Sanmati Library, Jaipur
Shreedheesh Geeta
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3 श्रीआयमहिलाहितकारिणी महापरिपद् । - कारबपादिकाः-भारतधर्मलक्ष्मी खैरीगढ़ राज्येश्यरी नवलासरथ कुमारी देवी..0. B. E, एवं हर हाइनेस धर्म- सावित्री महाराणी शिवाकुमारी देवी, नरसिंह गढ़। भारतवर्षको प्रतिष्ठित रानी महारानियो तथा विदुषी भद्रमहिला- ओंके द्वारा श्रीभारतधर्ममहामण्डलकी निरीक्षकता, प्रार्थमाता- ओंकी उन्नतिकी सदिच्छासे यह महापरिषद् श्रीकाशीपुरीमें स्थापित की गई है। इसके निम्नलिखित उद्देश्य है:- (क) आर्यमहिलाओंकी उन्नतिके लिये नियमित कार्यव्य. वस्थाका स्थापन ( ख ) श्रुतिस्मृति प्रतिपादित पवित्र नारी धर्मका प्रचार (ग ) स्वधर्मानुकूल स्त्रीशिक्षाका प्रचार (घ) पारस्परिक प्रेम स्थापित कर हिन्दूसतियों में एकताकी उत्पत्ति (ङ) सामाजिक कुरीतियोंका संशोधन और (च)हिन्दीकी उन्नति करना तथा (छ) इन्ही उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये अन्यान्य आवश्यकीय कार्य करना। परिषद्के विशेष नियम-:-१ म-इसकी सब प्रकारकी सभ्या. ओंको इसकी मुखपत्रिका आर्यमहिला मुक्त मिलेगी । स्य-स्त्रियाँ ही इसकी सभ्याएँ हो सकेंगी । ३य-यदि पुरुष भी परिपद्की किसी तरहकी सहायता करें तो वे पृष्ठपोषक समझे जायेंगे और उनको भी पत्रिका मुफ्त मिला करेगी। वार्षिक ५) और असमर्थ होने पर वार्षिक ३) देकर प्रत्येक हिन्दूमहिला इस सभाकी सभ्या होकर मुखपत्र विना मूल्य प्राप्त करती है। पत्रिका-सम्बन्धी तथा महापरिषरसम्बन्धी सब तरहके पत्रव्य. वहार करनेका यह पता है:- :- , महोपदेशक पण्डित रामगोविन्द त्रिवेदी वेदान्तशास्त्री कार्याध्यक्ष आर्यमहिला तथा महापरिपत्कार्यालय श्रीमहामण्डल-भवन जगत्गंज, बनारस । -
ॐ तत्सत् ।
श्रीधीशगीता
भाषानुवाद सहित।
श्रीभारतधर्ममहामण्डल के शास्त्रप्रकाश विभाग द्वारा
श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णादानभंडार
के लिये प्रकाशित ।
•-
8 काशी
प्रथमावृत्ति ।
बी० एल० पावगी द्वारा
हितचिन्तक प्रेस, रामघाट, बनारस सिटी
में मुद्रित !
सन् १९२० ईस्वी।
All right reserred]
[मूल्य ॥) पाठ थाना
-- - श्रीमहामण्डलके प्रधान पदधारीगण । प्रधान सभापतिः- श्रीमान महाराजा वहादुर दरभंगा। सभापति प्रतिनिधिसभाः- श्रीमान महाराजा यहादुर कश्मीर । उपसभापति प्रतिनिधिसभा:- श्रीमान् महाराजा वहादुर टीकमगढ़। प्रधान मंत्री प्रतिनिधि सभा- श्रीमान् आनरेवल के. भी. रंगस्वामी प्रायहर जमीनदार श्रीरंगम् । सभापति मन्त्रीसमाः- श्रीमान् महाराजा बहादुर गिद्धौड़। प्रधानाध्यक्षः- श्रीमान् पण्डित रामचन्द्र नायक कोलिया जमीन्दार व आनरेरी मेजिष्ट्रेट धनारस । . अन्यान्य समाचार जाननेका पता- जनरल सेक्रेटरी श्रीभारतधर्ममहामण्डल, महामण्डलभवन, जगतगंज, बनारस सूचना। श्रीभारतधर्म महामण्डलसे सम्बन्धयुक्त आर्य्यमहिलाहित- कारिणी महापरिषद्, आर्य्यमहिला पत्रिका, समाज हितकारी कोष, महामण्डल मेगजीन (अंग्रेजी), निगमागमचन्द्रिका, निगमागम बुडिपो, एरियन बोरो, आर्य्यमहिला महाविद्यालय, श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा दानभण्डार, शास्त्रप्रकाश विभाग, उपदेशक महाविद्यालय आदि विभागों से तथा श्रीभारतधर्म महामण्डलसे पत्र व्यवहार करने का पता:- श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, महामण्डल भवन जगत् गंज, बनारस।
ओ तत्सत् । श्रीधीशगीता विज्ञापन। . भीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय काशी 'धामके शाखप्रकाश नि: भागदाग अव तक अप्रकाशित पांच गीताओं का हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशन होकर हिन्दी साहित्य भण्डार और साथही साथ सनातनधर्म पन्थभएदार की श्री वृद्धि हुई है । इस से पहले श्रीगुरुगीता सव प्रकारके गुरुभक्तों के लिये, श्रीसंन्यास गीता सब प्रकारके संन्यासी और साधुसम्प्रदायों के लिये, सौर्य सम्प्रदायके लिये श्रीसूर्यगीता, वैष्णव सम्प्रदायके लिये भीविष्णुगीता, शाक्तसम्प्रदायके लिये श्रीशक्ति- गीता, हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित की गई है। अब यह श्रीधीश गीता जो अब तक अप्रकाशित थी-हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित की है। सर्वव्यापक, सर्वजीवहितकारी और पृथिवी के सब धर्मों के पितारूप सनातन धर्म में निर्गुण और सगुण उपासनारूप से प्रधान दो भेद हैं। यद्यपि लोलाविग्रह अर्थात अवतार-उपासना, पि देवता पितृ-उपासना और क्षुद्र तामसिक शक्तियों की उपासनारूप से सनातन धर्म में सत्र अधिकार के उपासकवृन्द के लिये और भी कई उपासनाशैलियों का विस्तारित वर्णन पाया जाता है, परन्तु लीलाविग्रह उपासना अर्थात अवतार उपासना तो पञ्च सगुण उपासना के अन्तर्गत ही है। श्रीविष्णुभगवान्, श्रीसूर्यभगवान्, श्रीभगवती देवी, श्रीगणेशभगवान् और भीसदा- शिव भगवान् , इन पन्न सगुण उपास्य देवताओं में से सबके ही अवतारों का वर्णन शाषों में पाया जाता है; क्योंकि सगुण उपासना की पूर्णता का लीलामय स्वरूप के विना उपासक अनुभव नहीं कर सकता। अस्तु, लीलाविग्रह की उपासना सगुण उपासनाको पूर्णता के लिये ही होती है तथा ऋपि देव पितृ-उपासना और अन्य क्षुद्र उपासना का अधिकार सकाम राज्य से ही सम्बन्ध रखता है। निर्गुण उपासना में सर्व साधारण का अधिकार होही नहीं सकता। निर्गुण उपा- सना अरूप, भावातीत, वाक् मन और बुद्धि से अगोचर अात्मस्वरूप की उपासना है। निगुण उपासना केवल श्रात्मज्ञान-प्राप्त तत्त्वज्ञानी महा पुरुषों तथा जीवन्मुक्त संन्या- सियों के लिये ही उपयोगी समझो जासकती है और केवल सगुण उपासनाही सव श्रेणी के उत्तम उपासकवृन्दके लिये हितकारी समझकर पूज्यपाद महर्पियों ने उसके सिद्धान्तों का अधिक प्रचार शाखों में किया है। सृष्टि के स्वाभाविक पञ्च तत्वों के श्रनुसार पञ्च विभागों पर संयम करके पञ्च उपासक सम्पदाय के भेद कल्पना करते हुए पूर्वाचार्यों ने पञ्च सगुण उपासनापाणाली प्रचलित की है। विष्णु उपासक के लिये वैष्णव सम्प्रदायप्रणाली, सूर्य उपासक के लिये सौर्यसम्प्रदाय.प्रणाली, शक्ति उपासक के लिये शाक्त सम्प्रदाय प्रणालो, गणपति उपासक केलिये गाणपत्यसम्प्रदाय . - re प्रणाली और शिव उपासक पोखिये शैवसम्पदाय प्रणाली उन्होंने विस्तारिन पगे नाना शास्त्रों में वर्णन की है। प्रत्येक उपासक सम्प्रदाय के उपयोगी अनेक प्रापं. हिताएं और अनेक तन्त्र ग्रन्थ श्रादि पाये जाते हैं, यहां तक कि प्रत्येक सम्प्रदाय के उपयोगी उपनिषद भी प्राप्त होते है । एसी शैली के अनुसार प्रत्येक सम्पदायफे टपा- सक केलिये अपने अपने सम्प्रदायके पन्नास ग्रन्थ है। अपने अपने सम्प्रदायके पनाम अन्यों में से अपने अपने सम्प्रदायका गीतानन्ध सबसे प्रधान माना गया विष्णुसम्प्रदायकी श्रीनिष्णुगीता, सूर्य सम्म दायकी श्रीस्थ्यगीता, देयोसम्मदाय की श्रीशक्तिगीता, गणपतिसम्प्रदायको श्रीधीशगीता और शिवसम्प्रदायकी श्रीशम्भु- गीता, ये पांचों अन्ध प्रति अपूर्व उपनिषद् रूपी है इन पांचों ग्रन्थानों का मकान अभीतक ठीक ठीक नहीं था । यदिच देवीगीताशिवगीता और गगोशगीता माम से कुछ ग्रन्थ प्रकाशित भी हुए है तो वे असम्पूर्ण दशामें प्रकाशित हुए हैं। श्रीमारतभन्म महा- मण्डल के शास्त्रप्रकाश विभाग तथा अनुसन्धान विभाग द्वारा पांचों प्रधान पने सम्पूर्ण आकार में प्राप्त हुए हैं। उन्हीं पाँचों में से यह चौधी गीना च प्रकाशित रही है। पाँचवी शंभु गीता उसी प्रकार प्रकाशित होगी। ये पाँचों गीता येदयि- शान, सनातनधर्म के पूर्व रहस्य, गभीर अध्यात्म तत्व और पूज्यपाद महरियों के ज्ञानगरिमाके सिद्धान्तों से परिपूर्ण हैं, इन पांचों के पाठ करने से पाठक बहुत कुछ मान लाभ कर सकते है। निगुग बना तथा इसकी उपासना का रहस्य, सगुग्य टपासना का महत्व और विज्ञान, वेद के कर्मकाण्ड उपासनाकागद और जानकार का मर्म, सनातनधर्म के सब गभीर सिद्धान्तों का निर्णय, अध्यात्मतत्व अधिदेवतत्व और अधिभूत तत्व, यहां तक कि वेदका सार सच कुछ इन पन्न गीतालों में प्राप्त होता है। जानकाण्ड का विघ्न जिस प्रकार प्रकार है, उपासनाकागद का विन मिस प्रकार साम्प्रादायिक विरोध है उसी प्रकार कम्न कागद फा विघ्न दम्भ है। कर्मकाण्डीदनमा पाठकरनेसे अपने दम्भको भूलकर भक्त बन जाएंगे. उपासकगण अपने घुदाराय शौर साम्प्रादायिकविरोधको भूलकर उदार और पगभत्तिके अधिकारी चन सकेंगे और तत्वज्ञानी केलिये तो ये पांचों अन्य उपनिपदों के सार रूप हैं। गृहस्थों के लिये पांच गीताएं परम मगावकर, और सन्यासियों के लिये अध्यात्मपरप्रदर्शक हैं। । श्रीभारतधर्म महामण्डलके शास्त्रप्रकाश विभागके अन्य गन्यों के अनुसार इस ग्रन्धरत्नका सत्वाधिकार दीन-दरिद्रों के भरणपोपणार्य प्रोविश्ननाध अन्नपूर्ण- दान भण्डार को दिया गया है । इस ग्रन्ध के इस संस्करणके यापनका व्यय मैरीगढ़ राज्येश्वरी श्रीभारतधर्मा लक्ष्मी महाराणी मुरथ कुमारी देयो के. एच.ओ. श्री ६. महोदयाने प्रदान किया है। श्रीगणपति देव धनको नोरोग और दीर्घायु . फो। विज्ञापनमिति। श्री काशी धाम गंगा दशमी संवत् १९७७ विक्रमी '. विवेकानन्द। -- श्रीगणेशाय नमः ।। श्रीधीशगीता, की विषयानुक्रणमणिका। १. प्रथम अध्याय । विषय पृष्ठाक स्वस्वरूपभावनिरूपण सूतजीकी प्रार्थना। (१)धीशलोक में महर्षियों को श्रीभगवान् धीशदेव ने जो मुक्तिप्रद धीशगीता सुनाई थी उसके सुनने की इच्छा से तथा धीश लोक कहां है इसके जानने की इच्छा से श्रीव्यास देव से सूत की प्रार्थना १-३ व्यासजीकी आज्ञा ।. (२) जिज्ञासुओंको शानोपदेश, मुमुक्षीको तत्व- मानोपदेश, वेदोका जगत्में प्रचार करना और प्रकाश करना मेरे जीवनका व्रत है ऐसी व्यासजीकी श्राक्षा (३) ऊर्द्ध सप्तलोक देवावास और अधः सप्तलोक असुरावास, मध्यसन्धिस्थिन मृत्युलोक, भूलोकका पार्थिव लोक मृत्युलोक और देवलोक पितृलोक, देवासुरसंग्राममें असुरों के जय होने पर कुछ उद्ध लोकोका असुराधीन होना, ऋषियोंकी अबाधित गति चतुर्दश भुवनों में होना और उन का निवासस्थान ऊई सप्तलोकों में होना ४-५ (४) इन्द्रका अनुशासन 'भूर्भुवः स्वः' में होना और असुरराजका अनुशासन सातों अधोलोकों में होना सप्तम, लोकमें ब्रह्मसन्दापयुक्त ऋषियोंका निवास और वहां से श्रीधीनगीता । . ... ... . पृष्टा विषय अपुनरावृत्ति, सगुणोपासनाके लोकों की स्थिति पष्ठ और सतम लोकजी सन्धि होना, देवताओंको पियाँका समा- गम निरन्तर होना और ऋषियोंज्ञा : धीशलोक सम्मिलित होकर भगवान् धोशदेवले प्रार्थना करना ऋषियों की जिज्ञासा! (:) भगवत्वल्पमानविपरिणी और तत्वज्ञानके तार विषयिणी लिमाला श्रीगणपति की भाज्ञा । (६)लप्त झोनभूनियाले परे भगवान्की स्थिति और भत्लॉसी भावनाके अनुसार स्थूलनर और ज्योतीरूप उनका दर्शन, स्थूल विषयाले पर क्रमशःइन्द्रियां. दन्ना- त्राएँ, वृत्तियां, भाव और महत् है, उनके अनकर भगवदर्शन होता है, भगवत्स्वरुपवर्णन, स्वल्पस्थितिम मूलप्रज- तिका भगवल्लीन होना और व्युत्थान दशाने उनका तुष्टि स्थिति लय करना, भावाले गुणीचा अनुभव, भावोंके द्वारा भगवदाविर्भाव और नजोशो ज्ञानप्रदान, नाबोंके द्वाग प्रकृतिदर्शन और उससे मुक्ति (झारपदशा त्रिभावोंकी अता और कार्यदशा- में निभावामक तरत्यज्ञानका मुक्तिप्रदत्व. भारवर पसे भगवान्की सापकता.भक्तिसागर उन्मजत निमन्जन करने में भावत्रयसी कारखना, अयात्म अधिदेव अधिभूत इन त्रिभावोंके लक्षण, ऋदि देवता और पितरोशा नशः इनसे लन्बन्ध. शाय॑ब्रह्मरूप जगत्के पदायोंमें, शालोम लुष्टि और लय.जावभाव, देवासुर संग्राममें,उत्पत्ति और दुनिदशामें विभावपरिदर्शन ...१०-१ (%D)*तन्तत् इस मन्त्रले भारत्रयका लन्यन्य और इसके जयादिले अन्नदृष्टिकी प्राप्ति, बिमावाको कार्यनल में व्यापकता,निमावोंमें भगवान के दर्शनके द्वारा प्रतिबन्धनसे ... - मुक्त होना ...
विषयानुक्रमणिका । " द्वितीय अध्याय ।। विषय पृष्ठाक सिडिस्वरूपवर्णन.... ...२१-३६ ऋपियोंकी जिज्ञासा (१) ऋषियोंके द्वारा सप्त ज्ञानभूमियों के ऊपर सिद्धि- सहित गणपतिदेवका साक्षात्कार करके उस रूपका वर्णन करते हुए सिद्धिके स्वरूपरहस्यकी जिशाला श्रीगणपतिकी आज्ञा । २) सिद्धिका भगवच्छक्तिरूप होना और भगवान्के निरपेक्ष होने पर भी भगवत्सेवामें लदा उनका रत रहना, 'अध्यात्म अधिदेव अधिभूत और सहजरूपसे चतुर्विध सिद्धियां, सिद्धि के साथ भगवंत्सम्बन्धविषयक दृष्टान्त, भग- वान्की सिद्धिके साथ निर्लिप्तता, सिद्धियोंके भेदवर्णन, सिद्धि- प्राषिके प्रधान आठ उपाय और उनके उदाहरण, तप संयम और समाधिके द्वारा सकल सिद्धियोंकी प्राप्ति, चतुर्विध सिद्धियोंके लक्षण, योगी तपस्वी और जीवन्मुक्तों में प्रकाशित होनेवाली तेतीस सहज सिद्धियां २३-२९ (३) भगवत्प्रकृति महामाया सिद्धियों के द्वारा जीवोंको मोहित करके आवागमन चक्रमें फंसाती है, ज्ञानी उसमें मोहित नहीं होते, झानियोंकी सिद्धिका प्राकट्य कुलका. मिनी अङ्ग दर्शनके समान होता है, भक्तिहीन योगी लक्ष्य हीन तपस्वी और शानहीन उग्रकर्मा साधक सिद्धियोंको बतलाकर पतित होते हैं, सिद्धिके चार आयुधोका विज्ञान, अज्ञ साधक सिद्धियों को प्राप्त करके स्वर्गनरक पितृ और प्रेतलोकों में भ्रमण करते रहते हैं किन्तु ज्ञानी भक्त मुझ सिद्धि के अधीश्वरको प्राप्त होते हैं २९-३२ (४) आर्ट अर्थार्थी और जिज्ञासु भक्तोंको मातृरूपिणी सिद्धि भगवान्की ओर अग्रसर करती है, परा प्रकृति और अपरा प्रकृति रूपसे सिद्धिके दो विभाग, अपरा सिशिका ... ... 1 श्रीधीशगीता । .... ... ... पृष्ठाक विषय अनेकविधत्व और पराका एकत्व, ऐशी सिद्धियोका, प्रकाश भगवदानासेभगवद्वतारों में तथानानी भक्तोंमें जीवोंके समष्टि करमानुसार होना. परासिद्धिकी उपासनाकी श्राशा और उसका फल. सिद्धिके मोदक और त्रिशूलकी ओर दृष्टि न रखकर चक्र और पनकी ओर दृष्टि रखने की आशा और उसका कारण तृतीय अध्याय । ज्ञानभूमिनिरूपण ऋषियोंकी जिज्ञासा। (१) ऋषियोंके द्वारा परा सिद्धिके दर्शनके उपायोंकी जिज्ञासा श्रीगणपतिकी आज्ञा । २) दिव्यदृष्टिले ज्ञान भूमियोंमें परासिद्धिका उत्त- रोत्तर स्पष्ट दर्शन होना, तटस्थ और स्वरूप ज्ञानके लक्षण, तटस्थमें सच्चिदानन्दभावोंकी पृथक् अनुभूति और स्वरूप उनका अद्वैतरूपसे अनुभव होना, तटस्थ भावोंकी अनन्तता और स्वरूपमें अद्वैतता, स्वरूपकी प्राप्तिमें तटस्थकी कारणता, स्वरूपको अवस्थाका वर्णन और उससे पूर्ण सात्त्विक ज्ञानका मिलान, तटस्थका अहङ्ककारले सम्शन्ध और स्वरूपका भगवद्रूपत्व, विभाज्ञानका अविधाजन्यत्व और अविभक्तज्ञानका विद्याजन्यत्व. विभक्त ज्ञानसे अविभक 'ज्ञानमें ले जानेवाली सात ज्ञानभूमियां (३) सप्त अज्ञान भूमियोंसे बचने के लिये कर्म उपा. सना और ज्ञानकाण्डको कारणता, सोपानारोहणके समान शानभूमियोंके अतिक्रमण करने पर भगवत्स्वरूप दर्शन, ज्ञान भूमियोंका परोसिद्धिकी कृपासे स्वरूपज्ञान प्राप्तिमें कारणत्व, शानभूमियों के नाम और उनकी प्राप्तिमें अज्ञानभूमियोंके अतिक्रमणकी आवश्यकता, चतुर्विध भूतसमें अज्ञानभूमि.
विषयानुक्रमणिका । पृष्ठाक योका स्थितिनाम, मनुष्यों में अधम मध्यम उत्तमरूप पञ्चम गष्ट और समम मानभूमियोंकी स्थिति, उनके लक्षण और , फल एवं इनके निराकरणमे वेदोको तत्परता ४१-४३ (४) मानभूमियोंका शुद्ध सत्यगुणवत्व और उनका अनुभव, श्रयण मनन निदिध्यासनरूप विविध पुरुगर्थ और उनकी शानभूभियाम उपकारिता. मानभूमियोंका विस्तृत सण, महाकाशगोलकका वर्णन और उसमें छाया और ज्योतीमपर महान और शान सप्त सप्त स्तरोंका विवेक, मानका मनुप्रैस सम्बन्ध और इन्दी में सब प्रकारके दर्शनशारों की स्थिति, इस अध्यात्मगोलके दर्शनका फल, दर्शनोंमें घिरोधकल्पनाका अनौचित्य ४४-५३ चतुर्थ अध्याय। धर्मविज्ञाननिरूपण ६४-६४ पियांकी जिनामा। (2) जानभूमियों के प्रमायसे पचाकर मुमुनुको शान भूमियों में पहुंचाने के उपायोंकी जिज्ञासा ५४-५४ श्रीगणपनिकी आना। (२ष्टिका धारक धम्म ही अशानभूमियोंसे यचा. कार मानिभूमियों में पहुंचता है, भगवानका धर्मकी स्थिति- का अधिष्ठानत्य, भगवच्छत्तिका दी धर्मस्वरूपत्व, सात्त्विकी शक्तिका धर्ममय होना, याकर्पण विकर्षणमें राजसी । नामसी शक्ति होना और दोनोंके सामञ्जस्यमें सात्विको शक्ति होना एवं उसी में ब्रह्माण्डकी स्थिति, सृष्टिक सामस- स्थम देवासुम्युन्दका कारणत्य,उद्भिजसे मनुष्यतक पहुंचने में धर्मका कारणत्य और उसमें मोक्षका अधिकारी होना, धर्मशतिका मनुष्यकी मुक्ति में कारणत्व, धर्मका महत्त्व- वर्णन, धर्मक साधारण और विशेष भेद, साधारण धर्म के चौवीस तत्वों अनुरूप चौबीस भेद (३ } साधारण धर्मका महत्त्ववर्णन और उसका ... ५५-६० श्रीधीशगीता। .... विषय पृष्ठान अन्यान्य धर्ममााँका जनकत्व एवं उसका पितृमाव. सना- तनधर्मका लक्षण, विशेषधर्मका लक्षण और उसके अङ्गभूत वर्णाश्रमधर्मका लक्षण, नारीधर्म और नृधर्मका तप और यज्ञमूलकत्व. प्रवृत्तिधर्म निवृत्तिधर्म राजधर्म प्रजा- धर्म प्रापद्धर्म शैवधर्म वैष्णवधर्म आदिका विशेष धर्म- त्व. सदाचारका विशेषधम्मामें प्राधान्य. विशेषधर्मका अन्तिम अधिकार सशस. सदाचारसे लेकर सन्न्यासतक विशेषधर्मका सम्बन्ध ६०-६३ (४) वर्णाश्रमादि विशेषधम्मोके पालनले शानभूमिके पधिक होकर साधारणधर्म के अधिकारी होना और उससे धर्मके सार्वभौमरूपका ज्ञान होना. सार्वभौमस्वरूपके पूर्णशान होनेपर भगवत्सायुज्यकी प्राप्ति ६३-६ पचम अध्याय । वेदान्तनिरूपण ...६५-८३: ऋपियों की जिज्ञासा। (१) वेदान्तविषयक जिज्ञाला ६५-६५ श्रीगणपतिकी आज्ञा । (२) श्रवण मनन और निदिध्यासनकी उपयोगिता, स्वभावजनित सहजकर्म और अविद्या प्रभावस जीवत्यका आविर्भाव, अविशा और कर्मप्रवाहका अनादित्व, लहज कर्मका प्रकृतिलहजातत्व और उससे चतुर्विध भूत- संघकी उत्पत्ति, जीवका चिज्जड़मन्थिरूपत्व, चैतन्याने जीवभावप्राप्तिका क्रम और विद्याकी सहायताले उसकी मुक्ति, अविद्या जाल और कर्मवन्धनसे भक्ति के द्वारा मुक्ति. प्रकृतिके तीन गुण और उनके कार्य ...६६-६८ (३) तीन गुणोंमें तम और सत्त्वका प्राधान्य और रजका उभयसहायकत्व, तमोमयी प्रति अविद्या और सत्यमयी प्रकृति विद्या, सत्वमें तमका परिणाम और तममें . सत्त्वका परिणाम, तममें सत्त्वके परिणामका उदाहरण, चिन्नड़मन्धि, .
विषयानुक्रमणिका । ७ - पृष्ठाक गिता और अधिशाफे कार्य और उनके फल (४'मान, स्थूल शरीर, म शरीर, कारण शरीर,काप, अन्नमय कोर, प्राणमय कोप, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोप, सामन्यमय पोर, जाप्रदादि अयम्धाप्रय, प्रान तेजस पश्चिममरण ७१-७७ (:) मशिनि गत्य और पविशनितम पुरुष, इन्द्रियोः चिरग, नियों में यो इन्द्रियोका विशपत्य, अन्तः परमप्रिय, शन्द्रिय और अन्तःकरण देवन अन्तःकरण के प्रधान देवगा , उनका चतुगमनत्य, जीप और श्चरफा माण, विधा और मायाप्त RT और उनका कार्य, करार अपना जीप घर इनसे यात्माका भिन्नत्व. मैमिनि विनाने नरवानीत पदकी प्रामि और भगवदर्शन ७७-३ . पट अध्याय । वहान्तसिन्हान्तनिरूपण ....८४-५३ श्रीगणपनिक आजा। { ) 27 कोपोग्ने आमाका आगरण, मृटिप्रकरण, पञ्चीकरणप्रकरण, प्रत्येक ग्रहागड़ के चतुर्दश विभाग, पिराटाभिमानी जीव और अखिल नामागडाभिमानी ईश्वर और उनका विद्या और मायासे सम्बन्ध, जीवेश्वरमें अभेद बुद्धि ना, याच्यार्थ लक्ष्यार्घ सपने 'सत्य" पदका एकीकरण, ग्राम सत्य. जगन्मिथ्या और जीव ब्रह्मकी एकता ८४-१५ (२) सर्वत्र प्रवृद्धि होनेसे मुक्ति, अविद्या और माया उपाधिशी मान्ति दूर होनले प्रामरूपका दर्शन और उससे मुक्किड़जीय, अमानी जीव,शानी और जीवन्मुक्तोंकी संसार विषयक टि. 'वसुधैव कुटुम्बकम् . वसुधैव कुटुम्बकम् . ' इस सिद्धान्तवाले जीवन्मुक्तीका परिवारविधरण और उसका फल ६१-१३ ...
- श्रीधीशगीता। - .... ... विषय पृष्ठान सप्तम अध्याय । विराट्स्वरूपवर्णन ..१४-११० ऋषियोंके द्वारा विरापिका वर्णन । (१) भगवत्कृपाले ऋषियों के तृतीय शाननेत्रका उन्मीलन और उसके द्वारा विराटपका दर्शन, विराटपका अद्भुत वर्णन, महाकाल' भूतस्रष्टा' 'भूतपालक' 'भूतहारी: विश्वचक्ष' 'विश्वचेता 'विश्वचेता'' रसमय 'तेजोमय ' 'विश्वा- धार' 'भावातीत ' ' त्रिगुणातीत ' 'सर्वेश्वर' 'सवितः, 'नारायण' 'शक्तिमन् । 'शम्भो । 'सिद्धिपते' 'देवनायक' धीश' इत्य दि सम्बोधन पदोसे भगवान्के अद्भुत कार्यों का वर्णत और प्रणाम ...६४-१०२ व्यासजी की आज्ञा । (२) ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करने पर भगवान् का आशा करना ... ...१०२-१०३ श्री गणपतिकी आज्ञा । (३) योगयुक्त दशामें, सगुणरूप, आत्मयुक्त दशाम विराटप और कर्मयुक्त दशामें विभूतिरूएका उपासनामें सहायक होना स्वाधीन और प्राकृत दोप्रकारकेजीव,प्राकृतामें गज और स्वाधीनोंमें मनुष्यका भगवद्रूप होना और इसी कारण गजानन. और मनुष्य शरीररूपसे भगवान के सगुण रूपका होना, भगवद्विभूतियों का विस्तृत वर्णन १०३-१०७ (४) सिद्धि में सात्त्विक श्रद्धा रखनेकी आज्ञा और उसके तीन भाव, धीशगीताका माहात्म्य, अधिकारी, फलश्रुति और अनुष्ठानविधि ...१०७-११० ... ... - ... ...
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গীয়া AIL. श्रीधीशगीता। भाषानुवादसहिता। स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । सूत उवाच ॥ १ ॥ गुरो ! वेदान्ततत्त्वज्ञ ! वेदार्थद्योतकान्यहो । अनेकानि पुराणानि कृपातः,श्रावितानि मे ॥२॥ अनेकोपनिषत्साररूपा गीताश्च कीर्तिताः। जातोऽस्म्यहं ततो देव ! कृतकृत्यो न संशयः ॥३॥ आश्रीपञ्च भवत्तोऽहं पुराख्यानप्रसङ्गतः। जगत्कर्ता जगदाता जगज्जन्मादिकारणम् ॥ ४ ॥ सूतजी वोले ॥१॥ हे वेदान्तके तत्त्व जाननेवाले गुरो ! वेदार्थप्रतिपादक अनेक पुराण अहो! आपने कृपापूर्वक मुझे सुनाये हैं ॥२॥ और उप. निषत्साररूप अनेक गीताएँ भी कही हैं हे देव ! जिससे मैं निस- न्देह कृतकृत्य होगया हूं ॥ ३ ॥ पूर्व कथाप्रसङ्गमें मैंने आपसे सुना है कि जगजन्मादिकारण जगत्कर्ता जगद्धाता जगद्वन्धु जगत्पिता २ श्रीधीशगीतां। - जगत्पिता जगद्वन्धुर्भगवान् विश्वपालकः । परे बुद्धेः स्थितो बुद्धिमधिष्टाय कृपावशात् ॥ ५॥ मुक्तिं ददाति जीवेभ्यः शरणागतवत्सलः । अतः सम्पोच्यते धीश आम्नायैरखिलेरसौ ॥६॥ इत्यप्याकणितं नाथ ! भवतो वदनाम्बुजात् । यत्पुरा दिव्यमासाथ धीशलोकं महर्षयः ॥७॥ श्रीमद्गणपतेर्देवाच्छ्रतवन्तो हिताञ्च्छुभान् । अनेकोपनिषत्सारोपदेशान्मुक्तिदायकान् ॥८॥ तवासीमकृपाराशिर्मय्यास्ते या तयैव माम् । दिव्यां धीशर्षिसम्वादरूपां पुण्यमयीमतः ॥ ९ ॥ ज्ञानदा मुक्तिदां श्रव्यां धीशगीतां सुधोपमाम् । कुरुष श्रावयित्वा मां कृतकृत्यं कृपार्णव ! ॥१०॥ कस्मान्महपिभिधीशलोकः प्राप्तः पुरा प्रभो ! क वासो धीशलोकोऽस्ति कथम्बा वत्र गम्यते ॥११॥ . जगत्पालक श्रीभगवान् वुद्धि के परे स्थित हैं और वे शरणागतवत्सल कृपावश बुद्धिमें अधिष्ठान करके जीवो को मुक्तिप्रदान करते इस कारण उनको सब वेदोंने धीश कहा है॥४-६॥ हे नाथ ! मैंने आपके मुखकमल से यह भी सुना है कि पुराकालमें महर्षिगणने दिव्य धीशलोकमें उपस्थित होकर श्रीगणपतिदेवसे मुक्तिप्रद उपनिषत्साररूप हित और शुभ अनेक उपदेशोको श्रवण किया था ॥ -- ॥ अतः मेरे ऊपर जो आपकी अपार कृपाराशि है हे कृपासागर ! आप उससे ही मुझे धीश और महर्षिसम्वादरूप शान और मुक्ति देनेवाली श्रवणीय-अमृतरूप पवित्र दिव्य धीश- गीताको सुनाकर कृतकृत्य कीजिये ॥ 8-१०॥ हेप्रभो ! पुराकालमें महर्षिगण किस कारणसे धीशलोकमें पहुंचे थे और वह धीशलोक कहांपर है, किस प्रकारले वहां जाना होता है और गणपतिदेयने स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । कान्यध्यात्मरहस्यानि धीशदेवेन प्रोचिरे । श्रावयित्वा च तत्सर्व व्यासतो मां कृतार्थय ॥१२॥ येन श्रौतरहस्यं तत्मचाऱ्यांह पुनः पुनः । मुमुक्षूणां कृते. लोके धन्यः स्यां हि स्वयं ध्रुवम् ॥१३॥ व्यास उवाच ॥ १४ ॥ सूत ! ते धर्मजिज्ञासाप्रवृत्त्या जन्मसिद्धया। भक्तया गुरोश्व सद्बुद्धया विश्वकल्याणसक्तया ।। १५ ।। प्रसन्नोऽस्म्यहमत्यन्तं सौम्यात्ते च स्वभावतः । यत्त्वं जिज्ञाससे तात ! यत्त्वं वा शंकसे धतः ।।१६।। तत्समाधानदानेन नितान्तं मोदमावहे । यतो मे प्रियशिष्योऽसि मत्कृपापुजभाजनम् ॥१७॥ जिज्ञासुमाणिन्देभ्यः शिक्षादानं निरन्तरम् । मुमुक्षुसाधकेभ्यश्च तत्त्वज्ञानोपदेशनम् ॥१८॥ . . किन अध्यात्मरहस्योका वर्णन किया था उन लवको विस्तार- पूर्वक सुनाकर मुझे कृतार्थ करें ॥ ११-१२ ॥ जिससे मैं उन वेद- रहस्योंको मुमुनु व्यक्तियों के लिये जगत्में वारम्वार प्रचारित करके निश्चयही स्वयं धन्य होऊँ ॥ १३ ॥ व्यासजी वोले ॥ १४ ॥ हे सूत तुम्हारी गुरुभक्ति जन्मसिद्ध धर्मजिज्ञासाप्रवृत्ति और जगत्कल्याणमें तत्पर सद्बुद्धि से एवं सौम्यस्वभावसे मैं अति-' प्रसन्न हूँ इसी कारण हे तात! तुम जो जिज्ञासा करतेहो और तुम जो शंका करते हो उसका समाधान करनेसे मैं अत्यन्त, आनन्दित होता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय शिष्य और अतिकृपापात्र हो ॥१५- १७ ॥ जिज्ञासुप्राणियोंको निरन्तर उपदेशप्रदान, मुमुचु साधकोंको तत्वज्ञानोपदेश और शानमय वेदों का जगत्में प्रचार एवं ४ श्रीधीशगीता। वेदानां ज्ञानरूपाणां विश्वस्मिंश्च प्रचारणम् । । तेषां प्रकाशनचास्ति जीवनस्य व्रतं मम ।।१९ ।। सूत ! विश्वेशमाहात्म्यमचारः पुण्यवर्द्धनः । स्वभावाद्रोचते मह्यं तत्रासि त्वं सहायकः ॥ २०॥ सानन्दं पूरयिष्येऽतः प्रार्थनामुत्तमामिमाम् । समाहितमना बुद्ध्या युक्तः श्रद्धान्वितः शृणु ।। २१ ॥ ब्रह्माण्डमेतत्समाधः सप्तोर्दध्वञ्चैव विद्यते । चतुर्दशमितेष्वेवं विभक्तं भुवनेप्वहो ॥ २२ ॥ चतुर्दशमितान्येतद्भुवनान्येव कोविदाः । अवलोकानधोलोकान् सप्त सप्त वदन्ति च ॥ २३ ॥ स्वाभाविक्यमुरावासभूरधस्ताद् भवेत्तयोः । सप्तलोक्यां तथोवस्था सप्तलोकी च देवभूः ॥ २४ ॥ चतुर्दशमितानाच भुवनानां विराजते । मध्यसन्धिस्थितोमृत्युलोको मर्मनिवासभूः ॥ २५ ॥ असौ सूत ! किल प्रा.भूलोकोऽपि निगद्यते । उनका प्रकाश करना मेरे जीवनका व्रत है ॥ १८-१६॥ हे सूत! पुण्य वर्द्धक भगवत्महिमाप्रचारमै मेरी स्वाभाविक रुचि है और जगत्म भगवत्महिमाप्रचारकार्यमें तुम सहायक हो इस कारण मैं आनन्द पूर्वक इस उत्तम प्रार्थनाको पूर्ण करूंगा, समाहितमन बुद्धियुक्त और श्रद्धान्वित होकर सुनो । २०-२५ ॥ यह ब्रह्माण्ड अहो ! सात ऊपर और सात नीचे इसी प्रकार चतुर्दश भुवनों में विभक्त है इन्हीं चौदह वनोंको ही पण्डितगण सप्त अवलोक और सप्त अधोलोक कहते हैं ॥ २२-२३ ॥ उनमेसे सप्त अधोलोक असुरोकी स्वाभाषिक आवासभूमि है और सप्त ऊर्दवलोक देवभूमि है एवं मृत्युलोक चतुर्दश भुवनोंकी मध्यसन्धिमे स्थित होकर शोभायमान है जो मनुष्योंकी आवासभूमि है ॥ २४-२५ ॥ हे सूत ! विद्वान्लोग स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । 7 पार्थिवो मृत्युलोकोऽस्य पितृलोकोऽस्ति दैविकः ॥२६॥ युद्धे देवासुरे जाते क्वाचित्केऽपि कदाचन । तयोनिवासभूम्योः स्यात् कादाचित्को विपर्यायः ॥ २७ ॥ हे सूताध्यात्मराज्यस्य चालका ऋपयो यतः । तचतुर्दशलोकेषु गतिस्तेषामवाधिता ।। २८ ॥ वासस्थानानि तेपान्तु लोकाः सप्तोववर्तिनः । श्रेण्योऽनेका महीणामूर्दबलोकेपु सन्त्यतः ॥ २९ ॥ तेपां निवासभूमीनां नाना भेदा निरूपिताः । अधोलोका यथा सप्तासुरभावप्रधानकाः ॥३०॥ भवन्समुरराजेण विस्तरानियमेन च । सर्वदा सर्वथा नूनं नितान्तमनुशासिताः ॥ ३१ ॥ तथा नैवोर्दवलोकेषु देवराजानुशासनम् । आवश्यकं वर्त्तते तें यतः सत्त्वप्रधानकाः ॥ ३२॥ ऋषीणां नितरां तत्र सुलभाप्यस्ति सङ्गतिः । यस्मान पुनरावृत्तिः सत्यलोकस्त्वसौ सदा ॥ ३३ ॥ उसको भूलोक भी कहते हैं इसका पितृलोक दैवीलोक और मृत्युलोक पार्थिवलोक है ॥ २६ ॥ कभी देवासुर संग्राम होने पर इसका साम- यिकरूपसे कहीं कहीं विपर्ययभी होता है॥ २७ ॥ हे सूत! ऋषिगण अध्यात्मराज्यके.संचालक हैं इसलिये उनकी गति चतुर्दश भुवनमें अवाधित है ।।.२८ ॥ परन्तु उनका निवासस्थल सप्त अवलोक है। पियोंकी श्रेणियां अनेक हैं इस कारण ऊर्दूवलोकोंमें उनके वास. स्थानके नाना भेद निरूपित है। जिस प्रकार सप्तअधोलोक असुरभाव प्रधानहोनेसे वे असुरराजके द्वारा सर्वदा नियमसे विस्तारपूर्वक सर्वथा अत्यन्तही अनुशासित हैं उसीप्रकार सप्त ऊर्दध्वलोकों में देवराजके अनुशासनकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे देवलोकसमूह सवप्र. धान हैं।। २९-३२ ॥ वहां ऋषियोंका समागम भी अत्यन्त सुलभ है।
६ श्रीधीशगीता। - मुक्तात्मभिस्तपोनिष्ठैर्योगयुञ्जानमानसैः । ब्रह्मसद्भावसंयुक्त ऋषिभिः पूरितोऽस्त्यलम् ॥ ३४॥ सम्भवः पुनरावृत्तेः सगुणाखिललोकतः । सर्वेऽतः सगुणालोका अवस्थानाधिवत्तिनः ॥ ३५ ॥ लोकयोः सन्धिमध्यस्थास्तपःसत्याभिधानयोः । नात्र त्वं विस्मयं कुर्याः सूत ! दर्भागधीपण ! ।। ३६ ॥ उर्दध्वलोकेषु सर्वेषु निश्चितं निवसन्यहो । यथाधिकारसँल्लब्धि यथास्थानं महर्षयः !! ३७ ॥ निर्जरा निखिलाः भूत ! लब्ध्वा येषां मुसङ्गतिम् । पारयन्ते स्वधर्मस्य पालनं कर्तुमुत्तमम् ॥ ३८ ॥ एकदा मिलिता नैके पुराकाले महर्षयः । अध्यात्मतत्त्वजिज्ञासा-सद्वाञ्छाभिश्च प्रेरिताः ॥३९॥ एकाग्रमानसाः श्रद्धाभक्तिभावसमन्विताः । एकतत्त्वयुताः शान्ता धीशलोकमधिश्रिताः॥ ४०॥ अपुनरावृत्तिभावको धारण करनेवाला. सत्यलोक तो सदा मुक्तात्मा ब्रह्मसद्भावयुक्त तपोनिष्णात और योगाभ्यासपरायण ऋषियोसे अत्यन्त पूर्ण है ॥ ३३-३४ ॥ सव सगुणलोकोसे पुनरावृत्ति सम्भव इस कारण सब सगुण ऊर्दध्वलोक तप और सत्यलोककी सन्धिमें स्थित हैं, हे कुशाग्रबुद्धि सूत । इसमें तुम विस्मय न करो ॥३५-३६॥ अहो यथायोग्य अधिकारके ऋषि सव ऊवलोकोंमें ही यथा- स्थान निवास करते हैं ॥ ३७ ॥ हे सून ! जिनके सत्संगको प्राप्त होकर सव देवतागण उत्तम रीतिसे स्वधर्म के पालन करने में समर्थ होते हैं ।। ३८ ॥ पुराकाल में एक समय अनेक ऋषि एकत्रित होकर अध्यात्मतत्त्वजिज्ञासाकी सद्वासनासे प्रेरित और एकाग्र स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । श्रीमद्गणपति देवं सजज्ञानानन्दविग्रहम् । तत्रत्य भगवन्तं तं प्रार्थयामामुरादराव ॥ ४१ ।। ऋषय ऊचुः ॥ ४२ ॥ भगवन् ! धीश ! सर्वज्ञ ! जगन्मान्य ! जगद्गुरो !। कृपातो भवतो वेदान प्राप्तवन्तो वयं पुरा ॥ ४३ ॥ तेपामांनुसन्धाने ऋतकार्या अभूम च । तवास्माभिः परं नेत्र ज्ञातं रूपं यथार्थतः ॥ ४४ ॥ अतो नैवाभवच्छान्तिरस्माकं चेतसि प्रभो!। वयं शरणमापन्ना भवल्लोकमुपस्थिताः ॥ ४५ ॥ अध नः कृपया देहि स्वरूपज्ञानमात्मनः । तत्वज्ञाननिय सारं ज्ञानं तच्छ्रावयामृतम् ।। ४६ ॥ यत्स्याच्चोपनिषद्रूपमस्मन्निाश्रेयसप्रदम् । चिरशान्तिकर देव ! ब्रह्मानन्दप्रदायकम् ॥ ४७ ॥ चित्त हो श्रद्धा भक्तिभाव और एकतत्त्वसे युक्त एवं शान्त होकर धीशलोफमें पहुंचे ॥ ३६-४० ॥ उन्होंने वहां पहुंचकर उन सञ्चिदा- नन्दमय धीभगवान् गणपति देव से श्रादरपूर्वक प्रार्थना की ॥४१॥ ऋषिगण चोले ॥ ४२ ॥ हे जगन्मान्य ! हे सर्वदा ! हे जगद्गुरो ! हे भगवन् धीश- ! हमने पुराकालमें आपकी कृपासे वेदोको प्राप्त करके उनके अर्थानुसन्धानमें भी कृतकार्य्यता प्राप्त की है परन्तु. हे प्रभो ! आपका यथार्थ स्वरूप हमें परिशात न होनेसे ही हमारे चित्तमें शान्ति प्राप्त नहीं हुई है । अव हम आपके लोक में उपस्थित हो. कर आपके शरणागत हुए हैं। कृपया आप अपने स्वरूपका ज्ञान हम प्रदान कीजिये और तत्त्वमानोंका सार वह अमृतरूपी ज्ञान सुनाइये कि मो उपनिषद्रूप होकर हमारे लिये निःश्रेयसप्रद हो और है देव ! जो हमें चिरस्थायी शान्ति और ब्रह्मानन्दप्रदान- कारी हो।। ४३-४७॥
४ श्रीधीशगीता। - -- १.NPar--- गणपतिरुवाच ॥ ४८ ॥ पारङ्गतोऽस्म्यलं विभाः ! स्वसप्तज्ञानभूमितः । सच्चिदानन्दरूपेण विराजे चाहमव्ययः ॥ ४९ ॥ विभुं मामप्यहो भक्ता भावुकाः स्वेच्छया द्विजाः । नानारूपेषु पश्यन्ति कृतकृत्या भवन्ति च ॥ ५० ॥ रूपहीनोऽस्म्यहं विप्राः ! श्रद्धावन्तस्तथापि मे । भक्ता मां स्थूलरूपे वा ज्योतीरूपे निरीक्ष्य च ॥५१॥ सानन्दाः कृतकृत्याः स्युनीत्र कार्य्या विचारणा । स्युः प्रपञ्चमयादस्मात् स्थूलादै विषयात्परे ।। ५२ ।। इन्द्रियौघास्ततः सन्ति तन्मात्राण्यखिलानि च । तन्मात्रेभ्यः परे पारे वृत्तयश्च भवन्त्यहो ॥ ५३ ॥ ताभ्यः पारं गता भावा भावेभ्योऽपि परं महत् । महतोऽपि परं नित्यं कुर्वते दर्शनं मम ।। ५४ ॥ ज्ञानिनो योगनिष्णाता भक्ता मे तत्त्वचिन्तकाः। श्रीगणपति बोले ॥४८॥ हे विप्रो ! मैं अपनी सप्त ज्ञानभूमियोंके ऊपर सच्चिदानन्दरूपसे अविनाशी होकर भलीभांति विराजमान हूँ ॥ ४६ ॥ हे ब्राह्मणो ! मेरे विभु. होनेपर भी अहो ! भावुक भक्तगण अपनी इच्छाके अनुसार नानारूपमें मेरा दर्शन पाते हैं और कृतकृत्य होते हैं ॥५०॥ हे विप्रो ! मैं रूपरहित हूं तथापि मेरे श्रद्धावान् भक्तगण मेरा स्थूल रूप अथवा ज्योतीरूपमें दर्शन करके आनन्दित और कृतकृत्य होते हैं इसमें विचारकी कोई बात नहीं है। इस स्थूलप्रपञ्चमय विषयसे परे इन्द्रियां हैं. इन्द्रियोसे परे सब तन्मात्राएँ हैं, अहो ! तन्मात्रा औसे परे वृत्तियां हैं, वृत्तियोंसे परे भाव है, भावसे भी परे महत् और महत्से परे मेरा दर्शन तत्त्वचिन्तक योगनिष्णात मेरे झानी है स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । एतद्रूपं परं ज्ञात्वा चिरं शान्तिमवाप्नुत ।। ५५ ॥ अहमेवास्मि सद्रूपश्चिद्रूपोऽपि महर्षयः । अमानन्दरूपोऽस्मि नूनमत्र न संशयः ॥५६॥ विभुश्च निर्विकारोऽहं निराकारश्च निर्गुणः । द्वन्दातीतश्च निर्लिप्तो ज्ञानरूपोऽप्यई ध्रुवम् ॥ ७ ॥ स्वरूपावास्थिती मूल-भक्रतिमें महर्षयः । मल्लीना भावमद्वैतमाविर्भावयतेतराम् ॥ ५८॥ सा न्युत्थानदशायान्तु स्त्रं रूपं त्रिगुणात्मकम् । घृत्वा दृश्यप्रपभस्य अष्टिस्थितिलयाक्रियाः ॥१०॥ कुत्राणीऽऽस्ते सदा विमाः ! महाज्ञावशवर्तिनी । मत्मकृत्याश्च भो विमाः ! तमस्सत्वरजोगुणाः ॥ ६ ॥ ज्ञायन्ने सचिदानन्दरूपैस्त्रिाभिषम । नवध्यात्माधिदवाधिभूतभावैरहो त्रिभिः ॥ ६१ ॥ आविर्भूयात्मभक्तभ्यो ज्ञानिभ्यः सत्वरं ध्रुवम । मक नित्य करते हैं। इस परम रूपको जानकर आप लोग चिरकाल नक शान्ति प्राप्त करें ॥ ५१-५५ ॥ हे महर्षियो ! मैं ही सत्रूप हूँ, मैं ही चिप भी है और मैं ही आनन्दम्प हूँ इसमें सन्देह नहीं । मैं विभु निर्यिकार निर्गुण निराकार निर्लिप द्वन्द्वातीत और निश्चय, दी भानस्वरुप हूँ ॥ ५६-५७ ॥ हे महर्पिगंण ! मेरी मूल प्रकृति स्यकप-अवस्थामै मुझमें ही लीन रहकर अद्वैतभावको अवश्य उत्पन्न करती है 1॥५॥ किन्तु हे विप्रो ! वह व्युत्थान दशामें अपने त्रिगुणात्मक रूपको धारण करके रश्य प्रपञ्चकी सृष्टि स्थिति और लयक्रियाको मेरी आमाके वशवर्तिनी होकर सदा करती रहती है। हे मा.मना मेरी प्रकृतिक सत्व रज तम ये तीनों गुण मेरे सञ्चिदा. नन्दमय त्रिमावास जाने जाते हैं। अहो ! मैं ही अध्यात्म अधिदेव और अधिभूत इन तीनों भावाँसे ही प्रकट होकर अपने झानी भक्तोंको श्रीधीशगीता। अहमेव प्रयच्छामि तत्त्वज्ञान न संशयः ॥ ६२॥ तदा मे ज्ञानिनो भक्ता भावत्रय्याश्रयाध्रुवम् । अघट्यघटनायां या प्रकृति, पटीयसी ॥ ६३ ॥ तस्यास्त्रैगुण्यमय्या हि कृत्वा तात्त्विकदर्शनम् । मामकीनां लभन्तेऽन्ते मुक्ति सायुज्यनामिकाम् ॥ ६४ ।। त्रिभावात्मकमेवास्ति तटस्थज्ञानमद्भुतम् । मत्स्वरूपाववोधाय सूपायः सर्वथोत्तमः ॥ ६५ ॥ मत्कारणदशायां वै सच्चिदानन्दरूपिणः। त्रिभावां अवतिष्ठन्तेऽद्वैतरूपे न संशयः ॥ ६६ ।। नन्वध्यात्माधिदेवाधिभूतभावस्त्रिभिध्रुवम् । प्रकृते, प्रजातस्य कार्यब्रह्मण एव हि ॥ ६७ ।। अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि व्याप्नुवन्नु पृथक् पृथक् । विश्वं प्रकाशये सर्वमहं वैचित्र्यसङ्कुलम् ॥ ६८ ॥ स्थानं तन्नास्ति विश्वास्मिन् व्याप्तं यन्न विभावतः। • - निश्चय ही शीघ्र तत्त्वज्ञान प्रदान करता हूँ इसमें सन्देह नहीं ५६-६२॥ तब मेरे शांनी भक्त त्रिभावकी सहायतासे ही मेरी अघटनघटनापटीयसी त्रिगुणमयी प्रकृतिका यथार्थरूपमें दर्शन करके अन्त मेरी सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ६३-६४ ॥ मेरे, स्वरूपशानकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारसे उत्तम त्रिभावात्मक अद्भुत तटस्थ शान ही श्रेष्ठ है ॥६५॥ मेरी कारणदशामें आनन्दरूप तीनों भाव निस्सन्देह अद्वैतरूपमें ही. रहते हैं ॥ ६६॥ मेरी ही प्रकृतिसे उत्पन्न कार्य्यब्रह्मके ,सव अनो. पाटोमै मैं ही अध्यात्म अधिदेव और अधिभूतरूपी तीनों पृथक पृथक् भावोंसे अवश्य ही व्यापक रहकर नाना वैचित्र्य पूर्ण सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता हूँ ॥ ६७-६८ ॥ इस जगत्में ऐसा स्थान उपाय सत् चित् और स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । ११ An AMIRMI- यन्न शचिराइरूपैः पश्यन्तो ज्ञानिनो हि माम् ॥ ६९॥ उन्मजन्ति निममन्ति भत्ता में भक्तिसागरे । तत्रापि कारणं चित्त नित्यभावत्रयं खलु ॥ ७० ॥ यत्तद्ब्रह्म मनोवाचामगोचरमितीरितम् । तत् सर्वकारणं वित्त साध्यात्मिकमित्यपि ॥ ७१.॥ अनायन्तमजं दिव्यमजरं ध्रुवमव्ययम् । अमतर्यमात्रिक्षेयं ब्रह्माग्रे समवर्तते ।। ७२।। स्वेच्छया मायया यत्तजगज्जन्मादिकारणम् । ईश्चराख्यं तु तत्तत्वमधिदैवमिति स्मृतम् ॥ ७३ ।। सर्वशः सद्गुरुनित्यो हान्तर्यामी कृपानिधिः । सर्वसद्गुणसारात्मा दोपशून्यः परः पुमान् ॥ ७४ ।। यत्कार्यत्रम विश्वस्य निधानं प्राकृतात्मकम् । विराडाश्यं स्थूलतरमधिभूतं तदुच्यते ।। ७५ ॥ नहीं है जो निभावसे व्याप्त न हो, मेरेशानी भक्त जो ब्रह्म ईश और विराट् अपमें मेरा दर्शन करके, ही भकिसागरमै उन्मजन भौर निमजन करते हैं यहां भी नित्य भाषत्रयको ही कारण जानो I188-७॥ जोमन और चाणीके अगोचर कहे गये हैं वे ब्रह्म हैं उनको सबका कारण और सबका अध्यात्म जानो ॥ ७१ ॥ अनादि, अनन्त, अजन्मा, दिव्य, अजर, अमर, नाशरहित, अनूहए और अग्नेय ग्रल प्रथम हैं ॥ ७२ ॥ अपनी इच्छारूपिणी मायासे जो जगत्की सृष्टि स्थिति और लयके कारण हैं वे ईश्वर हैं। पे ईश्वर तत्त्व अधिदेव कहाते है ॥ ७३ ॥ वे सर्वक्ष, सद्गुरु, नित्य, अन्तर्यामी, कृपासागर, सय सद्गुणों के साररूप, दोषशून्य पुगपोत्तम है ।। ७४ ॥ और जो विश्वके निधान, प्राकृतात्मक, स्थूल. सर और विराट्रप कार्यबल वे अधिभूत कहे जाते हैं। ७५ ॥ -
१२
श्रीधीशगीता।
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पुनर्वः सम्प्रवक्ष्येऽहं श्रूयतां तत्वमुत्तमम् ।
नन्वध्यात्माधिदेवाधिभूतभावत्रयानुगम् ।। ७६ ।।
यथाध्यात्माधिदेवाधिभूतभावत्रयं द्विजाः !।
विद्यते कारणे नूनं कार्येष्वपि तथैव तत् ।। ७७ ॥
विस्तरात्सम्प्रवक्ष्येऽहं तत्स्वरूपं निशम्यताम् ।
अहमेव स्वकीयां तां महामायामुपाश्रितः ।। ७८ ॥
विभ्राणोऽध्यात्मभावेन ऋपिरूपं सदोत्तमम् ।
तथाधिदैवभावेन देवतारूपमादधत् ।। ७९ ॥
तथाधिभूतभावेन पितृरूपमधिश्रयन् ।
नानाब्रह्माण्डसंघातं संरक्षामि महर्पयः।।। ८०॥
आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते ।
अधिभूतं तथा शब्दो दिशस्तत्राधिदैवतम् ॥ ८१ ॥
द्वितीय मारुतं भूतं त्वगध्यात्मं च विश्रुतम् ।
स्पष्टव्यमधिभूतञ्च विद्युत्तत्राधिदैवतम् ।। ८२ ॥
अध्यात्म अधिदैव और अधिभूतरूप भावत्रय-सम्बन्धी उत्तमतत्व
'फिर मैं आपलोगोंसे ही कहता हूँ सुनो ॥ ७६ ॥ हे ब्राह्मणो !
अध्यात्म अधिदैव और अधिभूत ये तीनों भाव जिसप्रकार कारण
में हैं उसीप्रकार के कार्य में भी अवश्य है ॥७७॥ उनका विस्तारसे
स्वरूप मैं कहता हूँ सुनो। हे महर्षियों में ही अपनी उन महामायाको
'आश्रय करके सर्वदा अध्यात्मभावसे ऋषि, अधिदेव भावसे देवता
और अधिभूत भावसे पितृरूप उत्तमतासे धारण करके अनेक
ब्रह्माण्डसमूहका संरक्षण करता हूँ.॥ ७:-८० ॥ पञ्च महाभूतोमै
प्रथम भूत आकाश है, वहां श्रोत्र अध्यात्म, शब्द अधिभूत और
दिशाएँ अधिदेव कहीगई है ॥ ८१॥ द्वितीय भूत वायु है, वहां त्वक
अध्यात्म, स्पर्श अधिभूत और विद्युत् अधिदैव कहे गये हैं ॥ ४२ ॥
स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । - तृतीयं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं ततो रूपं मूर्यस्तत्राधिदैवतम् ॥ ८३॥ चतुर्थमापो निज़यं जिहा चाध्यात्ममुच्यते । अधिभूत रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदेवतम् ।। ८४ ॥ पृथिवी पञ्चमं भूतं घाणभाध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्राधिदेवतम् ॥ ८५ ॥ पादावध्यात्ममित्याहुाह्मणास्तत्वदर्शिनः । अधिभूतं तु गन्तव्यं विष्णुस्तत्राधिदैवतम् ॥ ८६ ॥ अवागगनिरपानश्च पायरध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं विसर्गश्च मित्रस्तत्राधिदैवतम् ॥ ८७ ।। मजनः सर्वभूतानामुपस्थोऽध्यात्ममुच्यते । अधिभूतं तया शुक्र देवतश्च मजापतिः ॥ ८८ ।। हस्तावध्यात्ममित्याहुरध्यात्मदिनो जनाः । अधिभूतं च कर्माणि शक्रस्तत्राधिदेवतम् ॥ ८९ ॥ हनीय भूत ज्योति अर्थात् अग्नि है. वहां चक्षु अध्यात्म, रूप अधि- भूत और सूर्य्य अधिदेव कहे गये हैं ॥ ८३॥ चतुर्थ भूत जल वहां जिला अध्यात्म, रस अधिभूत और सोम अधिदेव कहे गये हैं॥४४॥ पाम भूत पृथिवी है. वहां प्राण अध्यात्म, गन्ध अधि- भूत और वायु अधिदेव कहे गये हैं ॥ ॥ तत्वदर्शी ब्राह्मण कहते है कि पाद ( पैर ) अध्यात्म है, गन्तव्य अधिभूत है और वहां विष्णु अधिदेव हैं ॥८६॥ निम्न गतिशील अपान है, वहां पायु अध्यात्म, विसर्ग अधिभून और मित्र अधिदेव है ।।८७॥ सब जीवोंका उत्पादक उपस्थ अध्यात्म है. शुक अधिभूत और प्रजापति अधिदेव हैं ॥८॥ अध्यात्म शासके पण्डितगण दोनों हाथोंको अध्यात्म कहते हैं, कर्म । १४ श्रीधीशगीता. । वैश्वदेवी ततः पूर्वा वागध्यात्ममिहोच्यते । वक्तव्यमधिभूतश्च वह्निस्तत्राधिदैवतम् ।। ९.०॥.... अहङ्कारस्तथाऽध्यात्म सर्वसंसारकारकम् ।। अभिमानोऽधिभूतञ्च रुद्रस्तत्राधिदैवतम् ॥९१ ॥ बुद्धिरध्यात्ममित्याहुर्यथावदभिदर्शिनः । बोद्धव्यमधिभूतं तु क्षेत्रज्ञश्चाधिदैवतम् ॥.९२ ॥ अध्यात्म मन इसाहुः पञ्चभूतात्मवारकम् । अधिभूतञ्च संकल्पश्चन्द्रमांश्वाधिदैवतम् ॥ ९३ ॥ वेदः शब्दमयं ज्ञेयं मत्स्वरूपं न संशयः । मन्त्रास्तत्राधिभूतं स्यादीश्वरश्चाधिदैवतम् ॥ ९४ ॥ . ज्ञानमध्यात्ममित्याहुर्वेदनिष्णातवुद्धयः । सरस्वत्याश्चगायत्र्याः साविध्यांश्च तथैव हि ॥ ९५ ॥ मच्छक्तिरेव वेदेषु त्रीणि रूपाणि विभ्रती। ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तियज्ञशक्तिस्तथा द्विजाः ॥९॥ : . अधिभूत और शक्र वहां अधिदैव है ॥ २ ॥ विश्वेदेवासे उत्पन्न प्रथम वाणी अध्यात्म है, वक्तव्य अधिभूत और वहां वह्निअधिदैव ॥९०॥ समस्त संसारका कर्ता अहङ्कार अध्यात्म है, अभिमान अधिभूत और रुद्र वहां अधिदैव है ॥९१॥ यथार्थ देखनेवाले विद्गण 'बुद्धिको अध्यात्म, शेयको अंधिभूत और क्षेत्रको. अधिदैव कहते हैं। ९२ ॥ पञ्चभूतोसे आत्माको आवृत करनेवाला मन अध्यात्म है, सङ्कल्प अधिभूत और चन्द्रमा अधिदैव है ॥ २३ ॥ वेदको नि: सन्देह मेरा शब्दमय स्वरूप जानना चाहिये । वेदविद्वर कहते हैं कि वहां श्रुतियां अधिभूत, ईश्वर अधिदैव और शान अध्यात्म है। हे विप्रो ! मेरी शक्तिही सरस्वती गायत्री और सावित्री,ये तीन रूप धारण. फरके वेदोंमें शानशक्ति क्रियाशक्ति और यशशक्ति इन ।
स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । १५ - एतन्छक्तित्रयं नृन:संमुत्पादयतेतराम् । नात्र कश्चन सन्देहो विद्यते विमपुङ्गवाः ॥ ९७ ॥. निगमागमयोरक्याच्छास्त्रेऽपि वेदसम्मते । साहदयं तु त्रिभावानामेवगेवास्त्यसंशयम् ॥ ९८॥ अन्तःकरणमेवास्ति कारणं बन्धमोक्षयोः । अकारो मनो बुद्धिश्चित्तश्चैतच्चतुष्टयम् ।। ९९ ॥ तत्राधिभूतमेवास्ति ब्रमा तत्राधिदेवतम् । ममानन्दविलासश्च तत्राध्यात्म समुच्यते ॥ १० ॥ जगदारकवर्मास्याधिभूतं कर्म प्रोच्यते । उपासनाधिदेवं स्यादध्यात्म ज्ञानमुच्यते ॥ १०१ ।।.' धम्मालेप्वपि सचेषु प्रत्येक विद्यते द्विजाः !! 'सम्बन्धी हि त्रिभावानां संशयो नात्र कश्चन ।।१०२॥ बंद एवास्ति भो विप्राः ! मदाज्ञायाः प्रकाशकः । वेदसम्मंतशास्त्राणि तस्य व्याख्यानिभानि च ॥ १०३ ।। तीन शक्तियोंको अवश्पही उत्पन्न करती है हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ ६४-२७ ॥ वेद और वेदसम्मत शास्त्र एकही हैं इस कारण उन वेदसम्मत शास्त्रों में भी त्रिभावों का निःसन्देह पैसाही सारश्य है।६टा अन्तःकरणही बन्ध और मोक्षका कारण है, ग्रही मन बुद्धि चित्त और अहङ्कार ये चारोही मधिभूत, ब्रह्मा अधि- देव और मेरा आनन्दविलास अध्यात्म कहा जाता है ॥ 88-१०० ॥ जगमारक धर्मका अधिभूत कर्म;अधिदेव उपासना और अध्यात्म जानकारड है ॥१०॥ हे ब्राह्मणो संघ धर्माङ्गों में से प्रत्येक धङ्गिक साथ भी भावत्रयका सम्बन्ध है इसमें कुछ संशय नहीं ॥ १०२ ।। हे ग्रामणों वेदही मेरी आमाका प्रकाशक है और वेदसम्मत शास्त्रसमूह - १६ श्रीधीशगीता: अहमेवासम्यतो वेदे शास्त्रेषु तत्परेषु च । लौकिकी परकीया च समाधिनामिका तथा ॥ १०४ ॥ एतत्रयेणं धृत्वाऽहं त्रिभावं भामि सन्ततम् । अधिभूतञ्च विद्यानां सर्वासां शास्त्रमुच्यते ॥ १०५॥ अधिदैवमृषिः प्रोक्तमध्यात्म वेद उच्यते। . अधिभूतं ध्रुवं सृष्टेः पिण्डसृष्टिमहर्षयः । ॥ १०६ ॥ ब्रह्माण्डसृष्टिरेवास्ति नूनं तत्राधिदैवतम् । सचितोर्नित्यमानन्दविलासोऽध्यात्ममुच्यते.॥ १०७ ॥ अनन्तकोटिव्रह्माण्ड-कारणं यच्च प्रोच्यते । पिण्डनाशोऽधिभूतं स्यात्मलयस्य महर्षयः ! ॥ १०८॥ प्राहुरज्ञाश्च यं मृत्यु जीवानां रोमहर्पणम् । ब्रह्माण्डप्रलयश्चास्ति विप्राः ! तत्राधिदैवतम् ॥ १०९ ॥ अध्यात्म तत्र जीवानां मत्सायुज्यसमागमः ।। जीवस्यावरणं नूनं वन्धकारणमुच्यते ॥ ११० ॥ . उसकी व्याख्यारूप है ॥ १०३ ॥ इस कारण बेद और वेदसम्मत शालोमे में ही समाधिभाषा लौकिकभाषा और परकीयभाषा रूपसे: विविधभावोंको धारण करके निरन्तर प्रकाशित हूँ। सब विद्याओं का अधिभूत शास्त्र,अधिदैव ऋषि और अध्यात्म वेद कहागया है। हे महर्षिगण ! सृष्टिका अधिभूत पिण्ड सृष्टिही है, अधिदैव ब्रह्माण्ड सृष्टिही है और अध्यात्म मेरे चित् और सत्भाव आनन्दका नित्य : विलास कहा गया है जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोका कारण है। हे महर्षिगण ! प्रलयकाः पिण्ड प्रलय अधिभूत है जिसको अशलोग जीवोंका रोमाञ्चकारी मृत्यु कहते हैं, अधिदेव ब्रह्माण्ड प्रलय है और अध्यात्म प्रलय जीवोंके मत्सायुज्य प्राप्त होने को कहते हैं। पाश अर्थात् प्रावरणही जीवके बन्धनका कारण कहा जाता है, .
स्वस्वरूपभावीनरूपणम् । १७ ........ - mama- अधिभूतं हि यस्यास्ति कोपाणां पञ्चकं बुधाः ।। अधिदैवमविद्या मे सत्सत्ताऽध्यात्ममुच्यते ॥१११॥ सामञ्जस्यसुरक्षार्थ सृष्टेरुत्पद्यते तु यः। देवासुराख्यसंग्रामः पूर्णः सोऽपि त्रिभावतः ।। ११२ ॥ विज्ञा महर्पयो नात्र काचित् कार्या विचारणा । धर्माधर्म्ममयीनां यत्तीनां द्वन्द्वसङ्गरम् ॥ १३ ॥ अन्तःकरणमासाध जायते नित्यमदभुतम् । देवासुराख्ययुद्धस्य तदेवाध्यात्ममुच्यते ॥ ११४ ॥ देवासुरं देवलोके युद्धं नैमित्तिकं तु यत् । भवेत्तदेव भो विमा आस्ते खल्वपिदैवतम् ॥ ११५ ॥ देवानामामुरीणाञ्च सम्पत्तीनां प्रभावतः । जायते मृत्युलोके यमहायुद्धं परस्परम् ॥ ११६ ।। अधिभूतं तदेवास्ति तस्य युद्धस्य निश्चितम् । ममैव प्रकृतिर्नूनमाश्रयेण ममैव तु ॥ ११७ ॥ आविर्भावयते सृष्टि-प्रपञ्चं सन्ततं द्विजाः!। विझो ! जिसका पञ्चकोप अधिभूत अविद्या अधिदेव और मेरी सत्सत्ता अध्यात्म है ॥ १०४-११ ॥ हे विज्ञ ब्राह्मणों। सृष्टि के सामञ्जस्यको रक्षाके लिये जो देवासुर संग्राम हुआ करता है वह भी निभावले पूर्ण है यह निःसन्देह है । धौ-धर्म वृत्तियों का जो अन्तःकरणमें नित्य अद्भुत द्वन्द्व युद्ध होता है वही उसका अध्यात्म है ॥ ११२-११४ ॥ हे ब्राह्मणो ! देवलोकके नैमित्तिक देवासुर संग्राम ही अधिदेव हैं और मृत्युलोकमें देवी और आसुरी सम्पत्तिके प्रभावसे जो परस्पर महा संग्राम होता है घही उसका अधिभूत है यह निश्चय है। हे विप्रो ! मेरी ही प्रकृति मेरे ही आंश्रयसे सृष्टिप्रपञ्च निरन्तर प्रकट करती है इस . १८ श्रीधीशगीता। कारणं बन्धनस्यातः प्रकृतेर्मे गुणत्रयम् ॥ ११८॥ ये त्रिभावाश्रयान्मे तु पश्यन्ति प्रकृति मम । त्रिभिर्गुणैर्न वध्यन्ते प्रकृतेस्ते कदाचन ॥ ११९ ।। मामकीनं स्वकीयञ्च गृहीत्वाऽऽदर्शमुत्तमम् । ममैषा प्रकृतिविप्राः ! संसारेऽपारसीमान ।। १२० ॥ नारीधारां नृधाराश्च प्रोत्पाच विश्वमश्नुते । अतो धाराद्वयेऽस्मिश्च बन्धमोक्षदशाद्वयम् ॥ १२१ ॥ कर्तुं सार्थकमेवास्ति द्विधा भावत्रयं खलु । सृष्ट्रर्दशायां दम्पत्योः क्षेत्रवीजे महर्षयः ! ॥ १२२ ॥ आधिभूतं तथा चास्ते पितरस्त्वाधिदैवतम् । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥१२३।। अध्यात्म प्रोच्यते तत्र नात्र कश्चन संशयः । मुक्तेर्दशायां दम्पत्योमल्लिङ्गं प्रकृतिश्च मे ॥ १२४ ।। अधिभूतं तथास्ते सच्चिद्भावावधिदैवतम् । . . ! कारण मेरी प्रकृतिके तीन गुण वन्धनके हेतु होते हैं ॥ ११५-१६८ ॥ परन्तु जो मेरे तीनों भावोका आश्रय ग्रहण करके मेरी प्रकृतिको देखते हैं वे प्रकृतिके तीनों 'गुणोंसे कभी बन्धन प्राप्त नहीं होते ॥ ११ ॥ हे विप्रो ! मेरे और अपने उदाहरणको लेकर मेरी यह प्रकृति अपार संसारमें श्रीधारा और पुरुषधाराको उत्पन्न करके जगत्को परिव्याप्त करती है इस कारण इन दोनों धाराओमें बन्धन वशी और मुक्तदशा इन दोनोंकी चरितार्थके विचारसे निश्चय ही त्रिभाषके दो भेद हैं। है महर्षिगण ! सृष्टिदशामें स्त्री और पुरुष- मैं क्षेत्र और बीज अधिभूत, पितृगण अधिदैव और वहां भूतभावो. अषकर विसर्गरूपी कर्म अध्यात्म कहा जाता है इसमें कुछ सन्देह नहीं और मुक्तिदशामें स्त्री और पुरुषमै मेरी प्रकृति और स्वस्वरूपभावनिरूपणम् । परमानन्द एवास्ति तत्राध्यात्मं न संशयः ॥ १२५ ॥ बामणाः ! इत्यमेवाई त्रिभावैर्दैशकालयोः। पात्रेऽपि दर्शनं दत्वा स्वभक्तान ज्ञानिनो ध्रुवम् ।।१२६॥ प्रकृतेर्वन्धनान्सून मोचयामि न संशयः। एतदगूढरहस्यं यः कथितं विमपुङ्गवाः !॥ १२७ ।। शुद्धभावमयो यश्च पूर्णशक्तिप्रकाशकः ।। ओतत्सदिति मन्त्री हि मगावत्रयवाचकः ॥ १२८ ।। भावनाभिस्तदर्थानां तज्जपश्च निरन्तरम् ।। मद्भक्ताननिष्णातैर्मन्त्रतत्त्वपरायणैः ॥ १२९ ।। अविभक्तज्ञानपूर्णा तैरन्तदृष्टिराप्यते ॥ ममैव सच्चिदानन्द-भावत्रयसमाश्रयात् ॥ १३० ॥ नन्वयात्माधिदेवाधिभूतरूपं महर्पयः ।। भावत्रयं हि सर्वस्मिन् कार्यव्रह्मणि भासते ॥ १३१ ।। दृश्य नातो भवेत् किश्चिच्छून्यं भावत्रयेण वै ॥ मेरा लिारूप अधिभूत, मेरा सत् और चिद्भाव अधिदैव और घहां निःसन्देह परमानन्द ही अध्यात्म है ॥१२०-१२५॥ हे ब्राह्मणों! मैं इसी प्रकार से सब देश काल और पात्रोमें त्रिभावोसे दर्शन देकर प्रकृति के बाधनसे अपने शानी भक्तोंको निश्चय ही यचाया करता हूँ इसमें सन्देह नहीं ! हे ब्राह्मणश्रेष्ठो ! मैंने आपलोगोंसे यह गूढ रहस्य फहा है ।। १२६-२७॥ शुद्ध भावमय पूर्ण शक्ति प्रकाशक जो मेरे तान भावाका याचक श्रोतलत् मन्त्र है उसका निरन्तर जप और उसके अर्थों की भावना द्वारा ज्ञाननिष्णात और मन्नतत्त्व. परायण मेरे भक्तोंको अविभक्तज्ञानपूर्ण अन्तर्टएि प्राप्त होती है। है महपियों ! मेरे ही सत् चित् और आनन्द इन तीनों भावोंको आथप करकं अध्यात्म अधिदेव और अधिभूतरूपी निभाष सम्पूर्ण कायसमें निश्चय ही प्रफट हैं ॥ २२-१३१ ॥ इस कारण २० श्रीधीशगीता। प्राप्य भक्तेः पराकाष्ठां ज्ञानयोगान्तिमस्थलीम् ॥ १३२ ।। यदा मे ज्ञानिनो भक्ता मां द्रष्टुं शक्नुवन्ति ह । सर्वेषु देशकालेषु तदा भावत्रयं मम ।। १३३ ।। भवन्त्यनुभवन्तस्ते मचित्ता नात्र संशयः । अघट्यघटनायां या प्रकृतिम पटीयसी ।। १३४॥ सा त्रैगुण्यमयी देवी तमःसत्त्वरजोऽभिधैः । त्रिभिगुणैस्तदा नालं वर्द्ध भक्तान मम प्रियान् ।। १३५ ।। अहो मत्प्रकृतिश्चैव विद्यारूपं समाश्रिता । नयते ज्ञानिनो भक्तान् मत्सायुज्यं न संशयः ॥ १३६ ॥ इति श्रीधीशगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे धीशर्षि- संवादे स्वस्वरूपभावनिरूपणं नाम प्रथमोऽध्यायः । . त्रिभावसे रहित कोई दृश्य हो ही नहीं सका । मेरेशानी भक जब ज्ञानयोगकी अन्तिम स्थलरूपा भक्तिकी पराकाष्ठाको प्राप्त करके मेरे दर्शन करने में समर्थ होते हैं तब वे सब देश और कालमें मेरे त्रिभावका अनुभव करते हुए निःसन्देह मद्गतचित्त हो जाते हैं। उस समय अघटनघटनापटीयसी त्रिगुणमयी मेरी प्रकृतिदेवी सस्व रज और तमरूपी तीनों गुणोंसे मेरे भक्तोको बन्थन करने में असमर्थ हो जाती है। अहो ! मेरी प्रकृति ही विद्यारूप धारण करके शानी भकोंको मत्सायुज्य प्राप्त कराती है, इसमें सन्देह नहीं ॥१३२-१३६॥ इसप्रकार श्रीधीशगीतोपनिषद्केब्रह्मविद्यासम्बन्धिधीशर्षि- सम्वादात्मक योगशास्त्रका स्वखरूपभावनिरूपण नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ। . .
सिद्धिस्वरूपनिरूपणम् । २१ Montent . TA.. सिडिस्वरूपनिरूपणम् । महर्पय ऊचुः ॥ १॥ ज्ञात्वा लोकोत्तरं दिव्यं तत्वातीतं कृपानिधे!। परतत्त्वात्मकं सम्यक् स्वल्पं ते यथार्थतः ॥ २ ॥ दृश्यमपनजात परिच्याप्नवतोऽखिलम् । त्रिभावात्मकरूपस्य रहस्यं परमाद्भुतम् ॥ ३ ॥ समाकर्ण्य वयं जाताः कृतकृत्या न संशयः । किन्त्यन्यदेव नो नातं परं कातृहलं हृदि ॥ ४ ॥ पश्यामः साम्मत सप्त-ज्ञानभूमेरुपर्यो । भवन्तं मुखमासीनं सुरम्ये कमलासने ॥ ५ ॥ धीश!सर्वज्ञ ! सरिमन्नासितस्यास्य ते विभो !। सौन्दर्य कमलस्यास्त वाङ्मनोबुद्धयगोचरम् ॥ ६ ॥ शरीरं भवतो धीश! रक्तवर्णमपि प्रभो!। महर्पिगण बोले ॥१॥ हे कृपानिधे ! श्रापके लोकोत्तर दिव्य और तत्त्यातीत परम- तत्त्वरूपी स्वरूपको यथार्थरूपसे भलीभांति जानकर और सम्पूर्ण रश्यमपञ्चसमूहमें परिव्याप्त आपके त्रिभावात्मक स्वरूपका परम अद्भुत रहस्य सुनकर हम निस्सन्देह कृतकृत्य हुए हैं, परन्तु हमारे हृदयमें एक और ही महान् कौतूहल (आश्चर्य) उत्पन्न हुआ है॥२-४॥ अदो! इस समय हम देख रहे हैं कि सप्त शानभूमिके ऊपर सुरम्य कमल पर आप सुखपूर्वक श्रासीन हैं ॥५॥ हे सर्वात्मन् ! हे. विभो! हे सर्वक्ष धीश ! जिस पर आप बैठे हुए हैं, उस कमलका सौन्दर्य वाक् मन और धुद्धिसे अतीत है ॥६॥ हे प्रभो धीश ! आपके शरीरका वर्ण रक्त होने पर भी वह रक्त आदि सब रंगों १२ श्रीधीशगीता। ---- . अतीत सर्ववर्णेभ्यो रक्तादिभ्योऽधुनात्यलम् ॥ ७॥ तर्पयत्यस्मदीयां वै रूपदर्शनलालसाम् । चक्रपद्मत्रिशूलैस्तु मोदकेन च भूपितैः ॥ ८॥ करैर्दिव्यैरेभिरस्वैर्भवान् नित्यं चतुर्भुजः । कैवल्याभ्युदयौ दातुमिवावासयते च नः ॥ ९ ॥ समाधत्ते च नो बुद्धिं भवान् भूत्वा गजाननः । उपदिष्टा वयं पूर्व भवता यत्ततस्तव ॥ १० ॥ ईशा ज्ञातुं स्वरूपस्य रहस्य यत्किमप्यहो । सुन्दरी लोहिताङ्गीन्तु भवद्वामाङ्कवत्तिनीम् ॥ ११ ॥ शङ्खशक्त्यब्जचकातिीवभूपितचतुर्भुजाम् । यां विश्वमोहिनी देवीं पोडशी शक्तिशालिनीम् ॥ १२ ॥ पश्यामो वयमेतस्याः स्वरूपस्याधुनावधि । नाज्ञासिष्म रहस्यं तव कृपां कृत्वैव साम्प्रतम् ॥ १३ ॥ से अतीत होकर हमारी रूपदर्शनतृष्णाको इस समय भलीभांति तृप्त कर रहा है । आप चतुर्भुज होकर अपने चक्र पल त्रिशल और मोदकरूप दिव्यास्रोले विभूपित इन हाथोंसे अभ्युदय और निःश्रेयस प्रदान करनेकेलिये मानो हमको नित्य आशान्वित कर रहे हैं ॥ ७-६॥ और आप गजवदन होकर हमारी बुद्धिको समा. हित कर रहे हैं । आपने पहले जो हमें उपदेश दिया है उसके द्वारा अहो ! हम आपके खरूपके रहस्य को तो यकिञ्चित् समझने में समर्थ हुए. हैं परन्तु आपके वाम-अङ्क-वर्तिनी शङ्ख चक्र शक्ति और पन से अति विभूषित चतुर्भुजा लोहितवर्णाङ्गी और शक्ति शालिनी षोडशी जगत् मोहिनी जिस देवी को हम लोग देखते हैं उनके स्वरूप का रहस्य अभी तक हमारे समझ में नहीं आया, इस लिये इस समय कृपा करके ही वे कौन हैं ? उनका स्वरूप क्या है ? ३ सिद्धिस्वरूपनिरूपणम् । N "कास्तेऽसा ? तस्वरूपं किं ? तद्रहस्यञ्च विस्तृतम् | ज्यासको वर्णयित्वतत् कृतकृत्यान कुरुप्प नः ॥ १४ ॥ गणपतिवाच ॥ १५ ॥ शक्तिपा ममैवास्ते सर्वकार्यसहायिका। सिद्धि नाम्ना च यामाहुाह्मणा वेदपारगाः ॥ १६ ॥ ममेर प्रकृतिविमाः ! सदा गुण्यशोभिता । अत्यन्तं सा प्रसीदन्ती सिद्धिरूपश्च विभ्रती ॥ १७ ॥ सेवायां में रता निसं मामुपाश्रित्य राजते । पूर्णाङ्गललिता रम्या पोड़शी सर्वसुन्दरी ॥१८॥ चक्राब्जशकशक्तीनां धारिणी शक्तिरूपिणी । सिद्धिर्विच्यांतते नव सेवातो मे कदाचन ॥ १९ ॥ अपि चन्निरपक्षोऽई तत्सेवाऽऽद्धानकर्मणि । शुश्रूपते तथाप्यपा धृत्वा रूपं चनुर्विधम् ॥ २० ॥ .. और उनका यिस्तारित रहस्य क्या है ? सो विस्तार पूर्वक वर्णन करके हमको कृतकृत्य कीजिये ॥३-१४॥ गणपति बोले ॥ १५॥ मेरे सब कार्यों में सहायिका ये देवी मेरी ही. शक्ति है, घेदश ब्राह्मण गण जिनको सिद्धि नाम से अभिहित करते हैं ॥ १६ ॥ है पिप्रवृन्द ! मेरी विगुणशोभित प्रकृति ही सिद्धिरूप धारण करके सदा मरी संघाम अनि प्रसन्न होकर रत रहती हुई निरन्तर मेरा आश्रय करके शोभायमान है। पुर्ण अवयव सुशोभित पोड़शी सर्व सौन्दर्यसमन्धिता मनोहारिणी शह चक्र शक्ति पद्मधारिणी शक्तिरूपिणी सिद्धि किसी समयभी मेरी सेवासे च्युत नहीं होती है 1-18 यद्यपि मैं इसकी सेवा ग्रहण करने में निरपेक्ष रहता है तौभी यह चतुर्विध रूप धारण करके मेरी सेवाकी इच्छा करती २४ श्रीधीशगीता। - नन्वध्यात्माधिदेवाधिभूतानि सहजं तथा । सिद्धेरस्या हि रूपाणि चत्वारि ब्राह्मणोत्तमाः। ॥ २१ ॥ ऐश्वर्यस्य चिता यद्वत् वलस्य च सता यथा । सम्बन्धः कर्मणः शक्तया रूपस्य तेजसा सह ॥ २२॥ तथैवास्ते च सम्बन्धः सिद्धेः सार्द्ध मया ध्रुवम् । सम्बन्धोऽयमपूर्वोऽस्ति नात्र कार्य्या विचारणा ॥ २३ ॥ विष्णोः प्रिया यथा लक्ष्मीः प्रिया उयामा शिवस्य च । ब्रह्ममय्या महाशक्ते मिय आस्ते यथा पुनः ॥ २४ ।। चिद्विलासात्मको भावः स्वकार्यब्रह्मणः खलु । अरुणोऽस्ति यथा विज्ञाः ! सूर्यदेवस्य च मियः ॥ २५ ॥ महर्पयस्तथैवास्ते सिद्धिरेपा हि मे मिया । परन्तु निर्विकारं मां निर्लिप्तं ज्ञानरूपिणम् ॥ २६ ॥ स्वप्रेमावरणे सिद्धि सज्जयितुमस्त्यलम् । अलौकिकोऽस्ति सम्बन्धः सिद्धयैवं मे महर्पयः ! ॥ २७ ॥ . है॥२०॥ इसी कारण हे ब्राह्मण श्रेष्ठो! इस सिद्धिके चार भेद हैं यथा-अधिभूतसिद्धि, अधिदेवसिद्धि, अध्यात्मसिद्धि और सहजसिद्धि ॥ २१ ॥ जिस प्रकार चित्के साथ ऐश्वर्यका सम्बन्ध है, सत्के साथ बलका सम्बन्ध है, शक्तिके साथ कर्मका सम्बन्ध है और तेजके साथ रूपका सम्बन्ध है उसी प्रकार मेरे साथ सिद्धिका नित्य सम्बन्ध है । यह सम्बन्ध अलौकिक है, इसमें विचारन करना ॥ २२-२३ ॥ हे विशो ! जिस प्रकार विष्णुको लक्ष्मी प्रिय है, शम्भुको श्यामा प्रिय है और पुनः जिस प्रकार ब्रह्मरूपिणी महाशक्तिको खकार्यब्रह्मका चिद्विलासरूप भाव प्रिय है, एवं जिस प्रकार सूर्यदेवको अरुण प्रिय है उसी प्रकारसे हे महर्पिगए ! मुझको यह सिद्धि ही प्रिय है; परन्तु निर्लिप्त निर्विकार और ज्ञानस्वरूप मुझको सिद्धि अपने प्रेम आवरणसे फंसा नहीं सक्ती। हे महर्षिगण ! इस प्रकारका सिद्धिके साथ मेरा अलौकिक सम्बन्ध सिद्धिस्वरूपनिरूपणम् । anandhan मन्त्रसिद्धिस्तपासिद्धियोगसिद्धिस्तथैव च । एवं नानाविधा लोके विख्याता याश्च सिद्धयः ॥ २८ ॥ उत याः सिद्धयो विप्रा ऐग्यः सन्त्यणिमादयः । जैव्यो वा सिद्धयः सन्ति या मेधामतिभादयः ॥ २९ ॥ ओएधीसिद्धयो याश्च या रसायनालिकाः। पदार्थासद्धयो याश्च विश्वस्मिन्मन्त्रदर्शिनः ! ॥३०॥ बलसिव्यिसिद्धिः सिद्धिश्च पुरुपार्थगा । सम्मोहनादयः ख्याताः सन्ति वा याश्च सिद्धयः ॥ ३१ ॥ ज्ञानस्य सिद्धयो नाना वेदशास्त्रप्रकाशिकाः । सास्तास्सन्ति मत्सिद्धरङ्गभूता न संशयः ॥ ३२ ॥ जन्मौपधिपदोपास्तितपोमन्त्रसमाधिभिः । संयमेनापि लभ्यन्ते सिद्धयोऽलौकिका द्विजाः ! ॥ ३३ ॥ अष्टोपायाः नधाना हि सन्तीमे सिद्धिलब्धये । सन्ति जातिस्मरत्वादिसिद्धयो जन्मासद्धयः॥.३४ ।। है ॥ २४-७ ॥ जगत्में जो,मन्त्रसिद्धि तपसिद्धि और योगसिद्धि, इस प्रकार नानाविध सिद्धियां प्रचलित हैं और हे विप्रगण ! जगत्में जो अणिमा लघिमा श्रादि ऐशी सिद्धियां हैं अथवा जो मेधाप्रतिभा श्रादि जैवसिद्धियां प्रचलित हैं या जगत्में जो औषधि- सिद्धि रसायनसिद्धि और पदार्थसिद्धि' नामसे प्रचलित हैं और ६ मन्त्रदर्शिगण ! जगत्में जो धनसिद्धि. चलसिद्धि, पुरुषार्थसिद्धि, संमोहित करनेकी सिद्धि आदि प्रचलित हैं और जगत्में जो वेद तथा नानाशास्त्र के प्रकाशकी जो नानाज्ञानसम्बन्धीय सिद्धियां हैं वे सब मेरी सिद्धिकी ही अङ्गभूत है इसमें सन्देह नहीं ॥ २८-३२॥ हे विप्रो ! जन्म, पद,औषधि.मन्त्र,उपासना, तप, संयम और समाधिक द्वारा अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं ॥ ३३ ॥ सिद्धिलाभके लिये ये ही आठ उयाय प्रधान हैं। जातिस्मरत्व आदि सिद्धियां जन्म- २६ श्रीधीशगीता। -- या सिद्धगुटिका कायकल्पश्चैव रसायनम । अन्या चैवंविधा सिद्धिरोपधीसिद्धिरुच्यते ॥ ३५ ॥ नैमित्तिक्यश्च या देव-शक्तयो राजशक्तयः । अन्याश्चैवंविधाः सर्वाः शक्तयः पदसिद्धयः ॥ ३६॥ उपास्तेः सिद्धयः सन्ति देवतादर्शनादयः । यासु सिद्धिपु लब्धामु.जायतेऽभ्युदयो ध्रुवम् ॥ ३७॥ षड्वशीकरणादीनि यानि कर्माणि सन्ति च । अन्यान्यन्तर्भवन्त्येवं मन्त्रसिद्धौ न संशयः ॥ ३८ ॥ नेवास्त्यवम्विधा सिद्धिदैवी वा कापि लौकिकी। या संयमसमाधिभ्यां लभ्येत तपसा न वा ।। ३१ ॥ चतुर्विधा हि लभ्यन्ते सिद्धयो निश्चितं द्विजाः । उपायैरष्टाभः प्रोक्तैनात्र कार्या विचारणा ॥ ४०॥ अनन्ताः सिद्धयो याश्च लोके मच्छक्तिसम्भवाः । विभक्तास्सन्ति तास्सर्वाश्चतुर्धेव मया पुरा ।। ४१ ।। सिद्धियां हैं॥३४॥ सिद्धगुटिकाकायाकल्प रसायन और इस प्रकार की अन्यान्य सिद्धियां श्रोषधि सिद्धियां कहाती हैं।॥ ३५॥ राजशकि और नैमित्तिक देवशक्ति और अन्यान्य इस प्रकारको सब शक्तियां पद-सिद्धियां कहाती हैं ॥ ३६ ॥ देवदर्शनादि उपासना सिद्धियां कहाती हैं जिनके प्राप्त होने पर अवश्य अभ्युदय होता है ॥ ३ ॥ वशीकरणादि षट्कर्म तथो उसी प्रकार की और सिद्धियां मन्त्रसिद्धि. के अन्तर्गत हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ३ ॥ तप संयम और समाधि द्वारा दैवी या लौकिकी ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं जो प्राप्त न हो सके ॥ २६ ॥ हे विप्रो ! इन श्राठ उपायों के द्वारा चतुर्विध ही सिद्धियां निश्चय प्राप्त हुआ करती हैं इसमें विचार न करो॥१०॥ संसारमें मेरी शक्तिसे उत्पन्न जो अनन्त प्रकारको सिद्धियां हैं मेरे द्वारा पहले ही से वे. सव चार श्रेणियों में विभक हैं और सिद्धिस्वरूपनिरूपणम् । २७ 4.-4-AAAA तासाच लब्धये नूनमुपाया अष्ट निर्मिताः । तैरेव ताश्च प्राप्यन्ते निश्चितं विप्रपुङ्गवाः ! ॥ ४२ ॥ कुर्वाणा लौकिकं कार्य सन्ति याः सिद्धयोऽखिलाः । ता ज्ञेया निखिला विमा आधिभौतिकसिद्धयः ॥ ४३ ॥ या देवकार्यकारिण्यः सिद्धयः सम्प्रकीर्तिताः। ता ज्ञेया आधिदैविक्यः सिद्धयो निखिलाः खलु ॥ ४४ ॥ सिद्धयो ज्ञानविज्ञान-भकाशिन्यश्च या इह । आध्यात्मिक्यश्च सर्वास्ताः सिद्धयः प्रोचिरे बुधैः ।। ४५ ॥ भवतां मन्त्रद्रष्टृणां सिद्धयोऽन्तर्गता इह । नैवात्र विस्मयः कार्यों भवद्भिविप्रपुङ्गवाः !॥ ४६ ।। सहजाख्या तु या सिद्धिर्वर्त्तते विज्ञसत्तमाः !! एताभ्यः सर्वसिद्धिभ्यः सां नितान्तमलौकिकी ॥ ४७ ॥ ममावतारवन्देऽसौ स्वत एव प्रकाशते । तत्त्वज्ञानमहात्मानो मनोनाशेन वै ध्रुवम् ।। ४८ ।। उनकी प्राप्तिके लिये ही आठ उपाय मैंने विधान किये हैं, हे ब्राह्मणो! उन्हीं के द्वारा वे अवश्य प्राप्त होती हैं.॥४१-४२॥ हे विप्रो । सव लौकिक कार्यकारिणी सिद्धियोको आधिभौतिक सिद्धियां, देवकार्यकारिणी सव सिद्धियोको आधिदैविक सिद्धियां और ज्ञानविज्ञानप्रकाशक सव सिद्धियोंको संसारमें बुधगण अध्यात्मि- कसिद्धियां कहते हैं ।। ४३-४५॥ मन्त्रद्रष्टा आपलोगोंकी सिद्धियां हे विप्रश्रेष्ठो! इसी सिद्धिके अन्तर्गत है इसमें विस्मय न करो ॥४६॥ परन्तु हे विशवरों ! सहज नाम्नी जो सिद्धि है वह इन सब सिद्धियोंसे अत्यन्त अलौकिक है ॥ १७ ॥ मेरे अवतारों में इस सहज सिद्धिका स्वतःही अत्यन्त विकाश होता है और महापुरुषगण जब तत्त्वज्ञान वासनाक्षय और मनोनाशके द्वारा अपने जीवभाव को निश्चय २८ श्रीधीशगीता। --hai- --- निर्वासनतया चैवोन्मूलयन्तः स्वजीवताम् । शिवरूपीभवन्तश्च समाधौ निर्विकल्पके ॥ ४९ ॥ तिष्ठन्तो यान्ति मय्येव लयमेकान्ततो यदा । मदिच्छया तदा तेषु सहजा कहिचिद्भवेत् ॥ ५० ॥ उन्नताः सहजा वयः सिद्धयो यद्यपि द्विजाः ।। तास्वहो सन्ति मुख्यास्तु त्रयस्त्रिंशच केवलम् ॥ ५१ ॥ योगिन्देऽवतारेषु जीवन्मुक्तमहात्मसु । तपस्विषु प्रकाशन्ते त्रयस्त्रिंशच सिद्धयः ।। ५२॥ समाहितर्भवद्भिस्ताः श्रूयन्तां वर्णयाम्यहम् । तासां नामानि पुण्यानि भवतामन्तिके द्विजाः !॥ ५३ ॥ एताः सर्वाः सिद्धयो हि वेदशास्त्रेषु वर्णिताः । अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा ॥ ५४ ।। वशित्वं गरिमेशित्वे तथा कामावसायिता । दूरश्रवणमेवालं परकायप्रवेशनम् ॥ ५५ ॥ नाश करके ही शिवस्वरूप हो निर्विकल्प समाधिस्थ रहते हुए मुझमें ही एकदम लीन होते हैं तब उनमें मेरी इच्छासे कभी कभी सहज सिद्धिका विकाश हुआ करता है॥४५-५०॥ हे ब्राह्मणों ! यद्यपि उच्चश्रेणीकी सहज सिद्धियां अनेक हैं तौभी अहो ! उनमें से केवल तैतीस ही मुख्य हैं ॥ ५१ ॥ अवतारोंमें, योगियों में और जीवन्मुक्त महापुरुषों तथा तपस्वियोंमें तैतीस प्रकारकी सिद्धियां प्रकट होती हैं ॥ ५२॥ हे ब्राह्मणो ! उनके पवित्र नामोंका वर्णन. आपके समीप करता हूँ उनको आपलोग सावधान होकर सुनो ॥ ५३ ॥ अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, वशित्व, गरिमा, ईशित्व, कामावसायिता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, मनोयायित्व, अभीप्सित सर्वशत्व, वरिस्तम्भ, जलस्तम्भ, चिरजी.
सिदिस्वरूपनिरूपणम् । २९ rease मनोयायित्वमेवेति सर्वज्ञत्वमभीप्सितम् । वाद्विस्तम्भो जलस्तम्भः चिरजीवित्वमेव वा ॥ ५६ ॥ वायुस्तम्भः शुनपिपासानिद्रास्तम्भनमेव च ॥ कायव्यूहश वासिद्धिर्मतानयनमीप्सितम् ॥ ५७ ॥ मुष्टिसंहारकर्तृत्वं प्राणार्पणमेव च । माणानाभ प्रदानच लोभादीनाञ्च स्तम्भनम् ।। ५८ ।। इन्द्रियाणां स्तम्भनञ्च बुद्धिस्तम्भनमेव च । कल्पसलसत्यानुसन्धाने अमरत्वकम् ।। ५९ ॥ अपव्यघटनायां या प्रकृतिमें पटीयसी। जगद्विमोहिनी सेंब महामायापराभिधा ॥ ६० ॥ महतो जानिनश्चत्रं योगिनोऽपि तपस्विनः । सिद्धिसाथैरनेकाहि माहयन्ती निरन्तरम् ॥ ६१ ।। आवागमनचकेऽस्मिन् स्वविलासात्मके मुहुः । मोक्षमार्गभ झन्धाना पूर्णयेत समन्ततः ।। ६२ ॥ ब्राह्मणाः! प्रकृतिमऽसा महामायापराभिधा । वित्य, वायुस्तम्भ, क्षत्स्तम्भ, पिपासास्तम्भ, निद्रास्तम्भ, कायन्यूह, वासिद्धि, ईप्सितमृतानयन, राष्टिफर्तृत्व, संहारकर्तृत्व, प्रणाक- पंण, प्राणप्रदान, लोभादिस्तम्भन, इन्द्रियस्तम्भन, वुद्धिस्तम्भन, कल्पवृक्षत्व, अमरत्य और सत्यानुसन्धान, ये सब सिद्धयां वेद और शास्त्रोम वर्णित है।। ५४-५५ ॥ जो अघटनघटनापटीयसी जगद्वि- मोहिनी मेरी प्रकृति है और जिसका दूसरा नाम महामाया है वही तपस्सियोंको योगियोंको और बड़े बड़े शानियोको भी नानासिद्धि. योंके द्वारा ही निरन्तर विमोहित करके मुक्तिमार्गको रोकती हुई अपने विलासखरूप इस अवागमनचक्रमें चारों ओर वारवार घुमाया करती है ॥ ६०-६२॥ परन्तु हे घ्राझणो! महामायानाम्नी यह मरी श्रीधीशगीता। किन्तु मे ज्ञानिनो भक्तान् मोहितुं न कदाप्यलम् ॥ ६३ ॥ कुलाङ्गनानां साध्वीनामङ्गानाशिव दर्शनम् । ज्ञानिनां मम भक्तानां भवेत् सिद्धिप्रकाशनम् ॥ ६४ ॥ पुरुषांश्च परान् कांश्चिद् यथा काश्चित् कुलाङ्गनाः । दर्शनाय निजाङ्गानां न क्षमन्ते कदाचन ॥ ६५ ॥ भवन्त्युत्कण्ठिताः किन्तु सर्वथा जनसंसदि । दर्शनाय निजागानां निर्लज्जाः कुलटा मुहुः ॥ ६६ ॥ सर्वसामर्थ्यवन्तोऽपि मद्भक्ता ज्ञानिनस्तथा । सिद्धिं स्वां नैव भो विप्राः! द्योतयन्ते कदाचन ।। ६७ ॥ योगिनों भक्तिहीनास्तु लक्ष्यहीनास्तपस्विनः । साधका उग्रकमाणो ज्ञानहीनास्तथा द्विजाः!॥ ६८॥ स्वीयाः सिद्धीर्वणिग्वृत्त्या सम्प्रकाश्य पतन्सलम् । प्रकाश्याः सिद्धयो नैव सर्वथाऽतो महात्मभिः ॥.६९ ॥ कदाचिद्भातरः पुत्रा आत्मीयाः स्वजना उत । प्रकृति मेरे ज्ञानी भक्तोंको कदापि विमोहित नहीं कर सक्ती ॥६३ ॥ मेरे शानी भक्तोंका सिद्धियोको प्रकाश करना सती कुलकामिनि- यो अङ्ग दिखानेके समान होता है । ६४ ॥ जिस प्रकार विप्रो ! कोई भी कुलकामिनियां कदापि किन्हीं परपुरुषों को अपने अङ्गोको नहीं दिखा सकतीं परन्तु निर्लजा कुलटा अर्थात् व्यभिचा. रिणी स्त्रियां जनसमाजमें सब प्रकारसे अपने अङ्गोको वार वार दिखानेके लिये उत्कण्ठित रहती हैं उसी प्रकार मेरे शानी भकगण सर्वसमर्थ होनेपर भी अपनी सिद्धिको कदापि प्रकट नहीं करते; किन्तु हे ब्राह्मणो ! लक्ष्यहीन तपखी, भक्तिहीन योगी और शानहीन उनका साधक वणिक्वृत्तिले अपनी सिद्धयोको प्रकट करके अत्यन्त पतित होते हैं ; इसलिये सर्वथा महात्माओको सिद्धियां प्रकाशित नहीं करना चाहिये ॥ ६५-६६॥ जिस प्रकार भ्राता पुत्र सिद्धिस्वरूपनिरूपणम् । . दैवादनिळ्यक्षेरन यथाङ्गानि कुलस्त्रियाः ॥ ७० ॥ शानिनां मम भक्तानां सिद्धीनां वैभव तथा । प्रकटत्वं हटायाति देवाल्लोके कदाचन ॥ ७१ ॥ हस्ताभ्यां मे यथा सिद्धिाभ्यां विप्रा निरन्तरम् । मायामोहितजीवेभ्यः शक्तयों प्रददत्यलम् ॥ ७२ ।। वनात्यस्मिन् हि संसारे कारागारे चिरन्तने । तथाऽन्याभ्यां स्वहस्ताभ्यां धर्मार्थों विनरन्त्यहो ॥ ७३ ।। प्रदत्ते ज्ञानिभक्तेभ्यः कैवल्याभ्युदयौ ध्रुवम् । . साधका मोहिता अज्ञाः कर्मस्वासक्तमानसाः ॥ ७४ ॥ माययोत्पादिताः सिद्धीः संसारे क्षणभङ्गुराः । परिणामस्वभावा हि लब्ध्वा तत्सेवया मुहुः ॥ ७५ ॥ नरके स्वर्गलोके च लोकयोः पितृप्रेतयोः । नित्यं घूयमानास्ते सन्तप्यन्ते त्रितापतः ॥ ७६ ।। किन्तु में ज्ञानिनो भक्ताः परमानन्दसागरम् । आत्मीय और वजन अनिन्चासे कभी कभी कुलकामिनीका अक्ष- दर्शन देवात् कर लेते हैं उसी प्रकार मेरे ज्ञानी भक्तोंका सिद्धिवैभव देवात् कमी कभी जगत्में हठात् प्रकाशित हो पड़ता है ॥ ७०-७१ ॥ हे विप्रो ! मेरी सिद्धि जिस प्रकार दो हाथोंसे मायाविमोहित जीवोंको निरन्तर अर्थ और शक्तिको भलीभांति देती हुई चिरन्तन कारागार रूपी संसारमें फंसा रखती है, उसी प्रकार अपने अन्य दो हाथोंसे धर्म और अर्थ देती हुई शानीभक्तोको अभ्युदय और निःश्रेयस अवश्य प्रदान क्रती है।मोहित, ज्ञानहीन, कर्मासक्तचिस साधक क्षणभङ्गुर परिणामशील और मायासे उत्पन्न सिद्धियोको संसारमें प्राप्त करके उनकी सेवाद्वारा वारवार नरकलोक खर्गलोक प्रेतलोक और पितृलोकमें नित्य घूमते हुए वे त्रितापंसे तापित होते रहते हैं ॥ ७२-७६ ॥ परन्तु मेरे शानीभक्तगण परमानन्दसागर ३२ श्रीधीशगीता। + स्वरूपं तत्त्वतो ज्ञात्वा सचिदानन्दरूपकम् ॥ ७७ ॥ समस्तसिद्धिसर्वस्वं मामेव प्राप्नुवन्त्यलम् । निरापदं पदं श्रेष्ठमधिकुर्वन्ति मे ततः ।। ७८ ।। मच्छक्तिरूपिणी सिद्धिः प्रभावात्यन्तशोभिनी । मद्भक्तर्विमुखान्जीवान मत्तोऽलश्च निवर्त्य सा ॥ ७९ ॥ संसारापारपाथोपावज्ञानावर्त्तसम्भ्रमे । निपात्य नितरां शश्वत् क्लिश्नातीह महर्पयः ।। ८० ॥ भजतोऽनन्यभक्तया मां भूयोऽसौ साधकान वरान् । मत्समीपं समानीय कृतार्थान् कुरुते द्रुतम् ॥ ८१ ।। यथा स्नेहमयी माता स्वात्मजानतियत्नतः । वर्द्धयन्ती प्रसादेन पुष्णन्ती पालयन्त्यपि ॥ ८२ ।। अधिकारयते क्षिप्रं परमं मङ्गलास्पदम् । तथा कारुण्यपूर्णाऽसौ सिद्धिर्मातेव सर्वदा ॥ ८३ ॥ . सच्चिदानन्दमय स्वरूपको यथार्थरूपसे जानकर समस्त सिद्धियोका सर्वस्व अर्थात् परमसिद्धि रूपी मुझको ही भलीभांति प्राप्त करते हैं उसके बाद मेरे परमपदके अनायास अधिकारी होजाते हैं ॥ ७७-७८ ॥ मेरी शक्तिरूपिणी सिद्धि अतिप्रभावशालिनी है। हे महर्षिगण वह मुझमें भक्तिहीन जीवोंको मुझमे अत्यन्त विमुख करके और अज्ञानरूपी आवर्त (जलभंवर ) से संकुल इस संसाररूपी अपार समुद्र में निरन्तर गिराकर सर्वदा क्लेशित करती है ॥ ७९-८० ॥ और पुनः वह मुझमें अनन्य भक्ति करनेवाले श्रेष्ठ साधकोंको मेरे निकट पहुंचा कर शीघ्र कृतार्थ कर देती है ॥ १ ॥ जिस प्रकार स्नेहमयी माता अपने पुत्रोको बड़े यत्न से पालती पोसती और प्रसन्नतासे बढ़ाती हुई परममङ्गलमय अधिकारको शीन प्राप्त करा देती है उसी प्रकार करुणामयी यह सिद्धि सदा ३३ सिदिस्वरूपनिरूपणम् । आतीनायिनो भक्तान जिज्ञासूसीनिमान्मम । ननमानन्दसन्दोमुत्साइभ ददत्यलम् ॥ ८४ ॥ निघतेऽग्रेसगन लिममाभिमुख्येन मे च तान । मम सेवारतायाश्व स्वल्पं प्रकृतदिया ।। ५ ।। विभक्त वतने विज्ञानात्र काया विचारणा । एका पराभिधा या द्वितीयाऽपरनामिका ।। ८६ ।। अपरानामिका जीवान प्रकृतिमेऽखिलानलम् । गुणत्रयात्मके जाले स्वस्मिन्नाश्लिप्य मायया ॥ ८७ ॥ इन्द्रस्यानुभव तैश्च कारयन्ती निरन्तरम् । स्वविलासात्मकं लीलामयं जनयते जगत् ।। ८८॥ परा म मनतिर्धन्या साधकानां हृदम्बुजे । भूगावी पराभक्ति सन्निवेश्य महर्षयः! ॥ ८९ ॥ वीजयन्ती त्रयाणाञ्च गुणानां वैभवं मुहुः । - माताके समान आन जिनासु और अर्थार्थी इन मेरे त्रिविध भक्तों- को निश्चय ही परम आनन्दसमूह और उत्साह भलीभांति देती हुई उनको शीन मेरी ओर अग्रसर करती है। हे विशवरों ! मेरी सेवा. में स्ना प्रकृतिके स्वरूप दो प्रकारसे विभक्त हैं, इसमें विचारने- की कोई बात नहीं है. एक को परा और एकको अपरा जानो 12-१६॥ अपग नाम्नी मेरी पति अपने त्रिगुणात्मक जाल में सय जीवों को मायारने फंसा कर उनको द्वन्द्वका अनुभव निरन्तर कराती ए. अपने बिलासरूपी लीलामय संसारको प्रकट करती है ॥ ८७-२८ ॥ और है महर्षिगण ! मेरी धन्या पग प्रकृति साधकों- योगदगक प्रलमें मेरी भक्तिरूपिणी भृशावलौको संनिविष्ट करके त्रिगुणवैभवको. बारबार दर्शन कराती हुई उनको इन्धातीत श्रीधीशगीता । द्वन्द्वातीतं पदं नीत्वा मामेनान दर्शयत्यहो ॥१०॥ अतो विज्ञवरा अत्र प्रकृत, दशाये । मम सिद्धिस्वरूपस्य विकाशोऽपि द्विधा भवेत् ॥ ११ ॥ अपरा सिद्धिरेकास्ति द्वितीया च परामिधा ।। नैकोक्तसिद्धिरूपाणि नानारूपाणि विभ्रती ॥ १२ ॥ सिद्धिर्मेऽस्त्यपरानाम्नी नात्र वः संशयो भवेत् । ज्ञानाधिकारिणो विप्राः ! पूज्या सिद्धिः पराभिधा ॥ ९ ॥ चिन्मयी सात्त्विकी नित्या हिताऽद्वैतविधायिनी। स्वरूपानन्दसन्दोहयोतिनी सा प्रकीर्तिता ॥ २४ ।। ऐश्यो मे सिद्धयो विप्राः ! कामनामन्तरेण मे । . प्रकटत्वं हि संसारे नैव यान्ति कदाचन ॥ ९५ ॥ मामकीना यतः शक्तिर्न स्वेच्छाचारिणी भवेत् । अतो ममावतारेषु ज्ञानिष्वपि कदाचन ॥ ९६ ।। भद्भक्तेषु प्रकाशेरनैश्यो मे सिद्धयः स्वतः । ! पदमें पहुंचाकर अहो ! मेरा दर्शन करादेती है ॥४-६० ॥ इसी कारण हे विशवरों ! मेरी प्रकृतिको इन दो दशाओमें मेरी सिद्धि- के स्वरूपका विकाश भी द्विविध होता है। एक परी सिद्धि और दूसरी अपरा सिद्धि नामसे अभिहित होती है। सिद्धि के जो अनेक रूप पहले कहे गये हैं वह नाना रूपधारिणी सिद्धि मेरी अपरासिखि : है इसमें आपलोगोंको सन्देह न होना चाहिये। हे ज्ञानके अधिकारी ब्राह्मणो ! जो पूज्या परानाम्नी सिद्धि है वह चिन्मयो सात्त्विकी नित्या हिता अद्वैतकारिणी और स्वरूपानन्दसन्दोहप्रकाशिनी कही गई ॥६१-६४ ॥ हे ब्राह्मणो ! मेरी ऐशी सिद्धियां मेरी इच्छाके विना संसारमें कदापि प्रकाशित नहीं ही हो सक्ती ॥ ५ ॥ क्योंकि मेरी शक्ति स्वेच्छाचारिणी नहीं हो सकी, इसी कारण मेरे अवतारोम !
सिंधिस्वरूपनिरूपणम् ॥ ममावतारन्दानामाविर्भावो. महर्षयः ।। ९७ ॥ अथवा ज्ञानिभक्तेपु होश्याः सिद्धेः प्रकाशनम्। समष्टेजारवर्गस्य कर्मणो निघ्नमस्त्यहो ।। ९८ ॥ सन्त्यत: सिद्धयो विमा ऐश्योऽत्यन्तं सुदुर्लभाः। स्वस्पं मम सिद्धेश्च ज्ञात्वा सम्यमहर्पयः ! ॥ ९९ ।। कदाचिदपरासिद्धर्माश्लिष्यध्वं हि बन्धने । चिन्मव्या मे परासिद्धेमहत्त्वं परमाद्भुतम् ।। १०० ॥ ज्ञात्वोपास्य च तामेवाद्वैतानन्दप्रकाशकम् । द्वन्द्वातीतं लभवं हि शाश्वतं परमं पदम् ॥ १०१ ॥ स्थिरं लक्ष्यं विधायैवं द्विजाः ! सिद्धिस्वरूपिणि । आयुधे मोदके नूनं त्रिशले मे त्रितापके ॥ १०२ ॥ हाष्टिक्षेपं न कुरिन भवन्तो हि कदाचन । . Home और कभी कभी मेरे सानी भक्तोंमें भी मेरी ऐशी सिद्धयोका प्रकाश स्पतः हुआ करता है । हे महर्पिगण मेरे अवतार समूहका अविर्भाव अथवा पानी भक्तोंमें ऐशी सिद्धिका विकाश अहो ! जीवोंके समष्टि काधीन है॥ १६-२८ ॥ इसी कारण हे ब्राह्मणो ! पेशी सिद्धियां अत्यन्त दुर्लभ है । हे महर्पियो । आप मेरे स्वरूप और मेरी सिद्धिके स्वरूपको भलीप्रकार जानकर कभी.भी मेरी अपरा सिद्धिके बन्धन-. जालमें न फंसो और मेरी चिन्मयी परासिद्धिके परम अद्भुत महत्वको जानकर और उसकी ही उपासना करके इन्द्वातीत अद्वै- तानन्दप्रकाशक सनातन परमपदको प्राप्त करो ॥ 88-१०१ ॥ ग्राह्मणो। आप इस प्रकार स्थिर लक्ष्य रखकर मेरे त्रितापरूपी त्रिशून और सिद्धिरूपी मोदक जो आयुध हैं उनकी ओर कभी भी इटिन रक्सो धौर चक्र और पत्नरूपी धर्म और मोक्ष पर निरन्तर श्रीधीशगीता। चक्रपद्यस्वरूपौ हि धर्ममोक्षौ निरन्तरम् ॥ १०३ ।। अग्रेसरेयुः संलक्ष्य बाधां नेयुः कदाचन । सत्यमेतद्धि जानीत नात्र कश्चन संशयः ॥ १०४ ॥ इति श्रीधीशगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे धीशपिंसंवादे सिद्धिस्वरूपनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः। लक्ष्य रखकर अग्रसर हो, कभी बाधाको प्राप्त नहीं होगे, इसको सत्य जानो, इसमें कुछ संशय नहीं है ॥ १०२-१०४ ।। इस प्रकार श्रीधीशगीतोपनिषद् ब्रह्मविद्यासम्बन्धी योगशास्त्रका धोशर्षिसम्वादात्मक सिद्धिखरूपनिक पण नामका द्वितीय अध्याय समाप्त दुधा।
ज्ञानभूमिनिरूपणम् । ३७ RA ज्ञानभूमिनिरूपणम् । । महर्पय ऊचुः ॥ १॥ है सर्वशक्तिमन् ! शीश ! भगवन् ! सर्वसिद्धिद !! हे विभो ! सर्वसिद्धीनां नित्याधारस्वरूपवन् ! ॥२॥ परासिद्धेः कृपाप्राप्य पूर्व तद्दर्शनं ध्रुवम् । आवश्यकीयमेवास्ति तदुपायानतो वद ।। ३ ।। यनः च्यादर्शनं नूनं परासिद्धनिरापदम् । यथा वा नः कृनार्थत्वमुपदिश्यामहे तथा ॥ ४ ॥ गणपतिरुवाच ॥ ५॥ विद्यास्वरूपिणी नित्यां परासिद्धिं मदाश्रयाम् । नत्त्वज्ञानमुनिष्णाताः महापौरुप्यशालिनः ॥ ६ ॥ दिव्यदृष्टया निरीक्षन्ते ज्ञानिना ज्ञानभूमिपु । तत्वनाः शान्तचेतस्काः साधकास्तु यथायथम् ॥७॥ mami महर्षिगण बोले ॥१॥ हे सर्वशक्तिमन, विभो ! हे सर्वसिद्धियोंके नित्य आधार सरूप हे सर्वसिद्धिदायिन् !हे भगवन् धीश ! परासिद्धिकी कृपा- प्रातिलिय प्रथम उनके दर्शनलाभकी निश्चय ही आवश्यकता है अतः उसके उपाय कह निनके द्वारा परासिद्धिके दर्शन हमलोगोंको अनायास ही हो अथवा जिस प्रकारसे हमलोग कृतार्थ हो सो उपदेश कीजिये ॥ २-४॥ गणपति बोले. ॥५॥ नित्या और विद्यास्वरूपिणी मेरी परासिद्धिका दर्शन शान- भूमियोंमें तत्त्वज्ञाननिष्ठ ज्ञानी महापुरुषोंको दिव्यदृष्टिसे हुआ करता और इस संसारमें शान्तचित्त तत्त्यत्रानी साधक क्रमशः श्रीधीशगीता। - क्रमादग्रेसरन्तीह सप्तसु ज्ञानभूमिपु। मम विद्यास्वरूपायाः परासिद्धस्तथातथम् ॥ ८ ॥ उत्तरोत्तरमत्यन्तं स्पष्ट रूपस्य दर्शनम् । प्राप्नुवन्तो निमज्जन्ति परमानन्दसागरे ॥१॥ अहं ज्ञानस्वरूपोऽस्मि नूनं विज्ञवरा द्विजाः ।। तटस्थश्च स्वरूपश्च द्विविधं ज्ञानमीरितम् ॥ १० ॥ ज्ञाता ज्ञान तथा ज्ञेयमेपां भानैः समन्वितः । यत्र त्रिपुटिसम्बन्धो विद्यते विमपुङ्गवाः ॥ ११ ॥ ज्ञानं स्यात्तत्तटस्थाख्यं स्वरूपज्ञानकारणम् । ज्ञानेऽस्मिश्च तटस्थाख्ये स्वरूपस्य. द्विजोत्तमाः ! ॥ १२॥ सच्चिदानन्दभावानामनुभूतिः पृथक् पृथक् । स्यादतस्तत्र सम्पूर्ण दृश्यजातं प्रतीयते ॥ १३ ॥ यत्र त्रिपुटिसम्बन्धलेशमात्रं न विद्यते । सच्चिदानन्दभावानामनुभूतिः पृथड्न च ।। १४ ॥ . जैसे जैसे सप्तशान भूमियों में अग्रसर होते जाते हैं वैसे वैसे उत्तरोत्तर मेरी विद्यारूपिणी परासिद्धिके स्वरूपका अत्यन्त स्पष्ट दर्शन प्राप्त करते हुए परमानन्दसागरमें निमग्न होते जाते हैं ॥६-28 हे विशवर ब्राह्मणो ! मैं ज्ञानखरूप ही हूँ और ज्ञान दो प्रकारकाकहा गया है। एक तटस्थज्ञान और दूसरा स्वरूपज्ञान।हेश्रेष्ठ ब्राह्मणों जहां झाता शान और शेयोंके भालसे युक्त त्रिपुटिका सम्बन्ध है वही वक- पज्ञानका कारण भूत तटस्थ ज्ञान है हे ब्राह्मणों ! इस तटस्थमान में सत् चित् और मानन्दभावोंका.खरूप पृथक् पृथक् अनुभूत होता। इस कारण उस अवस्थामें सम्पूर्ण दृश्यसमूह प्रतीत होता ॥ १०-१३ ॥ जहां त्रिपुटि सम्बन्धका लेशमात्र नहीं है, जहां सत्- चित् और आनन्द भावका खतंत्र अनुभव नहीं है और जहां ये जानभूमिनिरूपणम् । यत्राप्यतत्वयं तिष्टदावेऽद्धते निरन्तरम् । उदति निधितं तत्र स्वरूपज्ञानमुत्तमम ॥ १५ ॥ पत्तोऽस्तित्वं तटस्थस्याहंमहत्तत्ययोगतः । नटस्थानमन्त्यस्माबहुभावैः समन्वितम ॥ १६ ॥ पूर्ण ज्ञानं स्वरूपन्तु शाश्वतञ्चाविकारि च । तत्त्वानीते पदेऽस्त्यस्य परमे नित्यसंस्थितिः ॥ १७ ॥ परिणामितटस्याग्व्याजनानान्नूनं शनैः शनैः । स्वरूपमुदयज़ज्ञानं यदास्त विप्रपुड्गवाः ! ॥ १८ ॥ मर्वेषु माणिन्दावविभक्तं निग्विलेषु च । देशेषु सर्वकालेपु पात्रेपु विविधेषु च ॥ १९ ॥ विकाररहिनं सर्वभूतेप्वेकत्वदर्शकम । उन्नतं सात्त्विकं ज्ञानं तत्त्वज्ञेषु महात्मम् ॥ २० ॥ तदा प्रकाशते नूनं स्वत्त एव न संशयः । तत्मभावात्स्वरूपस्य ज्ञानस्यानुभवं किल ॥ २१ ॥ . तीनों ही अह भायमें निरन्तर स्थित है घही उत्तम स्वरूपशान- का उदय होना है॥ १४-१५ ॥ तटस्थ ज्ञान बहुभावोसे युक्त है क्योंकि अइंतत्त्व और महत्तत्त्व दोनों के संयोगके उसका अस्तित्व है ॥ १६ ॥ परन्तु स्वरूपशान नित्यं अविकारी और पूर्ण है और तत्वा- तीत परमपद में उसकी नित्यस्थिति विद्यमान रहती है ॥ १७ ॥ है ब्राह्मणधेशो! सय परिणामशील तटस्थज्ञानसे ही शनैः शनैः स्वरूपम्मानका उदय होने लगता है उस समय तत्त्वज्ञानी महात्मा. ओमें सर्यभूतोंमें अधिमक्त, सब देश काल और पात्रों में विकार- रहित और सर्वभूतोंमें एक भावको दिखानेवालाही उन्नत सात्यिक झान स्वतः ही प्रकाशित होता है, इसमें सन्देह नहीं है महर्षिगण ! उसके प्रभावसे दी मुक्तात्मा स्वरूपशानका अनुभव अनायास ही श्रीधीशगीता । 4-.ne कुर्वन्त्येव निरायासं मुक्तात्मानो महर्पयः । नैवात्र विस्मयः कार्यः सत्यमेतद्धवामि वः ॥ २२ ॥ यया शब्दं विनाऽऽकाशो विना स्पर्श समीरणः । रूपेणैवं विना वहिर्जलं खलु रसंचिना ॥ २३ यथा गन्धं विना पृथ्वी नैव तिष्ठेत, कदाचन । तथा तटस्थज्ञानस्य नोदयोऽहङ्कति विना ॥ २४ ।। नैव सम्भाव्यते किन्तु स्वरूपे द्वैतमण्वपि.। अतो ज्ञानं स्वरूपाख्य स्वस्वरूपं ममैव तत् ॥ २५ ॥ अविद्याजनितं विमा विभक्तज्ञानमस्त्य हो । विद्यासम्भूतमेवास्त्यविभक्तज्ञानमुत्तमम् ॥ २६ ॥ अस्म्यहं ज्ञानरूपत्वाञ्चेज्ज्ञानद्वयमप्यहो । अविभक्तं तथाप्येतज्ज्ञानं दत्ते परम्पदम् ॥ २७ ॥ मतो जीवान् दवयते विभक्तज्ञानमत्यहो। विभक्तज्ञानतो नीत्वाऽविभक्तज्ञानमन्दिरम् ॥ २८ ॥ फरलेते हैं, मैं आपलोगोंसे सत्य कहता हूँ इसमें विस्मय न करो ॥१८-२२॥जैसे शब्द्के विना आकाश, स्पर्शके विना वायु,रूपके विना अग्नि, रसके विना जल और गन्धके विना पृथिवीका अस्तित्व कभी भी नहीं रहसका उसी प्रकार अहंकारके बिना तटस्थ शानका उदय नहीं हो सक्ता ॥२३-२४ ॥ परन्तु स्वरूपशानमें अणुमात्र भी द्वैतको संभावना नहीं है इसकारण वह मेरा ही स्वरूप है ॥ २५ ॥ हे ब्राह्मणो ! अहो विभक्त ज्ञान अविद्यासम्भूत है और उत्तम अविभक्त ज्ञान विद्यासम्भूत ही है ॥ २६ ॥ अहो ! मैं मानरूप हूँ इस कारण यद्यपि दोनों शान मैं हूँ तथापि यह अविभक्त शान परम- पदकी प्राप्ति कराता है ॥ २७ ॥ और अहो ! विभक्त ज्ञान जीवोंको मुझसे अत्यन्त अलग स्थित रखता है । मुमुक्षत्रोको विभक्कानसे ज्ञानभूमिनिरूपणम् । ४१ मुमुक्षून स्वस्वरूपं मे नूनं नेतुं निरापदम् । श्रुतिभिर्वर्णिताः पूर्वं सप्तैव ज्ञानभूमयः ।। २९ ।। विश्वबन्धनकापु सप्तस्वज्ञानभूमिषु । अज्ञानान्धाः सदा जीया आसज्जन्ते विमोहिताः ॥३०॥ श्रीतानां कर्मकाण्डानां साहाय्यात्साधकाः खलु । पूर्व शरीरसंशुद्धिं मनःशुद्धिं ततः परम् ।। ३१ ॥ कृत्वा पश्चान्ममोपास्त्या चित्तवृत्तीः प्रशम्य च । अधिकारं लभन्तेऽन्ते तत्त्वज्ञानस्य दुर्लभम् ॥ ३२॥ नतश्च क्रमशो विप्राः ! सोपानारोहणं यथा । ज्ञानभूमीश्च सप्तैवमतिक्रम्य शनैः शनैः ॥३ ज्ञानपूर्णान्तरात्मानो मामन्ते प्राप्नुवन्ति ते । ज्ञानक्रमविकाशैहि पूर्णाः स्वाभाविकैरतः ॥ ३४ ॥ सप्तवा ज्ञानभूम्यो में परासिद्धेः कृपावशात् । म्वरूपज्ञानसँल्लव्धर्वहन्ते हेतुतामलम् ॥ ३५ ।। . अविभक्तमानमन्दिरमें पहुंचाकर मेरे स्वस्वरूपमें अनायास ही पहुंचानेके लिये वेदोंने पहले ही सात ज्ञानभूमियों का वर्णन किया है ॥ २८-२६ ॥ विश्वको बन्धन प्राप्त करानेवाली सात अज्ञानभूमि- कात्रामें अज्ञानान्ध जीव विमोहित होकर सदा फंसे रहते हैं ॥३०॥ वेदविहित कर्मकाण्डकी सहायतासे साधक प्रथम शरीरकी शुद्धि और.तदनन्तर मनकी शुद्धि सम्पादन करके तत्पश्चात् मेरी उपासनाके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंको शान्त करके अन्तमें तत्त्वज्ञा- नका दुलभ अधिकार प्राप्त करते हैं ॥ ३१-३२ ॥ एवं तदन्तर हे ब्राह्मणों ! क्रमशः सातो ज्ञानभूमियोंको सोपानारोहणके समान शनैः शनैः अतिक्रमण करके अन्तमें वे पूर्ण ज्ञानी होकर मुझको प्राप्त करलेते हैं इसकारण स्वभावसिद्ध ज्ञानके क्रमविकाशले पूर्ण ये सातो ज्ञानभूमियां मेरी परासिद्धि की कृपासे मेरे खरूपज्ञानप्रप्तिकी ४२ श्रीधीशगीता। सप्तानां ज्ञानभूमीनां प्रथमा ज्ञानदा भवेन् । सन्न्यासदा द्वितीया स्यात्वृतीया योगदा भवेत् ॥ ६ ॥ नीलोन्मुक्तिश्चतुर्थी स्यात्पश्चमी सत्पदा स्मृता । पश्यानन्दपदा जेया सप्तमी च परात्परा ॥ ७ ॥ यावजीवैरनिकान्ता न समाऽज्ञानभूमयः । नावन्न प्रथमा भूमि नस्य बाननाऽऽप्यने ।। १८ ॥ उद्भिजानां चिदाकाशे प्रयमाऽज्ञानभूमिका । स्वेदजानां चिद्राकाने सा दिनीया प्रकीर्तिता |13|| नुनीयाऽण्टजजातेश्वान्जानभूमिश्चिद्राश्रिता । जगनपशूनाभ चिदाकाशे चतुभ्यमौ ॥ १. || पञ्चकोप पूर्णवाधिकारिप्षेत्र में सन्ति शेषा अविकृतास्तिनस्त्वज्ञानभूमयः ॥ ४२ ॥ निसस्ता एव कथ्यन्न उत्तयारममध्यमाः । विगई ताः प्रचोऽहं श्रूयन्तां विमपुत्राः ॥४२॥ अत्यन्त कारणरूपा हैं ॥ ३३-३, " लाती सानभूमियों में से प्रथमा ज्ञानदा, द्वितीया सन्यासदा. तृतीया योगदा, चतुर्थी लोलोन्मुक्ति पञ्चमी सत्पदा, पष्ठी आनन्दपदा और सप्तमी परान्परा ।। ३६-३७ ॥ जब तक जीवोंने लप्त अज्ञानभूमियोंका अतिक्रमण नहीं किया है तब तक प्रथम ज्ञानभूमि शानदाकी प्राप्ति नहीं होती है ॥ ३८ ॥ उनिजोंके चिदाकाशमें प्रथम अज्ञानभूमि है. खेदजों के चिज्ञकाशने द्वितीय अज्ञानभूमि कहीगई है ॥ ३६॥ अण्डजाके चिदाकाशमै तृतीय अज्ञानभूमि है और जरायुज पशुओंके चिदा- काशमें चतुर्थ अज्ञानभूमि है ॥ ४. पांचकोषोके पूर्तताको अधिकारिी मनुपयोनिमें ही शेष तीनों सहानभूमियों का अधिकार है। वही तीनों उत्तम मध्यन और अधम अज्ञान- भूमियां कहाती है है श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं उनको स्पष्टरूपसे कहता । परन्तु जानमामिनिरूपणम् । . - एना अज्ञानभूमीहि निसरेव समूलतः । मूर्तिमन्नः स्वयं वेदा निगकर्तुं समुद्रताः ॥ ४३ ।। अधमाजानमा हि यावन्मर्त्यः प्रसजते । नेऽपराधे दग्दः स्यात्तियंग्योनों तदुद्भवः ॥ १४ ॥ पथ्यमातानभूमश्च मानधिकारिभिः । पितृलोकास्तथा विप्राः : नारकाश्च पुनः पुनः ॥ ४२ ॥ माप्यन्त मृत्युलोकश्च मुखदुःखादिपूरितः । ददात्यूदर्थश्च स्वलांकमुत्तमाऽज्ञानभूमिका ॥ ४ ॥ अधमाज्ञानभमिच मामा मा भवन्त्यहो। देहात्मवादिनाऽना- नास्तिकाः शौचयजिताः ॥ ४७ ।। मध्यमाऽज्ञानभमस्तु मानवा अधिकारिणः । आस्तिकत्वेन भो विप्राः ! सद्विचारपरायणाः ।। १८ ।। दहात्मनोटिं पार्थक्यं विश्वसन्तोऽपि सर्वथा । इन्द्रियाणां सुखे मना नितरापैहलौकिके ।। ४०. ॥ सुनो ॥ ४२ ॥ इन्हीं तीनों अमानभूमियोंके समूल निराकरणके लिये वेद स्वयं मूर्तिधारण करके प्रवृत्त है ॥ ४३ ॥ अधम अज्ञान- भूमिमें जब तक मनुष्य फंसा रहता है उसको अपराध करने पर तिर्यक योनिकी प्रति दण्डरूपसे हुश्रा करती है ॥ ४४ ॥ और हे बामणो ! मध्यम अशानभूमिके अधिकारी मनुष्योंको पितृलोक, नरकलोक और सुख दुःखपूर्ण मृत्युलोककी प्राप्ति घार चार होती है एवं सर्योन्नत अक्षानभूमि ऊर्द्ध स्वर्गलोक प्रदानकारी है ॥ ४५-४६ ॥ अधम अज्ञानभूमिप्रान मनुष्य अहो! नास्तिक देहात्म- बाही अशुचि और अनाय्यं होते हैं ॥ ४७ ॥ परन्तु हे ब्राह्मणो ! मध्यम अज्ञानभूमिकं अधिकारी मनुष्य आस्तिक होनेसे देहसे अात्माकी पृथकता पर सर्चथाविश्वास करते परायण होते हुए भी वे महामूद ऐहलौकिक इन्द्रियमुखमें और सद्विचार श्रीधीशगीता। 71 विस्मरन्ति महामूहाः सुग्वं ते पारलौकिकम् । उत्तमाऽज्ञानभूम। पुण्यवन्नोऽधिकारिणः ।।५।। आत्माऽतिरिक्तं मे शक्तमत्वाऽस्तिन्वं द्विजर्षभाः ।। स्वर्गीयस्य मुखस्यव जायन्ते तेऽधिकारिणः ॥ 2 ॥ अधमाऽज्ञानभूमि तमोमुठ्या विजृम्भने । तमोरजाप्रधाना च मध्यमाऽसौ प्रकीनिता ॥ २२ ॥ उत्तमाऽज्ञानभूमिश्च रजःसत्त्वपधानिका । शुद्धसत्त्वविकाशस्य स्थले नूनं यथाक्रमम ॥३॥ पुण्यभाजां मनुष्याणां चित्ताकाशे तनो द्विजाः ।। सप्तानां ज्ञानभूमीनामधिकाराः क्रमेण हि ॥१४॥ समुद्यन्ति ध्रुवं देवदुर्लभानां स्वभावनः । ज्ञानभूम्यश्च सप्तैता साधकान्तहदि क्रमान ॥ ५५ ॥ शुद्धं सत्त्वगुणं सम्यग्वर्द्धयन्त्यो निरन्तरम् । निःश्रेयसपदं नित्यं गुणातीतं नयन्त्यलम् ॥५०॥ यत्किञ्चिदासीज्ज्ञातव्यं ज्ञातं सबै गयोति धीः । अत्यन्त मग्न होकर पारलौकिक सुखको भूले रहते हैं। हे ब्रामणों : उत्तम अशानभूमिके ही पुण्यवान् अधिकारी श्रआत्मासे अतिरिक्त मेरी शक्तिका अस्तित्व मानकर वे खर्गीय सुखके ही अधिकारी हुआ करते हैं ।। ४-५१॥ अधम अज्ञानभूमि तमप्रधान, मध्यम अशानभूमि तमरजप्रधान और उत्तम अज्ञानभूमि रजसत्त्वप्रधान कही गई है। इसके अनन्तर हे ब्राह्मणो ! शुद्ध सत्त्वके क्रमविकाशस्थलरूपी पुण्यवान् मनुष्योंके चित्ताकाशमें देवदुर्लभ सप्तशानभूमियों के अधिकार क्रमशः स्वभावसे ही उदय होते और क्रमशः ये सातों ज्ञानभूमियाँ साधकके अन्तःकरण- में शुद्ध सत्त्वकी भलीभांति निरन्तर वृद्धि करती हुई नित्य और गुणातीत कैवल्यपद में निश्चय पहुंचादेती हैं ॥ ५२-५६ ॥ मुझे जो . ज्ञानभूमिनिरूपणम् । ४५ आद्याया भूमिकायाश्चानुभवः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥ त्याज्यं त्यक्तं मयत्येवं द्वितीयोऽनुभवो मतः । प्राप्या शक्तिर्मया लब्धानुभवो हि तृतीयकः ॥५८ ॥ मायाविलसितं चैतदृश्यते सर्वमेव हि । न तत्र मेऽभिलापोऽस्ति चतुर्थोऽनुभवो मतः ॥ ५१ ॥ जगद्ब्रह्मत्यनुभवः पञ्चमः परिकीर्तितः । ब्रहमवेदं जगत पष्टोऽनुभवः किल कथ्यते ।। ६० ।। अद्वितीयं निर्विकारं सच्चिदानन्दरूपकम् । ब्रह्माऽहमस्मीति मतिः सप्तमोऽनुभवो मतः ॥ ११ ॥ इमां भूमि प्रपद्येव ब्रह्मसारूप्यमाप्यते । नात्र कश्चन सन्देहो विद्यते मुनिसत्तमाः ! ॥ १२ ॥ श्रवणं मननश्चैव निदिध्यासनमेव च । पुरुषार्धास्त्रिधा मोक्ता एत एव महर्पयः ! ॥ ३३ ॥ . का कुछ जानने योग्य था सो सब कुछ जान लिया है ऐसी बुद्धि होना प्रथम शानभूमिका अनुभव कहागया है ॥ ७ ॥ मुझे त्यागना था सो त्याग दिया है यह दूसरी ज्ञानभूमिका अनुभव मानागया है। मुझे जो शक्ति प्राप्त करनी थी सो प्राप्त करली है यह तीसरी ज्ञान भूमिका अनुभव है ॥ ५८ ॥ यह मायाकी लीला मुझे सवही दिखाई देती है मैं उसमें मोहित नहीं होता यह चतुर्थ ज्ञानभूमिका अनुभव है ॥५६॥ जगत् हो ब्रह्म है यह पञ्चम ज्ञानभूमिका अनुभव कहा गया है। ब्रह्म ही यह जगत् है निश्चय ही यह षष्ठ ज्ञानभूमिका अनुभव कहा गया है ॥ ६०॥ और मैं अद्वितीय निर्विकार सच्चिदानन्दमय ब्रह्म हूँ ऐसी बुद्धि सप्तम ज्ञानभूमिका अनुभव माना गया है ॥ ६ ॥ इस भूमिको प्राप्त करके ही साधक ब्रह्मखरूप हो जाता है हे मुनिश्रेष्ठो ! इसमें कुछ सन्देह नहीं है ।। ६२ ॥ हे महर्षियो ! श्रवण मनन निदिध्यासनरूप ये ही त्रिविध पुरुषार्थ कहे गये हैं।।६३॥
श्रीधीशगीता। bute मुमुक्षूणां त्रिभिः सम्यङ्ममसामीप्यलब्धये । पुरुषार्थैरुपेतानामतैः साधनशैलयः ॥ ३४ ॥ सप्तानां ज्ञानभूमीनां सप्त सापानसान्निभाः । प्रासादपृष्ठमारोढुं यथा सोपानपङ्क्तयः ॥ १५ ॥ तथा तटस्थज्ञानस्य सौता ज्ञानभूमयः । सप्तसोपानतुल्याः स्युः स्वरूपज्ञानलब्धये ॥१६॥ आद्यायां ज्ञानदानाम्न्यां ज्ञानभूम्यां मुमुक्षवः । अन्तर्दृष्टिं लभेरस्ते तत्त्वजिज्ञासवो द्विजाः ॥ १७ ॥ तदा जिज्ञासवो नूनं परमाणुस्वरूपतः । स्थूलान्येव ममाङ्गानि ज्ञात्वा नित्यानि सर्वथा ।। ६८॥ पोड़शधा विभक्तानि दृष्ट्वा तान्येव मे पुनः । वादसाहाय्यतो वापि पालोचनलोचनैः ॥ १० ॥ दृष्टिं निरीक्ष्य तस्याश्च कर्तारं केवलं हि माम् । शक्नुवन्ति बुधा विप्राः ! अनुमातुं कुलालवत् ॥ ७० ॥ । मुमुक्षुओंको मेरे पास अच्छी तरह पहुंचने के लिये इन्हीं विविध पुरुषार्थोंसे युक्त सातो ज्ञानभूमियोंकी साधनशैलियां सात सोपानरूप हैं। जिस प्रकार किसी राजभवनको छतपर चढ़नेके लिये पौडियां होती हैं उसी प्रकार खरूपज्ञानमें पहुंचने के लिये तटस्थज्ञानकी ये सात ज्ञानभूमियां सात पौडियोंके समान ॥ ६४-६६ ॥ हे तत्वजिज्ञासु ब्राह्मणो ! शानदानाम्नी प्रथम शानभूमि में वे मुमुक्षु अन्तर्दृष्टि प्राप्त करने लगते हैं ।। ६७ ॥ हे ब्राह्मणों ! उस समय जिज्ञासु पण्डितगण मेरे स्थूल अवयवोंको ही परमाणुरूपसे सर्वथा नित्य जानकर और उन्हीं मेरे स्थूल अवयवरुप विभागों- को षोडश संख्या में विभक्त देखकर ही वादकी सहायतासे अथवा पालोचना दृष्टिके द्वारा सृष्टिको देखकर और मुझको कुलालके समान केवल उस सृष्टिके कर्त्तारूपसे ही अनुमान करनेमें समर्थ ज्ञानभूमिनिरूपणम् । अस्याञ्च ज्ञानभूमौ हि क्षेत्रे तत्त्वज्ञमानसे । आत्मज्ञानीयवीजस्य प्ररोहो जायते ध्रुवम् ॥ ७१ ॥ एनां बदन्त्यतो भूमि ज्ञानदां ज्ञानिनो जनाः । ददात्येपा यतो भूमिर्ज्ञानं नित्यं मुमुक्षवे ।। ७२ ॥ आसद्वानां जानभूमावतस्यां नियमेन च । ममोपास्ती भत्तानां येन केन प्रकारतः ।। ७ ॥ मुमुक्षूणां ध्रुवं चिने ज्ञानवायुप्रकम्पितम् । मूलमज्ञानवृक्षस्य सर्वथा शिथिलायते ।। ७४ ॥ सन्न्यासदाभिधायां हि ज्ञानभूम्याम्प्रतिष्ठिताः । मुमुक्षयः शरीरं मे स्थूलमल्पसमीपतः ।। ७० ॥ सम्पश्यन्तो ममाङ्गेषु स्थूलेप्वेव महर्षयः ।। कुर्वन्तः मूक्ष्मशक्तीनामनुभृति निरन्तरम् ॥ ७६ ॥ धर्माधम्मौ च निर्णय ह्यधम्म त्यक्तुमीशते । ज्ञानभूमिद्वितीयाऽत एषा सन्न्यासदोच्यते ॥ ७७ ।। होते हैं ।। ६०-७० ॥ इसी प्रथम शानभूमिमें तत्त्वज्ञानीके हवयरूप क्षेत्रमें आत्मज्ञानरूप चीजका अङ्कुर निश्चय उत्पन्न होजाता है॥७॥ इस कारण ज्ञानीलोग इस शानभूमिको ज्ञानदा कहते हैं क्योंकि यह शानभूमि मुमुक्षुको नित्य ज्ञान प्रदान करती है ॥ ७२ ॥ इस ज्ञानभूमिमें पहुंचे हुए और किसी न किसी प्रकारसे मेरी उपास. नामें नियमपूर्वक लगे हुए मुमुक्षुओंके चित्त शानवायुसे भलीभांति कंपाया हुश्रा अज्ञानवृक्षका मूल सर्वथा शिथिल होजाता है ॥ -७३-७४ ॥ हे महर्पियो ! सन्न्यासदानाम्नी द्वितीय ज्ञानभूमिमें स्थित मुमुक्षु ही मेरे स्थूल शरीरको कुछ निकटसे देखते हुए मेरे स्थूल अवयवों में ही सूक्ष्म शक्तियोंका निरन्तर अनुभव करते हुए और धर्माधर्मका निर्णय करके अधर्मके त्याग करने की योग्यता प्राप्त कर ही लेते हैं इसी कारण इल,दूसरी ज्ञानभूमिका नाम ४८ श्रीधीशगीता। योगदायां तृतीयायां ज्ञानभूम्यां मुमुक्षवः । चित्तवृत्तिनिरोधस्य कुर्वन्तोऽभ्यासमुत्तमम् ॥ ७८ ॥ मच्छक्तिं संयमेनैतां माम्पुनब्राह्मणोत्तमाः । अभ्यासेनकतत्वस्य पृथक्त्वेन निरीक्षितुम् ॥ ७९ ॥ यस्मिन् काले प्रवर्तन्ते सूक्ष्मदृष्टिस्वरूपकम् । ' साधकेषु तदोदोति प्रत्यक्ष नन्वलौकिकम् ॥ ८० ॥ ज्ञानभूमिमिमां विज्ञा योगदाञ्च वदन्यतः। चित्तवृत्तिनिरोधं यद्योगमेषा ददात्यलम्।। ८१ ॥ लीलोन्मुक्तिं चतुर्थी वै ज्ञानभूमि प्रपद्य च । अद्यव्यघटनायां हि पटीयस्या मुमुक्षवः ॥ ८२ ॥ त्रैगुण्यलीलामय्या मे तत्त्वम्वै प्रकृतेर्विदुः । तदा लीलामयी स्वस्यां लीलायां प्रकृतिः पुनः ॥ ८३ ॥ नासज्जयितुमीष्टे तान् साधकान् विज्ञसत्तमाः । लीलोन्मुक्तिं बुधाः प्रोचुर्ज्ञानभूमिमिमामतः ॥ ८४ ॥. सन्न्यासदा कहा जाता है ।। ७५-७७ ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! योगदा नाम्नी तीसरी ज्ञानभूमिमें मुमुक्षु चित्तवृत्तिनिरोध करनेका उत्तम अभ्यास करते हुए संयमके द्वारा इस मेरी शक्तिको और एकतत्त्वके अभ्यास द्वारा मुझको अलग अलग रूपसे देखने में जब प्रवृत्त होते हैं उस समय साधकोंमें सूक्ष्मदृष्टिरूपी अलौकिक प्रत्यक्षका उदय होता है ॥ ७८-८० ॥ इसी कारण विज्ञलोग इस ज्ञानभूमिको योगदा कहते हैं क्योंकि यह चित्तवृत्तिनिरोधरूपी योगको भलीभांति प्रदान करती है ॥ ८१ ॥ और हे विज्ञवरों ! लीलोन्मुक्ति नाम्नी चतुर्थी ज्ञानभूमिमें पहुंचकर ही मेरी लीलामयी अघटनघटना- पटीयसी त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके तत्त्वको मुमुक्षु निश्चय ही पहचान लेते हैं, उस समय लीलामयी प्रकृति अपनी लीलामें उन साधकोको पुनः नहीं फंसा सक्ती, इस कारण इस ज्ञानभूमिको बुधगणने -- ज्ञानभूमिनिरूपणम् । ४९ पञ्चमी ज्ञानभूमि ते यदा सम्प्राप्य सत्पदाम् ।, अभेद ज्ञानमाप्तुं वै चित्ते स्वस्मिन् मुमुक्षवः ॥ ८५॥ आरभन्ते तदा तेपामनुभूतेहि शक्तयः । विशेषेण विवर्द्धन्ते नात्र कार्या विचारणा ॥८६॥ अस्त्येकत्वादभेदो यो मन्मत्मकृतिगोचरः। यो वाऽभेदोऽस्ति भ विमाः! कार्यकारणरूपयोः ॥८७॥ तं वैज्ञानिकनेत्रण विस्पष्टं ज्ञातुमीशते । ज्ञात्वा सम्यग्रहस्यञ्च विश्वोत्पादककर्मणः ॥ ८८ ॥ जगदेवास्म्यहमिति मां निरीक्ष्य विचारतः । कार्यब्रह्मण एतस्य विबुध्यन्ते स्म सत्यताम् ॥ ८९ ॥ एनां वदन्ति विद्वांसो भूमि वै सत्पदामतः। सद्भावस्य यतोऽमुप्या ज्ञानं लोकैरवाप्यते ॥ १० ॥ नन्वानन्दपदा पष्ठी ज्ञानभूमि भपय वै दै लीलोन्मुक्ति कहा है ॥ ८२-८४ ॥ सत्पदानाम्नी पञ्चमी शानभूमिमें पहुंचकर चे मुमुक्षु जब अपने ही अन्तःकरणमें अभेद ज्ञानको प्राप्त करने . लगते हैं उसी समय उनकी अनुभवशकियां विशेष बढ़ने लगती हैं इसमें विचारनेकी बात नहीं हैं ।५-क्षा हे विप्रो! एकत्वके कारण मुझमें और मेरी प्रकृतिमे जो अभेद है अथवा मेरे कारणस्वरूप और कार्यखरूपमें जो अभेद है वैज्ञानिक दृष्टिके द्वारा उसको वे स्पष्टरूपसे समझने में समर्थ होते हैं और जगदुत्पत्तिकारक कर्मका रहस्य अच्छी तरह समझकर जगत् ही मैं हूँ इस विचारसे मुझको देखकर इस कार्यव्रह्मकी सत्यता जानलेते हैं ॥ ८७-८९ ॥ इसी कारण इस ज्ञानभूमिको ही विद्वान्लोग ‘सत्पदा कहते हैं क्योंकि इसके द्वारा सद्भावका ज्ञान लोगोंको प्राप्त होता है 1.80॥ और हे विप्रो ! आनन्दपदानाम्नी षष्ठी शानभूमिमें पहुंचकर, ही ५० श्रीधीशनीना। . एकाधारे तु मन्येव मम भक्ता मुमुक्षयः ॥१५॥ कर्मराज्यं जई विप्राः दिनगन्या नेतनम ! शक्नुवन्ति यदा द्रष्टुं नदा में ग्गनागरे ॥२॥ उन्मजन्तो निमजन्नो जगदिन्यागन माम । समीक्षमाणा अंदनादन !!!! बुधाः मम्पोचुरानन्दपदा भूमिमिमापनः । आनन्दः सायकैयस्पादस्यां भगावाप्यते ॥ ११ ॥ अन्तिमा ज्ञानभूमि में मप्तमी पापगम । सम्प्राप्य ज्ञानिना भक्ताः कार्यकारणयादिनाः ॥ २५ ॥ भेददृष्टिलयं कृत्वा म्वरूप बान्ति में लगा । भेदज्ञानलयनैव नेपां शुहान्नगगनि ! १६ ॥ सर्वेपु पाणिन्देप किलकलमद कम । अद्वैतभावजनकाऽविभक्तानानमुनमम ॥ ५॥ उदेति नात्र सन्दहोऽज्ञानवान्नापनादकम । मेरे भक्त मुमुनु तुझमें ही जड़मय फम्र्मराज्य और चेतनमय देव राज्यको एकाधारमें जब देखने में समर्थ होने नयचे मेरे रससा. गरमें उन्मजन निमजन करते हुए, मैं ही जगन् म प्रहार मुझको देखकर अहेन आनन्दका उपभोग करते॥8-21 इसी कारण इस मानभूमिको बुधगण आनन्दप माने हैं क्योंकि इस भूमिमें साधक आनन्द प्राप्त करते है विप्रो ! पग- स्परा नाम्नी सप्तमी और अन्तिम शानभूमि में मेरे पानी मन पहुंच कर कार्य कारणको भेदरणिका लय करके मेरे सत्पमें लय हो जाते हैं और भेदमानके लय होने में ही उनके विशुद्ध प्रातः करणमें, सर्वभूतोंमें ऐक्यप्रदर्शक अशानान्धकारापनोदक और अद्वैतभाव-उत्पादक अविभक्त शानका उत्तमरीतिले उदय होता है इसमै सन्देह; ही नहीं। उस समय मेरे मालिभक्तों में और मुझमे ज्ञानभूमिनिरूपणम् । तदा मे ज्ञानिभक्तपु माय भेदश्च नश्यति ॥ ९८ ॥ लीयन्ते मत्स्वरूपे ते स्वरूपज्ञानसंश्रयाव ! अतो वदन्ति विद्वांस इमां भूमि परात्पराम् ॥ ९९ ॥ एतासां ज्ञानभूमीनां केचित्तत्वयुभुत्सवः । . स्थूलदृष्ट्या विरोधं यच्छङ्कन्ते तन्न साम्प्रतम् ॥ १० ॥ हे विज्ञानविदो विमाः। नन्वज्ञानस्य सप्तभिः। प्रपूर्ण सप्तभिः सम्यक् तथा ज्ञानस्य भूमिभिः ।। १०१ ।। नूनमास्ते महाकाश-गोलकं परमाद्भुतम् । तस्य निम्नस्तराः सप्त सप्तच्छायाप्रपूरिताः ॥ १०२॥ उच्चैः सप्तस्तराः सप्तज्योतिर्मिश्चैव पूरिताः । अधः छायास्तराः सन्ति चत्वारो हि समष्टितः॥ १०३ ।। चतुर्धा भूतसवानां चिदाकाशेन पूरिताः। स्तरा. अज्ञानभूमीनां तत उर्ध्व गतास्त्रयः ॥ १०४ ॥ ज्ञानभूमिस्तराः सप्त तथा दशविधानमून् । धृत्वाऽधिकारान् सम्पूर्णान् पिण्डान दैवांश्च मानवान्॥१०॥ * भेदभाव नष्ट हो जाता है ॥ २५-१८॥ वे मेरे स्वरूपमें स्वरूपज्ञानके अंवलम्वनसे विलीन होजाते हैं इसी कारण इस भूमिको विद्वान् लोग परात्परा कहते हैं ॥ ९९ ॥ साधारण दृष्टिसे इन सातो ज्ञान- भूमियों में कोई कोई तत्वजिज्ञासु जो विरोध भावकी शंका करते हैं वह ठीक नहीं है ॥ १०० ॥ हे विज्ञानविद् ब्राह्मणो ! सप्त अज्ञान- भूमि और सप्त ज्ञानभूमिसे ही भलीभांति पूर्ण परमाद्भत महाकाश गोलक है, उस गोलकके नीचेके सात स्तर सप्त छायासे पूर्ण हैं ॥१०१-१०॥और ऊपरके सात स्तर सप्त ज्योतिसे ही पूर्ण हैं, नीचेके चार छाया स्तर चतुर्विध भूतसङ्घके समष्टि चिदाकाशसे पूर्ण हैं। उसके ऊपरकी तीन अज्ञानभूमियोंके स्तर तथाः सात. शानभू. मियोंके स्तर"ये दशस्तर: दशविध अधिकारोंको धारण करके श्रीधीशगीता। व्याप्नुवन्ति न सन्देहस्तस्माद्विज्ञानवित्तमाः!। एतद्दशविधेष्वेवाधिकारेप्वखिला हिताः ॥ १०६ ॥ निम्नानिम्नतरा एवमुच्चैरुच्चतमास्तथा । दार्शनिकाधिकारा हि सन्ति सम्मिलिता ध्रुवम् ॥ १०७ ॥ अघव्यघटनायां सा प्रकृतिम पटीयसी। मत्तो व्यक्ता महाकाश-गोलकेऽत्र प्रकाशते ॥ १०८॥ ऊर्ध्वगाः सप्तभूमी सा विद्यारूपतोऽअनुते । अविद्यारूपतो विप्राः ! सप्तसमीश्च निम्नगाः ॥ १०९ ॥ सप्तच्छायाभिरेताभिर्योतिभिः सप्तभिस्तथा । परिपूर्ण महाकाश-गोलकं मे जात्मिका ।। ११० ॥ विभत्ति प्रकृतिनित्यं नूनमाधाररूपतः। अहं तस्योपरिष्ठाच सन्तिष्टे शुद्धचिन्मयः ।। १११ ॥ ज्ञानिनः स्याद्धि यस्यादोऽध्यात्मगोलकदर्शनम् । मद्दर्शनं ध्रुवं कर्तुं शक्नुयात्सर्वथैव सः ॥ ११२ ।। . . ३ समस्त मानव और देवपिण्ड में व्याप्त है। इस कारण है विज्ञान- विद्वरो! इन दशो अधिकारमें ही निम्नसे निम्नतर और उससे उच्चतम सब हितकर दार्शनिक अधिकार सम्मिलित हैं यह निश्चय है।१०३-१०७॥ मेरी वह अघटनघटनापटीयसी प्रकृति मुझसे व्यका होकर इस महाकाशगोलकमें प्रकाशित है॥१०८॥ हे विप्रो ! वही विद्यारूपसे ऊपरकी सप्त भूमिकाओं में और अविद्यारूपसे नीचे की. सप्त भूमिकाओं में परिव्याप्त है ॥ १०९ ॥ इन सप्त छांया और सप्त ज्योतियोंसे पूर्ण महाकाश गोलकको अधाररूपसे मेरी जडा प्रकृति नित्य ही धारण कर रही है और मैं शुद्ध चिन्मय होकर उसके ऊपर स्थित हूँ ॥ ११०-११६ ॥ इस अध्यात्मगोलकका दर्शन जिस बानवान्को ही होता है वह निश्चय ही मेरे दर्शन करने में ज्ञानभूमिनिरूपणम् । . वैदिकदर्शनरुक्तं शानमेवास्ति लोचनम् । पनदयं न सन्देहः सत्यं सत्यं ब्रवीमि वः ॥ ११३ ॥ सप्तानां ज्ञानभूमीनामतो दर्शनसप्तके । चिरोधं येऽनुकल्पन्ते ते भक्ता शानिनो न मे ॥ १.१४ ।। मानिभका भवन्तो में भवन्तों में द्विजोत्तमाः ।। अद्वैतमविभक्तश्च विकारराहतं तया ॥ ११५ ।। जानं माप्य पगासिद्धेः कृपादृष्ट्यानुतोपिताः । मत्सायुज्यं समासाध लभेरन् कृतकृत्यताम् ॥ ११६ ॥ इति श्रीधीशगीतासूपनिपत्म ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे धीशर्षिसंवादे ज्ञानभूमिनिरूपणं नाम तृतीयोऽध्यायः सर्वथा समर्थ होता है॥१९शा वैदिक दर्शनोक्तशानही इसके लिये नेत्र- स्वरूप है निःसन्देह में सत्य सत्य कहता हूँ॥ ११३ ॥ अतः जो सप्त शानभूमियोंके सप्त दर्शनशास्त्रों में विरोधकल्पना करते हैं वे मेरे शानी भत्ता नहीं है ॥ ११४॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आपलोग मेरे ज्ञानी- भक्त होते हुए अविभक्त, विकारहीन और अद्वैत शानको प्राप्त करके परासिद्धिकी कृपादृष्टिसे आश्वासित हो मत्सायुज्यको प्राप्त करके कृतकृत्यताको प्राप्त हो ॥ ११५-११६ ॥ इस प्रकार श्रीधीशगीतोपनिषद्के ब्रह्मविद्यासम्बन्धी योग. शास्त्रका धीशर्षिसम्वादात्मक शानभूमिनिरूपण नामक तृतीय अध्याय समाप्त हुआ। .
श्रीधीशगीता। AWARA धर्मविज्ञाननिरूपणम् । 1 ऋषय ऊचुः ॥ १॥ रहस्यं ज्ञानभूमीनां हे सर्वज्ञ ! महाद्भुतम् । तथाऽविभक्तज्ञानस्य शैली श्रुत्वा प्रकाशिकाम् ।। २॥ अस्माकं संशयाः सर्वे दूरीभूता न संशयः । अस्मानुपदिशैतच्च कृपां कृत्वाऽधुना प्रभो ! ।। ३ ।। को नन्वज्ञानभूमीनां प्रभावादूरक्षयन मुदा । मुमुक्षून साधकालीवानयते ज्ञानभूमिकाः ॥४॥ अतीत्याज्ञानभूमीश्च कैरुपायैर्मुमुक्षवः । लभन्ते ज्ञानभूमीहि साधकाः सत्त्वरं ध्रुवम् ॥ ५॥ क्रमादग्रेसरन्तश्च सप्तमु ज्ञानभूमिपु । भवन्तं प्राप्नुवन्त्यन्ते सचिदानन्दरूपिणम् ॥ ६॥ . ऋषिगण वोले ॥१॥ हे सर्वज्ञ ! शानभूमियोंका महान् अद्भुत रहस्य और अविभः तज्ञान के प्रकाश करनेवाली शैलोको सुनकर हमारी सव शङ्काएँ दूर हो गई हैं इसमें सन्देह नहीं । अव हे प्रभो ! कृपा करके हमको यह भी श्राशा कीजिये कि अज्ञानभूमियोंके प्रभावसे बचाकर मुमुक्षु साधकजीवोंको आनन्दपूर्वक ज्ञानभूमियों में कौन पहुं. चाता है ? ॥२-३॥ किन उपायों द्वारा मुमुनुसाधक अज्ञानभूः मियोको अतिक्रमण करके शीघ्रही शानभूमियों का प्राप्त करते हैं ॥ ५॥ और सातो ज्ञानभूमियों में क्रमशः अग्रसर होते हुए अन्तमें सथिदा- नन्दस्वरूप आपका प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥ ।
धर्मविज्ञाननिरूपणम् । -- AIDARAMA. गणपतिरुवाच ॥ ७ ॥ प्रामणाः ! नयन नूनं सर्वलोकहितमदः । ब्रमाण्डपिण्डरूपायाः सोन धारको महान् ॥ ८ ॥ मानवान धर्म एवायं कैवल्याभ्युदयमदः । संरक्ष्याज्ञानभूमिभ्यो ज्ञानभूमीनिरन्तरम् ।। ९ ॥ ददाभ्युदयं सम्यक् सम्मापय्यान्तिमा क्रमाव । जानामि तनो दत्ते निःश्रेयसमहो परम् ।। १०॥ अमवास्मि धर्मास्य स्थितिस्थानं द्विजर्षभाः ।। धकिातर्ममैवास्ते शक्तिरेव सनातनी ॥ ११ ॥ विरादरष्टेः प्रवाहस्य धारणं कृतवत्यहो। ममेव सात्विकी शक्तिनं धम्मों महर्षयः !॥ १२ ॥ नात्र कथन सन्देहो विद्यते द्विजसत्तमाः । विद्यते विप्रशाईलाः ! शक्तिमें त्रिगुणात्मिका ।। १३ ।। गणपति बोले ।। ७॥ है ब्राह्मणो! सर्चलोकहितकर. ब्रह्माण्डपिण्डात्मक सृष्टिका धारक और अभ्युदय और मुक्किविधायक यह महान् धर्मही मनु- प्योको अमानभूमियोंसे बचाकर शानभूमियों में निरन्तरही पहुंचा. देता है। :- और क्रमश: अभ्युदयको सम्यक् प्रदान करता हुआ अन्तिम शानभूमिमें पहुंचाकर अहो ! तदनन्तर कैवल्य प्रदान करता है ॥ १० ॥ हे विप्रो ! धर्मका में ही स्थिति स्थान हूँ और धर्मरूपा मेरी ही सनातनी शक्ति अहो : विराट् सृष्टिके प्रवाहको निश्चय ही धारण किये हुए है । हे महर्षिगण निश्चय मेरी ही सत्त्वगुणमयी शक्ति धर्म है. हे ब्राह्मणश्रेष्ठो। इस विषयमें कोई सन्देह नहीं है है विप्रपुभयो ! मेरी शकि त्रिगुणारिमका है ॥ ११-१३ ।।
श्रीधीशगीता। A आकर्षणविशिष्टा या सा शक्तीराजसी मता । विकर्षणेन सम्पृक्ता शक्ति तामसी तथा ॥ १४ ॥ सामञ्जस्यं प्रकुर्वाणा तयोः शक्त्योर्द्वयोरिह । सात्विकी सैव धम्मोऽस्ति शक्ति, नात्र संशयः ॥ १५ परिव्याप्नोति धर्मस्य शक्तिरेच धारिका। परमाणुभ्य आ नूनं पूर्णां ब्रह्माण्डविस्तृतिम् ॥ १६ ॥ शतः संधारिकाया मे धर्मस्यैव प्रभावतः । सूयेन्द्रादिग्रहाः सन्चे तथा नक्षत्रमण्डलम् ॥ १७ ॥ उपग्रहादयोऽप्येवं विराड्देहे ममानिशम् । स्वस्वकक्षामुपाश्रित्य भ्रमन्ते हि समन्ततः ।। १८ सृष्टरक्षाञ्च कुर्वन्ति साहाय्यं ददतो मियः । देवासुरेण युद्धेन देव्याः सृष्टेः पवित्रताम् ॥१२॥ सम्पादयन्ती धर्मस्य धारिका शक्तिरुत्तमा । प्रतिष्ठापयते देवान् स्वस्वलोकेऽसुरांस्तथा ॥ २० ॥ आकर्षणशक्तिविशिष्ट राजसिकशति कहाती है और विकर्षण- शक्तिविशिष्ट तामसिक कहलाती है ।। १४ ॥ और उन दोनों शकि योंका इस संसारमें समन्वय करनेवाली मेरी जो सात्विक शक्ति है वही धर्म है इसमें सन्देह नहीं ॥ १५ ॥ यही धर्मकी- धारिका शक्ति परमायुसे लेकर ब्रह्माण्डके विस्तार पर्यन्त में परि. व्याप्त है ॥१६॥ धमकी धारिकाशक्ति के प्रभावसे ही सब सूर्य चन्द्रा. 'दि ग्रहउपग्रहादि और नक्षत्रमण्डल मेरे विराट् देहमें चौतरफ अपनी अपनी कक्षा में निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ।।१७-१८॥ और परस्परको सहायता देकर सृष्टिकी रक्षा करते हैं। धर्मकोउत्तम : धारिका शक्ति देवासुर संप्रामके द्वारा देवी सृष्टिको पवित्रता सम्पादन करती हुई देवताओं और असुरोको अपने अपने लोकोंमें ।
धर्मविज्ञाननिरूपणम् PANAAD mean+mainta.meRAMARAN निश्चितं मातृभावेन विज्ञाः ! धर्ममयेण मे । प्रकृतेः पालिता जीवाः पोपिताश्च निरन्तरम् ।।२१ ।। उद्भिजात्स्वेदजं गत्वा स्वेदजादाडजं तथा । ततो गच्छन्त्यही विमाः ! अण्डज़ाच जरायुजम् ।। २२ ।। : जरायुनायोनितो हि मत्ययोनि गताः पुनः । भवन्ति मोक्षमार्गस्य नूनमेतेऽधिकारिणः ॥ २३ ॥ ज्ञानं हि धर्माधर्मस्व मानवेभ्यो हि केवलम् । कृतास्ते मोक्षमार्गस्य पथिका ददता मया ।। २४ ।। धारिका शक्तिरेवामी धर्मस्य विमपुङ्गवाः ! ॥ क्रमादुन्नमयन्ती वै मानवानुत्तरोत्तरम् ।। २५ ।। कृवाधिकारिणो शानभूमेरन्ते च तानहो । कैवल्यपदवी तेभ्यः प्रदत्ते च शनैः शनैः ।। २६ ।। सापां रलको धर्मः सर्वजीवहितपदः । निखिलव्यापकश्चास्ति सव्वेभ्योऽभ्युदयप्रदः ॥ २७ ।। - . सुप्रतिष्ठित रसती ॥ १९-२० ॥ हे विशो! मेरी प्रकृतिके धर्ममय मातृभावके द्वारा ही निरन्तर पालित पोषित होकर जीव हे विनो। . उद्भिजसे स्वेदज,स्वेदजसे अण्डज, अण्डजसे जरायुज और जरायुज योनिसे मनुष्ययोनिमें पहुंचकर अवश्य ही वे कैवल्यमार्ग अर्थात् मोक्षमार्गके अधिकारी बन जाते हैं ।। २१-२३ ॥ मैंने केवल मनुष्यो- को ही धर्माधम्मका ज्ञान प्रदान करके उनको कैवल्यमार्गका पथिक 'बना दिया है ॥२४॥ हे विप्रश्रेष्ठो! यह धर्मकी धारिका शक्ति ही मनुष्योंकी क्रमशः उत्तरोत्तर उन्नति कराकर ही और अहो ! अन्त में उनको शानभूमिका अधिकारी बनाकर शनैः शनैः कैवल्यपद प्रदान करती है ।। २५-२६ ॥ धर्म सर्वव्यापक, सर्वजीवहितकारी सर्च- १ रक्षक सबको अभ्युदयप्रद और सबके हृदय में मेरे खरूपका प्रकाश " .* '५८ श्रीधीशगीता। सबैपां मानसे नूनं यत्स्वरूपप्रकाशकः । साधकानां हि जीवानां शिवत्वस्य विधायकः ॥२८॥ धर्मोऽयं ब्राह्मणाः ! प्रोक्तः सार्वभौयस्वरूपभाक् । साधारणविशेपाभ्यां द्विधा भिन्नो न संशयः ॥ २९ ॥. साधारणस्तयोर्धर्मः सर्वजीवाहिते रतः । अधिकारविशेपस्य जीवानां केन्द्रभागिनाम् ॥ ३०॥ विशेषस्तु विशेषेण हित सम्पादयत्यलम् । साधारणस्य धर्मस्य वर्णयेऽङ्गानि साम्प्रतम् ॥ ३१ ॥ आकर्ण्यन्तां भवाद्भिश्च सावधानेन चेतसा । चतुर्विंशतितत्त्वानां नूनं सन्त्यनुरूपतः ॥ ३२ ॥ अङ्गानि पूर्णधर्मस्य चतुर्विंशतिरेव भोः । दानं हि त्रिविध प्रोक्तं विद्यार्थाभयभेदतः ॥ ३३ ॥ कायिकं वाचिकञ्चैव तथा मानसमेव च । तपोऽपि त्रिविधः प्रोक्तं तपोविद्भिर्महात्मभिः ॥ ३४ ॥ पविधः कर्मयज्ञोऽस्ति नित्यो नैमित्तिकस्तथा । 1 करनेवाला एवं साधक जीवोंको शिवत्वप्रदनिकारक है ।।२७-२८॥ हे. ब्राह्मणों ! सांधारण और विशेष रूपसे दो प्रकारका यह सार्व भौमखरूपी धर्म कह गया है यह निःसन्देह है ॥ २९ ॥ उनमेसे साधारण धर्म सर्वजीवहिततत्पर है और अधिकार विशेषके. केन्द्रोंसे' युक्त जीवोंका विशेष धर्म निश्चय ही परम हित सम्पा- दन करता है। मैं इस समय साधारण धर्मके अङ्गवर्णन करता हूँ आप सावधान चित्तसे सुनो। चौवीस तत्त्वोंके अनुरूप पूर्णा- वयव साधारण धर्मके निश्चय चौबीस ही अंग हैं। दान विविध कहा गया है, यथा-अर्थदान, विद्यादान और अभयदान ॥ ३०-३३॥ तपोवेत्ता महात्माओंने तपके भी शारीरिक वाचनिक मानसिक कंपसे तीन भेद कहे. हैं ॥ ३४ ॥ कर्मयक्ष नित्य नैमित्तिक काश्य ।
धर्मविज्ञाननिरूपणम् । काम्योऽध्यात्मोऽधिदेवा पप्पश्चवाधिभौतिकः ॥ ३५ ॥ उपास्तियाभदाश्च विद्यन्ते नवधा दनु । ते सर्व भक्तिमूलाः स्युर्योगमलास्तथैव च ॥३०॥ उपास्तरास्ति योगो हि स्थली देहो न संशयः । तस्याश्चैव दिनाः ! या भक्तिः प्राणस्वरूपिणी ।। ३७॥ मन्त्री हो लयो राज नि भेदाचतुर्विधात् । चतुर्षापासना.वेद्या नूनं योगविचारतः ॥ ३८ ॥ तथा भक्तिमभेदन पश्योपासनास्त्यहो। रागद्वेषादिसन्जुश भक्ता मेऽशुचयो द्विजाः ! ॥ ३९ ॥ मां सदोपासते मुद्दा आसुरीयेच शक्तिषु । सकामाः फलमिच्छन्ता शुभं भक्तगणा मम ॥ ४० ॥ मामेवोपासते शम्वन्नृनं देवीपु शक्तिपु । विपयानन्द पवाहो ब्रह्मानन्दानुभावकाः ॥ ४१ ॥ स्वभाबादेव जायन्ते भक्तवृन्दा ममोन्नताः । मल्लीलाविग्रहोपास्तौ रतात्मानो न संशयः ॥ ४२ ॥ और अध्यात्म अधिदेव अधिभूत रूपसे पविध है ॥ ३५ ॥ उपा. सनायझके नौ ही भेद , वे सब भक्ति और योगमूलक हैं ॥ ३६॥ उपासनाका योग स्थूलदेह है यह निस्सन्देह है। हे ब्राह्मणो ! भकि उसीकी ही प्राणरूपिणी है।। ३७ ॥ योगके विचारसे उपासना मन्त्र हठ लय राज इन चतुर्विध भेदासे निश्चय ही चतुर्विध जाननी चाहिये ॥ ३८ ॥ और अहो! भक्तिके भेदसे उपासना पंचविध है। है ग्राह्मणों ! रागहेपयुक्त और अशुचि मेरे मूढ़ भक्तगण आसुरी शक्तियों में ही मेरी सदा उपासना करते हैं । शुभ फलेच्छु सकाम भक्तगण मेरी दैवी शक्तियों में निरन्तरही मेरी ही उपासना करते हैं। अहो । विषयानन्दमें ही ब्रह्मानन्दका अनुभव करनेवाले मेरे उन्नत भागण स्वभावसे ही मेरे शीलाविग्रहकी उपासनामें तात्मा श्रीधीशगीता। A rani--- ८ - भक्ता मे ज्ञानिनो.रूपे सगुणे निर्गुणे तथा । मामुपास्य निमज्जन्ति- परमानन्दसागरे ।। ४३ ।।। श्रवणं मननश्चैव निदिध्यासनमेव च । ज्ञानयज्ञस्य भेदाः स्युत्रिविधा हि महर्षयः ! ॥४४॥ "चतुर्विंशतिरेतानि धर्मस्य प्राकृतान्यहो । अङ्गानि सर्वजीवानां साधकानि हितस्य न ॥ ४५ ॥ विभिन्नरुचयो लोका नानाशक्तिमया यतः । अतः साधारणो धर्मः सर्वमाणिहितावहः ।। ४६ ॥ अङ्गैः पूर्णस्य धर्मस्य चतुर्विंशतिसङ्ख्यकैः। स्वरूपं चेद्विजानीयुः सर्वलोकहितालयम् ॥ ४७ ॥ धर्मजिज्ञासवो नूनमुदारहृदयास्तदा । श्रीगुरोः पदवी पूज्यां प्राप्नुयुः सर्वमाणिनाम् ॥४८॥ यावन्तो धर्ममार्गा वै जनिष्यन्ते युगे युगे । साधारणस्य धर्मस्य कियन्त्यङ्गान्यमीपु ते ॥ ४९ ॥ होते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ३६-४२ ॥ और शानीभक्तगण मेरे सगुणरूप तथा निर्गुणरूपमें मेरी उपासना करके परमानन्दसागरमें मग्न होते हैं ॥४३॥ हे महर्षिगण | श्रवण मनन और निदिध्यासन रूपंसे. ज्ञानयज्ञके तीन भेद कहे गये हैं ॥४४॥ धर्मके अहो! चतुर्विंशति स्वभावसिद्ध अङ्ग सर्वजीवहितसाधक कहे गये. ॥.४५॥ क्योंकि लोकमें रुचि विभिन्न है और सामर्थ्य भी विभिन्न इस कारण साधारण धर्म सर्वप्राणिहितप्रद है ॥ ४६॥ यदि चौबीस अगोंसे पूर्ण धर्म के सर्वलोकहितकर स्वरूपको धर्म- जिज्ञासु जानजायँ तो वे उदारहृदय होकर सब प्राणियोंके ही गुरुकी पूज्यपद्वीको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४७-४८ ॥ युगयुगमे जितने ही धर्ममार्ग पैदा होगे वे सब साधारण धर्मके इन प्रोमेसे कुछ अशोका आभय लेकर ही निःसन्देह कृतकृत्यताको प्राप्त होंगे। .
धर्मविज्ञाननिरूपणंम् । गृहीत्वैव प्रयास्यन्ति कृतार्थत्वमसंशयम् । मादुर्भुनाश्च ये लोके धर्ममार्गा द्विजोत्तमाः ! ॥ ५०.॥ अधुनावधि तेऽप्येवं कृतार्थत्वं गता ध्रुवम् । नात्र कश्चन सन्देहो विद्यते विमपुङ्गवाः । ॥५१॥. मपूर्णत्वं हि धर्मस्य शाश्चतस्येदमेव नु । एतदेव महत्त्वच पितृभावोऽप्ययं ध्रुवम् ।। ५२ ॥ अन्यधान्न यो द्वेष्टि बाधते वा कदाचन । यथायोग्यन्तु सर्वभ्यो द्विविधाऽभ्युदयप्रदः ।। ५३ ।। निःश्रेयसस्य चाऽध्यानं यस्तु दर्शयतेऽखिलान् । धर्मः सनातनो नूनमियं युपनिपन्मता ।। ५४ ॥ विमाः । विशेषधर्मस्य स्वरूपं महदभुतम् । यथा वार्णाश्रमो धर्म आर्यजातेः शुभावहः ॥ ५५ ॥ अनार्यजातिजातानां न तथास्त्युपयोगमाक् । अतोऽयं वर्तते धम्मों विशेषो नात्र संशयः ॥ ५६ ।। हे ब्राह्मणश्रेष्टो ! अबतक संसारमें जितने धर्ममार्ग उत्पन्न हुए हैं वे भी ऐसेद्दी कृतार्थताको प्राप्त हुए हैं हे विप्रो ! इसमें कुछ सन्देह नहीं है ।। ४२-५१ ॥ यही शाश्वत धर्मकी निश्चय पूर्णता है; यही महत्त्व है और निश्चय यही पितृभाव है ॥५२ ॥ जो.धर्म अन्यधर्मोसे द्वेष न करे अथवा अन्यधर्मोको कभी बाधा न दे और सबको यथाधिकार उभयविध अभ्युदय प्रदान करे और सवको निःश्रेयसका मार्ग बतावे यही सनातन धर्म है यही उप- निषद् है ।। ५३-५४ ॥ है विप्रो ! विशेष धर्मका स्वरूप अतिविचित्र है । जैसे आर्य जातिके लिये वर्ण और आश्रमधर्म परमहितकर कहा गया है वैसे अनार्य जातिके लिये वह उपयोगी नहीं है इस कारण यह वर्ण और आश्रम धर्म विशेष धर्म है इसमें सन्देह ६२ श्रीधीशगीता। प्रवृत्तिरोधको नूनं वर्णधों-महर्षयः ।। निवृत्तेः पोपकश्चास्ति धर्म आश्रमगोचरः ।। ५७ ॥ धावतावुभावेव सजीव्य शाश्वतीः समाः । आर्यजाति सुरक्षेतां साङ्कात् पतनात्तथा ।। ५८ ॥ नारीधर्मस्तपोमूलो नृधम्मो यज्ञमूलकः । एतौ द्वावपि वते धर्मों विप्राः ! विशेषको ॥ ५९ ॥ प्रवृत्तिधर्म एकोऽस्ति निवृत्तिधर्म इत्यपि । राजधर्मः प्रजाधर्मः शाक्तः शैवश्च वैष्णवः ।।६०॥ सौर्यो धम्मोऽपि भो विप्राः! आपद्धमादयस्तथा। एते विशेषधर्मस्य विद्यन्तेऽन्तर्गताः खलु ॥ १ ॥ सर्वप्रधान आद्यश्च वरीयान् व्यापकस्तथा । सदाचारो विशेषेषु धर्मेषु विद्यते द्विजाः ! ॥१२॥ यतो धानुकूलो यो व्यापारो वपुपोऽखिलः । सद्भिः प्रोक्तः सदाचारो नन्वसौ पुण्यवर्द्धनः ॥६३ ॥ नहीं॥५५-५६॥ हे महर्षियो वर्णधर्म प्रवृत्तिरोधक और आश्रम धर्म निवृत्तिपोषक है। आर्य जातिको ये दोनों धर्म ही चिरकार पर्यन्त जीवित रखकर संकरता दोष और पतनसे बचाते हैं ॥ ५७-५८ ॥ हे ब्राह्मणो ! तपमूलक नारीधर्म और यहमूखक पुरुषधर्म ये दोनों भी विशेष धर्म हैं ॥५६॥ प्रवृत्तिधर्म निधि धर्मराजधर्म प्रजाधर्म शाकधर्म शवधर्म वैष्णवधर्म सौर्यधर्म और आनुपर्म आदि, ये सब हे ब्राह्मणो ! विशेष धर्म के अन्तर्गत : ही हैं । ६०-६१ ॥ हे ब्राह्मणो ! विशेष धम्मों में सबसे प्रधान श्रेष्ठ च्यापक और प्रथम धर्म सदाचार है ॥ १२ ॥ क्योंकि धानुकूल सव शारीरिक व्यापारोंको सत्पुरुप. सदाचार कहते हैं यह निश्चय धर्मविज्ञाननिरूपणम् । आस्ते विशेपधर्मस्य हाधिकारोऽन्तिमो द्विजाः !! सन्न्यासाश्रम एवासी नाव काा विचारणा ॥६४ ॥ सन्न्यासो न भवद्विज्ञाः । कर्मत्यागेन केवलम् । किन्तु सन्न्याससंसिद्धिर्वासनात्यागतो भवेत् ।। ६५ ॥ अनो विशेषधर्मास्याधिकारस्यातिविस्तृतेः । वैचित्र्याच परात्स्थूलस्वांगसचालनामिकाम् ॥ ६६ ॥ सदाचारमयीं स्थूलस्थलामारभ्य सवक्रियाम् । सूक्ष्मसूक्ष्मतमत्रामसारमाप्तिकारणम् ॥ ६७ ॥ परिच्याप्य च सन्यासं सम्बन्धस्तस्य विद्यते । नात्र कश्चन सन्देहो विद्यते ब्राह्मणोत्तमाः ! ॥१८॥ वर्णाश्रमादिधर्माणां विशेषाणां द्विजोत्तमाः !। पालने व मे भक्ताः क्रमशोऽज्ञानभूमितः ॥ ६९ ॥ निवृत्य झानभूमीनां जायन्ते पथिका ध्रुवम् । साधारणस्य धर्मस्य साधकाः क्रमशो वरम् ॥ ७० ॥ ही पुगयवक है ॥ ६३ ॥ विशेष धर्मका अन्तिम अधिकार ही हे ब्राह्मणो ! यह सन्न्यास है यह निश्चित है॥६५॥ हे विशवरो! केवल कर्मके त्यागसे सन्यास नहीं होता किन्तु वासनाके त्यागसे ही सन्न्यासकी सिद्धि होती है इस कारण विशेष धर्मका अधि- कार अति विचित्र और अति विस्तृत होनेसे अपने स्थूल अङ्गके संचालनरूपी सदाचारमय स्यूलातिस्थूल सत् क्रियासे लेकर सूक्ष्मातिसूक्ष्म ब्रह्मसद्भावके प्राप्तिके कारणरूपी सन्यास तकसे उसका सम्बन्ध है । हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६५-३॥ हे विप्रो! वर्णाश्रम आदि विशेष धौके पालन द्वारा हो मेरे भक क्रमशः प्रशानभूमियोंसे बचकर शानभूमिके ही पथिक बनते हैं और हेदिजश्रेष्ठो क्रमशः साधारण धर्मके सार्वभौम , ६४ श्रीधीशगीता। सार्वभौम स्वरूपं वै सर्वजीवहितपदम् । सर्वशक्तिमयं दिव्यं व्यापकं मोक्षसाधकम् ॥ १ ॥ प्राणिनोऽनुभवन्त्यत्र यावदेव द्विजोत्तमाः!! ज्ञानस्य तावती भूमिमारोहन्ति समुन्नताम् ॥ ७२ ।। श्रेष्ठं वेदान्तसिद्धान्तानुभवं प्राप्य सत्वरम् । मत्सायुज्यं लभन्तेऽन्ते ततो यान्ति कृतार्थताम् ॥ ७३ ।। इति श्रीधीशगीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे धीशपिंसंवादे धर्मविज्ञाननिरूपणं नाम चतुर्थोऽध्यायः। marvatopati सर्वजीवहितकारी मोक्षसाधक और सर्वशक्तिमय श्रेष्ठ व्यापक दिव्य स्वरूपको साधक जीवधारी यहां जितना ही अनुभव करते जाते हैं वे उतनी ही उन्नतले उन्नततर ज्ञानभूमिमै आरोहण करते जाते हैं। ६९-७२ ॥ अन्तमें वेदान्तसिद्धान्तके श्रेष्ठ अनुभवको शीघ्र प्राप्त करके मत्सायुज्यको प्राप्त करते हैं और इसके बाद कृतार्थ हो जाते हैं ।। ७३॥ इसप्रकार श्रीधीशगीतोपनिषद्के ब्रह्मविद्यासम्बन्धी धोशर्षि संवादात्मक योगशास्त्रका धर्मविज्ञाननिरूपण नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त हुआ।
वेदान्तनिरूपणम् । --- चेदान्तनिरूपणम् । . ऋषय ऊचुः॥१॥ जगद्गुरो ! आदिगुरो ! पूज्य ! वेदान्तकृविभो । भवद्दयोदयादेव प्राप्तवन्तो वयं श्रुतीः ॥ २ ॥ देवापारकृपासिन्धोश्चलद्वीचेस्तटाश्रयात् । श्रुतवन्तो रहस्यानि त्वत्तोऽनेकानि साम्प्रतम ॥३॥ तत्कृतार्थीभवन्तोऽद्य तदेव प्रार्थयामहे । ज्ञानरत्नाधिवेदेषु यद्वेदान्तं प्रचक्षते ॥ ४ ॥ तस्य सर्बोत्तमं तत्त्वज्ञानमस्मानुपादिश । वयं येन परां शान्तिमाप्नुयामः सुनिश्चितम् ॥ ५ ॥ ऋषिगण बोले ।।१।। हे जगद्गुरो ! हे आदिगुरो! हे वेदान्तकृत् ! हे पूज्य ! हे विभो! हे देव श्रापकी कृपाके उदयले ही हमलोगोंने वेदोको प्राप्त किया था ॥ २॥ और इस समय आपके चलत्तरङ्ग अपार कृपारूपी समुद्र के तटाश्रयसे हमलोगोंने आपसे वेदके अनेक रहस्य सुने हैं। ॥३॥ जिससे कृतकृत्यताको प्राप्त करते हुए आज यही प्रार्थना करते हैं कि ज्ञानरत्नके समुद्र वेदों में जिसको वेदान्त कहा ॥४॥ उसी सर्वोत्तम तत्त्वज्ञान का हमको उपदेश दें जिससे हम निश्चित रूपसे परमशान्ति प्राप्त करें ॥५॥ है 1 ६६ श्रीधीशगीता। गणपतिरुवाच ॥६॥ सर्वोपनिषदां सारः पीयूपं वेदवारिधेः । विज्ञाः ! वेदान्तयोगोऽयमिदानी वर्ण्यते मया ॥ ७ ॥ मननाच्छ्वणाद्यस्य निदिध्यासनतस्तथा । त्रितापतो विनिर्मुक्तास्तत्त्वज्ञानाधिपारगाः ॥ ८ ॥ क्षमन्तेऽव्ययमात्मानं साक्षात्कर्तुं मुमुक्षवः । नात्र कश्चन सन्देहः कर्तव्यो विमपुङ्गवाः ! ॥९॥ स्वभावजस्य प्रकृतेः कर्मणः सहजस्य मे। पाशसङ्गादविद्याया अनाद्यायाः प्रभावतः ॥ १० ॥ आविर्भवति जीवत्वं चिज्जड़ग्रन्धिरूपकम् । अविद्येयमनाद्याऽस्ति जीवभावप्रकाशिनी ॥ ११ ॥ त्रिगुणात्मप्रकृत्याश्च लोल्यात्स्वाभाविकाढबुधाः !! नूनं कर्मप्रवाहोऽयमनादिर्षियते खलु ॥ १२ ॥ यतोऽस्ति सहजं कर्म कथितं पाशसन्निभम् । गणपति वोले ॥६॥ हे विझरो ! मैं तुमसे सब उपनिपदोंके साररूप और वेद समुद्रके अमृतरूप इस वेदान्तयोगका वर्णन करता हूँ जिसके श्रवण मनन और निदिध्यासन द्वारा मुमुक्ष ज्ञानसमुद्रको पार करके त्रितापसे मुक्त होते हुए अव्यय प्रात्माका साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं हे विप्रश्रेष्ठो ! इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिये ॥७-६॥ मेरी प्रकृतिके स्वभावसे उत्पन्न सहज कर्मके जालमें फंसनेसे और अनादि अविद्याके प्रभावसे जीवका चिजड़ग्रन्थिरूप जीवत्व प्रकट होता है । यह जीवभावप्रकाशिनी अविद्या अनादि हैं॥१०-२१ ॥ हे विशो ! त्रिगुणमयी प्रकृतिके स्वाभाविक चाच. ल्यहेतु यह कर्मप्रवाह भी अनादि है ॥ १२ ॥ क्योंकि "सहज कर्म .
वेदान्तनिरूपणम् । । मत्मकृत्याः स्वभावेन सहजातं न संशयः ॥ १३ ॥ भूतभावोद्भवकराद्विसर्गात्सहजादलम् । चतुर्था भूतसञोऽयं जायते कर्मणः स्वतः ।। १४ ।। अंनायाया अविद्यायाः प्रभावेण महर्पयः ।। जायते चिजड़ग्रन्धिोऽज्ञानमयो हि यः ॥ १५ ॥ जीवभावः स एवास्ति संसारावर्त्तपातकः । "प्रवियोपहित विप्राः ! चैतन्यं प्रकृतेर्मम ।। १६ ।। सत्सत्तायाः प्रभावेण व्यप्ट्यहङ्कारपूर्णितम् । द्वनस्योद्रोधकं विज्ञाः ! जीवभावं प्रपद्यते ॥ १७ ॥ पुनमें ज्ञानिनो भक्ता विद्यासाहाय्यतो द्विजाः !। -प्राप्य नित्यास्थितं मोक्षं विलीयन्ते ध्रुवं मयि ॥ १८ ॥ अविद्याया दृई जालं कर्मबन्धन दुम् । मम विप्राः प्रभावेण मद्ता अतियन्सहो ।। १९ ॥ १ पाश सदश और मेरी प्रकृतिके स्वभावके साथ उत्पन्न कहा गया है इसमें सन्देह नहीं ॥ १३ ॥ भूतभावोद्भवकर विसर्गरूपी सहज- कर्मके द्वारा इस चतुर्विधभूनसङ्घ की उत्पत्ति स्वतः ही होती है ॥ १४॥ हे महर्पिगण ! अविद्याके प्रभावसे जो दृढ अशा. नमयी चिजनन्धि उत्पन्न होती है वही संसाररूपी भंवर में डालने वाला जीवभाव है। हे विज्ञ विप्रो! अविद्योपहित चैतन्य मेरी प्रकृति की सत्सताके प्रभावसे व्यष्टि अहङ्कार के चक्र में पढ़कर. द्वैतभाव-उद्बोधक जीवत्वको प्राप्त करता है ॥ १५-१७ ॥ पुनः प्रात्मणो ! मेरा ज्ञानी भक्त विद्याकी सहायता प्राप्त कर नित्य- स्थित कैवल्यपद को प्राप्त करता हुआ मुझमें ही मिलजांता ॥ १८ ॥ हे ब्राह्मणो! मेरे भक्त अविद्याके दृढ़ जालको और दुर्दम कर्मके चन्धनको ग्रहो! मेरे प्रभावसे अतिक्रमण करलेते श्रीधीशगीता। -~----------- Juv" यतस्वैगुण्यमय्यास्ते प्रकृतिर्मय तामतः । स्वभावेनोपतिष्ठन्ते रजःसत्त्वतमोगुणाः ॥ २० ॥ उत्पत्ति रजसा विप्राः ! स्थिति सत्त्वेन सन्ततम् । तमोगुणेन संहारं करोति प्रकृति स्वतः ॥ २१ ॥ अस्मिन् स्वभावसिद्धेऽपि प्रकृतेर्मे गुणत्रये । उभावेव प्रधानौ स्तस्तमःसत्त्वाभिधानको ।। २२ ॥ प्रवृत्तिपरकत्वेन सृष्टिकारितया तथा । रजस्तु केवलं ज्ञेयं तमासत्वसहायकम् ॥ २३ ॥ अतस्तमोमयी विभाः ! यदास्ते प्रकृतिर्मम । विद्याविद्याप्रभेदहरविद्या सोच्यते तदा ॥ २४ ॥ प्रकृति, यदा त्वेषा शुद्धा सत्वमयी भवेत् । नाम्ना विद्या तदा लोके तत्वज्ञैरभिधीयते ॥ २५ ॥ परिणामो भवेत् सत्त्वे तमसो नात्र संशयः। सत्वस्यापि भवेन्नूनं परिणामस्तमस्यहो ॥ २६ ॥ है ॥ १९॥ क्योंकि मेरी प्रकृति त्रिगुणमयी है अंतः सत्त्व रज तम ये तीनों गुण उसमें स्वभावसे रहते हैं ॥ २०॥ हे ब्राह्मणो! प्रकृति रजोगुणसे उत्पत्ति सत्त्वगुणले निरन्तर स्थिति और तमोगुण से लय अर्थात् संहार स्वभावसे करती रहती है ॥२१॥ मेरी प्रकृतिके ये तीनों गुण स्वभावसिद्ध होने पर भी तम और सत्त्व ये दो गुण ही प्रधान हैं ॥ २२ ॥ रजोगुण प्रवृत्तिपर और सृष्टि कारी होने से वह तो तमोगुण और सत्त्वगुणका केवल सहायक है ।। २३ । इसी कारणले हे ब्राह्मणो ! मेरी प्रकृति जब तमोमयी रहती है तब उसको विद्या और अविद्याके भेदको जाननेवाले अविद्या कहते हैं ॥ २४॥ और जब वह शुद्ध सत्त्वमयी रहती है तब संसारमें तत्त्वज्ञानी उसको विद्या कहते हैं ॥ २५ ॥ अहो ! सत्यमे समका परिणाम और तममें भी सत्त्वका परिणाम अवश्य होता 1 . वेदान्तनिरूपणम् । ६९ , जोगुणो यतो नूनं साहाय्यं कुरुते द्वयोः । स्वभावात्मकृतिमऽस्ति यतश्च परिणामिनी ॥ २७॥ अतः स्वभावसिद्धोऽयं परिणामो मिथस्तयोः । महर्षयः ! न चवायं सिद्धान्तो विस्मयावहः ।। २८ ॥ . म्वतः पूर्ण यदा सत्त्वपरिणामस्तमोगुणे । जायते चिजगन्धिस्तत्रैवोत्पद्य प्रस्फुटम ॥ २९ ।। प्रकाशभावमापन्नः परमाणौ जड़ात्मके । उत्पादयति जीवत्वं साक्षात्मामाण्यवोधकम् ॥ ३० ॥ मा चैतन्यमयी सत्ता चिजडग्रन्थिरूपिणी । क्रमाद्विकाशमापन्नाद्भिज्जयोनौ महर्षयः !॥ ३१ ।। भाप्य स्वेदजयोनि तामाण्डजी योनिमाश्रिता । अन्य जारायुजी योनि मर्त्ययोनि प्रपद्यते ॥ ३ ॥ नत्र सत्त्वपूर्णत्वाश्रयेण प्रकृतेर्मम । है इसमें सन्देह नहीं ॥ २६ ॥ क्योंकि रजोगुण ही उभय सहायक है, और मेरी प्रकृति स्वभाव से परिणामशीला है ॥२७॥ हे मह- विंगण ! इन दोनों गुणोंका आपसमें यह परिणाम स्वभावसिद्ध है इस कारण यह सिद्धान्त आश्चर्यकारक नहीं ही है ॥२८॥ जब पूर्ण तमोगुणमें स्वभावसे सत्त्वपरिणाम उत्पन्न होता है वहीं चिजड़ग्रन्थि उत्पन्न होकर सुस्पष्ट प्रकाशभावको प्राप्त होती हुई जड परमाणुओं में प्रत्यक्षप्रामाण्यवोधक जीवत्व उत्पन्न करती है ॥२५-३०॥ हे महर्षि गण | उद्भिज्जयोनिमें वह चिजड़प्रन्धिरूपिणी चंतनसत्ता क्रमविकाशको प्राप्त करती हुई स्वेदजयोनिमें पहुंचती ।। है स्वेदजयोनिसे अण्डज योनिमें पहुंचती है, अण्डजयोनिसे 'जरायुजयोनिमें पहुंचती है और जरायुजयोनिसे मनुष्ययोनिमें पहुंचती है और वहां सत्त्वगुणकी पूर्णताके आश्रयसे मेरी विद्या- .
७० श्रीधीशगीता। Mrn कृपां विद्यास्वरूपायाः प्राप्ता स्वं रूपमश्नुते ॥ ३३ ॥ एतद्वो वर्णितं विज्ञाः ! रहस्यं गूढमदभुतम् । उत्पत्तेरपि मोक्षस्य जीवानां नु महर्पयः ! ॥ ३४ ॥ वर्त्तते गुप्तमेतद्धि सासूपनिपत्स्वपि । न प्राप्तुं कोऽपि शक्नोति श्रीगुरोः कृपया विना॥ ३५ ॥ अघट्यघटनायां या प्रकृति, पटीयसी । मास्त्यविद्यास्वरूपेण जीववन्धनकारिणी ।। 36॥ पुनः सत्त्वमयी सैव विद्यारूपस्य धारिणी । ददाति जीववर्गेभ्यः कैवल्यपदमुत्तमम ।। ३७॥ नोपासतेऽथ ये जी विद्यां स्वाधीनतां गताः । ते जीवा निश्चितं विप्राः ! अविद्याच्छन्नमानसाः ॥ ३८ गुण्यपरिणामस्य चक्रेऽस्मिन्छाश्वतीः समाः । तापत्रयं सुभुञ्जाना नितरां प्रभ्रमन्त्यहो ॥ ३९ ॥ रूपिणी प्रकृतिकी कृपाप्राप्त होकर स्वस्वरूपको प्राप्त होजाती है ॥ ३१-३३ ॥ हे विक्षमहर्षियो! यह जीवोंकी उत्पत्ति और मुक्तिका अद्भुत और गूढ़ रहस्य मैंने आपलोगोंसे वर्णन किया ॥ ३४ ॥ यह सब उपनिषदों में भी गुप्तही है, श्रीगुरुकी कृपा विना कोईभी इसको प्राप्त नहीं कर ,सका ॥ ३५॥ अघटनघटनापटीयसी मेरी प्रकृति अविद्यारूप से जीवका बन्धन करती है और पुनः वही सत्त्वमयी बनकर विद्यारूप धारण करके जीवोंको उत्तम कैवल्यपद प्रदान करती है ॥ ३६-३६ ॥ और जो जीव स्वाधीनताको प्राप्त करके विद्याकी उपासना नहीं करते हैं हे ब्राह्मणो! अविद्यासे आच्छन्नचित्त वे जीव निश्चय, इस त्रिगुण परिणामके चक्र में अनन्तकाल पर्यन्त त्रितापको भोग करते हुए अहो ! निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं वेदान्तनिरूपणम् । ७१ विशिष्टेलक्षणः सत्ताऽनुभूतिं ब्रह्मजीवयोः । मायाप्रपञ्चरूपायाः सृष्टेश्चैव द्विजर्षभाः !॥ ४० ॥ रहस्यं वर्णयाम्येतत् सावधानैर्निशम्यताम् । येन सम्यग्भवेज्ज्ञानं भवतां ब्रह्मजीवयोः ॥ ४१ ।। कारणस्थूलसूक्ष्मेभ्यः शरीरेभ्यो बहिर्गतम् | .अतीतं पञ्चकोशेभ्यो ह्यवस्थात्रयसाक्षिकम् ॥ ४२ ॥ चतुर्विंशतितत्त्वानां यदाधारस्वरूपकम् । द्वाभ्यां प्रतीयमानाभ्यां मायाऽविद्यास्वरूपिणा ॥ ४३ ।। उपाधिनेशजीवाभ्यां भिन्नं यच्च महर्पयः !। सचिदानन्दरूपं तद्ब्रह्म सम्पोच्यते बुधैः ॥ ४४ ॥ एतानि लक्षणानीह वर्णयामि यथाक्रमम् । साम्प्रतं सावधानैश्च श्रूयन्तां तत्त्ववदिनः ! ॥ ४५ ॥ पञ्चभिर्यन्महाभूतैः कृतं पञ्चीकृतैर्ननु । मुखदुःखादिभोगानां स्थानं विप्राश्च कर्मजम् ॥ ४६॥ ॥ ३८-३९॥हे द्विजवरो विशेष लक्षणद्वारा जीव और ब्रह्मकीसत्ताका अनुभव और मायाप्रपञ्चरूण सृष्टिका रहस्य आपसे मैं वर्णन करता है सावधान होकर सुनो जिससे आपलोगोंको ब्रह्म और जीवका सम्यक् ज्ञान होगा ॥ ४०-४१ ॥ हे महर्षिगरण ! स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरसे जो पृथक् हैं, पञ्चकोषोंसे जो अतीत हैं, तीनों अव- स्थाओंके जो साक्षीरूप है. चतुर्विंशति तत्त्वोंके जो आधार हैं और अविद्या तथा मायारूप उपधियोंके द्वारा प्रतीयमान जो जीव और ईश्वर इन दोनोंसे जो भिन्न हैं वही सच्चिदानन्दस्वरूपवान् ब्रह्म हैं ऐसा वुधगण कहते हैं ॥ ४२-४४ ॥ हे तत्त्वज्ञानियो ! अब मैं यहां इन सब लक्षणोंका यथाक्रम वर्णन करता हूं सावधान होकर सुनो ॥ ४५ ॥ हे विप्रो ! पञ्चीकृत पञ्च महाभूतोसे बना हुआ, कम्मोसे उत्पन्न और सुखदुःखादि भोगोंका जो स्थान है अर्थात् जिसके द्वारा - श्रीधीशगीता। MAR जायते वर्द्धतेऽस्त्येवं क्षीयते परिणम्यते । विनश्यतीति पड्भावविकारैश्च समन्वितम् ॥ ४७ ॥ स्थूलं हि तच्छरीरं स्यात्सर्वथा क्षणभङ्गुरम् । लक्षणं स्थूलकायस्य वित्तैतद्विशदं द्विजाः ! ॥ ४८ ॥ यदपञ्चीकृतैः पञ्चमहाभूतैः कृतं किलं । कर्मजं सुखदुःखादिमोगसाधनरूपकम् ॥ ४९ ।। पञ्चज्ञानेन्द्रियैविप्राः ! पञ्चकम्र्मेन्द्रियैस्तथा । पञ्चमाणैस्तथैकेन मनसा बुद्धिसंजुषा ।। ५० ।। यत्सप्तदशभिश्चैवं कलाभिः सह तिष्ठति । तद्धि सूक्ष्मं शरीरं स्यात्सूक्ष्मतत्वविनिर्मितम् ।। २१ ॥ विज्ञाः ! यदस्त्यनिर्वाच्याऽनाद्यविद्यास्वरूपकम् । कारणं हयेकमात्रञ्च स्थूलसूक्ष्मशरीरयोः ॥ ५२ ।। स्वस्वरूपाज्ञानरूपं निर्विकल्पकरूपकम् । तत्कारणशरीरं स्याज्जीवत्वप्रतिपादकम् ।। ५३ ॥ सुखदुःखादि भोग होते हैं एवं वर्तमान है, उत्पन्न होता है, बढ़ता. है, परिणामको प्राप्त होता है, क्षय होता है और नाश होता है, इन छ: भाव विकारोंसे जो युक्त है, वह सर्वथा क्षणभङ्गुर स्थूल शरीर है हे ब्राह्मणो! इसको स्थूल शरीरका स्पष्टलक्षण जानो ॥४६-४॥ हे विप्रो ! अपञ्चीकृत पञ्च महाभूतोसे ही बना हुआ, कम्मोंसे उत्पन्न और सुखदुःखादि भोगोका जो साधनरूप ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय, पांचवायु, एक मन,एक बुद्धि. इस प्रकार सत्रह कलाओस युक्त होकर जो स्थित है वह सूक्ष्म तत्त्वोंसे बना हुआ सूक्ष्म शरीर है ।। ४६-५१ ॥ हे विज्ञो.! अनिर्वचनीया अनादि विद्यारूप, स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीरका एक मात्र ही कारण, अपने स्वरूप का अज्ञानस्वरूप एवं निर्विकल्प रूप जो है वही एवं पांच वेदान्तनिरूपणम् । ७३ ~ - जीवानादिप्रवाहस्य जीवसृष्टेः पृथक् पृथक् । या मारम्भक्षणे विमाः ! चिज्जड़ग्रन्थिवान्धनी ॥ ५४ ।। जायते प्रथमावस्था तच्छरीरं हि कारणम् । संस्कारः मूक्ष्मदेहस्याऽनुक्षणं परिवर्तते ।। ५५ ।। थ्रियन्तेऽतो ध्रुवं जीवैः स्वसंस्कारानुसारतः । नानाविचित्रतोपेताः स्थूलदेहाः पृथक् पृथक् ॥ ५६।। परन्त्वनयविद्यैकमलिका सर्वथा द्विजाः । या शरीरद्वयस्यापि मूलकारणरूपिणी ॥ ५७ ॥ दशा विकारहीनाऽस्ति चिदात्यावरणक्षमा । तत्कारणशरीरम्बा ब्रुवन्ति तद्विदो जनाः ॥५८॥ विप्राः ! अन्नमयः प्राणमय एवं मनोमयः। द्वौ विज्ञानमयानन्दमयौ कोशौ तथैव च ।। ५९ ॥ कोशपञ्चकमेवैतदात्मावरणकारकम् । विद्यते नितरां विज्ञाः ! नान कोप्यस्ति संशयः ॥ १० ॥ . जीवत्वप्रतिपादक कारण शरीर है ॥ ५२-१३॥ अनादि जीव- प्रवाहकी अलग अलग जीव सृष्टिके प्रारम्भमें जड़ और चेतनकी ग्रन्थि वांधनेवाली जो प्रथम दशा पैदा होती है वही जीवका कारण शरीर है । सूक्ष्म शरीरके संस्कारोमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है और इसी कारण जीवोंको अपने अपने संस्कारोंके अनु- सार अलग अंलग नाना विचित्रतामय स्थूल शरीर अवश्य धारण करने पड़ते हैं ।।५४-५६ ॥ परन्तु हे विप्रो ! सर्वथा अनादि अविद्या- मूलिका और दो शरीरोंकी मूलकारणरूपा एवं चिदात्माको ढकने घाली और विकारहीन जो दशा है विद्वान्लोग उसको कारणशरीर कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥ हे विज्ञविप्रो ! आत्माको अत्यन्त श्रावरण करनेवाले अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय ये ही पांच कोष हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ५९-६० ॥
श्रीधीशगीता। ७४ -- - आच्छादनं तथा त्वक् च विप्राः ! आवरणादयः । कोशशब्देन गृह्यन्ते ये चान्ये वा तदर्थकाः ॥ ११ ॥ एकामुपर्युपर्येका पलाण्डुत्वग्यथा भवेत् । पञ्च कोशास्तथा ज्ञेया जीवदेहेपु निश्चितम् ॥१२॥ स्यादानन्दमयः कोशः प्रथमं तदनन्तरम् । विज्ञानमयनामास्ति तत्परश्च मनोमयः ॥६॥ ततः प्राणमयः कोशो वर्तते विप्रपुङ्गवाः ।। सर्बोपर्यस्ति कोशस्तु नूनमन्नमयाभिधः ॥ १४ ॥ जायतेऽन्नरसादेव यस्तेनैवाभिवर्द्धते । यश्चाऽन्नरसमय्यां हि क्षिसामन्ते विलीयते ॥ १५ ॥ एषोऽस्त्यन्नमयः कोपः स्थूलदेहापराभिधः । लक्षणं सूक्ष्मदेहस्य श्रूयतां मुनिपुङ्गवाः ! ॥ ६६ ॥ स्यान्मनःप्राणविज्ञानमयैः कोशैर्महर्पयः!। सूक्ष्मं शरीरं वै विप्रा इत्याहुर्वेदपारगाः ॥ १७ ॥ 1 1 हे विप्रो ! कोशशब्दसे आच्छादन छिलका आवरण आदि और तदर्थक अन्य शब्द भी समझने चाहिये ॥ ६१ ॥ जैसे प्याजमे एकके ऊपर दूसरा छिलका रहता है उसी प्रकार जीवशरीरों में पाँच कोश समझने ही उचित हैं। ६२ ॥ हे विप्रवरो प्रथम आनन्दमय कोश होता है, उसके ऊपर विज्ञानमय कोश होता है, उसके ऊपर मनोमय कोश होता है, उसके ऊपर प्राणमय कोश होता है और इन सबोके ऊपर ही अन्नमय कोश होता है। ६३-६४ ॥ अन्नके रससे ही उत्पन्न होकर, अन्नके रससे ही उन्नति (वृद्धि)को प्राप्त होकर और अन्नकी रसरूपा पृथिवीमें ही जो अन्तमें लयको प्राप्त होता है वह अन्नमय कोश है, इसीको स्थूलशरीर कहते हैं । हे मुनिवरो ! सूक्ष्मदेहका लक्षण सुनिये ॥ ६५-६६॥ हे महर्षिगण ! प्राणमय कोश, मनोमय कोश और विज्ञानमय कोशोका ही सूक्ष्म- -- वेदान्तनिरूपणम् । ७५ ..AM . मिलिताः पञ्च प्राणाश्च पञ्चकम्मेन्द्रियैः सह । ध्रुवं प्राणमयः कोश इत्याख्यामाप्नुवन्त्यहो ॥ ६८ ॥ एकमेव मनः पञ्चज्ञानेन्द्रियसमन्वितम् । नाम्ना मनोमयः कोशो नूनमाख्यायते बुधैः ॥ ६९ ॥ एकत्र मिलिता बुद्धिः पञ्चज्ञानेन्द्रियैः सह । विज्ञानमयकोशाख्यां भजते नात्र संशयः ॥ ७० ॥ कारणाख्यवपुर्भूताऽविद्यायां नन्ववस्थितम् । सत्वं मालिन्यसञ्जष्टं स्वरूपाज्ञानमेव हि ॥ ७१ ॥ मियमोदमोद भावरेभिर्युतञ्च सत् । आनन्दमयनामाऽसौ कोशः सम्प्रोच्यते बुधैः ।।७२ ॥ चतुर्विंशतितत्त्वानां यतोऽस्त्येतद्धि कारणम् अतस्तदेव सम्प्रोक्तं शरीरं कारणाभिधम् ।। ७३ ।। . एभिश्च पञ्चभिः कोपैः सम्बद्धमधुना मया । श्रूयतां प्रोच्यमानं तदवस्थात्रयलक्षणम् ॥ ७४ ।। शरीर होता है ऐसा वेदपारगामी ब्राह्मणगण कहते हैं ॥ ६७ ॥ प्राणादि पाँच वायु कम्मेन्द्रियोंके साथ मिल करही अहो ! प्राण- मय कोश इस नामको प्राप्त होते हैं ॥६॥ एक ही मन पाँचोंज्ञानेन्द्रि- योसे मिलकर ही मनोमय कोश नामसे विद्वानों के द्वारा कहाजाता है ॥६॥ एक हीवुद्धि पाँचों शानेन्द्रियोंके साथ मिलकर विज्ञानमय कोश नामको धारण करती है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७० ॥ हे ब्राह्मणो! कारणशरीरभूता अविद्यामें ही स्थित, मलिन सत्त्व, आत्मस्वरूपका ही अक्षानरूप और प्रिय भोद और प्रमोद इन भावोंसे ही युक्त आनन्दमय कोश विद्वानों के द्वारा कहा जाता है ॥ ७१-७२ ॥ और वही कारण शरीर कहा गया है क्योंकि वही चौबीस तत्त्वोंका कारण है ॥ ७३ ॥ अव इन पांचों कोषोंसे सम्बन्धयुक्त तीन अंव.
श्रीधीशगीता। जाग्रत्स्वप्नमुपुप्तयाख्यमवस्थात्रयमस्त्यहो। पञ्चज्ञानेन्द्रियैर्यत्र श्रोत्रमभृतिभिर्द्विजाः ॥ ७ ॥ शब्दादिविषयाः सम्यज्ज्ञायन्ते जाग्रदस्ति सा । स्थूलदेहाभिमान्यात्मा विश्व इत्युच्यते बुधैः ॥ ७० ॥. यत्र जाग्रदवस्थायां यच्च दृष्टं श्रुतञ्च यत् । तज्जन्यैर्वासनापुञ्जः प्रपञ्चः सम्प्रतीयते ॥ ७७॥ स्वप्नावस्थाऽस्ति सा जाग्रत्सुपुप्तचन्नरवर्तिनी । मूक्ष्मदेहाभिमान्यात्मा मोच्यते तेजसाभिधः ॥ ७८ ॥ न मया किमपि ज्ञातं मुखं निद्राऽन्वभावि च । इति जाग्रदवस्थायामनुभूतिस्मृतिहि या ॥ ७ ।। सा सुपुप्तत्यभिधावस्था कीर्त्यते तत्त्वकोविदैः । आत्मा कारणदेहस्याभिमानी माज्ञ उच्यते ।। ८० ॥ समाष्टः स्यूलदेहानां विराणनाम्नाऽभिधीयते । अतः स्थूलशरीरस्याधिदेवो विश्वनामकः ।। ८१ ॥ स्थाओका लक्षण मैं वर्णन करता हूँ सुनो ॥ ७४ ॥ जाग्रदवस्था, स्वप्नावस्था और सुषुप्ति अवस्था नामक अहो!ये तीन अवस्थाण हैं हे ब्राह्मणो श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियोंसे शब्दादि विषय जहाँ भलीभांति जाने जाते हैं वह जानवस्था है। विद्वानोंके द्वारा स्थूल शरीरका अभिः मानी आत्मा विश्व कहा जाता है ।।७५-७६॥ जाणवस्थामें जो देखने में और सुनने में आता है उससे उत्पन्न वासनासमूहके द्वारा जिस अवस्थामै प्रपञ्च प्रतीत होता है जाग्रत् और सुषुप्तिके मध्यवर्तिनी वह अवस्था स्वप्नावस्था है । सूक्ष्मशरीरका अभिमानी श्रात्मा तेजस कहाजाता है ॥ ७७-७८ ॥ मैं कुछ भी नहीं जानता था, सुखपूर्वक मैंने निद्राली इस प्रकारका अनुभव जानदवस्थामें जो याद दिलाती उसको तत्वज्ञानी सुषुप्ति अवस्था कहते हैं। कारण शरीरका अभिमानी आत्मा प्राश कहाजाता है ॥ ७१-८० ॥ समष्टि स्थूल- वेदान्तनिरूपणम् । ७७ - ममराज्यस्थदीवानां मूक्ष्मदेहावलम्बिनाम । नेनोमयं शरीरं स्यादयतो नूनं महर्षयः ! ।। ८२ ॥ मृमदेहाभिमान्यस्ति देवोऽतस्तैजसाभियः । मृक्ष्मायनोऽतिमूक्ष्मय शरीरं कारणं ततः ॥ ८ ॥ देवः कारणदेवस्याभिमानी प्राज्ञ उच्यते । चतुविनितत्त्वानि वर्णयामि निशम्यताम ॥ ८४ ।। नवनानि नैक न वर्णयन्नि महर्पयः । मतान्तगणांमध्यगां सिहान्ते न तु भिन्नता ।। ८५ ॥ श्रीचन्वनी नया चक्षरसना प्राणमेव च । पनजानन्द्रियाण्याविंज्ञा वेदान्तपारगाः ।। ८६ ।। वाकपाणिपादपायपस्थाव्यानि द्विजसत्तमाः । पन कम्मन्द्रियाण्याहुस्तत्त्वान्वेपणतत्पराः ।। ८७ ।। प्राणापानी समानचोदानव्यानो तथैव च । मणाः पत्र समान्याताः प्राणतत्त्वानुचिन्तकः ।। ८८ ॥ . शरीरको ही विराट कहते हैं इस कारण स्थूलशरीरके देवता विश्व कहाते हैं । ॥ है महर्षिगण ! सूक्ष्मराज्यके सूक्ष्म-शरीर-विशिष्ट देवनाओं का शरीर नेजोमय ही होता है इस कारण सूक्ष्म शरीरके अभिमानी देवता तेजस हैं। कारणशरीर सूक्ष्मातिसूक्ष्म ही है इस कारण उसके अभिमानी देवता प्राज्ञ कहाते हैं। चौवीस तत्त्वोंका यर्णन करता हूंमुनो। ८२-८४ ॥ हे महर्षिगण ! इन चौवीस तत्त्वोंको कोई किसी प्रकारसे वर्णन करता है, कोई किसी प्रकारसे; परन्तु ये सब मतान्तर मूल सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं हैं ॥ ५ ॥ श्रोत्र त्वक चक्षु 'रसना और प्राण, इनको वेदान्तपारगामी विज्ञगण पाँच ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं ॥ ८६ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठो ! बाक् पाणि पाद पायु और उपस्थ, इनको तत्वावपिगण पञ्च कर्मेन्द्रिय कहते हैं ॥ ७ ॥ प्राण अपान समान उदान और व्यान इनको प्राणतत्त्वानुचिन्तक पञ्च .
श्रीधीशगीता। ७८ हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले। उदानः कण्ठदेशे स्याव्यानः सर्वशरीरगः ।। ८१ ॥ शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धस्तथैव च । तन्मात्राण्यपि पञ्चैव ब्रुवते तद्विदो जनाः ॥ १० ॥ मनो बुद्धिस्तथा चित्तमहङ्कारस्तथैव च । अन्तःकरणभेदाः स्युश्चत्वारो नात्र संशयः ॥ ९१ ॥ चतुर्विंशतितत्त्वानि सन्त्येतान्येव सत्तमाः !। पञ्चविंशतमं तत्त्वमहमेवास्म्यसंशयम् ॥ २२ ॥ विप्राः ! पुरुपरूपेण नैव कार्योऽत्र विस्मयः । तत्त्वातीतं परं तत्त्वं तत्त्वज्ञा मां वन्यतः ॥ १३ ॥ विषया इन्द्रियाणाञ्च वर्ण्यन्तेऽतः परं मया । समाहितैर्भवद्भिस्ते श्रूयन्तां विभपुङ्गवाः ! ॥ ९४ ॥ श्रोत्रस्य विपयः शब्दस्त्वचः स्पर्शस्तथैव च । चक्षुषो रूपमेवास्ति रसनाया रसंस्तथा ॥ १५ ॥ . गाण कहते हैं ॥४८॥ प्राण वायु हृदयमें रहता है । अपान वायु गुदामें स्थत है। समान वायु नाभिमें है। उदान वायु कराठमें अवस्थित है और व्यान वायु सर्व शरीरमे रहा करता है 18 ॥ ज्ञानीगण शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध इनको पाँच तन्मात्रा करते हैं ॥ ६॥ मन बुद्धि चित्त और अहङ्काररूपसे अन्तःकरणके चारभेद हैं इसमें सन्देह नहीं ॥९१॥ हे सज्जनो ये हीचौवीस तत्त्व है । हे ब्राह्मणो ! निःसन्देह मैं ही पुरुप रूपसे पञ्चविंशतितम तत्त्व हूँ इस कारण तत्वज्ञानी गण मुझे तत्त्वातीत परमतत्व कहते हैं इसमें विस्मयन करो ॥९२-९३॥ अब इन्द्रियोंके विषयोंका वर्णन करता हूँ हे विप्रवरो! आपलोग समाहित होकर उनको सुनें ॥ ४॥ श्रोत्रेन्द्रियंका विषय शब्द त्वगिन्द्रियका विषय स्पर्श है, चक्षरिन्द्रियका विषय रूप ही है, रसनेन्द्रियका विषय रस है और घ्राणेन्द्रिय का विषम गन्ध ३ वेदान्तनिरूपणम् । ७२ . घाणस्य विषयो गन्धो विद्यते नात्र संशयः । वननं स्यादाविपयः पाण्योरादानमेव च ॥ १६ ॥ गमनं पादयों: पायोर्मलोत्सर्गश्च विद्यते । गत्रयाग यम्यस्य विपयोऽस्ति महर्षयः ! ।। २७ ॥ गहायक रहस्यं नो ब्राह्मणाः । वर्णयाम्यहम । गादिन्द्रियदयम्पाथ अयनां तत्समाहितः ।। १८ ।। निहायां वाग्रसादानेनन्छक्तिद्रययोगतः । भन्नन्नयेच जिहाऽसौ प्रवला विधने खलु ।। १०. ॥ निम्नयोन्योस्तथैवास्ते नृनारीचिह्नयोरपि । मुत्रत्यागात्मकः कम्मन्द्रियस्य विपयो ननु ॥ १० ॥ असन्तमबलस्पर्शसख ज्ञानेन्द्रियस्य च । तयोः प्रावल्यमेवानः प्रसिद्ध सर्वथास्सलम ।। १०१ ॥ गइल्पो निश्चयो नूनं स्मरणं गर्व एव च । नन्वन्तःकरणस्येने विषयाः स्युर्यथाक्रमम ।। १०२ ।। कन्यन्ते साम्प्रनं विज्ञाः ! देवास्तत्त्वाभिमानिनः । है इसमें सन्देह नहीं । चागिन्द्रियका विषय वक्तव्य है. पाणीन्द्रियका मिपय वस्तु ग्रहण है. पादेन्द्रियका विषय गन्तव्य है, गुदेन्द्रियका विषय मलत्याग है और है महरिंगण ! उपस्येन्द्रियका विपय मूत्र- - त्याग है ॥ १५-१७ ॥ हे ब्राह्मणो ! मैं दो इन्द्रियों का एक गुह्य रहस्य आपलोगोंसे कहता हूँ, समाहित होकर सुनो ॥ 8 ॥ जिह्वामें. रसग्रहण और वाशक्ति दोनों होनेसे वह अत्यन्त ही प्रबल है ॥ ६ ॥ उसी प्रकार पुरुपचिह्न और स्त्रीचिह्नरूपी उपस्थ और योनिमें भी मुत्रत्यागरूपी कर्मेन्द्रियका. कार्य और अतिप्रवल स्पर्शसुखरूपी भानेन्द्रियका कार्य रहनेसे उनकी प्रवलता ही सर्वथा प्रसिद्ध है ॥ १००-१०१॥ अन्तःकरणचतुष्टय (चारों अन्तःकरणके) संकल्प करना, निश्चय करना, स्मरण करता और अहङ्कार करना यथाक्रम ये चार विषय हैं ॥१०॥ हे विशमहर्पिशे अब तत्वोंके अभिमानको - श्रीधीशगीता। . निशम्यन्तां भवद्भिश्च दत्तचित्तैर्महर्षयः ! ॥ १०३॥ दिग्वातार्कमचेतोऽश्विवन्हीन्द्रोपेन्द्रमृसवः। शिवश्चन्द्रश्चतुर्वको रुद्रः क्षेत्रज्ञ ईश्वराः ।। १०४ ॥ श्रोत्रस्य हि दिशो देवास्त्वचो वायुर्न संशयः । मूर्योऽस्ति चक्षुपो देवो वरुणी रसनाधिपः ॥ १०५ ॥ घ्राणस्याप्यश्विनौ देवौ वह्निर्वाचो न संशयः। इन्द्रः पाणीन्द्रियस्यास्ति छुपेन्द्रः पादयोस्तथा ॥ १०६ ॥ मृत्युर्गुदोन्द्रियस्गास्त उपस्थस्य शिवस्तथा। रसना-योन्युपस्थेषु द्विधा शक्तिरवस्थिता ॥ १०७ ॥ तेपाम्प्रसेकमेवातो द्वौ देवौ भवतो ध्रुवम् । वरुणाग्निद्वयस्यास्ति रसना पीठरूपिणी ।। १०८ ।। प्रजापतिस्तथा वायुः शिवश्चैवं महर्षयः । पीठस्थानं त्रिदेवानामुक्तानां योनिशिश्नयोः।। १०९ ॥ अस्यतः सृष्टिकार्येषु लिङ्गयोन्योः प्रधानता। धारण करनेवाले अधिपति कहे जाते हैं सोदत्तचित्त होकर आपलोग सुनें ॥ १०३ ॥ दिक्,वायु, अर्क, प्रचेता, अश्वि, वह्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मृत्यु, शिव, चन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, और क्षेत्रज्ञ ये सब अधिपति हैं ॥ १०४॥ श्रोत्रेन्द्रियकी देवता दिशाएँ हैं, त्वगिन्द्रियकी देवता वायु ही है, चक्षुरिन्द्रियकी देवता सूर्य है, रसनेन्द्रियकी देवता वरुण है ।। १०५ ॥ घ्राणेन्द्रियकी देवता दोनों अश्विनी कुमार वागिन्द्रियकी देवता अग्नि ही है, पाणीन्द्रियकी देवता इन्द्र है, पादेन्द्रियकी देवता उपेन्द्र है. ॥ १०६॥ गुदेन्द्रियकी देवता मृत्यु है, उपस्थेन्द्रियकी देवता शिव है। रसना और उपस्थादिकमें द्विविध शक्ति निहित रहने से उनके प्रत्येकके ही दो दो देवता ही हैं। रसना वरुण और अग्निकी पीठरूपिणी है।॥ १०७-१७ || हे महर्षियो ! उपस्थ और योनिमें शिव, वायु और प्रजापतिका पीठ विद्यमान है इसी कारण सृष्टि कार्य में लिङ्ग और योनिकी , .
वेदान्तनिरूपणम् । ८१ नात्र कश्चन सन्देहः कर्तव्यो विमपुङ्गवाः ! ॥ ११०॥ चन्द्रमा मनसो देवो बुद्धेश्व चतुराननः । चित्तस्य देवः क्षेत्रज्ञो रुद्रश्चाहतेधुंवम् ।। १११ ।। विज्ञाः ! उपनिपज्ज्ञानमन्तःकरणगोचरम् । किश्चिदो वर्णयाम्यत्र दत्तचित्तैर्निशम्यताम् ।। ११२ ।। मनो बुद्धिरहहकारश्चतुर्थ चित्तमेव च । एतच्चतुष्टयं ज्ञेयमन्तःकरणसंज्ञकम् ।। ११.३ ।। एतच्चतुष्टयस्यैव ब्रह्मैव केवलं किल । विद्यतेऽधिपतिर्देव एक एव न संशयः ॥ ११४ ॥ अतोऽसौ गीयते लोके सर्वथा चतुराननः । अत्रापि कारणं वित्त बुद्धः प्राधान्यमेव ह ॥ ११५ ॥ माययोपहितं ब्रह्म विजरीश्वर उच्यते । अविद्योपहितं ब्रह्म जीवः सम्पोच्यते तथा ॥ ११६।। अविद्यामाययोर्विप्राः ! वेदे वर्णितयोः सदा। . - प्रधानता है, हे विप्रवरो ! इसमें कुछ सन्देह न करो ॥ १०६-११० ॥ मनको देवता चन्द्रमा, बुद्धिकी देवता चतुर्वक्र, अहवारकी देवता कद्र और चित्त की देवता क्षेत्र है ॥ १११॥ हे विशो। यहां मैं · अन्तःकरणके विषयमें कुछ उपनिषद्का ज्ञान आपसे कहता हूं दत्तचित्त होकर सुनो ॥ ११२ ॥ मन बुद्धि अहंकार और चतुर्थ चित्त. इन चारों को अन्तःकरण समझना चाहिये ॥११३ ॥ केवल ग्रह्मा ही इस अन्तःकरणचतुष्टयके ही अधिदैव हैं और इसी कारण घे संसारमें चतुर्वक्त कहे ही जाते हैं । यहां चारोंमें वृद्धिका प्राधान्य ही कारण जानो ॥ ११४-११५ ॥ मायारूप उपाधिसे युक्त ब्रह्मको :-विशलोग ईश्वर कहते हैं और अविद्यारूप उपाधिसे युक्त ब्रह्म जीव कहाजाता है ॥ ११६॥ हे ब्राह्मणो । वेदमें वर्णित इन भविद्या और .
८२ श्रीधीशगीता। Arran, व्योमपातालबन्द एतयोः संपतीयते ॥ १.१७ ।। विज्ञानश्चात्र वो वच्मि पार्थक्यानुगतं तयोः । अविद्या हि सदा जीवानिजायत्तान् प्रकुर्वनी ॥ १.१८ ॥ वहाऽऽसजायते स्वस्वां महामाया परन्तहो । विद्यास्वरूपिणी भूत्वा सर्वदेश्वरसात्सती ॥ ११९ ।। तमेव सेवमाना च जगत्सृष्टिलयस्थितीः । आस्ते सा विदयानाऽतः पार्थक्यं विपुलं तयोः ।। १२ ॥ शरीरं मे च मे प्राणा मनो मे धीश्च मेऽस्ति मे । ज्ञानमित्थं प्रतीयन्ते पञ्च कोशाः पृथक् पृथक् ॥ १२१ ॥ यथा स्वत्वेन विज्ञातमलङ्कारगृहांदिकम् । स्वस्माद्भिन्नं वरीवर्ति पञ्च कोशास्तथा द्विजाः॥! १२२॥ मदीयत्वेन विज्ञाता नैवात्मा स्यात् कदाचन । किन्त्वात्मा पञ्चकोपाणां ज्ञातैव भवति ध्रुवम् ॥ १२३ ॥ - मायांमें श्राकाश पातालके समान सदा भेद प्रतीत होता है ॥११७॥ उन दोनोंका पार्थक्य सम्बन्धी विज्ञान यहां आपलोगोंसे कहता हूँ। अविद्या जीवोंको सदा अपने अधीन करती हुई अपने में उनको बांधकर फसालेती है किन्तु, अहो महामाया विद्यास्वरूपिणी होकर सर्वदा ईश्वर के अधीन रहती हुई और उनकी ही सेवा करती हुई जगत् के सृष्टिस्थितिलय करती रहती है इसलिये इन दोनों में बड़ा अन्तर है॥ १८-१२० ॥ मेरो शरीर है मेरे प्राण है मेरा मन है मेरी बुद्धि है और मेरा शान है इस प्रकार से पृथक पृथकपसे पाँचों कोशीको प्रतीति होती है ॥ १२१ ॥ हेविप्रो । जैसे हमारे " हैं इस प्रकार जानेहुए अलङ्कार. और घर आदि अपनेसे भिन्न होते हैं वैसे ही पञ्चकोश, हमारे हैं इस प्रकार जाननेके कारण आत्मा कभी नहीं होसक्त हैं अर्थात् पञ्चकोश आत्मा नहीं हैं किन्तु पञ्चकोषोंके जाननेवाले निश्चयही वेदान्तनिरूपणम् । कारणस्थूलसूक्ष्माणि शरीराण्येवमेव च । जाग्रत्स्वप्नमुपुप्त्याख्यमवस्थात्रयमेव हि ॥ १२४ ॥ चतुर्विंशतितत्त्वानि पूर्वमुक्तानि यानि वै । जीवेश्वरी द्विजाः ! एते आत्मा नैव कदाचन ॥ १२५ ॥ तत्त्वज्ञानाश्रयादित्थं नेति नेति विचारतः। सबै स्थूलं सजन्तोऽलं सूक्ष्मान्वेपणतत्पराः ॥ १२६ ॥ भवेयुश्चेन्निरासक्तास्तत्त्वातीतं पदं गताः । तदा मां सर्वदा तत्र भवन्तो द्रष्टुमीशते ॥ १२७ ।। अतीतः सर्वतत्त्वेभ्यः तथैव पञ्चकोपतः । सचिदानन्दरूपोऽहमिति जानीत निश्चितम् ॥ १२८ इति श्रीधीशगीतामपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे धीशसिम्बादे वेदान्तनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः। . आत्मा है ।। १२२-१२३ ।। इसी रीति से ही हे विप्रो ! स्थूलशरीर स्मशरीर और कारणशरीर, जानवस्था स्वप्नावस्था सुषुप्ति अव- स्था ये तीनों अवस्थाएँ, पूर्वोक्त चौवीस तत्त्व, जीव और ईश्वर, ये कमी आत्मा नहीं ही होसके हैं ॥ १२५-१२५ ॥ इस प्रकार तत्त्वज्ञान की सहायता से यदि आपलोग नेति नेति विचारद्वारा सब स्थूलको छोड़ते हुए सूक्ष्मके अन्वेषणमें तत्पर होकर निरालत होंगे तो सर्वदा तत्वातीत पदमें स्थित होकर वहां मेरे दर्शनको प्राप्त कर सकोगे ।। १२६-१२७ ।। मैं पञ्चकोषोंसे परे और सब तत्वोसे अतीत सचिदानन्द स्वरूप हूँ यह निश्चय करके जानना ॥१२॥ 'इस प्रकार श्रीधीशगीतोपनिषद्म ब्रह्मविद्यासम्बन्धी योगशास्त्रकाधीशर्पिसम्वादात्मक वेदान्तनिरूपण नामका पञ्चम अध्याय समाप्त हुआ। - ८४ श्रीधीशगीता। वेदान्तसिद्धान्तनिरूणम् । श्रीगणपतिरुवाच ॥१॥ मत्मकृत्यैव जातस्य ब्रह्मणः कार्यतपिणः। स्वरूपं वर्णितं विप्राः ! भवद्भिश्च श्रुतं सल ॥ २॥ चतुर्विंशतितत्त्वैहि पिण्डब्रह्माण्डरूपकम् । दृश्यमानं जगज्जातं सर्वमेतचराचरम् ॥३॥ पञ्चकोषाश्च पिण्डानि व्याप्नुवन्तो महर्षयः !। आवृण्वन्तोऽवतिष्ठन्ते मत्स्वरूपं न संशयः ॥ ४ ॥ तत्त्वज्ञैः सर्वपिण्डेषु पञ्चकोशसमन्वयम् । ज्ञात्वा सर्वत्र मच्छतेस्त्वेकत्वमनुभूयते ॥५॥ ममैव प्रकृतिविज्ञाः ! मायानाम्नाऽभिधीयते । नूनं नैगुण्यमय्येषा भवन्ती परिणामिनी ॥ ६॥ गणपति बोले ॥ १॥ हे ब्राह्मणो ! मेरी प्रकृतिसे ही उत्पन्न कार्यक्रमका स्वरूप मैंने वर्णन किया है और आपलोगोंने सुना भी है ॥२॥ चतुर्विशति तस्वोसे ही ब्रह्माण्डपिण्डात्मक ये सब चराचर जगत्समूह अश्यमान है ॥ ३ ॥ और हे महर्षिगण ! पञ्चकोष सव पिण्डोंमें व्याप्त होकर मेरे स्वरूपको निःसन्देह ढके हुए हैं ॥ ४॥ परन्तु तापानी सब पिण्डों में पञ्चकोषकासमन्वय जानकर सद स्थानों में मेरी शक्तिको अतता अनुभव करते हैं ॥ ५॥ हे विशो ! मेरी प्रकृति हो भायानामसे अभिहित होती है। हे विनो! यहाँ त्रिगुणा- वेदान्तसिद्धान्तनिरूपणम् । ८५ Rom Pur----- कुर्वत्यास्ते सदा विमा! दृश्यसृष्टिलयस्थिती। सृष्टिकाले भवेत्तस्या आकाशः प्रकृतस्ततः ॥७॥ आकाशाद्वायुरप्येवं वायोरग्निर्न संशयः। अग्नेर्जलं जलात्पृथ्वी जायते ब्राह्मणोत्तमाः ! ॥८॥ एतेषां पञ्चतत्त्वानामाकाशस्य भवेत्पुनः । सात्त्विकादंशतो नूनमिन्द्रियं श्रोत्रनामकम् ॥९॥ वायोस्त्वक् सात्त्विकादंशादग्नेश्चक्षुर्भवेत्ततः । जलस्य सात्त्विकादशाद्रसना जायते ध्रुवम् ॥ १० ॥ पृथिव्याः सात्त्विकादंशाव्राणमुत्पद्यते द्विजाः ।। एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टेः सात्त्विकांशतः ॥ ११ ॥ मनो बुद्धिरहङ्कारस्तथा चित्तं भवन्त्यहो । द्विजोत्तमाः ! मनः कर्तृ स्यात्सकल्पविकल्पयोः ॥ १२ ॥ अहङ्कारोऽस्सहकर्ता बुद्धिनिश्चयकारिणी । चित्तं स्मर्तृ च सापां संस्काराणां यतः खनिः ॥ १३ ॥ Tr त्मिका प्रकृति सदा परिणामिनी होती हुई दृश्यका सृष्टि स्थिति लय करती रहती है। हे विप्रवरो ! सृष्टि करते समय उस प्रकृतिसे आकाश, आकाशले वायु, घायु से अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है इसमें सन्देह नहीं ॥ ६-८॥ और इन पांच तत्त्वों से आकाशके ही सात्त्विक अंशसे श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न होता है ॥ ९ ॥ वायुके सात्त्विक अंशसे त्वगिन्द्रिय, अग्निके सात्त्विक अंशसे चक्षुरिन्द्रिय, जलके सात्त्विक अंशसे रसनेन्द्रिय निःसन्देह उत्पन्न होता है ॥१०॥हेब्राह्मणो!पृथिवीके सात्त्विक अंशसे घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न होता है। अहो ! इन पाँचों तत्वोंके समष्टि (मिले हुए ) सात्विक अंशसे मन बुद्धि चित्त औरअहङ्कार उत्पन्न होते हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! संकल्प विकल्प करनेवाला मन है, अहकार करनेवाला अहकार है, निश्चय करनेवाली बुद्धि है, स्मरण करनेवाला चित्त है क्योंकि श्रीधीशगाता। एतेषु पञ्चतत्त्वेषु हयाकाशस्य रजोंऽशतः। वागिन्द्रियं समुत्पन्न वायोः पाणीन्द्रिय नथा ॥ १४ ॥ अग्नराजसिकादशाज्जायते पाद इन्द्रियम् । जलस्य राजसादशात् स्यादुपस्थेन्द्रियं. तथा ॥ १५ ॥ गुदेन्द्रियं पृथिव्यास्तु राजसांशात्मजायते । एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टे राजसांशतः ॥ १६ ॥ प्राणादयो भवन्सेते वायवः पञ्चसङ्ख्यकाः । कृकरो नागकूम्मौ च देवदत्तधनञ्जयौ ॥ १७ ॥ उपवायव एते हि तेष्वेवान्तर्भवन्त्यहो । एतेषां पञ्चतत्त्वानां तामसांशसमष्टितः ॥ १८ ॥ पञ्चीकृतानि जायन्ते महाभूतानि पञ्च च । स्थूलाक्ष्यगोचरं विप्राः ! सूक्ष्मराज्यं सदा भवेत् ॥ १० ॥ स्थूलं विश्व महाभूतैर्जातं पञ्चीकृतैर्यतः । मूक्ष्मैः पञ्चमहाभूतैः कथं पञ्चीकृतान्यहो ।॥ २० ॥ A यह सब संस्कारोंका श्राफर है।। ११-१३॥ इन्हीं पाँचों तत्वोमेसे आका शकेराजस अंशसे वागिन्द्रिय,वायुके राजस अंशले पाणीन्द्रिय, पह्निके राजस अंशसे पादेन्द्रिय, जलके राजस अंशसे उपस्थेन्द्रिय और पृथिवीके राजस अंशसे गुदेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं । इन पञ्चतत्वों के समष्टि ( मिले हुए.) राजस अंशसे प्राणादि पाँच वायु उत्पन्न होते हैं। अहो ! उपवायु, नाग कूर्म कर देवदत्त और धनञ्जय भी उक्त पाँच वायुओके अन्तर्गत ही हैं। इन पाँचों तत्वों के समष्टि (मिले हुए ) तामस अंशले पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत उत्पन्न होते है। हे ब्राह्मणो ! सूक्ष्मारज्य स्थूल इन्द्रियोंसे सदा अगोचर है ॥१४-१६ ॥ क्योंकि स्थूल जगत् पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतसे उत्पन्न है। हे ब्राह्मणो ! सूक्ष्म पञ्च महाभूतोंसे पञ्चीकृत स्थूल पञ्च महाभूत .
वेदान्तीसद्धान्तनिरूपणम् । २७ m पञ्च स्थूलानि जायन्ते महाभूतानि भूसुराः । तत्लकारं प्रवक्ष्येऽहं शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥ २१ ॥ एतत्पञ्चमहाभूततामसांशस्वरूपकम् । एकमेकं द्विधा भूनं विभज्यैकैकमर्द्धकम् ॥ २२ ॥ अवस्थाप्यापरं विज्ञाः ! चतुर्धाऽपरमर्द्धकम् । विभज्यैवं पृथक्त्वेन स्थापितार्द्धषु निश्चितम् ॥ २३ ॥ विभागेपु विभक्तस्य चतुर्धा विप्रपुङ्गवाः । एकैकस्य च भृनार्दा:मकस्यैकं किलैककम ॥ २४ ॥ अंशं कृत्वाऽथ संयुक्तं स्यात्पञ्चीकरणं ध्रुवम् । पञ्चीकरणनामायं विधिरत्यन्तमदभुतः ॥ २५ ॥ म्वाः प्रसेकभूतस्यापरेपां मिश्रितो भवेत् । भृतानामर्द्धभागस्य चतुर्थाशो न संशयः ॥ २६ ॥ यथा पञ्चीकृनाकाशे तस्याऽपञ्चीकृतस्य नु। अर्द्धमस्सपरेपाच भूतानां हे महर्षयः !॥ २७ ॥ कैसे उत्पन्न होते हैं उसका प्रकार मैं कहता हूं समाहित होकर सुनो ॥ २०-२१ ॥ हे विज्ञब्राह्मणोत्तमो! इन पाँचौं महाभूतोंके ताम- सांशस्वरूप एक एक भूतके दो दो भाग करके और एक एक भागको पृथक् रखकर दूसरे दूसरे भागके चार चार भाग करके पृथक् रक्खे हुए भागोंमें एक एक भाग प्रत्येक भूतका संयुक्त करनेसे निश्चय पञ्चीकरण होता है। यह पञ्चीकरण विधि अत्यन्त अद्भुत है ॥ २२-२५ ॥ प्रत्येक भूतके अपने आधे में प्रत्येक दूसरे भूतोके आधे भागका चतुर्थांश मिला हुआ रहता है इसमें सन्देह नहीं ।। २६ ॥ हे महर्पियो ! जैसे पञ्चीकृत आकाशमैं अपञ्चीकृत आकाशका आधा भाग और दूसरे प्रत्येक अपञ्चीकृतभूतोके अर्द्ध भागका चतुर्थांश अर्थात् अपर प्रत्येक भूतोका अष्टमांश मिला हुआ है इसमें सन्देह नहीं, इसी प्रकार प्रत्येक भूतमें मिश्रण जानना , ८८ श्रीधीशगीता। नन्वपञ्चीकृतानाम्दै अष्टमांशो न संशयः । एवमन्येषु भूतेषु वोद्धव्यं मिश्रणं ध्रुवम् ॥ २८ ॥ एतैः पञ्चीकृतैः पञ्चमहाभूतैर्हि जायते । ब्रह्माण्डं सततं स्थूलं प्रसेकं नात्र संशयः ॥ २९ ॥ ब्रह्माण्डमाप प्रसेकमधश्चो विभज्यते । तचतुर्दशलोकेषु नानाश्चर्यमयेष्वहो ॥ ३० ॥ ब्रह्माण्डे तत्र प्रसेकमुद्भिजस्वेदजाण्डजाः । जरायुजाश्च जायन्ते चतुर्धा स्थूलदेहकाः ॥ ३१ ॥ देव्यास्तव्यतिरिक्तं वै सृष्टवैचित्र्यमुत्तमम् । किमप्यपूर्वमेतेभ्यो विद्यते विप्रपुङ्गचाः ! ॥ ३२ ॥ जीवास्तत्तच्छरीराणामभिमानिन आसते । ईश्वरोऽनन्तब्रह्माण्डाभिमानी विद्यते खलु ॥ ३३ ॥ ब्रह्माण्डपिण्डयोरैक्यमेवं जातं महर्षयः ।। नैवात्र विस्मयः कार्यों भवद्भिर्विप्रपुङ्गवाः ! ॥ ३४ ॥ ईश्वरस्य च जीवस्य भेदो ब्रह्मणि कल्प्यते । चाहिये ॥ २७-२८ ॥ इन पश्चीकृत पञ्च महाभूतोसे ही प्रत्येक स्थूल ब्रह्माण्ड निरन्तर उत्पन्न होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ २९ ॥ प्रत्येक ब्रह्माण्ड भी ऊर्वाधोरूपसे नानाश्चर्यमय चतुर्दश भुवनों में विभक्त है. ॥३०॥ उन प्रत्येक ब्रह्माण्डोंमें उद्भिज स्वेदज अण्डज और जरायुजये चार प्रकारके स्थूल शरीर उत्पन्न होते हैं ॥ ३१॥हेविप्र- श्रेष्ठो! इनके अतिरिक्त दैवी सृष्टिको उत्तम विचित्रता इनसे कुछ वि. लक्षण ही है ॥३२॥ शरीरीका अभिमान रखनेवाले जीव और अनन्त ब्रह्माण्डोंके अभिमान रखनेवाले ही ईश्वर हैं ॥३३ ।। हे महर्षिगण! इस प्रकारसे पिण्ड और ब्रह्माण्डकी एकता प्रतिपन्न हुई, हे विप्रवरो! आपलोग इसमें विस्मय न करें। ३४॥हे ब्राह्मणो ब्रह्ममें ही विद्या वेदान्तसिद्धान्तनिरूपणम् । PIN मायाऽविद्यात्मकान्नूनं क्रमादावरणादद्विजाः ! ॥ ३५ ॥ ब्रह्मणः प्रतिविम्यं हि जीयो देहाभिमानकः । स्वस्मात्स्वभावतो भिन्न ईश्वरस्तेन मन्यते ॥ ३६ ।। ईश्वरस्य च जीवस्य भेदो यावदुपाधितः । तिष्ठेव, तावत्क्षणं विमाः ! कथञ्चिच्च कदाचन ॥ ३७॥ जन्ममृत्युप्रवाहोऽसौ संसारो न निवर्त्तने । ईश्वरे चैव जीवे च भेदबुद्धिः कदाप्यतः ॥ ३८ ॥ न कर्तव्या द्विजश्रेष्ठाः ! नत्वज्ञैरात्मवदिभिः । मङ्गलं जायते तेपामतो नूनं महर्पयः ! ॥ ३९ ॥ साहकारस्य जीवस्य किचिज्ज्ञस्य हि कोविदाः!। सर्वनेश्वरेणाहो निरहङ्कारिणा सह ॥ ४० ॥ तत्त्वमस्यादिभिर्वाक्यरेतयोभिन्नधर्मयोः । कथं वभेदबुद्धिः स्याच्छड्न्यते चेन्निशम्यताम् ॥ ४१॥ अर्थद्वयं द्विजश्रेष्ठाः ! स्यात्तत्वंपदयोर्द्वयोः। . औरमायारूप आवरणके द्वारा जीव और ईश्वर का भेद कल्पना किया गया है॥३५॥ शरीरका अभिमान रखनेवाला जीव ब्रह्मका प्रति- यिम्य है, वह जीय स्वभावसे ही ईश्वरको अपनेसे मिन्न समझना है ।। ३६ ॥ हे विप्रो ! उपाधिके भेदसे जीव और ईश्वरमें भेददृष्टि जव तक रहती हैं तब तक जन्ममरणप्रवाहरूप यह संसार कभी और किसी प्रकार निवृत्त नहीं होता है इस कारणसे हे द्विजश्रेष्ठो! जीष और ईश्वरमै भेददृष्टि तत्त्वज्ञ प्रात्मशानियोंको कदापि नहीं करनी चाहिये । हे महर्पियो! इससे उनका अवश्य मंगल होता है ।। ३७-३६ ॥ हे विंशो! अहङ्कारवान् और अल्पक्ष जीवको निरहङ्कार और सधश ईश्वर के साथ " तत्वमसि " आदि महावाक्योंके द्वारा, अहो! इन दोनों विरुद्धधमियों में अभेदबुद्धि कैसे हो सकती है। यदि ऐसी शङ्का करो तो सुनो ॥ ४०-४१ ॥ हे 'विश विप्रवरो।
२० श्रीधीशगीता। वाच्यार्थश्चैव भो विज्ञाः ! लक्ष्यार्थश्च न संशयः ॥ ४२ अविद्यावांश्च नत्कार्यकर्तृत्वादिगुणयुतः । जीवो देहाभिमानीति वाच्याऽर्थस्त्वम्पदस्य हि ।। ४६ अविद्योपाधिनिर्मुक्तं समावेश्च दशां गतम् । अविद्यया च नत्काय रहित प्रतिभान्विताः ॥ ४४ चिन्मात्रं शुद्धचैतन्यं लक्ष्यार्थस्त्वम्पदस्य वै । वाच्यार्थश्चैव लक्ष्यार्थस्तत्पदस्यापि कथ्यते ॥ ४ ॥ मायातत्का>सर्वज्ञभावादिगुणसंयुतः। ईश्वरस्तत्पदस्यास्ति वाच्यार्थो नात्र संशयः ॥ ४० ॥ मायातकार्यतः शून्यं मायोपाधिविजितम् । चिन्मानं शुद्धचैतन्यं लक्ष्यार्थिस्तत्पदस्य वै ॥ ४७॥ ईश्वरस्य च जीवस्य शुद्धचैतन्यरूपतः । अभेदे वाधकाभावः स्यादेवं ब्राह्मणोत्तमाः ॥ ४८ ।। अहं ब्रह्मास्मि' चेसादिमहावाक्यैरपि द्विजाः । तत् और त्वं इन दोनों पदोंके वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थरूप दो दो अर्थ होते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ४२ ॥ अविद्या, उसका कार्य और कर्तृत्वादि गुणवाला और शरीरका अभिमानी जीच यही स्वंपदका वाच्यार्थ है ॥ ४३ ॥ हे प्रतिभाशालियो ! अविद्यारूप उपाधिसे निर्मुक्त, समाधिदशाप्राप्त, अविद्याऔर उसके कार्यसे रहित, चिन्मात्र और शुद्ध चैतन्य ही त्वंपदका लक्ष्यार्थ है। अब तत्पदका भी वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ कहता हूँ ॥ ४४-४५ ॥ माया और उसका कार्य एवं सर्वज्ञत्व आदि गुणोंवाला ईश्वर तत्पदका वाच्य अर्थ है इसमें सन्देह नहीं ॥ ४६ ॥ मायारूप उपाधिसे शुन्य. शुद्ध चैतन्य, माया और उसके कार्यसे रहित और चिन्मात्र ही तत्पदका लक्ष्य अर्थ है॥४७॥ हे विप्रश्रेष्ठो! इस प्रकारसे जीय और ईश्वरमें चैतन्यरूपसे अभेद होनेमें कोई बाधक नहीं है ॥ ५ ॥ हे विप्रो उन दोनों की एकता"अहं ब्रह्माऽस्मि इत्यादि महावाक्योंसे भी .
९१ वेदान्तसिद्धान्तनिरूपणम् । विज्ञायते तयोरैक्यमुभयोर्नात्र संशयः॥ ४९ ॥ ब्रह्म सर्वं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव केवलम् । इति. शास्त्रोपदेशेन श्रीगुरोरुपदेशतः ॥ ५० ॥ स्वानुभूत्याऽथवा विज्ञाः ! ये विदन्ति सुसाधकाः । यपांच प्राणिमात्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणोत्तमाः ! ॥ ११ ॥ ब्रह्मबुद्धिः समुत्पन्ना ज्ञानयोगेन सर्वथा । त एव ज्ञानिनो भक्ता जीवन्मुक्ता भवन्ति मे ।। ५२ ।। पतद्वेदान्तसिद्धान्ततात्पर्य हि निशम्यताम् । अविद्योपाधिसम्भ्रान्तिर्यदा दूरीभविष्यति ।। ५३ ।। ब्रह्मसत्व लक्ष्यार्थरूपेणैवावशिप्यते । मायोपाधेमहत्त्वञ्च तत्त्वज्ञानेन वेत्स्यते ।। ५४ ।। नतश्च ब्रह्मरूपो हि लक्ष्यार्थः परिशिष्यते । जीवन्मुक्ता महात्यानस्तत्त्वज्ञानाधिपारगाः॥ ५५ ॥ जीवेशयोरित्यमेतमभेदमनुभूय च । ब्रह्मानन्दे निमज्जन्तः कृतकृत्या भवन्ति ते ॥ ५६ ।। जानी जाती है इसमें सन्देह नहीं ॥४९॥ हे विश विप्रवरो! जो सुसा- धक ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है और जीव केवल ब्रह्म ही है ऐसा शास्रोपदेशसे श्रीगुरूपदेशसे और अपने अनुभवसे जानते हैं एवं जिनकी सब प्राणिमात्रों पर ज्ञानयोगसे सर्वथा ब्रह्मबुद्धि उत्पन्न हुई है वेही मेरे ज्ञानी भक्त जीवन्मुक्त हैं॥१०-५२॥इस वेदान्त के सिद्धा. न्नका तात्पर्य सुनो। जव अविद्यारूप उपाधिभ्रम दूर होजायगा तो ब्रह्मसत्ता लक्ष्यार्थरूपसे अवशेष रहेगी। उसी प्रकार जय मायारूप उपाधिका महत्व तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञात होगा तब भी लक्ष्यार्थरूप ब्रह्मही अवशेष रह जायगा। इस प्रकारसे तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्मा जीध और ईश्वर दोनोंकी यह अभेद सत्ता अनुभव करके वे ब्रह्मानन्दमें निमग्न होते हुए कृतकृत्य होते हैं ॥५३-१६ ॥
९२ श्रीधीशगीता। ____ . M जडैजीवंगणौर्विश्वं विपयात्मकमीक्ष्यते । अज्ञानिजीवजातन सुखरूपं निरीक्ष्यते ।। ५७ ॥ जगत्प्रपञ्चजातन्तु ज्ञानवनिर्विवकिभिः । परिणामीति विज्ञाय दुःखरूपं प्रतीयते ।। ५८ ॥ किन्तु मे ज्ञानिनो भक्ता जीवन्मुक्तगणाः खलु । संसारमेतं पश्यन्ति स्वरूपे काऽप्यलौकिके ॥५॥ संसार में प्रकृत्यैत प्रसूतं सर्वथाऽद्भुतम् । आकाश इव गान्धर्व पश्यन्तो नगरं मुहुः ॥ ६ ॥ मिथ्यैव तत्स्वरूपञ्च जानन्तोऽपि द्विजोत्तमाः । दर्श दर्श प्रमोदन्ते तद्रूपं कौतुकप्रदम् ।। ६१ ॥ मृगतृष्णासमं विश्वं भ्रान्तिस्तोमसमाकुलम । दृष्ट्वेन्द्रजालवन्मिथ्या-अपञ्चावलिमूलकम् ॥ ६२ ।। मम शक्तेर्गुणानाञ्च परिणामस्वरूपकम् । तत्र नैव प्रसज्जन्ते पद्मपत्रामिवाम्भसि ।। ६३॥ तिष्ठन्तोऽपि प्रपञ्चेषु पृथग्भूतास्ततो ध्रुवम् । इस संसारको जड़ जीवगण विषयके रूपमें देखते हैं, अज्ञानी जीध- गण सुखरूपसे देखते हैं ॥ ५७ ॥ ज्ञानवान् विवेकिजन सम्पूर्ण संसारप्रपञ्चको परिणामी जानकर दुःखमय रूपमै अनुभव करते ॥ ५८ ॥ परन्तु मेरे ज्ञानीभक्त जीवन्मुक्तगण इस संसारको कुछ और ही अलौकिक रूपमें देखते हैं ।। ५५ ॥ हे विप्रवरो! वे मेरी प्रकृतिप्रसूत सर्वथा अद्भुत इस संसारको आकाशमै गन्धर्वनगरके : समान वार वार देखकर और उसके स्वरूपको मिथ्या ही जानते हुए भी उस कौतुकप्रदपको देख देखकर आनन्दित होते हैं ॥ ६०-६१ ॥ वे इस संसारको मृगमरीचिकावत् अनेक भ्रमयुक्त, इन्द्रजालवत् मिथ्या प्रपञ्चोंका मूल और मेरो शक्तिके ही गुणोंका परिणामस्वरूप देखकर उसमें फंसते ही नहीं। वे इस प्रपञ्चम रहकर भी जलमैं पापत्रके समान उससे अलग ही रहते हैं।
वेदान्तसिद्धान्तनिरूपणम् । भवितुं घेतदेवाऽौं लक्ष्यमुच्चपदं हितम् ॥ ६४ ॥ श्रेष्ठानां ब्राह्मणानां हि सर्वत्रैव सुखावहम् । परीवारोपमास्तेषां संसारा अखिला अमी॥६५॥ देवर्षिपितृसङ्घाश्च तदर्थ बान्धवोपमाः। साज्यं वाऽऽदेयमप्यस्ति तेषां नैवेह किञ्चन ।। ६६ ॥ पितरौ च कुलं जाति स्थूलदेहेन कुर्वते । निखिलां पृथिवीं धन्यां मातृभूमि विशेषतः ॥ ६७ ॥ दैवीञ्च जगतीं सूक्ष्मां सूक्ष्मदेहेन कुर्वते । सर्वदा सर्वथा धन्यां ते विप्रा नैव संशयः ।। ६८ ॥ ब्रह्मानन्दसुसन्दोहसविलासस्वरूपतः । धन्यं धन्यं पुनर्धन्यं कुर्वते.मामसंशयम् ॥ ६९ ॥ इति श्रीधीशगीताम्पनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे धीशार्प- संवादे वेदान्तसिद्धान्तनिरूपणं नाम पष्ठोऽध्यायः । . श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यही सर्वत्र ही सुखप्रद हितकर उच्चपद लक्ष्यरूप होना चाहिये । उनके लिये ये सब संसार परिवारके समान है ॥ ६२-६५ ।। देवता ऋषि और पितृगण उनके लिये बान्धध हैं। उनके लिये इस संसारमें गृहणीय भी कुछ नहीं ही है और त्याग करने योग्य भी कुछ नहीं ही है ॥६६॥ वे स्थूल शरीरसे माता पिता कुल जाति और समस्त पृथिवीको और विशेषतः जन्म- भूमिको धन्य करते हैं ॥ ६७ ॥ हे विप्रो। वे सूक्ष्मशरीरसे सूक्ष्मदैवी जगत्को सब 'प्रकारले सर्वदा धन्य कहते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥६८ ॥ और ब्रह्मानन्दसुसन्दोहके सम्यक् विलासखरूपसे नि:. सन्देह मुझे धन्य धन्यकरते हैं ॥ ६९ ॥ इस प्रकार श्रीधीशगीतोपनिषदें ब्रह्मविद्यासम्बन्धी योग- शास्त्रका धीशर्षिसंवादात्मक वेदान्तसिद्धान्तनिरूपण नामका छठा अध्याय समाप्त हुआ। 4 - - ९४ श्रीधीशगीता। be विराट्स्वरूपनिरूपणम् । ऋषय ऊचुः ॥ १ ॥ . हे सर्वज्ञ ! जगन्निवास ! भगवन् ! देवादिदेव ! प्रभो ! हे सर्वादिगुरो ! दयार्णव ! विभो ! विश्वेश ! विश्वम्भर !। अस्माकं भवतामपारकृपया नूनं तृतीय वर-- मद्यान्तर्नयनात्मकं सुविमलं ज्ञानाति प्रोन्मीलितम् ॥ २ ॥ पश्यामोऽद्य भवद्दयोदयवशाद्वारे मणीनां गणान सूत्रं प्रोतमिवान्तरेण निखिलब्रह्माण्डपिण्डव्रजे । सर्वेषां कुरुते सदैकविधिनाऽनुस्यूततामाप्तवान चैतन्यास्तितयोविधानमाखिलं शश्वद्भवानित्यहो ॥ ३ ॥ पश्यामस्तरतो गृहेऽपरिमितान् भूयो यथाऽनन्त ! हे रन्ध्रद्वारनिविष्टसूर्यकिरणस्तोमेष्वणूनां गणान् । . ', ऋषिगण वोले ॥१॥ हे प्रभो ! हे भगवन् ! हे सर्वज्ञ ! हे दयार्णव हे विश्वेश! हे देवादिदेव ! हे जगन्निवास ! हे सब गुरुओंके आदिगुरु ! हे विश्व म्भर ! हे विभो ! आपकी अपार कृपासे आज हमारा अन्तर्नेत्ररूपी ज्ञाननेत्र जो श्रेष्ट निर्मल तृतीय नेत्र है सो निश्चय ही खुल गया है आपकी कृपाके उदयसे अब हम देखते हैं कि आप जैसे मालाम मणिगणके बीच पिरोया हुआ सूत्र रहता है उसी प्रकार सय पिण्ड और सब ब्रह्माण्डोंमें एकरूपसे सदा अनुस्यूत रहकर अहो! सबके अस्तित्व और सबके चैतन्यका सम्पूर्ण विधान निरन्तर करते हैं ॥ ३॥ पुनः हे अनन्त ! जिस प्रकार घरमें छिद्ररूपमार्गले, प्रविष्ट सूर्यकिरणोंमें तैरते हुए अपरिमित अणुसमूहको हम .
विराट्वरूपनिरूपणम् । ९५ .marwa- ब्रह्माण्डानि तथा तरन्ति च विराइदेहाश्रितानि प्रभो- नायन्ते विपुलेऽमितानि वियति प्रोद्योतयन्ति ह्यमुम् ||४|| पश्यामश्च पुनर्वयं तव विरारूपं हि यत्राधुना भात्यन्तो हरितां न चादिरापि तद्देशस्य सन्दश्यते । पच्यामश्च पुनर्वयं तव महादेहे महाकौतुकम् व्याप्तश्वाऽगणितविराड्बपुपि ते मूर्यग्रहोपग्रहः ॥ ५ ॥ मयातमतिघाततः परिणमन् ब्रह्माण्डमाण्डव्रजः हान्योऽन्यं परमाणुल्पनिचयेऽनन्तो महाकाल ! हे । जायन्ते परमाणवश्च निखिला ब्रह्माण्डरूपाः पुनः नानाकारयुताः प्रभो ! बहुविधाः प्रत्येकमेव क्षणम् ॥ ६॥ नक्षत्रावलिभिश्च नूनमखिलैः क्वापि ग्रहोपग्रहैः मुांद्यहि समारताः सुमधनाः सन्तः परीणामतः । ब्रह्माण्डव्रजसम्भवक्षयविधिर्यत्र प्रभो ! भासते । देखते हैं उस प्रकार आदि अन्त रहित महाकाशमें अनन्त ब्रह्माण्ड- समूह आपके विराट् देहको आश्रय करके तैर रहे हैं और शोमाको निश्चय ही बढ़ा रहे हैं ॥ ४ ॥ हम पुनः देख रहे हैं कि आपका • विराट्रूप जहां इस समय प्रकाशित होरहा है उस देशकी दिशानोका न आदि और न अनन्त ही दिखाई देता है। हे महाकाल! हम पुनः आपके विराट् देहमै महाकौतुक देख रहे हैं ! आपके उस विराट् वपुमै अनन्त सूर्य और अनन्त ग्रह उपग्रह द्वारा परि- व्याप्त अनन्त ब्रह्माण्डसमूह आपसके घातप्रतिघातसे परमाणु- ऊपोंमें परिणत होरहे हैं और हे प्रभो! कहीं सब परमाणुपुज सम्यकापसे पुनः घनीभूत होकर नक्षत्रसमूह और सूर्यादि अखिल ग्रहोपग्रहोसे श्रावृत अनेक प्रकारके और अनेक आकृति. वाले ब्रह्माण्डरूपों में अनुक्षण ही परिणत होरहे हैं। परन्तु हे श्रीधीशगीता । काले तस्य न दृश्यते कथमपि त्वादिर्न चान्तः परम् ।। ७ सार्द्धश्चत्र बिराइनन्तवपुपा प्रोतातयोस्ते नयोः नान्तो नादिरवेक्ष्यते किमपि चेद्देशस्य कालस्य च । द्रष्टुं तर्हि विराड़नन्तवपुपः शक्तः कथं कोऽप्यहो आदि चान्तमशेषतः किमुत नै मूढा बनाऽस्मादृशाः ॥ ८ भूतस्रष्टरु ! भूतपालक ! सदा हे भूतहारिन् ! विमो : अस्माभिनिखिलैरितीक्ष्यत इहानन्तानि भूयोऽपि ते । ब्रह्माण्डानि पृथक् प्रकट्य प्रकृतः कर्ममवाहे पृथक् लीयन्ते प्रकृती स्वयं तव मुहुः सद्यो निविष्टानि च ॥१॥ जायन्ते प्रकृतहि पिण्डानवहास्ते भूतभावोद्भव- कृपण चितो जड़ेन सह यो ग्रन्थिविसर्गेण वै । तद्रूपाः परमाणुतो हयगणिताः प्रत्येकतो हि स्वतः प्रभो! इन ब्रह्माण्डसमूहकी उत्पत्ति और लयका कार्य जिस कालमें प्रतिभासित होता है उस कालका किसी प्रकार भी न आदि और न अन्त हमें दिखाई पड़ता है॥५-७ ॥ आपके विराट रूप असीम देह के साथ ही ओतप्रोत उन देश और कालका अब आदि और अन्त कुछ भी हमें दिखाई नहीं पड़ता है तव अहो ! आपके विराटप असीम देहका आदि और अन्त निःशेषरूपसे देखने में कोई भी किस प्रकार समर्थ हो सकता है और हमारे जैसे मूखों की तो बात ही क्या है ॥ ८ ॥ हे सदा भूतस्रष्टा ! भूत- पालक ! भूतहारी विभो ! हम सब यहां फिर भी यह देखते हैं कि अनन्त ब्रह्माण्डसमूह पृथक् पृथक् रूपमें आपकी प्रकृतिसे कर्म स्रोतमें अपने श्रापही प्रकट होकर अपने आप ही आपकी प्रकृतिमै सद्यः प्रवेश करके वारवार लयको प्राप्त होते हैं॥ ॥ उसी कर्मः स्रोतमै अपने आपही प्रत्येकं परमाणुसे भूतभावोद्भवकर विसर्ग द्वारा आपकी ही प्रकृतिले चिजडग्रन्धिरूपी अनन्त पिण्ड प्रकट .
विरादस्वरूपनिरूपणम् । १७ कर्ममोनसि ते प्रविश्य प्रकृतौ लीयन्त एवं ततः ॥ १० ॥ पश्यामश्च भवाननन्तनयनो हे विश्वचक्षुः ! क्रमात पिण्डौघस्य गति प्रपश्यति सदा ब्रह्माण्डपुञ्जस्य च । भाकृप्याऽभिमुखं निजस्य नयने धर्मस्य शक्तया च ते दृष्ट्वा सर्वमलौकिकं हि चकिता बुद्धिर्न एतादृशम || ११ ॥ पक्ष्यामः पुनाप्यनन्ननिखिलब्रह्माण्ड पिण्डावले. श्रोत्रानन्न्ययुनः शृणोनि सतन भयो भवान प्रार्थनाम । चिन्छतिया चितिसंयुताम्र विदधनां विश्वचेतः क्रमान मान्निध्यं च यथोचरं निजमहोनस्यै दिशन् राजने ॥ १० ॥ गश्यामश्च भवानन्तग्मनायुक्तः मुहृत्त्वं गतः युद्ध रूपमधिश्रितो रसमय : ब्रमाण्डपिण्डावलंः । मध्येऽध्यान्मपद विविच्य परमानन्दान्मकं प्राणिनः होते हैं और दूसरी और अपने पापही आपकी प्रकृति में प्रवेश करके लयको प्राप्त होते है ॥ १० ॥ हे विश्वचनु ! हमलोग पुनः देखते हैं कि आप अनन्त नेत्र होकर पिण्डसमूह और ब्राह्माण्डसमूहकी गतिको निरन्तर देखने हो और अपनी धर्मशक्तिके द्वारा क्रमशः उनको अपनी ओराकर्पण करते जाते हो। इस प्रकारके सव चमत्कारीको देखकर हमारी बुद्धि चकित हो रही है ॥ ११ ॥ हे विश्वचंता ! हम फिर भी देखते हैं कि आप अनन्तकर्ण होकर सब अनन्त ब्रह्माण्ड और सब अनन्त पिण्डॉकी प्रार्थना निरन्तर श्रवण करते हैं और चितिशक्ति द्वारा उनको क्रमशः उत्तरोत्तर चेतना. गुक्त करते हुए और ग्रहो ! उनको आप अपना सान्निध्य देते हुए विराजमान है ॥ १२ ॥ हे रसमय ! हम पुनः देखते हैं कि आप अनन्त रसनायुक्त होकर ब्रह्माण्डसमूह और अनन्त पिण्डसमूहमें । बुद्धिरुपये मुहद्भाव में रहकर हे लोकाश्रयगुरो!आप सब प्राणियोंको श्रीधीशगीता। सर्वान दर्शयते गुरो ! निजकृपालेशन लोकाश्रय ! ॥१३॥ हे तेजोमय ! तेजसाच निवहानां हे खने ! दृश्यते त्वं स्पर्शेन्द्रियपुजकुजनिकरैः स्पृष्ट्वा ह्यानन्तर्युतः । स्वैस्तेजोनिवहरनन्तगणितब्रह्माण्डपिण्डावलि सची स्वाभिमुखं प्रकृप्य पननाच्छश्वद्विभा ! रक्षारी || विश्वाधार ! च नामिकाभिरमिताभिस्त्वं युतो दृश्यसे जिघ्रन पुण्यसमूहगन्धममलं ब्रह्माण्डपिण्डावले। अस्तित्वञ्च विलीनमेव सततं कत्तं हि तस्या निजे केवल्याभ्युदयौ प्रयच्छसि यथायोग्याधिकारं प्रभो ! ||१५|| भावातीत ! विभो ! गदा त्रिगुणतोऽनीन ! प्रभोऽनुसण- मस्मात्पूर्वमलौकिकं गुणमयं भावस्वरूपं नव । रूपं सर्वमनोहरं सुविमलं दशन्द्रियाप्यायक- मस्माकं हि मनो व्यलीयत तदा सम्पश्यतां सत्वरम ॥१६॥ अपने कृपाकणसे विवेकपूर्वक परमानन्दमय अध्यात्मपद दिखा देते हो॥ १३ ॥ हे सकल जोके खनिरूप तेजोमय ! हम पुनः देखते हैं कि आप अनन्त स्पर्शेन्द्रियसमूहसे युक्त होकर अगणित और अनन्त ब्रह्माण्ड और पिण्डसमूहको अपने तेजोंके द्वारा स्पर्श करके सनको अपनी ओर निरन्तर खेचकर हे चिभो ! उनका पतन होने नहीं देते हो ॥ १४ ॥ हे विश्वाधार ! हम पुनः देखते हैं कि आप अनन्त नासिकायुक्त होकर ब्रह्माण्ड और पिण्डसमूहके पुण्यपुसका शुभ आघ्राण ग्रहण करके उनके अस्तित्वको अपने में ही विलीन करनेके लिये हे प्रभो ! उनको उनके यथायोग्य अधिकारके अनुसार अभ्युदय और निःश्रेयस निरन्तर प्रदान करते रहते हो ॥ १५॥ अनुक्षण हे त्रिगुणातीत ! सदा हे भावातीत ! हें विभो ! हे प्रभो ! इससे पूर्व जब हम दर्शनेन्द्रियोंको तृप्त करनेवाले निर्मल और सर्वमनोहर श्रापके गुणमय और भावमय अलौकिक रूपके दर्शन करते थे तब हमारा मन शीघ्र लयावस्थाको प्राप्त हो गया था विराटस्वरूपनिरूपणम् । ९९ 1 अद्यत्वे तु विरादस्वरूपममुकं दृष्ट्वा विशालं तव बुद्धिनः स्थगिता च याति चकिताऽवस्थां विलीनां पुनः। रूपं नः परिदर्शयाध कृपया ह्येवंम्विधं स्वं यतः सान्निध्य भवतामनुक्षणमहो लब्धुं वयञ्चेश्महे ॥१७॥ हे सवर ! भक्तकल्पलतिकारूप ! प्रभो ! पालक ! रूपेणापि विवजितो विभुरहो भंव्याय भक्तावले। भक्तानां प्रकृतिप्रतिजनितां स्वीकृत्य वै प्रार्थनां कल्याणं सगुणं स्वरूपममितं साध्नोति विभूदभवान् ॥१८॥ विभ्राणो रविरूपमेव सवितः ! भक्तान भवांस्तेजसा आकपत्यनिश विभो ! द्यतितरां कैवल्यभूमौ ध्रुवम | हे नारायण ! विष्णुरूपमभितः स्वीकृस चिद्भावतो ब्रह्मीभावामिमान निरीक्ष्य नयते तेषां क्रमेणोन्नतिम् ॥१९॥ ॥ १६ ॥ अब तो आपके इस विशाल विराट्खरूपका दर्शन करके हमलोगोंकी बुद्धि भी चकित और थकित होकर लया. वस्थाको प्राप्त हो रही है। अव कृपा करके आप ऐसे अपने रूपमें हमें दर्शन देखें कि जिसके अवलम्वनसे हम हरसमय अहो! आपके सानिध्यकोभी प्राप्त करसके॥१॥हे सर्वेश्वर ! हे भक्तवाञ्छा- कल्पतरु! हे प्रभो! हे पालक ! आप रूपरहित और विभु होने पर भी अहो! अपने भक्तोंके कल्याणके लिये उनकी प्रकृति और प्रवृत्ति- अनित प्रार्थनाको स्वीकार करके ही नाना सगुणरूप धारण करके उनका कल्याण साधन करते हैं ॥ १८ ॥ हे सवितः ! आपही सूर्य- रूप धारण करके तेज द्वारा हे विभो ! भक्तोंको कैवल्य भूमिमें निरन्तर ही अतिशय आकर्षित करते हैं। हे नारायण ! श्राप विष्णु- रूप धारण करके चिद्भाव द्वारा उनकी क्रमोन्नतिका. पर्यवेक्षण करके उनको ब्रह्मसद्भाव प्राप्त कराते हो ॥ १९ ॥ हे शक्तिमन् ! !
श्रीधीशगीता। -- देवीरूपमही धरन हि नयते धर्मस्य शक्त्या भवान सर्वेपां ह नियामकं परपदं हे शक्तिमन ! तान्सदा। अस्तित्वस्य विधायकं च बहु सद्भावेन भक्तानिजान हे शम्भो ! शिवरूपतो गमयते निःश्रेयसं निर्भयम् ॥२॥ स्वं भक्तांश्च धिया स्वरूपमनिशं सन्दर्य सिद्धेः पते : दत्ते मुक्तिपदं परं गणपते त्वा स्वरूपं भवान । सर्वेपामिह वर्त्तते खलु गुरो ! ह्याद्यो गुरूणां गुरु- देशादस्ति भवान् हि शश्वदपरिच्छिन्नस्तथा कालतः ॥२१॥ वं सर्वादिगुरुविभासि सकलालज्ञानस्वरूप सदा आदायपिंगणा वयं तव विभो ! ज्ञानाधिविड्लवमः । ब्रह्माण्डेषु प्रवाहयाम इह वै ज्ञानप्रवाई तथा सर्वप्वत्र विचक्षणा द्विजगणाः स्नात्वैव मुक्ति ययुः ॥२२॥ धारोत्पद्य हि देवनायक ! विभो ! सर्गस्थितिध्वमक- अहो! आपही देवीरूप धारण करके धर्मशक्ति द्वारा सबके नियामक परमपदमें सदा उनको पहुंचा देते हैं । हे शम्भो ! आपही शिवरूप धारण करके सद्भाव द्वारा सबके अस्तित्वविधानकारी निर्भय निःश्रेयस पदमें अपने भक्तोको अवश्य पहुंचादेते हैं ॥ २० ॥ और हे सिद्धिपते ! ओपही गणपतिका स्वरूप धारण करके बुद्धि द्वारा भक्तोंको स्वस्वरूप दिखाकर निरन्तर परममुक्तिपद प्रदान करते हैं । हे गुरो ! इस संसारमें आपही सय गुरुओंके श्रादिगुरु है क्योंकि आप सकल देशकालसे निरन्तर अपरिच्छिन्न और सर्वादिगुरु होकर ज्ञानस्वरूपमें सदा विराजमान रहते हैं और सब ब्रह्माण्डोंमें हम ऋषिगण हे विभो ! आपके ही ज्ञानसागरकी विषुटकणिकाको लेकर ज्ञानस्रोतको इस विश्व में प्रवाहित करते । इसमें विद्वान् ब्राह्मणगण स्नान करके ही मुक्तिको प्राप्त हुए !! २१-२२ ॥ हे देवनायक विभो ! सृष्टि स्थिति प्रलय कारिणी विश्व- !
विराट्स्वरूपनिरूपणम् । . m . M द्विश्वव्यापककर्मणोऽपि भवतस्त्वय्येव सलीयतेला सबै देवगणाः सदैव भवतामङ्गीभवन्तो मुदा प्रसेकं जनिरक्षणक्षयविधेब्रह्माण्डपुजेऽनिशम् ॥२३॥ सामन्जस्यमहो प्रभो ! विदधते कर्मव्यवस्थारताः उद्भित्स्वेदजरायुजाण्डजगणा भूतत्रजाः सन्ति ये। सर्व ते च चतुर्विधा हि मनुजानां,हे प्रजानां पते ! देवानां त्रिविधास्ताऽसुरगणानां ये च लोंका अहो ॥२४॥ त्वत्तो बुबुदवन्महार्णव इह त्वय्येव प्रोद्भूय ते लीयन्ते पितरोऽपि शक्तिमतुलां त्वत्तो गृहीत्वैव च । कृत्वा मर्त्यगणोन्नति क्रमगतां साहाय्यमातन्वते भूतीघस्य चतुर्विधस्य नियमे लोकव्रजस्याप्यलम् ॥ २९ ॥ तत्वेभ्योऽपि भवानतीतविभवो नूनं चतुर्विशते- यद्यप्यस्ति तथापि धीश ! नु महत्तत्त्वेऽन्तिमे प्राणिनः । व्यापक कर्मकी धारा आपसे उत्पन्न होकर भी श्रापमें ही विलीन होती है और सब देवतागण सदा आपके ही अङ्गरूप होकर अहो ! प्रत्येक ब्रह्माण्डों में प्रसन्नतासे कर्मकी व्यवस्था अहर्निश करते हुए हे प्रभो! सृष्टि स्थिति और लयकी व्यवस्थाका सामञ्जस्य विधान करते हैं । हे प्रजापते ! उद्भिज स्वदेज अण्डज और जरायुजसमूह रूपी जो चतुर्विधभूतसङ्घ है वे सव और अहो!जो देवी मानवी और आसुरीरूपी त्रिविधलोकसृष्टियाँ हैं वे सब महासमुद्र में बुद्धद्वत् आपसे ही यहां उत्पन्न होकर आपमें ही लयको प्राप्त होती हैं और पितृगण आपसे ही अतुल शक्तिको लेकर मनुष्योंकी क्रमो- न्नतिविधान करके चतुर्विधभूतसङ्घ और लोकसमूहकी व्यवस्था में भलीभांति सहायता करते हैं ॥ २३-२५ ॥ हे धीश ! यद्यपि चतुर्विंशति तत्मसे भी अतीतविभव ही आप हो तथापि आप - १०२ श्रीधीशगीता। क- नियोऽनिर्वचनो विकाररहितो ज्ञानस्य शक्तया स्थितः सर्वानभ्युदयस्य दर्शयति वै मोक्षस्य मार्ग तथा ॥ २६ ॥ ये स्वातन्त्र्यमदेन मोहिततमा जीवाः प्रमादेन वे मूढ़ा ज्ञाननिधेस्तवेङ्गितमहो निसं तिरस्कुर्वते । भ्रान्ता दुःखदजन्ममृत्युगहने संसारचक्रे ध्रुवम शंयोरभ्युदयाध्वनो हि पतिता दुःखान्यलं भुञ्जते ।। २७ ॥ भर्गो विश्वसमचितं यदिह ते हास्ते दयासागर ! तन्नो बुद्धिमहनिशं गणपते ! शक्तचा स्वया सत्वरम । संरक्ष्यासत एव कर्मनिवहात् सत्कर्मणि प्रेरयेत् सिद्धयाऽलङ्कृतवामपार्थ! भगवस्त्वां सन्नमामो वयमा॥२८॥ व्यास उवाच ॥ २० ॥ उक्त्वर्पयस्तस्थुरिति क्षणं ते रोमाञ्चिता गद्गदकण्ठशब्दाः। . S अन्तिम तत्त्व बुद्धिमें ज्ञानशक्तिरूपसे अविकारी अनिर्वचनीय और नित्य स्थित रहकर जीवमात्रको अभ्युदय और निःश्रेयसका मार्ग प्रदर्शन कराते हो ॥ २६ ॥ स्वाधीनताके मदसे विमोहित जो मूढ़ जीव प्रमादवश ही ज्ञाननिधि आपके इङ्गितकी अहो ! नित्य अव- हेला करते हैं वे अवश्य कल्याणकारी अभ्युदयके मार्गसे व्युत होकर ही दुःखदायी जन्ममृत्युओंसे गहन संसारचक्रमें अतिशय घूर्णायमान होकर दुःख भोगते रहते हैं ॥ २७ ॥ हे दयासागर ! आपका ही जो इस संसारमै जगत्पूज्य भर्ग (तेज).है वह हे सिद्धि. देवीसे अलङ्कतवामपार्श्व भगवन् गणपते ! हमारी बुद्धिको अपनी शक्तिके द्वारा असत् कर्मसमूहसे बचाकर सत्कर्ममें शीघ्र प्रेरणा करे। आपको हम अनन्यभावसे प्रणाम करते हैं ॥२८॥ व्यासदेव बोले ॥२२॥ इतना कहकर वे ऋषिगण कुछ देरतक आनन्दा युक्तगुख गद विराटस्वरूपनिरूपणम् । १०३ सानन्दजाताश्रुमुखाः स्थिराश्च विस्य धीशो मधुरं तदोचे ॥३०॥ गणपतिरुवाच ॥३१॥ दशायां योगयुक्तायां रूपं मे सगुणं द्विजाः !। मात्मयुक्तदशायाञ्च विरारूपं महाद्भुतम् ॥ ३२ ॥ कर्मयुक्तदशायान्तु ममोपास्तौ सहायकम् । मद्रिभूतिमयं रूप भक्ताः ! स्याच्छुतिरित्यहो ! ॥ ३३ ॥ स्वाधीनः प्राकृतश्चैव विविधो जीव ईरितः। गजोऽहं प्राकृते जीवे स्वाधीने मानवस्तथा ॥ ३४ ॥ अतोऽहं भक्तवृन्देभ्यो मर्त्यदहो गजाननः । दर्शनं स्वं प्रयच्छामि प्रादुर्भूय निरन्तरम् ॥ ३५ ॥ गजयोगोऽस्मि योगानामहमेंविधोऽपि सन । चतुविधेपु ध्यानेषु पञ्चोपास्तेरहं ध्रुवम् ॥ ३६॥ गदकण्ठस्वर रोमाञ्चित और निःस्तब्ध होकर रहे। तदनन्तर भगवान् गणपनिजीने मुस्कराकर मधुर स्वरसे कहा ॥ ३० ॥ गणपति वोले ॥ ३१॥ हे भक्त द्विजगण ! योगयुक्त अवस्थामें मेरा सगुणरूप, आत्म- युक्त अवस्थामें मेरा महदद्भुत विराटप और कर्मयुक्त अवस्थामें मेरा विभूतिमयरूप मेरी उपासनामें सहायक होता है । अहो : यही श्रुति है ॥ ३२-३३ ॥ जीव प्राकृत और स्वाधीनरूपसे दो प्रकारका कहा गया है। प्राकृत जीवों में मैं हस्ती हूँ और स्वाधीन जीवों में मैं मनुष्य ॥ ३४॥ इसी कारण हस्तीके सदृश मुख और मनुष्य सदृश शरीर होकर मैं भक्तोको निरन्तर प्रकट होकर अपना दर्शन देता हूँ ॥ ३५ ॥ में योगमें राजयोग हूँ परन्तु हे द्विजश्रेष्ठो! ऐसा होकर भी मैं चतुर्विध ध्यानों में से पञ्चोपासनाके पाँच ध्यान- हूँ 1 श्रीधीगगीता। - ...amara- , पञ्चध्यानयुतं स्थूल-ध्यानमास्मि द्विजोत्तमाः ।। नैवात्र संशयः कश्चित् सत्यं सत्यं ब्रवीमि वः॥ ३७॥ नरषु नरनाथोऽस्मि राज्ये तु सचिवाभिधः । मन्त्रिणां मण्डलं यस्माजज्ञानस्यास्ते सहायकम् ।। ३८ ॥ शक्तिष्वहं देवशक्तिरीदशोऽहन्तु सन्नपि । लौकिके शक्तिपुळेऽस्मि सशक्तिमहर्षयः ! ॥ आध्यात्मिक्याधिदैव्याधिभौतिक्यः शक्तयोऽखिलाः । सङ्घशक्तौ प्रकाशन्ते स्वयमेव यतो ध्रुवम् ॥ ४० ॥ वर्णेपु ब्राह्मणश्चामाश्रमेवान्तिमाश्रमः । वृद्धत्वेनैव पृज्येषु सर्वद्धप्वहं द्विजाः ॥ ४ ॥ मर्वथा ज्ञानवृद्धोऽस्मि नात्र कार्य्या विचारणा । अध्यात्मलक्ष्यसंयुक्त आयोऽहं मानवेषु च ॥ १२ ॥ भक्तपु ज्ञानिभक्तोऽस्मि वेदानां सामनामकः । किन्तु वेदविभागपूपनिषद्पभागहम् ।। ४३ ।। युक्त स्थूल ध्यान ही हूँ इसमें कुछ सन्देह नहीं है मैं आपलोगोंसे सत्य सत्य कहता हूँ ॥ ३६-३७ ॥ नरों में मैं राजा हूँ परन्तु राज्यमें मैं मन्त्रीरूप हूँ क्योंकि मंत्रिमण्डल ज्ञानसहायक है ॥ ३० ॥ शक्तियों में मैं दैवी शक्ति हूँ परन्तु ऐसा होकर भी हे महर्षियो मैं लौकिक शक्तियों में सङ्घशक्ति हूँ ॥ ३९ ॥ क्योंकि सङ्घशक्तिम आध्यात्मिक आधिदैविक और आधिभौतिक इन तीनो शक्तियोंका . विकाश अपने आपही अवश्य होजाता है ।। ४० ॥ मैं चों में ब्राह्मण हूँ और आश्रमों में मैं सन्न्यासाश्रम हूँ । हे ब्राह्मणो ! वृद्धत्व- कपसे पूजनीय सब प्रकारके वृद्धोंमें सर्वथा मैं ज्ञानवृद्ध ही है। . इसमें कुछ विचार न करो और मनुष्यश्रेणीमै मैं अध्यात्म लोदय- युक्त आर्य हूँ ॥ ४१-४२ ॥ भक्तगणमें में ज्ञानीभक्त हूँ। वेदों के बीच में मैं सामवेद हूँ किन्तु वेदविभागों में उपनिषद्प हूँ ॥४॥ ॥४॥ .
विगदानरूपतियणम! -NEKHANA +4 मन्या योगानामपस्मि परवहम । गमाधिनिनिकाल्पोऽपि निखिलप गमाधिषु ॥४४|| मायांगे मन्नोऽम्मि प्राणायामो हटे द्विजाः । यमिया ये मांगे गजोंग विवेचनम ॥४॥ अपदाना बाना नपम्यान यमस्तथा । गानभकामकन्याम नायता भी द्विजाः ॥४॥ नियकामा नन नाय काचिद्विवेचना। गम्तियाजाना पगमनाया ममन्त्रिता ॥४७॥ अन्योपाम्निमा निक्षा भस्म्यहं ब्रामणानमाः ! ॥ मनने पानापु मायावा, नवा ॥ ४८ ।। प्रायाम्पि भी विपाः ! सर्वयतशिरोमणिः । माया सभामय आचार्यः गिसकेगु च ॥४२॥ पंदनकचन्द जगत्यन्योऽम्यहं गुरुः । भान्मामास्मि भी विमाः ! भृतरन्दवस्थितः ॥५०॥ Pawan . योग. अकमें में प्रत्याहार परन्तु सय समाधियोमै मैं निर्विकल्प समाधि मानगो ! मन्त्रयोगमें मैं मन्त्र है, इठयोगमें मैं प्राणायाम लययोग में मैं लयमिया है और गजयोपमें मैं विवेचन {k •॥ हे प्रामणी ! दानधर्म में मैं प्रलदान हूँ, तपधर्म में मैं यम हैं. कर्मय में मैं भानप्रकाशक होनेसे नित्य कर्म ही हूँ इसमें कोई विवंचनानी चि ब्रामण श्रेष्ठो ! उपासना यनों में मैं अहो ! परामक्तियुनः प्रायोपासना है.शानयज्ञमें मैं मनन हूँ और हे ,विप्रो! महायों में सर्चयन शिरोमणि ग्रालयमा । सभाके बीच में वक्ता हूँ और शिक्षकांक धीच में में प्राचार्य है ॥ ४६-४९ ॥ उपदेशकोंके बीयम में जगत्पूज्य गुग हूँ। ६ विप्रो भृतगणके अन्तरमें अवस्थित ६४
श्रीधीशगीता-1
प्राणिपुशेषु.चैतन्यमहमेव न संशयः ।
नादः शब्दसमूहेषु वाक्येप्योहार एव च ||५||
इन्द्रोऽई देवन्देषु भृगुरस्मि महर्षिषु ।
यमो नियामकेप्यस्मि पितृमध्येऽर्यमाभिधः ॥१२॥
असुरेपु बलियो जाह्नच्यस्मि सरित्सु च ।
जलाशयेषु सर्वेपु.सागरोऽस्मि न संशयः ॥५३॥
पुष्पमानन्ददेवस्मि पदार्थेषु महर्षयः!
पवित्रं परमं विप्राः ! तेजस्तेजस्त्रिनामहम् ॥५४॥
बलं वलवतामस्मि कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि जननाय च ॥ ५५ ॥
विद्यास्वध्यात्मविद्याऽस्मि विद्वांसो ब्राह्मणोत्तमाः ।।
सत्यप्रकाशकश्चास्मि वादो वादिगणेप्वहम् ॥ ५६ ॥
नारीप्वहं तपोरूपो यज्ञरूपों नरेषु च ।
गुणत्रयेष्वहं विमाः ! गुणाः सत्त्वाभिधानकः ॥ ५७ ॥
आत्मा हूँ॥ ५० ॥ सब प्राणियों में मैं ही निःसन्देह चेतना रूप हैं।
मैं शब्दसमूहमें नाद और वाक्यसमूहमे ओंकार ही हूँ ॥ ५ ॥
मैं देवताओं में इन्द्र, महर्पियोंमें भृगु, पितरोंमें अर्यमा और नियाम-
कोमें यम हूँ॥५२॥ असुरोमै मुझको बलि जानो।मैं सरिताओंमें जाह्नवी
और सब जलाशयों में निःसन्देह सागर हूँ॥ ५३ ॥ हे महर्षिगण
आनन्दप्रद पदार्थों में मैं पुप्प हूँ। हे विप्रो । तेजस्वियों में मैं परम
पवित्र तेज़रूप हूँ॥५४॥ बलवानों में मैं कामरागविवर्जित बल
और उत्पत्तिके लिये प्राणियों में मैं धर्माविरुद्ध काम है ॥ ५५ ॥
हे विद्वान् विप्रवरो ! मैं विद्यासमूहमें अध्यात्मविद्या हूँ और वादि-
गणमें मैं सत्यप्रकाशक वाद हूँ॥५६॥ स्त्रियों में मैं तपोरूप हूँ और
परुषों में मैं यज्ञरूप हूँ। हे विप्रो ! मैं त्रिगुणमें सत्त्वगुण हूँ ॥ ५७ ॥
विरादस्वरूपनिरूपणम् । १०७ . .. भावत्रयेऽध्यात्मभावः शीलेषु विनयोऽस्म्यहम् । सदाचारेषु वृद्धानां मणतिः पादपद्मयोः ॥५८॥ कारणब्रह्मरूपेण हयेकोऽद्वैतोऽप्यहं द्विजाः ।। अनन्तोऽस्मि महाविज्ञाः ! सैत्यमेतन्न संशयः ॥ ५९ ॥ अनन्तत्वात्संख्यया मे कार्यब्रह्मस्वरूपतः । सङ्ख्यातुं नैव शक्नोति विभूतीः कश्चिदप्यहो॥ ६० ॥ भवतां विप्रवर्याणां कल्याणार्थ हि केवलमः । दिग्दर्शनस्वरूपेण,किञ्चिद्वो वर्णितं मया ॥ ६१ ॥ उपदेशश्च मे हृद्यं धृत्वा स्वहृदयेऽनिशम् । ममोपास्तौ रताः सन्तो भजध्वं मोक्षमुत्तमम् ।। ६२ ।। श्रद्धा वः सात्विकी विप्राः ! प्रकृतौ मे चिरं वसेत् । ममैव प्रकृतिधृत्वा स्त्रीभावं कामदायिनी ॥ ६३ ॥ . विभ्राणा भगिनीभावमर्थसिद्धिप्रदायिनी । धरन्ती मातृभावञ्च शक्तिधर्मप्रदा सदा ॥ ६४ ॥ .. . . त्रिभाषयों में मैं अध्यात्मभाव हूँ, मैं शीलमें विनय और सदाचारोमें वृद्धोके चरणकमलों में प्रणामरूप हूँ ॥ ५ ॥ हे महाविज्ञ ब्राह्मणो ! मैं कारणब्रह्मरूपसे एक अद्वितीय होकर भी अनन्त हूँ यह सत्य है. सन्देह नहीं ॥ ५ ॥ कार्यब्रह्मरूपले संख्याले अनन्त होनेके कारण.. मेरी विभूतियोंकी अहो ! कोई भी संख्या नहीं कर सका ॥ ६०॥ केवल आप विप्रेवरोंके कल्याणार्थ ही. दिग्दर्शन- रुपसे आपलोगोंसे यह कुछ वर्णन किया है॥ ६१ ॥ श्राप मेरे हृदयग्राही उपदेशको अपने हृदय में निरन्तर रखकर मेरी उपास- नाम रत हो कर उत्तम मोक्षपदको प्राप्त हो ॥ ६२ ॥ हे विमो! मेरी प्रकृति पर आपकी सात्त्विक श्रद्धा.चिरकालतक वनी रहे। मेरी प्रकृति ही स्त्रीभावको धारण करके कामंदा, भगिनीभावको धारण करके अर्थ. और सिद्धिप्रदा और मातृभाष धारण करके . १०८ श्रीधीशगीना। 764 ------ १ भूत्वा मे ज्ञानिनो भक्तान् प्रकृतिस्थान समन्ततः । तेभ्यो मुक्तिपदं दत्ते विधाना सुदुर्लभम् ॥ १५ ॥ श्रद्धान्वितानां मच्छतौ भक्तानां मुलभो भवन् । चतुर्वर्गो न सन्देहो विद्यतेंत्र द्विजोत्तमाः ॥१६॥ अत्यन्तं गोपनीया वः श्रावितोपनिपन्मया । धीशगीताभिधानेन लोकेष्वेपा प्रचार्यताम् ॥ १७ ॥ यया मे निखिला भक्ताश्चतुर्वर्गमवाप्नुयुः । एषा नैव प्रदातव्या नास्तिकेभ्यः कदाचन ॥ ६८ ॥ पापिभ्योऽश्रद्दधानभ्यः पाणिभ्यो ब्राह्मणोत्तमाः । अभक्तेभ्यः कृतघ्नेभ्यो गुरुद्रोहिभ्य एव च ॥ १९ ॥ श्रद्धा श्रीगुरुवाक्येषु येपां शास्त्रगणेप्वपि । विश्वासः परलोकेषु लक्ष्यमाध्यात्मिकं तथा ॥७॥ मत्परायणता पुण्या वर्तते च निरन्तरम् । इयं तेभ्यः प्रदातव्या धीशगीता ध्रुवं द्विजाः !॥ ७१ ॥ धीशगीतामिमां पुण्यां पाठयन्ति पठन्ति ये । - सदा धर्म और शक्तिप्रदा होकर मेरे ज्ञानीभक्तोंको सव ओरसे प्रकृतिस्थ करती हुई उनको सुदुर्लभ मुक्तिपद प्रदान करती है ॥६३-६५ ॥ मेरी शक्ति पर श्रद्धान्वित भक्तोंको चतुर्वर्ग सुलभ होजाता है हे विप्रवरो ! इसमें सन्देह नहीं है ॥६६॥ यह मैंने अति गोपनीय उपनिषद् आपलोगोंको सुनाया है आप इसको धीशगीतो नामसे प्रचार करो ॥ ६७ ॥ जिससे मेरे सब भक्त चतुर्वग प्राप्त करें । हे विप्रवरो ! अभक्त नास्तिक श्रद्धाहीन गुरु- विरोधी कृतघ्न और पापात्मा व्यक्तियोको इसको कदापि नहीं ही देना ॥ ६८-६९ ॥ गुरु और शास्त्रों में जिनकी.श्रद्धा है, पर- लोकपर जिनका विश्वास है, जिनका लक्ष्य आध्यात्मिक है और जिनमें पवित्र मत्परायणता निरन्तर है हे द्विजो ! उनको यह धीशगीता अवश्य देनी चाहिये ॥७१-७॥ इस पविन धीशगीताको विटादस्वरूपनिरूपणम् । १०९ - क्लेशकर्मविपाकेभ्यो रहिता आशयेन च ॥ ७२ ।। भजन्ते मेऽखिला भक्ता मत्सायुज्यमसंशयम् । न च तान् बाधते कश्चित्तापो लोके कथञ्चन ॥ ७३ ॥ कल्याणजननीमेतां श्रद्धयैव पठन्ति ये। एनया येऽधवा यागं गाणपत्यं प्रकुर्वते ॥ ७४ ॥ हवनात्मकमाहोस्वित् केवलं पाठरूपकम् । तेषां नश्यन्ति भक्तानामाधयो व्याधयोऽखिलाः ॥ ७९ ॥ सयता ये तपोनिष्ठा भक्तिभावन कुर्वते । पाठस्य श्रवणं सम्यगेतस्याः सार्थक द्विजाः ! ॥ ७६ ॥ गाणपत्यस्य यागस्यानुष्ठानं वैतया सदा । काचिद्राधा न तेषां स्याद्विपत्तिः प्राणिनां तथा ॥७॥ तादृशी विघ्नराशिर्वा नध्येया नैव सत्वरम् । नात्र कश्चन सन्देहो विद्यते ब्राह्मणोत्तमाः !॥ ७८ ॥ आर्ता जिज्ञासवो भक्तास्तथाऽर्थार्थिन एव वै । जो अध्ययन और अध्यापन करते हैं, क्लेश कर्मविपाक और आशयसे रहित होकर वे मेरे सब भक्त मत्सायुज्यको अवश्य प्राप्त होते हैं और उनको इस संसारमें किसी प्रकार भी कोई ताप बाधा नहीं देता है ।। ७२-७३ ॥ श्रद्धाके साथ ही इस कल्याण- कारिणी गीताका जो पाठ करते हैं अथवा जो इसके द्वारा केवल पाठात्मक वा हवनात्मक गणपतियागका अनुष्ठान करते हैं उन मेरे भक्तोकी सब आधि और व्याधियां नष्ट हो जाती हैं ॥७४-७५ ॥ हे द्विजो ! जो भक्तिभावसे संयत और तपपरायण होकर भलीभांति इसका सार्थक पाठश्रवण अथवा इसके द्वारा गणपतियागका अनुष्ठान सदा करते हैं उन जीवोंके ऐसे कोई बाधा, विपत्ति और विघ्नसमूह नहीं हैं जो शीघ्रही दूर न हो • सके, हे विप्रवरो ! इसमें कुछ सन्देह नहीं है ।। ७६-७८ ॥ मेरे आर्त जिज्ञासु और अर्थार्थी तीनों प्रकारके भक्त ही इस गीताके . ११.० -- श्रीधीशगीता। .. - .. - त्रिविधा एव मे भक्ता एतद्गीताश्रयेण:हि ॥ ७९ ॥ स्वमनोरथसाफल्यं लभेरन्नात्र संशयः । तथैवास्याश्च,गीतायाः श्रवणान्मननात्तथा ॥ ८ ॥ निदिध्यासनतो. नूनं ज्ञानिभक्ताश्च मामकाः ।.. अपरोक्षानुभूसा में दर्शन कमीशते ।।८।। चतुर्वर्णाश्रमस्थानां स्वधर्मासक्तचेतसाम् । जीवानां किनु, वक्तव्यं श्रद्धालूनां मयि ध्रुवम् ।। ८२ ।। सर्वेषामेव जीवानां चतुर्वर्गफलमदा ! वर्त्तते धीशगीतेयं सत्यं सत्यं न संशयः ।। ८३॥ इति श्रीधीशगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे धीशर्षिसंवादे विराट्स्वरूपनिरूपणं नाम. i. : : सप्तमोऽध्यायः। ... • - समाप्तेयं श्रीधीशगीता। -- आश्रयले ही निःसन्देह सफलमनोरथ होंगे और उसी प्रकार मेरे ज्ञानीभक्त भी इस गीता के श्रवण मनन और निदिध्यासन द्वारा अपरोक्षानुभूतिले मेरे दर्शन करनेमें अवश्य समर्थ होंगे॥७९-८१॥ चारों वर्ण और 'चारों भाश्रमोके स्वधर्मानुरत जीवोंकी तो वात ही क्या है मुझमें अटल श्रद्धा रखनेवाले जीवमात्रको ही यह धीशगीता चतुर्वर्गफलप्रद है। यह सत्य है सत्य है, इसमें सन्देह नहीं ॥२-८३॥ इस प्रकार श्रीधीशगीतोपनिषद्के ब्रह्मविद्यासम्बन्धि धोशर्षिसम्वादात्मक योगशास्त्रका विराटस्वरूप- निरूणि तामक सप्तम अध्याय समाप्त हुआ यही श्रीधीशगीता समाप्त हुई ।
श्रीविश्वनाथो जयति। धर्मप्रचारका सुलभ साधन । समाजकी भलाई ! मातृभाषाकी उन्नति !! देशसेवाका विराट् आयोजन !!! इस समय देशका उपकार किन उपायोंसे होसकता है ? संसार. रस छोरसे उस छोरतक चाहे किसी चिन्ताशील पुरुपसे यह प्रश्न कीजिये, उत्तर यही मिलेगा कि धर्मभावके प्रचारसे; क्योंकि धर्मने ही संसारको धारण कर रक्खा है। भारतवर्ष किसी समय संसारका गुरु था, श्रात. वह अध:पतित और दीन हीन दशामें यो पन रहा है ? इसका भी उत्तर यही है कि वह धर्मभाषको खो, बैठा है । यदि दम भारतसे ही पूछे कि तू अपनी उन्नति के लिये हम. से क्या चाहता है ? तो धद यही उत्तर देगा कि मेरे प्यारे पुत्रो! धर्ममाघ की वृद्धि करो । संसार में उत्पन्न होकर जो व्यक्ति कुछ भी सत्कार्य करने के लिये उद्यत हुए हैं, उन्हें इस , यातका पूर्ण अनुभव होगा कि ऐसे कार्यों में कैसे विघ्न और कैसी बाधाएँ उपस्थित हुआ करती हैं । यद्यपि धीर पुरुप उनकी पर्वाह नहीं करते और.यथासम्भव उनसे लाभ ही उठाते हैं, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि उनके कार्यों में उन विघ्न बाधाओंसे कुछ रुकावट अवश्य ही हो जाती है। श्रीभारतधर्म महामण्डलके धर्मकार्य में इस प्रकार अनेक बाधाएँ होनेपर .मी अब उसे जन- साभारणका हित साधन करनेका सर्वशक्तिमान भगवान्ने सुअव सर प्रदान कर दिया है । भारत अधार्मिक नहीं है। हिन्दुजाति धर्मप्राण जाति है, उसके रोमरोममें धर्मसंस्कार ओतप्रोत हैं। केवल वह अपने रूपको-धर्मभावको-भूल " रही है। उसे अपने "स्वरूपको पहिचान करा देना-धर्मभावको स्थिर रसना-ही श्रीभा- रतधर्ममहामण्डलका एक पवित्र और प्रधान उद्देश्य है । यह कार्य १८ वर्षोंसे महामएल कर रहा है और ज्यो ज्यो उसको अधिक- । 1 . ( २ ) सुअवसर मिलेगा, त्यो त्यो वह जोर शोर से यह काम करेगा। उसका विश्वास है कि इसी उपायसे देशका सच्चा उपकार होगा और अन्तमें भारत पुनः अपने गुरुत्वको प्राप्त कर सकेगा। इस उद्देश्य साधनके लिये सुलभ दो ही मार्ग हैं। (१) उप: देशकों द्वारा धर्मप्रचार करना, और (२) धर्मरहस्य सम्बन्धी मौलिक पुस्तकोंका उद्धार व प्रकाश करना । महामण्डलने प्रथम मार्गका अवलम्बन प्रारम्भसे ही किया है और अब तो उपदेशक महाविद्यालय स्थापित कर महामण्डलने वह मार्ग स्थिर और परिष्कृत करलिया है। दूसरं मार्गके सम्बन्धमें भी यथायोग्य उद्योग आरम्भसे ही किया जा रहा है। विविधग्रन्थोंका संग्रह और निर्माण करना, मासिकपत्रिकाओंका सञ्चालन करना, शास्त्रीय ग्रन्थोंका आविष्कार करना, इस प्रकारके उद्योग महामण्डलने किये हैं और उनमें सफलता भी प्राप्त की है; परन्तु अभीतक यह कार्य सन्तोष जनक नहीं हुआ है। महामण्डलने अब इस विभागको उन्नत करने का विचार किया है । उपदेशकों द्वारा जो धर्मप्रचार होता है उस- का प्रभाष चिरस्थायी होने के लिये उसी विषयकी पुस्तकोंका प्रचार होना परम आवश्यक है; क्योंकि वक्ता एक दो वार जो कुछ सुना देगा. उसका मनन विना पुस्तकोंका सहारा लिये नहीं हो सकता । इसके सिवा सब प्रकारके अधिकारियों के लिये एक वक्ता कार्यकारी नहीं हो सकता । पुस्तकप्रचार द्वारा यह काम सहल हो जाता है। जिसे जितना अधिकार होगा, वह उतने ही अधिकारकी पुस्तकें पढ़ेगा और महामण्डल भी सब प्रकारके अधिकारियों के योग्य पुस्तके निर्माण करेगा । सारांश, देशकी उन्नतिके लिये, भारतगौरवको रक्षाके लिये और मनुष्यों में मनुष्यत्व उत्पन्न करने के लिये महामण्डलने अब पुस्तकप्रकाशनविभागको अधिक उन्नत करने का विचार किया है और उसकी सर्वसाधारणसे प्रार्थना कि वे ऐसे सत्कार्यमें इसका हाथ बटावे एवं इसकी सहायता कर अपनी ही उन्नति कर लेनेको प्रस्तुत हो जावें। श्रीभारतधर्ममहामण्डलके व्यवस्थापक पूज्यपाद श्री १०८ स्वामी ज्ञानानन्दजी महाराजकी सहायतासे काशीके प्रसिद्ध विद्वानोंके द्वारा सम्पादित होकर प्रामाणिक, सुवोध और सुदृश्यरूपसे यह ग्रन्थमाला निकलेगी । ग्रन्थमालाके जो ग्रन्थ छपकर प्रकाशित हो चुके हैं उनकी सूची नीचे प्रकाशित की जाती है।
स्थिर ग्राहकोंके नियम। (१) TR समय हमारी अन्धमालामें निम्नलिखित अन्ध प्रकाशित पुर :- मंत्रयोगमंहिता ( भागनुपाद सदिन) मन (भावाभापान) गरमशाना सहित) नवीन प्रियीण भारत देनीमार्शम प्रगम भा (भारामायमद्वित) अनिलपुराण (भापानुपाद सदिन) १) उपदय पारिजाल (संत ) exce १३) २). " মামামামা হা १) पन्यासमीना ( भागनुवाद रहित ) ' गुरुगीता (भापानुवाद सहित) २) अपनपम प्रथम me २) हिनीर मण्ड ननीय नगर सांयन २) पामगर याएर श्रीमद्भगवडीना प्रथम मगर ( मापामाय सहित) .) মুসা { মানুষ গুলি) शम्भुगोना ( मापानुपाद सहित) गतिगीता (नापानुयाद महित) धीशगीना ( भाषानुयाद सहित ) 11) विष्णुगीता (भाषानुवाद सहित) (इनमें से जो कमसे कम ) मूल्यकी पुस्तके पूरे मूल्यमें मरीदगे अथवा स्थिर ग्राहक होनेका चन्दा ३) भेज दंगे उन्हें शेप । और आग प्रकाशित होनेवाली सब पुस्तफै मूल्यमें दी जायंगी। (३) स्थिर प्राहकोको मालामें प्रथित दोनेवाली हर एक .
( ४ ) पुस्तक खरीदनी होगी । जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी जायगी वह एक विद्वानोंकी कमेटी द्वारा पसन्द करा ली जायगी। (४) हर एक ग्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखाकर हमारे कार्यालयले अथवा जहाँ वह रहता हो वहां हमारी शाखा हो तो वहांसे, स्वल्प मूल्य पर पुस्तके खरीद सकेगा। (५) जो धर्मसभा इस धर्मकार्यमें सहायता करना चाहे और जो सजन इस ग्रन्थमालाके स्थायी ग्राहक होना चाहे चे मेरे नाम पत्र भेजनेकी कृपा करें। गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, अध्यक्ष शास्त्रप्रकाश विभाग। श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, जगतगंज, वनारस। इस विभाग द्वारा प्रकाशित समस्त धर्मपुस्तकोंका विवरण । सदाचारसोपान । यह पुस्तक कोमलमंति वालक वालि- काओंकी धर्मशिक्षाके लिये प्रथम पुस्तक है। उर्दू और बंगला भाषामें इसका अनुवाद होकर छपचुका है और सारे भारतवर्षमें इससी बहुत कुछ उपयोगिता मानी गई है। इसकी पांच आवृत्तियां छपचुकी हैं । अपने बच्चों की धर्मशिक्षाके लिये इस पुस्तकको हर एक हिन्दूको मँगवाना चाहिये। मूल्य) एक आना। कन्याशिक्षासोपान । कोमलमति कन्याओको धर्मशिक्षा देनेके लिये यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है। इस पुस्तककी बहुत कुछ प्रशंसा हुई है। इसका बंगला अनुवाद छप चुका है। हिन्दू- मात्रकोअपनी अपनी कन्याओंको धर्मशिक्षा देने के लिये यह पुस्तक मँगवानी चाहिये धर्मसोपान यह धर्मशिक्षाविषयक बड़ी उत्तम पुस्तक है। बालकोंको इससे धर्मका साधारण ज्ञान भलो भांति हो जाता है। । - - मूल्य -) CA ( ५ ), यह पुस्तक क्या गालक बालिका, क्या वृद्ध स्त्री पुरुष, सबके लिये बहुत ही उपकारी है। धर्मशिक्षा पानेकी इच्छा करनेवाले सज्जन अवश्य इस पुस्तकको मँगायें। मूल्य 1) चार आना। ब्रह्मचर्यसोपान । ब्रह्मचर्यवतकी शिक्षाके लिये यह प्रन्ध यहुत ही उपयोगी है। सघ ब्रह्मचारी श्राश्रम, पाठशाला और स्कूलों में इस ग्रन्धकी पढ़ाई होनी चाहिये। गजशिक्षासोपान । राजा महाराजा और उनके कुमारीको धर्मशिक्षा देनेके लिये यह ग्रन्थ बनाया गया है । परन्तु सर्वसाधा- रगकी धर्मशिक्षाके लिये भी यह ग्रन्थ बहुत ही उपयोगी है। इसमें सनातनधर्मके श्रद और उसके तत्त्व अच्छी तरह बताये गये हैं। मूल्य ) तीन आना। साधनसोपान । यह पुस्तक उपासना और साधनशैलीकी शिक्षा प्राप्त करने में बहुतही उपयोगी है। इसका बंगला अनुवाद भी छपचुका है। बालक बालिकाको पहलेहीसे इस पुस्तफको पढ़ना चाहिये । यह पुस्तफ ऐसी उपकारी है कि बालक और वृद्ध समानरूप से इससे साधनविषयक शिक्षा लाभ कर सके हैं। मूल्य ३) दो आना। शास्त्रलोपान | सनातनधर्मके शास्त्रोंका संक्षेप सारांश इस अन्धमें वर्णित है। सब शास्त्रोका कुछ विवरण समझनेके लिये प्रत्येक सनातनधर्मावलम्बीके लिये यह ग्रन्थ बहुत उपयोगी है। मूल्य।) चार आना। धर्मप्रचारसोपान । यह अन्य धर्मोपदेश देनेवाले उपदेशक और पौराणिक पण्डितोंके लिये बहुतही हितकारी है। मूल्य ३) तीन बाना। उपरि लिथितसय ग्रन्थ धर्मशिक्षाविषयक हैं इस कारण स्कूल, कालेज व पाठशालाओंको इकट्ठ लेने पर कुछ सुविधा से मिल सकेंगे और पुस्तक विक्रेताओंको इनपर योग्य,कमीशन दिया जायगा। उपदेशपारिजात । यह संस्कृत गद्यात्मक अपूर्व ग्रन्थ है। सनातनधर्म क्या है, धर्मोपदेश किसको कहते हैं,सनातनधर्मके सब शास्त्रों में क्या विषय हैं, धर्मवक्ता होने के लिये किन र योग्यताओं के होनेकी आवश्यकता है इत्यादि अनेक विषय इस ग्रन्ध में संस्कृत विद्वानमात्रको पढ़ना उचित है और धर्मवक्ता, धर्मोपदेशक, पौराणिक पण्डित आदिके लिये तो यह ग्रन्थ सब समय साथ रखने योग्य है। भूल्य ॥) आठ आना। इस संस्कृत ग्रन्थके अतिरिक्त संस्कृत भाषामें योगदर्शन, सांख्यदर्शन, देवीमीमांसादर्शन आदि दर्शन सभाष्य, मन्त्रयोग- संहिता, हठयोगसंहिता, लययोगसंहिता, राजयोगसंहिता, हरिहर. ब्रह्मसामरस्य, योगप्रवेशिका, धर्मसुधार,श्रीमधुसूदनसंहिता आदि ग्रन्थ छप रहे हैं और शीघही प्रकाशित होनेवाले हैं। काल्कपुराण । फल्किपुराणका नाम किसने नहीं सुना है। वर्तमान समय के लिये यह बहुत हितकारी ग्रन्थ है। विशुद्ध हिन्दी अनुवाद और विस्तृत भूमिका सहित यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ है। धर्मजिज्ञासुमात्रको इस ग्रन्थको पढ़ना उचित है। मूल्य २) एक रुपया। योगदर्शन | हिन्दीभाष्य सहित । इसप्रकारका हिन्दी भाष्य और कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। इसका बहुत सुन्दर और परि- वर्जित नवीन संस्करण भी छप रहा है। मूल्य २) रुपया। नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत । भारत के प्राचीन गौरव और आर्यजातिका महत्त्व जानने के लिये यह एक ही पुस्तक है । मूल्य १) एक रुपया श्रीभारतधर्ममहामण्डलरहस्य । इस ग्रन्थ में सात अध्याय हैं । यथा-आर्यजातिकीदशाका परिवर्तन, चिन्ताका कारण, व्याधिनिर्णय, औषधिप्रयोग, सुपथ्यलेवन, वीजरक्षा और महायज्ञ- साधन । यह ग्रन्धरत्न हिन्दूजातिकी उन्नतिके विषयका असाधारण ग्रन्थ- है। प्रत्येक सनातनधर्मावलम्बीको इस ग्रन्थ को पढ़ना चाहिये । द्वितीयावृत्ति छप चुकी है, इसमें बहुतसा विषय बढ़ाया गया है । इस ग्रन्थका आदर सारे भारतवर्ष में समान रूपसे हुआ है। धर्मके गूढ़ तत्व भी इसमें बहुत अच्छी तरह से बताये गये हैं। इसका बंगला अनुवाद भी छप चुका है। मूल्य १) एक रुपया। निगमागमचन्द्रिका। प्रथम और द्वितीय भागकी दो ।
मूल्य १) (७) पुस्तकें धर्मानुरागी सज्जनोंको मिल सकती हैं। प्रत्येक का मूल्य १) एक रुपया । पहले के पाँच सालको पाँच भागोंमें सनातनधर्मके थनेक गूढ़ रहस्यसम्बन्धीय ऐसे प्रवन्ध प्रकाशित हुए हैं कि आजनक वैसे धर्मसम्बन्धीय प्रवन्ध और कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं । जो धर्मवे. अनेक रहस्य जानकर तृप्त होना चाहे वे इन पुस्तकोंको मंगा। मूल्य पांचों भागों को २॥) रुपया। भक्तिदर्शन । श्रीशाण्डिल्यसूत्रों पर बहुत विस्तृत हिन्दी माप्यसहित और एक अति विस्तृत भूमिकासहित यह ग्रन्थ प्रणीत हुआ है। हिन्दीका यह एक साधारण ग्रन्थ है। ऐसा भक्तिसम्बन्धीय अन्य हिन्दी में पहले प्रकाशित नहीं हुआथा। भगवद्भक्तिके विस्ता. रित रहस्योंका शान इस प्रन्यके पाठ करनेसे होता है। भक्तिशास्त्र- के समझने की इच्छा रखनेवाले और श्रीभगवानमें भक्ति करने वाले धार्मिकमात्रको इस अन्यको पढ़ना उचित है। गीतावली । इसको पढ़नेसे सङ्गीतशास्त्रका मर्म थोड़ेमें ही समझमें आसकेगा। इसमें अनेक अच्छे अच्छे भजनोंका भी संग्रह है। सङ्गीतानुरागी और भजनानुरागियोंको अवश्य इसको लेना चाहिये। मूल्य ॥) आठ श्राना। गुरुगीता । इस प्रकारकी गुरुगीता आजतक किसी भाषा- में प्रकाशित नहीं हुई है। इसमें गुरुशिष्यलक्षण, उपासनाका रहस्य और भेद, मन्त्र हट लय और राजयोगोंके लक्षण और अङ्ग एवं गुरुमाहात्म्य, शिष्यकर्त्तव्य, परमतत्वका स्वरूप और गुरुशब्दार्थ आदि सब विषय स्पष्टरूपले हैं। मूल और स्पष्ट सरल व सुमधुर भाषानुवाद सहित यह प्रन्थ छपा है । गुरु और शिष्य दोनोका उपकारी यह प्रन्थ है। इसका बंगानुवाद भी छप चुका मूल्य ) दो आनामात्र। मन्त्रयोगसंहिता । योगविषयक ऐसो अपूर्व ग्रंन्य आज तक प्रकाशित नहीं हुआ है । इसमें मन्त्रयोगके १६ अङ्ग और क्रमशः उनके लक्षण, साधनप्रणाली आदि सब अच्छीतरहसे वर्णन किये गये हैं। गुरु और शिष्य दोनों ही इससे परम लाभ उठा सक्त हैं। इसमें मंत्रोंका स्वरूप और उपास्यनिर्णय. बहुत अच्छा किया . है J चुका है। और सन्न्या (८) गया है। घोर अनर्थकारी साम्प्रदायिक विरोधके दूर करनेके लिये यह एकमात्र ग्रन्थ है। इसमें नास्तिकोंके मूर्तिपूजा, मन्त्रसिद्धि आदि विषयों में जो प्रश्न होते हैं उनका अच्छा समाधान है। मूल्य १) एक रुपयामान ।, तत्त्वबोध । भाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित । यह मूल ग्रन्थ श्रीशङ्कराचार्य कृत है। इसका चंगानुवाद भी प्रकाशित हो मूल्य =) दो श्राना संन्यासगीता । श्रीभारतधर्म महामण्डलके द्वारा सन्न्या. सियोंके लिये सन्न्यासगीता, साधकों के लिये गुरुगीता और पञ्च उपासकोंके लिये पञ्चंगीताएँ हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित हो, बुकी हैं । सन्न्यासगीता में सब सम्प्रदायोंके साधु सियों के लिये सब जानने योग्य विषय सन्निविष्ट हैं। सन्न्यासिगण इसके पाठ करने से विशेष ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे और अपना कर्तव्य जान सकेंगे। गृहस्थोंके लिये भी यह ग्रन्थ धर्मज्ञानका भण्डार है। मूल्य 111) चारह आना। देवीमीमांसा दर्शन प्रथम भाग । वेदके तीन काण्ड हैं। यथा:-कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड । ज्ञान- काण्डका वेदान्त दर्शन, कर्मकाण्ड का जैमिनी दर्शन और भरद्वाज दर्शन और उपासनाकाण्ड का यह अगिरा दर्शन है। इसका नाम दैवीमीमांसा दर्शन है। यह ग्रन्थ अाज तक प्रकाशित नहीं हुआ था। इसके चार पाद हैं, यथाः-प्रथम रसपाद इस पाद में भक्तिका विस्तारित विज्ञान वर्णित है । दूसरा.सृष्टि पाद, तीसरा स्थिति पाद और चौथा लयपाद, इन तीनों पादोंमें दैवीमाया, देवताओंके भेद, उपासनाका विस्तारित वर्णन और भक्ति और उपासनासे मुक्तिकी । प्राप्तिका सब कुछ विज्ञान वर्णित है। इस प्रथम भाग में इस दर्शन शास्त्रके प्रथम दो पाद हिन्दी अनुवाद और हिन्दी भाष्यसहित प्रकाशित हुए हैं। मूल्य १॥) डेढ़ रुपया। श्रीभगवद्गीता प्रथमखण्ड । श्रीगीताजीका अपूर्व हिन्दी भाष्य यह प्रकाशित हो रहा है जिसका प्रथम खण्ड, जिसमें अध्याय और द्वितीय अध्याय का कुछ हिस्सा है प्रकाशित हुआ है। आज तक श्रीगीताजी पर अनेक संस्कृत और हिन्दी भाष्यं प्रकाशित प्रथम - २ हुए हैं परन्तु इस प्रकार का भाग्य आज तक किसी भाषा में प्रका- शित नहीं हुआ है। गीता का अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूतरूपी 'त्रिविध स्वरूप, प्रत्येक श्लोक का त्रिविध अर्थ और सब प्रकार के अधिकारियोंके समझने योग्य गीता-विज्ञानका विस्तारित विवरण इस भाष्य में मौजूद है। मूल्य १) एक रुपया। मैनेजर, निगमागम बुकडिपो, महामण्डलभवन, जगतगंज, वनारस । पाँच गीताएँ। पञ्चोपासनाके अनुसार पांच गीताएं-श्रीविष्णुगीता, श्री- सूर्यगीता, श्रीशक्तिगीता, श्रीधीशगीता और श्रीशम्भुगीता, भाषा- नुवाद सहित छप चुकी है। श्रीभारतधर्म महामण्डलने इन पाँच गीताओंका प्रकाशन निम्न लिखित उद्देश्योसे किया हैः-१ म, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासकोंको धर्मके नामसे ही अधर्म सञ्चित करनेकी अवस्थामें पहुंचा दिया है, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासकोको अहङ्कारत्यागी होने के स्थानमें घोर साम्प्रदायिक अहंकारसम्पन्न बना दिया है, भारतकी वर्तमान दुर्दशा जिस साम्प्रदायिक विरोधका प्रत्यक्ष फल है और जिस साम्प्रदायिक विरोधने साकार-उपासको घोर द्वेष दावानल प्रज्वलित कर दिया है उस साम्प्रदायिक विरोधका समूल उन्मूलन करना और रथ, उपासनाके नामसे जो अनेक इन्द्रियासक्तिकी चरितार्थक धोर अनर्थकारी कार्य होते हैं उनका समाजमें अस्तित्व न रहने देना तथा ३य, समाज में यथार्थ भगवद्भक्तिके प्रचार द्वारा इहलौकिक और पारलौकिक अभ्युदय तथा निःश्रेयस-प्राप्तिमें अनेक सुविधा ओंका प्रचार करना । इन पाँचौ गीताओमें अनेक दार्शनिक तत्त्व, अनेक उपासनाकाण्डके रहस्य और प्रत्येक उपास्य देवकी उपा- सलासे सम्बन्ध रखनेवाले विषय सुचारुरूपसे प्रतिपादित किये गये हैं। ये पांचों गीताएं उपनिषद्रूप हैं। प्रत्येक उपासक अपने उपास्यदेवकी गोतासे तो लाभ उठावेगा ही, किन्तु, अन्य चार - ।
( १० ) गीताओंके पाठ करनेसे भी वह अनेक उपासनातत्वोंको तथा अनेक वैज्ञानिक रहस्योको अवगत हो सकेगा और उसके अन्तःकरणमें प्रचलित साम्प्रदायिक ग्रन्धोंसे जैसा विरोध उदय होता है वैसा नहीं होगा. और वह परम शान्तिका अधिकारी हो सकेगा। पाठक इन गीताओको मंगाकर देख सकते हैं ये छप चुकी हैं। विष्णु गीताका मूल्य ) सूर्यगीताकामूल्य ॥) शक्तिगीताका मूल्य ) धीशगीताका मूल्य ॥) और शंभुगीताका II) है। इनमें एक एक तीनरंगा विष्णुदेव सूर्यदेव भगवती और गणपतिदेव तथा शिवजी का चित्र भी दिया गया मैनेजर, निगमागम बुकडिपो, महामण्डलभवन, जगद्गंज वनारस.। है धार्मिक विश्वकोष । ( श्रीधर्मकल्पद्रुम) यह हिन्दूधर्मका अद्वितीय और परमावश्यक ग्रन्थ है। हिन्दू जातिकी पुनरुन्नतिके लिये जिन जिन आवश्यकीय विषयोंकी जरूरत है उनमें सबसे बड़ी भारी ज़करत एक ऐसे धर्मग्रंथकी थी कि, जिसके अध्ययन-अध्यापनके द्वारा सनातन धर्मका रहस्य और उसका विस्तृत स्वरूप तथा उसके अङ्ग उपांगोंका यथार्थ शान प्राप्त हो सके और साथही साथ वेदों और सब शास्त्रोका आशय तथा वेदों और सब शास्त्रोंमें कहे हुए विद्वानोंका यथाकम स्वरूप जिशासुको भलीभाँति विदित हो सके । इसी गुरुतर अभाव को दूर करनेके लिये भारतके प्रसिद्ध धर्मवक्ता और धी भारतधर्ममहामण्डलस्थ उपदेशक-महाविद्यालयके दर्शन शास्त्रके अध्यापक श्रीमान् स्वामी दयानन्दजीने इस ग्रन्थका प्रणयन करना प्रारम्भ किया है। इसमें वर्तमान समयके आलोच्य सभी विषय विस्तृतरूपसे दिये जायंगे । अबतक इसके छः स्वएडों में जो अध्याय प्रकाशित हुए हैं वे ये हैं:-धर्म, दानधर्म, तपोधर्म, कर्मयक्ष, उपासनायक्ष, ज्ञानयज्ञ, महायज्ञ, वेद, वेदाङ्ग, दर्शनशास्त्र .
. . ( १ ) (वेदोपाल), स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, तन्त्रशास्त्र, उपवेद, ऋषि और पुस्तक, साधारण धर्म और विशेष धर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, नारीधर्म (पुरुषधर्मसे नारीधर्मकी विशेषता), आर्य जाति, समाज और नेता, राजा और प्रजाधर्म, प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म, आपद्धर्म, भक्ति और योग, मन्त्रयोग, हठयोग, लय- योग, राजयोग, गुरु और दीक्षा, वैराग्य और साधन, आत्म- तत्त्व, जीवतत्य, प्राण और पीठतत्त्व, सृष्टि स्थिति प्रलयतस्व, ऋषि देवता और पितृतत्त्व, अवतारतत्त्व, मायातत्व, त्रिगुणतत्त्व, त्रिभाव- तत्व,कर्मतत्त्व,मुक्तितत्त्व,पुरुषार्थ और वर्णाश्रमसमीक्षा दर्शनसमीक्षा, धर्मसम्प्रदायसमीक्षा, धर्मपन्यसमीक्षा और धर्ममतसमीक्षा । आगेके नएडोंमें प्रकाशित होनेवाले अध्यायोके नाम ये हैं:-साधन- समीक्षा, चतुर्दशलोकसमीक्षा, कालसमीक्षा, जीवन्मुक्ति-समीक्षा, सदाचार, पञ्च महायज्ञ, श्राहनिककृत्य, षोडश संस्कार, श्राद्ध, प्रेतत्व और परलोक, सन्ध्या-तर्पण, ओंकार-महिमा और गायत्री, भगवन्नाम माहात्म्य, वैदिक मन्त्रों और शास्त्रोका अपलाप, तीर्थ- महिमा, सूर्यादिग्रह-पूजा, गोसेवा, संगीत-शास्त्र, देश और धर्म सेवा इत्यादि इत्यादि । इस ग्रन्थसे आजकलके अशास्त्रीय और विज्ञान-रहित धर्मग्रन्थों और धर्मप्रचारके द्वारा जो हानि हो रही है वह सब दूर होकर यथार्थ रूपसे सनातन वैदिक धर्मका प्रचार होगा । इस ग्रन्थरतमें साम्प्रदायिक पक्षपातका लेशमात्र भी नहीं है और निष्पक्षरूपसे सब विषय प्रतिपादित किये गये हैं, जिससे सकल प्रकारके अधिकारी कल्याण प्राप्त कर सकें. इसमें और भी एक विशेषता यह है कि हिन्दूशास्त्रके सभी विज्ञान शास्त्रीय प्रमाणों और युक्तियों के सिवाय, आजकलकी पदार्थ विद्या ( Soience ) के द्वारा भी प्रतिपादित किये गये हैं जिससे आजकलके नवशिक्षित पुरुष भी इससे लाभ उठा सकें। इसकी भाषा सरल, मधुर और • गम्भीर है। यह ग्रन्थ चौसठ अध्यायों और आठ समुल्लासों में पूर्ण होगा और यह वृहत् अन्ध रायल साइजके चार हजार पृष्ठोंसे अधिक होगा तथा धारह खण्डों में प्रकाशित होगा। इसीके अन्तिम खण्डमें आध्यात्मिक शब्दकोष भी प्रकाशित करनेका विचार है। इसके छः खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं ।' प्रथम खण्डका मूल्प २), . . १६.
द्वितीय का १॥),तृतीयकार),चतुर्थकार) पंचमका २) औरषष्ठका ) है। इसके प्रथम दो खण्ड बढ़िया कागज पर भी छापे गये हैं और दोनों ही एक बहुत सुन्दर जिल्दमें वांधे गये हैं। मूल्य ५) है। सातवाँ खण्ड यन्त्रस्थ है। मैनेजर, निगमागम बुकडीपो, महामण्डलभवन, जगतगंज, वनारस। अंग्रेजी भाषाके धर्मग्रन्थ । . श्री भारतधर्म महामण्डल शास्त्र प्रकाश विभाग द्वारा प्रका- शित सवसंहिताओं,गीताओं और दार्शनिक अन्धोका अंग्रेजी अनुवाद तयार हो रहा है जो क्रमशः प्रकाशित होगा। सम्प्रति अंग्रेजी भाषामें एक ऐसा ग्रन्थ छप गया है जिसके द्वारा सव अंग्रेजी पढ़े व्यक्तियोंको सनातन धर्मका महत्त्व, उसका सर्वजीवहितकारी स्वरूप, उसके सब अङ्गोका रहस्य, उपासनातत्व, योगतत्त्व, काल और सृष्टितत्त्व, कर्मतत्त्व, वर्णाश्रमधर्मतत्त्व इत्यादि सब बड़े बड़े विषय अच्छी तरह समझमें भाजावें । इसका नाम, वर्लस इटरनल रिलिजन है। इसका मूल्य रायलएडीशनका ५) और साधारणका३) है। जिल्द बंधी हुई हैं और सात त्रिवर्ण चित्र भी दिये हैं। मैनेजर, निगमागम बुकडीपो महामण्डलभवन, जगत्गंज, वनारसं । विविध विषयोंकी पुस्तकें । पारिवारिकप्रवन्ध१) आवारप्रवन्ध १) असभ्यरमणी) धनुर्वेद संहिता 1) ग्वीसेफ मेजिनी ।) परशुराम संवाद )। शास्त्रीजीके - दो व्याख्यान ||=) अनार्यसमाज रहस्य ३) प्रयाग महात्म्य =) अर्जुनगीता -) दानलीला) हनुमान चलीसा )। भर्तृहरिचरित्र )। रामगीता) भजन गोरक्षाप्रकाश मजरी)। बारहमासी -) मानस 'मलरी) मूर्तिपूजा) वारेन्देस्टिनकी जीवनी १) इङ्गलिश ग्रामर 1) पहिली किताब )। उपन्यास कुसुम =) वालिका प्रबोधिनी-) वैवरहस्य दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग 1) दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग 2) नवीन रत्नाकर भजनावली)। आदर्शहिन्दू रमणी!) कार्तिकप्रसादकी जीवनी:-) किसान विद्या।) प्रवासी =).वसन्त- कार) घालहित.)। भेगास्थनीजका भारतवर्षीय वर्णन ||=) सदाचार ) होलीका रहस्य -) क्षत्रियहितैषिणी :-) गोवंशचिकि- सा) गोगीतावली - धीरवाला) हमारा सनातनधर्म )। वैया करणं भूपण ॥) त्रैभाषिक व्याकरण ) राजशिक्षा १) मङ्गलदेव पराजय -) भाषावाल्मीकीय रामायण ११) झांसीकी रानी1) कल्कि पुराण उर्दू ॥) सिद्धान्त कौमुदी २) राशिमाला ) सिद्धान्तपटल.) सारमअरी ..) सिकन्दरकी जीवनी ) योगामृततरङ्गिणी ) यजुर्वेदीय संध्या)। नोट-पच्चीस रुपयोंसे अधिककी पुस्तके खरीदनेवालेको योग्य कमीशन भी दिया जायगा। शीघ छपने योग्य ग्रन्थ । हिन्दी साहित्यकी पुष्टिके अभिप्रायसे तथा धर्मप्रचारकी शुभ चालनासे निम्नलिखित ग्रन्थ क्रमशः हिन्दी अनुवादसहित छापनेको तैयार हैं। यथा:- भाषानुवाद सहित हठयोग संहिता, योगदर्शनके भाषाभाष्यका नवीन संस्करण, भरद्वाजकत, कर्ममीमांसादर्शनके भाषाभाष्यका प्रथम खण्ड और सांख्यदर्शनका भाषाभाष्य ) मैनेजर, निगमागम बुकडीपो;. . महामण्डलभवन, जगत्गंज, बनारस। .. श्रीमहामण्डलके सभ्योको विशेष सुविधा। हिन्दू समाजकी एकता और सहायताके लिये विराट् आयोजन। श्रीभारतधर्ममहामण्डल हिन्दू जातिकी अद्वितीय धर्ममही- सभा और हिन्दू समाजकी उन्नति करनेवाली भारतवर्षके सकल प्रान्त- . ( १४ ) व्यापी संस्था है। श्रीमहामण्डलके सभ्य महोदयोंको केवल धर्मशिक्षा देना ही इसका लक्ष्य नहीं है, किन्तु हिन्दू समाजकी उन्नति, हिन्दूस. माजकी दृढ़ता और हिन्दू समाज में पारस्परिक प्रेम व सहायताकी वृद्धि करना भी इसकाप्रधान लक्ष्य है इस कारण निम्नलिखित नियम श्रीमहामण्डलकी प्रवन्ध-कारिणी सभाने वनाये हैं। इन नियमोंके अनुसार जितने अधिक संख्यकसभ्य महामण्डलमें सम्मिलित होंगे उतनी ही अधिक सहायता महामण्डल के सभ्य महोदयोको मिल सकेगी। ये नियम ऐसे सुगम और लोकहितकर बनाये गये है कि श्रीमहामण्डलके जो सभ्य होंगे उनके परिवारको बड़ी भारी एक- कालिक दानकी सहायता प्राप्त हो सकेगी। वर्तमान हिन्दूसमाज जिस प्रकार दरिद्र होगया है उसके अनुसार श्रीमहामण्डलके ये नियम हिन्दू समाजके लिये बहुत ही हितकारी हैं इसमें सन्देह नहीं। श्रीमहामण्डलके मुखपत्रसम्बन्धी उपनियम । (१) धर्मशिक्षाप्रचार, सनातनधर्मचर्चा, सामाजिकउन्नति, सद्विद्याविस्तार, श्रीमहामण्डलके कार्यों के समाचारोंकी प्रसिद्धि और सभ्योंको यथासम्भव सहायता पहुँचाना आदि लक्ष्य रख कर श्रीमहामण्डलके प्रधान कार्यालय द्वारा भारत के विभिन्न प्रान्तों. में प्रचलित देशभापामोंमें मासिकपत्र नियमितरूपसे किये जायेंगे। (२) अभी केवल हिन्दी और अंग्रेजी-इन दो भाषाओंके दो मासिकपत्र प्रधान कार्यालयसे प्रकाशित हो रहे हैं। यदि इन नियमोके अनुसार कार्य करने पर विशेष सफलता और सभ्योकी विशेष इच्छा पाई जायगी तो भारतके विभिन्न प्रान्तोंकी देश- भापाओमें भी क्रमशः मासिकपत्र प्रकाशित करनेका विचार रक्खां गया है। इन मासिकपात्रोमेसे प्रत्येक मेम्बरको एक एक मासिक- पत्र, जो वे चाहेंगे, विना मूल्य दिया जायगा। कमसे कम दो हजार सभ्य महोदयगण जिस भाषाका मासिक पत्र चाहेंगे, उसी भाषामें मासिकपत्र प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया जायगा, परन्तु जवता उस भाषाका मासिक पत्र प्रकाशित न हो तब तक श्रीम- .
( १५ हामण्डलका हिन्दी अथवा अंगरेजीका मासिक पत्र विना मूल्य दिया जायगा। (३) श्रीमहामण्डलके साधारण सभ्योको वार्षिक दो रुपये चन्दा देने पर इन नियमोंके अनुसार लव सुविधाएँ प्राप्त होगी। श्रीमहामण्डलके अन्य प्रकारके सभ्य, जो धम्र्मोन्नति और हिन्दू- समाजकी सहायताके विचारसे अथवा अपनी सुविधाके विचारसे, इस यिभागमें स्वतन्त्र रीतिसे कमसे कम २ दो रुपये वार्षिक नियमित चन्दा देगे वे भी इस कार्यविभागकी सब सुविधाएँ प्राप्त कर सकेंगे। (४) इस विभागके रजिस्टरदर्ज सभ्योंको श्रीमहामण्डलके अन्य प्रकारके सभ्योंकी रीतिपर श्रीमहामण्डलसे सम्बन्धयुक्त सब पुस्तकादि अपेक्षाकृत स्वल्प मूल्यपर मिला करेंगी। समाजहितकारी कोष । (यह कोष श्रीमहामण्डलके सब प्रकारके सभ्योके-जो इसमें सम्मिलित होंगे-निर्वाचित व्यक्तियोंको आर्थिक सहायताके लिये खोला गया है) (५) जो सभ्य नियमित प्रतिवर्ष चन्दा देते रहेंगे उनके देहान्त होने पर जिनका नाम वे दर्ज करा जायँगे, श्रीमहामण्डलके इस कोष द्वारा उनको आर्थिक सहायता मिलेगी। (६) जो मेम्बर कमसे कम तीन वर्ष तक मेम्बररहकर लोका. न्तरित हुए हो, केवल उन्हींके निर्वाचित व्यक्तियोंको इस समाज- हितकारी कोषकी सहायता प्राप्त होगी, अन्यथा नहीं दी जायगी। (७) यदि कोई सभ्य महोदय अपने निर्वाचित व्यक्तिकेनामको श्रीमहामण्डलप्रधानकार्यालयंके रजिस्टर में परिवर्तन कराना चाहेंगे तो ऐसा परिवर्तन एक वार बिना किसी व्ययके किया जायगा। 'उसके बाद वैसा परिवर्तन पुनः कराना चाहे तो।) भेजकर परि-. वर्तन करा सकेंगे। (८) इस विभागमें साधारण सभ्यों और इस कोषके सहायक अन्यान्य सभ्योकी ओरसे प्रतिवर्ष जो आमदमी होगी उसका आधा अंश श्रीमहामण्डलके छपाई-विभागको मासिक पत्रोंकी छपाई और ( १६ ) प्रकाशन आदि कार्यके लिये दियाजायगा। बाकी आधी रुपया एक स्वतन्त्र कोषमें रक्खा जायगा जिस कोषका नाम "समाजहित- कारी कोष होगा। • (९)" समाजहितकारी कोष " का रुपया बैंक ऑफ बंगाल अथवा ऐसे ही विश्वस्त बैंक में रक्खा जायगा। (१०) इस कोषके प्रबन्ध लिये एक खास कमेटी रहेगी। (११) इस कोषकी आमदनीका प्राधा रुपया प्रतिवर्ष इस कोषके सहायक जिन मेम्बरोंकी मृत्यु होगी, उनके निर्वाचित व्य. क्तियों में समानरूपले वाँट दिया जायगा। (१२) इस कोपमें बाकी आधे रुपयोंके जमा रखनेसे जो लाभ होगा, उससे श्रीमहामण्डलके कार्यकर्ताओं तथा मेम्बरोके क्लेशका विशेष कारण उपस्थित होने पर उन क्लेशोंको दूर करने के लिये कमेटी व्यय कर सकेगी। (१३) किसी मेम्वरकी मृत्यु होने पर वह मेम्बर यदि किसी महामण्डलकी शाखासभाका सभ्य हो अथवा किसी शाखासभाके निकटवर्ती स्थानमें रहनेवाला हो तो उसके निर्वाचित व्यकिका फर्ज होगा कि वह उक्त शाखासभाकी कमेटीके मन्तव्यकी नकल श्रीमहामण्डल प्रधान कार्यालयमें भिजवावे । इस प्रकारसे शाला. समाके मन्तव्यकी नकल आने पर कमेटी समाजहितकारी कोषसे सहायता देनेके विषयमें निश्चय करेगी। (१४) जहाँ कहीं सभ्योको इस प्रकारकी शाखासभाकी सहायता नहीं मिल सकती है या जहाँ कहीं निकट शाखासभा नहीं है ऐसी दशाम उस प्रान्तके श्रीमहामण्डलके प्रतिनिधियों से किसीके अथवा किसी देशी रजवाड़ोमें हो तो उक दर्वारके प्रधान. कर्मचारीका सार्टिफिकिट मिलनेपर सहायता देनेका प्रबन्ध किया जायगा। १५) यदि कमेटी उचित समझेगी तो, वालावाला खबर मंगाकर सहायताका प्रबन्ध करेगी, जिससे कार्यमें शीघ्रता हो.! अन्यान्य नियम। (१६) महामण्डलके अन्य प्रकारके सभ्यों से जो महाशय हिन्दूसमाजकी उन्नति और दरिद्रीकी सहायताके विचारसे इस - ( १७ ) कोष कमले कम ३) दो रुपये सालाना सहायता करने पर भी इस फण्डसे फायदा उठाना नहीं चाहेंगे वे इस कोषके परिपोषक समझे जायेंगे और उनकी नामावली धन्यवादसहित प्रकाशित की जायगी। (१७) हर एक साधारण मेम्बरको-चाहे स्त्री हो या पुरुष- प्रधान कार्यालयसे एक प्रमाणपत्र-जिसपर पञ्चदेवताओंकी मूर्ति और कार्यालयकी मुहर होगी-साधारण मेम्बरके प्रमाणरूपले दिया जायगा। (१) इस विभागमें जो चन्दा देंगे उनका नाम नम्बरसहित हर वर्ष रसीदके तौर पर ये जिस भाषाका मासिक पत्र लेंगे उसमें छापा जायगा । यदि गलतीसे किसीका नाम न छपे तो उनका फर्ज होगा कि प्रधान कार्यालयमै पत्र भेजकर अपना नाम छपधाचं, क्योंकि यह नाम छपना ही रसीद समझी जायगी। (२९ ) प्रतिवर्ष का चन्दा २) मेम्बर महाशयोको जनवरी महीनेमें आगामी भेज देना होगा । यदि किसी कारण विशेषसे जनवरीके अन्ततक रुपया न आवे तो और एक मास अर्थात् फरवरी मास तक अवकाश दियाजायगा और इसके बाद अर्थात्मार्च मदीनमें रुपया न प्रानेसे मेम्बर महाशयका नाम काट दिया जायगा और फिर वे इस समाजहितकारी कोपसे लाभ नहीं उठा सकेंगे। (२०) मेम्बर महाशयका पूर्व नियमके अनुसार नाम कट जानेपर यदि कोई असाधारण कारण दिखाकर वे अपना हक सावित रखना चाहेंगे तो कमेटीको इस विषय में विचार करने का अधिकार मई मासतक रहेगा और यदि उनका नाम रजि- स्टरमें पुनः दर्ज किया जायगा तो उन्हें ।) हर्जाना समेत चन्दा अर्थात् ।) देकर नाम दर्ज करा लेना होगा। (२१) वर्ष के अन्दर जब कभी कोई नये मेम्बर होंगे तो उन- को उस सालका पूरा चन्दा देना होगा । वर्षारम्भ जनवरीसे समझा जायगा। (२२) हर साल के मार्च में परलोकगत मेम्बरोंके नि- वर्वाचित व्यक्तियोंको ' समाजहितकारी कोष' को गतवर्ष की । -- ( १८ ) सहायता वाँटी जायगी ; परन्तु नं. १२ के नियमके अनुसार सहा- यताके बाँटनेका अधिकार कमेटीको सालभर तक रहेगा। (२३) इन नियमोके घटाने-बढ़ानेका अधिकार महामण्डल को रहेगा। (२४) इस कोषको सहायता · श्रीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधान कार्यालय, काशी' से ही दी जायगी। सेक्रेटरी, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगत्गंज, बनारस । . . श्रीमहामण्डलस्थ उपदेशक-महाविद्यालय । श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधानकार्यालय काशी में साधु और गृहस्थ धर्मवका प्रस्तुत करनेके अर्थ श्रीमहामण्डल- उपदेशक महाविद्यालय नामक विद्यालय स्थापित हुआ है । जो साधुगण दार्शनिक और धर्मसम्बन्धी ज्ञानलाभ करके अपने साधु. जीवनको कृतकृत्य करना चाहें और जो विद्वान् गृहस्थ .धार्मिक शिक्षा लाम करके धर्मप्रचार द्वारा देशकी सेवा करते हुए अपना जोवन निर्वाह करना चाहे वे निम्नलिखित पते पर पत्र भेजें। प्रधानाध्यक्ष, श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय, जगत्गंज, बनारस (छावनी)। .. श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णा-दानभण्डार । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशी में दीनदुःखि- योंके क्लेशनिवारणार्थ यह सभा स्थापित की गई है। इस सभाके द्वारा अतिविस्तृत रीति पर शास्त्र प्रकाशनका कार्य प्रारम्भ किया गया है । इस समाके द्वारा धर्मपुस्तिका पुस्तकादि यथासम्भव विना मूल्य वितरण करनेका भी विचाररक्खा गया है। इस दानमा- एडारकेद्वारा महामण्डलद्वारा प्रकाशित तत्ववोध,साधुओका कर्तव्य, धर्म और धज्ञि, दानधर्म, नारीधर्म,महामण्डलकी आवश्यकता आदि कई एक हिन्दीभाषाके धर्मग्रंथ और अंग्रेजीभाषाके कई एक ट्रैक्स विना मूल्य योग्य पात्रोंको बांटे जाते हैं। पत्राचार करनेपर विदित हो सकेगा। शास्त्रप्रकाशनकी आमदनी इसी दानभाण्डारमें दीन दुखियोंके दुःखमोचनार्थ व्यय की जाती है । इस सभामें जो दान करना चाहे या किसी प्रकारका पत्राचार करना चाहे वे निम्न. लिखित पते पर पत्र भेजें। सेक्रेटरी, श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णा-दानमण्डार, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधान कार्यालय, जगत्गंज, बनारस (छावनी)। . श्रीमहामण्डलका शास्त्रप्रकाशविभाग । यह विभाग बहुत विस्तृत है । अपूर्व संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजीकी पुस्तके काशी प्रधान कार्यालय (जगत्गंज) में मिलती हैं। बंगला.सिरीज कलकत्तादफ्तर(६२वाहबाजारस्ट्रीट)मेव उर्दू सिरीज फीरोजपुर [पजाब ) दफ्तर में मिलती है और इसीप्रकार अन्यान्य प्रान्तीय कार्यालयों में प्रान्तीय भाषाओंके अन्धोका प्रवन्ध हो रहा है। सैक्रेटरी श्रीभारतधर्म महामण्डल. जगत्गंज बनारस। आय्यमहिलाके नियम । १-श्रीआर्यमहिलाहितकारिणी महापरिषद्की मुखंपत्रिकाके रूपमें आर्यमहिला प्रकाशित होती है। २-महापरिषद्की सव प्रकारकी सभ्या महोदयाओं और सभ्य महोदयोंको यह पत्रिका विना मूल्य दीजाती है। अन्य ग्राहकोंको .६) वार्पिक अग्रिम देने पर प्राप्त होती है। प्रतिसंख्याका मूल्य १॥) है । पुस्तकालयों तथा वाचनालयों को ३) वार्षिको ही दी जाती है। ३-किसी लेखको घटाने बढ़ाने वा प्रकाशित करने न करनेका सम्पूर्ण अधिकार सम्पादिकाको है। योग्य लेखकों तथा लेखिकाओं को नियत पारितोषिक दिया जाता है.और विशेष योग्यं लेखकों तथा लेस्लिंकाओको अंन्यान्य प्रकार से भी सम्मानित किया जाता है। -हिन्दी लिखने में असमर्थ मौलिक लेखक-लेखिकाओंके ( २० ) लेखोंका अनुवाद कार्यालयसे कराकर छापा जाता है। ५-समालोचनार्थ पुस्तके, लेख, परिवर्तनकी पत्र-पत्रिकाएँ, कार्यालय-सम्बन्धी पत्र, छपने योग्य विज्ञापन और रुपया आदि सब निम्नलिखित पते पर आना चाहिये। पण्डित रामगोविन्द त्रिवेदी वेदान्तशास्त्री मैनेजर आय॑महिला श्रीमहामण्डलभवन जगत्गंज बनारस । आर्यमहिलामहाविद्यालय । इस नामका एक महाविद्यालय (कालेज) जिसमें विधवा- आश्रम भी शामिल रहेगा श्रीआर्यमहिलाहितकारिणी महापरिषद् नामक सभाके द्वारा स्थापित हुआ है जिसमें सत्कुलोद्भव उच्च जातिकी विधवाएँ मासिक १५) से २०) तक वृत्ति देकर भरती की जाती हैं और उनको योग्य शिक्षा देकर हिन्दूधर्मकी उपदेशि- का, शिक्षयित्री आदि रूपसे प्रस्तुत किया जाता है । भविष्यत् जीविकाका उनके लिये यथायोग्य प्रबन्ध भी किया जाता है। इस विषयमै यदि कुछ अधिक जानना चाहे तो निम्न लिखित पते पर पत्र व्यवहार करें। प्रधानाध्यापक आर्यमाहिला महाविद्यालय महामण्डल भवन जगत्गंज बनारस । हिन्दूधार्मिक विश्वविद्यालय । (श्री शारदामण्डल ) हिन्दू जातिको विराट् धर्मसभा श्री भारतधर्म महामण्डलका यह विद्यादान विभाग है। वस्तुतः हिन्दूजातिके पुनरभ्युदय और हिन्दूधर्मकी शिक्षा सारे भारतवर्षमै फैलानेके लिये यह विश्व- विद्यालय स्थापित हुआ है। इसके प्रधानतः निम्न लिखित पांच कार्यविभाग हैं।
(२१) (१) श्री उपदेशक महाविद्यालय (हिन्दू कालेज प्रोफ डिवि. निटी) इस महाविद्यालयके द्वारा योग्य धर्मशिक्षक और धर्मो. पदेशक तयार किये जाते हैं। अंग्रेजी भाषाके वी ए. पास अथवा संस्कृत भाषाके शास्त्री आचार्य आदि परीक्षाओंकी योग्यता रखने धाले पण्डित ही छात्र रूपसे इस महाविद्यालयमें भरती किये जाते हैं। छात्रवृत्ति २५) महावार तक दी जाती है। (२) धर्मशिक्षाविभाग । इस विभागके द्वारा भारतवर्ष के प्रधान प्रधान नगरांमें ऊपर लिखित महाविद्यालयसे परीक्षोत्तीर्णएक एक पण्डित स्थायी रूपसे नियुक्त करके उक्त नगरोंके स्कूल, कालेज और पाठशालाओं में हिन्दूधर्मको धार्मिक शिक्षा देनेका प्रवन्ध किया जाता है। वे पण्डितगण उन नगरोंमें सनातन धर्मका प्रचार 'भी करते रहते हैं। ऐसा प्रबन्ध किया जा रहा है कि जिससे महामण्डलके प्रयत्तसे सब बड़े बड़े नगरों में इस प्रकार धर्मकेन्द्र स्थापित हो और वहां मासिक सहायता भी श्री महामण्डलकी ओरसे दी जाय। (३) श्री आर्यमहिलामहाविद्यालय भी इसी शारदामण्डलका अङ्ग समझा जायगा और इस महाविद्यालयमें उश्च जातिकी विधवाओके पालन पोपणका पूरा प्रबन्ध करके उनको योग्य धर्मो- पदेशिका, शिक्षयित्री और गवर्नेस आदिके काम करने के उपयोगी बनाया जायगा। (४) सर्वधर्मसदन (हाल ओफ ओल रिलिजन्स ) इस नामसे यूरोपके महायुद्धके स्मारक रूपसे एक संस्था स्थापित करनेका प्रवन्ध हो रहा है। यह संस्था श्री महामण्डलके प्रधान कार्यालय तथा उपदेशक महाविद्यालयके निकट ही स्थापित होगी। इस संस्थाके एक और सनातन धर्मके अतिरिक्त सब प्रधान प्रधान धर्ममतोंके उपासनालय रहेंगे जिनमें उक्तधम्मौके जानने वाले एक एक विद्वान् रहेंगे। दूसरी ओर सनातन धर्मके पञ्चोपासनाके पांच देवस्थान और लीला विग्रह उपासना आदि देवमंदिर रहेंगे। इसी संस्थामें एक वृहत् पुस्तकालय रहेगा कि जिसमें पृथिवी भरके संब धर्ममतोंके धर्मग्रन्थ रक्खे जायंगे और इसी संस्थासे .
( २२ )
संश्लिष्ट एक व्याख्यानालय व शिक्षालय (हाल ) रहेगा जिसमें उक्त
विभिन्न धर्मोके विद्वान् तथा सनातन धर्मके विद्वान्गण यथानाम
व्याख्यानादि देकर धर्मसम्बन्धीय अनुसन्धान तथा धम्मशिक्षा-
कार्यकी सहायता करेंगे। यदि पृथिवीके अन्य देशोले कोई विद्वान्
काशीमें श्राकर इस सर्वधर्मसदनमें दार्शनिक शिक्षा लोभ करना
चाहेगा तो उसका भी प्रवन्ध रहेगा।
(५) शास्त्र प्रकाश विभाग। इस विभागका कार्य स्पष्ट ही है।
इस विभागसे धर्मशिक्षा देने के उपयोगी नाना भापानीकी पुस्तके
तथा सनातन धर्मकी सब उपयोगी मौलिक पुस्तकें प्रकाशित हो
रही हैं और होंगी।
इस प्रकारसे पांच कार्यविभाग व संस्थाओंमें विभक्त होकर
श्री शारदामण्डल लनातनधर्मावलस्त्रियोंकी सेवा व उन्नति
करने में
प्रधान मंत्री
श्रीभारतधर्म महामण्डल
प्रधान कार्यालय, बनारस ।
प्रवृत्त रहेगा।
एजन्टोंकी आवश्यकता । .
-
श्रीभारतधर्म महामण्डल और आय॑महिलाहितकारिणी
महापरिषद्के मेम्बरसंग्रह और पुस्तकविक्रय आदिके लिये
भारतवर्ष के प्रत्येक नगर में एजण्टोकी जरूरत है। एजन्टोको अच्छा
पारितोषिक दिया जायगा । इस विपयके नियम श्रीमहामण्डल
प्रधान कार्यालयमें पत्र भेजनेसे मिलेंगे।
सैक्रेटरी
श्रीभारतधर्म
महामण्डल
जगत्गंज बनारस।
. श्रीभारतधर्ममहामण्डलके सभ्यगण और मुखपत्र । शोभारमधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशी से एक हिन्दी भाषाका और दूसरा अंग्रेजी भापाका, इस प्रकार दो मासिक- पत्र प्रकाशित होते हैं एवं श्रीमहामण्डलके अन्यान्य भाषाओंके मुखपा श्रीमहामण्डलके प्रान्तीय कार्यालयों से प्रकाशित होते हैं। यथा:-कलकत्तेके कार्यालयसे वंगला भापाफा मुखपत्र. फिरोजपुर ( पक्षाय ) के कार्यालयसे उर्दू भाषाका मुखपत्र, मेरठके कार्याल- यसे हिन्दीभापाका मुखपत्र और दिल्लीके कार्यालयसे हिन्दी. भापाका मुखपत्र इत्यादि । श्रीमहामण्डलके पांच श्रेणीके सभ्य होते हैं। यथा:-स्वाधीन नर. पति और प्रधान-प्रधान धर्माचार्य्यगण संरक्षक होते हैं। भारतवर्षके सर प्रान्तोके बड़े बड़े ज़मीदार, सेठ, साहुकार आदि सामाजिक नेतागण उस उस प्रान्तके चुनावके द्वारा प्रतिनिधि सभ्य चुने जाते हैं । प्रत्येक प्रान्तके अध्यापक ब्राह्मणगणमे से उस उस प्रान्तीय मण्डलके द्वारा चुने जाकर धर्मव्यवस्थापक सभ्य बनाये जाते हैं। भारतवर्षके सब प्रान्तोंसे पांच प्रकारके सहायक सभ्य लिये जाते हैं; विद्यासम्बन्धी कार्य करनेवाले सहायक सभ्य, धर्म- कार्य करनेवाले सहायक सभ्य, महामण्डल प्रान्तीयमण्डल और शाखासभाओंको धनदान करनेवाले सहायक सभ्य, विद्यादान करने वाले विद्वान् ब्राह्मण सहायक सभ्य और धर्मप्रचार करनेवाले साधु संन्यासी सहायक सभ्यापाँचवीं श्रेणीके सभ्य साधारण सभ्य होते हैं जो हिन्दुमात्र हो सकते हैं। हिन्दु-कुलकामिनीगण केवल प्रथम तीन श्रेणीकी सहायक-सभ्याऔर साधारण-सभ्या हो सकती हैं। इन सब प्रकारके सभ्यो और श्रीमहामण्डलके पान्तीय मण्डल, शाखा सभा और संयुक्त-सभाओंको श्रीमहामण्डलका हिन्दी अथवाअंग्रेज़ी भापाका मासिकपत्र विना मूल्य दिया जाता है । नियमितरूपसे नियत वार्षिक चन्दा २) दो रुपये देनेपर हिन्दू-नरनारी साधारण सभ्य हो सकते हैं। साधारण सभ्योंको विना मूल्य मासिकपत्रिका. के अतिरिक्त उनके उत्तराधिकारियोको समाजहितकारी कोषके द्वारा विशेष लाभ मिलता है। प्रधानाध्यक्ष, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधान कार्यालय, जगत्गंज, बनारल।
up the THE ARYAN BUREAU OF SEERS & SAVANTS. ESTABLISHED UNDER THE DISTINGUISHED PATRONAGE OF THE LEADERS OF SRI BHARAT DHARMA MAHAN ANDAL. A Committee (Bureau) of this name has been started with the ohjoct, amongst others, of establishing a condecting link, through the vehicle of correspondence, with those Scholars and Litorary Societies that take an interest in questions of Theology, Hindu Philosophy and Sapskrit literature all over the civilised world, To fulfil the above objects the Bureau intends to tako following: 1. To receive and answer questions through bona file correspondence regarding Hindu Religion and Science, Codes, Practical Yoga, Vaidio Philosoply and General Sanskrit Literature. 2. To exbibit to the enlightened world the catholicity of the Vaidic doctrines, and its fostering agency as universal helper towards moral and spiritual amelioration of nations. 3. To render mutual help as regards comparative researches in Science, Philosophy and Literatures both Oriental and Occidental. 4. To welcome such suggestions as may emanato from learned sources all over the world conducive to the improvement and benefit of humanity. 5. And to do such other things as may learl to the fulfilmont of the above objects or any of them, RULES OF THE SOCIETY. 1. There are to be 2 ulasses of Meinbers, General & Special. 2. The Membership are to be all honorary. 3. Those who will sympathise with the oliject, and enlist thoir names and addresses in the Register of the Burenu as Co-operators will be considered as General Members. 4. Special members are to be those who shall bo qualifie. to answer points of their respective religions. 3. The Membersluip of the Burean will be irrespicolive of caste, creed and nationality. 6. The spiritual qnestions will bo responded to through correspondence as well as in Debate Meetings bold in the office of the Barcau on dates fixed for the purpose. 7. There is to be a Secretary and an Assistant Secretary to be appointed hy the Founder of the Bureau (lioth pusts lionorary.) 8. All the books, tracts and leaflets that will be published concerning the Bureau will be forwarded free to all the Members of the Burean, All correspondence to be addressed to SWAMI DAYANAND, SECRETARY, Aryan Bureau of Seers & Savante. C/o Sri Mahamandal Office, BENARES CITY (India.) NB.Orioutal scholars, all over the world, ale lnvited to send tlıoir Daines and addressos to facilitate mutual communication and despatch of necessary Papers. 3 {