Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Srishraddhadinkritya Sutram Ii
Front matter
No text on this page.
-- श्रीमद्धनञ्जयकविविरचित- ५ नाम-माला। का सरल हिन्दी अनुवाद। महरौनी (झांसी) निवासी घनश्यामदास जन प्रधान-अध्यापक सेठ स्व० हु० दि. जैन महाविद्यालय-इन्दौर । [मूल्य.) माने 'वीर नि० सं. २४५२ प्रथमावृत्ति] -
No text on this page.
नम्र निवेदन।
-
1000.
'इस पुस्तक के तथा इसके रचयिता के
विषय में विशेष कुछ लिखने की आवश्यकता
नहीं प्रतीत होती क्योंकि इन दोनों से ही
हमारे पाठक चिरपरिचित हैं-पर, इतना नम्र
निवेदन कर देना आवश्यक है कि कारण
वश इस पुस्तक के छपने में कई अशुद्धिएँ
रह गई हैं उनको, विज्ञ पाठक शुद्धि पत्र देख
कर पहले सुधार लेवें, पीछे पढ़ें, तो मैं उनका
बहुत ३ आभार मानूंगा।
बन्शीधर जैन मास्टर
ललितपुर (झांसी)
शुद्धिपत्र । ३ प्ररय C c RURUs अशुद्धि शुद्धि पत्र संख्या । अशुद्धि शुद्धि पत्रसंख्या । स्तंबरम वर मता वसुमती स्तम्बेरमः २४ विश्वभरा विश्वंभरा घमनधिस धमनीधम २७. वर्वत पर्वत प्रारश्य शिखरी .शिखरी परायात्मा पुण्यात्मा ३२ यौननिक शिलेच्चय शिलोच्चय ३४ यौवनिक निवृत निवृत ३७ प्लग प्लग वनेवरः वनचरः किसान(खितहड़), वलभद्र३६ पिशग्यपि पिशङ्गायपि ४२ ययस् पयस प्रदेश निदेश दीयता दयिता १० कंचिदकिश्चिन किञ्चित्किञ्चन वैर्यरति वैर्यराति १२ ४३ अचिौ १३ कश्चित् किञ्चितू मातराड मार्तण्ड किञ्चिन ४३ स्वद्यौः स्वधाः १६ क्षणो क्षणे ४३ सनासीर सुनाशीर १६ त्यगातन न्यगातन ४३ सुत्रासन सुत्रामन् देवानां ४५. प्रथमाधिप प्रमथाधिप १६ प्रस्तरोत्पल प्रस्तरोपल ४६ वाणिसूदन वाणसूदन २० उत्पल उपल हदयं हृदयं २२ पुगुण प्रगुण ५६ विनकरः विघ्नकरः वध्ने ६२ ७० पेज में ४५ वी गाथा के पूर्वार्द्ध का पेसा अर्थ है कि जिन और सिद्ध को परमात्मा तथा अहन्त, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और साधु इन पांचों को परमेष्ठी कहते है। ४३ 4 १४ कश्चिन १६ दपानां २२ / वृध्ने ।। श्री वीतरागाय नमः ।। . कविशिरोमणि श्रीमदूधनञ्जयविरचित- नाम-माला : का -- सरलहिन्दी-अनुवाद । . - मङ्गलाचरण । तन्नमामि परंज्योति-रवाङ्मनसगोचरम् । • उन्मूलयत्यविद्यां यद, विद्यामुन्मीलयत्यपि ॥२॥ 3 - नमस्कार करता हू, भाषार्थ-मै (धनञ्जय ) उस परज्योति-केवलज्ञान-को जो वचनसे अकथनीय और मनसे अचिन्त्य है तथा जो ज्ञानको प्रगट करती है और अज्ञानको जडसे उखाड़ देती है ॥ १॥ भावार्थ-परंज्योति-केवलज्ञान-का माहात्म्य अद्भुतही है। . . sammu मन करत नए मृगा . सानी सदाही संसार-परिभमणकी निवृत्ति और सावध उपकरणको इस प्रकार अतदानके संसारभावनारूप बड़े चित्रमें मृगापुत्र 1 .
नाम-मावा इयं द्वितयमुभय, यमले युगलं युगं । युग्मं बंद यमं द्वैतं, पादयोः पातु जैनयोः ॥२॥ भाषार्थ-द्वय, द्वितय, उभय, यमल, युगल, युग, युग्म, द्वंद्व, यम, और द्वैत (न० ) ये सब युगलके नाम है वे जिनेन्द्र देवके चरणोंके युगल ( जोड़) मेरी और श्रापकी रक्षा करें ॥ २॥ ऋषियतिर्मुनिभिक्षु-स्तापसः संयतो व्रती। तपस्वी संयमी योगी, वर्णी साधुश्च पातु वः॥३॥ भाषार्थ--ऋपि, यति, मुनि, भिक्षु, तापस, सयत, प्रतिन्, तपस्विन्, सयमिन्, योगिन्, वर्णिन् और साधु (पु०).ये सब मुनिके नाम है वे मुनि श्रापकी रक्षा करें ॥ ३ ॥ दीक्षितं मौढ्यं शिष्यं च, तमवन्तेवासिनं विदुः। कृतान्तागमसिद्धान्त-ग्रंथाः शास्त्रमतः परम् ॥४॥ भापार्थ-दीक्षित, मौढ्य, शिष्य और अन्तेवासिन् (पु०) ये चार छात्र (विद्यार्थी ) के नाम है । कृतान्त, अागम, सिद्धान्त, ग्रन्थ (पु०) और शास्त्र (न० ) ये सब शास्त्रके नाम हैं श्रागे पृथ्वी के नाम कहते है ।। ४ ॥ भूमिभूः पृथिवी पृथ्वी, गव्हरी मेदिनी मही । धरा वसुमती धात्री, क्षमा विश्वंभराऽवनिः॥५॥ वसुधा धरणी क्षोणी, क्षमा धरित्री चितिश्च कुः। कुम्भिनीलोरा चोर्वी, जगती गौर्वसुन्धस॥६॥ भाषार्थ-भूमि, भ, पृथिवीं, पृथ्वी, गव्हरी, मेदिनी, .
३ भाषार्थ ।. - हैं मही, धरा, वसुमता, धात्री, क्षमा, विश्वभरा, अवनि, वसुधा, धरणी, क्षोणी, क्षमा, धरित्री, क्षिति, कु, कुम्भिनी, इला, उर्वरा, उर्वी, जगती, गो, वसुन्धरा, ( स्त्री ) ये सब पृथिवीके नाम ॥५॥६॥ • तत्पर्याय-धरः शैलः, तत्पर्याय-पतिर्नृपः । तत्पर्याय रुहो वृक्षः, शब्दमन्यञ्च योजयेत् ॥ ७ ॥ भाषार्थ-इन पृथिवीके नामोंके आगे 'धर, शब्द जोड देनेसे ववतक और 'पति, शब्द जोड देनेसे राजाके तथा 'रुह' शब्द जोडदेनेसे वृक्षके नाम हो जाते है जैसे भूमिधर, भूधर श्रादि, भूमिपति, भूपति अादि और भूमिरुह, भूरुह आदि। विशेष बात यह है किधर पति और रुह, इनके समान अर्थवाले भृत्, ध्र तथा स्वामी, पाल आदि शब्दों को जोडनेसे भी भूधर ( पर्वत ) आदिके नाम बन जाते है जैसे महीध्र, महीभृत् आदि और भूस्वामी, भूपाल आदि ॥ ७ ॥ दरीभृदचलः शृङ्गी, पर्वतः सानुमागिरिः । नगः शिलोच्चयोऽद्रिश्च, शिर्खरी त्रिककुन्मरुत् ॥८॥ भाषार्थ-दरीभृत् , अचल, श्रृङ्गिन्, पर्वत, सानुमतू. गार, 'नग, शिलच्चय, अद्रि, शिखरिन्, त्रिककुत और मरुतु (पु.) ये सब पर्वत के नाम है ॥८॥ प्रस्थ पार्श्व तटं सानु-र्मेखलोपत्यका तटी। नितम्बमन्तो दन्तश्च, तद्वानपि गिरिः स्मृतः ॥३॥ भाषार्थ- प्रस्थं (पु० न०) पार्श्व (न.०.) तट (तीन) सानु (पु०.ने)मेखला, उपत्यका, तटी (स्त्री) नितम्ब (पु०न०) अन्त 4 ܝ 3 + 1 * - नाम-माला- 7 और दन्त (पु०) इन शब्दोंके आगे मतुप प्रत्यय जोड़ देनेसे पर्वतके नाम हो जाते है जैसे प्रस्थवत, पार्श्ववत्, तटबत्, सानुमत् इत्यादि । भावार्थ-प्रस्थ आदि शब्दोंके साथ मतुप् प्रत्यय जोड़ने से पनतके नाम हो जाते है वह मतुप् प्रत्यय यदि अकारान्त शब्दोंसे श्रांग होगा तो 'म, के स्थानमें 'व, हो जायगा इसलिए 'वत्' रहेगा और इकारान्त उकारान्त शब्दोंसे भागे होगा तो 'म' का म ही रहेगा तव सानुमत् इस तरहके रूप होंग ।। राजाऽधिपः पतिः 'स्वामी, नाथः परिवृढः प्रभुः। ईश्वरो विभुरीशानो, भर्तेन्द्र इन ईशिता ॥१०॥ भापर्थ-राजन् अधिप, पति, स्वामिन्, नाथ, परिवृढ़. प्रभु, ईश्वर, विभु, ईशान, भर्तृ, इन्द्र, इन, ईशित, पु० ) ये सब नाम राजाके है ॥ १० ॥ अनोकुहरलरुः शाखी, विटपी फलिनो नगः । द्रुमोऽहिपः फलेग्राही, पादपोऽगो वनस्पतिः ॥११॥ भाषार्थ-अनोकुह, तरु, शाखिन्, विटपिन्, फलिन,, नग, दूम अहिप, फलेग्राहिन्, पादप, अग और वनस्पति (पु०) ये सर्व वृक्ष (पेड़) के नाम है ।। ११ ।। तत्पार्याय-धरो ज्ञेयो, हरिवलि खः कपिः। बानरो प्लगश्चैव, गोलागृलोऽथ मर्कटः॥१२॥ भापाथ-इन वृक्षके नामोंके श्रागे 'चर, शब्द जोड़ देनेसे बन्दरके नाम हो जाते है जैसे अनोकुहचर, तरुचर, श्रादि (पु.) ।
भाषार्थ। . 1 तया हरि, बालमुख, कपि, बानर, प्लवग, गोलांगल और मर्कट (पु०) ये भी बानर (बन्दर ) के नाम हैं ॥ १२ ॥ विपिनं गहन कक्ष-मरण्यं काननं वनं । कांतारमटवी दुर्ग, लच्चरः स्यादनेवरः ॥ १३ ॥ भाषार्थ-विपिन; गहन कक्ष, अरण्य, कानन, वन, कातार (न०)अटवी ( स्त्री ) दुर्ग (न०) ये सब बनके नाम है इनके आगे 'चर, शब्द जोड देनेसे वनेचर ( भील ) के नाम हो जाते है ॥१३॥ पुलिन्दः शयरो दस्यु-निषादो व्याधलुब्धको । धानुष्कोऽथ किरातश्च सोऽरण्यानीचर स्मृतः १४ भाषार्थ-पुलिन्द, शबर, दस्यु, निषाद, व्याध, लुब्धक, धानुक और किरात (पु० ) ये सब अरण्यानीचर (भील )क नाम है ॥१४॥ वारि के पयोऽम्भोऽन्यु, पाथोर्णः सलिलं जलम्। शरं वनं कुशे नीरं, तोयं जीवनमविषम्॥१५॥-, । भाषार्थ-बार, वारि, क, ययस्; अम्भस, अम्बु, पाथस, अर्णस, सलिल, जल, शर, वन, कुश, नीर, तोय, जीवन, (न०) अप '('स्त्री ) विप ( न० ) ये सब जल ( पानी) के नाम है ॥ १५॥ तत्पर्धाय-चरो मत्स्थ-स्तत्पर्याय-प्रदो धनः। तत्पर्यायोद्भवं पद्म, तत्पर्याय-धरोऽम्बुधिः ॥१६॥ भाषार्थ-इन पानीके नामों के आगे'चर,शब्द जोड़देनेसे मत्स्य (मछली) के, 'प्रद, शब्द जोड देनेसे मेघके,उद्भव,शब्दके जोड़देनेसे कमलके और 'धर, शब्दके जोड़नेसे समुद्रके नाम हो जाते है जैसे नाम-माला- जलचर आदि (पु.), जलप्रद आदि (पु०), जलोदभव आदि (पु० न० ) और जलधर आदि (पु० ) होते है ॥ १६ ॥ पृथुरोमा षडक्षीणो, यादो वैशारिणो भषः । विशारी सफरो मीन:,पाठीनो निमिषस्तिमिः॥१७॥ भाषार्थ-पृथुरोमन्, पडक्षीण (पु०), यादम् (न०) वैशारिण, झष, विशारिन्, सफर, मीन, पाठीन, निमिष, और तिमि (पु.) ये सब मछली के नाम है ॥ १७ ॥ घनाघनो घनो मेघो, जीमूतोऽभ्रं बलाहकः । पर्जन्यो मुदिरोऽनभ्राट्,शंपा सौदामिनीतडित्॥१८॥ आकालिकी क्षणरुचि-विद्युत्तत्पतिरम्युदः । निर्घातमशनिर्व-मुल्काशब्दं च योजयेत् ॥१६॥ भाषार्थ-वनापन, घन, मेघ, जीमूत, (पु०) अभू (न०) बला- हक, पर्जन्य, मुदिर और अनभाज् (पु०) ये सब मेवो नाम है तथा शंपा, सौदामिनी, तडित, श्राकालिकी, क्षणरुचि, और विद्युत् (स्त्री) इन, बिजलीके नामोंके श्रागे 'पति' शब्द जोड़ देनेसे मेघके नाम वन जाते है इसी तरह निर्घात (न० ) अशनि ( स्त्री पु० ) वज (पु०न०) इन वजूके नामोके आगे तथा उल्का (गाज) शब्दके आगे पति शब्दको जोड़ देनेसे भी मेधके नाम बन जाते है ॥१८॥१६॥ परिषत्कर्दमः पंक-स्तज्जं तामरसं विदुः । कमलं नलिनं पद्मं, सरोजं सरसीरुहम् ॥ २० ॥ खरद कोकनदं, पुण्डरीक महोत्पलम् । इन्दीवरंचारविन्दं, शतपत्रम् च पुष्करम् ॥ २१ ॥ " . A भाषार्थ । - स्यादुत्पल कुवलय-मथ नीलाम्युजन्म च । इन्दीवरं च नीलेऽस्मिन् , सिते कुमुदकैरवे ॥२२॥ भाषार्थ-परिषत,कर्दम, पंक (पु०) ये तीन कीचड़के नाम है इन के आगे 'ज' जोड देनेसे तामरस कमल (न० ) के नाम बन जाते हैं जैसे परिषज्ज, कर्दमज, पंकज और कमल,, नलिन, पद्म, सरोज, सरसोरुह, खरदंड, कोकनद, पुण्डरीक, महोत्पल, इन्दीवर, अरविन्द, गतपत्र. पुष्कर, उत्पल और कुवलय (पु०न०) ये सब सासान्य कमलके नाम है और नीलाम्बुजन्मन्, इन्दीवर ( न० ) ये दो नील कमलके तथा कुमुद और कैरव (न०) श्वेत कमलके नाम हैं ॥ २० ॥ २१ ॥ २२॥ तदती विशनी ज्ञेया, व्रतती वल्लरी लता। 'वल्लीनामानि योज्यानि, वारिधिर्वण्यतेऽधुना॥२३॥ भाषार्थ-इन कमलके नामोंके आगे मतुप् प्रत्यय जोड़ देनेसे कमलवती श्रादि विशनी-कमलिनी-(स्त्री) के नाम बन जाते हैं और व्रतति, व्रतती वल्लरी और लता (स्त्री) इन लताके नामोंको जोड़देने से भी कमलिनी के नाम बन जाते है जैसे कमलव्रतात, कमलवल्लरी और कमललता । अब समुद्रके नामोंका वर्णन करते है ॥ २३ ॥ स्रोतस्विनी धुनी सिंधुः, सूवंती निम्नगाऽपगा। नदी नदो द्विरेफश्च, सरिनाम्नी तरंगिणी ॥२४॥ तत्पतिश्च भवत्यब्धिः, पारावारोऽमृतोद्भवः। अपारवारऽकूपारो, रत्नमीनाभिधाकरः ॥ २५॥ . . , -- क नाम-माला- - . समुद्रो वारिराशिश्च, सरस्वान्सागरोऽर्णवः । सीमोपकंठं तीरं च, पारंरोधोऽवधिस्तटम् ॥ २६ ॥ भाषार्थ-स्रोतस्विनी, धुनी, सिन्धु, स्रवन्ती, निम्नगा, आपगा, नदी (स्त्री) नद, द्विरेफ (पु० ) सरित, तरांगणी (स्त्री) ये सब नदीके नाम है इनके प्रागे । 'पति, शब्द जोडदेनेसे समुद्रके नाम बन जाते है जैसे स्रोतस्विनीपति श्रादि तथा अब्धि, पारावार, अमृतोद्भव, अपारवार्, अकूपार, रत्नाकर, मीनाकर, समुद्र, वारि- राशि, सरस्वत्, सागर और अर्णव (पु०) ये सब समुद्रके नाम है और सीमापकण्ठ, तीर, पार, रोधस ( न०) अवधि (पु०) तट (तान ) ये सब तारके नाम है ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ भंगस्तरङ्गकल्लोलो, वीचिरुत्कलिकावलिः । पाली वेला तटोच्छवासो, बिनमोयमुदन्वतः॥२॥ भापार्थ-भग,तरग, कल्लोल, (पु०) बीचि, उत्कलिका, और श्रावलि (स्त्री ) ये सब लहरके नाम है और पाली, वेला (स्त्री तटोच्छ्वास ( पु० ) ये तीन समुद्र के विभूम के नाम है ॥ भावार्थ---जलकी भौरको विभूम कहते है अर्थात् मण्डल के श्राकार जलकें घूमनेको विभूम कहते हैं ॥ २७ ॥ नुष्यो मानुषो मर्यो, मनुजो मानवो नरः । पुमान पुरुषो गोधो, धवः स्यात्तत्पतिनृपः॥२८॥ भापार्थ--मनुप्य, मानुप, मर्त्य, मनुज, मानव, नर, नृ, पुमस, पुरुप, गोध और धव (पु० ) ये सब पुरुपके नाम हैं इनके आगे • भाषाथं। १ 2 T - 'पति' शब्द जोड देनेसे राजाके नाम बन जाते है जैसे मनुष्य- पति, नृपति, नरपति श्रादि (पु० ) ॥ २८ ॥ भृत्योऽथ भृतकः पत्तिः, पदातिः पदगोऽनुगः । 'भटोऽनुजीव्यनुचरः, शस्त्रजीवी च किंकरः ॥२३॥ भाषार्थ-भृत्य, भृतक, पत्ति, पदाति, पदग, अनुग, भट, अनुजीविन्, अनुचर, शस्त्रजीविन्, किङ्कर (पु०) ये सब नौकरके नाम है ॥२॥ स्त्री नारी वनिता मुग्धा, भामिनी भीरगन्ना । ललना कामिनी योषिद्, योषा सीमन्तिनी वधूः॥३० नितम्बिन्यऽवलाबाला, कामुकी वामलोचना । भीमा तनूदरी रामा, सुन्दरी युवतिश्चला ॥३१॥ भाषार्थ-स्त्री, नारी, वनिता, मुग्धा, भामिनी, भीरु, अंगना, 'ललना, कामिनी, योषित, थोपा. सीमन्तिनी, वधू, नितम्बिनी, अबला, बाला, कामुकी, वामलोचना, भामा, तनूदरी, रामा, सुन्दरी, युवति और चला, (स्त्री) ये सब सामान्य स्त्रीके नाम है ॥३०॥३१॥ भार्या जाया जनिः कुल्या. कलत्रं गेहिनः गृहम् । महिला मानिनी पत्री, तथा दाराः पुरन्ध्रयः ॥३२॥ भाषार्थ भार्था, जाया, जनि, कुल्या, (स्त्री) कलत्र (न०) गेहिनी, (स्त्री) गृह (२०) महिला, मानिनी, पत्नी (स्त्री) और दारा (पु० ) ये सब अपनी विवाहिता स्त्रीके नाम है और पुरन्धी (स्त्री).यह पुत्र और पतिवाली स्त्रीका नाम है ॥ ३२ ॥ . त म है १० नाम-माला- t M . बल्लभा प्रेयसी प्रेष्ठा, रमणी दीयता प्रिया । इष्टा च प्रमदा कान्ता, चण्डी प्रणयिनी तथा ॥३॥ भाषार्थ-बल्लभा. प्रेयसी, प्रेष्ठा, रमणी, दयिता, प्रिया,. इष्टा, प्रमदा, कान्ना, चण्डी और प्रणयिनी ( स्त्री ) ये सब प्यारी स्त्रोके नाम हैं ॥ ३३ ॥ सती पतिव्रता साध्वी, पतिवत्येकपत्यपि । मनस्विनी भवत्यार्या, विपरीता निरूप्यते ॥३४॥ भाषार्थ--सती, पतिव्रता, साध्वी, पतिवती, एकपती, मन- स्विनी, भार्या (स्त्री ) ये सब पतिव्रता (पतिभक्ता) स्त्रीके नाम हैं अब कुलटा ( व्यभिचारिणो ) स्त्रीके नाम कहते है ॥ ३४ ॥ यन्धकी कुलटा मुक्ता, पुनर्मूः पुंश्चली खला। स्पाभिसारिका दृती, स्वैरिणी संपाली तथा ॥३५ भाषार्थ-बन्धकी, कुलटा, मुक्ता, पुनर्भ, पुंश्चली, खला, स्पर्मा, अभिसारिका, दूती, स्वरिणी, सफली (स्त्री) ये सब व्यभिचारिणी स्त्रीके नाम है ॥ ३५ ॥ गणिकालजिका वेश्या, रूपाजीवा विलासिनी । पण्यस्त्री दारिका दासी, कामुको सर्ववल्ल भा॥३६॥ भापार्थ-गणिका, लज्जिका, वेश्या, रूपाजीवा,, विला- सिनी, परयस्त्री, दारिका, दासी, कामुकी, और सर्ववरलभा (स्त्री ये सर्व वेश्याके नाम हैं ॥ ३६ ॥ -- भाषार्थ। २ ।" * . ~ 1. कान्तेष्टौ दयितःप्रीतः, प्रियः कामी च कामुकः । वल्लभोऽसुपतिः प्रेयान, विटश्च रमणो वरः ॥३७॥ भाषार्थ--कान्त, इष्ट, दयित, प्रीत,प्रिय, कामिन, कामुक, वल्लभ, असुपति, प्रेयस्, विट, रमण, वर (पु. ) ये सब पतिके नाम हैं ॥३॥ सवित्री जननी माता, जनकः सविता पिता। देहोऽपघनकायाङ्ग, वपुः सहननं तनुः ॥ ३८ ॥ कलेवरं शरीरं च, मूतिरस्माद्भवः सुतः । पुत्रः सूनुरपत्यं च, तुक् तोकं चात्मजः प्रजाः॥३६॥ उदहस्तनयः पोतो, दारको नन्दनोऽर्भकः । स्तनन्धयोत्तानशयौ, स्त्रीत्वे दुहितरं विदुः ॥४०॥ भाषार्थ-सवित्री, जननी, मातृ ( स्त्री ) ये तीन नाम माताके है और जनक, सवितृ और पितृ (पु० ) ये तीन पिताके नाम है देह (पु०न०) अपधन, काय (पु०) अग, वपुस्, सहनन (न०) तर्नु (स्त्री) कलेवर, शरीर, (न) मूर्ति (स्त्री) ये सब शरीरके नाम है इनके आगे 'भव' शब्द लगा देनेसे पुत्रके नाम हो जाते है और सुत, पुत्र, सुनु (पु०) अपत्य (न) तुक (पु०) तोक (न०) श्रात्मज (पु०) प्रजा (स्त्री) उद्वह, तनय, पोत, दारक, नदन, अर्भक, स्तनन्धय, उत्तानशय (पु० ) ये संब पुत्रके नाम है इनके आगे स्त्रीलिगं बोधक प्रत्यय जोड़ देनेसे दुहितृ (स्त्री ) अर्थात् पुत्रीके नाम बन जाते है परन्तु अपत्य और तोक ये दो शब्द समानरूपमें रहतेहुए ही पुत्र और पुत्री दोनोंके - बोधक होते है। ॥ ३८॥ ३६॥ ४०॥ r १२ । नाम-माला- - ( वयस्याऽऽली सहचरी, सध्रीची सवयाः सखी। पाली विजितं मित्रं,सम्बन्धोमित्रयुक् सुहृत्॥४१॥ भापार्थ-बयस्या. पाली, सहचरी, सधूीची, सवयस, सखी, (स्त्री) ये सब सखीके नाम है इनमें से प्राली शब्दको छोडकर स्त्री बोधक प्रत्यय निकाल देनेसे शेष शब्द मित्रके वाचक वन जाते हैं और वे पुल्लिंग होते है। तथा मित्र (न० ) सम्बन्ध, मित्रयुन, सुहृत् (पु०) ये सब मित्रके नाम है ॥ ४१ ॥ सहकृत्वा सहकारी, सहायः समवायिकः । सनाभिः सगोत्रो बन्धुः, सोदों वरजोऽनुजः॥४२ कनीयानग्रजो ज्येष्ठो, भ्रातृजानी स्वसाऽनुजा । भर्तुः स्वसा ननान्दा स्यान्मातुलानी प्रियाम्बिका४३ भाषार्थ---सहकृत्वन्, सहकारिन्, सहाय, सामवायिक, (पु०) ये मब सहायकके नाम है और सनाभि, सगात्र, बन्धु, सोदर्य, (पुं०) ये चार सगे भाई (सहोदर) के नाम हैं और अवरज, अनुज और कनीयम् (पुं० ) ये तीन अपने से छोटे भाईके नाम हैं, अग्रज, ज्येष्ठ (पु०) ये दो बड़े भाईके नाम है । भ्रातृजानी और स्वसृ (स्त्री) ये दो वहिनके नाम है । तथा अनुजा (स्त्री) छोटी बहिनका नाम है ननाद ( स्त्री ) यह नाम पतिकी बहिन का है प्रार मातुलानी, प्रियाम्विका (स्त्री.) ये दो नाम मामी अर्थात् मामाकी स्त्रीके है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥. वैर्यरतिरमित्रोऽरि-बिट् सपनो द्विषद्रिपुः । असेयो दुर्जनः शत्रु-र्दुष्टो देषी खलोहितः ॥४४॥ -- -- -- भाषार्थ। 1 th । t ) भाषार्थ-वेरिन, अराति, अमित्र, अरि, द्विप् , सपत्न, द्विषत् असेव्य, दुर्जन, शत्रु, दुष्ट, द्वेपिन्, खल, और अहित (पु० ) ये सब शत्रुके नाम है॥ ४४ ॥ -दीधितिर्भानुरूरनोंशु-र्गभस्तिः किरणः करः ।, पादोरुचिर्मरीचिर्भा-स्तेजोऽचिंगौद्युतिःप्रभा॥४५॥ दीप्तिज्योतिर्महो धाम, रश्मिरूजाविभावसुः । शीतोष्णप्रायपूर्वत्वे, तदन्ताविन्दुभास्करौ ॥४॥ भाषार्थ-दीधिति (स्त्री) भानु, उश्न, अंशु, गभस्ति, किरण, कर, पाद ( पुं० ) रुचि ( स्त्री ) मरीचि (स्त्री. पु०) भास ( स्त्री) तेजस, अर्चिष (न०) गो, (पु० स्त्री) द्युति, प्रभा, दीप्ति, (स्त्री) ज्योतिष, मह धामन्, (न० ) रश्मि (पु० ) ऊर्जस (नं० ) विभावसु (पुं०') ये सब किरणके नाम है। इन नामोंके पीछे शीत और आगे मतुप प्रत्यय जोडदेनसे चन्द्रमाके तथा पीछे उष्ण और आगे मतुप् प्रत्यय जोड़देनेसे सूर्यके नाम बन जाते है, जैसे शीतदीधितिमत् और उप्णदीधितिमत् ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ शशी विधुः सुधामूतिः, कौमुदी कुमुदप्रियः । कलाभृच्चन्द्रमाश्चन्द्रः,कान्तिमानौपंधीश्वरः॥४७॥ भाषार्थ-शशिन्, विधु, सुधासूति, कौमुदिन्, कुमुदाप्रिय, कलाभृत् चन्द्रमस, चन्द्र, कान्तिमत् और प्रौपधीश्वर (पु.) ये सब नाम चन्द्रमा के है ॥४॥ उडूनि भानि तार, नक्षत्रं तत्पति निशा। क्षणदा रजनी नक्तं, दोषा श्यामा क्षपाकरः॥४८॥ A प 1 - .
नाम-मावा भाषर्थ-उडु भ. (न) तारा ( स्त्री ) ऋक्ष, नक्षत्र (न०) ये सब नक्षत्रके नाम हैं। इनके आगे 'पति, जोड़देनेसे चन्द्रमा के नाम बन जाते है, जैसे नक्षत्रपति श्रादि तथा निशा, क्षणदा, रजनी (स्त्री) नक्त (अव्यय ) दोपा, श्यामा, क्षपा (स्त्री) ये. सब रात्रिके नाम हैं। इनके आगे 'कर, जोड़देनेसे भी चन्द्रमा के नाम बन जाते हैं, जैसे निशाकर, क्षपाकर श्रादि ॥ ४८॥ तरणिस्तपनो भानु-ज्रधनः पूषाऽर्यमा रविः । तिग्मः पतंगोमणि-र्मानेण्डोऽकों ग्रहाधिपः॥४६॥ इनः मर्यस्तमोध्वान्त-स्तिमिरारिविरोचनः । दिनं दिवाह दिवसो, वासरस्तत्करश्च सः॥५॥ चक्रवाकाजपर्याय-बन्धुः कुमुदविप्रियः । यमुनायमकानीन-जनकः सविता मतः ॥५१॥ भापार्थ-तरणि, तपन, भानु, ब्रघ्न, पूपन्, अर्यमन्, रवि, तिग्म, पतङ्ग, झुमणि, मार्तण्ड, अर्क, ग्रहाधिप, इन, सूर्य, तमोरि, ध्वान्तारि, तिमिरारि और विरोचन (पुं० ) ये सब सूर्यके नाम है। दिन ( न० ) दिवा (अव्यय ) अहन् ( न०) दिवस, वासर (पु० ) इन दिनके नामोंके आगे 'कर, जोड देनेसे भी दिनकर श्रादि सूर्यके नाम हो जाते है कोक, चक्र, चक्रवाक और रयाग (पु० ) इन चकवे के नामों के आगे और पीछे लिखे हुये कमलके नाके आगे बन्धु, शब्द जोड़ देने से भी सूर्यके नाम बन जाते है, जैसे कोकबन्धु, चक्रबन्धु श्रादि, और कमलबन्धु श्रादि तथा कुमुदविप्रिय (पु०) तथा यमुनाजनक, यमजनकं कानी- नजनक (पु० ) ये सवितृ ( सूर्य ) के नाम है ॥४॥५०॥५१॥ - १५ भाषार्थ। , वाहोऽश्वस्तुरगो वाजी, हयो धुर्यस्तुरंगमः । सप्तिरर्वाहरी रथ्यः, सप्ताद्यश्वो मयूखवान्॥५२॥ भाषार्थ-वाह, अश्व,तुरग, वाजिन्, हय, धुर्य, तुरगम, सप्ति, अ- चन्, हरि, रथ्य (पुं०) ये सब घोड़ेके नाम हैं। इनके पाछे ‘सप्त, शब्द जोड़देनेसे मयूखवत् ( सूर्य ) के नाम होजाते है, जैसे सप्तवाह सप्ताश्व (पु० ) श्रादि ॥ ५२ ॥ खं विहायो विययोम, गगनाकाशमम्बरम् । द्यौर्न भोऽभाऽन्तरिक्षं च, मेघवायु-पथोप्यथ ॥५३॥ भाषार्थ-ख (न०) विहायस् (पुन०) वियत्, व्योमन्, गगन, श्राकाश, अम्बर (न०) द्युस (दिव) नभस, अभू, अन्तरिक्ष (न०) मेघुपथ और वायुपथ (पुं० ) ये सब आकाशके नाम है ॥ ५३ ॥ तच्चरः खेचरस्तद्गः, पक्षी पत्री पतत्र्यपि । शकुन्तिः शकुनिश्चि, पतंगो विष्किरी वयः॥५४॥ भाषार्थ-इन आकाशके नाम के साथ 'चर' शब्दको जोड़देनेसे खेचर, विहायश्चर आदि विद्याधरके नाम बन जाते है और 'ग' शब्द जोड़देनेसे खग वगैरह तथा पक्षिन्, पत्रिन, पतत्रिन्, शकुन्ति, शकुनि, वि, पतग, विष्किर, (पुं० ) वयस (न० ) ये सब पक्षीके नाम है ॥ ५४ ॥ जाङ्गलं पिशितं मांसं, पलं पेशी च तत्प्रियः । यातुधानस्तथा रचो, राज्यादि-चर इष्यते ॥५॥ भाषार्थ- जांगल, पिशित, मास, पल (न०) पेशी (स्त्री) ये सब १६ नाम-मामा- मांसके नाम हैं। इनके श्रागे "प्रिय, शब्द जोडदेनेसे मांसप्रिय जांगलप्रिय आदि, और यातुधान (पुं० ) रक्षस (न०) तथा रात्रिके नामोंके आगे 'चर, जोड़देनेसे रात्रिचर, निशाचर आदि भी राक्षस के नाम बन जाते है || ५५ ।। सुतोऽदितस्तडित्त्वान्वा, सेन्द्रो देवः सुराऽमरः । स्वद्यौःस्वर्गोऽथ नाकश्च, तद्वासस्त्रिदशो मतः५६ भापार्थ-अदितिसुत, तडित्वत्, सेन्द्र, देव, सुर, श्रमर, (पुं०) ये देवके नाम हैं और स्वर (अव्यय)द्युम्(स्त्री).नाक (पु.) इन स्वर्गके नामों के आगे वास, शब्द जोडदेनेसे भी देवके नाम होजाते है असे स्वर्वास, इत्यादि ॥ ५६ ।। तत्पतिः शक्र इन्द्रश्च, -सुनाशीरः शक्रतुः । प्राचीनवर्हिः सूत्रामा, वजी चाखण्डलो हरिः ॥५७ शत्रुर्यलस्य गोत्रस्य, पाकस्य नमुचेरमि। . वृत्रहा च सहस्त्रानो, गीर्वाणेशः पुरन्दरः ॥५८॥ विडोजाश्वासरोनाथो, वासवो हरिवाहनः । मरुतश्च नरुत्वांश्च, वृपा रावणाधिपः ॥ ५९ ॥ शतमन्युस्तुरापाद च, पुरुहूतश्च कौशिकः । शकंदनोऽथ मघवान्पुलोमारित्तिखः ॥६०॥ भाषार्थ--देवके नामोंके आगे पति, शब्द जोड़दनसे इन्द्रके म बन जाते हैं असे त्रिदशपति, देवपति श्रादि तथा शक्र, इन्द्र, नाशीर, शतक्रतु, प्राचीनवाई, सुत्रामन, वजिन्, श्राखण्डल, हरि, - भाषार्थ। बलशत्रु, गोत्रंशत्रु, पाकशत्रु, नमुचिशत्रु, वृत्रहन्, सहस्राक्ष गीर्वाणेश, पुरन्दर, विडीजम्, अप्सरोनाथ, वासब, हरिवाहन, मरुत, मरुत्वत्, वृपन्, ऐरावणाधिप, शतमन्यु, तुरापाहू, पुरुहूत, कौशिक, शक्रन्दन, मघवत्, पुलोमारि, और मरुत्सख (पु० ) ये सब इन्द्र के नाम हैं ॥ ५७ ॥ ५८ ॥५६॥६॥ काष्ठा ककुछ दिगाशा च, दक्षकन्या तथा हरित् । तत्पर्यायपरं योज्यं, प्राज्ञैः पालगजाम्बरम् ॥६१॥ भाषार्थ-काष्ठा, ककुप्, दिश, श्राशा, दक्षकन्या, और हरित ( स्त्री ) ये सब दिशाओं के नाम है इनके आगे पाल, शब्द जोड़ देनेसे काष्ठापाल दिक्पाल आदि दिक्पालके, और 'गज' शब्द जोड़ देनेसे दिग्गज आदि दिग्गज के तथा अम्बर, शन्द जोड़ देने से दिगम्बर, काष्ठाम्बर आदि दिगम्बर (मुनि) के नाम हो जाते है वे सब पुल्लिग होते है ॥ ६॥ पवनः पवमानश्च, वायुर्वातोऽनिलोमरुत् । समीरणो गन्धवाहः, श्वसनश्च सदागतिः॥१२॥ नभस्वान् मातरिश्वा च, वरेण्युर्जवनश्चलः । प्रभजनोऽस्य पर्याय-पुत्रौ, भीमाजनात्मजौ॥६॥ भाषार्थ-पवन, पवमान, वायु, वात, अनिल, मरुतू, समी- रण, गन्धवाह, श्वसन, सदागति, नभस्वत, मातरिश्वन, वररायु, जवन, चल और प्रभञ्जन (पु.) ये सब वायु ( हवा ) के नाम हैं इनके आगे 'पुत्र' शब्द जोड़ देनेसे पवनपुत्र आदि भीम तथा हनूमानके नाम हो जाते है और वे पुरिलग होते है॥१२॥१३॥ --- नाम-माला- १८ , . तत्सखोऽग्निःशिखी वन्हिः, पावकश्चाशुशुक्षणिः । हिरण्यरेताः सप्ताचि-जर्जातवेदास्तनूनपात् ॥६४॥ स्वाहापतिर्हताशश्च, ज्वलनो दहनोऽनलः । वैश्वानरः कृशानुश्च,रोहिताश्वो विभावसुः॥६॥ वृषाकपिः समीगर्भो, हव्यवाहो हुताशनः । तदादि-सूनुः लेनानीः, स्कन्दश्च शिखिवाहनः॥६६॥ कार्तिकयो विशाखश्च, कुमारः पण्मुखो गुहः । शक्तिमान क्रोञ्चभेदीच, स्वामी शरवणोद्भवः॥६७॥ भावार्थ-पवनके नामांके आगे 'सख' शब्द, जोड़ देने से पवनसख आदि श्रार अग्नि, शिखिन्, वन्हि, पावक, प्राशुशुक्षणि, हिरण्यरेतस् , (पु०) सप्ताचिए (न०) जातवेदस् , तनूनपात् स्वाहापति, हुताश, जलन, दहन, अनल, वैश्वानर, कृशानु, रोहि- ताश्व, विभावसु, वृषाकपि, समीगर्भ, हव्यवाह, और हुताशन (पु०) ये सब अग्निके नाम है इनके आगे 'सुनु' शब्दके जोड़ देनेसे अग्निसुनु अादि तथा सेनानी, स्कंद, शिखिवाहन, कार्तिकेय, विशाख, कुमार परमुख, गुह, शक्तिमत्, क्रौञ्चभेदिन्, स्वामिन्। और शस्त्रोद्भव (पु.) ये सब कार्तिकेयके नाम हैं ॥ ६४ ॥ ॥ १५ ॥ १६ ॥६७ ॥ तत्पिता शंकरः शम्भुः, शिवः स्थाणुमहेश्वरः । यम्बको धूर्जटिः शर्वः, पिनाकी प्रमथाधिपः॥६॥ त्रिपुरारिविशालाचो, गिरीशो नीललोहितः । रुदेन्दुमौलियज्ञारि-स्त्रिनेत्रों वृषभध्वजः॥६६॥ ----
भाषार्थ।
1
,
-
उग्रः शूलों कपाली च, शिपिविष्टो भवो हरः।
उमापतिर्विरूपाचो, विश्वरूपः कपर्वपि ॥ ७० ॥
भाषार्थ-कार्तिकेय के नामोंके आगे 'पितृ शब्द जोड़ देने
से सेनानीपितृ श्रादि महादेवके नाम हो जाते है तथा शंकर, शम्भु,
शिव, स्थाणु, महेश्वर, त्र्यम्बक, धूर्जटि, शर्व, पिनाकिन् प्रचाधिप,
त्रिपुरारि, विशालाक्ष, गिरीश, नीललोहित, रुद्र, इन्दुमौलि, यज्ञारि,
त्रिनेत्र, वृषभध्वज, उग्र, शूलिन्, कपालिन्, शिपिविष्ट, भव, हर.
उमापति, विरूपाक्षा, विश्वरूप, और कपर्दिन् (पु.) ये भी
'महादेव के नाम है ॥६८॥६६॥ ७० ॥
भागीरथी त्रिपथगा,
जान्हवी हिमवत्सुता।
मन्दाकिनी युपर्याय-धुनी गङ्गा नदीश्वरी ॥७१ ॥
भाषार्थ-भागीरथी, त्रिपथगा, जान्हवी, हिमवत्सुता, मंदा-
किनी और युस (स्वर्ग ) के नामोंके आगे 'धुनी' शब्द जोड़
देने से स्वर्धनी, स्वर्गधुनी, घुर्धनी अादि तथा गंगा, नदीश्वरी,
(स्त्री) ये सब गगा के नाम है, नदीश्वरी के स्थान में नदीश्वर
ऐसा भी पाठ हो सकता है जिससे यह अर्थ निकलता है कि इन
गंगाके नामोंके आगे 'ईश्वर' शब्द जोड़ देनेसे भी महादेव के
नाम बन जाते है ॥ ७१ ॥
विधिधा विधाता च, द्रुहिणोऽजश्चतुर्मुखः ।
पद्मपर्याय-योनिश्च, पितामहविरञ्चिनौ ॥ ७२ ॥
हिरण्यगर्भः सूष्टा च, प्रजापतिस्सहस्रपात् ।
ब्रह्मात्मभूरनन्तात्मा, कस्तत्पुत्रो हि नारदः ॥ ७३ ॥
२० नाम-माला- - W भापार्थ--विधि, बेवस, विधातृ, दुहिण, अंज, चतुर्मुख, (पु.) ये ब्रह्माके नाम है और कमलके नामोंके आगे 'योनि' शब्द जोड़ देनसे भी कमलयोनि. आदि ब्रह्माके नाम बन जाते हैं तथा पितामह निरञ्चिन, हिरण्यगर्भ, सष्ट, प्रजापति, सहसूपात् ,. ब्रह्मन्, श्रात्मभ, अनन्तात्मन्, और क (पु० ) ये सब ब्रह्माके नाम है इनके पागे 'पुत्र' शब्द जोड़ देनेसे विधिपुत्र श्रादि नारदके नाम हो जाते है ।। ७२ ॥ ७३ ॥ कृष्णो दामोदरो विष्णु-रुपेन्द्रः पुरुषोत्तमः। केशवश्च दृषीकेशः, शाी नागयणो हरिः॥७॥ केशी मधुर्वलिर्वाणो हिरण्यकशिपुर्मुर । तदादि-मूदनः सौरिः, पद्मनाभोऽप्यधोचजः ॥७॥ गोविन्दो वासुदेवश्च, लक्ष्मीः श्रीगोंमिनीन्दिरा। तत्पतिः शैलभूम्यादि-धरश्चक्रधरस्तथा ॥ ७६ ॥ भापा-कृष्ण, दामोदर, विष्णु, उपेन्द्र, पुरुषोत्तम, केशव हृषीकेश, शाङ्गिन्, नारायगा, हरि, केशिन्, मधुसूदन, वलिसूदन, वाणिसूदन, हिरण्यकशिपुसूदन, मुरसूदन, सौरि, पद्मनाभ, अधौ- क्षज, गोविन्द, वासुदेव (पु०) ये सब कृष्णके नाम हैं लक्ष्मी, श्री, गोमिनी, इन्दिरा (स्त्री) ये नाम लक्ष्मी अर्थात् कृष्णकी स्त्री के है इनकं आगे 'पति' शब्द जोड़ देनेसे लक्ष्मीपति प्रादि और पर्वत, भूमि श्रादिक नामोंके आगे 'धर' शब्द जोड़ देनेसे 'पर्वतबर भूबर' आदि तथा चक्रधर (पु० ) ये भी कृष्णके नाम है ।।७४ ।। ७५॥ ७६ ॥ .
भाषार्थ
२१
-
.
तत्पुत्रो मन्मथः कामः, सूर्पकारिरनन्यजः ।
कायपर्याय-रहितो, मकरो मकरध्वजः ॥ ७७॥
भाषार्थ-इन कृष्णके नाके श्रागे 'पुत्र' शब्द जोड़ें
“देनेसे कृष्णपुत्र आदि तथा मन्मथ, काम, सूर्पकारि, अनन्यज,
तथा काय (शरीर) के नामोंके आगे 'रहित' शब्द जोड़ देनेसे काय
रहिते (अकाय ) शरीररहित ( अशरीर ) आदि और मकर,
मकरध्वज (पु० ) ये सब कामके नाम हैं॥ ७७ ॥
शिलीमुखः शरो बाणो, मार्गों रोपणः कणः ।
इषुः काण्डं क्षुरप्रञ्च, नाराचं तोमरं खगः ॥७॥
भाषार्थ -शिलीमुख, शर, बाण, मार्गण, रोपणं, कण, इषु,
(मु०) काण्ड, क्षुरप्र, नाराच, तोमर, (न०) खग (पु० ) ये
बाण के नाम हैं ॥ ७॥
कार्मुकं धन्व चापं च, धर्म कोदण्डकं धनुः।
शिलोमुखादेरासनं, तत्कोटिमटिनी विदुः ।।७६ ॥
भाषार्थ--कार्मुक, धन्वन्, (न०) चाप, धनुष (पुं०न० )
धर्म, कोदण्डक, और शिलीमुख आदि बाणके नामोंके आगे
श्रासन शब्दके जोड़ देमेसं शिलीमुखासन, शरासन श्रादि (ने०)
धनुषके नाम हो जाते है और धर्नुषकी कोटि ( कोण ) को अटनी
कहते है ।। ७६ ॥
पुष्पं सुमनसः फुल्लं, लतान्तं प्रसवोद्गमौ !
प्रसून कुसुमं ज्ञेयं, त, दाद्यस्त्रशरः स्मरः ॥८०॥
२२ नाम-माला- - भाषार्थ-पुष्प, सुमनस; फुल्ल, लतान्त (न०) प्रसव उद्गम (पु० ) प्रसून, कुसुम ( न० ) ये पुष्पके नाम है इनके आगे अस्त्र और शरके नाम जोड़ देनेसे स्मर ( काम ) के नाम बन जाते है ।।८०॥ - स्वान्तमास्विनतं चित्तं, चेतोऽन्तःकरणं मनः । हृदयं विशिखाकूतं, मारस्तत्रोद्भवो मतः ॥८॥ भाषार्थ-स्वान्त, श्रास्वनित, चित्त, चेतस् , अन्तःकरण, मनस, हृदय, विशिख, प्राकृत ( न० ) वे सब मनके नाम है.इनके आगे भव अथवा उद्भव, शब्द जोड़ देनेसे मनोभव स्वान्तभव श्रादि (पु०) मार ( कामदेव ) के नाम बन जाते है । ८१ ॥ मौर्वी जीवा गुणोगव्या, ज्यालिङ्ग शिलीमुखः। भूमरः षट्पदो ज्ञेयो, द्विरेफश्च मधुव्रतः ॥८२।। भापार्थ-मौर्वी. जीवा (स्त्री ) गुण “पु०') गव्या, ज्या (स्त्री) ये सब धनुपकी डोरीके नाम है अलि, भुंग, शिलीमुख भूमर, पट्पद, द्विरेफ, मधुव्रत (पु०) ये सब भूमरके नाम है ॥२॥ मौर्यादिप्रान्तमाल्यादि, कंदर्पस्यैचवन्धनुः । देतिरस्त्रायुधं शस्त्र-पुष्पाधस्त्रः स्मरो मतः॥३॥ भापार्थ-अलि श्रादि भमरके नामोंके आगे मौवी श्रादि शब्दों को जोड देनेसे अलिमीवी श्रादि भी कामके नाम बन जाते हैं कामके धनुषको ऐक्षव ( न० ) कहते है हेति (स्त्री) श्रस्त्र, श्रायुध, शस्त्र (न० ) ये चार हथियार के नाम है, पुष्पके भाषार्थ २३ " ~ नामोके आगे इन हथियारके नामोंको जोड़ देनेसे पुष्पहेति आदि कामके नाम होजाते है॥५३॥ ध्वजा पताका केतुश्च, चिन्हं तद्वैजयन्त्यपि । तत्तदन्तो झषाद्यादिः, शम्भोर्विघ्नकरः स्मरः॥८॥ भाषार्थ-ध्वजा, पताका (स्त्री) केतु, (पुं०) चिन्ह (न०) वैजयन्ती (स्त्री) ये पाच ध्वजा के नाम हैं, मछलीके नाम के आगे इनको जोड़ देनेसे झषध्वज, झपकेतु आदि (पु.) और शंकर ( महादेव ) के नामोके आगे विघ्नकर, शब्द जोड देनेसे शकर विघ्नकर आदि भी काम के नाम हो जाते है ॥८४॥. कौक्षेयकोऽसिनिस्त्रिंशः, कृपाणः करवालकः । तरवारिमंडला, ग्वङ्गनामावलिं विदुः ।।८।। भाषार्थ-कौक्षेयक, असि, निस्त्रिश, कृषाण, करवालक, तरवारि, ('पु० ) मण्डलाग्र ( न० ) ये सब खड्ग ( तलवार ) के नाम है ॥ ८ ॥ अक्षौहिणी बलानी, वाहिनी साधनं चमः। ध्वजिनी पृतना सेना, सैन्यं दण्डो वरूथिनी ॥६॥ भाषार्थ-अक्षौहिणी (स्त्री) बल, अनीक (न०) वाहिनी ( स्त्री ) साधन (न०) चमू , ध्वजिनी, पृतना, सेना (स्त्री) सैन्य (न० ) दण्ड (पु०) वरूथिनी (स्त्री) ये सब सेना के नाम है ।। ५६ ॥ कदनं समरं युद्ध, संयुगं कलह रणम् । संग्राम संपरायाजि, संयदाहुमहाहवम् ॥८॥ .
नाम-माला- ८ भाषार्थ-कदन, समर, • युद्ध, संयुग, कलह, रण, सग्राम (न० ) संपराय, आजि (पु०) संयत, महाहव ( न० ) ये सब युद्धके नाम है ।। ८७ ॥ गजो मताजो हस्ती, वारणोऽनेकपः करी । दन्ती स्तम्बरमा कुम्भी, हिरदेभमतङ्गमाः ॥८॥ शुंडाल सामजो नागो, मातङ्गः पुष्करी द्विपः । करेणुः सिन्धुरस्तषु, यन्ता यान्ता निषाद्यपि ॥८६॥ भापार्थ-गज, मतङ्गज, हस्तिन्, वारण, अनेकप, करिन्, . दन्तिन्, स्तम्बेरम, कुम्भिन्, द्विरद, इभ, मतङ्गम; शुंडाल, सामज नाग, मातंङ्ग, पुष्करिन्, द्विप, करेणु, और सिन्धुर (पु०) 'ये सब हाथी के नाम है इनके आगे यन्तु, यात और निपादिन् (पु०) ये तीन शब्द जोड देने पर गजयन्त, गजयातृ और गजनिषादिन प्रादि महावतके नाम बन जाते हैं ।। ८८ ॥६॥ नागाधरिः कंठीरवो. मृगेन्द्रः केशरी हरिः । व्याघश्चमूरः शार्दलः, शरभोऽष्टापदोऽष्टपात् ॥१०॥ भापार्थ-हस्ती (हाथी) के नामोंके आगे अरि. शब्द जोड़ देने से गजारि नागारि श्रादि तथा कराठारव, मृगेन्द्र, केगरिन्. हरि (पु० ) ये सब सिंह के नाम है व्याघ, चमूर (पु०) ये दो नाम तेंदुए को हैं शार्दूल, शरभ, अष्टापद और अष्टपात (पु०) ये चार अष्टापद है।॥१०॥ क्रोडो बराहो दंष्ट्री च, घृष्टिः पोत्री च शुकरः । उष्ट्रो मयः श्रृङ्खलिका, करभः शीघ्गामुकः ॥९॥ के नाम २५ नाम-माला। " " के नाम - भाषार्थ-क्रोड, वराह, दंष्ट्रिन्, घृष्टि, पोत्रिन्, और शूकर ( पु० ) ये सब सुअर के नाम है उष्ट्र, मय, शृंखलिक, करम और शीघ्रगामुक ( पु० ) ये सब ऊँटके नाम है ॥ ६१ ॥ कौलेयः सारमेयो, अण्डल: श्या पुरोगतिः । जिह्वापो ग्रामशार्दूलः, कुक्कुरोशत्रिजागरः॥६॥ भाषार्थ-कौलेयक, सारमेय, मण्डल, श्वन्, पुरोगति, जिव्हाप, ग्रामशार्दूल, कुक्कुर और रात्रिजागर (पु० ) ये सब कुत्ते है॥१२॥ हेम चाष्टापदं स्वर्ण, कनकार्जुनकाञ्चनम् । सुवर्ण हिरण्यं भर्म, जातरूपं च हाटकम् ॥६३॥ तपनीयं कलधौतं, कार्तस्वरं शिलोद्भवम् । रूप्यं रजतं गुन्तिका, शुक्ति मौक्तिकं तथा ॥१४॥ भाषार्थ-हेमन्, अष्टापद, स्वर्ण, कनक, अर्जुन, काञ्चन, सुवर्ण, हिरण्य, भर्मन्, जातरूप, हाटक, तपनीय, कलधौत कार्तस्वर और शिलोभव (न० ) ये सब सुवर्ण (सोने । के नाम हैं रूप्य, रजत (न० ) गुलिका (स्त्री) ये तीन चांदीके नाम हैं शुक्तिज और मौक्तिक (न० ) ये दो मोती के नाम हैं ।। ६३ ॥१४॥ वित्तं वस्तु वसु द्रव्यं, स्वार्थ रा द्रविणं धनम् । कस्वरं तत्पति प्राहुः, कुबेरं चैकपिङ्गलम् ॥६५॥ - ५ - - - नाम-माला वैश्रवणं राजराज-मुत्तराशापति तथा । अलकानिलयं श्रीदं, धनपर्यायदायदम् ॥१६॥ भापार्थ-वित्त, वस्तु, वसु, द्रव्य ( न० ) स्त्र, (पुन० } श्रर्थ, र (पु० ) द्रविण, धन, कस्बर ( न०) ये सब धनके नाम है इनके आगे ‘पति, शब्द जोड़ देनेसे धनपति बंगरा और कुबेर, एकापिगल, वैश्रवण, राजराज, उत्तराशापति, अलकानिलय श्रीद तथा धनके नामोंके आगे 'दाय और द, शब्द जोड़ देनेसे धनदाय, धनद आदि भी कुबेरके नाम बन जाते हैं और वे सन पुल्लिंग होते है ।। ६५॥६६॥ राष्ट्रं जनपदो निग्रो, जनान्तो विषयः स्मृतः । । पू: पुरं पुरी नगरी, पत्तन पुदभेदनम् ॥ ७॥ भापार्थ-राष्ट्र (न० ) जनपद, निग्र, जनान्त, विषय (पु० ) ये देशके नाम है पुर् (स्त्री) पुर ( न०) पुरी, नगरी (स्त्री) पत्तन, पुटभेदन ( न० ) 'ये सब नगरीके नाम है ।। १७॥ वक्त्रं लपनमास्यं च, वदन्ति वदनं मुखम् । आननं श्रवणं श्रोत्रं, श्रवः कर्ण श्रुनि विदुः ॥६॥ भाषार्थ-चक्त्र, लपन, श्रास्य, वदन, मुख, आनन, (न०) ये मुखके नाम है श्रवण, श्रोत ( न० ) व (पु० ) कर्ण (न०) श्रुति (स्त्री) ये सब कानके नाम है ॥ ८ ॥ दृगक्षि चक्षुर्नयन, दृष्टिननं विलोचनम् । फटाक्षं केकरापा, विभूमस्तस्य वैकृतम् ।। ६६ ॥
। ~ भाषार्थ। २७. . भाषार्थ-दृश, (स्त्री) अक्षि, चक्षुष, नयन ( न०) दृष्टि ( स्त्री ) नेत्र, विलोचन ( न० ) ये सब नेत्रके नाम हैं कटाक्ष (पु० न०) केकर, अपाङ्ग, विभूम (पु० ) ये नेत्रके विकार (निजारे ) के नाम है ॥ ६ ॥ 1 दो->षा च सुजो बाहु', पाणिहस्तः करस्तथा । प्राहुर्बाहुशिरोंसं च, हस्तशाखा कराङ्गुलिः ॥१०॥ भाषार्थ-दोस्, (पु०) दोषा (स्त्री) भुज, बाहु, (स्त्री. पु) ये चार बांहके नाम है पाणि, हस्त, और कर (पु० ) ये, तीन हाथके नाम है बाहुशिरस और अस, (न० ) ये दो कन्धेके नाम है और हस्तशाखा अर्थात् हस्तके नामोंके आगे शाखा 'शब्द' जोड देनेसे हस्तशाखा आदि और करांगुलि ( स्त्री० ) ये हायकी अंगुलीके नाम है ॥ ११० ॥ दन्तवासोऽधरोऽप्योष्ठो, वर्णितो. दशनच्छदः शिरोधरो गलो ग्रीवा, कण्ठश्च धमधिमः॥१०॥ भाषार्थ-दन्तवास, अधर, प्रोष्ठ, और दशनच्छद (पुं०) ये चार श्रोठके नाम है शिरोधर, गल ( पु० ) ग्रीवा (स्त्री) कण्ठ, धमनीधम, ( पु० ) ये पाच गलेके नाम है ॥ १०१ ॥ नासा घाणमुरो वचः, कुतिः स्याज्जठरादरम् । स्तनः पयोधरो कुचो, वक्षोज इति वर्णितः ॥१०२॥ भाषार्थ-नासा (स्त्री) घाण (न० ) ये दो नासिका (नाक) के नाम उरस् और वक्षस् ( न० ) वे दो छातीके है .
२५ नाम-माला- - Emaa नाम है कुक्षि (स्त्री ) यह एक कूख का नाम है जठर और उदर (न० ) ये दो पेटके नाम है स्तन, पयोधर, कुच, और वक्षोज (पु० ) ये चार स्तनके नाम हैं ।। १०२ ॥ कटिनितम्बः श्रोणिश्च. जघनं जानु जन्हु च । चलन चरण पादं, क्रसोऽट्रिश्च पदे विदुः ॥१०॥ भाषार्थ-कटि (स्त्री) कमर को कहते हैं स्त्रीकी कमर के पिछले भाग को नितम्ब (पु०) कहते है और अगले भाग को श्रीणि (स्त्री) और जघन ( न० ) कहते है जानु और नन्हु ( न० ) ये दो घुटनेके नाम है चलन ( न० ) चरण, पाद, (पुं०न० ) क्रम, अड्बूि (पु.) ये पांच चरणके नाम है ॥१०॥ शिरो मुद्दोत्तमा के, प्रारभ्य प्रेरितरितम् । वाग्वचो वचनं वाणी, भारती गीः सरस्वती॥१०४॥ भाषार्थ--शिरस् (न० ) मूईन् (पुं० ) उतमांग, क (न० ) ये चार शिरके नाम है प्ररभ्य, प्रेरित और ईरित (न०) ये तीन प्रेरित हुई वस्तुके नाम है वाच (स्त्री) वचस, वचन (न०) वाणी, भारती, गिर और सरस्वती ये सात वाणीके नाम है ॥१०४॥ सिंहडिपधने गर्जी, हेपाऽश्वे वृहित गज । स्फोत्कृतं धेनुकलभे, स्तनितं जलदे तथा ॥१०॥ भाषार्थ---सिंह, हाथी, और मेघ की बोली को गर्ज (पु.) कहते है घोड़े के हीसने को हेपा (स्त्री) तथा हाथोकी बोली को हित (न०) भी कहते हैं, गाय और हाथी के बच्चे की बोली भाषार्थ । २९ . हो को स्फीत्कृत'( न० ) और मेवकी गर्जनाको स्तनित भी कहते हैं ॥ १०५ ॥ स्यन्दने चीत्कृतं मन्त्रे, भटे घृष्टौ च हुकृतम् ।। शीकृतं मणितं कामे, खूत्कृतं च श्रृंखलायुधे॥१०६। भाषार्थ-रयके शब्दको चीकृत ( न० ) तथा मन्त्र, योधा और शूकर की आवाज को कहते है मैथुनके शब्द को शीकृत और मणित ( न०) कहते हैं । शृखला और आयुध ( हथियार ) इनके शब्द को खूत्कृत ( न० ) कहते है ॥ १०६ ॥ मजीरकं तुलाकोटि, नूपुरं तत्र झङ्कृतम् । झाकृतं मरुतिकोञ्च-हंसयोः क्रेङ्कृतं मतम् ॥१०७॥ भाषार्थ-मंजरीक, तुलाकोटि,नपुर (न० ) ये तीन विछुओं के नाम है इनके शब्द को झङ्कृत ( न० ) कहते है वायुके शब्द को झाङ्कत (न० ) और क्रोच तथा हंसके शब्दको फेंकृत ( न० ) कहते है ॥ १०७॥ प्रतीतं संस्तुतं लब्धं, दृष्टं परिचितं स्मृतं । स्थित दशमीस्थं च, परासुं च मृतं विदुः॥१०८।। भाषार्थ----प्रतीत, संस्तुत, लब्ध, दृष्ट, परिचित, और स्मृत (न०.) ये छह, जानी हुई वस्तुके नाम है संस्थित, दश- मीस्थ और परासु तथा मृत ( तीन ) ये चार मरे हुए पुरुष आदि के नाम हैं ॥ १०८॥ -- ३० नाम-माला- " खेदो देषोऽप्यमर्षश्च, रुट कोपक्रोधमन्यवः । हर्षः प्रमोदः प्रमदो, मुत्तोषानन्दमुत्सवः ।।१०।। भाषार्थ-खेद, द्वेष, अमर्प, रुप्, कोप, कोध, मन्यु (पु.) ये सात. क्रोधके नाम है, हर्प, प्रमोद प्रमद, ( पु० ) मुद्, (स्त्री) तोष, आनन्द, उत्सव (पु० ) ये सात, हर्षके नाम है।॥ १०॥ कृपातुकरूपानुक्रोशो, हन्तोक्तिः करुणा दया । शेमुषी धिषणा प्रज्ञा, मनीषा धीस्तथाशयः॥११॥ भाषार्थ-कृपा, अनुकम्पा (स्त्री) अनुक्रोश (पु०) हन्तक्ति, करुणा, दया, (स्त्री) ये छह, दया के नाम हैं, शेमुषी, धिषणा, प्रज्ञा, मनीषा, धी ( स्त्री) श्राशय (पु० ) ये छह बुद्धिके नाम हैं ॥ ११०॥ प्राज्ञो मेधादिनान्विद्वानभिरूपो विचक्षणः । पण्डितः सूरिराचार्यो, वाग्मी नैयायिका स्मृतः॥१११॥ “भाषार्थ--प्राज्ञ और बुद्धिके नामोंके आगे मनुप् प्रत्यय जोड़ देने से शेमुषीमतू, धिषणावत, प्रज्ञावत् मनीषावत, धीमत, श्राशय- वत्, मेघावत्, विद्वत्, अभिरूप-विचक्षण, पण्डित, सरि, प्राचार्य वाग्मिन्, और नैयायिक (पु०) ये सोलह पण्डितके नाम है॥ १११॥ पारिषद्यो बुधः सभ्यः, सदस्यासत्सभोचितः। प्रास्थानाधिपती राजा, राजसूयो नृपक्रतुः॥११२॥ H भाषार्थ। - A भापार्थ-पारिपद्य, बुध, सभ्य, सदस्य, सदुचित, सभोचित (पु० ) ये छह, सभासदके नाम है अास्थानाधिपति, और राजन् (मु० ) ये राजाके, नाम है इनके आगे 'सूय' शब्द जोड • देने से राजसूय आदि (पु०) नृपकृतु ( राजयज्ञ ) के नाम बन नाते है ॥ ११२॥ विष्टरं मल्लिकां पीठ-मासन्दीमासनं विदुः । विष्टपं भुवनं लोको, जगत्तस्थ पतिर्जिनः ॥११३।। 'सर्वज्ञो वीतरागोऽर्हन, केवली धर्मचक्रभृत् । तीर्थकरस्तीर्थकरस्तीर्थकृथिव्यवाक्पतिः ।। ११४ ।। भाषार्थ-विष्टर (पु०) मल्लिका (स्त्री) पीठ (न० ) प्रासन्दी (स्त्री') आसन ( न० ) ये पाच,- आसनके नाम हैं विष्टप, भुवन ( न० ) लोक (पु० ) जगत् (न० ) ये चार, संसारके नाम है इनके आगे 'पति' शब्द जोड देनेसे विष्टप पति आदि तथा जिन सर्वज्ञ, वीतराग अर्हत, केवलिन्, धर्मचक्र- भृत्, तीर्थकर, तीर्थकर, तीर्थकृत, दिव्यवाक्पति (पु० ) ये सब के नाम है ।। ११३ ॥ ११४ ॥ वर्षीयान्वृषभो ज्यायान्, पुरुषाद्यः प्रजापतिः। ऐक्ष्वाकुः काश्यपोव्रम्हा, गौतमो नाभिजोऽग्रजः११५ भाषार्थ---- बयस वृषभे, ज्यायस, पुरुपाद्य, प्रजापति, ऐक्षवाकु काश्यप, ब्रह्मन्, गौतम, नाभिज, अग्रज (पु०) ये सब आदिनाथ के नाम है ॥ ११५॥ जिनन्द्र भगवान् , ૨ नाम-माला . . . सन्मतिर्महतिौरो, महावीरोऽन्त्यकाश्यपः । माथान्वयो वर्द्धमानो, यत्तीर्थमिह सांप्रतम् ॥११६॥ भाषार्थ--सन्मति, महति, वीर, महावीर, अन्त्यकाश्यप, नाथान्वय, बर्द्धमान (पु० ) ये बर्द्धमान (अन्तिम तीर्थकर ) के नाम है इस वक्त भरत क्षेत्र में उन्हीं का बताया हुआ धर्म चल रहा- है ॥ ११६ ॥ चेलं निवसनं वासश्चीरसम्बरमशुकम् । चिस्त्राद्यन्तदिगाद्यादि-संज्ञितो वृषभेश्वरः॥११७॥ भाषार्थ-चेल, निवसन, वासस, चीर, अम्बर, और अंशुक ( न० ) ये छह, वस्त्र के नाम है दिशा के नाम के आगे चेल आदि वस्त्रोंके नामोंके जोड़ देनेसे दिगम्बर आदि, वृषभेश्वर अर्थात् धर्मके ईश्वर (दिगम्बर मुनि) के नाम बन जाते है ॥११॥ कुंकुमं रुधिरं रक्तं, कस्तूरी मृगनाभिजा । कर्पूर धनसारं च, हिमं सेवेत पुण्यवान् ॥११८॥ भापार्थ-कुंकुम, रुधिर और रक्त (न०) ये तीन, केसरके नाभ है कस्तूरी मृगनाभिजा (स्त्री) ये दो, कस्तूरीके नाम कपूर (दो) घनसार हिम ( पु० ) ये तीन कपूरके नाम हैं इन चीजों को पर्रायात्मा भोगते है ॥ १२८ ।। समालम्भोऽङ्गरागश्च, प्रसाधनविलेपनम् । भूषणाभरणं रुच्यं,माल्यं माला गुणि स्त्रजम् ॥११९॥ भाषार्थ-समालम्भ, अंगराज, (पु०) प्रसाधन, विलेपन (न०) ये चार लेपन के नाम है म हैं ३ भाषार्थ। - -- भूषण; आभरण, रुच्य (न० ) ये तीन गहनेके नाम है। मात्य (न०) माला, गुणि, सृज् (स्त्री) ये मालाके नाम है ॥११॥ मेखला रसना काञ्ची, हेमपर्यायासूत्रकम् "श्रोणीविम्बे कटीसूत्रं, मानसूत्रमिवाहितम् ॥१२०॥ भाषार्थ-मेखला, रसना, काञ्ची (स्त्री) तथा सुवर्ण के नामों के आगे सूत्र,, शब्दको जोड़ देनेसे सुवर्णसूत्र, हेमसूत्र श्रादि (न० ) भी कटीसूत्र अर्थात् करधौनीके नाम हो जाते है वह कर- धौनी कटीभाग में ऐसी शोभती है मानो उसके नापने का सूत्र ही है ।। १२० ॥ मदिरा मद्यमैरेय, सीधुं कादम्बरीमिराम् । प्रसन्नां वारुणी हालां, मधुवारां सुरां विदुः॥१२१ भाषार्थ-मदिरा (स्त्री) मद्य, मैरेय (न०) सीधु, काद- म्बरी, इरा, प्रसन्ना, वारुणी, हाला, मधुवारा, सुरा, (स्त्री-) ये सब मदिरा ( शराब ) के नाम है ॥ १२१ ।। शुण्डासवस्तद्विधायी, शौण्डो गयेत मद्यपः । शक्तोऽक्षयूतपानेषु, विचित्रा शब्दपद्धतिः ॥१२२॥ भाषार्थ-शुण्डा (स्त्री) यह एक प्रकारको मदिराका नाम है इसके पीनेवाले और बनानेवाले को शौण्ड कहते है तथा जो पांसोंसे खेलने में, जुवामें, मद्य पाने में प्रासक्त हो उसे मद्यप कहते है यद्यपि मद्य पीनेवाले को ही मद्यप कहना चाहिए नुवारी को नहीं; परन्तु शब्दोंके प्रयोगकी परिपाटी विचित्र ही है इस लिए उसको भी मद्यप कहते है ।। १२२ ।। - ३ ३४. नाम-माला- । सपियङ्गवीनाज्यं, दुग्धं चीरामृतं पयः । उदश्विन्मथितं तक्रं. कालशेयं पियेद् गुरुः ॥१२३॥ भाषार्थ-सर्पिष् , हैयङ्गवीन, श्राज्य ( न० ) ये तीन घी के नाम है दुग्ध, क्षीर, अमृत, पयस् ( न० ) ये दूध के नाम हैं तथा उदवित् , मथित, तक्र, कालशेय ( न०) ये चार छाछ (मठे) के नाम है इसको बलिष्ट पुरुष पावें ॥ १२३ ।। प्रायोवयोदशाऽनेहः-पूर्ण यौननिकं विदुः । तारुण्यं यौवनं चान्त्यो, वार्डीनः स्थविरोमतः॥१२४ भाषार्थ-प्रायस, वयस् (न०) दशा (स्त्री) अनेहस (पु०) ये चार अवस्था ( हालत ) के नाम है इनके आगे पूर्ण, शब्द जोड़ देने से प्राय पूर्ण, वयःपूर्ण, दशापूर्ण, अनेहःपूर्ण (पु०) ये यौवनिक अर्थात् जवान पुरुष के नाम बन जाते है । तारुण्य, यौवन (न.) ये दो जवानी के नाम हैं तथा अन्त्य, वाद्धीन और स्थविर (पु.) ये बुड्ढे के नाम हैं ॥ १२४ ॥ घंशोऽन्वयोऽन्ववाय: स्पा-दाम्नायः सन्ततिः कुलं । प्रोयो वर्गश्च सन्तानः, काव्यमेव कवेः स्थितिः १२६ भषार्थ-वंश, अन्वय, अन्ववाय, आम्नाय, (पु० ) सन्तति (स्त्री) कुल ( न० ) श्रोध, वर्ग, सन्तान, (पु०) ये सब कुल के नाम हैं कवि लोगों का काव्य ही कुल है । भावार्थ-जिस तरह कुल से लोगों का नाम निशान रहता है उसी तरह कवि का नाम निशान उसकी कृति अर्थात्- काव्य से रहता है इस लिए उसका वही कुल है ॥ १२५ ॥ .
भाषार्थ। . " - . हसो मरालश्चकाङ्गो, हंसवाहः सनातनः । मयूरो बर्हिणः केकी, शिखी प्रावृषिकस्तथा॥१२६॥ नीलकण्ठः कपाली च, शिखण्डी तत्पति मुहः । वरटा वारली हंसी, कोक ईहामृगो वृकः ॥१२७॥ भाषार्थ-हस, मराल, चक्रांग (पु.) ये तीन. इसके नाम हैं हंस के नामों के आगे 'वाह' शब्द जोड देने से सनातन अर्थात ब्रह्माके नाम बन जाते हैं - जैसे हंसवाह आदि । मयूर बहिण, केकिन्, शिखिन्, प्रावृषिक और नीलकण्ठ, कपालिन्, शिखण्डिन, (पु.) ये सब मयूर के नाम हैं इनके आगे 'पति' शब्द जोड़ देने से कार्तिकेयके नाम बन जाते है जैसे मयूरपति श्रादि । बरटा, वारली, हंसी, (स्त्री) ये तीन हसनी के नाम हैं कोक, इहामृग, वृक (पु ) ये तीन केक पक्षीके नाम हैं १२६ ॥ १२७॥ हरिणो मृगः पृषत स्तदङ्कः शर्वरीकरः । पनगोहि विषधरो, लेलिहानो भुजङ्गामः ॥१२॥ नागोरगौ फणीसर्प-स्तद्वैरी विनयात्मजः । सुपर्णो गरुडस्ताक्ष्यों, गरुत्मान् शकुनीश्वरः॥१२६ इन्द्रजिन्मन्त्रपूतात्मा, वैनतेयो विषक्षयः। खमिन्द्रियं दृषीकं च, श्रोतोऽनं करणं विदुः॥१३० भाषार्थ:-हरिण, मृग, पृषत ( पु. ) ये हिरण के नाम हैं इन के आगे 'अंक, शब्द जोड़ देने से हरिणांक श्रादि और शर्वरी- १४ , . ३६ नाम-माला- कर अर्थात् रात्रि के नामों के आगे कर शब्द जोड़ देने से शर्वरी- कर आदि भी चन्द्रमा के नाम हो जाते है और वे सब पुल्लिंग होते हैं । पन्नग, हि, विषधर, लेलिहान, भुजंगम, नाग उरग, फणिन्, सर्प, (पु ) ये सब सर्प के नाम हैं इनके आगे 'वेरिन्, शब्द जोड़ देने से पन्नगवैरिन् आदि और सुपर्ण, गरुड, ताय गुरुत्मत्, शकुनीश्वर, इन्द्रजित, मन्त्रपूतात्मन, वैनतेय, विषक्षय ये सब विनतात्मज अर्थात् गरुड के नाम है और वे सब पुल्लिग होते है। ख, इन्द्रिय, दृपीक, श्रोतस्, अक्ष, करण (न० ) ये सब इन्द्रिय के नाम है ।। १२८॥ १२६ ॥ १३० ॥ + पुण्य भाग्यं च सुकृतं, भागधेयं च सत्कृतम् । . • अघमहश्च दुरितं, पाप्मा पापं च किल्विषम्॥१३१॥ वृजिनं कलिल मेनो, दुःकृतं तज्जयी जिनः । सदनं सम भवनं, धिष्ण्यं वेश्माथ मन्दिरं ॥१३२॥ गेहं निकेतनागारं, निशान्तं निवृतं गृहं । वसत्यवसथावासं, स्थानं धामास्पदं पदम् ॥१३३ ॥ निकायं निलयं वस्त्यं, विदुरालयम् खेयं खातं च परिखा, वप्रं स्याद् धूलिकुहिमम्॥१३४ भाषार्थ-पुण्य, भाग्य, सुकृत, भागधेय, सत्कृत (न० ) ये सब पुण्य के नाम हैं अध, अंहस्, दुरित (न० ) पाप्मन् (पु.) पाप, कितिष, वृजिन, कलिल, एनस्, दुःकृत (न०) ये सब पाप के नाम हैं इनको जीतने वाले को जिन कहते हैं भावार्थ-इन पाप शरणं ।।
-- भाषार्थ। - - + के नाम के आगे जायन्' शब्द जोड़ देने से जिन (जिनेन्द्र ) के नाम हो जाते है ये सब पुल्लिंग होते हैं। सदन, समन् , भवन, विष्ण्य, वेश्मन् , मन्दिर, गेह, निके तन, श्रागार, निशान्त, निवृत, गृह ( न०), वसति, अवसथ, श्रावास (पुं०), स्थान, धामन् , श्रास्पद, पद (न० ), निकाय, निलय (पु० ), वस्त्य, शरण ( न०.) ये सब श्रालय घर) के नाम हैं । खेतं, खात (न०), परिखा (स्त्री०) ये तीन खाई के नाम है। वप्र और धूलिकुट्टिम (न० ) ये दो, खाई पर जो मिटी का 'कंट होता है उसके नाम हैं ॥१३१॥१३२॥१३॥१३४॥ प्राकारः परिधिः सालः, प्रतोली गोपुराकृतिः । प्रासादसौधहाणि, निव्यूहो नत्तवारणम्॥१३५ भाषार्थ-प्राकार (पुं०), परिधि ( स्त्री), साल-(पु०) ये तीन कोट के नाम हैं । गोपुर अर्थात् नगर के दरवाजे के श्रा. कार को जिसमें से लोग आते जाते है, प्रताली कहते है। प्रासाद (पु.), सौध (पुं० न० ), हर्य (नं० ) ये तीन महलके नाम हैं। भावार्थ-धनाढयों के महल को हर्म्य, देवताओं के स्थान को प्रासाद और राजा के भवन को सौध कहते है। नियूंह (पु० ) यह खूटी का नाम है, मत्तवारण (न० ) छज्जे के नीचे के टन्डों को कहते हैं ॥ १३५॥ वातायन मनालन्छ-मालम्ब्धं मुखमासनम् । समः सवर्णः सजातिः, सदृक्षः सदृशः सदृशा १३६ तुल्यः सधर्मः सरूप-स्तुला. कक्षोपमाभिधा ।
नाम-माला- ३ ३८ - । विन्मन्यो विद्यमानश्च, गुरुस्थानोऽम्वुजार्ननः॥१३७ सिंहनादीति पर्याय-मुपमानेषु योजयेत् । व्यपदेशं निभं व्याज, पदं व्यतिकरं छलं ॥१३८॥ भाषार्थ-वातायन, अनालम्ब, पालम्ब्य, मुखासन (न०) ये झरोखे के नाम है। सम, सवर्ण, सजाति, सदृक्ष, सदृश, सदृश, तुल्य, सधर्म, सरूप (पुं० ) ये सब समान ( बराबर ) के नाम है। तुला कक्षा, उपमा (स्त्री) ये तीन उपमा के नाम है। विन्मन्य, विद्यमान, गुरुस्थान, अम्बुजानन, सिंहनादिन् (पुं०) इत्यादि पर्याय . शब्दों को उपमानमें लगाना चाहिए। भावार्थ-ये शब्द उपमान के द्योतक हैं। व्यपदेश, निभ, व्याज पद, व्यतिकर, छल (न०) ये सब छल के नाम है ॥१३६॥१३७॥१३॥ छद्म वृत्तान्तमुत्प्रेक्षा, शब्दमन्यं च निर्णयेत् । : बातः पूगः समाजश्व, समूहः सन्तति व्रजः॥१३६ व्यूहो निकायो निकरो, विकुरम्धं कदम्बकं । प्रोधः समुदयः संघः, संघातः समितिस्ततिः ॥१४०. निचयः प्रकरः पंक्तिः, पशूनां समजो ब्रजः । भाषार्थ-छद्मन्, वृत्तान्त, ( न० ) ये उत्प्रेक्षा के नाम हैं, । इसी तरह के और भा शब्द जान लेना चाहिए। ब्रात, पूग, स- माज, समूह, सन्तति, ब्रम. व्यूह, निकाय, निकर, (पुं० ), निकु- रम्ब, कदम्बक, ( न० पुं० ) श्रोध, समुदय, संघ, संघात (पुं०) समिति, तति (स्त्री) निचय, प्रकर (पुं०,) पंक्ति (स्त्री) ये
माषार्थ।
१
सन समूह के नाम हैं । पशुओं के समुदाय को ब्रजा पुं० )
कहते है ॥१३॥४०॥
समीपाभ्यासमासन्न-मभ्यर्ण सन्निधिं विदुः ॥१४१
अविद्रं च निकट-मविलम्बमनन्तरम् ।
भाषार्थ-समीप, अभ्यास, आसन्न, अभ्यर्ण, ( न० ):सं-
निधि (स्त्री ) अविदूर, निकट, अविलम्ब, अनन्तर ( न ये सब
सन्निधि अर्थात् निकट ( पास ) के नाम हैं ||१४१॥
जित्या हलि हलः सार, लागलं तत्करोबलः ॥१४२
रेवतीदयितो नील-वसनः केशवाग्रजः ।
भाषार्थ-जित्या, हलि (स्त्री) हल (पुं० ) सीर, लांगल
( 40 ) ये सब हल के नाम हैं, इनके आगे कर शब्द जोड देने
से जित्याकर आदि और बल, रेवतीदयित, नीलवसन, केशवानमः
(पुं०) ये सब किसान (खितहड़ ) के नाम है ॥१४२॥ . .
अर्जुनः फल्गुनो जिष्णुः, श्वेतवाजी कपिध्वजः १४३
गाण्डीवी कामुकी सव्य-साची मध्यमपाण्डवा।।
वृषसेनः सुनिर्मोको, दैत्यारिः शक्रनन्दन ॥१४४॥
कर्णशुली किरीटी च, शब्दभेदी धनञ्जयः ।
भाषार्थ-अर्जुन, फल्गुन, जिष्णु, श्वेतवाजिन् , कपिध्वज,
गाण्डीविन , कार्मुकिन् , सव्यसाचिन् , मध्यमपाण्डव, वृषसेन, सु-
निर्मोक, दैत्यारि, शक्रनन्दन, कर्णशूलिन् , किरीटिन्, शब्दभेदिन,
धनञ्जय (पुं० ) ये सब अर्जुन के नाम है ॥१४३॥१४४॥
नाम-माला- . १ - + समवर्ती यमः कालः, कृतान्तो मृत्युरन्तकः॥४५॥ धर्मराजः पितृपतिः, सूरसूनुः परेतराट् ।। घमुनो यमुनाभ्राता, श्राहदेवश्च दण्डभृत् ॥१४६॥ भाषार्थ-समवर्तिन् , यम, काल, कृतान्त, मृत्यु, अन्तक, धर्मराज, पितृपति, सूरसूनु, परेतराज, यमुन, यमुनाभातृ, श्राद्धदेव, और दण्डभृत् (पु० ) ये सब काल के नाम है ॥१४५॥१४६॥ कुरुकीचकयोः शत्रु-र्वायुपुत्रो वृकोदरः । धर्मात्मजोऽजातरिपुः, कौन्तेयो भरतान्वयः ॥१४७ कौरव्यो राजलक्ष्मा च, सोमवंश्यो युधिष्ठिरः। भाषार्थ-कुरुशत्रु, कीचकशत्रु, वायुपुत्र और वृकोदर (पु०) ये चार भीमके नाम है । धर्मात्मज, अजातरिषु, कौन्तेय, भरतान्वय, कोरव्य, 'राजलक्ष्मन् , सोमवंश्य और युधिष्ठिर (पु०) ये सब युधिष्ठिर के नाम है ॥ १४७ || कृष्णं नीलासितं कालं, धूमं धूम्रमलिप्रभं ॥१४८॥ : भाषार्थ-कृष्णा, नील, असित, काल, धूम, धूम, और अलिप्रभ, ये सात काले रंग के नाम है ये तीनों लिङ्गों में देखे माते है ॥ १४८॥ तमोन्धकारतिमिरं, ध्वान्तं संतमसं तमम् । श्वेतार्जुनौ शुचिः श्येतो, वलक्ष सितपाण्ड्डरम॥१४९ शुक्लावदातं धवलं, पाण्डु शुभं शशिप्रभम् । लोहितं रक्तमातामं, पाटलं विशदारुणम् ॥१५०॥ . , -- भाषार्थ ४१ NAM १ भाषार्थ--तमस् ( न० ) अन्धकार ( पु० न० ) तिमिर ध्वान्त, संतमस, तम (न० ) ये सर्व अन्धेरे के नाम हैं। वेत, अर्जुन { पु० ) शुचि (स्त्री ) श्येत (पु० ) वलक्ष, सित, पाण्डुर, शुक्ल, अवदात, धवल, (पु० न० ) पाण्डु, (पु०) शुभ, शशिप्रभ (न० ) ये सब सफेद के नाम हैं और प्रायः ये सब तीनों लिंगों में देखे जाते हैं तथा लोहित, रक्त, श्राताम्'(तीन) ये तीन लाल के नाम है कुछ कम लाल वर्ण को पाटल (तीन) कहते है ।। १४६॥ १५० ॥ गौरं पीतं हरिद्रा, पालाशं हरितं हरित् । हरिणी लोहिनी शोणी,गौरी श्येनी पिशग्यपि।१५१ शारंगी शबली काली, कल्माषी नीलपिङ्गाली । पराग मधु किजल्क, मकरन्दच कौसुमम् ॥१५२॥ भाषार्थ-गौर, पीत, हरिद्राभ ( तीन ) ये तीन पीले के नाम हैं। पालाश, हरित् (तीन ) ये तीन हरे के नाम हैं । हरिणी, लोहिनी, शोणी, गौरी, श्येनी, पिशङ्गी, सारङ्गी, शबली, काली, कल्मापी, नीलपिङ्गली, (स्त्री ) ये सब स्त्रीलिंग शब्द रंग के वाचक है परन्तु ध्यान रहे कि इनका प्रयोग, स्त्रीलिंग में ही होगा। पराग, मधु, किन्जल्क मकरन्द, कासुम (न० ) ये पराग के नाम है || १५१ ॥ १५२ ॥ उचाराद्रजः पस्,ि रेणुं धूली च योजयेत् । कलङ्कावद्यमलिनं, किजल्कंलक्ष्म लाञ्छनम्।१५३॥ निर्वाधमधमं पङ्घ, मलीमसमपि त्यजेत् । - ५ 1 .
-- ४२ नाम-माला ) ) भाषार्थ-तथा उपचार से पुष्प के नामों के 'आगे रजस् ( न० ) पासु, रेगु, ( पु० ) धूली (स्त्री ) इन धूली के नामों को जोड़ देनेसे पुष्परजस् श्रादि भी पराग के नाम बन जाते हैं कलङ्क (पु०) अवद्य. मलिन, (न०) किञ्जक (पुं० ) लक्ष्मन् , लाञ्छन, निर्वाध, अधम (न० ) पङ्क, मलीमस ( पु० न०) ये सब कलंक के नाम है वह कलंक सर्वथा त्याज्य है ।। १५३ ।। जनोदाहरणं कीर्ति, साधुवादं यशो विदुः॥१५॥ वर्ण गुणावलिं ख्याति-मवदानं तु साहसम् । भाषार्थ-जनोदाहरण ( न० ) कीर्ति ( स्त्री) साधुवाद (पु.) यशस, वर्ग ( न० ) गुणावलि, ख्याति ( स्त्री) अवदान, साहस ( न० ) ये सब कीर्ति के नाम हैं ॥ १५४ ॥ प्रेष्यादेशप्रदेशाज्ञा-नियोगा: शासनं तथा ॥१५शा संदेशः प्रिययो वार्ता, प्रवृत्तिः किंवदन्त्यपि । कठोरं कठिनं स्तब्ध, कर्कशं परुषं दृढम् ॥ १५६ ॥ भाषार्थ-प्रेष्य, आदेश, निदेश, आज्ञा, नियोग (पु.) शासन ( न० ) ये श्राज्ञा के नाम है। प्यारों के समाचार को. संदेश (पु०) कहते है प्रवृत्ति और किंवदन्ती (स्त्री ) ये दो लोगों की अफवाह के नाम है। कठोर कठिन, स्तब्ध, कर्कश, | परुप, दृढ़ ( तीन ) ये सब कठोर ( कडे ) के नाम हैं ।। १५५ ।। ॥ १५६ ॥ अश्लीलं काहलं फल्गु, कोमलं मृदु पेशलं । प्रत्यग्रं साम्प्रतं नव्यं, नवं नृतनमग्रिमम् ॥१५७ ।। - भाषार्थ । ४३ . । भाषार्थ-अश्लील, काहल, फरगु, । न० ) ये तीन व्यर्थ के नाम है। कोमल, मृदु, पेशल (न० ) ये कोमल के नाम हैं। प्रत्यग्र, साम्प्रत, नव्य, नव, नृतन, अग्रिम (न०) ये सब नवीन , के नाम हैं ॥ १५७॥ पुराणं जरठं जीर्ण, प्राक्तनं सुचिरन्तनम् । भो रे हंहो हे चामन्त्रे, कञ्चित्किञ्चिन संशये॥१५८ भाषार्थ-पुराण जरठ, जीर्ण, प्राक्तन, सुचिरन्तन ( न०) ये सब पुराने ( जीर्ण ) के नाम है । भो, रे, हहो, हे ( अ० ) ये सब शब्द श्रामन्त्रण अर्थात् किसी को बुलाने में आते है और कञ्चित्, किंचिन (अ.) ये दो सशय अर्थ में आते हैं.॥१५८।। द्राक् क्षणोऽहाय सपदि, निषेधे मा न खल्वयम् उच्चैरुच्चावचं तुङ्ग-मुच्चमुन्नतमुछूितम् ॥ १५६।। भाषार्थ द्राक्, क्षणे, अह्नाय, सपदि, (अ० ) ये चा- तत्काल के नाम हैं। मा, न, खलु ( अ० ) ये निषेध करने आते है, उच्चैस्, (अ० ) उच्चावच, तुंग, उच्च, उन्नत, उरि (न० ) ये सब ऊचे के नाम है ॥ १५ ॥ नीचं त्यगातनं कुज, नीचै ईस्वं नयेत् परं । अमा सह समं साकं, सार्द्ध सत्रा सजूः समाः॥१६ भाषार्थ-नीच, न्यगातन, कुब्ज ( पु० ) नीचेस (अ. ह्रस्व (पु.) ये सब नीचे के नाम है । अमा, सम, साक, सा सना ( अ ) सजुष ( न० ) ये सब साथ के नाम हैं ।। १६० - नाम-माखा- सर्वदा सततं नित्यं, शश्वदात्यन्तिकं सदा । शृङ्गी दृतिहरि थि-हरिस्तिर्यञ्चशृगिणः॥११॥ भाषार्थ-सर्वदा, सततं नित्यं, शश्वत्, आत्यन्तिक, सदा (१०) ये सदा ( हमेशा ) के नाम है । शृङ्गिन्, दृतिहरि, नाथ- हरि (पु.) ये तीन सींग वाले पशु के नाम है ॥ १६१ ॥ गौश्चतुष्पात् पशुस्तत्र, महिषी नाम देहिका । वियोग मदनावस्था-विरह फुल्लकं विदुः ॥१६२॥ भाषार्थ-गो, चतुष्पात, पशु (पु० ) ये तीन पशुक नाम है उनमें भी भैस को महिषी और देहिका (स्त्री) कहते हैं काम की अवस्था के विरह को वियोग और फुल्लक (पु.) कहते हैं ॥ १६२ ॥ प्रेमाभिलाषमालम्ब, रागं स्नेहमतः परं । संहितं सहितं युक्तं, संपृक्तं संभृतं युतम् ॥१६॥ संस्कृत समवेत घ, प्राहुरन्वीतमन्वितम् । वध्विा सरणिः पन्थाः, मार्गःप्रचरसंचरौ॥१६४. भाषार्थ-प्रेमन् ( न० ) अभिलाप, पालम्ब, राग, स्नेह (पु० ) ये सब राग के नाम है इनके वाद, सहित, सहित, युक्त | संपृक्त, संभृत, युत, संस्कृत, समवेत अन्वीत, अन्वित ( तीन ) ये सव सहित के नाम हैं । वर्मन् ( न० ) अध्वन सरणि, पथिन्, मार्ग, प्रचर; संचर ( पु० ) ये मार्ग के नाम हैं ॥१६॥१६॥ निमार्गनामगा गङ्ग, घोषो गोमण्डलं व्रजः । , ४५ भाषार्थ। कृती नदीष्णो निष्णातः, कुशली निपुणः पटुः॥१६५ तुण्णः प्रवाण: प्रगल्भः, कोविदश्च विशारदः । विदग्धश्चतुरो धूर्त-श्चाटुकृरिकतवः शठः ॥१६॥ भाषार्थ-इन मार्ग के नामों के पीछे 'त्रि, शब्द और आगे' गा, शब्द जोड़ देने से त्रिमार्गगा (स्त्री) श्रादि गंगा के नाम बन माते है । घोष, (पु०) गोमण्डल (न० ) ब्रज (पु० ) ये तीन गौ के घेरे के नाम है । कृतिन्, नदीष्ण, निष्णात, कुशलिन, निपुण, पटु, क्षुण्ण, प्रवीण, प्रगल्भ, कोंविद, विशारद, विदग्ध, चतुर (पुं० ) ये चतुर के नाम है । धूर्त, चादुकृत्, कितव, शठ, (पु०) ये धूर्त के नाम है ॥१६॥१६॥ क्वापि नागरिको ज्ञेयो, गोत्रं संज्ञानाम तत् । मुग्धो मूढो जड़ो नेडो, मूको मूर्खश्च कददः॥१६॥ स देनानांप्रियोऽप्राज्ञो, मन्दो धीनामवर्जितः । षाष्टिकः कलमःशालि-र्जीहिःस्तम्बकरिस्तथा१६८ भाषार्थ---कहीं २ नागरिक को भी धूर्त कहते है । गोत्र (न० ) संज्ञा (स्त्री) अंक, नाम (न० ) ये नाम के नाम हैं। मुग्ध, मूढ़, जड़, नेड़, मूक, मूर्ख, कद्वद, देवानाप्रिय, अप्राज्ञ, और बुद्धि के नामों के आगे ' वर्जित, शब्द जोड़ देने से धीवर्जित अादि (पु०.) ये सब मूर्ख के नाम हैं । षाष्टिक, कलम, शालि, नाहि, स्तम्बकरि (पु० ) ये शालि (धान) के नाम हैं ॥१६॥ १६८॥ मन्द - ४६ नाम-माला - । वत्सः शकृत्करि र्जातः, षोडः षड्दशनः स्मृतः । शौण्डीरो गर्वितःस्तब्धो, मानी चाहंकृदुडतः१६६ " उग्रीव उद्धरो दृप्तो, नीचश्च पिशुनोऽधमः । चौकागारिकस्तेना-स्तस्करः प्रतिरोधकः ॥१७॥ भाषार्थ-वत्स, शकृत्करि, जात (पुं० ) ये तीन बछड़े के नाम हैं । पोड, षड्दशन, ( पुं० ) ये दो छह दति वाले बछड़े के नाम है । शौण्डीर, गर्वित, स्तब्ध, मानिन् , अहंकृत् , उद्धत, उद- ग्रीव, उद्धर, दृप्त (पुं० ) ये सब अहंकारी के नाम हैं। नीच, पि- शुन, अधम (पुं० ) ये नीच के नाम है। चौर, एकागारिक, स्तेन, तस्कर, प्रतिरोधक तथा • निशाचरो गूढचरो, हारका पारिपन्थिकः । प्रस्तरोत्पलपाषाण-दृषद्धातुशिलाधनाः ॥३७१॥ भाषार्थ-निशाचर, गूढचर, हारक, परिपान्थिक (पुं०) ये सब चोर के नाम है । प्रस्तर, उपल, पाषाण, दृषत्, धातु (पुं०) शिला (स्त्री ) धन (पुं० ) ये सब पत्थर के नाम हैं ॥१७॥ तत्र जालमयो लोहं, शातकुम्भं नयेत् परं । . साधीयोऽत्यर्थमत्यन्तं, नितान्तं सुष्ठु वै भृशं॥१७२ भाषार्थ-पत्थर के नामों के आगे 'जात' शब्द जोड़ देने से उपलजात श्रादि (पुं० ) अयस् ( न०.) लोह (पुं० ) ये सव लोह के नाम है । तथा उत्त्पल आदि के आगे 'जात, शब्द जोड़ देने से सुवर्ण के भी नाम बन जाते हैं जैसे उपलजात श्रादि ।
-- भाषार्थ। R- -- - " साधीयस (न० ) प्रत्यर्थ, अत्यन्त, नितान्त, सुष्टु, भृशम् (१०) ये सब बहुत के नाम है ॥ १७२ ॥ स्फुटं साधु खलु स्पष्ट, विशदं पुष्कलामलं । । चित्राश्चर्यादुद्भुतंचोचं,विस्मयः कौतुकोऽव्यहो१७३ भाषार्थ-स्फुट, साधु, खलु, ( श्र०) स्पष्ट, विशद, 'पु- कल, श्रमल, (न० । ये सब स्पष्टं के नाम हैं । चित्र ( न०) आश्चर्य (पुं० ) अदभुत चोद्य, (न०) विस्मय, कौतुक (पुं०) अहो ( अ० ) ये सब श्राश्चर्य के नाम है ॥ १७३ ॥ अभियोगोद्यमोद्योगा, उत्साहो विक्रमो मतः । चामं क्षान्तं कृशं क्षीणं, हीनं जीर्ण पुरातनम् ॥१७४ शीर्णावसानं न्यून च, धैर्य शौर्यञ्च पौरुषं । रहोऽनुरहसोऽपांशु, रहस्यं च भिनत्ति कः॥१७५ भाषार्थ-अभियोग, उद्यम, उद्योग, उत्साह, विक्रम (पुं०) ये सब उत्साह के नाम है । क्षाम, क्षान्त, कृश, क्षीण, हीन, जीर्ण, पुरातन, शीर्ण, अवसान, न्यून ( न०) ये सब दुबले (दुर्वल) के नाम है । धैर्य, शौर्य, पौरुष, ( न०) ये सब धीरज, के नाम हैं। रहस (१०) अनुरहस ( न०) उपांशु ( अ०) रहस्य ( तीन ) ये छिपे हुए अर्थात् गुप्त कार्य के नाम है। सज्जन लोग किसी की गुप्त बात को पुगट नहीं करते हैं ॥ १७४ ॥ १७५ ॥ कीनाशः कृपणों लुब्धो, गृथ्नो दीनोऽभिलाषुकः ।। क्षिप्राशुमंक्ष्वरं शीघं, सहसा झटिति द्रुतम् ॥१७६ नाम-माला- . , तूर्ण जवः स्यदो रहो , रयो वेगस्तरो लघुः । भाषार्थ-कीनाश, कृपण, लुब्ध, गृघ्न, दीन, अभिलाषुक (पु० ) ये सब कृपण ( कजस ) पुरुष के नाम है। क्षिप्र, आशु मंच, अरं, शीघू, सहसा, झटिति, द्रुत, तूर्ण (अ० ) जव, स्यद (पु०) रहस, ( अ०) वेग, तर, लघु (पु० ) ये सब शीघ ( जल्दी ) के नाम हैं॥ १७६ ॥ प्राध्वंकृत: सितो बद्धः,सन्धांनीतोनियन्त्रिता१७७ नियमितः श्रृंखलितः, पिनद्धः पाशितो रिपुः । भाषार्थ-प्राध्वकृत, सित, बद्ध, सन्धानात, नियन्त्रित निय- मित, शृंखलित, पिनद्ध, पाशित (पु० ) ये सब पाश से बांधे हुए शत्रु के नाम हैं ॥ १७७ ॥ कान्तं कमनं कम च, कमनीयं मनोहरं ॥ १७८ ॥ अभिरामं रमणीय, रम्यं सौम्यं च सुन्दरम् । चारु श्लक्ष्णं च सचिरं, प्रशस्त हृद्यधन्धुरम्॥७९॥ दर्शनीयं मनोज्ञं च, चित्तपपाहारि च । भाषार्थ-कान्त, कमन, कम, कमनीय, मनोहर, अभिराम रमणीय, रम्य, सौम्य, सुन्दर, चारु, श्लक्ष्ण, रुचिर, प्रशस्त, हृद्य, वन्धुर, दर्शनीय, मनोज्ञ और चित्त के पर्याय वाची शब्दों के आगे हारि' शब्द जोड़ देने से चित्तहारि श्रादि (न० ) ये सब सुन्दर के नाम है ॥१७८ ॥ १७६ ॥ - - 7 - F भाषार्थ। भवश्यायं तुषारं च, प्रालेयं तुहिनं हिमम् ॥१८॥ नीहारं तत्करं विडि, मृङ्गाकं रोहिणीपतिम् । चारोऽवसर्पः प्रणिधि-निगढ़पुरुषश्वरः ॥१८॥ भाषार्थ-अवश्याय, तुषार (पु० न०) प्रालेय, तुहिन, हिम (न०) नीहार, (पु० न०) ये सब वर्फ के नाम है इनके आगे 'कर' शब्द जोड़ देने से अवश्यायकर आदि तथा मृगाक रोहिणीपति (पु०) ये सब चन्द्रमा के नाम है चार, अवसर्प, प्रणिधि, निगूढ- पुरुष, चर ( पु० ) ये सब गुप्तचर के नाम है ॥ १८० ॥ १८१ ।। तदानुक्तः सहसाक्षः, सत्यार्थ ऋतसूनृते । अत्यन्ताय चिरायति, प्राण्हेऽकस्मादबलादिति१८२ भाषार्थ-इन गुप्त चर के नामों के आगे 'मतुप्' प्रत्यय लगा देने से सहसाक्ष अर्थात् इन्द्र के नाम बन जाते है वे पुलिंग होते है ऋतः सूनृत (न०) ये दो सत्य के नाम है अत्यन्ताय (१०) बहुत का, चिराय (अ०) बहुत काल का, प्राण्हे (१०) प्रातः कालीन दिवस का अकस्मात् (अ०) यह अचानक का और. बलात् (अ.) यह जबरदस्ती का नाम है ॥ १८२ ॥ प्रायेणेति कृतिश्चेति, विभक्तिप्रतिरूपकम् । रम्भा स्त्री कदली चिह्न, मोचासारतरुश्च सा १८३ ' भाषार्थ-प्रायेंण, (बाहुल्य ) और कृतिः ये दोनों अव्यय हैं 'परन्तु विभक्ति कैसे रूप मालूम होते है इस लिये इन्हें विभक्ति प्रतिरूपक अव्यय कहते है रम्भा (स्त्री० ) स्त्री और कदली को, ४ ३ नाम-माता- । कदली (स्त्री०) चिन्ह (ध्वना) और मोचा को तथा मोचा (स्त्री०), सारतरु ( शाल्मलि ) और कदली को कहते है ।। १८३ ॥ कीचकोध्वनिमद्वेणु-स्तालो गेयक्रमोद्भवः । पुष्करं मुरजं पनं, हस्तिहस्ताग्रनामकं ॥ १८४॥ -- भाषार्थ-बजने वाले वाश को कीचक (पु.) कहते है । गाने की आवाज के क्रम से (चढ़ा उतार से) जो शब्द उत्पन्न होता है उसे ताल ( पु०) कहते है, पुष्कर ('न० ) यह मृदंग, कमल, और हाथी की सूड़ के आगे की अगुलि का नाम है ॥ १८४ ॥ निस्तलं वर्तुलं वृत्तं, स्थपुटं विषमोन्नतम् । दीर्घ प्रांशु विशासं च, बहुलं पृथुलं पृथु ।। १८५॥ भापार्थ-निस्तल, वर्तुल, वृत्त ( न० ) ये गोल के नाम हैं ऊँचे नीचे विषम स्थल को स्थपुट (न०) कहते हैं दीर्घ, प्रांशु, विशाल (न० ) ये लम्बे के नाम है । बहुल, पृथुल, पृथु (न० ) ये तीन मोटे के नाम हैं ॥ १८५ ।। उल्धणं दारुणं तिग्मं, घोरं तीनोग्रमुत्कटम् । शीतकं, तिमिरं याप्यं, मन्दं विद्धि विलम्बितम् १८६ भाषार्थ--उल्वण, दारुण, तिग्म, घोर, तीन, उग्र, उत्कट, (न० ) ये सब तेन के नाम हैं । शीतक, तिमिर याप्य, मन्द, विलम्बित, (पु० न० ) ये सब देर के नाम हैं ॥ १८ ॥ सौहार्द सौहृदं हृद्यं, सौहथं सख्यसौरभम् । मैत्री मैत्रेषिकाजर्य, साहाय्यं सङ्गतं मतम् ॥१८॥ . .
- भाषार्थ। भाषार्थ-सौहार्द, सोहद, हृद्य, सौहृद्य, सख्य, सौरभ (न० ) मैत्री (स्त्री) मैत्रेयिक, अजय, साहाय्य, सगत ( न० ) ये सब मित्रता के नाम हैं ॥ १८७ ।। स्वभावः प्रकृतिः शीलं, निसर्गो विसूसा निजः। योग्यो गुणनिकाभ्यासः, स्थाभीक्ष्णं मुहुर्मुहुः१८८ न भाषार्थ-स्वभाव ( पु०) प्रकृति ( स्त्री० ) शील (न०.) निसर्ग (पुं० ) विसूसा ('अ०) निज (पुं० ) ये सब स्वभाव के नाम हैं । योग्य (पुं०) लायक को कहते हैं गुणनिका (स्त्री) अभ्यास (पुं०;) ये दो अभ्यास के नाम है अभीक्ष्ण, मुहुर्मुहु (अ) ये बारबार के नाम हैं ॥ १८८ ॥ मृषालीकं मुधा मोघं, वितथं विफलं वृथा । विधुरं व्यसनं कष्टं, कृच्छं गहनमुद्धरेत् ॥१८९॥ भाषार्थ-मृषा (अ०) अलीक (न०) मुधा (अ) मोध, वितथ, विफल (न०) वृथा (अ०) ये सब फजूल के नाम हैं विधुर, व्यसन, कष्ट, कृच्छ, गहन (पुं० न०) ये सब दुःख के नाम हैं । दुःख त्याज्य है ॥ २८॥. समस्तं सकलं सर्व, कृत्स्नं विश्वं तथाखिलम् । शकलं विकलं खण्डं, शल्क लेशं नवं विदुः।१९० भाषार्थ-समस्त, सकल, सर्व, कृत्स्न, विश्व, अखिल (न.) ये सब सम्पूर्ण के नाम हैं । शकल, विकल, खण्ड, शरक, लेश, लव (न०) ये सब टुकड़े के नाम हैं ॥१०॥ NA , ।
३२ . नाम-माला- मर्मकोशं च कलहं, परिवादं छलं नयेत् । शोणितं लोहितं रक्तं, रुधिरं चतजामृजम्।।१६॥ भाषार्थ-मर्मकोश, कलह (पु० ) ये दो लड़ाई के नाम हैं परिवाद ( पु०) यह निन्दाका नाम है छल ( न० ) कपटको कहते है शेणित, लोहित, रक्त, रुधिर, क्षतज. असृज् ( न० ) ये सब रक्त ( लोहू ) के नाम है ॥ १६१ ॥ सततानारताजसा--त्वहं कन्यापति वरः उदाहः परिणयनं, विवाहश्च निवेशनम् ॥ १९२॥. भाषार्थ-सतत, अनारत, अजस, अन्वह (अ०) ये चार हमेशाके नाम है कन्या के पति ( दूलह) को वर (पु.) कहते है उद्वाह (पु.) परिणयन (न. ) विवाह (पुं० ) निवे शन ( न० ) ये चार विवाह के नाम है ॥ १६२ ॥ शुषिरं विवरं रन्धूं, छिद्रं गतं च गहरं ।। श्वभं रस्थं च पातालं, नरकं यान्त्यमेधसः॥१६३॥ भाषार्थ-शुपिर, विवर, रन्धू, छिद्र, गर्त और गह्वर (न०) ये सव गढ्ढे के नाम है। श्वभू, रस्य, पाताल, नरक (न०) ये चार नरक के नाम है इसमें अज्ञानी जीव पड़ते है ।। १६३ ॥ अद्भू भूरि भूयिष्ठ, वहिष्ठं बहुलं बहु । प्रचुरं नैकमात्यन्त्य, प्रभुतं प्राज्यपुष्कले ॥१६४॥ भाषार्थ-अदभ, भूरि, भूयिष्ठ, वदिष्ठ, बहुल, बहु, प्रचुर, नैक, आत्यन्त्य, प्रभूत, प्राज्य, पुष्कल (न०) ये सब बहुत नाम है ॥ १४ ॥ के भाषार्थ। - भावो भवश्च संसारः, संसरणं च संमृतिः। तत्वज्ञश्चतुरो धीरस्त्यजेज्जन्माजवं जवं ॥१९॥ भाषार्थ-भाव, भव, संसार (पु०) ससरण (न०) स. सृति (स्त्री) ये सब संसार के नाम हैं जो तत्वज्ञ अर्थात् वस्तु के स्वरूप के ज्ञाता है चतुर है तथा धीर है वे इस संसार को शीघ ही छोड़ देते है ॥१६॥ प्रोजस्व्यूर्जस्वितेजस्वी, तरस्वी च मनस्व्यपि । 'भास्करो भासुरः शूरः, प्रवीर सुभटो मतः॥१६६॥' भाषार्थ-प्रोजस्विन्, ऊर्जस्विन्. तेजस्विन्, तरस्विन्, मन- स्विन् (पुं० ) ये प्रतापी पुरुष के नाम है । भास्कर, भासुर, शूर, प्रवीर, सुभट (पु.) ये सब शूरवीर के नाम हैं ॥१६॥ उररीकृतमप्यूरी-कृतमङ्गीकृतं तथा । अस्तुकारोऽभ्युपगमे, सत्यकारः पणार्पणे ॥१९७|| भापार्थ-उररीकृत, ऊरीकृत, अगीकृत ( न०) तथा अ- स्तुकार (पुं० ) ये स्वीकार के नाम है। बाजार में किसी चीज को निश्चित करने के लिए जो साई देकर प्रतिज्ञा की जाती है उसे सत्यकार ( पु० ) कहते है ॥१६॥ तनुत्रं वर्म कवच-मावृति ईणवारणम् । कूर्पासं कञ्चुकं छत्र-मातपत्रोष्णपारणम् ॥१९८॥ भाषणर्थ-तनुत्र, वर्मन्, कवच (न० ) आवृति (स्त्री) बाणचारण (न ) ये सब वखतर के नाम है। कूर्पास, कचुक ५४ . नाम-माला- 44 - - . (न०) य दो अंगरखे के नाम हैं । छत्र, प्रातपत्र, उष्णवारण ( न० ) ये तीन छत्ते के नाम हैं ॥ १८ ॥ केश शिरोरुहं बालं, कचं चिकुरमीहयेत् । चूडापाशं च धम्मिल्लं, कबरी केशबन्धनम् ॥१६॥ भाषार्थ-केश, शिरोरुह, बाल, कच, चिकुर (पु.) ये सब बालों के नाम है । चूडापाश, धम्मिल्ल (पु०) कबरी (स्त्री) केशबन्धन ( न० ) ये सब स्त्री के चोटी के नाम हैं ॥ १६ ।। क्षेमं कल्याणमभयं, श्रेयो भद्रं च मङ्गलम् । भावकं भविकं भव्यं, कुशलं च शिवं तथा ॥२०॥ भाषार्थ-क्षेम, (पु० न०) कल्याण, अभय, श्रेयस् , भद्र, मगल, भावुक, भविक, कुशल और शिव (तीन ) ये सब कल्याण के नाम है ॥ २० ॥ वक्ता वाचस्पति यंत्र, ओता शक्रस्तथापि तो शब्दपारायणस्यान्तं, न गतौ तत्र के वयम् ॥२०१॥ भाषार्थ-शब्द का समूह इतना भारी है कि वृहस्पति कहने वाले और इन्द्र महाराज सुनने वाले हुए तो भी वे पार न पा- सके, फिर हम लोग कैसे पार पा सकते है ।। २०१॥ तथापि किञ्चित्कस्मैचित्, प्रतिबोधाय सूचितं । बोधयेत्कियदुक्तिज्ञं,मार्गज्ञःसहयाति किम् । २०२॥ भाषार्थ-तौ भी किन्हीं लोगों को समझाने के लिये कुछ शब्द कहे है जो कि सूचना मात्र है। क्याोक युक्ति को जानने - - ( भाषार्थ। वाले लोगों को सूचना मात्र ही दीजाती है । सच भी है कि मार्ग को जानने वाला साथ नहीं जाता किन्तु दूर से रास्ता बता देता है कि तुम्हारा मार्ग अमुकी २ ओर से गया है ।। २०३ ।। प्रमाणमकलकस्य, पूज्यपादस्य लक्षणम् । द्विसन्धानकवेः कान्छ, रत्नत्रयमपश्चिमम् ॥२०३।। भाषार्थ अकलंक भट्टका प्रमाण, पूज्यपाद स्वामी का लक्षण और द्विसन्धान काव्य के रचयिता कवि का उक्त काव्य ये तीनों अपूर्व ही रत्न है। भावार्थ---अकलंक देव ने जैसा प्रमाण का स्वरूप कहा है वैसा और किसी ने नहीं कहा तथा पूज्यपाद स्वामी ने जैसे वस्तुओं के लक्षण बनाए है वैसे लक्षण दूसरों ने नहीं बनाए और धन- अय कवि के बनाए हुए द्विसन्धान काव्य की तरह काव्य भी किसी ने नहीं बनाया, इस लिए हम लोगों के लिए ये तीन रत्न अपूर्व ही है क्योंकि पहले कभी सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक. चारित्र इन तीनों के सिवा किसी का नाम रत्नत्रय नहीं सुना था । कवे धनजस्येयं, सत्कवीनां शिरोमणे। प्रमाणं नाम-मालेति, श्लोकानाच शतद्वयम्॥२०४॥ भाषार्थ-बड़े २ कवियो में शिरोमणि धनञ्जय नाम के कवि की बनाई हुई यह नाम-माला, सर्व मान्य है इसके श्लोकोंकी संख्या २०० के प्रमाण है ।। २०४ ।। ब्रह्माणं समुपेत्य वेदनिनदव्याजात्तुषाराचल स्थानस्थावरमीश्वरं सुरनदीव्याजासथा केशवं । +
--
५१
नाम-माला
अप्यम्भोनिधिशायिनं जलनिधि ध्वालापंदेशादहो
पूत्कुर्वन्ति धनञ्जस्य चभिया शब्दाः समुत्पीड़िताः
भाषार्थ-यह एक भारी आश्चर्य की बात है कि
धनन्जय कषि के भय से पीड़ित होकर शब्द, वेदध्वनि के
चहाने से ब्रह्मा के पास, गंगा के शब्द के बहाने से महादेव के
पास तथा समुद्र के शब्दों के मिस से विष्णु भगवान के पास
माकर पुकार करते हैं-अपना दुःख कहते है।
इति श्रीमधनलयकविविरचित नाम-माला समाप्ता ।
भाषा। " ॥श्रीजिनाय नमः ॥ अथ अनेकार्थ नाम-माला । गम्भीरं रुचिरं चित्रं, विस्तीर्थप्रकाशकं । शाब्दं मनाक् प्रवक्ष्यामि, कानां हितकाम्यया॥२॥ भापार्थ-मै (धनञ्जय ) कवियों के हितकी इच्छासे विशद अर्थ को बताने वाले, गम्भीर, मनोहर तथा विचित्र शन्दों के समूह को कहता हूं ॥ १॥ अहात्पनाकिनी शम्भू, जिनावहत्तथागतौ। घेदसूयौँ विवस्वन्तौ, विष्णुरुद्रो वृषाकपी ॥ २ ॥ भाषार्थ-शम्भु शब्द, अर्हत् (निन ) और पिताकिन् महादेव ) इन दोनों को कहने वाला है जिन शब्द, अर्हत और तथागत (बुद्ध) का वाचक है विवस्वत शब्द, वेद और सूर्य का वाची है वृषाकपि शब्द, विष्णु और रुद्र का वाचक है ये सब सन्द पुल्लिंग होते हैं ॥ २॥ वैकुण्ठाविन्द्रगोविन्दा-वनन्तौ शेषशाणिौ । जीमूतौ करिकुत्कीलो, पर्जन्यौ शक्रवारिदौ ॥३॥ भाषार्थ-वैकुण्ठ शब्द, इन्द्र और गोविन्द का, अनन्त, शब्द, शेष (सर्प विशेष ) और शाङ्गिन् (महादेव ) का, तथा जी मूत शब्द, करिकुत् ( मेघ ) और कील ( कीली ) का और प- जन्य शब्द, शक और वारिट (मेघ ) का वाचक है ये सब शन्द पुल्लिंग हैं ॥ ३॥ - -- नाम-माला- ) वनमम्भसि कान्तारे, भुवनं विष्टपेऽसि । घृतं सर्पिषि पानीये, विषं हालाहले जले ॥४॥ भाषार्थ-वन ( न० ) शब्द, अम्भस् ( जल ) और का- न्तार (जगल) का, भुवन (न०) शब्द, विष्टप (ससार) और अर्णस ( जल ) का, घृत ( न० ) शब्द, सापष् (घी) और पानीय (जल) का तथा विप (न०) शब्द, हालाहल और जल का वाचक है।॥४॥ तल्पं दारेषु शययायां, ज्योतिश्चक्षुषि तारके। धवले सुन्दरे रामों, वामो वक्र मनोहरे ॥५॥ भाषार्थ--तल्प (न०) शब्द, दारा (स्त्री) और शय्या का, ज्योतिष् ( न० ) शब्द, चक्षुष और तारक ( तारा ) का, राम (पु०) शब्द, धवल ( उज्ज्वल ) और सुन्दर का, वाम (पु०.) शब्द वक्र (टेढ़े ) और मनोहर का वाचक है ॥ ५ ॥ नक्षत्रे मन्दिरे धिष्ण्यं, वसने गगनतम्बरं । परिधौ पादपे सालः, सिन्धुः सोतसि योषिति ॥६॥ भाषार्थ---विष्ण्य ( न० ) शब्द, नक्षत्र और मन्दिर का वाचक है लम्बर (न. ) शब्द, वसन ( वस्त्र ) और गगन (श्राकाश ) का, साल ( पु० न. ) शब्द, परिधि ( कोट ) और पादप ( वृक्ष ) का तथा सिन्धु (पु. ) शब्द, सोतस् (नदी) और योषित् ( स्त्री ) का वोची है ॥ ६ ॥ सारसः शकुनौ धूर्ते, केतनं दीधितौ ध्वजे । मयूखः कीलके दीप्तौ, पतङ्गः शलभे रवौ ॥ ७ ॥ ) .
भाषा।
.
-
-
भाषार्थ-:-सारस (पु० ) शब्द, शकुनि (पक्षी) और
धूर्त ( चालाक ) का, केतन ( न०.) शब्द, दीधिति (किरण )
और ध्वज ( पताका) का, मयूख (पु० ) शब्द, कीलक और
दीप्ति का, एवं पतंग (पु० ) शब्द, शलभ और रवि ( सूर्य ) का
वाची है ॥ ७॥
अञ्जनः कज्जले नागे, सारङ्गः पृषते गजे ।
सरलः पुगुणे वृक्षे, 'पुन्नागः सन्नरे तरौ ॥ ८॥
भाषार्थ-अञ्जन (पु० न० ) शब्द, कज्जल और नाग
( हाथी ) का, सारङ्ग (पु० ) शब्द, पृषत ( हिरण ) और गन
( हाथी ) का, सरल (पु०) शब्द प्रगुण ( सीधे ) और वृक्ष का,
व्था पुन्नाग (पु०) शब्द, सन्नर ( सज्जन ) और तरु ( वृक्ष-
विशेष ) का वाची है ॥८॥
पाञ्चजन्योऽनले शंखे, कम्वुः शंख मतगजे ।
' कस्वरो शुभवे द्युम्ने, स्थन्दनं शकटेऽम्युनि ॥ ६ ॥
भाषार्थ-
--पाञ्चजन्य (पु० न०) शब्द, अनल (अग्नि)
और शख का, कम्बु (पु० ) शब्द, शख और मतङ्गन ( हाथी )
का, कस्वर (पु०) शब्द, घुभव (देव) और द्युम्न ( धन ) का,
एवं स्यन्दन ( न०) शब्द, शकट (गाडी ) और अम्बु ( जल )
का वाची है।
अद्रि गिरिवनस्पत्योः, शिखरी तरुभूधूयोः
राजा चन्द्रमहीपत्योः, द्विजो दशनधिप्रयो॥१०॥
नाम-माला- , , १. । भाषार्थ-अद्रि, (पु.) शब्द, गिरि और वनस्पति का, शिखरिन् (पु० ) शब्द, तरु और भूधू ( पहाड़ ) का, राजन (पु० ) शब्द, चन्द्र और महीपति ( राजा ) का, एवं द्विज (पु०) शब्द, दशन ( दांत) और विप्र ( ब्राह्मण ) का वाची है ॥१०॥ मोचामरस्त्रियोः रम्भा, कदली ध्वजमोचयोः। अशोकः सुमनस्तर्वोः, सुमनाः सुरपुष्ययोः ॥११॥ भाषार्थ-रम्भा (स्त्री) शब्द, मोचा (केल ) और अमर- स्त्री ( देवागना ) का, कदली (स्त्री) शब्द, ध्वज और मोचा का, अशोक (पु.) शब्द, सुमनस् ( पुष्प ) और तरु का, एवं सुमनस ( पु०) शब्द, सुर ( देव ) और पुष्प का वाची है ॥११॥ मुक्तारजतयोस्तारो, भूरि भूयः सुवर्णयोः । पानीयदुग्धयोः क्षीरं, पयः सलिलदुग्धयोः ॥१२॥ भाषार्थ--- तार ( पु० ) शब्द, मुक्ता और रजत ( चांदी ) का, भूरि ( अ० ) शब्द, भूयस् ( बाहुल्य ) और सुवर्ण का, तीर ( न० ) शब्द, पानीय और दुग्ध का एवं पयस् ( न० ) शब्द, सलिल ( जल ) और दुग्ध का वाची है ।। १२ ॥ कालप्रकर्षयोः काष्ठा, कोटि संख्याप्रकर्षयो। रन्धूसंश्लेषयोः सन्धिः, सिन्धुनंदसमुद्रयोः ॥१३॥ भाषार्थ-काष्ठा (स्त्री ) शब्द, काल और प्रकर्ष (बड़प्पन) को, कोटि (स्त्री) शब्द, सख्या और प्रकार को, सन्धि ( स्त्री) शब्द, रन्धू ( छिद्र ) और संश्लेप (मिलाप ) को तथा सिन्धु (पु०) आन्द, नद और समुद्र को कहता है ।। १३ ॥ .
भाषार्थ। * निषेधदुःखयोर्याधा, व्यामोहो मूर्खमौढ्ययोः । कौपीनाकार्ययोर्गुह्यं, कीलालं रुधिराम्भसोः ॥१४॥ भाषार्थ -बाधा (स्त्री) शब्द, निषेध और दुःख का, व्या- मोह (पु०) शब्द, मूर्ख और मौढय को, गुह्य (न०) शन्द, कोपीन ( लंगोटी ) और अकार्य (पाप) को, तथा कीलाल (न) शब्द, रुधिर और अम्भस को कहता है ॥ १४ ॥ मौल्यसत्कारयोरघों, जात्यः श्रेष्ठकुलीनयोः । मेघवत्सरयोरब्द-स्ताक्ष्यों हयगरुन्मतोः ॥ १५ ॥ भाषार्थ--अब्द (पुं०) शब्द, मेघ और वत्सर (वर्ष ) को, जात्य (पुं०) शब्द, श्रेष्ठ और कुलीन को, अर्घ (पुं०) शब्द, मोत्य (कीमत) और सत्कार को, तथा तार्य (पुं०) शब्द, हय (घोड़ा), और गरुत्मत् (गरुड़ ) को कहता है ॥ १५॥ स्तब्धतास्थूणमोः स्तम्भ-श्चर्चा चिन्ता वितर्कयोः । हरकीलकयोः स्थाणुः, स्वैरः स्वच्छन्दमन्दयोः॥१६ भाषार्थ-स्तम्भ (पु. ) शब्द, स्तब्धता (धीरता ) और स्थूण ( थम्भा) को, चर्चा (स्त्री) शब्द, चिन्ता और वितर्क ( विचार ) को तथा स्थाणु (पुं० ) शब्द, हर ( महादेव ) और कीलक (कीला ) को और स्वैर (पु०) शब्द, स्वच्छन्द (स्वतन्त्र) और मन्द ( धीर ) को कहता है ॥ १६ ॥ शङ्कुस्संकीर्णविवरे, पलालाग्नौ च कीलके संख्यायां काननोद्भूते, वह्रौ दावो दवोऽपि च॥१७॥ - नाम-माता- " C भाषार्थ-शंकु (पु० ) शब्द, सकीर्णविवर (छोटा छिद्र) पलालाग्नि ( भूसे की आग ) कीलक और संख्या को कहता है। दाव और दव (पु.) ये दोनों शब्द, जंगल में लगी हुई अग्नि अर्थात् दमार के वाचक हैं ॥ १७ ।। कीनाशः कृपणे भृत्ये, कृनान्ते पिशिताशिनि । तथा पुण्यजनान् प्राहुः, सज्जनान् राक्षसानपि॥१८॥ भाषार्थ-कीनाश (पु.) शब्द, कृपण, भृत्य, कृतान्त ( यम ) पिशिताशिन् ( मास भक्षी ) को कहता है तथा पुण्य- जनों अर्थात् पुण्यात्मा पुरुषों को, सज्जनोंको और राक्षसों को भी कहता है ॥ १८॥ विरोचनो रवौ चन्द्रे, दनुसूनौ हुताशने । हंसो नारायणे वृध्ने, यतावश्वे सितच्छदे ॥ १६ ॥ भाषार्थ--विरोचन ( पु० न०) शब्द, रवि, चन्द्र, दनुसूनु, ( प्रद्युम्न ) और हुताशन (अग्नि ) को कहता है । हंस (पु० शब्द, नारायण, बृध्न ( सूर्य ) यति (साधु ) अश्व (घोड़ा) और सितच्छद ( कमल ) को कहता है ॥ १६ ॥ सोमश्चन्द्रोऽमृतं सोमः, सोमो राजा युगादिभूः सोमः प्रताननीभेदः सोमः पौलस्त्यदिक्पतिः॥ भाषार्थ-सोम (पु०) शब्द, चन्द्रमा, अमृत, राजा, युगा- दिभु, (ब्रह्मा ) और लताविशेष तथा पौलस्त्यदिक्पति (वरुण) को कहता है ॥ २०॥ - ( + । भाषार्थ। १३ 1 अजो विधिरजो विष्णु-रजा शम्भुरजस्तमः ।, अजस्त्रैवार्षिकी ब्रीहि-रजो रामपितामहः ॥ २१ ॥ भाषार्थ-अन (पु०) शब्द, विधि ( ब्रह्मा ) विष्णु, शम्भु, ( महादेव ) अन्धकार, और तीनवर्षकोशालि को कहता है तथा रामचन्द्र जी के पितामह (बाबा) को भी अज कहते है ॥२१॥ शुद्धेऽनुपहते बन्हौ, ब्राह्मणे सचिवोत्तमे । आषाढ़ेऽध्यात्मसंवित्तौ, ब्रह्मचर्य शुचिर्मता-॥२२॥ भाषार्थ-शुचि (स्त्री ) शब्द के आठ अर्थ है । वे ये है शुद्ध, अनुपहत, बाह्नि, ब्राह्मण, उत्तममन्त्री, श्राषाढ़ ( महीना) अध्यात्मज्ञान, और ब्रह्मचर्य ॥ २२ ॥ अर्थोऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु । भावः पदार्थचेष्टात्मसत्ताभिप्रायजन्मसु ॥२३॥ भाषार्थ-अर्थ (पु०) शब्द के पांच अर्थ है वे, अभिधेय ( वाच्य ) रे ( धन ) वस्तु, प्रयोजन, श्रोर निवृत्ति, ये हैं । भाव (पु०) शब्द के, छः अर्थ हैं वे, पदार्थ, चेष्टा, आत्मा, सत्ता, अभि- प्राय और जन्म ( उत्पत्ति ) ये हैं ॥ २३ ॥ प्रायो भूमोपमार्तक्यप्रभृत्यन्ननिवृत्तिषु । अन्तः पदार्थसामीप्यधर्मसत्वव्यतीतिषु ॥२४॥ भाषार्थ-प्रायस् ( अ०) शब्द के छः अर्थ हैं वे 'भूमन् ( बाहुल्य ,) उपमा, प्रातस्य, प्रभृति ( आदि ), अन्न और निवृत्ति, ये है अन्त (पु.) शब्द, पदार्थ, सामीप्य, धर्म, सत्व ( बल ) व्य- तीति (अखार ) इन पांच अर्थों को कहता है ।। २४ ॥
नाम-माला- के छह अक्षायूते विरुथाङ्गे, नयनादौ विभीसके। सारः श्रेष्ठे बल वित्ते, केशे जलचरे स्थिरे ॥२५॥ भाषार्थ-अक्ष (पु.) शब्द, के द्यूत ( जुवा ) विरुथाङ्क ( सेना के अंग-सिपाही वगैरा ) नयन और अादि पद से धुर, व्यवहार. आदि तथा विभीतक ( भयानक ) को कहता है। सार, (पु०) शब्द अर्थ है श्रेष्ठ, बल, वित्त, केश, जलचर और स्थिर ॥ २५ ॥ वाचि वारि पशौ भूमौ, दिशि लोम्नि पचौ दिवि ।। विशिखे दीधितौ दृष्टा-कादशसु गौमतः ॥२६॥ भाषार्थ-गो (पु० स्त्री०) शब्द के ग्यारह अर्थ है वे ये ह वाच ( बोली ) वार् ( पानी ) पशु, भूमि, दिश, लोमन् (रोम) पवि ( वजू ) ( आकाश ) विशिख (बाण ) दाधिति (किरण ) और दृष्टि ॥ २७ ॥ चन्द्रे सूर्ये यमे विष्णौ, वासवे दर्दुरे हथे। मृगेन्द्रे वानरे वायौ, दशस्वपि हरिः स्मृतः ॥२७॥ भाषार्थ-हरि (पु० ) शब्द का प्रयोग इन दश अर्थों में किया जाता है चन्द्र, सूर्य, यम, विष्णु, वासव ( इन्द्र ) दर्दुर, (मेंढ़क ) हय ( घोड़ा ) मृगेन्द्र (सिंह) वानर ( वन्दर ) और कायु ॥ २७॥ - पने करिकरप्रान्ते, व्योम्नि खड्गफले गदे । वायभायडमुखे तीर्थे जले पुष्कर मष्टसु ॥ २८ ॥ ( -- - भाषार्थ। १५ भोपार्थ-पुष्कर (न०) शब्द के आठ अर्थ हैं वे पदम ( कमल ), हाथी की सड़ के अग्रभाग वाली अगुली, व्योमन (श्राकाश), तलवार की मूठ, गद, वाद्यभाण्डमुख. तीर्थ और जल ये हैं ॥ २८॥ शृङ्गारादौ कषायादौ, घृतादौ च विषे जले । निर्यासे पारदे रोगे, वीर्येऽपि रस इष्यते ॥३९॥ भाषार्थ-शंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत ये पाठ काव्य गत रस हैं इनमें, कषाय तिक्त, कटुक, आम्ल, मिष्ट, ये पाच रस पुद्गल के गुण हैं इनमें, तथा घी, लवण, दधि, दुग्ध, तैल, मिठाई ये छह भोजन के स्वाद बढ़ाने वाले रस हैं इनमें, और विष, जल, निर्यास, पारद ( पारा) राग, वीर्य, इनमें रस ( पु० ) शब्द का प्रयोग होता है ॥ २६॥ तीर्थ प्रवचने पात्रे, लब्धाम्नाये विदाम्बरे । पुण्यारण्ये जलोत्तारे, महासत्ये महामुनी ॥३०॥ भाषार्थ-तीर्थ ( न० पु०) शब्द, प्रवचन ( आगम') पात्र ( वर्तन ) लब्धाम्नाय-महत्व-को जैसे कि इस वक्त, महावीर स्वामी की श्राम्नाय है इसलिये उनका तीर्थ कहा जाता है। तथा विदाम्बर (पण्डित) पुण्यारण्य (शिखर सम्मेद आदि) जलोत्तार ( सीढ़ी ) महासत्य, और महामुनि को कहता है ॥ ३० ॥ धातुः पञ्चसु लोहेषु, शरीरस्थ रसादिषु । पृथिव्यादिचतुष्के च, स्वभावे प्रकृतावपि ॥३१॥ भाषार्थ-धान्नु (पुं० ) शब्द के पांच अर्थ है । लोहादि में . ६६ नाम-माला ५ (१) जैसे चांदी, सोना वगैरा । शरीर के रसादि (२) जैसे रस, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा, हड्डी, शुक्र (वार्य) । पृथिवी श्रादि (३) जैसे पृथिवी, अप् , तेज, वायु । तथा स्वभाव (४) और प्रकृति । प्रधानशृङ्गलांगूलभूषापुण्ड्रप्रभावना । ध्वजलक्ष्मतुरङ्गेषु, ललामो नवसु स्मृतः ॥३३ ।। भाषार्थ-प्रधान, शृङ्ग (सींग ) लागूल (पूछ ), भूषा (भूषण ), पुण्ड ( सांप ), प्रभावना, ध्वज, लक्ष्मन, और तुरंग ( घोड़ा ) ये नौ ललाम (पु० ) शब्द के अर्थ हैं अर्थात् ललाम शब्द इन नौ अर्थ को कहता है ॥ ३२ ॥ आकृतावक्षरे रूपे, ब्राम्हणादिषु जातिषु । माल्यानुलेपने चैव, वर्णः षट्मु निगद्यते ॥३३॥ भाषार्थ-प्राकृति अक्षर ( अ आ आदि ), रूप, (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) जाति, माल्य (माला ) और अनुलेपन (उप- टना ) ये छह, वर्ण (पुं० ) शब्द के अर्थ हैं ॥३३॥ आकारादावुदात्तादौ, पहजादौ निस्वने स्वरः । समयाधारसिद्वान्त, कालेषु समयः स्मृतः ॥३४॥ भाषार्थ-श्रा आदि, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि षड्ज अादि (निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत, पञ्चम ) निस्वन ये सब स्वर (पु०) शब्द के अर्थ है समय ( संकेत ) श्राचार, सिद्धान्त ( आगम) और काल ये सब समय (पु०) शब्द के अर्थ है ॥ ३४ ॥ C १
भाषार्थ।
६७
AN
,
तन्त्रं प्रधाने सिद्धान्ते, सैन्यं तन्तौ परिच्छिदें।
सत्वमोजसि सत्ताया, मुत्साहे स्थम्नि जन्तुषु॥३५॥
भाषार्थ--तन्त्र (न०) शब्द के प्रधान, सिद्धान्त, सैन्य
(सेना ), तन्तु और परिच्छिद ( परिग्रह ) ये पांच अर्थ है सत्व
(न० ) शब्द के, भोजस् (तेज), सत्ता ( अस्तित्व ) 'उत्साह,
स्थेमन ( स्थिर) और जन्तु ये पांच अर्थ हैं ॥ ३५ ॥
,रूपादौ तन्तुषु ज्याया-मप्रधाने नये गुणः ।
ज्ञानचारित्रमोक्षात्म-श्रुतिषु ब्रह्मवाग्वरा ॥३६॥
भाषार्थ--रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि, तन्तु, ज्या, धनुष्
की डोरी-तथा अप्रधान-गौण-और नय इन पाच अर्थों में गुण शब्द
का प्रयोग होता है वह पुल्लिंग है । ज्ञान, चारित्र, मोक्ष, आत्मा
और श्रुति (वेद) इन पाच अर्थों में ब्रह्मवाच् (स्त्री ) शब्द का
प्रयोग होता है ।। ३६ ॥
अवकाशे चणे वस्त्रे, वहिोंगे व्यतिमे।
मध्येऽन्तःकरणे रन्ध्र, विशेष विरहेऽन्तरं ॥ ३७॥
भाषार्थ---अवकाश (छुट्टी) क्षण, वस्त्र, वहियोग, व्यति-
क्रम, मध्य, अन्तःकरण ( मन ) रन्ध, विशेप, और विरह इन दश
अर्थों में अन्तर ( न०) शब्द का प्रयोग होता है ॥ ३७ ॥
हेतौ निदर्शने प्रश्ने, स्तुतौ कण्ठसमीकृतौ ।
आनन्तर्येऽधिकारार्थे, माङ्गल्ये चाथ इष्यते ॥३८॥
C नाम-माला- , .भाषार्थ-हेतु, निदर्शन ( दृष्टान्त ) प्रश्न, स्तुति, कण्ठस- मीकृति अर्थात् किसी पुस्तक का प्रारम्भ आनन्तर्य ( अव्यवहि- तता), अधिकार और मगल इन आठ अर्थों में अथ ( अ ) शब्द का प्रयोग होता है |॥ ३८ ॥ हेतावेवंप्रकारादौ, व्यवच्छेदे विपर्यये । प्रादुर्भावे लमाप्तौ च, इतिशब्दः प्रकीर्तितः॥३९॥ भाषार्थ--हेतु, एवंप्रकार आदि, व्यवच्छेद, विपर्यय, प्रादु- भर्भाव, ( उत्पत्ति ) समाप्ति इन अर्थों में इति (१० ) शब्द का प्रयोग होता है ॥ ३६॥ धर्मो धनुष्यहिंतादा वुत्पादादाक्ये नये । द्रव्य क्रियाश्रये वित्ते, जीवादी दारुवैकृते ॥४०॥ भाषार्थ----धनुप्, अहिसा, सत्य श्रादि, उत्पाद, व्यय, धौम्य, श्रय (विधि ) और नय इन अर्थों में धर्म शब्द का प्रयोग होता है । क्रियाश्रय अर्थात् जिसमें क्रिया पाई जाय, वित्त ( धन ) जीर्व, अजीव और काठ से बनाए हुए मंगल द्रव्य आदि इन अर्थों में द्रव्य ( न: ) शब्द का प्रयोग होता है ॥ ४० ॥ मूर्तिमत्तु पदार्थेषु, संसारिण्यपि पुद्गलः । अकर्मकमनोकर्म-जातिभेदेषु वर्गणा ॥ ४१ ।।. भाषार्थ--मूर्तिवाले पदार्थ और संसारी जीवों में पुद्गल (पु०) शब्द का प्रयोग होता है। अकर्म अर्थात् कर्म से भिन्न पुद्गल स्कन्ध, कर्म ज्ञानावारणादि, नोकर्म औदारिक, वैक्रियिक भाषार्थ । , - अहारक ये तीन शरीर और छह पर्याप्ति ( श्राहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छास, भाषा और मन ) रूप होने वाले पुद्गल, और जातिभेद इन में वर्गणा ( स्त्री) शब्द का प्रयोग होता है ॥४१॥ ऐश्वर्यस्थ समग्रस्थ, वीर्यस्थ यशसः श्रियः । वैराग्यस्यावयोधस्य, षण्णां भग इति स्मृतः॥४२॥ भाषार्थ-सम्पूर्ण ऐश्वर्य, वीर्य, यशस्, श्री, वैराग्य अववोध इन छह को भग ( पुं० ) कहते हैं ॥ ४२ ॥ पाहुः कैवल्यमहिन्त्ये, विविक्ते निर्वृतावपि । लब्धिः केवलवोधादा-विष्टाप्तौ नियतौ श्रियां ४३ भाषार्थ-कैवल्य (न०) शब्द, पार्हन्त्य अर्थात् अर्हन्त भगवान की अनन्त चतुष्टयरूप लक्ष्मीको, विविक्त-निर्जन स्थानको, और निवृति ( मोक्ष ) को कहता है। केवलज्ञान, केवल दर्शन आदि,' इष्टाप्ति अर्थात् इष्ट वस्तुकी प्राप्ति, नियति (कर्म) श्री ( लक्ष्मी-शोभा) इन अथॉमें लन्धि (स्त्री) शब्द का प्रयोग होता है ।। ४३ ॥ अनेकान्ते च विद्यादौ, स्यान्निपातः शुभे क्वचित् । दर्शनादौ मणौ रत्न, भव्धः शस्ते प्रसेत्स्यति ॥४४|| भाषार्थ--स्यात् ( अ ) शब्द का प्रयोग, अनेकान्त और विद्या आदि में होता है अर्थात स्यात् शब्द अनेकान्त जोकि जैनियोंने ही माना है जिसका अर्थ होता है कि सब पदार्थ अनेक धर्मवाले हैं, उसको और विद्या आदि को भी कहता है तथा कहीं २ शुभ अर्थ में भी स्यात् शब्द का प्रयोग होता है। 'सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, ७० नाम-माला- , सम्यकचारित्र और मणि इनमें रत्न (न०) शब्द का प्रयोग होता है। भव्य (पुं० ) शब्द का प्रयोग, शस्त (समीचीन अर्थात् प्रशसा योग्य वस्तु ) में और प्रसेत्स्यत् ( मोक्ष की योग्यता रखने वाले और सिद्ध होने वाले जीव ) में होता है ।। ४४ ॥ परमात्मा जिने सिद्धे, परमेष्ट्यहंदादिषु सिद्धः सिद्धनिषद्याया-महत्सिद्धश्रियामपि॥४५॥ भाषार्थ-जिन, सिद्ध और अहंत आदि पंच परमेष्ठी इन अर्थों में परमात्मन् (पुं० ) शब्द का प्रयोग किया जाता है। सिद्ध ( पुं०) शब्द का प्रयोग, सिद्धनिषद्या अर्थात् सिद्धों के ठहरनेके स्थान में और अहत तथा सिद्ध की लक्ष्मी में होता है । अहमिडमितिद्वाव-प्यहत्सिद्धाभिधायिनौ । अहंदादीनपि प्राहुः, शरणोत्तममङ्गलान् ॥४६॥ भाषार्थ-अर्हत और सिद्ध ये दोनों शब्द अर्हत् तथा सिद्ध के वाची है आचार्य लोगों ने अर्हत् आदि परमेष्ठिों को . शरण, उत्तम और मंगलरूप कहा है ॥ ४६ ॥ ) इति कविशिरोमणि श्रीमद्धनञ्जयकविविरचिता मनेकार्थ नाम-माला समाप्ता। -- Printed by Pandya Gulab Shankar, at the Tara Printing Works, Benares.
-- अनुक्रमणिका। ११ / अंगना श्लोक। शब्द श्लोक । शब्द शब्द श्लोक! प्रा. अमृतोद्भव २५ अंशु अन्तेवासिन् ४ अपारवार २५ अचिष् अवनि अकूपार २५ अर्यमन् मचल ८ अर्णव २६ अर्क अद्रि अनुग २६ अब्ज ५१ अधिप १० अनुजीविनू २६ प्रश्व ५२ अनोकुह ११ | अनुचर २६ अर्वन् अंहिय ३० अम्वर ५३ अग ११ । अवला ३१ अभ्र ५३ अटवी १३ अभिसारिका ३५ अन्तरिक्ष ५३ मरण्य १३ असुपति ३७ अदितिसुन ५६ भरण्यानीतर १४ अपघन ३८ अमर ५६ अम्भस् १५ अङ्ग ३८ अप्सरोनाथ ५६ अम्बु १५ अपत्य ३६ अस्चर ६१ अर्णस अनिल भप १५ यवरज ४२ मंजनात्मज દર अम्बुधि १६ अनुज ४३ अग्नि" अनिमिष १७ अग्रज ४३ अनल अन १८ अराति अनलसुनु ६६ अनभ्राट १८ मित्र प्रज ७२ प्रशनि १६ अरि अनन्तात्मन् ७३ अरविन्द २१ असेव्य ४४ अधोक्षज ७५ प्रब्धि २५ । अहित अनन्यज १५ अर्भक '६२ ( २ ) १५४ १५६ अनीक १२५ १२५ / अन्वीन १२८ । अन्वित अनेकप श्लोक । शब्द शब्द श्लोक शब्द श्लोक। अ. अंशुक ११५ अर्जुन १४६ मकाय ७७ काग्रज ११६ अवद्य १५२ अस्त्रशर अन्त्यकाश्यप११९ अधम अन्त'करण ८१ अङ्गराग ११६ अवदान १५५ अलि c૨ अमृत १२३ | अग्रिमम् ११७ अस्त्र ८३ अनहःपूर्ण १२४ अन्हाय असि ८५ अन्त्य १२3 अलम् १५६ अक्षौहिणी. ८६ ८६ अन्वय प्रमा १६० अन्ववय्य १६४ अजि ८७ | श्रहि १६४ अद्य १३ अध्वन् १६४ अष्टापद ६ अंहस् १३१ अप्राज्ञ १८८ अष्टपातू ९० अवसथ १३३ अहंकृत १६६ अर्जुन ६३ अम्बुजानन १३७ अधम १७० अलकानिलय ६६ अश्यास १७२ अक्षि ६ | अभ्यर्ण १४१ मत्यन्त १७२ अपाङ्ग ६६ | अविदूर १४र अमल १७३ अंश १४२ अद्भुत १७३ अधर • १०१ अनन्तर १४२ | अहो ૨ઉર अंघ्रि १४३ । अभियोग १७४ मनुकंपा ११० मन्तक ६४५ वसान १७५ अनुक्रोश ११० अजातरिपु १४७ अनुरहस १७५ अभिरुप १४८. अभिलाषुक. १७६ महत् ११४ अलिप्रभ १४८ परम् अम्बर ११५ ग्रन्धकार १४६ | अभिराम १७६ १४१ । प्रत्यर्थ १०० | अविलम्ब १०३ | अर्जुन १११ / असित ( ३ ) म. १९८ उ. २ १९२ | आचार्य श्लोक शब्द श्लोक। शब्द शब्द श्लोक। माखण्डल ५७ माज्ञा १५५ आत्यान्तक १६१ अवस्याय १८० ६१ आशा प्रालम्च अवसर्प १८१ माशुशुक्षणि ६४ १६३ आश्चर्य १०३ १८२ आत्मभू अत्यन्ताय १७३ ८१ आशु अकस्मात् १८२ / आस्वनित मानन्त्य श्रजर्य १८७ ८३ १६४ मायुध यावृति अश्यास १८८ समस्य श्रातपत्र अभीक्ष्ण १८८ १६८ आनन अलीक १८६ मानन्द १०६ अखिल प्राशय ११० उभय १११ उर्वी अनारत मजस्त्र १६२ प्रास्थाना- उर्वरा अन्वह ૨૬૨ धिपति ११२ उपत्यका अङ्गीकृत १६७ | आसन्दी ११३ उल्का १६ अस्तुंकार १९७ | आभरण ११६ उत्पल ૨૨ अभय प्राज्य १२३ / उत्कलिका ૨૭ मा. आम्नाय १२५ । उछाल ४० आगार १.३ उद्वह नागम प्रावास उत्तानाय श्राकालिकी १६ आस्पद १३३ उच्ण मापगा श्रावलि २७ त्रालय १३४ | उर्जस् ४६ माया १३६ उडु प्रात्मन ३९ आसन्न १४१ आताम्र १५० उमापति ७० माकाश ५३ | आदेश १५५ उपेन्द्र २०० ૨૭ ४ ૨૪ ३४ आलस्य माली ( ४ ) उद्म ए. १०४ कृषि १२३ | ऋत शब्द श्लोक । शब्द श्लोक । शब्द. श्लोक उष्णवारण १६८ ईशान १० उष्ट्र ६.१ ईशत १० उत्तराशापति ६६ ऊर्जस्विन् १९६ उरस १०२ ऊरीकृत १६७ / एकपत्नी ३४ उदर १०२ ऋ. एकपिङ्गल ३५ उत्तमांग एतस् १३२ उत्सव १०९ ऋत ४८ । एकागारिक १७० उदश्चित १८२ ऐ. उरग १२६ इ. ऐरावणाधिप ५६ उपमा १३७ ऐश्वाकु ११६ इला ६ उत्प्रेक्षा १३६ श्रो १० उच्चावच्छ १५६ इन १० अोष्ठ १०१ २१ प्रोघ १२५ १४० उच्छित १५६ प्रोजस्विन १६६ इष्ट उद्धत इन्दु श्रो. उद्रीय १७० इन ५० औषधीश्वर ४७ उद्धर ५७ क. उपल १७१ | इन्द्रा ७६ कृतान्त उद्यम ७८ कु उद्याग इभ ८८ कुम्भिनी उत्साह १७४ । इरा (१२ उन १७६ | इन्दुमौलि ६९ १३ उत्कट १८६ कानन १३ १० कान्तार १३ १५६ इन्दीवर १५६ - इष्टा ३७ प्रोजस्विन १६६ . १७० । इन्द्र १७४ | इषु १७४ १२१ / कपि ८ कक्ष ई. र उररीकृत १६७ ईश्वर ( ५ ) ५ २० ४७ / केशव । ] श्लोक। श्लोक। शब्द श्लोक.। शब्द ७० कपर्दिन क. किरण ४५ किरात १४ कौमुदिन क क १५ कुमुदप्रिय ४७ कपुत्र ७३ ७४ कुश १५ कलाभृत् ४७ कृष्ण कर्दम कान्तिमतू 'कमल २७ कुमुदविप्रिय. ५१ फेशिसूदन ७५ कोकनद २१ | कानीन ५१ काम ७७ २२ | कौशिक कुवलय ७७ ६० कायरहित कुमुद २२ काष्ठा ६१ कण कैरव २२ ककुप् ६१ काण्ड कल्लोल २७ काष्ठापाल ६१ | कार्मुक किंकर २६ ककुप्पाल ६१ कोदण्डक ७६ कामनी ककुबगज ६१ कुसुम कामुकी ३१ काष्ठागज ८१ ५३ कुल्या ११ / कन्दर्प काष्ठाम्बर कलन ३२ ककुवम्बर. १३ | कृशानु कान्ता ८५ ६५ | कौक्षयक कुलटा ३५ कृशानुसुनु ६६ कृपाण कामुकी ३६ कार्तिकेय . ६७ करनाल ८५ ८७ कदन कान्त कामिन् ३७ क्रौञ्चभेदिन् ६७ | कलह ८७ कामुक ३७ कार्तिकेयपितृ ६८ कारन 45 काय ३८० कुमारपितृ ६८ कुम्भिन् फलेवर ३६ कौंचभेदिपितृ ८ करेणु कनीय રૂ कपालिन् केशरिन् ३० ६१ / कर्ण *३२ ६१ केतु ३६ कुमार ६० Go ( ६ ) 'क. - 3 १४७ १४८ १४. कादम्बरी ६५ | कालशेय - शब्द श्लोक। श्लोक। शब्द श्लोक। कृपा ११० । कुरुशत्रु १४७ कण्ठीरव करुणा ११० कीचकशत्रु १४७ क्रोड़ ११ फेवलिन् ११४ कौन्तेय करभ ९१ काश्यप १.५ कौरव्य कौलेयक ६२ कुंकुम ११८ कृष्ण १४८ कुक्कुर ६२ कस्तूरि ११८ काल १४८ काञ्चन ६३ कपूर ११७ | कार्मुकिन् १४४ कनक ६३ । काञ्ची १२० / काली १५२ फलधौत ६३ कटिसूत्र १२० कल्माषी १५२. कार्तस्वर कादम्बरी १२१ कौसुम ९५२ कस्वर १२३ | किञ्जल्क १५२ कुबेर कुल कर्ण १५३ केकिन किञ्जल्क १२६ १५३ कटाक्ष ह कपालिन् केकर कठोर १२७ १५६ 88 करण किंवदन्ती १५६ फराङ्गुलि १०० १३० किल्विष १०० कण्ठ १३२ कर्कश १५६ कुत्ति १०२ कक्षा ९३७ । काहल १५७ कुच (१०२ / कदम्बक १४० कोमल १५७ १०३ | केशवाग्रज १४३ | कीर्ति १५४ १४३ / कुब्ज १६०० क १०४ | कर्णशूलिन् १४५ किञ्चित केंकृत १०७ किरीटिन् १५५ कश्चिन १५८ कोप १०१ | काल १५५ कृतिन् ऋोध १०६ । कृतान्त ५४५ कुशलिन् इ5 १२५ / कलक १३१ / कठिन १०१ / कलिल १०३ / कपिध्वज ( ७ ) ८ ~ श्लोक। श्लोक । शब्द श्लोक। क. केशबन्धन १६६ | गिरि कुशल २०० | गोलागुल १२ कोविद - १८६ कृच्छ १३ गहन कितव १६६ गोध २०० कल्याण कद्वद गहिनी कौतुक ૨૦ गृह गणिका ३५ ३५ खला कीनाश गभस्ति ४५ कृपण गो ४५ कान्त ५३ गृहाधिप कमन गगन ५३ खग ७८ कमनीय खङ्ग ८५ गीर्वाणेश ५८ कृति १०६ खेद कदली गन्धवाह १०६ १८४ -१३० गुह ६६ १३४ गिरीश कष्ट १६० खात १३४ गुहपितृ ख्याति कलह ११ १५५ | गंगा ७१ कन्यापति १६२ खलु १५६ गोनिनी कवच १७३ | गोविन्द कूर्पास १९८ ११५ प्रन्य गज ८८ १६ बाहरी ५ ग्रामशार्दूत २ कवरी २६६ । गो । गुलिका १७३ १७४ | खरदण्ड १७६ १७६ / खल १७८/ख १७८ खेचर १७८ १७८ १८३ खूत्कृत गोत्रशत्रु १८३ ख कीचक १८९ खेत ६८ J AM ११८ खलु ८२ १२८ खंड . 4 कंचुक ( ८ ) a - १०१ गह्वर १२६ / घृष्टि १२६ । धारण शब्द श्लोक । शब्द श्लोक। शब्द श्लोक । ग. गहन १८६ | चेतस ८१ गर्त १६३ / चिन्ह १०१ ८४ गल ग्रीवा १६३ चम् गिर घ. १०४ चमूर गर्ज १०५ घन १६ चतुष गौतम ११६ घनाघन १८ | चलन १०३ गुणि ११६ घन म चरण १०३ ६१ | चेल गरुड़ ११७ गरुत्मत् १०२ । चीर ११७ गेह १३३ घनसार ११८ । चक्रांग १२६ १३३ गृह घोष १६५ | चतुष्पाद १६२ घन गोपुर १३५ १७१ चतुर १६६. घोर गुरुस्थान १३७ १८६ चाटुकृत् १६६ गाण्डीविन् १४४ च. चौरकागारिक १७० १४१ चला १७३ गौरी १७३ गुणावलि १५५ चन्द्रमस चारु १७६ गो १६२ चन्द्र ४७ चित्तहारि १८० गङ्गा १६५ चक्रवाकबन्धु ५१ चेतोहारि , १८० गोमंडल १६५ সুত্র ६३ चार १८२ गोत्र १६७ चलपुत्र १८१ गर्वित १६८ चतुर्मुख ७२ विराय . १८२ गूढ़नर १७१. चक्रधर ७६ "चिन्ह १८३ गृध्न १७६ चाप ७६ चिकुर -गुणनिका १५८ :चित्त ८१ '-चूड़ापाश । १९६ ३१ / चौद्य ३३ / चित्र १५१ / चंडी ८ ६३ | चर , ( ६ ) १७ ३ श्लोक। शब्द श्लोक । शब्द श्लोक। जव चरवत् १८२ जातवेदःसुनु १६ जाह्नवी ७१ छ. जीवा ८२ भष १७ १३८ छल ८२ ज्या झषकेतु ८४ १३६ छद्मन् ६.२ १६१ / जिह्वाप झकृत. १०७ छिद्र १६३ जातरूप झाकृत १०७ १६८ जनपद ६७ झटिति १७६ जनान्त त जठर १०२ तपस्विन् ३ जगती जघन १०३ तापस s १५ १०३ जानु तट है जीवन १५ ६ १०३ | तटी जीमत जन्हु १८ जगत्पति ११३ तरु ११ जाया ३२ जगतू १५ जनी ૩.૨ जननी जिन १८ जनक जित्या ज्येष्ठ '२० १४२ तामरस ज्योतिष तरङ्गिणी जाङ्गल ५५ ' जनोदाहरण १५४ तीर २६ १५८ जरठ जवन तट २६ जवनपुत्र ३१ जवनसख ६४ तनु ज्वलन जात १६६ तुक ३६ जातवेदस् जातमय १७२ "ज्वलनसुनु ६४ जीर्ण १७४ निय १०३ तोय १०३ | तिमि १९५० तडित ३ ३८ । ज्यायसु ४६ । जिष्णु १४३ १८५ तनूदरी ६३ ६३ / जीर्ण ४ जड़ १६७ तांक ( १० ) श्लोक। १३७ द्वैत १४० ४६ १४ .. २४ ३२ ३३ in v w or ar so MO or m my mr my m my तर श्लोक। शन्द शब्द श्लोका शब्द त तुला तंजस् तति दीक्षित ४५ तमस तारा १४६ दरीभृत् तरणि तिमिर ४६ १४६ दन्त तम तपन १४६ द्रुम तिग्म तुङ्ग १५८ दुर्ग तमोरि त्यगातन ५० १९० दस्यु तिमिरारि तस्कर १७० द्विरेफ तूर्ण ५२ तुरग १७७ दारा तुरङ्गम ५२ १७७ दयिता तडित्वत् ५९ तुषार १८० दूती तुराषा १८० दारिका तनूनपात तुषारकर १८५ दासी तनूनपात्सुनु ६६ तुहिनकर १८५ दयित तोमर ताल १८ तरवारि ८५ तीव्र तपनीय ६४ तिग्म १८६ द्विष तुलाकोटि १०७ तरस्विन् १८६ १६६ द्विषन् तीर्थकर . तेजस्विन् १६६ दुर्जन तीर्थकृत ११८ दुष्ट तीर्थकर तिमिर १९४ तक १२३ द दीधिति तारुण्य १२४ ! द्वय २ झुति तापर्यः १२१ द्वितय दीप्ति तुल्य १३७ । द्वंद १२ | दोषा m' ६० तुहिन देह १८६ दारक ३७. ३८ ११४ तनुत्र १८६ द्वेषित् ४९ ( ११ ) ६५ १०० ५. श्लोक। शब्द श्लोक श्लोक । शब्द दंष्ट्रिन् हप्त १७० द्युम्न ४६ द्रविन दृषत् १७१ दिन ५० | द्रव्य ६५ दीन १७६ दिवा ५० द्रश ६६ द्रुत १७६ दिवस ५० दृष्टि ६६ दर्शनीय १८० दिव् ५३ / दोष दीर्घ १८५ ५६ / दोषा दारुण १०० देव १८६ दिव् ५६ / द्विप दिक ६१ दन्तत्रास १०१ घरा दक्षकन्या ६१ दशनच्छद १०२ ঘাষ दिपाल ६१ १०८ घरणी ६ दिग्गज ६१ दशमीस्थ १०८ धरित्री दिगम्बर ११ टेप १०६ धानुष्क १४ दक्षकन्याम्बर ६१ दया ११. धुनी २४ दक्षकन्यागज ६१ दिव्यवाक्पति११४ धव दक्षकन्यापाल ६१ दुग्ध १२३ धामन् दहन ६५ दुरित दहनसुनु ९३२ धूर्जटि धुधुनी ७१ / दैत्यारि धन्वन् ७२ दण्डभृत् द्रुहिण १४६ धर्म ७६ ७६ दामोदर ९५६ धनुष द्विरेफ ८२ द्राक १५६ ध्वजा ८६ / रतिहरि १६१ ध्वजिनी दन्तिन ८८ देहिका १६२ धनद द्विरद ८ देवानांप्रिय १९७ / धन १६५ - Pર १३१ धुरि १६ दुष्कृत १४४ ७४ दृढ .
C . ११० नीर ८६. १४५ नदी १४७ न २८ नगरी १७ ( १२ ) शब्द श्लोक। श्लोक। श्लोक। शब्द. शब्द नीललोहित ၆ ११ ७१ धमनीधम १०१ निषाद नदीश्वर १४ ॐ धिषणा. १५ नारद ७४ धी ११० निर्घात नारायण १६ धर्मचक्रभृत् ११५ नलिन २० नाराच धिष्ण्य १३२ नीलाम्वुजन्मन् २२ धामन् १३३ निम्नगा ५४ निस्त्रिंश ८५ धूलिकुहिम १३४ नद ૨૪ नाग धनञ्जय २४ निषादिन ८६ धर्मराज १४६ नर २८ नागारि ८६ धर्मात्मज धूम नृप २८ नयन धूम १४८ | नारी ३० नत्र ध्वान्त १४६ नितम्बनी धवल १५० ४० नन्दन १०२ नासा धून १६६ ननन्द धूलि १५३ १०७ ४८ नक्षत्र धीवर्जित १६८ निशा १११ धातु नक्तं ४८ नृपक्रतु ११२ धैर्य १७५ धस्मिल्ल नमस् १६६ ५६ नाक नाभिज ११६ न. नमुचिशत्रु ५६ नाथान्धय नभस्वत् ६ई नीलकण्ठ । ११६ १२६ नितम्ब नाग नभस्वत्पुत्र '१३३ नाथ १० नभस्वत्सख ६१ निकेतन ३१ निन ४३ । नितम्ब नूपुर ४६ | नैयायिक H १७१ ५३ - निवसन C . A ( १३ ) ११ १७१ १३३ / निशाचर १३४ नितान्त १३५ नेड़ १६७ , पयस् त . १४० नियन्त्रित १४. नियमित १४१ / नीहार १७८ पाठीन १८१ पर्जन्य श्लोक। श्लोक । श्लोक। शब्द शब्द शब्द नदीष्ण १६५ पति १० परिवृढ़ नागरिक निशान्त १० १६७ १३३ पादप निवृत प्लवग ૧૨ १७२ निकाय पुलिन्द १४ निलय १७५ १३४ न्यून १५ नियूंह १५ निभ १३८ १६७ पाथस नाम पझ निकाय नीच १६ १७० १४० निकर १७७ पृथुरोमन्द निकुरम्ब निचय निकट १४१ / नीहारकर १८१ परिषत् २० नीलवसन १४३ निगूढ़पुरुष १८१ पंक नील १८५ पुण्डरीक २१ नीलपिङ्गली १५२ निज २१ नियोग निवेशन १६२ १५५ पारावार २५ नव्य १५७ नरक १६३ पार नेक १६४ पाली नव ૨૭ निसर्ग नूतन ५५७ १८८ पुमस प पत्ति ૨૪ १५६ पदाति २६ नीच १६० पृथिवी ५ पदग ૨e ફર नाथहरि १६१ पर्वत निपुण पुरन्ध्री રૂ૨ निष्णात पार्श्व १४८ | निस्तल १८८ पुष्कर २६ न नीचैः १६० । पृथ्वी ६ पत्नी १६५ प्रस्थ १६५ ६ प्रेयसी श्लोक। ८० ५५/ प्रसून - 델 ८६ ६१ ६७ ६७ ८६ शब्द. श्लोक। श्लोक। पिशित पताका प्रेष्ठा ३३ पल ५५ प्रमदा २३ ! पेशिन् ५५ पृतना प्रणयनी ३३ | प्राचीनबर्हि ५७ पोत्रिन् पतिव्रता. ३४ पाकशत्रु पत्तन पतिवत्नी ३४ | पुरन्दर ५८ पुर पुनर्मू ३५ पुरुहूत १० पुरी पुंञ्चली ३५ | पुलोमारि पुर परायत्री ३६ ६२ | पुटभेदन प्रीत ३७ पवमान ६२ | पाणि प्रिय ३७ | प्रभञ्जनपुत्र ३७ पवनपुत्र पवमानपुत्र पुत्र ३६ प्रसजन ६३ पाय प्रजा पवनसख पोत पद पावक प्रारभ्य प्रियाम्बिका ४३ पावकसुनु प्रेरित पाद ४५ पिनाकिन् ६८ प्रतीत प्रभा ४५ | प्रमथाधिप ६८ पूषन् ४९ पायोनि ७२ पतंग टे। पितामह કર परासु पतिन् ५४ प्रजापति ७३ प्रमोद पनि ५४ पुरुषोत्तम ७४१ प्रमुद पतत्रिन् ८० प्रज्ञा पतग प्रसभ ८० प्राज्ञ प्रेयन पितृ ६६ पुष्करिन् ६३ पुरोगति ६३ । पयोधर ac AMAU इस १०२ १०३ १०३ १०४ १०४ १०८ 1 m ac .परिचित १०८ १०८ ०१०९ १०९ ५४ | पुष्प ११० १११ --- ( १५ ) श्लोक। प्रज्ञापति १५१ / पौरुप १५१ प्रवीण + . श्लोक। शब्द श्लोक । शब्द शब्द प पंक्ति १४१ / पथिन् पंण्डित १११ पितृपति १४६ | पिशुन १७० परिषद्य ११२ परतराज १४६ | प्रतिरोधक १७० ११५ पाराडुर १४६ पारिपान्थिक १.७० पीठ ११३ पाण्डु १५० पुष्कल १७३ पुरुषाद्य १९५ पाताल १५० । पुरातन १७४ प्रसाधन पीत .१७५ प्रसन्ना १२१ पालास १६६ • पयम् १२३ पिसङ्गी १५१ / प्रस्तर १७१ प्रायःपूर्ण १२४ पांसु १५३ पाषाण १७१ प्रावृषिक . २७ १५४ । पुरातन १७४ पृषित १२८ प्रेष्य १५५ | प्राध्वंकृत १७७ दन्नग १२८ प्रदेश १७७ पुण्य १३१ प्रवृत्ति १५६ प्रशस्त १७२ पाप्मन् १८० 'पाप १३१ হাল पापजयिन् १३२ १५७ / प्रालेयकर १८२ १८१ पद प्राक्तन परिखा १५८ प्रारहे १८२ १३४ प्राकार १३५ पराग १५२ प्रायण १८३ परिधि १५७ पद्य १८४ प्रतोली १३५ पशु ६६२ प्रांशु १८५ प्रासाद १६३ । पृथुल १८५ पद १६४ पृथू १८५ पूग १३६ । प? १८८ प्रकर प्रगल्भ १६६ परिवाद १६१ १५५ / पिनद्ध १५६ / प्रालेय 1 १५८ प्रणिधि १३३ / पुराण ५३५. प्रत्यय १३५. प्रेम २३५ पचर १६५ प्रकृति 1 , ( १६ ) , . १६४ . ५ ११ । बलिसूदन ११ वैजयन्ती श्लोक। शब्द शब्द श्लोक। शब्द श्लोक। वधु ३० ब्रीहि १६८ परिणयनं १९२ बाला ३१ वन्धुर १७६ पाताल १६३ बल्लभा ३३ बलात् ૨૨ प्रभूत बन्धकी ३५ | बहुल १८५ प्रवीर १२६ वल्लभ ३७ , बहुल १६४ पुष्कर १८४ ४२ वन्धु बहू प्रचुर ११४ नधन ४६ बाल प्राज्य १६४ মুহা पुष्कर १६४ भ. बिडोजस ५६ भिक्षु वृह्मन् ७३ फलिन भूमि ५ ७५ फलेग्राहिनू ५ फुल्ल भर्तृ १८ আল फणिन् १२६ भंग वाह १०० फलान १४३ कृय २६ १०० फल्गु १५७ ૨૭ मृतक वक्षन् १०२ फुल्लक १६२ हित भट २६ १०५ घ. भामिनी ३० बुध ११२ वृक्ष भीरु ब्रह्मनू बनस्पति ११ | वार्डीन भामा ३१ १२४ वलिमुख १२ बर्हिन भार्या ३२ १२६ वानर १२ | वृषधर १२८ भ्रातृजानि ४४ बलाहक १८ ब्रज .४५ বিয়ানী २३ ब्रज १४१ भास् ४६ बल्लरी २३ / वृषसेन भय ८४ | भू १ १६६ भानु १ 10 ( १७ ) - Www म मूर्ति म. मातुलानी ८३ عر ६३ . १५६ / मर्कट श्लोक। शव्द श्लोक। श्लोक शब्द शब्द २०० मनस्विनी भ भावुक भाविक २०० मुक्का ३५ भानु ४९ भब्य २०० मातृ ३८ भव ३६ भागीरथी ७१ ४१ भूमिधर ३ मित्रयुक् . ७६ मुनि मोदय ४३ भृङ्ग मरीचि ४५ भ्रमर ८२ मेदनी मही भर्मन् ४६ ५ महस् मार्तण्ड ८ भारती १०४ मरुत પુર ९ मयूखवत् भुवन ११३ मेखला मेघपथ ५३ १२ भूषण माल भुजंग ૬૨૮ मत्स्य १६ ५५ मरुत ५६ १७ शाग्य भागधेय मेघ १८ मरुत्वत् ५६ भवन १३२ मुदिर १८ मघवत् मरुत्सख महोत्पल भरतान्वय ६० २१ {४७ मो १५८ मीनाकर २५ / मरुत् २८ मातरिश्वन् ६३ भृश १७२ मनुष्य भूरि १६३ ! मानुष २८ मरुत्पुत्र ६३ भूयिष्ठ ૨૬૪ मर्त्य ૨૮ मातरिश्वपुत्र ६३ भाव ६६५ मानुज ર૬ मरुत्सख ६ १२५. मानव २८ मातरिश्बलख ६४ भास्कर १९६ मुग्धा ३० महेश्वर ६८ भासुर १६६ महिला ३२ | मंदाकिनी ७१ भद्र २०० मानिनी ३२ | मुरंसूदन ७५ १३१ / मीन ૨ -- ( १८ ) शब्द । श्लोक। मल्लिका १५२ १५२ १५३ १५४ १५६ मेखला १३२ १६४ १६७ १६७ १६७ ८२ मदिरा श्लोक। शब्द श्लोक। मनीषा ११० । मधु मेधावत् मधुसूदन मकरन्द ७५ ३१३ मलिन मन्मथ ७७ महावीर ११६ । मलीमस मदन महानि ११६ मा सकरध्वज ७७ मार्गण ७८ | मृगनाभिजा ११८ मृदु माल्य मनस् ८२ ११६ महिषी मार माला मार्ग ८२ ११६ मौवीं ८२ १२० | मुग्ध मधुव्रत १२१ मूढ मण्डलान ८५ मद्य १२१ । मूक मतंगज ८८ मेरेय १२१ मूर्ख महाहव ८७ मधुवारा १-१ मन्द मतंगम ८८ मद्यप १२३ माभिन् मातंग १२३ मंतु मृगेन्द्र मराल १२६ मनोहर मय ६१ मयूर मण्डल १२८ मनोहारि मौक्तिक मृगाङ्क १२८ मृगांक मुख ६८ मन्त्रपूतात्मन् १३० मोचा मूर्धन १०४ मन्दिर मजीरक १०७ मत्तवारण मृत १०८ मुखासन १३६ | मैत्रेयिक मन्यु १०६ मध्यमपाण्डव१४४ मुहुर्मुहु मुद १०६ । मृत्यु १४५ । मृषा ८६ | मथित १६७ १६६ १७६ १७८ १८० १८० ६० १२६ / मनोज्ञ ६२ | मृग ६ १३६. मुरज १३५. | मैत्री १८१ १८३ १८४ १८७ १८० १८८ १८६ ( १६ ) १२४ रात्रिचर मुधा १४८ रण २. योग्य श्लोक। | शब्द श्लोक। शन्द इलोक। म यात ८६ रक्षस् यौवनिक ५५ १८९ यौवन माघ १२४ रोहिताश्च १८६ यम १४५ रोहिताश्वसुनु ६६ मर्मकोश १६१ १४६ रुद्र यमुन ६६ मनस्विन् १६६ मंगल २०० यमुनाभ्रातृ १४६ रोपण मुधिष्ठिर मंद १८६ यशस् १५४ रात्रिजागर ६२ य. युक्त १६३ | रे ६.५ यमल २ युत १६३ रूप्य ६४ युगल १८८ रजत युग ૨ राजराज युग्म ૨ राष्ट्र ६७ यम राजन १० रुष यति रत्नाकर २५ राजन् ११२ योगिन् ३ रोधसू ११५ राजसूय यादस् रामा ३१ रुधिर ५११ योषित् ३३ ११८ थोषा ३० । रुपाजीवा ३६ रुच्य ११६ युवति ३१ । रमण ३७ रसना १२० ४४ यमुनाजनक ५१ रिपु रेवतीदायत १४३ यमजनक ५१ रुचिष, ४५ यातुधान ५५ रश्मि राजलदमन् १४८ यारि रजनी ४८ रजस १५३ युद्ध ८७ रवि यन्त ८६ २ ३ - २६ ३० रमणी ५२ रेणु ।
( २० ) १ १७५ / लोहित १५१ वैशारिण १५३ । विशारिन् • रय 7 १७६ | लुब्ध शब्द . श्लोक। शब्द श्लोक। शब्द श्लोक। र. लोक ११३ व्याध . रे १५८ लेलिहान १२८, वार १५ राग १६३ लाङ्गल १४२ वारि रहम् १७५ | लागलकर १४२ वन १५ रहस्य १५० विष १५ रहस १७७ लोहिनी १७७ लक्ष्मन् १७ रमणीय १७६ বান १५३ विद्युत् १६ १७६ लोह ६७२ वज १६ रुचिर १७६ व्रतती २३ रोहिणीपति १८५ लघु १७७ वल्लरी २३ रम्भा १८३ लेश ६६० वारिधि २३० लवं १६० वारिराशि रुधिर ૨૬ लोहित १६१ १६१ वीचि ૨૭ रन्ध्र १५३ ब. वेला रस्य १६३ वर्निन् ३ / विभ्रम वसुमती ३० लुब्धक । १४ विश्वम्भरा वामलोचना ३१ लता. २३ वसुधा ६ वेश्या ललन ३० । वसुन्धरा ६ / विलाशनी लडिजका ३६ विभु .३७ लक्ष्मी ७६ विटपिन् ११ वर लतान्त ८०. विपिन १३ | बपुष ३८ लपन ६८ ६३ वयस्या लब्ध १०८ | वनेचर १३ | वैरिन् v २७ . ५ वनिता M MCCw १० विद है ४१ -- ( २१ ) ८८ ६० - ६६ / वित्त ५३ / विशाख शन्द इल्लोक। शब्द श्लोक। शब्द श्लोक। व. वरेण्युसख :६४ • ६४ वारण वन्हि ६२ व्याघ्र विभावसु ४६ वैश्वानर वराह ६१ . विधु विभावसु विरोचना वस्तु ६५ ५० वृषाकपि वासर वन्हिसुनु ६६ वसु ६५ वाह २५ वाजिन् वृपाकपिउनु ६६ वैश्रवण ६६ विहायस् ५३ विभावसुसुनु, ६६ | वदन ६८ वियत् ५३ वैश्वानर सुनु ६६ वस्त्रं १८. च्योमन् ६७ विलोचन विशाखपितृ ६८ विषय ६७. वयस् वज़िन् विशालाक्ष ६ विभ्रम 88. ५७ वृत्रहन् ५% वृषभध्वज ६६ वक्षौज ૨૦૨ वासव ५६ विश्वरूप ७० वाच् १०४ वृषन् ७२ वचस् वि ५४ वेधस् ७१ | वाणी वायुपथ ५३ विधात ૭૨ वचन निष्कर वासुदेव ७६ | विद्वस् १११ विररुचन वायु ६२ ७२ विचक्षण वात ६२. विष्णु ७४ वाग्मिन् ११२ वरेण्यु ६३ वाणसूदन ७५ वीतराग १११ वायुपुत्र ६३. नाण ७८ वासन् ११४ वातपुत्र ६३ "विशिखाकूत ८. वर्षीयस् ११५ वरेरण्युपुत्र ६३ | वाहिनी ८६ । वृषभ ११५ जायुसख १४ विरुथिनी ८६ / विष्टर ५९/ विधि 'व. १ १४७/ विश्व १४५ विकल १५६ / विवर श्लोक। शब्द श्लोक। शब्द श्लोक । व्याज. १३८ वितथ १८६ विटप १४० विफल ११३ व्यूह 'विलेपन वृत्तान्त १३६ वृथा १८३ व्रात १३६ विधुर वारुणी १८६ १२१ वयःपूर्ण १४७ वायुपुत्र व्यसन १२४ १८६ वंश वृकोदर १२५ वर्द्धमान वलक्ष १६० वर्ग ૨૨ विशदारुण १५० | विवाह १६२ वर्ण १५५ वर १६२ वरदा ११२ वार्ता वारली १२७ वियोग १६२ वहिष्ठ वृक १२७ विनयात्मज १२६ वर्मन १६४ वाणवारण १६५ पैनतेय ब्रज १३० विदग्ध १६६ रा. विषक्षय १३० वत्स १६६ शिष्य वृजिन १३२ विस्मय १७३ शास्त्र वृजिनजयिन् १३२ विशद १७३ | शृंगिन् धेश्मन् १३२ / विशारद १९९| शिलोच्चय वसति १३३ निकम शिखिरिन् वस्त्य १३४ वेग १७७ शास्त्रिन् ११ वा वर्तुल १८५ शवर १४ वातायन १३६ वृत्त १८५° पार विन्मन्य १३७ विशाल १८५१ शम्पा १८ विद्यमान १३७ विलम्बित १८६ | शतपत्र २१ व्यपदेश १३८ विनसा १८८ | शस्त्रजीविन् २६ १६५ | वर्मन १९६६ ० 20P V ९७५ १३४ ( २३ ) . ७० ७४ शीतकृत ७६ | शेमुषी ४८ | शिलीमुख श्लोक। शव्द श्लोक। शब्द श्लोक। श. शिपिविष्ट श्रोणि १०३ शरीर शान्ि ३६ श्री ११०. शशिन् शैलधर ७६ | शौण्ड १२२ ७८ श्यामा १२६ शकुन्ति शर ७८ शिखण्डिन् १२७ शकुनि ५४ शिलीमुखासन ७६ | शर्वरीकर १२८ शक ५७ शिलीमुख ८२ | शकुनीश्वर १२६ शतक्रतु ५७ शम्भुविघ्नकर ८४ | श्रोतम १३० शतमन्यु ६० शुण्डाल ८६ शरण १३४ शक्रनन्दन ६० शार्दूल ९० श्वेतवाजिन् १४३ श्वसनः शरभ ६० शक्रनंदन श्वसनपुत्र ६१ | शब्दभेदिन् १४५ श्वसनसख शृंखलिक ९१ श्वेत १४४ शिखिन ०६४ | शीघ्रगामुक ६१ शुचि १४६ ६४ श्येत शक्तिमत् ६७ | शुक्तिज ४ शुक्ल 5 १५० शरवणोद्भव ६७ | श्रीद शुभ्र १५० शक्तिमपितृ ६८ श्रवण १८ शशिप्रभ शरवणोद्ववपितृ६८ श्रोत्र ६८ श्राद्धदेव -१४६ शङ्कर ६८ श्रव १८ शोणी १५१ शम्भु ६८ श्रुति शासन शिव ६७ शिरस् १०० श्येनी १५१ शर्व (८ श्वन १२ | शारंगी १५२ शूलिन् शिरोधर १०१ शवली ९५२ ६३ शूकर शिखिवाहन शिलोद्भव । . CD ( २४ ) * १६१ / षडक्षीण . १६८ पाष्टिक १६६ षोड ३. ३ ३ स्वैरिणी १७५ साधु ३ ४ शब्द श्लोक। शन्द श्लोक। इलीक। श, सरस्वत् शश्वत् १७ सागर २६ शृङ्गिन् १६१ वरामुख ६७ । सीमोपकगठ २६ शठ १६६० षट्पद ८२ स्त्री शालि १६८ सीमन्तिनी शकृतकरि १६६ सुन्दरी ३१ शोंडीर १६६ षड्दशन १६६ सती शिला १७२ साध्वी ३४ व शातकुम्भ १७२ सयत स्पर्शा शणि १७५ । संयमिन् शीय संफली शघ्रि १७ सिद्धान्त सर्वबल्लभा २६ श्लक्षण १७६ सानुमत शृंखलित १७८ सानु सवित्री ३८ शतिक १८६ स्वामिन् सचिनु ३८ १० शलि १८६ साल संहनन ३८ १५ | सुत ३६ सफर शल्क ३६ १९० | सौदामिनी १८ सुनु शोणित १६१ / सरोज स्तनधय शुषिर १६३ सरसीरुह २० सहचरी श्वन १६३ स्त्रोतस्विनी २४ सघ्रीची ४१ शर १६६ । सबन्ती २४ सवया शिरोरु १६६ सिन्धु २५ सखा २०० सरित सस्वन्ध शिव २०० समुद्र २६ । सुहृत् ४१ 8 शकल 7 '४९. श्रेयस् (- २५ ) 4 सुनु '६६ ६६ / सारमेय ६६ स्वर्ण ६७ श्लोक । । शब्द श्लोक। शब्द श्लोक। स समीगर्भ '१६ संयत् स्तम्मेरम सहकृत्वन् ४२ समीगर्भसुनु ६६ सामज ८८ सहकारिन् ४२ ४२ स्वाहापतिसुनु ६६ ८ सिन्धुर सहाय ४२ सप्तार्चिः समवायिक ४२ सेनानी ૨૨ सनाभि ४२ स्कन्द ६३ सगोत्र ४२ स्वामिन सुवर्ण ६३ सोदर्य ४२ सेनानीपितृ ६८ स्वार्थ १५ स्वन्स ४३ स्कन्दपित ६८ स्तन सपत्न ५४ स्वामिपितृ ६८ सरस्वती १०४ सुधासूति ४७ स्थाणु E८ स्फतिकृतू १०५ सूर्य ५० सृष्टि स्यन्दन १०६ सवित ५१ सहस्त्रपातू ७३ / स्तनित १०५ सप्ति ५२ सौरी ७५/ संस्तुत १०८ सप्ताश्व ५२ सूर्पकारि ७७ संस्थित १०८ सूरि स्वर ५६ स्मर ८३ सभ्य ११२ स्वर्ग ५६ स्वान्त सदस्य ११२ सुनाशीर साधन ७६ सदुचित ११२ सूत्रामन् समर ८७ सभोचित ११२ सहस्त्राक्ष '५८ सेना ८६ सर्वज्ञ ११२ ६२ . संयुग ८७ सन्मति सदागति ८९ समालस्व ११८ सप्ताचिष संग्राम ८७ स्त्रज् ११६ स्वाहापति सम्पराय ८७ सीधु ७३ सेन्द्र ५६ सुमनस् Co समीरण ११६ ६२ / सैन्य १ + (२६ ) १३६ साक . २४२ स्नेह शब्द श्लोक । शब्द श्लोक 1 शब्द श्लोक - शब्द.. श्लोक। स. समूह १३६ -सम ६० सुरा १२१६ /सन्तति २६० सर्पि १२३ समुदय - -१५०- साई स्थविर १२४ १६० संतति १२५ / संघौल १४ सजूष् १६. सतान १२५ | समिति १४समा सनातन १२६ समीप १४१ संर्वदा १६१ सर्प १२६ सिंहनादिन १३८ सतत १६१ सुपर्ण १२६ समीप १४१ सर्पवैरिण १२६ सदा १६। सीर १६ सुकृत १३१ सव्यसाचिन् १४४ संहित १६३ सत्कृत १३१ सूनिर्मोक -१५४ | सहित सदन १६३ १३२ समवर्तिन् ' १४५ / सम्पृक्त १६३ सद्मन् सूरसूनु स्थान १६३ सोमवश्य . १४८ संस्कृत साल १३५ सौध संतमस १३५ १४६ समवेत १६४ सर्म सित १४६ १३६ सारारी सवर्ण सन्निधि ९३६ १४१ सञ्चर १६४ सजाति १३६ साधुवाद संदेश सदृश १३ सहश् १३० स्तब्ध १५६ स्तब्ध (६६ सहक्ष १३६ साम्प्रत १५७ - स्तेन १७० सधर्म १३७ सुचिरन्तन १५८ साधीयस. १७२ सरुप १७२ समाज १३८ । सह ૨૭૩ १४६ सम्भूत १६४ १५४ । संज्ञा १६७ १५६. स्तम्बकरि १५८ १३७ / सपदि १५६ । सुष्ठ ११० } स्फुट
No text on this page.