Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
The Economy Of Human Life
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मनुष्य जीवन की उपयोगिता
OR
THE ECONOMY OF HUMAN LIFE
BY
AN OLD CHINESE WRITER.
अनुवादक
बाबू केदारनाथ गुप्त
हेडमास्टर दारागंज हाई स्कूल
प्रयाग।
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प्रकाशक
छात्र-हितकारी पुस्तक-माला.
दारागज-प्रयाग।
All rights reser tied
Second Edition
1000 Gopios
}
1926
प्रकाशक- छात्र हितकारी पुस्तक माला, , दारागज, प्रयाग। -- , -- . । . मुद्रक- बी. एल. पावगी, हितचिन्तक प्रेस, रामघाट, काशी।
PREFACE, It is a pleasure to introduce & book like this to the public in general and to students in particalar It is at onco & book on ethics, religion, pbilosopby, sociology and what not In fact, it is a universal hand book therein ono will find a soro and casy way to success in life and thereafter-no conflict of ideals, no dissensions of principles The book of whicb this is a translation is entie tled 'the economy of human life,' and has boen vory appropriately translated by the writer into tee sign it quifTENT" | Wo are so much carofal about our material advancoment and waste oorselvos in studying the problems of economios either to gain a parchment or to increase the wealth of our nation or country. Both these ideals are far below the Hindu ideal of & peaceful or happy life. We find many a learned head who have failed in life for want of certain knowledge of thinga indispensable for success in life The book colloots such necessaries and presents them to-day to our students, for them to read, mark, learn and digest Wouldst thou learn to die nobly? Let thy vices die before thee DARAGANJ High SOHOOL, Allahabad, Ioth April, 1919 HARI RAMA JHA
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हमारी प्रकाशित पुस्तकें
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(१) ईश्वरीय योध-जगत निण्यात स्वामी विवेका-
नन्द के गुरू परमहस श्रीरामकृष्ण के उपदेशों का सग्रह है।
एक एफ उपदेश अमूल्य है। मनुष्यमात्र के लिये बडी उपयोगी
है। मूल्य 1)
(२) सफलता की क्रुजी । श्री स्वामी रामतीर्थ
एम ए के 'सीक्रेट श्राफ सफसेसा नामक खेस का हिन्दी
अनुवाद । क्या आप प्रत्येक कार्य में सफलता चाहते हैं ? क्या
आप को अपना जीवन सुखमय बनाना है ? क्या आप अशाति
को भाकर शाति का आनन्द लूटना चाहते हैं ? यदि चाहते
हैं तो इस पुस्तक को अवश्य पढ़िये । मूल्य ।)
। (३) मनुष्य जीवन की उपयोगिता-प्रस्तुत
पुस्तक हाथ में है।
(४) भारत के दशरत्न-यह जीवनियों का सग्रह
६। भीष्म पितामह, श्रीकृष्ण, पृथ्वीराज, महाराणा प्रतापसिंह,
समर्थ गुरु रामदास, श्रीशिवाजी,स्वामी दयानन्द, स्वामी विवे-
कानन्द और स्वामी रामतीर्थ के जीवन चरित्र घडी यूपी के साथ
सक्षेप में तिखे गये है । केवल इस छोटी सी पुस्तक से श्राप
इन महानुभावो के चरित्र से परिचित हो सकते है। मूत्य ।-)
(५) ब्रह्मचर्य ही जीवन है-हिन्दी ससारमें अपने
विषय की एक ही मौलिक पुस्तक है। प्राचीनकाल में ब्रह्मचर्य
की कैसी महिमा थी, और ब्रह्मचर्य के पालन न करने से हम
.
-
लोग कैसी दुर्गति को प्राप्त हो गये है इसे सभी देख रहे है।
प्रस्तुत पुस्तक घडी खोज के साथ लिखी गई है । इसके लेखक
पक श्रादर्श ब्रह्मचारी हैं। हम प्रत्येक विद्यार्थी और उसके
अभिभावक से जोर देकर कहते हैं कि ये इस पुस्तक की एक
प्रति मगाकर अवश्य पढ़ें। और अपना तथा अपनी भावी
सतति का कल्याण करें । दो सौ पृष्ठ से भी अधिक पुस्तक का
मृल्य केवल )
(६) वीर राजपूत-यह एक ऐतिहासिक उपन्यास
है । राजपूताने के एक वीर राजपूत की सच्ची बहादुरी का
जीता जागता चित्र है। धीरता की यातो को पढ़ कर मुर्दा
दिलों में जोश या जाता है। एक बार हाथ में लेने पर छोडने
को जी नहीं चाहता- ढाई सौ पृष्ठ की पुस्तकका मू केवल१)
-
-
"
मैनेजर-छात्र-हितकारी-पुस्तकमाला
दारागंज प्रयाग।
अवश्य पढ़िये
भूमिका
(प्रथम सस्करण से)
जिस
पुस्तक
घी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पाश्चात्त्य
देशों में इतनी सर्वप्रियता मिले व जिस पुस्तफ के उपदेशा
मृत पान करने से मन्च, जर्मन इटैलियन और अगरेजों के
मन इतने शुद्ध और पवित्र बन जाय, उस पुस्तक का हिन्दी
में नाम तक न सुनाई पडे, यह कितने शोफ और आश्चर्य की
घात हे । पहिले पहिल यह पुस्तक एक चीन विद्वान की दृष्टि
में पडी । उसने उसका अनुवाद चीन भाषामे पिया। तदनन्तर
तत्कालीन चीन देश निवासी एक अमरेज़ विद्वान ने उसे देखा
और उसने उसफा अनुवाद अगरेजी भाषा में किया। फिर उसी
के द्वारा यह पुस्तक प्रथम प्रथम सर १७५५ ई० में इगलेण्ड देश
में प्रसिद्ध हुई।
हम भी अनुवाद करके कदाचित् हिन्दी ससार में इस
अभाव की पूर्ति न कर सकते यदि हमारी पाठशाला के मुयोग्य
हेड मास्टर प० हरिराम जी झा अगरेजी पुस्तक न देकर
उसके अनुवाद करने की उत्तेजना हम न देते । घस्तुत प्रस्तुत पु-
स्तक प्रकाशित होनेका अधिकाश श्रेय उन्हीं को मिलना चाहिये।
"मूल अन्य किस भाषा में लिखा गया, किस समय लिखा
गया, कहा लिखा गया, और किसने लिखा इसका कोई सतोष
प्रद प्रमाण नहीं है । लार्ड चेस्टर फील्ड के प्रति अगरेजी
भापान्तरकर्ता का पत्र ज्यों का त्यों अनुवाद करके हम पाठको
के सामने रफ्ने देते हैं। ये इन बातों का निर्णय स्वय कर लें।
-- - ( ख ) श्री १०८ चेस्टर फील्ड के अर्ल महोदयकी सेवा में पेकिन १२ मई १७४६ परम पूज्य महोदय २३ दिसम्बर सन् १७४८ के दिन जो पत्र मेने श्राप की सेवा में भेजा था उसमें जो कुछ मुझे इस विस्तृत राज्य के विशेष स्थान वर्णन और प्राकृतिक इतिहास के सम्बन्ध में लिखना था वह लिख चुका हूं। इसके आगे कुछ पत्रो में मेरा विचार था कि मैं आप को यहा के कायदे कानून, राज्य व्यवस्था, धर्म और लोगो के, रहन-सहन रीति रिवाज के विषय में लिखता किन्तु हाल में एक ऐसी घटना घटित हो गई है कि मुझे विवश हो कर अपने विचार स्थगित कर देने पडे । यहा के विद्वानो का ध्यान आज कल, उसी घटना की ओर आकृष्ट हो रहा है और सभन है प्रागे चल , कर योरोपीय घिद्वानों का भी ध्यान उसी ओर आकृष्ट हो जाय । इस घटना के वृतांत से श्राप सरीखे महानुभावों का कुछ न कुछ मनोरजन अवश्य होगा, यह समझ कर तत्सरन्धी अद्यावधि उपलब्ध बातों को स्पष्ट लिख कर आपके सामने रखता है। चीन से लगा हुआ पच्छिम की अोर तिव्यत नाम का विस्तृत देश है। कुछ लोग “वरान टोला " भी कहते है। इस देश के लासा नामक प्रान्त में मूर्ति पूजकों का गुरू दलाई लामा रहता है । समीपवर्ती देशाके निवासी भी देवता समझ कर उस को- पूजा करते हे । धार्मिक, वृत्ति के लिये अधिक प्ररयात होने के कारण लाखो धार्मिक मनुष्य उसका श्राशीवाद लेने के लिये- लासा जा कर उसका दर्शन,करते हैं और भेंट चढ़ाते है । उसका भव्य निवास मन्दिर पाऊताला पहाड पर 7 - .
पना हुया है। इस पहाड के इर्द गिर्द और खासा प्रान्त भर
में भिन्न भिन्न दरजे के इतने लामे रहते हैं फियदि उनकी संख्या
कही जाय तो लोग विश्वास न करें। इनमें से बहुतों ने अपने
रहने के लिये पड़े घडे सुन्दर मन्दिर बना रपये है। इनका भी
मान सर्वसाधारण दलाई लामा से उतर कर करते हैं । इटली
की तरह देश भर में धर्मोपदेशक ही धर्मोपदेशक देख पडते
है । तार्तरी, मोगल साम्राज्य और अन्य पूर्वीय देशों से प्राम
मेंट पर इनफा निर्याह होता है । जप लोग दलाई लामा की
पूजा करते है तो ये उसे एक सिंहासन पर चढ़ा देते है ।
इस पर एक गलीचा रहता है उसी पर वह पलथी मार कर
बैठ जाता है। उसके भक्त उसफे आगे बड़ी नम्रता में
साटाग दण्डवत करते हैं परन्तु यह उनका कुछ भी सत्कार
नहीं करता । यहा तक कि पडे पड़े राजा महाराजाओं से
पोलता तक नहीं। यह केवल अपना हाथ उनके मस्तक पर
रख देता है और ये समझते हैं कि हमारे सब पाप छूट गये ।
उनका यह भी कहना है कि यह सर्वश है और हृदय की
भीतरी वातो को भी जानता है। लगभग २००पड़े घडे लामे
उसके शिष्य है। ये लोगो से कहते फिरते है कि दलाई लामा
अमर है और जय जय यह भरता हुआ दिखलाई पडता
है तय तय यह केवल एक शरीर छोद्ध पर दूसरा शरीर
धारण करता है।
चीन देश के विद्वानों का चिरकाल से ऐसा मत है कि
दलाई लामा के नियास मन्दिर के पुस्तकालय में प्राचीन काल
से बहुत सी पुरानी पुस्तके छिपी रक्खी है। वर्तमान राजा
को प्राचीन ग्रन्थों के शोध कराने का बड़ा शौक है, उसे लोगों
के उपरोक मत का इतना विश्वास हो गया है कि उसने प्रन्यो
को दृढ निकालने का द्ढ सकरप कर लिया है। इस उर
.
. - *7 (घ ) की पूर्ति के लिये उसे पहले एक ऐसे व्यक्ति को सोज करने की चिन्ता हुई जो प्राचीन भाषा और लिपि दोनो का पडित हो । अन्त में "काउत्सू" नाम का एक विद्वान उसको मिल गया। उसकी प्रायु पू० वर्ष की थी। यह बड़ा गभीर, उदार चित्त और एक अच्छा वक्ता था। कई वर्ष पेकिन में रहने के कारण उसकी एक लामा से गाढ मैत्री हो गई थी। उसी की सहायता से तिव्बत में रहने वाले लामो की भाषा का उसे अच्छा शान हो गया था । भाषा और लिपिकी योग्यता रखने के कारण ही काउत्स् ने अपना काम प्रारम कर दिया । जनता पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ने के लिये 'राजा ने उसे अमूल्य वस्त्र प्रदान किये और प्रधान मत्री के "कोलोआ" पद से उसे विभूषित भी कर दिया। राजा ने दलाई लामा के लिये अमूल्य उपहार भेजे और अपने हाथ से लिख कर निम्न लिखित श्राशय का एक पन भी दिया। "ईश्वर के माननीय प्रतिनिधि, श्रेष्ठ, अतिपवित्र, पूजनीय श्री जी के कमल चरणो में अनेकानेक साष्टाह प्रणाम । भगवन्, 'मैं चीन देश का राजा और समारभर का महागजा अपने मुख्य मत्री काउत्सू द्वारा अत्यन्त नम्रता और सत्कार के साथ आपके चरणारपिन्दों में बार बार अपना सर झुकाता हूँ और अपने, अपने सम्बन्धियो और अपने देश के कल्याण के लिये आप के श्राशीर्वाद की भिक्षा मागता हूँ। प्राचीन ग्रन्थों के शोर करने और पुरातन कालीन शान को पुनर्जीवित कर उस को ग्रहण करने की मेरी प्रयल लालसा है। मुझे पता चला है कि आपके प्राचीन प्रथा रक्षागार में कुछ अमूल्य पुस्तकें हैं जिन को दीर्घ काल, होने के कारण विद्वान 4 -- " F .
- . से विद्वान मनुष्य भी समझने के लिये नितान्त असमर्थ है। उनको नष्ट होने से बचाने के लिये मने अपने “काउत्सू" नामक अत्यन्त विद्वान और माननीय मत्री को पूर्ण अधिकार देकर श्राप की सेवा में भेजा है। उक्त ग्रन्थ रक्षागार में प्रविष्ट होकर प्राचीन ग्रन्थो को पढकर छान चीन करने की प्राज्ञा श्राप उसे दे दीजिये । यही मेरी प्रार्थना है । मुझे पूर्ण भाशा है कि प्राचीन भाषा में अत्यन्त निपुण होने के कारण पुराने से पुगने ग्रन्यो को वह भती भाति समझ लेगा। उसे, इस बात को भी ताकीद कर दी गई है कि यह मेरे आतरिक भावो को भापके सम्मुख प्रगट कर के जिस प्रकार हो आप की श्राक्षा ग्रहण करे। काउत्सू ने अपने प्रयास की बड़ी लम्बी चौडी राम कहानी शिखी है जिसको पढ कर श्राश्चर्य होता है किन्तु उसे सविस्तर कह कर मैं शाप के श्रमूल्य समय को नष्ट नहीं करना चाहता। इगलैण्ड'लौटने पर मेरा विचार हे कि मारी पाते अगरेजी भाषा में लिस क्र प्रसिद्ध करू । यहाँ पर केवल इतना ही लिखना चाहता है कि वह उस पवित्र प्रान्त में पहुचा और मूल्यवान भेंट देने के कारण इच्छित स्थान तक पहुचने में फलीभूत हुश्रा । उस पवित्र विद्यालय में रहने के लिये उसे एक स्थान मिला और एक विद्वान् लामा ने उसे पवित्र काम में उसको सहायता देने का धचन भी दिया। वह मास पर्यन्त रहा थोर 'इस बीच में उसने कुछ प्राचीन अमूल्य प्रयों का अनुसधान भी किया । इन प्रयों में के कुछ वामय उसने अलग लिस लिये और उनके लेवर और जिस समय जिस स्थान में वे लिखे गये थे उस समय और उस स्थान का एक अच्छा प्योरा अनुमान से उसने दिया है जिससे सिद्ध होता है कि साउत्सू कितना पडा विद्वान विचारवान और बुद्धिमान था।
शोधे हुये प्रथो में से एक अन्य वडा प्राचीन है। सैकड़ों वर्ष तक बडे बडे लामे भी उसे नहीं समझ सके। यह नीति सपन्धी एक छोटीसी पुस्तक है और प्राचीन गिमना सोफिस्टस अथवा ब्राह्मण भाषा और लिपि में लिखी हुई है । यह पुस्तक कहां लिखी गई अथवा इसे फिसने लिखा काउत्सू इसका कुछ पता नहीं देता। उसने इसका चीनी भाषा में अनुवाद किया ययपि उसके कथानुसार मूल ग्रन्थ की रोचकता अनुवादित अन्य में नहीं आई । इस पुस्तक के सम्बन्ध में बोन्झीज और दूसरे विद्वानो के मत भिन्न भिन्न हैं। जो इसकी विशेष प्रशसा करते है उनका कहना है कि इस पुस्तक का रचयिता तत्व- वेत्ता कानफ्यूशस है। मूल पुस्तक खो गई है । बामणी भाषा में लिखी हुई पुस्तक खोई हुई पुस्तक का अनुवाद है। दूसरा दल कहता है कि कान्फ्यूशस का समकालीन और टेओसी पथ का सस्थापक चीन देश के दूसरे तत्ववेत्ता ल्याश्रो कियून ने इसे निर्माण किया था। परन्तु भाषा फेसम्बन्ध में दोनों दलो के विचार समान है। एक तीसरा दल और है। यह पुस्तक के कुछ विशिष्ट भावो और लक्षणों को देखकर कहता है कि पुस्तक को डडमिस नाम के ब्राह्मण ने लिखा था। उसने सिकन्दर बादशाह के पास एक पत्र भेजा था जो योरोपीय लेखकों को मालूम हे तीसरे दल से काउत्सु का मत बहुत कुछ मिलता जुलता है। यह कहता है कि पुस्तक का लेखक कोई प्राचीन ब्राह्मण है और उसको ओजस्विनी भाषा से ज्ञात होता है कि यह मूल ग्रन्थ है भाषान्तर नहीं है। शुफा एक बात की होती है कि उसकी योजना (Plan) पूर्वीय लोगों के लिये बिल्कुल नवीन है और यदि उसके विचार पूर्वीय देशो के विचार से न मिलते अथवा उसकी भाषा प्राचीन न होती तो लोग यही ख्याल कर पेठते कि इस पुस्तक का रचयिता कोई योरोपियन था। M - लेखक चाहे जो कोई रहा हो किन्तु इसका जयनाद इस नगर और साम्राज्य भर में गज रहा है। और हर प्रकार के लोग पढ़े चाव से इसे पढ़ते है । यही देख कर इसको अगरेजी भाषा में भापान्तर करने का मेरा भी चित्त उत्सुक हो उठा। श्राशा है यह श्रीमान के लिये एक अच्छा उपहार होगा। दूसरा उद्देश्य अनुवाद करने का मेरा यह है कि यदि मेरा अनुवाद आपको पसन्द भाया ता श्राप स्वय अनुमान कर मेंगे कि मूल प्रन्य फितना महत्व पूर्ण अन्य है । जिस ढग पर मैने अनुवाद किया है उस ढग पर अनुवाद करने का विचार पहिले मेरा नहीं था । किन्तु पुस्तक के पविन पिचार, उसके उस भाव और छोटे वाफ्यो को देख कर मुझे विवश हो फर वर्तमान ढग पर अनुवाद करना पड़ा । भाषान्तर करते समय जय सालोमन और प्राफेटस के रचे हुए ग्रन्थों की भी सहायता मैंने ली है। प्रस्तुत अनुपाद से यदि श्रीमान का कुछ भी मनोरजन हुआ तो मुझे बडी प्रसन्नता होगी, यहा के लोग और उनके देश की व्यवस्था में दूसरे पत्र में लिखगा। + . थापका" हुभा । भिन्न इगलैण्ड में पहिले पहिल जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो उसकी अच्छी विक्री हुई और थोडे ही समय, में अर्थात् सन १८१२२० तक इसके ५० सस्करण निकल गये। इसका अनुवाद फ्रेन्च, जर्मन, इटैलियन, घेल्श भाषा भिन्न देश के करियो ने इसफो कविता रूप में प्रकाशित किया और चित्रकारो ने इसके भावों का चित्र खीच खींच कर इसका गौरव बढ़ाया। प्रस्तुत अनुवाद का मुख्य उद्देश्य मनुष्य मात्र मुख्य कर विद्यार्थियों में जागृति फैलाने का है। मनुष्य जीवन यात्रा ।
.- ग . सुखमय किस प्रकार वनाई जा सकती है इसके साधन सोपत यथार्थ और उत्तम गति से अच्छे ढग पर घतलाये गये हैं। गीता के श्लोकों की तरह विषय पाठको-को पहिली दृष्टि में बडे सूक्ष्म दिखलाई पड़ेंगे किन्तु उनका महत्व उस समय मालम हो सकता है जर पुस्तक पकान्त में स्थिर चित्त हो कर ध्यान पूर्वक पढी जाय ! महाराजा भरथरी का कथन है। बलिष्ठस्यं जलायते 'जलनिधि कुल्यायते तत्क्षणोत् । मेरु स्वरपशिलायते मृगपति. सद्य कुरगायते ॥ च्यालो माल्यगुणायते विपरस पीयूपवर्षायते। यस्यागेपिललोकपालभतम शील। समुन्मीलति॥" लोगो का कहना वृथा है कि मनुष्य का ग्राभूपण गहना है और उत्तम उत्तम वस्त्रों से मनुष्यो का मान होता है। सच बात तो यह कि केवल सदाचार ही एक मात्र मनुष्य का सञ्चा आभूषण है। मैं मानता है कि सदाचार के उपदेश अन्य धर्मो की अपेक्षा हमारे धर्म में बहुत से भरे पड़े हैं, मैं मानता हूँ कि हमारा धर्म सदाचार ही के साचे पर ढला हुभा हे किन्तु में यह मानने के लिय तेयार नहीं हू कि हमारे पास सदाचार के साधन होते हुये भी हम में से कितने सम्चे सदाचारी है। बाहरी सदाचारी यहुत से मिलेंगे किन्तु सच्चे सदाचारी हजॉर में दो ही चार मिल सकेंगे।' ।। इसके प्रमाण में सर्वसाधारण की गई बीती हालत को छोड कर में विद्यार्थियों की वर्तमान स्थिति की किंचित् समा लोचना करता हूँ। इष्टि डालते ही शोक से करोजा थर थर कापने लगता है । तन क्षीण, मन मलीन और हृदय कमजोर दिखलाई पड़ते हैं। व्यग्रता उनका पीछा नहीं छोडती, क्सिी काम में उनका चित्त नहीं लगता। लगे कहा से जन कि ।
दुर्व्यसन का घुन उनके शरीर में लगा हुआ है। उन्ही दुर्व्यसनों के कारण जिनके नाम लेने से घृणा उत्पन्न होती है अल्प जीवन ही में उन्हें फराल काल के गाल में जाना पड़ता है। और उनके जाने के साथ ही साथ हमारी मातृ भूमि भारत माता की आशामो में भी पानी फिरता जाता है। हा शोक ! जिस जाति में महाराज दधीच ऐसे स्वदेश भक्ताहो गये जिन्होंने देश के लिये अपने पच भूत शरीर को अर्पित कर दिया, जिस जाति में महाराणा प्रताप ऐसे अग्रगण्य पीर उत्पन्न हुये जिन्होंने धन धन में भटकना और सूखी रोटियों पर निर्वाह करना पसन्द क्यिा किन्तु यवनों की अधीनता स्वीकार नहीं की, जिस जाति में गुरू गोविन्द सिंह ऐसे धार्मिक गुरु पैदा हुये जिन्होंने धर्म के लिये अपने प्राण प्यारे दोनो पुत्रो को दीवारों में चुनवा दिया किन्तु मुँह से " उफ" तक नहीं निकाला उस जाति के बच्चे ऐसे कादर, निवार्य और कर्तव्यहीन हो, यह कितने शोक और लज्जा की बात है। किन्तु यह सब समय का फेर है इतना ह्रास होते हुये भी यदि पुछ नियम बच्चों के सामने रक्से जाय और उनके सरक्षक उनको उन्हींके अनुसार अपने प्राचार बनाने के लिये उन्हें विवश करें तर भी घर्तमान स्थिति में बहुत कुछ परिवर्तन हो सस्ता है । सस्कृत साहित्य में ऐसी ऐसी अनेक पुस्तकें मिलेंगी जिनमें ऐसे ऐसे उत्कृष्ट नियमो का प्रभाव नहीं है किन्तु हिन्दी साहित्य में ऐसी पुस्तके कदाचित् बहुत कम मिले । प्रस्तुत पुस्तक में ये नियम जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त घडी यूयी से यतलाये गये है। इनको पढकर सदाचार निर्माण में पाठकों को यदि कुछ भी सहायता मिलीतो मैं अपने अनुवाद को सार्थक समझूगा। कहने की आवश्यक्ता नहीं कि जिस अगरेजी पुस्तक से - है
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यह पुस्तक अनुवादित की गई है उसकी भाषा कितनी पेचीदी
और कहीं कहीं पर कितनी क्लिष्ट है। संभवत मूल पुस्तक की
रोचकता इस पुस्तक में लाने का प्रयत किया गया है किन्तु
हम स्वय अपने मुँह मिया मिट्ट बन कर नहीं कह सकते कि
इस प्रयत्न में हमें कहा तक सफलता प्राप्त हुई है। पाठक इस
का निर्णय स्वयं कर ले
अन्त में तरुण-भारत ग्रन्थावली दारागज
प्रयाग के सुयोग्य सपादक पं० लक्ष्मीधर वाजपेयी
को धान्यवाद देते हुये, जिन्होंने घडी रूपा कर के इस पुस्तक
को छपने के पूर्व श्राद्योपान्त पढ़ने का फष्ट उठाया और अपनी
त्रुटियों की क्षमा मांगते हुये हम इस वक्तव्य को समाप्त
-
करते हैं।
-
दारागज प्रयाग
रामनवमी १९७६
سیم
केदारनाथ गुप्त
।
.
विषयानुक्रमणिका पूर्वार्ध पहिला खण्ड व्यक्तिगत मानवी कार्य पृष्ठा १-२ २-४ ५-६ " पहिला प्रकरण दूसरा तीसरा चौथा पॉचना छठचा सातवा श्राठवा १ कार्याकार्य विचार विनय , उद्योग ईपी। तारतम्य धैर्य सतोप- सयम- " १६-११ १२-१३ १४-१५ . दूसरा खण्ड मनोधर्म पहिला प्रकरण प्राशा और भय दसरा आनन्द और दुस तीसरा मोध चौथा। दया वासना और प्रेम १४-२० २१-२३ " २६ पाचपा " (ठ) तीसरा खण्ड पहिला प्रकरण स्त्री २०-३० चौथा खण्ड कौटुम्बिक सम्बन्ध " पहिला प्रकरण पति दूसरा पिता तीसरा पुत्र चौथा सहोदर भाई पृष्ठाव ३१-३२ ३३-३४ ३५-३६ ३७ " . + " " " पांचवां खण्ड ईश्वर की करनी अथवा मनुप्यों में दैविक अन्तर ॥ पहिला प्रकरण चतुर और मूर्ख ३८-३६ दूसरा धनी और निर्धन ४०-४२ तीसरा स्वामी और सेवक કરે चौथा शासक और शासित छठवां खण्ड सामाजिक कर्तव्य पहिला प्रकरण परहित बुद्धि दूसरा ४8-10 तीसरा परोपकार चौथा कृतज्ञता ५२-५३ निष्कपटता ५४-१५ न्याय " पाचवा सातवां खण्ड पहिला प्रकरण ईश्वर उत्तरार्ध ५६-५६ . 1 पहिला खण्ड- -- सामान्यतः मनुप्य प्राणी के विषय में - " 1 पृष्ठाक पहिला प्रकरण मानवी शरीर और उसकी बनावट ६०-६१ दूसरा. इन्द्रियो का उपयोग ६२-६३ तीसरा मनुष्य की श्रात्मा उसकी उत्पत्ति और धर्म चौथा मानवी जीवन और उसका उपयोग ६-७३ दुसरा खण्ड मानवी दोष और उनके परिणाम पहिला प्रकरण पृथाभिमान ७५-७६ दूसरा चंचलता ७७-८० तीसरा दुर्वलता ६१-३ चौथा ज्ञान की अपूर्णता पाचवा छठवां निर्णय ६१-४५ सातवा भहकार । " ४ " " तीसरा खण्ड स्वपरविघातक मानवी मनोधर्म - ६ " पहिला प्रकरण लोभ १००-१०२ दूसरा श्रतिव्यय १०३-१०४ तीसरा बदला १०५-१०F चौथा फ्रूरता, द्वेष और मत्सर १०६-१११ पाचवा हृदय का क्षोभ ('उदासीनता) ११२-११६ " " चौथा खण्ड मनुष्यों को अपनी जातिवालों से मिलनेवाले लाभ: -- पहिला प्रकरण कुलीनता और प्रतिष्ठा, दूसरा शान और विज्ञान पृष्ठा ११७-१२० १२१-१२३ पांचवां खण्ड , स्वाभाविक योगायोग.. पहिला प्रकरण सपकाल और विपत्काल दूसरो क्लेश और व्याधि तीसरा मृत्यु है १२४-१२६ १२७-१२८ १०६-१३० 7 - - .
मनुष्य जीवन की उपयोगिता
पूर्वार्ध
पहिला खण्ड
व्यक्तिगत मानवी कार्य
पहिला प्रकरणं
.
कार्याकार्य विचार
परमेश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ यनाया है। उसने उसको
विचार शक्ति दी है। उसका कर्तव्य है कि वह इस विचार
शक्ति से काम ले । यदि नहीं लेता है तो उसमें और एक
साधारण पशु में कोई अन्तर नहीं है।
दो चार कोस की यात्रा करने के लिये हम कैसे कैसे
वधान पाँधते है । कौन कौन हमारे साथ चलेगा, रास्ता
सराय तो नहीं है,साने पीने का सामान तो ठीक है, कुल
फितना मर्च पडेगा, इन सय धाता की हमें कितनी चिन्ता
रहती है। जब इतनी छोटी यात्रा के लिये इतनी झमट करनी
पहती है तो इस पडी ससार यात्रा के लिये फितनी यही
( । पश्चात्ताप झझट की आवश्यकता है इसका अनुमान पाठक स्वय क सकते है। ऐ मनुष्य, जरा सोच तो सही, तू इस संसार में कि वास्ते पैदा किया गया है। अपनी शक्तियो का ख्याल कर अपनी आवश्यकतानो पर विचार कर । तु अपने कर्त श्राप से श्राप समझ जायगा, और विघ्न बाधाश्री बचा रहेगा। जो तुझे कहना है उस पर विना विचार किये और उसम जो परिणाम होगा उस पर बिना सूक्ष्म निरीक्षण किये। कुछ न बोल । ऐसा करने से अपकीर्ति का भय न रहेगा किसी के सामने ललित न होना पडेगा, और औ चिन्ता से मुक्ति मिल जायगी । अविचारी मनुष्य का अपनी जीभ पर कुछ भी वश नह रहता। वह जो मन श्राता हे घडवडा डालता है। परिणाम यह होता है कि उसे अपनी ही बातो में उल्टी मुंहकी सान पडती है। मनुष्य नहीं जानता कि इस घेरे के उस ओर क्या है, किन्तु तेजी से दौड़ कर फादना चाहता है । सभव है उसका पैर गढे मं पड जाय । यही दशा उस मनुष्य की होती है जो बिना आगा पीछा सोचे सहसा क्सिी काम में हाय, इसलिये पहिले कार्य का विचार कर और बुद्धि और विचार शक्ति से काम ले। ऐसा करने से यह मसार यात्रा सुलम होगी और तू सुरक्षित स्थान पर पहुच जायगा। हाल बैठता हे। - है 1 1- + --
-
--
दूसरा प्रकरण
विनय
सारे ससार की ओर यदि हम एक बार दृष्टिपात कर
तो यह बात सहज ही में मालूम की जा सकती है कि मनुष्य
प्राणी एक कितना क्षुद्र जाव हे । ऐसा होते हुए फिर पे
मनुष्य, तू अपनी बुद्धि और ज्ञान का घमड क्यों करता है?
अपने को अज्ञानी जानना ही शानी होने की पहिली सीढी
है। और यदि तू चाहता है कि दूसरे हमें मूर्ख न समझे तो त
भी अपने को जुद्धिमान समझना छोड दे ।
जिस प्रकार सादा वस्त्र ही एक सुन्दर स्त्री को सब प्रकार
अलकृत कर देता है, उसी प्रकार प्रशस्त और पवित्र आचरण
ही घुद्धिमत्ता का सवोत्तम आभूपण हे।।
शीलनान मनुष्य के विनययुक्त भाषण से सत्य मैं और
भी अधिक तेजस्विता पाती है। मनुष्य को अपने कथन का
सदेच सकोच प्रथया अविश्वास मालूम होते रहना चाहिये ।
कोई भी गात विरकुल साहस पूर्वफ और विश्वास से न फछना
चाहिये । क्योकि प्रत्येक घीत की सच्चाई मनुष्य की बुद्धि में
नहीं पा सकती।
केवल अपनी ही बुद्धिमत्ता पर भरोसा न करो। अपने
मित्रों को भी याता पर ध्यान दो और उनसे लाभ उठाओ।
जय कोई तुम्हारी प्रशसा कर रहा हो तो उसकी भोर
से अपने कानो को फेर लो और उस पर विश्वास न करो,
क्योंकि यह मदिरा से भी अधिक हानिप्रद है । परमेश्वर को
छोड कर अन्य कोई भी निर्दोष नहीं है, इसलिये सब से पीछे
हा अपने को निर्दोष समझना अच्छा है ।
।
1-
-
( ४ )
जिस प्रकार घूघट स्त्री की सुन्दरता को बढ़ा देता है उसी
प्रकार विनय की छाया मनुष्य के सद्गुणों को और अधिक
उत्तम बना देती है।
परन्तु अभिमानी मनुष्य की ओर देखो । वर तडक भडक
को पोशाक पहिन कर इधर उधर देखता हुआ पडे अभिमान
के साथ सडको पर चलता है। उसे सदैव यही पड़ी रहती
है कि लोग हमारी ओर देखें, आश्चर्य करें, और बडे अदव से
झुक कर हमें सलाम करें।
वह अपनी गरदन सीधी किये रहता है और गरीय गुरयो
की ओर ध्यान नहीं देता, वह अपने से कम दरजे पालो के
नाथ घडी वृष्टता का बर्ताव करता है। परिणाम यह होता है
कि उससे ऊँचे दरजे के लोग भी उसके घमड और मूर्खता का
सहज ही में उपहास करने लगते हैं।
धमडी मनुष्य दूसरों को सम्मति का अनादर करता है।
उसे अपनी ही बुद्धि का भरोसा रहता है किन्तु अन्त में उसे
धोखा खाना पडता है।
वह अपने, ही शहकार पूर्ण विचारो में मस्त रहता है।
और दिनभर अपनी ही प्रशसा सुनने और कहने में उसे
प्रानन्द मिलता है।
परन्तु इधर तो वह आत्मश्लाघा में चूर रहता है और
उधर' हाजी हांजी करने वाले खुशामदी उसे चूस कर फेंक
देते हैं।
-
--
तीसरा प्रकरण J उद्योग जो दिन यात गये चे लौटने वाले नहीं और जो श्राने वाले हे उन पर कोई भरोसा नहीं, इसलिये, ऐ मनुष्य, तुम्ने उचित है कि तू न भूत काल के लिये पश्चात्ताप कर और न भविष्य पर अधिक विश्वास रख, केरल वर्तमान काल का उपयोग करना अपना लक्ष्य बना । यह समय थपना है और आगे चल फर क्या होगा, यह कोई जानता नहीं। श्रतएव जो कुछ करना है उसे शीघ्र ही कर डाल । जो काम प्रान पास हो सफता है उसे सायकाल पर मत छोड । बालस करने से श्रावश्यक वस्तुयें मो ग्राम नहीं होती, जिससे मनुप्य को बहुत दुख होता है, परन्तु परिश्रम फ्रने से श्रानन्द ही श्रानन्द मिलता है। उद्योगी को किसी बात की कमी नहीं रहती, क्योंकि उन्नति और विजय उसके पीछे पीछे चलते हैं। जो कभी भी खाली नहीं बैठता और श्रालस को शनु समझता है यही बनवान है,वही अधिकार सपा है, वही श्राद- रणीय हे थोर बडे बडे राजे महाराजे उससे ही सलाह लेने की इच्छा करते हैं। उद्योगी मनुष्य मुह श्रधेरे उठता है और अधिक रात गये सोता है, वह अपने मन और शरीर को मनन और व्यायाम द्वारा सशक्त बनाये रहता है। परन्तु नालसी मनुष्य ससार की कौन चलाये स्पय अपने हो को भार स्वरूप बन जाता है, उसका समय घाटे नहीं फटता, यह दर दर भटकना फिरता है, उसे सूझ नहीं पड़ता
कि मुझे क्या करना चाहिये वोदल की परछाई की भॉति
उसकी आयु व्यतीत हो जाती है। और वह कोई ऐसी वस्तु
नहीं छोड जाता जिसको देखकर लोग उसकी
मृत्यु
के
पश्चात्
उसका स्मरण करें।
व्यायाम के अभाव से उसका शरीर रोगी हो जाता है।
काम करना चाहता है परन्तु करने का सामर्थ्य नहीं, मन में
अधकार का परदा पड जाने के कारण उसके विचार भी गड
वडा जाते है । उसको शानोपार्जन की लालसा होती है किन्तु
उसमें उद्योग कहाँ। बादाम साना चाहता है किन्तु छिलके
तोडने का फष्ट कौन उठावे?
आलसी मनुष्य के घर में बडी गडबडी रहती है । उसके
नौकर चाकर उडाऊ वीर और झगडालू हो जाते है और उसे
विनाश की ओर सोंचते रहते हैं । वह आँखो से देखता है,
कानो मे सुनता है और बचने का प्रयत्न भी करता है किन्तु
उससे निकल कर भागने का उसमें साहस कहाँ ? अन्त में
श्रापत्ति तूफान की तरह उसे श्री घेरती है और मृत्यु पर्यन्त
उसे पश्चात्ताप करना और लजित होना पडता है परन्तु
समय निकल जाने पर फिर क्या हो सकता है ,
।
7
-
चौथा प्रकरण
-
1
.
ईर्षा
यदि तेरी श्रात्मा सन्मान की भूखी है, यदि तेरे कान
अपनी प्रशसा सुनने के लिये श्रातुर हो रहे है, तो जिस धृलि
(भौतिक पदार्थ) से तू बना हे उससे दिल हटा कर किसी
स्तुत्य (श्राध्यात्मिक) वस्तु को अपना ध्येय बना ले।
आकाश मडल को चुम्बन करने वाले इस शाह यलूत के
वृक्ष को देस । यह किसी समय पृथ्वी माता के पेट में एक
क्षुद्र घीज था।
जो कुछ व्यवसाय त करता है उसमें सर्गोश्च होने का
प्रयत्न कर, अच्छे काम में किसी को भी अपने आगे न
घढने दे ।' दुसरो के गुणो का डाह न कर, अपने गुणो की
वृद्धि करने की ओर ध्यान दे ।
अपने प्रतिद्वन्द्वी को निन्दनीय साधनों का अवलम्य लेकर
दवाने की चेष्टा न कर , हृदय में पवित्र मात्र रसते हुये उससे
आगे निकल जाने का प्रयत्न कर । यदि सफलमनोरथ न हुआ
तो कम से कम तेरा सन्मान तो अवश्य होगा ।
सात्विक ईर्षा से मनुष्य को श्रात्मोन्नति होती है । उसको
अपनी कीर्ति की जिज्ञासा लगी रहती है और सिलाडी की
तरह अपने काम की दौड तगाने में उसे आनन्द मिलता है।
दुखो की कुछ भी परवाह न करता हुथा यह ताल वृक्ष की
तरह पढता है और उकाव की तरह अपना लक्ष सूर्य रूपी
अपने गौरव की भोर लगाये रहता है। रात्रि के समय स्वप्न
में भी उसे श्रेष्ठ और यडे पुरुषों के उदाहरण दिखलाई पडते
है और दिन भर उन्हीं के अनुकरण करने में उसे प्रसनता
होती है । वह बडे बडे बधान बांध कर उन्हीं में जोश और
उत्साह पे साथ लगा रहता है, और फिर उसकी कीर्ति
संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक फैल जाती है ।
परन्तु मत्सरी मनुप्य का अन्त करण चिरायता की
तरह कडुना होता है , उसके मुख से शब्दों के साथ विप
घाहर निकलता है और पड़ोसियों की बढ़ती देख कर उसे
बेचैनी रहो करती है । वह पश्चोत्ताप करता हुआ अपने झोपडे
में पड़ा रहता है और दूसरो की भलाई देख कर बुरा मानता
है। घृणा और द्वेष उसके हृदय को छेदते है और उसके मन
को शाति विकुल नहीं मिलती।
मत्सरी मनुष्य के हृदय में दूसरों की भलाई का प्रेम
भाव उत्पन्न नहीं होता और इसी लिये पडोसियों को भी वह
अपने समान हा देखता है, अपने से श्रेष्ठ पुरषों का अपमान
करने का वह सदैव प्रयत्न करता है और उनके कामो की
घुरी २ अालोचनाये किया करता है।
वर दूसरों की बुराई करने की ताक में रहता हे परन्तु
लोगों के तिरस्कार उसका पीछा नहीं छोडते । अन्त में
मकड़ी की तरह अपने ही फैलाये हुए जाल में फस कर वह
मर जाता है।
.
17
1
1
पांचवां प्रकरण
तारतम्ग
नारतम्य भी एक अद्भुत वस्तु है । जिसको तारतम्य
नहीं यह मनुष्य काहे का यह कोई विकने वाली चीज नहीं।
मनुष्य में थोडो रहुत म्यभार ही से वर्तमान रहती है। हाँ,
अधिक उपलब्ध करने के लिये निरीक्षण और अनुभव को
आवश्यकता पड़ती है। इसके अवलम्बन से अनेक सद्गुणों
की प्राप्ति होती है । तारतम्य ही मनुष्य जीवन का नेता
और स्वामी है।
अपनी जीभ को Tट और श्रोठो को सी रक्खो। पेसा
न हो तुम्हारे ही मुरा से निकले हुए शब्द तुम्हारी शॉति को
भग कर दें।
जो लँगड़े को देख कर हँसता है उसे स्मरण रखना
चाहिये कि दूसरों को भी उसके ठट्टा उडाने का अवसर मिल
सकता है । जो दूसगे के दोप कहते फिरते हैं उनको भी अपने
दोषो के मुनने का सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य प्राप्त होता है।
मनुष्य स्वमाय बहुत फरके एक ही समान होता है। हम जेसा
करेंगे वेसा दूसरे लोग भी हमारे साथ कर सकते हैं ।
बहुत बोलने से पश्चात्ताप करना पड़ता है, केवल चुपचाप
रहने में ही पल्याण है।
पक्की ( वाचाल ) से समाज को पोडा पहुँचती है, उसकी
पकवक से कान को चला फटने लगती है, यह यातचीत,को
नीरस ना डालता है।
अपनी बडाई तुम स्वय अपने मुख से न करो नहीं तो
(१०) लोग तुम्हारा तिरस्कार करेंगे। दूसरोका भी उपहास न क क्योकि इससे भी तुम्हारी हानि होने की सभावना है। बुरी लगने वाली हँसी दिल्लगी करना भी उचित नहीं इससे मित्रता भग होती है। वह जो अपनी जिह्वा को वश नहीं रखता सकट में पड़ता है जैसी तुम्हारी स्थिति हो उसी के अनुसार सामग्री एक- करो, आय से अधिक व्यय न करो। याद युवा अवस्था कुछ द्रव्य सचित कर लोगे तावुढापे में तुम्हें पाराम मिलेग द्रव्य की तृष्णा बुराइयो का घर है किन्तु मितव्ययिता हम गुणो का रक्षक है। अपने काम पर ध्यान लगाओ, वृथा दूसरो से छेड न करो। काम न करने से काम में लगा रहना कहीं अच्छा सारे जगत की चिन्ता करना मुर्सता हे । आमोद प्रमोद में अधिक व्यय न करो, क्योंकि जितना व तुम उनके प्राप्त करने के लिये उठाओगे उससे अधिक पान तुम को नहीं मिलेगा। वढ़ती होने पर असारधान न रहो, अथवा विपुल पास हो जाने पर मितव्ययिता को तिलाञ्जलि न दो जिसका ध्यान निरुपयोगी बातो का ओर अधिक रहता उसे जीवन की श्रावश्यक घातों के लिये भी अन्त में शो करना पड़ता है। दूसरो के अनुभव से चतुराई सीखो, यह अनुभव बडे क से मिलता है। यदि विना मरे ही स्वर्ग मिले तो मरने की पर आवश्यकता । चार जन यदि किसी बात को बुरा बतलाते तो उसको परीक्षा स्वय करने से क्या लाभ । लागों को श्रा कीर्ति देखकर अपने दोप सुधारो। ।
।
(११)
भले प्रकार परीक्षा किये गिना किसी का भी विश्वास
न करो किन्तु साथ ही साथ निना कारण किसी पर अवि-
श्वास भी न करो। ऐसा करना अनुदारता का लक्षण है।
जब तुमने किसी की परीक्षा पूर्ण रूप से करली तो उसे
इन्य की तरह सन्दूक रूपी अपने हृदय में वद फरलो और
उसे एक अमूल्य रत्न समझो ।
लोभी के उपकारा को स्वीकार न करो। वे तुम्हारे लिये
जाल का काम करेंगे और तुम्हें उसके अहसानी से छुटकारा
नहीं मिरोगा।
"जिसकी आवश्यकता कल पडे उसे आज ही न सर्च फर
डालो, और जिसका प्रतीकार, बुद्धि अथवा दूरदर्शिता द्वारा
हो सकता है उसको भावीपर मत छोडो।
तथापि यह न समझो कि तारतम्य से सदा विजय
होगी, कोई नहीं कह सकता कि पल पल में क्या होगा।
अपनी ओर से उद्योग करना चाहिये लाम हानि तो परमे
श्वराधीन है।
मूर्ख सदा अभागा नहीं रहता और न बुद्धिमान सदा
विजयी होता है। तथापि न तो मुर्खको कभी पूर्ण आनन्द हुया
और न बुद्धिमान को कमी पूर्ण दु.ग्व ।
(१२) छठवां प्रकरण धैर्य । जो जो इस ससार में जन्म लेते हे उन में ने प्रत्येक के भाग में कुछ न कुछ संकट श्रापत्ति क्लेश और हानि अवश्य लिखा रहता है । इस लिये, ऐ दुःख के पुतले मनुष्य ! उचित है कि तू पहिले ही से अपने मन को साहस और धैर्य से सुदृढ बना, ताकि भावी आपत्तियां तुझे मालम न पडें । जिस प्रकार ऊट मरुस्थल में श्रम, गरमी, भूख और प्यास को नहन करता हुआ बराबर धागे को बढ़ता चला जाता है यक कर बैठता नहीं, उसी प्रकार मनुष्य का धर्य ही सकट के समय में उसको उत्तेजित करता है, उसे हार कर बैठने नहीं देता। तेजस्वी पुरुष भाग्य की वक्रदृष्टि से नहीं डरता । उसकी आत्मा अपने गौरव को नहीं छोडती । वह अपने सुख को भाग्य की कृपादृष्टि पर अपलवित नहीं रहने देता, और इसी लिये उसकी वक्रदृष्टि से निरुत्साही नहीं होता। समुद्र के किनारे की चट्टान की तरह एक स्थान पर जमा रहता है, और दुस की सारी लहरें उसका कुछ नहीं निगाड सक्ती ।। वह सकट के समय पहाड की तरह अचल रहता है। दुर्दैव के तीदण घाण उसके पैरो के पास आ पावर गिरते हैं। विपत्ति काल में धैर्य और मनको दृढ़ता उसे समाले रहती है। रण भूमि में जाने वाले सैनिक की तरह वह जीवन की थाप- त्तियों का सामना करता है और विजयी होकर लोटता है। उसका धैर्य दुर्दैव के बोझ को हलको करता हे और दृढ़ता उसे दूर भगा देती है।
(१३ ) परन्तु कायर मनुष्य को अपनी कायरता के कारण लजित होना पडता है। दरिद्धता के कारण यह नीचता करने पर उतारू हो जाता है और फिर चुपके २ अपमान सह- कर श्रापत्तियो को निमत्रित करता है। जिस प्रकार घास की पत्ती या के झकोरे से हिलने लगती है, उसी प्रकार दुस की केवल कल्पना उसको कंपा डालती है। सकट के समय यह पागल सा होजाता है। उसे सूझ नहीं पड़ता कि क्या करना चाहिये । निगशा उसे व्याकुल कर देती है। यह सब क्यो ? केरल धर्य न होने के कारण । .
(१४)
सातवाँ प्रकरण
सतोप
परमेश्वर सर्वव्यापी है। वह नेरे मन की बात जानता
है। केवल दयालु होने के कारण ही वह उछ इच्छाधों को
पूर्ण नहीं करता। प्रत्येक मनुष्य कहता है कि ईश्वर हमारे
ऊपर फुपित है, वह हमें दुःस दे रहा है । उसके घर में न्याय
नहीं। यदि ऐसा न होता तो हमारी ऐनी अच्छी हालत
होकर भी ऐसी धुरी दशा क्यों होती है परन्तु प्रत्येक को
यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि अपनी अपनी योग्यता
के अनुरूप सय को इस ससार में स्थान मिलना है। उपयुक्त
इच्छा पूर्ण होने और यश मिलने की व्यवस्था परमेश्वर ने
पहिले हो से निश्चत कर रक्खी है। अपनी वेचैनी का,
जिस दुर्दैव के लिये से करते हो उसका, और उसी प्रकार
अपने पागलपन, धमड और क्रोध का, कारण दढ निकालो।
ईश्वर के प्रबंध के विषय में वृथा करक न करो, पहिले
अपना अन्त करण शुद्ध वनायो।
"मेरे पास अगर द्रव्य होता, मुझ को अधिकार मिला
होता अथवा मुझे साली रहने को मिलता तो मै वडा
मुसी होता" ऐसा कभी मन में न लाश्रो, क्योंकि ये जिसमें
पास होते उनके मार्ग में भी तो अडचन पडा करती है।
दरिद मनुष्य धनवानों को चिन्ताश्री और पलेशों से बिलकुल
अनभिज्ञ रहता है। वह नहीं जानता कि अधिकार के पीछे
कितनी कठिनाइयाँ और कितने झगड़े है । वह नहीं जानता
कि साली बैठना कितनी बुरी बात है, इसी लिये उन बातो
के अमाव पर वह अपने भोग्य को कोसता हे।
दूसरो को सुखो देस कर डाह न करो। तुम्हें नहीं
मालूम कि उसके हृदय में कौन से दुए छिपे पड़े हैं।
थोड़े में ही सतुष्ट हो जाना बडी गुद्धिमानी का काम है । जो
धन की वृद्धि करता है वह अपने पीछे अधिक चिन्ता भी
लगाता जाता है । परन्तु सन्तोष एक गुप्त धन हे। यर
चिन्तित मनुष्य को नहीं मिलता, तात्पर्य यह कि-'
। गजधन, ध्यधन, वनफधन, रतन सान बहु खान ।
जप भारत सन्तोष धन, सर धन धूलि समान ॥
किसी चेले ने अपने गुरु से पूछा कि महाराज दरिद्धी
कौन है, और श्रीमान कौन है ? गुरुजी ने उत्तर दिया कि
दरिद्री वह हे जिसके हृदय में पड़ी तुप्णा हो और श्रीमान
वह है जो सदेव प्रसन्नचित रहे ।
धन सचित करना पुरा नहीं है। सपत्ति का उपयोग
अगर अच्छा हुश्रा तो उससे अनेक पुरुषार्थ सिद्ध हो
सक्ते है । धन फे मद से यदि न्याय, सयम, नियम, पर
हित बुद्धि अथवा विनय को तिलान्जुलि न दी गई है तो मुस
होगा । सपत्ति स्वत धुरी नहीं है। किन्तु उससे उपर
होने वाला मद बुरा हे। इसको मारना अद्भुत कठिन है।
सतोप से ही इस सम्पत्ति जन्य मद को जीत सकते है।
-
( १६ )
आठवां प्रकरण
,
संयम
ईश्वरदत्त बुद्धि और आरोग्य का ठीक २ उपभोग
करनाही इस मृत्युलोक के सुप को करीब करीब प्राप्त कर
लेना है। जिनको ये बरकतें मिली है और जो उन्हें अंत तक
स्थिर रसनो चाहते हैं उन्हें उचित है कि वे विपयों के प्रलो-
भन से बचते रहें।
जव यह (विपय) अपने स्वादिष्ट पदार्थों को तुम्हारे
सामने मेज पर रफ्वे, जब उसकी मदिरा प्याले में चमकने
लगे, जब हँसकर तुम्हें यह प्रानन्द और सुख की ओर खींचने
लगे तभी धोखे फी वेला समझो और उसी समय अपनी
बुद्धि से बड़ी होशियारी के साथ काम लो । ऐसे समय यदि
तुम उसकी सम्मति के अनुसार चले तो समझ रक्खो
तुम
ने
धोसा साया। जिस भृठे आनद को तुम देखते हो वस्तुत
वह दुख हे । उसके उपभोग से तुम रोगी धन जानोगे और
अत में तुम्हारी मृत्यु हो जायगी।
विषय की मेहमानी की ओर देखो, उसके निमत्रित पाहुनो
की ओर दृष्टिपात करो, जिसको उसने अपने पजे में कर लिया
है उनकी दशा पर किञ्चित विचार करो। क्या वे दुर्यल, रोगी
और निरुत्साही नहीं देख पडते?
थोडे ही दिन भोग विलास करने के पश्चात् उन्हें सारी
आयु दुःख और निरुत्साह के साथ व्यतीत करनी पड़ती है।
विपयों के कारण भूख मर जाती है। और इसीलिये उत्तम से
उत्तम पदार्थों को खाने के लिये भी उनको इच्छा नहीं चलती।
अंत में घे उसके पजे में फंस कर नष्ट हो जाते हैं। ईश्वर दत्त
।
(१७)
वस्तुओं का जो दुरपयोग करते हैं उहे सचमुच एसा ही दड
मिलना चाहिये।
वह देखो एक रमणी अँठसेलिया करती हुई बडे ओमद
क साथ तुम्हारी ओर भा रही है। उसके गाल गुलाबी है,
प्रभात काल का सौन्दर्य मानों उसके चेहरे से टपक रहा है
निर्मल और विनययुक्त प्रानन्द उसके श्रॉसों में चमक रहा है।
और प्रसश श्रत करण से यह कोमल गीत गा रही है।
तुम्हें मालूम है, यह कौन सी है ! यदि नहीं तो लो मैं
यतलाता है। उसका नाम आरोग्य सुन्दरी है। वह व्यायाम की
लडकी है और सयम के सयोग से उत्पन्न हुई है। उसके भाई
ग्बुली हवा में रहते है । वे शरवीर, निरालसी और प्रसवचित्त
रहते हैं । इसी कारण उन में वहिन का सौन्दर्य और सर्व गुण
पास करते हैं। उनकी नसो और हाडो में शक्ति होती है और
दिन भर काम करने में ही उनको ग्रानन्द मिलता है।
उनकी भूख जग उठती है, और भोजन गडा प्रिय लगता
है। मनोविकारों को रोकने में उन्हें बडा हर्ष होता हे और
दुर्व्यसनो को रोकने में वे अपना गौर समझते हैं । उनके
भोग विलास नियमित होने के कारण चिरकाल तक टिकते हैं।
उनको विश्राम यद्यपि थोडे समय के लिये मिलता हे परन्तु यह
गभीर और शात होता है। उनका मन प्रसश रहता है,
रुधिर शुद्ध होता है और उन्हें फिर बैद्यों को दवा पोने की
आवश्यक्ता नहीं पड़ती।
परन्तु मनुष्यप्राणी सुरक्षित नहीं है । उस पर एक न
एक नया सकट पडा ही करता है । याहरी उपद्रव के अतिरिक्त
भीतर भी एक नया उपद्रव लगा रहता हे अर्थात् उनकी
मारोग्यतो, उनका सौन्दर्य, उनकी शक्ति और उनकी फुर्ती
उनका
२
(२०)
उसमें लगे रहो, तो जय अवश्य प्राप्त कर सकते हो। पोली
आशा में मुखों को आनन्द होता है, और बुद्धिमान उसकी
कुछ परवाह नहीं करते ।
में कोई भी इच्छा करने के पूर्व सूय सोच विचार
लो और अपनी आशा को मर्यादा के बाहर न ले जाओ,
अर्थात् जा वस्तु मिल सकती है आशा उसी की करो। यदि
ऐमा करोगे तो प्रत्येक काम में तुम्हें सफलता मिलेगी और
निगशाओ से व्याकुल होने का समयन आवेगा।
र हे किन्तु मनहस नहीं है । वह जीवन के सुख दुस की
रसम दृष्टि से देखती है।
जिस प्रकार पर्वत पर से आस पास का दृश्य कई मील
स्पष्ट देर पडता है उसी प्रकार जाति देवी के युज से उन
गो का पागलपन पोर हुस देसने में आता है जो विलास
र होने के पारण चैनी और रगीले मित्रों के साय मते
रते हैं, अथवा उदासीनता और नियत्साहपन में पडफर
ग्य जीवन के दुर श्रोग सन्टा के लिये जन्म भर शिफा.
। करते है।
तुम दोनो का मानुभूति की दृष्टि से देसो, और उनकी
गो को देराकर अपनी भूता फे सुधारने का प्रयत करो।
( २२ )
वे अपने को वडे सैलानी जीव लगाते हैं, हँसते है, चैन करते है
परन्तु उनके सब कामो में मूर्खता और पागलपन भरा रहता
है। उनमें दुष्टता कूट कूट कर भरी रहती है, उनका चित्तसदैव
बुराई की ओर लगा रहता है, भय उनको, चारो ओर से घेरे
रहता है, और विनाश का गढ़ा मुह फैलाये उनके पेरो तले
बैठा रहता है।
अब जरा दूसरी ओर नजर दोडाइये और वृक्षो से
आच्छादित बाटो में उस दुरा को देखिये जो मनुष्य दृष्टि से
परे है । उस घर की मालकिन की दशा सुनिये। वह लेश से
पीडित हे और दुख की लगी लम्ची आहे मर रही है।
किन्तु मानवी दुख पर विचार करने में उसे पानद
मिलता है।
वह जीवन की साधारण घटनाप्रो को याद कर कर के
गेती है । मागवी दुष्टता प्रोर दोनत्यकी चर्चा बैठे किया करती
है।'सारा संसार उसे पापमय दिसलाई पडता हे । जिन २
वस्तुनो की अोर वर दृष्टि फेकती है ये सर उसी की तरह
नीरस मालूम होती है, और इसी कारण रात दिन उसके घर में
उदासीनता का बास रहता है । उसके श्राम के समीप न
जामो, उसकी एवा में छूत हे उससे सदैव धचे रहो, नहीं तो
वह जीवन रूपी वाटिका को मुशोभित करने वाले फलो को नष्ट
कर देगी और फलो को सुसा डालेगो।
श्रानन्दाश्रम को छोडते समय मनहस और उदासीनतापूर्ण
स्थान की ओर जाने में भी सबरदारी रक्सो । चीच का मार्ग
सावधानतया पकडो । यह मार्ग तुमको धीरे धीरे शाति देवी के
उज तक पहुँचा देगा। शाति उसी के पास है। सुरीक्षता और
सन्तोष वहीं है । वह प्रफुल्लित है परन्तु विलासी नहीं है। वह
-
-
(२३)
गभीर हे किन्तु मनहस नहीं है। यह जीवन के सुख दुख की
ओर सम दृष्टि से देखती है।
जिस प्रकार पर्वत पर से आस पास का दृश्य फई मील
तक स्पष्ट देख पडता हे उसी प्रकार जाति देवी के कुज से उन
लोगो का पागलपन शोर टुस देखने में आता है जो विलास
प्रिय होने के कारण चैनी और रगीले मित्रो के साथ घूमते
फिरते हैं, अथवा उदासीनता और निरुत्साहपन में पडकर
मनुष्य जीवन के दुस और सकटो के लिये जन्म भर शिका-
यत करते है।
तुम दोनो को सहानुभूति की दृष्टि से देखो, और उनकी
भूलो को देख कर अपनी भूतो के सुधारने का प्रयन करो।
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तीसरा प्रकरण क्रोध जिस प्रकार तुफान अपने वेग से वृक्षों को उसाड कर फेंक देता है और प्रकृति देवी चेहरे को कुरूप बना देती है, अथवा जिस प्रकार भूफप अपने क्षोम से, नगर के नगर, भूतल- शायी कर देता है, उसी प्रकार क्रोधित मनुप्य का क्रोध अपने चारो ओर उपद्रव मचाये रहता है। भय और नाश उसके पास । हाय जोडे खडे रहते है। इस लिये अपनी कमजोरी पर विचार करो, और उसको स्मरण रक्खो । ऐसा करने से तुम दूसरों के अपराधो को क्षमा कर सकोगे। क्रोध को अपने पास न फटक्ने दो । उसे अपने पास पाने देना मानो स्वय अपने हदय को फाटने अथवा अपने मित्र को मारने के लिये तलवार टेना है । यदि तुमने किसी की छोटी मोटी बात सहली तो लोग उन्हें बुद्धिमान कहेंगे, और यदि तुमने उसे भुला दिया तो तुम्हारा चित्त प्रसन्न रहेगा। क्या तुम नहीं देखते कि क्रोधी मनुप्य की बुद्धि भ्रष्ट रहती है ? इसलिये जर तक तुम्हारे होश हवाश दुरुस्त हैं तर तक दूसरों का क्रोध देस कर शिक्षा ग्रहण करो। मनोविकार के चकर में पड़ कर कोई बेहूदा काम न कर बैठो । भला यह तो चतलामो कि भयकर तूफान के समय क्या तुम अपनी नाव समुद्र में छोड़ दोगे? मोधरोकना यदि कठिनमालूम होताहो तोउसे पहिलेही श्राने न देना बुद्धिमत्ता है। इसलिये क्रोधोत्पन्न करने वाली प्रत्येक यात से बचे रहो। और जर कोई ऐसी वात आने वाली हो ( २५ ) तो चौकन्ने हो जानो । कठोर भाषण से मूर्ख मनुष्य चिढता है परन्तु बुद्धिमान हंसकर इसका तिरस्कार करता है। किसी से बदला लेने की बात अपने हृदय में मत लाओ। घह तुम्हारे हृदय को पीडा देगी और उसके उत्तमोत्तम भावो को मिट्टी में मिला देगी। हानि पहुँचाने की अपेक्षा दूसरो के अपराध क्षमा करने के लिये सदैव तेय्यार रहो । जो बदला लेने को घात में रहता है यह एक प्रकार से अपने लिये श्रापत्ति का धोज वो रहा है। जिस प्रकार पानी डालने से आग बुझ जाती है उसीमकार मृदु भाषण से कोधित मनुष्य का क्रोध शात होसकता है और यह इस तरह शत्रु से मित्र धन सकता है। सोचो तो सही, क्रोध करने योग्य कितनी थोडी बातें हैं, तब तुम श्राश्वयं करोगे कि मूरों को छोडकर दूसरा को कोध किसप्रकार पाता है । मूर्ख और अशक्त मनुष्य हो फोर अधिक करते है। परन्तु स्मरण रक्खो कि उसका परिणाम सिवाय पश्चात्ताप के और दूसरा कुछ शायद ही होता हो । मूर्खता के सामने लाज, और शोध के सामने पश्चात्ताप हाथ जोडे सहे रहते हैं। -
(२६)
चौथा प्रकरण
दया
जिस प्रकार वसत फलो को पृथ्वी पर बिखेरता है और
मेव जिस प्रकार सेतो को शस्यसपन्न करता है उसी प्रकार
दया अभागे प्राणी मात्र पर कल्यारा की वर्षा करती है।
जो दूसरो पर दया करता है वह दूसरो से दया के लिये
अपनी शिफारस करता है । परन्तु जिसको व्या नहीं है वह
उसका पान नही।
जिस प्रकार भेडो की चिल्लाहट से कसाई का दृश्य नहीं
पिघलता उनी प्रकार दूसरो के उस से निर्दयी का रदय नहीं
पसीजता।
दया के पासू गुलार पर के हिम करणे से भी अधिक
मोहक होने हैं। इसलिये दोनों के श्रात नाद को सुनकर कान
न बद करो, और न निर्मल श्रन्त करण चालो को श्रापत्ति में
देखकर बटोर हृदय वर जात्रो।
जर अनाथ तुम्हारे पास सहायता के लिये श्राव और ये
प्राखो में प्रासू भर कर तुम्हारी मददमागे, तो उनके दुखो पर
ध्यान दो पोर निगभितो को यथा शक्ति सहायता करो।रास्ते
में भटकते हुए वस्त्र होन निराधार मनुष्य को शीत से कापते
हुये देखो तो उस समय अपनी उदारता का परिचय दो । दया
की छाया उसके ऊपर करके उसके प्राणों की रक्षा करो। ऐसा
फरने से तुम्हारी आत्मा को शाति मिलेगी।
जर कि गरीब रोगी विस्तरे पर पडा कराह रहा हो, जव
कि कोई बदनसी कारागृह में पडो पड़ा लड रहा हो, अथवा
पक यारा वाला एक वृद्ध पुरष नुम से दया की इच्छा रखता हो,
उस समय भला यताओ तो सही, उनके दुखों की ओर कुछ भी
न ध्यान देकर तुम क्या अपने ऐश व आराम में निमग्न रहोगे?
।
, (२७) पांचवां प्रकरण वासना और प्रेम नवयुरको, गयरदार । भोग विलास से चे रहो, और प्रेम के चारनं न पडो।यदि तुम इस फटे मं पदे तो तुम्हारा मनाश हो जायगा। उसके क्षोभ से अधे होने के कारण तुम निनारा को दोड पर स्वय मोल तोगे । इसलिये उस पर दिल न लगानो, श्रोर ग उसके गोरक जाल में पड़कर अपनी श्रात्मो का बलि- दान परो। नहीं तो मुग्यसागर को भरने धाता धारोग्यता का श्रोत शीघ्र ही सूग जाया और ग्रानन्द का झरना निशेप हो जायगा। नए अवस्था ही में तुम बुड्ढे हो जाओगे, और जीवन के प्रमात माल ही में तुम्हारी आयु का सूर्य अस्त हो जायगा। । परन्तु जा सद्गुरा और विनय स्मिी स्त्री के सौन्दर्य को बढ़ाते ई ता उसको प्रभा आकाशस्थ तारों की अपेक्षा अधिया उज्ज्वल हो जाती है और उसकी शक्ति को कोई रोक नहीं सकता। उमा हसना कमल को भी मात करता है, उसका अन्त करण निष्कपट, शुद्ध और सत्यपूर्ण होता है, उसकी पाखें भोली भाली होती है, उसके मुख के चुम्मे शहद से भी अधिक मीठे होते है, और उसके होठो से मुगन्धि निकलती है। इन प्रकार के मृ प्रेम को हृदय तल पर स्थान देने में कोई हर्ज नहीं है। उस प्रेम को पवित्र और उज्ज्वल ज्योति तुम्हारे हृदय को उदार याविगी ओर उसे इस योग्य कर देगी कि उसमें मशार शुद्ध प्रेम के चिन्ह उमट सके। । - -
( २८ )
तीसरा
खण्ड
पहिला प्रकरण
-
स्वी
-
ऐ सुन्दरी, बुद्धिमत्ता की यातें सुन और उन्हें अपने हृदय
में स्थान दे। मन के सौन्दर्य से तेरे शरीर की काति बढ़ेगी।
और गुलाय के सदृश तेरी सुन्दरता कुम्हला जाने पर भी
अपनी मोरकता ज्यो की त्यो कायम रपेगी।
तेरी युवा अवस्था में, अथवा जीवन के प्रभात काल में,
जर कि पुरपो की आँखे तेरी ओर श्रानन्द से लगे और प्रकृति
देवी उनके दृष्टि पात का उद्देश तुझे बतावे, तो उस समय
उनकी मोहनी वाणी पर सावधानी से विश्वास कर, मन को
अपने कब्जे में रख और उनको फुसलानेवाली बातों पर
ध्यान न दे।
याद रख, तू पुरपकी योग्य ओर सझान सगतिन है, उसके
मनोविकार की दासी नहीं है । तेरे जीवन का उद्देश केरल
यही नहीं कि तू उसकी कामेच्छा को तृप्त कर, किन्तु तेरो यह
भी फर्तव्य है कि जब यह कष्ट में हो, तो उसकी सहायता फर,
धैर्य दे, और सारी चिन्तानी को मधुर भापण द्वारा दूर कर।
मनुष्य को अपनी ओर कौन खींच ले जाती है ? उसको
अपने प्रेम पाश से जफड कर उसके हृदय में कौन अपना
निवास स्थान बनाती है?
(२६)
वह मिता-
।
मुगृहिणी
मुगृहिणी का मन निष्कपट होता है, उसके गाला पर
विनय की प्रामा झलकती है। वह सर्वदा फाम में लगी रहती
है, खाली नहीं बैठती । उसके वध खच्छ होते है,
हारी, नम्र और सोम्य होती है । यह वुलवुल की तरह बोलती
है, और उसके मुख से फूल झडते हैं।
उसके शब्दों में बडी मोहकता होती है, और वह जब
उत्तर देती है तो सचाई और नम्रता के साथ देती है। शरण
जाना और श्राना पालना ये उसके जीवनोहश्य है । और इन्हीं
उपलक्ष में शाति और सुस उसे पुरस्कार मिलते है ।
दूरदर्शिता उसके श्रागे चलती है और सदाचार उसके
दाहिने हाथ की भोर रहता है। उसके श्रॉसो में ममता और
प्रीति रहती है, विवेक दड लिये उसकी भौहो पर बैठा रहता
है। उसके मद्गुणो के भय से दुराचारी मनुष्य को जिला
उसके सामने नहीं खुलती।
निन्दक जय अडोसी पडोमियो के दूपण निकाल कर
उनको निन्दा में डूबे रहते हैं तो यह अपनी उदारता के
कारण
मुह पर हाथ धरे चुप चाप बैठी रहती है। उसके हृदय मदिर
म सजनता होने के कारण उसे दूसरो के अयगुण नहीं
दिखलाई पड़ते।
सुखी है ये मनुष्य, जिनके ऐसी खिया मिलती हैं, और
सुखी हैं ये बालक जिन्हें ऐसी स्त्रियों को माताकहने का सौभा
ग्य प्राप्त होता है।
यह जहाँ रहती ह यहाँ शाति वास करती है। यह विवेक
के साथ हुक्म देती है और उसका पाला होता है। यह प्रात
(२८)
तीसरा खण्ड
पहिला प्रकरण
खी
ऐ सुन्दरी, बुद्धिमत्ता की बातें सुन और उन्हें अपने हृदय
में स्थान दे । मन के सौन्दर्य से तेरे शरीर की काति बढ़ेगी।
और गुलाय के सदृश तेरी सुन्दरता कुम्हला जाने पर भी
अपनी मोहकता ज्यों की त्यो कायम रखेगी।
तेरी युवा अवस्था में, अथवा जीवन के प्रभात काल में,
जब कि पुरुपो की आँखें तेरी ओर श्रानन्द से लगे और प्रकृति
देवी उनके दृष्टि पात का उद्देश तुझे घतावे, तो उस समय
उनकी मोहनी वाणी पर सावधानी से विश्वास कर, मन को
अपने कब्जे में रख और उनकी फुसलानेवाली बातो पर
ध्यान न दे।
याद रख, तू पुरुप की योग्य पोर सज्ञान सगतिन है, उसके
मनोविकार की दासी नहीं है । तेरे जीवन का उद्देश केवल
यही नहीं कि तू उसकी कामेच्छा को तृप्त फर, किन्तु तेरो यह
भी कर्तव्य है कि जर यह कष्ट में हो, तो उसकी सहायता कर,
धैर्य दे, और सारी चिन्तानो को मधुर भापण द्वारा दूर कर।
मनुप्य को अपनी ओर कौन सांच ले जाती है? उसको
अपने प्रेम पाश से जकड फर उसके हृदय में कौन अपना
निवास स्थान बनाती है?
-
(२६) मुगृहिणी सुगृहिणी का मन निष्कपट होता हो उसके गाला पर विनय की थामा झलकनी है। यह सर्वदा काम में लगी रहती है, खाली नहीं बैठती। उसके बग्न सच्छ होते है, यह मिता- हारी, नम्र और साम्य होती है। घर बुलमुल की तरह योलती है, और उसके मुख से फल झडत हैं। उसके शब्दों में पढी मोएकता होती है, और वह जब उत्तर देती है तो सचाई और नम्रता के साथ देती है। शरए जाना और श्रामा पालना ये उसके जीवनोद्देश्य है । और इन्हीं के 'उपलक्ष में शाति और मुस उसे पुरस्कार मिलते है। दूरदर्शिता उसके आगे चलती हे और सदाचार उसके दाहिने हाथ की ओर रहता है। उसके प्रॉसो में ममता और प्रीति रहती है। विवेक दड लिये उसकी भौहों पर बैठा रहता है। उसके मद्गुणो के भय से दुराचारो मनुष्य की जिह्वा उसके सामने नहीं खुलती। निन्दक जब पडोसी पड़ोसियो के दूपण निकात पर उनको निन्दा में इये रहते हैं तो वह अपनी उदारता के कारण मुह पर हाथ धरे चुप चाप बैठी रहती है। उसके हृदय मदिर में सजनता होने के कारण उसे दूसरो के अवगुण नहीं दिसलाई पडते। सुखी है थे मनुष्य, जिनके ऐसी स्त्रिया मिलती हैं, और सुखी है वे बालक जिन्हें ऐसी स्त्रियो को माता कहने का सोमा ग्य प्राप्त होता है। वह जहाँ रहती है यहाँ शाति यास करती है। यह विवेक के साथ हुक्म देती है और उसका पालन होता है। यह प्रात- । 1 15
( ३०)
कात उठकर अपने घरेलू मामलो पर विचार करती है और
प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार काम सौंपती है।
अपने कुटम्ब का प्रवध करने ही में उसे आनन्द मिलता
है। इसी प्रकार के कार्यों में उसकी सारी शक्ति खर्च होती
है। वह किफायत से रहती और अपने घर को साफ सुथरा
रखती है। उसके प्रवध की उत्तमता उसके पति का भूषण है।
स्त्री की प्रशसा सुन कर पतिको भी भीतर ही भीतर बडा
श्रानन्द होता है।
वह अपने बयो के मन में चातुर्य्यकी या कृट २ फर भर
देती है, और स्वयं अपना उत्तम श्रादर्श उनके सामने रख कर
उनका आचरण दुरुस्त करती है। उसकी श्राशा ही बच्चो का
सस्त्र है और उसके केवल संकेत मात्र से वे उसका पालन
करते है।
.
उसके मुह से शब्द निकला नहीं कि नौकरो ने झट उसका
पालन किया नहीं। उसने इशारा क्यिा और काम हुआ,
कारण इसका यह है कि नौकर उसके प्रेम रज्जु में वधे रहते
हैं। दयालु होने के कारण उसका फाम और अधिक चौकसी
से होता है।
ऐशयं पाकर वह फूलती नहीं । नापत्ति का मुकाविला
वह बडे धैर्य से करती है । उसको सहायता से पति काटु स
हतका हो जाता है और उसकी तीव्रता कम हो जाती है। वह
अपने हदय को स्त्री के हृदय में रखता है, और ऐसा करने से
उनके मन को शाति मिलती है।
ऐसी साध्वी को जिसने भार्या बनाया है, वह सचमुच
सुखी है, और ऐसी साध्वी को "माता" कह कर जो पुकारता
है वह बच्चा धन्य है।
।
(३१)
,
चौथा खण्ड
कौटुम्बिक संबंध
.
-
पहिला प्रकरण
पति
A
हे नवयुचफ ! विवाह करके ईश्वर की आज्ञा पालन कर
और समाज का एक विश्वस्त सभासद यन | बडी सावधानी
मे स्त्री पसद कर, जल्दी करने की कोई आवश्यकता नहीं,
क्योकि धर्तमान चुनार पर ही नेरा भावी मुख अवलम्बित है।
यदि कोई स्त्री वस्खाभूपण संघारने में अधिक समय नष्ट
फरती हो, यदि उसे अपनी सुन्दरता का घमड हो और श्रात्म
प्रशसा ही में प्रागन्द मानती हो, यदि वह रहा मार कर
हॅसती हो और जोर २ से बात करती हो, यदि उसका पैर
अपने बाप के घर न लगता हो और अन्य पुरुषों पर उसकी
दृष्टि भटकती रहती हो तो उसकी सुन्दरता श्राकाशस्थ चन्द्र
की तरह भले ही हो किन्तु तू उसकी अोर से अपनी दृष्टि
खींच ले । जिस मार्ग में होकर यह जाय उस मार्ग मेन चल,
भोर करपना जन्य विचारा में पड़ कर अपनी आत्मा को
दुस न दे।
परन्तु यदि उसका हृदय कोमल और श्राचरण पवित्र हो,
यदि उसका मन मुशिक्षित और रूप तेरी रुचि के अनुकूल
,
(३२)
हो तो उसके घर को अपना ही घर समझ । वह तेरी मैत्रिणी,
जीवन की सगतिन और हृदय की स्वामिनी होने योग्य है।
उसे ईश्वरदत्त प्रसाद समझ कर उसका पालन कर, और उसके
साथ ऐसा बर्ताव कर कि वह तेरी प्रेमिका बनी रहे।
यह तेरे घर की मालकिन हे । इसलिये उसको सन्मान
की दृष्टि से देख, ताकि तेरे नौकर उसकी आशा का पालन करें।
यिना कारण उसकी आकांक्षाओ का विरोध न कर । चूंकि वह
नेरे दुस में साथ देती है इसलिये त अपने सुस में उसे अपना
साथी बना।
उसका अपराध घडी शाति के साथ उसको समझा दे।
कठोरता के साथ अपनी आज्ञा का पालन उससे न करा अपनी
गुह्य तं उसके हृदय में भर, उसकी सलाहमसलहत निष्कपट
होगी। उससे तुझे धोसा न होगा, कुकर्मी बन कर उसे धोखा
न दे क्योकि वह तेरे बच्चों की मा हे।
जब यह बीमार पडे और शारीरिक व्यथा से पीडित हो,
तो अपनी दया से उसका कष्ट हलका कर। यदि त एक यारभी
दया और प्रेम की दृष्टि से देखेगा तो उसका दुख कम
होगा और वह दष्टि उसके लिये दस वैद्यो से भी अधिक गुण
कारी होगी।
स्त्री जाति की कोमलता और सके शरीर के नाजुकपन
पर ध्यान दे। वह अयला हे, अतएव उसके साथ निर्दयता का
वर्ताव न कर । हां, स्वय अपने अवगुणों की याद अवश्य रख ।
।
( ३३ ) . दूसरा प्रकरण पिता - नूथर पिता पना, इसलिये अपने कर्तव्य की ओर ध्यान है। जिस प्राणी को तू ने उत्पन्न किया है उसका पोपण करना नेरा कर्तव्य है। तेरा लडका तेरी कीर्ति फैलानेगा अथा तेरे नाम पर घमा लगानेगा, समाज का उपयोगी सभासद होगा अथवा भार स्वरूप वन जायगा, यह सर तुझी पर निर्भर है। लुटपन से ही उसे उपदेश दे, और सचाई के सिद्धान्त उसके मन पर अमित कर । उसकी चित्तवृत्ति पर ध्यान रख । बाल्यावस्थाही से उसे सन्मार्ग पर ला । उसकी आदतो पर भी ध्यान देता रह, ऐसा न हो, ज्यों२ उसकी बायु पढतीजाय, त्यो २ यह युरी आदतों में फसता जाय । इस प्रकार की देखरेख से वह पर्वत पर के वृक्ष की तरह पढेगा और उसका सिर अन्य वृक्षो की अपेक्षा ऊचा रहेगा। दुष्ट पुत्र से पिता की निन्दा होती है और सदाचारी पुत्र से उसको कीति फैलती है। जमीन तेरी है, उसको वजर नछोड । जेसा वीज त उसमें घोचेगा वैसा ही फल तुझे मिलेगा। यदि आमा पालन यी शिक्षा देगा तो यह तेरा गुण फैला- वंगा, यदि विनय का पाठ पढावेगा तो ससार मैं उसे ललित न होना पड़ेगा। यदि कृतज्ञता का शिक्षण देगा तो उसका लाभ उसे मिलेगा । यदि दान की ओर उसके चित्त को लगा वेगा तो लोग उसे प्यार करेंगे। यदि सयमी धनावेगा तो वह निरोग रहेगा। यदि दूरदर्शी बनावेगा तो भाग्यशाली होगा। यदि न्याय का पाठ पढ़ायेगा तो लोग उसका सन्मान करेंगे। ३ .
यदि निष्कपट बनायेगा नो उसका दृद्य उसे काटेगा नहीं।
यदि परिश्रमी बनावेगा तो बनाना होगा, यदि दूसरा के
साय उपकार करना सिखायेगा तो उसके विचार उच्च हागे।
यदि उसे विज्ञान की शिक्षा देगा तो उसका जीवन सफल
होगा । और यदि धार्मिक शिक्षा देगा तो उसकी सुख से मृत्यु
होगी। साराश यह कि श्रादर्श वनकर जैसी तू शिक्षा देगा
चैसा ही यह बनेगा।
-
.
(३५)
तीसरा प्रकरण
1
पुत्र
ईश्वर ने जिन प्राणियों को उत्पन्न पिया हे, मनुष्य का
तव्य है कि यह उनसे बुद्धिमानी सीसे और जो शिक्षा वेद
उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करने का प्रयत्न करे ।
ऐ मेरे पुत्र, जरा जगल में जाकर वहाँ के सारस को
सीर उसे अपने साथ समापण करने दे । फसे प्रेम से
[ह अपने वृद्ध पिता को पखो में ले जाता है और सुरक्षित
स्थान में उसे बैठा कर टाना पानी का फैसा उत्तर
प्रबंध
पितृभक्तिः सूर्य को समर्पित किये हुये ईरान देश की धृप
से भी अधिक मधुर हे और पश्चिम दिशा की ओर बहने वाली
हमानो द्वारा प्रसारित अरन देश के मसालो की सुगधि से भी
प्रधिक शानददायक है।
श्रतएव तू अपने पिता का कृतश रह क्योंकि उसने तुझे
पेदा किया है । अपनी माता को भी तू न भूल क्योकि उसने
तुझे महीने अपने पेट में रक्सा ।
उनकी बातो को मुन क्योंकि वे तेरे लाभ के लिये कही जा
रही है । तेरा पिता यदि तुझे बुरा भला कहे तो उसे भी कान
लगा कर सुन क्यो कि उसने प्रेम से ऐसा कहा है, किसी
अन्योहश से नहीं। उसने तेरी भलाई के लिये राते जाकर
व्यतीत कर दी, उसने तेरे श्राराम के लिये वडा परिश्रम किया
इसलिये उसकी अरस्था का मान रख, उसके सफदवालो का
अपमान न कर।
।
( ३६ )
अपनी दुर्वल बाल्यावस्था ओर युवावस्था के उतपने
को न भूल, अपने वृद्ध पिता के दोपो पर ध्यान न दे, बुढापे में
उनकी सब प्रकार से सहायता कर ।
इस प्रकार वे मुख और प्राति से इस मनुष्य शरीर को
छोडेंगे । और जिस प्रकार की पितृभक्ति और प्रेम तू अपने
पितापर करेगा उसी प्रकार की पितृभक्ति और प्रेम तेग सन्तान
तेरे साथ करेगी।
1
-
( ३७ )
चौधा प्रकरण
सहोदर भाई...
हे सहोदर भाइयो! तुम एक बाप को मतान हो, उसने
चडी सावधानी से तुम्हारा संगोपन फिया हे तुम लोगो का
भरण पोपण भी एक ही माके दूध से हुआ है । इसलिये
तुम लोग प्रेम रज्जु में एक दूसरे से घध कर रहे ताकि
तुम्हारे पितृगृह में सुख और शाति का वास हो । और जन
तुम एक दूसरे से अलग हो तो अपने प्रेम और एकता के यधन
को न भूलो । परिवारवालों की सहायता करना अपना पहिला
एनन्य समझो।
यदि तुम्हारा भाई विपत्ति में पड़ गया है तो उसकी
सहायता करो, यदि तुम्हारी यहिन' मक्ट में पड गई है तो
उसकी भी मदद करो।
इस प्रकार तुम्हारे पिता की सपत्ति से घराने मर का
लाभ होगा और उसकी श्रद्धा का भाव सदैव तुम सब में प्रेम
की वृद्धि करता रहेगा।
पांचवा खण्ड
ईश्वर की करनी
-
अथवा
मनुष्यों में दैविक अंतर
।
.
.
r
पहिला प्रकरण
चतुर्र और मूर्ख
वुद्धि भी परमात्मा की देन है। जिसको जितना उचित
समझता है उसको उतनाही उसको योग्यतानुसार यह देता है।
" जिसको ईश्वर ने बुद्धि दी है, जिसके हृदय म उसने ज्ञान
का प्रकाश डाला है, उसको उचित है कि वह उससे मूरों को
उपदेश करे और स्वय अपने शान की वृद्धि के लिये भी विचार ।
रूप में उसे अपने बडो के सामने रखे।
सन्चे ज्ञानी में अज्ञानी की अपेक्षा उद्दडता कम होती है ।
चतुर मनुष्य के मन में बारबार शकायै श्राती रहती है,
जिनको परख कर वह अपने विचारों को अपने अनुकूल
स्वरूप देता रहता है । परन्तु मुर्ख मनुष्य सदेव हठी होता है,
उसके मन में किसी प्रकार की शका नहीं पाती, वह सब ।
कुछ जानता हे-हा प्रशानी रहता है तो सिर्फ अपनी मूर्तता
के विषय में।
-
(38)
पोली ऐंठ निन्दनीय हे और अधिक रहाडाना मुर्सता
का लक्षण है, तथापि शाति पूर्वक मूों का उद्धतपन सट्न
करना और उनकी मूर्सता पर सहानुभूति प्रगट करना बुद्धि
मानी का काम है।
अमिमान में पाकर फूल न जानो और न अपनी प्रखर
शुद्धि का धमड, करो, क्योंकि मनुष्य का ज्ञान बहुत ही
सकुचित है।
चतुर मनुष्य को अपने दोप मालुम रहते है, अतएव
यह नम्र होता है, और स्नय भता धनने के लिये प्रयत करता
रहता है।
परन्तु मूर्ख अपने मन प्रगह को हराको एफडिया को
दसकर हा प्रसन्न होता रहता है । वह उनको निकाल २ कर
मोती की तरह दिरालाता है और जर दूसरे लोग उसकी
प्रशसा कर देते हैं तो यह बहुत खुश होता हे । निरुपयोगी
गातो के शान पर यह वडा अभिमान मानता है पर वह यह
नहीं सोचता कि न जानम अपनी मूर्यता पर कहा लजित होऊ।
। यदि उसे पुद्धिमानी के रास्ते में लगा दीजिये तब भी वह
मूर्वता के मार्ग में चलने लगता है किन्तु इस परिश्रम का
पुरस्कार उसे क्या मिलता है ? निन्दा और निराशा ।
परन्तु बुद्धिमान मनुष्य ज्ञानोपार्जन करता हुआ अपने
को शिक्षित करता है, कलाकौशल की उन्नति करने में उसे
उडा प्रानन्द मिलता है, और उससे समाज को लाभ पहुंचने
के कारण उसका बड़ा मान होता है । सद्गुणो का प्राप्त कर
नाही वह श्रेष्ठ शान समझता है और सचा मुख क्सि प्रकार
मिलता है इसी का अध्ययन यह जीवन पर्यन्त फरता रहता है।
-
(४०)
दृसरा प्रकरण
पनी और निर्धन
T
.
जिस पुरुष को ईश्वर ने सपचि और उसके उचित उपयोग
करने की धुद्धि दी है उसी को ईश्वर का प्यारा और कीर्तिमान
समझना चाहिये।
अपनी सपत्ति देख कर वह बडा प्रसन्न होता है क्योकि
इसी के कारण वह दूसरी का उपकार कर सकता है। यह
पीडितो की रक्षा करता है और पलवानो को निलो के साध
जुरम नहीं करने देता । जो लोग दया के पान हे उनको, वह
जानता है और उनकी श्रावश्यक्तायो का विचार कर नि सार्थ
भाव से बुद्धिमत्ता पूर्वक वह उनकी सहायता करता है । यह
गुणियो को उत्तेजित करता हे और प्रत्येक उपयोगी विपय की
उन्नति उदारता के साथ करता है।
वह बड़े • व्यवसाय के काम प्रारभ करता है जिससे उसके
देशके मजदूरो को मजदूरी मिलती है, और देश धन संपन्न
होता है । वह नई • युक्तिया सोच कर निकालता है जिससे
क्लाकोशल की वृद्धि होती है । आवश्यकता से अधिक भोजन के
पदार्थ वह अपने दीन पडोसियो के समझना हे और इसीलिये
उन्हें यह दे देता है।
ऐश्वर्या के कारण उसके मनकी उदारता कम नहीं होती
और इसीलिये वह अपने द्रव्य को देख देखकर प्रसन्न होता है।
उसकी प्रसन्नता बिलकुल निर्दोष होती है।
परन्तु धिधार है उस मनुष्य को जो विपुल धन सचित
कर के अपने पास रस्ये रहना ही पसद करता है, वह गरीब
( ४ )
गुरवा को चूलता रहता है और उनके श्रम और कष्ट का विचार
नहीं करता।
अत्याचार द्वारा अपनी उन्नति फरने में उसे कुछ भी खंद
नहीं होता और भाइयो का विनाश देसकर उसका दिल नहीं
दहलता । अनाथों के बांसुनो को वह दूधको तरह पी जाताहे
और विधवाओ का क्रदन उसके कोनों को कुछ भी कट नहीं
देता । धन के लोभ से उसका हृदय कठोर हो जाता हे इसलिये
दूसरो के दु ख का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता।
परन्तु इस पाप का पिशाच उसका पीछा नहीं छोडता।
वह उसे कभी चैन नहीं लेने देता। दूसरो पर यह जो अत्याचार
करता हे उसकी चिन्ता उसे सदैव सताये रहती है और परधन
हरण का दुर्व्यसन उसे सदैव तग किये रहता है।
अफसोस-जो पीडा उसके हृदय को भीतर ही भीतर होती
है, उसके मामने दरिद्रता का टुस कोई चीज नहीं।
गरीवी को श्रानन्द मनाना चाहिये, इसके कई कारण है
उसको खुशामदो और खाऊ भाई सदेव नहीं घेरे रहते, श्रत
एव वह अपनी नमक रोटी सुख और सतोप के साथ खा
सफता है। बहुत से नौकर चाकरी की हैरानी उसे नहीं रहती।
और न याचक लोग उसे कष्ट देने को प्राते है । धनयानों के
उत्तम भोजन चूकि उसे नहीं मिलते, अतएव यह रोगों से भी
पचा रहता है । उसे रूसा सूखा अन्नोर कुए का पानी अच्छा
लगता है । इसके सामने यह वडे स्वादिष्ट खाद्य और पेय
पदार्थो को तुच्छ समझता है।
परिकाम करने के कारण उसका स्वास्थ्य अच्छा बना रहता
है। और उसे यह गहरी नींद आता हे जो सेज पर लेटने वाले
सुस्त धनियों को मुअस्सर तक नहीं होती।
।
(४८) चौथा प्रकरण H 1 शासक और-शासित M ऐ परमेश्वर के प्यारे, तुझको मानवी प्राणियो ने अपने ऊपर हुकूमत करने के लिये राजसिंहासन पर बैठाया है। इसलिये अपने पदके ऐश्वर्य की अपेक्षा तुझे इतना पडा। गौरव देने वाले उन लोगों के उद्देशो की पूर्ति के लिये अधिक विचार करना चाहिये। अमूल्य वस्रो से सुशोभित करके तू राज्य सिंहासन पर बैठाया गया है, तेरे सर पर राजमुकुट रक्सा गया हे, गजट । मेरे हाथ में दिया गया है, ये राज्यचिन्ह क्या तेरे व्यक्तिगत लाभ के लिये दिये है ! नहीं। ये तुझे प्रजा-हित करने के लिय सौंपे गये हे । प्रजा के कल्याण में ही राजा का गौरव है, क्यों कि उसका अधिकार और राज्य-पद प्रजा की इच्छा ही पर अवलम्वित हे। अपने पद् के ऐश्वर्य से किसी उत्तम बादशाह का हृदय उदार होता है । वह बडे पधन बाँधता हे और नये काम अपनी शक्ति के अनुसार सोलता है। वह अपने गज्य के चतुर मनुप्यो की सभा करता है, उनसे सलाह मशविग करता हे और उनकी बातो को मानता है। यह अपने चातुर्य से लोगो को देखते ही उनकी योग्यता समझ लेता है, और उसी के अनुसार उन्हें काम देता है । उसके न्यायाधीश न्यायी होते हैं उसके मत्री चतुर होते हैं, और उसके निकटवर्ती उसे धोखा नहीं दे सकते। उसकी छत्रछाया में कला कौशल और मय प्रकार के विज्ञान . M - 1 Y (४५) की उन्नति होती है। विद्वान और चतुर लोगो का सा करना उसे अच्छा मालम होता है, जिससे उसकी महत्वाकांक्षा की वृद्धि होती है और उन ना के परिश्रम से राज्य का गौरव और अधिक बढ़ जाता है। व्यापार वृद्धि करने वाले सौदागरों के उत्साह को परिश्रम करके भूमि को उपजाऊ बनाने वाले किसानो की चतुरता फो, कारीगरी की कारीगरी को, और विद्वाना की योग्यता को मान दे कर यह सबो को उदारता के साथ पुरस्कार देता है। वह नई यस्तिया वसाता हे,मजबूत जहाज बनवाता है, आराम के लिये नदियों से नहरें निकलगाता है, और सुभीते के लिये बदरगाह बननाता है। परिणाम यह होता है कि उसकी प्रजा वैभवशाली थोर गज्य सुद्रढ हो जाता है। वह राज्य नियम न्यायग्नोर चातुर्य से धनाता है, उस की प्रजा प्रानन्द से अपने परिश्रम का फल भोगती हे। राज निय- मा से उनके मार्ग में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़ने पाती, उलटे उनके अनुसार चराने से ही उन्हें सुख मिलता है। वह दया को साथ लेता हुश्रा न्याय करता है, परन्तु अप गधिया को निष्पक्षपात और कडाई के साथ दड देता है। अपनी प्रजा की शिकायतों को सुनने के शिये यह सदैव तैय्यार रहता है और अत्याचारियों के अत्याचार से उन्हें बचाता है। उसकी प्रजा इसीलिये पितृवत मान और प्रेम की दृष्टि से उसे देखती है और अपने सय सुखों का उसे रक्षक समझती है। लोगो का प्रेम उसके हृदय में प्रजावात्सल्य उत्पन्न करता है और फिर यह उनके मुस को रक्षा करने का घरापर प्रयन करता रहता है। उनके दिलो में उसके प्रति कोई शिकायत नहीं रह जाती और शत्रु फिर उसका कुछ नहीं विगाह सकते। 1 ना
--
।
-उसकी जा उसके सब कामो में राजभक्ति और दृढना से
सहायता करती है। वह लोहे की दीवात की तरह उसकी रक्षा
करती है । शत्रु की सेना उसके सामने इस प्रकार नहीं ठहर
सकती जिस प्रकार हवो के सामने भूसा ।'
ऐसे राजा की प्रजा सुरक्षित और सुखी रहती है, और
यश और सामर्थ्य उसके सिहासन के चारो ओर हाथ जोडे
सड़े रहते है।
(७)
छठवां खण्ड
सामाजिक कर्तव्य
पहिला प्रकरण
परहित बुद्धि
जर तु अपनी पारश्यकतायो और कमी पर विचार करने
बैठे तो ऐ मनुष्य प्राण ! उस परमात्मा का उपकार न भूल
जिसने तुझे बुद्धि और कथन शक्ति दी है और जिसने पारस्प
रिक सहायता और श्ररसान करने के लिये तुझे समाज में
स्थान दिया है।
अन्न, वस्त्र, घर, श्रापत्तियों से बचाव, जीवन का मुख और
चैन ये सब तुझे दूसरो की महायता से मिले है। समाज के
विना अन्यत्र कही नहीं मिल सकते थे। इसलिये तेरा कर्तन्य हे
कि जिस प्रकार तू चाहता है कि दूसरे हमारे मिन बने रहें उसी
प्रकार तू भी दूसरों का मित्र बना रह ।
जिस प्रकार गुलार से मधुर सुगधिश्राप से श्राप निक्लती
है उसी प्रकार परोपकारी मनुष्य का हृदय अच्छे काम की ओर
आप से आप लगा रहता है कहने की जरूरत नहीं पड़ती।
यह अपने हदय में मुस और शाति का अनुभव करता है भोर
पटोसियो की बढती देख कर खुश होता है । यह किसी की
निन्दा नहीं सुनता और दूसरो को भूलो और दुर्गुणो को ठेस
कर उसे दुख होता है।
(४)
उसकी इच्छा सदा दुसरो की भलाई करने की ओर रहती
है और उसके लिये यह अवसर हडता फिरता है । दूसरों का
करके वह शांति उपलब्ध करता है।
मन विशाल होने के कारया वह परमेश्वर से यही मनाता
है फि सय को सुख मिले और हृदय की उदारता के कारण उसे
सुलभ करने का प्रयत्न करता है।
कट
दूसरा प्रकरण
-
न्याय
समाज को शाति न्याय पर अपलवित है और मनुष्यों का
सुप अपनो सपत्ति के उपभोग करने पर निर्भर है। इसलिये
अपनो घासनायों को मर्यादा के भीतर रक्खो और न्याय से
उनको पूर्ति करो।
अपने पड़ोसी की संपत्ति पर दात न लगाओ। जितनी
उसकी जायदाद है उसे सुरक्षित रहने दो। लालच अथवा
मोध के वशीभूत होकर उसकी जान लेने पर उतारू न होजायो।
उसके प्रावरण पर धना न लगानो और न उसके विरुद्ध
झूठी गवाही दो । उसको स्त्री के साथ भोग करने की कोशिश
न कगे और उसके सेवको को रुपया पैसा देकर न इस घात
की चेष्टा करो कि वे अपने मालिक को छोड दें। इससे उसके
दिल को वडा दुस होगा जिसको तुम निवारण नहीं कर सकते।
दुसरो के साथ निष्पक्षपात और न्याय का चर्ताध कगे।
और उनके साथ घेसा ही वर्ताव करो जेसा तुम अपने साथ
चाहते हो।
जो तुम्हारा विश्वास करे उसका साथ दो, जो तुम पर
निर्भर रहे उसे धोखा न दो । स्मरण रहे परमात्मा की दृष्टि
में चोरी करना इतना बडा पाप नहीं हे जितना बडा पाप
निश्वासघात करना है।
दीन दुसियों पर अत्याचार न करो, और न मजदूरो
को मजदूरी देने में टालमटोल करो । नफे के साथ अपनी
वस्तुएँ पेचते समय अन्त करण की आवाज सुन कर थोडे
(५०)
ही लाभ पर सतुष्ट रहो । ग्राहको को भोला माला समझ
कर उनको मूडो नहीं।
यदि तुमने किसी से ऋण लिया हे तो उसे चुका दो ।
महाजन ने तुम्हें तुम्हारी साख पर रपये उधार दिये धे । रुपये
न चुकाना नीचता और अन्याय है।
मारांश यह है कि प्रत्येक मनुष्य समाज का एक प्रश है।
उसे अपने हृदय की छान चीन करके अपनी स्मरणशक्ति से
काम लेना चाहिये । और यदि उसे मालूम हो कि मैने
उपरोक्त माता में से किसी बात को उरलंघन किया है तो
उसे उसके लिये लजित और दुखित होकर भविष्य में उनके
सुधारे । यथाशक्ति प्रयत करना चाहिये ।
( ५१ ) 1 तीसरा प्रकरण परोपकार जसने अपने हृदय में परोपकार का बीज धारोपण किया है उस पुरुष को धन्य है क्योकि परोपकार से धर्म और प्रेम उत्पच होते है। परोपकारी मनुष्य के हृदयसरोवर से भलाई की नदिया निकल कर मनुष्य मान का उपकार करती है । सकट के समय वह गरीबों की सहायता करता है और समाज का उत्कर्ष करने में उसे श्रानंद मिलता है। घह अपने पड़ोसियो की निन्दा नहीं करता, डाह और मत्सरता की बाता पर विश्वास नहीं करता और किसी की चुगली नहीं साता। वह दूसरो केअपराधो को क्षमा करके उन्हें भूल जाता है । बदला और दे को उसके हृदय में जगह नहीं मिलती। बुराई के दले में वह बुराई नहीं करता । पर अपने शत्रुओ से भी घृणा नहीं करता बल्कि प्रेमभाव से उनके अपराधो को भूल जाता है । दूसरों के दुख और चिन्ताश्रा को देख कर परोपकारी मनुष्य का हृदय पसीज उठता है। वह उनकी आपत्तियों को दूर करने का प्रयत्न करता है और यदि सफलता हो गई तो उससे जो श्रानन्द मिलता हे उसे चद अपने लिये पुरस्कार समझता है। वह, मोधी मनुष्य क क्रोध को शात करके झगडे शे ते कर देता है और इस प्रकार आगामी वैर भाव और लडाई झगडे को रोकता है। यह अपने पड़ोसियो में शाति और परस्पर सहभाव की वृद्धि करता है और इसी कारण लोग उसकी प्रशसा करके उसे आशीर्वाद देते है। - + 1
(५२)
चौधा प्रकरण
कृतज्ञता
-
जिस प्रकार रस वृक्ष की शाखाओ से फैलकर फिर
उसी जड में लौट जाता है जहा से वह पाया था, अथवा
जिस प्रकार नदी का पानी जिस समुद्र से नदी को मिलता
है उसी समुद्र में फिर चला जाता है उसी प्रकार कृता
मनुष्य का दृदय अपने उपकारकर्ता की ओर जाता रहता है।
उसके उपकार के बदले उपकार करने ही में उसे मानद
मिलता हे।
वह दूसरो के उपकार को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करता
है और अपने उपकर्ता को सत्कार और प्रेम, की दृष्टि से
देता है।
और यदि उम उपकार का बदला चुकाना उसकी शक्ति
के बाहर हुश्रा तो भी उसको सारे जीवन वह कभी नहीं
भूलना।
कृतज्ञ 'पुरुष आकाश के बादल की नाई है जो पानी
बरसा कर पृथ्वी के फल, फूल, तरकारियों की वृद्धि करता
है। प्रत्युत कृतनी का हृदय वाल को मरुभूमि की तरह है.
यह घरसे हुए पानी को सोख कर अपने
उदर में ररा छोडती
है । कुछ पैदा करना नहीं चाहती।
अपने कल्याणकर्ता- से डाह न करा और न उसके
किये हुए उपकार को छिपाने का प्रयत्न करो। क्योकि यद्यपि
उपकारबद्ध होने की अपेक्षा, उपकार करना अच्छा है, यद्यपि
उपकार से हमारी प्रशसा होती हे तथापि कृतज्ञ पुरुष
की
मा
।
(५३)
नम्रता हृदय को द्रवीभूत करती है और ईश्वर और मनुष्य दाना
को भली मालम होती है।
परन्तु धमडी मनुष्य के उपकार को प्रहण न करो और
न स्वार्थी और लोभी मनुष्यो के साथ कुछ उपकार करो।
क्योंकि घमंडी की घमंड 'तुम को लजित करेगो और लोभी
और मतलयो मनुष्य का स्वार्थ कमी दूर होने का नहीं।
६ ५४ ) है पांचवां प्रकरण । । . निष्कपटता ऐ मनुष्य, तू जो सचाई की फेवल सुन्दरता, पर भूला हुआ है और उसके ऊपरी गुणो पर मोहित है वास्तव मे तुझे उसके असली स्वरूप पर श्रद्धा रखनी चाहिये । उसे कभी छोडना नहीं चाहिये फ्योकि सचाई पर लगे रहने से तेरा सत्कार होगा। सरा मनुय्य दिल मे योलता धोसा और दगाबाजी उसकी बातो में नहीं पाये जाते । झूठ बोलने में उसे लजा आती है और वह सिर नीचा कर लेता है परन्तु सत्य बोलते समय उसकी दृष्टि स्थिर और निश्चल रहती है। वह अपने ऐसे निष्फपट मनुष्यो का सत्कार करता है। परन्तु ढोगियो के ढीग देखते ही उसे घृणा मालम होती है । उसके श्राचरण में सुसपद्धता होने के कारण वह कभी नहीं घर डाता, सच बोलने से नहीं दयता; किन्तु झूठ बोलने से घबडाता है । कपट का न्योहार करना यह नीच समझता है और जो वह दिल में सोचता है वही उसके मुख से निकलता है। यह दूर- दर्शिता और सावधानी से अपना मुह खोलता है । वह सत्य की छाननीन करता है और फिर समझबूझ कर बोलता है। प्रेमभाव से यह उपदेश करता है। निडर होकर बुरा भला कहता है और जो कहता है उसे पूरा कर दिखाता है। परन्तु एक ढोगी के विचार उसके हृदय में छिपे रहते है । वह सच घोलने का दम भरता है किन्तु जीवन भर दूसरी को ठगने का प्रयत्न करता है। यह दुख में हसता हे, शानद
(५५)
में रोता है और उसकी बात स्पष्ट नहीं होती। यह घळू दर
की तरह रात्रि में काम करता है, किसी को मालम नहीं होता
और सोचता है कि में सुरक्षित है, किन्तु उसका भेद खुल
जाता है और फिर उसे अपना मुह काला करना पड़ता है।
इस प्रकार उसे अपने दिन दुख के साथ बिताने पड़ते हैं ।
उसके मुह की बातें उसके दिल की बातों के दिलकुल
निरुद्ध रहती है। देखने में तो येचारा बडा सीधा सादा और
सदाचारी बना रहता है किन्तु हमेशा दूसरो का गला काटने
के लिये तैयार रहता है।
हा ! कैसी मूर्सता हे जितना प्रयल यह अपने दोपो
को छिपाने में करता है उतना उनके हटाने में करे तो उसके
सर दोष दूर हो सकते है । ऐ ढोगी मनुष्य अपने को जितने
दिन चाहे उतने दिन छिपाले परन्तु समय श्रावेगा जर तेरा
सच्चा स्वरूप गुल जायगा और बुद्धिमान लोग तुझे देखकर
हमंगे और तेरा तिरस्कार करेंगे।
1
-
(५६) सातवां. खण्ड ईश्वर, 1+ - और अगम्य हे ॥ - -1 ईश्वर एक है। यह सृष्टि का कर्ता, (जगत नियता) सर्वशक्तिमान, सनातन, सूर्य यद्यपि ईश्वर का विशुद्ध प्रतिबिम्ब हे परन्तु वह ईश्वर नहीं है। वह अपनी ज्योति से ससार को प्रकाश देता है। उसकी उष्णता से तृण अन्नादि ससार की वस्तुओं को जीवन मिलता है। जो परमेश्वर सर्वश्रेष्ठ, मेधाबी और दयाशील है केवल उसी की उपासना, धाराधना और स्तुति करनी चाहिये और केवल उसी का कृतज्ञ होना चाहिये। उसने अपने हाथो श्राकाश रुपी वितान फैलाया है। नक्षत्र तागग्रहों की चाल निश्चित की हे, समुद्र की मर्यादा याध दी है जिसका उल्लघन यह नहीं कर सकता और महाभूतो को अपने वश में रख छोडा है। यह पृथ्वी को हिला देता है जिससे बटे २ राष्ट्र नष्ट हो कर कापने लगते है। यह विजली चमका देता है जिससे दुष्ट घनडा जाते है । केवल अपनी इच्छा मात्र से वह अनन्त ब्रह्माण्ड की रचना करता है और अपने ही हाथ से उस का लय कर डालता है। इसलिये उसी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के तेज के सामने अपना सर मुकाओ, उसको क्रोधित न करो नहीं तो तुम्हारा नाश हो जायगा।
-
(५७)
अपनी उत्पन्न की हुई सब वस्तुओं पर उस की दृष्टि
रहती है और उन पर यह बड़ी चतुरता के साथ शासन
करता है।
उसने संसार के शासन के लिये नियम बनाये हैं । वे भिन्नर
लोगों के लिये भिन्न २ स्वरूप में हैं और प्रत्येक नियम उस की
इच्छानुसार काम करता है।
।। तेरे दिल की बातें यह जानता रहता है और तेरे इराटे उसे
पहिले ही से मालूम रहते हैं । भविष्य को धातें उस से छिपी
नहीं हैं और भाग्य में लिखी हुई बातें उसे मालूम रहती है।
उसके सय काम विचित्र हैं। उसके मत्र अचिन्त्य हैं ।
उस का ज्ञान क्त्पनातीत है। इस लिये उस के शान का
सत्कार करो और उस के सर्वश्रेष्ठ शामन को नम्रता के साथ
सिर झुकायो।
परमेश्वर दयालु और दानशील है। उसने दया और
वात्सल्यमाय से इस ससारको उत्पन्न किया है। उसकी मुजनता
उसके प्रत्येक काम में दिखलाई पड़ती है। यह सपत्ति का भंडार
और सिद्धि का केन्द्र है।
सृष्टि मात्र उमकी सुजनता प्रगट करती है । उस के मुस
उसका गुणानुवाद गाते है । वह सृष्टि को सौन्दर्य से विभूपित
करना हे, अन्न देकर उसका पोषण करता है पोर पीढ़ीदर पीढ़ो
तर अानन्द से उसे कायम रखता है।
। जय नाख उठा कर हम अाकाश की ओर देखते है तय
उसका तेज मालूम होता है, जब हम पृथ्वी की ओर देखते है
पृथ्वी सुजनता से भरी दिसलाई पडती है । पर्वत और घाटिया
उमको स्तुति करने हैं और येत, नदी और जगल उसकी प्रशसा
की प्रतिध्वनि करते हैं।
-
- (५८) परन्तु ऐ मनुष्य ! तुझे उसने अपना एक मुख्य कृपापात्र बना रक्खा है और सब प्राणियों की अपेक्षाष्ट्रस्थान दिया है। उसने तुझे अपना पद कायम रखने के लिये बुद्धि, समाज की उन्नति करने के लिये वाणी, और उसकी पूर्णता को मनन करने के लिये विचार-शक्ति है। उसने जीवन के निमय इतने अच्छे बनाये हैं और तेरी प्रकृति के अनुसार उसने ऐसे कर्तव्य निश्चित किये हैं कि उन नियमो के पालन , करने से ही तुझे सचा सुख मिल मक्ता है इसलिये अनन्यभक्ति के साथ उसके गुण गावो, जिससे तुम्हारा हृदय उसकी कृतज्ञता से पसीजे और पाखो से पासुनो की धारा पहने लगे। अपनी वाणी से उस की स्तुति करो और ऐसे २ उत्तम काम करो जिससे यह मालूम पडे कि तुम उस के नियमों का पालन कर रहे हो। ईश्वर न्यायी और सत्यप्रिय है। इसलिये ससार का न्याय यह सचाई और निष्पक्षपात के साथ करता है । जय उसने अपने नियम सदुद्देश्य और दया के साथ बनाये हैं तो उनके उल्लघन करने वालो को क्या चह टड नहीं देगा, अरे भाई यदि तुम्हें जल्दी दण्ड न मिले तो यह न सोचो कि ईश्वर का हाथ निर्वल हो गया है और न व्यर्थ की पोली २ पाशा कर के अपने दिल को यह कह कर पहलाओ.कि वह हमारे कामों को देख ही नहीं रहा है। .. उस की दृष्टि प्रत्येक अन्त करण की बातो पर पडती है और यह उन्हें हमेशा याद रखता है। वह न तो मनुष्यो की और न उनकी पदवियों की ही कुछ परवाह करता है । इस नश्वर पचभूत शरीर से जय श्रात्मा निकल बाहर होगी तो ऊच और नीच, धनवान और निर्धन, बुद्धिमान और , - -
(५६)
मूर्ख अपने २ फर्म के अनुसार श्वर के सामने यथा योग्य
फल पारेंगे। उसी समय दुर्जन कापेंगे और भयभीत होंगे किंतु
सजन उसके न्याय से प्रसश होगे।
इसलिये सारे जीवन परमेश्वर से डरते रहो और जो मार्ग
उसने तुम्हारे सामने सोल कर रख दिया है उसी पर हो कर
चलो । विवेक फी यांतों पर ध्यान दो सयम से अपनी
इन्दिया को अपने वश में करो, न्याय को अपना पथ प्रदर्शक
पनायो, उदारता को अपने हृदय में स्थान दो, और धन्यवाद
पूर्वक रिसर की भक्ति करो । ऐसा करने से तुम्हें इस लोक
और परलोक दोनों में मुख मिलेगा ।
1
(६०)
उत्तरार्थ
.
पहिला खण्ड
-
सामान्यतः मनुष्य-प्राणी के विषय में
पहिला प्रकरण
मानवी शरीर और उसकी बनावट
मनुष्य प्राणी निर्यल और अज्ञान है, इस लिये उसे सदव
नम्र रहना चाहिये। यह जिमको ज्ञान कह कर पुकारता है
और जिसके लिये यह घमण्ड करता है, सचा शान नहीं
है। यदि उसे सच्चे भान के जानने की इच्छा है, यदि यह
जानना चाहता है कि ईश्वरीय-शक्ति क्या है तो उसे अपने
शरीर की बनावट का पहिले अवलोकन करना चाहिये।
मनुष्य की उत्पत्ति अद्भुत और भयजनक है इसलिये
अपने उत्पन्न कर्ता से भयभीत होतो हुना उसे उसकी प्रशसा
करनी चाहिये और उस पर दृढ़ विश्वास करके आनन्द
पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करना चाहिये।
हमें ईश्वर ने अन्य प्राणियो की अपेक्षा श्रेष्ठ क्यों बनाया
? इस लिये कि हम उसके कामों को देख कर उनसे शिक्षा
ग्रहण कर सके । ऐ मनुष्य प्राणी, मला घतला तो सही,
उसकी और उसके कामों की प्रशसा हमें करना उचित हे
अथवा नहीं?
मनुष्य प्राणियों ही में आन्तरिक चेतन्यता क्यों है?
. (६१) घह उसे कहां से और क्यो कर मिली । विचार करना मास का धर्म नहीं है, अथवा तर्क करना कुछ हडियो का काम नहीं। सिंह नहीं जानता कि फीटक मुझे खा जायेंगे और बैल को क्षात नहीं कि मैं बलिदान के लिये खिला पिला कर मोटा किया जा रहा हूँ। अन्य प्राणियो की अपेक्षा तुम में एक नवीन शक्ति है यह शक्ति इन्द्रियगोचर शान की अपेक्षा एक विशेष शान का परिचय तुम्हारे जड शरीर को करा देती है। आइये, निवार वा सही कि यह कौन सी ऐसी शक्ति है। उसके निकल जाने पर भी यह शरीर पूर्णावस्था में घना रहता है। इससे जान पड़ता है कि यह शरीर का कोई भाग नहीं है, किन्तु उससे अलग है। वह निराकार और सनातन हा बह फर्म करने में स्वतन्त्र है। इसलिये यह बात सिद्ध है कि वह अपने कर्म के लिये उत्तरदायी है। गधा अपने दातों से घास-पात साता है, किन्तु अन्न का उपयोग नहीं जानता, मगर की रीढ की हट्टी सीधी होती है, परन्तु वह मनुप्य को तरह सीधा नहीं खडा हो सकता ! ईसर ने जिस प्रकार इन्हें बनाया है उसी प्रकार उसने 'मनुष्य को भी बनाया है, परन्तु यह सर से पीछे पैदा क्यिा गया है। अन्य प्राणियो पर उसे श्रेष्ठत्व और स्वामित्व दिया गया है, और उसे वेदों का सामान भी करा दिया गया है । इसलिये मनुष्य प्राणी ईश्वर की सृष्टि में एक अभिमान को वस्तु है । यह यीच में रह कर प्रकृति और पुरुप की एकता का अनुभर करता है। यह ईश्वर का एक अंश हे । उसे अपना गौरव ध्यान में रखकर 'बुराई की ओर प्रवृत्त नहीं . । होना चाहिये। 1
( २ )
'. दुसरा प्रकरण
इन्द्रियों का उपयोग
हमारा शरीर और मस्तिष्क अन्य जीवधारियो की
अपेक्षा श्रेष्ठ है ऐसी अपनी बडाई न हाको । 'घर के दीवालों
की अपेक्षा घर का मालिक ही अधिक प्रादरणीय होता है।
वीज बोने के पहिले ही जमीन तैयार कर लेनी चाहिये ।
घडे बनाने के पहिले ही कुमार को अपनी मट्टी तेयार कर
लेनी चाहिये।
जिस प्रकार ईश्वर समुद्र को हुक्म देता हे कि तेरी लहरे
इस ओर बहे दूसरी ओर नहीं, ये इतनी ऊंची हो, इससे
अधिक नहीं, वे इतना शोर करे " इससे अधिक शोर न करे
उसी तरह ऐ मनुष्य भी अपने प्रात्म बल द्वारा इस शरीर
से उसी प्रकार काम ले जिसमें सन इन्द्रिया तेरे वश में रहे।
यह शरीर पृथ्वी हे, हडिया उसको सभाले रहने वाले सभे
हैं । जीवात्मा राजा है । इन्द्रिया प्रजा है। जिस प्रकार गजा
को चाहिये कि वह अपनी प्रजा को राज विद्रोह करनेसे रोके
उसी प्रकार मनुष्यका धर्म है कि वह प्रजा रूपी इन्द्रियो को
अपने वश में रक्खे।
जिस प्रकार समुद्र का पानी वादल द्वारा वरस कर नदियो
में जाता है। और नदियो से वही पानी फिर लौट कर समुद्र
में श्राजाता है, उसी प्रकार मनुष्य का चेतन्य उसके हृदय से
निकल कर बाहर के अवयवों में जाता है और वहा से घूम
घाम कर फिर अपने स्थान में लौट जाता है । इन दोनों का
मम घरायर रेसा ही जारी रहता है। और इस प्रकार दोनों
परमेश्वर के नियम का पालन करते है।
।
-- . (६३) क्या तेरी नाक सुगन्ध लेने का द्वार नहीं है। क्या तेरामुह पेट के भीतर अच्छे • भोजन के पदार्थ भरने का द्वार नहीं है ? अवश्य है, परन्तु याद रस, बहुत देर के पश्चात् सुगन्ध से मन ऊर उठता है, और भोजन के पदार्थ फीके मालूम होने लगते हैं। - क्या तेरी बासंतेरे शरीर की चौकसी करने वाले पहस्ये नहीं है ? तथापि कितने चार सत्य और असत्य के निर्णय करने में ये चूक जाती हैं। इसलिये मन को अपने वश में रक्खो, अपनी बुद्धि को अपने हित की योर लगाने का अभ्यास करो। ( नेत्रादि) उसके मन्त्री हमेशा आप से श्राप सत्य की ओर सगे रहेंगे। अहा ! तेरा हाथ क्या एक अद्भुत वस्तु नहीं है ?, क्या उसका सा लारी सृष्टि में कोई है ? मालम है, यह तुझे क्यों दिया । गया ? पास्तर में भाई-गन्धुत्रों की सहायता करने के लिये। परमेश्वर ने सा जीवधारियों में तुम्हीं को लजायुक्त पयो उनाया ? जर तुम्हें लजा मालम होती है वह उसी समय चेहरे से टपकने लगती है। इसलिये कोई लजा-जनक कार्य न करो। भय और उद्वेग करके तुम अपने चेहरे की कान्ति को क्यों नए कर रहे हो? पाप कर्म करना छोड दो, फिर तो तुम 'स्वय कहोगे कि भय करना मेरी प्रकृति के विरुद्ध और उद्ध। - करना नामर्दी है। निद्रा में दिखलाई देने वाली प्रारुतिया मनुष्य प्राणिया ने ही योगाती है, इसलिये उनकी अवहेलना न फगे घेईश्वर-प्रेरित है। ऐ मनुष्य ! केवल तुझी को घोलने की शक्ति दो गई है। अपने विशिष्ट अधिकारों के लिये आश्चर्य कर देने वाले की यथोचित प्रशमा कर, और अपने लडपो गे विवेकी और ईश्वरभक्तिपरायण यना। --
(६४)
तीसरा प्रकरण
-
मनुष्य की आत्मा, उसकी उत्पत्ति और धर्म ।
यदि हम शरीर की ओर देखे तो मालूम होता है कि प्रा
रोग्यता, बल और सौन्दर्य ईश्वरीय देन हैं । इन सबो में श्रा
रोग्यता का स्थान सर्वश्रेष्ठ है । जो सम्बन्ध सत्य और आत्मा
का है वही सम्बन्ध प्रारोग्यता और शरीर का है।
ए मनुष्य ! इस बात का ज्ञान कि, तेरे श्रात्मा हे, अन्य
मव शानों की अपेक्षा अधिक निश्चित, और सब सत्यों की
अपेक्षा अधिक स्पष्ट है। इसलिये नन बनो, परमात्मा को
धन्यवाद दो, किन्तु इसको पूर्ण रूप से जानने का प्रयत न
करो, क्योंकि अतयं होने के कारण उसका पूर्ण ज्ञान असम्भव है
विचारशक्ति, बुद्धि तर्क पद्धति और मन सकरप, इन में
में कोई भी श्रात्मा नहीं है । ये तो उसके काम हैं- मूलतत्व
नहीं हैं
उसकी ही सहायता से उसकी तलाश करो उसके ही गुणो
से उसे पहिचानो । सिरके वालों और श्राकाशस्थ तारो की
अपेक्षा उसके गुणों की संख्या अधिक है।
अरस के लोगो की यह धारणा है कि एक प्रात्मा के
खण्ड सण्ड फर के सब को घाट दिये गये हैं, और मिश्र देश के
लोगों का ख्याल है कि, प्रत्येक मनुष्य को बहुत सी आत्मायें
हैं। इन दोनोमॅसे कोई मान्या नहीं है। तुम्हारीधारणा यह होनी
चाहिये कि, हृदय की तरह तुम्हारी आत्मा भी एक ही है।
क्या सूरज गीली मिट्टी को कडी नहीं करता? क्या वह
मोम को पिघलाता नहीं? जिस प्रकार सरज एक साथ दो काम
(६५) कर सका है उसी प्रकार आत्मा भी दो विरुद्ध बातें एक साथ कर सक्ती हे। निस प्रकार बादल से घिर जाने पर भी चद्रमा अपना धम नहीं छोडता, अर्थात् प्रकाश करता रहता है, उसी प्रकार मुर्ख के हृदय में भी प्रात्मा अपना धर्म नहीं छोडती-निदोंप और पूर्ण -- रहती है। वह श्रमर है, स्थायी है, और सब प्राणियो में एक ही सी है। आरोग्यता स उसकी सुन्दरता बढ जातीहै, और सतत अभ्यास से वह उत्साहान्वित होती है । वह तुम्हारे पीछे भी जीवित रहेगी, परन्तु ऐसा रयाल न करो कि उमफा जन्म तुम्हारे पहिले हुआ था, यह तेरे शरीरके साथ बनाई गई थी। उसकी उत्पत्ति तेरे मास के साथ हुई थी हम सर्वगुएसम्पन्न है, इसलिये न्याय से,ओर हम दुर्गुणी है, इसलिये दया से यह मिलने वाली नहीं। न्याय और दया हम परही बाधित है, और उनके उत्तरदायी हमी है । कम्मों से पचालेगी, ऐसा ख्याल न करो और न यही समझो कि चरितभ्रष्ट होने पर हमारी जाच पर- ताल न की जायगी। ईश्वर की सत्ता की मर्यादा नहीं है, उसकी लीला अपरम्पार है, उसको कुछ भी श्रशस्य नहीं है। गत क्तिनी गई, मुर्गा इस यान को जानता है । वाग देकर कहता है, उठो सवेरा हो गया। कुत्ता अपने मालिक के पैरा को श्राहट पहिचानता हे। पैर में धार जाने,परयकरा उस श्राराम फरने वाली घनस्पति की ओर दौड जाता है। फिर भी यह सर जप मर जाते है तो इनकी आत्मा पचतत्व में मिल जाती है, फेवल मनुष्य को श्रात्मा जीवित रहती है। मृत्यु क्येि - ५ - (६६) पक्षियों की इन्द्रियाएमारी इन्द्रियों से अधिक तीक्ष्ण ह. इसलिये उनकी ईर्षा न करो। सूयी पिसी वस्तु के रखने में नहीं किन्तु उसके उचित उपयोग करने में है। यदि तेरे कान बारहसिंद्दे के कान की तरह होते, आँखें गिद्ध की तरह तीक्ष्ण होती, प्राणेन्द्रिय कुत्ते की तरह होतीस्वादेन्द्रिय चन्दर की तरह होती अथवा तेरी कल्पनाये कछुये के सदृश होती तो भी क्या, निना बुद्धिके तुझको इन सबमे कोई लाभ हुश्रा होता ? उपर्युक्त सभी प्राणी मरणशील ही है फिर भी क्या इनमें से किसी के विचार प्रकट करने की शक्ति है ? क्या तुमने उन्हें कभी कहते सुना है कि, हमने ऐसा किया । जिसने हमको अात्मा दिया हे उसी की यह प्रतिमा हे। उसपर तुम पूर्ण विचार नहीं कर सकते । उसकी स्तुति करना तुम्हारी शक्ति के बाहर है। इसलिये सदा सर्वदा उसके यड- प्पन की याद रक्खो। कितना बडा बुद्धि-वैभव तुम्हारे सुपुर्द किया गया है, इस बात को न भूलो । जिससे भलाई होती है उससे चुराई भी होती है । इसलिये उसे सन्मार्ग में लाने का प्रयत करो। भीड में तुम उसे खो नहीं सकते हो और न हृदय-कपाट में ही उसे रोक रख सके हो। काम करने ही में उसे मानद पाता है, और इससे तुम उसे पराङ्मुख नही कर सकते। श्रात्मा कभी खाली नहीं बैठी रहती। उसके प्रयत्न विश्व व्यापक है । उसकी चपलता दवाई नहीं जा सकती । पृथ्वी के सिरे में कोई वस्तु रख दीजिये,उसको वह प्राप्त कर लेगी।मास मान की चोटी में कोई वस्तु रख दीजिये, वहा भी उसकी दृष्टि पहुच जायगी । प्रत्येक नई वस्तु की छानबीन करनेही में उसे आनन्द मिलता है । जिस प्रकार रेगिस्तान में मनुष्य पानी की -
॥
खोज में भटकता फिरता है, उसी प्रकार इस ससार में प्रात्मा
ज्ञान की तलाश में भटकती फिरती है।
प्रात्मा घडी चचल है, इसलिये उसकी चौकसी कगे
यह अनियनित है, इसलिये उसे अपने दार में रक्खो, वह
उपद्रवी है, इसलिये उसे अपने वश में किये रहो, वह पानी से
भी पतली, मोम से भी कोमल और वायु से भी अधिक चचल
हे, तर मला बतलायो तो सही कि क्या कोई वस्तु उसे थाध
पागल मनुष्य के हाथ में तलवार को नॉई विवेकहीन
पुरुष में श्रात्मा समझनी चाहिये।
सत्य ही प्रात्मा का उद्देश हे । अनुभव और बुद्धि उस
सन्य को ह ढने के साधन हैं ये साधन अनिश्चित और प्रमजनक
है ? उनके द्वारा यह सत्य किस प्रकार प्राप्त कर सकती?
यहमत होना उछ सत्य का प्रमाण नहीं है। क्योकि जनता
सामान्यत श्रश दृया करती है।
आमा की परीक्षा, अपने उत्पन्न कर्ता का शान और उसकी
आराधमा ही वस्तुत सच्चा शान मिलने के साधा है । इनसे
कदर जानने के और क्या साधन हो सकते हैं?
-
बैठे - (७०) मर्स मनुष्य कहते है कि जीवन अल्प है, किन्तु तुम ऐसा न कहो , क्योकि श्राप जीवन के साथ चिन्ताये भी तो अल्प । ही रहती हैं? जीवन का निरुपयोगी भाग निकाल; डाला जाय, तो क्या बचेगा ? याल्यावस्था, बुढापा सोने को समय, बेकार रहने का समय, और बीमारी के दिन यदि जीवन के सम्पूर्ण दिनों में से निकाल दिये जाय तो कितने थोडे दिन शेषरहजाते है। मनुष्य जीवन ईश्वरीय देन है । यदि यह अल्प है तो उससे सुख भो अधिक होगा। दीर्घ गहित जीवन से हम को क्या लाभ ? क्या अधिक दुष्कर्म करने के लिये अपना जीवन पढ वाना चाहते हो? श्रारही वात भलाई करने की। तो क्या वह जिसने तुम्हारा जीवन परिमित कर दिया है, उतने दिन क कर्मों को देखकर सन्तुष्ट न होगा। ऐ शोक के पुतले मनुष्य, तृ अधिक दिनो तक क्यो जीवित रहना चाहता है ? केवल श्वास लेने के लिये, खाने पीने के लिये, और ससार ला सुख भोगने के लिये ? यह तो, पहले ही न जाने कितने वार कर चुका है। चार वार वही यही करना क्या अरुचिकर श्रोर व्यर्य नहीं है? क्या तू अपने गुणो और बुद्धि की वृद्धि करेगा ? परन्तु शोक न तो तुमे कुछ सीसना हे और ग तुझे- कोई शिक्षक मिलता है ? तुझे जो अल्प जीवन दिया गया है जब तू-उसी का सदुपयोग नहीं करता तो दीर्य जीवन के लिये फिर क्यो अभिलाया करता है हम में विद्या का प्रभाव हे , इसके लिये तू क्या पश्चात्ताप करता है ? उसका अन्न तो तेरे ही साथ स्मशान में होजायगा। इसलिये इस ससार में ईमानदार वन पर रह, तभी तू चतुर कहलायगा। T . - - 11 ८
?
(७)
"कांचे और हिरनों की अवस्था १००. वर्ष की होती है ,
और हमारी आयु इतनी दो क्यों नहीं होती?" पेसा ध्यान
में भी न लाश्रो । छि छि तुम अपनी समता फौन्यो और
हिनों से करते हो । यदि उनमे तुलना करने बैठो तब भी उसमें
विशेष गुण मिलेंगे, वे तुम्हारी तरह न तो झगडाल हैं और न
ऋतनी हैं, उलटे ये तुम्हें उपदेश करते हैं कि निष्कपट और
सादगी के साथ जीवन व्यतीत करन से बुढ़ापे में सुस
होता है।
क्या तुम अपने जीवन को इस पशु पक्षियो से अधिक
उपयोगी बना सकते हो ? यदि नहीं, तो अस्प जीवन तो
तुम्हें मिलना ही चाहिये।
मनुष्य जानता है कि मे थोडे दिन तक इस ससार में रहेगा
तर भी अत्याचार करने के लिये समार को अपना गुलाम
बनाकर छोडता है। यदि कहीं यह अमर होता तो न मालूम
स्तिना भीषण अत्याचार करता ।
ऐ मनुष्य ! तुझे जीवन बहुत काफी मिला है। परन्तु
न इसे न जानता हुआ सदैव दीर्घ जीवा के लिये झोंकता है।
सच तो यह है कि, तुझे दीर्घ जीवन को कुछ भी प्रावश्यकता
नहा, क्योकिं न उसका दुरुपयोग कर रहा है। तू उसे इस
तरह न्यर्थ गवाता है जैसे तुझे आवश्यकता से अधिक जीवन
दिया गया हो। और फिर भी शिकायत करता है कि मेरा
जीरन दीर्घ नहीं बनाया गया
मनुप्य, सम्पत्ति का ठीक २ उपयोग करने स बनधान्
हो हे । केवल धन की प्रचुरता से ही यह धनी नहीं कहाँ
- जा सकता। विन जन पहिले ही से सयम पूर्वक रहते हैं।
और आगे भी सयम का ध्यान रखते हैं। परन्तु मूखों का
हमेशा ही "श्री गणेशाय नम " हुआ करता है।
( ७२ )
"चलो प्रथम धनोपार्जन करले और फिर इसका उपयोग
कर लेंगे । ऐसा विचार छोड दो । वह जो धर्तमान समय का
दुरुपयोग करता है, एक प्रकार से अपना सर्वस्व गवा रहा
है । सैनिक के हृदय को याण सहसा घेध देता है । उसे' कुछ
खबर नहीं कि यह घाण कहा से आया। उसी प्रकार मृत्यु
मनुष्य फो एकाएक ा धर दवोचती है जब उसे स्वप्न में भी
यह स्याल नहीं होता कि मैं इस प्रकार कात का ग्रास
चन जाऊगा।
है
अव यतलाइये जीवन क्या है जिसकी लोगों को इतनी
उत्कट इच्छा रहती है ? अथवा श्वासोवास क्या वस्तु
जिसकी चाय जन साधारण इतना करते हैं ? उत्तर यही देना
पडेगा कि यह जीवन भ्रमोत्पादक और श्रापत्ति पूर्ण है । इसके
श्रादि में अज्ञान, मध्य में दुख और श्रत में शोक होता है।
जिस प्रकार एक लहर दूसरी लहर को धक्का देतो हे
और फिर दोनो पीछे से आई हुई तीसरी लहर में प्रतभूत
हो जाती है, उसी प्रकार जीवन में एक सकट के बाद दूसरा
दूसरे के वाद तीसरा और तीसरे के बाद चौथा ऐसे ही नये
नये सकटो का आना जाना लगा रहता है प्रस्तुत पडे सकट
में पूर्व के छोटे २ सकटविलीन हो जाते हैं । यदि सच पृच्छिये
तो हमारे भय ही हमारे वास्तविक सकट है और हम असमत्र
वातों के पीछे पडकर निराशानो को मोल लेते हैं।
मूर्ख मृत्यु को तो डरते हैं, और अमर होने की भी इन्छा
करते हैं।
"
जीवन का कोनसा भाग हम हमेशा अपने साथ रेग्ना
चाहते हैं ? यदि कहिये जवानी, तो क्या जवानी व्यभिचार,
और धृष्टता में व्यतीत करने के लिये माग रहे हो? और
4.
( ७३ )
- यदि कहो बुढ़ापा, तो क्या निर्वीर्य अवस्था ही तुम्ह अधिक
पसन्द है।
ऐखा कहा जाता हे कि, सफेद बालों का घडा सत्कार
होता है। यह बात सच है, परन्तु सद्गुण योवन का भी
मान घटा सकता है, विना सद्गुणों के वुढापे का प्रभाव
आत्मा की अपेक्षा शरीर पर ही अधिक पडता है ।
कहते हैं कि, वृद्ध पुरुषो का श्रादर इसलिये होता है कि
ये विट खलता का तिरस्कार करते हैं। परन्तु नय हम देखते
हैं कि ये व्यसन और विषय का तिरस्कार स्वय नहीं करते,
किन्तु व्यसन और विषय स्वय उनका ही तिरस्कार करते हैं,
तब हमें यही कहना पडता हे कि लागों का उपर्युक्त क्धन
कुछ यहुत सत्य नहीं है।
अनएर यौवन काल में सद्गुणों को उपलब्ध करो तभी
बुढ़ापे में भी सत्कार होगा।
1.
( ७४ )
दूसराखण्ड
मानवी दोष और उनके परिणाम
1
।
--
पहिला प्रकरण
स्थाभिमान
मनुष्य का मन चचल है । उच्छृखलता, जहां चाहती है
उसे खींच ले जाती है । निराशा उसे व्याकुल किये रहती है,
और भय कहता है कि, मैं तुझे -खाही डालू गा। किन्तु इन
सर की अपेक्षा मन पर अहकार की-ही सत्ता अधिक है।
इसलिये मानवी आपत्तियो को देखकर आंसू न यहाश्रो, बल्कि
उनकी मूर्पता पर यदि हसो तो कोई हानि नहीं । अहकार
पूर्ण मनुष्य का जीवन स्वप्न के समान शेता है।
मनुष्यो में सब से अधिक प्रसिद्ध योद्धा भी यदि अहकार
रखता हे तो उसका अस्तित्व व्यर्थ है। जनता अस्थिर और
कृतन है । इसलिये बुद्धिमानो को इसकी विशेष परवाह न
करनी चाहिये।
जो मनुष्य अपना वर्तमान काम वधा छोडकर सोचने
बैठता है कि भविष्य में जब हमें घडा पद मिलेगा तो हम
क्या २ करेंगे, वह मनुष्य वर्तमान जीविका से भी हाथ धो
बैठता है, क्योंकि दूसरे उसकी ताक लगाये रहते है,
अत म उसे फिर धूल ही फाकफर रहना पड़ता है । इसलिये
अपने वर्तमान पद के काम ठीक ठीक करो। ऐसा करने से
भविष्य के उच्च काम भी तुम घडी चौकसी से कर सकोगे।
अहङ्कार मनुष्य को श्रधा बना देता है। इसी के कारण
अपने मन के भी विचार अच्छी नरह उसको समझ में नहीं
पोर
( ७५ )
श्राते ! अहकार के कारण जब तुम अपने को नहीं देख सकते
तर दूसरे तुम्हें अवश्य ही अच्छी तरह देखते रहते हैं।
टेसू का फूल देखने में सुन्दर होता है और निरुपयोगी
होने पर भी उत्कृष्ट मालूम पडता है परन्तु महके कुछ भी नहीं
होती। ऐसी ही स्थिति उस मनुष्य की होती है जो दिखलाता
तो अपने को बहुत है, परन्तु सद्गुणों से ही है।
अहकारी का हृदय देखने में तो शात होता है, किन्तु
स के मारे भीतर ही भीतर पकता रहता है । उसको चिन्ता
उसके सुखो से कहीं ज्यादा है।
उसकी व्यग्रता दीर्च होतो हे,'यह श्मशान में भी नष्ट
नहीं होती। वह अपनी पहुँच से बाहर अपने विचागे को ले
जाती है। यह चाहता है कि मृत्यु के पश्चात् मेरी प्रशसा
हो, परन्तु जिन लोगो से इस बात को उसे आशा होती है
ने ही उसे धोखा देते हैं।
जिस प्रकार विवाह करके लीसे साध न रखना 'असभर
है उसी प्रकार मनुष्य के लिये यह प्राशा करना वृथा है कि मृत्यु
के
पश्चात् लोग मेरी प्रशंसा करें, और उससे मुझे मुख हो ।
सारे जीवन अपना कर्तव्य करते रहो । लोग यदि उसके
विषय में कुछ भला बुरा कहें तो उस पर ध्यान न दो। तुम्हारी
योग्यता के प्रसार तुम्हारी जो प्रशसा हो उसी में सतोष
ग्गयो उसी के सुनने में तुम्हारे चशजो को श्रानन्द मिलेगा।
तितली को जिस प्रकार अपना रग नहीं दिरालाई पटता
अथवा चमेली की सुवास सय चमेली को नहीं मालूम होती,
उसी प्रकार डोंग हाक्ने वाले पुरुष को अपने गुण दृष्टिगोचर
नहीं होते । यह चाहता है दूसरे उनको देखा परें ।
यह कहता हे कि, मेरे इस सोने चादी और उत्तमोत्तम
यस्तुओं से क्या लाभ, यदि लोगा को यह
मालुम हो और
( ७६ )
घे उनकी प्रशसा न करें। किन्तु याद रखना चाहिये कि यदि
सचमुच इसकी यह इच्छा है कि लोग उसके विपुल धन को
देखें, और उसकी प्रशसा करें तो उसे चाहिये कि भूखों को
अन्न और नगो को घस्न दे।
निरर्थक शब्दो में दूसरों की वृथा सुशामद क्यों करते
हो? तुम जानते हो कि जय कोई तुम्हारे सामने हा जी
हा जी" करता है, तब तुम उसकी और कितना ध्यान देते हो ।
खुशामदी मनुष्य जान बूझ कर तुम से झूठ बोलता है,
और वह भी जानता है कि तुम उसको धन्यवाद दोगे परन्तु
तुम सदेव उससे सत्य और सरल भाषण करो, इनसे यह भी
ऐसा ही करेगा।
वृथाभिमानी पुरुप अपने ही विषय की वार्तालाप करने में
प्रसन्न होता है, परन्तु वह नहीं ममझता कि, दुसरे उसे सुनना
पसद नहीं करते।
यदि उसने कोई अच्छा काम किया, अथवा उसके पास
कोई उत्तम वस्तु हुई, तो वह घडी खुशी के माथ लोगो मे
कहता फिरता है । यह चाहता है दूसरे उसका गुण गान
करें, किन्तु उसकी प्राशा निराशा के रूप में परिगत हो, जाती
है। लोग कहते तो हैं कि अमुक मनुष्य ने अमुक काम किया,
अमुक मनुष्य में अमुक गुण है, परन्तु पीछे से यह भी कहने
लगते है कि देखो तो वह मनुष्य कितना घमडी हे।
मनुष्य एक दफे में कई काम नहीं कर सकता। जो मनुष्य
अपना ध्यान धाहरी सौन्दर्य पर लगाता है, आन्तरिक मूल
को खो बैठता है । अप्राप्य प्रलोभनों के पीछे लगा रहता है,
और जिससे उसका गौरव होगा जिससे उसको मान मिलेगा
उसकी कुछ परयाह नहीं करता।
-
--
--
(७७)
5
दूसरा प्रकरण
चचलता
-
ऐ मनुष्य ! प्रकृति तुझे सदेव चचल बनाने का प्रयत्न
काती है, इसलिये उससे हमेशा सावधान रह ।
तूमा के गर्म से ही चचल और अस्थिर है, पिता की
चचलता भी तुझ में उतर पाई है, ऐसी दशा में तू निश्चल
और स्थिर किस प्रकार बन सकता है ?
जिसने तेरा शरीर बनाया, उसने तुझे कमजोरी भी दी।
और जिमने तुझे अात्मा दो उसने तुझे दृढता का हथियार भी
दिया । उस हथियार का उपयोग कर उसका उपयोग करने से
हिमान बनेगा, और बुद्धिमान होने से तू सुखी होगा।
जो मनुष्य कोई एक आध अच्छा काम करता है, उसे
बहुन समझ बूझ कर अपनी पडाई मारना चाहिये । क्योकि
यह उस काम को अपनी इच्छा से नहीं कर पाता है । यह
काम या तो बाहरी प्रोत्साहन से अथयो घटनाचक्र के फेर
फार में पडकर, बिना किसी निश्चय के, आप से आप, हो
जाया करता है इसलिये काम का श्रेय घटनाचक्र और प्रोत्सा
हन को ही मिलना चाहिये।
। मनुष्य-म्वभाव की दो कमजारियां है-चित्त की व्यग्रता
और अस्थिरतासलिये किसी काम को प्रारभ क्रते समय
इन दोनो कमजोरियो से होशियार रहो।
चचलता के साथ काम करना एक बहुत ही निन्दनीय
योत है। इस चचलता को हम उसी समय वशीभूत कर सम्ने
है जब मन को दृढता का अवलम्ब से ।
चचलचित्त मनुष्य जानता है कि में चचल , परन्तु
- ( ७८ ) वह यह नहीं जानता कि में ऐसा क्यों है । वह देखता है कि मैं मष्ट हो रहा है परन्तु भ्रष्ट होने का कारण उसे नहीं सूझ पडता । सत्य बातो में चचलता करना छोड दो, लोग तुम्हारा विश्वास करने लगेंगे। काम करने के लिये कुछ नियम बनालो और देखो कि वे ठीक है, अथवा नहीं । यदि ठीक जान पडे तो स्थिर चित्त होकर उन्हीं के अनुमार काम करना प्रारभ कर दो । इस प्रकार मनोविकार तुम्हें तग नहीं करेंगे, चित्त की दृढता सद्गुणो को स्थिर करके कठिनाइयों को दूर करेगी । और चिन्ता तथा निराशा को तुम्हारे पास तक पाने का साहस नहीं होगा। किसी मनुष्य की बुराई पर विश्वास न करो जन तक तुम उसे न देखलो । और बुराई यदि सचमुच देखने में श्रावे तो उसे भूल जाओ। जिससे शत्रुता हो चुकी उससे फिर मित्रता नहीं हो सक- ती, क्याकि मनुष्य अपने दोष सुधारने का प्रयत नहीं करता। जिसने अपने जीवन के कुछ नियम नहीं बनाये उसके काम ठीक किस प्रकार हो सकते हैं जो विचार शक्ति से काम नहीं लेता उसके काम भी ठीक नहीं उतरते । चचल पुस्प का चित्त शात नहीं रहता। वह उन लोगो की शाति को भी भंग करता है जिनके साथ यह उठता घेठता है। उसका जीवन वेढगा होता है। उसके काम घेतुके होने है। और उसका चित्त हमेशा वायु की तरह रुख बदला करता है। श्रीज तुम्हें यह प्यार करता है और कल ही घृणा कर सकता है । क्यो ? उसे स्वयं नहीं मालूम कि मने पहिले फ्या प्यार किया, और अब क्यो घृणा करता है।
?
( 8 )
आज तुम्हारे साथ अत्याचार करता है, फल वह तुम्हार
नोकर से भी अधिक नम्न हो सकता है । क्यो ? यस इसी लिये
कि अधिकार के बिना जो आज उद्धतस्वभाव है यह अधीनता
के बिना फल दाम भी बन सकता है।
घोज जो मनुष्य खूप उर्चीला है, फल समव हे वह पेट
भर भोजन भी न करे। जो नियमित नहीं है, उसकी यदि ऐसी
दशा हो, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?
कोई नहीं कह सकता कि गिरगिट का रंग काला हे, लाल
है, अथवा पीला है, घस इसी प्रकार चचल चित्त पुरषों के चित्त
का पता लगाना भी बडा फठिन है।
- ऐस मनुप्या का जीवन स्वम के सदृश नहीं तो और क्या
है ? प्रात प्रसन्न मुख उठता है, दोपहर में मलिन घदन हो जा
ता है। श्रमी ईश्वर तुत्य बना है, फिर कोडे मकोटो की तरह
क्षुद बन जाता है। घटी हँसता हे, घडी रोता है। घटी काम
करने लगता है और घडी छोड़ देता है।
ऐसी दशा में सुख-दुस, यश-अपयश, दर्प-विपाद, सा
उसके लिये बरार हैं। इनमें से कोई चिरकाल तक उसके पा
स नहीं टिकते।
चचल मनुष्य का सुख चालु की नीवं पर घने हुए राज
मासाद की नाई हे। चचलता रूपी घायुके झकोरे से उसकी
जड हिलने लगती है । फिर वह गिर पडता है, और मूद लोग
आध्वयं करने लगते हैं।
परन्तु दृढ़ मनुष्य जीवन के नियम बना कर उन्हीं के अनु
सार चलता है । किसी नापत्ति के श्राजाने पर अपने मार्ग
से विचलित नहीं होता। उसकी गति गभीर, श्रवका और
अस्खलित होती है। और उसके श्रत करण में शाति का निवा
स रहता है।
(८०)
विन आते है, परन्तु वह उनकी परवाह नहीं करता । दै
विक और मानुपिक शक्तियां उसे रोकती है, परन्तु वह आगेही
को पैर रखता जाता है।
पहाड उसका कुछ नहीं विगाड सकता, और समुद्र उसक
चरणस्पर्श से सूख जाता है। सिंह उसके सामने आकर लेट
रहता है, और वन के अन्य पशु उसे देखकर भाग जाते हैं।
वह भयपूर्ण स्थानो से होकर गुजरता है, और मृत्यु.
को
अपने पास नहीं फटकने देता।
तूफान उसके कधो से टक्कर लगाना चाहता है, किन्तु छूने
का साहस नहीं होता। सिर के ऊपर बादल गरज रहा है,
परन्तु उसे क्या ? यिजली कडकती है, परन्तु उसे भयभीत नही
कर सकती, प्रत्युत उसका तेज बढाती है। ऐसा दृढ़ निश्चयी
मनुष्य ससार के दूरस्थ प्रदेशो से भी श्राकर अपना प्रभार
जमाता है । सुख उसके आगे धागे नाचता चलता है। शान्ति
देवी का मन्दिर उसे दूर ही से दृष्टिगोचर होने लगता है ।
वह दौड कर साहस के साथ उसमें प्रवेश करता है, जहा
मदैव उसका निवास रहता है।
इसलिये ऐ मनुष्य ! अपने दिल को उसी में लगा जो न्याय
सगत है , और समझ रस कि, निर्विकारता ही मनुष्य का
श्रेष्ठ ऐश्वर्य है।
-
( २ ) तीसरा प्रकरण ? दुर्बलता मनुष्य प्राणी वृथाभिमानी और अस्थिर होने के कारण स्वाभाविक ही दुर्वल होता है, क्योंकि अस्थिरता और पिनाश मैं बडा घना सम्बन्ध है । 'दुर्वला के बिना वृथाभिमान नहीं था साता। इसलिये यदि तू एक से होने वाले भय को छोड दे, तो दूसरे से होनेवाली हानियो से बच सकता है। जहा तू अपने को बडा 'सामथ्र्यवान समझता है, जहा तू अपने को पंडा प्रभावशाली वहीं तू विशेष कम- जोर है, यहा तक कि जोसाधन तेरे पास है, अथवा जिन जिन श्रच्छी बानो का तू उपयोग करता है, उनमें भी तू कमजोर है । क्या तेरी इन्चाये क्षणभगुरे नहीं है ? क्या तुझे मालम है कि न किस यात इच्छा कर रहा है ? इच्छित घस्तु मिल जाता है, तब भी तुझे सलोप नहीं होता। इस यात को जन तू चाहे देरा ले। वर्तमान वस्तुओं में तुझे श्रानन्द क्यो नहीं मिलता ? भावी घस्नुए तुझे क्यो प्रिय मालूम होती है ? इसका कारण यह है कि वर्तमान वस्तुओं के मानन्द से तु र जाता है, और भावी वस्तुओं की पुराइयो से तू रिल्युल अनभिज्ञ है । इस- लिय समझ रख सिधा मानन्द सतोष ही में है। यदि बहुत सी वस्तुए परमात्मा सय तेरे सामने रख दे और तुझ से कहे कि जो तेरा जी चाहे, ले ले । तो भी क्या सनोप तेरे साथ रहेगा ? उस हालत में भी क्या सुरस तेरे सा- मने हाथ जोडे खडा रहेगा अफसोस, तेरी कमजोरी विघ्न डालती हे और तेरी दुर्घ लता यामक होती है । भिन्न २ वस्तुओं में तुझे मौज मिलता ६ । उससे घृणा करता . (२) हे, परन्तु जिस वस्तु से चिरस्थायी सुख मिले वही वस्तु चिरस्थायी प्रेम के योग्य है। सुस जय तक तेरे पास है, तब तक तृ हे और जर चता जाता है तब उसके लिये पश्चात्ताप करता है। उसके बाद जो दूसरा सुख पाता है उसमें भी तो तुझे नहा आनन्द मिलता । उसके लिये भी तो तू अनाया करता है। कौनसी बात हे जिसमें तू गलती न करता हो? वस्तुयो की इच्छा करने और उपलब्ध होने पर उनको उपयोग करने में मनुष्य की दुर्वतता विशेष रूप से दृष्टिगोचर होती है। जो वस्तु शुद्ध और मधुर होती है वह हमें कडुई मालूम होती है । हमारे सुख से दुख और श्रानन्द से शाय उत्पन्न होता है। इसलिये अपने मुखत्वाद परिमित रक्खो, तभी वे तुम्हारे साथ रहेंगे, और विवेक के साथ हर्प मनाओ तभी तुम दुख से बचोगे। किसी प्रेमिका से प्रेम लगाने में पहिले आहे भरनी पड़ती हे और पीछे भी दु स तथा निराशा होती है । अर्थात् जिस वस्तु के प्राप्त करने के लिये तू मरता है यह तुझे इतनी अधिक मिल जाती,हे कि उससे जान छुडाना तुझे कठिन हो जाता है । हमारी प्रशसा में यदि प्रादर होगा और प्रीति, में यदि मित्रता होगी तो अन्त में इतना सतोप होगा कि उसके सामने यडा से घडा श्रानन्द कोई चीज नहीं। इतनी शाति मिलेगी कि उसके सामने घड़े भारी हर्ष का भी कोई मूल्य न होगा। ईश्वर ने भलाई दी है तो उस में उतनी ही मिली हुई बुराई भी दी है, परन्तु साथ ही साथ बुराई निकाल कर फेंक देने का साधन भी दिया है। जिस प्रकार सुख में दु ख मिश्चित है उसी प्रकार दुख भी मुख से खाली नहीं है। सुख और . - । v
दुःख एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक दूसरे से मिते हुए
है। उसको सुख ही मुस बनाना प्रथया दुख ही दुस बना
ना हम पर निर्भर हे । उदासीनता से कभी २ प्रानन्द मिलना
हे, और हर्ष के अतिरेक में प्रासू यहने रागते है । सय से न.
की वस्तु भी मूर्स के हाथ में उसके नाश का कारण बन सक्ती
है ! और बुद्धिमान धुरी से पुरी घस्तु से भी अपने लाभ की
याते टूट ले सत्ता है।
मनुष्य प्राणी स्वभाव ही से इतना कमजोर है कि केरल
अच्छे अयना केवल बुरे होने की शक्ति उसमें नहीं है । इसलिये
उसे चाहिये कि युगइयो की ओर से मन हटा कर जो कुछ
अच्छाई उसके हृदय में वर्तमान है उसी में सतोप फरे ।'
मनुष्य की स्थिति उसकी योग्यता के अनुसार बनाई गई
है। इस लिये अप्राप्य वस्तुथा के प्राप्त करने की इच्छा करो,
और न इस बात के लिये शोक करो कि सा वस्तुएँ हमें क्या
नहीं मिल जाती।
क्या तू चाहता है कि हमें धनियो की उदारता और गरीयो
का सन्तोष एक ही साथ मिल जाय ? यह उसी प्रकार अस.
म्भर हे जिस प्रकार सौभाग्यवती स्त्री में विधवा के गुण ।
यदि तेरे पिता के प्राण सकट में पडे हों तो तू क्या न्याय
दृष्टि से उनको मरवा डारोगा, प्रथया कर्तव्य बुद्धि से उनकी
रक्षा करेगा। यदि तेरा भाई सूली पर लटकाया जा रहा हो
क्या तु उसे बचावेगा नहीं, धार उसकी मृत्यु को अपनी
मृत्यु नहीं समझेगा।
सत्य एक ही है। अपनी शकाओं को तृने स्वय ही उत्पन्न
किया है । जिसने तुझे गुण दिये उसने उसके गोरर का ज्ञान
भी तुझे दिया। जैसा तेरी आत्मा कहे। वेसा कर परिणाम
अच्छा होगा।
(४)
चौथा प्रकरण
-
ज्ञान की अपूर्णता
यदि कोई वस्तु सुन्दर है, यदि कोई वस्तु स्पृहणीय है
यदि कोई वस्तु मनुष्य के लिये सुलभ है जिससे उसकी प्रश.
सा हो तो वह शान है। ऐसा होते हुये भी किसने उसे पूर्ण
रूपसे उपार्जित किया है।
राजनीतिज्ञ कहते है कि हम बडे ज्ञानी है राजा कहता
हे, वाह हम बडे शानी है, परन्तु प्रजा दोनो में से भला किस
को ज्ञानी समझती है?
मनुष्य के लिये दुराचार की कोई श्रावश्यकता नहीं है।
और न दुर्गुणो को सहन करने की जरूरत है। परन्तु कुछ
ध्यान भी है फि नियमो की अवहेतना हमसे कितने पाप कर्म
करा डालतो हे और सामाजिक नियमो के पालन न करने के
कारण हम से कितने पाप हो जाते है।
पे शासक । जरा तभी ख्याल में रक्खे रह कि तेरे द्वारा
किया हुआ एक पाप दस श्रादमियो को दड से बचाने की
अपेक्षा भी बुरा हो सकता है ।
जर तेरे घराने वालो की संख्या बढ़ जाती है अथवा जय
तेरे
बहुत
से बच्चे हो जाते है तो क्या तू, उन्हें निरपराधी
गरीष गुरवरी को सताने के लिये नहीं भेजता और क्या वे
लोग उनके हाथ से नहीं मारे जाते जिन्होंने उनका कुछ भी
नहीं विगाडा है?
यदि तेरा मनोरथ हजारों मनुष्यों के प्राण लेने से प्राप्त
होता हो तो तू ऐसा मत कर । तुझे याद रखना चाहिये कि
।
.
.
(५)
जिस परमेश्वरने तुझे बनाया है उसीने इन्हें भी बनाया है और
इनकी जान उतनी ही प्यारी है जितनी कि तेरी।
क्या तू यह समझता है कि बिना कठोरता किये न्याय
नहीं हो सकता? यदि सचमुच येही तेरे विचार है तोतूअपनी
ही फजीहत कर रहा है।
तू जो दम दिलासा देकर किसी अभियुक्त से पूछता है कि
तु ने क्या अपरान किया, और उससे अपना अपराध स्वीकार
कराना चाहता है तो क्या ऐसा करके न स्वय उसका अपराधी
नहीं बनता है?
जर तू शका मान से किसी को दढ देने चाहता है तो क्या
कमी तू ख्याल करता हे फि सम्भव है अभियुक्त पर मंठा अप
राध लगाया गया हो, और यह बिलकुल घेगुनाह हो ?
इस प्रकार के द्ड से क्या तेरी इच्छा की पूर्ति होती है ?
अमियुक्त जब अपना अपराध कबूल कर लेता है तो पया तेरी
आमा को सतोप होता है ? जर त उसे धुडकी देता है तो,
सम्भव है, वह डर कर, तुझे प्रसन्न करनेके लिये, झूठ भूटअप
राध खीकार करले जिसको उसने किया नहीं। कैसे प्रफसोस
की गात है । कि त सथा हाल नहीं जानता और अपराधी
को मरवा डालता है।
ऐसचाई से अनभिज्ञ अल्पज्ञानी मनुष्य ! समझ रख,
जय तेरा परम पिता तुझसे इसका हिसाय मागेगा तो तर
रह कर पछताये कि हा ! मैने क्या किया जिन लोग को
मारा धेनो निरपराधी थे।
न्याय के पालन करने में जर मनुष्य प्राणी असमर्थ है तो
उसे सत्य का ज्ञान किस प्रकार हो सकता है ? सत्य के
. . (८६) तक उसकी पहुंच नहीं हो सकती। जिस प्रकार सूरज की रोशनी से उल्लू की आंखे चकाचौंध होने लगती हैं उसी प्रकार सत्य की काति से तुम्हारी आखें चकाचौध होने लगेंगी। यदि तू सत्य के पास, पहुंचना चाहता है तो पहिले उसके चरणों में अपना सिर नम्रतापूर्वक झुका । यदि तू सत्य का ज्ञान उपलब्ध करना चहता है तो पहिले यह समझ कि तुझ में कितना नशान भरा है। सत्य का मूल्य मोती से भी अधिक है । इसलिये बड़ी सावधानी के साथ उसकी खोज करो। नीलम, माणिक और हीरे यह सब उसके पैर की धूल है इसलिये वडे 'पुरुषार्थ के साथ तलाश करो। उद्योग करना ही सत्य की प्राप्ति का मार्ग है । 'एकाग्रता उसके मदिर का मार्ग दिखलाने वाली दासी है। परन्तु मार्ग में थक कर बैठ न जायो । जव तुम उसके पास पहुच, जागोगे तर तुम्हारे सर दुस, सुख रूप में परिवर्तित हो जायगे । सत्य किस काम का ? सत्य से दगे यखेडे, उठ खड़े होते है । कपट का व्यवहार बहुत अच्छा है, देखो. इससे अनेको मिन धनते हैं । मे तो इसी का आश्रय नूगा"-पेसा मुहसे न निकालो, क्योंकि सत्य के द्वारा नने हुए शत्रु चाप लूसी (कपट व्यवहार ) द्वारा बनाये हुए मित्रो से बढकर है । मनुष्य स्वभाव ही से सत्य की इच्छा करता है, परन्तु जब वह उसके सामने आता है तब उसको कदर नहीं करता । और जब वह जबरदस्ती से मनुष्य के पास आता है तब वह झोध करने लगता है। इसमें सत्य का कोई दोष नहीं है क्योकि वह सर्वप्रिय है। परन्तु दोष है मनुष्य की दुर्बलता का । वह उसके तेज को महन नहीं कर सकता । अव भला तुम्हीं घतलायो कि मनुष्यमाणी कितना अपूर्ण है।। 1 . 7
और क्या है?
रिकार छोडकर दूसरो की पातो को सुन ।
(८७)
यदि तु अपनी अपूर्णता को अधिक जानना चाहता है तो
इश्वरोपासना के समय अपने दिल से पूछ कि धर्म किस लिये
बनाया गया । उत्तर मिलेगा कि तेरी कमजोरी का स्मरण
दिलाने के लिये, और तुझे यह बतलाने के लिये कि भलाई की
आशा केवल परमात्मा से करनी चाहिये।
धर्म सिसलाता है कि हम खाक से पेदा हुए हैं और साफ
हो में मिल जायगे। ऐसा होते हुए भी यदि शरीर के लिये
पश्चात्ताप करें तो यह सिवाय 'हमारी कमजोरी के भला
जर दूसरे तुमसे सौगधे खिलाते है, अथवा तुम स्वय
दूसरों को धोखा न देने के लिये सौगध साते हो, तो क्या तुम
नहीं देखते कि तुम्हारे चेहरे पर एक प्रकार की लजा छा जाती
। इसलिये न्यायी वनना सीखो तो पश्चाताप न करना
पड़गा और ईमानदारी के साथ रहो तो सौगध साने की
जो अपने दोपं चुप चाप सुन लेता है वह दूसरो को घडे
जोरी के साथ भला बुरा कह सकता है । यदि तुम पर कोई
सदेह करे तो स्पष्ट रूप से उत्तर दो। जो अपराधी नहीं,
जो हृदय का कोमल है, वह प्रार्थना परने पर अपने अङ्गी
कान कार्य से मुह मोड सकता है, परन्तु जो घमडी हे,
पर्थना से और शेर हो जाता है। जग तुझे अपनी अज्ञानता
मालूम हो जायगी, तभी तृ दूसरा को यातो को ध्यान से
यदि न्यायी यनने की सचमुच तेरी इच्छा हे तो मनो
है
आश्यकता न पड़ेगी।
-
उसको भय कैसा?
यह
सुनेगा भी।
पांचवां प्रकरण
दुःख
भलाई करने में मनुष्य कमजोर और अपूर्ण है। मुख
में दुर्घल और अस्थिर बनता है, टु ख में ही कैरल दृढ़
और
अचल होता है।
दुख मानवी शरीर का एक धर्म है। यह निसर्ग देव का
एक विशेष अधिकार है । वह मनुष्य के हृदय में वास करता,
है, और उसके मनोविकार ही से उसकी उत्पत्ति होती है।
जिसने तुझे मनोविकार दिया उसने तुझे उनको वशी-
भूत करने की शक्ति भी दी, उसका उपयोग करने ही मे तू
उन्हें दवा सकेगा।
तेरी उत्पत्ति क्या लज्जास्पद नहीं है ? तर फिर , तेरा
विनाश फ्या शेयस्कर नहीं ? देखो, मनुष्य विनाश करने
वाले रथियारो को सोने और ग्लो से अलकृत करके अपने
शरीर पर धारण करते है।
जो भनेको बच्चे पेदा करता हे लोग उसका नाम धरते
हैं, और जो सेक्डो की गरदन लडाई में काटता हे लोग
उसका सत्कार करते है । परन्तु ये सर ढकोसले हैं। रीति
रिवाज सत्य का स्वभाव नहीं बदल सकते, और न एक मनुष्य
की राय से न्याय का नाश हो सकता है। जिसको यश मिलना
चाहिये उसको अपयश और जिसको अपयश मिलना चाहिये
यश मिलता है।
मनुष्य के उत्पन्न होने का तो एक ही मार्ग:हे,
के नष्ट होने के अनेको मार्ग हैं । जो दूसरो को जन्म'
उसकी कोई प्रशंसा नहीं करता, और न उनको
प
1 देता है, परन्तु जो दूसरो का मन करता है उसका नाम होता है, और उसे जागीर मिलती है। तथापि यह समझ रखना चाहिये कि जिसके बहुत से यच्चे हैं, आनन्द उसी को है और जिसने दूसरी की जान ली उमे कुछ भी मुस नहीं। मनुष्य को काफी दुख दिया गया है, परन्तु यह शोक करके उसकी मात्रा और अधिक बढाता है। जितने सकट मनुष्य को मिले हैं उनमें शोक सरसे निकृष्ट हे। इसका न मालूम कितना घडा -भाग मनुष्य को जन्म ही स दिया गया है- उसे अधिक बढ़ाने का प्रयत्न क्यो करना चाहिये। दुख करना मनुप्य का स्वभाव है। और वह तुझे हमेशा धेरे रहता है । मुख एक बाहिरी महिमान है, जिमका, भाग मन कभी २ टुना करता है । धुद्धि का उचित उपयोग करने से दुख दूर होगा, और दूरदर्शिता के साथ काम लेने से मुख चिरकाल पर्यन्त ठहरेगा। तेरे शरीर के प्रत्येक अंग मे दुख होने की मभावना है परन्तु भानन्द मिलने के मार्ग प्रात ही थोडे और संकुचित है। भानन्द एक एक करके आते है, परन्तु दु ख एक ही समय में सेकडो पा सकते है। जिस प्रकार तिनका जलते जाता है, उसी प्रकार सुख पाते ही एक दम अदृश्य जाता है, किसी ने जाना और किसी ने न जाना। दुव याचार आता है। दुख म्यय आता है, परन्तु मुख के लिये कोशिश करती । भस्म - पडती है। निरोगी मनुप्यो की ओर लोगो की दृष्टि कम पड़ती है। परन्तु किंचित् रोग से भी पीडित गेगी को ये बड़े व्यान में
-
.
(80)
देखते है, इसी प्रकार उच्च से उच्च कोटि के आनन्द का प्रभाव
हम पर बहुत कम पड़ता है किन्तु थोडे से' थोडे दुख का
अवसर आवश्यकता से अधिक होता है।
विचार करना ही मनुष्य माग का काम है हम कैसे है
इस बात का शान उपलन्ध करना उसका पहिला कर्तव्य है।
परन्तु सुख में ऐसा कौन ख्याल करता है ? फिर यदि हमें
दुस मिले भी तो पाचश्यर्य की क्या बात है"
मनुष्य भावी सकट का विचार करता है। उसके निकल
जाने पर उसकी उसे याद रहती है। परन्तु वह नहीं देखता
कि, सकट की अपेक्षा केवल उसके विचार ही से अधिक दुख
होता है । यदि यह दुस उपस्थित होने पर उसे एक दम भूल
जावे तो फिर उसे दुप की समवेदना सहन न करनी पडे ।
जो बिना कारण रोता है वह घडी भूल करता है। वह
इसलिये रोता है कि रोना उसे बहुत प्रिय है।'
जब तक तोर घुस नहीं जाता तब तक बारहसिना नहीं
गेता, जब तक शिकारी कुत्ते हरिन को चारो ओर से घेर नहीं
लेते तब तक उसकी आखो से एक बूद भी आंसू नहीं गिरता।
एक मनुष्य ही ऐसा है जो मृत्यु पाने के पूर्व ही उसके भय
मान से घबडा कर रोने लगता है।
अपने छत्यो का हिसाब देने के लिये हमेशा तैयार रहो
और समझ रखो कि चिन्ता और शय सात मृत्यु सब से
बढिया मृत्यु है।
(१) छठवा प्रकरण : निर्णय 1 N है " ईश्नर ने मनुष्य को दो घहुत ही घडी शक्तिया दे रखी है- २) विवेक शक्ति और (२) इच्छा शक्ति । वस्तुत सुसी घह है जो इनका दुरपयोग नहीं करता । - जिस प्रकार पर्वत पर का झरना जिन २ वस्तुयो को अपने साथ लेकर चलता है उन वस्तुओं को चुचूर कर डालता है उसी प्रयार जनापवाद से उस मनुष्य की पुद्धि चूर चूर हो जाती हे जो उसकी बुनियाद जाने बिना उस पर सहसा विश्वास कर बैठता है। सरदार! खरदार । जिसको तुम सत्य समझते हो, ऐसा न हो कि वह कहीं असत्य निरुत जाय, थोर जिस पर तुम अधिक विश्वास करते हो यह कहीं झूठा न सिद्ध हो। दृढ शोर स्थिर बनो, करने पोर न करने का निश्चय तुम स्वय करो, ताकि उसका उत्तरदायित्व केनल तुम्हीं पर रहे। इर्द गिर्द की परिस्थितियों को जाने बिना केवल कार्य से ही उसका परिणाम न निकाल लो । मनुष्यप्राणी घटना चक के बाहर नहीं है। चूकि दूसरों के विचार हमारे विचारों से नहीं मिलते, इसलिये उनकी अनहेलना न करो । सभव है, हम दोनो गलती कर रहे हो। जर तुम किसी मनुष्य को प्रशसा उसकी उपाधियो के कारण कर रहे हो, और उन उपाधियो से वञ्चित दूसरो का तिरस्कार करते हो, उस समय तुम भूल करते हो। नफेल से " 4 T (२) ही ऊट की परीक्षा भला कहीं होती है उसकी परीक्षा के लिये सय अगों को देखना पडेगा। यह न समझो कि शत्रु के प्राण लेने से बदला मिल जाता है। मार कर तुम तो उसे शान्ति दे रहे हो और बदला लेने के सब अवसरों को अपने ही हाथो खो रहे हो। यदि कोई तुमसे पाकर कहे कि तुम्हारी माता व्यभिचारिणी हे अथवा तुम्हारी स्त्री किसी दूसरे से प्रेम करती है तो क्या तुम्हें दुख न होगा ? अवश्य होगा। किन्तु यदि इसक लिये तुम्हारा कोई तिरस्कार करे तो एक प्रकार से वह अपने को तिरस्कृत कर रहा हे । भला कहीं एक मनुष्य दूसरों के दुर्गुणो का उत्तरदाता हो सकता है? न तो अपने हीरे की येकदरी करो और ने दूसरों के हीरे की विशेष प्रशसा करो। समझ रक्खो वस्तु का मूल्य कुबुद्धियाँ और बुद्धिमानो के ससर्ग से घटता बढ़ता है। "हमारी पत्नी तो हमारे प्राधीन है। यह ख्याल करके उसका मान कम न करो। पया समझकर उसने तुम्हें पति बनाया ? देवल तुम्हारे गुणों को देखकर । इस एडे उपकार के लिये क्या तुम उसको कम प्यार करोगे? विवाह करते समय पत्नी के साथ यदि तुम्हारे वादे सच्चे रहे हैं, तो जब तक वह जीवित है तब तक तुम चाहे भले ही मुह फेरे रहो, परन्तु उसकी मृत्यु से तुम्हे दुख अवश्य होगा। . । उस मनुष्य का विवाह हो गया है, इसलिये उसका जीवन सर्वोत्तम है " ऐसा न सोचो । हां, इतना अवश्य पहा जा सकता है कि उसका जीवन मुखमय जरूर है। हमारा मित्र असू यहा रहा है," केवल इतने ही स . - - (३) उसके हानि की करपनान करलो। ऐसी यडी २ आसू की बूदो का द्वानि से कोई सम्ध नहीं है। कमी २ लोग बिना हानि हुए भी, दूसरो को , सहानुभूति प्राकृष्ट करने के लिये ऋठ मूठ रोने लगते है। 'चाहे कोई काम यडे धूम धडके और गाजे बाजे के साथ किया गया हो, तो भी उसकी प्रशसा न करो। महात्मा लोग बडे २ काम करते हैं, परन्तु इसके लिये ढोल पीटते नहीं फिरते। कोई साधारण मनुष्य जर दूसरो की फीति सुनता है तो उसे आश्चर्य होने लगता है, परन्तु जिसका हृदय शातिपूर्ण हे उसको उसीसे सुख मिलता है "दूसरों ने इस उत्तम काम को किसी पुरी इच्छा से किया-एमा न कहो, क्योंकि तुम्हें दूसरो के दिल का हाल क्या मालूम । दुनियो तुम्हें अवश्य थूकेगी और कहेगी कि तुम्हारा दृदय ईओ से भरा हुया है। दामिकता में दुर्गुण की अपेक्षा मूर्यता ही अधिक है, ईमानदार होना उतना ही सुलम हे जितना ईमानदार होने का वहाना करना। वूनरो के अपकार के बदले उनका उपकार अधिक करोमानो ऐसा करने से घे तुम्हारे साथ अपकार की अपेक्षा उपकार अधिक करेंगे। शृणा करने के बदले प्रेम करने की ओर अधिक प्रवृत्त रद्दो। ऐसा करने से लोग घृणा करने की अपेक्षा अधिक rot प्रेम करेंगे। । हमरो की निन्दा करने के बदले उनकी प्रशसा क्रो। ऐसा करने से लोग तुम्हारे गुणो की प्रशसा करेंगे और तुम्हारे दोपों पर ध्यान न देंगे। १ P (४) जब तुम किसी की भलाई कर रहे हो तो यह ख्याल करके करो कि भलाई करना उत्तम है। यह स्याल करके न करो कि लोग तुम्हारी प्रशसा करेंगे। उसी प्रकार चुराई इसलिये न छोडो कि लोग इसके लिये तुम्हारी निन्दा कर रहे हैं, गल्कि यह समझ कर उसका परित्याग करो कि चुराई करना बुरा है ईमानदारी को अच्छी समझ कर अपनायो, ऐसा करने से तुम ईमानदार सदा बने रहोगे। जो विना किसी नियम के काम करता है हमेशा चचल रहता है। चुद्विमानों की लानतमलामत अच्छी है, किन्तु मसी की प्रशसा अच्छी नहीं है। बुद्धिमान तुम्हारे दोष इसलिये वन लाते हैं कि जिसमें उन्हें तुम सुधार लो, परन्तु मूर्ख तुमको अपने ही सदृश समझ कर तुम्हारी प्रशसा करता है। जिस पद की योग्यता तुम में न हो उसे स्वीकार न करो अन्यथा, वे लोग, जो उस पद के योग्य हे, तुम्हारा तिरस्कार करेंगे। जिस विषय का तुम्हें स्वय ज्ञान नहीं है, उसका उपदेश दूसरो को न करो, नहीं तो जा यहयात उन्हें मालूम हो जायगी तो ये तुम्हारी निन्दा करने लगेंगे। जिसने तुम्हें हानि पहुचाई' उससे मित्रता की आशा न रक्खो। जिसको हानि पहुंचाई गई है यह चाहे 'क्षमा भी कर दे परन्तु जो हानि पहुचाता है वह कभी क्षमा नहीं करसकता। अपने मित्र पर उपकार का बोझान लादो।समझारखो, यदि उसे मालूम हो गया, तो मित्रता फिर नहीं रहने की । थोडे उपकार से मैत्री भंग हो जाती है, और बड़े उपकार से शत्रता उत्पन्न होती है। . । -
(६५)
जो अपना मृण नहीं अदा कर सकता वह उसके स्मरण
मात्र से भैप जाता है और जो दूसरे को हानि पहुंचाता है
वह उस मनुष्य को देखकर लजित होता है।
दूसरों की बढती को देखकर खेदन करो और न अपने शत्रु
की आपत्ति को देखकर खुशी मनायो । यदि तुम ऐसा करोगे
तो दूसरे भी ऐसा ही करने लगेंगे।
यदि मनुष्य मान का प्रेम सपोदन करना चाहते हो तो
अपनी परोपकार बुद्धि को सार्वभौमिक बनायो । यदि इस
उपाय से तुम्हें प्रेम प्राप्त न दृया हो तो फिर वह और किसी
उपाय से नहीं मिलने का।। फिर भी, चाहे वह तुम्हें प्राप्त न
हो, परन्तु तुम्हें इस बात का सतोप अवश्य होगा कि तुमने
अपने को उसके योग्य बनाया है।
P
(६६) - 'सातवां प्रकरण अहंकार -- - 5 अहकार और नीचता एक दूसरे के विपरीत देख पडते है, परन्तु मनुप्य प्राणी इन विपरीत वातों को भी एक समान बनाता है । वह एक ही समय अत्यन्त दुःखी और · अहंकार- युक्त घनता है। अहकार बुद्धि के क्षय का कारण है । यह लापर्वाही को घदाता है। फिर भी यह न समझना चाहिये कि, धुद्धि से उसकी कोई शत्रुता है। कौन ऐसा है जो अपनी प्रशसा और दूसरों की निन्दा न करता हो ? जब स्वय ईश्वर तक अपने श्रकार से नहीं वच सक्ता जो कि हमारा कर्ता है-तव फिर हमी उससे कैसे बचे रह सकते हैं? मढ विश्वास कहा से उत्पन्न हुधा ? और सोटी उपासना कहाँ से चली ? जो बात हमारी पहुच के बाहर है उस पर वाद विवाद करने से और जो पात हमारी समझ में नहीं श्रा सक्ती उसको समझने की चेष्टा करने से इन दोनों की उत्पत्ति हुई। हमारी बुद्धि परिमित और अस्प है, तव भी उसकी अल्प- शक्ति का प्रयोग जैसा हमें करना चाहिये वैसा हम नहीं करते । हम ईश्वर की महत्ता जानने का प्रयल नहीं करते। जब हम उसकी उपासना करने धैठते है तो उसकी ओर अपने ध्यान को पूर्ण रूप से नहीं लगाते । जो मनुष्य अपने राजा के विरद्ध बोलने में डरता है यह ईश्वर के कामों में दोष निकालता फिरता है।
जा मनुष्य, बिना अादर सत्कार के, अपने राजा का नाम
लेना तक पसन्द नहीं करता यही मनुष्य जय झूठ को सत्य
बतलाने के लिये सौगन्ध खाता है तो उसे लज्जा नहीं आती।
जो मनुष्य न्यायाधीश को साझा को चुपचाप सुन लेता
है, वही ईश्वर के साथ वहस करने का दम भरता है। यह
हाथ पैर जोड कर उसे पुश करता है, उसकी स्तुति करता
है, कहता है कि यदि अमुक मेरी इच्छा पूरी हो जाय तो में
१० ब्राह्मणों को भोजन फगऊगा, यदि उसफी प्रार्थना का कुछ
फत न हुआ तो वह उसी ईश्वर को गालियाँ तक देने लगता है।
ऐ मनुष्य ! इतना अधर्म करते हुए भी तुमे दड क्यों नहीं
मिलता? कारण यह है कि समय बदला लेने का नहीं है।
यह समझ कर ईश्वर को पूजा करनान छोडो कि वह हमें दड
देता है। ऐसा करने से तुम्हाग ही पागलपन साबित होगा,
अपने अधर्म से दु स तुम्हीं को मिलेगा, दूसरे को नहीं ।
तुम कहते तो हो कि म परमेश्वर का पुत्र है किन्तु
उसका उपकार मानना भूल जाते हो और उसकी आराधना
नहीं करते । विश्वास तो ऐसा ऊचा और कृत्य ऐमा तुच्छ !
सच पूछिये तो मनुष्यप्राणी अनन्त विश्व में एक जरे की
नाई है, किन्तु यह समझता है कि पृथ्यो और आकाश मेरे
ही लिये बनाये गये हैं। उसमा ख्याल हे कि सारी प्रकृति
मेरी भलाई करने में श्रानन्द पाती है।
वृक्षो और नागो की परछाई पानी में हिलती है, किन्तु
मूर्ख समझता हे कि, निसर्ग देव मुझे प्रसन्न करने के लिये
पेसा कर रहे हैं। प्रकृति देवी अपना नियमित काम करती है,
परन्तु मनुष्य समझता है वह सा मेरी आँखों को प्रानन्द
देने के लिये कर रही है।
७
T वह जन ध्रप लेने के लिये बैठता है तो समझता है कि सूर्य की किरणें मेरे ही लिये बनाई गई है और जब चादनी रात में बाहर घूमने के लिये निकलता है तो सोचता है कि चन्द्रमा मुझे प्रसन्न करने ही के लिये बनाया गया है। ऐ मूर्ख ! इतना घमड क्यों करता है। याद रख निसर्ग 'देव तेरे लिये काम नहीं कर रहा है। जाडे और गरमी तेरे लिये नहीं बनाये गये है। मनुष्यसृष्टि की सृष्टि यदि न रहे नो भी उस में परिवर्तन नहीं होने का । तो फिर उन असंख्यो में से एक है। अपने को ऊचा न समझो, क्योकि देवदुत तो तुझ से भी अधिक ऊचे है । अपने दूसरे भाइयो ‘की भी उपेक्षा इसलिग न करो कि वे तुम से छोटे हैं। क्योंकि उनको भी तो परमेश्वर ने ही तुम्हारी तरह बनाया है। यदि परमात्मा ने तुम्हें मुखी बनाया है तो पागल पन में श्राफर दूसरों को दुखी न करो। होशियार रहो कहीं उलटकर फिर तुम्हारे ही पास न चला पाये । क्या चे हमारी ही तरह परमेश्वर की सेवा नहीं करते ? क्या उसने उन सबों के लिये नियम नहीं बनाये ? क्या उन की रक्षा का उसे ग्याल नहीं है ? तो उन को दुसी करने का साहस तुम फिर क्यों करते हो। अपनी राय और लोगा की राय से निराली न समझो । और जो तुम्हें अच्छा न लगे उसको बुरा समझ कर उसका निरादर न क्रो। दूसरों के विषय में राय स्थिर करने की शक्ति किसने दी श्रथवा भला बुरा जानने की समझ तुझे कहा से मिली। न मालूम कितनी सच्ची घाते ॐठी सिद्ध हो गई और न मालम अभी और दूसरी कितनी बातें आगे चल कर झूठी 3 १ 1 १ H ,
सिद्ध होगी। ऐसी दशा में मनुप्य फिर किसी बात का पूरा
निश्वास क्यों कर सकता है?
जो यात तुम्हें मली मालूम होती है उसे करो। आनन्द
श्राप से श्राप दौडो पायेगा । बुद्धिमान होने की अपेक्षा
सद्गुणी होना अच्छा है।
जिस बात को हम नहीं समझते उस में सत्य और मठ
फ्या समान नहीं देख पड़ने १ तर उनके जानने का अन्य कौन
सा मार्ग है?
बहुत सी बातें हमारी बुद्धि के बाहर ह, और वास्तव में
हम उनको समझ नहीं सक्ते, परन्तु दिखलाने के लिये लोगो
से हम यही कहते है कि वाह, हम तो इन्हें समझ गये हैं
ताकि वे हमारी प्रशसा करें । क्या यह मूर्खता और अहकार
नहीं है ?
वृष्टता पूर्वक कोन बोलता है ? अपनी जिद पर डटे रहने
का प्रयन कौन करता है? वह नहीं जो अज्ञामी है, बल्कि यह
जो वृथाभिमानी है।
प्रत्येक पुरुष ने जहा एक यात पकडली तो उसी पर यह
दृढ रहना चाहता है। परन्तु श्रभिमानी ही अधिकतर ऐसा
किया करते हैं। भीतर से उसका विश्वास तो उसमें नहीं है,
किन्तु दूसरा को उस पर विश्वास कराने का आग्रह करता है।
ऐसा न समझो कि प्राचीनता अथवा बहुमत से कोई बात
सत्य हो सकी है। यदि विनेक घोसा न दे तो हमारी पात
उतनी ही श्रादरणीय हो सक्ती हे जितनी दूसरो की।
1
।
(१००)
तीसरा खण्ड
स्वपरविघातक मानवी धर्म
ah
--
।
1
पहिला प्रकरण
लोभ
धन अधिक ध्यान देने योग्य वस्तु नहीं, इस लिये उसके
उपार्जन करने के लिये एक दम तन्मय हो जाना उचित नहीं।
किसी वस्तु को अच्छी समझ कर यदि मनुष्य उसके पाने
की इच्छा करता है तो वह इन्छा और उससे उपलब्ध आनन्द,
केरल कर पनामात्र होते है। इसलिये गॅवार लोगो का मत
स्वीकार न करो, वस्तु के मूल्य की परीक्षा स्वय करो, इस
प्रकार मनुष्य सहसा लोभी नहीं हो सकता।
यनका अपरिमित लोभ श्रात्मा के लिये विष का काम
है। यह प्रत्येक सद्धर्म का नाश करता है उसका
अविर्भाव होते ही सारे गुण, ईमानदारी और साभाविक
'मनोधर्म दूर हो जाते हैं।
लोभी मनुष्य पेसे के लिये अपने बच्चों तक को बेंच
देता है । उसके माता पिता चाहे मर जाय परन्तु यह पैसा
नहीं मर्च करता। यह धन के सामने स्वाभिमान तक सोने
के लिये तैयार रहता है। ढूँढता है वह मुख, और मिलता हे
करता
उसे दुखा
१
वह मनुष्य, जो धन के पीछे मन की शांति से हाथ
धो बैठता है, इस उद्देश्य से कि भविष्य में उसके उपभोग
करने में मुझे पता अानन्द मिलेगा, उस मनुष्य के समान
(१०१) है जो घर के सजानेका सामान खरीदने के लिये अपने घर ही को पंव डालता है। लोभी मनुष्य की आत्मा कृपण होती है । जो मह समझता है कि केवल धन ही मुख का साधन नहीं है, उसके अन्य दूसरे सुख के साधन नष्ट होने से यचे रहते हैं। जो दरिद्रता को स्वाभाविक आपत्ति न समझ कर उससे भय भीत नहीं होता यह उससे ध्यान हटाफर अपने को और आपत्तियों से बचाये रहता है । अरे मूर्ख ! धन की अपेक्षा सद्गुण क्या अधिक मूल्य- वान नहीं होता ? दरिद्रता से पाप फ्या अधम नहीं है। सतोष करना और खोभ बढ़ाना मनुष्य के हाथ म है । जो माणी सतोपी है वह उन पुरुषा के दुखों को देख कर हसता है जो तृष्णावश अधिक धन सचय करने की चिन्ता म चूमा करते हैं। यह समझ कर कि सोना देखने योग्य प्रस्तु नहीं, निसर्ग देव ने उसे पृथ्वी के अन्दर छिपा दिया है, और इसी विचार से चादी को भी उसने तुम्हारे पेरों के नीचे गाड रक्खा है। क्या इससे उसका यह उद्देश्य नहीं है कि सोना और चादी आदर और ध्यान देने योग्य बस्तु नहीं है? लोम ने लाखो अभागे मनुष्यों को आज तक मिट्टी में मिला दिया है। लोभी मनुष्य उन सेवको की तरह ह जो दिलजान से एक निर्दयी मालिक की सेवा करते हैं और बदले में पुरस्कर की जगह दुख पाते हैं। जहा धन गड़ा रहता है यहा की जमीन बर्जर होती है। जहा सोना छिपा पडा रहता है वहा धास तक नहीं उगती। ऐनी जमीन में पशुओं के लिये चारा नहीं मिलता, इर्दगिर्द धान्य सम्पन्न खेत नहीं दिखलाई पडते, फल फल - । , . नहीं उत्पन होते, इसी प्रकार जिसका ध्यान उठते बैठते, सोते जागते धन में रहता है उसके हृदय में किसी सद्गुण की वृद्धि नहीं होने पाती। धन बुद्धिमानो का दास है, परन्तु वही धन मूरों के हृदय में अत्याचारियो का काम करता है । लोभी धन की चाकरी करता है, धन उसकी चाकरी नहीं करता । जिस प्रकार रोगी रोग के वश में रहता है, उसी प्रकार लोभी धन के वश में रहता है । वह उसकी तृष्णा बढाकर उसे दुख देता है, और मरते दम तक उसका पिंड नहीं छोड़ता। क्या सुवर्ण ने अब तक लाखों के प्राण नष्ट नहीं किये। क्या उसने अभी तक किसी का भला किया है ? तो फिर क्यों इच्छा करते हो कि मेरे पास यदि विपुल धन हो जाय तों मेगा नाम हो ? क्या वे ही लोग बुद्धिमान नहीं हुए जिनके पास धन की मात्रा कम रही है? क्या उन्हीं का शान सच्चा सुख नहीं, है ? क्या निकृष्ट मनुष्यो ही के यहा-ध्रन की अधिकता,नहीं दिखलाई पडती । और साथ ही क्या उनका प्रतिम काल दुखमय नहीं होता। दरिद्री को अनेक वस्तुओ की लालसा रहती है, परन्तु लोभी को यन छोड कर और किसी वस्तु की-चाहना नहीं रहती। लोभी से किसी का भला नहीं हो सकता। यह दुसरो के साथ इतना निर्दयी नहीं होतो जितना अपने साथ। परिश्रम के माथ द्रव्योपार्जन करो और उदारता के साथ उसे व्यय कगे। दूसरो को सुरसी करके जितना सुख- होता है उतना मुख उसे और कहीं नहीं मिलता। . । - 1. . - - (११०३) दूसरा प्रकरण क प्रतिव्यय T - धन सचय करने से बढ़ कर यदि कोई दूसरा और अधिक निस्ट व्यसन है तो निरर्थक गातों में उसका व्यय करना है। निसगदय ने चीजों के व्यय करने का अधिकार सर को समान दिया है। जो आवश्यकता से अधिक व्यय फरता हे यह एक प्रकार से अपने गरीर माइयों के अधिकारी पर हस्त- भेप कर रहा है। जो अपना धन नष्ट करता है वह दूसगे के उपकार करने क साधन कम कर रहा है । वह धर्म करना नहीं चाहता और न उमस होने घाले मुख का अनुमान करना चाहता हे । अन के प्रभार से मनुष्य को इतना दुख नहीं मिलता जिनना दुस धन की विपुलता से होता है । दरिद होने पर मनुष्य जितना अात्मसयम यर सकता है उतना धनवान होने पर नहीं कर सकता। दरिद्र होने पर केवल पक गुण की श्रावश्यकता हे, और वह सहिष्णुता, परन्तु धनियों को दान, धर्म, परिमितता परोपकार, दूरदर्शिता आदि अनेक गुणो की पानश्यकता यदि य गुण उनमें न हों तो दोषी ठहराये जाते हैं। गरीवो को केरल अपनी ही श्रावश्यकताओ की चिन्ता करनी पड़ती है, कि तु धनियों को दूसरो का भी रयाल फरना पडता हे । जो अपने द्रव्य को बुनिमचा से सर्च करता है वह अपने दुस दरिट भी दूर कर रहा है, और जो उसका सचय हे वह अपने लिये दुख जमा कर रहा है।
(१०४)
अतिथि को यदि किसी बात की आवश्यकता पडे तो उस
से मुह न फेरो। जिस यात को आवश्यकता तुम्हें हे यदि उसी
बात की आवश्यकता तुम्हारे भाई को पड जाय तो भी उसे
देने में श्रागा पीछा मत करो। स्मरण रहे अपने पास की वस्तु
देकर उससे रहित रहने में जितना आनन्द हे उतना आनन्द
उन लाखों रुपयों के रहने में भी नहीं है जिनका उचित उपयोग
हमें नहीं मालम।
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T (१०५) तीसरा प्रकरण घदला यात्मिक निर्मलता के कारण पदला लेने की इच्छा उत्पन्न होती है। जो अत्यन्त नीच और डरपोक हे उन्हीं की प्रवृत्ति इस और अधिक रहती है। जिनसे घृणा होती है उनको कौन सताता है ? डरपोक । जिनको लूटती हैं उन्हीं को मारती कौन हैं ? स्त्रिया । हानि पहुंचाने का विचार आते ही बदला लेने की इच्छा उत्पन्न होती है । सजना के हृदय में दूसरो को पीडा पहुंचाने के विचार कभी नहीं पाते और इमो कारण ये बदला लेने का ख्याल तक नहीं करते। जर कि स्वय दुख ही ध्यान देने की बात नहीं है, तर फिर दुख देने वाले की उपेक्षा क्यों न फरनी चाहिये ? ऐसा न करना मानो अपने को मनुष्यत्व से गिराना है । जो तुम्हे पीडो पहुंचाना चाहता है उससे अलग रहो । जो तुम्हारी शाति को भंग करना चाहता है उसका साथ छोड दो । इससे केरल-यही नही होगा कि तुम्हारी शाति ज्यों की त्यों धनी रहेगी, बल्कि बिना किसी निन्दनीय साधन का अवलम्प लिये तुम्हारे प्रतिद्वन्द्वी को श्राप से आप यदला मिल जायगा।। जिस प्रकार तफान और रिजली का प्रभाव मूर्य प्रार नारा पर नहीं पडता, बल्कि वे स्वय पत्थरी- और वृक्षो पर टकरा कर शान्त होते हैं, उसी प्रकार हानि का प्रभार महा- स्माश्रा के हृदय पर नहीं पड़ता, उलट कर यह उन्हीं लागो पर पड़ता है जो हानि पहुंचाना चाहते हैं। बदला लेने की इच्छा वे ही करते हैं जिनकी श्रात्मा क्षुद्र हे -- । 1 4 । (१०६) ओर जिनकी आत्मा महान है वे उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और घुराई करनेवाले की भलाई करते है। तुम यदला लेने की इच्छा क्यों करते हो? किस उद्देश से बदला लेने का ख्याल तुम्हारे मस्तिष्क में नाचता रहता है ? इससे क्या तुम अपने शत्रु को दु.स देना चाहते हो? परन्तु स्मरण रक्खो, शत्रु को दुख पहुचने की अपेक्षा इससे पहिले तुम्हारे ही दिल को दुख पहुंचेगा। जिसके हृदय में बदला लेने की इच्छा उत्पन्न होती है, उसी के दिल को वह इच्छा पहिले पीडित कर डालती है, और जि ससे बदला लिया जाता है उसका दिल शात, रहता है। बदला लेने की इच्छा से हृदय रोगी हो जाता है इसीलिये बदला लेना उचित नहीं । सृष्टिदेवी ने उसे मनुष्यप्राणी के लिये नहीं बनाया है। जिसको स्वय बहुत दुख है उसे और अधिक दुरा की क्या आवश्यकता? अथवा दूसरे ने यदि दुख, का भार किसी मनुप्य के ऊपर लाद दिया हे तो उसमें और हम अधिकता क्यो करें, बदला लेने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को, पहले की पोडा से सतोप नहीं होता, और इसीलिए मानो वर उस दण्ड का भी अपने को भागी बनो लेता है जो वस्तुत दूसरे को मि. लना चाहिये । यही नहीं, किन्तु वह पुरुष, जिससे वह बदला लेना चाहता है, मोज करता है, और उसके एक और नवीन दुख को देसकर हसता हे । । बदला लेने का विचार घडा क्लेशकारक होता है, और जन उसे कार्य में परिणत करते हैं तब यह बडा भयकर हो जाता है। कुहाडी फेंकने वाला जहा उसे फेंकना चाहता है, वहा प्राय वह नहीं गिरती । यह भी संभव है कि चिटक पर वह उसी का प्राणान्त कर दें।। 1 7 N ।
(१०७) इसी प्रकार शत्रु से बदला लेने में प्राय बदला लेने वाले के ही माण सकट में पड़ जाते है । वह अपने प्रतिद्वन्दी की एक श्राख फोडते समय अपनी दोनो श्रासं फोड डालता है। यदि उसका मनोरथ निफल हुश्रा तो उसके लिये शोक करता है, और यदि फलोनूत हुआ तो उसके लिये पश्चात्ताप भी करता है। शत्रु की मृत्यु से क्या तुम्हारा द्वष शान्त हो जायगा ? क्या उसे मार डालने से तुम्हे भाति मिलेगी ? क्या तुम दुख देने के लिये उसे पराजित करके छोड देना चाहते हो ? पेसा करने से मृत्यु के समय क्या वह तुम्हारी श्रेष्ठता मानेगा और तुम्हारे क्रोध का क्या उसे अनुभव होगा ? निस्सन्देह बदला लेने में बदला लेनेवाले की विजय होनी चाहिय और जिसने उसे हानि पहुचाई उसे दिसला देना चा हिये कि देखा मुझे कोधित करने का यह फल होता है। उसे अपने किये का फल भोगनाचाहिये, और उसके लिये पश्चात्ता- प करना चाहिये । तथापि इस प्रकार का बदला भी क्रोध सेही उपन होता है और इसमें कोई गौरव नहीं। गौरव तो इस में है कि उसको हात भी न पहुंचे और तुम्हारा काम भी . A हो जोर्य। , - 1 कायरता ही हम से हत्या कराती है। जो हत्या करता है यह डरता रहता है कि यदि शत्रु, जीवित रहा तो वह कहाँ अदला न ले । मृत्यु झगडो का अन्न कर देती है, इसमें कोई का नहीं, परन्तु इसमें कोई कीर्ति भी नहीं । हत्या करना शुर तो नहीं है। यह तो सिर्फ अपना बचाव करना है। किसी अपराध के लिये यदला लेने से बढ़ कर कोई सुगम वस्तु नहीं, परन्तु माय ही उसे क्षमा करने से यह कर कोई दूसरा उत्तम काम नहीं ।
7
(१०८)
अपने मन को जीतने से बढ़कर कोई दूसरी जीत नहीं है।
अपराध की अवहेलना करना ही अपराध का बदला लेना है।
जब तुम बदला लेने का विचार करते हो तो तुम स्वीकार
फरते हो कि हमारी हानि हुई, जब तुम शिकायत करने हो तब
तुम कबूल करते हो कि शत्रु ने हमें हानि पहुचाई, पेमा करके
क्या तुम अपने शत्रु के चल की प्रशसा करना चाहते हो"
जो मालुम न पडे वह हानि कैसी ? जिसे हानि कीपरपना
ही नहीं उसको बदला फैसा ? हानि के सह लेने में अपमान न
समझो । इससे बढकर शत्रु पर विजय प्राप्त करने का कोई
दूसरा साधन नहीं है।
उपकार कर देने से अपकार करने वाले को लज्जा मालूम
होती है। तुम्हारी आत्मा के घडप्पन सेडरकर वह हानि पहु-
चाने का विचार भी न करेगा।
जितने अधिक अपराध हो उतनी अधिक क्षमा प्रदान करना
अत्युत्तम है । और जितना न्याय यदला लेने में है। उससे
बढ़कर न्याय और गौरव उसको भूल जाने में है। क्या तुमको
स्वय अपने विषय में न्यायाधीश होने का अधिकार है ? क्या
तुम स्वय एक फरीक होते हुए निर्णय सुना सकते हो? हमारा
काम उचित है, अथवा अनुचित हे, ऐसा स्वय निर्णय करने
के पहिले देखो तो सही कि दूसरे तुम्हारे निर्णय को न्यायसगत
यताते हैं कि नहीं।
प्रतिकारपरायण पुरुप भयभीत होता है, इसीलिये ये लोग
उसका तिरस्कार करते हैं। परन्तु जिसके हृदय म क्षमा और
दया है उसकी पूजा होती है। उसके कृत्यों को प्रशमा हमेशा
के लिये रह जाती है, और सारा जगन, -प्रेम के साथ उसका
नाम लेता है।
7
(१०६) चौथा प्रकरण क्रूरता, द्वेप और मत्सर बदला लेना पुरा है, किन्तु मूरता उससे भी अधिक धुरी । फरता नै बदले की सब बुराइया मौजूद हैं, विशेषता यह है कि उसे उत्तेजित करने के लिये किसी कारण की आवश्य- ता नहीं पड़ती। करता मनुष्य का स्वभाविक धर्म नहीं है, इसीलिये लोग सका परित्याग करते है। उससे उनको राज्जा आती है, और इसीलिये ये उसे निशाचरी प्रकृति कहते हैं। यदि ऐसी त है तो वह फिर उत्पन्न कहा से हुई ? मुनिये। इसके पिता नाम श्रीमान् भय और माता का नाम श्रीमती निराशा वो है। इन्हीं के संसर्ग से नह जन्मी है। वीर पुरुष सामना करने वाले शत्रु पर तलवार उठाता हे रन्तु उस के शरण श्राते ही वह हथियार रख देता है। शरण आये हुए को मारने से कोई यहादुरी नहीं है । उस को अप- न करने में कोई या नहीं, वह तो स्वय भर रहा है । मारो उत स्वभाव वाले को और पचायो नन पुरुषों को इसी में म्हारी विजय और कीर्ति है। इस ध्येयकी पूर्ति करने के लिये जिसके पास सद्गुण नहीं - इस ऊच पद पर चढने के लिये जिस के पास साहस नहीं ही हत्या करके विजय, और रुधिर यहा पर राज्य प्राप्त कर- है। जो सर से डरता है यह सब को मारता मी हे-- आचारी अत्याचार क्यों करते हैं? क्योंकि उन्हें मय लगा रह- है। जब तक कोई जी जीवित है तब तक बुचा उस से ख नहीं मिला सका, जर वह मर जाता है तर,यही उत्ता .
" - (१९०१) उस का मृत शरीर खाता है। परन्तु शिकारी कुत्ता, जन तक यह जीवित है तभी तक उस पर वार करता हे योर जन पह मर जाता है तो कुछ नहीं बोलता। देश के भीतर ही होने वाली लडाइयो म घटा रक्तपात हो- ता है, क्योकि लडने वाले लोग बडे डरपोक होते हैं। गुन पडयन रचने वाले हत्यारे होते हैं, क्योकि मृत्यु के समय मन मौन रहते हैं। हमारा कृत्य कहीं खुल न जाय इस यान केलिने पया घे डरते नहीं रहते? यदि तुम क्र नहीं होना चाहते तो मन्सरता से दूर रहो और यदि तुम चाहते हो कि हम निशाचगें की गराना मे बन्ने रहें तो ई न, करो। प्रत्येक मनुष्य को हम दो दृष्टियो में देख सस्ते हैं । एक से तो वह हमें बहुत दुखदाई प्रतीत हो सम्ता है, और दूसरी से नहीं यथाशक्ति उसी दृष्टि से उसे देखो जिस से यह तुम्ह दुखदाई मालूम न हो । यदि यह सुसदाई मालन होगा तो तुन भी उसे दुख न पहुंचानोगे। ऐसी कौन सी बात है जिसको मनुष्य कल्याणकारी न बना सकता हो ? जिससे हम को अधिक मोघ पाता है उससे घृणा की अपेक्षा शिकायत करने का भाग अधिक रहता है। जिसकी शिकायत हम करते हैं उससे हम से मेल हो सकता है, परन्तु जो हमारा तिरस्कार करता है उसको मारने के अनि रिक्त हमाग समाधान और किसी प्रकार नहीं होता। यदि तुम्हारे लाभ होने में कोई विघ्न डालदे तो मभक न उठो। ऐसा करने से तुम्हारी युद्धि नष्ट होग हानि उस लाभ से कहीं अधिक है । यदि तुम्हारा चुराले जाय तो क्या तुम अपना अगा भी फार . 7 . तो तुम 18 ." (१११) जर तुम दूसरे की पदवियों को देखकर ईर्षा करते हो, जर दूसरों के गौरव को देखकर तुम्हारे हृदय में शल होने लगता हे, उस समय यह सोचो कि उन्हें ये सर कैसे मिले। यह जर मालूम हो जायगा तर तुम्हारी ईर्षा दया रूप में परिवर्तित हो जायगी। * कोई चभव याद उसी मूल्य पर तुम्हें दी जाय, यदि बुद्धिमान हा, तो उसे जरूर अम्वीगार कर दोगे । पदपि यो का मोल क्या है ? चापलुसी । ऐसी दशा में पदवी देनेवाले का दाम धने विना मनुष्य वैभव (पदवी) किस प्रकार प्राप्त कर सकता है? दूसरों की स्वतन्त्रता अपहरण करने के लिये क्या तुमाल पनी स्वतपता खो दोगे ? अथवा किसी ने यदि ऐसा किया हो तो क्या तुम उसकी ईषां करोगे? जिसको तुम स्वीकार नहीं करना चाहते उसकी ई-नहीं करते। वर फिर जिस कारण से डाह उत्पश होता हो उसी की ईर्पा क्यों करते हो? यदि तुम्हें सदगुणों की कीमत मालूम होती तो क्या तुम उनके लिये शोच न करते जिन्होने इतनी नीचता से सद्गुण निष्ट फरवं प्रतिष्ठा खरीदी है? जर पिना दुख किये दूसरा की भलाई सुनने का अभ्यास तुम्हें पड जायगा तो उनके सुख को सुनकर तुम्हें सचा आनन्द प्राम होगा। जर तुम देखोगे वि उत्तम वस्तुए योग्य पात्रों को मिलो हे तो उन्हें सतोप, होगा, क्योंकि गुणियो के उत्कर्ष -को देखकर गुणियों को सुप्त होता है । जो दूसरो के सुख को देखकर मुखी होता है वह अपने सुस को वृद्धि करता है। - - (११) पांचवां प्रकरण न . - - - - 1 हृदय का भोभ (उदासीनता) प्रानदी जीव का देस कर दुसी के होठो मैं मुस्कराहट मा सकती है। परन्तु उदासीन की उदासीनता को देखकर आनन्दी मनुष्य का भी प्रानन्द लोप हो जाता है। उदासीनता का कारण क्या है ? आत्मिक निर्बलता। उसकी वृद्धि क्यों कर होती है ? निरुत्साह के कारण । उसका सामना करने के लिये तैयार रहो, वह हानि पहुचाये बिना आप से आप भाग जायगी। घह तुम्हारी जाति भर की वैरिणी है। इसलिये उसे अपने हृदय से निकाल दो। यह तुम्हारे जीवन के सुखों को विप देकर मार डालने वाली है, इसलिये उसे अपने घर में न घुसने दो। एक तिनके की मी हानि हो जाने पर उदासीन मनुष्य को मालूम होता है कि हमारी सारी 'सपत्ति नष्ट हो गई । उदा सीनता तुम्हारी आत्मा को थोडी थोडी वातो पर प्रशान्त करली है और महत्व पूर्ण वातो पर उसे प्रवृत्त नहीं होने देती। घह तुम्हारे गुणो के ऊपर बालस का परदा डाल देती है । वह उन गुणों को छिपा देती है। जिनसे दूसरे तुमारा सत्कार कर सकते हैं । वह उन्हें दवा देती है । उस समय तुम्हारा काम हे कि उन्हें फिर विकसित करो। वह अरिष्टों को तुम्हारे लिये श्रामलित करती है। यह तुम्हारे हाथों को 'गाध देती है । यदि तुम चाहते हो कि कायरता हम में न रहे, यदि तुम चाहते हो कि कमीनापन हम में से निकल जाय, यदि तुम्हारी इच्छा है कि अन्याय , ।
-
(११३)
को हमारे हृदय में म्यान न मिले, तो उदासीना के वशीभूत
न होयो।
म्मरण रवि कहीं बुद्धिमता के येप में यह तुम्हें धोखा
न दे दे। धर्म तुम्हारे उत्पन्न कर्ता पी स्तुति करता है इसलिये
उसे उदासानता की छाया से न ढप जाने दो। उत्साह के
साथ रहने से ही तुम प्रसनचित्त रह सकते हो इसलिये
उदासीन रहना छोड दो।
मनुष्य को दुग्यो क्यो होना चाहिये ? उस आनन्द मनाना
स्या छोड देना चाहिये जन्म उसके सा कारण उसमें विद्यमान
है ? दुखी होना क्या दुर को और मोल लेना नहीं है।
माडे पर बोलाये हुए मातम परने वाले जिस प्रकार दुखी
देख पडते अथवा पसे मिलने के कारण वे जिस प्रकार आसू
यहाने लगते है उसी प्रकार रहुत से मनुम्य भी उदासीनता
के कारण भासू नहाने रागते है यद्यपि इस उदासीनता का
कोई कारण नहीं होना।
किसी वस्तु से कोई दुखी होता हो सो बात नहीं ।
क्योकि माय देखा जाता है कि जिस से एक, मनुष्य दु.सी
होता हे उसी से दूसरे सुखी होते है।
पिसी मनुष्य स पूछो तो सही फि क्यो भाइ शोक करने
स क्या तुम्हारो दशा कुछ सुधर जाती है। वह स्वयं कहेगा
कि नहीं, शोक फरना मचमुच मूर्वता है। ये उस पुरुष की
प्रशसा करगे जो अपने सकटो को धीरता ओर-साहस पूर्वक
सह लेते है परन्तु अपनी धार धावले बन जाते है। कैसे शोक
की बात है । ऐसे मनुष्यो को चाहिये कि जिनका चे प्रशसा
परते है उनका अनुकरण करे ।
शोक करना निसर्ग देव के विरुद्ध है। क्योकि इससे
-
- - ( १९४) नैसर्गिक कामों में बाधा पडती है। जिसको निसर्ग देव रोचक बनाते हैं उसको शोक देवी नारस घना देती है। जिस प्रकार प्रड' तूफान के सामने वृक्ष गिर पडता हे और फिर उठने का साहस नहीं करता उसी प्रकार निर्मल आत्मा वाले मनुप्य का हृदय शोफ के बोझ से झुक जाता है फिर नहीं उठता। जिस प्रकार पहाड़ पर से नीचे भाने घाला पानी बरफ को भी यहाकर नीचे ले जाता है उसी प्रकार गालो पर की सुन्द- रता आसुओं से धुल जाती है। न तोपहाड पर की बरफ तौट कर फिर से आ सकती है और न गालों पर की यह सुन्दरता ही अपने स्थान को लौट सक्ती है। जिस प्रकार तेजाय में मोती डालने से पहिले वह धूमिल हो जाता है और फिर गल जाता है उसी प्रकार हृदय' की उदासीनता प्रथम मनुष्य पर अपना काम करती रहती है और फिर उसे हडप कर जाती है। सडको पर, विधाम लेने वाले स्थानो पर भी उदासीनता दिखलाई पडेगी। ऐसा कौनसा स्थान है जहा उसकी निवास न हो किन्तु उससे बच कर निकल भागने का प्रयत्न करना चाहिये, यह तो मनुष्य के हाथ में है। देखो तो किस प्रकार उदासीन मनुष्य उस फूल की तरह सर नीचे किये रहता जिसकी जड काट दी गई है । वह किस प्रकार अपनी प्राग्ने जमीन की भोर गाडे रहता है । परन्तु ऐसी अवस्थाओं से सिवाय रोने के और क्या लाभ । उदासीन मनुष्य का मुह क्या कभी ग्वुलता हे क्या उसके हृदय में समाज के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है? क्या उसकी विचार शक्ति अपना काम करती है ? उससे इन सयका कारण है
-
म
पूछो तो कहंगा कुछ नहीं । पूछो कि भाई यह उदासीनता
से आई, कहेगा, ऐसे ही, कोई कारण नहीं है
धीरे धीरे उसकी शक्ति का वास होता जाता है और
अन्त में यह कराल काल का ग्रास बन जाता है। और फिर
कोई पता भी नहीं कि श्रमुक मनुष्य का क्या दुधा।
तेरे घुद्धि है और तू देखता नहीं । तुझ में ईश्वर की भनि
और न अपनी भूल नहीं समझता।
ईश्वर ने षडी दया के साथ मनुष्य को पेदा किया है।
यदि उसे तुझे सुरवी रखने की इच्छा न होता तो वह उत्पन्न
ही काहे को परता? तुम उसके नियमों का उल्लघन करने का
प्रयत्न क्यों करते हो।
'जब तक तुम निदोषी होवर अत्यन्त 'सुखी हो तर तक
तुम ईश्वर का बडा मान कर रहे हो । और जय तुम असन्तुष्ट
हो तब तुम उसको अवहेलना करते हो । क्या उसने सय
यस्तुओ को परिवर्तनशील नहीं बनाया हे ? नो फिर जब उन
में परिवर्तन होता है तो शोक क्यों करते हो ?
यदि हमें निसर्ग देव के नियम मालूम हैं तो हम शिका-
यत क्यों करते हैं? यदि नहीं मालुम तो सिवाय अपने अन्धे-
पन के दोष भोर दे किसे ? '
संसार के नियम तुम नहीं बना सकते । जिस कैप में तुम
नियमों को देखते हो उसी रूप में उनका पालन करना तुम्हारी
पहिला काम है। यदि घे दुप देते है तो दुखी होकर तुम
स्षय अपने दुख को अधिक पढ़ा रहे हो ।
बाहरी लुभाय में न फसो और न यह ख्याल करो कि
शोक से दुर्भाग्य का घाव भर जाता है । शोक दवा की जगह
विष का काम करता है। कहता तो है कि में तेरे छाती में
-- - (११६) तीर निकाल रहा है, किन्तु उल्टे वह उसे हृदय में घुसेडता जाता है। उदासीनता के कारण तुम में और तुम्हारे मित्र में अन बन हो जाती है। इसी के कारण तुम खुल कर बात चीत नहीं कर सकते । कोने में छिपे पडे रहते हो, लोगो केसामने निकलने में अपने हो । दुर्भाग्य के श्राधात -सहन कर लेना तुम्हारा स्वाभाविक धर्म नहीं है और न तुम्हारी बुद्धि तुम से कहती है कि तुम ऐसा करो। किन्तु वीरता के साथ आपत्ति, का सामना करना तुम्हारा मुख्य स्वाभाविक धर्म है । और साथ ही साथ इस बात का अनुभव करना भी तुम्हारा कर्तव्य है कि, यह वीरता हम में वर्तमान है।' सभव है कि श्रासू पासो से गिर पड़े, परन्तु सद्गुण नष्ट न होने पावें । श्रासू बहाने का कारण , मिल सकता है, परन्तु साथ ही यह भी स्मरण रहे कि अधिक श्रासू न घहने पायें ।। नासुओ के प्रवाह से दुख की मात्रा नहीं ज्ञात हो सकी। जिस प्रकार हद दरजे का श्रानन्द- कोई नहीं जान सकता, उसी प्रकार हद दरजे का शोक भी किसी को नहीं मालम हो सकता। श्रात्मा को दुर्गल कोन करता है , उसका उत्साह कौन अपहरण करता है, महत्कार्यों में विघ्न कौन डालता है। और सद्गुणों को नष्ट कौन करता है ? शोक, और कोई नहीं । इसलिये जिस शोक से कोई लाभ होने की सभावना नहीं उसमें क्यो पडते हो ? ओर जिसका मूल ही अनिष्टकर हे उस में उत्तम उत्तम साधनो का बलिदान क्यो करते हो? ? - . . -
(११७)
।
चौथा खण्ड
मनुष्य को अपनी जातिवालो से मिलनेवाले लाभ
.
पहिला प्रकरण
। कुलीनता और प्रतिष्ठा
कुलीनता आत्मा को छोड कर अन्यत्र पास नहीं करती,
और सद्गुणों के अतिरिक्त कहीं प्रतिष्ठा नहीं मिलती । पाप
कर्म द्वारा (दुटिल नीति) हम राजाओं के कृपापात्र यन
सक्ने है। द्रव्य खर्च करके बडे २ पद हम उपलब्ध कर सकते
है, परन्तु इन साधनों के द्वा नाम की हुई प्रतिष्ठा सी
प्रतिष्ठा नहीं है । पाप कर्म द्वारा न तो मनुष्य कुछ तेजस्वी
यन सकता है, और न द्रव्य द्वारा यह कुलीन बन सक्ता हे।
जन मनुष्य को उसके सद्गुणों के कारण पद मिलने
है, जब देश की सची सेवा करने से मना उसका मान होना
है, तभी देने वाले और पाने वाले दोनों को प्रतिष्ठा होती है
और ससार का लाभ होता है।
अरबतलाओ तो सही कि तुम प्रतिष्ठा किस प्रकारसपादन
करना चाहते हो, धूर्तता से अथवा सद्गुणो से ?
जब किमी पराक्रमी पुरष के गुग उसके गाल वची में
उतरते है, तभी उसके पद उन को शोभा देते है। परन्तु जब
पद विभूषित मनुष्य योग्य किन्तु पद रहित मनुष्य से बिलकुल
भिन्न होता है तो क्ष्या जनना पद विभूषित मनुष्य को मान
पैतृक प्रतिष्ठा सर्व गोष्ट मानी जाती है, किन्तु लोग प्रशसा
उसी की करते हैं जिसने उसे पहिले उपार्जित किया था। जिस
दृष्टि से देखती है,
हे , + प M (१११) पुरुष में स्वय तो कोई गुण नहीं है, किन्तु अपने पूर्वजो के उत्तम कमों के बहाने प्रतिष्ठा चाहता है, वह उस चोर के सदृश है जो चोरी करके देवालय में प्राश्रय लेने का प्रयत करता ताकि उसके दुर्गुणं सब छिप जाय । यदि अन्धे के माता पिता श्रोसो से देख सकते थे तो अन्ये को क्या लाभ ? यदि गूगेरे पूर्वज स्पटतया बात चीत कर सकने थे तो गुगे को क्या फायदा ? उसी प्रकार यदि नीच मनुष्य के वाप दादे कुलीन रहे हो तो इससे नीच मनुष्य की कोनली प्रतिष्ठा सच्ची प्रतिष्ठा उसी की होगी जिसका मन सद्गुणों की ओर प्रवृत्त है। चाहे वह पदवियो से विभूपित न हो, किन्तु लोग उसका सत्कार अवश्य करेंगे। ऐसा ही पुरुष तो वास्तविक प्रतिष्ठा उपार्जित करेगा और दुसरे तो उससे पावेंगे। ऐसे ही नर रत्नो से तुम प्रतिष्ठित होने का दम भर सकते हो।। जिस प्रकार परछाई चरतु के पीछे२ चलती है उसी तरह उनो प्रतिष्ठा सद्गुणो का अनुसरण करती है। यह न ख्याल करो कि साहस के काम करने अथवा जीवन का बोखे में डालने से प्रतिष्ठा मिलती हे। प्रतिष्ठा कुछ काम से नहीं मिलती। प्रतिष्ठा मिलती, है कार्य करने की विधि से। राष्ट्ररूपी जहाज सभालने का भार सय पर नहीं रहता अथवा सेनाओं का प्राधिपत्य प्रत्येक को नहीं मिलता। इसलिये जा काम तुम्हें सोपा जाय उसे जी जान से करो । तोग तुम्हारी प्रशसा सहज ही में करने लगे गे! “कीर्ति मिलने के लिये विमो पर जय प्राप्त करना पडेगा ओर गड़े कष्टो का सामना करना पडेगा-सा न-कहो । जोली सती है उसकी कीर्ति क्या श्राप से श्राप नहीं होती! V T ।
" M (98) जो मनुष्य ईमानदार है उसका सर्वत्र क्या मान नहीं होता ? कीर्ति की लालसा प्रबल होती है, प्रतिष्ठा की इच्छा बलवती होती है । जिसने इन्हें दिया उसका उद्देश्य इनके देने का महान था । जिम समय समाज के हित के लिए साहस-पूर्ण काम करने की नायश्यकता है, जब देश के लिये प्राणों को सकट में डालना पडता ह, उम समय महत्याकाना, के अतिरिक सद्गुणों को और कौन उत्तेजित करता है। महात्माशों को कोरी पदवियो से प्रसन्नता नहीं होती। उन्ह प्रसन्नता होती है इस टोह से कि हम इन परियो के योग्य है, अथवा नहीं। इस मनुष्य की मूर्ति किसने बनाई ऐसा कहने की अपेक्षा क्या यह कहना उत्तम नहीं ह "वि श्रमुक मनुष्य की मूर्ति क्यों नहीं बनाई गई " महत्वाकाक्षी भीड भयरे में प्रथम रहे। श्रागे को ठेलता चलेगा, पीछे को देखेगा भी नहीं । सहस्रो मनुष्यो पर विजय प्राप्त करने से उसे इतना सुस-न होगा जितना खेद उसे अपने से एक भी अधिक योग्य पुरष को देखकर होगा। महत्वाकाक्षा का वीज प्रत्येक मनुष्य में होता है, परन्तु सबमें इसका विकाश नहीं होता। मिली जगह पर तो उसे भय दगा देता है और अनेक स्थानों में उसे विनय से दयना पड़ता है । महत्वोकाक्षा आत्मा का श्रान्तरिक। वस्त्र है। जड देह से सम्बन्ध होने के साथ ही उसका आविर्भाव होता है और उससे सम्बन्ध टूटने के पहले उसका विनाश होता है। यदि तुम महत्वाकाक्षा का उचित उपयोग करोगे तो तुम्हारा सत्कार किया जायगा, और यदि उसका दुरुपयोग करोगे तो तुम्हारी अपकीर्ति होगी, और तुम्हारा नाश हो जायगा। निश्वासघातको के हदय में महत्वाकाक्षा दिपी रहती है, -
को सद्गुण
(१२०)
दाम्भिकता उसको श्रोट में रहती है और मायावीपन चटक
मटक बातों से उसका मान बढ़ाता है, किन्तु अन्त में लोग
उसकी असलियत समझ जाते है।
जो वास्तव में सद्गुणी है वह सद्गुण
समझ कर उस पर प्रेम करता है। और उस महत्वाकाक्षा से
घृणा करता है जिससे प्रशंसा मिले। यदि दूसरों की प्रशंस
से सद्गुणी मनुष्य सुखी होता तो उसकी स्थिति कितन
शोचनीय हुई होती । परन्तु ऐसा नहीं । वह फल की इच्छ
नहीं करता और जितनी योग्यता उसमें है उससे बढकर पुर
स्कार नहीं चाहता।
सूर्य ज्यो २ ऊपर चढता है माया त्यों त्यो कम होत
जाती है उसी प्रकार जितनी अधिक मात्रा मद्गुण की मनुष्य
में होती हे उतनी ही कम भूख उसे प्रशसा को रहती है। तथापि
उसको योग्यता के अनुसार जितना मान उसे मिलना चाहिये
उतना अवश्य मिलता है।
कीर्ति परछाई की तरह अपने पीछा करने वाले से दूर
भागती है परन्तु जो उसकी ओर से मुह फेर लेता है उसके
पीछे २ लगी रहती है यदि विना सदगुण के कीर्ति पाने की
इच्छा करोगे तो न मिलेगी, परन्तु यदि तुममें सद्गुण विद्यमान
है तो चाहे तुम एक कोने में छिपे रहो तब भी घहायर तुम्हारा
साथ नहीं छोड़ेगी।
इसलिये जिससे कीर्ति हो उसी पकडो और जो उचित
और न्याय पूर्ण हे उसी को करो । इस प्रकार ऋत करण की
सतुष्टि से जो हर्प प्राप्त होगा वह उस हर्प, से कहीं बढ पर
होगा जो तुम्हारी वास्तविक योग्यता को न जाननेवाले लाखो
मनुष्यो की भूठी प्रशसा सुनने से हो सकता है।
4
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दूसरा प्रकरण
ज्ञान और विज्ञान
अपने उत्पन्नकर्ता की सर वस्तुओं का अध्ययन करना
हो मनुष्य का मुख्यकर्तव्य है । जिसे प्रकृति की प्रत्येक यात
में श्रानन्द मिलता है उसे परमात्मा के अस्तित्व में शफा नहीं
होती । वह उन्हीं वस्तुओं में गदगद होता हुश्रा उसकी धारा
धना करता है।
सदेव उसका मन ईश्वर की ओर लगा रहता है, और
उसका जीवन भक्ति पूर्ण होता है । जब यह पारख उठा कर
ऊपर की ओर देखता है तो उसे क्या अाकाश चमत्कारों से
भरा हुभा नहीं दिखलाई पडता और जर यह पृथ्वी पी ओर
देसता है तो छोटे छोटे फोड़े मकोड़े उससे क्या सकेत करते
हुए नहीं देख पडते कि परमात्मा को छोड कर हमें और कोन
बना सकता है?
सर ग्रह अपने अपने मार्ग में पूमते हैं। सूर्य अपनी
जगह पर स्थिर रहता है । पुच्छल तारा वाय मडत में घूम
पर श्रपने स्थान पर फिर से या जाता है। मनुष्य, ईश्वर
को छोड कर इन्हें और कौन धना सकता है ? मियाय उस
सर्व न्यायी परमात्मा के उनको नियम के बन्धन मे और कौन
जकड सकता है।
अहा ! ये क्तिने चमकीले है और इन की चमक न्यून
नहीं होती। वे कितनी तेजी से घूमते है, किन्तु एक दूसरे से
टकराते नहीं।
पृथ्वी की 'भोर देखो और उसके उनिज पदार्थों पर
विचार करो। उसके उदर का निरीक्षण करो और देखो कि उस
में क्या है। इन सब से क्या ईश्वर की सत्ता प्रगट नहीं होती।
"पास कौन उत्पश करता है? उसे समय समय पर
.
। F ( १२२) सोंचता है । बैल उसे खाते हैं। घोडे और गायें उस से पेट भरती हैं । भेड और यकरिया को घास पात फौन देता है। बोये हुए अन्न की वृद्धि कौन करता है ? एक मुट्ठी अन्न से सौं मुठी अन्न कौन पैदा करता है। अगूर जैतूनादि आदि फलों को प्रत्येक ऋतु में कौन पकाता है? क्षुद्र मनी क्या आप से श्राप उत्पन्न हुई फ्यात अपने कों परमात्मा समझता है ? येदि समझता है तो तूभी उसी को तरह मकिराया उत्पन्न कर । पशु समझते हैं, हम जीवित है, परन्तु इस पर वे आश्चर्य नहीं करते ।, उन्हें जीवित रहने में श्रानन्द, मिलता है, परन्तु वे ख्याल नहीं करते कि इस जीवन का भी फभी अत, होगा । प्रत्येक प्राणी अपना २ काम परपरा से करते हैं। और हजारो पीढिया गुजर जाती हैं किन्तु जाति लुप्त नहीं होती। परमात्मा की सत्ता, जो छोटी बातो में दिखलाई पडनी- है, वही बडी २ बातो में भी देखने में आती है।-तेरा कर्तव्य हे कि तू अपनी आखो को उसके जानने में लगा और मस्तिष्क को उसके चमत्कार की परीक्षा में खर्च कर । प्रत्येक वस्तु की बनावट में परमात्मा का सामर्थ्य और उसकी दया देखने में आती है। प्रत्येक वस्तु की बनावट में उस की नीति और मुज ता भासमान होती है। ससार के प्रत्येक प्राणी को सुस मिलने के भिन्न साधन है । वे एक दूसरे की ईर्षा नहीं करते। अब भला तुम्ही बतलानो कि भाषा के शब्दो में शाना है, अथवा परमात्मा निर्मित वस्तुप्रो के निरीक्षण में । उत्तर यही देना होगा कि प्रति सौन्दर्य के निरीक्षण में जितना ज्ञान है उतना दुसरी घस्तुत्रों में नहीं है। जर तुमने बर बना लिया तो उसका उपयोग करना सीखो । * - - , . पृथ्वी माता जितने पदार्थ उत्पन्न करती है वे सब तेरे भरो के लिये है । अन्न तेरे सोने के लिये और जडी बूटिया तेरे रोगो को दूर करने के लिये उत्पन्न की गई ! अप तानो कि चतुर कौन है ? वह जो परमात्मा की सृष्टि का प्रान रसता है। और युद्धिमान कौन है ? जो उस पर विचार करता है । जिस शास्त्र की उपयोगिता पढी चढी हे, जिस शान में अभिमान उत्पन्न होने की सफा नहीं हे तुम्हारा कन्य है कि तुम स्वय उसे पहिले सपादित कगे। और फिर अपन पडोसियो फो सिसलामो, ताकि उन का भला हो । जाना शोर मरना एकमत करना और माना पालगा, काम करना और उस का फल भोगना. इत्यादि वातो के विषय में भा तुम्हारा ध्यान आकर्षित होना चाहिये । नीति यह सब तुम्हें सिसा देगी, ' जीवन की उपयोगिता"। इन याता में तुम्हारी सहायता करेगी ।।- स्मरण रस्मो, ये सर तुम्हारे हृदय पटल पर लिखे हुए ६ ! वारश्यकता केवल इतनी ही है कि तुम्ह उन की याद भर पड जाय । याद आना भी कोई कठिन नहीं है। 'मन को एकाग्र करो, वल तुम उन्हें स्मरण में ला सकोगे। अन्य सर्व शारा व्यर्थ हैं, अन्य सारा सान कपोल करिपन है। मानवी जीवन में उनकी कोई बारश्यक्ता नहीं। उन से मनुष्य कुछ अधिक नेक और ईमानदार नहीं हो सकता। ईश्वर की भत्ति और सजातीय प्राणियो के प्रेम-ये ही क्या तुम्हारे मुख्य फर्तय नहीं हैं ? विना ईश्वर की सृष्टि का निरीक्षण किये उस पर तुम्हारी-भक्ति किस प्रकार हो सकती है? और पराधीनता के ज्ञान विना सजातीय लोगो के साथ प्रेम कैसे हो सकेगा? - - 44 .
(.१२४ ) पांचवां खण्ड स्वाभाविक योगायोग - पहिला प्रकरण सपत्काल और विपत्काल उत्कर्ष होने पर मर्यादा से अधिक वर्ष में न श्राश्रो और विपत्काल आने पर अपनी श्रात्मा को शोक के गढ़े में न ढकेलो संपत्काल का सुख चिरस्थायी नहीं है, इसलिये उस पर भरो. सा न करो। और विपत्काल की दृष्टि हमेशा चक नहीं रहती, इसलिये घरडाना छोड कर धैर्य के साथ प्राशा को स्थिर रसो विपत्ति काल में धैर्य रखना जितना कठिन है, सपत्काल मैं सयमी बनना उतना ही बुद्धिमानी हे । सपत्काल और विप- त्काल तुम्हारी आत्मिक दृढता परखने की कसौटिया है । इन को छोड कर और किसी प्रकार तुम्हारे आत्मा की परीक्षा नहीं हो सकती है। इसलिये जर इन का ओगमन हो तर नडी सावधानी से काम लो। संपत्काल को तो जरा देखो। कैसे मजे में चाटुकारी कर के तुम्हें अपने पजे में ले पाता है, और किस प्रकार धीरे धीरे तुम्हारी शक्ति और तुम्हारे उत्साह का अपहरण करता है । माना कि तुम सकट में दृढ रहे हो, माना कि विपत्ति में तुम अचल रहे हो। तय भी अपनी शक्ति को इस त्याल में कि तुम्हें अब उसकी आवश्यकता नहीं पडेगी, घटने न दो। हमारो आपत्ति को देख कर हमारे शत्रुनो का भी दिल पसीज उठता है, और हमारी सफलता और सुस को देख पर हमारे मित्र भी हम से ईर्षा कर माने है! . । ।
(१२५) सका की जड श्रापत्ति ही है। आपत्ति, शौर्य और धव्य की धात्री है। जिसके पास माल भरा है क्या वह और अधिक पाने के लिये अपनी जान को खतरे में डालेगा।- सधा सद्गुणी मनुष्य, परिस्थित के अनुसार काम करता है। परन्तु जर तक उसके ऊपर आपत्ति न आवे तय तक उस का यह गुण सर्व साधारण को मालूम नहीं होता। आपत्काल में मनुप्य को ज्ञात होता है कि हमारे मित्र पैसे के साथी थे। उन्होंने अब मुझे छोड दिया है । आपत्काल म यह समझता है, मेरी सर आशाएँ, केवल मुझी पर आश्रित ६ । उसी समय यह वीरता के साथ कठिनाइयों का सामना करता है, और वे उसका कुछ नहीं बिगाड संकतीं। 'सपत्काल में वह समझता हे कि, में सुरक्षित, और मेरे मित्र मुझे प्यार कर रहे हैं। मपत्काल में वह ये परवाह हो जाता है। सपत्काल में यह अागामी नापत्ति को नहीं देखता। और सपत्काल ही में वह दूसरो पर पूर्ण भरोसा करना है, और अत में उन्हीं से धोखा साता है। आपत्काल में मनुष्य भला बुरा सोच सकता है परन्तु सपकाल में उस को बुद्धि नहीं काम करती । इसलिये आपत्काल अन्धा है, जो मनुष्य को संतोप का पाठ पढ़ा सकता है, परन्तु सपत्काल अच्छा नहीं है जिस के वशीभूत हो कर मनुष्य नापन्काल श्राने पर एक दम घरडा जाता है। और फिर उसी में उस की मृत्यु हो जाती है। किमी वात का अतिरेक होने पर हमारे मनोविकार हम पर हुकुमत करने लगते है । समभाव बुद्धिमत्ता का चिन्ह है। सारे जीवन सादगी के साथ रहो, हरएक दशा में सतोप रक्सो। इस से प्रत्येक समय प्रत्येक बात से तुम्हारा लाम होगा, और लोग तुम्हारी प्रशसा करेंगे। . . J (१२६) - म 7 । चुद्धिमान' प्रत्येक वस्तु से अपना लाभ द निकालता है। और भाग्य के सर परिवर्तनों को एक दृष्टि से देखता है, सुख दुःस पर समान अधिकार रखता है, और कभी अपने नियम से विचलित नहीं होता। न तो सपकाल में शेखी-मारो, और न आपत्काल में निराश होश्रो । सकट को न तो बुलाश्रो और न उसके आने पर मुछिपाते फिरो । जो तुम्हारे साथ हमेशा रहने ही वाला नहीं है उस से डरते क्यो हो? आपत्ति में फस कर आशा को न छोडो, और, उत्कर्ष होने पर बुद्धिमत्ता को तिलाजली न दो। जिसको फल के प्राप्त होने में शका होगी उसकी सिद्धि नहीं हो सकती । और जो सामने के गड्ढों को नहीं देग्वेगा उसका पिनाश अवश्य होगा। जो कहता है कि समृद्धि ही में मेरा कल्याण है, उसी में मुझे सचा मुख मिल सकता है, वह एक प्रकार से अपने जहाज को, बालू को सतह पर लंगड डाल कर, खडा कर रहा है जिस को ज्वारभाटा यहा ले जाता है। जिस प्रकारः पर्वत से निकल कर समुद्र में जाकर मिलने वाला जल प्रवाह नदी रूप में, मार्ग के खेतों में हो कर जाता है, कहीं ठहरता नहीं, उसी प्रकार भावी प्रत्येक के पास दोग करती है, किन्तु ठहरती नहीं, क्योकि उसको गति अविरत और हवा की तरह चचल है। इसीलिये तुम उसे पकड नहीं सकते। जर तुम्हारे ऊपर उस की कृपा दृष्टि होती हे तब तुम्हें सुख होता है, परन्तु जा तुम उसका स्वागत करना चाहते हो तर वह दूसरों के पास निकल भागती है। -
(१२७)
'दूसरा प्रकरण
ऐश और व्याधि
न
है
शरीर की व्याधि या प्रमाय प्रात्मा पर भी पडा फरता
। एक को प्रारोग्यता मिले विना दूसरे को प्रारोग्यता नहीं
मिल सकती।
च्याधियो में प्लेश का नर सर से यढा चढा है ।
निसर्गदेव ने इस को दूर करने की कोई औषधि नहीं
तैयार की।
जय तुम्हाग धोरज छूटने लगे तो आशा से काम लो और
जर तुम्हारी दृढ़ता जवाय देने लगे तो युद्धि से काम लो।
दुख भोगना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। क्या तू
चाहता है कि कोई ईश्वरीय शक्ति तुझे पाकर बचा ले।
अरे भाई तू घडा मूर्ख है जब देखता है कि सभी दुख भोगते हैं
तो तु अपने लिये क्यों घबडाता है!
जो दु ख तेरे भाग्य में लिख दिया गया है उससे छूटने
का प्रयत करना अन्याय है। जो तेरे भाग्य में आ जाये उस
को चुपके से अगीकार कर ले ।
"ऐ ऋतुओ, तुम न बदलो, नहीं तो मेरी आयु कम हो
जायगी। ऐसा कहने से क्या ये मान जायगे जिस का कोई
प्रतीकार नहीं हो सकता उस को सह लेना ही अच्छा है।
चिरकाल तक ठहरने वाला सोश तीव नहीं होता ।
इस रिये उस के बारे में शिकायत करते समय तुम्हें लज्जा
भानी चाहिये । जो तीव्र हे यह अन्तकाल तक ठहरता है,
इस लिये उसे अन्त तक सह लेना चाहिये।
(१२-1)
शरीर इस कारण घनाया गया था कि वह आत्मा के
आधीन रहे । शरीर के सुख के लिये जीवात्मा को दुख देना
जीगत्मा की अपेक्षा शरीर की अधिक कदर करना है
काटो से कपडे फट जाने पर जिस प्रकार बुद्धिमानो
को खेद नहीं होता। उसी प्रकार शरीर को सट होने से धीर
पुरुष अपनी पारमा दुखी नहीं होने देते।
-
.
.
(१२)
तीसरा प्रकरण
सुत्यु
जिस प्रकार सोना तेयार करने से कीमियागर की परीक्षा
होती है, उसी प्रकार मृत्यु से जीवन और उस के कर्मों की
परीक्षा होती है।
यदि जीरन की परीक्षा करनी है तो उसके प्रतिम
कात से करो। इसी से तुम्हें मालुम हो जायगा कि तुम्हारा
जीवन किस प्रकार का रहा है। जहां कपट का व्यवहार नहीं
है वहीं सत्य प्रकाशमान होता है।
जो यह जानता है कि, मरना किस प्रकार चाहिये,
उसने अपने जीवन का अपव्यय नहीं किया । उसी प्रकार
जो अपना अतिमकाल कीर्तिमद यनो रहा है उस का जीवन
व्यर्थ नहीं पीता।
जिस को जिस प्रकार मरना चाहिये यदि वह उसी
प्रकार मरा, तो उसका जन्म लेना निरर्थक नहीं हुआ।
अथवा जिसने हसते हसते अपने प्राण विसर्जन क्येि उसका
भी जीवन व्यर्थ नहीं गया।
जो जानता है, हम मरेंगे अवश्य, उसे सारे जीवन सुख
मिलता है, परन्तु जो इस से अनभिज्ञ है उसे सुखनहीं मिलता
और यदि कुछ मिलता भी है, तो हीरे की तरह शीघ्र ही खो
जाने का उस में भय लगा रहता है।
क्या तुम्हारी इच्छा मर्दानगी के साथ मरने की है?
यदि है तो पहिले अपने दुर्गुणो का गला घोट डालो। मुखी
है यह, जो मरने के पूर्व अपने जीवन का कार्य समाप्त कर
देता है, जो मृत्यु के समय केवल मरना ही अपना मुख्य
-
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(१३०)
कर्तव्य समझता है और जो कहता हे, बस, में जीवन के
सब काम कर चुका, अब मेरो मृत्यु में विलम्ब होने की कोई
आयश्यकता नहीं है।
यहादुरी के साथ मृत्यु का सामना करो, उससे मुह
मोडना कायरता है । तुम नहीं जानते, वस्तुत मृत्यु हे फ्या।
तुम तो यही समझते हो कि इस से हमारे दुखों का प्रत
होता है।
दीर्घ जीवन सुखमय जीवन नहीं है । सुसमय जीवन है
घह जिस का अच्छा उपयोग किया गया हो। जिस मनुष्य ने
अपने जीवन का उचित उपयोग किया उसी को प्रतिष्ठा मिलती
है और मरने के अनन्तर उसी की आत्मा को सम्धी शाति
मिलती है।
।
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"
साहित्य के अनूठे रत्न
१ विहारी सतसई सटीक-टी० लाला भगवानदीन । विहारी
के सम्पूर्ण सातो सौ दोहों की सरल टीका । पहला सस्करण
समास । द्वितीय परिवर्तित सस्करण १०) सचिन राज
स०१॥1)
२रामचन्द्रिका सटीक--टीका० लाला भगवानदीन ।
दोभागों में समाप्त ! प्रथम भाग (१-२० प्रकाश तफ) राज
सस्करण २॥१) सजिल्द ३) द्वितीय भाग (२१-३४ प्रकाश
तक)1) सजिरद )
३ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव-ले० देवीप्रसाद प्रीतम 1)
रा स ।)
४ मिनयपत्रिका सटीक-टोका० वियोगी
हरिजी।
गोस्वामी तुलसीदासजी की सर्वश्रेष्ठ रचना । मूल्य २॥)
सजिद २॥) वढिया कपड़े की जिरद ३)
५. गुलदस्तए-विहारी-विहारी के दोदो पर रचे गए उर्दू
शेर हिन्दी लिपि में। प्रणेता देवीप्रसाद 'प्रीतम' । मूल्य me)
सचिन राज सस्करण १॥)
६ कुसुम सग्रह -ले० धगमहिला | सम्पा०प० रामचन्द्र
शुझ । द्वितीयावृत्ति । मूत्य १॥) सचित्र
७ मुद्राराक्षस-ले० भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजी । भालोचना-
त्मक भूमिका तथा भरपूर टिप्पणी सहित । शुद्ध सस्करण
मृत्य १),
८ भ्रमरगीत महात्मा नन्ददास कृत । सटिप्पण मूरय E)
भ्रमरगीत-सूरसागर के सर्वोत्कृष्ट पद, विस्तृत भूमिका
सहित । स० रामचन्द्र शुक । मूल्य १) पृ० २५० के लगमग
१० अनुरागवाटिका-मौलिक भक्ति रस पूर्ण कवितायें।
रचयिता-श्रीषियोगीहरि मूत्य)
स्वर्गीय बंकिम वाबू-रचित
उपहार मे देने योग्य सचित्र एवं सुन्दर पुस्तकें
कागज मोटा, छपाई सुन्दर
11)
११)
10)
सीतागम
रजनी
दुर्गश-नन्दिनी
कपाल कुण्डला
कृष्णकान्त का वसीयतनामा
एम ए बनाके क्यो मेरी मिट्टी खगय की?
शैलबाला
वाल मनोरजन
राजारानी (श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर)
२)
१)
।
हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन परीक्षा तया हिन्दी की सब प्रकार की
पुस्तके मिलने का पता-
पुस्तक-भवन, बनारस सिटी