Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Jivan Ka Kartvya

Sadhu Ramsukhdas · 2011/03

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मुद्रक तथा प्रकाशक
मोतीलाल जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
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संवत् २०१०
से २०२५ सक ७५१०००
संवत् २०२८
नयों
संस्करण
१५.०००
संवत् २०३४ दसवाँ संस्करण
१०.०००
कुल ११००१०60
सूल्य पचपन पैसे
पता-गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस ( गोरखपुर )

श्रीहरिः परिचय इसमें हमारे स्वामीजी श्रीरामसुखदासजीके कुछ लेखोंका संग्रह है। जिन लोगों को स्वामीजीके गीतासम्बन्धी तथा अन्यान्य परमार्थ- विषयक प्रवचन सुननेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है, अथवा जो सज्जन श्रीस्वामीजीकी जीवनचर्यासे परिचित हैं, उन्हें तो खामीजीके लखोंकी सारगर्भिता और उपयोगिताक सम्बन्धी कुछ बताना नहीं है। वस्तुतः उनके लेग्नका एक-एक वाक्य साधकोंके तथा परमार्थ-पथिकोंके लिये ज्योतिपूर्ण पथप्रदर्शकका काय दंगा। इसमें घोडमें उपयोगी विषय आ गये हैं। आशा है, हमारे पाठक इन साधु-पुरुपके अमृतमय वचनोंसे लाभ उठायेंगे पुरुषोत्तम माल त्रयोदशी दशी सं० २०१० हनुमानप्रसाद पोद्दार

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श्रीहरिः निवेदन इधर, कुछ वर्षोंसे मुझे भगवतिपयक्की चर्चाके निमित्त गीताके ग्लोकोंके आधारपर अथवा स्वतन्त्ररूपले भी अपनी टूटी-फूटी भाषामें लोगोंके समक्ष कुछ कहनेका अवसर मिलता रहता है। मेरा यह कथन या प्रवचन सुनकर कुछ भाइयोंने मुझसे इन भावोंको लिपिवद्ध करनेका आग्रह किया और उन्होंने स्वयं ही कुछ व्याख्यानोंका लिख भी लिया । यद्यपि मेरे प्रवचन में गीतादि शास्त्रोंक सिवा और कोई नयी बात नहीं; किंतु लोगोंका आनह देखकर और भगवान के भावांका किसी भी निमित्तसे अधिकाधिक प्रचार हो, वही अच्छा समझकर उन लिखे हुए व्यायानोंको संशोधित करके कल्याण' मासिकपत्र में छपने के लिये भेज दिया गया। उन्ही लेखॉका यह संग्रह लोगोंक विशेष आग्रह छापा जा रहा है। इन लेखाम साधारणतया भगवत् सम्बन्धी भावोंकी ही कुछ बर्चा की गयी है। इनकी भाषा तो शिथिल है ही, पुनरादयाँ भी कम नहीं है किंतु भगवान की चर्चा में पुनरुक्तिको दोष नहीं माना जाता; यही समझकर पाठकगण इनमें जो भी-चनावनी, बैंगग्य: नामजप, रूपचिन्तन, भक्ति और भगवन्-वरुपकी जानकारी आदि बातें उनको अच्छी जान पड़े, उन्हींको यदि आचरणमें लानेका प्रयत्न करेंगे तो मैं अपने ऊपर उनकी बड़ी कृपा समसँगा । आशा है, विजन मेरी धृष्टता क्षमा करेंगे। विनीत- Poonam स्वामी रामसुखदास

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॥ श्रीहरि
विषय-सूची
विषय
१.-समयका मूल्य और सदुपयोग
२-कर्मयोग
१७
४-गोतामें भक्ति और उसके अधिकारी
काय द्रकिया महस्य
-तुम नाम-पान कही भगवान्
+mmm
८-भगवद्धजरका रख रूप
...ना और रामायणके क्रियात्मक प्रचारकी
आकरयकता
...
१७७
१०-नन और उनी खेवा
२१-पत्र मिले
१२. बालहितोपदेशमाला
१३-गारगार नहिं पाइये ननुप-जनामकी मौज
१८४
१९४

श्रीहरिः वन्दना सत-चित-सुखमय अचल सम रहत सकल थित राम । अलख अगुन अरु गुन सहित नित प्रति प्रति करउँ प्रनाम ॥१॥ जनम-करम-अघहर अमल श्रवन-सुखद गुनगाथ। तन मन 'जन बचन सब तव अरपन जदुनाथ ॥ २॥ नर मुनिबर चर अचर सब कर हित करनार। तिन कर गुन गन कछु कहत लघु जन मति अनुसार ॥ ३॥ गुन तब मन तक, बचन तव, तन तव, सब तव, ईस । सुखद तव पद कमल इक रति करु बखसीस ॥४॥ -स्वामी रामसुखदास श्रीहरिः जीवनका कर्तव्य समयका मूल्य और सदुपयोग श्रीपरमात्माकी इस विचित्र सृष्टिमें मनुष्य-शरीर एक अमूल्य एवं विलक्षण बस्तु है । यह उन्नति करनेका एक सर्वोत्तम साधन है। इसको प्राप्त करके सर्वोत्तम सिदिके लिये सदा सतत चेष्टा करनी चाहिये । इसके लिये सर्वप्रथम आवश्यकता है-ध्येयके निश्चय करनेकी । जबतक मनुष्य-जीवनका कोई ध्येय ---उद्देश्य ही नहीं बनाता, तब तक बह वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य ही नहीं; क्योंकि उद्देश्यविहीन जीवन पशु-जीवनसे भी निकृष्ट है, किंतु जैसे मनुष्य-शरीर सर्वोत्तम है, वैसे इसका उद्देश्य भी सर्वोत्तम ही होना चाहिये । सर्वोत्तम वस्तु है परमात्मा । इसलिये मानव-जीवनका सर्वोत्तम ध्येय है-परमात्माकी प्राति, जिसके लिये भगवान् श्रीकृष्णने कहा है- यं लब्ध्वा चापर लामं मन्यते नाधिकं ततः । इस परमात्माकी प्राप्तिके लिये सबसे पइला और प्रधान साधन है-'जीवनक समयका सदुपयोग ।। समय बहुत ही अमुल्य वस्तु है ।

जीवनका कर्तव्य १२ , जीविका पैदा करनेके लिये जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद आदिके लिये अपने-अपने वर्ण-धर्मके अनुसार न्याययुक्त कर्तव्यकर्मोंका पालन करना बतलाया गया है। तीसरा विभाग है--शयन करने के लिये, इसमें कोई विशेष उल्लेखनीय बात नहीं है। अब चौथा प्रमुख विभाग है--जगनेका । इस श्लोकमें 'अवबोध' का अर्थ तो रात्रिमें छः घंटे सोकर अन्य समयमें जगते रहना और उनमेंसे प्रातः- सायं दिनभरमें छः घंटे साधन करना है। परंतु 'अवबोध' से यहाँ वस्तुतः मोहनिद्रासे जगकर परमात्माकी प्राप्ति करनेकी बातको ही प्रधान समझना चाहिये । श्रीशंकराचार्यजीने भी कहा है-'जागर्ति को वा सदसद्विवेकी अब इसपर विचार कीजिये । हमारे पास समय है चौबीस घंटे और काम हैं चार । तब समान विभाग करनेसे एक-एक कार्यके लिये छः-छः घंटे मिलते हैं । उपर्युक्त चार कामोंमें आहार- बिहार और शयन-ये दो तो खचके काम हैं और व्यापार तथा अवबोध ( साधन करना )--ये दो उपार्जनके काम हैं । इस प्रकार खर्च और उपार्जन-दोनोंके लिये क्रमशः बारह-बारह घंटे मिलने हैं । इनमें लगानेके लिये हमारे पास पूँजी है दो--एक समय और दूसरा द्रव्य; इनमेंसे द्रव्य तो लौकिक पूँजी है और समय अलौकिक पूँजी है । आहार-विहारमें तो द्रव्यका व्यय होता है और शयनमें समयका । इसी प्रकार जीविका और अवबोध ( साधन करने ) में केवल समयका व्यय होता है; किंतु अलौकिक पूंजीरूप समयका तो चारों में ही व्यय होता है। अब हमें सोचना चाहिये कि अलौकिक पूँजीको खर्च करके तो अलौकिक लाभ ही प्राप्त करने योग्य है ।

समयका मूल्य और सदुपयोग साधारणतया आहार, विहार और जीविकाके कार्यसे हम लौकिक लाभ ही उठाते हैं तथा शयन तो श्रम दूर करने के सिवा कोई विशेष लाभकी बात दीखती ही नहीं, परंतु ये ही सब कम यदि निष्कामभावसे किये जायें तो सर्वोत्तम अलौकिक लाभ प्रदान कर सकते हैं। यहां एक बात और समझनेकी है कि यदि साधन भी सकाम- भाव किया जाता है तो वह समय भी लौकिक लाभ ही टेनवाला होना है और निष्कामभावले कानेपर बड़ी साधन अलौकिक लाभ देनेगला हो जाता है । अतः हमें समी काम निष्कामभावसे ही करने चाहिये। अभिप्राय यह कि हमें अवबोध-~मोहनिद्रासे जगकर परमात्मा- की ओर ही अपनी सत्र क्रियाओंका लक्ष्य बना लेना चाहिये। इससे हमको जो अबतक केवल सांसारिक-लौकिक लाभ ही हो रहा था, उसकी जगह अलौकिक लाभ होने लगेगा और इस प्रकार हम लौकिक पूँजीको भी अलौकिक पूँ जो बना सकेंगे। यह बात तो ऊपर कही जा चुकी कि आहार-विहार और शयन-ये दोनों खर्चके काम हैं, इनमें भी आहार-विहारमें तो द्रव्यका ग्वच है और शयनमें जीवनका । इसी प्रकार जीविका और अवबोध-- ये दोनों उपार्जनके काम हैं, इनमें आजीविका द्रव्यका उपार्जन होता है और अवबोध नित्य-जीवन (मोक्ष)का उपार्जन । अतः मनुष्यको चाहिये कि नित्य-जीवनके उपार्जनका समय, जो कि अलौकिक है, द्रव्योपार्जनके साधन---आजीविकाके कार्यमें न लगाये, प्रत्युत उसमें भी निष्कामभाव और भगवत्स्मृतिको सम्मिलित करके उसे नित्य- जीवनका कर्तव्य -- भी यही उपदेश दिया कि इस पदको प्राप्त करनेके लिये तुम भगवान् विष्णुकी आराधना करो और उनसे प्रेम करनेवाली माता सुनीतिने भी इसीका समर्थन किया तथा उदासीन श्रीनारदजीने भी अन्तमें श्रीविष्णु-भक्तिका ही उपदेश दिया । कहनेका अभिप्राय यह है कि जिसकी साधना,, तपस्याका लक्ष्य ध्रुव है, अटल है, उसके लिये कोई बाधक नही; द्वेपी-प्रेमी या उदासीन-सभी - विभिन्न प्रकारसे इसके सहायक ही बन जाते हैं। किंतु हिरण्यकशिपुकी भाँति जिसका लक्ष्य पारमार्थिकं नहीं, उसकी क्रियाएँ बलवती होनेपर भी वास्तविक सिद्धि नहीं दे सकतीं । ब्रह्माजीने स्वयं बतलाया कि हिरण्यकशिपु कौर हिरण्याक्ष- जैसी तपस्या सृष्टिमें अभीतक किसीने नहीं की। हजारों वर्पोतक ऐसी कठोर तपस्या करनेपर भी उनका लक्ष्य पारमार्थिक न होनेसे वास्तविक सिद्धि नही हुई—उनके विरोधी और उदासीन व्यक्तियोंकी तो बात ही क्या, सहायक भी छिन्न-भिन्न हो गये। अतः मनुष्यको उचित है कि अपना लक्ष्य एक परमात्माको बनाकर सावधानीके साथ तत्परतापूर्वक यथोक्त रीतिसे कर्तव्यकर्म करता रहे । ऐसा करने पर वह अनायास ही परम ध्येयकी सिद्धि कर सकता है । आवश्यकता है सजग रहनेकी—सावधानीकी । मनुष्यको हर समय जागरूक होकर इस बातका ध्यान रखना चाहिये कि मन, इन्द्रियों और शरीर आदिकी चेष्टाएँ कहीं संसारको मूल्यवान् समझकर न होने लग जायँ अर्थात् संसार लक्ष्य न बन जाय; इस प्रकार हर समय एक लक्ष्यसिद्धिकी जागृति बनी रहनी चाहिये।

समयका मूल्य और सदुपयोग लक्ष्य स्थिर करके चटनेवालेके लिये निम्नलिखित दो बातों से किसी एकको भलीभांति समझ लेने और निरन्तर स्मरण रखनेकी तो बहुत ही आवश्यकता होती है। दोनों रहें तब तो कहना ही क्या है। एक तो यह कि हमें पहुँचना कहाँ है और दूसरी यह कि उसका मार्ग कौन-सा है। जैसे हमें किसी पहाइपर एक देवमन्दिरमें जाना है तो पहले उसका दिग्दर्शन हो जाय कि जहाँ जाना है तो फिर हम उस दिशाको ओर दृष्टि करके चलते रहें । अथवा मन्दिर न दीखनेपर भी हमें केवट गस्ता मिल जाय कि इस रास्तेसे इस प्रकार पहाड़पर स्थित देवमन्दिरम पहुँचा जा सकता है तो हम केवल रास्तेके आधारपर ही चल सकते हैं। पहले लक्ष्यके बरूपको समझना चाहिये कि परमात्माकी प्राप्ति क्या हैं । भगवान्ने गोतामें बतलाना है-- यं लब्ध्वा चापर लानं मन्यतेनाधिकं ततः। यस्मिन् स्थितो न दुग्नेन्द शुरुणापि विचाल्यते ।। (६ १२२ अर्थात उसकी प्राप्ति होनेपर उससे बढ़कर अन्य कोई लाभ होता है, मी मान्यता जपके मन में नह ही नहीं सकती और उसमें स्थित हो जाना बड़ा गरी दुःख भी उसे कभी विचलित कर नहीं सकला, यानी कता भी कार क्यों न प्राप्त हो, हमारे परम आनन्दनें कमा कमी आ ही नहीं सकता, तो फिर दुःख तो वहीं रद ही कैसे सकता है ? दुःखका तो वहाँ आरम्भ ही नहीं हो सकता; क्योंकि मुखमें कमी शनेसे ही दुःखके आनेकी गुंजाइश रहती है और सुग्वकी जी०प्र०२- १८ जीवलका कर्तव्य कभी, किञ्चित् भी कमी वहाँ रहती नहीं । उस स्थितिमें हर समय एकरस समता बनी रहती है; राग-द्वेप, हर्प-शोक, चिन्ता-भय; उद्वेग आदि भाव अन्तःकरणमें कभी हो ही नही सकते । कर्म, क्लेश, विकार, अज्ञान, संशय, भ्रम आदि दुःग्व और दुःखोंके कारणोका सदाके लिये विनाश हो जाता है । यह है वस्तुस्थिति; यही प्राप्तव्य है और यही गन्तव्य लक्ष्य है । दूसरा है मार्ग । मार्ग क्या है ? हम कोई भी काम करें, वह होना चाहिये शास्त्रविहित और हमारे लिये विशेषरूपसे निर्धारित किया हुआ । उस कामको राग-द्वेषरहित होकर भगवदाज्ञा मानकर केवल भगवत्प्रीत्यर्थ भगवच्चिन्तन करते हुए निष्कामभावसे तत्परतापूर्वक करते रहें। लक्ष्य और मार्ग स्थिर कर लेनेपर भी साधकके लिये एक बहुत बड़ी आवश्यकता है--भगवान्पर भरोसा रखनेकी। हृदयमें यह विश्वास सुदृढ़ होना चाहिये कि 'मेरा वह कार्य अवश्य ही सिद्ध होगा क्योंकि मुझपर भगवान्की बड़ी भारी कृपा है। भगवान के मार्गपर चलनेवालेके लिये बड़े भारी आश्वासनकी बात तो यह है कि इसमें घाटा (नुकसान) तो कभी होता ही नहीं.--- तुलसी सीताराम कहु दृढ़ राखहु बिस्वास । कबहूँ बिगरे ना सुने रामचन्द्र के दास ॥ इसलिये हमें परमात्माकी प्राप्ति के मार्गकी ओर बड़े जोरोंसे उत्साहपूर्वक लग जाना चाहिये, क्योंकि समय है बहुत थोड़ा और काम है बहुत अधिक । संसारके भोगोंका तो कोई अन्त ही नहीं है-- समयका मूल्य और सदुपयोग १९ -- दुनियाकै जो मज है हरगिज भी कम न होंगे। चरचे यही रहेंगे अफलान वय न होग। तब फिर हमारा कौन होगा ! अतरव तृणं यतेत न पतेनुमृत्यु याव- नियसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ कल्याणक लिये अनिर्शन यान करे और मृत्युपर्यन्त कहीं भी मागले च्युत न हो, इसके लिये सवा सावधान रहे; क्योंकि विषय-पदार्थ तो सर्वत्र ही उपलब्ध हो जाते हैं।' इस भगवद्वाक्य अनुसार शीव्रता करनी चाहिये क्योकि अन्य सब वस्तुएँ और बातें तो सभी जगह मिल जायेंगी, पर भगवत्प्राप्तिका हुअवसर तो केवल इस मानव-शरीर में ही है- श्रीमतहरिने कहा है- यावत् रदस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूर जरा यावच्चेन्द्रियशकिरप्रनिहना याववक्षयो नायुपः । आत्मश्रेयसि तापदेव विमुपा कार्यः प्रयन्नो महान प्रादीप्ते भवने दुरखननं प्रत्युधमा कोशः 'जबतक यह शरीर स्वस्थ है और जबतक वृद्धावस्था दूर तथा जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति नट नहीं हुई है एवं जबतक आयुका क्षय नहीं हुआ है, तभीतक समादार मनुष्यको आत्मकल्याण के लिये महान् प्रयत्न कर लेना चाहिये; अन्यथा वरमें आग लग जानेपर कुआँ खोदने के लिये परिश्रम करने से क्या लाभ ?' है कर्मयोग समतापूर्वक कर्तव्यकोंका आचरण करना ही कर्मयोग कहलाता है । कर्मयोगमें खास निष्कामभावकी मुख्यता है। निष्काम- भाव न रहनेपर धर्म केवल 'कर्म' होते हैं; कर्मयोग नहीं होता । शासविहित कर्तव्यकर्स करनेपर भी यदि निष्कामभाव नहीं है तो उन्हें कम ही कहा जाता है, ऐसी क्रियाओंसे मुक्ति सम्भव नहीं; क्योंकि मुक्तिमें भावकी ही प्रधानता है। निष्कामभाव सिद्ध होनेमें राग-द्वेप ही बाधक हैं-'तौ ह्यस्य परिपन्थिनौर (गीता ३ । ३४);

कर्मयोग वे इसके मागमें लुटेरे है। अतः राग-द्वेषक बत्रा नहीं होना चाहिये । तो फिर क्या करना चाहिये ?- श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मान् खनुष्ठितात् । स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो, भयावहः ॥ । गीता ३ । ३५) -इस इलोको बहुत विलक्षण बातें बतायी गयी हैं। इस एक इलोकमें चार चरण हैं। भगवान ने इस इलोककी । भगवान ने इस इलोककी रचना कैसी सुन्दर की है ! थोड़-सरे शब्दोमें कितने गम्भीर भात्र भर दिये हैं। कर्मोक विषयमें कहा है। 'श्रेयान् बधमा विगुणः यहाँ श्रेयान्' क्यों कहा ! इसलिये कि अर्जुनने दूसरे अध्यायमें गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भीख मांगना श्रेय' कहा था--'श्रेयो भोक्तुं भक्ष्यमयीह लोक-(२।५); किंतु यच्छंयः स्यानिश्चितं हि तन्मे (२ । ७ ) में अपने लिये निश्चित 'श्रेया भी पूछा और तीसरे अन्यायमें भी पुनः निश्चित 'श्रेय' ही पूछा- 'तदेकं बद्र निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम (३२)। यहाँ भी निश्चित' कहा और दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी निधितम्' कहा है। भाव यह है कि मेरे लिये कल्याणकारक अचूक रामबाण उपाय होना चाहिये । वहाँ अर्जुनने प्रश्न करते हुए कहा ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन (३।१); यहाँ 'ज्यायसी' पद है। इस 'ज्यायसी' का भगवान्ने 'कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः' ( ३ । ८ ) में 'ध्यायः' कहकर उत्तर दिया कि कर्म न - , वैराग्य तपसामपि सर्वेषां वैराग्यं परमं तपः । यज्ञ, दान, योग, तीर्थ, व्रत, खाध्याय आदि पुण्य कमरूप सभी प्रकारकी तपस्याओंमें वैराग्य परम तप है; क्योंकि अन्यान्य धार्मिक कार्य ( तप ) सकामभावसे करनेपर उनके द्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है और निष्कामभावसे करनेपर ही वे परमात्माकी प्राप्तिके साधन बनते हैं, परन्तु वैराग्य तो निशामभावसे ही होता है। सकामभाव और वैराग्य-दोनों एक जगह रह ही कैसे सकते हैं ? अतः पारमार्थिक साधकके लिये एक वैराग्य ही बहुत आवश्यक और परम उपयोगी है। जबतक वैराग्य नहीं तबतक चाहे जितनी डींगें मारें, उनसे कोई भी आध्यात्मिक कार्य सिद्ध नहीं होता। दूसरी ओर यदि हमें बातें करना नहीं आता, ज्ञानयोग तथा हठयोगकी युक्तियाँ भी हम नहीं जानते, तो भी केवल बैराग्य होनेपर ध्यान आदि साधन सरलतासे स्वयमेव होने लगते हैं, ध्यान आदिकी युक्तियाँ बिना सीखी हुई स्वतः स्फुरित होने लगती हैं। जबतक संसारके पदार्थों में राग है और प्रभुमें प्रेम नहीं तबतक बैराग्य नहीं । वैराग्य नाम है सांसारिक पदाथोंमें आन्तरिक रागके अभावका । बाहरी स्वगका नाम वैराग्य नहीं है । वैराग्य भीतरी त्यागके भावका वाचक है। वैराग्य कई हेतुओंसे होता है-दुःखसे, भयसे, विचारसे, साधनसे और परमात्मतत्त्वके बोधसे । इन सबमें पूर्व-पूर्व वैराग्यकी अपेक्षा उत्तरोत्तरका वैराग्य श्रेष्ठ है । दुःखसे होनेवाला वैराग्य-~-घर, धन, स्त्री, पुत्र, परिवार आदिकी अनुकूलता न होनेपर तथा परिस्थितिकी प्रतिकूलना प्राप्त होनेपर जो मनमें संसारके त्यागकी उकलाहटये भी भावना होती है. उसे दुःखसे होनेवाला बैंराग्य कहते हैं । यह दृःखरे होनवान वैराग्य असली नहीं; क्योंकि हमें आगम नहीं मिला. दृकार मिळी. निरस्कार मिला या मनमानी चीज नहीं मिली नो मनमें गव आया कि छोड़ो संसारको, इसमें क्या पड़ा है । संसारने तो केवल दु:ख-ही-दुःख भरा है । इस प्रकारका गन्य तो सभीको हो सकता है। कुता भी तनी हुई लाठी देखकर भागता है. अपनी जान बचाता है । अतः वह यथार्थ बैंगग्य नहीं । इसमें जो कुछ उक्ताहट है और अनुकूलताका अनुसंधान है, वह वैराग्य नहीं। उसमें नो गगही कारण है क्योंकि दुःखक कारण हटनेपर अर्थात् अनुकूलता प्राम हो जानेपर वह त्यागका भाव रहना कठिन है । यदि प्रतिकूलता न रहे. सब कुटुम्बीजन मनोऽनुकूल सेवा करने लगे. नो फिर वैराग्य भूल जाता है। उसमें कंवल जो पाको दुन्दका कारण समानका भाव है, वही वैराग्यका अंग है । इस प्रकार दुवक पारण होनेवाला वैराग्य यथार्थ वैराग्य नाही. किंतु उस समय यदि का अच्छा मिल जाय तो वही वैराग्य अधिक बढ़कर आत्मोद्धा कारण बन सकता है । इसलिये उसे भी बगग्य कह सकते हैं। भयन होनेवाला वगन्य खसे होनेवाले वैराग्यकी अपेक्षा भयो होनेवाला वैराग्य श्रेष्ट है। स्वास्थ्यमा भय, राज्यका भय, समाजका भय, मान-प्रतिष्टाका भप, जन-पाका भय और नाकोंका ......!न अनेक प्रकारके भयोस होनेवाल गगक अभावको 'भयसे होनेवाला येराग्य' कहते हैं। भय.

२८ जीवनका कर्तव्य ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ विषचेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदनेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत् सुखं राजसं स्मृतम् ॥ (५ । २२, १८ । ३८) 'जो ये इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषोंको सुखरूप भासते हैं तो भी दुःखके ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन ! बुद्धिमान्--विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता ।' 'जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह पहले --भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।' विषयों में सुख होता तो बड़े-बड़े धनी, भोगी और पदाधिकारी भी सुखी होते । पर विचारपूर्वक देखनेपर पता चलता है कि वे भी दुःखी ही हैं। पदार्थोंमें शान्ति है नहीं, हुई नही, होगी नही और हो सकती नहीं । विचारशील व्यक्तिको तो पद-पदपर अनुभव सी होता है कि इनमें सुख नहीं है । चाख चाख सब छाड़िया माया-रस खारा हो । नाम-सुधारस पीजिये छिन बारंबारा हो ॥ जो-जो भोग सुख-बुद्धिसे भोगे गये, उन-उन भोगोंसे धीरज नष्ट हुआ, ध्यान नष्ट हुआ, रोग उत्पन्न हुए, चिन्ता हुई, व्यग्रता हुई, पश्चात्ताप हुआ, बेइज्जती हुई, बल गया, धन गया, शान्ति गयी एवं प्रायः दुःख-शोक-उद्वेग आये---ऐसा यह परिणाम प्रत्यक्ष वैराग्य ANA Air देखने में आता है। इससे मान्म होता है, कि विषयोंमें सुख नहीं है । जिस प्रकार स्वप्नमें जल पीने हैं पर प्यास नहीं मिटती, उसी प्रकार पदार्थाने न तो शान्ति मिलती है और न जलन ही मिटती । मनुष्य सोचता है कि इतना धन हो जाय, इतना ऐश्वर्य हो जाय. नो शान्ति मिलगी; किंतु उतना हो जाने पर भी शान्ति नहीं होती उल्टे पदाकि बढनये उनकी लालसा और बढ़ जाती है-.- जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ।। धन-परिवार होने पर उनके और बढ़ने की लालसा होती है। राज्य होनेपर राज्य और बढ़ जाय, यह लालसा होती है । इस प्रकार और हो जाय', और हो जाया -यह क्रम चलता ही रहता है। किंतु संसार में जितना धन-धान्य है, जितनी लियों हैं, जितनी सामग्रियों हैं, सब-की-सब एक साथ किसी एक व्यक्तिको मिल जाये तब भी उनसे उसे तृति नहीं हो सकती । शास्त्र में कहा है-- यत् पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । पकस्यापि र पर्याप्तमिति मत्वा शमं ब्रजेत् ॥ इसका कारण यह है कि जीव परमात्माका अंश तथा चेतन है और पदार्थ प्राकृत तथा जड है । चेतनकी भून्य जड पदार्थोके द्वारा से मिट सकती है । भग्य है पेट में और हलवा बाँधा जाय पाटपर तो भृन्च कर मिटे । प्यास लगनपर गरमागरम बढ़िया-से- बढ़िया हच्या न्यानल भी प्यास नहीं मिट सकती । भूग्वे व्यक्ति भूख ठंडा जल पीनेसे करे निवृत्त हो सकती है । इसी प्रकार जीवको प्यास तो है, चिन्मय परमात्माकी, किंतु यह उस प्यासको मिटाना चाहता है जड पदाकि द्वारा ! इसमें मुख्य कारण है-अविवेक!

३०
जीवनका कर्तव्य
जीवका अविवेक मिटानेमें पदार्थ सर्वथा असमर्थ हैं; अतः वे शान्ति
प्रदान नहीं कर सकते। उल्टी राह चलनेसे गन्तव्य स्थानपर
कैसे पहुँचेंगे । चाहे ब्रह्माजीकी आयुके कालतक जीव ऐश्वर्यके संग्रह
और भोगोंके भोगने में लगा रहे तो भी उसकी भूख कमी नहीं मिट
सकती, उसे शान्ति नहीं मिल सकती । शान्ति तो तभी मिलेगी
जब कामनाका अत्यन्त अभाव होगा।
पञ्च कासमुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् ।
तृष्णाक्ष्यमुखस्यैते नाहतः पोडशी कलाम् ॥
'जो भी संसारमें इष्ट पदार्थोके मिलनेसे सुख होता है तथा
जो स्वर्गीय महान् सुख है, वे सब सुख मिळकर भी तृष्णानाशके
सुखके सोलाइवें हिस्सेके बराबर भी नहीं हो सकते ।'
न सुखं देवराजस्य च सुखं चक्रवर्तिनः ।
यत् सुखं वीतरागस्य मुनेरकान्तशीलिनः॥
'एकान्तशील वीतराग मुनिको जो सुख है, वह सुख न तो
इन्द्रको है न चक्रवर्ती सम्राटको ही।' संतोंने क्या ही सुन्दर
कहा है-
सुख काजी पंडिताँ ना सुख भूप भयाँ ।
सुख सहजाँ ही आवसी तृप्णो रोग गयो ।
'तृष्णारूपी रोगके चले जानेपर सुख सहज ही आ जायगा।'
जबतक पदार्थोकी लोलुपता है, दासता है, तबतक सुख कहाँ ?
दासता, लोलुपता, दीनता मिटनेपर ही सुख होगा और यह मिटेगी
चाहके न रहनेपर।
चाह गयी चिंता मिटी
मनुवा बेपरवाह ।
जिनको कछू न चाहिये सो जग शाहन्शाह ॥
१
-

वैराग्य
जबतक चाह है, तबतक चिन्ता नहीं मिटती और जबतक
चिन्ता नहीं मिटतो, नवतक सुख नहीं हो सकता।
पिइन्टा नामकी एक वेश्या थी। वह बड़ी प्रसिद्र थी।
बहुत-से मांगी, धनी उनके यहां आया करते थे और उसे धन दिया
करते थे, किंतु एक दिन रात्रिकी वह गह देखती ही रह गयी. पर
कोई धन देनवाला आया ही नहीं । इससे वह बड़ी उदिन थी ।
इतने में ही उसने देखा कि उबरसे दनात्रयजी अपनी मन्तीमें
चूमते हुए चले आ रहे हैं। उनको देवकर वह विचारने लगी
कि इस जनक रानाकी विदहनगरों में ही एक ऐसी मुर्वा हूँ,
जो दुसरे पुरुपोंमे मुम्ब और तृमि चाहती हूँ। वे मुझे क्या
सुग्ख देंगे, मेरी क्या तृति करेंगे । यदि उनके पास मुख होता और
वे तुझे सुन्य दे सकते तो मेरे पास उसे लेने क्यो आने जो
स्व अपनी ध्यास नहीं
प्यास नहीं बुझा सकता, वह दूसरेकी क्या
बुझायेगा। जो सुटुकड़के पीछे कुत्तकी तरह सुन्वक लिये दर-दर
भटकता है, यह औगेको क्या बुख देगा ! दत्तात्रेयनीकी मन्ती देवकर
उसके मनन ऐसे विचार आये और उसे बैगम्य हो गया। उसने
सोचा---'अबतक मन बड़ी भूल की, अब में अपना अमूल्य समय
नष्ट नहीं करूंगी।' उसकं विश्यमें श्रीगुकब जीने कहा है-
आशा दि परमं दुःखं नंगाश्यं परमं सुखन ।
यथा संछिद्य झान्नाश सुखं सुम्बाप विचला ॥
(श्रीमन्दा ११ । ८ । ८४ )
आशा ही सबसे बड़ा दुःख और वैराग्य हो सबसे बड़ा

जीवनका कर्तव्य 1 सुख है । पिङ्गला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी। सचमुच आशा ही दुःखों और पापोंकी जड़ है । गीतामें अर्जुनने भगवानसे प्रश्न किया है कि मनुष्य पाप करना नहीं चाहता, फिर भी बलात्कारसे किसकी प्रेरणासे पाप करता है । इसपर भगवान्ने उत्तरमें कामनाको ही पापका कारण बतलाया। जितने व्यक्ति जेलमें पड़े हैं, जितने नरकोंकी भीषण यातना सह रहे हैं और जिनके चित्तमें शोक,उद्वेग हो रहे हैं तथा जो न चाहते हुए पापाचारमें प्रवृत्त होते हैं, उन सबमें कारण भीतरकी कामना ही है । संसारमें जितने भी दुखी हैं, उन सबका कारण एक कामना ही है। कामना प्रत्येक अवस्थामें दुःखका अनुभव कराती रहती है--जैसे पुत्रके न होनेपर पुत्र होनेकी लालसाका दुःख, जन्मनेपर उसके पालन-पोषण, विद्याध्ययन और विवाहादिकी चिन्ताका दुःख और मरनेपर अभावका दुःख होता है। कामनाके रहनेपर तो प्रत्येक हालतमें दुःख ही होगा । अतएव जिस प्रकार आशा ही परम दुःख है, इसी प्रकार निराशा-वैराग्य ही परम सुख है । स्त्री, पुत्र, परिवार-सब आज्ञाकारी मिल जायँ, तब भी सुख नहीं होगा, सुख तो इनकी कामनाके परित्यागसे ही होगा। ऐसा विचारकर पिङ्गला अपनी सारी धन-सम्पत्तिको लुटाकर वैराग्यके नशे में निकल जाती है और निश्चय करती है कि मैं परमात्माका ही भजन-ध्यान करूँगी और परम सुखी हो जाऊँगी । मैवं स्युर्मन्दाग्यायाः कलेशा निर्वेदहेतवः । येनानुवन्धं निहत्य पुरुषः शममृच्छति ॥ A

वैराग्य
३३
तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः।
त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम् ॥
संतुष्टा श्रद्दधत्येतद् यथालाभेन जीवती
विहाम्यमुनवाहमात्मना रमणेन
(श्रीमद्रा० ११॥ ८॥३८-८०)
( अवश्य मुझपर आज भगवान प्रसन्न हुए हैं ) अन्यथा
मुझ अभागिनीको ऐसे कलेशा ही नहीं उठाने पड़ते, जिससे वैराग्य
होता है । मनुष्य बैंगन्यके द्वारा ही सद बन्धनोंको काटकर
शान्ति-लाभ करता है । अब मैं भगवान्का यह उपकार आदरपूर्वक
सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुगशा छोड़कर
उन परमेश्वर की शरण ग्रहण करती हूँ। अब मुझे प्रारब्धानुसार
जो कुछ मिल्ट जायगा, उसीमे निर्वाह कर लूंगी और संतोष तथा
श्रद्धाक साथ रहुँगी । मैं अब वि.सी दूसरेकी ओर न ताककर
अपनं हृदरेवर आन्मस्वरूप प्रभुके साथ ही विहार करूंगी।'
मुख यदि एदार्थामें होता ना राजा-महाराजा राज्यका और
पदार्थाचा त्याग क्यों करते । राजा भतृहरिने कहा है-
एकाकी नि:स्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः ।
कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलन क्षमः ॥
'अन्दा, म्पृटारहित, शान्तचित्त, करपात्री और दिगम्बर
होकर टे शम्भः : मैं कब अपने कर्मोको निर्मूल करनेमें समर्थ
होऊँगा।'
महरि सबै कर्मोका निर्मूलन यानी अत्यन्ताभाव--ऐसी
अवस्या केवल चाहते ही थे, ऐसी बात नहीं, वे उसे प्राप्त करके ही
रहे । उनकी व्याकरण के नियमोंकी कारिकाएँ (इलोक) देखनेमें आती
।
जी० क०३-
van

जीवनका कर्तव्य - हैं, उनका बड़ा सुन्दर साहित्य मिलता है। वे व्याकरण-साहित्य आदिके प्रकाण्ड विद्वान् थे और वे अध्ययन आदि जिस काममें लगे उसे उन्होंने बड़ी तल्लीनतासे किया । जब राज्य कार्य हाथमें लिया, तब उसे बड़ी तत्परतासे और लगनसे सँभालते रहे । रात्रिमें स्वयं वेष बदलकर घूमते और निरीक्षण करते कि मेरी प्रजाको कोई कष्ट तो नहीं है। इस प्रकार प्रजाका पालन भी किया । सारे काम किये, पर किसी जगह भी टिके नहीं, अटके नहीं । पर जब वैराग्य ले लिया, तब फिर उसे छोड़कर कहीं गये नहीं । ठीक ही है-रहने योग्य, ठहरने योग्य एक निर्भय स्थान तो वैराग्य ही है; अन्य तो सभी भयप्रद हैं । स्वयं भर्तृहरिजी कहते हैं- भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्यं माने दैन्यभयं वले रिपुभयं रूपे जराया भयम् । शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्यं सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वेराग्यमेवाभयम्॥ 'भोगोंमें रोगादिका, कुलमें गिरनेका, धनमें राजाका, मानमें दैन्यका, बलमें शत्रुका, रूपमें बुढ़ापेका, शावमें विवाद का, गुणमें दुर्जनका और शरीरमें मृत्युका भय सदा बना रहता है । इस पृथ्वीमें मनुष्योंके लिये सभी वस्तुएँ भयसे युक्त हैं । एक वैराग्य ही ऐसा है, जो सर्वथा भयरहित है! राजा भर्तृहरिको अपनी पहली अवस्था में किये हुए कार्योपर तो पश्चात्ताप ही हुआ, अन्तमें संतोष तो वैराग्यसे ही हुआ। वे कहते हैं. भोगा भुक्ता वयमेव भुक्ता- स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः । कालो न यातो वयमेव याता- स्तृष्णा न जीर्णावयमेव जीर्णाः ॥

वैराग्य
हमने भोगोंको नहीं भोगा, भोगोंने ही इमें भोग लिया, हमें
समाप्त कर दिया । अच्छे कुलमें जन्म होनेपर भी उससे गिरनेका
भय रहता है । धनवान् को अपने पुत्रसे भी भय लगता है; फिर
राजासे भय हो, इसमें तो कहना ही क्या है । मानमें दीनताका
भय बना रहता है तो बलमें रिपुका भय उत्पन्न हो जाता है।
बुढ़ापेका भय तो प्रसिद्ध ही है । उस अवस्थामें मनुष्य तीन पगोंसे
चलना है-
।
लहरी पझरी सुन्दरी फरमें पग पंथ परे न भरे डगरी।
नगरी ननरी सुउरानि परी, अब लूटत है भगरी बगरी ।।
न घरी भर बैठ भज्यो मुहरी कथ कर करी जगरी नगरी।
अररी विरधापन बात बुरी सु बरी सम लागन है सुत री ॥
एक संत कहते हैं-
जरा कुनी जोवन सना
सती साल अहेरी लार ।
पाव पलकमें मारनी गरव्यो
कहा गँवार ॥
जरा आनेपर वह बल्ट, यह उत्साह, वह साहस कहाँ गया !
शास्त्र में वाद-विवादका बड़ा भय रहता है। अन्य व्यक्तियोंकी
अपेक्षा तो पढ़े-लिखेको ताप भी अधिक होता है। गँवारके केवल
आधिभौनिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक--ये तीन ताप होते हैं,
पर पढ़े-लिखे विद्वान् के ताप सात होते हैं--( १) आधिभौतिक
( २ ) आधिदैविक, (३ ) आध्यात्मिक, ( ४ ) अभ्यास
( शास्त्रका अभ्यास ), (५) मङ्ग ( अपमानका भय ), (६)
विस्मार ( भूल न जाऊँ----इसकी चिन्ता ) और (७) गर्व
( विद्वत्ताका अभिमान )।

जीवनका कर्तव्य
"
'गुणे खलभयम्'-जहाँ परीक्षक नहीं, गुणी नहीं, गुणग्राही
नहीं, वहाँ मूखोंमें हमारा मूल्य ही क्या । एक गवैये थे। वे बड़ी
सुन्दर सितार लेकर राजाके पास गये। पर राजा मूर्ख था, संगीतको
क्या समझता! इसपर किसी कविने कहा-
रे गायक ये गायसुत तू जानत परबीन ।
ये गाहक कड़बीन के तै लीन्हीं कर बीन ॥
गुण कितने ही हों, पर गुणग्राहक नहीं तो उन्हें कौन
लेगा। भर्तृहरि कहते है—'हमारे पास बहुत विद्या थी, पर किसीने
नहीं ली-
1
बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः
प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम् ॥
इसी प्रकार एक कविने कहा है----
कौन सुनै कासों कहूँ सुने तो समुझै नाहिं ।
कहना सुनना समझना मन ही का मन माहि ॥
'काये कृतान्ताद्भयम्'-शरीरके पीछे तो यमराज सदा ताकमें
ही रहते हैं कि कब कलेवा करें-
.
इस श्वासका मूढ़ विश्वास कहा पल आवत ही रह जावता है ।
सब पीर पैगम्बर खाक मिले तेरो का अनुमान फुलावता है।
बड़े-बड़े राजा-महाराजा हो गये । अब उनके महलोंके टूटे-
फूटे खंडहर पड़े हैं । उनको देखनेसे मनमें वैराग्य होता है, जो
सर्वथा अभयप्रद है। जिसके हृदय वैराग्य है, उसे शरीरके जानेका

वैराग्य भी नय नहीं; फिर नाशवान पदार्थाक चले जानका तो भय ही क्या है। क्योंकि अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वापि विपया वियोग को भेदस्त्यजतिन जनो यत् स्वयममून् । व्रजन्तः स्वातन्त्र्यादतुन्टपरितापाय मनसः न्ययं त्यका होते शमसुखमनन्तं विदधति ॥ विषय-पदार्थ चाहे दीघ कालतक रहें, पर एक दिन वे अवश्य जानेवाले हैं...चाहे हम उनका न्याग कर दें अथवा वे हमें त्याग दें। उनका विछोह अवश्य होगा । पर संसारी मानव स्वयं उनका त्याग नहीं करने ।जब विषय-पदार्थ स्वतन्त्रतामे उनका त्याग करते हैं, तब उनके मनको बड़ा संताप होता है; परंतु यदि वे स्वयं उनका न्याग कर दें तो उन्हें अनन्त सुग्व-शान्तिकी प्राप्ति हो सकती है। मनसे छोड़ दनपर य ही पदार्थ सुग्व देनेगले हो जायेंगे। ने. दस रुपये चोरी चले गये तो दृग्व होता है, पर अपनी इच्छाने दान दे दिया तो सुग्व देता है, किंतु उनसे सम्बन्धविच्छेदमें तो कोई भेद नहीं। यार जावे ॥ ३ ॥ महा परदनामी प्रीति जावता न लाये । आत न देण्यो जात न जाण्या क्या कहियों बणि आवे ॥ १ ॥ जैसे बाग्म फूलन ने बिछुरे माहो माहि : समावै ॥ २ ॥ जैने नंग सरायला दिन ऊगे उटि मलदाम अगम न घटने, जो खाने मां पावै ॥ ४ ॥ -~~-जानेवाला हो, उसे एक का अपनी तरफसे दे और काह दे कि जा, चला जा तो मौज हो जाय !

३८
जीवनका कर्तव्य
एक जाट-दम्पति थे। दोनों में ग्वटपट चला करती।
जाटनी बार-बार कहा करती कि 'मैं अब तुम्हारे पर नहीं रहूँगी,
चली जाऊँगी।' जाटने सोचा---'नित्य लड़ाई करती है. अन्लमें
यह जायगी ही; इज्जत भी लेती जायगी। इसमें तो इसे पहले ही
त्याग देना अच्छा है, एक दिन जब रातमें लीने स्पष्ट कह दिया कि
'कल सवेरे मैं चली ही जाऊँगी, तब जाटने रानमें अपने
कोठेपर खड़े होकर गाँववालोको जोरसे घोषणा कर दी कि 'अब मुझे
कोई उलाहना न देना, मैने आजसे ही अपनी पत्नीका परित्याग
कर दिया है। स्त्री चली नहीं गयी, उसे मैंने निकाल दिया है।
ऐसे ही संसारके समस्त पदार्थ जाटनीकी तरह हैं, अतः इन्हें
पहलेसे ही त्याग दें। पदाथोंको स्वयं त्याग देनेपर ये परम शान्ति
देनेवाले हो जाते हैं---
अंतहु ताहि तजेंगे पामर ! तू, न नजे अबही ते ।
ऐसा विचार करके भर्तृहरि कहते हैं-
अजानन् दाहात्ति पतति शलभस्तीवदाने
न मीनोऽपि ज्ञात्वा वडिशयुनमश्नति पिशितम् ।
विजानन्तोऽप्यते वयमित विपज्जालजटिलान्
न मुञ्चामः कामानहइ ! गहनो मोहमद्दिमा !
'पतिंगा इस बातको नहीं जानता कि जलनेपर कैसी पीड़ा
होती है, इसीलिये वह प्रचण्ड अग्निमें कूद पड़ता है। मछलीको
भी बंशीमें लगा हुखा मांसका टुकड़ा खाते समय पता नहीं रहता
कि उसके भीतर लोहेका काँटा है। परंतु हम तो यह जानते हुए

वैराग्य
३९
भी कि विषय-भाग वित्तिके जालमें फंसानेवाले हैं, उन्हें छोड़ नहीं
पाने ! अहो माग कितना बड़ा और वना अज्ञान है ।'
कई बार पायको देवा. अनेक बार मांगों को भोगकर देवा ।
फिर भी उनके मिले पड़े हैं। पलिंग आदि जानवर तो विनयसङ्गसे
एक बार ही मरे, पर हमलोग नो भोगोंको भोगकर बार-बार मर
रहे हैं। पर फिर भी चेन नहीं हो रहा है। बार-बार टोकर लगने-
पर भी संभलनेका नाम नहीं लेने । आखिर कब अक्ल आयनी ।
बूढ़े हो गये, जीवनका अनुमय समय चला गया। फिर भी विषयोंकी
और न्दोलुपनासे देख में हैं ! त्रका, प्रपौत्रका मुंह देखना
चाहते हैं। अरे. धनसे मृत मिलना दीखे धसे पूछो; लियोंमें
मुन्वका ना हो तो जिसके दो-तीन स्त्रियां हो. उससे पूछो;
सामग्री में सुख दी तो अधिक सामग्रीवालोंस मिलो। राज्यमें सुख
दीने तो राजाओंसे मिलकर बात कर लो। मुन्न तो कहीं नहीं
मिलेगा क्योंकि सुख बन्न चाहके न्याग-बैंगग्यसे ही है !
कहा है।
-
बाई चूड़ी रामदाम सत्र नीचान नीन ।
नृ नो केवल ब्रह्म या वाह
न होती मीच ॥
पर रागनरी दृष्टिवालीको कोई बैंगग्यवान् दीवता हा नहीं,
जहाँ देखो वहीं संगी-झी-रागी दीखते है। बात भी ठीक हैं, सच्चे
वैराग्यवान् है ही कम; क्योंकि
आदि अविद्या
अटपटी बट बट बीच अड़ी ।
समझाइये कुएँ भाँग
भाँग पड़ी।

जीवनका कर्तव्य ४२ कोपीन। हाथ में दादृमे सतगुरु मिले, सिष रजबसे जान । एकहि सब्द सुलझ गये, रही न चानान । एक ही शब्द काम कर गया ! वैराग्यवान् पुरुषोंको तो देवनेसे ही वैराग्य हो जाता है। वेश्याको दत्तात्रेयजीने कहा कुछ नहीं, उसे उनको देखते ई वैराग्य हो गया ! क्योंकि वैराग्यवान्की मुद्रा ऐसी ही होती है। खंडी हंदी बंदी-सी रंडी दिसि देवे नहीं, काया दंडी कीन ॥ वैराग्यकी मतमें भी इतना आनन्द है तो फिर यदि हृदयसे सच्चा वैराग्य हो जाय तब तो आनन्दका कहना ही क्या । सच्चे वैराग्यवान के सामने बढ़िया वन पहनकर, इत्र आदि लगाकर एवं शृङ्गार करके बैठनेवालेको बैठने में भी संकोच होता है। उपर्युक्त प्रकारका वैराग्य विवेक-विचारसे होनेवाला वैराग्य है। किंतु साधनसे होनेवाला वैराग्य विचारसे होनेगले वैराग्यसे भी श्रेष्ठ है । वाणीसे रामनामका जप प्रारम्भ कर दिया- राम राम राम राप गमः । शरीर रोमाञ्चित और पुलकित हो रहा है तथा हृदयमें लबालब प्रेम भरा है, भगवान्की बात सुनकर ही नाचने लग जाता है । उस हालतमे कभी भूलकर भी पदार्थोकी ओर मन नहीं जाता, उसे खाभाविक ही भोगोसे वैराग्य रहता है । मन तो भगवान्की ओर ही प्रतिक्षण बरबस खिंचता रहता है। उसके हृदयमें प्रेमानन्द समाता नहीं । वह तो यही कहता रहता है कि 'गिरधारीलाल ! चाकर राखो जी' और वह मीराकी तरह प्रेममें मस्त होकर नाचने लगता है ।

वैराग्य पग बुवर बांध मीरा नाची रे। मतवाली मरा-में मस्त होकर ली नाचने । कारण क्या ? भजनका रस मिल गया। सांसारिक दृटिसे ज्यादा-से-ज्यादा आकर्षक मान-बड़ाई, यशकीर्ति है; इनकी नो परवा ही क्या हो, उल्टी बदनामीन डर न लगकर ऋ मोटी लगने लगती है। मीरा कहती है- या बदनामी लागे मीठी। रागाजी : म्होंने या बदनामी लागे मीली । धारे शहरको राणा : लोड निमागी. बान करे अगदीटी॥ हरि मंदिरको नेम हमारे दुरजन लोन म्हाने दीठी ।। राणाजी० ॥ लॉकड़ी में हारा सतगुरु मिलिया. फिस विधि फि अफूटी । म्हारा नाँचारियों ना घट-घट व्याक. घोरे हि री काई फूटी ॥ सान्नु ननद हारी देशणी जेठानी बल जल हो गयी अँगीठी! मीराके प्रभु मिन्धर नागर र नयां चोल मजीठी ॥ राणाजी० ॥ इस प्रकार सावन-भजन कानेपर जो बैराग्य होता है, उससे पदार्थोने राग अपने-आप अनायास मिट जाता है। भजनानन्दीको पदार्योस अरुचि करनी नहीं पड़ती। उसका मन तो भगवान्में सहन ही संलग्न हो जाता है। यदि कहें कि हमलोगोंका मन इर जगह जाता है, तो ठीक है; हर जगह जाता है, पर भगवान्पर नहीं जाता। और अगर भगवान्पर चला जाय तो फिर लौटकर संसारमें आयेगा नहीं। मवली सब जगह जाकर बैटती है, पर आगपर नहीं। वह आगपर बैंटती ही नहीं; पर यदि आगपर बैठ जाय तो फिर उठती ही नहीं, इसी प्रकार भगवान्में मन लग जानेपर फिर कहीं नहीं जाता, तड़प हो जाता है ! अतः संसारसे वैराग्य और जीवनका कर्तव्य - परमात्माकी प्राप्ति हो जानेपर होनेवाला वैराग्य बहुत ही अलौकिक है, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता; उसे न तो राग कह सकते हैं न गाय ही। ऐसा विलक्षण पैगम्य परमात्मप्रान महापुरुषोंका ही होता है। ब्रह्मलोकतकर कभी कसेही कितने ही भोग क्यों न प्राप्त हों. उनके अन्तःकरणमें रामकी, गन्धकी भी कभी जागृति होनेकी सम्भावना नहीं रहती; क्योकि, जब एक परमात्मतत्त्वके सिवा अन्य सत्ता ही मिट जाती है. ना शिक्षक प्रति राग हो । पहायोंमें सता न रहने के कारण उनको परमामतत्वक सिवा कही रस या सार बुल भी प्रतीत नहोला । उनके अन्तःकरणमें अन्तःकरणसहित संसारका मृगतृष्णा-जलकी भाँति तया नीदसे जगनेपर स्वप्नकी भांति अन्यन्न अभाव और परमात्मतत्वका भाव नित्य निरन्तर दृढ़ताके साथ स्वाभाविक ही बना रहता है । फिर परमात्मतत्त्वके सिवा कुछ रहता ही नहीं। उक्त अनिर्वचनीय स्थितिको ग्राम करने के लिये बैराग्यवान् पुरुषों और भगवत्प्राप्त पुरुषोंका सह करना चाहिये। उनके शब्दोंसे, उनकी क्रियाओंसे शिक्षा लेकर हमें तेजीसे चलना चाहिये । संसारके पदार्थोंमें कभी किसीको सुग्व हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं। ऐसा विचार कर भक्तिमार्गीको भगवान में मन लगाने की चेष्टा करनी चाहिये तथा ज्ञानमार्गीको चित्तसे पदार्थोकी सत्ताको मिटाकर एक सच्चिदानन्द- घन पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है...ऐसा दृढ़ निश्चय निरन्तर रखना चाहिये।

गीतामें भक्ति और उसके अधिकारी - श्रीमद्भगवदीताकी महिमा अपार है। यह श्रीभगवान्की दिव्य वाणी है, इसके रचयिता म्बयं भगवान् वेदव्यास हैं । सर्वविश्न- विनाशक श्रामणेशजी इसके लेखक । सभी सम्प्रदायोके प्रमुख आचानि इसपर भाप्य लिाव है। इस ग्रन्थरत्नपर टीका लिवनवाले अच्छे अछे त्यागी नया बहुत-से व्हात्मा पुरुष हो चुके हैं । अच्छे- अच्छे दिग्विजयी पण्डितोंने भी उपपर अपने भाव व्यक्त किये हैं। इतना ही नहीं, हिंदुधर्मको न माननेवाले विदेशी सज्जनोंने भी इसपर बहुत कुछ दिग्बा है । संसारमें श्रीमद्भगवद्गीतापर जितने भाप्य, टीकार्य, लेख, समालोचनाएं. प्रश्नोत्तर और विचार किये गये हैं; उननी टीकाएं और उनमें विवेचन पृथ्वीमण्डलके अन्य किसी भी ग्रन्धपर नहीं । ही, बाइबलपर बहुत-से अनुवाद मिलते हैं और अब भी होने जा रहे हैं। परंतु उसके इतने विस्तारका राजमना तथा धनकी अधिकता ही है । श्रीमहावीताके विषयमे यह बात नहीं है । यह जड राज्य और ऐश्वर्यकी सहायताको अपेक्षा नहीं रग्वती । इसमें तो ऐसी अलौकिक तथा विलक्षण शक्ति संनिहित है, जिससे यह जिस विचारशील विद्वान्के हाथों पड़ी, वही इसपर लिखने के लिये बाध्य हो गया। अर्थात् उसने बड़े प्रेम और आदरसे इसपर कुछ लिखकर अपनको धन्य समझा और अपनी लेग्टनीको पवित्र किय। प्रधान कारण ५० जीवनका कर्तव्य श्रीगीताका अध्ययन करनेवाले जिज्ञासु या तत्त्वालोचक विद्वान्के लिये इस बातपर ध्यान देनेकी विशेष आवश्यकता प्रतीत होती है कि वह अपनेको किसी मतमें ढालकर उसी दृष्टिसे गीताको न देखे-गीताका अर्थ अपने मतके अनुसार लगानेकी चेष्टा न करे, अपितु अपनेको गीताका अनुवर्ती बनानेके लिये उसके श्लोकों तथा भावोंका मनन करे। गीतामें जैसा लिखा है, उसके अनुसार साधनात्मक विचार करते हुए परमात्माकी ओर अग्रसर होनेकी चेष्टा करनी चाहिये । उसके भावोंको समझनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण- चन्द्रजी महाराजके अनन्यशरण होकर ऐसा विश्वास निरन्तर बढ़ाता रहे कि अपने दिव्य वाणीका यथार्थ भाव भगवान् मुझे अवश्य समझायेंगे तो वह अपने लिये परमोपयोगी भावोंको समझ सकेगा। युद्धारम्भके समय अपने खजन-बान्धवोंके नाशकी भाशङ्कासे व्याकुल हुए अर्जुन भगवान्की शरणमें जाते हैं और उनसे प्रेय लौकिक उन्नति नहीं, अपितु अपने निश्चित श्रेय-कल्याणकी ही बात पूछते हैं--'यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं हि तन्मे' (२ । ७); 'तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् (३ । २); 'यच्छेय एतयोरेक तन्मे हि सुनिश्चितम् ( ५। १)। तब भगवान् सम्पूर्ण वेद और उपनिषद् आदिमें बताये हुए समस्त कल्याणमय साधनोंका सार श्रीगीताके रूपमें कहते हैं। सच्ची बात तो यह है कि जो भगवान् कहते हैं, वही सबका सार है । वेद-शास्त्रोंको आदर देनेके लिये ही भगवान्ने वेद, शास्त्रों तथा उपनिषदोंका प्रमाण दिया है (१३।४) श्रीभगवान्ने उन शास्त्रोक्त साधनोंमें जो कुछ कमी दीखती थी, उसे पूरा किया, उनमें जो परस्पर विरोध प्रतीत होता था, उसका गीतामें भक्ति और उसके अधिकारी निराकरण किया और उन सिद्धान्तोंका परिमार्जन करके थोड़ शब्दोंमें उन्हें बिन्तारपूर्वक बार-बार समझाया। एक ही बातको अनेक युक्तियोंसे समझानेपर भी विशेषता यह है कि पुनरुक्तिका दोष नहीं आया और थोड़े शब्दोंमें कहनेपर भी कमी नहीं रही। कहीं-कहीं श्लोका की पुनरुक्ति अवश्य आती है, किंतु बह सहेतुक है । विचार करनेपर वहाँ बड़ी विलक्षणता जान पड़ती है। कल्याणकारी शास्त्रों तथा सम्प्रदायाचाकि सिद्धान्तों अनेक मतभेद है-अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि । इन सबका अन्तर्भाव अति और द्रुतमें ही किया जा सकता है। इन दोका ही वर्णन भगवान्ने सांख्य और योगनिष्ठाक नामसे किया है। इन दोनोंको अभेद और भेदमार्ग भी कह सकते हैं। सांख्यनिष्ठामें आत्मा और परमात्माका अभेद मानकर साधन किया जाता है। वह इस लेखका विषय न होने से उसे छोड़कर योगनिष्टाका ही वर्णन किया जाता है; क्योकि भक्ति योगनिष्ठाके ही अन्तर्गत है । भगवदाशनुसार फल और आसक्तिको त्यागकर अपने कर्तव्यकर्मीका पालन करना योगनिष्ठा है । योगनिष्टा तीन प्रकारकी होती है- ( १ ) कर्मप्रधान, (२) भक्तिमिश्रित तथा (३) भक्तिप्रधान । इन तीनोंमें भगवान्ने भक्तिप्रधान कर्मनिष्टाकी ही अधिक प्रशंसा की है और स्पष्ट शब्दोंमें यह घोषित किया कि सब प्रकारके योगियोंमें मद्गतचित्त होकर श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करनेवाला सर्वश्रेष्ट-युक्ततम है (६। ४७)। श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने व्यवहारमें परमार्थ-सिद्धिरूप जीवनका कर्तव्य अन्तिम और दसवेंका आदि भाग है, यही गीताके मध्यमें पड़ता है। इसलिये इसको गीताका 'हृदय' कह सकते हैं। नवें अध्यायके आदिमें भगवान् विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके चौथे, पाँचवें, छठे श्लोकोंमें उदाहरणसहित राजविद्याका वर्णन करते हैं। उसके बाद अपनेसे संसारकी उत्पत्ति-प्रलयका प्रकरण बतलाकर अपनेको साधारण मनुष्य मानकर अवज्ञा करनेवालोंकी निन्दा करते हैं (९। ११ ) और कहते हैं कि जो महात्मा हमें सम्पूर्ण भूतोंका अविनाशी कारण मानकर अनन्यभावसे भजन करते हैं (९।१३) ऐसे भक्तोंका योगक्षेम मैं खयं ही वहन करता हूँ (९ । २२ )। यद्यपि अन्य देवता भी भगवान्के अतिरिक्त कुछ भी न होने के कारण अन्य देवताओंकी भक्ति भी प्रकारान्तरसे भगवान्की ही भक्ति मानी जा सकती है, परंतु उनको भगवत्स्वरूप न समझनेके कारण वह विधिपूर्वक यथार्थ भक्ति नहीं है । शास्त्रोंमें जिन-जिन देवताओंकी पूजाके लिये पूजा-पद्धति, मन्त्र, सामग्री आदिका जो-जो विधान है, उसके अनुसार यथार्थ रीतिसे पूजा करनेपर - बड़े-से-बड़ा फल उन देवताओके लोकोंकी प्राप्ति ही है, भगवान्की प्राप्ति नहीं । किंतु यथार्थ भक्तिसे तो भगवान् भी सुलभ हो जाते हैं (८ । १४)। भगवान्के पूजनमें उतनी विधि, मन्त्र और सामग्रीकी आवश्यकता नहीं है; वहाँ तो एकमात्र भावकी ही प्रधानता है । कितनी सुगमता है ! भगवान् कहते हैं- पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि ( ९ । २६ ) to प्रयतात्मनः॥

गोतामें भकि और उसके अधिकारी 'जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अपंग करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुप्यादि में सगुणरूपसे प्रकट होकर श्रीनिसहित खाता हूँ। इम इन्टोको भगवान्ने पत्र-पुष्पादिका नाम लेकर भक्ति' शब्दका दो बार प्रयोग किया है। इसके द्वारा भगवान् यत् व्यक्त करते हैं कि मुझे विविध सामग्रियोंकी आवश्यकता नहीं है । अनायास ही जो कुछ भी भक्तको मिल जाय, बही भक्तिपूर्वक सच्चे हृदयसे अपंग कर देनेसे में संतुष्ट हो जाता । जैसे द्रौपदीके दिये हुए शाक-पत्र ने भगवान प्रसन्न हो गये। गजेन्द्रक अर्पण किये हुए पुजको लेने के लिये वैकुण्ठसे दौड़े हुए आये । शबरीके प्रेमपूर्वक घरोसे हुप फलोंके समान मधुरनाका अनुभव भगवान्ने और कहीं किया ही नहीं तथा महाराज रन्तिदेयके जलमात्रसे तृप्त होकर उनका कल्याण कर दिया । इन पत्र, पुष्प, फल तथा जलको स्वीकार करने में भोंके सच्चे हृदयकी विकलता और अनन्य प्रेम ही प्रधान कारण थे । भगवान् इसी प्रेमके वशीभूत होकर पत्र-पुप्पको भी जो न्वानकी चीज नहीं है ) खाते हैं। वे स्वयं कहते हैं- 'अनामि' अर्थात् मैं खाता हूँ। प्रिय भक्तवर अर्जुनके लिये तो पत्र-पुप्यादि सामग्रीकी भी आवश्यकता न रखते हुए वे कहते हैं- भैया कुन्नीनन्दन ! तुम स्वाभाविक ही जो कुछ करते हो, जो कुछ खात हो, जो होम करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो. वह सब मुझे समर्पण कर दो' ( ९ । २७ ) । इस प्रकार समर्पण कर देनेसे शुभाशुभ दोनों प्रकारके फलोसे मुक्त होकर मुझे प्राप्त कर लोगे (९।२८)। ।

जीवनका कर्तव्य भगवान् कहते हैं- प्रेममें होता है। कैमरा तो सामनेकी जड वस्तुकी उस आकृतिमात्रको ही खींचता है, परंतु भगवद्भक्तका प्रेम चिन्मय परमात्माको अपने मनचाहे रूपमें खींच लेता है । इसलिये भगवान् कहते हैं- ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् । श्रीमद्भागवतमें साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् । मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥ (९।४।६८) 'साधुओंका मैं हृदय हूँ और संत छोग मेरे हृदय हैं। वे मेरे सिवा और किसीको नहीं जानते और मैं उनके सिवा किसीको कुछ भी नहीं जानता। भगवान्को अपने भक्त जितने प्यारे हैं, उतनी अर्धाङ्गिनी लक्ष्मी, गरुड़ आदि पार्षद और अपना शरीर भी प्रिय नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवसे कहते हैं-भक्तोंके सिवा मेरा कोई प्यारा नहीं है। एक स्थलपर भगवान् कहते हैं-यदि भक्तों के प्रतिकूल मेरी भुजा भी उठे तो उसे काटकर फेंक दूं- छिन्द्यां स्ववाहुमपि वः शतिकूलवृत्तिम् । भक्त नीच घरका हो तो भी भगवान् उसके यहाँ पधारते हैं। यहाँ एक शङ्का होती है कि जब भजनेवालेको ही भगवान् भजते हैं जो जिस भावसे भजता है, उसे उसी भावसे वे भी भजते हैं तब जो भगवान्की आज्ञाके सर्वथा विरुद्ध चळनेवाला, भगवान्- का विरोध करनेवाला, भगवान्के द्वारा निषेध किये हुए कर्मोको आसक्तिपूर्वक करनेवाला अर्थात् भगवान्का सर्वथा विरोधी हो, वह ।

गीतामें भक्ति और उसके अधिकारी ५२ यदि भजन करे तो क्या भगवान् उसे भी अपनाते हैं ? इसका उत्तर है.--'अवश्य । अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ।। (९ । ३० अर्थात् 'यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त हुआ मुझे निरन्तर भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है अर्थात् उसने भली प्रकार निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।' यहाँ भगवान् स्पष्ट कहती हैं कि चाहे दुराचारी-से-दुराचारी भी हो, परंतु जो अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर भजन करता है, उसे साधु ही मानना चाहिये। क्योंकि उसने उत्तम निश्चय कर लिया है। दुराचारी चाहे इस जन्मका हो चाहे पूर्वजन्नका, भक्तके उस पाप और दुराचारको भगान् नष्ट कर देते हैं । भगवान् रामायणमें कहते हैं- कोटि विष दध लागहि जाए । आएँ सहन तजउँ नहिं ताहू ॥ करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या करनेवाला भी यदि शरणमें आ जाय तो भगवान् उसके पापको नष्ट कर देते हैं । एक जन्मके नहीं, अनेकों जन्मोके पापका भी नाश कर देते हैं। सनमुख होइ जीव मोहि जनहीं । जन्म कोटि अघ नासहि तवहीं ॥ जीर जभी मेरे सम्मुख होता है, तभी उसके अनन्त जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, शरणमें आ जानेपर उसे साधु ही मानना चाहिये । यहाँ यह प्रश्न होता है कि गीता ७।१५ में भगत पतिताँ पावन ६२ जीवनका कर्तव्य की ही दयासे । ऐसा उसका अटळ निश्चय है । इसीसे तो एक भक्त कहता है- व्रत समुझिके रजव दीन्हों रोय। जब सुने, रह्यो न चीतो सोय ॥ इसी कारण भगवान् कहते हैं- वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है । तात्पर्य यह कि जब वह भगवान्की ओर ही चलनेका दृढ़ निश्चय कर लेता है, तब उसके आचरण और भाव बहुत जल्दी सुधर जाते हैं। जब उसके ध्येय एकमात्र परमात्मा हो गये, तब वह दुर्गुणका आश्रय कैसे ले सकता है, भगवत्-प्रतिकूल आचरण कैसे कर सकता है । ज्यों-ज्यों भगवान्के अनन्य आश्रित होता जाता है, त्यों-त्यों उसमें सद्गुण-सदाचारकी स्वाभाविक वृद्धि होती जाती है ! जब सब प्रकारसे वह प्रभुके आश्रित हो जाता है, तब उसी क्षण धर्मात्मा बन जाता है। केवल धर्मात्मा ही नहीं होता, उसे अविचल शान्ति भी प्राप्त हो जाती है। अर्थात् जिस सुख-शान्तिमें क्षय आदि विकार और दोष नहीं आते, उसी शान्तिको वह प्राप्त हो जाता है। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छति। कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ (गीता ९।३१) 'इसलिये वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने- वाली परम शान्तिको प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।" निरन्तर रहनेवाली शान्ति क्या है ? जिसे गीतामें परमपद, गीतामें भक्ति और उसके अधिकारी ब्रह्मनिर्वाण, निर्वाण, परम शान्ति, आत्यन्तिक सुख आदि नामोंसे कहा गया है, उसीको शश्वच्छान्ति कहते हैं । यही सब साधनोंका अन्तिम फल है । इसे ही शास्त्रकारोंने मुक्ति कहा है । यह सर्वोपरि स्थिति है । इसीके लिये भगवान् कहते हैं- यं लब्ध्वा वापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ (गीता ६ । २२) जिसे पा जानेपर उससे बड़कर दूसरा कोई लाभ नहीं जान पड़ता तथा जिस स्थितिमें स्थित हो जानेपर मनुष्यको कोई भारी दुःख कभी विचलित नहीं कर सकता ।' तात्पर्य यह कि जिसमें दुःख, अल्पज्ञता, अशान्ति, असहिष्णुता आदि कोई भी दोप नहीं है, ऐसी परम शान्तिमयी अवस्थाको वह प्राप्त हो जाता है । अहा ! भगवान्की कितनी अलौकिक कृपा है। 'विनु सेवा जो द्रवहि दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं ॥' 'दुराचारी भी यदि भगवान्का भजन करने लगे तो वह शीत्र ही धर्मात्मा बन जाता है । भगवान् ने दुराचारीकी बात तो कही; अब जो पूर्वजन्मके अनुचित आचरणके कारण नीच योनिमें जन्म लेते हैं; वे भी भक्ति के अधिकारी हैं, यह बात भी भगवान् कहते हैं-- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ( गीता ९ । 'पापयोनिवाले जीव भी मेरा आश्रय लेकर परमपदको प्राप्त होते हैं; स्त्री, वैश्य और शूद भी परमपदको जाते हैं ।' जो जाति- !

६४ जीवनका कर्तव्य बहिष्कृत है, जिसको स्पर्श करनेमें भी लोगोंको हिचक होती है, ऐसे पुरुषको भी यदि वह भक्त है तो भगवान् परमप्रिय मानते हैं । रामावतार में भगवान् श्रीरामचन्द्रजी गुहको हृदयसे लगाकर भेंटते हैं और पूज्य वशिष्ठजी भी रामभक्त समझकर उसे हृदयसे लगाते हैं। भरतजी भी लक्ष्मणकी तरह उसे भेंटते हैं । भक्त तो त्रिभुवनको पवित्र करनेवाला होता है। शास्त्रपरम्परासे अइिंसादि सामान्य धर्मोकी भाँति भक्ति में भी चाण्डालादि सभी योनिके मनुष्योंका अधिकार है। आनिन्धयोन्यधिक्रियते पारम्पर्यात् सामान्यवत् ।' (शाण्डिल्यभक्तिसूत्र ७८) भगवद्भक्तिके अधिकारी नीच-से-नीच व्यक्ति भी हैं। यहाँ 'पापयोनि' शब्द इतना व्यापक है कि आभीर, यवन, कङ्क, खशादि जातिके मनुष्य भी इसीके अन्तर्गत लिये जा सकते हैं। चारों वर्गों के सिवा जितनी योनिणं हैं, सब पापयोनि ही हैं। 'बड़ सेयाँ बड़ होत है। उक्तिके अनुसार बड़ोंका आश्रय पाकर प्रायः सभी बड़े हो जाते हैं। छोटा-सा जन्तु भी यदि सज्जन पुरुषोंका सङ्ग करे तो वह कष्टसाध्य कार्य भी सुगमतासे ही सिद्ध कर लेता है । जब सज्जनोंके सङ्गियोंका सङ्ग करनेसे ऐसा फल मिलता है, तब साक्षात् भगवानका साथ होनेपर मनुष्य श्रेष्ठ बन जाय-इसमें कौन-सी आश्चर्यकी बात है। मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य०' (९। ३१ )-इस श्लोकमें जो 'पापयौनयः' पद है, वह खतन्त्र है; स्त्री, वैश्य और शूद्रका विशेषण नहीं । क्योंकि वैश्यका - गीताम भक्ति और उसके अधिकारी वेदोंमें अधिकार है । 'स्त्री' शब्दसे ब्राह्मण-क्षत्रियोंकी स्त्रियोंका भी ग्रहण हो जाता है। वे अपने-अपने पतिके साथ यज्ञमें बैठ सकती हैं। ब्राह्मणी समस्त जातिकी पूजनीया है, इसलिये यह पापयोनि नहीं कही जा सकती। 'येऽपि स्युः पापयोनयः' में 'स्युः क्रियाका साक्षात् सम्बन्ध 'पापयोनयः' से ही है । 'त्रियो वैश्यास्तथा शूद्राः' इसमें तथा' शब्द स्त्री, वैश्य और शूद्रको 'पापयोनयः से अलग कर रहा है। इन सबका अन्य एक साथ 'यान्तिा क्रिया में होता है-'तेऽपि यान्ति परां गतिम्। वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते है । यद्यपि स्त्रियाँ भी सम्पूर्ण मन्त्रों और वेदोंकी अधिकारिणी नहीं हैं, तथापि भगवान्की प्राप्तिमें उनका भी अधिकार है ही- नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधन क्रियादिभेदः । (नारदभक्तिसूत्र ७२) 'भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादिसे होने- वाला भेद नहीं है। शबरीमें स्त्रीत्व होनेपर भी शूद्रत्व और पापयोनित्व भी है । बह कहती है- अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह मह मैं मतिमंद अघारी ॥ अधम अर्थात् ब्राह्मणकी अपेक्षा नीचा क्षत्रिय, उससे अधम वैश्य. उससे अधम शूद्र और उससे अति अधम शबर जाति तथा शबर जातिकी स्त्रियोंमें फिर मन्दमति । शबरीकी ऐसी अभिमानशून्य वाणी सुनकर श्रीरघुनाथजी कहते हैं- जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चनुराई ।। भगति हीन नर लोह्इ कसा । दिनु जल वारिद देखिअ जैसा कह रघुपति सुनु भामिनि वाता। मानउँ एक भगति कर नाता ॥ जी० क०५- - ६६ जीवनका कर्तव्य भगवान् तो केवल भक्तिका नाता मानते हैं। 'भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः ।। भगवान् तो केवल भक्तिसे संतुष्ट होते हैं, गुणोंसे नहीं। वे तो भावग्राही हैं । भगवान्के आगे पण्डिताईका जोर नहीं चलता----- मन्दो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे। उभयोश्च फलं तुल्यं भावनाही जनार्दनः ॥ किस भावसे कौन क्या कर रहा है, इसे भगवान् जानते हैं। जो कोई प्रेमसे भावान्की ओर दौड़ता है, उसकी ओर भगवान् भी दौड़ पड़ते हैं। यहाँतक भगवान्ने आचरणों और जातिसे नीचके उद्धारकी बात बतायी तथा मध्य श्रेणीके स्त्री, वैश्य और शूद्रोंकी सद्गतिका भी वर्णन किया । अब भगवान् यह बता रहे हैं कि जब पापयोनिवाले एवं स्त्री, वैश्य और शूद्र भी भक्तिसे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, तब जो आचरण और जाति दोनोंसे ही पवित्र हैं, उनका भक्तिसे उद्धार होना कौन बड़ी बात है ! किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजपयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ (गीता ९ । ३३) इसमें 'कैमुतिक' न्याय है। अर्थात् जब स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा दुराचारी और पतित जातिवालोंका भी उद्धार हो जाता है, तब पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और क्षत्रिय यदि भगवान्के भक्त हों तो उनके उद्धारके विषयमें तो कहना ही क्या है। यदि कोई जातिसे ब्राह्मण और क्षत्रिय हों, पवित्र आचरणवाले भी हों, परंतु भक्त न हों,तो गीनाम भक्ति और उसके अधिकारी - उनके उद्धारकी गारंटी भगवान् नहीं लेते। इस इलोको भगवान्ने आचरण और जाति दोनोंसे ही उत्तम पुरुषोंको यतिका अधिकारी बतलाया है; क्योंकि पहले कहा है कि जो आचरण अथवा जाति दोनॉन ही नीच हो, वे भी मेरे भक्त बन सकते हैं तथा जो दोनोंसे ऊँचे हों, उनकी तो बात ही क्या है। इस प्रकरणमें मलिक साथ अधिकारी बनाये गये हैं। इनमें कोई काम नहीं है । (१) आचरणोंये नीच, (२) जातिले नीच, ( ३) ही, (४) वैश्य, (५) शद्र, (६) पवित्र ब्राह्मण और (७) राजर्षि ! इन सात अधिकारियोंके ही अन्तर्गत सभी मनुष्य आ जाने हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवानकी भक्रिके सब अधिकारी हैं। भगवान्ने भक्तिके अधिकारी बालाकर ३३के उत्तरार्द्ध में कहा है- 'अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ।' अर्थात् 'नाशवान् एदं सुवरहित मानव-शरीरको प्राप्त करके मेरा भजन का। इसक्ती अनित्य तथा क्षणभर इसलिये कहा कि इसका कोई भरोसा नहीं है ! पता नहीं कर नष्ट हो जाय । इसलिये भगवान् चेतावनी देते हैं कि इस शरीर के रहते-रहने मुझे प्राप्त कर लेना चाहिये । भागवत भी कहा है- सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुप्यमर्थदनित्यमद तृणं यतेत न पतदनुमृत्यु याव- निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ (११११।२१) अर्थात् 'बहुत-से जन्मों के अन्तमें बहुत-से प्रयोजन सिद्ध करनेवाले लन्ध्या धीरः ।

६८ जीवनका कर्तव्य इस अत्यन्त दुर्लभ किंतु अनित्य मानव-शरीरको पाकर जबतक मृत्यु न आये, उससे पहले जल्दी-से-जल्दी आत्म-कल्याणके लिये यत्न करना चाहिये; क्योंकि विषय तो निश्चय ही सर्वत्र मिल सकते हैं, परंतु भगवान् नहीं ।' गीताके आठवें अध्यायमें तो इसे भगवान् 'दुःखालयमशाश्वतम्' कहते हैं, फिर दुःखालयमें सुख कहाँ ! जिस प्रकार पुस्तकालयमें औषधि और औषधालयमें कपड़े नहीं मिल सकते, ठीक उसी प्रकार इस दुःखमय संसार में सुख नहीं मिल सकता । सुख है ही नहीं। मनुष्यको जबतक किसी बातकी उत्कट इच्छा नहीं होती तबतक किसी पदार्थमें ऐसी शक्ति नहीं जो उसे सुख दे सके । इसलिये पदार्थोके सुखके लिये पदार्थविषयक उत्कट इच्छा और इच्छाके लिये अभावका अनुभव परम आवश्यक है और अभाव- की अनुभूतिमें सुखका नाम-निशान नहीं, दुःख-ही-दुःख है । एक ही अवस्थामें दो पुरुष एक ही साथ जा रहे हैं। दोनोंकी वेष-भूषा एक ही है । दोनोंके पास जूता नहीं, छाता नहीं। दोनोंके पास फटे कपड़े हैं । दोनों एक-से हैं पर उनमेंसे एक विरक्त है, एक अभावग्रस्त है। विरक्त पुरुष के भीतर दुःखका नाम नहीं है और अभावग्रस्त पुरुषके पास सुखका नाम-निशान नहीं है, वह वस्तुओंके अभावकी अनुभूति- से निरन्तर व्यथित रहता है । उसीको ही क्षणभङ्गुर पदार्थ क्षणिक सुख दे सकते हैं, विरकको नहीं; क्योंकि विरक्तको पदार्थोका सर्वथा अभाव होनेपर भी अभावकी अनुभूति नहीं है । अर्थात् विरक्त किसी वस्तुकी आवश्यकता ही नहीं समझता, ऐसी स्थितिमें किसी पदार्थमें ऐसी शक्ति नहीं है जो उसे सुख दे सके । तात्पर्य यह कि अभावकी अनुभूति न होनेपर विषय सुख नहीं दे सकेगा । ।

गीताम भक्ति और उसके अधिकारी जिसे रुपयेकी चाहना नहीं, उसे रुपया सुग्छ नहीं दे सकता । जिसे स्त्रीकी इच्छा नहीं, उन्ले स्त्री सुख नहीं दे सकती । सुख लेनेवालेको अपने लिये अभावकी अनुभूति आवश्यक है। इससे सिद्ध हुआ कि पदार्थकी अनुपस्थितिमें भी पदार्थ दुःख देते हैं । मिलनेपर उनके नाशकी शङ्का हरदम बनी रहती है। न्यूनता खटकती रहती है, वही पदार्थ दूसरोंके पास अधिक मात्रामें अपनी अपेक्षा अधिक सुन्दर देखकर जलन होती है । पदार्थ नष्ट हो जाने पर भी दुःख ही देते हैं । लड़केके न रहनेपर दुःख होता है। पैदा होने पर उसके रोगादिसे दुःख होता है। लड़केकी मृत्यु हो जानेपर उसकी स्मृति किस प्रकार कलेजेमें कसक पैदा करती है, यह अनुभवी पुश्योंसे छिपा नहीं है । मनुष्य उसके वियोगमें जो रोता-कळपता है, उस दुःखकी क्या बात कही जाय । सांसारिक सुख भी दु:खके ही कारण हैं। एक मनुष्य ऐसा है, जिसका सुख छिन गया है। दूसरा ऐसा है, जिसको आरम्भसे वह मुग्ख नहीं मिला। वर्तमान समयमें दोनोंकी एक-सी अवस्था है; किंतु पहलेको जैसा दुःख होता है, वैसा दूसरेको नहीं । इसका कारण यह है कि वह वस्तु उसके पास पहले नहीं है, जिसके लिये वह दुःस्व करता है। इसलिये पढार्थ रहें, नन्द भी दुःख होता है; न रहें, तब भी दुःख होता है और रहकर चले जाय, तब भी दुःख लटाना पड़ता है । इसीसे भगवान् इस संसारको असुख, नगर और दुःखालय कहते हैं। अतः इस मानव-शरीरका फल भगवद्भजन ही है, विषय-सेवन नहीं.

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जीवनका कर्तव्य
दर्शनसे भगवान् याद आ जाते हैं, जिस प्रकार सिपाहीके देखनेसे
राजा याद आ जाता है और जब भजन-चर्चा चलती है, तब
'खूब गुजरेगी, मिल बैठेगे दीवाने दो' वाली कहावत चरितार्थ होती
है । अर्थात् भगवान्का निरन्तर चिन्तन होने लगता है। भगवञ्चर्चा
चलती है तो मन उसमें रम जाता है । कण्ठ गद्गद हो जाता है,
नेत्रोंसे आँसू आने लगते हैं । गोस्वामीजी कहते हैं...-
हिय फाटउ फूटहुँ नयन, जरउ सो तन केहि काम ।
द्वै सवै पुलकै नहीं तुलसी सुमिरत
भागवतमें भी कहा है-
तदश्मसारं हृदयं बतेदं यद् गृह्यमाणहरिनामधेयः ।
न विक्रियेताथ यदाविकारो नेत्रे जलं गात्ररुहेपुहर्षः॥
(२।३।२४)
कबीरदासजी भी कहते हैं-
सुमिरन सों सुधि लाइए, ज्यों सुरभी सुत माहि ।
कह कबीर चारो चरत छिनहूँ बिसरत नाहिं ।।
ऐसा नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेके लिये भगवान् कहते हैं ।
यह एक बात हुई।
दूसरी बात है- 'मद्भक्तो भव' इसका तात्पर्य यह है कि
मेरी भाज्ञाका प्रेमपूर्वक पालन कर ।
अग्या सम न सुसाहिब सेवा ।
भगवान्का आज्ञापालन ही सेवा है। आदरपूर्वक भगवान्की
एक आज्ञा पालन करनेसे ही भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं-

गीतामै भक्ति और उसके अधिकारी सो सेवक प्रियतम मम सोई । सम अनुसासन मानइ जोई ॥ है भगवान्की प्रसन्नता प्राप्त होनेपर फिर क्या बाकी रह सकता है। एक पिताके कई लड़के हैं। उनमें पिताको अत्यन्त प्यारा वह होगा, जो पिताकी आज्ञाका पालन करेगा । गुरुसे वही शिष्य विशेष लाभ उठायेगा, जो गुरु-आज्ञामें तत्पर होगा। आज्ञा-पालनसे पूज्यकी सारी शक्ति आज्ञा-पालकमें उतर आती है । इस विषयमें यह बात विशेष समझनेकी है कि श्रद्धेय पुरुष जिस क्षण किसी बातके लिये आज्ञा दें, उसी क्षण उसका पालन करना चाहिये । इससे विशेष लाभ होता है। असली आज्ञा वही है, जो मालिकके अनुकूल हो, हमारे लिये भले ही प्रतिकूल हो । इसी तरह भगवदाज्ञा- पालन करनेवाला ही भगवद्भक्त यहाँ प्रश्न होता है कि भगवान् तो प्रत्यक्ष नहीं; फिर उनकी आज्ञाका पता कैसे लगे ! तो इसका उत्तर यह है कि भगवदाज्ञाका पता लगानेके लिये चार उपाय हैं । एक तो सत्-शाल- वेद, पुराण, ऋषिप्रणीत ग्रन्थ । इनमें जिनके लिये जो कर्तव्य बताया गया है, वही करना चाहिये । ऋषि- मुनियोंने सत्-शान्त्र भगवान्का आशय समझकर ही लिखे हैं । इसलिये भगवान् भी कहते हैं- नरमाच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थिती। शात्या शास्त्रविधानोत कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ गीता १६ । २४) इससे तेरे लिये कर्नर मात्र ही ७६ जीवनका कर्तव्य श्रीविग्रहका तथा सब जीवोंको भगवान्का स्वरूप समझकर उनकी जो सेवा करनी है, वही भगवान्की पूजा है । भगवान् कहते हैं--- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥ ( १८ । ४६) 'जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोद्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धिको प्राप्त करता है।' ऐसी पूजा तथा अपना सब कुछ भगवान्के समर्पण कर देना ही 'मद्याजी' का तात्पर्य है। भगवान्ने कहा- 'तू सर्वस्व मेरे ही समर्पण कर दे । अर्थात् अपने मनसे कल्पना की हुई ममता उठा ले । संसारकी सभी वस्तुएँ परमात्माकी ही हैं। किसी भी वस्तुको न तो हम साथमें लाये हैं, न ले जायेंगे तथा इन वस्तुओंको रखनेमें भी हम स्वतन्त्र नहीं हैं। मनकी इच्छाके अनुसार रख नहीं सकते। फिर हमारा क्या है, केवल भूलसे ही वस्तुओंपर अपनापन । उसको उठा लेना ही भगवदर्पण करना है। यह तीसरी बात हुई । ( ४ ) चौथो है-मां नमस्कुरु ।' इसका तात्पर्य है आत्म- समर्पण अर्थात् भगवान्के विधानमें संतोष । जब अपराधी जिसका अपराध किया है, उसके चरणों में गिरकर कहता है--'सरकार ! जो इच्छा हो करें' तब उस अपराधीका कोई अधिकार नहीं रह जाता । इसी प्रकार नमस्कार करनेवाला भगवान्के सामने अपना कोई अधिकार नहीं समझता । उनकी मर्जी हो, वैसे रक्खें। वैसे हमने एक यन्त्र किसीको दे दिया । अब वह उसे चाहे जैसे बरत सकता है। हैं गीतामें भक्ति और उसके अधिकारी उसका उसपर पूर्ण अधिकार है । हमें आपत्ति क्यों हो। इस प्रकार भगवान्का भक्त भगवान्को अर्पित हो जाता है। उसपर भगवान् सुख या दु:ख-जो भेज दें, वह सबमें प्रसन्न ही रहता है । वह सुग्दकी अपेक्षा दुःख पानेपर और प्रसन्न होता है; क्योंकि वह समझता है कि भगवान् मुझपर बड़े प्रसन्न हैं, तमी तो सब क्रियाएँ निस्संकोच करते हैं। हमारी इन्द्रिय-मन-बुद्धिपर ध्यान न देकर अपने मनकी करते हैं। भगवान् हमारे लिये बही करते है, जिसमें हमारा परम हित है। हमें वह भले ही विपरीत दिग्वायी दे, पर भगवान्के काोंमें कहीं भी भूलकी गुंजाइश नहीं है । भगवान् हमपर दुःख भेजते हैं, इसमें हमारे कई लाभ हैं। एक तो हम पापोंसे सावधान होते हैं, क्योंकि भगवान् पापोंके फलरूपमें पापोंक नाशके लिये दुःख देते हैं । दुःखको पापोंका फल समझकर हम फिर पाप करनेसे डरेंगे । भगवान्की कितनी दया है ! दूसरा लाभ यह है कि प्रभु हमें अपनाने के लिये परम पवित्र बना रहे हैं। जैसे सुनार जिस सोनेको अपनाना चाहता है, उसे तपाकर और अधिक शुद्ध करता है। अथवा जैसे माता अपने बच्चेक मलको घोती है, साफ करती है; क्योंकि उसको अपने हृदयसे लगाना है, गोद में लेना है । इस प्रकार कृपालु भगवान् भी अपने भक्तको कट देकर उसे पवित्र करते हैं। यही भगवान्के शरण होना है। भगवान् कहते हैं कि तु इस प्रकार मेरे शरण होकर मुझे ही प्राप्त कर लेगा। यही शरणागति है और मत्परायणः' कहकर इसीका वर्णन किया गया है।

भगवद्भक्तिका रहस्य
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम वपु एक ।
इनके पद बंदन किएँ नासत बिन अनेक ॥
( १ ) भक्तिका मार्ग बतानेवाले संत 'गुरु', ( २ ) भजनीय
भगवान्', (३) भजन करनेवाला 'भक्त' तथा ( ४ ) संतोंके
उपदेशके अनुसार भक्तकी भगवदाकार वृत्ति भिक्ति है। नामसे
चार हैं, किंतु तत्त्वतः एक ही हैं।
जो साधक दृढ़ता और तत्परताके साथ भगवान के नामका
जप और स्वरूपका ध्यानरूप भक्ति करते हुए तेजीसे चलता है,
वही भगवान्को शीघ्र प्राप्त कर लेता है।
नो जिव चाहे मुक्तिको तो सुमरीजे राम ।
हरिया गैल चालताँ जैसे आवे गाम ।।
(१) इस भगवद्भक्तिकी प्राप्तिके अनेक साधन बताये गये
हैं। उन साधनोंमें मुख्य है--संत-महात्माओंकी कृपा और उनका
सङ्ग । रामचरितमानसमें कहा है-
भक्ति सुतंत्र सकल गुन खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥
भक्ति तात अनुपम सुख मूला । मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ॥
उन संतोंका मिलन भगवत्कृपासे ही होता है। श्रीगोखामीजी
कहते हैं-
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥
। बिनुहरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
। सतसंगति संसृति कर भंता ॥

भगवद्भक्तिका रहस्य
७५
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असली भावप्रेमका नाम ही भक्ति है। कहा भी है-
पन्दगार सुनु ग्रंम सस
न दृसर आन।
अल विचारि पुनि पुनि मुनि करत राम गुन गान ।।
इस प्रकारक प्रेमको प्राप्ति संतोंके सबसे अनायास ही हो
जाती है क्योंकि संत-महात्माओंके यहाँ परम प्रभु परमेश्वरके गुण,
प्रभाव, तत्त्व, रहस्यकी कथाएँ होती रहती हैं। उनके यहाँ यही
प्रसन्न चलता रहता है। भगवान्की कथा जीवोंके अनेक जन्मों में
किये हुए अनन्त पापोंकी राशिका नाश करनेवाली एवं हृदय और
कानोंको अतीव आनन्द दनकाली है। जीवको यज्ञ, दान, तप,
तीर्थ भादि बहुत परिश्रमसाध्य पुण्य-साधतोंके द्वारा भी वह
लाभ नहीं प्राप्त होता, जो सत्सङ्गसे अनायास ही हो जाता है;
क्योंकि प्रेमी संत-महात्माओंके द्वारा कथित भगवत्कयाके श्रवणसे
जीवोंके पापोंका नाश हो जाता है। इससे अन्तःकरण अत्यन्त
निर्मल होकर भगवान्के चरणकमलोंमें सहज ही श्रद्धा और
प्रीति उत्पन्न हो जाती है। भक्तिका मार्ग बतानेवाले संत-महात्मा
ही नन्तिमार्गके गुरु हैं। इनके लक्षणोंका वर्णन करते हुए
श्रीमद्भागवत में कहा है-
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः
सर्वदेहिनाम् ।
सत्यलारोऽनवद्यात्मा नुमः सवोपकारका ॥
कासंग्हतधीदान्तो मृदुः शुचिरकिञ्चनः।
अनीहो मितभुक शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ।।
सप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितपडगुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैनः कारुणिकः कविः ॥
(११ । ११ । २९-३१)

जीवनका कर्तव्य , , 'भगवान्का भक्त कृपाल, सम्पूर्ण प्राणियोंमें वैर-भावसे रहित, कष्टोंको प्रसन्नतापूर्वक सहन करनेवाला, सत्यजीवन, पापशून्य, समभाववाला, समस्त जीवोंका सुहृद्, कामनाओंसे कभी आक्रान्त न होनेवाली शुद्ध बुद्धिसे सम्पन्न, संयमी, कोमलखभाव, पवित्र, पदार्थोंमें आसक्ति और ममतासे रहित, व्यर्थ और निषिद्ध चेष्टाओंसे शून्य, हित-मित-मध्य-भोजी, शान्त, स्थिर, भगवत्परायण, मनन- शील, प्रमादरहित, गम्भीरखभाव, धैर्यवान्, काम-क्रोध-लोभ-मोह- मंद-मत्सररूप छः विकारोंको जीता हुआ, मानरहित, सबको मान देनेवाला, भगवान्के ज्ञान-विज्ञानमें निपुण, सबके साथ मैत्रीभाव रखनेवाला, करुणाशील और तत्त्वज्ञ होता है।' ऐसे भगवद्भक्त ही वास्तवमें भक्तिमार्गके प्रदर्शक हो सकते हैं। (२) इस जीवको संसारके किसी भी उच्च-से-उच्च पद या पदार्थकी प्राप्ति क्यों न हो जाय, इसकी भूख तबतक नहीं मिटती, जबतक यह अपने परम आत्मीय भगवान्को प्राप्त नहीं कर लेता; क्योंकि भगवान् ही एक ऐसे हैं, जिनसे सब तरहकी पूर्ति हो सकती है । उनके सिवा सभी अपूर्ण हैं। पूर्ण केवळ एक वे ही हैं और वे पूर्ण होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति बिना कारण ही प्रेम और कृपा करनेवाले परम सुहृद् हैं, साथ ही वे सर्वक और सर्वशक्तिमान् भी हैं। कोई सर्वसुहृद् तो हो पर सब कुछ न जानता हो, वह हमारे दुःखको न जानने के कारण उसे दूर नहीं कर सकता और यदि सब कुछ जानता हो पर. सर्वसमर्थन हो तो भी असमर्थताके कारण दुःख दूर नहीं कर सकता । ,

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भगवद्भक्तिका रहस्य
एवं सब कुछ जानता भी हो और समर्थ भी हो, तब भी
यदि मुद् न हो तो दुःख देखकर भी उसे दया नहीं आती,
जिसमे बह हमारा दुःख दूर नहीं कर सकता। इसी प्रकार सुहृद्
भी हो अर्थात दयालु भी हो और समर्थ भी हो, पर हमारे दुःखको
न जानता हो, तो भी काम नहीं होता तया मुहृद् और सर्व
हो, पर समर्थ न हो तो वह हमारे दुःखको जानकर भी दुःख
दूर नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी दुःखनिवारणकी सामर्थ्य ही
नहीं । किंतु भगवान्में उपयुक्त तीन बातें एक साथ हैं।
(३, उन सबसुहृद्, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् भगवान्पर ही
निभर होकर जो उनकी भक्ति करता है, वही भक्त है । भगवान्की
भक्तिक अधिकारी सभी तरहके मनुष्य हो सकते हैं। भगवान्ने
गोनाके नत्र अन्यायके ३०३, ३२वें और ३३२ इलोको बतलाया
है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद, स्त्री, पापयोनि और दुराचारी-
ये सातों ही मेरी भक्तिके अधिकारी हैं।
अपि चन् सुदुराचारो भजते सामनन्यभाक ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ख्यवसितो हि सः ॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
नियो वेश्यास्तथा शूद्वान्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
किं पुनीह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्पयस्तथा ।
'यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त
होकर तुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि
बद्द यथार्थ निश्चयवाला है-अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर
लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।'
जी० क०६--

८२ जीवनका कर्तव्य 'हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि---चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परम गतिको ही प्राप्त होते हैं।" 'फिर इसमें तो कहना ही क्या है कि पुण्यशील ब्राह्मण तया राजर्षि भक्तजन मेरे शरण होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं।' यहाँ भगवान्ने जातिमें सबसे छोटे और आचरणोंमें भी सबसे गिरे हुए—दोनों तरहके मनुष्यों को ही भगवद्भक्तिका अधिकारी बतलाया । यद्यपि विधि-निषेधके अधिकारी मनुष्य ही होते हैं, तो भी 'पापयोनि' शब्द तो इतना व्यापक है कि इससे गौणीवृत्तिसे पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी लिये जा सकते हैं । अब रहे भावसे होनेवाले अधिकारी। श्रीमद्भागवत में बतलाया है कि कोई भी कामना न हो या सभी तरहकी कामना हो अथवा केवल मुक्तिकी ही कामना हो, तो भी श्रेष्ठ बुद्धिवाला मनुष्य तीव्र भक्तियोगसे परम पुरुष भगवान्की ही पूजा करे-- अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ (२।३ । १०) यहाँ 'अकामासे ज्ञानी भक्त, 'मोक्षकामासे जिज्ञासु तथा 'सर्वकामासे अर्थार्थी और आर्त भक्त समझना चाहिये । ज्ञानी भक्त वह है जो भगवान्को तस्वतः जानकर स्वाभाविक ही उनका निष्कामभावसे नित्य-निरन्तर भजन करता रहता है । जिज्ञासु भक्त उसका नाम है, जो भगवत्तत्त्वको जाननेकी इच्छासे उनका भजन करता है। अर्थार्थी भक्त वह होता है, जो भगवान्पर ,

भगवद्भक्तिका रहस्य
८३
भरोसा करके उनसे ही संसारी भोग-पदार्थीको चाहता है, और आर्त
भक्त वह है, जो संसारके कष्टोंसे उन्हीं के द्वारा त्राण चाहता है ।
गीलामें इन्हीं भक्तोंके सकाम और निष्काम भावोंके तारतम्यसे
चार प्रकार बतलाये हैं-
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आतों जिज्ञासुर्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।
(७ । १६)
'हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी,
आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको
भजते हैं।
इनमें सबसे निम्नश्रेणीका भक्त अर्थार्थी हैं, उससे ऊँचा
आत, आर्तसे ऊँचा जिज्ञास्तु और जिज्ञासुसे ऊँचा ज्ञानी है।
भोग और ऐश्वर्य आदि पदार्थोंकी इच्छाको लेकर जो भगवान्की
भक्तिमें प्रवृत्त होता है, उसका लक्ष्य भगवद्भजनकी ओर गौण
तथा पदार्थोकी ओर मुख्य रहता है; क्योंकि वह पदार्थोके लिये
भगवान्का भजन करता है, न कि भगवान् के लिये। वह भगवान्को
तो धनोपार्जनका एक साधन समझता है, फिर भी भगवान्पर
भरोसा रखकर धनके लिये भजन करता है, इसलिये वह भक्त
कहलाता है।
जिसको भगवान् स्वाभाविक ही अच्छे लगते हैं और जो
भगवान्के भजनमें स्वाभाविक ही प्रवृत्त होता है, किंतु सम्पत्ति-
वैभव आदि जो उसके पास हैं, उनका जब नाश होने लगता है
अथवा शारीरिक कष्ट आ पड़ता है; तब उन कष्टोंको
दूर
करनेके

८६ जीवनका कर्तव्य इससे यह सिद्ध हुआ कि चाहे जैसे भी हीन जन्म, आचरण और भाववाला मनुष्य क्यों न हो, वह भी भगवद्भक्तिका अधिकारी हो सकता है। भगवान के साथ अपनेपनको लेकर उनपर दृढ़ विश्वासका होना---यह भक्तहृदयका प्रधान चिह्न है । भक्तोंका हृदय सम्पूर्ण जगत् में अव्यक्तरूपसे परिपूर्ण रहनेवाले परमात्माको आकर्षित करके साक्षात् मूर्तरूपमें प्रकट कर लेता है, जैसे भक्त ध्रुव और प्रह्लादके लिये भगवान् साक्षात् प्रकट हो गये थे। उन सर्वेश्वर प्रभुमें भक्तका हृदय धारावाहिकरूपसे तन्मय हो जाता है । इस प्रकार हृदयकी तल्लीनता तो मारीच, कंस, शिशुपाल आदिकी भाँति भय और द्वेष आदिके कारण भी हो सकती है। किंतु वह तल्लीनता, भक्तिमें परिणत नहीं हो सकती; क्योंकि उसे भक्तिरसके आनन्द का अनुभव नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति सर्वलोकपावनी गङ्गाजीमें वैशाखमासमें स्नान करता है तो गङ्गास्नानसे उसके पापोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे स्नान करनेमें भी प्रत्यक्ष ही अर्व रसानुभूति- आनन्दानुभव होता है, किंतु जो माघमासमें गङ्गास्नान करता है, उसके पापोंका तो अवश्य नाश हो जाता है, पर शीतके कारण उसे स्नान करने में आनन्द नहीं आता, प्रत्युत उसका आनन्दांश तिरस्कृत होकर उसे कष्टका अनुभव होता है । इसी तरह भय- द्वेष आदिके कारण भगवदाकार अन्तःकरणवालोंका आनन्दांश तिरोहित होकर उनका हृदय दुःखित और चिन्तित रहता है।

। भगवद्भक्तिका रहस्य इसलिये उनके अन्तःकरणकी तदाकारता भक्तिमें शामिल नहीं है। अतः भगवान के प्रति आत्मीयताको लेकर दृढ़ विश्वास और प्रेमपूर्वक जो अन्त:करणका भगवदाकार हो जाना है, वहीं भक्ति ई। किंतु नास्तिकोंकी अपेक्षा तो भय-हेप आदिको लेकर भगवान्- का चिन्तन करनेवाले भी अच्छे हैं । फिर उनका तो कहना ही क्या है जो भगवान्का श्रद्धा-प्रेमपूर्वक निरन्तर निष्काम अनन्य सजन करते हैं। जिस प्रकार गङ्गाकी चाल स्वाभाविक ही निरन्तर समुद्रकी शोर है, इसमें न तो उसका अपना कोई प्रयोजन है और न बहू काही टहरती ही है, इसी प्रकार अनन्य भक्त न तो कुछ चाहते ही हैं और न वहीं भगवत्स्मरणसे बिराम ही लेते हैं; त्रे तो नित्य निरन्तर निष्कामभावसे भजन ही करते रहते हैं। श्री- नारदजीने भी कहा है. 'भक्ता एकान्तिनो मुख्याः।' ( सूत्र ६७) ( ४ ) एकमात्र भगवान्को इष्ट मानकर उन्हींकी अनन्य भक्ति करना ही सर्वश्रेष्ट भक्ति है । इसलिये सम्पूर्ण जगत्को भगवान्का न्वरूप समझकर भी ऐसी भक्तिका साधन किया जा सकता है; क्योंकि वयं भगवन् ही जगत् के रूपमें प्रकट हुए हैं, इसीलिये यह सारा ब्रह्माण्ड भगवान् का ही स्वरूप है एवं देवता आदिमें भगवान्की बुद्धि करके भी भक्ति की जा सकती है और इसका फल भी भगवत्प्राप्ति ही है। इस प्रकारकी भगवान्की भक्ति करनेवालेमें दो बातें प्रधान होनी चाहिये---साधकमें हो निष्कामभाव और उपास्यमें हो भगवद्बुद्धि । इससे भगवान्की प्राप्ति निश्चय ही हो जाती है। किंतु समस्त जगत्में भगवद्बुद्धि न होकर भी साधकमें पूर्ण निष्कामभाव हो तो ९० जीवनका कर्तव्य बहुत देरतक युद्ध किया, पर वे भी राजाके बाणके आघातसे मूञ्छित होकर स्थपर गिर पड़े। यह देखकर सुग्रीव उनसे लड़ने गये, पर राजाने उनको भी रामास्त्रका प्रयोग करके बाँध रिया । तदनन्तर राजा सुरथ उन सबको रथमें डालकर अपने नगरमें ले गये । वहाँ जाकर वे राजसभामें बैठे और बंधे हुए हनुमान्जीसे बोले-'पवनकुमार ! अब तुम भक्तोंके रक्षक परम दयालु श्रीरघुनाथजीका स्मरण करो, जिससे सन्तुष्ट होकर वे तुम्हें तत्काल बन्धनमुक्त कर दें।' श्रीहनुमान्जीने अपने-सहित सब चीरोंको बंधा देखकर कमलनयन परम कृपालु श्रीरामचन्द्रजीका अनन्यभावसे स्मरण किया । वे मन-ही-मन कहने लगे....- हा नाथ हा नरवरोत्तम हा दद्यालो सीतापते रुचिरकुण्डलशोभिवक्त्र। सक्कार्तिदाहक मनोहररूपधारिन् मां बन्धनात् सपदि मोचर मा विलम्बम् ॥ ( पा० पाताल० ५३ । १४ ) 'हा नाथ ! हा पुरुषोत्तम ! हा सुन्दर कुण्डलसे सुशोभित बदनवाले, भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले तथा मनोहर विग्रह धारण करनेवाले दयालु सीतापते ! मुझे इस बन्धनसे शीघ्र मुक्त कीजिये, देर न लगाइये ।। श्रीहनुमान्जीके इस प्रकार प्रार्थना करते ही तुरंत भगवान् श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर वहाँ आ पहुँचे । भगवान्को पधारे देख राजा सुरथ प्रेममग्न हो गये और उन्होंने भगवान्को सैकड़ों बार प्रणाम किया । श्रीरामने भी चतुर्भुजरूप - भगवद्भक्तिका रहस्य २१ धारण करके अपने भक्त सुरयको छातीले लगा लिया और आनन्द्राथुओं- से उसका मस्तक अभिषिक्त करते हुए कहा-'राजन् ! तुम धन्य हो । आज तुमने बड़ा पराक्रम दिखाया है। फिर भगवान ने श्रीहनु- मान्, मुन्नीब, शत्रुघ्न, पुष्कल आदि सभी योद्धाओंपर दयादृष्टि डाल- कर उन्हें बन्धन और मासे मुक्त किया। उन्होंने उठकर भगवानको प्रणाम किया । राजा सुरथने प्रसन्नतापूर्वक अपना राज्य भगवान रामको समर्पित कर दिया । भगवान् तीन दिन कुण्डळनगर में रहे, फिर राजा मुरथको ही राज्य सौंपकर उनकी सम्मति ले वहाँसे चले गये। तब राजा सुरय अपने राजमार चम्पकको राज्यभार देकर शनके साथ अश्वकी रक्षाके लिये चल पड़े। यहां हमें भक्त हनुमान् और राजा सुरथके भक्तिभावपूर्वक किये हुए स्मरणके प्रभावघर ध्यान देना चाहिये। उनकी अनन्य भक्तिये आकृष्ट होकर भगवान् तुरंत वहाँ पहुँच गये। भगवान्के प्रेमपूर्वक अनन्य स्मरणका बड़ा भारी माहात्म्प है । भक्त सुधन्वाको कथा दखिये, भगवान्के स्मरण के प्रभावसे अत्यन्त प्रतप्त तेल भी उनके लिये अतिशय शीतल हो गया तथा अर्जुनके साथ युद्ध करते समय भी उनमें जगह-जगह भगवत्स्मरणका प्रभाव दिखायी पड़ता है। जब अर्जुनने भगवान्का स्मरण करके तीन बाण निकालकर प्रतिज्ञा को कि इन तीन ही बाणोंसे मै सुधन्वाका मम्तक काट डालूंगा; यदि ऐसा न कर सकें तो मेरे पूर्वज पुण्यहीन होकर नरकमें गिर पड़ें। तब ठीक इसके विरुद्ध सुधन्याने भगवान्का स्मरण करके प्रतिज्ञा की कि इन तीनों ही वाणोंको मैं अपने बाणोंसे सब नाम-रूपोंमें एक ही भगवान् भारतीय संस्कृतिमें सबसे मुख्य वेद माने जाते हैं । वे अपौरुषेय हैं, अनादि हैं और सदा रहनेवाले--नित्य हैं। उनमें (कर्म, उपासना और ज्ञान ) तीन काण्ड माने जाते हैं। उन्हीं तीनोंका विशद एवं विस्तृत वर्णन पुराण और इतिहास-ग्रन्थों में मिलता है, जिनकी रचना सुन्दर-सुन्दर कथाओंके द्वारा सर्वसाधारण जनताको गम्भीर विषय सरलतासे समझाने के लिये श्रीव्यासदेवने कृपापूर्वक की है । ऐसे तो पुराण भी अनादि ही माने जाते हैं, पर इनका समय-समयपर जीर्णोद्धार होता रहा है । पुराणोंमें ही लेख मिलता है कि इनका कलेवर बहुत बड़ा था । उसको अल्पायु कलियुगी जीवोंके लिये संक्षिप्त रूप दिया गया है । इनमें सांसारिक तथा पारमार्थिक सर्वोपयोगी सभी विषयोंका बड़ा अच्छा वर्णन किया गया है। पढ़नेसे मालूम होता है कि दैवी-सम्पत्ति, आसुरी-सम्पत्ति, तीर्थ, व्रत, उपवास, यज्ञ, दान, तप, संयम, सेवा, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, स्त्रीधर्म, सामान्यधर्म, राजधर्म, प्रजाधर्म, जाति, देश, काल, समय, सम्बन्ध, परिस्थिति आदिको लेकर अवश्य- कर्तव्य कर्म आदि-आदि विषयों का गूढ आशयसहित विचित्र ढंगसे वर्णन हुआ है। साधारण रीतिसे देखनेपर कहीं-कहीं परस्पर बड़ा विरोध-सा मालूम देता है, जिसका साधारण मनुष्यों के द्वारा समाधान करना कठिन हो जाता है-इतनी ही बात नहीं, अपितु अपने अविवेकके कारण पुराणोंकी बातें पक्षपातपूर्ण, अनर्गल एवं असत्य प्रतीत होती हैं, जिससे मनमें सब लाम-रूपाम एकही भगवान् . नास्तिकता आ जाती है क्योंकि जब जहाँ जिस तीर्थ, व्रत आदिकी महिमा वर्णन करने लगते हैं, यहाँ उसीको सर्वोपरि बतला दिया जाता है। जैसे---श्रीगङ्गाजीकी महिमा आयी तो कहा- इसके समान न सरयू है, न तो पुष्कर है, न यमुना है, न तीर्थराज प्रयाग ही है और तीर्थराजका वर्णन करने लगे तो कहा कि इसके समान और कोई तीर्थ है ही नहीं न गया है, न यमुना है, न सरय है, न पुष्कर है। एक यही सम्पूर्ण तीयोंका राजा है । काशी-माहात्म्यमें आया है कि इस मोक्षदायिनी पुरीके समान तीर्थ इस त्रिलोकीमें कोई नहीं है । इसको बराबरीमें न सरयू है, न यमुना है, न पुष्कर; क्योंकि यह भगवान् शङ्करके त्रिशलपर बसी हुई है। ऐसे ही कार्तिक-माहात्म्य, वैशाख-माहात्म्य, मार्गशीर्ष-माहात्म्य तथा एकादशी आदि व्रतोंके विषयमें भी कथन है । इस प्रकार एकके द्वारा दूसरेका खण्डन हो जानेसे सबका खण्डन हो जाता है । कहीं-कहीं तो इसके अतिरिक्त भिन्न प्रकारसे ऐसा कहा है कि तीर्थयात्राका फल साधारण है, व्रतका विशेष, व्रतसे इन्द्रियसंयमका और इन्द्रियसंयमसे भजन भगवचिन्तनका और अधिक एवं भगवत्प्रेमका उससे भी अत्यधिक है। धर्मः खनुष्ठितः पुंसां विप्वक्सेनकथासु यः । नोत्पादयेद् यदि रसिं श्रम एव हि केवलम् ॥ आदि-आदि। इसका समाधान करने के लिये दो विभाग कर लेने चाहिये कि पूर्वका वर्णन निष्टाकी दृष्टि से है और दूसरा वर्णन वस्तु-तत्त्व- दृष्टिसे । अतः इसमें कोई विरोध नहीं है। निष्ठाका तात्पर्य है---- एक मनुष्यविशेषकी किसी इष्टपर हृदयकी दृढ़ धारणा । उस . जीवनका कर्तव्य धारणाको अत्यधिक दृढ़ करने के लिये ही पहला वर्णन है। इससे हृदय-प्रधान साधककी वृत्ति सब ओरसे हटकर एक इष्टमें लग जाती है और उसीमें सर्वोपरि अनन्य भावना हो जाती है, ऐसा होनेसे जब सर्वोपरि परमात्मा प्रकट हो जाते हैं, तब या तो उसे सारा यथार्थ तत्त्व भगवान् समझा देते हैं या वह स्वयं उसकी समझमें आ जाता है। कहा भी है- आदि अन्त जन अनतके सारे कारज सोय। जेहि जिव उर नहचो धरै तहि ढिग परगट होय ॥ फिर उसके लिये कुछ भी करना-जानना शेष नहीं रह जाता। वह कृतकृत्य और ज्ञातज्ञातव्य हो जाता है। दूसरे प्रकारका वर्णन वुद्धिप्रधान तर्कशील मनुष्यों के लिये है। उप्तपर विश्वास करके चलनेवाला क्रमशः एकसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे साधनद्वारा यथार्थ स्थितिमें पहुँच जायगा । यदि तारतम्यताके विवेकद्वारा निःसन्दिग्ध होकर तेजीसे चलता रहेगा तो वह भी क्रमशः सब श्रेगियोंको पार करता हुआ उस पार पहुँचकर सदाके लिये कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य हो जायगा। सिद्धान्ततः बात यह है कि श्रीपरमात्मा एक हैं, वे ही अनेक जगह अनेक नामोंसे कहे गये हैं। वे अनेक जगह अनेक रूपोंमें रहते हुए भी हरेक जगह पूर्णरूपसे ही विराजमान हैं । जो उनको जिस भावसे, जिस रूपमें, जिस प्रकार चाहता है, वह वैसे ही उनको प्राप्त कर लेता है; क्योंकि वे भी उसे वैसे ही चाहते हैं। उनकी यह घोषणा है- . " X सब नाम-रूपों में एक ही भगवान् ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांत्तथैव भजाम्यहम् ।' अतः कोई चाहे किसी भी रीतिसे उनको भजे, यदि आजतक किसीने भी जिस प्रकारसे उपासना न की हो, ऐसे किसी नये ढंगकी उपासना भी कोई करे, तो भी प्रेमको पूर्णता होनेपर उसे परमात्माकी प्राप्ति अवश्य होगी, क्योंकि वह एकमात्र अपने प्रियतम परमात्माको ही चाहता है । उनके लिये जो कनक, कामिनी, आराम, मान, सत्कार, कीर्ति आदि लोक और परलोककी भोग- सामग्रियोंका त्याग करता है, किसी भी नाशवान् पदार्थको नहीं चाहता, सच्ची हार्दिक लगनसे सर्वोत्तम परमपुरुष पुरुषोत्तम भगवान्- को चाहता है, ऐसे साधकसे बिना मिले वे कैसे रह सकते हैं। कहनेका अभिप्राय यह है कि सच्ची लगन और ईमानदारीके साथ जिस तत्त्वको मनुष्य सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि, सर्वथा पूर्ण मानता है, उसका वह चाहे कैसा भी नाम-रूप क्यों न मानता हो, चाहे किसी भी प्रकार-विशेषसे उसकी सेवा, पूजा, उपासना क्यों न करता हो, भगवान् उसको अपनी ही उपासना, सेवा और पूजा मानते हैं; क्योंकि सर्वोपरि तत्त्व एक है और वही हैं भगवान् । साधककी समझमें भूल हो सकती है, परंतु भगवान्के यहाँ तो भूल नहीं होती । वे एकमात्र भावको ही देखते हैं। अतः श्रद्धालु साधकको चाहिये कि भगवान्के किसी भी रूप और नामपर पूर्ण विश्वास करके अनन्य प्रेमपूर्वक उनका स्मरण करता रहे, किसी भी अवस्थामें उनको भूले नहीं, तो प्राप्ति भगवान् की ही होगी। जी०क०७- -- १०२ जीवनका कर्तव्य . हैं, जो परमात्माके स्वरूपके साक्षात् द्योतक होते हैं, पर वे भी परमात्मा अनिर्देश्य होनेके कारण तटस्थ ही रह जाते हैं। और निषेध विशेषण उन्हें कहते हैं, जो परमात्मामें आकार, गुण, विनाश, किया. पदार्थ, देश, काल आदिका अभाव बतलाते हैं। परमात्माके सत्, चित्, आनन्द आदि 'विधेय' विशेषण कहे जाते हैं और निराकार, निर्गुण, अव्यय, अविनाशी, अक्रिय, अचल, अद्वैत, अप्रमेय, असीम, अपार, अनादि, अनन्त आदि विशेषण निषेध' कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्माका निर्गुण स्वरूप लक्षण और विशेषणोंसे रहित ही है। यह कहना भी समझनेके लिये ही है तथापि उस निर्गुण परमात्माके यथार्थ तत्त्वको बुद्धिसे पकड़नेके लिये ये विशेषण ही काम दे सकते हैं। इनके सिवा बुद्धिको परमात्माके नजदीक पहुँचाने के लिये अन्य कोई सहारा नहीं है । इसीलिये उनका वर्णन किया जाता है। सत्-तत्त्व सत् क्या है--जो हरदम रहे, हर वस्तुमें रहे और हर जगह रहे । भगवान्ने भी कहा है--'अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः' (गीता २ । २० )-'यह आत्मा अज, नित्य, शाश्वत और पुराण है ।' पर शब्दोंके द्वारा कैसे समझाया जाय । आखिर कोई भी समझायेगा तो हमारी भाषाका आश्रय लेकर ही हमें समझा सकता है । इसी तरह श्रुति भगवतो भो देश-कालको लेकर ही उसका लक्ष्य कराती है। श्रुति कहती है भगवन्तत्व - 'सदेव सोम्येदमत्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्'- (छा० उ०२१) इत्यादि। एकम् एव, अद्वितीयम् ---इन शब्दोंसे उस परमात्माको कामा: सजातीय, विजातीय और हात भेटोसे रहिन बतलाया है । मनुस्य सत्र एक होते हुए भी व्यक्तिरूपाने एक-एक अलग हैं- यह सजातीय भेद है । मनुष्य और वृक्ष--इनमें सजातीयता नहीं है, एक दूसरेसे भिन्न हैं, अतः यह विजानाय भेद है। यह मेरा हाथ है। पैर है। इस प्रकार अवश्योंका भंड स्वगतभेद है। परमात्मा इन सत्र भेदोंसे रहित ये भेद प्रकृति में है, परमात्मा प्रकृतिने अन्यन्त परे है। जिसमें कोई विकार नहीं, भेद नहीं, जो घटता-बढ़ता नहीं, जिसका कभी क्षरण नहीं होता, निसता कभी कहीं किञ्चिन्मात्र भी अभाव या परिवर्तन नहीं होता; जो सदा सर्वत्र सर्वथा एकरस, एकरूप और परिपूर्ण रहे और जिसमें कभी ननिक भी विकारकी सम्भावना हो न हो, वह 'सत्' है। उस परमात्माके सिवा जो कुछ भी लौकिक या अलौकिक पदार्थ दखने-सुनने और समशनमें आते हैं, उन सभीमें विचार करनेपर प्रत्यक्ष यह अनुभव होता है कि एक समय में ये वस्तुएँ नहीं धीं और किसी समय ये सब नहीं रहेंगी तथा एक देशमें होते हुए भी दूसरे देशमें उन चीजोंका अभाव मालूम होता है एवं वस्तु- का भेद तो प्रत्यक्ष है ही { परंतु सत्-वरूप परमात्मामें देश, काल, जीवनका कर्तव्य वस्तुका अत्यन्त अभाव होनेके कारण उसके देश-काल-वस्तु- निमित्तक अभावकी कभी सम्भावना भी नहीं हो सकती और खरूप- से तो वह परमात्मा सत् यानी नित्य विद्यमान है ही। इसीलिये उसे 'सत्' कहते हैं । इस 'सत्' तत्वका वर्णन गीताके दूसरे अध्यायके १२, १३, १७, २३, २४, २५, ८वें अध्यायके २०; १२वें अध्यायके ३; और १३वेंके २७वें श्लोकोंमें विशेष- रूपसे किया गया है। चित्-तत्व 'चित्' से चेतन, बोध, ज्ञान समझना चाहिये। चेन वह है, जहाँ जडताकी कभी किसी तरह भी जरा भी सम्भावना नहीं वह चेतन तो केवल चिन्मय बोधस्वरूप ही है। अभाव होनेके कारण उसमें ज्ञातापनका आरोप भी नहीं हो सकता । ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, द्रष्टा- दर्शन-दृश्य और प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय आदि भाव भी जिससे स्वाभाविक ही प्रकाशित होते हैं, ऐसा वह चेतन केवल एक दीप्तिमात्र ही है । साधारण लोग प्राण और चेष्टायुक्त जीवोंको चेतन कहते हैं तथा जिसमें प्राण और क्रिया नहीं होती, उसे जड कहते हैं; पर परमात्मामें क्रिया और प्राणके सम्बन्धसे होनेवाली चेतनता नहीं है, उसमें तो केवल चिति–जाननामात्र ही है। तात्पर्य यह कि वहाँ जडता, अज्ञान, मोह, अन्धकार आदि कुछ भी नहीं है, केवल चेतनमात्र ही है तथा वह भी स्वाभाविक खतः ही है। उस चित्-तत्त्वको समझनेके लिये एक बात कही जाती है। संसारमें दो पदार्थ हैं—(१) दीखनेवाला और (२) देखनेवाला। जडताका अत्यन्त , " भगवन्तत्त्व १०५ , है । उनका देखनेवाला चेतन है, दीखनेवाला जड है। देखनेवाला द्रष्टा है, दीखनेवाला दृश्य है । दृश्य दृश्य ही रहता है और द्रष्टा द्रष्टा ही। घट-पट आदि संसारके सम्पूर्ण पदार्थोको प्रकाश करनेवाले नेत्र हैं। घट-पटादिमें परिवर्तन होता है, उनका परस्पर भेद भी है, कभी उनका प्रकाश होता है तो कभी अप्रकाश । किंतु नेत्रों में कोई मेद न रहते हुए भी प्रकाशनशक्ति है। नेत्र भी मनके द्वारा प्रकाश्य हैं । अनः नेत्रों में भी अन्यता, मन्दता, पटुता आदि धर्म रहते हैं, उन धोको मन एकरूपसे देखता है । नेत्रोंका विकार मनमें नहीं भाता; क्योंकि नेत्र प्रकाश्य है और मन प्रकाशक है । मनसे भी आगे बुद्धितत्त्व है, वह एक रहता हुआ ही मनकी संकल्प-विकल्प आदि अनेक वृत्तियोंको निर्विकाररूपसे प्रकाशित करता है। इसलिये बुद्धि प्रकाशक और मन प्रकाश्य है। इसी तरह बुद्धिमें भी अज्ञता, विज्ञता आदि अनेक धर्म रहते हैं। अतः बुद्धि दृश्य और आत्मा दृष्य है, क्योंकि बुद्धि और बुद्धिगत विज्ञता-अज्ञता आदि धर्म निर्विकार आत्मासे ही प्रकाशित होते हैं और आत्मा किसीसे भी प्रकाशित नहीं होता । अर्थात् वह मन, बुद्धि, इन्द्रिय, शरीर आदि किसीका भी विषय नहीं होता। इसलिये वास्तविक द्रष्टा यही है। इसमें भी यह समझनेकी बात है कि आत्माकी द्रष्टा-संज्ञा दृश्यको लेकर ही है। अगर दृश्य नहीं हो तो आत्माकी द्रष्टा-संज्ञा भी नहीं रहती, बल्कि एक चेतनमात्र ही रह जाता है । वह फिर एकदेशीय नहीं रहता; क्योंकि वहाँ दुइयका-देश, काल, वरतुका सर्वथा अभाव है। वही परिपूर्ण 'चित्' तत्त्व कहा जाता है । इस चित्-तत्वका वर्णन गीतामें ५वें , जीवनका कर्तव्य तत्काल हो जाती है ( गीता ४ । ३९ ) तथा किसी भी विषयको हम जितना ही समझते हैं, उतना ही आनन्द उसे जाननेके साथ भी उत्पन्न हो जाता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि जानना और आनन्द--दो चीजें नहीं एक ही हैं । इसी प्रकार सात्विक आनन्द बहुत बढ़ जानेसे उस तत्त्वका ज्ञान भी अपने-आप ही हो जाता है ( गीता २ । ६५); क्योंकि वह आनन्द ही ज्ञानस्वरूप है। वहाँ उस ज्ञान-आनन्दकी सत्ता होनेसे वह स्वतःसिद्ध तो है ही । एवं परमात्माकी सत्ताका दृढ़ निश्चय हो जानेपर भय, अशान्ति आदि सब मिटकर साधकको परम आनन्द और परम शान्तिकी प्राप्ति हो जाती है और वह शीघ्र ही परमात्माका यथार्थ तत्त्व जान जाता है । इसीलिये सच्चिदानन्दस्वरूपसे निर्गुण-निराकार परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया जाता है। सगुण निराकार-तत्त्व सच्चिदानन्दघन निर्गुण पूर्ण ब्रह्म परमात्माके किसी एक अंशमें प्रकृति है, उस प्रकृतिसे युक्त होनेसे ही उस पूर्णब्रह्म परमात्माको सगुण- चेतन सृष्टिकर्ता ईश्वर कहते हैं, वही आदिपुरुष पुरुषोत्तम, मायाविशिष्ट ईश्वर आदि नामोंसे कहा जाता है। प्रकृतिको लेकर ही उसमें समस्त जीवोंकी स्थिति है। प्रकृति उस परमात्माकी एक अलौकिक दिव्य शक्ति है। उस शक्तिको लेकर ही परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टिका सृजन, पालन और संहार किया करते हैं । वे ही मायापति परमात्मा परिपूर्ण सर्वान्तर्यामी सच्चिदानन्दस्वरूप होते हुए भी वस्तुओंमें अस्ति, भातिा और प्रियरूपसे प्रतीत होते हैं। - अग्निकी सत्ता सभी जगह सामान्यल्पसे विद्यमान है, परंतु उसमें दाहिका और प्रकाशिका शक्ति विद्यमान रहते हुए भी समय-समयपर ही प्रकट होती हैं। काठ, दियासलाई आदि सबमें एक सत्ता हो प्रतीत होती है, चन्द्रमामें सत्ता और प्रकाश-दोनों प्रत्यक्ष दोखते हैं और सूर्यमें सन्ना, प्रकाश तथा दाह-तीनों प्रकटरूपसे दीखते हैं। इसी प्रकार भूत, भौतिक, जड़, चतन, स्थावर, जङ्गम-सभीमें परमात्माकी सत्ता तो सामान्यलय से प्रतीत हो रही है। पर चितिशक्तिका प्रकाश विशवतासे प्राणियों में ही देखा जाता है, जई चीजोंमें नहीं एवं आनन्दकी प्रतीति तो ज्ञानी महात्माओंमें ही विशेषरूप से प्रकट है, अन्य जगह यह लुप्त ही है। तमोगुणके कार्य जड़ पदार्थोमें भी सत्ता तो प्रकट है, किंतु तमोगुणकी अधिकता होनेके कारण वहाँ चिदंश और आनन्दांश तिरस्कृत । तथा सजीव प्राणियोंमें सत्ता और चेतनता प्रत्यक्ष दीखते हुए भी अज्ञतारूप तमोगुण और चञ्चलतारूप रजोगुणको अविकताकै कारण वहाँ आनन्दांश निरस्कृत है । जहाँ साधनले द्वारा रजोगुण-तमोगुण अंश दूर कर दिये गये है, वहाँ महात्मा पुत्वों में सत्. चित्, आनन्दवन परवल परमात्माका स्वन्न प्रकटरूपसे विद्यमान है। अस्ति तन्त्र संसारमें जो जड पदायाँकी सत्ता दीख रही है, उनका होना सिद्ध हो रहा है, वह उसा परमात्मासे है । उनको द्योतन करनेवाला सत्-तत्त्व ही पदार्थोके सम्बन्धसे 'सत्' की अपेक्षा स्थूल होनेसे अस्तिखरूपसे कहा जाता है जीवनका कर्तव्य , संसारमें जितनी भी जड वस्तुएँ हैं, वे सब उत्पन्न होती हैं, बीचमें सत्तारूपसे दीखती हैं, बढ़ती हैं, परिवर्तित होती हैं, क्षीण होती हैं और नष्ट हो जाती हैं। उन उत्पत्ति-विनाशशील सम्पूर्ण वस्तुओंमें जो एक सत्ता प्रतीत होती है, वही अस्तिरूपसे कही जाती है । यहाँ यह समझनेकी बात है कि किसी एक पदार्थको लेकर उसकी उत्पत्ति के बाद जो उसका अस्तित्व दीखता है, वह तो उस पदार्थके नष्ट होनेपर नष्ट हो जाता है; क्योंकि वह विकार है । पर उन पदार्थोके अभाव हो जानेपर भी सब वस्तुओमें सामान्य रीतिसे जो एक होनापना प्रतीत होता है, वह होनापना ही असली अस्तिस्वरूप है । वह अस्तिस्वरूप नित्य विद्यमान रहता है। जैसे "यह मनुष्य है, 'यह पक्षी है, 'यह देश है। इन सबमें 'है' अनुस्यूत है । वस्त्रमें धागा सर्वत्र एक है। मिट्टीके बरतनोमें मिट्टी सबमें एक है। इसी तरह यह अस्तित्व सबमें अनुस्यूत है । यह सर्वत्र व्यापक है, परिपूर्ण है। जब घड़ा फूट जाता है तो घड़ेका अनाव होनेपर भी उसके टुकड़े तो रहले ही । ऐसे ही पदार्थोका अभाव होनेपर भी उनका रूपान्तरने अस्तिपना वैसे ही वर्तमान रहता है। इसलिये जो भी उत्पत्ति-विनाशवाली वस्तुएँ हैं, उन सबमें जो सत्ता प्रतीत होती है, वह वस्तुतः उन चीजोंका आधार है, पर दीखनेमें ऐसा प्रतीत होता है कि वह चीज पहले है और बाद में उसकी सत्ता है। यही तो परमात्माकी दिव्य प्रकृतिकी अविद्या- मायाशक्तिका विलक्षण परदा है। ।

भगवत्तत्त्व साथ ही भाति-तच्च जो सम्पूर्ण वस्तुओंको प्रतीति होती है, वस्तुएँ दीखती हैं, उनका अनुभव होता है-यह भाति है । भूत, भविष्यत, वतमान----सबमें सत्ता प्रतीत हो रही है । एक पदार्थका होना सत्ता है और उसका दीम्बना, अनुभव होना भाति है। विदेशकी वन, यहाँ नहीं दीग्वती; पर वहाँ वह बीज है। इस प्रकार सामान्य भात्र तो बुद्धि में आता ही है तथा उन जन्तुओंका न जाना जाना भी प्रतीत हो ही रहा है। जिससे सम्पूर्ण वस्तुओंकी प्रतीनि होती है, वस्तुएँ प्रकाशित होती है, उसे भाति-तत्त्व कहते हैं । यह परमात्माका निर्गुण चित्-तत्त्व ही मायाके सम्भावसे प्रकाशचन्चे प्रतीत हो रहा है। यह प्रकाश महत्तत्त्व मिश्रणले सामान्य ज्ञानस्वरूप है. जिसमें कि घट-पटादि समन्त पदाधीका भान हो रहा है । पढार्थोका दान-अज्ञान, लौकिक प्रकाश और अन्धकारका ज्ञान, वस्तुओंका भाव-अनाव, जानत्, स्वप्न, सुपुनि...... अयन्याओंका ज्ञान-अज्ञान--...ये सभी जिस बुद्धितत्वसे प्रकाशित हो रहे हैं. समझनेमें आ रहे हैं। वह निर्गुण परमात्माका चित्-नत्व , नत्वको लेकर भातिरूपसे कहा जाता है। यह भाति-तत्व महत्तत्वका सम्बन्न होनेके कारण चित्-तन्वशी अपेक्षा स्थूल है। हामें भी अस्तिकी भाँति घरतुओका ज्ञान वस्तुअंकि बाद प्रतीत होता है, पर वास्तवमें वस्तुओं के ज्ञान और अज्ञान दोनोंको ही यह भाति-तत्त्व सामान्यरूपसे निरन्तर प्रकाशित कर रहा है। यही सगुण परमात्माका भातिः रूप है।

११४ जीवनका कर्तव्य भगवान्का अवतार-विग्रह दिव्य, अलौकिक और अद्भुत होता है। वे परमात्मा मायाके वशमें होकर जन्म नहीं लेते; किंतु अपनी विद्यामयी प्रकृतिको अपने वशीभत करके योगमायासे प्रकट होते हैं । यह भगवान्का प्रकट होना जीवोंके जन्मकी अपेक्षा बहुत ही विलक्षण और दिव्य है। जगत्के सभी चराचर जीव अपने गुण, कर्म, स्वभावके वशमें हुए प्रारब्धानुसार सुख-दुःखादि भोग भोगनेके लिये जन्म लेते हैं; परंतु परमात्मा किसीके भी वशमें न होकर अपनी इच्छासे केवल जीवोंपर अहेतुकी कृपा करके ही अवतरित होते हैं। इस प्रकार ईश्वरका प्रकट होना उनकी आनन्दमयी लीला है और जीवोंका जन्म लेना दुःखमय है। भगवान् प्रकट होनेमें सर्वथा खतन्त्र हैं और जीव जन्म लेनेमें सर्वथा परतन्त्र हैं। ईश्वरके अवतरित होनेमें केवल उनकी अहैतुकी कृपा ही कारण है और जीवोंके जन्ममें हेतु उनके शुभाशुभ कर्म हैं। विग्रह-तत्व वे सर्वत्र परिपूर्ण सत्स्वरूप परमात्मा ही दिव्य विग्रहरूपमें प्रकट होते हैं। भगवान्का वह दिव्य विग्रह अलौकिक, अद्भुत और विलक्षण है ( गीता ४ । ९ ) और वे परमात्मा अपनी पूर्ण शक्तिसे ही प्रकट होते है। उनका साकार विग्रह एक देशमें प्रकट दीखनेपर भी वे वास्तवमें न तो दूसरे देशसे हट जाते हैं और न एक देशमें सीमाबद्ध ही हो जाते हैं। वे जीवकी तरह शरीरधारी नहीं होते। उनके विग्रहमें देह-देहीभाव नहीं है, उनका वह विग्रह दिव्य चिन्मयखरूप ही है, जिसका यथार्थ अनुभव दिव्य नेत्रवाले भक्तोंको होता है, दूसरोंको नहीं ।

भगवत्तत्व चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत विकार जान अधिकारी ॥ भगवान्ने भी कहा है नाह प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मृदोऽयं नाभिजानाति लोको सासजमव्ययम् ।। (गीता ७ । २५) 'अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझे जन्माहित अविनाशी परमात्मा नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्नने-मरनेवाला समझता है । जीवोंके शरीर तो अनित्य, पापमय, रोगग्रस्त, लौकिक, विकारी, पाञ्चभौतिक और रज-वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले होते हैं और परमात्मा- का वह साकार विग्रह नित्य, पाप-पुण्यसे रहित, अनामय, अप्राकृत, विकाररहित, विशुद्ध परम दिव्य और प्रेममय होता है; अन्य जीवोंकी अपेक्षा तो देवताओंका शरीर भी दिव्य होता है। परंतु भगवान्का स्वरुप उससे भी अति दिव्य विलक्षण होता है, जिसका देवतालोग भी दर्शन चाहते रहते हैं (गीता ११ । ५२)। भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्ण जत्र इस धरातलपर अवतरित हुए, उस समय वे माता कौसल्या और देवकीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुए। पहले उनको अपने शङ्ख, चक्र, गदा, पन्नधारी स्वरूपका दर्शन देकर फिर वे ही माताको प्रार्थनासे बालरूपमें लीला करने लगे। श्रीतुलसीदासजी कहते हैं- भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कोसल्या हितकारी । हरपित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप विचारी ॥

जीवनका कर्तव्य जुष्टं लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूपन बनमाला नयन विसाला सोमासिंधु वरारी॥ साता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा । झीजै सिसुलीला अति प्रियसीला ग्रह बुख परस अनूपा ।। सुनि बचन सुजाना रांदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।। उपसंहर विश्वात्मन्नदो मामलोकिकम् । शङ्खचक्रगदापाश्रिया चतुर्भुजम् ।। (श्रीमद्भा० १० । ३ । ३०) माता देवकीने कहा---'विश्वात्मन् ! शश, चक्र, गदा और पद्मकी शोभासे युक्त इस चार भुजाओंवाले अपने अलौकिक- दिव्यरूपको अब छिपा लीजिये ।' जब भगवान् श्रीराम परमधाम पधारने लगे, उस समय वे अन्तर्धान हुए थे। मनुष्य-देहकी भाँति उनका देह यहाँ नहीं रहा, वे इसी शरीरसे वैवुण्ठधाममें चले गये । पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य विनिश्चित्य महामतिः। विवेश वैष्णवं तेजः तेजः सशरीरः सहानुजः }i (वा० रा० उत्तरकाण्ड १९०। १२) 'महामति भगवान्ने पितामह ब्रह्माजीके वचन सुनकर और तदनुसार निश्चय कर तीनों भाइयोंसहित अपने उसी इरीरसे वैष्णव- तेजमें प्रवेश किया । भगवान् श्रीकृष्णके लिये भी ऐसे ही बचन मिलते हैं। लोकाभिरामा स्वतन धारणाध्यानललम् । योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम् ॥ (श्रीमद्भा० ११ । ३१ । ६) भगवत्तत्त्व 'धारणा और ध्यानके लिये अति मङ्गलरूप अपनी लोकाभिरामा मोहिनी मूर्तिको योग-धारणाजनिस अग्निके द्वारा भन्म किये बिना ही भगवान्ने अपने धाममें प्रवेश किया । भगवान्के सृष्टिके लुजन, पालन, संहार आदि तथा अपने अवतारलीला आदि जितने भी कम होते हैं, वे सभी परम दिव्य, उमञ्चल, प्रकाशमय, आनन्दमय, विशुद्ध एवं अलौकिक होते हैं। भगवान के समान कर्म साधारण मनुष्य तो कर ही क्या सकता है; ऋषि, मुनि, देवता और महात्मा भी नहीं कर सकते । जीवन्मुक्त और नारक पुरुयों की भी क्रियाएँ भगवान्की-जेंसी नहीं होती । भगवानले वाम इन सभीनी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण और अद्भुत होते कर्म चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो नहीं कर सकता । कारण यह है कि अन्य लोरोम शक्ति, विद्या, प्रभाव, ऐश्वर्य आदि परिमित होते हैं और वे भी भावान के दिये हुए तथा उस सर्वशक्तितके अंशमात्र ही प्रकाशित होते हैं। अतः उन सबैश्वर्यसम्पन्न अनित प्रभावशाली भगवान्के कर्म उन सबकी अपेक्षा सब प्रकारसे विलक्षण, दिव्य और अद्धा होते हैं। भगवान्में अज्ञता, जडता, भूल, आलस्य, प्रमाद, असावधानी, भ्रम आदि किसी भी दोपकी ननिक भी सम्भावना न होने तथा ज्ञान, चेतनता, सावधानी और विज्ञता आदिके स्वाभाविक ही अविचलरूपसे नित्य विद्यमान रहने के कारण उनके कर्म अत्यन्त ही उज्ज्वल होते हैं। इसलिये उनके लीला-कर्माका तथा गीतादि परम रहस्यमय , जीवनका कर्तव्य उपदेशका संसारमें जितना ही श्रवण, मनन, पठन, कथन, कीर्तन आदिके द्वारा विस्तार किया जाता है, उतना ही प्राणिमात्रके हृदयमें अज्ञान, अन्धकार, जडता आदिका विनाश होकर परम दिव्य प्रकाशमय ज्ञानका साम्राज्य छा जाता है। जब लोगोंके हृदयमें भी उनके लीलाकर्म और उपदेशके श्रवणादिसे इतना दिव्य प्रकाश छा जाता है, तब फिर उनके स्वयं परम दिव्य प्रकाशमय होने में तो सन्देह ही क्या है।' वे प्रेममय भगवान् जिनके साथ जो कुछ भी व्यवहार करते है, उसमें निष्काम प्रेम और अहैतुकी कृपा भरी रहनेके कारण जिनके साथ व्यवहार किया जाता है, वे प्राणी परम आह्लादित हो जाते है। भगवान् जिस तरफ देखते हैं वह सारी दिशा प्रेम और आनन्दमय बन जाती है। उनकी देखी हुई वस्तुओमें, उनकी क्रीड़ा की हुई भूमिमें इतना आनन्द और प्रेम भरा हुआ है कि हजारों-लाखों वर्षोतक उनसे लोगोंको परम लाभ होता रहता है। भावुक प्रेमी भक्त उन लीलास्थलियोंमें निवास करते हैं और जन्म- मरणादि सांसारिक दुःखोंसे सर्वथा मुक्त होकर उस परमानन्दका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। , जो भगवान्के अनुकूल होकर प्रेम रखते हुए श्रद्धा-बुद्धिसे उनके दर्शनादि करते हैं, उनके आनन्दलाभमें तो कहना ही क्या है; जो द्वेषभावसे भगवान्से विरोध रखकर विपरीत आचरणोंमें ही लगे रहते हैं, उनको भी भगवान् दयापरवश हो अपने हाथोंसे मारकर अपना परम दिव्य आनन्दमय धाम प्रदान करते हैं।

मगपत्तत्व
उनकी मारने आदि क्रियाओं में भी परम कल्याण भरा रहता है,
इसलिये उनकी सम्पूर्ण क्रियामात्र ही थानन्दमय है।
ताडने मातुन कारुण्यं यथार्भक ।
तहदेव महशस्य नियन्तुगुणदोपयोः॥
'जिस प्रकार माताकी बालकपर उसके पालन करने और
ताड़ना देने की अकृपा नहीं होती, उसी प्रकार गुण-दोपोंगर
नियन्त्रण करनेवाले परमेश्वरकी कही किसीपर अकृया नहीं होती।'
पूर्णतन पुरुषोनम भगवान् के सभी कर्म निःस्वार्थभावसे होते
है। उनमें यात्री नी जरा भी स्वार्थ नहीं होता । केवल प्राणियोंपर
अकारण करुणा करनेके लिये ही वे निःस्वार्थभावसे कर्माका
आचरण किया करते हैं । उनको अपने लिये कुछ भी कर्तव्य
अथवा प्रामव्य नही होता, तो भी वे लोकसंग्रहार्य जगत् के हितके
लिये ही कांगें प्रवृत होते हैं। भगवान् गीता में स्वयं कहते हैं-
न में पार्थास्ति कार्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्नयवानवयं वर्त एव च कर्मणि ॥
(३।२२)
हे अर्जुन ! मुझे इन तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है
और न कोई भी प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्ममें
ही वर्तता हूँ।
भगवान्के कम में अपना निजी कोई स्वार्थ या कामना नहीं
होतो। उनके कर्म निर्मल पापरहित होते हैं। उनके उपदेश,
भाव और आचरणोंका अनुकरण करनेसे पापी-से-पापी भी परम
,

१२०
जीवनका कर्तव्य
विशुद्ध तरन-तारन बन जाता है । इसलिये भगवान्के कर्म परम
विशुद्ध और निर्विकार होते हैं।
भगवान्के कर्म अलौकिक होते हैं । जहाँ देवताओंकी भी
कल्पना नहीं पहुँच पाती और जो बिल्कुल असम्भव होते हैं, उन
कर्मोको भी वे सम्भव कर दिखाते हैं। उनकी तो माया ही
अघटनघटनापटीयसी है, फिर उन मायाके एकमात्र अधीश्वर
परमात्माके कर्म सर्वथा अलौकिक हों, इसमें तो कहना ही
क्या है?
जैसे सर्वत्र परिपूर्ण सामान्य अग्नि साधनोंसे साकाररूपमें
प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार वह सर्वत्र अस्तिरूपसे प्रतीत
होनेवाला निर्गुण सत्तत्त्व ही अपनी अहेतुकी कृपा और भक्तों के प्रेमके
वश होकर दिव्य विग्रहरूसमें प्रकट होता है।
प्रकाश-तत्व
भगवान्के विग्रहका प्रकाश दिव्य होता है। वह निर्गुण
सर्वव्यापी चिन्मयस्वरूप ही स्थूउरूपसे प्रकाशरूपमें आता है।
वह प्रकाश प्राकृत नेत्रोंका विषय नहीं होता, दिव्य चक्षुसे ही
देखा जा सकता है । भगवान्ने अर्जुनसे कहा है.-
न तु मां शझ्यले द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥
(गीता ११ । ८)
'परंतु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रोंद्वारा देखनेमें
निःसन्देह समर्थ नहीं है; इसीसे मैं तुझे दिव्य अर्थात् अलौकिक
चक्षु देता हूँ; उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्तिको देख ।।

भगवन्तत्व यद्यपि थवतार; समय भगवानका विना सबके सामने होनेसे सभीको दर्शन शन होना है। परंतु उनको दर्शन होने योग- मायासमावृत ताबारग पनुन्यमापक हो, दिव्यरूपक नहीं । भगवान्का दिव्य प्रकाश गया. चन्द्रमा आदि प्राशसे स्वत्या महान और विलक्षण होता है। मजयने मीतामें कहा है- विनि बताया भवेद् गुगपदुन्थिना । यदि मा सहकाता महालतय सामनः । (११ १२) जब एक साथ उदय होनत्र उत्पन्न जो प्रकाश भी कर जाना प्रकाशके मश दाचिन + मा प्रकाश . → भावान वित्राका नीललो नस्य प्रकाश होता; बन मोनगाना, उग और दुनिता पनी होती । मवान विद्या प्रकाश सूयर भी बहुत अनिक इंता है, किंतु पूरी तक मध्यता नहीं होती; बद तो इन्द्रमान नहीं, चन्द्रमा भीत्यन्त विनय, सौग्य, शान्त, शीतल और नेत्राव होता है । वास्तव में चार लम-चन्द्रमा- जैसा ही नहीं है और न उसे सूर्य-अदमा प्रकाशित ही कर सकते हैं, भगवान्का प्रकाश नारे बहुत विलक्षण होता कहने ल तद् भासयते स्यों न शशाज्ञान पाचकः । यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परमं मम ॥ ( गीता १५ । ६) . है। भगवान् damadakur जीवनका कर्तव्य 'जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसारमें नहीं आते-उस स्वयंप्रकाश परम पदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा भौर न अग्नि ही; वही मेरा परमधाम है ( जो कि भगवत्स्वरूप ही है ) वास्तवमें सूर्य-चन्द्रमा आदि भी तो भगवान्के प्रकाशसे ही प्रकाशित होते हैं, तब वे उसे कैसे प्रकाशित कर सकते हैं ? क्योंकि उनमें वह तेज भी भगवान्का ही तेज है । यदादित्यगतं तेजो जगद् भालयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत् तेजो विद्धि मामकम् ।। ( गीता १५ । १२ ) 'सूर्यमें स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमामें है और जो अग्निमें है, उसको तू मेरा ही तेज जान ।' सूर्य, चन्द्रमाका प्रकाश तो पार्थिव पदार्थोसे आवृत हो जाता है, अतः उससे छाया भी पड़ती है; परंतु भगवद्विग्रहका प्रकाश, चाहे पहाड़ भी बीचमें क्यों न आ जाय, आवृत्त नहीं होता और न उससे छाया ही पड़ती है । वह प्रकाश दिव्य चिन्मय होता है और सूर्य-चन्द्रमाका प्रकाश भौतिक होता है। चितिशक्ति स्वयं आत्मस्वरूप है। वह बुद्धितत्वसे जाननेपर ज्ञानरूपसे प्रतीत होती है और वही नेत्ररूपसे दीखनेपर प्रकाशरूपसे प्रकट दीखने लगती है, तत्त्वतः वह चिति, भाति और प्रकाश एक ही वस्तु है ।

भगवन्तत्व
परमात्माका
।
प्रेम-तच्च
वे निर्गुण मानन्दमय सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा ही प्रेमरूपसे
साकार विग्रहक समं प्रकट
प्रकट होते
होते हैं ।
प्रेम बड़ा विलक्षण ई। परमात्माका दिव्य विग्रह प्रेममय होता
है, जिसके दर्शन करनेसे खर, दृषण, जगसन्ध-जसे विरोधी
जीवोंक भी चिन उस ओर जबरन् खीचे जाते हैं। उनके उस
प्रेममय विना में विलक्षण आकर्षण होता है । जहाँ भगवान्की कथा
होती है, लीला-विग्रह आदिका वर्णन होता है, वहाँ भी प्रेम,
आनन्द्र और शान्निकी बाइ-सी आ जाती है, सर्वत्र परम शान्तिमय
वातावरण छा जाता है ! उस वर्णनको सुनकर श्रद्धालु प्रेमियोंका
हृदय गने तर हो जाता है। उनके नेत्रोंसे आँसुओकी धारा बहने
लगती है, कार, गद्द हो जाते हैं, वाणी लक जाती है और समस्त
मग पुलवित हो उठते हैं। इस प्रकार भक्त प्रेममें मतवाले हो जाते
है। महात्मा श्रीनन्ददासजी कहते हैं-
उग नाम जय ते मैं श्रवग सुन्यौ से आली !
भवन में तो बावरी भई री ।।
जब उसकी कथा-वार्ता सुननेसे ही इतना असर पड़ता है, तब
यह स्वयं कितना प्रेममय है-इसका अनुभव तो परम प्रेमास्पद
भगवान के दर्शन किये हुए सच्चे प्रेमी भक्त ही कर सकते हैं; पर
भी उस प्रेमका वर्णन करने में अपनेको असमर्थ ही पाते हैं। प्रेमका
स्वरूप वर्णन करते हुए श्रीनारदजी कहते हैं---
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् ।' 'सृकारवाददवत् ।' 'गुणरहितं
कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ।
(नारदभक्तिसूत्र ५१-५२, ५४ }
मूली री

१२६ जीवनका कर्तव्य " उद्वेग, भय आदिका लेश भी नहीं है, प्रेम और भगवान् वस्तुतः दो नहीं, एकरूप ही हैं। ऐसा होनेपर भी भगवान्के दर्शन होनेपर प्रेम हो ही जाय, यह सर्वत्र अबाधित नियम नहीं है, पर प्रेम होनेपर तो भगवान् मिल ही जाते हैं । इसलिये प्रेमकी कीमत भगवान् भी नहीं हैं, बल्कि भगवान्की ही कीमत प्रेम है। अतः प्रेम भगवान्से भी बढ़कर है। इसलिये दिव्य प्रेमको प्राप्त किये हुए भगवद्भक्त भगवान के दर्शनोंकी भी परवा नहीं करते बल्कि भगवान् ही उन भक्तोंकी चाह किया करते हैं। प्रेम बड़ी ही अलौकिक वस्तु है । वह द्वैत-अद्वैत, भेद- अभेद, सबसे निराला, विलक्षण अलौकिक तत्त्व है । प्रेम और आनन्द वस्तुतः एक ही वस्तु हैं। क्योंकि प्रेम होनेपर ही आनन्द होता है और जहाँ आनन्द होता है, वहीं प्रेम होता है। सबकी एकता सत्-रूप परमात्माका जो होनापना है, जो सामान्यरूपसे सर्वत्र सर्बदा परिपूर्ण है, वही कृपापरवश हो भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये श्रीविग्रहरूपसे प्रकट होता है और जो सामान्य चिन्मय ज्ञानस्वरूप परमात्मा है, वही श्रीविग्रहके प्रकाशरूपसे प्रकट होता है तथा जो निरतिशय आनन्दधन परमात्मा है, वही श्रीविग्रहमें प्रेमरूपसे प्रकट होता है। जैसे सत्, चित्, आनन्द--ये तीनों शब्दतः अलग-अलग होनेपर भी वस्तुतः एक ही हैं और परमात्माके स्वरूप ही हैं, उसके कोई विशेषण या उपाधि नहीं, उसी तरह साकार परमात्मा उसका प्रकाश तथा प्रेम भी कोई भिन्न-भिन्न चीजें नहीं हैं।

গুণ
१२७
प्रति
प्रेम हरीको रूप है, त्यों हरि प्रेम स्वरूप ।
एक होय दाम
लमें, ज्यों सूरज अरु धूप ॥
तस्म-विवेचन
इस प्रकार परमात्माके सच्चिदानन्दधन निर्गुण-निराकार, अस्ति-
भाति-प्रियरूप सगुण निराकार, दिव्य विग्रह, प्रकाश और प्रेममय
सगुण-साकार स्वरूपका नया उन सबकी एक्ताका कुछ संकेत
कराया गया । अब इनकी एकता प्रतिपादक गीताके निम्न
लोककी कुछ व्याख्या की जाती है-
अजोऽपि सन्तव्ययात्सा भूतानामीश्वरोऽपि लन् ।
स्वामधिष्टाय सस्मवारपात्समायया ।।
(४ १६)
भगवान् कहते हैं.--'मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते
हुए भी तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको
अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता है।'
इस इलोको भगवान्ने छः बातें कही है-तीन अपने
खरूपके सम्बन्ध में, दो प्रकृति के सम्बन्धमें और एक अवतार लेनेके
सम्बन्धमें । ये क्रमश: इस प्रकार है-
में (१) अजन्मा हॉत हुए भी, (२) अविनाशीखरूप
होते हुए भी, (३ ) समन्त प्राणियोंका ईनर होते हुए भी, (४)
अपनी प्रकृतिको अधीन करके, (५) अपनी योगमायासे, (६)
प्रकट होता है।
इन छहोमसे 'अजन्मा' और 'अविनाशी होते हुए भी ये
दो तो निर्गुण निराकार तथा समस्त प्राणियोंका ईश्वर होते हुए
,

जीवनका कर्तव्य भी, -यह सगुण निराकारका एवं अपनी प्रकृतिको अधीन करके' ----यह भगवान्के श्रीविग्रहके तत्त्वका द्योतक है । 'प्रकट होता हूँ....इससे अपने साकाररूपसे प्रकट होनेकी बात कही है। ऐसे साकाररूपसे प्रकट होनेपर भी अभक्त उन्हें नहीं जान पाते; क्योंकि भगवान् योगमायासमावृत रहते हैं—यह बात भगवान्ने अपनी योगमायासे ---इस पदके द्वारा व्यक्त की है। भगवान् अज अर्थात् जन्मरहित रहते हुए ही जन्म लेते हैं अर्थात् प्रकट होते हैं । जन्म लेनेपर भी भगवान्के 'अज'पने- कभी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं होती । भगवान् अव्ययात्मा यानी परिवर्तन, क्षय, विनाश आदि विकारोंसे सर्वथा रहित रहते हुए ही लोगोंके सामनेसे अन्तर्धान हो जाते हैं; किंतु अन्तर्धान हो जानेपर भी वे कहीं नष्ट नहीं हो जाते। इसी प्रकार प्राणिमात्रके एकमात्र महान् शासक-ईश्वर रहते हुए ही वे किसी देशविशेषमें माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले नाम-रूपविशिष्ट बालक बन जाते हैं। परंतु बालक बन जानेपर भी उनके शासकत्वमें कोई भी कमी नहीं आती । वे ही भगवान् अपनी प्रकृतिको अधीन करके प्रकट होते हैं; किंतु इस प्रकार प्रकट होनेपर भी वे प्रकृतिके परतन्त्र नहीं हो जाते, बल्कि प्रकृति तो उनके अनुकूल चलनेवाली उनकी दासी ही रहती है। वे नित्य ज्ञानस्वरूप भगवान् अपने ऊपर योगमायाका परदा रखकर प्रकट होते हैं, पर भगवानका दिव्य ज्ञान उससे जरा भी आवृत नहीं होता । प्रेमी भक्तों के लिये भी वह परदा नहीं रहता, तो उनके चिन्मय स्वरूपका दर्शन कर ही लेते हैं । इस आवरणसे तो भगवान्की भक्तिसे रहित मूढलोग ही उन्हें नहीं जान पाते। tor

भगवन्तत्व
।
शाश्वतस्य
इस इलोकमें भगवान ने अपने निगुण निराकार, सगुण निराकार
एवं सगुण साकार-स्वरूपकी एकता की है। भगवान श्रीकृष्ण बतलाते
हैं कि वह निगण सच्चिदानन्दघन सर्वव्यापी परमात्मा मै ही है और
मैं ही समय-समयपर साकाररूपमें प्रकट होता है ! गीता में कहा है-
ब्रह्मणो हि प्रतिष्टाहममृतन्याव्ययम्य च ।
च धर्मस्य तुलस्यैकान्तिकस्य च ॥
(161२७)
'उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृतका तथा नित्य-धर्मका
और अग्बाड एकरम आनन्दका आश्रय मैं हूँ।"
यहाँ भगवान्ने अपने जिन-जिन रूपोंका वर्णन किया है,
उनमें अगर एक भी रूपके तत्त्वका ज्ञान हो जाय तो मनुष्य
जीवन्मुक्त और कृतकृत्य हो जाता है। नगवान्ने गीतामें अपने
किसी एक रूपको भी जाननेवालेको असन्म-~~-ज्ञानवान् और न
जाननेवालको मृढ बतलाया है, यह बात नीचे लिख उद्धरणोंसे
स्पष्ट की जाती है।
या मामजमनादि च बत्ति लोकमहेश्वरम् ।
नम्मूढः स मर्त्यपु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
(गीता १० । ३ )
यहाँ भगवान्ने अपने 'अजर-जन्मरहित रूपको जाननेवाले.
का सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होना बतलाया है तथा उसे सब मनुष्यों में
असम्म?--ज्ञानवान् बनलाया है।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमध्ययम् ॥
गीता७ । २५ )
जी० क० २-
AAPAN
.

१३०
जीवनका कर्तव्य
यहाँ 'अज' नहीं जाननेवालेको मूद कहा है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
(गीता ९ । १३ )
यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
( गीता १५ । १७, १९ )
यहाँ भगवान्ने 'अव्यया खरूपके जाननेवालेका असम्मूढ---
ज्ञानवान् और सर्ववित् बतलाया है।
४
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामवुद्धयः ।
पर भावमजानन्तो
ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
( गीता७ । २४-२५)
इन श्लोकोंमें 'अव्यय' स्वरूपके न जाननेवालेको बुद्धिहीन
और मूह कहा गया है
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
( गीता ५ । २९ )
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
अलम्मूढः स मर्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
( गीता १० । ३)

भगवत्तत्त्व
--
यहाँ सर्वलोकमहेश्वरः रूपके जाननेवालेको शान्तिकी प्राप्ति
बतलायी है और उसे असम्मुढ कहा गया है ।
अवजानन्ति मां मूढा मानुपी तनुमाश्रितम् ।
परं आवमजानन्तो भूतमहेश्वरम् ॥
(गीता ९ | ११)
यहाँ 'भूनमहेश्वर' रूपको न जाननेवालेको मूढ बतलाया है।
यहाँ इस चौथे अध्यायके छ इलोकमें वर्णित प्रकृति और
योगमाया--ये दो अलग-अलग तत्त्व हैं। प्रकृति परमात्माकी एक
नित्य दिव्य शक्ति है और उस प्रकृतिके ही एक अविद्यामय अंशको
अनान या माया कहते हैं जो कि प्रकृति के कार्यरूप तीनों गुणोंवाली
है । ज्ञानमार्गी इस प्रकृतिको विद्या कहते हैं और इस ब्रह्मविद्या-
अध्यात्मविद्या ( गीता १० । ३२ ) का अवलम्बन लेकर अविधाका
नाश करके परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं तथा भक्तजन इसे
भगवान की भक्ति--देवी सम्पत्ति कहते हैं, जिसका आश्रय लेकर
वे भगवान के दर्शन करते हैं । वही भगवान्की ओर ले जानेवाली
भगवानकी देवी प्रकृति है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः ।
मजयनन्यमनसो
भूतादिमव्ययम् ॥
( गीता १ । १३)
इसमें परमात्माकी देवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंको महात्मा
बतलाया है।
देवी योगमाया तो बन्धनकारक, दुस्तर, मोहित करनेवाली
ज्ञात्वा

१३२
जीवनका कर्तव्य
और परमात्माकी ओरसे दूर ले जानेवाली है । इसे ही अश्यिा
कहते हैं।
त्रिभिर्गुणमयमांवरेभिः
लर्वमिदं
जगत् ।
मोहितं नाशिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥
दैवी होपा गुणमयी मम माया' टुरत्यया ।
मासेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां
मायामतां तरन्ति न ॥
( गीता ७ । १३.१)
इस मायाका आश्रय लेनेवाले लोग उस अव्यय परमा-माको
नहीं जान पाते ।
गीतामें खोज करनेपर यह बात सुस्पष्ट हो जाती है कि यह
माया गुणमयी है । गुण मायासे उत्पन्न नहीं हैं। इनको तो
भगवान्ने प्रकृतिसे उत्पन्न बतलाया है । यथा
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणः ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् । (१३ । ३९)
पुरुषःप्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् । (६३ १२१)
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । (१४ । ५ )
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः म्यात्त्रिभिर्गुणैः । ( १८ । ४० )
भगवान्ने मायाको गुणमयी बतलाया है, न कि प्रकृतिको ।
'मयट' प्रत्यय विकारार्थमें भी होता है, इसलिये यहाँ मायाको
गुणोंका विकार माना है । प्रकृति तो गुणोंसे क्या मायासे भी परेकी
वस्तु है । इसीलिये भगवान् प्रकृतिको अधीन करके लीला-विग्रह
धारण करते हुए भी मायिक या गुणमय नहीं हो जाते। वे तो
सदा सर्वथा दिव्य अमायिक गुणातीत ही स्थित रहते हैं पर

मावाका पर्दा लकार प्रकट होने के कारण साधारण जीव उन्हें नहीं
जान पाने और भावानको साधारण मनुष्य ही मानने लगते हैं।
। गीता ७ । २४९ ११ ) ।
इस प्रकार माया और प्रकृति-ये दो अलग-अलग तत्त्व है
और इनमें बड़ा भारी अन्तर है।
यहां यह बात समझने की है कि सगुण साकार परमात्मा
अज, अन्याय और गणातील । भगवानका दिव्य विग्रह प्रकृतिजन्य
नीनों गुगोंके, और नहीं है । भगवान ने कहा है.-
विभिणमयभायेगेभिः
सर्वसिद
मोहिनं नाभिजानानि मामेभ्यः परमव्ययन ।
(७ । १३)
'जशों कादरूप सावित्रा, गजम और तामस----इन तीनों
प्रकार मात्रामे यह सब संसार----प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा
६. इसीलिये इन तीनों गुणोंन्ने परे मुझ अविनाशी परमात्माको
नहीं जानता।"
लगा लाकार भावान इन तीनों गुणोंस अत्यन्त पर है।
जब उनकी उपासना कान ही मनुष्य गुणातीत हो जाता है, तब
फिर वे वर नीना गुगोसे परे है...इसने तो सन्देह ही क्या
समयान्न वाहन
ལྕ यो व्यभिचारण भक्तियोगन सेवते ।
स गुणान् लगतीत्येतान, ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
---
है
prn
'जो पुरप अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मुझको निरन्तर

जीवनका कर्तव्य भजता है, वह इन तीनों गुणोंको भलीभाँति लाँधकर सच्चिदानन्दधन ब्रह्मको प्राप्त होनेके लिये योग्य बन जाता है ।' यदि साकार भगवान् तीनों गुणों के अंदर होते तो उनकी उपासना करनेसे मनुष्य गुणातीत कैसे हो सकता । अत: भगवान्का दिव्य विग्रह मायिक नही है। यदि मायिक होता तो आत्मनिष्ट ज्ञानीजनोंका उसमें आकर्षण क्योंकर होता। तत्वज्ञानी जनकजीका भी मन भगवान् श्रीराम-लक्ष्मणके स्वरूपको देखकर आकर्षित हो जाता है । गोस्वामी तुलसीदासजीने उनकी स्थितिका वर्णन करने हुए कहा है मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ विदेहु विदेहु बिसेपी ॥ प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेक धरि धीर । बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर ।। सहज बिराग रूप मनु मोरा | थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्म सुखहि मन त्यागा ॥ पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाह । पुलक गात उर अधि - उछाहू ॥ एक बार सनकादि ऋषि वैकुण्ठमें जा रहे थे, वहाँ भगवान के द्वारपाल जय-विजयने उन्हें भीतर जानेसे रोका। तब सनकादिन उनको तीन जन्मोंतक राक्षस होनेका शाप दे दिया। भगवान् अपने अनुचरोंद्वारा श्रेष्ट पुरुषोंका अपमान हुआ जानकर स्वयं लक्ष्मीसहित वहाँ पधारे । उस समय भगवान के दर्शनसे उनकी जो दशा हुई, वह बड़ी विलक्षण थी। भागवतकार लिखते हैं- नस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किचल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः।

भगवतन्त्र अन्तर्गतः स्वविवरण चकार नेपां संक्षोभमक्षरजुपामपि चित्ततन्योः॥ (३।१५ ! ४३) "प्रणाम करने पर उन कमलनेत्र भगवान्के चरणकमलकी परागसे मिली हुई तुलसी-मनरीकी ड्याने उनके नासिका-छिद्रों में प्रवेशकर उन अक्षर परमात्मा नित्य स्थित रहनेवाले ज्ञानी महात्माओं- के भी चिन और शरीरको क्षुब्ध कर दिया ।' जिनका मन महजविरागलप' था, जो अक्षर परमात्मामें नित्य स्थिर रहनेवाले थे, जिन्हें दुग्वदोषानुदर्शनन की साधनापूर्वक वैराग्य करना नहीं पड़ता था. उन जनक और सनकादिकोका चित्त भी भगवानकी ओर विच जाता है । वे विलक्षण प्रेमाणव भगवान मायिक कैसे हो सकते हैं। इस निर्गुण सगुण-साकार तत्त्वकी एकता बतलानेवाले इलोकमें 'अपि' और 'सन' पदोंक दो बार देनेका यह बारस्य है कि निर्गुण निराकार, सगुण निराकार और मनुण साकार वस्तुतः एक ही तत्व हैं। इनमें अनेकता तो साधकोंक दृष्टि मंदके ही कारण दीखती है । परमात्माका जो ध्यान, चिन्तन, धारण, भावना और ज्ञान किया जाना है. वह सब मन-बुद्धिके द्वारा ही किया जाता है और परमात्मा वस्तुत: मन-बुद्धिसे अतीत हैं। अतः वृत्तिके द्वारा जो कुछ भी निश्चित किया जाता है, उससे परमात्मा वास्तवमें परे ही रह जाते हैं । इसलिये मन-बुद्धिसे पकड़ा हुआ परमात्माका कोई भी स्वरूप वास्तविक नहीं, कब्धित ही है । यद्यपि मन-बुद्धि परमात्माके यथार्थ स्वरूपतक नहीं पहुँच पात, तथापि परमात्मा तो सर्वातीत होते हुए साधकको कल्पनामें भी मौजूद हैं ही; क्योंकि जीवनका कर्तव्य वे देश, काल, वस्तु, भाव और धारणा--सभीमें अविच्छिन्न रूपसे सदा ही विद्यमान हैं। तथा परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करने- वाले पुरुषका लक्ष्य परमात्मा होनेके कारण उनके परम मात्रको समझकर सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार---किसी भी रूपको कैसी भी भावना क्यों न की जाय, उसका भी फल परमात्माकी प्राप्ति ही होता है । अतः परमात्माकी प्राप्तिके उद्देश्यसे जो भी कुछ साधन किया जाता है उसका फल वस्तुतः सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति ही होने के कारण सभी साधन वस्तुतः सत्य ही है, कल्पित नहीं। परमात्मा सर्वत्र सर्वदा विद्यमान है। किंतु लक्ष्य परमात्मा न रहनेके कारण ही मनुष्य शान्तिलाभसे वक्षित रहता है। यदि उसका लक्ष्य परमात्मा हो जाय तो किसी भी शास्त्रोक्त उपायसे परम शान्तिकी प्राप्ति हो सकती है। किसी भी मार्गसे चला जाय, वास्तविक परमात्माकी प्राप्तिके बाद सो उस पुरुपकी स्थितिमें किश्चिन्मात्र भी अन्तर नही होता; परंतु हरनकालमें उपायभेदके कारण अन्तर रहता है तथा साधनकी अन्तिम सीमाकी प्राप्तिमें भी भेद रहता है। नीचे इस विषयमें कुछ लिखा जाता है- दर्शन, ज्ञान, प्रवेशाज्ञा प्रकरण सगुण साकार- भगवान्की अनन्य भक्ति करनेवाले भक्तोंको परमात्माके दर्शन, उनका तत्त्वज्ञान और उनके स्वरूपकी प्राप्ति--तीनों होते हैं। भगवान्ने कहा है शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । झातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ (११ | ५४) त्वनल्यया

भगवन्नत्व
HA
तर अर्जुन : अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज
पत्राला में अन्य देखने के लिये, तत्याने जानने के लिये तथा प्रवेश
करनेक वियत की गवाने ग्राम हनिक टिये भी शक्य हैं।'
मनिलाकारको वासनाको यो प्रणालियाँ होती हैं.---एक
तो मा जाद, परिका है और मैं उनका दास हूँ. इस
प्रकारचे भावक की जानी है । यथा -----
मिति न
रह हनुमंन ।
नामि भगवंत ॥
नमरी गालीन अदभाव रहता है कि सब परमात्मा ही है,
न
भनयमावर्मकस्थमनुपश्यति ।
पत्र विना र सम्पयंत नदा
MAR
प्राप्त चार
MAP
इन दोनो ममगाटी जानेवाला साधन-कालमें मंद
मानकर निकालने अमिन भी मान सकता है और भिन्न
भी कि मारमा नो पयुत्ता नाण मायारको मनाके
मारके नया नया गानका उ
ना है और विकाको मागको अपने अभिन्न मानने वाला
रमा स्नान जानका निग-निराकारको प्राप्त हो
जाता
TET विपकी भावना नया दर्शनी उन्हान
रहन माया उनके दर्शन नही होन
सकालाकारको मासनाने नत्रों दर्शन, बुद्धिसे ज्ञान और
मात्माले प्रालि ...तीनों सोने और नाम निराकारकी उपासनासे

जीवनका कर्तव्य केवल बुद्धिसे ज्ञान और आत्मासे प्राप्ति-दो ही होते हैं एवं मन, बुद्धिका विषय न होनेसे निर्गुण-निराकारकी तो उपासना ही नहीं बन सकती; वहाँ तो केवल आत्मासे प्राप्ति ही होती है। अभेद-भेदमार्गका वर्णन साधनका आरम्भ सगुण-निराकारसे ही होता है। साधनके मुख्य भेद दो ही हैं-निर्गुण और सगुणकी उपासना अथवा यों कहें कि अभेद और भेदमार्ग। निर्गुण निराकारका उद्देश्य रखकर अभेदभावसे उपासना करनेमें मुख्य साधन है एक सच्चिदानन्द घन परमात्मा ही सर्वत्र सहा परिपूर्ण है, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है; सम्पूर्ण पदार्थ, क्रिया, भाव, व्यक्ति--सभी मृगतृष्णाकी अथवा खप्नकी सृष्टि- की तरह केवल मायामय ही है----इस प्रकारकी वृत्तिको हर समय अटल बनाये रखना। यह भाव यदि बुद्धिमें अन्छी तरह न बैठे तो वह सच्चिदानन्दधन परमात्मा सर्वत्र सदा परिपूर्ण है-इस प्रकार परमात्माकी सत्ताको ही प्रधान लक्ष्य बनाकर. साधन किया जा सकता है। सगुण उपासनामे भेदभाव ही मुख्य है और भेदभावमे ऊँची- से-ऊँची स्थिति परमात्माके साकार स्वरूपके साक्षात् दशन होना है । इसके लिये निरन्तर साकार इष्टदेवके नामका जप और उनके स्वरूपका चिन्तन करना ही मुख्य साधन है । यदि साकार रूप ध्यानमें न आये, तो भी परम प्रेममय, परम दयालु भगवान् सदा सर्वत्र विराजमान हैं, वे मेरे साथ चलते हैं, मेरे साथ प्रत्येक कार्य करते हैं और मुझे अपने आज्ञानुसार चलते देखकर प्रसन्न होते भावनन्त्र --- रहते हैं तथा बड़ी ही कृपादृष्टिमे मुझे देख रहे हैं, मैं इस प्रकार उनकी कृपादृष्टिमं रहकर सदा प्रसन्न रहना हुआ उन्होंक आतानुसार चलना है। इस तरह भगवान्की सत्ताको लम्य बनाकर भी सावन किया जा सकता है। निगुग-मागुण --~-दोनों उपासना परमान्माकी सत्ताकी प्रधानता रखकर ही होती है. अतः ये सगुण निराकारसे ही आरम्भ होती हैं। णि उपासना में दो न्यो-ज्यों दूसरी विजातीय- प्रकृतिको सत्ता हटती जाती है और जीव-जयका भेद मिटता जाता है तथा वृनियों मूतम होती चली जाती है. त्यों-ही-न्यों वह उपासना ऊँची-श्रेष्ठ मानी जाती है ! सगुण-साकारकी उपासनामें ज्यों-ज्यों भगवानका विग्रहमा ध्यान में आने लगता है अर्थात् वृत्तियाँ विशेष- रूपसे भगवदाकार बनती जाती हैं. जितना ही भगवानका स्वरूप वृनि और इन्द्रियोंका विषय होता चला जाता है, उतनी ही वह उपासना ऊंची-श्रेष्ठ मानी जाती है। निगुण निराकारको लक्ष्य करके उपासना करनेवाले पुरुपकी उपासनाकी पूर्णता होनेपर उसकी दृष्टि में एक सच्चिदानन्दवन बोध- म्वरूप परमात्मा ही रह जाते है । परमात्माके सिवा अन्य किसी भी वस्तुका संकल्प भी नहीं रहता । उसके ज्ञान अपनी तथा संसार- की सत्ता परमात्मासे भिन्न नहीं रहती । ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय-सभी कुल एक परमान्मभ्वरूप ही बन जाने हैं, तब वह कृतकृत्य हो जाता है। सगुण साकारको उपासनाकी पूर्णता होनेपर भक्तको नेत्रोंसे भगवान्के दिव्य स्वरूपका साक्षात् दर्शन होता है, वह उनके , १४२ जीवनका कर्तव्य तथा श्रद्धा-विश्वासपूर्वक की गयी उपासना ही साधकको वास्तविक तत्त्व पूर्णतः समझानेमें समर्थ होती है । इसलिये साधकको भेद, अभेद या यों कहें कि भक्ति, ज्ञान इनमेंसे किसी भी एक मार्गको पकड़कर श्रद्धा और तत्परताके साथ उसे तय करने में जल्दी-से-जल्दी लग जाना चाहिये । यह मानव- शरीर बहुत ही दुर्लभ है और इससे ऐसा बड़ा भारी काम सिद्ध हो सकता है, जो कि देवयोनिमें भी सुलभ नहीं है। परंतु यह शरीर है अनित्य; इसलिये जल्दी ही सावधान होकर साधनमें लग जाना चाहिये; क्योंकि पारमार्थिक साधनके बिना केवल स्त्री, पुत्र, धन-जन, जमीन-मकान, भोग-सामग्री के संग्रह और उपभोगमें ही समय बरबाद हो जाता है--जिससे पूर्व के पुण्य तथा पुण्यसे प्राप्त आयु तो नष्ट होती है, साथ ही आसक्ति और स्वार्थ रहनेके कारण न्याय- अन्यायका कोई ख्याल न रहने से मनुष्य चौरासी लाख योनियों तथा नरक प्राप्त करानेवाले बड़े भारी पापोंको भी बटोरता रहता है और फलतः सदाके लिये दुखी बन जाता है। भोगोंके उपभोगसे आयु नष्ट होती है, समय बरबाद होता है, अन्तःकरणमें भोगोंके संस्कार जमते हैं, आदत बिगड़ जाती है, धन नष्ट होता है, पुण्य क्षीण होते हैं, शरीर निर्बल और रोगी हो जाता है; भोगोंमें ही रचे-पचे रहनेके कारण धर्मसञ्चय नहीं हो पाता और अन्यायसे भोग भोगनेपर तो पापोंका बोझ भी बढ़ता है । अतः इन असत् भोग-पदार्थोकी तरफ़ लक्ष्य न रखकर दुःख, अशान्ति, बन्धन, अल्पता, भय, उद्वेग, चिन्ता, शोक, जलन, ह्रास आदिका जहाँ अत्यन्त अभाव है, - ऐसे 'सत्' स्वरूप परमानन्दमय परमात्माकी प्राप्तिके लिये . , भगवतन्त्र शीवातिर अपना सारा बल लगाकर प्रयत्न करना चाहिये। क्योंकि यह शरीर अनित्य है, न जाने का प्राण चले जाय और यदि साधन न किया गया तो ऐसा मौका युनः मिन्टना बहुत ही कठिन है । यह मुटभ मानव-शरीर और यह कलियुगका समय प्राम करके भी जो मनुष्य सावधान नहीं होता. वह महान हानि उठाना है । श्रुनि कहती है-- हदयदीदथ मन्यमग्नि न चदिहावीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचिन्य धीराः न्यायाल्लोकादमृता भवन्ति ॥ (केन. १५) दिसमनुपशीरमें ही उस परमात्म-तत्वको जान लिया तो सगर गनी उत्ता है की इस जन्ममें उसको नहीं जाना नो महान हानि । और धुरा सा भूतों में परमात्माका चिन्तन पार, परमामाको माया इस देइको होड़ अमृतन्त्ररुप परमात्माको रिये मनुष्यको उचित है कि उस परमात्मतत्वको जाननेके लिये महापरपीक झारण जाकर. सरल हृदयसे श्रद्धापूर्वक उस तो समझे और सत्र सन्तहों का समाधान करके किंकर्तव्य- विदनाको मग टाकर उनके कहने के अनुसार परमात्माकी प्रापिके लिये नगरी जाय । अनिभगवती छोपणा करती है- उत्तिष्टन वगन्नियोधत । ( कट० १।३।१४) 'उठो जागो और श्रेष्ठ पुरयोंको प्राप्तकर इस नत्वको जानो।"

दस आया न
आया
क्या
भगवद्भजनका स्वरूप
श्रीभगवान् कहते है---
'अनित्यममुखं लोकमिदं प्राप्य भजस्व माम् ।'
-----इस भगवद्वाचनके अनुसार हमें तुरंत भगवद्भजनमें लग
जाना चाहिये । श्रीभगवान्ने इस इलोकाधम बतलाया कि
'अनित्यम् असुखम् इमम् लोकम् प्राप्य माम् भजन ।। अनित्य
कहनेका तात्पर्य यह है कि देर न करो, क्या पता है----
है ?
यदि अभी श्वास बद हो जाय तो फिर कुछ भी न
हो सकेगा । विचारी हुई बातें सब बैंसी-की-वैसी ही रह जायेंगी !
सब गुड़ गोबर हो जायगा, क्योंकि शरीर क्षणभङ्गुर है, यह एक
क्षण भी स्थिर नहीं रहता, प्रतिक्षण बड़ी तेजीसे जा रहा है और
जा रहा है उस मृत्युकी भोर, जिसको कोई नहीं चाहता। वही
मृत्यु प्रतिक्षण समीप आ रही है। प्रतिघंटा ९०० श्वास जा
रहे हैं, २४ घंटोंमें २१६०० श्वास चले जाते हैं । जरा इस ओर
ध्यान देना चाहिये । खर्च तो यह हो रहा है और कमाई क्या
कर रहे हैं ? किस बातकी प्रसन्नता है ?
छ: सौ सहम इक्रीस दम जावत हैं दिन रात ।
एको टोटो ताहि घर काहेकी कुसलार ॥
दूसरा पद कहा है---'असुखम्' यानी यहाँ इस लोकमें
सुख नहीं है। यह लोक सुखरहित है । इतनी ही बात नहीं

भगवद्धजनका स्वरूप है, भगवान तो कहते हैं-दुःखालयमशाश्वतम् । दुग्नालय है; किंतु इम तो इसमें ठीक इसके विपरीत सुन्छ ढूँढ़ते हैं, यह कितने आश्चर्यकी बात है। जैसे कोई आदमी विद्यालयमें धोती आदि कपड़े खोजे, औषधान्टयमें मिठाईका भाव पृछे बैसे ही हम इस दुःखालयमें मुग्व ढूँढ़ रहे हैं । इस संसारमें सुखकर वस्तुएँ मानी जाती है----धन, स्त्री, पुत्र, घर और भोग । इन सबमें विचार करके देखें तो वास्तव में सुग्न है ही नहीं, आदि-अन्त में सर्वत्र दुःग्व-ही-दुःख है। यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि हमें वही वस्तु सुख दे सकती है, जिसका हमारे पास अमात्र है और हम जिसे चाह रहे हैं। उसके लिये चाहना जितनी ही बलवनी होगी, उतना ही उस वस्तुके मिन्टनेपर सुन्ध अधिक होगा । अभाव रहते हुए भी यदि उसके अभावका अनुभव नहीं है यानी उसके लिये छटपटाहट नहीं है तो वह वस्तु प्राम होकर भी हमें मुन्बी नहीं बना सकती। अतः धन आदि पदार्थासे सुख प्राप्त करनेके लिये पहले उनके अभावका दु:ख अत्यावश्यक है । यह तो हुआ वस्तुके होने से पहले होनेवाला दुःन् । फिर वे धनादि पदार्थ मनोरथके अनुसार प्रायः मिलने नहीं । यह हुआ दूसरा दुःख । मिल भी जाय तो हमने दूसरेको अधिक मिल जाते हैं तो यह एक नया दुःख बड़ा हो जाता है. यह हुआ तीसरा दुग्छ । और मिलनेपर उसके नाशकी आशका बनी ही रहती है, जो महान् चिन्ताका कारण है। यह हुआ चौथा दुःख । एवं होकर नष्ट हो जानेपर तो बहुत ही जी क०१०-- १४६ जीवनका कर्तव्य -- कष्ट भोगना पड़ता है । उस समय जो दुःख होता है, वह उसके अभावके समय भी नहीं था। यह हुआ पाँचवाँ दुःख । श्रीपतनलिने कहा है-- परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच दुःखमेव सर्व विवेकिनः। 'परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कार दुःख - ऐसे तीन प्रकारके दुःख सबमें विद्यमान रहनेके कारण और तीनों गुणोंकी वृत्तियोंमें परस्पर विरोध होनेके कारण विवेकीके लिये सब-के-सब ( कर्मफल ) दुःखरूप ही हैं । मायाकी मोहिनी शक्तिसे ही यह अनुभव होता है कि धनादि पदार्थों के इतने रूपमें प्राप्त हो जानेपर हम बहुत सुखी हो जायँगे । ऐसी आशा और कथन तो हम सुनते भा रहे हैं; पर अभीतक ऐसा संसारी मनुष्य कोई नहीं मिला, जो यह कह दे कि हम पूर्ण सुखी हो गये हैं । प्रत्युत यह कहते तो प्रायः सभी देखे जाते हैं कि 'हम तो पहलेसे भी अधिक दुखी हैं।' कहा भी है- एकस्य न दुःखस्य यावदन्तं गच्छाम्यह पारमिवार्णवस्य । तावद् द्वितीयं समुपस्थितं मे छिद्रप्वनी बहुलीभवन्ति ॥ 'जबतक समुद्रको पार करनेकी तरह एक दुःखका अन्त नहीं होता कि उसी बीचमें दूसरा दुःख आ धमकता है; ठीक ही तो है अभावोंमें तो अनर्थोकी बहुलता होती ही है।' .

भगवदजनका स्वरूप
एक वस्तु के अभावका अनुभव होनेया उसकी पूर्तिके लिये
चेष्टा करते हैं. किंतु प्रायः उसकी सिद्धि होती नहीं; कहीं
देवसंयोगसे हो भी जाती है तो फिर उसमें कई अन्य नये-नये
अभावोंकी सृष्टि होने लगती है, जिनकी कि पहले कभी सम्भावना
ही नहीं थी । इसीलिये श्रीभगवान्ने कडा है-
यदि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तय न तेषु रमन बुधः ॥
'विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले जितने भी
सांसारिक टुम्न
सब-के-सत्र दुःखयोनि यानी दुःवोंकी
प्रसवभूमि--दुःवीको पैदा करनेवाली ग्वाने हैं. पूर्व उत्पनि और
विनायासे संयुक्त है । अतः हे अर्जुन ! बुद्धिमान विवेकी मनुष्य
उनमें नही रमता ।।
विचार करके देखा जाय तो किसी भी मांसारिक प्राणीको
अपनी परिस्थिति में पूर्ण सुख और संतोर नहीं है। क्योंकि वह
उसमे भी और अधिक सुम्वका लिये तदा लालायित तथा प्रयत्नशील
रहता है। शाम बतलाया है
सुग्वं देवराजस्य न पुरवं चत्रावर्तिनः ।
यत् नुवं
चीतरागम्य मुनरकान्तशीलिनः ॥
किसी राजस्थानी कविन बड़ा ही सुन्दर कहा है-
ना तुम काजी पदिनों ना सुख भूप भयो ।
मुन्य मोही भावी नृगा-नाग गर्यो ।
तीसरी बात कहते है कि इमन टोकम प्राप्या। यहां
हमन, लोकमः इन पदोंसे संकेत
संकेत है मनुष्य-शरीरकी ओर;
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जीवनका कर्तव्य भगवान् कहते हैं कि इस मानव-शरीरको प्राप्त करके तो मेरा भजन ही करना चाहिये, क्योंकि- एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥ नर तनु पाइ विषयँ सन देहीं । पलटि सुधा ते सठ विप लेहीं ।। ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई । गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥ अतएव इस मानव-देहको प्राप्त करके तोकेवल भगवद्भजन ही करना चाहिये; क्योंकि दूसरे-दूसरे काम तो अन्यान्य शरीरों में भी हो सकते हैं, पर भजनका अवसर तो केवल इसी शरीरमें है । देवादि शरीरोंमें तो भोगोंकी भरमार है तथा वहाँ अधिकार न होनेसे भी भजन कर नहीं सकते; और नरकोमें केवल पापोंके फलोंका भोग होता है, वहाँ नया कर्म करनेका न अधिकार है और न उनको कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान ही है । इसी प्रकार अन्य चौरासी लाख योनियोंमें भी कर्तव्याकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता, तथा साधन-सामग्री नहीं और अधिकार भी नहीं । अधिकार, ज्ञान और सामग्री ये तीनों केवल इस मानव-शरीरमें ही हैं । कहीं-कहीं पशु-पक्षी आदिकोंमें भी भगवद्भक्ति आदि देखनेमें आती है तो वे अपवादखरूप ही हैं । श्रीतुलसीदासजी कहते हैं साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक लॅवारा ।। सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ । कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ ॥ इस कथनपर हमें ध्यान देकर विचार करना चाहिये। जो मनुप्य-शरीर पाकर साधन नहीं करते, वे कहते है--'यह कलियुग

भगवजनका स्वरूप
--
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। समय बड़ा बुरा है। इस समय चारों ओर पाप-ही-पापका
प्रचार हो रहा है; सत्य, अहिंसा आदि धोका पालन नया
भगवडूजन हो ही नहीं सकता। यह कलिकाल बड़ा विकराल युग
है, सबकी बुद्धि अधर्ममें लग रही है, क्य’ करें, समयकी बलिहारी
| नब सब-का-सब वायुमण्डल ही बिगड़ा हुआ है, जब एक
मनुष्य क्या कर सकता है। यदि हम समय के अनुसार न चलें
तो निर्वाह होना टिन है और उसके अनुसार चलें नो पारमार्थिक
साधन नहीं बन पाता। किंतु आमा में विचार करना चाहिये,
क्या हम सचमन समय के अनुसार चलते हैं ! कभी नहीं । जब
गीतकाल आता है, गर्म कपड़े बनवाते हैं. आग आदिका
योकि अन करने है, घरमै आमा बंद करके रहते हैं....क्या
या समय, प्रनिकट चटना नहीं है। ऐसे ही माक दिन में
जल आदिमा प्रयोग करने हैं, गार्ग बनके लिये नतम
सावधान रहन है औः वने मी यथायोग्य पायों में उससे भी
जाण पालेकी बता करने हो न । अर्थात् सभी समय शरीरको
प्रतिकूलता निवार, उसने र ता २६ र अनुकुन्द सामग्री
जुटाने के लिये चेष्टा करते रहते हैं। इसी प्रकार हमें टिकालले
आयामिकतामोचानकी चेटा करनी चाहिये । जैसे शरीरकी
ग्धा न मानेपर सागा नाश हो जाता है. ऐसे ही आध्याधिक
जीवनको रक्षा
उनलमले सर्वश्रा धिन रहने के लिये
जान होना पड़ेगा।
अतः समयको दोष देना मिथ्या है; क्योंकि आयात्मिक
उन्नतिक लियाटियुग बन उत्तम माना जाता है । कारण, इसमें
Kared
.

१५०
जीवनका कर्तव्य
भगवद्भजनका मूल्य बहुत मिलता है, बड़े सस्तेमें मुक्ति मिल जाती
है, जैसी कि दूसरे युगोंमें सम्भव नहीं थी। श्रीतुलसीदासजी
कहते हैं--
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥
इसलिये बिना प्रयास ही जिसमें संसारसमुद्रसे पार पहुँचा जा
सके, ऐसे कलियुगको दोष देना सरासर भूल है ।
इसी प्रकार जिन कर्मोके फलस्वरूप मुक्तिका साधनरूप
मानव-शरीर प्राप्त हुआ है, उन कर्मोको दोष देना भी मिथ्या है।
क्योंकि-
बड़े भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा ॥
ईश्वरने भी बड़ी भारी कृपा कर दी कि जिससे कर्मोका सब
सम्बन्ध जुटाकर यानी इस समय मानव-शरीरके योग्य कर्म न
रहनेपर भी मानव-शरीर देकर आत्मोद्धारके लिये सुअवसर दे
दिया। एक राजस्थानी कविने कहा है-
करुणाकर कीन्हीं कृपा, दीन्ही नटवर
ना चीन्ही कृतहीन नर खल कर दीन्ही खेह ॥
'करुणानिधि भगवान्ने कृपा करके श्रेष्ठ मनुष्य-शरीर दे दिया,
परंतु मुर्ख और कृतघ्न मनुष्यने उस शरीरको पहचाना नहीं; प्रत्युत
उसे यों ही मिट्टी में मिला दिया ।
ऐसे अकारण कृपालुको यह कहकर कि क्या करें, भगवान्ने
देह ।

भगवङ्गजनका न्यम्प - } हमें ऐसा ही बना दिया, उन्होंने हमको संवारी बनाकर घरके काम-धंधोंमें फैमा दिया. कैसे भजन करें, भगवानकी मर्जी ही किसी है, वे कगने है तभी हम ऐसा करते है इत्यादि दोष ना मिथ्या है। नापय यह कि मनुय स्वयं तो उद्योग करता नहीं और दोषारोपण करता है दसरोपर नशा आरहना चाहता है निर्दोष। ऐसे काम करतक चलेगा-हमे नित्र रामजी गई लपेटी आग ? अतः विवेकपूर्वक विचार करके अपनी बान्तविक उन्नतिक लिये कटिबद्ध होकर नपरनाने खूब उत्साहकं साथ लग जना भगान्ने चौथी बात कही है.---'मान भजस्व ।' मुझको भजो। अब विचारना यह है कि भगवादका खन्य क्या है और उसका भजन क्या है । आजनक जना देखा. जैसा सुना और पढ़ा नया उसके अनुसार भगवानका साकार-निराकार, सगुण- निर्माण जिला बम समया, यही है भगवान का स्वरूप और इस प्रकार भगवान के स्त्रमयको मापरि तथा परम प्रापणीय समदाबर एकमात्र उनके शाण हो जाना ही भजन है। अर्थात् जिससे मान के नामका जप मनसे उनके बनाएका चिन्तन और बुद्धिसे उनका निधय करना तथा शरीर में उनकी आजाओंका पाटन करना; एवं सब कुछ उन्त्रीक सार्पण कर देना और उनके प्रत्येक विधान में परम संतुष्ट रहना-..--यह है भगवद्भजन । अब भगवदजन्य शरणागतिके उक्त चारों प्रकारोंका कुछ स्पष्टीकरण किया जाता है ।

१५२ जीवनका कर्तव्य : भगवान् के स्वरूपका चिन्तन करते हुए उनके परम पावन नामका नित्य-निरन्तर निष्कामभावसे परम श्रद्धापूर्वक जप करना और उन्हीं भगशन्के गुण, प्रभाव, लीला आदिका मनन, चिन्तन, श्रवण और कथन करते रहना एवं चलते-बैठते, सोते-जागते, खाते- पीते हर समय भगवान्की स्मृति रखना--यह शरणका पहला प्रकार है। दूसरा प्रकार है----भगवान्की आज्ञाओंका पालन करना। इसमें केवल इस बातकी ओर ध्यान देना है कि कहीं मन इन्द्रियों के और शरीरके कहने में आकर केवल उनकी अनुकूलतामें ही न लग जाय; बल्कि यह विचार बना रहे कि भगवान्की आज्ञा क्या है और यही विचारकर काम करता रहे । भगवदाज्ञा क्या है ? और वह कैसे प्राप्त हो ? इसका उत्तर यह है कि एक तो श्रीमद्भगवता-जैसे भगवान्के श्रीमुखके वचन हैं ही। दूसरे भगवत्प्राप्त महापुरुषोंके वचन भी भगवदाज्ञा ही हैं। क्योंकि जिस अन्तःकरणमें स्वार्थ और अहंकार नहीं रहा, यहाँ केवल भगवान्की आज्ञासे ही स्फुरणा और चेष्टाएँ होती रहती हैं। तीसरे उन महापुरुषोंके आचरण भी हमारे लिये आदर्श हैं; क्योंकि भगवान्ने कहा है-- यद् चदाचरति श्रेष्ठस्तत् तदवेतरो जनः। यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा- वैसा ही आचरण करते हैं। बह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्यसमुदाय उसीके अनुसार बर्तने लग जाता है ।।

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६५६
जीवनका कर्तव्य
और शरीरके प्रतिकूल हो या अनुकूल । क्योंकि केवल प्रभुका
विधान मानकर चलनेपर तो अनुकूलता-प्रतिकूलता दोनोंमें परम
मङ्गल-ही-मङ्गल भरा है। अतः वह अपना मनोरथ भगवान्से अलग
नहीं रखता, भगवान्की चाहमें ही अपनी चाहको मिला देता है।
इस प्रकार भगवान्का चिन्तन, भगवदाज्ञापालन, सब कुछ
भगवान् के अर्पण कर देना और भगवद्विधानमें परम प्रसन्न रहना ही
भगवद्भजन है।
,
अतएव हम सबको चाहिये कि बहुत शीव भगवद्भजनके हो
परायण हो जायँ । ऐसे परायण हो जायँ कि भगवानका भजन
करते-करते वाणी गद्गद हो जाय, चित्त द्रवित हो जाय, मन
भगवान्में ही लग जाय । फिर सजन करना न पड़े, स्वाभाविक ही
होने लग जाय, तभी सजन भजन है, नहीं तो भजनकी नकल है,
क्योंकि जो भजन किया जाय, वह नकली होता है और जो
स्वतः बनने लग जाय, वह असली होता है । न होनेसे तो भजनकी
नकल भी बड़ी अच्छी है, नकलसे भी आगे जाकर असली बन
सकता है । इसलिये भगवान्ने कहा है-
--
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
'सुखरहित और क्षणभङ्गुर इस मनुष्यशरीरको प्राप्त होकर
निरन्तर मेरा ही भजन करना चाहिये।
,

गीता और रामायण, क्रियात्मक प्रत्रा की
मावस्यकता
पार गरी पाम अनुसार पाने मनुष्य को प्राप्त हुभा
स शुगरकी महिला प्रतिपादि सभी बड़े हासे गाते हैं:
श्योकि हमने हर हे प्रयोजनको तिलि ही नकल है ।
श्रीमदीना निमा लामो नदका कोई लाभ
नहीं और जिनमें पिता का भारी दृग्न भी कभी भी विचलित
wweindia
लना चाप ला मल्यत नाधिक ततः।
यस्मिन् विना न बुलन गुरुणापि विचाल्यने ।।
Hamarewa
ऐसा अनपम लाभ अभी इमो शरीरमें और हर एक
मनुष्यको हो सकता है । मूर्व-से-सर्व एवं पापी-से-पापी मनुष्य

१५८ जीवनका कर्तव्य भी थोड़े-से-थोड़े समयमें दुर्लभ परमपद-परमात्माको प्राप्त कर सकता है। भगवद्गीतामें श्रीभगवान्ने कहा है तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददासि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ ( १० । १०) भगवान् स्वयं जब बुद्धियोग प्रदान करेंगे, तब मूर्खसे भी मूर्ख क्यों न हो, उसे उनकी प्राप्तिमें कौन-सी अड़चन रहेगी। भगवान्ने यहाँतक कह दिया कि 'अपि चेत्सुदुराचारः' सुष्टु दुराचारी अर्थात् साङ्गोपाङ्ग पापी भी अनन्यभाक् होकर भजन करे तो उसको भी साधु मानना चाहिये; क्योंकि उसने निश्चय बहुत ही अच्छा कर लिया है। इससे वह क्षिप्र- बहुत ही शीघ्र धर्मात्मा बन जायगा और शाश्वती शान्तिको प्राप्त हो जायगा। अधिक समयकी भी आवश्यकता भगवान् नहीं बताते- अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्धावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ (८ । ५) इस श्लोकमें 'च' अव्यय 'अपिके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । इसका अर्थ होता है कि 'अन्तकालमे भी मुझको याद करता हुआ शरीर छोड़कर जाता है, तो भी मुझको प्राप्त हो जाता है. इसमें संदेह नहीं ।' तब, जो सव समय भगवान्का चिन्तन करे उसके कल्याणमें तो कहना ही क्या है । गीता आदि ग्रन्थोंके विचार करनेपर यह बात समझमें आती है कि प्रभुकी प्राप्ति वास्तवमें कठिन नहीं तथा उसके लिये अधिक समयकी भी आवश्यकता गीता और रामायणके क्रियात्मक प्रचारकी आवश्यकता १५९ नहीं, आवश्यकता है----अपनी हार्दिक लगनकी तथा परमात्माकी प्रामिक मार्ग-नरीके जाननेशी । । मानको जानने और बतानेवाले हैं..-सच्चे महात्मा एवं शात्र, वेद, स्मृति, पुराण, इतिहास आदि अन्य । इनमें महात्माओंको तो हरेक मनुष्य पहचान ही नहीं सकता, तब वह उनसे कैसे लाभ उठाये और वेदादि ग्रन्थों का सम्यक रीतिसे अध्ययन करके विचार- पूर्वक ययाधिकार साधन चुन लेना साधारण बात नहीं । शास्त्रका पारावार नहीं, ऐसी हालतमें हमें नुगमताने सरल और सुखमय मार्गका बोध करा दनेवाले छोटे तथा सरल अन्य हों तो हम अनायास ही अपने जीवनको सफल बना सकते हैं और इसके लिये मेरी साधारण वुद्धिक अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीतुलसी- दासकृत मानसरामायण-----ये दो वन्य बहुत ही उपाय है। श्रीगीतोपदेशक समय अर्जुनकी जो दशा थी, वही किंकर्तव्य-विमढ़ दशा आज भारतवर्षकी है और इधर राज्यव्यवस्थाको देखते रामायण- की अर्थात् रामराज्यको अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है जीवनमें गमजीका आदर्श बर्ताव नितान्त प्रयोजनीय है और इसके लिये रामायण और गीताका श्रद्धापूर्वक पाट करना, उसका अर्थ समझना और उसीके अनुसार जीवन बनाना परम भावश्यक है और यह सब तभी सम्भव है, जब कि हम गीता और रामायणको अच्छी तरह समझकर तदनुकूल आचरण करें---उनको अपने जीवन- में उतारें । इसलिये गीता और रामायणका स्वयं पठन-पाठन करना चाहिये और दूसरोंमे करवाना चाहिये । उन बालकोंको जो ।

१६० जीवनका कर्तव्य आधुनिक समयानुसार धर्मरहित शिक्षा पाये हुए हैं। * विशेषरूपसे सच्ची धार्मिक शिक्षाकी आवश्यकता है, हमारे शास्त्रोंका तो कहना है--'धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ।' यह पशुवृत्ति बड़े जोरोंसे हमारे देशमें फैल रही है और घर कर रही है। अतः इसे निकालनेके लिये उनकी शरण लेनी चाहिये । जो खार्थत्यागी और हमारे यथार्थ हितैषी हैं। ऐसे हैं---भगवान् और उनके प्यारे भक्त-- -- सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥ स्वास्थ मीत सकल जग माहीं । सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥ हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥ * धर्मरहित राज्य, ब्राह्मणरहित धर्मविधान, क्षत्रियरहित शासन, वैश्यरहित व्यापार, शूद्ररहित सेवा, अन्त्यजरहित स्वच्छता-सफाई, वृक्षरहित उद्यान, फलरहित वृक्ष, सुगन्धरहित पुष्प, गोरस-घृतादिरहित मिष्ठान्न भोजन, धृतरहित हवन, अनुभव और आचरणरहित उपदेश; त्यागरहित प्रेम, गुण और धर्मरहित शिक्षा, आदररहित आतिथ्य, श्रद्धा- रहित साधन, योग्यतारहित अधिकार, भजनरहित जीवन, कर्तव्यरहित क्रिया, गो-महिष-रहित घृत, अश्व-गजरहित सवारी, ईश्वररहित जन- समुदाय, न्यायरहित निर्णय, स्त्रीरहित गृहस्थी, पुरुषरहित सेना, साहसरहित उद्योग, समत्वरहित ज्ञान, अनुरागरहित भक्ति, कुशलतारहित कर्म, पूर्ण निर्भरता-रहित शरणागति, पूर्ण समर्पणरहित आत्मनिवेदन, गुरुओं (अध्यापको और आचायों) पर - शिष्योका (विद्यार्थियोका ) शासन, माता-पितापर पुत्रका शासन, धार्मिकोपर अधार्मिकोंका शासन, न्यायशील राजापर प्रजाका शासन और पुरुषोपर स्त्रियोंका शासन आदि ऐसी चीजें है कि जिनसे समाज और राष्ट्रका सर्वनाश हो जाता है ।

गीता और रामायणके क्रियान्मक प्रचारको आवश्यकता १६१
सनन मिलि निरन क्रियो मथि पुरान इतिहाद !
भजिवे को दोई सुबर, के हरि, के हरिदान ।।
इन दोनों ही साक्षात् वचनामृतरूप ये दो पवित्र प्रन्धरत्न
है----श्रीभगवान् के श्रीमुखकी वाणी गीता और भकगज तुलसीकी
मधुर वाणी श्रीगनायम ! भाषाएं अनेक है, पाना सर्वश्रेट है.
देवमाश संस्कृत और दूसरी है राष्ट्र हिंदी का संस्कृतमें है
और गमाया हिंदी । हमारे अवतार भी दो ही मुल्य माने जाते
है.----एक श्रीराम और दूसरे श्रीकृष्ण ! उन दोनों समय भी इन
दोनोंकी महिमा है। उपदेश देने के तरीके भी दो ही है.--एक
मुम्ब कार और पक आचरण करके।
यद् यदाचरति श्रेष्टस्तन् तंववेनरी जनः ।
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तत ॥
(३१२१)
वही श्रीगीता में श्रीभगवान्ने कहबार उपदेश दिया और
भगवान् श्रीरामजी ने श्रीरामायण, उसीको कारके दिग्बलाया। काव्य
भी दो ही ताहके होते हैं...--एक दृश्य और दूसरा भव्य । रामादग
दृश्य और गीता श्रव्य है।
श्रीमद्भगवद्गीता संक्षिप्त उपदेशले और रामायण विशद
उदाहरणों और लीला-कथाओंसे हमें समझा रही है। इसलिये इन
दोनों ग्रन्थरनोंका अच्छी तरह से अध्ययन करके अनुसरण करना
चाहिये।
जी

संत और उनकी सेवा तमिस्तजने भेदाभावात् । ( नारदभक्तिसूत्र ४१) संत भग्वान्से अपना अलग अस्तित्व नहीं मानते, इसलिये उनमें स्वार्थकी गन्ध भी नहीं रहती। भगवान्से अलग उनकी कोई इच्छा नही, वे स्वाभाविक ही भगवान्की इच्छामें अपनी इच्छा, उनकी रुचिमें अपनी रुचि मिलाये रहते हैं। अतः उनके हरेक विधानमें परम संतुष्ट रहते हैं। संत भगवान्पर ही निर्भर रहते । 'जाही विधि राखै राम, ताही बिधि रहिये--को वे अपने जीवनमें अक्षरशः चरितार्थ कर लेते हैं और इस प्रकार भगवान्के विधानानुसार रहनेमें वे बड़े प्रसन्न होते हैं । हमलोग भी भगवान्के विधानानुसार ही रहते हैं। ( क्योंकि भगवान्की इच्छाके विरुद्ध एक पत्ता भी नहीं हिलता। ) पर उसमें हमारी प्रसन्नता नहीं होती, हमें बाध्य होकर रहना पड़ता है । यदि हममें मन-इन्द्रियोंके प्रतिकूल भगवद्विधानको बदलनेकी शक्ति-सामर्थ्य होती तो हम उसे अपने अनुकूल बना लेते। परंतु करें क्या, हमारा वश नहीं चलता, तो भी शक्ति- सामर्थ्य न रहने पर भी उससे बचनेका असफल प्रयत्न तो निरन्तर करते ही रहते हैं । पर संतमें ऐसी बात नहीं है । संतके मनमें भगवान् के विधानानुसार बरतनेमें कुछ भी विचार नहीं होता; प्रत्युत भगवान्के विधानके अनुसार प्राप्त परिस्थिति उसके लिये

संत और उनकी सेवा
१६३
-
अनुकून्ट-से-अनुकूल प्रतीत होती है। तथा उसके हृदयमें सदा-
सर्वदा भावानके विराजमान रहनेके कारण उसपर प्रतिकूलताका
कोई असर नहीं होता।
भगवान स्वयं कहते हैं-
नमोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्रुग्योऽस्ति न प्रियः।
व भजन्ति तु मां या मयि नेतेपुवाप्यहम् ॥
( गीना ९।२९)
अन ! मैं सब भूनाम समभावले व्यापक हूँ, न कोई
मेरासिय ई, न अप्रिय है। परंतु जो नुनको प्रेमसे भजते हैं, वे
मुझमें है और में भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।' विचार कर देखें तो
यह बारीक समयमें आ जाता है। जैसे एक अच्छा मकान है,
उसमें किसीका कजा-उबन्न नहीं ६: अनमय अच्छे पुत्यको उपमें
झनेस स्थानाविक ही प्रसन्नता होगी । इसी प्रकार संतके अहंता-
मनतास सहन निर्मल, अन्तःकर गर्ने भगवान प्रकटरूपसे रहकर
बड़े प्रसन्न होते हैं। बांकि वहाँ उनके रहनने कोई किसी प्रकारका
प्रतिबन्ध मी गाना, बिन नहीं डालना । भगवान् से घरमें
बनिनकोचनाबसे रहते हैं। श्रीरामचरितमानसमें वाल्मीकिनान
कहा भी है--
जानि चाहिम कबहुँ का तुम्ह ग्मन सहज सनेहु ।
बसहु निरंतर सासु मन सो सडर निज गहु ।
इस प्रकार के हृदयमें भगवानका वास होनेसे, वह जो
कार्य करता है, वह भी भगवान् ही करते हैं; यह जो भी सोचना
है, वह भगवान् ही सोचते हैं, इत्यादि कथन सर्वथा सत्य है ।
स
--

१६४
जीवनका कर्तव्य
संत और भगवान्के विषयमें तीन प्रकारकी बातें मिलती हैं-
(१) दोनोंमें कुछ अन्तर नहीं ।
संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं किमपि सति मलिन
कह दास तुलसी ॥
(विनयपत्रिका)
संत ही भगवान् हैं और भगवान् ही संत हैं अर्थात् संतोंका
भगवान् के अतिरिक्त कोई पृथक अस्तित्व ही नहीं रहता। केवल
भगवान् ही रह जाते है । किसीने कहा भी है--
हूढ़ा सब जहाँमें पाया पता तेरा नहीं।
जब पता तेरा लगा तो अब पता मेरा नहीं ।।
(२) वास्तवमें भगवान् भगवान् ही हैं। संत संत ही हैं।
संत भगवान्के बराबर नहीं, भगवान् उससे बड़े हैं। संतके
ज्ञान, सामर्थ्य, शक्ति आदि सीमित है और भगवान्का सब
कुछ अनन्त और असीम है। माना, संत भगवान्को प्राप्त हो
गया और दूसरेको भी उनकी प्राप्ति करा सकता है । पर वह भगवान्
नहीं बन जाता । न्यायसे भी यह ठीक लगता है। जैसे जब हमें कोई
संत मिलता है तो हम कहते हैं--महाराजजी ! भगवान्के दर्शन
करा दो।' इससे प्रत्यक्ष है कि संतके मिलनेसे हमारी आत्यन्तिक
तृप्ति नहीं हुई; उनसे बड़ी जो एक वस्तु--भगवान् है, उसको
पानेकी इच्चा बनी रही। इससे स्वाभाविक ही भगवान्का बड़ा
होना प्रकट होता है और संत सदा भगवान्को बड़ा मानते
आये हैं
-

संत और उनकी सेवा (३) संत भगवान में बढ़कर है। गोवामी तुलसीदासजी -- मा Hain राम सिंध बन सजन धीरः । चंदन का हरि मन सगरा ॥ मार मन प्रभु अप बिस्वासा । राम ने अधिक राम कर दासा ।। श्रीभगवान ने भी दुर्वासाने कहा है- मनापराधीनो बस्वतन्त्र व द्विज ! साधुभिम्रतहदयों भनयक्तजनप्रियः॥ सनाने तो भगवान्को बड़ा बनलाया और भगवान् संतांको बड़ा बयान हैं । परंतु नंतीको भगवान् और संत दोनो ही ब्रा बनवाने हैं। भगवान्ने काही भी अपनेको संतसे बड़ा बतलाया डो----रेना देग्नने में नहीं आया। इस दृष्टि से बड़े हुए संत ही। और हम अपने यामक निये विचार करते है. नो भी लंत ही बड़े हैं। क्योंकि मामा संचमानन्दको जीवमात्रक हदय में रहते हुए भी संत-कृत और सुबह के बिना नावान के उन परम आनन्दमय स्मक अनुभवले यश्चित रहवार जीव दुग्नी की हते हैं। भगवरख- माका अनुभव तो भगवकिसे ही होता है और वह मिटती है मन-ऋश तथा सत्सहने---- गानि नान अनुभम मुन्र मूल । मिलना हहिं संत अनुहला !! भगनि स्वतंत्र महल गुन वानी । भिनु यतमंग न पाय पानी ॥ अतश्व हमारे लिये तो संन ही बड़े हुए। भगवत्कृपासे प्राप्त हुए मानवदेहका फल मनुप्यके कर्म एवं साधनके अनुसार स्वर्ग, नरक अथवा मोक्ष--सभी हो सकता है। किंतु संतोकी

जीवनका कर्तव्य
कृपासे प्राप्त हुए सत्सङ्गका फल केवल परम पद ही होता है।
भगवान् तो दुष्टोंका उद्धार करते हैं उनका विनाश करके,
पर सत दुष्टोंका उद्धार करते हैं उनकी वृत्तियोंका सुधार करके ।
भगवान् अपने बनाये हुए कानूनमें बँधे हुए हैं। परंतु
संतोंमें दया आ जाती है। इस प्रकार भी संत भगवान्से बड़े
हैं । भगवान् सब जगह मिल सकते हैं, पर संत कहीं-कहीं
ही हैं। अतएव वे भगवान्से दुर्लभ भी हैं-
हरि दुरलभ नहिं जगत में, हरिजन दुरलभ होय ।
हरि हेरयाँ सब जग मिले, हरिजन कहिं एक होय ॥
हमारा उद्धार करनेमें तो संत ही बड़े हुए, अतएव हमें
उन्हींको बड़ा मानना चाहिये ।
तात्त्विक दृष्टिसे देखें तो संत और भगवान् दोनों एक ही हैं।
क्योंकि संत भगवान्से पृथक अपनी आसक्ति, ममता, रुचि आदि
नहीं रखते । अतः वे भगवत्स्वरूप ही हैं--
भक्ति भक्त भगवंत गुरु, चतुर नाम, वपु एक ।
इन के पद बंदन किएँ नासत बिध्न अनेक ॥
अब प्रश्न होता है कि संतोंका सेवन किस प्रकार किया
जाय ? इसके उत्तरमें यही कहा जा सकता है कि संतों के सेवनका
सर्वोत्तम ढंग है उनके मन, उनकी आज्ञाके अनुसार चलना, उनके
सिद्धान्तोंका आदरपूर्वक पालन करना । यह संत-सेवनकी ऊँची-से-
ऊँची विधि है। इसका कारण यह है कि सतोंको अपना
सिद्धान्त जितना प्यारा होता है, उतने उनको अपने प्राण
-

स्तन और उनकी सेवा
१६७
on
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भी नही होने, जो हमलोगों को सबसे अधिक प्यारे हैं। यही
कारण है कि आवश्यकता पड़नेपा अ.ने प्राण हो सकते है,
समान नहीं। मात्र उनके का माहावा पालन
काना, उनके मन अनुसार चना और यदि मनका ना न लगे
-आशा आदेखें, अनुनार बनना चाहिये. यह उनका सबसे
कड़ी मेवा है...'या मद मुनाहिन सेवा ।' अत: शहर
या कानेक मात्र ही अदाग पर्वक, मन भी नेत्रा की जाय
तो कहना ही हाई . उनका सिद्धान्त जानने के लिये
जनका मा करके उनसे भगया: बार पूछनी चाहिए। इससे
हम अधिक लाभ उठा सकते हैं। सनीने सुत्र, बी, धन, मान,
बाई आदिने सम्बन्ध रखने वाले मजारिक, दार्थ चाहना अमूल्य
होरेको प्यार को दाना; ग्रह मदोंक महाका मा योग नही है।
को मनाने कादने आदि पुत्र आदि प्रम भी हो सकती है,
किंतु यह तो उनकी कीमत न समयन्त
संगमा प्रायः मनमाने ना तो सी बाहरी
क्रियाक अान् अधिक गाने. त्रिीको सोना बना देने
चापकार :: नानोमी विमान बना बाईने किंतु इन
मानव तप का उदर न । सोका या लक्षण
कही भी नहीं टिला, मीना स्थान स्थान आदिकलमण
लिने , पर उसमें एक स्थान पर भी ना किया कि वे बेटा द
नने हैं, बचनास मान हैं आदि ।
तो फिर तोंकी पहचान कैसे हो ? संतांकी पहचानका
है

१६८ जीवनका कर्तव्य सीधा-सा उपाय यही है कि जिस व्यक्तिके सङ्गसे हमारा साधन बढ़े, हममें दैवी सम्पत्ति आये, हमारे भाचरणमें न्याय आने लगे, भगवत्तत्त्वका ज्ञान होने लगे, सत्-शास्त्र, भगवान्, महात्मा, परलोक और धर्ममे श्रद्धा बढ़े और भगवान्की स्मृति अधिक रहने लगे, हमारे लिये वही संत है। संतोंसे ऐसा ही लाभ लेना चाहिये और उनसे इस प्रकारका आध्यात्मिक लाभ लेना ही सच्चा लाभ है । भगवान्से लाभ उठानेकी पाँच बातें हैं-नाम-जप, ध्यान, सेवा, आज्ञा-पालन और सङ्ग । पर संतोंसे लाभ लेनेमें सङ्ग, आज्ञा और सेवा-ये तीन ही साधन उपयुक्त हैं। संत-महात्मा पुरुष अपने नामका जप और अपने स्वरूपका ध्यान कभी नहीं बताते और जो अपने नाम और रूपका प्रचार करते हैं, वे कदापि संत नहीं। सच्चा संत तो भगवान्के ही नाम-जप और ध्यान करनेका उपदेश देता है । हाँ, वह सेवा, आज्ञापालन और सङ्ग- इन तीनके लिये प्रायः मना नहीं करता । सेवामें कुछ संकोच रखता है और जहाँतक सम्भव होता है, नहीं करवाता है । सेवाके दो भेद हैं (१) पूजा, आरती करना आदि, (२) वस्त्र देना, भोजन देना, अनुकूल वस्तुओंको प्रस्तुत करना इत्यादि । भगवान्की तो ये दोनों ही सेवाएँ उचित हैं, परंतु संत पुरुष पहले प्रकारकी सेवा नहीं चाहते और यदि कोई ऐसी सेवाके लिये आग्रह करता है तो वे अपने स्थानपर भगवान्की ही वैसी सेवा करवाते हैं। क्योंकि वे जानते है कि मेरा शरीर हाड़-मांसका है, इसकी सेवासे क्या लाभ !' दूसरी प्रकारकी सेवा वे आश्रम और वर्णके अनुसार

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जीवनका कर्तव्य तुरंत उत्तर दिया, ठोक है, मेरे शरीरपर तो तुम पैर नहीं रखने, पर मेरी जबानपर तो पैर रख दिया न ?' यह एक दृष्टान्त है। इससे हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि सेवामें शरीरकी अपेक्षा वचनोंके पालनको अधिक महत्त्व दें। हाँ, यह सम्भव है कि हम संतके वचनका पूरा पालन न कर सकें, कितु यदि मन में बनन- पालनकी नीयत है तथा उसके लिये यथासामर्थ्य प्रयत्न भी किया गया है तो फिर चाहे उसका अक्षरशः पालन न भी हो पाया हो तो भी उससे बहुत बड़ा लाभ होता है । यदि सतोंके वचनोंका भाव कही पूर्णरूपसे सनझमें नहीं आये तो नम्रतापूर्वक उन्हींसे पूछकर समाचान कर लेना चाहिये; पर समझमें आ जानेपर पालन करनेमें किञ्चन्मात्र भी कमी नहीं लानी चाहिये । संतके वचन-पालन में यदि कहीं उनकी सेवाका भी त्याग करना पड़े तो वह भी कर देना चाहिये। सेवा करनेसे जब लाभ है तो सेवा-त्यागसे अधिक लाभ होना चाहिये, क्योंकि जो कमिटी चीज है, उसका त्याग उस चीजसे भी बड़ा है फिर यह त्याग यदि संतकी आज्ञासे ही किया जाता है, तो वह और भी आचेक महत्त्वकी वस्तु है । सचा श्रद्धालु इसमें क्यों चूकेगा । हाँ. रक बात है जो सेवा के कष्टसे बचकर सेवाका त्याग करते है, वे तो सेवाके महत्वको जानते ही नही । उनको तो सेवा करनेमें कटका अनुभव होता है । इसलिये वे उस लाभसे बञ्चित रहते हैं। संत की किसीदो किञ्चिन्मात्र भी कष्ट देना नहीं चाहता, इसलिये वह ऐसे व्यक्तियों से सेवा क्यो करवायेगा, क्योंकि उनको सेवा करानेकी .

संत और उनकी सेवा
।
कोई भूख तो है ही नहीं । जो लोग दूसरों से अपनी सेवा करवानः
चाहते हैं, उनके अन्तःकरणमें खार्थ और अहंकारकै कारण यह नहीं
सूझ पड़ता कि किसको क्या कर और हानि हो रही है। किंतु
संतोंक नि:स्वार्थ हृदय तो प्रकाश है। वे तो जानते हैं कौन व्यक्ति
सेवा सुग्वका अनुभव करता है और कौन दुःखका ।
सत्सके लिये तो संत स्वयं अपनी ओर से चले जाते हैं। क्योंकि
प्रेमी जिज्ञासुओंके पास जानेमे भगवद्-वाक्योंका मनन, विकार
और अनुशीलन होता है, जो उन्हें अत्यन्त मारे हैं। इतना ही
नहीं, वे अपना सब करनेवाले व्यक्तिका उपकार भी मानते है कि
इसके कारण हमारा कुत सम्य भगाचर्चा में व्यतीत हुआ ।
काकभुशुण्डिजीने गाजीले कहा---'महाराज ! मुझग आरयो नई
कृपा हर, जो मुझे सत्म, दिया ।
--
तुम्ह विग्यानाप
नहिं मोहा । नाय की मो पर निहा।
प्रचिन राम कथा अति शनि । सुसनकादि संभु मन भावन्दि ।।
मन्तिम्मनस
सकी बानी अलौकिक कि हम उनका विमान भी
नहीं कर सकते. फिर अनुभवी नो बान हो अलग है।
अपनी बुद्धिने सोचान करना कठिन है। उनकी
पमान को संत में मावानको कृपाले सत्र है। कार टीमें
चाम करने का ही फेट हो जाने है कि हमारी
कमी हो जाता है। संत को पहचान पर बसा है नरोकही
की जा सकती है कि (१
व्यक्तिवासन मातलाममा

जीवनका कर्तव्य १७२ हममें दैवी सम्पत्ति आये, भगवान्में हमारी रुचि बढे, आध्यात्मिक पथपर हम अग्रसर हों, (२) जो हमसे कभी किंचिन्मात्र किसी तरहको सेवाको इच्छा न रखता हो, ( ३ ) जो हमारा सदा ही विना स्वार्थ के हित करता रहता हो एवं (४) हमारी दृष्टि में जो आध्यात्मिक विषयमें सबसे बढ़कर जानकार हो, वही हमारे लिये संत है । एवं स्थूल रीतिसे संतकी पहचान करनेका यह उपाय भी है कि सच्चा संत स्त्री, सम्पत्ति नहीं चाहता, मान-बड़ाई नहीं चाहता, जितनी भौतिक वस्तुएँ हैं उनकी उसको इच्छा या लालसा नहीं रहती। संतोंका सङ्ग किया जाय तो वह कभी निष्फल नहीं जाता । पर उनका महत्त्व समझकर उनके सिद्धान्तानुसार आचरण करते हुए उनका सङ्ग करना उनका वास्तविक सङ्ग करना है। इस प्रकार करनेसे ही उनके सङ्गका वास्तविक लाभ शीव्र प्रकट होता है। इसपर यह शङ्का होती है कि अग्नि अनजानमें भी स्पर्श किये जानेपर जला डालती है, इसी प्रकार अनजानमें भी किया हुआ संतोंका सङ्ग पापोंका नाशक अवश्य होना चाहिये । तो इसका उत्तर यह है कि यह बात उचित ही है। पापोंका नाश तो अनजानमें भी किये हुए संत-सङ्गसे अवश्य होता है, परंतु जिस प्रकार अग्निमें दाहिकाशक्ति, प्रकाशिकाशक्ति, पाचनशक्ति एवं स्वर्ग तथा मोक्ष देनेकी भी शक्ति है, पर दाहिकाशक्तिको छोड़कर अन्य शक्तियोंका लाभ हम बिना जाने नहीं उठा सकते । अग्नि अनजानमें स्पर्श करनेपर जलाता तो है, पर उससे जलानामात्र ही संत और उनकी सेवा होता है। किंतु जो उस अग्निको अग्नि ( अग्निका वास्तविक महत ) जानकर उसके अनुकूल क्रिया करने हैं, उससे प्रकाश भी ले सकते है और उसे सटी बनाकर अपनी भृग्न भी मिटा सुकाने हैं। इनना ही नहीं, अग्निसे ये काम को श्रद्धारहित व्यक्ति भी ले सकता पर वैदिक मन्त्र और परलोकी अना न्याला मनुष को दिन गन्नों प्रदायक विधिन अनिमें आहुति देकार वर्गप्राप्ति में कर सकता और भगगनकी आक्ष मानकर निकाममा अनि आदनि देकर यह करता है. वो धानि भगवानको प्रामि भी कर सकता है । इली प्रकार संतोको न जाननेपर भी उनके सासे पायोका नाम तो होता ही है, पर जाने बिना परमाता विशयकान और सांसारिक पदार्थास वैराग्य नहीं होता। जानकर उनका सा करनेसे सत्-अगद, काय- अनन्य, इप-उपादेय और सार-असारका हान एवं अग्ने लिये अभी और परिणाम सानिकारक वस्तु तथा नियाओंका त्याग हो सकता है एवं शतापूर्वक निकामभावसे उनकी आज्ञाके नुसार अनुष्ठान करनेसे तो अडान, क्लेश, कर्म, विकार, वासना आदिवा अत्यन्त अभाव होकर परमानन्दरूप परमाताकी प्रालि हो जाती है। यह सब लाभ संत-महात्माओं को जानकर उनका श्रद्धापूर्वक सह और तदनुकुल आचरण करनसे ही होता है। इस विषयमें एक बात और भी है। अगिसे जलना तभी होता है, जब अग्नि और अपने बीचमें कोई व्यवधान नहीं होता। परमें जूता पहनकर अग्निका समर्श किया जाय तो वह जला भी ..

२७४ जीवनका कर्तव्य नहीं सकता । इसी प्रकार यदि संतोंके सड़में कुतर्क, निन्दा, तिरस्कार आदिकी आड़ लगा दी जाय तो पापनाशरूपी लाम भी नहीं हो सकता। अग्नि तो अनजानमें स्पर्श किये जानेपर केवल जलाता ही है, पर यदि कोई संतके प्रति तिरस्कार और निन्द्राका भाव नहीं रख कर अनजानमें भी उनका सङ्ग करता रहे तो सनीका सङ्ग तो उनके पापनाशके सिवा उसे परमात्माकी प्राप्तिका अधिकारी भी बना देता है। जैसे पारस और लोहेको टकराते रहो तो पहले लोहेपर लगी हुई मिट्टी, जंग आदि व्यवधान दुर होंगे और बाद में स्पर्श होनेपर लौह खर्ण बन जायगा । बस, इसी प्रकार बार-बारके सङ्गसे पापरूपी मल (मिट्टी, जंग आदि ) दूर हो जायगा और अन्त में कल्याण हो जायगा । ऋषिकेश ( उत्तराखण्ड ) की ओर देखा होगा, गङ्गाजीमें गोल-गोल पत्थर मिलते हैं । पहाड़ोंकी चट्टान के टेढ़े-मेढ़े पत्थर पानीके प्रवाहमें लुढ़कते-लुढ़कते गोल हो गये। उन्होंने कोई उद्योग नहीं किया और न उनमें गोल होनेकी इच्छा ही थी। पर प्रवाहमें पड़े रहे तो गोल और चिकने हो गये। इसी प्रकार संत-महात्माओंकी शरणमें पड़ा रहे तो अन्तमें कल्याण हो ही जाता है। श्रद्धाके दो भेद हैं--(१) स्थायी और (२) अस्थायी । स्थायी श्रद्धा वहाँ होती है, जिसमें कभी कमी नहीं हो सकती। पर अस्थायी श्रद्धा बाजारू भावकी तरह घटती-बढ़ती रहती है। स्थायीमें बढ़नेकी गुंजाइश तो है; पर वह घट कभी नहीं सकती। अस्थायी श्रद्धा भी बढ़ते-बढ़ते अन्तमें स्थायी श्रद्धामें परिणत हो संत और उनकी सेवा सकती है। क्योंकि अस्थायी श्रद्रामें जो वास्तविक श्रद्धाका अंश रहता है, वह स्थायी श्रद्धा में शामिल होता रहता है। संतोंका बार- कर सङ्ग करनेसे उनके गुग-प्रभावका ज्ञान होनेपर तथा उनकी आना-पालन करने से उनके प्रति श्रद्धा-भावका विकार होता रहता और अन्त में स्थायी श्रद्धाका उदय हो जाता है । संत सदा रहने है ।सा कोई भी समय नहीं होता, जन्न पृथ्वीमण्डल यति. लती, धर्मामा और सत पुरुष न हो । आज मी संना पुरुष मिट सकते हैं। और से संन मिल सकते हैं, जो हनाक उद्वार कर सकते है । पर हमें मिल कमे हम्में उनके लनकी लालसा हो नहीं । अनत्र यह लालसा बढ़ानी चाहिये कि हमें संत. सच्चे संत मिलें । संतक जीनकालमें यदि कोई उनारे लाभ लेने वाला न हो. मी में उनके विद्वान वायुमण्डलमें स्थिर हो जाते हैं, जिससे मंच में यदि कोई दाग लेनेवाला उत्पन्न होता है तो उनसे लाभ उठा लेता है। मी वान नहीं किसनी संत पकाने । उनको बान्तविध तिमें भर न रहने पर भी वर्ण, आश्रम. सर, स्वाध्याय, प्रकृति, साचनमी प्रणाली आदिका माधनका में अन्तर रहने के कारण मिन्दावस्था में भी उनसी मान्यता, आचरण और उपदेशप्रणाली में wmmer तापाया जाता संत लोग जिसीको अपना चेचा-चेली नहीं बनाते । पर यदि १७६ जीवनका कर्तव्य कोई अपनेको उनका अनुयायी मान ले तो इसमें उसको कौन रोक सकता है ! जो व्यक्ति ईश्वरपर भरोसा करके सच्चे हृदयसे अपने आपको किसी संतका अनुयायी मान लेता है, उसका भार भगवान्पर आ जाता है । पर मान्यता होनी चाहिये असली। मतलब यह है कि साधकके मनमें इच्छा हो केवल भगवत्-प्राप्तिकी ही तथा श्रद्धा हो सिद्धान्तको लेकर ही, तो फिर व्यक्तिपर आग्रह न होने तथा इच्छा भौतिक न होनेके कारण वह कहीं भी ठगा नहीं सकता । इस प्रकार यदि मान्यता असली हुई और भगवान् देखेंगे कि इस व्यक्तिका कल्याण इस संतमें श्रद्धा रहनेसे हो सकता है, तब तो वे उसकी श्रद्धा उस संतमें दृढ़ कर देंगे, किंतु यदि वह संत न हो और उसमें श्रद्धा रहनेसे उस साधकको हानि होनेकी सम्भावना हो तो भगवान् उसकी श्रद्धा और कहीं लगा देंग; क्योंकि साधकके न जाननेपर भी भगवान् तो साधक और संत दोनोंको ही जानते हैं और अनजानमें भी रक्षा करना भगवान्का सर्वभूतसुहृद्वभाव है ही। अतः दोनों अवस्थाओंमें उसका उद्धार होना निश्चित है ही; क्योंकि 'मेरा कल्याण भगवान् अवश्य करेंगे। ऐसा उसका भगवान्पर दृढ़ भरोसा रहता है । एकलब्यके भाषसे उसको सफलता मिल गयी । वास्तवमें श्रद्धा-भक्ति असली चीज है. नेग-चारसे भगवान् नहीं मिल सकते । संतके विषयमें भी यही बात है । नेग-चार करके चाहे हम विसीको गुरु न बनायें, पर श्रद्धा- भक्तिसे संतको गुरु मानकर उनकी सेवा, आज्ञा-पालन और सङ्ग करें, लाभ हो ही जायगा। - सुख कैसे मिले ? जो मन-इन्द्रियों को अनुकूल जान पड़ता है, वह सुख और जो प्रतिकूल प्रतीत होता है, वह दुःख है । यह है न्युग्व-दृःखको साधारण जनताद्वारा की हुई परिभाषः । हम सोचते हैं कि हमें रोटी, कपड़ा, मकान, सवारी, जमीन, वित, न्याय, विद्या और औषध आदि तरतु सस्ती तथा पुष्कल- मात्रा में प्रान हो जाये तो हम मुसी हो जायंगे किंतु विचारिये--जिसके पास उक्त पदार्थ प्रचुर मात्रा में है, या वह वास्तव में सुखी है । कदापि नहीं, गोंकि पढ़ायात बढ़नेसे उनकी लालसा बढ़ती है और वस्तुओंकी लालसा ही सम्पूर्ण दुःनोका कारण है। गीतामें अर्जुनने भगवान ज दुःखोंके कारणरूर पापोंका हेतु छा, तब भगवान ने बाम ( लालसा) को ही पापाचरणका हेतु, जी क० १२-- , १७८ जीवनका कर्तव्य बतलाया । दुःखका साक्षात् कारण भी लाळसा ही है । कैदमें, नरकादिमें या जहाँ-कहीं भी कोई दुखी देखनेमें आते हैं, उन सबके दुःखोंके कारण पहले कभी लालसासे किये हुए पाप या वर्तमानमें पदार्थोकी लालसा ही है । लालसा ( चाह ) करनेसे पदार्थ मिलते भी नहीं । संसारी लोग भी चाहनेवालेको नहीं देते, बल्कि जो नहीं लेना चाहता, उसे आग्रह और प्रसन्नतापूर्वक देना चाहते हैं ! किसी व्यक्तिको यदि सम्पूर्ण संसारकी उपर्युक्त सभी मनचाही वस्तुएँ मिल जाय तब भी उनसे तृप्ति नहीं हो सकती, प्रत्युत उसकी लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती ही जायगी जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई । इस लालसाके बढ़ने का अर्थ यही है कि आपको अपनेमें कमीका अनुभव है, और जबतक अपने में कमीका अनुभव होगा, तबतक सुख हो ही कैसे सकता है, प्रत्युत दुःख ही बढ़ेगा। गम्भीरतासे विचार कीजिये तो आपको मालूम हो जायगा कि पदार्थोके मिलनेसे सुख नही होता, वरं पदार्थ मिलनेसे दुःखकी कारणभूत इच्छा ( चाह ) और बढ़ती है। कहा भी है- यत् पृथिव्यां ब्रोहियचं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। लालसेकस्य तृप्त्यर्थमिति मत्वा शमं ब्रजेत् ॥ न जातु कामः कामालामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवमेव भूय एवासिवर्धते ॥ 'पृथ्वीमें जितने भी धान्य चावल, जौ, गेहूँ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब-के-सब मिलकर एक मनुष्यकी तृप्तिके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं, ऐसा मानकर तृष्णाका शमन करे; क्योंकि - सुख कैसे मिले? भोग-पदाकि उपभोगले कामना कभी शान्त नहीं होती, बल्कि जैसे वीपी आहुति डालनेपा भाग और भड़क उटती है, वैसे ही भोगवासना भी भोगोंके भोगने से प्रबल होती जाती है। सभी मनुष्य चाहते तो मुख ही हैं, परनु सुखकी सामग्री इन संसारकी वस्तुओं को हो समझते हैं, इसलिये इन्हींको प्राप्त करने का प्रयत्न करते दे जाते हैं। आज पृथ्वीमा ढाई अरब मनुष्य माने जाते हैं. उनमेंने प्रत्येक व्यक्तिको संसारकी समस्त वस्तु को मिल सकती है। क्योंकि बस्तुओंपर सभीका हक है, एवं वस्तु सब मिलकर भी सीमित है और उनके चाहने वाले हैं बहुत धाधिक ! जब एकको एक पूरी नहीं मिल सकती. नत्र प्रत्येको सभी बल पूरी से मिले मान लीजिये, यदि सभीको मिल भी जायें, नत्र भी उन वस्तुओनि मुग्द होना सम्भव नहीं; क्योंकि चेतन जयो केवल पूर्ण चिनयतासे ही शान्ति मिल सकती है. पूर्ण और सीमित जड वस्तुओंसे नहीं । चदि इन नश्वर पदाथोंके संयोगसे मुगदावा जो सुन प्रतीत होता है, उसे ही सृग्ब मान लें, तो भी जट रतुएँ तो प्रतिक्षण परिवर्तनशील और शील और नाशवान् हैं तथा जीव for र अविनाशी है । अतः इन दोनोंका नित्य संयोग कैसे रह सकता है? तो फिर सुख से मिले, सुखका उपाय क्या है ? सुखका उपाय है.--चिन्मय परमात्माकी प्राप्तिका लथ्य और धन तथा न्यायका माचरण । अभिप्राय यह है कि जब हमारे आचरण धर्मवत होंगे और जब हम न्यायसे प्राप्त अपने हकके अतिरिक्त और कुछ ग्रहण १८० जीवनका कर्तव्य करनेकी इच्छा नहीं करेंगे, तभी अपली सुखकी उपलब्धि हो सकेगी । यह होगी त्याग और उदारता आनेसे | जिन वस्तुओंको हम सुख देनेवाली समझते हैं, उनको जब हम सभी त्याग और उदारताके भावसे एक दूसरेको देना चाहेंगे और लेना नहीं चाहेंगे तब उन वस्तुओंकी स्वतः ही बहुतायत हो जायगी और लेनेवाले हो जायँगे कम । उस समय हमारी उदारताके फलस्वरूप दैवी शक्ति भी पूरा काम करेगी, जिससे वस्तुओंका उत्पादन और रक्षण भी अधिक होगा । इस प्रकार सर्वत्र सुखका ही साम्राज्य छा जायगा । त्याग और उदारताकी भावनासे हमारा मन ज्यों-ज्यों जड पदार्थोकी ओरसे हटता जायगा, त्यों-त्यों वह चेतन परमात्माकी ओर लगेगा । जडकी ओरसे दृष्टि हटनेपर वह चेतनकी ओर खतः ही प्रवृत्त होगी । तब उसकी जो यह भूल धारणा थी कि इन पदार्थोंमें सुख है, वह मिट जायगी । तथा वह चेतन परमात्मा बोधस्वरूप और आनन्दस्वरूप है, यों समझकर उसकी ओर लक्ष्य दृढ़ हो जानेपर जीव स्वयं हो ज्ञानवान् और आनन्दवरूप हो जायगा। उस स्थितिमें ऐसे पुरुषके दर्शन, भाषण और स्पर्शसे दूसरे जीवोंको भी सुख पहुँचेगा; फिर वह स्वयं महान् सुखी है, इसमें तो कहना ही क्या है ? जो अपने स्वार्थका त्याग करके जनताका हित चाहता है और बदलेमें किसी भी चीजको लेना नहीं चाहता, वही वास्तवमें सुखी है। कुछ भाइयोंकी यह धारणा है कि धनी आदमियों के पास जो धन है, उसे छीनकर अभावग्रस्तोंको बाँट दिया जाय तो सब सुखी .

सुख कैसे मिले?
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हो जाय, किंतु सोचना चाहिये कि धनी आदमियोंको जिस तरहका
सुख प्राप्त है, यह तो दुःखबाला ( दुःखपूर्ण) ही सुख है, जिससे वे
स्वयं रात-दिन जलते रहते हैं, उन्हें कभी शान्ति नहीं मिलती । अतः
उनसे जो सुख मिलेगा, वह तो उसी प्रकार का होगा. जो दुःखपूर्ण
ई; तया जिससे धन हीना जायगा, उसे तो महान कष्ट होगा ही।
उसे कष्ट देकर लेनसे लेनेवालेको भी मुख से होगा, जलन ही
होगी तथा व धन जिसे दिया जायगा, जहाँ जायगा. यहाँ भी
दुःख, अगान्ति और जलन ही ग्रान होगी
यह सिदान्त है कि देनेवाला दे ही दे. और देनेवाला सेवक,
परिचारक लेना ही न चार, नो इमाने देनेवाले तो उठाता पैदा
होकर प्रसन्नता हो और देवानको प्रसन्नता लेनेवाले भी
त्यागपूछ ले आनन्द आयेगा तथा यह अमृतमय पदार्थ जहाँ
जायगा. वहाँ भी सन् शान्ति और मानन्दका ही वातावरण पैदा
करेगः । नमी सबको मिलेगा तभी सके हृदयके भाव
टदार होगे क्योंकि मुल वस्तुओम नहीं है, सुख है हमारे हृदयकी
कारनामें शालका वचन है-
यत्र कामसुख लोके यच्च दिव्यं महन्मुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यंत नाईतः पोटशी कलाम् ॥
'संसारमें जो भी कामोपभोगका सुख है तथा जो स्वर्गीय महान्
सूख -ये दोनों ही तृष्णानाशसे होनेवाले सुखके सोलहवें अंशके
बरावर भी नहीं हैं।
किसी कविने भी क्या हो सुन्दर कहा है-

बालहिलोपदेश-माला
१-सबको सूर्योदयसे पहले उठना चाहिये ।
२-उठते ही भगवान्का स्मरण करना तथा स्वमेव माता
च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेत्र
त्वमेव सर्वं मम देवदेव । इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये।
३-अपने बड़ोंको प्रणाम करना चाहिये ।
४-शौच-स्नान करके दंड-बैठक, दौड़-कुश्ती आदि शारीरिक
और आसन-प्राणायाम आदि यौगिक व्यायाम करने चाहिये।
५--प्रातःकाल हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।। ---इस मन्त्रकी कम-से-कम
एक माला अवश्य जपनी चाहिये । और जिनका यज्ञोपवीत हो
चुका है, उनको सूर्योदयसे पूर्व संध्या और कम-से-कम एक माला
गायत्री-जप अवश्य करना चाहिये।

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२८६ जीवनका कर्तव्य १०-पढ़ाईको कभी कठिन नहीं मानना चाहिये । ११-अपनी कक्षामें सबसे अच्छा बननेकी कोशिश करनी चाहिये। . १२-किसी विद्यार्थीको पढ़ाई में अपनेसे अग्रसर होते देखकर खूब प्रसन्न होना चाहिये और यह भाव रखना चाहिये कि यह अवश्य उन्नति कर रहा है, इससे मुझे भी बढ़कर उन्नति करनेका प्रोत्साहन एवं अवसर प्राप्त होगा। १३-अपने किसी सहपाठीसे डाह नहीं करनी चाहिये और न यही भाव रखना चाहिये कि वह पढ़ाई में कमजोर रह जाय, जिससे उसकी अपेक्षा मुझे लोग अच्छा कहें। १४-किसी भी विधा अथवा कलाको देखकर उसमें दिलचस्पीके साथ प्रविष्ट होकर समझनेकी चेष्टा करनी चाहिये . क्योंकि जानने और सीखनेकी उत्कण्ठा विद्यार्थियोंका गुण है । १५-अपनेको उच्च विद्वान् मानकर कभी अभिमान न करना चाहिये, क्योंकि इससे आगे बढ़नेमें बड़ी रुकावट होती है । १६-नित्यप्रति बड़ोंकी तथा दीन-दुखी प्राणियोंकी कुछ-न- कुछ सेवा अवश्य करनी चाहिये । १७-किसी भी मङ्गहीन, दुखी, बेसमझ, गलती करनेवालेको देखकर हँसना नहीं चाहिये । १८-मिठाई, फल आदि खानेकी चीजें प्राप्त हों तो उन्हें दूसरोंको बाँटकर खाना चाहिये । १९-न्यायसे प्राप्त हुई चीजको ही काममें लाना चाहिये ।

घालहितोपदेश- २०-दूसरेकी चीज उसके देनेपर भी चुरावे । परीक्षा चाहिये। २१-हर एक आदमी द्वारा पर्श की हुई मिठाई आदि अन्नकी बनी ग्वाध वस्तुएँ नहीं खानी चाहिये। २२-कोई भी अपवित्र चीज नहीं खानी चाहिये। २३-कोई भी खाने-पीने की चीन ईशाको अपण करके ही उपयोग; लेनी चाहिये। २भूव बुत कम खाना चाहिये । २५-सदा प्रसन्नतापूर्वक भोजन याना चाहिये। २६-गजनके समय क्रोध, शोका, दीनता, देष आदि भाव मन लाना उचित नही, रि नेले भोजन टीक नही amridant rane २७.गमन के दोनों हाथ, दोनों पैर और हैं . इन पदको जवानी लेना चाहिये। २८- मनके और करावान जना करना २. का कुल कार के मुंह साफ करना उचित है। वर्गकि काल का होना। -ने-किर ने मार दीदने माय एवं अः अनन्य नया में माना-पाना नहीं चाहिये, क्योंकि म्याने-पीते नमो र आगार कारना ३१मान और रोमासना करना भोजन नहीं करना बाहिये। है

११
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२८६
विनका कर्तव्य
१०-पढ़ाईको प्याज, अंडा, मांस, शराब, ताड़ी आदिका
सवन कभी नहीं करना चाहिये।
३३-लैमनेड, सोडा और वर्फका सेवन नहीं करना चाहिये।
क्योंकि इनसे संसर्गजन्य रोगादि आनेकी भी बहुत सम्भावना है।
३४-उत्तेजक पदार्थोका सेवन कदापि न करे ।
३५-मिठाई, नमकीन, बिस्कुट, दूध, दही, मलाई, चाट
आदि बाजारकी चीजें नहीं खानी चाहिये; क्योंकि दूकानदार
लोभवश स्वास्थ्य और शुद्धिकी ओर ध्यान नहीं देते, जिससे
बीमारियाँ होनेकी सम्भावना रहती है
३६-बीड़ी, सिगरेट, भाँग, चाय आदि नशीली चीजोंका
सेवन कभी न करे।
३७-अन्न और जलके सिवा किसी और चीजकी आदत
नहीं डालनी चाहिये।
३८-दाँतोंसे नख नहीं काटना चाहिये ।
३९-दातुन, कुल्ले आदि करनेके समयको छोड़कर अन्य
समय मुँहमें अँगुली नहीं देनी चाहिये ।
४०-पुस्तकके पन्नोंको अँगुलीमें थूक लगाकर नहीं उलटना
चाहिये।
४१-किसीकी भी जूठन खाना और किसीको खिलाना
निषिद्ध है।
४२-रेल आदिके पाखानेके नलका अपवित्र जल मुँह धोने,
कुल्ला करने या पीने आदिके काममें कदापि न लेना चाहिये।
४३-कभी झूठ न बोले । सदा सत्य भाषण करे ।

Pady बालहितोपदेश-माला ४४-कभी किसीकी कोई भी चीज न चुगवे । परीक्षामें नकल करना भी चोरी ही है तथा नकल कानमें मदद देना चोरी कराना है। इससे सदा बचना चाहिये। ४५-माता, पिता, गुरु आदि बडोंकी आनाका उत्साह- पूर्वक तत्काल पालन करे । बडोके आज्ञा-पालनसे उनका आशीर्वाद मिलता है, जिसले लौकिक और पारमार्थिक उन्नति होती है। ४६-किसीसे लड़ाई न करें। 2७-किसीको गालीन के। १८-अस्दील गंदे शब्द उच्चारण न करे । ४९-किसीसे भी मार-पीट न करे। ५०-कभी हटे नहीं और मिड भी न करे । ५२-दूसरोंकी बुगई और गन्दी न करे । ५३-अध्यापकों एवं अन्य गुरुजनों की कमी हसी-दिल्लगीन उहाये, प्रन्युत उनका आदर-मार करे ताज पढ़ाने के लिये अध्यास आये और जाड़े होका और नगरकार करके work ५४-मान सामने और नोटोंमे प्रावक, वांव करे। ५५-नम्नाय हिसकर, गोडे और प्रिय वचन बोले । ५६-सबक हितकी ना करे। ५७ सनातन्यनामे आता लेकर नम्रतापूर्वक चलें । किसी को लांघकर न जाय ।

जीवनका कर्तव्य
५८-सभा या सत्सङ्गमें जाते समय अपने पैरका किसी
दूसरेसे स्पर्श न हो जाय, इसका ध्यान रक्खे, अगर भूलसे किसीके पैर
लग जाय तो उससे हाथ जोड़कर क्षमा माँगे।
५९-सभामें बैठे हुए मनुष्यों के बीचमें जूते पहनकर न चले।
६०-सभामें भाषण या प्रश्नोत्तर करना हो तो सभ्यतापूर्वक
करे तथा सभामें अथवा पढ़नेके समय बातचीत न करे।
६१-सबको अपने प्रेमभरे व्यवहारसे संतुष्ट करनेकी कला
सीखे।
६२-आपसी कलहको पास न आने दे । दूसरोंके कलहको
भी अपने प्रेमभरे बर्ताव और समझानेकी कुशलतासे निवृत्त करनेका
प्रयत्न करे।
६३-कभी प्रमाद और उद्दण्डता न करे ।
६४-पैर, सिर और शरीरको बार-बार हिलाते रहना आदि
आदतें बुरी हैं, इनसे बचे।
६५-कभी किसीका अपमान और तिरस्कार न करे ।
६६-कभी किसीका जी न दुखाये।
६७-कभी किसीसे दिल्लगी न करे ।
६८-शौचाचार, सदाचार और सादगीपर विशेष ध्यान रक्खे।
६९-अपनी वेष-भूषा अपने
तथा सादी रक्खे । भड़कीले, फैशनदार और शौकीनीके कपड़े न पहने।
७०-इत्र, फुलेल, पाउडर और चर्बीसे बना साबुन, वैसलिन
आदि न लगाये।
.
देश और समाजके अनुकूल

बालहितोपदेश-माला
१९१
an
७१-जीवन खुर्चीला न बनाये अर्थात् अपने रहन-सहन,
खान-पान, पोशाक पहनावे आदि में कम-से-कम खर्च करे ।
७२-शरीरको और कपड़ोंको साफ तथा गुद्र रकावे ।
७३-शारीरिक और बौद्धिक बल बढ़ानेवाले सात्विक खेल खेले।
७४--जुआ, नाश, चौपड़, शतरंज आदि प्रमापूर्ण खेल नन्वेट ।
७५-टोपी और बीका पीता, मनीवेश. इंडवेग, रितचंद्र,
कमा बंट और सता आदि चीजें यदि चमडेकी बनी हो तो उन्हें
काम न लाये
७६-सिनेमा, नाटक-भादि न क्योंकि इनमें जीवन खत्रीला
नो बनताती है, शकीनी. समाय-पक्षण, मचा आदि अनेक
टोर भी आ जाने र उसले जीवन पायमय बन जाता है।
90--दुरी पुरनकों और गंदे सायिक, पढ़े।
७८-अनधी पुन्नकोंको और भामिन सम्मेलनाम जाय।
७९-गाना, सम्पया आदि धार्मिक ग्रन्थों का अभ्यास अवश्य करे।
८०.पाटन-गन्ध अथवा धार्मिक पुस्तकांको आदरपूर्वक ऊँचे
आसन पर रमाइलो मी पर लगनेपर उन्हें नमस्कार करे।
८१-अपना येय सदा उसकते।
८२--अपने कर्तव्य-पालनमें सदा उत्साह तथा तत्परता रकवे ।
८३---किसी भी कामको कभी असम्भव न माने, क्योंकि
उत्साही गनुप्यके लिये कठिन काम भी सुगम हो जाने हैं।
८४-किसी भी कामको करने में भगवान श्रीरामको आदर्श माने !

जीवनका कर्तव्य
८५-भगवान्को इष्ट मानकर और हर समय उनका आश्रय
रखकर कभी चिन्ता न करे।
८६-अपना प्रत्येक कार्य स्वयं करे । यथासम्भव दूसरेसे
अपनी सेवा न कराये।
८७-सदा अपनेसे बड़े और उत्तम आचरणवाले पुरुषोंके साथ
रहनेकी चेष्टा करे तथा उनके सद्गुणोंका अनुकरण करे ।
८८-प्रत्येक कार्य करते समय यह याद रक्खे कि भगवान्
हमारे सम्पूर्ण कार्योंको देख रहे हैं और वे हमारे हितके लिये हमारे
अच्छे और बुरे कार्योंका यथायोग्य फल देते हैं।
:, ८९-सदा प्रसन्नचित्त रहे ।
९०--धर्म-पालन करने में होनेवाले कष्टको प्रसन्नतापूर्वक सहन करे।
९१-न्याययुक्त कार्य करनेमें प्राप्त हुए कष्टको तप समझे ।
२२-अपने-आपआकर प्राप्त हुए संकटको भगवान्का कृपापूर्वक
दिया हुआ पुरस्कार समझे ।
९३-मनके विपरीत होनेपर भी भगवान्के और बड़ोंके किये
हुए विधानमें कभी घबराये नहीं, अपितु परम संतुष्ट और प्रसन्न रहे।
९४-अपनेमें बड़प्पनका अभिमान न करे ।
९५-दूसरोंको छोटा मानकर उनका तिरस्कार न करे ।
९६-किसीसे घृणा न करे ।
९७-अपना बुरा करनेवाले के प्रति भी उसे दुःख पहुँचानेका
भाव न रक्खे ।
९८-कभी किसी के साथ कपट, छल, धोखाबाजी और
विश्वासघात न करे।

बाहिनापंदश-साला
की मौज १९५
९.९-बावर्यका पूरी तरह पालन करे । ब्रह्मचारीक ७५
शाम बतलाय हा नियमोंका यथाशछि पालन करें ।
१००-इन्द्रियामा सार करें । मनमें भी किसी बुरे विचारको
नभाने।
१०१-अपनेसे हो बालकाने कोई दुव्यवहार या कुचेष्टा दीखे
तो उसकी लालाये अपवा उस बालक हितक लिये अध्यापक
अथवा अभिमायकोंको सूचित कर दे।
१०२-अपने बडो को दवा या कुचटा दीखे तो
उसके हिसाब गुरपोको नमसार्वक भूचित कर दे।
१०३-अपनी दिनचर्या बनाकर तत्परताये उसका पालन करे।
१०.सदा दहा अने।
१०५-रोक का नियत स्थानमा रकवे चोर उनकी
सम्मान करें।
१०६-साकार पाने माय भी प्रातःकाटके अनुसार
भगवान राम की कार-से-कम एक, गाल: अवश्य जपे
और जिसका मोबीन की गो, उसको सूर्यास्तक्त पूर्व संध्या तथा
कर-नरे-जा कमाल गायत्री जप त्रस्य करना चाहिये ।
१०८-अपनी दुम-दुराचार मुठ जाय और सद्गुण-सदाचार
आयें, समयानले सय हदयले प्रार्थना करे और भगवान्के
चलपर सदा निर्भय रहे।
१०८--अपने पायको गार करके भगवान्का नाम लेते हुए सोये।
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०६३

'१९२ कृष्णाय बार-बार नहिं पाइये मनुष-जनमन्ही मौज प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेकपाणये। ज्ञानमुद्राय गीतामृतदुहे सच्चिदानन्दधन पूर्णब्रह्म परमात्माको तथा संत-महापुरुषोंको सादर अभिवादन करके कुछ बातें कहनेकी चेठा करता हूँ। इन बातोंमें जो आपको अच्छी लगें, सुन्दर दीखें, उन बासोंको तो संत- महात्माओंकी, शास्त्रोंकी और भगवान्की माननी चाहिये तथा जो त्रुटियों हों, उन्हें मेरी। त्रुटियोंकी ओर ध्यान न देकर अच्छी बातोंकी भोर ध्यान दें, कारण, जो महापुरुषोंके और भगवान्के वचन हैं, वे मेरे और आपके लिये परम हित करनेवाले हैं, उन वचनोंके अनुसार आचरण करनेसे निश्चित कल्याण होता है। आप आचरण करेंगे तो आपका हित और कल्याण है तथा मैं करूँगा तो मेरा कल्याण है। सबसे पहली एक विशेष ध्यान देनेकी बात यह है कि यह मानव-जीवनका समय बहुत ही दुर्लभ है और बड़ा भारी कीमती है, श्रीमद्भागवतमें बताया है- दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुरः। तत्रापि दुर्लभं सन्ये वैकुण्डप्रियदर्शनम् ॥ 'दुळभो मानुषो देवः'—यह मनुष्यसम्बन्धी देह-यह मानव-शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। इसकी प्राप्ति के लिये बड़े-बड़े देवता भी पार-धार नहिं पाइये मनुप-जनमकी मौज १९५ लळचाते रहते हैं, क्योंकि इससे बड़ी-से-बड़ी उन्नति हो सकती है। परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है, जीवका कल्याण हो सकता है और सदाके लिये उसे परम शान्तिकी प्राप्ति हो सकती है। ऐसे दुर्लभ शरीरको प्राप्त करके जो इसे व्यर्थ ही खो देता है, उसे फिर बड़ा पश्चात्ताप करना पड़ता है क्योंकि यह सर्वधा अलभ्य, अमूल्य है। अतः इस मनुप्य-जीवनके एक-एक क्षणको ऊँचे-से-ऊँचे काममें बितानेकी चेष्टा करनी चाहिये । समयके समान कोई अमूल्य वस्तु नहीं है । संसारमें लोग पैसाको बड़ा कीमती समझते हैं, आवश्यक समझते है, किंतु विचार कीजिये, जीवनका समय देनेसे तो पैसे' मिल जाने हैं, पर पैसे देनेसे यह समय नहीं मिलता। हमारे जीवन के लिये हमारे पास हजारों, लाखों, करोड़ों रुपये रहनेपर भी गदि हमारी आयु नहीं है तो हमें मरना पड़ता है, किंतु यदि हमारी आयु बाकी हो, और हमारे पास एक भी कौड़ी न हो, तो भी हम जी सकते हैं। हमारे जीवनका आधार आयु है, न कि 'रुपया' । इतना होनेपर मी हमारे भाई लोगोंकी पैसोंमें तो बड़ी भारी आसक्ति, सचि और सावधानी है। वे बिना मतलब एक कौड़ी भी खर्च करना नहीं चाते, परंतु 'समयकी ओर ध्यान ही नहीं है। हमारा समय इतनी देर कहाँन्टगा और कहीं गया, इसमें हमने क्या उपार्जन किया, क्या कगाया-~-इस ओर हमारा खयाल ही नहीं है। बड़े आधर्यकी बात है ! ठीक कहा है श्रीमतहरिने- - पीत्वा मोहमयीं प्रसाश्मदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ।' इस प्रमाद-गदिरासे उन्मत्तता छायी हुई है। नशेमें जैसे जीवनका कर्तव्य - मनुष्यको अपने शरीरका, कपड़ोंका होश नहीं रहता, ऐसे ही इस विषयमें होश नहीं है, चेत नहीं है, इधर ध्यान नहीं है, लक्ष्य नहीं है । नहीं तो ऐसे अमूल्य समयका इस प्रकार सत्यानाश क्यों किया जाता, समय जो निरर्थक ही चला जाता है, यही उसका सत्यानाश करना है। ऐसे अमूल्य समयको कीमती-से-कीमती काममें लानेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये । क्या करें विचार करनेसे मालूम होता है कि बहुत-से भाई तो तास-चौपड़, खेल-तमाशेमें ही समयको लगा देते हैं, बीड़ी-सिगरेट, हुक्का, चड्स, भाँग आदि नशेके सेवनमें इस समयको बर्बाद कर देते हैं तथा ऐसे ही हँसी-मजाक समय खो देते हैं। वे सोचते नहीं कि हम इस आयुमें उपार्जन क्या कर रहे हैं और खर्च कितना हो रहा है। समय तेजीसे जा रहा है और समयके बीत जाते ही मौत उसी क्षण आ जायगी। मृत्यु में जो देर हो रही है, केवल हमारे जीवनका समय शेष है उसीके आधारपर । हम जी रहे हैं-यह बुद्धिके आधारपर नहीं, बळके आधारपर नहीं, विद्याके आधारपर नहीं, बल्कि समयके भाधारपर, जीवनके आधारपर, आयुके आधारपर । वह आयु इतनी तेजीसे निरन्तर जा रही है कि इसमें कभी आलस्य नहीं होता, कभी रुकावट नहीं होती। यह लगातार दौड़ती चली जा रही है और हम बिल्कुल असावधान हैं । कितने आश्चर्य और दुःखकी बात है । आश्चर्य इस बातका है कि बुद्धिमान् होकर हम इतनी हानि कर रहे हैं और दुःख इस बातका है कि परिणाम क्या होगा, इसका हम विचार नहीं कर रहे हैं। की हुई भूलका दुःख और " " बार-बार न पाये अनुम-जनमकी मौज परिणाम कर्ताको ही भोगना पड़ता है. अन्य किसीको नहीं । अतः बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि यह जल्दी-से-जल्दी माध्यामिक उन्नति- में अपने समयको लगाये । भरिने कहा है - यावत् स्यम्यगि कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियनिरनिकता यान् क्षयो नायुपः। आन्मयलि नायव विद्या कार्यः प्रयन्नो महान् मोहप्ते भवने च कृपवननं प्रयुधमः कीदृशः ॥ जबतक. स्वाथ्य ठीक है, वृद्धावस्था दूर है, इन्द्रियोम साधन मानन-ध्यान करनेको दाति है. भायु समाप्त नहीं हो गयी है, विकी बुद्धिमान पुरुषको चाहिये कि तभीतक पाध्यात्मिक उन्नति के लिये बड़ा भारी प्रयत्न कर ले; क्योंकि घरमें भाग लग जाने- पर कोई कहे कि जल्दी करो, कुओं खुदवाओ, आग बग गयी है, जल चाहिये. नो यह सुनकर चाहे कितनी ही जन्दी की जाय, उद्योम किया गया किंतु अब कुआँ खुदकर कत्र जल आयेगा । आयु तो जल्दी-जल्दी खतम हो रही है, इसलिये जल्दी-से-जलती अपने उदारने लिये चटा करनी चाहिये। आध्यात्मिक उन्ननिय लिये देर नहीं करनी चाहिये। दूसरे जो सांसारिक काम है, वे आप करेंगे, तो भी हो जायेंगे और धापन करेंगे तोकापके बेटे-योतेइनको कर लेंगे. परंतु धारका कल्याण कौन-से बेटे-पीले कर लेंगे। आपके पास हजारों-लाखोकी सम्पत्ति है, बहुत धन है, बड़ा कारोबार है, किंतु थापका शरीर जा रहा है और पीछे कोई बुटुम्बी भी नहीं है तो जितना धन है, उसको राज्य संभाल लेगा, आपकी मिलों, पै.कारियोंको राज्य चला लेगा, पर भापो लद्धार, कमी रहेगी तो उसको

जीवनका कर्तव्य
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कौन पूरी करेगा । यह काम दूसरेसे होनेवाला नहीं, इस कामको
तो आप स्वयं ही करेंगे तभी होगा, इसलिये मनुष्यको चाहिये कि
दूसरे जितने भी काम हैं, उनकी ओर ध्यान न देकार केवल एक
आध्यात्मिक उन्नतिकी ओर ही ध्यान दे । नीतिकारों ने भी कहा है-
'कोटिं त्यक्त्वा हरि स्मरेत् ।'
करोड़ों कामोंको छोड़कर एक भगवानका स्मरण करना
चाहिये । दूसरे मौके तो हरेकको मिल जाते हैं, पर यह मौका
बार-बार नहीं मिलता।
खादते मोदते नित्यं शुनकः शूकरः खरः।
तेपामेषां को विशेपो वृत्तिर्यपां तु तादृशी ॥
खाना, पीना, ऐश-आराम करना आदि तो मनुष्य क्या, पशु-
पक्षियोंमें भी हो जाता है; परंतु आध्यात्मिक उन्नतिका अवसर
मनुष्ययोनिके सिवा और कहीं नहीं है । इसलिये बड़ी सावधानीसे
काम लेना चाहिये । आजतकका समय चला गया है, विचार करनेसे
दुःख होता है । संतोंने कहा है कि भजनके बिना जो दिन गये, वे
हमारे हृदयमें खटकते हैं। किंतु भाइयो ! अब क्या हो !
अब पछिताए होत क्या (जब) चिड़िया चुग गई खेत!
समय चला गया, उसके लिये पछतानेसे क्या होगा। अब तो
यही है कि गई, सो गई, अब राख रहीको ।' जो समय बचा है,
उसी समयको सावधानीके साथ ऊँचे-से-ऊँचे काममें लगानेकी
विशेष चेष्टा करें तो आगे नहीं रोना पड़ेगा। हो गया सो हो
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Jivan Ka Kartvya

Author
Sadhu Ramsukhdas
Title
Jivan Ka Kartvya
File name
Jivan Ka Kartvya
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Gorakhpur, Motilal Jalan Gitapress
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550721
Barcode
4990010031533.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
CQSsJU5pb4P
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