Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Swen
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V स्वेन मूह विश- सेपमा लेजरलाफ [नोयुग पुरस्कार विजयिनी] . प्रकाशक- पस० एस० मेहता ऐराट मदर्स ६३ सृतटोला-मनारस अपमा स. १९९६ वि. [मूल्प ३) प्रकाशक- ५०गिरिजाशंफर मेहता एस० पस्० मेहता पंड प्रदर्स जशी। नोवुल-पुरस्कार के निर्णायकों की राय:- For reason of the noble idealism, the wealth of imagination, the soulful quality of stylo which characterisa her books" - मुद्र:- ५०गिरिजाशकर मेहता महना न श्री प्रेस काशी सेवा में- -- -- -na-44nARMA- मर्मम गेंट
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दो शब्बत
मनोरन पोनर पाप रेगिया Tar
मेल्मा TAR..िविन परिचय
पागजी नाम TEa sutr sst nा frat नुसार
पी मेवा में Rgy मा २01
पुस्तक कमी है, पर IT मा काम
दिखाना है। फिर भी मा मनुका न होगा
कि यह पुस्तम मानrean amaमशागक
रचना है।
মা খালা সীন খ গ গননা এ শনা
या अतिक्रमण परना कितना भयार भरा है, युद्ध,
।
जो दिन-दहाड़े हजारों निर्देोप प्राणियों को तलपार के घाट
उतार देता है, मानव-जाति का कितना सघातक शत्रु है;
ससार अतस्तल की गभीर भारनामों को पहचानने में
धोखा खाकर कितनी निर्दयता के साथ निरपराधियों को
पैरों तले रौदा करता है और समाज से बहिष्कृत व्यक्ति
फा जीवन-पथ निराशा के गहन अधकार से आच्छादित
होकर कितना दुरतिक्रम्य बन जाता है-इसका ऐसा
गर्मस्पर्शी, करुण और भावपूर्ण चिा इस उपन्यास में
खींचा गया है कि पढ़कर दिल में अहिंमा, जाति प्रेम और
आत्मोत्सर्ग के भाव भरे बिना नहीं रहते। यह उपन्यास
नहीं, अाधुनिक संसार को अधोगति और करता का
रोमाचकारी खाका है, जिसमें कथानक के प्रावरण में कुशल
लेखिका ने जोवन को कई गहनतम पहेलियों पर ऐसी
फड़कती हुई शैली से प्रकाश डाला है कि पढ़नेवाले अवाक
रह जाते हैं। इसमें जीवन की महत्ता और पवित्रता के
साथ साथ इस महान् तथ्य को भी अभिव्यक्ति की गयी है
कि तिरस्कृत होकर भी मनुष्य अपनी नम्रता, सहनशीलता
और परोपकार-वृत्ति से गहरी बुराइयों की जड़ खोद सकता
है । वस्तुतः डाक्टर लेजरलाफ ने यह पुस्तक मनुष्य-मात्र
के मनमें युद्ध के प्रति घृणा और जीवन के प्रति का भाव
।
भरने के उद्देश्य से रची थी। गत महासमर के भीपण
हत्याकांड ने इनके हृदय पर जो गभीर आघात पहुंचाया
था, वही दो वर्ष बाद इस पुस्तक के रूप में इन्होंने अभिव्यक्त
कर संसार के समक्ष रखा, ताकि प्रत्येक मनुष्य के दिल में
यह वात गड़ जाय कि हिंसा से बहकर दुसरा कल्मप और
अपराध पृथ्वी तल पर नहीं है।
माशा है, पाठक इस प्रकार के उत्तम उपन्यास को
पढ़ने का कष्ट उगने की कृपा रेगे इसे अपनाकर हमको
मोत्साहन देने की भी कृपा करेंगे, जिससे हम भविष्य में
भी इसी प्रकार उत्तमोत्तम संसार प्रसिद्ध साहित्यिको की
पुस्त को को अनुवाद करार प्रकाशित पर सकें।
-मराशक
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स्वी
(१)
की पश्चिमी पहाड़ियों से घिरे हुए प्रोगन के टापू में
वर्प पहले एक व्यक्ति अपनी स्त्री के साथ रहा करता
वे सुरत शह में एक दमर से निकुन ही मिन्न थे, क्योंकि जो
पति एक महा, पदसरत और सुस्त गति पा, वहाँ पत्रो पचाम
की उम्र में भी बीस वर्ष का युवती-जैमी सुन्दर और सुकुमार
थी। नये नाम जोश और तालिया थे।
एक दिन रविवार की सुहावनी सध्या के समय जोश अपनी
पनी क साथ कुटिया के सामनेपानी चट्टान पर बैठा था। यह
अपनी वाक चातुर्ग दिराताने का यहुन हो शोकीन था और अपने हा
शब्दो का श्रान द लूटने के अभिप्राय से अमर पत्नी के साथ
ग भी लगाया करता था। श्राज भी वह सायकाल के समय प
हुए किसी असवार का समाचार सुना रहा था, फिन्तु तानिया का
मन पति की बातों पर पकायन या । घः मन ही मन सोच रहो थो-'इनका कैमा अनोर दिमाग है! शारगार की दो चार पहियों से ही कितना रहस्य नियास लेते हैं। किन्तु असाप हे कि दूसरों के लिये सीर सपाने क यमाय हम लागों क लिये अपनी प्रतिभा का कुछ भो उपयोग नहीं परते।" फुटिया के सामने एक ओर्ण शाणं मकान था, जहाँ पहल कुछ मल्लाह और जहाजी कप्तान रहा करते थे। किन्तु बह रहने के योग्य न था। इसीलिए जोन उस कुटिया में रहता था जा पहले रसोई घर और भयहार का काम देती थी। यकायक तानिया की इष्ट उस मकार पर जा पड़ी और उसके मन में विचार ठ सडा हुआ-'यदि इन्हें भी अपने पाप दादो की उन्ह ममुद्र से प्रेम हाना, तो आज घर में कितने पैम जमा हो जाते। विन्तु खेता की शुभक मागे कुछ सुझे तर न दिवाला निकन रहा है, फिर भी खेती ये पीछे हाथ धाकर पड़े हैं।" यद्यपि तालिया पनि के समीप चुपचाप बैठी थी, उसका मस्तक चिडिया के चञ्चन मिा की तरह इधर उधर घूम रहा था। वह टापूकी चट्टानों क धीच जहाँ तहाँ ऊगे हु! बालू और गेहूँ के खेतों की आर देख रही थी। मोमन फा अधिश भाग पहाडी धार ऊसर था । श्रतएन पालो-काली चट्टानां व पाय हरे रोत द्वीपों जैस सुन्दर प्रतीत हो रहे थे। यह सम जोन की ही पठोर मिहनत का फन था । ग्रीमन की जमीन को उपजाऊ बनाने के लिये वह कई बार नावों पर लादकर खाद और मिट्टो लाया था । उसे उम्मीद थी कि किसी दिन समकी मेहनत का पूरा पुर- स्कार प्राप्त होगा। किन्तु तानिया उन यानों पर विश्वास न रखती थी। वह पति की खेती की श्रार देखकर अक्सर यही सोचा करती थी-'इन देशों में पसीना बहाने से क्या लाभ ! उत्तर की - - बर्फीली हवा का एक मोंका ही इस हरियाली को मिट्टी में मिलाने के लिये काफी है। मैं तो हमेशा कहती हूँ कि सेती के झमेले में पड़ना भारी मूर्खना है । इसमे तो बेहतर समद्र का व्यवसाय ही है।' श्राज भी जर उसकी दृष्टि मकान को प्रोट में मिलमिन किन मिल करती हुई अनत जलराशि पर पड़ी तो उसके दिन से एक ठएडी निश्वास निकल पडी और मन में विचार उठ खड़ा हुआ- 'श्रोह ! समुद्री व्यवमाय कितना यढिया है मजे से माल ढोना और भाड़ा कमाना । चादी ही झड़नी रहती है। पाचों अगुलिया घी मे तर रहती हैं। अगर मैं पुरुष होती तो सबसे पहले समुद्र की ओर दौड़ पड़ती और भूनकर भी खेती का पचडा न उठाती । देखो ना हम बूढ़े हो रहे हैं। मन थककर लाचार हो जायगे तब क्या दुर्दशा होगी ? लड़के तो इस जजान मे फसेंगे ही नहीं। और सन बेचारों का इसमे दोष ही श्या . 'सुनती नहीं हो ?-इमी समय उसके पति ने गौर के साथ देखते हुए कहा | उसने स्त्री के स्वगत विचार भाप लिए । वह सत्ती से लौटे हुए कुछ अग्रेज यात्रियों का निस्सा सुना रहा था। यकायक सन्देह हुआ कि तालिया का ध्यान एकान नहीं है। किन्तु उसे न तो श्राश्चर्य ही हुआ, और न क्रोध ही, क्योंकि यह पहनाही मौका न था, जब उसे तानिया से उसकी लापरवाही की शिकायत करनी पड़ी हो। 'वाह ! फोन कहता है मैं नहीं सुन रही हूँ ?' स्त्री ने हक्का बक्का होका उत्तर दिया इसी क्षण सोच रही थी, कि आप कितने अच्छे पका है। क्या ही अच्छा होता, यदि पादरी का काम 'खूब कहती हो!' जोन हसता हुआ बोला, 'एक पाता तो समलता नहीं, और पादरी मनाने वजी हो।' - - मन पति की बातों पर पशासन था । यह मन ही मन सोच रही या-'इनका फैमा अजोय दिमाग है! सवार की दो बार पहियों में ही कितना रहस्य नियाद लेते हैं । किन्तु अफसास है दूसरों के लिये सीर रूपाने के बजाय हम लोगों के लिये अपनी प्रतिमा का कुछ भी उपयोग नहीं करने ।' कुटिया क सामने एक जोर्ण शायं मकान था, जहाँ पहले पुर, मल्लाह और महामी पप्तान रहा करते थे। किन्तु यह रहने के योग्य न था। इसीलिए जोन उस फुटिया में रहता था जा पहले रसोईघर और भयहार का काम देती थी। यकायक बाजिया की दृष्ट उस मकार पर जा पडी और उसके मन में विचार छठ खड़ा हुआ-'यदि इन्ह भी अपने पाप दादो की तरह समुद्र से प्रेम हाना, तो घास घर में कितने पेम जमा हो जाते। किन्तु खेता का ३३ क मागे कुछ सूझे तब न दिवाला निकल नहा है, फिर भी खेनीक पीछे हाथ धाकर पडे है। यद्यपि तालिया पति के समीप धुपचाप बैठी थी, उसका मस्तक चिडिया के चचम सिर की तरह इधर उधर घूम रहा था। वह पूरी चट्टानों के बीच जहाँ तहाँ ऊगे हु। भालू गहूँक खेतों की भार देख रही थी। मोमन का अधिकाश भाग पहादी और असर था। प्रताव कानो-काली चट्टानों क योच हरे खेत द्वीपों जैम सुन्दा प्रतीत हो रहे थे। यह सब जोन की ही यठोर मिहनत का फल था । ग्रीमन की जमीन को उपजाऊ बनाने क लिये यह कई बार नावों पर लादकर खाद और मिट्टो लाया था ! उसे उम्मीद थी कि किमी दिन मसकी मेहनत का पुरा पुर- स्कार प्राप्त होगा। किन्तु तानिया उन बातों पर विश्वास न रखती स्थो । वह पति की खेती की प्रार दखकर अक्सर यही सोचा करती थी-इन देशों में पसीना बहाने से क्या लाभ । उत्तर की M -- बर्फीली हवा का एक झोंका ही इम हरियाली को मिट्टी में मिलाने के लिये काफी है। मैं तो हमेशा कहती हूँ कि खेती के झमेले में पड़ना भारी मूर्खना है । इसमे तो बेहतर समद्र का व्यवसाय ही है।' आज भी जब उसकी दृष्टिमान को प्रोट में मिलमिन झिम मिल करती हुई अनत जलराशि पर पड़ी तो उसके दिन से एक उपडी निश्वास निकल पड़ी और मन में विचार उठ सड़ा हुमा- 'ओह ! समुद्री व्यवमाय कितना यदिया है !मजे से माल ढोना और भाड़ा माना । चादी ही झड़नी रहती है। पाचों अगुलिया घी में तर रहती हैं। अगर मैं पुरुष होती तो सबसे पहले समुद्र की ओर दौड़ पड़ती और भूनकर भी खेती का पचड़ा न उठाती । देखो ना हम यूढे हो रहे हैं । जस थककर लाचार हो जायगे तब क्या दुर्दशा होगी? लड़के तो इस जजाल मे फसेंगे ही नहीं। और एन घेचारों का इसमे दोष ही भ्या १. 'सुनती नहीं हो १-इमी समय उसके पति ने गौर के साथ देखते हुए कहा । जमने स्त्री के स्वगत विचार भाप लिए । यह सत्तरी व से लौटे हुए कुछ अग्रेज यनियों का किस्सा सुना रहा था। यायक सन्दह हुआ कि तानिया का ध्यान एकान नहीं है। किन्तु उसे न तो आश्चर्य ही हुआ, और न कोष ही, क्योंकि यह पहनाही मौका न था, जब उसे तानिया से उसकी लापरवाही की शिकायत करनी पड़ी हो। 'वाह ! कौन कहता है मैं नहीं सुन रही हूँ ?' स्त्री ने हक्का घशाहोकर उत्तर दिया इसी क्षण साच रही थी, कि धाप कितने अच्छे पका है! क्या ही अच्छा होता. यदि पादरी का काम करते 'लय कहती हो । जोल हसता हुश्रा बोला, 'एक सभलता नहीं, और पादरी मनाने चजी हो।'
4 'केस जागत हैं कि मैं नहीं सुन रही थी। स्तोत्तो मा तो याद है-सिवाह उनका जहाज दुरा, यफ में पूरा वर्ष का अब सामान चुक गया और पाईक टुई चयान पर वह विदर कहने लगो । ससा ह इस तरह कॉप रहा था, माना दिल में जयली मच रही हो। 'घरा पल्पना करा, यदि उन लोगों के साथ कोई इमारा ही निकट सम्बन्धी भूगों मरता हाता-ति न जापरवाह की वादकहा। ची चौक ठीचौर तीक्ष्या दृष्टि से जोल की और जान ना । समान मफी, इस शब्दों का प्राशय क्या थाट- न युद्ध अर्थ का होगा ही। उसन सोचा, किन्तु जोश की मित्र मिघाती आसा से उसका दिन मापना मासान न था। 'यो इस लिये ही मलिक और समय बर्बाद करते रहेंग तो जीवन में कुछ भी रस न बचेगा।' प्राधिकार वह पात पलटने फ लिये धोनी-जन घ लोग पच ही गय तो निर्थक मारपना नफ्या बाभ तानिया की दृष्टि में इस बात के लिये दिमाग सपाना मूसंता यी, जिसका अन्त सुखपद हो । किन्तु जोजन , शब्द मात्र नहीं कहे थे तालिया को जापाचा दसकर हमने पहना शुरू किया-करात को मैंने एक अजोय सपना देखा! पेसा नजर पाया मानो स्वन सिरहाने खड़ा होकर पिसी भारी अपराध के लिय मुमे कोस रहा है। सैर, सपनों में कुछ अर्थ होता है या नहीं, यह तो में नहीं जानता, किन्तु एक पान का आश्चर्य है। आज ही अखबार में भी इसका नाम देखा 'खार में?: वालिया चोककर चिछा पठी । इसकी लापरवाही न जाने कहाँ भाग खडी हुई। "किस प्रसार में १ । । .
किमका नाम भादि पचीमा प्रश्नों की पौछार से मोल परे.
शान हो गया। असावरानी की शिकायत करने की अब प्रावश्य.
कता न रही। बात यह थी कि यदि और किमी के मर में
ऐसा कहा जाता तो वह सदापि इतनी अधोर न होती । फिन्तु यह
तो स्वेन या समाचार था! 3RT-जो ताजिया का मत्रमे लाइला
मेटा याnिenो नौ वर्ष की उम्र में ही अप्रेश मन्जनले गये
थे। जिमका सह वर्ष से न पोई पम प्रायाथा, ममाचार औरही।
अचानक ही नाव की यात्रा करते करते एक अपज दम्पति
इस टापू पर श्री पहुँचे थे। म्बन उस समय येवा नौ माल का
जड़का था। उसके पाम श्रगार सम्पत्ति थी, किन्नु पार पथा
एक भी न था। म्न को देगा ये मुग्ध हो गये और उसे
गोद लेन र नियतवार हो गर । सानिया पहले तो अपने पुत्र
को देने से हिचकिचायी, किन्तु भविष्य का विचार का श्रापिरकार
राजी हो गयी। लड़का होनहार और प्रतिभाशानी था-अवतर
मिलने पर काफी नाम कमा सस्ता था। यही माचर माता-
पिना ने उसे दूसरों के ह य सौप दिया। तब से मद वर्ष बीत गए,
स्वेन रन लीगा क लिए तना ही अशात था, जितना समुद्र के
तले में पड़ा हुप्रा प्राणी।
'यद दसो, बचे हुए यात्रिों में हम मी नाम सम्मिलित
है। जोन ने अपार निसते दुा कहा ।
मपदर तालिया ने अपवार पीच लिया।
"पले ही प्रथा न कह दिया कि स्मन भी यात्रा में शगेक
था" व श्लहने के स्त्र में चाची-'अब दुपारा की किस्मा
दाहराना हा! मैंने एक शब्द भी न सुना।
मान बुद्ध हवामाहित सा हो गया। वह स्वंन की चर्चा
छेडने क पहने फाको भूमिका योर देना चाहता था। वैस
।
समान भी
"
(१०)
से असान मात कहना आसान होता, किन्तु अब पनी की वेचनी
ने सारा मामला हो पलट दिया, तो नाचार छोर से फिर से
सब याते दोहरानी पडा।
'मोह। अपने बच्चों को बाहरी लोगों के हाथ सौपना धुग है।
तालिया किस्सा सुनती हुई कहने लगी उसने 'क्या-क्या मुसीबतें न
उठायी होगी ! जय जहाज के साथ साने का
हम गया होगा, तर चारों ने क्या साया होगा?
इसी समय जोन उत्तरी ध्रव के यात्रियों की वापसी पर
निकाले गये जलूस और स्वागत समारोह का वर्णन करने लगा।
'नाखों स्त्री पुरुष बदरगाह पर श्राये थे। जगह-जगह यात्रियों के
स्वागत की धूम थी
'प्राद! अगर हम भी सड़क के एक कोने में सड़े बहकर
समका स्वागत देस मकते ताजिया बीच में ही बोल उठी।
'सड़क पर क्यो। माता पिता और रिश्तेदारों के लिए तो
सास जहाज तैयार पडा था।"
'माह ! हमें उस जहान का कौन जाने दता १ ली ने एक
निवास नीचत हुए कहा, 'क्या 'यह' ऐसी बात सहन कर
सपत्ती थी
स्वेन की जिसमाता ने गोद लिया था उस माता को वालिय ।
'ब' नाम से पुराफाती थी। बात यह थी कि अब से उस
समी न रधेन का पत्र जिसन से मना कर दिया था, तब सतालिया
इससे पहत ज्यादा प्रसन्न रहा करती और अपने मन मे उसे
रासी की तरह निर्दय और डरावनी स्त्री समझने लगी थी।
श्राम भा बातचीत के बाद में वह महिला याद हा आई, जिससे
वालिया का चेहरा उदास हो गया।
'दुसने से तो मना न करती।" जोन ने युद्ध साहस पटोर.
4
.
( ११ )
कर उत्तर दिया। वह स्त्री के समक्ष कोई महत्वपूर्ण समाचार पाट
करना चाहता था, किन्तु ऐसा विदित हाना था मानो एक दम कह
देने के पहन उन कुछ समय को आवश्यकता है। इसलिए वह
यार-बार अपने मन में कह रहा था-'आह ! उसी एक बात पर तो
हमारा भाग्य तुला हुआ है।
'अजी, अभी तुम क्या जानते हो।' तालिया गेप भरे स्वर
में चिछा उठो, 'सह परस में एक पत्र भी तो उस दुष्ट ने लिखने
न दिया ! स्वने फोई पच्चा ता या नहीं, चाहता तो खानगी तोर
पर ही एकाध पत्र लिख ही सकता था, भिन्तु लिख कैसे १ बात तो
साफ झलक रही है कि उस हरामजादी न भोले लड़के के कान
खून भर होंगे। जरूर स्वेन क मास्तष्क में यह बात ठू सी गई होगा
कि हम लोग बड़ों की सङ्गति क बिलकन अयोग्य है।'
कहते-कहते उसका गला रुघ गया। आवाज भर्राने लगी
और आँखों में आँसू छलक पाये। चेहर से प्रसन्नता का भाव
विलुप्त हो ग्या और मन मे कई पुरान रनीदा विचार उठने लगे।
'सच कहती हो,आश्चर्य की बात है कि स्वेन को एक अन्तर
भी लिखने की फुर्सत न मिली, जरूर उन लोगों ने भड़काया
होगा।' जोल हाँ म हाँ मिलाता हुआ बोला।
किन्तु तानिया ने कुछ भी उत्तर न दिया । दिल की व्यथा के
भागे बोजना उसके लिए असम्भर हो रहा था।
'मामला विगढ़ रहा है । जाल ने अपने मन मे कहा, 'अगर
यही दशा रही तो कुछ भी उम्मीद न रहेगी।'
यह अपनी पत्नी से एक जरूरी ममाचार कहने के लिए उत्सुक
हो रहा था ।, किन्तु तालिया की उदासीनता देखकर, उस समाचार
कहने से वह डर रहा था । यही कारण था कि वह इस बात को कहने
के लिए उपघुम्म अवसर की साज में था। पर जब स्नो का
समान भी (१०) से असन यात फहना श्रासान होता, किन्तु जब पन्नी की येचैनी ने सारा मामला हो पानट दिया, तोलाचार होर उसे फिर से सय यात दोहरानी पडा। 'मोह ! अपने बच्चों को बाहरी लोगों के हाथ सौंपना धुग है। वालिया रिस्मा सुनती हुई कहने लगी उसने 'क्या-क्या मुमीवर्तन छठायी होगी ? जय जहाज के साथ खाने का सूर गया होगा, तब वेवारों ने क्या साया होगा ? इसी ममय जोन उत्तरी ध्रर के यात्रियों की वापसी पर निकाले गये जलूस और स्वागत समारोह का वर्णन करने लगा। 'लाखों स्त्री-पुरुप बदरगाह पर आये थे। जगह-जगह यात्रियों के स्वागत की धूम थी 'आआह ! अगर हम भी सड़क के एक फोने मे खडे रहकर सफा स्वागत दय सक्त तालिया बीच में ही योन उठी। 'सड़क पर क्यों ! माता पिता और रिश्तेदारों के लिए तो खास जहाज तैय र सड़ा था।' 'आह । हमें उम जहाज पर फौन जाने देताखी ने एक नि श्वास रसींचते हुए कहा, 'क्या 'वह ऐसी बात सहन कर सपती थी? स्वेन की जिसमाता ने गोद लिया था उस माता को तालिय। 'वह' के नाम से पुरा करती थी। बात यह थी कि जब से उस रमणी न स्वेन को पत्र जिसने से मना कर दिया था, तब से तालिया उससे बहुत ज्यादा अप्रसन्न रहा करमी और अपन मन में उसे राशमी की तरह निदय और डरावनी खो समझने लगी थी। आज भी बातचीत के प्रवाह में वह महिना याद हा आई, जिससे aलिया का चेहरा उदास हो गया। 'दसन से तो मना न कावी! जोज ने कुछ साहस बटोर- - वह अपनी पत्नी से एक जरूरी समाचार कहने के लिए उत्सुक हो रहा था, किन्तु ताजिया को उदासीनता देखकर, उस समाचार कहने से यहांडर रहा था। यही कारण था कि वह इस बात कोने कर उत्तर दिया । वह स्त्री के समक्ष कोई महत्वपूर्ण समाचार प्रकट करना चाहता था, किन्तु पेसा विदित हाना था मानो एक दम कह देने के पहत २ कुछ समय की आवश्यकता है। इसलिए वह बार-बार अपने मन में कह रहा था-'आह ! उसी पक बात पर तो हमारा भाग्य तुला हुआ है।' 'अजी, अभी तुम क्या जानते हो।' तानिया रोप भरे स्वर में चिछा उठी, 'सह पास में एक पत्र भी तो उस दुष्ट ने लिखने न दिया ! स्वने कोई यच्चा ता था नहीं, चाहता तो खानगी तोर पर ही एकाघ पन लिख ही सकता था, किन्तु लिख कैसे ? यात ता साफ झलक रही है कि इस हरामजादी न भाले बड़क के कान खूप भर होंगे । जरूर स्वेन क मास्तक में यह बात तू सी गई होगा कि हम लोग यड़ों की सद्गति क विनकुन अयोग्य है।' कहते-कहते उसका गला रुघ गया। श्रावाज भर्राने लगी और प्रॉखों में आँसू छलक पाये। चेहर से प्रसन्नता का भाव विलुम हो गया और मन में पई पुरान रनीदा विच र उठने लगे। सच कहती हो,प्राश्चर्य की बात है कि स्वेन को एक अशा भी लिखने की फुर्तत न मिली, जरूर उन लोगो ने भड़काया होगा। जोल हाँ में हाँ मिनाना हुआ बोला। किन्तु तानिया ने कुछ भी उत्तर न दिया । दिल की व्यथा के आगे बोलना उसके लिए असम्भव हो रहा था। 'मामला बिगड़ रहा है !' जाल ने अपने मन में कहा, 'प्रार दशा रही तो कुछ भी उम्मीद न रहेगी। - कजिए उपयुक्त अवसर की साज में था। पर जब सोका . . 1 - .. । । वाड़ते देखा तो बात छिपाने का साहस न रहा। दरी जवान सं' इसने कहना शुरू किया-'अाज गिर्जाघर में एक नई समर सुनी- ३ तालिया ! शाम को पादरी मुझे घर जिवा ले गये थे। उनके नास इग्नेंड से कुछ समाचार आया है। वहीं तो मुझे असनार भी मिना 'पादरी १ तालिया हडबड़ाकर पूछने लगी। 'हो, स्वेन के बारे में कुछ कहना चाहते ये '! हमे म्धेम से क्या मतलय । वह चाहे जो हो गया हा, हमार लिए एक सा है। वह चुप हो गई और मुह मोड़कर बैठ गयी। जान ने भी कुछ उत्तर न दिया। बहुत देर तक दोनों सुप्पी साधे }ठे रहे। माग्विरकार तालिया ने ही मौन मग किया। 'कै निष्ठुर श्रादमा हो ।' वह उत्तेजित होकर योन उठो, । किसी दुखिया फेा मत्सुक बनाकर तडपाने में हो तुम्हें मना माता ३। पादरी वाला समाचार क्यों नहीं कहते १. पादरी स्वय पह देंग अभी अभी आनेवाले हैं।" 'पादरी ?', तालिया उछलकर चिछा उठी, कैसे अजीब यादमी हो । पादरी भानेवाले हैं और तुम ध्यान लगाये बैठे दो! गुमास कहना तो चाहिये था ?' यह मकान की घोर बढी । देखना चाहती थी, फि घर की, समज ना दुरुस्म है, किन्तु यकायक चलते चलते रुक गयी। 'पादरी कपाश्राम्हे हैं ?' पनि की ओर दमकर वह बोलो, 'हागा घर दाला में फाला । अन्यथा पादरीका क्या काम ?' बा जाम के विचार भाषा का प्रयन्न करन लगी। 'समय भुव की चपाती या साने और चमई के टुम्हे चबाने से । -
"
स्वैन का दिमाग ठिकाने आ गया हो और वह हमसे मिलने का
इगदा कर रहा हो, किन्तु याद रसो, इस बार उसे घर में पैर
भी न रसने दूंगी । वह हम लोगों को क्या समझता है ? अगर
हम उसक कुछ भी नहीं हैं, जैसा कि वह समझ रहा है, तो हमें
ईस छोकर स कुछ सरोकार नहीं ।'
'जान समान फर बोलो तालिया। पति ने डॉट कर कहा,
'जब असली बात जानोगी तो इन शब्दा के लिए पछताोगी।'
वह स्त्री के उत्तेजित शब्द सुनकर तमतमा उठा । 'मैं कुछ
पाहता हूँ और यह उल्टा हीर्थ लगा लेती है। उसने मन-ही मन
मे कहा, 'ओह !' इसकी खोपड़ी कर सुरंगी। वात का न मतलय
समझनी है, न अस्म से ही जयाम देती है ।
'प्रासिर कहो तो, पादरी क्या समाचार सुनाने वाले हैं ?
तालिया पति की धमकी से डार चोली । उमे तरह तरह की
थाशकाएं सतान लगी। इसका ता यही अर्थ होता है कि स्वेन
सशन नहीं है।
ऐसा नहीं है।
"एसा मालूम पपता है कि लडका पिसी श्राफ्त में फस
गया है। पति ने गम्भीर मुख मुद्रा बनाकर कहना शुरू किया-
'पहले तो उनन स्वागत पे उपलक्ष्य में खूर जलूस निफ्ले, दावत
और तरह तरह की खुशियाँ मनाई गई। स्न्तुि एक दा दिन
भी न बीत पाय होंगे कि लीग उत्तरी ध्रुप के यात्रियों के साथ
मे तरह तरह पी भद्दी अफवाहें सुनाने लगे
'अफवाह ! सान दातों तले उंगली दबार कहा-'तय ता
मुन्द्र गड़प हुई है।
'यहाँ तक कि लोग उनका सुनेश्राम तिरस्कार
और नीच याभार में उनक झडे भी छीन लिये ।
- । 1 - । - (१४) लोग उनका दर्शन पाने के लिये टूटे पहते थे और सहक पर तिज धाने की भी जगह न थी। पर भप दर्शनामिनापा धन मुंह पर यूकने को तैयार खडे थे 'प्रोफ ! ऐसी बात ता प्राज फ भी सुनने में न पायी थी। तानिया पाश्चर्य के साथ पोली, 'अच्छा हाता, अगर स्वेन घर पर ही हम लोगों के साथ रहता 'और यह कोई अचम्मे की बात नहीं है। जोल अब मोश में श्राकर कहने लगा 'असाधारण कामों में ऐसी अनहोनी वारदातें अक्सर हो ही जाती हैं । वेवार भूखों मर रहे थे । भने बुर फा न ज्ञान थो, न पाप पुण्य का ही भान ! तब सहसा पेट की भाग से पागल होकर एक यात्री ने आत्मघात कर लिया। बस, फिर क्या था ! सब लोग गिद्ध की तरह उस पर टूट पड़े और सिर काट कर '? उसको सा गये ताजिया चीख सी उठी। 'उन्हें सुध-बुध ता थी नहीं ! पागलों की तरह वेभान हो गये थे। 'और स्सन भी मन लेगा में शरीक था? स्वन भी?' 'न रहा होगा ता जबरन शामिल कर लिया गया होगा। ऐसे मौकों पर लोग खुब सावधानी रखते हैं। 'श्राह ! अब समझी कि पादरी महाशय क्यों तशरीफ ला रहे हैं। दुमगे जगह तो उसके लिये ठिकाना रहा ही नहीं, तप हजरत हमार पास आ रहे हैं । और शिफारिश करने के लिये पादरी का है ददा। हर्ज क्या है " सो उसी स्वर में चिल्ला उठी-'जय गुल घर उडाला रहा, तम बिडो लिखने फा मिला और श्रव ठिकाना न रहा ता हार मैं उसे दरवाजे पर पैर भी न . .
( १५ ) । क्या हुभा १ ऐसे लडके के किसी हालत में घर में स्थान न । उसने वह काम किया है, जिससे सभी लोग नफरत करते हैं जोल पन्नी की उत्तेजना देखकर अधीर होने लगा। पह मन- । मन बोला-'यह औरत कितनी बेवकूफ है । कैसी जिही और tale ! कितनी बदिया बात होगी यदि एक जवान लड़का बुढापे में सहायता देने या पहुँचे ! पर तालिया अपनी हरू प्रागे पुछ सोचती हो नहीं सैर, अभी उसका दिमाग ठिकाने । देता हूँ 'ठाफ है, जो मैंने सोचा था वह गलत नहीं है। वह स्त्री की देखकर बाला-'अय पत्र की खबर सुनाने पादरी थे। तरह की कठिनाई न होगी!' खो का माथा ठनका जाल फी धमकी काम कर गई। श्रम यह और भी कड़ी निगाह से देखता हुआ नाला-'हे, पादरी के माने तक ठहगगी या में ही कह दूँ ?-और उद्दण्डता पा दण्ड देने के इरादे से कहना शुरू किया-'यह तो तुम्हें मालूम ही है कि नमक धर्म के माँ बाप लयडन में रहत हैं, यात्रा के याद वह वही लोटा भी। विजय उसके सबध में पई भद्दी अफवाहे उदने रागी, ता एक दिन पिता ने उसके पास वह अखवार भेजा, जिसम एसो तरह की एक बेहूदी रामर छरी थी। पर मिर्फ अवधार ही नहीं, साथ ही एक भरी हुई पिस्ताल भी ३१ तालिया पीस पठी 'और उस स्त्री ने घू नक भी न कया . 'यह भी पति से सहमत थी 'तष 'तप यही हुमा जो ये लोग पाहते थे। 'और यह दामिन दसती टी रही क्या ? यहो, गे उसकी मा .
.. . बैठी थी, तालिया तमतमा फर बोली, 'नहीं नहीं, यह असंभव 1 तुम झूठे है।।' में भी एक घण्टे पहले शायद ऐसा ही कहता । पति 'ने शाति के साथ कहा, मैं भी पहने यही सोचा फाता था कि श्री का हृदय इतना पर नहीं हो सकता किन्नु र मुझे सन्दह नहीं है, क्योंकि तुम्हारी बातें इसकी प्रत्यक्ष ममाया है कि ससार में हदय हीन स्त्री असभव नहीं है।' तालिया के गानों पर बापू को घाग यह ची है । वह मुह मोडका मिसकने लगी, स्पेन, तू न रहा, अरे।' वह तेरी मा थी? वह पापण हृदया, जिसन तुझे मरते देखते हुए एक पास भी । न दहाया वह विनाप करन लगी, 'हे भगवन् ! हमने उसे जाने हो । क्यों दिया और उसे माना हानने का, औरत उस को, क्या अधिकार था जिसको पैदा करनेवाने दुसर ही लोग थे ।' 'चुप रहो तालिया! इसी समय पति ने कहा, 'देखो पादरी या गये है। 'कह दो, वापिस लौट जायें । मुझे अब सुनने की आवश्यकता नहीं है। 'नहीं ! नहीं ! जन मन्होंने पाने का कष्ट उठाया है, ता ऐया पहना मचित नहीं-कह कर जोन नाव के सामने गया और कुछ ही मिनट बाद पादरी को लेकर वापस लौट आया। साथ में एक दुबला पतला नौजवान भी था। 'जान कहते हैं कि आप ममाचार सुन चुकी है, गती हुई यी के समीप आकर पादरी ने कहा, 'दुर्भाग्य से स्वेन एक यहूदे झमट मे फॅम गया था, निमक फन भरूम धर्म के माता- ५॥ ने उसे घर से निनाल दिया है।' । .
तालिाया, जो अञ्चल से मुंद दाँपे श्रम भी सिसक रही थी
म्मान प्रदर्शित करने के लिय उठ खड़ी हुई, किन्तु ज्यों ही उसकी
ष्टि पादरी के साथ पाले नवयुवक पर पड़ो, वह चौक उठी।
हैं। यह ता स्वेन है। उसक
अत करण से एक श्रावाज
माई और क्षणभर बाद ही अनेक विचार बबण्डर की तरह
इठ कर उसक मस्तिष्क मे चक्कर लगाने लगे। तब क्या जोल
जा समाचार कहा था यह झूठा था ?' वह मन ही मन पुलन
लगी और उस समझते दर
लगी कि क्यों उसका पति स्वेन
की खबर सुनाते समय झूठ बोला था। 'बाद, जाल के ढग निराल
हैं ! पित्तनी अजीर गति से मुझे अपनी निर्ममता का दण्ड
दिया। किन्तु अब स्वेन का क्या अपने साथ ही रखना पडेगा ?'
पुत्र के पलक की याद आते ही उसके दिल मे सलबली सी मच
गयी । ऐसा प्रतीत हुआ, मानों पुत्र क कुफम से उसक दिल म
जो रज पैदा हुआ था, वह लाय प्रयत्न करने पर भी न मिट
सकेगा। 'ओफ! frant बेहुदा काम कर लिया। मनुष्य का
मौसा -वह सोचन लगा और उसफ मन में विचाराया
एक तुमुल सग्राम मच गया। फिन्तु इसी समय उसकी हाट
पुन फ दुबल चेहरे पर जा पडी। उसकी प्रासा मे कितनी बदा
महित थी। एसा लगता था माना मद मद मुस्कराता हुश्रा
वह सहानुभूति और दया की भिक्षा माग रहा है।। पुत्र क उस
कायिक स्वरूप का दसकर तालिया क ठण्डे विचार न जान
कहा भाग गए और उसफ हदय में यकायक प्रम का एक वर
उमड़ पाया। 'साह, जोन ! आज तुमन मरो आ खोल दो
है। वह मन ही मन कहने जगा, 'तुमन बता दिया है, मैं क्या
हूँ । मेरो भावनाय क्या हैं । क्योकि श्राज में अच्छी तरह अनु-
भव कर रही हूँ कि वर्षों से बिछुड़े हुए पुत्र को मैं प्यार किये मिना
है . 4 पर ही ना अटकी, जो असख्य पापियों से भरी हुई एक कडाही क नाचे धधकती भट्टी में ईधन झोंक रहा था। उसको दुम रस्सा की तरह तीन भागों में गुथी हुई बहुत अनोग्यो थी, जिसके सिरे स वह कडाही का उबलता हुआ शोरवा हिला रहा था। बचपन में उस तस्वीर को देखकर स्वन तरह-तरह की कला दौसाया करता। कडाही और मही को एक साथ संभालने वास उस अद्भुन रसोइय को देखकर उसे श्राश्चर्य और कोतूरला लगता था । किन्तु शैशव की वह मधुर मल्पना, प्राज के रस दा विचारों से स्तिनी विभिन्न थी ! 'यदि गिर्जे में बैठे हुए स्त्री पुरुष- जो रविवार को पायामत की उस डरावनी कड़ाही और डरा शैतान को देखते हैं- यकायक जान लें कि उपासना-मन्दिर म एक एसा व्यकि उनका साथ बैठा है, जो मनुष्य का मास भक्षण कर चुका है, ता क्या ताण भर के लिए भी वे मुझे इस स्थान पर सड़ा रहन देंगे ? ओह ! यों ते। राज ही नये नये पाप होते हैं। गारी से भारी अनाचार होता है। चोरी, घोसनाजी, शाखारी. खून, अत्याचार और व्यभिचार सभी बाते इस दुनिया के लिए सामान्य हो गई हैं । होंगे कुछ लोग जो का नाम सुनकर नाक भौह मियाडे। पर अधिकाश लोगों के लिए तो इनमें न र असाधरणता है, न कोई गम्भीर महत्व ही है। नित्य ही ये या दिन-दहाडे होती हैं और पाई फान भी नहीं फटपटाता । फिर पफ महापाप ऐसा है, जिसकी पल्पना माग से लोग थर्रा उरत है। जिसकी तुलना में चोरी से लेकर खून तक सभी अपन। नहीं थे वानर हैं, और मैं वही दुष्कृति विना हिचश्चिाहट के पर सुकाएँ ! तप मुझसे अधिक भूपित व्यकि कौन होगा ? कौन दोगा मुम जैसा शेतान स्वेन इसी तरह के विचारों में तल्लीन हो रहा था कि गरी 7 ने गिले में प्रवेश किया। चर्च में बैठे हुए तोगों में जोन और तामिया को छोड़कर, स्वेन के वापस आने का अमना कारण यदि कोई जानता था तो यह एजम का पानी था । उसकी सहायता और सहानुभूनि से ही स्पेन ग्रीमन मे रहने का स्थान पा सफाया | उसने ही गत रविवार को माता पिता से बडगा अपनाने का जोरदार अनुत भी किया था। हमने ही स्वन को अपनी शक्ति भर सहायता भी दी थी यह सोचकर किजो कुछ कुकर्म उमन किया था, वह अपनी स्वतन्त्र इच्छा से नहीं, वरन् दुसर रोगा द्वारा यनात् लाचार यनाया जाकर किया था। प्रत्येक बातमे पादरी ने उसके प्रति दया और उदारता ही प्रदर्शित की थी। वह जानता था कि स्वेन उस येहूद शिकने में फंस गया था कि जिसमे मुक्ति न हाने पर सम्भव था कि वह अात्मघात भी कर लेता। यही साचर पादरी ने इसे भरसक सहायता भी दी थी, हार्दिक सहाउभूमि भो दिपाइ थी। और स्वय ग्रोमन जाकर Bमा माता-पिता से शरगा दने की सिफारिश भी की थी । यह सब तो ठीक था। किंतु स्पेन को श्राज चर्च में उपस्थित देखने की उसे जरा भी आशा न थी। अतएव ज्योंही गिों की दालान में कदम रखा और उसकी दृष्टि उत्तरी ध्रुव की यात्रा से लौट हुए उस नर माँस भदो मनुष्य पर पड़ो, उसके शरीर में एक ऐसी सनसनी फैल गई, माना नफरत के मारे उसका गला घुटा जा रहा हो। 'यदि घर आता तो किसी हालत में भी मुझे नागवार न होता! पादरो अपने मन में लगा-'बल्कि वहाँ ना उसका स्वागत भी करते मुझे हिचकिचाहट न होती, किंतु यहाँ ? यहाँ पाने के पूर्व क्या उसे मालूम न था कि वह ऐसा घृणित छन्य फर चुका है, जो सर्वथा फुत्सित, घृणित और अपवित्र है। नर मास भक्षण क्या यह मामूली बात है ? तम उसने . - । - । - - ( २४ ) पर दूसरे ही दिन उसे अपनी बेवकूको मालूम पड़ी। 'ओक. मैं कैसो मूर्सना कर डाली। वह अपने आपका कोसने लगा- 'कैसा लड़कपन ? कितनी जल्दनाजी!! जगमी श्रादमो की तरह निर्ग प्रेग्गा के वशीभूत हापर मैंन कितना अनुचित कार्य कर झाला ? पर श्रय क्या है। सकता है। श्रम तो मामला जितना सुधारा जाय उतना ही बिगड़ने जगगा । बेहतर है कि किसी वित अवमर की प्रतीक्षा की जाय।' और तर श्राश्चर्य से औरों फाडकर उसने अपन मन मे कहा- 'प्रोफ। इस घृणा की भावना में कितनी जाग्दस्त शफि है कि मुम-जैस व्यक्ति को भी उसने चुटकी मे पराजित कर दिया। और यह भी उस समय जय उपासनालय जैसे पवित्र स्थान में एक धर्मोपदशक और आध्यात्मिक पय प्रदर्शक की हैसियत से में प्रार्थना के लिये श्राए हुए नर-नारियों को श्रादेश द रहा था। ज्योंही प्रार्थना समाप्त हुई और पादरी मञ्च से उतरा, यीमन से आए हुए में तीनों प्राणी भी उठे और नीचा सिर किए हुए गिरजे से बाहर निकले । किन्तु बाहर श्रात ही उनके पैर न जाने क्यों रुक गण । हर-बक्क होकर वे चारो ओर देखने लगे। गिर्जाघर के श्रास-पाम एक खुना दुपा समतल मैदान था । देश के उस पहाड़ी मात में यह एक अनहानी बात थी। लबा चौडा ते न था, फिर भी था बहुत गुजाइशदार । यद्यपि एक सिरे से दुसरे सिर की चीजें स्पष्ट दिसलाई पड़ती थी, तथापि उस मैदान में गिर्जाघर और दस ग्रीस झोपडियों व ग्वेतों के उपयुक्त पर्याप्त प्यान था। चारो ओर भूरी पहाड़ियों की एक लयो दीवार थी, जो इतनी जची ते न थी कि उत्तर की फीली हवा का राक सफ, पर उस पार की सभी वस्तुओं से इस छोटे से गांव को छिपा इसने पालिये पर्याप्त थी। सारा मैदान कपि के उपयुम छोट-छोटे ।
खेतों में विभाजित था, जो नाप-चोल में एक दुसरे के समान थे।
और ऐसे ही किसानों के कुछ नोले पोले मकानात भी थे, जिनमें
'न पड़ी-पदी भाजीशान इमारतें नजर पानी थी, जो दूसरे
मकानात का दवा दें, न अत्यत टूटी झोपड़ियाँ हो। सब
समान और एक-से थे। नऊच नीच का भाष था, न छोटे-बड़े
का ही भेद।
यही हाल यहाँ की हरियाली का भी था। न उसे सूप हरा
भग स्थान ही कह सकते थे, क्योंकि पदादियों, मैदानों और सड़कों
पर वृक्षों का अभाव था और न बिलकुल ऊमर ही ससे कह सकने के
क्योकि खेतों में गेहूँ और मटर का एक समुद्र सा लगता था ।
इप्सी विचित्र मैदान के बीचोबीच वह गि घर था, महासे
प्रीमन के चे तीनों प्राधी इस ताह नोचा सिर पि हुए निकले है
मानों धक्के देकर वे निकाल दिए गए हों।
गिघिर की पुरानी ढग को इमारत इतनी भी तो नर्थ
कि विनकुन ही बदसूरत वह कही जा सके, क्योंकि उसकी छत प
एक मीनार थी, जिसका देसकर हग्य ईश्वराभिमुख होने लगत
था। किंतु उसे अधिक सुन्दर भी नहीं कह सकते थे, क्यों
इसका नीचे वाला हिस्सा इतना धुक्ला और मका हुआ था।
देखकर मन में एक उदासीनता हो छाने लगती थी।
ज्याही वे तीनों चर्च के बाहर निकले, उनकी दृष्टि मिले
हाते में इधर-उधर घूमती हुई एक चितश्यरी दिल्ली पर जा पड़ी
यह कोई बदसूरत आवर तो न थी, क्योंकि आम बात
जैसे नरम ये और चाज भी अत्यत मद और मधुर यो । फिर
ज्यों ज्यों उसकी ओर देखने लगे, उसकी नाम चमड़ी क
विभिन्न अगों के हिलने डुलने मे एक ऐमा भाव नजर आने
जिसमें धूर्तता और शैतानी छिपी हुई थी। सिर्फ
। ( ३२) थी। तानिया अब बार-मार उस गाव फी सफर करने और त्रियों से बात करते समय स्वेन को निदोष साबित करने कामी प्रपन्न भी करने लगी। यह स्वेन की प्रशंशा के पुत्र बांध का और और मके सरल निष्कपट स्वभाव का साका भी सीव देतो, कि मुछ दिनों के बाद ही उसे अपना प्रयत्न निष्कन प्रतीत होन aily लिया कुछ बुरा-भला तो न महनी, किन्तु तरह तरह के बहाने बनाकर स्वेन से संबंध रसवाली बाते अनसुनी कर देती यौ ।। 'श्रोह ! ये स्त्रियाँ इस नश्वर पृथ्वी के उपयुक्त नहीं. प्रत्युत, देवलोक मे रहने योग्य है । ताजिया वहाँ से वापस लोटते समा ग्मानियुफ व्या के साथ कहती-धार्मिकता और सचाई से ये इतनी भयाल र भरी हैं कि इनके दिल में अब दया की एक भी बूद ममाने का स्थान तक नहीं बच पाया है।' उधर यही हाल जल का भी था | जम कभी कोई व्यकि उसके पास पाता, वह कहता-भाई ! मैं तो इतना थक गया हूँ कि कुछ भी काम नहीं कर सकता। चाहता हूँ कि शीत्र ही स्खेत मेरे को काभर उठा ले किन्तु लोग इस बात पर कान भी न देते । किमान दीर, ना कोई भी आते, स्वेन की बात जिद जाने पर जैसे ही यहरे पन जाते जैसे नेपफोर्ड की 'कट्टर धार्मिक स्त्रियाँ तालिया पी यात सुनकर बन जाया करती थी । एक दिन निसमस की शाम को माता, पिता और पुत्र कुटिया में बैठे भविष्य के सम्बन्ध में वाला रहे थे । उसो समय स्वेन जो माल हमेशा से भी ज्यादा प्रसन्न मालूम है। 1 था, बाल अमा, य प तो बहुत सका है। अगर इस छोड़ कर बड़े मकान में रहने लगें, तुम्हारी क्या राय है ,
ते क्या हो ! उसमें न छत है न फिर्श हो । तालिया
त होकर बोली।
क है' लड़के ने कहा-'पर अभी इतना चुग तो नहीं
या फि काबिल मरम्मत भी न हो। मैंने उसकी दीवारें देसी
की मजवून हैं । कमरे भी खूब लम्बे-चौडे हैं और प्रकाश भी
है। और सबसे बढिया बात तो यह है कि उसका रुस समुद्र
र है । शर्म की बात होगी, अगर हमार रहते बूढे कप्तानो फा
मिट्टी में मिल जाय।
ड़क की बात माता-पिता के गले उतर गई। वे मकान
नेि को राजी भी हो गए । पर अब सवाल पैसे का उठा।
न ने इसका भी एक सीधा नुस्खा पेश क्यिा। बोला-
पास कुछ रुपया जमा है। सौतेले माँ बाप का नहीं, वरन
की गादी कमाई का है। ध्रव यात्रा के लिये एक हजार
मिले थे ! उससे श्राप
उससे जोल यकायफ चिल्ला उठा-कदापि नहीं। मकान
वाने के लिये इन्कार नहीं है, पर उस पैसे से कदापि नहीं।'
रुपये का नाम सुनते ही उसे ऐसा प्रतीत हुआ, मानों
घ प्रदर्शित करने के लिये वहा के पुराने निवासी १७ में
रहे हैं।
माता और पुत्र भौचक्के होकर जोन का मुह ताकने लगे।
दाण भर बाद ही घे उसके दिल का भाव भाप गए। अतएर
शब्द भी न कहकर चुप्पी साधे बैठे रहे।
श्रोह ! फिलने भोले-भाले, पाक-दिन आदमी ये कप्तान
जोल उन प्राचीन निवासियों को याद करने लगा-'उन्हें न
पत-सगत की चाह थी, न बोलचाल पीही परवा । घ समुद्र पर
ना महार दो रोटी कमा लेते थे और उसी से सन्तुष्ट होकर
,
V
.
(६९).
बचे पचाए होश भी उड़ गए। दो मिनट याद का नजारा उसकी
आखों के पर्दे पर नाचने लगा । ' खिलाने के लिये जबर्दस्ती
करेंगे और मैं इन्कार करूगा । क्या ऐसा घृणित फर्म स्वम में भी
कर सकता हूँ। नहीं 1 नहीं !! संसार की फाई भी शकि मुझे ऐसे
वीभत्स कार्य के लिये बलात् बाध्य नहीं कर सकती । तब एक
साथ ही मात-घूमों की पौछार के साथ घे मुझपर टूट पड़ेंगे और
सम्भव है, प्राण लेकर ही पिंड छोडे • ज्यों-ज्यों वह सोचने
लगा, उसका साहम भी टूटता गया।
किन्तु अभी हाथा पाई शुरू होने में कुछ देर थी। जिसको
मात काल के समय वह मरा हुआ साप मिला था, उस शख्स ने
श्रय जेब में हाथ डालकर उस चिकनी लोथ को बाहर खींचना
आरम्म किया। अब पूरा सॉप निकल आया, तो उसे इधर-उधर
मुलाता हुआ तालिया की आखों के समीप ले गया और शरारत
भरी मजाक करता हुआ बोला-'कहो, है न स्वेन के लिये
बदिया पकवान
'श्रर ! तुम अपने फो इन्सान समझते हो?' सो क्रोध से
लाल होकर नोन उठी-'तुम किस गुमान में हो ? क्या में इतनी
मूर्ख हूँ कि तुम-जैस गुण्डो के साथ, स्पेन को जो तुम सब लोगों से
हजार गुना ज्यादा कीमती है, मेज दूंगी?'
गुण्डे जोर से खिलखिलाकर हस पड़े।
'वालिया । डरो मत' वही शख्त पुन पाना, 'ससे ज्यादा
दुर न जाना होगा । सिर्फ किनार तक चलने की तो बात ही है।
वहीं हम जाग आग सुलगाकर उसके लिये भनमाना पकवान
पका देंगे।
माता ने अपने पुत्र की ओर मुहका एक निगाह डाली । देखा
वह किवनी उदासीन मुसकान मुस्कराता हुआ धैठा है। चेहरे
२
-
पान हो शेप पेही मिन्द है, और न विरोध प्रदर्शित करने की
उत्तेजना हो । मानो पामा करता मा वह सब कुछ सहन करने
के लिये तैयार है।
'स्वेन ! माँ ने विवा कर कहा-यों चुप चाप यैठकर क्या
सोच रहे हो? इनके साथ जाने का वो तुम्हारा विचार नहीं है न ।
जानते हो ये भोग फोन हैं ? यह देखो-जो सरसे भागे पड़ा है--
उसका नाम श्रोनास है । यह वही आदमी है जिसने पैदा होते
अपने यच्चे को मार डाला और जघा की उस समय भी हिकारत
नफी, म यह माचार और लगभग बेहोश थी।'
गुराढे पुन पिलपिलाकर इस दिए ।
'चिन्ता न करो शोलास योला, 'स्वेन मी हिफाजत में हम
पुछ भी कसर न रखेंगे। नमक-मिर्च डालकर उसकी चीज
काफी शादिष्ट बना देंगे। और फिर जो-कुछ वह खा चुका है,
उसकी तुलना में साँप है हो कि गिनती में "
'वह देखो' तानिया एक सबसे अचे और ख्वार व्यकि
की ओर इशारा करती हुई मोली, 'वही कोरफो जोन है, जिसने
याए के सिवा जिन्दगी मे दुसरा काम हो न किया । यही वह व्यक्ति
है जिसने बीमा के रुपयों के लोभ में जानवरो और चौपायों से भर
हुए मवेशीखाले में भाग लगा दी थी।
'द योंही बबद करती है । तुम उसकी बातों पर ध्यान मत
दो बेटे हमारे साथ भाम्रो। कोरफीजन ने स्वेन के कधे पर
हाय घरकर कहा।
पर तानिया बिना रुके कहती ही रही, वह देखो यही, बलि
है जिसन अपनी दादो को भूखों मार डाला, और यह टासन है
जिसने धान तक ऐसी एक मछली नहीं बेची, जिसे उसने दूसरा
की जाल से चुराई न हो और कोने में महसड़ाते हुए जो दो
(४२)
पकद कर उठा लिया और देखते ही देखते कुटिया के बाहर दें
उसी समय सरदार की मदद के लिये फोरफीजोन सामन
लपका। किंतु दूसरे ही पाण उसकी भी फमर में दो मजबूत हाथ
जय दिष और थोनास की तरह वह भी ऊची टोगे किए मकान
फे बाहर घड़ाम जा गिरा।
श्रय अगजोल भी भाई की मदद के लिए बढ़ा। कुछ देर
की गुत्थम गुत्या के बाद सब रफूचश्कर हुए और मैदान साफ हो
गया। अगलाल ने फौरन ही दरवाजे की धुराडी चढ़ा दी। तब
पदर क साथ हाथ बढ़ाकर भाई के समीप आया। 'कैसे तुमने
धन सरका दे मारा ?' व प्रशसा के स्वर में धोना-'वह दाव
तो मुझे भी सिखाना होगा।'
पड़े भाई का चेहरा बड़ाई की उत्तेजना से लाल हो रहा
था। अब चेहरे पर न वह रजीदा मुसकान थी, और न वह
उदासीन विरति हो।
'खुन छकाया सालों को! अगजोल बोला, 'ऐसा सक
मिल गया है कि भविष्य में पास फटकने की भी उनकी हिम्मत न
होगा। पर मैया ! अब तुम उन सबको पछाड़ने के लिये भयले
हो काको थे, तो इतनी देर चुपचाप सहन क्यों करते रहे।
स्वेन का गला रुघ गया फुर्सी पर लुढक कर वह हाथों में
मुह ढापफर सिसकने लगा। यह पहला ही अवसर था, जब उसके
दिन का बाध फूट चला हो ।
आह ! अंगजाल वह ताकत और कूमत किस काम की।
वह राता हुआ चिल्ला ठा-'किस तरह मैं अपन आपको, बचा
सपना हूँ जब स्वत ही अपने श्राप से इतनी नफरत करता हूँ,
जितनीधे सम भी मिलफर नहीं करत होंगे। ओफ! कितना
1
मेरा स्वरूप भयङ्कर है। कितना वीभत्स है ! तुम उसको कल्पना भी नहीं कर सकते। केवल में ही जानता हूँ, मैंने कितना भीषण दुष्कृत्य किया है। मोह ! जब मेरे मस्तिष्क पटल पर वह वस्तु आठों पहर अदित रहती है-वह जो सबसे अधिक घृणित और वीभत्स है, तो कुछ शराबियों के मुह मन्द कर देने से मुझे कैसे सात्वना मिल सक्ती है?
। प्रसन्न थी। अतएव 'मुझे तो उसका कुछ भी समाचार नहीं मिला। अंगजोम पोला, 'हो, लोगों की गपशप कह सुनाता हूँ। कहते हैं कि पहले तो नेद पर केवल छ ही श्रादमी थे, जिनमें एक ने अपना प्रचार मार डाला था, दूसरे ने दादी को स्वर्ग पहुँचा दिया था, तीसरा ढोरों से भग घर जा चुका था, चौथा मछली चुराकर बेचता था और शेष दो शराय पीकर मृत्यु को न्यौता दे रहे थे, पर अब उन्हें सातवा साथी और भी मिल गया है, जो मनुष्य का मास भक्षण कर चुका है । अतएव खून मजेदार समाज जुटा होगा।' 'पेमा कहनेवाले गये हैं। वालिया ने मुंह बनाकर कहा। पर पुत्र का कुशल-समाचार पाकर वह मन जप आगजोल जाने लगा तो, वह बोली-'ज्योंही इसकी खबर उसे मिले-फौरन ही श्राफर सुना जाना । भूलना मत, यही तुम्हारे लिए माता पिता की सेवा है।" पद्रह दिन बाद लढा फिर टापू पर आ धमका । ‘पर अब लोग कहते हैं कि स्पेन ज्यादे दिन इन लोगों के साथ नहीं टिक सकता। वह कहने लगा, क्योंकि उसने फ काम ऐसे कर डाले है जो उन लोगों को स्वर में भी सहन नई। हो सकते। सुना है कि स्येन की देखरेख से नेद-जो पहले सर से भद्दी किश्ती मानी जाती थी, श्रय ऐसी सुर गई है किन ग्सका इजिन ही बिगड़ता है, न मंडा ही फटा नजर आता है। सब फटे पाल सो दिए गए है। नाव नये रग से पोत दी गई खाना मी बढिया मिलता है और धरतन भी पहले से बहुत साफ रहते हैं। और यही कारण है कि उनके साथ स्वेन की नहीं पट सकती। क्योंकि नेद के लोग किसी बदमाश को अपने साथ रखना चाहे पसद फरभी ने, पर परतन साफ रखना और पाल-पतमार रगना तिना तो वे स्वप्न में भी सहन न करेंगे।'
( ४७ ,
'आह ! लड़का मेरी खिल्ली उड़ा रहा है। मा ने मन में
पा पर वन के लिये वह पहले से भी ज्यादा प्रसन्न हुई।
प्रीमन के निवासियो को खबरें जल्दी जल्दी नहीं मिल सकती
। अतएव लडका पुन दा सप्ताह बाद आया।
'सचमुच हा वन उनके साथ ज्यादा दिन अब नहीं निम सकता।
.. उसी तरह कहने लगा, क्योंकि दिनोंदिन वह 'नेद करग
बदलता ही जा रहा है। और सभी प्रकार के काम भी ज्याद
से होने लगा है। सब जाने सुभर गई हैं। इसलिए मछलियो
देर लग जाते हैं । पर यही तो कारण है, क्या ये लोग स्वन से
है, क्योकि ओलास और कारफोभान, तिल और वासन
चाहे विसी नर मासौं भक्षो के साथ रहना स्वीकार भी कर ल, पर
फुर्ती से काम करना और खूब पैसा पैदा करना तो उन लोगों को
कभी स्वीकारी नहीं हो सकता।'
तानिया उसकी बेसिर पैर की बातें सुन कर चिढ़ गयी।
पा नाराज न हुई । उसे विश्वास होने लगा कि स्वेन की उन लोगों
से खूब पट रही है । श्रतएव वह मन ही मन प्रसन्न थी।
'ओह, जोल सचमुच ही मबसे धुद्धिमान आदमी है। यह
आनता था कि लड़का काफी सफल होगा। तभी उसे मेजने का
पवना अनुराध किया। वह बोली।
पाच-सात दिन बाद अगजोज पुन एक नवीन समाचार
लेकर था पहुँचा।
'स्पेन को हो मैं नहीं देख सका वह योना, क्योंकि किश्तियों
आजकल उत्तर की ओर गई हैं। पर लोगों की अफवाह का
सुनाता हूँ। लोग कहते हैं कि जब श्रोलास मकान बनवा रहा
है, तो नेदक मशाहों में जरूर कुछ गडबड हुई है। जरूर कुल
दाल में करना है। उन लोगों ने एक मनुष्य मांस भी को अपना
-- - -- Y स पत्री चौज पड़ी। तो शायद तुम ठेका लेने का निश्चय ही कर, चुके है।। पर अपने यज पर उसे निमा भी लोगे? बुढा फुछ अचफचा गया। वोजा-'घर में जवान लडछ तो ।। 'अजीय आदमी हो !" ताजिया पति को प्रदूरदर्शिता देखकर बोली, 'उसमे पहले पूछना तो चाहिए था ?' मां को भरोसा न था कि जदका पाप के काम में सहायता देगा । क्योकि स्वेन कुछ दिनों से बहुत उदासीन नजर पाता था। मैं तो नहीं समझता कि स्वेन इम काम से हिचकेगा' चूहा चौमा, 'प्रत्येक प्रादमी को इमारती काम से जानकार रखनी चाहिए, क्योंकि सबको मकान में रहना ही पड़ता है।' पर स्त्री के गले एक भी बात न उतरी । वह समझ न सकी कि स्वेन उप्स मकान का काम कैसे कर सकेगा, जिसका, संबध एप्लम के गिर्जे से है, जहाँ का लोकमत सर्वथा विरुद्ध है। जन माता पिता स्कृन की चर्चा में उलझ रहे थे, वेन भी। उपस्थित था। पहले तो उसने कुछ भी न पहा, पर जा पिता को निराश होते देखा, वह यकायक वाल उठा, 'सैर, जब ठेका लेना , धाप मजूर फर हो चुके हैं तो अब छोड़ना नहीं चाहिए। मैं शक्ति भर आपको मदद दूंगा। यो फि स्पेन अपने पिता का प्रातरिक उद्देश्य जानता था। उसे मालूम था कि जोन से किसी भी साधन से समाज में प्रश कराना चाहता है। श्रतएव ग्रीमन में एकान्त वास करने की प्रपल इच्छा होने पर भी, वह पिता को राजी करने के लिये स्कूल में योग देने को तैयार हो गया। स्त्रीचति पाकर जाल बहुत प्रसन्न हुआ और उसी दिन बई, - 1 -- . घात From
मजदूर आदि से मिलाने के लिये पुत्र को अपने साथ
गया।
अनिच्छा रहने पर भी न कुछ ही दिनो में उस काम में
रोन लगा। पिता ने भी धीर-धीरे सारा काम पुत्र को
सौप दिया। अब वही काम की निगरानी रख सकता था
इच्छानुसार रद्दोबदन भी कर सकता था । लडका श्रव
क्षण भी फिजूल धर्याद करना नहीं चाहता था । अतएव
ग्रीमन श्राना भी छोड दिया। वह उसी स्थान पर रात दिन
रहता था, जहाँ इमारत का काम चल रहा था। जोल भी
। भार पुत्र के फधों पर रख चुका था। अतएव वह
ग्रीमन में ही रहने लगा। सिर्फ कभी-कभी चक्कर
- चला जाता था। और जब कभी लौटता, पनी या वहाँक
सुनाता रहता था। स्त्री पुत्र के लिये चितित होकर हमेशा
करती थी कि नोमन क लोग स्वेन से असतुष्ट तो नहीं हैं।
जोल उसे हर बार विश्वास दिलाया करता था।
'फन मुझे इसराइन जान्सन मिले थे, एक दिन उसने पती
कहा, 'वही स्थानीय काउन्सिल के सभापति हैं । मेंने स्कूल
इमारत के बारे में उनकी राय पूछी ता ये बोले-'जोन।
तो हम लोग तुम्हारे लडके को यह काम सौंपते हिचकिचा
२थे । पर श्रम ताम्फून और गाव की काउन्सिने ऐसा सोचने
पहले दो बार विचार करेंगी। क्योंकि जब हम देखते हैं कि
मामूली पत्थर की जगह उम्दा पत्थर और पतले पटियों के
समती लकड़ी काम में ला रहा है तो हमें यही कहना
इता है कि जो इससे विद्वेष रखते हैं, वे गलती कर रहे हैं
पाजिया अप समझ गई कि जोल ने केवल इसीलिये ठेका
था. साकिस्तान अपनी योग्यता प्रदर्शित करने का मोता
,
।
Fu
'क दिन स्कून की इमारत के लिये सरीदे हुए सामान का
हिमाच चुकाने स्वेन यनमरी गया था। लौटती घार वह रेल से
श्राया और पप्जम के पासाले स्टेशन पर उतरा। किन्तु प्लेट
फार्म से बाहर आने पर जन उसे वह घोडागाडी-जो उसके
लिये श्रानेवाली थी- मिनी वो स्पेन एक प्रजीम
में पड़ गया। गाँव करीब दम मील दूर था। पैदल
न था। वह निश्चय नहीं कर सम कि वह इम -
इमी समय एक छोटी-सी बग्घी सडसडाती
टेशन के सामने ठहर गई। स्व7 उमकी
। हुश्रा तपका। पर दरियाप्त करने
पा
।
( ५५ )
सके लिये नहीं पर एनम के नव विवाहित पादरी के लिये आई
। उत्तर के किसी पुरोहित की लड़की से अभी हाल में हो उसने
दी की थी और इसी गाडी से नववधू के साथ वह वापस श्रा
स्नेन निराश हो गया। बचो के लिये उसने पहले हो सुचना
मदी थी। पर अब पता चला कि वह सदेशा एजम तक
हुँचा ही नहीं था। अब क्या किया जाय ?
'बन्धी का कोचषक्स खानी है। आप पादरी से करियेगा।
हाँ बैठकर आप मजे से एप्लम तक चल सकेंगे। गाडीवान
| राय दी।
पर स्वेन क गने वह नहीं उतरी। जबर्दस्ती किमी के सिर
ET वह नहीं चाहता था।
इमो समय स्टेशन के फाटफ मे पादरी अपनी नई पन्नी के
साथ निकला। दोनों की जोड़ी खुप फाती थी। पादरी लगभग
तीस साल का एक हट पुष्ट नोमवान था। उसका ललाट चौड़ा,
चेहग तेजम्बी और मम्तक विशाल था। दाढी घु घराली और
दाँत मोती जैसे स्वच्छ थे। उसमें वे सभी बातें मौजूद थी, जा
उपयुक्ती अपने पति में देखना चाहती है। स्त्री को जीवन की
आपदाओं से पचाकर, एमे सुख और सम्मान देने के लिये वर
सर्वथा उपयुक्त और समर्थ था।
नमधू भी कोई माधारण सुन्दरी न थी। उसे देखार अमेज
चित्रकारों को श्रादर्श रचनाए याद आने लगतो थी, जिसमें पेसा
दीप अधिकार चिनित यिा जाता है। जम्या फड, पनना
| बदन, ढालू कधे, झुकी हुई गरदन, सुनहले पाल, गुनायी
और स्वगीय न्यानि से जगमगाते हुए विशान
नेम, जो अनित्य संसार से हटकर सर्वदा किसी अष्ट्र शोक
0 R की ओर ताका फरते हैं। यह युवती उसी रूप को साकार प्रतिमा थो। स्वन उस अप्रतिम सौंदर्य को देखकर विमुघ ना हुआ, किन्तु खा की तुलना में उस पति बहुत मद्दा, निकृष्ट, और लगभग कुरूप, ही प्रतीत हाने लगा। ज्यों ज्यों स्वेन स्त्री के नाजुक घदन का साथ पादग के भारी शरीर की तुलना फरता, उस ऐमा मालूम पडता' मानो वह व्यक्ति उस अनुपम सुन्दरी क सर्वथा अयोग्य है । कई नहीं सकते, स्वेन क मन मे पादगे के प्रति इत दुर्भावना का कारण क्या था। संभव है, उस दिन चर्च में किए गए अपमान को याद कर वह पादरी को निकृष्ट कह रहा हो। पर स्वेन को तो यही विश्वास था कि वह किसी भी दुर्भावना से प्रभावित नहीं है। ज्योंही व दोनो गाड़ी के समीप पाए, स्वेन फौरन ही वहाँ में खिसक गया । किन्तु कुछ ही घाण बाद उसने पादरी को अपनी पार पाते देखा। गाड़ीवान ने स्वन को ले चलने के लिये अपनी ओर से पूछ लिया। समीप आकर पादरी न गाडी में, मैठने का अनुरोध किया। बात यह थी कि उसक मन में इस अभागे नवयुवक के लिये हमेशा सहानुभूति का भाव रहा करता था। 'प्रोफाख्यान क्तिना गलत था ?' भाग की सीट पर बैंऽते हुए स्वन ने अपने मन में कहा- 'हमेशा मैं जल्दयाजी में लोगों को समझने में गलती करता है। पादरी वास्तव में कैसे अच्छे हैं ! तिने सजा है और तय क्षण भर पहले ५ विचार के लिये वह अपने आपको फोसने लगा और मन ही मन उन लोगों की प्रशंसा भी करने जगा, 'वर्षों से ऐसी सुना और समान जगेडी मैंने नहीं देखी थी। याघी में साथ-साथ बैठे हुए दोनों फिनने अच्छे मालूम पढ़ते हैं १ दोनों इम समय नवीन सुन के स्वप्ना को देखने में + ए • हो रहे हैं। अब हमारे एमजैसे घर में गृहियो के प्रवेश में कितना पाला हो जायगा! पादरी एक घड़ी के लिये भी वहाँ से दूर रहना न चाहेंगे। इन विचारों में स्वन इनना निमान हो गया कि वह चौक पड़ा, जब यकायक नववधू की थकी हुई आवाज सुनाई दी, 'श्रोह ! कभी इसका श्रत भो हामा १' 'धन्त । स्पेन चौका अपने मन में दोरा गया, ऐसी कोन सी वस्तु है जो इसको नकभीक दे रही है ? और वह भी सास शान न कि वह पहले पहल पति के घाना रही है?' वह औदौड़ाका चारों प्रार दसने लगा और इसे मम झते देर न लगी कि वो रिस वस्तु से ऊब रही थी, 'प्राह ! इन फानी काली चट्टानों को देखकर वह परा ठी है।' स्वेन ने अपने मन में कहा। सचमुच ही वह एफ धनीर प्रदेश था, जहाँ गाडी इस समय दौड़ रही थी। न उसे पहाड़ी प्रदेश ही कह साते थे- कोंकि वहाँ ची चोटियों या पर्वत मानाओं का नामानिशान भी न था वह मैदान ही काा सकता था, क्योंकि अगह- जगह चट्टान और टीले नजर पा रहे थे और ये भी कहीं इतने संकर थे कि गाड़ी के लिये गस्ता होना पवना था और कही इसने दुर दूर कि गो धमने क कामिन बढे पडे मैदान नजर पाने लगते थे दाहिने और बाए, भागे और पीछे चारों ओर पवन चट्टान ही घट्टान थी। न उRH प्रारम नद्या श्राता था, मन हो। स्वामाविक हो था कि उनको देखार जिनकी का दिन अब उठे। सडक भी उन चट्टानों के बीच इतनी धूमता फिरती हुई जा रही कि पना ही नहीं था कि श्रागे कैसा प्रश आनेवामा है । रास्ते भर बन्द IIT शिला-सपटही
-
सामने मिलते थे। उनके सिवा न हरे-भरे वृत थे, न छोटेनो
पौद ही । अधिकाश चट्टानें नगी ही थी और कुछ ढकी भी यो
तो इतनी छिट व्युट घास से कि फरीम करीम पकसी ना
आती थीं। उनका दसार मन परान लगता था और जा
कभी को खुला मैदान दीसने लगता तो साफ प्रदेश पाने की
उम्मीद सादल छजन लगता था। किन्तु क्षण भर, बाद ही
पुन पकाध चट्टान सहक के सामने श्रा खड़ो होतो थी।
'सचमुच ही यह टील बहुत बेहूदे और दिन में घबगाट
पैदा करनवाल है। अफसास है कि इस युवती को अपन ससुराल
पहल पहल इन्दो भदो चट्टनों के दर्शन हुए।
मैं समझता हूँ उस पात में ऐस खराम दृश्य न हाग! स्वेन
न साचा और दुमर ही क्षण उम पुनः प्रावात सुना दी
'आफ ! इन बाड़ पहाडिया में वा सपन माइ-खड से भी
ज्यादा सुनमान लगता है।'
इमा सम्य एक जगह ऐसी आई जहाँ कुछ गाए और
हुन्छ म चा रही थी। समाप हा कुछ बचे भी बैर
खा रह थ । सन्हें दखकर युभी अपने पति की भार मुद्द
याला, 'चमा कम स कम दा-चार बच्चे और जानवा ता नज
माए ! वरना में ता यही साच रहा थी, कि हमलोग विसा जग
देश मे से गुजर रहे है, जहाँ रभ्यता का नामानिशान
प्रात समय
चुन-चुन
.
यह क्या कहती ो सिग्रन" उसका पति बोल 38
'जानती हा, यह मग मातृभूमि है ? यहाँ का ए-1 काम
छोर सनका मुझे प्राण सभा अधिक व्याग है। अगर तुम्हार प्रान्त
के पार म एस ही अपशब्द यह ता तुम्हे कितना बुग लगगा ?
जैसा कि स्वाभाविक या, सासक शब्दा स मर गई ।
-
--
. ५६
पात देर तक वह कुछ भी ना कह सकी और अन्त में जय
पोली मोनने गधे कठ से कि स्पेन समझ गया, यह अपने
शब्दों क निये पति स मा माग रही है।
'वस्तुता और दिन में ऐसी अनमनी नहीं रहती थी। वह
नहीं सकती भाज मुझे क्या हो गया है।"
BREE प्रत्येक शब्द इतना व्याग जगता था, प्रत्येक प्रात
हानी गभीर थी कि सन मन में सोचे मिना न सा
'भगवान कर, यह सो सरह पोजती है। इस मुस स कुरूप
वस्तुओं को निन्दा सुनने में भी एक शानद ही है।'
अब दर तक घुर हपर बह पुन रहने लगी। इस बार
इसके स्वर में एक विचिन कपन था-'रहबर्ड ! मैं माननी हूँ
ऐसो पातों से तुम्हें श्राघात पहुँचाकर मैं भारी अपराध कर रही
हैं। पर क्या करू, में इतनी भयभीत हो गई है कि लाख
प्रयन फरन पर भी उस भावना का नहीं दा सकता। इमानिये
तुमस सस्यता पान कलिये बदती हूँ। क्याकि मुझ विश्वास है कि
भोवन युद्ध में कमजार हाने पर मैं अप तुम्हारा AIM पा
सगी उसकी वाया में इतनी गभीर ध्यर्थना थी कि चोरी
से इसक उद्गार सुनने प लिये स्वेन को एक माह का कोष
होने लगा।
'पेसा याद भाता है। वह पति से अपने मन को घाट
प्रकट कर रही थी, 'शान न चट्टानों को मैं पहले भी की दस
घुकी हुँ । मानो काई पाक मेरा पीछा कर रहा था और मैं
प्राया बचाने के लिये उन पहाड़ियों की भुलभुलै । में भाग रही
थी। ओहो वही भय भान भी मेरा गला दार मैठा है। मानो
अब भी कोई साफ लगाए समीप बैठा है और लय भर याद ही
भयकरता क साथ मुमार टूट पड़ेगा। यदि मेर मन में काई इच्छा
,
प्रतीत होने
कहते-कहते पादरी रुक गया। किंतु स्त्री उत्सुक होकर बोल
उठी-'तव :
'तय ! नर कुछ नहीं। उस दृश्य को देखकर मेरे हृदय में.
इतनी चुलचुनाहट पैदा हुई कि तत्काल ही प्रांखें खुन गई।
पादरी इतना महार चुप हो गया
किन्तु स्त्र। के हाल में उस
रहस्यपूर्ण स्सेिस इतनो सलपनी मचने लगी थी कि वह अपन
मन के श्रावेश का गनमकी।
'तो आपका यही मतलय है न, कि यदि मेरे दिल में भी उसनी
छो गर्मी उत्पन्न हो जाय ता ये सुनो चट्ट न भी
जगे?' यह गद्-गद् कठ स यानी-गहर नहीं। अब मे।
भय भाग गया है। मैं भी अब वैमा ही अनुभव कर रही हूँ जैस
पापा उस प्र में हुआ था। पापक पार देश और पाक
देखत्र र मेरगिल का आनन्द उमड़ रहा है।'
'दया न ! स्वेन अब मन-ही मन कहने लगा, 'पहले पहर
देसार किमा यात का भला बुरा कान में अक्सर विना भा
घोसा हा जाता है। इस पादरास अच्छा और को मिसर
था ? RTE य ता विशाल है हो। साथ ही मस्तिष्क
असाधारगा है। वाना कौन उस युक्तो को इसना अच्छो सर
उत्तर सकता था
-
नय दपती मगलवार को श्राप थे । अगले शनीचर पोर ग्कूल- सधा कुछ जरूरी कागजात लेकर स्वन पादरी क मकान पर पहुँचा। उस प्राशा थी कि घर पर ही मिलेंगे। इसलिय द मान में हाकर यह सीधा पारिस में जा धमका। पर पादरी नदारत। सोचा कहीं श्रास-पास हो गए होग, क्योंकि दो चार बलिया और किताबें मेज पर खुली पड़ी थी। कलम भी दावात में ऊचा टॉग किए खड़ी थी। स्वन की यह भादन न थी कि हर कमरे मे माता फिरे और पृछे, 'साहब घर पर है ?' अतएव कुछ देर के लिये वह दश्तर मे हो ठहर गया।
नयी सिमसे साफ-साफ मना रहा था कि पन्ना के इन्कार पड़ा। . जाय। - (६४.) पर इसी समय पास के कमरे में कुछ फुस-कुस सुनाई टो! दरवाजा करीब करीब अध-खुला ही था, अतएव साफ-साक सुनाई 'सिग्रन ! वह पादरी का ही स्वर था, 'डाक आ पहुँ वो होगा। पर श्राज जाने से लाचार हूँ। सभव है, कोई मिलन-जुनने म 'तो चिता की क्या बात है। स्त्री ने उत्तर दिया, 'मालित याभार जायगी ही। उधर से पत्र भी लेनी श्राएगी।' जन ने समझा, अब पादगे वोपम घाहर आ जायगे । हा का प्रबंध करने दूमने कमरे में गए थे । काम बन गया। पर बहुत देर बीनने पा भी पादरी न श्राप । ना भर या पुन उनका म्या सुनाई दिया, 'क्या हर्ज है, यदि तुम्ही प्राजधा जाओ ? दिन सुहावना है। कल की यासात के बाद मकस गई है। अच्छा है, यदि कुछ हवा सा श्राया। टहलना भी जायगा और दिल भी बदलेगा।" 'मैं खुश -खुशी जाती। पर देखिएन, ये परदे कमरे में है विखर पड़े हैं। इनको ठोक किए बिना कैसे जा सकती हूँ १.. स्वन ने साचा अन पाद र दफ्तर में या माय क्योंकि भागे फहन की काई वान हीन थी। पर बहुन पतीना पर भी वे न पाए ! प्रत्युन आवाज कुछ विगडो सुनाई ऐमा नगा, मानो मामला अभी ममात नहीं हा पाया है। पति का वा सुन पडा, 'मोद शाप जैमी कुनोन महि... निस्पन्दह पह माह में पास ऐसी यह चिढ़ गया है। J अपने पति कलिये डार लाने कैम ना सहती हैं !' - +
'एडवर्ड, श्रोक! तुम मेरा मतलब ही न समझ पाए।'
'सम्भव है, आप-जैसी सुन्दरी के लिये एनम बहुत मही
जगह हो। वह उसी स्वर में कहता रहा, 'शायद श्रीमती जी
तब तक हवासाने नहीं निकलती जय तक ऐसा रमणाय स्थान न
मिले, जहाँ चारों ओर सुन्दर अट्टालिकाए और सुरम्य वाटिकाएं
न हों। श्रोह, भूल गया । मुझे चाहिए था एक बग्धो का इन्तजाम
फरता, ताकि आपxx
'एडवर्ड ! वह अधीर होकर चिल्ला उठी।
'आह, मैं जानता हूँ बेचारा एप्लम क्या वरावरी करेगा,
श्रापके पिता के ग्राम की। पर मुझे मालूम न था, आप इतनी
सुरमार हैं कि प्लम की जमीन पर पैर ही न रखेंगी।।
'ओह एडवर्ड, क्या कह रहे हो ! मैं फिलहाल नहीं जा
सस्ती।"
'नहीं जा सकती। पति ने आश्चर्य से नेत्र विम्फारित पर
पूछा।
इसी क्षगा स्वेन ने सोचा, छिपकर बाने सुनना अनुचित है।
प्रतएर दरवाजे का हैंडल पकड कर जोर से सटखटाया। जूने
मीबजाए और खसा भी। पर किसी ने उसकी आवाज पर
ध्यान ही न दिया । पति पत्नी उसी तरह बातें करते ही रहे।
'नहीं, मैं नहीं जा सत्ती' स्त्री कह रही थी, 'इस स्थान में
कोई ऐसी वस्तु है, जिससे मेरा गला घुटने लगता है। मैं नहीं
जानती वह क्या है ? वह माता पिता से पिछड़ने का रज नहीं
परन् कोई दुसरी वस्तु है। अब तक घर में रहती हूँ, मजे में
रहती हैं, पर ज्यों ही बाहर निकलती हूँ, वह वस्तु मेरा गला श्रा
दयोपवी है।
६ . पाता या क्या करे ? उस जैसा शाशील और यात्म-विश्वास हीन व्यक्ति शायद ही कोई मिलेगा । उसका मन अत्या परने लगती हूँ। ऐसा प्रतीत होता है मानो एक सफरे, सुने स्थान में बद रहने का मुझे दड मिला है। यही सोचकर एफ विविधा' उसा गला संघ रहा था। शब्द टूट रहे थे । -उत्तेजना यह रही थी। 'पर सिमन, मैंने कोई धुरी धान तो कही नहीं।' 'ओक ! तुम मुझे नहीं जानते। वह सिसकने लगी, मैं पैसा, धर्मही नहीं हूँ, जैसी समझ रहे हो। मेरे घावालों से पुरो, बताएगे, मेगसमाव कैसा है। यह कारण नहीं है कि यह जगाई सुदा नहीं है, सुहावना नहीं है । न PH MAR भय का कारण 'सुनो, सिमन ! यो मन ही मन जलने-फुढने में कुछ सार । नहीं। तुम्हें इन सत्र यातों का साफ मतलब कह देना चाहिए यह मजाक या सिनवाई नहीं है।' स्वेन बडे पशोपेश में पड़ गया। बहुत देर से वह उनकी यात सुन रहा था। यदि वे जान ने किया वहाँ छिपकर बैठा है त मामला और भी बदतर हो जायगा। वह ठकर दरवाजे की श्रोग, घढा, पर ठिठक गया। वान यह थी कि वह निश्चय नहीं कर 'वस्तुन उसका कुन्द्र भी अर्थ नहीं है।', स्री पूर्ववत् अधीर हो फर कहने लगी, इसीलिए मैंने तुमसे कहा नही । उसे मैं देख या सुन नही सक्ती, केवल घर के बाहर निकलने पर अनुभव । ॥ दवाडोल रहा करता था। - । उदासी मेरे दिल में छाने लगती है। मुझे अपनी दुर्दशा पर थाना है।" 'ओह ! अय समझा ।' स्वन ने सोचा, 'वह इसी इरादे से, मात कर रही है ताकि पति पुन सदर उति सुनाए, जैसी
दिन बग्घी में सुनाने लगा था। और पादरी है भी इस
पात्रो को ठिकाने लाने को उसमें काफी शक्ति है। दिन भी
और दिमाग भी।"
'श्राह! अगर
मैं इस मिल में कैद न होती और पहाड़ियों
'यह दीधार चारों ओर न दोबती, अगर इस पर जैसे -
ने में गड़ी न होती और कुछ वाहर का भी प्रकाश पा सकती।'
श्रदस्ती-अटकती बोली, पर यह फाई किसी पूर्वजन्म घ
का फल है, वरन् मैं यहाँ प्राप्ती ही क्यों ? श्रोह, इस दुग्म
रास्ता बतलाने के लिये तुम भी दा शब्द नहीं कर साते ?'
'अम पादरी जरूर कोई मजेदार बात कहेंगे। स्पेन ने सोचा
हॉखड़ा रहने के लिये स्पेन के मन में पछतावा न था। स्त्री
आवाज मीठी थी और श्राशा थी पति भो कोई बात
-
-
'पचीसों बार मैंने बाहर निक्लने का प्रयत्न किया' स्त्री कहती
हो, 'पर नहीं जा सकी। तुम नहीं जानते, मुझे कैसा अनुमर
न लगता है । मेरा गमा घुटा जाता है, में राने लगती है-
'पर यहा तो ऐसा कुछ भी नहीं है सिमन ! यह फेवान तुम्हारी
त्रान्ति है।
'नहीं नहीं ! यहा अवश्य गोई वस्तु है, ना मुझे नफरत करना
है । जो मेरा सुख हदप लेा चाहती है। जानते हा,
क्या किया करती हूँ ! मैं बार-बार अपन गाव की तस्वीर पा
देखती हूँ ? जो भाई ने मेरे लिये बीच दी थी। पहले उस नदा
और मकान, उस फाटक और सड़क को सफर में मजार करत
लगती थी। पर अब समते हो हनना ढाढम बंध रहा है। माना
उसको ही देखकर मैं जिदा रहनी हूँ।'
'मुझे भय है प्रिये ! तुम बेरफूकी से भरी हुई निरर्थक कला
आजाल
(६८)
नामों में उमन रही हो,पति अब सपदेशफ के गंभीर रस
कहने लगा, 'तुम्हे चाहिए कि जय वफ वह भ्रान्ति दृढ हो,
पहले ही उसे पुरी तरह दयादा। इसीलिये में रहता हूँ
घाइतो हो कि हमारा सुग्न एक दो सप्ताह हो नहीं, वरन् जीवन'
दूसरी बार चजी जाऊगी। एक दो दिन में इस उदासी को दर
स्वेन साँस राके सहा था। उत्सुक था, देख पति "सको
प्रार्थना स्वीकार करता है या नहीं। पर सी के गिड़गिडान पर
भी जब पादरी न यही कहा कि उसे ताजा अखबार देसने नौ
सहन ररत है, तो स्वेन को अचानक एक घात ऐसी सूफी जो
पहले ही सम जानी चाहिए थी, पर बातों की घबड़ाहट में बाद
छीन रही थी। चुपचाप दरवाजा खोलकर वह धीर से बाहर
धीमे समग्रता हुआ चलता रहा। पर ज्यों ही मकान प्रि-
श्रत पति की आज्ञा से लाचार होकर जम सिग्रनाल
दूंगी-
श्रोमन हुआ वह एक सपाटे से डाकघर की ओर लपका।
करो-चामा डारघा तक कुछ टहल श्राओ!'
'नहीं, न जा मस्ती। वह चिल्ला उठी।
'सुना सिग्रन ? इस तरह बेसिर पर की यातों में उलमल
नापन है। तुम इतनी कमजोर तो हो नहीं कि डाकघर म
जाने में थक जानो। तब क्यों हिचकिचा रही हो, १ यदि तुम
भर अटल रहे, तो तत्काल इन वेवकूफियों को अपने मस्तिष्क से
शिन फैको
स्त्री कुछ नरम पड़ गई। यानी, 'आज तो मुझे छुट्टी दे दो
.
,
सेम
: और बीमार की तरह फॉपती-लइखड़ाती हुई, सा
भोर यकी वो उसे अधिक दूर नहीं जाना पड़ा।
.
कदम गई होगी कि एक नवयुवक सामने आ खड़ा हुआ और
से अभिवादन कर, इस दिन की याद दिलाने लगा, जम
टेशन से एप्लम तक वे साथ ही बग्घी में बैठ कर आए थे।
सियन इसकी भोर आश्चर्य के साथ ताफने लगी। समझ
इसकी उसका आशय क्या है ? तब स्वेन ने बतलाया कि वह
डाकघर गया था और सिग्रन कौरन समझ गई, वह क्यों उसके
रास आया है। समझ गई कि पोस्टमास्टर ने उसके हाथ
प्रखबार भेजा है। पर युवफ इतनी हिचकिचाहट के साथ बोज
पहा था कि उसका पूरा मतलय समझना कठिन था।
उसने स्धेन के हाथ से अखबार ले लिया । पर घर की और
वापस मुड़ी नहीं। मानो ध्यान हो न हो कि जिस चीन के लिये
जा रही थी, वह उसे मिल चुकी है।
सब नवयुवक पुन उसके समीप आया और अत्यन्त विनय
के साथ पहन लगा, 'पृष्टता के लिये क्षमा करें। यदि श्राप
टहलने निकली हों, तो इम सुहावनी सध्या के समय समुद्र तट से
दिपर इमरी
है 'समुद्र-तट ? यह चौफपर बोल सठी, 'क्या यहाँ समुद्र
'हो, समीप हो । और यदि हमें आशा करें तो जाने में ज्यादा
र भी न लगेगी।
बाह पश्चिम की थोर जानेवाली एक पगडएडी की ओर
दा। उसके वक्ष मामूली मजदूरों से कुछ ही पेहतर होंगे। पर
पहरे से सचाई, ईमानदारी और नम्रता टपकी पड़ती थी।
सके साथ जाने में सिग्रन को कुछ भी हिचकिचाहट
आकाश एक विविध अरुणिमा से अनुरनित था। वह
-
रिवार का मनेारम भात काज था। अक्टूबर का अन्तिम
वृक्षों के पीले पत्तों, अभई घोंसों और तितलियों के
सप्ताह
प्रभात फालीन वायु दक्षिण के मन Bणा प्रदेशों को साफ
करती चली आ रही थी, जहा पगीचों में गुलाय खिल रहे थे, अगर
को नई फसल ढल चुकी थी और कोल्हुओं मे दाख का ताज
रस फन रहा था। उसका आदरताबखडाहट में हृदय को
अयन कर देनेवाली एक विचि न था, जो चित्त में वैसी हो
सानपनी मचाने लगती थी, जैसी किसी अजनबी की धोनी । कई
नहीं समते, उस अभीय आवाज में कोई निगूढ रहस्य छिपा था
,
.
पसर पों की फरणा कहानी थी। नहीं जानते, उस विचित्र बाइस और फुम-फुम का अर्थ क्या था । किन्तु इसमें सो दनिक नी सन्देह नहीं कि वायु की उस विचित्र भाषा में दिन की पया जगा देनेवाली कोई शक्ति अन्तर्दित थी। कुछ ही क्षण पूर्व एल्लम के छोटे से यन्दरगाह पर नाव से को प्रादमी नीचे उतरे थे । बूढ़ा तो घाट पर उतर कर, प्रार्थना में सम्मिलित होने के लिये सीधा गिजे की घोर चल दिया था। फिन्तु लड़का पिता के साथ न जाकर वही किनारे एक पहावी-कदरा में घुसा बैठा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो पहले से ही उसे वह एकान्त स्थान शात है और वात थी भी सोलह घाना ठीक हो। क्योंकि बचपन में अक्सर इसी चट्टान के पोपले में घुसकर वह दिन-दिन भर लेटा रहता था। स्वेन की उदासी अब धीरे धीरे मिट चली थी। न उसक ओठों पर अब पहले जैसी रजोदा मुमकुराहट थी, न हदय में वह कडवी वेदना हो, जो आग की तरह प्रतिपल इसके अन्तराल में धधकती रहती थी। धव से लौटा, तब से किसी दिन भी नसे इतना सुस नसीम न हुआ था, जितना पिछले एकाध सप्ताह म । यही कारया था जब समुद्र तट की उस एकान्त कन्दरा में लेटे- लेटे, यह प्रभाव-वायु का रहस्यमय सगीत सुनने लगा तो अचानक उसके मस्तिष्क में कई पुरानी स्मृतियाँ चमड़ आई और पसे याद हो पाया वह दिन---जब इसी तरह शितिज तक फैने हुए मनन महासागर को सुखमा निहारता हुआ, वह किनारे की एक ढलुवा चट्टान के सहारे लेटा था। जब पानी पर प्रतिविम्बित हानवाले प्रकाश की चकाचौंध के आगे ऑखें खुल ही न पाती थी और अन्त में जय बहुत देर तक मुदी रहने पर घे यकायक ।
था। यद्यपि - (७६), लगी । किनारे की ढालू चट्टान से एक आदमी नीचे उतर रहा था । 'ओह यह तो वही नौजवान है, जिसने कुछ सप्ताह पूर्व मुझे पहले-पहल समुद्र का दर्शन कराया था। इसे पहचानकर वह मन ही मन कहने लगी, 'अभी तो उस दिन की अनुकम्पा । के लिये धन्यवाद देना भी बाकी है और जल्दी-जल्दी आले पोछ वह भागन्तुक की ओर बढी! M किन्तु तब तक वह स्वय नजदीक था पहुँचा इतबार का दिन था, उसकी पोशाक मलाही जैसी सादी और मैली थी। पैर में भारी समुद्री जूते, बदन पर खुरदर कपडे, सिर पर पुराने जमाने के सम्राटों के फोजी ताज जैसी एक बरसाती टोपी । किन्तु साधारण होने पर भी ये सब उसे खूब फब रहे थे ! 'आपको यहाँ धैठी देख, सोचा कुछ सेवा करने का साहस करू ।' वह समीप श्राफर बोला, 'नजदीक ही मेरी नाव है, दीखन में भद्दी होने पर भी वास्तव में धुरी नहीं है । मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी यदि कुछ देर तक समुद्र की सैर कराने का मौका देकर अनुगृहीत करेंगी। यदि और किसी दिन होता, तो वह शायद ही स्वीकार फरतीकिन्तु आज तो वह थोडी सी सहानुभूति के लिये भी तरस रही थी। साथ ही उसे भय था कि वह नवयुवक की अपनी साधारण पोशाक और टूटी नौका को ही अस्वीकृति का कारण न समझ बैठे। यह सोचकर वह इन्कार न कर . . . In पान चढ़ा दिया गया। दक्षिणी पवन के झोंक फर वइ तन उठा। नौका और तिग्छी होकर एक और '. और क्योंही स्वेन ने पसबार समाल कर डोह चलाना . T N शुरू किया, साड़ी को चीरती हुई वह समुद्र की ओर भाग वली। पहले वो समुद्र की सैर से आनन्द लाभ को सिमन को न प्राशा थी, न अमिझापा ही। उसे विश्वास ही न होता था कि संसार में इस दिन फा बोम हलका करनेवाला कोई पदार्थ है। किंतु जम छाया-चु मित धरावट को त्याग कर नौका असीम महामागर में प्रविष्ट हुई, वो सिमन के हृदय में ऐसी शान्ति और शरीर में ऐसी ताजगी का अनुभव होने लगा कि पठिन से कठिन विषाद को धर दयाना भी उसे अत्यन्त सान प्रतीत होने लगा। इगर-उधर बिखरे हुए बादलों के कुछ सफेद धब्यों को छोड़ माकाश लगभग निरभ्र था। किन्तु प्रखर किरणों को मद करने के उपयुक्त, निचले वायुमण्डल में अब भी पर्याप्त पुन्ध विद्यमान थी, जिससे ढककर आसपास की नगी चट्टानों और सूखी पर्वत- मानायें रग-विरगी छायाओं का नृत्य प्रदर्शित कर रही थीं। उनका प्रतिबिंब जगमगाते हुए सागर के वक्ष स्थल पर पड़ रहा था, जिसस प्रोखों के सामने एक अजीब समा बध जाता था। आसपास क ढालू पगारे भयानक दृष्टिगत हो रहे थे। दूर की पर्वत मालाएँ गमिरगी रेखाओं के रूप मे एक के बाद एक सामने आ रही थीं। है धाप श्रापस हम वातावरण में प्रवेश करते ही सिमन की प्रॉसों में एक याल तुल्य सत्कठा का भाव झपकने लगा। उसके हाथ आप-ही- वधकर गोदी मे लटक गए। वह इतनी श्रद्धा और भकि क साथ सागर की ओर देखने लगी, माना प्राकृतिक सिौदर्य पर यिमुग्ध होकर प्रकृति की एकाम उपासना में तलोन हो रही हो।
-- - होते थे। प्रभात कालांक में वे सब इतने सुन्दर, इतने सजी ( ७८ ) आज तक उसने जाना भी न था कि समुद्र के इतने समीर श्राकर, उसका श्वामोच्छवास -सुनने और क्षगा फागो पर हमने मुखाकृति के भावपरिवर्तन का कौतुक देसने में कौन सा रहस निहिन है । आज तक ससे अज्ञात था कि सागर के वक्षस्थल पर शिशु की तरह लेटकर प्रकृति की शात लोगियों सुनने में किचन थानद है। कितनी विश्राति है ! यह पहला ही अवसर था क वह ईश्वर के एक अद्भुत कौतुक का रहस्य सौम रही थी। इसन्नि वही एक विचार उसक मस्तिष्क मे चार-बार उमड़ रहा था। एकाएक स्वेन ने पनवार घुमाना छोड़ दिया और नौ। आधी फ वेग में द्रुत गति से उत्तर की ओर भाग चली।' वे कभी सकरी गलियों के बीच, कमी खुग्दरी चट्टानों के नी होकर गुजरने लगे। किनार पर कहीं लाल पीले फर्मा से ल हुए नाशपाती क पुराने पृक्षा, कहीं घोवरों की रंगीन झापडिया कहीं चट्टानों क मासों से मारते हुए हरे-हरे चरागाह दृष्टि नजर आ रहे थे कि पसंत-सुखमा भी उनकी तुलना फीकी थो। श्रम नाव एक टापू से वूमरे टापु को, एक चट्टान से दूस चट्टान को जाने लगी। रास्ते में कहीं जलयान,, कहीं मा जा हुए वनडे, कही छोटी छोटी नौकाए सामने मिलनी थी पानी की चमकीनी सड़क पर वे ऐसी दृष्टिगत हो रही थी, मा पड़ी बड़ी तितलिया हो। स्वत स्वेन भी उनकी ओर एक के विस्मय के साथ दस रहा था। आज प्रत्येक . और चट्टान, क्या वृश मोर प्रतीद है। रहे थे, ऐसे अवर्णनीय। थे, मानों किसी त्योहार की तैयारी भन्या त स्वेन प मन में, इस भोली युवती के सम्मुस अपनी पाप 'जरूर ये जानते होंगे कि यह नी सौदर्य की अनन्य भा दे वह मन ही मन कहने लगा, 'तभी तो पेसे ग बिरंगे साज में सज घन कर तैयार सडे हैं ।। उसे प्रसन्नता थी कि सिग्रन उन्हें इतने अच्छे रूप में देख रही थी। किन्तु न सिर्फ समुद्र और पहाड ही मत्युत्त स्वेन भी आज अपने सबसे सुन्दर स्वरूप में प्रकट हो रहा था, क्योंकि और दिनों की अपेक्षा आज वह अधिक प्रसन्न था। अधिक शात भी था। धीरे धोरे पातचीत का मवाद भी फूट निकला । पहले मौसिम के सबध में चर्चा होने लगी। तम आस-पास के दृश्यों का प्रारया छिन गया और स्वेन से किनारे के द्वीप और पहाड़ा के नाम और पते बतलाने लगा। कुछ ही मिनट के बाद शम और सोच साफ पर रख दिए गए और इस तरह घुन घुलकर यात होने लगी, मानों वर्षों के मित्र हो । ज्यों ज्यों साहस खुमता गया, त्यों-त्यों कई नई पुगनी मा छिड़तो गई और सिग्नन उसका अगाध अनुभव ज्ञान दरवकर मन ही मन विस्मित और उत्कठित हान लगी। विस्मित इसलिये कि समुद्र के निर्शन तट पर जनभनेवाले उस नवयुवक में इतनी प्रतिमा नजर आना एक तरह का आश्चर्य या। और उत्फटित इसलिये कि इसकी धमतिम नम्रता, सुशीलता और युद्धमानी देखकर वह उसका वास्तविक स्वरूप दखना चाहता थी । वह स्वेन के सौजन्य पर मुग्ध थी, और धीरे-धीरे इसके लिये अपने मन में एक श्रद्धा का अनुभव फर रही थी। पाहती थी, ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति परिचय प्राप्त करें, ताकि जय कभी अपनी दुबलता का भाव प्रकट हो, उससे सान्त्वना सदानुभूनि और सहायता पा सके। अधर बातचीत परते कुछ मिनट भी न बोत पाप होंगे कि - किए बिना नहीं रह सकती थी। फिर भी स्वन उमक सम कहने की प्रपल सत्कंठा उठने लगी। बात यह थी कि आम जितने भी लोगों ने उसको दोषी करार दिया था, उन सपा यह फिसी न किसी हद तक पाप-मित समता था। सभी ने जावा में किसी न किसी अवसर पर चोरी और धावाजी 'की भी झूठी गवाही दी थी और अनाचार भी किया था। सभी किमी द तक घमण्डी और सुम्त, निर्दयी और अत्याचारी रह चुक में किन्तु यह जवान लड़की, जो एक धार्मिक वातावरण में पार थी-पाप या स्वार्थ से अभी इतनी अजित थी कि उसे न अपन न दुसरों को ही प्रवृत्तियों का ज्ञान था। आज तक उनके म में न कोई बुरी मावना ही उठी थी, न किसी का बुरा ही पार था। यह बात सच थी कि उससे उदार निर्णय पाने की बार रसना व्यर्थ था। क्योंकि वह प्रत्यन भावुक और सतर्क प्रतएव धुरी और पदसरत दीखनेवाली प्रत्येक वस्तु से नकार अपना मामला पेश करने के लिये तत्पर था। वही उसकी प्रति न्यायाधीश थी। उसफा ही निर्णय इसे सर्वोपरि मान्य था यदि सम्राट के पास न्याय पाने के लिये जाना होता तो सम था कि वह इन्कार कर दता, किंतु इस सामान्य लड़की निर्णय के सम्मुख अपना सिर झुकाने के लिये वह सुशी-खुश इसी बीच, जय कि वह अपने मन का हाल कहने में हिच त्रिचा रहा था, उसने देखा कि मिग्रन पुन पहले की तरह मो धारण फिर पैठी है। ऐसा प्रतीत होता था, मानो कोई या कहना चाहती है, किंतु प्रारम करते हिचकिचा रही है। आसिरकार साहस बटोर कर वह एक दम अपने मुए, विषय पर आ पहुँची और स्वेन की ओर मुफर कहने लगी - 1 तैयार था।
(८१)
अपने देखा होगा, जब आप आप, उस समय मैं प्रामु यदा
थी।
स्वेन ने 'हा' कहकर स्वीकार किया।
'मात तो कोई बड़ी मारी न थी। वह अप सुलकर कहने
गी, सिर्फ एक पत्र श्राज मुबह मिला था। वह मेरी एक मम्मी
पर था। अभी श्रमी उसका विवाह हुआ है। इसका पिता एक
धनवान व्यकि है और पति भी प्रारम्भ में इतना भना प्रनीत
ता था कि सभी लोग प्राशा करते थे, तड़की सुग्वी होगीxx'
'और अब सुखी नहीं है क्या ? स्वन ने दोनों हाथों से
वार थाम कर कहा । वह इस तरह धागे झुक गया था, माना
मन की ससी का हाल सुनने के लिये काफी उत्कठित हो
| 'हा, ऐसा ही प्रतीत होता है । युवती ने स्वेन की दृष्टि
चाने के लिये समुद्र की ओर तारते हुए उत्तर दिया, 'पनि न
जाने क्यों उससे नाराज रहा करते हैं । वह खुद इसका फारण
ही समझ पाती । इसलिये मुझे लिसकर पूछा है । पर मैं भी
सके दुःख को दवा बतलाने में असमर्थ हूँ। मुझे उस बचारी
र तरस आती है। उसकी दशा का हाल पढ़कर आँसू निकालने
जगते हैं, हृदय फट जाता हैxx'
'किंतु आपके पति पादरी तो बड़े अनुभवी श्रादमी हैं।
से आपने नहीं पूछा क्या?
स्त्री का चेहरा लज्जा की हलकी सुखी से लाल हो गया।
सने स्वैन के प्रति एक सदेह मिश्रित फटाक्ष पात विथा। पाया
र के लिये दोनों की पाखें चार हो गई। किंतु युवक की दृष्टि
| मकाच या हिचकिचाहट का भाव न था। उसकी बातों में
. (८) - कहने का साहस करती है तो ऐसा चुभता जवाब देते है मानो। खेल कूर में ही। मेरी सखी तो इतनी टरती रहती है कि इस मकान-मालिक ने आकर अनुरोर/ फिया । और वहाँ भी कोई विशेष प्रातचीत न हुई। सिर्फ बगीचे के समय में कुत्र माने छिड़ गई । उसने कुछ पौदे पसद !ि ओर प्रपन मम्मन पर वैसा ही बगीचा जगवाने की इच्छा प्रगत की। यान का बड़ी भारी न थी। फिर भी पति महाशय निंगा पड़ हुए लोटत यफ जय स्त्री ने संपने पति को नमन करने के मशिन पग्ने फ लिये पाधी के घोड़ों को इसनी वेदर्दी में पीटन: (८२ इतनी स्पष्ट गादिता थी माना सब कुछ दिल खोलकर कहर चाहता है।। 'पनि से इस बात का जिक्र करना शायद मेरो सखी रमर न करे।' सियन ने उत्तर दिया और पुन अपनी कहानी अमा शुरू किया-'दर असल बात यह है कि जब कभी बाहर जार का मौका होता है, तभी उसके पति अधिकतर गिड़ा करते हैं। रास्ने भर जबान पर ताला लगाए बैठे रहते हैं और यदिखी कुछ जले पर नमक छिड़क रहे हों। 'पर इसका क्या भरोसा कि पति को नाराज करनेवाली, कोई नात प्रापको मसी में नहीं है ? अर्थात दाल में कालाx नहीं नहीं मुझे पका विश्वास है कि वे दानों सथे और नेफ हैं। यदि बाहर भी जाते है तोन में शरीक होते हैं, ३, दिन की बात है, जावे पास मित्र के यहाँ दावत में गो. वह दिन-भर बूढी औरतों में ही बैठी रहो, और बगीचे 'मी तभी गई जप लिये पगीचे का जिक्र किया, तो ममा उठे कोर क्रोध For लाल हो गए और अगुलिया समट पड गई । Rate-१टकार सुनाई गई और भविष्य में उनकी आड़ा M के ।
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स्वेन पुन उत्तर देन में असमर्थ रहा। यह स्त्री कितनी भी (८४) स्वतंत्र घर प्राप्त होने पर भी, स्वाधीनता पूर्वक विचार करत का अधिकार नहीं है। उसका प्रत्येक काम गलत करार दिया आम है । प्रत्येक शब्द के लिये डॉ. फटकार सुननी पड़ती है है। ओह. जब वह बचपन के दिनों से बाज की स्थिति को तुलना करती है ता अपने भाग्य के वाचन पर हसे बिना नहीं रह सकती। । हाय और असमर्थ है ?' वह मन ही मन कहने लगा, 'ऐसा- भी व्यक्ति नहीं, जिसके सम्मुख वह अपना कलेजा चीरका तभी सखी के बनावटी किस्से की आड़ में अपन कह । 'यदि मैं किसी भी रूप में उसकी सहायता पर' सक्ती । वह आँसू बहाती हुई कहने लगी, क्योंकि मैं जानती हूँ। वह नेफ परोपकारी है। उसे गरीबों को सहायता देने की उत्कः अभिलाषा है। पर अफसोस, उसे परोपकार करने की भी अनु मति नहीं मिलती, न गिजे में ही मनचाहे स्थान पर बैठन मिलता है। गांव के गिर्जे में मजानिको के समीप एक स्थान है जहाँ से सारा हाल अच्छी तरह दृष्टिगत होता है श्रीर सगी स्पष्ट रूप में सुनाई पड़ता है। वह उस स्थान पर बैठने के लि मलाइत रहती है। किंतु पति श्राज्ञा दें तब न! स्वेन को श्रम पहा विश्वास हो गया कि सिमन स्वत अपन ही किस्सा सुना रही है, क्योंकि पर्च की जिस बैठक का वह वर्गा कर रही थी, एनम के गिर्जाघर में ठीक वैसी ही एक बैठक वन थी, जो सास पादरी के परिवार के जिये निश्चित थी। 'ओह ! समझ गया, पति इस स्त्री को सन्देह की दृष्टि में देखता है। स्वेन मन में विचार करने लगा, पर इससे किस पर यह यात अच्छा है यह उस तथ्य से अनभिज्ञ रहे ।। - 4 -
चे वड़ा जाना ही नहीं चाहते थे तो किस काम की वह
(८५)
और यह सोचकर कि पादरी चर्च से वापस लौटें, तबतक
सा घर पहुँचना आवश्यक है, स्वेन ने नौका को वापस एनम
की ओर पाई । साय ही रजीदा विचारों से उसका ध्यान हटाने
के लिए एक पहाड़ी की ओर सकत करते हुये कहा 'दखिए ! वही
ग्रीमन है, जहाँ स्वेन नामक एक व्यक्ति रहता है। उसका किस्सा तो
आपने सुना ही होगा?
स्त्री ने सिर हिलाकर स्वीकार किया। वह बात आगे बढाना
नहीं चाहती थी। पर यकायका कुछ ऐसे शब्द बोल गई, जिन्हें
सुनकर स्वेन के होश उड़ गए और उसक मन की सारी प्रसन्नता
विलुप्त हो गई।
'और यह तो आप सुन ही चुके होंगे' वह बोली-'कि उस
व्यक्ति ने जो मदरसा यनवाया था, वह फम रात को जलकर
खाक हो गया ?
'खाक हो गया? स्पेन करीव करीव चीस उठा। उसके हाथों
से पतवार छूट पड़ा। पाल उलट गया। नाव भी करीब करीब
चक्करसा गई।
'हा, जमकर निजकुल नष्ट हो गया। और एक दृष्टि से हुआ
मो अच्छा हो'-वह बिना घराहट के बोली।
'यह क्या कहती हैं आप' स्वेन न श्रोठ चबाते हुए कहा,
नोग तो उस इमारत को यहुत तारीफ करते थे। तब भला क्या
भ हुमा उसको नष्ट करने से ,
'हा, सुना तो मैंने भी था कि मकान अच्छा था। पर जब
रत?
जाना ही नहीं चाहते थे ? स्वेन घोककर उन्हीं शब्दों क
។ AN (८८) पहले से ही शोफ के वोम से दब रहा है। मैंने वह नेहूदा समाचार सुनाकर उसके घाव पर और नमक छिड़क दिया! हाय ! क्या यही स्मृति लेकर वापस लौटू गो कि आज रहने पर भी एक दुखी हृदय को आघात पहुँचाया है ?" वह बार-बार अपने पापको कोस रही थी। 'न जाने किम उज्वल भविष्य के स्वप्न देस रहा था। न जाने कितने म वर्वाद फर डाले । बेचारे ने अपना काम-धन्धा मी त्याग दिया सिर्फ इसी एक उद्देश्य से कि लोग उसे फिर में कृपा-दृष्टि र देखने लगें । पर हाय ! सारे अरमान मिट्टी में मिल गए ! सत्र भवन पानी हो गया । श्रोफ, क्यों मैंने यह बात सुना दी। मुझे इस तरह नहीं बोलना चाहिए था। रास्ते भर दोनों चुपचाप बैठे रहे। फिसी ने मुंह से एक शब्द भी न निकाला। किन्तु जब नौका एम के पथरीले घाट पर जा नगी और स्वेन अपनी साथिन का उतान के लिये उठ खडा हुआ, तो सिग्रन ने उसका हाथ पकड लिया। कीजियगाव अत्यन्त प्यार भरे स्वर में घोली, 'मुझे मालूम न था श्राप ही स्वेन हैं। और झुककर - उसक सलाद पर अपने ओंठ चिपका दिए । 'अरे ! यह क्या कर रही हैं ' स्वेन इस तरह चौकपर चिल्ला उठा, मानो किसी ने जोर से तमाचा मार दिया हो । 'कुछ नहीं, सिर्फ यही बतलाना चाहती हूँ कि में आपको उसी दृष्टि से नहीं दसती हूँ, जिसम और लोग दवा करते हैं और तय घाट पर उतर कर वह चट्टानों की सफरी गर्ल ओर बढ़ी। किन्तु कुछ ही क्षण घाद स्वेन पुन उसकी याजू में जा खब । . - -- इत अच्छा है, यद्यपि कुछ लोग उसका चेहरा देखना भी सहन फरेंगे। कुछ भी हो, मैं तो समझती हूँ कि उसको जो सजा ...जो है, यह अनुचित नहीं है। जरूर उसमें कुछ दोष है। मैं आनती हूँ कि मेरे पति व मुझे प्यार की दृष्टि से नहीं देसते। पर वे ईर्षालु तो नहीं है। किससे करेंगे ईर्षा ! तर स्वेन क्या समर कहता था कि डाही है?xxनहीं, नहीं, यद्यपि के मुझे चाहत नहीं है, कम से कम मेर प्रेम पर तो विश्वास रखते होगा सरासर अन्याय होगा, उनपर ऐसा आरोप लगाना।' घर का दालान में पैर रखते ही उसे अपनी दासी मिजी। उसका चेहरा उतरा हुआ था। मालकिन की भोर मुड़कर वह ( 8 ) हुआ। कधे पर हाथ रखकर वह गद्गद् काठ से बोला, 'आह ! आपको किस तरह धन्यवाद दूँ। परमात्मा श्रापफा भला करे। किन्तु ध्यान रहे, भविष्य में ऐसी गलती पुनः न हो। न अपरे पति ही से आज की यानों का जिक्र करे वरना ईर्षा के मारे धे आपको जिन्दा न छोडेंग। वह चला गया और सिग्रन पुन खेतों में होकर अफेली चलने लगी। किंतु युवक के अन्तिम शब्द अर भो उसके कानों में गूंज रहे थे। 'इर्षा ? क्या सच है, कि मेरे पति इर्षा करते हैं ११ वह सोचने लगी, 'नहीं। नहीं !! असभव है । उस युवक ने क्या सोच र ऐसे शब्द कह डाले १ उसे सोचना चाहिए था कि जी. नि से मैं पति की ही हूँ। उनके ही चरणों की मैं दासी हूँ।' सोचते सोचते घसफो आँखों में आँसू छलक आए। अपन पति के सम्बन्ध में कुछ भी अपशब्द सुनना उसे नागवार था। से स्वेन के शब्द सरासर अनुचित, और फर प्रतीत हो रहे थे । 'भगवान् जाने यह स्पेन कैसा है? लोग कहते हैं वह वस्तुन
.
पाता। मी समय उसका हाथ अचानक किसी कुदिया के दराडे
ही अपनी सन्दुक बन्द कर लेते है--इसके बाद भी यद्यपि
जंगल में भटक रहा है, शरीर भिसमंगों की तहर चियों से
हुश्रा है, चारों ओर काली काली नगी चट्टाने हैं, रानि का
अंधकार फैल चुका है, सर्दी के मारे प्राण सिकुड गए हैं, न को
गस्ता सुझ पडता है, न कहीं दोपक ही दिखाई देता है -
व्याकुल होकर इधर-उधर टटोलता है, पर कहीं भी सहारा भी
पर जा लगता है और सिटकनी आप ही आप सिम पडतो है।
वह अधखुले दरवाजे को धीरे से खोलकर भीतर घुस जाता है।
देखता है कि अगीठी के कोयले महक रहे हैं। एक और को
कुर्सियों पड़ी है, दुसरी और एक सन्दूक-जिसके समीप देश को
एक पुरुष और दूसरी स्त्री-चुपचाप बैठे हैं। दरवाजा खुलने ही
व हड़बड़ा कर उठ खड़े होते हैं। वे बडा जाते हैं और और
विस्तरा विछाते हैं, वे मन ही-मन यही मानते हैं कि भगवा
फरे, वह अजनी मेहमान कौरन ही अपना रास्ता नापे । तत्र पत्थ
की फर्श पर एक कोने में सटाई मिलाई जाती है
लेम्प्रेच बूढों को अनुदारता के लिये मन-ही-मन खीझता
क्योंकि पत्थर चुभते हैं और चटाई बहुत पतली है। यह रोपम
दृष्टि से दोनों की ओर देखना है। अंगीठी के समीप एक दुसरे
सटे हुए वे कैमे मगे के माय सो रहे हैं। उनका आराम से से
देख उसे क्रोध पाना है, किंतु इमो समय , उसकी दृष्टि बूद
सिरहाने पड़ी हुई एक चमकीली वस्तु पर परती है और पर
फे मार फॉप उठता है। '! यह तो वही फुल्हाड़ी है, HिE
लाड़ी चीरकर प्राग मुनगाई गई थी। वह भयभीत हो
ने है पर ये लोग इसे सिरहाने पर क्यों सोप है
गते ही उचककर पुल्हाड़ी उठा में और देखते देखते घड़स
सि... बार-बार उसे यही भय व्याकुज कर देता है और
इसकी शाए बढ़ती जाती है। इसी समय कमर में कानफूसी
सुनाई पड़ती है और लेम्प्रेच के कान खडे हो जाते हैं। घूढा न जाने
बनाकर जोर जोर से खुर्राट मरने लगता है। उसे पैरों की आहट
सुनाई पड़ती है। चूढ़ा छठ खड़ा होता है, रानि की प्रार्थना करता
रद हो जाता है। अब उसे काफी विश्वास होता है कि बुढे
पास कुछ रुपये पैसे हैं, जिनके लिये इन्हें भय है कि ज्योंही
म्भीर निद्रा में अचेत हो गए हों। पर सेम्प्रेच का सन्दह रत्ती
-
२
उताशका स.कॉप उठता है । सहसा उR सदह होता
भानी बह कुल्हाड़ी सी साम मतमा से वहाँ रखी गई है।
मासानी से मिल सट हाथों में पा जाय ! आफ, यूढे कितने
नाक हैं वरना इसने समीप कुल्हाड़ी रसने स क्या मतलब ?
हिज्यों ज्यों सोचता है, उसका सन्दे रद होता जाता है। इस
पश्वास होता है कि सत्य उन लोगों के मन में दगा है। नोंद
ताने लगती है, पर सोने का साहस नहीं हाता । 'क्या पता खि
४
किस बात के लिये। अनुरोध कर रहा है, पर घुढिया उसे बारबार
रोक रही है। 'सन करो, उसे सो जाने दो। लेम्प्रेच को स्त्री
को स्पष्ट भावाल सुनाई पड़ती है और उसका रहा सहा सह
'श्रोक किसी गरीष खाना-बदोश की जान भयकर खतरा
सभी रहती है। वह मन ही मन सोचता है-'शायद इन लागों
खर्राटे लेने लेंग, उचकर जन्नुम पहुँचा दे। इसी समय कमरे
पुन कानाफूसी सुनाई पड़ती है और लेम्प्रेच सोने का बहाना
PM
है और पुन लेट जाता है। दोनों खुर्गट भरने लगते हैं, मानों
NA
na.
सियर
(१०)
वर १६१५ की बात है। नालेण्ड से दक्षिण की ओर
श्रानेवाली रेल के एक वीसरे दर्जे के हिव्ये में, सिर से पैर
तक काली पोशाक पहने एक नायुक्ती वैठी थी। वह अपने
साथियों से बातचीत करने में ही मशगूज थी, पर चूकि उसकी
आवाज जरा तेज थी, डिब्बे के दुसरे मुसाफिर भी आसानी से
उसके शब्द सुन रहे थे। शीघ्र ही सब लोगों को
गालूम
हो गया
कि रेन में सफर करने का उसका यह पहला ही मौका था।
भीड़ और चहल-पहल देखकर वह ऐसी उत्तेजित हो उठी
नों-अजनवी स्त्री-पुरुषों से मिलने-जुलने का मौका पाकर
हृदय की कली सिल ठी हो। वह लगातार अपनी ही
.
जिसको काबू में रखना उमकी ताक्त के सर्वथा बाहर हो।
बीस निर्धत और असहाय की तरह रहना पड़ा। आज भी
से बातचीत करने में सबसे पहले शरीक हुई थी। जब जरूरत
से ज्यादा उत्तेजित होते देखा, तो शात करने के लिये उसने युवती
का घुटना थपथपाया। पर स्त्री न रुकी, न चुप हुई। ऐसा लगता
था मानो भीतर से कोई जबरदस्त शकि उसे ढकेल रही है,
(११५ )
कहानी सुना रही थी, जिससे पता लगता था कि संफोगों
बावरण में रहने से उसे जी का गुबार निकालने का फभो
वसर ही न मिला था। यही कारण था कि रेल के मुसाफिरों से
इननी दिलचस्पी के साथ बातें कर रही थी और प्रत्येक व्यक्ति
यतमा रही थी-यह कौन है, कहाँ से आई है, कैसा सदेश
'यह न समझ फिल्म के वोम से मेरा दिमाग बिगड़ गया
" वह कह रही थी, मैंने न तो इन के सिवा दूसरी कितान
आजतक पढी है, न किसी निरर्थक वितयहाबाद से अपना
स्तिष्क ही बिगाड़ा है। मैं तो सफर कागज जैसी साफ हूँ, जिस
र स्वय परमात्मा ही अपने विचार अकिन क्यिा करते हैं । पर
रू क्या, जी-भर कर अरमान निकालने का भी मौका ही न
मला, क्योंकि लैजेंड के शोत प्रदेश में जन्म हुमा और भारभ
दियासलाई के कारखाने में दा घड़ी मजूरी करती हूँ, तय
यही पट के लिये दा रोटी नसीब होती है। पति या घच्चे तो है
नहीं । नब जी का गुब्बार निकाल तो किसक सामने ? लोग तो
ऐम निष्ठुर हैं कि मरने-जाने का भी हाल नहीं पूछते । यदि बीमार
पड़ती हूँ तो कोई पानी देनेवाना भी नहीं मिलता । पल्कि पीठ
-पीछे व मय मेरी मजाक उड़ाते हैं ।
सामने सीट पर एक दयालु चुढिया बैठी थी । वही उस युवती
4 कर किसान उन दिनों के स्वप्न देखने लगे, जब उन्हें जडीश, देश की रक्षा के लिये भेजने की श्रावश्यकता न रहेगी। सोनगर। खाद्य पदार्थों की कमी के लिये घबराने लगे। सभी एक स्वर में एक साथ ही चिछा उठे-'श्रोह ! इस कपरूत जडाई काम प्रायश्चित है। जाने पर वे आप ही-आप दुनिया में प्रकाशित (१०), से ग्रस्ति ससार क दुसी की दवा मिलनेवाली है । मानों शीशीर अनवरत हत्याकांड के हाहाकार और मूक-चीत्कार का आद. ६ शाति का पुनरागमन होनेवाला है। बाजार की महगाइक विषय में चिंता करने लगे और मन फा होगा? इस आपत्ति से दुनिया का हुन । हेगा? नाटक की उस नयीया का स्वप्न में भी मालूम न था उसके शब्दों से डिया में साम्प मच जायगा। जारी भावाज में उसने उत्तर दिया, और पत्र में ये स बातें मिली हैं। है। जायगी। मुननवालों की सारी उत्तेजना तत्काल ठडी पद गई. कई मुसाफिर उठ खड़े हुए थे, वापस अपनी मीट पर खिस गए। स्पष्ट था कि यह स्त्री दूमर लोगों से अधिक कुछ भी न जानती थी। और तब सामने बैटी हुई चुदिया के सिवा किसी न भी उसके गन्दा पर ध्यान न दिया। धीरे धीर वह भी जान गई। लोग उसकी बातों में दिलचस्पी नहीं ले रहे है । अतएव जल्दी जल्दी अपनी पास समा का वह चुप हो गई। उसके प्रति शनर तो इतनी धीमी प्राशन में कहे गर थे कि बगज के एक "माफिरों के सिवा दूसरा कोई भी न सुन सका ! , - . -
से नीचे उतर गए। तब दूसरे डिकने का एक मुसाफिर येइतर
जगह साजता हुआ बहा श्रा पहुँचा और कोने में आसन जमाकर
बैठ गया। श्राते ही उसने लोवा के साथ बातचीत शुरू कर दी।
उसका स्वर चित्ताकर्षक और मधुर था । बोली में बेहद नम्रता थी।
बिना नुकताचीनी विए, वह दिलचस्पी के साथ प्रत्येक बात
सुनता था। दूसरों को उसकी श्रामिनी शायद खटकन लगती,
पर लोता तो मान सम्मान की भूखी थी। अतएवं आदरयुक
संवोधन सुन कर मन ही मन खिल उठी।
(११)
गाड़ी स्टेशन के बाद स्टेशन पार करती लगातार चली जा
रही थी। धीरे-धीर लोता के सिवा सभी मुमाफिर डिव्ये
S
।
पड़ा, क्योंकि वहाँ कोई भी व्यक्ति न था, जिसे में अपन पास
मानों उसी कमरे में, जहाँ में सड़ी थी, कोई सुरीले स्वर में।
अद्भुन वाद्य यन्त्र बजा रहा है। मै ठिठकर सड़ी नही
मेर श्रानन्द में बाधा देनेवाला वहाँ कोई न था। चूकि नोशाने
जापता थी, अतएव निश्चित होकर मै कुछ देर के लिये ।
वहीं खड़ी रहती और जाने का नाम भी न लेती। सचमुच ही
'उस समय गिर्जाघर की पुगनी ढग को हारमोनियम ।
सिवा मैंने दूसग कोई भी बाजार ही नहीं सुना था। शतएका
आश्चर्य करने लगी, वह कौनसा अनूठा यन्त्र है जिसकी आवार
तरगत होने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा। माना पृथ्वी समुह
( १२४ )
नहीं चढ़ पाई थी। मैंने सोचा, अवश्य कोई शुभ घटना होने
वाली है। अतएव दौड़ती हुई में पुरोहित के मन में
पहुँची।
'पर वहाँ भी वही विचित्र शानि थी। मुझे दरवाजे पर कर
फा दुध सोपती ।।
'इमो समय अचानक ऊपर के छम से संगीत' की एक
मा धाग उमड़ पड़ी और मुझे इतनी स्पष्ट 'सुनाई पस्न म
गई। मुझे जाने की जली न थी-यदि सभव होता तो रात
उस सुरोली तान में ऐसा जादू भरा था
सम कमर में ना रही है ? ज्या ज्या व लहरे मेरे कानों के पद
पर टक्गने लगो, मर मस्तिष्क में मधुर और पवित्र विचा
-
।
होरर में परमेश्वर के समीप जा रही हूँ'
'पर इमी ममय कमर में पाई व्यक्ति आ गया और तथा
चह विचित्र सगोत मन्द हो गया ।'
'मानवानी घर की महागाजत थी । दुघ अलेज फर उसने
7 टन थे। कहा और मिठाई की एक तरी सामने रक्त
परमात्मा की लीला कितनी विचित्र है। मुझे पहले ही भरोसा
पर सोचा कि पासी हुई चीजे खाए बिना उठ खड़ा होना उचित
मुझे डग दिया था। इसलिये मे सर कुछ भून गई-वह अटपते
थटपते बोली-'कहती है, कुछ मिनट पूर्व ऊपर छज्जे से
( १२५ )
हुए बताया कि उस दिन घर की मालकिन-पुरोहित की पुदी
माता-की अंत्येष्टि क्रिया की गई थी। अतएव लोगों का भेजिन
के लिए बुलाया गया था।
'उसका अनुग्रह देखकर मेरा साहस यदा । मैंने पूछा यह
फोन व्यकि है जो कुछ मिनट पूर्व इतनी सुन्दरता से ऊपर के
छज्जे में बाजा बना रहा था ?'
प्रश्न सुनकर महाराजिन ताज्जुष करने लगी। 'क्या कहती
है। बेटी । वह भौचक्की-सी होकर बोली, 'ऊपर क छज्जे से
संगीत की आवाज आना कैसे समान है ? पियानो तो घर फ
पिछले हिस्से में है और यहाँ सड़े
होकर उपका स्पर
सुनना असमय है। इसके अलावा जरा साचो तो भाना सान
के दिन-जप कि सास मालकिन दफनाई गई है-कौन गाए
बजाएगा।
'मेरी बासों से प्रॉस निकल पड़े, क्योंकि बुदिया मुझे झूठी
समझ रही थी। इच्छा हुई, फौरन दौड़कर वहा से भाग निक्लू
'इसो समय भीतर का दरवाजा खुना और स्वय पुरोहित
फर बोले, 'यहाँ क्यों बैठी हो, क्या प्रार्थना की घटी नहीं
सुनी।
महाराजिन मेंपकर बगलें झाँकने लगी। 'इस लड़की ने
संगीत को आगाज पा रही थी।
नहीं है।'
३
'पुरोहित ने विस्फारतर बोल ठे, 'सोत ? अहा !
. । - युवक पुन सचेत होकर बैठ गया। दोपी उतार कर उसने रैक पर डॉग दी और लोता की ओर मुबार पुनः चामचीत मिलकर यही सोचता था, 'इसको अपना दाज अवश्य पहना ( १२८ ) आग्नह कर रही थी-सिमन की चर्चा छेडकर इस व्यक्ति है अपनी यात्रा का हश्य हो । महान पापी को भी वह अपने मच मानता है उसका हृदय विशान है । वह टुस की बडु घू. पी चुका है । ऐसे शख्म के आगे अपने दिल की बात पर फरने में कुछ भी हर्ज नहीं है।' म्टेशन के बाद स्टेशन पा रहे थे । गाड़ी भकभक करता हुई लगातार दौड रही थी। बीच बीच में लोग कहीं उतरते, कही चढ़ते थे । तब एफ भारी जशन प्राया, जहाँ कई लाइनों का सगम होता था। लोता व सामने बैठे हुए युवक को कोई पर सभी मुसाफिर उस डिब्बे से उतर पड़े। करना शुरू किया। वह प्रसन्न था, बुद्धिमान था, इद दजें तक नम्र था। यई आमिजी ही उसकी मासे यही सोसियत थी। ऐसा कोई भी व्यक्ति न होगा जो पांच मिनट तक उसकी ओर देस धुम्ने पर उसने अपना दुस दर्द कहना न चाहे। प्रत्येक व्यक्ति इसमे चाहिए । यह श्रादमी दिल का दर्द समझ सकता है।' और पुनः बातचीत का प्रवाह ममडते देर न लगी ! फार पाने की बात करत-करते जोता पाल उठो–मुझे आपसे एक राय पूछनी है। यह तो आप जानते ही है कि मैं प्रभागिन ली और दुसी हूँ xx' 'राय ?' युवक ताज्जुब क साथ कहने लगा, भला, मुझ जैसा श्रापको क्या गय द माता है ? से पाहिए किसी लयी यात्रा तो फटेगी, क्योंकि मैं मी दालसदक
वापके बच्चे थे, अतएव धनवानों के लड़के लड़की हमारे
उनम रहे थे। मुझे याद है, एक ना कह रहा था मुझे
परमारमा मनुष्य मान से प्रेम करते हैं, ये हमारे रचयिता है।
( १२६ )
रहा हूँ और घर पहुँचने के पहले भी दो दिन और रेल में
टना है।
स्त्री ने कहना शुरू किया-'सन दिनों की बात है जम
का प्राप्ति के लिये में बाइबल छास में पढ़ने जाया करती थी।
स समय मेरी एक सती थी, जो स्टेंग्राटस्क के पुगहित की
न्या थी, और मेरे ही स थ एक फक्षा में पढनी थीxx'
गेलत-बोलते उसका गला रुघ गया और पाखें सुर्ख हो गई ।
एमाण भर बाद अपना श्रावेश रोककर वह पुनः कहने लगी,
और मैं उसे इतना अधिक चाहती थी कि संसार का कोई भी
यक्ति मुझे इतना प्यार नहीं लगता था xx'
युवक चुपचाप रियर और शात होकर बैठा था। पर श्रम
उसके चेहर पर न जाने क्यों धबराहट के चिह झलकने लगे।
'पहले मुझे फह लेने दें कि इससे पहली मुषालात किस
तरह हुई । ऐसा करन से आप समझ सकेंगे, वह लड़की कैसी थी।
'हा, हाँ, सुशी के साथ कहिए । हमारे पास समय की
कमी नहीं है । अभी तो पूरा दिन सामने पड़ा है। युवक बोमा ।
'अच्छा, तो उस दिन की बात है, जब जलपान की छुट्टी के
समय कक्षा के करीम दर्जन भर लड़के लड़की गिर्जे के हाते में
खडे थे और प्रश्नोत्तरी के किसी विवादग्रस्त विषय की चर्चा में
याद है, एक लड़का कह रहा था-झपका विश्वास है कि
अपनी रची हुई वस्तु को कौन नहीं चाहता ?'
-
'मैं भी उसी मण्डली में शरीक थी। हम लोग गरीय में
असाधाग्याता न थी। यह सच था कि हमारे समान ही उस पापी हमारे जैसे उसके नाक-कान थे और उसके माता पि १३० 1 - ऐसी श्रापक थी कि एक बेर देखकर कोई भी उसके नगद तरह महरा रही थी। चलते समय उसका मस्तक ऐसा अनु मुराई की परिचित रूप रेसा मनपने लगी, जिसे उसने नमुद्र सर कगने समय, हूबहू इसी रूप में देखा था। श्रोफ1३ 'उसका नाम सिग्नन था' लोता कहने लगी, निस्ससदेह फटकते भी न थे। वे अधिकतर अकेले ही-हाते में पहला इमा किया करत थे, या' पुरोहित की लड़की के आसपास भाग की तरह जुटा करते थे। कारण वह सुंदर और लुभावनी थी, और गए बिना नहीं रह सकता था।' महक की बात सुनकर मैंने पुरोहित की कन्या की प्रो सकेत करते हुए कहा- यदि हम सब उस जैसे सुदर होते सभर था कि परमात्मा हम लोगों को भी चाहते।' और तुर सय लोगों की श्रोखे उसी लड़की की ओर मुड गई ।। वह हम लोगों में कुछ दर लड़कों के साथ टहल रही थी घसका चेहग लया था। बाँस गभीर थीं। गाल फूल की तर नाजुक और सुख थे। धमा गोर मलाट और कंधों पर, धुपगली जुल्फे रेशम प्रा से एक थोर झुक जाता था कि सुदरता सौ-गुनी ध्य बढ़ जाती थी। साराश यह कि परमात्मा ने उसे हर हम लोगों से अधिक सुन्दर बनाया था । सामने बैठे हुए युवक के मानस-पट पर यकायक एक रूप में कैसा यौवन था ! कैसा सौदर्य! एक अनाग्या नाम था। तु स लड़की में सिर्फ यही । बान - । - . हम लोगों जैसे साधारण मनुए थे । तथापि यह स्पष्ट था, . - Hasi ।
विसक गई । किन्तु शीघ्र ही मेरी ससियों वा बडी हुई और
व्या मिश्रित स्वर में मजाक उड़ाने लगी। 'यह दखो लोता
इसजिये एकान्त में बैठी रो रही है कि सिग्नन उसकी ओर आँख
1 भी नहीं उठाती--एक जड़की बोली, 'मरा लेोता के बालों का
अयन साधारण मनुष्यों से विजकुज निगजी थी। यह इस ससार
ही नहीं थी । यह किसी दूसरे ही लोक की निवामिनी थी।'
सामने बैठे हुए नवयुवक ने अनजान ही अपना सिर हिला
दया। 'निस्सदह यही शब्द उसके लिये सर्वथा उपयुक हैं।'
रह मन ही मन वाल उठा, सचमुच ही वह किमी दूसरी दुनिया
की रहनेवाली है। वह उस उदनमाने पक्षी जैसी है जो रास्ता
भूलकर न जाने कैसे अपने स्वजातीय वन्धुओं से बिछुड़ जाता
है और ऐन अ ड में शरीक हो जाता है जो उससे सर्वथा विभिन्न
और विजातीय होत है।'
'क्योंकि परमात्मा की सृष्टि में सिर्फ यही एक लोक नहीं है।
लोता कह रही थी, और भी कई लोक हैं जो हमारी दुनिया
से निनकुल निगले है और सिनन उन्हीं लोकों में से किसी एक
की निवामिनी थी। पर आप मेरी बातो का मतलब शायद नहीं
समझ रहे हैं "
'नहीं, सूप अच्छी तरह समझता हूँ' युवक बोला, 'एक बार
मुझे भी एक सुन्दरी मिली थी, जो किसी दूसर ही लोक की प्रतीत
- होती थी।
'पर मैं ममम न सकी लाता पुन अपना किस्सा कहने लगी,
'मा लोफ की होने पर भी सन क्यों नहीं जान पाई कि मैं
परमात्मा की वाणी प्रकाशित करने के लिये नियुक्त की गई हूँ ।
अन विचार करने क लिये में चर्च के घटाघर की ओर चुपचाप
-
w
चेहरा साल दिया और मुझे ऐमा अनुभव हुआ मानो अचानक ( १३२ )" तो मुआयना करो-कैरे उलझ रहे हैं, मानो कोई अपनी माड़ी हा। 'मैं चुपचाप उनकी मपाक भरी बातें सुनती रही । मैं सोच रही थी कि सिमन की उपेक्षा का मामेर उलझ बाल नहीं हैं, प्रत्युत यह है कि वह दूमरे लोक की निवासिनी है। पर लड़कियों ने मेरा पिंड न छोडा! 'जरा इसकी सूरत तो देखो। एक कहने लगी, 'न बदन में ढग है, न कपड़ों में। और आवाज कैसी है मानो कोई कौवा चिजा रहा है। मेरी सहनशीलता विसर पडी । उसकी तीसी बातें सुन पर मैं अब तक चुप थी। पर अब श्राखों से ऑन उमा पार और मैं सिसकियाँ भर भर कर रोने लगी। मैंने हाथों से अपना मुह लिपा लिया। किंतु दूमरे ही पाण किसी ने अपने मुलायम हापों से मेरा 1, - ही मधुर प्रकाश की एक बाद सी श्रा गई है। और जन मैंने अपनी आँखें ऊपर उठाई तो मेरे पाश्चर्य ला पारावार न रहा। क्योकि स्वन सिम्रन मेरा हाप भामे मुस्करा रही थी और छुट्टी के पाद नदी में नौका विहार करने का अनुरोध कर रही थी। 'मोह ! उस समय मेरे हृदय में अकस्मात ही कितना सुख अमर पाया । यद्यपि मैं जानती थी कि यह केवल दया के लिये ही इनना चार प्रदर्शित कर रही है। फिर भी में प्रसन्न हुए पिना न रही और सी पाया उसके प्रेम-पाश में बंध गई।" मैं भी इसी पाया उसके प्रेम पाश में बंध गया'-सामने ने ४५ दि का चुंबन और मल्द-हास्य याद - । ।।
यहा है कि अपना जीवन रोग-प्रनित मनुष्यों को मेवा में अपंगा
मदा ५ मिये तुम्हारी स्मृति चित्त से भुना चुका । तष वापस
मन ही उस दिन मेरे मकान पर वह स्वर्गीय समोन सुना था ?'
भने स३ बुबह सुनाया और बताया कि किसी दिन ससारका
और घटना का किस्सा सुनाने के लिये वह अनुराध करने लगी।
दिव्य सदेश सुनाऊगी। पर वहन हमी न आश्चर्यान्वित हुई।
पराधियों म पीडिन मनुषों को कुछ मदद कर और यदि
यह न कर सको तो कम-मम श्रा, गूगों, और बहिर्ग की ही
घोह जन सो वह बात कही, तब वह कितनी सुन्दर
स.मा बैठे हुए युग की प्रसि ए श्रदमुन प्रकाश मे चमक
सपना भी नहीं पर सती । पहखी को और
पापको पहाना सुनहर में कितना प्रसन्न हो रहा
ते हुए मन ही मन कहा-'यद्यपि मैं जानता हूँ कि वह केरल
पा के लिये हो प्यार प्रदर्शित कर रही थी।
'श्राह सिग्रन ! वह अर्द्ध स्वागत स्वर
गुगुनाने लगा, 'इस
" श म अाकर मुझे क्यों तड़पा रही हा ? मैं नो समझा था
को भारही हो? क्यों सता रही हा ?'
उधर लोता भागे का रिस्सा बयान कर रही थी। कथा से
इटी पाकर जय हम दोनों पर सवार हुई और मैंने डाँड
जना शुरू किया, तो उसने उत्सुकता क साथ पूछा- क्या
.
। मैं चाटती ना का प्रोग-जैन भय
हूँ
काम में मुझे न जुटन देंगे।'
अतीत हुई थी। पित्तनी महान !
ना
इधर साता मिनाम ही अपनी कहानी कहती रही, क्या 'तम मैं यह साधार निराश होने लगी कि पढाई ममाप्त करने। " 11 'सचमुच लाता प्रसन्न होकर कहने लगी, मैं यो, श्राप सुनते सुनते ऊब कठे हैं।' 'नहीं नहीं ऐसा मत हो। इसके सबध में यदि ... भर बातें करोगी तो भी मुझे सताध न होगा। यह 'गा। गई। । + 1 . । 41 क्या हुया? उसी दिन से श्राप दोना गिमता कपास में 'हाँलोमा कहने लगी, उस दिन या बाद ज्याही मनाम छुट्टी मिलती. हम दोनों फिश्नी पर 'जा वठतीवह नाब में इधर घर तैरना बहुत पसद करती थी। उसन,जहाना अधिक पसन्द करती थी और उसके दिल में यदि,काई पर सामने बैठे हुए अजनबी ने अपना मस्तक झाकर Bअपना मुह ढाप लिया। 'माह सचमुष। समुद्र देखने उसे कितनी प्रबल इच्छा थी वह मन ही मन-पान, लगात 'उसने बताया था कि पद्रवप की थी, तभी से उमर मन ममुद्र-शत की कामना जग पड़ी थी। और भगवान ने उसई राति करने का सौभाग्य मुझे ही सौपा था। जीवन में कम-से-कम एक सहकार्य ता,वश्य पिया है कि ही चिर शछित यामना पूरी कराने में सहायता देसका आता की ओर से प्रोत्साहन मिलने की उसे आवश्यकता नमें वाहती थी। रन गाड़ियों में बैठने की चाह यो, न गाड़ी घोड़ों पर मीर होने की ही परवाह । यह तो all में बैठना ही मा - मैन म + । # रा'यह हम दोनो हमेशा के लिये एक दुसरे से बिलु जाय
K
और घर में तुम्हें बतलाऊगी, किस तरह उस मित्रता का
चानक धन हे। गया-लाता ने कहा, 'चार वप नोका बिहार
उन सुहाउने दिन ये ओर उस दिन शायद तिवार था। मैं
की खिड़की के श्राग बैठी इधर उधर श्रॉसें दोडा रही थी
सम्मात् एके ऐमा प्रतीत हुश्रा माने मामनवात टीले पर
कमाझ गया बगलाबना हुप्रा । म समझ न सकी, सहसा
बनावट भी बडे अजीब ढग की थी। दुमजिला मकान था।
बाजू चौपाल और खलिहान थे, दूसरा प्रोर रसाई घर और
रन्तवान। सामने नाशपाती के कुस पुरा वृक्ष थे। समोपदी
कलवी चौड़ी सारी थी, जिमकी दीवारें
(ऊपर एक छोटी-सी कोठरी थी। पर सबसे शोष
का एक वेढगावृक्ष था, जो मोट तो
(१३५ )
नहीं, सिमन इस प्रीम पर प्रतिदिन प्राती रही और हम
घातक नाव की सैर किया करती थी। इस तरह कई ग्रीष्म
- और चले गए। वह मेरे जीवन का सबसे अधिक सुम्बमय
युवक के मुह से एक निश्वास निकल पड़ी। सिग्रन !'
अपन आप गुनगुनाया, 'यौवन और सौदर्य का यह अनि
रूप लेकर तुम क्या बाजार मे स्मृति-पट पर श्राबड़ो
। हे' ? आह ! मेंन तुम्हें भुनाने का कितना प्रयत्न किया ?
नापार कल्पना की, माना तुम बूढा हो चली हा, बच्चों की
ना है, पति को प्यार करनेवाला प्रौदा पनी हो । तब क्या पुन
चन की नवीनता समेट कर पा रही हो ?'
के बाद एक दिन मैं दापर क ममय घर पर बैठी थी ।
ने
पथरकी मनी धो
से - ( १५० ) डानी । पर किसी को भी पता न चला कि पादरी को माग्नेवाला, फोन था, न उन्होंने अपने पाप का प्रायश्चित हो किया। सुनते. हैं, तभी से वहाँ के निवासियों को एक तरह का शाप लग गया है कि भविष्य में इगर का प्रत्येक निवासी अकाल मृत्यु मरेगा 'वाह ! यह कहाँ का न्याय है? मेरी मा घोल रही-'अपं गधी क साथ-साथ निर्दोषो भी मारे जाय?" 'हा, मुझे भी यह बात समझ में नहीं पातीका योमा 'किंतु इसमें सदेह नहीं कि हमारे परिवार के लोग अधिकतर अपन, हो हाथों मरते हैं। कहते है TEEसका कारण एक वृद्धा है, जो पाटरी के हत्यार की मा थी और इस मामले के गुम रहस्य से परिचित भी थी। उसने ही अपने हा मे फाटक के 15 समें के नीचे पन सोदकर वह नाश दफनायी थी। उसके बाद 45, घसारी पी उपरवानी कोठरी में बैठकर गत दिन उस सभे का पहा दिया करती थी, ताकि कोई हमे उसाड न फेंक ।' कुछ ताग. तो कहते हैं कि आज भी वह फोठरी में बैठो खमे की ओर ताक रही है । और यद्यपि हंगर-परिवार के लोग अन मूल निवास स्थान छप कर इधर उधर भटकते फिरते हैं, तथापि उनका वह नहीं छोड़ती। जहा कहीं वे लोग जाते हैं, उन्हें वह धुदिया नजर In लगती है। मानो उन लोगों में से एक को भी भोगने से नहीं अपने देगी। 'पर यह सर्वथा असभव है कि हमेशा इमी तरह होता गोल उठी, 'कुछ न कुछ रास्ता तो होगा हो, जिस को प्रव हो जाय। श्रापका कहना सत्य है, वह बोला, 'और हम लोगों इसका प्रयन भी कर चुक हैं। दो व्यकियों ने पिंड - गा 14 - र
( १५१ )
कि यदि पादरी हो जायं तो सभव है कि यह शाप मिट जाय ।
पर यह बात भी उस वृद्धा के गले न उतरी । क्योंकि ज्योंही घे
पादरी बने, उनमें से एक की मृत्यु हो गई ।'
'और दूसरा ?' मैंने उत्सुक होकर पूछा।
'वह आजतक एनम का पादरी है। सुना है, यहों आपके
गाँव के पुरोहित की लड़की से उसने शादी की है।"
इसी समय सामने बैठा हुआ नवयुवक सहसा चौककर उछल
पडा । गाडी क छोटे से स्टेशन के प्लेटफार्म पर श्राकर ठहर
गई थी। युवक हडबडा पर रैक से अपना सामान उतारने लगा।
पर लोता को उसकी आहट भी नहीं मालूम हुई । बोलते बोलते
उसकी आसें तैरने लगी और चेहरे पर एक अजीब भाव मलफने
लगा। वह अटकती बोली, 'श्रोह ! मुझे कुछ नजर श्रा रहा है
.
धर्फ और एक काला तबू
तब तक वह अजनबी डिब्बे से बाहर निकल कर जली -
। . - डानी । पर किसी को भी पता न चला कि पादरी को मारनेवाला फोन था, न उन्होंने अपने पाप का प्रायश्चित हो किया । सुनते हैं, तमो से वहाँ के निवासियों को एक तरह का शाप लग गया है कि भविष्य में हगर का प्रत्येक निवामी अकाल मृत्यु से मरगा 'वाह ! यह कहाँ का न्याय है " मेरी मा बोल उठी-'अप! गधी के साथ साथ निदोपो भी मारे जाय ? 'हा, मुझे भी यह बात समझ में नहीं पाती'-वर बोला, 'किंतु इममें सदेह नहीं कि हमार परिवार के लोग अधिकतर अपने हो हाथों मरते हैं। कहते हैं कि इसका कारण एक वृद्धा है, जा पादरी के गार की मा यो और उस मामले के गुम रहस्य से उसने ही अपने हाश से फाटक के संभे वह लाश दफनायी थी। उसके बाद वह कोठरी में बैठकर गत दिन उस समे का पहरा uri काई उसे उबाडकर न फेंके। कुछ लोग श्राज भी वह कोठरी में बैठी समे की ओर ताक 1९ यद्यपि हगर-परिवार के लोग प्रम मूल निवास स्थान इधर उधर भटत फिरते हैं, तथापि उनका यह पिंड छोड़ती। जहा कहीं वे लोग जाते हैं, उन्हें वह चुढिया नजर न लगती है। मानो उन जोगो मे से एक को भी वह पाप को सजा भोगने से नहीं बनने दगी। 'पर यह सर्वथा असभव है कि हमेशा इसी तरह होता रहेगा', माँ पुनः गोल ठी, 'कुछ न कुछ गस्ता तो होगा हो, जिसम उस शाप का त हो जाय। 'आपका कहना सत्य है, वह बोला, 'और हम लोगों में से कुछ व्यकि इसका प्रयन भी कर चुके हैं। दो व्यक्तियों ने सोचा .
कि यदि पादरी हो जाये तो सभव है कि यह शाप मिट जाय ।
पर यह बात भी उस वृद्धा के गले न उतरी। क्योंकि ज्योंही घे
पाढरी बने, उनमें से एक की मृत्यु हो गई।'
'और दूसरा ?' मैंने उत्सुक होकर पूछा।
'वह श्राजतक जम का पादरी है। सुना है, यही आपके
गाँव के पुरोहित की लड़की से उसने शादी की है।'
इसी ममय सामने बैठा हुश्रा नवयुवक सहसा चौकार उछल
पडा । गाडी एक छोटे से स्टेशन के प्लेटफार्म पर आकर ठहर
गई थी। युवक वडार से अपना सामान ताने लगा।
पर लोता को उसकी आहट भी नहीं मालूम हुई । बोलते बोलते
उसकी प्रासें तैरने लगी और चेहरे पर एक अजीब भाव झलकने
लगा। वह अटकती घोली, 'मोह ! मुझे कुछ नजर आ रहा है
धर्फ और एक काला तवू
.
तब तक वह श्रसनबी डिब्जे से बाहर निकल कर जल्दी जल्ली
कदम बढाता हुया प्लेटफार्म के फाटक पर पहुँच गया। जब लाता
को होश आया, वह युवक को नलाश में इघा-उधर देखने लगी।
फितु पहले ही वह अजनबी स्टेशन से बाहर निकल गया था।
f
।
( १५० ),
डानी । पर किसी को भी पता न चना कि पादरी को मारनेवाला
फोन था, न उन्होंने अपने पाप का प्रायश्चित हो किया । सुनते.
हैं, तभी से वहाँ के निवासियों को एक तरह का शाप लग गया
है कि भविष्य में हगर का प्रत्येक निवामी अकाल मृत्यु
मरगा
'वाह ! यह कहाँ का न्याय है? मेरी मा बोल उठी-अप
राबी के साथ साथ निर्दोषी भी मार जाय ?'
'हा, मुझे भी यह वात समझ में नहीं पाती'-वह बोला,
'किंतु इसमे सदेह नहीं कि हमार परिवार के लोग अधिकतर अपने
हो हाथों मरते हैं। कहते है कि इसका कारण एक बृद्धा है, जो.
पादरी के हत्यारे की मा था और इस मामले के गुप्त रहस्य
से परिचित भी थी। उसने ही अपने हागों से फाटक क एक खमे
के नीचे पन सोदकर वह लाश दफनायी थी। उसके बाद वह
वखारी की उपरवाली कोठरी में बैठकर गत दिन उस खमे का पहरा
4 करती थी, ताकि काई उसे उसादर न फेंक । कुछ लोग
तो कहते हैं कि आज भी वह कोठरी मे बैठो समे की ओर ताक
रही है । और यद्यपि हंगर-परिवार के लोग अन मूल निवास स्थान
छोर कर इस उधर भटकते फिरते हैं, तथापि उनका वह पिंड
नहीं छोड़ती। जहा कहीं वे जोग जाते हैं, उन्हें वह धुढिया नजर
आने लगती है। मानो उन जोगा मे से एक को भी वह पाप की
सजा भोगने से नहीं बनने देगी।
'पर यह सर्वया असभव है कि हमेशा इसी तरह होता रहेगा',
घोल उठी, 'कुछ न कुछ गस्ता तो होगा हो, जिसमें उस
हो जाय।
हिना सत्य है', वह बोला, 'और हम लोगों में से
इसका प्रयन भी कर चुके हैं। दो व्यक्तियों ने सोचा
.
कि यदि पादरी हो जाय तो समव है कि यह शाप मिट जाय ।
पर यह बात भी उस वृद्धा के गले न उतरी। क्योंकि ज्योंही घे
पानी बन, उनमें से एक की मृत्यु हो गई।"
'और दूसरा ?' मैंने उत्सुक होकर पूछा।
'वह आजतक पटनम का पादरी है। सुना है, यही मार
गाँव के पुरोहित सी लड़की से उसन शादी की है।'
इसी ममय सामने बैठा हुआ नवयुवक सहमा चौकार उछल
पदा गाडी एक छोटे स स्टेशन के प्लेटफार्म पर भार ठहर
गई थी। युवक हदयदा कर रैक से अपना सामान उतारने लगा।
पर जोता को उसकी आहट भी नहीं मालूम हुई । घोलते बोलते
उसकी आसे तैरने लगी और चेहरे पर एक अजीच भाव झलकन
लगा। वह भटकती योनी, 'प्रोह ! मुझे कुछ नजर आ रहा है
धर्फ और एक काला सबू
तब तक वह अपनी डिब्बे से बाहर निकल कर जल्दी जल्दी
प्रदम दाता हुप्रा प्लेटफार्म के फाटक पर पहुँच गया। जब लाता
का होश भाया, वह युवक की ताश में इधा-घर देखने लगी।
किंतु पहले ही वह अजनसी स्टेशन २ बाहर निकल गया था।
-
.
.
-
V
घटोरने शप्रयत्न करने लगी। 'खैर जो यदा होगा. सो सो होगा
हो।' वह चिवा दमाने पलिये कहने लगी, 'और कुछ नहीं तो
इस याग द्वारा दुनिया बना सो मिला। जब माता पिता मर
गय और भाई ने मेरी जायदाद हडप कर, रहने क लिये वह बेहूदी
काठग दी, ता घर उदर र मायन-मांद करने में नाम हो क्या
था ? उघर दिन में शांति न था। रात दिन सिग्रन क लिये कोई
नातरिम शहि मुझे ग किया करती थी"
'वड देखिए, गिजांपा दिखलाई पड़ता है। हम लाग करीम
फरीय आ पहुँचे'-इसी समय गाड़ीवान शतों के झुरमुट में छिपी
हुई एक मीनार की छोर धानुक से सत करता हुआ पाल उठा ।'
पाण भर बाद सड़क ढालू इनि लगा और नीचे नदी की टढी.
मेढ़ी घाटी में वृक्षा य स और frसानों क मकानों के साथ साथ
लाड़ा का एक विज्ञपिर नजर आने लगा।
पर वहा पहुँचन के पूर्व गाड़ीवान फिर चाबुक उठाकर विद्या
का, और वह गिर्जा मालकिन ही सड़क पर
तो जा रही है Venkar सुनकर
साहस न जाने
.
-
.
४.४
--
--
पर तब तक ये इसने समीप आ गए कि सियन ने उनकी आवाज सुन ली। वह मुड़कर देखने लगी और एक अजनबी स्रो को गाडीवान के साथ खींचनतानी करते देख, उसके गभीर चेहर पर एक हल्की मुसकान दौड़ गई। किंतु क्षण पर बाद वह मुस्करा- हट न जाने कहाँ विलुप्त हो गई और छाती पर हाथ रखकर वह गाड़ी की ओर लपकी । 'पर लोवा, तुम कैसे ?' वह ऑस्तू बहाती हुई चिल्ला उठी। मोता ने सोचा, ये घोस उपालभ सूचक थे। क्योंकि पुत्री क पैदा होते समय वह सिमन का सहायता नहीं द सकी । वह गाड़ी से उछानकर कूद पड़ी और पागा भर गद ही क्षमा की भीस माँगने ससी के चरणों में लाट जाती, यदि उसक पहले ही सिमन 1 उसे बाहुपाश में कसकर न पायनिया हाता! दानों की आँखों से आम की धार,ए उमड चली । लेोता य जिये तो निस्सदह यह जीवन की सरते महान् सौभाग्य की घडी थी। उसक श्रानन्द का पारागार न था, क्योंकि सखो ने प्रसन्न होकर उसे अपना लिया या। पर साथ ही उसके मन में यह विचार भी उठ रहा था-'यदि मुझ जैसी प्रभागिन को देखकर सिगन की ऑग्मों में श्रानदाश्रु उमड़ पड़ते हैं तो जरूर उसके जीवन मे फोटा उसके दिल में त का अभाव है - - । । ( १५४ ) बटोरने का प्रयत्न करने लगी। 'सैर जो षदा होगा, सो सो होगा हो ।' वह चिंता दमाने के लिये कहने लगी, 'और कुछ नहीं हो इस यात्रा द्वारा दुनिया, दसना तो मिला। जब माता पिता मर गये और भाई ने मेरी जायदाद हड़प कर, रहने के लिये वह वेहूनी फोठरी दी, तो घर ठहर कर जीवन बर्बाद करने में लाभ हो क्या था ? उधर दिल में शाति न था। रात दिन सिनन के लिये कोई श्रातरिक शकि मुझे तग किया करती थी 'वह दखिए, गिजांघर दिखलाई पड़ता है। हम जोग करीम करोय श्रा पहुँचे'- इसी समय गाडावान वृक्षों के झुरमुट में छिपी हुई एक मीनार की ओर चाबुक से सफन करता हुआ बाल उठा। पाण भर बाद सड़क ढालू होन लगी और नीचे नदी की देदी- मेढ़ी घाटी में वृक्षा र झड और किमानों के मकानों के साथ साथ लकड़ी का एक गिज पर नजर आन मगा। पर व पहुँचने के पूर्व गाड़ीवान फिर चाबुक उठाकर विण' । पा, 'और वह सिए । खुद गिर्जे की मालकिन ही मडक पर ली जा रही हैं। इन शब्दों को सुनकर लोता का साहस न जाने हा यिखर गया और उस साँस लने में भी दिक्कत होन जगी। 'श्रर ! मैं क्या सापकर यहाँ न चजी पाई ?-4 साचन लगो, 'यदि वह मुझे पहचान ही न सीता तिना मजाक होगी, फैसी सिल्ली उड़ाई जागी। गावाग ने साचा, यह सो पादरी के यहाँ नौकरी करने पाई है। अतएव मुहार पूछा, 'गाड़ा रोक +, जिसमें आप मालकिर से मिल सके। लाता की रही सही हिम्मत भा ढेर हो गई। फर ला" बद नगाम छीनी हुई पाल, हम रास्नाम: जाना नही चाहती। - -- . -- पर तप तक इसने समोपमा गए कि सिमन ने उनी आवाज सुन ली। यह मुड़कर देसी लगी और एक अजनमी की को गाडीमान क साय पीचातानी फरते दस, उसके गमीर चेहर पर एक हल्की मुसकान दौड़ गई । रितु पाण पर बाद यह मुम्करा- हट न झाने यहाँ विलुप्त हो गई और छाती पर हाथ रखकर यह गाड़ी की ओर लपकी । 'अर जोता, तुम कैसे ? वह आँसू बहाती हुई चिल्ला उठी। मोता ने सोचा, ३ श्रास उपालभ सबक थे। क्योंकि पुत्री के पैदा होत समय वह सिमन या सहायता नहीं द सकी। वह गाड़ी से उछलफर कूद पड़ो और पागा भर बाद ही कामा की भीख माँगने सती के चरणों में लाट जाती, यदि उसस पहले ही सिमन ने उसे बाह पाश में कसकर न यो जिया होता! दात की खिों स भामरी धारए उमड़ पनी । लेोता क जिये तो निस्सदेह यह जीवन की सबसे महान सौभाग्य की घडी यो । सा श्रानन्द का पारावार न था, क्योंकि सखी ने प्रसन्न होकर उसे अपना लिया या । पर माप ही उसके मन में यह विचार भी उठ रहा था -'यदि मुम जैसी प्रभागिन को देखकर सिग्रन की ग्रामों में आनदाश्रु उमड़ पड़ते हैं ता जहर उसके जीवन में सुख और शाति का अभाव है ! अवश्य पोई फाँटा उसके दिल में गड़ रहा है।"
. । (१६२ ) यकायक पादरी ने उनके हाव-भाव में परिवर्तन देगा। पता.. नहीं, वह कौन सी बात थी जो उन्हें असामान्य प्रतीत हुई । संभव कि मनीम के स्वर में उत्तेजना भाने लगी हो अथवा सियन यी हो मुख-मुद्रा परिवर्तित दृष्टिगत होने लगी हो। कह नहीं सस्ते वह श्राकस्मिक परिवर्तन क्या था! पर पादरी को उनके नगढग में कुछ अन्तर नजर श्राया, इसमें कुछ भी संदेह नहीं । ये श्रखयार पटक कर उठ खडे हुए और साँस गेकफर किवार की पोट से ताकने लगे। नीम अन भी रड-कास संस्था की नसों के बारे में कुछ कह रहा था। क्षण भर बाद सिग्रन के गालों पर आँसु की दो बूदै लुढकती हुई नजर आई। तर धीरे धीरे कई दें टपकीं और अदृश्य हो गई । मुनीम ने उन आँसुओं को देगा, पर बहुत देर तक वह उसी स्वर में चोलता रहा, मानो सिग्रन क अ देश का उसे पता ही नहे।। तव यकायक वह इतना आगे झुक गया कि उसके हाथ सिग्रन के शरीर से लगभग छू गए । 'अच्छा! तो यही आपकी तृप्त श्राकाक्षा है ? यानी आप भी उस काम में भाग लेना चाहती हैं वह वाला। 'श्रोह ! पर सफल कैसे हो सम्नी हूँ ?' वह अपनी चाहें मामने फैलाती हुई बाली । 'मैं हृदय मे चाहती है कि कुछ न कुछ करू । क्योंकि इस घिरौंद के सुस और आराम से मैं अब उठी। हूँ। पर क्या करूं, लाचार हूँ।' २ जाने में भी क्या श्राप दिनकुन्न असमर्थ है ?' यदि कुछ दिनों के लिये मैं मुक्त हो जाती !'-मो. हाथ छठाती हुई बोली, अाखिरकार में भी इन्सान हूँ।' । . L 1 ,
वे दोनों अधकार में विलीन होकर दृष्टि से श्रोमल गए
.
उसी समय दरवाजे का धडाका, पैरों की भगदड़, पादरी की
लेोता चोककर उछल पड़ी। दरवाजा खोलकर उसने बाहर
कि हाते में दो श्रादमी घेतहाशा भागे जा रहे है । क्षय भर
कम से कम एक मार ता मुझे स्वतत्रतापूर्वक काम करने का मौका
मिलना चाहिए।
मुनीम ने ससफ हाथ अपने हाथों में पकडकर हत्य से लगा
निये । 'श्राप सच कहती हैं। वह धीमी आवाज मे बामा,
श्रापको भी स्वतन्त्रतापूर्वक रहने का उतना ही हक है, जितना
दूमरों को
किंतु इसी समय पीछे की ओर किसी के पैरों की श्राहट सुन
दोनों चौंक पडे । बैठक का दरवाजा एफ घडाके की आवाज के साथ
गुज पडा और पादरी उग्र रूप धारण कर मुनीम की पार लपक ।
हडबड़ाकर दानों चौस ठे। मुनीम तो इतना भयभात हो गया
किग समेट कर भीगी बिलो का तरह सिकुड़ गया।
'भागा ! जल्दी ।' सियन चिल्ला उठी और भरपूर ताकत से
पति के हाथ पकड़कर पूछा, एडवर्ड ! यह क्या मामला है ?'
इस बीच मुनीम साहस बटारकर उठा और दरवाजे की ओर
जान लेकर भागा।
पादरी ने जोर का धक्का देकर अपने हाथ छुड़ा लिए । सो
मेज से टकराती हुई पहाइ साकर जमीन पर गिर पडी ! पर पति
ने उसको और ध्यान भी न दिया । भूखे मेडिए की तरह वे भगोड़े
के पीछे लपफ । एक क्षण में दानो दालान और बरामदा पार करते
हुँ हात से बाहर निकल गए ।
लनकार और सिनन की चकार सुनकर, रसोई घर में बैठी हुई
. 1 - । - ( १६४) भगदड का कोलाज नौकों के कमर में भी सुनाई पहा उन्होंने अपनी मानफिन को लडखडाती हुई सामने आते देखा। उसके बाल बिसर रहे थे, कपड़े तितर-बितर हो रहे थे और जलाट से खुन की बूदें टपक रही थी। घबराकर वे उसकी ओर दौडे । पर सिनन ने मना करते हुए यहा-'मेरी चिंता न कगे। पहले उन दोनों के पीछे दौडो, अन्यथा वे दूसरे को मा। डालेंगे। वे भौंचक्के होकर वाक्ने लगे। 'क्या ताक रहे हो।' वह चिल्ला उठी, जाम्रो जल्दी, नहीं तो दोनों को जिंदा न पायोगे। एक नौकर दौडा। बाकी दो मालकिन की देख-भाल करने के जिते वहीं रुक गए । वे एक कुसीनाए, क्योंकि उसके पाय ऐसे छाप रहे थे, मानो नीचे की जमीन हिल उठी है।। 'लाता के पास ले चलो! लोता क पास। वह बच्चे की वरह रातो हुई बोली। नौकरो न उसे वॉही पर उठा लिया और लोसा क कमर की ओर ले चले। पर तरफ लोता स्वयं लपक पर सामने आ पहुँची। 'ओह लोता। मैंने कुछ भी न किया, सिनन चिल्ला उठी, 'मैं मुनीम स बातें कर रही थी और वे समीप ही बैठक मे छिपकर देस रहे थे। यकायक उसके चेहर पर मुर्दनी छा गई । लाता पानी लान दौड़ो। फौरन घाव घोपर उसने पट्टी बाध-दा । चोट सहत न थी, न घाव ही गहरा था । पर आमत यह थी कि सिग्रन, का.म - न था लगातार बह यही शब्द बार-यार कर रही थी में पुत्र न किया, फेवल उससे यातें कर रही थी और कमर स देख रहे थे। . . । - मन -- । ।
-
न
निश्चित किया कि बीमार की मर्जी माफिक चलना ही श्रेयस्कर
उतारन लगो। घिरतर तैयार होने के पहले ही वह कपड़े निकाल
बिस्तर पर लेटते ही उसने लोता को अपने पास आने का
'मेज के पास बैठ जाओ और मुझे अपनी बाइबल पढ़
( १६५ )
'सिमन! तनिक शाति रसो' जोता ने प्यार भरी आवाज में
कहा, 'मुझे भय है, तुम कहीं बीमार न पड़ जायो । ठहरो, बांदी
स तुम्हाग विस्तर तैयार करने के लिए कहाती हूँ। तुम्हें कुछ
दर सो लेना चाहिए।
'नहीं, नहीं, मैं वहाँ कदापि न भाजगी।' सिग्रन योल उठी,
'में उस घर में श्रम पैर भी न रखू गो।'
- 'पर प्यागे सिमन ! तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए।
'नहीं, मैं यहीं तुम्हारी साट पर सो रहूँगो लोता! मैं जानती
हूँ, मुझे कई दिनों तक बिस्तर पर पड़े रहना पडेगा । अतएव
मुझे ऐसा स्थान ही चाहिए, जहाँ किसी तरह का भय न हो !!
पाण भर बाद पुन वह यकने लगी-'ओह ! मैंने कोई भी
अपराध नहीं किया। क्या उससे कुछ देर बातचीत की और व
जपक कर टूट पडे ।
वह श्रासपास खडे हुए लोगा की ओर इस तरह मात्र
विस्फास्ति कर देखने लगा मानो आश्चर्य कर रही हो कि
क्योर वे लोग उसके शब्दों का अर्थ नहीं समझत ।
लोता न दोनों नौकरों से सलाह लेकर प्राविकार यही
है। नौकरानी फौरन मकान की ओर दौड़ी और चादर, फबन्न
वकिए श्रादि लेकर वापस सिन जल्दी जल्दी कपडे
कर सोने के लिये तैयार हो गई।
'अभी सोश्रो मत लोता। वह अनुरोध करती हुई योती
सक्त किया।
4 F - - - (१७० ). उसने सच-सच पता दिया कि फि मिमन खुत्र श्राराम के साथ सा रही है । न उसे बुखार है, न किसी तरह का दर्द ही है और सिर की चोट तो नहीं के परामर है। पर जब पादरी ने पत्नी को मकान में लाने का सवाज उठाया। तो लोवा ने साफ एन्कार कर दिया। 'क्यों ?' पति ने पूछा, क्या वह मुझसे भयमीत है ? 'जग सब रखिए' लाता वाली, 'अभी कमजोर हैं। अच्छी दाते ही वह खुद चली आएँगी। बीमार के मुंह से एक निश्वास निकल पड़ी। उसके चेहरे पर न सिर्फ शारीरिक, प्रत्युत एक मानसिक बेटना के भी 'चिह्न झलक रहे थे। 'श्रोह ! नहीं, वह निराश होकर बोला, 'अन वह वापस मैरे. पास नहीं पायगी। उसे पाने का साहस न होगा।' दोपहर बाद जब डॉक्टर श्राया, तो उसने भी सिग्रन के बारे में करीब करीब वही बातें कह सुनाई । 'मैं आपकी पनी फी बीमारी को समझ ही नहीं पाता' वह पादरी से कहने लगा, 'सभव है, कोई दूसरा राग हो। पर आपको फिलहाज अधिक छेडछाड़ नहीं करना चाहिए । जो कुछ उनी मर्जी हो, वही कामं कीजिए । पता नहीं, उनका कौन-सा राग है । सभर है, किसी छुत की बीमारी का कीटाणु उनके गैर में प्रवेश पर गया हो, जा कुछ दिन बाद भयकर रूप धारण फर ले। अतएव ' उनके संबंध में विशेष सावधान रहिएगा।' इस तरह भरीव एक सप्ताह बीत गया और स्थिति में कुछ भी परिवर्तन न हुा । प्रति दिन चौकीदार के घर से वह लडका पत्र चुप चुपके आता और लेोता द्वारा वापस ज्यों-का त्यों । जाता । प्रतिदिन पादरी पत्नी का समाचार जानने के लिये - + - । रहस्य का अर्थ मालूम पडा कि क्या उसने अपने रुपये मगाये थे, क्यों अखबारों मे छपे हुए जहाजों के रास्ते और टाइम टेबल पढा गिरने लगी। सड़के सफेद हो गई। बग्घियों का साइखाना बद हो गया और उनके बदने धिना पाहियों की स्नेक गादिया वर्फ पर फिमजने लगीं। सिड़की के बाहर वर्फ की सफेदी देखर सिमन को अपने मायके की याद हो आई । उत्तर की प्रपर सी (१५) लेोता या घुलाते और सिमन भी प्रतिदिन सुबह से शाम तक खटिया पर पड़े-पड़े खुर्राटे लिया करनी। निद्रा नहीं आती, उस समय स्वीकृति सूचक भार से सिर हिलाने लगती थी, मानो मन ही मन किसी बात का प्रस्ताव कर स्वय ही उसका समर्थन कर रही है। । लाता भाँप गई थी कि मौन के श्रारण में वह अपने भविष्य का कार्यक्रम बना रही है। पर अभी तक सिग्रन की योजनाओं का वास्तविक स्वरूप न जान सकी थो । एक दिन सिग्नन ने लाता को समीप धुलाकर कहा, 'सुना, मकान मे मेरे फमर की अमुक भालमारी में कुछ रुपये रक्खे हैं जगमग 5 सौ होंगे। यह सर मेरी ही सम्पत्ति है, दूसरों का इस पर कुछ भी हफ नहीं है। यह रकम मैंन, उन पैसों से बचा-चा कर जमा की है. जो माता-पिता साम-गिरह के दिन मुझे देत रहे है। मुझे चिन्ता है, कोई उन रुपयों को चुग न ले, क्यालि दिन भर मान सुना पड़ा रहता है।" दुसर दिन सिग्रन ने कुछ पढ़ने की इच्छा प्रकट की और मोना ने एक अखबार ला दिया। सिन दिन भर उस अखबार में छप हुए रल और जहाज-सधी विज्ञापन देखती रही । लोता उसकी ओर ध्यान मी न दिया। किन्तु याद में उसे सम बातों क करती थी. इसी दमियान दम घन के साथ जादा पा धमा। बर्फ
2
.
( १७६ )
दिल से चाहते हैं। लोता ने उसकी बाते सुनकर कहा ।
नहीं, नहीं तुम नहीं जानती हो लोता। सिमन बोल उठी,
'मैंने कभी उनके साथ विश्वासघात नहीं किया। उनके सिवा किसी
का स्वप्न में भी ध्यान नहीं किया। फिर भी वे मेरा विश्वास नही:-
करते । यही बात मेरे हृदय को छेदे डालती है।'
'पर मिग्रन ! युवावस्था में सदेह, ईया श्रादि स्वाभाविक हैं।
तुम देखोगी कि ज्यों ज्यो जनानी ढलती जायगी, ये बात भी
अदृश्य हे।ती जायंगी।
'नहीं' नदी ! तुम उनको नहीं पहचान पाई है। । मिगन
बेचेन होकर कहने लगी, 'यह तो उनकी सान्दानी खासियत है।
वन परिवार के सभी व्यक्ति ऐसे ही हुए हैं। पचीसों बार उन्होंने
इम बुरी लत को छोड़ने की कममें खाई, घर अाखिर क्या फर्क
पहा? इसी उद्देश्य से एप्जम छोडकर इस माडखण्ड में था बसे ।
सोचा, इस परिवर्तन से दिन की बेचैनी ठएढी हो जायगी। जिन्तु
यहाँ आकर जो नतीजा हुश्रा, वह देख हो चुकी हो, और मैं जानती
हूँ कि उनकी भी दशा कम दयनीय नहीं है। उनके धार्मिक
व्याख्यान अब हास्याम्पद हो चले हैं। लोग बिलकुम्न दिएनपी
नही लेते। उनकी हालत अत्यन्त चिताजनक है। पर
भी क्या किसी दले फम दुम्ली हूँ ? मुझे उन्होंने छ ।
कर दिया है कि चाहे घानात् मुझे जंजीर में बांधकर
तो भी उनकी ओर
जाय,
4
(१७)
लोता भापगई कि बीमारी का ढोंग रचकर वह घर से निका
भागने की तदबीर सोच रही है। पर, निश्चयन पर सको, किस
उपाय से उसका अनर्थकारी सकल्प रोके । गत रात्रि की तरह
बादचीत का सिलसिलान छिड़ पाया, क्योंकि सिग्रन न जान
मिस विचार में निमग्न होकर चुप्पी साधे भैठो।
जा बैठी
भाज
भी वे दोनों घटों तक जागती रही, किंतु फन की तरह आण
और लोना
अगले
गने दिन धीमारी का बहाना बनाकर सिवन सुरह से शाम
वक खाट पर पड़ी रही। किंतु राग्नि क भोजनोपरान्त जर
नौकर-चाकर सा गए, वह उठ सड़ी हुई और पोशाक पहन कर
घगलक कमर में
'तबीयत तो ठीक है ? लाता ने चाककर पूछा।
'बहुत अच्छी । कक्ष मुस्कुरा कर बोली ।
( १८०)
जोता त तरह ताकने जगी मानो सिमन के मन का विचार
ताड गई हो । किन्तु सिग्नन विना डगमगाए कहती रही, 'और
इसमें सशय नहीं कि हमें यह कोठरी छोड़नी होगी, क्योंकि यहाँ की
प्रत्येक वस्तु गेग के कीटाणुओ से दूषित हो चुकी है। पर अर
हम जायगी कहा ? क्या उसी पुराने मकान में-सी। 'दु.खदाइ -
कारागार में ?
A
।
A
1
'नहीं, पादरी अपनी गलती समझ गये हैं, अतएव वह मकान
अब दुखदाई न होगा', लोता बोली, 'अब तो तुम्हारे सुख के
दिन लौट रहे हैं । सियन ! ज्या-ज्यों दिन बीतेंगे, तुम्हार जीवन की
समस्त चिन्ताए शात हो जायंगी।'
सिग्रन सुझमार उठ खड़ी हुई । 'चलो, हमें मृतक की,
शाति में विघ्न न डालना चाहिए। वह लैंप उठाकर बोली और
साधिन का हाथ पकडकर बगल के कमर को और बढी। इस
समय दीपक के प्रकाश में उसका सलोना मुख-मण्डन ऐमो विचित
श्रामा से जगमगा उठा कि लोता ठिठक कर वहीं खड़ी हो गई
और उसके असाधारण सौदर्य की प्रशसा करती हुई सोचने
जगी-सचमुच ही यह बी एफ दुर्लभ और अनमोल रन है ।
'लोता" पास क फमरे में पहुँच कर सिनन बोली,
हो परमात्मा ने तुम्हें किस उद्देश्य से भेजा है ? क्वज
मिश्राज-जैसी स . में मझे सहायता दे सको।
लोता सिग्रन कार गई, किंत वह शोध
..
उपस्थित कर दिया है कि वारे फी एफ लगीर भी तोडे बिना में
भोर कहना गारी रसायद परमात्मा फीही कृपा समझो कि
एडवई का दिल दुग्गाए बिना अब में चाहे जहाँ ना मफूगी अन्यथा
एक दाण पजिये भी सहन कर सकते ? ऐसी दशा में तो
दुनियों को जाने में मुझे इंढत और पा लेने पर या तो मुझे
रज में श्रा सुवाइट न रहेगी, क्योंकि पौरों को चाहे जिस
निगाह से रस, मृत्यु को तो सदिग्य दृष्टि से देखना असंभव है।
'मरी? मी तो सबसे भारी भाई इसी पात मे है, जिससे
सुनी हो सकसिग्रन के ओठों पर स्वर्गीय ज्याति-तुल्य एक
हो मार डालत या स्वत ही मर जाते । पर अब जो रास्ता सुक
वाराश यह कि हर तरह से इसमें उनकी भनाई ही है
"पर उनका तो सबसे भारी सुख इसी में है कि तुम
--
सामने घुटन देक मुक गई, तोता! मैंने एहबई से एक यार
वादा किया था कि मृत्यु के सिवा कोई भी मुझे उनसे विभिन्न न
का सागा, और आज तक यह वादा मैंन अशरश निभाया।
प्रतिक्षामा रन की अपेक्षा मर
जाना लाच दजें बेहतर
है। पाने परमात्मा ने पुकार सुनकर ऐसा सुन्दर अवसर
सदा के लिये कूच कर सकती है। जाननी हो वह क्या है ? मृत्यु !'
लोता कुसी से सड़ी होने के लिये छटपटान लगी, किन्तु सिग्रन
में एक न सुना। उसने जीता को जयरन कुर्ती पर बिठा दिया
-
योही माग गडी होती अथवा सबध विच्छेद फर लती तो क्या व
पड़ा है, उसपर अग्रसर होने से, न उनके क्रोध का भय है, 7
संदेह का ही। सभव है, का साल तक उन्हें रज रहे, किंतु उस
'सभर है, स्तुि तुम्हारी
कान मनफन लगी।
र उनके घर की शोभा बढाती रहो।"
१२
( १८० )
जोतास तरह ताफने जगी मानो सिमन के मन का विचार
ताई गई हो । किन्तु सिग्नन यिना डगमगा फहती रही, ''और
इसमें सशय नहीं कि हमें यह कोठरी छोड़नी होगी, क्योंकि यहाँ की
प्रत्येक वस्तु रोग के कीटाणुओं से दूषित हो चुकी है। पर अर
हम जायगी रहा ? क्या उसी पुराने मकान में-सी दुखदाई
पागगार में?"
'नहीं, पादरी अपनी गलती समझ गये हैं, अतएव वह मकान
श्रय दुखदाई न होगा', लोता घोजी, 'अप तो तुम्हार सुस
दिन लौट रहे हैं। सियन ! ज्यों-ज्यों दिन बीतेंगे, तुम्हार जीवन की
समस्त चिताएं शात हो जायंगी।"
सिग्रन मुझसार छठ सड़ी हुई । 'चलो, हमे मृतक की।
शानि मे विघ्न न डालना चाहिए। वह लैंप उठाकर बोली और
साथिन का हाथ पकडकर बगल के कमरे की ओर बढ़ी। उस
समय दीपक के प्रकाश में उसका सलोना मुस मण्डल ऐसी विचिन्न
श्रामा से जगमगा उठा किलोता ठिठक कर वहीं सड़ी हो गई
और उसके साधारण सौदर्य फी प्रशसा करती हुई सोचने
लगी-सचमुच ही यह स्त्री एक दुर्लभ और अनमोल रन है।'
'लोता! पास के क्मर मे पहुँच कर सिग्रन बोली, जानतो
हो परमात्मा ने तुम्हे किस उद्देश्य से भेजा है? फेवन इसीलिये .
किश्राज-जैसी सकटावस्था में मुझे सहायता दे सफो !'
लोता सिग्रन का श्राशय भांप गई, किंतु वह शीघ्र ही काबू
में आनेवाली स्त्री न थी। बोली, क्या पता सिग्रन ! शायद
इसलिये मेजा हो कि आज जैसी परिस्थित में तुम्हारे गस्ते पर
रोडे अटका सकू।
'ओह लोवा, तुम नहीं जानवी । -सिग्रन श्रावेश में
उठी और जोता को वैत की कुर्सी पर निठाकर
१
.
सामने घुग्न देक मुध गई लोता! मैंने एहाई से एक बार
बादा किया था हिम्पु के मित्रा कोई भी मुझे उनमे विमिन
सागा, और श्राज तक वह बाग मैंने प्रतरश निमाया।
प्रतिज्ञा मारन को अपना मर जाना लास हा बहतर
है। आम परमात्मा ने पुकार सुनकर पैसा सुन्दर अवमा
उपस्थित कर दिया है कि वारे को एक तीर भी तो हिनाम
सदा के लिये पूच कर सकती हूँ। जानती हो वह क्या है। मृत्यु,
लेता कुर्सी स सड़ी होने के लिय छटपटान भगी, किन्तु मियान
ने एक न सुना। सने जोता वाल गुर्श पर बिठा दिया
और पहना जारी रसा-यह परमात्मा की ही कृपा समझो कि,
पदाई का दिन टुम्बाए बिना अब मैं चाइ नही जो मकू गो अन्यथा
योदी माग संडी होती श्रषवा समध विच्छेद पर लगी वो क्या में
पेक क्षणाक शिय भी सदन कर सस्ते १ एमी दशा में तो ये
दुनिशे क धोने काने म मुझे ढूंदते और पा लेन पाया तो मुझे
हा मार डालने या स्वत ही मर जाते । पर अब भो राम्ता मम
पा है, उसपर घमसर होने से, न उनके कोच का भय है, न
संह का हो । मभव है, पाय साल तक उन्हें रज रह, पितु इस
रज में अर बाइट न रहेगी, क्योंकि शोरों को चाई शिम
निगाइ स देस, मृत्यु को तो सदिग्ध रष्टि से देखना असभव है
सारा यह रिताह से इसमें उनकी भनाईही है
'सभर है, किंतु तुम्हारी
'मेरी १ मा तो सबसे भारी माई मी मात में है, HिER
व सुखी हो सः । सिमन के नोटों पर स्वर्गीय यातिनुया,
मान मानने लगी।
'पर मनाता सबमे भारी मुख ममी
र उनके घर की शोभा यदाता रहा
-
मी ममय लोवा चौस टी, क्योकि सिप्रन पानी में बने
Finर पुनिया के जगले पर जा चुकी थी।
'! भगवान के नाम पर ऐसा न करो, घामामा
बिताया और स्प्रिन की ओर लपक्ष। 'नहीं, मैं घर न लौटुगो ।
यह वही बडेवई दृढता के बार होगी।
'हो, मत लोटिए ! में किली ते एफ शब्द भी न कगा।
आइए, गाड़ी में बैठ जाइए | मैं अगली सराय तक पहुँना दूंगा,
क्योंकि आप-सी महिला के लिये में पेट मना मा
काम नहीं है।'
'डानो सिमन सचमुच हो एकरनी बन
लोग ने प्रारच घरते हुए सोचा, यह मनमा सन करा
है कि मी कोई नहीं करता।
समीपमाकर ससन सक्स पश्न दातान पार प्राधना
सीन पहर रात बीत चुकी थीं। सूर्योदय के पहले आगामी
कदिनाई के लिये तैयार हो जाना आवश्यक था। इसलिए मना
६, कपड़े-लत्त जलाकर उसने अस्त व्यस्त कमरे के पद पूर्ववत
लटका दिये और भय से कॉपती हुई पडोस के कमरे की ओर
बड़ी, जहाँ उस अजनबी औरत की जाश अधेरे में पड़ी थी।
सोता ऐसी डरपोक तो न थी कि मुड़ के नजदीक आ र
माती, किंतु यह सोचकर फॉप रखो थोकि अनुचित बर#
मृतक की पारमा पदी अप्रसन्ननदो उठे। मतपय सम
(१८)
वह दिन जिसका श्रीगणेश सिनन के पन्नायन से हुआ था, ऐसा
जम्मा और उदासीन था कि लोता उसके अवसान की
सियन का पहुँचाकर वह फुटिया में वापस भाई, उस समय
मतीक्षा करते करते कर उठी।
H
की तरह मिसा-सिसक कर रोने लगी, 'ओह! मुझे पायो,
मुझे शाया दो।
सन इसके कंधों पर हाय घरकर मुक गया। इतना अधिक
फगया कि उसका कपोल सिग्रन फे मिना श्रोठों से जा लगा।
'तुमने महान सबट में एक यार मेरी रक्षा की थीह रुपी
प्रागन से घोला, आज तुम्हारी फातर पुकार सुनकर उस
उपकार का हजार गुना बदला देत भी मैं क्ग हिचकिचारगा?'
वर कुर्सी पर घेठ हदय का श्रावेग दपाता हुआ पोनी--
'पाखिर इस दुसमन परिस्थिति का कारण क्या था ?'
'क्या कहूँ | ऐसा नवा निस्मा है किन श्रारभ सूझता, न
अन्व ही वह फुर्सी की बगल में खड़ी होपर बोली, विवाद हमें
सुसमद न दुपारन वे ही सुप्त पा सके, न मैंही!"
'यही हाल रूप का भी था'-वह अपने आप गुनगुनाया
'मुझसे विवाह कर वह जग भी सुख नहीं पा सकी।"
'डाप अलजेरद में वह मुनीम पाता रिस्सा तो सुन हो चुके'
-
'हो, कितु उसमें दुर्भार को छाया न थी। वैवान शोक!
अनवरत शोकही था।
'तो सचमुच ही मेरे मरने में वहॉ किसी,
किया।
'हो, वहो तो समका यही विश्वामर्थ
की
छूत
से मर गई।
'श्रोह ! तुम्हे क्या मालुम, चेचक
वह कहते रहते अटक गई।
'कौन ?' स्वैन चौक ठा. "
मा वठी और पापों
.
(२०७ )
एक कमरे में सन्नाटा छाया रहा, स्वेन चुपचाप कर चानी इक दम
मस्त था और मिसन रूमान मिगावी हुई मन ही मन अपना
भाग्य कोस रही थी।
सब रहमता रहलता वह वापस मेज प समीप मा धेठा और
पग हाल सुनने के लिए बोला-'पागे १.
और यह फहने जगी, किस तरह उम अमनणे स्त्री ने कमर
में प्राश किया था, किस तरह तड़प तड़प फर धमकी जान
निानी थी, किम तरह वह चाहाना पा सा हुआ था और
अन में हगर तक पहुँचा परे किस तरह टसक नोटों का पुनिंदाचुरा
का नो टो-ग्यारह हो गया।
स्पेन घ्यानपूर्वक - उसका प्रत्येक शन्द सुन रहा था। वह
जानता था कि इस अभागिन औरत क निये दुनिया फ सभी द्वार
श्रम मन्द हो गये थे । श्रतएव निट भविष्य में आनेवाले उसके
दुखी जीवन की पल्पना कर, यह उदास हो रहा था। कह रहा
था, 'यदि ससार में रहना चाहे तो इस अमागिन प लिए, श्रम
छों का कडुवा फर धवने के सिवा दुसरा मार्ग हो रही है ।'
सिमन की राम कहानी समाप्त हो गई। फिर भी स्वेन की
धुप्पी भग न हुई । वह निश्चय नहीं कर पाता था. क्या फरे, क्य
नकर । और सिग्रन उमफी चुप्पी देखकर भयभीत हो रही थी
'वापस मुझे घराजेरद तो नहीं भेज दगा ? ओह ! कौन इस
अभागिनी का पृया भार उठान को इल्त मजूर करेगा ?' 4
निगश होकर पुन मृत्यु का आह्वान करने लगी। पर, श्रासिरका
वह उठ खडा हुआ और अत्यत सहानुभूतिपूर्ण स्वर में घोल
सिप्रन, यह मामला साधारण नहीं है । इस समय तो इसको सुरु
माने
रास्ता नहीं दिसलाई देता। पर, एक बात ५
. । ।। की तरह सिसक-सिसक कर रोने लगी, 'ओह ! मुझे बधाो, मुझे शरया दो।' स्पेन उसके फघों पर हाथ धरकर मुक गया। इतना अधिक सुरु गया कि उसका कपोल सिमन के स्तिग्य अोठों में जा लगा। 'तुमने माम सकट में एक बार मेरी रक्षा की थी यह रुघो नावान से घोला, आज तुम्हारी फातर पुकार सुनकर उस उपकार का हजार गुना बदला दते भी मैं क्या हिचकिचाग' : वह कुर्सी पर बैठकर हृदय का प्रावेग दाता हुआ पोजा- 'आखिर इस दु समद परिस्थिति का कारण क्या था ? 'क्या कहूँ? ऐसा लगा किस्सा है कि न आरम सूझना, न अन्त हो ।' वह कुर्सी की बगल में सड़ी होकर बोली, विवाह हमें सुखपद न हुआ। न वे ही सुस पा सके, न मैं ही !' 'यही हाल स्थ का भी था-वह अपने-आप गुनगुनाया। 'मुझसे विवाह करके वह जरा भी सुख नहीं पा सकी ।' 'माप अनजेरद में वह मुनीम वाला किस्सा तो सुन हो चुके होंगे।" 'हो, फितु उसमें दुर्भार की छाया न थी। येचन शोक अनवरत शोकही था। 'वो सचमुच ही मेर मरने में वहाँ किसी ने भी सदा न किया। 'हो, यहाँ तो सयमा यही विश्वास था कि तुम चेचक की चूत से मर गई। 'श्रोह ! तुम्हे क्या मालुम, घेषक से मरनेवाली कौन "वह कहते-कहते घटक गई । 'कोन स्पेन चौक उठा, माघटी और थासों से श्रॉमा देर . 1
में प्रवेश किया था, मिस तरह तडप तड़प कर उसकी जान
सिग्रन की राम रहानी समाप्त हो गई। फिर मोवनी
घोर वह कहने लगी, किस तरह उस प्रजनधी छीन कमर
जानता था कि इम अभागिन औरत के लिये दुनिया के समी द्वार
स्त ध्यानपूर्वक उसका प्रत्येक शन्द सुन रहा था। वह
अरबन्द हो गये थे। श्रतएव निकट भविष्य मे आनेवारने सके
दुसी जीवन की शल्पना कर, वह उदास हो रहा था। कहा
पा, 'यदि ससार में रहना चाहे तो इस प्रभागि झिए, श्रा
कमो का कडुवा फन चखने के सिवा दुमरा मार्ग ही नही है।"
चुप्पी भगनई। वह निश्चय नहीं पर पाताधा.शा
न करे । और सिग्रन एमकी चुप्पी देवर भयभीनाain
'बापम मुझे अलजेरद तो नहीं भेज देगा?
अभागिनी का या मार उठान को इल्न मजूर
सिप्रन, यह मामला साधारण नहीं है। इस
माने का कुछ भी रास्तानली दिसलाई
( २०७)
सक कमर में सनाटा छाया रहा, स्वेन चुपचाप कर चानी हक दम
में मस्त था और सिमन रूमान भिगोती हुई मन ही मन अपना
भाग्य कोस रही थी।
तब इसका टहलता वह वापस मेज के समीप था बैठा और
पुग हाल सुनने क लिए बोला-'आगे ?'
3
अन में हगर तक पहुँचा कर सतह सक नाटों का पुलिंदा पुरा
कर नो-दो-न्यारह हो गया।
N
निराश होकर पुन मृत्यु का श्राद्वान
करने गो
वह उठ खड़ा हुआ माता महानुभूति
( २१० ) वातावरण दिखलाई पड़ा। उसे आश्चर्य हुया कि उसके दामाद जो पहले पनी श छोड़कर अन्य किसी की ओर प्रॉस भी नहीं पठाते थे। श्रय इन छोकरियो की हसी-मजाक और नपरेबाजी में दिलचस्पी कैसे लेने लगे ? उसे पादरी क रग-ढग में बहुत फर्क नजर आया। पहले वे कितने गम्भीर रहते थे और अब कितने चञ्चल । पहले भूनकर भी अपने सम्बन्ध में एक शन न कहते । पर, अन स्वत ही अपनी तारीफ के पुल बाँधने लगते-बताते स्कृत में कितने अच्छे नम्बर पाते थे, एनम में फिननी अच्छी शैली स व्याख्यान देते थे और कैसे कैमे अद्भुत काम दिख- लाते थे। लडकियाँ उसकी बात सुनकर तानियाँ पीटनी और हसी मनाक परती थीं। पादरी उनसे प्रसन्न न थे, क्योंकि वे उन दोनों एक प्रकार की अवहेलना की दृष्टि से देखा करते काम काज छोडवे घण्टो तफ उन युवतियों लहाया करते, मानो सास को दिसलाना चाहते उन्हें चाहती हैं। सिमन की माता को अपने अजीन परिवर्तन बहुत बुरा मालूम हुआ वह शीघ्र ही वहाँ से निकल भागने का इगदा करने देखती, उधर उसे पुत्री का सलोना मुखडा याद होने लगा कि पादरी अपनी पत्नी को - । त " - 1 45 दिन उसे रवाना होना या, अतएव और कुछ बातचीत करना 'तो रंगे ही? इस वार इतावलापन करने - .
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-- ( २१०) वातावरण दिखलाई पड़ा। उसे श्राश्चर्य हुया कि उसके दामाद जो पहले पत्नी के छोड़कर अन्य किसी की ओर आँस भी नहीं उठाते थे। अब इन छोकरियों की हसी-मजाक और नसरे बाजी में दिलचस्पी कैसे लेने लगे ? उसे पादरी के रग-ढग में बहुत फर्क नजर आया। पहले वे कितने गम्भीर रहते थे और अब कितने चञ्चल । पहले भूलकर भी अपने सम्बन्ध में एक शब्द न कहते । पर, अब स्वत ही अपनी तारीफ के पुल बाँधने लगते-तजाते स्कूल मे कितने अच्छे नम्बर पाते थे, एजम में कितनी अच्छी- शैली से व्याख्यान देते थे और कैसे कैसे अद्भुत काम, दिख- लाते थे। लड़कियों उसकी बाते सुनकर तालियाँ पीटती और हसी मनाक परती थीं । पादरी उनसे प्रसन्न न थे, क्योंकि वे उन दोनों को की अवहेलना की दृष्टि से देखा परते थे। फिर भी छोड़कर वे घण्टों तक उन युवतियों के साथ गप्पे ते, मानो सास को दिसलाना चाहते हों कि वे दोनों पाहती हैं। रिमन की माता को अपने दामाद का रह परिवर्तन बहुत चुरा मालूम हुआ। वह अधीर हो उठी और ही वहाँ से निकल भागने का इरादा करने लगी। जिधर मी, उधर उसे पुनी का सलोना मुखडा याद हो पाता। उसे होने जगा मि पादरी अपनी पत्नी को इतने शीघ्र कैमे - 1 - मूल गये। . "सरे दिन उसे रसना होना था, प्रतएव रात को वह पादरी और कुछ बातचीत करना आवश्यक समझ कर बोली- दी तो करेंगे ही इस बार जाँच परसकर कीजिये करने से ही पहले धोग्वा हो उतावलापन . -
उन्हान पखालमागे पोलो. जिममदाथा दायदा ६क्स
रहे थे। पाटनी ने उद्दघूम जिया और या1-45 हून
पश्चात मेज की दराज से मदीन फागज म तपीहुई स्टेगो
क की यह तस्वीर निकाजी, जिसे मिग्रा सरसे अधिक
, 'इसको भी मैं सय लोगों को नहीं ऐसने दवा-वे शाले
घोर मेजका एक स्मात उठाकर पहन लगे-'यह कपड़ा में
काली, भो एक चमई के घेग में सावधानी क माध रखी हुई
'इन्हें में हमेशा अपनी जेर में रसता हूँ, वे बोत 'और रात
बुदिया सोफा पर बैठ गई और पादरी को समीप माने
। पिया-'आप्रो बैठो। उसने माना की तरह
चाहती थो, धनराइन यथाकोन रिसीमो हाथ लगाने "ता
नाश धूप प्राती दे, ता प्रसे दूमर ६पड़े से ढक दता हूँ, ताकि
(२११ )
पाटगे सुन बोले । ये उठे और हार से म
कमरे में हो गये। यहा सिनन की सभी वस्तु दोंन ऐसी घट
रखी थी, मानो किमी नुमाइश में समा दीगार पर इस
भिव मिल भाकर का चित्र स्टक मह , घालमारी में
पुनिन्दा पुस्तक थी और पा के पाम मज पर उसकी प्रना
पुस्ता पो धो। पादरी न उस पुस्तक 41 BIRर का-मैं
भनिदिन सिर्फ यही पुस्तक पढ़वा दुसगे छूना भी नहीं । तब
हैंग दसन "ता हूँ।
चाहनी थी।
मेशा सामने रखता है, कि सिगन ने अपन हाथों से इस धनाया
मफे फूलों कारगन "
इस सरह कई वस्तुएँ दिखाकर अन्त में उन्होंने दो अगूठिया
भी सिरहान रसकर सोता हूँ।
से पहा, 'आखिर
तुम्हार दिल का दर्द क्या है
।
4.
( १२१२
(।
पादरी फूट फूटकर रोने लगे। 'श्रोह ! जसे वह चली गई,
मेरा जोवन अन्धकार-पूर्ण हो गया ।-वे सिसक सिसक कर
कहने लगे, 'वह चली गयी, पर मुझे विश्वास नहीं होता कि वह
मर चुकी है। लोग कहते हैं, वह चेचक से मर गयी। पा, मुझे,
विश्वास नहीं होता। मुझे तो यही लगता है कि वह घर छोड़कर
भाग गई है, क्योंकि में उसे सुग्घी नहीं बना सका। नोह ! वह
मुझसे कैसी भयभीत हो गई थी। मैं उसे जरा भी सुख न दे
सका। इसका देवन एक ही कारण था कि मैं अपने स्वाश
उसे आजादी नहीं देता था। मैंने उसे दुनिया से छिपाकर एक
तरह के कारागार में फैद कर रखा था। वहीं याद भाज मेर
कलेजे को चौर डालती है। क्या हो अच्छा होता, यदि अपना
अस्तित्व मिटाफर भी मैं उसे कुछ दिनों के लिये सुखी या ।
सिमन की माता को पादरी के शब्दों से ताज्जुब न हुआ,'
क्योंकि यह जानती थी कि अपने प्यारे की पत्र के सामने खस
होकर कोई भी मनुष्य पश्चाताप और शोक के भाव यहाए 'ग्रिना
नहीं रह सकता।
।
4
-
सकता।
-
.
-
सतावाद पादरो एक दिन दोपहर वक अपनी बैठा
मलदहुए 4,इमी समय लोना ने हाथ में एक पत्र लिहु-
कमर में प्रश किया। जबदसो मन मासूम दवी घो, मानो
भनाराम ही काई स्वीय सम्पति पाकर निहाल हो गई हो।
उमा भारसे चमक रही थी, पपड़े ढगदार थे और यात सवार हुए
पारी प्रसादी प्रसना और शाति दस फर चाफ पड़े, क्योंकि
नि,तब से घर फभी इतनी खुश नजर न आई थी।
शिउलफत दिना से वायद ऐसी बन भोर घाड़ायी सी रहा
परता यो फिदिम भर अपने बाप बड़-पड़ाया परती सौर दिवा
मना का अद्भुतहान सुनाती हुई कहा करती कि किस तरह
दुनिया का प्राजय होगा। उसके वन अस्त व्यस्त रहते, पाल हलके
दएर पाखये-नी के साथ इधर उधर दौड़ा करती। वह लोगों
-विशेष पर पादरी से-मुह चुराया करती थी
मि.मान जड़कियों से तो ऐसी विद्रा परती
(२१)
कुत्र
क
पादरी
4
.
(२१२।'
पादरी फूट फूटकर रोने लगे। 'श्रोह ! जब से वह चली गई,
मेरा जोवन अन्धकार-पूर्णः हो गयो-वे सिसक सिसा कर
कहने लगे, 'वह चन्नी गयी, पर मुझे विश्वास नहीं होता कि वह
- मर चुकी है। लोग कहते हैं, इ चेचक से मर गयी। पर, मुझे,
विश्वास नहीं होता। मुझे तो यही लगता है कि वह पा छोहार
भाग गई है, क्योंकि मैं उसे सुखी नहीं बना सका। श्रोई । का
मुझसे कैसी भयभीत हो गई थी। मैं उसे जरा भी मुसनटे
सका। इसका फेवान 'एक ही कारण था कि मैं अपने स्वार्थवश
नसे आजादी नहीं देता था। मैंने उसे दुनिया से छिपाकर एक
तरह के कारागार में कैद कर रखा था। वही याद आज मेर
कलेजे को चीरे डालती है। क्या ही अच्छा होता, यदि आपना
अस्तित्व मिटाकर भी में से कुछ दिनों के लिये सुसी मना-
माता-
प
'सिमन की माता को पादरी के शब्दों से ताज्जु नहुमा,
क्योंकि वह जानती थी कि अपने प्यारे की, या फे सामने खड़ा
होकर कोई भी मनुष्य पश्चात्ताप और 'शोक के आँसू बहाय रिना
नहीं रह सकat
.
,
न
a
-
न
.
1
F
को में मान अभियों से तो ऐसी चिदा परती
मताह बाद पादरोक दिदोपहर के वक्त प्रश्नी मंठ
कमर मम्श दिया। मापद ऐसो प्रसन मालूम दवी घो, मानो
नागमही कोई स्वर्गीय सम्पति पाशर निहाल हो गई हो।
सो प्रोसंचमा रही थी, कपड़े ढगदार थे और याज संवारे हुए
पादरी इसी प्रमनना और शाति देख कर चौक पड़े, क्योंकि
JEET गई, तप से घद भी इतनी गुश नजर न आई मी।
विने पुत्र दिनों से तावह ऐसी बेर और पनायी सी रहा
हाती दी कि दिन भर अपने आप घड़-बनाया परती और दिवा-
वनों का अद्भुत दान सुनाती हुई पहा मरती कि किस तरह
दुनिया का प्रजय होगा! उसके वन अलज्यस्त रहते, याल बलझे
हुए और श्राव येनी घे साथ इधर उधर दौड़ा करती/वानोगों
स-विशेष कर पादयी से-मुह घुराया करती थी
(२१)
में लटे हुए , इसी ममय लोसा ने हाय में एक पा लिए हुए
पादरी
-
4
( २१४ )
मिजती, उन्हें दो चार खरी-खोटी सुनाये बिना नहीं रहती थी।
लड़कियाँ जोता को वापस स्टेंबोटस्क भेन देने के लिए पादरी से
बार-बार अनुरोध किया करती थों पर पादरी जानते थे कि उसकी
वैचैनी का कारण सिनन का राज यो, इमलिए लास शिकायन आने
पर भी उसको घर छोड़ने के लिए नहीं रहते थे।
किन्तु श्राज उसके बदले हुग सा ढन को देखकर ये सोचे गिना
न रहे कि लोता सियन को भून गई है। 'भाह ! मेरे सिवा पर
कोई भी शसकी याद नहीं करता। उन्होंने मन-ही-मन कहा।
'कृपया ध्यान देकर सुने !' जोता श्रात ही वाली, 'मुझे बहुत
पुछ कहना है। और तब गभीर स्वर में एक शाशीम पिस्ता'
श्रारम पर उसने पादरी को चकित कर दिया ।
'एक छोटा-मा गाँन था वह उपदशक की तरह कहने लगो,
'जिसके पडोस में थी, एक छोटी सी पहाड़ी। गाँव में एक किसान
परिवार रहता था और पदोदी पर कुछ सानाबदोश बसते थे।
एक दिन किसान की सी, सानानदोश की स्त्री को प्रभव के
समय सहायता दने पहाडी पर गई । रिन्तु जर बच्चे को नहलाया
धुदिया की प्रासों में महसो पानी का एक छोटा सा गिरा, जिस
स ऐसी दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो गई कि घा पर बैठे व सानामोशी
की घोरियाँ पकड़ने जगी। उस दिन से जा फ्भो।
गानाबदोश
याने, धुढिया फोर7 उन्हें जा पड़ता थी। एकदिना हाट ,
कौटते व राह में एक सानाबदोश स उमझी भेद हो गई
'कहो जी यह कपड़ा पहा वीदा ?' उसने सानागदोश ६
गगे दस फर पृछा-'प्रजीदा सम्ता हाय लगा' श्रादर्म
', 'दी किसान धापम में न रहे थे, में पीस ले भागा!
मुस्कराई और बहुत देर तक उसको साथ गप्प लगात
। राय सानादाश योगा, 'बुढ़िया तुम हम लागा मो ६
पादरी चुपचाप सुन रहे थे । 'पहे जात्रो!' उन्होंने शाति
'हा, मैं कोई फिस्सा बनानेवाली नहीं हूँ लाता साँस लेकर
पहने हागी, में एक जरूरी बात कहने आई हूँ। पर वह पान
• पहूँ, इसके पहले मुझे एक किस्सा और कहना है। आपने सुना
होगा, यहाँ नजदीक ही हगर नाम की एक ऊजड़ बस्ती है। जहा
की विचित्र कपा आप सुन हा चुक हागे, किस तरह वहा एक
पादरी फातून हुआ था। हा, तो जब कभी मुझे हगर का ध्यान
याता, मर मन में विचार उठता है कि उस आदमी को-जो
वहा के शाप ग्रस्त निवासियों का वश है और जानता है कि वह
के लोग अधिकतर अकाल मृत्यु पाते है-एक फूल जैसी कोमात,
निष्पाप और भोली लड़की से विवाह करते समय क्या तनिक भी
ख्याल न आया होगा कि वह एक भीषण अपराध करने का
4
( २१५ )
जगह कैसे देख लेती हो ? और भोली घुढिया ने आखों मे .
पड़ने का पूरा किस्सा कह सुनाया। वस, ज्योंही बुढ़िया ने अ
रहस्य गोला, सानाबदोश ने लपक कर उसकी 'पाखें फोड ड
और दमेशा के लिये उसे दिव्य दृष्टि से यचित कर दिया
जत्र श्रापस पहली बार मुल
कात हुई यो। आपने निर्दयता के साथ मेर दिव्य चक्षु फ
कर हमेशा के लिए मुझे अघी बना दी। तब से मरा जीवन इतन
अबधारपूर्ण हो गया कि मुझे न कुछ दिखाई पड़ता है,
सुनाई।।
यही हाल मेरा भी हुआ महाशय
.
साय कहा, 'मैं जानता हूँ, तुम फेदन किस्सा सुनाने नई
आई हो।
'लाता !' पादरी उसे चेतावनी देते हुए मोल छठे । पर
शान्त थी।
.
,
.
-
ते हा सन्नी धो, अगर न पा किसी
प्रभार न होता? अगर तुम्ही काय ।
भार शक्षिसे कम पी का, जिसे 'तुम
खीच लाने वाद सपने कर लिए
घटनायें कैपे हो सफ्ती थी।
सधी बात है। क्षेन ने मावेश
घड़ा, 'यदि तुम्हारी ही मालिका,
यतों पर निम किया जाय तो करा,
किंतु यदि यह सच है कि ज्य के कई
यहां तक खिंची चको बायो हो, मैं स'
दण्ड देने के लिए ही यह मिनाप पराया।
मी कि तुमसे मिलकर मेरे प्रेम की रात
छठेगी।
है, वह जानती थी-सिमन पैसे स्व.
किसी पारलौकि यफि से बातचीत कर,
कि प्यार करने पर भी तुम प्रेम का मर
शान हुआ। में उन्ह पूरा हाल कह सुनाऊगी, ताकि वे जान सके किमान किसी का आधिपत्य स्वीकार करता है, न प्रियतम क अतिरिक्त किसी की परनाद करता है। प्रेम का कानुन निराला ही प्रेम वाद और हुक्म का गुलाम नहीं है। वह चाहे जप याता गदा के प्राचीन निवास स्थान हगर में बुलाकर बताऊ गी, क्योंकि नति के इस सुन्दर वातावरण में प्रेम का रहस्य सुनकर वे जाग गाड़ी में छिपा हुआ व्यक्ति चोर की तरह लापर बैठने में ना का अनुमा करने लगा। सभर था कि पाप भर बाद ही झाड़ी से तिकतकर सिमन और स्वेन के सम्मुख जा सहा वा। यकायमसरन सम्मुस एक अजीव वस्तु देखकर वह नग किच ह ताव भी प्रकृति की तरह महान और सुन्दर बन ( २२४ ) शिक्षा से श्रम मेरी रग रग मे कितनी गहरी पैठ गई हैं। अब मैं अलनेरद वापस जाऊगी तो एडवर्ड मुझे कितना परिवर्तित पार्यग । च मम पहले से भी अधिक सुरखी होंगे और इसके लिए तुम्हे जिन शब्दों में धन्यवाद देंगे ?' ' स्वेन को प्रॉसों में आँस उमड़ पाये । वह सिग्रन का हाथ प्रसार कुरु गगा और सिसककर रोने लगा। "और क्ल अब एडवर्ड आयेंगे' वह कहती रही, 'मैं उन्हें पूरा हाल सुना दूंगी, जिससे वे तुम्हें हानिक धन्यवाद दे सकें ' "उन्ह ?'-.न चकिपर उछल पड़ा। 'सुनों स्वेन ।' यह दृढतापूर्वक गोली, 'अन दुराव छिपाव का परदा यीच में रखना ठीक न होगा। मैं उन्हें बता दूंगी कि तुम मुझे पाहते हो। बता दूंगी, सि तरह मुझे प्रेम वा सया रहस्य नाते हैं।
11 मिटा, ना जाग्नुश करने की इमोश्च कती
Prim, म काम में जमरा
Hinाग भी नहीं है-देन अपने दाने मोजा.
HIOfrisोटमटान लगा,'तर दिना
HThan, किस तरह गुझे उम्दाने चरन चिश/
Hathi film 'पक गण माना माग पशिए ५ सय
Harita तुमने रन में भी पेमा कमनफियाहामा।
श्रा नाँगिया ? या यों है। पहले कुछ भी
नीच पुन गई, इतना जर्जर, और,
श्रा है कि पन्नों का नाम न होता, जय भर में हा
आगामी हो जाना ! मार्ग को पड़े, डि,काने टमकी',
F} या बंधा था, न ही दिलाई माया सोचा'
अम्ति है और ऑमलने का मौका नया
IT HTE मा ना लगाक दावोठामा इमरी हो
1.htri irगा है ।, मिशन ऋड रही सी-तो सच
मा५५ प ने पागल हा गए थे कि पाना श्री फुल
roma
HET, HT, य: तुम्हारे मन या कवन भ्रान्ति है वह
"
८
18
Arri
-
'फनून उल्टी करा दौड़ा रहो हो भिनन । मम ईन्छ ।
1कि मैं मसमें शोकथा
पिन' या मोश के साथ योगी. जो कोई भी
६, ना मा धान मनमानमा ,
दीमामा नरनाकि नागाने तुम्हे
थाव फिलफुल भूटी है।
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- (३०) का माठिठक गया। देवा, पत्थरों के टो, मोपले कुन भी नहीं था, पाटक का पुराना समा है, आडना' Hit और सहा हुमा दे कि परयों का महान होता, माया भर में टूटकर घासायी हो जाना! पादचार पड़े, क्याधि पान सी . जोर मामा भान फाटर ही दिखाई पड़ता यांना मन का भति है और प्रोन मनन लगे। फिर भी बनाया समा 7 मिटा, ता य तान्नु। करन तगे। दो बच यतूप की शोर या ता पता लगा कि यातचीत का प्रमादप्रय दुगहो दिशा मे गहने नगा। मिल पा रही थी-'तो समुच ही क्या उस समय तुम ऐन पागल हा गाये कि यमाकी पुत्र मी स्मृति न रम्ब म " हा, म्न ता जरा भी नहीं है वे अपने अटकते शेषा, "मा सदा नी कि में उमनाम मे कम, मोतिहारा, पर जम उन्ह डॉटने कदमारने लगा, ता । विधिना', सहन नग, किताह गुम म्हान पर दिना" जमान विनकुन अटक गर्थ माता श्राग य लिए वह सर्वथा - ha TH 'मी, नहीं, ८, तुम्हारे माथी केवन भनि गोली पसमम दे, तुमन रसाने में भी प्रेसा मन किया होगा।' 'फजून उल्टी करना दोदा रहो हो नियन! इम देह न कि मैं उसमें शोक था पिन,' वह जोश के माय योली, 'जो को. वह प्रेमी यात काशिनही मास यो माना मरता हूँ कि लोगा ने तुम्हें. पाव किलपुल भूरी है।" 41 स । " L .
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(२३२ ) उसके शब्दों का विरोध करना दुस्तर था। स्वेन ने करिता भारभ की ! करिश्रपनी प्रेममिका से अनुरोध कर रहा है कि मुझे स्वर्ग में भी मत भूलना-'यह मत समझो कि मैं तुम्हें नहीं चूम सकु गा, क्योंकि तुम मर चुकी हो, या तुम्हार गले में वाह नहीं डाल सकु गा, क्याफि तुम कब्र में सा चुकी हो-' वह सिमन की और पीठ किये बैठा था। उसका मस्तक मुका हुया था, और असि शुन्य दृष्टि से न जाने किस वस्तु की ओर ताफ रहीं थीं । सहसा उसके जी का गुप्यार, जो सायमाल की धान सुहावनी बेला मे अपनी प्रेमिका से अत्यत समीप रहकर भी नहीं, उमड पाया था, कवि के फडक्ते शब्दों का धक्का वाकर वह चरण 'देखा-वह कविता का दूसरा पद्य सुनाने लगा, सूर्य की गुतहको किरण हिमाच्छादित पर्वत शिखर व बगीचे में खिने हुए गुलार को कैसे समान भाव से चुमती हैं। कुछ क्षण तक सिमन एकाग्रता के साथ सुनती रही। म्वेन की तरह वह भी मुह फेरपर बैठ गयी मानो अपने चेहर का भाव छिपा रही हो। पादरी को अव मादी की पोट से उसका चेहरा साफ दिखलाई पड़ रहा था। उन्होंने देखा कि स्वेन की तरह वह भी अपने दिन के भाव कश्रावेश में बह चली है। उसकी पल के गिरी हुई थी, वाहे कमी हुई थी और ओठ किसी व्यक्त वेदना से मद मद फड़क रहे थे। पादरी का उसके शब्द ता नहीं सुनायी पड़े, पर उसके शोठों के स्पदन से उन्होंने अनुमान लगा लिया, मानो वह कह रही है-'आह ' उन्हे में ऐसे शब्द नहीं कह सकती, कभी नहीं। 'जर प्रबन मम्मात समुद्र क गभीर वक्षस्यन को विडोलित पर रहा हो-स्थेन उसी तरह फॉपती श्रावास से पह..रहा था, 'और चन्द्रमा मेघ-मालायों का घूघट काढकर श्रद्धरात्रि के समय -
मा विरोध न करेगा। वह तो स्वत मृत्यु का श्रामाइन कर रहा
पल पीछे से पानी में धक्का देने की आवश्यकता है। वह तनिक
(२३३ )
विलुप्त हो गया हो, उस समय पन का प्रावणा चौरकर हे सुन्दरी !
शपने यों ने वश पर मुझे विपका लेना और विभिन न
होना, अब तक मेगथात्मा, शरीर और ससार फ वधन से मुक
न हो जाय।"
झाड़ी में धैठे हुए व्यक्ति के शरीर में एकाएक भय मिश्रित
कार की 1 फपरी फैल गई। उसने दया कि सियन एक
'वका भरी दृष्टि से इस तरह याहे फैनाकर ताक रही है माना
पिान्तर काम से किसी वस्तु पतिए तइप रही हो। उसके श्रोठ
पुन एक वेदना भर पहन के साथ गुनगुना रहे थे-'नहीं, कभी
पत्रो को पार से निगाह हटाकर पादरी सभे की ओर देखने
लगे। वह उसी तरह नियम भाव से समाधि जगाये खड़ा था
माना मूर-भाषा में पादरी को सयोधिन पर दा हो -'तुम उन
मायो पुजुर्गों की सन्तान हो, जो तिनो-जैमा अपमान भी नहीं
सर सस्त थ, क्योकि वे जानते थे, बदला कर लिया जाता है।"
करिता ममान हो चुकन पर, गगीचे में गभीर सन्नाटा छा
गरा। वे दोना 33 पडे हु। मियन मापन में घुस गई और स्वेन
झाड़ी के समीप होता हुआ वृक्षों के झुरमुट में छिपे हुए एक
तालाब के किनार जा सड़ा हुमा ।
वह एकान हाकर चालाय पे गमीर जाल की ओर ताक रहा
था ! इमी समय पादरी के मनमें एक भयकर विचार उठ खड़ा
हुप्रा- यह क्ति सिग्रन को प्यार करता है। इसको जीवित
पहन देना चतरनाक है।' और दो ही क्षण उन्हे मुफ पहा-
-
वह एक खतरे की घड़ी थी। पादरी विरोधी भावनाओं से
( २३४),
युद्ध कर रहे थे। तब अनायाम ही एक विचार, जो बहुत दिनों
स उनक तस्तज में छिपा था--3ठ खड़ा हुआ और खतरे को
घको टल गई । 'तुमने एक दिन फवल इसा अपराध पर उस चर्च
सधक दर निकाल दिया था कि वह मृतक का अपमान कर,
बुश या । पर आज तुम खुद हा जिस गौपण काम के लिए पढ़े
रहे हो, वह क्या है ?, पाग पशापेश में पड़ गये । 'हे भगवन् ।'
व साचन लग, 'मैं क्या करन चला था ! TER तो कवन मृतक
की हत्या की थी, पर मैं जीवित को ही समाप्त करन जा रहा
सा। आह, सैकहाँ जन्म में भी ऐसे महापाप का भी प्रायश्चित
हा साता है ? और अचानक ही उन्हें एक महान -सत्य जात
हा गया-क्या जीवत, मृत्यु स हजार गुना पविन, महान और
अमूल्य नही है
'जय उन्होन पुन तालाब की और दृष्टि डाजो तो देखा कि
स्वेन गायर है । सिर्फ स्वेन ही नहीं, एक श्रार वस्तु भी यकायक
अश्य हा गई यो वह पुराना समा भो न था।
पादरी को ऐसी भ्रांत हा गइ माना कुभावनाओं से युद्ध
फरत समय सन्हान ही सम का उसाड़ कर जमीन पर पटक
दिया था, जो पेसा चकनाचूर हा गया था कि, बुगदे और छिलके
की ढेरी फ सिवा कुछ भी विन्द अशिष्ट न रह गया था।
तम धीर धार उन्हें ऐसा प्रतीत हान लगा मानो वह सभा घोहर,
नहीं था, प्रत्युत उनक हा श्रता
था।
.
M
। रखी ग थी, जहा नस पागगार मुक सैनिक की कहानी लिखी थी। ग्रिन प्राश्चय का पारावार न रहा, जब उसने देखा कि थैली में स्थत उसकी दो अगृठियों और कुछ अशर्फियों रसी है। क्षण भर में वह सारा मामला ताई गई और उसकी आखों से ( २३५ ) हो गया है, न गन में एक विचित्र हल्कापन मासिन होने लगा या ना इस्य में प्रेम और त्याग की पुनीत भावनाओं को एक मधुर फालय राम घारा प्रमादिन हाने लगी थी। उन्हे भर पान मान में एक अभूतपूर्व प्रानद मिल रहा था, क्योंकि भाध्यक्ष के पदेन सागामाया पय-पदर्शक, संरश और वा धे, प्रत्युत माना जानि ५ विशाल परिवार के कुलपति जगत क विस्तृत उद्यान में माली और भुने मटक मनुष्या फै गरिय थे। पय यसव को उस सुहावना सध्या फ समय योइड पहाड़ी प्रदेश में हाकर वे वापस घर को पार पलटे, उन्हें BR वस्तु क लिए आश्चर्य हाने लगा, जिसन उनको हत्या के महा पाप स बचा लिया था। क्याकि वह वस्तु न प्रेम की प्रवृत्ति थी, ने त्याग की, प्रत्युत जावन के पवित्रता की वह भावना था, जो म्यन के दुभार रूपी खन में उगार आज एक विशाल वृक्ष की वरह एदना साथ खड़ी थी। अगने दिन प्राय काल के समय गीचे में आने पर सिमन ने खा कि करिना की पुस्तक गत को वहीं बलूत व नीचे छूट गई यो ) उसन fat का जमीन से हालिया, किन्तु पनों के बीच क छोटी सी थैली देखकर वह चौंक पड़ी। थैली उसी पृष्ठ पर अविरल 41 अश्रुधार यह चमी। जम का आया, यह फुर फूटकर रो रही थी। बहुन ढास बधाने पर बोली- यल रात को एहवई यहीं थे। उन्होंने सब -- ܗܝ
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. । २३६-) बाते जी । जान लिया कि मैं तुम्हें चाइनी हूँ। श्यतन ये चीजें, जोड़ गये है। 'चाहती हो ?' स्वेन आनद के मार विष्टा उठा, "क्या सच- मुच ही तुम मुझे चाहती हो सिमन 'पर वे नाराज नहीं हुए। वह पहनी रही, 'पर मुझे लिंबाने फो ये नहीं पायेंगे स्वेन ! वे इस अंगूठी द्वारा कह गये हैं कि मैं अप यहीं रहकर तुम्हारी हो सकती हूँ। दोपहर बाद पादरी का एक सदेश लेकर नोना ने हगर में प्रधेग किया। एसे बहुत सी बात पहनी थी, जिनमें एक दिवा स्वप्न का । भी हाल था । बोली-'कल गत को मुझे हगा को भर इमारत फिर नजर श्राई । बुढिया उसी तरह खिडकी मे बैठी ताक रही थी, और पसी तरह वह पुराना सभा भी अटल भार से सड़ा था। तन अचानक ही वह बुढिया सर्ग पो भार हाथ उठापर उठ खड़ी हुई और उसका सिकुड़ा हुआ चेहरा हप के मारे जगमगा उठा । 'हगर के प्राचीन निवासी शाप से मुक्त हो गये-एक गभोर पानाज सुनाई दी और दुमरे हो क्षण वह बुढिया, जो सदियों से वहाँ बैठी रही थी, जमीन पर गिरकर विलुप्त हो गई। साथ ही वह is हो गया थोर मकानात धडा गिने लगे। मैं' ई कि यह दिया स्वप्न मुझे अब कभी नजर न आएगा, हगर निवासी शाप से मुफ हो गये। . . है --
(२३)
वियारो
होता?
‘আ বিগ সৰি হী। সামাবি নই,
सोचता.मग विचार मोभित है और
यो " "अपनी खोज यो सर फूलग जाता है, पर
किसी अष्ट शनि द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी पर योये गय पोज की तरह
जर दगारों लोगों का मस्तिमा पे ही विचार उठ पड़े
होत है, तो चष्टि का प्रभुतीना दम्बार दो लजित हो
भार हैं। यही हाल पार्टी के मन में उपगे हुए 'जीवन की पति
ता सम्बन्धी नि विचार या भी हुआ। अभी ये अपनी नई
मोम का FIR भी नहीं कर पाये थे कि सहसा हजार लोगों
मन म वही प्रभु विचार नठ साहुमा
जून में स्वीसन के पशिमी समुद्र तट के लोग वायु परिवर्तन
का निर माने या ने कमि प्रतिस्प हजारों
वाद की पारिया करने में रहते हैं। शियाँ रगो जाती
हैं, । ,
( २३८ ) हम्मामों में गरम पानी के हौज तैयार रखे जाते हैं। एक सप्ताह भी नहीं बीत पाता कि विश्रान्ति और मनोरञ्जन के इच्छुक हजारों को पुरुप, रोगी-निगेगी, बूढे और घाला, रल गाड़ियों में मदफर सागर की हिमारे लेने के लिए या धमक्त है और घुछ दिनों के लिये नेपफोर्ड और आस-पास के टापुओं पर ऐसा रयामा मेला मच जाता है, मानो सारा स्वाइन ही खानी हो उमड़ा हो। इस वर्ष भी हमेशा की तरह धूम-धाम से तैयारी की गई। मकान सजाय गय, नावे गी गई, सड़क सुगी गई और हम्माम भरे गये। पर यह तैयारी कवल उन्हीं यात्रियों के लिए थी, जा रल मे लदफर देश के भीतरी प्रान्तों आये थे। अतएर मुसाफिरों का एक झु हजर जहाज में नदकर समुद्र की ओर से आया, तो नेपफोड बन्दरगाह पर किसी ने मा उनका स्वागत सम्मान न किया। पता नहीं, इसका क्या फारण था, पर एक यात स्पष्ट थी कि उस जहाज क सभी यात्रा चदास और पिक चिड़े दिसलाई पड़ते थे। एक सप्ताह बाद हगा का एक पति इन्दी यात्रियों से मिलने के उद्देश्य से एप्लम क समीपस्थ रज स्टेशन पर उत्तग। क्योंकि उन जोगा में उसका बाटा भाई अजाम भी शरीक था, जो दो. तीन वर्षों तक समुद्र की हवा खार पागल और पीमार होर बापस लौटा था। जब रन नेएकार्ड में भाई के मकान पर पहुँचा, अगजान दायाने की तरह कमर में इधर उधर दौड़ रहा था। उसे यो खास थीमागे तो न पो, पर इसकी श्रास सूजफर ऐमी माल हो गई थी माती महीनों से उस पर नही, उस धनी पा फार । ata + -- -
( २३६)
भीष मग घुम गया मा, जिससे वह न लेट पाता था, न भार
होम साता था, प्रत्युतर घर-घर दोहा कता था, ताकि
भांब मान न पायें।
'अगमा ! यह क्या कर रहे हो पेन ने पाकर पुत्रा।
परप्रामात न सुना ही नहीं। यह मसी तरह कमर में चक्कर
मटा दुमा या पठार पममाया में पिल्ला रहा था.
'भरे हत्त ! मारा न साम पत्तियों को।
फोन म उसकी नर विवादिता पनी सिर पटकाये बैठी थी।
स्पेन को देराकर यह माना ठो, 'यो । किमी तरकोप स अगर
इन्हें नीद था ओय, तो भा में यह यती मिद जाय । पर,
हुमायसन मान क्या र समा गया है कि न पा लेटते हैं,
पाखें मूदते हैं। दिन रात इसी तरह ना में पाए फटकारत हुए
दौरत रहत है-
...
स्वन न उसका ध्यान खींचने का घूमरा रास्ता देण किसी
पुरानी स्मृति को याद दिलात हुए कहा-माम 1 याद है, किस
वरह नैद र धो क साथ तुम एक दिन मुझे मरा साप खिमा
प्रीमन आये थे?
अगमाला फौरन चलते चलते एक गया। कोन, स्येन षह
मोखे फाहार याला आग, अप में पान के पतो तुम
से क्षमा माग सफू गा।
उसकी अनसानो हबों से टपाटप कई यूद प्रॉस कुमा
पहे। इसने कहा शुरू किया, किस हरा समुद्र के भगकर
युद्ध के बाद एक दिन म महाज ऐसी जगह मा पहुँचा था,
महा युद्ध में मारे गए सिपाहियों को मारों लाशें समुद्र के पक्ष •
स्पा पर तैर रही थी। बेचित नहीं थी बहने लगा, 'प्र
( २४० ) , गले में बंधी हुई रबर की चैशियो के कारण पिलकुल सही तर रही थीं, जिनसे उनके मिर पानी से ऊपर, साफ साफ दिखाई देते थे । ऐसी हजारों लाश थी, जिनसे सारा समुद्र भरा हुमा दिसलाई देवाधा। ओह, स्न! जरा पल्पना तो फरो, वह दृश्य कितना भयाश्ना रहा होगा। पर सबसे भयंकर यात तो थी कि पानी पर तैरते हु। उन नर-मुरा हों की श्रॉसे, सिर पर मंडराती हुई समुद्री चीजों ने नोंच सायी थी । योह ! वह वीभत्स दृश्य अब भी नाखों फे सामने नाचने लगता है। इसीलिए न साता हूँ, न बास मूदता हूँ, कोकि मुफे भर है, पजफै ढापते ही वे डरावनी नेन विहीन लाशें फिर न दिसने नगें । यह भयभीत होकर बोलते मोलते रुक गया, पर क्षण भर याद फिर कहने लगा, 'तर एक अजीम घटना । जहाज के नायय-यप्तान, जो बहुत देर से उस मय कर दृश्य फा देग्य रहे थे, प्रोसें मूकर पानी में कूद पडे । यह वीमन दृश्य उनके लिए असाह हो उठा। वे समझ गये कि एक बार वह नजारा देस लेने पर जीवन भर शाति मिना श्रमानव है। ओह ! आज पहना रहा हूँ कि उस समय मैंने भी अपने पप्तान का अनुकरया क्यों न कर लिया। 'नहीं, नहीं ऐसा न हो ।' स्वेन गोना, 'उम बात को याद ही मत करा पर अगमोल चुप न हुआ-तत्र में श्रनोसी बारे सूफी । हमें -काध आ रहा था, इसलिए यन्दू ठार लगे उन चीनों को दनादन मारने 1 कितनी भारी मूर्सना थी। मला इममें उन निर्दोष अपराध ? वे तो कैवान मरी हुई लाशें नीच, रहे दोष न राक्षसो की नृशसना के समक्ष था ही जिन्होने चुटकी बनाते समुद्र का वात स्थच हजारों - --
( २४१ )
नौजवानों की तानों से पाट दिया था ? यही बात तुमसे कहना
चाहता था मेरीकि जय मनुष्य के प्रति मनुष्य फो नृशसता का
किता
र करता हूँ तो सिर सजा के मार मुफ जाता है। श्रोह!
पामा करों भैया! एक दिन अपने आपको यहा मानता हुआ मैं
तुम्हे ध्रुव की नस दुर्घटना के लिए घृणा की निगाह से देखा करता
था, जबकि स्मय सिवा जीवन का निरादर करने के दुसग धन्धा ही
नहीं करता या! मैं याज वन माता पिता की सेवा की,
किसी और को सहायता दी । तुमने तो उन चीजों की तरह पाल
मृतक का अपमान किया, पर मैंने सिवा जीवन का तिरस्कार करने
के और क्या किया
व भाई के चरणों में लड़खड़ाकर गिर पड़ा और क्षमा की
भीख माँगता हुआ फूट फूटकर राने लगा।
'सम अच्छा होगा जोल ! स्पेन ने भाई के पात्रों में अगुनी
सुहरात हुए कहा, 'श्रय मो स्थिति सभल सकती है।'
'नहीं, अब वक चना गया है। वह नजारा सदा के लिये
श्रासों म स्थापित हो चुका है। में पागल हो जाऊंगा।
सन ने अपने हाथो से भाई को श्रासें मूद दी। 'याजाला
पालो, मेग हाय पासों पर रहते तुम्हें ये भी भयर पात
न दिखेगी।
'श्रोह, मच कहते है। स्पेन !'
जैस परापकारी के हाथों मे चमका
-
'पासमूद
अब हम सित
सेवा कर साते
( २४२, अगगोल ने भासें मूद लो और क्षण गेलकुल सही तर गोदी में मस्तक रसकर वह दसने ही-दसत गमोरफ दिखाई देते हो गया। किया x x । यह दिन सचाच ही शिक्षा और अनुन धा । प्रेसा प्रनीत धाता का माना नेफाट के सभी मनुष्यों का ससा उपी नवीन सत्य की प्रमियर गई थी, जो अगाल के मस्तिष्क में- सम दिन 38 पड़ा हुआ था। अयोनिद्रा में अचेत हो गया, स्वेन उठाभोर वस्ती मे हे नाग टहलने के लिए ममुद्र को और बढ़ा। किन्तु थोड़ी ही दूर गया होगा कि औरत ने सामन प्राकर सा हाध पर लिया । स्पेन पहचान गया, वह नेद के महाद फेमपन की पन्नी थी। मेमपत भी युद्ध में शरीक हुआ था और नीर वर्ष याद अपनी दोनों टार्गे शोर एक मुना साकर वापस घर लौटा - d . स्वेन और साय नमो ना पर पहुँचा। 'ओह ! कितने दिनों मैं क्षमा माँगन लिये गपकी मतक्षा कर रही यो पद बाली, 'क्यासिर मैं उन जेागो को बान माचनी हूँ, जो ऐसे शैतानी इथियार बना रहे हैं, जिनस कई निर्दोस प्राणो जन्म भर के लिए लून भाडे है। जाते हैं, तामा प्रति पिये हुए दुर्य यहार के लिए गौ महान् परकत्ताप हाना है। अापने का देवल मृतक की हिमा को थो, पर, वे दिनदहाड़े हजारों जोगो का जिबह करने के लिए छुरियाँ पिसा करते हैं। उसने बातचीत परने के पाद जय स्वत श्रागे पढ़ा, कोरत मिली, जिसे वह फोग्न पहचान गया कि की जूजिया है, जिस पाठ २५ पूर्व उसके . है - समय ( २४३ ) घृणा के साथ टुक्रा दिया था। 'क्षमा कीजिए! वह समीप भाकर योली, 'उस समय मुझे मालूम न था कि मृत्यु से जीवन का निरादर निमा बदतर होता है । जम मैं देखती हूँ, कितने बच्चे इस भया युद्ध से अनाथ हो गए हैं, कितनी खिगों विधवा हो गई हैं, और दिन रात भूखों मरतों हैं, तो आपके बारे में अपने भूतपूर्व विचार के लिए मैं शर्म से गड़ जाती हूँ।" यस्तो के परले कोर पर मे ॥ Ta चिा नवयुवक मिला, जो नौडार उसक पैगे में गिर 'द. और यातों में सांस भरकर बोना, 'प्राप मुझ नही करत हाग, क्योंकि श्राप ग्रामन द्वादकर गये, उम मैं वन मान यरस का लडका था। पर मुझे श्राप से क्षमा मांग है, क्योंकि कम समय और ल्ला प साथ में भी आपको चढाया करताय, और जब भी आप बामार मे निक- मत मैं आपको गालियाँ सुनाना हुम्रा पाछे पीछे दौड़ना था। पर श्रव में जान गया हूँ कि श्राप निल कुन निर्दोष थे । कि युद्ध में शहर जब मैंने अपनी stों से माया पी अपन भाइयों को मारत असारे मुझे प्रतीत हुआ कि मृयु के मति अपराध करने पी अपना जीव की हिसा करना भारी पाप उम भापरिचित युवक स पैर छुड़ाग स्वेन ए मोरवती पहाड़ी घड़ गया और समुद्र की अनत जा राशि पर प्रखं टोडाना हा मन ही मन बोला, 'गदि मर जी37 + तूफत स सीक गाय लोगों को इस परम सत्य की भागरिक कान की हिमा र प्रदपर दसरा भी श्राप ध नहीं है, तो काठं श्री भी अन्तर्दित थ।' - इम व कीरा ही रिमे दुर्भाग्य यो पटुप शेज में भलाइ 3
(२४)
-
व अगोगा की तबीयत दुरुस्त हो गई, स्वेन टहलता हुभी।
एक दिन दोपहर में दा नेपफोर्ड के पदरगाह पर घi
पहुँचा । दसा, 'नद' अपने पुराने घाट पर खडी है और शोलास
प्रादि उसके पुराने मजाद मछली के शिकार पर जाने की तैयारी,
कर रहे हैं। गरमी के दिन थे, अतएवं समुद्र की हवा खाने के
लिए स्वत श्रादित लनचाने लगा। सोचा, दी एकरात समुद्र पर,
ही क्योन रिताद जाय। मोजार राजी तो न था, पर इन्कार
नहीं कर सकता था। शतपत्र स्वेन जा' लदा और किश्ती
रवाना हुई।
मौलिम बुरा न था, अतएव काफी शिकार हाय लगने की
उम्मीद थी। फिर मी स्पेन ने देखा कि नेद फ मलाह न जाने
क्यों उदास और चिड़चिड़े हो रहे हैं, न किसी से बोलत हैं, न
मुस्कराते हैं, फेनल मनहूम की तरह मह मटकाये चुपचाप बैठे हैं,
--
-
HI
( २४५) और बोलते भी हैं तो सिवा गाली-गलौज के बात नहीं करते, मानो एफ दूपर का मुह भी देखना न चाइते हों। स्वेन को वह चुप्पी अपग्न लगी। यह रात भर ड पर अकेला बैठा रहा, पर किसी ने उससे कुशन क्षेम भो न पत्रा, मानो सम के मिजाज किरकिरे हा रहे हों। प्रात काल हुश्रा और जाज बाहर सोचो जाने लगी। एक आर घोझाम सोच रहा था, दुसरी ओर कोरफीजोन । बाकी सब मछलिया निकालने को तैयार सडे घे। पदमा बाम आया और इद्र धनुप के रंग की पड़ी-बड़ी मछलिया दसकर सम लाग बहक ठे। पर ज्याही जाज अपर उठा, चमचमाती मछलियों के साथ एक फाली भाजी वस्तु दखकर सब लोग स्तब्य हो गये। वह किसी श्रदमी की लाश था, जो मछलियों के साथ जाल में समझ गई था। एक व्यकि उन छुहान क लिए लपा, पर भोजास ने डॉट पर कहा, 'बाहो उसे। यहाँ श्रीमा, दूपरो था पहुँची है। और साए भर बाद आपस में लिपटी हुई दो और लाशें जान में दिख- लाई पड़ीं। इसी समय फोरपीजोन ने भी मछलियों के साथ एक भयर तो ऊपर खींची। क्रमश मछलियों, माशा और बालों पा डेक पर दे लग गया। मछलियाँ जाल में उजटती हुई तदप रही थी जिससे ढेर को भय करता और भी अधिक बढ़ जाती पो । सश्य को दसकर स्वेन की आँखों में श्रॉस् झनक पाये । उसने चौह स बार यार ओस पोलो, पर आँसु न रुक । आखिरकार काम घोडकर वह एकान्त में जा खड़ा हुआ और सिसक सिसक कर जा का गुब्बार निकालने लगा। मलाइ थनमने होकर जालों से मछलियों निकालने में पस्त थे । श्रम पहले से भी अधिक दास, मौन और सुब्ध हो रहे थे।
।
(४६)
मो समय मुखिया की थावात पायी-'सब काम धीश जान
म निकाल पानी में फेंक दो।'
स्पेन गैरहा था, पर महायता देना भानश्यक समनः पुनः
मपर स्थान पर या पाश्रा और मलाई के भयका काम में
शो म नगा। फालतू कृपा निकर पानी में फेंक रहे थे
और गान सुगमापर एक और घटारत जाते थे। इसी समय
धन न एक पर्वाचानी लाश को जाल की होरियों से बाहर
कानी । पिसी ने महा-सब फालतू चीज पानी में
करना।
रकम से रोका। बोला, 'पोलास! या हर्ज है, यदि यह
कनिस्तान में दफावी जाय ?'
पा भोलास पन मानने वाला या नहीं, नहीं-या पोला,
'नी सन पुमित वस्तुओं को कटपट पूर घर देना ही
टीका
स्चन की भाषा के और भी चा से उमड पडे। ताक
माघ ६ बाना, 'मुझे याद पानी में धक्का दे दो, मैं इस लाश का
नहीं करने दूंगा!"
नोगों ने देखा कि जैसा वह पहता था, वैसा करने में भी
तैयार था । योनाम गुर्राया और किनारे हट गया होगा लाभ
भाषी ! यह मारी थी, इसलिए प्रस्तान म । एकादमी
मदद करन सा गया । क्रमश सभी लाशें जानी से निकालकर
एक मोर रस दी गयौं । धेमी ही एक और लाश पार किसी ने
1-जर्मन मारनुम देता है। मोर उम प्रमेश चोली लागी
मात्र में लिटाना।
पे प्राधर्य के माय या किसी पर पहुए ।
मान गइमा दल गये। नगालो सघ
#
। २४७ ) शात और गभीर कोफर ग्वदे थे, मानो उन्हें किसी से भी घृणा न हो। ऐसा प्रतीत होता था मानों डूबे हुए सैनिकों की लाशों की समुद्र म सड़ने से बचाकर उनक मन में भारी शाति त्रा गयी है। प्रत स्पेन भी अपने मन के प्राकस्मिक परिवर्तन से प्राध- याधित हो रहा था। प्राज नायास ही से यह अलौकिक शांति मिल गयी थी, जो वर्षों से--सासकर ध्रुप से नोटा तन से-उमफे लिए दुर्लभ हो गयी थी। श्राज मनुष्य की प्रमा, अविनाशी मारमा फ इन अपर कलेयों को पचाने के उपलक्ष्य मे उम अपने चारों ओर साधुवाद की अमख्य अय वाणो सुनाई पड़ रही यो-'तुम मुक्त हो गये। तुम्हारी कालिमा धुल गयी। गुमने इन मानव-शगों के लिए अपन प्रागों की भी परवाह न फो, प्रत दम्दारा प्रायश्चित हो गया।" इसका उदय साना और शाति क साथ मद मद नृत्य करने लगा। यह मन ही मन कहने लगा-'प्र लोग चाहे तिरस्कार और पनिकार करते रहें, मुझे चिंता नही है। क्योंकि मुझे सताप है कि मेरी नपस्या परिपूर्ण हो गयी। मैंने अपने आपको जीन लिया।
J . फेंक दी। 1 । 1. (२४६ ) इसी समप मुखिया की आवाज आयी-सब फालतू चीज शाम , म निकाल कर पानी में फेक दो ।' स्बेन रो रहा था, पर सहायता देना श्रावश्यक 'समम पुनः अपने स्थान पर भासा हुआ और महादो क भयका काम में योग देने लगा। वे फालतू कृपा निकाल पानी में फेंक रहे थे और जानें सुनमाकर एक ओर बटोरते जाते थे। इसा समय एन ने एक वदीवाली लाश को जात, की टोरियों में बाहर निकाली। किसी ने कहा-'सन फालतू धीजे पानी में रयेन ने उसे रोगा। बोला, 'पोलास! क्या हर्ज है, यदि यह पनिस्तान में दफना दी शाय?' पर शोलास का मानने वाला था। 'नही, नदीमा बोला 'किश्ती से इन पूगित यस्तुओं को झटपट पर फर ऐना ही ठीक होगा स्वेन की भागों के अति और भी वेग से उमड़ पड़े। दवा के साथ वह बोला, 'मुझे चाहे पानी में धक्का दे दो, में इस लारा ) नहीं फेकने दूंगा" जोगों ने देखा कि जैसा वह पहता या, नसा पर भी नैयार था। सोनाम गुर्राया और किनारे हट गया । न न नाश पठायी। वह भारी थी, इसलिए अगला न उठा मका एक शादमी मद करन आ गया। क्रमश सभी नाशें जाजो से निजात पर रख दी गयी। वैसी ही एक और लाश पायर पिसीन कदा-'जर्मन मालुम देता और में ग्रेज वाली लारा की याज़ में लिगमा ये मार्य माथ किलो पर सड़े हुए लोगों “दा गय। ये न गाती देते थे, ति, । -
।
२४७ )
शात और गभीर होकर सडे थे, मानो उन्हें किसी से भी घृणा न
हो। ऐसा प्रतीत होता या मानों इने हुए सैनिकों की लाशों को
समुद्र में सड़ने से बचाकर उनके मन में भारी शाति का
गयी है।।
प्रत स्पेन भी अपने मन के आकस्मिक परिवर्तन से श्राश्च
यान्वित है। रहा था। आज अनायास ही उसे वह अलौकि शांति
मिल गयी थो, जो वर्षों से--सासकर ध्रुप से लौटा तब से-उमके
लिए दुर्लभ हो गयी थी। अाज मनुष्य की अमा, अविनाशी
प्रास्मा के इन ऊगड़ क्लेवों को पचाने के उपलक्ष्य मे उस अपने
चारों ओर साधुवाद की असख्य अप वाणो सुनाई पड़ रही
यो-'तुम मुक्त हो गये। तुम्हारी कालिमा धुल गयी। तुमने इन
मार शरीरी के लिए अपर प्रागों की भी परवाह न की, अत
सम्हारा प्रायश्चित हो गया ।"
सका हदय शानद और शाति क साथ मद मद नृत्य करने
लगा। वह मन ही मन कहने लगा-'अब लोग चाह तिरस्कार
और पहिष्कार करते रहें, मुझे चिंता नही है। क्योंकि मुझे सताप
है कि मेरी तपस्या परिपूर्ण हो गया। मैंने प्रपा प्रापका
जीत लिया।
-
।
२५)
।
-
आज
ज एप्लम के कब्रिस्तान में उत्तगे-समुद्र क भयकर युर
मे मर हुए नानिकों की कुछ माशें, जो बहती हुई अक
स्मात स्वीडन के पश्चिमी तट परया पहूँची थो, दफनाई जा रही
है। गिर्जाघर के समीप स्मशान के हाते में लगभग सत्रह लाशों
फे लिए लबी चौडी पत्र सोदी गई है, जिसक श्रासपास पड़ोस
की प्रामीण जनता कधे-स कधा भिडाफर गभीरतापूर्वक सही है।
यह एप्लम के इतिहास में एक असाधारण घटना मानी जायगी।
क्योंकि इससे पहले उस छोटे से कनिस्तान मे न कभी इतना बढ़ा
जनाजा आया, न इतना भारी जन समुदाय ही एकत्रित हुप्रामा।
भाड में माता और भाई के साप स्वेन भी दृष्टिगत हो रहा
है, जो पिछले आठ वर्षों से गिर्जाघर के इतने नजदीक कभी नहीं-
प्राया था और प्रवेश करते समय बहुत हिचकिचा रहा पा, किंतु
माता के प्रयन अनुरोध से उसे पाने के लिए मजबूर होना पड़ा ।।
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1
मेलास दजे श्रेष्ठ है, जो मानव जीवन की पवित्रता का निरादर
जोनबंभव से उपभहो सकती थी,न असाधारया बोरता या
( २४४ )
पा। तानिया, जो अगजोश से मिलने के लिए गर से आई थी,
उसे आनाकानी करत दस पोज उठी थी, 'सुना स्वेन ! में भी
तुम्हारी सम्ह इस गिों में पदम रगना नहीं चाहती, पर सैनिकों
को इन लाशों को पत्रिस्त तक लाने के लिए तुमने इतनी दो-
धूप की कि सप्ताह भर निार के टाप छानते फिरे, तो प्रतिम
समय मुह छिपाये अाना सदा रहना कितना अनुचित होगा।
और जप तुम दग्न रह हो कि तुमार प्रति लोगों को मनोवृत्ति अब
परले जैसी नहीं है, तो क्या कारण है कि गिजें की शाम देखते ही
कामाको नगत हो ?'
नानिगा का कहना सोलहों आना ठीक था, क्योंकि लोगों
की विचारधारा में श्रय मचमुर ही श्राफाश पाताभ का अनर
गवर पाने लगाया। पिछने युद्ध के भीपणा हत्याकाण्ड और
भयकर दुगाम का नारा देख चुक थे। इसलिए असख्य
खो पुरुषों की पनि लेनवाने इस वीभत्स मृत्यु यज्ञ की तुलना में
समेन का छोटा सा अपाय उन्हे नगण्य प्रतीत होने लगा था।
'पोह । मृत्यु न जीवन निना अधिक पुनीत और महान है"
भर वे स्वेन की पगपचार वृत्ति और युद्ध पीड़ितों की सहायता
फरने को नगन देखकर कहने लगे थे, "निसह स्वेन उन लोगों
कर दिन-हाड़े जा ना तलवार के घाट सतार रहे हैं."
- वन दृष्टिगत होने लगाया! जिस दिन
यश से ही। अब उसे जीवन में पहले पहन
उसने समुद्र में डूबी
घर स्पेन की अन्तर्दशा में भी पहले की अपेशा भारी परि-
हुई लाशे वचार
TET त हा क्यिा
था. उस दिन से ऐसी अभूतपूर्व शाति का अनुभव होने लगा था।
- -- ( २५०') कि संसार में सुख नाम को भी कई वस्तु है। 'आह ! पहले कितना दुखी और अयोध था। वह अब सोचने लगा था, 'यह भी नहीं जानता था, जीवन किसे कहते हैं। जिन्तु भान फलक की शालिमा से मुफ होकर वापस सिग्रन के पास.जाऊगा ता यह कैमी जिन ठेगी अब लोग चाहे मेरा वहिष्कार करना न छोडे, तो भी मुझे दुसया ग्लानि न होगी, क्योंकि मुझे विश्वास हो गया है कि मेरी अतरात्मा श्रम मुझे दोषी करार नहीं देती। मरे पापो का प्रायश्चित हो चुका है। एप्लम के इस महत्वपूर्ण कार्य में शरीफ होने के लिए। अमरद क पादरी भी प्राये थे। उन्हें देखकर पहले तो स्वेन के मन में एक बचना होने जगी, किन्तु चूमर ही क्षणा व चने जगा, 'पाइ ! यह व्यछि मेरा क्तिना भारी हितेच्छु है ! भना फोन मुझे इतना सुन्दर उपहार दे सकता था, जैसा मिग्रन-जैसे अनमोल ग्न के रूप में इस महात्मा ने मुझे प्रदान किया है। निस्सदह यह एक महात्मा है, क्योंकि इसके चेहरे पर त्याग और श्रारम बनिदान की एक असाधारण छाप है।" जन लाशें दफना दी गई और अतिम भजन समाप्त हो चुका की स्मृति में कुछ कहने के लिए पत्र के सम्मुख । स्वेन को प्रारभिक शब्द नहीं सुनाई दिये, अपने भूतपूर्व जजमानों को धन्यवाद देकर पादरी त्योंही पीछे से वाह सोचकर किसी ने स्वेन का कर दिया। पलट कर देखा तो वही जननी औरत आई, जो दा रप पूर्व उत्तर से आनेवाली रेल से सले. ही एक दिन मिल गई थी। 'अकेली ही आई हूँ'-लाता ने गभीर मुख मुद्रा देसकर कहा, 'उनक साथ नही' वसन । 1 4 । . व 1. - ( २५१ ) सन दिया। पर व्याख्यान जोर शोर के सप शुम हो गया था, इसलिए म्वेत ने लोता की बातों पर ध्यान न दिया। वह एकद कर उसी भार गौर के माप इसने लगा निघर सारी भीड़ एकाम दृष्टि मे ताक रही पो। 'मित्रो" पादरी सिद्धहस्त बहा की तरह गमीर भामाज से कह रहे थ, 'इस भमा समाधि के सम्मुख समा हाकर भान में मृत्यु गौर जीवन की पवित्रता फ सघ में 3 करेंगा। मुझे विश्वास है कि यह एक भी व्यक्ति ऐसा न होगा, जो मृत्यु की यजध्य पवित्रता से अनगिडा हाकर न जानता हो कि मृतक का अपमान परनशाना दाना ताक में कठोर दया का भागी होता है। आपरा याद होगा कुछ वर्ष पूय यहाँ एजम मे म्मेन नामक एक व्यक्ति रहा करता था, जिस हम सब तिरस्कार और प्रणा की दृष्टि से दरग करते थे, क्योंकि वह मछति और समाज क एक महान नियम का प्रतिमा पर मृत्यु पी पवित्रता का निरादर फर चुका था। मैं समझता हूँ, श्राप में से कुछ लोगो नेते। उस दिन अपनी श्रास देखा होगा, स्मि तरह इमी गि घर के मच से उसके पार की घेपणा की गई थी, किस तरह लज्जित और विस्मृत होकर वह नीचा मिर यि गिजेंस चुपचाप निपला था, और उसके बाद किस तरह लेगी काव्यगपूर्ण भर्सना महता हुश्रा, वा अपन जीवन पी निराश घदियों गिना करता था। आप का याद होगा, फितनो निदयता से हम लोग तिरस्कार पे तीवे धागों से उसका फ्लेजा देवा फाते थे, कितनी भीषणता क साथ समानक प्रल अख-बहिष्कार से उसपर प्रहार करत थे, यहा तक कि चारों आपस सता सतार हम लोगों में उस एम छोडकर बाहर चले जाने के लिए विवश कर दिया था, तथा व्यफि अपनी वेद आभिजी, सहनशालना और 1 .. ( २५२ ) विमुस नहीं होता था। वह दूमों की गह से हमेशा गळून की तरह दर रहता, चुपचाप सब लोगों के तीखे व्यग्य और उपहास सहन परता और अघिफ्तर ऐसे ही लोगों के साथ मिलना-जुनता रहता था, जो निकृष्ट श्रेणी के होते । जैसे-अनाथ बच्चे, हेतू भिखारी और बदमाश खानाबदोश । और प्रतिदिन, हम सुना करते थे कि आज समके प्रयत्न से अमुक बदमाश रास्ते पर लग गया है और अमुक अनाथ बालक घर-द्धरण गया है। पर हम उसकी बेहद प्राजिजी देखकर ऊन उठे थे, कोकि जब कभी पाई असाध्य काम आ सडा होता, वह फोग्न आगे बढकर उस., पग पर डालता था, मानो किसी भी गस्ते मेहमागे महानुभूति वापस पाने का प्रयत्न कर रहा हो। हम उसकी अमीम सहन शीलता देखकर घराने लगे, चाहत थे, कि किसी तरह एस व्यक्ति से हमारा पिण्ड छूटे। पर इच्छा होने पर भी हम उसे समाज में वापस शरोक परन के लिए अममर्थ थे, क्योंकि उसे दण्ड दकर अपराध से मुक्त करना हमारी शक्ति से बाहर था। उसने हमार प्रति कोई अपराध किया होता, तो हम उसे दण्ड भी दते । किंतु वह ता एक प्राकृतिक धर्म का उल्लघन पर चुका था, तम भन्न ईश्वर के न्यायालय के इस महा7 अपराधी को मुक्त करने या सजा देने की हममे क्या शक्ति थी ! भाइयो, जग पल्पना काजिये, उस अभागे को उस समय कैसी दयनीय दशा रही होगी। वह दूसरा को भनाई करके अपने पापों का प्रायश्चित कर रहा था । तथापि मृत्यु उसके कंधों पर झुककर एक व्यग्यमय मुसकान क माय यह रही थी-'तुम उस शिफजे में फम गय हो, जिमसे सस र की कोई भी शक्ति प्रय तुम्हें न. सकती। स्वन की माता फूट फूटकर रा रही थी। पर वह निमीकाकर वधा को भोर ताक रहा था। यद्यपि सक मनप पुन उसी . - 1 ( २५३ ) आजिजी या अनुभव हो रहा था, जो समाज की सहानुभूति के लिए उसके चेहरे पर पहरो मनकती थी, तथापि उसफ मन में प्रय पहले-जैसी आत्मग्लानि न थी। यह निश्चित होकर वका का एक एक शब्द सुर रहा था, माना तोगों में अपनी मुभी चर्चा होने की उसे तनिक भी परवाह न हो। किंतु पिउरो पुत्र दिनों से हम देखते हैं कि मृ यु का साम्राज्य अधिकाधिक विरत और प्रबल होता जा रहा है-' व्याख्यान जारी या, 'हम दखते हैं कि मृत्यु, हिंसा और अत्याचार क भयानक अस्त्रों से दिनोंदिन मानर पाति पर अपना अत: जमा रही है। आम एक भी ऐसी घुराई नहीं, जो मृत्यु क गम में प्रोमाया न पानी हो। वह तरह-तरह के परमप, रोग और अपराध फैना रही है, फयान के पहले ही बच्चे पोधे काट लेती है और युद्ध के भोपगा घघ यत्र द्वारा चुटकी बजाते हजागें तागो गो बोपों के मु है एड़ा रही है। श्राज कितना विधवाए मृत्यु क अत्याचार मे नय रही है, कितनो माता अनाथ बाल को यो ता रोगही हैं, कितन थडे, जबान येटों को सोकर नैराश्य के समुद्र में हर रहे हैं । अप हमागे मनुष्यों का दिन-दहाडे यरल होना और समुद्र मे दूर जाना एक मामूनो ग्वेल हो गया है । तर प्रश्न उठता है- -क्या मृयुक इस मनमाने जुल्म के विरुद्ध ना । लनवाली एक भी शक्ति समार में मौजूद नहीं है, जो प्रमान जाति को भारी नदियों काटकर उसे मुझ कर सके ? उत्तर मिलता है है क्यों नहीं ! मृत्यु का आजन्म शत्रु-जीवन क्या सभी प्रस्याचारों को तहस-नहस कर फिर से मानस जाति को हरी भग करन के लिए समर्थ नहीं है ? पर पुन सवाल उठता है क्यों हमार पैरों की वड़ियाँ नहीं इटतों ? क्या हम जीवन का सबसे प्रकिना चाहत ? माइयो । इसी प्रश्न का उत्तर देन कहिए मैं आपके सम्मुग्न खड़ा हुआ । - ( २५४ ) क्योंकि मुझे प्रतीत होता है कि अभी तक हम लोगों ने जीवन को फेवन अपेक्षा की दृष्टि से देखा है, मानो यह कोई बिना वेतन का गुलाम हो, जिससे फाम तो पूरा ले सकते है, पर तनख्वाद नहीं क्षेनी पड़ती। सच पछा जाय तो हम लोगों ने जीवन को रोटी जैसा समझ रखा है, जिसे पाते ता सभी हैं, पर धन्यवाद कोई भी नहीं देता, मानो उसमें कोई भी गभीर तत्व निहित न हो, मानो Sमका न पोई मूल्य हो, न स्वरूप ही!' 'श्राप जोग कहते होंगे कि यह जानते हुए भी कि हम जीवन को सबसे अधिक प्यार भरत है, पादरी पोरी पल्पना मिड़ा रहा है। पर भाइयो! मैं पूछता हूँ, क्या जीवन को बार बनाने के लिए उसे पचान प्यार करना ही पर्याप्त है। यदि ऐसा ही हो. तो हमार उच्चे कभी-कभी काटे-जैसे क्यों हो जाते हैं, यद्यपि हम उन्हे मरने अधिक प्यार करते हैं। क्या इससे साफ 477 नदी लगता कि जिस तरह यचों को सुधाग्ने क लिए प्रेम के अतिरिक्त बुद्धि, शिक्षा और शाति की जात है, उसी तरह जीवन के लिए भी किसी और वस्तु की आवश्यकता है ? भाइयो । जीवन एक नया विवाहिता बधू है, जिसे सुशीन बनाने के लिए न सिर्फ प्रेम की मयुत शाति, पवित्रता और मयम को प्रावश्याता है। जीवन तब 'तक मृत्यु स जोहा लेन योग्य नहीं हो सकता, जम तक उसका रोम रोम अहिसा, जाति प्रेम और पविनता से अभिमनित न किया, जाय ! मुझे प्रसन्नता है कि पिछले कुछ दिनों से हमें इस महान, सत्य की अभिव्यक्ति होने लगी है कि जीवन, मृत्यु से लास गुना अधिक पवित्र, महा7 और मूल्यवान है, और जीवन के पुजारिया का सम्मान करना, अनाथों को श्राश्रय देना, पतितों को राह घताना और मरका ममान भाव से दसना ही महान धर्म है । प्रसन्नता की बात है कि श्रम एनम के अधिकाश लोग स्वेन के 3
प्रति किये गये अपन अपराध के लिये पश्चागप कर रहे हैं और
उसकी परोपकार वृत्ति का सम्मान परत हुए इसे प्यार की निगाह
से दसने लगे हैं। क्याकि व जान गये हैं कि कोई फैमा ही
अपराध क्यों न हो, यदि वह जीवन का भक, लोगों का सेवक
और गरीयों का सहायक है, तो वह सबसे अधिक प्रादर और
मम का पात्र है।"
'अतएव जीवन के सच्चे पुजारी से, यदि आप लोगों की
और स, मैं आज पूवत अपराधो के लिये क्षमा माग और
घोषणा करू कि वह सवथा निर्दोषी है, तो आशा है कि आप
मे से कोई भी असहमत न होगा।'
समशी आखों में धार छतक आये। किसी ने भी पादरी
फ शब्दों का विराध न किया।
'मुझे प्रसन्नता है कि दूसरे जरिए से साबित होने के पहले
ही आपने उसे बगुनाह स्वीकार कर लिया-पादरी जेब से एक
पत्र निकालत हुए वाले और तब विस्तारपूर्वक पहन लग, क्सि
तरह उत्तरी समुद्र क नारियों की लाशों से कई फाग पर परा-
मद हुए थे, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण पन उस अमेज की जेब से
मिला था जिसकी लाश के लिए स्वेत नेद के मलाही से झगद
पड़ा था। पत्र अजी में था, इसलिए उसका अनुवाद करते हुए
पादरी पढने लगे-
'प्यारी मेरी
क्ल हम लोग युद्ध के लिए कृच कर देंगे। पता नहीं, फिर
मिलना नसीब होगा या नहीं। इसीलिए आज ए यात जिस
रहा हूँ, जिसे प्रकट किये बिना मुझे पत्र में भी शाति न मिलगी।
im Tn गिफील्ड क यहाँ
1.
श्राया, ( २५६ ) सके, तो उन्हें सूचित कर देना कि उनका गोद लिया हुआ लड़का, ध्रुव यात्रा में हमारे साथ उस वीभत्स पाप में शरीक नहीं हुआ था। वह वेचाग घण्टों से बेहोश था। जब होश में तो हमने उमे झूठमूठ ही बहका दिया था कि वह भी आदमो का मॉम खा चुका है, जिससे बाद में हमारे 'विरुद्ध मुखबिरी न कर सके पादरी बोलते-बोलते रुक गये । पर क्षण भर बाद स्वेन की ओर देसार रुद्ध-क्यठ से बोले, 'स्पेन ! मैंने ही एक दिन इस गिर्जा के मच से तुम्हें दोषी करार देकर ' समाज से बदि स्कृत किया था। आज परमात्मा को धन्यवाद देता हूँ कि तुम्हे निर्दोपी घोषित कर पुन समाज में सम्मिलित करने का सौभाग्य भी मुझे ही मिला है । मैं घोपणा करता हूँ कि तुम मर्वया पवित्र हो । अब तुम्हें दुनिया से मुह छिपाने की आवश्यकता न होगी । प्रन तुम्हारी पोर एक बच्चा भी निरस्कार के साथ अगुलो नी', 7 . उठा मागाxx' १ 11 सुननेवालों क दिल में आनद और विस्मय की एक मनसनी फैल गई। वे वर्षों पहिष्कर स्नेन को पुा अपने बीच पार.' श्र नद के आँस नहाने लगे। पर स्वेन उसी तरह शात भाव, अपने स्थान पर चुपचाप खड़ा था। उसे समाज में आने की इननी खुशी न थी, जितनी इस बात से तमको अतगत्मा भी था से निरपगची स्वीकार कर रही थी। 'किन्तु आप लोग शायद पूछने लगेंगे कि यदि स्वेन बेगुनाह था, तो उसे इतना कष्ट क्यों उठाना पदा?" पांढरी पुन भीड़ की ओर मुड़कर कहने लगे, 'तो इसके लिए मैंने दे। उत्तर सोचे हैं। पहला तो यह कि परमारमा सुख देने के पहले अधिकतर दुग्न दिया करते हैं। अतएव स्वैन को भी इन्होंने तरह तरह के ।
. ( २५७ ) कष्ट दिये, ताकि अत में उसे मनावाछित सुख उपलब्ध हो सके। दूसर, कलियुग में ईश्वर हमे प्रत्यक्ष वाणी द्वारा नहीं, प्रत्युत मनुष्य क फर्म द्वारा आदेश दिया करते हैं, ताकि हम जान सकें कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में सृष्टिकर्ता का कोई निगूढ सदेश निहित है । भाइयो ! मुझे विश्वास है कि परमात्मा ने स्वेन का भी एक महान सदेश दकर भेजा है, जिसके द्वारा घोप्रज्ञानां घकार के इस युग मे हमें दुख के जाल से मुक्ति पाने का सघा रास्ता दिखलाई पडे- स्पेन का हृदय इन शब्दों का सुनकर आनद के मार बॉसा उछालन लगा। 'आह ! सिग्रन कितनी प्रसन्न होगी, जर फलक की कालिमा से मुक्त होकर मैं वापस उसक पास जाकगा।' वह भावी सुख की फ्ल्पना मे गोते लगान लगा। पर न जान क्या उसक पैर ऐले फापने लगे कि इससे पड़ा न रहा गया। वह घुटनों के बल जमीन पर झुक गया। उसका कलेजा धक-धक पर रहा था। पर भीतर ही भीतर उसक जी में अब एक घेदना भी उठ रही थी। 'क्योंकि इस व्यक्ति ने हमें सिसमाया है कि बुराई के विरुद्ध युद्ध करने में निरे उपदेश और श्रादर्श क पाठ निष्फल रहत वका कह रहे थे 'आवश्यकता तो इस बात की है कि पतिम का पाप मिटाने के लिए उसके मन में पाप के प्रति घृणा का ऐसा भाव भरा जाय कि उसी आमा दहल उठे और तब तक चैन न ले, जब तक पाप की दुर्गन्ध उसके अंतराल स समूल नष्ट न हो जाय । भाइयो! नफरत की भावना को दुनिया की गई का नष्ट करने का साधन बनार, स्वेन ने हमें बवला दिया है कि मनुष्य अपने दुख फे फाटे से समस्त पुराइयाँ उसाड़ कर मानव- जाति का महान उपकार कर सकता है।' วัน” F (२०) व्यापार-उद्योगस लाभ उठाकर, हर तरह से इस भीषणा इत्या- काण्ड मे याग दिया है। इसलिए ये भयकर लाशें वैरती हुई श्राज हमार तट की ओर आ रही हैं, ताकि हम देख सके, युध कैसी घृणित और वीभत्स वस्तु है। मित्रो ! समुद्र के वक्षस्थल पर तैरती हुई ये माशें भूनों की कहानी जैसी कल्पित नहीं है। ये सत्य की तरह ठोस है और बना रही हैं कि ये किसी दिन पुन इस तट पर इमो स्वरूप में श्रा सस्तो हैं, कि युद्ध के विरुद्ध चाह-जैसी वकृताए झाड़ी जानी हो भोर शाति क उपासकों द्वारा उसकी चाहे जितनी खिल्लो उड़ायी जाती हो, तथापि युद्ध का अस्तिय ससार से मिटा नहीं है। इसलिए मैं आपसे प्रानुराध कर रहा हूँ कि श्राप इन लाशी पर से प्रोजन हटावें, ताकि एक दिन-'युद्ध' शब्द को धारण भो आप लोगों के लिए पर्णकट है। जाये कि उसे न कोई सुने, न वाले । भाइया ' युद्ध की भाषणता का यह अतिम स्वरूप नहीं है। क्या पता, कुछ वपाद श्राज का बीमा नजारा मुना दिया जाय और हमारी भावो प्रजा नये जोश, EEमा के साथ पुन. युद्ध के नगाड़े बजान लगे। क्या पता भविष्य में इसस भी भयकर यामागड हो और लोग पुन रणवीरता की प्रशसा और उपासना फान लगे। श्रत भावश्यक है कि मानव जाति के मन में हम श्रमी से युद्ध के प्रति घृणा की ऐसी भावना भर दें कि भविष्य में लड़ाई का दुनिया मानव जाति का सपस प्रकल शाह है। युद्धक में हुए मा रूप में पली स्वर्ण r जाय। जिसमें
,
पदरी बोझते-पोरते सक गये, क्योकि पीछे से याद तीसर
सहमा फिमी ने कहा-'वेन फी हालन सतरनाक है, यह पत्तेजना
अससे महन नही हो सकी, उसका फोमा हट गया है
व्याख्यान भदों का नही रह गया। पादरी भोको पोरते
हुए स्थेन की ओर लपफे। वह माता की गोद में सिर रखे मुर्दे
की तरह अमीन पर पड़ा था। सकी छाती, हृदय की प्रचण्ड
धान क मारे, पानी की तरह पाप रही थी। पादरी को प्रात
दुखमा मुमका पीमा मुसमराल प्रेस की एक मधुर मुसकान
से भागोषित हो उठा। महाप पदापर, पामा मागन के लिए
अपना धन्यवाद दर क लिये, घस्पष्ट घर में गुनगुनाया। पादरी
उसके सम्मुख घुटनों क प मुक गये। उनका हृदय स्वेन जैस
थनमोन मित्र का पोरकी आशका से काप उठा। रोते हुए
अवरुद्ध एठ से चिछा छठे-'मर यधु, यहाँ आते हो ? ओह,
यही रहो, कमस-कम सिमन की ही सातिर
लोग उसे पड़ोस के एक मकान में उठा ले गये। भीड़ में
से एक डाक्टर भी उसके पास जा पहुंचा था। परीक्षा कर उस
पादरी के कान में कहा कि रोगी एक दो घटे से ज्याई वक्त य?
मेइमान नही है।
इस वफ वका की प्रतीक्षा में भीड़ ज्यों की त्यो फरक आस
पास जुटी थी। मन् श्राशा थी कि जाते जाते पादरी और कुन
पहेंगे, जिस उन्हें जीवन के दुखों से मुक्ति उपलब्ध हो सा।
पर बहुत देर तक घाट जोहने के बाद जब समाचार लान क निय
भादमी मेगा गया, तो पता लगा कि पादरी मरणासन्न स्वन का
छोड़फर नहीं पाते। रोगी के गले में घोह डालकर बैठे
। वह उन्हें प्रतिम वक अपने से अग होने देना नहीं चाहता।
(२६) - व्याख्यान की समाप्ति के लिए भीट अभी पादरी की प्रतीक्षा में ज्यो की-त्यों पड़ी थी। इसी समय गिजे के हाते में अजीन आवाज सुनकर लोग विस्मय के साथ चारों और • साफने लगे। क्षण भर बाद उनकी ष्टि घुटानों के बम गिरी हुई एफ सी पर पड़ी, जो वाहें फैलाकर अर्द्ध सुपुप्तावस्था में बोल रही थी। इसकी श्रॉसें मुदी हुई थी और मस्तक पीछे की ओर लटक गया था, मानों नेभान होकर वह कोई अदभुन दिवा स्यात देन 'मैं उन मृतकों की आनाए दल रही है, जिन्हें इस श्मशाम में हम लोगों ने श्राज दफनाया है, वह कहने लगी- मृत्यु के धरने प्रदश में प्रवेश कर चुक हैं और विद्यालय जैसे प्रतीत हान बाल एक विशाल भवन को भार थयसा हो रहे हैं। द्वारपास गता है, किंतु वे भीतर प्रवेश करने फनिए दुल मचाते है ।
। - ( २६३ ) हत है-'हम दुनिया क मदरसे से पास हो पुरे हैं। अब प्रतिम परोता यहाँ आ गरियव उप है।' द्वारपाज कहता है, 'तुम लेग ममय स पहन पदाई दोकर श्मा पहुँने हो, पाश्रत में वह भवन का विशाम फाटक साल देता है और सपको एक लये पौवामान में ले TIRE र दवा है। ये सय षठोर परीक्षा पभप से कार ठन है। इसो समय पफ दिव्य पुरुष प्रकट हासे है, मिना शुभ माट र पास जैसन केश पाश रशम की तरह महरा रहे है। 'पृथ्वी चाय पत्तीर्ण विद्यार्थियो " व समीप श्राफर पूरत है, 'टुनिया मेगे दस प्रशाएँ मास का किस रूप में पानी ? विद्यार्थी इस साण प्रश्न को सुनकर खिल उठन है पर इत्तर देते समय न जाने क्यों, नको जनान तुतलाने तगती है, मात्रामा है और गला रुघा तगता है। य खत. नहीं समझ पात, याकामा का उचारण परत समय उन्हें ठिनाइहान नगती है। परयन कठिनाई से व उतर देते हैं- 'मिथ्या देवो की पूजा न करा, 'प्रभु क नाम का दुरुपयोग न रा "विवार को 27, गा से शुद्ध रहो, -माता पिता की सेया फगे-- वृद्ध पुरुप उनको भटक्त देख मुस्का देते हैं। 'तुम लोगों न येश ज्योस्यों रट लिए हैं। वे कहते हैं, पर ये तो चार हो । शेष छ अक्षाए क्या हैं ! मृतक इस पार फौरन पोन मत है। उन्हें अपने विद्यालय मे सीसी हुई छात्रायें याद श्रा जानी है। न उसकी जान तुवलाती है, न गला ही र धने लगता है। एफ स्यर में, एक साथ ही सय योन उठत है-'हस्या कग, चोगे करो, व्यभिचार करो, झूठ योलो, पड़ोसी को लूगो, उसका मकान हीन लो, खत काट लो, घर उजाड़ दा, ली उड़ानो । देकर वे भानन्द के मारे, इतनी तेजी
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(२६६ )
'! मैं कहाँ गई थी? क्या बोली थी? क्या सचमुच ही
परमपिता ने मेरे मुख से अपना सदेश सुना दिया?' लोता
श्राश्चर्य करती हुई बोली। उसकी आँखों से श्रानन्द की प्रविरल
अश्रुधारा बह चली थी
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उपसंहार
एक वर्ष
घाद
अलजेरद क पादरी की कुटिया के सामने एक घोडागाडी
श्रा सड़ो हुई। शोक स्वक पाने वस्त्र पहन एक नवयुवती उसने
उतरी थोर चुपचाप मकान क पिछले कमरे में चली गई । उसका
श्रागमन से किसी को भी आश्चर्य 7 हुआ, क्योकि उस जीवित
रहने की अफराह पहले फैन चुकी थी। पुन उस छोटे-ते परिवार में
शाति का साम्राज्य छा गया। पादरा अय पना के जीवन में
इतक्षेप नहीं करते थे । स्वन की मृत्यु के बाद घे अधिकता अकेले
हो एकाति-जीवन व्यतीत करत थे। न दूसरों के काम में दखल
देते थे, न अपनी ही बदता मे हस्तक्षेप करने देते थे।
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एक दिन मर्यवश सिग्रन पनि क कमर में गयी, तो उसे प्रेमी
आनन्दमयी पफपो का अनुभव हुआ, मानो किसी सुने प्रदेश
से अचानक प्रेम के पुलक्ति रातावरण में श्रा पहुँची हो। उसन
देखा कि दीवारों पर भिन्न भिन्न अवस्था के उसके ही अनेक
फाटो लटक रहे हैं। अलमारियों में उसकी ही चुनिन्दा किना
सकी हुई है। मेज पर ससक ही हाथों से बना हुप्रो वेज-टेनार
रूमाल है और पलग के सिरहान उसकी ही प्यारी भजन माला
की पुस्तक है । उसे समझते देर न लगी, यह पति की ही कृति है।
वह भाना क मार गद्गद् हो गयी।
'प्रापको शायद मालूम नहीं है कि स्वेन अपने
सम्पत्ति छोड़ गया है। पादरी के समीप आकर वह
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पाफर उस अमेज सज्जन ने-जिसने उसको गोद लिया था-अपन)
समस्त सम्पत्ति उसके नाम कर दी थी। वह रकम अब जोन और
तालिया को मिली है। इसी के संबंध मे जोन का आज एक.
आया है। वे हम लोगों को हंगर बतौर उपहार दे रहे हैं और
स्पेन द्वारा आरभ किये हुए लाय-सेवा के कार्य को आगे नमान
का हमें अनुरोध करते हैं। मैं समझती हूँ, वहाँ हमें काम काने,
का प्रच्छा क्षेत्र मिल सकेगा।
पादरी का चेहरा गभीर हो गया। ये उठ सडे हुए और कार
में चहल कदमी करने लगे।
'अच्छी बात है । यदि जाना चाहो तो मैं रोकू गा नहीं।
तापरवह की तरह बोले, 'चाहे जहाँ रहो मेरे लिए एक सा है।"
'मोह एडवर्ड ! वह चौंककर बोल उठी, 'इस घर के सिवा मे,
दूसरा कौन-सा श्राश्रय है ?
'पर तुम्हारा घर में रहना ही क्या मेरे लिए पर्याप्त है ?
सिग्रन कुछ भी उतर न दे सकी। उसका गला घ गया।
हाय पकड़कर वह पति को खिड़की के समीप ले गई।
मगीचे की ओर सफेस करती हुई बोली- याद है, हम आये
स समय यहाँ बनफशा के कुछ जगली पौधे थे, जिनकी कोई
दख-भाल
नहीं करता था, तथापि घे प्रति वर्ष, ऊगा ही परते थे
ये को-फूले और यनफशों के रिक स्या-
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