Shree Abhya Jain Granthalya,bikaner

Karunayog Parveshika

Pandit Kailashchandra · 2011/07

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ملح و آ करणांनुयोग प्रवेशिका पर जो फल आता है उसे क्षेत्रफल कहते हैं। जैसे चार हाय सम्बे और पांच हाथ चौड़े क्षेत्रका क्षेत्रफल २० हाप हुआ। १५. प्र०-पन क्षेत्रफल किसे कहते हैं ? -जहां लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई तीनोको विवक्षा हो उसे धन क्षेत्र कहते हैं । और उमसो क्षेत्रफलको सात फल या पन क्षेत्रफल कहते हैं । जैसे चार हाय लम्बे, चार हाय चौड़े और पांच हाथ ऊंचे क्षेत्रका खातफल ४४४४५-८० हाय हुआ। १६.३०-प्यास या परिधि किसे कहते हैं ? उ.--गोलाकार क्षेत्रके बीचमे जितना विस्तार होता है उसे व्यास कहते हैं और गोलार क्षेत्रको गोलाईके प्रमाणको परिधि कहते हैं । १७. प्र०-परिधि और क्षेत्रफलमा वया नियम है ? उ.-मोटे तौर पर प्यास से तिगुनी परिधि होती है। और परिधिको ट्यानको पोचाईमे गुगा करने पर क्षेत्रफल होता है । तथा क्षेत्रफलको ऊंचाई या गहराईन गुणा करने पर सानफल होता है। १८. प्र०-मानके रितने भेद हैं ? उ.-दो भेद हैं-लौकिक मान और लोकोत्तर मान । १९.३०-टोरिक मान फिले कहते हैं ? उ.-लोकमें प्रचलित मान लोषिक मान यही हैं । उसो भेद है- मान, उन्मान, अपमान, गपिमान, प्रतिमान और तत्प्रनिगान । अन्न वगैरह मापने घरननों को मान परते हैं। तराको उन्मान करते हैं। पुल्लू वगैरहको अवमान पहले हैं जैसे एक. पन्छ जल । एक आदितो गणिमान पहते हैं जो एक दो तीन । गुंजा आदियो प्रतिमान वही हैं जो रती गागा पर्गरह । घोड़ेगी लम्बाई वगैरह देशकर उसका मूल्यांना तत्प्रतिमान है। २०.३०-सोकोत्तर मानके रिसने भेद हैं ? उ-चार भेद हैं-द्रव्यमान, क्षेत्रमान, पालमान और भावमान । एक परमाणु जपन्य दम्पमान है और गव द्रव्यांका मगृह, उपष्ट द्रम्समान है। एक प्रदेश जपन्य क्षेत्रमान है और समस्त बाकाम उत्तुष्ट क्षेत्रमान है। एक समय जपन्य बालमान है और सबाल उत्ष्ट कारमान है। मूहम निगोरिया सम्भ्य- १७-41.मा.गा.१७॥ १८-११-वि.मा.गा.११२००२१-निगामा..२१२२-पान भेत विस्तृत पर पानी दिय गिर पाया १५-५१ देगी।

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करणानुयोग प्रवैगिता ३ पर जो फल आता है उसे क्षेत्रफल कहते हैं। जैसे चार हाय लम्वे और पांच हाथ चौड़े क्षेत्रका क्षेत्रफल २० हाप हुआ। १५.प्र०-चन क्षेत्रफल पिसे फहते हैं ? उ--जहाँ लम्बाई, पौड़ाई और ऊंचाई तीनोको विवक्षा हो उसे धन क्षेत्र रहते हैं। और उसके क्षेत्रफलको सात फ. या धन क्षेत्रफल कहते हैं । जैसे चार हाथ लम्वे, पारहाथ चौड़े और पांच हाथ ऊंचे क्षेत्रका खातफल ४४४४५०८० हाय हुआ। १६. प्र०-प्यास या परिघि झिसे कहते हैं ? उ०-गोलाकार क्षेत्रके बीचमै जितना विस्तार होता है उसे व्यारा कहते हैं और गोलाबार क्षेत्रवी गोलाई प्रमाणको परिधि कहते हैं । १७. प्र०-परिधि और क्षेत्रफलका क्या नियम है ? उ.--मोटे तौर पर पाम से तिगुनी परिधि होती है। और परिधिको प्यानरो पोयाईमे गुगा करने पर क्षेत्रफल होता है । तथा क्षेत्रफलको ऊँचाई या गहराईम गुणा करने पर सानफल होता है। १८.३०--मानके रितने भेद है? उ.-दो भेद है-लौकिक मान और लोकोत्तर मान । १९ प्र०-लौकिर मान रिगे कहते हैं ? उ०-लोकमे प्रचलित मागको लोरिक मान रही हैं । उगो भेद हैं- मान, उन्मान, अवमान, गणिमान, प्रतिमान और तत्प्रतिमान । अन्न यगरह मापनेके बरतनों को मान पड़े हैं। तराको उन्मान कहते हैं। पुत्लू वगरहो अवमान कहते हैं जैसे एक पुल्लू जलाए आदिको गणिमान पहते हैं जैसे एक दो तीन । गुंजा आदिको प्रतिमान करते हैं जने रत्ती मागा यगरह । पोदेयो सम्वाई वगैरह देगकर उरारा मूल्यांपना वरिमान है। २०.३०-सोकोत्तर मानके रितने भेद है ? उ.-पार भेद है--द्रव्यमान, क्षेत्रमान, मारमान और भावमान । एक परमाणु जपन्य द्रव्यमान है और मय द्रव्योवा मगृह गष्ट समान है। एक प्रदेश उपन्य क्षेत्रमान है और समम्न याबाग उत्तट क्षेत्रमान है। एक समय जपन्य बालमान है और सबंशल उत्कृष्ट पारमान है। मृष्म निगोदिया रम्य १७-१.सा. गा.१०॥ १८-१९-नि.मा. पा.९।२०-११-नि.मा.पा.११.२०२२पनर भंगाशित भार मानने विशिगार माला १५-५ देगी।

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७
करणानुग प्रवेशिरा
छेद होते हैं। जैसे सोलहके अदंच्छेद चार होते हैं क्योकि सोलह राशि चार
पार आधी-आधी हो सकती है-८,४,२,१।
४१. प्र०--प्रतरांगुल किसे कहते हैं ?
उ०-सूच्यंगुलके वर्गको प्रतरांगुल कहते हैं ।
४२. प्र०--धनांगुल किसे रहते हैं ?
उ०-सूच्यंगुलके घनको घनागुल याहते हैं। सो एक अंगुल लम्बा, एक
चंगुल चौड़ा, और एक अंगुल ऊंचा प्रदेशोका परिमाण जानना।
४३. ३०-जगच्छेणी फिरो कहते हैं ?
उ०-पत्यके अद्धच्छेदोंके असंस्थातवे भाग प्रमाण धनांगुलको रसकर उन्हें
परस्परमे गुणा करनेपर जो राशि उत्पन्न हो उसे जगन्छ्रेणी कहते हैं । मो सात
राजु लम्बी आकाशके प्रदेशोंदी पंक्ति प्रमाण जाननी चाहिये।
४४. प्र०–जगत्मतर या प्रतरलोक किसे कहते हैं ?
उ-जगच्नेणोके वर्गको अर्थात् जगत्श्रेणीको जगन्भेणीसे गुणा करनेपर
जो प्रमाण हो उसे जगत्पतर या प्रतरलोक यहते हैं । सो जगन्छेणी प्रमाण लम्बे
और पौड़े क्षेत्र में जितने प्रदेश आयें उतना जानना चाहिये।
४५.प्र.-जनलोक रिसे कहते हैं ?
उ०-जगधेणीक पनको लोक अयदा घनलोग कहते हैं। सो जगन्धेणी
प्रमाण सम्वे चौड़े और ऊँचे क्षेत्रमे जितने प्रदेश आयें उनना जानना पाहिये ।
४६ १०--राजु किसे कहते हैं ?
उ०-जगन्धेणोके सातवें भागो राग कहते हैं।
४७.३०-सोक विसे रहते हैं ?
उ.--जितने आराम धर्म अधर्म मादि द्रव्य पाये जाते है तथा जीव
और पुद्गलोरा गमनागमन होता है उनने आवागमो लोक अपदा खोरापारा
फहते हैं।
४८.४०-शोर महापर स्थित है ?

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करणानुयोग प्रवेशिका 30-जहां सराि, मपि, कृपि, वाणिज्य, विद्या और शिल्प इन बमोती प्रवृत्ति हो उमे कर्मभूमि कहते हैं । ६१.३०-कर्मभूमियां कितनी हैं ? २०-पांच मेरु सम्बन्धी पांच भरत, पांच ऐरावत और देवकुर उतरकुरुको छोड़कर पांच विदेह इस प्रकार राव निलवार १५ कर्मभूमियां हैं। ६२. ३०-भोगभूमि फिरो कहते हैं ? जहां दस प्रकारले कल्पवृक्षोंसे प्राप्त भौगोको ही भोगा जाता है और छ कार्मोकी प्रवृत्ति नही है उसे भोगभूमि कहते हैं । ६३. प्र० --भोगभूमिया स्तिनी है? उ०-मय भोगभूभियां तीन है । जिनमेसे पांच मेर सम्बन्धित, पांच हेमवत और पांच हैरण्यक्त इन दन दोनोमे जपन्य भोगभूमि है। पांच हरि और पांच रम्य इन दन क्षेत्रामे मध्यम भोगभूमि है । और पांच देवकुरु और पांच उत्तर- पुर इन दर क्षेत्रोमें उत्तम भोगभूमि है। ६४.प्र०-५ग भरतादि क्षेत्रमि सदा एक सी हो पपस्या रहती है ? उ.-भरत और ऐरावत क्षेत्रों, जनपिणी और उत्मपिणी पालकै समोके द्वारा परिवर्तन हुआ करता है। शेप क्षेत्रोमे सदा एक-शा ही पाल परतता है। ६५. म०-नवरापिगो और उत्सरिणो फाल पिरो पहते हैं ? उ.--जिस कालमें मनुष्प और तिजोरी थाप परीरको ऊँचाई और विभूति आदि पटते रहने है उसे अपनरिणी पार बढे हैं और जिग पालमें ये यहने रहने है उन उत्मपिगी काल पहने हैं । ६६.प्र.-अयारिणी मोर उलपिगो कालो भेद पौन से हैं ? उ-मुपमागुपमा, सुपमा, सुपमा दुपमा, दुषमा गुपमा, दुपमा और बनि- दुषमा ये छ अपरिणी मालय भेद है और अतिदुषमागे मुषमागुपमा पग्नई भेद उत्सपिणो पारक हैं। ६७. प्र--मरत क्षेपमें परिवर्तनका कप सा है? उ०-गुपमामुपमा पालो आदिम भरत क्षेत्रों इत्तम भोग-गमि एनी है। सुषमागुपमा पालथा प्रमाण पार मोठाकोशी गागर है। फिर मनमे हानि होते होवे गुपमा पालना प्रारम्भ होता है। गर्म मपम नोगभूमि रही है उसका प्रमाण नीन पोडापोड़ी मागर है। फिर मामे हानि होने गुपना-

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धारणानुयोग प्रवेशिका भूमिका बारम्भ होने लगता है । उस कालभे प्रथम तीर्थकर और प्रथम चक्रवर्ती भी चलन हो जाते हैं । युद्ध जीव मोक्ष भी चले जाते हैं। चक्रवर्तीका मान भंग होता है, यह एक नये वर्ण ब्राह्मणको रचना करता है। चौये दुपमासुपमा कालमें ६३ मेरो ५८ शालाका पुरस ही जन्म रोते हैं। नौवेंसे सोलहवें तीर्थदर तक सात तीर्थ सरोके तोयम धर्मका विच्छेद हो जाता है। सातवें, तेईमवें और अन्तिम तीर्थदरसर उपसर्ग होता है । ग्यारह रुद्र और नौ नारद होते हैं। पांचवें दुपमा कालमें चाण्डाल आदि जातियां तथा कत्वी उपपत्की होते हैं। ये अनेक नई वाते हुण्डावसर्पिणी कालभे होती हैं । ६९. प्र०--प्रेस मालाका पुरुष चिन्हें कहते हैं ? 30-चौवीरा तीर्थहर, बारह चक्रवर्ती, नो बलभद्र, नौ नारायण और नौ प्रतिनारायण ये प्रेसट पालाका पुरुष अर्थात् गणनीय महापुरुष कहे जाते हैं। ७०. प्र०~चोवीस तोपंडुरों के नाम क्या है ? 3०-ऋपम, अजित, सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चन्द्र- प्रभ, पुष्पदन्त, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म, शान्ति, कुन्यु, अर, मल्लि, मुनिसुग्रत, नमि, नेगि, पार्व और वर्द्धभान ये भरत क्षेत्रमे उत्पन्न हुए चौवीस तीर्थहराफे नाम है। ७१. प्र०-चौवीस तीर्थदूरोका जन्म स्थान कहाँ है ? उपभनाथ, अजितनाथ, अभिनन्दन नाय, सुमतिनाथ, और अनन्त नायका जन्मस्थान अयोध्या है। संभवनाथका जन्मस्थान श्रावस्ती नगरी है, पाभका जन्मस्थान कौशाम्बी है, सुपार्श्व और पार्वनामा जन्मस्थान वाराणसी (बनारम ) है, चन्द्रप्रभका जन्मस्थान चन्द्रपुरी और श्रेयासनायका जन्मस्थान सिंहपुरी (बनारसके पास गारनाथ ) है। पुष्पदन्ता जन्म स्थान वावन्दी, गोतलनाथका भद्दलपुर । भेजसा ), वासुपूज्यरा पम्पानगरी, विमल नापका कोपिला, धर्मनाथवा रत्नपुरी ( जयोध्याक पास ), शान्ति, युन्यु और और अपनाथका हन्तिनापुर, माल्लनाथ धीर मिनाथमा मिथिलापुरी, मिनाप- पा शारीपुर ( पटेश्वरक पास ), मुनिमुवतनापपरा गजगृह और वर्धमानपा जन्मस्थान कुण्डलपुर है। ७२. प्र०-चौयोस तोयंरोश निर्माणस्यान कौनसे हैं ? उ.-भगवान् कृपभदेवरा निर्वाणस्थान फैलास पर्वत है, दामुपूज्या पम्पापुर, नेमिनायका गिरनार पर्वत और महादीर ददमानरा निर्वाणरयान पावापुरी है। और गंप तो रोगी निर्वान-भूमि सम्मेर शिसर पर्वत है।

१२० प्र०-famimal?
3-कमी : ५३
१२८. 80-अप..रगिरी है?
3०---मिग पगार,
मनात लिहतो. f
पतंगान नी भी ATTER: ५ है। दर
एग गार अशाप्रपा प्रा irlfrint पर
उनी एक जीतक परिणाम नेगी ?
येसी विमुखतातो लिये हुए परिणाम प्रा माग भी। हम पसार
करण जार और नोनी समपानीमा ATTRACT
होनेसे इसे अमःगृतकरण हो। इन मारा।
१२९. प्र०-तापूर्वकारण किसलो पाही?
उ०-जिनमें प्रति समय अपूर्व अपूर्व परिणाम हो उमेर म
स्थान कहते हैं। सारांगनी किन गणला गान
और नीने सगयों में स्थित जीवोंने परिणाम कमी भी महान
एक ही समय में स्थित जीवों के परिणाम समान भी होता है और गमान नहीं
भी होते। जैसे, जिन जीवोंको अपूर्वकरणों आप पानवों गम:, उन जी
जैसे परिणाम होते हैं वैसे परिणाम गिन जीवों को अगरणमें आये पर दो तीन
या चार अथवा छै समय हुए है, उनमें कभी भी नहीं होते। तथा पांचवें गमा
वर्तमान जीवोंके परिणाम परस्परमें सगान भी होते हैं और नहीं भी होते।
इसका काल भी अन्तर्मुहूर्त है।
१३०. प्र०-अधःकरण और अपूर्वकरणमें क्या अन्तर है ?
उ०- अधःकरणमें भिन्न-भिन्न समयोंमें वर्तमान जीवोंके परिणामोंमें जैसे
समानता होती है अपूर्वकरणमें वह नहीं होती। तथा अध.करणमें जैसे एक
समयमें स्थित जीवोंके परिणामोंमें समानता और असमानता दोनों होती हैं वैसे
अपूर्वकरणमें भी होती है।

परणानुपोग प्रवेशिता १३१ प्र०-अनियत्तिकरण किसको कहते हैं ? उ० - जिरा करणमे निन्न रामयवी जीवों के परिणाम अममान ही होते हैं और एक समयवर्ती जीवोके परिणाम ममान ही होते है, उमको अनिवृत्तिकरण पहते हैं। जैसे, जिन जीवोको अनिवृत्तिकरणमे आये हुए पांचवां समय है उन विरालवी जीवों के परिणाम परम्परमे ममान ही होते है, होन अधिक नही होते । तया वे परिणाम, जिन जीवोको अनियनिकरणमे आये हुए चौथा समय हुआ है, उनके विशुद्ध परिणामागे अनन्तगणे विगढ होते हैं। इसी तरह जिन जीवोको अनिवृत्तिारणमे आये हा एका ममय हुआ है, उनके परिणाम चये समयवर्ती जीवोंके विगद्ध परिणामोसे अनन्तगुणे विगुद्ध होते हैं । इमी रह मर्वत्र जानना। १३२ ३०---सूदम साम्पाय गुणस्थानका क्या स्वरूप है ? उ०--जिम गुणम्यानमे अत्यन्न सूक्ष्म अवस्थाको प्राप्त लोभ पाय मात्रा उदय गैप रहता है उमको मुभम माम्पगय नामरा दमवां गुणस्थान कहते हैं । १३३. प्र०--उपशान्त कपाय गुणस्थानका क्या स्वरूप है ? उ०-बैंग गद पानीमे 'पटकरी डालने पानी कामे निर्मल हो जाता है चौर गाद उनके नीचे वेट गाती है वरी ही जिग जीवरा मोहनीय वर्म पूरी तरहमे अपशान्त हो जाता है, वह जीव उपनाम पार नामक दमये गुण- स्थानवाला पहा जाता है। इस गुणस्थानका पाल अन्तमहा है। काल पूरा हो जानेपर मोहनीयरा उदय हो आता है जिनग इन गुणस्थानदाला जीन गिरकर नौ गुणस्थानोभे या जाता है। १३४ प्र०-क्षी पपाय गुणरपानका पा स्यरूप है ? 30-मोहनीय पी ममम्त प्रतिपोरा क्षय हो जानेसे जिमवा चित्त स्फटिक पारमे गे हुए जारेममान निर्मल होता है उनसे शीण यपाय गुण- स्थानवाला बने हैं। १३५. प्र०-उपशान्त वापय और क्षीपरपायमे क्या मन्तर है? उ०-उपमान्त नपाय जीवके यद्यपि मोहता उदय नहीं है फिर भी मोहनीय ममंशी गता है किन्तु धोण पाप जीवके मोहनीय मर्मका उदय भी नहीं है और अग्नित्य भी नहीं है। फिर भी दोनोरे ही परिणामों पपायोग अभाव है अतः दोनों पारवान पारित होता है और दोनों ही पाए घोर यन्यन्तर परिम्हो रहिल होनेके पारण निन्य कहे जाने हैं । १३६.०-सपोग वेदतो पुगस्यानका क्या राय है। ४

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१३३. Fory"
30-
AR: ! "
भगाना Tr: :: ::::
अयोगमा जान १
१३८. प्र०-- गुममा amiri: है ?
उ०-मियानी र ? A.
सफता। मामा,
ऊपर नही गढ़ माना। MATRE
होता है । अपिल गायी और दमानिन, प्रता
संयतके सिवाय अन्ग हिली भी गुम हो । समागमा
गुणस्थानवाला अप्रमत नया गाना नि भो
प्राप्त हो सकता है। मामला गंगा गमावानवाला Times
गुणस्थानको प्राप्त होता है । उपम श्रेणियार
क्रमसे हो चढ़ते हैं और मागाही आलो रगतिकारमा
और सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थानवाले एक पोनोगी और अपने कपर,
इस तरह दो ही गुणस्थानीको प्राप्त कर सकते। और उपमान पाम गुम
स्थानवाला ऊपर नहीं चलता, नीने ही आता है अतः वा एक सुगताम्मराय
गुणस्थानको ही प्राप्त होता है। ापक श्रेणियाले जीव गाने, गौर, दस और
वारहवें आदि गुणस्थानों मगरो चढ़ते हैं।
१३९. प्र०-फित गुणस्थानमें मरण होता है ?
उ०-तीसरे गुणस्थानमें तथा क्षपक श्रेणिके चार गुणस्थानों में और तेरहवें
गुणस्थानमें मरण नहीं होता । शेप गुणस्थानों में होता है।
१३८. कर्मकाण्ड, गा० ५५७-५५९ ।

करणानुयोग प्रवेशिका २७ १४०.०-किस गुणस्थानमे परफर जोय किस गतिमे जाता है ? Romपहले और चौथे गुणम्यानमे मरकर गोव राग तयामस किमी भो गतिमे जा सकता है। मानादनो ममः कातिम नमो नारा पानाम किसी भी गतिमे जाना है। चोदत्त रशमानमे भक्ति होती है। और गप सात गुणस्थानोस मरकर जीव नियममे देवगनमें जन्म होता है। १४१ zo-फिन अवस्यायोमे मरण नहीं होता? उo-मिश्र काययोगया, प्रथमोपगम गम्याचमा जोर मानवे नरकम दूमरे आदि गुणमानोभ वनमा बोका मी', जनानानुरन्धारा विसंयोजन करके जो जीव मियान्य गुणम्यानम मा जाप १३ बलमनं तक उसका मरण नहीं हो गाना ! दर्शन माहवा र नेशला जर तक तात्य नहीं हो जाता तब तक उगमरण नहीं होता। १४२.०ीय समास किसे कहते है। To-जिन द्वारा अथवा जिन व ममाग जायरा भयह रिया जाना है उन्हें जोवममाम कहते हैं। १४३. प्र०संक्षेपसे जोयममाम शितने भेदो। 3o-चौदह भेद है.न्द्रिय दो मंद - वार नीर म:म, हिन्द्रियके तीन भेद-दो इन्द्रिय तेन्द्रिय और चोइन्दिर नया पर्योपा दो भद-मनी और अगली । ये सानो पर्याप्त मोर भार्यात भदाने दो-दो प्रकारके होत है। १४४. Ho-विस्तारसे गायरामा कितने भव है ? 10- अहान--एकन्द्रियक बयालीम, विरगन्द्रय के नो, पञ्चन्द्रियके मैनालीग। १४५. प्र०एफेन्द्रियके ममालीस भेद कोनते हैं । उ०-पृथ्वीकायिका, जलवापिक, अग्निवायिर, वायुकायिक, और साधारण वनस्पतिमापिय दो भेद नित्यनिगोद और नर्गनगांद पंछहा पादर भी होते है और गूल्म भी होते हैं मत बारह भेद हए । नपा प्रत्येक कम्पतिको दो भेद हैं--प्रतिष्ठित और अप्रतिष्टित में चौदही पार, निवृत्तपता और हायपर्याहरके भेदसे तीन-तीन प्रकारके होते है। इस सरह एपेन्द्रियरं, ११ जोयसमास होते हैं ? १.to-विकलेन्द्रियके नो भेद कौनसे हैं ? उडोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय और चौइन्दिपरे पार, निकाला और सातको मसारी नौ जीवसमास होते हैं ?

१५२. प्र०-नारफियोशे दो भेद मोनो ?
उ०-पर्याप्तक और निवृत्तपना।
१५३. प्र०-देवों दो भेद पौनसे है ?
उ०-पर्याप्तफ और निवृत्त्यपर्याप्तक ।
१५४. प्र०-पर्याप्तक किसे कहते हैं ?
उ०-जिस जीवकी शरीरपर्याप्ति पूर्ण हो गई है उसको पर्याप्त महते हैं।
१५५. प्र०-निवृत्त्यपर्याप्तफ किसे कहते हैं ?
उ०-जव तक जीवको शरीरंपर्याप्ति पूर्ण न हुई हो, किन्तु नियमसे पूर्ण
होनेवाली हो, तब तक उस जीवको निर्वृत्त्यपर्याप्तक कहते हैं ।

परमानुयोग प्रवेशिका १५६. ३०-सध्यपर्याप्तमा किसे कहते हैं ? Fo-जिस जोयको एक भी पर्याप्ति पूर्ण न हो और स्वासके अट्ठारहवें भागमे ही मरण होनेवाला हो उसको लब्ध्यपर्याप्तक कहते हैं। १५७. प्र०-पर्याप्ति किसे कहते हैं ? 3०-आहार वर्गणा, भाषा वर्गणा, और मनोवगंणाके परमाणुओको शरीर आदि रूप परिणमानेको दशक्किी पूर्णताको पर्याप्ति कहते हैं । १५८.३०-पर्याप्तिके कितने भेद हैं ? उ०-पर्याप्तिके छ भेद हैं-आहार पर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति, स्वासोच्छ्वाम पर्याप्ति, भाषापर्याप्ति और मन.पर्याप्ति । १५९. प्र०-आहार पर्याप्ति किसे कहते हैं ? उ०--आहारवगंगाके परमाणुओको सल और रसभाग रूप परिणमानेकी कारणभूत जीवनी शफियी पूर्णताको आहारपर्याप्ति कहते हैं । १६०. प्र०ारीरपर्याप्ति किसे कहते हैं ? उ०-जिन परमाणुओंको सल स्पपरिणमाया था उनको हाड़ वगैरह कठिन अवयवरूप और जिनको रसरूप परिणमाया था उनको रधिर आदि रूप परिण- मानेको कारणभूत जीवकी शक्तिको पूर्णताको शरीर पर्याप्ति कहते हैं । १६१.३०-इन्द्रिय पर्यानि किसे पाहते हैं ? उ-आहारवर्गणापे परमाणुओंको इन्द्रियके आकाररूप परिणमानेमे तथा इन्द्रिय द्वारा विषय ग्रहण करनेमे कारणभूत जीववो शक्तियो पूर्णताको इन्द्रिय. पर्याप्त पाहते हैं। १६२. ५०-यासोच्छवास पर्याप्ति किसे कहते हैं ? १०-आहार वर्गणाके परमाणुनाको स्वासोवास स्प परिणमानेमे पारण. , भूत जीवकी शकिको पूर्णताको स्वासोच्छ्वास पर्याप्ति कहते हैं । १६३ प्र०-भाषा पति किसे कहते हैं ? 5०-भापागणारे परमाणुओरो वचनाप परिणमानेमें पारणभूत जीवरी गरिवी पूर्णताको भाषा पर्याप्ति कहते हैं। १६४. प्र--मन:पात दिसे करते हैं ? उ०-मनापगंगा में परमाणुको समनापपगिणमानों का मारा गुण दोपया दिचार, बीती बानका स्मरण आदि पार्य करनेमे वारणमन बीदको रातियो पूर्णताको मन.पर्याप्ति कहते है।

१७०-जयपnीय jalins न मारमा
उ० डियानमारोगा
१७१. प्र०-योनि किसे कहते हैं?
उ० -- जीव उत्पति स्थानन्तगोनि मत है।
१७२. प्र०योनिफे जितने भेद है ?
उ०-दो, आकार योनि और गुण योनि।
१७३. प्र०-आफार प योनिम कितने भेद है ?
so--स्त्रीय शरीरमें होनेवाली आकार का योनिः तीन में सारा
योनि, कूर्मोन्नत योनि और वंशपन योनि ।
१७४. प्र०-किस योनिमें फोन उत्पर होता है ?
उ०--शंखावर्तक योनिमें तो गर्भ नहीं रहता। पूर्मोन्नत योनिमें तीर्थकर,
चक्रवर्ती, नारायण आदि उत्पन्न होते हैं और वंशपय योनिमें जनसाधारण
उत्पन्न होते हैं।

परमानुयोग प्रशिक्षा १७५. प्र०-गुण योनिके कितने भेद हैं ? उ०-नो सचित्त, अचित्त, सचित्ताचित्त, शीत, उष्ण, शीतोष्ण, संवृत, विवृत, संवृतविवृत । १७६.प्र०-राचित आदिका पया स्वरूप है? उ०-चेतन सहित पुद्गल स्कन्धको सचित्त कहते हैं। उससे विपरीतको अचित्त कहते हैं। जो पुद्गत स्कन्ध राचित्त अचित्त दोनो रूप होते हैं उन्हे सचित्ताचित्त पते हैं। शीत स्पर्शसे युक्त पुद्गल स्कन्धको शीत कहते है । उष्ण स्पर्शसे युक्त पृद्गल स्कन्धको उष्ण कहते हैं। जो पुद्गल उभय रूप हों उन्हे मौतोष्ण कहते हैं। जिस पुद्गल स्कन्धका आकार गुप्त होता है, जिससे उसे देसा नहीं जा सकता, उसे संवृत कहते हैं। जिसको देखा जा सकता है उसे विवृत कहते हैं । और जो दोनों रप हो उसे संवृतविवृत कहते हैं । १७७. प्र.-किस जन्मपालोंको कौन योनि होती है ? 30-उपपाद जन्मवालोंकी अचित, शीत या उष्ण और सवृत योनि होती है। गर्भ जन्मवालोकी सचित्ताचित्त, शीत उष्ण या शीतोष्ण और स्वृत योनि होती है । सम्मून जन्मवालोकी राचित अचित्त या सचित्ताचित्त, पोत उष्ण या शीतोष्ण और गंवृत अया विवृत योनि होती है। इतना विरोप है कि रोज- स्कायिक जीवोंको योनि उष्ण ही होती है । तथा एपेन्द्रियोंकी योनि संग और विकलेन्द्रियोकी विवृत होनी है। १७८, प्र०-योनि मोर जन्ममें पपा भेद है ? उ.-योनि आधार है, जन्म साधेय है, क्योंकि राचित्त आदि योनियोंमें जीव सम्मून आदि जन्म तार उत्पन्न होता है। १७९ प्र० - विस्तारसे योनिके भेद कितने है ? उ०-विस्तार योगिक भेद चौरागी लाप हैं-नित्यनिगोद, इनरनिगोद, पृथ्वीनायिक, जलकायिक, तेजस्कापिक और धायायिक इन एहोमेरो प्रत्येकी सात सात सास योनियां हैं। प्रत्येक वनस्पनिकी दस साय योनियो हैं । दोइन्द्रिय तेन्द्रिय और चौइन्द्रियमेसे प्रत्येकी दो दो सास योनियां हैं। देव नारसी और पन्द्रिय तिर्यशमसे प्रत्लेमरी पार चार सास योनिया है जोर मनुष्योती पोदर लास पोनियां हैं। १८०. प्र०-जन्मके स्तिने भेद है? ३०-तीन - गम्मूठन जन्म, गर्म रन्म और पार जन्म ।

१८६. प्र०-ौनोती?
30-मारती और
गान होता।
पुल्लिंग और गोलिंग
होना भी कि
होता है।
१८७.३०--प्राण फिरो पाहते हैं?
उ०--जिनके संयोगसे यह जीव जीवन अपात और विनोगरो मरण
अवस्थाको प्राप्त होता हैं उन्हें प्राण पाहते हैं ।
१८८. प्र०-प्राणके फितने भेद हैं ?
उ०--दो हैं-द्रव्यप्राण और भावप्राण ।
१८२, प्र०-द्रव्यप्राण फिसको कहते हैं ?

करणानुयोग प्रवेशिका उ०-पुद्गलद्रव्यसे उत्पन हुए द्रव्य इन्द्रिय वगैरहकी प्रवृत्तिको द्रव्यप्राण १९०. प्र०--भावप्राण किसे कहते हैं ? उ०-आत्माको जिस शक्तिके निमित्तसे इन्द्रिय वगैरह अपने कार्यमे प्रवृत्त हों, उसे भावप्राण पहते हैं। १९१. प्र०-द्रव्यप्राणके कितने भेद हैं ? उ.--दस हैं--मन, वचन, काय, स्पर्शनइन्द्रिय, रमनाइन्द्रिय, प्राणइन्द्रिय, पभुइन्द्रिय, क्षेवइन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास और आयु । १९२. प्र०-पिस जीवके कितने प्राण होते हैं ? उ०-- सैनी पन्द्रिय पर्याप्त जीवके दमो प्राण होते हैं। असैनी पर्षेन्द्रिय पर्याप्तके मनो विना नो प्राण होते हैं। चौइन्द्रियके मन और श्रोन इन्द्रियके दिना आठ प्राण होते हैं। तेइन्द्रियके मन, श्रोत्र और चाइन्द्रियके बिना सात प्राण होने हैं। दोइन्द्रियवे मन, श्रोन, चक्षु और प्राण इन्द्रियके बिना छ प्राण होते हैं। एपेन्द्रियके पनिइन्द्रिय, पायवल, श्यामोच्छ्वाम और आयु ये चार प्राण होते हैं । यह पर्याप्त अवस्थाको अपेक्षा जागना । पर्याप्त दशाम सनी और बनी पन्द्रियक सात प्राण ही होते हैं, क्योंकि वागोच्छ्वास, वचनबल और मनोवल ये तीन प्राण पर्याप्त दशागे ही होते हैं। चौइन्द्रियके श्रोत्रके विना छ, संइन्द्रिया चक्षुपो बिना पांच, दो इन्द्रियको घाणके बिना चार और एपेन्द्रिय अपर्याप्त रगनाने विना तीन हो प्राण होते हैं । १९३. प्र०-पर्याप्ति और प्राणमें पया भेद है ? उ०पर्याप्ति कारण है, प्राण कार्य है। १९४.प्र०-सा रिसे कहते हैं ? उ०-याठा ( पाह) को संज्ञा कहते हैं। १९५ प्र--संज्ञा शितने भेद हैं ? 30- चार है--आहार, भप, मैथुन और परिग्रह । १९६ प्र०--उपयोग रिते कहते हैं ? उ०--जीवफे लक्षणस्प परिणामो, जो चैतन्यो होनेपर ही होता है, जापांग रहते हैं। १९७. प्र०--उपयोग कितने भेद है ? --दो है- मावार उपयोग और अनागर उपयोग । १९१. गो. नी.गा० १३.। ५

गतिमें आदिक पांच गुणस्थान ओर म गोरा गुमामान
२०३. प्र०-गतिशिल र?
उ०-वार-, मिनुमा ।
२०४. प्र०-बिय गतिशिल मानने ?
Go-देवगति और नमतिमारा होते है , fir.
होते हैं।
२०५. प्र०-इन्द्रिय फिराको पाहते हैं ?
उ०-आत्माके चिह्न विशेषको इन्द्रिय कहते है।
२०६. प्र०-इन्द्रियके फित्तने भेद है ?
उ०-दो है--द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय ।
१९९, गो० जी० गा० १४१ ।

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. २७०. Ho-गोमूनिका गतिोि ? Goगे गायला न iti प्रकार तीन गोवानी गानो गोन। म र म होती है। २७१. प्र०-चार मोडेवाली गति पयों नहीं होतो? उ०-लोग गाय गार कार, नी पोरन आme के प्रदेशोंकी गतिको श्रेणि गते । श्रोणि अमगार को भी मान होता है । कणिका उल्लंघन गरी गगन नागि का गोई बात नहीं जहाँपर पहुंचनेके लिए चार गोलेने । २७२. प्र०-समुद्घात फिसे पाहते हैं ? उ० - मूल शरीरको बिना जीवन प्रगति बाहर निकलनेको समुद्घाः कहते हैं। २७३. प्र०-समुद्घातके कितने भेद हैं ? उ०-सात भेद हैं - वेदना समुद्वात, पाय गमुद्घात, विशिया समुद्घात, मारणान्तिक समुद्घात, आहारक समुद्घात और केवली समुद्घात। २७४. प्र०-वेदना समुद्घात वगैरहका पया स्वरूप है ? उ०-बहुत पीड़ाके निमित्तसे गात्मप्रदेशोंको बाहर निकलनेको वेदना समुद्घात कहते हैं । क्रोध आदि कपायके निमित्तसे आत्मप्रदेशोंके बाहर निकलनेको कपाय समुद्घात कहते हैं । विक्रियाके निमित्तसे आत्मप्रदेशोंके बाहर निकलनेको विक्रिया समुद्घात कहते हैं। मरण होनेसे पहले नवीन पर्याय धारण करनेके क्षेत्र पर्यन्त प्रदेशोंके बाहर निकलनेको मारणान्तिक समुद्घात कहते हैं। अशुभ या शुभ तैजसके साथ आत्मप्रदेशोंके वाहर निकलनेको तेजस समुद्घात कहते हैं। प्रमत्त गुणस्थानवर्ती मुनिके आहारक शरीरके साथ आत्मप्रदेशोंके बाहर निकलनेको आहारक समुद्घात कहते हैं । और केवलज्ञानीके समुद्घातको केवलि समुद्घात कहते हैं। २७५. प्र०-केवलो समुद्घात क्यों करते हैं ? उ०-आयु कर्मको स्थितिसे अन्य तीन कर्मोकी स्थिति अधिक होनेपर उनकी स्थिति भी आयु कर्मके समान करनेके लिए केवली समुद्घात करते हैं। समुद्घात, तेजस . - रणानुयोग प्रवेशिका २०६. प्र०-समी केयलो समुद्घात करते हैं क्या? उ०-यतिवृषम आचार्यो मतसे सभी केवली समुत्पात करके हो मुक हो हैं। अन्य आचार्य मतले कुछ केवली समुसात करते हैं और कुछ नहीं करते। २७७. प्र०बोल्टो समुद्घातमे कितना समय लगता है। 30- केवली ममुत्पातमें आठ गमय लगते हैं-पले रामपमें आत्मप्रदेशको पंलाकर दण्डके आवार परते हैं। दूमरे रामपंग पपाटो मातार पले हैं। तोगरे समयमे प्रतररूप करते हैं और घोपे गमयमै नात्मप्रदेगोने सोतो पूर दी हैं। पांचवें गमयरो सोरपूरणने तरम्प, एटेमें प्रारमे पादरून, मान मागे पाठरप और आटयमे फिरने गरि प्रविष्ट हो जाते है। २७८.०-एए. पालमें योग कितने होते हैं ? उ०--एक बारमे एर जीयक एर हो योग होता है। २७९.३०-येद किसकोपते हैं ? ३०-चारित्र मोहनीपो भेद पुरण्यक, और नामरामायके उदयो उत्तम हुई मंचुनरी अभियानो माय: प है। और नामामो सपने शरीर प्रकट होनेवाले चिल विगतो रहा है। २८०.६०-येर तिने ? To-मीन है -पुरद, प्रदेः और नमावे। २८१.3-मार और समान होहीन भो। 15०-देव, मारपी, भोगगि का वि और माग १ देगा ही भापर्व भी हानि Traftaari वो गाम्यवेद होना गा माया होगा fotraEE: इरागहोगा और भावर मग होगा। २८२ ---भादो गुणायाम तक हो' - गुणरदानरे राबंद भाग होntimrakrit रहित हो। Fet. He-fuो मे पोसnti ७०-मामी मगर वेदी raiREP गयर निसीनो पाया। Error fro T-भीगर पीसेरामा !

४६ गरणानुगगनगिका २९९. प्र०-~-अनक्षरात्मक श्रुतगान किराको कहते हैं ? उ०--जो श्रुतशान अक्षरा निमित्त मान होता किन्तु लिग (गिल) के निमित्तसे उत्पन्न होता है उसे अक्षरामा अगवा लिंगा श्रुतमान महते हैं। जैसे शीतलवायुका स्पर्श होनेपर गीतालयागुका जागना तो गतिमान है और उसके पश्चात् ही वातप्रकृति पालेको यह शातलवायु हानिकर है ऐसा जानना अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान है। ३००. प्र०-अक्षरात्मक श्रुतज्ञान फिसको कहते हैं ? उ०-अक्षररूप शब्दके निमित्तसे उत्पन्न होनेवाले श्रुतज्ञानको अक्षरात्मक श्रुतज्ञान कहते हैं। जैसे, जीव हैं ऐसा करने पर श्रोन्द्रियके द्वारा जो शब्दका ज्ञान हुआ वह तो गतिज्ञान है, और उस ज्ञानके पश्चात् जीव नामक पदार्थ है ऐसा जो ज्ञान हुआ वह अक्षरात्मक श्रुतज्ञान है । ३०१. प्र०-अक्षरात्मक श्रुतज्ञानके कितने भेद हैं ? उ०-दो भेद हैं-एक अंगप्रविष्ट और दूसरा अंगवाह्य । ३०२.प्र०-अंगप्रविष्ट श्रुतज्ञान किसको कहते हैं ? उ०-भगवान् तीर्थङ्करने केवलज्ञानके द्वारा सब पदार्थोको जानकर दिव्य ध्वनिके द्वारा उपदेश दिया। उनके साक्षात् शिष्य गणधरने उस उपदेशको अपनी स्मृतिमें रखकर बारह अंगोंमें संकलित किया । यह अंगप्रविष्ट श्रुतज्ञान है । ३०३. प्र०-अंगवाह्य श्रुतज्ञान किसको कहते हैं ? उ०-आचार्योने अल्पबुद्धि शिष्योंपर दया करके उन अंग ग्रन्थोंके आधार पर जो ग्रन्थ रचे वे अंगवाह्य कहलाते हैं। ३०४. प्र०-अंगप्रविष्ट श्रुतज्ञानके भेद कितने हैं ? उ०-बारह हैं-आचार, सूत्रकृत, स्थान, समवाय, व्याख्याप्रज्ञप्ति, ज्ञातृ- धर्मकथा, उपासकाध्ययन,, अन्तःकृद्दश, अनुत्तरोपपादिकदश, प्रश्नव्याकरण,. विपाकसूत्र, दृष्टिवाद। ३०५. प्र०-बारहवें दृष्टिवाद अंगके कितने भेद हैं ? उ०-पांच भेद हैं--परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्व और चूलिका । ३०६. प्र०-पूर्वके कितने भेद हैं ? ३०४-अंग प्रविष्ट श्रुतज्ञानके वारह भेदोंमें किन-किन विपयोंका वर्णन है यह जानने के लिए देखो-जयघवला, १ भाग पृ० १२२-१३२ ।

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५० गरणानुगोग प्रतिमा उ०- सामायिक अथवा छेदोस्थापना संयमको धारण करनेवाले मुनिको कपाय जव अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है तब ये सूक्षणसागराय संयमी गन्हे जाते हैं। ३३४. प्र०-यथाख्यात संयम किसको कहते हैं ? उ०-समस्त मोहनीयकर्मके उपशमसे अथवा क्षयरो जेसा आत्मामा निर्विकार स्वभाव है वैसा ही स्वभाव हो जाना यथाख्यात चारित है। ३३५. प्र०-संयमासंयम फिसको कहते हैं ? उ०-सम्यग्दर्शनपूर्वक पाँच अणुन्नत, तीन गुणवत गोर चार शिक्षावतार धारण करनेको संयमासंयम कहते हैं । ३३६. प्र०-असंयम किसको कहते हैं ? उ०- जोव हिंसा और इन्द्रियोंके विपयोसे विरत न होनेको असंयम कहते हैं। ३३७. प्र०-किन गुणस्थानोंमें कौन सा संयम होता है ? उ०-सामायिक और छेदोपस्थापना छठेसे नौवें गुणस्थान तक होते हैं । परिहारविशुद्धि छठे और सातवें गुणस्थानमें होता है। सूक्ष्मसाम्पराय संयम केवल दसवें गुणस्थानमें होता है। यथाख्यात संयम ग्यारहसे लेकर चौदहवें गुणस्थान तक होता है। संयमासंयम पांचवें गुणस्थानमें होता है और असंयम आदिके चार गुणस्थानमें होता है। ३३८. प्र०-दर्शन किसको कहते हैं ? उ०-सामान्य विशेषात्मक बाह्य पदार्थोंको अलग-अलग भेद रूपसे ग्रहण न करके जो सामान्य ग्रहण होता है उसको दर्शन कहते हैं। अर्थात् विषय और विषयीके योग्य देशमें होनेकी पूर्वावस्थाको दर्शन कहते हैं । ३३९ प्र०-दर्शन कब होता है ? उ०-ज्ञानके पहले दर्शन होता है। विना दर्शनके अल्पज्ञानियोंको ज्ञान नहीं होता। परन्तु सर्वज्ञ देवके ज्ञान और दर्शन एक साथ होते हैं। ३४०. प्र० - दर्शनके कितने भेद हैं ? उ०-चार-चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन । ३४१. प्र०-चक्षुदर्शन किसको कहते हैं ? उ०-चक्षु इन्द्रियसे होनेगले मतिज्ञानके पहले जो सामान्य ग्रहण होता है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं।

परमानुपा . 7 ३४२ ०-अवगुदर्शन किसी रहते हैं ? -परनिराय मार दिया और मन सम्बन्धी मजिमान के पहले जो सामान्य प्रहा होता है उसे बचान रहते हैं। ३४३. R०-अनि रिसरो करते हैं ? 10-अवधिमानगे पहले होनेवाले मामान्य प्रणरो भवपिन रहते हैं। ४.zomantiनगिसो पो हैं ? -यशानो गाय होनेगले गामान्य हो दल दर्गन रहते है। २४५.०-नान नि मायानाम होता है। Somपोन और अचानकारहवें गरमान माहती है। बधि. दर्शन को भाग्य उजापान नपा होता है। और ये वरदान नग्दा नया धौरहवें गुमरपानमे और होगा। ३६.xomain पिरोते हैं To अनुमित पायोग, रोग और नोसोनिकों मारत है। Pres- तिने ? TT SCIETimr. मन्दामादलग, पारगे 10 रा, दया. min, in और एया। Presemat for YARोपेहोसी" Ramgar mitar arrierrrrrrrr. या और पापागामापान tamine rCERTinti प्रय मार्गमा Re-01-पभोर अभय १५७, romafrmए। trim urint krtext ...

५२ +in Go - जो जो f; A और नगरी म । ३५१. प्र०-~- TT गुनाह उ०-गग आयो : गोरः गुणा और मंगल एक पहला गुणस्थान ही होता। ३५२. Ho--सम्पय फिराको गो? उ०-जिनेन्द्र भगवानगमागम गोप निकाय और तो पदार्थीका प्रदान करनेगा गम्यस्प मारते है। ३५३. प्र०--सम्यपत्य मागंणा कितने भेव : उ0--2 भेद हैं-उपगग सम्पपत्य, चंदा गायोपागा सम्यान, क्षायिक राम्यक्त्व, राम्यक् मिथ्यात्व, मासान सम्मान और मिथ्यास्य । ३५४. प्र०--उपशम सम्यपत्य फिराको पाहते हैं ? उ०-~-अनन्तानुवन्धी क्रोध मान माया लोभ और मिथ्यात्य, सम्यक मिथ्यात्व तथा सम्यक्त्व मोहनीय, इन सात कर्मप्रकृतियों उपरामरी, कोनटके नीचे बैठ जानेसे निर्मल हुए जलके समान जो पदार्थोंका निर्मल श्रद्धान होता है उसे उपराम सम्यग्दर्शन कहते हैं। उसके दो भेद है-प्रथमोपशम सम्यक्त्व और द्वितीयोपशम सम्यक्त्व। - - ३५५. प्र०-प्रथमोपशम सम्यक्त्व किसको होता है ? उ०-~चारों गतियों से किसी भी गतिमें वर्तमान भव्य, सैनी पक्षेन्द्रिय, पर्याप्तक, विशुद्ध परिणामी साकार उपयोगी, शुभलेश्या वाले और फरणलब्धिसे सहित अनादि अथवा सादि मिथ्यादृष्टि जीवको हो प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्ति होती है। ३५६. प्र०-लब्धियाँ कितनी हैं ? उ०~-पांच हैं--क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि, प्रायोग्य लब्धि और करण लब्धि । इनमें से चार लब्धियां तो भव्य अभव्य सभीके होती हैं, किन्तु करण लब्धि भव्यके ही होती है और उसके होने पर सम्यक्त्व अवश्य होता है। ३५७. प्र०-क्षयोपशम लब्धि किसको कहते हैं ? . ३५३-लब्धिसार, गा०२।

करमानुयोग प्रगिस
Te-जिन समर माँका अनुभाग प्रनिममय बनातागुणा पता हमा
उसमे आता है त३ सोरम लब्धि होती है। यदि मनुभागो
अनन्त भाग मात्र देनपानी समोरारामावर सप और सेन
पार गर्वधानो स्पसमा मस्सया रामरी प्रामिनाम सोजगम
सच्यि है।
२५८ Foryद्धि चिसिरोपाते हैं ?
Gorपोरसमस होने से मानोर बाकि मोरे
यन्ध बार ओ धर्मानुगत गुम परिणाम होता है उनको प्रकिो मिति
सिपले हैं।
१५. प्रासरि गिरोहले हैं।
3o-मनोर नो पदाni कनेशल नाना वर्ग
पोनागिन पाको भागको नाम,
प्रोग्य roidो है ?
30- बही गगनगम लिहm
स,
मानापरी fair and ram
मागे अनुगामा
मा प्रमाणात रस m garam
पानी परकी पाया ran।
१५१ xorrrruinोगो।
Form umar enemr free
बरण यInnnn
१२.०-गोपाय M.

तो मिथ्या और मामा बदर अया उER ARE FREE.५ र वेवा सम्मानको प्रामा। ३६४. ०-अन्तररण सभा उ०---गिग १ का Ft और द्वितीय विमतिपो चौतारम Titfairअमा पारनेको अन्तरसारण, मिनार मनासारण करता है। इसमें अन्त को जाति में आगे- वाले मिथ्यात्वकाकी पात प्रमाण nि from छोहार उससे ऊपरसो अन्तमुंहतं प्रमाण निको जाने प्रयाग उठा उठाकर कुछको प्रथम स्थिति (नीकी स्थिति ) मी नि मिला है और कुछको द्वितीय स्थिति ( ऊपरकी स्थिति ) सम्बन्धी निमें गिला देता है। इस तरह वह तब तक करता रहता है जयराम जगात प्रमाण स्थिति के पूरे निपेक समाप्त न हो जायें । जय मध्यवर्ती गमम्त निगे जारकी अथवा नीकी स्थितिके निपेकोंमें दे दिये जाते हैं और प्रथम मिति तथा द्वितीय स्थिति वीचका अन्तरायाम मिथ्यात्व कर्मके निकोसे सर्वथा शुन्य हो जाता है तब अन्तरकरण पूर्ण हो जाता है । ३६५. प्र०-वेदक अथवा क्षायोपशमिक सम्यक्त्व किसको कहते हैं ? उ०--अनन्तानुवन्धी कपायका अप्रशस्त उपशम अथवा विसंयोजन होनेपर और मिथ्यात्व तथा सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृतिका प्रशस्त उपराम अथवा अप्रशस्त उपशम अथवा क्षयोन्मुख होने पर, तथा देशघाती सम्यक्त्व प्रकृतिका उदय होने पर जो तत्वार्थश्रद्धान होता है उसे वेदकसम्यक्त्व कहते हैं। इसीको क्षायोप- शमिक सम्यक्त्व भी कहते हैं। क्योंकि सर्वधाती अनन्तानुवन्धी कपाय, मिथ्यात्व और सम्यक मिथ्यात्वका उदयाभाव रूप क्षय तथा सदवस्थारूप उपशम होनेपर और देशघाती सम्यक्त्व प्रकृतिका उदय होनेपर वेदक सम्यक्त्व होता है । इससे इसीका दूसरा नाम क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है। ३६६. प्र०-अप्रशस्त उपशम या देशोपशम किसे कहते हैं ? उ.-जिसमें विवक्षित् प्रकृति उदय आने योग्य तो न हो किन्तु उसका स्थिति अनुभाग घटाया बढ़ाया जा सके अथवा संक्रमण वगैरह किये जा सकें, उसे अप्रशस्त उपशम या देशोपशम कहते हैं। ३६७. प्र० --प्रशस्त उपशम या सर्वोपशम किसको कहते हैं ?

परणानुयोग प्रतिका उ.-जिसमें विवक्षित प्राति न तो उदर आने योग्य ही हो बोर न उगरा स्थिति अनुभाग घटाया जा सके तथा न संक्रमण वगैरह ही रिया नामक दमे प्रशस्त उपसम या सर्वोपराम महते हैं ? ३६८.३०-पेदक सम्पन्य पोस्पिनि रितनी है। २०-वेदक सम्पत्ती जपन्य मिति अन्तमहन और उसष्ट पिनि टियागठ सागर प्रमाण है। ३६९ प्र० - क्षायिक सम्पत्य रियो करते हैं' -अनन्तानुवन्धी क्रोध, मान, माया, मोम और पिचार, मम्पर- पिप्यारव और गम्बराय इन मात प्रतियोर क्षय में गेनिम प्रमान होता है यह भाविक गम्यस्त्व है। २७०.३०-सायिक सम्पत्ति नाम है। २०-अमेयन, देश गा मा गया अयान ATTRICT. पना देश गम्पष्टि मनुष्य परमो धपग TET बना पापले अन्नमे अनन्तानमन्धी कपमान दिन मात को बार बार और नर गोrrent पणन मोहनीय पोवा का १७१.०-म मोवी ERRm गारण अस ना धोरण गार परा Ariti irani भाग गान अन्नमाल न irrit जिराने फरने गोल गरगो दर्शन क्षपणाके योग्य मार्ग अनितारण : वह कृतम्त्य चंदा महा जाता। ३७५. प्र०-दर्शन मोहन्त क्षपणा frama करता है ? उ०-दर्शन मोहनीयाको शपणा आगाराला या वेदक होने के पश्चात् आगुगा क्षय होना गदि माना तो सम्परा ग्रहण करनेसे पहले बांधी हुई आयुरो अनुसार पार्टी गति उत्तम होकर दर्शन मोहनीयको क्षपणाको पूर्ण करता है। उसमें खाना बितिमा वेश कालो चार भाग कर उनी यदि प्रथम भाग मानो नियनी देह होता है, दूसरे भागमें मरनेसे देव या गप्प होता, तोगर भाग गरनेरी देव मनुष्य या तियश होता है और जो भागमे मरने नारोमरो किसी भी गतिमें जन्म लेता है। ३७६. ०-क्षायिक सम्यक्त्वको कितनी स्थिति है ? उ०---अन्य सम्ययत्वोंकी तरह क्षायिक सम्यक्त्व उत्पन्न होकर टूटता नहीं है। फिर भो क्षायिक सम्यक्त्व उत्पन्न होने पश्चात् क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवके संसार में रहनेकी अपेक्षासे क्षायिक सम्यक्त्वनी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त आठ वर्ष कग दो पूर्व कोटो और तैतीस सागरते कुछ अधिक है क्योंकि क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव प्रथम तो उसी भवसे मुक्त हो जाता है जिस भवमें उसने दर्शनमोहका क्षय करते क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त किया है । यदि क्षायिक सम्पक्त्व प्राप्त करनेसे पहले उसने पर भवको आयु बाँध ली हो तो वह तीसरे भवसे मुक्त हो जाता है और यदि उसने मनुष्य या तिर्यञ्चकी आयु बाँधी हो तो चोथे भवमें अवश्य मुक्त हो जाता है । ३७७. प्र० -क्षायिक सम्यक्त्व किन गुणस्थानोंमें रहता है ? उ०--चौथेसे चौदहवें गुणस्थान तक । ३७८. ३०-ओपशमिक सम्यक्त्व कितने गुणस्थानोंमें रहता है ? उ०-प्रथमोपशम सम्यक्त्व चौथेसे सातवें गुणस्थान तक और द्वितीयो- पशम सम्यक्त्व चौथेसे ग्यारहवें गुणस्थान तक रहता है । ३७५. पट्खण्डागम, पु० ४, पृ० २६ ।

परमानुस प्रतिमा ३७१. सायोपामिक सम्पत्य शितने गुणस्थानों में एता है ? उ-चोपसे सात गुणस्थान तक। ३८०. ०-किस गतिमें कितने सम्पार होते हैं? Fo-पम नरक में तीनों पाच पाये जाते हैं, जिनु र ६ मतले दापिर मम्मान नहीं पाया जाना। निरी, मनुनी और देगी नीनां मम्मान पाये जाते हैं । घेवरानी दिया है कि मनमो, तर और मोतिला देवों में समा देवियों में शापित गम्मच नी पारा जाता। १८१.Bom-शो हिराकोले है ? जो जीय मनको महायतामे ना यगएको र की मंशा यही है और जो ऐना नहीं पर गै अगझी रही है ? २८२. प्रशिने गुरपान होते है ? Touो प्रम पर वार गुमधान होते है और मोरे वन परपरागणमान ही होता है। ३. Fair पिको पहते हैं। 20-रिक र मानकर fr गीर, मायामा योग्य Trimmatrireri पर जाकर Tariram | २८४. Ro-xam कोयना Forer.ruTerrrrr गोषी और ferrrrrr... . १८५, Forgetnti Ver-NEET Parent terrerant लाल E-mitrrst ~: E" ** Arr. .

३८७. प्र०-अनुपोगदार ?
उ०-सार, संगा, ग, साग, का, गाा और मामला
आठ अनुयोगद्वार हैं।
३८८. प्र०-अनुयोगमागेकामा प्रपोगा?
उ०-ये वाट अनुयोगहार अशोर अभितार जागने पारि
क्योंकि इनकी जानकारीक बिना गुणवान और गागानin लोगटी
ज्ञान नहीं हो सकता।
३८९. प्र०-रात्परपणा किसका कथन करती है ?
उ०-सत्यरूपणा पदाकि मस्तित्वका मान करती है। कपन के दो
प्रकार हैं-एक ओघ कथन और एक आदेश काया । सामान्य नापनको औष
कहते हैं। जैसे मिथ्यादृष्टि गुणस्थान , सागादन सम्बष्टि गुणस्थान है,
आदि । और विशेष रूपरी कथन करने को आदेश नहीं हैं। जैसे, नारतो जोवी
चार गुणस्थान होते हैं, तिर्यों पांच गुणस्थान होते हैं आदि ।
३९०. प्र०-संख्या अनुयोग किसका फायन करता है ?
उ०--सत्प्ररूपणामें जिन पदार्थोंका अस्तित्व कहा गया है उनकी रांत्यामा
कथन संख्या अनुयोगमें होता है । जैसे, मिथ्यादृष्ट अनन्त हैं, सासादन सम्यग्दृष्ट
पल्यके असंख्यातवें भाग है । इस कथनके भी दो प्रकार हैं- ओघ और आदेश ।
३९१. प्र०-क्षेत्र अनुयोग किसका कथन करता है ?
उ०---उक्त दोनों अनुयोगोंके द्वारा जाने हुए द्रव्योंकी वर्तमान अवगाहनाका
कथन क्षेत्रानुयोग करता है । जैसे मिथ्यादृष्टि जीव सर्वलोकमें रहते हैं, इसके भी
पूर्ववत् दो भेद हैं।
३९२. प्र०-स्पर्शनानुयोग किसका कथन करता है ?
उ०-उक्त तीन अनुयोगोंके द्वारा जाने हुए द्रव्योंके अतीतकाल विशिष्ट क्षेत्रका
कथन अर्थात् भूतकालमें जितने क्षेत्रको स्पर्श किया है और वर्तमानमें जितने
क्षेत्रको स्पर्श किया जा रहा है, उसका कथन स्पर्शनानुयोग करता है । इस कथनके
भी पूर्ववत् दो प्रकार हैं।
२९३ प्र०- कालानुयोग किसका कथन करता है ?
उ.-पूर्वोक्तचार अनुयोगोंके द्वारा जाने गये द्रव्योंके कालका कथन कालानुयोग

करणानुयोग प्रतिर
करता है। जैसे मियादृष्टि जीव सर्वश पाये जाते हैं। इसके भी पूर्ववत से
प्रसार है।
३९४.३० -सन्तरानुयोग सित कपन करता है ?
Toजन पक्षों मस्मिल, परसा, क्षेत्र, सन, और याला शान हो
पग है उन अरmापन चन्तरानुयोग करता है। जो कोसी
স্যা নিশষশ্য মাৰাত থম থম তলা।
३९५.-
भाग पिन करता है।
For उन भनुरोगों द्वारा मानो भागामधन भागनुरोग बरा
है । लोग गिप्पाटि पानी बोलिभाय होता है, बाशिनतरे
भी पूर्ववत दो प्रकार हैं।
११.comarwarनुरोग विरारपरता?'
ao-उत मोगोरे ग जाने हा माहोल.
पना-नयन अन्ययानुयोग पलाम यीशदोरह।
२०७ Fo-RAIष्टि नीर शिलने
3-।
१९८.co-नाम्बाहि in IIT र
गुणाकार site for
Potram मगर'
१९९-KRTN पीया
Toniferrery smati Artina
नीचे गिनी rat meirr:rmere
प्रमाण दे rm emorroriti
४. romagra रिसने "
Tomato,rists Forucrate
मामाधार प्रदानाmrrrrrrr
यार।।
vat Rement arrianr"

१० ३५. है। विशेष it heritanA जोयोग और गिनी समयमे तास, नोभेम, पास तालीरा, सात सानो मोनोरा पर चरते हैं । इस गानो । ४०२. प्र०-क्षक श्रेणीक घार गुमाया Arial ? उ०--2 महीना आठ समय अंगी मोमा राम जघन्यसे एक जीव एक रागयों और मोआ गुमलान प्रवेश करते हैं। यह सामान्य गाथन । मानीवाला प्रमान उपशम श्रेणीवालोंसे दुगुना है। ४०३. प्र०-सयोगफेवलो जीव कितने हैं ? उ०-सयोगकेवली जीवोंकी संगमा आठ लाग असागवे हजार पांच सौ दो है। ४०४. प्र०-अपोगफेवलो जोय कितने हैं ? उल-अयोगकेवली जीवोंका प्रमाण क्षपक श्रेणीवाले जीवोंक बरावर ही होता है। ४०५. प्र०-मिथ्यादृष्टि जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? उ०--सर्वलोकमें रहते हैं। ४०६ प्र०-सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवलो गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवाले जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? उ०--लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं। किन्तु इतना विशेष है कि प्रतर समुद्घात करनेवाले सयोगकेवली लोकके असंख्यात बहुभाग प्रमाण क्षेत्रमें और लोकपूरण समुद्घात करनेवाले सयोगकेवली सर्वलोकमें रहते हैं। ४०७. प्र०-मिथ्यादृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? उ०—सर्वलोक स्पर्श किया है। ४०८. प्र०-सासादन सम्यग्दृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? उ०-लोकका असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है। और विहारवत्स्वस्थान, वेदना समुद्धात, कषाय समुद्घात तथा वैक्रियिक समुद्घातगत सासादन सम्यग्दृष्टि -०७-पट्खण्डागम, पृ० ४, पृ० २६ ।

करणानुरोग प्रशिक जोषोंने प्रसगालो चौरह भागोमसे युछ बम बाट माग प्रमाण क्षेत्री र दिया है। और मारणान्तिक रामुख्यान यरनेवाले मामादन गम्पयूटी जोगने अमनाली के चौदह भागोमेगे युट वम वाह भागप्रमाणटोको तरिया है। को इस प्ररार है गुमेर पर्वतो मूल भागने लेकर कपर पिसाभार पिदी तर सात राज होते है और नीचे पी पक्षियी तर पाय राहोते है। उन दोनोको मिला देनेने मागादन गम्य जीवो. मापान्तिा क्षेत्रको सम्बाई बुध पमबारह राग होती है। ४०९. प्र-पिहारस्यामा परोसा २०-यामान, समुत्थान बोर उपादये गेम जीयोकी अन्यानोन प्रभारी होती है। उनमें ग्वाधान्य दो प्रकार है-र दायानग्यमान और दूगग दिहारवरवधान । रुपने मन हानेर म बागिना नाना दगम्हमन्यानमामान है और न उस दिनार अन्यत्र माना- गना आदि विहाग्दादान है। गत सरकार है। मार लहानेके प्रथम ममम । नयागजीवने स्तिोत्रमे गमानागगन यह रिसाद बनाया है। ४१०. Bo-मिटी मोर भगा मम्मी बोरो रिपत्र पा. उ.-वायानीपाद भारत और दिदस्यमान, बना पाय थोर बिपि marwance भारको धीर भागया है l REE Erasma मोदी र प्रमाण है। या ! we tri पुष्पमा पोरगर भाग का ": En श्रीरामपादनाना है। १६.प्र. संपरा को farera frot. पापा वामRit. Itr! ४१६.-IIT PICमग Enter प्रय लागेको nिerritri. गावान' 14t...aar.re या भाr, Amrapमार... ture Re- farria Int ६२ उल-गाना जोगी tutter तीन प्रकार-अनादि धागामादिगा समय गिथ्यादृष्टीका गाल पनादिना और अन्त नहीं होता। भय जी मितिमाम भी है और सादि सान्त भी होना मादि मामला अन्तर्मुहत है पयोंकिताई सामिपानी, मादी संयतासंयत अधया प्रमत्तगंगा जी IIT और अगर काल तक मिथ्यात्वमें सफर गुम: सम्मा मा अनार या संयमासंयमको अथवा मागत मंगर माता या एक जीवको अपेक्षा सादि सान्त मिथ्यात्वका माल मुछ हा गुगल परावर्तन है । क्योंकि एक बार सम्यान हो घर जाने पर भी जीन अपि अधिक कुछ कम मधं पुद्गल परावर्तन कालवार ही संगारमें ठहरता है। ४१४. प्र०~-सासादन सम्यग्दृष्टी जीव तिने फाल तक होते हैं ? उ० - नाना जीवोंको अक्षा जघन्यने एक समय तमा होते है। और उपाय से पल्योपमके असंख्यातवें भाग कालतक होते हैं। गुलागा इस प्रकार है- पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र उपशग सम्यग्दृष्टी जीव उपराम सम्यक्त्यके कालमें एक समय मात्र शेप रहने पर एक साथ सासादन गुणस्थानको प्राप्त हुए और एक समय तक सासादन सम्यग्दृष्टी रहार दूसरे समयमें सबके तर मिथ्यात्वमें चले गये। उस समय तीनों लोकोंमें कोई भी सासादन सम्यग्दृष्टी नहीं रहा । इस तरह नाना जीवोंको अपेक्षा जघन्यकाल एक समय प्राप्त हुना। पल्योपमके असंख्यात भाग उपशम सम्यग्दृष्टी जीव उपशम सम्यक्त्वके काल में एक समयसे लेकर छै आवली अवशिष्ट रहने पर सासादन गुणस्थानको प्राप्त हुए । वे जब तक मिथ्यात्वको प्राप्त नहीं होते तब तक अन्य भी उपशम सम्यग्दृष्टी सासादन गुणस्थानको प्राप्त होते रहते हैं। इस तरह उत्कृष्टसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग काल तक सासादन गुणस्थान पाया जाता है। और एक जीवको अपेक्षा सासादन गुणस्थानका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्टकाल छै आवली है; क्योंकि उपशम सम्यक्त्वके कालमें कमसे कम एक समय और अधिकसे अधिक छै आवली काल शेप रहने पर उपशम सम्यग्दृष्टी जीव सासादन गुणस्थानको प्राप्त होता है। और जितना उपशम सम्यक्त्वका काल शेष रहता है उतना ही सासादन गुणस्थानका काल होता है । ४१५. प्र०-सम्यग्मिथ्यादृष्टी जीव कितने काल तक होते हैं ? पल्योपमके असंख्यातवें भाग काल तक होते हैं। खुलासा इस प्रकार है: उ०--नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्ट :

-1 7.-1 करणानुयोग प्रशिरा मोहनीय फार्मपी बट्टाईम प्रातिपोशी मत्ता ग्पनेवाले मिप्याटि अथवा वेदन राम्याच सहित भगवन सम्बादती गरतामया गया प्रमानमरन गुमान पाले जीव परिणामौके निमित्त गम्यग्मध्यान्य गुणन्यानो प्रहए और अन्तमहर्न पाल तक व्हर पर नियात्रा या अमन सम्पदाको प्रार हो गये। तय सम्यक् मिथ्यात्व नष्ट हो गया। इस प्रकार सरकार संत निट हुआ। नो नरइ पूर्वान मान्धाननी जोर मानो प्राप्त हुए और यहाँ मन्नमुंहन राता । जय राम मो पूर्वोन गुणस्थानवों जीव गम्यम् from रहे। न पचौरमा बस्तान माग मात्र सभा " Pram ने रहते हैं । उगने पम्चात् नरम मा : ar संसा माग्मध्यादृप्टी जीवया जपान और 77... पन्यो उतर पाल मगाणा : ". गुजरथानमे मो टा माना ४१६ 80- मम्मी जीव तने Trit 50-नाना जीयोmart-... एजीसीधा जयन्य7 :--- सागर है। मोम-: दागीयमर mrr: 1:11 योमे उत्पनमा । ammer हमा | artak rat गरेघा प्रमा परापूर्व को पिर होगा। ४७.-RELEPerre... en cir ce:er प.in २०- दिनाat:rmir गरपारा । मर पर पाra मनुष्कीम mer ... पnिimuary". 16.111 ..., 11 . प 1 .. ... १ प . 6 गया। और एक अप्रमत्तसंयत उपशम श्रेणीपर चढ़कर पुनः लौटा और अप्रमत्त How १९ - अन्तरकाल पल्यका पसंख्यातवां भाग है। एक जीवनी अगदा सन्म अन्तारसाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अर्थ पुदगल परावर्तन है। इस सदा ही जीव पाये जाते हैं। एक जीवकी अपेक्षा उक्त गुणस्थानोंका जपत्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त हैं। वह इस प्रकार है एक असंयत सम्यग्दृष्टि संगमा- संयमको प्राप्त हुआ और एक अन्तमुहूर्त तक संयमासंयगी रहकर पुनः असंयत सम्यग्दृष्टी हो गया। एक संयतासंयत मिथ्यादृष्टि हो गया या असंयत सम्यग्दृष्टी अथवा संयमी हो गया और एक अन्तर्मुहूर्त तक वहाँ रहकर पुनः संयतासंयत हो गया। इसी तरह एक प्रमत्तसंयत अप्रमतसंयत होकर पुनः प्रमत्तसंयत ४२४. प्रल-मा: Transform? अन्तराल ; अधिक अनि जीव नही पाया माना। 17 असंगात भाग; गोममा मान सम्मान होता है और पवार मानेर पुन: के अन्यात भाग पर TREE HEAafai जीवको अपेक्षा उत्कट असा पर यो एक अनादि मियादृष्टि जीरने मारा गंगासी अर्ध पुद्गल परावर्तन गार किया पुन: म सम्बन्टि बार या सासादनराम्यपवी हो गया। याना गा और अगदान परावर्तन कालतक नियात्यों बार जाम पास गरी पुनः सासादन गुणस्थानको प्राप्त जागा माल जानना । ४२५. प्र०-सम्पग्मिथ्यावृष्टि गुणरथा का लिगा है ? उ०-नाना जीवोंकी पेक्षा जपाय A राम और उत्तर उपपादन सासादन सम्यग्दृष्टिो अन्तरमालको दृष्टिों साकार कर लेना चाहिए। ४२६. प्र० - संयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेगार अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानका अन्तरकाल कितना है ? उ०-नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरकाल नहीं है। क्योंकि उक्त गुणस्थानों में ४२५-पखण्डाम, पु० ५, पृ० १४-१५ । - करजानगंग प्रति होता है । रापा नष्ट बन्तरसाल कुछयम मय पदनल परावर्तन है। गो बनादि मिप्यादृष्टि जीवो गम्पा उत्तम पाराकर ग मनग्यान भेना चाहिये वोर वहांगे मन कारावर पुनः मिथ्यात्वमें लारर दुमपम म पुगत परावर्णन कपाल तक अमन परागर, पुनः गम्याय उत्तम करार उस गुमायान से जाना पारितारग तरह करनेने उष्ट मानसालनिकलता है। ४२७ प्र०-उपप घेतो. धारों पुगरपानोरा नरनिा है ? ३०-माना जीयाको मेधा जपन्य अन्नर समय है। जोमप्रसार - जीव अपूर्वकरण गुणग्यान गये और उनका गल गया होनेर पृकार पर गोल गोनेरियो मे कोई भी गहोगा। उगरे पार गरे गम गाामे पर रोगिहर मना र अपूरण गुणपानी को गये। प्रार" गार उपन्य अलर मोगर र नीन गुपयानो र गा पाहिये। न श्रेणी के पागे गुमपानी बनाया पिरमें अधिक यात्रा पोर उमामा मनोन म्यानमे नहानगना । चागे ERICTimnamam यता पो र war मा सो को पदार और पनि मिपा भगा Erra मग कार पर IT 1 At पण सामोरकोर 3.18 Fi" और मीय गुणाधान Trte rrrrrrrrr पर भी errane एम बी antarrati. : " एपीपी men राम ! अगादिगियाट नीवर म: PRE Emr.ult. समीर पायmanter ..! विanfrun ना. YE'mer. or पर पुन meहो नाम भावार १०५५४ (* . १८ Re-धागे सपा. कोर पोर SHARE F-गामामोदmr. rmthittortur माय Firint । रागयों नाव मात्र नितिग। और एमए भी जीव अपूर्व पणन राममनोरम क्षपणा हो गर्थे । इस तर जापानी आठ अपूर्वकरण म सयो सब मान हो गये और छ माग त कोई भी जीव IT करा न मन: उगाट अन्तर छ गारा होता है। नी नानांनी मान्य और जाट अन्तर जान लेना । एक जीबी पेक्षा वाTET और अपोगरवली गुणस्थानका अन्तर नहीं है पाक्ति वाम श्रेणीवाले जोगका पता नहीं होता। ४२९. प्र० - सयोगयोबलो गुणस्थानका मरनाल कितना है ? उ०-नाना जीवों तथा एका जीयोगी अपेक्षा भी गांगोलली गुणस्थानमा अन्तर नहीं है; क्योंकि रायोग फेवलियोंका कभी अभाव नहीं होता। तथा रायोग- केवलीसे अयोगकेवली हुए जीव पुनः रायांगोवली नहीं होते। ४३०. प्र०-मिथ्यादृष्टि गुणस्थान पौन-सा भाव है ? उ०-मिथ्यात्व कर्मके उदयसे उत्पन्न होनेके कारण मिथ्यावृष्टि गुणस्थान औदयिक भाव है । क्योंकि जो उदयसे हो उसे औदयिक कहते हैं। ४३१. प्र०-सासादन सम्यग्दृष्टि कौन-सा भाव है ? उ०~~आदिके चार गुणस्थानोंमें जो भाव बतलाये गये हैं वह दर्शन मोहनीय की अपेक्षासे बतलाये गये हैं। इसलिये दर्शन मोहनीय कर्मके उदय, उपराम, अथवा क्षयोपशमसे न होनेके कारण सासादन सम्यक्त्व पारिणामिक भाव है। क्योंकि जो भाव किसो कोके उदय, उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशमसे नहीं होता उसे पारिणामिक कहते हैं । ४३२. प्र०-सम्यग्मिथ्यादृष्टि कौन-सा भाव है ? उ०-- सम्यग्मिथ्यात्व कर्मका उदय होनेपर श्रद्धान-अश्रद्धान रूप जो मिला हुआ जीव भाव होता है उसमें जो श्रद्धानका अंश है वह सम्यक्त्वका हिस्सा है, उसे सम्यग्मिथ्यात्व कर्मका उदय नष्ट नहीं करता। इसलिये सम्यग्मिथ्यात्व भाव क्षायोपशमिक है। ४३३. प्र० - असंयत सम्यग्दृष्टि कौन-सा भाव है ? उ०-दर्शन मोहनीयको उपशमसे उपशम सम्यक्त्व उत्पन्न होता है इसलिये असंयत सम्यग्दृष्टि औपशमिक भाव है । दर्शन मोहनीयके क्षयसे क्षायिक सम्यक्त्व रोता है, इसलिये असंयत सम्यग्दृष्टि क्षायिक भाव है। सम्यक्त्व प्रकृतिके घाती स्पर्द्धकोंके उदयके साथ रहनेवाला सम्यक्त्व क्षायोपमिक कहलाता क्षय परणानुपौग प्रवेशिका है। इसलिये अमंपत राम्यादृष्टी बायोपमिक भाव है। इस तरह बगपत मम्मदृष्टि गुजरथानमें नोन भाव होते हैं। ४३४. ३०-पतासंपत, प्रमत्तसंपन बार अप्रमत्तसंयत पौन-सा भाव है ? उ०पारिष मोहनीय फर्मर उदा आपोरगम होनेपर गंतागंपा, प्रमत्तनपत और अप्रमत्तगंपत भाव उत्सान रोते है इसलिये ये तीनो भार सायोपसमिक हैं। ४३५. प्र०-अपूर्वकरण आदि पारों जपान गुणरमान कौन-सा भाव है ? उ.-इनमे पारित्र मोहलीको सरोग नियोका जाम होगा निये चारों गुणायान बौमिक भावार हैं। ४१६ ३०-चारों धारयः, योगरेपली और योगातोरगाभाष है? रोगी बग्ने पारण और यदि आपने यमरने वारप गेशपय वगैरह दायिक मापार है। ४१७.80-मंदिगोपले है। ३०-जो पुनर सप पीक राग कालो निमि पर्म र परिणाहीर जी पाप बन्यो प्रहार गोप परी है। ४१८०-धमकिता भं' उ.-माद-जानावरण, नाण, नार, , . और अनाराय। ४१९:०-mनावरणमंसिरो। उ.-जीव गन meint दारण। no.to-सांगादरण परायोप" २०. भाजीव गणतो! Creat {. Re-in • vit? 30-को भीगा और माना Ft पर पा Mizo-मोमीय निरोग' Re--- गोरो गलामा । mti-ngrilोए Tri w - Ge-मिनिममा माउस अमु समय तक माना। ४४८ Horniकाको ? 30-जो भारीर मारनानासाना नाम गर्म है। ४४५. प्र० गोना सितो ? उ०-जीवको उन्न अगवा ना लगे :: सरसा: मोन कर्म कहा जाता है। ४४६. १०-अन्तराय फार्म शिताको हो ? उ०-जो दान, लाभ, भोग, भोगा िकरने में मार्थ है उसो अन्तराय कर्म कहते हैं। ४४७. प्र०-ज्ञानावरण फर्मके कितने भेद है ? Fo-पांच भेद हैं-मतिज्ञानावरण, श्रुतशागावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलशानावरण। ४४८. प्र०-दर्शनावरण फर्मके कितने भेद हैं ? उ०-नी भेद हैं-निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, निद्रा, प्रचला और चक्षुदर्शनावरण, अचक्षु दर्शनावरण, अवधि दर्शनावरण, केवल दर्शनावरण । ४४२. प्र०-निद्रानिद्रा पिसको कहते हैं ? उ०-जिसके तीव्र उदयसे जीव वृक्षकी चोटी पर भी गाढ़ निद्रामें सोता उसे निद्रानिद्रा कहते हैं। ४५०. प्र०-प्रचलाप्रचला किसको कहते हैं ? उ०-जिसके तीन उदयसे जीव बैठा या खड़ा-खड़ा सो जाता है, सोते हुए मुँहसे लार गिरती है, शरीर काँपता है उसे प्रचलाप्रचला कहते हैं । ४५१. प्र०-स्त्यानगृद्धि किसको कहते हैं ? उ०--जिसके तीन उदयसे उठाये जाने पर भी प्राणी पुनः सो जाता है, सोते हुए भी कार्य कर डालता है, वड़बड़ाता है और दाँत किटकिटाता है उसे स्त्यानगृद्धि कहते हैं। ४५२. प्र०--निद्रा किसको कहते हैं ? उ०-~-जिसके तीव्र उदयसे जीव थोड़ा सोता है, उठाये जाने पर जल्दी उठ . - থে মরিয়া संशा है, और पोशा-सा भी शन होनेसे जल्दी सचेत हो जाता है जो निदा १५३.toवता रिसको बहने हैं ? To-जिमके तीर उदयसे आगे ऐगो रहती हैं, मानो उनमे न भग है, मिर भारी रहा है और नेत्र बार-बार बन्द होते और गलने हैं ने प्रमा १४.प्र०-देवनीय कमोहितने भेव हैं ? उरुको मेर है-सात वेदनीय और अमार घेदनीय। ४१५.40 -मोहनीय रमदितने भेद है। ३०-दो भेर-दन मोहनी और पागि नया ४५६ ० . न मोहनी पिसाने है। ३०-देव, गाय और गाय ARTIME रहते हैं। अचान minar पानमोनीय कर्मक है त - दिमाखो पर ... शाय बरसान I सोनामे पहा Erit! . .. . on mere..." artATE" rt-.-" जंगura" . ६ T . ६५ MC FAEET ...24 Mer-menumers, near-साल cant ७२ 4. Trria - - उ०-जियो नाम मा र मरने भसा होती. ufMES ४६१. प्र०-मिथ्या? उ० --जिग का है. जोशमा गनिमा पाम है। ४६२. प्र०-पारिर मोहनीय कि? उ०-पापक मागों का सागर । उग गादिया जो मोहित करता है अर्थात् टोला, उसे नारि गो: नाग का नाम है। ४६३. प्र० ~चारित्र मोहनीयक जितने भेद है ? उ०-दो भेद हैं-गाय वेदनीय और नाजायलीय काय वेदनीय रे सोलह भेद हैं-~-अनन्तानुबन्धी कोष, मान, गागा, लोभ, अप्रगामानावरण कोध, मान, माया, लोभ, प्रत्यारयानावरण कोष, मान, माया, लोग और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ । तथा नोकगाय वेदनीयो नो भव -सीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति, शांत, भय, गुगुप्सा। ४६४. प्र०-अनन्तानुवन्धी ग्रोध मान माया लोभ शिसको कहते हैं ? उ०---अनन्त भवोंको बांधना हो जिसका स्वगाय है ऐसे क्रोध मान माया लोभको अनन्तानुवन्धी क्रोध मान माया लोभ गाहते हैं। सारांश यह है कि इन कपायोंका संस्कार अनन्त भवों तक माना गया है। ये चारों ही कपाय सम्यक्त्व और चारित्र दोनोंको घातती हैं। ४६५. प्र०-अप्रत्याख्यानावरण कोष मान माया लोभ किसको कहते हैं ? उ०-अप्रत्याख्यान संयमासंयम या देश चारित्रको कहते हैं। उसको जो आवरण करता है उसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ कहते हैं ? ४६६. प्र०-प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ किसको कहते हैं। उ०-प्रत्याख्यान कहते हैं संयम अथवा महाव्रतको। उसको जो आवरण करते हैं वे प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध मान माया लोभ कहलाते हैं। ४६७, प्र०-संज्वलन शोध मान माया लोभ किसको कहते हैं ? उ०-जो कषाय चारित्रका घात तो नहीं करतो किन्तु यथाख्यात चारित्रको उत्पन्न नहीं होने देतो उसको संज्वलन क्रोध मान माया लोभ कहते हैं । ४६८. प्र०-नोकपाय किसको कहते हैं ? उ०-ईषत् कषायको नोकषाय कहते हैं ।

परमानुसोग प्रतिका ४६..प्र०-मोहपायोंका या स्परप है ? उ-जिस उदयसे पुरुष को भाकांदा उत्पन होती है अगरी खबर कहा है। जिसके दस के प्रति आकांदा उत्पन्न होती है जो पुरसवेरने हैं और जिसके उदय स्पी और पुष्प दोनो प्रीि आकांक्षा हो या मागावे है।रिम उससे जीवमें हास्य निमितक राग का होता है उस पगाया हारय पहते हैं। जिमी उत्यो जोवर्म रागमार उपस होरा है उसको गर यहाँ हैं। जिसको उदपले जीवमे रिनीर प्रति अपनी यो परिमले है। निगो उपसे जीव के पोर नम होता उसको गोकमत है। रिमर उदय जीवो भर उत्तम होता है. यो है। font नेलानि उदास होती है जो जगाना रहते है । ६ गर नोरगर है । 30. Bo-आरमी रितने भैर है ? 3-चार भैर है-नायायु, निशा मनुमान योर देगा। nि सपने जोमो नारत भर टाना पडे ग मला यागि यो नि भयमे नाना पडे उसे शिकार करने को Fign और थापा र आगना। st.zo-माम परे तिने भैर, Som-fरे-पार नाम मा romart गाम (एपेन्द्रिय. दोसि Hि: (मोडारिस, मिनि, am m { sharire, IIT AT Kum Writert.. (दिपिक trex rr Pram, afmor cirrest Ti-rinrim auri Prere, माणrma rrrrrrn. नाम Afrrrincreer rec .... Finnis Rana RTET Ang: ........" tim, RAM #yri...rin.... नाम (artant cre For {4tमार rr for Pritreet Km मा rearrrrrrrr, KE PETER TITE Irri MEER Pr:

Farai ४८५. प्रागपin? उसरी परदा fEE, पाया और माद में आठ अंग होत mein aaiAE, भौं, माण, नात, गांगा, ताल, जीन बरः। ४८६. प्र० --गहना नामक किरातो हो हैं ? उ०-जिस का उपयो मारी गोली और वियों की रगना हो? ४८७, प्र० --बचाया नारान कार हनन नाम किसको कहते हैं ! उ०मतियों का संचयको गंगा और यही है । जिम की उदयसे वञमय हालियां बजाय बेष्टा धित और पनागरी भोलित होतो हैं। ४८८. प्र०-~ -जनाराच संहनन नामकर्म किसको कहते हैं ? उ०-जिस कर्मके उदयरो पूर्वोक्त अश्विन्धन ही बजाय वेष्टनरो रहित हो । ४८९. प्र०-गाराच संहनन नामक फिराको पाहते हैं ? उ०-जिस कर्मके उदयसे नाराच अर्थात् कीलें सहित हार हो वज्रमय न हों। ४९०. प्र०-गर्धनाराच संहनन नामकर्म फिसको कहते हैं ? उ०-जिस कर्मके उदयसे हाड़ोंको सन्धियां नारायसे आधी विधी हुई हों। ४९१. प्र० -कोलक संहनन नामक फिसको कहते हैं ? उ०--जिस कर्मके उदयसे हड्डियाँ परस्परमें कोलित हों वह कीलक संहनन नामकर्म है। ४९२. प्र.---असंप्राप्तामृपाटिका संहनन नामकर्म किसको कहते हैं ? उ०—जिस कर्मके उदयसे जुदे-जुदे हाड़ शिराओंसे बँधे हुए हों। ४९३. प्र०-वर्ण नामकर्म किसको कहते हैं ? उ०-जिस कर्मके उदयसे जीवके शरीरमें अपनी जातिके काले-पोले आदि वर्णकी उत्पत्ति हो। ४९४. प्र०न्ध नामकर्म किसको कहते है ? उ०--जिस कर्मके उदयसे जीवके शरीरमें अपनी जातिके अनुसार नियत गन्ध उत्पन्न होती है। ९५.३०-रस नामकर्म किसको कहते हैं ? किन्तु अनुसार नियत -- करमानुयोग प्रवेशिका उ०-जिस कर्मक उदयसे जीवके शरीरमें अपनी जाति अनुसार नियत निरबादि रस उत्पन्न हो ४१६.३०-स्प नामाम किसको कहते हैं ? उ.--जिस चमके उदयसे जीयो पारीरमे अपनी जानिके अनुसार नियत उसन होता है। ४९७.३०-मानुपूर्टी नामस्म रिसको कहते हैं ? 30--जिन पर्मक उदयसे उन्मने पहले और मरणके पीछे बोमरे और मीन समयमे अर्थात् विग्रह गनिमें वर्तमान जीवके प्रदेशोका आगार मरपमे पले शरीरके आकार होता है। ४९८.प्र०स्पान नामराम और आनुपूर्ण मामरममे ग मरता है २०-ग्धान नामरमवा उदय पगेर प्रहरी प्रथम ममदमे होगा और दावोगा उदय दिग्रह गतिमे होता है। मानवीवे उदरसे ही जीत का से जाता है। दिन मतिमे आगार विपनाये गाना और जिम न पगना ये दोनो ही मानुनी वार्य है। १९:०-गुरु लघु नामपम शिरोरते है। 30-जिगमर्मर उदयने जीयारो नमो गोहान भारी मारोत्यो महाना ५००.३०-पमान मामय गिरोहै। उ.--मिग पर उगे दोरा देनेवारे, पाता. सौगरेगी। ५०१.०-परमात मार" उ- रागार vि,पि, गिर ETAHI ५.६.३०-वारा मारियो T-गलपEncreratorrent-t. +et. xo-माप मामrfinोपहो।। Fo- ब पी डी clickrt.it. पापिय पी र पदमri Erti मा........। ---- #Trainian -- ५०४.०~-उधोका नाही ? 30-निग को गद, रायोत गोरसेगी गोल पा Fift ५०५. प्र० --विहायोग नrrarifm? 50--विहागन नाम faitam गगन हो उसको विभागोना। ५०६. प्र०-तिया और मनुष्यों का मिनर हिरा झी उपयो होता है ? उ०-विहायोगति नाम उल में। ५०७. ३०-स नामक तिसते पाहते हैं ? उ०-जिस कमक उदयरी दोन्द्रिग आदि पाप हो। ५०८. प्र०-स्थायर नामसमं फिसको माहो हैं ? उ.-जिस कर्मको उदयरो जीव स्थायर पर्यायको प्राप्त हो। ५०९. प्र०यादर नामकर्म किसको कहते हैं ? उ.-जिस कर्मके उदयसे जीय बादरकाय वालोंमें उत्तान हो। • ५१०. प्र०-सूक्ष्म नाककर्म किसको कहते हैं ? उ०-जिस कर्मके उदयसे जीव सूक्ष्मताको प्राप्त हो । ५११. प्र०-पर्याप्त नामकर्म किसको कहते हैं ? उ०-जिस कर्मके उदयसे जीव पर्याप्त होता है। ५१२. प्र०--अपर्याप्त नामकर्म किसको कहते हैं ? उल-जिस कर्मके उदयसे जीव पर्याप्तियोंको समाप्त करनेमें समर्थ नहीं होता। ५१३. प्र०-प्रत्येक शरीर नामकर्म किसको कहते हैं ? उ० --जिस कर्मके उदयसे जीव प्रत्येक शरीर होता है, अर्थात् एक शरीरमें एक ही जीव पाया जाता है । ५१४. प्र०~~साधारण शरीर नाम कर्म किसको कहते हैं ? उ.--जिस कर्मके उदयसे जीव साधारण शरीर वाला होता है। ५१५. प्र०-स्थिर नाम कर्म किसको कहते हैं ? उ०---जिस कर्मके उदयसे रस, रुधिर, आदि धातुएँ स्थिर हों, उनका बनाश न हो। .

বুৈৰীৰ সুৰাৰ্য
.
५१६.80 अस्पिर नाम कर्म किसको कहते हैं ?
उ०-जिस कर्मके उदयसे रस रघिर आदि धातुएं अधिर हो ।
५१७. 10-शुम नाम कम रिसोरहते हैं।
३०-जिस धमके उदयसे पग और उपाग रमणीर ने है।
५१८.०-अमुभ नाम कर्म किसशे करते है।
३०-जिस कर्मी उदय ग और उपर मुन्दर ।
-सुभग नाम कर्म किसको पता
Fo-ौभाग्यको नाम करनेवाले पक...
१२०. Fo-दुभंग नाम किया है।
30-दुर्भाग्य को उपप बनेका

८४ मरणानुगोग प्रालिका वर्ग है। सुमारे आदि नियमोंगो सिमा पो लिग निककी स्थिति सत्तर होगी गागरीती। ५५१. प्र० आयायामा फिसे पाने ? उल-गाका बन्धनले पानात् जब ना गम उस अपवा उनीरणा अवस्थाको पार नहीं होता, उतने कालको पावागामाल करते हैं। ५५२ प्र०-भावाधातालका गया नियम है ? उ०-उदयगी अपेक्षा आयुगा शिवाय शंग मान मोकी आवाधा पा कोडाकोड़ी सागरकी स्थितिमें सो वर्ष प्रमाण होती है। अत: जिग नमकी स्थिति रात्तर कोलाकोटी सागर प्रमाण बंधती है, उसमा आवाधाताल सात हजार वर्ष है। जिग कामको स्थिति नालीम कोलाकोटी गागर है उसकी आवाधा चार हजार वर्ष है। जिसकी स्थिति तीस कोसाकोली सागर है उसका आवाधाकाल तोन हजार वर्ष है। इसी तरह सब कर्मा की स्थिति में आवाधाकाल जानना । जिस कर्मकी स्थिति अन्तःकोडाकोड़ी सागर है उसका आवाधाकाल अन्तर्मुहूर्त है। ५५३. प्र०-आयु कर्मको सावाघाका क्या नियम है ? उ०-आयु कर्मको आवाधा अन्य कर्मोको तरह स्थितिबन्धके अनुसार नहीं होती। इसोसे आयुके स्थितिवन्धमें आवाघाकाल नहीं गिना जाता; क्योंकि आयुका आवाधाकाल पूर्व पर्यायमें ही बीत जाता है। अतः आयु कर्मके प्रथम निपेककी स्थिति एक समय, दूसरे निषेककी दो समय, इस तरह क्रमसे बढ़ते-बढ़ते अन्तिम निपेककी स्थिति सम्पूर्ण स्थितिवन्ध प्रमाण होती है। ५५४. प्र०-आयु कर्मका मावाधाकाल कितना है ? उ०-~-आयु कर्मका बन्ध अन्य कर्मोकी तरह सदा नहीं होता। देव और नार- कियोंके छ महीने आयु शेष रहने पर और भोगभूमिया जीवोंके नौ महीना आयु शेप रहने पर उसके त्रिभागमें आयु कर्मका बन्ध होता है । कर्मभूमिया मनुष्य तिर्यञ्चोंके अपनी सम्पूर्ण आयुके विभागमें आयु कर्मका बन्ध होता है। सो कर्मभूमिया जीवको उत्कृष्ट आयु एक कोटी पूर्व होती है अतः एक कोटी पूर्वका विभाग आयु कर्मका उत्कृष्ट आवाधाकाल है। विभागके द्वारा आठ अपकर्ष कालोंमें आयुकर्मका बन्ध होता है। किन्तु यदि किसी भी अपकर्ष कालमें आयु नहीं बँधती तो किन्हीं आचार्यके मतसे एक आवलोके असंख्यातवें भाग और किन्हीं आचार्यके मतसे अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयुके अवशेष रहने पर उत्तर भवको आयुका वन्ध होता है। अतः आयु कर्मका जघन्य आवाधाकाल अन्तर्मुहूर्त अथवा आवलीका असंख्यातवां भाग होता है।

करणानुयोग प्रवेशिका ८५ - ५५५. प्र०-अपकर्षकाल किसे कहते हैं ? उ०-वर्तमान आयुको अपहप्य अर्थात् पटा-घटाकर भागामो परभारी आयु जिम कालमे बंधे उसे अपरूपं काल बहते हैं। जैसे, किमी वर्मभूमिमा मनुष्यरो आयु इक्यामा वर्ष है। उम आयुरो दो भाग बीतने पर जब सत्ताईन वर्षकी आयु दोष रहती है तो तीसरे भागने लगते हो प्रथम ममयगे लेकर अन्नहनं पार पर्यन्त प्रथम अपर्य काल होता है उसमें परभरकी यायुरा वय होता है। यदि न धंधे नो उगवे भी दो भाग बीतने पर व नौ वर्षकी बार पर रहलो है राय अन्तर्मुहत के लिये दूगरा अपवर्षकाल आता है। उसमें भी बानु न बंधे तो तीन वर्षकी वायु दोष रहने पर तोगरे पर गारमें बाबु बंधती है। उसमें भी न बंधे तो एक वर्ष आयुर रहने पर चोपे अपगालमे वायु बंधती है। इन तरह भुग्यमान आयु का जितना प्रमाण हो उपके विभाग विभागमे याट अपसवाल होते हैं। आयुरघा योग्य परिणाम इन अपर कालोमे ही होते हैं। किन्तु ऐमा योई नियम नहीं है कि इन बाम आयुगा रंप होना ही चाहिये । बन्ध होना हो तो होता है. न होना हो तो नहीं हो। ५५६.३०-निषेक रिमको बाहते हैं। २०--एक गमयमे जितने वर्मपरमाणु सदमें आये उनके गमूहको निक - ५५७ प्र०-अनुभागरम्प विकोपाते हैं । उ.- जो मारन गेरो निमिणगे 7 ने मदिग होमो उगमे गोनि को जो दिउगई पागावोगमा) भाता है। मेही गगादिवे निभिगो देगी पनि होगी। गिगे उन्यवान मानेपर और Treferrern पर पान पल । यह समय पर सो रही अनुभागपंप है। ५५८ प्रतिभागी प्रतिरो। ७- विभागीभाषी भाft.। ..:-गरियोपो।" .- निमोद गोरे भोग fami-मोदEN ५९०.zo-अपना विरो।" २.-को माग बारेमाप पर। - ३.mgiritten . isit antritertificate की है। * , . Gv – 31-1: tivi, fzzi # ? Torrenमा। ५६३. No--दितीय rian farst ? 3N-माग गरेका अनि जिमी पनि माग समूहको शिवीग गर्गणा की। ५६४, प्र० - पलंग किसको कहते हैं ? उ-3myार एक-एक अधिभागी प्रतिमेव अगि वर्गो समूह कर यगंणा जहाँ तक उपलब्ध हो, उन सब वगंगापि ममहगो पर्व माहते हैं। ५६५. प्र०-द्वितीय स्पद्धक फिसको कहते हैं ? उ० . प्रथम स्पर्वको ऊपर कमरो एक-एक अविभागो प्रतिच्छेद अधिकवाले वर्गोको समूह वर्गणा जब तक उपलब्ध हों, उन सब वर्गणाओंके समूहको द्वितीय स्पर्द्धक कहते हैं। ५६६. प्र०-गुणहानि फिसको कहते हैं ? उ० स्पर्द्धकोंके समूहको गुणहानि कहते हैं । ५६७ प्र०-गुणहानि आयाम फिसको कहते हैं ? उ --एक गुणहानिके समयोंके समूहको गुणहानि आयाम कहते हैं । ५६८. प्र०-नाना गुणहानि किसको कहते हैं ? . उ० - गुणहानिके प्रमाणको नाना गुणहानि कहते हैं । ५६९. प्र०--अन्योन्याभ्यस्तराशि किसको कहते हैं ? उ०-नाना गुणहानि प्रमाण हुए रखकर उन्हें परस्परमें गुणनेसे जो प्रमाण होता है उसे अन्योन्याभ्यस्तराशि कहते हैं। ५७०. प्र०-स्थिति रचनाको अपेक्षा निषेकोंमें द्रव्यका प्रमाण लानेकी विधि क्या है ? उ०--जैसे, किसी जीवने एक समयमें तिरसठ सौ परमाणुओंके समूहरूप समय- प्रबद्धका बंध किया और उसमें ४८ समयकी स्थिति पड़ी। गुणहानि ८; नाना- गुणहानि ६, अन्योन्याभ्यस्तराशि ६४ स्थापन. करके सर्व. द्रव्यको साधिक डेढ़ गुणहानिका भाग देने पर प्रथम निषेकका द्रव्य आता है। जैसे, तिरसठ सौ को ८७ परमानुपांग प्रवेशिका साधिक वारदका भाग देनेसे ५१२ आते हैं। प्रथम निपारो यो गुणहानिया भाग देनेने चपका प्रमाण आता है। जैसे ५१२ यो १६ मा भाग देनेमे ३२ आना है यह चय है। सो द्वितीय आदिनिका द्रव्य एक-एक पय घटना मानना। जने ५१२, ४८०, ४८, ४१६, ३८४, ३५२, ३२०, २२८ । इस तरह पाते घटते जिम निषेकने प्रथम निपेरगे आपा दम्य पाया जाये वहम दूनरी पुणतानि प्रारम्भ होती है। जैसे दूमरो गुणहानिके प्रथम निषेपका प्य २५६ है । या घर का प्रमाण प्रथम गुणहानिमें आपा है अर्थात् १६ है। मो यहाँ भी द्वितीय आदि निकासा द्रव्य अमगे एकएर चर घटता हुआ जानना । जगे. २५६ २४०, २२४, २०८, १९२, १७६, १६०, १४४। इन प्रकार प्रथम गारानगे द्वितीय गुणहानिशा द्रव्य और पपया प्रमाण गे आधा होता कोही नाम मादि गुणहानियों में अपनेमे पूर्य पूर्वकी पुणहानियोगे प्य और पया प्रमा कमी भाषा आपा होता जाता है । इस नाद नाना गुहानि प्रमा शानियों में निरेशी व्या प्रमाणाना चाहिये । जोगीनगपालिका १२०, ११२, १०४.९६, ८८. ८०.७२ । चौथी महानिमें inte: ४८,४४,४०,९६ पाचवीमे १२,१०,२०.६.२.....१८ | rum १६, १५, १४, १५, १२, ११,१०,१। ५७१.३०- अपसमता तिरोडो -अनेक गमयों में चंच हर वो पा विer 47 Mira होनेरा माम मार है। ५७२. प्र०-सारिने भेट है। 30-गाव भीमारप्रसारका-TATE : ५७१ - femiarit २०-अपमा • रण : र प्रतिदिन 1941-ear 13.to-ame im. २०-ना१ mmoti ११.zorrrr EिREN" -प्रा मागीय E-m m Prni: और IITERA RE ..

minila 6 ५८९. प्र-कमोमियो रोग है ? 30-Twn, Fri, अमला, मन, ग गंगन, मै जान ५९०. प्र०-गोलन संग किम पर? 30-अधःप्रवृरा आरिती परलोनिमा जनप्रतिपरमाणुओं- में उद्वेलन भागहानमा नागने पर एक भाग मा परमाणु जो अन्य प्रकृति रूप परिणगन पारते हैं उसे उलग सगा। ५९१. प्र०-उद्वेलन प्रतियां फोर सो ? उo-आहारण पारीर, माहारा गोग, सगालात, मिश्र प्रकृति, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, नरगगति, नरागत्यार्थी, शिविर शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, उच्च गोत्र, मनुष्यगति, गनुष्यगत्यानुपूर्वी में सरह सोलन प्रतियां हैं। ५९२. प्र०-उद्वेलन प्रहतियोंको उद्धलगा रतौन करता है? उ०-शुरुको चार प्रकृतियोंकी उद्वेलना तो चारों गतियोंक मिथ्यावृष्टि जीव करते हैं। फिर छ प्रकृतियोंकी उद्वेलना एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीव करते हैं । शेष तीन प्रकृतियोंकी उद्वेलना तेजस्कायिक और वायुगायिक जीव करते हैं। ५९३. प्र०-विध्यात संक्रमण फिसफो कहते हैं ? उ.-मन्द विशुद्धि वाले जीवके जिनका वन्ध नहीं पाया जाता, उन विवक्षित प्रकृतियोंके परमाणुओंमें विध्यात भागहारका भाग देनेपर एक भाग मान परमाणु जहाँ अन्य प्रकृति रूप परिणमन करते हैं उसे विध्यात संक्रमण कहते हैं। ५९४. प्र०-अधःप्रवृत्त संक्रमण किसको कहते हैं ? उ०-बंधनेवाली प्रकृतियोंमें अधःप्रवृत्त भागहारका भाग देने पर एक भाग मात्र परमाणु जहाँ बंधको प्राप्त अन्य प्रकृति रूप परिणमन करते हैं उसे अधःप्रवृत्त संक्रमण कहते हैं। ५९५. प्र०-गुण संक्रमण किसको कहते हैं ? उ०-विवक्षित अशुभ प्रकृतियोंके परमाणुओंमें गुण संक्रमण भागहारका भाग देने पर जहाँ प्रति समय असंख्यातगुणे असंख्यातगुणे परमाणु अन्य प्रकृति रूप परिणमन करते हैं उसे गुण संक्रमण कहते हैं। ५९६. प्र०-सर्व संक्रमण किसको कहते हैं ?

परषानुयोर प्रवेशिका उ०प्रति समय विवक्षित प्रतिके परमाणु अन्य प्रति स्प परिणमन करते करते नहाँ अन्त समयगें नन्त के काण्डकी नन्तिम फालोस्प सभी परमाणु अन्य प्रतिस्प परिणमन करते हैं उसे सर्व संक्रमण रहते हैं। ५९७ प्र०-भागहारोंका प्रमाग श्या है ? उ.-गवं संक्रमण भागहारका प्रमाण तो एक है। उससे असंस्थात गुणा पुन संक्रमण भागहारका प्रमाण है। उसने भी अगरपात गुणा उतपंग मोर कारण भागहारका प्रमाण है। उसमे भी असंस्वातगुणा अधः प्रवृत्त राधम मागहारा प्रमाण है। उससे भी बसस्वातगणा म्यिात गंकन मारहारला प्रमाण है । और उमसे भी असंस्थातगुणा उमेगन मक्रमण भागारपा प्रमाण है। ५९८.३०-उपदान करण फिसको रहते हैं ? ३०-यिक्षिा प्रवृतिक जो निषेक उपसावलीने बाहर है. उनके परमानो. सावली में आने अयोग्य करनेका नाम जाम सपा जमान ५९९.३०-उपनाम रितने भव है ? ३०-दो-एक मन्तररण स पाम और दूसरा मारम्पारागम। ६००.०-अनरकरण पाम रिमो पर है ? २०-अन्नापरणादार पहले गहा मलकापोग की वे उदय आने योग्य पर्म परमाणुओंगो लागे टारनने रा. म अन्तरगरण र उपमहै। ०१ १०-भावापाप राम सिहोसार -आगामीमा यो घोर nिsurt पप गम। २.:.-अपामार शान" .- . उपग भावता मागीयाntum.org बनियोगाथा Tr... हामि साग भावपापपुर ६.१ro-मितिारण fro! To-matorrent * : भाने दोयगातार १.४.-freोए! .

ये ६२० zommitt? jomitri , भोग, नमा भागु, THER THATi, iii, firmire ४ जागा, मेरा मन..':, मगर, अशुभ गप २, mirar ifs, गावर, गुम, अपर्याप्त, गाभारा, अपार, मन, मूग, मार, अनाम, अपकीति में पाप प्रतियां । ६२१. प्र०-पुदगलविपाको पाकिसो महो? उ०-जिसका फल पुदगलग हो । पारीर नामका उपयसे गुण शरीर रूप होपर परिणमन करता है। ६२२. प्र०-पुद्गल विपाको प्रकृति कितनो और फोन-सी हैं ? उ० -पांच शारीर, पांच बन्धन, पानपात, संस्थान, तीन अंगोपांग, छै संहनन, पांच वर्ण, दो गन्ध, पांच रस, आठ स्गरा, निर्माण, आतप, उद्योत, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, प्रत्येक, साधारण, मगुगलपु, उपपात, परपात, वासठ प्रकृतियां पुद्गल विपाकी हैं। ६२३. प्र.-भवविपाको फर्म फिसफो कहते हैं ? उ०--जिसका फल मनुष्यादि भव रूप हो। ६२४. प्र०-भवविपाको प्रकृतियां कौन-सी हैं ? उ.-चारों आयुकर्म भवविपाकी हैं। ६२५, प्र०-क्षेत्रविपाको कर्म किसको कहते हैं ? उ०-जिसके फलसे परलोकको गमन करते समय विग्रह गतिमें जीवका आकार पूर्व शरीरका-सा बना रहे। ६२६. प्र०-क्षेत्रविपाको प्रकृतियाँ कौन-सी हैं ? उ~-चारों आनुपूर्वी नामकर्म क्षेत्र विपाकी हैं। ६२७. प्र०---जीव विपाको कर्म किसको कहते हैं ? उ०---जिसका फलं जीवमें हो। ६२८. प्र०-जीवविपाको प्रकृतियां कितनी और कौन-सी हैं ? उ.-दो वेदनीय, दो गोत्र, धातिया कर्मोकी ४७ प्रकृतियाँ तथा नामकर्मकी सत्ताईस ( चार गति, पांच जाति, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, अप्रशस्त সােনুষী ময়িক विहायोगति, प्रस, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त, अपर्याप्त, सुभग, दुभंग, सुस्वर, दुसर, बादेय, अनादेय, मनस्वीति, अयशस्वीति और तीर्यहर) ये महत्तर प्रतिमा बोविपाकी है। ६२९. --शानावरण को कितने यन्य है? 30-मानावरण पर्मा एक ही साधरपान है पोंकि भानापरण बमरी पांचों जातियां दग गुणस्थान तक प्रत्र बोदके बंपनी है और उगो बाद पौरों नहीं बंधतो। १०.teiनावर तिने मायामान है? Toran-नौतिक कि और पारि ६२१. Re-नावरण मौत मारथाना स्वामीन है ? -मप्याटि और मामादन परष्टि कीबो ना मी यो पनी है। धागे के गणमानोंमें निद्राना, मान- टिबन्ध नहीं होगा ६१२. FokiमारपEETरामीचौर" To-माइटि मानकर पा re Bीन nिtine Im और प्रपाकपमहीरा है। ६१fun frmani Tomen Pणा fantart. For we rrrrr लागणाnire Tre . भारया Emirmirkari कपा - ६३४. xo-frre गुमान frimary? 30-मिलामा र अगर और मारा गोपांग इन तीन या दोन योग्य एकागो बोया प्रकारको गभ गोग हैं। ६३५. प्र० -तीर प्रकृति वाहिका है ? उ०-गोचे असंयत सम्पादष्टि गुगालावर मात मनमन गणलान पर्यन्त ही गायली गा शुगवली भनी किट सीकर प्रगतिक बगल प्रारम्भ करते हैं। ६३६. प्र० -गिमात्यगुणस्यानमें तिल प्रतियों को अन्य व्युछित्ति होती है ? उ० -मिथ्यात्व, हुण्डका गंस्थाग, गांगावः, गंगा पाटिका गहनन, एकेन्द्रिय, स्थावर, आताप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, छोइन्द्रिय तेन्द्रिय चोइन्द्रिय जाति, नरक गति, नरमगत्यापूर्वी और नरसागु, इन सोलह प्रकृतियोंके बन्धका कारण मिथ्यात्व ही है। अत: मिथ्यात्व गुणस्थानसे आगे इनका वन्ध नहीं होता। ६३७. प्र० -सासादन गुणस्थानमें कितनो प्रकृतियोंका बन्च होता है ? उ० -पहले गुणस्थानमें जो ११० का वन्ध होता है उनमेंसे मिथ्यात्व गुण- स्थानमें जनकी व्युच्छित्ति होती है उन सोलह प्रकृतियोंको घटाने पर सासादन में १०१ प्रकृतियाँ बन्ध योग्य हैं। ६३८. प्र०-सासादन गुणस्थानमें किन प्रकृतियों को वन्यन्युच्छिति होती है ? उ० --अनन्तानुबन्धी चार, स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, दुभंग, दुस्वर, अनादेय, न्यग्रोध परिमण्डल स्वाति कुजक वामन ये चार संस्थान, वज्रनाराच नाराच अर्धनाराच कीलक ये चार संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, स्त्रीवेद, नोचगोत्र, तिर्यञ्च गति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, तियंचायु, उद्योत ये पच्चीरा प्रकृतियाँ अनन्तानुबन्धी कंपायके उदयसे वंधती हैं। अतः सासादन गुणस्थानसे आगे इनका बन्ध नहीं होता। ६३९. प्र० . तीसरे मिश्र गुणस्थानमें कितनी प्रकृतियोंका बन्ध होता है ? उ०-- दूसरे गुणस्थानमें बन्ध योग्य प्रकृतियाँ १०१ हैं। उनमेंसे व्युच्छित्त हुई पच्चीस प्रकृतियोंको घटाने पर शेष ७६ वचती हैं। किन्तु इस गुणस्थानमें .

परमानुयोग प्रवैगिका
विनी भी आयु कर्मका बन्ध नहीं होता । अतः पहले गुणस्थानमें नरमायु और
दूसरे गुणस्थानमें तिर्यवायुको बन्धयुरित्ति होने ना यची मनुवायु और
देवापुरी भी पटा देने पर तीनरे गुणस्पानमे यन्ध योग्य प्रति ७४ रहती हैं।
६४०. प्र०-मिश्र गुणस्यानमें स्तिनी प्रतियोगी पायप्युटित्ति होती है ?
२०-मिय गुणस्यानमे किनी भी प्रकृतित्री यन्ममिति नहीं होगी।
६४१.प्र०-चौथे अविरत सम्यग्दृषि गुणस्पानमें कितनो प्रतियोस पाप
होता है?
उ०. जोसरे गुणस्थानमें ७४ प्रकृतियोंका यन्ध होता है । मनुलाय, देश
और तोयंकर प्रकृतिका पन्ध बढ़ जानेरो पोपे गुणस्थानने वन्ध योग्य प्रतिमा
७.रहती है।
६४२. प्र०---चौये गुणस्थान शिन प्रतियों को पन्ध युधित्ति होती है।
ao-अप्रत्यार पानावरण काय ४, वर काम नाराव मनन, मोगरिक
घरीर, बोदारिप अगोपांग, मनुबति, मनुषगरपानुर्यो, अनुमान देदम
मनियां यस्यायनावरण वायके यो नि मलने बंधा है। श्री पारे
एमयानके अन्न गमरमें सो बन्यो युधिति हो जाती है।
६४६.३०-पांच देशविरत गुजरथानमें तिनो प्रापि
होता है?
२०-चौथे गुण पाको गोदिया कराये में
पुच्चिन दग प्रतिको पटाने र
६४.३०-पाप गुग पास nि'
२०-पारप्रचारपानापास पी .....
मनु पाप गुणगाना :
. Ho--प्रमाणाrifier Tar"
२०-परिगतामा प्रोप
चार प्रशासनादरण गपा को र
सरकार
Pr.co-- गृणायाम नि REET.
T०-दिर, भ, मोर, Amt.

-- प्रEिri filai ! यो मन गया। ६४७. प्र०--गाने aftra गुमान ना योग्य प्रतिया faनी? उ०- TER: Mirror और. ६ को मन चुन्चिति । रितु मा आहार गरीर आहारक जाना योग्य प्रतिया ५९ है। ६४८. प्र०--सात गुणस्थानमें जिन प्रातियों को ना प्युरित्ति होती है ? उ०-सातवें गुणस्थान अन्त में पना देशागता का शुष्मिति होती है। ६४९. प्र०--आठवें अपूर्वकरण गुणस्थान में कितनी प्रतियोगबन्ध होता है ? उ०-सातये गुणस्थानमें ५०. प्रकृनियों का बन्ध होता है। उनमें एच्छिन्न हुई देवायुको घटानेपर ५८ प्रतियोंका बन्ध आठया होता है। ६५०. प्र०--आठवें गुणस्थानमें फिन प्रकृतियोंको बन्ध प्युमिति होती है ? उ०-आठवें गुणस्थानके प्रथम भागरी निद्रा और प्रचलाली बन्ध गुन्छित्ति होती है। छठे भागमें तीर्थकर, निर्माण, प्रशस्त विहायोगति, पोन्द्रिय, तेजस, कार्मण, आहारक, अंगोपांग, समचतुरस्त्र संस्थान, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक, वैक्रियिक अंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, भगुरुलघु, उपघात, उच्छ्वास, बस, वादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय इन तोस प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है। और अन्तिम भागमें हास्य, रति, भय और जुगुप्साकी व्युच्छित्ति होती है। ६५१. प्र०--नौवें अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें कितनी प्रकृतियोंका वन्ध होता है? उ०-आठवें गुणस्थान में बंधनेवाली ५८ प्रकृतियोंमें व्युच्छन्न हुई ३६ प्रकृतियोंको घटानेपर शेप रहीं वाईस प्रकृतियोंका बन्ध नौवें गुणस्थानमें होता है। ६५२. प्र०--नौवें गुणस्थानमें किन प्रकृतियोंकी बन्धव्युच्छित्ति होती है ? उ०-अनिवृत्तिकरणके पाँच भागोंमें क्रमसे पुरुपवेद, संज्वलन क्रोध, संज्वलन मान, संज्वलन माया और संज्वलन लोभकी वन्ध च्छित्ति होती है । ६५३. प्र० - दसर्वे सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थानमें कितनी प्रकृतियोंका बन्ध होता है ? परघात, .

एणानुयोग वंशिका २०-नोवे गुणस्यानमें वन्धयोग्य वाईन प्रतियोमेमे व्युटित हुई पांच प्रावियोंको घटानेपर शेप रहीं १७ प्रकृतियोगा वन्ध दसवें गुणस्थानमें होता है। ६५४. प्र.- दसवें गुणस्थानमें कितनी प्रकृतियोंको यन्य घुच्छित्ति होती है। दावें गुणस्पान के अन्तमें पांच भानावरण, चार दर्शनावरम, पांच मन्तराय, परावति और उच्चगोत्र इन सोरह प्रकृतियोंगो बन्ध च्छित्ति होती है। ६१५ प्र०-पारहवें उपशान्त कषाय गुणस्थानमे मितनो प्रातियों बंधती हैं? Fo-दसवें गुणस्थानमे जो १७ प्रतियों का यन्ध होता है उनमेगे धिन गोल्ह प्रतियोयो पटानेपर मेष रहो एक सातादनीपया यध होता है। ६५६.प्र०-यारहये और सेरहवें गुणस्थानमें रितनी प्राणियों पन्य होता है ? २०-एक सातावेदनीया बन्ध होना है। ६५७. Fo-ग्यारहवें रारहवें और सेरह पुजापानमें रिग मानियोको पन्य पुछित्ति होती है ? २०-यारहवें, बारहयमे एक भी प्रालित्री पगि रही होती। तेरहवें गुणरमानमे बन्धनेवाली एक गालावेदनीती हो। ६५८ ०-चौदहवें अयोगरेयलो गुगरा निी मhiner होता है? उ.-एर भी प्रतिया मन्य नहीं होगा। ६५९. ३०-मिधा गुणरयानमे यकिनीran" उम्पपल प्रति गम्बर मियानाOrrti और तीर्थ र प्रनिन पाच किल.. बत योग्य १२२ प्रतियोमेगे पाप interriti ६०. Ro-मिटा गुमान Cre tra fer Hit होपी११ So-मिलाप परवाना मिrart भरिय कोरिय, जाति, NHTT, CTET,BTETrwar नियमी उस मति होती है। Tr: ..दागम, सर......।

200 . -- उ०-एक सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृतिको उदय व्युच्छित्ति तीसरे गुणस्थानमें प्रकृति सम्यक् मिथ्यात्वको घटानेपर ९९ शेष रहती हैं। इनमें चारों आनुपूर्वी गणित An: FIET मा अभियान iiiii ... Tir आदि और र riniमामा । ६६१. प्रसार गुना - are faitarin hinा है ? Ge--- मानो ११० fruitm, अगर पुच्छिा पान १२ मा । परन्तु सामान गरणा गत्यापूर्वी पहाग १११ उदयोग होती है। ६६२. प्र०-गासादन गुणस्यागमें उदय निति तिनी प्रातियोंकी होती है ? उ०-सासादन गुणायानो अन्तिम समय में जालानुमन्धी शोध मान माया लोभ, एपेन्द्रिय आदि चार जाति और स्थावर इन नो प्राशियों की उदय व्युछित्ति होती है। ६६३. प्र०-मिश्र गुणस्यानमें जितनी प्रकृतियों का उदय होता है । उ०-दूसरे गुणस्थानमें १११ प्रगतियोंका उदय होता है। उनमेरो व्युन्छिन नी प्रकृतियोको घटानेपर शेष १०२ गैसे नलगत्यानुपूकि शिवाय ( गयोकि यह दूसरे गुणस्थानमें घटाई जा चुकी है ) शेष तीन आनुपूर्वी घटानेपर शेष रहीं ९९ प्रकृतियोंमें एक राम्यक् मिथ्यात्व प्रकृतिका उदय यहां होनेसे तीसरे गुण- स्थानमें उदययोग्य प्रकृतियां १०० हैं। ६६४. प्रo-मिथ गुणस्थानमें मानुपूर्वोका उदय पयों नहीं होता ? उ०.. तीसरे गुणस्थानमें मरण न होने से किसी भी आनुपूर्वीका उदय नहीं होता। ६६५. प्र०- तीसरे गुणस्थानमें उदय व्युच्छित्ति फिन प्रकृतियोंको होती है । होती है ? ६६६. प्र०-चौथे गुणस्थानमें उदय कितनी प्रकृतियोंका होता है ? उ०-तीसरे गुणस्थानमें १०० प्रकृतियोंका उदय होता है। उनमेंसे व्युच्छिन्न होता है। ६६७. प्र०-चौथे गुणस्थानमें उदय व्युच्छित्ति किन प्रकृतियोंकी होती है ।

करणानुयोग प्रवेशिका २० अप्रत्यास्थानावरण कोष मान माया लोभ, नरकायु, देवायु, नरकगति, देवगनि, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, चारों आनुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय, अपस्योति, इन सतरह प्रकृतियोको उदय व्युच्छित्ति चौथे अविरत सम्यग्दृष्टो गुप्त्यानमें होती है। ६६८. प्र०-पांचवें गुणस्यानमें उदय कितनी प्रकृतियों का होता है ? Fo-चौथे गुणस्थानमें जो १०४ प्रकृतियोंका उदय कहा है, उनमेरो प्पुटिन हुई १७ प्रहतियोंको घटानेपर शेष ८७ प्रकृतियोका उदय होता है। ६६९. प्र०-पांचवें गुणस्थानमें उदय युधिति फिन प्रकृतियोंकी होती है ? २०-प्रत्यारपानावरण कोष मान माया लोभ, तिर्यवायु, तिथंचगति, उद्योत, नीच गोत्र इन आठ प्रकृतियों को उदय व्युच्छित्ति पांचवें देशविरत गुणस्थानमें होती है। ६७०.३०-उठे पुणस्थानमें उदय कितनी प्रकृतियोंगा होता है ? FO-पांचवें गुपस्थानमे ८७ प्रवृत्तियों का उदय कहा है। उनमेरो पन्छिन्न प्रति भाट घटानेपर शेष रहो ७९ प्रतियोगे आहारक परीर और माहारस गोगगवा मिलानेसे ८१ प्रतियोका उदय छठे गुणग्यानमें होता है। छठे गुणस्थानमें उत्य चिति किन प्राहियों होती है ? SO-निहानिद्रा, प्रचलनचला, रस्थानगडि, आहारक पगैर, आहार गोपांग इन पांच प्रतियोको सम्पत्ति के प्रमत्त गया गुजरथानमें ६७१.प्र०- होती है। ६७२.०-सात गुणस्थानमें उदय रितनी प्रतियोराधा है? 10-टे गुणग्यानमे को ८१ प्रतिशत रहायमेने मात्र पांच प्रतियोगी पटानेपर लिया है। ६७. प्र० गुणरयानमे सत्य निति निगे।" T-अर्धनागप, पीला, भागागा, पारमारियोफी उभय पनि गाये गत मे में है। bex. Ho-हाय गुणापानभे उदय सिराना" २०-गान गुणासागमे जो नियोगारnti चार मतियोरो रोका है। ६७५०-भाउ गृगापानमे उदय कतिहिन पाहा!

* *MA । . सातवें गुणवागमें जो १४६ पासवान जगननामुगन्धी मोच मान गाया लोगोमटानेपर १८२ मा गलक्षिामियः रायमी यदि है। और क्षपक श्रेणिवाली जनतागुवन्धी ४, दांन गोनीय ३, जौर मनुयायुके उल-आश्वें गुणस्थाननी परत इस गुणस्थानमें भी उपराग श्रेणियाले हितीयोपशम राम्यग्दृष्टिी १४२, धामिक सम्पदपीक १६९और क्षपफ श्रेणिवालके निद्रानिद्रा, प्रचलाचला, उद्यात, आतप, साधारण, सूक्ष्म और स्थावर इन . और प्रत्याख्यानावरण शोध मान माया लोभ, इन आठ प्रकृतियोंकी सत्त प्युच्छित्ति होती है। तीसरे भागमें नपुंसक वेद, चीये भागमें सीवेद, पांचवें भाग मेंगोपाय, छठे भागमें पुरुषवेद, सातवेंमें संज्वलन कोध, आठवेंमें संज्वलन ६९.१. Romararhindi ! ६९५. प्रo jarurififti पहा है। उ.-मार और fati figer सम्म गोलामा। ६९६. प्रल - माया प्रिय मान रहता है ? For गुमानतः१५: ६१.७. प्रल-भाको गुनायानोनि friका सा रहता है। उल-पाठन गुमाधानी मानी -गि और पक श्रेणि। निगो महा। प्रातः उगरे, उपशम श्रेणि पहा, तो उगो माता माया ना १३२. का सत्व होता सियाग तीन आयुगे धिना १३८ का हो सब होता। ६९८. प्र० --गोवे गुगल्यान में कितनी प्रतियोगा सत्य होता है ? १३८ प्रकृतियोंका सत्त्व होता है। ६९९. प्रल-नौवे गुणस्थान में फिन प्रकृतियोंती सत्त्व पुच्छित्ति होती है ? उ०-गौवें गुणस्थानो प्रभग भागमें नरकगति, नियंगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्गञ्चगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय दोइन्द्रिय तेइन्द्रिग जोइन्द्रिय जाति, स्त्यानगृद्धि, सोलह प्रतियोगी सत्त्व व्युञ्छित्ति होती है। दूसरे भागमें अप्रत्याख्यानावरण गान और नो भागमें संज्वलन माया इस प्रकार नौवें गुणस्थानमें छत्तीस ररणानुगोग प्रदगिरा प्रातियों मत्त बुधिति होती है। यह मत्त पनि उत्ति घर तिरे ही होती है। ७०.५०-दमवें गुणम्यानमें कितनो प्रतियोंतमत्व रहा है? जल-दमयमै नोवे गुणस्थानकी तरह सागर अंगोगा जिगर सम्पनीर १४२ और क्षायिक मम्याष्टिक १६९ का गत्व रहा है। गया हायर पियाले नौवें गुणग्यानमें जो १६८ प्रतिचौरा मत्व है मांगे पन्धित हुई ३६ प्रतियोको पटाने पर दर्शन रह। १०२ प्रतियोग गर एना है। ७०१. प्र०-दम गुणस्थानमे नि प्रतियोगी साय पुष्मिति है। २०-एक गंग्वलन लोभरी पुच्छित होती है। ७०२. ३०-सारयें गुणापानमे सत्य शिली नियोग हो' Ro-दमयें गुणग्यानो तर द्वितीपोरगम गम्भाष्टिो १२ और शापिका सम्मा:प्टी १३९. या गत्य रहता है। इस गाने का नहीं है। ७०३. प्र०-या गुणरयानमें तिमी प्रतिमा? उ०-दगरे गुणस्थानमे शरय णि यावे. को १ मा रोग है उनमेने निउन प्री मम्मलन न परin ot प्रतियोषामन्य होता है। ७०४ -दाएवं जयानमें पार की ऐसी है? Fo-दार गुणगाना :." नावरण, निदान और तर न... *न कि होगा। ७०५ ०-पानमेव fearni 36--पार गुमायागमे 7 147 द ! १६ मायाको घटाने पर रोपदी ८५ प्रतिशत गुणदान होगा। ७०६. मोर गपापानमे मिना !! ३०-कोरे गुबान संग मा x c• भरपर गाय और HE Irani सभा ( मशनो-ti १०६ करणानुगनिक ७०७. प्र०-चौदहवें गुणत्वाना तिन प्रातियों को राहत चिति होती है ? उ०~-चौदहवें अयोगावली गुणाधान उपान्या समयों पान गरीर, पांग बन्धन, पांच संघात, छ संस्थाग, नीन यांगोपांग, दंगानन, पांग वर्ण, दो गन्ध, पाँच रस, आठ स्पर्श, स्थिर-अस्थिर, गुण-अनुभ, गुरपर-युःस्वर, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, प्रशस्त और अनशस्त विहायोगति, सुगंग, निर्माण, अयशस्कीति, अनादेय, प्रत्येक. अपर्याप्त, अगुल्लघु, उपवात, परपात, उच्यास, एक वेदनीय, नीच गोत्र इन वहत्तर प्रगतियोंकी रात्त्व प्युच्छित्ति होती है। और अन्त रामयमें एक वेदनीय, मनुष्यगति, पशेन्द्रिय जाति, सुभग, प्रस, चादर, पर्याप्त, आदेय, यशकीर्ति, तीर्थकर, मनुष्यायु और उच्च गोत्र, मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन तेरह प्रकृतियोंकी सत्त्व व्युच्छित्ति होती है । ७०८. प्र०--किन प्रकृतियोंको बन्धव्युच्छित्ति उदयव्युच्छित्तिके पीछे होती है ? उ०--देवायु, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैफियिक शरीर, वैनियिक अंगोपांग, आहारक शरीर, आहारक अंगोपांग, अयश:कीति इन आठ प्रवृत्तियोंकी उदय व्युच्छित्ति पहले होती है, पीछे बन्धव्युच्छित्ति होती है। ७०९. प्र०--फिन प्रकृतियोंकी उदयव्यच्छित्ति और बन्यन्युच्छित्ति एक साथ होती है ? उ०-~-मिथ्यात्व, भय, जुगुप्सा, हास्य, रति, पुरुषवेद, संज्वलन लोभ के विना १५ कपाय, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, स्थावर, आतप, सूक्ष्म, एकेन्द्रिय आदि चार जाति, साधारण, अपर्याप्त इन इकतीस प्रकृतियोंका वन्ध और उदय दोनों एक साथ व्युच्छिन्न होते हैं। ७१०. प्र०--किन प्रकृतियोंको उदयव्युच्छित्ति वन्धव्युच्छित्तिके पोछे उc~-पूर्वोक्त ८+३१ = ३९ प्रकृतियोंसे शेप जो इक्यासी प्रकृतियां रहती हैं उनका वन्ध व्युच्छेद पहले और उदय व्युच्छेद पीछे होता है। ७११. प्र०--परोदयसे बंधनेवाली प्रकृतियां कौन-सी हैं उ०-तीर्थकर, नरकायु, देवायु, नरक गति, देवगति, नरकं गत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, आहारक शरीर, आहारक अंगोपांग ये ग्यारह प्रकृतियां परोदयसे बंधती हैं, अर्थात् तीर्थकर प्रकृतिके उदयवालेके तीर्थकरका बन्धे नहीं होता। इसी तरह नारकीके नरकायुका और देवके देवायु: का बन्ध नहीं होता। - ।

परमानुरोग प्रवेशिका .. ७२ प्र.-स्वोदपसे यन्यने वाली प्रातियों कोन हैं ? Fo-गाच शानावरण, पान अन्तराप, चार दानापरण, चिर, अस्थिर, गुन, अनुभ, तेजम और फार्मण दागेर, निर्माग, अगुव राय, वर्ग मानि यार, बोर मिपास ये मताई। प्रतियां सादयने बधाो है। अर्मा बिनो मिप्यारा उदय होता है उगो मिप्यात्वमा वन्ध होता है जो तरह मेर २६ प्रहनियों के विषयमे भी जानना। -स्पोदर और परोपपने बंधनेशलो प्राधिोनगो है। उ-रोदय वन्धी ११ और म्योदय कपी २७ प्रतीयोंके बिना ८२ प्रतिया रयोदनगे भी बंधती है, और परोदयगे भी दी है। ७१४.३० -निरन्तर बंधनेवारीप्रतिमा शेन सो हैं । 30-तालीग घुयालया नोपर माहात परीर, आधार , ओर पार आप ये चोयन प्रतिमा निरन्तर बंधती है । ७१५. १०-भूपबन्यो प्रशनिवार को है? उ.- नादरण, मोदनावमा पार गर, हार- पपाय, भय, जगुया, मंजग और पाणीर दी। पात, निर्माण ये मंगालीग प्रयापी। ७१६ प्र०-निरन्तरमाय और भूपा' उ.--गार सारिन . RET गमय अपाय पन्ध पक्षातीrar.ru पपलिपि HITHER Ter their कीराहामा नेपाfree-..-- मामानि उपानि म NY.tart जिग वाला योग्य है उगाriter Search trutकिन निगा। ७१७.६० सातापी प्रतियोrt २०-वेद मरमधेर, भार साल, Har M. पानीप, सोच, वि... retri भप्रदान क्षिामगर, रमापर ... for परपर, भगाय, भरतावा दो E- Triti १८ :.-सातरी निति बारा - --

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मंगविष्ट अंगविष्ट, भेद मंगवाए मंगुल मेर माराम थत अायक श्रुतके भेद अगरलघु नामाम अपासीय भपाती वर्म किनने विषयानुक्रमणी प्रश्नांक अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमे कितनी ३०२ प्रतियोरा बन्ध ३०४ अनिवृत्तिकरण गुणम्यानमें पिन ३०३ प्रकृतियोगी बन्य म्युन्छित्ति ६५२ २९ अनिवृत्तिकरण गुमायानसे कितनी प्रनियोगा उदय ६२६ ३०१ अनिवृत्तिारण गुमन्यानमें कितनी प्रशनियोंकी उदय मुनिति ॥ अनिवृत्तिकरण गुणापान पितो प्रतियोगत्त ३४२ ७४१ अनिवृत्तिकरण गुमपानने ७१२ मत्वमिति २८ अनुभाग पापा १२८ अनुभाग पाणलोतरपसार ७. अनुभागबन्ध १३. अनुभाग गान ५४ अनुसोगार पिर अंगविकास अन्तमा धार अनुरोग nिre... अचान अबावरी अनिम्यापनारली १० अपकरण अपवरण और अपूर्ववरणमें अन्तर अपनपत मंकमण अमीष सवाय बनरामरत अनन्तानृपन्धो बनाएर उपयोग अनादिबन्ध अनादेय नामम भमाहारी बीम मनाहापारेरणापान मिनिकरण गुणस्थान निररण गुणस्थाना भन्दा अजरायो ७॥ अन्योलमा आगार মান ११ सपूरपार अपराध माग ."

अप्रमत्तविरत गुणस्थानमें सत्त्व - ६९६ अविरत सम्यग्दृष्टो गुणस्थान कितने ११४ परागोग प्रतिका ६४२ ४२८ -- ६७५ ६८७ ७०६ अपूर्वकरण गुणस्थानमें कितनी अगोगावली गणमानात प्रकृतियोंका बन्ध अपूर्वकरण गुणस्थानमें किन अयोगवली गुणवान कितने हैं, ४०४ प्रकृतियोंकी बन्धव्युच्छित्ति ६५० अगोगोयली गणस्थान कौन भाव ४३६ अपूर्वकरण गुणस्थानमें कितनी अयोगांबली गुणस्थानमें बन्ध ६५८ प्रकृतियोंका उदय ६७४ अयोगवली गुणस्थानमें उदय ६८६ अपूर्वकरण गुणस्थानमें उदय वयोगी वली गुणस्थानमें व्युच्छित्ति उदयव्युन्छित्ति अपूर्वकरणमें कितनी अयोगकेवली गुणस्थानमें सत्य प्रकृतियोंका सत्त्व ६९७ अयोगवली गुणस्थानमें अपूर्वकरण आदि चार सत्त्व व्युच्छित्ति उपशमक गुणस्थान कोन अर्धच्छेद 'भावरूप हैं। ४३५ अर्धनाराच संहनन अपर्याप्त नामकर्म ५१२ अल्पबहुत्वानुयोगमें अप्रतिष्ठित प्रत्येक २३९ किसका कथन अप्रत्याख्यानावरण ४६५ अवग्रह ज्ञान अप्रमत्तविरत गुणस्थान ११६ अवधिज्ञान अप्रमत्तविरत ११७ अवधिज्ञानके भेद अप्रमत्तविरत गुणस्थानका अवधि दर्शन अन्तरकाल ४२६ अवायज्ञान अप्रमत्तविरत गुणस्थानमें अविगामी प्रतिच्छेद वन्धयोग्य प्रकृतियां ६४७ अवसर्पिणी उत्सपिणी अप्रमत्तविरत गुणस्थानमें अवसर्पिणी उत्सर्पिणीके भेद. बन्धव्युच्छित्तिः ६४८ अविरत सम्यग्दृष्टी गुणस्थान अप्रमत्तविरत गुणस्थानमें उदय ६७२ अविरत सम्यग्दृष्टी गुणस्थानमें 'अप्रमत्तविरत गुणस्थानमें अन्तर काल उदयव्युच्छित्ति ६७३ अविरत सम्यग्दृष्टी गुणस्थानमेंभाव४३३ ७०७ -- ४० गुणस्थानके भेद ३९६ २९१ ३०७ ३४३ २९३ ५५८ ६५ ६६ १११ ४२६ अप्रशस्त उपशम काल तक होते हैं 'अप्रमत्तविरतोंकी संख्या ४०० अविरत सम्यग्दृष्टी गुणस्थानमें अयश-कीर्ति नामकर्म ५२६ बन्ध अयोगकेवली गुणस्थान : १३७ अविरत सम्यग्दृष्टी गुणस्थानमें अयोगकेवली गुणस्थानका कालः ४२१ वन्ध व्युच्छित्ति ४१६ ६४१ ६४२ पमा उत्कृष्ट चितिदध ५० आहारक कारयोग इतर निगोद कराया विषयानुगमती अविरत सम्पादृष्टी गुणस्थानमे उदय ६६६ आहार पर्याप्ति अविरत सम्यग्दृष्टो गुणस्थानमे आहारक २८३ उदय व्युच्छित्ति ६६७ आहारको गुणरधान २८५ अविरत सम्यग्दृष्टो गुणस्थानमे २५७ ६९१ बाहारवामित्र काययोग २५८ भविरत सम्पादृष्टो गुणस्थानमें याहारक और आहासमिश्र मत्व व्युच्छित्ति पाययोग किमके २६३ अविरत सम्यग्दृष्टो गुणरथानको एर समय कम तेतीग गागर आयुयानोंमे यवों उत्पन्न इन्द्रिय २०१ ४१७ इन्द्रिय पर्याप्ति असुन नाम ५१८ इन्द्रियके भेद २०६ अपम ३३६ पुगनि ४९२ ईहानान अग्पिर नामकम मा वापारयोनि भेद १७३ सन्धिारटी ७३५ उत्तम थापनामवर्म ५०३ उत्रण और भारत ६४ " ५६ उत्तर ४९७ उपाय ५५१ उहाभांगर पि अग्राम गृपाटिरा गह्नन उन्छवाम मामाम मागास परमाप कार मी firs बआत्मोपुर भारमागमे विगकर मार যায় না थानाी नामयम थायापागल अदापासण्या नियम पायापावली भामग्तर उपकरण माभ्यन्तर उपकरण निति भार मायकमा भेद ४१ : उन स्यामा । मापदी भागाथा मायका नियम 4.

में अन्तर , करणानुयोग प्रवेशिका उपकरण (इन्द्रिय) २१२ माजुमति गनःपयंग उपयोगके भेद २१३ अनुमति-विपुलगति उपघात नाम कर्म ५.०० उपपाद जन्म १८३ ए उपमा मान २३ एक कालमें कितने योग २७८ उपयोग १९६ एक जीवके अधिकसे उपकरणके भेद १९७ अधिक प्रदेशसत्त्व ५७५ उपयोग ( इन्द्रिय) २१८ एक एक समयमें एक जीवके कितने उपशम श्रेणी १२१ कर्म परमाणु बैंधते है उपशम श्रेणिके गुणस्थान १२२ एक समय में बंधे सभी नाम- उपशम श्रेणिके गुणस्थानोंका परमाणुओं की स्थिति क्या अन्तरकास ४२७ समान होती है ५५० अन्तरकालमें जीव संख्या ४०१ एकेन्द्रियके वयालीस भेद १४५ उपशम सस्यक्त्व ३५४ एकेन्द्रियके गुणस्थान २२७ उपशान्त कषाय गुणस्थान १३३ औ उपशान्त कषाय गुणस्थानका औदारिक काय योग अन्तरकाल ४२७ औदारिक मिश्र काययोग उपशान्त कषाय गुणस्थानमें बन्ध ६५५ औदारिक, ओदारिककमिश्र उपशान्त कषाय गुणस्थानमें काययोग किसके २६० बन्धव्यु० ६५७ औपशामिक सम्यक्त्वमें उपशान्त कषाय गुणस्थानमें गुणस्थान ३७८ उदय ६८० क उपशान्त कषाय गुणस्थानमें करण २ उदयव्युच्छित्ति ६८१ करणलब्धि ३६२ उपशान्त कषाय गुणस्थानमें सत्त्व ७०२ करणानुयोग १ उपशान्त कषाय और क्षीण कर्म ४३७ १३५ कर्मके भेद ४३८ उपशमकरण ५३१ उपशमके भेद ५९९ कर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध उपशम भाव और उपशमकरणमें कर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ५४८ अन्तर ६०२ कर्मकी बन्धयोग्य प्रकृतियाँ ६०५ कर्मकी उदययोग्य प्रकृतियाँ ऊर्ध्वलोक ७३ कर्मकी सत्त्वयोग्य प्रकृतियाँ .. ६०७ २५३ २५४ कषायमें अन्तर ५९८ कर्मकी अवस्थाएँ ५४१ अ ६०६ कमायमें गुणस्थान विषानुजमणो पर्मभूमिज तियं के तीस भेद १४९ किस जीवके कितने प्राण १९२ पर्मभूमि ६. किस इन्द्रियका कैमा मापार कर्मभूमि कितनी ६. किन जीवोंके कौन लिंग स्पाय २४ किन जीवोंके बिननो इन्द्रियाँ वायके भेद २८५ किन जीवों में कोन वेद २८६ किम जीवा क्मि मरक में जन्म ५८ पाहक ७३८ किस जीवका रिम स्वर्ग तक जन्म ८२ २२८ अवधि भान कार्मणका योग २५९ कुमति ज्ञान पार्मणया प्रयोग किमके २६४ दृश्रुत मान वामानुगमे विसका पयन २९३ कुम्जा संस्थान ४८५ किन गुणस्यानोमें कोन ज्ञान ३२६ तापवेदक पिन गुणस्थानोमे कौन मंयम १३७ वनमान विन गुणरपानोमे कौन लेश्या ३४८ बेलदमन किन गुणरपानों में कौन दर्शन देवलो मनोयोग " गिम गणरथानरो विय गुणस्थानमे पेवली गमुवान में गमन ११८ देवली गमुरपाल किरा गमय বি যুগশ্বানুম মলে पोहोरो लिप गुणग्यानमे मरवर विस गनिमें गमन रिन अदाथाओमे मरण नहीं र अंगोमे पूजापान रिस गनिमें कितने सम्यग्दर्शन १८० परजीमे और रापरणीमेन्ट समय বিশ রশিয়া গী প্রতিনি सापिसाव उत्यम्पानिये. परचाद पिसारा निमनियापी सन्धक तथा बम उदयन्तित्ति एइ गाय सालिसा रिमनियोको उदय भूमिनि शामि बन्धन्जितिरे पापा ७१. THE EART गि व रितनी पतियां किस जगवारीन दोनि १७. mirrecruir निस योनि से पौन उत्पन्न होnt or वित धारमधनी रिम गतिमे कितने गुणस्थान ७०८ शिमशीर कौन जन्म ११८ १३४ फरमानुग प्रशिक २ १५ १२ ७०३ - ७०४ ४२ ७१ ૬૦૮ ६०२ ६१२ २२२ १४ ६२६ चक्षु इन्द्रिय चक्षु दर्शन क्षीणकपाय गुणस्थान क्षीणकपाय गुणस्थान बन्ध घन क्षोणकपाय गुणस्थान पनवाल वन्धव्युच्छित्ति ६५७ क्षोणकपाय गुणस्थान उदय ६८२ धनला क्षणिकपाय गुणस्थान उदय व्युन्छित्ति धनांगुल ૬૮૨ घातायुक क्षोण कपाय गुणस्थान रात्व घातीकर्म क्षीणकपाय गुणस्थान घाती कर्मक भेद सत्त्वव्युच्छित्ति घातीप्रकृतियां क्षेत्र अनुयोगमें किसका कथन घ्राण इन्द्रिय क्षेत्रफल क्षेत्र विपाको कर्म ६२५ क्षेत्र विपाकी प्रकृतियाँ ग गति २०२ चन्द्रमा परिवार गतिके भेद चारित्र मोहनीय गति नाम कर्म चारित्र मोहनोयके भेद गन्ध नाम कर्म चार मोड़ेवाली गति क्यों गर्भजन्म नहीं होती गुणकार ६ चारों क्षपकोंका काल गुण प्रत्यय अवधि ३११ चारों क्षपकोंका कोन भाव गुण प्रत्यय अवधि किसके ३१२ चारों उपशमकों का काल गुणयोनिके भेद १७५ चोवीस तीर्थकर गुणस्थान चौवीस तीर्थकरके जन्म स्थान गुणस्थानके, भेद १०४ चौवीस तीर्थकरके निर्वाण स्थान ७२ गुणस्थानके नामोंका करण १०५ गुणधेणि ७३२ छेदोपस्थापना संयम ५६६, ७३३ गुणहानि आयाम ५६७ जगच्छणी गोत्र कर्म ४४५ जगत्प्रतर गोत्र कर्मके भेद ५२९ जघन्य वर्ग गोत्र कर्मका उत्कृष्ट स्थिति बन्ध ५४६ जघन्य वर्गणा गोमनिका गति २७० जघन्य स्थिति वन्ध किसके । २०३ ४७२ ४९४ १८२ २२३ ३४१ ९३ ४६२ ४६३ २७१ ४२१ ४३६ ४२० ७० ! गुणहानि ७१ ३३० ३ ज ४३ ४४ ५६० ५६२ ५४९ विषयानुवममी m जन्मके भेद १८० घनके भेद जाति नाम वर्म ४७. गंन कब होता है जीव प्ररूपणाके भेद १०२ दर्शन मोहनीय जीवधिपानी कम ६२३ वर्णन मोहनीयो भेर जीवविपाती कर्म कोनरी २८ दोन माहको धारणामा जीवममाम प्रागन कहाँ ज्योनिन देव १४ दान मोहरी सपा ज्योनिया देवकी आयु प्रग्यापर ६०२ ज्योतिपदेव भेद न मोदी परनामा ज्योनिप्पा दरमहाँ रहते हैं निधारा ग्यौनिक या विमानो दान मोक्षीरताका बआकार निधारन बहा २८७ दनावरणम जान मागणारे भेद २८८ दांनावरण और मानावरण भेट दानावरपबई कम पान मानावरणय बन्धाधान ६.२० पनाम प्राचिनकामी नियंपाने नायरणार नियर और मनुष्योग विषिष क.पापा १३ परमे ६६२ भंग नाम नियर और गनृप्या भूमि पर दमन विपरित tain निवन्दि भर १४८ सर १ सीनो अधिनगर पीपर गागम सौर नाम वर्गका माम १r ferritor नाम गाती पर गागरम सरकार ... . रा irror द १२० मरणानुपांग प्रगिस १४७ देशघाति कर्म प्रकृतियां ६१४ निद्रा देशोपशम ३६६ निद्रानिद्रा ४४२. द्रव्य प्राण १८९ निर्माण नामकर्म ५२७ द्रव्य प्राणके भेद १९१ निति (इन्द्रिय) २०८ द्रव्य निक्षेपणका अर्थ ७४३ नितिक भेद २०१ द्रव्यमानके भेद २१ निवृत्त्यपर्याप्त द्रव्येन्द्रिय २०७ निक द्रव्येन्द्रियके भेद १९१ नोकपाय ४६८ द्वितीय वर्गणा ५६३ नोकपायका स्वरूप ४६९ द्वितीय स्पर्द्धक ५६५ न्यग्रोध परिमण्डल ४७२ प धारणाज्ञान २९४ पञ्च भागहार ५८९ ध्रुर्ववन्ध ७२२ पधेन्द्रियके ४७ भेद ध्रुववन्धी प्रकृतियाँ ७४५ परघात नामकर्म ५०१ न परिकर्माष्टक ३ नरकसे निकला जीव कहाँ जन्म परिधि १६ ५६ नरकसे निकला जीव क्या नहीं परिधि और क्षेत्रफलका नियम १७ होता ५७ परिहारविशुद्धि संयम ३३१ नाना गुणहानि ५६८ परिहारविशुद्धि संयम किसके ३३२ नामकर्म ४४४ परोदयमें बंधनेवाली प्रकृतियाँ . ७११ नामकर्मके भेद ४७१ पर्याप्त नामकर्म ५११ नामकर्मकी उत्तर प्रकृतियोंका पर्याप्तक उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ५४३ १६७ १५२ पर्याप्ति १५७ नारकियोंके दो भेद ५५ पर्याप्तिके भेद १५८ नारकियोंके शरीरको ऊँचाई ५५ पर्याप्तियोंके आरम्भ और पूर्णता- नाराच संहनन ४८९ का क्रम १६५ नित्य निगोद २४३ पर्याप्ति और प्राणमें भेद १९३ निकाचितकरण ६०४ पल्य निधत्तिकरण ६०३ पल्यके भेद २५ निरन्तरवन्धी प्रकृतियाँ ७१४ पाणिमुक्का गति २६८ निरन्तरवन्ध और ध्रुववन्ध में ६१७ अन्तर ७१६ पाप प्रकृतियाँ '६२० लेता है १५४ पर्याप्तकके गुणस्थान नारकियोंकी आयु ૨૪ -- पापकर्मका स्वरूप विपानुम्ममी १२१ पुष्प प्रतिया पुरगत विपारी स्वरूप ६२१ प्रमतमंचन गुणस्थानने योग- पुदगल विजय स्वरूप प्रकृतिका ६२२ देवली पर्वत प्रत्येक गुणस्थानी पूपी भेद शेरने शेषता सन पिरो वापिक प्रमत और जामत्त संरतका पुनरमंका स्वरूप ६१८ कान ६२० प्रमत्तगयन गुणाभाना प्रनियाप बन्तरवाल प्रानिबन्धके भेद ५३५ प्रमत्तगयन गणग्यान प्रतिवन्धारसरण ७२४ प्रमागवन गुगम्यानमे प्रगनिमत्व चिनने जोर प्रचा प्रमरामस्त गुणम्यान बन्य En प्रबन्चला प्रमामन म्यानमें कर प्रलोक ਦfਨ प्रसंगुल प्रमनमाया गुणापान जर प्रबनरपति प्रमाया गुजापान प्रत्येक पनपतिरे मेर २१५ रस पनि प्रापेरपरीर नामकर्म प्रमागतान प्रत्यामानावरण मापागाल ७६ प्रमाणात ro प्रमा মখিনি বর मएमोपराम गायरको प्राधि कम प्रांगाम गाया पर प्रापन अयम्पा प्रयमोपाम म्याची बिग पा दिपिरोणि सरापात्र १२१ प्रथमोपरामरमियोपसम गम्यायो बगर ६ बरी भासद हरदा २८९ मिश्र गुणस्थानकी विशेषता १२२ वादर नामकर्म वादर और सूक्ष्मजीव वारहवें दृष्टिवादके भेद करणानुयोग प्रयोगका ५०० मनःपर्ययज्ञान २४५ मनःपगंगनाना भेद ३०५ गनःपयंय किमा ३१५ मनोयोगमें गुणस्थान ३२० २५० १८ २०० २०१ १०६ ६५९ भरत क्षेत्र में परिवर्तन भवप्रत्यय अवधि भवप्रत्यय अवधि किसके भवनवासी देव कहाँ रहते हैं। भवनवासो देवके भेद भवनवासी देवकी आयु भव-विपाकी-स्वरूप भव-विपाको प्रकृतियाँ भव्यमार्गणाके भेद भव्य-अभव्यका स्वरूप भव्य-अभव्यके गुणस्थान भागहार भागहारोंका प्रमाण भावप्राण भाववेद किस गुणस्थान तक भाववेद-द्रव्यवेदमें असमानता भावानुयोगमें किसका कथन भाषापर्याप्ति भोगभूमि भोगभूमि कितनी भोगभूमिज तिर्यञ्चके भेद ૬૮૮ ६७ मानके भेद ३०९ मागंणा ३१० मागंणाके भेद ८२ मिथ्यात्व गुणस्थान मिथ्यात्व गुणस्थानमें बन्ध ८६ मिथ्यात्व गुणस्थानमें बन्धव्यु० ६३६ ६२३ मिथ्यात्व गुणस्थानमें उदय ६२४ मिथ्यात्व गुणस्थानमें उदयव्यु० ६६० ३४९ मिथ्यात्व गुणस्थानमें सत्व ३५० मिथ्यादृष्टी जीवोंका क्षेत्र ३५१ मिथ्यादृष्टी जीवोंका स्पर्शन ७ मिथ्यादृष्टी जोवोंका अन्तर ५९७ मिथ्यादृष्टी जीवोंकी संख्या १९० मिथ्यादृष्टो जीवोंका काल २८२ मिथ्यादृष्टी जीवोंका कोन २८१ भाव मिथ्यात्व कर्म १६३ मिश्र गुणस्थानमें बन्ध ६२ मिश्र गुणस्थानमें बन्धव्यु० मिश्र गुणस्थानमें उदय १५० मिश्र गुणस्थानमें उदयव्यु० मिश्र गुणस्थानमें सत्ता ४०५ ४०७ ४२३ ३९७ ५१३ ३९५ मिश्र गुणस्थान ४३० - मतिज्ञान मतिज्ञानके भेद मतिज्ञानके विस्तारसे भेद मध्यलोक मनुष्योंके नौ भेद मनुष्य कहां रहते हैं पर्याप्ति १०९ ६३९ ६४० ६६३ ६६५ ६९० २९० २९५ ५९ १५१ १७० १६४ मोहनीय कर्म मोहनीय कर्मके भेद मोहनीय कर्मकी उत्तर प्रकृतियोंमें उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ४४२ ४५५ यथाख्यात संयम ५४२ ३३४ विषयानुक्रमणी ४८८ यवनाराच संहनन २४७ यनस्पतियां भेद ८ माकोति नाम योग योगके भेद योजन मोनि पोनिके भेद पोनि और जन्ममें अन्तर २४८ वर्ग ३६ वर्गणा रमना इन्द्रिय रग नामवर्म अन्य पाधि कितनी सम्स्यपर्याप्तक हम्प्यरतिपके गुणग्यान सम्पर्याप्तकके चिन्तने जन्म एप्पार्यावरा जन्म বিবি हरया ऐया भेद वर्गमूल १७२ वर्ष नामनाम १७८ वातवलय वामन मंस्थाननाम ४८२ २२१ विकलेन्द्रियो नौ भेद ४९५ विग्रहगति १ विग्रहगति भेद विद्धिलन्धि १५८ २१७ विस्तारमे जीवगमाग ३५६ विस्तारगे योनि भेट १५६ विहारवल्बरमान मादिता মি ६." वेक भेट २६९ वेदक गम्बार ११ वेदक गम्यायनीति १४७ वेदना गमुदाल मारि in ७ येनौर १० वेदनोपनी ५१ देनीर वीरे उमहिप ४८ दिलनि मन १ विहालोपरि नामा दरियार सिमिधा. ८० होपरा आवार सोरीमोटाई मादि कोपरे भेद मोडमा स्थित है रोसिने रचा होपात्तरमान भेद रान्तिरदेष हरिमान C2 पयोग गुजरथान भगाराप सहनन २४२ अन्तरदेशी मन्दर पाए।

१२४ गरणानुगांग प्रबंगिका व्यन्तरोंकी आयु व्यवकलन व्यवहारपल्य व्यास व्युच्छित्ति श शरीरअंगोपांग नाम शरीर नामकर्म शरीरपर्याप्ति शरीरबन्धन नामकर्म शरीर संघात नामकर्म शरीर संस्थान नामकर्म शरीरमें अंग उपांग शुभ नामकर्म ८९ संयग मागंणा भेद ३२८ ५ संयमासंयम २६ संयतारांयत जीवोंका काल ४२८ १६ संयतासंयत जीवोंका स्पर्शन ४११ ६३३ संयतारांयत आदि गुणस्थानों में जीव संख्या ३९८ '४८४ संयतासंयत जीवोंका काल में भाव ४३४ ४७४ संस्थान नाम और आनुपूर्वी नाममें १६० अन्तर ४९८ ४७५ संहनन नामकर्म ४८६ ४७६ सकल प्रत्यक्ष ३२१ ४७७ सचित्त योनि आदिका स्वरूप १७६ ४८५ सत्त्व अथवा सत्ता ५७१ ५१७ सत्त्व अथवा सत्ताके भेद ५७२ २९७ सत्प्ररूपणामें कथन ३८९ २९८ सत्य मनोयोग आदिका स्वरूप २४९ १६२ सदवस्था रूप उपशम ६०१ १२० सम्यक्त्व ३५२ १२५ सम्यक्त्व मार्गणाके भेद ३५३ २२४ सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान (मिश्र). का अन्तरकाल ४२५ ४ सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थान जीवोंका ५८७ काल ४१५ ५८८ सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें भाव ४३२ः १४३ सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयत २२ सम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शन. ४१० ३९० सयोग केवली गुण० १३६ ४६७ सयोग केवली गुणका काल ४२२ १९४ सयोग केवली गुण का अन्तरकाल ४२९ १९५ सयोग केवली गुणजीवोंकी संख्या ४०३ ३८१ सयोग केवली गुण बन्ध गुण० बन्धव्यु०. ६५७. ६८४ श्रुतज्ञान श्रुतज्ञानके भेद श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति श्रेणि चढ़नेका अभिप्राय श्रेणि चढ़नेका पात्र श्रोत्र इन्द्रिय स संकलन संक्रमण संक्रमणके नियम संक्षेपमें जीवसमास संख्यामानके भेद संख्या अनुयोगमें कथन संज्वलन कषाय संज्ञा संज्ञाके भेद संज्ञी संज्ञीके गुणस्थान संयम . ३८२ सयोग केवली गुण० बन्धव्यु. ३२७ सयोग केवली गुण० उदय पियानुक्रमपी . सयोग वली गुण उदयपु० ६५ सामादिक संयम ३२९ सयोग ऐवती गुण सत्त्व सामादन गुणरधान सप्रतिष्ठित प्रत्येक २८ मामादन गुपस्थान बन्ध मप्रतिष्ठित अप्रतिष्टिको पहचान २४० मामादन गुणाधान बन्धन १.८ मम्मूचन जन्म १८ गामादन गणरथान उदय गमपात २७२ गागांदन गुणाधान उदयपु. २ महपात भेद मामादन ग.जधान मरव मभी चस्सी क्या ममुरपात सामादन गुजरथान पर करते है मामाइन गुमायान रपयन ४०८ सम्परा प्रकृति .४८ मापादन गुणम्पान कान सम्पन्य प्रनिरा नाम सम्पन्न मामाइन सम्पादृष्टी आदि प्रत्येक बयो गुणापानवाले क्लिने से पम्यर मियान्याम समचतुपामग्यान माप ४३८ मामादन पर गमय प्रस्वायर औरप्रमाण गणमान और या १९८ समय प्रयविभाग १११ मिटा रोष गभगमण शर्वपानी ११७ मृदा नाकार समानी प्रतिया খাবার महापार र अधिक समारrt मायु होनेापारण मनापर. गावरार उपयोग TRE T.rr .. सागर सानिधय अप्रत १५ मार.. साधारण बनत FRE सपEE.हर मापारा बना HTTEEमापनगरि गापागमाग FE TRaw... एम गानीमा पर पाब गान्तरमभी Harya गुमग मामा एण्यामा करणानुपोग प्रवैगिका ७६ स्थावर और प्रसोंके गुणस्थान २४६ पदक ५६४ स्थितिकाण्डक ७२६ स्वस्थान अप्रमत्त ११८ स्थिति काण्डक आयाम ७१७ स्वर्गसे चयकर निर्वाण जानेवाले स्थिति और अनुभागका अपकर्षण ५८५ देव ८१ स्थिति और अनुभागका उत्कर्षण ५८३ स्वर्गामें जन्म व मरणका अन्तर ७५ स्थितिबन्ध ५४० स्वर्गों में देवोंकी आयु ७७ स्थितिबन्धापसरण ७२५ स्वर्गों में देवांगनाओंको आयु स्थिति रचनाको अपेक्षा निकोंमें स्वों में देवांगनाओंकी उत्पत्ति ७४ . द्रव्यका प्रमाण लानेको विधि ५७० स्वोदयमें बंधनेवालो प्रकृतियां ७१२ स्थितिसत्त्व ५७६ स्वोदय और परोदयमें बंधनेवाली स्थिर नामकर्म ५१५ प्रकृतियाँ ७१३ स्पर्शन : इन्द्रिय २० ह स्पर्शन अनुयोगका नियम ३९२ हुण्डक संस्थान नाम ४८३ स्पर्श नामकर्म ४९६ हुण्डावसर्पिणीके चिन्ह ८६

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Karunayog Parveshika

Author
Pandit Kailashchandra
Title
Karunayog Parveshika
File name
Karunayog Parveshika
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/07
Publisher
Veer Seva Trust Parkashan
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Shree Abhya Jain Granthalya,bikaner
DLI number
314404
Barcode
99999990313161.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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