Banasthali University

Hathyog Sanhita

Vishvanath · 2009/04

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हठयोग संहिता।
पस्थली विजापीठ (जयपुर),
श्रीविश्वनाथो जयति।
भाषानुवाद सहित।
श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय
श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा दानभंडार
द्वारा
प्रकाशित
वृद्धि म........
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तारोय........
Data Emire
से
गोती नाथ पुरराहित
पुस्तकालय
श्री
GAR
44. नारायणरावं अग्निहोत्री
द्वारा
"श्रीमीरतधर्म प्रेस. "काशीमें मद्रित ।
................
Banasthal Vidyapith

। श्रीभारतधर्ममहामण्डलके सभ्यगण और मुखपत्रिका। श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशीसे एक हिन्दी भापाका और दूसरा अंग्रेजी भाषाका, इस प्रकार दो मासिकपत्र प्रकाशित होते है एवं श्रीमहामण्डलके अन्यान्य भाषाओके मुखपत्र श्रीमहामण्डलके प्रान्तीय कार्यालयोंसे प्रकाशित होते हैं, यथा:- फिरोजपुर ( पक्षाव ) के कार्यालयसे उर्दू भापाका मुखपत्र और मेरठ और कानपुरके कार्यालयोंसे हिन्दी भाषाके मुखपत्र । श्रीमहामण्डलके पांच श्रेणोके सभ्य होते हैं, यथाः-स्वाधीन नर- पति और प्रधान प्रधान धर्माचार्यगण संरक्षक होते हैं । भारत- वर्पसब प्रान्तोके बड़े बड़े ज़मींदार,सेठ,साहुकारादि सामाजिक नेतागण उस उस प्रान्तके चुनावके द्वारा प्रतिनिधि सभ्य चुने जाते हैं। प्रत्येक प्रान्तके अध्यापक ब्राह्मणगणमेसे उस उस प्रान्तीय मण्डलके द्वारा चुने जाकर ध व्यवस्थापक सभ्य बनाये जाते हैं। भारतवर्ष के सय प्रान्तोंसे पांच प्रकारके सहायक सभ्य लिये जाते हैं, विद्यासम्बन्धी कार्य करनेवाले सहायक सभ्य, धर्मकार्य करनेवाले सहायक सभ्य, महामण्डल प्रान्तीय मण्डल और शाखा समानीको धनदान करनेवाले सहायक सभ्य, विद्यादान करनेवाले विद्वान् ब्राह्मण सहायक सभ्य और धर्मप्रचार करनेवाले साधु संन्यासी सहायक सभ्य । पाँचवी श्रेणीके सभ्य साधारण सभ्य होते हैं जो हिन्दुमात्र हो सकते हैं । हिन्दु कुलकामिनीगा केवल प्रथम तीन श्रेणीकी सहायक सभ्या और साधारण सभ्या हो सकती हैं। इन सब प्रकारके सभ्यों और श्रीमहामण्डलके प्रान्तीय मण्डल, शाखा सभा और संयुक्त सभाओंको श्रीमहामण्डल- का हिन्दी अथवा अंग्रेजी भाषाका मासिकपत्र विना मूल्य दिया जाता है। नियमितरूपसे नियत वार्पिक चन्दा २) दो रुपये देने पर हिन्दू नर नारी साधारण सभ्य हो सकते हैं । साधारण सभ्योंको विना मूल्य मासिकपत्रिकाके अतिरिक्त उनके उत्तराधि- कारियाको समाजहितकारी कोपके द्वारा विशेष लाभ मिलता है। प्रधानाध्यक्ष, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधानकार्यालय, जगतगंज, बनारस सुचना। श्रीभारतवर्न महामण्डल के सञ्चालकासा यह निशान्त है कि जब तक इस समय के उपयोगो आवश्यकीय ग्रन्थात नमूह शुद्ध हिन्दोभाषामें प्रकाशित करके हिन्दीभाषाको पुष्टि न को जाय, जब तक हमारे प्राध्यत्मिक उन्नतिकारी बहुमूल्य ग्रन्थरन लमूह जो संस्कृत भाषाम है उनको विशुद्ध हिन्दोमें अनुपादित करके प्रचार न किया जाय और जा तक अाजकल देश काल पात्र उपयोगी और उपयुक्त रीतिपर धर्म प्रचार और धर्म शिक्षा उपयोगी यथा योग्य ग्रन्थ अपनी मातृभाषा हिन्दी में प्रगोत होकर प्रकाशित न हाँ तब तक हिन्दूजातिका यथार्थ रूपसे कल्याण होना असम्भव है इस कारण विशेष पुरुषार्थ के साथ श्रीभारतधर्म महामण्डलके श्राश्रयसे एक स्वतन्त्र कार्यविभाग द्वारा अनेक ग्रन्थरत प्रकाशित हो रहे हैं। उसी कार्यविभाग द्वारा यह हठयोग संहिता नामक अन्थरन प्रकाशित हुआ है। सनातनधर्मकी पुष्टि, सनातनधर्म के अधिक रूपेण पुनः प्रचार, सनातनधर्ममले साम्प्रदायिक विरोधका नाश और अन्य- धमौके आक्रमणोंसे रक्षार्थ सनातन धर्मको भित्ति दृढ़ करना आदि उद्देश्योंकी पूर्ति तभी हो सक्तो है जब सनातनधर्म के दार्शनिक ग्रन्थोंका विशुद्ध भाषानुवाद प्रकाशित हो और साथही साथ उपासना और योगशास्त्र सम्बन्धीय ग्रन्थ भाषानुवाद सहित प्रकाशित हो। सनातनधर्मम जितने प्रकारकी साधन प्रणाली है उसको पूज्यपाद महर्पियोंने चार भागमें विभक्त किया है, यथा-मन्न योग, हठयोग, लययोग और गजयोग । इन योग सिद्धान्तोंके (२) अलग अलग संहिता ग्रन्थसमृह जब श्राद्योपान्त पड़े जायगे तो साम्प्रदायिक विरोधको सम्भावना ही नहीं रहेगी इस कारण मन्त्रयोग संहिता, हठयोग सांहिता, लययोग संहिता और राजयान संहिता, इन चार संहिता अन्धामसे मन्त्रयोग संहिता पहले तो प्रकाशित हो चुकी है और हठयोग संहिता यह प्रकाशिन हो रही है, शेष संहिताएँ क्रमशः प्रकाशित होगी । इन चारों सहिता अन्योंके द्वारा सनातनधर्मके सव सम्प्रदाय हो कल्याण प्राप्त नहीं होंगे किन्तु पृथिवीके सब धर्ममार्ग भी लाभवान् हो सकेंगे। इस ग्रन्थरत्नका स्वत्वाधिकार श्री १०८ पूज्यपाद ग्रन्थकर्ताको श्रोशानुसार श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा क्षनभण्डारको अपित हुश्रा । मार्गशीर्ष शुक्ला १५ दत्तजयन्ती संवत् १९७८ विक्रमी विवेकानन्द ।

प्रात्मज्योतिपे नमः। हठयोग संहिता विषयानुक्रमणिका । की पृष्ठ १ २ ३ ४ ... ४ ४ विषय (१) मङ्गलाचरण (२) हठयोगका लक्षण (३) हठयोगके अङ्ग (४) हठयोगके अझोंके साधनका फल (५) पटकौके भेद (१) धौतिके भेद (१) अन्तर्धातिके भेद (१) वातसार धौति (२) वारिसार धौति (३) अग्निसार धौति (४) बहिष्कृत धौति (९) वहिष्कृतधौतिका अङ्ग प्रक्षालन ७ (२) दन्तधौतिके भेद (१) दन्तमूल धौति (२) जिज्ञामूल धौति (३) कर्णरन्ध्र धौति (४) कपालरन्ध्र धौति (३) हद्धौतिके भेद (१) दण्ड धौति १० (२) वमन धौति १० (३) वासो धौति १०. () मूलशोधन धौति ११ ५ ५ ६ ६ ७ ७ m & & पृष्ठ ११ १२ १२ १२ १३ १३ .. ... १४ १४ १५ १५ १५ ... विषय (२) वस्तिके भेद (१) जल वस्ति (२) शुष्क स्ति (३) नेति प्रकरण (४) लौकिकी प्रकरण । ५) त्राटक प्रकरण (६) कपालभातिके भेद (१) वातक्रम कपालभाति प्रयोग (२) व्युत्क्रम कपालभाति प्रयोग (३) शीत्क्रम कपालभाति प्रयोग (६) श्रासन प्रकरण (१) अासनके लक्षण और संख्या ... (२) प्रासनके स्थान और देशका वर्णन (३) आसनके भेद (१) सिद्धासन (२) स्वस्तिकासन (३) पद्मासन (४) बद्धपद्मासन (५) भद्रासन (६) मुक्तासन ७) वज्रासन () सिंहासन (8) गोमुखासन (१०) वीरासन (११) धनुरासन (१२) मृतासन वा शवासन (२३) गुप्तासन (१४) मत्स्यासन (१५) मत्स्येन्द्रासन (१६) गोरक्षासन (२७) पश्चिमोत्तान वा उग्रासन १० ... १६ १६ २० २० २० २१ २१ २१ ... ... ૨૨ २२ २२ ૨૨ ( ३ ) २३३ ૨૨ २४ ... ... २४ २४ २५ २५ २५ २६ २६ २६ २६ २७ ... ... विषय (१८) उत्कटासन (१६) सकटासन (२०) मयूरासन (२१) कुक्कुटासन (२२) कूर्मासन (२३) उत्तानासन (२४) मण्डकामन (२५) उत्तानमण्डूकासन (२६) वृक्षासन (२०) गरुडासन (२) वृपासन (२६) शलभासन (३०) मकरासन (३१) उष्ट्रासन (३२) भुजङ्कासन (३३) योगासन (७) मुद्रा प्रकरण (1) मुद्राका लक्षण और फल (२) मुद्राके भेद (१) महामुद्रा (२) नभामुद्रा (३) उदीयानयन्ध मुदा (४) जालन्धरवन्ध मुद्रा (५) मूलबन्ध मुद्रा (६) महावन्ध मुद्रा (७) महावेध मुद्रा (3) खेचरी मुद्रा (8) विपरीतकरणी मुद्रा (१०) योनि मुद्रा (११) चमोली मुद्रा (१२) शक्तिचालिनी मुद्रा २६ ... ... २६ ३० ३१ ३१ ३१ ... ३३ ३३ ३४ ३६ ... ३७ ४ पृष्ठ ४६ ४६ ... ४६ ... ( ४ ) विषय (१३) ताडागी मुद्रा (१४) माण्डुको मुद्रा (१५) शाम्भवी मुद्रा (२०) पञ्चधारणा मुद्रा (१) पार्थिवीधारणा मुद्रा (२) प्राम्भसीधारणा मुद्रा (३) आग्नेयीधारण मुद्रा (४) वायवीधारणा मुद्रा (५) श्राकाशीधारणा मुद्रा (२१) आश्विनी मुद्रा (२२) पाशिनी मुद्रा (२३) काकी मुद्रा (२४) मातगिन्नी मुद्रा (२५) भुजङ्गिनी मुद्रा (2) प्रत्याहार प्रकरण (१) प्रत्याहार वर्णन (२) सिद्धि वर्णन (8) प्राणायाम प्रकरण (१) प्राणायाम वर्णन (२) प्राणायामके भेद (१) सहित प्राणायाम (२) सूर्यभेदी प्राणायाम (३) उज्जायी प्राणायाम (४) शीतली प्राणायाम (५) भस्त्रिका प्राणायाम (६) भ्रामरी प्राणायाम (७) मूर्छा प्राणायाम = ) केवली प्राणायाम (१०) बाग वर्णन (११) सताधि वर्णन ४६ ५० ५१ ५.१ ५२ ५२ પૂરે ५३ :: ५४ ... ५६ ५४ ५६ ६० ६० ६३ ६५. ६६ ६७ ६७ ... ... ... ... ६६ ७३ ७४ ... -10% श्रीविश्वनाथो जयति। हठयोगसंहिता। मङ्गलाचरणे । , जो चित्खरूप ब्रह्म मन, बुद्धि और चनसे किसी प्रकार जाने नहीं जाते हैं और जिनको योगिंगण ज्योतीरूपमें दर्शन करके कृतकृत्य होते हैं, जिनकी आधिभौतिक ज्योतिसे नेत्र दर्शन करनेमें समर्थ होते हैं, जिनको आँधिदैविक ज्योतिरूप सूर्यमण्डल जगत्को प्रकाशित करता है और जिनकी आध्यात्मिक ज्योतिसे जगद्भासमान होता है, ऐसे ज्योतिर्मय परमात्माको नमस्कार है ॥१॥ मार्कण्डेय, भरद्वाज, मरीचि, पराशर, विश्वामित्र, जैमिनी और भृगु आदि पूज्य- चरण महर्षियोंको कपासे हठयोगका प्रकाश जगत्में हुआ है ।।२-३॥ जिन पूज्यवरण प्राचार्योने लौकिक क्रिया द्वारा अलौकिकशक्तिको प्राप्त मङ्गलाचरणम्। चित्तप्रज्ञावचोभिः कथमपि न हि यद्गम्यते चित्स्वरूपम् । नेत्रे द्रष्टुं क्षमेते निजविषयचयं ज्योतिरासाद्य यस्य ॥ यद्भासा सूर्यदेवः प्रतपति जगतां मङ्गलं यस्य दीप्या। विश्वं देदीप्यमानं भवति स परमः पूरुषो वन्दनीयः ।। १ ।। मार्कण्डेयो भरद्वाजो मरीचिरथ जैमिनिः । पराशरो मृगुश्चापि विश्वामित्रादयश्च ये ॥ २ ॥ एषां पूज्याङ्घ्रिपद्मानामृषीणां कृपयाऽनिशम् । हठयोगविकाशो वै जगत्पत्र विजृत्यते ॥३॥ लौकिकक्रियया. पूर्वाचार्यास्ते परमर्षयः । .

------------- हठयोगसंहिता। करनेको शिक्षादी है एवं जिन्होंने स्थूल शक्तिविशिष्ट मन्दमति साधका को भी सूक्ष्मशक्ति प्राप्त करने और तत्त्वज्ञान लाभ करके कृतकृत्य होनेके मुफौशलपूर्ण अतिसुगम सायनयुक्त हठयोगके उपाय बताकर कृत- कत्य किया है उनको वारतार नमस्कार करके हठयोगसंहिता प्रारम्भ- की जाती है॥४६॥ .:०: हठयागका लक्षण । प्राण, अपान, नाद, विन्दु, जीवात्मा और परमात्मा, इन सबके मेलसे जो बनता है उलीका नाम घट है अर्थात् स्थूलशरीरको घट कहते हैं ॥३॥ जोवदेह जलस्थित कच्चे घड़ेको नाई सदा जोर्णता- को प्राप्त हुआ करता है, योगरूप अग्निसे उस घटको पकाकर उत्लकी शुद्धि करनी चाहिये ॥२॥ प्रथम हठ योगके द्वारा जीर्यमाण इस स्थलदेहको दृढ़ करते हुए पुनः सूक्ष्मशरीरको योगयुक्त करना चाहिये ॥ ३॥ स्थूलशरीर सूक्ष्मशरोरका दूसरा परिणाम दिव्यशक्त्त्य तये युक्तिं निर्दिशन्ति स्म शोभनाम् ॥ ४ ॥ सुकौशलभरःस्तावद्धठयोगक्रियाः शुभाः। प्रदर्शिताः साधकानां सूक्ष्मतत्त्वोपलव्धये ॥ ५ ॥ तत्त्वज्ञानाय च परं मुनिभिः सूक्ष्मदाभिः । संहिता हठयोगस्य तान्नवारभ्यतेऽधुना ॥ ६ ॥ हठयोगलक्षणम् । प्राणापाननादविन्दुजीवात्मपरमात्मनान् । मेलनावटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते ।। १ ।। आमकुम्भमिवाम्भस्थं जीर्यमाणं सदा घटम् । योगानलेन संदा घटशुद्धिं समाचरेत् ॥ २ ॥ हटयोगन प्रथम जार्यमाणामिमां तनुम् । स्टयन् सूक्ष्मदेहं च कुर्यायोगयुजं पुनः ॥ ३ ॥ लः सूक्ष्मस्य देहां वे परिणामान्तरं यतः ।

हठयोगके अङ्गोंके साधनका फल । इस कारण जैसे ककारादि वर्गीके अभ्यास द्वारा शास्त्रज्ञान क्रमशः लाभ होता है: उसी प्रकार स्थूलशरीरके सोधनोंके द्वारा अन्तः- करणको योगयुक्त करनेको हठयोग कहते हैं ॥ ४-५ ॥ शोधन, दृढ़ता, स्थैर्य, धैर्य, लाघव, प्रत्यक्षत्व और निर्लिप्तता, ये सात स्थूलशरीरके साधन कहे गये हैं, इनके अभ्याससे साधक समाधि प्राप्त करता है ॥६-७ ॥ -::- हठयोगके अङ्ग। षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान और समाधि, हठयोगके ये सात ही अङ्ग हैं ॥ १ ॥ हठयोगके अङ्गोंके साधनका फल । -10/- षटकर्म द्वारा शोधन, श्रासन द्वारा दृढ़ता, मुद्रा द्वारा कादिवान् समभ्यस्य शास्त्रज्ञानं यथाक्रमम् ॥ ४॥ यथोपलभ्यते तद्वत् स्थूलदेहस्य साधनैः । योगेन मनसो योगो हठयोगः प्रकीर्तितः ॥५॥ शागेनं दृढता चैव स्थैर्य धैर्य च लाघवम् । प्रत्यक्षमपि निर्लिप्तं घटस्य सप्त साधनम् ॥ ६ ॥ एषामभ्यासतो योगी समाधिमधिगच्छति ॥ ७ ॥ हठयोगाङ्गानि । षट्कर्मासनमुद्राः प्रत्याहारश्च प्राणसंयामः । ध्यानं समाधिः सप्तवाङ्गानिस्युर्हठस्य योगस्य ॥ १ ॥ हठयोगाङ्गसाधनफ़लानि । बटुकर्मणा शोधनञ्च आसनेन भवेदम् ।

ट हठयोगसंहिता1 स्थिरता, प्रत्याहार द्वारा धीरता, प्राणायाम द्वारा लाघव,ध्यान द्वारा आत्माका माक्षात्कार और समाधि द्वारा निर्लिप्तता प्राप्त होकर मुक्ति होती है इसमें सन्देह नहीं ॥ १-२॥ . पटकों के भेद । 10 धौति, वस्ति, नेति, लौलिको, बाटक और कपालभाति, ये घट- कर्म कहासे हैं, इनका साधन करना चाहिये ॥१॥ धौतिके भेद । अन्तौति, दन्तधौति, हृद्धौति, और मूलशोधन, ये चार प्रकारकी धौतियां होता हैं, इनको करके शरोरकी निर्मलता साधन करना उचित है ॥२॥ अन्तर्धेतिके भेद । वातसार, वारिसार, वह्निसार और वहिष्कृत, शरीरको निर्मल करनेके लिये ये चार प्रकारकी अन्तर्धातियां होती हैं ॥३॥ मुद्रया स्थिरता चैव प्रत्याहारेण धीरता ॥ १ ॥ प्राणायामालाघवञ्च ध्यानात् प्रत्यक्षमात्मनः । समाधिना निर्लिप्तश्च मुक्तिरेव व संशयः ॥ २॥ षट्कर्मभेदशः। धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिलौलिकी त्राटकन्तथा । कपालभातिश्चैतानि पदकर्माणि समाचरेत् ॥१॥ धौतिभेदाः । अन्तधातिर्दन्तधौतिईद्धातिमूलशोधनम् । धौति चतुर्विधां कृत्वा घटं कुर्वन्तु निर्मलम् ॥२॥ अन्तधौतिभेदाः। वातसारं वारिसारं वहिमार बहिष्कृतम् । सदनिर्मलतार्थाय अन्ततिश्चतुर्विधा ||३||

पटकमाके भेद।
वातसार धौति ।
होठोंको कारुचञ्चुकी नाई करके धीरे धीरे वायु पानपरे और
वायुको उदरमें परिचालित करके पश्चान्मार्ग (गुदा) द्वारा उसको
शनैः शनैः रेचन कर दिया जाय । यह वातसार अतीव गोपीनय
है, इसके द्वारा शरीरका निर्मलतासाधन, सर्व प्रकारके रोगोंका
नाश और जठराग्निकी वृद्धि हुआ करती है ॥४-५ ॥
वारिसार धौति ।
मुख द्वारा कण्ठपर्यन्त जलभरकर शनैः शनैः उदरमें भरे,
उदर में जल चालित करके उदरसे अधोमार्ग द्वारा नीचे रेचन कर दे,
यही वारिसार कहाता है। यह वारिसार परम गोपनीय है, इसके
द्वारा देहकी निर्मलता होती है, सुतरां यदि यत्नपूर्वक इलका साधन
किया जाय तो देवदेह लाभ होता है, जो मनुष्य इस सर्वश्रेष्ठ
वारिसार धौतिका प्रयत्नसे सांधन करते हैं वे मलदेहको शुद्ध करके
देवताओंकी नाई सुन्दर देहको प्राप्त होते हैं ॥ ६-८ ॥
वातसारधौतिः ।
काकचञ्चुवदास्येन पिवेद्वायुं शनैः शनैः ।
चालयेदुदरं पश्चाद्वर्त्मना रेचयेच्छनैः ॥ ४ ॥
वातसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारणम् ।
सर्वरोगक्षयकरं देहानलविवर्द्धकम् ॥५॥
वारिसारधौतिः।
साकण्ठं पूरयेद्वारि वक्त्रेण च पिवेच्छनैः ।
चालयेद्गुदमार्गेण चौदरानेचयेदधः ॥ ६ ॥
वारिसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारकम् ।
साधयेद्यः प्रयत्नेन देवदेहं प्रपद्यते ॥ ७ ॥
वारिसारं पर धौति साधयेद्यः प्रयत्नतः ।
मलदेहं शोधयित्वा देवदेहं प्रपद्यते ॥८॥

६ हठयोगसंहिता। WHAVA A-...AAM. आग्नसार धौति । मेरुदण्डमें नाभिग्रंथिको एक शतवार संयुक्त किया जाय दी उसीका नाम अन्निसारधौति कहाता है। यह धौति योगि- गणको योगसिद्धि प्रदान करती है । इस धौति द्वारा उदरा- मय (उदररोग) की सबं पीडाएँ नष्ट हो जाती है और इसके साधनसे जठराग्नि बहुत ही वृद्धिको प्राप्त होती है। यह धौति परम गोपनीया है । यह सुरगणके लिये भी दुष्प्राप्य है । इस धाति द्वारा ही मनुष्यगण देवताओंके तुल्य देहको प्राप्त कर सक्ते हैं; इसमें सन्देह मात्र नहीं है ॥ ६-१० ॥ वहिस्कृत धौति । कांकीमुद्रा द्वारा वायुकों उदरमे भरकर और उस घायुको श्रद्ध प्रहर तक उदरमें रखकर पश्चात् अधोमार्ग द्वारा निकाल देनसे बहिष्कृतधौति कहांती है। यह धौति परम गोपनीया है, कभी प्रका- शित नहीं करनी चाहिये ॥११-१२॥ एपा धौतिः अग्निसारधौतिः। नाभिप्रन्थि मेरुपृष्ठे शतवारं च कारयेत् । अग्निंसारमियं धौतियोगिनां योगसिद्धिंदा ।। ९ ।। उदरामयकं हत्वा जठराग्निं विवर्द्धयत् । परा गोप्या देवानामपि दुर्लभा । केवलं धातिमात्रेण देवदेहो भवेद्धवन् ॥ १० ॥ वहिवंतांतिः। काकीमुद्रां साधयित्वा पुरयेन्ममतोदरं । धारयदईयामन्तु चालयेद्गुदवर्मना ॥ ११ ॥ एषा घीतिः परा गोप्या न प्रकाल्या कदाचन ।। १२ ।।

पटकमौके भेद वहिष्कृत धौतिका अङ्ग प्रक्षालन । नाभिमग्न जलमें खड़े होकर शक्ति नाडीको बाहर निकार कर जब तक उसका मंल पूर्णरूपेण धुल न जाय तव तफ उसको करद्वारा प्रदालनं किया जाय, पश्चात् शुद्धको हुई नाड़ी पुनः उदरमें भरली जाय । यह प्रक्षालन देवतांगणके लिये भी दुर्लभ है, यह गोपनीय है और केवल इस धौति द्वारा ही देवताके सदृश देहकी प्राप्ति होती है इसमें संन्देह नहीं। जबतक साधक एक यामार्द्ध समय तक वायुको रोक नहीं सके तबतक इस बहिष्कृत महाधौतिका साधन नहीं होता है ॥ १३-१५ ॥ दन्तधौतिके भेद । दत्तमूलधौति, जिह्वामूलधौति. कर्णरन्ध्रद्वयंधौति और कपा- लरन्ध्रधौति, ये पांच दन्तधौतिके भेदं हैं ॥ १६ ॥ दन्तमूल धौति । खांदिररस द्वारा अथवा विशुद्ध मृत्तिका द्वारा जबतक वहिष्कृताङ्गंभूतप्रक्षालनम् । नाभिमग्नजले स्थित्वा शक्तिनाडी विसर्जयेत् । कराभ्यां क्षालयेन्नाडी यावन्मलविसर्जनम् ॥ १३ ॥ तावत्प्रक्षाल्य नाडीञ्च उदरे वेशयेत् पुनः । इदं प्रक्षालनं गोप्यं देवानामपि दुर्लभम् ॥ केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद्बुवम् ॥ १४ ॥ यामार्द्ध धारणाशक्तिं यावन्न साधयेन्नरः । बहिष्कृतं महद्धौतिस्तावचैत्र न जायते ॥१५॥ दन्तधौतिभेदाः। दन्तस्य चैव जिवाया मूलं रन्धं च कर्णयोः। कपालरन्ध्र पञ्चैते दन्तधोतिर्विधीयते ॥ १६ ॥ दन्तमूलधौतिः। तादिरेण रसनाथ शुद्धया च मृदा तथा । .

हठयोगसंहिता। सल दूर न हो जाय तबतक दन्तसूल मार्जन करना उचित है ॥१७॥ योगिगणके योगसाधनमें दन्तमूलधौति प्रधान कहाती है। योगवित् साधक प्रतिदिन प्रभातमें दन्तरक्षाके अर्थ यह धौति फरे। दन्तमूल घौति आदि काय्योंके करनेपर योगियोंको बल प्राप्त होता है ॥१८॥ " जिह्वामूल धौति । अब जिहाशोधनका कारण वर्णन किया जाता है। जिलाशोधन द्वारा जिहाकी दीर्घता साधन और जरा, मरसा एवं नाना रोगादिकी शान्ति हुआ करती है ॥ १६ ॥ तर्जनी, मध्यमा और अनामिशा, इन तीनो अङ्गुलियोको एकत्र करके गलेके भ.तर प्रवेशकर जिह्वाके मल- को मार्जन किया जाय ॥.२०॥ शनैः शनैः इस प्रकारसे मार्जन करने से कफदोपका नाश हो जाता है। पुनः पुनः नवनीत द्वारा जिहा मार्जन और दोहन करे ॥ २१॥ और लोहयन्त्र द्वारा जिहाके अग्रभागको शनैः शनैः श्राकर्पण करे। प्रतिदिन प्रातः काल और सूर्य प्रस्तके माजयहन्तमूलञ्च यावन्किस्विपमाहरेत् ॥ १७ ॥ दन्तमूलं परा धौतियोगिनां योगसाधने । नित्यं कुर्यात् प्रभाते च दन्तरक्षाञ्च योगवित् । दन्तमूलधावनादिकार्येषु योगिनां बलम् ॥ १८ ॥ जिड्यामूलधौतिः । अधातः सम्प्रवक्ष्यामि जिह्वांशोधनकारणम् | जरामरणरोगादीन्नाशयेद्दीर्घलम्बिका ॥ १९ ॥ तर्जनी मध्यमाऽनामा इत्यङ्गुलित्रयं नरः । वेशयेद्गलमध्ये तु मार्जयेम्बकामलम् ॥ २० ॥ शनैः शनर्माजयित्वा कफदोपं निवारयेत् । मार्जयन्नवनीतेन दोहयेच पुनः पुनः ॥ २१ ॥ तदनं लोहयन्त्रण कर्पयित्वा शनैः शनैः । नित्यं कुर्यात्प्रयानेन रवेरुदयोऽस्तके ।

पदकमौके भेद। समय यत्नपूर्वक इस धौतिका अभ्यास करना उचित है, नित्य ऐसा करनेसे जिह्वा दीर्घताको प्राप्त हो जाती है ॥ २२ ॥ कर्णरन्ध्र पौति । तर्जनी और अनामिका इन दोनों अङ्गुलियों द्वारा कर्णरन्ध्रयु- गल मार्जन करे । प्रतिदिन ऐसा करनेसे एक नादका प्रकाश होता है ॥ २३ ॥ कपालरन्ध धौति । दक्षिण हस्तकी वृद्ध अङ्गुलि (अंगूठे ) के द्वारा कपालरन्ध्र मा- र्जन करे । इसका प्रतिदिन भोजनके अन्तमे, निद्राके अन्तमें और दिनके अन्तमें सांधन करे ॥ २४ ॥ इस अभ्याससे कफदोषोंका नाश होता है, इस कपालरन्ध्रधौतिक साधनसे नाडियों की निर्मलता और दिव्य दृष्टिकी प्राप्ति होती है । २५ ॥ हृद्धौतिके भेद । हृद्धौति तीन प्रकार की होती है; यथा-दण्डधौति, वमन धौति और वासोधौति ॥ २६ ।। एवं कृते च नित्यं सा लम्बिका दीर्घतां व्रजेत् ॥ २२॥ कर्णरन्ध्रयोधौतिः। तर्जन्यनामिकायोगान्मार्जयेत्कर्णरन्ध्रयोः । नित्यमभ्यासयोगेन नादो याति प्रकाशताम् ॥ २३ ॥ कपालरन्ध्रधौतिः। वृद्धाङ्गष्ठेन दक्षेण माजयेदालरन्ध्रकम् । निद्रान्ते भोजनान्ते च दिवान्ते च दिने दिने ।। २४ ॥ एवमभ्यासयोगेन कफदोष निवारयेत् । नाडी निर्मलतां याति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ २५॥ हृद्धौतिभेदाः। हृद्धौति त्रिविधा कुर्याद्दण्डवमनवाससा ॥ २६..।।

१०
हठयोगसंहिता।
दण्ड घौति ।
रम्भादण्ड हरिद्रादण्ड अथवा वेत्रदण्ड हृदयके वीच
बार बार प्रवेश करके धीरे धीरे निकालनेसे दण्डधौतिका साधन
होता है ॥ २७ ॥ इस दण्डधौतिके साधनसे ऊर्द्धव मार्ग द्वारा कफ,
पित्त और क्लेद आदि निकाले जातेहैं और इससे हृद्रोगकी शान्ति
होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २८ ॥
वमन धौति ।
भोजनके अन्तमें धीमान् साधक कण्ठपर्यन्त वारि पान
फरके तत्पश्चात् कुछ कालतक ऊर्द्ध व नयन रह कर वमन द्वारा
उल जलको निकाल डाले, यह वमनधौति कहाती है। प्रति-
दिन इस धौतिके अभ्याससे कफ और पित्तका नाश हो
जाता है ॥२६॥
चासो धौति ।
चार अंगुल चौडा सूक्ष्म वस्त्र धीरे धीरे ग्रास करके तत्पश्चात्
शनैः शनैः वस्त्रको वाहिर निकालनेसे वासोधौति कहाती है ॥३०॥
दण्डधौतिः ।
रम्भाहरिद्रयोर्दण्डं वेत्रदण्डं तथैव च ।
हृन्मध्ये चालयित्वा तु पुनः प्रत्याहरेच्छनैः ॥ २७ ॥
कफपित्तं तथा क्लेदं रेचयेदूववर्मना ।
दण्डधातिविधानेन हृद्रोगं नाशयेद्भुवम् ॥ २८ ॥
वमनधौतिः।
भोजनान्ते पिवेद्वारि बाकण्ठपूरितं सुधीः ।
ऊवां दृष्टिं क्षणं कृत्वा तज्जलं वायत्पुनः ॥
नित्यमभ्यासयोगेन कफपित्तं निवारयेत् ।। २९ ।।
वासोधौतिः
चतुरगुलविस्तार सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्ग्रसेत -
पुनः प्रत्याहरेदेतपोच्यते धौतिकर्मकम् ॥ ३० ॥

पटकमौके भेद। इस वासोधौतिके अभ्यासले गुल्म, घर, लोहा, कुष्ट, कफ, और पित्त रोगोंकी शात्ति होती है और दिन प्रतिदिन आरोग्य, वल और पुष्टिको प्राप्ति होती है ॥ ३१ ॥ मूलशोधन धौति । जब तक मूलशोधन नहीं किया जाता है तब तक अपान वायु की क्रूरता विद्यमान रहतो है इस कारण यत्नपूर्वक मूल- शोधन करना उचित है ॥३२॥ हरिदा मूलके दण्डसे अथ- या मध्यम अङ्गुलि द्वारा और जलसे पुनः पुनः यत्नपूर्वक गुहा स्थानको प्रक्षालन करना उचित है ॥ ३३ ॥ मूलशोधन द्वारा कोष्टकी वद्धता, ग्राम और अजीर्णता नाराको प्राप्त होती है, देहमें कान्ति और पुष्टिको वृद्धि हो जाती है और जठराग्नि वृद्धिको प्राप्त होती है ॥३॥ वस्तिके भेद । वस्तिके दो भेद हैं, यथा-जलवस्ति और शुष्कवस्ति । जलवस्ति' जलमें और शुष्कवस्ति स्थलमें सदा साधन की जाती है ॥ ३५ ॥ गुल्मबरः कफः पित्तं प्लीहा कुष्ठं च नश्यति । आरोग्यं बलपुष्टी च स्यातां तस्य दिने दिने ॥ ३१ ।। मूलशोधनधौतिः। अपान क्रूरता तावद्यावन्मूलं न शोधयेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मूलशोधनमाचरेत् ।। ३२ ।। पीतमूलस्य दण्डन मध्यमाङ्गुलिनापि वा । यत्तेन क्षालयेद्गुह्यं चारिणा च पुनः पुनः ॥ ३३ ॥ वारयेत्कोष्ठकाठिन्यमामाजीणं निवारयेत् । कारणं कान्तिपुष्ट्योश्च वन्हिमण्डलदीपनम् ॥ ३४॥ वस्तिभेदाः। जलपस्तिः शुष्कवस्तिर्वस्ति, द्विविधा स्मृता । जलवस्तिं जले कुर्याच्छु कवस्तिं सदा.क्षितौ ।। ३९ ।।

हठयोगसंहिता। ..... जल वस्ति। नाभिमग्न जलमें अवस्थित रहकर उत्कटासन द्वारा गुहादेशका श्रा- कुंबन और प्रसारण करके जलवस्तिको करे॥ ३६॥ जलवस्तिसाधन द्वारा प्रमेह, उदावर्त और क्रूरवायु, विनाशको प्राप्त हो जाता है और साधक निरोगो और कामदेवके समान होता है ।। ३७ ।। शुष्क वस्ति । पश्चिमोत्तान प्रासन द्वारा शनैः शनैः वस्तिको नोचेकी पोर चालन करके अश्विनीमुद्दा द्वारा गुह्यस्थानको श्राकुंचा और प्रसारण करे ॥ ३८ ॥ इस वस्तिके अभ्याससे कोट दीप और श्राम- वातको शान्ति होती है, और जठर-अनिको वृद्धि होतो है ॥ ३६ ॥ नेति प्रकरण । आध हाथके परिमाण मासूक्ष्म सूत्र नालिकाके वोचमें प्रवेश करके, पश्चात् उसको मुख द्वारा निर्गत करनेसे नेतिकर्म कहाता है ॥४॥ जलवस्तिः। नभिमानजले पायु न्यस्तवानुत्कटासनम् । आकुचनं प्रसारञ्च जलवस्तिं समाचरेत् ।। ३६ ॥ प्रमेहं च उदावतं ऋग्वायु निवारयेत् । भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कामदेवसमो भवेत् ॥ ३७ ।। शुष्कवस्तिः। पश्चिमोत्तानतो वस्तिं चालयित्वा शरधः । आश्विनीमुद्रया पायुं कुञ्चयच प्रसारयेत् ॥ ३८ ॥ एवमभ्यासयोगेन कोष्टदोपो न विद्यते । विवर्द्धयेज्जाठराऽग्निमामवातं विनाशयेत् ॥ ३९ ॥ नेतिप्रकरणम् । वितस्तिमात्रं सूक्ष्मसूत्रं नासानाले प्रवेशयेत् । मुग्वान्निर्गमयत्पश्च त्यांच्यते नेतिकर्म तत् ।। ४० ॥

षटकमौके भेद । नेतिकर्म के साधनले खेत्ररोमुद्राको सिद्धि होती है, कफदोषका नाश होता है और दिव्य दृष्टिको प्राप्ति होती है ॥४१॥ . लौलिकी प्रकरण । प्रवल वेगसे जठरको दोनों ओर भ्रामित करनेसे लौलिकी क्रिया- कासाधन होता है, इस क्रिया द्वारा सब प्रकारकेरोगोंकी शान्ति और पेहानलकी वृद्धि हुआ करती है। यही क्रिया और नाना क्रियायो- में सहायकारी होती है ॥४२॥ त्राटक प्रकरण । जव तक नेत्रद्वयले अश्रुपात न हो तवतक अनिमेषपूर्वक किसो सूक्ष्मपदार्थकी ओर दृष्टिपात किये रहनेका नाम विद्वान् लोग त्राटक योग कहते हैं ॥४॥ त्राटक योगके अभ्यास करनेसे शाम्भवी मुद्रा अवश्य होती है और इसके साधनसे नेत्ररोगोंकी शान्ति और दिव्यदृष्टिको प्रालि हुआ करती है ॥४४ ॥ साधनान्नेतिकार्यस्य खेचरी सिद्धिमाप्नुयात् । कफदोषा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ४१ ॥ लौलिकीप्रकरणम् । अमन्दवेगकैस्तुन्दं भ्रामयदुभपार्श्वयोः । सर्वरोगानिहन्तीह देहानलविवर्धनम् ॥ ४२ ॥ त्राटकप्रकरणम् । निमेषोन्मेषको त्यक्त्वा सूक्ष्मलक्ष्यं निरीक्षयेत् । यावद श्रुणि मुञ्चन्ति त्राटकं प्रोच्यते बुधैः ।। ४३ ॥ एवमभ्यासयोगेन शाम्भवी जायते ध्रुवम् | .. नेत्ररोगा विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥.४४ ॥ २ १४ हठयोगसंहिता। कपालभाति भेद । कपालभाति तीन प्रकारको होती है, यथा-वातक्रमकपाल- भाति, व्युत्क्रमकपालभाति और शीत्क्रमकपालभाति । कपालभाति साधनसे कफदोषको शान्ति हुआ करती है ॥ ४५ ॥ वातक्रम कपालभाति प्रयोग । इडा अर्थात् वाम नासाद्वारा वायुका पूरक करके पिङ्गला अर्थात् दक्षिण नासाद्वारा उसका रेचन किया जाय और पुनः दक्षिण नासाद्वारा वायुका पूरक करके वाम नासा द्वारा उसका रेचन करनेसे वातक्रम कपालभाति किया हुआ करती है ॥४६॥ पूरक और रेचक करते समय वेग प्रयोग नहीं करना चाहिये अर्थात् शनैः शनैः वायु ग्रहण और त्याग करना उचित है। इस क्रियाक अभ्याससे फफ दोषको शान्ति होती है ॥४७॥ व्युत्क्रमकपालभाति प्रयोग। नासाद्वय द्वारा वारिग्रहण करके मुख द्वारा निर्गत किया जाय और पुनः मुख द्वारा वारि ग्रहण करके नासिका द्वारा बहिर्गत करने से तथा पुनः पुनः ऐसा करते रहनेसे व्युत्क्रम कपालभाति क्रियाका साधन होता है । इसके द्वारा कफ दोष दूर हो जाता है ॥ ४ ॥ कपालभातिभेदाः। वातक्रमव्युत्क्रमेण शीत्क्रमेण विशेषतः। भालभाति त्रिधा कुर्यात्कफदोष निवारयेत् ॥ ४५ ॥ वातक्रमकपालभातिः। इडया पूरयेद्वायु रेचयेपिङ्गलाख्यया । पिङ्गलया पूरयित्वा-पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ।। ४६ ॥ पूरक रेचक कृत्वा वेगेन न तु चालयेत् । एवगन्यासयोगेन कफदोष निवारयेत् ॥ १७ ॥ व्युत्क्रमकपालभातिः। नामाभ्यां जलमाकृष्य पुनर्वस्त्रेण रेचयेत् । 'पागं पापं व्युत्क्रमेण श्लेष्मदोष निवारयेत् || १८ ॥

प्रासन प्रकरण।
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शीत्क्रम कपालभाति प्रयोग
मुख द्वारा शीत्कार पूर्वक वायु ग्रहण करके नासिका द्वारा
निकाल देनेसे शीत्क्रम कपालभातिका साधन होता है। इस क्रिया-
के साधनसे शरीर कामदेवके तुल्य होता है, ॥४६॥ वार्द्धक्य और
ज्वरका उदय कभी नहीं होता और कफ दोषले बचकर शरीर
नीरोग बना रहता है ॥ ५० ॥
आसन प्रकरण ।
आसनकं लक्षण और संख्या ।
जिस तरह वैठने के अभ्याससे यह शरीर योगोपयोगी होता है
और मन स्थिर होता है उसको आसन कहते हैं ॥१॥ जितनी योनिके
प्राणी हैं आसनोंकी संख्या भी उतनी ही जानना उचित है, देवादि-
देव महादेवने चौरासी लक्ष आसनोंका वर्णन किया था ॥२॥
शीत्क्रमकपालभातिः ।
शीत्कृत्य पीत्वा वक्त्रेण नासानालेविरेचयेत् ।
एवमभ्यासयोगेन कामदेवसमो भवेत् ।। ४९ ।।
भवेत्स्वच्छन्ददेहश्च कफदोष निवारयेत् ।
न जायते च वार्दूधक्यं ज्वरो नैव प्रजायते ॥ ५० ॥
अथाऽऽसनप्रकरणम्।
आसनलक्षणं संख्या च ।
अभ्यासाद्यस्य देहोऽयं योगोपयिकतां व्रजेत् ।
मनश्च स्थिरतामेति प्रोच्यते तदिहाऽऽसनम् ॥ १॥
आसनानि समस्तानि यावत्यो जीवयोनयः।
चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि तुः॥२॥

हठयोगसंहिता।
उनमेंसे चौरासी श्रासन सबसे श्रेष्ठ हैं। और उन चौरासियोमेसे
मानवलोकमें तेतीस श्रासन कल्याणको देनेवाले हैं ॥३॥
आसनके स्थान और देशका वर्णन ।
जहां सुराज्य हो, जो देश धार्मिक हो, जहां सुप्रिक्ष रहे, जिस
देशमें किसी प्रकारका उपद्रव न रहे वहां शिला अग्नि और जलसे
धनुः प्रमाण परिमित दूर पर रहकर एकान्त स्थानमें छोटीसी मठि-
का बनाकर योगीको योग साधन करना उचित है। योग साधन गृह-
में छोटा द्वार होना उचित है, वह घर छेद और विल श्रादिसे रहित
हो,वह न तो बहुत ऊंचा हो और न बहुत नीचा, गोमयसे लिपा हुआ
हो, और सब प्रकारके कीटों से रहित हो तवही वह साधन उपयोगी
होगा । उस मठके बाहर एक मण्डप, एक वेदो और एक कूप रहना
उचित है। ऐसा वृक्ष आदिले रमणीय स्थान प्राकार द्वारा वेष्टित
होनेसे वह योगाभ्यासके उपयोगी होता है और योगियोको सिद्धि
दान कर सक्ता है ॥४-६॥
तेशं मध्ये विशिष्टानि पोड़शोनं शतं कृतम् ।
आसनानि जयस्त्रिंशन्मर्त्यलोके शुभानि वै ।। ३ ॥
आसन स्थानदेशवर्णनम् ।
सुराज्ये धार्मिके देशे सुभिक्षे निरुपद्रवे ।
धनुःप्रमाणपर्यन्तं शिलाऽग्निजलवर्जिते ॥ ४ ॥
एकान्ते मठिकामध्ये स्थातव्यं हठयोगिना ॥ ५ ॥
अल्पद्वारमरन्ध्रगत विवरं नाऽत्युच्चनीचायतं
सम्यग्गोमयसान्द्रलिप्तममलं निःशेषजन्तूझितम् ।
वाझं मण्डपवेदिकूपरुचिरं प्राकारसंवेष्टितं
प्रोक्तं योगमठस्य लक्षणमिदं सिद्धहठाभ्यासिभिः ॥ ६ ॥

त्रासन मारण। MAVM इस प्रकारले मळमें स्थित रह कर सर प्रकारकी चिन्तानोको त्याग करके गुरु उपदिष्ट साधन प्रानुसारल्यास करता मुमुक्षुको उचित है ॥७॥ आसनभेद । सिद्धासन, स्वस्तिकासन, पद्मासन, पद्धपद्मासन, भद्रासन, मुक्ता- सन, वज्रासन, सिंहासन, गोमुखासन,वीरासन, धनुरासन,मृतासन, गुप्तासन, मत्स्यासन, मत्स्येन्द्रासन, गोरक्षासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्कटासन, संकटासन, मयूरासन, कुक्कुटासन, कूर्मासन, उत्तान- कूर्मासन, उत्तानमण्डूकासन, वृक्षासन, मण्डूकासन, गरुडासन, वृषासन, शलभासन, मकरासन, उष्ट्रासन, भुजङ्गासन और योगासन, ये तेतीस मर्त्यलोकमें सिद्धि देनेवाले हैं ॥ ८ ॥ ११ ॥ सिद्धासन । जितेन्द्रिय साधक जव वामगुल्फ द्वारा गुदाको दवाकर और एवंविधे मठे स्थित्वा सर्वचिन्ताविवर्जितः । गुरुपदिष्टमार्गेण योगमेवं समभ्यसेत् ॥ ७ ॥ आसनभेदो। सिद्धं च स्वस्तिकं पनं बद्धपद्मं च भद्रकम् । मुक्तं वजं च सिंह च गोमुखं वीरमेव च ॥८॥ धनुर्मू तथा गुप्त मात्स्यं मत्स्येन्द्रमेव च । गोरक्षं पश्चिमोत्तानमुत्कटं संकंटं तथा ॥९॥ मायूरं कुक्कुटं कूर्म तथा चोत्तानकूर्मकम् । उत्तानमण्डुकं वृक्षं माण्डूकं गरुडं वृषम् ॥ १० ॥ शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजंग योगमासनम् | आसनानि त्रयस्त्रिंशत्सिद्धिदानीति निश्चितम् ॥ ११ ॥ सिद्धासनम् । वशीकृतेन्द्रियग्रामो वामगुल्फेन गुह्यकम् ।

हठयोगसंहिता। तक्षिण गुल्फ द्वारा लिङ्ग मूल दवाकर मेरुदण्डको सीधा करता हुआ सुखले बैठता है उसको सिद्धासन कहते हैं, यह योग सिद्धिकर है॥ १२-१३॥ स्वस्तिकासन । जानु द्वय और ऊरु युगलके वीचमें चरण तल द्वय रखकर त्रिकोणाकार आसन वद्ध होकर सीधी रीतिपर बैठनेका नाम खस्ति- फासन कहाता है ॥ १४॥ पद्मासन । क्लेश रहित होकर बैठते हुए दक्षिण पैर वाम ऊरुके ऊपर और वाम पैर दक्षिण ऊरुके ऊपर रख कर जो सुगम आसन होता है उसको पद्मासन कहते हैं ॥ १५ ॥ बद्धपद्मासन । दक्षिण पाद वाम उरुके ऊपर और वाम पाद दक्षिण ऊरुके ऊपर स्थापन करके करद्वय द्वारा पीठसे धूमाकर चरणोंकी वृद्ध दक्षिणन च लिङ्गस्य मूलमापीड़येत्ततः ॥ १२॥ मेरुदण्डमृजकुर्वन्नास्यते यत्सुखासनम् । सिद्धासनमिति प्राक्तं योगसिद्धिकरं परम् ॥ १३ ॥ स्वस्तिकासनम् । जानूोरन्तरे कृत्वा सम्यक्पादतले उभे । ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ।। १४ ॥ पद्मासनम् । दक्षिणं चरणं वामे दक्षिणोरों च सव्यकम् । अक्वेशमासनं यद्धि पद्मासनमितीरितम् ॥ १५ ॥ चद्धपद्मासनम्। वामोरूपरि दक्षिण हि चरण संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरुपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ।

प्रासन प्रकरण
अङ्गुली धारण करके चिवुक वक्षस्थलपर स्थापन करके नासाग्रभाग
वर्शन करनेसे बद्ध पद्मासन हुआ करता है, इस आसन द्वारा नाना
प्रकारकी व्याधियोंका नाश होता है॥१६॥.
भद्रासन ।
दोनों गुल्फ वृषणके नीचे विपरीतभावसे स्थापन करके पृष्ठसे
करद्धय चलाकर दोनों चरणोंकी वृद्धाङ्गुली धारणपूर्वक जालन्धर
वन्ध करते हुए नासिकाके अग्रभागका दर्शन करनेसे 'भद्रासन हुआ
करता है। इस आसनके अभ्याससे सब प्रकारको व्याधिोकी
शान्ति हुआ करती है ॥ १७-१८॥
मुक्तासन ।
वामगुल्फपायुमूलमें रखकर उसके ऊपर दक्षिणगुल्फ स्थापित
करके मस्तक और ग्रीवा सीधमें रखते हुए शरीरको समभावमें
रखनेसे मुक्तासन हुआ करता है, यह आसन साधकगणको
सिद्धिका देनेवाला है ॥ १६ ॥
अगुष्ठी हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकये-
देतद्व्याधिविनाशनं सुखकर बद्धासनं प्रोग्यते ॥ १६ ॥
भद्रासनम् ।
गुल्फी च वृषणस्याऽधो व्युत्क्रमण समाहितः ।।
पादाङ्गुष्ठौ कराभ्यां च धृत्वा च पृष्ठदेशतः ॥ १७ ॥
जालन्धरं समासाद्य नासाग्रमवलोकयेत् ।
भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ १८ ॥
मुक्कासनम्।
पायुमूले वामगुल्फ दक्षगुल्फ तथोपरि ।
समकायशिरोग्रीवं मुक्तासनन्तु सिद्धिदम् ॥ १९ ॥

२० हठयागसंहिता। वजासन । दोनों जंघाओको वज्राकृति करके गुदाके उभय पार्श्वमें दोनों पैरोंको स्थापन करनेसे वज्रासन हुआ करता है । यह श्रासन योगि- योको सिद्धि प्रदान करनेवाला है ॥ २० ॥ सिंहासन । गुल्फद्वय वृषणके नीचे उलटी रीतिसे रखकर ऊपरकी पार निकलते हुए दोनों जानुप्रोको पृथिवो पर रखकर और जानुनों के ऊपर मुख व्यक्तरीतिपर रखके जालन्धर बन्ध करते हुए नासिका के अग्रभागको देखनेसे सिंहासन हुआ करता है। इस श्रासनके साधनसे सव प्रकारको व्याधियोंकी शान्ति हुआ करती है ॥२१-२२॥ गोमुखासन । पृथिवीके ऊपर दोनों चरणोंको स्थापन करके पीठके दोनों ओर निकालते हुए गोमुखकी नाई श्रासन करके समान होकर बैठनेसे गोमुखासन कहाता है ॥ २३ ॥ वज्रासनम्। जङ्घाभ्यां वज्रवत्कृत्वा गुदपार्श्वे पदावुभौ । वज्रासनं भवेदेतद्योगिनां सिद्धिदायकम् ॥ २० ॥ सिंहासनम् । गुल्फी च वृषणस्याऽधो व्युत्क्रमणोर्खतां गतौ । चितिमूलो भूमिसंस्थी कृत्वा च जानुनोपरि ॥ २१ ॥ व्यक्तवक्त्रो जलन्ध्रञ्च नासाग्रमवलोकयेत् । सिंहासन भवेदेतत्सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ २२ ॥ गोमुखासनम् । पादौ च भूमौ संस्थाप्य पृष्टपार्वे निवेशयेत् । स्थिरकायं समासाद्य गोमुखं गोमुखाकृतिः ।। २३ ।।

श्रासन प्रकरण।
૨૬
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वीरासन ।
एक ऊरुके पास एक पाद रखकर दूसरे पादको पोछेकी ओर
रखनेसे वीरासन कहलाता है ॥ २४ ॥
धनुरासन ।
दोनों चरणोंको पृथिवीपर दण्डवत् सीधा रखकर पीठकी
ओर से दोनों हाथ चलाकर चरण युगलको धारण करके देहको
धनुप श्राकार करनेसे उसे योगीगण धनुरासन कहते हैं ॥२५॥
मृतासन वा शवासन ।
मृत मनुष्यकी नाई पृथिवीपर शयन करनेसे मृतासन कहाता
है, इलीको नाम शवासन है । यह श्रासन श्रमको दूर करनेवाला
और चित्त विधामका हेतु कहाता है ॥ २६ ॥
गुप्तासन ।
जानुद्वयके मध्यस्थलमें चरण युगलको गुप्त भावसे स्थापन कर-
के उन चरणोपर गुहदेश रखनेसे गुप्तासन कहाता है ॥ २७ ॥
वीरासनम् ।
एकपादमथैकस्मिन्विन्यसेदुरुसन्निधौ ।
इतरं तु तथा पश्चाद्वीरासनमितीरितम् ॥ २४ ॥
धनुरासनम्।
प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपौ करौ च पृष्ठे धृतपादयुग्मौ ।
कृत्वा धनुस्तुल्यविवर्तिताङ्ग निगद्यते वै धनुरासनं तत् ।।२९॥
मृतासनम् ।.
उत्तानं शववद्भूमौ शयानं तु शवासनम् ।
शवासनं श्रमहरं चित्तविश्रान्तिकारंणम् ॥ २६ ॥
गुप्तासनम्।
जानूोरन्तरे पादौ कृत्वा पादौ च गोपयेत् ।
पादोपरि च संस्थाप्य गुदं गुप्तासन विदुः ॥ २७ ॥

२२ हठयोगसंहिता। -~- . मत्स्यासन । मुक्त पद्मासन करके कोनियों (कुहुनियों) को शिरपर लगा फर शयन करनेसे मत्स्यासन हुश्रा करती है । इस श्रासनद्वारा नाना प्रकारके रोगोंकी शान्ति हुआ करती है ॥ २८ ॥ मत्स्येंद्रासन । जठर देश पीठकी नाई ऋजुभावसे स्थापन करके यत्न पूर्वक स्थिर रहकर वामपादको नन करके दक्षिण जानुके ऊपर रखकर और उस पर दक्षिण कोहनिकोको रखकर दक्षिण हाथपर वदन रक्खे हुए भ्रूयुगलके वीचमें दर्शन करनेसे मत्स्येन्द्रासन हुआ करता है ॥ २९-३०॥ गोरक्षासन । जानुद्वय और ऊरुके वीचमें पद युगलको व्यक्तभावसे उत्तान- रूपसे स्थापन करके उत्तान करद्वय द्वारा गुल्फ युगलको समावृत किया जाय ॥ ३१ ॥ मत्स्यासनम् । मुक्तपद्मासनं कृत्वा उत्तानशयनं चरेत् । कूर्पराभ्यां शिरो वेष्ट्य मत्स्यासनमरोगकृत् ॥ २८ ॥ मत्स्येन्द्रासनम् । उदरं पश्चिमाभासं कृत्वा तिष्ठति यत्नतः । नम्राङ्गं वामपादं च दक्षजानूपरि न्यसेत् ।। २९ ।। तत्र याम्यं कूपरं च करे याम्ये च वक्त्रकम् । भ्रुवोर्मध्ये गता दृष्टिः पीठं मात्स्येन्द्रमुच्यते ॥ ३० ॥ गोरक्षासनम् । जानोरन्तरे पादावुत्तानी व्यक्तसंस्थितौ । गुल्फी चाच्छाद्य हस्ताभ्यामुत्तानाभ्यां प्रयततः ।। ३१ ॥

धालन प्रकरण। तदनन्तर कण्ठसंकोचन पूर्वक नासिका प्रभाग दर्शन करनेसे गोरक्षालनाभागारता है,यहासन योगिशेको सिद्धिदेनेवाला है॥३२॥ पश्चिमोत्तान वा उग्रासन । पदयुगलको पृथिवी पर दण्डवत् सीधे रखकर फरद्वय द्वारा यत्न पूर्वक चरणयको धारण करके जंघाओंके बीच में शिर रखते से पश्चिमोत्तान पालन कहाता है। इस आसन में वायुका उहीपन होता है इस कारण इसको उन्नासन भी कहते हैं ॥ ३३ ॥ उत्कटासन । पदाइष्टद्वयद्वारा मृत्तिकास्पर्श पूर्वक गुल्फद्वयको निरालम्बभावसे रम्बार उनपर गुडदेशको स्थापन करनेसे उत्कटासन कहलाता है॥३॥ सङ्कटासन । बामवरण और बामजानु पृथिवी पर स्थापन करके दक्षिण- पाद द्वारा वामपाद वेष्टित करके जानुद्वयके ऊपर करद्वय स्थाएन करनेले संकटासन होता है ॥ ३५ ॥ कण्ठसोचनं कृत्वा नासाग्रमवलोकयेत् । गोरक्षासनमित्याहुर्योगिनां सिद्धिकारणम् ॥ ३२॥ पश्चिमोत्तानमुग्रासनं वा। प्रसार्य पादौ भुवि दण्डरूपी संन्यस्य भालं चितियुग्ममध्ये । यत्नेन पादौ विधृतौ कराभ्या- मुत्तानपश्वासनमेतदाहुः ॥ ३३ ॥ उत्कटासनम्। अड्गुष्ठाभ्यामवंष्टभ्य धरां गुल्फी च खे गतौ । तत्रोपरि गुदं न्यस्य विज्ञेयमुत्कटासनम् ॥ १४ ॥ सङ्कटासनम् । वामपादं नितमूलं संन्यस्य धरणीतले । पाददण्डन याम्येन. वेष्टयेद्वामपादकम् । जानुयुग्म हस्तयुग्ममेतत्सङ्कटमासनम् ।। ३५ ॥

२४ हठयोगसंहिता। .. -~- मयूरासन । हथेलीले पृथिवीका श्राश्रय करके कोणी द्वयके उपर नाभिका । उभय पार्श्व स्थापनपूर्वक चरणद्वय पीछेकी ओर उठाकर दण्डवत् होकर शून्यमें अवस्थित रहनेसे मयूर प्रासन हुआ करता है । इस मयूर आसनके अभ्याससे अधिक भोजन भी पचन होजाना है, जठ- राग्निकी वृद्धि होती है, विपदोपका नाश हो सक्ता है और गुरुन ज्वर श्रादि नाना रोगोंकी शान्ति होती है ॥ ३६-३७॥ कुक्कुटासन । मुक्त पद्मासन होकर जानुद्वय और ऊरुद्वयके मध्यमें करतय. को पृथिवीपर स्थापन करके मंचस्थ हो स्थिर रहनेसे कुकुटासन हुआ करता है ॥३॥ कूर्मासन । वृपणके नीचे गुल्फद्वय विपरीत भावसे स्थापन करके मस्तक मयूरासनम् । धरामबष्टभ्य करदयेन तस्कूपरस्थापितनाभिपादयम् । उपचासने दण्डवदुस्थितः खे मायूरतत्प्रवदन्ति पीठम् ।। ३६ ।। बहुकदशनभुक्तं भस्मकुर्यादशेपं जनयति जठराग्नि जारयेत्कालकूटमू । हरति सकलरोगानाशुगुल्मज्वरादीन् भवति विगतदोपमासनं श्रीमयूरम् ॥ ३७॥ कुकुटासनम् । पद्मासनं समासाद्य जानोरन्तरे करौं । कूपराभ्यां समासीन उच्चस्थः कुक्कुटासनम् ॥१८॥ कूर्मासनम् । गुल्को च दृपणस्याऽधी व्युन्क्रमण समाहिती !

भाजन प्रका ----- ---- ग्रोवा और देहको ऋजुभावले स्थित करके श्वास्थित रहनेसे हमा- सन हुया करता है ॥ ३४॥ उत्तानकूर्मासन । कुकुटासनवन्धपूर्वक करदार द्वारा कन्धर धारण करके कर्म बत् उत्तान होकर सोनेसे उत्तानासन हुश्रा करता है ॥ ४० ॥ मण्डूकासन । पृष्ठदेशपर चरणतलद्वय लेजाकर पादयुगलको वृद्ध अङ्गुलियोको परस्पर संलग्न करके जानुदयको लामने रखनेसे मण्डूकासन हुश्रा करता है ॥ ११ ॥ उत्तानमण्डूकासन । मण्डूफ श्रासनपर समासोन होकर कोनीद्वंय द्वारा मत्तकको धारण करके मण्डक भाबसे उत्तान सोनेका नाम उत्तानमण्डक श्रासन है॥४२॥ ऋजुकायशिरोनी कूर्मासनमितीरितम् || ३९ ।। उत्तानकूर्मासनम् । कुक्कुटासनबन्धस्थं करामगं धृतकन्धरम् । शेत कूर्मवदुत्तान एतदुत्तानकूर्मकम् ॥ ४० ॥ मण्डूकासनम्। पृष्ठे पादयुगं त्वस्याऽगुप्छे द्वे तस्य संस्पृशेत् । जानुयुग्मं पुरस्कृत्य मण्डूकासनमाचरेत् ॥ ४१ ।। उत्तानमण्डूकासनम् । मण्डूकासनमध्यस्थं कूपराभ्यां धृतं शिरः । शेते भेकवदुत्तानमेतदुत्तानमण्डूकम् ॥ ४२ ॥ ३ २६ हठयोगसंहिता। वृक्षासन । दक्षिणचरण वाम उरुके मूलदेशमें स्थापन करके वृत्तवत् समा- नताके साथ पृथिवीपर अवस्थित रहनेसे वृतासन हुआ करता है ॥४३॥ गरुडासन । उरुद्वय और जवाद्वय द्वारा भूतल आक्रमण पूर्वक जानुद्वय द्वारा देहको स्थिरभावसे रखकर जानुयुगलके ऊपर करद्वय स्थापन करनेसे गरुडासन होता है ॥ ४ ॥ वृषासन । गुह्य देशवर दक्षिण गुल्फका उपरिभाग स्थापन करके उसीकी वामदिक पर चामचरण विपरीत भावसे धारण पूर्वक पृथिवी स्पर्श करनेसे वृपासन हुआ करता है ॥ ४५ ॥ शलभासन । अधोमुख होकर शयन करके वक्षस्थलपर करद्वय स्थापन वृक्षासनम्। वामोरुमूलदेशे च याम्यं पादं निधाय तु | तिष्ठन्तु वृक्षवभूमो वृक्षासनमिदं विदुः ॥ ४३ ।। गरुड़ासनम् । जङ्घोरुभ्यां धरां धृत्वा स्थिरकायो द्विजानुना | जानूपरि करद्वन्द्वं गरुडासनमुच्यते ॥ ४४ ॥ इपासनम् । याम्यगुल्के पाधुमूलं वामभागे पदेतरम् | विपरीतं स्पृशेट्टमिं वृषासनमिदं भवेत् ।। ४ ।। शलभासनम् । अध्यास्य शेते हिकरं च वक्षसा पृथ्वीमवष्टभ्य करद्वयेन ।

श्रासनप्रकरण।
२७
पूर्वक करतलद्वय द्वारा पृथित्री स्पर्श करके शुन्यमें बितस्ति प्रमाण
ऊपर पादद्वय रखनेते शलभासन हुआ करता है ॥ १६ ॥
मकरासन ।
अधोमुख होकर शयन करके पृथिवीपर वक्षस्थल स्थापन
करके पादद्वय विस्तार करते हुए करयुगल द्वारा मस्तकको धारण
करनेसे मकरासन हुआ करता है, इस आसनके अभ्याससे शरीरस्थ
तेजकी वृद्धि हुआ.करती है ॥ १७ ॥
उष्ट्रासन ।
अधोमुख होकर शयन करते हुए चरण युगलको उलटकर पीठ-
की ओर रखकर करद्धय द्वारा चरणोंको धारण करके जठरको दृढ-
रूपले सदोचित करनेसे उष्ट्रासन हुआ करता है ॥ ४ ॥
पादौ च शून्ये च वितस्ति चावं
वदन्ति पीठं शलभं मुनीन्द्राः ॥ १६ ॥
मकरासनम् ।
अधस्तु शेते हृदयं निधाय
भूमौ च पादौ च प्रसार्यमाणौ ।।
शिरश्च धृत्वा करदण्डयुग्मे
देहाग्निकारं मकरासनं स्यात् ॥ ४७ ॥
उष्ट्रासनम् ।
अधस्तु शेते पदयुग्मव्यस्त
पृष्ठे निधायाऽपि धृतं कराभ्याम् ।
आकुञ्चयजाठरचर्मगाढ-
मौष्ट्रिं च पीठं मुनयो वदन्ति ॥ ४८ ॥

२८ हठयोगसंहिता। AAAAA...... भुजङ्गासन । नाभिसे लेकर पादके वृद्धाङ्गुष्ठ पर्यन्त निम्नभाग पृथिवीपर स्थापन करते हुए करतल द्वारा पृथिवी अवलम्बन पूर्वक भुजङ्गकी नाई शिरोदेश ऊपरको उठानेसे भुजगासन हुआ करता है, इस प्रासन द्वारा शरीरस्य अनलकी दिन दिन वृद्धि और नाना रोगांकी शान्ति हुआ करती है और कुण्डलिनी शक्ति भी जागृत होतो है॥४९-५०॥ योगासन । चरणद्वय उत्तान (चित्ता) करके जानुयुगलके ऊपर स्थापन करते हुए करद्वयको उत्तान भावसे आसनपर रखकर पूरक द्वारा अनिल श्राकर्षण पूर्वक कुम्भक करते हुए नासाग्रभागको देखनेसे योगासन हुआ करता है, योगिगणके लिये यह आसन सदा उप- योगी है॥५१-५२॥ भुजगासनम् । पादादिनाभिपर्यन्तमधाभूमा भुवि न्यसेत् । कराभ्यां च धरां धृत्वा ऊर्ध्वशीर्षः फणीव हि ॥ ४९ ।। दहाऽग्निर्वर्धते नित्यं सर्वरोगविनाशनम् । जागर्ति भुजगी देवी भुजगासनसाधनात् ॥ ४० ॥ योगासनम् । उत्तानी चरणां कृत्वा संस्थाप्य जानुनोरपि । आसनोपरि संस्थाप्य उत्तानं करयुग्मकम् ।। ५१ ॥ पूरकैर्वायुमाकृष्य नासाग्रमवलोकयेत् । यांगासनं भवेदेतद्योगिनां योगसाधने ।। ५२ ॥

सुमाकरण।
२२
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सुदा प्रकरुए।
मुद्राका लक्षण और फल ।
जिन क्रियायोंके द्वारा प्राणायात प्रत्याहार धारणा ध्यान और
लमाधि इन साधन अङ्गोंकी सिद्धि में सहायता प्रात होती है, ऐसी
सुकौशलपूर्ण क्रियाको मुद्रा कहते हैं। कोई मुद्रा इनके सब अोंकी
सहायता करती है, कोई कोई इनसे विशेष अहॉकी सहायता
करती है ॥ १-३॥
मुद्राके भेद ।
महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयानवन्धमुद्रा, जालन्धरवन्धमुद्रा, मूल.
पन्धमुद्रा, महावन्धमुद्रा, महावेधमुद्रा, खेचरीमुद्रा, विपरीतकरणी-
मुद्रा, योनिमुद्रा, वज्रोलीमुद्राः शक्तिचालिनीमुद्रा, ताडागीमुद्रा,
माएकीमुद्रा, शाम्भवीमुद्रा, पञ्चधारणामुद्रा,आश्विनीमुद्रा,पाशिनी-
प्रथमुद्राप्रकरणम्।
मुद्दालक्षणं फलम।
प्राणायामातथा प्रत्याहारो धारणध्यानके।
समाधिः साधनाङ्गानामेषां सिद्धी हि या हिता ॥ १ ॥
साहाय्यमादधातीह सुकौशलभरा क्रिया ।
मुद्रा सा प्रोच्यते धारयोगिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ २॥
सहायिका भवेन्मुद्रा सर्वाङ्गानां हि काचन ।
काचिच्च तत्तदङ्गानामुपकारं करोति वै ॥ ३ ॥
मुद्राभेदाः।
महामुद्रा नभोमुद्रा उड्डीयानं जलन्धरम् । :
मूलबन्धो महाबन्धो महावेधश्च खेचरी ॥४॥
विपरीतकरी योनिर्वज्रोली शक्तिचालिनी।
ताड़ागी चैव माण्डुकी शाम्भवी पञ्चधारणा ॥ ५ ॥

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हठयोगसंहिता।
मुद्रा, काकीमुद्रा, मातङ्गीमुद्रा और भुजङ्गिनीमुद्रा, ये पचीस मुद्राएँ
फहाती हैं, इनके साधनसे योगिगणको योग-सिद्धिकी प्राप्ति हुआ
करती है ॥४-६॥
महामुद्रा।
वामगुल्फको पायुमूलमें लगाकर और दक्षिणपाद दण्डवत्
फैलाकर दोनों हाथोंसे पादाङ्गुली धारणकरके कण्ठ सङ्कोच करते
हुए भ्रूमध्य दर्शन करके पुनः स्थिरभाव धारण करके कुम्भक किये
हुए वायुको शनैः शनेः रेचन करे, वेगसे रेचन न करे, तदनन्तर
इसका विपरीत करे अर्थात् दक्षिणगुल्फको गुहा द्वारमें स्थापन
करके वाम पादप्रसारण द्वारा वैसी ही क्रिया करे, पुनः उभय पादोसे
वैसी ही क्रिया करे, तो महामुद्राका साधन हुआ करता है । इस
मुद्राके साधनसे नाना प्रकारके रोगोंकी शान्ति होती है और योग-
की सिद्धि होती है ॥ ७-१०॥
आश्विनी पाशिनी काकी मातङ्गी च भुजङ्गिनी ।
पञ्चविंशतिमुद्राः स्युः सिद्धिदा योगिनां सदा ॥ ६ ॥
महामुद्रा।
पायुमूले वामगुल्फ सम्पीड्य च यथाक्रमम् ।
दक्षपादं प्रसार्याऽथ करयोरगुली दधत् ।। ७ ॥
कण्ठसंकोचनं कृत्वा भ्रवोर्मध्यं निरीक्षयेत् ।
ततः शनैः शनैरेवं रेचयत्तं न वेगतः ॥ ८ ॥
अनुसृत्य गुरोर्वाक्यं जानुस्थापितमस्तकः ।
वामेन दक्षिणनाऽपि कृत्त्वोभाभ्यां पुनस्तथा ॥ ९॥
नांगायत्सर्वरोगांश्च महामुद्रासुसाधनात् ।
सिद्धिदा योगमार्गस्य वदन्तीति पुराविदः ॥ १० ॥

मुद्रा प्रारण।
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नभोमुद्रा।
योगी सर्वदा सर्व कार्योंमें स्थिर रह कर उद्ध्वजिह होकर
कुम्भकद्वारा वायु रोधरे तो नभोमुद्राका साधन हुन्ना करता है,
इस मुद्रा साधनले योगिगणके सब प्रकार रोगोंकी शान्ति
हुश्रा करती है ॥११॥
उड्डीयानवन्ध मुद्रा ।
उदरको पश्चिमतान युक्त करके नाभिको श्राकुश्चन करनेसे
उड्डीयानयन्धमुद्रा हुआ करती है। यह मुद्रा मृत्युरूप मातङ्गके लिये
सिंहरूप है। जितनी मुद्राएँ कही गई है उनमेंसे उट्ठीयानबन्ध श्रेष्ठ
है, इसके साधनसे विना प्रयास मुक्तिकी प्राप्ति हो सक्ती है ॥१२-१३॥
जालन्धरवन्ध मुद्रा।
कराठ देश संकोचन पूर्वक हृदयपर चित्रुफ लगानेसे ही जालन्ध-
रवन्ध मुद्रा हुन्ना करती है, इसके द्वारा और सोलह प्रकारके आधार-
नभोमुद्रा।
यत्र यत्र स्थितो योगी सर्वकार्येषु सर्वदा ।
ऊवजिहः स्थिरो
भूत्रा
धारयत्पवनं सदा।
नभोमुद्रा भवत्येषा योगिनां रोगनाशिनी ॥ ११ ॥
उड्डीयानवन्धमुद्रा।
उदरे पश्चिमं तानं नाभेरुम्वं तु कारयेत् ।
उड्डानं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः ।
रहोयानं त्वसौ वन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ १२ ।।
अन्यस्माइन्धनादेतदुड्डीयानं विशिष्यते ।
उड्डीयाने समभ्यस्ते मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत् ॥ १३ ॥
जालन्धरवन्धमुद्रा।
कण्ठसङ्कोचनं कृत्वा चिबुकं हृदये न्यसेत् ।
जालन्धरे कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम् ॥ १४ ॥

हठयोगलंहिता। वन्धों में सहायता मिलती है, यह मृत्युको भी जीत लेती है, सिद्धजा- लन्धरबन्धयोगिगणको सिद्धि प्राप्त कराता है जो पट्मासतक इसका साधन करते हैं उनको सिद्धि लाममें कुछभोसंशय नहीं रहता ॥१४-१५॥ मूलबन्ध मुद्रा। गुह्य प्रदेशने वामगुल्फ रखकर योनि आकुञ्चन पूर्वक मेरुदण्ड- में नाभिग्रन्धिको दवाकर, पुनः लिङ्गमूलपर दक्षिण गुल्फ दृढ रूपसे संबद्ध करनेसे मूलवन्धका साधन हुआ करता है; यह जरा नाश करनेवाला है। जो मनुष्य संसाररूप सागरको पार होनेकी इच्छा करता है वह अवश्य इस मुद्राका साधन करे, इसके द्वारा वायुजी सिद्धि होती है इस कारण साधकोंको उचित है कि पालसत्याग पूर्वक मौनी हो यत्नसे इस मुद्राका साधन करे ।। १६-२६॥ जालन्धरमहामुद्रा मृत्योश्च क्षयकारिणी। सिद्धो जालन्धरो बन्धो योगिनां सिद्धिदायकः । घण्मासमभ्यसयो हि स सिद्धो नाऽत्र संशयः ॥ १५ ॥ मूलवन्धमुद्रा। पाणिना वामपादस्य योनिमाकुञ्चयत्ततः । नाभिनन्धिं मेरुदण्डे सम्पीड्य यत्नतः सुधीः ॥ १६ ॥ मेर् दक्षिणगुल्फे तु दृढवन्धं समाचरेत् । जराविनाशिनी मुद्रा मूलबन्धो निगद्यते ॥ १७ ॥ संसारसागरं तर्तुमभिलष्यति यः पुमान् । प्रन्छन्नो निर्जने भूत्वा मुद्रामेतां समभ्यसेत् ॥ १८॥ अभ्यासाद्वन्धनस्याऽस्य मरुसिद्धिर्भवेद्धवम् । साधयेदात्नतस्तर्हि मौनी तु विजिताऽलसः ।। १९ ॥

मुद्रा प्रकरण। महावन्ध मुद्रा । शमगुल्फ द्वारा पायु मूल निरोध करके दक्षिण पाद द्वारा यल- युर्वक वामगुल्फको दयाकर शनैः शनैः गुह्य देश परिचालित करके आकुञ्चन करते हुए जालन्धरवन्ध द्वारा प्राण वायुको धारण करने से महाव-ध मुद्रा हुआ करती है। महावन्धमुद्रा सब मुद्राओंसे श्रेष्ठ मुद्रा कहहे जाती है और जरा मृत्यु नाश करनेवाली है एवं मनोरथ सिद्ध करनेवाली है ॥ २०-२२ ॥ महावेध मुद्रा। पुरुपके विना जैसे स्त्रीके रूप यौवन और लावण्य विफल होते हैं वैसे ही महावेधके विना मूलबन्ध और महावन्धमुद्रा निष्फल होती है। पहिले महावन्घ मुद्रा अनुष्टान पूर्वक उड्डीयान बन्ध करते हुए कुम्भक द्वारा वायु निरोध करनेसे ही महावेध मुद्रा- का साधन हुआ करता है । महावेध योगियोंको सिद्धि देनेवाली महावन्धमुद्रा। चामपादस्य गुल्फन पायुमूलं निरोधयेत् । दक्षपादन तद्गुल्फ सम्पीड्य यत्नतः सुधीः ॥ २० ॥ . शनैः सञ्चालयेत्पाणि योनिमाकुचयेच्छनैः । जालन्धरे धृतप्राणो महाबन्धो निगद्यते ॥ २१ ॥ महाबन्धः परो वन्धों जरामरणनाशकः । प्रसादादस्य बन्धस्य साधयेत्सर्ववाञ्छितम् ।। २२ ।। महावेधमुद्रा। रूपयौवनलावण्यं नारीणां पुरुषं विना । मूलबन्धमहाबन्धी महावधं विना तथा ॥ २३ ॥ महाबन्धं समासाच उड्डीनकुम्भकं चरेत् । बहावेधः समाख्यातो योगिनां सिद्धिदायकः ॥ २४ ॥ .

३४ हठयोगसंहिता। -~- है। जो साधक प्रतिदिन महावेध सहित महावन्ध और मूल- बन्धका आचरण करता है वही योगी श्रेष्ठ कहलाता है, उसको न तो मृत्यु और न जरा आक्रमण कर सक्ती है । श्रेष्ठ योगिगण यत्नपूर्वक इसका आचरण करें ॥ २३-२६॥ खचरी मुद्रा । जिहाके नीचे जो नाडी है उसको छेदन करके निरन्तर रसनाको चालित करे और नवनीत द्वारा जिहाका दोहन और लोहमय यन्त्र द्वारा आकर्पण किया करे। प्रतिदिन इस प्रकार करनेसे जिहा दीर्घताको प्राप्त होकर क्रमशः भीतरकी ओर जाकर भूद्वयके मध्यस्थलको स्पर्श करेगी। तालुके मध्यस्थ कपाल कुहर नामक गहर है, जिहाको उसी गहरमें विपरीत भावसे पहुंचाकर भ्रूयु- गलके मध्यमै अवलोकन करनेसे खेचरीमुद्रा हुआ करती है । जो मूलबन्धमहाबन्धौ महावेधसमन्वितौ । प्रत्यहं कुरुते यस्तु स योगी योगवित्तमः ।। २२ ॥ न मृत्युतो भयं तस्य न जरा तस्य विद्यते । अनुष्टेयः प्रयत्नेन वेद्योऽयं योगिपुङ्गवैः ॥ २६ ॥ खेचरीमुद्गा। जिहाऽधो नाडी संछिन्नां रसनां चालयेत्सदा । दोहयेन्नवनीतेन लौहयन्त्रेण कर्पयेत् ।। २७ ।। एवं नित्यं समभ्यासालम्बिका दीर्घतां व्रजेत् । यावद्गच्छेद्धृवोर्मध्ये तदा भवति खेचरी ॥ २८ ॥ रसनां तालमध्ये तु शनैः शनैः प्रवेशयेत् । कपालकुहरे जिहा प्रविष्टा विपरीतगा। अवोर्मध्ये गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ।। २९ ।।

मुद्री प्रकरण। ३५. मनुष्य इस खेचरी मुद्राका अभ्यास करते हैं मूर्छा, क्षुधा और तृष्णा उनको क्लेश प्रदान नहीं कर सकी, आलस्य उनके शरीरमें नहीं रह सक्ता, रोग और मृत्यु भय दूर होकर वे देवदेहतुल्य देहको प्राप्त कर लेते हैं। जो खेचरी मुद्राका साधन करते हैं न तो अग्नि उनको दग्ध कर सक्ती है, न वायु उनको शुष्क कर सका है, न जल उनके देहका गला सक्ता है और न सर्प उनको दंशन कर सक्ता है। खेचरी मुद्रासे देह अपूर्व लावण्ययुक्त हो जाता है और इसकी सिद्धिसे समाधिकी सिद्धि हुआ करतो है, कपाल और वक्त्रके सम्मिलनसे रसनामें अद्भुत रसोंकी उत्पत्ति हुआ करती है। जो इस मुद्राका साधन करते हैं उनकी रसनामें दिन दिन अद्भुत रसोंकी उत्पत्ति और उनके चित्तमें नव नव श्रानन्द भावोंका उद्भव हुश्रा करता है। उनको जिह्वामें पहिले लवणरस, पुनः क्षाररस, पुनः तिक्तरस, तदनन्तर कपायरस, पश्चात् नवनोत, घृत, क्षीर, दधि, तक्र, मधु, द्राक्षा, अमृत आदि विविथरसोंका आविर्भाव हुआ करता है। खेचरी मुद्राके साधनके लिये जिह्वाको नियमित करना प्रथम और सर्व प्रधान कार्य है, सो आवश्यक होनेपर विना छेदनके भी न च मूर्छा क्षुधा तृष्णा नैवाऽऽलस्यं प्रजायते । न च रोगो जर। मृत्युर्देवदेहः स जायते ॥ ३० ॥ नाऽग्निना दह्यते गात्रं न शोषयति मारुतः । न देह क्लेदयन्त्यापो संदशेन्न भुजङ्गमः ॥ ३१ ॥ लावण्यं जायते गात्रे समाधिश्च भवेद्भवम् । कपालवक्त्रसंयोगे रसना रसमाप्नुयात् ॥ ३२ ॥ नानारससमुद्भूतमानन्दं च दिने दिने । आदी लवणक्षारञ्च ततस्तिक्तकषायकम् ॥ ३३ ॥ नवनीतं घृतं क्षीरं दधितकमधूनि च । द्राक्षारसं च पीयूषं जायते रसनोदकम् ॥ ३४ ॥ मुद्रामिमां साधयितुं जिह्वानियमनं पुरः।

.... ३६ हठयोगसंहिता। हो सत्ता है। वह कार्य जिहा 'चलान रूप तालव्य क्रियासे भी हो लता है । वह क्रिया तन्त्रों में अतिगुप्त है, केवल योगचतुष्टयके शाता योगिराज ही उस क्रियाका उपदेश दे सक्त हैं ॥ २७-३७ ॥ विपरीतकरणी मुद्रा सूर्यनाडी नाभिमूलमें और चन्द्रनाडी तालुमूलमें विद्यमान है, सहस्रदल कमलसे जो पीयूषधारा प्रवाहित हुआ करती है सूर्य नाड़ी उसको ग्रहण कर जाती है, इस कारणसे ही जीवगण मृत्युग्रासमें पतित हुआ करते हैं, यदि कार्यमुकौशलले चन्द्रनाड़ी द्वारा वह अमृत पान किया जाय तो कदापि मृत्यु आक्रमण नहीं कर सक्ती। इस कारणसे योगसाधन द्वारा सूर्य नाडीको उद्ध्वमें और चन्द्रनाडोको अधोभागमें ले श्राना योगीकाकर्तव्य है, इस विपरीत करणी मुद्राके आचरणसे नाड़ियोंको वेसी अवस्थामें ला सक्ते हैं, मस्तकको पृथिवीपर स्थापन करके कर द्वयका अाधार करते हुए पादयुगलको प्रधानं तद्धि भवति जिह्वायाश्छेदनं विना ॥ ३५ ॥ जिव्हाचालनतालव्यक्रिययाऽपि च सिध्यति । प्रच्छन्नेयं क्रिया बोध्या तन्त्रशास्त्रेषु नित्यशः ।। ३६ ।। चतुर्विधस्य योगस्य विज्ञाता योगिपुङ्गवः । क्रियामुपदिशत्येतां योगसिद्धिकरी पराम् ॥ ३७॥ विपरीतकरणीमुद्रा। नाभिमूल वसेत्सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमाः। अमृतं असते सूर्यस्ततो मृत्युवशो नरः ।। ३८ ॥ निपुणं चन्द्रनाड्या वै पायते यदि सा सुधा । कहिचिन्न हि तम्याऽस्ति भीतिम॒त्योहि योगिनः ॥ ३९ ॥ ऊवञ्च योजयेत्सृथै चन्द्रञ्चाऽधः समानयेत् । विपरीतकरी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ४० ॥ भूगो शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मं समाहितः ।

मुद्रा प्रकरण। ३७ ऊध्व दिशा में उठाकर कुम्भक द्वारा वायु निरोध करनेले विपरीत- करणी मुद्रा हुश्रा करती है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस मुद्राका साधन किया करते हैं, जरा और मृत्यु उनके निकट पराजयको प्राप्त होते हैं और वे सर्वत्र सिद्ध नामसे प्रसिद्ध होते हैं, प्रलय काल- में भी वे योगी भयके कारण श्रवसन्नताको नहीं प्राप्त होते ॥३-४२॥ योनि मुद्रा । सिद्धासनमें उपवेशन करके कर्णद्वय वृद्ध अङ्गुष्ठद्वय द्वारा, नेत्रयुगल तर्जनीद्वय द्वारा, नासिकाद्वय मध्यमाद्वय द्वारा और मुख अनामिका द्वय द्वारा निरुद्ध करके काकी मुद्रा द्वारा प्राण वायु आकर्षण पूर्वक अपान वायुके साथ मिलाते हुए शरीरस्थ पट चक्रो- में मन लेजाकर 'हुँ' और "हंस" इन दोनों मन्नोंके जप द्वारा देवी फुलकुण्डलिनीको जगाते हुए जीवात्माले साथ मिलाकर उनको सहस्रदल फमलमें लेजाकर जवसाधक ऐसा ध्यान करे कि मैं शक्ति- मय होकर शिवके साथ मिलित हूं, परमानन्दरूप विहार कर रहा हूँ ऊद्धपादः स्थिरी भूत्वा विपरीतकरी मता ॥ ४१ ॥ मुद्रा च साधयेन्नित्यं जरां मृत्युं च नाशयेत् । स सिद्धः सर्वलोकेषु प्रलयेऽपि न मीदति ॥ ४२ ॥ योनिमुद्रा। सिद्धासनं समासाद्य कर्णाक्षिनातिकामुखम् । अङ्गुष्टतर्जनीमध्याऽनाभिकाभिश्च साधयेत् ।। ४३ ॥ काश्या प्राणं समाकृष्य अपाने योजयेत्ततः । पट्चक्राणि क्रमाझ्यात्वा हुं हंस मनुना सुधीः ॥ ४४ ॥ चैतन्यमानयेद्देवी निद्रिता या भुजङ्गिनी । जीवन सहितां शक्ति समुत्थाप्य शिरोऽम्बुजे ॥ ४५ ॥ स्वयं शक्तिमयो भूत्वा शिवन योजयेत्स्वकम् । नानासुखं बिहारं च चिन्तयेत्परमं सुखम् ॥ १६ ॥ ४ ------ -. . हठयोगसंहिता। और शिवशक्तिसंयोगरूप में ही श्रानन्दमय ब्रह्म है तभी योनि मुद्राका साधन होता है । यह मुद्रा परम गोपनीय और देवताओं- को भी दुर्लभ है, इसके साधारण साधनसे ही साधकको सिद्धि. को प्राप्ति हुआ करती है और इसके द्वारा अनायाससे समाधि लाभ हुआ करता है। जो मनुष्य योनिमुद्राका साधन करते हैं उनको ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, सुरापान, गुरुदारागमन आदि महापाप भी स्पर्श नहीं कर सक्ते, पृथिवी पर जो बडे बडे पातक और महापात- क हैं वे भी इस मुत्राके आचरणसे नष्ट हो सक्ते हैं, जिनको मुक्ति लाभ करनेकी इच्छा होती है वे ही इस मुद्राका साधन किया करते हैं॥४३-५०॥ वज्रोली मुद्रा। जो योगीयोगके अन्य नियमोंको न मानकर अपनी इच्छाके अनु. सार आचरण करनेपर भी वज्रोली क्रियाक साधनको जानते हैं वे योगिगण सिद्धि प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। इसके साधनमें दो शिवशक्तिसमायोगादेकान्तं भुवि भावयेत् । आनन्दमाननो भूत्वा अहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् ।। ४७ ।। योनिमुद्रा परा गोप्या देवानामपि दुर्लभा । मकृत्तु लाभमंमिद्धिः ममाधिस्थः स एव हि ॥ १८ ॥ ब्रह्महा भ्रुणहा चैत्र मुरापो गुरुतल्पगः । एतः पापन टिप्पेत योनिमुद्रानिबन्धनात् ।। ४९ ॥ यानि पापानि घोराणि उपपापानि यानि च । तानि सर्वाणि नश्यन्ति योनिमुद्रानिबन्धनात् । तस्मादभ्यसनं कुर्याद्यदि मुक्ति समिच्छति ॥ ५० ॥ वज्रोलीसुद्रा। स्वेच्छया वर्तमानोऽपि योगक्तिनियमविना । माली यो विजानाति स योगी सिद्धिभाजनम् ।। ५१ ।।

APAA- समय मुद्रो प्रकरण विशेष फलोंकी प्राप्ति होती है, प्रथम तो क्षीर भोजनका फल और द्वितीय नारीका वशीभूत होना । स्त्री सङ्ग करते योगक्रिया द्वारा बोर्यको पुरुप अथवा स्त्रीके यत्नपूर्वक इन्द्रिय प्राकुञ्चन द्वारा चढ़ा लेनेसे वज्रोली मुद्राका साधन हुआ करताहै। एक चांदीकी बनी हुई नाल शनैः शनैः लिङ्ग द्वारमें प्रवेश करके पुनः उस नाल- में फूंक देकर वायु संचारका अभ्यास करना उचित है । तत् पश्चात् नारीयोनिमें पतित विन्दुको श्राकपण कर लेवे अथवा अपने चलित विन्दुको. वीचमें ही रक्षा करके खींच लेवे। तब इस प्रकारसे विन्दुको रक्षा करनेसे मृत्युका जय और योगकी प्राप्ति हो जातो है क्योंकि विन्दुपातसे ही मृत्युको प्राप्ति और विन्दुके धारण- से ही जीवनकी रक्षा हुआ करती है । जो इस मुद्राके साधनसे बिन्दुको रक्षा किया करते हैं उनके देहमें सुन्दर सुगन्धि, हो जाती है और जबतक वह योगी विन्दुको धारण किये रहता है तबतक कदापि उसको मृत्युका भय नहीं होता । यह निश्चय की हुई तत्र वस्तुद्वयं वक्ष्ये दुर्लभं यस्य कस्यचित् । क्षार चकं द्वितीयं तु नारी च वशवर्तिनी ॥ १२ ॥ मेहनेन शनैः सम्यगू_कुञ्चनमभ्यसेत् । पुरुपोऽप्यथवा नारी वज्रोलीसिद्धिमाप्नुयात् ।। ५३ ॥ यत्नतः शस्तनालेन फूल्कारं वज्रकन्दरे । शनैः शनैः प्रकुर्वीत वायुसञ्चारकारणात् ।। ५४ ॥ नारीभगे पतेद्विन्दुमभ्यासे नार्चमाहरेत् । चलितं च निजं बिन्दुमूर्ध्वमाकृष्य रक्षयेत् ॥ ५५ ॥ एवं संरक्षयेद्विन्दुं मृत्युं जयति योगवित् । मरणं विन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् ॥ १६ ॥ सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात् । यावद्विन्दुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः ॥ १७ ॥ - हठयोगसंहिता। बात है कि जब मन चलायमान होता है तभी मनुष्यका वीर्य भी चलायमान होता है अर्थात् वीर्यसे मनका एक ही सम्बन्ध है और शुक्र स्थिर रहनेसे जीवन भी स्थिर रहता है इस कारण यतपूर्वक शुक्रकी रक्षा करना उचित है। . जो योगी ऋतुमती स्त्रीके रज और अपने वीर्यको इस आकर्पण कियासे खेचकर धारण कर सक्ता है वही योगको जाननेवाला है इसमें सन्देह नहीं। सहजोली और अमरोली ये दोनों क्रियाएं वज्रोलीके ही अन्तर्गत है, दग्धगो- मयसे भस्म बनाकर उसे जलके संयोगसे कार्यकारी करके पुनः वज्रोली क्रिया साधनके अर्थ मैथुन करके स्त्री पुरुष आनन्द पूर्वक श्रासनस्थित होकर उत्सव रहित हो अपने अङ्गपर उसको धारण करें। इस प्रकारको अन्तर क्रियाको सहजोली कहते हैं। योगि- गणको श्रद्धायुक्त होकर इसका आचरण करना उचित है, यह साधकोंके लिये शुभकारी और भोगयुक्त होनेपर भी मुक्तिको देने वाली है। यह साधन पुण्यवान्को, धैर्यवान्को, तत्त्वदर्शीको और चित्ताऽऽयत्तं नृणां शुक्रं शुक्राऽऽयत्तं च जीवितम् । तस्माच्छुकं मनश्चय रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥ ५८ ॥ ऋतुमत्या रजोऽप्येवं विजं बिन्दुं च रक्षयेत् । मेंद्रेणाऽऽकर्षयेदू सम्यागभ्यासयोगवित् ।। ५९ ॥ सहजोलिश्चामरोलिर्वजोल्या भेद एव ते । जले सुभस्म निक्षिप्य दग्धगोमयसम्भवम् ॥ १० ॥ वज्रोली मैथुनादू स्त्रीपुमोः स्वाङ्गलेपनम् । आसीनयोः सुखेनैव मुक्तव्यापारयोः क्षणात् ।। ६१ ॥ सहजालिरियं प्रोक्ता श्रद्धया योगिभिः सदा । अयं शुभकरो योगो भोगयुक्तोऽपि मुक्तिदः ॥ १२ ॥ अयं याग: पुण्यवतां धीराणां तत्त्वदर्शिनाम् | मुद्रा प्रकरण। ४१ मात्सर्य रहितको सिद्ध हुआ करता है और मात्सर्य युक्त पुरुषको यह कदापि फलदायी नहीं होता। शिवाम्बुनिर्गत होते समय पित्त- के कारण उत्कट और उष्ण प्रथम धाराको त्याग करके और असार अन्त धाराको भी ग्रहण न करके केवल मध्यकी शीतल और पित्ता- दिदोषवर्जित धाराका सदा सेवन करनेसे अमरोली नामक इस मुद्राकी अन्तर क्रियाका साधन हुमा करता है, कापालिक मता- नुयायी इसका ऐसा नाम दिया गया है । जो पुरुष अमर वारुणीको नासिका द्वारा ग्रहण करके प्रतिदिन पान करते हुए वज्रोली मुद्राका अभ्यास किया करते हैं तभी उस क्रियाका नाम अमरोली क्रिया कहा जाता है। इस अमरोली साधनसे प्राप्त हुई चन्द्र- सुधा पूर्व कथित भस्ममें मिलाकर यदि मस्तकपर धारण की जाय तो दिव्य दृएिको प्राप्ति हुआ करती है। जो कामिनी अभ्यास योग द्वारा पुरुषविन्दुको आकर्षण करके वज्रोली मुद्रा द्वारा अपने रजकी रक्षा कर सकती है शालमें उसीका नाम योगिनी कहा है। उस योगिनीका शरीरस्थ रज कुछ भी नष्ट नहीं होता निर्मत्सराणां सिध्येत न तु मात्सर्यशालिनाम् ।। ६३ ॥ पित्तोल्वणवात्प्रथमाऽम्बुबारां निषेव्यते शीतलमध्यधारा । विहाय निःसारतयाऽन्त्यधाराम् | कापालिके खण्डमतेऽमरोली ॥ ६४ ॥ अमरी यः पिवेन्नित्यं नस्यं कुर्वन्दिने दिने । वज्रोलीमभ्यसेत्सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥ ६५ ।। अभ्यासानिःसृतां चान्द्री विभूत्या सह मिश्रयेत् । धारयेदुतमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ १६ ॥ पुंसो ।बन्दु समाकुञ्च्य सम्यगभ्यासपाटवात् । यदि नारी रजो रक्षेद्वजोल्या साऽपि योगिनी ॥ ६७ ॥ तस्याः किञ्चिद्रजो नाशं न गच्छति न संशयः।

१२ हठयोगलंहिता। और उसके अङ्ग नाद और विन्दुको प्राति हो जाती है इसमें कोई सन्देह नहीं। वज्रोली मुद्राके लाधनके अभ्याल द्वारा जब पुरुपविन्दु और स्त्रीरज इन दोनोंकी स्थिति अपने शरीरम हो जाती है तब सब प्रकारको सिद्धियोंकी प्राप्ति हुआ करती है और अब स्त्री याकुञ्चन क्रिया द्वारा रजकी रक्षा कर सक्तो है तभी यह योगिनी भूत भविष्यत् ज्ञानवती हो जाती है और आकाश मार्गमें भ्रमण करनेकी शक्तिभी उसमें हो जाती है इसमें कोई सन्देह नहीं। बज्रोली मुद्राके अभ्यास द्वारा योगीको शरीरको पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है, इस पुण्यकारक योगमें भोगका सम्बन्ध रहनेपर भी यह मुक्तिका देनेवाला है। पुरुपका वज्रोलो अभ्यास अथवा स्त्रीका वज्रोली अभ्यास, सहजोलो क्रिया अथवा अमरोली क्रिया, ये सब इसी मुद्राके अन्तर्गत हैं, यह मुद्रा उपनिपत् और तन्त्रों में अति गुप्त है और इतनी कठिन है। चुर धाराके अवलेहनके समान है और भी अनेक क्रियाएं इसके अन्तर्गत हैं जिनका योग चतुष्टय- तस्याः शरीरे नादश्च बिन्दुतामेव गच्छति ॥ ६८ ॥ म बिन्दुस्तद्वजदचंब एकाभूय स्वदेहनौ । वजोल्यभ्यामयांगन सर्वमिद्धिं प्रयच्छतः ॥ ६९ ॥ रक्षेदाकुचनादूचं या रजः मा हि योगिनी । अतीताऽनागतज्ञानं विचरी च भवेद्धवम् ॥ ७० ॥ देहसिद्धिं च लभते वनोल्यभ्यासयोगतः । अयं पुण्यकरो योगो भोगे भुक्तेऽपि मुक्तिदः ॥ ७१ ॥ वझे लीसाधनं घुसस्तस्या वा साधनं स्त्रियाः । सहजोली चामरोली चाऽत्रैवान्तर्भवद्धि वै ।। ७२ ॥ गोपितयं क्रिया सर्वा तन्त्रपनिपत वै । अया च दुष्कग यादृक् क्षुग्धाराऽवलहनम् ॥ ७३ ॥ सम्भूताः क्रियाश्चाऽन्या वद्या या यागवित्तमः ।

मुद्रा प्रकरण।
४
३
ima
साधनज्ञाता योगी ही उपदेश दे सकते हैं। मन्त्रयोग-अन्तर्गत
लतासाधनले इसका बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध है। इस मुद्राका विज्ञान
यह है कि वैषन्यावस्था होनेपर प्रकृति पुरुपले अलग रहकर
सृष्टि प्रसार करतो है, परन्तु साम्यावस्थामें प्रकृति पुरुषमें मिल
जानेसे परमानन्द अद्वेत पदकी प्राप्ति होती है अस्तु चाहे
जैसे हो सुकौशलपूर्ण बाग साधन द्वारा ऊर्ध्वरेतस्त्व होना इसका
प्रथम लक्ष्य है, सात्विक धृतिका सम्पादन करना इसका चरम
फल है और वीर्यमें रजके लयके द्वारा मनोजयमें समर्थ होना
इसका परम पुरुषार्थ है। योगिराज गुरुको विना सहायतासे यह
मुद्रा कभी नहीं प्राप्त होती और जितेन्द्रिय और वीतराग साधक
हो इस साधनका अधिकारी होता है ॥ ५१-८१॥
योगमार्गान्विजानद्भिपढश्या भवन्ति ताः ।। ७४ ।।
इयं हि मन्त्रयोगस्य लतासाधनमित्युभ ।
सम्बन्धवत्यो विज्ञेये विज्ञान चाऽपि कथ्यते ।। ७५ ।।
वैषम्याऽवस्थया यद्वत्पृथग्भावं प्रपद्य वै ।
पुरुषात्प्रकृतिः मर्ग विदधाति निरन्तरम् ॥ ७६ ।।
सा तस्मिन्पुमने साम्यामवस्थां प्राप्य लीयते ।
ततश्च परमानन्दमदतमुपलम्यते ॥ ७७ ॥
ऊर्ध्वरतस्त्वसम्प्राप्तिः कुशलोगसाधनैः ।
लक्ष्यमस्या विनिर्दिष्ट प्रथमं परमार्षिभिः ।। ७८ ॥
साधनं मात्तिकधृतेश्चरमं फलमुच्यते ।
सङ्गत्या वायरजसर्मिनसो विजयाक्रिया ।। ७९ ॥
परमः पुरुषार्थोऽयं प्राप्युपायस्तु कथ्यते ।
योगिमुख्यगुरूणां हि साहाय्यादेव केवलम् ॥ ८० ॥
जितेन्द्रिया वातरागा अस्याः स्युरधिकारिणः ॥ ८ ॥

हठयोगसंहिता। शक्तिचालिनी मुद्रा । परम देवता कुलकुण्डलिनी शक्ति साढ़े तीन फेर लगाकर भुज- आकृति हो मूलाधारपद्ममें स्थित है। वह शक्ति जबतक निद्रिता रहती है तबतक कोटि कोटि योगक्रिया करनेसे भी जीवको शानकी प्राप्ति नहीं हो सकी और वह पशुवत् अज्ञानी ही रहता है। जिस प्रकार कुञ्चिका द्वारा द्वार समुद्घाटित हुआ करते हैं उसी प्रकार कुलकुण्ड- लिनी शक्तिके जगानेसे ब्रह्मद्वार अपने आप ही खुल जाता है और इस प्रकारसे जीवको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है । वस्त्र द्वारा नाभिदेश वेष्टन पूर्वक गोपनीय गृहमें प्रासन स्थित होकर शक्ति- चालिनी मुद्राका अभ्यास करनाउचित है; परन्तु नग्नावस्थामें रहकर खुले हुए स्थानमें कदापि यह साधन न किया जाय। वितस्ति परिमित और चारअङ्गुली विस्तृत, सुकोमल, धवल और सूक्ष्म वस्त्र द्वारा नाभिको वेष्टन करके उस वस्त्रको कटिसूत्र द्वारा सम्बद्ध किया जाय, शक्तिचालिनीमुद्रा। मूलाधारे आत्मशक्तिः कुण्डली परंदवता। शयिता भुजगाऽऽकारा माईत्रिवलयाऽविता ॥ ८ ॥ यावसा निद्रिता देहे ताबजीयः पशुर्यधा। ज्ञानं न जायते तावत्कोटियोंगावधरपि ॥ २॥ उद्घाटयेकपाटं च यथा कुञ्चि.या हठात् । कुण्डलिन्याः प्रबोधेन ब्रह्मद्वारं प्रभेदयेत् ।। ८३ ॥ नामि संवेष्ट्य रस्त्रेण न च नग्नो बहिः स्थितः । गोपनीयगृहे स्थित्वा शक्तिचालनमभ्यमंत् ।। ८४ ॥ वितस्तिप्रमितं दीर्घ विस्तारे चतुरङ्गुलम् । मृदुलं धवलं सूक्ष्म वेष्टनाम्बरलक्षणम् । एवमम्बरयोगं च कटिसूत्रण कल्पत् ।। ८५ ॥

मुद्रा प्रकरण ४५ तत् पश्चात् भस्म द्वारा समस्त शरीर लेपन पूर्वक सिद्धासन पर बैठ कर प्राण वायुको नासिका द्वारा आकर्षण करके बलपूर्वक अपान वायुके साथ संयुक्त किया जाय और जब तक वायु सुषुम्ना नाड़ी- 'के भीतर जाकर प्रकाशित न हो तबतक अश्विनी मुद्रा द्वारा शनैः शनैः गुह्य देशको श्राकुञ्चन करना उचित है। इस प्रकारसे निःश्वास रोध कर कुम्भक द्वारा वायुनिरोध करनेसे भुजङ्गा- कारा कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर ऊपरकी ओर चलने लगती है और पीछे सहस्रदल कमलमें पहुंचकर शिवसंयोगिनी हो जाती है। शक्तिचालिनी मुद्राके विना योनिमुद्रामें पूर्ण सिद्धि नहीं होती इस कारण आगे इस मुद्राका अभ्यास करके तत् पश्चात् योनिमुद्रा अभ्यास करने योग्य है। यही शक्तिचालिनी मुद्रा- का वर्णन है, श्रति यत्न पूर्वक इसको गोपन रखके प्रतिदिन इसका अभ्यास करना उचित है। यह मुद्रा बहुत ही गोपनीय है, इसके द्वारा जरा और मृत्युके हाथसे जीव वचसक्ता है इस कारण सिद्धिकी इच्छा करनेवाले योगिगण इसका अवश्य अभ्यास करें। जो भस्मना गात्रमालिप्य सिद्धासनमथाऽऽचरेत् । नासाम्यां प्राणमाकृष्य अपाने योजयेद्बलात् ।। ८७ ॥ तावदाकुञ्चयेद्गुह्यं शनैरश्विनिमुद्रया । यावद्वायुः सुषुम्नायां न प्रकाशमवाप्नुयात् ।। ८८ ॥ तदा वायुप्रबन्धेन कुम्भिका च भुजङ्गिनी । बलासस्ततो भूत्वा ऊवार्ग प्रपद्यते ॥ ९ ॥ योनिमुद्रा न सिध्येद्वै शक्तिचालनमन्तरा । आदा चालनमभ्यस्य योनिमुद्रां समभ्यसेत् ॥ ९० इति ते कथितं सौम्य कपालशक्तिचालनम् । . गोपनीयं प्रयत्नेन प्रत्यहं तत्समभ्यसेत् ॥ ९१ ।। मुद्रेयं परमा गोप्या जरामरणनाशिनी । तस्मादभ्यसनं कार्य योगिभिः सिद्धिकाक्षिभिः ॥ १२ ॥ "- ४६ हठयोगसंहिता। योगी प्रतिदिन इस मुद्राका अभ्यास करते हैं अष्ट सिद्धियां उनके करतलगत हो जाती हैं और उनले विग्रहसिद्धिकी प्राप्ति हो- कर उनके सव रोगोंकी शान्ति हो जाती है ॥२-६३ ॥ ताडागी मुद्रा । पश्चिमोत्तान आसनपर बैठकर उदरको तडागाकृति करके कुम्भक करनेसे ताडागी मुद्रा हुश्रा करती है, यह एक प्रधान मुद्रा है इसके द्वारा जरा और मृत्यु जय किया जा सक्ता है ॥ १४ ॥ माण्डुकी मुद्रा । सुख विवर मुद्रित करके उर्ध्वको और तालु विवरकी ओर. जिह्वा मूलको चलाकर जिहाद्वारा धीरे धीरे सहस्रदल कमल विनिर्गत सुधाधारा पान करनेसे माण्डकी मुद्रा हुआ करती है, इसके साधनसे शरीरमें पूर्ण वलका संचार होता है; केशपकता दूर होती है और यौवनकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ५-६६ ॥ नित्यं यः कुरुते योगी सिद्धिस्तस्य करे स्थिता । तस्य विग्रहसिद्धिः स्याद्रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ ९३ ।। ताड़ागीमुद्रा। उदरं पश्चिमोत्तानं कृत्वा चैव तड़ागवत् । ताडागी सा परा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥ ९४ ॥ माण्डूकीमुद्रा। मुखं सम्मुद्रितं कृत्वा जिहामूलं प्रचालयेत् । शनम्रसेत्तदमृतं माण्डूकी मुद्रिकां विदुः ॥ ९५ ।। हालितं पलितं नव जायते नित्ययावनम् । न केश जायते पाकी माण्डकी यः समाचात् ।। २६ ।।

'मुद्रा प्रकरण। २७ -------------- शाम्भवी मुद्रा । बृद्धयके मध्यस्थलमें दृष्टि रखकर एकान्त मनहो परमात्माके रूप- का दर्शन करनेसे शाम्भवी मुद्रा हुश्रा करती है, यह मुद्रा सर्व तन्त्रॉमें गोपनीय कही गई है। क्या वेद, क्या पुराण सव शास्त्र ही गणिका. की नाई प्रकाशित है; परन्तु शाम्भवी मुद्रा कुलकामिनीकी नाई अताव गोपनीय है । जो शाम्भवी मुद्रासे परिज्ञात हैं वे अदिनाथ तुल्य हैं, वे ही नारायण वरूप और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा स्वरूप हैं । जो साधक इस मुद्राका साधन करते हैं वे मूर्तिमान् ब्रह्मस्वरूप हैं इनमें सन्देह नहीं, यह सत्य सत्य हो है यह वाक्य श्री महादेवजीने सत्य ही कहा है ॥६-१०० ॥ पञ्च धारणा मुद्रा । शाम्भवी मुद्राका वर्णन हो चुका अब पञ्च धारणामुद्रा कही जा रही है नुनो। यह पञ्चधारणा मुद्रा सिद्ध होनेसे इस संसारमें ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जिसकी प्राप्ति नहीं होसकी। पञ्चविध धारणा. शाम्भवीमुद्रा। नेत्रान्तरं समालोक्य आत्मारामं निरीक्षयेत् । सा भवेच्छाम्भवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ।। ९७ ।। वेदशास्त्र पुगणानि सामान्यगणिका इव | इयं तु शाम्भवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ॥ ९८ ।। स एव आदिनाथश्च स च नागयणः स्वयम् । सच ब्रह्मा सृष्टिकारी यो मुद्रां वेत्ति शाम्भवीम् ॥ ९९ ॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यमुक्तं महेश्वरि । शाम्भवीं यो विजानीयात्स च ब्रह्म न चाऽन्यथा ॥ १०॥ पञ्चधारणामुद्रा। कथिता शाम्भवी मुद्रा शृणुष्व पञ्चधारणाम् । धारणां वै समासाद्य किन्न सिध्यति भूतले ।। १०१ ।।

--- हठयोगसंहिता। मुद्रा सिद्ध होनेसे मानवगण इस शरीरसे ही सुरलोक गमनागमन कर सक्ते हैं और वे मनोगतित्व और खेचरत्वको लाभ कर लेते हैं ॥ १०१-१०२॥ पार्थिवीधारणा मुद्रा। । पृथिवी तत्त्वका वर्ण हरितालकी नाई. इसका चीज लकार (ल). इसकी आकृति चतुष्कोणविशिष्ट और देवता इसके ब्रह्मा हैं । योग प्रभावसे इस पृथिवी तत्त्वको हदयके वीचमें प्रकाशित करके चितके साथ एकत्रित करके प्राण वायु आकर्षण पूर्वक पांच घड़ीतक कुम्भक योग अभ्यास करनेसे पृथिवी धारणा हुआ करती है, इसका दूसरा नाम अधोधारणा मुद्रा है, इसके अभ्याससे योगी पृथिवीको जये कर सक्ता है अर्थात् पृथिवीके यावन्मात्र पदार्थ उसके वशीभूत हो जाते हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन इस पृथिवीधारणा मुद्राका अभ्यास करता है वह साक्षात् मृत्युञ्जयके तुल्य होकर पृथिवीपर विचरण करता रहता है ॥ १०३-१०४॥ अनेन नरदेहेन स्वर्गेपु गमनाऽऽगमम् । मनोगतिर्भवत्तस्य खेचरत्वं न चाऽन्यथा ॥ १०२॥ पार्थिवीधारणामुद्रा। यत्तत्त्वं हरितालवर्णसदृशं भौमं लकाराऽन्वित वेदालं कमलासनेन सहितं कृत्वा हदि स्थायि तत् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चबटिकाश्चित्तान्चितं धारये. देवा स्तम्भकरी मदा क्षितिजयं शुदिनोधारणा ॥ १०३ ॥ पार्थिवी धारणामुद्रां यः करोति च नित्यशः । मृत्युञ्जयः शिवः सोऽपि प्रसिद्ध विचरेद्भुवि । १०४ || मुद्रा प्रकरण ४६ ~~vern. FAAVAN आम्भसी धारणामुद्रा । जलतत्वका वर्ण शश शशि और कुन्दवत् धवल, इसकी प्राकृति चन्द्रवत्, वीज वकार (व) और देवता विष्णु हैं। योगप्रवाहसे हृदयके वीचमे जलतत्वका उदय करके प्राण वायु आकर्पण द्वारा एकाग्रचित्त हो पांच घड़ीतक कुम्भक करनेसे जल धारणा अर्थात् प्राम्भसी मुद्रा हुआ करती है। इस मुद्राके अभ्याससे जलके वीच- का सब भय दूर हो जाता है और असह्यभाव भयका पुनः उदय नहीं होता। जो योगवित् साधक इस मुद्राको जान लेते हैं भीपण गम्भीर जलके बीच डूबनेपर भी उनका मृत्यु नहीं होगा। यह श्राम्भसी मुद्रा परम श्रेट है और अनीव गोपनीय है, मैं सत्य कहता हूँ कि इसके प्रकाश करनेसे सिद्धिकी हानि हुश्रा करती है ॥ १०५-१०७॥ आमेवी धारणामुद्रा। नामिस्थल अग्नितत्वका स्थान है, इसका वर्ण इन्द्रगोप कीटकी नाई, बीज रकार (र) श्राकृति त्रिकोण और देवता रुद्र है । यह तत्व तेजःपुखशाली, दिप्तिमान् और सिद्धिदायक है। योगाभ्यास बारा प्राम्भसीधारणामुद्रा। शलेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं तत्वं किलाल शुभं तत्पीयपवकारबीजमाहितं युक्तं मदा विष्णुना । प्राणं तत्र विलीय पञ्चटिकाश्चित्ताऽन्वितं धारये- देपा दुःमहतापपापहरणी स्यादाम्भसीधारणा ॥१०॥ आम्भी परमां मुद्रां यो जानाति स योगवित् । गभीरेऽपि जले घोरे मरणं तस्य नो भवेत् ॥ १०६ ॥ इयं तु धारणा मुद्रा गोपनीया प्रयत्नतः। प्रकाशासिद्धिहानिः स्यात्सत्यं वच्मि च तत्त्वत: ॥ १०७॥ आग्नेयीधारणामुद्रा। यन्नाभिस्थितमिन्द्रगोपसदृशं बीजं त्रिकोणाऽन्वितं : तत्त्वं तैजसमाप्रदीप्तमरुणं रुद्रेण यसिद्धिदम् । . ५.

yo हठयोगसंहिता। , अग्नितत्वका उदय करके एकाग्रचित हो पांच घड़ीतक कुम्भक द्वारा प्राण वायु धारण करनेसे आग्नेयी धारणा हुश्रा करती है। इसके अभ्याससे संसार भय दूर हो जाता है और अग्निसे भी साधककी मृत्यु नहीं होती । यदि साधक प्रदोतवह्निके वोचमें निपतित हो तो भी इस मुद्राके प्रभावसे जीवित रहेगा और कदापि मृत्यु उसको ग्रहण नहीं कर सकेगी ॥ १०-१०६ ॥ वायवी धारणामुद्रा । वायुतत्त्वका वर्ण मर्दित अजनको नाई और धूम्रकी नाई कृष्ण- वर्ण, वीज यकार (य) और देवता ईश्वर है । यह तत्त्व सत्वगुणमय है, योगाभ्यास द्वारा इस तत्त्वका उदय करके एकाग्रचित्त हो कुम्भक द्वारा पांच घड़ी तक प्राणवायु धारण करनेसे वायवीधारणा सिद्ध होती है । इस मुद्राके अभ्याससे वायु द्वारा साधककी मृत्यु नहीं होती और साधकको शून्य मार्गमें विचरण करनेकी शक्ति प्राप्त होती है । यह मुद्रा श्रेष्ठ कही जाती है, इसके द्वारा जरा और मृत्युभय नाश होता है। इस मुद्रामें सिद्धिप्राप्त साधक वायुसे कदापि मृत्युको प्राप्त नहीं होता और गगनमार्गमें विचरण कर सक्ता है। जो प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्ताऽन्वितं धाग्ये- देषा कालगभीरभीतिहरणी वैश्वानरी धारणा ।। १०८।। प्रदीप्ते बलिते वहीं संपतेद्याद माधकः । एतन्मुद्राप्रसादेन स जीवति न मृत्युभाक् ।। १०९।। वायवीधारणामुद्रा। यद्भिन्नाऽखनपुजसन्निभमिदं धूम्राऽवभासं परं तत्वं सत्त्वमयं यकारमहितं यत्रेश्वरो देवता। प्राणं तत्र विटीय पञ्चघटिकाचित्ताऽन्वितं धारये- देया खे गमनं करोति यमिना स्याद्वायवी धारणा ॥ ११०॥ दपं तु धारणा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी । वायुना नियते नाऽपि ख गतेश्च प्रदायिनी ।। १११॥

मुद्रो प्रकरण।
पूर
मनुष्य शठ अथवा भक्तिहीन है उसको कदापि यह बुद्रा प्रदान न की
जाय, शठ अथवा भक्तिहीनको यह मुद्रा प्रदान करनेसे अपनी
सिद्धिकी हानि होती है ॥ १९०-११२ ।।
आकाशीधारणा मुद्रा।
श्राकाशतत्त्वका वर्ण विशुद्ध सागरवारिकी नाई, वीजहकार (ह)
और देवता सदाशिव है। इस आकाशतत्त्रको अभ्यास द्वारा उदित
करके एकायचित्त हो प्राणवायुधाकर्षण पूर्वक पांचथड़ी तक कुम्भक
करनेसे आकाशीधारणाकी सिद्धि होती है। इसके साधनसे देवत्व
और मुक्तिलाम होता है, जो इस धारणाको जानते हैं वेही परमयोग
वेत्ता हैं, उनको कदापि मृत्यु ग्रास नहीं कर सकती अर्थात् वे इच्छा-
मृत्यु होकर प्रलय काल तक रह सक्ते हैं ॥११३-११४॥
आश्विनी मुद्रा।
पुनः पुनः गुह्यद्वार प्राकुश्चन और प्रसारण करनेसे आश्विनीमुद्रा
हुश्रा करती है, यह मुद्रा प्रवोधकारिणी कही जाती है। परमश्रेष्ठ
शठाय भक्तिहीनाय न देया यस्य करयचित् ।
दत्ते च सिद्धिहानिः स्यात्सत्यं वच्मि च पण्डिते । ।। ११२॥
आकाशीधारणामुद्रा।
यसिन्धौ वरशुद्धवारिसदृशं व्योमं परं भासितं
तत्त्वं देवसदाशिवेन सहितं बीजं हकाराऽन्धितम् ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्ताऽन्वितं धारये-
देषा मोक्षकणटभेदनकरी कुर्यान्नभोधारणाम् ॥ ११३ ।।
आकाशीधारणामुद्रां यो वेत्ति स च योगवित् ।
न मृत्युर्जायते तत्र प्रलयेऽपि न सीदति ॥ ११४ ॥
आश्विनीमुद्रा।
आकुञ्चयेद्गुदद्वारं भूयोभूयः प्रकाशयेत् ।
सा भवेदाश्विनी मुद्रा शक्तिबोधनकारिणी ॥ ११५ ॥

हट्योगसंहिता। ------ अाश्विनीमुद्राके प्रभावसे सर्वविध रोग शान्तिको प्राप्त होते हैं और साधक बल और पुष्टिको प्राप्त करके अकाल मृत्यु के हाथ से बच जाता ॥ ११५-११६॥ है पाशिनी मुद्रा । पादद्वय करठकी श्रोरसे पोटकी श्रीर ले जाकर दृढम्पसे बन्धन फरनेसे पाशिनी मुद्रा हुआ करती है। यह मुद्रा शक्तिप्रवांधकारिणी है। इस परम श्रेठ मुद्रा द्वारा बल और पुष्टिको प्राप्ति होती है, इस कारण सिद्धि-अभिलापी साधकगण यत्नपूर्वक इसका अभ्यास करें ॥ ११७-११८॥ काकी मुद्रा । मुख काकचञ्चुफी नाई करके धीरे धीरे वायुपान करनेसे काको- मुद्रा हुआ करता है, इसके साधनसे नाना प्रकारके रोगोंकी शान्ति होता है। यह श्रेष्ठ काकीमुद्रा सर्व-तन्त्रोंमें गोपनीय कही गई है, इसके द्वारा साधक काकवत् नीरोगी होजाता है ॥ ११६-१२० ॥ आश्विनी परमा मुद्रा सर्वरोगविनाशिनी । बलमुष्टिकरी चैव अकालमरणं हरेत् ।। ११६ ।। पाशिनीमुद्रा। कण्ठपृष्ठ क्षिपत्पादौ पाशवदृढ़बन्धनम् । सा एव पाशिनी मुद्रा शक्तिबोधनकारिणी ।। ११७ ॥ एप। हि पाशिनी मुद्रा बल पुष्टिविधायिनी । साधनीया प्रयत्नेन साध सिद्धिकादिक्षमिः ॥ १८ ॥ फाकीमुद्रा। काकचञ्चुवदास्येन पिवद्वायुं गनैः शनैः । साकी मुद्रा भवेदेवा सर्वगविनाशिनी ॥ ११९ ।। कामामुद्रा परा गोप्या सर्वतन्त्रषु गोपिता। यस्याः प्रसादमात्रेण न रोगी काकवद्भवेत् ।। १२० ॥

मुद्री प्रकरण।
५३
मातङ्गिनी मुद्रा ।
प्राकण्ठ जलमें अवस्थित रहकर प्रथममें नाइके द्वारा जल ग्रहण
करके मुख द्वारा निकाल दिया जाय, पुनः मुख द्वारा जल ग्रहण
करके नाक द्वारा वहिर्गत किया जाय, इस प्रकार वारम्वार करनेसे
मातङ्गिनी मुद्रा हुआ करती है। इस मुद्राके साधनसे जरा और
मृत्यु साधकको आक्रमण नहीं कर लक्त । निर्जन स्थानमें अवस्थित
रहकर एकाग्रचित्त हो मातगिनीमुद्राका आचरण करने योग्य है ।
इस मुद्राके साधनसे साधक मातमन्बत् वलशाली हो जाता है।
योगी चाहे किसी स्थानमें अवस्थित रहे इस मुद्राके साधनसे
उसको परम सुखकी प्राप्ति होती है इस कारण यत्न पूर्वक इसक
आचरण करना उचित है ॥१२२-१२४॥
भुजगिन्नी मुद्रा।
मुखविवर किंचित् प्रसारित करके गल द्वारा वायुपान करनेसे
भुजगिनी मुद्रा हुआ करती है; इसके साधनसे जरा और मृत्युभय
मातदिनीमुद्रा।
कण्ठघ्ने जले स्थित्वा नासाभ्यां जलमाहरेत् ।
मुखानिर्गमयेत्पश्चात्पुनर्वक्त्रेण चाऽऽहरेत् ॥ १२१ ।।
नासाभ्यां रेचयेत्यश्चात्कुदिवं पुनः पुनः ।
मातङ्गिनी परा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥ १२२ ॥ .
विरले निर्जने देशे स्थित्वा चकाग्रमानसः ।
कुर्वन्मातङ्गिनी मुद्रां मातङ्ग इव जायते ॥ २३ ॥
यत्र यत्र स्थितो योगी सुखमत्यन्तमश्नुते ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साधयेन्मुद्रिका पराम् ॥ १२४ ॥
भुजङ्गिनीमुद्रा।
वक्त्रं किञ्चित्सुप्रसार्याऽनिलं कण्ठेन यत्पिवेत् |
सा भवद्भुजगी मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥ १२५ ॥

हठयोगसंहिता।
दूर होता है। इसके साधनसे सकल रोगोंका नाश होता है और
योगसिद्धि होती है ॥ १२५-१२६ ॥
प्रत्याहार प्रकरण।
प्रत्याहार वर्णन ।
प्रय सर्वोत्तम प्रत्याहार योगका वर्णन किया जा रहा है जिसके अव-
गत होनेसे काम,क्रोध, लोभ,मोह,मद और मात्सर्य,येच रिपुविनाश-
को प्राप्त हो जाते हैं। चित्त जहां जहां चञ्चल होकर भ्रमण करता है,
प्रत्याहार क्रिया द्वारा मन वहींले लौटकर आत्माके वश हो जाता है।
जहां जहां दृष्टि जाती है वहां: वहां मन भी चला जाता है, प्रत्याहार
क्रियासे वहींसे मन लौटकर आत्माके वशीभूत हो जाता है। पुर-
स्कार हो अथवा तिरस्कार मन सवमें ही लग जाता है; परन्तु मुद्रा-
ओके साधनसे प्रत्याहारकी प्राप्ति होती है। शीत हो अथवा उपा
सर्वे रोगा विनश्यन्ति भुजामुद्रया ध्रुवम् ।
योगसिद्धिप्रदा चयं प्रोक्ता योगपरायणः ॥ १२६ ।।
अथ प्रत्याहारप्रकरणम् ।
प्रत्याहारवर्णनम्।
अथाऽतः सम्प्रवक्ष्यामि प्रत्याहारकमुत्तमम् ।
यस्य विज्ञानमात्रेण कामादिरिपुनाशनम् ॥ १ ॥
यतो यतो निश्वरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥२
यत्र यत्र गता दृष्टिर्मनस्तत्र प्रगच्छति ।
ततः प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ३ ॥
पुरस्कारं तिरस्कारं मनः सर्व वशं नयेत् ।
मुद्राणां साधनाच्चैव प्रत्याहारः प्रजायते ॥ ४ ॥

प्रत्याहार प्रकरण।
५५
,
मन उनमें लग जाता है; परन्तु प्रत्याहारके साधनसे ही मन उनमेंसे
हटकर आत्माके वशीभूत हो जाता है। सुगन्धि हो अथवा दुर्ग-
न्धि उनमें अवश्य करके मन जाता है; परन्तु प्रत्याहारके साधनसे
ही मन उनमेंसे हटकर आत्माके वशीभूत हो जाता है। मधुर हो,
अम्ल हो, तिक्त हो, कपाय हो अथवा किसी प्रकारका रस हो मन
उनमें चंचल होता है; परन्तु प्रत्याहारके साधनसे ही मन वहांसे
हटकर आत्माके वशीभूत हो जाता है। योगीका मन जब प्रत्याहार
भूमिमें ठहरनेके उपयोगी हो जाता है, उस समय मुद्रातत्त्वश गुरु
देव विभिन्न प्रकारके साधकको ख व अधिकारके अनुसार प्रत्याहार
साधनकी क्रियानोका उपदेश देते हैं। उड्डीयानवन्ध जालन्धरबन्ध
और मूलवन्ध इन तीनोंको एक साथ करनेसे योगी शीघ्र ही
प्रत्याहार भूमिको लाभ कर सकते हैं। शाम्भवी मुद्रा प्रत्याहार
प्राप्तिका साक्षात् कारण है। गुरुभक्त शिष्य अनायास ही
प्रत्याहार साधनके इन सब रहस्योको जान सकता है। केवली
शीतं वापि तथा चोष्णं यन्मनः स्पर्शयोगतः ।
तस्मात्प्रत्याहरेदेतदात्मन्यव वशं नयेत् ।। ५ ॥
सुगन्धे वाऽपि दुर्गन्धे घ्राणेषु जायते मनः ।
तस्मात्प्रत्याहरेदतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। ६ ॥
मधुराम्लकतिक्तादिरसं याति यदा मनः ।
तस्मात्प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ७ ॥
षट्कर्मासनमुद्रासाधनतः सिद्धीः समासाद्य ।
प्रत्याहारे तिष्ठति योगिवराणां मनो यदा सम्यक् ॥ ८॥
यथाऽधिकारं तानाशु प्रत्याहारक्रियां तदा ।
गुरवो योगतत्त्वज्ञा भिन्नामुपदिशन्ति वै ॥९॥
जालन्धरश्चौडीयानो मूलबन्ध इति त्रयम् ।
कुर्वाणो युगपद्योगी प्रत्याहार क्षमो भवेत् ॥ १० ॥
प्रत्याहारस्य लाभे हि शाम्भवी मुख्यकारणम् ।
गुरुभक्तो ह्यनायासं रहस्यं ज्ञातुमर्हति ॥ ११ ॥

५६ हठयोगसंहिता। प्राणायाममें जिसने सफलता लाभ किया है, जो शाम्भवीमुद्रा- सेवी है ऐसे योगीके लिये प्रत्याहारसाधन प्रति सरल हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धिसे साधन प्रतिजय पारनेकी शक्ति प्राप्त करता है, प्रत्याहारकी सिद्धि मुद्रा ही परमसहायक है और प्राणयामके द्वारा प्रत्याहारकी दृढता होती है।॥ १-१३ ॥ सिद्धिवर्णन । योगियोचो प्राप्त होनेवाली सिद्धिया चार प्रकारकी होती है.यथा- अध्यात्मसिद्धि, अधिदेवसिद्धि, अधिभूतसिद्धि और सहजसिद्धि । ये सब सिद्धियां-योपधि मन्त्र तप स्वरोदय और संयमशक्ति द्वारा प्राप्त होती हैं । सिद्धिके पूर्वोक्त चार भेद इस प्रकारसे हैं, यथा- भौतिक स्थूल पदाओंकी प्राप्ति श्राधिभौतिक कहाती है, देवी शक्तियों- की प्राप्ति अधिदेवसिद्धि कहाती है, बुद्धि सम्बन्धी सिद्धि प्राध्या- स्मिक सिद्धि कहाती है। इस सिद्धिका अधिकार बहुत उन्नत है, वेद- यो योगी शाम्भवीमधी यो वा स्यात् कवलीक्षमः । प्रत्याहारस्तयोंनूनं मुलभी नात्र संशयः ॥ १२ ॥ प्रत्याहारस्य सिद्ध्या वै प्रकृतिर्जीयते क्षणात् । तसिद्धी महकार व मुद्राः कुर्वन्ति नित्यशः । प्राणायामेन दृढ़ता प्रत्याहारस्य जायते ॥ १३ ॥ सिद्धिवर्णनम् । चतुर्विधाः सिद्धयः म्युः प्राप्या या गोगवित्तमैः । आध्यात्मिकी चाऽधिवी सहजा च'ऽधिभौतिकी ॥ १४॥ मन्त्रीपधितपोभिश्च प्राप्यन्ते सिद्धयोऽग्विलाः । स्वरोदयनाऽपि तथा मयमेनति निश्चयः ॥ १५ ॥ इत्थं चतुर्विधा भेदाः मिद्धः प्रोक्ता मनीषिभिः । भीमस्थूलपदार्थानां सिद्धिः स्वादाऽऽधिभौतिकी ॥ १६ ॥ देवशक्तिममापत्तियत्र मा चाऽऽधिदैविकी। शाकामिकी च विज्ञयाः प्रशासम्बद्धसिद्धयः ॥ १७ ॥ सम्झतश्चाऽधिकारोऽस्याः परमः :एते बुधः ।

प्रत्याहाप्रकरण । ५७ Aur-.-.-. NAGA. का प्रावि व इसी अवस्था होता है और जीवन्मुक्तकी सिद्धि सहज कहाती है। योगतत्त्ववेत्तायांने सिद्धियोंके और भी कई एक भेद किये हैं, यथा-प्रतिभा, श्रवणा, वेदना, दर्शना, श्रास्वादा और वार्ता । वेद्य वस्तुकर ज्ञान विचार द्वारा जिससे हो उसे बुद्धि कहते है; परन्तु प्रतिभा उस बुद्धिको कहते हैं कि जिसके द्वारा विना विवेचना किये भी दर्शन मात्रसे वेद्य वस्तुका ज्ञान हो जाय । सूक्ष्म, च्यवहित, अतीत, विनकृष्ट और भविष्यवस्तुका शान प्रतिभाले होता है । जिस अवस्थामें ह्रस्व दीर्घ प्लुत गुप्त श्रादि शब्दोका श्रवण योगीको विना प्रयत्नले होने लगे उस सिद्धिका नाम श्रवणा है । सकल वस्तुओंके प्रत्यक्षको वेदना कहते हैं । अनायास जव दिव्यरूपोंका दर्शन होने लगे उस अवस्थाका नाम दर्शना है। विना प्रयत्न के जव दिव्यरसाँका श्रास्वादन होने लगे उसे आस्वादा कहते हैं और जब अलौशिक गन्धोंका प्रत्यक्ष योगीको हो उसको आविभावा हि चदानां जायत यत्र निश्चितम् ॥ १८ ॥ सहजाः सिद्धयः प्रोक्ता जीवन्मुक्तस्य सिद्धयः । सिद्धर्हि वहशे भेदा विनिर्दिष्टा महर्षिभिः ॥ १९ ॥ प्रतिभा प्रथमा सिद्धिर्दितीया श्रवणा स्मृता । तृतीया वेदना चैव तुरीया चह दर्शना। आस्वादा पञ्चमी प्रोक्ता वार्ता – षष्ठिका स्मृता ॥ २० ॥ बुद्धिर्विवेचना वेद्यं बुध्यते बुद्धिरुच्यते । प्रतिभा प्रतिभा वृत्तिः प्रतिभार इति स्थितिः ।।२१।। सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे वनागते । सर्वत्र सर्वदा ज्ञानं प्रतिभानुक्रमेण तु ।। २२ ।। श्रवणा सर्वशब्दानरमप्रयत्नेन योगिनः । इस्वदीर्घप्लुतादीनां गुह्यानां श्रवणादपि ॥ २३ ॥ स्पशस्याऽधिगमो यस्तु वेदना तूपपादिता । दर्शना दिव्यरूपाणां दर्शनं चाऽप्रयत्नतः ।। २४ ।। साहिन्यरसे तस्मिन्नाऽऽस्वादो ह्यप्रयत्नतः।

हठयोगसंहिता। ...A...... । वार्ता कहते हैं, इस अवस्था में योगीको सकल ब्रह्माण्डका ज्ञान हो जाता है ॥ १४-२५ ॥ संयमके द्वारा समात्रि विषयक वुद्धिका प्रकाश होता है, संयम ही मुख्य है। संयन शक्तिकी वृद्धि द्वारा योगी जो चाहे सो कर सकता है। कहां कहां संयम करनेसे क्या पया सिद्धि प्राप्त होती है सो योगिराज श्रीगुरुदेवसे जानने योग्य है। संयम . शक्ति समाधि भूमिमें प्राप्त होती है; परन्तु अन्य शक्तियां पहलेकी भूमियोंमें भी प्राप्त हो सक्ती है, हठयोगियों में तपःशक्तिकी प्रधानता है सो प्रत्याहार भूमिमें ही प्रात हो सकती है। सिद्धियां परम सुखकर होनेपर भी सर्वथा निन्दनीय और हेय हैं । आत्मोन्नतिका इच्छुक योगी वैराग्यकी सहायतासे उनसे विमोहित न हो ऐसा ही योगानुशासन है। हठयोगकी सिद्धि में एक विशेषता यह है कि उससे सब प्रकारके रोगोंकी शान्ति होती है। योगियों को जो कुछ वार्ता च दिव्यगन्धानां तन्मात्रा बुद्धिसंविदा । विन्दन्ते योगिनस्तस्मादाब्रह्मभुवनं ध्रुवम् ॥ २२ ॥ समाधिवुद्धिः प्राकाइयं येन याति निरन्तरम् । स संयमो मुख्यतमः प्रोच्यते कृतबुद्धिभिः ॥ २६ ॥ यदृच्छाचारिताप्राप्तिः संयमस्य विवृद्धितः । कुत्र संयमतः सिद्धिः प्राप्यते का हि योगिभिः ।। २७ ॥ विज्ञयमेतद्गुरुभियोगमार्गविशारदैः । संयमः प्राप्यते धीर: समाधावत्र फेवलम् ॥ २८ ॥ शक्तयोऽन्याः प्रपद्यन्ते पूर्वभूमी मनीषिभिः । हठयोगिषु मुख्या स्यात्तपःशक्तिश्च माऽऽप्यते ॥ २९ ॥ प्रत्याहारे शुभकरा: मिद्धयो हि सुखावहाः । तथाऽपि सर्वथा हेया आत्मप्राप्तिमभाप्मुभिः ॥ ३०॥ न ताभिर्मोह आप्येत स्वात्मान्नतिनिरीक्षका: । योगाऽनुशामनं चतद्वैराग्यमहकारतः ॥ ३१ ॥ सिद्धिर्हि हठयोगस्य सर्वरागविनाशिका ।

प्राणायाम प्रकरण। .५8 और प्रष्ट रोग हो सो योगतत्त्वज्ञ महात्माओके उपदेश द्वारा शान्त हो सका है, रोगांकी शान्ति करनेमें तेतीस प्रासन, पच्चीस मुद्रा प्रकारके प्राणायाम परमं सहायक हैं। संयमक्रिया सर्वोपरि है, श्रासन मुद्रा और प्राणयामकी भिन्न भिन्न क्रियानों में भिन्न भिन्न रोग- मुक्तिकारी योगसिद्धिकर शक्तियां निहित है ॥१४-३५॥ प्राणायाम प्रकरण । प्राणायाम वर्णन। प्राण ही महाशक्ति है, प्राण ही जगत् रक्षक है, प्राणके जया करनेसे सब कुछ जय होसक्ता है। स्यूल और सूक्ष्म भेदसे प्राणके दो भेद हैं। प्राणजय करनेवाली क्रियाको प्राणायाम कहते हैं । प्राण- जयकी क्रिया त्रिभेदमें विभक्त है । मन्त्रयोगमें प्राणजयकी क्रिया गेगा वै योगिनां योगतत्वज्ञस्योपदेशतः ॥ ३२॥ उपशाम्यन्ति निखिलाश्चेति प्रोचुर्महर्षयः । आसनानि त्रयस्त्रिंशन्मुद्रा वै पञ्चविंशतिः ।। ३३ ।। प्राणायामास्तथा चाष्टो रोगशान्तिसहायकाः । मुख्यस्तु संयमः प्रोक्तो मुद्रायामामने तथा ॥ ३४ ॥ प्राणायाम विभिन्ना हि शक्तये। निहिताः शुभाः । रांगा याभिविनश्यन्ति योगसिद्धिश्च जायते ॥ ३५ ॥ अथ प्राणायामप्रकरणम् । प्राणायामवर्णनम् । प्रधानशक्तयः प्राणास्ते वै संसाररक्षकाः ।, वशीकृतेषु प्राणेपु जीयते सर्वमेव हि ॥ १ ॥ प्राणास्तु द्विविधा ज्ञेयाः स्थूलसूक्ष्मप्रभेदतः । यया जयः स्यात्प्राणानां प्राणायामः स चोच्यते ॥२॥ मन्ने स्याद्धारणा मुख्या त्रिभेदास्तु जयक्रियाः ।

an
६०
हठयोगसंहिता।
धारणा प्रधान है, हठयोगमें वायु प्रधान है और लय योग सूक्ष्म
क्रियाका साधन होता है वह मनःप्रधान है। वायुप्रधान प्राणाया-
मक्रिया सर्वहितकर है। अब प्राणायामका वर्णन किया जारहा
है, प्राणायामसाधनसे साधक देवताके समान हो जाता है। प्राणा-
याम साधन करनेके लिये चार बातोंकी आवश्यकता है। प्रथम उप-
युक्तस्थान, द्वितीय नियमित समय, तृतीय मिताहारकोअभ्यास और
चतुथ नाडीशुद्धि ॥ १-६॥
प्राणायाम भेद ।
प्राणायामके आठ भेद हैं, यथा-सहित, सूर्यभेदी, उज्जायी, शीत-
ली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और केवली ॥७॥
सहित प्राणायाम ।
सहित प्राणायाम दो प्रकारका होता है, यथा-सगर्भ और निगर्भ।
जो प्राणायाम बीजमन्त्रसहित किया जाय उसको सगर्भ और जो
बीजमन्त्ररहित हो उसे निगर्भ प्राणायाम कहते हैं। सगर्भ
हठे वायुप्रधाना वै प्रोक्ता प्राणजयक्रिया ॥ ३ ॥
मनःप्रधाना भवति साध्या सूक्ष्मक्रिया लये ।
सा च वायुप्रधाना हि सर्वश्रेयस्करी मता ॥ ४ ॥
अथाऽतः सम्प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्यं तद्विधिम् ।
यस्य माधनमात्रेण देवतुल्यो भवेन्नरः॥ ५॥
आदौ स्थान तथा कालं मिताहारं ततः परम् ।
नाड़ीशुद्धिं ततः पश्चात्प्राणायामे च साधयेत् ।। ६ ।।
प्राणायामभेदाः।
सहितः सूर्यभेदीच उज्जायी शीतली तथा ।
भस्त्रिका भ्रामरी मूर्छा केवली चाऽष्टकुम्भकाः ॥ ७॥
सहितप्राणायामः।
सहितो द्विविधः प्रोक्तः सगर्भश्च निगर्भका।
सगर्भो बीजसहितो निगर्भो बीजवर्जितः ॥ ८ ॥

भारणायाम प्रकरण। प्राणायाम जिस प्रकारसे किया जाता है वह में प्रथम कहता हूँ, पूर्व- दिशा अथवा उत्तरदिशाकी ओर मुख करके सुखदेनेवाले आसनपर बैठकर ब्रह्माका ध्यान करे, वह ब्रह्मा रक्तवर्ण "अ" कार रूपी और रजोगुणविशिष्ट हैं। तत्पश्चात् “ अं" इस वीज मन्त्रको पोडशवार जप द्वारा वाम नासिकासे वायु पूरक फरे, कुम्भक करनेके पहिले और वायु पूरण करनेके पश्चात् उड्डीयान वन्धका आचरण करना उचित है। तदनन्तर सत्त्वगुणयुक्त "उ" काररूपी सपणवर्ण हरिके ध्यानपूर्वक “ उं" वीजको चतुःषष्टिवार जपपूर्वक कुम्भक द्वारा वायुको धारण करना उचित है । तत्- पश्चात् तमोगुण "म" काररूपी श्वेतवर्ण शिवके ध्यानपूर्वक "मंग वीजको द्वात्रिंशत् वार जप करते हुए दक्षिणनासिका द्वारा वायु रेचन कर दिया जाय। पुनः ऊपर लिखी हुई रीतिपर वीजमन्न जप द्वारा यथा संख्या और क्रमसे दक्षिण नासिका द्वारा वायु पूरक करके कुम्भक करते हुए वामनासिका द्वारा वायु रेचन कर दिया जाय। इस प्रकार तीन श्रावृत्तिमें एक प्राणायाम होता है, इस प्राणायाम सगर्भञ्च प्रथम कथयामि ते । मुग्नाऽऽसने चोपविश्य प्राङ्मुखो वाऽप्युदङ्मुखः ।।९।। ध्यायेद्विधि रजोरूपं रक्तवर्णमवर्णकम् । इड़या पूरयेद्वायु मात्रापाड़शकैः सुधीः ॥१०॥ पूरकान्ते कुम्भकाद्य उड्डीयानं समाचरेत् । हरिं सत्वमयं ध्यात्वा उकार कृष्णवर्णकम् ॥ ११ ॥ चतुःषष्ठ्या मात्रया वै कुम्भकेनैव धारयेत् । तमोमयं शिवं ध्यात्वा मकारं शुक्चवर्णकम् ।। १२॥ द्वात्रिंशन्मात्रया चैव रेचयोद्वीधना पुनः । पुनः पिङ्गलयापूर्य कुम्भकेनैव धारयेत् ॥ १३ ॥ इडया रेचयेत्पश्चात्तद्वीजेन क्रमेण तु । ६ દર २ हठयोगसंहिता। ..... रीतिपर अनुलोम विलोम द्वारा पुनः पुनः प्राणायाम अनुष्ठान करने योग्य है। वायु पूरकके अन्त में कुम्भक शेष पर्यन्त तर्जनी मध्यमा- के बिना कनिष्ठा, अनामिका और अंगुष्ट इन तीन अंगुलियोंके द्वारा नासापुटद्वय धारण किया जाय अर्थात् कुम्भक करते समय वाम- नासामें कनिष्ठा अंगुलि और अनामिका अंगुलि देकर दक्षिण नासिका- में केवल वृद्ध अंगुष्ठ लगाकर धारण किया जाय । साधारण सहित प्राणायाम केवल व्याहृति सहित गायत्री मन्त्र द्वारा रेचक पूरक कुम्भक करनेपर भी हो सकता है। कर्मकाण्डमें इसका विधान है। ध्यानके विना भी पूर्व कथित संख्याके अनुसार केवल प्रणव अथवा केवल वोजमन्त्रकी सहायतासे जो सहित प्राणायाम किया जाता है वह भी आरुरुतु बोगीके लिये कल्याणप्रद है। जो प्राणायाम वीजमन्त्र न जपकर साधन किया जाय उसीको निगर्भ प्राणायाम कहते हैं। पूरक कुम्भक और रेचक इन तीन अंगसमन्वित सहित प्राणायाम साधन करनेकी विधिका झम एफ संख्यासे लेकर शत संस्त्यातक है । मात्राके अनुसार प्राणायामके तीन भेद है, यथा-विंशति माना साधन, पोडशमामा साधन और द्वादश मात्रासाधन । विंशति ... अनुलोमविलोमेन वारं वारं च साधयेत् ॥ १४ ॥ पूरकान्त कुम्भकान्ते धृतनासापुटद्वयम् । कनिष्ठाऽनामिकाऽङ्गष्ठस्तर्जनीमध्यमे विना ॥ १५ ॥ प्राणायामो हि सहितो गायत्र्यापि सुसिध्यति । कर्मकाण्डे विधेयोऽसौ नान्यत्र कचिदिष्यते ॥ १६ ॥ केवले बीजमन्त्री केवलप्रणवेन वा । आरुक्षोोगिनो हि कृतोऽयं शिवदो भवेत् ।। १७ ॥ प्राणायामो निगर्भस्तु विना बनिन जायते । एकादिशतपर्यन्तं पूरकुम्भकरेचनम् ॥ १८ ॥ इत्तमा विशतिर्मात्रा मध्या पोशमात्रिका ।

प्राणायाम प्रकरण । ६३ मात्रा साधन उत्तम, पोडश मात्रा मध्यम और द्वादश मात्रा अधम है । अधममात्रा प्राणायामकी सिद्धिसे शरीरसे स्वेद निर्गत होता है, मध्यममात्रा प्राणायाम साधन करनेसे मेरुदण्ड कम्पित होने लगता है अर्थात् गुह्यद्वारसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक एक नाड़ी कांपती हुई अनुभव होती है और उत्तममात्रा प्राणायामके साधनसे साधक 'भूमि त्यागकरके शुन्यमार्गमें उत्थित हो सक्ता है। स्वेदनिर्गम, मेरु कम्पन और भूमित्याग, ये तीनों प्राणायाम सिद्धिके चिह्न हैं। इस प्राणायामके साधनसे खेचरत्व शक्तिकी प्राप्ति होती है, सब प्रकारफे रोगोंका नाश होता है, परमात्मशक्तिका प्रबोध होता है और दिव्य- ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है; जो मनुष्य प्राणायाम साधन करते हैं उनके चित्तमें परमानन्दकी प्राप्तिसे वे परम सुखी होजाते हैं ।।८-२१॥ सूर्यभेदी प्राणायाम । सहित प्राणायाम कहा गया अब सूर्यभेदी प्राणायाम कहा जाता है। सर्वात जालन्धरवन्ध मुद्राका अनुष्ठान करके दक्षिणनासिका द्वारा वायु पूरक करते हुए यत्नपूर्व कुम्भक द्वारा वायुको धारण अधमा द्वादशी मात्रा प्राणायामास्त्रिधा स्मृताः ॥ १९ ॥ अघमाज्जायते स्वेदो मेरुकम्पश्च मध्यमात् । उत्तमाच क्षितित्यागस्त्रिविध सिद्धिलक्षणम् ॥ २० ॥ प्राणायामाखेचरत्वं प्राणायामाद्रुजाक्षयः । प्राणायामाच्छक्तिबोधः प्राणायामान्मनोन्मनी। आनन्दो जायते चित्ते प्राणायामी सुखी भवेत् ॥ २१ ॥ सूर्यभेदीप्राणायामः । कथितः सहितः कुम्भः सूर्यभेदनकं शृणु । पूरयेत्सूर्यनाड्या च यथाशक्त्यानिलं बहिः ॥ २२ ॥ धारयेद्वहुत्नेन कुम्भकेन जलन्धरैः।

हठयोगसंहिता। समान फरके रहे और जबतक नख और केशद्वारास्वेद निर्गत न हो तबतक कुम्भक ही किया जाय । प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान, ये पञ्च वायु अन्तरस्थ और नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनक्षय, ये पांच वायु पहिःस्थ हैं। प्राण हृदय देशमें, अपान गुटमें, नाभिमें, उदान कण्ठमें और व्यान वायु समस्त शरीरमें व्याप्त हो रहा है। ये पांच वायु अन्तरके हैं और नाग श्रादि पांच घायु बाहिरके हैं। अब इन पाचोंका भी वर्णन किया जा रहा है। नाग वायु उद्गारमें,. कूर्म वायु उन्मीलनमें, कृकर वायु सुत्कारमें, देवदत्त वायु जम्भणमें और धनंजय वायु देह त्याग होनेपर भी शरीरमें स्थित रहता है। नाग वायु चैतन्य प्राप्त करता है, कर्म वायु निमेषण करता है, ककर वायु क्षुधा और तृपा बढाता है, देवदत्त वायु जृम्भण कार्य करता है और धनञ्जय वायु द्वारा शब्दकी उत्पत्ति हुआ करती है और यह कदापि देहको त्याग नहीं करता । सूर्यभेदी कुम्भक करते समय इन उल्लिखित यावास्विन्नाः केशनखास्तावत्कुर्वन्तु कुम्भकम् ॥ २३ ॥ प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानो तथैव च । नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनजयः ॥ २४ ॥ हृदि प्राणो वहनित्यमपानो गुदमण्डले । समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यगः ।। २५ ॥ व्यानो व्याप्य शरीरं तु प्रधानाः पञ्च वायवः । . प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥ २६ ॥ तेरामपि च पञ्चानां स्थानानि च वदाम्यहम् । उगोरे नाग भाख्यातः कूर्मस्तून्मीलने स्मृतः ।। २७ ।। कृकरः क्षुत्कृते ज्ञयो देवदत्तो विजृम्भणे । न जहाति मृते काऽपि सर्वव्यापी धनञ्जयः ।। २८ ।। नागो गृहाति चतन्य कूर्मश्चैव निमेषणम् | क्षुत्तर्ष ककरश्चैव चतुर्थं च विजृम्भणम् । भवेशनबापाच्छब्दः क्षणमात्रं न निःमरेत् ।। २९ ।।

प्राणायाम प्रकरण।
६५
प्राणादि वायुसमूहको पिगला नाजी द्वारा विभिन्न करके मूल देश-
ले समान वायु उठाया जाय, तदनन्तर धैर्यपूर्वक वेगस वामनासिका
द्वारा रेचन कर दिया जाय। पुनरपि दक्षिण नासापुट द्वारा वायु
पूरण करके सुपुम्नामें कुम्भक करके वाम नासापुट द्वारा रेचन कर
दिया जाय । इसी प्रकार पुनः पुनः करनेसे सूर्यभेदी कुम्भक हुश्रा
करता है। यह प्राणायाम जरा और मृत्युका नाश करनेवाला है,
इसके द्वारा कुण्डलिनी शक्ति प्रबोधित होती है और देहस्थ अग्नि-
की विवृद्धि हो जाती है; यही अति उत्तम सूर्य भेदी नामक प्राणायाम
फा वर्णन है। २२-३२ ॥
उज्जायी प्राणायाम |
वहिःस्थित वायु नासिका द्वारा आकर्षण करके और अन्तःस्थ
वायुको हृदय और गलदेश द्वारा आकर्पण करके मुखमें कुम्भक द्वारा
धारण किया जाय, तदनन्तर मुख प्रक्षालन पूर्वक जालन्धर मुद्राका
अनुष्ठान किया जाता है, इस प्रकार निज शक्ति अनुसार वायुको
धारण करनेसे उजायी प्राणायामका लाधन हुआ करता है । इसके
सर्वे ते सूर्यसम्भिन्ना नाभिमूलात्समुद्धरत् ।
इडया रेचयेत्पश्चाद्धर्येणाऽखण्डवेगतः ।। ३० ॥
पुनः सूर्येण चाऽकृष्य कुम्भीयत्वा यथाविधि ।
रेचयिवा साधयेत्तु क्रमेण च पुनः पुनः।। ३ ।।
कुम्भकः सूर्यभेदी तु जरामृत्युविनाशकः ।
बोधयेत्कुण्डली शक्ति देहवहिं विवर्धयत् ।
इति ते कथितं सौम्य ! सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥ ३२ ॥
उजायीप्राणायामः।
नासाभ्यां वायुमाकृष्य मुखमध्ये च धारयेत् ।
छद्गलाभ्यां समाकृष्य वायुं वक्ते च धारयेत् ॥ ३३ ॥
मुखं प्रक्षाल्य सम्बध्य कुयाज्जालन्धरं ततः ।
आशक्ति कुम्भकं कृत्वा धारयेदविरोधतः ॥ ३४ ॥

हठयोगसंहिता।
साधनसे नाना प्रकारके कर्मोकी सिद्धि होती है. और जो मनुप्य जरा
और मृत्युसे बचनेकी इच्छा करते हों वे अघश्म इस प्राणायामका
साधब करें और इसके साधनसे निश्चय करके सम्पूर्ण रोगोंका
नाश होता है ।। ३३-३५ ॥
शीतली प्राणायाम ।
जिला द्वारा (काकचञ्च रूपसे) वायु आकर्षण पूर्वक धीरे धीरे
उदरको परिपूरित करके तत्पश्चात् थोडी देर धारण पूर्वक नासिका
द्वारा रेचन कर देनेसे शीतली प्राणायाम हुआ करता है। साधयो-
को सर्पदा कल्याणप्रद इस शीतली कुम्भकका अनुष्ठान करना उचित
है, इसके साधनसे सकल रोगोंका नाश होता है और योगकी सिद्धि
प्राप्त होती है। इस प्राणायामके द्वारा सुधा तुष्णा तथा कामादिको
अनि शान्त होती है इसलिये इसको शीतली कहते हैं। यह
सफल प्रकार श्वासरोग तथा हृद्रोगकी महौषधि और समाधिका
सहायक है ॥३६-३८॥
उज्जायी कुम्भकं कृत्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ।
जरामृत्युविनाशाय चाज्जायीं साधयमरः ।
नश्यन्ति सकला रोगाः साधनादस्य निश्चितम् ||३५||
शीतलीप्राणायामः।
जिया वायुमाकृष्य उदरे पूरयेच्छनः ।
क्षणं च कुम्भकं कृत्वा नासाभ्यां रेचयेत्पुन: ।। ३६||
सर्वदा साधयेद्योगी शीतलीकुम्भकं चरेत् ।
से रोगा विनश्यन्ति योगसिद्धिश्च जायते ।। ३७ ॥
भुत्कामाद्यग्निनिर्वाणात् शीतलीति प्रकीयते ।
घामहद्रोभिदयं समाधिसाधको भवेत् ॥ २८ ॥

प्राणायाम प्रकरण । ६७ -~~-~- भस्त्रिका प्राणायाम । लुहारोंके भस्त्रिका यन्त्र द्वारा जिस प्रकार पायुपारुष्ट किया जाता है उसी प्रकार नासिका द्वारा वायुसमाफर्पण पूर्वक शनैः शनैः सदरमें वायु भरकर उदरको परिचालित करे। इस प्रकारले विंशतिधार घायुको परिचालित करके कुम्भक द्वारा घायु धारण करते हुए पुनः भस्त्रिका यन्त्र द्वारा जिस प्रकार वायु निर्गत होता है उसी प्रकार नासिका द्वारा वायु निकाल देनेसे भलिझा प्राणायाम हुथा करता है। यह कुम्भक घथा नियमसे तीनवार आचरण करनेके योग्य है। इसके साधन द्वारा किसी प्रकारकी व्याधि अथवा केश साधकके शरीरमें नहीं हो सका और दिन दिन आरोग्यता बढ़ती जाती है। भस्त्रिका प्राणायामकी संख्या तथा मनकी धारणाके तारतम्यानुसार सकल रोगोंका मूलोच्छेद हो जाता है ॥३६-४२॥ भ्रामरी प्राणायाम । रात्रिका अर्द्ध अंश व्यतीत होनेपर जिस स्थानपर किसी जीव भस्त्रिकाप्राणायामः। भस्त्रेव लोहकाराणां संभ्रमेत् क्रमशो यथा । तथा वायु च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनैः ॥ ३९ ॥ एवं विंशतिवारं च कृत्वा कुर्याञ्च कुम्भकन् । तदन्त चालयद्वायु पूर्वोक्तं च यथाविधि ॥ ४० ॥ त्रिवारं साधयेदनं भस्त्रिकाकुम्भकं सुधीः । न च रोगा न च क्लेश आरोग्यं च दिने दिने ।। ४१ ।। भत्रिका प्राणायामस्य स्फुटं संख्यानुसारतः । मनसो धारणायाश्च तारतम्यानुसारतः । व्याधीनामिह सर्वेषां मूलमुच्छिद्यत खलु ॥ ४२ ॥ भ्रामरीप्राणायामः। अर्धरात्रे गत योगी जन्तूनां शब्दवर्जिते ।

NA-.. हठयोगसंहिता। जन्तुका भी शब्द सुनाई न दे उस स्थानपर गमनपूर्वक योगी अपने हल्त द्वारा अपने कर्ण युगलको बन्द करके पूरक शोर कुम्भकका अनुष्ठान करे। इस प्रकार कुम्भक साधन करनेले साधकके दक्षिण फर्णमें नाना प्रकारके शब्द सुनाई देंगे। वे शब्द देहके अभ्यन्तरही उदित हुश्रा करते हैं। प्रथम झिल्लीरव, तदनन्तर बंशीरव, तदन- न्तर मेघध्वनि, तदनन्तर झर्मरी नामक वाद्यध्वनि और तत्पश्चात् भ्रमरके "गुन गुन" शब्दके नाई सुनाई देगा; तत्पश्चात् घंटा, कांस्य, तुरी, भेरी, मृदङ्ग, पानक दुन्दुभि श्रादि शब्द श्रुति गोचर होंगे। इस प्रकार प्रतिदिन नाना प्रकारकी ध्वनि सुनने में आया करेगी और पीछेसे अनहद शब्दकी प्रतिध्वनि सुनाई दिया करती है। तत्प- श्चात् साधक ध्वनिके अन्तर्गत परज्योति और ज्योतिके अन्तर्गत पर. ब्रह्ममें मन लय करता हुआ विष्णुके परम पदमें लय प्राप्त हो जाता है। इस प्रकारसे भ्रामरी कुम्भककी सिद्धि हुथा करती है। इस प्राणायामके साधनसे समाधिकी प्राप्ति हो जाती है ॥४३-४७॥ 'मूर्छा प्राणायाम । प्रथममें सुखसे पूर्व कथित रीतिपर कुम्भकका अनुष्ठान करके कर्णी पिधाय हस्ताभ्यां कुर्यात्पूरककूम्भकम् ॥ ४३ ॥ शृणुयादक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं शुभम् । प्रथमे झिंझिनादञ्च वंशीनादं ततः परम् ।। ४४ ॥ मेघझर्झरभृगौघघण्टाकांस्यं ततः परम् । तुरीभेरीमृदङ्गादिनिनादानकदुन्दुभिः । एवं नानाविधो नादः श्रूयतेऽभ्यसनाध्रुवम् ॥ ४५ ॥ अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः । वनेरन्तर्गतं ज्योतिर्योतियोऽन्तर्गतं मनः ॥ ४६॥ तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् । भ्रामरीसिद्धिमापन्नः समाधेः सिद्धिमानयात् ॥ ४७ !! मूप्रिाणायामः। सुखन कुम्भकं कृत्वा मनो भृयुगलान्तरम् ।

प्राणायाम प्रकरण ।
सर प्रकारके विपयोंसे मनको हटाकर, तत्पश्चात् युगलके वीचमें
मनको लगाते हुए मनकी लयावस्था उत्पन्न करे तो मूर्छा कुम्भक-
का साधन हुआ करता है; इस कुम्भक द्वारा परमानन्दकी प्राप्ति
हुश्रा करती है। इस प्रकार दिन प्रति दिन इस प्राणायामके अभ्या-
ससे नानाप्रकारका आनन्द प्राप्त होते होते अवशेपमें समाधिकी
सिद्धि हो जाती है। इस प्राणायामके द्वारा स्वतःही प्रत्याहारमें
सिद्धिलाभ होता है। वासनाक्षय और तत्त्वज्ञानका मूल मनोनाश
है। इस प्राणायामके द्वारा मनोनाश सहज साध्य हो जाता है।
सकल प्रकार आधि व्याधिके तत्काल दूर करनेके लिये यह प्राणा-
याम महीपधिस्वरूप है ॥४-५१॥
केवली प्राणायाम
भुजङ्गिनीके श्वाससे अर्थात् कुण्डलिनी शक्तिके प्रभावसे नीव
सदा अजपा जप करता है, जिसमें श्वास निकलते समय "ह" और
जाते समय "स" मन्त्र उच्चारण होकर अजपाजप होता है। "हंस"
सन्त्यज्य विषयासर्वान्मनोमूी सुखप्रदा ॥ १८ ॥
आत्मना मनसो योगादानन्दो जायते ध्रुवम् ।
एवं नानाविधाऽऽनन्दो जायतेऽभ्यासतः स्फुटम् ।
एवमभ्यासयोगेन समाधेः सिद्धिमानयात् ।। ४९ ॥
मूर्छाप्राणायामतोऽस्मात् प्रत्याहारः सुसिध्यति ।
वासनाया: क्षयस्तत्त्वज्ञानकार्य मनोलयः ॥ १०॥
अनेन प्राणायामेन मनोनाशो भवत्यलम् ।
सर्वाधिव्याधिविलये महौषधमयं ध्ररम्।। ५१ ।।
केवलीप्राणायामः।
भुजङ्गिन्याः श्वासवशादजपा जायते ननु ।
हङ्कारण बहियाति साकारेण विशेहपुनः ॥ १२ ॥

७०
हठयोगसंहिता।
अर्थात् “ सोहं " रूप प्रकृतिपुरुपसंयुक्त गायत्री जप जीव दिवा
रानि करता रहता है। उसकी संख्या एक विंशति सहन एवं पट
शत (२१६००) है। मूलाधारपद्म, हृदयपक्ष और नासापुट द्वय, इन
तीनों स्थानों द्वारा यह जप हुआ करता है । इस श्वासवायुके वाटर
निकलनेका परिमाण पएणवति अङ्गुली है और इसकी खाभाधिक
पहिर्गति द्वादश अङ्गुली, गायनमें इसका परिमाण पोडश अङ्गुली,
भोजनमें विंशति अङ्गुली, पथपर्यटनमें चतुर्विशति अङ्गुली, निद्राम
त्रिंशत् अकुली, मैथुनमें पत्रिंशत् श्रद्गुली और व्यायाममै उससे भी
अधिक मुश्रा करता है। वायुकी स्वाभाविक गति द्वादश अगुली
है यह पूर्व ही कहा गया है; इस द्वादश अगुली परिमाणसे वायुकी
गति जितनी न्यून होती है उतनी ही परमायुकी वृद्धि हुआ करती
है परन्तु इस परिमाणसे अधिक बढ जानेसे परमायु क्षय हुआ
फरता है। जबतक देह अन्तर्गत प्राणवायु अवस्थित है, तबतक
जीवकी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं, कुम्भक साधनमें प्राण वायु
पट् शतानि दिवा रात्री सहस्राण्येकाविंशतिम् ।
अजपां नाम गायत्री जीवो जपति सर्वदा ।। ५३ ॥
मूलाऽऽधार यथा हंसस्तथा हि हृदि पङ्कजे ।
तथा नासापुटद्वन्द त्रिभिहसममागमः ॥ ५४ ॥
पण्णवत्यङ्गुलीमानं शरीरं कर्मरूपकम् ।
देहाहहिर्गतो वायुः स्वभावावादशीलः ॥ ५५ ॥
गायने पोडशाङ्गुल्यो भोजन विंशतिस्तथा ।
चतुर्विशाङ्गुलिः पान्थे निद्रायां त्रिंशदङ्गुलिः ॥ ५६ ॥
मैथुने पट्त्रिंशदुक्तं व्यायाम च ततोऽधिकम् ।
म्वभावऽस्य गते न्यूने परमायुः प्रवर्धते ॥ १७ ॥
आयुःक्षयोऽधिकं प्रोक्तो मारते चाऽन्तगद्ने ।
तस्मात्प्राणे स्थिते देहे मरणं नैव जायंत ॥ १८ ॥

प्राणायाम प्रकरण। ७१ ही मूलभूत कारण है। जीव देह धारण करके जबतक जीवित रहता है तबतक वह यथाविहित परिमित संख्याके अनुसार अज- पाजप करता रहता है; देहके वीचमें प्राण वायुका धारण करना ही केवली कुम्भक कहाता है; केवली कुम्भकसाधन जितना अधिक होता है उतनी ही मनकी लयावस्था हुश्रा करती है। नासापुट द्वारा वायु प्राकर्पण पूर्वक केवली कुम्भक किया जाता है। केवली- की क्रिया सहज कहाती है क्योंकि उसमें रेचक पूरकका कोई क्रम नहीं है और न कुम्भककी कठिनता है। प्राणपर कुछ प्राधिपत्य हो जानेसे श्री गुरूपदेश द्वारा इसकी क्रिया प्राप्त होती है। प्रथम अवस्थामें प्राण वायुको नियमित करके प्राणकी क्रिया संयमित करनी पड़ती है और इसकी उन्नत अवस्थामें खतः ही इसका साधन हुआ करता है। इन्द्रियोंके विपयोंसे मनको हटाकर भ्रूयुगलके वीचमें मनको स्थापित करते हुए अपान और प्राण दोनोंकी गति रुद्ध कर- वायुना घटसम्बन्धे भवेत्केवलकुम्भकम् । यावज्जीवं जपेन्मन्त्रमजपास्यं यथाविधि ॥ ५९ ॥ अद्यावधि धृतं संख्याविभ्रम केवली कृते । अत एव हि कर्तव्य: केवली कुम्भको नरैः ॥ ६० ॥ . केवली चाऽजपा सङ्ख्या द्विगुणा च मनोन्मनी । नासाभ्यां वायुमाकृष्य केवलं कुम्भकं चरेत् ।। ६१ ॥ कुम्भकस्य न काठिन्यमक्रमा पूररेचको । विद्यते यत्र सा ज्ञेया सुसाध्या केवली क्रिया ॥ ६२ ।। वशीभवत्सु प्राणेपु गुरूणामुपदेशतः । अवाप्यन्ते क्रियाः सर्वा नियम्याः प्राणवायवः ।। ६३ ।। आदी प्राणक्रिया तस्मात्संयम्या भवति ध्रुवम् । अस्याः समुन्नताऽवस्थां प्राप्य ता साध्यते स्वतः ॥१४॥ मनोऽपनीय विषयाद्भूमध्ये तन्निवेशयेत् ।

७२ हठयोगसंहिता। नेके उपायसे केवली प्राणायामकी क्रिया होती है। केवली प्राणा- याम समाधिप्रद है और विविध तापनाशक है। इस प्राणायमकी सिद्धिमें योगीको कुछ भी प्रभाव नहीं रहता। केवली कुम्भकके द्वारा कुलकुण्डलिनी शक्ति जाग्रत् होकर सहनारमें ब्रह्मसायुज्यको लाभ करती है इसलिये इस प्राणायाममें पट चक्र भेदकी क्रियाएं भी करनी होती हैं। प्रथमतः रेचक पूरकका अनायाससाध्य कौशल अवलम्बन करनेपर अन्तमें वह सहजदशामें परिणत हो जाता है। खेचरीमुद्राके साथ इस प्राणायामके करने पर विशेप लाभ होता है। केवली प्राणायाम सकल प्रकार आधिव्याधिका नाशक तथा यात्मज्ञान प्रदायक है ॥ ५२-७० ॥ प्राणाऽपाननिरोधेन जायते केवलीक्रिया ।। ६५ ।। समाधिदश्च त्रिविधांस्तापान्नाशयति ध्रवम् । सिद्धेऽस्मिन्योगयुक्तानामप्राप्यं नैव किञ्चन ।। ६६ ।। केवली कुम्भकेनेयं शक्तिः कुण्डलिनी ध्रुवम् । प्रबुद्धा हि सहस्रारे ब्राह्मसायुज्यमेति यत् । पट्चक्रभेदने तस्मादेतत् साधनमिष्यते ।। ६७ ॥ रेचकस्य पूरकस्य कौशले सुखमाश्रिते । महजायां दशायां स्यादयं परिणतः ध्रवम् ॥ ६८ ॥ ववर्गमुद्रया सार्द्ध प्राणायामे कृते पुनः । अस्मिन्नुत्पद्यते लाभा विशिष्टो नात्र संशयः ॥ १९ ॥ प्राणायामो नूनमयमाधिव्याधिविमर्दकः । मज्ञानोत्पादने च परमं कारणं भवेत् ।। ७० ।।

७३
ध्यान वर्णन।
ध्यान वर्णन ।
मन्त्रयोग हठयोग और लययोगमें पृथक् पृथक् स्थूलध्यान,
कोतिर्ध्यान और विन्दुध्यान, ये तीन प्रकारके ध्यान नियत किये गये
हैं। जिनमेसे मूर्तिमान् इष्टदेव मूनिका ओ थान है वह स्थूलध्यान,
जिसके द्वारा तेजोमय ब्रह्मका दर्शन होता है वह ज्योतिान और
विन्दुमय ब्रह्म और कुल कुण्डलिनी शक्तिका जो ध्यान किया जाता
है वह विन्दुध्यान कहा जाता है । मन्त्रयोगोक्त स्थूल ध्यानके भेद पञ्चो-
पासनाके अनुसार अनेक हैं; परन्तु हठयोगके ज्योतिर्ध्यानकी शैली
एकही है। केवल ध्यान स्थान साधकके अधिकारके भेदसे विविध
हैं। दीप कलिकावत् तेजोमय ब्रह्मध्यानको ज्योतिर्ध्यान कहते हैं,
वह प्रकृति ध्यानभी है और ब्रह्म ध्यान भी है, क्योंकि "अहंममेतिवत्॥
ब्रह्म और प्रकृतिमें अभेद है। तेजोमय रूपकल्पनाके द्वारा ब्रह्मध्यान
करनेको ज्योतिर्ध्यान कहते हैं। उसके ध्यान करनेकी शैली श्रीगुरुदेव-
अथ ध्यानवर्णनम् ।
मन्त्रयोगो हठश्चैव लययोगः पृथक् पृथक् ।
स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्म ध्यानन्तु त्रिविधं विदुः ॥ १॥
स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं भवेत् ।
विन्दु विन्दुमयं ब्रह्म कुण्डली परदेवता ॥२॥
स्थूलध्यानं हि मन्त्रस्य विविधं परिकीर्तितम् ।
उपासनां पञ्चविधामनुसृत्य महर्षिभिः ॥ ३ ॥
एकं वै ज्योतिषो ध्यानमधिकारस्य भेदतः ।
साधकानां विनिर्दिष्टं त्रिविधं ध्यानधाम वै ॥ ४ ॥
ध्यानं यद्रह्मणस्तेजोमयं दीपार्चिसन्निभम् ।
ज्योतिर्ध्यानं हि भवति प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥५॥

७५ हठयोगलंहिता। की कृपासे ही प्राप्त हो सकी है । माभि, हदय और भ्रूयुगल, ये तीनो स्थान ज्योतिनिके हैं। साधकके अधिकार भेदसे ही ये स्थान निर्णीत किये गये हैं। कोई कोई योगवित् आधारपमरूपी चतुर्थ स्थान भी :निरूपित करते हैं। ज्योतिानकी सिद्धावस्थामें आत्मसाक्षात्कार होता है। उपनिषत् और तन्त्रोंमें ज्योतिर्ध्यानकी बहुत कुछ महिमा कीर्तित हुई है ॥ १-६॥ समाधि वर्णन। मन्त्रयोगकी समाधिको महाभाव और हठयोगकी समाधिको महा- योध कहते हैं। हठयोगके द्वारासमाधि सुसाध्य है। प्राणायामसिद्धि- अहं ममेतिवत्तौ चाऽभिन्नौ हि परिकीर्तितौ। ध्यानं वे ब्राह्मणस्तेजोमय रूपं प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥ ज्योतिर्ध्यानं भवेत्तद्धि प्राप्यं गुरुकृपावशात् । नाभिहृद्मयुगान्याहुनिस्थानं मनीषिणः ॥ ७ ॥ स्थानभेदो विनिर्णीतः साधकस्याऽधिकारतः । आधारपद्ममपरं ध्यानस्थानं चतुर्धकम् ॥ ८ ॥ कोचिनिरूपयन्तीह योगतत्वाविशारदाः । सिद्ध ध्याने हि प्रत्यक्षीभवत्यात्मा विशेषतः ।। कीर्तितश्चाऽस्य महिमा तन्त्रेपूपानिपत्सु च ॥९॥ अथ समाधिवर्णनम् । ममाधिर्मस्त्रयोगस्य महाभात्र इतारितः । हटस्य च महाबोधः समाधिस्तेन सिध्यति ।।३।।

समाधि.वर्णन।
५
के द्वारा वायुजय हो जानेपर कुम्भक करनेकी पूर्ण शक्ति प्राप्त होनेले
हयोग समाधिको प्राप्ति होती है। वीर्य, वायु नौर.मन, ये तीनों
स्थूल सूक्ष्म और कारण सम्वन्धसे एक ही हैं। इन तीनों में वायु ही.
प्रधान है; क्योंकि वायु शकिरूप है। वायुके निरोध द्वारा मनका
निरोध हो जाता है; सुतरां वायुके लयसे मनका लय और मनके
लयसे समाधिकी उत्पत्ति होती है। ध्यानकी सिद्धिके साथ ही
साथ प्राणायामसिद्धि द्वारा समाधि प्राप्त होती है। किस अधि-
कारीको किस प्राणायामके द्वारा महाबोधकी प्राप्ति होगी सो
श्रीगुरुदेवके द्वारा जानने योग्य है। योगचतुष्टयके शाता योगि-
राज ही इसका उपदेश ठीक ठीक कर सकते हैं। समाधि
ही योगसाधनका परम फल है। शरीरसे मनको अलग करके
उसका लय' करते हुए स्वखरूपको प्राप्त करे, यही समाधि है।
प्राणायामस्य सिद्धया वै जीयन्ते प्राणवायवः ।
ततोऽधिगम्यते शक्तिः पूर्णा कुम्भकसाधने ॥ २॥
समाधिहठयोगस्य त्वरितं प्राप्यते ततः।
शुक्र वायुमनश्चैते स्थूलकारणसूक्ष्मतः ॥ ३ ॥
अभिन्नास्तत्र प्राधान्य वायोरेव विदुर्बुधाः ।
शक्तिखरूपवत्त्वाद्धि तन्निरोधान्मनोजयः ॥ ४
तस्मान्मनोजयाच्चैव समाधिः समवाप्यते ।
प्राणायामे तथा ध्याने सिद्ध के सोऽधिगम्यते ॥ ५॥
प्राणायामस्योपदेशः कतमायाऽधिकारिणे ।
प्रदत्तः कीदृशश्चैव महाबोधप्रदायकः ॥ ६॥
एतत्सर्वं हि विज्ञेयं योगज्ञाद्गुरुदेवतः ।
योगक्रियायाः परमं समाधिः फलमिष्यते ॥ ७॥
शरीरतो मनः सम्यगपनीय विजित्य तत् ।
स्वस्वरूपोपलब्धिर्हि समाधिरिति चोच्यते ॥८॥

IMA- हठयोगसंहिता। समाधिदशामें मनका लय हो जाता है और "मैं ही अद्वितय वाह सच्चिदानन्दरूप नित्यमुक्त हूँ" ऐसा अनुभव होता है ॥ १-६॥ इस प्रकार हठयोगसंहिताका भावानुवाद समाप्त हुधा । अद्वितीयमहं ब्रह्म सच्चिदानन्दरूपधृक् । नित्यमुक्ताऽस्मीति सदा समाधावनुभूयते ॥९॥ इत्यध्यात्मविद्यायां योगशास्त्रे समाप्तयं हठयोगसंहिता ।

श्रीविश्वनाथो जयति । হজাহঙ্কা ভূক্ত হৃঙ্খল । समाजकी मलाई ! मातृभापाकी उन्नति !! देशसेवाका विराट् आयोजन !!! इस समय देशका उपकार फिन उपायोंसेहोसकता है ? संसा- रहे इस छोरसे उस छोरतक बाहे शिसी चिन्ताशील पुरुपसे यह मन कीजिये, उत्तर यही मिलेगा कि धर्मभावके प्रचारले; पयोकि धर्मने ही संसारको धारण कर रखा है। भारतवर्ष किसी समय संसारको गुरु था, आज वह अधःपतित और दीन हीन दशामें पयों पर रहा है ? इसका भी उत्तर यही है कि वह धर्मभावको खो बैंा है। यदि हम भारतले ही पूछे कि तु अपनी उन्नतिके लिये हम- ले क्या चाहता है ? तो वह यही उत्तर देगा कि मेरे प्यारे पुत्रों ! धर्मभावती वृद्धि करो। संसारमें उत्पन्न होकर जो व्यक्ति कुछ भी सत्कार्य करने के लिये उद्यत हुए हैं, उन्हें इस बातका पूर्ण अनु- भर होगा कि ऐले कार्यामें कैले विघ्न और कैसी बाधाएँ उपस्थित हुना करती है। यद्यपि धीर पुरुष उनकी पर्चाह नहीं करते और यथासंभव उनसे लाभही उठाते हैं, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि उनके कार्यो में उन विन्न बाधानासे कुछ रुकावट अवश्यही हो जाती है। श्रीभारतधर्म महामण्डलके धर्मकार्यमें इस प्रकारकी अनेक वाधाएँ होनेपर भी अव उले जनसाधारणका हित साधन करनेका लर्वशक्तिमान भगवानले. 'सुअवसर प्रदान कर दिया है। भारत धार्मिक नहीं है, हिन्दुजांति धर्मप्राण जाति है, उसके रोम रोममें धर्मसंस्कार श्रोतप्रोत है। केवल वह अपने रूपको-धर्म- भावको-भूल रही है। उसे अपने स्वरूपको पहिचान करा देना- धर्मभारको स्थिर रखना-ही श्रीभारतधर्ममहामण्डलका एक पवित्र और प्रधान उद्देश्य है। यह कार्य २० वपोले महामण्डल कर रहा है और ज्योज्यों उसको अधिक सुअवसर मिलेगा, त्यो यो वह जोर शोरसे यह काम करेगा। इसका विश्वाल है कि इसी ( २ ) उपायने देशका सच्चा उपकार होगा और अन्तमें भारत पुनः अपने गुरुत्वको प्राप्त कर सकेगा। इस उद्देश्य साधनके लिये सुलभ दो ही मार्ग हैं। (१) उपदे- शकों द्वारा धर्मप्रचार करना और (२) धर्म रहस्य सम्बन्धीय मौलिक पुस्तकोंका उद्धार और प्रकाश करना। महामण्डलने प्रथम मार्गका अवलम्बन प्रारम्भसे ही किया है और अब तो उपदेशक महाविद्यालय स्थापित कर महामण्डलने वह मार्ग स्थिर और परिष्कृत कर लिया है । दूसरे मार्गके सम्बन्धमें भी यथाय ग्य उद्योग प्रारम्भसे ही किया जा रहा है, विविध ग्रन्थोंका संग्रह और निर्माण करना, मासिक पत्रिकाओंका सञ्चालन करना, शास्त्रीय ग्रन्थोका प्राविष्कार करना, इस प्रकारके उद्योग महामण्डलने किये हैं और उनमें सफलता भी प्राप्त की है ; परन्तु अभी तक यह कार्य संतोप- जमक नहीं हुआ है। महामण्डलने अब इस विभागका उन्नत करने. का विचार किया है। उपदेशकों द्वारा जो धमप्रचार होता है उस- का प्रभाव चिरस्थायी होनेके लिये उसी विषयकी पुस्तकोका प्रचार होना परम श्रावश्यक है क्योंकि वक्ता एक दो चार जो कुछ सुना देगा, उसका मनन विना पुस्तकोंका सहारा लिये नहीं हो सकता। इसके सिवाय सब प्रकारके अधिकारियोंके लिये एक वक्ता कार्यकारी नहीं हो सकता। पुस्तकप्रचार द्वारा यह काम सहल हो जाता है। जिसे जितना अधिकार होगा, वह उतने ही अधिकारकी पुस्तकें पढेगा और महामण्डल भी सब प्रकारके अधिकारियोंके योग्य पुस्तके निर्माण करेगा। सारांश, देशकी उन्नतिके लिये,भारत गौरवकी रक्षाके लिये और मनुप्योंमें मनुष्यत्व उत्पन्न करनेके लिये महामण्डलने अव पुस्तक प्रकाशन विभागको अधिक उन्नत पर- नेको विचार किया है और उसकी सर्व साधारणसे प्रार्थना है कि वे ऐसे सत्कार्यमें इसका हाथ वटावें एवं इसकी सहायता कर अपनी ही उन्नति कर लेने को प्रस्तुत होजावें । श्रीभारतधर्ममहामण्डलके व्यवस्थापक पूज्यपाद श्री १०८ स्वामी सानानन्दजी महाराजकी सहायतासे काशीके प्रसिद्ध विहा. नों द्वारा सम्पादित होकर प्रामाणिक, सुबोध और सुदृश्यरूपसे यह ग्रन्यमाला निकलेगी। ग्रन्थमालाके जो ग्रन्थ छपकर प्रकाशित हो चुके हैं उसकी सूची नीचे प्रकाशित की जाती है।

१) " " १) (३) स्थिर प्राहकों के नियम। १) इससमय हमारी पन्यमालामें निम्नलिखित पन्ध प्रका- शित हुए हैं:- मंत्रयोगसंहिता (भाषानुवाद- तृतीय स्वराड सहित) (नूतन संस्करण )२) हश्योगसंहिता 11) चतुर्थ खण्ड २) भक्तिदर्शन (भापामाप्य सहित) १) पञ्चमखण्ड २) योयदर्शन (भाषाभाष्य सहित नूत- पष्ठ खण्ड १॥ न संस्करण) ३) श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम खण्ड दैवीमीमांसादर्शन प्रथम भाग (भागभाप्यसहित) १॥ (भाषाभाष्यसहित) १) कल्किपुराण (भाषानुवाद गुरुगीता (भाषानुवाद सहित सहित) नूतनसंस्करण) D नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत शम्भुगीता(भापानुवादसहित)) (नवीन संस्करण) १) धीशगीता 1) उपदेश पारिजात (संस्कृत) | शक्तिगीता ॥) गीतावली ॥ सूर्यगीता ॥ धर्मचन्द्रिका १) विष्णुगीता 1) भारतधम्ममहामण्डल रहस्य सन्न्यासगीता 10) (नूतन संस्करण) १) रामगीता (भापानुवाद और धर्मकल्पद्रुम प्रथम खण्ड २) टिप्पणी सहित सजिल्द, २) द्वितीय सण्ड १५प्राचारचन्द्रिका १) (२) इनमेंसे जो कमसे कम ४) मूल्यकी पुस्तकें पूरे मूल्यम खरीदेंगे अथवा स्थिरयाहक होनेका चन्दा १) भेज देंगे उन्हें शेष और आगे प्रकाशित होनेवाली सव पुस्तकें मूल्यमें दी जायंगी। (३) स्थिर ग्राहकोको मालामें अथित होनेवाली हर एक पुस्तक खरीदनी होगी। जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी जायगा वह एक विद्वानोंकी कमेटी द्वारा पसन्द करा ली जायगी। ४) हर एक ग्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखाकर हमारे कार्यालयसे अथवा जहां वह रहता हो वहां हमारी शाखा हो तो वहांसे, खल्प मूल्य पर पुस्तकें खरीद सकेगा। " " - (४) (५) जो धर्मसभा इस धर्मकार्यमें सहायता करना चाहे और जो सजन इस प्रन्थमालाके स्थायी ग्राहक होना चाहे वे मेरे नाम पत्र भेजनेकी रुपा करें। गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, अध्यक्ष शास्त्रप्रकाश विभाग, श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधानकार्यालय, जगतगंज, बनारस । इस विभाग द्वारा प्रकाशित समस्तं धर्मपुस्तकोंका विवरण । सदाचारसोपान ! यह पुस्तक कोमलमति थालक बालिकाओं के धर्म शिक्षके लिये प्रथमं पुस्तक है। उर्दू और बंगला भाषामें इसका अनुवाद होकर छपचुका है और सारे भारतवर्ष में इसकी यहुत कुछ उपयोगिता मानी गयी है। इसकी सात आवृत्तियां छपचुकी हैं। अपने बच्चोंकी,धर्मशिक्षाके लिये इस पुस्तकको हर एक हिन्दूको मंगवाना चाहिये । मूल्य) एक आना। कन्याशिक्षासोपान । कोमलमति कन्याओंको धर्मशिक्षा देने के लिये यह पुस्तक बहुतही उपयोगी है । इस पुस्तकको बहुत कुछ प्रशंसा हुई है। इसका वंगला अनुवाद छप चुका है। हिन्दूमात्र को अपनी अपनी कन्याओंको धर्मशिक्षा देनेके लिये यह पुस्तक मंगवानी चाहिये। ; .. मूल्य) एक आना धर्मसोपान ! यह धर्मशिक्षा विषयक बड़ी उत्तम पुस्तक है। बालकोको इससे धर्मका साधारण शान भली-भांति होजाता है। यह पुस्तक क्या चालक वालिका, क्या वृद्ध स्त्री पुरुप, सबके लिये बहुत ही उपकारी है । धर्मशिक्षा पानेकी इच्छा करनेवाले सजन अवश्य इस पुस्तकको मंगावें। मूल्य । चार माना ब्रह्मचर्यसोपान । ब्रह्मचर्यवतकी शिक्षाके लिये यह ग्रन्थं बहुत ही उपयोगी है । सव ब्रह्मचारी पाश्रम, पाठशाला और स्कूलों में इस ग्रन्थकी पढ़ाई होनी चाहिये।. मूल्य तीन पाना साधनसोपान । यह पुस्तक उपासना और साधनशैलीको शिक्षा प्राप्त करनेमें बहुत ही उपयोगी है। इसका बंगला अनुवाद भी छपचुका है। बालक बालिकाओंको पहले ही इस पुस्तकको पंढना चाहिये। यह पुस्तक ऐसी उपकारी है कि बालक और वृद्ध समानरूपसे इससे.साधनविषयक शिक्षा लाभ कर सकते हैं। मूल्य ।) .

(१०). मूल्य ) सूर्यगीताका मूल्य ॥) शक्तिगीताका मूल्य II) धीशगीताका मूल्य ॥) शंभुगोताका मूल्य ॥) सन्न्यासंगीताका मूल्य ) और गुरुगीताका मूल्य ।) है। इनमेंसे पञ्चोपासनाकी पांचगीतानों में एक एक तीनरंगा विष्णुदेव सूर्यदेव भगवती और गणपतिदेव तथा शिवजीका चित्र भी दिया गया है। इनके अतिरिक्त शम्भुगीतामें प्रकाशित वर्णाश्रमबन्ध नामक अद्भुन और अपूर्व चित्रं भी सर्वसाधा- रणके देखने योग्य है। मैनेजर, निगमागम बुंडिपो, महामण्डलभवन, जगत्गंज वनारस.। धार्मिक विश्वकोष । (श्रीधर्मकल्पद्रुम) यह हिन्दुधर्मका अद्वितीय और परमावश्यक ग्रन्थ है । हिन्दू जातिकी पुनरुन्नतिके लिये जिन जिन आवश्यकीय विषयोंकी जरूरत है उनमेंसे सवके वड़ी भारी ज़रूरत एक ऐसे धर्मग्रन्थकी थी कि जिसके अध्ययन-अध्यापनके द्वारा सनातन धर्मका रहस्य और उसका विस्तृत स्वरूप तथा उसके अङ्ग उपांगोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो सके और साथ ही साथ वेदों और सब शास्त्रोका आशय तथा वेदों और सब शास्त्रों में कहे हुए विज्ञानोंकी यथाक्रम स्वरूप जिज्ञासुको भलीभाँति विदित हो सके। इसी गुरुतर अभावको दूर करनेके लिये भारतके प्रसिद्ध धर्मवक्ता और श्रीभारतधर्म- महामण्डलस्थ उपदेशक महाविद्यालयके दर्शनशास्त्र अध्यापक श्रीमान् स्वामी दयानन्दजीने इस ग्रन्थका प्रणयन करना प्रारम्भ किया है। इसमें वर्तमान समयके वालोच्य सभी विषय विस्तृत- रूपसे दिये जायंगे । अवतक इसके छः खण्डोंमें जो अध्याय 'प्रकाशित हुए हैं वे ये हैं:-धर्म, दानधर्म, तपोधर्ने, कर्मयज्ञ, उपा- सनायज्ञ, ज्ञानयज्ञ, महायज्ञ, वेद, वेदाङ्ग, दर्शनशास्त्र (वेदोपाङ्ग) स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, तन्नशास्त्र, उपवेदं; ऋषि और पुस्तक, 'साधारण धर्म और विशेष धर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, नारीधर्म .(पुरुषधर्मसे नारीधर्मकी विशेषता), आर्यजाति; समाज और नेता, राजा और प्रजाधर्म,प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म; आपद्धर्म, भक्ति और योग, मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग, राजयोग, गुरु और सम्बन्धी अन्य हिन्दी में पहले प्रकाशित नहीं हुआ था। भगवद्भक्तिके विस्तारित रहस्यों का प्रान इस प्रन्धके पाठ करनेसे होता है। भक्तिशालके समझनेकी इच्छा रखनेवाले और श्रीभगवान्में भक्ति कारनेवाले धार्मिकमात्रको इस ग्रन्थको पढ़ना उचित है। मूल्य १) योगदर्शन । हिन्दीभाप्य सहित । इस प्रकारका हिन्दी भाप्य और कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है । सव दर्शनों में योगदर्शन सर्व- वादिसम्मत दर्शन है और इसमें साधनके द्वारा अन्तजर्गतके सभ विषयोका प्रत्यक्ष अनुभव करा देनेकी प्रणाली रहनेके कारण इसका पाठन और भाप्य एवं टीका निर्माण वही सुचारु रूपसे फर लकता है जो योगके क्रियासिद्धांशका पारगामी हो। इस भाप्यके निर्माणमें पाठक उक्त विषयकी पूर्णता देखेगें। प्रत्येक सूत्रका भाग्य प्रत्येक सूत्रके प्रादिमें भूमिका देकर ऐसा क्रमबद्ध वनादिया गया है कि जिसले पाठकोको मनोनिदेश पूर्वक पढ़ने पर कोई असम्बद्धता नहीं मालूम होगी और ऐसा प्रतीत होगा किमहर्पिसूत्रकारने जीवोंके कमा- भ्युदय और निःश्रेयसके लिये मानो एक महान राजपथ निर्माण कर दिया है। इसका द्वितीय संस्करण छपकर तयार है इसमें इस भाष्यको और भी अधिक सुस्पष्ट, परिवर्द्धित और सरल किया गया है । मू०२) देवीमीमांसा दर्शन प्रथम भाग । वेषके तीन काण्ड हैं, यथा:-कर्मकाण्ड, उपासनालाण्ड और शानकाण्ड। ज्ञानकाण्ड- का वेदान्त दर्शन, कर्मकाण्डका जैमिनी दर्शन और भरद्वाज दर्शन और उपासनाझाएडफा पह अन्निरा दर्शन है। इसका नाम देवी- मीमांसा दर्शन है। यह अन्य आजतक प्रकाशित नहीं हुआ था। इसके चार पाद है, यथाः-प्रथम रसपाद, इस पादमें भक्तिफा विस्तारित विशान वर्णित है। दूसरा सृष्टि पाद, तीसरा स्थिति पाद और चौथा लयपाद, इग तीनों. पादोंमें दैवीमाया, देवताओंके भेद, उपासनाका विस्तारित वर्णन और भक्ति और उपासनासे मुक्तिको प्रामिका सब कुछ विधान वर्णित है। इस प्रथम भागमें इस दर्शन पालो प्रथम दो पाद हिन्दी अनुवाद और हिन्दी भाग्यलहित प्रकाशित हुए हैं। मूल्य २) डेढ़ रुपया। कक्किपुराण । कल्किपुराणका नाम फिसने नहीं सुना है। वर्त. मान समय लिये यह यधुत हितकारी ग्रन्थ है। विशुद्ध हिन्दी मनु- है (७) पाद और विस्तृत भूमिका सहित यह अन्य प्रकाशित हुआ है। धर्म जिज्ञसुमात्रको इस प्रन्यको पढ़ना उचित है। मूल्य १) नवीन दृष्टि में प्रवीण भारत । भारतकामाचीन गौरव और मार्य- जातिको महत्व जानने के लिये यह एक ही पुस्तक है। इसका द्वितीय- संस्करण परिवर्द्धित और संस्कृत होकर छप चुका मूल्य १) उपदेशपारिजात | यह संस्थत गद्यात्मक अपूर्व ग्रन्थ है । सनातनधर्म क्या है, धर्मोपदेश किसको कहते हैं, सनातनधर्मके सब शास्त्रोंमें क्या' विषय है, धर्मवक्ता होनेके लिये किन २ योग्यताओं के होनेकी आवश्यकता है इत्यादि अनेक विषय इस पन्धमें संस्थत विद्वान्मात्रको पढ़ना उचित है और धर्मवक्ता, धर्मोपदेशक, पौराणिक पण्डित मादिके लिये तो यह ग्रन्थ सव समय साथ रखने योग्य है। मूल्य 1)आठ आना इस संस्कत ग्रन्थ के अतिरिक्त संस्कृत भाषामें योगदर्शन, सांख्य दर्शन, दैवीमीमांसादर्शन आदि दर्शन सभान्य, मंत्रयोगसंहिता, हठयोगसंहिता, लययोगसंहिता, राजयोगसंहिता, हरिहरब्रह्मसाम. रस्य, योगप्रवेशिका, धर्मसुधाकर, श्रीमधुसूदनसंहिता आदि ग्रन्थ छप रहे हैं और शोब्रही प्रकाशित होनेवाले हैं। गीतावली । इसको पढ़नेसे सङ्गीतशालका मर्म थोड़े में ही समझमें आसकेगा। इसमें अनेक अच्छे, अच्छे भजनोंका भी संग्रह है। समीतानुरागी और भजनानुरागिशेको अवश्य इसको लेना चाहिये। मूल्य 1) पाठ श्राना। श्रीभारतधर्ममहामण्डलरहस्य । इस ग्रन्थमें सात अध्याय हैं, यथा-आर्यजातिकी दशाका परिवर्तन, चिन्ताका कारण व्याधिभिर्सय, औषधि प्रयोग, सुपथ्यसेवन, वीजरक्षा और महायज्ञ साधन । यह ग्रन्थरत्न हिन्दूजातिकी उन्नतिके विषयका असाधारण. ग्रन्थ है। प्रत्येक सनातनधर्मावलम्बीको इस ग्रन्थको पढ़ना चाहिये। द्वितीयावृत्ति उप चुकी है। इसमें बहुतसा विषय बढ़ाया गया है। इस ग्रन्थका आदर सारे भारतवर्ष में समान रूपसे हुआ है। धर्मके गूढ़ तत्त्व भी इसमें बहुत अच्छी तरहसे बताये गये हैं। इसका बंगला अनुवाद भी छप चुका है। मूल्य १) एक रुपया। श्रीभगवद्गीता प्रथमखण्ड । श्रीगीतांजीका. अपूर्व हिन्दी भाष्य यह प्रकाशित हो रहा है जिसका प्रथम खरड, जिसमें प्रथम अध्याय और द्वितीय अध्यायका कुछ हिस्सा है, प्रकाशित हुआ है। आजतक श्रोगीताजी पर अनेक संस्कृत और हिन्दी भाष्य प्रकाशित हुएं हैं परन्तु इस प्रकारका भाष्य आजतक किसी भाषामें प्रका- शित नहीं हुआ है। गीताका अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूतरूपी त्रिविध स्वरूप, प्रत्येक श्लोकका विविध अर्थ और सब प्रकार के अधिकारियोंके समझने योग्य गीता-विज्ञानका विस्तारित विवरण इस भाष्यमें मौजूद है। मूल्य १) एक रुपया तत्त्ववोध । भाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित। यह मूल ग्रन्थ श्रीशङ्कराचार्यकृत है। इसका वंगानुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। मूल्य ) दोआना। स्तोत्रकुसुमाञ्जलि मूल । इसमें पञ्चदेवता, अवतार और ब्रह्मकी स्तुतियोंके साथ साथ आज कलकी आवश्यकतानुसार धर्म- स्तुति, गंगादि पवित्र खादोंकी स्तुति, वेदान्तप्रतिपदक स्तुतियां और काशीके प्रधान देवता श्रीविश्वनाथादिकी स्तुतियां हैं। मूल्य ।) निगमागमचन्द्रिका । प्रथम और द्वितीय भागकी दो पुस्तके धर्मानुरागीसजनोंको मिल सकती हैं। प्रत्येक कामूल्य१) एक रुपया। पहलेके पाँच सालके पाँच भागोंमें सनातनधर्मके अनेक गूढ़ रहस्यसम्बन्धी ऐसे २ प्रवन्ध प्रकाशित हुए हैं कि आजतक वैसे धर्मसम्बन्धी प्रवन्ध और कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं। जो धर्मके अनेक रहस्य जानकर वप्त होना चाहे वे इन पुस्तकोंकों अंगावे। मूल्य पांचों भागोका २) रुपया। मैनेजर, निगमागमवुकडिपो। महामण्डलभवन, जगतगंज, वनारस। सप्त गीताएं। पञ्चोपासनाके अनुसार पाँच प्रकारके उपासकोंके लिये पाँवं गीताएं-श्रीविष्णुगीता, श्रीसूर्यगीता, श्रीशक्तिगीता, श्रीधीशगीता और श्रीशम्भुगीता एवं सन्न्यासियोंके लिये संन्यासगीता और सोधकोंके लिये गुरुगीताभापानुवाद.सहित छप चुकी हैं।श्रीभारतधर्म, महामण्डलने इन सात गीताओका प्रकाशन निम्न लिखित उद्देश्योंसे ( 8 ) चिया हैं:-१ म, जिस साम्प्रदायिक विरोधते उपासनेने धर्म के नामसे ही धर्म सश्चित करनेकी अवस्थामें पहुंचा दिया है, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासकोको अहंकारत्याशी होनेके स्थानमें बोर लास्प्रदायिक अहंकारसम्पन्न बना दिया है, भारतकी वर्तमान दुर्दशा जिल साम्प्रदायिक विरोधका प्रत्यक्ष फल है और जिस साम्प्र- दायिक विरोधने साकार-उपासकोंमें घोर द्वेपदावानल प्रज्वलित कर दिया है उस साम्प्रदायिक विरोधका समूल उन्मूलन करना और २ य, उपासनाके नामसे जो अनेक इन्द्रियासक्तिको चरितार्थना- के घोर अनर्थकारी कार्य होते हैं उनका समाजमें अस्तित्व न रहने देना तथा ३ य, समाजमें यथार्थ भगवद्भक्तिके प्रचार द्वारा इह- लौकिक और पारलौकिक अभ्युदय तथा निःश्रेयस-प्राप्तिकी अनेक सुविधाओका प्रचार करना । इन सातो गीताओंमें अनेक दार्शनिक तस्व, अनेक उपासनाकाण्डके रहस्य और प्रत्येक उपास्य देवकी उपासनाले सम्बन्ध रखनेवाले विषय सुचारुरूपसे प्रतिपादित किये गये है । ये सातो गीताएं उपनिपद्रूप हैं । प्रत्येक उपासक अपने उपास्पदेवकी गीतासे तो लाभ उठावेगा ही, किन्तु, अन्य चार गीताोके पाउ'फरनेसे भी वह अनेक उपासनातत्त्वोंको तथा अनेक वैज्ञानिक रहस्योंको जान सकेगा और उसके अन्तःकरणमें प्रचलित साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे जैसा विरोध जदय होता है वैसा नहीं होगा और वह परमशान्तिका अधिकारी हो सकेगा। संन्यास- गीतामें :सव सम्प्रदायोंके साधु और सन्यासियोंके लिये सव बानने योग्य विपय सन्निविष्ट है । सन्न्यासिगण इसके पाठ करनेसे विशेष ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। गृहस्थोके लिये भी यह ग्रन्थ धर्म- शानका भाण्डार है । श्रीमहामण्डलप्रकाशित गुरुगीताके सदृश अन्थ श्राज तक किसी भाषामें प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें गुरु-शिष्य- लक्षण, उपासनाका रहस्य और भेद, मन्त्र हठ लय और राजयोगोंके लक्षण और अङ्ग एवं गुरुमाहात्म्य, शिज्यकर्त्तव्य, परम तत्त्वका स्वरूप और गुरुशब्दार्थ आदि सव विषय स्पष्टरूपसे हैं । मूल, स्पष्ट सरल और सुमधुर भाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित यह ग्रन्थ छपा है । गुरु और शिष्य-दोनोफा उपकारी यह ग्रन्थ है। इसका अनुवाद चंगभाषामें भी छप चुका है। पाठक इन सातों गीताओंको मंगाकर देख सकते हैं, ये छप चुकी हैं। विष्णुगीताको ( १० ) मुल्य ) सूर्यगीताका मूल्य ॥) शक्तिगीताका मूल्य 1) धीशगीताका मूल्य ॥) शंभुगोताका मूल्य ॥) सन्न्यासंगीताका मूल्य ॥) और गुरुगीताका मूल्य ।) है। इनमेंसे पञ्चोपासनाकी पांचगीताओमें एक एक तीनरंगा विष्णुदेव सूर्यदेव भगवती और गणपतिदेव तथा शिवजीका चित्र भी दिया गया है। इनके अतिरिक शम्भुगीतामें प्रकाशित वर्णाश्रमवन्ध नामक अद्भुन और अपूर्व चित्रं भी सर्वसाधा- रणके देखने योग्य है। मैनेजर, निगमागम बुडिपो, महामण्डलभवन, जगतगंज वनारस.। धार्मिक विश्वकोष । (श्रीधर्मकल्पद्रुम) यह हिन्दुधर्मका अद्वितीय और परमावश्यक ग्रन्थ है। हिन्दू जातिकी पुनरुन्नतिके लिये जिन जिन आवश्यकीय विषयोंकी जरूरत है उनमेसे सबके बड़ी भारी ज़रूरत एक ऐसे धर्मग्रन्थकी थी कि जिसके अध्ययन अध्यापनके द्वारा सनातन धर्मका रहस्य और उसका विस्तृत स्वरूप तथा उसके श्रङ्ग 'उपांगोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो सके और साथ ही साथ वेदों और सव शास्त्रोका आशय तथा घेदों और संव शास्त्रोंमें कहे हुए विज्ञानोंका यथाक्रम स्वरूप जिज्ञासुको भलीभाँति विदित हो सके। इसी गुरुतर अभावको दूर करनेके लिये भारतके प्रसिद्ध धर्मवक्ता और श्रीभारतधर्म- महामण्डलस्थ उपदेशक महाविद्यालयके दर्शनशास्त्र अध्यापक श्रीमान् स्वामी दयानन्दजीने इस ग्रन्थका प्रणयन करना प्रारम्भ किया है। इसमें वर्तमान समयके आलोच्य सभी विपय विस्तृत- रूपसे दिये जायंगे । अवतक इसके छः खण्डोंमें जो अंध्याय प्रकाशित हुए हैं वे ये हैं:-धर्म, दानधर्म, तपोधर्ने, कर्मयज्ञ, उपा- सनायश, ज्ञानयश, महायज्ञ, वेद, वेदाङ्ग, दर्शनशास्त्र (वेदोपाङ्ग) स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, तन्त्रशास्त्र, उपवेद, ऋपि और पुस्तक, साधारण धर्म और विशेष धर्म, वर्णधर्म, श्राश्रमधर्म, नारीधर्म (पुरुषधर्मसे नारीधर्मकी विशेषता), आर्यजाति, समाज और नेता, राजा और प्रजाधर्म,प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म, आपद्धर्म, भक्ति और योग, मन्नयोग, हठयोग, लययोग, राजयोग, गुरु और (११) दीक्षा, वैराग्य और साधन, आत्मतत्त्व, जीवतत्त्व, प्राण और पीठतत्त्व, सृष्टि स्थितिप्रलयतश्च,ऋषि देवता और पितृतत्व, अवतारतत्व,माया तत्त्व, त्रिगुणतत्त्व, त्रिभावतत्त्व, कर्मतत्त्व, मुक्तितत्त्व, पुरुषार्थ और घर्णाश्रमलमीता, दर्शनसमीक्षा, धर्मसम्प्रदायसमीक्षा, धर्मपन्यस- मीक्षा और धर्ममत समीक्षा। श्रागेके खण्डोंमें प्रकाशित होनेवाले अध्यायोंके नाम ये हैं:-साधन समीक्षा, चतुर्दशलोकसमीना, कालसमीक्षा, जीवन्मुक्ति-समीक्षा, सदाचार, पञ्च महायश, आह्नि- कछत्य,, पोडश संस्कार, श्राद्ध, प्रेतत्व और परलोक, सन्ध्या, तर्पण, ओंकार-महिमा और गायत्री, भगवन्नाम माहात्म्य, वैदिक मन्त्रों और शास्त्रोका अपलाप, तीर्थ महिमा, सूर्यादिग्रहपूजा, गोसे- वा, संगीत-शास्त्र, देश और धर्म सेवा इत्यादि इत्यादि। इस अन्यसे आजकलके अशास्त्रीय और विज्ञानरहित धर्मग्रन्थों और धर्मप्रचारके द्वारा जो हानि हो रही है वह सब दूर होकर यथार्थ रूपसे सनातन वैदिक धर्मका प्रचार होगा। इस, अन्यरत्नमें साम्प्रदा- यिक पक्षपातका लेशमात्र भी नहीं है और निप्पक्षरूपसे सर्व विषय प्रतिपादित किये गये हैं जिससे सकल प्रकारके अधिकारी कल्याण प्राप्त कर सकें। इसमें और भी एक विशेषता यह है कि हिन्दुशास्त्र के सभी विज्ञान शास्त्रीय प्रमाणों और युक्तियोंके सिवाय, आजकल की पदार्थ विद्या ( Science ) के द्वारा भी प्रतिपादित किये गये हैं, जिससे आजकलके नवशिक्षित पुरुपंभी इससे लाभ उठा सकें। इसकी भाषा सरल, मधुर और गम्भीर है । यह ग्रन्थ चौसठ अध्याय और आठसमुल्लासौमें पूर्ण होगा और यहवृहत् ग्रन्ध रायल साइजके चार हजार पृष्ठोसे अधिक होगा तथा वारह खण्डोंमें प्रकाशित होगा। इसीके अन्तिम खण्डमें श्राध्यात्मिक शब्दकोष भी प्रकाशित करनेका विचार है। इसके छः खण्ड प्रकाशित हो चुके है। प्रथम खण्डका मूल्य २), द्वितीय का १, तृतीयके छितीय संस्करणका र), चतुर्थका २) पंचमका २) और पठका १॥) है। इसके प्रथम दो खण्ड बढ़िया कागज पर भी छापे गये हैं और दोनों ही एक बहुत सुन्दर जिल्दमें वांधे गये हैं। मूल्य ५) है। लावाँ खएड यन्त्रस्थ है। मैनेजर, निगमागम वुडिपो, महामण्डलभवन, जगत्गंज, बनारस ।

(१२) श्रीरामगीता । पह सर्वजीवहितकर उपनिषद् ग्रन्थ प्रयतफ श्रमकाशित था। श्री महर्षि वशिष्टकृत 'तत्व सारायण' नामक एक विराट ग्रन्थ है, उसीके अन्तर्गत यह गीता है। इसके १८ अध्याय है, जिनके नाम इस प्रकार हैं, १-अयोध्यामण्डपादिवर्सन, २-प्रमाणसारविवरण, ३-शान योगनिरूपण, ४-जीवन्मुक्तिनिरूपण, ५-विदेहमुक्तिनिरूपण, ६-चाल नाक्षयादिनिरूपण, सप्तभूमिकानिरूपण,-समाथिनिरूपण.ह-वर्ण- भ्रमव्यवस्थापन, १०-कर्मविभागयोगनिरूपण, ११-गुणत्रयविभोग- चोगनिरूपण, १२-विश्वरूपनिरूपण, १३-तारकप्रणव विभागयोग, १४-महावाक्यार्थविवरण, १५-नवचक्रविवेकयोगनिरूपण, १६-श्र- णिमादिसिद्धिदूषण; १७-विद्यासन्ततिगुरुतत्त्वनिरूपण, १८-सर्वा- ध्यायसमातिनिरूपण । कर्म, उपासना और शानका अद्भुत साम जस्य इस ग्रन्थमें दिखाया गया है। विपयोंके स्पष्टीकरणके लिये ग्रन्थमें ७त्रिवर्ण चित्र भी दिये गये हैं। चे इस प्रकार हैं-१ श्री राम, सीतामाता, वीरलक्ष्मण, २-श्री राम, लक्ष्मण और जटायु, ३-श्रीराम, सीता और हनूमान् , ४-वृहत् श्रीराम- पञ्चायतन, ५-श्रीसीताराम, ६-श्रीरामपञ्चायतनं, ७-श्रीसम हनुमान् । इनके सिवाय इसके सम्पादक स्वर्गीय श्रीदरवार महा- रावल बहादुर डूंगरपुर नरेश महोदयका भी हाफ टोन चित्र छापा गया है। बढ़िया कागज पर सुन्दर छपाई और मजबूत जिल्दवन्दी भी हुई है। स्वर्गीय महारावल वहादुरने बड़े परिश्रमसे इस ग्रन्थका सरल हिन्दी भापामें अनुवाद किया है और उनके पूज्यपाद गुरुदे- वने अति सुन्दर वैज्ञानिक टिप्पणियाँ लिखकर ग्रन्थको सर्वात सुन्दर बनाया है। ग्रन्थके प्रारम्भमें जो भूमिका दी गई है, उसमें श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रकी समालोचना अलौकिक रीति पर की गई है जिसके पढ़नेसे पाठक कितनेही गूढ़ रहस्योंका परिचय पा जायंगे। अाज तक ऐसा ग्रन्थ प्रकाशित न होनेसे यह अप्राप्य और अमूल्य है। श्राशा है, लर्घ साधारण इसका संग्रह कर नित्यपाठ हर और इसमें उलिखत तत्त्वोंका चिन्तन कर फर्म, उपासना और मानके अद्भुत सामञ्जस्यका अलभ्य लाभ उठायेंगे और धीमारतधर्म महामएलके शासप्रकाशक विभागको अनुगृहीत करेंगे। मूल्य २)। गनर -निगमागम कडिपो, महामण्डलभवन, जगतगंज, बनारसे ।

। ( १३ ) धर्मचंद्रिका---एन्टेस क्लासके यालकोंके पाठनोपयोगी उत्तम धर्मपुस्तक है। इसमें सनातन धर्मका उदार सार्वभौम स्वरूप- वर्णन, यज्ञ, दान, तप मादि धर्माङ्गोका विस्तृत वर्णन, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, नारधर्म, मार्यधर्म, राजधर्म तथा प्रजाधर्म के विषयमें बहुत कुछ लिखा गया है। कर्मविज्ञान, सन्ध्या, पञ्च महायज्ञ आदि नित्यकर्मोका वर्णन, पोडश संस्कारके पृथक् पृथक वर्णन और संस्कार शुद्धि तथा क्रिया शुद्धि द्वारा मोक्षका यथार्थ मार्ग निर्देश किया गया है। इस प्रन्थके पाठसे छात्रगण धर्मतत्त्व अवश्य ही अच्छी तरहसे जान सकेंगे। मूल्य ) आचारचंद्रिका--यह भी स्कूलपाठ्य सदाचारसंबन्धीय धर्म- पुस्तक है। इसमें प्रातः कालसे लेकर रात्रिमें निद्राके पहले तक क्या क्या सदाचार किसलिये प्रत्येक हिन्दुसन्तानको अवश्य ही पालने चाहिये, इसका रहस्य उत्तम रीतिसे यताया गया है और आधुनिक समय के विचारसे प्रत्येक आवार पालमका वैज्ञानिक कारणा भी दिखाया गयो है। यह अन्य बालकोंके लिये अवश्य ही पाठ करने योग्य है। मूल्य । अंग्रेजी भाषाके धर्मग्रन्थ । श्रीभारतधर्ममहामण्डल शास्त्रप्रकाशक विभाग द्वारा प्रकाशित सा संहिताओं, गीताओं और दार्शनिक ग्रन्थोफा अंग्रेजी अनुवाद तयार हो रहा है ओ क्रमशः प्रकाशित होगा। सम्प्रति अंग्रेजी भाषामें एक ऐसा प्रन्थ छप गया है जिसके द्वारा सब अंग्रेजी पढ़े व्यक्तियोंको सनातन धर्मका महत्त्व, उसका सर्वजीवहितगारी खरूप, उसके सब अहाँका रहस्य, उपासनातत्त्व, योगतत्व, काल और सृष्टि तत्त्व, क्रर्म तत्व, वर्णाश्रमधर्मतत्त्व इत्यादि सब बड़े बड़े विषय अच्छी तरह समझमें आ जावें। इसका नाम "वर्ख स इंटरनल रिलिजन है। इसकामूल्य राबतएडीशनका) और साधारणका ३) है। दोनों में जिन्द बंधी हुई हैं और सात त्रिवर्ण चित्र भी दिये हैं। मैनेजर, निगमागम धुडीपो 'महामण्डलभवन, जगतगंज बनारस । , .

( १४ ) विविध विषयोंकी पुस्तकें । असभ्यरमणी ) अनार्यसमाजरहस्य ) अन्त्येष्टिक्रिया ।) श्रानन्द रघुन दन नाटक " प्राचारप्रवन्ध १) इङ्गलिशग्रामर ।) उपन्याल कुसुम ). एकान्तवासी योगी ) कल्किपुराण उर्दू ॥). कार्तिकप्रसादकी जीवनी) काशीमुक्ति विवेका) गोवंशचिकित्सा।) गोगीतावली -) ग्वीसेफमेजिनी।) जैमिनीसूत्रं ।) तर्कसंग्रह ।।) दुर्गेश- नन्दिनी द्वितीय भाग )देवपूजन) देशीकरघा धनुर्वेद संहिता।) भधीन रत्नाकर भजनावली)। न्याय दर्शन ) पारिवारिक प्रवन्धर) प्रयाग माहात्म्य ॥4). प्रवासी :)..वारहमासी) बालहित )। भक्तसर्वख ) भंजनगोरक्षाप्रकाश मलरी) मानस मञ्जरी ।) मेगास्थनीजका भारतवर्षीय वर्णन =) मङ्गलदेव पराजय'-) रागरत्नाकर २) रामगीता ) राशिमाला ॥ वसंतश्कार ) वारेन्हेस्टिङ्गकी जीवनी १) वीरबाला ॥) वैष्णवरहस्य ) शारीरिक- भाष्य ।) शास्त्रीजीके दो व्याख्यान -) सारमञ्जरी)सिद्धान्तकौमुदी २)सिद्धान्तपट ) सुजान चरित्र २) सुनारी।) सुवोध व्याकरण ।) 'सुश्रुत संस्कृत ३) संध्यावन्दन भोप्य हनुमजोतिष) हनुमान- चालीसा )। हिन्दी पहिली किताघ । क्षत्रियहितैषिणी) नोट-पचीस रुपयोंसे अधिककी पुस्तक खरीदनेवालेको योग्य कमी- शंन भी दिया जायेगा। शीघ्र छपने योग्य ग्रन्थ-हिन्दी साहित्यकी पुष्टिके अभिप्रायले तथा धर्मप्रचारकी शुभ वासनासे निम्नलिखित ग्रन्थ छापनेको तैयार हैं यथाः-भरद्वाजकृत कर्ममीमांसादर्शनके भाषाभाष्यका प्रथम खंज, -सांख्यादर्शनका भाषाभाप्य। मैनेजर, निगमागम.बुडीपो, महामण्डलभवन, जगत्गंज, बनारस,। श्रीमहामण्डलका शास्त्र प्रकाशकविभाग । यह विभाग बहुत विस्तृत है । अपूर्वसंस्कृत, हिन्दी, बंगला और अंग्रेजीकी 'पुस्तके काशी प्रधान कार्यालय जगत्गंज में मिलती हैं और उर्दूसिरीज फीरोजपुर (पाब.) दफ्तरमें मिलती है और इसी प्रकार अन्यान्य प्रान्तीय कार्यालयों में प्रान्तीय भाषाओके ग्रन्थोंका प्रवन्ध हो रही है। लेनेटरी श्रीभारतधर्म महामण्डल, जगतगंज, बनारस! .

-- ( १५ ) श्रीमहामण्डलस्थ उपदेशक-महाविद्यालय । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधानकार्यालय काशीमें साधु और गृहस्थ धर्मवक्ता प्रस्तुत करनेके अर्थ श्रीमहामण्डल उपदेशक महा- विद्यालय नामक विद्यालय स्थापित हुश्रा है । जो साधुगण दार्शनिक और धर्मसम्बन्धी ज्ञान लाभ करके अपने साधु जीवनको हातकृत्य करना चाहे और जो विद्वान् गृहस्थ धार्मिक शिक्षा लाभ करके धर्म- प्रचार द्वारा देशकी सेवा करते हुए अपना जीवन निर्वाह करना चाहें वे निम्मलिखित पते पर पत्र भेजें। प्रधानाध्यक्ष, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधान कार्यालय, जगत्गंज, बनारस (छावनी)। श्रीभारतधर्म महामण्डलमें नियमित धर्मचर्चा | श्रीभारतधर्ममहामण्डल धर्मपुरुषार्थमें जैसा अग्रसर हो रहा है, सर्वत्र प्रसिद्ध है। मण्डलके अनेक पुरुषार्थों में 'उपदेशक महा- • विद्यालय की स्थापना भी गणना करने योग्य है। अच्छे धाम्मिक वक्ता इसमें निर्माण हुए, होते हैं और होते रहेंगे ऐसा इसका प्रबन्ध हुआ है। अब इसमें दैनिक पाठ्यक्रमके अतिरिक्त यह भी प्रबन्ध हुआ है कि रात्रिके समय महीनेमें दस दिन व्याख्यान-शिक्षा, दस दिन शास्त्रार्थ-शिक्षा और दस दिन सङ्गीत-शिक्षा भी दी जाया करे. वक्तृताके लिये संगीतका साधारण ज्ञान होना आवश्यक है और इस पंचम वेदका (शुद्ध सङ्गीतका) लोप हो रहा है। इस कारण व्याख्यान और शास्त्रार्थ-शिक्षाके साथ सङ्गीत-शिक्षाका भी समा- वेश किया गया है। सर्व साधारण भी इस धर्मचर्चाका यथा 'समय उपस्थित होकर लाभ उठा सकते हैं। निवेदक-सेक्रेटहरी महामण्डल, जगत्गंज, वनारस। हिन्दूधार्मिक विश्वविद्यालय । (श्री शारदामण्डल) हिन्दु जातिकी विराष्ट्र धर्मसभा श्रीभारतधर्ममहामण्डलका 'यह विद्यादान विभाग है। वस्तुतः हिन्दुजातिके पुनरभ्युदय और हिन्दुधर्मको शिक्षा सारे भारतवर्ष में लानेके लिये यह विश्व- . ।

( १६ ) विद्यालय स्थापित हुआ है। इसके प्रधानतः निम्न लिखित पाँच कार्य विभाग है। (१) श्री उपदेशक महाविद्यालय (हिन्दू कालेज प्रोफ डिवि- निटी ) इस महाविद्यालय के द्वारा योग्य धम्मशिक्षक और धर्मा- पदेशक तैयार किये जाते हैं। अंग्रेजी भाषाके वी० ए० पाल अथवा संलन भाषाके शास्त्री आचार्य आदि परीक्षाओंकी योग्यता रखने- वाले परिडत ही छान रूपसे इस महाविद्यालयमें भरती दिये जाते है। छात्रवृत्ति २५) माहवार तक दी जाती है। (२) धम्मंशिक्षाविभाग। इस विभागके द्वारा भारतवर्ष के प्रधान प्रधान नगरों में ऊपर लिस्नित महाविद्यालयसे परीक्षोत्तीर्ण एक एक पण्डित स्थायीरूपसे नियुक्त करके उक्त नगरों के स्कूल, कालेज और पाठशालाओं में हिन्दुधर्मकी धार्मिक शिक्षा देनेका प्रबन्ध किया जाता है। वे परिडतगण उन नगरोंमें सनातनधर्मका प्रचार भी करते रहते हैं। ऐसा प्रबन्ध किया जा रहा है कि जिसखे महामण्डलके प्रयलसे सव बड़े बड़े नगरोंमें इस प्रकार धर्म केन्द्र स्थापित हो और वहाँ मासिफ सहायता भी महामण्डलकी ओरसे दी जाय। (३) श्री आर्यमहिलामहाविद्यालय भी इसी शारदामण्डलका अंग समझा जायगा और इस महाविद्यालयमें उच्च जातिकी विधवाओं के पालन पोषणका पूरा प्रयन्ध करके उनको योग्य माँ- पदेशिका, शिक्षयित्री प्रौर गवर्नेस आदिके काम करने के उपयोगी । बनाया जायगा। (४) सर्वधर्मसदन (हाल आफ पाल रिलिजन्स ) इस नामले यूरोए-महायुद्धके बादको शान्ति के स्मारक रूपसे एक संस्था स्थापित करनेका प्रबन्ध हो रहा है। यह संस्था श्रीमहामण्डलके प्रधान कार्यालय तथा उपदेशक महाविद्यालय निकट ही स्थापित होगी। इस संस्थाके एक और सनातन धर्म के अतिरिक्त सब प्रधान २ धर्ममतोंक उपासनालय रहेंगे जिनमें उक्त धम्मों के जाननेवाले एक एक विद्वान् रहेंगे। दूसरी ओर सनातनधर्मके पञ्चोपासनायो पाँच देवस्थान और लीलावियह उपासना मादिके विमन्दिर रहेंगे। इसो संस्थामें एक वृहत् पुस्तकालय रहेगा कि जिसमें पृथियो सरक र धर्ममतोंके धर्मग्रन्थ रपये जायंगे मोर इसी संस्थाले . (१७) संश्लिष्ट एक व्याख्यानालय और शिक्षालय (हाल) रहेगा जिसमें उक्त विभिन्न धम्मों के विद्वान् तथा सनातन धर्म के विद्वान्गमा यथाक्रम व्याख्यानादि देकर धर्मसम्बन्धीय अनुसन्धान तथा धर्मशिक्षा- 'कार्य की सहायता करेंगे। यदि पृथिवीके अन्य देशील कोई विद्वान् फाशीमें आकर इस सर्वधर्मनंदनमें दार्शनिक शिक्षा लाभ करना चाहेंगे तो उसका भी प्रयत्न रहेगा। (५) शास्त्र प्रकाश घिमाम | इस विभागका कार्य स्पट ही है। इस विभागसे धर्मशिक्षा देनेके उपयोगी नाना भाषाओंकी पुस्तकें तथा. सनातनधर्मको संब उपयोगी मौलिक पुस्तक प्रकाशित हो रही हैं और होगी। इस प्रकारमे पाँच कार्यविभाग और संस्थाओंमें विभक्त होकर -श्री शारदामण्डल- सनातनधर्मावलम्बियोंकी सेवा और उन्नति करनेमें प्रवृस रहेगा। प्रधान मंत्री श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, बनारसं। श्रीमहामण्डल के सभ्योंको विशेष सुविधा। हिन्दू समाजकी एकता और सहायता के लिये विराट् बायोजन । श्रीभारतधर्ममहामण्डल हिन्दू जातिकी अद्वितीय . थममहा- सभा और हिन्दू समाजर्की उन्नति करनेवाली भारतवर्ष के सात मान्त व्यापी संस्था है। श्रीमहामण्डल के सभ्य महोदयोंको केवल धर्म शिक्षा देना ही इसका लक्ष्य नहीं है। किन्तु हिन्दू समाजका उन्नति, हिन्दूसमाजमी हढ़ता और हिन्दू समाज पारस्परिक प्रेम और संहायताकी वृद्धि करना भी इसका प्रधान लक्ष्य है इस. कारण निम्नलिखित नियम श्रीमहामण्डलकी -अन्ध-कारिणी सभाते. बनाये है। इन नियमों के अनुसार जितने अधिक संख्यक सभ्य महामरलमें सम्मिलित होगे उतनी ही अधिक सहायता महामण्डल के. संस्थ महोदयोंको मिल सकेगी। ये नियम ऐसे सुगम और, लोकहितकर धनाये गये हैं कि श्रीमहामण्डखोजो, सभ्य झगे उनके परिवारको घड़ी भारी:एककालिक द्वानकी सहायता प्राप्त हो सकेगो । वृत्त मान हिसमाज जिस प्रकार दरिद होमया है उसके अनुसार श्रीमक्ष- भण्डलके ये नियम हिनासमाजके लिये बहुत ही हितकारी हैं, इसमें सन्देह नहीं।

(१८) श्रीमहामण्डलके मुखपत्रसम्बन्धी उपनियम | (१) धर्मशिक्षाप्रचार, सनातनधर्मचर्चा, सामाजिक उन्नति, माद्रिद्याविस्तार, भीमहामण्डलके कार्यों के समाचारोंकी प्रग्निद्धि और सभ्योंको यथासम्भव सहायता पहुचाना आदि लक्ष्य रखकर श्रीमहामण्डल के प्रधान कार्यालय द्वारा भारत के विभिन्न प्रान्ती- में प्रवलिन देशमापायोंमें मासिकपत्र नियमित रूपसं प्रचार किये जायेंगे। (२) अभी केवल हिन्दी और अंगरेजी-इन दो भागो के दो मासिकपत्र प्रधान कार्यालयसे प्रकाशित हो रहे हैं। यदि इन नियमों के अनुसार कार्य करनेपर विशेष सफलता और सभ्योंकी विधेय इच्छा पाई जायगी तो भारतके विभिन्न प्रान्तोकी देवा भाषाओं में भी क्रमशः मासिकपत्र प्रकाशित करनेका विचार रखा गया है। इन मासिकपत्रीमेसे प्रत्येक मेम्बरको एक एक मासिक- पत्र, जो वे चाहेंगे, विनामूल्य दिया जायगा। कमसे कम दो हजार सम्म महोदयगण जिस भाषाका मासिकपत्र चाहेंगे, उसी भाषामें मासिकपत्र प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया जायगा, परन्तु जबतक उस भाषाका मासिकपत्र प्रकाशित न हो तबतक श्रीमहा- शेगडलका हिन्दी अथवा. अंगरेजीका - मासिफपत्र 'घिना मल्य दिया जायगा। (३) श्रीमहामण्डलके साधारण सभ्योको वार्षिक दो रुपये चन्दा देनेपर इन नियमोंके अनुसार सब सुविधा प्राप्त होगी। श्रीमहामण्डलके अन्य प्रकार के सभ्य जो धम्मो नति और हिन्दू- समाजकी सहायता के विचारसे अथवा अपनी सुविधाके विचारले इस विभाग स्वतन्त्र रीतिसे कमसे कम २ दो रुपये वार्षिक नियमित चन्दाग वे भी इस कार्यविभागकी सय सुविधाएँ प्रात कर सकेंगे। (४) इस विभाग के रजिस्टरदर्ज सभ्योंको . श्रीमहामण् दलक अन्य प्रकार सभ्योंकी रीतिपर श्रीमहामण्डलस सम्बन्धयुक्त मर पुस्तकादि अपेक्षाभतं स्वल्प मूल्यपर मिला करेंगी। समाजहितकारी कोप. (चा, दोष श्रीमहामण्झ्लके सब प्रकारके सभ्योंक-तो इनमें (१६) सम्मिलित होंगे-निर्वाचित व्यक्तियोंको आर्थिक सहायताके लिये खोला गया है) (५) जो संभ्य प्रतिवर्ष नियमित चन्दा देते रहेंगे उनके देहान्त होने पर जिनका नाम वे दर्ज करा नायंगे, श्रीमहामण्डलके इस फोप द्वारा उनकी प्रार्थिक सेहायता मिलेगी। (६) जो मेम्बर कममे फम तीन वर्ष तक मेम्बर रहकर लोका- सरित हुए हों, केवल उन्होंने निर्वाचित व्यक्तियोको इस समाज- हितकारी कांपकी सहायता प्राप्त होगी, अन्यथा नहीं दी जायगी। (७) यदि कोई सभ्य महोदय अपने निर्वाचित व्यक्तिक नामको श्रीमहामण्डल प्रधानकार्यालय के रजिस्टरमें परिवर्तन कराना चाहेंगे तो ऐसा परिवर्तन एकवार बिना किसी व्ययके किया जायगा। उसके बाद वैसा परिवर्तन पुनः कराना चाहे तो ।) भेजकर परि- वर्शन करा सकेंगे। (3) इस दिभागमें साधारण सभ्यों और इस कोषके सहायक मन्यांत्य सभ्योकी ओरसे प्रतिवर्ष जो आमदनी होगी उसका माधा 'अंशं श्रीमहामण्डलके छपाई-विभांगको मासिकपत्रोंकी छपाई और प्रकाशन मांदि कार्यके लिये दिया जायगावाकी बांधा रुपया एक खतन्त्र कोपमे रक्खा जायगा जिस कोषका नाम "समाजहितकारी कोप" होगा। (2) “समाजहितकारी कोप" का रुपया बैंक आफ बंगाल अंथवा ऐसे ही विश्वस्त-वैको रक्सा जायगा। १०) इस कोपके प्रबन्धके लिये एक मास कमेटी रहेगी। (११) इस कोपकी प्रामक्ष्मीका प्राधां रुपया प्रतिवर्ष इस कोपके सहापक जिन मेम्बरोकी मृत्यु होगी, उनके -निर्वाचित न्य- कियों में समानरूपसे बाँट दिया जायगा। (१२) इसकोपमें बाकी आथे रुपयों के जमा रसनेसे जो लाभ होगा, उससे श्रीमहामण्डलके कार्यकर्तामो तथा मेघरोके क्लेशको विशेष कारण उपस्थित होनेपर उन क्लेशोंको दूर करनेके लिये कमेटी व्यय कर सकेगी। (१३) किसी मेम्बरकी मृत्यु होनेपर वह मेम्बर यदि किसी .महामण्डलकी शाखांसभाका सभ्या हो अथवा किसी शाखासभाके निकटवर्ती स्थान में रहनेवाला हो तो उसके निर्वाचित व्यक्तिका - ( २० ) फर्ज होगा कि वह उक्त शाखासमाफी कमेटीके मन्तव्यकी नकल श्रीमहामण्डल प्रधान कार्यालयमें भिजवाये। इस प्रकारसे शाम्बा सभाके मन्तव्यकी नकल मानेपर, फमेटी समाजहितकारी कोपस सहायता देनेके विषयमे निश्चय पगो। (१४) जहाँ कहाँ सभ्योको इस प्रकारकी शाखासभाकी सहायता नहीं मिल सकती है या जहाँ कहीं निकट शाखासमा नहीं है ऐसी दशामें उस प्रान्तके श्रीमहामण्डलके प्रतिनिधियों में से किमीके अथवा किसी देशी रजवाड़ोमें हो तो उक्त दर्वारके पृधान कर्मचारीका सार्टिफिकेट मिलनेपर सहायता देनेका परन्ध किया जायगा। (१५) यदि कमेटी उचिस समझेगी तो बाला २ खबर मंगाकर सहायता दानका प्रबन्ध करेगी, जिससे कार्यमें शीघ्रता हो । अन्यान्य नियम । (१६) महामण्डलके अन्य प्रकारके सभ्योमेंसे जो महाशय हिन्दुसमाजकी उन्नति और दरिदौकी सहायताके विचारसे इन कोगमें कममं कम २) दो रुपये सालाना सहायता फरनेपर भी इस: फण्डसं फायदा उठाना नहीं चाहेंगे वे इस फो के परिपोषक समझे जायंगे और उनकी नामावली, ध यवादसहित प्रकाशित की जायगी। (१७) हर एक साधारणं मेम्बरको याहे स्त्री हो या पुरुष पृधान कार्यालयसे एक प्रमाणपत्र-जिसपर पञ्चदेवताओंको मूर्ति और कार्यालयकी मुहर होगी-साधारण मेम्परके प्रमाणपसे दिया जायगा। • (१%) इसे विभागमें जो चन्दा देंगे उनका नाम नम्बर सहित हर वर्ष रसीदके तौरपर वे जिस भाषाका मासिकपत्र लंगे उसमें बापा जायगा। यदि पानी से किसीका नाम न छपे तो उनका फर्ज होगा कि प्रधान कार्यालयमें पत्र भेजकर अपना नाम स्वावं गंकि यह नाम छपना ही रसीद समझी जायगी । (२) प्रतिवर्षयता चन्दा २) मेमार महाशयोको जनवर्ग महीनो सागामी भेज देना होगा। यदि किसी कारण विनिमय जसमा मन्ततक रुपमान मावे तो लौर एक मास अर्थात पारवटी ( २३ ) महापरिषत्सम्बन्धी पत्र आदि सब निम्नलिखित पतेपर आने चाहिये। कार्याध्यक्ष, आर्यमहिला तथा महापरिपत्कार्यालय, श्रीमहामण्डल भवन, जगत्गल, वनारस । आयमहिला महाविद्यालय । इस नामका एक महाविद्यालय (कालेज) जिसमें विधवा आश्रम भी शामिल रहेगा श्री आर्यमहिला हितकारिणी महापरिषद् नामक सभाके द्वारा स्थापित हुआ है जिसमें सत्कुलोद्भव उच्च जातिकी विधवाएँ मासिक १५) ले २०) तक वृत्ति देकर भरती की जाती हैं और उनको योग्य शिक्षा देकर हिन्दू धर्मकी उपदेशि- का, शिक्षयित्री श्रादि रूपसे प्रस्तुत किया जाता है। भविष्यत् जीविकाका उनके लिये यथायोग्य प्रवन्ध भी किया जाता है। इस विषयमें यदि कुछ अधिक जानना चाहे तो निम्नलिखित पतेपर पत्र व्यवहार करें। प्रधानाध्यापक-श्रार्यमहिला महाविद्यालय महामण्डल भवन जगत्गंज वनारस। बंगलाके धर्मग्रन्थ । . श्रीमहामण्डल प्रकाशित बंग भाषाके धर्मग्रन्थ फलकत्ता प्रान्तीय कार्यालयसे यहां मंगालिये गये हैं उनकी नामावली निम्न- लिखित है। मन्त्रयोग संहिता 1) पुराण तत्त्व 11) जातीय महायज्ञ साधन ॥ धर्म देवीमीमांसा दर्शन १म खण्ड साधन तत्त्व गुरुगीता जन्मान्तर तत्त्व ॥ तत्त्ववोध NI) साधन सोपान १) सदाचार सोपान 'सदाचार शिक्षा 13) कन्याशिक्षा सोपान नीतिशिक्षा (यन्त्रस्थ) मैनेजर निगमागम चुकडीपो- महामण्डलभवन जगतगंज काशी। ८ M] 1) आर्यजाति a) नारी धम 12121 ( २४ ) प्रतिदिन सत्संग। श्रीमहामण्डलमें नित्य धर्मचर्चा । - धर्मविज्ञानवृद्धि और प्रतिदिन सत्संगके. विचारसे श्रीभारत- धर्ममहामण्डलने यह प्रबन्ध किया है कि उसके प्रधान कार्यालयक जगत्गंजमें स्थित भवनमें प्रतिदिन अपराहकालसे दियायत्तीके समय तक एक घण्टा धर्मजिज्ञासुओका सत्संग नियमित हुआ फरेगा। उस सत्संगसभामें श्रीमहामण्डलके साधुगण, विद्वान् पण्डितगरा और उपदेशक महाविद्यालयके छात्रगण उपस्थित रहकर प्रश्नोत्तर, शवासमाधान प्रादिरूपसे सत्संग करेंगे। धर्मजिज्ञासु सर्वसाधा- रण सजन भी उसमें सम्मिलित होकर श्रवण तथा जिज्ञासा द्वारा सत्संगका लाभ उठा सकेंगे। आर्यमहिलामहाविद्यालयकी छात्रि- गण भी इसमें उपस्थित रह सकेंगी इस कारण धर्मजिज्ञासाकी इच्छा रखनेवाली प्रार्थमहिलागण भी इसमें सम्मिलित हो सकेंगी। धर्मजिज्ञासा और सत्संगकी इच्छा रखनेवाले सजन तथा माताएँ इस शुभ कार्यमें सम्मिलित होकर लाभ उठावें यही प्रार्थना है। खामी दयानन्द प्रधानाध्यापक, 'उपदेशक महाविद्यालय श्रीमहामण्डल भवन, जगत्गंज, बनारस । एजन्टोंकी आवश्यकता। श्रीभारतधर्म महामण्डल और श्रा>महिलाहितकारिणी महा- परिपके मेम्बरसंग्रह और पुस्तकविक्रय श्रादिके लिये भारतवर्षक प्रत्येक नगरमें एजन्टोकी जरूरत है। एजन्टोको अच्छा पारितोषिक दिया जायगा। इस विपयके नियम. श्रीमहामण्डल प्रधान कार्या- तय पत्र भेजनेसे मिलेंगे। सेरोटरी श्रीभारतधर्म महामण्डल. जगत्गंज, बनारस।

( २१ ) मासतक अवकाश दिया जायगा और इसके बाद अर्थात् मार्च महीने में रुपया न आनेसे मेम्बर माशयका नाम काट दिया जायगा और फिर वे इस समाजहितकारी कोपसे लाभ नहीं उठा सकेंगे। (२०) मेम्बर महाशयका पूर्व नियमके अनुसार नाम कर जानेपर यदि कोई असाधारण कारण दिखाकर वे अपना हक सावित रखना चाहेंगे तो कमेटीको इस विषयमें विचार करनेका अधिकार मई मासतक रहेगा और यदि उनका नाम रजिस्टर में पुनः दर्ज किया जायगा तो उन्हें ।) हर्जाना समेत चन्दा अर्थात् २१) देकर नाम दर्ज करा लेना होगा। (२१) वर्पके अन्दर जब कभी कोई नये मेम्बर होंगे तो उनको उस सालका पूरा चन्दा देना होगा। वर्षारम्भ जनवरीसे समझा जायगा। (२२) हर सालके मार्चमें परलोकगत मेम्बरों के निर्वाचित व्यक्तियोंको 'समाज हितकारी कोप की गत वर्षकी सहायता बांटी जायगी परन्तु नं १२के नियमके अनुसार सहायताके चांटनेका अधि: कार कमेटीको सालभरतक रहेगा। (२३) इन नियमोके घटाने-बढ़ानेका अधिकार महामण्डल- को रहेगा। (२४) इस कोषकी सहायता 'श्रीभारतधर्ममहामण्डल, पूधाम कार्यालय, काशी, से ही दी जायगी। सेक्रेटरी श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगत्गंज, बनारस । श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णादान-भण्डार । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशीमें दीनदुःधि- यो फ्लेशनिवारणार्थ यह सभा स्थापित की गई है। इस सभाके द्वारा अतिविस्तृत रीतिपर शास्त्र प्रकाशनका कार्य प्रारम्भ किया है। इस समाके द्वारा धर्मपुस्तिका पुस्तकोदि यथासम्भव विना मूल्य वितरण करनेका भी विचार रक्खा गया है। इस दानभण्डार- के द्वारा महामण्डल द्वारा पूकाशितं तत्ववोध, साधुओका कर्तव्य, धर्म और धर्माङ्ग, दानधर्म, नारी धर्म, महामएउनकी आवश्यकता आदि कई एक हिन्दीभाषाके धर्मग्रन्थ और अंग्रेजी भाषाके साईपफ र एस.विना मूल्य योग्य पात्रोको बांटे जाते हैं.। . पत्राचार करनेपर अन्य ( २२ ) विदित हो सकेगा। शास्त्र प्रकाशनकी आमदनी इसी दानमा हारमें दीनदुःवियों के दुःखमोचनार्थ व्यय को जाता है। इन सभामें जो दान करना चाहे या किसी प्रकारका पत्राचार करना चाह निम्न लिखित पते पर पत्र भेजें। सेक्रेटरी, श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णादानभण्डार. श्रीभारतधर्ममहामण्डल. प्रधान कार्यालय। जगतगंज वनारस ( छावनी) आर्यमहिलाके नियम । १-श्रीपार्यमहिलाहितकारिणी महापरिपद्की मुखपत्रिकाके रूपमें प्रार्यमहिला प्रकाशि होती है। २-प्रहापरिषद्की सब प्रकारकी सभ्या महोदयात्रों और मभ्य महोदयोहा यह पत्रिका विना मूल्य दी जाती है। ग्राहकोंको ६) वार्षिक अग्रिम देनेपर प्राप्त होती है। प्रति संख्याका मूल्य १॥) है। ३-पुस्तकालयों (पब्लिक लाइब्रेरियों) वाचनालयों (रीडिंग मो) और कया पाठशालाओको केवल ३) वार्षिकर्म ही दी जाती है। ४-किसी लेखको घटाने बढ़ाने और प्रकाशित करने न करनेका सम्पूर्ण अधिकार सम्पादिका को है। ५-योग्य लेखकों तथा लेखिकाओं को नियत पारतायिक दिया ता है और विशेष योग्य लेखक तथा लेखिकाओंका अन्यान्य प्रकार से भी सम्मानित किया जाता है। ६-हिन्दी लिखने में असमर्थ मौलिकलेखक लेखिकाओकेले लोका अनुवाद कार्यालय से कराकर छापा जाता है। ७-माननीया श्रीमती सम्पादिकाजीने काशी विद्वानांसी एक समिति स्थापित की है, जो शुल्तके आदि समालोचनार्थ कार्यालय में पर नंगी उनपर यह समिति विचार करंगी। जो पुस्तकं आदि योन्य लमभी जायंगी उनके नाम पता और विषय आदि आमहिलामें प्रकाशित कर दियं जायंगे। -समालोचनार्थ पुस्तके, लेख, परिवर्तनही पत्र-पत्रिका. माजप-सम्बन्धी पन, अपने योग्य विज्ञापन और रुपया तथा ( २१ ) माजनक अवकाश दिया जायगा और इसके बाद अर्थात् मार्च महीने में रुपया न आनेने मेम्बर महाशयका नाम काट दिया जायगा और फिर वे इस समाजहितकारी कोपसे लाभ नहीं उठा सकेंगे। (२०).मेम्बर महाशयका पूर्व नियमके अनुसार नाम कर जानेपर यदि कोई असाधारण कारण दिखाकर वे अपना हक सावित रखना चाहेंगे तो कमेटीफो इस विषयमें विचार फरनेका अधिकार मई मानतक रहेगा और यदि उनका नाम रजिस्टर, पुनः दर्ज किया जारगा तो उन्हें ।) हर्जाना समेत चन्दा अर्थात् २१) देकर नाम दर्ज करा लेना होगा। (२२) वर्पके अन्दर जब कभी कोई नये मेम्बर होंगे तो उनको उस सालका पूरा चन्दा देना होगा। वारम्भ जनवरीसे समझा जायगा। (२२) हर सालके मार्च में परलोकगत मेम्बरोंके निर्वाचित व्यक्तियोंको 'समाज हितकारी कोष' की गत वर्पकी सहायता पांटी नारगी परन्तु नं १२के नियमके अनुसार सहायताके वांटनेका अधि- कार कमेटीको सातभरतक रहेगा। (२३) इन नियमोके घटाने-बढ़ानेका अधिकार महामण्डल. फो रहेगा। (२४) इस कोपकी सहायता 'श्रीभारतधर्ममहामण्डल, पूधान फार्यालय, काशी, से ही दो जायगी। सेक्रेटरी श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगत्गंज, बनारस । श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णादान-भण्डार । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशीमें दीनदुःखित यौके क्लेशनिवारणार्थ यह सभा स्थापित की गई है। इस सभाके द्वारा अनिविस्तृत रीतिपर शास्त्र प्रकाशनका कार्य प्रारम्भ किया है। इस समाके द्वारा धर्मपुस्तिका पुस्तकादि यथासम्भव पिना मूल्य वितरण करनेका भी विचार रक्खा गया है। इस दानभण्डार- के द्वारा महामण्डल द्वारा पूकाशित तत्ववोध, साधुओंका कर्तव्य, धर्म और धर्माङ्ग, दानधर्म, नारी धर्म, महामण्डलको आवश्यकता शादि कई एक हिन्दीभापाले धर्मग्रन्थ और अंग्रेजी भापाको एक र इस विना मूख्य योन्य पानीको बांटे जाते हैं। पन्नाचार करनेवर ( २२ ). विदित हो सकेगा। शास्त्र प्रकाशनकी आमदनी इसी दानभण्डारमें दीनदुःखियों के दुःखमोचनार्थ व्यय को जाता है। इस सभामें जो दान करना चाहें या किसी पूकारका पत्राचार करना चाहे वे निम्न लिखित पते पर पत्र भेजें। सेक्रेटरी, श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णादानभण्डार, भीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधान कार्यालय । जगतगंज वनारस ( छावनी) आर्यमहिलाके नियम । १-श्रीमार्यमहिलाहितकारिणी महापरिपद्की मुखपत्रिकाके रूपमें आर्यमहिला प्रकाशि होती है। २-प्रहापरिषद्की सब प्रकारकी सभ्या महोदयात्रों और सभ्य महोदयो हो यह पत्रिका विना मूल्य दी जाती है। अन्य याहकोको ६) वार्षिक अमिम देनेपर प्राप्त होती है। प्रति संख्याका मूल्य १॥) है। ३-पुस्तकालयों (पब्लिक लाइब्रेरियों) वाचनालयों (रीडिंग रूमो.) और कन्या पाठशालाओंको केवल. ३) वार्षिकमें ही दी ४-किसी .लेखको घटाने बढ़ाने और प्रकाशित करने न करनेका सम्पूर्ण अधिकार सम्पादिका को है। ५-योग्य लेखकों तथा लेखिकानोको नियंत पारतोषिक दिया ता है और विशेष योग्य लेखकों तथा लेखिकाओंशी अन्यान्य प्रकार से भी सम्मानित किया जाता है। ६-हिन्दी लिखनेमें असमर्थ मौलिक लेखक लेखिकाओके लेखोंका अनुवाद कार्यालयसे कराकर छापा जाता है। ७-माननीया श्रीमती सम्पादिकाजीने काशीके विद्वानोंकी एक समिति स्थापित की है, जो पुस्तकें आदि समालोचनार्थ कार्यालय में पहचेंगी उनपर यह समिति विचार करेगी। जो पुस्तके आदि योग्य समझी जायंगी उनके नाम, पता..और विषय आदि आमहिलामें घकाशित कर दिये जायंगे। समालोचनार्थ पुस्तके, लेख, परिवर्तनकी पत्र-पत्रिकाएँ, कार्यालय सम्बन्धी पत्र, छापने योग्य विज्ञापन और रुपया तथा जाती है।

( २३ ) परिपतसम्बन्धी पत्र धादि सर निम्नलिखित पतेपर याने चाहिये। कार्याध्यक्ष, त्रार्यमहिला तथा महापरिपत्कार्यालय, श्रीमहामण्डल भवन, जगत्नश, वनारस । आयमहिला महाविद्यालय । इस नामका एक महाविद्यालय (वालेज) जिसमें विधवा श्राश्रम भी शामिल रहेगा श्री आर्यमहिला हितकारिणी महापरिषद् नामक समाके द्वारा स्थापित हुआ है जिसमें सत्कुलोद्भव उच्च जातिकी विधवाएँ मासिक १५) से २०) तक वृत्ति देकर भरती की जाती है और उनको योग्य शिक्षा देकर हिन्दू धर्मकी उपदेशि- का, शिक्षयित्री श्रादि रूपसे प्रस्तुत किया जाता है। भविष्यत् जीविताका उनके लिये यथायोग्य प्रवन्ध भी किया जाता है। इस विपयमें यदि कुछ अधिक जानना चाहे तो निम्नलिखित पतेपर पत्र व्यवहार करें। प्रधानाध्यापक-आर्यमहिला महाबिंद्यालय महामण्डल भवन जगत्गंज बनारस । बंगलाके धर्मग्रन्थ । श्रीमहामण्डल प्रकाशित बंग मापाके धर्मग्रन्थ कलकत्ता प्रान्तीय कार्यालयसे यहां मंगालिये गये हैं उनकी नामावली निस्न- लिखित है। मन्नयोग संहिता D! पुराण तत्व जातीय महायश साधन 2) देवीमीमांला दर्शन १ म खण्ड ॥ साधन तत्त्व गुल्गीता २) जन्मान्तर तत्त्व 12) तत्वबोध साधन सोपान 'नारी धर्म १) एदाचार सापान सदाचार शिक्षा 15) कात्याशिक्षा सोपान नीतिशिक्षा (यन्त्रस्य) सैनेजर निगमागम वुफडीपो- महामण्डलभवन जगतगंज काशी। . m) धर्म आर्यजाति नातीर्दन सत्संग। श्रीमहामण्डलमें नित्य धर्गचर्चा । धर्मविज्ञानवृद्धि और प्रतिदिन सत्संगके विचारसे श्रीभारत- धर्ममहामण्डलने यह प्रवन्ध किया है कि उसके प्रधान कार्यालय जगत्गंजमें स्थित भवन में प्रतिदिन अपराहकालसे दियावती समय तक एक घण्टा धर्मजिज्ञासुओंका सत्संग नियमित हुश्रा करे ।। उस सत्संगसभामें श्रीमहामण्डलके साधुगरण, विद्वान् पण्डित और उपदेशक महाविद्यालयके छात्रगण उपस्थित रहकर प्रश्नोत्तर, शवासमाधान नादिरूपसे सत्संग करेंगे। धर्मजिज्ञातु सर्वसाधा- रण सजन भी उसमें सम्मिलित होकर श्रवण तथा जिज्ञासामा । सत्संगका लाभ उठा सकेंगे। आर्यमहिलामहाविद्यालयकी छानि. गण भी इसमें उपस्थित रह सकेंगी इस कारण धर्मजिज्ञासाकी इच्छा रखनेवाली श्रार्यमहिलागण भी इसमें सम्मिलित हो सकेंगी। धर्मजिज्ञासा और सत्संगकी इच्छा रखनेवाले सजन तथा माताएँ इस शुभ कार्य में सम्मिलित होकर लाभ उठाचे यही प्रार्थना है। MMARRImखमिी दयानन्द प्रधानाध्यापक, 2. Entered उपदेशक महाविद्यालय 4: श्रीमदामण्डल भवन, जगत्गंज, बनारस । एजन्टॉकी आवश्यकता । श्रीभारतधाई महामडिल और शार्थमहिला हितकारिणी सदा- परिषद्के मेम्बर ग्रह और पुस्तकविक्रय श्रादिके लिये भारतवर्ष के प्रयंका नगर में एजलोंकी जरूरत है। एजन्ट्रोको अच्छा पारितो पक दिया जायगा। इस विषयक नियम श्रीमहामण्डल प्रधान कार्या- तयों पर भेजनेने मिलेंगे। लेटी नारतवर्म महामण्डल, लगन्नग, बनारस। Ena

की सर्वाङ्गीण उन्नति लिखने पढनेसे
हता है। पहिले समयमें शिक्षा-प्रचारका कोई
सुलभ साधन नहीं था, परन्तु वर्तमान समय में
शिक्षा-वृद्धिके जितने साधन उपलब्ध हैं, उनमें
'प्रेस' सबसे बढ़कर है।
सनातन धर्मके सिद्धान्तोंका प्रचार करनेक
लिये भी इस साधनका अवलम्बन करना उचित
जानकर श्रीभारतधर्ममहामण्डलने निजका
भारतधमनामक प्रेस ।
खोल दिया है। इसमें हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला और
उर्दू. का सब प्रकारका काम उत्तमतासे होता है।
पुस्तक, पत्रिकाएं, हेडविल, लेटरपेपर, वालपोस्टर्स,
चेक, बिल, हुण्डी, रसीदें, रजिस्टर, फार्म आदि
छपवाकर इस प्रेस की छपाई की सुन्दरता का
अनुभव कीजिये।
पत्र व्यवहार करने का पता:-
मैनेजर भारतधम प्रेस,
महामाडल भवन
जमगंज, बनारस।
,

Hathyog Sanhita

Author
Vishvanath
Title
Hathyog Sanhita
File name
Hathyog Sanhita
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2009/04
Publisher
Shri Bharatdharma Press, Kashi
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Banasthali University
Classification
Health
DLI number
405302
Barcode
99999990064842.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
CdBZoe3a4Np
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