ हुई हो। मैं डिक्की की तरफ पैर करके टैक्सी की छत पर लेटा हूं। टैक्सी के मीटर की किटर-किटर, टैक्सी की पीली छत, वॉनेट सव मुझे बहुत ही चटख रंगों में दीख रहे हैं। नीचे टैक्सी ड्राइवर बहुत डूबकर अपने साथी को कोई किस्सा सुना रहा है। शायद उसे खयाल भी नहीं है कि मैं ऊपर लेटा हूं। लालकिले वाले तीनों गेरुआ पुलों के नीचे से गुजरते हुए मुझे पुलों की छतों वाली धारियां बहुत साफ दीखती हैं। छतें काफी नीची हैं। शायद गर्मी का मौसम है। हम लोग अशोक होटल जैसे एक पोर्च में पहुंचते हैं। टैक्सी ड्राइवर बड़े अदव से दरवाजा खोलता है और मैं बड़े आभिजात्य से बाहर निकलता हूं। दरवान रास्ता दिखाता है । अब हम लोग एक खुली-सी जगह पहुंच गए हैं। यहां पार्टी चल रही है और लोग काले सूटों पर 'वो' लगाए हुए गिलासों में कुछ पी रहे हैं: "मुलायम पेय । औरतें रंग-बिरंगी साड़ियों में हैं। ऊपर खूब- सूरत झाड़ और बल्वों की झालरें हैं । साड़ियों, झालरों और गुब्बारों के लाल, पीले, हरे रंग मुझे अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं। पास ही सिर से कुछ ऊंची एक छत है, और उसपर बैंगनी रंग का मोटा-सा कालीन विछा है और उसपर लेटा मैं नीचे चल रही इस पार्टी को देख रहा हूं। मैं औंधा लेटाहूं और एक- दम किनारे पर हूं। किसी तरह कुहनियों से अपने को नीचे फिसलने से रोके । - ।
हूं। अचानक मैं पाता हूं कि मेरी उठी हुई कहनियों और कालीन के बीच एक लड़की है। उसने कपड़े नहीं उतारे हैं। न इतनी नीची है कि नीचे से अगर कोई गिलाम ऊपर उठाए तो मैं आसानी से ले सकता हूं। मन में बड़ी अजीव- सी गोपन-प्रसन्नता है कि ये मय अपने राग-रंग, वन-मुबाहिसे में ही मस्त हैं और इन्हें पता नहीं है कि मैं ऊपर लेटा हुमा इन्हें देख-देखकर मजा ही नहीं ले रहा, कुछ और भी कर रहा हूं। लेकिन भीतर बहुत वेचनी भी है कि यह लडकी कौन है ? मैं क्मिी तरह उमकी शक्ल नही पहचान पाता हूं। या तो उसने चेहरा ढक रखा है या फिर चेहरा ही नहीं है। फिर अचानक कही वह लडकी चली जाती है और मैं ऐसी संकरी गली और गलियारों में भटकने लगता हूं, जैसी पानी के जहाजो मे होती हैं-पतली-पतली गंग-वे... बिना चेहरे वाली इस औरत का सवाल मुझे काफी दिन परेशान करता रहा "आप ही बताइए, यह सपना क्या है ?"
दलीप कौर टिवाणा दलीप कौर टिवाणा पंजावी की एक प्रसिद्ध उपन्यासकार है। उसके एक पन्यास को साहित्य अकादमी एवार्ड भी मिला है। इस किताब के लिए लीप ने अपने जो सपने लिखकर भेजे हैं, वे सचमुच एक खोज के लिए वढ़िया जमीन हैं। सपने किसी भविष्य का इशारा भी हो सकते हैं। इस सोच में पड़- कर न मैं कहीं पहुंच सकती हूं, न पाठक, पर इस बात को खोज के हवाले करके, मैं दलीप के सपनों का एक-एक अक्षर संजोकर यहां दे रही हूं: "मैं अपने सपनों को नींद का एक वावरापन समझकर हंस-भर नहीं देती, बल्कि उनसे चौकती हूं। वैसे तो जैसे मैं समूची रात ही सपनों में चलती रहती हूं,पर कुछ एक सपने मुझे ऐसे भी याद हैं जिन्होंने रात के अंधियारे को लांघकर दिन के सफेद उजाले में भी मुझे परेशान किया। ऐसा ही एक बहुत पुराना सपना है। अभी मैं पढ़ती ही थी, एक रात को सपना आया कि फूफाजी (उन वुआजी के पति जिनकी बेटी बनकर मैं वचपन से रही) जैसे मर गए हैं । मैं बहुत रोई। रोते-रोते जाग गई। मेरी आंखें अव भी आंसुओं से भरी थीं। वत्ती जलाई, चार बजे थे । खुद ही सोच लिया, कहते हैं सपने में जिस व्यक्ति की मौत हो उसकी उम्र बढ़ती है। यह सोचकर म ठिकाने पर आ गया, और मैं फिर सो गई । सुवह उठी, सपना याद था इसलि परेनान-जी मैं आंगन में धूप में बैठे अखबार पढ़ रहे फूफाजी के पास बैठ स्वेटर बुनने लगी। 'यह किसका स्वेटर है ?' उन्होंने पूछा। ४६ / अपने-अपने चार वरस 'आपका।' 'मेरे पास तो कई हैं।' उन्होंने कहा। 'गुरबचन अकाली भाई साहब के लड़के का परसो व्याह है ना, उसके लिए नया स्वेटर बनाकर दूगी।' ऐसा बताया। अखबार पढकर उन्होंने रसोई की दीवार के पिछली और बंटकर हमारे नौकर चरनी से घण्टे भर तक बदन पर, टागों, बाही, सिर पर मालिग करवाई और फिर गर्म पानी से नहाए। दो अण्डे, पराठा, मक्खन और चाय का ब्रेक- फास्ट किया। वाकी रह गया अखवार पड़ा। बड़ी बेजी के पास आकर बातें करने लगे। ग्यारह बजे फूफाजी कर्ने लगे कि मैं डॉक्टर जगदीगसिंह को मिल- कर बाता हूं, कई दिन मे पेट भारी-भारी-सा लगता है। सरसरो वातें हो रही थी मो उटकर ऊपर कोठे पर चली गई, पता नहीं क्या करने। बाद में वह डॉक्टर के यहां जाने के लिए तैयार हो गए। छोटी वेजी पढे लगी, 'मैं भी चलती हूं, साथ ही उसकी घरवाली से मिल आऊगी।' कोठी से बाहर आकर फूफाजी ने पहले ड्राइवर को कार निकालने के लिए कहा, फिर खुद कह दिया, 'रहने दे अह्मद, टागाही जोड़ ले।' महमद अभी टागा जोड़ हो रहा था, उन्होंने कहा, 'पास ही तो है, पैदल ही हो आते है।' सो पैदल ही चले गए। छोटी वेजी बताती हैं, 'डॉक्टर के घर जाकर कुछ देर बातचीत करते रहे, फिर कहने लगे, 'डॉक्टर साहब, कुछ दिन से मेरा पेट भारी-मारी लगता है।' डॉक्टर जगदीश ने कहा, 'है तो आज इतयार, फिर भी हम हस्पताल चलते हैं । वहा चलकर देखते हैं क्या बात है ।' पास ही हस्पताल था। पैदल ही चले गए । डाक्टर ने कहा, 'लेट जाओ, आपका ब्लड प्रेशर देखते है ।' उन्लड प्रेगर देखने लगे तो फूफाजी बेजी को कहने लगे, 'बीवी, दीप को बुलाओ। जरूरी बात करनी है। अहमद को टागा लाने के लिए वेजी कहने दरवाजे की ओर बढ़ी ही थी कि डाक्टर ने भवराकर नम्ज पकहते हुए कहा, 'यह तो गए !' एक हिचकी-सी आई और खत्म हो गए। डॉक्टर जगदीश ने बताया कि दिल का पहला दौरा ही इनकी जान ले गया। घर से पैदल चलकर गए और घण्टे के अन्दर-अन्दर ही घर लाभ गई। में आज भी बड़ी इरान-सी होकर मोचती हूं कि जिस दिन उन्हें मरना था, मुझे उनी रात उनके मरने का सपना क्यों आया था? . दलीप कौर टिवाणा । उनका अपना कोई वेटा-बेटी न होने के कारण यह एक कठिन मौत थी। कुछ उलट-पलट हो गया था। उनका भोग पड़ जाने के काफी दिनों बाद नके एक दोस्त सरदार जयसिंह हमारे पास आए। आकर बताने लगे। रात मुझे सपने में भाई साहब दिखे थे। कहने लगे 'वीवा को जाकर कहो, मेरा स्वेटर तो बना दे।' उस दिन फिर मैं बहुत रोई । अस्तव्यस्त पड़े स्वेटर के पड़ते ढूंढे, ऊन ढूंढ़ी। स्वेटर पूरा किया। उनके कपड़ों के साथ गंगाजी भेज दिया।) । - इसी तरह एक और सपना मुझे याद है । मैंने मन में स्यूसाइड एक पनाह मान ली थी। ज़िन्दगी में न सुलझने वाले सवाल जव आंखों के सामने सिर के वल खड़े हो जाते, तो हैरान-सी होकर मैं सोचती, इनसान जब चाहे अपनी मर्जी से अपनी आंखें क्यों नहीं मूंद सकता ? एक दिन सपना आया जैसे मैं मर गई हूं, और मरकर सफेद धुआं बन गई हूं। ड्राइंग रूम में बैठे सब वातें कर रहे हैं। कुछ मैं भी कहती हूं पर कोई ध्यान ही नहीं देता, क्योंकि मेरी आवाज़ किसीको सुनाई ही नहीं दी। फिर मैं वेजी को कहती हूं, 'वेजी, मुझे बड़ी प्यास लगी है।' वह हुंकारा ही नहीं भरते और न मेरी ओर देखते हैं। मैं झुंझलाक उनका हाथ पकड़कर कहती हूं, 'वेजी मुझे प्यास..." पर उनका हाथ पकड़ा नहीं जाता । मैं तो धुआं हूं। आधा धुआं उनके एक ओर निकल जाता है, अ दूसरी ओर से। उन्हें पता ही नहीं लगता। उस वक्त लाचारी की, हाज़िर हुए गैरहाज़री की जिस वेबसी में से मैं गुज़री, उससे परेशान होकर जार और जिस स्यूसाइड को मैंने सपनों-रहित नींद समझ लिया था, उसकी अस उस सपने ने ऐसी स्पष्ट कर दी है कि अव तपती लूओं, ठिठुरी रातों चलते तूफानों के वक्त की वह पनाह इन सबसे मुश्किल लगती है।" . "एक सपना और बताना चाहूंगी। ६१-६२ में सपना आया वि गोपालसिंह दरदी को और मुझे भाषा विभाग, पंजाब वाले कोई इ हैं। लगा, शायद अचेतन मन की कोई इच्छा दो रूप धारण कर सपना मैंने डायरी में नोट कर लिया, पर किसीको नहीं बताय गोपालसिंह दरदी का पंजावी साहित्य का इतिहास कभी नहीं जानती थी कि वह कौन है। किसीसे पूछा कि डॉक्ट दरदी जी जिदा हैं ? उसने कहा, 'हां, कोई काम है ? मैंने कहा, 'नहीं। कुछदिनों बाद पता लगा, भाषा विभाग, पंजाव वाले हॉटर गोपालसिंह दरदी को ऑनर कर रहे हैं, और मेरी कहानियों की किताब 'साधना' को एक हजार रपये इनाम मिला है। मैंने मोचा, मेरी किताब को कैसे इनाम मिल सकता है, मैंने तो इनामी मुकाबले में किताब भेजी ही नहीं है। पर पता लगा कि भाषा विभाग में मेरा एक विद्यार्थी काम करता था, उमने खुद बाजार ने किताब लेकर आखीरले दिन भापा विभाग में इनामी मुकाबले में भेज दी थी।" " और सपना याद है । बंगला देश की लड़ाई लगी हुई थी। मेरी दो वहनों के पति और एक मेरा माई उस लडाई मे गए हुए थे। इन दिनों की परेशानी को वही लोग समझ सकते हैं जिनके घर में तडाई पर गए हो। जब आसपास के परिभित या पड़ोसी के घर तार आता, तो मारे घर की जान सूस जाती । लखा भाई साहब (वहन का पति, जो फौज में कर्नल हैं) बना गए ये, जब तक कोई बवर न आए, समझना हम ठीक-ठाक हैं। शुकर-शुकर करके लड़ाई बन्द हुई। दोनों बहनों के घर वालों के तार आ गए कि टीक हैं। दूर- पास के रिश्तेदारों के भी सुख-समाचार पहुंच गए। पर वीरें का (भाई का) कोई पता नहीं आया। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन पलटन को तार दिए, बहनों के घर वालों को दिए, आर्मी हेडक्वार्टर को फोन किए, आर्मी चीफ को भी तार डाला। हारकर दिल्ली की केजुअल्टी लिस्टो में भी पता किया, पर कुछ पता नहीं लगा। जो कभी पाठ करने लगे, कभी रोने लगे। डॉक्टर दलजीतसिंह का सारा परिवार हमारे पामतमाम दिन टेलीफोन के पास बैठा रहे। मेरी सहेली अमृत कलेर, जो अब अमृत गुरम है, कभी दिलासा देने वाली बातें करे, और कभी वेजी के साथ खुद भी रोने लग जाए। मारी-मारी रात आंखों में गुजर जाती। एक दिन में गोली खाकर सो गई कि शायद सपने में ही बीरा दिखाई दे जाए कि वह किस हाल में है। रात को मपना माया, वोरा छोटा-मा कही गुम हो गया है । मैं बहुत रो-रोकर आवाजें दे रही हूं--'वीरे! वोरे!' कितनी ही आवाज देने के बाद 'वह' दूर एक पेड़ पर से बोला, 'बहनजी, में यहां हूँ !' मेरा जी ठिकाने आ गया कि वह महीं न कहीं जिन्दा है। अगरे दिन सके एक दोस्त की चिट्ठी आ गई कि पिछले दिनों वायरलेस के द्वारा मिली है कि वीरा ठीक-ठाक है। वे किसी ऐसी जगह पर थे जहां के सारे रास्ते कट गए थे। फिर छुट्टियों में आया वीरा बताने लगा, 'बहनजी ! एक जगह अंधेरे में चलते दुश्मन के विलकुल ऊपर चले गए। जब हेवी शेलिंग होने लगी तो एक जगह हम लाशों में लेट गए। सिद्ध मुझे कहने लगा, वीरे, मरियो ना! नहीं तो मैं तेरे घर वालों को क्या लिखूगा!--और फिर जब चारों तरफ लाशें ही लाशें दिखीं, तो हो रही फायरिंग में ही पेड़ पर चढ़ गए। साथ ही डर लगे, कहीं कोई साला दुश्मन पहले ही ऊपर ना बैठा हो । आम यह उसूल है कि रात को लड़ाई नहीं होती, पर इस लड़ाई में कोई उसूल-असाल नहीं रहा था। सारी- सारी रात भी लड़ाई होती रही है." लखा भाई साहव बताने लगे कि जव कभी रोटी खाने लगते तो ग्रास मेरे गले में अटक जाता कि कल को इस समय जव रोटी खाएंगे तो पता नहीं मेरा कौन-कौन-सा अफसर होगा और कौन-कौन-सा नहीं होगा, और इसी तरह पता नहीं कौन-कौन-सा जवान होगा और किस-किसके घर चिट्ठियां लिखन पड़ें। और क्या पता मैं भी होऊं कि नहीं।" "इन सपनों के अलावा कुछ सपने ऐसे भी हैं जिनके अर्थ मेरी समझ में ए। जैसे, मुझे एक बार सपना आया कि एक अंग्रेज़ साधु मुझे कहा कि तू हेमिंग्वे सारा पढ़ ले । हेमिंग्वे की बहुत सारी किताब मैंने खरी ती पर अभी तक केवल दो-तीन ही पढ़ी होंगी। पता नहीं वह अंग्रे कौन था, और मुझे हेमिंग्वे सारा पढ़ने के लिए क्यों कह गया।" "फिर एक और सपना है जो कई सालों से बहुत बार आया है जैसे मैं कहीं जा रही हूं, कभी स्टेशन पर खड़ी हूं कभी कह रही पर तो जैसे मैं पहले भी कभी आई हूं।' कभी जैसे गाड़ी छूट गई। आने वाली है। इस सपने के दौरान एक उदासी और कचोट-सी है और घबराहट-सी में मैं जाग जाती हैं।" "एक बार माली ने मां के घर-आंगन में थमले के पास गुल. नेचारवरस वेल लगाई। बेल बढकर कोठे तक चली गई। टहनिया सारी खिड़की के आगे फैल गई। दो वरम गुजर गए, उसको कोई फूल न लगा। माली कहने लगा, 'इसको फूल नहीं लगते, उखाड़ देता है। मैंने कहा, 'नही, रहने दें। क्या खबर लग ही जाए। उस रात मुझे ऐमा सपना आया जैसे आगन मे चल पर बड़ा ही सुन्दर प्याजी रग का फूल लगा है। अगले दिन मैंने माली को कहा, 'बेल नहीं काटना, इसमें फूल लगेंगे। कुछ दिनो वाद उम बैल पर प्याजी रग का एक फूल लगा। फूल बहुत दिन खिला रहा । पर उस फूल के बाद फिर कोई फूल न लगा। चत-वंशास के महीने माली ने मारी वेल काट दी और उसकी जड के पाम नयी कतम जोड़कर कतरन बाध दी।" "एक बार सपना आया जैसे अमेरिका में रह रहे हरनेक (मेरी छोटी बहन का पति) की शक्ल बहुत बिगड़ गई। सारा चेहरा जैसे कट-फट गया हो । मन ही मन कहा, हाय रखवा | मा-बाप का इकलौता बेटा है, और फिर कवल (उसकी पत्नी) के सदके, उसको हर बला से वचा लेना। वा शुकर किया, जब कंवल और हरनेक की तरफ से कोई चिट्ठी या तार न आया। दो महीने बाद अमेरिका से उसका दोस्त आया। पूछा, 'हरनेक ठीक-ठाक है ?' बोला, 'विलकुल ।' मैंने कहा, 'मुझे बड़ा खराब सपना आया था कि जैसे उसकी शक्ल बहुत बिगड़ गई है। वह बोला, 'शक्ल तो नही, पर वह आप विगढ़ गया है। पर यह ना कहना कि मैंने तुम्हें बताया है।' " . "मेरे श्रीमानजी प्रो० भूपेन्द्र साहब जद विलायत गए थे, लोग कोई मजाक से, कोई मंजीदगी से कहते, 'अब उन्हे लौटकर नही माना है । विलायत से भी भला कोई व्यक्ति लौटकर आया है। मैं कहूं, 'दो महीने तक जब छुट्टियां खत्म होंगी, जरूर आ जाएंगे।' वीम दिनों बाद मुझे मपना आया, वह आ गए हैं । मोचा, यह तो जरूर मेरी इच्छा ने सपने का रूप धार लिया है। नहीं तो दस हजार रुपये खर्च करके जब कोई जाता है तो इतनी जल्दी थोडे ही लौट आता है। अगले दिन इनकी विट्ठी आ गई, 'मैं जल्दी आ रहा हूं!' और अभी महीना भी नहीं बीता था कि वह वापस भी आ गए।"
- "और बहुत सारे सपनों में से एक सपना याद है कि एक रात सपने में मेरे वल 'एह हमारा जीवणा' की भानो आई। आकर कहने लगी, 'बड़ी मुश्किल से आपका घर ढूंढ़ा है। मैं तो चलती-चलती हार गई। काला राज़ी है ? मैं गंगा नहाने चली हूं, सोचा मिल लूं, और अपने भाई नरैण को कहना, मेरा फिकर काहे करता है। और जव मेरी आंख खुली तो लगा जैसे सच में भानो आई थी।" "सपनों में मैं कई अनदेखी जगहों पर चलती रहती हूं। एक वार समुद्र की तह में उगे किसी शहर में अपने किसी परिचित को मिलकर आई। एक वार पहाड़ की किसी गुफा में किसी सदियों पहले के ऋपि को नमस्कार कर वातें कर रही थी। कुछ पूछ रही थी।' "ऐसे सपने और भी लोगों को आते होंगे और कई वार सच्चे सपने भी इसीलिए मुझे लगता है कि सपनों का भी एक संसार है। सचमुच का संसार और कभी-कभी मेरा कोई सपना जब नींद से चलकर दिन के सफेद उजाले भी आ पहुंचता है, मैं हैरान होकर उसकी और ताकती हूं, और इसी त जागते हुए में जो सपने देखती हूं, वे काले अक्षर बन जाते हैं।" ...
फेंकाइस दलीप टिवाणा के सपने पढकर मुझे फासीसी चित्रकार फकाइस का वह सपना अनायास याद आया है जो पाब्लो पिकासो को मिलने से कोई एक वरम पहले उसे आया था, और जो उसने पिकासो को मिलने से कुछ महीने बाद अपनी डायरी में लिखा हुआ सुनाया था : "ऐतिहासिक स्मारक देखने के लिए मैं उस बम में जा रही है, जो यात्रियो को वे स्मारक दिखाती है। एक जगह एक म्यूजियम देखने के लिए हम सब लोग वस मे से उतरते हैं तो वह हमे एक भेडोके वाड़े में ले जाते है। वहा अन्दर बहुत अधेरा है । पर मैं देख सकती है कि अन्दर कोई भेड़ नहीं। हैरान होती है कि वह मुझे वहा क्यो लाए है कि देखती हू कि बाड़े के बिल्कुत बीच मे एक बच्चागाडी पड़ी हुई है। गाडी के अन्दर और बाहर लटकती दोपॅटिंग्स हैं । एक इंगरस की बनाई पोट्रेट, और एक रूसो की छोटी-सी पेण्टिग । एक बच्चागाडी के हैण्डल के साथ लटक रही है, और दूसरी गाडी में पड़ी हुई है।"-और फ्रेंकाइस जब पिकासो से हुए अपने बच्चे के जन्म के समय हस्पताल जाती है तो हैरान होती है-दोनों नसों के वही नाम हैं--एक इगरस और दूसरी मंडम रूसो। पिकासो को भी फेंकाइस का सपना याद आता है और वह फ्लीनिक के मनोविशेपन से भेडों के वार्ड का विश्लेपणी अर्थ पूछता है । डॉक्टर बताता है कि भेड़ों के बाड़े का चिह्न बच्चे की पैदाइदा मे सम्बन्धित है।
गुरदयालसिंह . श्री गुरदयालसिंह पंजाबी को गुप्रसिद्ध उपन्याराकार हैं। इनमें एक याग को अकादमी एवाई गी मिला है। इनके शब्दों में 'सपने ज्यों संसार' चर्णन इस तरह है : "बचपन में आम गाने ऐसे आते थे कि मेरे पीछे विल्ली या बन्दर पड़ गया 1 में चीखता उनके आगे भागता और जाग जाता। कई बार चीख मारकर ही जागता। कई बार.'ऊ-ॐ कारता रहता तो मां जगा देती। मरा उम्र के सपने अब याद नहीं रहे।" "कुछ बड़ा हुमा तो बढे खूबसूरत सपने आने लगे। हमारी एक पड़ोसिन ललगी बहुत खूबसूरत थी । गहीने में पच्चीग दिन उराको या उस सरीखी लड़की को सपने आते रहते। पर जल्दी से व्याह हो गया। गेरी साथिन उस लड़की से कम गुन्दर नहीं थी। अब सपनों में मेरी साथिन भी शामिल होती। पर उसके ज्यादा सपने तब आते, जब वह गायके गई होती। यह रंगीन सपनों की उम्र थी। उनकी रंगीनी में से भी अब कोई रंग बाकी नहीं रहा, जिन्दगी गी गहन धुंध ने गारे सपने सफेद बादलों की तरह अलोप पार दिए हैं।" - "पिछले बीस-पच्चीरा बरा से शायद कोई खूबसूरत रापना नहीं आया होगा बस, इतना-मर याद है कि एक बार जब मैं कसौली (पहाड़ी शहर) रहताथार वहां एक बहुत बगूरत लड़की, मेरी कोठरी ने सागने, एक अच्छे घर में रह ५४ अपने-अपने चार वररा थी। उसके नयन-नक्श और शक्ल-सूरत कभी भी मचमुच के नहीं लगते थे । लगता था कि वह ऐमी स्वप्नपरी थी जिसका रंग-रूप मुझे किसी दूसरे ससार का लगता! उसके सपने मुझे बहुत लम्बे समय तक आते रहे । वह भी अव याद नहीं रहे।" "पर जो सपने मुझे कभी नहीं भूलते, वे ऐसे है जिनका मेरी निजी जिन्दगी से कोई सम्बन्ध नहीं। उनकी याद सदा काटे की तरह चुभती रही है । जब भी चाहूं, उन्हें याद कर सकता हूं। ऐसा एक सपना पहला नॉवल 'मढी का दोबा' लिखते समय आया था। यह सपना एक दिन तब आया जब इस नॉवल का वह काण्ड लिख रहा था जिसमे रौनको और जगसीर कुछ मन की बातें करते हैं, पोछे मे भानी और उसकी साथिर्ने जागो लेकर आती है। रोनकी को गेंद की तरह लुढ़का जाती हैं। सपना कुछ इस तरह था : एक पहाड पर काले भूरे वादलो की परछाइयां फैली हुई है। पहाड़ पर बर्फ जमी हुई है। पर चोटी से नीचे वडे हरियाले पेड़ हैं। फसलें लहलहा रही है। पहाडी पर से एक अधनंगा आदमी कंधे पर हल रसे आ रहा है। एक बैल उसके आगे है, एक पीछे। आगे का बैल सफेद हैं, पीछे का हरा। वह आदमी जोर- जोर से हेक लगा रहा है। वादलो में उसकी आवाज गूज रही है। 'तू कहा जाएगा?' मैं उसके पास जाकर पूछता हू । 'तू क्या करेगा पूछकर ' वह आदमी गुम्सा होकर मेरी ओर घूरता है । मुझे अचानक खयाल आता है, किसी भी काम पर जा रहे आदमी से 'किधर जाना है ?' पूछना बदशगुनी होती है। मैं चुप कर जाता है। वह आदमी पलो-क्षणों मे अलोप हो जाता है । पर उसकी मावाज मुझे सुनाई देती रहती है । जव पहाड की चोटी से नीचे को खतरा देखता हूं तो मफेद कपड़ी वाली एक औरत, सिर पर लस्सी की घडिया और रोटिया रखकर उन- पर दिया जलाए उस हल वाले आदमो के पगचिह्नो पर वढती चली जा रही है। दिये के प्रकाश से चौगिर्द ऐसे उजाला हो गया है जैसे मूरज चढ आया हो। हल वाता आदमी मुझे फिर दिखने लगता है। उसके पास न बैल हैं, न हल । पगडी की जगह अब सिर पर एक कलगी लगी हुई है । उसका कद बहुत लम्बा हो गया है। उसने राजाओं वाले वस्त्र पहने हुए हैं। एक हाथ में तलवार और एक मे ढाल है।
गुरदयालसिंह . श्री गुरदयालसिंह पंजावी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। इनके एक पन्यास को अकादमी एवार्ड भी मिला है। इनके शब्दों में 'सपने ज्यों संसार वर्णन इस तरह है: "बचपन में आम सपने ऐसे आते थे कि मेरे पीछे विल्ली या बन्दर पड़ गया मैं चीखता उनके आगे भागता और जाग जाता। कई वार चीख मारकर ही जागता। कई बार 'ऊ-ॐ करता रहता तो मां जगा देती। इस उम्र के सपने अव याद नहीं रहे।" है। "कुछ बड़ा हुआ तो बड़े खूबसूरत सपने आने लगे। हमारी एक पड़ोसिन लड़की बहुत खूबसूरत थी। महीने में पच्चीस दिन उसके या उस सरीखी लड़की के सपने आते रहते । पर जल्दी से व्याह हो गया। मेरी साथिन उस लड़की से कम सुन्दर नहीं थी। अव सपनों में मेरी साथिन भी शामिल होती। पर उसके ज्यादा सपने तव आते, जब वह मायके गई होती। यह रंगीन सपनों की उन्न थी। उनकी रंगीनी में से भी अब कोई रंग वाकी नहीं रहा, जिन्दगी की गहन धुंध ने सारे सपने सफेद बादलों की तरह अलोप कर दिए हैं।" - "पिछले बीस-पच्चीस वरस से शायद कोई खूबसूरत सपना नहीं आया होगा। बस, इतना-भर याद है कि एक बार जब मैं कसौली (पहाड़ी शहर) रहताथा तो वहां एक बहुत खूबसूरत लड़की, मेरी कोठरी के सामने, एक अच्छे घर में रहती ५४ / अपने-अपने चार बरस थी। उसके नयन-नक्श और मक्ल-सूरत कभी भी मचमुच के नही लगते थे । लगता था कि वह ऐसी स्वप्नपरी थी जिसका रग-रूप मुझे किसी दूसरे संसार का लगता! उसके सपने मुझे बहुत लम्बे समय तक आते रहे । वह भी अब माद नहीं रहे।" "पर जो सपने मुझे कभी नही मूलते, वे ऐसे है जिनका मेरी निजी जिन्दगी से कोई सम्बन्ध नहीं। उनकी याद सदा काटे की तरह चुभती रही है। जब भी चाहूं, उन्हें याद कर सकता है। ऐसा एक सपना पहला नॉवल 'मही का दीवा' लिखते समय आया था । यह सपना एक दिन तब आया जब इस नॉवल का वह काण्ड लिख रहा था जिसमे रोनको और जगसीर कुछ मन की बातें करते हैं, पीछे से भानी और उसकी साथिनें जागो लेकर आती है । रोनकी को गेंद की तरह लुढका जाती हैं। सपना कुछ इस तरह था : एक पहाड़ पर काले भूरे बादलो की परछाइयां फैली हुई है। पहाड पर बर्फ जमी हुई है। पर चोटी से नीचे वडे हरियाले पेड हैं । फमले लहलहा रही हैं। पहाडी पर से एक अधनगा आदमी कधे पर हल रखे आ रहा है। एक बैल उसके आगे है, एक पीछे। आगे का बैल मफेद है, पीछे का हरा। वह आदमी जोर- जोर से हैक लगा रहा है। बादलो मे उसकी आवाज गूज रही है। 'तू कहा जाएगा?' मैं उसके पास जाकर पूछता हूं। 'तू क्या करेगा पूछकर ?' वह आदमी गुस्सा होकर मेरी ओर घूरता है । मुझे अचानक सयाल आता है, किसी भी काम पर जा रहे आदमी से 'किधर जाना है ?' पूछना बदशगुनी होती है। मैं चुप कर जाता हूं। वह आदमी पलो-क्षणों मे अलोप हो जाता है। पर उसकी आवाज़ मुझे सुनाई देती रहती है। जब पहाड़ की चोटी से नीचे को खतरा देखता हू तो सफेद कपड़ी वाली एक औरत, सिर पर लस्सी को घडिया और रोटियां रखकर उन- पर दिया जलाए उस हल वाले आदमी के पगचिह्नो पर बढ़ती चली जा रही है। दिये के प्रकाश से चौगिर्द ऐसे उजाला हो गया है जैसे मूरज वढ आया हो। हल वाला आदमी मुझे फिर दिसने लगता है। उसके पास न बैल है, न हल । पगडी को जगह अव सिर पर एक कलगी लगी हुई है । उसका कद बहुत लम्बा हो गया है। उसने राजाओं वाले वस्त्र पर्ने हुए हैं। एक हाथ में तलवार और एक मे ढाल है।
--- - और अचानक आसमान में विजली कड़कती है। पलों में बुआंधार मेंह वरसने लगता है । ओले भी पड़ते हैं, तूफान आता है। सारे पेड़ जड़ ने उसड़ जाते हैं। उस सफेद कपड़ों वाली औरत के निर पर खा दिया बुझ जाता है; पर इस अंचे तूफान में भी उस दिये सरीखी किनी और चीज़ का प्रकाश इर्द- गिर्द को प्रकाशित किए जाता है। मुझे सब कुछ दिख रहा है। बडोल-शान्त उजी जारत भी और राजा सरीखा वह हल वाला आदमी भी "फिर अचानक सब कुछ बदल जाता है। एक वीरान, खंडहरों की वादी में वे दोनों जने मुझे फिर नजर जाते हैं। औरत के कपड़े अब मैले हो गए हैं । उसका परियों सरीखा रूप ढल गया है। हल वाला नादमी बूढ़ा होकर झुक गया है। उसके सिर पर कलगी की जगह अब मैली फटी पगड़ी है । वे दोनों कुछ बातें करते हैं। फिर यूं ही अचानक अलोप हो जाते हैं । इस उजाड़ बियाबान में अब सिर्फ दिय का प्रकाश वाकी है। सारे खंडहर चमक रहे हैं-यूरज सरीखे दिये के प्रकाशने। नीर इस बार वह औरत और मर्द आसमान में उड़ते नजर आते हैं। मैं नज़र टिकाकर उनकी ओर देखता रहता हूं। वे धीरे-धीरे दो छोटे-छोटे तारों की तरह दिखने लगते हैं। एक बार फिर घोर अंधियारा छा जाता है । मुझे अपना दिल डूबना-सा लगता है । जब जागता हूं तो शरीर पनीने से भीगा हुआ होता है। आधी रात पीछे नींद नहीं माती । कई दिन और कई रात इस सपने में देखे दृश्य से मेरा मन पता नहीं क्यों वडा वेत्रन रहा। इस सपने में कोई ऐसी अजीव या भयानक घटना नहीं घटी थी। पर आज तक वह नहीं भूलता। पता नहीं इसका सम्बन्ध मेरी मानसिक स्थिति ने था या मेरी क्रियात्मक दशा ले। पर कभी-कभी लगता है कि सांसा- रिक जीवन और सपनों का सम्बन्ध कहीं न कहीं ऐसी जगह जा मिलता है, जिनकी सीमा हमारी बौद्धिक शक्तियों को पकड़ से कहीं दूर होती है।" m
गोविन्द मिथ
दिमीने ममय को अपने पलंग के पाये ने दाया था-यह वार्ता हमारे
निवहाम का हिम्ना है, हमारी जिन्दगी के किमी अनुभव को हरीकन नहीं। पर
किमरे मपने हैं, जो रातो को इसके जादू का जाल हमारी आंयों के आगे नहीं
विद्या जाते ! हिन्दी के मायराना स्वभाव वाले पर गंभीर चिन्तन के मेगरः
गोविन्द मिश्र ने अपने सपनों की बात करते हुए इस पहलू को विशेष तौर पर
सामने रखा है :
"मेरे मपने ! इस नाम से कोई चीज़ उठकर मामने नहीं भूलती। बाय
"नहीं याद पड़ता कि बचपन में कुछ देखे थे "हा, पलारारों के मार होना
शुरू में ही अच्छा लगता या।
दरअसल, यह मेरी उन दुन्दुरी उमीन की ही कामात है कि काले
कभी नहीं देगे। जो मुलायम-मुलापन सगम समय मौजीने सोनिरंद ...
उन्हें तो खूब रन ले-लेकर जीता यावन रिमी नहीं देनदा याद
इसीलिए कवि न होकर गद्यकार बना।
आज भी मेरे सपने कोई नहीं है. दोन्ट मानेर बन्द
""उन्हें मपना कम रहूं। मैंनो जर्मन ई,
शिमोडल
रेगनी छिड़काव कर गुजर वाद है. यही देनदारिरहन्छ।
मुझे घून में गिरावट नहीं है ?
जिन्दगी को नहीं दहादा,विन्दनी"37.
पहचानने, मनझने की वर बंद नाना ,
मैं उनके पीछे इसलिए भागता हूं." रात की बड़ी जीवन्त दुनिया देखता हूं कि एक पूरे का पूरा उपन्यास मेरे द्वारा लिखा जा रहा है।"उसका सारा कायाकल्प अपनी पूरी बारीकी में, निहायत सफाई से खुलता जाता है एकदम चुस्त-दुरुस्त चीज़, कथा के सारे आयाम अपनी विराटता में। यह वही चीज होती है जो लिखे जाने के ठीक पहले पूरे जीव को मथती रहती है. 'यथार्थ से स्ट्रक्चर्ड रियलिटी की उठती-वनती सीमाएं, फार्म को लेकर कशमकश और सबसे ऊपर वह वेदना, छटपटाहट." कहीं कोई रास्ता नहीं दिखाता कि फिर सपने में सब कुछ खुल जाता है, भड़ाक . से। ... जागता हूं तो सब कुछ फिर फिसल जाता है। जैसे जिन्दगी जिई जाकर भी परायी रहती है। अगर ठीक सपने जैसा ही उपन्यास लिख जाता तो दुनिया की एक बड़ी कृति बन जाती मगर कुछ भी याद नहीं रहता, सिर्फ बड़ी ही मोटी-मोटी बातें याद रहती हैं जो लिखी जाकर और भी बासी हो जाती हैं। फिर भी सचेतन से बहुत ही ज्यादा ताज़ा। मैं इनका खूब इस्तेमाल करता हूं... जो कुछ जितना भी हाथ आ सके। सपना टूट जाता है तो उठकर बटोरने बैठ जाता हूं..'कभी लिखने के दौरान जब कहीं से कुछ रास्ता दिखाई नहीं देता तो यह सोचता हुआ सो जाता हूं कि शायद सपने में कुछ हो जाए. कोई जरूरी नहीं कि सपने सोने पर ही आते हों.."जागने और सोने के वीच की जो अर्द्धमूछित-सी स्थिति होती है उसमें भी आते हैं "जीवन में टॉर्च की तरह सीधी रोशनी फेंककर चीजों को साफ करते हुए.''चीजें जो यों ही वहुत पेचीदा होती हैं और जिन्हें हमारे पेचीदा व्यक्तित्व और भी पेचीदा बना डालते हैं। कितने दिनों से विपाद की मन पर जबर्दस्त छाया थी-प्यार की लपेट कसती जा रही है, एक अनुभव किशोरावस्था में हुआ था, जला क्या, अच्छा-खासा भूना था उसने सोचता था कि चलो अपने हिस्से का ज्वार और खार दोनों ही उस उम्र में ऊपर से गुजर गए जब वहुत कुछ कुचले जाकर भी जिन्दा रह लेने की कूवत थी और रहे भी आए लेकिन अव क्या गीदड़ को फिर मौत आई है कि शहर की तरफ भाग रहा है ?अजीव हैरत हुई, यह महसूस करके कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती. ठीक पहले जैसा ही 'चांदनी से झरती हुई मिठास, अपनी आभा से सारी दुनिया आलोकित करती हुई 'एक ५८/ अपने-अपने चार बरस व्यक्ति में उठती हुई खुशबू सारी दुनिया को महकाती हुई."उससे सटकर सड़े होते ही देवत्व की सरहदो तक उठ जाना" मेरा जागता हुआ आदमी कहता था कि इस भागती, तरक्कीपसंद दुनिया के चतुर व्यक्ति के पाम प्यार को बेवकूफी के लिए समय है क्या ? प्यार की आंच से मंतुलित व्यक्ति क्या बिखर नही जाएगा वह सिर्फ सम्बन्ध रखता है, अपने मामाजिक जीवन को रंगारग रखने के लिए। सफल व्यक्ति बने रहने के लिए खुद को आदमियो, सम्बन्धों और चीजों के ऊपर रखना है...चतुर जो है ! जब कि प्यार में तो नीचे जाना पडता है, चतुराई और दिमागदारी के । दुनिया तुम्हारा उल्लू बना रही है... .."अब की बार ऐसे झुलसोगे कि फिर कुछ भी नहीं बचेगा."निस्शेप ! कि तभी एक दिन सपने में सब कुछ माफ हो गया. पीली साडी में लिपटी एक मफेद धुली हुई मूर्ति मुझे अपनी गोद में लिटाए थी, ऊबड़-खाबड़ जिन्दगी को भी संवरने का सुख देती हुई। दो चीज़ो पर कौघाती हुई रोशनी पडी और वे सपने के बाद भी मुझे याद रह गई.."साहित्यकार को कुछ नहीं मिलता.. लगातार जलते जीवन की मिठास ऐसे ही मिलती है. “सरस्वती इसी तरह कोई आधुनिक मल बन इस सुलगती कौम को बीच-बीच में आकर वह जीवन्तता दे जाती है जिसके बगैर साहित्य रचना तो दूर, उसमें विश्वास ही रख पाना मुश्किल होता है। दूसरे, लगा कि अगर हम यह जानते हैं कि मर तो जाना ही है, तो पहले ही क्यों नहीं आत्महत्या कर लेते "तीप्यार में जलने का डर क्या है. हैरानी होती रही कि इतनी मोटी बात सपने में जाकर मूझती थी ! यह मेरा गद्यकार था जो इस मवपर हंसता है और कहा है कि तुम्हारे हाथ में न तो लपेट को कमना है और न उसने बचना। तुम तो वहीं करोगे, जो जिन्दगी तुमसे कराएगी."मिफं. उसी मंझधार पर बहते रह मक्ने हो। जिन्दगी का दुर्भाग्य कि हम मिर्फ आग हो यागे जाते हैं. यतीन में टीक वैम ही फिर में उतरने की कोशिश करो तो इतना बीद समता है कि वृदही अवकचाकर भाग खड़े होते हैं। एक सपने में ही यह नंभव है किहमान नाय- साथ ममय को भी लपेटकर पादेले जा मरते हैं और दम दरह अद्रीत कोहू. वह पहले जैसा जी लेते हैं, अक्सर आज और आने वाले कल का घोल भी तरह- तरह में मिलाकर "प्राहा का होटल इण्टरनेसनल "मंजिल के कमरे मोदिन्दनिया सामने के पहाड़ी जैसे इलाके के दरख्त खूब दिखते हैं। पिछली रात की वारिश से धुले दरख्त खिड़की से उन्हें तकता हुआ मैं अपनी पहचान बैठाने में लगा हुआ हूं"लगता है जैसे मेरे साथ कुछ मरने जैसी चीज़ हुई थी पिछली रात । सिर्फ सपना नहीं था वह, बाकायदे उस दुनिया में जाकर रहाथा"रहकर आया था. अभी भी लौट रहा था धीरे-धीरे.. मैंने देखा कि मुझे जर्मनी जाना है (जिस ट्रिप पर मैं निकला भी हूं), इलाहाबाद में उसे खवर देकर, मिल-मिलाकर बांदा आ जाता हूं अपने मां-बाप से मिलने 'छत पर जाता हूं और उधर अपने छत पर वह है 'इलाहाबाद से मेरे पीछे-पीछे आ गई जैसे अक्सर करती थी.''वही यूनिवर्सिटी का ताज़ा- ताजा जीव. फिर वैसा ही मिलना, वही बातें.. और मन पर विछती वही ताजगी फागुन की रातों के अन्तिम प्रहर चांद वांदा में अब भी वैसा ही होता है "हलका पीला, नम आने वाले इम्तहानों के लिए छटपटाहट वैसे ही उता- रता हुआ'छाती में वाईं तरफ फुरफुरी जो तव तक धुकधुकाती रहती है. जव तक प्रिय से मिल न लो. 'लेकिन हम कहां हैं नून, तेल, रोटी की दौड़ में बूढ़े हो रहे हैं । उसकी अव की सूरत से दर्जनों वार मिला हूं, लेकिन सपनों में जब- जब वह आती है, उन्हीं दिनों की पूरी ताज़गी में। मैं कहां का कलाकार हूं जो कहूं कि उसकी प्रेयसी कभी बूढ़ी नहीं होती. "हां, सपने अलवत्ता उसे बूढ़ा नहीं में होने देंगे। मैं चाहता हूं कि खूब सपने आया करें, आते रहें। सरस्वती कहती है कि तुम खुद पर जरूरत से ज्यादा लिखने लगे हो" ठीक कहती है लेकिन उधर अमृता थीं। चलो, अव लौं नसानी, अब न नसँही! ६० / अपने-अपने चार वरस देवेन्द्र देवेन्द्र पंजाबी का वह कहानीकार है जिसने व्याह तो कहानी क्ला ने किया है, पर इश्क मायरी में और चित्रकला में। उनके पास एक डायरी है, जिसमें कोई तिथि नहीं, कोई वार नहीं, सिर्फ हादने और सपने दर्ज हैं। ये सपने देवेन्द्र की उसी डायरी में से हैं : "उस बूढे ने छ छ:किताबें निकालकर मेरे मामने रख दी और धला खाली करके बोला, 'यह बड़ी कीमती और नायाब पिता हैं, संभालकर रखना।' किताबें वास्तव में वही ही नायाब धी। इमरोज ने शिव को इलस्ट्रेट किया था; एक मफा नज्म, एक तमवीर; एक नग्म, एक तमवीर । चुगताई साहब ने फैज और अमृता को इलस्ट्रेट किया था। दो नम्बर थे, एक 'फनून' का, एक 'नकूम' का और एक पन्द्रह माला 'नागमणि' का वाम बंक, जिममें मेरी कई कहानिया थी। मैंने जेब टटोली-जेब खाली थी। क्तिने पैसे ?' मैंने पूछा, और उदास हो गया। पैसे मैं बाकर फिर ले लूंगा, पर किता मंभालकर, गाना।' उमने ताकीद की और चलता बना। मैंने किताबों को वगल में गया और मोचन नगा, इनको तो दम गहर के गोरगुल में बोलकर देखना भी यवना है । चली किमी हरियाली और एकान्त मे चलकर पटने हैं । मैं दौड़ने लग पड़ा, दोट पड़ा, दौडना-दौड़ता उडने लग पडा । हैरान या, किताबों ने तो मुझे उड़ना भी मिसा दिया। देवेन्द्र/६१ उड़ रहा था। हवा की लहरों में महक थी। नीले आकाश में उड़ान भरते न पहाड़ों की तरफ मुंह कर लिया। ऊपर से ऊपर उड़ता जा रहा था और रहा था कि उड़ना तो आ गया है, अगर उतरना न आया तो क्या होगा? कितावें मेरे हाथ से गिरने को हो रही थीं कि मैं एक ऊंचे पहाड़ की चोटी 7 उतरता हूं। और एक किताव, जिसको मैंने पढ़ा नहीं, जो बड़ी खूबसूरत री बगल में से सरककर नदी में जा गिरती है। मेरा दिल धक् करके रह है। जैसे किताव न हो, मेरी बच्ची हो । राणो का आंसू हो, अमृता की इकी हो, विरदी का खत हो! इमरोज़ की तसवीर हो। जिन्हें मेरे हाथ से ने का कोई हक नहीं। जो गिर पड़ा। मैं उसको झुककर उठाने लगता हूं तो नदी खड्ड बन जाती जिसके किनारे पर दलदल फैल गई है। रुआंसा होकर मैं उस किताव की पर देखता हूं; पानी में पड़ी किताव हंस रही लगती है। पानी के किनारे पर लदल में अनगिनत छोटे-छोटे केकड़े-से रेंगने लग पड़े हैं। मैं आगे बढ़ता हूं तो ह मगरमच्छ बनकर मेरी ओर बढ़ने लग पड़ते हैं। मैं चीखें मारता हुआ वापस कदम उठाता हूं तो वह घाटी जहां हरियाली, खुशबू और नदियां थीं, तपता सहारा बन जाती है, जिसकी नुकीली चट्टानों की पगडण्डी पर मैं चलता जा रहा हूं। आसपास खड्डे ही खड्डे हैं। मैं हर रात इस पगडण्डी पर अकेला चलने लगता हूं.''पता नहीं कव यह सफर खत्म होगा "पिछले दिनों मैं अमृतसर गया तो वागा भी गया था। उस शहर की ओर मुंह करके सजदा गुज़ारने के लिए जहां मेरे बचपन का यार वशीरा है। मेरा भाटी दरवाज़ा है। वे गलियां हैं जहां छुपन-छुपाई और चोर-सिपाही खेलते हुए मैं पहली बार कहानी लिख बैठा था। उस शहर को दूर-दूर से सलाम करने के लिए जिसे फैज़ साहब रोशनियों का शहर कहते हैं। मैंने सलाम करने के बाद इधर-उधर देखा कि कोई देखता तो नहीं। और मैं सीमा पार कर आया । किसीने देखा नहीं, रोका नहीं, टोका नहीं। मेरे साथ अन्धे लोगों का काफिला है। मैं भाटी दरवाज़े आ गया हूं जहां फैज़ साहव हैं, चुगताई साहव हैं, कतील शिफाई हैं, मुनीर नियाज़ी और फखर जमां साहब हैं। नूरजहां और इकवाल ६२ / अपने-अपने चार बरस वानो हैं, जमीला हाशमी और सतनाम महमूद हैं । मशकूर सावरी और हनीफ चौधरी है। मैं सबसे वशीरे का पता पूछता हू, अनवरी आपा का पता पूछता हूं। कोई वोलता ही नहीं । आखिर मैं नशीर चौधरी को कहता हू, 'चौधरी साहब! बशीर कहां है ?' वह कहते हैं, 'साम ले, इतनी दूर ने आया है। वगीरा तो तेरे साथ ही चला गया था। वह मुझे 'सवेरा' के नये अंक दे देते हैं । मैं उनमे अब्दुल रहमान चुगताई साहब का पता पूछता हू, चौधरी साहब, 'इकबाल और चुगताई' वाली बहुमूल्य किताव देकर कहते हैं, 'यह तेरे वास्ते छोड़ गए हैं।' मैं नगर मुहम्मद राशिद माहब को मिलने की तमन्ना जाहिर करता हूं तो वह हसते-हंसते रोने लगते हैं । फिर में कर्नाल शॉप पर जाकर मण्टो साहब से मिलने की तमन्ना जाहिर करता हूं कि उनपर इतने दिनों से कोई कहानी न लिखने का मुकद्दमा क्यों नही चला? सब मुझे घूरने लग पड़ते हैं। कासमी साहब कहते हैं, "मिया, तुम चुप कर जाओ. नहीं तो यहां फिर छुरी-कटारी चलने लग पड़ेंगी । अगर बोलना है तो यहा से चले जाओ...' में वापस लौट रहा हूं-मैंने गोल वाग से गुलाब के फूल तोड़ लिए । कितावो का वण्डल मेरे पास है। वापस जिस सड़क पर लौट रहा हू, वह लोहे की बन गई है। लोहे के संतरियों ने वागे की सीमा पर लोहे के फाटक बन्द कर दिए हैं। और मुझे कहते हैं, 'किनार्वे यहां रख दी। फूलो को कहां ले जा रहे हो? तुम्हारा पासपोर्ट कहां है ? तुम चोर हो, मुजरिम हो !' मेरे पास उनकी किसी भी वात का जवाब नहीं । 'तुम वापस नहीं जा सकते !'कोई कड़कता है, मैं नोमनलंण्ड पर बैठा हूं..." "उस लड़की ने मेरी ओर पीठ कर ली और मेरी मां से कहा, 'यह वन्चा जो मेरे अन्दर पल रहा है, इसका बाप आपका लड़का है।' पर पापाजी कड़के, 'यह सरासर इल्जाम है।' एक औरत ने पहली बार इल्जाम लगाया। मैं मुल्जिम न होते हुए भी मुनकिरन हो सका । 'अगर यह कहती है तो मैं इल्जाम कबूल करता हूं।' राणी (भरी वीवी) चुप हो गई। वह चाहती थी कि मैं उनके सपने को वल ने बचाने के लिए ही मुनकिर हो जाऊं। रागो का दिल टूट गया। यह देते।
गुनाह मैंने किया और उस रात मैं आंखों जैसे पवित्र मन्दिर में गुनाह वस्शवाने के लिए चला गया। जव दरवार में पहुंचा तो आरती हो रही थी। मैंने अपने पैरों की ओर देखा तो लगा कि मैं तो जूतों समेत इस मन्दिर में आ गया हूं। सब लोगों के पैर नंगे थे और मैंने बूट पहने हुए थे। काश! यह सपना हो, सब न हो । काश! कोई मेरे पैरों की ओर न देखे । पता नहीं मैं किसके आगे गिड़गिड़ा रहा हूं ! जूते उतारकर मैं उन्हें कपड़ों में छुपाने के बारे में सोच रहा हूं। अव पूरी भीड़ की नजरें मेरे पैरों पर आ पड़ती हैं । मैं क्या कर सकता हूं। मैं भाग भी नहीं सकता। इन पैरों को काटकर फेंक भी नहीं सकता। पूरा मजमा मेरा दुश्मन है । और मैं वेबस हूं... वताओ यारो, तुम क्या करते? वताओ यारो, इस तरह के सपने क्यों आते हैं ? और वार-बार क्यों आते हैं ? ये सपने नहीं बारसोज के वेतिर-पैर के ठोस बुत" जिनको डायरी में लिखना पड़ता है, जिसमें तिथि और वार वजित हैं.... ६४ / अपने-अपने चार वरस हरकिशनलाल श्री हरकिशनलाल पंजाब के वह चित्रकार हैं, जिनके चित्रो की नुमाइशें भारत से बाहर भी कोई पन्द्रह देशो में हो चुकी हैं। उनके इस वक्त दो स्टूडियो हैं; एक बम्बई मे, एक लदन मे । उनके साथ उनके सपनों की बात कर रही थी कि अचानक उनके मुह मे निकला, "पता नही क्यो पर सपने में मैं सीढिया उत- रने से बड़ा घबराता हू।" मैंने हसकर कहा, "शायद आप अपने अचेतन मन को देखने में घबराते हों-सीढ़ियां उतरकर, जो मकान के निचले हिस्से होते हैं, वे जुग के कथनानुसार अचेतन मन की गहराइयां होती हैं-अंधियारी..." वह भी हंस दिए, कहने लगे, "शायद..." और उन्होंने जो अपने सपने सुनाए, वे "एक रात सपने में फैज़ अहमद फैज मुझे अपनी गजल सुनाते रहे, मैं हर शेर पर दाद देता रहा। जागा तो वही शेर मेरे होठो पर था, जिसकी मैं उम वक्त दाद दे रहा था। विलकुल याद था, पर उसी वक्त फिर नीद आ गई, और जब जागा, वह शेर भूल चुका था । पर दूसरी रात फिर मपने में फैज साहब ने एक गजल सुनाई, कहा, 'हरकिशन ! एक और गज़ल लिखी है, 'वह सुन ।' फिर तीमरी रात भी सपने में उन्होंने एक गीत मुनाया। मैं उन्हें कह रहा हूं, 'इस गीत को रात में कंपोज़ करना चाहिए।' उस रात सपने मे मैं उस मकान में बैठा हुआ था, जहा कभी फिरोजपुर में मैं छोटी उम्र में रहा था। देखा-वहा, उस मकान में एक गाने वाली भी बैठी हुई है, पाम ही तवला और सारंगी भी हैं। तबले वाला जव तवला शुरू करता है तो बोल का सम नहीं पकड़ हरकिशनलात/६५ वोल सोलह माना के हैं, पर अजीव नये ताल में तर्ज बनी है जो न तीन ताल में न एक ताल में। मैं तवले वाले को ताल समझाता हूं, फैज़ साहब भी ताल के वोल वता-बताकर समझा रहे हैं-अजीव सपना था। मुझे आज तक पता नहीं लगा कि फैज़ साह्न लगातार तीन रातें मेरे सपने में आकर मुझे कैसे अपनी गजलें और गीत सुनाते रहे।" "मैं खुद भी कई वार सपने में नज्म लिखता हूं। उनींदी-सी हालत में कई बार पंक्तियां कागज़ पर उतार लेता हूं, पर जब पूरी तरह जागता हूं, देखता हूं, जो कागज पर लिखा था, वह पूरा पढ़ा नहीं जा रहा है। कोई-कोई लफ्ज पढ़ा भी जाता है, पर पूरा कुछ भी पढ़ा नहीं जाता। कागज़ पर अजीव लकीरों का नक्शा-सा बना हुआ होता है।" . - "मेरे वाप की मौत आज से २४ वरस पहले हुई थी। और मां की आज से तीन वरस पहले। अपने बाप का पूरे इक्कीस वरस तक मुझे कभी सपना नहीं आया था । पर जब से मां की मौत हुई है, अब दोनों के बहुत सपने आते हैं । सिर्फ उनके नहीं, बल्कि उनसे भी पहली पीढ़ी वालों के । पुराने घरों के भी। दूर-पास के रिश्तेदारों के भी। कई वे लोग जो सुने-सुनाए थे, अव सपनों में रिश्तेदार लगते हैं।" "कई बार सपने में मुझे सारे लोग अलग-अलग रंगों के दिखाई देते हैं। यह नहीं कि उन्होंने रंगदार कपड़े पहने हुए हैं, उनके बदन भी जैसे अलग-अलग रंगों के बने हुए हों..." "मुझे तीर्थो के बड़े सपने आते हैं । उन तीर्थों के जिन्हें मैंने जिन्दगी में देखा नहीं। कभी-कभी एक तीर्थ कई बार दिखता है । वम्बई तीन बत्ती के पास कोई नदी नहीं, पर सपने में मुझे वहां एक नदी दिखती है। और उसके किनारे पर बना हुआ एक छोटा-सा घर होता है, दो मंजिला, साधारण-सा, पर मुझे पता होता है कि वह मकान मेरा है। मकान में दाखिल होता हूं, देखता हूं, यहां में - ६६ / अपने-अपने चार वरस अपना सामान छोड़ गया था, वह कहां गया? वहां अब मेरा छोड़ा हुआ सामान नहीं मिलता..." "मुझे सपने में अक्सर एक मन्दिर दिखता है, जिसके चारों ओर अजन्ता और एलोरा की मूर्तियों की तरह मूतिया दिखती हैं। उनके बीचोंबीच आंगन में एक तालाव है, जिसमे मैं अक्सर नहाने के लिए जाता हूं।" "एक वार सपना आया कि मैं नहाकर मन्दिर के पिछवाडे वाली राह से पिछले जंगल में चला गया। वहा शीशे के बक्सों में सुनहरी मछलिया हैं। जगल के पेड़-पौधे वडे ही खूबसूरत हैं । मैं मछलिया देख रहा था कि मेरे पास राजा का बजीर आया। सपने में मुझे काल का पता नही, पर कोई ऐसा काल है जब किसी राजा का राज है। वह वजीर मुझरो आकर कहने लगा कि मैं तुझे ही ढूढ रहा था। देख! राजा को एक बहिश्त बनवाना है जिसकी सारी रचना तुझे बनाकर देनी है। बहिश्त का नक्शा भी। मैं कहता हूं, 'पर वह नक्शा अपनी मर्जी से बनाऊगा।' वह मान जाता है और मुझे साथ लेकर राजा के महल की ओर चल पड़ता है । आगे जाकर पूरा महल तो नहीं दिखता पर उसका दरवाजा दिखता है । वह कहता है, 'तू यहा बाहर खडा रह । मैं राजा को सूचना दे आऊँ।' मैं जब वहां अकेला खड़ा हूं, देखता हूं, राजा महल के अन्दर से निकलता है, उस दर- वाजे मे मे, जहा शीशे की लड़ियो का पर्दा लगा हुआ है । राजा के गले में लम्बा चोगा है। बनारसी रेशम का। पर देखता हूं—आसपास से कई लोग सामने आ जाते हैं, और राजा को सलाम करके उनके इर्द-गिर्द खड़े हो जाते हैं । वजीर भी वहां है। मुझे राजा के पास ले जाना चाहता है, पर राजा के गिर्द एक भीड़ इकट्ठी हो गई है । और राजा उन लोगों समेत फिर महल के अन्दर चला जाता है। मैं जब फिर अकेला खड़ा हो जाता हूं तो एक बड़ी खूबसूरत, वुत सरीखी तराशी हुई लड़की मेरे पास आती है, कहती है, 'मैं राजा की नर्तकी हूं। राजा को फुसंत नहीं, चल मैं तुझे अपना नाच दिखाऊँ। मैं उसके साथ चल पड़ता हूं, और देखता हूं, एक तरफ कोई मेला-सा लगा हुआ है, जहा लोग कही कव्वाली गा रहे हैं, कही नाव कर रहे हैं। पर देखता हूं, एक जगह हुक्कों में अफीम पी रहे लोग वेसुध-से पड़े हुए हैं। पास जाकर देखता हूं-चे लकड़ी के शिकंजे में वि ला . 7 हुए हैं और उनके बदन भिचे हुए हैं। यही डरावने दृश्य वड़ बता हूं-यह तो दोजख है, मुझे किसी तरह यहां से दौड़ जाना चाहिए। हां से दौड़ता हूं तो आगे जाकर देखता हूं-एक जगह बड़े-बड़े मन्दिर बने ए हैं--कोई वौद्ध मन्दिर, कोई सीरियन, कोई इजिप्शियन तरह का, कोई यूनानी, कोई हिन्दू मन्दिर । मैं हैरान-सा खड़ा ही रह जाता हूं। सोचता हूं- यह वहिश्त है। साथ ही सोचता हूं-मेरे लिए किस मन्दिर में हिफाजत होगी? एक मन्दिर ऊंची जगह पर बना दिखता है, जिसके थड़े को हाथ डालकर मैं ऊपर चढ़ना चाहता हूं, पर देखताहूं-मन्दिर के पहरे पर खड़े लोग मेरी ओर भाले लेकर दौड़ते हैं, मुझे मारने के लिए। मैं वहां से दौड़ पड़ता हूं। देखता हूं, वह नर्तकी भी मेरे पीछे-पीछे आ रही है। फिर एक जगह एक पग- डण्डी नीचे की ओर जाती दिखती है, मुझे लगता है-इस पगडण्डी पर जाने से मैं बच जाऊंगा। जब उस पगडण्डी पर दौड़ता हूं तो नीचे सामने हरी घास का मैदान दिखता है । वहां एक नदी भी दिखती है। जहां कुछ औरतें कपड़े धो रही हैं । पास घास पर कुछ बच्चे खेल रहे हैं। मुझे सुख की सांस आती है कि अव मैं वच गया हूं। वह नर्तकी भी मेरे पीछे-पीछे आ रही है, मेरे पास अ जाती है और मैं उसको भी कहता हूं-'अब हम वच गए हैं। और देखता हूं- राजा की उस नर्तकी के गले में पहने वे रेशमी कीमती कपड़े सादी सूती धौ में बदल गए हैं..." ने चार वरस वणजारा वेदी श्री वणजारा वेदी पंजाबी के वह विद्वान हैं, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी लोक- साहित्य के लेखे लगा दी है। वह १९५० से बराबर यह सोज का काम कर रहे हैं। लोककथाओं के बारे में उनके पांच संग्रह छप चुके हैं। एक आठ सौ पृष्ठों का 'पंजाब का लोकसाहित्य' उनका अन्य बडा कीमती है। अब 'लोकधारा विश्वकोश' दम जिल्दो में छप रहा है। लोकोक्तियो और मुहावरों के विपर पर भी उनकी एक पुस्तक है 'लोक आखदे हन' और उनके शब्दो में "जब मुझे कोई लोकोक्ति मिलती है, ऐसा लगता है जैसे अपना ही खोया हुआ बच्चा मिल गया है।" सपनों के बारे में हमारी सभ्यता का दृष्टिकोण क्या रहा है, इन पक्ष से उनकी खोज के कुछ हिस्से मैं उनके छप रहे विश्वकोश में से लेकर यहां दर्ज कर रही हूं। "मपनों के बारे में बड़े रोचक विश्वाम, मान्यताएं और वहम भ्रम प्रचलित है। आदि मानव सपनों को आत्मा के भ्रमण से जोड़ता रहा है। प्राचीन धारणा यह रही है कि प्राणी जब रात को सोता है, तो उसकी आत्मा देह को त्यागकर भ्रमण करने को चली जाती है। और जिन-जिन जगहों पर मात्मा घूमती है, जो-जो दृश्य देखती है, वही मपने का रूप धारते हैं। इसलिए सोए हुए मनुष्य को झटके से जगाना ठीक नहीं समझा जाता, कि हो सकता है, उसकी आत्मा यद्भुत दूर गई हुई हो, जहा से जल्दी लोटना मुश्किल हो, इमलिए वेरूहे प्राणी को जागने से मकट की हालत पैदा हो सकती है। इस संकल्प-संवन्धो कई कथा-कहानियां मिलती हैं । यह मंकल्प वृहदारण्यक उपनिषद् में भी मिलता है। वणजारा बेदी मानों की धारणा है कि अच्छे सपने अल्ला की तरफ से आते है, की तरफ से, इसलिए अच्छे सपने एक तरह से भविष्यवाणी होते हैं, शतान की धमकियां। जब किसीको बुरा सपना आए तो उसे जागते वार अपने वायें कंधे के ऊपर से थूकना चाहिए और शैतान से रक्षा के ल्लाह से तीन बार पनाह मांगनी चाहिए। और जिस करवट लेटे रहने ह सपना आया हो, वह करवट बदलकर दूसरी करवट से लेटना चाहिए। न में मूरत यूसुफ आयत (३६, ३७, १०२) में सपनों के फल का जिक्र ता है। सिक्ख धर्म के अनुसार सपने मन की माया होते हैं । इनका शुभ या अशुभ ल कोई नहीं। प्राचीन हिन्दू धर्मग्रन्थों में सपनों के शुभ-अशुभ फल का जिक्र मिलता है। ऋग्वेद और अथर्ववेद की कई ऋचाओं में बुरे सपने की तुलना दुख-दारिद्र्य और संकट से की गई है । और उससे मुक्त होने के उपाय भी बताए गए हैं। अथर्व- वेद के ३३वें परिशिष्ट में कुछ ऐसी ऋचाओं की सूची है जो बुरे सपनों के मन्द प्रभाव को नष्ट करने के लिए पढ़नी जरूरी हैं। यह भी कि किसीको कुरा सपना आया हो तो उसे व्रत रखना चाहिए, और खीर बनाकर ब्राह्मणों को खिलानी चाहिए । गृह्यसूत्र में भी बुरे सपनों के प्रभाव से बचने के लिए कई उपाय बताए गए हैं, जिनमें बकरों की बलि का भी विधान है। ऋग्वेद (८, ४७, १५) के अनुसार सपने में गहना गढ़वाना या फूलों का हार गूंथना शुभ है। उपनिषद के अनुसार यज्ञ के दिनों में यदि यज्ञ करवाने वाले को रात को सपने में औरत दिखे तो यज्ञ सफल होता है, और कामना पूरी होती है। आरण्यक उपनिषद् के अनुसार जो कोई इंसान सपने में कोई काले दां वाला आदमी देखे, या सुअर उसके ऊपर हमला करे, या वन्दर उसके ऊपर उह कर आए या तूफान-अंधेरी उसे उड़ाकर ले जाए या वह सोना निगल जाप लाल फूलों की माला पहने, तो सपने मौत के संकेत होते हैं। पंजाबी लोगों की सपनों के बारे में अलग तरह की मान्यताएं हैं। है कि सवेरे का सपना हमेशा सच्चा होता है। रात के पहले पहर क निरर्थक होता है। दूसरे या तीसरे पहर में देखा सपना उलटा होता आपने-अपने चार बरस दोपहर के समय देते सपने का कोई शुभ या अशुभ फल नहीं होता। यह भी कि अच्छा सपना किसीको सुनाना उचित नहीं, क्योंकि उसका फल दूमरे से बांटा जाता है। इसी तरह बुरा सपना किसीसे सुनना उचित नहीं, क्योंकि उसका अशुभ फल सुनने वाले को भी मिल जाएगा." सपने मे हरी या मफेद रंग की वस्तु देखनी, या पानी का प्रवाह देखना शुभ होता है, पर काली या लाल रंग की चीज़ या आग जलती देखना अशुभ ममझ जाता है। मपने में माप दिखाई दे तो इसका भाव है कि कोई मन्नत मानकर पूरी नहीं की गई। सपने मे नाच-रंग देखना भी किसी दुख-संकट की चेतावनी समझी जाती है । इसके विपरीत गम, दुःस और मुमीवतें देखना शुभ है, जिसका भाव यह लिया जाता है कि दुख भोग लिए गए। मपने में तावे या लोहे के सिक्के मिले तो वे भी अशुभ होते हैं, किसी आने वाली बीमारी के सूचक । हफ्ते में अगर मरे हुए बड़े-बूढों से मिलाप हो जाए, तो पुण्य-पाठ कराया जाता है। सोचा जाता है कि उनकी गति नहीं हुई, उनकी रूहें भटक रही हैं। हां, अगर मरा हुआ प्राणी कुछ दे जाए तो शुभ ममझा जाता है, धन-दौलत की बढ़ोतरी । पर अगर वह सपने मे कुछ ले जाए तो घर मे धन का घाटा हो जाएगा। इसी प्रकार अगर सपने में कोई जीवित व्यक्ति मर जाए तो उसकी उम्र लम्बी समझी जाती है, पर अगर सपने में व्याह देखें तो वह किसी संकट की सूचना मानी जाती है। सपने मे हाथी देखने का भाव है कि गणेश देवता किमी कारण से रुष्ट है, मो दिन में उसकी पूजा की जाती है, उसे खुश करने के लिए। सपने में पानी देखना शुभ है, पर यदि नदी पार करनी पडे तो किसी मुशिल मे से गुजरने का सकेत। हां, नदी पार करके दूसरे किनारे पर लग जाए तो किसी मुश्किल से या लम्बी बीमारी से छुटकारे का सकेत समझा जाता है। सपने में कोई अपने-आपको ऊंट, गधे या बैल पर सवार देखे तो वह उसकी जल्दी मौत का संकेत समझा जाता है। इसी तरह अगर वह कोई फल तोड़ने के लिए पेड़ पर चढे तो यह भी मौत की सूचना होती है। क्योंकि मरे हुए इंसान के फूल (हड्डियां) नदी प्रवाह से पहले कहीं पेड़ पर टागकर रखे जाते हैं. वणजारा सपने में कच्चे मांस की बोटियां देखना किसी आने वाले भारी रोग की सूचक होती हैं । सूखा तालाव देखना भी किसी आने वाली भूख-नंग का संकेत होता है । पहाड़ की चोटी पर चढ़ना तरक्की का सूचक, और चोटी से गिरना असफलता का सूचक । अगर कोई सपने में अपने-आपको जेलखाने में देखे तो वह उच्च अधिकारी बनता है । अगर फांसी लगता हुआ देखे तो जल्दी बादशाह बन जाता है। सपने में कोई सड़क दिखाई दे तो वह लम्बे सफर की सूचक होती है, पर. राह में राख, हड्डियां या कांटे देखना शुभ नहीं है। सपनों द्वारा कई दवे खजानों की सूचना भी मिलती है। सिक्ख गुरुओं से सम्बन्धित कई वावड़ियां थीं जो मीर मन्नु के ज़माने में बन्द कर दी गई थीं । उनका पता सपनों के द्वारा मिला बताया जाता है। महाराज रणजीतसिंह ने सपने में देखा था कि कोई आदमी कह रहा था, 'सुनहरी मस्जिद के पास बाजार के नीचे गुरु की वावड़ी दवी हुई है। सुबह महाराजा ने धरती खुदवाई तो नीचे वावड़ी बरामद हुई। इसी तरह अम्बाला शहर की बावड़ी का भी सपने के द्वारा पता लगा था, जहां देश के बंटवारे के बाद गुरुद्वारा बनाया गया है। यह भी माना जाता है कि रात दूध पीकर सोने से बुरे सपने आते हैं, और इसके विपरीत फल खाकर सोने से अच्छे सपने आते है।" . प्राचीन मान्यताओं को हवाले के तौर पर रखने के लिए मैंने श्री वणजारा वेदी की मदद से ये कुछ सफे इस किताब में दर्ज किए हैं, पर इनके सोच-विचार में पड़ना इस किताब का ध्येय नहीं। हां, श्री वणजारा वेदी की वरसों की खोज के समय लोककथाओं और लोकधारणाओं का उनके अपने सपनों पर क्या असर हुना, इसमें मेरी दिलचस्पी ज़रूर है; और उन्होंने अपने निजी सपने ये वताए हैं: "यह सपना मेरी चढ़ती जवानी का है। तव मेरी मानसिक स्थिति आम जवानों से अलग थी। घर के गुर सिक्खी प्रभाव के नीचे नियम से पाठ करना जरूरी था, जिस कारण मुझमें धार्मिक रुचियां बड़ी बलवान थीं, पर उन्हीं दिनों में मैंने कुछ ऐसी पुस्तकें पढ़ी जिनके कारण मेरे मन में निवृत्ति-भावना बड़ी प्रवल हो गई। उन्हीं दिनों में नवे पहल्ले के श्लोक दिन में कई वार पड़ता जिनसे ७२/अपने-अपने चार बरस निवृत्ति और त्याग को भावनाएं इतनी गह्न हो गई कि मैंने अपने मन मे निवृत्ति मार्ग को अपनाने का दृढ निश्चय कर लिया। इसी स्थिति में यह सपना आया: मैंने एक बडी रमणीय घाटी देखी जहा एक झरने के किनारे तरह-तरह के खूबसूरत फूल उग रहे थे। पाम ही एक बड़ा प्यारा पर अद्भुत-सा पेड़ देखा। मैं यह अन्तर न जान सका कि यह पेड़ था कि कोई युवती, पर कुछ पलों के बाद ही मुझे पेड को जगह एक वेल सरीखी युवती झूमती दिखाई दी। लगा या कि वह युवती अभी झरने मे से स्नान करके निकली थी। वह अद्धनग्न और आधी ढकी हरे और लाल रंग के कपडे पहले जैसे मुझे अपनी ओर खुला रही हो। पर जैसे उसके रूप-जवानी का मेरे ऊपर कोई असर नहीं हो रहा था। मैं उसको देखकर चौंका और पीछे लौटकर मूखे और वंजर पहाड़ो की तरफ दौड़ पड़ा। वह युवती भी मेरे पीछे दौड़ी। उमने बड़े मधुर स्वर मे मेरा नाम लेकर बुलाया। मीठी ध्वनि फिजा मे गूज गई। मैंने लौटकर देखा। मेरे पैर मन-मन के भारी हो गए और मैं एक भी कदम आगे न उठा सका। उसने मेरी तरफ मुस्कराकर देखा । मैं उनकी तरफ दौडा। पता नहीं, उसने मुझे वाहो मे भर लिया या मैंने, पता नही उसने मेरे होंठ चूमे या मैंने उसके, पर मेरे सारे रोम-रोम मे झनझना- हट-मी छिड़ गई। मुझे ऐसे लगा कि जैसे उस चुम्बन की मिठाम मिश्री की तरह समूचे गरीर में घुल गई हो । अचानक मेरी आख खुल गई। यह उसके होंठों का स्पर्श एक अलौकिक रस बनकर मेरी स्मृति मे कई वरस रचा रहा। यह माना था जिमने अगले दिन मैंने निवृत्ति-मार्ग को अपनाने का दृढ निश्चय त्याग दिया था।" "एक सपना परियों के बारे में है और उन दिनों का है जब मैं अपनी किताव के लिए लोककहानिया एकत्र कर रहा था और अनेक परियां मेरे जीवन में लालमा वनकर फैली हुई थी। तव में जागते हुए भी परियों के सपने लेता था, सोते हुए तो स्वाभाविक ही था। मोता आदमी तो जीता ही सपनों को दुनिया में है। मब परियों में अनारपरी सबमे पारी और हमीन लगी होने के कारण मेरे दिल-दिमाग में छाई हुई थी। अनारपरी को मैंने कई वार दिन में जागते रात के सपनों में आलिंगन किया था। जैसे कि कथा प्रचलित है कि अनारपरी सहजादे को मौत के बाद अदृश्य हो गई थी, कि वह किसी अनार मे ममा गई वणजारा वेदी व भी वह किसी अनार में ही वसती है। छ इसी तरह की मनःस्थिति थी जिसमें यह सपना देखा । मैं जगह-जगह ता उस अनार को ढूंढ़ रहा हूं जिसमें अनारपरी शहजादे की मौत के वाद पी थी। अचानक एक नदी के किनारे एक बड़ा रमणीय वाग दिखाई दिया में वेशुमार अनार के पेड़ थे। मैंने नदी की तरफ देखा कि एक परी जंसी न युवती स्नान कर रही थी । किनारे पर उसके कपड़े पड़े हुए थे। मैं कपड़े काने के लिए दौड़ा, पर वह युवती विजली की तेज़ी से नदी में से निकलकर पड़े लपेटती एक अनार के पेड़ में अलोप हो गई। मैं समझ गया कि यही अनार हज़ादी है। मैं उस पेड़ की तरफ बढ़ा जहां अनारपरी अलोप हुई थी। वहां एक बड़ा सारा अनार लगा देखा। मैं जल्दी से अनार तोड़कर घर की ओर दौड़ा और छत के ऊपर चढ़कर अनार काटा, पर बीच में से छन-छन करती लाल-हरे कपड़े पहने कोई परी न निकली। कोठे के ऊपर मेरी नानीजी भी आ गई। मैंने उनको कहा कि अनार शहज़ादी वाला अनार तो मैं तोड़ लाया हूं, पर इसमें से परी नहीं निकली। केवल झांवला-सा पड़ा है। नानीजी कहने लगीं, 'अरे मूर्ख, तू व्याहा हुआ है। व्याहे हुए मर्द का हाथ लगते ही अनारां अलोप हो जाती है।' मैं शर्मिदा-सा हो गया। अचानक मेरी आंख खुल गई.." सुवह जागकर जव सपना मेरी स्मृति में उभरा तो मैंने अपनी नानीजी को सपना सुनाया। उन्होंने सचमुच बताया कि अनारां शहज़ादी व्याहे वर के हाथ नहीं आती। मुझे बड़ा दुःख हुआ। काश, मैं कुंवारा होता तो कम से कम सपने में तो अनारां को गले लगा सकता..." "लोग कहते हैं, सुबह-सवेरे का सपना हमेशा सच होता है। शायद इस कि सुबह के समय की निर्मल-निश्छल फिजा में सपनों का सृजनहार भी पा नहीं रचना चाहता। एक सपना जो दिन में सच हुआ उसका वर्णन करता हूं मैं एक मासिक पत्रिका का सम्पादक था। एक तो पैसे बहुत थोड़े मिलते थे काम बहुत ज्यादा करना पड़ता था, जिस कारण मैं नौकरी छोड़ना तो था, पर कोई और काम-धन्धा न होने के कारण मैं छोड़ने में असमर्थ था कई वार इस्तीफा दे चुका था। जब तक इस्तीफे की मियाद पूरी होती मुझे न कोई धंधा मिलता और न ही अखबार वालों को मुझ-ता सस्त ने अपने चार वरस हाय लगता । फलस्वरूप इस्तीफा अपने-आप रद्द हो जाता। किसीको कुछ कहने-सुनने की जरूरत ही न पड़ती। इसी मानसिक स्थिति में एक सपना आपा: मैं क्या देखता हूं कि मैं जब घर से दफ्तर जा रहा था तो थोड़ी दूर पीछे तेज कदमो से दफ्तर का एक क्लर्क, जो हमारे मकान की दूसरी मंजिल में ही रहता था, आ रहा है। मैं रक गया। हम दोनों अपनी-अपनी खस्ता आर्थिक हालत के बारे में बातें करते दफ्तर पहुच । पर आज दफ्तर बन्द था । हम दोनों दफ्तर के बाहर खड़े वातें करते रहे। पहले दपतर नौ बजे खुल जाता था, पर आज पौने ग्यारह बजे मालिक का लड़का साइकिल पर आया और बिना हमारी ओर देखे, आख चुराता दपतर का दरवाजा खोलकर अन्दर चला गया। उसके पीछे-पीछे हम दोनो अन्दर आए। मालिक के लडके ने मेरी और देखा। उसका गला भर आया और आखो मे बांमू उतर आए। वह कहने लगा, 'वेदी साहब ! मैं बड़े दुखी और भरे हुए दिल से कह रहा हूं कि वाऊजी ने आपका इस्तीफा मजूर कर लिया है, और आज से नये सम्पादक का प्रबन्ध हो गया है। इसीलिए आज से आपकी छुट्टी!' मैंने कहा, 'कोई डर नहीं। तुम मेरा हिसाब चुकता कर दो।' फिर एकदम मेरी आंख खुल गई। मैंने इस सपने को एक साधारण सपना न समझा और जब मैं सुवह घर से दफ्तर जाने लगा तो अपनी पत्नी को यह सपना विस्तार से सुनाते हुए कहा कि आज मैरी नौकरी का अन्तिम दिन है। जब मैं घर से निकलकर सड़क पर आया तो सपने ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। मेरे पीछे-पीछे तेज कदम रखता हमारे दफ्तर का क्लर्क आ रहा है। मैंने मिलते ही उसको अपना सपना सुनारा। हम वातें करते हुए दफ्तर पहुंचे तो दफ्तर का दरवाजा वन्द था । यह क्या वात, आज इतनी देर तक दफ्तर क्यो नहीं खुला? सपना तो ऐन-वैन सच्चा हो रहा है। पूरे पौने ग्यारह बजे मालिक का बड़ा लडका साइक्लि पर सवार वहां आया, और उसने ही दरवाजा खोला। वह मुझसे आंखें चुरा रहा था। मैं जब उसके पीछे-पीछे कमरे में दाखिल हुआ तो मेरी ओर देखते ही उसकी आंखें भर आई। फिर वह भर्राए हुए गले से कुछ कहने ही लगा था कि बात उसके गले में अटक गई। अखिर उसने कह दिया, 'हमने आज नया सम्पादक रख लिया। आपका इस्तीफा मंजूर है।' बाजारातदी।
आविद सुरती गुजरात के मशहूर कलाकार आविद सुरती के हाथों में लेखक का कलम है, चित्रकार का ब्रुश भी। आविद सुरती के कहने के मुताविक "मेरे सपने भी भी रोमाण्टिक नहीं होते" पर अपने जिन सपनों की उन्होंने बात की है, नमें पेड़ की डाल-डाल पर पत्तियों की जगह उंगलियां उग आती हैं, कोई बौंटी सिर पर बड़ी-सी चट्टान लिए चल रही है और कोई लड़की चांदी की -लेट में अपना ही सिर रखे हुए छुरी-कांटे से खा रही है। उनकी कलम से : "पता नहीं यह मेरी खुशकिस्मती है या बदकिस्मती, मेरे सपने कभी भी रोमाण्टिक नहीं रहे। सपनों में मैंने न कभी गोरी-गोरी वर्फ जैसी परियां देखी हैं, न कभी इंद्रधनुपी फूलों से भरी वादियां। न कभी मैंने अपने-आपको लोक- प्रियता के एवरेस्ट पर खड़ा पाया है, न कभी महापुरुपों के चोले में। न कभी किसी 'विश्व सौंदर्य स्पर्धा-विजेता सुंदरी के साथ संसर्ग करते हुए मैंने अपने- आपको सपने में देखा है, न कभी सपनों में मैंने अपने-आपको मुगले-आज़म की तरह हरम में खड़ा पाया है। वचपन में मुझे लॉलीपॉप बहुत ही पसंद थे। और मेरे परिवार की स्थिति ऐसी थी कि महीने में एकाध लॉलीपॉप खरीदना भी मेरे लिए मुश्किल था। कम से कम यह लॉलीपॉप का स्वाव तो भगवान मुझे भेंट दे सकते थे! नहीं दिया। बल्कि एक भी ऐसा सपना मुझे दिखाई नहीं पड़ा जिसे देखकर मेरा जी बहल जाए। अलवत्ता, ऐसा कई वार हुआ है कि किसी कहानी का अंत न मिलने पर ७६ / अपने-अपने चार वरस सोचते-मोचते मेरी आखें मुद जाती हैं और सपने में वह कहानी आगे बढ़कर अंत तक पहुंच जाती है। शायद इमे हम हमारे अजाग्रत् मानस का कार्य कह सकते हैं । तव प्रश्न यह उठता है कि सपने क्या है ? क्या वे भी अजाग्रत् मानस के प्रतिविम्ब नही ? शायद। पर यह शोध का विषय है, मेरा नही । हां, एक बात तय है । करीव-करीव मेरे सारे ख्वाव एक्सर्ड और ऊटपटांग रहे हैं । सपने में मैंने देखा है-आदमी के सिर वाला एक कुत्ता, जो जब भी भौंकता था उसके मुंह से एक छिपकली कूदकर दौड जाती थी। मैंने देखा है-एक समदर को, जिसकी सतह पर से दसो सिर वाला रावण सिर के बल फिसलता हुआ क्षितिज-रेखा की ओर चला जा रहा था। मैंने देखा है-एक नग्न युवती को, जो किमी फाइव स्टार होटल के डाइ- निंग हॉल में छुरी-चम्मच लिए बैठी थी और उसके सामने चादी की प्लेट में उसका अपना ही सिर पड़ा था। मैंने देखा है-एक पेड़ को, जिसकी डाल-डाल पर पत्तियों को जगह उंगलिया उग आई थी। पर एक स्वाद, जो मैं बचपन से लेकर आज तक कई बार देख चुका हूं, वह कुछ और ही है। न जाने क्यो, जागने से पहले मैं एक चोटी को देखता हूं जो अपने सिर पर एक बड़ी-मी चट्टान लिए हुए आगे बढ़ती चली जा रही हो। पहले यह सपना मैं साल में दो-चार बार देखता था। अब दो-चार साल में एक बार देख लेता हूं। जागने पर कई दिनों तक सोचता रहता हूं। यह चींटी कब तक मेरे सपनो में चट्टान उठाए भटकती रहेगी ?" आबिदसुरती/७७ इन्दु जैन - न्दु जैन मन की तीक्ष्णता को बौद्धिक स्तर पर जीने और लिखने वाली न्दी लेखिका हैं जिनके कई सपनों और कई रचनाओं के बीच कोई लकीर सकना उनके लिए भी संभव नहीं रह जाता-मन-मस्तिष्क पिघलकर जान हो जाते हैं। इन्दु जैन की अपनी लेखनी द्वारा सपनों का वर्णन इस र है: "सपने कोई 'यों ही-सी' चीज़ नहीं होते। वे बहुत निजी हैं, मेरे अपने । ऐसे हैं जिन्हें कभी-कभी मैं खुद से कहने में कतरा जाती हूं। वैसे भी, मेरा वश्वास है कि तीन अनुभव का क्षण सच्चा और खरा क्षण होता है। वह जिंदगी में नहीं घटा-सपने में आया-इस वजह से वह कम असल नहीं हो जाता। फर्क ही क्या है दोनों में ? इतना ही न कि जिंदगी में गुज़रे क्षणों का प्रमाण कोई दूसरा भी दे सकता है-'हां, ऐसा तेरे साथ हुआ था। लेकिन मेरे अनुभव की तीव्रता' का प्रमाण कोई दूसरा तो नहीं दे सकता न! जब उसकी गवाह सिर्फ मैं खुद हूं तो फिर सपने और यथार्थ में अन्तर ही कहां रह गया? इसके अलावा, जो भोगा गया वह जिंदगी में आया और चला गया। इसी तरह सपने में उसका आना और बीत जाना है। क्या जीवन में हम उसे पकड़कर बैठा लेते हैं-उसका निरन्तर आस्वाद करते रहते हैं ? जब ऐसा नहीं तो दोनों की अनुभूति एक-से स्तर की, एक-से महत्त्व की ही तो कहलाएगी! मेरे सपने, रातों में देखे हुए सपने, वार-बार मेरी कविताओं में मूर्त हुए हैं। कुछ में मैं अकेली हूं और कुछ में मेरे साथी हैं-शरीके-ख्वाब 'ऐसे जो मेरे ७८ / अपने-अपने चार वरस
सपनों का हिस्सा होने का सपना तक नहीं देख सकते। किसी कविता में डूब
जाना, उसके रचयिता को सपने में निकटस्य कर लेना बोर इस पद्धति से, एक
तरह से, उम कवि को अपने सिस्टम से निकाल देना-यह एक प्रक्रिया है। इस
नरह के सपनों ने कविताएं लिखवाई हैं :
रात एक नया गीत गया था
किमी ने खुद आकर बजाया था
पिघली हुई आग-सा राग या पिलाया था।
और वह साज़दा
देह के कसे तार छेड़ लौट आया जो
चौंक कर पूछ रहा-
"अरे, क्या तेरे किसी सपने में
मैं कभी आया था?'
तुम भी मेरे एक सपने हो
खुले डस्टधिन में
वामी फूलों के लहकते झोंके
नीबू में धुआंती गंध
सांस की किमी खास देसाख कड़ी की तरह
मेरे अपने हो
तुम भी सपने ही मेरे एकः ।
या फिर वह कविता:
कल रात मुझ एक सपना नाया
जिममे तुम थे
सपने में हम तुममे मिले
हम यानी मैं और मेरी छोटी बहन ।
वरसों पहले गमशेर वहादुर सिंह से पहली मुलाकात हुई थी और वह मेरी
एक कविता में एक सपना पडकर चौके थे । चौंककर उन्होंने मुझे पहली बार कवि
के रूप देखा था। उम कविता में एक सही सपना ज्यो का त्यों उतारा गया था:
रन्ट 10r
मुझे एक सपना दिखता है
अक्सर सोते-जगते
और अचानक छोटे-मोटे सपने आकर मिल जाते हैं
एक अकेले अलग खड़े सपने में..."
सपना-१
"एक घना जंगल-सा है। कलसाई हुई हरी वेल-लतरें चढ़ी हुई हैं पेड़ों पर।
गहरा झुरमुट है। मालूम नहीं, मैं उसमें कैसे पहुंच गई हूं। रास्ता नहीं है। फिर
भी मैं बढ़ रही हूं। नीचे काली मिट्टी, ऊपर छतनार ऊदे पेड़ । आसमान नहीं
दिखता। अचानक दिखता है एक मकान का हिस्सा-उन्हीं वेलों से छता।
वीच-बीच में सफेद दीवार झलकती है। उसमें एक खिड़की है। खिड़की में
कोई वैठा है-ठोढ़ी हथेली पर टिकाए । उसका मुख मेरी ओर नहीं है। उसने
अपनी लम्बी गोरी कोहनी चौखट पर टिका रखी है। कोहनी तक की बांह, घूमे
हुए मुख की कोर और गर्दन-बस, यही दिख रहा है। वह स्त्री है या पुरुष ? मैं
अकुला रही हूं, मना रही हूं-'वह पुरुष ही हो, पुरुष ही हो "मुझे दिख जाए
उसका मुख, दिख जाए। मैं देखना चाहती हूं-जरूर-जरूर...' लेकिन उस
व्यक्ति की दुनिया खिड़की के पार, कमरे के अन्दर है। वह मुझसे वेखबर है
मैं जानती हूं-मुख मेरी ओर नहीं घूमेगा। मैं बढ़ रही हूं, बढ़ रही हूं, लेकिन
सफेद कोहनी, सफेद दीवार, खुली खिड़की-सव ज्यों के त्यों उतनी ही
रहते हैं, उतनी ही दूर रहेंगे।
बहुत वेचैन सपना :
और एक पत्तों में डूबा
छायादार जंगली रस्ता
तांवे के पत्तों का लम्बा सूना
हवा नहीं जो चर्-म बोले
तभी अचानक
व्यू मास्टर के नये चित्र-सा
चौड़ा नीला सागर खुलता
| अपने-अपने चार वरस
जिसमें जाकर दूर कटी परती-सा वह रस्ता मिल जाता। उसके पतले, मटमैले, सतरीले कोने पर कुछ बच्चे वाल सुनहरी, हवा मिले बस खड़े हुए हैं...।" सपना-२ "मैं मर गई है। पता नहीं कमे, क्यो जोर कहा? बहुत-से लोग एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं। मेरी ममी-जसीला सोलह-सत्रह साल की उम्र में, अपनी फोटो मे लगा करती थी-रो रही हैं। मालूम नहीं कौन अनजान लोग उन्हें चुप कराते हैं-'अब क्या हो सकता है ? अब क्या हो सकता है ?' ममी गुस्मे से तेजस्विनी लगती हुई कहती हैं, 'हो क्यों नहीं सकता? वो मरी नहीं है। मैं उसे अभी आवाज़ देती हूँ।' वे मुझे मेरे घर के नाम से पुकारती हैं 'शोन... शोन...' मैं जानती हूं कि मैं मर गई हूं और अव उनके कितने भी पुकारने पर नही आ पाऊंगी। 'मनी, मैं अब नही आऊगी'-मैं सोचती हूं और इस दर्द से, छटपटाहट से कि दो बुलाती रहेगी और मैं आ न सकूगी, मेरा दम घुटने लगता है। मैं अपनी मौत की निश्चितता, अंतिमता से अभिभूत होकर रोने लगती हूं-हिचकियां बंध जाती हैं। अवसाद इतना गहरा हो जाता है कि मैं घबरा- कर उठ जाता हूँ सपना-३ "एक ऊंचा पहाड़ । उसपर जाती हुई एक सड़क, एक मोड़। मुडते ही दायें एक पेड़ दिखाई देता है । नीचे बायें एक मकान है, जिसके छज्जे में सुर्स जेरे- नियम उग रहे हैं। तभी कोई कहता है, कोई बड़ी मामूली-मी बात।... "बिलकुल ऐसा ही मोड़ मैं पहले भी कभी मुडी हूं, यही पेड, यही फूलों वाला मकान वहां भी या और इसी क्षण किसीने यही बात कही थी। मैं फिर याना शुरू करती हूं। वही स्थिर दृश्य फिर से, फिर से वही शब्द ! अजब नौस्टॅल्जिया होता है। यह दृश्य मैंने कब, कहां देखा है ? यह किसने कहा था? यह क्षण बिलकुल ऐसे इन्दु जन/१ सपना-४ "विवाह का घर है। वारिश-का सा सुरमई दिन । जिस घर में विवाह का इन्तज़ाम है वह न सजा हुआ है, न सुरुचिसम्पन्न है। ट्रंक बेतरतीव रखे हुए हैं, उनपर कपड़ों का अम्बार है, कुछ चारपाइयों पर लोग अस्तव्यस्त बैठे हैं। रिश्तेदार इकट्ठे हैं लेकिन कोई उत्साह, उछाह नहीं दिखता । 'कुछ होना है, इस- लिए किया जा रहा है' जैसा भाव । बीच सपने में आभास हुआ जैसे मैं किसी दूसरे के विवाह में शामिल होने नहीं आई हूं-मेरा ही विवाह है, मेरे अपने पति के साथ ही। वे किसी काम से अन्दरे आते हैं तो मैं पूछती हूं, 'क्या हम हनीमून पर जाएंगे?' वे काम में व्यस्त हैं। उन्हें सवाल पसन्द नहीं आता। कहते हैं, 'हनीमून पर क्या जाएंगे! कोई पहली वार तो शादी हो नहीं रही हमारी। अच्छा नहीं लगेगा कि सब लोग आए हुए हैं और हम बड़ा शौक दिखाएं, चले जाएं ।' मैं चुप रह जाती हूं। दिमाग के किसी कोने में बच्चों की प्रतिक्रिया भी लगाम का काम कर रही है। हम दोनों के विवाह में एक ही बात रेखांकित है कि प्रणय उद्दाम है।" सपना-५ "एक स्कूटर-नुमा टू-सीटर हवाई जहाज है। मैं उसमें बैठी हूँ, 'ये' चला रहे हैं और हम उड़ रहे हैं। मुझे न कोई आश्चर्य है, न रोमांच। मेरे हाथों में कितावें हैं, कुछ लिफाफों में खरीदारी है और गोद में कुछ कपड़े भी हैं। मैं सब चीजें संभाल रही हूं। बार-बार लगता है, कुछ गिर न जाए! सबसे ज्यादा परेशानी यह है कि मेरी चप्पल वायें पैर से खिसक गई है और जान पड़ता है----अब गिरी, अब गिरी। अधिक हिली-डुली या झुकी तो खुद न गिर पडू या सामान न जा पड़े ! मेरे पीछे छोटी विटिया भी सो रही है--मुझसे टिकी हुई। मैं इनसे कहती हूं, 'जरा रोक लो, मैं चप्पल पहन लूं।' ये हवाई जहाज़ कुछ धीमा करते हैं और फिर बिना पूछे चला देते हैं। चप्पल वैसी ही ढीली है। ममी से बात कर रही हूं। पूछती हैं, 'कहां थीं?' मैं बताती हूं, 'तुम्हें नहीं ८२/ अपने-अपने चार बरस मालूम ? इन्होंने हवाई जहाज बनाया है। पिछले दो दिन से हम उसीमें घूम रहे हैं।' मेरी सहेली जमुना का फोन आता है। वह समाचार सुनकर मेरे भाई का नाम लेती है । 'अशोक ने मदद को होगी !' में कुछ गर्व से कहती हूं, 'नहीं, वह तो वरमों से जापान में है। इन्होंने खुद ही बनाया है। मुझे भी कुछ पता नहीं । ये ही करते रहते हैं कुछ न कुछ..." "एक जमाना था जब आसमान में उड़ने के सपने बहुत देखती थी। सड़े-सड़े ज़रा पैर धरती से उठाए और उड़ चली। बहुत सुखद अनुभूति होती थी। लेकिन शायद जिंदगी ने किसी हद तक पत्र काट दिए और वो सपने आने बंद हो गए, पैर जमीन पर टिक गए। इसी तरह साइकिल चलाने के सपने भी खूब देखें। साइकिल पर बैठी, किसीने जरा-सा धक्का दिया और मैं लहराती हुई साइकिल पर वैलेंस करती चल दी-~चली जा रही हूं। चारों तरफ से हवा मुझे छू रही है। में विचित्र उन्मुक्तता और आलाद से भर उठी हूं। मजे की बात यह कि जिंदगी में एक बार साइकिल सीखते समय जो गिरी तो फिर कभी चलाना न सीख पाई ! सीघे चार पैरों वाली कार ही चलाने की हिम्मत की। इसी तरह पहले नृत्य करने के सपने भी बहुत देखती थी। मुझे याद है, किसोने एक बढ़िया नये रेकॉर्ड का जिक्र किया जिसमें अन्य वाद्यो के साथ वामुरी मुख्य यताई। यह भी कि उसपर नृत्य बहुत अच्छा हो सकता है। उम सारी रात में सपने में नाचती रही और एक रेकॉर्ड बजता रहा—गजब का! यह भी याद है कि जब एक दिन वह घुन सचमुच सुनी तो बहुत निराशा हुई, क्योंकि वह मेरे सपने को धुन के पासंग भी न थी। कुछ भी हो । मपने राहत देते हैं। कितनी हो बार जो जीवन में संभव नही है, जिस सामीप्य-सुख की तरफ हाथ बढाना निपिद्ध है वह मुझे सपने में मिला है और अपूर्व तृप्ति से भर गया है। शायद जिंदगी में उसे पाना चाहती तो इतनी कालिख, इतनी फिजूल स्थितियां झेलनी पडती कि उनकी राख में अंगारा बिलकुल ही दय जाता । और यह भी संभव है कि वह अनुभव न उत्कट होता, न अपूर्व! इन सपनों ने मेरा मानस-परिवार किस तरह निर्मित किया है, कितनी समृद्धि दी है-मैं ही जानती हूं। अकुलाने वाले, घबराने वाले मपने भी मन
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साली कोनों को भरते ही हैं। वे मेरे जिंदा होने का दस्तावेज़ हैं। जिस दिन
ने आने बंद हो जाएंगे, उस दिन मैं एकसतही हो जाऊंगी, मर जाऊंगी। मैं
हती ही रहूं:
पैरों के नीचे घास-सा
फिर भी सरसराता रहा मेरा सफा।"
गुरवस्शसिंह पंजावी लेखक सरदार गुरवस्यसिंहजी बड़े कोमल और खूबसूरत ख्यालों के मालिक हुए हैं। उनकी जिंदगी और रचना सपनों के साथ लबालब भरी हुई थी । अपनी आत्मकथा में जहां उन्होंने जागती आंखों वाले सपनो का भरपूर जिक्र किया है, कुछ रात के सपनों का भी जिक्र किया है। उनकी छोटी उसके दो सपने ये हैं : एक उम्र के पन्द्रहवें बरम का है। जब वह नौवीं जमात मे थे : "तव शोशे को मैंने अपना साथी चुन लिया। जव घर वालों को मेरे इस साथी का पता लग गया तो मैंने इसे बाबाजी के डेस्क में छुपा दिया। जब कोई पास न होता, मैं उसे निकाल लेता । मुझे अपना रंग अच्छा लगने लगा।पीलापन जाता रहा, कालिस कम हो गई."जमात में भी उतना नाचीज़ नही रह गया था । मैंने एक बहुत सुन्दर और अमीर लड़के की दोस्ती जीत ली थी। कश्मीरी पण्डितो का यह भानगा श्यामसुन्दर था, नौवीं जमात मे कहीं बाहर से आकर दाखिल हुआ था। कद में मुझसे भी छोटा, पर बड़ा ही प्यारा था। उस श्यामसुन्दर के सपने मुझे आते थे। मैं उसके पास बैठना चाहता था और में उसकी चीजों को आंख बचाकर चूम लेता था.." दूसरे मपने का जिक्र उस 'मखनी' से सम्बन्धित है जिसने लेम्बक की सोलह बरस की उम्र में उसकी कल्पना को अनोखे रंग से रंग दिया था। वह वुछ बड़ी उम्र की थी, व्याही हुई, पर लेखक के मन में जादू छा गया था। उसी मखनी गारल्यामिर क तपती दोपहर में लेखक को अपनी गगरी में से ठण्डा रजिसका ज़िक्र लेखक के लफ्जों में इस तरह है : "मैं अन्दर की ओर दौड़ा कि ई गिलास या कटोरा ढूंढ़ लाऊं मखनी की गगरी में से पानी डलवाने के लिए। ठे वर्तनों का अनमंजा ढेर सामने दिखा। कहीं उसे बहुत देर खड़ा न होना पड़े, मैं एक जूठा गिलास ही उठा लाया। डुबडुव करती गगरी का मुंह निवाके उसने मेरा जूठा गिलास सुच्चे पानी से भर दिया 'साकी की सुराही की कुल- कुल को मखनी की गगरी की डुवडुब ने मात दे दी। जूठा गिलास मेरा विल्लौरी पैमाना बन गया..." और उस घटना के सात वरस बाद जव लेखक ईरान में था, वहां के एक रात के सपने का ज़िक्र है : "खूव नींद आई। और सपना आया-गगरी ने कुलकुल किया, मेरी दुनिया सुनहरी हो गई। पर उसी समय गगरी उसके प्यारे हाथों से गिर गई, टुकड़े फर्श पर छनक गए, मेरा दरवाजा खड़क रहा था।" गुरवख्शसिंहजी की आत्मकथा से दूसरे हिस्से में कुछ सपने विस्तार से हैं: "यह मेरा सपना है तो किसी लम्बे सपने का अन्त, पर लम्बा सपना मुह याद नहीं रहता-अन्तला भाग जैसे मेरी आंखों में भरा रहता है। कितनी तक जागते हुए भी मुझपर खुमारी छाई रहती है। लगता है नींद अब खुलने वा है। यकायक सिनेमा की फिल्म की तरह दृश्य पर दृश्य उभरते आते हैं... आसमान का एक टुकड़ा जगमग करने लग पड़ता है, यह जगमगाहट अ किस्म की होती है-जागते हुए मैंने इसके सरीखा कभी कुछ नहीं देखा तारा वड़ा पास और हीरे-लाल जैसी चमक वाला दिखता है। नीचे घर एक पिघले हुए नील की झील दिखाई पड़ती है। झील के एक तरफ ह पर्वत ऊंचा हो जाता है। झील में छोटे-छोटे टापू निकल पड़ते हैं जिन वादवानी किश्तियां तैर रही हैं, बड़े ही प्यारे लोग किसी एक टापू से किसी दूसरे पर पहुंचते हैं । झील के दायें-वायें एकदम महल खड़े होते अनुपम छवि वाले–उनकी खिड़कियों में रेशमी पर्दे उड़ते और सरीखे मुंह झमझमाते हैं । सपने की फिल्म तेज़ चाल से घूमती स्वर्गीय दुनिया का अक्स डालती जाती है, सामने पर्वत, बीच में कि दो ओर महल-दुमहले, और चौथी ओर हरी मखमल जैसा । r:/अपने-अपने चार बरस इसके ऊपर एक जगह में सुग, खिला-सा खड़ा हुआ, चारों ओर ऊपर-नीचे, उंगलिया मुंह में डाले देख रहा हूं -पर एक कचोट-सी मेरे अन्दर होती है, कि दृश्य खत्म होने वाला है टूक-सी उठती है कि एक पल और, एक पल और। तभी एक तरफ हवा में सरसराहट होती है। उस ओर आं उठाता हूं.."यह कोई उड़ता आ रहा है ! मेरी धरती जैसी कोई सूरत है। "नजदीक आ रही है, प्यारी-प्यारी लग रही है। कोई महक उसकी तरफ से आ रही है बेमिसात महक, ओह, वह बहुत नजदीक आ गई। कितना सादा इसका पहरन है—एक सफेद ढीला कुरता, नीचे ढीला सफेद पजामा, लहराते केश, हाय खूबसूरत अन्दाज में तैरते । ऐसी सादा और संक्षेप पोशाक मैंने कभी किसी स्त्री को नहीं सोची थी। सिर्फ दोसफेद कपडे, सगमरमरी नंगे पैर, जैसे निर्मल पानी में तैरते दिख रहे थे। कोई जेवर नही, कोई बिन्दी नही, कोई तिलक नही, मांग में कोई सिन्दूर नही पर हर अंग में से किमी मीठे फुहारे में से उडते चादी-कणो की तरह, कोई जादू-भरी मुस्कान कर रही है। उड़ती-तरती वह मेरे पास से फर- फरा जाती है, और जमीन से इतनी ही ऊंची होती है कि उसके पर मेरे होंठो के घराबर पर होते । बारी-बारी से मैं उसके पैरों को चूमता है और वह उड जाती है, पर एक छोटा-सा चक्कर काटकर वह फिर मेरे पास से गुजरने लगती है। 'जब वह मेरे पास आती है, उसकी रफ्तार धीमी हो जाती है। इस बार उसकी कमर मेरे होंठों की ऊंचाई तक होती है। इस कमर को मैं चुम्बन देता हूं। उसकी मुस्कान मेरे कुछ नजदीक होने के कारण सुनहरी चमक फेंकती है- मेरा अन्तस् अकुला उठता है, और मैं चाहता हू कि, अगले चक्कर में वह एक पल के लिए मेरी धरती को छूती जाए और सोचता हूं-इस बार उसका कौन- सा अंग मैं चूमू और मुंह उठा-उठाकर उसकी उड़ान की ओर ताकता हूं- पर उसने अपना मुंह पर्वत की ओर कर लिया है, मेरे अन्दर दृश्य खत्म हो जाने की खुतावुती मचती है ।"अगले पल मैं अपने विस्तरे पर करवटें ले रहा होता हूं-समूचा बदन काप रहा होता है।" - और गुरवस्यसिंह जी लिखते हैं : "कई अपने सपने में वढाकर लिख देता हूं, सुना देता हूं, पर मेरा यह सपना है जिसको ठीक तरह कहने के लिए मेरे पास लफ्ज नहीं हैं-किसी कोरा में भी नहीं। यह सपना मुझे साल में दो-तीन वार गुरवणसिंह । पर इसका रूप हमेशा नया होता है। कभी महर ती वाले दरिया और जंगल होते हैं-उतने ही प्यारे पशु और पछा हैं."एक औरत ज़रूर होती है और इस सपने के बाद उगती सुबह को मैं महसूस करता हूं। उसे मैं अपना 'लाल दिन' कहता हूं। कभी चिन्ता-भरे डरावने सपने भी आते हैं। जैसे यह मीठा सपना मुझे कई वार आता है, तरह तीन और किस्मों के सपने भी भेस बदलकर मुझे दिखते हैं : एक है उड़ान का सपना। जिस तरह हाथ-पांव मारकर हम पानी में रते हैं, उसी तरह हाथ-पैर मारकर खड़ा-खड़ा मैं आसमान में उड़ता हूं। बहुत ऊंचा नहीं चढ़ सकता, ज़रा-सा हाथ मारने बन्द करूं तो नीचे-नीचे आता जाता हूं, पर फिर जोर लगाकर ऊपर चढ़ जाता हूं। कभी-कभी तो बड़ी साफ और दिलचस्प उड़ान भी भर लेता हूं-पर कभी-कभी ही।" . "दूसरा सपना मेरा यह होता है कि नीचे मेरे विरोधी मुझे पकड़ने के लिए बांहें फैलाए शोर मचा रहे हैं, पर मैं जोर लगाकर उनको पकड़ से ऊंचा चढ़ जाता हूं। कई-कई वार उनको लगता है, 'हाथ आया, कि हाथ पाया', मुझे कई वार लगता है कि 'अब, बस, अब पकड़ा गया', पर हर बार जरा-सा फर्क रह जाना है-मैं उनके हाथ कभी आता ही नहीं-और जव हाथ-पांव थककर दूर हो जाते हैं, तव मेरी नींद टूट जाती है।" "तीसरा सपना वरस में एक-आध बार आता है। यह बड़ा ही डरावना हो है। कोई मुझे मारने के लिए आ रहा है-मदद के लिए आवाजें देता हूं, आव' मुंह से नहीं निकलती। फिर खतरा सर पर पहुंचता है--अपनी तरफ से र मचाता हूं, इतने में कोई मेरे पास सोया हुआ मुझे झिंझोड़कर जगा देता क्योंकि मेरे सोए हुए के मुंह से कोई डरी-डरी वेशब्द आवाज़ ज़रूर निकल होती है।" गुरवस्शसिंहजी अपने इन सपनों का कुछ विश्लेपण भी करते हैं। उड़ान वाला सपना मनुष्य की सीमा लांघने वाली जन्मजात प्रवृत्ति है सपने के अर्थ भी मुश्किल नहीं, पर तीसरा डरावना सपना कितने समय ८८ अपने-अपने चार वरस समझ न सका ।सामने कोई वडा सतरा न होते भी यह सपना मुझे आ ही जाता है। मेरी निडरता मे काफी बढोतरी हो चुकी है, पर यह डरावना सपना अभी भी उतना ही डरावना आता है। ऐसा सपना मेरी माताजी को भी आया करता या,तो हम उन्हें जगाकर सावधान कर दिया करते थे। अब मपनों परवज्ञानिक- साहित्य पढ़ने के कारण मुझे पता लगा है कि यह सपना मेरी माताजी का है। गर्म-समय मा-बेटे का सम्बन्ध अटूट होता है, तब से माताजी का कोई बड़ा डर मेरे अचेतन मन का हिस्सा बन गया है--तब से जब मेरी-उनकी तन्तु-प्रणाली एक ही होती थी।" परवत्सामिा पद्मा सचदेव पद्मा सचदेव डोगरी भापा की लोकप्रिय शायरा हैं। पद्मा सचदेव की नी : "अमृताजी ! कई चीजें हमसे बहुत परे होती हैं। हर सोच और समझ से परे । आपको एक बात बताऊं। जो पहले सिर्फ अपनी दोस्त लता बताई थी, लता मंगेशकर को, आज आपको बता रही हूं। कोई दस वर्ष होने लगे हैं, वर्ष में दो बार ऐसा होता है कि मैं सोई हुई उठती हूं और देखती हूं कि उंगलियों के पपोटों पर मेहंदी लगी होती है। केवल मुझे नहीं, सबको लगी दिखाई देती है और तीन-चार दिन दिखाई देती रहती है। वे निशान 'फिर धीरे-धीरे उसी तरह मिटते हैं जैसे मेहंदी का रंग उतरता है । शुरू-शुरू में मैंने सोचा, पपोटों पर हल्दी-सी लगी रह गई है, पर नहीं दूसरी बार देखा वो मेहंदी पपोटों पर नहीं हथेली के बीच में लगी हुई थी। यह सब कुछ मेरी समझ से परे है। मैंने सिर्फ घवराकर इसके बारे में कविता लिखी है जो आपको सुनाती हूं: मुझे पता है-दूर कहीं कंडी के इलाके में एक कुआं है और जिसके पानी को पीकर कभी प्यास नहीं लगती मुझे पता है—यह कोई आत्मा है बड़ी प्यासी, मुझे प्यार करती है पर मैं उसके छोड़े हुए चिह्न कभी-कभी उंगलियों के पपोटों पर देखती हूं." कभी मैं सोई हुई जागती... और किसी-किसी उंगली के पपोटों पर मेहंदी के निशान दिखते ६० / अपने-अपने चार वरस - वह रूह कहां है कंडी इलाके के कुएं को तरह उसे भी ढूंढना मुश्किल है पर उस चीज को याद करूं तो आंखें भर आती है उस कुएं की तरह-जो कंडी इलाके में है... अमृताजी! पता नही मन के ये रेगिस्तान कैसे होते हैं."एक और सपना आता था, १६५८ की बात है। देखती थी-बहुत गहरा और काला पानी होता था, इतना काला कि देखते ही डर लगता था, और उस पानी में दो मीनार बने होते थे, एक पर में खडी होतो दूसरे पर वह, जिसको मैं प्यार करती थी। बीच में फासला होता था। मैं वाहें फैलाती यो, उसे आवाज देती थी, 'हाय इधर बढा, मेरी ओर', पर वह हाथ कभी भी मेरे तक नहीं पहुंच सकता था और नीचे बहुत गहरा और काला पानी होता था। फिर १९७५ में मैं अपने साविन्द के साथ जिनेवा गई और वहां जिनेवा की झील का पानी, झील का नहीं, झील से टूटा हुआ, दूर पत्थरो मे वह रहा, उसी तरह काला और भयानक था। मैं वहां खडी थी, लगा, यहां मैं अठारह वरस पहले भी सड़ी थी और मैं खौफ से चीख ही पडी। अपने खाविन्द से बिलखकर कहा, 'मुझे यहां से दूर ले जाओ, जिनेवा में कही और ले जाओ...' लगा, यह पानी मेरे पीछे पड़ा हुआ है और इसने अठारह वरसों से मेरी परछाई को अपने सीने में पकड़ा हुआ है "देखो, अमृताजी ! आपको यह सब कुछ सुनाना ऐसे है जैसे मैं अपने वजूद के टांके खोलकर दिखा रही होऊ."नहीं, मैं इसके बारे में कभी कोई नाम नहीं लिख सकी. "नश्म लिखने का भी हौसला नहीं पड़ता... पमा सचदेव /६१ मनमोहनसिंह शायद इंसान किसी जगह अपनी हर सोच से बड़ा होता है, अस्तित्व की जानी-पहचानी हकीकत से कुछ अधिक । पता नहीं, पर अंग्रेज़ी के शायर और कहानीकार मनमोहनसिंहजी का एक सपना ऐसी ही किसी दिव्य शक्ति की ओर संकेत करता लगता है "मैं भी वाकी इंसानों की तरह सपने देखता हूं। कई बार सोचता हूं कि इंसान खुशकिस्मत हैं या वदकिस्मत, क्योंकि वे सपने देखते हैं। वाल्ट ह्विट- मैन ने कहा था कि जानवरों और इंसानों में यही फर्क है कि रात को इंसान अपने अस्तित्व या अपने सपनों के अस्तित्व के बारे में बहुत कुछ देख सकता मेरे सपनों के खजाने या विरासत में से मुझे कई सपने याद हैं । पर यह चुनाव करना मुश्किल है कि कौन-सा सपना एक अमिट याद है। मैंने शेरों और चीतों के सपने देखे हैं, क्योंकि मुझे शिकार खेलने का शौक है। मैं मछलियां पकड़ने का सपना भी देखता हूं, क्योंकि मुझे इसकी भी सनक है। मैं हवाई जहाज़ के सपने देखता हूं, क्योंकि मैंने इनमें बहुत सफर किया है। और मैं सुन्दर व्यक्तियों के सपने देखता हूं, क्योंकि मैं हविसों की पवित्रता में यकीन रखता हूं। मुझे अनुभव है कि मनोविज्ञानशास्त्रियों को यह बताकर अपने पर मजाक उड़ाने का मौका दिया है, क्योंकि उनके अनुसार चीतों और मछलियों के सपने आने का सम्बन्ध केवल सेक्स से ही है। कितनी बदकिस्मती है कि यदि जागते हुए सपने लेते हैं तो शेखचिल्ली कहलवाते हैं, और अंधेरी रात ६२ / अपने-अपने चार वरस की ओट में जद म दुनिया के सरने लेते हैं जो दुनिया नहीं है तो उसमें कई तरह के मनोवैज्ञानिक जुनों के दोषी बन जाते हैं। चाहे गधे का सपना हो या फरिश्ते का, हमारे सपने भी मनोवैज्ञानिक अदालत के कटघरे में दोषी बनाकर खड़े कर दिए जाते हैं। हां, मेरा एक ऐसा सपना है जो मेरो जिन्दगी के सारे सपनों में से महत्त्व- पूर्ण है। चाहे यह एक सपना नहीं दो सपने हैं, पर वे दो सपने एक जैसे थे। उनका रंग, उनका ढंग, उनकी शक्ल एक जैसी थी । ऐसा लगता था कि जैसे उनको किमी अमानवीय शक्ति ने एक-सा गरा हो। मैं समझताया कि किसी मूर्तिकार के लिए या किसी चित्रकार के लिए दो एक जसो मूर्तियां और दो एक जैसे चित्र बनाने बड़े मुस्किल हैं, पर सपनों को बनाने वाला नित्रकार एक अमानवीय शक्ति रखता है,इसी शक्ति ने ये दो सपने एक जैसे गड़े थे। हैरानी की बात तो यह है कि दोनो बार ये सपने सुबह तीन बजे के करीब मैंने देखे । मुझे यह इमलिए याद है कि दोनों बार मैंने घडी देख ली थी। इस सपने में कुछ कंपकंपी लाने वाली शक्ति थी। इस तरह लगता था कि एकदम मुझे जाग आ गई हो और मैं सपने की इंतजार में मुन्न हो गया होऊं। यह मपना एक रोशनी के रूप मे आया। वह रोशनी भी इतनी अजीब कि इसमे पहले कि मैं सपने का वर्णन करूं या इसके अर्थ के बारे में सोचू, पहले उम रोशनी के बारे में बताता हूं जो कि एक अजीव रोशनी थी। उन सब रोशनियों में अलग जो कि चाद, सूरज, आग, बिजली या जुगनू मे से निकलती है। यह रोशनी रोशनदान में से आई। चाहे मैंने बाद में सोचा कि ऐसी रोशनी तो शायद दीवार फाड़कर भी आ सकती थी। इस तरह से पानी मलमल के कपड़े में से निकल जाता है । यह रोशनी पहले बहुत ही छोटे-से सितारे की तरह थी । उन आकाशो के मितारो जितना, या रेत के एक छोटे-से कण जसा जो धूप में चमक रहा हो। फिर रोशनी वा यह कण फट गया जिस तरह कि एक शान्त मणि वम फटा हो, और उस वम के टुकड़े किरणों को तरह फैल गए। "जव यह कण फटा तो कमरे में रोशनी हो गई। यह रोशनी एक अ मनमोहनसिंह।
रोशनी नहीं थी। इस रोशनी को रोशनी के नियमों से नापा या देखा नहीं जा सकता था। यह रोशनी एक मरमरी तरह की रोशनी थी, न ही सुबह की, न ही दोपहर की, न ही शाम की। इस रोशनी से ऐसे लगता था जैसे हाथी के कई मन दांतों को पीसकर किसीने हवा में विखेर दिया हो और उस पिसे हुए हाथी दांत पर कोई अलौकिक झलक पड़ रही हो। मैं समझता था कि रोशनी को देखने की शक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है। पर उस दिन मैंने वह रोशनी देखी जिसे छुआ जा सकता था। वह रोशनी भी एक कंपकंपी-सी लाने वाली घटना थी। इसलिए मैं सोचता हूं कि वह रोशनी पिसे हुए हाथीदांत के पाउडर की बनी हुई थी। इस रोशनी ने कुछ शक्लों का रूप धारण कर लिया। मैं सुन्न पड़ा देख रहा था। रोशनी की शक्लें एक आकाश के बैले डांस वालों की तरह झूम रही थीं और फिर उन शक्लों में से एक आवाज़ निकली। मैंने अपने कानों से यह आवाज़ नहीं सुनी। यह आवाज़ इस तरह लग रही थी जैसे मेरे जिस्म में ढल गई हो और भीतर से ही एक नगाड़े की तरह गूंज रही हो-वह नगाड़ा जो किसी गांव के छोटे-से गुरुद्वारे में पड़ा टिब्बों के पार गए हुए लोगों को वापस बुला रहा हो। इस आवाज़ की ज़बान भी एक अजीव जवान थी। मुझे वह लफ्ज़ याद नहीं पर ऐसा लगता था कि वह एक ऐसी आवाज़ हो जिसे अभी शब्द न मिले हों। शायद यह सपना भी एक ऐसा निजी सपना था कि इसकी आवाज को. आम जवान में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। इस आवाज़ के शब्द डिक्शनरी या शब्दकोप की जंजीरों के कैदी नहीं। पर फिर भी इस आवाज को मैं समझ सका। यह आम आवाज जैसी सुनने की शक्ति से नापी नहीं जा सकती, ऐसे लगता था जिस तरह कि इस आवाज़ को देखा भी जा सकता हो । यह आवाज़ उस रोशनी से ज्यादा प्रकाश कर रही थी जिस रोशनी को छुआ जा सकता था। यह आवाज़ उस तरह की आवाज़ थी जिसको देखा और पकड़ा भी जा सकता था। इसका क्या मन्तव्य था? ऐसा लगता था जैसे उस हाथीदांत के पाउडर की शक्लें मुझे अपने-आपमें से खींचकर ले जा रही थीं। उन शक्लों की उंगलियां जो मेरी ओर उठाई जा रही थीं, उन शक्लों के हाथों से भी लम्बी थीं। मैं अपने अपने नाम महसूस कर रहा था, जिस तरह एक निजाम के कटघरे में में खड़ा होऊ और यह रोशनी उस कटघरे से मुझे आजाद करवा रही थी। थोड़े समय बाद ऐसा लगा जैसे वह रोशनी कमरे मे से अपने-आपको लपेट रही हो, जैसे स्टेज पर काम कर रहे कलाकार उस ड्रामे के अन्तिम सीन के बाद वहा का सामान उठाकर ले जा रहे हों। इससे पहले कि रोशनी बिलकुल ही धीमी हो जाए, मैंने अपने-आपमे कुछ जिन्दगी का अहसास समझा और थोड़ी-सी करवट ली। सिरहाने पड़ी एक किताब को उठाया। चाहे ऐसे लगता था कि वह किताब कोई बहुत ही भारी पत्थर हो । मैंने इस किताव को उलटा-पलटा और उसका वरका देखा और उस वरके की पहली पंक्ति पढ़ी। रोगनी सांप की तरह बल खाती हुई रोशनदान मे से वापस जा रही यो और दूर एक सितारे में फिर समा गई । वह सितारा जो दरिया के किनारे पर पड़ा रेत के एक कण की तरह चमक रहा था। कमरे में फिर घुप्प अंधेरा हो गया। मैंने अपने-आपमें किताव का वरका और उसकी पंक्ति को फिर याद किया और दोहराया ताकि वह मुझे याद रहे। मुबह हुई और सूरज निकला। मैंने सिरहाने की ओर से किताव को उठाया। मुझे वरका याद था। मैंने किताव उस वरके पर खोली और उस घरके की पहली पंक्ति पढ़ी । और फिर एक सुन्न-सी मेरे समूचे बदन में आ गई और किताब मेरे हाथ में से गिर पड़ी। इस वरके को पहली पंक्ति वही थी जिसे मैंने रात उस रोशनी में पड़ा था।" मनमोहनसिंह चन्दन नेगी - । चंदन नेगी पंजाबी की एक उभरती कहानीकार है, जिसने सपनों में कई र भविष्य के इशारे देखे हैं-यहां तक कि जब उसने जागते हाथों में कलम ही पकड़ी थी, कलम का वर सपने में पाया। "कई बार मैं सपने में ऐसी जगहों पर घूमती हूं, ऐसे स्थान देखती हूं जो वास्तव में कई-कई सालों वाद जव देखती हूं तो सपने का नज़ारा सामने आ जाता है। कई बार ऐसे चेहरे देखती हूं जो पहचाने नहीं जाते और जिनसे मिलन पता नहीं कितनी देर बाद होता है। जीवन में घटित होने वाली घटनाएं कई बार मुझे सपने में ही सचेत कर जाती हैं । और कभी-कभी किसी अजीब-से सपने से डर भी लगने लगता है। मैं चार-पांच सालों की थी जब मेरी मां मुझे और दो छोटे भाइयों को छोड़कर चल बसी थी। मां के बाद दोनों भाई भी चल वसे और फिर पापाजी भी। पन्द्रह नवम्बर, १९७७ की रात क्या देखती हूं कि पापाजी मर गए हैं, उनकी लाश सफेद कफन में लिपटी तस्तपोश पर पड़ी है। पैरों के पास मां बैठी हैं। उन्होंने सफेद धोती पहन रखी है । बाल खुले हैं। मेरे दोनों भाई जीत और कालू भी पास खड़े हुए हैं। मैं चुपचाप सबको देखती हूं, रोती भी नहीं। हैरान होती हूं, दोनों भाई तो छोटे थे। (जीत नौ साल का और कालू छः महीने के मरा था) अव दोनों ही भर जवान हैं। मैं सोचती हूं, इतने बड़े कैसे होग जैसे उम्र के अनुसार होना चाहिए था? मैं थोड़ी दूर पर खड़ी पूछती हूं, 'ज मुझे तो याद ही नहीं तू बड़ा कव हो गया तू अपनी कविता न मांगना। ? .६६ / अपने-अपने चार वरस कागज तो पेशावर हो रह गया है।' (छ: साल का जीत कविता विस्तापा।) वह हंसा, 'मैंने तुमसे अपनी कविता तो नही मागी?" 'यह तेरे साथ और कौन लडका है ?" 'तुमने नहीं पहचाना? कालू है-अब बड़ा हो गया है। तुम दूर दोसड़ी हो ? क्या सोच रही हो?' मैं हैरान, फिर भी एकटक देखे जाती है। 'चंदन, छ सालो से पापाजी भी हमारे पास ही आ गए हैं. हम मा दाई रहते हैं-मैं, काल, मा और पापाजी। पापाजी सो रहे हैं, तुम कब आओगी? तुम ही अलग रह गई हो। तुम भी आ जाओ, यहा सब इसई रहने। नमाज पापाजी को ? चंदन आई है ?' उसने पैशावरी नहरे में ही पूछा। 'नहीं" ..' में लौटने लगती हूं। सोचतो हू पापात्री तो मर गए हैं। 'कहा चली जा रही हो? आओन चदन, सब इकठे रहें."आशी!' मैं जीत का मुह देख रही यो, मे ही भोले-गोरे लोनन-गोर चेहरे परदा भी आ गई थी। उसने मेरी वाह झिझोडी, 'कब आओगी."का माशेली?' मेरी जाग खुल गई। दिल की धडकन को आवाज सुन रही पो और सत्रह नवम्बर को मेरा एक्सीडेण्ट हो गया। बुरी तरह पायन हुई रद को हड्डी टूटी, पर उन मवके पास पहुचने से बच गई। अब भो न माने कोकार करती हूं। बात है भी सच ! सारा परिवार तो रिनी अदृश्य देन में इस है और मैं यहां एकाकी उन सबसे अलग..." "कई मालों से अनजाना, अनपहबाना चेहरा देवती रही। कमोरिनना के रूप में, कभी पुजारी के रूप में, कभी लेखक के रूप में भी पीर के पर आता है मैं बड़े-से कमरे में अकेली सड़ी हुई है। कमरे को मन दोगर, र. फर्श ईरानी लाल कालीनों से सजे हुए हैं। मैं सारे कमरे में पूनी हरकत को छूकर देखती हूं। कमरे के दूसरी ओर के कोने में में आवार आता है, 'चंदन!'चोककर देखती हू, मर्दाना आवाज कहा से आईअडसमसिन कद, भारी जिस्म, लाल गोल नूरानी चेहरा, हाय में आधुनी माल पोग: मेरे पास आ रहा है। मोतिया रंग को वोमी की गलवार, घटना दर नन:- मी कमीज, सुमंई रंग की पगडी, जरीदार पानीचर। मैंने दहदंग पटवाय शिश की पर पहचान न सकी। 'देख मैं तेरे लिए कावुली रूमाल में लपेटा एक पेन निकाला-सुनहरी पेन, जिसपर टेढ़ा छो रंग-विरंगीधारियां थीं। उसने मुझे दिया। 'मैं खास तेरे लिए लेकर आया मैं पेन को इधर-उधर गोल घुमाकर देखती हूं। उसने फिर कहा, 'इसको न से बरतना। यह बड़ा अच्छा लिखता है। इसकी स्याही न खत्म होने देना!' र उसने पेन से मेरी वायी हथेली पर एक लकीर खींचकर वताई। अपनी थेली पर पेन की निब की गुदगुदी महसूस करते हुए मेरी नींद खुल गई। वैसा बहरा अभी तक तो नहीं मिला अगर मिले तो ज़रूर पहचान लूं । और उस पेन वाले सपने का महत्त्व अव पता लगता है। हैरान भी हूं । अचानक मेरे हाथ में कलम कैसे आ गई, कहानियां कैसे उभरने लगी हैं ?" । "जब मैंने पीर खोह वाला सपना देखा, लिखना तो दूर रहा, कभी कोई किताब भी पढ़ती नहीं थी। कभी यह सपना आया था, ध्यान ही नहीं दिया। गुरु नानकदेवजी की जम्मू की यात्रा के बारे में पढ़ते हुए पीर खोह का भी जिक्र आया। देखने को जी किया। जम्मू में रहते कई साल हो गये थे। पर 'पीर खोह' कभी भी नहीं गई थी। एक दिन १९७५ की बात है, जब पीर खोह देखने गई तो मैंने सफेद सन्तरी वार्डर की धोती, जो नई ही खरीदी थी, पहनी। जब तहसील रोड की ओर से पहाड़ी के साथ-साथ तंग-सी सड़क पर चल रही थी, रास्ता कुछ जाना-पहचाना-सा लगा। पर मैं तो कभी नहीं गई थी। मन्दिर के पास पहुंचकर हैरान-ती, कभी पहाड़ी के पैरों में वल खाती तवी (नदी) कभी गोभी-पालक की क्यारियां, कभी कुएं को देख मेरे पैर उस जगह रुक गए जहां से तवी के पास से पत्थरों की सीढ़ियां मन्दिर के द्वार के पास खत्म हो हैं-मैंने दो-चार बार नीचे तवी से पहाड़ी पर मन्दिर और मन्दिर से तवी देखा। यह जगह तो जैसे मैंने देख रखी थी, पहाड़ों की ओट में खड़ी पुजारी गऊ। मैं दो-चार कदम चली तो मुझे लगा, उतनी पहाड़ी पर चढ़ने के लि ऐसी ही सीढ़ियां हैं; ऊबड़-खाबड़ पत्थरों की। और सच ! सीढ़ियां अ थीं, जिनपर चढ़ते-पढ़ते मैं थक गई थी। मन की तह के किसी कोने में से। कर एक सपना याद आ गया। पर मेरे साथ कौन था ? मन्दिर के अंदर गई। शिवजी ने जिस गुफा में भक्ति की थी, व . -अपने-अपने चार वरस - शिवलिंग पड़ा है। सिर झुकाते ही सपने वाला चेहरा जमे साकार हो मेरी आखों के सम्मुख मा बड़ा हुआ। पतला सूखा जिस्म, गन्दुमी रंग, सफेद घोनी, सफेद कुर्ता और पैरों मे अगूठे वाली चप्पल । हम दोनो तवी के किनारे खडे हुए हैं। मेरे पास खड़े आदमी के हाथ मे आठ-दम मोटी-मोटी कितावें हैं। मुझे प्यास लगती है। पानी पीने के लिए जैसे ही अजुली भरने लगती है कि एक हाथ से पानी लेकर मेरा माथी मेरी अजुली भर देता है। बातें करते-करते हम तवी के किनारे सारे पत्थरो को लाघ आए । पहाड़ी के पैरो के पाम गोभी और पालक की क्यारियां हैं। मैं गोभी तोड़कर खाने लग पडती हू । और उसने जगली फूल तोड़कर मेरे जूड़े में टांक दिए । 'देखो-देखो मतरगे फूल ! और मैं हस दी, लाल हो गई। दौड़कर सीहिया चढने लगी हाफ गई.."अभी नहीं और चटो।' मेरा माथी मुझसे आगे जाकर सडा हो गया। मेरी सास फूल रही थी। फिर प्याम "मैंने कुए के पास जाकर जी भरकर पानी पिया । उसने नीली स्याही के धन्यो धाले रुमाल से मेरे हाय पोछे। रूमाल की स्याही मेरे हायो पर फैल गई। मैंने सपने मे भी सफेद, सिन्दूरी वार्डर वाली धोती बांधी हुई है। धोनी को सारी फाल कीचड़ से सनो है। मैं एक हाथ से पल्लू और दूसरे से फाल को इकट्ठा करके मन्दिर की सीढियो के पास बैठ गई। मेरा साथी मेरे पास खटा सबसे मोटी किताब में से कुछ ढूढ रहा था। एक पहाडी और चटनी थी। 'वैमी ही ऊबड़-खाबड़ पत्यरो की सीढिया। मैं थक-टूटकर कभी पड़ी हो जाती, कभी धीरे-धीरे दोन्चार मीढ़ियां चढती। फिर उसने एक हाथ में किताबें और दूमरे से मेरी बांह थाम ली 'और चट्टो "योडा और धीरे-धीरे से सोढी- सीढ़ी चढती आओ!'जहां सीढियां खत्म होती थी, वहा रोशनी थी, नाल-बाल रोगनी, जैसे उगते सूरज की होती है । और उमकी आवाज हर सीटी पर सुनती थी। 'यस उम रोशनी तक!' हाथ पकड़कर वह मुझे अन्तिम मोदी तक ले ही गया। जहां मेरे चारो तरफ अजीब-मी रोशनी थी। मेरे हायपर कितावें रखकर • उसने यहा, 'इन्हें ज़रूर पढना।' सपने मे मैने अपने साथी को मन्दिरका पुजारी समझा था। में कुछ कहना ही चाहती थी कि हाय पर पडे किताबो के योश में बांख खुल गई। पीर वोह इस सपने से चार-पाच साल बाद गई थी, और अब सोचती हूं, सीड़ी-मोटी चढ़ती की मंजिल पता नहीं कहां है।"
मेरे अपने सपने - - . घर की सारी हवा धार्मिक थी, सुबह-शाम पाठ करना, सोने से पहले दस मिनट आंखें बन्द करके मन को ईश्वर के ध्यान में टिकाना घर का नियम था। चाहे घर में मेहमान आए हों और चाहे हम किसीके घर मेहमान हों, अवेर हो जाए, आंखों में नींद भर जाए, पर कोई भी बात इस नियम में भांजी नहीं मार सकती थी। "परमात्मा की शक्ल कैसी होती है ?" एक दिन मेरी वालेपन की जवान ने पिताजी से पूछा था। "क्योंकि आंखें मूंदने पर नींद आ जाती है, सामने कुछ दिखता नहीं, अगर आप मुझे परमात्मा की शक्ल बता दें, फिर मैं उसे कल्पना में एक रात रख लूंगी, और नींद नहीं आएगी।" यह जब पूछा था, तब मेरी उम्र मुश्किल से आठ-नौ बरस की रही होगी। "भगवान की मंजिल पर गुरु की राह से होकर पहुंचते हैं । यह दस गुरुओं की तस्वीरें हैं, तू इनमें से किसी भी शक्ल की कल्पना कर लिया कर।"पिताजी ने कहा और मैंने दसों गुरुओं की तसवीरें बड़े गौर से देखीं । बार-बार देखीं। 'दस चेहरों की तो कल्पना नहीं की जा सकती, मुझे इनमें कोई एक चेह चुनना पड़ेगा।' मैंने मन में सोचा और अपने चुनाव के बारे में अपने पिता से भी पूछा। "गुरु नानक के चेहरे की कल्पना किया कर। यह आदि गुरु थे... "गुरू नानक? "इनकी और तसवीर कोई नहीं ? सिर्फ यह एक ही "किसी चित्रकार ने गुरु नानक को और रूप में बनाया ही नहीं।" १००/ अपने-अपने चार वरस "पर सव चित्रकार उन्हें बूडा क्यों बना देते हैं ? और फिर इस दरख्त पर पिंजरे में पड़ा हुआ तोता मुझे अच्छा नहीं लगता..." मैंने कह दिया, पर फिर सहमकर पिताजी के मुह की ओर देखा। मुझे लगा, मेरे मुंह से कोई बेअदब बात निकल गई थी, और अव पिताजी गुस्ने होंगे। पर पिताजी गुस्से न हुए। शायद उन्होंने वाल-मनोविज्ञान को समझ लिया था। मैं एक तसवीर रखती, एक उठाती, पर बार-बार जहा आंसें थम जाती, वह छठे गुरु हरगोविन्द जी और दसवें गुरु गोविन्दसिंहजी को तमवीरें थी। भरपूर जवानी, अंग-अंग में से झलकती बहादुरी, चमकता घोड़ा, और हाय पर उड़ने को आतुर वाज" रात को दम मिनट आम्ब मूदने के नियम मे दिल लगने लगा बल्कि साम के समय से ही एक इन्तजार-सी होने लगती कि किस समय रोटी खत्म होगी, किस वक्त विस्तरे में होंगे, किम वक्त दस मिनट आखें मूदने का वक्त आएगा... जब मैं वरमो की तहें उलट-पलटकर अपने सपने दूढ़ने लगी, सबने निचली तह मुझे यह १६२८ की मिली थी, जब रातों को अकमर मुझे गुरु हरगोविन्दसिंहजी का और गुरु गोविन्दसिंहजी का सपना आने लगा। इस मिश्रित रूप का समूचा युत मानवीय सौन्दर्य की मिसाल होता। अगों में वहा- दुरी का मेंक होता, पर उससे चेहरे पर कठोरता न होती, बल्कि उस सेंक से चेहरे के सारे नक्श पिघले हुए होते। मैं मपने में उनके साथ बातें करती। वह अपना घोड़ा सड़ा कर देते, में घोड़े की चमकती पीठ पर अपना छोटा-सा हाय छुआकर देखती और मैं सपने में सोचती, अगर मैं वाज वन जाऊ.."उनके हाथ में पकड़ा हुआ बाज"या मैं तलवार बन जाऊं.."उनके गले में पड़ी तलवार "मोरी की तलवार या पीरी की तलवार... मुबह उठकर में अपनी मां को अपना सपना सुना देती। मेरी मां मेरे सपने की बात अपनी सहेलियो को बता देती और फिर अचानक शाम को मेरी मां की सहेलियां आकर मेरे पैरो को हाथ लगा देती, 'इसके ऐसे पूर्वजन्म के कर्म हैं, इने सपने में गुरु का दर्शन होता है।' एक रात मुझे मेरे सपनों के राजा ने कहा, "देस तू मेरे सपने की बात किसी. को न सुनाया कर-और अब मैं तेरे पास भेस बदलकर आया करूंगा..."
गुरु गोविन्दसिंह का और गुरु हरगोविन्दजी का यह शायद आखिरी सपना था। इसके बाद मुझे मेरे कल्पित महबूब का सपना आने लगा। किसी तसवीर से या किसी इंसान के चेहरे से मैं उसका चेहरा नहीं पहचान पाती थी। उसका नाम मैंने खुद ही सोचकर रख लिया, 'राजन' । उसका सपना मैंने कई बरस तक किसीको नहीं सुनाया। मुझे डर था कि सुनाने से यह सपना भी पहले की तरह बाना बन्द न हो जाए। मेरी छोटी उम्र के और दो सपने मुझे याद हैं। एक यह कि एक बड़ा किला होता। और लोग मुझे उस किले में बन्द कर देते। वाहर पहरा होता। भीतर से कोई दरवाजा न मिलता। मैं किले की दीवारों को उंगलियों से टटो- लती रहती, पर पत्थर की दीवारों की कोई जगह नहीं पिघलती थी। सारा किला ढूंढ-ढूंढकर जब कोई दरवाजा न मिलता, मैं सारा जोर लगाकर उड़ने की कोशिश करने लगती । मेरी बाहों में इतना वल लगता, इतना वल कि मेरी सांस फूलने लगती। फिर मैं देखती, मेरे पैर जमीन से ऊपर को उठने लगते। मैं ऊपर उठती जाती, और ऊपर, और फिर किले की दीवार से भी ऊपर हो जाती। सामने आसमान आ जाता। ऊपर से मैं नीचे की ओर देखती। किले का पहारा देने वाले लोग घबराए होते । गुस्से से वाहें फैलाते, पर मुझ तक किसी- का हाथ न पहुंच पाता। । । -- दूसरा सपना था, लोगों की एक भीड़ मेरे पीछे होती, मैं पैरों की पूरी ताकत लगाकर दौड़ती, लोग मेरे पीछे दौड़ते। फासला घटता जाता और मेरी घबराहट बढ़ती जाती। मैं और ज़ोर लगाती, आगे बढ़ती पर सामने दरिया आ जाता । मेरे पीछे आती लोगों की भीड़ में खुशी फैल जाती, "अब आगे कहां जाएगी? आगे कोई राह नहीं, आगे दरिया वहता है..." -और मैं दरिया पर चलने लगती, पानी बह रहा होता पर जैसे उसमें धरती का-सा आसरा आ जाता। धरती बल्कि परों को सख्त लगती है, पानी कोमल लगता, और मैं चलती जाती, सारी भीड़ किनारे पर रुक जाती। कोई पानी में पैर नहीं डाल सकता था। जो कोई डालता, डूब जाता। और किनारे पर खड़े लोग धूरते, खिसियाते, पर किसीका हाथ मुझ तक न पहुंच सकता - बहुत-से लेखक मध्यम श्रेणी में ही पैदा होते हैं, और धीरे-धोरे ज्ञान के बल पर अपने चेतन यलों में अपने मन-माथे से लिपटी संस्कारों की गांठों को सोलते हैं। इसलिए लगता है प्रारम्भिक रन के सपनों में वह चाहे चांद-तारों को छू आएं पर संस्कारों को मन-मस्तिष्क में संजोए रखते हैं। जैसे इनी किताब के प्रारम्भ में बगाल के बडे रोमाचक और पैरों की आवारगो के माने हुए लेखक श्री प्रबोधकुमार सान्याल अपने लगातार पंद्रह बरस आने वाले सपने का जिक्र करके कहते हैं कि जिससे उन्होंने प्यार किया, वह यगाल की विधवा लड़की थी, और वह हमेशा उनके सपने मे विधवा वेश में ही आती रही। उसके बदन पर लिपटी सफेद पोती कभी सपने में भी रंगीन न होती। जिन्दगी में उन्होंने सामाजिक रीति-रिवाजों को जो लाज रखी, कभी भूलकर भी एक- दूसरे का हाथ नहीं छुआ, यह 'लाज' उन्होंने सपनों में भी रखी। सपनों में भी उन्होंने अपने-आपको भयमुक्त नहीं होने दिया। इसी तरह जिन्दगी में मैंने जिसमे पहली मुहब्बत की थी, वह मुहब्बत समाज की नजरो में वजित थी। मैंने उसे सपने में हद तक अवजित बनाया पर सिर्फ कुछ हद तक । मिर्फ यह कि में उसे सपने में देख मकू और यह स्वप्न-दर्शन मेरे लिए वजित न रहे। उस समय का एक मपना मैंने अपनी किताब 'काला गुलाव' में लिया था : "उस रात सपने में मैंने उसकी पीठ देखी। पतले जिस्म पर ढीली सफेद कमीज पहनी हुई थी। मेरे पास मेरे पिताजी पडे हुए थे, उन्होंने उस पीठ की ओर इंगली की और पूछा, 'पहचान सकती है ?' और साथ ही कहा, 'यह तेरी तकदीर है।" सो, इस तरह सपने में मैंने अपने बाप से यह कहलवाकर अपनी मानसिक हालत के लिए एक तरह की स्वीकृति ले ली थी। गिनवा नहीं मक्ती-उसका सपना मुझे जिन्दगी में कितनी बार आरा। पर हर मपने में उनके और मेरे दरम्यान का फासला एक निश्चित तादीर को तरह कायम रहता था। कभी सपने में उसका हाथ मुझे छुआ-पर सिर्फ तव जब मुझे दुपार चहा हो। और यह भी इस तरह कि वह हाय को हथेली से मेरा माया छूकर जैसे मेरा बुखार देख रहा हो । सो हाय को एक छुअन के लिए भी बुगार का सबब सपने में जरूरी था। यह जरूर मेरी मध्य श्रेणी सोच की गुलामी होगी जिमसे मैं सपने में भी स्वतंत्र होने का जेरा न कर सकती थी। अगर कभी उसके होंठ मेरे कुछ निकट होते तो चौककर मेरी नीद सुल जाती।
ज डॉक्टर पत्नीशिआ गारफील्ड की किताब 'क्रिएटिव ड्रीमिंग' में लोगों की एक अजीव वढ़िया प्रथा के बारे में पढ़ रही हूं कि कैसे वे लोग वच्चों को सपनों के माध्यम से भयमुक्त होने में मदद करते हैं। उनके त का कोई वच्चा अगर सुबह उठकर वताए कि उसे सपने में धरती अपने बुला रही थी, पर वह एक ऊंची पहाड़ी पर खड़ा हुआ था, जहां से वह ती की ओर आने के लिए झुका तो गिर पड़ा, तो आगे मां बड़ी सहजता से रझाती है : “यह बड़ा वढ़िया सपना था, घरती तुझे प्यार करती है, उसे रूर तुझे कोई वढ़िया चीज़ देनी होगी, तभी बुलाया। पर तुझे पहाड़ी पर से गरना काहे को था? तू धीरे-धीरे उड़ता, पंछी की तरह धरती पर आ सकता या ।" और इस तरह उड़ने का सुझाव देकर सनाई लोग अपने बच्चों को पंख लगा देते हैं। वह सपने की चोटों से बच जाता है, और जहां भी उसे कोई. और रुकावट की गुलामी दिखती है, वह झट स्वतंत्र हो जाता है। इस तरह सनाई लोग सपने का कोई भोग वजित भोग नहीं मानते, बल्कि उसको मान- सिक तृप्ति समझकर अपने-आपको दुविधामुक्त कर लेते हैं । सनाई सिस्टम से प्रभावित होकर डाक्टर गारफील्ड ने अपनी ज़िन्दगी में आई तब्दीली का भी जिक्र किया है, "मेरी ज़िन्दगी का एक लम्बा दुखद सपना था, जो मेरी तेरह बरस की उम्र में हुई एक घटना का नतीजा था। मैं एक वीरान जगह में से गुजर रही थी कि लड़कों की एक टोली मेरे पीछे पड़ गई। वे मुझ 'रेप' करना चाहते थे । मैं तमाम ज़ोर लगाकर दौड़ती रही थी। और आखिर दादी के घर के पिछवाड़े पहुंच गई थी। बच गई थी। तब से सपने भयानक हो गए थे। सनाई सिस्टम को अपने मन में वसा लिया,तो एक रात उन 'रेप करने वाले लड़कों के सम्मुख तनकर खड़ी हो गई, उनसे लड़ी, उन्हें मार उनकी आंखों में कोई जहरीली चीज़ फेंकी, और मैंने वह लड़ाई जीत ली। 3 इस तरह मैं उस घटना से हमेशा के लिए मुक्त हो गई।" पर मैं ज़िन्दगी के जब कठिन बरसों में से गुजर रही थी, मेरे पास सनाई सोच नहीं थी, मेरे सपने भयभीत भी थे, अनन्त निराशामय भी। पांत्र सपने ये हैं : नापने चार वरस १. जख्मो हाथ देखा, एक बच्चे को स्कूल दाखिला करवाने के लिए गई हूं। स्कूल की साधारण-सी इमारत है। हेडमिस्ट्रेस के कमरे में गई। देखा, हेडमिस्ट्रेस के दोनों हाथ मूजे हुए हैं और उनमे से थोडा-थोडा खून रिस रहा है। एक उबकाई सी आई। पर मन मारकर बच्चे के दाखिले की बात की। हेडमिस्ट्रेस ने एक फार्म दिया और घण्टी बजाकर स्कूल को एक अध्यापिका को बुलाया। कमरे में जब वह अध्यापिका आई तो क्या देखती हूं, उसके दायें हाथ पर पट्टी बंधी हुई है। घबराकर मैं हेडमिस्ट्रेस के कमरे से बाहर आ गई। स्कूल लगा हुआ था, एक क्लासरूम में चली गई कुर्सी पर बैठी अध्यापिका के दोनों हायो पर पट्टी बंधी हुई थी। मैं डरकर एक और कमरे की ओर गई-वहां भी कुर्मी पर बैठी मध्यापिका को देसा-उसकी दोनो वाहे जम्मी थी। मैं जमे एक चीख मारकर एक और कमरे की तरफ दौडी-उम कमरे में खड़ी अध्यापिका के दोनों हाथों में से पीप रिम रही थी। अपनी ही चीख से नीद सुल गई। सोचने लगी, मुझे जिन्दगी मे कभी बुरे सपने नहीं आए थे, यह अचानक क्या हो गया ? मैंने मन को टटोला-पिछले दिनों में हुए एक हादसे ने मेरो जिन्दगी को अपने पजे में इस तरह भीचा था कि उसके समूचे वदन पर उन पंजों के निशान पड़ गए थे। कोई चौदह वरम हुए, मुझे एक छोटो-मी लडकी की चिट्ठी आई थी : "मेरे से मेरे मा-याप के चेहरे खो गए हैं। एक रहमदिल स्त्री और उसके पति ने मुझे अपने घर आसरा दिया हुआ है । वे मुझे अपनी बेटी कहते हैं। मैं उनका सादर करती हूं, उनका कहा नही टालती। पर अपनी सोई हुई मां का चेहरा ढूंढती रहती हूं। तुम्हारी रचनाओं में मैं तुम्हें देखती हूं तो उसमें से मुझे अपनी मां का झांवला पड़ता है..." इस वालिका की झोली मे जितना प्यार डाल सकती थी डाल दिया-और इन वरसों में प्यार और विश्वास की जड़ें दूर-दूर तक फैल गई थी। पिछले दो वरसों से कुछ गुमनाम चिट्ठिया मुझे मानसिक तौर पर बहुत परेशान कर रही थी। उन चिट्ठियों मे मुझसे रपया मांगा जाता मेरे अपने सपने .."मैं वीमार और हैरान''डॉक्टरों की दवाइयों से रातों की नींद मांगन गी थी.. कभी सोच नहीं सकती थी कि प्यार और विश्वास की जड़ों को न्दर-अन्दर कोई घुन खा रहा था और एक दिन वह सारा पेड़ गिर पड़ा। मुझे लगा, उस पेड़ के नीचे आई मेरी हड्डियों को जरव आ गया था जोड़ जगह से हिल गए थे-ये चिट्ठियां मुझे वही लड़की लिखती रही, जिसकी बाल-बोली में मैंने कभी प्यार डाला था। यह वही दिन थे जब मुझे ज़ख्मी हाथ का सपना आया। स्कूल की इमारत -और स्कूल की अध्यापिकाएं-शायद इसलिए कि वह लड़की भी अब एक स्कूल की अध्यापक थी... २. मौत की मांग दूसरा भयानक सपना था-शीशे के आगे खड़ी थी, शीशे में दिखती अपनी शक्ल से सवाल किया-"क्या अभी भी जीना होगा ?" "हां!" , "नहीं, अब हिम्मत नहीं, बहुत थक गई हूं। तू मेरे खत्म हो जाने में मे दद कर!" शीशे में दिखती मेरी शक्ल कितनी देर तक मेरी ओर ताकती रही, ताक रही और फिर उसके हाथ हिले, मेरी ओर बढ़े, मेरी गर्दन को छुए, पकड़ सख्त हो गई, हाथ और कस गए, मेरी सांस रुकने लगी, और फिर मेरी सांसों से मेरी आंख खुल गई ''यह शायद मेरे होंठों पर मौत की मांग थी ३. गीत के स्वर "और नहीं जिया जाता, बहुत थक गई हूं।" मैं सपने में कह रही "पर तेरा गीत : चानन दी फुलवारी".""वर्मन कह रहा था। "हां, पर मैं क्या करूं इस गीत को ? मुझसे अब इस फुलकारी तोपा नहीं भरा जाता। देख मेरी उगलियो"इनमें सुइयों ने सुरा "तू नहीं मर सकती, अभी तो इस गीत को स्वर देना है। मेरे उंगलियों के सुराख भर जाएंगे।" चार बरस "तू वर्मन""मेरे गीतों को स्वर देगा?" "हां" वर्मन के इकरार से मेरी नीद खुल गई। और दूसरे दिन जब मैं स्टूडियो मे गई (उन दिनो में आकाशवाणी के पंजाबी विभाग में नौकरी करती थी), रामसरन दास पिआनो बजाता मेरे उसी गीत को स्वर देता जैसे बर्मन का इकरार पूरा कर रहा था। और पिआनो के पास खड़ी होकर मुझे लगता रहा, मेरी उंगलियों के सुरास भर रहे हैं। मुझे अभी जीना है, अभी मुझे रोशनी की फुलकारी में कई तोपे भरने हैं... ४. आत्मविश्वास देखा, मेरे इर्दगिर्द पाच शेर हैं। एक सघन भयानक जगल है और वे मेरे गिर्द ऐसे घरा डालकर चलते हैं, जमे मेरा पल-भर को भरोसा नहीं करते। चलती रही पता नहीं कितनी राह, और फिर मैंने उन्हें कहा, अगर वे मुझे थोडे से पलों के लिए एक छोटी-सी पहाड़ी के पीछे अकेले बैठ लेने दें-मैं एक गीत लिम्बूगी। उन्होंने मान लिया, मुझे कागज दे दिया, कलम दे दी, और सुद पहाड़ी के पास जैसे पहरा देने बैठ गए। जैसे ही पहाड़ी के पीछे गई, देखती हूँ एक छोटी लाल ईटों का बना हुआ मकान हैं। मकान के अन्दर गई। इसमे कोई नही बसता दिखता। पर मकान के खिडकी-दरवाजे सावुन है। भीतर की सभी कुण्डियां ठीक हैं। और मैंने उस मकान के भीतर जाकर सभी कुण्डिया बन्द कर ली। कुछ देर के बाद मुना कि बाहर दौरों के गरजने की आवाज आ रही है। आवाज़ मेरे ममूचे बदन में उतरती जा रही थी, और मैं कापते हायो से बार-बार कुण्डियों को टटोलती थी। पता नहीं कितनी देर हो गई । शेर परेशान थे। दूर-दूर तक दौड़ते, फिर उस मकान के चक्कर काटते, मुझे सोजते... अचानक मुझे भूख-सी लग आई । और साथ ही ख्याल आया, इम मकान में मैं गेरों को पकड़ से तो बच जाऊंगी, पर भूख-प्यास से तिल-तिल करके मरूंगी। घर मे देखा-मूरो फलों के जैसे मम्बार लगे हुए थे और मान की ऊपरली छत पर पता नही ताजे फलो के कितने ही पेड थे। एक जगह सीडिया । मेरे अपने सपने /१०७ . ।
ही अन्दर निचले हिस्से में जाती दिखीं । मैं मकान के उस हिस्से में गई। नीचे एक चश्मा था जिसका पानी एक बड़ी धारा में मकान से वाहर वह था। यह कैसा मकान था -जहां हर एक तरह की हिफाज़त थी, खाने पीने की कोई कमी न थी और फिर मेरे पास कागज़ भी था और कलम रात के इस सपने को मैंने दिन के उजाले में सोचा तो समझा शायद यह मांच शेर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के चिह्न थे। मैं उनसे वचना चाहती थी। उनकी गरज से, उनके पंजों से और वह मकान शायद आत्म- विश्वास का चिह्न था जो किसी चीज़ की कमी नहीं आने देता। वहां सुरक्षा भी थी और तृप्ति भी। . ५. काला गुलाव गाड़ी में सफर कर रही थी। सामने की सीट पर एक बुजुर्ग चेहरा था, वड़ा कोमल और चमकता-सा। लम्बे सफर में मैं कितावों के वरके उलटती रही, और फिर मेरी चुप कितावों ने उस बुजुर्ग को बातों में लगा लिया। उसने से पूछा, "तूने कभी काला गुलाव देखा है ?" कहा, "काला गुलाव "काला गुलाव ? ..'नहीं ।।" वह कहने लगा, "यहां और थोड़ी देर बाद एक स्टेशन आएगा, वहां से एक राह एक छोटे से गांव को जाती है। उस गांव में गुलाब के फूलों का एक वाग है। उस बाग में थोड़े-से लाल रंग के गुलाब हैं, बाकी सारा वाग, क गुलाव के फूलों से भरा हुआ है। "सच?" "तू वह वाग देखना चाहेगी ?" "मैं यही सोच रही हूं. 'काश, मैं वह वाग देख सकूँ!" "उसकी एक कहानी भी है।" "क्या ?" "जो तू वह देखने चले, मैं वहां ही यह कहानी सुनाऊंगा।" !" कहा और फिर एक स्टेशन पर मैं और वह बुन गए। एक लम्बी कच्ची डगर पर चल पड़े, वहां कोई सवारी नहीं जा और फिर सचमुच हम एक वाग में पहुंच गए। इतना बड़ा मो "मैं चलूंगी गुलाब मैंने कभी जिन्दगी में नहीं देखा था। गुलाब की पत्तियों पर से नजर फिसल-फिमल जाती थी। बहुत बड़ा बाग था, एक छोटे-से हिस्से में गहरे लाल रंग के गुलाव थे, और एक छोटे-से हिस्से मे एक सफेद दूधिया रंग के बाकी तमाम मील-मर तक फैला वाग काले स्याह गुलाब से भरा हुआ था। "इसकी कहानी ?" "कहते हैं एक औरत थी, बड़े सच्चे मन से उसने किसीको मुहब्बत की। एक बार उसके महबूब ने उसके वालों में एक लाल गुलाब का फूल टाका। और औरत ने मुहब्बत के बडे प्यारे गीत लिखे। पर वह मुहब्बत असफल रही। उस औरत ने अपनी जिन्दगी समाज को गलत कीमतो पर वार दी । एक असह्य दर्द उसके दिल में पड़ गया। और वह तमाम उम्र अपनी कलम को उस दर्द में भिगोकर गीत लिखती रही। आत्मपीड़ा एक वह नजर होती है जिस नजर से कोई पराई पोड़ा को देख सकता है। उसने अपने दर्द में समूचे इंसानियत के दर्द को मिला लिया और फिर ऐसे गीत लिखे-जिनमें सिर्फ उसका नहीं, दुनिया का दर्द था।" "फिर?" "जब वह औरत मर गई, उसको इस धरती में दफनाया गया-उमकी कब्र पर पता नही किस तरह तीन फूल उगे। एक फूल लाल रंग का, एक काले रंग का और एक सफेद रंग का।" "अजीब बात है !" "और फिर वे फूल खुद ही बढ़ते गए। न किसीने पानी दिया, न किसीने रखवाली को। और धीरे-धीरे यहा एक फूलो का बाग बन गया। अब तूने अपनी आंस से देख लिया है, एक हिस्से में लाल रंग के गुलाब हैं, एक हिस्से मे सफेद रंग के, और बाकी सारे हिस्से में काले रंग के।" "लोग क्या कहते हैं ?" "लोग कहते हैं, उस औरत ने जो मुहब्बत के गीत लिने, वे लाल गुलाब बन गए हैं और जो दर्दो के गीत लिखे वे काले गुलाब हो गए हैं और जो उसने इंसानो प्यार के गीत लिसे, वे सफेद गुलाब बन गए हैं।" सिर से पैर तक मुझे एक कंपकंपी आई और मैंने उस वुर्जुग से पूछा, "आपका नाम क्या है?"
"मेरा नाम ?.."मेरा नाम 'समय।" " 'समय'! तू मेरी कहानी ही मुझे सुना रहा है ?" और समय की मुस्करा- हट से और मेरी अपनी कंपकंपी से मेरी नींद खुल गई। उस वरस के अन्त में (१९६० में) मैं एक साइकेट्रिस्ट के इलाज में रही। अपने-आपको जानने के लिए, उसके कहने के मुताविक रोज़ के खयालों और सपनों को कागज़ पर लिखा करती थी। उन दिनों के अजीवो-गरीब सपने जो डॉक्टर के पढ़ने के लिए लिखे थे, ये हैं : । १ । - किसी बड़ी ऊंची इमारत के शिखर पर मैं अकेली खड़ी होकर अपने हाथ में पकड़ी हुई कलम से बातें कर रही थी, "तू मेरा साथ देगी?--कितने दिन मेरा साथ देगी?" अचानक किसीने कसकर मेरा हाथ पकड़ लिया। "तू, छलावा है, मेरा हाथ छोड़ दे !" मैंने कहा और जोर से अपना हाथ छुड़ाकर उस इमारत की सीढ़ियां उतरने लगी। मैं बड़ी तेज़ी से उतर रही थी, पर सीढ़ियां खत्म नहीं हो पा रही थीं। मेरी सांस उतावली हुई जा रही थी कि अव पीछे से आकर वह छलावा मुझे पकड़ लेगा। अन्त में सीढ़ियां खत्म हो गई, पर नीचे उतरकर देखा, हर तरफ बाग ही वाग थे, और ज़मीन का चप्पा- लोगों से भरा हुआ था। ये वाग भी उसी इमारत का हिस्सा थे और वहां लोगों का मेला लगा हुआ था। किसी तरफ लोग नाटक खेल रहे थे, किसी तरफ कोई मैच । पता नहीं कहां से मेरा पुराना साइकिल मुझे मिल गया और मैं साइकिल पर चढ़कर बाहर जाने का रास्ता ढूंढने लगी। वागों के किनारे- किनारे साइकिल चलाती मैं जिस भी तरफ जाती, वहां आगे पत्थर की दीवार आ जाती और मुझे बाहर जाने का रास्ता न मिलता। मैं फिर किसी और तरफ साइकिल मोड़ती, पर वहां भी अन्त में दीवार आ जाती, और मुझे बाहर जाने का रास्ता न मिलता-इसी घबराहट में मेरी नींद टूट गई। । २ सफेद संगमरमर का एक वुत मेरे सामने पड़ा हुआ था। मैं उसकी ओर देखती रही, देखती रही और फिर मैंने उसे कहा, "मैं तेरा क्या करूं! न तू बोलता है, न सास लेता है ! आज मैं तुझे तोड़ दूगी, टुकड़े-टुकड़े कर दूंगी। तूने मेरी सारी उग्र गवा दी है ! मेरा तमन्बुर, तू मेरा आदर्श!" और जब मैंने जोर लगाकर उस युत को परे फेंका, मेरे अपने ही जोर से मेरी आग मुल गई। ३ मैंने देसा, मेरे पास एक लडकी खडी हुई थी। कोई बीम बरन को होगी। पतली-लम्बी और उसका नैन-नक्श जैसे किसीने बड़ी मेहनत से गढ़ा हो । पर उसका रंग काला और चमकदार था जैसे किमीने एक काले पत्यर को तराश- तरागकर एक वुत बनाया हो । “यह कौन है ?" मुझे किसीने पूछा। "मेरी बेटी !" मैंने जवाब दिया। पूछने वाला कोन था, यह मुझे पता नहीं, पर उसने फिर हैरान होकर पूछा, "मैंने तेरे दो बच्चे देखे हुए हैं, वे बहुत सुन्दर हैं। सुन्दर तो यह भी है, पर इसका रग..." कहा, "वे दोनो छोटे हैं। उनका रंग गोरा है । यह मेरी सबसे बड़ी बेटी है "तुझे पता है पार्वती ने एक बार अपने वदन की मैल इकट्ठा करके एक पुत्र गणेश बना लिया था। मैंने अपने मन के तमाम रोप को बटकर यह बेटी बनाई है.. मेरी कला मेरी रचना..." ४ मैं एक उजाड़ में से गुजर रही थी। मुझे किसीकी शक्ल नजर नही आई, पर एक आवाज आई। कोई गा रहा था। "बुरा कोतोई साहिवा मेरा तरकस टंगिओ ई जंड!"मैंने उजाड़ में खड़े होकर चारो ओर ताका और पूछा, "तू कौन है ?" जवाब मिला, "मैं वहादुर मिरजा हूं! साहिबा ने मेरे तीर छुपा दिए और मुझे लोगों के हाथ से विन आई मौत मरवा दिया।" मैंने फिर चारो तरफ देखा, पर मुझे किमीकी शक्ल नजर न आई। जवाब दिया, "कभी-कभी कहानियां करवट बदल लेती हैं, आज एक मिरजे ने मेरे तीर छुपा दिए हैं और मुझे एक बहादुर साहिबा को अन आई मौत मरवा दिया है।" ५ वादल बडे जोर से गरजे | ममूचा आममान कांप रहा था। और फिर हाथ पर बिजली गिर पड़ी। मेरे जिस्म को एक सख्त झटका मैंने संभलकर अपने हाथ को हिलाकर देखा । हाथ बिलकुल ठीक था। # एक जगह से थोड़ा खून बह रहा था जैसे एक खरोंच आ गई हो। दूसरी र फिर विजली कड़की और मेरे उसी हाथ पर गिर पड़ी। फिर एक सख्त टका लगा और मैंने जब हाथ को हिलाकर देखा, वह विलकुल साबुत था; सिर्फ एक जगह ऐसे था, जैसे थोड़ी-सी रगड़ आ गई हो। तीसरी बार फिर आसमान फट गया और मेरे उसी हाथ पर विजली गिर पड़ी। सस्त झटका लगा। पर उसके बाद मैंने जब हाथ को हिलाया तो हाथ हिलता जरूर था, पर एक उंगली टेढ़ी हो गई थी। मैंने अपने दूसरे हाथ से उस उंगली को दवाया, बार-बार भींचा, और वह सीधी हो गई, अपनी जगह पर हो गई-मैंने अपने हाथ में कलम पकड़कर देखी, मेरा हाथ विलकुल ठीक था, मेरी कलम अब भी लिख रही थी, जागी तो मेरे मन की हालत वादलेअर के मन सरीखी थी, जब उसने 'सुन्दरता का विरद' लिखा था ! तू ऊंचे आसमान में से उतरी है, कि गहरे पाताल में से निकली है तेरी चितवन निरी शराब, दैत्यमयी भी और देवमयी भी। तेरी आंखों में सांझ भी और सवेरा भी। तेरी सुगन्ध जैसे शाम की अंधेरी सी। तेरे होंठ, दारू का एक चूंट, तेरा मुंह एक जाम तू किसी खोह खन्दक में से उभरी है कि तारों में से जन्मी है ? तू एक हाथ से खुशी वीजे, दूसरे से तबाही तेरे गहनों की छनक कितनी भयानक ! तेरा आलिंगन, जैसे कोई कव में उतरता जाए- - सपने और कविताएं अपनी कलम के प्रारम्भिक वरसों में मैंने कई नज्में सपनों में लि कइयों की कुछ पंक्तियां जागकर याद रह जाती थीं, कश्यों की पंक्ति । पर एक नज्म पूरी की पूरी याद रह गई थी, जोजागकर कागज पर उतारी थी। वह नरम यह है : से अपने चार वरत यह सारी रात तेरे ख्यालों में बिताकर मैं अभी-अभी जागी हूं सातो बहिश्तें देखकर यह रात जैसे कुछ रहमत-सी वरसती रही यह रात तेरे वायदों को पूरा-सा करती रही पछियो की तरह उडते कितने ख्याल आते रहे मेरे होठ तेरे मासो की महक को पीते रहे दीवारें बहुत ऊची हैं, रोशनी दिसती नहीं यह रात सपने सेलती है और कुछ कहती नही इस नज्म मे जागने का जिक्र भी है, पर यह जागना मपने में जागना है, सपने का हिस्मा। सपना यह था कि जिस किसीको बरसों चुपचाप मुहब्बत करती रही यी उमे सपने में देखा था। सपने मे मुझे बुखार चढा हुआ था, और उसने मेरे तपते माथे पर आहिस्ता से हाथ रखा था। वही चुपचाप चेहरा। "मैंने सोचा था तुम कभी नही आओगे !" मैंने उससे पूछा तो उसने जवाब दिया, "मैं जानता था मैं आऊगा।" और इसके बाद न मेरे होठों पर कोई लफ्ज आया था, न उसके होठों पर, और शायद यही वक्त था जब मैं जाग गई थी (सपने मे) और एक नरम लिखो यो । जब वास्तव में जागी तो वह सारी की सारी नरम मेरे होठो मे छलक रही थी। जिस सपने मे जागना भी सपने का हिस्सा होता है उसको स्वप्नान्तर कहते हैं। अपनी एक नरम मैंने जिस सपने के वाद लिखी थी उस नरम का और सपने का जिक्र मैंने अपनी 'काला गुलाब' नामक किताब में इस प्रकार किया था: "एक रात के मपने में मैंने देखा कि एक जंगल फूलों से भरा हुआ था, जिसमे एक फूलो से लदे हुए पेड़ पर एक कुकनूम बैठा हुआ था, और वह गा रहा या। ज्यों-ज्यों गीत ऊंचा होता गया, कुकनूस की आवाज में एक मिठास और एक तलखी पैदा होती गई। इतनी कि वह एक आग की लपट बन गई । आग की यह लपट ऊंची होती गई और सारे का सारा कुकनूस जलने लगा । कुकनुस के पंखों में से आग की कई लपटें निकलने लगी। आग के सेंक से मेरी नींद खुल गई । मेरा माया, मेरे हाय, मेरा समूचा मेरे अपने सपने / ११३ वदन जल रहा था। इस सेंक से मैंने एक गीत लिखा: लिख जा मेरी तकदीर को मेरे लिए मैं जी रही तेरे विना तेरे लिए उम्र भर का इश्क वेआवाज़ है हर मेरा नग़मा मेरी आवाज़ है लपज़ मेरे तड़प उठते इस तरह रात को तारे सुलगते जिस तरह चीरकर सपनों को तू आजा ज़रा रात बाकी बहुत है न जा जरा कुकनूस दीपक राग को अव गाएगा इश्क की इस लपट पर जल जाएगा राख ही इस राग का अंजाम है कुकनूस की इस राख को प्रणाम है। कई महीने यह सपना, कई महीने यह जलन--यहां तक कि मैं पैरों में चप्पल न पहन सकी, पैर जलते, कच्ची मिट्टी पर पानी छिड़ककर मैं अपने दोनों पैर रख लेती..." 'काला गुलाब' में एक और सपने का, एक नज़्म का, और मेरी खुद की ई उसकी एनलेसिस का जिक्र इस तरह है : "कोई बरस-भर थोड़े-थोड़े दिनों के बाद मुझे एक सपना आता रहा- अथाह, अपार समुद्र मुझे अपनी ओर बुलाता है, आवाज़ देता है, 'देख मेरी वाहें कितनी विशाल हैं, कितनी कोमल और कितनी मजबूत, मैंने तेरे लिए दोनों वाहें पसार रखी हैं..'मेरी छाती कितनी चौड़ी, कितनी नर्म..." समुद्र के किनारे एक होटल का कमरा लेकर मैं कई दिन वैठी रही और समुद्र को देखती रही । एक नज्म लिखी, उसके बुलाने के जवाब में : तुम्हारे पास अनेकों लहरें हैं यह कैसी रात है और कैसा चांद आज मेरे दिल में ज्वार उठ रहा है तुम्हारे पास अनेकों मोती हैं और चौदह रत्न भी देखो अपनी एक सीप में मेरे दिल की बात संजो लो X x किनारो में रिश्ता तोडकर इसका यात्री अकेले पल पहा यह 'आज' कसे नाव है और 'कल' कैसा टापू होगा दिल के पानी में लहर उठी और एक सफर लहर के पांव से लिपटा हुमा देखो किरणें हमें बुलाने आई है कह रही हैं, चलो, सूरज फे पर पलो। इसमें एक बात जो मैंने समुद्र से यही कि अपनी एक सीप रागोगे, यह बात है कि अगर तू मेरे जिस्म को अपनी बाहो में भार भी रो तो भी मेरे दिल को वह भालिंगन नहीं मिलेगा-जो मेरी उराण्ठा है (मेरे मस्सूर की बाहो की छुअन)।आज धरती के फिनारे से मेरे 'आज' की नाप ने आतीगी खोल ली है, और इसमे मेरा इश्क अकेले यासी की तरह पठाहमा है..." एक और मेरे सपने का, और नाम की दो पंक्तिमा गपने लिषो मा और बाकी जागकर लिखने का जिक्र 'काला गुलाब' में प्रग सरह है: "सपना आया---एक रैगिस्तान है-मीलों पर रेस मटा हुआ है मी. उग रेगिस्तान में एक मरान बना हुआ है । उस मकान के दरवाजेपर एक औरत खड़ी हुई है उसका नाम है जिन्दगी। इस सरह की हार मभी गिी पोरन के मुंह पर नहीं होगी, जमी हार उसके मुह पर है। उगरे पहरे पगला मे वह वरमों से उम रेगिम्नान को देख रही हो, और कभी उगका महाय उग राह से न गुजरा हो बरगी में फल पकते और भारत ही 1 और प्रया थप गई हो, बहन थक गई हो और फिर उग योग ने गोरा, यह पर दरवाजा बन्द कर लेगी-हमेगा के लिए और कभी गिाली गहनती सामग मैं पता नहीं मे वहा पहुंची। नहीं जानती जो मुछ उगक मन मा, - मैं जान पाई, पर मैंने उस औरत का हाथ पकड़ लिया। मेरे मुंह पर एक मुस्कान थी, एक चमक थी, मैंने उसे कहा: जिन्दगी का द्वार मत बन्द करो, अपने विश्वास की लाज रख लो। देखो मरुस्थल से कदमों की आवाज़ आ रही है। और में भी उसके पास खड़ी होकर रेगिस्तान की ओर ताकने लगी मेरे कानों में किसीके कदमों की आहट आ रही थी। कई वरस हो गए थे, जब मैं सुबह जागती थी, मेरा अंग-अंग जैसे थका हुआ होता था, मेरे सिर में एक तेज दर्द हो रहा होता-उस दिन जब मैं जागी लगा, मैं कभी इस तरह नहीं जागी थी। अंगों को जैसे पंछियों के पंख लग गए थे..." समूचा सपना याद आया। सपने में कही दो पंक्तियां याद आई.-और मैंने उस समय कागज-कलम लेकर एक पूरी नज्म लिखी। एक नज्म का अलौकिक अनुभव एक वार मैंने नाम लिखी थी 'नो सपने'. ये सपने मैंने नहीं मेरी कल्पना ने देखे थे, अपने लिए नहीं, सिक्ख इतिहास की पात्र तृप्ता के लिए । गुरु नानक का जन्म तृप्ता की कोख से हुआ था। मैं इतिहासकार नहीं, सो नानक-वार्ता इतिहासकारों के जिम्मे छोड़कर मैंने सिर्फ उन नौ महीनों की वार्ता लिखी थी जव नानक जैसा वेटा मां के गर्भ में था। लगा, एक साधारण मां, साधारण वच्चे की रचना करते हुए भी अगर नौ मास के लिए एक छोटा-सा भगवान हो सकती है, तो नानक सरीखी रूह को जन्म देते हुए एक मां कैसा भगवान रही होगी! सो, गर्म के नौ महीनों की रचना के नौ महीनों की कल्पना करके मैंने तृप्ता के नौ सपने लिखे थे। जैसे दुनिया का प्रसिद्ध चित्रकार वानगॉग लिखता है कि कभी-कभी किसी वढ़िया किताव को पढ़कर दीवानगी का एक आलम छा जाता है। मैं असीम हो जाता हूं, शक्लें, तसवीरें मेरे सामने इस तरह आती हैं जैसे कोई सपना आ रहा हो "उसी तरह मां तृप्ता के सपने लिखते समय, सपनों की सारी क्रिया मेरे सामने शून्य में उभरते और मिटते आकारों की तन्ह आई थी। हर महीने गर्न के बदलते चिह्नों के अनुसार ये सपने अपना आकार बदलते दिने । तृप्ता - कलपने अपने चारवरम को गर्म की पहली रात अपने पति की सेज से उठते हुए देखने में लेकर उसके बदन में मे उठती प्रमूर्ति की पहली पीहा तक । बच्चे को कोख मे धारण करने वाला पहला पल नरम में मा तृप्ता का अलौकिक सपना है -जब वह नदी में स्नान करती है और नदी में तैरते चांद को हथेलियो में लेकर पानी का घूट भरती है। और चांद का प्रकाग उसकी कोख में हिलने लगता है। गर्म का दूसरा महीना दूसरे सपने जैसा है, जब उसको अपनी कोख में एक घोंसला बनता-सा लगता है । और उसे आभास होता है कि तपस्वियों को भगवान के दर्शन पता नहीं कमे और किम जगह से होते हैं, पर एक मां को जरूर अपनी कोस में से होते हैं । तीसरे महीने के तीसरे सपने में उसका जो मितलाता है, वह घडिया में दही मथती है और मक्खन निकालने के लिए जब घड़िया में हाथ डालती है तो घड़िया में में मूरज का पेडा निकलता है... चौथे सपने में वह गेहूं को फटकने के लिए मूप में डालती है, तो हाथ में पकडा हुआ मूष गेहूं के दानों की जगह तारो से भर जाता है। (यह चीया सपना मि कल्पना की करामात नहीं थी, तारो का भरा मूप मैंने नीद के सपने में देया था। और मेरी सुद ही तागे की रोशनी से चौरकर नीद टूट गई थी। और यह भी माक्षात् सामने था कि वह मूप मेरे हाथ में नहीं था, तृप्ता के हाथ में था। में मिर्फ उमकी दर्शक थी।) पांचवां सपना जल-पल में से उठते एक नाद का सपना है। जिम नाद को सुनकर तृप्ता सोचती है कि यह मोह काया-माया का गीत है कि भगवान की काया का मंगीत है । इसी सपने में उसे अपनी नाभि में से सुगन्ध आती है और यह हिरणो की तरह कस्तूरी को मुगन्ध ढूढती बनो में दौड़ती है और कभी अपनी कोख में अपने कान लगाती है... छठे महीने जब गर्भ का बच्चा कभी हिलता-दुलता है, वह मपने में मरोयर के किनारे उतरता एक हम देखती है और उमे जागकर भी लगता है कि सपने में देसे हुए हम का पंख मचमुच उसको कोस में हिल रहा है... सातवें महीने में उसकी झोली में कोई नारियल डालता है, निमे तोड़कर वह मारे जगत् में गरी वांटती है, पर नारियल वी गरी नही खत्म होती । और, 1 ... जव जागती है नारियल का पानी उसकी छातियों में दूध. की तरह भरा लगता है इस सातवें सपने का नारियल ज़रूर मेरे अचेतन मन में पड़ा हुआ शगुन का चिह्न होगा, क्योंकि पुरानी रीतियों-रिवाजों के अनुसार औरत की झोली में नारियल डालना उसके लिए पुत्र की कामना करना होता है । पर आगे जगत् में गरी बांटने का और गरी के न खत्म होने का चिह्न मेरे चेतन मन की सोच है, जिसको मैंने ज्ञान के साथ जोड़ा है, जो वांटने से खत्म नहीं होता। आठवें सपने में भी तृप्ता अपने बच्चे का कुर्ता बनाने के लिए सपने में चरखा कातती है, तो पूनी में से सूत के तारों की जगह पतली, लम्बी और चमकती किरणें निकलती हैं। यह ज़रूर मेरे चेतन मन की कल्पना है, जिसके द्वारा मैंने तृप्ता को हो रही ज्ञानप्राप्ति की कल्पना की है कि मोह के तारों में आसमान नहीं लपेटा जा सकता। यह तो कोख में सच-सी वस्तु है, और सच- सी वस्तु को किसी चोले में नहीं लपेटा जा सकता। इस सपने में तृप्ता अपनी कोख के आगे माथा झुकाती है और कुदरत का यह भेद जान जाती है कि यह तो कोई अनादिकाल का जोगी है, जो मौज में आकर मेरी कोख की धूनी सेंकने वैठ गया है। इसी आठवें सपने में तृप्ता मोह और वैराग्य का अनादि रहस्य प लेती है। नौवां सपना प्रसूति की पहली उठती पीड़ का है-जब उसे कोख की धू में से आग की पहली लपट उठती दिखाई देती है और उस रोशनी के तिनके उसकी देह दीये की तरह प्रज्वलित हो जाती है। इस नज्म को न मैं निरे रातों के सपने कह सकती हूं, न मेरी जार अवस्था की कल्पना। यह अनुभव मुझे ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार हुआ है, इसमें मैंने एक वह अवस्था देखी है जब सोने और जागने का भेद मिट जाता एक चेतनता जो सोते हुए भी बनी रहे, और एक अचेतन अवस्था जो जागते भी बनी रहे। -- बीस बरस लम्बा एक सपना इमरोज़ मेरी ज़िन्दगी का पहला वाकिफ इंसान था, जिसे मैंने अपने से अपने चौदह बरसों की असफल मुहब्बत की कहानी सुनाई थी। उसने ११८ / अपने-अपने चार बरस चाप कहानी सुनी, और मैं हैरान-सी रह गई, जब उमने उठते समय सिर्फ इतना कहा, "जो मैं उमकी जगह होता...' सिर्फ इतने अक्षर, और उसने आहिस्ता में यह बहकर आगे नीमी करसी थी। पता नहीं मेरे अन्तस् के किस सेंक से उसका चेहरा पिपल-गा गया था। फिर वह चुपचाप चला गया। और नमाम दिन उमका पिघला पेहरा मुगे दिखता रहा । उस रात मुझे सपना आया था-मैं बीमार ह, यह मंगे पासाई के पास आकर महा हो गया है, उगने मुझे एक गहरी नजर से देगा, और थोड़ा-मा आगे झुककर कहा, "क्या मैं गाहिर नही बन गाना ?" उमने सीधा उगमा नाम लेकर कहा जिम गाथ मैंने अपनी अगफल मुहब्बत की बात मुनाई थी और मैं चोककर गपने गे जाग गई। इससे पहले मैंने चैनन मन में कमी इमरीज को माहिर की जगह पर ग. कर नहीं गोचा था। यह मेरी पहली गोच थी, जो मेरे अपंतन मन ने मुहग बोलकर कहीं। मेरी जवानी नहीं, गायद अर्चनन मन राकुना गया था, उगने इमरोज़ की जवानी कही। अगले वरमों में इमरोज ही मेरी जिन्दगी की हकीकत बना। पर यह मपना आने वाली जिन्दगी का में पहला दगारा था। एक होनी की भविष्यवाणी जैमा। १९७७ में मैंने एक नम लिया था लिविंग विद इमरीज' यह 'यूथ टार' के मिनम्बर १६-२६ अंक में छपा था। उममे मैंने अपने उम गपने पिक किया था, जो वरीब वीम वरग मुझे मगातार आता रहा था कि यहीं पाई मकान है, दोमंजिला। में मीडिया चार दूसरी मंजिल पर पहुंचती हैं मो देखती हूं-वहां कोई कनयम पर पेस्ट कर रहा है। वह मेरे लिए बिल अर. नबी है. पर वह मुझे देखकर हेगन होता है, फिर मुझे अपनी कनवग दिलाता है, निमार हू-ब-ह मेरी तमवीर है। यह मपना वरीबन हर बार एर जैसा होता था, मिमद होने, बंटने के योड़े-योई फर्क के माय। मान हमेगा वही हमारता पा, प्रिमरीतुमर्ग मंजिल की मिड़की एर जंगल की तरफ देखती थी। मिकी में बाहाने पर मिर्फ पेड़ दिसने ये, या एक नदी - वहां दूसरी मंजिल पर उस अजनवी को देखकर अजीव सकून आता था- उसका सांवला, उदास और गंभीर चेहरा। और लगता था सारी उम्र से मैं उसे ढूंढ रही थी । और वह वहां बैठा बरसों से मेरी इन्तज़ार कर रहा था। पर यह सपना इमरोज़ से मिलने के बाद कभी नहीं आया। जो घटना कभी जिन्दगी की हकीकत बननी थी, लगता था, उसीकी परछाई मैंने वीस वरस पहले देखी थी, और फिर लगातार वीस वरस तक देखती रही। आज अपने इस सपने की बात करते हुए मुझे प्रसिद्ध रूसी लेखक बोरिस पास्तरनाक का वह सपना याद आया है--जिसे वह अपनी ज़िन्दगी का सबसे उदास सपना कहता था। वह सपना यह था कि एक विलकुल मूना मैदान है, जिसे देखने से ही अहसास होता है कि मारवर्ग शहर दुश्मन के कब्जे में है। यह दिन का एक ऐसा अंधेरा समय है, जो वास्तविक जीवन में कभी नहीं होता। लोग एक अजीव खामोशी में लिपटे हुए हैं, जिस तरह ज़िन्दगी में कभी नहीं होते। और पास्तरनाक को आने वाला यह सपना सचमुच माने वाली जंग का सपना था। कोई सपना भविष्य की किसी घटना का सूचक हो सकता है, मैं नहीं जानती, सिर्फ जानती हूं कि मेरा वीस वरस लम्बा सपना सचमुच एक दिन मेरी जिन्दगी की हकीकत वन गया। शायद इसका कारण सिर्फ यह हो कि पास्तर- नाक के लपजों में "कोई दृढ़ विचारों का आदमी जब अपने किसी निजी कानून पूर्ति चाहे तो कई बार कुदरत मजबूर होकर अपना कानून भंग कर देती है"--और शायद जो मेरी ज़िन्दगी का असम्भव था, वही मेरे वीस बरसों की जिद को देखकर संभव हो गया। : अपने पात्र : अपने सपने शायद और लेखक भी इस तरह करते होंगे, पर मैंने कई वार किया है कि अपने सपने, अपने नॉवलों में अपने पात्रों के सपने बनाकर लिखे हैं। आज सपनों की बात करने लगी हूं तो एक अजीव वात सामने आई है कि जिन दिनों में कोई नॉवल लिख रही होती हूं, उन दिनों मुझे एक ऐसा अजीव सपना क्यों जाता है, जो वास्तव में मेरे नॉवल के पान को आना चाहिए। नहीं तो नॉवल के पात्र-निर्माण में मेरा सपना कैसे उसकी सोच का हिस्सा बन सकता १२० / अपने-अपने चार बरस है ? शायद मैं पात्र के साय इतनी एकजान होती हूं कि मैं खुद उनकी जगह सपने में में गुजरती हूं। पता नहीं। पर अपने कुछ वे सपने जहर गिन सकती हूं जो मैंने अलग अलग समय अपने नॉवलों में डाले थे। मेरे पहले नॉवल 'डॉक्टर देव' मे उमको मुख्य पान ममता जब अपने महबूब और अपने बच्चे से जबरन अलग कर दी जाती है और जिसके कारण उने बाद में अपने साविद और अपनी बच्ची से भी बिछुडना पड़ता है, यह एक स्कूल में नौकरी करते हुए अपने एकाकीपन को ऐसे कबूल कर लेती है कि एक दिन सपने मे उमका कमरा बहते पानी जैसा हो जाता है, और कमरे का पलंग एक किश्ती की तरह । वह अकेली किश्ती में बैठी हुई पानी के बहाय में यह रही है। वारी-बारी किनारे पर सबको देखती है-अपने माविंद को भी, अपने महबूब को भी। और उन परछाइयो को आंखें भरकर वारी-बारी से विदा पहनी है.."किनारे की भीगी रेत पर सहे बच्चों को भी देखती है, और कोप- कर मिर नीचा कर लेती है। यह सपना नामों के फर्क मे मुझे आया था। लेकिन एक अजीय बात है कि यह मपना मुझे १९४६ में आया था। पर यह मन की जिम हालत में से गुजरता है, वह हालत मैंने अपनी जिन्दगी मे १९६० मे देसी। यह जिन्दगी के हादसे से ग्यारह बरस पहले किस तरह आ गया, यह मैं बाज तक नहीं समझ सकी। भेरा नॉवल 'एक मवाल' १९५६ में प्रकाशित हुआ था, जिसका पात्र चित्रकार जगदीप अपनी महबूब को नही पा सकता। पर अपनी कला के द्वारा शोहरत जरूर पा लेता है। यह उदास है, और एक रात जलपरी-गी मोहरत, सीप सरीखे बदन वाली, और पानी की बूदों को पोशाक पहने, उसके सपने में आकर उससे बात करती है. यह मपना भी मेरा निजी सपना था, जो मैंने अपने पात्र जगदीप या मपना लिसा था। वर, उन दिनों मेरी और जगदीप के मन की हालत एक जैसी थी। जो उदासी उमको अपना नमीय लगती थी, वही मुझे। जानती हूं, कई बार मैं अपने पात्रों से इस तरह एकप्राण हो जाती कि मेरा चेहरा उनके चेहरो में समा जाता है। देविन्दर नं १६६६ में कविता पर एक रिताब लिखी थी 'बलम दाभेत', उमने गाई पक्ष में - पूछे थे, जो उसकी किताब का हिस्सा बने थे। तब एक सवाल का जवाब देते हुए मैंने कहा था, "'डॉक्टर देव' नॉवल की गमता, 'घोसला' नावल की नीना, एक सवाल' नॉवल की रेखा, मैं खुद चाहती थी जिन्दा रहें, पर वे जैसे जीने के लिए बनी ही नहीं थीं। वे दोनों तरफ से शमां की तरह लट-लट जली और फिर खत्म हो गई।" यह मेरे पान, जानती हूं मेरी कल्पना होते हैं, पर समय पाकर यह मेरे लिए भी हकीकत बन जाते हैं। इतनी कि यदि कहीं देखू तो झट पहचान लूं। उन दिनों मुझे एक सपना आया, जिसमें मेरे 'घोंसला' नॉवल की नीना मेरे सपने में आकर मुझसे लड़ी थी। वह सपना मैंने देविन्दर को सुनाया था, और उसने अपनी किताब में दर्ज किया था। वह सपना था : “एक दिन नीना ने मुझसे यही बात पूछी थी। पतले-से, सांवले-से, कोमल-से मुंह वाली नीना। बड़ी बिलखकर पूछने लगी, 'मेरी कोई उम्र थी इन दुखों के लिए? मेरा कोई मुंह था इन आंसुओं के लिए ? तूने मेरी कहानी ऐसी क्यों गढ़ दी ? मैं रोती रहूं, तुझे अच्छा लगता है ? यह तूने मेरे साथ क्या किया ?" और मैंने देविन्दर को कहा था, "मैं नीना को क्या जवाव देती, मैं तुम्हें भी क्या जवाब दूं। मुझे तो ऐसा लगता है कि शायद मेरी होनी मेरे पात्रों को लग जाती है।" सो पता नहीं लगता मेरे पान किस समय मेरे दर्द को अपने जिम्मे ले लेते हैं। और पता नहीं किस समय अपना दर्द मेरी हथेली पर रख जाते हैं। मेरा नॉवल 'जलावतन' १९७० में छपा था। उसमें एक नामुराद आशिक सपने में सूरज से टूटकर धरती पर गिरी हुई किरणों को चुनता है-~-गर्म और चमवाती। कोई किरण गड्ढे में गिरी होती है, कोई पहाड़ी ढलान पर, वह अकेला जंगल में जाकर इन किरणों को चुनता है । यह भी जानता है ये किरणे इंसान की सोचें हैं, उसके सपने, जो रोज झड़ते हैं, और इनको अब जमीन से उठाने पर कुछ नहीं बनेगा। ये किरणे हाथ में लेने से तिनकों की तरह हो जाती हैं, पर वह किरण चुनता है... यह नॉवल लिखते हुए मेरे मन की हालत नॉवल के पान जैसी नहीं थी, 'पर यह सपना मुझे आया था, शायद मेरे पात्र की जगह आया था। . अपना नया नविल 'तेरहवां सूरज' मैंने १९७७ में लिखा था। लिख रही १२२ / अपने-अपने चार वरस थी-जब एक रात सपना आया कि मेज पर लिखकर रखा कागज हवा ते उड़- कर मेज के नीचे गिर पड़ा है। मैं जब झुककर कागज को उठाती हूं तो देखती हूं-वह साली है। लिसा हुआ कागज कोरा कैसे हो गया? हैरान होती हूं, और फिर फीकी-सी रोशनी मे देसतो हूँ- कागज पर लिसे असर नीचे, मेज के नीचे, गिरे हुए हैं । काले दोनों की तरह । मैं एक-एक अक्षर को दायें हाथ से उठाकर बायें हाथ की हथेली पर रखे जाती है । फिर देखती हूंबायें हाय की होली गीली मिट्टी की तरह हो गई है। मैं दायें हाथ की उंगली से वीजों सरीसे अक्षरों को हथेली मे गडाकर देखती है। वे मास में ऐसे उतर जाते हैं जैसे मिट्टी में दब गए हों। फिर बायों हथेली पर बचे हुए अक्षर मैं दायों हथेली पर पलटती हूं। वह हथेती भी मिट्टी की हो जाती है, और जब बायें हाथ को उंगली से उन्हें दबाकर देखती हूं, तो वै सव दाई हथेली में बीजो को तरह उतर जाते हैं। घबराकर दोनो हाथों को झाड़ती हू. लगता है मिट्टी के हाथ टूटकर नीचे गिर पड़ेंगे। पर हाथ उसी तरह रहते हैं। मैं सूंघकर देखती हूं- दोनों हाथों में से भीगी मिट्टी की मुगन्ध आती है। और फिर देखती हूं- दोनों हथेलियों पर छोटे-छोटे लाल रंग के फूल उग आए हैं। सूपकर देखती हूं- दोनों हाथों से फूलों की महक आ रही है.... यह सपना सारे का सारा मैने नॉवल के पात्र संजय का सपना लिख दिया। अजीय मंयोग या कि वह मेरा पान भी कहानियां लिखने वाला पान था। इस लिए उसे यह सपना आना उसी तरह स्वाभाविक या जैसे मुझे। एक भयानक सपना मेरे बाप को मौत १९४६ में हुई थी, मेरी नजरों से बहुत दूर बिहार में, जहां उन्होंने कुछ जमीन यरीदकर रहनी जिन्दगी के लिए एक सपना समारना चाहा था। पर दिसम्बर १६७५ को मुझे उनकी मौत का एक भयानक सपना आया, जो २८ दिमम्बर के खत में मैंने बम्बई गए हुए इमरोज को लिखा था किरान हमारा दरवाजा जौर से किमोन राटराटापा। कुछ लोग आए (मर- कारी विस्म के लोग) और वह मेरे दारजी को पकड़कर ले गए, और फिर मुबह पता लगा कि उन्होंने दारजी को यही ले जाकर गोली में मार दिय यह दरवाजा खटखटाए जाने वाली रात भी सपने की थी, और म मार देने वाली खबर की सुबह भी सपने की । अचानक यह सपना क्यों आया, मैं इसका कारण कितनी देर तक सोचती रही । अचेतन मन में पड़ी हुई एक शंका भी हो सकती है कि दारजी की मौत शायद कुदरती नहीं थी, क्योंकि जो ज़मीन उन्होंने खरीदी थी, वह मेरी मौसी के लड़के ने जाली दस्तखत करके बेच दी थी, और उन पैसों के बारे में उसने हमेशा के लिए एक चुप धार ली थी। पर एक कारण और भी हो सकता है कि उन दिनों में सोल्जेनिसिन की किताव 'गुलाग' पढ़ रही थी, जिसमें अकसर रातों को लोगों के दरवाजे खड़कते थे, और बड़े मासूम लोग या तो बीस-बीस वरसों के लिए जेल की कोठरियों में डाल दिए जाते थे या उसी रात गोलियों से मार दिए जाते थे। ये दोनों दलीलें वारी-बारी से मेरे अंदर उठती रहीं। एक यह कि लाखों मासूम लोगों की मौत मेरे दिल को इतना हिला गई है कि उनकी मौत मुझे अपने बाप की मौत जैसी लग रही है । और दूसरी दलील यह थी कि क्या पता मेरे बाप की मौत एक राज़ हो, जिसे मैंने आज तक न जाना हो, और यह सपना उसी राज की ओर एक इशारा हो मैं कई दिन तक इस सपने से परेशान रही थी। मेरी १९७७ की अप्रका- शित डायरी में जो सपने लिखे हुए हैं, वे ये हैं : "आज रात फिर सपना आया कि मेरे दोनों बच्चे छोटी उम्र के हैं। पिछले एक-दो बरसों से कभी-कभी ऐसा ही सपना आने लग पड़ा है, जिसमें मैं आज के जवान बच्चों को, तीन-चार साल, या छ:-सात साल की उम्र के देखती हूं। शायद जवान हुए बच्चे मां की ज़रूरत से आज़ाद होते हैं, और फिर मां उसी तरह अपने-आपको चाहे जाने की हैसियत में देखना चाहती है, इसलिए सपने में वह इस इच्छा की पूर्ति करती है। मां लफ्ज़ का मकसद जव पूरा हो चुका होता है, उसके बाद भी..." १४-८-९७ "आज वित्ता-भर रात रह गई है, मैं एक अजीव सपने से चौंककर जाग पड़ी हूं-देखा था कि एक बहुत बड़ी उम्र का आदमी मेरे पास आकर मुझे एक मकान खरीदने के लिए कह रहा है। मैं कहती हूं, 'मेरे पास घर है, मुझे और नहीं चाहिए', फिर कुछ आंधी-सी आती है, उसकी जेब में से कुछ कागज १२४ / अपने-अपने चार वरस निकलकर हवा में उड़ जाते हैं, पर फिर उड़ते, गिरते कागज मिल जाते हैं, और वह मुझे पढ़ने के लिए देता है। एक कागज पड़ती हूं, जिसमें एक घटना दुहराई हुई है-पुरानी ऐतिहासिक घटना की तरह, कि एक छोटी-सी वच्ची थी जो खेलती-खेलती रसीदी टिकट' को पकड़कर उसके अक्षरों को जीभ से चाटने लग पड़ी थी, और अक्षरो की स्याही का जहर उसे चढ़ गया था। वह मर गई थी. इम किसी पुरातन पटना की बात सुनकर, मैं सपने में कांप गई, और चौक- कर जाग पड़ी ''"रात अब भी बाकी है, इसलिए इमरोज को नहीं जगाया। सुद ही फ्रायड की तरह इस सपने को एनेलाइज़ कर रही हू-कि कल शाम नेदानल बुक शॉप वाले राजेन्द्र ने आकर कहा था कि मैंने गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के किसी व्यक्ति से बात की थी, वह कह रहा था, 'हम 'रसोदो टिकट' के बारे में फिर कुछ नही कहेंगे । अगर वह किताब को कुछ पंक्तियो पर चेपिया लगा दे और कहें कि वे पंक्तिया फिर रसीदी टिकट' में नहीं छपेंगी।' यही शायद अपने अक्षरों को चाटने वाली भयानकता थी, जिससे यह सपना आया । वे पंक्तियां जब लिखी थी, मन की कमी पाकोजगी और मामूमियत से लिम्वी थीं । और अव जैसे कहा जा रहा है कि उन अक्षरों को वापस ले लू, कागज पर से मिटा दू । यही अक्षरो को चाटने वाला कर्म है और जिसके बाद सायद मन की मासूमियत हमेशा के लिए मर जाएगी। सपने वाला वह बुजुर्ग शायद समय का वह इतिहामकार है, जिसका लिखा इतिहास कभी नहीं छपता। वह सिर्फ सोच के टुकडे बनकर हवा में उड़ता रहता है । और कभी-कभी ऐसे कागज का पुर्जा किसीके हाय लग जाता है, जिममें वह किसी अहमास की मौत को सवर पढ़ता है..." १३-६-१९७७ "एक पहर रात बाकी है। आज रात बडा ही अजीब सपना माया! कोई एक पुरानी-मी कार आई, जिसमे पता नहीं कौन-कौन था, पर मुझे यह एक पूरा अहमास हुआ कि उस कार में जो लोग आए हैं, वे मेरा कोई नुकसान करने आए हैं। क्या नुकसान? विस तरह का? कोई पता नहीं। पर वे किसी दुश्मनी पर तुले हुए हैं, सिर्फ इतना लगा। फिर एक इलहाम जमा खयाल आया- अगर मैं इस कार के गिर्द मेरे अपने सपने / एक लकीर खींच दूं, एका घेरे की तरह, तो वे लोग मेरा कुछ नहीं कर सकेंगे। मैंने जल्दी ने एक गहरी लकीर कार के वांगिदं खींच दी। और मेरे देखते- दन्वत वह कार उन लोगों समेत धरती में घंन गई। और सामने सिर्फ खाली जमीन थी.. चाककर जागी तो यह सपना इमरोज़ को सुनाया, पर ऐसा सपना जिन्दगी में पहली बार आया है। यह न इमरोज़ की समझ में या रहा है, न मेगी..." २४ सितम्बर, १९७७ "कोई दस दिनों से रोज रात को सोते समय जब वत्ती बन्द करती हूं, आंखें मूंदती हूं, आंखों के समक्ष किसी पर्वत की ओट से सूरज चढ़ने का समय फैल जाता है। देखती हूं-पता नहीं कहां-एक हरी घाटी है, नामने दूर नदी है, उसके पार पहाड़ों की एक कतार है और उनकी मोट से चढ़ते सूरज की लाली फैल रही है... आज अजीब इत्तफाक हुमा, मैंने और इमरोज़ ने फिल्म देखी, 'वन पलीट योवर द युयुज नेस्ट'-एका भयानक खूबसूरत फिल्म । और उसका पहला दृश्य बिलकुल नहीं था, जो पिछले दस दिन से रात सोते समय मुझे दिखता है। "मैं हैरान उस दृश्य को सामने स्क्रीन पर देखती रह गई..." २-१-33 "कभी-कभी एक अजीव सपना नाता है. आज रात फिर याया कि मेरी गोद में एक नवजात बच्ची है, मार जब मैं उसे कपड़े में लपेटकर चारपाई पर मुलाने लगती हूं, तो वह मुझसे बात करने लग पढ़ती है। सपने में भी हमेशा हैनन होती हूं कि यह नवजात बच्चा बातें कैसे कर सकता है ? और जब आंख खुलती है तो तब भी इस सपने पर हैरान रह जाती हूं। यह सपना कभी-कभार माता है, पर आता जरूर है। पता नहीं यह मेरी कलम का चिह्न है कि कुछ मोर?" । २८-११-७७ "यात जिन्दगी का सबसे अन्जीव सपना आया। पता नहीं बचेतन मन का १२६ / अपने-अपने चार बरस कमा जादू था कि सपने के तार मेरे चारों ओर लपेटे गए। देखा, एक पहाडी-सा इलाका है, जहां पूरे इलाके में मेरी नरमों की और मेरी दीवानगी की शोहरत एक लोककथा की तरह फैली हुई है। वहीं मैं एक दिन एक नदी के किनारे खड़ी हुई यो कि नाव में बैठकर इलाके का राजा आता है। मुझे देख- कर राजा के दरवारी नाव को किनारे पर बांध देते हैं, राजा को बताते हैं, 'राजाजी! आप जिसकी नरमें सुनकर, उसे ढढने आए हो, वह यही है..."राजा नाव में मे उतरता है। कहता है, 'तेरी नस्मै मेरे महल में भी गूज रही हैं। मेरे मन में भी...' फिर मैं भी हैरान होकर उसकी ओर देखती हूं, वह भी। उसे याद आता है कि बहुत वरस हुए, शायद वीस वरस, जब मेरा उसके साथ व्याह हुआ था, मैं उसके महल मे उसकी रानी थी। पर वह ऐशोइगरत मे इतना खो गया था कि मुझे भूल गया था... अब वह मेरी ओर हाय वढाता है, कहता है, "मैं तुझे, सिर्फ तुझे प्यार करता हूं। तेरा हुस्न मैंने पहचाना नही था, अब मेरे महल मे सिर्फ तू चाहिए...' में पोछे हटती हूं, कहती हूं, 'नही, अब नही...' देखती हूं-दरवारी मेरे सामने हाथ जोडते हैं । राजा की आंखों में पश्चा- ताप का पानी आ जाता है, पर मैं दोनो हाथ जोड़कर नमस्कार करती दूर जंगल की ओर चली जाती हूं सपने में राजा का नाम मुझे पूरी तरह याद था पर जागकर सिर्फ इतना याद रह गया है कि उसका नाम 'र' अक्षर से शुरू होता था। पूरा नाम भूल गया है। मुझे इस सपने का अर्थ नहीं मिल रहा । यह सपना क्या है, इसका क्या एनलिसिम है । जी करता है कि जुंग जिंदा हो तो उससे इसके अर्थ पूछू । आज जंग की किताब 'मेम्वायज, ड्रीम्ज, रिपलेक्शज' पढ़ रही हूं। जुग को भी अजीबो-गरीब सपने आते थे, जिन्हें वह कई बार बरसो तक नही समझ सकता था। फिर किसी दिन अपने-आप ही उनके अयं उसके अदर से बोल पड़ते थे। वह फ्रायड की तरह सपनों को गढी हुई प्योरियों में नहीं बांधता था। जो ख्याल उसके चेतन मन से धीरे-धीरे मपनों के गिदं जुड़ते थे, उनमें मे ही वह मपनों के अर्थ पहचानता था. यही-मन में में स्वाभाविक-मे उटते स्यालों के माय मैं इस सपने सपने ... ma को समझने की कोशिश कर रही हूं-वह राजा कौन था? क्या पिछले किसी जन्म की कोई परछाई मेरे सामने उघड़ रही है ? क्या किसी जन्म में यही मेरा इमरोज़ किसी इलाके का राजा था, जिसने मुझे महल में ले जाकर भी विसरा दिया था? क्या पहले किसी जन्म में भी मैं शायर थी दीवानी और जंगलों में धूमती ? और जव राजा को मेरी प्यास लगी, क्या उसी जन्म की प्यास से वह इस जन्म में इमरोज़ बना? उसी प्यास को बुझाने के लिए ? इमरोज़ को मिलने से पहले यह जिन्दगी मेरे लिए जंगल थी। एक भटकन थी। वह जव मिला, सचमुच लगा था--कोई सदियों की पहचान है, उसके साथ सदियों का रिश्ता है..." पता नहीं, यह सपना क्या है ? शायद किसी वीते जन्म की हकीकत है। या मेरे आज के कहानियां लिखने वाले चेतन मन ने सपने के तार पकड़कर योंही यह कहानी गढ़ ली है... ४ दिसम्बर, ७७, सवेरे चार बजे "आज सपने में मैं अपने छोटे-से कार्तिक से वातें करती रही कि अच्छाई इंसान की सोच का एक बड़ा खूबसूरत पहलू है, कि वह उठकर जमीन में फलों और फूलों के बीजों की तरह कुछ वोने लग पड़ा। में हैरान हुई तो कहने लगा, 'अम्माजी ! मैं अच्छाई बो रहा हूं, फिर उसके बहुत-से पौधे उगेंगे।' में हंसती हूं पर फिर पानी लेकर उसकी वोई हुई मिट्टी को पानी देने लगती यही पानी दे रही होती हूं कि उस समय आंख खुल जाती है... यह सपने में छः बरसों का कार्तिक, और करीबन साठ वरसों की मैं, मिल कर किस वहिश्त का बाग लगा रहे हैं, कुछ समझ में नहीं आता..." ७ दिसम्बर, १९७७, सुबह चार बजे "रात एक भयानक सपना आया-कहीं कोई कविन्ज-सी बनी हुई हैं। 'जिस कैविन में मैं अकेली रहती हूं, उसके बराबर की कैविन में जर्मन सिपाही रहते हैं। हर कैविन का दरवाजा आवा लकड़ी का है, आधा पर का हिस्सा शीशे का, जिसमें से बरावर की कैविन का ऊपर का हिस्सा दिखता है। देखती हूं, पास के कैबिन में जर्मन सिपाही दो आदमियों को इस तरह मार रहे थे कि - १२८/अपने-अपने चार वरन
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- होती है कि नहीं, पर मुझे सपने में भी हैरानी होती है। अपने ही फिकरे से, कि मैंने कैसे हर लेखक का जन्म एक गांव से जोड़ दिया है, और उसका नाम भी ऐसा रखा है-कलम का गांव, जैसे वह सचमुच धरती का एक खास अलग टुकड़ा होता है और इस अचम्भे की झनझनाहट से मैं जाग जाती हूं।" १६-१२-७७ जव इंसान का सारा ध्यान किसी खास काम में लगा हुआ हो तो उसके रातों के सपने भी कैसे उस काम से जुड़ जाते हैं-इस पक्ष से मैं अपने दो सपने खास तौर से दर्ज करना चाहती हूं, जो इस किताब पर काम करते हुए दो रातों को लगातार आए थे: ३१ दिसम्बर रात की बात है, मेरा वेटा घर की निचली मंजिल में अपने ड्राइंग रूम में नये वरस का जश्न मना रहा था। उसके दोस्त शराब पी रहे थे। नाच रहे थे और म्यूजिक की आवाज़ मुझे ऊपर भी काफी सुनाई दे रही थी। पर मैं आराम से सो गई, तो पहला सपना आया : कोई बहुत बड़ी इमारत है, जहां देखती हूं-इन्दिरा गांधी अकेली खड़ी हुई हैं, उसी तरह हसीन, नाजुक वदन और मुस्कराती-सी । पर देखती हूं, उनकी आंखों पर काले रेशम की पट्टी बंधी हुई है और वह हाथों से खाली जगह को ऐसे टटोल रही हैं, जैसे छुपन-छुपाई की बाज़ी उनके सिर आई हो। उनके साथ छुपन छुपाई खेलने वाले कौन लोग हैं, वे नहीं दिखते । सोचती हूं, वे सव कहीं छिपे होंगे। मैं सपने में इस खेल की दर्शक मान हूं। जहां सामने सिर्फ इन्दिरा गांधी दिख रही हैं-और कोई नहीं... यही सपना आ रहा था जिस वक्त मेरे वेटे ने ऊपर मेरे कमरे में आकर आवाजें दी, "ममी-ममी, नया साल मुबारिक। देखो, सोनी भी आपको साल मुवारक कहने आई है।" मैं जागती हूं, कमरे की बत्ती जलाती हूं, वेटे को में प्यार से साल मुबारिक कहती हूं, और उसकी दोस्त लड़कियों को भी। वड़ अच्छा लगता है कि बच्चे मुझे जगाकर साल मुबारिक कहने आए हैं." वे फिर नीचे पार्टी में चले गए। मैं उठकर इमरोज़ के कमरे में गई, उ सोए हुए के माथे पर चूमकर साल मुबारिक कहा, पर वह नींद में ही साल मुव रिक कहकर फिर सो गया। मुझे अब नींद नहीं आ रही थी इसलिए चाय १२०/ अपने-अपने चार बरस प्याला बनाया, पिया, एक सिगरेट भी पिया, और फिर कोई किताव परत परते पता नहीं किम वक्त सो गई। यह जब दूसरी बार सोई, तो सपना आया, किसी गाव मे गई है,वहा एक अजनवी मुझे अपने अजीबो-गरीब मपने सुना रहा है। मैं कहती हूं, "मैं आजकल सपनी पर एक किमार लिख रही हूं, तेरे अनीय सपने हैं, पर मुझे किताब में मिर्फ लेसकों के सपने दर्ज करने हैं। आम लोगों के नहीं।" वह कहता है, "मैं मशहूर तसा तो नही, पर ग्रामीण गौतों को मैंने पाच रिता लिखी थी।" मैं सुना होकर जवाब देनी हूं, "फिर तो बात बन गई, में तेरे सपने भी अपनी किताब में दर्ज करूगी। अन्डा फिर मुना ! मैं माग पर लिख लू !" और ज्योंही लिखने के लिए कागज पकडती है. नीद सुल जाती दूसरा सपना उमगे अगती रात देखा था। देखा : "मैं अपने बाप के माय किमी पहाड़ी की शिखर पर पड़ी हूं-जहां में नीचे को उतरती कई पहाड़ी इण्डियां हैं । एक पहाडी को पिछली डण्डो पर उतरती मैं कहती हू'इस इण्डी को लोग नहीं जानते, पर में पहचानती हूँ, यह बहुत जल्दी, निर्जन की ओर से होती हुई नीचे वड़ी सड़क पर पहुंच जाएगी । मैंने एक बार दोपहर में यह पग- डपडी टूढी थी। अव शाम का वक्त है, वहा अपेरा हो आएगा, पर कोई डर नही, आप माय हैं !' और उस पगडण्डी पर से उतरते-उतरते सचमुच बुछ देर भाद दूर से ही बड़ी सहक दिखने लगती है। रास्ते में अधेरा जरूर हो जाता है, पर तमल्ली-सी होती है कि राह ठीक है। बस, अब जंगल सत्म होने वाला है... राह में कोई आदमी नहीं मिलता, सिर्फ एक जगह सींगों वाला एक जानवर दिखता है, बिलकुल पगडण्डी पर। मैं उमने कुछ डरती हूं, पर फिर जल्दी गे उसके पाम से गुजर जाती हूँ। यह मुझे धुछ नहीं कहना... फिर पता नहीं किम तरह हुआ देखा कि मैं लान पत्थरों के एक किले में फंस गई हूं। उसके अन्दर से बाहर निकालने की गह दूदती, में कई मंजिन नौ उतरती हूं। किले में और कोई नहीं, बस चारो तरफ लाल सूबमूरल पत्यरों के बने हुए कई कमरे हैं, कई वरामदे, और कई गोल सम्भ। फिर एक बरामदे में अचानक मुझे एक आदमी मिलता है, जिसमे मैं राह पूछती हूँ। वह माधारण- सा पतला-सा आदमी है, पर उसने वर्दी-सी पहन रसी है, जैम यह रिनेका । पहरेदार हो। पर वह कुछ डाकिया-सा भी लगता है। वह पास आकर अचानक मेरे होंठ चूम लेता है। मैं घबराकर कहती हूं, 'नहीं' 'नहीं।' और जल्दी से अकेली वहां से चल पड़ती हूं। वह हंस पड़ता है, पर मेरा पीछा नहीं करता। पर आगे जाकर मुझे फिर राह नहीं मिलती। वहां एक और आदमी दिखता है। उसी तरह के कपड़े । मैं उससे राह पूछती हूं। वह कहता है, 'तुझे फिर पिछले वरा- मदे में से जाना पड़ेगा। मैं कहती हूं, 'नहीं, मैं वहां नहीं जाऊंगी,वहां जो पहरे- दार है, मैं उसके पास नहीं जाऊंगी।' यह दूसरा पहरेदार मेरे साथ-साथ चलता हुआ कहता है, 'अच्छा अगर वापस वहां नहीं जाना है तो दीवार के बाहर नीचे की ओर छलांग मारनी पड़ेगी।' वह आगे होकर दीवार के बाहर नीचे की ओर लटक जाता है। वहां कुछ तार-से हैं, जिनको हाथ डालकर मैं भी बड़ी आसानी से दीवार से बाहर की ओर लटककर नीचे उतर जाती हूं। जिस्म को कोई खरोंच नहीं लगती, बस तारों के सहारे नीचे की मंजिल पर पहुंच जाती हूं। पर नीचे की मंजिल में भी बाहर जाने की राह नहीं मिलती। वह मंजिल भी किले का ही कोई हिस्सा है। वह कहता है, 'वस एक मंजिल नीचे और, फिर बाहर जाने का रास्ता मिल जाएगा।' वह मेरे साथ चलता है, बड़ा भला-सा आदमी लगता है। पूछता है, 'जो पहरेदार तुझे पहले मिला था, उसने तुझे कुछ कहा था ?' मैं हंस-सा देती हूं, पर उसे कुछ नहीं वताती। सिर्फ मन में घबराती हूं-वह कहीं फिर न मिल जाए । इतने में चलते-चलते बाहर निकलने वाला दरवाज़ा दिख पड़ता है-छोटा-सा, पुराना- सा। और उसमें से बाहर की रोशनी दिख रही है। मैं मन में सुख की सांस लेती हूं। और अपने-आपको महफूज़ समझकर सोचती हूं---ये पहरेदार असल में कौन हैं ? और खुद ही बड़ी स्पष्ट होकर समझ लेती हूं--पहला फ्रायड था। दूसरा जुंग है और इस ख्याल के साथ ही मेरी नींद खुल जाती है..." २ जनवरी, १९७८, रात ३ वजे अपने इन सपनों का जो विश्लेपण सहज मन से मुझे दिखता है लगता है पहले सपने का पहला हिस्सा(आंखों पर काले रेशम की पट्टी बांधकर इंदिरा गांधी का छुपन छुपाई खेलने वाला)आज की राजनैतिक खबरों के प्रभाव के नीचे है। और दूसरा हिस्सा (किसी गांव में जाकर किसीसे उसके सपने सुनने वाला) १३२ / अपने-अपने चार वरस सीधा इस किताब को उम प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है जो मैं अपने परिचित नेगमों के मपने एकत्र करना चाहती हू । हा, दूसरा सपना अपने ही अचेतन मन में उतरकर उममें में बाहर की राह और बाहर की रोशनी ढूढने का एक गहरा यत्न लगता है--जिममें फायह और जुग दो रहनुमा वनकर मुझे मिलते हैं। चेतन मन से फ्रायड के बारे में मैंने जो भी पड़ा है, सेक्स की जरूरत में ज्यादा अहमियत देने के बारे में, मेरा ख्याल है वहीं सोच सपने में प्रत्यदा होती है। उमका तसन्दुर मेरे सपने में मेक्मी हरियो से सम्बन्धित है, और जुंग का उन मोजी रचियों में, जो रुचियां उलार होकर हर चीज़ को मैक्म मे नही जोहती। वह मेरे सपने मे मिर्फ एक मददगार के रूप में है। चाहती यो-लेखको, चित्रकारो के सपने में इमरोज़ के मपने जरूर दर्ज करूं, पर नहीं कर सकी थी । उमके लपडो में "अजीब बात है। मुझे कोई मपना आता ही नहीं। शायद आता हो पर जागकर मुझे कभी नहीं लगा कि आज कोई मपना देखा था।" पर यह किताब जी-जमे लिखती रही, माय ही माय उमे मुनाती रही । इस सम्बन्ध में और जितनी भी कितायें पढ़ी, उनसरा जिक्र भी रोज़ अकमर होता था, और मेरा स्याल है जरूर महीनो चलते इम निक का अमर हुआ होगा कि चार जनवरी को सुबह को इमरोज़ ने चाय का प्याला देकर मुझे गोते से जगाया और कहा, "अजीब बात है. आज रात मुझे दो सपने माए..." और उमने जो सपने सुनाए, वे ये हैं : "आज मैंने बत्तीस बग्मी के याद पहली बार मपने में लाहोर का यह आट स्कूल देवा, जहां में पढ़ा था। उनका होस्टल एक पुरानी इमारत में था, जिसके नीचे के हिस्म में प्रिमिपल रहता या। और ऊपर के हिस्से में लड़को का होस्टल था। प्रिमिपल मुसलमान था। इसलिए उसके घर की औरतें मन पर्दे में रहती थी, और हम होस्टल में पते लड़के अपनी खिड़कियों में से नीचे नहीं झार मरते थे। मम्न मनाही थी। गुस्मा आता था कि यह पर्दो में लिपटा हुआ घर, जवान तड़ों के मामने हर समय क्यों रखा हुआ है। प्रिमिपल को अपनी रिहायग वही और रणनी चाहिए। लड़कों में कई एक मुगलमान थे, पर बाकी नहीं थे, उन्हें पर्दै रवापत से कोई लगाव नहीं था। उनके सामने हर समय एर वजित चीज - अहसास रहता था। और साथ ही सिर पर एक सख्त कानून जैसा हाकिमी लहजा लटकता रहता कि कोई लड़का खिड़की में से नीचे नहीं देख सकता। पर आज रात मैंने सपने में देखा कि ऊपर की मंज़िल साबुत है, पर निचली मंजिल सारी ढह चुकी है-वहां कोई घर नहीं। वहां पर्दो में लिपटी कोई चूड़ियों की खनक नहीं। वहां सिर्फ कुछ खंडहर हैं, कुछ उखड़ी-पुखड़ी घास, और एक जगह कुछ सब्जी-सी बोई हुई है। उसी वीराने में मैंने अकेले धूमते प्रिसिपल को देखा, उसने भी मुझे पहचाना, और याद किया कि हां, फलाने साल में तुम यहां पढ़ते थे और कोई वातचीत नहीं हुई। मैं सिर्फ हैरान उस निचली मंजिल की वीरानगी को देखता रहा। फिर उसी घड़ी लाहौर की जगह मैंने देखा -यह बम्बई शहर है। वही जगह, जहां मैं कभी काम ढूंढ़ने के लिए विश्वनाथ भिड़े नाम के आर्टिस्ट के पास गया था, और उसका असिस्टैण्ट होकर रहा था। फिर कुछ सालों बाद जव मैं अकेला इण्डिपेण्डेण्ट होकर काम करने लगा तो महबूब प्रोडक्शन के कैमरामैन फरदून ईरानी ने फिल्म 'अमर' के लिए मुझे वनशीट पोस्टर बनाने के लिए कहा । मैंने पोस्टर बनाया, और वह चुना गया। मुझे नहीं पता था कि भिड़े ने भी पोस्टर बनाया था। मेरा पोस्टर चुन लिया गया तो उसका रिजेक्ट कर दिया गया। वास्तव में वही आर्टिस्ट कई बरसों से उस प्रोडक्शन का काम कर रहा था, यह मुझे पीछे पता लगा जब उसका रवैया मुझसे बदल गया। बाद में उसी प्रोडक्शन ने मुझे छः शीटर बनाने को कहा, तो मैंने एक शर्त रखी--- 'आप या तो उस आर्टिस्ट से बनवाओ या सिर्फ मुझसे । यह खामखाह का मुकावला मुझे पसन्द नहीं। आखिर आपको एक का काम चुनना है, दूसरे का काम बेकार जाएगा। मैं नहीं चाहता किसीका भी काम बेकार जाए।' वह नहीं माने, कहने लगे-'हम दोनों से बनवाकर देखेंगे। मैंने पोस्टर बनाने से इनकार कर दिया। यह बात बहुत देर बाद उस आर्टिस्ट को पता लगी तो उसका रवैया मेरे साथ फिर अच्छा हो गया। शायद तभी का कोई दर्द मेरे मन में पड़ा हुआ था, जब पहली बार उसका रवैया मुझसे बदला था, कि रात सपने में मैं उससे मिला, तो वह मुझे प्यार से मिला। एक समय आया था कि जब वह आर्टिस्ट ज्यादा खुशहाल नहीं रहा था, पर सपने में मैंने उसका बढ़िया घर देखा, बढ़िया स्टूडियो। और वह प्यार से बातें करता हुआ मुझे चाय पिलाने के लिए एक - १३४ अपने-अपने चार बरस चाय की दुकान पर ले गया। वहां दुकान पर एक औरत तेल को बड़ाई में कुछ भजिया-सा तल रही थी। आर्टिस्ट ने उसे एक भजिया की प्लेट भी देने को कहा। और मैंने देखा वह गर्म कड़ाही में से पानी से भजिया निकालने के बजाय, हाय से निकाल रही है। मैं हैरान होता हूं कि उसकी उंगतियां माम की हैं कि लोहे की जो गर्म तेल से जलती नहीं"इमी हैरानी में मेरी नीद सुल । इमरोज़ के इन मपनों के बहुत-में हिस्से का विश्लेषण मुझे स्पष्ट-सा लगता है कि जवानी के प्रारम्भिक बरसों में अपने ही कमरे की शिडकी से नीचे न देखने का जो सस्न हुक्म था, उसका रोप उसके मन में तव का कही पड़ा हुआ था, जिस रोप के कारण अब उसे निचली मजिल की आबादी एक वीरानी नजर आई। दूगरे सपने का भी पहला हिस्सा बडा स्पष्ट लगता है कि जिस आर्टिस्ट ने उमै बम्बई जैसे शहर में पहला काम दिया था, उसकी रिसी तरह की भी नाराजगी उमे कबूल नहीं थी। उसके रवये में जो फिर प्यार और आदर शामिल हुआ, उमने सपने में उसकी तसदीक देवी। सिर्फ दूसरे सपने का अन्तिम भाग-गर्म तेल मे से हाय से भजिया निकालने वाला-- विश्लपण मागता है। उसकी गहराई में कोई मनोवैज्ञानिक ही जा गाता है, पर मुझे जो सहज स्वाभाविक अयं दिखते हैं, वह कह सकती है कि यह गर्म तेल कला की तपस्या लगता है, जिसमे से किमी उच्च कलावृति को हासिल करने के लिए, कलाकार अपने हाय उसमे डुबोता है, हाथ जलते नही। पर हागो को गर्म तेल में डालना--एक साधना का, एक जुरंत का, और एक विश्वास का मूवक है, जो इमरोज के अचेत मन से जुड़ा हुआ है उसके अपने ऊपर अपने विश्वास से, और कता के प्रति उसकी आस्था से । इमरोज मेरे इस विश्लपण मे पूर्णतया सहमत है, सिर्फ कह रहा है, "उस आर्टिस्ट का कोई निरादर मुझे इसलिए नहीं असरता लगा था कि उसने मुझे पहला काम दिया था, और उसका आदर मुझे अपना फर्ज लगा था। उमरी जगह कोई और आर्टिस्ट होता तो भी मैं ऐसे ही महमूम करता। मैं किसी आर्टिस्ट को अबहेलना नही सह सकता।" मानवीय मन का अध्ययन कभी मनोविज्ञान के विशेषज्ञों को करना है, यह मेरे अपने सपने/१३५ क्षेत्र उनका है, पर मैं उन आने वाले वक्तों के मनोवैज्ञानिकों के लिए कुछ वह जमीन जरूर सामने रखना चाहती हूं, जिसपर खड़े होकर वे यह अध्ययन कर. सकें! कई जगह विलकुल अजनबी, जो पहले हमारी वाकफियत का हिस्सा नहीं होती, वह क्यों अचानक हमारा हाथ पकड़कर खड़ी हो जाती है, यहां उनके कुछ उदाहरण दे रही हूं: दुनिया का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सी० जी० जुंग अपने अफ्रीका के सफर का जिक्र करते हुए लिखता है, "रात स्याही की तरह काली हो गई, तो धीरे-धीरे ठण्ड पसर गई। मैं सो गया। जव सूरज की पहली किरण ने सुबह होने की खबर दी तो मैं जागा। उस वक्त गाड़ी धूल के लाल वादल में से गुजर रही थी। उसने मोड़ काटा तो मैंने देखा -एक ऊंची चट्टान पर, अपने लम्बे भाले पर झुका एक पतला-सा काला लड़का अडोल खड़ा हुआ था और नीची जगह से गुजरती गाड़ी को देख रहा था। यह दृश्य मुझपर जादू कर गया। यह मेरे लिए बिलकुल अजनवी था~मेरे अनुभव से परे, पर मुझमें एक तीखा जज्बा जगा गया। लगा कि यह पल मैंने पहले भी देखा हुआ है, और इस दुनिया को मैं पहले भी जानता हूं-चाहे यह वक्त के फासले से बहुत दूर था। ऐसे, जैन मैं अभी अपनी जवानी की धरती पर से लौटा होऊ, और इस गहरे रंग के वदन वाले लड़के को पहले भी देखा हुआ है, जो पांच हजार वरसों से यहां खड़ा मेरी इन्तज़ार कर रहा है...।" १६६६ में मैं मास्को, जाजिया और आर्मीनिया गई थी। वापस आकर अपना सफरनामा लिखा था जो और कई देशों के सफर को मिलाकर 'इक्कीस पत्तियों का गुलाब' नामक किताब में छपा था। उसमें आर्मीनिया का जिक्र करते यह व्योरा आता है: "तुम्हें कभी किसी खास देश के लोगों से कोई खास तरह का अपनापन लगा है ?" तविलिसी में वरतानिया के एक लेखक ने मुझे पूछा था, और मैंने उसको जवाब दिया था, "इस तरह मुझे कभी किसी देश में नहीं लगा, पर कई बार कई किताबों के कई पानों से लगने लगता है।" और उस दिन आर्मीनिया के अजनबी शहर के वीरान पहलू में एक पहाड़ी पर बनी आर्क पर खड़े होकर मेरी आंखें इर्द-गिर्द का कुछ समेटकर अपने भीतर जोड़ने लग पड़ी थीं। पैरों में १३६ / अपने-अपने चार बरस
हरेक ५:१३..
यो। सो : २५
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सारको पर-यादो कोष भी है start 1
पहार देगी. इसके AMAR Ri vil
निपटा मासा माहीशी भूषसतो. तो मार 10
सोसमती पी.
पुण्दूर पर रहतीसरीका | HAATHA
से काट-तराफर पनामा माग tenant in mility
मेला यहाँ जुडा हुआ था। मोदी-n.mahilantra.
मोटे और लाल पेशे से किसी It 1111111
चचं के बाहर कई लोग ग्रहों की मदद fit
हुए थे और कई लोग ritinatantant THIRT 111
घूमते प्रार्थना गार रहेगा गर्ग की 10 mins
मिक्क फेयरो, गन्न मागणे, भारत ETHALIM
मुछ एक मैये का ही iman, MAITHI
मुके हए मार्च का EN 0101
पत्थर पी गय. गुग में Artmenu HIROHINI onm
निमकर, फिीग पापा, "Anti1400101
को लापार, 31 मारता" manti
मिनार कर दिया था, illent 14/0mm
काजान जाकिस पुरखों के जो चेहरे हमने कभी देखे नहीं होते, न उनकी सोच से हम वाकिफ होते हैं, न उनके कारोवार से हमारी कोई उन्सियत होती है, वह कैसे हमारे अन्दर जीते हैं, हमारे चेतन विचारों से वेपरवाह, और बड़ी हद तक उद्दण्ड, इसका एक बड़ा पुष्ट और भयानक वर्णन यूनान के लेखक निकोस काजान जाकिस की आत्मकथा 'रिपोर्ट टु ग्रैको' में मिलता है। "मैं अपने भीतर देखता हूं तो कांप-चौंक जाता हूं। मेरे दादा-परदादा खून के प्यासे समुद्री लुटेरे थे। जल में लुटेरे और थल में योद्धा । न खुदा से करते न इंसान से। मेरे नाना-परनाना सीधे-सादे किसान थे जो एक विश्वास से धरती पर झुकते, धरती को गोड़ते और बोते, और फिर मौके पर धूप की और मेंह की इन्तजार करते । शाम के समय घरों के दरवाजों पर बैठे भगवान के आगे हाथ जोड़ते, और सव आशाएं भगवान के हवाले कर देते। आग और मिट्टी। इन दोनों शक्तियों का मैं अपने अन्दर सन्तुलन खोजता था। मैंने अपना ध्येय यह समझा कि अपने अंगों में से पुरखों का अंधेरा 'निकालकर, जितना भी हो सके उजाले में बदल दूं। इस ध्येय के लिए मैं तमाम उम्र जूझता रहा हूं। एक अंधेरा मेरे अन्दर हमेशा रहा है, और मेरी जद्दोजहद हमेशा चलती रही है। मेरे पुरखे मेरे अन्दर पता नहीं कितने गहरे गड़े हुए हैं। कभी ऊपर तैर आते हैं, कभी नीचे गहरे उतर जाते हैं । अथाह अंधेरे में उनकी पहचान मेरे लिए बड़ी मुश्किल है। पहली नज़र में यह चेहरा अपने वाप-भाई का-सा दिसता, पर गहरी नज़र से । १३८ / अपने-अपने चार बरस देसू तो मेरे अंगो में से कोई बालों से भरा हुआ, और बड़े-से जबड़े वाला, कोई उसका पुरसा निकल आता है जो भूप और प्याम से वोगलापा हो और जिमकी आखो में सून उतर आया हो। यह पशु पुरखा मेरे हवाले किया गया है कि मैं उसे मनुप्प बनाऊ, और हो सके तो उमसे भी कुछ अधिक । कितनी कठिन राह है बन्दर से मनुष्य, मनुष्य से खुदा। एक रात में एक दोस्त के साथ वर्फीली पहाड़ की चोटियों पर घूम रहा था। हमें राह भूल गई और रात उतर आई। कोई वादल नहीं था, चाद आसमान मे लटका हुआ लगता था, यर्फ चमक रही थी, सलेटीसे रंग में । हम घाटी में उतरे। यह चुप अमह थो। भगवान ने भी जरूर ऐमो ही चुप से घबराकर दुनिया बनाई होगी। मेरा मन अजीब तरह से अलसा गया था, पगक्ति की तरह मैं न रहा था। दूर कहीं धीमी-सी रोशनी दियो। गई बस्ती होगी पल मेरे माय कुछ अजीव-मा घटा । अब भी या नो वाप जा मैं खड़ा हो गया। एक मुक्का तानकर गांव की चीर "तूम सबको मार दगा।'
कहते हैं कि सूरज अपनी गति से चलता हुआ कभी किसी लड़की के गीत को सुनने के लिए रुक जाता है । अटल नियमों को हम भी बदल सकते हैं, सिर्फ अगर कभी अपने आंसू, हंसी, और गीतों के साथ हम नये नियम बनाने में समर्थ हो जाएं. वे मेरे पुरखे-मरते थे, मारते थे, रूहों का आदर वे नहीं जानते थे, न अपनी रूहों का, न दूसरों की रूहों का। उनका वास्ता तो सिर्फ भूख और प्यास से था। गर्मियों में उनके धड़ नंगे और सदियों में खालों से ढके हुए। मेरे बाप के बाप का बाप, खास तौर पर मुझे अपने खून में जी रहा लगता है । नसों में धड़कता। उसका सारा सिर मुंडा हुआ होता था, माथे की ओर से सिर्फ पिछली तरफ एक लम्बी लट होती थी। वह अलजेरियन लुटेरों का साथी था। सारे समुद्र छान मारते थे। उजड़े टापुओं को उन्होंने अपने छुपने की जगह बनाया हुआ था। यहां से वे राह जाती किश्तियों को लूटते थे। ये किश्तियां हज जाने वाले मुसलमानों की हों या ईसाइयों की, इससे उन्हें कोई वास्ता नहीं होता था। बूढ़ों को मार देते, जवानों को गुलाम बना लेते, औरतों को घर रख लेते। उनकी मूंछों में से हर समय लहू की गन्ध आती थी। एक बार उन्होंने पूर्व की ओर से आता हुआ गर्म मसाले का भरा जहाज़ लूटा। मेरे देश के बूढ़ों को अभी भी याद है कि सारे टापू में से कितने समय तक दालचीनी और जायफल की महक आती रही। मेरे बड़े-बूढ़ों ने वह लूट का माल दूर गांव के परिचितों को भी सौगात के तौर पर भेजा था। कई ऐसे चिह्न मैंने अपने में देखे जिनपर पहले मैंने गौर नहीं किया, पर पीछे से पड़ताल की, तो उन चोर दरवाजों को पाया, जिनका सम्बन्ध मेरे भीतर घुसे हुए मेरे पुरखों से था। ऊपर के हादसे को जब जाना नहीं था, कई वार हैरान होता था, कि मुझे. हर समय अपने पास दालचीनी की टहनी और जायफल के बीज रखने क्यों अच्छे लगते थे। यह मैं सफर के समय भी रखता था, और लिखते समय अपनी मेज के सामने भी। मैं यह सब कुछ अपने भीतर से निकालकर अपनी आत्मा का मुंह देखना चाहता था । यह मेरी बहुत बड़ी इच्छा थी। मेरे पुरखे जहां जन्मे-पले थे, मैंने उसे सोचा। एक सुलतान ने जब करेट , १४०/अपने-अपने चार वरस को अरबों मे दमवीं सदी में फिर वापस लिया, तो जो अरब दम परलो. सून मे बच गए थे, वे वारवारी नामक माव में कमाए गए। ऐसे ही एक गाव मे मेरे पुरखो की जड़ें हैं । सबमे अरवी स्वभाव है--स्वाभिमानी, बिही, मुहदवे, मूसी मिस्सी खाने वाले और मेलजोल मे कतराते। उनरात्रोध और प्यार वरमों तक उनकी छाती में जमा रहता है । मुह से कुछ नहीं बोलने, पर अचानक यह ग्रोथ फट पड़ता है । उनके लिए जिन्दगी को इतनी अहमियत नहीं जितनी तीपण जरखे की। यहां तक कि वे जिस औरत से इरक करते हैं, उने जान से मार देते हैं ताकि वह उनपर कभी गलवा न पा ले। मेरे भीतर कई आवाजें हैं जिनसे मुझे पुरपी तक जाने का रास्ता मिलता है। मैं खुगो से निहाल हो उठता हूं जब कही मजूर का पेड देग लूं। जैगे वतन को जा रहा होऊ। एक बार ऊंट की मवारी फरता मैं अरब के रेगिस्तान मे गया था-अनन्त रेत पसरी हुई देवी, दोपहर को पोनी-मी, शाम के समय जामनी-सी । कही मनुष्य को जात नहीं थी। मैं मस्ती में वोरा गया। एक बार में एक जगह रहा, एक ग्रीक गाव की एक कुटिया में । यह कुटिया पेडों से ढकी हुई थी। मैं अन्दर बैठा कई दिन तक नरमे लिखता रहा। एक वागी यहा से गुजरता था। वह रोज मुझे दूध, उवले अण्डे और थोड़ी-मी रोटी दे जाता था। एक दिन शाम को मैंने अण्डो को लगाने के लिए नमक की पुड़िया खोली, तो थोड़ा-मा नमक जमीन पर गिर पड़ा। मैं जल्दी मे घबराकर नमक का जर्रा-जरा जमीन पर से उठाता रहा। और फिर इस हरक्त में मैं ही घबरा गया नि तुच्छ-गी चीज़ को मैं ऐने मिट्टी में में क्यो उठा रहा था? कही बेकार ही आग जल रही हो या पानी गिर रहा हो तो मैं हडबडाकर आग को बुझाने के लिए और पानी की टूटी यो बन्द करने के लिए दौड पड़ता हूं। इन आदतो पर मैंने पहले ध्यान नहीं दिया था । कई यरम ऐम होता रहा, पर फिर इनके बिखरे हुए धागे मेरे मन में जुड़ गए। नमन, आग और पानी। मरुस्थलों में बहुत बडी नियामत होती है। मेरे भीतर जरूर मेरा कोई पुरमा, चेकार जाते नमक, आग या पानी को देसकर मेरे अगो में इलाग मारकर उनको बचाना चाहता होगा..." काजान जारिम/१४१ अन्तिका पितृपूजा मौत को अस्वीकृति देना है। और यह विश्वास और धारणा है कि मौत अन्त नहीं। यह सिर्फ किसीका अपने परिवार, कवीले या कौम से उस हद तक दूर चले जाना है, जहां आंखों, कानों की साधारण शक्ति नहीं पहुंच सकती। और दृश्य तथा अदृश्य के बीच में रिश्ते का बना रहना स्वाभाविक समझ लिया जाता है। पितृपूजा वास्तव में ज़िन्दगी के अनन्त प्रवाह की और उसकी बेपनाह शक्ति की पूजा है । यह उस अदृश्य स्रोत से प्रारम्भ होती है, जिसका साक्षात् प्रमाण इंसान का अपना अस्तित्व है। इसलिए जो इंसान के अपने ज्ञान की सीमा से परे है, पर है, वह ईश्वर इंसान का आदि पितृ है । मौत-रहित । और उसके बाद सूरज, पानी, आग और पवन जैसी कुदरत की वे वेपनाह शक्तियां इंसान के पितृ हैं, जिनका मेहरवान सलूक इंसान की ज़रूरत है। और उन शक्तियों के प्रतीक देवी-देवता, जिनके नाम को मनुष्य मंत्रों के रूप में जपता हुआ उनको स्मरण रखने के लिए और उनकी स्मृति में रहने के लिए अपने आदिकाल से एक यत्न कर रहा है। (इंसान का यह यत्न अपने शिखर पर होता है, जव उसपर किसी अचानक मुसीवत का, महामारी का या देश में अकाल पड़ने जैसा कोई भारी संकट आ जाता है।) यह पितृपूजा शक्तिपूजा होती है, नायक-पूजा। सो मज़हवों के बानी रूहानी शक्ति के प्रतीक बन जाते हैं, और वे लोग, जिन्होंने समय-समय पर कबीलों, कीमों और देशों के लिए ज़िन्दगी कुर्वान की होती है, शारीरिक - १४२ / अपने-अपने चार वरस साधन होने के कारण अति आवश्यक साधन के तौर पर पूजनीय है। इसी तरह अफ्रीका में चीता और सांप पूजने के योग्य हैं। भारत में भी सांप को गुग्गा पीर कहकर पूजा जाता है। मिथहास में सांप वजित ज्ञान का ज्ञाता माना जाता है। और आदिवासियों के कई कवीले अपने-आपको शेरों के वंश में से मानते हैं। भारत के आदिवासी जंगल में किसी शेर के मरने पर सगे वाप के मरने की तरह क्रिया-कर्म करवाते हैं, और तेरह दिन घर में शोक मनाते हैं। यह पितृपूजा जो मानवीय आवादी के कई हिस्सों में पुरखों की पूजा की तरह ही प्रचलित है, या देवताओं के अवतार या वाहन समझकर ही (जैसे हंस सरस्वती का वाहन माना जाता है, गरुड़ विष्णु का वाहन, और चूहा गणेश का वाहन) पर यह मान्यता हर रूप में सिर्फ एक ही विश्वास की पुष्टि करती है, इंसान को अपनी रक्षा के लिए, किसी बड़ी शक्तियों का भरोसा चाहिए होता है। पितृपूजा का इतिहास उतना ही लम्बा है, जितना इंसान की उन जरूरतों का, जिनकी पूर्ति उसकी सीमित शक्ति से परे होती है। और जिसके लिए वह अपार शक्तियों से समय-कुसमय पर वल मांगता है। सो, मांगने की जगह पर खड़े होकर, स्वाभाविक है कि उसमें भय का अंश हमेशा बना रहता है। मनुष्य की सोच केवल देवी-देवताओं के से ही सम्बन्धित नहीं, अपने खून-मांस के रिश्ते से अपने जैसे साधा सम्बनि। खास स्वाभाविक मौत हों, बोर वह अपने ने नावारन ननुपकोहों को प्रसार करने भर सा जाता है। इन नप के कई का दुनिया में दिखते हैं। जो बाद के नार का दरवाजा चाहे कितना बड़ा हो, पर मरे हुए ईनान को नहीं,पर की दीवार का एक हिम्मा गिराकर, उस राह में बाहर निकलते हैं। औरचिर दीवार लीपकर उनके फिर नौट भाने की राह बन्द कर देते हैं। सजाने की राह सिर्फ उनके लिए केवल वही एक हो सकता है, विरह में वह बाहर गया था। पितृपूजा के लिए जहा पर का एक हिन्ना, कोई राया दीवार का एक माला, हमेशा सुरक्षित रखा जाता है, ताकि इसकी जाना होंगा वहां रसती रहे, यह उनसे बिलकुल विपरीत कर्म है। वह घर में हनेमा के लिए उसकी विदाई को कामना है। आत्मा की वापसी को रोक्ने के लिए चीन में पर की रात में एक मोकला निकालकर उनसे बह के जाने के लिए यह बनाई जाती है, और छत को लीपकर उसको वापसी की राह बन्द कर दी जाती है। इस तरह जो लोग, किसीको अन्तिम विदाई देने की रस्म के लिए मान घाट तक जाते हैं, वे जिस रास्ते में जाते हैं, उन राह से लौटते नहीं । लौटते समय राह बदल लेते हैं। या लौटते समय अपने पैरों के निशान मिटाते जाते हैं। माइबेरिया के कुछ कवोल ऐसे हैं, जो कत्र को भरकर जव रोते हैं, तो जानवरों की आवाजें निकालते हैं, ताकि मरे हुए आदमी की रुह को उनकी पहचान में मुलाया हो जाए, और वह यह न समझे कि जो लोग मुझे अनी भी याद करते हैं, मेरे बिना रो-रोकर दुखी हैं, मुझे उन लोगों के पास लौटना चाहिए। आस्ट्रेलिया के आदिवासी कद्र के गिदं उगे पेड़ों पर एक खास निशान लगा वाते हैं, ताकि रूह जब कत्र में से उठकर घर लौटने लगे, तो पड़ों के निशानों से राह खोजती पेड़ों के घेरे में ही घूमती रहे। कई कवीलों में इसके बड़े भयानक रूप हैं. वे किसीको दफनाने से पहले उसका मिर धड़ से काटकर अलग कर देते हैं, या मरे आदमी को टागों की हड्डिया तोड़ देते हैं, ताकि उमकी रूह जब कत्र में से उठकर चलने लगे, तो मन्तिका/१४ चलने योग्य न रहे। आस्ट्रेलिया के कई कवीले ऐसे हैं, जो मरने वाले का नाम नहीं लेते। विश्वास किया जाता है कि अपना नाम सुनकर मृतक की आत्मा वहां आ जाती है। दक्षिणी अमेरिका में तो मरने वाले का सारा परिवार अपना-अपना नाम बदल लेता है, ताकि मृतक की आत्मा उनके वदले हुए नामों से उनकी पहचान भूल जाए। कई जगहों पर सिर्फ घर के लोग नहीं, पड़ोसी घर वाले भी अपना-अपना नाम बदल लेते हैं। यह विश्वास तकरीबन है कि मृतक की आत्मा तेरह दिन तक घर में रहती है, पर जव उसे अपने पुन:-प्रवेश के लिए अपना शरीर नहीं मिलता, तो वह निराश वहां से चली जाती है। तिब्बतियन विश्वास के अनुसार मौत और पुनर्जन्म के बीच ४६ दिनों का फासला होता है, इसलिए ४६ दिन रूह की रहनुमाई के लिए पूजनकर्म किया जाता है। यह सब कुछ अजीव है, निर्मोही-सा लगता भी इस बात की हामी ज़रूर 'भरता है कि मरे हुओं का रिश्ता जीवित लोगों से टूटता नहीं। और शायद भयानक हद तक ये यत्न भी इसलिए हैं कि जो नहीं टूटता लगता उसे किसी तरह तोड़कर या तोड़ने का मुलावा खाकर जो अभी जीते हैं वे जिन्दगी के कामकाज में लग सके। ये सब कर्म मनुष्य के मन की भयभीत हालत के हैं। जहां वह भयरहित है, और पितरों को शक्तिदाता समझकर पूजता है, वहां उसके सारे प्रतिकर्म खूबसूरत हैं। नाच और संगीत से भरे हुए, मन की शायरी से भरे हुए, और अक्सर मन के उन ऊंचे विचारों से भरे हुए, जहां उसे अपनी करनी और कथनी का अन्तर पाप लगता है। और जब वह सच और संयम के बिना स्वयं ही अपनी पूजा को अकारथ समझ लेता है इंसान किसी सीमा तक देवी-देवताओं से भी भय खाता है, पर किसी बदले की भावना उनके साथ नहीं जोड़ता। सिर्फ अपनी लापरवाही से हुए उनके रोप की या ताड़ना की कल्पना करता है, पर साथ ही उसकी हर खता को माफ कर देने वाले उनके दैवी स्वभाव में विश्वास रखकर; और कुछ प्रयल १४६ / अपने-अपने चार वरस से उन हुओ को फिर ने मना लेने का विश्वान धारकर । सी, उनका पित- पूजा का कर्म अनियमित हो सकता है, वेअदव कभी नहीं होता। जहां तक मनुष्य का मौत से अस्वीकृत होने का सम्बन्ध है, उसका सबूत मिर्फ यह पूजा नहीं, प्राचीन समय में लाशों को मभालकर रखना भी होता था, जैसे ईजिप्ट में मम्मी रो जाते थे। जिस्मो को साबुन और बडोल कों में रखे रखने के पीछे भी यही एतकाद है । और कई पुरानन कबीलो में मग्ने पाला वैरी कवीलों के हाथ न लग जाए, अपने कबीले का हिस्मा ही रहे, यह सोचकर उसकी लादा को सारा कवीला वाटकर सा लेता था। और इस तरह उसको अपने-अपने जिस्म का भाग बना लेता था। मरने वाले के अंग लगी चीजें अभी तक सभालकर रखने का विश्वास है, यह सोचकर कि उसका 'कुछ' इन वस्तुओं में देखने और छूने को हद तक, यभी दिखतो दुनिया का हिस्सा है। पुनर्जन्म भी इसी विश्वास का एक हिस्सा है। यह सिर्फ एक 'मावपवित्र यपाय है या कुछ और, इम विस्तार में जाने की जरूरत नही; पर यहा इन विश्वास की एक बड़ी दिलचस्प घटना दोहराई जानकती है। एटलाण्टिक टापू के गर्क होने का इतिहाम ढ़ते हुए इतिहासकारो ने लिखा है कि यह पूरे यूरो के कद मे बड़ा टापू ईमा काल में दन हजार वर्ष पहले तकनीकी उन्नति के पक्ष से ऐसा टापू था, जिसके वानी महावती थे। वहा एक ऐमो शफाफ चट्टान थी, जिसके द्वारा उन्होंने मूरज की शक्ति जोड ली थी। बिजली भी पंदा यी थी, हवाई जहाज भी बनाए थे। वे लोग सिर्फ एक ही देवता की पूजा करते में- ताकत के देवता को। और पुनर्जन्म की बात करते हुए उसके बारे में एडगर कायस (Edgar Cayice) ने लिखा है,"हिटलर और स्टालिन एटलान्टियन्त बात्माओं का पुनर्जन्म थे।" पितृपूजा के स्थान आदिकाल से मनुप्यो की चमती रमनी दुनिया का हिस्सा है-एक साधारण पत्थर के टुकड़े, दोधार के आले और नाधारण का से लेकर, इमारतकारी, बुतकारी और चित्रकारो की बढिया से बहिया रूम में। पर पिन- पूजा का एक स्थान कुछ वे चिह्न भी है, लकीरी, शक्ती, अक्षरो पोर अंको के रूप में, जो सिर्फ कुछ विद्वानों को स्मृति में हैं, और कभी-कभी फिनी उरूल. नन्द की सातिर कागजों पर उतरते हैं। उनमे आदिकाल में एक दिव्य शस्ति अन्तिना/१४७ समझी गई है, जिसका जाप या तावीज़ की शक्ल में स्पर्श, मनुष्य को अपनी शक्ति का कुछ हिस्सा देकर, उसकी जरूरतों को पूरा करता है । तांत्रिक विद्या भी उसीपर आधारित है, और हिन, विद्वानों की अलग-अलग अक्षरों और नम्बरों में खास-खास तरह की निश्चित ताकत वाली रवायत भी। और इसी तरह दुनिया का साहित्य भी पितृपूजा का एक स्थान है जहां आज भी 'जुज अपनी तो जुदा कितोई, तेरियां कीतियां मत्थे धारियां' का विश्वास लेकर, और 'मेरे हाल दा महरम तूं' और 'नाम अल्लाह दा सव तो चंगा' मानकर कई शायर अपनी रचना का आरम्भ उस आदि पितृ की पूजा से शुरू करते हैं, जो मौत-रहित है, और इसलिए जन्म-मरण के चक्र से स्वतंत्र है । जैसे 'जदों इश्क दे कम नूं हत्य लाइए पहलों रव दा नाम ध्याइए जी।' इसी तरह कुदरत की-सुरज, पानी. अग्नि और पवन जैसी शक्तियों की स्तुति, सराहना और उनके प्रति देवी-देवताओं की आराधना भी साहित्य का हिस्सा होती है। आज भी हर देश के लोकगीतों में ऐसी भावना मिलती है, जो सुरज को कहती है, 'जो कोई तेरा दर्शन करदा उसदे मत्ये भाग', चांद को कहती है, 'भागी भरया सुख दा चढ़ी! खैर दा चढ़ी !' पानी को कहती है, 'जल मिलया परमेशर मिलया मेरे तन दी गई बला।' और संध्या के समय दिये की लो के आगे माथा निवाकर कहती है-~-'दीवे तेल विछड़े मेल । दीवे वट्टी, आवे खट्टी।' और इसी तरह यह भावना अपनी-अपनी भाषा में रखे गए देवी-देवताओं के ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और शिव जैसे नामों को जपती है। मजहबों के बानी भी हमेशा अपने-अपने मजहब के शायरों की कलम का हिस्सा होते हैं। शायर कभी उनको सिर्फ पूजा, इबादत के यकीन में से स्मरण करते हैं, और कभी कीमों या देशों की किसी जरूरत के समय । जैसे पंजावी साहित्य में वारिसशाह हज़रत मुहम्मद के चार खलीफों की स्तुति करता हुआ लिखता है, 'चारे मार रसूल दे चार गौहर, सब्वे इक थीं इक चढ़दड़े ने' और पंजाब के लोकगीत निजी खुशियों को गाते हुए कहते हैं 'गुरू घ्याके मैं पावां वोली। इन लोकगीतों में कई बार तो मजहबों के वितकरे भी मिट जाते हैं। सब गुल्-पीर शक्ति का सम्मिलित चिह्न हो जाते हैं। जैसे पंजाब की एक बोली है, 'देवी दी में करां कड़ाही, पीर फकीर ध्यावां, हैदर शेख दा देवां वकरां, नंगे पैरी जावां, ते हनुमान दी देवां मन्नी, रती फर्क न लिआवां ।' , - १४८ / अपने-अपने चार वरस हर साहित्य में इन शक्तियों को समय-समय पर स्मरण करने की पनेकों मिसाल है, जैसे पंजाबी साहित्य में जगती ज्योति वाली की पूजा करते हुए पंजाव की औरतें चिन्तपूरणी मे दूध और पून की आस करती हैं, और गुरु गोरस को 'इक सलामा मेरिया दोए सलामा गुरु गोरसा।' कहकर मुराद मागती हैं-'सालू वो दयो जी औलाद!" आध्यात्मिक शक्तियों के प्रतीक भी पूजे जाते हैं, जैसे भारतीय साहित्य में सिसी और नाथों की पूजा है, और राम, कृष्ण या युद्ध की पूजा है। इसी तरह समय-समय पर हुए राजा और योद्धा भी साहित्य के नायक होते हैं। राजाजों की तारीफ में विरद, और वहादुरो की तारीफ मे वार लिसी और गाई जाती कौमो के मुखिया भी हर देश में नायक होते हैं जैसे भारत के ताजा साहित्य में गाधी एक नायक हैं । यह नायक प्रया कई बार देशो और जवानी की सीमाएं भी मिला देती है, जैस लेनिन को नायक मानकर उसके बारे में कई देशो के साहित्यो मै उसे चित्रित किया गया है। और जहा तक प्रेम-कहानियों के पात्र हर साहित्य मे समय पाकर नायक बनते हैं, उससे तो हर भाषा का साहित्य भरा हुआ है। यह शायद इसलिए है कि उनकी वार्ता में इंसान अपने को सबसे ज्यादा पहचानते हैं। और अपने अपूर्ण सपनों को चुप की छाती में से निकालकर, कुछ देर के लिए बावाड को दुनिया में ले जाते हैं। और शायद कुछ घड़ियों के लिए उनका अपना अनक्रिया जेरा उन दूसरो के जेरे में पनाह दूढ लेता है। जहा तक पितृपूजा के स्थानों का सवाल है, उनकी बनावट में जरूर फर्क होता है, पर उनके निर्माण में निहित भावों में फर्क नहीं होता। ईश्वर को सर्वव्यापी मानकर किसी भी रूप मे पूज लिया जाता है । पर कुदरत को शक्तियों के लिए और उनके प्रतीक देवी-देवताओं के लिए मदिरो जसे स्थान बनाए जाते हैं जहाँ मोने जैसी महंगी से महंगी वस्तु, फूलों जैमी कोमल से कोमल वस्तु, और अन्न-फल जैसी जरूरी से जरूरी वस्तु चढ़ाकर, उनको पूजा जाता है। हर मजहब के पानी के लिए भी ऐमा स्थान बनाया जात, परति बाहरी रूप एक दूसरे से अलग रखा जाता है, जो मनुष्य मे के लिए सम्बन्धित हो जाता है, गिरजे, मंदिर, मस्जिद 1 उसके साथ ही हर संचालक के अपने मुंह से कहे गए शब्दों को, या उसको हाथों लिखी रचना को, उसका स्थान समझा जाता है, जिसके आगे अपने-अपने विश्वास के अनुसार वन्दगी की जाती है। जो आध्यात्मिक शक्तियों के प्रतीक कोई सिद्ध पुरुप होते हैं, उनकी समाधियों या कत्रों को पूजने के योग्य समझा जाता है और वहां दिये जलाकर दूध या फल-फूल जैसी वस्तु चढ़ाकर मन्नतें मानी जाती हैं। जो योद्धा होते हैं, उनके लिए मीनार जैसा कोई स्थान बनाकर उनको आदर योग्य माना जाता है, और वहां गाहे-बगाहे फूल चढ़ाए जाते हैं। जो फोनों के बानी होते हैं, उनके लिए कोई अलग जगह बनाकर उनकी यादगार वनाई जाती है और फूलों से सजाई जाती है। उनके यादगार-दिवन जलसों और जुलूसों के साथ भी मनाए जाते हैं। जो प्रेम-कहानियों के पात्र होते हैं, उनकी समाधियों या कत्रों को ढूंढकर उनपर दूध या फल-फूल चढ़ाकर उनको पूजा जाता है। और जो सिर्फ निजी रिश्ते से पितृ होते हैं, उनके लिए या तो घर का कोई छोटा-सा हिस्सा, चाहे एक आला ही, सुरक्षित रख लिया जाता है, या सिर्फ वरस का वह दिन जो उनके बिछुड़ने का दिन होता है, उस दिन उनकी याद कुछ जरूरतमन्द लोगों को या जानवरों को कुछ खिलाकर अपनी कमाई का कुछ हिस्सा उन तक पहुंच गया समझा जाता है। और उस दिन उनकी अपने बीच उपस्थिति भी मानी जाती है। चाहे वह उपस्थिति साधारण आंखों से फिसीको नहीं दिखती। सो,ये पितृपूजा के वे स्थान हैं, जो हमारी दुनिया का वसते-रसते घरों की तरह एक हिस्सा है। पर एक, जिसको शायद सबसे बड़ा कह सकते है, स्थान वह है, जो कहीं बाहर नहीं होती, वह सिर्फ मनुप्य की अपनी छाती में होता है। उसके अचेतन मन में, जहां सदियों से पितरों का इतिहास जुड़ा होता है और जिसमें सदियों का वह तजुर्वा सोया रहता है, जो अपने-आपमें एक वेपनाह शक्ति होता है। चेतन मन आज की हालतों से, आज के तजुवों से, और आज के हासिल किए हुए ज्ञान से वास होता है, जिसकी अपनी तरह की प्राप्ति होती हैं और अपनी तरह की एक सीमा । पर अचेतन मन सदियों के तजुवों का जोड़ होता है, एक असीम शक्ति, जो चमत्कार की हद तक आज की सीमित समझ १५०/अपने-अपने चार बरन बाहर होती है। मे इस अचेतन मन की शक्ति जो पहचानने के लिए कोमित सिने, क्रिश्चियन विश्वान में जो मनुष्य का बुनियादी गुनाह गिना गया है, tal नरे अयों में पेश किया है, 'हम, तुम और ये, उगगे माही पाया ARARI जिसे हम स्वय कभी नहीं जानते। और यही युनियाने गुनाह है।" गो ॥ अपनी ही यक्ति को न जानना गुनाह है। चंतन मन किसी शक्ति को बरतने का माध्यम है, गि. माध्यम से सही प्रयोग की पहचान भी, और प्रयोग के मतव्य का निर्णय भीर भन शक्ति का स्रोत है । सब पितरो का एक वह पान, जिसकी मनुष्य भी मही अर्थों में पूजा करके नहीं देगी, और न चेतन यन में उगा 11 पाम ने अपनी ही गसियत के हुस्न की मुगद पाई है। यहां 'पूजा' शब्द, चेतन मन का दलील के सहारे अवैगन मन के गीरको बरतने के अर्थों में है। सपने अचैत मन के प्रकटीकरण का गवत बड़ा माध्यम हानेर-tो. देखे और कानों-उने अर्थों की तरह इनके अयों को अंधेरे में गं निकालकर को रोगनी में ले आना, किसी के लिए भी अपनं मयं पी परमान सचमुच बड़ा सहाई हो सकता है।