Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Anubhav Prakash
Front matter
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काय ४८ जिसको
अनुभवप्रकाश।
tecar
श्रीश्रीउमारामजीमहाराजकृत ।
श्रीश्रीसुरवरामजीमहाराजक शिष्य ब्रह्मनिष्ठ
माधु श्रीअचलूरामजीमहागजन
सशोधन किया।
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और
श्रीश्रीनवलनाथजीमहाराजकी आज्ञासे
बीकानेरनिवासी महेमरी चिन्नाणी श्रेष्ठी जनायीक पुत्र संठ
चम्पालाल तथा किसनगोपालने मुमुक्षुओकेलाभार्थ
चंबई में
मुद्रित कराय प्रगट किया ।
सरत् १९६५, नगर १८०
Mint 1 1 1
Shri lue ligar Stem Pr
---
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PresenterrerCEPTICERFEEKEExcertersses प्रस्तावना। 1-AN acceserseases, सोरठा-आप्तवाक्य प्रमाण, नहि कारण भाषा सस्कृत । सुनत करत तम हाण, अचलूराम ब्रह्मविद्रह्म ॥ समस्त सजनारो आनन्दपवा निवेदन करनेमे आताहै कि, उस सञ्चिदानन्द आनन्दकन्द परमात्माको अनेसन प्रणामहै । जिसने वेदान्त सिद्वान्त चास्यरूपसे हमारा मायाजाल काटकर उद्धार किया और आनन्दमय अपना निजस्थान दर- शायाहै। ऐसे दयावान् प्रभुकी दयालुताका हम क्या वर्णन कर ? जिसने चौरासी- लक्ष योनियोंमें भ्रमतेहुए हमलोगाको मनुष्य शरीर दिया। और हमारा अज्ञानान्ध कार नष्ट करने केलिये सूयप्रकाशवत् वेदान्तशास्त्र प्रगट किया । वही परमात्मारूपसे प्रादुर्भाव श्री १०८ श्रीवनानाथजी महाराजके परम शिष्य श्रीअवधूत महात्मा वैगगवान् यदे अनुभवी श्रीवेदान्तसिद्वान्तके जाननेवाले ब्रह्मनिष्ठ वरिष्ठ श्रीउमा- रामजी महाराजकृत यह "अनुभवप्रकाश" ग्रथ सर्वोपरि उत्तम बनाहै । इसमे सपूण वेदान्तशास्त्रका सार प्रगटहै। यह प्रथ सपूर्ण जीवाका उद्धार करने वालाहे इसम सदेह नहीं । इसमें विशेष करके गानके अनेक रागरागोणयाम पद बनायेहै । इस ग्रन्थके उत्तरभागम २४ अगमा एक ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ गुरुमुपद्वारा पढनेसे अथवा श्रवण करनेसे मानो तत्कालही मोक्षका भागी होताहै। इस शास्त्रका सगोधन श्रीश्रीसुखरामजी महाराजके शिष्य ब्रह्मनिष्ठ श्रीअचलूरामजी महाराजने बड़े परिश्रमसे कियाहै। भ्रमवशात् कही भूल रहगई होतो सज्जन महात्मा सुधारके बॉच । यह ग्रन्थ १००० एक हजार पुस्तक परमाथ- लिये मुफ्त दिये जाँयगे। सज्जनाकाऊपाभिलाषी- चम्पालाल विन्नाणी, meetSEASE SSSSSSSSESSESASUR चीकानेर RAAFeatiastanRastraRitrakasRARRESOR
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॥ॐ॥ अथ श्रीउमारामजीमहाराजकृतवाणियोंकी अनुक्रमणिका। विपय । | पृष्ठाक १ २ . २ ३ ६ साधो भाई सत्री संगत सुख पाया साधो भाई भेदी भेद निहारा साधो भाई सत्गुरू सैन अथाई साधो भाई गुरू चेतन ब्रह्म रहवा अर्ज मेरी सॉभलो सही विगत मेरी सॉभलो सही लख्या सोई भवपार साधो भाई परस्या महर निवाज प्यारी ये अधर सधरकी सैन प्यारी ये सोजी सुरत विचार प्यारी ये ले सत्गुरूकी सार प्यारीये सत्कुं लिया पिछाण प्यारी ये ले सत्की प्रतीत प्यारी ये सत्गुरू शब्द पिछाण आदू राय योगका योई सॉभलो संत समझरी बाता साधो भाई निराकार दरसाया । - १२ (२) अनुभवप्रकाशकी-अनुनमणिका । पिपर पृष्ठाक १२ १३ .. १४ १४ १५ १६ १७ १७ १८ साधो भाई निर्गण खेल हमारा साधो भाई रहवो सन्मुख गुरू सामा साधो भाई सत्शन्द प्रकाशा साधो भाई निरत धरे निरखाणा साधो भाई समझकिया एकसारा साधो भाई समझे गुरुका वाला सुरत मेरी पीवसुं मिली सुरत मेरी पीवसू लगी सुरत मेरी दमसे लगीरे एली सधर सत् श्यामकू लख्यारे : पायाहे जी सतगुरू श्यामका अव में जाण्या है जी अब मोय दीस्या है जी दाता तेरी कुदरतपर कुरवाणी तेरी गम अस्थ कहाणी लस्या मन केवल ब्रह्माअपार ... या विधि सुरल मिली पीतमम् । मत गुर मेदरम लसानिया मदा मत परया निज नेणा अनामी या नदि जाने शनिग्भेद लगगाया मान निज आतमसा योही . . १८ १९ ... २१ २१ २३ २३ २३ २३ २५ अनुभवप्रकाशकी--अनुक्रमणिका। (३) विपय पृष्ठाक. २६ .. २८ २८ ... होरी अनुभव जग्या विवेक होरी अनुभव आप अथाप फकीरी यह मेहरम तत्सार फकीरी निराधारकी सार फकीरी हद बेहदके बार फकीरी रहत निचिन्त सबूर फकीरी सधर भरया भरपूर फकीरी भाख्या अखत बयान . साधो भाई नाम रूप सब कूरा. साधो भाई निज निरभेद हमारा साधो भाई आतम अचल अभंगा साधो भाई यह विवेक तत्सारा मनरे याविध तोय समझाऊं साधो भाई परमसिद्धान्त ये ज्ञाना साधो भाई अविगत भेद अथाया साधो भाई आनन्द तीनूं विचारा साधो भाई चेतन जाणण हारा साधो भाई शुद्ध स्वरूप हमारा. सत्गुरू सत् समजावीया ये निश्चय निरलेप है अस्त अज्ञ जड पर हरो आत्मज्ञानी ओलखे ३१ ३१ ३२ Bરે ३६ . ३७ ३७ ३८ (२) अनुभवप्रकाशकी-अनुक्रमणिका । पिपर पृष्ठाक १२ ૧૨ १४ १४ १५ १५ १६ १७ १७ १८ . साधो भाई निर्गण खेल हमारा .. | साधो भाई रहवो सन्मुख गुरू सामा साधो भाई सत्रशब्द प्रकाशा साधो भाई निरत धरे निरखाणा साधो भाई समझकिया एकसारा साधो भाई समझे गुरुका वाला सुरत मेरी पीवसुं मिली सुरत मेरी पीवसूं लगी सुरत मेरी दमसे लगीरे एली सधर सत् श्यामकुँलख्यारे पायाहे जी सतगुरू श्यामका . अव में जाण्या है जी अब मोय दीस्या है जी दाता तेरी कुदरतपर कुम्वाणी तेरी गम अस्थ कहाणी लग्या मन केवल ब्रह्मअपार या निधि सुरत मिली पीतम मत् गुरमेहग्म लसाविया मदा मत् परस्या निज नेणा अनामी पत्त्या नदि जाने म निम्मंद लगाया माननिन आतमसा योदी १८ १९ . .. . . .. . २० २० २१ २१ ૨૨ २३ २३ ૨2 ૨૧ .
अनुभवप्रकाशकी--अनुक्रमणिका। (३) विपय. पृष्ठाक. .. ... २७ २८ ૨૮ होरी अनुभव जग्या विवेक होरी अनुभव आप अथाप फकीरी यह मेहरम तत्सार फकीरी निराधारकी सार फकीरी हद बेहदके बार फकीरी रहत निचिन्त सबूर फकीरी सधर भरया भरपूर फकीरी भाख्या अखत बयान . साधो भाई नाम रूप सब कूरा . . साधो भाई निज निरभेद हमारा साधो भाई आतम अचल अभंगा साधो भाई यह विवेक ततसारा मनरे याविध तोय समझाऊं साधो भाई परमसिद्धान्त ये ज्ञाना साधो भाई अविगत भेद अथाया साधो भाई आनन्द तीनूं विचारा साधो भाई चेतन जाणण हारा साधो भाई शुद्ध स्वरूप हमारा. | सत् गुरू सत् समजावीया ये निश्चय निरलेप है अस्त अज्ञ जड पर हरो आत्मज्ञानी ओलखे ३० ३१ ३१ ३२ . ३४ ३६ ३८ --
(४)
अनुभवप्रकाशकी-अनुक्रमणिका ।
विषय
पृष्ठाक
वेद संत प्रगट कह
योई जाण शुद्ध स्वरूपकी
यो निश्चै सिद्धान्तका
योंही ज्ञान सबतेंपरे
चेत मुसाफिर बेगोई चाले
सतगुरू मेहरम निगे कर सारा
ब्रह्म विचार यहीहै भाया
वेद हमारी शाखा भाखे
साधो भाई सत् निश्चै उरधारा
साधो भाई योही बात परवाणा
साधो भाई आतम ज्ञान बताया
साधो भाई रमझ समझ लख गाया
साधो भाई सो जोगी निरभोई
साधो भाई खोजी खोज विचारे
साधो भाई चेतन ब्रह्मलखाना
साधो भाई तज दुरमत गम गोई
साधो भाई बेरंग कह्या न जाई
साधो भाई निर्गुण ब्रह्म अथागा...
साधो भाई नीर बूंद सम जोई
साधो भाई ज्यूं मुख मुकर दिखारा
साधो भाई आतम अखंड अनासी
ऐसी विध समझारे साधो भाई
अनुभौ सोजीरे साधो भाई
४५
४८
अनुभवमकाशकी-अनुक्रमणिका । (५) पृष्ठाक २ २८ विषय, आत्मज्ञान योईरे साधो भाई खोजी खोज खबर कर खोज्या दृश्यादृश्यं अदृश्य न जामें ऐसी रमझ समझ कह दाखी मेरी सूझ परख कहि पूरण सत् गुरू मेहर करी मेरे पर पूरण सैन योही तत्सारा खोजी खोज खोजीया पूरा ऐसी विगत समझ कह राखी निर्गुण ब्रह्म निरतसं निरख्या आतम परम प्रकाश सजाती अगम अगोचर अलख अजाती ऐसी रमझ लखे संत कोई विरला संत लखे आ सोजी भरम भूतकू जाण्या ऐसा निश्चै सूझ केवल म्हारी आपोई आप अवर नहि कोई साधो भाई निर्गुणकी गम याई साधो भाई लख गुरूगम गमगाया साधो भाई सत् निश्चै कहुँ बैणा साधो भाई ज्ञान अज्ञान बताया साधो भाई कर मेहरम दरसाई साधो भाई पागी पारख लाया.. ६० ६१ ... ६२ ६३ ૬૯ ६२ १६) अनुभसा-अनुमणिरा। विषण पर ६६ ទី២ ६७ ६८ ७१ सायो भाई ममझे सन्त मुजाणा साधो भाई सब समर कर देग... साधो भाई यह केवल निग्धाग साधो भाई ब्राम विचार अपारा . साधो भाई आतम अमय कहाणी साधो भाई योही मेदग्म महाझीणा सायो भाई योई सिद्धान्त कहाई जग मिथ्या दग्स्यारे केवल स्वरूप थायारे दूजा नाहिरे रहता आप असे सत गुरूकी सेना बड़ी विशाल . ऐसा दे हुवा अन्दर जानभाण त्रिगुण अतीत अव्यय अपार सार निज आपणी सारी अगमकी वारता भाखीरे साधो कहणके वार आसोजी रे साधो ब्रह्मकी सूझ ना योई रे साधो ब्रह्मका ज्ञान हे योई रे साधो चेतनका स्वाल है योई रे साधो सिद्धान्तका छाण है योई रे साधो सूझ सत् गुरूजीरी आईए निज अनुभवकी पारखा यो निरणा निज स्वरूपका ७३ ৩৪ ७४ . ១ ७६ ৩৩ ७८ १८० ८१ अनुभवप्रकाशकी-अनक्रमणिका । पृष्ठाक विपय साधो भाई हमहीं अपार अचाई ८२ साधो भाई पलटा अजब बताया ८३ साधो भाई निराकार निरधारा ८३ साधो भाई अनिरवाच मम सोई ८४ साधो भाई निज प्रत्यक्ष परवाणा ८४ साधो भाई आतम ज्ञान बताया साधो भाई यह अनुभौ निरभोजी साधो भाई योई ज्ञान निरवाणा साधो भाई चेतन जाणणहारा साधो भाई यह निश्चै निरदाई साधो भाई सच्चिदानन्द सुखदाई ८९ साधो भाई आचेतनकी सोजी .. ८९ साधो भाई आ चेतनकी जाणा ९० साधो भाई चेतन अमित अथाई इति श्रीउमारामजीमहाराजकृतवाणियोंकी अनुक्रमणिकासमाप्ता। अथ श्रीअनुभवप्रकाशकी अनुक्रमणिका । ८८ अंगसख्या छन्दसख्या पृष्ठाक १गुरू महिमाको अंग . २गुरूशन्दको अंग ३ ज्ञानभक्ति मिश्रितकोअंग ४ सर्वज्ञ चेतावणीको अंग ९३ ९८ १०० १०३ १४ . १८ (८) अनुभवप्रकाशकी-अनुक्रमणिका अगसख्या छन्दसल्या. पृष्ठाक १२. ५ गुरुज्ञान औषधिको अंग *१०५ ६संचितक्रिया प्रारब्धको अग ७ स्वार्थ परमार्थको अंग १०८ ८ अनुभवप्रकाश निरूपण १०९ ९ वाचक अरु लक्षको अग ११ १११ १० रहणी कहणीको अंग ११ साधू असाधुको अंग "२६ ११५ १२ साधू लक्षणको अंग ११८ १३ वैरागको अंग ११९ १४ निश्चै फकीरीको अंग १२ १२१ १५ साचको अंग १२३ १६रामनामको अंग ૧૨૬ १७ विद्या अविद्याको अंग १२६ १८ ब्रह्मज्ञानको अग १२ १२८ १९ मनको अंग १८ १३० २० स्वरूप ज्ञान उपदेशकोअंग २५ २१ निज ज्ञानको अंग १३६ २२ निज विवेकको अग २३ अनात्माखंडन आत्मापरमात्माएकताको अंग.. ६ १४२ २४ स्वरूप अनुभवको अग २३ १४३ श्रीअचलूरामजीमहाराजकृत छन्द ६ इति अनुभवप्रकाशकीअनुक्रमणिका समाप्ता। .
ॐ
॥श्रीपरमात्मने नमः॥
अथ श्रीउमारामजी महाराजकृत-
वाणियाँप्रारम्भः।
23
गावणकेपद । राग आसावरी।
साधो भाई सत्री संगत सुखपाया ॥ भयाआनद कल्पना तूटी।
रहता गांव बसाया ॥टेर॥
सत्की संगतका भाव समाया ॥ साच करे ठहराया ॥
सत्की संगतमें सिमरथ सूज्या ॥ ज्यांसू ध्यान लगाया ॥१॥
सत्की संगतमें साच है केवल ॥ दूर किया विप दाया ॥
साहबसेती जाय मिलाणा ॥ जन्म मरण नहि आया ॥२॥
सत्की संगत परसे कोइ साचा॥ जिनही साच पठाया॥
कर सत्संग चले कुसंगत ॥ ज्यांके हात न आया ॥३॥
सत्की संगत जगमें तत्सारा ॥ अगम निगम जश गाया ॥
कर सत्संग अनन्त उधरिया ॥ सत्में जाय समाया ॥४॥
(२) अनुभवप्रकाश। वनानाथ गुरु मिल्या व्यापारी ॥ सौदा सही पजाया ॥ उमाराम सत्भाव पिछाण्या। अभै अमाप अथाया ॥५॥१॥ राग आसावरी। साधो भाई भेदी भेद निहारा ॥ जाणी जाण लिया निरधोके ॥ अब डर नहीं लिगारा ॥ टेर॥ गुरूकी शोभा गाय सुणाऊं ।। गुरू है अगम अपारा ॥ अगम निगम गात यूं गुरुकू । साधक किया विचारा ॥१॥ गुरूअविगत अविनासी एकरस ॥ गुरूका सकल पसारा ॥ सबमें छता रहे निरबंधण ॥अकथ जाण किरतारा ॥२॥ गुरूकी महर भई जिन ऊपर । कारज सवी सुधारा ॥ भक्ति दान अभै पद सूंप्या ॥ ऐसा गुरू दातारा ॥३॥ सुर नर असुर भेप सब वरणे ॥ महिमा अगम अपारा ॥ गुरूविन मुक्तिहुवे नहिं किसकी ॥ ये साचा इतबारा ॥४॥ वनानाथ गुरू चेतन देवा ॥ सबकू जाणण हारा ॥ उमाराम गुरू पद परस्या ॥आवागवण निवारा ॥६॥२॥ राग आसावरी। साधो भाई सत्गुरू सैन अथाई॥जोसमझ्या शिपसैनसतगुरूकी जिनकू गुरू दरसाई ॥ टर॥ सत्गुरू चेतन ब्रह्म अनादी ॥ जिन सब सृष्टि देखाई ॥ हे सब माय सबी ते न्यारा ॥ रहता अलख सदाई ॥३॥ जैस नभ सवही घट, मठमें ।। व्यापक बाहर माई ॥
गापणके पद। यूं सतगुरू पूरण गया न आया॥ निरवंधण निज सांई ॥२॥ सत्गुरू शोभा कथी न जावे ॥ कहण सुणणमें नाहिं ॥ ज्यूं गूंगा गुड भीतर जाणे ॥ यूं शिष्य समझ्या माहिं ॥३॥ सत्गुरू अनन्त कोट हंस तान्या ॥ पलमें पार लॅचाई ॥ वनानाथ गुरू अवर्ण थाया। उमाराम गम पाई ॥४॥३॥ राग आसावरी। साधो भाई गुरूचेतन ब्रह्म रहवा ।। सारा सन्त वेद ऐसेई कह, परख विचार भखेवा ॥ टेर॥ ठीका ठीक पजाया सौदा ॥ साचे सत् गुरू देवा ॥ भव सिन्धुसूं किया किनारे ॥ आप मैई कर लेवा ॥ १ आगेतूं आगे गुरू रहता ॥ महा निकालस भेवा ॥ शेप सदा आवे नहिं जावे ॥ ऐसा गुरु पर सेवा ।। २ ।। गुरू पूरा परमेश्वर सांई ॥ नहि कोइ संग बिछेवा ॥ स्थाई कलम बिना गुरू सिमरथ ॥ कैई रचना रच देवा ॥ ३॥ सकल सृष्टिका सत्गुरूमालक ॥ गुरू बिना हिले न केवा ॥ गरक भरया खलकमें गहरा ॥ भाव अभाव न गेवा ॥४ गुरूका भेद लखे शिष्य साचा॥ जिनकू गुरू दरसेवा साच विना रीझे नहिं सत्गुरू ॥ अनन्त उपाय करेवा ॥६॥ वनानाथ गुरू अदल गुसांई ॥ असल मुद्दा वक्सेवा ॥ उमाराम पाया गुरू महर्म ॥ सत् चिद् आनन्द अखेवा॥६॥४॥ रागएली। अर्ज मेरी सॉभलो सई । सिमर्थ बांय संभाय ॥टेर॥
अनुभवप्रकाश। तेरी बात मो दुर्बलकी सुणो वीनती ॥ कृपाला कृपाल ॥ बांय गृरयांकी लाज तुमई ॥ तुमई सन्मुख नाल ।। १ ।। तेरे बिना दूजा नहिं जाणू। ये सुमती दो भाल ॥ याहीकी फरियाद पुकारूं ॥ यही बक्स गोपाल ॥२॥ तेरेसे मैं सन्त कहवाया ॥ झंव्या तेरी चाल ॥ मैं शरणागत शरण तुमारी ॥ काटो सबी जंजाल ॥३॥ हाथ तेरेही ॥ तेरेनूं तेरेट् रे पाल ॥ दूजी कोउ कारी नहि लागे ॥ तुमही करो रुखवाल ॥४॥ हिरणाकुस रावणसा जोधा ॥ दिया पलकमे गाल ॥ भक्तां काज लिया अवतारा | स्याय करी तत्काल ॥५॥ असुर, संहारण अन्तरयामी ॥ भूपाई भूपाल ॥ देवनका देवा तूं दाता ॥ सिमर्थ बडा दयाल ॥६॥ सुर नर असुर गात सनकादिक ॥ गावे शेप पैंयाल ॥ महिमा अगमजायनहि बरणी ॥ तेरी गती निराल ॥ ७ ॥ ग्रायन गाय सकू गुण तेरा॥ कहांलग कर निहाल ॥ उमाराम अर्ज कह दाखी ॥ तेराही विडद सँभाला।८॥५॥ राग एली। विगत मेरी सांभलो सही॥यो दाता सत्गुरू दीन दयालोटेर। हूं मारी कांई अर्ज गुदारूं ॥ मोमे गुना हजार ॥ तेरे तो आसान कहीजे ॥ छिनमे लेत उवार ।। १ ॥ आश्रम वर्ण साध संसारी ॥ सवियनको दातार तेरे बिना सेवक क्यास्वामी ॥ कबहु न उतरे पार ॥२॥ ।
गावणके पद। हार॥ जती सती धर्मी अरु कर्मी ॥ तारया अनन्त अपार फेर कोई स्वामी संसारी ॥ तोय ते होत उद्धार ॥ ३ ॥ गुण अवगुण क्रिया नहिं देखे ॥ सबी सुधारे कार ॥ महर निवाज महरका मालक ॥ यह साहब तेरी सार ॥४॥ जोर जर्व किसका नहिं चाले ॥ बडा बडा गया हार॥ सचिदआनन्दअलखअजूणी ॥ थारो काई वरणू विस्तार ॥५॥ तेरा पार आवे नहिं कवहूं ॥तूं सुखसिन्धु जहार ॥ जितनी प्यास जितांकी पूरे ॥ तूं सिमरथ निराधार ॥ ६॥ उमारामकी योही अर्ज है ।। सुणियो सिरजण जन्म जन्म तुमरी सगराखो ॥ योही अर्ज किरतार ॥ ७॥६॥ रागएली। लख्या सोई भवपार ॥ गुरूजीके महरमकू ॥टेर ॥ मेरा भाव लग्या सत्गुरूसूं ॥ जमका वार॥ दुरमतका जहॉ दाव न लागे ॥ सत्गुरू परम उद्धार ॥१॥ दुरमत कामक्रोध मद कहिये। लोभ अरु अहंकार ॥ सत्गुरू शब्द धूस मांयेलागी॥ भागा सबी विकार ॥२॥ गुरूका राज सदा सब ऊपर ॥ अब डर नहीं लिगार ॥ भागा भर्म कर्म नहिं लागे ॥ सत्गुरू लिया उबार ॥३॥ जिन शिष्यभाव गृह्या ।। सतगुरूका ले पूरा इतबार ।। तत्व तारलिया गुरू ताकू ॥ येही गुरूका उपकार ॥ ४॥ वनानाथ गुरूअलख अजन्मा ।। सुधा अद्वैत अपार ॥ उमाराम पाय निज गुरुकू॥ भाख्या वचन विचार ॥९॥७॥ लगे न (६) अनुभवप्रकाश। रागसारंग । साधोभाई परस्यामहरनिवाज ॥ मेरो सब सन्त सुधारणकाज॥ धिन गुरू तेरा महरम अज्ञाद॥ मुझकूभेललियाकर यादाटेर॥ सत्गुरू मेरा सिर धणी ॥ शिरपर धरिया हात ॥ बहुत जुगनकी भूल भर्मना ॥ मेटी तिर्गुणरात ॥१॥ अगम अगोचर अधरकी ॥ सही बताई वात ॥ है नही के मध्य विराजे ॥ चेतन ब्रह्म अजात ॥२॥ उण सिमरथ सारी रची॥भेद अनन्ता सब घट माये भरयाएकसारा॥ नहिं आवे नहिं जात ॥३॥ अति विमल नित निरमला ॥ नहिं कोई दूर संगात ॥ तुरीयाअतीत लगे नाह कहणी॥असंग अनामी रैइयात ॥४॥ सो महरम सन्त जाणियां ॥ अन्दरमें ओलखात ॥ वनानाथ सत्गुरूजीरा चेरा ॥ उमाराम लख गात ॥५॥ ८॥ सात।। राग मंगल। धरी॥ प्यारी ये अधर सधरकी सैन । समझ घटमें सुरत समाया भेव ॥ देव गुरू गमगरी ॥१॥ नाभी. किया निहार ॥ निगे सबकी करी॥ पांचूं शस्त्र वांध ॥ पश्चिमदिशकू फुरी ॥२॥ सोझ॥ सुपमणा निरखरी॥ अखंड जोत प्रकाश ॥ त्रिवेणी तट भरी ॥३॥ गगन मंडल गुंझार ॥ राग अनहद धूरी। इडा पिंगला
गावणके पद।
(७)
॥
मन पायो विश्राम ॥ खुली मुक्त गली ॥४॥
सुन सायर भरपूर । वास वेगम पुरी॥
रहत अटल अविनाश ॥राय ओ परापरी ॥५॥
वनानाथ गुरू देव ॥ दया मुझपर करी
उमाराम पिछाण ॥ मिल्यो मोहन हरी ॥६॥९॥
रागमंगल।
प्यारी ये सोझी सुरत विचार ॥ चली कर सार है ॥
| लिया अगम अस्थान ॥ मिल्यो करतार है ॥ १ ॥
दर्शन दिया दयाल ॥ भया दुख दूर है ॥
सतसायरमें सहज ॥ सदा भरपूर है ॥ २॥
| अविगत अखे अजीत ॥ जीत नहिं हार है ॥
रहता
ब्रह्म नचिन्त
नचिन्त ॥ पुरुष नहीं नार है ॥ ३ ॥
लखे सन्त यह सैन ॥ ज्याकू इतबार है ॥
उमाराम विचार ॥कही निज सार है ॥४॥१०॥
राग मंगल।
प्यारीये ले सतगुरूकी सार ॥
धार कर निहार है ॥
देखत पेखत सैन ॥ समझ भव पार है ॥ १ ॥
तूटत छूटत फन्द ॥ निरत
निबंध है ॥
खंडत नहीं अखंड ॥ लगे नहि दण्ड है ॥२॥
जात न पांत न भांत ॥ रूप
रूप नहिं रंगहै ॥
गम नहीं अगम अखेद ॥ अटल अणभंग है ॥ ३ ॥
(८) अनुभवप्रकाश। ॥ नैन बैन बिन सैन ॥ अगोचर जाण है ॥ उमाराम लख जाण ॥ कही परवाण है॥४॥११॥ रागमंगल। प्यारिये सतकू लिया पिछाण ॥ जाण मन जकिया ॥ परगत पांच पचीस ॥ जहां सब थकिया ॥ १ ॥ सन्त सदा निरलेप ॥ लेप नहीं कोइये ॥ निराकार निरदोप ॥ अखे निरभोइये ॥२॥ नभ घट मठमें रहत ॥ अन्दर अरु बार है यूं आतम सब मांय ॥ सबीते पार हैं ॥३॥ सत् स्वरूप निरवाण ॥ थया इक सारहै ॥ उमाराम साइ जाण ॥किया निरधारहै ॥४॥१२॥ राग मंगल। प्यारी ये ले सत्की प्रतीत ॥ जहां मन आणियां ॥ नित्यानित्य विचार ॥ असत् सत् छाणियां ॥ १॥ माया अनित्य असार ॥ इन्हीमें ॥ नित आतम सत् आप ॥ अखंड अद्वैत है ॥२॥ अस्त अरु जड़ क्लेश ॥ माया सब मेटिया ॥ सत् चेतन आनन्द ॥ सोई निज भेटिया ॥३॥ उमाराम शुद्ध स्वरूप ॥ परमप्रकाश ॥ नाह कोई भावाभाव ॥ निरास न आस है ॥॥१३॥ है
गावणके पद।
(९)
रागमंगल।
प्यारी येसत्गुरू शब्द पिछाण॥ ढील मत लाइये ॥
यह निश्चय उरधार ॥ कर्म कट जाइये ॥ १ ॥
सत्गुरू शब्द अगाध ॥ गाध नहिं
गाध नहिं आइये ॥
नित चेतन सुखरूप ॥ गुरू परसाइये ॥ २ ॥
निश्चल अति अडोल ॥ अपरमें थाइये ॥
सवमे
अखेल ॥ सदा निरदाइये ॥३॥
सब सन्ता कह्या अपार ॥ वेद यूं गाइये ॥
लख्या जिनीकू ठाय
॥ कह्या नहिं जाइये ॥४॥
वनानाथ
देव ॥ विगत समझाइये ॥
उमाराम लीवी जाण ॥ भर्म नहिं काइये ॥५॥१४॥
राग कानडा।
आदू रायजोगका योई।अगम अरु निगम साख कह दोई॥टेर॥
सत्गुरू मोपर कृपा कीजे ॥ पारब्रह्मकी सोजी दीजे ॥
भूला बहुत जुगनका प्यासा ॥ दया करे पूरो गुरू आशा॥१॥
सत्गुरू दया करी अब ऐसी ॥ शब्द साधना कहिहै जैसी ॥
सोहं शब्द दिया तत् सारा ॥ सो निश्चै हम उरमें धारा ॥२॥
ज्यामे सुरत धरी एक सारा ॥ हरदम सास उस्वास संभारा ।।
मन पवनाका बेला बाधा अरध उरध जुगती कर साधा॥३॥
द्वादश खोज सरोधे लाया ॥ इडा पिंगला दो, धाया ॥
चन्द सूर एकण घर लाया ॥सुपमणके घर हंस मिलाया॥४॥
(१०) अनुभवप्रकाश। ऐसे चढ्या त्रिकूटी घाटी । अखंड जोत जले विन वाटी। निरभै जाय गगन घर लिया ।। बैठ गगन पर डंका दिया ॥५॥ सुंन मांय सहज मिल्यासुख धाराज्यांतोजीव पीव नहि न्यारा।। सधर सरोवर है इक सारा ॥ परसे गुरूमुख संत पियारा॥६॥ वनानाथ गुरू सार बताई ॥ निश्चै जाण परमपद पाई॥ उमाराम भरम नहिं काई॥ कर महरम आसोजी गाई॥७॥१६॥ पद राग॥ सॉभलो सन्त समझरी वातां ॥ हरी आप अदेख रहवाया । सत्गुरू जाण दीवी महा झीणी॥ कर निरणे दरसाया ॥टेर ॥ अणघड अलख निरञ्जन देवा ॥ नहीं जहां जगत पसारा ।। आपोई आप अलोगत स्वामी ॥ नहिं कोइ खिलका धारा॥१॥ आदू खेल अमावस थरप्या॥ सुरत सरोधे लाया ॥ सास उस्वास लग्या मन मेरा। समझ करे ठहराया ॥२॥ पडवा पहल पिछाणी काया॥ कार जगाया देखत आप आपके भीतर ॥ दुरमत दूर हटाया ॥३॥ बीजम बीज हुवा प्रकाशा । चेतन तार लगाया ॥ रोजो रोज सवाया दरसे ॥ आप अकाशबहवाया ॥४॥ तीजम तंत मिल्या त्रिवेणा ॥ भलकत जोत अखंडा ॥ हद बेहद लग हुवा उजाला ॥ सब संशयकू खंडा ॥५॥ चौथम सुरत निरत मिल चाली।। गगना रास रचाया ॥ आदू पीव रीझायो सुन्दर ॥ अनहद नाद घुराया ॥६॥ पंचम आतमदेव परसिया ॥ सुन घर शहर बसाया ॥ ॥
गावणके पद। (१३ बेरंग वृछ अमर फल लागा ॥ अण रागी फल पाया ॥७॥ छठम छूट गई सब आशा ॥ हंस स्वतंत्र थाया ॥ पाया भेद भजन कर पूरा ॥ ममता सबी मिटाया॥८॥ सातम सागा भया समझका ॥ सहज अमरपुर आया। निरभै हंस भया निरबंधण ।। अब कोई काल न खाया॥९॥ आठम अधर तख्त पर आसणा। ब्रह्म रहत बिन काया ॥ सूरा होय मिल्या महरमले ॥ पिंड ब्रह्मंडनहिं दाया।।१०॥ नमी नाथ निरंजन निरख्या ॥ आप निगेसूं न्यारा ॥ | रहता अलख सबीमें व्यापक ॥ खोजी किया विचारा ॥११॥ दशम दशमें देव निराला ॥ आळं पहर निरदाया ॥ | भरिया अधर अलोगत पूरण। जा घर सन्त रहवाया ॥१२॥ इग्यारस एकू एक सारा ॥ उरे परे नहिं न्यारा ॥ पागी परख लिया परवाणा ॥ नहिं कोई जीतनहारा ॥१३॥ बारस भेद रह्या न बेदा ॥ बाहर भीतर वासा ॥ आतम देवा रहत अभेवा ॥ जरा मरण नहिं त्रासा ॥१४॥ तेरसमें तेरा नहिं मेरा ॥ हूं तूं रह्या न कोई अलख पुरुपकी अवरण महिमा॥ अद्वितीय है सोई ॥१५॥ चवदश चाय रही नहिं काई ॥ नित निरवाण अचाई ॥ क्रिया करम केश नजामें ॥ भेदाभेद न काई ॥ १६ ॥ पूनम नित पूरणहै निरमल ॥ सो अनुभव कर दीशा ।। सोले कला समझ महाज्ञानी । भाखी विसवा वीशा ॥ १७॥ वनानाथ गुरू चेतन सांई। अखे स्वरूप अपारा॥ उमाराम सोई सत थाया ।। सर्वा अतीत विचारा॥१८॥१६ ॥
(१२)
अनुभवप्रकाश
राग आसा।
साधो भाई निराकार दरसाया ॥ वा घरकी मैं कहूं सेनाणी॥
सन्त समझलो भाया ॥टेर ।
विन मुख बोल सुण्या विन सरवण ॥ विन पग पंथ चलाया ।
विन नैणां निरख्यो निरबंधण। यूं कर सत् घर आया ॥१॥
वो सत् नगर दिप्टन दूरा ॥ सो अविनाशी थाया।
धर बिन अधर रह्याबिन आसे॥ निरालेप बिन काया ॥२॥
हैअलख पुरुप आत्म नितचेतन॥ नहिं थावर जंगम माया ।।
सोनहिं बिछड्या नहीं मिलाणा॥ नहिं कोई गयान आया॥३॥
नहिं कोई दूर नजीकन न्यारा॥ नहिं भारी हलकाया ॥
उमाराम है ज्यूँका त्यूही ॥ अवरण आप अजाया ॥१७॥
राग आसा ।
साधोभाई निर्गुण खेल हमारा ॥ पट दरसण साधू सब सुणजो॥
अन अक्षर किरतारा ॥ टेर॥
कर बिन राग छत्तीसूं छेडी ॥ पग विन खेल सुधारा ॥
आंधे अगम अगोचर देख्या ।। बहरे सुण्या चौधारा ॥१॥
मीन पपील राय पंछीका ॥ तीनो खोज विचारा ॥
दरस्या गैब गुरूका ज्ञाना ॥ प्रगट गुप्त मंझारा ॥ २ ॥
अखे अजाती सबका साथी॥ बेरंग ब्रह्म विचारा ॥
चेतन थया एकरस आदू ॥ निरालंब निराकारा ॥ ३ ॥
वोध स्वरूप आतमा केवल ॥ नाम रूपसूं न्यारा ॥
उमाराम सुझ अनुभवकी ॥ प्रगट कही पुकारा ॥४॥१८॥
राग आसा। साधो भाई रैवोसन्मुख गुरूसामा।काटे जन्म जन्मका फंदा । अवर धरो नाहिं जामा ॥ टेरे॥ धूपन छांय दिष्ट नहिं पहुँचे ॥ अगम ब्रह्म विसरामा ॥ बिन सव गुरू कोई पारन पावे। ज्यां नहिं सिंवरण कामा ॥१॥ सत् गुरू ज्ञान लखाया केवल ॥ निर्गुण अलख अनामा ॥ भई पिछाण भर्म सब भागा॥ पाया सधर मुकामा ॥२॥ नित निरवाण ब्रह्म वे नामी॥ धरण गगन विन गामा ॥ समझ्या सन्त लखे वा घरकू ॥ भृला नर अभिमाना ॥३॥ वनानाथ सत् गुरू दी सोजी॥ तत्व ज्ञान निज धामा । उमाराम आत्म लखी चेतन ॥ क्रिया थकत तमामा॥४॥१९॥ राग आसा। साधो भाई सत शब्द प्रकासा ॥ निश्चै ओलख लिया निज तत्व अनुभव कया विलासा ॥टेर ॥ पांच तत्वकू प्रगट परख्या ॥ तोड्या पचीसू पासा ॥ तीन गुणाका तिमिर मिटाया ॥ शुद्ध स्वरूप माही वासा ॥१॥ शुद्ध स्वरूप सुतेप्रकाशी ॥ नहीं ज्यां तम प्रकाशा ॥ आदिअरु अन्तमध्य नहिवाको। नहिं ज्यांआशनिरासा ॥२॥ सेवा सुरत निरत नहि पहुंचे॥ नही वहां श्वास उश्वासा ॥ अरघ अरु ऊरध दशंदिश नाहीं ॥ नित चेतन इकरासा ॥ ३ ॥ वा कारण कारज नहिं कोई ॥ नहि कोई नाश अनासा॥
(१४)
अनुभवप्रकाश
उमाराम आतम शुद्ध चेतन ॥ नहिं स्वामी नहिंदासा॥४॥२०॥
राग आसा।
साधोभाई निरतधरे निरखाणा॥ सतशब्द लख कही पारखा ॥
परसे सन्त सुजाणा ॥ टेर॥
सत्गुरू शब्द दिया निरवाणा ॥ ज्या संग किया पियाणा॥
मनका मता सहजमें खूटा ॥ करता लहर मिटाणा ॥१॥
अनुभौ चस्मा खुल्या अगमका ॥ वे रंग ब्रह्म पिछाणा ॥
मिटगई त्रास आस नहि अंदर ॥ सत्सायर गलताणा ॥२॥
तामे करम धरम नहिं धरता ॥ नहिं गहला नहिं सेंणा ॥
अकल अरूप सकलमें व्यापक।। गुरूमुख ज्ञानी जाणा ॥३॥
सो शुद्ध आतम सदा अचाई ॥ ज्यां कोई लाभ न हाणा ॥
उमाराम सोई पद पाया ॥ आदू अमर ठिकाणा ॥ ४ ॥२१॥
राग आसा।
साधो भाईसमझ कियाएकसाराकटगया करम भरम सबभागा
दरस्या देव अपारा ॥ टेर॥
सत्गुरू सात द्वीप नवखंडपर ॥ सब घट किया पसारा॥
जिनपर कृपा सो घट तारे ॥ यह गुरूका उपकारा ॥१॥
होय सन्मुख सत्गुरू संगलागा ॥ मिटगया अन्दर अॅधारा ॥
'सूज्या साम सकलसूं न्यारा ॥ दुरस किया दीदारा ॥२॥
बाहर भीतर सधर सरोवर ।। नहिं दुश्मन नाह प्यारा॥
कहतां वण आवे नहि काई ॥ ज्यू गूंगे गुड विचारा ॥३॥
गावणके पद। (१५) वनानाथ गुरू सत् चिद्आनन्द ॥ नित निर्गुण निराकारा ।। उमाराम सोई निरवाणी ॥ नहिं कोई द्वैत लिगारा॥४॥२२॥ राग आसा। साधो भाई समझे गुरूका बाला ॥ समझ्या दरसे आतम चेतन।। कटे करमका जाला ॥टेर॥ फुरी अदेख देखले आया॥होय चेतन किया चाला ॥ क्रिया करममे भूल बंधाणा ॥ धरचा भरमका पाला॥१॥ चित्तमन बुध हंकारा कहिये ॥ यह चारूं वह बाला ॥ बांध स्वरूप स्वप्नहोय भरम्या ॥ चल्यो दे घर ताला ॥२॥ पागी मिल्या परमगुरू पूरा ॥ उलटा किया निहाला ॥ अपणा खोज लिया आपहीमें ।। खुली दिष्ट घर भाला ॥३॥ अधर आधार अखंड लिव लागी॥ आप अदेख उजाला ॥ ज्यांका था तांही मन ॥सो पद कहिये निराला ॥४॥ आदि न॥ नहिं फुरण अफूरण जंजाला।। ॥पूरण अरथ संभाल॥ ६॥२३॥ एली। ॥सब दुख दिया विसार ॥टेर॥ ॥ मती लगावो वार ॥ ॥ पारब्रह्म पिया सार ॥ १॥ ॥ दातारी दातार गेना ॥ वा पीतमकू धार ॥२॥ दजी दुलहन कम्बखतका फकीर इस बार किसी दिन यहा निकल जा की चुलबुला चटका देता है दवाई ॥ ७ ॥ दिन मेरेटी जज वानी हल चुकी बाधा पिन्त सीना पडा ढीला || रा वचपनमे पिड मंग जोही रखने पतलाः ।। ६ नटरी गुणसे मुनो जताई नहीं इसकी जो सारी अगर छोई तो इंजर नहीं हो तो जगसे डर ।। कर किस्को जिगर जाने कमाई मेरी सी सब दूर हसाद ॥५॥ ॥
(१६)
अनुभवप्रकाश
सदा अथाग थाग नहिं वाको ॥ केवल आनन्द अपार ।।
आदि अनादि अखंड अविनासी॥ ऐसा वो करतार ॥३॥
वा पीतमके मिली मोहोले ॥ तूटा सवी विकार ।।
कृपा भई कटी सब किया। अमर पायो भरतार ।। ४॥
विपकी वास तजे हकारा॥ पीतमस्र इतबार
या विध जाण लीवि सोइ जीता। यह विवेक तत्सार ॥५॥
याविधकू जाणे नहिं जबलग ।। सरे नहीं कोउ कार ॥
दूजा काज अकाज कहीजे । जुग जुग मिटे न हार ॥६॥
अगम निगम शोभा कहथाकी। सब कहणीके पार ॥
उमाराम सूरा सन्तपरसे ॥ पीतमको दीदार ॥७॥२४॥
राग एली।
सुरत मेरी पीयेसू लगी। सत् गुरू दिया लखाय ।। टेर।
मेरा पीव सकलका साहब ॥ सब पर रखे महर ॥
सबकी जाण उनी चाले ॥रहता आपहि ठहर ॥ १ ॥
वो साहब सारामें सामल ॥ सबहीमें रहे गहर ॥
है सब माये रह निर आसे ॥ आप अनामी अलहर ॥२॥
वो पीतम मेरेकू दरस्या ॥ मिट्या हमारा जहेर ॥
निज सुख रूप सदा एक सारा॥ लीया सुरता हेर ॥३॥
वा पीतमकी खबर न जिनकू ॥ मिटे नहीं दुख लहेर ॥
और खबरतें काज न सीझे ।। अगम निगम कह टेर ॥४॥
कोटक भाण रोमकी शोभा ॥ तां नहि सांझ सवेर ॥
अकथ उजाला कह्या न जावे ॥ कोई कहसके न फेर ॥५॥
गावणके पद। (१७) | सच्चिदानंद केवल करतारा ॥ सभर भरया चौफेर ॥ उमाराम पीतमकी सना ॥लखे संत कोई शेर ॥६॥२६॥ राग एली। सुरत मेरी दमसे लगीरे एली । सो दम लिया पिछाण। टेर॥ दमका दम दमीकू फोरे ॥ पिण्ड ब्रह्मड सारा ॥ सबी दमानं आप निरंतर ॥ वो सच्चिदानन्द प्यारा ॥१॥ सबी दमांमें वो दम व्यापक ॥ सबका सिरजण हारा ॥ सबी दिखाय दिष्ट नहिं आवे॥ वो दम अखी उजारा ॥२॥ सारासार उन्होंतें भ्यासे । वो दम रह एकसारा॥ जाण स्वरूप अरूप अनादि ॥ सतनकू इतबारा ॥ ३ ॥ वा दमकू हम निश्चय जाण्या॥ तूटा भरम अंधारा ॥ नाम रूप दम मिथ्या दरस्या ॥ वो दम अमर दीदारा॥४ वेद सन्त वा दमकू वरण्या॥नेती कह्या पुकारा ॥ उमाराम वा दमकी सैना ॥सब कहणीके पारा॥५॥२६॥ राग एली। सधर सत्साम… लख्यारे॥ सत्गुरूके प्रताप ॥ टेर॥ सबी कल्पना मनकी मानी ॥ मतहीणा वेकार महामलीन चिपैकू बोरे ॥ झूठा करत व्योपार ॥ १ ॥ पांच विपैको मन अधिकारी ॥ मन क्रिया आसार अंतःकरण अविद्या सारी ॥ मिथ्यादिरस आकार ॥२॥ सत्गुरू भेद लखाया पूरा ॥ निश्चै किया विचार
अनुभवप्रकाश।
॥
सदा अथाग थाग नहिं वाको ॥ केवल आनन्द
अपार ॥
आदि अनादि अखंड अविनासी॥ ऐसा वो करतार ॥३॥
वा पीतमके मिली मोहोले ॥ तूटा सबी विकार ॥
कृपा भई कटी सब क्रिया ॥ अमर पायो भरतार ॥ ४॥
विपकी वास तजे हंकारा । पीतमसूं इतबार
या विध जाण लीवि सोइ जीता। यह विवेक तत्सार ॥६॥
याविधकू जाणे नहिं जबलग ॥ सरे नहीं कोउ
कोउ कार॥
दूजा काज अकाज कहीजे ॥ जुग जुग मिटे न हार ॥६॥
अगम निगम शोभा कहथाकी। सब कहणीके पार ॥
उमाराम सूरा सन्तपरसे ॥ पीतमको दीदार ॥७॥२४॥
राग एली।
सुरत मेरी पीयेसुं लगी॥ सत् गुरू दिया लखाय ॥ टेर॥
मेरा पीव सकलका साहब ॥ सब पर रखे महर ॥
सबकी जाण उनीते चाले ॥रहता आपहि ठहर ॥ १ ॥
वो साहब सारामे सामल ॥ सबहीमें रहे गहर ॥
है सब माये रह निर आसे ॥ आप अनामी अलहर ।।२
वो पीतम मेरेकू दरस्या ॥ मिटया हमारा जहेर ॥
निज सुख रूप सदा एक सारा॥ लीया सुरता हेर ॥३॥
वा पीतमकी खबर न जिनकू ।। मिटे नही दुख लहेर ॥
और खबरतें काज न सीझे । अगम निगम कह टेर ॥ ४॥
कोटक भाण रोमकी शोभा ॥ तां नहिं सांझ सवेर
अकथ उजालां कह्या न जावे ॥ कोई कहसके न फेर॥५॥
गावणके पद। (१७) सच्चिदानंद केवल करतारा ॥ सभर भरया चौफेर ॥ उमाराम पीतमकी सना ॥लखे संत कोई शेर ॥६॥२५॥ राग एली। सुरत मेरी दमसे लगीरे एली ॥ सो दम लिया पिछाण। टेर॥ दमका दम दमीकू फोरे ॥ पिण्ड ब्रह्मंड सारा ॥ सबी दमासूं आप निरंतर ॥ वो सच्चिदानन्द प्यारा ॥३॥ सबी दमांमे वो दम व्यापक ॥ सबका सिरजण हारा ॥ सबी दिखाय दिष्ट नहिं आवे॥ वो दम अखी उजारा ॥२॥ सारासार उन्होंते भ्यासे । वो दम एकसारा॥ जाण स्वरूप अरूप अनादि ॥ सतनकू इतबारा ॥३॥ वा दमकू हम निश्चय जाण्या॥ तूटा भरम अंधारा ॥ नाम रूप दम मिथ्या दरस्या ॥ वो दम अमर दीदारा॥४॥ वेद सन्त वा दमकू वरण्या॥नेती कह्या पुकारा ॥ उमाराम वा दमकी सैना ॥ सब कहणीके पारा॥५॥२६॥ राग एली। सधर सत्सामकू लख्यारे ॥ सत्गुरूके प्रताप ॥ टेर॥ सबी कल्पना मनकी मानी ॥ मतहीणा वेकार महामलीन विकू बोरे ॥ झूठा करत व्योपार ॥ १ ॥ पांच विपैको मन अधिकारी ॥ मन क्रिया आसार ॥ अंतःकरण अविद्या सारी ॥ मिथ्यादिरस आकार ॥२॥ सत्गुरू भेद लखाया पूरा ॥ निश्चै किया विचार ॥
(३८) अनुभवप्रकाश। सदा निराश लेश नहिं वाके ॥ निरवंधण किरतार ॥ ३ ॥ वो किरतारा सबमें थाया। सवहीका दातार ॥ हाण लाभ न्यारा नहिं भेला ॥ आपोई आप अपार ॥ ४ ॥ वाकी शोभा कथी न जावे ॥ अगम निगम गई हार ॥ भेद अलेदा वचन न पहुँचे । निरालम्ब निराधार ॥ ५ ॥ नाम रूप मन भाव मिटावे ॥ तजे विपैकी उमाराम केवल जब दरसे ।। सही पुरुप दीदार ॥६॥२७॥ पदराग। पायाहै जी सत्गुरू श्यामका ॥ दीदार में पायाहै ।। टेर ॥ सोहं भेद दिया मेरे सत्गुरू ॥ जाका सिवरण गया ॥ जागी जाण धरी धुन उनमें ॥ दुरमत दूरा भया ॥१॥ अखी उजाला सबके पारा॥ सन्मुख दरशण किया । नूर अखंडित निहचल वासा ॥ सो तो गया न आया ॥२॥ आदि रु अंत मध्य तिहुँमाहीं ॥ रह चेतन एक राया ॥ सो समझ्या सतगुरूकी सैना ॥ जो जन महरम पाया ॥३॥ वनानाथ गुरू सतस्वरूपा ॥ नित निरवाण अथाया। उमाराम सोई निज केवल ।। मैं तूं भेद विलाया ॥२८॥ पदराग। अबमैं जाण्या हैजी ॥ सत् पतिम सम भाव ॥ अब मैं जाण्या॥ टेर॥ मेरा पीव पीतका गाढा ॥ पीत बिना नहि नहिं पावै ॥
गावणके पद। (१९) सवसूं तोड रखे पीतमसे । जब पीतम दरसावे ॥१॥ निज पीतम इच्छाका दाता ।। सकल सिष्ट दिखलावे ॥ सबमें आप सरोवर थाया| किसकी निजर न आवे ॥२॥ आनन्द अपार पार नहिवाको महिमा अगम अथावे ॥ नित केवल पीतम परमेश्वर ॥ प्रगट भाक सुणावे ॥३ जवलग पीतलगे नहिं वासू ॥ तवलग दरद न जावे ॥ दूजी पीत करो कोउ बहुती ॥ ज्यांसू काज न थावे ॥४॥ अन अक्षर अक्षर नहि लागे ॥क्या कहणी करगावे॥ संत लखे पीतमकी सेना ॥ बुरी भलीउं निरदावे ॥५॥ वनानाथ गुरू शब्द सुणाया ॥ एकाएक लखावे ॥ उमाराम सही कर समझ्या ॥ अखंड अथाग रहावे॥६॥२९॥ पदराग। अब मोय दिस्या है जी ॥ दिलदिलदारका दीदार ॥ टेर॥ अनन्त दिलांका दिल अविनासी॥ अनेक दिल दिखलावे ॥ सकलदिलांका वो दिलमालक ॥ अदली अदल चलावे ॥१॥ सकल दिलांपर हुक्म उनीका । पलभर चूक न पावे ॥ साच झूठ दोऊँ चले हुक्मसूं ॥ आप रहे निरदावे ॥२॥ जबलगवा दिलकू नहि जाणे ।। तबलग 'गोता खावे ॥ दूजी जाण रखो बहु तेरी ॥ वा दिलमें नहिं भावे ॥३॥ नापाकी दिल काट भगावे ।। पाक महोबत थावे ॥ जब दिलदार रखे नहिं परदा ॥ अरस परस मिल जावे ॥४॥ वादिलकी गम कथी न जावे॥ वेद थक्या क्या गावे॥
(२०)
अनुभवप्रकाश।
मुरसद महर करे जब सूजे ॥ दिलकू दिल, दरसावे ॥५॥
वनानाथ गुरू नित पूरणदिल ॥ दिष्ट · मुष्ट नहि आवे ॥
उमाराम है दिल सोई । सत् लख भाक सुणावे ॥६॥३०॥
पदराग।
| दाता तेरी कुदरत पर कुरबाणी । तेरी गम विरला जाणी॥टेर॥
सतगुरु मया आंकुर पूरबला ।। साधु संगत सत् ठाणी ॥ १॥
भव दरियाव तरंगचितवनबहै ।। पारकिया निरवाणी ॥२॥
सदा अखूट कबहुँ नहि खूटे ॥ सो चित्तलियाहै पिछाणी॥३॥
आप अलोगत लोग रचाया।सब रचलूं क्या सेलाणी॥ ४॥
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ॥ सबर भरया गरकाणी ॥५॥
अवरण महिमा वरणी नहिं जाव।कोउ लगे नहिं काणी ॥६॥
वनानाथ गुरू भव डर भाग्या।उमाराम ठीक ठहराणी॥७॥३१॥
पदराग।
तेरी गम अकथ कहाणी ॥ कोउ पहुंचे नहिं वाणी ॥ टेर ॥
अकल स्वरूपी कलियो नहिं जावे। आप अलेखी थाया ॥१॥
तेरेसे सारी कल चाले ॥तूही अकल निरदाया॥२॥
तूंही सफल सृष्टिको दाता ॥ तूही अपार रहाया ॥३॥
तेरी जाण तुझेही मालम ।। तेरा भेद अथाया॥४॥
तूं निकलंक निरालेप अनादू॥ तूं पूर्ण थिर थाया ॥५॥
उमाराम शुद्ध आतम परस्या॥नहीं जहां करम नकाया॥६॥३२॥
गावणके पद। (२३) पद रांग। लख्या मन केवले ब्रह्म अपार ॥ टेर।। सत् गुरू दाता कृपा कीनी ॥ दिया ज्ञान तत् सार ॥ १ ॥ जाण्या ज्ञाना ब्रह्म विज्ञाना॥ निबंधण निराकार ॥३॥ सबी खेलकू आप देखावे ॥ सब वाके आधार ॥ ३॥ निकलंक स्वामी सबमें व्यापक॥ देख दिखावण हार ॥४॥ 'सन्त शास्त्र कह कह थक्या कहणी लगे नाहिं लगार ॥५॥ नित निरवाणी अकथ कहाणी॥उमाराम परस्या विचार॥३३॥ रोग प्रभाती। या विध सुरंत मिली पीतम।।। अपनी सार विचारी ॥ परमसुखी भई सदा सर्वांगण ॥ छैया द्वैत विकारी ॥टेर॥ निजें पीतंमतूं सुरत विछूटी ॥ शुद्ध बुद्ध सबी बिसारी ॥ भ्यानक रूप जगत विध नाना ॥ ज्यांमे पच पच हारी ॥१॥ च्यार खाणको अंत न आवे ॥ लख चौरासी वारी ॥ व्याधि रोग लग्या अति उरमें। फिर फिर भई खवारी ॥२॥ नर देह मिली बडा पुनर्वासू ॥ जाग्या भाग भलारी ॥ चेत अबे आई पुलं आछी ॥ वे गई होय हुसियारी ॥३॥ संरदा झाल सवागण सेठी । करो चलणकी त्यारी ॥ तेरा पीव वसे पर्द चौथे ॥ जासू मिलो पियारी ॥४॥ चिदानन्द पीतमं परमेश्वर ॥ अनतं कला विसंतारी ॥ सर्व भावV न्यारों खेले ॥ गुरूं विना लगें न कारी॥५॥ वेगुरू दयाल तिरण और तारण || अशरण शरण उधारी ॥
(२२) अनुभवप्रकाश। परकारज लिया अवतारा ॥ वेद पुराण पुकारी ॥६॥ आलस त्याग उठी भट सुरता ॥ उठकर चली । सवेरी ॥ चलकर गई शरण सत्गुरूकी ॥ मैंहूं शरण तुम्हारी ॥७॥ बोले दयाल दयाके सिन्धू ॥ क्यूं आई ढिग मारी ॥ पूछे बात सवागण तोसूं ॥ कहो हकीकत थारी ॥८॥ उपजे मरे मरे फेर जनमें ॥ अजर पास बडभारी ॥ तुम बिन दरद कटे नहिं मेरा ॥ तुम गुरू काटण हारी ॥९॥ तिर्गुण मान लिया ज्या दिन।॥ भूल गई भरतारी ॥ पीतम मिल्या कटे दुख सारा ॥ तज दो जगत विकारी॥१०॥ दोयकर जोड अरजकी सुरता। मैंहूं अति खुदियारी ॥ ज्या विध पीव मिले सोई भाखो। करूं पीवसूं यारी ॥ ११ ॥ पीतमका महरम कह दारवू ।। लीज्यो ताय विचारी ॥ गुणा अतीत पीव सुण सुरता ॥ सब वाके आधारी ॥ १२ ॥ जाग्रत् स्वप्न सुषुपति कहिये ॥ ये तिर्गुण मायारी ॥ पीतम पद चौथाहै तापर ॥ अपणा आप अपारी ॥ १३ ॥ विश्व जीव थूल देह धरके ॥ भलीभांतसं धारी इन्द्रयां अर्थ करत केई किरिया । जाग्रतका हंकारी ॥ १४ ॥ तैजस जीव मान मनोरथकू ।। सूक्षम देह पसारी ॥ संकल्प अर्थ हग लघु कल्पे ॥ सपन तणां इधकारी ॥१५॥ प्राज्ञे जीव देह कारणकू ॥ आदि अनादि निहारी ॥ भूल अर्थ सुंनगई सुपोपत ॥ तहां नाह याद लिगारी ॥ १६॥ पीतम पद तीनांको प्रेरक ॥ ज्यूँका त्यूं दिष्टारी ॥ ॥
गावणके पद। (२३) आप सदा निरलेप निरंजन ॥रेतिनमें तिन पारी ॥ १७॥ तिर्गुण भाव कलप पीतममें ॥ पीतम अखे मुरारी ।। सतगुरू सूझ कही कर निरणे ॥ सुरता ताये लख्यारी ॥१८॥ मोटी महर करी सत्सतगुरू ॥ दातारा दातारी ॥ पूरण ज्ञान दिया पेंता शुद्ध ॥ तिर्गुण मिटी अंधारी ॥ १९॥ वनानाथ गुरू पीतम परस्या ॥ सुरत सुवागण नारी ॥ उमाराम निमक नहिं खंडे ॥ रिलमिल भई एकसारी॥२०॥३४॥ पदराग। सत्गुरू मेरम लखाविया ॥ जगदूं दिया बिसार ॥ समझ सारिये ॥ गुरू बिन गेलो ना मिले ॥ टेर ॥ कृपा सत्संगतें ॥ दरस्या ब्रह्म विचार ॥ पारब्रह्म पिछाणिया ॥वाको आर न पार ॥१॥ आदि अन्त वाको नहीं ॥ नहि हलवा नहिं भार ॥ न्यारा भेलाको भेलाको नहीं ॥ नहि कोई जीतनहार ॥२॥ अविगत अकथ अलेप है ॥ ज्यां नहीं दिरस विकार ॥ असंग अनामी रहत है ॥ नित निर्गुण निराकार ॥३॥ वनानाथ सत्गुरू मिल्या ॥ पाई चेतन सार ॥ उमाराम चनन लख्खा ॥ आपोई आप अपार ॥४॥३६॥ राग रेखता। सदा सत् परख्या निज नैणा ॥ नहीं वो मूर्ख नहीं सैणा॥ देर॥ जग्या केवल अनुभौ ज्ञाना ॥ तिमिर तन भेद मिटयानाना।। १०१४- (२४) अनुभवप्रकाश। अखंड निज नूर प्रकाशा॥निकाल स चेतन निरआशा ।।१।। ख्याली उन खेल दिखलाया ॥ सबी रच रहत निरदाया ॥ घटे वधे नाम रूप सारा ॥ आप निरलेप निराधारा ॥२॥ खेल सव मायाके माहीं ॥ शुभाशुभ दुख सुख सवयाहीं॥ भांत रंग रूप विस्तारा ॥ इन्द्र सम जाल आकारा॥३॥ पिंड ब्रह्मंड नहीं माया ॥ज्यां कछु धूप नही छाया । परब्रह्म गया नहि आया ॥ अकल अनलाग एक राया॥४॥ रमझ यह लखे संत सूरा ॥ बुद्धि मन चक्षुतें दूरा॥ चिदानन्द निरमल निरवाणा।।सोई उमाराम निज जाणा५॥३६॥ राग रेखता। अनामी कह्या नहिं जावे ॥ लखे सोई महरम वो पावे ॥ टेर॥ इस्क दा रायहै एडा। चले वे धड़क फकर बेंडा॥ काहूका ध्यान नहि धारा ॥ आपा तन खोय गया सारा ॥३॥ इस्क पद अटल आप देखा ॥ निरंतर निरसंधे पेखा ॥ अनादू निरबंधण नूरा ॥ सकलमें गरक भन्या पूरा ॥२॥ आपतां जगत नहिं जोगी ।। अवर कोई हकीम नहिं रोगी । वेद संत कह यूं दरसाया ॥ नितोनित केवल थिरथाया ॥३॥ तीववैराग परम ज्ञाना ॥ तहां मन माया नहिं आना ॥ उमाराम चेतनहै सोई॥ द्वैतका लेश नहि कोई ॥४॥३७॥ रागरेखता। इस्क निरभेद लख गाया। परमपद इस्कतें पाया॥टेर॥
गावणके पद।
(२५)
इस्ककी रीत कह दाखू ॥ निगे कर सूझ ना भारवू ॥
इस्क तो दोयहै भांता ॥ खवर तो पडे कोई पातां ॥१॥
सबी जग झूठ है वाना ॥ अति दुख या जगमें जाना ॥
इस्क यो पकड्या सोई हारा ॥ जुगोजगभुगतेगा प्यारा ॥२॥
साच सच्चिदानन्द निराधारा ॥ सदा सुखरूप एक सारा॥
इस्क यो गृहा कोई साधू । जिनीसंत पाया घरआदू ॥३॥
| इस्क दोउं खूब हम देखा ॥ साच अरु झुठका लेखा ॥
जैसा था जैसा वतलाया ॥ अरथ कर सागे दरसाया ॥४॥
गुरू वनानाथ दीवी लखता ॥ लग्या रंग रोम रोम मुक्ता ॥
उमाराम इस्कमें माता ॥ तोड़ दियाजगत्का नाता ॥५॥३८॥
रागरेखता।
ज्ञान निज आतमका योही ॥ संत सब सुरती कह सोही ॥ टेर॥
प्रगटी निरालंब सोजी ॥ निरखिया निरगुण निज खोजी॥
यथार्थ भारवू सोई वाणी ॥ जाण यों निशिदिन निरवाणी ॥१॥
अकरता पद अखे अध्ये ॥ ध्यान अरुध्यातानहिं कोईध्ये ॥
नहीं वा वाल तिरण दाना ॥अधरधर पावत नहिंआना॥२॥
माया गुण कारण कारज होई ॥ आसरे चेतनके
चेतनके योई ॥
कर्म करता क्रिया भ्यासे ॥ सकलकू चेतन प्रकासे ॥३॥
बाहर भीतर
आतमसुधा ॥ हरप अरु विख्यात नहि धूंधा॥
सदा सुखकंद अविनासी ।। अनादि निरबंध एक रासी॥४॥
ब्रह्मका गुंझ अति थाया ॥ गलत वा गुणे कारण माया ॥
उत्पती परली वां झूया ॥ अजन्मा तुष्ट ना, रुप्टा ॥५॥
(२६) अनुभवप्रकाश। रहतनित अन्येन स्वरूप देवा।। इष्ट अनइट नहीं भवो ॥ अद्वितीय उमाराम सोई ॥ नहीं कोई लघुदीर्घ दोई॥६॥३९॥ रागवसंत। होरी अनुभव जग्या विवेक ॥ जी साधो जीयो॥ ज्यांमें दरस्या ब्रह्म अदेख ॥ टेर॥ होरी झाल देखता कहिये ।।धारां लगी अनेक॥ भांतभांतकी उठे दो झालां ॥ ज्यांमें आपातप्या बहु भेक!!३॥ विपै मायाको मनहे भोगी ॥ गृह विपयकी टेक ॥ तृष्णा अनंत लपट माई उठे। ज्यांमें जलता फिरे विपेक ॥२॥ मन माया निर्गुणतें भ्यासे । पूरण भरया अलेक ॥ नित ज्यूँका त्यूं रहत सकलमें।। नेकुल ब्रह्म अभेक ॥३॥ तजो सकल संताप दिरसकी॥ अभै अकरता देख ॥ स्वप्रकाशी आनंद अपारा ।। निरसंधे लिया पेख ।। ४ ।। वनानाथ गुरू निर्गुण कहिये । ज्यां धरम करम नहि रेख ॥ उमाराम सोई शुद्ध चेतन ॥ कोउ एका लगे नाहि बेख ॥५॥४०॥ रागवसंत। होरी अनुभव आप अथाप ॥ जी साधो जीयो ॥ ज्या नहि तिर्गुणकी ताप ॥ टेर॥ निर्गुण लियांसबीगुण भ्यासे । नानारूप विलास ॥ गुण विलासमें निर्गुण ऐसे ॥ ज्यूं निरमल आकाश ॥३॥ दृश्यादृश्य अदृश्यतिहुँझवका ॥ आदि अन्त मध नास ।।
गावणके पद।
(२७)
नित निर्गुण सतचित आनन्द ॥ नहिं ज्यां तिर्गुण भ्यास ॥२॥
निरापक्ष निरलेप ॥ निरंतर पारब्रह्म प्रकाश।
ज्यां नही हूणा नहिं अणहूणा॥ नहीं ज्यां वास अवास ॥३॥
लख अलख दोउतें दूरा ।। अगम निगम थकी वाच ॥
उमाराम सोई निज चेतन ॥ आपोई आप अवाच ॥४॥४१॥
राग सोरठ।
फकीरी यह महरम तत् सार ॥ऐसी सूझ सूझी सोई सीधा।
मिलरया मोक्ष द्वार ॥टर ॥
माया ठगणी बोत ठगारी॥ठगीया जुग संसार ॥
सुर नर असुर लोक तीनूकू ॥ लीया
तीनूकू ॥ लीया घेर बकार ॥१॥
झूठा साव साच दिखलावे ॥ आ पासी दीवी डार ॥
परतक रस मीठा दे पकडया ॥ या छलसूं लिया नार ॥२॥
छल बहु भांत मायाके माहीं ॥ एक इधकार ॥
चवदे लोक गृहा बाकेमें ॥ किसविध होय उबार ॥३॥
सत् चेतन आनन्द विचारे ॥ आपा तजे विकार ॥
उनी फकर मायाकू छेदी ॥ दीवी वासना जार ॥ ४ ॥
उनी फकरकू ज्ञान ब्रह्मका ।। आप ब्रह्म एक सार ॥
सदा अमल माया मल नाही ॥ शुद्ध स्वरूप अपार ॥५॥
वनानाथ पाया गुरू पूरा ॥ सोजी दीवि विचार ॥
उमाराम पिछाणी निश्चै । माया तजी असार ॥६॥४२॥
(२८) अनुभवप्रकाश। ॥ राग सोरठ। फकीरी निराधारकी सार ॥ सोई लखे तजे सब आपा ॥ जो पावे दीदार ॥ टेर॥ असल फकीर असल• मान्या ॥ अदली लिया विचार ॥ जीव लहर सब कटी कल्पना ॥ दीवी नकल विडार ॥१॥ अदली पुरुष अमर अविनासी॥ ताका वार न पार ॥ आप अनादी केवल थाया॥ नहि कोई जीतन हार ॥२॥ चवदे लोक इकी ब्रह्मंड ।। अदलीके आधार परवर दिगार घटोघट व्यापक। सबकू जाणणहार ॥३॥ हिन्दू मुसलमानका मालक ॥ सबकी सुणे पुकार ॥ जैसी करे तैसी दिखलावे ॥ चूकते नहीं लिंगारें ॥ ४ ॥ अखे स्वरूप सदा निरबंधण ॥ आपोई आप अपार॥ उमाराम फकर सोईचेतन ॥ अनुभव कह्या विचार ॥५॥४३॥ रागसोरठ। फकीरी हद बेहदके वार ॥ सोई फकीर तजे हद वेहद ।। सो पावे निजसारं ॥ टेर।। मस्त फकीर सदा रह मस्तां ॥ मेटयां विपय विकार ॥ तीनो लोक समझियांमिथ्या ॥ तत्त्व दिया विसरि ॥ १ ॥ गृहा सत् धारणा गाढी ॥ आंठ पोहोर हुशियार ॥ सुल्या कपाट दरसीया दाता ॥ पायो अलख अपार ॥३॥ पूरण ब्रह्म रहं थिर सोई ।। निरंभय निज निराकार ।।
मावणके पद।
(२९)
दूजा लेस नहीं ता भीतर ॥ यह केवल निराधार ॥३॥
जो जाणे जाहूकू मालम ॥ जिनकू यह इतबार ॥
उमाराम साच कही साखा ॥ वेदा नहीं लिंगार ॥४॥४४॥
रागसोरठ।
फकीरी रहत निचिन्त सबूर ॥ निबंध फकर सदा थिरथाया।।
मेट दिया जग कूर ॥ टेर॥
शब्द सम शेर दियागुरू साचा ।। लिया समझ सहि सूर ॥
क्रिया करमळू काट पहुंता ॥ मालम भई हजूर ॥ १ ॥
पट्टा मिल्या प्रतीत पूरवला ॥ अमर
लोक भरपूर ॥
आदिअन्त मध कबहुँन उतरे ॥ अवर अखंडित नूर ॥ २ ॥
आहूं जाम रहे इक सारा ।। सबमें हुकुम जरूर ॥
राव रंक ब्रह्मादिक मानें ॥पल नहीं चूके करूर ॥३॥
अकल आप नहिं थाप उथापा॥ नहिं कोई निकट न दूर ॥
उमाराम सबीको दिया ॥ नित चेतन निज मूर॥४॥४९॥
राग सोरठ।
फकीरी सधर भरया भरपूर॥अमिन्त आचिन्त अनुगत आतम॥
परतक जाण जरूर ॥ टेर॥
पिंड .ब्रह्मडके परे ॥ फकरका चस्मा खुल्या जहूर ॥
निरख्या निजानन्द निरआसे। जां थित दृढ़ मंजूर ॥ १ ॥
निजानंदकी गम अगम है ॥ जां नहीं शशि अरु सूर ॥
जां अन्वय व्यतिरेक नहिरंचक ॥ सदा स्वच्छेद नूर ॥२॥
(३०) अनुभवप्रकाश। अज्ञ सर्वज्ञ उवां है कैसा ॥ उरे बीच कहां दूर ॥ जां स्पंद निस्पंदन पावे ॥ निरविशेप निज मूर ॥ ३ ॥ परमाणी परमाण न पूगे ॥ नहिं जां अनहद तूर ॥ नेती निगम पुकारे प्रगट । अखिल स्वरूप हजूर ॥४॥ अपणा आप परम पुरुषोत्तम ॥ श्याम श्वेत नहिं भूर ॥ उमाराम अद्वैत आतमा ॥ना कोई धत आंकूर ॥५॥४६॥ राग सोरठ। फकीरी भाख्या अखत बयान ।। योही है परम पराकी पारख ॥ परखे फकर सुजान ॥ टेर॥ अती अलाग विचार फकरका॥ शब्दा अतीत पिछाण ॥ वां दूजा किचित् नाहिं कोई । सो कह दाखू विधान ॥ १ ॥ अनुभव स्वरूप प्राप्त नितही ॥ मन बुद्ध सकत न जान ॥ ज्यां नहिं जीव ईश ब्रह्म कैना॥ गावे वेद कुराम ॥ २ ॥ तीनू कांड वेद विधि थापी ॥ भिन्न भिन्न परमान प्रथम करम उपासन द्वितीये। तृतीये वरन्या ज्ञान ॥ ३ तीनूं कांड परे कहि नेती ॥ ज्यां तिहुँ विधकी हान ॥ केया न जाय वचन कह थाका॥ कहांसू कह बखान ॥ ४ ॥ महा पदमाय निषेध न विधि ।। बोल • अबोल न आन ॥ उमाराम अवाच्य आतमा ॥ निरवानी निरवान ॥६॥४७॥ राग आसा। साधो भाई नाम रूप सब कूरा।कारण लिंग स्थूल भरम भागा॥ अनुभव जज्ञा आंकूरा ॥ टेर॥
गावणके पद। (३१) निज मनसू मनका सब कामा॥ निज मन मनसे दूरा ॥ मन भोगी विपयारस भोगे । निज अभोगता नूरा ॥१॥ मन झलियारा बहुविध झलके | ज्यूं मृग तृष्णा धूरा ॥ दीसे सो झलका है नाहीं ॥ निज प्रकाशज्यूं सूरा ॥२॥ निज वेनामी सेवकै नहिं स्वामी।। आपोई आप हतूरा ॥ मन माया तृष्णा तन मेटे । सो पद पावे पूरा ॥ ३ ॥ बनानाथ गुरू रमझ लखाई ॥ तसवर खुल्या जहूरा ॥ उमाराम समझ सत्भाखी ॥ महरम मिल्या जू मूरा ॥४॥४८॥ रागा आसा। साधो भाई निज निरभेद हमारा॥ विधिनिषेध दोऊते न्यारा ॥ है सबमें सब पारा । टेर॥ निज मनसू मनका रंग भ्यासे । मन रंगझू • निज न्यारा॥ जैसे नभ व्यापक घट मठमे ॥ यूं अन्दर यूं बारा ॥१॥ मनरंग जाग्रत् स्वप्न सुषुपत ॥ जाण भूल मन धारा ॥ नित्यानित्य समझ रंग मनका।। मनरंग है जड सारा ॥२॥ निज मन चेतन आदि अंत मध ॥ आप अखे निरधारा ॥ मनका लेश नहीं निज माहीं ॥ सदा रहे एकसारा ॥३॥ वनानाथ गुरू सत् चेतन निज ॥ सत्गुरू अगम अपारा ॥ उमाराम सोई निज चेतन ॥ परतक जाणण हारा ॥४॥४९॥ राग आसा। साधो भाई आतम अचल अभंगा॥ है सब मांये सबी ते न्यारा ॥ ज्यू जलमें चंद असंगा॥ टेर॥
अनुभवप्रकाश।
मन भूल्या मिथ्या सत् माने ॥ विपय व्यवहारत अंधा ॥
अपणा स्वरूप लखे नहिं भोदू । मान रह्या दुख धंधा ॥ १ ॥
अनन्त उपाधि याद तज दूरी ॥ मैं तूं मेट सुगन्धा ॥
शुद्ध स्वरूप एक रस तेरा ॥ तूं नित चेतन निष्फंदा ॥२॥
चेतन ख्याली ख्याल दिखाया। तरह तरह बहु धुंधा
जैसे रवि अनंत सर्वांमें ॥ यूं चेतन निरवंदा ॥३॥
वनानाथ गुरू सैन लखाई॥ पाया भेद सर्वदा ॥
उमाराम करि निज निरणे ॥ संत सदा परखंदा ॥ ४॥९॥
राग आसा।
साधो भाई यह विवेकतत्सारा॥ जाण अरु भूल दिखाईहै ज्यूं ॥
चेतन जाणण हारा ॥ टर।
आपा बांध आपकू भूला || क्रिया कर्म मन धारा ।।
अपणा स्वरूप विसार विछूटा ॥ मान लिया संसारा ॥१॥
विषय व्यवहार निवार अभागी ॥ आपा छोड विकारा॥
दुरमत मेट दोय मत देखे ॥ जोय तूं स्वरूप तुमारा ॥२॥
तेरा स्वरूप मुकर न्यूं थाया॥देख दिखाय रह न्यारा ॥
रूपारूप अलेख अखंडी । सो तू चेतन प्यारा ॥३॥
तोयतें होय वाग बन वाडी । बहुविध रंग पसारा ॥
नित चेतन जैसा का तैसा ॥ खट मीठा नहिं खारा ॥४॥
ज्ञान अज्ञान देखाया मनमें ॥ सो मन अस्त असारा ।।
उमाराम निज चेतन परतक॥ शुद्ध अद्वैत अपारा ॥६॥५१॥
गावणके पद। राग आसा। मनरे या विध तोय समझांऊ ॥ मान वचन परतक जग झूठा। थिर निर्गुण लखताऊं ॥ टेर।। सकल लोकका छोड विवेका राग द्वेप मत लाऊं ॥ करम केश' विपय तज सारा ॥ परमानंद परसाऊं ॥ १ ॥ पंच कोशके परे परमानंद ॥ 'विधिनिषेध न जाऊं ॥ उण समरथ पलमेंकी रचना ॥ शोभा किसी सराऊं ॥२॥ अले अछे अक्रिये अणघड़ ॥ दूर 'निकट नहिं काऊं ॥ सभर भन्या सारामें सामल ॥ नित साखी क्या गाऊं ॥३॥ वनानाथ गुरू सार पजोई ॥ मनका खोज मिटाऊं ॥ उमाराम विशेप विचाया॥ समदरशी ब्रह्म सोऊं ॥ ४॥५२॥ राग आसा। साधो भाई परम सिद्धान्त ये ज्ञाना ॥ सत् मिथ्यादोका दिया। चेतन जाणे म्याना॥ टेर॥ मन कलप्या आतममे ऐसे ॥ ज्यू मृग तृष्णा पाणी॥ भांतभात'मन कलपन हारा ।। बहुत कलपना ठाणी ॥१॥ ईश्वर जीव ब्रह्म मन माना ॥ न्यूनं विशेष समाना ॥ जाग्रत् स्वप्न सुपुपति तिहूँगुण ॥ उत्पति थिती लयजाना ॥२॥ अर्थ धर्मअरु काम मुक्त फल ।। इनका मन अधिकारी। प्रवृति निवृत्ती दोनूं ॥ यह मनमायं विचारी ॥३॥ रज्जूमे सर्प सीपमे रूपा ।। गंध्रव शहर कहाई ॥
(३४)
अनुभवप्रकाश
ज्ञान बिना मिथ्या मनसाँचा । ज्ञान भया मन नाई ॥४॥
आतम अखे अमान सदाई ॥ ज्यां मन नहीं लिगारा॥
उमाराम सोई शुद्ध आतम ॥ अनिरवाच अपारा॥५॥५३॥
राग आसा।
साधो भाई अविगत भेदअथाया॥समझेगा कोई संत सुजाना॥
निर्भय रहत अचाया ॥ टेर॥
व्यवहार वादी विगत नजाणे ॥ बहु प्रकार संभाया ॥
जप तप करम करे करतूतां ॥ भोले जन्म गमाया ॥१॥
पखवादी प्रतीत न धारे ॥ नहीं तन मन परचाया ॥
अपणी थपे अवर नहिं माने ॥वा कोई मुक्त न पाया ॥२॥
पंथ वादी चाले पंथ ऊले ॥ अगम पंथ नहिं ध्याया ॥
अटल राय पोंचे कोई पागी ॥ बहुर जन्म नहिं आया॥३॥
ब्रह्म वादी करता नहिं माने ॥ अगम अगोचर थाया॥
सदा अखंड निकट नहिं दूरा ॥ नित निर्लेप अजाया ॥४॥
च्यारूं बाद चेतन कर चेते । सो चतन निरदाया॥
उमाराम आत्मारामी ॥.च्यारूंवाद बताया॥५॥५४॥
राग आसा।
साधोभाई आनंद ती विचारा॥ विषयानंद भजन आनन्दा ॥
ब्रह्मानंद उचारा ॥टेर।
विपयानंद सकल संसारा ॥ विषरा करत व्यवहारा ॥
आशानदी भन्या जल तृष्णा ॥ अहंममता वह धारा ॥१॥
गावणके पद।
(३५)
भजनानंद भक्त सोई भेद्या ॥ निर आसे .निज सारा॥
ज्ञान उजाला बेहद व्यापक ॥ ता नहिं तिमिर ॲधारा ॥२॥
ब्रह्मानंद अरूप अखंडी । अखे अतोल अजारा ॥
स्वप्रकाश सदा सत् पूरण ॥ वेद कतेब पुकारा ॥३॥
था जैसा जैसा बतलाया ॥ ज्यूँका त्यू. निरधारा ॥
गुणातीत निजानंद आतम ॥ सोई उमाराम अपारा॥४॥५॥
राग आसा।
साधो भाई चेतन जाणण हारा ॥ चेत अचेत चेतावे चेतन ॥
आप दोईतें न्यारा ॥ टेर॥
दार्टान्त दृष्टान्त बताऊं ॥ है ज्यू कर निरधारा ॥
दार्टान्त निराकार निरंतर ॥ है दृष्टान्त आकारा ॥१॥
रस अरु खांड खिलूणा तिर्पण ॥ गुणातीत मिठियासा ॥
जाग्रत स्वप्न सुषुपति ऐसे ॥ तीऊ तुरीये करभासा ॥२॥
स्वपना खांड खिलूणा जाग्रत।। सुषुपती रस धारा॥
मिठास तुरीये सबमें साखी ॥ आर पार इक सारा ॥३॥
रस विना न हुवे खांड खिलूणा ॥ ख्याल खांड रस माहीं ॥
यूं सुषुपतते स्वप्न जाग्रत.॥ तुरीये में तिहुं नाहीं ॥४॥
चेतन तुरीये नित निबंधण ॥ निरालेप निराकारा ॥
सते प्रकाश आदि अविनासी ॥ नाह हलका नाहं भारा ॥५॥
ख्याल खांड रस मीठास च्यारूं। रसणा आ रसमें खूटा ॥
अवस्था अतीतआतमाचतन ॥ भाव अभाव ज्यां झूठा ॥६॥
(३६) अनुभवप्रकाश। १ ॥ गुण अरु गुण अतीत नज्यामें।। नहि हेती नेती वाणी ॥ उमाराम सोई शुद्धचेतन ॥ कही परतकही निरवाणी ॥७॥५६॥ राग आसा। साधो भाई शुद्धस्वरूप हमारा ।। जाग्रत् स्वप्न सुषुपत तुरीया ॥ सबकू जाणणहारा ॥ टेर॥ जाग्रत् पांच तत मिल जागे ।। सकल सृष्टि वरतारा॥ इन्द्रयां द्वार करत सब कामा ॥ वरतत विपे व्यवहारा ॥ १ ॥ स्वप्न मनोरथ भवे कल्पना ॥ भूलगया घर बारा ॥ कबहूँ राव कबहूँ भया कंगला ॥ संकल्प सुख दुख धारा॥२ अति भूल नित रहत अचेतन ॥ सुपुपती सुखधारा जाग्रत् स्वप्न गल्या ता माहीं। महाघोर अॅधारा ॥३॥ जाग्रत स्वप्न सुपपत वरते ॥ साखी स्वरूप निराधारा ॥ महाप्रकाश सकल प्रकाशी ।। तुरीये ब्रह्म अपारा ॥ ४ ॥ पृथ्वीबीज वृक्ष छायामें ॥ नभ सबमें फेर न्यारा॥ यूं उमाराम अवस्था उलंगत ॥ नित चेतन एक सारा|६||१७|| 'राग हेली। सत्गुरू सत समजावीया ॥ है नहीं के बीच ॥ टेर॥ जगत जाण मिथ्या सबी । उलज रही विप कीच ॥ करम जालमे पच रही ।। महा नीचनकी नीच ॥१॥ साचा रस्ता सामका ।। झुठ जगत्की पीत ॥ सतंकू गहो ॥ छोडे जगत्की रीत ॥ २॥ 1) - गावणके पद। (३७) पार 'ब्रह्म सत सामहै । महा भीचनका भींच। सत परस्या सो वां वसे ॥ उना लगे न शीत ॥३॥ सच्चिदानन्द सबमें भन्या ॥ केवल आप अजीत ॥ ता सत्कं समझ्या बिना ॥ जुग जुग होत फजीत ॥ ४॥ अनन्त 'कोट संत ऊधया॥ ले सत्की परतीत ॥ उमाराम सत् भेटिया। सव तृष्णा गई बीता॥६॥१८॥ राग हेली। ये निश्चय निरलेप है ॥सव संता कही विचार ॥ टेर।। बाजीगर रचना रची॥ नाना रूप आकार ॥ बाजीगर बहु जाणहै ॥ रहे रचनासू बार ॥१॥ ख्यालीतें खिलका चले। स्वर्ग नर्क संसार ॥ अक्रिये नित आपहै ॥ सच्चिदानन्द निराकार ॥२॥ बाजीगर सबमें , : वसे ॥ पारब्रह्म निराधार है सबमें सबतें परे ॥ नित चेतन एकसार ॥३॥ वाकी महिमा को कहे ॥शोभा लगे न संत लखे ता भेदकू । ताहीकू इतबार ॥४॥ सत ख्याली खिलका मिथ्या ॥ प्रगट कहीं पुकार ॥ उमाराम 'खिलका तज्या ॥ ख्याली लिया विचार ॥५॥५९ राग हेली। अस्त अज्ञ जड पर हरो ॥ सत् चित् ब्रह्म विचार ॥ टेर ॥ सरग मृत्यु पाताल है। तीन गुणां विस्तार गार। 1
(३८)
अनुभवप्रकाश।
चवदे लोक तिर्गुण रच्या ।। धरम करम व्यवहार ॥१॥
ब्रह्मा सृष्टि उत्पन्न करे ॥ शिव सब करत संघार ॥
विष्णु
पोपे
विश्वकू ॥ शक्ती तणे आधार ॥२॥
सच्चिदानन्दः शक्ती करी ॥ शक्ति ब्रह्मकी नार ॥
तीनलोक • वह शक्तिसू ।। आप रहे निराधार ॥३॥
तिर्गुण इच्छा सव तजो ॥ सुख दुख भरया विकार ॥
शक्ति मिटी तां ब्रह्ममें ॥ दुरमत नहीं लिगार ॥४॥
वेद , संत शाखा कही ॥ आदि अंतका
उमाराम सत् चित् लख्या ।।सरवगआनन्द अपाराद॥६॥
रागहेली।
आत्मज्ञानी ओलखे ॥ ब्रह्म शक्तिका विचार ॥ टेर ॥
आदि पुरुष शक्ती करी॥ मोजी मोज
विचार ॥
सगत रचो सब सृष्टिकू । हुकुम दिया भरतार ॥१॥
आदि शक्ति तिहुँ गुण किया । अंस पुरुपका धार ॥
एक पलक जगरच्या । इछ्या अनन्त पसार ॥२॥
हुकुम पुरुपका शक्ति पर ॥ शक्ति हुकमकी “लार ॥
शक्ति हुकुम सब लोगपर ।। सब जग शक्ति आधार ॥३॥
पारब्रह्म निरदोष है ॥ खेल खिलावण हार ॥
निरालेप निहचल थया ॥ सब घटमै एकसार ॥४॥
विप इछ्या मिथ्या सवी ॥ नाम रूप ' आकार ॥
ब्रह्म सदा सत् स्वरूप है ।। सुरती करत पुकार ॥६॥
गावणके पद। . (३९) ते शक्ती कल्पत ब्रह्ममें ॥ नहिं घट मठ संसार ॥ उमाराम निश्चै लख्या ॥ तूटा विप हंकार ॥६॥६॥ राग हेली। वेद संत प्रगट कह ॥ जग मिथ्या सत ब्रह्म । टेर। पारब्रह्म खेलहै ॥ कारण कारज सरव ॥ सब व्यापक निरलेप है। सबका लखे गरब ॥ १॥ बुद्धि कारण कारण विश्वको ॥ कारज नाना करम ॥ सरग नरक दुख सुख सवे ।। है बुद्धीका धरम ॥२॥ बुद्धि आदि कारज सबे ॥ मिथ्या कल्पत भरम ॥ निज आतम बुद्धी परे ॥ नित चेतन बिन भरम ॥३॥ कारण कारज तामें नहीं ॥ नहीं कोई सीला गरम ।। उमाराम अज आतमा ॥ अपणा आप परम ॥४॥६२॥ रागहेली। | योई जाण शुद्ध स्वरूपकी । अगम निगम रही गाय ॥टेर॥ चेतन लिया अभाव है। चेतन लिया सब भाव ॥ परब्रह्मके आसरे ॥ कल्पत भाव अभाव ॥ १ ॥ हूणेमें हवा नहीं ॥ नहिं ॥ नहिं मिटणेमें' नाश हूणे मिटणे बीचहै ॥ परमेश्वर निवास ॥२॥ हेता नेती भावना ॥ दोऊ क्षेतरकी होय ॥ परमातम एकसार है ॥ क्षेतर लेश न कोय ॥ ३ परमेश्वर सुख रूपहै ॥ सदा असंगी आप ॥
(४०) अनुभवप्रकाश, हाण लाभ तामें नहीं ॥ नहि कोई थाप उथाप ॥४॥ अपणी सोजी आपकू ॥ आप अखे निरवाण ॥ निज निश्चै उमाराम है ॥ नहि कोई वाण अवाण॥५॥६३॥ राग हेली। यो निश्चै सिद्धान्तका ॥ परतक कही परवाण ॥ टेर॥ सरवांमें प्रतिबिम्ब है। सूरज करके होय ॥ यूं चेतन प्रकाशते ॥ बुद्धि भ्यासत सोय ॥१॥ घटके अन्दर बारही ॥ नभ निरलेप रहियात ।। यूं चेतन बुद्धी परे ॥ त्यूं बुद्धीके सात ॥२॥ वृद्धि चेतनके चेतनके ' आसरे ॥ कलप्या बहुत विवाद ॥ वणणां मिटणां रहवणां ॥ आ वुद्धीकी याद ॥३॥ जाण भूल भुंडा भला ॥ आस्ती नास्ती ज्ञात॥ | सर्गुण निर्गुण भावही । बद्धिका धरम कहात ॥४॥ एक अरु दोय अनेकही ॥ बुद्धीका विस्तार मृगतृष्णाके नीर ज्यूं ॥ बुद्धी भरम असार ॥५॥ ज्यका त्यू शुद्ध स्वरूपहै । ज्यां बुद्धीकी हाण ॥ उमाराम चेतन- सोई ॥ निरमाया निखाण ॥ ६॥ ६४ ॥ राग हेली। सोही ज्ञान सबतें परे ॥ परतक वचन सिधान्त ॥ टेर। सकुल। मध्यको मध्य है ॥ सकल भेदको भेद ॥ सकला रूपको रूप है ॥ चेतन रूप, अभेद ॥ १॥ ॥ N गावणके पद। (४१) है कही वो ना बणे ॥ नहिं नहिं कह्या न जाय ॥ नाहींके वीचमें ॥ चेतन रह्यो अचाय ॥२॥ चेतनकी चेतन लखे ॥ चेतनकू है ठाय ॥ मन बुद्धीकू गम नहीं ॥ चेतन जाण अथाय ॥ ३॥ उमाराम निरवाण है। सच्चिदानंद निराधार ॥ निरधुन्धि अक्रिय सदा ॥ नहिं कोई आर न पार॥४॥६५॥ राग चौपाइ। चेत मुसाफिर वेगोई चाले ॥जगत प्रपंच झूठ मत झाले॥टेर॥ तू नहि किसका कोइ नहिं तेरापावपलकका लियाहै बसेरा॥१॥ तेरेही देखतां सबीजगजावे ॥ रहता नदीसे संसार बिलावे॥२॥ ओ ससार अती दुख मोटा ॥ जन्म जन्म भागे नहिं टोटा॥३॥ जिन या जगका आपा माना ॥ भुगतेगा चौरासीकीखाना॥४॥ जिन जिनतजीखलककीआसा॥ निशिदिनसुखीहरिमाहिवासा उमाराम झूठ जग त्याग्या ॥ सत्शब्द मांय सेंठा लाग्या ६॥६६ राग चौपाई। सन्नरूमेहरमनिगेकरसारा॥ निरख परखकर वचनउचारा॥टेर॥ सत्गुरू पूरण ब्रह्म अनामी ॥ सचिदानंद निरवंधण स्वामी॥१॥ | सबी मांडका सत्गुरू सांई ॥ एकरस ठाढा बाहर माई ॥२॥ गुरू समर्थका ज्ञान अपारा ।। गुणा अतीत आरनहिंपारा॥३॥ रोम रोमकी जाणणहारा ॥ गुरू चेतन अदली दातारा॥४॥ सकल जगतसूं सुरती तोडे ।सत्गुरूके चरणाचित जोडे।।६॥
(४२)
अनुभवप्रकाश।
वाकू सतगुरू तत्व तारे । जन्म मरण भव फंदा टारे ॥६॥
जो जन रक्खेजगत्की आसा।।सोजन्मजन्मभुगतेगावासा॥७॥
वाकू गुरू तारे नाह काई । सत्गुरू जाण सई आई ॥ ८॥
बारे पंथ पट मत अवतारा ।। गुरूका ध्यान धरतहै सारा ॥९॥
अनंत कोटि सीधा गुरू सेवा ॥ गुरू है गति मुक्तिका देवा॥१०॥
वेद संत सत्गुरूकू गावे ॥ महिमा अतिअतोल बतावे ॥११॥
वनानाथ गुरू निर्गुण देवा ॥ उमाराम गुरूमैइरेवा ॥१२॥६॥
राग चौपाई।
ब्रह्म विचार यहीहै भाया॥ लख्या सोई संतनिरभै थाया।टेर॥
निरख्या निर्गुणही निरधारा ॥ निरणै कर यह वचनपुकारा॥३॥
कूटस्थ अक्रिय अमल अपारा॥ आपोई आपथयाएकसारा॥२॥
सो दीसे सो वोही दिखावे ।। रहे सबमाय निजर नहिं आवे॥३॥
जमी असमान रवी नहिं चंदा ।। ज्यांनाहं पांचतीनकाफंदा ॥४॥
कारण कारज वामें नाहि पावे ॥ हेती नेती कह्या न जावे ॥५॥
द्रष्टा दर्शन दृश्य न वाई । ज्ञाताज्ञात अज्ञात तहॅ नाई॥६॥
नित चेतन निज स्वरूपअचाई ॥ उमाराम सोई सुखदाई॥६८
राग चौपाई।
वेद हमारी शाखा भाखे ॥ प्रगट यूं निश्चै कह दाखे ॥ टेर ।
मेहरम हमारा झीणेते झीणा ॥ मैंही चेतन महापरवीणा ॥१॥
निरणा हमारा हमहीं सोजी।। हमही बोध स्वरूप निरभोजी॥२॥
अंस हमारे उपाई माया ॥ तामै भेद अनंतां थाया॥३॥
गावणके पद। (४३) सारा चरित अंस दिखलावे ॥ सबीदिखाय रहत निरदावे ॥४॥ अंस हमारे विरा नहिं कोई ॥ एकोई एक कबूं नहिं दोई ॥५॥ माया उपजी मायाई विनासी॥ हमहीं अमर थया अविनासी॥ उमारांमचेतन निरवाणी॥अपणी लक्ष आपही छाणी॥७॥६९॥ रागशुभ। साधो भाई सत् निश्चै उरधारा ॥ खुल्या भंडार गैबका वायक। अनुभव भया उचारा टेर। तजी जगत जगकी मरजादा ॥ अवर तज्या व्यवहारा ॥ धरम करम याहीकू त्याग्या ॥ त्याग्या विपै विकारा ॥१॥ मैं मेरेका खोज मिटाया ॥ हूं नहि रह्या लिगारा ॥ अब मेरे हरि अंतर नाही ॥ ओत प्रोत एक सारा ॥२॥ रोम रोम चेतन प्रकाश्या ॥ असंख्य भानु उजियारा॥ यही ज्ञान ब्रह्मका कहिये । अपणा आप विचारा ॥३॥ यही लक्ष दोनूं कहे शाखा ॥ यही जाण तत् सारा ॥ उमाराम खबर कर भाखी ॥ लख्या सन्त इतबारा ॥४॥७० ॥ राग शुभ। साधो भाई योही बात परवाणा॥ सोजी कर सत् किया निवेडा। छूटी खेचाताणा ॥टेर॥ दोई बात सारे कोई सत जन ॥ जिनही चेतन जाना ॥ सत् सो सत् मिथ्या सो मिथ्या ॥ यही निकालस ज्ञाना ।। १ मिथ्या जगत सत् आतम तत् ।। दोनूं बात बताई ॥
(४४),
अनुभवप्रकाश।
सत्का भाव अभाव जगत्का ॥ हमारे तो निश्चै आई ॥२॥
झूठी माने साचन ठाने । उलटी ताणे वादी ॥
बातां करे विवेक न जाणे ॥ है इन्द्रयांका स्वादी ॥३
वे, नहिं इतकावे नहिं उतका ॥ लटक रह्या अध बीचा ॥
मैं बडपणमें जन्म गमाया। वे डूवा विश्वा वीसा ॥४॥
संत शास्त्र आई पुकारे ॥ रती झूठ नहिं कोई ॥
यह समझ्या सो पाया परमपद॥ सवी मिटाया भोई ॥५॥
सतगुरू कृपा साध संगतसूं ॥ निरख लिया तत्सारा ॥
उमाराम साच कही बातां ॥ वेदा नहीं लिगारा ॥६॥७१॥
राग शुभ।
साधो भाई आतमज्ञान बताया। भजण तजण दोनूते न्यारा ॥
वचन परे कह गाया।टेर ॥
उगड्या नैन विचार चानणा ॥ तम अज्ञान विलाया ॥
सचित आनंद अनूप आतमा ॥ यह निश्चै ठहराया ॥ १ ॥
आतम अमर मरे नहि जनमे ॥ नित निर्गुण निग्दाया॥
पाप पुण्य सुख दुख नहि ज्यामें।अलख अकरता थाया॥२॥
चेतन आप बडा महा जाणी॥ सबही चेत दिखाया ॥
चेत चेताय चेतनूं न्यारा ।। रहता अलाग अजाया ॥३॥
अगम निगमशोभा कह थाकी । कहणीमें नहि आया।
अविगत अकथ कथ्या नहिंजावे । सेनीमे समझाया ॥४॥
|साच झूठका किया निवेड़ा ॥ आतम परचा
पाया ॥
उमाराम मिट्या अलुजाड़ा । चेत लेश नहिं माया ॥५॥७२॥
गावणके पद। (४५) - राग शुभ। साधो भाई रमझ समझ लखगाया।यही रमझकू सत लखाणा॥ जिनी परमपद पाया। देर ॥ निर्गुण अकथ का नहिं जावे ॥ सोई सुझ पठाया ॥ गुंझनूं'गुंझ मिलाय गुंझ किया ॥'ज्यूका त्यूं दरसाया ॥१॥ चेतन ख्याली दिरस खड़ी करी ॥ ब्रांड अनंत थपाया ॥ ऊंच नीच वैकुंठ चौरासी ।। दृश्यही माय रचाया ॥२॥ अन्दर बाहर चेतन ठाडा ॥'जाण स्वरूपी थाया ॥ सबकी सार चले वाहते ॥ आप रहे निरदाया ॥ ३ ॥ नहिं कोई उपज्या नहीं मिटाणा॥ नहिं भूला नहिं पाया॥ आपोइ आप अवर नाहि दूजा॥ चेतन सदा रहवाया ॥४॥ दृश्य भावना अलप बताई ॥ निर्गुण 'साच ठहराया ॥ उमाराम उदै भया ज्ञाना ॥ परपंच सबी विलाया ॥६॥७३॥ राग आसा। साधो भाई सो जोगी निरभोई ॥ विगड़ी विपे राखे नहिं सूरा ॥ निज निश्चै. पत पोई ॥ टेर।। बिगडया लोक संबी कोई केती ॥ बिगड न जाणे कोई ॥ विगडया नाम उनीको कहिये । सकल वासना खोई ॥ १ ॥ विपय इच्छा गृह सब जग बिगडया ॥ गाढी करकर गोई ॥ विन इच्छा देखे नहि सामा ॥ बहुविध बात पजोई ॥२॥ विषय इच्छा पकडी सोडूवा ॥ लख चौरासी ढोई ॥ ( अनुभवप्रकाश आ बिगडी सुधरी कोउ माने ॥ जन्म जन्म लग रोई ॥३॥ सकल लोकका भाव मिटावे ॥ दूर करे मन दोई .॥ जोजन आदि ठिकाणा परस्या ॥ सुधरया कहिये सोई ॥४॥ सत्संगत सतगुरूकी कृपा ॥ लिया रहत घर जोई ॥ उमाराम सार सत्भाखी ॥ लख्या सो निरभै होई ६॥७॥ राग आसा। साधो भाई खोजीखोज विचारे॥खोज्या सोई पूरण पद परस्या॥ सुरती संत पुकारे ॥ टेर॥ कहा कारण यह स्याल कहाया ॥ काकू हेला मारे ॥ कहा कारण यह फिरे भटकता ॥ किसविध खे वारे ॥१॥ आपा करके स्याल कहाया ॥ मन हूं हेला धारे ॥ विषय वास कर फिरे भटकता ॥ या विध करके बारे ॥२॥ विषय वास मन आपा छोडे ॥ शुद्ध स्वरूप विचारे ॥ जब दरसे पूरण ब्रह्म पोते ॥ गुणा अतीत अपारे ॥३॥ | दरपणके सुख अंदर बाहर ॥ अन्दर बार देखारे ॥ अंदर बार नही दरपणमें ॥ यूं चेतन एक सारे ॥ ४ ॥ चित्त जड सूक्षमथूल कल्पना॥ज्यां नहिं लेस लिगारे ॥ उमाराम सदा सत् सोई ॥ पारब्रह्म निराधारे ॥५॥७५ ॥ रागआसा। साधो भाई चेतन ब्रह्म लखाना।। सत्की सैन समझ कर भाखी।। वा घरका यह म्याना ॥ टेर।
गावणके पद। (४७) हरहर करता भया दिवाना ॥ हेरत रह्या हेराना ॥ रोम रोममें वास तुमारा ॥ यह मन लिया इमाना ॥३॥ इचरज रूप अपंबर तेरा ॥ निराकार निज ज्ञाना ॥ निशिदिन इडग डिग्या नहिं कबहूँ॥सत् चिद् आनन्द.रहानार त्याग न राग जगत नहिं जोगी ॥ बन्ध मुक्त नाहं ध्याना॥ सब साधू कहता यूं आया। सुरती करत बयाना ॥३॥ सतगुरूकी कृपा भई हम ऊपर ॥ टूटा सकल अज्ञाना ॥ उमाराम जुगत कर जोया ॥ पूरण ब्रह्म विज्ञाना ॥४॥७६॥ राग आसा। साधो भाई तज दुरमत गम गोई ॥ है वो सदा सरोवर समरथ।। अगम निगम कह दोई ॥ टेर॥ संस्कृत गीता पट पढीया ॥ करम उपासन सोई॥ नेती नेती वेद पुकारे । सो क्या विध कर जोई ॥१॥ यो निर्गुण अकथ गुणासूं न्यारा ॥ ज्यां आश्रम वरनन कोई॥ भाव अभाव परे परमेश्वर ॥ सत्गुरू सैन पजोई ॥२॥ वो अखे अगोचर अकल अजूणी ॥ सकल कला संजोई ॥ आप असल सब नकल बणाई ॥ ऐसा समर्थ वोई ॥३॥ निरमल नूर हजूर विराजे ॥ सब व्यापक निरभोई ॥ क्या जस करूं कह्या नहिं जावे ॥ वासू मालुम होई ॥ ४॥ गूंगे का सा स्वपना कहिये ॥ यूं निश्चै है वोई॥ उमाराम सदर लख दाखी ॥ नहिं कोई गम्या न ढोई॥५॥७॥ ४ (४८) अनुभवप्रकाश - राग आसा। साधोभाई बेरंग कह्यान जाई॥ नित निर्वाण अगोचर आतम ॥ कहणी लगे न काई ॥ टेर॥ ज्यू पावक पाहणमे व्यापक ॥ जले बूझे ' वी नाई ॥ शीतल ताव लगे नहिं उनके । यूं सच्चिदानन्द सांई ॥ १ ॥ घन बादल नभ करके भ्यासे ॥ रंग रूप ता माई सवते' व्योम निरंतर थाया। यूं निरलेप गुसांई ॥२॥ गुणा अतीत रूप नहि रेखा ॥ अगम अज्ञाद रेवाई ॥ निष्किंचन नित अमल अकरता ॥ सत शास्त्र गाई ॥ ३ ॥ सेवा ध्यान लगे नहिं सिमरण ॥ सवी उपाव थक जाई ॥ उमाराम अज्ञे निजआतम ।। को कुण लखे लखाई ॥४॥७८ ।। राग आसा। साधो भाई निर्गुण ब्रह्म अथागा|आपे परे आप अविनासी ।। अगम निगम कहे साखा ॥ टेर॥ निर्गुण सवी गुणातूं न्यारा ॥ ज्यां धरम अधरम न लागा॥ स्वर्ग नर्क ऊंचा नहि नीचा ।। नहिं सूता नहिं जागा ॥१॥ हर्प नशोक वियोग नजोगी। नहिं पीछा नहिं आगा ॥ वेद कतेब वचन नहिं पहुंचे ॥ रहता अखे अलागा ॥२॥ सूक्षम रूप अनामीअविगत निहिं बंधण नहि त्यागा ।। सदा सुचेत परम प्रकाशी ॥ नहिं विछड्या नहि सागा ॥३॥ नहि कोई ज्ञान नहीं अज्ञाना॥ नहिं जूझे' नहि भागा ॥
गावणके पद। (४९) उमाराम है ज्यूँका त्यूही । नित चेतन अनुरागा ॥४॥७९॥ राग आसा साधो भाई नीर बूंद सम जोई ॥जीव शीवका किया विचारा॥ ओत प्रोत नहिं दोई ॥ टेर॥ पाणी कर जीवांकी उतपुत ॥ जात वरण -कुल होई ॥ नकुल आप रहत पाणी ज्यूं तां कुल कारण नहिं कोई ॥१॥ जलमें नाम अनन्त आकारा। चलता जीव कहाई॥ पाणी ज्यूं चेतन सारामें ॥ लिपे नही थिर माई ॥२ ऊंच नीच मोटा अरु छोटा । नामरूपमें होई ॥ पाणी ज्यूं आतम एक सारा ॥ है ज्यूका त्यूं सोई ॥३॥ वनानाथ गुरू अभै अकरता ॥ नहीं प्रीय नहि द्रोही । उमाराम गुरू शिष्य एकही। शिव स्वरूप निरभोई ॥४॥८॥ राग आसा। साधो भाई ज्यूं मुख मुक्कर दिखारा। देख दिखाय दिष्टनहिआवै। चिदानंद निरधारा ॥टेर॥ चेतन पुरुप आदि अविनाशी । उनतें सकल पसारा ॥ एक रोमतें सब जग भ्यासे । रेता आपई न्यारा ॥१ चवदे लोक उतपती इच्छा ॥ ऊंच नीच विस्तारा ॥ दीसे सो मायाका खिलका ॥ है मृग नीर विकारा ॥२॥ अखे अनूप अभोग न भोगी। नहिं कोई भोग भोगारा ॥ नित निरमल पूरण प्रकाशी। नहिं कोई देव पुजारा ॥३॥ ५
(५०)
अनुभवनकाशा
बनानाथ गुरू निकलंक निबंधणनिहिं इच्छा आदि संसारा ॥
उमाराम सोई निर आवरणानिहि कोई मिल्यानन्यारा॥४॥८॥
राग आसा।
साधोभाई आतम अखंड अनासी।एक अरु दोयअनेक न वामें।।
निज खोज्या सोई पासी ॥ टेर॥
बारे पंथ पट दरसण सुणज्यो । सैन कहुआ साची ॥
महरम अकथ दूरसे दूरा । ओलख लिया अविनाशी ॥१॥
वाके अंस खडी कीवी माया ॥ सबी देखावे साखी ॥
नित निज ज्ञान लिपे नहिं किसमें ॥ जाण आपकी भाखी॥२॥
बहु उलझाड मायाके भीतर ।। दुख सुख वैकुंठ चौरासी॥
माया मूल झूठहै वाना ।। आदि अंत मध नासी ॥३॥
परमातम आतम दुई नाही ॥ ओत प्रोत इकरासी ।।
आपोई आप लेश नहि माया ॥ निराधार प्रकाशी ॥४॥
तुरीये अतीत दृश्य नहि दिया ॥ विधिनिषेधऊ निवासी ॥
उमाराम सोई निरवाणी ॥ नित चेतन सुखवासी ॥५॥ ८२॥
राग गुजराती।
ऐसीविध समझ्यारे साधो भाई ॥ निरख लिया तत्सार टेर।
खेल खिलाडी नकल बणाई ॥ चवदे तबक चहुँ खाण ॥
भांत भांतका रंग रचाया || जुदी जुदी करीबाण ॥१॥
आप खिलाडी सबमें पूरण ॥ नेकल सदा निरवाण ॥
सबी नकलमें लिपे न कबहूँ ॥ रहता अलख अवाण ॥२॥
गावणके पद ।
(५१)
बहुधार ॥
रंग नकल दृश्य झूठ तमासा ॥ ख्यालीफू सत् चिद जाण ॥
अधर अलोकी लोक न कोई ॥आपोई आप पिछाण ॥३॥
झीणेते झीणा दिष्ट न आवे ॥ चेतन सोई सुजाण ॥
बावन अक्षरमें नहिं आवे ॥ सत लख्या वो छाण ॥४॥
वनानाथ गुरू दुरस दिखाया ॥ परब्रह्म परमाण ॥
उमाराम गम गैब पिछाणी॥ उदै भया ज्ञान भाण ॥५॥ ८३॥
राग गुजराती।
अनभौ सोजीरे साधो भाई ॥ प्रगट भाखीरे विचार ॥ टेर ॥
अखे पुरुपते धरता भ्यासे॥ धरतामें
स्वर्ग नर्क दोई भाव इनीमे ॥ धरम करम विस्तार ॥१॥
आप अलख धरतातूं न्यारा ॥ है दिटा निरविकार ॥
सब माये पूरण आप अलागी । अखे पुरुप निराकार ॥२॥
अखे सारकू संत पिछाणी ॥ धरता तज्या रे विकार ॥
आपमे सूते रहाणा ॥ धरता नहीं रे लिगार ॥ ३॥
वो तो लय विक्षेप कोउ नाहीं ॥ नहि कोइ धार अधार ॥
उमाराम सोई है निबंध ॥ नित चेतन एक सार ॥ ४॥८४॥
रागगुजराती।
आत्मज्ञान योई रे साधो भाई ॥ परख कही सत् सार ॥ टेर॥
सत रज तम तिहु भाव माई ॥ चेतन भरया भरपूर ॥
तिहूँ भावतें चेतन न्यारा ॥ अलख अनामी नूर ॥ १ ॥
(५२)
अनुभवप्रकाश।
लेय ॥
.
चेतन माय तिर्गुण भाव कलपित ॥ आप भाव सहि मूल ॥
उत्पत्ति स्थिति
ज्यामें नहीं कोई ॥
चेतन अन असथूल ॥२॥ ज्ञाता ज्ञात अज्ञात न ज्यामें
नाहिं भेला नहिं दूर ॥ ऊंचा नहिं नीचा ॥
आगा नाहं पीछा ॥ सत् चिद् आनंद-सवूर ॥३॥
गुणा अतीत सदा शुद्ध केवल ।। आपोई आप हजूर ।।
उमाराम सोई है चेतन ॥ जाणे सन्त कोई सूर ॥४।। ८५ ॥
पद राग।
खोजी खोज खबर कर खोज्या ॥ है ज्यूं वचन निहारा ॥
समझेगा सत्गुरूका चेरा ॥ जाण किया निरधारा ॥ टेर॥
शब्द गुरूका निकलंक तेगा॥ जिन लागा सो पारा ॥
दया करे देवे जब सूझे ॥ शब्द गुरुका इसारा ॥१॥
वोई शब्दहै अलख अजाती ॥ नित निर्गुण निराधारा ॥
अति अपरबल अनंद स्वरूपी॥ छिनमें रच्या पसारा ॥२॥
बाहर भीतर आप विराजे ॥ चेतन ब्रह्म अपारा ॥
हिले चलें उपजे नहि विणसे ॥ ऐसा सिमरथ प्यारा ॥३॥
गृहा शब्द सोई संत सीधा ।। मिटगया सबी विकारा ।।
संत शब्दके दूज न कोई ॥ जाण हुवा एक सारा ॥४॥
वनानाथ गुरू शब्द सुणाया॥ दिया शब्द तत् सारा ।।
उमाराम लिया सरधा कर ॥ काट्या भेद विकारा ॥६॥८६॥
गावणके पद। (५३) ब्रह्म अलागी पदराग। दृश्यादृश्य अदृश्य न ज्यां ॥ पूरण ब्रह्म अथाया। जाण भूल दोऊंका दिष्टा ॥ है ज्यूं निश्चे,थाया ॥ टेर॥ सदा निरमला ॥ निरहंकार थाया ॥ छिपत अनेक रूप बहु भांती ॥ उन्हीं पुरुष दिखाया ॥१॥ गुणा अतीत विदेह न देहा ॥ अथंग थाग नहिं भाया । शुद्ध स्वरूप सबीके सामल ।। रहे सवसूं निरदाया ॥२॥ वेद कतेब संत कह थाका ॥ अक्षरमे नहिं नहिं आया ॥ अन अक्षर चेतन ब्रह्म कहिये । आपोई आप रेवाया ॥३॥ राग द्वेपकी धुंध मिटाणी ॥ मैं तूं मूल गमाया। उमाराम खुल्या निज नेत्र ॥ ज्यूँका त्यूं दरसाया ॥४॥८७॥ पदराग। ऐसी रमझ समझ कह दाखी ॥ ब्रह्म वारता योई॥ काना मात लगे नहिं टेवा ॥ आतम ज्ञानी जोई ॥ टेर॥ अज्ञ तज्ञ कारण नहि कारज ॥ सक्षम स्थूल नहि कोई ॥ लय विक्षेप आस्त नहिं नास्त ॥ चेतन ब्रह्म अलोई ॥१॥ विधि निषेध उथाप थापना ॥ नाम रूपमें होई॥ तीन शरीर अवस्था तिर्गुण ॥ झूठ झबाका दोई ॥२॥ ज्यूं वन एक वृक्ष बहु जाती॥ सबी दिखावे तोई ॥ यूं शुद्ध स्वरूप अवर नहि तामे ॥ जाणी जाण पजोई ॥३॥ निरधोखे आतम निरबंधण ॥ अज अविनासी सोई ॥
(५४)
अनुभवप्रकाश
उमाराम नितोनित चेतन ॥ निराधार निरभोई ॥ ४॥ ८८॥
पद राग।
मेरी सूझ परख कहि पूरण ॥ निश्चै वचन पुकारा ॥
अगम निगम शाखा कह उभी ॥ यह मेरा इतबारा ॥टेर ॥
मेरापेच बांधीया मैहीं ॥ विधी · विधी विस्तारा ॥
मेरा पेच पेचमूं न्यारा ॥मै अपेची हूं प्यारा ॥१॥
हूं सव माय सबी मो माई ॥ यही पेच हमारा ॥
सारांको चेतन द्रष्टा ॥ निरबंधण एक सारा ॥२॥
जगत भक्त भजनी नहिं मोंमें ॥ नहिं ब्रह्मंड
पसारा॥
आदि अलेख लेख नहिं मोंमे ॥ लेखा सबी असारा ॥३॥
महरम हमारा हमही जाणे ॥ हम, अगम अपारा ।।
हूं तूं नाहि सोई हूं उमा ॥ मेरा किया विचारा ॥ ४ ॥८९॥
पदरागा
सत् गुरू महर करी मेरे पर ॥ ज्ञान विज्ञान लखाया।
निश्चै कही अगमकी शाखा ॥ वेद इसी विध गाया। टेर।
असंख्य जुगांके कहूं आगली । ज्यां सुंन असुन न माया ।।
शुद्ध स्वरूपी चेतन सांई ॥आपोई आप रेवाया ॥३॥
नहि कोई आदि अंत मध वाको ॥ पांच तत्त्व नहि काया॥
नहिं कोइ स्वर्ग मृत्यु पाताला ॥ पारब्रह्म अथाया ॥२॥
परमपुरुषका पार न कोई ॥ जिन एक मता उपाया।
आप मांये करी इच्छा अपरखल ॥शक्ती नाम दिराया ॥३॥
गावणके पद। (५५) आदि पुरुपकी अर्धशरीरी ॥ रिलमिल बात बणाया ॥ सगत सवागण रचो सृष्टिकू । हुकुम पुरुप दरसाया ॥४॥ होताई हुकुम शक्ति करी जलदी ॥ वेगाई हुकुम समाया ॥ पुरुप पराक्रम लिया शक्तिने ॥ तत्वे तीनूं जाया ॥५॥ चवदे लोक इकीसूं ब्रह्मंड ॥ तिर्गुण मांय रचाया। ब्रह्मा उत्पत पालणा विष्णू ॥ शिव संघार भोलाया ॥६॥ तिर्गुण भेद चले सगतीसूं ॥ जुदा जुदा दिखलाया ॥ तीनूं देव शक्तिके सारे ॥ आदि पुरुप निरदाया ॥७॥ पारब्रह्म सूते प्रकाशी ॥ सबमें रहत अचाया ॥ घटत बधत गुण माया भीतर ॥ सदाई वो केवल थाया ॥८॥ सबी विकार गुणांके भीतर ॥ कल्पत भाव कहाया ॥ ब्रह्म माये छाया जूं माया ॥ परमपुरुप एक राया॥९॥ बनानाथ भेट्या गुरू पूरा ॥ सत्चिद् अनन्द बताया। उमाराम सोई पद परस्या ॥ भेदाभाव मिटाया।॥१०॥९॥ पदराग। पूरण सेन योई तत् सारा ।। जाण वचन दरसाया॥ समझेगा सत्गुरूका चेरा ॥ परमपद जिन पाया ॥ टेर।। परलां अरु परलांसूं न्यारा ॥ ज्यांका अगम विचारा॥ ताका अबे भिन्न भिन्न करके ॥ सत्भाखू निरधारा ॥३॥ नित परलाकी कहूं वारता ॥ सांझ पड्या सब सोवो ॥ विसवे सकल नींदमे मिटेगी॥ नित परला यह जोवो ॥२॥ परला निमत कहीजे योही ॥ देही भावना भावना भाकू॥
(५६) कई समै यह देही विणासे। परला निमत कह ताकू ॥३॥ बमार खाण सौरासी जाती॥ जीता जूण विलाया॥ तम हेयर माल्य होसी । यह पिरथी परला बताया ॥४॥ महा मलमकी गित बता॥ यामें झूठ न कोई ॥ मामा सब सुन भिटज्यासी ॥ महा परला है सोई॥५॥ परा भार शास्त्र गावे ॥अगम साख कहयोई ॥ मा भेद भाव गदि पलका कह दाखी निरभोई ॥६॥ गामा पा उपजे शिणासी । परा याके माई ॥ पारमहा मामा पिन थापा ज्यूं का त्यूँ साई॥७॥ पारमहाक्षी सत् सत्ताते ॥माया सबी दिखाया। सत् भाराम परमातम एको निकलंक सदा रेवाया ॥८॥ ज्ञाग भागममाश्या भीतर ।। माया सबी मिटाणी ॥ जगाराम आपकी सोजी। चेतन आप पिछाणी॥ ९॥९१॥ पदराग। खोजी सोग खोजीया पूरा ॥ नहीं वृद्ध नहि हाना॥ निरगलज्ञान कसा कर निरणे॥ श्रीपुरु निर्यण शरु सर्गणका निश्मा ॥ परम पार पार पायो माई आये। मात ल मागजी शश पुरुपका प गोग गाला निर्यास भति तशगत राक्षयक या बना खातीर शा .
गावणके पद। (५७) निर्गण जहां जहां सर्गुणहे । उभै अंग परखाना ॥ जू वृक्ष वृक्षकी छाया ॥ यूं वे भाव थपाना ॥४॥ सर्गुण रेत आसरे आदू ॥ निर्गुण तणे लखाना ॥ निर्गुण पुरुष कहीजे प्रेरक ॥ सर्गुण श्री बखाना ॥५॥ निर्गुणकी सर्गुण अर्धगिया॥ साची सूझ पटाना ॥ जिनकी आदि कछू नहिं आवे ॥ दोऊं अनाद रेवाना ॥६॥ जबही पुरुप चेतावे माया॥ श्री धरे बहु वाना ॥ बिना चेतायां कबहूं नहिं चेते ॥ ऐसा पुरुप सुजाना ॥७॥ सब सरवांके अन्दर बाहर ॥ ज्यूं प्रकाशत भाना ॥ ऐसे पुरुप रखी ज्यूं दिया ॥ बोध स्वरूप निधाना॥ ८॥ पांच पचीस समष्टी व्यष्टी ।। रज तम सत् गुण ठाना ॥ ये सब श्री फरक नहिं तामें ।। ठोड़ ठौड़ परवाना ॥ ९ ॥ निर्गुण पितामात पुनिसर्गुण ॥ यामे भेद न माना ॥ अचल पुरुपतें अचल श्रीहै ॥ ज्यूं है त्यूं दरसाना ॥१०॥ मा है सुंन पिताहै चेतन ॥ येही रमझ निरवाना ॥ पिता हमारेकी मा है शोभा ॥ अवर नहिं कोई आना ॥११॥ माताकू माता ज्यूं समझ्या ॥ पिताकू पिता समाना ॥ अदल विचार विचारयाअदली ॥ कर निरधार भकाना ॥१२॥ समझ्या संत भाके आसोजी ।। गावे वेद वेद पुराना उमाराम सारनिज सारी।। परम यथारथ जाना॥ १३॥९२॥ पदराग। एसी विगत समझ कह राखी ॥ सुणियो संत सुजाणा ॥ ॥
(५६)
अनुभवप्रकाशा
॥
केई समै यह देही विणासे । परला निमत कह ताकू ॥३॥
च्यार खाण चौरासी जाती ।। जीवा जूण विलाया ॥
तम हंकार माये लय होसी । यह पिरथी परला बताया ॥४॥
महा प्रलयकी विगत बताऊं ॥ यामें
झूठ न कोई॥
माया मूल सुंन मिटज्यासी ॥ महा परला है सोई॥५॥
परला चार शास्त्र गावे ।। अगम साख कहयोई ।।
यामें भेद भाव नहि पलका | कह दाखी निरभोई ॥६॥
माया कलपत उपजे विणासी ॥ परला याके मांई
पारब्रह्म माया बिन थाया ॥ है ज्यूं का त्यू सांई ॥७॥
पारब्रह्मकी सत् सत्ताते ॥ माया, सबी दिखाया।
सद आतम परमातम एको । निकलंक सदा वाया ॥८॥
ज्ञान भान प्रकाश्या भीतर ॥ माया सबी मिटाणी ॥
उमाराम आपकी सोजी। चेतन आप पिछाणी॥९॥९१॥
पदराग।
खोजी खोज खोजीया पूरा ॥ नही वृद्ध नहि हाना॥
निरमल ज्ञान कह्या कर निरणे ॥ श्रीपुरुषका म्याना ॥ टेर॥
निर्गुण अरु सर्गुणका निश्वा ॥ परम अज्ञाद
कहाना ॥
वार पार वाको नहि आवे॥ मात लगे नहिं काना॥१॥
हमही अंश पुरुपका परतक । जानत सोई ठिकाना॥
मोय मालम निर्गुण सर्गुणकी ॥रती न हमते छाना ॥२॥
अति सूक्षमते सूक्षम कहिये । निर्गुण सर्गुण ज्ञाना ॥
जुदा जुदा जुगतीनं भाका । प्रगट करूं बयाना ॥ ३ ॥
गावणके पद। (५७) निर्गण जहां जहां सर्गुणहैं । उभै अंग परखाना ॥ जूं वृक्ष वृक्षकी छाया ॥ यूं वे भाव थपाना ॥४॥ सर्गुण रेत आसरे आदू॥ निर्गुण तणे लखाना ॥ निर्गुण पुरुष कहीजे प्रेरक ॥ सर्गुण श्री बखाना ॥५॥ निर्गुणकी सर्गुण अर्धगिया ॥ साची सूझ पटाना ॥ जिनकी आदि कछू नहिं आवे॥ दोऊं अनाद खाना ॥६॥ जबही पुरुप चेतावे माया॥श्री धरे बहु वाना ॥ बिना चेतायां कबहूं नहिं चेते ॥ ऐसा पुरुप सुजाना ॥७॥ सब सरवकि अन्दर बाहर ॥ ज्यूं प्रकाशत भाना ॥ ऐसे पुरुप खी ज्यू दिया । बोध स्वरूप निधाना ॥८॥ पांच पचीस समष्टी व्यष्टी ।। रज तम सत् गुण ठाना ॥ ये सब श्री फरक नहि तामें ।। ठौड़ ठौड़ परवाना ॥ ९ ॥ निर्गुण पितामात पुनिसर्गुण ॥ यामें भेद न माना ॥ अचल पुरुषतें अचल श्रीहै । ज्यूं है त्यू दरसाना ॥१०॥ मा है सुंन पिताहै चेतन ॥ येही रमझ निरवाना ॥ पिता हमारेकी माहै शोभा ॥ अवर नहि कोई आना ॥ ११॥ माताळू माता ज्यूं समझ्या ॥ पिताकू पिता समाना ॥ अदल विचार विचारयाअदली ॥ कर निरधार भकाना ॥ १२ ॥ समझ्या संत भाके आसोजी ॥ गावे वेद पुराना उमाराम सार निज सारी ॥ परम यथारथ जाना ॥ १३॥९२॥ पदराग। एसी विगत समझ कह राखी ॥ सुणियो संत सुजाणा ॥ ॥
(६२) अनुभवप्रकाश। - हमहीं सारा खेल पसारा ॥ तीनों लोक रच्या संसारा॥ मोतें चले कला यह सोई ।। हमही अचल चले नहिं कोई ।। १॥ मेरा ज्ञान सदा एक सारा ॥ सवी कलाकू परखण हारा॥ तीनलोकमों मांय असारा ।। हमहीं चेतन अगम अपारा ॥२॥ मोमें दृश्य अदृश्य न पावे ।। हेती नेती कहां ठहरावे ॥ तुरीया अतीत अनादीथाया ॥ नहिं हम गया नहीं हमआया॥३॥ जाण हमारी हमर्हि पिछाणी ॥ निर्गुण अमल थया निरवाणी ॥ उमारामअमरअविनाशी ॥ आपोईआपस्वयंप्रकाशी॥४॥३०॥ राग कानडा। आपोईआप अवर नहि कोई ॥नामरूपभ्रमकी नहिं सोई।। टेर।। हूं निबंध फंद नहिं हमारे ॥ जोग विजोग वार नहि पारे॥ मेरी गती लेखी नहिं जाई ।। आदि अंत मध मेरे नहिं काई ॥१॥ मेरा स्वरूप सुते प्रकाशी ॥ निरालेप अद्वैत एकरासी ॥ नाम रूप जग मोंते भ्यासे । सभर भरया निरभै निरआस॥२॥ वेद बहुविध किया विचारा ॥ तिरविध भाव कहकर हारा॥ नेती वचन साख दोउं कहिया । मेरामहरम मैंई लखरहिया॥॥ हम हमारी आ जाण बताई ॥ यामें भेद भाव कछु नाही। निज स्वरूप निश्चैहै योई। उमाराम चेतनहै सोई॥४॥ १०१॥ राग आसा। साधो भाई निर्गुणकी गम याई॥जाण विगत साची कह दावू ॥ भेदाभेद न काई ॥ टेर।।
गावणके पद। (५७) निर्गण जहां जहां सर्गुणहै ।। उभै अंग परखाना ॥ जूं वृक्ष वृक्षकी छाया। यूं वे भाव थपाना ॥४॥ सर्गुण रेत आसरे आदू ॥ निर्गुण तणे लखाना ॥ निर्गुण पुरुप कहीजे प्रेरक ॥ सर्गुण श्री बखाना ॥५॥ निर्गुणकी सर्गुण अर्धगिया। साची सूझ पटाना ॥ जिनकी आदि कछू नहिं आवे ।। दोऊं अनाद खाना ॥६॥ जबही पुरुप चेतावे माया ॥ श्री धरे बहु वाना ॥ बिना चेतायां कबहूं नहिं चेते॥ ऐसा पुरुष सुजाना ॥७॥ सब सरवांके अन्दर बाहर ।। ज्यूं प्रकाशत भाना ॥ ऐसे पुरुप खी ज्यूं दिया ॥ बोध स्वरूप निधाना ॥८॥ पांच पचीस समष्टी व्यष्टी ।। रज तम सत् गुण ठाना ॥ ये सब श्री फरक नहिं तामें ॥ठौड़ ठौड़ परवाना ॥ ९ ॥ निर्गुण पितामात पुनिसर्गुण ॥ यामें भेद न माना ॥ अचल पुरुपते अचल श्रीहै ॥ ज्यूं है त्यूं दरसाना ॥१०॥ मा है सुन पिताहे चेतन ॥ येही रमझ निरवाना ॥ पिता हमारेकी माहे शोभा ॥ अवर नहिं कोई आना ॥ ११॥ माताकू माता ज्यूं समझ्या ॥ पिताकू पिता समाना ॥ अदल विचार विचारयाअदली । कर निरधार भकाना ॥ १२ ॥ समइया संत भाके आसोजी ।। गावे वेद पुराना उमाराम सारनिज सारी॥ परम यथारथ जाना॥ १३॥९२॥ पद राग। एसी विगत समझ कह राखी ॥ सुणियो सत सुजाणा ॥ ॥
(५६)
अनुभवप्रकाश
केई समै यह देही विणासे ॥ परला निमत कह ताकू ॥३॥
च्यार खाण चौरासी जाती ॥ जीवा जूण विलाया ॥
तम हंकार माये लय होसी ।। यह पिरथी परला वताया ॥४॥
महा प्रलयकी विगत बताऊं ॥ या झूठ न कोई॥
माया मूल सुंन मिटज्यासी ॥ महा परला है सोई॥५॥
परला चार शास्त्र गावे ॥ अगम साख कहयोई॥
यामें भेद भाव नहि पलका ॥ कह दाखी निरभोई ॥६॥
माया कलपत उपजे विणासी ॥ परला याके
याके माई ॥
पारब्रह्म माया बिन थाया है ज्यू का त्यूं सांई ॥७॥
पारब्रह्माकी सत् सत्ताते ॥ माया. सबी दिवाया॥
सद आतम परमातम एको ॥ निकलंक सदा रेवाया ॥८॥
ज्ञान भान प्रकाश्या भीतर ॥ माया सबी मिटाणी ॥
उमाराम आपकी सोजी॥ चेतन आप पिछाणी ॥ ९॥ ९॥
पदराग।
खोजी खोज खोजीया पूरा ॥ नहीं वृद्ध
नहि हाना॥
निरमल ज्ञान करा कर निरणे ॥ श्रीपुरुषका म्याना ॥ टेर॥
निर्गुण अरु सर्गुणका निश्वा ॥ परम अज्ञाद कहाना ॥
वार पार वाको नहिं आवे॥ मात लगे नहि काना ॥१॥
हमही अंश पुरुपका परतक ॥ जानत सोई ठिकाना ॥
मोय मालम निर्गुण सर्गुणकी ॥ रती न हमतें छाना ॥२॥
अति सूक्षमते सूक्षम कहिये । निर्गुण सर्गुण ज्ञाना ॥
जुदा जुदा जुगतीनं भाका ॥ प्रगट करूं बयाना ॥ ३ ॥
गावणके पद। (५७) निर्गण जहां जहां सर्गुण हैं । उभै अंग परखाना ॥ जू वृक्ष वृक्षकी छाया॥ यूं वे भाव थपाना ॥४॥ सर्गुण रेत आसरे आदू॥ निर्गुण तणे लखाना ॥ निर्गुण 'पुरुष कहीजे प्रेरक ॥ सर्गुण श्री बखाना ॥५॥ निर्गुणकी सर्गुण अर्धगिया ॥ साची सूझ पटाना ॥ जिनकी आदि कछू नहिं आवे॥ दोऊं अनाद खाना ॥६॥ जबही पुरुप चेतावे माया॥ श्री धरे बहु वाना वाना ॥ बिना चेतायां कबहूं नहिं चेते ॥ ऐसा पुरुप सुजाना ॥ ७॥ सब सरवांके अन्दर बाहर ॥ ज्यूं प्रकाशत भाना ॥ ऐसे पुरुप रखी ज्यूं दिष्टा ॥ बोध स्वरूप निधाना॥ ८॥ पांच पचीस समष्टी व्यष्टी । रज तम सत् गुण ठाना ॥ ये सब श्री फरक नहिं तामें ॥ ठौड़ ठौड़ परवाना ॥ ९ ॥ निर्गुण पितामात पुनिसर्गुण ॥ यामे भेद न माना ॥ अचल पुरुपते अचल श्रीहै ॥ ज्यूं है त्यूं दरसाना ॥१०॥ मा है सुंन पिताहै चेतन ॥ येही रमझ निरवाना ॥ पिता हमारेकी मा है शोभा॥ अवर नहि कोई आना ॥ ११॥ माताकू माता ज्यूं समझ्या ॥ पिताकू पिता समाना ॥ अदल विचार विचारयाअदली ॥ कर निरधार भकाना॥१२॥ समझ्या संत भाके आसोजी ॥ गावे वेद पुराना ॥ उमाराम सार निज सारी। परम यथारथ जाना॥ १३॥९२॥ पदराग। एसी विगत समझ कह राखी ॥ सुणियो संत सुजाणा ॥
(५६)
अनुभवप्रकाश
केई समै यह देही विणासे । परला निमत कह ताकू ॥३॥
च्यार खाण चौरासी जाती ॥ जीवा जूण विलाया।
तम हंकार माये लय होसी ।। यह पिरथी परला बताया।॥४॥
महा प्रलयकी विगत बताऊं ॥ यामें झूठ न कोई ।।
माया मूल सुंन मिटज्यासी ।। महा परला है सोई ॥६॥
परला चार शास्त्र
गावे ।। अगम साख कहयोई॥
यामें भेद भाव नहि पलका ॥ कह दाखी निरभोई ॥६॥
माया कलपत उपजे विणासी ॥ परला याके
याके मई ॥
पारब्रह्म माया बिन थाया॥ है ज्यू का त्यूं सांई ॥७॥
पारब्रह्मकी सत् सत्तातें ॥ माया. सवी दिखाया ॥
सत् आतम परमातम एको ॥ निकलंक सदा रेवाया ॥८॥
ज्ञान भान प्रकाश्या भीतर ॥ माया सबी मिटाणी ॥
उमाराम आपकी सोजी॥चेतन आप पिछाणी॥९॥९१॥
पद राग।
खोजी खोज खोजीया पूरा ॥ नही वृद्ध नहि हाना ॥
निरमल ज्ञान करा कर निरणे ॥ श्रीपुरुषका म्याना ॥ टेर॥
निर्गुण अरु सर्गुणका निश्चा॥ परम अज्ञाद कहाना ॥
वार पार वाको नहिं आवे ।। मात लगे नहिं काना ॥३॥
हमही अंश पुरुपका परतक । जानत सोई ठिकाना ॥
मोय मालम निर्गुण सर्गुणकी ॥ रती न हमते छाना ॥२॥
अति सूक्षमते सूक्षम कहिये ॥ निर्गुण सर्गुण ज्ञाना ॥
जुदा जुदा जुगतीनं भाका ।। प्रगट करूं बयाना ॥ ३ ॥
गावणके पद। (५७) निर्गुण जहां जहां सर्गुणहै । उभै अंग परखाना ॥ जू वृक्ष वृक्षकी छाया। यूं वे भाव थपाना ॥४॥ सर्गुण रेत आसरे आदू ॥ निर्गुण तणे लखाना ॥ निर्गुण पुरुष कहीजे प्रेरक ॥ सर्गुण श्री बखाना ॥५॥ निर्गुणकी सर्गुण अर्धगिया ॥ साची सूझ पटाना ॥ जिनकी आदि कछू नहिं आवे॥ दोऊं अनाद रेवाना ॥६॥ जबही पुरुष चेतावे माया॥श्री धरे बहु वाना ॥ बिना चेतायां कबहूं नहिं चेते॥ ऐसा पुरुष सुजाना ॥७॥ सब सरवांके अन्दर बाहर ॥ ज्यूं प्रकाशत भाना ॥ ऐसे पुरुप रखी ज्यूं दिष्टा ॥ बोध स्वरूप निधाना ॥ ८॥ पांच पचीस समष्टी व्यष्टी ।। रज तम सत् गुण ठाना ॥ ये सब श्री फरक नहिं तामें ।। ठौड़ ठगड़ पखाना ॥ ९ ॥ निर्गुण पितामात पुनिसर्गुण ॥ यामें भेद न माना ॥ अचल पुरुपतें अचल धीहँ । ज्यू है त्यूँ दरसाना ॥ १० ॥ मा है सुंन पिताहे चेतन ।। येही रमझ निखाना ॥ पिता हमारेको माहे शांभा॥ अवर नहिं कोई आना || १३॥ माताकू माता ज्यूं समझ्या ॥ पिताहू पिता ममाना ॥ अदल विचार विचारयाअदली । कानिधार नाना||R! समझ्या संत भाके आसोनी ।। गाई सुगना उमाराम सारनिज सारी। पाम यथास्य जाना। ५२॥ पदराग। ऐसी विगत समझ कद राखी । मुगिया नंत मनाना अनुभवप्रकाशा ॥ जाणलिया जिन सही ठहराणा।जाकू दरस्या ठिकाणा ॥टेर॥ ऐसा ख्याल निरत पर निरख्या ॥ कह बतलाऊं बैणा ।। आदि जुगादि आगला मरमें ॥ सो दरसाणा नैणा ॥१॥ निर्गुण निरालभ निरवाणा ॥ बिना भोम थिर थाणा ॥ सब मिटज्याय शेप रह वोई ॥ सो चेतन परखाणा ॥२॥ च्याएं खूट दिशू दिस पूरण ॥ चेतन ब्रह्म रहाणा ॥ निहचल आप अनादी केवल ॥ नहि कोई विपै मिलाणा॥३॥ चेतन भेद कहणसूं न्यारा ॥ वाणी न्यारा ॥ वाणी वेद थकाणा ॥ ज्ञेय ज्ञाता कोउ ज्ञान न लागे॥ नहि कोई भूल सयाणा॥४॥ वनानाथ गुरू समझ पठाई ॥ पारब्रह्म परवाणा उमाराम सधर घर पाया। दृश्य हंकार मिटाणा ॥५॥९३॥ पदराग। निर्गुण ब्रह्म निरतसूं निरख्या ॥ वचना अतीत रेवाणा ॥ ज्यू गूंगा गुड़ मीठा समझ्या ॥ जैसे यह गम गाणा ॥टेर ॥ ब्रह्म विचार परखिया चसमा ॥ प्रगट सत्सुख परम प्रकाश अप्रमें ।। पारब्रह्म निरवाणा ॥१॥ अण घड अलख अपरवल देवा ॥ डाल मूल बिन थाणा ॥ आपोई आप अवर नहिं दूजा ॥ सदर सदा ठहराणा ॥२॥ ब्रांड पिड आसरे उनके ॥ तीन लोक कमठाणा ॥ भाव अनेक धरया भांडामे ॥ क्रिया करम भोलाणा ॥३॥ अटल अभंगी सबका संगी। नित पूरण रहवाणा ॥ सबतें गुप्त आपका परमंद ॥ अति अमर महा जाणा ॥४॥ कहू पिछाणा ॥
गावणके पद।
(५९)
ग्रथ अनन्त वेद पट वाणी ॥ यही सार विगताणा ॥
याका खोज खबर कर खोज्या॥ यह निबंधण छाणा ॥५॥
वनानाथ गुरू दिया मुजाका । अदल छाप परवाणा ॥
उमाराम सहि भई मालम ॥ साचो साच पठाणा ॥६॥९४ ॥
राग कानडा।
आतम परम प्रकाश सजाती ॥ ज्यां नहिं तिर्गुण तिमिर
विजाती ॥ टेर ॥
उत्पती थिति लय सब माया ॥ शुद्ध चेतन निरमाया थाया ॥
अध्ये चेतन अज अविनासी।जानहिं उत्पतिथितिअरु नासी १
| खुल्या बंद्या एक अरु दोई ॥ चेतन खुल्या बंध्या नहि कोई ॥
सर्व उपाधीते न्यारा सोई ॥ आपोई आप सदा निरभोई ॥२॥
चेतन अखे आर नहि पारा नहि कोई क्षर अक्षर नहि धारा ॥
सत् समर्थ सूक्ष्म निराकारा नहीं मध मिल्या नहिं न्यारा॥३॥
नित चेतन निवाण अचाई ॥ज्यां गुण मायावाण नहि काई ॥
उमाराम अजूणी अनन्तानाह कोई आदि मध्य अरु अंता॥४॥
राग कानडा।
अगम अगोचर अलख अजाती।और न पार दूर नहि साती टेर
नित्यानित्य कारणी माया ॥ कारण मठ कारज घट काया ॥
आवागवण इनीमे होई । कारण कारज है मिथ्यादोई ।। १॥
कारण कारज चेतन कर हूवा ॥ है सब माये सभी ते जुवा ।।
चेतन मे घट मठ नहि पावे ॥वाहर भीतर रहे निरदावे ॥२॥
(५८) अनुभवप्रकाश। जाण लिया जिन सही ठहराणाजाकू दरस्या ठिकाणा ॥टेर॥ ऐसा ख्याल निरत धर निरख्या ॥कह बतलाऊं बैणा ॥ आदि जुगादि आगला मरमें ।। सो दरसाणा नैणा ॥१॥ निर्गुण निरालभ निरवाणा ॥ बिना भोम थिर थाणा सब मिटज्याय शेप रह वोई । सो चेतन परखाणा ॥२॥ च्यारूं रखूट दिशं दिस पूरण ॥ चेतन ब्रह्म रहाणा ॥ निहचल आप अनादी केवल ॥ नहि कोई विपै मिलाणा॥३॥ चेतन भेद कहणसूं न्यारा ॥ वाणी वेद थकाणा ॥ ज्ञेय जाता कोउ ज्ञान न लागे । नहिं कोई भूल सयाणा॥ ४ ॥ वनानाथ गुरू समझ पठाई ।। पारब्रह्म परवाणा ॥ उमाराम सधर घर पाया।। दृश्य हंकार मिटाणा ।। ६॥ ९३ ॥ पदराग। निर्गुण ब्रह्म निरतमूं निरख्या ॥ वचना अतीत वाणा : ज्यूं गूंगा गुड़ मीठा समझ्या ॥ जैसे यह गम गाणा ॥ टेर। ब्रह्म विचार परखिया चसमा ।। प्रगट सत्सुख परम प्रकाश अप्रमे ॥ पारब्रह्म निरवाणा ॥१ अण घड अलख अपरवल देवा ॥ डाल मृल बिन थाणा आपोई आप अवर नहि दूजा ॥ सदर सदा ठहराणा ॥२ ब्रह्मंड पिड आसरे उनके । तीन लोक कमठाणा भाव अनेक धरया भांडामे ॥ क्रिया करम भोलाणा : अटल अभंगी सबका संगी॥ नित पूरण रहवाणा सवते गुप्त आपका परमंद ॥ अति अमर महा जाणा ॥ कहू पिछाणा गावणके पद। (६१) यूं सच्चिदानन्द निकलंक थाया॥आपो आप भूल नहिं पाया३॥ चेतन भूल रचाई ऐसी॥ आप खिलारी बडा अपेची ॥ भूल दिखाय भूलमें नाई ।। ऐसा चेतन अलख गुसांई ॥४॥ भूल झवाका मिथ्या सारा ॥ चेतन सदा सत् निराधारा ॥ उमाराम भूलकू जाणी॥ मेट भूल परस्या निरवाणी॥६॥९८|| राग कानड़ा। भरम भूत• जाण्या ऐसा ॥ इन्द्रजालके खिलके जैसा ॥ टेर ॥ भरम माय यह पडीया वेदा ॥ छोटा बडा हुवा दोय भेदा ॥ भरम मांय यह लोक परलोका॥ योही भरमका कहियेधोका १॥ आश्रम वरण भरमके माहीं ॥ धरम करम व्यवहारा याहीं॥ ज्ञानी मूढ भरमहीं गया ॥ बंधणमुक्त भर्मकी क्रिया ॥२॥ भाव अनन्तां भरम समाया॥ भांत भांत कर भरम बंधाया। मोटा भूत भरम यो भारी ।। सवी कल्पना भरम विचारी ॥३॥ | पारब्रह्म निकालस नूरा ॥ शुद्ध स्वरूप आपही पूरा ॥ तामें लेशभरमका नहिं कोई ॥ आपोईआपअचल निरभोई॥४॥ चेतन सुते भरम उपजाया। आप भरमतें न्यारा थाया। अलप भरम मृगतृष्णा झाई ।। नित चेतन ज्यूं का त्यू सांई ॥५॥ केवल ज्ञान कहीजे योई ।। संत शास्त्र भाखे सोई ॥ उमाराम अभै पद पाया॥ सहजे साराभरम विलाया ॥६॥९९।। रागकानडा। निश्चै सूझ केवल म्हारी॥ आपणी जाण आपही सारी। टेर ।।
(६०) अनुभवप्रकाश अकल कलानित चेतनथाया।कारण कारज विना सधर रहवाया अखंड अतोल अदेख अपाराविरला संत लखे यो सारा ॥३॥ आतम अज 'अकारण सांई ॥ ज्या हेति नेति दोऊं नाहीं॥ अपणा आप प्राप्त आत्म ॥ उमाराम सोई अध्यात्म ॥४॥९६॥ राग कानडा। ऐसी रमझ लखे संत कोई ।। ज्याकू दरस्या चेतन सोई॥ टेर।। तिर्गुण पांच तत् देह धारी ॥ भांत भांतकर बंध्या विकारी ॥ सबहि उपाधी इनीके भीतर ॥ आतम चेतन रहे निरंतर ॥१॥ उपजे मिटे फेर होय जासी॥ पांचू तत् तीन गुण नासी ॥ तिर्गुण भेद कल्पना योई ॥ कर महरम भाखी निरभोई ॥२॥ सारी कला अकल दिखलावे ॥ अकल कलामें हात न आवे ॥ शुद्ध स्वरूप ब्रह्म एक सारा ॥ तामें नाम रूप नहि हंकारा॥ वनानाथ गुरू अलख अपारा॥ शुद्धाद्वैत अंदर नहिं बारा ॥ द्वैताद्वैत तहां नहिं लिगारा।। उमाराम सोई जाणण हारा।।४॥९७॥ राग कानडा। विरला संत लखे आसोजी॥जिनलखि जिन मेटया भोजी॥टेर।। चवदे लोक मूल माहिं भासा।। स्वर्ग नर्क सुखं दुख माहि आशा ॥ पांच तीन अरु नव पट आठयही भूलमे वणियाथाठा॥१॥ दीपक तारा चंद उजासा ॥रात माये यह सब प्रकाशा ॥ यूई भुलमे सबी विस्तारा ॥ ब्रह्मा तिरण बंध्या आकारा ॥२॥ भानु उदै हुवां रात विलावे॥ तारा चंद दीपक कहां पावे ॥
गावणके पद। (६१) यूं सच्चिदानन्द निकलंक थाया॥आपो आप भूल नहिं पाया३॥ चेतन भूल रचाई ऐसी ॥ आप खिलारी बडा अपेची ॥ भूल दिखाय भूलमें नाई ॥ ऐसा चेतन अलख गुसांई ॥४॥ भूल झबाका मिथ्या सारा ॥ चेतन सदा सत् निराधारा ॥ उमाराम मूलकूजाणी ॥ मेट भूल परस्या निरवाणी॥५॥९८॥ राग कानड़ा। भरम भूतकू जाण्या ऐसा॥इन्द्रजालके खिलके जैसा ॥ टेर।। भरम मांय यह पडीया बेदा ॥ छोटा बडा हुवा दोय भेदा ॥ भरम मांय यह लोक परलोका ॥ योही भरमका कहियेधोका ॥ आश्रम वरण भरमके माहीं ॥ धरम करम व्यवहारा याहीं॥ ज्ञानी मूढ भरमहीं गृया ॥ बंधणमुक्त भर्मकी क्रिया ॥२॥ भाव अनन्तां भरम समाया। भांत भांत कर भरम बंधाया। मोटा भूत भरम यो भारी । सबी कल्पना भरमविचारी ॥३॥ पारब्रह्म निकालस नूरा ॥ शुद्ध स्वरूप आपही पूरा ॥ तामें लेशभरमका नहिं कोई ॥ आपोईआपअचल निरभोई॥ चेतन सुते भरम उपजाया। आप भरमतें न्यारा थाया। अलप भरम मृगतृष्णा झांई ॥ नित चेतन ज्यूं का त्यू सांई ॥६॥ केवल ज्ञान कहीजे योई ।। संत शास्त्र भाखे सोई ॥ उमाराम अभै पद पाया॥ सहजे साराभरम विलाया ॥६॥९९॥ रागकानडा। निश्चे सूझ केवल म्हारी ॥ आपणी जाण आपही सारी॥ टेर॥
(६२) अनुभवप्रकाश। हमहीं सारा खेल पसारा ॥ तीनों लोक रच्या संसारा॥ मोते चले कला यह सोई॥ हमही अचल चले नहिं कोई ॥१॥ मेरा ज्ञान सदा एक सारा ॥ सबी कलाकू परखण हारा॥ तीनलोक मों मांय असारा ॥ हमहीं चेतन अगम अपारा॥२॥ मोंमें दृश्य अदृश्य न पावे ॥ हेती नेती कहां ठहरावे ॥ तुरीया अतीत अनादीथाया। नहिं हम गया नहीं हमआया॥३॥ जाण हमारी हमहिं पिछाणी ॥ निर्गुण अमल थया निरवाणी ।। उमारामअमरअविनाशी आपोईआपस्वयंप्रकाशी॥४॥१०॥ राग कानडा आपोईआप अवर नहिं कोई॥नामरूप भ्रमकी नहि सोई॥ टेर॥ हूं निरबंध फंद नहिं हमारे । जोग विजोग वार नहि पारे ।। मेरी गती लखी नहि जाई ॥ आदि अंत मध मेरे नहिं काई ॥१॥ मेरा स्वरूप सुते प्रकाशी ॥ निरालेय अद्वैत एकरासी । नाम रूप जग मोतें भ्यासे । सभर भरया निरभै निरआसे॥२॥ वेद बहुविध किया विचारा ॥ तिरविध भाव कहकर हारा॥ नेती वचन साख दोउं कहिया ॥ मेरामहरम मैंई लखरहिया॥३॥ हम हमारी आ जाण बताई ।। यामें भेद भाव कछ नाही। निज स्वरूप निश्चै है योई॥ उमाराम चेतनहै सोई॥४॥१०१॥ राग आसा। साधो भाई निर्गुणकी गम याई॥जाण विगत साची कह दावू ॥ भेदाभेद न काई ॥ टेर॥
गावणके पदं ।
(६३)
समर्थ जैज जलदसूं न्यारा ॥ जैज
जलद ज्यां नाही ॥
जैज जलद वाहूतें भ्यासे ॥ सर्व प्रकाशी सांई ॥१॥
सारी खलक मुलकका मालक ॥ है साराके माई ॥
आना लेप सारांके साथे ॥ रहे जहांका ज्याई ॥२॥
अविगत गती दूरसे दूरा ॥ बोली लगे न ताई ॥
वेद सन्त नेती कह ऊबा ॥ फेर कह को काई ॥३॥
नहिं कोई विद्या नहीं अविद्या ॥ बंध मुक्त नहि वाई ॥
उमाराम निजानंद चेतन ॥ समर्थ आप गुसांई ॥४॥ १०२॥
राग आसा।
साधो भाई लख गुरूगम गमगाया|या गमकू कोई संत पिछाणे।।
बहुर जन्म नहिं आया ॥ टेर॥
सत्गुरू समर्थ सेन
लखाई ॥ सत् चेतन दरसाया ॥
अलख अरूपी अवरण स्वामी ॥ परब्रह्म परसाया ॥ १॥
सच्चिदानंद आनंद अखडी ॥ कर इच्छा जग थाया ॥
इच्छातें चाले जग सारा ॥ आप रहे निरदाया ॥२॥
रोम रोम सारामे पूरण ॥ निरालेप विन काया ॥
जग मिथ्या स्वामी सत् वोई ॥ आतम अनत अजाया ॥३॥
ब्रह्मंड पिड उपाधी सारी ॥ मृगजल ज्यूं दरसाया ॥
अद्वैत आप द्वैत नहि तामें ॥ गुरू मुख ज्ञानी पाया ॥४॥
भलक्या ज्ञान
भाण प्रकाशा॥ इच्छा भेद विलाया ॥
उमाराम लक्ष कह ताकी ॥ आपोई आप रहवाया ॥६॥१०॥
(६४) अनुभवप्रकाश । राग आसा। साधो भाई सत् निश्चै कहुं बैणा ॥ यही विगतकू संत लखाणा। निरखलिया निज नैणा ॥टेर ॥ पारतें पार परेरा रहता ॥ नेडेसुं रह रह नेडा ॥ नेडा दूर दोईके सामल । बीच भरया ब्रह्म सेणा ॥१॥ वा समर्थकी समर्थकी एक पलकतें ॥ ब्रह्मंड अनंत हुवाणा ॥ आप अपल पलमें नहिं आया॥ आदू पुरुप पुराणा ॥२॥ ब्रह्मा आदि तिणखला भीतर ॥ पूरण आप रह वाणा ॥ गेह न तजे मिले नहीं न्यारा ॥ नहीं वो मिट्या हुवाणा ॥३॥ आगे अनंत कोट संत कहग्या ॥ फेर अनंत कह कहणा ॥ गीता वेद पुराण शास्त्र । सबमें या विध जाणा ॥४॥ वेद संतकी साख यथारथ ।। भिन्न भिन्न किया पीयाणा ।। उमाराम अकलकी सैना ॥ सत् भाक्या परवाणा ॥५॥१०॥ राग आसा। साधो भाई ज्ञान अज्ञान बताया॥ इचरज वडा बातका योई॥ सत् खोजी सहि थाया ॥ टेर॥ पडी सारा जुग भूला ॥ आपेमे लपटाया। आपे बिना आप सारामें ॥ ताका मरम न पाया ॥१॥ है सब आप उलट नहिं देखे । यही भूल कहाया ॥ आपा छोड आप सच्चिदानंद ॥ आदू आप अथाया ॥२॥ आदि अंत मध आप एकसा ॥ कबहुं न पलट्या भाया।
गावणके पद। (६५) पलट्या सब दीसे सो मिथ्या ॥ सागे वेण सुणाया ॥३॥ आपणी जाण आपही जाणे ॥ज्यूं गूंगे सैन चलाया। नहिं दूजा दूजाका पाईये ॥,आपोइ आप रहवाया ॥४॥ भेद आपका भेद ने कोई ॥ ऐसे जाण जणाया॥ उमाराम आप बिन आपे । सैनीसैन पजाया ॥५॥१०५॥ रागा आसा। साधो भाई कर मेहरम दरसाई॥ उपजे रह मिटे मायाई ॥ भूल कहीजे आई॥ टेर॥ पारब्रह्म का सत् शब्द है ॥ सो आतम है सांई ॥ शब्द ब्रह्मतें सवी फोरणा ॥ आप अफुर रहवाई ॥ १ ॥ शब्द ब्रह्मतें शब्द अनंता ॥ नाना भांत दिखाई ॥ आप अभांती भांत न राखे ॥ सोहं ब्रह्म अथाई ॥२॥ सबी कलेश करमते न्यारा॥ सबमें रहत अचाई ॥ अकल स्वरूपी आप अनादी ॥ वेद संत आ गाई ॥३॥ सोहं शब्द निज ज्ञान कहीजे ॥ भेद नहीं ता माई ॥ शब्द, ब्रह्म पारब्रह्म एकहै ॥ सूर घाम दुइ नाई ॥४॥ सचिदानंद आनन्द अपारा ॥ मुखसूं कह्या न जाई ॥ आपोई आप अवर नहिं दूजा ॥ उमाराम लख थाई ५॥१०६॥ राग आसा। साधो भाई पागी पारख लाया ॥ प्रगट जाणे कह्या परवाणा॥ साचा खोज बताया ॥ टेर॥
(६६) अनुभवप्रकाश पारब्रह्मकी सता अपरवल ॥ सारा खेल रचाया ॥ नाना भांत भावना नाना ॥ सब माये सता अचाया ॥१॥ सकल सृष्टिमें सता है केवल ॥ ज्ञान कहलावे भाया ॥ सो आतम परमातम है ऐसे ॥ अग्नि उष्ण एक राया ॥२॥ आतम चेतन सकल प्रकाशी ।। नहिं कोइ करम न काया।। सदा अकरता आप विराजे ॥ शुद्ध स्वरूप रेखाया ॥३॥ धरण न गगन दिवस नहिं राती ॥ नहिं कोई धूप न छाया ।। धरम करम सेवक नहि स्वामी ॥ चेतन जाण रहवाया ॥ ४ ॥ अपणी बात आपकू मालुम ॥ आपही खेल खिलाया ॥ आप बिना दूजा नहिं दरसे ।। उमाराम निज थाया।।६।।१०७|| रागआसा। साधो भाई समझे संत सुजाणा-।। के समझे सत् गुरूका चेरा॥ जिनही साच पठाणा ॥ टेर॥ अनुभव ज्ञान उदै हुवा अन्दर ॥ परम पुरुपकू जाणा ॥ वाकी सूझ खबर कर भाकू ॥ येही वचन परवाणा ॥१॥ नहिं वो अन्दर नहिं वो बाहर ॥ नहीं दूर नहिं नेरा ॥ नही वो गुप्त नही वो परगट ॥ आपोई आप रहेरा ॥ २ ॥ वा समर्थकी सत्तासत्तें ॥ सुते किया कमठाणा ।। सृष्टि अनन्त अनन्त अवतारा॥ ब्रह्मड अनन्त थपाणा ॥३॥ सारा खेल सता दिखलावे ॥ आतम सोइ कहाणा ॥ रह सब माय मिले नहिं किसीमें ॥ निराधार ओलखाणा ॥४॥ सब खिलका माया माहि कहिये । यह मिथ्या दरसाणा ॥
गावणके पद।
(६७)
आतम सत् अमर अविनासी ॥ यह विवेक निज छाणा ॥५॥
परमातम आतम हे एको ॥ यही रमझ
निरवाणा॥
उमाराम विचारा योई॥ सारा भरम विलाणा ॥६॥१०८॥
राग आसा।
साधो भाई खूब खबर कर हेरा ॥ शुद्ध स्वरूप सुते प्रकाशी॥
तहां नहीं सांझ सबेरा ॥टेर॥
आतम अगम अगोचर सांई ॥ नहीं ज्यां मेरा न तेरा॥
हूं तूं दोनूं परे परमपद ॥ नहिं कोई मिल्या विसेरा ॥१॥
नजीकतें नजीक दूरतें दूरा ॥ दूर निकट बिच
निकट बिच डेरा॥
गया न आया गुम्या नहिं पाया॥ नहिं कोई ढक्या उगेरा ॥२॥
आदि अरु अंत मध्य मायाकी ॥ आतम अनन्त अखेरा॥
आतममें माया कहां पावे ॥ नित चेतन निरभरा ॥३
अगम निगम वाणी नहिं पहुंचे ॥ रहता वचनऊ परेरा॥
उमाराम अलेप असंगी॥ निरविकार दिष्टेरा ॥४॥ १०९ ।
राग आसा।
साधो भाई यह केवल निरधारा॥ सव मिथ्याका किया निवेडा॥
याही जाण सब पारा ॥ टेर॥
सत्स्वरूप आतम नित चेतन ॥ निरमन थया अपारा॥
उण आतमसूं मन हुवा प्रगट ।। ज्यूं बंझ्या घरखारा ॥१॥
मन अभिमानी सकल जगतको ॥ मान्या बहुत प्रकारा॥
द्वैत अरु अद्वैत मानीया ॥ यामें कलपण हारा ॥२॥
(६८) अनुभवमकारा। ॥ ब्रह्मा होयके मानी उतपती॥ होय शिव मान्या संघारा ।। विष्णु होयके मानी पालणा। यह मन भाव विचाग॥३॥ मनही धरण पवन अरु पाणी ॥ मनही तेज अकाशा ॥ मनही चवदे भवन दिशि च्यारूं ॥ जुदाजुदा कर भ्यासा।। ४ ।। मनही समंद नदी अरु वाला ।। मनही पर्वत आठा मनही चंद सूर दिन राती ॥ यह सब मनका थाठा ॥५॥ मनही तीर्थ व्रत हे जप तप ।। मन दातार भिख्यारा ॥ मनही मनुष्य देव अरु दानव ॥ मन लिया सव अवतारा ॥६॥ मनही ज्ञानी ध्यानी अज्ञानी ॥ मनगुरू मन चेला ॥ मनही वरण व्यवहार आश्रम ॥ यह सब मनका खेला ॥७॥ मनही पाप पुण्य है सुख दुख ॥ स्वर्ग नर्क मन माना॥ जो माने वाहीकू भुगते ॥ महा उपाधिकी खाना ॥८॥ अनन्त कल्पना मनके माहीं। मनहै झूठ पसारा ॥ आतममें मन लेश न पावे ।। यह निरणा तत्सारा ॥९॥ अगम अरु निगम ज्ञान योइ गावे ॥ प्रगट करे पुकारा ।। उमाराम आप सत् जाण्या॥ खूटा मन विकारा॥१०॥११०॥ राग आसा। साधो भाई ब्रह्म विचार अपारा। चेतन जाण जणाई चेतन ॥ चेतन जाणणहारा ॥टेर॥ परमातम परब्रह्म पुरुपोत्तम ॥ परमदयालू मोजी ॥ वेई उदै हुवा महा अनुभौ ॥ सो दरशाऊं' सोजी ॥१॥ परम पुरुपोत्तम महा अकरता।। महा करताहै सोई गावणके पद। (६९) आप निरंतर प्रगट वरते ॥ करण अकरणा दोई ॥२॥ व्यष्टी अरु समष्टी नाना, रचे पलकों केई ॥ पल पल मांय करे महापरला॥ ऐसा समर्थ वेई ॥३॥ उपजावण विणसावण हारा ॥ अति परवीण वेई दाता ॥ आप कबूं उपजे नहिं विणसे ॥रेता अनादू ज्ञाता ॥ ४ ॥ नहिं कोई भाव अभाव रूप वे ॥ चेतन आप असंगी ॥ नहि भेला न्यारा नहिं कामं ॥ निराधार बेरंगी ॥५॥ अविगत गती ब्रह्मकी कहिये ॥ मती न पहुंचे वाई ॥ विधविध वेद वाक्यकह छूटा॥ लगे नहीं है नाई ॥६॥ बोध स्वरूप अजन्मा आतम ॥ शुद्ध साक्षात आ वाणी ॥ सदाउद्योत सुचेत सर्वगत ॥ उमाराम सोई जाणी ॥७॥११॥ राग आसा। साधो भाई आगम अकथ कहाणी॥चेतन गतीपिछाणेचेतन ॥ चेतन आप बखाणी ॥ टेरा अगम जाण कहिये आतमकी ॥ सरवां पर विचारा॥ | देख अदेख दृष्टि नहिं पहुँचे ॥ आतम अनन्त अपारा ॥१॥ प्रगट करूं लक्ष आतमकी ॥ हेती नेती सारूं ॥ सोई यथार्थ 'निरणे करके ॥ अनुभव वचन उचारूं ॥२॥ आतम लियां हेती भ्यासे । नेती सोई जणावे ।। चेतन आप दोईको द्रष्टा ॥ ठौड ठौड वर्तीवे ॥३॥ बंधन वाकी ॥ नेतीसूं निरदाया ॥ निरालंब निरदोप निरंजन ।। अपना आप रेवाया ॥४॥ हेतीमें हद (७०) अनुभवप्रकाश। रहत विशुद्ध अनादी आतम ॥ जाण स्वरूपी सोई॥ मेहरम सदा आपका ऐसा ॥ आप बिना नहिं कोई ॥५॥ निजपद अन कूटस्थ अजनमा ॥ है नहिं जा कैसा ॥ उमाराम एक रस आतम ।। नित जैसाका तैसा ॥ ६॥ ११२॥ राग आसा। साधोभाईयोहीमेहरम महा झीणा॥ अनुभौ उक्त कहीकरनिरण।। लखे संत परवीणा ॥ टेर॥ अनिरवाच आतम पद कहिये ॥ कथा अगोचर वाकी ॥ जाकू परख पारखा भाखू ॥ निगम इसीविध दाखी ॥१ चेतन ब्रह्म ज्ञान घन स्वामी ॥ निरमल अखंड अनूपा ॥ आदिन अंत मध्य नहिं वाको। निकलंक शुद्ध स्वरूपा ॥२॥ सो चेतन सब जगको प्रेरक ॥ सबकू पैरण वेही द्रष्टा बहु देख दिखावे ।। भांती भांत पसारा ॥३॥ घट मठके भीतर अरु न्यारा ॥ नभ निर्भेद रहवाई ॥ यूं चेतन पैरक यूं द्रष्टा । भजे तजे नहि काई ॥४॥ जगका भाव अब न पावे ॥ चिदानंद घन माई ॥ सदा सुचेत विराज्या चेतन ॥ परमानंद गुसांई ॥ ५ ॥ निगे आपकी अनन्त अपारा ॥ आप वडा महाजाणी ॥ आपी लखे आपका निश्वा ।। परतकही परवाणी ॥६॥ मम ओलखाण सोहं प्रकाशी ॥ नही विशेप समाना ॥ उमाराम आतमा चेतन ॥ बंध मुक्त नहिं आना ।। ७॥ ११॥ हारा ॥
गावणके पद। (७१) राग आसा। साधो भाई योई सिद्धान्त कहाई॥ च्यारू वेद हमारी शाखा ॥ प्रगट पुकारे आई ॥ टेर॥ हमही अति अनन्त अलागी ॥ सुते प्रकाश सदाई ॥ आदि अरु अंत मध्य नहि मेरे ॥ रहता अचल अथाई ॥१॥ हमही विधि निषेध उपाई ॥ दो→ भावना भावना थाई ॥ मेरी जाण इनीतें छानी ॥ ग्रहण तजूं नहिं काई ॥२॥ विधिनिषेध भाव क्षेतरका ॥ आई हुई आनाई ॥ योई कल्पना कहणे मात्र ॥ जाण रह्या हूं माई ॥ ३ ॥ हमही अकल गमलगे न है नहि ॥ शिव स्वरूप निज सांई ॥ सो हूं उमाराम अनादू ॥ अपणी सार बताई ॥४॥११४॥ रागप्याला। जग मिथ्या दरस्यारे ॥ सत् चिद निश्चै थया ॥ | भरम ना सबही भागीरे ॥ पूरण प्याला पाया ॥टेर ॥ सतगुरू स्वामी कृपा कीवी ॥ शिरपर हाथ दिया । दया विचार ज्ञान गुंझ पाया ॥ पीवत उदै भया । निज तत्त्व सारया रे ॥ तत्त्व जाण लिया ॥१॥ निराधार अज अव्यय अपारा ॥ निरालम्ब निरमाया । है सब माय सबीसू न्यारा ॥ ऐसा वो चेतन भाया । गम सत् भाखीरे ॥ सोजी कर वचन कया ॥२॥ अखे अजाती दूर न साथी ॥ आपोई आप रहवाया ॥
(७२) अनुभवप्रकाशा ॥ निकलंक नूरा पूरण पूग ॥ अखे अनूप अजाया ॥ सैन यो झीणीरे, ॥ गुरूमुख संत लख्या ॥ ३ ॥ वाकी महिमा गाइय न जावे ॥ वेद संत थक गईया फेर कोई केवे तो कह्या नहिं जावें। सैनी सैन समझाया । अक्षर नहि लागेरे ॥ अंदर मांय ओलखाया ॥ ४ ॥ वनानाथ गुरू आदि अनादी ।। पारब्रह्म निज थाया ॥ उमाराम सत् सोई पिछान्या ॥ अवर धरूं नहि काया ॥ शुद्ध स्वरूप परस्यारे ।। अस्त जड क्वेश विलाया ।।६।।११६॥ राग प्याला। केवल स्वरूप थायारे ॥ नित सत् ज्यूं का त्यूही ॥ सूझ मेरी ऐसीरे ॥अगम निगम गाय रेही ॥ टेर॥ | मेरी तो सार मैहीं पिछाणी ॥ मो बिन दूजा नाई ॥ मेरी सारका वार न पारा । मैंई जाण रह्या माई ॥ सोह प्रकाशीरे ॥ अवर कोई केवे कांईं ॥१॥ मेरी सता कर सब जग भ्यासे । सता दिखावे सोई॥ मेरी तो सताहै मेरे माई ॥ मै अरु सता एक सोई ॥ ज्ञान मेरा योई रे ॥ सबको द्रष्टा मेंई ॥२॥ ब्रह्मा विष्णु महेश चवदा भुवन लग ॥ मोहीतें चालरेया॥ मेरे बिना कोई पल न चाले ॥ मैंई अपल निरदाया॥ एकरस ठाडा रे॥ दूजा मोंमें पावे नाई ॥३॥ नामरूप जग मोंमें नहिं कोई ॥ मेरी है चाल अचाल ॥ उमाराम , सो, चेतन , आदू ॥ मेरा कया स्वाल ॥
गावणके पद। (७३) दूजा नाहिरे अकल गुंझ मेरारे ॥ लखणेमें आवे नहिं कोई ॥ ४ ॥ ११६॥ राग प्याला। रहता आप अखे ।। सिद्धान्त योईरे ।। शाखा दोऊं वचन भखे ॥टेर॥ नहिं कोई दृश्य नहिं अदृश्य ॥ नहिं कोई सूक्षम थूल || नहिं कोई उपज्या नहीं मिटाना ॥ नहीं ज्यां साच न कूर ॥ अनुभव सोजीरे ॥ अपणी आप लखे ॥ १॥ कोशाअतीत कोश नहिं लागे। आप निकालस नूर ।। सबी लोक उनके आधारा ॥ सबको दिष्टा हजूर ॥ निरबंध थायारे ॥ नहिं कोई दूर नखे ॥२॥ कीडी कुंजर ब्रह्मा तिरण मांई ॥ आप रह्या भरपूर ॥ त्याग न संग्रह मारे नहिं तारे॥ नहिं कोई कायर सूर ॥ समर्थ ऐसारे ॥ घट वध नाय रखे ॥३॥ निरभौ निरंतर सदा आतमा॥ नहीं जां माया आंकूर ।। सोई है उमाराम चेतन ॥ परब्रह्म निज सूर ॥ कहणी नहिं लागेरे ॥ वायक सबी थके ॥ ४॥ ११७॥ रागधमाल। सतगुरूकी सैना बडी विशाल।जिन पाई सो भया निहाल ॥टेर। सत्गुरू मिलिया चतुर सुजान ॥ पारब्रह्मकी दीवी पिछाण ॥ निरखतनैना भया निहाल।जनम मरणका मिटगया साल ॥१॥ निराकार निरदोप अज्ञाद ।। हरप शोक नहिं वाद विवाद ।।
(७४) अनुभवप्रकाश। दिवस न रैन घाम नहीं शीत ॥ आपोई आप नहीं हार जीत ॥२॥ अविगत अखे अरूप सुचेत ॥ ज्यां नहिं चेताचेत अचेत ॥ ज्यां नहिं मनमायाका खेल ॥ रहता चेतन अलख अखेल॥॥ कहण सुणणकी बात नहिं कोय ।। गुरू मिलियां आसोजी होय।। वनानाथ गुरू दीवीसार ।। उमाराम सत् लीवी विचारा॥४॥११८॥ रागधमाल। ऐसाउदैहुवाअंदरज्ञानभाणाअनुभौभंडार खुल्यानिजछाणाटेर॥ खोजी खोज पिछाण्या साच ।। वाका निरणा कहू वाच ।। है ज्यूंका ज्यूं देऊं बताय ।। यह सोजीहै अगम अथाय ॥१॥ पारब्रह्म निरमला नूर ।। रहता अद्वै अनादि हजूर।। सोहं रूप सदा एकसार ।। आपोई आप दूजा नहिं लिगार॥२॥ अक्षय अजीत अखे निरकंद ।। ज्ञान अज्ञान नहीं मुक्त बंद ।। भूत भविष्य नहीं ज्यांवरतमान।सत्चिद् आनन्दअमितअमान३ चिदानन्द चेतन निरवाण ॥ वोई परम प्रकाशी जाण ॥ चेत अचेत चेतावे सोय ॥ अद्वै आप जां नहिं एक दोय ॥ ४ ॥ दरशन द्रष्टा दृश्य संसार ॥ यह संब माया अलप असार ॥ शेप वोई रह आवे नहि जात ॥ वेद सन्त ऐसेई दरसात ॥६॥ झीणेसू झीणी यो सैन ॥ मनबुद्धि पहुंचे नहि बेण ॥ आत्मज्ञानका योई विचार ॥ उमाराम सत् जाणण हार६॥११९ राग धमाल। त्रिगुणअतीत अव्ययअपार॥ आपआपका किया विचार ॥टेर॥
गावणके पद। (७५) हमहीं चेतन निराधार ।। देख अदेख नहिं गुप्त जहार ॥ लघु दीर्घ नहि रंक राव ॥ आपोई आपरया समभाव॥१॥ मेरी सता खड़ा किया भेप ॥ ईश्वरी ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ | यामें भाव दिखाया अनेक ॥ सबमें सता विराजे एक ॥२॥ सता हमारी केवल जाण ॥ आतम सोई चेतन निरवाण ॥ मेरी सताहै हमारे मांई ॥ सता हमार अंतर नाई॥३॥ कारण लिग अरु थूल विकार ॥ त्रिगुण माया सबी असार ॥ सत् चिद् आनन्द निरविकार ॥ नितप्राप्ति अपणा आपअपार॥ गुंझ हमारा अती अथाय ॥अगम निगम पहुंचे नहि काय॥ उमाराम चेतनहै सोय। अपणी निश्चै आपकहिजोय॥५॥१२०॥ राग एली। सार निज आपणी सारी ॥ परखण हारा आप ॥ टेर॥ भूला स्वरूप आपना आतम ॥ होय रह्या बहुत अजाण ।। मान अनादि जगतकू उरमें ॥ यह गिरली परवाण ॥ १ ॥ विपरयासिंघ शुद्ध सबअपणी ॥ अज्या मानी आण ऐसे जगत मानली आतम ॥ इचरज योई कहाण ॥२॥ लख चौरासी जूण भोगवे ॥ भागे च्यारू खाण ॥ स्वर्ग नर्क सुख दुखकू भोगे॥ पड़ी अनतां हाण ॥३॥ तुं निज ब्रह्म देख तूं तुझकू ॥ आन नही दरसान ॥ तूं नहिं जगत जगत नाहि तोमें ॥ छोड़ जगत्की बाण ॥४॥ रखी माय रजनी नहिं पावे ॥ रजनीमे नहि भाण यूं सब जगत लेश नाहि तोमे ॥ याई थारी ओलखाण ॥५॥ ॥
(७६) अनुभवप्रकाश। तूं सत् चिद् आनंद आतमा॥ तेरी गती पिछाण ॥ नित शुद्ध स्वरूप आतम अखंडी ॥ निराकार महरान॥६॥ आपही जाण भूल दिखलावे ॥ आप भूल नहिं जाण ॥ उमाराम सदा ज्यूँका त्यूं | अनिरवाच निरवाण॥७॥१२१॥ राग एली। अगमकीवारता भाखीरे साधो ।जाणे कोई संत सुजाण ॥ टेर॥ पूछणकी तो दोय बातहै ॥ एक झूठी एक साच ॥ नाम रूप सब झूठी कहणी ॥ आतम सत् अवाच ॥ १॥ दोय बात निरण करी॥ वेदा निरणै करी॥ वेदा नहीं लिगार ॥ साच बातका भाव हमारे ॥ झूठी तजी असार ॥२॥ लाख बातकी योई बात है। योई बात निरदोष ॥ भावे झालो झूठ बातको ॥ के साचीलो सोच ॥ ३ ॥ झूठी बात गिरीसो डूबा ॥ जुग जुग आवा गूण ॥ साच गिरया सोई पार पहुंता ॥ भेट्या अखी अजूण ॥४॥ इसी बात• संत दृढावे ॥ आई वेद दरसाई ॥ वनानाथ गुरू सोजी दीवी ॥ उमाराम लख गाई ॥५॥१२२॥ राग एली। कहणके बार आसोजी रेसाधो कोई गुरूमुख लेसी जाणा।टेर॥ बात करो तो देखके ॥ पीछे बोलो बोल ॥ साच झूठका करो निवेडा ॥ आ मनमें लो तोल ॥१॥ योही बात परवाण है ॥ जग मिथ्या ब्रह्म सत् ॥
गावणके पद । (७७) यही बात श्रुति स्मृति खड़ी पुकारे ॥ निज निरणाकी आ मत् ॥२॥ यही बात चेतनकुं सूझे ॥ सबकू जाणण जाणण हार ॥ निरमाया अद्वैत विराजे ॥ आपोई आप अपार ॥३॥ गूगेकी सैनी ॥ गूंगा माने साच ॥ वनानाथ गुरू निरणे दीवी ॥ उमाराम कही वाच ॥४॥१२३॥ रागएली। ब्रह्मकी सूझ ना योई रे साधो ॥ यही जाण सब पार ॥ टेर। छकिया संत बक्या निरधोखे ॥ सत्गुरूके प्रताप ॥ प्याला गुरू पाया सच्चिदानन्द ॥ निश्चै ओलख्या आप ॥१॥ अति अनन्त अपार अनादू ॥ पारब्रह्म प्रकाश ॥ विधिनिषेध नहिं थाप उथापा ॥ निष्प्रिये अविनास ॥२॥ सारा खेल दिखावे वोई ॥ समर्थ बडा सुचेत ॥ आप अकरता सबको द्रष्टा । सबी दृश्यते रहेत ॥ ३ ॥ नाम रूप मृग तृष्णा जल है ॥ यह मिथ्या दरसाई ॥ चेतन है नित ज्यूँका त्यूंहीं ॥ ज्यां माया नाहं काई ॥४॥ है ज्यूकी ज्यूई कह दाखी ॥ यह निरवंधण वाक ॥ समझ्या जके सत्करमाने ॥ अगम निगम भरे साख ॥५॥ वनानाथ गुरू केवल सोई ॥ तिर्गुण नहीं तरास ॥ उमाराम सदा सत् सोई ॥ अनुभव भाखी साच॥६॥१२४ ॥ रागएली। ब्रह्मका ज्ञान है योहीरे साधो । चेतन जाणे जाण ॥ टेर।
(७८),
अनुभवमफाश।
सोहं ब्रह्म अमर अविनासी ॥ पूरण
सुते प्रकाश ॥
परखण वाला मेंई चेतन ॥ आपोई आप निरास ॥ १॥
कारण लिंग थूल तिहुँ देहा ॥ मेरी सतातें भास ॥
तिर्गुण भाव सताके सारे ॥ मैंई अकरता खास ॥ २ ॥
| मेरी सता सतहै सई ॥ जाण हमारे पास ॥
सता हमारे रोम ने अतर ॥ सदा रह्या एक रास ॥३॥
सबी क्केश गुणमें कहिये ॥ गुण तीनूई नास ॥
निर्विकल्प सत् चेतन आनन्दानहिं गुण गुणी विलास ॥ ४ ॥
अविगत भेद हमारा कहिये ॥ अगम निगम थकी वाच ॥
तुरीया अतीत उमाराम चेतन। मेरा किया अभ्यासा॥५॥१२५॥
राग एली।
चेतनका स्वाल है योईरे साधो। परखणवाला आप ॥ टेर ॥
हमहीं निरालेप निरद्वंदी ॥ नहिं कोई देख अदेख ॥
| दूजा लेश नही मो मांहीं ॥ हमहीं निकलंक एक ॥१॥
पांच ततगुण तीन आददे ॥ हमी दिखाई
दिखाई देख ॥
सबी भावना मोतें भ्यासे । मेरा भाव
अलेख ॥२॥
अचल अखंड सबीको दृष्टा ॥ मेरा सई विवेक ॥
नाम रूप सब मोमें मिथ्या । हमहीं सत् विपेक ॥३॥
शुद्ध स्वरूप सदा सुखाई ॥ योई हमारी टेक ॥
उमाराम निरवंधण नितही ॥ निर्गुण थयाअभेक ॥४॥ १२६॥
गावणके पद।
(७९)
राग एली।
सिद्धान्तका छाणहै योहीरे साधो नहिं कोई द्वैत अद्वेताटेर॥
एक बिना नहिं दोय है ॥ दोय विना नहिं एक ॥
चेतन करके एक दोय है ॥ आप दोय नहिं मेक ॥१॥
एक दोयके मध्य विराजे ॥ आतम सदा सुचेत ॥
भजे न तजे खुल्या नहि बंध्या ॥ नहिं कोई चेत अचेत ॥२॥
विखरे बणे अकरता करता ॥ एक दोयके माई ॥
याहीमें वैकुंठ चौरासी ॥ स्वामी सेवक यांई ॥३॥
एक दोयमें सबी पसारा ॥यामें लेख
अलेख ॥
चेतनमें याकी सब हाणी ॥ निरअंगी रेया सेख ॥४॥
एक दोय वामें कहां पावे ॥ कहण अकहण न कोई ॥
उमाराम सोई है चेतन ।। निष्प्रिये निरभोई ॥६॥ १२७॥
राग देश।
सूझ सदगुरूजीरी आईए ॥ कर निरधार सार ज्यूंकी त्यूँ ॥
प्रगट गाईए ॥ टेर॥
परमविशुद्ध सूझ सत्गुरूकी ॥ परम प्रकाशीए ॥
महासुखरूप स्वरूप सनातन ॥ अमल अनासीए ॥ १ ॥
क्रांती अनंत गुरू समर्थमें ॥ कला अनंताए ॥
सकल सृष्टिकू धारण हारा॥ आदि न अंताए ॥ २ ॥
परम गुरूके. रोम रोममें ॥ कोट ब्रह्मडाए ॥
सर्वा अतीत सर्वगत व्यापक ॥ अचल अखंडाए ॥३॥
(८०) अनुभवप्रकाशा जो कोई निश्चै सत्गुरुकू ।। ज्याविध सेवेए ॥ बडा दयाल सबी फलदायक । सो फल देवेए ॥ ४ ॥ सर्व मनोरथ पूरण हारा ।। सत्गुरू स्वामीए ॥ पलपल मांय खबर ले सबकी ।। वे अंतरयामीए ॥५॥ मुखहै सहस सहस दोय जिह्वा ॥ शेपजी ध्यावेए ॥ नये नये ले नाम नितो नित ॥ पार न आवेए ॥६॥ नर असुर संत सनकादिक ॥ गावे साराए ॥ चारूं वेद गाय कह गुरूकू ॥ अगम अपाराए ॥७॥ बनानाथ सत्गुरू सच्चिदानन्द । अखे सदाईए ॥ उमाराम गुरू मैई चेला || दुतिया ढाईए ॥ ८॥ १२८॥ राग प्रभाती। निज अनुभवकी पारखा ॥ अनभोई जाना ॥ अनभोई अनभी कया ॥ अनभौका म्याना ब्रह्मवेता ब्रह्मरूप है ॥ भाखे वाणी ॥ उभै अंगळू ओलखे ॥ ब्रह्मवेत्ता जाणी ॥ १ ब्रह्म अखंडानन्द है ॥ खंडित नहिं राई ॥ जाण भूल जामें किसी ॥ द्वैताद्वैत न काई ॥२॥ वा समर्थके आसरे ॥ आसरे ॥ माया प्रगटाणी ॥ तेई अविद्या सुन्य है ॥ बहुती फैलाणी ॥ ३ ॥ पांच तत्त्व पांचं विपे ॥ गुण तीन पसारा पिण्ड ब्रह्मंड खंडहै ॥ माया विस्तारा ॥४॥ चवदे भवन , चऊंखाण लो ॥ प्रकृति वंच्या ॥ । - गावणके पद। (८१) स्वर्ग मृत्यु पाताल लों ॥ भिन्न भिन्न भई इछ्या ॥५॥ न्यून विशेष समान है ॥ क्रिया करत अनेका ॥ पाप पुण्य दुख सुख सबे ॥ अन आतम लेका ॥६॥ नाना मार्ग मार्गी ॥ नाना इट उपासा नाना ज्ञानी ज्ञान है ॥ तिर्पणमें भ्यासा ॥ ७ ॥ सर्व भेद माया मई ॥ भावाभाव विकारा ॥ ब्रह्म अचल निरलेपहै ॥ निशिदिन एक सारा ॥८॥ अस्ती भाती प्रिये सिन्धुमें ॥ माया कहां पावे ॥ ब्रह्म सदा साक्षात है। आवे नहि जावे ॥ ९॥ गूढ गति अति ब्रह्मकी ॥नेती निगम कहावे ॥ उमाराम आतम अखे ॥ आपही लखे लखावे ॥१०॥१२९॥ राग प्रभाती। यो निरणा निज स्वरूपका ॥ निज जाण जणाई॥ निज ज्ञानी निश्चै कया॥ निज पारख पाई ॥ टेर ॥ परम यथार्थ ओलख्या ॥ परमातम देवा ॥ जाका - अज्ञाद है ॥शो भा भेवा ॥१॥ नहिं छाने नहिं नहिं जहारहै ॥ आतम अविनासी॥ नहीं आगा पीछा नहीं ॥ परिपूर्ण प्रकाशी ॥२॥ अरध ऊरध नहि बीच है ॥ खोया नहि पाया। निश्चल पद नित प्राप्ति ।। ज्यूँका त्यू थाया ॥३॥ नहीं वा जोग विजोग है। नहीं वां जाण अजाणी।। नहिं विरक्तं नहिं रागहै ॥ निकलंक निरवाणी ॥४॥ अर्थ- अज्ञाद (८२) अनुभवप्रकाश लघु दीर्घ कोउ वा नही ।। नहीं · कोई झूठ न साचा । नहीं विक्षेप एकाग्र ॥ नहिं स्वामी नाहि दासा ॥५॥ नहीं वां च्यारूं अवस्था ॥ देह विदेह न कोई ॥ पांच कोश नहिं भूमिका ॥ चेतन भूमिका ॥ चेतन ब्रह्म सोई ॥६॥ जहां शास्त्र नहिं ज्ञान है ॥ नहिं कोइ सार असारा ।। चळं वाणी खाणी नहीं। पारब्रह्म अपारा॥७॥ स्वास उस्वासा वां नहीं । नही सफंद सफंद निसफदा।। शुद्ध अद्वैत निशंक है॥ नहीं खुल्या नहीं बंदा ॥८॥ कारण कारज वां नहीं ॥ नहीं अधर नहिं धरता ।। उमाराम शुद्ध स्वरूप है ॥ नहि कोइ करता अकरता॥९॥१३० पद राग। साधो भाई हमहीं अपार अचाई॥शब्द अतीत शब्दनहिं पहुंचे। जाण हमारी आई ॥टेर॥ हमही सुते खडा किया मनकू ॥ मेरी सता कर फोरा ॥ ता मन माहें करी बहु सृष्टी॥ कहां सोरा कहाँ दोरा ॥१॥ पुण्यकियांतें स्वर्ग सुख भोगे । पापांते नर्क सिधाया।। पुण्य पाप कारण सुख दुखका । ये मन माये थाया॥२॥ सता हमारी सब दिखलावे ॥ सवी भावना सारे॥ बाहर भीतर सता विराजे ॥ नहि जीते नहिं हारे ॥३॥ मन संसार कल्पना मिथ्या ॥ सता हमारी साची ॥ हम अरु सता सदा एक सारा । निश्चल थया अवाची ॥४॥ भाव अभाव नही मेरेमें । ग्रहण त्याग नहिं कोई ॥
गावणके पद। (८३) नहि कोई करता नहीअकरता। उमाराम है सोई ॥५॥१३१॥ पद राग। साधो भाई पलटाअजब बताया। लखे संत पलटांका मेहरम ॥ सो सत् चेतन थाया ॥ टेर॥ चेतन सुते फोरणा फोरी ॥ ज्यांमे पलट बणाया ॥ पलट दिखाय आप नहिं पलट्या ॥ फुरणा परे रहवाया ॥ १ ॥ पलटा विधिनिषेधही पलटा ॥ पलटा यो दोउं नाहीं ॥ पलटांकू परखे निरपलटी॥ सदा सुचेत गुसाई ॥२॥ नहि कोई ऊंचा नहिं कोई नीचा ॥ दशृं दिशा नहि कोई ॥ नहि कोइ पलट अपलट न पलटा ॥ जाणे चेतन सोई ॥३॥ सत् विचार किया पलटांका ॥ राई वाक नहि कोई ॥ अपणा आप कबूं नहिं पलट्या॥ उमारामहै सोई॥४॥१३२॥ पदराग। साधो भाई निराकार निरधारा निज स्वरूप निरलेप सदाई ॥ अनुभव वचन उचारा ॥ टेर॥ अकथ अमान आतमा चेतन ॥ आपोई आप अपारा ॥ नही ज्यांव्यापक नही अव्यापकानिहींज्या द्वैत लिगारा ॥१॥ वां कोई तीन लोक नहिं तृष्णा ॥ नहिं मन माया हंकारा ध्याता ध्यान ध्येतां नाही ॥ अध्ये स्वरूप हमारा ॥२॥ वां नहिं बंध मोक्ष नहि गुरू शिष्यानिहिं आश्रम वर्ण व्यवहारा ॥ पुण्य पाप सुख दुख तां नाहीं ॥ नहीं ज्या तम उजियारा ॥३॥ F (८४) अनुभवप्रकाश। ज्यां तो नहीं अधरता धरता ॥ नहीं ज्यां गुप्त जहारा ॥ उमाराम अखे अविनासी ॥ आपही जाणणहारा ||४|१३३॥ पदराग। साधो भाई अनिरवाच मम सोई ॥ दरशन दृश्य नहीं ज्यां द्रष्टा।। अप्रमेय निरभोई ॥ टेर॥ भावाभाव अभावऊ परेहै ॥ आतम तत्त्व तत्त्व अनासी ॥ दृश्यादृश्य अदृश्य न ज्यामे ॥ निराभास अविनासी ॥१॥ जोग विजोग संयोग न ज्यामें ॥ नहीं एक नहिं दोई ॥ ज्ञानी मूढ गुरू नहिं चेला ॥ है ज्यूँका त्यं सोई ॥ २ ॥ उत्पती थिति लय तहां नाहीं ॥ नही न्यून विशेप समाना॥ दैत अद्वैत तहां कछु नाहीं ॥ निज स्वरूप निरवाना ॥३॥ वा सर्गुण निर्गुण नहि कोई ।। नहिं अकार निराकारा । विश्व अरु तैजस प्राज्ञ तहां नहि।।नहीं ज्यां सार असारा ॥४॥ वनानाथ गुरू कोशां अतीत है । आपोई आप रहवाया ॥ उमाराम सोई है चेतन ॥ अमल अछेद अजाया ॥५॥१३॥ रागआसा। साचो भाई निज प्रत्यक्ष परवाणाकरी पिछाण आपआपीकी। आप जाणरया जाणा ॥ टेर॥ वेदांतकी रमझ बताऊं ॥ तुरीया , अतीत ' है ज्ञाना । न्यून विशेष समानं न ज्यामें ॥ निर्विशेष निरवाना ॥१॥ जाग्रत स्वम सुषुपत. तुरीये ॥ लखू अवस्था च्यारूं॥
गावणके पद। (८५) है ज्यूँका त्यूं करूं निवेडा ॥ अनुभव उक्त उचारूं ॥२॥ पनरे तत् जाग्रत अस्थूला ॥ वरतत सकल शरीरा ॥ सब इन्द्रियांके साव अलूझ्या ॥ भुगत रया विप खीरा ॥३॥ नव तत्त्व स्वप्न भटकता डोले ।। सूक्ष्म शरीरही धारा ॥ जाग्रत प्रपंच स्वप्नमें वर्ते ॥ सुख दुख गिरथा अपारा ॥ ४ ॥ जाग्रत् स्वप्न मिट्या दोनूई ॥ सपुपतीके माई ॥ अप्रमाण समान सदाई ।। हरप शोक नहिं काई॥५॥ | तुरीये आदि अनादू चेतन ॥ आपोई आप हजूरा ॥ सबहीमे इकसार विराजे ॥ तुरीये निकलंक नूरा ॥६॥ च्या अवस्था परे परमपद ॥ द्वैत अद्वैत न कोई ॥ स्वप्रकाश अपार अक्रिय ॥ उमाराम है सोई॥७॥ १३७॥ राग आसा। साधो भाई आतम ज्ञान बताया। च्यारूं मुखका किया निवेडा॥ है ज्यूं कह दरसाया॥टेर ॥ वे मुख जुगत मुक्त नहिं दरसे ।। वाद विवाद हलाया ॥ दुरमत धार पड्या भव माहीं ॥ विपै रस मांय समाया॥१॥ मन मुख मान लिया आपेकू ॥ सत्यासत्य कहाया करता कलेह कल्पना मनकी ॥ मन कल्पत ज्यूं छाया ॥२॥ गुरू मुख गोप दरसीया प्रगट ॥ ज्ञान गृझ ठहराया ॥ समझ निरंतर भेद मिटाया ॥ तन मन लगे न दाया ॥३॥ निज मुख आतम, निरद्वंदी ॥ सब व्यापक निरदाया ॥ निरभौ निरालंभ निरबंधण ॥ नहिं कोई गया न आया।॥४॥ ॥
(८६) अनुभवप्रकाश। मुखा अतीत चेतन निरमुखहै।। सत् चिद् आनंद अजाया ।। उमाराम सोई निवाणी ॥ निरउपाधि निरमाया ॥ ॥१३८॥ राग आसा। साधो भाई यह अनुभौ निरभोजी।।अनआतम आतमपरमातम।। कर निरणै कही सोजी ।। टेर॥ अन आतम आतम परमातम ॥ तिहुँ निरण कह दावू ॥ एक नीरमे तीन भावकर ॥ है ज्यूं की त्यूं भाव ॥ इच्छा आदि अनातम कहिये ॥ ज्यूं पर्वत हिमाला ॥ न्यून विशेष समान अन आतम ॥ मूल अज्ञान दिखाला ॥२॥ महा दरियाव पाल विन पूरा ॥ निरबंध सदा अथाया ।। यूं परमातम सुते प्रकाशी ॥ आपोई आप रहवाया ।।३।। महा हेमाला महा समन्दके ।। बीच नदी महा धारा ।। यूं अन आतम यूं परमातम ।। आतम मध्य विचारा ॥४॥ हेमाला ज्यू हे अन आतम ॥ परमातम ज्यूं दरिया ॥ महा नदी ज्यूं आतम कहिये। आप चेतन सब भरिया ॥५॥ सलिता समन्द अनादि एक रस ।। नहीं हेमाला वाई॥ यूं आतम परमातम एकही ।। ज्यां अन आतम नाईं ॥६॥ तूं तत् असी नहीं ता मांही ॥ नही ज्यां रूप अरूपा ॥ उमाराम अखे अविनासी ॥ चेतन शुद्ध स्वरूपा ॥७॥१३९॥ राग आसा। साधो भाई योई ज्ञान निरवाणा ॥अपणा आप लखेआसोजी।। प्रत्यक्षही परवाणा ॥टेर॥
गावणके पद। (८७) चर्मदृष्टि अरु दिव्य दृष्टिहै । समदृष्टी तिहुं जाणा ॥ केवल ज्ञान दिष्ट निज चौथी॥ भिन्न भिन्न कहूं पिछाणा ॥१॥ तरु जर दृष्टी सर्पकी दृष्टी ॥ दृष्टि पहुमी दरारा ॥ रज्जू दृष्ट परम प्रकाशी। अनुभव खोज विचारा ॥२॥ तरु जर दृष्ट ज्यूंई सब जाग्रत ॥ वर्ते सकल व्यवहारा ॥ पाप पुण्यकू भुगते प्रत्यक्ष ॥ यह चर्म दृष्ट निहारा ॥३॥ सर्प दृष्ट ज्यूं स्वप्न शरीरा ॥ मन मनण भरमाणा॥ ऊंच अरु नीच मानियां बहुविध ॥ यह दिव्यदृष्टि बखाणा ॥४॥ पहुमी दरार दृष्ट ज्यूं सुपोपत ॥ नित समान रहाई ॥ जाग्रत स्वप्न दोनूं ज्यां खूटा ॥ सम दृष्टीहै याही ॥६॥ रज्जू दृष्ट ज्यूं चेतन तुरीये ॥ चम सम दिव्य दिखाया। तिहूं दृष्टतें आप निरंतर ॥ निज दृष्टी सोई थाया ॥६॥ तीन दृष्टिमें हाण लाभहै ॥ एक एकके माई निज दृष्टी चेतन ज्यू का त्यूँ ॥ तीन दृष्ट ज्या नाईं ॥७॥ तुरीये है सोई तुरीये अतितंग ॥ दृष्ट अदृष्ट न ज्याई ॥ उमाराम सोई शुद्ध चेतन ॥ ॥ सुते प्रकाशी साईं॥८॥१४॥ राग आसा। साधो भाई चेतन जाणण हारा॥ चेत अचेत चेतावे चेतन ॥ आप दोईतें न्यारा ॥ टेर॥ दान्ति दृष्टान्त बताऊं ॥ है ज्यूं कर निरधारा ॥ दान्ति निराकार निरंतर ॥ है दृष्टान्त अकारा ॥१॥ रस अरुखांड खिलूणा तिर्गुण ॥ गुणा अतीत मिठीयासा ॥ %3D (८८) अनुभवप्रकाश! ॥ जाग्रत स्वप्न सुपुपत ऐसे ।। तुरीयेते तिहुँ भ्यासा ॥२॥ स्वप्न खांड खिलूणा जायत ।। सुषुपती रसधारा तुरीये मिठास सबमें साखी ।। आर पार एक सारा ॥३॥ रस विना न 8 खांड खिलूणा ।। ख्याल खांड रस माई ॥ यूं सुपुपतते स्वप्न जाग्रत ।। तिहुँ तुरीयेमें नाई ॥ ४ ॥ तुरीये चेतन नित निरखंधण ॥ निरालेप अविकारा सुते प्रकाश आदि अविनाशी । नहिं हलका नहिं भारा ॥५॥ ख्याल खांड रस मिठास च्यारूं ॥ रसणा आरसमे खूटा ॥ अवस्था अतीत आतमा चेतन ॥ भाव अभाव ज्यां झूठा॥६॥ गुण अरु गुणा अतीत न ज्यामें ॥ नहिं हेती नेती वाणी॥ उमाराम सोई शुद्ध चेतन ॥ कही प्रत्यक्षही निरवाणी॥७॥१४॥ राग आसा। साधो भाई यह निश्चै निरदाई ॥ वाच अवाच लगे नहिं कहणी ॥ अपणा आप रहवाई ॥ टेर॥ सत् सुख परम प्रकाश सनातन ॥ शुद्ध स्वरूप मम सोई॥ लाग अलाग अशुद्ध न शुद्धा ॥ ज्यां नहिं यह वह कोई ॥१॥ ज्ञान अज्ञान विज्ञान न वाई ॥ नहिं कोई जोत अजोता ॥ श्रोता अरु वक्ता ज्यां नाई ॥ नहि निरभौ नहिं भोता ॥२॥ नहि ज्या उत्तम मध्यम कनिष्ठा ॥ नहिं कामी निष्कामी ।। अनुलोम प्रतिलोम न कोई ॥ नहीं ज्यां नाम अनामी ॥३॥ वां तो बुद्धि बोध न कोई ॥ नहीं तिर्गुण विस्तारा ॥ ईश्वर जीव ब्रह्म ज्यां नाई ॥ नहिं कोई पार अपारा ।। ४॥
गावणके पद। (८९) कहाँ अन आत्म आत्म परमातम ॥ कहां बंध निरबंधा ॥ उमाराम निजानन्द सोई॥ नित चेतन निरफंदा ॥५॥ १४२॥ रागआसा। साधो भाई सच्चिदानन्द सुखदाई।योहि सिद्धान्त वेद संत वर्णे।। अवस्था अतीत रहवाई॥ टेर॥ आतम अखे अदाय अथापं ॥ नहि छूटा नहि गिया । चेताचेत अचेतन ज्यामे । स्वयं स्वरूप सधरिया ॥१॥ वां तो शब्द अशब्द न कोई ॥ नहि रीता नहिं भरिया ॥ ज्यां नाह चिन्ता नही अचिन्ता ॥ नहिं सूका नहिं हरिया ॥२॥ गिणती अगिणती उवां कछु नाही ॥ नहिं जीवत नहि मरिया। ज्यां नहि करणा नहीं अकरणा॥ नित चेतन निष्प्रिया ॥३॥ वां तो प्रमाण प्रमे नहि परमाता ॥ नहिं डूबा नाहि तिरिया ।। सारासार बुद्धि ज्यां नाहीं ॥ नहीं अधर नहिं धरिया ॥४॥ देखण सुणण कहण अरु जाणण ॥ सब आतममे गलिया। अनुभौ स्वरूपउमाराम द्रष्टा नहिन्यारा नहिं मिलिया५॥१४॥ राग आसा। साधो भाई आ चेतनकी सोजी॥ अपणाआप मिट्या नहिं हुवा।। नहीं एक नहिं दोजी ॥टेर ॥ प्रगटसू प्रगट गुप्तसूं गुप्ता ॥ निज स्वरूप निरमुक्ता ॥ प्रगट गुप्त दोउंको द्रष्टा ॥ आप प्रगट नहिं गुप्ता ॥१॥ चेतन सदा परम प्रकाशी ॥ ज्यां नहिं भोगता अभोगता॥
(९०) अनुभवप्रकाश वां नहिं प्रोक्ष अप्रोक्ष ॥ नहीं दीर्घ नहि लघुता ॥२॥ ज्यां तो नहीं अविनासी नासी ॥ नहिं प्राप्त नहि हाणी॥ परमार्थ स्वार्थ ज्यां नाई ॥ नहिं कोइ जाण अजाणी॥३॥ तां नहिं किंचिन नहीं अकिंचन ॥ शिवशक्ती तां नाई ॥ अगम अरु निगम दोऊं कहथाकी ॥ अध्यय चेतन सांईं ॥४॥ सर्वातीत अलाग आतमा ॥ निजानंद निरमाया॥ उमाराम सोई नित चेतन ॥ प्रत्यक्ष कह दरसाया ॥५॥१४४॥ राग आसा। साधो भाई आ चेतनकी जाणा ॥ प्रत्यक्षही निरण कह दाखी आई जाण निरवाणा ॥ टेर॥ तीनूं भाव चेतावे चेतन ॥ आप तिहूंतें न्यारा ॥ अज कूटस्थ अलागी द्रष्टा ॥ सोई जाणण हारा ॥१॥ अब यह तीनूं भाव बताऊं ॥ रती फरक नहिं राखू ॥ यह निश्चै निरलेप निरंतर ॥ अनुभव उक्ती भाखू ॥२॥ प्रथम भाव कहीजे हेती॥ द्वितीय कहीये नेती ॥ तृतीये भाव कहीजे योही ॥ नहिं नेती नहिं हेती ॥३॥ कर्म उपासना ज्ञान तीनही ॥ आ हेती ठहराई जाग्रत कर्म उपासना स्वप्ना ॥ ज्ञान सघुपती गाई ॥४॥ हेती है सोई भइ नेती ॥ हेती रही न काई ॥ सो है नेती नही कोइ हेती ॥आ नेती कह थाई ॥५॥ हेती नही नेती नाहीं ॥महा निषेध आ सोजी ॥ ज्यूं होती ज्यूई करी निरणे ॥ खोज बताया खोजी ॥६॥ ॥
गावणके पद। (९१) विधिनिषेध निषेध न विधि ॥ नहिं चेतनके माई ॥ आपोई आप अवर नहिं दूजा ॥ निरविभाग निज साईं ॥७॥ सर्वातीत निजानन्द चेतन ॥ नित निरमल निरभोई ॥ परिपूर्ण प्रकाश परम पद ॥ उमाराम है सोई॥८॥ १४५॥ राग आसा। साधो भाई चेतन अमित अथाई । चेतनकी चेतनकू मालुम ।। चेतन जाणे आई ॥ टेर॥ निकलंक निरातंक निरबंधण ॥ निरद्वन्द्वी निरमाया ॥ अणघड़ अलख अजूणी चेतन ॥ अखे अनंत अजाया ॥१॥ चेतन वचन दिखावे च्यारूं ॥ सोई परखण हारा ॥ चहूँ वचनमें आप न आवे ॥ रहत सदाई न्यारा ॥ २ ॥ आतम ज्ञानी आप आतमा ॥ शुद्ध स्वरूप निज ज्ञाना ॥ सो च्यारांका निरणा भाखे ॥ जुदा जुदा दे म्याना ॥३॥ है में नहीं नहीं में हैई ॥ हैमें नहीं समाया ॥ नहींके मांय हैहै सबही ॥ प्रथम वचन बताया ॥ ४ ॥ हैके मांय नहीं कां पावे ॥ नही में है नहिं कोई ॥ इनके विरोध रखी रजनी ज्यूं ॥ दूजा वायक योई ॥५॥ हैभी हैई नहींभी हैई ॥ यह दोनूं है थाया ॥ इनका मेहरम कहिजे योई ॥ वचन तीसरा गाया ॥ ६ ॥ है सोइ नहीं नहि सोई नाई ॥ महा नहीं योई वखाणी ॥ चौथा वचन बताया हैज्यू ॥ आतमज्ञानी छाणी ॥ ७ ॥ वचना अतीत विराज्या चेतन ॥ ज्यां चहुँ वचन विलाणी। उमाराम आपणा आपही। नित चेतन निरवाणी ॥८॥१४६॥ इति श्रीउमारामजीमहाराजकृतवाणियाँ सम्पूर्ण ॥
इति श्रीउमारामजी महाराजकृत- वाणियॉ समाप्ता।
ॐ ॥ श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नमः॥ श्रीसच्चिदानन्दाय नमः। अथ श्रीउमारामजीमहाराजकृत- अनुभवप्रकाशप्रारम्भः। दोहा-छन्द। अनुभवस्वरूप अनन्त अज, पारब्रह्म निज सोय ॥ जिहे जाण्याजग है नहीं, बिन जाण्या जग होय ॥१॥ पारब्रह्म परमात्मा, सत् चिद् आनंदरूप ॥ सो अनुभव उर प्रगटयो, नमो अखंड अनूप ॥२॥ छन्द-छप्पय। नमो ब्रह्म गुरू संत, देह वाणी अरु मनतें। गुरू दियो निज ज्ञान, परख पाई संतनतें। अचल अखंड अनंत । ओलख्यो आतम सांई ।। निराकार निरलेप ॥ अजनमा आदि गुसाई ।।
अनुभवप्रकाश। गुरू बराबर विश्वमें । हुवो न होसी है अवै ।। उमाराम वंदन किया। मिटे भर्म संशय सबै ॥३॥ गुरू वनानाथ उरधार। अवल अक्षर गुरुसाचा॥ जगत् जाल अज्ञान । जाणकर तजीया काचा ॥ पूर्व उदै आंकूर । ज्ञान सूरज प्रकाशा ॥ कले कल्पना तिमिर । भर्मका भयाज नाशा ॥ उमाराम सत् सत्गुरू । कही वेद सन्त वाचा ॥ गुरुवनानाथउरधार अवलअक्षरगुरूसाचा ॥४॥ कुंडलिया। बनानाथ सत्गुरूके चरणे। कहा करूं बकशीश ॥ जेती चीज ब्रह्मंडमें । मिथ्या विश्वा बीस ॥ मिथ्या विश्वा बीस । सत्त सत्त' गुरूहैं आपू॥ गुणातीत अरूप । नहीं ज्यां तिर्गुण तापू ।। उमाराम सत्सत् गुरू । ईशनहूके ईश॥ वनानाथ सद्गुरू के चरणे । कहा करूं बकशीश ॥५॥ बहुत जन्मकी भूलकू । पलमें दी गुरू टाल ॥ तिमिर मिट्या तड़का भया । दरस्या निज अकाल ॥ दरस्या निज अकाल । सोई समर्थ सत् जाणा ।। अब दरसे नहिं और। आपई है निरवाणा॥ उमाराम सत्गुरू बिना । मिटे नहीं जमजाल ॥ बहुत जन्मकी भूलकू । पलमें दी गुरू टाल ॥६॥ गुरू वनानाथ निर्भय निज पूरा । वन वस्ती इकसार ।।
पहिला अग१ '(९५) शुद्ध स्वरूपी सकलमें । लिपे न कोउ विकार ।। लिपे न कोउ विकार । गगन ज्यू सदा असंगी। आदि मध्य नहिं अंत। अनंत अनूप अभंगी॥ सत् चेतन आनन्द गुरू । कही उमाराम विचार ॥ गुरू वनानाथ निरभयनिज पूरा। वन वस्तीइकसार ॥७॥ गुरू वनानाथ निरबंधन साईं । सत् चिद् आनंद अभंग॥ ज्यूं नभ अन्दर बाहर है । यूं गुरू सबके संग ॥ यूं गुरू सबके संग । रंग बेरंगी थाया। फटिकमणी ज्यूं फर्क । अज कूटस्थ अजाया। उमाराम गुरू निज चेतन । निरमाया निरअंग ॥ गुरूवनानार्थनिधन सांई।सचिद् आनन्द अभंग ॥८॥ दातारां दातार गुरू । शिष्य कहिये निजभक्ता॥ शिष्य हुवा सत्गुरूके सन्मुखामिट्याअज्ञानरु अज्ञता॥ मिट्या अज्ञान रु अज्ञता । आपके मायें मिलाया ॥ रती न राख्या फेर । आप सरीसा ही थाया॥ वनानाथ गुरू शुद्ध स्वरूपा । उमाराम सोई लखता ॥ दातारां दातार गुरू । शिष्य कहिये निज भक्ता ॥९॥ धन्य सत्गुरू दीदारकू । दरशन दिया दयाल ॥ देह इन्द्रयां मन बुद्धि परे । निरखत भया निहाल ॥ निरखत भया निहाल । स्वच्छन्द निजानन्द नित्यं ।। नही द्वंद ज्यां कोय । अनन्त स्वरूपा सत्यं ॥ सत् सत्गुरू सत् शिष्यहै । सत्का योही स्वाल ॥
अनुभवप्रकाश धन्य सत्गुरू दीदारकू। दरशन दिया दयाल ॥ १० ॥ वनानाथ गुरू अभै अगोचर । पारब्रह्म निरवाण ॥ उत्पति थिति लय तहां नहीं । आपोई आप पिछाण ॥ आपोई आप पिछाण । अमल अणभंग रहवाया ।। अप्रमेय अद्वैत । द्वैतका लेश न पाया ॥ उमाराम चेतन है । गुरू सोई शिष्य जाण ॥ वनानाथ गुरू अभे अगोचर । परब्रह्म निरवाण ॥११॥ शिष्य सतगुरूकू परखीया। निष्प्रिये निरमान ॥ सवसुख परमप्रकाश है। निरविभाग निज ज्ञान ॥ निरविभाग निज ज्ञान । आन मायाकी हाणी। वेद कतेब पुरान । । तहाँ नहिं पहुंचे बानी ॥ उमाराम गुरू सोई चेला । जैसे किर्ण अरु भान ॥ शिष्य सत्गुरूकू परखीया। निष्प्रिये निरमान ॥ १२॥ गुरू मिल्या जब वेदा छूटा । सत्कू लिया पिछान ।। साध सङ्गतसूं सधर ठहराना। कबूं डिगे नहि जान ।। कवू डिगे नहिं जान । अखे अद्वैत अलागी । तहां कोई जीत न हार । नाहि सग्रह नहि त्यागी । उमाराम अनुभौ प्रकास्या। रही न खेचातान ॥ गुरू मिल्याजव वेदा छूटा। सतकूलिया पिछान ॥ १३॥ दोहा-त्रिलोकीमें है नहीं। सत्गुरू जैसा और ॥ सत् सत्गुरू दूजा सब मिथ्या। यारत्ती न फोर १४॥
पहिला अंग १ (९७) कुण्डलिया। बनानाथ गुरू चेतन देवा । अखे अनूप अपार ।। गुणातीत निर्लेप निरंतर । दूजा नहीं लिगार ॥ दूजा नहीं, लिगार । सदा शुद्ध निकलंक साई॥ ज्ञाता, ज्ञान रु ज्ञेय । तहां कोउ पावे नाई। उमाराम सोई निरवाणी। स्वते प्रकाशण हार ॥ वनानाथ गुरू चेतन देवा । अखे अनूप अपार ॥१५॥ दोहा-निज चेतन गुरू देवहै । द्वितीये लेश न कोय ॥ उमाराम शिष्य ऐसे जाणो । चेतन कहिये सोय ॥१६॥ कुण्डलिया। ब्रह्म चेतन गुरू चेतन है। चेतन सबही संत ॥ चेतनकू चेतन लखे । शुद्ध अद्वैत अनंत ॥ शुद्ध अद्वैत अनंत । अंत तिहुंको नहिं आई ॥ नाम चियेहे एक । ब्रह्म गुरू संत एकराई ॥ उमाराम चेतन है सोइ । अनुभौ भाकंत ॥ ब्रह्म चेतन गुरू चेतनहै। चेतन सवही संत ॥१७॥ दोहा-शेप गणेश रु कवी मुनी। सब गुरूका गुन गाय॥ नारद शारद सरस्वती। कथ कथ कहत अथाय ॥ १८॥ गुरूदेवका अनंत गुन । कापे वरण्या जाय ॥ शिव विष्णु ब्रह्मादिले । खोज खोज थकजाय ॥ १९ ॥ ब्रह्म गुरू अरु संतकी । जिनपे कृपा होय ॥
(९८)
अनुभवप्रकाशा
पुनि कृपा अपणा आपकी । तब दरसे निज सोय ॥२०॥
इति श्रीअनुभवप्रकाश गुरुमहिमा निरूपणंनाम
प्रथमोअंग समाप्तम् ॥ १॥२०॥
दोहा-शब्द गुरूका सत् है । जो कोई लेवे धार ।
ताते जग पासी मिटे । गुरू शब्द तत्सार ॥१॥
चौपाई।
भवसागरका दुख अति भारी । सब जीव पचे कर मारी थारी॥
गुरू शब्द बिन यह नहि छूटे।गुरूशब्द लख्यां भवबंदण तूटे।२॥
सत् शब्द निरमलहै अति । निरबंदण निरआसे गति ॥
सत् शब्द कोई लेवे विचार । सोई है भवसागर पार ॥३॥
दोहा-गुरू शब्द सुण कानमें । करे न कछू विचार ॥
विन विचार पावे नहीं । सत् शब्दकी सार ॥ ४ ॥
श्रवण मात्र गुरूमूं । सुणे शब्द शिष्यकोय ॥
नितप्रति करे विचार पुनि । निरभै होवे सोय ॥५॥
शब्द गुरूका निरमला । लागतही मल जाय ॥
कर्म काट दूरां करे॥ जन्म मरण मिटजाय ॥६॥
कर्मभूत भारी लग्या । बहुविध बंध्या विकार ॥
उमाराम सत् शब्दते । तूटे कर्म आकार ॥ ७ ॥
चौपाई।
शब्द विचारे सो बड़भागी । ममता रोग वासना त्यागी ॥
वे जिन जगसूं रहत उदासी । निरभै पद पाया अविनाशी॥८॥
दूसरा अंग २ (९९) दोहा-जिनपाया सत् शब्दकू । तिनकी मिटी उपाध ॥ निरभै विचरे जगतमें । वे धिन जगमें साध ॥ ९ ॥ सत् शब्द श्रद्धा कर लेह । तजै विषयकी वास ॥ जिनकू है सत् प्राप्ति । सोई है निरवास ॥१०॥ । शब्द सैल गुरू दिया । समझ श्रद्धा करलिया ॥ ले चढ्याशील संतोप। पकड मनकू वश किया॥१॥ रेखता। सत्का खडक गुरू देव तीक्षण दिया।लीया जूशिष्य श्रद्धा सूरा।। पांच पचीस गुण तीनकू ढायके । भरमका मोरचा किया दूरा ॥ महाँ अज्ञानकी फौजकू जीतके । किया अज्ञानकू चकचरा ॥ सत् चेतन आनन्द अखंड सु । पाईया पद निवाण पूरा।।१२॥ गुरूका शब्द अछेद अदायहै । अलख अनूप नही अंत आया। तत् तिर्गुण ब्रह्मंड ज्यां नायहै । अखे निज नूर एक सार थाया॥ वाहूके रोमतें कोट ब्रह्मंड जू । होय मिटजाय क्षण भंग माया ॥ गुरुकेप्रसाद उमाराम कहतहै।जाण सत्शन्द सुखधाम पाया॥ कुण्डलिया। सत् शब्द प्रकाशते । चिन्त्या रही न काय ॥ राग द्वेप राती मिटी । ममता गई विलाय ॥ ममता गई विलाय । विप हंकारा भागा ॥ गुरू कृपा सत्सङ्ग । रङ्ग वेरंगी लागा॥.
(१००) अनुभवप्रकाश। निराकार सत् शब्दहे । खंडित, सब आकार ॥ उमाराम सत् शब्दमई । गुरू दीवी निजसार ॥ १४ ॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशगुरूशब्द प्राप्तिनिरूपणंनाम द्वितीयोअंग समाप्तम् ॥२॥३४॥ दोहा-निर्गुणभक्ती निरमली । लिया ज्ञान विचार ।। तन मन वचनसूं ईशकू । वदित वारंवार ॥१॥ इन्दव छन्द। थावर जंगम जीव चराचर । एकही ईश्वर है सब माई ॥ तन अरु मन, वचनमूं। काहुकू सोई भक्त दुखावत नाई॥ दूसरा भाव कवू नहिं ठानत । जहां तहां देखत ईश, गुसाई॥ उमाहीराम कही समदृष्टिजू । ये निज ज्ञान भक्त कहवाई ॥२॥ भूमीके मांय कठोर शक्ति जू। नीरके माय दरवता जू वोई-॥ तेजके माय उष्ण शक्तिजू । वायुके माय सफंद जू होई ॥ व्योममें पोल शक्तिजू ईशकी । व्यापक ईश घटो घटसोई ॥ बाहर ईश्वर भीतर ईश्वर। ईश बिना नहिं रंचक कोई ॥३॥ चन्दकू शीतलता दीवी ईश्वर । रकूसू तेज दियो इधकाई ।। जिनदियो विधिकू विधितापन । जिनदीवी शिवकू शिवताई ॥ जिन दीयो विष्णूपन विष्णुकू । ईशनहूके वे ईश सदाई ।। उमाही रामके घटमें प्रगट । सो निज ईशभक्ति चेताई ॥ ४ ॥ दोहा-ज्या भक्ती ज्यां आप है । ईशनहूके ईश ।। प्रगट गुप्तवेही प्रभु। निजाकेवल जगदीश ॥५॥ .
तीसरा अंग ३ (१०१) कुण्डलिया । बाजीगर बाजी करी । रचना रची अपार ॥ तीन गुणा आंटी पडी । भूलगया संसार॥ भूलगया संसार । मोह मायाके माई॥ मिथ्याकू लिया मान । आपकू जाणत नाई ॥ उमाराम लखी आपकू । पाई भक्ति विचार ॥ बाजीगर बाजी करी । रचना रची अपार ॥६॥ कारीगर कर्ताराहै । हुनर किया हजार। हुनर न्यारा है कर्ता । ज्यू भंजन रहित कुंभार ॥ ज्यूं भंजन रहित कुंभार । सबी हुनर जड जाना ॥ 'चेतन ईश्वर आप । संत जाणे यो म्याना॥ उमाराम समझ्या सही । सवमाही सब पार ॥ कारीगर करिहै । हुनर किया हजार ॥७॥ कर्ताकी कुदरत सबे। कुदरतमें कर्तार ॥ सर्वव्यापी ईश्वर विभु । यो निश्चै उर धार यो निश्चै उर धार । सोई है साहब साचा ॥ आदि अंत मध्य एक । कही सबही. सन्त वाचा। उमाराम निरमै भया। भक्ति ज्ञान विचार ॥ कर्ताकी कुदरत सबे । कुदरतमें कार ॥८॥ रह साहब सबते परै। कोउ न पहुंचे भाक्ति बिना पहुंचे नहीं । आदि पुरुपकी ठौड ॥ आदि पुरुपको ठगड। भक्ति ईश्वर उर आणों ॥
(१०२)
अनुभवप्रकाश।
दूजा तजो जंजाल । जगत सुपना कर जाणों ॥
उमाराम ईश्वर में। मिटी जन्मकी खोड ॥
रह साहब सवतें परे । कोउ न पहुंचे दौड ॥९॥
तन मनकी ममता गई । समझ मिटाई
मिटाई हाण ॥
ज्यूं का त्यूं भरपूर है । कही न दीसे काण ॥
कही न दीसे काण । भेद भर्म रह्या न कोई ॥
बाहर भीतर एक । सत् ईश्वरहै सोई ॥
उमाराम ईश्वरकी कृपा । अनुभव प्रगट्या भाण ॥
तन मनकी ममता गई । समझ मिटाई हाण ॥१०॥
ईश्वर अगम
अज्ञाद है । अनन्त शक्ति कर्तार ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सब । ईश्वरके आधार ॥
ईश्वरके आधार । ईश निज चेतन सांई ।।
भक्ति पिछाणे ईश । भक्ति हरि अन्तर नाई ॥
उमाराम दरसिया । ईश्वरका दीदार ॥
ईश्वर अगम अज्ञाद है। अनन्त शक्ति कर्तार ॥११॥
देह इन्द्रियनका कर्मगुन । मुझकू लगे न कोय ॥
ईश्वर चेतन ब्रह्म निज । मम
स्वरूप है सोय ॥
मम स्वरूपहै सोय । ईशकर ईश उपासा।
द्वैत रह्या नहिं लेस । भक्त भगवत इकरासा ॥
उमाराम सोई ईश प्रभु । आपही आपकं जोय ॥
देह इंद्रियनका कर्म गुन । मुझकू लगेन कोय ॥ १२॥
चवथा अंग
(१०३)
चौपाई।
गपही रूप अरूप अपारा । आपही निकट रु दूर मॅझारा॥
पही भक्त आप भगवंत ।उमाआपही आप अनंत ॥ १३॥
-भगवत मांई भक्त है । भक्त मांई भगवंत ।।
गम अनुभव कही। निर्गुण भक्ति सिधंत ॥ १४॥
अनुभवप्रकाश ज्ञानभक्तिमिश्रितनिरूपणं नाम
पुतीयोअङ्ग समाप्तम् ॥३॥४८॥
चौपाई।
कठिन जगजाल मोह माया। बॅध्या सबी जीवपकड़ काया॥
अनहोती मानी कर होती। भूलगया निज आतम मोती ॥१॥
दोहा बन्दर देख चुगो भुडकीमें । मूठी भीच बॅधाना॥
यूंजीव बंध्या मोह माया भीतर। जन्म जन्म अलुजाना॥२॥
ज्यू मरकट मूठी गही । मूरख छोड़े नाय॥
ऐसेही सव जीव जगतका । बंध्या विपै रस माय ॥३॥
चौपाई।
बदरकू बाजीगर जैसा । त्रिया नाच नचावे ऐसा॥
बहुविध नाच नचावे नारी । कह सन्त अरु वेद पुकारी॥४॥
लख चौरासीकी ये खाण । जन्म मरण सब याही जाण ॥
जन्म मरणका मेटो दुख । तजो सवी त्रियाका सुख ॥५॥
नारीसा बंदण नाह और । चिन्ता रहै आठही पौर ॥
इनका रस जो त्यागे कोई । सो भव दुखते निभै होई ॥६॥
नुभवमकारा। नारीका रस सबतें मोटा । जीव बन्ध्या सव बडा छोटा ।। येही जग बंदणका रस । ब्रह्मा इन्द्रादिक सवही वस ॥७॥ जो तनधारी जीव अनेक । मनुष्य देह सब माये विपेक ॥ और न जाणे सारासार । मनुष्य देहमें ब्रह्म विचार ॥८॥ यह देह पाय विपै हित करही।सो ब्रह्मद्वार चढ पीछाही पडही ।। बहुन्यो औसर मिले न कबहूं । कहि उमाराम चेतहु अबहूं।॥ ९॥ दोहा-ब्रह्म विचार घटमे प्रगट । सो नर देही सत् विपै मायामें रत रहे । वे पशु मनुष्य असत् ॥ १० ॥ कुण्डलिया। भेड चाल संसार है। एक एककी लार ॥ भिष्टापर भागी फिरे । कैसे होय उधार ॥ कैसे होय उधार । सार कोई सूझत नाही ॥ मोह ममताकी झाल । लगी तन मनके माहीं।' उमाराम सब जगत यूं । बेहत विपैकी धार ॥ भेड चाल संसार है। एकएककी लार ॥ ११॥ कर्मनके झोले पड्या। अन्तर रहत उदास ॥ माया ममता मोहनी। गिरयो जीव दे पास ॥ गिरयो जीवदे पास । भार भवसागर दीना ॥ भूत भविष्य वर्तमान । तीन पोरायत कीना ॥ उमाराम तीनां परे । रहत' पुरुप निरवास ॥ कर्मनके झोले पड़या। अन्तररहत उदास ॥१२॥ कर्म कुत्ता को गत करे । भर्म भुसे अज्ञान ॥ , पांचवां अंग ५ (१०५) जात एक जाणे नहीं। ऐसे भूले श्वान ॥ ऐसे भूले श्वान । दर्द दूजा कर पावे ॥ जैसे सकल जहांन । आप तज आपा ध्यावे॥ आप भरयो आपा बिना । उमा ब्रह्म विज्ञान ॥ कर्म कुत्ता को गतकरे। भर्म भुस्से अज्ञान॥१३॥ दोहा-श्वान मुकरका मेहलमें । भुस्स भुस्स मरे व्यर्थ । यूं निज आतम भलके । गिरयो जीव अनर्थ ॥१४॥ शुद्ध स्वरूपकं भूलके । गिरयो जीव अज्ञान ॥ लखे न आपण आपकं । व्यर्थापचे अजान ॥१५॥ तजो जीव अज्ञानकं । सत् आतम लोधार ॥ ताहि क्षण संशय मिटे। येही ज्ञान लो सार॥१६॥ सोरठा। 'नरदेहीकू पाय । सत् असत् नहिं जाणियो । वृथा धरीनरकाय । विपैप्रवाह भवसिन्धु बह्यो॥१७॥ सोई जगमे बडभाग । भक्ति ज्ञान वैराग उर ।। महा अज्ञानतें जाग । कही उमाराम चेतावणी॥१८॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशसर्वज्ञचेतावणीनिरूपणनाम चतुर्थो अंग समाप्तम् ॥४॥६६॥ सोरठा। जेती जीवा जूण । दीर्घ रोग सबके लग्यो । लखे न अलख अजूण । बिनलखियां जन्मे मरे॥॥
(१०६)
अनुभवप्रकाश।
।
दोहा-रोग असाध्य अनादिको । कटे न आन उपाय ॥
निज गुरू सन्त वैद्यमिले । ताही क्षण मिटजाय॥२॥
अस्त रु जड़ केशका । लग्या सबीकू रोग ॥
कुटक गुटक गुरुज्ञानकी । लै सोइ होय अरोग ॥३॥
चौपाई।
सत् चिद् आनद अखे स्वरूप। नित निरमल कूटस्थ अनूप ॥
यह औपधि गुरू देवे पाय । यातें रोग अनादी जाय ॥४॥
अमल अच्छेदअभड्गअनन्त ।जाको नहीं आदि मध्य अन्त ।।
सो मम चेतन शुद्ध अवाच । गुरू ज्ञान औषधि यह साच ॥५॥
दोहा-औषध ले गुरू ज्ञानका । पचे जदे परमाण ॥
अस्त अज्ञ जड़ केशका । मूल गमावे जाण ॥ ६॥
औपध ले रखे साधना । तह नहिं दुखका लेश ।।
आठ पहर सुख एकसा। परम सुखी रहे शेश ॥ ७॥
औपधसाधन दोऊं सजे । तब पावे सुखसीर ।
बिन साधन वैदन वधे । दिन दिन दूणी पीर ॥ ८॥
सत् सन्तोप विवेक पुनि । सत्सङ्गत निज सार ।
या साधनतें प्राप्ति । शुद्ध स्वरूप अपार ॥ ९॥
चौपाई।
साधन लियां ज्ञान तत् सार । बिन साधन को ज्ञान असार ॥
अगम निगम शाखा कह दोई। उमा राम निश्चै कर जोई॥१०॥
छठवा अंग ६
(१०७)
गुरू ज्ञान औषधि निरवास । कर्म रोगका करे है नास ॥
तत्व आप स्वरूप कर लेवे । खै कीट ,गी कीट न रहवे ॥१॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशगुरूज्ञान औपधिनिरूपणनाम
पंचमोअंग समाप्तम् ॥५॥७॥
सोरठा।
ज्यूं शशि किरण प्रकाश । नाम त्रिये पुनि एक हैं।
एक बिना दोइ नाश । यूं संचित क्रिया प्रारब्ध॥१॥
दोहा-संचित शशि अमावस्या क्रिये मान किर्ण होय ।।
प्रारब्ध प्रकाश. ज्यूं । मिटे रवीमें सोय ॥२॥
इन्दव छन्।
किये जू मान संचितको कारण । संचित कारज कारण क्रिये ॥
संचित कारण प्रारब्ध को । प्रारब्धते संचित क्रिये ॥
एकको एक कारंज रु कारण । त्रिगुणी तापका संचाय त्रिये ॥
उमाहीराम उपाधिरहित जू । बोध स्वरूप सदा निष्प्रिये ॥३॥
कुण्डलिया।
अधिदेव अध्यातमा । अधिभूत तिहुँ ताप ॥
ता माहीं सब जगजले। लीवी साचकर थाप ॥
लीवी साचकर थाप । भर्म यो कैसे छूटे ॥
होय निश्चै निज ज्ञान । तबी सारा दुख तूटे ॥
उमाराम तिहुँ ताप तज । परस्या आपो आप ॥
अधिदेव अध्यातमा। अधिभूत तिहुँताप॥४॥
(१०८) अनुभवप्रकाश। . प्रारब्धतें सब जग चाले । प्रारब्धही करता। प्रारब्धही भोग भोगता। प्रारब्धही धरता॥ प्रारब्धही धरता । दुख सुख भाव संभाया। ये शरीरका धर्म । आत्मा रह निरदाया ॥ उमाराम प्रत्यक्ष कही । आतम जाण अकरता। प्रारब्धतें सबजगचाले । प्रारब्धही करता ॥५॥ दोहा-प्रारब्ध प्रत्यक्ष दिखलावे । संचित केरा साव ॥ क्रिया मान कारण है याको। तीनूं मान्या भाव॥६॥ किया मान कारणकू मेटो । संचित रहे न कोय ॥ प्रारब्ध कहां पाइये । उमाराम कही जोय ॥ ७॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशसंचितक्रिया प्रारब्धनिरूपणंनाम पष्ठोअंग समाप्तम् ॥ ६॥ ८४ ॥ दोहा-कर्म धर्म अरु शर्म धर्महै । आन धर्म यह तीन ॥ परमधर्म इनते परे। ले बडभागी चीन ॥१॥ च्यार धर्मका दोय भागहै । स्वारथ अरु परमार्थ ॥ वेद कह भिन्न भिन्न मरम । ज्यूँका त्यूंही यथार्थ॥२॥ मृतक जन्म व्याव बन्धू जाती । जुदाजुदा कर्मधारे ॥ दुख रु सुख कल्पना माने । ये कर्म धर्म उचारे ॥३॥ मांगण भाट ब्राह्मण स्वामी'। पुत्री बहन मा तात ॥ अपणीलना इनकू पोखे । यह शर्म धर्मकी बात ॥en सबी देवकी संख्या राखे । माने हाण रु लाभ ॥ हाण लाभ दोनेकी पूजा। यह आन धर्मकाजाव।।
सातवां अंग ७. (१०९) निरआपे साराकू पोखे । पट्दर्शन इकसार । यही धर्म परमार्थ आदू । पावे मोक्ष द्वार ॥६॥ साध सती परमार्थ झाले । स्वारथ धर्म विडारे॥ परमधर्मतें अनन्त उधरिया। श्रुति संत पुकारे ॥७॥ स्वारथकू सेंठा गया। परमारथ नहिं जोया ॥ उमारामवे जीव अभागी । जुग जुगजन्मबिगोया॥८॥ परमारथ साचा गह । स्वारथ देह मिटाय ॥ उमाराम उन सन्तकी । सहज मुक्ति होय जाय॥९॥ स्वारथमें सब जग बध्या । हुसियार समाया ॥ परमारथ हाथे नहीं । तातें भव दुख पाया ॥१०॥ सोरठा-सत् परमारथ थरप । तजी स्वार्थ तन मनको ॥ सब ईश्वरकू अरप । मुक्त स्वरूपी जे सदा ॥११॥ दोहा-स्वास्थ धर्म बताया झूठा। परमारथ सत् भाख्या ॥ अनुभौ छाण करीज्यूंकी त्यूं।रती फरक नहिं राख्या॥१२॥ परमारथ स्वार्थका निश्चय। प्रगट कह्या पुकार ॥ उमाराम सत्ले परमारथ । स्वारथ दिया बिसार ॥ १३ ॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशस्वार्थपरमार्थनिरूपणं नाम सप्तमोअंग समाप्तम् ॥ ७॥ ९७ ॥ कुण्डलिया। बारे पंथ पट दरशन साधू । हिन्दू तुर्कलो जान ।। पखापखीमे मती बन्धो कोऊ रखोनखेचातान।। कोऊ रखो न खेंचाताना सकलको साहव एका॥
(१०८) अनुभवप्रकाश। ये . प्रारब्धतें सब जग चाले । प्रारब्धही करता ॥ प्रारब्धही भोग भोगता। प्रारब्धही धरता ॥ प्रारब्धही धरता । दुख सुख भाव संभाया। शरीरका धर्म । आत्मा रह निरदाया ॥ उमाराम प्रत्यक्ष कही। आतम जाण अकरता ।। प्रारब्धतें सबजगचाले । प्रारब्धही करता ॥५॥ दोहा-प्रारब्ध प्रत्यक्ष दिखलावे । संचित केरा साव ।। क्रिया मान कारण है याको। तीनूं मान्या भाव।।६॥ क्रिया मान कारण• मेटो। संचित रहे न कोय ॥ प्रारब्ध कहां पाइये । उमाराम कही जोय ॥७॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशसंचितक्रिया प्रारब्धनिरूपणनाम पष्ठोअंग समाप्तम् ॥ ६॥८४ ॥ दोहा-कर्म धर्म अरु शर्म धर्महै । आन धर्म.यह तीन ॥ परमधर्म इनतें परे । ले बडभागी चीन ॥१॥ च्यार धर्मका दोय भागहै । स्वारथ अरु परमार्थ ॥ वेद कह भिन्न भिन्न मरम । ज्यूँका त्यूंही यथार्थ ॥२॥ मृतक जन्म व्याव बन्धू जाती । जुदाजुदा कर्मधारे । दुख रु सुख कल्पना माने । ये कर्मधर्म उचारे ॥३॥ मांगण भाट ब्राह्मण स्वामी । पुत्री बहन मा तात ॥ अपणीलज्जा इनकू पोखे । यह शर्म धर्मकी बात ॥४॥ सबी देवकी संख्या राखे । माने हाण रु लाभ ॥ हाण लाभ दोनूंकी पूजा। यह आन धर्मकाजाबाद।
सातवां अग ७. (१०९) निरआपे साराकं पोखे । पट्दर्शन इकसार ॥ यही धर्म परमार्थ आद। पावे मोक्ष द्वार ॥६॥ साध सती परमार्थ झाले । स्वास्थ धर्म विडारे।। परमधर्मतें अनन्त उधरिया। श्रुति संत पुकारे ॥७॥ स्वारथकू सेंठा गया। परमारथ नहि जोया ॥ उमाराम जीवअभागी जुग जुग जन्मविगोया॥८॥ परमारथ साचा गह । स्वास्थ देह मिटाय ॥ उमाराम उन सन्तकी । सहज मुक्ति होय जाय॥९॥ स्वारथमें सब जग बॅध्या । है हुसियार समाया ॥ परमारथ हाथे नही । तातें भव दुख पाया ॥१०॥ सोरठा-सत् परमारथ थरप । तजी स्वार्थ तन मनको। सब ईश्वरकू अरप । मुक्त स्वरूपी जे सदा ॥११॥ दोहा-स्वारथ धर्म बताया झूठा । परमारथ सत् भाख्या ॥ अनुभौ छाण करी ज्यूंकी त्यू। रती फरक नहिं राख्या।।१२।। परमारथ स्वार्थका निश्चय । प्रगट कह्या पुकार ॥ उमाराम सत्ले परमारथ । स्वास्थ दिया बिसार ॥१३॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशस्वार्थपरमार्थनिरूपणं नाम सप्तमोअंग समाप्तम् ॥ ७॥९७।। कुण्डलिया। बारे पंथ पट दरशनसाधू । हिन्दूतुर्कलो जान ।। पखापखी में मती बन्धो कोऊरखोनखेंचातान॥ कोऊ रखो न खेंचातान।सकलको साहब एका ॥ - -- स (११०) अनुभवनकाशा गर्कभन्यो निरपक्ष । अजातीअखण्ड अभको ॥ उमाराम समदृष्टि कही। ये समझो परवाण ॥ बारे पंथ पट दरशन साधा हिन्दुतुर्कलोजान॥१॥ जब लग पखांपखीमें बन्ध्यातिवलग मिटेन हान।। कोउ काज सीझे नहीं। साध करी पिछान ।। साधूकरी पिछान । पखापखी रखो न कोई ।। परि पूरण निरपक्ष । लक्ष निश्चैकर जोई॥ सब हितार्थ उमाराम। कही यथारथ जान ॥ जबलग पखापखीमें बन्ध्यातबलग मिटे नहानर श्रुति सन्त वेद कहताहै । साच झूठकी रीत ॥ पखापखी सब झूठहै । साच साहबसूं प्रीत ॥ 'साच साहवरां प्रीत । करे सो सर्वज्ञ राखे । येही आदू रीत। पलकभर झूठ न भाखे ॥ उमाराम लखकहतहै । आदि अन्तका गीत ॥ श्रुति सन्त वेद कहताहै । साच झूठकी रीत॥३॥ पखापखीके भावतें । कारज है न कोय ।। निरापक्ष सबमे हरि देखे । भला याहिते होय ॥ भला याहितें होय । भाव योही ततसारा॥ श्रुति अरु स्मृति कहे । सन्त सब करत पुकारा। उमाराम निरपक्ष पद । गुरु मुख लेसी जोय ॥ पखापखीके भावतें । कारज है न कोय ॥४॥ पक्ष अरु निरपक्षकी। है ज्यू भाखी जाण ॥
नव अंग ९ - (१११) पखापखी सब अस्तहै । निरपक्ष सपिछाण ॥ निरपक्ष सत् पिछाण । भाव दोनूं दरसाया ॥ पखापखीकू त्याग । सत् निरपक्ष उर थाया ॥ उमाराम विचारके । निरपक्ष कियो छाण ॥ पक्ष अरु निरपक्षकी 1 है ज्यूं भाखी जाण ॥५॥ दोहा-निज स्वरूपका ज्ञान है । तब पक्ष रहे न कोय ॥ विना ज्ञान पक्ष ना मिटे । उमाराम कहि जोय॥६॥ इति श्रीअनुभवप्रकाश निरूपणंनाम अष्टमोअंग समाप्तम् ॥८॥१०॥ . सोरठा। कहणी एकहि होय ॥ वाचककी अरु लक्षकी । परि निश्चय है दोय ॥ रवि रजनी ज्यू ऑतरो॥१॥ कुंडलिया। वाचार्थ अरु लक्षार्थके । बहुत ऑतरो होय ॥ रजनी ज्यू वाचार्थ कहिये। लक्ष रखी ज्यूं जोय॥ लक्ष रवी ज्यूं जोय । रहत लियां वोही ठाढा ॥ वाचारथ नहिं रहत । अज्ञानमें जुडिया गाढा ।। परमसुखी लक्षार्थ उमा। वाचारथ दुख सोय ॥ वाचार्थ अरु लक्षार्थके । बहुत ऑतरो होय ॥२॥ वाचार्थ बहु बातां करे । सुरत विपैमें लीन । कोउ वातके राह न चाले । थोथी बातां कीन ।
तुमसनकाशा थोथी बातां कीन । बात लक्षार्थ जाने ॥ चले बातकी रीत । रीत बिन और न माने ॥ उमाराम लक्षार्थ सतहै । वाचारथ मत हीन ॥ वाचारथ बहु बातां करे । सुरत विषयमें लीन॥३॥ इन्दव छन्द। हंस बुगल जुगल स्वरूपमे । वाणी रु खाणीम पारख होती ।। युगके नित उपाय अनर्थकी । मार मच्छी कर पेट भरोती ॥ हिंसा रहित सदा शुद्धकेवल । हंस चुगे अर्थानिज मोती। हंस लक्षार्थ बैण अमोख । वाचक युगकी कहणी है थोती॥४॥ सोरठा। वाचक थोथा बोल ॥ निज पदमाहि थिति नहीं। भरिया अर्थ अमोल ॥ लक्ष कह निज पद लियां ॥५॥ कुंडलिया। लक्षार्थकी खोड खुडावे । सीख बात वाचक ॥ सत् आत्माकू चीन्या नाही। कबहुँन पावेजका। कबहुँ न पावे जक । लक्ष ज्ञानी सुखदाई ॥ प्राप्ती परमानद । कल्पना रही न काई॥ उमाराम उदय निज ज्ञाना अनुभव भाखी लक। लक्षार्थकी खोड़ खुड़ावे । सीख बात वाचक॥६॥ चौपाई। वाचकका निश्चयहै ऐसा । विन चितवन चिन्तामणि जैसा ॥
नववां अंग९
(११३)
अनुभव चितवन लक्षार्थ । नितही प्राप्ती आत्म सत ॥७॥
दोहा।
लक्षार्थ ज्ञानी सोई । तजी असार गहसार।
उमाराम यथार्थ जाने । नित्यानित्य विचार ॥८॥
वाचककी तोता ज्यं कहणी । बहुविध बात बणाय ॥
साच झूठ नहिं ओलखे । उदर भरणकी चाय ॥९॥
सोरठा।
ज्यूं पंछी चंडूल । बोली बोले सबनकी ॥
निजस्वरूपकी भूल । यूं वाचक संसारमें ॥१०॥
दोहा।
लक्षार्थकी नित थिति । शुद्ध स्वरूपके माय ॥
वाचार्थकी थिति विषयमें । मुक्ती पावे नाय ॥ ११ ॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशवाचकलक्षनिरूपणं नाम
नवमोअंग समाप्तम् ॥ ९॥ ११४॥
दोहा।
रह रहणी कहणी कहे। सोइ सन्त निज ज्ञानी ॥
बिन रहणी कहणी कहे ॥ पाखंडी अज्ञानी ॥ १ ॥
चौपाई।
कहणीसूं रहीहै न्यारी । सब सन्तां रहणीकू धारी ॥
कहणी ज्यू रजनी में चमका ।रहणी ज्यू प्रकाश रवीका ॥२॥
(११४) अनुभवप्रकाश । । रहणी सो कहणीहे साची । विन रहणी कहणी सब काची चिन्तामणि ज्यूं रहणी सत् । कहणी कागर जाणे असत् ॥ दोहा। कहणी ज्यू कागद कासीदी । तन दुख कटे न कोय ॥ रहणी हुण्डी वाल ज्यू । शुद्ध सदा सुख सोय ॥४॥ रहणीकू राजा ज्यूं समझो। बिन रहणी ज्यू भंगी ॥ वो सारांका भिष्ठा बोरे । वे सब सुखका संगी॥५॥ कहणी कह्या काज नहिं सीझे । बांता करो हजार ॥ तारांसूं रजनी नहिं जावे । यूं कहणी आसार ॥६॥ रहणी रह्या परमसुख पावे । दुख नहि रहे लिगार ॥ रवि माये रजनी नहिं जैसे। यूरहणी तत्वसार ॥७॥ चौपाई। रहणी कल्पवृक्षकी वाड । कहणी ज्यूं एरंडका झाड मन वांछित आनँद रहणीतें। नहिं मिटे केश कछू कहणीत।।८ सोरठा। कह कहणी दिनरात । अस्त रु जड क्लेश बिन रहणी नहिं पात । सत आनन्द रहणी रहे जु साद । सो सि शिव विष्णु ब्रह्माद । वछे । दोहा सब सर्ता
ग्यारहवां अंग ११
(११५)
रहरेणी कहणी कही। उमाराम यो साची ॥११॥
इति श्रीअनुभवप्रकाश रहणीकहणीनिरूपणं नाम
दशमोअंग समाप्तम् ॥ १० ॥ १२५ ॥
चौपाई।
आशा तृष्णा चिन्ता नारी । ममता रोग बधावण हारी॥
सुर नर असुर ब्रह्मादिक लागी । इनतें बचे साधबड़ भागी॥१॥
इनतें जन्म मरण आशंका । रंकही इन्द्र इन्द्र होय रंका ॥
भरम्या फिरे जगत सब जूणी । साधू मिटावे आवागणी ॥२॥
ममता रोग तजे जन सूरा । इच्छा सबी काटरहे दूरा ॥
सो साधू सुख माये सदाई । आवागवण कबूं नहिं आई ॥३॥
हूं तूं आपा रखे न माई । सब घटमें देखे एक साई ॥
हरप शोक व्यापे नहिं कोई । उमाराम निज साधू सोई॥४॥
दोहा।
हूं तू हरप शोक ज्या घटमे । सो घट भरयो विकार ॥
उमाराम उपाधीसबै । तजी सो साधू सार ॥५॥
साध छता काचा मता । नहिं तत्व वस्तुको भेद ॥
उमाराम कैसे कटे । जन्म मरणकी खेद ॥६॥
साध सोई विसरे नहीं। परम गुरुका भेद ॥
उमाराम लवलीन नित । सष कर्मनकू छेद ॥ ७ ॥
मन आपा छूटा नहिं । कहा कथ्यो जिन ज्ञान ॥
लह्यो न शुद्ध स्वरूपकू । तब लग होत अज्ञान ॥ ८॥
(११६) अनुभवप्रकाश। तन मनतें निरलेप है। सदा असंग विचार ॥ उमाराम संसारमें। सो साधूजन सार मन आपा माने नहिं । रखे नहीं कोउ आस ॥ उमाराम साधू सोई । सदा रहे निवास ॥१०॥ मन मूडा है कालका । सब जग मन मुख माय॥ सत् मूडाहै सन्तका। ज्यां मन पावे नाय ॥११॥ सत् मार्ग साधू चले । अखी वसाई धाम ॥ मिथ्या मार्ग जग चले । उपे खपे वे काम ।। १२॥ नैणा निरमल वचन अमोलक । तनमन गलत सहेजू॥ निर अभिमानी संत जन । गुरूका ज्ञान गहे जू ॥१३॥ पांच तीन पंट जीत । रीत पंट जीत। रीत समज्यां की योई ।। साधू सदा निष्काम । काम व्यापे नहिं कोई ॥ १४ ॥ साधू वोही सत् है। दुरमत दे खोय ॥ समदृष्टी आतम लखे । निज साधू है सोय ॥१५॥ जब लग दृष्टी अज्ञकी। तबलग ज्ञान न जानी ॥ ज्ञान भयाअज्ञ ना रहे । ज्यूं काष्ठ अनि समानी ॥१६॥ चौपाई। समझ्या सन्त अज्ञे नहि धारे । जैसे सर्प कंचरी डारे ॥ केवल सदा निरंतर सोई। नहि शत्रु मित्र जिनके कोई ॥१७॥ ज्ञान सोई अज्ञान मिटावे ॥ ब्रह्मा तिरण एक कर थावे॥ सारामें सच्चिदानन्द जाणे ॥ उमाराम सोइ साधु वखाणे॥१८॥ अज्ञ जाणकू मिथ्या माने ॥ सर्वज्ञ सदा सत्कू जाने ॥
ग्यारहवां अंग ११ (११७) सो साधू जगमें निरभोई ॥ अगम निगम यूं भाखे दोई ॥१९॥ दोहा। अज्ञानीकी दिष्टमें । ऊंच नीचकी जाण ॥ केवल दृष्टी सन्तकी । सर्वज्ञ सत् पिछाण ॥२०॥ कुंडलिया। सत्पुरुपांकी रमझ न जाणे । करे उणारी होड ॥ तीन गुणामें खाय गुलेटा॥ विपयमें डूबा डोड ॥ विपयमें डूबा डोड । संत पटगुणतें दूरा ॥ पारब्रह्म लवलीन । परमारथ भाखे पूरा ॥ उमाराम संत या जगमें । कहिये बंदी छोड़ ॥ सत्पुरुपोंकी रमझन जाणे । करे उणारी होड ॥२१॥ सिंह सर्प ज्यूं जगत छेडियां । तहाँ होवे कछुहाण ॥ साधूकू भल छेडिये । शुद्ध बतावे जाण ॥ शुद्ध बतावे जाण । अंतर वे रखे न काई ॥ सवी कर्म दे काट । दीखावे पूर्ण साई ।। उमाराम साधू या जगमें । जैसे प्रगट भाण ॥ सिंह सर्प ज्यूंजग छेडिया तहां होवे कछुहाण ॥ २२ ॥ दोहा। उमाराम सन्त बहु घालू । अधम उधारणहार ॥ परमारथकारणया जगमें।"लियासंतअवतार ॥२३॥ साधू पद निन्दे कोइ भोदू । जिनकू ज्ञान न कोय।।
(११६) अनुभवप्रकाश। तन मनतें निरलेप है । सदा असंग विचार ॥ उमाराम संसारमें । सो साधूजन सार ॥९॥ मन आपा माने नहिं । रखे नहीं कोउ आस ॥ उमाराम साधू सोई । सदा रहे निरवास ॥१०॥ मन मूडा है कालका । सब जग मन मुख माय॥ सत् मूडाहै सन्तका। ज्यां मन पावे नाय ॥११॥ सत् मार्ग साधू चले। अखी वसाई धाम ॥ मिथ्या मार्ग जग चले । उपे खपे वे काम ॥ १२॥ नेणा निरमल वचन अमोलक । तनमन गलत सहेजू॥ निर अभिमानी संत जन । गुरूका ज्ञान गहे जू ॥ १३॥ पांच तीन पंट जीत । रीत समज्यां की योई ॥ साधू सदा निष्काम । काम व्यापे नहिं कोई ॥१४॥ साधू वोही सत् है। दुरमत दे खोय ॥ समदृष्टी आतम लखे । निज साधू है सोय ॥१५॥ जब लग दृष्टी अज्ञकी । तबलग ज्ञान न जानी ॥ ज्ञान भया अज्ञ ना रहे । ज्यू काष्ठ अग्निसमानी ॥१६॥ चौपाई। समझ्या सन्त अज्ञे नहि धारे । जैसे सर्प कंचरी डारे ॥ केवल सदा निरंतर सोई । नहि शत्रु मित्र जिनके कोई ।। १७॥ ज्ञान सोई अज्ञान मिटावे ॥ ब्रह्मा तिरण एक कर थावे॥ सारामें सच्चिदानन्द जाणे ॥ उमाराम सोइ साधु बखाणे॥१८॥ अज्ञ जाणकू मिथ्या माने ।। सर्वज्ञ सदा सत्कुं जाने।
ग्यारहवां अंग ११ (११७) ॥ सो साधू जगमे निरभोई ॥ अगम निगम यूं भाखे दोई ॥१९॥ दोहा। अज्ञानीकी दिप्टमें ।' ऊंच नीचकी जाण ॥ केवल दृष्टी सन्तकी । सर्वज्ञ सत् पिछाण ॥२०॥ कुंडलिया। सत्पुरुपांकी रमझ न जाणे । करे उणारी होड। तीन गुणामें खाय गुलेटा ॥ विषयमें डूबा डोड ॥ विषयमें डूबा डोड । संत पटगुणतें दूरा पारब्रह्म लवलीन । परमारथ भाखे पूरा ॥ उमाराम संत या जगमें । कहिये बंदी छोड़ ॥ सत्पुरुषोंकी रमझन जाणे । करे उणारी होड ॥२१॥ सिंह सर्पज्यूं जगत छेडियां । तहॉ होवे कछुहाण ॥ साधूकू भल छेडिये । शुद्ध बतावे जाण॥ शुद्ध बतावे जाण । अंतर वे रखे न काई ॥ सबी कर्म दे काट । दीखावे पूर्ण सांई ॥ उमाराम साधू या जगमे । जैसे प्रगट भाण ॥ सिंह सर्प ज्यूंजग छेडिया।तहां होवे कछुहाण ॥ २२ ॥ दोहा। उमाराम सन्त बहु घालू । अधम उधारणहार ॥ परमारथकारणया जगमें। लियासंतअवतार ॥ २३ ॥ साधू पद निन्दे कोइ भोदू । जिनकू ज्ञान न कोय॥
मदन ल न हामविचारा संत एडमन का दरिया बाई ॥ या मनाने जा । उन गई ॥ २५ ॥ सोला। अनल आतना ना ! सामनायितत्वहनने ॥ नहीं उपारी कोई । नारान निद की ॥२६॥ इति श्रीअनुभमन्नाश सावूअनाबूलनगनिरूपनाम एकादशो अंग समातम् ॥ १३ ॥ ३९०॥ दोहा। करुणा मेत्री सुदता। पर उपकार हियेजु ॥ दांत रु शांत सुछंदता ।शम दम साध लियेजु ॥३॥ सोरठा। नित आतम आराम । निर्मल अचल अगाध मति॥ निष्प्रिये निहकाम । कृपासिन्धु गंभीर अति ॥२॥ दोहा। नान वेराग संतोप सत । शील साच सुधरम ।। परम विवेकी भक्ति निज । वेत्ता वेद मरम ॥३॥ ज्ञाता अगम रु निगमका । अति प्रवीन सब वात ॥ असत तजी सत्में थिति ॥ लिपे नहीं निज गात ॥४॥ इन्द्रिये जीतन चिन्त नित । त्यागी महाविचार ॥
तेरहवां अंग १३
(११९)
पट उरमी ते रहित है । जाणे सारासार ॥ ५॥
गुणातीत निरविकल्प जिन । सदा तृप्ति सुख भाय ॥
कोमल वचन दयालु है । कह बंद मुक्तिको राय॥६॥
बोध स्वरूप विज्ञानतें । चिद जड़ ग्रन्थी तूटी ॥
कनक कामणीमहाबली । नहिं सके साधुकू लूटी ॥७॥
निर आशा निरमल सदा । नहिं राव रंककी चाय ॥
हाण लाभ सुख दुख सम । शत्रु मित्र एक भाय ॥८॥
कंचन काच रु अमृत विप । निद्या अरु स्तुती ॥
ब्रह्मा आदि अरु कीटलू । सम दृष्टी एक सूती ॥९॥
महंत नहिं साधू जिसो । ब्रीडमें कोय ॥
परिलघुता सबते रखे । अन्तर आतम जोय ॥ १० ॥
सोरठा।
नखशिख सेती संत । पहरया आतम कवचकू ॥
नहिं माया बाण लगंत । शूरवीर महन्तकू ॥११॥
अमित अनूप अनंत । लक्षन सन्त महन्तके ॥
नहिं सके वेद ले अंत । उमाराम कछुकछु कही॥१२॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशसाधूलक्षणनिरूपणंनाम
द्वादशोअंग समाप्तम् ॥ १२ ॥ १६२॥
सोरठा।
नाना विधके भोग । इन्द्रादिक ब्रह्मादिके ।।
तज्या जाण यह रोग । तुच्छानंद सब जगतको॥१॥
(१२०) अनुभवप्रकाश। दोहा। अति तीव्र वैराग ले। विपकू दिया विडार ॥ तीन लोगका भोगकू । तजिया जाण असार ॥२॥ कुंडलिया। क्या राजाक्याबादस्या। ब्रह्मा इन्द्र स्वर्गलोग ।। याकू मैं मायूँ नहीं । झूठा इनका भोग । झूठा इनका भोग । सवी मायाके माहीं ॥ छिनमें जाय विलाय । कबूं थिर खे नाहीं ॥ उमारामआतम सुख पाया।यह सब त्याग्या रोग। क्या राजाक्या बादश्याब्रिह्मा इन्द्र स्वर्गलोग३॥ आतमवानं पदार्थ त्यागा। मोक्ष अर्थ धर्म काम ॥ नौ निधी चौईस सिद्धी । जाणी अल्प निकाम ।। जाणी अल्प निकाम । कामना रही न काई॥ नित तृप्ती वैराग। निजानन्द आनंद माई ॥ उमाराम वैराग योई । कह रह्या संत तमाम ।। आत्मवान पदार्थ त्याग्या।मोक्ष अर्थधर्मकाम॥ हद बेहद व्यवहारा त्यागा। त्याग्याहरप रुसोग। बंदण मुक्त दोनूकू त्यागा। त्याग्याजोग विजोग। त्यागा जोग विजोग । भोगता भोग मिटाया ॥ सत् चेतन आनन्द । सोई सुख केवल पाया ॥ उमाराम नर्चित सदाई । नाम रूप तज रोग ॥
चौदहवां अग १४. (१२१) हद बेहद व्यवहारा त्यागा त्यागा हरपरु सोंग॥६॥ सोरठा। केवल अमल आनन्द । उमा आपही आपमें ॥ कबहुँ न जाण सनन्द । सुर नर इन्द्र ब्रह्मादि सुख ॥६॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशवैरागनिरूपणं नाम त्रयोदशोअंग समाप्तम् ॥ १३ ॥ १६८॥ दोहा। फिकर माय सबही रहे । कीडी अरु ब्रह्मादि । हाण लाभकी कल्पना । सबके लगी उपादि ॥१॥ फिकर बडीहै महा बली। तीन लोक वश कीन । फकर मेटी फिकरकू । निज आतमळू चीन ॥२॥ कुंडलिया। फकर फिकर फाकके ॥ ममता सवी मिटाय ॥ गुण इन्द्रियनकू जीतके ॥ दिया विपैरस ढाय ॥ दिया विषैरस ढाय । नित निर आसे थाया। आपा द्वैत बिसार । निजानंद आनन्द पाया। निज केवल निरलेप है। चेतन ब्रह्म जु शुद्ध । उमाराम फकरकी निश्चै ।जाण सके नहिं बुद्ध॥३॥ फकर लक्ष सक्तें परे । निरमाया निरवाण ॥ ऊंच नीच घट बध नहीं।ज्यांकोई लाभ न हाण।। ज्यां कोई लाभ न हाण गगन ज्यूंसदाअसंगी।
(१२२)
अनुभवमकाश ।
अन्दर बाहर स्वछन्द । नहिं विछड्या नहिं संगी॥
उमाराम फकर सोइ चेतन । सर्वातीत पिछाण ॥
फकर लक्ष सबतें परे । निरमाया निरवाण ॥४॥
फक्करकी निश्चै है योई । फिकर रखे नहिं कोय॥
हूं तूं राग द्वेप अहं आपो। द्वैत भाव दे खोय ॥
द्वैत भाव दे खोय । फकर सोई है पूरा ॥
शुद्ध केवल अद्वैत । सदा निरबंदण नूरा ॥
उमाराम फकर कही । फकर लेसी जोय ॥
फकरकी निश्चैहै योई । फिकर रखे नाहि कोय॥५॥
फकर सबी फिकर न्यारा।दीवी अविद्या खोय॥
सत् अरु चिद आनन्दकू । प्रत्यक्ष लिया जोय ॥
प्रत्यक्ष लिया जोय । फकर चेतन एकसारा ॥
नाम रूपकी हाण । आपही जाणण हारा ॥
उमाराम फकरकी सोजी। फकरहीकू होय ॥
फकर सबी फिकर न्यारा।दीवी अविद्या खोय६॥
दोहा।
राव रंक सब वश भया । कनक कामणी भीतर ।।
उमाराम फकर सोई । इनते रहे निरंतर ॥ ७ ॥
तनमनके स्वारथ बंदे । जठे फकीरी काची ॥
उमाराम तन मन तजे। सोइ फकीरी साची ॥८॥
लाभहाण दोउ त्याग करी । फकर सदा शुद्धचित्त ।
विचरे सवही लोकमें । कनक कामणी रहित ॥९॥
पन्द्रहवां अंग १५ (१२३) । स्वर्ग मृत्यु पातालमें । चौदेहि लोक स्थान ॥ सुरनर असुर रूप पंछी । सब रखे फकरको मान॥१०॥ चौपाई। फकरकू चेतनको ज्ञान । फिकरमाया रखे न आन ॥ आपोई आप अवर नहिं काई।अनुभव स्वरूप सदा सुखदाई ११॥ दोहा। निजानंद आनंदमें । नित थिति फक्करकी जु ॥ उमाराम अवधूतके । नहिं उपाधि रहीजू ॥ १२ ॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशनिश्चैफकीरीनिरूपणं नाम चतुर्दशोअंग समाप्तम् ॥ १४ ॥ १८०॥ दोहा। साच माहि प्रगट नित्यं । समर्थ सत् अलेख ॥ साच बिना पावे नहीं । कहा गृहस्थी कहा भेख ॥१॥ कुंडलिया। बुरी भली छूटी नहीं। तबलग मोटी पास ॥ सकल रोगको मूल यही झिले नहीं निज साच॥ झिले नही निजसाच । संत सब कहता आया। मै तूं तजो विकार । सत् जब सूझत भाया । उमाराम निश्चै कही। करो दुईका नास ॥ बुरी भली छूटी नहीं। तबलग मोटी फास ॥२॥ झूठा घटमें बंद रहा। मान लिया करसाच ॥
(१२४)
अनुभवप्रकाश
सदा साच देखे नहीं। यही भूल गल फास ॥
यही भूल गलफास । झूठ घट छोडो सारा ॥
जब दरसे निज साच । परम पद सुख अपारा ॥
उमाराम सत् कही निश्चै । सन्त लखे यह वाच ॥
झूठा घटमें बंद रह्या ।मान लिया कर साच ॥३॥
साच ग्रियां ऐसी हुवे । जम झेडा टलजाय ॥
जन्म मरण दुखदद मिटे । ज्यूँका त्यूं ठहराय ॥
ज्यूँका त्यूं ठहराय । अमर आदू घर पावे ॥
ज्ञान भक्ति वैराग । साच ज्यां सब चल आवे ॥
उमाराम साचकी महिमा। सब संतां कहिगाय ॥
साचग्रियां ऐसी हुवे । जमझेड़ा टलजाय ॥४॥
इन्दव छन्द।
साचसूं सबी जगतका झबका ॥ दीसत आपनी आपनी ठाई ॥
साचसूं सती अग्नि जले पुनि ॥ साचसूं सूरा लडे रन माई ॥
साचलूँ सती रु जती जगतमें ॥ साच बिना कोई सीझत नाई ।।
उमाजु राम विचारिया साचहीअन्दर बाहर साच गुसांई ॥५॥
सोरठा।
सत् चिद् आनंद साच । नाम रूप मिथ्या सबे ॥
आतम अज अवाच । उमाराम निरणे करी॥६॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशसाचनिरूपणनाम पंचदशो
अंग समाप्तम् ॥ १५॥ १८६॥
सोलहवां अंग १६ (१२५) कुंडलिया। राम लखे सोइ रामका ॥ सब परपंच दे खोय ॥ निन्दता विन्दता ना करे। राम सनेही सोय ॥ रामसनेही सोय ॥ सकलमें रामही देखे ॥ राग द्वेप बिसराय ॥ राम बिन और न पेखे ॥ उमाराम रत राममें ॥ संशय रही न कोय ॥ राम लखे सोई रामका ॥ सब परपंचदे खोय॥२॥ सकलसृष्टिमें रामविराजे ॥ रोम रोम भरपूर ॥ रह सबमें सबतें परे ॥ ज्यूं सरखामें सूर ॥ ज्यूं सर्वामें सूर ॥ राम निरबंदण साई ॥ अचल अखंड अपार ॥ सदा शुद्ध राम गुसाई ॥ उमाराम राम यूं जाण्या॥ सब संशय भई दूर ॥ सकल सृष्टिमें राम विराजे ॥ रोमरोम भरपूर॥२॥ दोहा। रमतीत राम सब माहे यूं ॥ जैसे पुहुप सुगन्ध ॥ ज्ञान प्राणमें प्रगटहीं ॥ राम निजानन्द कन्द ॥३॥ निराकार निज रामजी । ज्यूं घृत माहे स्वादि। रसना विवेकमें प्राप्ति । सत् चिद् राम अनादि ॥१॥ ज्यूं काष्ठमें अमिहै । ऐसे राम अरूप ॥ चक्षु विचारतें निरखिया। राम निरंजन रूप ॥५॥ स्पंद निस्पंद वाय ज्यूं। प्रगट गुप्त यूं राम ॥
(१२६)
अनुभवप्रकाश।
स्पर्श साच पिछाणियां । राम अनामी नाम ॥६॥
निर्विकार नित रामजी । नभ ज्यूं नहीं लिपंत ॥
श्रोत्र शुद्ध अनुभव लह्यो । आतमराम अनंत ॥७॥
ज्ञान विवेक विचार पुनि । साच सहित अनुभोजु ॥
सर्व स्वतंत्र रामजी। या विध लियाजु सोजु ॥८॥
चौपाई।
अज कूटस्थ रामरमतीत ॥ ताते नाम अनाम उदीत ॥
महा अकरता राम गुसांई ॥ महा करत वेई समर्थ सांई ॥९॥
दोहा।
लखे लखावे रामजी । राम सदा सुखधाम ॥
निर्विभाग थित रामजी । उमाराम सोई राम ॥१०॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशरामनामनिश्चयनिरूपणं नाम
षोडशोअंग समाप्तम् ॥ १६॥ १९६॥
सोरठा।
विद्याकी विधि दोय ॥ निज पण्डित दोनू पढे ॥
सत् असत् भल जोय॥ तजे असत् सत्कू लहे ॥१॥
मिटे नहीं अज्ञान ॥ अक्षरकी विद्या पढयां ॥
अन अक्षर निज ज्ञान ॥ आतम विद्या सन्तकी॥२॥
चौपाई।
नानाविध बहु ग्रन्थ अपारा । बावन अक्षरका विस्तारा ॥
आतम अक्षरमें नहिं आवे । रहे निरंतर सब चेतावे ॥३॥
सत्रहवां अंग १७
(१२७)
रवि प्रकाशते जगकी क्रिये । सब क्रियामें रवि निष्प्रिये ॥
यूं आतमतें अक्षर भ्यासे । आतम अन अक्षरनिर आसे ॥४॥
अक्षरमें है नाना भेद । अन अक्षर आतम निरभेद ॥
जो उपज्या सोई अक्षर नासी ।अन अक्षर आत्म अविनासी॥६॥
अक्षर विद्या सबी अविद्या ।अन अक्षर आतम सत् विद्या॥
योई सत् अस्तका छाण । यूं जाण्या बिन मिटे न हाण ॥ ६॥
दोहा।
नर असुर विद्यार्थी । लिवी अविद्या थाप ॥
सत् असत्का छाण बिन ।भुगते तीनूं ताप ॥७॥
पचीसूं शस्त्र ले वांधे। और मारणके ताई ॥
अपणा कारज होय एकमें । मार कलेजा माई ॥ ८॥
च्यार वेद नव व्याकरण । पटमत पढो पुराण ॥
आतम विद्या ओलख्यां बिना। पढियामिटे नहाण ॥९॥
विद्या सोई आतमा चीन । योइ विद्या परवाण ॥
पढ विद्या बैदा नहि छूटे । सोई अविद्या जाण ॥ १० ॥
कुंडलिया।
पण्डित परपंच छोडदो । दूर करो सब झोड ॥
आतमकी विद्या बिना । कबहुँ न पावो ठोड ॥
कबहुँ न पावो ठोड । भाव अक्षरका मेटो ॥
अन अक्षर निज स्वरूप । अपणा आपही भेटो।
उमाराम सतविद्या भाखी । सवी वासना तोड ।
पंडित परपंच छोडदो । दूर करो सब झोड ॥११॥
(१२८)
अनुभवप्रकाश।
.
-
अन अक्षरतें अक्षर सवे । वो अक्षरतें वार
अन अक्षर निज मूलहै । सन्तां किया विचार ।।
सन्तां किया विचार । सवी अक्षर खर मानो।।।
सद चिद् आनंद अखंड।सोईआतम सत् जानो।
पंडित सोई सुजाणहै। लखे जू सारासार ।
अन अक्षरतें अक्षर सके। वो अक्षरतें बाह॥१२॥
दोहा।
पढे सुणे कई जन्मलों । ग्रन्थ अनेक विचार ॥
आतमकी विद्या बिन । संशय बधे अपार ॥ १३ ॥
विद्या असल ज्ञान आत्मको । सब विद्याको नूर ।।
यह विद्या तत्व सारहै । अक्षर विद्या कूर ॥१४॥
आत्मविद्या शुद्ध स्वरूपी । निरविकार सुख सार ॥
जहॅ अक्षरका लेशन कोई।आपोई आप अपार ॥१५॥
श्रुती अरु स्मृती कही। आतम विद्या साच ॥
नाम रूप खंडण कही। उमाराम सत्वाच ॥ १६॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशविद्याअविद्यानिरूपणं नाम
सप्तदशोअंगसमाप्तम् ॥ १७॥२१२॥
+
दोहा।
क्रिया करे का जन्मलूं। जन्म मरण नहिं छूटे।
ब्रह्मज्ञान उद्योत होतहीन छिनमें, जेड़ा,तूटे ॥१॥
अठारहवां अंग १८ (१२९) दीपक अरु सोरठा। कह उपाय यह वेद । ब्रह्मज्ञान उद्योतकी ॥ विषयवास सब छेद। सत् चिद् आनँद ब्रह्म तूं ॥२॥ दोहा। पंचभूत हकार सहित । तजे मन मन आस ॥ ताहि क्षीण चेतन ब्रह्मप्राप्ति । आप ब्रह्म एक रास ॥३॥ चौपाई। जबलग ब्रह्मज्ञान नहिं आवे । तबलग भर्म कर्म नहि जावे ॥ होतांहीं ज्ञान कटे कर्म सारा।ज्यूं उगत भानु मिटे अँधियारा॥en चंद्रमा तारा । रातलियां प्रकाशे सारा॥ यूं बुद्धीमें जगत विलास । नाना ज्ञान बुद्धि प्रकास ॥५॥ दोहा। बुद्धि आदि जग कल्पना । कहिये अल्प अज्ञान ।। सदासुचेती शुद्ध सत् । अखे ब्रह्म निज ज्ञान ॥ ६॥ और ज्ञान सब है उरे । ब्रह्मज्ञान सब पार ॥ ब्रह्मज्ञान सोइ ज्ञान है। दूजा ज्ञान असार ॥ ७॥ त्रिभंगी छंद। वाहण थके पूगन सके । पंछीये पके गरुड तिहां ॥ रस जो नाना अल्प वखाना। अमृत पाना पिया जिहां ॥ यूं ब्रह्म ज्ञाना खी समाना। सब जग जाना दीप दिहां ॥ सन्तसुजाना जानत म्याना । केवल ज्ञाना सब परिहां ॥८॥ ९ (१३०) अनुभवप्रकाश। दोहा। और ज्ञान बुध्यादि ले। मृग तृष्णाको नीर ॥ ब्रह्मज्ञान अद्वैत अज । आपोई आप सधीर ॥९॥ कारण लिंग स्थूल जो। महाविकारी भर्म रूप ॥ नित असंग इनतें जुदो । चेतन ब्रह्म स्वरूप ॥ १० ॥ ब्रह्मज्ञान निज ज्ञान है ।सबी ज्ञानको द्रष्टा ॥ तिर्गुण ज्ञान उपाधिमें। नही रुष्ट नहिं तृप्टा ॥ ११ ॥ ब्रह्म अजन्मा शुद्ध घन । अनुभौ स्वरूप अनादि ।। द्वैताद्वैत भेद नहिं कोई । नहिं ज्यां माया आदि ॥१२॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशब्रह्मज्ञाननिरूपणं नाम अष्टादशोअंग समाप्तम् ॥ १८ ॥२२४ ॥ दोहा। यह मन अन्धा असर । पसर मायामें भूलो॥ आतमरूप बिसार । बंध्यो अज्ञ आपे ठूलो ॥१॥ मन है बड़ा खराब । रूप अपणा नहिं जोवे॥ कामा कर निष्काम । जुगोजुग जन्म बिगोवे ॥२॥ मन उलज्या विषय माये । जुगोजुग नाहि छूटे ॥ झूठा मान्या साव । याहीते उपजे खूटे ॥३॥ जंबका जाय करकपर ठाडा। ऐसे मनको भाव ॥ माया करकमें उलज्या। मिथ्या मानत साव ॥४॥ सब प्रपंच मनमानिया । विपयभोग ससार ।।
उन्नीसवां अंग १९
(१३१)
.
दुख सुखकू सेंठा गह्या । हरप शोक उरधार ॥५॥
मलमूत्रका पीजरा लिया साच मन थाप ॥
भरमें भवसागर
माहिं । भुगते तीन ताप ॥६॥
चौपाई।
शुभ अशुभ कर्म मन साथे। पाप रु पुण्य लिया दोइ माथे।
अर्थ रु धर्म काम विस्तारे । कबहूं जीते कबहूं हारे ॥७॥
काम क्रोध मोह लोभ हंकारू । यह निशिदिन मन संगबटपारू।।
मन इनके रंग माहे राता। जगे काम जब गिणे न नाता ॥८॥
मनमें क्रोध प्रगटे जबही । महाविराल दुखी है तबही ॥
मनके चढ्यो क्रोधको जहर । ताते फिरे चौरासी फेर ॥९॥
मोह मलेच्छ भया मनसात । मान्या मात रु तात जमात ॥
झूठी जग मनमाने साच । मोह मायामें रह्या जराच ॥१०॥
सोरठा।
मन उर उदै हुवा जु । लोभ पापको बाप जो॥
लोभ बडी है दाजु । जन्म जन्म छूटे नहीं ॥११॥
दोहा।
अहंकारते प्रगट्या । मनमें अनन्त विकार ॥
सब परिवार अज्ञानको । रह जूमनकीलार ॥१२॥
सबही जग मन मानियो । विन मन जगहै नाय ||
अरधउरध अरु लघु दीर्घ। ये सब मनके माय॥१३॥
(१३२)
अनुभवप्रकाश।
चौपाई।
मनही धरणी मनहै नीर ।। मनहै तेज रु मनी समीर ॥
इनके आगे मनहै नभ ॥ पंचरूप मन जगहै सम ॥१४॥
रजनी दिवस चंद अरु सूर ।। ये सबहीहैं मनको नूर ॥
मन ब्रह्मा विष्णु शिव शेष ॥ नाम रूप सब मनको भेप ॥१५॥
इन्दव छन्द।
होतीकू करे अनहोती पल्कमें। होय अनहोती सो होती ठहरावे॥
महाविपरीत गती मनकी पुनि । जैसे बाजीगर बाजी दिखावे ॥
मन अनंग अपर बली अति । तीनही लोककू नाच नचावे ॥
मनही विधि निषधको करता । मनही थापत मन उठावे ॥१६॥
कुण्डलिया।
मन जालम जोरावर योधा । महा बलीहै दूट ।।
तीन लोक पर हुक्म चलावे । बंद लगाया झूठ ॥
बंदलगाया झूठ । विषयमें डूबा बैठा ॥
सत् संभाले नाही । अस्तकू गहिया सैठा।
उमाराम अनुभव प्रकाश्यागमनका रटान लेस।
शुद्ध सनातनआतमा। अपणाआप महेश।॥१७॥
दोहा।
जीव ईश अरु ब्रह्मका । मनही मान्या भेद ॥
उमाराम निज बोधले। मनकू दियाज छेद ॥ १८ ॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशमननिरूपणं नाम एकोनविशो
अंग सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥२४२॥
बीसवां अंग २०
(१३३)
दोहा।
दृश्यादृश्य अदृश्य तिहुं । यह जडमाया रूप ॥
तूं चेतन इनते जुदो । अमल अनादि अनूप ॥१॥
चौपाई।
जबही विषय वासना ग्रेही। तब निज चेतनता विसरेही ॥
विषय वासना सबही तज। तूं चेतन निरमल नित अज ॥२॥
दोहा।
अस्त अज्ञ जड तूं नहीं । देह इन्द्रिय नहिं कोय ॥
तूं चेतन सुख रूप है । आपही आपकू जोय ॥३॥
मनमानी मुक्ती चौरासी । आपे बन्धा विख्यासी ॥
निरालम्ब निर्वाण तूं । निर्विकार द्रष्टासी ॥४॥
चौपाई
नीर दिष्ट एकू इकसारा । तरंग दिष्ट भ्यासे बहु धारा ॥
यूं नाम रूप आपा तज दूर । तूं चेतन निरबंदण नूर ॥६॥
दोहा।
पदविकार दे त्याग । जाग जो रूप तुमारा ॥
वाहर भीतर एक । तूई निर्लेप अपारा ॥६॥
धर्म कर्म डूबण तिरण । यह तन मनकू जोय ॥
हाण विरध तोकू नही । तूं नित न्यारा सोय ॥७॥
पंच तत्व गुण तीन सबै । जग तेरे आधार ॥
निराकार निरबंद तूं । शुद्ध चेतन एक सार ॥ ८॥
(१३४)
अनुभवप्रकाश।
देह इन्द्रिये मन बुध जड़ । तोय सके नहिं जान ॥
तोहीतें चेतन है । यह सब माया आन ॥९॥
विन चेतन चलता नही, चेतन चले न कोय ॥
चलता नाम रूपसब मिथ्या।तूंचेतन थिरसोय॥३०॥
जग स्वप्ना दे खोय । समझ सत् स्वरूप तुमारा ॥
निर्विकल्प निरधुंद । सोई तूं चेतन प्यारा ॥ ११ ॥
नाम रूप तोमें नहीं । तूं नाम रूप क्यों होय ॥
जैसे भूपण हेममे । हेम न भूपण कोय ॥ १२ ॥
अनहोती जग तरंग सम । तोय बिना नहिं आन ॥
सुखसागर चेतन तूं। आपही आपकू जान ॥ १३॥
नाना रूप ज्यूं नभमें । बणे रहे लय होय ॥
तू चेतन निरलेप यू ॥ ज्यूँका त्यूँ थित सोय ॥१४॥
चौपाई।
मृतकातें नाना घट भ्यासे ॥ यूं तूं सब जगहू प्रकाशे॥
ब्रह्मादिक उपजे होय भंग ॥ तू चेतन शुद्ध स्वरूप अभंग॥१५॥
बणे मिटे देहादिक सोई ॥ तोकू हाण विरध नहिं कोई ॥
चिदाकाश चेतन निरधुन्ध ॥ तेरे नहीं मुक्ति अरु बंध ॥ १६॥
पांच पचीस देहके सात ॥ निशिदिन करत रहे उत्पात ॥
निराकार चेतन तू शुद्ध ॥ तिर्गुणी देहादिक अशुद्ध ॥ १७ ॥
दोहा।
कारण लिग स्थूल जू ॥ तिहूं अवस्था जाण ॥
यह सब धर्म शरीरको ॥ तूं चेतन निरवाण ॥ १८ ॥
घीसवां अग २०
(१३५)
चौपाई।
जाग्रत स्वप्न सुपुपती तीन । एक एकमें होवे खीन ॥
नित व्यभिचार गुणाके माई ॥तू चेतन ज्यूँका त्यू सांई ॥१९॥
दोहा।
उत्पति स्थिति लय गुणनमें ॥ गुण होवे मिटजाय ॥
तूं उपजे विणसे नहीं ॥ चिंता करे वलाय ॥२०॥
फेन वुदबुदा लहर तिहूं ॥ जलतें जुदी न कोय ।।
ऐसे विश्व तोहिमें ॥ तोमे न विश्व होय ॥ २१ ॥
तेरेही अज्ञानते ॥ रज्जु सर्पवत जगत ॥
पुनि तेरे निज बोधते ॥ नहिं कोई जगत् अजगत ॥२२॥
चौपाई।
तूं है सब मायाको पती ॥ ज्ञान स्वरूपी निर्मल अति ॥
सब माया तेरे आधार ॥ अज कूटस्थ स्वरूप तुमार ॥२३॥
दोहा।
पंचभूत माया मई । इनमें तिरगुण ताप ॥
सदा शान्ति सुख धाम तूं । निरमाया निज आप ॥२४॥
सोरठा ।
निरउपाधि निरवंद । सतसुख परम प्रकाश तूं ॥
निजानन्दआनन्द। शिवस्वरूप शुद्ध बोध निज ॥२५॥
इति श्रीअनुभवप्रकाश स्वरूपज्ञानउपदेशनिरूपणं
नाम विशमोअंग समाप्तम् ॥२०॥२६७ ॥
(१३६) अनुभवप्रकाश दोहा। मेरी भूल मोतें पडी । मोतें मिटी जु सोय ॥ हूं चेतन अद्वैत शुद्ध । मोमें भूल न कोय ॥१॥ मेरेते सब जग भया । मैई लिया जगधार ॥ मैंई जगसूं न्यारा थया । मोमें जगत असार ॥२॥ अन होतो होतो सो भ्यासे । ज्यूं स्वप्नो निद्रा माई ॥ यूं जगहै मो माहे अनोतो । हूं चेतन जग नाई ॥३॥ हूं चेतन निर्दोपहूं । निर्दोपहूं । सब मेरेते सब मेरेतें चोज ॥ सबी चोजमें मैहूं पूरा । निज स्वरूप थित मोज ॥४॥ मिटणे में हूं ना मिट्टू । हूणमें नहीं हुवा ॥ हूंणे मिटणे बीचहु । नहीं हूं मिल्या न जुवा ॥५॥ कहा आस्ती कहा नास्ती । स्वप्ना कैसी काणी ॥ मेरे अदै स्वरूपमें। इन दोनोंकी हाणी ॥६॥ आस्ती नास्ती अज्ञकी । अज्ञ ज्यूं लहरीवत ॥ हूं चेतन दरियाव सम । परमप्रकाशी सत ॥७॥ रज्जूमें सर्प सीपमें रूपा। अन होता परवाण ॥ यूही है सब जग मो मांही । हूं चेतन निरवाण ॥ ८॥ आपमें। और नदीसे कोय ॥ विधिनिषेध कहां पाइये । ज्यूँका त्यूं थित सोय ॥ ९ ॥ भजण तजण मोमें नहीं । हूं भजू भजाऊं नाय ॥ निरमल शुद्ध स्वरूप हूं। भजू तजूं कहो काय ॥ १० ॥ चेतन द्रष्टा
बाईसवां अंग २२
(१३७
भजणा तजणा मूलमें। यह महा अज्ञान ॥
हूं चेतन्य अनन्त गति । शुद्ध स्वरूप निज ज्ञान ||११॥
इति श्रीअनुभवप्रकाशनिजज्ञाननिरूपणंनाम
एकविंशमो अंग समाप्तम् ॥२१॥२७८॥
दोहा।
शुद्ध चेतन अद्वैत अज । निर्विकार सुखधाम ॥
ताकी इच्छा शक्तितें । या अनन्तां नाम ॥१॥
मनहर छन्द।
पुरुष प्रकृति मेहतत्व अहंकार पुनि ॥
रज तम सत् गुन इच्छाहीके नाम है।
व्योम रु समीर तेज नीर भूमी चंद सूर ॥
लोकहु चतुर्दश इच्छाहीका धामहै ।।
सुर नर असुर चौगसीलक्षच्यारूंखाणि।
सबहीका कारण जु इच्छा माया बाम है ।
गिणती करत कछु पार नहिं आवे कोय॥
करही विवेक निज होय उमाराम है॥२॥
दोहा।
निज विवेकतें ज्ञान । बिन विवेक वै नाय ।।
जोग आदि क्रिया सबै । है मायाके माय ॥३॥
माया अति प्रचंड है । सब जग लियाजु धेर॥
बहु रस जाली नोखके। सबळू कियाज जेर ॥४॥
(१३८) अनुभवप्रकाश। कुंडलिया। माया बडी अपरबल कहिये । बहुत मचाया फैल ॥ चवदेई लोक समेटके । लिया उदरमें मेल ॥ लिया उदरमें मेल । नचावे बहु विधि माया ॥ कई वार उपजाय । कई फेर वार खपाया ॥ उमाराम माया है ऐसी । किम कर छूटे गैल ॥ माया बडी अपरबल कहिये । बहुत मचाया फैल ॥६॥ माया कहिये वासना । मिथ्या मानी योय ॥ निरालेप चेतन अनादू । सत्कर जाण्या सोय ॥ सत्कर जाण्या सोय । इसी विध माया जीता। आतममें गलतान । रह्या निरभोय न चिन्ता॥ उमाराम तजी वासना । माया रही न कोय ॥ माया कहिये वासना। मिथ्या मानी योय ॥ ६ ॥ तोयतें वीज वृक्ष बहु भ्यासे । सर्व प्रकाशी तोय ॥ उलटा देखो तोयमें । बीज वृक्ष नहि कोय ॥ बीज वृक्ष नहिं कोय । बीज ज्यूं माया झांई ॥ उतपति थिति अरु लय । सबी मायाके माई ॥ उमाराम निरमाया चेतन । तोय ज्यूं है सोय ॥ तोयते बीज वृक्ष बहु भ्यासे । सर्व प्रकाशी तोय ॥७॥ रेखता छन्द। शुद्ध चेतन अनन्त अनूप है । आपही आप नही लेस माया ॥ - बाईसवां अंग २२ (१३९) . रहे मिट जाय वाहूकी सत्ता कोट ब्रह्मंड है ॥ दीर्घ काया ॥ आदि अरु अन्त पुनि मध्य वाको नहीं ॥ सत् सुख परमप्रकाश थाया ॥ रमझ ऐसी लखी उमाराम आपमें मिट्या अज्ञान शुद्ध स्वरूप पाया ॥ ८ ॥ अलककी पलकतें खलक केता भया ॥ पलकते खलकका काम सारा ॥ सच्चिदानन्द इण पलक अरु खलकतें ॥ आप अपल नित रहत न्यारा ॥ तहां जगत नहीं जात कोई पुण्य नहि पाप ॥ कोई दिवस नही रात नहीं जीत हारा ॥ सन्त सूरा लखे सूरा लखे भेद अलेखका ॥ उमाराम रमझ प्यारा॥९॥ मनहर छंद। अखंड अपार दधी आरही न पार कोउ ॥ अनन्त अकथ गति निर्गुण कहत है ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश नाम रूप सब जग ॥ ब्रह्म दरियाव ज्यांमें लेरांसी भ्यास तूहै ॥ सत् चिद् सुखरूप चेतन विराजे आप ॥ निराधार निकलंक अचल रहतु है ॥ ऐसी जाण जाणी हम अपणा आपके माई ॥ कहत है (१४०) अनुभवप्रकाश । ॥ उमाराम निस्संदेह वचन भखतु है ॥१० आतम अगाध अति पारही न आवे कोउ ॥ निरमल नचिन्त नित आतम अपार है ।। आत्मा चेतावे चेत अनेकां देखावे भेक ॥ दिष्टा सबीको आप अन्दर वाहर है॥ साराही प्रपंच भर्म आत्मामें पावै नाहीं॥ अक्रिये नहचल निज आप सुखसारहै ॥ अनुभवप्रकाश उदै उमाराम आप माई ॥ प्राप्ति आत्मस्वरूप संशय न लगार है ॥११॥ कुंडलिया। चेतनके आधारहै । चेत अचेत विलास ॥ आप इनमें मिटे न होवे । नित न्यारा प्रकाश ॥ नित न्यारा प्रकाश । आप निरबंधन सांई ॥ विधि निषेध विकार । नहिं चेतनके माई ॥ निजानंद निरवास है । उमाराम थित स्वरूप । चेतनकीचेतन लखे। नहिं कोई रूप अरूप॥१२॥ उत्पतिथिति लय भावना । नहि चेतनमें कोय ॥ थाप उथाप न पाईये । नहीं एक नहिं दोय ॥ नहीं एक नहिं दोय । आपही आप रहवाया॥ नितज्यूँका त्यूँ आप नहीं कोई गयान आया। उमाराम चेतनकी निश्चै । चेतन जाणे सोय॥ उत्पतिथिति लय भावना निहिंचेतनमे कोय१३॥
बाईसवां अंग २२. (१४१) दोहा। पंचतत्त्व गुण तीन तें। रहित आतमा आप ॥ सो आतम आवे नहिं जावे। नहीं क्रियाकर्म ताप ॥१४॥ चौपाई। चेतन बिन क्रिया नहिं कोई ॥ क्रियामें चेतन नहिं होई ॥ ज्यूं रविते जग क्रिया भ्यासे । यू चेतन सबतें निरआसे ॥१५॥ तंतु कर भ्यासे घट पट । घट पटमें तंतू अविघट ॥ पट पूतरी सत्या सत दोई । चेतन है सदा सत सोई ॥ १६॥ दोहा। मन मायाका खेल । होत पूतरी पट ताई ॥ अरु तंतू अलख अखेल। तहां मन माया नाई॥१७॥ सत् बाजी घर खेल पसारा । भांत भांत दिखलाया ॥ जड़ खिलका उन्ही तें भ्यासे। आप रहत निरदाया॥१८॥ निरदाया दायांसू द्वरा । नहिं दायामें हेत ॥ नहि चुम्बक मांहि चेप्टालोहकीलोहचुम्बकबिनानचेत॥१९॥ निरवधि बॅधिया नहीं । नहीं बंधणमें निरबंध ॥ चेतनमें कहां पाईये । किया कर्म अरु फंद ॥२०॥ चेतन सर्वातीतहै । अद्वितीय अविनाश ॥ निरद्वंदी निरवाण नित । अनुभव स्वयं प्रकाश ॥२१ ॥ चौपाई अनन्त घटॉमें सूरज भ्यासे । है सब माहे रहत निरआसे।
(१४२) अनुभवप्रकाश। यूं आतम निरलेपरहवाया।बाहर भीतर अलख अजाया॥२२॥ नाम रूप अन आतम मांई । आतममें अनातम नाई ॥ अन आतम मिथ्या आकार।आतम चेतन अखंड अपार॥२३॥ दोहा। नाम रूप कल्पत सबे । ज्यूं मृग तृष्णा नीर ॥ आतम सत् प्रत्यक्ष है ॥ चेतन शुद्ध गॅभीर ॥ २४ ॥ कुण्डलिया। नित केवल सत् ब्रह्म है । जग सब अस्त असार॥ गीता वेद पुराण कहत है।सन्त भाखत यह सार॥ सन्त भाखत यह सार । इनीमें झूठ न कोई ॥ यह विवेक निज छाण । लख्या सोई निरभै होई॥ उमाराम अनुभौ उदै । जाण्यां सारासार ॥ नित केवल सब्रह्महै।जग सब अस्त असार॥२५॥ इति श्रीअनुभवप्रकाशनिजविवेकनिरूपणं नाम द्वाविंशमोअंग समाप्तम् ॥ २२॥३०॥ दोहा। परमातम विज्ञान है । आतम है निज ज्ञान ।। नाम रूप अनातमा । यह कहिये अज्ञान ॥१॥ भानू बिन नहिं घाम है। घाम बिना नहिं भान ॥ यूं आतम परमात्मा । अद्वितीय निज ज्ञान॥२॥ रजनी ज्यूं अनातमा । तामें भेद अपार ॥
चौवीसवां अंग २४ (१४३) तारा चंद मशाल पुनि । एकू एक अधिकार॥३॥ चींटी ब्रह्मा आदि ले। लघु दीरघ बहु देह ॥ न्यून विशेष समानपुनि । अनातम है येह ॥४॥ अनआतम अज्ञान न पावोनिज आतमके माय॥ जैसे प्रत्यक्ष रविमें । रजनी पावे नांय ॥६॥ आतम सोई परमात्मा । स्वते शुद्ध प्रकाश ॥ शुद्ध चेतन केवल सदा।आपही आप अविनाश ६ इति श्रीअनुभवप्रकाशअनात्माखण्डन आत्मापरमात्माएकता- निरूपणं नाम त्रयोविशमोअंग समाप्तम् ॥२३॥३०९॥ दोहा। पंचभूत देह इन्द्रिये नहिं । चित्त मन बुध अहंकार ॥ शिवरूप थित मोहिमें। नहिं सुन्य असुन्य लिगार॥१॥ निवृत्ति प्रवृत्ति नहीं। नहीं प्राप्त नहिं हाणी ॥ नही बन्ध निरबन्ध कोउ । मम स्वरूप निरवाणी॥२॥ सोरठा। नहिं बाणी खाणी च्यार । निरवाणी वाणी मैं ॥ शिव स्वरूप मम सार । परमाणी परमाण नहीं ॥३॥ दोहा। नहीं साच नहिं झूठ है। नही पक्ष निरपक्ष ॥ अनिरवाच मम स्वरूपमें। नहीं मूर्ख नहिं दक्ष ॥४॥ नहीं वर्ण आश्रम नहीं। नहीं पुण्य नहि पाप ॥
(१४४)
अनुभवप्रकाश।
निरअंजन मम स्वरूपमें । नहीं पुत्र नहि वाप॥५॥
नहीं स्वार्थ परमार्थ नहीं। नहीं मोक्ष नहिं बन्द ॥
अज कूटस्थ स्वरूप मम । निरउपाधि निरद्वन्द ॥६॥
नहीं शास्त्र बकता नहीं। नहीं दान जिज्ञासु ॥
निरविभाग चैतन्यमें । नहीं वास निरवासु ॥७॥
नहि कोइ ज्ञान अज्ञान है । नहिं कोई काम अकाम ॥
संग वियोग न पाइये । शुद्ध स्वरूप सुखधाम ॥८॥
नहीं दीर्घ नहिं लघु पुनि । नहिं सूक्षम नहिं स्थूल ।
नही प्रगट नहिं गुप्तहै । मम स्वरूप निज मूल ॥९॥
नहिं कोई चित्त अचित्त है। नही प्रोक्ष अप्रोक्ष ॥
निरविकार चैतन्य अज । नहीं रोक्ष नहिं तोक्ष ॥१०॥
नहीं आस्ती नास्ती नहीं। नहीं एक नहिं दोय ॥
सत्सुख परम प्रकाश मम । भेद अभेद न कोय ॥११॥
निष्प्रिये प्रिये नहीं । नहि कोइ शेप अशेष ॥
स्वते प्रकाश स्वरूप निज । नहिं कोइ देख अदेख ॥१२॥
सोरठा।
ध्याता ध्यान न ध्येय । ज्ञाता ज्ञान रु ज्ञेय नहि ॥
निजानन्द मम हेय । ज्ञाता ज्ञात अज्ञात नहीं ॥१३॥
दोहा।
द्रष्टा दर्शन दृश्य नही । ना कोइ विधि निषेध ॥
अमल अच्छेद्य स्वरूपकू । नाही खेद अखेद ॥ १४ ॥
अनुभवप्रकाश। (१४५) लेख अलेख न भज्य तज्य। नहिं कोइ भोक्त अभोक्त ।। निष्किये क्रिये नहीं। चिदानन्द निरमोक्त ॥१५॥ भावाभाव अभाव नहिं । नहीं द्वैत अद्वैत ॥ शुद्ध सनातन स्वरूप मम । नहिं कोइ मिव्यान द्वैत॥१६॥ सोरठा। ईश्वर जीव नाही जु । नहिं कारण कारज नहीं॥ अपर स्वरूप माही जु । नहीं ब्रह्म माया नहीं ॥ १७॥ दोहा। विश्व रु तेजस प्राज्ञ नही । नहिं बिसरया नहिं जुत ॥ निज प्रकाश चेतनमें । नहिं कोई सुमति कुमुत॥१८॥ जाग्रत स्वप्न सुषुपति नहीं । नहीं तुरीये प्रकाश ॥ अचल अनन्त स्वरूपमें। नहि कोइभासअभास॥१९॥ अन आतम आतम नहीं । नहिं अन्दर नहिं बाहर ।। अनिरस्वभाव स्वरूपमे । नहिं कोई सार असार ॥२०॥ नही जोग जोगी नहीं । नहिं कोई लोय अलोय ॥ नहिं निर्गुन सर्गुन नहिं । अखिल स्वरूप ममसोय॥२१॥ सोरठा। नहि कोई मान अमान । गुरू शिष्य नहिं अथिर थिर।। नहीं भूल नहि जान । विमल सदा सुख स्वरूपमें॥२२॥ दोहा। नहि नासी अविनासी नही। नित्य अनित्य न कोय॥ १० (१४६) चौवीस अंग २४, अनुभव स्वरूप अनन्त मम। आपहीआप निज सोय! इति श्रीअनुभवप्रकाशस्वरूपअनुभवनिरूपण नाम चतुर्विशोअंग समाप्तम् ॥ २४ ॥ ३३३ ॥ छप्पय छन्द। यह अनुभवप्रकाश अंग चौवीस कहाई। कुंडलिया।॥५५॥इक्कावन है चौपाई॥५१॥ सप्त जु इन्दव छन्द ॥७॥ मनहर तीन वखाने ॥३॥ तीन छप्पय पुनि छन्द ॥ ३॥ रेखता चतुर्थ जु ठाने ॥ ४ ॥ एकसौ तिरासी दोहा ॥१८३॥ सोरठा छन्द छब्बीस ॥२६॥ एक त्रिभंगी छन्द है ॥१॥ यह तीनसौ अरु तैंसीस ॥ ३३३॥ दोहा। उमाराम अवधूत कृत । अनुभवप्रकाश निजसार ॥ तीनसौ अरु तैतीस छन्द। सुखराम लिख्या जु विचार॥१॥३३३।। इति श्रीउमारामजीमहाराजकृत- अनुभवप्रकाश समाप्त। श्रीअचलूरामजीमहाराजकृत-छन्द । छन्दमनहर । कबहुँक इहै मन ब्रह्ममे लगावे ध्यान । कबहुँक इहै मन योगी निराधारहै ।। कबहुँक इहै मन त्यागी होय माने मोद ।
अनुभवप्रकाश। (१४७) कबहुँक इहै मन विषयको विकार है ।। कबहुँक इहै मन अनुभव वाणी कथै । कवहुँक इहै मन करत विचार है । कहै अचलूराम मन तेराही सर्व काम । तेरी तो गतीको कोई वारनहिं पारहै ॥ १॥ छन्दइन्दव। कहै मन आप' न्यून गिने पुनि। कहै मन आप। श्रेष्ठबखाने॥ कहै मन आपकू पण्डित मानत । ग्रन्थ पढे बहु चातुरी ठाने । कहै मन सबकू मूरख मानत । आपनि बात कहै परवाने ॥ अचलूराम ये मनकी मायाजू । मनकू त्याग रहो निरवाने ॥२॥ छन्दमनहर। मायाको प्रचण्ड वेग पारनहि जाने देत । कोऊ साधु शूर वीर मायागुण जीती है । ऋद्धी होय छललेत सिद्धी होय छललेत । छललेत नवनिधी योगी भोगी जती है ।। मायाचिह्न ज्ञानी ध्यानी मायाचिह्नअभिमानी। माया चिह्न गृही त्यागी सबकू नचातीहै कहै अचलूराम मायाको प्रचण्ड काम । मुवात छोड़े नाही लारे होत सती है॥३॥ छन्दमनहर। अनुभवरूपी बोध भान हृदयमाहिं उगो आन । माया अन्धकार जाके मिटगई रातीहै ।
(१४८) अनुभवप्रकाश। जाके नेडी काया नाहिं जाके नेडी माया नाहिं । निर्गुण अखण्ड निराकार एक ज्योति है । त्रिगुण अतीत होय माया सब दूर करी। निर्गुण ब्रह्ममें जाय करी स्थिती है । कहै अचलूराम हम पायो है परमधाम । जहाँ नही माया नाम ज्योतिमें ज्योति है॥४॥ कुण्डलिया। आपा तो ओलख्या नहीं, पन्या चारों वेद । भेदग्रंथी तूटी नही, लख्या नहीं अभेद ॥ लख्या नहीं अभेद, शास्त्र उक्तही बक्या । वाचक हुआ विशाल, विद्यामद छक्या ॥ अचलूराम गुरूकृपा बिन, भेद भ्रम नहिं छेद । आंपा तो ओलख्या नहीं, पढया चारों वेद ॥५॥ परधनकी बातां किया, घरकी भूख न जाय । घरकी भूख जब जायगी, जो धन हाते आय ॥ जो धन हाते आय, तबी दालिद्र जावे । जबी होय संतोष, जाणिये बैठो खावे ॥ अचलूराम मुखते कहां, 'ब्रह्म धन्न नहिं पाय। परधनकी बातां कियां, 'घरकी भूख न जाय ॥६॥ इति ।
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