Sanmati Library, Jaipur
Samvatsarikaikoddrishthi Shraddha Prayog
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अब सावत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धप्रयोग ॥ श्राद्ध से एक दिन पहिले नियम ,करना ब्रह्मचर्य से रहना भोजन के लिये ब्राह्मण को निमन्त्रण देना ॥ १॥ श्राद्ध के दिन प्रातःकाल [ वस्त्रोपवस्त्र ) अर्थात् एक धोता और एक अग पोछने का वस्त्र सहित स्नान श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ सांवत्सरिकैकोदिष्टश्रादप्रयोगः ॥ तत्र पूर्वदिने कृत- नियमः॥ १ ॥ श्राद्धदिने प्रातर्वस्त्रयुग्मेन कृतस्नानः ॥२॥ पंचगव्योपलेपनं ज्व- लदंगारभ्रमणगौरमृत्तिकाच्छादनैः श्रादभूमिसंस्कारं कृत्वा वस्त्रादिना वेष्टयित्वा तिलगौरसर्षपरवकीर्य पित्रासनस्थानाहाममागे श्राद्धदेयवस्तून्यासोद्य ॥ ३ ॥ कृत- स्नानादिमध्यान्हे शुचिः शुक्लद्विवासः पादौ प्रक्षाल्याचम्य श्राइदेशमागच्छेत् ॥४॥ तत्र स्वयं पाक कुर्यात् सपिण्डं स्त्रीहोरा वा पाचयेत् ततः पाके वृत्तेरक्षादीपं निधाय करना ॥ २ ॥ जहाँ श्राद्ध करना हो उस भूमि को अग्नि से शुद्ध करके उस पर पचगव्य सहित पीली मिट्टी से लोपके और वहा कनात अथवा चटाई आदि से आड़ करके तब मध्यान्ह में उसी क्रम से स्नान करके श्राद्ध करना तिल और पीली सरसों छीट देना पितृ के आसन से गमभाग में श्राद्ध सामग्री रखना.।। ३.!॥ शुद्ध सफेद वस्त्रोपवस्त्र पहिन ओढ़ कर हाथ पैर धोके आचमन श्राद्ध प्राणायाम करना ॥ ४ ॥ फिर अपने हाथ से अथवा अपनी स्त्री या भाई आदि से पिण्ड के लिये पाक बनवाना ॥ पाक करने के बाद रक्षा दीप बालना फिर आचमन करके पूरब मुँह बैठ कर जिसने पाक बनाया होय उससे पूछना कि पाक भया ? ॥५॥ पुनराचम्य प्राङ्मुखउपविशेत अन्यकृतेपाके सिद्धमिति पाचिका पृष्ट्वा ॥ ५॥ ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थागतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं सबाह्याभ्यंतरः शुचिः । ॐ पुंडरीकाक्षः पुनात्वितिपठित्या कुशत्रयजलैः श्रावस्तून्यभिषिचेत्॥६॥ ततः कुशत्रयतिलजलान्यादाय ॐ अद्यामुकमासीयामुकपक्षीयामुमतिथौ अमुकगो- त्रस्य पिनुरमुक्शर्मणः सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राडमहं करिष्ये इतिसंकल्पं कुर्यात् ॥ ततो गायत्रीं विर्जपित्वा ॐ देवताभ्यः पितृभ्पश्च महायोगिभ्य एव च ॥ नमः स्वाहाय रवधायै नित्यमेव नमो नमः इति त्रिर्जपेत् ॥ ७॥ ततोऽपसव्यं कृत्वा दक्षिणमुखः फिर अपवित्र० इस मन्त्र से त्रिकुश जल में बोर के श्राद्ध की समग्री पर छिडके ॥ ६॥ त्रिकुश तिल जल लेकर प्रतिज्ञा सकल्प कर ३ वार गायत्री और देवताभ्य० मन्त्र को पढे ॥ ७ ॥ फिर अपसव्य होके दक्षिण मुख बैठकर बाया पैर मोडके मोटक तिक . ।
जल लेकर संकल्प करके पलास के तिपतिया पातया पर दक्षिणाय दोहर कुशका मोटक रूप आसन दे ॥ ८ ॥ फिर अपहता० पातितवामजानुर्मोटकादीन्यादाय ॐ अद्यामुकगोत्रपितरामुकशर्मन सांवत्सरिकैकोद्दि- ष्टाद्दे इदमासनं ते स्वधेति पूर्वोपकल्पितं मोटकरूपमासनं तिलजनप्रोक्षितं दक्षि- णायं पितृतीर्थेनोत्सृजेत् ॥ ८ ॥ ॐ अपहताअसुरारक्षा सिवेदिषदः इति भोजन- पात्रे तिलान्विकीर्य ॐ आयंतु नः पितरः सोम्यासोग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानः । अस्मिन्यज्ञे स्वधयामदंतोधिब्रुवंतुतेवंत्वस्मानिसिपठित्वा ॥ ६ ॥ततोऽऱ्याकरणम. पुट- कादो दक्षिणायं पवित्रं धृत्वा ॐ शन्नोदेवीरभिष्टयऽआपो भवंतु पीतये । शंयोरभि- स्रवतुन इतिमन्त्रेण जलं प्रक्षिप्य ॐ तिलोसिसोमदेवत्योगोसवोदेवनिर्मितः ।प्रत्न- मन्त्र से भासन के आगे अर्थात् आसन से उत्तर रखे हुए भाजनपात्र पर तिल छोडना आयन्तुन.. मन्त्र पढ़ देना ॥ ९ ॥ तक अर्घ्य के वास्ते १ पात्र रखना उसमें शन्नोदेवी० मन्त्र से जल छोड़ना तिलोसि० मन्त्र से तिल छोड़ना और बिना मन्त्र के गन्ध श्राद्ध - पुप्प छोड़ना । फिर, उसी अर्यपात्र मे २ पत्ती, कुशा ग्रन्थि देकर दक्षिणाय धरना ॥ १० ॥ फिर उसको बायें हाथ में लेना उस में से पवित्री निकाह के भोजनपात्र पर उत्तर आगा करके रखना उसके ऊपर १ आचमनी जर छोड़ना फिर अर्ध- मद्भिः पृक्तः स्वधयोपित्तन्लोकान्प्रीणाहिनः स्वाहा इति तिलान् प्रक्षिप्य गंधपुष्पे तूष्णीं निपेत् ॥ १० ॥ ततोऽर्घ्यपात्रं वोमहस्ते कृत्वा भोजनपात्रे पवित्रमुत्तरायं धृत्वा तदुपरि किंचिदुदकान्तरं दत्त्वा ॐ यादिव्या आपः, पयसासंबभूवुर्याऽआंतरि- ताउत्पार्थिवीर्याः हिरण्यवर्णायज्ञियास्तान आपः शिवाः स रयोनासुहवाभ- वन्तु इति पठित्वा ॐ अद्यामुकगोत्रपितरममुकशर्मन् सांवत्सरिकैकोद्दिष्ट- श्राद्ध एष ते हस्तायः स्वधेति हस्तायः स्वधेति पवित्रोपरि जलं यथापतितमेव- पात्र को बायें हाथ में जो रखा है दहिने हाथ से -दाकना यादिव्या० मन्त्र पढ़ना और संकल्प करके आधा का भोजनपात्र पर रखी हुई पवित्री पर छोड़ना पवित्री उठाय के अर्घ्यपात्र में फिर रख अर्यपात्र को मोटक जो पहिले से रखा है उसके पूष वाम भाग में उलट के जल अध्य कर आसन , - रखदेना । दक्षिणा दान के समय तक उसको उठाना नहीं ॥ ११॥ फिर मोटकरूप आसन पर चन्दन फूल धूप दीप पान सुपारी वस्त्रोपवस्त्र यज्ञोपवीतः चढावना मोटक तिल जल लेकर गन्धादि दान करना ॥ १२॥ पश्चात् जल से आसन मुत्सृजेत् ततः पवित्रयुतं तदापात्रमवशिष्टजलयुतमेवासनवोमभागे ॐ पित्रे- स्थानमसीति न्युब्जीकुर्यात् दक्षिणादानपर्यन्तं. नोहरेत् न. चालयेत् ॥ ११॥ ततो गंधादिदद्यात् ततो मोटकतिलजलान्यादाय. ॐ अद्यामुकगोत्रपितरममुकश- मन् सांवत्सरिकैकोददिष्टश्राद्धे एतानि गंधपुष्पधूपदीपतांबूलयज्ञोपवीतवासांसि ते स्वधेति गंधादीन् दद्यात् ॥ १२ ॥ ततो जलेन भोजनपात्रासनयोश्चतुर्दिशं मंडलं कृत्वा सव्यंजनं सघृततिलजलमन्नं किंचिदग्रभागमुद्धृत्य मोटकादिना ॐ इदमन्नमेत भूस्वामिपितृभ्यो नमः इतिभूस्वामिनेऽन्नं दद्यात् ॥ १३॥ ततः सिद्धमुष्णमन्नं रज- सहित भोजनपात्र का ( मण्डल ) अर्थात् घेरा करना आगे भांजी सहित घृतं तिल जल और पाकान्न थोडा दौनियाँ में 'मेकर भूस्वामि को लिखे वाक्य से दंना ॥ १३॥ फिर पाकान्न चाँदी आदि के पात्र में रख के स्तिरका ध्यान करके योग 4 । गरम २ पुरुष के भोजन माफिक परोसे साग भाजी घृत मीटा इत्यादि उत्तम २ पदार्थ और एक पात्र में जल परोसे मधुव्वाता० तादिपात्रस्थं कराभ्यामादाय पितरं ध्यायन् मंद मंदं परिवेषणं कुर्यात् ततः पुरुषाहार- चममन्नं परिविष्य यथासंभवं व्यंजनमन्नं जलं घृतं च पात्रांतरस्थं तत्रोपनीय अन्नं मधुनाभिधार्य ॐ मधुव्वाताऋतायते मधुतरंतिसिंधवः । माध्वीनः संवौषधीः ॥१॥ मधुनक्तमुतोषसोमधुमात्पार्थिव रजः । मधुद्यौरस्तुनः पिता ॥२॥ मधुमान्नोवनस्पति- मधुमा अस्तु सूयः। माध्वीर्गावोभवंतुन इतित्यूचंमधुमधुमध्वितिचजपित्वा॥१४॥ पात्रमालभेत् ततः सव्येन हस्तेन पात्रं पश्चिमभागे स्पृशन् तदुपरि गतदक्षिण- हस्तेनाधोमुखेन पूर्वभागे पात्रं स्पृशन् ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते अमृतं जुहोमि स्वाहा ॐ इदंविष्णुर्विचक्रमेत्रेधानिदधेपदं ॥ मन्त्रों से मधु पाकान्न पर छोडे ॥१४॥ फिर-बायाँ हाथ नीच दहिना ऊपर करके भोजनपात्र को सर्श ,कर पृथ्वी ते पात्रं. इत्यादि NA मन्त्र से भोजनपात्र मन्त्रं पाठ करे फिर बायां हाथ लगाये रहे दहिने हाथ के अँगूठा से अन्न जर घृत आदि देखावै अपहता . समूढमस्या - सुरे इतिपठित्वा ॐ कृष्णकव्यमिदंरक्षमदीयमितिपठित्वा वामेन पाणिना पात्रं स्पृशन्नेव दक्षिणेपाणिमुद्धृत्य ॐ इदमन्नं ॐ इमाआपः ॐ इदमाज्यं ॐ इदं हविरिस्यन्ने जलं घृते पुनरन्ने चांगुष्ठं निक्षिप्य ॐ अपहता असुरारना सिवेदिषदइत्यन्नोपरितिलान्विकीर्य्यमोटकतिलजलान्यांदायॐ अद्यामुकगोत्रपितरम- मुकशर्मन्सोवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धे एतत्तेन्नसोपकरणंस्वधेत्युत्सृजेत ततोवामहस्तमप्यु- दृत्य ॐ अन्नहीनंक्रियाहीनंविधिहीनंचयद्भवेत् । तत्सर्वमच्छिद्रमस्त्वितिपठित्वा ॥१५॥ ॐ गायत्रींचत्रिर्जपेत् ततः कुशेषूपविश्य ॐ मधुवातेत्यादिजपेत् ततः ॐ कृणुष्व- पोज: प्रसितिन्नपृथ्वीं याहिराजेवामवा इभेन । तृष्वीमनुप्रतिंद्रूणानोस्तासि पर तिल छाडै मोटक तिल जल लेके अन्न आदि दान करै अन्नहीन० मन्त्र पढके क्षमा मागे ॥ १५ ॥ सव्ध होके पूरब मुख - श्राद्ध कुशासन पर बैठ के ३ वार गायत्री मधुव्वाता० ३ मन्त्र कृणुष्वापाजः० मन्त्र पाठ करके भूमि मे तिल छोडै पितर को ध्यान करै विध्यरतसंस्तपिष्टः इतिरक्षोघ्नी!चोजपित्वाभूमौतिलानविकीर्यपितरंध्यात्वा ॥१६॥ ॐ उदीरतामवरउत्परासउन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः। असुंयईयुखुकाऋतज्ञास्तेनोवं तुपितरोहवेषु इति पितुः मंत्रान् ॐसहस्रशीर्षापुरुषः सहस्रातः सहस्रपातासभूमि सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठदशांगुलमिति पुरुषसूक्तं ॐ आशुःशिशानोवृषभोनभीमोघनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्। संक्रंदनोनिमिष एकवीरः शतः सेनाअजयत्साकमिन्द्रइत्य प्रतिरथंच' जपेत्. यथाशस्त्यान्यान्यपि. पवित्राणिजपेत् रुचिस्तवादीनिचजपेत् ॐ नमस्तुभ्यंविरूपाननमस्तेनेकचक्षुषे । नमापिनाकहस्तायवजूहस्ताय वै नमः ॥१७॥ इति पठित्वो। उच्छिष्टसमीपेदक्षिणोग्रंकुशत्रयमास्तीर्य जलेनसिक्त्वा किंचिदन्नंसघृत- ॥ १६ ॥ फिर उदीरता० इत्यादि पितृमत्र पुरुषसूक्तादि पवित्र पाठ करना ॥ १७ ॥ भोजनपात्र के पास दक्खिन भागा करके ४ . कुशा अपसव्य होके विछाना उस पर मर छीटना सव्य होके १ पात्र मे थोड़ो अन्न वृत तिल जल सहित लेकर अग्निदग्ध,० मन्त्र स तीनो कुशा पर गिराय देना॥१८॥ स्व्यहो आचमन करके विष्णु का स्मरण कर गायत्री मधुन्याता० ३ मन्त्र पढना ॥१९॥ तिलजलसिक्तमादाय अपसव्यं० ॐ अनग्निदग्धाः येजीवाः येण्यदग्धाः कुल्लेमम । भूनौदत्तेनतृप्यतुतृप्तायांतुपरांगति॥इतिमत्रस्थफलमुद्दिश्य कुशोपरिअन्नं विकिरेत्॥१८॥ ततः सव्यं कृत्वाचम्य हरिं स्मृत्वा गायत्री मधुव्वाता इत्यादिकं मधुमधुमध्विति च जपेत् ॥ १९ ॥ ततोऽपसव्यं कृत्वा हस्तमात्रचतुरंगुलाच्छ्रितदक्षिणप्लवों पिंडिका- यां प्रादेशमात्रं परिमाय दर्भपिंजूल्या दक्षिणांगुष्ठतजनीधृतमूलया वामहस्तांगुष्ठत- जनीधृतोपरि भागया ॐ अपहताऽसुरारक्षा सिवेदिषद इति प्रादेशमात्रमुल्लिख्य फिर अपसव्य होके १ हाथ की वंदी ४ अंगुल ऊँची दक्खिन तरफ कुछ ढार रहे ऐसी वेदी बनावै उस पर १ कुशा लेकर दहिना हाथ नांचे बाया हाथ.कार करके ( प्रादेशमात्र) अर्थात् अंगूठा ओर अगूठे के पासगाली अंगुली फैलाने में जो स्थान आवे उसीको प्रादेश कहत हैं इतनी ही, लम्बी अपहता० मन्त्र को पढ़के १ रेखा कुशा स वदो पैर करना उस कुशा को उन्तर दिशा में फेंक देना.
श्राद्ध ॥ २० ॥ ये रूपाणि मन्त्र से जलती हुई लकड़ी वेदीपर घुमाय के दक्खिन दिशा में फेक देना ॥२१॥ फिर ३ कुगा जिसकी बा कटी हो उसको वेदी पर विछाना और सत्य होके देवताभ्यः मत्र ३ बार जपना ॥ २२ ॥ फिर अपसव्य होके तिल जल दर्भपिंजुलीमुत्तरस्यां दिशि त्यजेत् ॥ २० ॥ ॐ येरूपाणिप्रतिमुंचमानोअसुराः संतः स्वधयाचरंति । परापुरोनिपुरोयेभरंत्यग्निष्टांल्लोकान्प्रणुदात्वस्मान इत्यंगारं भामयित्वा अंगारं दक्षिणस्यां दिशि क्षिपेत् ॥२१॥ ततस्तत्र छिन्नमूलकुशत्रयमास्तीर्य सव्यं कृत्वा देवताभ्य इति विर्जपेत् ॥ २२॥ तत अपसव्यं कृत्वा तिलजलगंधपुष्पाणि पुटकं कृत्वा पुटकं वामहस्ते धृत्वा मोटकतिलजलान्यादाय ॐ अद्यामुकगोत्र- पितरममुकशर्मन् सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्रादपिण्डस्थानेऽत्रावनेनिक्ष्व ते स्वधेति छिन्नमूलकुशोपरि अवनेजनं दद्यात् किंचिज्जलं पुटके अवशेषयेत् ॥ २३ ॥ गन्ध पुष्य १ टोनियों में रखना । मटक तिज जल लेबर संकल्प करके दोनियां का आधा जल वेदी पर बिछ हुयं कुश पर छेड़मा शेष जल सहित दोनिया रख देना ॥ २३ ॥ फिर तिल जल भाजी आदि घृत मिलाय के बल के समान पिण्ड बनाय के ऊपर पिण्ड के मधु घृत लगाय के मोटक तिल जल सहित दहिने हाय में बार हाथ से पिण्ड रख सकल्प करके वेदी के कुशा ततः तिलजलव्यंजनघृतमिरन्नैः “पिएडं विल्योपमं निर्माय्य मधुघृता- भ्यामभिधार्य मोटकतिलजलसहितमादाय सव्योपग्रहीतदक्षिणहस्तेन ॐ अद्या- मुकगोत्रपितरममुकशर्मन्सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धे एष ते पिण्डः स्वधेति छिन्नमू- लकुशोपरि पिण्डं दद्यात् ततः कुशमूलेतूष्णीं करं प्रोक्ष्य ॥ २४ ॥ सव्यं कृत्वा द्विराचमेत् हरिं स्मृत्वा ॥ २५ ॥ अपसव्यं कृत्वा दक्षिणाभिमुखः ॐ अत्र पितर्मो- दयस्व यथाभागमावृषायस्वेति पठित्वा उत्तराभिमुखीभूय श्वासं निर्यम्य पितरं ध्या- पर धरना कुछ के जड़ में हाथ पोंछ देना ॥ २९ ॥ सा होके २ आचमन करके हरिका स्मरण करना ॥ २५ ॥ अपसप हो क अत्र पितर० मन्त्र से उत्तर मुख ह के इटास सच कर पितर का ध्यान करके फिर दक्षिण मुम्ब होके अम मदन्त० मन्त्र से ।
. श्राद्ध -- पिण्ड की तरफ लास छोडे ॥ २६ ॥ तब फिर सफर करके वेदी पर उसी दोनिया का आधा बचा हुआ, जल छोड़ना पहिले उसी जलका अवनेजन पीछे अर्घ अंग जलको प्रत्यानेजन कहते हैं ॥ २७ ॥ फिर कमर के धोतो की, मी ढोला करना , सव्य, यन पुनर्दक्षिणाभिमुखो भवन् ॐ अमीमदन्त पितर्यथा भागमावृषायिष्टेतिपठेत् ॥ ॥ २६ ॥ ततः पूर्वदत्तावशिष्टजलयुतं प्रत्यवनेजनजलपात्रमादाय ॐ अद्यामुकगोत्र- पितरममुकशर्मन् सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धपिएडेऽत्रप्रत्यवनेनिक्ष्वतेस्वधेतिपिण्डोपरि प्रत्यवनेजनं दद्यात् ॥ २७ ॥ ततो नीवीं विस्रस्य सव्येनाचम्य ॥ २८ ॥ अपमव्यं कृत्वा वामेन पाणिना सुत्रमादाय दक्षिणकरेण धृत्वा ओंनमस्ते पिता रसाय नमस्ते पितः शोषीय नमस्ते पितर्जीवाय नमस्ते पितः स्वधाय नमस्ते पितोराय नमस्ते. पितर्मन्यवे नमस्ते पितः पितर्नमस्ते गृहोनः पितर्देहि सतस्ते पितर्देष्म इतिपठित्वा हो के आचान करना ॥ २८ ॥ अपसव्य होके बाये हाथ से मून उठाय के दहिने हाथ में लेना नमो व ० मन्त्र से एतते पितर- 1 . वासः,वाक्य कहके पिण्ड पर सूत चढादेना मोटक तिल जल लेकर सुत्र दान करना ॥ २९ ॥ फिर पिण्डपर बिना मन्त्र पढे चन्दन फूल धूप दीप ताम्ब्लादि चढाना 'और भोजन पात्र पर आचमनी “जल और अक्षत' छोडना “भौटक आदि लेकर ॐ एतत्ते पितर्वास इति पिंडोपरि सूत्रं दद्यात् 'ततो 'मोटकतिलजलान्यादाय ॐ अद्यामुकगोत्र पितरमुकशर्मन्सवित्सरिकैकोद्दिष्टश्रादपिंडे एतत्ते वासः स्वधेति सूत्रमुत्सृजेत् ॥ २९ ॥ ततः पितरमुद्दिश्य पिंडेतूष्णीं गंधपुष्पधूपदोपतांबुलानिद- द्यात ततः ॐ शिवाप्रापासंत्वितिजलं ॐ सौमनस्यमस्त्वितिपुष्पम् ॐ अक्षतं चारिष्टं चास्त्विति तंडुलान्भोजनपात्रे विपेत ततश्च मोटकतिलजलान्यादाय ॐ अद्यामुक- गोत्रस्य पितुरमुकशर्मणः सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धे दत्तैतदन्नपानादिकमक्षय्यमुपतिष्ठता- मित्यतथ्योदकं दद्यात ॥ ३० ॥ ततः सव्यं कृत्वा दक्षिणाभिमुखः ॐ अघोरः संकल्प छोट देना ॥ ३० ।। तब सव्य होके दक्खिन मुख बैठे कर पश्चिम से पूरब को पिण्ड पर जलधारा देना फिर पूरब मुख को श्राद्ध करके दोनों हाय से अंजुली बाँध कर गोत्रन्नो० मन्त्र पढ़के आशीर्वाद लेना ॥ ३१ ॥ पुनः अपसव्य होके पबित्री सहित ३ कुमा दक्खिन आगा करके पिण्ड पर ऊज्जवहन्ती मन्त्र में उत्तर से दक्खिन को पिण्ड पर जलधारा देना और झुक के पिण्ड की सूघ पितास्त्विति पिण्डोपरि पूर्वार्या जलधारां दद्यात् ततः पूर्वाभिमुखः कृतांजलिः सुमनाः ॐ गोत्रं नो वर्द्धतां दातारो नोऽभिवईन्नां वेदाः संततिरेव च श्रद्धा च नो माव्यगमहहुदेयं च नोऽस्तु अन्नं च नो वहुभवेदतिथींश्च लभेमहि याचितारश्च नःसंतुमाचयाचिष्म कचन एताः सत्याआशिषः संतु इत्याशीः प्रार्थनां कृत्वा ॥३१॥ अपसव्यं कृत्वा सपवित्रकुशत्रयं दक्षिणायंपिण्डोपरिधृत्वा ॐ ऊर्जव्वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलोलं परिस्नुर ॥ स्वधास्थ तर्पयत में पितरइतिमन्त्रेण कुशोपरि दक्षिणायां जलधारां दद्यात् ततो नमीभूय पिंडमाघ्रायोत्थापयेत् पिएडाधारकुशा- नुल्मुकं च वन्हो क्षिपेत् ॥ ३२॥ अर्घ्यपात्रमुत्तानीकृत्य दक्षिणां दद्यात्तथा मोट- के उठाय लेना पिण्ड के नीचे की कुशा जलती हुई अग्नि में छोडदना ॥ ३२ ॥ अयपात्र जो आसन के पीछे उलटे रक्से हैं . 7 उसको सीधा कर देना मोटकादि लेकर सकल्प करके दक्षिणा चंदिा की देना ॥ ३३ ॥ फिर ओंकारपूर्वक अभिरम्यता० वाक्य से विसर्जन करना ॥ ३४॥ तव फिर सव्य होके देवताम्यः मात्र ३ बार जपना ॥ ३५ ॥ अपसव्य होके रक्षा दीप बुताय कादीन्यादाय रजतं च ओं अद्यामुकगोत्रस्य पितुरमुकशर्मणः कृतैतत्सांवत्सरि- कैकोद्दिष्ट श्रावप्रतिष्ठार्थमिदं ग्जतं चंद्रदैवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे यद्युपस्थितं रजतं न भवति तदा रक्तिकामितं रजतं चंद्रदेवतमित्ये- वमादिवाक्यं कर्तव्यं इदं पदं न दातव्यमिति शेषः ॥ ३३॥ ततः ओं अभिरम्यता- मिति विसर्जनम् ॥ ३४ ॥ ततः सव्यं कृत्वा ओं देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायो- गिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायनित्यमेव नमो नमः ॥ इति त्रिः पठेत् ॥३५ ।। ततोऽपसव्यं कृत्वा पाणिभ्यां दीपं निर्वापयेत् ततो हस्तौ पादौ प्रक्षाल्य सव्यं कृत्वाचम्य प्रमादात्कुर्वतां कर्मप्रच्यवेताध्वरेषुयत्।स्मरणादेवतद्विष्णोःसंपूर्णस्यादितिश्रुतिः॥३६॥ देना हाथ पैर धोके फिर सव्यहोके प्रमादात् इत्यादि मन्त्र पढके परमात्मा का स्मरण करना ।। ३६ ।। इसी प्रकार से माता 1 एको ८ अथवा स्त्री आदिका एकोहिष्टश्राद्धकर और स्त्रीका अपने पति, अथवा पुत्रादिको एकोद्दिष्टश्राद्भभी इसी विधिसे करना होगा । 'इति एकोद्दिष्टश्राद्धप्रयोगः ॥ श्राद्ध इतिश्रीरुद्रधरकृतश्राद्धविवेके सविसरिकैकोद्दिष्टश्राद्धप्रयोगः ।। 'अथ बलिवैश्वदेव प्रयोगः।ओं ब्रह्मणे स्वाहा ओं प्रजापतये० ओंगृह्याभ्यः ओंकश्यपाय ओंअनुमतये ॥ १॥ ततो हुतशेषान्नेनबलिदानं ओं पर्जन्याय नमः ओंअंड्यो नमः ओं पृथिव्य नमः उदक्मस्थ ॥२॥ओं धात्रे नमः ओं विधात्रे नमः द्वारशाखयोः ॥ ३ ॥ ओं वायवे नमः इति प्रतिदिशे ॥४॥ओं 'प्राच्यै नमःओं अवांच्यै नमःओं प्रतीच्यै नमःओं उदीच्यै नमःॐब्रह्मणे नमःओं अंतरिक्षायॐ || अय बलिवैश्वदेवप्रयोग । अग्नि में ॐ ब्रह्मणैस्वाहादि पांच आहुति दे ॥१॥ फिर होम से बचा हुआ अन्न का बलिदान दे पर्जन्याय नमः आदि ३ मंत्र से जल में दे ॥ २ ॥ धात्रे नम. १ विधात्र नमः २ से चक्र के द्वार शाखा के पास दे ॥३॥ वायवे नमः से चारो दिशा मे दे ॥ ४ ॥ ॐ प्राच्य नमः इत्यादि ७ मन्त्र से बीच में दे॥५॥ ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नम.
च आदि ४ मन्त्र से चक्रमध्य में उत्तर फिर उसके उचर क्रम से दे॥ ६ ॥ फिर बायां पैर मोड के (पिततीर्थ ) अर्थात् अंगुठा और अगुली के वीच से दक्खिन मुख होके दक्खिन दिशा में दे ॐ पितृम्य स्वधा नमः इसी एक मंत्र से फिर ॥ ७ ॥ सूर्याय इतिमध्य॥५॥ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमःओं विश्वेभ्यो भूतेभ्यो नमःओं उषसे नमःओं भूतानां च पतये नमः इत्युत्तरोत्तरं॥६॥ततः प्राचीनावीती दक्षिणाभिमुखः पातितेवामजानुः पितृतीर्थेन दक्षिणस्यां दिशि ओं पितृभ्यः स्वधा नमःइतिदद्यात७ ततो बलिशेषान्नलिप्तपात्रं प्रक्षाल्य ओंयमैतत्ते निणेजनं नमः इतिवायां दिशि दद्यात् ॥ ८॥ ओं देवा मनुश्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः । प्रेता पिशाचास्तरवः समस्ताये चान्नमिच्छन्ति मयो प्रदतं ॥१॥पिपीलकाः कीटपतंगकाश्च धुभुतिताः कर्मनिबद्ध बद्धाः । प्रयान्तु ते तृप्तिमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो बलि से बचा अन्न जिस पात्र में है। उस पात्र को धोय के ॐ यदमै तत्ते निणेजन नमः इस मन्त्र से वायु कोण में दे ॥ ८॥ देवा मनुष्याः इत्यादि मत्रों से ३ और सौरभैय्य मन्त्र से गोको १ खानौ से कुत्ते को २ ऐन्द्र वारुण से कौवों के। ३ ABRI को बलि दे ॥ ९॥ फिर ब्राह्मण भोजन करावै ॥ १०॥ यह नैमित्तिक श्राद्ध बलिदान है ॥ विष्णु का स्मरण करे ॥ ११ ॥ श्राद्ध भवंतु ॥ २॥ येषान्न माता न पिता न बन्धुर्न चान्नसिद्धिर्न तथान्नमस्ति। तत्तृप्तयेन्नं भुवि दत्तमेतत्तेषान्तु तृप्तिर्मुदिता भवन्तु ॥ ३ । शंखः । सौरभेय्य इतिगोभ्यस्तताही श्वानाविति शुनां ऐन्द्रोति वाय पानां च शनैर्निवर्तयेद्भुवि ॥ ६ ॥ ततो ब्राह्मणान्मो- जयेत् ॥१०॥ इतिनैमित्तिकश्राबिलिदानम् ॥११॥ॐ प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेता ध्वरेषु यत् स्मरणादेवं तद्विष्णोः संपूर्ण स्यादिति श्रुतिरिति पठित्वा श्राद्धसंपूर्णकामो विष्णुं स्मरेत् । श्राद्धीयवस्तूंनि ब्राह्मणाय प्रतिपादयेत् ॥१२॥ अंभसि वा क्षिपेत्१३ ततः शेषं ज्ञातिभिः सह मुंजीत ॥१४॥ एवमेव पितृव्यभात्रादि श्रादप्रयोगः ॥१५॥ को बस्तु ब्राह्मण को दे ॥१२॥ वा ज में छोड़ दे॥१३॥ शपै पकान दि जात भाई लोगों के साथ भाजन करै।।१४॥ इसी प्रकार से चाचा भाई को भी श्राद्ध करने की विधि है ॥१५॥ संग्राम में शस्त्र से मरे हुए के निमित्त कुआर नदी पितृपक्ष की चतुर्दशी को ही एकोदिष्ट श्राद्ध करना साल पूरा होने पर उनका पिण्डदान नहीं देना इति ॥ १६ ॥ अथ मातृश्राद्धप्रये.ग ॥ श्रीगणेशजी को विघ्ननाशार्य नमस्कार करना ॥ १ ॥ फिर मध्यान्ह वेला में श्राद्ध शस्त्रादिहतनिमित्तकमाश्विनकृष्णचतुर्दश्यामप्येकोदिष्टमेव कर्तव्यं तत्र सांवत्सरिक पदं परं न दातव्यमिति ॥ १६॥ श्रीगणेशाय नमः॥१॥अथ मातृश्नाद्धप्रयोगः॥अथ शुकलाम्बर स्नातो मध्यान्हे सुसमावृतः पंचगव्योपलेपितज्वलदगारशोधितगौरमृत्तिकाच्छादितयथाप्रदेशासादित श्रीडीयद्रव्यं तं देशमागत्य पादौ प्रक्षाल्याचम्य ॥२॥ सपिण्डस्त्रीद्वारापोचयेत् स्वयं करने की जगह को गाबर, संपेद मृत्तिका से लिपर्वा कर पचगव्य प्रोक्षण करके बलते अंगारादि से शुद्ध करके श्राद्ध सामग्नी सब रखवाय के फिर स्नान करके श्वेत वस्त्रोपवस्त्र धारण करके श्राद्ध स्थान पर आवै हाथ पाय धोयके आचमन करै ॥ २७ फिर अपनी स्त्री वा 'कुटुम्ब के द्वारा पिण्ड का पाक बनवावै या अपने हाथ करें तब फिर हाथ पा धोयक पूर्वाभिमुख कुशासन वा कम्बलासन पर बैठे चिमन ३ प्राणायाम करके ॥ ३ ॥ रक्षा दीप बालना दूसरे कोई ने पाक किया होय तो पूछना कि पीक सिद्ध भया ॥ ४ ॥ तवै त्रिकुश जल लेकर श्राद्ध सामग्री पर मोक्षण करें ॥ ५॥ आरै त्रिकुश जल वापचेत् ततः पादौ प्रक्षाल्याचम्य शुद्धासने उपविश्य ॥३॥ दीप प्रज्वाल्या. चम्य प्राङ्मुखः परकर्तृ के पाके सिद्धमिति पाचिकां पृष्ट्वा ॥ ४ ॥ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥ ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनोत्वितिकुशत्रयजलैः श्राद्धीयद्रव्याणि सिंचयेत् ॥ ५॥ ततः कुशत्रयतिलजलान्यादाय ॐ · अद्यामुकमासीयोमुकपक्षीयामुकतिथोवमुकगोत्राया मातुरमुकदेव्याःसांवत्सरिककोहिष्टश्राद्धमहंकरिष्ये इति-संकल्पं कुर्यात ततो गायत्री त्रिर्जपित्वा देवताभ्यस्त्रिजपेत् ॥ ६ ॥ ततोऽपसव्यं कृत्वा पातितवामजानुदक्षिणा- भिमुखो मोटकतिलजलान्योदाय ॐ अद्यामुकगोत्रे मातरमुकदेवि सांवत्सरिकैकोद्दिष्ट- कर सङ्कल्प करना ३ वार गायत्री जैपना देवताम्य मन्त्र जपना ॥ ६ ॥ फिर अपसव्य होकर वावगे पैर मोड़के दक्खिन -- मुख मोटक तिल जन रेकर सङ्कल्प करके मोटक रूप आसन दाक्षणाम कुशा तिल सहित घरदे ॥ ७ ॥ अपहता मत्र से अर्घ पात्रके बायें तरफ तिल छोड़े और आयन्तु नः मन्त्र पदे ॥ ८ ॥ अर्ध पात्र में दक्षिणान पार्वत्री धर शन्नो ,देवी मन्त्र श्राद्ध इदमासनं ते स्वधेति मोटकरूपमासनं दक्षिणायंसतिलमुत्सृजेत् ॥ ७ ॥ ततः ॐ अपोहताअसुरोरक्षा सिवेदिषद, इत्यर्घपात्रे वामावर्ततिलान्विकीर्य ॐ यन्तु नः पितरः साम्यासोग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानः । अस्मिन्यज्ञेस्वधयामदन्तोधिन्छ, वन्तु तेवन्त्वस्मानिति पठित्वा ॥ ८ ॥ अर्घपात्रे दक्षिणायं पवित्रेधृत्वा ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपोभवन्तुपीतये ॥शंय्योरभिस्रवन्तु नः इत्यर्घपात्रे जलक्षिपेत् ॐ तिलोसि सोमदेवत्योगोसवोदेवनिर्मितः। प्रत्नमद्भिः प्रक्तः स्वधयापित ल्लोकोन्प्री- णाहिनः स्वाहेति तिलान् लिप्त्वा गंधपुष्पे तूष्णीं क्षिपेत् ॥ ६ ॥ ततोऽर्घपात्रंवाम- हरते कृत्वा पवित्रं भोजनपात्रोपरि उत्तरायं धृत्वा तदुपरि किचिदुदकांतरं दत्वा ॐ से जले भर तिलोसि मन्त्र से तिल अर्ध पात्र में छोड़ें और फूल चन्दन अमन्त्रक ही छोड़े ॥ ९ ॥ फिर अर्धपात्र । RAM श्राद्ध की पवित्री भोजनपात्र पर उत्तराम रक्खै उसपर योग जल छोडदे अर्धपात्र वाये हाथ में लेकर दाहिने हाथ से दाके यादिव्या मन्त्र पढ़ें ॥१०॥ फिर दहिने हाथ में लेकर मोटक तिल जल सहित संकल्प करके भोजन - पात्र पर रखी हुई पवित्री पर अर्ध का आधा जल गिरावै और उस पवित्री को अर्ध में घर के अर्घ पात्र को आसन के वाम या दिव्याऽआपः पयसासंबभूवुर्याऽांतरिताऽउतपार्थिवीर्याः॥ हिरण्यवर्शायज्ञि- यास्तानऽओपः शिवाः शस्योनाः सुहेवाभवन्तु इतिपठित्वा ॥ १० ॥ मोटकतिल- जलान्यादाय ॐ अद्यामुकगोत्रे मातरमुकदेवि सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्ध एष ते हस्ताघःस्वधात अयंदददुत्सृजेत् ततोऽवशिष्टजलसहितं पवित्रसहितं चार्घ्यपात्रमा- सनवामभागे ॐ मात्रेस्थानममीति न्युब्जीकुर्यात् तच्च दक्षिणादानपर्यन्तं नोदरेत् न चालयेत् ॥ ११॥ ततो गंधादिदानं ॐ अद्यामुकगोत्रेमातरमुकदेवि सांवत्सस्कैि- कादिष्टश्राद्दे एतानिगंधपुष्पधूपदीपतांबूलसिंदूरचासांसि ते दत्तानि ॥ १२ ॥ ततो माग में मात्रै स्थानमसि वाक्य से उलट के घर दे दक्षिणादान पर्यन्त उसका न उघारे न हटावे . ॥ ११ ॥ चम्दन फूल धूप दीप ताम्बूल सिंदूर वस्त्र से मोटकरूप आसन की पूजा करें और उसका संकल्प करै ।। १२. ॥ फिर जल से भोजमपात्र सहित आसन के चारो तरफ मण्डल कर श्राद्धान्न का अग्नमाग तिलजल सहित दोनयाँ वगेरह लेके इदमन्नमेतद्भूस्वामि पितृम्यो नमः कहके भूस्वामि को दे ॥ १३ ॥ फिर ताम्रादिपात्र में रक्खा हुआ अन्न माता का ध्यान जलेनासनसहितभोजनपात्रस्य चतुर्दिषु चतुष्कोणं मण्डलं कृत्वा सव्यंजनं श्राद्धदेयान्नाग्रभागं तिलजलसहितं कुत्रचित् पुटकादौ कृत्वा ॐ इदमन्नमेतद्भूस्वा मिपितृभ्यो नमः इनिमोटकादिना भूस्वामिनेऽन्नमुत्सृजेत् ॥ १३ ॥ ततः कराभ्यां ताम्पात्रस्थमन्नं मातरं ध्यायन्भोजनपात्रे पुरुषाहारक्षम परिविष्य यथासंभवं सव्यंजनं घृतपानीयं च पात्रांतरेषूपनीय मधुनान्नमभिधारयेत् यतः ॐ मधुवाताऋ तायते मधुक्षरन्तिसिंधवः । माध्वीनः सन्त्वौषधीः। मधुनक्तमुतोषसोमधुमत्पार्थिव रजः । मधुद्यौरस्तु नः पिता । मधुमान्नोव्वनस्प्पतिमधुमाऽ अस्तुसूर्य्यः । माची करके दोनों हाथों से भोजन-पात्र पर.१ पुरुष के आहार नोफक रोसे और जो भोजन पदार्थ नैयार हो सर साग माजा वृतं पानी १ , मोठा इत्यादि. गरोसे तब मधुन्वातादि मन्त्र से मधु छोड़े ॥ १४.। फिर माया हाथ नीचे दाहिना ऊपर करके दोनों हाप से भोजन पात्रको सर्व करें और पृथिवीते पात्र मन्त्र पढ़ के दाहिने हाथ के अंगूठा से अन्न जल धृत फिर अन्नादि को गर्गावो भवन्तु नः ॐ मधुमधुमध्विति च जपेत्. ॥ १४॥ ततः पाणिभ्याँ पुजाभ्यां व्यस्ताभ्यां पात्रं स्पृशन्. ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे. अमृते अमृतं जुहोमि स्वाहा ॐ इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधानिदधे पदं । समूढमस्यपा सुरे स्वाहा ॐ कृष्णाकव्यमिदं रक्षमदीयमिति पठेत् ततो दक्षिणहस्तमुत्तानं तदंगुष्ठं ॐ इदमन्नभित्यन्ने इमो आप इति जले ॐ इदमाज्यमिति घृते ॐ इदं हविरिति पुनरन्ने निवेशयेत् ॥१५॥ ॐ अपहताऽअसुरारक्षा ५ सिवेदिषदः इत्यन्ने तिलान् क्षिपेत् ततो मोटकादिन्यादाय ॐ अद्यामुकगोत्रे मातरमुकदेवि सांवत्सरिकैकोद्दिष्ट -दिखेगना ।। १५ ॥ अपहता मात्र से अन्न पर तिल छोड़ना मोटकादि लेकर सफल्प. करके अन्नही श्लोक पढके पार्थना करे ॥ १६ ॥ सव्य हाके आचमन कर के ३ बार गायत्री जपै कुशासन पर बैठ कर मधुव्वाता ३ मन्त्र कृणुष्व पाजः इत्यादि पढके भूमि में,तिल छोडे माता का ध्यान कर ॥ १७ ॥ उदारतादि और पुरुष सुक्त आशु: अध्याय और पितृमन्त्र स्तोत्रादि का पाठ श्राद्ध इदमन्नं सोपकरणं ते स्वधा इत्यन्नमुत्सृजेत् ततः पात्रंत्यजेत् ॐ अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्वमच्छिद्रमरित्वति पठित्वा ॥१६॥ सव्येनाचम्य गायत्रीं त्रिर्जपित्वा कुशेषूपविश्य ॐ मधुव्वातेति जपेत् । ततः कृणुष्वपाजइत्याद्याराक्षसोध्नीर्ऋचो जपेत्तिलान्भूमौ विकीर्य्य मातरं ध्यात्वा ॥१७॥ ॐ उदीरतामबरइत्यपि. पित्र्यमन्त्रान्सहस्रशीत्यादिपुरुषसूक्तं ॐ. आशुः शिशान इत्यादिकमप्रतिरथं अन्यांश्च मन्त्रान जपेत् ततोऽपसव्यः उच्छिष्टसमीपे कुशत्रय: मारतीयं जलेन प्रोंच्यासव्यंजनमन्नं सघृतं. सतिलजलप्रोतितमादाय ओं अनग्नि- दग्धा ये जीवा ये प्रदग्धाः कुले मम । भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यांतु पसं गतिमिति करना फिर भेजनात्र के समीप ३ कुशा विछ.य के जल से 'प्रोक्षण कर के तरक री सहित अन्न जल घृत तिल एक पात्रमे लेकर '.."
को श्राद्ध अनग्नि दग्धा मन्त्र से कुशा पर भन्नादिक छोड़ दे ॥ १८ ॥ फिर अपसव्य होके चेदी बनात्र अाहता मन्त्र से वेदी पर कुश मूलसे प्रादेशमात्र रेखा करना ये रूप.ण मन्त्रसे बंदो पर आर बुझाय के दक्सिन दिशा में रखरे फिर छिन्न मूल कुशा. बिछावै कुशोरि अन्नमुत्सृजेत् ॥१८॥ ततः सव्यं कृत्वाचम्य हरि स्मृत्वां गायत्री मधुबातेति च जपेत् अपसव्यं कृत्वा वेदिकां कृत्वा पिण्डस्थाने प्रादेशमात्रे ॐ अपहताऽ. असुगरक्षा सिवेदिषदः इतिमंत्रेण दर्भपिंजूल्या उल्लिखेत् दर्भपिंजूलीमैशा-यां विपेत् ततः ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना. अतुराः संतः स्वधयाचरन्ति । परापुरो- निपुरो ये भान्त्यग्निष्टॉल्लोकान्प्रणुदात्वस्मादिति मंत्रेण रेखांयामंगाई भ्रामयित्वा दक्षिणस्यां दिशि त्यजेत् ततस्तिच्छिन्नमूनकुशानास्तीयं ॥ १९ ॥ सव्य कृत्वा देवताभ्य इति · त्रिंजपेत् ॥ २० ॥ ततोऽपसव्यं कृत्वा पुटके जलतिल पुष्पगन्धनकृत्वा मोटकतिलजलान्यादोय ॐ अधोमुकगोत्रे मातरमुकदेवि सांवत्सरिक ॥ १९॥ सन्य होके देवताभ्यः ३ वार जपै ॥ २० ॥ अप सव्य हो के १ दोनियाँ में तिल जल गन्ध पुष्प छो के संकला १३ - करके वेदी पर अधा जल! छोडना ॥ २१ ।। तब तिल घृतादि मिलायके पिण्ड बनाये फिर मधु घृत कारमें लंपन करके मोटक तिक जल लेकर संवल करके वेदी के कुश पर पिंड धेरै ॥ २२ ॥ कुश मूत्र से हाथ पॉछ फिर सग ह के ६ आचमन करके कोद्दिष्टश्राद्धेपिण्डस्थानेऽत्रावनेनिः ते स्वधेति छिन्नमूले कुशोपरि अवनेजनं दद्यात् ॥२१॥ ततस्तिलघृतसहितान्नेन पिण्डं कृत्वा मधुघताभ्यामभिघार्य मोटक तिलजलपिण्डमादाय ॐ अद्यामुकगोत्रे मातरमुकदेवि सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्ध एष ते पिण्डःस्वधेति पिंडमपसव्येन गृहीत्वा दक्षिणहस्तेन कुशोपरि दद्यात् ॥२२॥ ततः कुशमूले कर प्रोक्ष्य सव्यं कृत्वा त्रिराचम्य हरिं स्मृत्वा ॥ २३ ॥ अपसव्यं कृत्वा दक्षिणाभिमुखः ॐ अत्रमातर्मादयस्वयथाभागमावृषायस्वेति पठेत् उद्ङमुभूखीय श्वासं निरुध्य मातरं.ध्यायन्परिवर्तमानः ॐ अमीमदत्तमातायथाभागमावृषायिष्टोति हारका स्मरण करें ॥ २३ ॥ अपसव्य होक दक्षिण मुख बैठकर उत्तर मुख होके अत्र मातर मन्त्रसे श्वास बँचा र माता का को श्राद्ध १४ ध्यान करके अमीमत्त मन्त्र से पिण्डके तरफ से छोड़े ॥ २१ ॥ फिर वेदी के आगे की दोनिया. का बचा हुआ था जल पठेत् ॥ २४.॥ ततोऽवनेजनावशिष्टजलसहितं पुटकमादाय मोटकतिलजलान्यादाय ॐ अद्यामुकगोत्रे मातरमुकदेविसांवत्सरिकैकोद्दिष्ट श्रादपिण्डेऽत्र प्रत्यवने निक्ष्व ते स्वधो इति प्रत्यवनेजनं दद्यात् ततो नीवीं विस्रस्य सव्यं कृत्वाऽऽचम्य॥२५॥अपसव्यं कृत्वा वामेन पाणिनोद्धृतं सूत्रं दक्षिणेन चादाय ॐ नमस्ते माता रसाय नमस्ते मातः शोषाय नमस्ते मातीवाय नमस्ते मातः स्वधायै नमस्ते मातर्मातर्नमस्ते गृहान्नो मातदहिसतस्ते मातर्देष्म इति पठित्वा एतत्ते मातर्वास इति मंत्रणपिंडोपरिसूत्रं धृत्वामोटकतिलजलान्यादाय ॐ प्रद्यामुकगोत्रमातरमुकदेवि सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद संकल्प करके पिड पर चटाये और कमर दौली करदे सव्य होके आचमन करे ॥ २५ ॥ फिर अपसव्य होके बायें हाथ से सून 4 लेकर दहिने हाथ से नमस्ते० मन्त्र पढ़ के पिंड पर चढाव और सूत्र दान का संकल्प करै ॥ २६ ॥ फिर पिंड पर गन्ध पुष्प धूप दीप ताबूल मन्त्र सहित चढावै भोजनपात्र पर जल पुष्प तलाक्षत छोडे और अक्षय्योदक दान करै ।। २७ ॥ फिर सम्प पिंडे एतत्ते वासः स्वधेति सूत्रमुत्सृजेत् ॥ २६ ॥ ततः पिंडे गंधपुष्पधूपदापतांबू लानि तूष्णीं दत्वा ॐ शिवा आपः संत्विति जल ॐ सौमनस्यमस्विति पुष्पं ॐ अततं चारिष्टमस्त्विति तंडुलान्भोजनपत्रेि निक्षिपेत् ततो मोटकतिलजलान्यादाय अयोमुकगोत्राया मानुरमुकदेव्याः सांवत्सरिकैकोद्दिष्टाछ दत्तैतदन्नपानादिकम तय्यमुपतिष्ठतामित्यक्षय्योदकमुत्सृजेत्॥२७॥ ततः सव्यं कृत्वा दक्षिणाभिमुखः ॐ अघोरा मातास्तु इति पिंडोपरि पूर्वाग्रां जलधारां दद्य त् ततः पूर्वाभिमुखः कृतांजलिः ॐगोत्रं नो वर्धतां दातारो नोऽभिवर्धतांबेदाःसंततिरेवची श्रद्धाच नोमाव्यगमहहुदेयंच नोऽस्तु अन्नवनो बहुभवेदतिथींश्च लभेमहि याचितारश्चनःसंतुमाचयाचिष्म कंचन। होकर दक्षिणमुख बैठकर पचिश्म से पूर्वान्त पिण्ड पर जलधारा दे पूर्वाभिमुख होक' गोत्रन्नो पढके माता से आशं.व.द लं " - ॥ २८॥ फिर अपसर होके सपवित्र तीन कुशा पिण्ड पर रखके ऊळ वहन्ती मन्त्र से दक्षिणाय जलधारा दे ।। २९ ।। और झुक के पिण्ड को सूघ के उठाय दें पिण्ड के नांचे की कुशा अग्नि में छोड़ दे उल्टा अर्धपात्र को सौवा करदै दक्षिणा दोन करे एताः सत्या आशिषः संतु इत्याशोःप्रार्थना कुर्यात्।२८॥ ततोऽपसव्यं कृत्वा सपवित्र कुशत्रयं पिंडोपरि आस्तीय ॐ ऊर्जन्वहन्तीरमृत घृतं पयः कीलालं परि सुत स्वधास्थतर्पयतमे मातरमिति कुशोपरि दक्षिणायां जलधागं दद्यात् ॥ २९ ॥ ततो नघीभूय पिण्डमाघ्रायोत्थापयेत् पिण्डाधारकुशानुल्मुकं च वह्नौ निक्षिप्याऽर्घपात्र- मुत्तानीकृत्य दक्षिणां दद्यात् । ततो मोटकतिलजलान्यादाय ॐअद्यामुकगोत्राया मातु रमुकदेव्याः सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धपूतिष्ठार्थमिदं रक्तिकोपरिमितं रजतं चंद्रदेवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे इति यथा वैभवं दद्यात् ॥ ३०॥ ॐ अभिरम्यतोमिति विसर्जनम् तत: सव्यं कृत्वा ॐ देवताभ्य इति निर्जपेत् जसी शक्ति हो उसी माफिक दक्षिणा दे ॥ ३०॥ अभिर-यताम् वाक्य से ? आचमनी जर मोटक रूप आसन पर छोड़ के कार । . विसर्जत कर फिर सध्य होके देवताभ्यो ३ वार पढ़े ॥ ३१ ॥ अपसव्य होके दोनो हाथों स रक्षादीपः बुता हाथ पैर धो डाले ॥ २॥ फिर सव्य होके आचमन करे और विष्णु का स्मरण करै ॥ ३३ ॥ श्राद्ध की चढी सामग्री वाम्हण को दे अथवा जल ॥ ३१ ॥ ततोऽपसव्यं कृत्वा हस्ताभ्यां दीपं निर्वाप्य हस्तौ पादौ पूनाल्य ॥३२॥ सव्येनाचम्य ॐ पूमादात्कुर्वतां कर्म पूच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्ण स्यादिति श्रुतिरित्युक्त्वा श्रादसंपूर्णकामो बिष्णु स्मरेत् ॥ ३३ ॥ ततः श्राद्धीयवस्तुनि ब्राह्मणाय प्रतिपादयेत् जले वा क्षिपेत् ॥३४॥ तत इष्टःसह शेषभोजनं ॥ ३५॥ एवंपल्यादिश्राद्धम् ॥ ३६॥ 'पल्यादिसंबन्धिनाम्न उल्लेखे विशेषः यथा - स्त्रीकर्तृकश्राद्धपूयोगः ॥ स्नाता में छेड्दै ॥ ४ ॥ ब्राम्हण भोजन के बाद अपने इष्ट मित्र सहित भोजन करे ॥५॥ इसी प्रकार से पत्नी पितृव्यपत्नी अर्थात् चाची और सापल माता याने सौतेली माता आदि का भी श्राद्ध करना ॥ ३६॥ अय स्त्रीकर श्राद्धप्रयोग । स्त्री अपने पति अथवा पुत्र-का श्राद्ध भी इसी प्रकार से करे स्नान करके सफेद वस्त्रोपवस्त्र १ - १५ • धारण करके स्वच्छ मनसे मध्यान्हमें पचगव्यसे लिपी और जलते अंगार से शुद्ध देवतमृत्तिका से आच्छादित भूमि में श्राद्ध सामग्री रखके रक्षादीप बारके पीली सरसों छोड़ कर श्राद्ध करने की जगह पूरब बैठ कर आचमन करै ॥ १॥ पाक बनाने शुक्लव स्त्रयुगधारिणी मध्याह्ने सुसमावृतं पंचगव्योपलेपितं ज्वलदंगारशोधितं गौरमृत्तिकाच्छादितं यथा प्रदेशासादितश्राद्धीयद्रव्यं ज्वलितदीपं विकीर्णतिलगौरसर्षपं श्राददेशमागत्याचम्योसने प्रामुखी उपविशेत् ॥ १ ॥ पाचिकांतरपने सिद्धमिति पाचिका पृच्छेत् अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा॥ यःस्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यंतरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनात्वितिकुशत्रयजलेन श्राद्धीयद्रव्याणि सिंचेत ॥२॥ ततः कुशत्रयतिलजलान्यादाय अद्योमुकगोत्रस्य पत्युरमुकशर्मणः सांवत्सरि कैकोद्दिष्टश्राद्धमहंकरिष्ये इति संकल्ययेत् ततः देवताभ्य इति विर्जपेत ततो दक्षिणा भिमुखः पातितवामजानुभॊटकतिलजलान्यादाय अपस० अद्योमुकगोत्र पतेऽमुकश वाले से पाक भया पूछकर अपवित्र मन्त्र से त्रिकुश लेकर जल से श्राद्धयि द्रव्य पर सिंचन करै ॥३॥ ३ कुश तिल जल लेके . मोदकरूप आसन दे।। ३॥ मन्त्र हित भोजनपात्र पर तिल छोड अर्धपात्र में पवित्र जल तिल सुगन्धं पुष्प छोडकर अर्धपात्र हाथ में करके पवित्रा निकाल कर भाजन पात्र पर उत्तराम रखके उस पर किंचित् जल देके फिर दहिने हाथ से दोनिया ढाक मन सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्ध इदमासनं ते नमः इतिपितृतीर्थनमोटकरूपमासनमुत्सृ जेत् ॥३॥ ततस्तूष्णीं भोजनपात्रे तिलान् प्रक्षिप्य अर्घपात्रे पवित्रधारणं जलप्रते पस्तिलगंधपुष्पप्रक्षेपणं च ततोऽर्घपात्रं वामहस्ते कृत्वा पवित्रामुत्तरायं भोजनपात्रो धृत्वा तदुपरि किंचिदुदकांतरं दत्वा मोटकादीन्यादाय अद्यामुकगोत्रपतेऽमुकशर्मन् सांवत्सम्कैिकोडिष्टश्राद्ध एष ते हस्ता? नम इत्यधैं पवित्रो परि दददुत्सृजेत् ॥ ४ ॥ ततोऽवशिष्टजलं पवित्रासहितमद्यपात्रमोसनवामभागे पत्येस्थानमसीति न्युजीकुर्य्यात ॥ ५॥ ततो गन्धादिदोनम मोटकतिलजलान्यादाय अद्यामुकगोत्रपतेऽअमुकशमन सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धे एतानि गन्धपुष्पधूपदीपावूलयज्ञोपवीतवासांसि ते नमः' के या दिब्या मन्त्र पढ कर सकल्प मोटकादि रेक छोडना ॥४॥ पवित्री पर आधा जल गिरराय के फिर अर्घा में पवित्री वर के श्राद्ध शेप जल सहित आसन के वाम भाग में पत्ये १ पुत्रे २ भ्राने ३ स्थानमसि इत्यादि-वाक्य कह के अर्धपात्र उलट ॥ ५ ॥ फिर आसन पर गन्धादि से पूजन करके उसके सकल्प करे और जल से आसन सहित भोजनपात्र का मण्डल करे ॥ ६ ॥१॥ ततो जलेनासनसहितं भोजनपात्र मण्डलेन वेष्टयेत्॥६॥श्राहीयान्नाग्रभाग सव्यंजनं सतिलजलं पुटकादौ कृत्वा मोटकादीन्यादाय इदमन्नमेतद् स्वामिपितृभ्यो नम इति भूस्वामिनेऽन्नंदद्यात् ॥ ७॥ ततस्तापात्रास्थितमन्नं कराभ्यामादाय पतिं ध्यायती परिवेषयेत् जलघृतव्यंजनं पुटकांतरस्थं तच्चोपनीय अन्नेमधु दत्वा मधुमधुमध्विति च जपेत् ॥ ८ ॥ तत उभाभ्यां व्यस्ताभ्यां हस्ताभ्यां भोजनपात्रमालभ्या- नममृततया चिन्तयेत् कृष्णकव्यमिदं रक्ष मंदीयमिति पठित्वा दक्षिणहस्तमुत्तोल्य दोनियां में श्राद्धान्न भाजी घृतादि सहित लेकर मोटकादि-के-मुस्वामि पितरों को दे ॥ ७ ॥, फिर वाम्नादि में रखी वस्तु दोनों हाथों से भोजन पात्र पर पतिका ध्यान करके परोसे जा घृत . तरकारी द्वेनियां वगैरह में परोसे अन्न पर मधु छोड़ें मधु ३ बार कहै ॥ ८॥ फिर दोनों हाथों से भोजनपात्र छुरे कृष्णकव्यामिदं रक्षमदायमित्यादि पदै- दहिने हस्त के अगुष्ट से' अनस १ m s जल २ घृत ३ शविष्यान्नादि देखावै अन पर तिल छोड़े अन्नदान को अन्नहीनं इत्यादि पढे ॥ ८॥ भूमिमें तिल छोड़े कुशासन पर बैठ कर नीले कण्ठवाले शिवका ध्यान कर रुचिस्तोत्रादि पहे, अशक्त हो तो नमस्तुभ्य मन्त्र पढे ।।.१० ॥ भोजनपात्र के समीप तदंगुष्टमिदमन्नं इमा आपः इदमाज्यमित्यन्नजलघृतेषु निक्षिप्य इदं हविरिति पुनरन्नेऽङ्गुष्ठं निक्षिप्य अन्नोपरि तिलान्विकीर्य मोटकादीन्यादाय अद्यामुकगोत्र पते ऽमुकशम्मन् सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद इदमन्नं सोपकरणं ते नम इत्यन्नमुत्सृजेत् ततो वाममप्युत्तोल्यान्नहीनमित्यादि पठित्वा ।। ६ ॥ ततो भूमौ तिलान् विकीर्य्य दभेषू पविश्य नीलकंठस्तुतिरुचिस्तवादीनि पठेत् अशक्तौ नमस्तुभ्यं विरूपा इति श्लोक मपि पठेत्॥१०॥ तत उच्छिष्टसन्निधावास्तृतकुशत्रयां भूमि प्रोदय सतिलजलप्रो तितं सव्यं जलघृतमन्नमादाय अनग्निदग्धा पठित्वा कुंशोपरि कुशादिना विकिरेत् ॥११॥ तत आचम्य हरिं स्मृत्वा दक्षिणामुखी पिएजस्थाने प्रादेशमात्रं परिमाय कुचा बिछाव के जल छिड़िक के १ दोनियों में अनन जलं तिल घतादि लेकर अनाग्निदग्धा पेढक कृष्ण पर छीटदे ॥ ११ ॥ - फिर आचमन करके विष्णु का स्मरण को दक्षिणमुझं होके बंदी बनाय के प्रादेशमात्र को रेखा करके कुशा फेंक दे फिर वेदी पर अंगार घुमय के कुगा विछावै पूरब मुख बैठकर देवताभ्य ३ बार पढे ॥ १३॥ दक्षिण मुख होकर । दौनिथी करयतजन्यंगुष्ठधृततन्मूलया 'दर्भपिंजुल्या तदुल्लिख्य'. दर्भपिंजुलीमुत्तरतः क्षिपेत् ॥ १२ ॥ ततस्तत्र ज्वलदंगारं भ्रामयित्वा दक्षिणस्यां क्षिपेत् ततस्तत्र छिन्नमूलकुशत्रयमास्तीर्य प्राङ्मुखी देवताभ्य इत्यादि .त्रिः पठेत् ॥ १३ ॥ ततो दक्षिणमुखी पुटके तिलजलगंधपुष्पाणि कृत्वा पाणिनो मोटकादीन्यादाय अद्यामुकगोत्रपतेऽमुकशर्मन् सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धे पिण्डस्थानेत्रावनेनिक्ष्वते नम इति कुशोपरि अवनेजनं दद्यात् ॥ १४ ॥ अद्यामुक गोत्रपतेऽमुकशर्मन सांवत्सरिककोदिष्टश्राद्धे एष ते पिंडो नम इत्यवनिक्तकुशोपरि गन्ध पुष्प तिल जल छोड़ के मोटकादि लेकर सकल्प करके वेदी पर के कुशापर देशनियाँका आधा जल गिरावै ॥ १४ ॥ फिर । में २८ IN पिण्ड दानकरै ६ आचमनकर उत्तर मूख होके श्वास बैंच कर पिण्ड पर छोडै तब फिर दोनियों का बचा आधा जल का प्रवत्य- वामान्वारब्धदक्षिपाणिना- पिंडं दद्यात ततो द्विराचम्य हरि स्मृत्वा दक्षिणामुखी तत उत्तराभिमुखी भूय श्वासं नियम्य पतिं ध्यायंती दक्षिणामुखी भवेत् ततो दत्तावशि- एजलयुतमवनेजनपात्रं मोटकादीनि चादाय अद्यामुकगोत्र पतेऽमुकंशर्मन् सांवत्सरि- कैकादिष्टश्रादपिंडेऽत्रप्रत्यवने निक्ष्व ते नम इति प्रत्यवनेजनं दद्यात् ॥१५॥ अद्या- मुझगोत्रपतेऽमुकशर्मन सांवत्सरिकैकोदिष्टश्राद्धपिण्डे एतत्तेवासो नम इति मोटका- दिना सूत्रमुत्सृजेत् ततः पिण्डे गंधादिदोनम् ततः शिवा आपःसंत्विति जलं सौमन- स्यमस्त्विति पुष्पम अक्षतं चारिष्टमस्त्विति तंडुलान्भोजनपात्रे प्रक्षिप्य मोटकोदोन्या- नेजन, दान करै ॥ १५ ॥ फिर पिण्ड पर सूत्र चढावे सूत्र दान कर पिण्ड पर गन्धादि दान करै भोजनपात्र पर जल फुल - श्राद्ध. अक्षत छोड़ अक्षय्योदक दान करै ॥१६॥ सत्य होके पिण्ड पर पूर्वाग्र बलधारा दे गोत्रन्नो वर्द्धन्ताम् इत्यादि अंजलि करके पटै दाय अद्यामुकगोत्रस्य पत्युरमुकशर्मणः सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धे दत्तैतदन्नपानादिक- मलय्यमुपतिष्ठतामित्यक्षय्योदकं दद्यात् ॥ १६॥ ततः पिंडोपरि अघोरः पितरस्त इति पूर्वानां जलधारां दद्यात्ततः कृतांजलिः गोत्रं नो वतामित्यादि पठित्वा एता सत्याः आशिषः संस्वित्याशिषः प्रार्थयेत् ॥ १७ ॥ ततः पिंण्डोपरि दक्षिणामुखी सपवित्रकुशत्रयं दक्षिणायामास्तीर्य तदुपरि दक्षिणायां जलधारां दद्यात् ततो नम्री- भूय पिंडमाघ्रायोत्स्थापयेत् ॥ १८ ॥ विडाधारकुशानुल्मुकं च वन्हीं क्षिपेत् ततोऽर्घ- पत्रिमुत्तानीकृत्य दक्षिणादानं अद्यामुकगोत्रस्य पत्युरमुकशर्मणः कृतैतत्सांवत्सरिकै- आशीष ले ॥ १७ ॥ फिर पिण्ड पर अपसव्य से दक्षिणाय जलधरा पवित्री कुशा रख के नम्र होके पिंडाघ्राण करके उठाचे ॥ १८ ॥ आधा कुशा उल्मुकग्नि में छोटे अर्धपात्र उधार के दक्षिणा रजत दान कर अभिरम्यताम वाक्यसे विसजर्न करै ।। १९॥ कोदिष्टश्राद्धप्रतिष्ठाथै रक्तिकापरिमितं रजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्राय वाह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे इति दक्षिणां दद्यात् ततोऽभिरम्यतामिति विसर्जनम् ॥१९॥ ततः प्रामुखी देवताभ्य इति त्रिः पठेत् ततो दक्षिणामुखी हस्ताभ्यां दोपं निर्वाप्य ततः हस्तौ पादौ प्रक्षाल्याचम्य प्रमादात्कुर्वतामित्यादि पठित्वा श्राद्धसंपूर्ण कामतया विष्णुं स्मरेत् ततः श्रादीयवस्तु ब्राह्मणायार्पयेत् अंभसि वा क्षिपेत् तन इष्टैः सह भोजनम् ॥ २० ॥ शेषः शास्त्रादिहतनिनित्तकेपि एकोद्दिष्ट एप एव प्रयोगः सांवत्स- रिकपदं तत्र ने दातव्यं ॥२९॥ तद्यथा आश्विनकृष्ण चतुर्दश्यां तिथावमुकगोत्राया फिर सव्य से देवताभ्य. आदि मन्त्र से विष्णुस्मरण कर रक्षादीप बुताव हाय पाव धोके आचमन करके श्राद्धायवर। ब्राह्मण को दे को वा जलमें छोड दे ब्राह्मण भोजन के बाद कुटुब सहित भोजन करै हीत स्त्रीकर्तृक श्राद्धविधिः ॥ २० ॥ शास्त्रादि से मरे हुवे का भी इसी बिघिसे एकोदिष्ट करना ॥ २१ ॥ + मातुरमुकदेव्या एकोद्दिष्टश्रादमहं करिष्ये इति संकल्पं कुर्यात् ॐ अद्यामुकगोत्रे मातरमुकदेवि एकोद्दिष्टश्राद्ध इदमासनं ते स्वधा इत्येवमोद्युत्सर्गवाक्यम ॥ इति रुद्वधरकृतश्रादविवेके सांवत्सरिकैकोदिष्टश्रादप्रयोगः समाप्तः ।। इति रुद्रधरकृतप्राद्धविवेके सांवत्सरिकैकोद्दिष्टयाद्धप्रयोगः समाप्तः ।। २०॥ बाय कायमसाद मा व द्वारा भार्गवभूषण प्रेस, काशी में मुद्रित ।
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Saat aald zala tutelat a A 214 2,2 L
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इति
सांवत्सरिकैकोद्दिष्टश्राद्धप्रयोगःभा.टी.
से समाप्त:
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