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Parskar Grahmsutram

2009/09

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पारस्कर गृह्यसूत्र
सभाषाभाष्यम्
समस्तजगदाधारस् जगदीशम्परात्यरम् ।
नत्वा पारस्करभाष्यम् कुर्य संस्कारसिद्धिदम् ।।-
भुजसप्ताङ्क चन्द्रेब्दे मार्गशीर्ष सिते दले।
द्वितीयायां बुधे घस्ने आप्यारम्भः कृतोमया ॥२॥
काग १ कपिडका १ (कुश कण्डिका)
अथातो गृह्यस्थालीपाकानां कर्म ॥ १॥
परिसमुह्योपलिप्योल्लिख्योवृत्त्याम्युक्ष्याग्निमु-
पसमाधाय दक्षिणताब्रह्मासनमारतीय प्रणीय
परिस्तीर्यार्थबदाजार पवित्रे कृत्वा प्रोक्षणी:
संस्कृत्यार्थवत्माक्ष्य निरूप्याज्यमधिभित्र पर्य-
गिकुर्यात् ॥२॥ नुवं प्रतय संमृज्याभ्युक्ष्य पुनः
प्रतप्य निदध्यात् ॥३॥ आज्यमुबास्योत्पूयावेक्ष्य
प्रोक्षणीश्च पूर्ववदुपयमनान् कुशानादाय रुमि-
धोऽस्याधाय पर्युक्ष्य जुहुयात् ॥ ४ ॥ एष एक
विधिर्यत्रक्वचिवोमः ॥५॥

पारस्कर गृह्यसूत्रभाध्ये भाषार्थः-(अथ) शब्द पूर्वाधार्य सङ्गल वाचक लिखतेथे तथा किसी बात के पूर्ण करने परीछे नई बात के आरम्भार्थ "अध" आता है। (अतः) अब (स्थालीपाकानाम्) गृहस्थ में स्थित पुरुषों के लिये ख्यालीपाकों की किया कहते हैं। (परिसमुत्य) यज्ञ स्थलको कुशाओं से सकर कर धूलिं आदि दूर करके (उपलिप्य) गोवर नही जलसे लेपन कर (अम्लिख्य) खैर के काष्ठ के बने हुळे खांडे या चुवे से रेखा करे । (उद्धृत्य) रेखानों से उठी मृत्तिकादि को अनामिका अंगुष्ठ से उठादे । ( अस्युक्ष्य ) जल छिड़के (अभिम उप समाधाय) अग्नि को सामने रखकर (दक्षिणतो) अग्नि से दक्षिणलोर (पूर्वाभिमुख बैठा यजमान ) अपने दाहिने हाथ ब्रह्मा का आसन बिछावे। उसपर वेदविद् ब्राह्मणकोवस्त्र भूपण पहिना कर बैठावे। ( प्रणीय ) मंणीतामें जल भरे । (परिस्तीर्य ) चारों ओर कुशा फैलावे (अर्थवत्०) अर्थात् प्रयोजन योग्य सामग्री को यथास्थान करे । (पविने कृत्वा ) दो पवित्री. बना कर (प्रोक्षणी: संस्कृत्य) प्रोक्षणी को शुद्ध करके (अर्थ- घर प्रोक्षय) प्रयोजनीय सब यज्ञवस्तुओं पात्रों कुंशादि को साफ शुद्ध करके (निरूप्याज्यम्) घृतको देखकर (अधिनित्य) आज्यस्थाली को तपावे (पर्याग्निकुर्यात् ) आज्यस्याली के चारोंओर अग्निकरे अर्थात् घुमावे जलती लकड़ी धृतक चारों ओर घुमावे ऐसी रीतिहै। परन्तु हमारीसम्मतिमें उसपात्रको ऐसे घुमावे जो चारों ओरसे अग्निसे तपजावे । बहुल बड़ा धुतपात्र हो तो उसके चारों ओर जलती लकड़ी ही रखदे। जिससे घृत बिखरने हाथ के जलने का भय भी न रहै ॥२॥ (नुवं प्रतप्यं ) चुव को तपाकर ( संसृज्य ) मांग-साफ़ कर ( अभ्युक्ष्य ) जल से धोकर ( पुनः तप्य.) फिर तपा कर कांगई १ कण्डिको १ (निध्यात) रखदे ॥३॥ (भाज्यं उदास्य) घृत को उतारकर (उत्पूय) ठीक नितारे (अवेक्ष्य) देख कर (प्रोक्षणीश्च) और मोक्षणीपात्रको भी (पूर्ववत्) पहिले सूत्र में कहे अनुसार ही। (उप यमनान् कुशान् आदाय) उप यमन कुशाओं को लेकर (सभिधीश्याधाय)समिधाहोमकर जल छिड़ककर होमकरे ॥३॥ (एष एव०) यही विधि है जहां कहीं होस होता है। भावार्थ:-इसे कुशंकरिड़कानाम से कटलोग कहते हैं । कण्डिका २ (आवसथ्याधान के सूत्र ) आवसथ्याधानं दारकाले ॥ १ ॥ दायादा- काल एकेषाम् ॥ २ ॥ वैश्यस्य बहुपाशी हाद- ग्निमाहृत्य ॥३॥ चातुंध्याश्यपचनबतसर्वम् ॥१॥ अरणिप्रदानमेके ॥३॥ पञ्चमहायज्ञा इति श्रुतेः६ अग्न्याधेयंदेवताभ्यः थालीपाकं सपयित्वाऽऽ. ज़्यभागाविष्ट्वाऽऽज्याहुतीजुहोति ॥ ७ ॥ "स्वन्नो अग्ने, सत्वं नो अग्ने, इमं मे वरुण, तत्वा- यामि, ये ते शतं, अयाचाग्ने, उदुत्तम्, भवत नः" इत्यष्टौ पुरस्तात् ॥८॥ एवमुपरिष्टांत् स्था- लीपाकस्यान्यायदेवताभ्यो हुत्वा जुहोति॥६॥ ल्विष्टकृते च ॥ १० ॥ “अयास्यम्नेः षट्कृतम्, यत्कर्मणोऽत्यरी रिचम,देवागातुविदः इति॥११॥ बहिहु त्वा प्राश्नाति॥१२॥तता ब्राह्मण भोजनम्१३ भाषार्थ-( दारकाले) विवाह के समयः (आवसथ्या- .

१ पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्य धानम् ) आवसथ्य अग्नि का स्थापन होता है. ॥१॥ ( एके- पाम् दायाद्यकाल) कोई आचार्यों के मत में दायभाग-पत्र- कादि धन बांटनेके समय होता है। प्रत्येक गृहस्थी विवाह समय से ही अलग २ नित्यं प्रति होम करें, कोई कहते हैं घर में एकत्र ही होम होवे परन्तु जब सम्पत्ति का विभाग करके जुदे २ घर.बनावें तव अपने २ घर में जुड़ २ होम किया करें ॥२॥ बहुत पशु जिस वैश्य के हो ऐसे वैश्य दो घर से अग्नि लाफर ॥ ३ ॥ * चातुमाश्य पचन के समान सब विधि करे ॥ ४॥ कोई भाचार्य भरणी देना कहते हैं [ यजमान को अरणी देवै वह स्त्री पुत्प अग्नि निका] ५ पञ्चमहायज्ञ हैं ऐसी श्रुति है ॥६॥ अग्नि के आधेय देवताओं के लिये स्थालीपाक पका कर दो आज्याहुति देकर धृता- हुति देता है ॥ ॥ "स्वन्तो अग्ने० ( य०.२१ । ३) सत्वन्तो अग्ने० (२९॥४) इमं मे वरुण (२१ ॥१) तत्त्वा यामि०(२११२) ये ते० (कात्या २५ ॥ १९) आयाश्चाग्ने (का० २५ । ११) उदु- त्तमम् (य० १२ ॥१२)भवतं नः(य०५॥३)यह ८ पहिले आहुतिदे ॥८॥ स्थालीपाक के अग्न्याधेय देवतों की आहुति देकर फिर उक्त मन्त्रों से ८ आहुति देवे ॥ ॥ और विष्टकृत आहुति भी देवे॥१०॥ भयास्याग्नेः वषट् कृतम्, यत्कर्मणो० देवागातु विदो० इन मन्त्रों से आहुति दें॥ ११ ॥ वर्हि होम करके प्राशन करताहै ॥१२॥ फिर ब्राह्मणोंको भोजनकरावे॥१३॥ * चातुष्प्राश्य अन्न ऋत्विजों के लिये पकाया जाता है। कात्या०,४ । १९८-२०४ तक देखो । कर्माचार्य ने लिखा है कि चातु० पचन नीतकर्म है । अत्तः सर्वत्र नहीं है यही जयराम का मत है।

काय १ कण्डिका करिडका ३ (अर्घविधि-मधुपर्क विधि ) षडा भवन्त्याऽऽचार्यऋत्विग-वैवाह्यो राजा,प्रियः, स्नातक, इति ॥१॥ प्रतिसंवत्सरा- नई येयुः ॥२॥ यक्ष्यमाणा स्त्वृत्विजः ॥३॥ आ- सनमाहार्याह ' साधुभवानास्तामर्चयिष्यामो भवन्तम्, इति ॥४॥ आहरन्ति विष्टरंपाद्य पादार्थमुदकमर्चमाचमनीयंमधुपर्क दधिमधुघृत मपिहितकार्थस्ये कास्येन ॥शा अन्यस्त्रि:त्रिः प्राह विष्टरादीनि ॥६॥ विष्टरं प्रतिगृह्णाति॥७॥ वोऽस्मि समानानामुदातामिव सूर्यः । इमंत- मभितिष्ठामि यो मा करचाभिदासति, इत्येनम- भ्युपविशति ॥८॥ पादयोरन्यं ॥६॥ विष्टर मा- सीनाय सव्यं पादं प्रक्षाल्य दक्षिणप्रक्षालयस्ति ॥ १०॥ ब्राह्मणश्चेदृक्षिणं प्रथमम् ॥ ११ ॥ विराजोदोहोसि विराजो दोहमशीय मयिपा- दवायें विराजोदोहः' इति ॥१२॥ अर्धं प्रतिगृह्णाति 'आपः स्थयुष्माभिः सर्वान् कामानवानवानि : इति ॥ १३ ॥ निनयन्नमिमन्त्रयते ' समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत । अरिष्टाऽ- स्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः, इति ॥ १४ ॥ आचामति , 'आमागन् यशसा सर्छ सृजवर्चसा योति । पारस्र मृह्यसूत्र माध्ये तं माकुरुप्रियं प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तननाम्,इति ॥ १५ ॥ मित्रस्यत्वेति मधुपर्कप्र. तीक्षते ॥ १६ ॥ देवस्यत्वेति प्रतिगृह्णाति ॥१०॥ सव्ये पाणीकृत्वा दक्षिणस्यानामिकया त्रिः प्र. नमः श्यावास्यायान्नशनेयत्त आविद्धं तत्ते निष्कृन्तामि,इति ॥ १८॥ अनामिकांगुष्ठे- नचत्रिर्निरुक्षयति ॥१९॥ तस्य त्रिःप्राश्नाति"य- न्मुधुनो मधव्यं परम रूपमन्नाचं । तेनाहं मधुनो भधव्येन परमेणं रूपेणालाधनपरमेो सधव्याऽन्नादोऽसानि,इति ॥२०॥ मधुमतीभिर्या प्रत्युचम् ॥ २१॥ पुत्रायान्तेवासिनेवोत्तरत आ: सीनायोच्छिष्टं ददयात् ॥ २२॥ सर्व वा प्राश्नी- यात् ॥ २३ ॥ प्रात्राऽसंचरे निनयेत् ॥ २४॥आ, चम्य प्राणान् संमृशति-' वाम आस्य, नसा: प्राणः अक्षणोश्चक्षुः,कर्णयोः श्रोत्रम्, बाहार्ब- लम्, ऊर्वोरोजः अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह' इति ॥ २५ ॥ "प्राचान्तोदकाय शासमादाय गौरिती निः प्राह॥२३॥ प्रत्याह, नाता रुद्राणां 'दुहिता वसूनाथ स्वसाउदित्यानाम मृतस्य नाभिः । 'प्रनुबोचं चिकितुवे जनाय भानामनागाम दितिं वधिष्ठ । समधामुष्य च पाम्मान हनोमि,इति यद्या.

কাম ? ক্ষবিক্ষো ३ लक्षेत ॥ २७ ॥ · अध यद्युत्सृजेद मम्चामुन्यः च पाप्मा हतः, गोमुत्सृजत तृणान्यत्तु, इति ब्रूयात् ॥ २८ ॥ नत्वेवामां सेऽर्घः स्यात् ॥२९॥ अधियज्ञमधिविवाह कुरुतेत्येव ब्रूयात ॥ ३० ॥ यद्ययतकृतं संवत्सरस्थ सोमेन यजेत वृताा एवेनं याजयेयुः कृतायाः, इति श्रुतेः ॥ ३१ ॥ भापार्थ-आचार्य १ अत्विज्ञ २ विवाहवालावर ३ राजा ४ प्रियनित्र ५ स्नातक ६ यह छः अर्घ के योग्य होते हैं ॥१॥ प्रतिवर्ष पूजने चाहियें ॥ २॥ जब जब यज्ञ करे तब तब ही ऋत्विजों का पूजन करें ॥३॥ शासन हाथ में लेकर कहत है कि हम पाप को पूजेंगे भले प्रकार वैठिये ॥४॥ आसन लाते हैं बेठने कों, पाद्य-पग धोने को जल, अर्घ, आच- मन को जल, और मधुपर्क को दधि, शहत, घृत ढका हुआ कांसी के पात्र में कांसी ही के पात्र से ढका हुवा ॥ ५ ॥ यजमान के अतिरिक्त कोई अन्यपुरुष विरादि को विएरो विष्टरो विष्टरः ऐसे ३।३ वार कहै ॥६॥ विष्टर लेता है ॥ वमोस्मि० इस मन्त्र को पढ़ कर विष्टर पर बैठता है ॥८॥ अन्य प्राचार्यों का मत है कि पाहों के नीचेही विष्टर रन्के विष्टर पर बैठे का वाया पग धुलाने के पीछे दक्षिण पग धुलावे ॥ १० ॥ ब्राह्मण हो तौ पहिले दक्षिणपग धुलावे ११ " विराजो दोहो० " इस मन्त्र से ॥ १२ ॥ इस मन्त्र से अर्घ ॥ १३ ॥ “ संमुद्वः० " इस मन्त्र को पढ़ता हुवा नर्थ के जल को भूमि पर छोड़ता है ॥१४॥ 'सामागन्' इस मन्त्र से आचमन करता है॥६५॥ मित्रस्य त्वा० इस मन्त्र से ( मधुपर्क को ) हाथ में लेता है ॥ १७ ॥ बायें हाथ में लेकर दहिने हाथ की अनामिका से नमः श्यावा" इस मन्त्र से घोलता ॥ १८ ॥ अनामिका और अंगूठे से तीन धार छींटा देता है. ॥ १९ ॥ ' यन्मधुनो। इस मन्त्र से आपस्थल इस मन्त्र पारस्कर गह्यसूत्र भाज्ये तीन वार मधुपर्क चाटता है ॥ २० ॥ वा " मधुमती० ॥ इस से ३ प्रति ऋचाओं से ३ वार मधुपर्क भक्षण करै ॥२१॥ उत्तर की ओर बैठे पुत्र वा शिष्य को मधुपर्क का झूठन-उच्छिष्ट देदे ॥ २२ ॥ या सब ही चाटले ॥ २२ ॥ या पूर्वकी ओर गढ़े में बखेर दे ॥ २४ ॥ आचमन कर वाङ् मे० इत्यादि कह कर अङ्ग स्पर्श करता है ॥२॥ ( उदकाय *शासं आदाय ) जल के लिये आज्ञा लेकर (आचम्य ) आचमन करके गौः गौः गौः ऐसा तीनवार कहै । अथवा अलसे आचमन किये अर्घ्य से आज्ञा लेकर गौः ३ कहै वर माता रुद्रा० को पढ़े। गौ को ब्राह्मण ग्रहण करै वा छोड़ दे ५ २६-२८ ॥ प्रति यज्ञ प्रति विवाहमें गोदान किया जाताहै ऐसा कहै॥३०॥ यद्यपि वर्ष में कई वार सोमयाग करै तौ भी प्रति यज्ञ में ही अर्घादि देवे क्योंकि श्रुति में बताया है कि अर्घ किये हुवे ही इस यजमानको यज्ञकरावें विवा अर्घ पाये न करके। * शासं का अर्थ हरिहरादि भाष्यकार खग करते है। हमारी समझ में शास का अर्थ आज्ञा ही ठीक है। अथवा हमारी सम्मतिमें यह २५ से २९ तक ५ सूत्र वाममार्ग के मिलाये हैं क्योंकि मधुपर्क हो चुका, खा भी चुके, आगे यौ की प्रशंसा है कि यह गौ रुद्रों की माता, वसुओं की बेटी भादित्यों की भगिनी अमृत की नाभि है। विचारवान् पुरुषों को मैं कहता हूं (अनागाम् ) निष्पाप.( गाम् ) गौ को ( मा वधिष्टः) मत सारो। यह मन्त्र किसी प्रामाणिक अन्य या वेद वाक्य नहीं तो भी न मारने की आज्ञा है.। यौ.की प्रशंसा है। जब अयं पूजनीय राजादि ही निषेध करता है फिरभी वहकार्य करना आज्ञाभंग पापभी है ।

स । कापड १ करिडका ४ करिडका ४ ( होम से पूर्व कृत ) चत्वारः पाकया हुतोऽहुतः प्रहुत: प्रा. शित इति ॥१॥ पञ्चसु बहिः शालायां विवाहे चूडाकरणे उपनयने केशान्ते सीमन्तोनयन इति ॥२॥ उपलिउधतायाक्षितेऽग्निमुपसमा- धाय ॥ ३ ॥ निर्मन्थ्यमेके विवाहे ॥ ४ ॥ उद- गयन आपूर्यमाण पक्षे पुण्याहे कुमार्याः पाणिं गृह्णीयात् ॥ ५॥ त्रिषु त्रिपूत्तरादिषु ॥ ६ ॥ स्वाती मृगशिरसि रोहिण्यां वा ॥ ७॥ तिलो ब्राह्मणस्यानु पूर्येण ।। वे राजन्यस्य ॥ ९ ॥ एका वैश्यस्य ॥ १० ॥ सर्वपाई शूद्रामप्येके मन्त्रवर्जम् ॥ ११ ॥ अथैनां वासः परिधापयति जरांगच्छ परिधत्सव वासो भवा कृष्टीनामभि शस्तिपाया। शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्रा ननुसंव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः, इति ॥ १२ ॥ अथोत्तरीयम्-'या अकृ. न्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनभि तो ततन्थ । तास्त्वा देवी जैरेले संव्ययस्वायु मतीदं परिधरस्व वास" इति ॥ १३ ॥ अथैनी समजयति "समञ्जन्तु विश्वेदेवाः समापो हृद, -- १० पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्ये यानिनौ। संमातरिश्वा संधाता समुदेष्ट्री दधातु नौ " इति ॥ १४ ॥ पित्रा प्रत्तामादाय गृहीत्वा निष्क्रामति “ यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपत्र- मानो वा । हिरण्यपणेवैकर्णः स त्वा मन्म- नसां करोतु असो " इति ॥१५॥ अथैनी समी- क्षयति “अघोरचक्षुरपतिघन्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुघर्चाः । वीरसूई व कामास्यानाशन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे " । सामः प्रथमा वि- विदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः । सेोमोऽदगन्ध- र्वाय गन्धर्वोऽदददग्नये । रयिं च पुत्रांश्चादा. दग्निर्मह्यमथो इमाम् । तां पूषन् शिवतमा मेर यस्व सान ऊरू उशती विहर । यस्यामुशन्स: प्रहराम शेपं यस्यामु कामा बहवो निविष्ट्यैइति भाषार्थ-१हुत,२ अहुत,३ प्रहुत प्राशित, यह चार पाक अज्ञहैं।।१ विवाह । २मुंडन । ३ यज्ञोपवीत ४केशान्त ५सीम- न्तोन्नयन इन पांच संस्कारों में बाहर की शाला में होते हैं । अर्थात् दो दो शाला बनावे ॥२॥ लेपन की उद्धृत की छिड़के भूमि में अग्नि को सामने स्थापित कर के ॥ ३ ॥ आचार्य विवाह में अग्नि को मंथन कर स्थापित करे यह उत्तरायण में शुक्लपक्ष में शुभ दिन में कुमारी ॥ ४ ॥ कन्या का पाणिग्रहण करे।४॥ उत्तराफाल्गुनी,हस्त,चित्रा, उत्तरा .

ar काण्ड १ करिडका ४ याढा,प्रवण, धनिष्ठा,उत्तराभाद्रपदा,रेवती,अश्विनी इननवल में॥६॥ या स्वाति,मृगशिर,रोहिणी में (विवाह करे) वर्णक्रम वर्ण की ब्रालण की (स्त्री) In दो क्षत्रियकी । ॥ १ वैश्य की ॥१०॥ विवाह योग्य है। कोई साधार्य शूद्राको चारों वर्णी की रखी योग्य बताते हैं, विनाही मन्त्र पढ़े ॥११॥ जरांगच्छ इरा मन्त्र से अगिर स्थापन हो बाद अब इसे वन्न पहिना ताह ॥ १२ ॥ एस के पीछे “या भकृ० इस मन्त्र से ओढना ( उढावे ) ॥ १३ ॥ तदुपरान्त " समंजन्तु० * इस मन्त्र से इन दोनो बंधूवरों को सन्मुख करता है ॥ १४ ॥ पितासे दी हुई कन्या को ले हाथ पकड़ कर “ यदैपि. " इस.मन्त्र से चलता है अधोरचक्षु० इन मन्त्रोंसे परस्पर देखते हैं ॥१६॥ कचिडका ५ ( विवाह होम) प्रदक्षिणमग्निं पर्याणीयके ॥१॥ पश्चादग्ने स्तेजनी कटं धा दक्षिणपादेन प्रवृत्योपविशति ॥२॥ अन्वारब्ध आधारावाज्यभागी महाव्या- हृतयः सर्वप्रायश्चित्तं प्राजापत्य स्विष्टकच्चा ॥३॥ एतन्नित्य सर्वत्र ॥४॥ प्राङ् महाव्या. हृतिभ्यः स्विष्टकृदन्यच्चेदाज्याढविः ॥ ५॥ सर्व प्रायश्चित्तं प्राजापत्यान्तर मेतदावापस्थानं वि. वाहे ॥६॥ राष्ट्रभृत् इच्छज्जयाम्यातनांश जानन् ॥ ७ ॥ येन कर्मणसैदिति वचनात् ॥ ८॥रितं च चित्ति वाकूतंचाकूतिश्च विज्ञातं च बि- १२. पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये ज्ञातिश्च मनश्च शकरीश्च दर्शश्च पौर्णमासंच वृहच्च रथन्तरं च । प्रजापतिर्जयानिन्द्राय वृष्ण मायच्छदुनः पृतनाजयेषु । तस्मै विश: समन- मन्त सर्वाः स उग्रः स विहव्यो बभूव स्वाहा, इति ॥ ६ ॥ अग्निभूतानामधिपतिः स मांड- वतु इन्द्रो इति ॥ ६॥ अग्निभूतानामधि पतिः स माऽवतु । इन्द्रो ज्येष्ठानाम् । यमः पृथिव्या। वायुरन्तरिक्षस्य । सूर्योदिवः । चन्द्रमा नक्षत्रा- णाम् । वृहस्पतिव्रह्मणः । मित्रः सत्यानाम् । वरुणोऽपाम् । समुद्गः स्रोत्यानाम् । अनर्थ साम्राज्यानामधिपति तन्माऽवतु । सेाम ओष- धीनां, सविताप्रसवानां । रुद्रः पशूनां । त्वष्टा रूपाणां। विष्णुः पर्वतानां । मरुतो गणानाम- धिपतयस्ते माऽवन्तु । पितरः पितामहाः परे- ऽवरे तसास्ततामहाः इह मावन्त्वस्मिन ब्रह्म- 'ण्यस्मिन् क्षत्रऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायाम. स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहुत्यार्थ स्वाहा, इति स- वत्रानुपजति । १० । अग्निरैतु प्रथमो देव- ताना सोल्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्युपाशात् । तद य राजा वरुणाऽनुमन्यतां यथेयत्रो पौत्र-

कापड १ कण्डिका ५
१३
मंघन्न रोदात् , स्वाहा । इमामग्निस्त्रायतां
गाह पत्यः प्रजामस्यै नयतु दीर्घमायुः । अशू.
न्योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमानन्दमभि-
विधुध्यतामियथं स्वाहा । स्वस्तिना अग्ने दिव
आपथिव्या विश्वानि धेह्ययथा यजत्र । यदस्यां
महि दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि.
चित्र स्वाहा । सुगनु पन्यां प्रदिशन एहि
ज्योतिष्मध्ये हजरत आयुः। अपैतु मृत्युरमृतं
मागाद्वैवस्वता नो अभयं कृणोतु स्वाहा,इति
।१९। परं मृत्यविति चैके प्राशनान्ते । १२ ।
भाषार्थ कोई प्राचार्य अग्निपरिक्रमाके पीछे उक्त विधि
को मानते हैं । १ । अग्नि के पश्चिमभाग में तृणमय मा.
सन पूला या घोरिया बुना हुवा विछाकर बैठे ॥२॥ ब्रह्मा
से आज्ञा लेकर आधार आज्यभाग २२ आहुतिदे। महाव्या-
इतियों से ।३। सर्व प्रायश्चित्ताहुत्ति १ प्राजापत्य आहुति १
खिष्टकृत भी १ आहुति दे ॥३॥ यह सर्वत्र हो.मों में नित्य
कर्म है ॥ ४ ॥ यदि घृत के सिवाय अन्य घरु भी होम को
हो तौ महाव्याहृतियों से पूर्व स्विप्तरुत् पाहुति होती है ।
॥५॥ सर्व प्रायश्चित्त और प्राजापत्य होम के बीच में यह
अवापस्थान विवाह में होता है ॥६॥ राष्ट्रभृत की इच्छा
करता हुवा और जय तथा अन्यातन को जानता हुवा होमे
॥७॥ येन फर्मणेतत्तत्र होतव्या ऋशोत्येवतेन . कर्मणा (ते.
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१४ पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्ये ६० ३।४।६) इस वचन से ( ज्ञात होता है कि जिस कर्म की ऋद्धि चाहे उसी मन्त्र से होन करे ॥ 9 ॥ जय होम के मन्त्र ( सूत्र में चित्तं च० इस में बतायें हैं स्वाहा शब्द लगा कर होम होता है जो पद्धति में लिखेंगे)। सूत्र १०॥ ११ से अभ्यातन होम होता है यह भी पद्धति में लिखेंगे । परंमृत्यो अनु० इस मन्त्र से भी माहुति देवे । कोई आचार्य कहते हैं कि संभव प्राशनके पीछे इस मन्त्रसे आहुतिदेवे॥१२॥ छठी कविटका-(लाजा होम) कुमार्या भ्राता शमी पलाश मिशाल्लाजानं जलिनांजलावावपति । १। ताजुहोति .स: हतेन तिष्ठन्ती 'अर्यमणं देवं कन्या अग्निमय- क्षत । स नो अर्यमा देवः प्रेता मुञ्चतु मा पले स्वाहा। इयं नार्युपब्रूते लाजानावपन्तिका,आयु- मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा । इमल्लाजानावपाम्यग्नी समृद्धिकरणं तब । मम तुभ्यं च संघननं तदग्निरनुमन्यतामिय स्वाहा, इति ।२।अथास्यै दक्षिण, हस्तं गृह्णा ति सांगुष्ठम्-गृभ्णामि ते सौभगतवाय हस्तं मया पत्या जरदष्टियथासः । भगो अर्यमा स- विता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः । अमोहमस्मि सा त्वई सा त्वमस्यमा अहं, सा माहमस्मि ऋक्त्वं दौरहं पृथिवी त्वं । तावहि पारस्कर गय मूत्र भाष्ये १५ विवहावहै सहरेतो दधावहै प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्दामहै बहून् ते सन्तु जरदष्टयः । सप्रियी रोचिष्णू सुमनस्यमानी । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदःशतणुयामशरदः शतमित्ति३ भाषार्थ-कन्या का भाई जांड के पत्ते मिली धान कीखीलों को अंजलिसे (कन्या की) अंजलि पर छोड़ता है ॥ १॥ यह कन्या खड़ी हुई पतिकी अंजलिके साथ “अर्यमणम्" इत्यादि मन्त्रों से प्राहुति देती है ॥२॥ अब इस के दक्षिण हाथ को अंगूठे सहित वर पकड़ता "सौभगाय त्वा०" यह मन्त्र बोलता है ॥३॥६॥ अथैनामश्मानमारोहयत्युत्तरतोऽग्नेर्दक्षि- णपादेन 'आरोहेममरमानमरमेव त्वस्थिरा भव । अभितिष्ठ पृतन्यताऽवबाधस्व पृतनायत इति ॥ १॥ अथ गाथां गायति 'सरस्वति प्रे दमव सुभगे वाजिनीवती । यां त्वा विश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः । यस्यांभूतथे सम: भवदास्यां विश्वमिदं जगत् । तामा गाथा गास्यामि या स्त्रीणामुत्तमं यशः, इति ॥२॥ अथ परिकामतः तुभ्यमग्ने पर्यवहन सूर्या वह तुना सह । पुन: पतिभ्योजायांदाग्ने प्रजया 'सह " इति ॥३॥ एवं द्विरपरं लाजादि ॥ ४५ । १६ कागड १ क गिडकी चतुर्थ शूपंकुष्ठया सल्लाजानावपति 'भगा- यस्वाहा ' इति ॥ ५॥ त्रिः परिणीतां प्राजा. पत्य हुत्वा ॥ ६ ॥ ७ भाषार्थ-अब अपिनसे उत्तरकी और दक्षिणपंगसे पत्थर पर चढ़ाता है । आरोहेम० इस मन्त्रसे। १ तदुपरान्त सर- खति० इस मन्त्र से घर गाथा गाता है। अब तुभ्यमग्नेपर्यः इस मन्त्र से परिक्रमा करते हैं ॥३॥ ऐसे ही दीवार फिर लाजादि होम करै ५.४ ॥ चौथे छाज की खूट से सब खोल छोड़ता है । भगाय स्वाहा. इस मन्त्रसे तीनधार परिक्रमा . करा कर प्राजापत्य होम करके ॥ ६॥ ७ ॥ अथैनामुदीची ७ सप्तपदानि प्रक्रामयति, एकमिषे, वे ऊर्ज,त्रीणि रायस्पोषाय, चत्वारि मायाभवाय, पञ्च पशुभ्यः, षडू ऋतुभ्यः, सखे सप्तपदाभव सामामनुव्रता भव ॥ १॥ विष्णु- स्त्वा नयत्विति सर्वत्रानुषजति ॥ २॥ निष्क्र- मणप्रभृत्युदम्भ स्कन्धे कृत्वा दक्षिणताजाने वग्यतः स्थितो भवति ॥३॥ उत्तरत एकषाम् ngn तत् एनां मूर्धन्यभिषिञ्चति'' आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्" इति ॥ ५ ॥ आपो हिष्टेति च ति- सृभिः ॥६॥ अथैना सूर्य मुदीक्षयति 'सच्चक्षुः इति ॥ ॥ अथास्यै दक्षिणासमधि हृदय कार्ग । करिखको ।।। ..... मालभते 'मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्त- मनु चित्तं ते अस्तु । मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा निघुनक्त मह्यम्' इति ॥ ॥ अथैना मभिमन्यते 'सुमङ्गलीरियं बधरिमा समेत पश्यत । सौभाग्यमल्यै दत्वा याथाऽस्तं विपरे। तन, इति ॥ ६॥ तां दृढ़पुरुष उन्मथ्य प्राग्यो। दवाऽनुगुप्तागारे * आनुडुहे रोहिते चर्मण्युप: पेशयति 'इह गावो निषीदन्त्यिहाश्वा इह पूरुषाः । इहो सहस्रदक्षिणो यज्ञ इह पूषा निषीदतु" इति ।१०। ग्रामवधनं च कुयुः ॥११ । विवाहश्मशानयोमिं प्रविशतादिति वचनात् ॥ १२ ॥ तस्मात् तयोग्रामः प्रमाणम् इतिश्रुतेः। ॥ १३ ॥ आचार्याय वरं ददाति ॥१४ ॥ गोर्ला- ह्मणस्य घरः ॥ १५ ॥ पामीराजन्यस्य ॥ १६ ।। अश्वविश्यस्य ॥ १७ ॥ अधिरथ शतं दुहिट- मते ॥ १८ ॥ अस्त मिते ध्रुवं दर्शयत्ति 'ध्रुवमसि ध्रुवं स्वा पश्यामि ध्रुवैधि पोष्ये मयि । मां त्वादाद बृहस्पतिर्मयापत्या प्रजावती शंजीव शरदः शतम् इति ॥ १६ ॥ सा यदि न पश्येद पश्यामीत्येवब्रूयात् ॥२०॥ त्रिरात्रमक्षारंलग- ३ , १८ पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । णाशिनौ स्यातामधः शयीयातासंवत्सरं न मिथुनमुपेयातां द्वादशरात्र पात्रं त्रिरात्रम- न्ततः ॥ २१ ॥ ८॥ भाषार्थ-अब इस कन्या को अग्नि से उत्तर की दिशा में सात पग चलाता है। एकमि० इत्यादि मन्त्रोंसे ॥१॥ विष्णुस्त्वां नयतु विष्णु तुझे चलावें, यह सर्वत्र ७ सातों वार लगावे ॥२॥ क०४ । १५ के निकलने के समय से पानी का कलश कन्धे पर धरे, अग्नि से दक्षिण की ओर मौनहो. बैठा रहै ॥ ३ ॥ कोई प्राचार्य उत्तर में बैठना कहते हैं ॥४॥ आपः शिवा इस मन्त्र इस कन्या शिरपर छोटा लगाता है ॥५॥ आपोहिष्टा० इन ३ मन्त्रों से भी ॥६॥ अब इसे सूर्य दिखाता है । तच्चक्षुः० इन मन्त्र से ॥७॥ फिर इस कन्या के दक्षिण कन्धे के नीचे हृदय को (घर) छूता है । ममव्रते. इत्यादि मन्त्र से॥८॥ फिर इसे समंगलीरियं इस मन्त्र को पढ़ता है ॥६॥ उस कन्या को दृढ़ पुरुष अर्थात् वर उठा कर पूर्व या उत्तर में पर्दैके घरमें लेजाने । (*मानुहुह लाल विस्तर पर बैठावे) जिस विस्तर पर लालरंग से सुन्दर बैल का चित्र बना हो ऐसे विस्तर पर बैठावे । इहगावो० यह मन्त्र पढ़े ॥१०॥ ग्राम वचन भी करे अर्थात् ग्राम की रीति नीति भी करै ॥ १९ ॥ विवाह और मृत्यु में ग्राम में प्रवेश करें इस वचन से । स्त्रियों की प्रतक्षतार्थ उन की भी रीति नीति विवाह और मृत्यु समय वः ॥ १२॥ इन दोनों अव- * नोट-आनुडुह चर्म का अर्थ पौराणिक पद्धति कार शश- की त्वचा टाट का फर्श कहते हैं ।

. . कापड । करिष्ठका ! १६ सरों में ग्राम का प्रमाण है यह अति अर्थात् जनश्रुति है१३ प्राचार्य को वर दक्षिणा देवे ॥ १३ ॥ ब्रालया का वर गौ दे ॥ १५ ॥ राजा का वर ग्राम दे ॥ १६ ॥ वैश्य का वर घोड़ा दे ॥ १७ ॥ रथ सहित १०० गौ कन्यापक्ष के प्राचार्य को देवे ॥ १८ ॥ सूर्यास्त होने पर 'ध्रुवमसि' इस मन्त्र से ध्रुव को दिखावे ॥१en तीन रात्रि तक अक्षार और नमकरहित भोजन करे ॥ २०॥ भूमि पर सोवे, २ वर्ष स्त्री समागम न करे ॥२१॥ १२ रात्रि तक छः रात्रि तक या ३ रात्रि तक ही संग न करे नवनी कयिहका ए (साधारण नित्य होम) उपयमनप्रभृत्यौपासनस्य परिचरणम् ॥१॥ अ- स्तमितानुदितयार्दधनातण्डुलैरक्षतैर्वा । अग्नये । स्वाहा, प्रजापतये स्वाहेतिसायम् ॥३॥ सूर्याय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहेतिप्रातः ॥४॥ पुमा ७ सौ मित्रावरुणौ पुमा ॐ सा वश्विनावुभौ । : पुमानिन्द्रश्च सूर्यश्च पुमा , सं वर्तता मयि न पुन: स्वाहेति पूर्वा गर्भकामा ॥ ५ ॥६॥ भाषार्थ-उपयमन कुशलेकर भारम्भ कर प्रौपासन-गृहा अग्निपरिचर्या सेवा (कहते हैं)॥१॥ सूर्याससे सूर्योदय तक (इस # का समय है) दही, या चावल वा अक्षतों से (फरे) ॥॥ अ. ३ ‘ग्नये स्वाहा १ प्रजापते स्वाहा सायं काल में ॥३॥ 'सूर्या- यस्वाहा' प्रजापतये वोहा यह प्रातः काल ॥ ४॥ यदि गर्भ की इच्छा वाली स्त्री हो तो पुमा सौ० इस मन्त्र से १ माहुति पहिले स्त्री देवे ॥ ५ ॥६ 1 * :

दो बल दक्षिणा देवे यह मायश्चित्त कर्म है ॥२॥ फिर बा, २६ पारस्कर गृह्यसूत्रमाये। दशमी १० करिडका ( प्रायश्चित्त ) राज्ञोऽक्षभेदेनढविमोक्ष यानविपर्यासेऽन्यस्यां वा व्यापत्तौ खियाश्चोतहने तमेवाग्नि मुपास- शाधायाज्यसंस्कृत्यहरति रिति जुहोति नाना मन्त्राभ्याम्॥१॥ अन्यदानमुपकल्प्य सत्रोपवेश येद्राजानखिय वा प्रतिक्षत्र इति यज्ञाम्तेना. साहार्षमिति चैतया ॥२॥ या दक्षिणा ॥३॥ प्रायश्चित्तिः ॥ ततो ब्राह्मण भोजनम् ॥५॥१०॥ भाषा:-राजा जाब दौरे का आरम्म करे या शत्रु पर सदाई करे उस समय रथ का कोई भाग टूट जाय वा सु. धन जोड़ खुल जाय वा रथ लौट जाय या अन्य कोई आ. पति आजाने पर अथवा वर स्त्रियों को विवाह को लाता हो तब उसी गृयाग्नि को रामा की यात्रा में सेनाग्नि को समाधान करके घृतको शुद्ध कर । इहरति० (य०८।१५) इत्यादि २ मन्त्रों से पृताहुति देवे और अनेक मन्त्रों से. भी ॥१॥ अन्य सवारी तयार कर के उस में राजा वा वि. वाहिता भार्या को वैठावे। प्रतिक्षत्रे (२० २७ । १०) यजे तक मन्त्र से आस्बाहर्ष० यजुः १२ । ११ पाठ करे ॥२॥ धोरी । सायों को भोजन करावे । ५ । १० ॥ ११ वी करिहका ( चतुर्थी कर्म) श्वसुथ्यांमपररात्रे ऽभ्यन्तरतोऽग्निमुपसमाधा- प दक्षिणतो ब्रह्माणमुपवेश्योत्तरत उदषानं प्र-

काय १ कपिटका ११ ॥
हैं
तिष्टाप्यस्थालीपाक नपयित्या ऽऽज्यभागा-
विष्टाऽऽज्याहुतीर्जुहोति ॥ अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं
देवार्ना प्रायश्चित्तरसि ब्राह्मणस्त्वा नायकाम
उपधायामि, याऽस्यै पतिघ्नोपन स्तामस्यै-
नाशय स्वाहा । बायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां
प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधा-
वामियाऽस्यै प्रजाघ्नो तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा।
सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्रा.
हरणस्त्वा नाधकाम उप धावामि या ऽस्य
पशुधनी तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा । चन्द्र प्राय.
श्चित्त त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा
नाथकाम उपधावामि या ऽस्यै गृहघ्नी तनू-
स्तामस्य नाशय स्वाहा । गन्धर्व प्रायश्चित्ते तवं
देवानां प्रायश्चित्तिरिसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम
उपधावामि थाऽस्य यशानी तनू स्तामस्यैः
नाशय स्वाहेति ।२। स्थालीपाकस्य जुहोति
प्रजातये स्वाहेति' ।। हुत्वाहुत्वैतासामान
हुतीनामुदपात्रे स ,खबान्त्समवनीय तत एनां
मूर्धन्य भिषिञ्चति 'याते प्रतिधुनी प्रजाघ्नी पशु:
।

२१ पारस्कर गृह्यमूत्रभाष्ये घनी गृहनी यशोघ्नो निन्दिता तनू र्जारनी तत एनां करोमि साजीर्य त्वं मया सह, असा. विति ॥ ॥ अथैना १ स्थालीपाकं माशयति 'प्राणैस्ते प्राणान्त्संदधाम्यस्थिभिरस्थीनिमा , सर्मा सानि त्वचा त्वच निति ।। तस्मादेवं विच्छ्रोत्रियस्य दारेण नापहासमिच्छेदुतोवं वित्परो भवति ।६। तामुदुह्य यथर्तुप्रवेशनम् । यथाकामीवाकाममाधिजनिताः सम्भवामेतिव. चनात्ााअथास्यैदक्षिणा,समधिहृदयमालभते 'यत्ते सुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि नितम् । वेदाहं तन्मांतद्विद्यात् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतटणुयाम शरदः शसमिति ॥ एव मत ऊर्ध्वम् ॥ १० ॥ ११ ॥ भाषार्थ:-विवाह से ४ थी रात के पिछले भाग में अर्ध रात्रि के पीछे घर के भीतर अग्नि स्थापन करे दक्षिण में ब्रह्मा को आसन दे उत्तर में जलं पात्र रख स्थाली पाक बना आज्यनागाहुति और आज्याहुति देता है ॥ १॥ अग्नि प्राय० । सूर्य प्रा० । गन्धर्व इन मन्त्रों से आहुत्ति देता है ॥२॥ प्रजापतये साहा इस मन्त्र से स्थाली पाक सहोमकरताहैप्रत्येकमन्त्रको आहुति केपीछेजुवेके बचे को जल में छोड़ता जाय और उस पात्रके जलसे निम्नमन्त्रसे बच के शिर को अभिषेक करे ॥४॥ अब इस वधु को प्राणैस्ते. घत 3 है कारा १ करिडका १२ । मन्त्र से स्थाली पाक खुलाता है । (इस मन्त्र से पति पत्नी का एक ही अङ्ग हो जाता है) इस लिये यह जानने वाला श्रोत्रिय की स्त्री से हंसी न करे। ऐसा जानते शत्रु होजाता ॥६॥ उस पत्नी को घर लेजा कर ऋतु ऋतु में सम्भोग फरै ॥ ॥ अथवा जब उस की कामना हो क्यों कि पहिले गर्भ इस कामना से सम्भोग करें ऐसा वचन है॥८10 अब इस पनी के दक्षिण कन्धे के ऊपर हाथ कर हृदय को स्पर्श करता है “यत्तेसुसीमें" ॥ ॥ यह मन्त्र पढ़े ऐसे ही इस के बाद भी जब सनम हो इसी मंत्र से हृदय छुवे ( १० १२ कण्डिका (पाक्षिक यक्ष ) पक्षादिषु स्थालीपाकनपयित्वा दर्शपूर्णमास देवताभ्यो हुत्या जुहोति ब्रह्मणे प्रजापतये वि- श्वेम्योदेवेभ्यो द्यावापृथिवीभ्यामिति ।१। वि. श्वेभ्यो देवेभ्यो बलिहरणं भूतगृह्य भ्य, आका- शाय च ।। वैश्वदेवस्याग्नौ जुहोत्यानये स्वाहा, प्रजापतयेस्वाहा, विश्वेभ्योदेवेभ्यः यः स्वाहा, अ. ग्नये स्विष्टकृते स्वाहेसि प्राशनान्ते ।।। बाह्यतः स्त्री बलि हरति 'नमास्त्रियै नमः पुसे य. यसे वंयसे नमः । शुक्लाय कृष्णदन्ताय पापीनी पतये नमः । ये मे प्रजामुपलोभयन्ति ग्रामे व- सन्ता उत्तबाउरण्ये । तेभ्यो नमोऽस्त बलिमेस्यो पारस्कर,धसूत्रभाष्ये। हरामि स्वस्ति मेऽस्तु प्रजां में ददत्विति ॥४॥शेष मतिः प्रप्लाध्य ततेो ब्राह्मण भोजमम् ॥५॥ भावार्थ:-पक्षारम्भ दिन में १ प्रतिपदा को स्थालीपाक पकाकर दर्श पौर्णमास की देव माहुति करके ब्रमणे स्वाहा प्रजापतये विश्वेभ्योदेवेभ्योः, द्यावापृथिवीभ्याम् स्वाहा, इन मन्त्रों से होम करता है ॥१॥ विश्वेदेवो, गृहभूतो श्रा. काश के लिये भी बलि ( अन्न) देता है ॥२॥ विश्वेदेव के श्रम में से अग्निमें इन मन्त्रोंसे होम करता है। अग्नये स्वाहा, प्रजापते स्वाहा,विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, अग्नये- खिष्टकते स्वाहा, इति यह पाहुति प्राशनान्त में होती है ( संस्थव प्राशन उस को कहते हैं जो जुवेका घृत जल में छोड़ते जाते हैं ) उस घृत को चाटले हैं ॥३॥ अग्निशाला के बाहर यजमान पत्नी बलि देती हुई यह मन्त्र पढ़ती है। नमाश्रियैनमपु० ॥ ४॥ शेष अन्न को जो हाथ से लगा हो जलमें छोडदे फिर ब्रह्मभोज । यह दर्श पौणर्णमास यश है ॥५॥ कतिका १३ (गर्भ धारणोपाय ) सा यदि गर्भ न दधीत सिह्याः श्वेतपुष्प्या उपोष्यपुष्येण मूलमुत्थाय चतुर्थेऽहमि स्नातायां निशायामुदपेषं पिष्वा दक्षिणस्यां नासिकाया भासिञ्चति इयमोषधी त्रायमाणा सरस्वती। मस्या अहं ब्रहत्याः पुत्रः पितुरिव नाम जग्र; . भमिति ॥ १॥ १३ ॥ -

२५
काश १ कवितका १५ ।
वह स्त्री यदि गर्भ धारण न करै तौ पुष्य नक्षत्र के दिन
मत फरके पति सिंही वूदी अफेद पुष्पवाली जड़ सहित
उखाड़ लावे । जब रजस्वला होकर स्नान करे चौथे दिन
की रात्रि में यूटी को पानी में पीसकर नाक के दाहिने नथने
से निचोड़ दे। इयमोषधी० यह मन्न पड़े।
पुंसवन संस्कार १४ वी करिडका
अथ पु सवनम् । १। पुरास्यन्दत इति मासे
द्वितीये तृतीयेवा । २ । यदहः पुसा नक्षत्रेण
चन्द्रमा युज्येत तदहरुपवास्याप्लव्याहते वाससी
परिधाप्य न्यग्रोधावरोहाञ्छुकांश्च निशाया मु.
दपेषं पिष्ट्वा पूर्ववदा सेचन 'हिरण्यगर्भाऽट्यः
सम्भृतः' इत्येताभ्याम् । ३ । कुशकण्टकथं सोमो
शुं चैके । ४ । * कूर्मपित्तं चोपस्थे कृत्वा स
यदि कामयेत वीर्यवान्तस्यादिति विकृत्यैनमभि
मन्नयत, सुपर्णीऽसीति प्राग्विष्णु क्रमेभ्यः ।।
अव पुंसवन कर्म कहते हैं ॥१॥ (स्पन्दतपुरा) हिलने
से पहिले दुसरे या तीसरे महीने में ॥ २ n जिस दिन पुरुष
नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा हों उस दिन पत्नी को व्रती रख स्नान
फरा शुद्ध वस्त्र धारण करा कर रात्रि में बड़ के वृक्ष की. लाटा
और कोपलों को रात्रि में जल से पीसकर पहिलेकहे
अनुसार हिरण्य गर्भ। अद्भध सं० इन दो मन्त्रों से दाहिनी
मासिका में निचोड़े ॥३। कोई प्राचार्य वटजठा के साफ

7 पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये। कुशा का कांटा और सोमलता ४ वस्तु निचोड़ना कहते ॥ ४ ॥ वह पुरुष चाहै कि मेरा पुत्र बलवान हो तो भार्या के उपस्थ पर * कूर्म पित्त रखकर विकृतिछन्द के सुपौसि यजुः १२।४ इस मन्त्र से गर्भ को स्पर्श करे फिर विघ्नोक्रमो सि० यजुः १२ । ५ यह दो मन्त्र ,पढ़े ॥ १५ कण्डिका-आगे सीमन्तोन्नयन है ॥ १॥ अथ सीमन्तोनयनम् ।। पुछसवनवत् ॥२॥ प्रथमगर्भमासे पष्टेऽष्टमेवा । ३ । तिलमुदामित्र * नोट-पुंसवन संस्कार में कूर्मपित्तको पन्नो के उपस्थ पर रखना लिखा है । हरिहरादि चारों भाष्यकारों ने इस का अर्थ पानी की शराई लिखा है। श्री राजाराम जी ने भी यही अर्थ किया है परन्तु नोट में कछुवे का पित्ता भी लिख दिया है जो किसी कोश से नहीं मिलता। हमारी सम्भति में कछुवे का पित्ता गर्म होता है जो हानिप्रद होगा इसी लिये सब टीकाकारों ने पानी का पात्र लिख दिया है कूर्म कच्छ कच्छप एकार्थ शब्द हैं। अमरकोष में लिखा है। कुणिः कच्छ: कांतलको नन्दिवृक्षोथराक्षसी। वनौषधिधर्ग श्लोक १२८ द्वितीय कांड दीका-कुणिः (तुणिः) कच्छ कान्तलकः “नन्दी के वक्षः" षट्कं नन्दि यक्षस्य मांद रूखी इति ख्यातस्य अयं अश्वत्था कार पत्रः ॥ पीपल के आकार का पत्ता होता है यह पता भी है। २-इस वृक्ष के पत्ते की टिकिया बना कर रखना प्रतीत होता है । सम्भव है कि कच्छ पत्र के स्थान में कूर्म पित्त पाठ बन गया हो।

२७ भूर्भुवः स्वरिति काग-१ करिखका १५ । स्थालीपाकनपयित्वा प्रजापतेहु त्वा पश्चा- दगर्भद्रपीठ उपविष्टायां युग्मेन सठालुग्रप्सेनी. दुम्बरेणत्रिभिश्चदर्भपिउजलस्त्रेण्या शलल्या वी. रतरशङ्खना पूर्णचात्रेण च सीमन्तमूवं विनयति ।१ । प्रतिमहावयाहृतिवा ।५। त्रिवृत्तमाबध्नाति 'अयमूर्जावती वृक्ष ऊर्जीव फलिनी भवेति, । ६ । अथाह वीणा- गाथिनौ राजानसंगायेतां यो वाध्यन्योवीर- तर इति । ७ । नियुक्तामप्येके गाथा मुपोदाह- रन्ति सोम एव नो राजेमा मानुषीः प्रजाः । अविमुक्त चक्र ओसीरं रतीरे तुभ्यम् , अखौ, इति यां नदी मुपावसिता भवति तस्या नाम गृह्णाति 1८। सतो ब्राह्मण भोजनम् ।। भागे सीमन्तोन्नयन है १पुंसवन के समान ही है ।। ६ठे या - वें मास में प्रथम गर्भ समय में ही होता है ॥३॥ तिल मूंग मिलाकर स्थाली पाक पकाकर प्रजापति की आहुति करें अनि के पश्चिम में कोमल आसन बिछा कर स्त्री पुरुष दोनों बैते। ३ कुशा सेह के कांटे जो ३ जगह सुफेद हों। या लकड़ी की कंघी डारे से बन्धी हुई। दो गूलर के फलों का गुच्छा हाथ में लेकर ३ महाव्याहृतियों से मांग निकाले ॥४॥ अथवा महाव्याहतियों से ३ वार - पारस्करगृह्यसूत्रमाच्ये । मांग निकाले ॥५॥ गूलर की गुच्छी को शिर में बांधदे अय. मूर्मावतो इस मन्त्र से ३ गांठ देवे। ६॥ पति दो वीणा गायकों को राजानं इस मन्त्र के गान को कहै ॥७॥ कोई प्राचार्य " सोम एवनो राजेमः " इस मन्त्र को भी वीणा से गवाते हैं। असौ के स्थान में पार्मिणी स्त्री पाश्ववत्ति नदी का नाम लेखे ॥ ॥ फिर ब्राह्मणों को भोजन करावे । १६ कपिडका (जातकर्म विधिः) सोष्यन्तीमद्विरभ्युक्षति 'एजतु दशमास्यः' इति प्राग् 'यस्यैते, इति ।१॥ अथावरावपतनम अवैतु पृश्नि शेवल,शुने जरास्वत्तवे । नैव माथसेन पीवरि न कस्मिंश्चनायतमवजरायु पद्यताम, इति ।२५ जासस्य कुमारस्याच्छितायां नाड्यां मेधाजननायुष्ये करोति ।३। अनामि- कथा सुवर्णान्तर्हितया मधुघृते प्राशयति घृतं वा 'भूस्त्वयि दधामि भुत्रस्त्वयि दधामि स्व- स्त्वयिदधामि भूर्भुवः स्वः सर्व त्वयि दधामि, इति । १ । अथास्यायुष्यं करोति । ५। नाभ्यां दक्षिणे वा कर्णे जपति अग्निरायुष्मान्त्स वन- स्पतिभिरायुप्मांसतेन त्वोऽऽयुषा ऽऽयुष्मन्तं करोमि। सोम आयुष्मान्तस ओषधीभिरायुष्मां- स्तेनत्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि। ब्रह्मायुष्मत् काण्ड १ करिडका १६ । तद्राह्मणरायुष्मत् तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तंकरी- मि । देवा आयुष्मन्तस्तेऽमृतेनायुष्मन्तस्तेन- त्याऽऽयुपाऽऽयमन्तं करोमि ।ऋषय आयुष्म. न्तस्तेव्रतरायुष्मन्तस्तेन त्वाऽऽयुपाऽऽयुमन्तं क- रोमि। पितर आयुष्मन्तस्ते स्वधाभिरायुष्मन्त- स्तेनत्वाऽऽघुपाऽऽयुष्मन्तं करोमि । यज्ञ आयु- मान्स दक्षिणाभिरायुप्मास्तेनत्वाऽऽयुषाऽऽयु. मन्तं करोमि.। समुद्र आयुष्मान्त्सलवन्तीभि- रायुमास्तेनत्वाऽऽयु पाऽऽय मन्तं करोमि, इति । ६ । त्रिस् बिस् ‘ज्यायु पम् ' इति च । ७ । स यदि कामयेत सर्वमायुरियादितिवात्सप्रेण - नमभिमृशेत् । ८ । दिघस्परि इत्येतस्यानुवाका- स्थीपत्तमामृचं परिशिनष्टि ।। प्रतिदिशं पञ्च ब्राह्मणानबस्थाप्य याद 'इममन प्राणित' इति. । १० । पूर्वी ब्रूयात् 'प्राण'' इति ११॥ 'व्याना इति दक्षिण. । १२ । 'अपान इत्य परः । १३॥ उदान' इत्युत्तरः ।१४। 'समान' इति पञ्चम उपरिष्टादवेक्षमाणो ब्रूयात् ।१। स्वयं वा कुर्या-.. दनुपरिक्राममविदामानेषु ॥१६॥ स यस्मिन् देशे

३०
सा त्वं
पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये
जातो भवति तमभिमन्त्र पते 'वेद ते भूमिहृदय
दिवि चन्द्रमसि गितम् । वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत शृणु-
याम शरदः शतम्' इति । १७ । अथैनममिमू-
शति 'अश्मा भव परशुर्भव हिरण्य मलुतं भव
। आत्मा वै पुत्रनामासि सजीव शरदः शतम्,
इति ।१८। अथाऽस्यमातर मभिमन्त्रयते 'इडा-
"ऽसि मैत्रावरुणी वीरमजीजनथाः ।
धीरवती भव याऽस्मान् वीरवतोऽकरत् , इति ।
१६॥ अथास्यै दक्षिणथं स्तनं प्रक्षाल्य प्रयच्छति
'इमस्तनम्' इति ।२०१ यस्ते स्तनः' इत्युत्त.
रमेताभ्याम् ॥२१॥ उदपात्रशिरस्तों निदधाति
'आपो देवेषु जाग्रथ यथा देवेषु जाग्रथ एव
मस्या सूतिकाया, सपुत्रिकायां जाग्रथ' इति
२२॥ द्वारदेशे सूतिकाऽनिमुप समाधायोत्थानात
संधिवेलयाः फलीकरणमित्रान् सर्षपान नावा-
वपति 'शण्डामा उपवीरः शौण्डिकेय उलू-
खलः ।मलिम्लुचे द्रोणासश्चयवना नश्यतादितः
सवाहा। आलिखन्ननिमिषः किंवदन्त उपश्रुतिः

३१
कागष्ट १.क्षरिष्ठका १६ ।
हर्यक्षः कुम्भी शत्रुः पात्रपाणिनू मणिर्हन्त्रीमुखः
सर्षपारुण श्च्यवना नश्यता दितः स्वाहा' इति
२३ । यदि कुमार उपद्रवज्जालेन प्रच्छाद्योत्तरी-
येण वा पिताङ्क आधाय जपति 'कू'रः सुकूधैरः
कूकुरो बालबन्धनः । चेच्चेच्छुनक सृजनमस्ते
अस्तु सीसरोलपेतापहर तत्सत्यम् । यत्ते
देवावरमददुः सत्वं कुमार मेत्र वावृणीथाः ।
चेच्चेच्छुनकसूज नमस्ते अस्तु सीसरोलपेतापहर
सत्सत्यं । यत्ते सरमा माता सीसरः पिता
श्यामशबलौ मातरौ चेचे च्छनक सृज नमस्ते
अस्तु सीसरो लपेसापकहर, इति ।२४। अभिमृशति
न नामयति न रुदति न हृष्यति न ग्लायति यत्र
वयं वदामायत्र चाभिमुशामसि' इति । २५ ।
प्रसवासन्न पत्नी को एजतु दशभाल्यः यजुः०८।२८ इस मन्त्र से
यस्पैते ८ । २९ तक २ मन्त्रों को पढ़कर जल का छींदा देवे ।
बालक के भूमि पर आने पर भबैतु पश्नि यह मन्त्र पढ़े ॥
जन्म वो पीछे नाल छेदन करा कर मेधा जनन प्रायुध्य
बुद्धि प्रद ायुप्रद क्रिया करे ॥३॥ यथा-सुवर्णयुक्त अना-
मिका उङ्गली से घृत शहत चटावे या केवल घृत इस मन्त्र
से चटावे । भूः त्वयि दधामि । भुवः त्वयिद । खः त्वयिद०४
फिर आयुष्य करता है ॥५॥ नाभि या दक्षिण कान मे. अमि
आयुष्मान् । सोम साघु० । ब्रह्मा आयु० । देवा० । ऋषयः

२ व्यान अपान पारस्फर गृह्यसूत्रभाष्ये । आ० । पितर० । यज्ञ श्रा० । समुद्र मायु०। इन मन्त्रों का पाठ करता है । ६ ।। श्रायुषः यजुः-३ ६२ इस मन्त्र से तीन वार आयुष्य आशीर्वाद करता है ॥ ॥ पिता यदि पुत्र की सर्वायु चाहे तो ( यक्षु० १२ । १८ से २८ तक मन्त्र ) वात्सम अनुवाक ८ का, पाठ करै ॥६॥ दिवस्परि प्रथम० इस मन्त्र से आरम्भ कर इस अनुवाक की अन्त को नचा छहदे (शेष ११ मन्त्र पढ़े ) ॥ ॥ प्रत्येक दिशा में ५ ब्राह्मण घेठावं (१ पूर्व र दक्षिण ३ पश्चिम ४ उत्तर ५ मध्य ) यजमान : से आशीर्वाद की प्रार्थना करें ॥१०॥ पूर्व का कहे "प्रागा" १९ दक्षिख का १२ । पश्चिम का १३ । उत्तर का “उदान" १४ । मध्य का ऊपर को देखकर "समान ऐसा कहै ॥१५॥ ब्राह्मण न हों तो चारों ओर घूमता हुवा स्वयं पिता ही इन उक्त शब्दों को कहै ॥१६॥ जिस भूमि पर जन्म लिया उस भूभाग को स्पर्श कर पढ़ें " वेदते. इस मन्त्र को पढ़ता है १७ ॥ फिर इस बालक को छूकर इस मन्त्र को पढ़ता है १८ ॥ फिर इस की बालक की माता को लूकर इडासि. यह मन्त्र पढ़ता है । १६ ॥ पिर उस की दक्षिणदूधी को धोकर और "मस्तनम्०० २०१७ ८७ मन्त्र पढ़कर बालक को देवे ॥२०॥ यस्ते स्तनः वहदा०६ । ४ । २७) इस मन्त्र से बायां स्तन धोकर पिलाने को दे। इन दो मन्त्रों से दोनों स्तन धोकर पिलावे सो पानी का पात्र सिरहाने रखता हुवा आपोदेवेषु० यह मन्त्र पढ़े ॥ २२ ॥ सूतिकागृह के द्वार, पर सूतिकाग्नि का स्थापन कर जब तक प्रसूता न उठे. नित्यमति दोनों अश्माभव " काण्ड १ कपिडको ३३ संमय वहाँ हामकः इन २ मन्त्रों से सरसों पलीकरण * मिलाकर होम करता है ॥ १३॥ यदिबालक रोगी हो तो पिता गोदी में बैठाकर जाली वा दुपट्टे से ढक कर " कुकुरः० इस मन्त्र को जपे ॥ २४ ॥ फिर त्वनामयति इस मन्त्र से स्पर्श करे ॥ २५ ॥ १६ १७ करिडका दशभ्यामुत्थाप्य ब्राह्मणान् भोजयित्वा पिता नाम करोति । । यक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदादान्तरन्तस्थं दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्वितम् । २। अयजाक्षर माकारांन्त खिये तद्वितम् । ३ । शर्म ब्राह्मणस्य धर्मक्षत्रियस्य नोट-" फरलीकरणा मिश्राम्सर्षपान् अमो० यहां फलीकरण का अर्थ 'कर्क,गदाधर, हरिहर, जयराम के संस्कृत भाष्यों और तदनुसार ही श्री राजाराम जी के भाष्य में भी तंडुल कंगचावल की किनकी में सरसों मिला कर ही होम लिखा है परन्तु हम को फलीकरण का अर्थ चावल कण कहीं कोष में या व्युत्पत्ति द्वारा ठीक प्रतीत नहीं । तब कोष देखें ऐसे ज्ञात हुवा कि फली नाम अमरकोष । के वनौषधिवर्ग कांड २ के श्लोक ५५ में प्रियंगुलता का है ॥ कृष्णवृन्ता कुवेराक्षी श्यामा तुं महिला हया लता गोवन्दिनी गंगा-प्रियंगुः फलिनी फली ॥ विष्वक्सेना गंधफली कारम्भा प्रियकश्यता श्यामा से प्रियङ्गुतक १२ नाम प्रियंगुके हैं. -- हुवा। .

३४ पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये। गुप्तति वैश्यस्य ।। चतुर्थ मासि निष्क्रमणिका सूर्य मुदीक्षयति ' तच्चक्षुः' इति तच्चक्षुः' इति । ६ । १७॥ दश दिन प्रसूता को उठाकर ब्रह्मभोज कराकर पिता नाम धरै ।। नाम या अक्षर का हो घोप* अक्षर आदि में हो, मध्य में अन्तस्थ हो, शन्त में दीर्घ वा विलग हो कस् प्रत्ययान्तहो।तद्वितान्त न हो ॥२॥ विषमाक्षर आफारन्त तद्वितान्त कन्या का नाम हो ॥३॥ शर्मा ब्राह्मण, वर्मा क्षत्रिय, गुप्त वैश्य के (नामाल्तमेहो) ॥ चौथे मास निष्क- मण होता है ॥ ५ ॥" तचक्षुः० यजुः ३६ । २४ "मन्नसूर्य को दिखाता है॥६॥ १७ १७ करिखका प्रोष्येत्य गृहानुपतिष्ठते पूर्ववत् ।१। पुत्रं दृष्ट्वा जपति-'अङ्गादङ्गात् सम्भसि हृदयादधि जायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमिति । २ । अथाऽस्यमूनिमवजिघ्रति 'प्र- जांपतेष्ट्वा हिङ्कारेणावजिघ्रामि सहस्रायुषाऽसौ- जीव शरदः शतम, इति ।३। गवां त्वा हिङ्का. रेणेति चेतिदक्षिणेऽस्य कर्णे जपत्ति 'अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र रायो विश्ववारस्य भूरेः । अस्मे शतशरदो जीवसे धा अस्मे वीरां *घोषाक्षर-ग घ ङ । ज भज। ड ढ ण, दघन, बम म यरल व अन्तस्थ कांगड १ कण्डिका १८ । १६ । उछन्वत इन्द्र शिप्रिन् , इति ।४। इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्ति दक्षस्य सुभगत्वमस्मे । पोषछ रयीणामरिष्टिं तनूना स्वाक्ष्मानं वाचः सुदिनत्व महाम्, इति सव्ये । ५। स्त्रिवैतु मूनिमेवाधजिघ्रति तूष्णीम् । ६ ।१८ विदेशसेघरमातापूर्ववत्वासकरताहैपुनकोदेखकरजपता है अङ्गा दा० यह मन्त्र शतपथ ॥२॥ फिर इस पुत्र के शिर को सूपता है " प्रजापते. " " प्रजापते. " कन्त्र से ॥ ३ ॥ गवांत्वा० यह मन्त्र पुत्र के दक्षिण कान में जपता है । ४ । इन्द्रम् श्रेष्ठा० यह मन्त्र वांये कान में ( अपे) ॥५॥ कन्यानों के शिर को ही चुपके सूंघले ॥ ६ ॥ १८ ॥ १९ वीं कगिका पष्टे मासेऽन्नप्राशनम् । १ । स्थालीपा नपयित्वाऽऽज्यभागा बिष्ट्वाऽऽज्याहुती जुहोति देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मंद्रेषमूर्ज दुहाना धेनुर्वाग- स्मानुप सुष्टु तैतुस्वाहा, इति । २ । 'बाजी नो अदा' इति च द्वितीया । ३ । स्थालीपाकस्य प्राणेनानामशीय स्वाहा, अपानेन गन्धानशीय स्वाहा, चक्षुषारूपाण्यशीय स्वाहा, नोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा, इति । ४ । प्राश.. जुहोति ३६ पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । नान्ते सर्वान् रसान्त्सर्वमन्नमेकत उद्धत्त्याथैनं प्राशयेत् । ५ । तूष्णी हन्तेति वा 'हन्तकारं मनुष्या' इति श्रुतेः । ६ । भारद्वाज्या माथुसेन धाक्प्रसारकामस्य । ७ । कपिज्जलमधिसेनाना- द्यकामस्य ।। मत्स्यैर्जबनकामस्य ।। कृक- पाया ओयुकामस्य । १० । आट्या ब्रह्मवर्च- सकामस्य ।११। सर्वैः सर्वकामस्य ।१२। अन्न- पर्यायवा ततो ब्राह्मणभोजनमनपर्यायवा सतो ब्राह्मणभोजनम् । १३ । १९॥ छठे मास में "अन्नप्राशन अन्नघटाना होता है ॥१॥ स्थालीपाक पकाकर प्राज्य मागाहुति देकर " देवी घा० " इस मन्त्र से आहुति दे ॥ २ ॥ वाजो नो अघ इस मन्त्र से दूसरी ॥३॥ स्थालीपाक से होम करता है " प्राणेमानम् अशीय” स्वाहा । अपानेन गंधं० । चक्षुषा रूपा० । श्रोघेण यशोऽशीय स्वाहा इन मन्त्रों से पाहुति देवे । ४ । संस्त्रव प्राशन के पीछे सब रसों को सब अन्नों को एकत्र करे और वालक को चटावे ॥५॥ धुप होकर चटावे वा " हन्तं " कह कर । क्योंकि "हन्त झारम् मनुष्या: यह श्रुति है ॥६॥ ।। १० । ११ । १२ सूत्र प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं । क्योंकि.सबरसो को सब अन्नों को चढो चुकने के पीछे मांस चढाने में क्या रस नसक आदि नहीं हैं ? मन्न परोसकर ब्राह्मण को भोजन करावे ॥१३॥ प्रथम कागड समाप्त 2. कास्व र करिडफा १६। अथद्वितीयकांडे प्रथमाकंडिका सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् । १ । तृतीये पाऽप्रतिहते।२। षोडशवर्षस्य केशान्तः । ३। यथामंगलं वा सर्वेषाम् । १ । ब्राह्मणान् भोज- यित्वा माता कुमारमादायापलाव्याहते वाससी परिधाप्याङ्क आधाय पश्चादग्नेरुपविशति।। अन्वारब्ध आज्याहुतीहूत्वा प्राशनान्ते शीता- स्वप्सूष्णा आसिञ्चति 'उष्णेन वाय उदकेनेह्य- दिते केकान् वपं 'इति । ६ । केशरमश्निति च केशान्ते । ७ । बथान नवनीतपिण्डं घृतपिण्डं दधनो वा प्रास्यति । । तत आदाय दक्षिणं गोदानमुन्दति 'सवित्रा प्रसूता दैव्याआप उन्वन्तु ! ते तनुं दीर्घायु त्वाय बर्चसे इति । ९ । त्रेण्या शलल्या विनीय त्रीणि कुशलरुणान्यन्तर्दघाति 'ओषध ' इति । १० । 'शिवोनाम' इति लोह- शुर मादाय निवर्तयामि' इसि प्रवपति येना- । खपत्नविताक्षरेण खोमत्यराज्ञा वरुणस्य विद्वान तेन ब्रह्माणों पतेदमस्यायुध्यं जरदष्टिर्य थाऽसद्ध इति । ११ । सकेशानि प्रच्छिमा डुहे गोमये T ।

- पारस्कर गृह्यसूत्रभाध्ये पिण्डे प्रास्यत्युत्तरतानियमयाणे १२॥ एवं द्विर- परं तूष्णीम् । १३ । इत्तरयोश्चान्दनादि । १४ । अथपश्चात् 'त्र्याय पम् । इति । १५ । अथी- त्तरतः 'येन भूरिश्चरादिवं ज्योक च पश्यामि सूर्यम् । तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवातवे जीवनाय सुश्लोक्यायस्वस्तये' इति ॥ ६ ॥ त्रिः क्षुरेण शिरः प्रदक्षिणं परिहरति ॥ १७ ॥ संमुखं केशान्ते ।१८॥ यत्क्षुरेण मज्जयता सुपे. शसा वप्ना वपति केशान् छिन्धि शिरोमाऽस्यायुः प्रमोषीः । १६ । मुखमिति च केशान्ते । २० । ताभिरद्विः शिर समुदा नापिताय धुरं प्रय- च्छति 'अक्षण्वन् परिवप इनि । २१ । यथा मङ्गलं केशशेषकरणम् (२२१ रनुगुप्तमेत सकेशं गोमयपिण्डं निधाय गोष्ठे पल्बल उदकान्ते वाऽऽचार्याघ वरं ददाति । २३। गांकेशान्ते ।२४। संघात्रं ब्रह्मचर्यमवपनं च केशान्ते द्वादशरात्र षडानं त्रिरात्रमन्ततः । २५ । १॥ चूडाकरण १ वर्ष के बालक का होता है ॥१॥ या तीसरे घर्ष की समाप्ति से पूर्व । २. १६ वर्ष दो बालक का केशान्त होता है अथवा कुलाचारानुसार जिस वर्ष में होता हो या ।

काठ २ करिडका १। जय अनुकूल हो तब ही सब केश कृन्तनकरावें ॥४॥ ब्राह्मण जिमाकर माता बालक को लेकर स्नान करा नवीन दो वस्त्र पहिनाकर गोद में ले अग्लि के पश्चिम भाग में बैठे ॥५॥ पिता अला से अन्वारब्धकन्धा छूकर भाज्याहुति से प्राशन पर्य- न्त सब कर्म करे । उष्णेनवा० इस मन्त्र से ठंडे जल में गरम जल मिलावे केशान्त संस्कार में केशश्मशु कहै ॥ ७ ॥ फिर पानी में मक्खन वा घृत वा दही डाले ॥८॥ उस जल में से घुल्लुभर कर दहिनी कनपटी पर बालों को सविना मसूतेन, इस मन्त्र से गीला करै ॥ ॥३ सेह के कांटे ३ कुशा लेकर बालों को "ओपधे ब्रायस्व. यजु:०४ । १ इस मन्त्र से बाल ढांचे ॥१०॥ शिवोनामासिव्य०३ । ६३ इस पद से लोहे का उस्तरा लेकर " निवर्तयाम्यायुषे ३ । ६३ इस मन्त्र से केशकाटने प्रारम्भ करै। येनावपत० मन्त्र को पढ़ता हुवा काटे । १९ । कुश सहित केश काटकर अनुहुहवष के गोवर पिंडको उत्तर में धरकर उस में बालों को रखताजाय ॥१२॥ इसी प्रकार और दो वार चुप के से काटे ॥१३॥ अन्य दोनों ओर के बालों को भिगोनादि कार्य ती मन्त्र पूर्वक करै ॥ १४ ॥ तत्पश्चात् व्यायुषं०. इस मन्त्र को पढ़े ॥ १५ ॥ येनभूरि: इस यजुः ३ । ३६ से बांये भाग के बाल कोटे ॥६॥ तीन वार शिरके चारों ओर प्रदक्षिणक्रम उस्तरा से घुमावे १७ केशान्त संस्कार में मुख के दाढ़ी मूल भी मुंडे ॥ १८ ॥ यत्क्षुरेण यह मन्त्र मुंडन का है ॥ १९ ॥ मुख के बाल के- शान्त में जब मंडे ॥२०॥ पूर्वोक्त प्रकार शीतल और उष्णो दकों से शिर को भिगो कर नाई को उस्तरा देता है। अद्यु० खून न निकले ऐसा भूछो इस मन्न से ॥ २१॥ यथा १० पारस्कर गृह्यसूत्र भाप्ये : । योग्य कुलदेशाचारानुसार केश कटावे ॥ २२ ॥ शिखा कंही छूटती है । सब केशों को बीन कर गोवर सहित लपेट कर गोशाला पोखर या नदी में गाढ़ देवे श्राचार्य को भेट दे। ॥२॥ केशान्त संस्कार में गोदान दे। २४॥ : चूहा कर्म संस्कार के पोळे १ वर्ष तक बाल न मुहावे ब्रह्मचर्य बत् रहै । और केशान्त के पीछे १२ वा ६ वा रानि सफ क्षौर न करावे ॥२५॥ इति द्वितीय काय प्रथमा कण्डिका। कपिडका २ (उपनयन) अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेटु गर्भाष्टमेवा ।। एकादशवर्षराजन्यम् । २ । द्वादशवर्ष वैश्यम् ३। यथामङ्गलं वा सर्वेषाम् । ब्राह्मणान् भोज- येत् तं च पर्यप्तशिरसमलङ्कृतमानयन्ति । पश्चादग्नेरवस्थाप्य " ब्रह्मचर्यमागाम् " इति वाचयति "ब्रह्मचार्यसानि" इति च । अथैनं वासः परिधापयति येनेन्द्राय बृहस्पतिर्वासः. पर्य दधादमृतम् । तेन त्वा परिदधाम्यायुषे दीर्घायुवाय. बलाय वर्चसे " इति । मेखलां वनीते "इयं दुरुक्तं परियाधमाना वर्ण पवित्रं पुनती म आगात्त । प्राणापानाभ्यां बल माद- धाना- स्वजा देवी सुभगा मेखलेयम्, इति । :

कापड २ काहका. ४१ "युत्रा सुवासाः परिधील आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः । तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः " इति घा ।। तूष्णी था । १० । ( यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापते. यत् सहजं पुरश्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुच्च शुभे यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः । यज्ञोप- बीत मञ्चि यज्ञस्यत्वा यज्ञोपवीतेनोपन- ह्यामि” इति । अथाजिनं प्रयच्छसि "मि- प्रस्य चक्षुर्धरुणं चलीयस्तेजो यशस्त्रि स्थविर समिद्धम् । अनाहनस्यं वसनं जरिणः परीदं वाज्यजिनं दधेऽहम् इति दण्डं प्रयच्छसि।११॥ तं प्रतिगृह्णाति “यो मे दण्डः परापतद्वैहान- सोऽधि अभ्याम् । लमहं पुनरावद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय" इति । १शदीक्षाषदेके 'दीर्घसत्र मुपैति, इति वचनात् । १३ । अथाऽस्याद्विग्ज- लिनोऽञ्जलिं पूरयति 'आपोहिष्ठा' इति मिसृभिः । ११ । अथैन, सूर्यमुदीक्षयति 'सच्चक्षः' इति । १५ । अथास्य दक्षिणार्थ समधि हृदयमालभने ममव्रते ते हृदयं दधामि ममचितमान चित्त ते माह , पर 'पारस्कर गृह्यमृन्न भाष्ये अस्तु । मम वाचमेकमना F जुषस्थ वृहस्प. तिष्ट्वा नियुनक्तुमह्यम्, इति । १६ । अथाऽस्य दक्षिणहस्तं गृहीत्वाऽऽह 'कोनामाऽसि, इति ॥१७॥ अमी 'अहं भोः, इति प्राह ।१८। अथैन कसय ब्रह्मचार्यसि, इति ।१८। 'भवतः इत्यच्यमाने ' इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्य स्तवाली, इति ॥२॥ अथैनं भूतेभ्यः परिददात्ति प्रजापतये त्वा परिददामि देवाय धा सवित्रे परिददाम्यदुभ्य त्वौषधीभ्यः परिददामि द्यावा पृथिवीभ्यां त्वा परिददामि विश्वेभ्यस्त्वा वेदे- भ्यः परिददामि सर्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः परिददा- म्यरिष्टये, इति । २१ । कमिष्ठका २ साठ वर्ष के बाल का यज्ञोपवीत करावे या गर्भ से आठवें वर्ष में ॥१॥ १९ वर्ष के क्षत्रिय की । २ ॥ १२ वर्ष के वैश्य को । ३ । या जैसा कुलाचार हो वैसा सय का । ४ । बालगों को भोजन करावे और बालक का शिर मुंडा कर मंडप में लावे ॥ ५॥ अग्नि के पश्चिम भाग में घंठा कर र्यमागाम्य ऐसा और "ब्रह्मचर्यसानि" बचवावे, कहावे ॥६॥ "येनेन्द्रायवृ०" इस मन्त्र से बालक को वस्त्र पहिनावे ॥ ७ ॥ "इयंदुरुक्त " मन्त्र से मेखला तगड़ी बांधे ॥८॥ अथवा "युवा- ब्रह्मच- . काश २ कपिलका। ४३ सुवासा० " इस मन्त्र से ॥ ॥ या चुप के ही बांधे ॥ १० ॥ (यज्ञोपवीतम्० इस मन्त्र से यज्ञोपवीत पहिनावे) फिर मृग- धर्म देता यह मात्र पढे " मित्रस्य चक्षुः० " दंड देता है ॥ ११ ॥ उस दंड को लेता हुवा यह मन्त्र पढ़े “योमेदंडः०, ॥ १२ ॥ कोई नाचार्य दीक्षा के समान दंड को "दीर्घसत्र- को प्राप्त होता है" कह कर दंड को देते हैं । १३ । फिर इस ब्रह्मचारी की प्रजन्नी को प्राचार्य अपनी अञ्जली से भरती है । आपोहिष्टा० इन ३ तीन मन्त्रों से ॥ ॥१४॥ तच्चक्षुः इस मन्त्र से पुनः इस को सूर्य दिखाता है ॥१५॥ फिर इस का दक्षिण हृदय छूता है । “ममव्रते इस मन्त्र से ।१६। फिर इस का दक्षिण हाथ पकड़ कर प्राचार्य कहै को नामाथि 129 शिष्य अपना नाम लेकर अहंभोः ३ ऐसे है ए फिर इससे कहै "कस्यब्रह्मचार्यसि" ऐसे । 'भवतः । ऐसे शिष्य कहै । ऐसा कहने पर “इन्द्रस्य ब्रह्म, यह मंत्र पढ़े। २० । फिर इसे पोषण करता है। प्रजापतये " मन्त्र से ॥ २१ ॥ कमिष्ठका प्रदक्षिणमग्निंपरीत्योपविशति । १ । अ- न्वारब्ध आज्याहुतीहुत्वा प्राशनान्तेऽथैन म थशास्ति ब्रह्मचार्यस्यपोऽशान कर्म कुरु-मा- दिवा सुषुप्था वाचं यच्छसमिधमाधेह्यपोऽशान, * इति । २ । अथास्मै सावित्रीमन्वाहोत्तरतोऽग्नेः -- , पारस्कर गृहखूनभाष्ये । प्रत्यङ्मुखायापविष्टायापसनाय समीक्षमाणाय समीक्षिताय । ३ । दक्षिणतस्तिष्ठम आसीनाय वैके ।। पच्छोऽर्द्धचंशः सर्वाज तृतीयेन सहान- वर्तयन् ॥ सवत्सरे पाण्मास्ये चतुर्विशत्यहे. द्वादशाहे षडहेहे वा ६. सारत्नेश्व गायत्री ब्राह्मणायानुब्रूयात् 'आउनयो वै ब्राह्मणः इति पतेः । ७ । त्रिष्टुमधुराजन्यस्य ।। जगतीं वैश्यस्य । ६ सर्वेषां वा गायत्रीम् ॥१॥ अक्षधारी अग्नि की परिक्रमा करने बैठता है ॥९॥ छूकर आचार्य होम होम कर प्राशन कराकर उपदेश देवे कि तू ब्रह्मचारी है । आचमन कर सन्ध्यादि नित्य कर्म कर । दिन में मत सो । वाणी को सम्भाल। अग्निहोत्र कर । भोजन से पूर्व आचमन कर । ऐसे ।। फिर इस के लिये गायत्री देवे । अग्नि से उत्तर में पूर्वाभिमुख वाचार्य के पास बैठा आचार्य को देखता हो आचार्य ब्रह्म- घारी को देखता हो । ३। अग्नि से दक्षिण में स्थित वा बैठे को उपदेश करे कोई ऐसा मानते हैं । ४ । प्रथम बार गायत्री का एक पाद । दूसरी वार दोपाद । तीसरी वार समस्त गायत्री को साथ र बुलवावे ॥५॥ यज्ञोपवीत से १ वर्ष ६ मास, २४ दिन १श६ वाइदिन पीछे उपदेश करे ॥६॥ अल्दी ही उसी दिन गायत्री बाण को पढ़ाने क्यों कि "ब्राह्मण- आग्न प्रधान है, ऐमी श्रुति है ॥ ॥ त्रिष्टुप् क्षत्रिय का।। जगती वैश्य का . या सब का गायनी ही (मन्न है) ॥९॥ ब्रह्मा से n काश कमिका ।।। ४५ कनिष्ठका ४ अत्र समिदाधानम् । १ । पाणिनाऽग्नि परिसमूहति 'अग्ने सुनुवः सुनुवसं मा कुरु। यथा स्वमग्ने सुश्रुवः सुधा अस्येवं मासु. नत्रः सौनवसं कुरु । यथास्वमग्ने देवानांयज्ञ स्य निधिपा अस्येषमहं मनुषयाणां वेदस्य नि. धिपोनूयासम्, इति । २ । प्रदक्षिणमग्निंपर्यु- क्ष्योत्तिष्ठन्तपमिधमादधाति 'अग्नये समिध- 'माहा वृहतेजानवदसे । यथा त्यमग्ने समिधा समिध्यस एप्रमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुमिब्रह्मवर्च सेन समिन्धे जोषपुत्रो ममा- चार्योमेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुयशस्वी तेज स्वो ब्रह्मषचंस्यन्नादो भूयास स्वाहा, इति । ३. एवं द्वितीयां तथा तृतीयाम् । १ । एषा त इति वा समुच्चयो नो । ५। पूर्ववत् परिसमूह- नपर्युक्षणे। ६ । पाणी प्रतय मुखं विमृष्टे 'त. नूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाहायुर्दा अग्नेऽस्या- युमै देहि बौदा अग्नेऽसि वी मे देहि, अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपण । ७ मेघां में पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । देवः सविता मेधां देवी सरस्वती। मेधामश्विना देवावाधत्तां पुष्करखजौ, इति । । यहां समिधा अग्नि में छोड़ता है। १ । ब्रह्मचारीहाथ से अग्नि को (जुधे से ) समेटता है । "अग्ने सुश्रुव० "इ. त्यादि मन्त्रों से ॥२ ॥ अग्नि के चारों ओर जल छिड़क कर खड़ा होकर समिधा धरता है । 'अग्नये समि० इस मन्त्र से । ३ । ऐसे ही दूसरी तथा तीपरी समिद् भी ( लगावे ) । ४ । वा “ एषाते " यजु०९ । १४ ।इस मन्त्र से या एक ही वार तीनों समिधा लगावे ॥ ५ ॥ प्रथम कहे अनुसार अग्नि को समेटे और चारों ओर जल छिड़ के ॥६॥ "तनू पाअग्ने०॥ ॥ ७ ॥ “मेधां में देवः ॥ ८॥ इन दोनों मन्त्रों से दानों हाथ तपाकर मुख से लगावे ॥ करिडका ५ अत्र भिक्षाचर्यचरणम् ।। भवत्पूर्वी ब्रा- ह्मणो भिक्षेत ।२ । भवन्मध्या९राजन्यः । ३ । भवदन्त्यां वैश्यः । ४ । तिस्त्रोऽप्रत्याख्यायिन्य: ॥ षड् द्वादशाऽपरिमिता वा ।६। मातरं प्रथ- मामेके । ७ । आचार्याय भैक्षं निवेदयित्वा वा- ग्यतेाऽह.शेष तिष्टेदित्येके । ८ । अहि सन्नर- ण्यात् समिधआहृत्य तसिमन्नग्नौ पूर्वपदा- धाय वाचं विसृजते । ९ । अधः शाय्यक्षारल .

काग २ कण्डिका । 19 वणाशी स्यात् । १० दण्डधारणमग्निरिचरणं गुरुसुश्रूषा भिक्षाचर्या । ११ । मधुमाथे पमज्ज नोपर्यासन स्त्रीगमनानृतादत्तादानानि वर्जयेत् । १२ । अष्टमत्वारिशद वर्षाणि वेद ब्रह्मचर्य चरेत् । १३ । द्वादश द्वादश वा प्रतिवेदम् ॥१४॥ यादग्रहणं वा । १५ । वासा ७ सि शाणलो- माविकानि । १६ । ऐण यमजिनमुत्तरीयं ब्राह्मा- णस्य । १७ । गैरवराजन्यस्य । १८ । आज गव्यं. वा वैश्यस्य । १६ । सर्वेषां गव्यमसति प्रधानत्वात २०१ मौजी रशना ब्राह्मणस्य ॥२१॥ धनुा राजन्यस्य । २२ । मौर्व वैश्यस्य । २३ मुजाभावें 'कुशाश्मन्तकबल्वजानाम् । २४ । पालाशेः ब्राह्मणस्य दगडः । २५ । ल्वो रा. जन्यस्य । २६ । औदुम्बरो वैश्यस्य । २७ । सर्व वा सर्वेषाम । २८ । आचार्यणाहून उ. त्थाय प्रतिशृणुयात् । २६ । मायान चेदामीन आलीनं चेन तिष्ठस्पिष्ठन्तं चेदभिक्रामन्नभिका- मन्तं चेदभिधानन् । ३० । स एवं वर्तमानोऽमु. त्राच वसत्यमुत्रादा वसतीति तस्य स्नातकस्य ।

पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये कीर्तिभवति । ३१ । प्रायः स्नातका भवन्ति विमास्नातको व्रतस्नासको विद्यावतस्नातक इति । ३२ । समाप्यवेदमसमाप्य व्रतं यः समा वर्तते स विद्यास्नातकः । ३३ । समाप्यवतमस- माप्य वेदं यः समावर्तते स व्रतम्नातकः ।३४ । उभय समाप्य यः समावर्तते स पिद्मावतस्ना- तक इति ! ३५ । आषोडशाद् वर्षाद् ब्राह्मण: स्यानतीतः काली भवतीति । ३६ । माद्वावि- शाद राजन्यस्य । ३७ । आचतुर्विशावे- श्यस्य । ३८ । अत ऊर्ध्व पतितसावित्रीका भवन्ति ।३९ । नेमानुपन येयुर्नाध्यापयेधुनषा- जयेयुन चैभिर्व्यहरेयुः । १० । कालातिक्रमे नि- यतवत् । ४१ । त्रिपुरुष पसितसावित्रीकाणा- मपत्यसंस्कारो नाध्यापनं च । १२ । तेषा- संस्कारप्सुळत्यस्तामेनेष्ट्वा काममधीयीरन् व्यव- हार्या भवन्तीति वचनात् ॥ १३ ॥ यहां शिक्षा के प्राचार का कथन है ॥ १॥ भवात शब्द प्रथम बोलकर ब्राहमण भिक्षा मांगे।२ । भवत् सध्य कह क्षत्रिय । ३ । भवंत शन्त में कह वैश्य । ४ । यथा-आप भिक्षा. दीजिये ब्राह्मण भिक्षा माप.दीजिये, क्षत्रिय । भिक्षा दी- - कागष्ठ कमिका । जिये महाराज । ऐसे वैश्य मांगे। ( पूर्वदिन ) ऐनी तीन लियों से मांगे जो नकार न करें। ५। छः या १२ से मांगे।६। कोई आचार्य प्रथम माता से मांगे ऐसा कहते हैं 191 आचार्य के सामने भिक्षा लाई भेटकर चुपचाप शेषदिन खड़ा रहे । यह किन्ही का मत है।। हरे वृक्षों को न काट कर ( अहिंसासे, समिधा लावे । अग्नि में छोड़े वागी को बोले मन्त्र पढ़े।। भूमि पर सावे, क्षार लवण न खावे । २॥ दण्ड रक्खे, अग्नि सेवा"गुरुसुशूषा"भिक्षाचर्या करे ।१॥ भिक्षा में शहद और मांस नले (अर्थात मांशाहारी 'जनों के घर मे भिक्षा न ले) बहुत स्नान,जंचे पर बैठना स्त्रियों का संग मिथ्यासाषण, विना दी हुई वस्लु लेना, यहवर्जित है ॥१२. ४८ वर्ष तक वेदपढ़े ब्रह्मचर्य करे :१३॥ १२॥१२ वर्ष एक २ वेद पढ़े ।१४ याजवतक पढ़ सके ११॥ व सण, रेशम या जन के हों ।१६ । ऐणेय छाल ब्राह्मया को । १७ . रुरु कीक्षत्रिय को १८. अज बागौ* की वैश्य को ११९॥ उक्त छाल न होतो सब गौकी ही रक्खें क्योंकि गौ प्रधान है, २०। भूज की तगड़ी ब्राह्मण क्षत्रिय की धनुष के ज्या डोरे की ।२२॥ वैश्योंको माले के वक्त की ।२३॥ ज न होतो कुशां बल्बन को बनावे ।। ढाक का दंड ब्राह्मण का ।२५। वेल का क्षत्रिय का ।६। गूगर का वैश्य का । २७ । या सख दंड सब के । २८ । आचार्य के बलाने पर * उठकर सुने । २९ । साता हो तो बेठ कर । बैठे हों तो खड़े होकर । खड़े हों तो कुछ चलकर । चलते हो दौ दोड़कर *इन ब्रह्मचारियों के ओढने के वस्त्र पर उक्तचित्र बने हों जिससे ब्रह्मचारी के वस्न पर निशान मार्क समझ जाने (संपादक) - ५० पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । छात्र ऐसे रहता है यदि स्नातक ऐसे न रहे तो अपयश होता है...३१ । तीन प्रकार के स्नातक होते हैं। विद्या स्नातक, व्रतस्नातक, विद्या व्रतस्नातक । ३२ । वेद समाप्त करके व्रतसमाप्त न करको वत्त वह बिद्यास्नातक है । ३३ । व्रतसमाप्त कर वेद समाप्त न करके वक्त वह व्रतस्नातक है ।३४॥ वेद और व्रत दोनों को समाप्त करे वह विद्यावत स्नातक है १३॥ ब्राह्मण का १६ वर्ष तक अनतीतकाल होता है । ३६ ! क्षत्रिय का२२ वर्ष तक ३॥ वैश्य का २४ तक ३८. इस के बाद सावित्री से पतित हो जाते हैं । ३९ । न इन्हें यज्ञोपवीत दे न वेद पढ़ावे न यज्ञ करावे न इन से व्यवहार करै । ४० । समय बीतने पर श्रौत सूत्र में नियत किये अनादिष्ट प्रायश्चित्त करे ॥४१॥ निन के ३ पीढी तक सावित्री पतित हो जावें उन को सन्तान को. न. पढ़ावे । ४२ । वह यदि संस्कार चाहे तो व्रात्यस्तोम इष्टि करें तो भले ही पढ़े व्यवहार योग्य होते हैं ऐसा वचन है ॥ ४३ ॥ करिडका ६ ( समावर्तन संस्कार ) वेदसमाप्य स्नायात् । १ । ब्रह्मचर्य वा- ऽष्टाचत्वारि ७ शकम् ।२ । द्वादशकेऽप्येके. । ३ । गुरुणानुज्ञातः ।। विधिविधेयस्तर्क- श्ववेदः । ५ । षडङ्गमेके। ६ । न कल्पमात्रे । ७ । कामन्तु याज्ञिकस्य । ८ । उपसंगृह्य गुरु समिधोऽभ्याधाय परिश्रितस्योत्तरतः कुशेषु प्रागग्रेषु पुरस्तात् स्थित्वाऽष्टानामुन्दकुम्भानाम् कापड २ कपिडा। 16। ये अप्स्वन्तरगयः प्रविष्टांगोह उपुलो मयूखीमनोहाऽस्खलो विरुजस्तनद्रषिसिन्द्रिय हाअतितान्सृजामि । योरोचनस्तमिहगृह्णा- मिः इत्येकस्मादपगृहीत्वा । १० । तेनाभिषि- चने तेन 'मामाभिषिञ्चामि श्रियै यशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसेाय, इति । ११ । येन नियमकृणुतां येनावमृशतासुराम् । येनाधावभ्यषिचतां यद्वा सदग्विना यशः' इति । १२ । आपोहिष्टा इति च प्रत्चम् । १३ । त्रिभिस्तूष्णीमितरैः । १४ । उदुत्तममितिमेखलामुन्मुच्य दण्डं निधा- य बासेोऽन्यत् परिधापादित्यमुपतिष्टने । १२ । उद्यन्भ्राजभूष्णुरिन्द्रो मरुद्विरस्थात् प्रातर्यात्र- भिरस्थाद दशसनिरसि दशसनि मा कुळविद- न्मागमय ॥ उद्यन भाजभृष्ण रिन्द्रो मरुदिर- स्थाद् दिवायावभिरस्थाच्छतसनिरसि शतसनि मा कुर्वाविदन्मागमय । उद्यन् भ्राजभूष्णुरिन्द्रो मरुद्विरस्थात् सायंयवभिरस्यात् सहस्त्रसनिरसि सहस्रसनिं मा कुर्वाघिदन्मा गमय , इति । । १६ । दधि तिलान्या प्राश्य जटालोभनखानि सहस्योदुम्बरेण दन्तान वेतमालालाशय ५२ . पारस्कर गृह्यसूत्रशान्ये । व्य इध्व सासाराजायमागमत् । स मे मुखं प्र. मायते यशसा च भगेन च, इति । १७ । उ- रसाद पुन: स्नात्वाऽनलेपनं नासियार्म खस्य बोपगृह गीते 'प्राणापानौ से तर्पय, चाक्षु मै तर्प- या, ओनं ने लय , इति । १८ । 'पित्तरः शुन्ध- ध्वम्, इति पारयो रवमेजनं दक्षिणा निषिच्या- नुलिप्य जपेत् 'सुचक्षा अहमक्षोभ्यां भूयाससु- वची मुखेन । सुश्रुत कर्णाभ्यां भूयासम्, इति । १९ । अहतं बालो धीतं वाऽमैत्रेणाच्छादयीत 'परिधास्यै यशोधास्य दीर्घायस्वाय जराष्ट- रस्मि । शतं च जीवामि शरदः पुरूचीरायस्पो- परमि संव्ययिष्ये, इति । २० । अथोत्तरीयम् यशलामा द्यावापृथिवी यशसेन्द्रा बृहस्पती यशो भगरच मा विदद् यशो मा प्रतिपदा- ताम् ' इति । २१ । एक चेत् पूर्वस्योत्तरवर्गण प्रच्छादयीत । २२ । मुमनसः प्रतिगृह्णाति 'या आहरज्जमदग्निः नहाय मेधाय कामायैन्द्रि- यायाताअप्रतिगृणामियशसाचभगेनचा इतिा२३॥ अथानबध्नीत' यद् यशोऽसर सामिन्द्रश्च कार 6 . 'कागड २ करिडका ।। विपुलं पृथु। तन संग्रथिताः सुमनस आबध्नामि यश माय' इति । २४ । उष्णोषेण शिरो वेष्ट. यते 'यु वा सुनासा: ' इति । २५ । 'अलंकर- णमांस, भूयोऽलंकरणं भूयात् इति कर्णवेष्टको । २६ । वृत्रस्य ' इत्यङ्क्ते अक्षिणी । २७ । रोचिष्णुरसि' इत्यात्मानमादर्श प्रेक्षते ॥२८॥ छत्रं प्रतिगृह णाति बृहस्पते श्छदिरसि पाप्मना मा मन्त तेजसोयशसा माउन्सहि' इति ॥२६॥ 'प्रतिष्ठ स्थो विश्वतोमा पातम् इत्युपानही प्रति मुज्जते । ३० । 'विश्वाभ्यो मानाष्ट्राभ्यस्परिपाहि सर्वतः इति वैणवं दण्डमादत्ते । ३१ । दन्तप्र- क्षालनादीनि नित्यमपि वास छत्रापानहश्चा- पूर्वाणि चेन्मन्त्रः ॥ ३२ ॥ वेद समाप्त करके स्नान करै (इमी लिये स्नातक कहते )। १। या ४८ वर्ष तक पढ़ के ही स्नातक हो।२। कोई १२ वर्ष के पीछे ही स्नातक बनाते हैं । ३ । गुरु की आज्ञा पाकर ही।४। विधि विधेय वेद हैं। कोई छः अङ्गों को वेद कहते हैं। ६ । कल्पमात्र को नहीं। ॥ जव यज्ञ के कर्म कराने वाले की इच्छा होतब ही स्नातक हो । ८ । ( विधिः ) आचार्य के चरण स्पर्श कर, अग्नि में समिधा छोड़कर अशि से उत्तर की ओर अय. भाग बिछाई कुशों पर घड़े, जल के भरे हुवों से ।।

पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्ये
" ये अमु० ॥ इस मन्त्र से एक घड़े का जल लेकर । १० ।
उस से अभिषेक करै । तेनामि० ईस मन्त्र से ॥१॥ फिर येन
श्रियमाणु० इस से । १२ । फिर आपोहिष्टा० इन ३ मन्त्रों से
३।४। ५ घड़े से । १३ । शेष ६।७।८वें इन तीन पड़ो
से चुप चाप अभिषेक करै । १४ । उदुत्तमम्
सगड़ी छोड़ दे। दण्ड को धर कर अन्य वस्त्र पहिन कर सूर्य
के सामने खड़ा होता है । १५ । उद्यन भ्राजि० इत्यादि
मन्त्र पढ़ता है । १६ । दही वातिल खाकर जटा लीम मखों
को कटाकर गूलर को दतौन से दान्त शुद्ध करै । "अनाद्याय*
ऐसे मन्त्र पढ़े १७ उवटन मलकर फिर स्नान कर "प्राणा:
पानी में उस मन्त्र से मुखनासा पर जन्दन लगावे ॥१८॥
"पितरः शुन्धध्वम्' कहकर दक्षिण को मुखकर दोनों हाथों
से जल देकर चन्दन लगाता हुवा “शुचक्षा” ऐसे जप करें।
१९ । नवीन वस्त्र वा धुले वस्त्र धोती परिधास्थ०." इस
मन्त्र से पहिने । २०1 यशसामा० . इस मन्त्र है दुपट्टा
मोड़े । २१ । यदि १ ही धोती हो तौ पहिले मन्त्र से आधी
बांधले उत्तर मन्त्र से प्राधी ओढलेवे । २२ । या श्राहर
ज्जमदग्निः- इस मन्त्र से प्राचार्य से पुष्प माला डेवे ॥२३॥
" यद्यशो० " इस मन्त्र में गले में पहिने । २४ । पगड़ी से
शिर को लपेटता है " युवासुर
" इस मन्त्र से। २५ । "श्रलं
करणमसि इस मन्त्र से कान लपेटे । २६ । पत्रस्प.
आंखों में अञ्जन डाले । २७ । “ रोचिष्णुरसि० * इस मन्त्र
से-दर्पण देखे । २८ । छत्र लेता है । वहस्पते.. इस मन्त्र से
। २९ । "प्रतिष्ठेस्थो मन्त्र में जूता पहिने ३० "विश्वाभ्यो
मन्त्र में वांस का . दण्ड लेना ।३१ । दन्तधावनादि वन
छाता जूता जब २ नवीन पहिने तब २-मन्त्र पढ़े ॥ ३२ ॥

काह२कारका ५५ - कपिडका (स्नातक के लिये मम )। स्नातस्य यमान् वक्ष्यामः । १ । कामा- दितरः ॥ २॥ नृत्यगीतवादित्राणि न कुर्यान्न च गच्छेत् ॥ ३॥ कामं तु 'गीतं गायति वैव गीते वा रमते , इति श्रुत_परम् । ४ । क्षेमे मक्तं ग्रामान्तरं न गच्छेन च धावेत् । ५। उद- पानावेक्षण वृक्षारोहण फलप्रपतन सन्धिसर्पण विमस्नान विषमलङ्घन शुष्कवदन सन्ध्या- दित्यप्रेक्षण भैक्षणानि न कुर्यात् ' न ह वै स्नात्वा भिक्षेतापह वै स्नात्वा भिक्षां जयति इति श्रुतेः । ६ । वर्षत्यप्रावृत्तो व्रजेन 'अयं मे बजः 'पाप्मानमपहनत्' इति । ७ । अप्स्वा- तमानं नावक्षेत । ८ । अजातलोनी विपुथ्सी- ॐषण्डञ्च नोपहसेत् । ६ । गर्भिणो विजनन्ये- ति ब्रूयात् । १०। सकुलमिति नकुलम् ॥ ११ ॥ भगालमिति कपालम् ॥ १२ ॥ मणिधनुरितीन्द्र धनः ॥ १३ ॥ गां धयन्ती परस्मै नाचक्षीत ॥ १४ ॥ उर्वरायामनन्तहितायां भूमावुत्सस्ति- छन्न मूत्र पुरीषे कुर्यात् ॥ १५॥ स्वयं विशीर्णन काठन प्रमृजीत ॥१६॥ विकृतं वासो नाच्छा- पारस्कर गृह्यसूत्रमाध्ये दयीत ॥ १७ ॥ द्रढवतो वधत्रः स्यात् सर्वत आत्मनं गोपायेत् सर्वेषां मित्र मिध ॥१८॥ ७ ॥ कण्डिका अर्थ-स्नातक के यम कहते हैं। १। इन यमो को अन्य पुरुष भी चाहे तो पालन करै । २ । नाचना, गाना, बजाना न स्वयं करै न इन कार्यों में जावे।३। "गीतं गायति. "गीत गाता है वा गीत से प्रसन्न होता है। यह अति है इस से सामवेद गामामात्र चाहै तौ दोष नहीं।४। विना आपत्ति समयं के गत में दूसरे ग्राम में न जावे न दौड़े । ५। कूप झांकना पक्षों पर चढ़मा फल झाड़ना नस चटकाना, नग्न. स्नानचे नीचे में कूदना कठोर भाषण, उदय अस्त होते, सूर्य का देखना और भिक्षा मांगना यह कर्म न करे । “नह:, वै० शतपथ २०।३।३ । ७ भिता वर्जित है।६ । वर्षा में भी छत्र न लगावे । अयं मैं मन्त्र पढ़ता हुवा । ७ । पानी में मुख न देखे । ८ । जब तक रोमन भाये हों ऐमी वाला. स्त्री और नपंसक से उपहास-हंसी न करै ( विवाह न करे. यह तात्पर्य है।)। । गर्भिणी स्त्री को विजन्या कह कर बोले । १० । नौले को नकुल न कह सकुल कहै ।११। कपाल को भगाल । १२ । इन्द्र धनु को मणि धनुष कहै ।१२। बछड़े को चुंखोती गौ को किसी को न बतावे । १४ । जमे हुवे या बुथे हुवे खेत में या चलते २ या खड़े२ विष्टा मूत्र न करै । १५ । स्वयं गिरी हुई लकड़ी से गुद को पौछे । फिर महो जल मे शुद्ध करें ) । १६ । बिगड़ा (विकृत) वस्त्र न ओढ़े । १७ । दृढ़ प्रतिज्ञ रक्षक सब का मित्र हो ॥ १८ ॥ .

कायम ३ कविका करिडका (स्नातक के व्रत) प्रक्षिप्त तिस्रो रात्रीतं चरेत् । १। * अमाथेसा- श्यमृण्मयपायी । २ । स्त्रीशूद्रशवकृष्णशकुनि शुनांचादर्शनमसम्भाषा च तैः । ३। शवशूद्र- सूतकानानि च नादात् । १ । मूत्रपुरीषेष्ठीवनं चातपेन कुर्यात् सूर्याच्वात्मानं नान्तर्दधील ।५। सप्त नोदकार्थान् कुर्वीत । ६ । अवज्योत्य रात्रौ भोजनम् । ७ । सत्यवदनमेव का।।दीक्षितो- प्यात पादीनि कुर्यात् प्रकार्यवांश्चेत् । ६ ॥ कश्तिका ८ समावर्तन से तीन राततक व्रतकरै । सांस न खावे और मही के पात्र में पानी न पीवे । स्त्री, शूद्र, शव, काले पक्षी, कुत्ता इनको न देखे न इन से बोले । ३ । शव शूद्र और सूतक का अन्न न खावे । ४ । धूप में मूत्र विष्टा थूकना न करै छत्री यह समस्त कपिका ही प्रक्षिप्त प्रतीत होती है। जब कं०७ में स्नातक के निमम कह चुके थे तब उसी में यह भी धर देते । मांस का माम-उड़द अर्थ भी कर दिया तो क्या मही के पात्र में भोजन क्यों न करें। गर्म जल से स्नानादि सभी क्रिया अंड वगइ हैं । यमो के वर्णन में पहले ही “ यमान् रक्ष्यामः " ऐसी प्रतिज्ञा है शागे पीछे सभी कण्डिकानों के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा हैं इस कमें कोई प्रतिज्ञा भी नहीं है।

पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये धूपमें भी न लगावे । ५ । गरम जल से स्नान संन्धादि करें । रात्रि को दीपक जलाकर भोजन करे ।। अथवा सब नियमों के बदले सत्य भाषण ही करै ।। दीक्षित समर्थ हो तो उक्त नियम करें । ॥ कण्डिका अथातः पञ्च महायज्ञाः । १ । वैश्वदेवाद- सात् पर्युक्ष्य स्वाहाकारैर्जुहुयाद् ब्रह्मणे प्रजा- पतये गृह्याभ्यः । कश्यपायानमतय इति । २। भूतगृह्येभ्यो मणिके त्रीन् पर्जन्यायाट्दयः पृथि- व्यै । ३ । धात्रे विधात्रे च द्वार्ययोः । ४ । प्रति दिशां वायवे दिशां च । ५मध्ये त्रीन् ब्रह्म- णोऽन्तरिक्षाय सूर्याय । ६ । विश्वेभ्यो देवेभ्यो विश्वेभ्यश्च भूतेभ्यस्तेषामुत्तरतः । ७ । उषसे भूनानां च पतये परम् । ८ । पितृभ्यः स्वधा नम इति दक्षिणतः । ९ । पात्रं निर्णिज्योत्तरा परस्यां दिशि निनयेन् ‘यक्ष्मैमत्ते, इति । १० । उद्धृत्यो ब्राह्मणागावनेज्य ददयात् 'हन्तते, इति । ११ । यथार्ह भिक्ष कानतिथीश्च सम्भ- जेरन् । १२ । बालज्येष्ठा गृह्या यथार्हमश्नीयः । १३ । पश्चात् गृहपतिः पत्नी च । १४ । पूर्वो वा . कापड २ कपिडका ।। गृहपतिः तस्मादुस्वादिष्टं गृहपतिः पूर्वोऽतिथि- भ्योऽश्नीयाद्, इति श्रुतेः । १५ । अहरहः स्वाहा कुर्यादन्नाभावे केनचिदाकाष्ठाद देवेभ्यः पितृभ्या भनुष्येभ्य श्चोदपात्रात् । १६ ॥९॥ कण्ठिका अब आगे पञ्चयज्ञ हैं । ९ । वैश्वदेव के अन से पर्युक्षण कर स्वाहा शब्द लगाकर ब्रह्मणे, प्रजापतये, गृह्याभ्यः, कश्य- पाय, अनुमतये, इन का होम करै ।। पर्जन्यायनमः, अयो नमः पृथिव्यै नमः ऐसे ३ बलि देवे । ३ धात्रे, विधात्रे, और द्वार्ययोः नमः कह बलि दे । ४ । पूर्वादि दिशाओं में दिशाओं को वायवे स्वाहा कह कर वलि धरे । ५ । मध्यमे ३ बलि ब्रह्मणे स्वा० । अन्तरिक्षाय स्वाहा सूर्याच स्वा०।६। उत्तर में विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा० विश्वेभ्यो भूतेभ्यः ।। उम से आगे उपसे० और भूतानाम् पतये स्वाहा नमः ।। पितृस्यः खधानमः ऐसे कह कर दक्षिया में। । । पात्र को. धोकर उत्तर की ओर उंधादे “ यत्मतत्ते " यह कहै । १० । हन्तते कहकर ब्राह्मण के भागे भोजन देवे । ११ । यथायोग्य भिक्षुकों को अतिथियों को भी देवे ।१२। घर के बालक बड़े सब यथायोग्य भोजन करें । १३ । फिर गृहपति और उसकी पती भी भोजन करें ।१४या पहले गृहपति खावे पीछे पत्नी खावे। क्योंकि अतिथि पूर्व जिमाकर पहिले गृहपति खावे यह श्रुत है ।१५॥ नित्य र होम करे । अन्न न होतो किसी समिधा से ही देवों मनुष्यों पितरों को जल के पात्र से प्रसन्न करै ३५ - पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्ये कण्डिका १० (अध्ययनारम्भ )। . अथासोऽध्यायोपाकर्म । १ । ओषधीनां प्रादुर्भावे श्रवणेन श्रावण्यां पौर्णमास्यार्थश्रा- वणस्य पञ्चमीहस्तेन वा ।२। आज्यभागा- विष्ट्वाऽऽज्याहुतीर्जुहोति । ३ । 'पृथिव्या अगये, इन्य ग्वेदे। ४ । अन्तरिक्षाय वायने, इति यजु- वैदे। ५ । 'दिवे सूर्याय, इति सामवेदे।६। दिग्भ्यश्रन्द्रमसे, इत्यथर्ववेदे। ७ । 'ब्रह्मणे छन्दो भ्यश्च, इति सर्वत्र । । प्रजापतये देवेभ्य ऋ- षिभ्यः श्रद्धायै मेधायै सदस्पतयेऽनमतये इति च । । एतदेवव्रतादेशन विसर्गेषु। १० । सदसस्पतिम् , इत्यक्षतघानास्त्रिः ११॥ सर्वेऽनु- पठेयुः । १२ । हुस्वाहुत्वादुम्बर्यस्तिस्रस्तिस्रः समिध आदध्युरा 'सपलाशा घृताक्ताः सा- वित्र्या । १६ । ब्रह्मचारिणश्चपूर्वकल्पेन । १४ । शनो भवन्तु,. इत्यक्षतधाना अखादन्तः ,प्रा. श्नीयः । १५ ।, दधिकाठणे, इति भक्षयेयुः १६ । स यावन्तं गणमिच्छे सावंतस्तिलाना- कर्षफलके जुहुयात् सावित्र्या 'शुक्र ज्योति इत्यनुवाकेनवाः। १७ । प्राशनान्ते प्रत्यङ्मुखे. .

- कायह२ कपिडका । १० । ६१ भ्य उपविष्टेभ्य ओंकारमुक्त्वा त्रिश्चसावित्रिम- ध्यायादीन् प्रचूयात् । १८ । ऋषिमुखानि बह- चानामाला पर्वाणि छन्दोगानामा२०। सूक्तान्य- थर्वणाम् ॥२१॥ सर्व जपन्ति 'सहनोऽस्तु सहनो- ऽवतु मह न इदं वीर्यवदस्तुब्रह्म। इन्द्रस्तद्वेद येन यथा नविद्विषामहे, इति । २२ । त्रिरात्रं नाधी- योरन् । २३ । लोमनखानामनिकन्सनम । २४ । एके प्रागुत्सर्गात् । २५ । कडिका १० भव पढ़ने का फर्म कहते है। प्रोधियों के उगने पर श्रवण नक्षत्र युक्त श्रावणी पूर्णिमा को वा श्रावण की पञ्चमी इस्त नक्षत्र से युक्तहो ।। भाज्यभागाहुति फरके आज्याहुति देता है।३ । पृधिव्यै स्वा० अग्नये स्वाहा यह ऋग्वेद पाठ में । ४ । अन्तरिक्षायस्वाहा वायवे स्वाहा यह यजुर्वेद पढ़ने 11 दिवेस्वा सूर्यायस्वाल यह सामवेद में 1६। 'दग्भ्यःस्वा०चन्द्र- मसे स्वाहा ऐसा अथर्व वेद में ब्रह्मणे स्वा० और छन्दोभ्यः स्वाहा यह सब वेदों में।। प्रजापतये । देवेभ्यः । ऋषिभ्यः। श्रद्धाये, मेधायै, सदसरूपतरे, अनुगतये ( चाहा लगाकर ) 11 ऐसे ही यज्ञोपवीत और सनायनों में फरें । १० । सद सस्पतिः ( य०३० । १३) मन्त्र से चावलों की खोल से प्राचार्य ३ पाहुति देवे । १९ । मन्त्र सब शिष्य साथ पढ़ें । २२ । होम कर करके गूलर की ३ । ३ समिथा पत्तों सहित ..

६२
पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये।
गीली घृत में भिगो कर गायत्री पढ़कर लेवें । १३ । प्राचार्य
के साथ २ ब्रह्मचारी भी होमें। १४ ।
कमिडका ११ ( अनध्याय प्रकरण )।
वातेऽमावास्याया सर्वानध्यायः ॥१। श्राद्वा-
शनेचोल्काऽवस्फर्जदुभूमिचलनारन्यत्पातेष्वृतु
सन्धिषुचा कालात उत्सृष्टेष्वनदर्शनेसर्वरूपे
चत्रिरात्रं त्रिसन्ध्यं वा । ३ । भुक्तवाऽऽर्द्रपाणि
रुदा के निशायासन्धिवेलयोरन्तःशवेग्रामेऽन्त
दिवाकीयै ।। धावतोऽभिशस्तपतितदर्शना-
श्वार्याभ्युदयेषु च तत्कालम् ।। नीहारे वादित्र
शब्द आर्त स्वने ग्रामान्ते श्मशाने श्वगर्दभोलूक
शृगालसामशब्देषु शिष्टाचरिते च तत्कालम।।
गुरौप्रेतेऽपोऽम्यवेयाद्. दशरात्रं चोपरमेत् । ७ ।
सतानूननिणि सब्रह्मचारिणिच त्रिरात्रम्काएक
रात्रम सब्रह्मचारिणि । अटुंषष्ठान मासानधी
त्योत्सृजेयुः।१०। अर्द्धसप्तमान्वा ।११। अथेमामृचं
जपन्ति 'उभा कवी युवा यो ना धर्मः परापतत् ।
परिसख्यस्य धर्मणो विसस्यानि विसृजामहे,
इति । १२॥ त्रिरात्रसहोण्य विपप्रतिष्ठेरन्।१३ ।
कण्डिका १९
अतिवायु चलते दिन और सब अमावसों को छुट्टी है ।११

- १ हाथ रहैं कामा २ कायाका १९ । श्राद्ध भोजन * उल्कापात बादल गर्जने पर भूमि कोप अग्नि पड़ौस में लगने पर ऋतु परिवर्तन के दिन १ । १ दिन छुट्टी हो । ९। वेद समामि और जब समस्त दिन मेघदर्शन न हो तीन रात या ३ सम्ध्या का अनध्याय हो 18। भोजन के पीछे : यावत मीने । जल में नौका पर बैठे रात में, सायं प्रातः नन्ध्या के समय, ग्राम में मुर्दा पड़ा हो ॥ या दिवा कीर्ति कोई चायटाल पास हो तब तक वेद न पढ़े । छुहो है। दौड़ते पाखण्डी, पतित के देखते हुवे । पाश्चर्य देखने के समय (नसी समय तक) वेदन पढ़े ॥ कुहरा, वर्षते वाजा बजते, हा हा कार में, सिवाने पर श्मशान में, कुत्ते गधे उल्लू गीदड़ बोलते में, सामवेद के, गाते समय और किसी सज्जन के आने पर उस समय न पड़े। ६ । गुरु के मरने पर जल में स्नान करे और १० दिन तक पठनबन्द करे ।। सोमयाजी ऋत्विज के और ब्रह्मचारी सहाध्यायी के मरने पर ३ दिन । । अ ब्रह्मचारी सहाध्यायी की भृत्यु पर १ दिनअनध्याय करे । साढ़े छः मास पढ़कर छुट्टी करे ( वेद की) १० था मास । १९ । फिर गुरु शिष्य साथ इस ऋचा को जमैं “ उभाकवी० । । १२ । तीन रात गुरुकुल में छुट्टी मनाकर अलग हो जावे । १३ । करिडका १२ ( उत्सर्ग कर्म) पौषस्य रोहिएयां मध्यमायां वाऽष्टकाया- मध्यायानुत्सुजेनन् । १ । उदकान्तं गत्वादि दै- वांश्छन्दासिवेदानुषोन् पुराणाचार्यान् संवत्सरं * जिस दिन बहुत श्रद्धा से प्रीति भोजादि हुवा हो उस उस दिन अधिक खाया जाता है ।

।
पारस्कर गृह्यसूत्रमण्ये
च सावधव पितृनाचार्यन स्वांश्चतर्पयेयुः ।।
सावित्री
चतुरनल्य
न्य विरता: स्म' इति प्रब्रूयुः ।।
क्षपणं प्ररचनं च पूर्वत्रन् । ४॥
कण्डिका १२
पौष के रोहिणी नक्षत्र में या मावस या अधमी को
पढ़ना छोड़ दे। १ । जलाशय पर जा के जल से देवतों
छन्दों, वेदों, ऋषियों, पुराणाचायौं, गन्धर्यो ,अन्यआचार्यों
संवत्सर को और महीनों को। पितरो-ऋतुओं को अपने
प्राचार्यों को भी तृप्त करें ।। गायत्री चार वार पढ़ कर
"विरताः स्म ऐसे कहै । दूसरे भाकर पूर्व के समान फिर
पढ़े तब अनध्याय करे ।४।
करिडका १३ (प्रथम हल योजन )
पुण्याहे लाङ्गलयोजन ज्येष्ठया वेन्द्रदेव-
त्यम्। १ ।' इन्द्रं पर्जन्यमश्विनौ मरुत उदला.
काश्यपस्वातिकारी_सीतानुमतिं दधना तण्डुले
गन्धरक्षतैरिष्ट्वाऽनडुहो मधुघृते प्राशयेत् । २।
'सीरायुञ्जन्ति, इति योजयेत् ।। 'शुनसुफालाः,
इति कृषेत्फालं बाऽऽलभेत निवाम्न्युपदेशाद्
वपनानुषङ्गाच्च ।। अग्रयमभिषिचयाकृष्टं तदाकृ-
या विस्थालीपाकस्य पूर्ववदेवता यजेदुभयो-
ाहियवयोः प्रवपन्त् पीताय चततेब्राह्म-
णभोजनम् ॥ ८॥

काग २ कमिडका १३ । १४ ६५ कडिका १३ पवित्र दिन हल जोते । इन्द्र देवता के ज्येष्ठा नक्षत्र में ।१ । इन्द्र, पर्जन्य, अश्विनी दोनों मरुत् उदल काश्यप, स्वातिकारी सीता और अनुमति को दही चावल सुगन्धों और जो से आहुति देकर अनुइह बैल को घृत मोठा घटावे ॥२॥ सीरा यजन्ति० य०१२ १६७ मन्त्र पढ़कर हल जोड़े।३ । शुन- फालाः य० १२ । ६ इस से फाली को ठीक करे या जोते ।४। या अग्नि में आहुति देते समय ही इन मन्त्रों को पढ़े हल जोड़ते जातते समय न पढ़े । ॥ बिना जतं खेत में हल जोते और उत्तम बेलको उस दिन पहिले पानी से साफ़ करले । ६ । जब २ धान जौ आदि बोने हो तभी पूर्व कहे देवों को स्थाली पाक से होम करे । और सीता यज्ञ में भी ।। फिर ब्राह्मण जिमाये । ८ ॥ १३ ॥ कगिटका १४ (श्रवणा कर्म) । अथातः अत्रणा कर्म ।११ श्रावशयां पी. मास्याम् ।२१ स्थालीपाकनपयित्वाऽक्षतधा- नाश्चैककपालं पुरोडाशंधानानां भूयसोः पिष्ट्वा- उज्यभागाविष्टाऽऽज्याहुनीजहोलि।३। अपश्वेत- पदा जहि पूर्वण चापरेण च सप्त-चवारुणीरिमा: प्रजा:सर्वावराजबान्धवैःस्वाहामानव श्वेतस्या- ध्याचाऽहिददर्श कञ्जन । श्वेनाय वैदाय नमः स्वाहा इति ॥ स्थालोपाकस्य जुहोति विष्णव, श्रवणाय,मावण्यै पौर्णमास्य, वर्षाभ्यश्चेति ।। + - ६६ पारस्कर गृह्यसूत्रमध्ये धानावन्तमिति धानानाम्धृसा क्तान् सक्तूतून सभ्यो जुहोति । आग्नेय पाण्डुपार्थिवाना सर्पाणामधि पतये स्वाहा, श्वेतवायवान्तरिक्षा- यासर्पाणामधिपतयेस्वाहा, इतिहा सर्वहुत मेक कपालं ध्रुवाय भौमाय स्वाहा' इति ।१० माशनान्ते साना- मेकदेश शून्यूप्योपनिष्कम्य बहिः शालायाः स्थण्डिलमुप- लिप्योल्कायां नियमाणायां माऽन्तरागमतपत्युक्त्वा वाग्यतः सर्पानवनेजयति । ११ । भाग्नेय पाएहुपार्थिवाना, सर्पाणा- मधिपतयेऽवननिक्षव, श्वेत वायवान्तरिक्षाणा साणामधि- पोऽवनेमिक्षव, अभिभूः सौर्यदिव्याना सर्पाणामधिपतेऽव- नेनिव'इति ॥१२॥ यथाश्वनिक्तं दोवघातसक्तून्त्सभ्यो बलि हरति । १३ । आग्नेय पाण्डपार्थिवाना, सर्माणा माधिपते एपते बलिा, श्वेतवानवान्तरिक्षाणा' सामधि- पत एषते बलिः, अभिभूः सौर्यदिव्याना सर्पाणामतिपत एषते बलिः' इति । १४ । अवनेज्य पूर्ववत् कतैः प्रलिखति । १५ । भाग्नेयपछि पार्थिवाना सर्याणामधिपते प्रलिखस्व श्वेतवायवान्तरिक्षाणासर्पाणामधिपते प्रलिखस्व, अभिभूः सौर्यदिव्या सांगामधिपते प्रलिखस्व' इति ।१६। अञ्ज- मानुलेपन सजश्चाजखानुलिम्पस स्रजोऽपिनास्त्र, इति १. सक्तुशेष स्थिण्डिले न्युप्योदपानेणोपनिनीयोपतिप्यते 'नमोस्तु सभ्यः, इति तिसृभिः । १८ । स यावत् कामयेत 'न सर्या अभ्युपेयुरिति. तावत् सन्ततयोदधारया निवेशनं त्रिः परिषिञ्चनपरीयात् ' अपश्वेत पदा जाहीति ' द्वाभ्याम् १८ । दाशूर्प प्रक्षाल्य प्रतक्ष्य प्रयच्छति । २० । द्वारदेणे . ।

कायत २ कपिछका १४ १५ मार्जयन्तः 'मापोहिष्ठा, इति तिसृभिः १२१। अनुगुप्तमेत सक्तुशेष निधाय ततोऽस्तमितेऽस्तमिते ऽग्निं परिचर्य दो पघात सत्तून् चम्पो बलिं हालेदाग्रहायरया ॥२तं हरन्तं नान्तरेण गच्छेयुः । २३ । दाचमनं प्रक्षाल्य निद- धाति ।२४. धानाः प्रानन्त्यस स्थूताः ।२५। ततो ब्राह्मण भोजनम् । २६ ॥ १४ ॥ करिडका १४ का भाषार्थ अब आगे श्रवणा कर्म है। श्रावणी पौर्णिमा में सस्थाली पाक पकाकर सत्तूरे जी की खील कुछ सत्तू जी के और पुरोडाश बनावे, दो भाज्य भाग होमे । आज्याहुति देता है।३। अपश्वेतपदा० ।। । नवैश्वेतस्याः।५। इन से आहुति देकर स्थालीपाक से होमे । विष्णवे, श्रवणाय, श्रावण्यै, पौर्णमास्यै, वर्षाभ्यः इत्यादि वाहान्त आहुति दे ।६। धानावन्तम् । य०२० । १९) से खीलों को होमे घी मिलाकर खत्तुओं से सपों के लिये होम करे । ८ । अग्नेय. आदि मन्त्रों से आहुति दे। । ध्रुवाय भौमाय स्वाहा कह कर कपाल में बनाये पुरोहाश को समस्त १ आहुति देवे । १० । संभव प्राशन कर कुछेक सत्तू छाज में घर बाहर आकर । शाला के बाहर चौतरी स्थंडिल को लीप कर जलती लकड़ी पर कार माअन्तररा गमत ऐसे कह चुप हो सो का जल देता है। इत्यादि कृत्य प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। अतः भाषार्थ नहीं किया। काण्डका १५ ( इन्द्रयज्ञ) प्रौष्ठपदामिन्द्रयज्ञः । १ । पायसमैन्द्र

६०
पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये
नपयित्वा पूपांश्चायूपैः स्तीवाज्यभागात्रि.
ट्वाऽज्याहुतीजुहोतीन्लायेन्द्रादाया अजायैकपदे-
हिर्बुध्न्याय प्रौष्ठपदास्यशेति १२ । प्राश नान्ते
मरुदयोधलि हरति अहुतादो मरुतः, इतिश्रुतेः
३। आश्वत्थेनु पलाशेषु 'मरुता ऽश्वत्थे तस्थुः,
इनि बचनात् ।। 'शुक्रज्योतिः इनि प्रतिमन्त्रम्
। विमुखेन च ६ सनसानामान्येषामेतानि,
इसि श्रुतेः । ८ । इन्द्र देवोः, इति जपति । ६ ।
ततो ब्राह्मण भोजनम् । १०।१५ ॥
१५ करिहका
भादों की पूर्णिमा को इन्द्रय होता है । १ । इन्द्र को
खीर और पूड़े पकाकर ४ पूहे अग्नि के चारों ओर धरे।
भाज्यभाग २ आहुति दे। इन्द्राय, इन्द्रायय, अजाय, एक
परे, अहिर्बुडन्याय, प्रौष्ठपदाभ्यः, स्वाहान्त कह आहुति रे।।
माशन के पीछे मरुतों को बलि देता है । अत खाने वाले
सरुत हैं यह श्रुति है । पीपल के पत्तों पर वलि दे । मरुत
(हवा ) पीएल पर रहता है ।४ शुक्र ज्योति इत्यादि मन्त्रों
से आहुति दे । ५ तथा विमुख से भी । ६ । मन से मन्त्र
पढ़कर । । यह मरत को नाम हैं यह श्रुति है। । "इन्द्र
देवी: इस मन्त्र को जपता है या फिर ब्राह्मण भोजन करावे १०
ण्डिला १६ (एषातक कर्म)
आश्वयुज्या पृषातकाः । १। पावसमैन्द्र

ge. काण्ड २ रिडका । १६.१७ नपयित्वा दधिमधु धृत्तमि पत्र जुहोतान्द्राये न्द्राण्या अश्विभ्यामाश्वयज्यै पौर्णमास्यै शरदे चेति । २ । प्राशनान्ते दधिपृषात झमञ्जनिा जुहोति ' जनं मे पूर्यता पूर्ण मे माव्यगान् स्वाहा इति । ३। दधिधुतमिन्नाममात्या अवेक्षन्त' आयाविन्द्रः , इत्यनुवाकेन । १ । माभिर्वत्सान्सथ्सृज्यता रात्रिमाग्रहायणी च। ५। ततो ब्राह्मणभोजनम् । ६॥ १६॥ १६ कपिटका आश्विन की पूर्णिमा का पषांतक यज्ञ है। १ । इन्द्र को खीर पकाकर दही शहद घी मिलाकर होमता है इन्द्राय इन्द्रायौ, अश्विभ्यां, पाश्वयुज्य,. पौर्णिमास्यै और शरदे, स्वाहा कह हो । प्राशनान्त में पृषाकत को दोनों हाथों से होने । जनं मे इस मन्त्र से । ३१ दही मधु घृत खीर में मिलाकर मित्रजन देखें । “मायात्विन्द्रः (२०२० । २७) इस अनुवाक से होभ करै।४ । उन्ल असौज की रात में माताओं (गौओं) से बछड़े मिलावे ।। फिर ब्रह्मभोज करें कमिडका १७ ( सीतायज्ञ ) अथ सीतायज्ञः ।। ब्रीहियवानां यत्र यत्र गजेत तन्मयस्थालीपाक नपयेत्।२। कामादीजानोऽन्यत्रापि ब्रीहियवयोरेवान्यतर स्थालीपाक, नपयेत् १३ । न पूर्वघोदित्त

.
पारस्कर गृहमन्त्र भाष्य
त्वात् सन्देहः । ४ । असम्भवाद्विनिवृत्तिः ।।
क्षेत्रस्यपुरस्तादुत्तरता वा शुधौ देशे कृष्टे फ-
खानुपरोधेन । ६ । ग्रामे बोमयसम्प्रयोगादवि
रोधात् । ७ १ यत्र पयिष्यन्नुपलिप्त उद्धतावो
क्षितेऽग्निमुपसमाधाय तन्मिर्दभैः स्तीत्वाऽऽ
ज्यभागा विष्टा पुज्याहुतीजहोति ।। पृथिवी
धीः प्रदिशो दिशो यस्मै शुभिरावृताः । तमि
हेन्द्र मुपतये शिवानः सन्तु हेतयः स्वाहा ॥
यन्मेकिञ्चिदुपेप्सितमस्मिन् कर्मणि वृत्रहन् ।
तन्मे सर्व , समृध्यतां जीवस: शरदः शतर्थ
स्वाहा। सम्पत्तिभूति मिर्वृष्टि ज्येष्ठय /श्रेष्ठय
ॐ श्रीः प्रजामिहारतु स्वाहा । यस्या उभावे
वैदिक लौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणाम् । इन्द्र
पत्नीमुपव्हये सीतार्थ सा मे त्वनपायिनी
भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा । अश्वावतीगामती.
सूतावती बिभर्ति या प्राणभृतो अतन्द्रिता ।
खलामालिनी मुर्वरामस्मिन् कर्मपयुपव्हये ध्रुवा
सा मे त्वन यायिनी भूयात् , सवाहेति ।
स्वालीपाकस्य जुहोति सीतायै जयायै शमायै
भूत्या इति । १०.मन्नवत् प्रदानमेकेषाम् ॥११॥

काराकनिएका । १७ - स्वाहाकारप्रदाना इति श्रुतेर्विनिवृत्तिः । १२ । स्तरणशेष कुशेषु सीतागोप्तृभ्योधलि हरत्ति पुरस्ताटु ये त आसते सुधन्वानो निषङ्गिणः । ते त्वा पुरस्ताद गोपायन्त्वप्रमत्ता छानपायिनो नम एषां करोम्यहं बलिमेस्या हरामीममिति । १३ । अथ दक्षिणोऽनिमिषा वर्मिण आसते तेत्वा दक्षिणते गोपायन्त्वप्रामत्ता अनपायिनो लम एषां करोम्यहं बलिमेभ्यो हरामीममिति । १४ । अथ पश्चात् आभुवः प्रभुको भूतिभूमिः पाणिः शुनङ् कुरिः । ते तवा पश्चाद् गोपा- यन्त्रप्रमत्ता अनपायिनो नम एषांकरोम्यह बलिमेभ्यो हरामीममिति। अत्तरता भीमा वायुसमा जवे ते त्वोत्तरतः क्षेत्रे खले गृहेऽध्वनि गोपायन्त्वप्रमत्ता अनपायिने नम एषां करो म्यहं बलिमेभ्यो हरामीममिति । १६ । प्रकृता- दन्यस्मादाज्यशेषेण च पूर्ववालि कर्म । १७ ॥ लियश्चापयजेरवाचरिसत्वात् ॥१८॥ स स्थिते कर्मणि ब्राह्मणान् भोजयेत् ब्राह्मणान् भोज- येत् । १६ ॥१७॥ इतिद्वित्तीय काण्डम् समाप्तम् ॥

७२ ঘৰৰ হুমুনিয়ায়। काधिका १७ अब सीता यज्ञ है। धान या जच मिल कर करे उमी का ( स्थालीपाक ) वटनोई में भात बनावे।२१ मई हो चाहे अन्य योगों में भी जी या शान किमी " भात अनावे ।३ । पहिले .कही कहा नहीं इस लिये सन्देह है. ।४। मनम्भव होने से संदेह नहीं। ५। खेत के पूर्व या नत्तर भाग में जहाँ शुद्ध हल मे जुते हुवे खेत को नि। न हो।६। या ग्राम यो खेड़े पर जहां खेत और ग्राम मिलेते हैं वहां पारे कोई विरोध न होने में। 9। जहां भात पकाना है वहां गोयर महो मे लीपकर ऊँची वेदी बना जब से खिड़को अग्नि स्यापन कर धान पाक में धान के तुषों वा पयाल, पाक जौ का हों तो जौ के पयाल कुशा वेदो के सब ओर विशावे। आज्यभागाहुति भाज्याहुति देता है। पृथिवी चौ० इत्यादि ५ मन्त्र जो मूल करिका में जमा हैं इनसे ५ घृत की आहुतिदे।। स्थाशीपाक की आहुति भागे लिखे अनुसारदे । सीतायै स्वाहा, प्रजायै स्वाहा, शनाये स्वाहा, भूत्यै स्वाहा, । १०१ कोई आचार्य कहते हैं स्वाहा भी न लगावे। ११ । स्वाहा शब्द से आहुति होती है यह श्रुति है इसलिये सूत्र १० को निवृत्ति है । १२ । अग्गि के पास विकी कुशों पर सीता रक्षकों को बलि देते हैं। “पुरस्तात" इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें । १३ । मिरदक्षिण में निमिषावर्य इस मन्त्रसे । १४ । फिरपश्चिम में "भुव प्रभुवो०॥ ५॥ फिर उत्तर में "भीमावायुसमा०५ इस मन्त्र से । १६ । प्राधान या जी छोड़ अन्य सुगंचित मिष्ट और घृत से पूर्ववत बलिकर्म करे 1१७ खियां भी बलिकर्म यज्ञकरें ऐसा प्राचारहै। १८कर्म 'समाप्तिपर ब्राह्मणों को सोजन करावे। ब्राह्मणों को भाजन करावे या दोवार उच्चारण ग्रन्थ की समाप्तिका चिन्ह है। ।

कापड कमिका ।। ३ - तीसरा काण्ड कण्डिका १ भमाहिताग्नेर्नवनाशनम् । १। नव स्थालीपाक अप- यित्वान्यभागाविष्ट्वाज्याहुती जुहोति 'शतायुधाय शत वीर्याय शतोतये अमिमासिपाहे । शतं यो नःशरदोजीजा. निन्द्रो नेपदति दुरितानि विश्वा स्वाहा। ये चत्वारः पथयो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिधी वियन्ति । तेषां येज्यानि- मजी तिमावहात् तस्मै नो देवाः परिधतेह सर्व स्वाहा,इति १२। स्थालीपाकस्याग्रयणदेवताभ्यो हुन्या जुहोति. खिष्ट. कृतेष' स्विष्टलग्ने अभि तह पृणीहि विश्वांश्च देवः पृतना अभिव्यक् । सुगन्नु पन्यां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मद्वेश न- रक 'मायुःखाहा, इति । ३ । अथ प्रामाति-'अग्निः प्रथमः प्राशातु सहि वेद यथा हविः । शिवा अस्मभ्यमोषधीः कृणोतु विश्वचर्षणिः । अदानः श्रेयः समनैष्ट देवास्त्वयाऽवसेन समशीमहित्वा । स नो मयोभूः पितवाविशस्त्र शं तोकाय तनुवे स्योगः, इति । ४ । अन्नवतीयया वा ५॥ अथ यावाना मेतमुत्यं मधुना संयुन यवं सरस्वत्या अधिवनाय चर्कषुः । इन्द्र आसोत सोर पतिः शतक्रतुः कीनाशा भासन मरुतः सुदानवः, इति । ६ । तेरो ब्राह्मण भोजनम् । ७ ॥१॥ कणिकका २ (आग्रहायगी कर्म) मार्गशीयों पौर्णमास्यामाग्रहायणीकर्म । १. स्याली- पाक अपयित्वा श्रवणावदाज्याहुती हुत्वाऽपरा जुहोति-यां जना प्रतिनन्दन्ति रानी धेनुमिवायतीम् । संवत्थरस्य यापत्नी सा नो अस्तु सुनङ्गली स्वाहा । संवत्सरस्य प्रतिमा या ता रात्रिमुपास्महे । प्रजा सुवोयाँ कृत्वा दीर्घमायुठपनवे स्वाहा। संवत्सराय परिवत्सरायेदावल्लरायेद्वत्सराय बस्स.

-- का सानाध्य राय कृणुता बहसमातियां वय सुमतौ यज्ञियानांज्यो गजीता नहताःस्याम स्वाहा। ग्रीमो हेमन्त उत्तनो वसन्तःशिवा वर्षा अलया: शरतः । तेषामृतूनां शत शारद्वानां निवासं एषा; भभये बसेम स्वाहेति । २ । स्यालीपाकस्य जुहेाति सामाय मृगशिरसे, मार्गशीष्य पौर्णमास्यै हेमन्ताय चेति । ३ । प्रा; शनान्ते सकुशेष भूपैन्युयोपनिष्क्रमणप्रभृत्यामानात मानान्त उत्सृष्टो बलिरित्याह । ५. ' पश्चादग्ने त्रस्तरमा. स्तीर्याहतं च बास बालुता पाहतवासः प्रत्यवरोहन्ति: दक्षिणतः स्वामी जायोरा यथाकनिष्ठमुत्तरतः । । दक्षि खतो ब्रह्माणमुपवेश्योत्तरत:उदपान शमीशाखासीतालोछाः मनो निधायाग्निमीक्षमाणो ज़पति अग्निवीरतमोऽयं. अगवत्तमः सहस्सातमः । सुवीयोग्या श्रेष्ठये दधातु नौ, इति ।७। पश्चादग्नेः पाञ्जमजलिं करोति । । दैवी नावनिति तिवृभिः स्नस्तरमारोष्ट्रन्ति । ९ । नलाणनामन्त्रयते 'झोमन्: प्रत्यवरोहाम, इति. १० वरमानुज्ञाताः , प्रत्यवरोहन्ति 'आर युःकोतिर्यशो बलभन्माद्यं प्रजाम्, इति । १९ । उपेता जपन्ति सुहेमन्तः सुवसन्तःलुग्रीष्मः प्रतिधीयतां नः शिवा नो वर्षा सन्तु शरदः सन्तुः नः शिवाः, इति । १२ । स्योना पथिवीनी. अध इति दक्षिणपावः मान शिरम: विशन्तिः। १३ । तपो त्तिष्ठन्ति । उदायुषा स्वायुगोपर्जन्य, य. या पृथिव्याः सप्तधामभिः, इति । १४ । एवं. द्विरपरं ब्रहमानुज्ञाताः । १५ । अंधः शयार चतुरो मासान् यो वा । १६ ॥२॥ कण्डिका ३. ( अष्टका कर्म) नहायर यास्तिस्तोरसकाः ॥ १॥ ऐन्द्री वैश्वदेवी प्राजापत्या पिश्यति ॥ अपूपमा संशा कथासंख्यम् ॥ ३ ॥ प्रथसाहका पाष्टरमाल ॥४. पाली पाक अपयित्या . Price:

काप कगिक भागाविधाज्यातीजुहोति नि* शतखबार उपयन्तिनिष्क. लि. समान सुप्रतिमुचनामाः । तू स्तन्वते स्वयः प्रजा. लतीने येछन्दसः परियत्ति मावती: RTET ज्योतिग्मती. प्रलिमुचनभोरात्री देवी सूर्यस्य व्रताधि .. विपश्यन्ति पराधी जायमाना कानारूपा मासुरख्या उपत्ये स्वाहा ॥ एफएका रुपांतध्यमामा जजानगर्भ महिमानमिदम् । सेल दस्यून् प्पलहन्त देवा हन्तासुराणाममवछची मिः स्वाहा ॥ अना- नुजा ननुजां मासकर्त तत्वदन्त्यन्विच्छएतत् । भूयाममंस्य सुमतौ यथायूयसन्या को अन्याभति मा प्रयुक्त स्वाहा । अभून्मम सुनती विश्ववेदा माटमसिंधानविदाद्वि गांधम् ॥ भूयासमस्य सुमतौ यथायूधमन्या वो अन्यामतिमा प्रयुक्त वाहा । पञ्चव्यष्टीरल पदोहा गां. पचनाली मृतधोपनुपी. पञ्चदिशः पञ्चदशेन्स्कृताः समानभूरिधिलोफलेक स्वाहा ॥ तस्य गर्भः प्रथमा व्यूषिष्पपामेका महिमा बिभर्ति पूर्यस्यैका घरति निष्कतेषु धर्मल्यैका सवितेकांनियाँ स्वाहा, या मथमा योध्छत् साधेवरभवद्यमे ॥ सानः पय- स्वती धुक्षोतरामुत्तरा:समा स्थाहा। शुभऋषभानभसा ज्योतियागाद् विश्वरूपा शबलीः प्रशिकोतुः । समानमर्थ स्वपश्यमाना विनंती जरामजर उप आगाः स्वाहा । तूनां पनी प्रथमेमसागादन्हां नेत्री जनित्री प्रजानाम् । एका सती बहुधोषोठ्युन्छस्याशी त्वं जरयलि सर्धमन्यात् स्वाहेति । ।। स्यालीपाकस्य जुहोति 'शान्ता पथिवी, शिवमन्तरिक्ष: शक्षो द्यौरक्षयं कृणोतुं । शम्तो दिशः प्रदिशादिशो नोऽहो राने कणुतं दीर्घमायुष्यश्नवस्वाहा भरपो मरीची परिपान्तु अधक्षो धाता समुंद्रों अपहन्तु पापम् । सूतं भविष्टदलतद धि- रामरतुने ब्रह्माभिगुप्तः सुरक्षितस्याः स्वाहा। विश्वेआदित्य :

१६ - . पारस्कर गृह्यसूत्रवाये। वसवश्च देवा रुगा गोदारो मरुतश्चसन्तु । ऊर्जप्रजाममृवं. दीर्घमायुः प्रजापतिर्मपि परमेष्ठी दधातु नः स्वाहेति । ६। अष्टकायै स्वाहेति । मध्यमा मवा ।। तस्यै वर्षा जुहोति 'वह बपां जातवेदः पितृभ्यः, इति । । श्वोउन्धष्टका स- वास पावसक्थिसव्याभ्यां परिषते पिराह पितृयजयत् ॥१॥ स्त्रीभ्यश्चोपसेचनं चकर्षु तुरया रार्थणेन घाजनानुलेपन स्त्रजच । ११ । प्राचार्यायान्तेवासिभ्यश्चानपत्येभ्य इन्छन् । १२ । मादया वर्षे च तुरीया शाकाष्टका ! १३ ॥३॥ * कपिहका ४ ( शालाकर्म ) अथातः शालाकर्म । १ । पुण्याहे शाला कारयेत् ।। सस्या अष्टमभिजुहोति 'अच्युताय भौमाय स्वाहा' इति स्तम्भमुच्छ्यति इमामु- च्छयामि भुवनस्य नाभिं बसोर्धारां प्रतरणी वसू. माम्। इहैव ध्रुवा निमिनामि शालां क्षेमे तिष्ठतु घृत्तमुक्षमाणा । अश्वावती गोमती सून्तान त्युच्छ्रशस्त महते सौभगाय आत्मा शिशुराक्र- न्दत्वा गावो धेनवो वाश्यमानाः। आत्या कुमार स्तरुण आवत्सा जगदैः सह । आस्वा परि नुतः कुम्भ आदनः कलशैरुप । क्षेमस्य परनी बृहती सुवामा रयिं नो धेहि सुभगे सुवीर्यम् । अश्वानद् गोमदूर्जस्त्रत् पर्णी वनस्पतेरिव । अ- भिनः पूर्यला ७ रयिरिदमनायो वमान इति * इस कपिडका के पाठ सस्कारविधि में भी कुछेक हैं।

... , पाण्ड ३ कगिटका । । चतुरः प्रपद्यते । । अभ्यन्तरसेऽग्निमुपस- माधाय दक्षिणता ब्रह्माणमुपवेश्योत्तरतो उद- पात्रं प्रतिष्ठापय स्थालीपापयित्वा निष्क्र- म्य द्वारसमीप स्थित्वा ब्रह्माणमामन्त्रयते 'ब्रह्मन् प्रधिशामि, इति ॥ ब्रह्मणानुज्ञाताः प्रवि शति 'चं प्रपदो शिवं प्रपद्य, इति ।६। आज्य , संस्कृन्य ' इहरतिः , इत्याज्याहुती हुत्वाऽ- परा जुहोति-' बास्तोपते प्रतिजानीह्यस्मान स्वावेशा अनमोवो भवानः। यत्त्वेमहे प्रतितलो जषस्त्र शं नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे स्वाहा । वास्तोष्पते प्रसरणो न एधि गयस्फानो गोभि- रश्वेभिरिन्दो । अजरासस्ते सख्ये स्याम पितेव पुत्रान् प्रति सन्नो जुषस्व ( शंनो भव द्विपदेशं चतुष्पदे स्वाहा ) वास्तापते शरमया स , मदा ते सक्षीमहिरण्मया गातुमत्या पाहि. क्षेम उत योगे बरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदान: स्वाहा । अमीवहा बास्तोपते विश्वारूपाण्या- विशन् । सखा सुशेव एधि नः स्वाहा, इति । स्थालीपाकस्य जुहोति ‘अग्निमिन्द्रं गृहस्पति se पोऽहं वास्तु पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये विश्वान् देवान पवहये । सरस्वती च बाजी च वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा । सर्पदेवजनान् स्सर्वान् हिमवन्त सुदर्शनम् । असुंश्च रुद्राना दित्यानीशानं जगदैः सह । एतान् सर्वान् प्र. मे दत वाजिनः स्वाहा । पूर्शन्ह अपरान्हं चोभीमध्यदिना सह । प्रदोषम रात्रिं च व्युष्टां देवी महापथाम्, एतान् तसर्वान् प्रपद्ये- ऽहं वास्तु मे दत्तवाजिनःस्वाहा । कर्तारं च विकारं विश्वकर्माणमोषधींश्च बनस्पतीन् । ए तान् सर्वान् प्रपद्येऽहं बास्तु मे दत्त वाजिनः चाहा । धातारं च विधातारं निधीनां च पति ॐ सह । एतान् सर्शन प्रपोऽहं वास्तु मे वाजिनः स्वाहा। स्योन ७ शिवमिदं वास्तु दत्तं ब्रह्मप्रजापती । सर्वाश्य देवताः स्वाहा, इति ।। प्राशनान्ते कास्येसम्भारानाप्योदुम्बर पलाशालि ससुराणि शाडलं गोमयं दधि घृतं कुशान् यवांश्वासनोपस्थानेषु प्रोक्षेत् ।। पूर्व सन्धावभिभृशति-नीश्च त्वा यशश्च पूर्वेस- न्धौ गोपायेताम् , इसि। १० । दक्षिणे सन्धाव- भिमृशति 'प्रज्ञश्च त्वा दक्षिणा च दक्षिणे सन्धी मधु .. कारोह ३ कागिढ़ का गोपायेताम् , इति । ११ । पश्चिमे सन्धावभि मुशति अन्नं च त्वा ब्राह्मण पश्चिमे सन्धौं गौपायेताम्, सि. १२ । उत्तरे सन्धावभिम- शसि 'ऊ च वा. सून्ता चौत्तरे सन्धौ गो. पायेलाम्, इति । १३ । निष्क्रम्य दिश उपतिष्ठते 'केता च मा सुकेता च पुरस्ताद गोपायेत्तामि- स्यमिकेताऽऽदित्यः सुकेता तो प्रपो ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पुरस्ताद गोपायतामिति १४ । अथ दक्षिणता.गोपायमानं न मा (रक्षमाणा) बदक्षिणतागोपायेतामिति अहवैगोपायमान रात्रो रक्षमाणा ते प्रपद्ये साभ्यां नमोऽस्तु ते मा दक्षिणता गोपायतामिति । १५॥ अथ पश्चात् दीदिविश्यमा जागृषिश्य पवाद गोपायेतामि- त्य वैदीदिविःप्राणो जागृविस्तौ प्रपो ता- भ्यां नमोऽस्तु तोमा पश्चाद गोपायेतामिति ।१६। अशोत्ततेऽस्वप्नच मानवाश्चोत्तरतांगों पाये तामिति चन्द्रमामा अस्वप्नो त्यह गोपाय मानरात्रीरक्षमाणाते प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तुते मादक्षिणता गोपायैतांबायुरन बंदणस्ता प्रप.

पार कर गद्यसूत्रभाष्ये बताभ्यां नमोस्तु तौमात्तरता गोपायेतामिति ॥१॥ निष्ठिना प्रपदाते धर्मस्थूणा राजश्रीस्तूप महोरात्रे द्वारफलके, इन्द्रस्य गृहा वसुमन्तो वरूथिनस्तानहं प्रपदो सह प्रजया पशुभिः सह यन्में किञ्चदस्त्युपहूनः सर्व गणः सखाय साधु संवृतः सांत्वाशालारिष्टवीरा गृहानः सन्तुसर्वशः इति ।१८। ततो ब्राह्मणभोजनम् ॥ १९ ॥ कगिडका ५ ( मणिकोवधान) अथातो मणिकावधानम् । १ । उत्तरपूर्वस्यां दिशियूप बदवदं खात्वा कुशानास्तीक्षितानरिष्टकांश्चान्यानि चाभि- मङ्गलानिच तस्मिन् मिनोति मणिकं 'समुद्रगोगसि' इति ।। अप आसिञ्चति-'आपो रेवती: क्षयथाहि वस्वः क्रतुंच भद्रं विथामृतंचरायश्वस्थस्थ पत्यस्य पत्नी सरस्वती तद् गृणते अयोधाद्' इति । ३ । नापोहिष्ठेति च तिसुभिः । ४ । ततो ब्राह्मणभो जनस् । ५ ॥ ५॥ ६ कण्डिका अथातः शीर्षरोगभेषजम् ॥१. पाणी प्रक्षाल्य बुवौ विमार्टि- चक्षुा श्रोत्राभ्यांगदान छुबुकादधिं । यक्ष्म शी- पश्य रराटाद् विधामीमम् । इति । २ । अर्द्धचेद् 'अव- भेक विरूपाक्ष श्वेतपक्षो महायशाः । अथा चित्रपक्ष शिरो मास्यामिताशीः इति । ३ । क्षेम्पो वेव भवति ।४। ७ करिडका उतूलपरिमहा १५ जीस्वपलोवविपायो स्वसूत्रमासिघ्या. - - कामा ३ करिखकर । १ पसलवित्रिः परिषिचन परीयात् 'परित्वा गिरेरहं परि मातुः परि । स्वजः ।। परिपित्रोश्च भात्रोण सख्येभ्यो विसुजाम्यहम् । उतूल परिनीति परिमी ढवगमिष्यसि इति ।। स यदि मान्याद् दावाग्निमुपसमाधाय घृतामाणि कुशेषतानि जुहुयात् परित्या हलनो हल निकृतेन्द्र वीरथः इन्द्रपाशेनछित्वा मां मुझाउथान्यमानयेदिति' । जेम्यो वेष भवति ॥४॥॥७॥ (करिखका) शूलगधः ।। स्वयं पशष्यः पुत्र्यो धन्यो यशस्य आयुष्यः ।२। औपासनमरण्य हत्वा नितान" साधयित्वा राष्ट्र पशुमालभेत । ३ । सायडम् ।। गौशब्दात् । ५ । वपा आपयित्वा स्थालीपाकमवदानानि च रुद्राय पामन्तरिक्षाय स्यालीपाकमिनारयवदानानि जुहोति मग्नये रुद्राय शर्वाय पशुपतय उनायाशनये भवाय महादेवायेशानायेति च ।६। बनस्पतिः । । विश्कदन्ते । दिग्व्याधारणम् । । ध्या- घारणान्तेपत्नीःसंयाजयन्तीन्द्राण्यै रुद्रायये शर्वारय भवान्या अग्निगृहपतिनिति लोहितंपलाशेषुकूर्चेषु गद्गाय सेनात्यो बलिं हरति 'यारते रुद्र पुरस्तार सेनास्ताभ्य एष बलिस्ता- म्परते नमः । यास्ते रुद्र दविणल:सेनास्ताम्य एप बलिस्तास्य स्ते नमः । यारले रुद्र पश्चात् सेनास्ताभ्य एष बलिस्वाभ्यस्ते ननः । यास्ते रुद्गोत्तरतः सेनास्ताभ्य एप बलिस्लाभ्यस्ते नमः । यास्ते रुद्रीपरिष्ट्रात से नास्ताम्य एष बलिस्ताम्यस्ते नमः । याश्ते रुद्रापल्तार सेनास्ताम्य एष बलिस्ता- भ्यस्ते नमः । इति । ११ । जवऽयं लोहिलिममग्नी प्रास्य- त्यधोवा लिखनन्ति । ११ । अनुवातं पशुमवस्याच्य सद्रूप. लिटते प्रथमोत्तमाभ्यां बानुबाकायाम् । १३ । नेतस्य पशो- पारस्कर गह्यसूत्रभाज्ये यांम" हरति । १४ । एतेनेव गोयज्ञो व्याख्यातः । १५.. पायसेमानर्थलुप्तः ॥१६॥ सस्य तुल्यत्रया गौर्दक्षिणाः ॥ १७॥८॥ करिडका : अथ वृषात्सर्गः । १. गोयशेन व्याख्यातः । २ । कार्ति- पयां पौर्णमास्या रेवत्यां वाऽश्वयुजस्य । ३ । मध्ये गवा सुसभिनुमग्निं करवाज्य संस्कृत्य 'हरतिः, इति षट् जुहोति प्रतिमन्त्र ।४। पूषा गा अन्वेतु नः पूषा रक्षतुसवंतः पूषा वाण मनोतु नः स्वाहा, इति पोष्णस्य जुहोति ! ॥ सदान् खपित्वैकवणं द्विवर्ण वा यो वा यूथं चादयति यं. वा यूथं छादयेद रोहितो वैव स्यात सर्वा रूपेतो जीववस्तायाः पस्विन्याः पुत्रा यूथे च समंवतमः स्यात् समलंकृत्य यूथे. मुख्याश्चतस्नोवत्सतर्यस्ताश्थालंकत्य "एतं युवान पतिं वो. ददामि तेन कीडन्ती चरथा प्रियेण । मानः साप्तं अनुषा सु- भगा रायस्पोषेण समिषा मदेम इत्येतयैवोस्तरम् । ६। जाभ्यस्य मभिमन्त्रयते भयोभूः, इत्यनुवाकशेषेण in सर्वासां. पयसिं पायल अपयित्वा ब्राह्मणान् भोजयेत् । ८। पशुम- प्येक कुर्वन्ति । तस्य शूलगवेन कल्पोव्याख्यातः। - १०:: ॥ - करिष्ठका १० : प्रथोदककर्म । सद्विवर्ष मेते. मातापिन्नोरांशोधम् ॥२॥ शोधमेवेसरेषाम् । ३ । एकरात्रं निरानंवा । ४ । शरीरमदग्ध्वाः निखशान्ति । ५। अन्तः सूतके घेदोत्थानादाशौच सूतकवत । ६ । नाचोदककर्म ।। द्विवर्षप्रति प्रेतमाश्मशानात सर्व अनुगज्युः । ८ । यमगाथां गायन्तो यमसूर च जपन्त इत्येके 1 या पेलो भूमिजोचणादिखमानमाहिताग्नेरोदकान्तस्य गमनात् ।। शालाग्निनादचन्त्येनमाहितश्चेत् । ११ ।। सूशी प्रामाग्निनेतरम् । १२ । संयुक्तं मैथुनं बोदकं याचेरन कायहइ करिहका १० -उदकं करिष्यामहे, इति १३ : 'कुरुध्वं मा चैवं पुनः इत्य- शतवर्ष मेते । १४ । कुरुध्वम इत्येवेतरस्मिन् । १५ । सबै तयोऽपोस्वंयस्यासप्तमात पुरुषाद् देशमाद्वा । १६ । स- माननामधाचे यावलम्बन्ध मनुस्मरेयुः ११७ । एकवलाप्रा- चीनावीतिनः । १८ । सव्यस्यानामिफयापनोद्य 'अपनःशी- शुचदंघम् इति । १० । दक्षिणामुखा निमन्जन्ति । २० । प्रेता 'योदक सकृत प्रसिचन्त्यचलिना 'असावेतत्ते उदफम्, इति 1:२१. उत्तीर्णा धोदेशे शाहवलवत्युपविष्टांसात्रैतानपव. देयुः । २२ ! मनवेक्षमाणा ग्राममायान्ति रीतिभूताः कनि: पूर्वाः । २३ । निवेशनद्वारे पिचभन्दपत्राणि विदश्याचभ्यो दकमग्नि, गोमयं; मौरसर्षपस्तिौलमालम्याश्मानमाक्रम्य स- विन्ति । २४ । त्रिरात्रं ब्रह्मचारिणोधः शायिमो न किचन की कुर्युर्नप्रकुर्वीरन् ।२५ कोत्या लब्ध्वा वा दिवैधाक्षमशी- युरमा सम् ।।२६ । प्रेताय पिण्डं दत्वावजनदानप्रत्यव- नेजनेषु नाम शाह २७॥ संयनये ता रात्रौं क्षीरोदके वि, हायसि निदध्युः प्रेतान हमाहि., इति । स । मिरात्र भावमाशौचम् । १६ । शरान भित्येके । ३० । न स्थाध्यायम... धीयोरन् । ३१ । नित्यानि निरन् वैतामहर्जम् । ३२ । शा- लाग्दो चैक । ३३ ! अन्य एतानि पुर्युः ॥ ३४ । प्रेलस्पर्शिनो पानं गमविशेयरानक्षत्रदर्शनाम् । ३५ । रानी चेदादित्यस्य i६ प्रवेशनादिखमानमितरैः । ३७ । पक्षं द्वौधागशौषम् । ३८ । साधार्ये वैशम् ।। मातामहयोश्च । ४० । स्त्रीणा बानत्तानाम् । ४१ मतान्नामितरे दु:रन् । ४३ साशय तें- पाम् ३ प्रोषित यायपाति रुतोदशाः कालशेष मासीरन् । ४४ । अतीतश्पेदेकरानं निरानं पा : अय- पास्कर - गृघासूनभाज्ये कामोदकान्युटिवश्वशुर खखिसम्मन्धि मातुलमागिनेयानाम् १४६ । प्रसानांच । ४७ । एकादश्यानयुग्मान् बालशान् भोजयित्वा मा अवत् । ४८ । मेतायोद्दिश्य गामप्येके मन्ति । । पिण्ड करणे प्रथमः पितृणां प्रेतः स्यात् पुत्रवांश्चेत् । ५० । नियतत चतुर्थः । ५१ । संवत्सरं पृथगेके । ५२ । न्यायस्तु न चतुर्थः पिपडो भवतीतिश्रुतेः ॥५३ । अहरहरमनस्मै मारल- गायोदकुम्भं च दद्यात् ।।५॥ पियडमध्येके निपुणन्ति ॥५५॥९० फशिवका' १९ पशुश्चेदाप्लाव्यागामणाग्नीन् परील्य पलाशशाखां निहन्ति । १। परिव्ययणोपाकरणनियोजनप्रोक्षगान्याता कुर्याद्यश्चान्यत् । ३ । परिपशव्ये हुस्सा लूठणीमपराः पञ्च ।। वाहरणं चाभिधारयेद् देवताचादिशेत् । ४ । उपाकरणनि- योजनप्रोक्षणेषु स्थालोपाके पैवम् शिवपा हुस्वावदाना व्यवति । ६ । सर्वाणि त्रीणि पञ्च वा।। स्यालीपाकमि- श्रापयवदानानि जुहोति । ८ । पश्वगंदक्षिणा । 6 । यद्देवते तदैवतं यजेत तस्मै च भागं कुर्यासं च ब्रूयाद् 'इममनुप्रापय, इति । २१ । नद्यन्तरे नावं कारयेझवा । १९ ॥ ११ ॥ 'कशिलका १२ (अधकीणिप्रायश्चित्त) अथातोऽवकीर्णिप्रायश्चितम् । १ । मावास्यायां चतु पणे गर्दभपशुमालभेत निर्गतिं पाकयज्ञेन यजेत।३। अप्ववदानहीनः । ४ । सूमो पशुपुरोडायनपणम् । ५। तां- धिं परिदधीत ६ जर्वबालाभित्येके ।। संवत्सरं भिक्षा- धर्य धरेत् स्वकर्म परिकीर्तयनामा अथापरमाज्याहुती जुहोति "कामावकीणोऽस्म्यवकोोल्मि काम कामाय स्वाहा । कामाभिदुग्धोत्भ्यभिदुग्धोऽस्मि काम कामाय स्वाहा" * दुग्यास्मि इत्यपिपाठः .

E - काग ३ कपिष्ठका १६.१४. इति ।। अषोतिष्ठते लम्मासिवन्तु मरुतः सिन्धः संसहस्पतिः। स मायमग्निः निधन्तु माया च धनेन व इति ।।२० । एतदेव मायश्चित्त । ५१ ॥१॥ (महिका) प्रथातः सभा प्रवेशनन् । १ सभामधेति 'सभाशिरसि ! वादि मासि विपिन नाति तस्य ते नमः, इति ।२ । अथ प्रविशलि सभा च मा समितिश्चोभे शाफ्लेर्दुहितरी सधे- तसोयोमानविद्यादुपमा नतिष्ठेत् ख घेतनो भवतु श सथे जने, इति । ३ । पर्षदमेत्य जपेत् 'अजिसूरहमागनं विराखंप्रतिवाच्यः । अस्याः पर्यदः ईशानः बहसी उदुष्टरो जनः , इति । ४ । स यादिमन्येत 'मुद्धोयस्' इति, तमसिम त्रयते 'या त एषा राया तनूमन्योः कोषस्य नाशनी । तो देवा ब्रमचारिणो दिनयन्तु सुमेधसः धौरहं पृथिवो चाह तो ते बोधं नयामसि गमश्वतर्यसहासी, इति ।। अर्थ यदिमन्येत दुग्धोऽयमिति तमभिमन्यते. 'तान्ते वाघमास्य आदत्ते. हृदय आधे । यन्त्र यन्त्र निहिता वाक् वा ततस्ततः प्राददे। यदहं ब्रवीमि तत्सत्यमधरीमतोद्यस्व छति ।। ऐतदेव वशीकरणम् । ॥१३॥ कपिठका १४ अथातो रथारोहण । १। युंक्तति. रथं सम्प्रेष्य इति प्रोक्त ताधिष्ठित्येत्य चके अभिशति । २। 'रथन्तर-: मसि' इति दक्षिणम् । ३ । हदसि, इत्युत्तरम् । ४ ३. 'वा- मदेव्यमसि, इति बरीन् । ५। हस्तेनोपस्थमभिशंति 'प्रती न्यङ्कायभितो रघं यो अक्षान्त वाताचमनुसंञ्चरन्सी । दूरेछेति रिन्द्रियावान् पतनिस्ते नोऽनयः पमयः पारयन्तु, इति । युमा - । मुहू - पारस्कर गृह्मसूत्रभाष्ये 'नमोमाणिचराय, इति दक्षिण धुधं प्राजति । ७ । अप्राप्य देवताः प्रज्यरोहेत् सम्प्रति ब्राह्मणान् मध्ये गा अभिक्रम्य पितृन् । ८ । न स्यीब्रह्मचारिणौ सारथी स्याताम् तमतीयाय अपेद् इह रतिरिहरमध्वम्,। १०. एके मारित्वह- रतिः इति घ , । ११ । र यदि दुर्बलो रथः स्यात् समा- स्थाय जपेद् ‘अर्थ धामाश्विना रथो मा दुर्गे मास्तरोषद् इति । १२१ ल यदि भस्यात् स्तन्ममुपस्पृश्य भूमिं वा जपेद एष वामश्विना रथो भा दुर्ग मा स्तरोरिषद् इति ।९३ । तस्य न काधनालिन रिष्टिर्भवति । १४ । यात्वाऽध्वानं वि- मुख्य रथं यवसादके दापयेद् एष, उहवाहनस्यानपन्हव, इति श्रुतेः । १५ ॥१४॥ कण्डिका १५ अथातो हस्त्यारोहणम् । १ । एत्य हस्तिनमभिमुशति हस्तियशसमसि हस्तिवर्चसमसि , इति । २॥ अथारोहति इन्द्रस्य त्वा वनगाभिनिष्ठामि स्वस्तिमा सम्पारय,इति ।३। एतेनैवाश्वारोहणं व्याख्यातम् । ४ । उष्ट्रमारोक्ष्यन्नभि मन्त्रयते 'स्वाष्ट्रोलित्वष्ट देवत्यः स्वस्ति मा उम्पारय, इति ।।रासभमारोपयनभिमन्यते 'शूद्रोऽसि शूगजन्माउग्नेयो वैद्विरेताः स्वस्ति मा सम्पराय, इति ॥६। पन्थानमभि मन्त्रयते 'नमोरुद्राय पथिषदे स्वस्ति मा सम्पारय, इति । ७ । चतुष्पचमभिमन्नयते 'नमोरुद्राय चतुष्पथमदे स्वस्ति मा सम्पारय, इति । नदीमुत्तरिष्यअभिमन्त्रयते नमोरु- दायाप्सुषदे खस्ति मा सम्पारय, इति है। गावरारोहयात- भिमन्यते सुनावम, इति । १० उत्तरियलसिमान्यतै त्रामाणम् , इति । १९ ।यनमभिमन्नयते ‘मभो सदाय म कारख। कपिडका ।१५। वनसदे स्वस्तिमा सम्पारय, इति । १२ । गिरीमभिमन्मयते नमोरुद्रायः गिरिषदे खास्ति' मा सम्पारय, इति । १३ । धर्मशान मभिमन्त्रयो नमो रुद्राय पिषदे स्वस्ति माम- पारय, इति ।१४। गोष्ठमभिमन्नयंते 'नमो सदाय शकल्पि गठन बस्ति मा सम्पारय.. इति । १५ । यन्त्र चा न्यत्रापि, नमो रुद्राय, इत्येव यात् । तद्गो ोबेद सर्वस्, इति तः । १६ : सिधाग्वधताऽभिमन्यते ‘सिगति न यजोसि नमस्ते अस्तु मानाहि सीः, इति ।१७१ स्तनयिनुमभिम- न्यते 'शिधा नो वर्षाः सन्तु शिवा नःसन्तुं हेतयः । शिवा मस्ताः सन्तु यास्त्व मुजति वृत्रहन्, इति । १८ । शिवां वाश्यमानामभिमन्त्रयते "शियो नाम, इलि । १९ । शकुनि- घाश्यनानमभिमन्त्रयते हिरण्यपर्ण शकुने देवानां प्रहितं गम । यमदूत नमस्ते ऽस्तु किन्या कारिणोद्रवीद्, इति ।० लक्षण्यं वृक्ष. मंभिमन्त्रयते 'मा त्वाशनिर्मा परशुर्मा बातो मा राजप्रेषितो दण्ड बङ्कराहते प्ररोहन्तु गिवातेत्या उभिवर्षतु । अस्मिन्टे सूलं साहि" सीन स्वरित से ज्स्तु वन- स्पते खस्ति मे ऽस्तु वनस्पते., इति । २१ । यदि किश्चिन सभेत् तत्प्रतिगृहातु 'धोरुत्वा ददातु पृथिवी स्वा प्रतिग- खपतु' इति सास्य न ददत्तः शीयले सूयचीच प्रतिरहीता भवति । २२। अथयद्योदनं लभेत्त तेव प्रतिगृह्य 'धौस्त्या, इति तस्य द्विःप्राश्नाति ब्रह्मात्वामानातुं ब्रह्मात्या मा. शनातु, इति । २३ । अध यदि मन्य लोत, तमतिमद्य द्यौ- रत्वा, इति तस्यन्त्रिः प्राशनाति ब्रह्मा त्यामानातु ब्रह्मा स्वा प्राश्नातु अलावा पिबतु, इति । २४ ६.१५ ॥ * नोट-काशीके छपे. पुस्तक में करिडका १५ सेही १६ भी मिलादी है। यही समाल कर दिया है। और १०:१५ के सही सूत्र हैं।

पारस्कर गृह्यसूत्रमाष्ये कविहका १६ अशालोपोत्याधीत्यानिराकरणं प्रतीक में विचक्षणं जिEE मे ना या यो पूरि शुश्रुधे गा स्व हापी अहं भि । हया मनासिब्रह्मणः प्रतिष्ठाममखि ब्रह्मा- দীপ্তি লকি ব্যারাকপন্থি মন্ত্রী ক यशायावा या पिदधामि वाचा स्वाऽपिदधासि खरकरण- काव्यौरमदन्यौष्ट्यग्रहणाधारणोच्चारणशक्तिर्मयि भवतु । प्राप्यायन्तु लेङ्गानि बाक्माणश्चक्षुः प्रोत्रं यशोबलम् । यन्भे, शुतमधीतं तन्मे मनसि तिष्ठतु तन्मे मनसि तिष्ठतु ।१३ ॥१६॥ इति पारसकर गृह्यसूत्रं समाप्तम् । परिशिष्टकगिका नथात वापी फूपतहागारामदेवतायतनपुष्करिण्याः प्रतिष्ठा- पनं व्याख्यास्यामः सादगयमापूर्यमाणपक्षे पुण्याहे तिथिवारकरणे अझनेष गुणान्वितेतन वारुणं यवमयं चरु अपयित्वात्यभागाविष्वाज्यहुतिर्नुहेाति “ त्यामग्नेसत्वको अशाइसंघरुण तत्वायाभि,येले शतमयाश्चाग्नउदुत्तममुरु, निराशा बसलस्योशम्भनमग्नेरनीकमिति दशर्च हुत्वारा स्थालीपालस्य जुहोत्यग्नये हा माय स्वाहा धरणाय लाहा एमााय स्वाहानाय खोहा भीमाय स्वाहा शतमतवे स्वाहा व्युमुथै स्वाहा स्वर्गाय स्वाहेति यथोक्त स्विष्टकत प्राशनाते जल पराणि क्षिप्वालंशन्य ३ गांतारयित्वापार्याय घर दस्वाक्षर्णवेष्टको वासा सिधे नुदक्षिणा । ततावालय मिनम ॥ ॥ इति शम्

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पारस्करभाषाभाष्य
८ में मधुपर्क में पशुवध पर और पृ० २६
पुंसवत में कूर्म पित्त पर पृष्ठ और ३३ के नोट
देखने योग्य हैं।
१९६६ पर अन्नप्राशन में सूत्र से१२तक प्रक्षिप्त
प्रतीत होते हैं। कारण बहीं लिख दिया है।
काण्ड ३ समस्त ही हमने बारीक टाइप
से छापा है । उस में प्रक्षिप्तांश बहुत अधिक
प्रतीत हुवाहै.जैसा नीचे की सूचीसे पता लगेगा।
-काण्ड३
नव-प्राशन
वृषोत्सर्ग
२ाग्रहायणी
१०. उदक करें
अष्टं का कर्म
११ पशुकल्प
शाला कर्म,
१२-अवकीर्ती
मणिकावधान
१६:समा प्रवेश
६ शिर रोग का इल १५ रप पर बैठना
वश कर
९५ हाथो पर पड़ना
८ भूल गवं
१६ पड़ी हुमा न भूलमा
वाणी कप प्रतिष्ठा परिचित
..

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१-प्राचीन ग्रंथों में अन्त में पाठ दोबार पढ़ने का र
सो पारस्कर सूत्र में दूसरे काण्ड के अन्त में कगिहका १७
ब्राह्मणान भोजयेत, ब्राह्मणान् भोजयेत् ऐसे दोवार है, ऐ।
पूर्व काण्ड के अन्त में नहीं है इससे भी कार ममाप्ति न
'किन्तु ग्रंथ ममाप्ति सीही प्रतीत होती है।
२-पूर्वग्रंथों में २ भाग या ४ भागहुवा करतेथे ३ भाग बहु
कम होते थे ॥
३-इस समय में दोही कागहों के कर्मकाण्ड का प्रचार
जाय तो
बहुत लाभ है तीसरे का भाषाभाष्य छपाने से गौर
की हानि होती है वृद्धि नहीं ॥
४-चस का भाषानुवाद
'भी ने इसी लिये नहीं किया
कि मांस से यज्ञ या पक्षुवध हमारे पौराणिक पड़ो
भी कलिवर्जित कहकर उसे करना धर्म नहीं मानते हैं तो
'कलियुगी भापा में उस भाग का अर्थ ही क्यो करने की
आवश्यकता है।
५-हमने मूल इस लिये छापा दिया है,कि मूल बना रहे।
तो नजाने कोई बात इस से भी उत्तम निकल आवे , इची
लिये उसे बारीक टाइप में छपाया है, ग्रन्थ से अगल नहीं
किया है।
६-मंत्रों फाअर्थ अधिकतर संस्कार चन्द्रिका में भी छपचुका
है संक्षेप लिखा मंत्रार्थभी समझा नहीं जाताई विस्तार से
लिखने योग्य समय नहीं है, दूमरेसंस्करंग में यत्न करूंगा
लांटकरसबकाअर्थवहींकरकेछपा
+
मति

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Parskar Grahmsutram

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Parskar Grahmsutram
File name
Parskar Grahmsutram
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Citation
1111
Published
2009/09
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322473
Barcode
99999990252943.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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