Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Jeevvichardiprakaransangrah

Suri, Shri Jindatt · 2011/08

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i unahli rutal by the Trasters of ibn Fond. 1 rretallings Hayatulo Peru Sunday at the imagen er Press No 26-28 hollihat Lan, Bombay Politoll, Jari Pesebidra Bisbhai Shri Junulattaiurl Jasa Bbandar Sars..

५ १ मगखापरण २ जीवमेव २ पप्पीफायमेव ४ मप्पकायमेव ५ ममिकायफामेव ६ वाकायकामेर . बनस्पचिपापसाधारणमेव ८ प्रत्येकवनस्पतिमेव ९ सूरमपावरस्वरूप १० पेडीमेद ११ इंटीमेद १२ पोस्लिीमेद १३ पट्टीमेव मारकीमेद जीवविचारसूची। गाया १४ अलबरबलपरसपरविर्यपभौरमनुष्यभेव२० २१ २२ २३ २ १५ देवताकामेव २४ ३-४ १६ सियोधमेव २५ १५ पोपद्वार २५ १८ शरीरप्रमाणारभवगाहना २७-२८ २९ ३० ३१ ३२२३ १९ बायुप्रमाणार ३४-२५-२६-३५-३८-३९ ८-१-१०-११-१२ १३ २० कायस्थितिप्रमाणघर ४०-४१ १४ २१ प्रामप्रमाणार ४२-४३-४४ २२ पोमिदार ४५-४६-४७ २३ सिखकास्वरूप ४८ २४ संसारखरूप ४९-५० २५ जीयविचारउतारस्वरूप इति ।

गाया १ २ नवतस्वसूची। १मावस्पनाम २ नववत्वमेष ३ पीवकामेर ४ जीवग्षण पोसिमाण ५ मजीवमेवम्बमान ६ पुसखरूप मुहूर्वमें मावलि ११-१२ ७ कास्त्ररूप परिणामीगाथा १३-१४ ८ पुष्पवस्वमेर १५-१६-१७ ९ पापवस्वमेव १८-१९-२० १० मारपवस्वमेष २१-२२-२३-२४ ११ संघरवस्वमेर २५ २६ २-२८ २९ ३० ३१ ३२३३ १२ निरजरावसमेष २४-२५ १३ पतस्वमेवफर्मसमावमितिनमम्पोक्रुष्ट -२८-३९-४०-४१-४२ १४ मोमवस्वमेव मार्गणाधार ४३-४४-४५-४६-१७ -४८-४९-५० १५ सम्पखरूपमाहात्म्य ५१-५२-५३ १६ प्रद्रलपरापनस्वरूप १. १५ मेसिन ५५-५६-५७-५८-५९ १८ सिद्विगमनप्रमाण ६० दटकसूची। १ मंगणधरण २ २४ दफनाम गामा १ ५ पारगाथा सप्राणी २५ घर गावा ३-४ १शरीरावर २ भवगाहनावर पैनियन०प्र०कास ५ २४ वशर पपुनः मसागस्वधार गाया३८-३९-४० १५ स्तुति फरवामाम ४१-४२ इति । ५ ८ ३ सपवणार ४ संशावार ५ संसानगर १२-१३ ६ फपामार . सेस्मा ८ इंद्रियाहार १४-१५ ९१० समुदपावार ११ष्टिगार १५-१६-१७-१८ १२ वमनार १३ मानवार १९-२० १५ योगशर १५ उपयोगवार २१-२२ १६-१७ उपपादपषणधर १८ मितिबार १९ पर्याप्तिद्वार २४ २५-२६ २५२८ २० किमाहारसार २१ वीमसंशाधर २९-३०-३१ २२ विशर २३ भागतिधर ३१-३२-३३-३४ -३५-३६-१७ जबूद्वीपसघयणीसूची। मगलापरण द्वारगापा १ सरवाशार गाया १-२-३-४-५ २ योजनघर परपिगणिवपर ३ क्षेत्रवार ? पर्ववद्यार ५ इटार १३-१४-१५-१६-१७ ६ वीर्यवार . मेणीवार ८ विजयगर ९ द्रहार २० १० मदीवर २१-२२-२३-२४-२५-२६ २-२८-२९ परवाप्रमाण इति ।

विपय पत्र " ५२ ७६ आगमसार अनुक्रमणिका। विपय १ अणकरण समकिशनाननिप्रयव्यवहारस्वरूप २ पम्मकास्वरूपगुणपर्याप ३ माठपक्ष स्वदम्पादि ४ सावनवकासरूप ५ च्यार निपा ६चार प्रमाण ७ सप्तमंगी निमगीसामाम्पसमावमायतन ८ निगोर विचार ९ साघु भावकावत १०ध्यार प्यान ११ भावना १२-४ १२ समकित १० रुपि ८ गुण ५ भूपम १५ नियम्यवहारस्वरूप १९ पचसमवाय ५४ ८० ८३ ८४ ८५ १५ प्रखावना १६ बपना मिखेपा निरूपण सम्प रयम मागि इति सूची ।। " ६८ --

नयचक्रसार अनुक्रमणिका
विपप
१ मंगलाचरण । चार अनुयोग क्या गुपठाणा भा
भीगीवकामेव भोर सापारण पैराग्य उपदेश
वया मरकी सामाम्य विवक्षा भौर मीमांसाविक
अर्प वर्शनोका विपार
२ द्रम्पफा गुणका भौर पर्यायका माण नय निक्षे
पारिक सहित एणुके भन्सरभूव सम्पदर्शनीयोकी
उन्मार्गवा इत्याधिक
३ पंपासिकायम स्वरूप वमा पकेक द्रम्पका मिन
मिम ममण इत्यादि
विपय
४ पंचास्तिकायका सामान्य विक्षेप धर्म
१०१
५ मखिस्समावका लक्षण और नारिखमावका
छमण
१०२
६ मर्पिस अनर्पितपणे एकमर्म सप्तभंगी रेखाइहै १०५
. अस्पंत विस्तारसहित स्वरूपपणे सप्तमंगी ऐसार १०८
८ गुणनी सप्तमंगीवा देखाई है
९ नित्यानित्यसमावमें और बस्ति नाखि स्वभा-
पमें उत्साद म्पयका एक भेष दुसरा
११४
१४

पत्र विषम १० मे तीसरा मेर बोबा भेद पापमा मेर पठा भेष साधा इत्यादि ११ एखमाम भनेसमाप मेरसमाव बोए समाव मम्पसमाव ममम्यखमाद वजन्य समाप ब- कम्पसमाव परमपमान माविमा सरूप सूक्षा मा जामवा पिपय १२ लिमेपाधिकार १३ नयमानकरपेश वपिपर. १२८ १५ प्रमाणका स्वरूपके साथ ज्ञानखरूपका मोम- आमा बार्षिकरण इत्यादि १४४ १५ पर्शनशान पारिवरूप मोडमार्ग निरूपण १४७ १५ वर प्रशन भीजिनदारिपुस्तकोग्रारफंडमेयाङ्क २५ । जीवविचारप्रकरणम् । AURAT प्रणम्य श्रीधीमानं, सर्वज्ञ सर्वदर्शिनं, भीषयिधारयोधार्य, क्रियते लोकमापया १ व्याख्या इतिशेपः । भुयणपईव वीर, नमिऊण भणामि अवुहयोहत्य । जीवसरूव किंचिवि, जह भणियं पुबसूरीहिं॥१॥ (भुयपपईय) तीनभुवनम्म संसारमें दीपकफे समान, (धीर) भगवान् महावीरको, (नमिऊण) नमस्कार करके, (अपुहयोहस्य) अज्ञ लोगोंको ज्ञान कराने के लिये, (पुवसूरीहिं) पुराने आचार्योने, (जह मणिय) जैसा कहा है पैसा, (जीयसहय) जीयफा स्वरूप, (फिचिषि) संक्षेपसे (भणामि) मैं कहता हूँ॥१॥ माम-जीयका स्वरूप जाननेसे क्या लाभ है। उपसर-उनको हम अपनी भास्माके समान समझ कर उनसे पाय करें-उनको तकलीफ न पहुँचाएँ 1-सामान है कि- 'पार्म मान तमो एपी, पूर्व वि सम्पसनप । मामास्मिी! किरा मारीच सेप पावर्ग" पहले शाम होगा बरी मरिसाधर्मका पाटन हो सके। 1.

47 म०-यदि हम उनको सतापेंगे तो क्या होगा! उ.--ये मी हमें सतागे-पदला लेंगे, इस यफ कमजोर होनेफे सपप ये पदला न ले सकेंगे तो दूसरे जन्ममें सेंगे प्र-भगवान्को मुयन-प्रदीप क्यों कहा! उ०-जैसे दीपक घट-पट आदि पदार्योको प्रकाशित करता है घेसे भगवान् सारे ससारके पदार्थाको प्रकाशित करते हैं-खुद जानते हैं तथा समयसरणमें औरोंको उपदेश देते है- इसलिये उनको भुपन प्रदीप कहते हैं चार भज्ञ फिनको समझना चाहिये ! उ०—जो लोग, जीवके स्वम्पको नहीं जानते उनको माचार्य कौन है। उ०—गौतम स्वामी, सुधर्मा स्वामी आदि सारिणो य, तस थावरा य ससारी।पुढवी-जल-जलण वाऊ, वणस्सई थावरा नेया ॥२॥ -जीव, दो प्रकारके हैं (मुचा) १ मुफ (य) और (संसारिणो) २ ससारी है (स) प्रस जीय, (य) ) स्थावर जीय, (संसारी) संसारी दोपकारके हैं बसफे मेद आगे कहेंगे (पुढषी अल अषण याक यी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिको (पायरा) स्थावर (नेया) जानना ॥२॥ मापार्य-जीयके दो भेद है। मुफ और ससारी संसारी जीवके दो भेद हैं-प्रस और स्यावर स्थायर जीयके पाँच मेद हैं।-पृष्यीकाय, अटकाय-अपकाय, अग्निकाय-तेजाकाय, वायुकाय और पनस्पतिकाय म-जीय फिसको कहते हैं! 10--ओ प्राणोंको धारण करे प्राण दो तरहके हैं, भाय-प्राण और द्रव्य- प्राण कहते है चेतनाको भाव-प्राण कहते हैं पाँच इन्द्रियाँ-आँख, जीभ, नाक, कान और स्वचा विविध पल-मनोवल, पचनयल और काययल, श्वासोरहास और आयु पे दस द्रव्य-प्राण हैं म०-मुक फिसफो फहते हैं। उ०—जिसका जन्म और मरण न होता हो-जो जीव, जन्म-मरणसे छूट गया हो प्र०-संसारी फिसको कहते हैं! उ०-यो जीय अन्म-मरणके पफरमें फँसा हो प्र-प्रस किसफो कहते हैं। जो जीव, सर्दी-गरमीसे अपना पचाय करनेके लिये पल-फिर सके, यह प्रस प्र०-स्थावर फिसको कहते हैं। उ-जो जीय सदी-गरमीसे अपना पचाव करनेके लिये पल-फिर न सके, यह स्थायर। म.--पृथ्वीफाय आदिका क्या अर्थ है। उ०-कायका अर्थ है शरीर जिस जीवका शरीर पृथ्यीका हो, यह पृथ्वीकाया जिसका शारीर जसका हो, पह अलफाय, मिसका अमिफा हो, यह अग्निकाय, जिसफा यायुका हो, यह पायुकाया जिसका पनस्पतिका हो, वह वनस्पतिकाय फलिहमणि-रयण विडुम , हिंगुल हरियाल-मणसिल-रसिंदा । कणगाइ धाउ-सेठी-, वनिअ-अरणेय पलेवा ॥३॥ .

अन्भय तूरी-ऊस, मट्टी-पाहाण-जाइमओ णेगा । सोवीरजण लुणा-इ, पुरवि मेआह हवाई ॥ ४ ॥ (पहि) सटिक, (मणि) मणि-शाम्त मावि, (त्यण) रज-चमकसन आपि, ( विघुम) मुंगा, (हिंगुल) हित-गुर, (हरियार) रताल, (मणसिल) मैनसिठ-मन:शिखर, (रसिंद) रसेख-पारा-पारद, (कणगाव धार) कनफ आदि धातु सोना, पान्दी, साम्या, छोहा, राँगा, सीधा और जस्खा, (सेबी) सटिका सपिया, (पनिम पर्णिका-गाव रसकी मिट्टी, सोनागेर अरणेद्धय ) अरणेहक-पस्यके उपरोसे मिली हुई पीली मिही, (पसेवा) पसेवक-एक पिस्मका परपर ॥ ३ ॥ (अग्मय ) अभ्रक-अपरक, (पूरी) तेजननी (कर्म) धारभूमिकी कसरकी मिष्टी, पापडखार (मही पाहाण आओ गा) मिट्टी और पत्थरकी अनेक जातियां, (सोषीरजण) सुरमा, खापरिया (लूणाई) उयण-नमक, (इचाई ) इत्यादि (पुरपिमेमाई) पृथ्वीकाप भीयोंके मेद है ॥४॥ भायार्थ सटिफ, मणि, रम, भूगा, हिंग, हरवास, मैनसिष्ठ, पारा, सोना, पान्दी, ताम्बा, लोहा रोंगा, सीसा-शीशा, मखर, सदिया, सोनागेरु पापाणफे टुकड़ोसे मिली हुई पीली मिट्टी, पलेवक नामा पत्थर, अयरक, सेवनतूरी नामफ मिट्टी, सरफी मिट्टी, और भी काली, पीली भारि रगी मिट्टी तथा एस्थर; सफेद, काला, लाल रंगका सुरमा, साभर मादि नमक, इस प्रकार मौर मी पहतसे पृष्वीकाय जीवोंके मेव समझना चाहिये Ho- क्या इन सोने-पान्दीफे गहनोंमें मी जीय है? To-नहीं, जब तक सोना-पान्दी खानमें रहता है 1 सय सफ उसमें जीव रहता है, खानसे निकाल्नेपर गठानेसे जीय नष्ट हो जाता है इस तरह पunny लने तया मिट्टियोंको पैरोंसे घठने आदिसे मी जीय नष्ट होते हैं। भोमतरिक्ख-मुदग, ओसाहिम-करग-हरितगू महिआ। हुति घणोदहिमाई, भेआणेगा य आउस्स॥५॥ (भोम) भूमिफा-फूमा, तालाय आदिका जल, (अंतरिक्समुदर्ग) अन्तरिक्षका-आकाशका अल (मोसा) ओस, (हिम ) धर्फ, (फरग) ओले, (हरितण) हरित घनस्पतिफे-खेवमें वोये हुप गेहूँ, अय माविके-वालोंपर जो पानीके चूद होते हैं, थे, (महिया) महिमा-छोटे छोटे जलके कण जो यादलोंसे गिरते हैं, (पणोदहिमाई) घनोदधि आदि, (आउस्स ) अप्काय जीवफे, (मेमा णेगा) अनेक मेद, (हुति) होते है ॥५॥ भावार्थमा, तालाय माविका पानी, घर्पाका पानी, गोसका पानी, धर्फफा पानी, ओलोका पानी, खेतकी यनस्पतिके ऊपरफे जलीय कण, आकाशमें पादोंके घिरनेपर कमी कमी सूक्ष्म जल-तुपार गिरते हैं, पे, तथा घनो दपि ये सय, सया और मी अफ्फाय जीवके भेद है म०-पनोदपि फिसे कहते हैं? उ.---स्वर्ग और नरक-पृण्यीके आधार-भूत जलीयपिण्डको इगाल जाल-मुम्मुर,-उकासणि-कणग-विज्जुमाईआ।अगणिजिआण भेआ, नायवा निउणबुद्धीए॥६॥ (गाय) अंगार-ज्यालारहित काठकी अमि, (जार) ज्वाला (मुम्मुर ) कण्डेकी अथवा भरसौंयकी गरम रास्समें रहनेयाले अग्नि-कण, (उफा) उल्का-आफादासे जो अग्निकी वर्षा होती है यह, (असणि) अशनि-यनकी अग्नि, . (फणग) भामाद्यमें उड़नेयाले अग्नि-फण, (विजुमाइमा) विमलीकी अग्नि इत्यादि, (अगणिजिमाण) अनिकाय गीयोक (मेमा) मेद (निउणबुद्धीए) निपुण-चुद्धिसे-सूक्ष्म-युनिसे (नायपा) जानना ॥ ६ ॥ माया-फाप्ठ आदिकी ग्याला-रहित अग्नि, अनिकी वाला, कण्ठेकी अयया भरसायकी गरम राखमें रहनेवाले मग्नि-फण, उत्काफी अग्नि, आकाशीय अग्नि-कण, वज्रकी अग्नि, विद्युत्की अग्नि ये वया अन्य मी अमिफाय जीवोंके । भेद सूक्ष्म-बुद्धिसे जानना चाहिये उभामग-उफलिया, मडलि-मह-सुद्ध-गुजवाया य । घणतणु-वायाईया, भेया खल्लु पाउकायस्स ॥७॥ इ(उम्भामग) उधामक-तण आदिको आकाशमें उड़ानेयाला यायु, (उकलिया) उत्कलिका-नीचे पहनेवाला वायु, मिससे पूछिमें रेवायें हो जाती है (मंडलि) गोडाफार पहनेवाला पायु, (मा) महायात-आन्धी, (सुर) शुद्ध- ( मन्दपायु, (गुंजपाया य) और गुजयायु-जिसमें गूंजनेफी आयाज होती है, (घणतणुयायाईया) यनयात, तनुयात 5 मादि, सजु (याउकायस्स) यायुफायफे (मेया) मेद निश्चय है ।। ७॥ भावार्य आकाशमें ऊँचा पहनेयाठा, नीचे पहनेपाला, गोलाकार पहनेयाला, आम्धी, मन्द-यायु, गुआरप करः । नेयाला यायु, पनपात, वनुयात, ये सप, क्या है मी यायुकायजीवोंके मेव है ~ - -पनयात और वनुपातमें क्या फर्क है! उ-चनवास जमे हुए घीकी तरह गाढ़ा है और तनुपात सपाये हुये घीकी सरह तरल है। घनपात स्वर्ग तथा नरक-पृथ्वीका मापार है और तनुपास नरफ-सीके नीचे है साहारण-पत्तेआ, वणसइजीवा दुहा सुप भणिआ।जेसिमर्णताण तणु, एगा साहारणा तेऊ ॥८॥ (सुए) मुतमें शास्त्रमे, (पणसमीषा) घनस्पति-कायके जीप, ( साहारण पञ्चेा) साधारण और प्रत्येक ऐसे, दुहा) दो प्रकारके (भणिया) कहे गये हैं (जेसिमणताण ) जिन अनन्त मीयोंका (पगा) एक (सणु) शरीर हो, (तेज) घे (साहारणा) साधारण कहलाते हैं॥८॥ भाषार्थ-सिद्धान्तमें पनस्पतिकाय जीवोंके दो भेद कहे गये हैं। साधारण-बनस्पति-काय और प्रत्येक यनस्पति- फाय जिन अनन्त जीयोंका शरीर एक हो वे जीय, 'साधारण-पनस्पतिकाय' कहलाते हैं कदा अकुर किसलय, पणगा-सेवाल-भूमिफोडा अ। अष्ट्रय तिय-गज्जर-मो,-स्थ वत्थुला-येग-पालका ९ कोमलफल च सध, गूदसिराइं सिणाइपत्ताइ ।योहरि आरि-गुग्गुलि, गलोय-पमुहाइ-छिन्नरुहा ॥१०॥ (कंदा) जमीफन्द-आलू, सूरन, मूलीका फन्द आदि (अफर) अङ्कर, (फिसलय) नये कोमल पचे, (पणगा सेपाल) पाँध रगकी फुति-जो कि यासी अन्न यगेरेमें पैदा होती है, और सेवाल पाणीपर जमती है (भूमिफोठा) भूमिस्फोट, वर्षा ऋतुमें छत्रके आकारकी वनस्पति होती है, (मल्लयतिय) अद्रक, इन्दी और कफ, (गार) गाजर,

(मोत्थ) नागरमोथा, (पत्युला) वयुमा, (ग) एक किस्म का कन्द, (पटका) पाठफा-पाकयिशेप ॥९॥ (फोमठफले
च सर्प) सप तरहके कोमल फल-मिनमें बीज पैदा न हुने हो, (गूढ सिराई सिणाइ पचाई) जिनकी नसें प्रकट न हुई
हो, थे, तथा सन आदिके पचे, (योहरि ) थार, (आरि) कुषारपाठो, (गुग्गुलि ) गुग्गुल, (गलोय) गिलोय-गुर्ष,
(पमुहाइ) मादि, (छिमाहा) छिन्नलह-काटनेपर मी मंगनेवाली कुछ घनस्पतियों ॥ १० ॥
भावार्थ-आलू, सूरन, मूखीका फन्द, महर, नये कोमल पत्ते, और फुलि जो कि पासी अन्नमें पाँच रग की पैदा
होती है और सेवाल, वर्षा मातुमें पैदा होनेवाली छम्राकार पनस्पति, अद्रक, हम्दी, फक, गामर, नागरमोथा,
यधुमा, पेग नामफ कन्द, पाठको, जिनमें पीज पैदा न हुये हों, ऐसे फोमल फल, जिनमें नसें प्रकट न हुई हो, थे,
और सन आदिके पचे, यूटर, पीकुवार, गुग्गुल तथा काटनेपर पोद देनेसे कगनेयाली गुच नीपगिजोय आदि धन
स्पतियों, ये सब साधारण वनस्पतिकाय कहलाते हैं, इनको मनम्सफाय और पावर लिगोदफे जीप मी कहते हैं यहाँ
यह समझना चाहिये कि ये सब गीली पनस्पतियाँ ही समीव होती है, सूखी नहीं
इथाइणो अणेगे, हवति भेया अणंतकायाण । तेसिं परिजाणणत्थं, लक्खणमेय सुप भणिय ॥११॥
(चाणो) इत्यावि, (अणेगे) मनेक (मेया) मेद, (मणसफायाण) अनन्तकाय जीयोंके, (इयंति) है, (वेर्सि)
सनफे, (परिजाणणत्यं) अच्छी तरह जाननेके लिये, (सुप) मुतमें-शास्त्र, (पये) यह (उपखणे) क्षण
(मपिर्य) कहा है ॥ ११॥

भावार्थ-नव और दसमी गाथाओंमें जो अनन्तकायके मेद गिनाये हैं, उनसे मी मषिक मेद है, उन सयको
समझाने के लिये सिद्धान्तमें अनन्तकायका लक्षण कहा है
गूसिरसधिपय, समभग-महीरुह च छिन्नरुह । साहारण सरीर, तविवरीअ च पत्तेय ॥ १२ ॥
जिनकी (सिर) नसें, (सघि) सन्धियों, और (पष) पर्व-गठिं, (गूठ) गुध हों-देखने में न आवें, (समभंग)
जिनको तोडनेसे समान टुकडे हो, (अहीरग) जिनमें वन्तु न हो, (छिन्नरह) मो काटनेपर मी जगें ऐसी घनस्प
सिया-फल, फल, पत्ते, मूछियों आदि, (साहारण) साधारण, (सरीर) शरीर है (तपिपरीम प) और उससे विप-
रीत, (पत्य) प्रत्येफ-वनस्पतिकाय है ॥ १२ ॥
मायार्प -अनम्तकाय पनस्पति उसको समझना चाहिये "जिस धनस्पतिमें नसें, सन्धियों और गाँडे न हों, जिसको
वोग्नेसे समान भाग हो, जिसमें वस्तु न हो, जिसको काटकर वो देनेसे यह ऊगे" जिसमें उफ लक्षण न हो, उस
पनस्पतिको 'प्रत्येक-यनस्पति' समझना चाहिये।
एगसरीरे एगो, जीवो जेसिं तु ते य पचेया । फल-फूल छल्लि कट्ठा, मूलगपचाणि घीयाणि ॥ १३॥
(जेसिं) जिनके (एगसरीरे)एक शरीरमें (एगो जीयो)एक जीव हो (व तु) वे तो (पत्तेया) प्रत्येक-वनस्पतिकाय हैं।
चनफे सात मेव हे (फल, फल, छति, फट्ठा) फल, पुष्प, छाल, फाठ, (मूलग)मूलियों, (पचाणि) पत्ते,और (पीयाणि) पीजा॥१३॥

भावार्ष-जिन पनसतियोंके एक अरीरमें पफ जीप हो अर्थात् एक शरीरका एक ही जीव, स्वामी हो, उन वन स्पतियोंको मस्पेकन्चनपतिकाय समझना चाहिये, प्रत्येक वनस्पतिकाय जीवके सात मेद है-फल, पुष्प, छाल, काष्ठ, मूलियाँ, पचे और वीज पचेयं तरु मोत्तु, पचपि पुढवाइणो सपललोए । मुटुमा पति नियमा, अतमुहुचाउ अदिस्सा ॥१४॥ (पसेय सरु) प्रत्येक वनस्पतिकायको (मोर्मु) छोरकर, (पंचयि) पाँचों ही (पुरषाणो) पृथ्वीकाय आदि, (सहुमा) सूक्ष्म-स्थावर (सयत लोए) सम्पूर्ण छोकमें (एति ) विद्यमान है-रहते है-और पे (नियमा) नियमसे (मतमुहुघाउ ) अन्तर्व आयुष्यवाछे होते हैं, क्या ( अदिस्सा) अदृश्य है-आँखसे देखनेमें नहीं आते ॥ १४ ॥ भाषाप-प्रत्येक वनस्पतिकायको छोड़कर पृथ्वीकाय आदि पाँचों ही सूक्ष्म-स्थावर सम्पूर्ण लोकमें भरे पड़े हैं उनकी भायु भन्तमदर्तकी होती है तथा वे इतने छोटे है कि आँख सम्हें नहीं देख सकती प्र०-अन्तर्महुर्त किसे फहसे हैं? उ०-नय समयसे लेकर, एक समय कम, दो पड़ी जितना काल अन्तर्मु पूर्व कहलाता है नय समयोंका भन्तर्महुर्त सबसे छोटा अर्थात् अपन्य है। और, दो पनीमें एक समय कम हो, तो पह अन्तर्मुहर्त उस्कृष्ट है। पीचके काठमें, नव समयसे आगे, एक एफ समय पड़ाते जाय तो, उस्कृष्ट भन्तर्मर्स तक, असंस्य अन्तर्मर्त होते है प्र०-समय किसे कहते है। उ-उस सम्म काठको, जिसका कि सर्वज्ञकी रहिमें मी विभाग न हो सके म०-मुहर्त किसे कहते हैं? To-दो घड़ी अर्थात् मन्तालीस मिनिटोंका मुहूर्त होता है विशेप-प्रत्येफयनस्पतिकाय नियमसे चादर है, पाँच स्थापर, सूक्ष्म और पावर दो तरहके हैं, सयको मिलाकर ग्यारह मेद हुये; ये ग्यारह पर्याप्त और अपर्याप्तरूपसे दो तरहके हैं, इस तरह स्थावरजीयके वाईस मेद हुये प्र०-पर्याप्त-जीव किसे कहते हैं? उ.--जो जीप अपनी पर्याप्तियों पूरी कर चुफा हो, उसे म०-अपर्याप्त-जीय फिसे करते हैं? To-जो जीष अपनी पर्याप्तियों पूरी न कर चुका हो, उसे प्र०-पर्याप्ति किसे कहते है? उ०-जीवकी उस सफिको-जिसके द्वारा जीव, आहारको ग्रहण कर रस, पारीर और इन्द्रियोंको यनाता है तथा योग्य पुगताको प्रहण कर श्वासोपहास, भापा और मनको बनाता है सख-कवड्य गड्डुल, जलोय-चदणग-अलस-लहगाई। मेहरि किमि-पयरगा, घेइदिय माइवाहाई ॥१५॥ (संस) शह दक्षिणायन आधि, (फवड्य) कपर्दफ-कौड़ी, (गदुल) गण्डोल पेटमें जो मोटे कृमि गंदोला पैदा होते है, (जलोय) जलीफा-मोक, (पदणग) चन्दनक-अक्ष-जिसके निर्जीय शरीरको साधु लोग स्थापनाचार्यमें रखते है, (अलस ) भूनाग अलसीया जो वर्षा भतुमें सौंप सरीखे लंघे लाल रगके जीव पैदा होते हैं, ( लहगाई ) लहक-लाली यक-जो पासी रोटी आदि अन्नमें पैदा होते हैं, (मेहरि) काष्ठके फीडेट्ट, (किमि ) कृमि-पेटमें, फोरेमें तथा यवासीर मादिमें पैदा होते हैं, (पूअरगा) पूतरफ-पानीके कीडे, जिनका मुंह काला मौर रंग छाल पा श्वेत-प्राय होता है, भावार्थ-जिन वनस्पतियों के एक शरीरमें एक जीप हो अर्थात् एक शरीरका एक ही जीष, स्वामी हो, उन धन स्पतियों को प्रत्येक-वनस्पतिफाय समझना चाहिये। प्रत्येक वनस्पतिकाय जीवके सात मेद है-फल, पुप्प, छाल, काठ, मूलियाँ, पसे और पीज पत्तेय तरु मोनु, पचवि पुयाइणो सयललोए । मुटुमा इपति नियमा, अतमुलुत्ताउ अघिस्सा ॥१४॥ (पधेर्य तरु) मस्येक-यनस्पसिकायको (मोच) छोड़कर, (पंचवि) पाँचों ही (पुरयाणो) पृथ्वीकाय आदि, (सुरमा) सूक्ष्म-स्थावर (सयठ छोए) सम्पूर्ण लोफमें (हर्षति ) विधमान है-रहते हैं-और (नियमा) नियमसे (अंतमुहुचाउ) अन्तमार्त आयुष्यषाले होते हैं, क्या ( अहिस्सा) महश्य है-ऑससे देलनेमें नहीं आते ॥१४॥ मापार्य-प्रत्येक घनस्पतिकायको छोड़फर पृष्पीकाय आदि पांचों ही सूक्ष्म-स्थावर सम्पूर्ण लोकमें भरे पड़े हैं उनकी मायु अन्सद्वर्तकी होती है तथा ये इसने छोटे हैं कि भाँस उन्हें नहीं देख सकसी Ho-अन्तमुहर्त किसे कहते हैं। उ०-नय समयसे लेकर, एक समय फम, दो धरी जितना फाल अन्तर्मु इत कहलाता है नय समयोका अन्तर्महुर्त सबसे छोटा अर्थात् जघन्य है। और, दो घड़ी में एक समय कम हो, तो यद मन्तर्मुर्त उस्कृष्ट है। भीषफे काठमें, नव समयसे आगे, एक एक समय बढ़ाते जाय तो, उस्कृष्ट अन्तर्मुहुर्त तक, मसंख्य अन्तर्महर्व होते है म०-समय किसे कहते है। उ०-उस सूस्म काठको, जिसका कि सर्वशकी दृष्टिमें भी विभाग न हो सके.

जो शर और पायसमें पैदा होती है, (ईदगोवाई) इन्द्रगोप-जो घपोमें लाल रंगका जाय पदा होता है जिसे पंजाबी पीजन्होटी, और गुजराती गोफलगाय कहते है-मारयारमें मम्मोलाफ० इत्यादि (वेईदिय) श्रीन्द्रिय जीय है ॥ १७ ॥ भाषा-जिन जीयोंको सिर्फ शरीर, जीभ और नाक हो, उनको प्रीन्द्रिय कहते हैं, ये हैं। कानखजूरा, खट मग, में, चींटी, दीमक, अनाजमें पैदा होनेयाली इली, मकोड़ा, धीमें पैदा होनेयाली लाल कीटी, शरीरमें पैदा होने याठी पर्म , गायके कानमादिमें पैदा होनेयाले की, गोशालामें पैदा होनेयाले जीप, विष्ठाके कीडे, गोयरफे फीमे, मनाज कीड़े, फुल, गोपालिका, शकर भौर बाषउमें पैदा होनेयाले जीव ईली, इन्द्रगोप आदि पउरिदिपा य विच्छ,हिंकण-भमराय ममरिया-तिहा।मच्छिय-उसा-मसगा,फसारी-कविलडोलाई१८ (विप) विफ, (रिडम) बिहण-पुड़साप मादिमें पैदा होता है, (ममरा) भ्रमर-भौरा, (भमरिया) बम रिकापरे, (विडा पचिन ) ममिका-मक्सी, मधुमक्सी, (सा) दंश-रांस, (मसग विडोमई) जीय "मशक- साउमें (माझ्याहाई) माववाहिका-जिसकी गुजरातमें अधिकता है और यहाँके छोग घूरेठ कहते हैं, इत्यादि (वादिय) दीन्द्रिय जीव है ॥१५॥ भाग-जिन जीपोंके स्यचा और जीभ हो, दूसरी इन्द्रियों न हों, ये जीव द्वीन्द्रिय कहलाते हैं, जैसे शंख, काडी, पेटके जीय, ऑक, अक्ष, भूनाग, गालीयफ, फाटकीट, कृमि, पूतरक और मातृयाहिफा आदि गोमी-मकण-जूआ, पिपीलि उद्देहिया य मक्कोडा। इल्लिय-घयमिल्लीओ, सावय-गोकीड जाईओ॥१६॥ गदहय-चोरकीडा, गोमयकीडा य धनकीडा य । कुथु-गुवालिय-इलिया, तेइंदिय इदगोवाई ॥१७॥ (गोमी) गुल्मि-कानसपूरा, (मंकण) मस्कुण-खटमल, (जूमा) यूका-, (पिपीलि) पिपीलिका-चींटी, फाली फीरी (उद्देहियाय) उपदेहिका-दीमक, और (मकोरा ) मत्कोटक-मकोड़ा, (इलिय ) शलिका-ईली, ओ अनाजमें पैदा होती है, (घयमिलीगो) घृतेलिफा-मो धीमें पैदा होती है, छाउकीरी (सायय) धर्म-यूका-मो शरीरमें पैदा होती है, जिससे भषिप्यमें अनिष्टकी शकर की जाती है, (गोकीड आईमो) गोकीटकी जातियों अर्यात् पशुओंके कान मादि अघयों में पैदा होनेवाले मोव ॥ १६ ॥ (गदहय ) गर्दमक-गोशाला आदिमें पैदा होनेघाले सफेद रंगके जीव, (चोर कीरा) पोरकीट-विष्ठाके कीये, (गोमयकीरा) गोमयकीट-गोयरके कीड़े, (घनकीराय) धान्यकीट-अनाजके कीरे, मौर (कुथु ) कन्यु-एफ किस्मका कीग, (गुयालिय) गोपालिका-एक किस्सका अप्रसिद्ध जीय, (इलिया) ईलिका- जो शपर और पायलमें पैदा होती है, (इंदगोपाई) इन्द्रगोप-जो पोमें लाल रंगका जायें पैदा होता है जिस पजामा पीसम्होटी, और गुजराती गोकलगाय कहते है-मारपारमें मम्मोलाक० इत्यादि (वेदिय) श्रीन्द्रिय जीव है ॥ १७ ॥ भाषार्थ-जिन जीयोंको सिर्फ शरीर, जीम और नाफ हो, उनको श्रीन्द्रिय कहते हैं, ये ये है।-कानखजूरा, खट मल, में, चीटी, दीमक, अनाजमें पैदा होनेवाली ईसी, मकोड़ा, धीमें पैदा होनेयाली ठाठ कीरी, शरीरमें पैदा होने पाठी धर्म, गायके फानआदिमें पैदा होनेवाले कीड़े, गोशालामें पैदा होनेपाळे जीष, विष्ठाके कीड़े, गोपरके कीडे, मनाजफे फीडे, फुन्धु, गोपालिका, शकर और पापलमें पैदा होनेवाले जीष ईली, इन्द्रगोप आदि चरिदिया य विच्छू,र्दिकुण-भमराय ममरिया तिडा।मच्छिय उसा-मसगा,कसारी-कविलटोलाई१८ (विच्छ) विच्छ, (विफुण ) विण-पुसाय माविमें पैदा होता है, (भमरा) भ्रमर-भौरा, (भमरिया) प्रम- रिफा-घरे, (तिडा) टिड्डी-टीदी, (ममिय) मक्षिका-मक्सी, मधुमक्सी, (संसा) दंश-डांस, (मसगा) मशक- मर (सारी) सारिका-बो उजाड़ अगहमें पैदा होती है, (कषियोलाई) कपिछटोछक-एक किस्मका जीव जिसे गुजराती सम्माफडी कहते हैं, इस्यादि (पारिदिया) चतुरिन्द्रिय जीप ॥ १८ ॥ भावार्थ-पिन जीयोंको शरीर, मीम, नाफ और आँख हो, पे चतुरिन्द्रिय कहलाते हैं, जैसे:-विच्छ, मुनसाउमें पैदा होनेवाला विडण नामक जीप, भमरा, परे, मक्सी, मधुमक्खी, डॉस, मच्छर, टीड़ी, कंसारिका, कपिलरोलक आदि।

पंचिदिया य चउहा, नारय तिरिया-मणुस्स-देवा य। नेरइया सचविहा, नायमा पुढविभेपण ॥ १९ ॥
(पंचिंदिया) पग्नेन्द्रिय बीघ (चरहा) चतुर्भाधार प्रकारके है (नारय) नारकिया, (तिरिया) तिर्यच, (मणुस्स)
मनुष्य (य) और (देवा) देव, (नेरश्या) नैरयिकनरफर्मे रानेवाले जीप (पुठविमेपर्ण) पृषीके मेवसे (सत्तविहा)
सप्तषिधा-सात प्रकारफे (नायपा) बानना ॥ १९॥
भाषा-पधेन्द्रिय जीवके पार मेद है। नारक, तिर्यच, मनुष्य और देव मिन्न मिन्न सात स्थानों में पैदा होनेके
कारण नारक बीव सात प्रकारफे में चन सात स्थानोंके नरकोंफे नाम में है, रकममा, धर्फराप्रमा, पाचकाममा,
पाहममा, पूमममा, तमाममा और तमस्तमम्ममा
"पवेन्द्रिय पीवों में नारफोंके मेद काफर मव चार गापायोंसे पश्चेन्द्रिय, तिर्यश्च और मनुयोफे मेद कहते हैं'
जलयर-घलयर-स्त्रयरा, तिविहा पर्चेदिया तिरिक्खा याससमारमच्छ-कच्छव,गाहा मगराइ जलचारी
(जलयर) जसपर, (पलपर) स्वलचर, (सयरा) सेपर (परिया ) पश्चेन्द्रिय (तिरिक्सा) तिर्यश्च (विविहा)
विविध अर्याद तीन प्रकार है (जछचारी) जलमें रहनेपाछे (सुसुमार) शिशुमार-मुरस, जिसका माफार भैस
बैसा होता है, (मच्छ) मस्स्प-मण्ली, (कच्च्य) कउप कछुआ, (गा) ग्राह-पड़ियाछ, (मगराए) मकर-मगर
मादि है॥३॥

भाषाप-पधेन्द्रिय तिर्ययफे तीन भेद हैं अवघर, स्थलचर और खेपर जलचर जीव ये हैं। सुईस, मछली,
कघुमा, माह, मकर मावि
चउपय-उरपरिसप्पा, मुयपरिसप्पा य थलयरा तिषिहा।गो-सप्प-नउल-पमुहा, घोषवा ते समासेण२१॥
(घलयरा) स्थल पर जीव (तिथिहा) विविध अर्थात् तीन प्रकारफे है, (चतपय ) चतुष्पद-पार पेरसे पलनेषाले,
(चरपरिसप्पा) चरपरिसर्प-गतीसे-पेटसे घसनेवाले (य) और (मुयपरिसप्पा) भुजपरिसर्प-भुजाओंसे चलनेवाले,
गो) गाय, (सप्प) साँप, (नग्ल) नफुल नयलिया (पमुहा) प्रमुख-आदि (ते) वे (समासेणं) समाससे-सहेपसे
(मोघपा) जाननें ॥२१॥
'मापार्ष-जमीनपर पख्नेवाले जीव-जिनको स्थलचर कहते हैं-तीन प्रकार के हैं, (१) धार पेरसे पठनेवाले गाय,
भैस आदि, (२) पेटसे घउनेयाले सर्पादि; (३) भुजामोंसे चलनेवाले नकुल-स्योग आदि । क्रमशः इन तीनोफोठोंको
पतुप्पद, उरपरिसर्प और भुजपरिसर्प कहते हैं
खयरा-रोमय-पक्खी, चम्मयपक्वी य पायदा घेवानरलोगाओ वाहि, समुग्गपक्खी विययपक्खी ॥२२॥
(सयरा) खेघर-आकाशमें उरनेवाले जीय (रोमयपक्सी) रोमअपक्षी (प) और (धम्मयपक्सी) धर्मजपधी
(पायहा) प्रकट है-मसिब है (नरोगामओ) नरठोकसे-मनुप्यठोकसे (बाहि) बाहर (समुग्गपक्खी) समुद्रपक्षी
और (पिययपक्खी) विततपक्षी हैं ॥ २२ ॥

भाया-आकाशमें उसनेया सिर्वच, खेघर कहलाते हैं, उनके दो भेद हैरोमजपक्षी, और धर्मजपधी रोमसे जिनके पड़पने हैं पे रोमजपथी, जैसे-तोता, हंस, सारस आदि चामसे जिनके पापने हैं चर्मजपक्षी, जैसे-चम- गादड आदि जहाँ मनुप्यका नियास नहीं है, उस भूमिमें दो सराके पक्षी होते हैं। समुद्गपक्षी और विससपथी सिकुड़े हुए, जिनके रम्पेके समान पक्ष हों, घे समुन्नपक्षी जिनफे पक्ष फैले हुए हों, घे वितसपी कासाते है सवे जल-थल-खयरा, समुच्छिमा गम्भया दुहा हुति । कम्माकम्मगभूमि, अतरदीवा मणुस्साय ॥२३॥ (स) सप (जलथलतयरा ) जलचर, स्थलचर, और खेघर (संमुभिमा) सम्मूछिम, (गम्मया) गर्मज (बुदा) विधा-दो प्रकारफे (हुति) होते हैं (मणुस्सा) मनुप्य (फम्माफम्मग भूमि) फर्मभूमिज, अकर्मभूमिज (य) और (अवरदीया) अन्तदीपयासी है ॥२॥ भाषार्थ-पहले तिर्ययके तीन मेद कहे-बतचर, स्वतचर, और खेपर ये तीनों दो दो प्रकार के हो-सम् छिम, और गर्भस जो जीय, मा-पापफे बिना ही पैदा होते हैं, वे सममि कालाते है जो जीष, गर्मसे पैदा होते हे वे गर्भज मनुप्यके तीन भेद है, कर्मभूमिज, अकर्मभूमिज, और अम्तरीपनिघासी खेती, व्यापार आदि फर्म-प्रधान भूमिको कर्मभूमि कहते है । इसमें पैदा होनेवाले ममुप्य कर्मभूमिज काठाते हैं। कर्मभूमियाँ पन्दरह है। पांच भरत पोप परवत और पांच महाविदेह अहाँ खेती, व्यापार मादि कर्म नहीं होता उस भूमिको अकर्मभूमि करते हैं, वहाँ पेदा होनेयाळे मनुष्य अफर्मभूमिज कहलाते हैं मकर्मभूमियोंकी संख्या वीस है। यह इस प्रकार:-दाई दीपमें पाँच मेर है, प्रत्येक मेरुके दोनों तरफ अर्यात् उचर तथा दक्षिणकी ओर १ हेमपंत, २ ऐरण्यवंत, हरियर्प, ४ रम्मय, ५ देयकुरु और ६ उचरकुरु, इन नामोंकी छह छ। भूमियों हैं, इन छह भूमियोंको पाँच मेरुओंसे गुणनेपर तीस संख्या होती है अन्तदीपमें पैदा होनेवाले मनुप्य अन्तद्वीपनियासी कहलाते है, मन्तदीपोंकी संख्या छप्पन है, यह इस प्रकार-मरतक्षेत्रसे उतर दिशामें हिमयान् नामक पर्षत है, यह पूर्व दिशामें तथा पश्चिम विधामें लपणसमुद्रता लम्या है, इसकी पूर्व तया पश्चिममें ईशानादियिशिमें दो दो दंष्ट्राकार भूमियों समुद्रके भीतर है, इस तर पूर्व तया पधिमकी पार दंष्ट्रायें हुई। इसी प्रकार ऐरषतक्षेत्रसे उत्तर, शिखरी नामक पर्वत है, यह भी पूर्व तया पश्चिममें समुद्र तक उम्या है और दोनों विशामोंमें दो दो दंष्ट्राकार भूमियों समुद्रफे अन्दर घुसी है, दोनोंकी आठ दंष्ट्रायें हुई, हर एफ दंष्ट्रामें सात सात अन्तींप है, सावको आठसे गुणनेपर छप्पन सस्या हुई विशेष-कर्मभूमि, मकर्मभूमि और अन्वीप, ये सय गई शीपमें है जम्बूद्वीप, धातकीखण्ड और पुष्करपरती पका मापा भाग, इनफो दाई दीप कहते है इस दावीपमें ही मनुष्य पेदा होते हैं तथा मरते हैं, इसलिये इसको 'मनुष्यक्षेत्र' फहवे है, इसका परिमाण पैतालीस लाख योजन है अफर्मभूमि और अन्तद्वीपमें जो मनुष्य राते है, रहें 'युगलिया' कहते हैं, इसका कारण यह है कि स्त्री-पुरुषका युग्म-जोड़ा-साय ही पैदा होता है और उनका मैया हिक सम्पन्ध मी परस्पर ही होता है इनफी ऊँचाई आठसी धनुपकी, और आयु, पन्योपमका असंख्यातों भाग निवनी है पन्दरह कर्मभूमियों, तीस अकर्ममियों और छप्पन अन्तीप, इन सबको मिलानेसे एफसी एक. मनुष्य- " भावार्थ-आकाशमें पड़नेपाले तिर्यश, क्षेचर कराते हैं, उनके दो मेद है-रोमजपपी, और गर्मजपषी रोमसे घिनफे पर बने हैं रोमजपक्षी, वैसे-तोता, हंस पारस आदि घामसे जिनके पड़पने है वे धर्मसपक्षी, जैसे-चम- गादर भावि जहाँ मनुम्मका निषास नहीं है, उस भूमिमें दो तरह के पक्षी होते है। समुद्रपक्षी और विततपक्षी सिफुजे । हुए, जिनके रम्येके समान पाएँ, ये समुनपपी जिनके पास फैले हुए हों, वे चितवपक्षी कहलाते है सो जल-पल-खयरा, समुच्छिमा गम्भया दुहा इति । कम्माकम्मगभूमि, अतरदीवा मणुस्सा य ॥२३॥ (सबे) सव (जउपलखपरा ) जलपर, स्थलचर, और खेचर (संमुष्ठिमा) सम्मछिम, (गम्भया) गर्मज (खुहा) विधा-दो प्रकारके (हुति) होते है (मणुस्सा ) मनुष्य (कम्माकम्मग भूमि) फर्मभूमिज, अमर्मभूमिय (य) और (मंतरदीषा) अम्तीपवासी हैं ।। २ ।। भावार्य--पाले तिर्यम्बके तीन मेद कहे जलचर, स्वलचर, और खेघर ये तीनों दो दो प्रकारके है। सम् छिम, और गर्मज खो बीष, मा पापके बिना ही पैदा होते हैं, वे संहिम कहलाते हैं मो जीप, गर्भसे पैदा होते हैं वे गर्भज मनुप्यके तीन भेद है, कर्मभूमिञ, मकर्मभूमिम, और अन्तदीपनिघासी खेती, व्यापार आदि कर्म-प्रधान भूमिको कर्मभूमि कहते हैं। उसमें पैदा होनेवाले मनुष्य, फर्मभूमिज कहलाते हैं। कर्मभूमियों पन्दरह हैं। पांच मरत पोप ऐरषस और पाँच महाविदेश जहाँ लेती, व्यापार मादि कर्म नहीं होता उस भूमिको अफर्मम्मि कहते हैं, यहाँ पेदा नेपाले मनुष्य अकर्मभूमिज कहलाते हैं, अकर्मभूमियोंकी संख्या वीस है। यह इस प्रकार -पाई सीपमें पांच मेरु है, प्रत्येक मेरुके दोनों तरफ अर्थात् अत्तर सथा दक्षिणकी ओर १ हेमवंत, २ पेरण्यवंत, हरिषर्प, ४ रम्मय, ५ देवफर मौर प एचरकुरु, इन नामोंफी छह छह भूमियों है, इन छह भूमियोंको पाँच मेरुभोंसे गुणनेपर तीस सख्या होती है अन्तहीपमें पैदा होनेवाले मनुष्य अन्तधीपनिवासी कहलाते है, अन्वनीपौकी संख्या छप्पन है, वह इस प्रकार-भरसभेषसे उत्तर दिशा में हिमवान् नामक पर्वत है, यह पूर्व विधामें तया पश्चिम दिशामें लपणसमुद्रक लम्बा है, इसकी पूर्व समा पश्चिममें इशानादिपिशिमें दो दो दंष्ट्राफार ममियों समुद्र के मीतर है, इस वरह पूर्व तया पश्चिमकी चार दवायें हुए इसी प्रकार पेरयसक्षेत्रसे उधर, शिखरी नामक पर्वत है, यह मी पूर्व तथा पधिममें समुद्र तक लम्या है और दोनों विधाओं में दो दो दंष्ट्राकार भूमियों समुद्र के अन्दर भुसी हैं, दोनोंकी माठ ईष्वायें हुई, हर एक दंष्ट्रामें सात सात अम्तीप है, सातको आठसे गुणनेपर छप्पन संख्या हुई विशेष-कर्मभूमि, अफर्ममूमि और मम्तीप, ये पप बार दीपमें है जम्बूदीप, धातकीखण्ठ और पुष्करवरही पका आधा भाग, इनको दाई दीप कहते है इस दाई बीपमें ही मनुष्य पेदा होते हैं तथा मरते हैं, इसलिये इसको 'मनुप्पक्षेत्र' कहते हैं, इसका परिमाण पैशालीस लाल पोषन है अकर्मभूमि और अन्यद्वीपमें सो मनुष्य राते दे, उन्हें 'युगलिया' कहते हैं, इसका कारण या है कि श्री-पुरुषका युग्म-जोगा साथ ही पैदा होता है और उनका वैधा हिफ सम्पन्ध मी परस्पर ही होता है इनकी ऊँचाई आठसौ धनुपकी, और आयु, पस्योपमका असल्पावर्षो माग जितनी है पन्दरण कर्ममूमियों, तीस अकर्मभूमियों और छप्पन अन्तद्वीप, इन सपको मिलानेसे एकसौ एक मनुष्य- मूमियाँ हुए, इनमें पैदा होनेसे मनुष्योंके मी रतने ही मेद हुप, इनफे मी पर्याप्त और अपर्याप्त रूपसे दो भेद है, इसलिये दोसी दो मेद हुए इन गर्मध मनुष्यों के मछ, कफ माविमें जो मनुप्य पैदा होते हैं, वे संमूच्छिम कहलाते हैं सया घे मपनी पर्याप्ति पूरी किये बिना ही मर जाते हैं। इनफे-समष्टिम मनुष्यके-एकसौ एक मेदोंके साथ दोसौ दोको मिलानेसे मनुष्योंके तीनसौ तीन मेद होते है दसहा भवणाहिवई, अट्ठविहा वाणमतरा इति । जोइसिया पचविहा, दुविहा वेमाणिया देवा ॥२४॥ (भषणादिवई ) भषनाधिपति देवना, (दसहा) दशधा वस प्रकारफे हैं, (पाणमंतरा) षानमन्तर देयता, (अट्ठ विहा) अष्टविपा-आठ प्रकारके, (हुति) होते हैं, (ओइसिया) म्योतिप्का-ज्योतिप्क देवता, (पंचयिहा) पञ्चविधा- पाँच प्रकार है और (वेमापिया देवा) वैमानिक देवता, (दुविहा) दो प्रकारके हे ॥ २४ ॥ भावार्थ-भवनपति देवताओं के दस मेद हैं-१ असुरकुमार, २ नागकुमार, ३ सुपर्णकुमार, ४ विद्युतकुमार, ५ अमिकुमार, ५ दीपकुमार, ७ उदपिरमार, विमार, ९ षायुकुमार, और १० स्वनितकुमार वानमन्तर-याणष्य न्तर-देवताओं के माठ मेद है। पिशाच, २ भूत, ५ यक्ष, ४ राक्षस, ५ किलर, ६ किंपुरुप, ७ महोरग, और ८ गान्धर्व वाणव्यम्तर ( कन्दित, महाकनिमम्तर) के ये भी माठ मे ।-१ अणपनी, २. पणपनी, २ इसीयादी, ४ भूतषादी, ५ कोहण, और ८ पता ज्योतिष्क देयताओंफे पाँच मेद हैं। चन्द्र, २ सूर्य, । प्रह, ४ बारा त्रैमानिक देषता दो प्रकारके है।-१ कस्पोपपन्न और २ कस्पातीत कल्प- मर्यात भाचार- नक्षत्र, और 4 तीपरोफे पाँच फल्याणफमें आना-जाना, उसकी रक्षा करनेवाले देयता, 'कस्पोपपन्न कहलाते हैं उक माधारके पालन करने का अधिकार मिहें नहीं है, वे देव, 'कस्पातीव' कहलाते हैं कस्सोपपन्न देवताओंके यारह देवलोक है इसलिये स्थानफे मेदसे उन देवोंके मी पारह मेद समझना चाहिये पारह देय छोक ये हो-१ सौधर्म, २५शान, २ सन कुमार, ४ माहेन्द्र, ५ ब्रह्म, ६ छान्वफ, ७ शुक्र, ८ सहस्रार, ९ आनत, १० माणत, ११ आरण, और १२ अच्युत कल्पातीत देपोफे चौदह मेव । नयमषेयकमें रहनेवाले तथा पाँच मनुचरविमानमें रहनेवाले नवप्रयेयकोंके नाम ये ज-१ सुदर्शन, २ सुप्रपुर, ३ मनोरम, ४ सर्वतोभद्र, ५ पिशाख, ६ सुमनस, ७ सौमनस, ८ प्रियकर, और ९ नन्दि कर पाप अनुसरविमानोंके नाम ये है-१ विजय, २ पैजयन्त, ३ जयन्त, ४ अपराजित, और ५ सर्वार्थसिर अय उक देवों के स्थान-रहनेकी अगह-संक्षेपमें कहते हैं। मेरु पर्वसफे मूलमें समभूतल पुप्पी है, उससे नीचे रदममा नामक मथम नरकका दस एफ लाल अस्सी हजार योजन मोटा है, उसमें तेरह प्रतर हैं, उन प्रतरोंमें घारह आन्तर-स्थान है, मथम और अन्तिम मान्तर-स्थानोंको छोड़कर पाकीके दस मान्तर-स्थानोंमें, हर एकमें, एक एक भयनपति देयोंके निकाय रहते है प्रत्येक निकायमें दक्षिणकी तरफ एक, और उत्सरकी तरफ एफ, ऐसे दो इन्द्र होते है, इस तरह दस निकायोंके वीस इन्द्र हुए पहले कहा गया है कि रसप्रभाका दठ एक लाख अस्सी हजार योजन मोटा है, ऊपर एक हजार और नीचे एफ हजार योजन पप्यीको सोरकर याकी एक लास अठहत्तर जार योजनमें पर्योक तेरह प्रतर हैं जिनमें फि दस प्रकारके भषनपति देव राते हैं, ऊपरफे वधे हुए एक हजार योजनमें सौ योजन ऊपर, और सौ पोजन नीचे छोड़ दिये जानेपर वाकी आठसौ योजन पथे, उनमें माठ व्यस्तर निकाय , प्रत्पेक निकायमें, भषनपति निकायकी तरह, दक्षिणमें एक, और सचरमें एक, ऐसे दो इम्म एते हैं, इस पर आठ व्यन्तर निकायके सोग म्द्र हुप, अपर जो सी पोजन छोर दिये गये थे, उनमेंसे दस योजन ऊपर, और इस योजन नीचे छोड़ दिये जानेपर अस्सी योजन पचे, मनमें आठ मफारके वाणमन्तर देष रहते , प्रत्येक निकायमें पहले की तरह एक दक्षिणमें, और एक सचर में ऐसे दो इन्द्र रहते हैं, इस प्रकार माठ निकायोंके सोछह अन्न ए, दोनों प्रकारके व्यन्वरोफे पश्चीस इन्द्र हुए, इनमें मवन पति के पास रोके मिलानेपर वाषन इन्म हुए भव म्योतिष्क देयोंकी रहने की जगह करते है पहले पोतिक पेयोंकि पाँध मेद कर पुके है, उनके और भी दो मेद , एक 'घर' और दूसरे "मिर', मनुष्य-क्षेत्रमें जो म्योतिष्क देय है, पे पर है, भात हमेशा धूमते रहते है और मनुष्यलोकसे पाइरफे न्योतिप्क देष, स्थिर है अर्थात् उनके विमान एक ही जगा रते हैं, जहाँपर किये हैं पन्द्र, सूर्य, ग्रा, नक्षत्र और वारा, इन पांच ज्योतिष्क देयों में, चन्द्र और सूर्य, इन दोनोंकी इन्द्र-पदधी है अर्षात् ये दोनों, ज्योतिकोंमें इन्द्र कहलाते हैं, दूसरोंको एम-पदवी नहीं है मेरुके सम- भूतल भूससे ऊपर सात सौ नये योबनकी पाईपर वाराोंकि पिमान है, यहाँसे इस योजनकी पाईपर सूर्यका विमान है, पहोंसे अस्सी योभनकी ऊँचाई पर चन्द्रका विमान है, पासि पार योजनकी ऊंचाई पर नक्षत्रों के विमान है, घाँसे सोलह योजनपर दूसरे दूसरे पहोंके विमान है, तात्पर्य यह है कि मेरुके मूलकी सपाट-भूमिसे सातसो नो पोजनके उपर एफसी दस पोजनोंमें ज्योतिप्क देय रहते हैं अप पैमानिक देवोंके स्थान कहते है।-सम्पूर्ण लोक-जिसे त्रिमुयन कहते हैं-उसका माफार पुरुपके समान है, और उसकी उम्माई चौदह राजू है, नीचेकी सात रामुमोंमें सात नरक हैं नामिकी अगह-मध्यमै-मनुष्यलोक है मेरुकी सपाटभूमिसे सातसौ नघे योजनपर ज्योतिप्क देयोंके पिमान है, यहाँसे उगमग एक राजू ऊपर, दक्षिण दिशामें सौधर्म देयक और चचर दिशामें ईशान देयकोक परस्पर मुड़े हुए है। यहाँसे कुछ दूर ऊपर, दक्षिणमें तृतीय देवलोक सनत्कुमार और उधरमें पीया देयठोक माहेन्द्र, एक दूसरेसे उगे हुए है। यहाँसे ऊपर पांचों प्रक्षोक, छठा गन्तफ, सातों शुम, माठाँ सहस्रार ये धार देवलोक, फुछ कुछ मन्तरपर, फमसे एकपर एक, ऐसी स्थितिमें है। यहाँसे कुछ ऊंचाईपर नषयाँ मानत और दसों माणत, दक्षिण और उधरमें, एक दूसरेसे उगे हुए हैं। यहाँसे कुछ ऊँचाईपर, ग्यारहयों मारण मौर धारहवाँ मप्युठ, दक्षिण सपा सधर विशाओंमें, एक दूसरेसे जुड़े हुए हैं प्रयमके माठ देयतोकोंके आठ इन्द्र हैं अर्याद हर एक देयलोकका एक एक इम्बो पर नवर्षे और दस देवगेशकर एक तया ग्यारहवें और बारहवें देयलोकका एफ, इस प्रकार अन्तिम धार देयलोकोंके दो इन्द्र है। प्रथमके माठ मिठानेसे फसोपपन्न पैमानिक देवताओंफे दस इन्द्र हुए पुरुपा कार सोफके गलेके स्थानमें नयनवेयफ हैं, यहाँसे कुछ ऊपर पांच अनुपरपिमान है तोफरूम पुरुपके लछाटकी जगह सिद्धशिला है, जो स्फटिकके समान निर्मठ मर्जुनसोनेकी है, यहाँसे एक योजनपर छोकका अन्त होता है, लोकके मन्तिमभागमें सिर महाराजका निवास है मप तीन मकारके फिस्विपिक देष तया नष प्रकारकेलोकान्सिक देषोंका निया सस्थान कहते है मयम मकारके फिलिपिकोंकी तीन पस्योपम आयु है और वे पहले तया दूसरे देवठोकके नीचे रहते है दूसरे प्रकारके किस्थिपिकोंकी आयु, तीन सागरोपमकी है और वे तीसरे सथा पौये देवलोकके मीचे राते हैं तीसरे प्रकारके फिस्विपिकोंकी आयु तेरह सागरोपम है और ये पाँचवें तथा छठे देषलोकके नीचे राते है ये सब किस्विपिफ देच, पाण्डालके समान, देयोम नीच समझे जाते हैं लोकाम्तिक देव, पांचवें देवलोकके अन्तमें उत्तर-पूर्षादि कोणमें रहते है पौसठ इन्धा-भवनपति देवोंके वीस, व्यन्तरोफे यत्तीस, म्योतिषियोंके दो और वैमानिक देके दस, सबकी , संस्था मिलानेपर इन्द्रोंकी पौसठ संस्या होती है शास्त्र में देयोंके १९८ मेद कहे हैं, उनको इस तरह समझना चाहिये -मषनपतिके दस, पर ज्योतिष्कके पाँच, स्थिर ज्योतिएको पाँच, वायपर रहनेवाले तिर्यक् अम्भक देषोंफे दस मेद, नरकके जीपोको दाल देनेवाले परमापामीके पन्दरह मैद, व्यन्तरफे माठ मेद, पानव्यन्तरफे आठ मेद, किल्लिपियोंके वीन मेद, छोफान्तिकके नष मेद, पारह : देषलोकोंके पारह मेद, नव प्रवेयर्कोफे नय मेद, पाँच अनुचरविमानोंके पाँच मेद, सप मिलाकर ९९ मेद हुए, इनफे मी पर्याप्त और अपर्याप्त रूपसे दो भेद है, इस मकार १९८ मेद देवोंके होते है मनुष्योंके ३०९ भेद पाले का सुके । अप तिर्यचके ५८ मेद कावेर-पाच रस्मस्थावर, पाँध पादरस्थावर, पफ प्रत्येक वनस्पतिकाय और तीन विक- सेन्द्रिय सब मिलकर पौवह हुए। ये पौदह पर्याप्त और अपर्याप्त रूपसे दो मकारफे है, इस वरर अठाईस हुए अस घर, खेघर, तया स्पलपरके तीन मेद:-चतुष्पद, उरम्परिसर्प क्या मुखपरिसर्प, ये प्रत्येक संमूर्णिम मौर गर्मज होनेसे , दस मेद हुए। ये दसों पर्याप्त और अपर्याध रूपसे दो प्रकारफे है, इसलिये बीस मेव हुए, इनमें पूर्वोक अट्ठाइस भेदक मिछानेपर तिर्योंफे ४८ मेद होते हैं। नारक जीपोंके सात मेद कह चुके हैं, वे पर्याप्त क्या अपर्याप्त रूपसे दो सरहके हैं, इस तरह नारक जीयोंके चौदह मेद होते हैं देयोंके १९८, मनुष्योंके ३०५, तिर्योंके ४८ और नारकोंफे १४ मेद, इन सबको मिलानेसे ५१३ मेद, संसारी जीयके हुए। सिमा पनरसभेया, तिस्थ-अतित्थाइ सिद्ध भेएणं । एप सखेवेण, जीवषिगप्पा समक्खाया ॥२५॥ (तिस्य अविस्थाइ सिट भेएर्ण) वीर्य-सिद्ध, अतीर्य-सिर आदि मेदोंसे, (सिला) सिर-जीयोंके (पनरस मेया पन्दरह भेद है (संखेषेणं) सोपसे, (पए) ये-पूर्पोक, (जीयषिगप्पा) मीष-विकल्प-श्रीयोफे मेव, (समक्खाया कहे गये ॥२५॥ भाषार्ष-वीर्य-सिन, मतीर्य-सिर मावि सिद्ध के पन्दरह मेद "नवतस्व" में कहे है, उसे देसलेना चाहिये सहेपमें जीयोंके मेद इस प्रन्यमें कहे गये है (एपर्सि जीवाण, सरीरमाऊ-ठिई, सकायमि । पाणा जोणिपमाण, जेसि ज अस्थि त भणिमो ॥२६॥ (एपनि) इन-पूर्णांक (जीवाण) जीपोंफे, (सरीरं) शरीर-प्रमाण, (आक) आयु:-प्रमाण, (सफार्थमि) स्य-, फाया, (लिई) स्थितिका प्रमाण मर्यात् स्वकायस्थिति-प्रमाण, (पाणा) माण-प्रमाण और (जोणिपमाण) योनि- प्रमाण, (सिं) मिक, ( अस्थि) बिवने हैं, () उसे, (मणिमो) कहते हैं ॥ २६ ॥ मावार्थ-पहले एफेद्रिय आवि जीव कहे गये हैं, उनके शरीरका प्रमाण, आयुका प्रमाण, स्वकायस्थितिका प्रमाण-एकेन्द्रियादि जीयोंका मर कर फिर उसी कायमें पैदा होना, 'स्वकापस्थिति' कहलाता है उसका प्रमाणा माण-प्रमाण-दस प्राणोंमसे अमुक जीयको फितने माण है इसकी गिनती; योनि-प्रमाण-पौरासी लाख योनियों मेंसे फिन किन जीयोंकी कितनी कितनी योनियों है इस विषयकी गिनती ये बातें आगे कही जायेंगी अग्रलमसखमागो, सरीरमेगिदियाण ससि । जोयणसहस्ससहिय, नवर पत्तेयस्क्वाण ॥ २७॥ (सपेसि) सम्पूर्ण (एगिविषाण) एफेन्द्रियोंका (सरीर) शरीर (मंगुलपर्ससमागो) उँगलीफे असंस्थाधवें भाग जिवना है, (नपर) श्वनाविशेपहें लेफिन (पचेयरुक्खाण) प्रत्येकषनस्पतियोका शरीर, (मोयणसहस्समहिय) हजार पोजनसे कुछ मधिक है ॥ २७ ॥ मायार्यसम्म तथा वापर पणीकाय मादि एकेन्द्रिय जीयोंका शरीर-प्रमाण, उंगलीके मसंख्यातर्षे भाग दिखना है, लेफिन प्रत्येक पनस्पतिकायके जीपोंका शरीरप्रमाण, हजार योजनसे कुछ अधिक है। यह प्रमाण समुद्रके पद्मना एका तया डाइबीपसे पाहरकी सत्तामोंका है n

यारस जोयण तिने, व गाउआ जोयण च अणुकमसी।घेइदिय तेइदिय, चउरिदिय देहमुश्चत्त ॥२८॥
(याविय) बीन्द्रिय, (वेदिय) त्रीद्रिय और (परिविय) पतुरिन्द्रिय जीपोंके, (देहमुख) शरीरका प्रमाण,
(मणुकमसो) क्रमसे (पारस जोपण) यार योजन, (तिनेष गाउआ) तीन गम्यूत-तीन कोस-और (जोयणं)
एफ योजन है॥२८॥
भावार्थ-दीन्द्रिय जातिके जीयोंफा शरीर-प्रमाण, अधिफसे अधिक, पारह पोजन हो सकता है, इससे अधिक
नहीं । इसका मतलय फिसी द्वीन्द्रिय आतिसे है, संसहोता है कुछ द्वीन्द्रियोंसे नहीं, ऐसा ही श्रीन्द्रिय जीवोंका
शरीर-प्रमाण कानसमुरा सीन फोस और धतुरिन्द्रिय जीयोंका शरीर-प्रमाण ममरोका एफ योजन है
प्र०-योजन फिसे कहते हैं। उ०~धार कोसका एफ योजन होता है
किसे कहते हैं।
७०-एक कोसको
धणुसयपचपमाणा, नेरइया सत्तमाइपुटवीए । ततो अखणा, नेया रयणप्पहा जाय ॥ २९ ॥
(सत्तमाइ) साती (पुटपीए) पृष्पीफे (नेरइपा) नारफ-जीय, (धणुसयपंचपमरणा) पाँचसी घनुप प्रमाणके
है, (रयणप्पहा जाय) रसप्रमा नामक प्रथम पुप्योतक, (तो) पससे (असणा) माघा २ कम प्रमाण (नेया)
प्र०-गम्यूत
जाणना॥२९॥

मापा-मासयें नरफके जीयोंका शरीर-प्रमाण पाँचसो धनुप, उद्वे नरफके जीयोंका शरीर-प्रमाण वाइसी
प, पापये नरफफे जीवोंका एकसी पचीस घनुप, चौथे नरफके जीयोका साढ़े पासठ धनुप, तीसरे नरफके जीषोंका
कितीम धनुप, दूसरे नरफके जीयोफा साढ़े पन्दरह धनुप और धारह अटुंछ, तथा प्रयम नरफके जीवोंका शरीर
गण पाने माउ धनुष और छह महुल है नारकोंके उत्तरवैक्रिय शरीरका प्रमाण, उक्त प्रमाणसे दुगुना समझना चाहिये
10-धनुषफा प्रमाण क्या है। उ०-पार शायका पफ धनुप समझना चाहिये
ग्णसहस्समाणा, मच्छा उरगा य गन्भया हुति। धणुअपुडुच पक्खिसु, भुयचारी गाउअपहृत्त ॥३०॥
राधणुअपुडुत्त, भुयगा उरगा यजोयणपुडुच।गाउअपुछुत्तमित्ता, समुच्छिमा चउप्पया भणिया ३१
पया) मष्टिम या गर्मज (मछा) मत्स्य-मछलियाँ, (य) और गर्भज (उरगा) सौंप यह अपिफसे
जोयणसहस्समाणा) हमारयोजन प्रमाणयाले (हुंसि ) होते हैं (पक्सिसु) पक्षियोंमें शरीर प्रमाण(धणुम
नुप-धपत्य है तथा (भुयधारी) मुखधारी-मुजाओंसे घलनेयाले (गाउअपुटुच) गम्यूत-पृथक्स्व-प्रमाण
( है।॥ ३०॥
छमा) मम्मठिम (सयरा) खेघर जीय (भुयगा) और भुजाओंसे पलनेयाले जीव (धणुअपूत) धनुप
--प्रमाणयाले होत है (य) और (उरगा) सौंप मादि (जोयण पुरुच) पोजन-पुपक्य शरीर-प्रमाणफे
(पउप्पया) चतुप्पद जीय (गाठअपहुचमिया) गम्यूस-ग्यवस्थमात्र (भणिया) कहे गये है ॥ २१ ॥

भाषा-समुग्छिममोर गर्भज मत्स्य और गर्मज सर्पका शरीर-मान एक हजार योजनफा है। इस प्रकारफे
मत्स्य स्वयम्भूरमण समुद्रमें होते हैं तथा सर्प मनुष्य-क्षेत्रसे बाहर होते हैं गर्भज पक्षियोंका शरीर-मान धनुप-
पृथक्स्य है अपात् दो धनुषसे लेकर नय धनुप तक है गर्मज म्योला, गोह आवि भुजपरिसर्प जीयोंका शरीर-मान,
गम्यूत-गधपत्य है अर्थात् दो कोससे लेकर नय कोस तक है
सम्मठिम खेचर तथा भुजपरिसर्प जीयोफा शरीरमान, धनुष-गृथक्रय है सम्मम्छिम उर परिसर्प जीयोंका शरीर-
मान, योजन-पृययस्य है सम्मम्छिम चतुप्पद-चार पैरयाले-जीयोंका शरीर-मान गव्यूत-पृथक्स्व है
म०-पृथक्स्य किसको कहते है। उ०-दोसे लेकर नय तफकी संख्याको पृथक्स्व कहते हैं
छच्चेव गाउआइ, चउप्पया गन्भया मुणेयवा । कोसतिग च मणुस्सा, उक्कोससरीरमाणेण ॥ ३२॥
(पठप्पया गम्भया) चतुप्पद गर्भजोंका शरीर-मान (छयेय गाउमाई) छह फोसका (मुणेयवा) जानना (प)
और (मणुस्सा ) मनुप्य ( उफोससरीरमाणेणे) उत्कृष्ट शरीरमानसे (कोसतिगं) तीन कोसके होते हैं ॥ २२ ॥
भावार्थ-देयफुरु आदि क्षेत्रोंमें चतुप्पद गर्भज हापीका शरीर-मान छह कोसका है तथा ऐयफुरु आदिके युग-
लीया मनुप्योके शरीरकी ऊँचाई, अधिफसे अधिक तीन कोसकी होती है
ईसाणत सुराण, रयणीओ सच हुति उच्चत्त । दुग-युग-युग-चउ-गेवि, वणुत्तरे इकिक परिहाणी॥३३॥

(ईसाणत) ईशानाम्त-शान देवलोक-तकफे (सुराण) देवताओंकी (चर्च) ऊँचाई (सच) सात (स्यणीमो) रसि-आय (हुति) होती है। (दुग-दुग-दुग-घर गेविजणुचरे) दो, दो, दो, चार, नवप्रेषेयक और पाँच अनुत्तरवि मानोंके देयोंका शरीर-मान (इपिक परिहाणी) एक एक हाथ कम है ॥१३॥ भावार्थ-दूसरा देवलोक, ईशान है, यहाँक देवोंका तया भवनपति, व्यस्तर, न्योतिपी और सौपर्म देषोंका शरीर सात हाय ऊँचा है। सनत्कुमार और माहेन्द्र के देवोंफा शरीर छह हाय ऊँचा है। ब्रह्म और छाम्तकके देवोका पाँच हापा शुक्र और सहस्रारके देयोंका चार हाथी आनत, प्राणत, आरण और मच्युत इन पार देवलोकोंके देषोंका तीन हाया नयनवेयकफे देवोंका दो हाथ और पाँच मनुचर विमानवासी देवोंका एक हाय ऊँचा है यहाँ जीपोंका शरीर-मान सत्सेपालसे समझना चाहिये म०-उस्सेघाहुल क्सिको कहते हैं। ४०-आठ पोंका एफ उरसेपाछ होता है वावीसा पुढवीए, सत्चय आउस्स तिन्नि याउस्स।वास सहस्सा दस तरु, गणाण तेऊ तिरचाऊ ॥३४॥ (पुरषीए) पृप्वीकाय मीयोंका आयु (वाषीसा) वाईस हजार पर्पका है (मानस्स) अपफाय जीवोंका आयु (सचय) सात हजार पर्पका (पारस्स) वायुकाय जीपोंका आयु (तिनि) तीन हजार पर्पका (तरुगणाण) प्रत्येक वनस्पतिकायके जीप-समुदायकी आयु (वास सहस्सा दस) पर्पसहस्र-पश मर्यात् दस एजार वर्षका (क) तेज- काय जीवोंका (तिरचाक) तीन अहोरात्रका आयु है।॥ १४॥ E

+
भाषा-गप्वीकाय जीयोंका अधिफसे अपिक आयु-उस्कप्ट आयु-भाईस हजार पर्पी अपफाय जीपोफा आयु
सात हजार पर्प यायुकाप जीयोका तीन इमार पपी मस्पेक घनस्पतिकाय मीयोंका दस हजार पर्प और रोजाफाय
जीयोका तीन ओराम आयु है यह तो हुई उस्कृष्ट आयु, लेकिन अपम्य आयु सपका अम्तमदर्तका है
यासाणि पारसाऊ, पिइदियाण तिइदियाण तु । अउणापन्न दिणाइ, चउरिवीण तु छम्मासा ॥३५॥
(पिदियाणे) दीन्द्रिय जीयोका (आठ) आयु (पारस) पारह (पासाणि) घर्पका है, (तिवियाण तु) श्रीन्द्रिय
जीयोंका सो (मरणा पर विणाइ) ग्नपास विनका आयु होता है (चररिंदीणं तु) और चरिंन्द्रिय जीयोका आयु
(अम्मासा) छह महीनेका है ॥ १५ ॥
मापार्य-दीन्द्रिय जीयोका उत्कृष्ट आयु पारह यर्पका, त्रीन्द्रियोंका उनधास विनका और धतुरिन्द्रियका छए
महीनेका है यह सपका उत्कृष्ट आयु है, जघम्य आयु अन्तर्मर्वका समझना चाहिये
सुरनेरइयाण ठिई, उफोसा सागराणि तित्तीसं । चउपय तिरिय-मणुस्सा, तिनिय पलिओवमा हुति ॥
(सुर-रायाण) देय और नारफ जीयोंका (कोसा) उस्कृष्ठ-अधिकसे अधिक (ठिई) स्थिति-आयु (सागराणि
तिचीस) तेत्तीस सागरोपम है, (परपय-सिरिय) चार पैरपाले तिर्यघ और (मणुस्सा) मनुष्योंका आयु (सिनिय)
तीन (पलिमोपमा) पत्योपम (हुंति ) है ॥ २६ ॥

(ईसाणत) ईशानाम्त-ईशान देवलोक-वफके (मुराणं) देवतामोंकी (उच) ऊँचाई (सच) सात (रयणीमों
रमि-हाय (इंसि) होती है। (युग-युग-युग-पर गेविजणुचरे) दो, दो, यो, चार, नषगैयेयक और पाँच अनुचरवि
मानोंके देवोंका शरीर-मान (इकिक परिहाणी) एक एक हाथ कम है ॥१३॥
भावार्थ-दूसरा देवलोक, ईशान है, यहाँके देवोंका तया भयनपति, व्यस्तर, ज्योतिपी और सौपर्म देवोंका शरीर
सास हाथ ऊँचा है। सनत्कुमार और माहेन्द्र के देयोंका शरीर छह हाथ ऊँचा है। ब्रह्म और छाम्तकके देवोंका पार
हाय, शुक्र और सहस्रारके देवोंका चार हाया आनत, प्राणत, आरण और अच्युत इन चार देवलोकोंके वेषोंका सीन
हाथ नषप्रेयेयकके देयोंका दो हाय और पाँच अनुचर विमानवासी देवोंका एक हाथ ऊँचा है
यहाँ जीपोंका शरीर-मान उत्सेघालसे समझना चाहिये
प्र०-उत्सेधाकुरा क्सिको कहते हैं। उ०-आठ ययोंका एफ उस्सेपामुछ होता है
पापीसा पुरवीए, सत्तय आउस्स सिन्नि वाउस्स।वास सहस्सा दस तरु, गणाण तेजतिरचाऊ ॥३४ ।
(पुरषीप) पृष्यीकाय जीवोंका मायु (यावीसा) पाईस हजार वर्षका है (आउस्स) अप्काय जीवोंका माइ
(सत्य) सात हजार पर्पफा (पारस्स) षायुकाय जीवोका आयु (सिसि) तीन हजार पर्पका (तरुगणाण) प्रत्येक
वनस्पतिकायफे मीय-समुदायकी आयु (वास सहस्सा वस) पर्पसहन-दश अर्यात् वस हजार वर्षका (वेक) तेजः
काय जीयोंका (तिरघाऊ) सीन महोरात्रफा आयु है ॥ १४ ॥

भाषा-पृथ्वीकाय जीपोंका अधिकसे अधिक आयु-उत्कष्ट मायु-वाइस हजार घर्फी भएकाय जीपोंका मायु
सात हजार यर्प, पायुकाय जीयोका तीन हजार पर्पी प्रत्येक पनस्पतिकाय जीयोंका दस हजार यर्प और वेजकाय
जीयोंका सीन अहोरात्र आयु है यह छो हुई उस्कृष्ट आयु, लेकिन अघम्य आयु सपका अन्तर्मुका है
वासाणि यारसाऊ, विइदियाण तिइदियाण तु । अउणापन्न दिणाइ, चउरिवीण तु छम्मासा ॥३५॥
(पिइवियाणं) द्वीन्द्रिय जीयोका (आर) मायु (पारस) यारह (यासारण ) घर्पका है, (तिईदियाण तु) त्रीन्द्रिय
जीयोका तो (अउणा पनि विणाइ) बनधास दिनका आयु होता है (चरिंदीणे तु) और परिन्द्रिय जीयोका मायु
(म्मासा) छह महीने का है ॥३५॥
भावार्थ-मीन्द्रिय जीयोंका उत्कृष्ट मायु पारह वर्पका, श्रीन्द्रियोंका सनघास विनका और पतुरिन्द्रियका छह
महीनेका है यह सपफा उस्कृष्ट आयु है, जघन्य आयु अन्तर्मका समझना चाहिये
सुरनेरइयाण ठिई, उफोसा सागराणि तित्तीस । चउपय तिरिय-मणुस्सा, तिन्निय पलिओवमा हुति ॥
(सुर नेरयाण) देय और नारक जीयोका (उकोसा) उस्कृष्ट अधिकसे अधिक (ठिई ) स्थिति-मायु (सागराणि
तिचीस) तेतीस सागरोपम है, (चवपप-तिरिय) चार पैरपाले तिर्षच और (मणुस्सा) मनुष्योंका आयु (तिप्लिय)
तीन (पलिमोयमा) पस्योपम (इंति ) है ॥ २६ ॥

भाया-देय और नरकयासी जीप, अधिफसे अधिक, तेतीस सागरोपम सफ मीते हैं और चतुप्पद सिर्यश्च तथा मनुष्य तीन पत्योपम तक ये विर्यय तथा मनुष्य देयकुरु आदि क्षेत्रोफे समझना चाहिये देव वमा नारफ मीयोंका अपन्य आयु कमसे कम मायु-दस हमार पर्पका है। मनुष्य तया तिर्यच बीयोंका जघन्य आयु, मम्तर्मुहर्वका है जलयर-उरभुयगाण, परमाऊ होइ पुषकोडीऊ । पक्खीण पुण भणिओ, असखभागो अपलियस्स ३७ (जलयर-उरभुयगाणे ) जलधर, उरम्परिसर्प और मुजपरिसर्प जीयोंकी (परमाऊ) उस्कृष्ट आयु (पुपकोठीक) एक करोड़ पूर्व है, (पफ्सीण पुण) पक्षियोंकी आयु तो (पलियस्स) पत्योपमका (मसंखभागो) असंख्यावर्षों भाग जितनी (भणिमो) कहा है ॥ ३७॥ भावार्थ-गर्भज और सम्मूरिछम ऐसे दो प्रकारके जलघर जीयोंका तथा गर्भज, तर परिसर्प और भुजपरिसर्प जीयोफी उत्कृष्ट आयु एक करोड पूर्व है। गर्भस पक्षियोंका आयु पल्पोपमका असंख्यातयाँ भाग जिवना है सद्ये मुट्ठमा साहा-रणा य, समुच्छिमा मणुस्सा य । उक्कोस जहन्नेणं, अतमुलुत्त चिय जियति ॥ ३८॥ (स) सम्पूर्ण (मुहमा) पृथ्वीकाय आदि सूस्म (य) और (साहारणा) साधारण वनस्पतिफाय (य) और (समुच्छिमा मणुस्सा) समूरिज्म मनुष्य (चकोस जहण) नरकृष्ट और जघन्पसे (अंतमु चिय) अम्तमुहर्त ही : (मियंति) पीते हैं ।। ३८ ॥

मायार्प-सूक्ष्म पृथ्वीकाय आदि जीप, सूक्ष्म और पादर साधारण यनस्पतिकायके जीष और सम्ममि मनुष्य, उत्कर्षसे और अपन्पसे सिर्फ अन्तर्मुस तफ जीते हैं प्रम-पस्योपम किसको कहते है। उमसंख्य पर्पोका एक पत्योपम होता है म०-सागरोपम किसे कहते है। उ०-दस कोड़ा कोड़ी पस्योपमफा एक सागरोपम होता है म०--पूर्व किसको कहते है। उ०-सप्तर लाखकोर, छप्पन हजार करोर पोका एक पूर्व होता है ओगाहणाउमाणं, एव सखेचओ समक्खायं । जे पुण इस्थ विसेसा, विसेस सुचाउ ते नेया ॥३९॥ (पर्य) इस प्रकार (ओगाहणाउमाण) अपगाहना-शरीर और आयुका मान (संनेयभो) सोपसे (समक्खार्य) कहा गया (जे पुण इत्य) यहाँ जो घातें (विसेसा) विशेष है, (विसेस सुचार) विशेष सूत्रोंसे (वे) उनको (नेया) जानना ॥१९॥ भावार्थ-देह-मान तथा मायु-मानके पिपयमें विशेष पाते बानना हों, तो "संग्रहणी," "प्रज्ञापना" आदि सूबोसे जानना चाहिये पगिदिया य सवे, असंख उस्सप्पिणी सकायमि । उवयजति चयतिअ, अणतकाया अणताओ ॥४०॥ (सपे) सप (पर्गिविया) एकेन्द्रिय जीप (असंख उस्सप्पिणी) असंख्य उत्सर्पिणी वया अवसर्पिणी तक (सका यमि) अपनी फापामें (उपधजति ) नस्पन्न होते है (अ) और (चयति ) मरते (अर्णतकाया) अनम्तकाय जीव (मर्णसामो) अनम्त उस्सर्पिणी तया अवसर्पिणी तक ॥ ४॥ भाषार्थ-पप्पी, अप, सेज, वायु और प्रत्येक घनस्पतिकायके जीप, उसी पृथ्वी आदिकी अपनी काया, असंस्य पस्सर्पिणी-भषसर्पिणी तक पैदा होते तथा मरते है। अनम्तकापके जीप तो उसी अपनी कायामें अनन्त उस्सर्पिणी- अषसर्पिणी तक पैदा होते तथा मरते है म०-उत्सर्पिणी किसको कहते हैं। To-दस कोड़ा कोडी सागरोपमकी एफ उत्सर्पिणी तथा उतनेकी ही एक अपसर्पिणी होती है सखिजसमा विगला, सत्तट्ठ भवा पणिदि तिरि-मणुया। उववज्जति सकाए, नारय देषा अनो चेष ॥४१॥ (विगा) विकलेम्ब्रिय जीप (सखिजसमा) संख्यात हमार वर्षों तक (सकाए) अपनी काया (ज्यवर्जति) पैदा होते हैं, (पणिदि-तिरि-मणुया) पधेन्द्रिय तिर्यश्च और मनुष्य (सचठ्ठ भषा) सात-आठ भय तक, लेकिन (नारय देषा) नारफ और देव (नो घेव) नहीं ॥४१॥ भावार्थ-सीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीव, स्वकायामें संख्याच हजार वर्षांतक पैदा होते तथा मरते हैं। पवेन्द्रिय तिर्यक्ष तथा मनुष्य जगातार साव तपा आठ मय करते है अर्थात् मनुष्य, उगातार सात-आठ वार, मनु प्य-पारीर धारण कर सकता है, इस प्रकार पक्षेन्द्रिय तिर्यक्ष मी कोन देयवा खया नारक जीप मरकर फिर तुरम्त

अपनी योनिमें नहीं पैदा होते अर्थात् देष भरकर फिर सुरन्स देययोनिमें नहीं पैदा हो सकता । इस प्रकार नारक जीप
भरकर तुरन्त नरफमें नहीं पैदा होता । हो एक दो अम्म दूसरी गसियोंमें विताफर फिर देय या नरक-योनिमें पैदा
हो सकते है इसी तरह देव मरफर सुरन्त नरफयोनिमें नहीं आता और नारक जीय मरकर सुरन्त देव-योनिमें नहीं
पैदा हो सकता
दसहा जियाण पाणा, इदि-उससाउ-जोगयलरूवा। एगिदियसु चउरो, विगलेख छ सत्त अटेव ॥४२॥
(मियाण) जीपोंको (सहा) इस प्रकारफे (पाणा) माण होते हैं। (इदि-उसासाउ-जोगपस्या) (प) इन्द्रिय,
पासोपछास, आयु और पोगयतरूम, तीनवड (पर्गिदिएस) एकेन्द्रियोफो (पपरो) चार प्राण है, (विगलेस) विक
छेन्द्रियोंको ( सच भडेय) छह, सास और आठ ॥ ४२ ॥
मापार्ष-माणों की संख्या दस है। पाँच इन्द्रियों, श्वासोमास, भायु, मनोवल पचनपल और फायपर इन दस
प्राणोंमेसे चार-स्पषा, श्वासोच्यास, आयु और कायबल एकेन्द्रिय जीयोंको होते , दीन्द्रिय जीयोंको छह माण-
स्थपा, रसना (जीम), श्वासोच्छ्वास, मायु, कायपल और पचनपल श्रीन्द्रिय नीयोंको सात माण-स्यषा, भीम,
नाक, श्यासोवास, आयु, कायपल और पचनपल चतुरिन्द्रिय जीवोको माठ माण-पूर्योफ साव, और आँख
असग्नि-सन्नि-पचिं, दिपसु नव दस कमेण षोधछा। तेहिं सह पिप्पओगो, जीवाणं मपणए मरण॥४३॥

(असभि-सग्नि-पंपिंदिपस) असंझी पवेन्द्रिय सया संझी पवेन्द्रिय मीयोंको (फमेण) क्रमसे (नव दस) नव
र दस प्राण (वोधषा) आणना (वेहिं सह) उनके साप (विप्पओगो) विप्रयोग-वियोग, (जीवाणं) जीपोंका
रणं) मरण (भण्णए) कहलाता है ॥४३॥
भावार्थ-असंझी पधेन्द्रियोंको स्वचा, जीम, नाक, माँख, कान, यासोच्शस, मायु, कायपल और पचनवल ये
|माण होते है और संशी पञ्चेन्द्रियोंको पूर्वोक्त नप और मनोवल, ये दस माण होते हैं जिनको जिवने प्राण कहे
उन माणों के साय वियोग होना ही उन जीवोका मरण कहलाता है देव, नारफ, गर्भज तिर्यध तथा गर्मज
पे संझी पश्चेन्द्रिय कहलाये हैं सम्मठिम तिर्यग्ध और सम्मठिम मनुष्य, मसंझी पश्चेन्द्रिय कराते है
मनुप्योंको मनोवल और पाक्षत नहीं है, इसलिये उनके आठ प्राण, और, यांसोशास पर्याप्ति पूर्ण न
कारण सादा सात प्राण होते है
• अणोरपारे, ससारे सायरमि भीममि । पत्तो अणतखुत्तो, जीवहिं अपत्तधम्महि ॥ ४४ ॥
भपतघम्मेहिं) नहीं पाया है धर्म जिम्होंने ऐसे (बीवेटिं) जीयोंने (मणोरपारे) आर-पार-रहित-आदि-
त-रहित (मीममि) भयहार (संसारे सायरमि) संसाररूप समुद्र में (एवं) इस प्रकार-माण-वियोग-कम मरण
पर्णतखुचो) अनन्त पार (पयो) प्राप्त किया ॥४४॥

मापार्य-संसारफा मारि नहीं है, न मन्त है। अनन्तवार जीप मर चुके है और आगे मरेंगे मुदयसे यदि उन्हें
धर्मफी प्राप्ति हुई तो जन्म-मरणसे छुटकारा होगा
तह चउरासी लक्खा, सखा जोणीण होइ जीपाण । पुरवाईण चउण्ड, पचेय सत्त सत्तेव ॥ ४५ ॥
(जीपार्ण ) जीयोकी (ोणीण) योनियोंकी (संसा) सङ्ख्या (परासी छमता) चौरासी लास (होर) है (पुर-
पाण धरई) पृथ्वीफाय आदि चारकी प्रत्येककी योनि-सहमा ( सच सधेप) सात सात छाख है ॥ ४५ ॥
भाया--जीपोंफी चौरासी लास योनियों हैं, यह पात प्रसिन । उसको इस प्रकार समझना चाहिये-पृप्वीका
नकी सात लाख, अपफायकी सात लाख, वेजाकायकी सात लाख और पायुकायकी सात लाख योनियों है। समको
मेला कर अट्ठाईस पास हुई
म०-योनि फिसको कहते हैं। उ० पैदा होनेवाले जीयोंके जिस उत्पधि-स्थानमें धर्ण, गन्ध, रस और
पर्दा, ये पारों समान हो, उस उत्पधि-स्थानको उन सब बीयों की एक योनि कहते है
इस पत्यतरुण, चउदस लक्खा हवति इपरेस। विगलिंदियेम दो दो, चउरो पर्चिदितिरियाण ॥४६॥
(पत्तेयतम्णं) प्रत्येक वनस्पतिकायकी (दस) दस लाख योनियाँ है, (इपरेसु) प्रत्येक पनस्पतिकायसे इतर-सा
पारण पनस्पतिफायकी (परदस एफ्ला) चीवर लाख (पति) हैं, (विगलिंविपस) विफलेन्द्रियोंकी (दो दो) दो
दो लाख है, (पपिवितिरियाणं ) पधेन्द्रिय तिर्यचौकी (धरो) चार लाख हैं ॥ ४ ॥

मापा प्रत्येक पनस्पतिफायफी दस छाखा साधारण वनस्पतिकायकी चौदह लासा द्वीन्द्रियकी दो छाला श्रीन्द्रिपफी दो शाखा पतुरिन्द्रियकी दो लाख और पञ्चेन्द्रिय तिर्योंकी पार लाख योनियों है चउरो चउरो नारय, सुरेसुमणुआण चउदस हवति।संपिडियाय सधे, चुलसी लक्खाउ जोणीण॥४७॥ (नारय मुरेस) नारफ और देषोंकी (चरो घरो) घार चार लाख योनियाँ हैं (मणुमाण) मनुष्योंकी (पर- दस) चौदा लाख (हयंति), (सपे) सव (संपिरिया) श्ठी की जायें-मिलाई जायें सो (जोणीणे) योनियोंकी साया (घुउसी लक्सान) पौरासी लाख होती है ॥४७॥ भावार्थ -नारक जीयोंकी चार छाख, देवोंकी चार लाख और मनुष्योंकी चौदह छाख पोमियाँ है योनियोंकी सव संस्था मिलानेपर चीरासी ठास होती है सिद्धाण नत्यि देहो,न आउ कम्मन पाण जोणीओ।साइ-अणता तेसिं,ठिई जिणिंदागमे भणिया॥४८॥ (सिद्धाण) सिद्ध जीयोंको (देहो) शरीर (नस्थि) नहीं है, (न मार कम्म) आयु और कर्म नहीं है, (न पाण सोणीओ) माण और योनि नहीं है, (वेसिं) उनकी (लिई) स्थिति (साइ अणंता) सादि और अनन्त है। यह पात (जिणिंदागमे ) बैन सिद्धान्तमें (भणिया) कही गई है ॥४८॥ भावार्ष-सिख जीयोको पारीर नहीं है इसलिये आयु और कर्म मी नहीं है, मायुके न होनेसे माण भौर योनि मी नहीं है, माणके न होनेसे मृत्यु मी नहीं है। उनकी स्थिति सादि-अनन्त है अर्पात् जय पे छोकके अभभागपर अपने स्वरूपमें स्थित हुए, यह समय उनकी स्वम्म-स्थितिका मादि है तथा फिर यहाँसे प्युत होना नहीं है इसलिये स्वरूप-स्थिति अनन्त है। यह पात जैन सिद्धान्तमें कही गई है ॥४८॥ काले अणाइनिहणे,जोणीगहणमि भीसणे इत्या भमिया भमिहिंति चिरं,जीवा जिणवयणमलहता १९ । (मणाइ निहणे) आदि और अम्त रहिव अर्यात् अनादि-अनन्त (काले) काठमें (मिणधयणं) जिनेन्द्र भगया नफे उपदेशरूप पचनको (अठांता) न पाये हुए (जीया) जीया (अोणी गहणमि) योनियोंसे फ्लेवरूप (मीसणे) भयङ्कर (इत्य) इस संसारमें (चिर) बहुत काल तक (ममिया) भ्रमण कर चुके और (ममिहिंति ) भ्रमण करेंगे भावार्थ-चौरासी लाख योनियों के कारण पुखिदायक तया भयङ्कर इस ससारमें, जिनेन्द्र भगवान्फे यतलाये हुए मार्गको न पाये हुए जीय, मनादि काउसे जन्ममरणके चकरमें फंसे हुए है तथा अनन्त कालतफ फंसे रहेंगे ता संपइ सपने, मणुअचे दुलहे वि सम्मत्ते । सिरिसतिसूरिसिढे, करेह भो उज्जम धम्मे ॥ ५० ॥ (ता) इसलिये (संपह) इस समय (दुराहे) दुर्लभ (मणुमचे) मनुजत्व-मनुष्यजन्म और (सम्मचे) सम्यक्त्व (सपो) प्राप्त हुआ है तो (सिडे) शिष्ट-सजन पुरुषोंसे सेपित ऐसे (धम्मे) धर्ममें (मो) अहोभव्यप्राणियो!: उजर्म) उधम-पुरुपापं (करेह) करो, पेसा (सिरिसंतिसूरि) श्रीशान्तिसूरि उपदेश देते हैं ॥ ५० ॥ भाषा-जप फि ससार भयङ्कर है और चौरासीलास पोनियोंके फारण उससे पार पाना मुश्किल है और - ) उचित साममी-मनुष्य-जन्म और सम्यक्त्व-सभी श्रद्धामी प्राप्त हुई है इसलिये हे भव्य जीयो ! ममाद न करके, महापुरुषोंने मिस धर्मका सेयन किया है उसका तुम मी सेवन करो, क्योंकि पिना धर्मकी सेवा किये तुम जम्म-मरण- फे जजालसे नहीं सकोगे एसो जीवषियारो, सखेवरुईण जाणणाहेउ । सखिचो उद्धरिओ, रुपाओ सुयसमुहामो ॥५१॥ (संखेयरुईण) सहेपरुधियोंफे-अपमतियोंके (जाणणा हे) जाननेफेलिये (रुद्दामओ) रुद्र-अतिषिस्तृत (सुयस मुद्दामो) भुवसमुद्रसे ( एसो) यह (जीपवियारो) जीवविचार (संखिचो) मलेपसे (उदारिओ) निफाठा गया ॥५१॥ भावार्थ-सिमान्तों में जीयोंके मेवआदि विस्तारसे कहे गये हैं इसलिये मत्स युद्धिवाले छाम नहीं उठा सफते, उनके जाननेकेलिये सलेपमें यह "जीयविचार" सिद्धान्तके अनुसार बनाया गया है, इसके बनानेमें अपनी कल्पनाको स्थान नहीं दिया गया जीवविचारसार्थ समाप्तः।

॥ अथ नवतत्त्वप्रकरणप्रारंभः ॥ ध्यात्या नषपदी भक्त्या, नयतत्त्वानों विषरण, यालानां सुखपोषाय, क्रियते लोकभापया ॥१॥ जीवाऽजीवापुण्ण पावाऽसवसवरोय निज्जरणा । यधोमुक्खोय तहा नवतत्ता ढुति नायया ॥१॥ (जीया) जीयतस्म १ द्रव्य और माषप्राणको धारण करनेवाला (अनीवा) ज्ञान-सनासे रहिस सो अजीय वस्य २ (पुणे) शुभ फटका जो भोगना यह पुण्य तत्त्व ३ (पाया) अशुभ फलको जो भोगना यह पापतत्त्व ४ (मासय) जो शुभाशुम फर्मफा आना यह मामवतव ५ कहलाता है (सपरो) जो शुभाशुभ कर्मको रोकना यह संपरतत्त्य ६ कहलाता है। (य) और (निजरणा) जो मात्मध्यानसें शुभाशुम दोनें फर्मको पालके भस्मीभूत करके सर्पया नही लेकीन देससे रसदेना यह निर्भरातत्त्व ७ (पंघो) जो शुभाशुभ कर्मका खीरनीरकी सरह मास्मप्रदेशकी साय पंधहोना यह पंघसस्य ८ (मुस्लो) सर्पया कर्मोसें जो मुफहोना सो मोक्षतत्त्व ९ (य) फिर (सहा) सेसे (नय) नय (वचा) उत्त्य याने रहस्य (हुति) है (नायषा) मानना ॥१॥ चउदसचउदसयायालीसा यासीयहुतियायाला । सत्तावन्नपारस चउनवमेयाकमेणेसि ॥ २॥ (परदस) मीयतत्य १ का चौदर भेद (पदस) मजीवतत्त्व २ का मी चौदह भेद (पायालीसा) पुण्यवत्त्य ३ के मपाठीस भेद (पासीय) पापतत्व ४ के व्यासी भेद (इति) है (पापाण) माभपतत्त्व ५ के बयालीस भेद है (सखायम) सपरतस्य प के सचायन मेद (वारस) निरातत्त्व के पारह मेद (घर) पंपवस्व ८ के पार मेद (नष) और मोषवत्व कर नष (मेया) मेद है (कमेलिं) अनुक्रमसें नपे तत्त्वका सब मिलकर २७६ मेद है ॥२॥ एगविहदुविहतिविहा, घउविहापचछविहाजीवा । चेयणतसइयरेहि, यगई करणकाएहिं ॥३॥ (एविए) चेतना उषणसे सब जीवो एफ प्रकारे है (दुषिद) मस और स्पावरपणेसे बीघोंके दो भेद है (सिविहा) खीधेद पुरुपये और नपुंसकवेदसे जीवोंके तिन मेद है (पविहा) देव मनुष्य सिर्यच और नारक इसमकारसें जीव पार घराका (पंच) एफेन्द्रि आदिसें बीय पाँच वराका (बिहा) पृषी मादि लेकर छे तरहकर (जीया) मीष है । (पेयण) झानावि सना सहित (वस ) अस एलटे पछते सो (इयरेहिं) इचर स्थिर रो सो स्थापर (प) तीन वेद (गई) पार गति (करण) इंद्री पाँच (कापडं) फाया छ ॥३॥ पर्गिदियमुहुमियरा सन्नियरपणिदियायसमितिचउ । अपजचापज्जत्ता कमेणचउदसजियठाणा ॥४॥ (पर्गिविप) पफेन्द्रि मीयों के दो भेद है (सुमियरा) एक सूक्ष्म और दुसरा भादर (समि) मन सहित (इयर) दुसरा असनि मन रहित पेसे (पणिदियाय) पंषेन्द्रि के दो मेद है (स) उस पूर्वका चारकी साथ (पि) इंद्रीका एक भेद (ति) इंद्रीका एफ मेष (चर) पौरिबीका एक मेद यह वीन मिठानेसें साव हुवा (अपनसापजता ) यर ।

सात भपर्याधा और दुसरा सात पर्याधा (कमेणचपदस) अनुक्रमसें ऐसे सब मिलकर चौदह (जिय) मीयोंका (गणा) स्थान पाने मेद है॥४॥ नाणचदसणचेव चरित्तचतवोतहा । वीरियउवमोगोय एयंजीवस्सलक्षण ॥५॥ (नाण) शान माठ प्रकारे पाच ज्ञान सम्पफ्स्व आसरे और तीन अज्ञान मिथ्यात्व आसरे (प) और (दसणं) दर्शनका घार मेद (वेय) निक्षे (परिच) घारीप्रका सात मेद सामायक आदि निक्षय भ्यपहार (च) फिर (वयो) तपफे पारह मेद (सा) सेही (पीरियं) धीर्य दो प्रकारके (चवमोगो) उपयोगके बारह भेद (य) और (एये) ये (जीयस्स) जीवका (स्वर्ण) खक्षण है ।। ५॥ आहारसरीरइदिय पजत्तीमाणपाणभासमणे । चउपचपचछप्पिय इगविगलासग्निसनीण ॥६॥ (आहार) आहारपर्याप्ति १ (सरीर) शरीरपर्याप्ति २ (इविय) इंद्रियपर्याप्ति ३ (पजची ) पेसे तीन पर्याप्ति (माणपाण) स्वासोस्वास ४ (भास) भाषा ५ (मणे) मनपर्याप्ति ६ (पर) आहारादि पार (पष) मन छोसफर पॉप (एप्पिय) मन सहित संपूर्ण ऐ पर्याप्ति (पग) एक इंद्रीको पार (विगछा) विगलेंद्रीको मन छोटकर पाँच (मसप्ति) असंनी पंचेद्रिको मन छोरके पांच (सन्नीर्ण) संनी पंचेन्द्रिको छे है ॥ ॥ अब जो इस अपनी अपनी पर्याप्ति पूरी करके मरे सो जीय पर्याप्ता और पिना पुरी कीए मरे सो जीप अपर्याप्ता कहलाता है । ।

पणिदियतिवलूसा-साऊदसपाणचउछसगमट्ठ । इगदुतिचउरिंदीण असन्निसन्नीणनवदसय ॥७॥
(पणिंदिय) पाँच इंद्रियों (सिपल) मनावि वीन पर (सास) स्वासोस्वास (आक) आयु (वस) ऐसे दस
(पाण) माण है (पर) स्पर्शनेंद्रिय फायपल स्वासोखास और आयु ऐसे धार (छ) पूर्वका धारकी साप रसना और
पचन ऐसे छे (सग) पूर्वका छेकी साथ नासीका ऐसे सात, (मछ) आठ प्राण, पूर्वका सातकी साप पक्षु (ग)
पद्रिको पूर्वका धार (दु) वेइंद्रीको पूर्वका छे (ति) तेईजिको पूर्षका सात (परिंदीण) चौरिंदीको पूर्वका पाठ ।
(मसभि) मसंनी पंचेंद्रिको (सन्नीणं) और संनी पंचेन्द्रिको (नवदसय) अनुफमसें नव और दश प्राण जान लेना
जैसेकी पूर्वका आठकी साप प्रोत मिलानेसें नष मौर नवकी साय मन मिलानेसे वश । चार भाषमाण तो सवकाही
समान है॥७॥ इति जीवतत्त्वम् ॥
धम्माऽधम्माऽगासा तियतियमेयातहेवमद्धाय । खधादेसपएसा परमाणुअजीववउदसहा ॥ ८॥
(धम्मा) धर्मास्तिफाय (मधम्मा) अधर्मास्तिकाय (आगासा) और माकाशासिकाय (तियतिय) प्रत्येक प्रत्ये
कका सघादि तीन तीन (मेया) मेव है पेसे नप (सहेप) तेसेही (अदाय) कालका एफ मेद इस प्रकारसे पूर्वका
नव और कासका १ सब मिलकर दश हुमा सो सरुपी है (संपा) और संघ (देस) देश (पपसा) प्रदेश (परमाणु)
परमाणु यह धार पुमतका रूपी कहा (मजीव) रूपी अरूपी दोनु मिलकर अजीयका (चसदसहा) चौदा मेद है॥८॥

धम्माऽधम्मापुग्गल नहकालोपंचकुंतिअजीवा । चलणसहायोधम्मो पिरसठाणोअहम्मोय ॥९॥
(धम्माऽधम्मा) धर्मासिकाय और अधर्मासिकाय (पुग्गल) पुनलास्तिकाय (नह) आकाशसिकाय (कालो
और काछ (पंच) यह पांच (हुति ) है (अमीषा) अभीय द्रग्य (चलणसहायो) चलन स्वभावगुणवाा (धम्मो)
धर्मास्तिकाय है (यिरसठाणो) और स्थिरस्वभावगुणपाठा (महम्मोय) एक अधर्मास्तिकाय है ॥९॥
अवगाहोआगास पुग्गलजीवाणपुग्गलाचउहा । स्वधादेसपएसा परमाणुचेवनायवा ॥१०॥
(अवगाहो) अयकाश स्वमायगुणपाठा (मागासं) आकाशतिकाय है, यह (पुग्गल) पुमलको (जीयाण) और
जीयफो अवफाश देखा है (पुग्गला) पुनलफे (घरहा) चार मेद है (संधा) संघ (देस) वेश (पपसा) प्रदेश
(परमाणु) और परमणु ऐसे (चेय) निधे (नायवा) जानना ॥१०॥
सरघयारउज्जोय पभाछायातयेहिआ। वण्णगधरसाफासा पुग्गलाणतुलख्खण ॥ ११ ॥
(सई) मीय शद्वादि वीन (अंधमार) अंधकार (उज्जोय) प्रफाश (पभा) ज्योति (छाया) छाया (तयेहिमा)
सूर्यका तोपरा (यण्ण) पाँचोही यर्ण (गंध) दोनु गन्ध (रसा) पांघरस (फासा) आठ स्पर्धा (पुग्गलाणंतु)
पुनसका एसे (उस्षण ) लक्षण है ॥ ११॥
एगाकोडिसतसहि लस्खासचहुत्तरीसहस्साय । दोयसयासोलहिया आवलियाइगमुहुत्तम्मि ॥१२॥

(एगाकोरि) एक कोर (सतसहिस्सा) सरठठ डास (सत्तात्तरीसहस्साय) सिचोसर हजार (दोयसयासोल- हिपा) दोसो सोछह अधिक (मायशिया)१६७७७२१६ भयलिका (इग) एक (मुहुचम्मि) मुहर्तके विपे होती है ॥१२॥ समयावलीमुहुचं दीहापख्खायमासवरिसाय। भणिओपलिआसागर उस्सप्पिणीसप्पिणीकालो ॥१॥ (समय) समय, पतिसम्म काठको समय कहते है ऐसे मर्सस्य समयकी (आपली) एक आपलिका होती है (मुहुई ) यो परीका मुहर्च मुकरवायफा प्रमाण आपलीकी सस्या पूर्वकी धारपी गापासें आणलेना (बीहा) ऐसे तीस मुहर्तका एक अहोरात्री दिन (पस्ता) ऐसे पंद्रह दिनका एक पक्ष (प) और (मास) ऐसे दो पक्षका एक मास (परिसा) ऐसे पारा मासका एक पर्प (प) और (मणिओ) कहा है (पछिआ) पेसे असंख्य पर्पका परष्टोतकरके पक पस्योपम, ऐसे दश कोराकोटी पस्योपमका (सागर) एक सागरोपम, ऐसे पश कोडाफोरी सागरोपममिलनेसें एफ (स्सप्पिणी) नस्सर्पिणी और ऐसे दश कोराकोरी सागरोपमकी एक (सप्पिणी) अघसर्पिणी होती है (कालो) ऐसे उत्सर्पिणी और अषसर्पिणी मिठकर २० क्रोगकोर सागरका एक फारुपक और ऐसे अनंते कालचक्र जानेपर एक पुनरु परापरतन होता है। ऐसा अनंता पुनख परावर्तन होचुके और आगे होवेंगे इति फालबम्यका मान कहा ||१|| परिणामिजीवमुत्त सपएसाएगखिचकिरिआय । णिचकारणकचा सवगयइयरअप्पवेसे ॥१४॥ (परिणामि) म्यमै परीणामी कितना और अपरीणामी कितना निश्चयनयसे तो छेही द्रम्य परिणामी है और . म्यपहारनयसें सो एक जीप दुसरा पुरय यह दो परिणामी याकीके पार अपरिणामी है १ (जीव) यह छ म्यमें एफ जीपद्रव्य घेवन है शेष पाँच द्रभ्य मनीष अचैतम्य है २ (मुर्च) यह छे द्रग्यमें पक पुगल जो है यह मूर्तिमंत है पाकीफे पाच ब्रम्प अमूर्स अरूपी (सपएसा) यह छे द्रम्यमें पांच प्रव्यस प्रदेशी है और एक कालदम्य अप्रदेशी है (ग) यह छे मन्यमें धर्म अधर्म और आकाश ये तीन ब्रम्य एक है शेप तीन अनेफ है (क्षित) यह छ म्यमें एक आकाश द्रष्य जो है यह क्षेत्र है शेप पाँच क्षेत्री है (किरिमाय ) इस छे द्रव्यमें जीव और पुनल यह दो दम्य सक्रिय हे शेप पारद्रव्य अफ्रिय है (मि) ये छे द्रम्पमें व्यवहारसे तो धर्म अधर्म माकाश और काल यह पार निस्प है घाकीफे दो प्रम्य अनित्य है और निधयसें छेदी दम्य नित्य है (कारण) भीषको छोरकर पाँच द्रष्य कारण है और जीवद्रग्य अकारण है (कचा) ये छे ब्रम्पमें जीव तथा पुलक व्यवहारसे का वाकीफे चार अकर्ता (सषगय) पे छ ब्रम्यमें एक आकाशवम्य डोकाडोफ म्यापक है और पाकीके पाँच ब्रम्य ठोकन्यापी है (इयर) इतर (अप्पसे) कोई दम्य कोईसें मिले नहीं ॥ १४ ॥ इति अमीयतत्त्वम् ।। साउच्चगोअमदुग सुरखुगपंचिंदिजाइपणदेहा। आइतितणुशुषगा आइमसघयणसठाणा ॥ १५ ॥ (सा) शाखा पेदनी कर्म १ (ग्धगोम) घ गोत्र फर्म २ (मणुदुग) मनुप्यगति ३ और मनुष्यानुपूर्वी ४ (सुर दुग) पेवगति ५ और देयानुपूर्वी ६ (पपिविभाइ) पंचेन्द्रि आतीनाम कर्म ७ (पणदेरा) औदारिकादि शरीर पाँच १२ (माइसितणु) माविके सीन शरीरफा (णुषंगा) अंगोपाग १५ (माइमसंघयणसंठाणा) आदि परिपमनाराष सघयण १६ और प्रयम सस्पान समचोरस १७ ॥ १५॥ षण्णचउकागुरुलहु परघाऊसासआयकुजोय।सुमखगइनिमिणतसदस सुरनरतिरियाउतित्ययर ॥१६॥ (यण्णपनका) शुभवर्णाविचार २१ (मगुरुला) अगुरुगधु २२ (परघा) पराघातनाम कर्म २३ (ऊसास) स्वासो स्वास नामकर्म २४ (मायय) माताप नामकर्म २५ (उचोर्य) उद्योतनामफर्म २५ (सुभखगइ) शुभविहायोगति जिस फर्मफे पदयसें जीपकी हंससमान चाली हो २७ (निमिण) निर्माण नामकर्म २८ (तसदस) प्रम दशफ ३८ इस दशफेका मेघ आगेकी गायासें कहेंगे (सर) देवआयु नामकर्म ३९ (नर) मनुष्यमायु नामकर्म ४० (तिरिया) विर्यघायु नामकर्म ४१ (तित्ययरं) और तीर्थफरनामकर्म ४२॥ १६ ॥ तसवायरपज्जच पत्तेयथिरसुभचसुभगच । सुस्सरआइज्जजस तसाइवसगइमहोइ ॥ १७ ॥ (स) प्रसनामकर्म १ (पायर) पावरनामकर्म २ (पजत) पर्याप्तनामकर्म एक सवपि पर्याप्ता दुलाफरणपर्यावा ऐसे वो मेद ३ (पत्तेय) प्रत्येफनामकर्म ४ (पिर) पिरनामकर्म ५ (मुम) शुभनामकर्म ६ (च) और (सुभगं सौभाग्यनामकर्म ७ (4) और (सुस्सर) सुस्वरनामकर्म जिसका स्वर कोकिलाकी तरह मधुर हो ८(माइला मादेयनामकर्म ९ (जसे) यशकीर्तिनामकर्म १० (वसाइ) प्रस आविक (दसग) दशक (इमहोइ) इस प्रकारसें ॥ १७ ॥ इतिपुण्यतत्त्वम् ॥

नाणतरायदसग नवधीयनीयसायमिच्छच । थावरदसनरयतिग कसायपणवीसतिरियदुग ॥ १८॥
(नाण) पाँच ज्ञानापरणी मतिज्ञानापरणी १ मुतज्ञानायरणी २ अयपिज्ञानायरणी ३ मनापर्ययझानावरणी ४ और
केयन शानायरणी ऐसे पाच ( असराय) अन्तराय दानान्तराय १ डाभान्तराय २ भोगान्तराय ३ उपमोगान्वराय ४
और धीर्यान्वराय यह पांच अन्तराय (वसग) ऐसे दश भेद कहे (नवधीये) और नव दुसरा दर्शनायरणी कर्मफे
निद्रा १ निद्रानिद्रा २ मधछा प्रथलाप्रथला ४ यिणसी ५ चक्षुवनायरणी ६ अपनदर्शनापरणी ७ अवधिदर्शना
यरणी ८ और फेयलदर्शनायरणी ९ ऐसे नव और पूर्वकादशमिसफर ओगुणीस (नीय) निघगोम २० (असाय)
असावापेदनीफर्म २१ (मिच्छ) मिग्यात्व मोहनीनामफर्म २२ (थायर) स्थावरको (दस) दशको इस दशकेका
मेद मागे कहेंगे २२ (नरयतिर्ग) नरकत्रिक नरफगती नरकानुपूर्थी और नरक आयु ऐसे तीन ३५ (फसायपणषीस)
कवाय पचीस सो देखाते है अनन्तानुपंधी आदि क्रोधके पार सथा अनन्तानुवंषि आदि मानके घार फिर अनन्ता
नुयंधि आदि मायाफे पार और अनन्वानुषधी आदि छोमके चार यह सोख कपाय अव नवनो कपाय कहते हैं हास्य
१ रवि २ अरति ५ शोक ४ भय ५ पुगंछा ६ खीवेद ७ पुरुपयेद ८ नपुंसक्वेव ९ पूर्वके सोल कपाय और यह नय
नोफशाप सप मील २५ तथा पूर्वक ३५ सम मिल साठ (तिरियपुगे) और तिर्यचद्विक इस लिये तिर्यपगति २१ और
तिर्यघानुपूर्वी ५२॥१८॥
इगवितिचउजाईओ कुखगइउषघायडुतिपावस्स । अपसत्यवपणचउ अपढमसंघयणसठाणा ॥ १९ ॥

(इग) एकेन्द्रिजाति (वि) वहन्द्रिजाति (ति) वेरिन्द्रीजाति (चर) और चोरिन्द्रिजाति (जाईमओ) पेसे चार भाति नामकर्म यह सम मिठके छासठ (कुखगा) अशुभ विहायोगति नामकर्म इस नामकर्मसें जीव गधेकी नाइ पले सो १७ (उवधाय) उपघात नामकर्म १८ (हुतिपायस्स) यह सब पापके मेद है (अपसर्थयण्णधर) अशुभवर्णादि पार ७२ (अपडमसंपयणर्सठाणा) मयमका संघयनको छोरफर ऋपमनाराघ १ नाराच २ अर्धनाराच ३ कीलीफा ४ और सेवठा पह पांच संघयन और प्रपमका संस्थान छोरफर न्यग्रोध १ सादि २ कुम्भ ३ वामन ४ और डुंरफ यह पांच संस्थान सप मिलकर पापतत्त्वका व्यासी मेप हुआ ॥ १९॥ थावरसुठुममपज साहारणमपिर मसुभदुभगाणि । दुस्सरणाइज्जजस थावरदसगवियज्जत्य ॥ २० ॥ (थायर) स्थावर नामकर्म १ (मुहम ) सूक्ष्म नामकर्म २ (मपज) अपर्याप्ति नामकर्म ३ (साहारण) साधारण नामकर्म ४ (मपिर) अस्थिर नामकर्म ५ (भमुम) अशुभ नामफर्म ६ (वुभग्गणि) दुर्भाग्य नामकर्म ७ (दुस्सर) दुःस्वर नामकर्म ८ (अणाज) भनादेय नामकर्म ९ (अजस) अपयश नामकर्म १० (थायरवसर्गविक्जय) या स्थापरको रशको पससे विपरित जान लेना ॥ २० ॥इतिपापतत्त्वम् ।। इंदिअकसायअवय जोगापचचउपंचतिनीकमा । किरिआओपणवीस इमाओताओअणुकमसो ॥२१॥ (ईदिम) इन्द्रियो पांच (कसाय) कोषादि फपाय पार (मषय) प्राणातिपासादि समस पाँच (जोगा) मनावि योग तीन (पंच) पाँध (घर) पार (पत्र) पाँच (विप्नी) तीन (फमा) अनुक्रमसे जानलेना (किरिआओपण- पीस) क्रिया पंपीश (इमामोतामोमणुफमसो) यह पचीस क्रियाको अनुक्रमसे कहते है ॥ २१ ॥ काइयअहिगरणीआ पाउसिआपारितावणीकिरिया। पाणाइवायारमिअ परिग्गहियामायवत्तीय ॥२२॥ (फाइय) कायाको अजतनासें यरतायनासो कायिकी मिया १ (अहिगरणीआ) मिस क्रिया जीय नरफाविकका अधिकारि हो उसको अधिकरणिफी क्रिया कहते है जैसे कि शस्त्रादिकसें जीयोंकी हत्या करना (पारसिआ) जीव अजीयसें जो द्वेष फरना यह प्रक्षेपिकी क्रिया ३ (पारितापणीकिरिया) अपने जीयको या दुसरा जीयोंको तकलीफ पहुंचाना यह पारितापनिकी फ्रिया ४ (पाणाइपाय ) जो फिशी बीयकों प्राणोंसे रहित करना यह प्राणासिपातिकी क्रिया ५ (आरंमिम) जो खेती आदि आरंभका काम करना सो आरंमिकी क्रिया ६ (परिग्गहिया) जो परिग्रह रसना या परिमहपर ममत्व रखना सो परिमहकी क्रिया ७ (मायवत्तीम) जो माया-कपटसें किशीको ठगना सो मायामत्ययिकी क्रिया ८॥ २२ ॥ मिच्छादसणवची अपच्चक्खाणायदिट्टिपुट्ठिअ । पाइञ्चिअसामतो-वणीअनेसत्यिसाहत्यि ॥ २३ ॥ (मिच्छादसणवची) जिनेंद्रके सिद्धावसे मो विपरीत एकान्तकियारुपी यात्मज्ञानसे हीन पहिरारमा सम्यकहीन और एटिरागी जिसको सत्यासत्यका निरणय नहीं सो मिथ्या दर्शनकी क्रिया ९ (अपचक्खाणाय) प्रतपयखान नही करनेसे जो क्रिया उगती है पाह अप्रत्यास्यानिकी क्रिया १० (विहि) जो अशुभ रटीसें देखना,सो एटीफी क्रिया ११ (पुदिन) यो रागाविफसे कनुपितचित्तकरके स्त्री आदिको भंगका स्पर्श करना सो स्पृष्टीकी फिया १२ (पाखुश्चिम) मो. मपने मनसे स्वपरका पुरा विधारना सो प्रावीत्सकीक्रिफा १३ (सामवोयणीम) अपना अश्व प्रमुखकी प्रशसासें रूपं करना सो अथवा बुध दही घी भाविके भाजन खुला रखनेसें उसमें जो प्रसमावि जीवपरफर मरे उससे उगे सो मतोपनिपातीकी क्रिया १४ (नेसस्थि) नैशनकी क्रिया १५ (साहत्यि) स्वास्तिकी क्रिया १६ ॥ २३ ॥ माणापविआरणिआ अणभोगाअणवकखपञ्चइआ।अन्नापओगसमुदा-णपिजदोसेरिआवहिआ २४ णे) जो जीप अमीषको जाने मानेसें क्रिया लगे उसको आनयनिकी क्रिया कहते है १७ (विभारणिमा) जीपको पिदारनेसें पिदारणि लगेसो थिवारणकी क्रिया १८ (अणभोगा) बिना उपयोगसें जो चीज रफम ना तया एलने चलनेसें नो क्रिया लगे से अनामोगिकी क्रिया कहते है १९ (मणषकखपचाआ) इस लोफ से जो विरुष आधरण करना उसे अनवकांक्षप्रत्ययिकी क्रिया कहते है २० (अन्नापओग) दुसरी प्रयोगिकी समुदाण) समुदायकी क्रिया २२ (पिप) माया और छोम करनेसे जो क्रिया ठगे उसे प्रेमफी मिन्या २ (दोसे) क्रोध और मानसें जो क्रिया उगे से वेपकी क्रिया कहते है २४ (इरिआपहिमा) रस्ते घर- व्यापारसे जो किया उगे उसे इर्यापपिकी क्रिया काते है २५ पच्चीसमी क्रिया मप्रमचसाघुसैलेके तथा छीपर्यवको मी उगति है ॥ २४ ॥ इति आभयतस्वम् ॥

समिईगुत्तिपरीसह जइधम्भोभावणाचरिचाणि । पणतिदुवीसदसधार पचभेपहिंसगवन्ना ॥२५॥
(समिइ) समति (गुति) गुप्ति (परीसह) परिसइ (जाधम्मो) यतिधर्म (भाषणा) भाषना (चरिचाणि) चारित्र
(पण) समिति पाप (ति) गुप्तितीन (दुषीस) परिसह पावीश (दस) दशविध यति धर्म (पारस) पारह भावना
(पघ) चारित्र पाँच (मेपहिं ) ऐसे सप मिलके संपरफे मेद (सगवता) सचायन कहै जिसमें दो भेद है एक द्रव्य
संपर और दुसरा भायसंपर जो आवे हुये नवीनफर्मकोरोकदेना आत्मस्वरूपमे रहकर उसको भाषसपर कहते है और
कर्म पुगतकी रुफायटको द्रव्यसंयर फहते है॥ २५ ॥
इरियाभासेसणादाणे उच्चारेसमिईसुअ । मणगुत्तिषयत्तिकायगुचितहेवय ॥ २६ ॥
(इरिया) यतनापूर्षक रस्तेमें घटना उसको ईर्यासमिति कहते है १ (मास) निर्दोष मापाफा जो पोखना उसे भापास
मिति कहते है २ (पसणा) निर्दोप आहारको जो प्रहण करना सो एपणासमति ३ (दाणे) दृष्टिसे और पुजनीसे प्रमार्जन
करफे पीजको उपगरणको उठाना और रखना चसको मादाननिक्षेपणसमिति कहते है ४ (उच्चारे) फफ मल मूत्र आविको
जतनापूर्षफ परठना उसे पारिठापनिझा करते (समिई) पांचसमिति (सुम) यह ५ (मणगुचि) और मनोगुठिफे तीन
मेव है १ असत्कम्सनाषियोग २ समताभाषकी और ३ मास्मविचार ६ (वयगुचि) पचनगुप्तिजिसके तीन मेद है १ अशुब
२ मिम और २ शुख व्ययहार ७ (कायगुत्सितहेयय ) कायगुप्ति पशुम करणीसे कायाको गापरसना ८॥ २६ ॥

खुहापिवासासीउण्ह दसाचेलारइथिओ । चरिआनिसिहियासिज्जा अकोसवहजायणा ॥ २७ ॥ (खुहा) पुधापरिसह १ (पिवासा) प्यासको सहन करना पह पिपासा परिसह २ (सी) शीत परिसह ३ (उई) उप्ण परिसह ४ (सा) रंश परिसह ५ (पेला) अचेलक परिसह ६ (अरइ) भरति परिसह ७ (स्थिमो) बीके अगउपांगको सराग रप्टिसें न देखे सो स्त्री परिसह ८ (परिमा) घलनेका परिसह ९ (निसिहिया) नैपेपिकी इस लिये स्मशान भौर सिंहकी गुफा आदि स्थानोमें भ्यानके समय नाना प्रकारके कप्टको साता हुषा मी निपिन न करे सो १० (सिजा) संपारेकी भूमी कहाँही उंची निधी मिखजानेपरमी मुनि रहेग न करे सो सम्या परिसह ११ (सकोस) आक्रोश इस लिये कोइ गाली देवे तोमी सहन करे १२ (पह) पप इस लिये कोई पुष्ट जीष मुनिको मारे पीटे या मानसे मारगले सो मी पीतरागी साधु क्रोध न करे १३ (मायणा) याचना परिसह १४ ॥ २७ ॥ अलाभरोगतणफासा मलसकारपरीसहा । पन्नाअन्नाणसम्मत्त इअबावीसपरीसहा ॥ २८ ॥ (माम) गभान्तराय फर्मफे उदयसें जो मागने परमी चीज न मिळे तोमी समता रखे और विचारे कि अन्त रायफर्मकानदय है सो मठाम परिसह १५ (रोग) म्परावि अतिरोग आने परमी साधु चिकीत्सा करानेकी इच्छामी न करे फिन्तु समभाषसे सहनकरे सो रोगपरिसह १६ (वणफासा) वणस्पर्शपरिसह साधुको वणमादिको जो संपारो मिले तोमी शात चिचसे वेदना सहन करे १७ (मस) मठपरिसह इस लिये शरीरपर जो पसीनेसें मेक पर जाये तोमी सानादिककी इच्छा न करे १८ (मवारपरीसहा) सस्कारपारसह, कम न भावे, स्तुति करणेपर सम- परिगाम रखे १९ (पन्ना) मशा इस लिये परी विदचा होनेपरमी मुनि घमण्ड न रखे २० (अनाण) अशानपरि सह महानफे उदयसे मुनि दुर्यान न करे २१ (सम्म) सम्पक्स्वपरिसर (इम) इस प्रकारसें (भाषीसपरीसहा पापीशपरिसह जाणना २२ ॥२८॥ खतीमावअज्जव मुचीतवसजमेअघोषवे । सचसोमअफिचणच यभंचजइधम्मो ॥ २९ ॥ (संती) क्षमा सय प्राणीमात्रपर सम दृष्टी रखे फिन्तु यति कोइपर क्रोध न रखे १ (मदय) मानका त्याग करना उसको मार्दयधर्म कहते है २ (मज्जष) किशीके साथ कपट नहि रखना सो भावधर्म । (मुखी) निरलोभता ४ (वप) तप जो इच्छाका निरोध करना यही तप ५ (संजमे) सचरे प्रकारे संयमका आराधनकरना पही संयम ६ (म) और (पोपपे) जानना (सर्च) सत्यधर्म ७ (सोम) मनमादिको पवित्ररखना या शौचधर्म ८ (अकि- घण) राम अभ्यरतर परीग्रहका त्याग सो अकिंचनधर्म ९ (च) और (म) द्रव्यसें और मापसे जो मैपुनका त्याग करना यह ब्रह्मचर्यधर्म १० (जाधम्मो) ऐसे दशमकारे यतिधर्म पाले उसको यति कहना योग्य है ॥ २९॥ पढममणिचमसरण ससारोएगयायअन्नच । असुइआसवसवरोअ तहनिजरानवमी ॥ ३० ॥ (पदममणिप) प्रयम मनित्यभावना इस भावनामें मव्यजीव ऐसा विचारे कि धन योयन आदि सय पदार्य अनित्य F है मारमाका मूलपर्म अविनाशी है १ (असरण) मशरण मारना कि मृत्युफे समय इस जीवको ईसारमें धर्म विना कोई मी शरणभूत नही है एक धर्मही धरण है ऐसा पिधारना सो २ (संसारो) संसारमाषना इस भाषनामें भव्य ऐसा विचारे फि मेरे जीवने पौराधी छाल पोनिमें परिभ्रमण करते अमम्सेकासबक होगये है इस संसारमें पिता सो पुत्र और पुत्र सो पिता ऐसा पलट मुख्ट अनंसी देर होता है ऐसा विचारना सो संसार भावना २ (एगयाय) पकस्य भाषना इस मापनामें भम्प पेशा पिंस कि मेरा जीप मकेलाही पाये है और मफेलाही आवेंगा मुखाख मी अके साही भोगेंगो ४ (अपच) अम्पत्य भावना इसमें भम्य ऐसा विचारे कि मेरा भास्मा मनन्त ज्ञानमयी है मौर घरीर जर पदार्थ है शरीर पारमा नहीं है न मारमा शरीर ऐसा सदेष विचारे ५ (मसर) अशुषि भाषना पहरीर खून मांस ही मलमूष आदिसें भराहुमा पसा जो विचारना यह अशुचिस्प भाषना ६ (भासप) मासष भावना रागोप और अज्ञान मिथ्यात्व यायिक जोरसें नये नये कर्मन जो बाना मर्यात् रामायुमका विचार यह आसष ७ : (संपरोम) संवर मापना शुभाराम पिधारको छोरकर स्वसम्पमें छीन रहना अर्थात् नवीन कर्मको माने नहीं देना पद नियम संपर और मकेला मधुम विचारोंको रोकना सो म्यवहार संपर भाषना ८ (वह) ठेसेडी (निजरान पमी) नवमी निर्जरा भावना निर्जराके दो भेद है एक सकाम निर्मरा और दुसरी अफाम निर्जरा ९॥३०॥ लोगसहायोयोही बुशहाधम्मस्ससाहगाअरिहा । एआमओभाषणाओ भावेअपापयचेण ॥ ३१॥ (मोगसदापो) दशमी छोकस्वभाष भावना इसमें चौदहराजखोकमा सम्म विचारना (पोझा) ११ मी

सम्पक्स्यकी भाति होनी पहोत दुर्लभ है पेसा पिघारना यह पोधिदुर्लभभाषना (धम्मस्स) पारहमी धर्मभायना
इसमें भम्य पेसा विधारे फि संसारसमुद्रसे पार होने के लिये जो मिनेस्वरमहाराजने कहा हुमा धर्म है उसका (साह
गामरिहा) साधक कहनेवाला मरिहंसादि मिलना दुर्लभ है (एमामो) इस मकारसें कही गई (भाषणाओ) भाषनामो
(भाषेमपा) विचारनी (पयत्वेणे) मयससें ॥११॥
सरमाइअत्यपदम छेओवट्ठावणभवेवीम । परिहारषिमुद्धिण मुट्ठमंतहसपरायच ॥ ३२ ॥
(सामाइ) सामायिक पारिप्रद्रष्य और भाषसे ( अस्थ) हां (पटर्म) पहिला है १ (छेगोषट्ठावर्णमयेभीमं) छेदो
पस्थापनीयधारित्र दुसरा है २ (परिहारषिसुद्धीण) परिवारपिशुद्धि चारित्र ३ (सद्धर्मसहसंपरायच) फिर धोया सूक्ष्म
संपराय पारिन ४ यह पारिष दशमा गुणस्थानवाले मुनिको होता है ॥ १२ ॥
तत्वोअअहसखायं खायसम्मिजीवलोगम्मि । जंचरिऊणसुविहिआ पञ्चतिअयरामरठाण ॥ ३३ ॥
(वयोमभहस्साय) उस पीछे पाँधमा ययाख्यात चारित्र (लायंसपम्मिनीषछोगम्मि) यह चारित्र सम जीवलोगमें
प्रसिद्ध है (अपरिऊणसुविहिमा) जिसका सेवन करनेसें सुविदित साधु छोगों (पचंतिमयरामरंठाण) अजरामरस्थान
फको पाते है ॥ ३३॥ इति संयर तस्वम् ॥ १३॥
अणसणमूणोमरिआ विचीसखेवणरसञ्चाओ। कायकिलेसोसलीण-न्यायवमोयतवोहोइ ॥ ३ ॥

(मणसणे) सर्वया आहारफा त्याग उपवासादिक सो अनसन तप १ (कणोअरिमा) आहार फमकरना सो
उनोदरी वप २ (विधीसखेपर्ण) पचिका संक्षेप करना सो चिसंप तप (रसचामो) विगयका त्याग करनासो रस
त्याग तप ४ (फायफिछेसो) ठोधादि जो फट करना या कायलेश तप ५ (सेलीणयाय) सप इन्द्रियोंका दमन करना
यह संलीनता वप (पोपतयोहोइ) इस प्रकारसें पाम सपके छ मेद कहै ॥ ३४ ॥
पायच्छिचविणओ वेयावञ्चतहेवसज्झाओ । झाणउस्सग्गोविम अप्मितरमोतवोहोई ॥ ३५॥
(पायपिछ) जो शुद्ध मनसे गुरु महाराजके पास मातोयणा ना सो प्रायश्चित वप १(विणओ) विनय तप र (प्या
पर्य)पैयावृत्य सप ३ (बहेयसम्झामो वेसेही स्वाध्याय तप ४ (माणे) ज्यान तप भ्यानमा स्वरूप गुरुगमसें धारना ५
(नस्सग्गोविम) और फायोत्सर्ग वप (कारसग्ग) (अभिवरमोतपोहोइ) ऐसे छ प्रकारसें अभ्यन्तर तप कहा ॥ ३५ ॥
पारसविहंतयोनिजराय घंघोचउषिगप्पोम । पपईठिइअणुमागो पपसभेपहिनायो । ३६ ॥
(पारसविई) ऐसे सब मिलकर पारह मेरे (ववो) तप (निाराय) निर्जराके लिये है। इति निर्जरावस्यम् (पंघो)
मय मघवत्य (पउविगप्पोम) धार मेद है (पयई) १ प्रकृतिमन्य (ठिन) स्थितिवरप (मणुभागो) ३ मनुभाग-
पन्ध (पएस) और प्रदेशपम्प ४ (मेपहि) ऐसे चार मेदसें (नायबो) मानना ॥ १६ ॥
पयइसहावोवुत्तो ठिईकालावहारण । अणुभागोरसोनेओ पएसोदलसंघओ ॥ ३७॥

(पयइसहायोवुघो) प्रकृतिपन्ध इसलिये कोफा स्वमाय (ठिईकालापहारणे ) फोकी स्थिति-कालका निमय यह स्थितियग्ध २ (अणुभागो) ३ भनुमाग पन्ध सो (रसोनेमो) कोका रस आनना (पपसो) ४ प्रदेशपग्ध (दलसे पभो) कमकि दसका संघय ॥ ३७॥ पडपडिहारसिमज हडचिचकुलालभडगारीण । जहएएसिमावा कम्माणविजाणतहभावा ॥ ३८॥ (पर) पाटा, जैसे फिसीफे आंखोंपर पन्धे हुए पाटेके संयोगसे कुछ नहीं देखार देता सेसे ही ज्ञानापरणीय कर्मफे स्वमायसें आरमाफों अनन्त ज्ञान नहीं होता है १ (पटिहार) द्वारपारफेसमान दर्शनावरणीय कर्मका स्वभाष है जैसे राजाको दर्शन पाहनेवालेको द्वारपाल रोक देते है उसी तरह आत्माके दर्शनगुणको पर्शनापरणीय फर्म रोक देता है २ (मसि) तरपार, वेदनी फर्मफा स्वभाष ऐसा है कि जैसे सहच खरी तलवारकी घारको चाटनेसे अच्छा उगता है मगर जय जीभ कटजाति है वप दुख होता है पेसीही तरह शावादनीसें जीवको सुख होता है और भशा सावेदनीसें जीवको धुस होता है ३ (मन) मदराफीछाक समान मोहनीयकर्मका स्वभाष है जैसे मदिरासें जीच पेमान होजाते है सेही मोहनीयकर्मफे उदयसें जीव संसार में मुंझाते हैं यह फर्म मास्माका सम्यग्दर्शनको और सम्यक चारित्र गुणोंको रोकता है अर्थात् रक देता है । (हर) खोरासमान भायुफर्म है जैसे खोरेमें परे हुए पोर राजाके हुकम विन नही निकठ शफते है तैसे ही आयुफर्मके जोरसे जीव गतीसे नहीं निफळ शकते है ५ (चित) इस नामकर्मका समाप चित्रकार जैसा है यह फर्म मारमाफे भरूपि धर्मको रोकता है जैसे पितारा गच्छा पुरा नाना प्रकारका चित्राम

पनाता है से ही यह नामकर्म आत्माको अछी पुरी गतियोंमे पापा देवा है नाना प्रकारके स्वम्मको धारण फरा देवा
है । (कुगल) यह गोत्रकर्म कुमार जैसा है जैसे फुमार मछे और पुरे नाना प्रकार के परतन मनाते है वैसे ही इस
कर्मफे उदयसें भीय ऊंच निच फुलको धारण करते है ७ (मरगारीणं) इस मम्वराय फर्मका स्वमाय भगरी जैसा
है क्योंकि जय राजा किसीको दान देने के लिये मगरीको कहे परन्तु भरारी उसको देवे नहीं ऐसेही इस कर्मफे उद
यसे जीव दानावि नहीं कर शफवे है ८ (अहपएसिंभाषा) मैसे पर्नुका भाव जैसा यह माठोही वस्तुका खभाष है
(कम्माण) तैसेही आठोही कर्मोकामी (विजाण) जानो (वहभाषा) वैसेही कर्मोका स्वभाव ॥ १८ ॥
इहनाणदसणावरण वेपमोहाउनामगोमाणि । विर्घचपणनवदुअठवीस घउतिसयदुपणविह ॥३९॥
(इनाण) यह शनायरणीयकर्म १ (सणापरण) और पुसरा दर्शनावरणीफर्म २ (यमोहाचनामगोआणि)
तीसरा वेदनीयफर्म ३ ४ मोहीनीकर्म ५ आयुकर्म व नामकर्म और सासमा गोत्रकर्म ७ (वि) अन्तरायफर्म ८ (१)
यह आठ कर्म (पण) शानायरणीयकी सत्तर प्रकृतियों पांच है (नव ) और वर्मनावरणीयकी उत्तरपति नष (पु)
धेदनीकी मतति दो (अठवीय) मोहीनीकर्मकी उत्तर प्रकृति अग्रवीस (पट) मायुकर्मकी सचर प्रकृति चार (सिसय)
नामफर्मको उत्तर प्रकृति एकसो तीन () गोषकर्मकी उघर प्रकृति दो (पण) और भन्तराय कर्मकी उत्तर प्रकृति
पांच (पिई) ऐसे सष फर्मोकी उत्तर प्रकृति एकसें महावन जान सेना ॥१९॥

नाणेयदसणावरण वेअणिएचेष अतराएअ । तीस कोडाकोटी अयराणठिईयउकोसा ॥ ४०॥ (नाणेपदसणावरणअणिए) ज्ञानापरणी दर्शनाषरणी घेदनी (पेय) निश्चय (मवराएम) और अन्तराय इन पारो कर्मोकी (तीसकोडाकोगी) तीस फोडाफोडी (अयराण) सागरोपमकी (यिनकोसा) चस्कृष्टी स्थिति कही है।॥ ४०॥ सत्तरिकोडाकोडीमोहणिए पीसनामगोएस । तिचीसअयराइ आउठिइयघउकोसा ॥४१॥ (सत्चरिकोटाकोरी) सिचर कोराकोरी सागरोपमकी स्थिति ( मोहणिप) मोहनीयकर्मकी है (वीसनामगोपस) षीस मोटामोरी सागरोपमकी स्थिति नामकर्म और गोप्रकर्मकी है (तिचीसंजयराई) सेवीस सागरोपमकी (आर) आयु- फर्मकी (ठिड) स्थिति कही (पंधरकोसा) एसे सब कर्मोकी चस्कृष्टी स्थितिका बंध कहा है ॥४१॥ पारसमुछ्त्तजहन्ना वेयणिएअठनामगोएम् । सेसाणतमुलुत्त एयवधठिईमाण ॥ ४२ ॥ (पारसमुहूराजहता) पारह मुहर्षकी जपन्यस्थिति (पेयणिए) सकसाय घेदनीयकर्मकी हे अपाय वेदनीकी २ समयकी स्थिति है (अठनामगोएस) आठ मुहर्चकी जघन्यस्थिति नामकर्म और गोत्रकर्मफी है (सेसागतमुहुचं) शेप पाँच कोफी जपन्यस्थिति अन्तरमुर्तकी है (एयर्यपठिईमाण) इस प्रकारसें सप कर्मोकी उस्कृष्टी और जघन्यसे स्थिति मंधफा प्रमाण कहा ॥ ४२ ॥ इति पंधसत्यम् ॥

सतपयपरुघणया वधपमाणचखित्तफुसणाय । कालोअअतरभाग भावेअप्पाषडचेव ॥ ४३ ॥
(संतपयपस्यणया) सत्पदफी प्ररूपणाद्वार १ (दम्पमाण) फिर सिद्धनीयों के द्रव्यका प्रमाणद्वार २ (खित ) क्षेत्र
मार ३ (सणाय) सिझोफी स्पर्शनावार ४ (कालोम) काद्वार ५ (अवर) अम्वरद्वार ६ (भाग) भागमार ७
(भाष) भाषद्वार ८ (अप्पापा) और अस्पायहुत्यद्वार ९ (पेष) निमे यह मोषके नव द्वार कहै ॥४३॥
सतसुद्धपयत्ता विज्जतखकुसुमवनअसंत । मुक्खत्तिपयतस्सउ परूवणामग्गणाईहि ॥४४॥
(संत) मोक्ष छतो है (सुब) शुद्ध (पयचा) पद होनेसे (विजसकुसुमपनअसं) यह विधमान है परन्तु यह
आफायफे फुसुमफी तरह असो नहीं है (मुक्सत्तिपर्यतस्सर) यह मोक्षपदकी (पल्यणा) प्रपणा (मग्गणाईदि.)
मार्गणादारो विचारसे कहते हैं ॥ ४ ॥
गइइदीएकाय जोपवेयकसायनाणेय । सजमदसणलेसा भवसम्मे सन्नि आहारे ॥४५॥
(गइ) गतिमार्गणा ४ (इंदीए) इंद्रिमार्गणा ५ (फाय) कायमार्गणा ५ (जोए) योगमार्गणा ३ (य) वेदमार्गणा :
(फसाय) कपायमार्गणा ४ (नाणेय) ज्ञानमार्गणा ८ (संजम) संयममार्गणा ७ (दसण) दर्शनमार्गणा ४ (सा)
श्यामार्गणा ६ (भय) भव्यमार्गणा २ (सम्मे) सम्यक्त्वमार्गणा ६ (सति) संनिमार्गणां २ (आहारे) माहार
भार्गणा २॥ ४५ ॥

नरगइपणिदितसभव सन्निमहक्खायखइमसम्मत्ते । मुस्खोणाहारकेवल दसणनाणेनसेसेसु ॥ ४६॥ (नरगा) मनुष्यगतिसें १ (पणिंदि) पंचेन्द्रिजातिसें २ (ठस) प्रसकायसें ३ (भय) भव्यपणसें ४ (सनि) सैनी पंषेन्द्रिसें ५ (महफ्सायं) पयाख्यावचारित्रसें ३ (खामसम्म) धायकसम्यक्स्यसें ७ (मुफ्सो) मोक्ष जाते हैं और (णाहर) मणहारीक पदसे ८ (केयपदसण) फेघल दर्शनसे ९ (नाणे) और केयलझानसें इन दश मार्गणा द्वारसे जीयों मोक्ष जाते है १० (नसेसेस) परन्तु शेप ५२ मार्गणाओंसें मोक्ष नही आते ॥ ५५ ॥ इति प्रयमद्वार ।। तवपमाणेसिद्धाण जीवदवाणिहुतिणताणि । लोगस्सअसखिजे भागेइकोयसदेवि ॥ १७ ॥ (दपपमाणेसिद्धार्ण) सियोके व्यफाप्रमाण (जीवदपाणिहुतिणताणि) सिदोंमें जीवद्रव्य अनसा है ॥ इति दुसरा बार २ (ोगस्समसखि मागे) चौदह राजलोकके असंख्यातमे भागमे (कोय) पफ सिन और (सदेषि) सप सिम रहते है।। इति तीसरा द्वार ३ ॥४७ ॥ सणामहिआकालो इगसिद्धपढुञ्चसाइओणतो। पडियायाभावाओ सिद्धाणतरनस्थि ॥४८॥ (सणा) स्पर्शना सिर जीयोंकी (अहिया) अधिक है यह चौथा द्वार ४ (कालो) काल (इगसिपहचसाद ओणतो) एक सिद्ध मानित सादि अनन्त स्थिति है और अनेक सिम आभित अनादि अनन्त स्थिति है ॥ इति फालदार ५ (पठियायामायामो) सिके जीवोंको पिछा पडनेका अभाव है ।। इति छठा द्वार (सियाणभंवर- नस्थि) सियोंफे गीपोंको अन्तर नहीं हे फारकत और क्षेत्रकृत दोनोंसें इति सातमा मार ॥४८॥ सधजियाणमणते भागेतेतेसिंदसणनाण । खइएभावेपरिणामि एअपुणहोइजीवच ॥ ४९ ॥ (सपजियाणमर्णते) सब संसारी जीयोंसे सिरके जीवों मनम्तमें (भागे) भागमे है इति माठमो द्वार ८ (तेवेसि दसणनाणं ) उन सिद्धोफे जीयोफे केवलदर्शन और फेवलशान (सइप) धायिक (भाव) भावमे है (परिणामी एम) परिणामी है (पुण) यह पुनः (होइजीपच) जीवत्वपना हे ॥४९॥ योवानपुससिद्धा थीनरसिद्धायकमेणसखगुणा । इममुक्खतत्चमेम नवचचालेसमोभणिभा ॥ ५० ॥ (पोवा) सबसे कम (नपुस) नपुसफ (सिद्धा) सिद्ध हुया (पी) नपुंसफसे स्त्रीसिद्ध संस्पातगुणा अधीक हे खी सिखसे (नरसिद्धा) पुरुप सिद्ध संख्यावगुणे हुए (कमेणसखगुणा) अनुक्रमें संख्यातगुणा जानना (इममुफ्स) यह मोध (वयमे)तत्त्व जाणना इस प्रकारसें नय मेव कहे ( नवउचालेसओभमि) इस प्रकारे नष तत्त्व संक्षेपसे कहेगये ॥५०॥ जीवाइनवपयत्ये जोजाणइतस्सहोइसम्मत्त । भावेणसदहतो अयाणमाणेविसम्मत्तं ॥५१॥ (जीयाइ) जीयादि (नवपयरथे) नव पदार्थको (जोमाणइ ) जो जीव जागसे है ( तस्सहोसम्मच ) उस जीवको 2

मयश्यही सम्यक्त्व हो (भावेणसदहतो) और भायसें जो सई है सो (आयाणमाणेयि) अजान भीयोकोभी (सम्मच )
सम्यफ्स्य मासि होवे ॥५१॥
समाइजिणेसरभासिआइ चपणाईनग्नहाहुति । इअवुद्धीजस्समणे सम्मचनिच्चलंतस्स ॥ ५२॥
(समाई) सर्य (जिणेसरभासिआई) मिनेश्वर महाराजफे कहे हुए (ययणाई) पचन (नप्तहासि) अन्यथा नही है अर्थात्
सत्य है (इअयुद्धीजस्समणे) ऐसी बुद्धि जिसफे मनमें होवे (सम्मतनिश्चलंसस्स) उस प्राणीको निश्चल सम्यक्स्व होये ॥५२॥
अतोमुहूत्तमित्तपि फासिअजजेहिंसम्मत्त । तेसिंअवठ्ठपुग्गल परिअहोघेवससारो ॥ ५३ ॥
(अतोमुहचमिचपि ) एक अन्तरमहर्चमाघमी (फासिमंज हिं) स्पर्श हुआ हो जिसको (सम्मत ) सम्यक्त्वका
(वेसि ) तिस जीयको (अयर) अर्ध (पुग्गसपरिमो) पुगल परावर्ततफ उसको परिश्रमण करना होगा (ब)
निक्षयकरेफे (ससारो) संसारमें याद मोहमें जायेंगे ॥५३॥
उस्सप्पिणीअणता पुग्गलपरिअहओमुणेभयो । तेणतातीअखा, अणागयदाअणंतरणा ॥ ५४॥
(नरसप्पिणीअर्णता) मनन्ती रस्सपिणी और अनन्ती अवसर्पिणी आने पर (पुग्गलपरिमओ मुणेगवो) एक पुगल
परापर्जन होता है (वर्णसाचीमसा) सैसा अनन्ता पुनल परापर्चत मतितकाले हो चुके (मणागयताममंतगुणा)
और अनागतकाले अनन्तगुणा मागे जावेंगे ॥ ५४ ॥

जिणअजिणतित्यतिस्था गिहिअन्नसलिंगधीनरनपुसा । पचेमसयबुद्धा बुद्धघोहिकणिकाय ॥ ५५॥ ।
(जिण) जिनसिक १ (अक्षिण) अधिनसिब २ (तित्य) वीर्यसिद्ध (तित्था ) अतीर्थसिद्ध ४ (गिहि ) गृहीलिंग
सिद्ध ५ (अम) मन्पलिंगेसिद्ध (सलिंग) स्वलिंगसिर ७ (पी) स्त्रीलिंगसिय ८(नर) पुरुषलिंगसिर ९ (नपुसा)
नपुंसकर्षिगसिर १० (पचेम) मस्पेकयुद्धसिद्ध ११ (सयंदा) स्वयंपुरसिर १२ (मुखमोहि) बुद्रवोपितसिद्ध
१३ (कणिकाय) एकसिर १४ और भनेकसिय १५ यह सिरके पन्द्रह मेद संमेपसे कहा फिर विदोप दिखलाते है ॥५५॥
जिणसिद्धाअरिहसा अजिणसिद्धायपुररियपमुहा । गणहारितित्यसिद्धा अतित्थसिद्धायमरुदेवी ॥५६॥
(जिणसिमा) तीर्घकर होफे मोक्ष गये यह तीर्थकरसिद्ध (अरिहसा) रिपमादि अरिहंतसिद्ध १ (अजिणसिमाय
पुररियपमुहा) मधिनसिर सामान्य फेयली पुररिक गणधर आदि २ (गणहारितित्यसिद्धा) गणधर गौतमाधि तीर्घ
सिर ३ (अतिस्थसिद्धायमरुदेषी ) अवीर्यसिर यह मरुदेवी ४ ॥५६॥
गिहिलिंगसिखभरहो वलकलचीरीयअन्नलिंगम्मि । साहुसलिंगसिद्धा थीसिद्धाचदणापमुहा ॥ ५७ ॥
(गिहिलिंगसिड) गृहीलिंग सिन हुये (मरहो) यह भरतादि ५ (वलफलपीरीय) पस्कलधीरीयादि वापसके ।
षेपमें मो सिद्ध हुये (अन्नलिंगम्मि) या अम्यलिंग सिद्ध जानना ६ (साहुसलिंगसिद्धा) साधुके घेपमें ओ सिम हुए
या स्वलिंगसिर ७ (पीसिनाचंदणापमुह) स्त्रीफे सिंगमें जो सिर हुए यह पदनयावादि ८ ॥१७॥

पुसिद्धागोयमाई गंगेयाईनपुसयासिद्धा । पत्तेयसयबुद्धा भणियाफरक कविलाई ॥ ५८॥ (सिद्धागोयमाइ) पुरुष लिंगसिर गीतमादि० (गांगेपाईनपुंसपासिया) गंगेयादि जो सिद्ध हुए यह नपुंसकलिंग सिर १० (मत्तेयसयेयुद्धा) प्रतेकयुद्धसिन और स्वयंवुद्ध अनुमसे (भणिया) कहा (करफंड) फरफड राजा ११ (कपिठाई) और कपिछादि को १२॥ ५८॥ तहबुद्धयोहिगुरुवोहिया इगसमयएगसिद्धाय । एगसमपविअणेगा सिद्धातेणेगसिद्धाय ॥ ५९॥ (तह) फिर वैसे ही (बुद्धघोहिगुरुयोहिया) युद्धपोधित सिद्ध हुए यह गुरुके उपदेशसें १३ (गसमयएगसिझाय) एफ समयमें एफही सिद्ध होप एक सिद्ध महावीर मावि १४ ( एगसमएपिणेगा) (सिमातेणेगसिद्धाय) ओर एफ समयमें अनेक सिद्ध होय पर रिपभादि अनेक सिद्ध कहिये १५॥ ५९ ।। जइआइहोइपुच्छा जिणाणमग्गमिउत्तरतइया । इक्कस्सनिग्गोयस्स अणतभागोयसिद्धिगओ ॥६॥ (जइमाइहोइपुच्छा) जिस जिस समयपर भगयान्फो पुराने में आये (जिणाणमग्गमिउत्तरंतइया) उस उस समय पर मिनेस्वर महाराजफे मार्गमे यह ही उचर मिलता है फि (इकस्सनिग्गोयस्समणवभागोय) एक निगोदफे अनतमें मागे (सिद्धिगो) सिखो गये हे ॥१०॥ इति नतवत्त्वप्रकरण समाप्तम् ।

॥ अथ श्रीदडकप्रकरण मूलसहित हिन्दी अनुवादसहित प्रारभ्यते ॥
स्तवना
मेउचउयीसजिणे तस्सुत्तवियारलेसदेसणओ। दरगपपहिंतेच्चिय थोसामिमुणेहमोभवा ॥१॥
निमिरंधावीसभिणे) चोषीश जिनेश्वरोको नमस्कारकरके (तस्सुत्तषियारलेसदेसणओ) पणुंके सूत्रोंमें कहा
लेशमात्र कहनेसे (दरगपपहितेधिय) दंडगफे पदोंकरके सन भगांनोकी (थोसामिसुणेहमोमया) में
हु सो हेमव्यप्राणिजीयो तुम सुनो ॥१॥
इआअनुराई पुढवाईघेइदियादओचेव । गम्भयतिरियमणुस्सा वतरजोइसियवेमाणी ॥ २ ॥
(नेयमा) सात नरकको १ दरफ (असुराई ) असुगदि भुवनपतिका १० दश इंटक (पुरवाई) पृथ्वीकायादि
उक (इदियादोघेव) दो इंद्रियापि विकलेंद्रिफे ३ दरफ (गाभयतिरिय ) गर्मअविर्यधका २०
) गर्भज मनुप्यका २१ मांदरफ (यंतर) ष्यतरका २२ माघरफ (जोइसिय) ज्योतिपि देवोका २५
1) और पैमानिक देयोका २४ मादरक ऐसे सब मिलकर चोवीश दरक समज लेना ॥२॥
रमा सरीरमोगाहणायसघयणा । सन्नासठाणकसाया लेसहंदीयवसमघाया ॥ ३ ॥

(संखिचयरीइमा) यह सग्रहणीनीगाथा संक्षेप मात्र कठे है (सरीर) शरीद्धार १ (मोगाहणाय) अवगाहना बार २ (संग्मयणा) संग्घयणद्वार १ (सन्ना) संशाद्वार ४ (संठाण) संस्थानद्वार ५ (कसाया) कपायद्वार ६ (खेस) डेश्यावार ७ (इविय) इन्द्रियद्वार ८ (दुसमुग्घाया) दो प्रकारे समुद्घातबार ९ ॥३॥ दिठीदसणनाणे जोगुवओगोवधायचवणठिई । पज्जत्तिकिमाहारे प्तग्निगइआगईवेए ॥ ४ ॥ (विठी ) रष्टिद्वार १० (दसण ) दर्शनद्वार ११ (माणे) शानद्वार अज्ञानमार १२ (जोगु) योगवार १५ (योगो) उपयोगद्वार १५ (पयाय) उपपातवार १५ (चषण) घ्ययनद्वार ११ (ठिह) स्थितिवार १७ (पजत्ति) पर्याप्तिद्वार १८ (फिमाहारे) किमागारबार १९ (सक्षि) संसादार २० (गई ) गतिवार २१ (आगई) मागतिद्वार २२ (वेद) घेदवार २३ धपुन असबहुत्यवार २४ इति घोषीशद्वार आणना ॥ ४ ॥ चउगम्भतिरियवाउसु मणआणपचसेसतिसरीरा । यावरचउगेवुहओ अगुलअसखभागतणू ॥ ५॥ (घठगभविरियपाउसु) गर्भतिर्यच और वानकायके औदारिफ पैक्रिय तेजस और कार्मण यह पार पारीर होते है (मणुमाणपंप) मोर मनुप्पोके पांचोही शरीर होते है (सेसतिसरीरा) वाकीफे एकवीश दरफोके यिपे तिन सिन शरीर है १३ घेवता १ नारकी यह १४ दसकमें वैक्रिय १ सेजस २ कार्मण ३ यह ३ शरीर हो थायर ४ षिक सेंद्री र पय ७ देसको औदारिक १ तेजस २ कार्मण ३ यह शरीर होघे इति १ शारीरद्वार ॥॥५॥ (पावरपर - गेहभो ) बनस्पतिवरजके पार स्थायरफो अपन्य और उस्कृष्ट ऐसे दो प्रकारे (मगुलअसंखभागतणु) मंगुलके असं ख्यातमें भागे शरीरफी भवगाहना होति है ॥५॥ सवेसिपिजहन्ना साहापियअगुलस्ससखसो । उकोमपणसयधणू नेरइयासत्तहत्यसुरा ॥ ६॥ (सपेसिपिजहन्ना) सब दरकोफे विपे जघन्यसे (साहावियमगुलस्सअसंखेसो) स्वाभाविक अंगुलके असंख्यातमे ( भागे शरीर होते है (उकोसपणसयपण) और उस्कृष्टी अवगाहना पांचसे धनुप्यकी (नेराया) नारकीफे मीयोकी है (सत्वहरयसुरा) और देयोंकर उस्कृष्टा धारीरमान साव हायर होता है ॥३॥ गम्भयतिरिसहस्सजोयण वणस्सईमहियजोयणसहस्म । नरतेइवितिगाऊ बेइदियजोयणेपार ॥७॥ (गप्मयतिरिसप्तसजोयण) गर्भजतिर्यपका शरीर एक हजार जोजनका है (यणसामहियजोयणसहस्स) और पनस्पतिकायका शरीर एक हजार जोजनसें कुछ अधिक होते है (नरतेइवितिगाऊ) मनुष्य और तेइद्रिका शरीर तिन गाउका होता है (इदियजोयणेपार ) और इद्रिका शरीर यारह जोजनका है॥७॥ जोयणमेगचरिदि देहमुश्चत्तणसुरमणिय । वेउवियदेहपुण अगुलसखसमारभे ॥ ८॥ (जोयणमेघारिदि) एक जोजन चौरंद्रिका (देहमुघवणंसुरमणियं) शरीरका संधपणा सूत्रमे कहा है (घेरपि । ~-

यदेहपुण) फेर वैक्रिय शरीरका अनुमान कहते है (अंगुल संख्समारंमे) औदारिफ शरीरयालौफे सपा वेक्रिय शरीर-
पाठोफे उत्तर पैफ्रिय मारंमतीवेर अंगुसके संख्यातमे भागे होता है ॥८॥
देवनरअहियलक्ख तिरियाणनवयजोयणसयाइ ! दुगुणंतुनारयाण भणियवेउहियसरीर ॥९॥
(देपनरमहियउसस) देवताका वैफियशरीर एक छाखजोमनफा होता है और मनुप्यका क्रियशरीर एक
खास जोजनसें कुछ अधिक होता है (तिरियाणनवयजोमणसयाइ) और नियंषका वैक्रिय शरीर नपसें जोजनका
(पुगुणंतुनारयाण) और नारफयोका शरीर मूससे दूना होता है (भणियंवेरपियसरीरं ) इसप्रकारे क्रिय पारीरका
ममाण कहा ॥९॥
अतमुहुत्तनिरये मुहुरघचारितिरियमणुपसु । देवेसुअद्धमासो उक्कोसविउवणाकालो ॥ १० ॥
(मतमुहत्तनिरये) नारकयोफे उतरवैक्रियशरीरफा काल मसर्मुहर्तका होवे है फेर दुसरा फरणा पड़ता है (मु
परसारितिरियमणुएस) मनुप्प और तिर्यबफे वैकिय शरीरका काल मान चार मुर्चका है (देषेमुपद्रमासो) और
देयोके उचरक्रियशरीरफा काठ एकपथविनका (चकोसवितषणाकालो) इस प्रकार पैकिय शरीरका उत्कृष्टका
उमान कहा है ॥ इति शरीर भषगाइना द्वार २॥ १०॥
थावरसुरनेरइया असघपणापविगलछेवट्ठा । सघयणछगगम्भय नरतिरिपसुमुणेयत्वं ॥ ११ ॥

(पापरसुरनेराया) पांच स्थावर तेरे देवता और एक नारक ऐसे सय मिटफे उगणीसदंसफोके विपे (असंघयणाय)
समयण नहीं है ( विगपछेषठा) और तीन विफनिको एक छेया संघयण है (संघयणछकंगम्भय) छे संघयण गर्म
अको (नरतिरिपमुयिमुणेयर्य ) मनुष्य और तिर्यचको जान लेना ॥ इति धौयिस दटके संघयण द्वार ३ ॥११॥
सधेसिंचउदहवासन्ना, ससुरायचउरसा । नरसिरियछसठाणा हुढाविगलिदिनेरइया ॥ १२ ॥
(सपेसिंघग्दहवा) सय दरकोके विपे धार तया दश (सन्ना) संक्षा होती है ॥ इति चोवीश दरकके चतुर्य संझावार
ससुरायचउरसा) सब देयोका समचोरस संस्थान है (नरसिरियछसठाणा) मनुष्य और तिर्यघको छही संस्थान होते
है (इंगविगठिदिनेरईया) विकणेंद्रि और नारफीको एफ हुंरक ही संस्थान होता है ॥ १२ ॥
नाणाविधयसूई बुब्युइवणवाउतेउअपकाया। पुढपीमसूरचढा-कारासठाणओभणिया ॥ १३ ॥
(नाणाविह) नाना प्रकारका (धप) यमाके आकारे संस्थान (सूइ) सुईके आकारे (युम्नुछ ) जरुके बुख़ुदामे
प्राकारे (पणयारवेसमपकाया) मनुक्रमसें वनस्पतिकाय बाउकाय तेनकाय और अपकायफा है (पुटपीमसूरचंदा
द्वारा) और पृथ्वीकायका मसूरकीदाल अथवा पम्प्रफे फारे (संठाणमोमणिया) इस प्रकारसें चोषीश दरकके
चम संस्थानदार कहा ॥ १३ ॥
सवेविचउकसाया लेसछकंगभतिरियमणुपसु । नारयतेऊवाऊ विगलामाणियतिलेसा ॥ १४ ॥

।
(सपेयिघरफसाया) सर्व दरकोके पिपे चारोही कपाय होते है इति घोषीय दरकके छठा पायवार ॥ (लेसहक
गम्मतिरियमणुएस) छेड़ीठेसा गर्म तिर्यच और मनुष्यको होते है (नारयतेऊषा) और नारक वेचकाय पारकाय
(पिगडा) और तिनविफसेंद्रि एसे छे दरकोके विपे प्रपमकी तीन लेस्सा होता है (माणिपतिलेसा) और पैमाणिक
देयोंको मन्तकी तीन लेस्था होति है ॥ १४ ॥
जोइसियतेउलेसा सेसासविहुतिचउलेसा । इदियदारसुगम मणुाणसत्चसमुग्धाया ॥ १५ ॥
(जोइप्सियवेनसा) और म्पोसिपीको एक तेजोलेस्याची होति है (सेसासपेबितिधनलेसा) और शेप सब देरफोफे
विपे कृमादि पार लेस्या है इति बोवीस दरके सेस्याद्वार ७ (इवियदारसुगम) और इम्ब्रियद्वार तो सुगम है ८॥
(मणुभाणसचममुग्धाया) मनुष्यको साटोही समुपास होति है ।। १५ ।।
वेयणकसायमरणे घेउवियतेयएयाहारे । केवलियसमुग्धाया सत्तइमेहुतिसन्नीण ॥ १६ ॥
(येयण) वेदना (कसाय) कपाय (मरणे) और मरण (रपिय) पैक्रिय (वेयएय) तेजस और (माहारे)
आहारक (फेपलियसमुग्धाया) फेषठी समुपात (सत्तइमेहुतिसन्नीण) इस प्रकार से सासोही समुथ्षात समि-पंचन्त्री
मनुष्यको होता है॥ १५ ॥
पगिदियाणकेपलि तेउमाहारगविणाउचचारि । सेपेउधियवजा विगलासनीणतेचेव ॥ १७ ॥

(एगिवियाणकेयलि) एफेन्द्रीको केवळी (वेसमाहारगविणा उपचार ) तथा तेजस मौर माहारक इस तीनुको घर- जके वाकीका पार समुपपात एकेन्द्रिको होता है (सेवेतपियपना) या तिन और वैक्रिय यह चार घरजके (विगला समीणवे) तीन समुश्चात विकलेन्द्रि ओर असन्नीको होता है (चेय) मिझे करके ॥ १७ ॥ पणगष्मतिरिसुरेस नारयवाऊसुचउरतियसेसे । विगलवुदिट्ठीयावर मिच्छचिसेसतियविट्ठी ॥ १८ ॥ (पणगप्मतिरिमरेसु) परन्तु गर्मज तिर्यच और सेर देवोंको प्रथमका पांच समुपास होता है (नारयवानम) नारक और पातकायके विपे प्रथमका (पर) चार समुन्धात है (तियसेसे) और शेपके सात दरकोफे विपे प्रथमका तीन समुद्रपात होता है ॥ इति चोवीस यंरके नवमा समुपात मार ॥ (विगठदुविधी) विकलेन्द्रिको दो रष्टि होती है एक सम्पद और दुसरी मिप्यारष्टि ऐसे को (थापर) पाच स्थापरको (मिच्छत्ति) एक मिप्यारष्टिही होति है (सेसतियविठी) क्षेप रहे हुये खो सोलर दरक उसके विपे सम्पक मित्र और मिप्यास्प यह तीन रष्टि होति है ॥१८॥ इति चौविश दरकके दशमा रष्टि द्वार.॥ पावरवितिसुअचफ्नु चउरिंदिसतर्गसपमणिय । मणुआचउदसणिणो सेसेसुतिगतिगमणिय॥१९॥ (पायर) पांच स्थापरको (वितिसुमचक्सु) तथा इन्द्रि और इन्द्रिको एक अचखुदशनही होता है (परि पिसु) परिविको (वर्गसुपभणिय) पा तया अपच ऐसे वो दर्शन सूत्रमे कहा है (मणुमाषउदंसमिणो) और मनुष्यफे थिप तो पपुदर्शन अभक्षुदर्शन अघधिदर्शन और फेवदर्शन ऐसे पारोही होते है (सेसेस्मृतिगतिर्गमणियं) पाकीफे सय दरकोके पिपे केपल पर्नके तीनतीन दर्शन कहा है ।। इति चोवीश दहकके ११-१२-दर्शनद्वार ॥१९॥ अन्नाणनाणतियतिय सुरतिरिनिरपथिरेअनाणदुगानाणा नाणदुविगले मणुएपणनाणतिअनाणा॥२०॥ (अन्नाणनाणतियतिय ) तीन अज्ञान और तीन ज्ञान (सुरतिरिनिरप) देवताको तथा तिर्यच और नारकफे होते है (घिरेअनाणदुग) आर स्थावरको मति तया भुत पैसे दो अज्ञान होते है (नाणाप्माणदुयिगले) दो ज्ञान तथा दो मज्ञान विफलेंद्रिको होते है (मणुएपणनाणतिअनाणा) और मनुष्यको तो पाष ज्ञान और तीन अज्ञान पसे आठोही होते है ।। इति पीपीश दंरफमें ज्ञान अज्ञानद्वार १५ ॥ २० ॥ इकारससुरनिरप तिरिपसुतेरपनरमणुपसु । विगलेचउपणवाए जोगतियथावरेहोई ॥ २९ ॥ (फारससुरनिरप) देयता और नारकको इग्यारे योग होते है (तिरिपसुतेर) तिर्यघको तेरह (पनरमणुएस) और मनुष्यको पद्रेही योग होते है (विगठेघर ) विकलेंद्रिको पार (पणपाए) यानकायको पांच (जोगतियथायरे होर) और स्थायरको तीन योग होते है ॥ इति चोवीश दसकके योगद्वार १४ ॥२१॥ उबओगामणुएसु पारसनषनिरयतिरियदेवेसु । विगलदुगेपणछकं चउरिंदिसुथावरेतियग ॥ २२ ॥ (उपभोगामशुपस) मनुष्यफे पिपे उपयोग (यारस) बारह होते है (नयनिरयतिरियदेषेस) नारक विर्यच और देवोंको नष उपयोग होते है (विगतदुगेपण) दो विकलेंद्रिको पाप (छ) छ (परिविस) पौरेन्द्रिको (पावरेति यर्ग) और स्थावरको तीन उपयोग होते है॥ इति घोषीश दरकमें उपयोगवार १५ ॥ २२ ॥ सखमसंखासमए गप्भयतिरिविगलनारयसुराय । मणुआनियमासंखा पणऽणतायावरअसंखा ॥२३॥ (संसमसलासमए) एक पमपके विपे संख्याता और असंख्याता (गप्मयतिरि) गर्भजतिर्यध (पिगठनारयसुराय) विकलेंद्रि नारक और देवता उत्पन्न होते है (मणुमानियमासंखा) मनुष्योंनिययकरके संख्याता उत्पन्न होते है (पणऽ पंता) पनस्पतिकाय अनम्ता (पापरमसंखा) और स्थावर असंख्याता उत्पन्न होते है ॥ २३॥ असन्निनरअसखा जहउवषाओतद्देवचवणेवि । पाषीससगतिदसंवास सहस्सउक्किट्ठपुठवाई ॥ २४ ॥ (मसधिनरमसंसा) असधी मनुष्यो असंख्याता उत्पन्न होते है (जहन्यवाओ) जैसेही उत्पन्न होते है (सहेवषय मेषि) तैसेही चषते है ॥ इति चौवीश पंरकमें उपपातदार तया चषणद्वार (पावीससगतिदसयाससहस्स) पाषीस हजार सात बजार सिन हमार और दक्ष हबार वर्षको मायु (उकितपुठवाई) उस्कृष्टो अनुक्रमे पृथ्वीकायादि इस लिये पृप्वीकाय अप्काय वाचकाय और वनस्पतिकायका जान लेना ॥ २४ ॥ तिदिग्गितिपलाक नरतिरिसुरनिरयसागरतितीसा । वंतरपाटंजोइस परिसलसखाहिअपलि२५॥ (तिविणग्गि) तिन अहोरात्रिका आयु अनिकायका (तिपलाऊ) तीन पस्योपमका आयु (नरतिरि) मनुष्य और तिर्यवफा (सुरनिरयसागरतितीसा) देवता और नारफका उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरोपमफा होता है (यतरपाई) व्यंत रफा आयु एक पत्योपमका (जोइस) और ज्योतिपी देपोका आयु (परिसलहसाहिसंपलिस) एकलास पर्प अधिक एफ पस्योपमका होता है ॥ २५ ॥ असुराणअहियअयर देसूणदुपछयनवनिकाए । यारसवासुणपणदिण छम्मासउकिट्ठविगलाऊ ॥२६॥ (असुराणादियमयर) असुरफुमारनिकायका आयु एक सागरोपमसे कुछ अधिक होता है (वसूणवुपश्यनवनिकाए) शेपनयनिकायफा आयु देसेरणा दो पस्योपमका होता है (पारसयासुणपणदिण) पेरंद्रीका घारह वर्ष और वेश्द्रीका गुण पपास विन (छम्मासफियिगलाऊ) परिंद्रीका छ मासका उत्कृष्ट आयु अनुक्रमसे समज छेना ॥ २६ ॥ पुढवाइदसपयाण अतमुलुचजहन्नआउठिई। दससहसयरिसठिइआ भवणाहिवनिरयवतरिया ॥२७॥ (पुढयाइदसपयाणे ) पृथ्वीफायावि दशपदफी पांच स्थावर तीन विकलेन्द्रि पंचेंद्रितिर्यच और मनुष्यका (अंतमुह चजहनमारठिई) जपन्यसें आयुफी स्थिति असहिचकी कही है (दससहसपरिसठिइमा ) दश हजार पर्पकी आयु स्थिति अपन्यसें (भयणाहियनिरययंसरिया) दश मुयनपति नारक और व्यंवरीककी फही है ॥२७॥ येमाणियजोइसिया पल्लतयट्टसाउआईति । सुरनरतिरिनिरएस छपज्जत्तीथावरेचउग ॥२८॥ (येमाणियजोइसिया) पैमानिक और ज्योतिपीका आयु जपन्यसें (पाहतयसमाउमाटुंति) एक पल्योपमफे आठमे

भागे होता है १८॥ इति चौवीश दंरफे उत्कृष्ट और जघन्यसें स्पितिवार कहा ॥ (सुरनरतिरिनिरपस) देयता मनुष्य तिर्यच
पौर नारफके पिपे (छपजसी) छही पर्याप्ति होति है (थायरेषतर्ग) और पाच स्थापरके पिपे प्रथमकी चार पर्याप्ति है ॥२८॥
विगलेपचपज्वची छदिसिआहारहोइसोसि । पणगाइपएभयणा अहसन्नितियभणिस्सामि ॥ २९ ॥
(बिगपचपजत्ती) तीनो विकलेंद्रिके विपे प्रथमकी पांघ पर्याप्ति होति है ॥१९॥ इति चौधीश ईरफमें पर्याप्तिद्वार॥
(छदिसिआहारहोइसलि) सप जीवोंके आशरे छही दिशीका माहार जान लेना (पणगाइपएभयणा) इवना विशे
पकि पृष्षी फायादि पांचोही स्थायर पदके विपे भजना है इस लिए पदिशीका माहार होघे मी सही और तीन प्यार
पाच दिशीका मी होवे २०॥ इति चौयीश दरके दिशी माहारद्वार (अहसमितियभणिस्सामि) अप तीन संज्ञा
मार कहता ॥२९॥
चउविहसुरतिरिपसु निरपसु अ दीहकालिगीसन्ना । विगलेहेउपएसा सन्नारहियाथिरासखे ॥ ३०॥
(पविइसुरतिरिपस) पार मकारके देषोंके विपे तया तिर्यच (निरपसुमवीहकालिगीसन्ना) और नारकके विपे
दीर्घ फासकी संशा होति है (विगलेहेचषपसा) और विकलेंद्रिके पिप हितोपदेशकीसंज्ञा होति है (सप्नारहियाथिरास)
भौर स्थायरो सवही संज्ञा रहित होते है ।। ३० ॥
मणुआणदीहकालिय दिट्ठीवाओवपसिआकेवि। पजपणतिरिमणुअघिय घउविहदेवेसुगच्छति ॥३१॥

(मणुमाणदीपफालिय) मनुष्यको दीर्घकालफी सज्ञा होति है (विठीवामोयपसिआफेयि) किसनेक आचार्य मनु
प्यको रष्टियादोपदेशकी २ संज्ञा मी फहते है ।। इति घोषीशदरकमें तीन प्रकारकी संझादार ॥ (परमपणतिरिमणु
अघिय) पर्याप्ता पद्रितियंच और मनुष्य निश्चय करफे (चयिहदेवेसुगच्छति) चार प्रकारके देके पिपे जाते है ३१ ।
सखाउपज्जपणिदि तिरियनरेसुतहेवपज्जते । भूदगपत्तेयवणे एएमुश्चियसुरागमण ॥ ३२ ॥
(संवाउपअपणिदि) संस्याते आयुपाले पर्याप्तापपेन्द्री (तिरियनरेसुतहेयपणाचे) तिर्यच और मनुष्यके पिपे तेतेही
पर्याप्ता (भूदगपतेययणे) पृप्पीफाय अपकाय और प्रत्येक वनस्पतिकाय (एएसुधिय) इस पांचोदरकके विपे निश्चय
फरफे (सुरागमण) देयता उत्पन्न होते है ।। ३२॥
पजचसखगप्भय तिरियनरानिरयसत्तगेजति । निरयउवहाएपम उवषजतिनसेसेसु ॥ ३३ ॥
(पज्जयसंखगप्भय) संख्यासा वर्षके आयुषाले पर्याप्ते गर्भज (तिरियनरा) तिर्यच और मनुष्य (निरयसचगेजति)
यह दोनोही सावोही नरकफे यिपे आते है (निरयस्वष्टा) नरफसे निकले हुवे जीयो (एएस) यह यो दंडफमे
उपयति उपजे हे (नसेसेलु) शेप दरकोफे विष उत्पन्न नही होवे है ॥ ३३ ॥
पुढवीआउवणस्सइ मज्झेनारयविवज्जियाजीवा । सधेउषवज्जति नियनियकम्माणुमाणेणं ॥ ३४ ॥

(पुदयीमाउयणस्सइ) पृयीकाय अप्काय और यनस्पतिकायके (मम्झ) विपे (नारयविवजियाजीया) नारकके जी- योको पर्मक (सपेज्यवमति) और सर्व जीयो उत्पन्न होते है (नियनियकम्माणुमाणेण) अपने अपने कर्मानुसारे ॥२४॥ पुढवाइदसपएम्स, पुढवीआउवणस्सईजति । पुढवाइदसपएहिय, तेउवाउनुउववाओ॥ ३५ ॥ (पुरपाइदसपपमु) पृष्यीकायादि दश पदके विपे (पुढवीआठषणस्साईजति) पृथ्वीकाय अप्पकाय और यनस्पति कापफे जीयो सप होते है (पुठयादिसपपहिय) और पृथ्वी कायादि दश पदमेंसे निकले हुये बीयो (उपारसुग्य पामो) तेउकाय और पारकायफे विपे उत्पन्न होते है ॥ ३५ ॥ तेउवाउगमण, पुरवीपमुहम्मिहोइपयनवगे । पुनवाइटाणदसग, विगलाइतियतहिजति ॥ ३६ ॥ (तेज्याउगमर्ण) वेदकाय और पारकायकाजाना (पुढवीपमुहम्मिहोइपयनयगे) पृथ्वीकायादि नषपदके पिपे होता है (पुरयाइठाणसग) पप्वीकायादि दश स्थानकके जीयो (पिगलाईसियतहिंजति) तीन विफलेन्द्रिमें उत्पन्न होवे तैसे जाये है ॥२॥ गमणागमणंगप्मय, तिरिआणसयलजीवठाणेनु । सवरपजतिमणुआ, तेउवाऊहिंनोति ॥ ३७ ॥ (गमणागमणगाभयविरिमाणसयराजीवगणेम) गर्मजतिषचका आना आना सप दंरफोके पिपे होता है (सदस्य जतिमणुमा ) और मनुप्योकामी जाना सय दरकोफे विपे होता है (उपाहिंनोजति) परतु उफाय और यातका पसें नहीं माते ॥ १७ ॥ यतियतिरिनरेस, इत्थीपुरिसोयचउविहसरेस्तु । पिरविगलनारपस, नपुसवेओहवइएगो ॥ ३८॥ (यतियतिरिनरेसु) तीन वेद तिर्यप और मनुप्यको होते है (इरपीपुरिसोयचरविहसुरेसु) और चार प्रकारके देवोफे पिणे खी घेव तथा पुरुप घेद होता है (चिरयिगठनारपस) और पांच स्पायर पिकलेन्द्रि और नारकके विपे (नपुसओहवाएगो) एक नपुंसक घेदही होता है ॥ ३८ ॥ पञ्चमणुयायरग्गी, येमाणियभवणनिरयवंतरिया । जोइसचउपणतिरिया, पेइदितिइदिमूआउ ॥३९॥ (पजमणुयायरग्गी) पर्याधा मनुष्य और यादर अनिकाय (वेमाणियमवणनिरयसरिया) पैमानिक मुवनपति नारक और भ्यंतर (मोइसपनपणतिरिया ) ज्योतिपि चौरिन्द्रि और पंधेन्द्रि सिर्यच (पइवितिइंविभूभाग) तया दोन्द्रि विम्द्रि पृषीफाय और अप्पकाय ॥ १९ ॥ पाऊयणस्सईचिय, अहियाअहियाकमेणमेहुति । सविइमेभाषा, जिणामएणतसोपचा ॥ ४० ॥ (याषणस्राईपिय) पाउफाय और वनस्पविकाय यह सप निश्चय करके (महियाअहियाकमेणमेहुति) गनुक्रमे एक एफसे अधिक होते है (सपेविइमेभाषा) या सपही मी भाव (जिणामएर्णतसोपचा) हे जिनेश्वर देव मैंने अनती र पाया है॥४॥ सपइतुझभत्तस्स, दउगपयममणभग्गहिययस्स । दरतियविरइसुलह, लछुममदितुमुक्खपय ॥४१॥ (संपातुहीमचस्सदंरगममममणभग्गहिययस्स) मय चौधीश दरकोके स्थानकके विपे ममनेसे (निपच) भागा हुवा है मन जिसफा ऐसा तुमारा भफ पसा मुझको (दरतियविरबसुला) मन वपन और काया यह तीनदरका पिरामसे सुम्म एसो (लहुममदितुमुक्सपर्य) मोष पर मेरेको जख्दी वेवो ॥ ४१ ॥ सिरिजिणहसमुणीसर, रजेसिरिधवलचदसीसेण । गजसारेणलिहिया, एसाविन्नचीअप्पहिया ॥४२॥ (सिरिषिणासमुणीसर) श्री जिनसमुनीपरके (रखेसिरिघवलपदसीसेण) राज्यके समय श्री धवलचंद्रनपाध्या यके शिष्य (गजसारेणलिहिया) गजसार मुनिने लिखा है (पसाविक्षतीमप्पहिया) यह विज्ञप्ति अपनी आस्माके हितके मर्षे ॥४२॥ ॥ इति हिन्दी अनुवादसहित दडक प्रकरणं समाप्तम् ।।

यन्दे बिनवरम् ।
अथ लघु-सघयणि-प्रकरणम् ।
नमिय जिण सवलु, जगपुज्ज जगगुरु महावीर । जचुदीवपयत्थे, वुच्छंसुत्तासपरहेउ ॥ १ ॥
अर्ध-(अगपुज) तीन जगत् के पुण्य (जगगुरु ) तीन जगत्के गुरु, ऐसे (सपन्न ) सर्पस (मिर्ण) श्री मिनेम्वर
(महावीर) महापीर स्यामीफो (नमिय) नमस्कार करके, (जबुद्दीय) जवुद्वीपके अदर रहे हुए शास्वते, (पयत्ये)
पदार्य उनको (सुचा) सुषसे जाणकर (सपर हेर्न) स्वपर हिवार्य (बुच्छ) फहुंगा ॥१॥
मावार्ध-तीन अगरके पुण्य और गुरु पंसे सर्वज्ञ श्री महावीरस्थामिको नमस्कारकर अंयुशीपमें रहे शास्वते पदार्थ
उनको स्वपर हितार्थ फहुंगा ॥१॥

खदा जोयणवासा, पचय कुठाय तिस्थ सेठीओ।विजय इह सलिलाओ, पिंटेसि होइ सघयणी॥२॥ अर्थ-प्रथम भरवक्षेत्रषत् इस अंयुद्धीपमें कितने (ला) संपा है। द्वितीय (मोपण) योजनका ममाण, प्रितीय भरतादिक (पास) पाशभेत्र कितने है। पोया पैताब्याविक (पमय) पर्षत किये है। पांचमा पन पर्वतोपर (कुराय) कुट (शिखर) कितने है। छडा मागपादिक (तिस्प) सीर्य कितने है। सातमा, वैतादयाविक पर्षदोपरि रविदुई, विपा भरोष आमियोगिक देवोंकी (मेडीभो) श्रेणिये शिसनी है? आठमें कादिक (विजय) विमय कितना है? नपमें पभद्रहादि (पर) द्रा कितने है। दशमें गहासिघ्यादि (सलिलामो) नदीयें कितनी है। एवम् इसी दशो बारोको (पिरसि) इकडायाने समुदायके विपरणकरके पह (संघयणी) संग्रहिणी नामका मफरण (होइ) होता है ॥२॥ भावार्य-पोला बारमें भरत पेनके मुताविक अनुशीपमें कितने सर है। दुसरेमें योजनका प्रमाण तीसरेमें पास क्षेत्र बोयेमें पर्वत पाचमें उन पर्वतोपर शिखर छहेमें तीर्य सातमें मेणियों की संख्या बाठमें विजय नषमे ब्रह, पञ्चमें नदिये इनही यशोमारोकरके या संघयणी प्रकरण होता है॥२॥ णउम सय खगण, भरह पमाणेण भाइए लक्खे।अहवाणउयसयगुण, भरह पमाणं हवइ लक्ख ॥३॥ अर्थ-(सस्ते) एकसास योजनका जयुवीप उसको (मरहपमाणेण) भरतपेत्रके प्रमाणसें, "याने पांचसो छवीश योजन एकलासे" (भाइये) मांगाकार करें वो (परमा सर्य संगणी) भरतक्षेपके मुसापिक "एकसो और निवे" संख्या होते है, (आया) या (णत्यसय) एकसो और नपे क्षेत्रीको (मरहपमाणेणं) मरतक्षेत्रके प्रमाणसे (गुण) गुणाकार करें तो (उस) एक लाख योजनका यह अनुदीप (इया) होता है ॥३॥ भाया-एफ डास योजनफे जंबुद्वीपको, पांचसो छ्यीश योजन छ कलासे मांगें तो भरतक्षेत्रयत् एकसो नपे क्षेन (भाग) इस युद्धीपमें होते है, इसी एफसो नपेको पांचसो छवीश योजन छकछासे गुणाकार करें तो एक लाखफा क्षेत्रफल होता है॥३॥ अहविगखंढे मेरहे, दो हिमवते अ हेमवइ चउरो। अट्ठमधा हिमवत, सोलसखडाइ हरिवासे ॥४॥ अर्थ (अप) मर्यात् (हग संसे भरहे) एकसंख्या भरतक्षेत्रका (दो हिमयते) दो संख्या हिमयंत पर्पसके (अ) पुनः (पारो) धार संख्या (हेमया) हमयंस करके युगलियांके क्षेत्रका (अ) माठ सध्या (महाहिमर्पते) महा हिमपंत पर्वतके (सोउसखंडाई) सोलह संस्था (इरिषासे) हरिवर्प करफे युगलियांके क्षेत्रका ॥४॥ भायार्प-~एक संठया भाग भरतक्षेत्र दो संश्वा भाग चुहिमपत पार संख्या भाग हेमर्पत, आठ संख्या माग महाहिमपंत पोले संडया भाग हरिषर्प, एय इकतीश खस्या इस गायासें जाणना ॥ शेप मागे ॥ ४ ॥ बचीस पुण निसडे, मिलिया तेसहि पीय पासेवि। चउसहिओ विदेहे, तिरासि पिंडेइ णउयसय॥५॥ अर्प-(पुण) फिर (यचीस) यत्तीस संख्या प्रमाण (निस) निपथ पर्वत, यह सर्व (मिलिया) मिलानेसे (सेसहि)

तेसठ संख्या होते है, "इसीतरह" (बीयपासेवि) दुसरी तर्फमी "एक खरया परवत क्षेत्रका दो शिखरी पर्वतके
चार पेरण्पषत देवके माठ रूपी पर्वतके, शोला रम्यक क्षेत्रफे पचीस नीलत करके तीसरा यर्प घर पर्वतफे, एवं
या सठ संग्वा सपा (पसठिओ) चौसठ संरघा (विदेहे) महाविदेह क्षेत्रके यह सर्व (तिरासि) दीनो राशीके
संख्या (पिग) मिलानेसे (णयसम) एफसोने नि संस्था होते है इति प्रथम भारम् ॥ ५ ॥
भावार्थ-पच्चीश सरया भाग निपर पर्षत इसके साथ उपरकी गाथाके संख्या माग मिलानेसें (तेसह) खडया
भाग होवे है । इसीतरह, दुसरी तर्फ १ लर माग पुरयर २ सर माग शिखरी पर्वत ४ क्षेत्र माग ऐरण्यपत, आठ
संख्या भाग, रूपी पर्वत १६ सरया भाग, रम्पक क्षेम ३२ संसपा माग नीयत और १४ खटवा भाग महाविदेह
इतनासपकी गिणना की बाप तो, एफसो निये (१९०) संरवा होते है ॥५॥
जोयण परिमाणाइ, समचउरसाइ इस्थ खहाई । लरफस्सय परिहीए, तप्पाय गुपोय छुतेष ॥ ६ ॥
बर्ष-(इत्प) यहां अंधुदीपके अन्दर (जोयण परिमाणाई) एक योजनके प्रमाणपाठे (समपरसाई) समच
तुरन (संगई) संख्या कितने होंगे। असफी रीति करते है।
(उस्लस्स) एक लाख योजनकी (परिहीप) परिपिका जो अक आय उसको (सप्पाय) तस्माद याने क्षेत्रके चौथे
हिस्सेसे जैसें लास पोजनके युदीपका चोयाहिस्सा २५ हजार योजन होता है उससें (गुणेय ) गुणाकार करणेपर
गणिवपद(क्षेत्रफल)का प्रमाण (ईवेष) निघय होता है ॥ ६ ॥

भायाध-उास योजनफे अंबुद्वीपमें एफ योजन सम चतुरन कितनं खरष झागा उसका क्रम आगे दिखाते है।
एक लाख योजनकी परिधीका जो अंक आय उसफो मूछ क्षेत्रके चोये मागसें गुणा करणेपर "क्षेत्रफल
पनवा "॥६॥
विक्खमवग्गदहाण, करणी वहस्स परिरओ होई। विक्खमपायगुणिओ, परिरओ तस्स गणियपय ॥७
अर्थ-पुदीपका (विस्वम ) विष्कम याने गोठ क्षेत्रका विस्तार [प्रमाण ] जितना हो उसका (पग्ग) घर्ग याने
जिवना विष्कम हो उनको उतनेसेंहि गुणा करे, पाव उस वर्गके अकोंफो (दह गुण) दशगुणा करने से जो अंक आये
उसको "विसमसम पयइयग्गो" इस वृहद् क्षेत्र समासकी गाथाके अन्दर जो (फरणी) करणेकी आम्नाय कही है उसके
मुतायिफ उन अंकका मूल सोधा जाय अप (पट्टस्स) गोउ क्षेत्रकी (परिरओ) परिधि (होइ) होती है और बाद
उस (परिरमो) परिपिके योजनफा जो अंक आय उसको (विक्सम) विष्कम योमनके (पायगुणिमो) पादसे याने
चौपे हिस्सेफे अंकोसे गुणाकरे तप (वस्सगणियपर्य) रसका गमिवपद याने क्षेत्रफल होता है ॥७॥
भाया-जिस क्षेत्रका मितना विष्कम्म हो उनको उतोसें गुणाकरणेपर वर्ग बनता है उस पर्गको दश गुणाकर
"मुहद क्षेत्र समासमें पताये" हुएफमसें उस विकम क्षेत्रको परिधिनिकाले बाद उस परिषिके अंकोंको विकमके चतु
घांश अकोंसें गुणाफरणेपर गणितपद याने क्षेत्रफल पनता है॥७॥

परिही तिलक्खसोलस, सहस्स दोसय सत्तवीस हिया । कोसतिग अट्ठावीस, धणुसय तेरंगलदहियं ॥ ८॥ अर्थ-अबुद्धीपका विष्कम एक ठास योजनका है उसकी (परिडी) परिधी (तिउक्त सोलस सहस्स) तीन लाख शोठे हजार (दोसय सत्तषीस हिया) दोसो सचाईन योजन अधिक (कोसतिग) तीन कोन (सय) पकसो (अ. पीस) अगास (पणु) धनुप्य और (वेरगुरुसहिय) सार्घत्रयोदघागुल जंबुद्धीपकी जानना ॥८॥ (परिशिष्ट) इस परिपीको मुद्वीपके विष्कम प्रमाणसे चतुर्याश्च निकाल उससे गुणाकरे तम अंगुदीपक गणितपद (धेप्रफल) होता है उसकी संस्या नीषेकी गापासें दिखाते है। माया-अबुद्वीपका विष्कम एक ठास योजनका है जिसकी परिपी "तीन छाल मोठे हजार दोसो सचाईश योजन तीन कोप" एफसो महादश धनुप सादातेरा अगुरु (३१५२२७) वोजन (३)कोप (१२८) पनुप्प (१) अगुठ) होती है ॥८॥ सत्तेवय कोडिसया, पउआ छप्पन्नसयसहस्साई। चउणउप पसहस्सा, सर्यदिव क साहियं ॥९॥ अर्थ-(य) जो (सत्तव) सात (नया) अतानि (सों) (कोरी) झोगेपरी परमा)नि मोर माने गये निये कोर" (उपनसय) उपन्यो (सहस्साई) सहस्र “याने छपनखाख" (च) पुना (पठणउप सहस्सा) चोराएं हजार (सर्य दिय8) देवसोसें (साहियं) साधिक ॥९॥ माया-सातसो निपे फोर, छप्पन लाख घोराणु हजार, देठ सो समचतुरन योजनसें अधिक ॥९॥ |गाउअ मेंहगपन्नरस, घणुसया तह धणूणि पन्नरस्स। सर्द्धिच अंगुलाई, जवुदीवस्सगणियपयं ॥१०॥ (युम्मम्) अर्थ (गावममे) एक कोश (पारस धणुसया)पद्रहों धनुष्योपरी (घशुणिपसरस्स) पनराधनुष्य (च) पुनः , (सहि अगुठाइ) साठ गुरु (जबुखीयस्स) अंबुद्धीपका (गमिमयर्य ) गणितपद जाणना॥इति द्वितीयहारम् ॥ १० ॥ एक कोप पनरेसो पनरा धनुप, साठ अगुल यह एफ लास जोजग जयुर्वीपका गणितपद. (क्षेत्रफल) जानना अंक गणित (७९०, ५६, ९४, १५०) योखन (१) कोप (१५१५) धनुप्य (१०) भगुलेति ज्ञेयम् ॥ १०॥ मरहाइ सत्त वासा, विया चउ चउरतीस पटियरे।सोलसवक्खारगिरि, दो चित्त विचिच दो जमगा ११ अर्थ-मिरवाइ सच्चयासा) मरतादि सात पास क्षेत्र "चसफे नाम' १ भरत २. हेमवत हरियर्फ ४ महाविदेह ५ रम्यकपरण्ययत ७ एरवत ॥ इति तृतीयदारम्॥ "चतुर्प निश्चल उमार"

देयकुरु उचरफुर यह दो युगलियांके क्षेत्र छोरकर, शेप च्यार क्षेत्रोंके अंदर (वियह पनवष्ट) यर्तुल घेताम्य प्यार
१ फिर (इयरे) इन वैवाथ्योंसे इतर (धरतीस) चततीस छम्ये वैवाय पर्वत है, पुनः (सोखसषक्लारगिरि)
शोले पपसारागिरि "विजयांके अंतरमे है" फिर (वित्त विपित्त) १ विच २ पिपिच पह दो पर्वत और है इतर
दो पर्वत, (अमगा) एक जमग दुसरा समग ॥ ११ ॥
भाषार्थ-भरत १ हेमवत २ हरिवर्प ३ महाविदेह ४ रम्यक ५ हिरण्यवत ६ परवत ७ यह सातवाश क्षेत्र है ।
देषफुरु, उत्तरकुरु इन दोनो क्षेत्रोंको छोड शेप प्यार क्षेत्रोंमें पर्तुल घेताव्य एक एफ है इनसें भिम चोवीश उम्ये,
पैताम्य, शोले यक्सारा गिरि, दो चित्त १ विचित २ दो जमग १ और समग २ यह सब मिल अठायन शास्वते
पर्वत, शेप आगे ॥ ११ ॥
दोसय कणय गिरीण, चउ गयदताय तह सुमेरुय । छवासहरापिंडे, एगुणसचरिसयातुनी ॥१२॥
अर्प-देयकुरु और उप्परफुरु इन प्रत्येक क्षेत्रमें पांच २ द्रह है और एकैफ ब्रहके समयसर्फ दश २ कंचनगिरि है,
अतः इन सबको मिसानेसै (दोसयकणयगिरीर्ण) दोसो (२००) फेघनगिरि होते है, (च) फिर (पतगयता)
प्यार गजदते पर्यत है (वा) से (सुमेरु) एक सुमेरु (प) और इनके दोनो वर्फ, तीन २ मिलकर (छ) छ
(पासहरा) घKघर, पर्षत है, इन सबको ( पिरे) फटाफरणेसै (सयादुधी) दोसो (एगुणसचरि) एक कम सित्तर
पर्वत होते है ॥१२॥

भायार्थ-देयफुरु उत्तरकुर इन मत्येक भेनमें पांच २ वह है, और पफ २ ब्रहके दोनो तर्फ दश २ कंपन गिरी
है.इससे इन दोनो क्षेत्रोंमें दोसो पर्वताकी सस्या हुई फिर प्यार गमदत पर्वत एक मेरु गिरी इन मेरु गिरीके दोनो
सर्फ तीन २ यर्पधर पर्वत इन सबको मिठानेसे दोसो इग्यारा (२११) पर्वत ए इसके साथ पूर्वके (५८) मिलानेसें
दोसो एक कम सिचर (२१९) शास्त्रते पर्वत इस जयुद्वीपमें है ॥ १२ ॥
सोलस वक्खारेनु, चउ चउ कूडाय हुति पचेय।सोमणस गधमायण, सचट्ठय रुप्पि महाहिमवे ॥१३॥
अर्ध-(सोउसयक्सारेसु) शोठा पक्षस्कार पर्वतांफे अदर (पचेयं) प्रत्येकपर (धरपउग) प्यार प्यार शिखर
(इंति) है, यह शोले पर्वतोपर सर्व पोसठ शिखर हुए फिर (सोमणस गंधमायण) एफ सौमनस द्वितीय गंधमादन
इन प्रत्येक गिरिपर (सचे) सात साव कूट है (रुप्पि महाहिमधे ) रूपी और महाहिमवंत इन दोनो पर्वतोपर (अठ्य)
आठ आठ फूट है, एवं ९४ फूट (शिखर हुए) ॥१३॥
भापार्थ-शोले यक्षस्कार पर्वताफे प्रत्येकपर प्यार २ फूट होनेसें, घोसठ फूट, फिर सोमनस और गंधमादन इन
दोनोंपर सास २ फूट होनेसे चयदा य रूपी और महाहिमयंत इन दोनोंपर आउ २ फूट होनेसे शोला यह सय मिला
नेसे चोराणु (९४) फूट होते है ॥ १३ ॥
चउतीस वियवेसु, विजुप्पह निसद नीलवतेपु।तह मालवत सुरगिरि, नव नव कूडाइ पत्तेय ॥१४॥

अर्प-चटतीस वियझेस) वैवाज्यनामके पोतीस पर्वतापर, व (विजुष्पह) विद्युत् प्रम नामका गमदस गिरि
वथा ( मिसर) निपप गिरि खया (नीउपस) नीलवंत गिरि (वा) वेसेहि (भारत) माझ्यत नामका गजवंत
गिरिस्त या (सुरगिरि ) मेरुगिरि, यह एक कम पाठीश पर्वसांपर (पर्य) प्रत्येके २ (नव नप कूडाई) नष नप फूट
है ॥ एवं पूर्वके और यह मिलकर (४४५) कट हुए ॥ १४ ॥
भावार्थ-पोतीश छम्बे पैताव्य ष एक विद्युत्नम, दुसरा मिपध, वीसरा नीलपत, घोया मान्ययाप्त पाथमा ।
सुमेरु इन इन चालीश पर्वतापर, नव २ कूट होनेसे तीनसो इवन कट हुए, और पूर्वक मिलानेसे (४५) कूट
होते है॥ १४ ॥
हिम सिहरिम इकारस, इय इगसट्ठि गिरीम्स हाणाएगचे सावधणं, सय चउरो सत्तसट्ठीय ॥१५॥
मर्य-(हिम) हिमवंत गिरिखया (सिहरिस) शिखरी पर्वत, इन प्रत्येकपर (इकारस) इग्यारा २ कूट है, (इय)
पह (इगसहि गिरीठ) स्व इगसद्ध पर्वतोंपर जो (शाणं) कुट है उसको (एगते) एकत्व करपेसे समधणं) सर्व
संख्या (सयचारो) प्यारसे (सचसठीर्य) सरसठ फूट (भिसर) होते हैं ॥ १५ ॥
भावार्प-हिमवंत मौर शिनरी इन दोनों पर्वतोंपर इग्यारा २ फूट है, पपे सर्व इगसठ पर्वतापर मारसो सरसठ ।
(४९७) फूट होते है ॥१५॥

चउसच अट्ठ नवगे, गारसकुडेहिं गुणह जह सख।सोलस वुदु गुणयाल, दुवेयसगस४ि सय चउरो ॥१६॥ अर्थ-(सोउस) पदश पर्वतोंके (पर) प्यार प्यार कूट गिननेसै चोसठ होते है। (६) दो पर्वाक (सत्त) सास २ फूट गिननेसे पपदे होते है (दु) और दो पर्वतोंके (मह) माठ २ फूट गिननेसे शोले होते है (गुणपाठ) एक फम चालीस पर्योंके (नवगे) नय २ कूट गिनते तीनसो इकापन ( ३५१) होते है (दुवेय) दो पर्वतोंके (पगा- रस फूटेहि ) इग्यारा २ फूट गिननेसे पावीस होते है एवं पूर्योक सर्व फूटें (गुणद) गुना (जहसखं) ययासंख्यासे (सय परो सगसठि) पयारसे सरशठ (४६७) होते है ॥ १६ ॥ भावार्थ-शोलोपर प्यार २ फे हिसामसें चौसठ, दोपर सास २ के हिसायसें घपदा, दोपर आठ २ के हिसावसें शोला उन चालीसपर नघ २ के हिसायसें तीनसो इफापन दोपर इग्यारा २ के हिसापसे यावीस, पयं इगसठ पर्वतोपर प्यारसे सउसठ (४६७) फूट जाणना ॥ १६ ॥ चउतीसविजएम, उसहकूहा अट्ठमेरु जवुमि । अट्टयदेवकुराइ, हरि कूड हरिस्सयसट्ठी ॥ १७ ॥ अर्थ-(परतीसं पिमएस) चकपर्तिके चौतीस (३४) विजयमें पकैक (साता) अपभफूट है, और ( मेरु) मेरु पर्वतफे प (अंघुमि) जंयु पृटके (मह) आठ २ फूट है, पुनः (वेवराई) देषकुरु अंदरमी (मह) आठ फूट

है, फिर शामलि सूक्षके मम्पका (हरिफूट) हरिकूट, और (हरिस्सस) हरिसह ये दो फूट इन टाके साथ मिला
णेसे (मठी) साठ भूमि फूट होते है ॥ पंचम फूट द्वार मिति ॥ १७॥
माया-पोतीश पिजयके पोतीच फापम कूट और एक मेरु पर्वत, दुसरा जवुवृक्ष तीसरा देयकुरु इन तीनांके
आठ २ भुमिकूट, फिर शात्मलिवृक्षके पीच हरि फूट और हरिसह यह दो फूट, एवं मुमि कूाकि सस्या साठ (६०)
होती है ॥ १७॥
मागह वरदाम पभास, तित्यविजएम एरवय भरहे। चउतीसा तिहिंगुणिया, दुरुचरसयं तु तित्याण १८
। मर्ध-(विजएस) पचीस विजय, य (परयय) पेरपस, और (मरहे) भरसक्षेत्र, इन प्रत्येक पोधीश स्यानोके
अन्दर, एक (मागह) मागध, दुसरा (परवाम) परदाम, तीसरा (पमासं) ममास, ये तीनो (तिस्थ) तीर्य है, अतः
(परतीसा) घनतीशको (तिहिं) तीनसे (गुणिया) गुणा फरें तो (६) फिर (दुरुचरसय तिरयाणं) एकसो दो (१०२)
वीर्य होते है।॥ १८॥
भाषा-यधीशयिजय और एफ ऐरषत, एफ भरत इन पोतीझ धेषाम एक मागध दुसरा घरदाम तीसरा ममास
यह तीन २ तीर्प हरपक क्षेत्रमें होते है अस्तु एफसो दो (१०२) सपी वीर्योकी संख्या मानना ॥१८॥
विजाहर अभिमोगिय, सेठीओ दुन्निदुन्नि घेय । इय चउगुण चउतीसा, छत्तीस सयतु सेढीण ॥१९॥

अर्थ-(धेय) पेसान्यके ऊपर, एक (विजादर ) विद्याधर और दुसरी (अमिओर्गिय) आमियोगिक ब्याका (दुतियुति) दो दो (सेदीमओ) मेणिये है तय (इय) ये (घनतीसा) पोतीश दीर्घ (सम्वे) वेतान्यांको (घरगुण) प्यार गुणा करणैसे (सु) फिर (छत्तीस सयं सेवीण) एकसो छचीस श्रेमिये अंयुद्धीपमें होती है ॥ १९ ॥ भाषार्थ-प्रत्येक छम्वे वैताब्यापर, विद्याधर और आभियोगिक देषांकी दो दो श्रेणिये है ॥ अतः प्रत्येकपर च्यार २ के हिसायौ एफसो छधीश श्रेणिये होती है ॥ १९ ॥ चकीजेअबाइ, विजयाई इत्यहुति चउतीसा । महदह छ पउमाइ, कुरुसुदसगंति सोलसगं ॥२०॥ अर्थ-(पीजे अपाई) पीतव्यानि, याने पक्रयाची जिन क्षेत्रको जीतकर उस्मे राज्य करे पसे (विजयाई) । पिजय (इत्य) इस अयुदीपमे "यचीस महाविदेह पफ ऐरयत एफ भरत यह मिलकर (परतीसा) परतीश (ति) है ।। (परमाइ) पद्माविक महादह (छ) पद याने १ पम, २ महापम, तिगिछि, ४ फेसरी, ५ पुंडरीक, ६ महापु पारीक, यह छ है, पुनः (फुरसु) देयफुरु और उधरफुरु इन दोनो क्षेत्रोंमें पांच पाच द्रह है यह मिलकर (दसर्गति) पछद्रह हुए इसके साय उपरके मिठगनेस (सोउसग) सोलह (महदह) महानद्रह इस अबुद्धीपमें आणना ॥ २० ॥ मापार्थ-मिस क्षेत्रको चक्रवर्ती जीतकर उस्मे राज्य करे उसको विजय कहते है, ऐसे विजय जपवीपमें, पतीश महायिदेह एक ऐरयत और एफ भरत, यह पोतीश है।

पा १ महापन र सिगिछि र केसरी : पुण्डरीक ५ और महापुण्ठरीफ ६ इन छके साय देषकुरु मोर उत्तरकुर इन क्षेत्राके पाघ २ द्रह मिलानेसे शोले महानग्रह जातीपमें जानना ॥ २०॥ गगा सिंधुरचा, रत्तवई चउनईओ पचेयं । चउदसहिं सहस्सेहि, समग्ग पञ्चति जलहिम्मि ॥२१॥ अर्थ-जंबुद्धीपके दक्षिण भरत क्षेत्रमें एक (गंगा) गंगा दुर्जी (सिंधु) सिन्यु यह दो वरी नदीये है, इसी तरह उचरकी तर्फ ऐरयत क्षेत्रमें पफ (रचा) रका दुजी (रचपई) रफयची यह दो बरी नदीये है, इन (पोय) प्रत्येक २ (पर) प्यार (नामो) नदियोंके (पदसहि सहस्सेटिं) घनदा पचदा हजार नवियांका परिवार है, और इनकी (समग्ग) समम याने सर्प संख्या, छप्पन्न हजार नविय होती है मौर (जतहिम्मि) समुद्र के अंदर भाके (पति) मिख्ती है॥२१॥ भाषार्षयुद्धीपफे भरत क्षेत्र आनी एक गंगा, बुजी सिन्धु, और ऐरयत क्षेत्र मात्री एक रफा, पुजी रहयती, यह प्यारो नदिये अपने २ पउदद २ हजार नदियों के परियारसें समुद्र में बाके मिलती है ॥ २१ ॥ एव अम्भितरिया, चउरो पुण अट्ठधीस सहस्सेहि। पुणरवि छप्पनेहि, सहस्सेहिजति चउसलिला ॥२२॥ अप-(पुण)फिर (पर्व) ऐवेहि एक हेमपत दुजा ऐरण्यवत इन दो युगलियांके (अभिसरिया) अभ्यतर धेश्की नदिये एक रोहिता दुजी रोहितांचा तीमी म्पकूला और बोयी सुवर्णकूला, यह (चरो) न्यारों नदिये

अपनी २ (महमीस सहस्सेहिं ) अहाइस २ हजार नदियांक परियार सहित समुद्र में आफे मिलती है, (पुणरवि ) पुन
रपि एक हरिपर्ष दुजा रम्यक इन दो युगलियांके क्षेत्रफी, पक हरिकाता दुमी हरिसलिला, तीजी नरफांता और चोयी
नारिकांचा ये (चरसलिला) प्यारों नदिये अपनी २ (छप्पन्नेहिं सहस्सेहिं) छपन्न, २ हजार नदियोके परिवार सहित
समुद्र में (अति) जाती है ॥ २२ ॥
भाषार्य हेमपत और ऐरण्ययत इन दो युगलियाफे अभ्यंतर क्षेत्रकी, रोहिता १ रोहिताशा २ रूपमूला ३ और
सुवर्णफूला ४ यछ प्यारों नदिये अपने २ अठाईश २ हजार नदियां के परिधारसें, व हरिवर्प, और रम्पफ इन दो
क्षेत्राफी हरिकांता १ हरिसलिला २ नरकंता और नारिकांचा ४ यह प्यारों नदिये अपने २ छप्पन २ दजार नदि
यांके परियारसे समुद्र में जाके मिज्वी है ॥ २२॥
कुरु मझे चउरासि, सहस्साई तहय विजय सोलसेसु । वचीसाण नईण, चउदस सहस्साइ पत्रेय ॥२३॥
अर्ष-(फुल मझे) देयपुर और उत्तरकुछ इन दोनो क्षेत्रोंकी शमसे सीतोदा और सीता नदियोंमें छ छ संतर
नदिमें मिलती है और उन छ छ नदियांका याने प्रत्येक छ नदियांका परियार (पतरासि सहस्साई) घोराशी हजार
नदिये है, (तक्ष्य ) तैसेंहि, पश्चिम महापियरकी (विजय सोलसेम) झोले विजयफे अन्दर प्रत्येकमें, रका और रक-
पती यह दो दो नदिये गिणनैसें (पचीसाण नईण) मधीस नदियें होती है, और यह (पचेय) प्रत्येक २ अपने २ (घउ-
दस सहस्साई) परदह २ हजार नदिया के परिवारसे है ॥ २१॥

भावार्थ-
- कुरु और वेफुरु इन दोनो क्षेत्राकी ऋमसें, सीता और सीतीदा नवियां 8 मंतर नविये
मिलती है और प्रत्येक नदीका परिवार परदा २ हजार नदियांका है।
फिर पश्चिम महाधिवेशकी, शोले विजयांमें प्रत्येक विषयके अन्दर, रका और रकवती, इन नामकी दो नदिये
होनेमै यतीश नदिमें होती है और इन प्रस्पेकका चौदह २ हमार नवियाका परिवार है ॥ २१॥
चउदस सहस्स गुणिया, अडतीस नइमो विजय मझिला।सीओयाए निवरति, सहय सीयाइ एमेय २४
अर्थ-(विजय मनिहा) मशविदेशकी पश्चिम शोले विजयके अन्दरकी २२ व छ मतर नदिये यह मिलाकर,
(अठतीस नइओ) अठतीस नदियांको (घरदस सहस्स गुपिया) चौदह हजारसै गुणा करते पाच लाख बत्तीस
हजार (५३२०००) नविये होती है यह सर्व (सीमोयाए) सीतौदाके अन्दर (निवति) मिलची है, (तहय) ऐसेही
(सीयाइ) सीता नदीफे अन्दरमी (एमेय) एसेही याने पूर्व शोले विजयकी, और छ सचरकुरु क्षेत्रकी भतर नदिये
यह सय मिठकर पूर्व संख्यायत् (५३२०००) नदिये मिलती है ॥ २४ ॥
भावार्य-पधिम शोले विजयके अन्दरकी पचीस पछिम विवरक्षेत्रकी अन्तरनदिये छ इन असतीश नवियाको
पौद हजारसे गुणा करनेपर "पाच लाख पतीश हजार (५३२०००) नवियें होती है और यह सष सीतोदा नदीमें
माझे मिलती है। एसेहि पूर्वी शोले विजयकी पवीश और पूर्व विदेह क्षेत्रकी अन्सर छ यह अस्वीय नलियेंमी पूर्वोक
हिसापसे (५३२०००) के परिवारसे सीवा नदीमें जाके मिठती है ॥ २४ ॥

सीया सीओया विय, पत्तीस सहस्स पचलक्खेहि। सब चउदस लक्खा, छप्पन्न सहस्स मेलविया ॥२५॥ अर्थ-मरपेक (सीया सीओयाषिय) सीता और सीतीदा यह दोनो नदिये अपने २ (पचीस सहस्स पंचवक्रोहिं) पांच छाल और पत्तीस हजार नदियो सहीत समुद्रमे जाती है, एवं (स) सर्व इस अयुद्धीपके अन्दर (परदस छम्सा) चौदह लाख (छप्पन सहस्स) छप्पन हजार नवियें (मेउपिया) मिगनेसें होती है ।। २५ ॥ भावार्ष-सीता और सीटीमा भर दोनो अपनी २ पांच २ गस पतीश २ हजार नवियाफे परिमारसे समुद्र में माफे मिलती है ॥ एवं इस पुदीप सप नदियोकी संख्या चौदह पास एप्पन हमार होती है ॥२५॥ छन्चोयण सकोसे, गगा सिंधुण वित्थरो मूले । दसगुणिओ पज्यते, इय धुदु गुणणेण सेसाण ॥ २६ ॥ अर्प-(गगा सिंभूण) गंगा और सिंधु इन यो नवियांका (मुले) मूसमें याने जहा पभद्रासे निकली है यहाँ (सकोसे) कोशसहित (छ जोपण) छ योजन (विरपरो) विस्तार है॥ याद पिस्तार पधते २ (दसगुणिमो) पशगु गावाने साग पासठ योजन (पमते) पर्यंत हो समुझमें मिलती है (इय) एसे (बुदु गुणणेण) धुगणी २ (सेसाण) शेष पूर्योफ नदियों का निर्गमन और मपेश मनुक्रमसें जानना ॥ २६ ॥ भापार्ष-वहाँसे गंगा और सिंधु यह दोनो नदिये निकली है पहा इसका सया छ योमनका विस्तार है । और

इन्हीका जहां समुद्र में जाके मिली है नहां सातापासठयोजनका विस्तार है इसी तरह इनसे चुणा २ क्रमवार शेष
नदियांका निर्गमन और प्रवेश विस्तार जानना ॥ २६ ॥
जोयण सयमुचिट्ठा, कणयमया सिहरि चुलहिमवता। रुप्पि महाहिमवता,वुसुउच्चारुप्य कणयमया २७॥
अर्थ - एक (सिहरि) शिखरी दुसरा (पुह हिमयंता) लघु हिमपंत ये दो पर्वत (सय) एकसो (जोयण) योजन
(मुपिठा) उंचे पनेमे, भौर (फणयमया) स्वर्णमयी है पुनः एक (रुप्पि) रूपी दुसरा (महाहिमवता) महाहिम
यस ये दो पर्षद (दुसुनचा) दोसो योजन उंचे पनेमें है, इसमे रूपी पर्वत (उप्य) चादीमयी और महाहिमवत
(कणयमया) स्वर्णमई है।॥ २७॥
भाया-शिलरी और छोटाहिमपत यह दो पर्वत एफसो पोजन चे और स्वर्णमयी है, रूपी और महाहिमवंत
यह दो पर्यत दोसो पोजन संचे मोर क्रमसे स्वर्ण और सप्यमयी है ॥२७॥
चत्तारि जोयणसए, उचिट्ठो निसट नीलवतोय। निसढो तवणिजमओ, वेरुलिओ नीलवतोय ॥२८॥
अर्थ-(निसद नीलधतो) निपप और नीउयंस या दोनो पर्वत (पचारि जोयणसए) प्यारसे योजन (पशिष्टो)
पे है, इममे (य)जो (निसदो) निषध पर्वत है यो (वयणिझममओ) सघ स्वर्णमयी पाने छाठवर्ण और दुसरा
(नीलबसो) नीलयंत पर्यस जो है यो (धेलिओ) पैतुर्य पाने नीलारसमद है ॥२८॥

भायार्थ-निपए और नीलयत यह यो पर्वत प्यारसे पोजन संचे और क्रमसे तपेहुए सोनेके और नीसेरसके
है।॥ २८॥
सधेवि पवयरा, समयखित्तम्मि मदरविडणा । धरणि सलेमुवगाढा, उस्सेह चउत्प भायम्मि ॥२९॥
अर्थ-इस (समय विचम्मि) समयक्षेत्र याने मिस क्षेत्रमें समयकी गिणना होती है उसमें (मदर विहुणा)
पांच मेरु पर्षदोको छोर शेप जितने शास्वते (पपयरा) पर्वत है यो (सपेयि) सर्व अपने (उस्सेय) पच प्रमाणसें
(पउरथ मायम्मि) पोया भाग (परणितछे) जमीनके मंदर (नवगाठा) अषगार पाने पटे हुए है ॥ मौर समयक्षेत्र
मिसको अवाइ सीप समझना चाहिये उसमें जो पांच मेरु पर्वत है इन पांचोंके मन्दर मुहीफ्फा जो मम्प मेरु है
पो निमाणु हमार योजन उपा मोर पकाशार योजन अमीनके अन्दर है एवं यह मेरु सय मिलकर एक लाख
योजनका है। अत एप शेप प्यार मेरु एक २ हजार योजन जमीनमें और परासी २ (८४) हजार योजन उंच
पनेमें है ॥२९॥
मापार्ष- इस समय क्षेत्रयाने अदाइ द्वीपमें पांच मेरु पर्षतोको छोर शेप जितने शास्वते शैल है उनकी उचाइ
भागफे पीपे हिस्सेका भाग भूगर्भमें है, और पांच मेरु पर्वतोंके अदर जो जैबुदीपका मध्य मेरु है यो निनाशुहार
पोजन या और एकहजारयोजन भूतले, एवं छासयोमनका मानना ॥ शेप म्यारो मेरु एक २ हमार योजन
भूगर्भमें और परासी २ हमार योजन संधपनेमें है ॥ २९॥

खडाईगाहाहि, दसहिं दारोहिं जवुदीवस्स । सषयणी समचा, रइया हरिभवसूरीहिं ॥ ३०॥ अर्थ-इस तरह (संसाई गाहाहि) संगदिकोकी गाया ये (वसहि वारे) दशमारकरके (परिभदसरीहि.) श्रीहरिमसुरिजी महाराजनें (या) रचि है पसी (जंयुदीपस्स) जंयुद्वीप मात्रीकी (संपयणी समक्षा) छघुसंघ यणी नामका प्रकरण समाप्त हुआ ॥३०॥ भाषा-एसे श्रीहरिमसुरि महाराजने यह लघुसंघयणी नामका प्रकरण जिसमें जंयुधीपके शास्ववे संगविकोका विपरण दशद्वार करके रचा समाप्त किया ।। ३० ।। इत्पलम् ।। ॥ इति लघुसघयणी प्रकरणम् ॥

*श्रीसर्पज्ञाय नमः। अथ। श्रीपडितदेवचद्रजीकृत-आगमसार । भव्यजीपने प्रतियोधया लिमित्ते मोक्षमार्गनी पनिका कहे ऐ तिहा प्रथम जीयमनादिकालनो मिथ्यात्वीहतो ते फाललरिध पामीने प्रणकरण करे छे तेनानाम-पहेल्ल यथाप्रवृत्तिफरण, घीर्जु अपूर्षकरण, अने श्रीर्जु अनियतिकरण येमा पहेलुं यथामधिकरण कहे छे १शानायरणी, २ दर्शनापरणी, ३ घेवनी, ४ अतराय, एचारकर्मनी श्रीस फोटाकोशीसागरोपमनी स्थिति छे, मापी उगणत्रीस कोराकारी सपाये अने एकफोडाफोडी घाफी राखे, तथा १ नामफर्म, २ गोत्रकर्म, ए घेर्मनी घीसफोडाफोडी सागरोपमनी स्थिति छे, तेमांपी उगणीस स्सपाये अने पककोग फोडी राखे, अने मोहनीयकर्मनी सिचेर कोराकोसी सागरोपमनी स्थिति छे, तेमापी अगणोत्तेर खपाचे, पाकी एफफो । ठाकोठी राखे । एपीरीते एक आयुफर्म पीने घाफी सानेकर्मनी एफपस्पोपमना असंख्यातमा भागे न्यून एफको. गफोडी सागरोपमनी स्पिति राखे, एवं जे वैराग्यरूप उदासी परिणाम ते ययामधिकरण फहिये ए पहेल्ले करण सर्वसभी पंद्रीजीय अनन्तीयार करे छे ये धीमुं भपूर्वकरण कहे छे ते एक कोराकोरी सागरोपमनी स्थितिमाहेपी एकमहर्च अने अनावि मिप्यास्य जे अनंतानुषंघीमानी चोफरी ते खपायषाने अज्ञान हेय से छांरतुं अने ज्ञान उपादेय पटले भावर, ए पांछाम्म अपूर्व कहेवा पहेलो फ्यारे नाथ्यो पषो जे परिणाम से भपूर्व करण कहिये, ए वीर्जुकरण से समकितयोग्य जीपने थाय हये श्रीर्जु अनिवृतिकरण कहे छे से मुहर्च रूपस्थिति सपाधीने निर्मल शुद्ध समकित पामे मिप्यास्वनो उदय मटे स्पारे जीय उपदाम समफित पामे, एवो जे परिणाम ते अनिवृत्ति करण कहिये ए करण कीषाथी गठीमेदथयो कहिये उत्तय आयश्यक नियुक्तौ “जागठीतापदम । गठीसमयछेओ मधेवीओ ॥ अमिअष्टिकरणं पुण । समसपुरक्खरेखीये ।। १ ।। ऊसर देसं दुहिमं च । विजाइयणदवोपप्प ॥ मिच्छच्चस्समणुदए । चमसमसम्म लाइ जीयो ॥ २ ॥ एम मिथ्यात्यनो उदयमव्याधी जीय समकित पामे, ते समक्तिनी सहहणाना पे मेद छे, एक व्यपहार समकिससहहणा, पीजी निमय समफित सदहणा देयभीमरिहत देयापिदेय अने गुरु सुसाघु जे सूधो मर्प कहे ते तथा भर्म फेवलीनो परुप्यो जे आगममा सातनय तया एक प्रत्यक्ष यीशु परोक्ष प चे प्रमाण अने चार निझेपेकरी सद्दहे, एषी सदहणा ते व्यवहार समकित कहिये ए पुण्यनुं कारण तया धर्म प्रगट करवान कारण छे एवी रुची झानविनापण पणानीयोंने उपजे बीर्जु निधयसमफित ते माषीरीते मे निसयठेय ते पापणोस मायनीष मिप्पमस्वरूपी सिद्ध के संग्रहनयनीस- चागपेपता तथा निषयगुरु ते पण आपणो आरमाज तत्स्वरमणी मने निधयधर्म से आपणा जीवनो स्वभायज छे एवी सहाणा ते मोषने कारण छे फेमफे जीय स्वरूप ओठल्या पिना फर्मखपे नहीं एवी शुद्ध सदहणा से निश्चयसमफित हवे ज्ञान स्वरूप कहे छे ते ज्ञानना ये मेद छे एक व्ययहारज्ञान, वीमुं निवज्ञान, मां जे अन्यमतिनां सर्व- शास्त्र आणपां अपपा जैनागममाये कया ये एकगणितानुपोग ते क्षेत्रमान, पीजो परणकरणानुयोग से कियाविषि, श्रीजो धर्मकथानु योग ए प्रण भनुयोगर्नु जाणयापणु से सर्वम्यवहारज्ञान छे अपया अस्तरउपयोगविना जे सूचना अर्षकरवा वे पण म्यवहारमान कहिये हये निमयमान ते छे द्रव्य तथा तेनागुण अने पर्याय सर्पने जाणे सेमा पांघ अजीपदन्य छे वे हेय-फेवा छोरचा योग्य माणी छाख्या भने एक जीयद्रव्य से निमयेकरी सिद्धसमान मोक्षमयी भोक्षनोजाणनार मोक्षनु कारण मोक्षनो मायापालो मोक्षमांजरहे छ पछयो आपणो जीप अनंतगुणी अरूपी छे तेनेग ध्याये से निश्चयज्ञानकहिये हवे एकधर्माखिकाय, पीजो अधर्मास्तिकाय, श्रीजो आकाशासिकाय, घोषो पुनलाखिकाय, पाचमो जीया स्तिकाय, अने छटो फाउ परे दम्य शाश्ववा छे वेनु शान कहे छे ए छेद्रव्यमध्ये पांच अनीय ब्रम्य छ भने एक जीपद्रम्य से चेतनाउक्षणपंत ठे उपादेय छे हपे ए छद्रग्यना गुण फहे रे पहेलो धर्मास्तिकाय तेना चार गुण एफ अरूपी धीजो अपेतन श्रीजो मक्रिय चोयो गतिघहायगुण, भने पीजो अधर्मास्तिफाय सेना पण चारगुण छे एक अरूपी बीजो अपेवन त्रीमो अक्रिय चोयो स्पिति सहायगुण, अने पीजो आकाशास्तिफायद्रम्य वेना चार गुण छे एक अरूपी पीयो अचेतन त्रीमो अक्रिय चोयो अवगा- इना दानगुण, हये फाउनम्यना पारगुण कहे छे एक अरूपी बीजो अचेतन त्रीमो अक्रिय पोयो नयापुराणवर्चना लक्षण, हये पुनलगन्मना धारगुण कहे छे एकरूपी पीजो अपेतन श्रीजो सक्रिय चोयो मिलणपिखरणस्म पूरणगलन गुण, इषे मीपतम्यना चार गुण कहे छे एक अनंतझान बीजो अनंतदर्शन श्रीजो अनन्त चारित्र छोयो अनंतषीर्य ए छद्रव्यना गुण कला ते निस्यय छे इवे छद्रव्यना पर्याय फहे छे धर्मासिकायना पारपर्याय छे एक खप, पीजो देश, श्रीजो प्रदेश, चोथो अगुरुलघु, मधर्मास्तिकायना चारपर्याय एफसंघ, वीजोवेश, श्रीजाप्रदेश, चोयो अगुरुगपुर पुल द्रध्यना चारपर्याय एफयरण वीजो गंध, श्रीमो रस, चोयो स्पर्श मगुरुलघुसहित, समा आकाशासिकायनापार पर्याय एफसंघ, पीजो देश, नीजो प्रदेश, चोयो अगुरुखमा काछद्रस्यना पारपर्याय एकमतीत काल, पीजो अनागतफाख, चीजो वर्चमानकाल, चोयो मगुरुलमा अने जीव दम्पना पारपर्याय एफ अभ्यागाभ, वीजो मनपगाह, श्रीगो अमूर्तिक, चोयो अगुरुलघु ए छे द्रस्यनापर्याय कमा हवे छ प्रम्यना गुणपर्यायर्नु साधर्म्यपणु कहे छे अगुरुषपुपर्याय सर्वद्रष्यमा सरीखो छ भने अरूपीगुण पांच द्रम्यमा छे एक पुनरुद्रम्यमा नथी, तथा अचेतनगुण पांच ब्रम्पमा छे एकजीवद्रध्यमां नयी, भने सक्रियगुणजीव तथा पुनल एपे तम्या छे पाकी चारदम्यमां नथीतथा घरुणसहायगुण एकधर्मासिकाया छे. वीजा पाचदम्यमा नथी, यली स्थिर सहायगुण एक अधर्मास्तिकायमा छे वीजा पाच प्रथ्यमा नपी वया अवगाहनागुण वे एक आकाशद्र- प्यमा छे, पीजा पाप द्रव्यमा नयी, अने पर्तनागुण ते एक फाउद्रव्यमाज छे, वीजा पांघ द्रव्यमा नयी तेमज मिल णयिसरणगुण ते पुनलमा छे, पीजा म्यमा नयी वधा ज्ञानचेतनागुण ते एक जीवद्रन्पमा छे, पण वीजा द्रव्यमा नपी ए मूलगुण कोर द्रष्यना कोई प्रन्यमा मिले नही एफ धर्म धीजो अधर्म श्रीजो आकाश ए प्रण द्रन्यना प्रण गुण तया चार पर्याय सरिसा छे भने प्रणगुणे फरी वो कालन्द्रप्य पण ए समान छे हये पली अग्यार पोलेकरी छ म्यना गुणजाणवाने गाया कहे छे परिणामिजीवमुचा, सपएसा एगवित्तकिरिआ य । निध कारणकत्ता, सधगयइयरअप्पवेसे ॥१॥ अर्थ-निश्चयनयपी माप आपणा स्वमाषे छए द्रव्य परिणामी छे अने म्ययहारनयपी जीप तया पुनल ए पे न्य परिणामी छे तपा एक धर्म, पीजो अधर्म, त्रीजो आकाश, अने पोथो फाल, ए चार द्रव्य अपरिणामी छे तथा छे द्रष्यमा एफ जीप द्रम्प ते जीप छे, पीला पांच ब्रम्य अजीव छे तथा छे द्रष्यमा एक पुद्गल मूर्तिपन्त रूपी छे अने पांच द्रव्य अमूर्तियंत अरूपी छे छ दन्यमा पाच प्रष्य सप्रदेशी छे, अने एक कालद्रष्य अप्रदेशी छे तेमा एफ धर्मा स्तिफाय योजो अपर्मास्तिकाय ए ये द्रव्य असख्यातमदेशी छे अने एक आमाशद्रम्म अनतमवेशी छे भीषद्रव्य असंख्यात प्रदेशी छे, पुद्रलपरमाणु अनंत प्रदेशी छ) परमाणुमा अनंता छे, पम पाच द्रष्य समदेशी छे भने छट्ठो काठ ममदेशी छे छे ब्रम्पमा एक धर्मास्तिफाय, बीयो मधर्मास्तिफाय, पीजो आकाशास्तिकाय पण ते पकेक ब्रम्य छ, तथा एक जीवद्रम्म पीजो पुनरुवन्य प्रोजो कालदम्म ए प्रण द्रम्य अनेक अनेक छे, छद्रम्पमा एफ आकाशद्रभ्य क्षेत्र छ, भने पीमा पांघ प्रम्य क्षेत्री छ, निययनयमी छे दम्प पोखपोताना कार्ये सदा प्रपर्ने छे माटे सक्रिय थे अने व्यपहारनपपी भीप वया पुगत एपे द्रव्य सक्रिय से, सेमो पण पुनव सदा सक्रिय छे, मने जीपद्रव्य सो संसारी यको सक्रिय छ। पण सिरमपस्पायें धको संसारी मिपाकरवाने अमिय से, सया पाकीना पार दम्य सो मक्रिय छ, निमयनयपीछे ब्रम्य नित्य छे नुव छ। अने स्पाइम्पयकरी अनित्यपणे पण छे सया व्यवहारनयें नीष अने पुनल ए वे द्रम्य अनित्य छे, पाकीना पार द्रम्प निस्य छ, पपपि नस्पादम्पय वषपणे सर्व पदार्थ परिणमे छे तोपण एक धर्म, पीजो अधर्म, श्रीमो माकाश, चोपो काल, ए चार दम्य सदा अवस्थित छे ते माटे निस्य का छे ब्रम्यमा एक जीवध्य अकारण से अने पांच उम्प कारण के केमके पाचे प्रम्प बीपने भोगमा मा छे माटे कारण कहिये फेमके धर्मास्तिकाय पाण्यानो सान आपे से अधर्मास्तिकाय पिर रोषानो साप मापे माफाशास्ति काय अयकाश आपे छे पुन्नवास्तिकाय नीषने मपुरादि सुरमिगंधाविक वया सकोमल स्पर्शाविक मोगपणे भाय छे तया फारुद्रष्य बीषने जरा पाल तारूण्य अघस्पादिप छे तथा अनादि संसारी जीष भयस्थिति परिपाक छता एक मतर मार्सकालमां सकलकर्म मिर्जरी मोक्ष पहोंचे विहां सिम अवस्थायें मनसोकाल पर्यंत नीष अनता सुखने विलसे माटे काठ व्रम्पपण जीपने भोग पाय पण एक जीप दम्य कोने मोग आषतो नपी माटे अकारण कई भने पांच द्रव्य भोग आये माटे कारण फमा तथा "पणी प्रवामा सो सधेपे पटाई जे छ अन्यमा एक जीष प्रम्य कारण छे पाय दम्य अकारण छे ए पण पात मणीरीते मख्ती छे माटे जे पहुश्रुस कहे हे खरु मारीधारणा प्रमाणे मीष सम्म कारण भने पांच ब्रम्य अझारण एम संभवे छे" निभयनयपी छए तम्य फळ छे अने व्यपहारनयें एक जीवद्रव्य फर्ता छे पाकी पधि द्रष्य अफर्ता छे छ इथ्यमा एक माफाशदम्य सर्प म्यापी छे भने पाँध द्रष्य लोक म्यापी छे छए द्रप्प पफ खेत्रमा पफठो रया छ पण एक पीजा साये मली जाय नहीं ए छद्रव्यनो विचार कमो एपे एफेका म्यमा एफ नित्म, पीसो मनिस्य पीजो एफ घोये मनेक, पांचमो सत्, छटो असत्, सासमो धकम्य, भाठमो अपफम्य, ए माठ माठ पक्ष महेछ धर्मास्तिफापना पार गुण निस्म छे तया पर्यायमा धर्मास्तिकायनो एक संघ नित्य छे पाकीना देश प्रदेश तथा अगु रुग्घु पर्याय भनित्य छे मधर्मास्तिफायना धार गुण तया एक छोक प्रमाण संघ नित्य छ भने एक देश पीजो प्रदेश प्रीशा भगुरुग्घु ए प्रण पर्याय अनित्य छे तमा माफावास्तिकामना पार गुण तया लोकालोकममाणसघ निस्य छ मने एफ देश पीजो प्रदेश वीको अगुस्तभु ए प्रण पर्याय भनित्य छे सपा कागदम्पना पार गुण नित्य छे अने चार पर्याय अनिस्म छे पुन अन्यना पार गुण नित्य छे मने पार पर्याय भनिस्य छे जीपमना पार गुण वया प्रण पर्याय नित्य छ भने एफ अगुरुपु पर्याप अनित्य छे ए रीते नित्यानित्य पप को इथे एक भनेक पक्ष को छे एक धर्मास्तिकाय कीमो अधौखिकाय ए प्रम्यनो संघठोकाकाश प्रमाण एक छे अने गुण अनंता के पर्याय अनंता के प्रदेश मसंख्याता छ तेणेंकरी अनेक छे, आकाशद्रम्यनो लोकागेक प्रमाण खध एक छे मने गुण मनता के पर्याय अनता छ मदेश मनता छे माटे अनेक छे, काल ब्रन्यनो घर्चनारूप गुण एक छे मने गुण अनसा छे पर्याय अनता छे समय अनता छे फेमके अतीत काले अनसा समय गया भने अनागसफाले अनसा समय मावशे तया वर्तमानकाले समय एक छे माटे अनेक पक्ष छे पुन्नल म्यना परमाणु अनता छे से एकेक परमाणुमा मनतागुण पर्याय छे से अनेक पर्नु ऐ मने सर्व परमाणुमा पुनलपण वे पछज छे माटे एक छे जीवद्रष्य अनता के एकेका जीपमा प्रदेश असंख्याता छे तपा गुण अनंता ऐ पर्याय अनंता छे ते अनेकपणे छे पण जीवितम्यप) सर्व जीवोर्नु पफसरीखं छे माटे एक पणु छे रहो शिष्य पूछे छे जे सर्व जीप एक सरीखा छे तो मोबना जीप सिद्ध परमानंदमयी देसाय छे अने संसारी जीय कर्म यश पच्या दुखी देखाय छे अने वे सर्व जुदाजुदा देखाय छे से कम सेहने गुरु उत्तर कोठे के निशयनये तो सर्व जीय सिद्ध समान छे माटेज सर्व जीय कर्म सपा- षीने सिन्याय छे सेयी सर्व जीवनी सत्ता एक फरि शिष्य पुछे छे के जो सर्व भीष सिर समान फहो छो तो अभम्प जीव पण सिद्ध समान छे एम ठेलं अने ते सो मोक्ष जवा नवी ने उत्तर अमायने कर्म चीकणा छे अने अमम्यमा परावर्त धर्म नथी वेषी सिद्ध यता नयी माटे सेनो पापोज स्वमाय छ जे मोक्षे जवु नयी अने भम्य बीवमा परापर्व धर्म छे माटे कारण सामग्री मिले पलटण पामे गुणभेणी परी मोझे करी सिद्ध थाय पण जीयना मख्य आठ रुघा प्रवेश छे से निश्चय नयपी भग्य तथा अभव्य तया सयना सिद्ध समान छे माटे सर्व जीवनी सत्ता एक सरीखी छे फेमके ए आठ प्रदेशने बिलकुल कर्म ठागवा नपी ते "श्री आचारांग सूत्रनी श्री सिांगाचार्य-कृत टीकाना लोकपिजयाध्ययने प्रथमोदशके सास छे तिहाथी सविस्तर पणे जो हये सत् तथा असत् पक्ष कहे छे ए छद्रव्य ते स्यद्रष्य स्वक्षेत्र स्वकाल अने स्वभावपणे सत् एटले छता छे अने पर दम्य परक्षेत्र परकाल वया परमायपणे असत् एटले अग्रता छे तेनी रीत पवायवाने अर्ये छए द्रष्यनो द्रव्य क्षेत्र काल भाष कहिये ये धर्मास्तिफायनो मूलगुण पठण सहायपणो ते स्वद्रष्य, अधर्मासिफायनो मूलगुण स्थिति सहायपणो ते स्वद्रव्य, माकाशासिकायनो मूल गुण अयगाहपणो से स्वदन्य, फालद्रष्यनो मूल गुण घर्तनालयणपणो ते स्वतन्य, तथा पुगलनो मूरगुण पुरण गरुनपणो ते स्वद्रष्य, अने जीयद्रभ्यनो मूठगुण ज्ञानादिक घेवनालक्षणपणो वे स्वद्रष्य ए छद्रव्यनो स्वदम्यपणो कमो हये स्वक्षेत्र ते दम्यनो प्रदेशपणो छे ते देखाउ छे विहां पक धर्मास्तिकाय पीजो अधर्मास्तिफाय ए पे द्रष्यनो स्वक्षेत्र असंख्यात प्रदेश छे यने आकाशदम्यनो स्वक्षेत्र अनंतप्रदेश छे कारुद्रष्यनो स्वक्षेत्र समय छ पुनलद्रव्यनो स्वक्षेत्र एक परमाणु छे ते परमाणु अनवा छे जीयम्यनो स्वक्षेत्र एक जीपना भसरस्याता प्रदेश छे इये स्यकाल वे छए द्रव्यमा अगुरुलघुनोज छे अने ए छ अन्यना पोतपोवाना गुण पर्याय से सर्व ब्रम्पनो स्वमाय जाणयो एटले धर्मास्तिकायमा पोतानास द्रव्य क्षेत्र काल भाष छे पण वीजा पांच द्रश्यना नथी तथा अधर्मासिकाय ब्रम्यमध्ये पण स्वद्रम्पाविक पार छे पण वीजा पाच म्यना नपी एमज माकाशास्तिकायने विषे आकाशनाज स्वन्द्र म्याविक पार हे पण वीजा पांघ द्रव्यना नषी कालद्रव्यमा काठना द्रष्याविक चार छे वीजा पांच म्यना नथी भने पुनलना द्रम्पाविक चार ते पुगऊमाम छे पण बीजा पांच द्रश्यना नयी तथा जीव द्रम्यना स्वद्रव्याविक पार से जीयमा छे पण वीजा पांच द्रष्यना नपी ने ब्रम्य से गुण पर्यायवंत द्रव्यपी अमेदपर्याय होय से द्रव्य कहिये तथा स्वधर्मनो आधारपंतपणो ते क्षेत्र कहिये भने उत्पाद व्ययनी पर्चना ते काल कहिये तथा विशेषगुण परिणति स्वभाष परिणति पर्यायममुस ते स्वभाव कहिये रहा १ मेदस्वमाष २ अमेदस्वभाव ३ मम्यस्वभाव ४ अमम्यस्वभाष ५ परमस्वभाव ए पांच स्वमाष कहेया तेमा दम्यना सर्वधर्मने पोतपोवाना स्वस्वकार्यने करवेकरी भेद स्वभाव छे मने अवस्थानपणे अमेदस्वभाष छे अणपलटण स्वमा ममम्प स्वभाव छे तया पलटण स्वमावे भम्पस्वमाय छे मने ब्रम्यना सर्वधर्म ते विशेष धर्मने मनुयापीज परिणमे ते माटे ते परमस्वमाष कहिये ए सामान्यस्वभाष जाणवा ए रीते छए ब्रम्य स्वगुणे सत्से अने परगुणे मसत् छे हवे पफम्य क्या मवकम्पपष कहे ए छद्रम्पमा मनता गुण पर्याय ते पचम्य पटले पचने कोना पोग्प छे मने अनंता गुण पर्याय ते भरकम्प पटले बचने कमा जाय महीं एकाविहां केवठी भगवते समन भावरीग क वेने अनप्त मे भागे जे यफल्य एटले कहेया योग्य इवा ते कया यली तेनोपण अनसमो माग श्रीगणधर देये सूत्रमा गुंप्यो ते सूपमा गुप्या सेने असंख्यातमे मागे हमणां आगम रया छे ए छ द्रष्यनों आठ पक्ष कमा हवे नित्य तथा अनित्य पक्षयी चामगी उपनी ते को छे एक जेनी आदि नयी भने अत पण नपी ते मनादि अनंत पहेलो भांगो अने जेनी आदि नयी पण अत छे ते अनाविसांत पीजो भागो तथा जेनी आदि पण छे भने अत एटले छहेगे पण छे ते सादिसांत श्रीमो भांगो घडी जेहने आदि छे पण अत नयी ते साविमनंत नामे बोयो भागो जाणयो इयं ए पार मांगा छ ब्रम्यमा फसायी देखाउछे जीयाद्रव्यमा ज्ञानाविक गुण ते मनादि अनेत छे निस्य छे अने भव्य जीपने फर्म साधे संपन्ध तथा संसारी पणानी आदि नथी पण सिनयाय वेपारे मत आम्यो तेथी ए अनादिसांत मांगो छे भने देयता तया नारफी ममुखना भयकरवा से सादिसांत मांगो छे भने मे जीय फर्म सपायी मोक्ष गया सेनी सियपणे आदि छे भने पाछो ससारमा कोइ कालें आवघु नपी माटे भंत नयी तेयी ए सादि अनंत भांगो छे प जीय दम्यमा पौभंगी कही जीयद्रप्यना पार गुण अनादि अनंत छे जीयने फर्मसायें संयोग ते अनादि सांत छे फेमके फेयारे पण फर्म छुटे हये पर्मासिकाया चार गुण तथा संधपणो से मनादि अनंत छ भने अनादि सात भांगो नपी सथा १ देश २ प्रदेश ३ मगुरुलघु प सादि सांत मांगो छे तया सिखना जीपमां धर्मास्तिकायना जे प्रदेश रमा छे ते प्रदेश आत्र पीने मादि अनत भांगो छे एवीन रीते अधर्मास्तिकायमा पण पौभगी माणवी मने आकाशद्रम्पमा गुम तथा संघ अनादि अनत छे पीजो भागो नथी अने १ देश २ प्रदेश तया ३ अगुरु लघु सादि सांत छे तथा सिदना जीयनी सापे सपप ते सादि अनंत छे पुनल द्रग्यमा गुण अनादि अनत छे जीय पुनलनो सपन्ध अभन्यने अनादि अनत छे भम्पजीयने अनादि सात पुलना मप सघ सादि सास छे जे संध घांध्या ते स्थिति प्रमाणे रही खरे छे यली नवा पधाय छे माटे सादि अनत भांगो पुनलमां नयी कालद्रग्यमा गुण पार अनादि अनत छे पयायमा अतीत काल अनादि सात छे अने घर्तमानकाल सादि सांत छ । अनागत काल सादि अनत छे ए कालनु स्वरूप सर्व उपचारपीछे ए रीतें कालद्रव्यमा चौमंगी कही ये द्रप्पधेय फाउ तया भायमा चौमंगी कहे ऐ जीयम्यमा स्वद्रव्ययी ज्ञानादिक गुण ते अनादि अनत छे स्वक्षेत्रे जीयना प्रदेश असस्याता छे ते सादि सात छे तमोर्चनापणे फरे छे ते माटे अथया अवगाहना माटे सादि : मात हे पण छत्तीपणे सो भनादि अनंत छे स्यकाल मगुरुलपुने गुणे अनादि अनत छे अने अगुरुलघु गुणनो उपजयो तथा विणारे ते सादि सान्त छे तथा स्वभाष गुणपर्याय वे अनादि अनत छे अने मेदान्तरे भगुरुलघु ते सादि सात छे धर्मास्तिकापमा स्वदन्य जे पठण सहाय गुण वे अनादि अनंत छे अने स्वखेन असंख्यात प्रदेश लोकममाण छे ते मयगाहना पणे सादि सात छे स्वकाल से अगुरुलघु गुणे करी मनादि अनंत छे अने उत्पाद म्यय ते सादि सात छे स्वमाय ते चार गुण अगुरुलघु मनादि अनस छे १ खघ २ देश ३ प्रदेश ते अषगाहनाने प्रमाणे सादि सांत छे एम अधर्मास्तिफायना पण प्रन्यादि पार भांगा जाणया तथा आकाशास्तिकायमा स्वद्रव्य अवगाहना दान गुण ते अनादि अनत छे अने स्वखेत्र ठोकाठोफ प्रमाण अनत प्रदेश ते अनादि अनंत छे स्वकाल ते अगुरुलघु गुण सर्वथा पणे अनादि मनत छे अने उपजये तथा विणसवे सादि सांव छे स्वभाय चार गुण सथा सघ अने अगुरुरुघु ते अनादि अनंत छे तथा देश प्रदेश ते सादिसात छे से आकाश म्यना पे मेद छे पफ चौदराजलोकनो खंघ लोफाकाश ते सादिसांस छे बीजो अठोकाकासनो खंघ ते सादि अनंस छे फाल द्रव्यमा स्पद्रम्य जे नप पुराणयर्चना गुण ते अनादि अनंत छे स्वक्षेत्र समय काल ते साविसांत छे केमके पर्वमान समय एक छे ते माटे तपा स्पफाल ते अनादि अनंत छे स्वमाय ते गुण घार अने अगुरुग्घु अनादि अनंत छे अतीत काल अनादि सात छे अने वर्तमान काठ सादि सात छे अनागत काल सादि अनंत छे पुनरा दप्यमा स्वद्रव्य से दम्यपणे जे पूर्णगठन धर्म ते अनादि अनन्त छे अने स्यनेत्र परमाणु साविसोत छे स्यकासस्थिति अगुरुलघु गुण ते अनादि अनंत छे अगुरुलघुनो उपजयो विणावो ते सादि सांत छे स्वभाव ते गुण पार मनादि मनत छे पर्णाविपर्याय पार पटले वर्ण गंध रस स्पर्श ते सादि साप्त छे ए द्रष्यादि घारमा पौभंगी फही हये छ दम्यना संपन्ध माश्री चौमंगी कहे छ, तिहाँ प्रयम माकाशद्रस्य छे तेमां अठोकाकाशमा कोइ वन्य नपी, भने उकाकाशमा छ दम्य छ, विहां छोफाफाश अन्य तया पीर्नु धर्मास्तिकायद्रव्य अने श्रीजु अधर्मास्तिफायद्रव्य ते अनादि अनत संपपी छे जे तोफाकाथना एफेक प्रदेशमा धर्मद्रम्य तथा अधर्मद्रम्पनी एकेक प्रदेश रमो छे तेपण पियारे विसरसे नही माटे अनादि अनंत सपषी छे आकाश सेमलोकसर्व भने जीवद्रम्यनो अनादि अनंत सर्वष छे, अने संसारी जीय कर्म सहित तया सोफना प्रदेशनो सादि सांत संपन्ध छे लोकांत सिद्खेत्रना सिखजीवोनो आकाश प्रदेश सा सादि मनंत सबन्ध छे, लोकाफाश अने पुल द्रन्यनो अनादि अनत संपन्ध छे आकाश प्रदे- शनी सा पुन्नर परमाणुनो सादि सात संवन्ध छे पम आकाश द्रव्यनी परे धर्मास्तिकाय तथा अधर्मास्तिकायनो पण सर्व संप ध आणयो जीय भने पुराना संबंधमा अमध्य जीवने पुनलनो अनादि अनत सर्पप छे केमफे अभम्य नीषना कम कियारे सपशे नही माटे अने मष्य जीयने फर्मनु लागणुं अनादि काउनु छे पण ते कियारेफ छुटशे माटे मध्य जीनने संबध अनादि सांत छे तर निमें नयकरी उम्प स्वमाष परिणाम परिणम्या के ते परिणामी पणो सदा शाश्वतो छे ते माटे अनादि अनव छे अने जीव तया पुरल बेहु ब्रम्य मलि सषध माय पामे छे से पर परिणामी पणो २ ते परपरिणामिपणो अभव्य जीवने मनादि अनंत छ भने भम्प जीवने अनादि सांत छे मने पुनलनो परि णामी पणो ते सत्तायें अनादि अनंत छे भने पुगलनो मिठ्यो विछयो ते सादि सात छे पटले जीप द्रव्य पुगल साये मिल्यो सक्रिय मने पुदल फर्मपी रहित पाय सेवारें पीय द्रव्य अक्रिय छे भने पुनल द्रम्य सदा सक्रिय छे हवे एक, मनेफ-पक्षयी निमे ज्ञान कहेवाने नय फहे छे, सर्व द्रम्यमा भनेकस्वमाय छे, एक पचनपी कमा जाय नही माटे माहो महि नय करी संप पणे कहे छे, तिहा मूस नयना मेद छे एक द्रम्पार्थिक पीजो पर्याया थिक मां उत्पाद म्यय पर्याय गौण पणे अने प्रधान पणे द्रन्यनो गुण सचाने महे ते द्रव्याथिकनय कहियें वेना दश मेद छे १ सर्व दम्यनित्य छे ते नित्यम्याथिक २ अगुरु लघु भने खेत्रनी अपेक्षा न करे भूल गुणने पिंरपणे प्रहे थे एफद्रग्याधिक ३ शानाविक गुणे सर्य जीव एकसरीखा छे माटे सर्पने एक जीप कहे स्वद्रष्याविकमे ग्रहे से सत् द्रष्या धिक जेम सत् उक्षणं द्रव्य ४ द्रव्यमा कहेवा योग्य गुण अंगीकार करे ते पफम्य द्रव्याथिक ५ आरमाने अज्ञानी कहेयु ते अशुद्ध दम्याथिक ६ सर्व द्रम्य गुणपर्याय सहित छे एम फहवं ते अन्धय प्रम्पापिफ ७ सर्व जीवद्रम्मनी मूल सचा एफ छे से परम दम्याधिफनय ८ सप नीषना आढ प्रदेश निर्मल छे ते शुद्ध द्रव्याफिनय ९ सर्य जीयना असे स्यात प्रदेश एकसरीखा छे से सचा दम्याधिकनय १० गुणगुणी द्रव्य ते एक छे ते परममावग्राहक द्रम्यार्षिक जेम मात्मा ज्ञानरूप छे इत्यादिफ ए म्यार्थिक नयना दश मेद काया हये पर्यायाधिक नयना छ भेद कहे छे से पर्यायने आहे हे पर्यायार्यिफ नय फहिये, सेना छ भेद छे १ द्रव्यपर्याय ते जीयने मम्यपणु तथा सिद्धपणुं फहेषु २ द्रव्यन्जनपर्याय वे द्रष्यन प्रदेशमान ३ गुणपर्याय ने एक गुणधी भनेकता याय जेम धर्माधर्मादि द्रव्य पोताना घलण सहकारादि गुणधी अनेक जीव सया पुग्ने सहाय करे ४ गुण यंजन पर्याय ने एफ गुणना पणा मेद छे ५ स्वभाव पर्याय ते अगुरु लघु पर्याययी जाणषु ए पांच पर्याय सर्व द्रव्यमा ठे अने छटो यिभाय पर्याय से जीव पुनउ ए पे द्रव्य मा छे तिहां जीय जे चार गतिना नवा नवा भय फरे से जीवमा पिभाप पर्याय वया पुनलमा संघ पणू ते विभाय पर्याय आणयो हो पर्यायना पीजा छ मेद कहे छे १ अनादि नित्यपर्याय ते जेम पुनल न्यनो मेरु प्रमुख २ सादि नित्य पर्याय से जीय दम्पर्नु सिद्धपणु ३ अनित्यपर्याय से समय समयमा वन्य उपजे पिणशे छे ४ मधुर अनित्यपर्याय से जन्म मरण पाय छे वेणे करी फहेवू ५ उपाधिपर्याय ते फर्म संबंध ६ शुद्धपर्याय जे मूलपर्याय सर्व द्रष्यना एक सरीखा छे प पर्यायाधिकर्नु स्वरूप कई इपे सास नय कहे छे १ नेगम, २ संग्रह, ३ म्पयहार, ४ रुजुसूध ५ शद ६ सममिरुल ७ एषभूत-ए सास नयना नाम आणां, तेमा पहेलो नैगम नय कहे छे नपी एफ गमो ते नेगम कहिये गुणनो एक अंश उपनो होय तो नेगम नय कहियें रटान्त-सेम कोइक मनुष्यने पायली लापवानो मन पयो तेवारें अगलमा लाकडु लेघा चास्यो रखामा कोरफ मनुष्य मन्यो तेणें पूज्यं तु क्या माय छे तेयारे सेणे कई जे पायली वा जाउ छु से पायली वो हमी घरी नपी पण मनमा पितषी के पद पम गण्यु तेम नैगम नय सर्व जीपने सिद्ध समान कहे केमफे सर्व जीवना माठ रुचक प्रदेश निर्मल सिद्ध रूप में वेपी एफ अशे सिर छे से माटे सिद्ध समान सर्ष जीव कमाते नैगम नयना प्रण मेद छे १ मतीत नैगम २ अनागस नेगम ३ वर्तमान नैगम ए नेगम नय कयो ये समा नय को छे ससामहे से संग्रह मे एक नाम लीपाँधी सर्व गुण पर्याय परिवार सहित मापे ते समापनय जाणयो वेनो रटान्त-नेम कोइफ मनुष्ये प्रभातें दावण फरवाने भर्थे पोताना घरना पारणे वेशीने पाकर पुरुपने का जे दावण लइ आयो देवारे ते पाकर मनुष्य पाणीनो छोटो तया रुमाल मने दावण एम सर्प पीज लहान्यो हये शेठे वो एक दातण नाम माने मगाष्यु हतुं पण सर्वनो सग्रह करी पाकर ले माग्यो वेमस ब्रम्य एवं नाम की तो द्रष्यना गुण पर्याय सर्प आभ्या ५ सग्रह नयना ये मेद 2 एफ जे द्रष्य पणो सामान्य पणे पोस्तां जीप तथा मनीष प्यनो भेद पायो नही ते पेहेलो सामान्य संमद सया योजो पिशेपताने भगीकार करे छे जे जीप द्रव्य एम की तो मजीप सर्य टत्या ते पिशेप समाह हो म्यवहार नय कहे जे जे यामस्वरूप देसीने मेदनी वेहेषण करे अने जे पाहेर देखता गुणनेज माने पण भवरंग सत्ता न माने पटले ए नयां आधार मिया मुख्य छे भतरग परिणामनो उपयोग नयी फेमके नेगम तथा संमद नय शान रूपध्यानना परिणाम विना अंदा सपा सचा माही छे तेम इहा करणी मुख्य छे से व्यपहार नय पणो जीवनी व्यवस्था मनेक प्रकार छ तिहाँ नैगम तथा संमा नय करी सर्व जीय सन्चायें एफ रूप छे पण भ्यवहार नयपी जीयना ये मेव छे एक सिद्ध पीमा ससारी ते पली संसारी जीवनामे मेद से एफ मयोगी चोदमा गुण ठाणा पाछा तथा पीमा सयोगी ते सयोगीना ये मेद एफ केपली भीजा छन्मस्थ, छमस्यना मेद एफ पीणमोही पारमा गुण ठरणे पर्धवा मोहनीय फर्म समाम्यं ते धीमा उपशान्त मोह वे उपशान्त मोहना यसी पे भेद एक अपायी एयारमा गुणगणाना मीय पीजा सफपायी वे सफपायीना प मेद छे एक सूक्ष्मफपायी दशमां गुण गणाना जीव वीजा यादर कपायी ते बादर कपापीना यली पे भेद छे एक श्रेणी प्रतिपम, वीमो श्रेणीरहित ते श्रेणीरहितना ये मेद एक मममादी पीजो प्रमादी ते प्रमादीना ये मेद एफ सर्वपिरति धीमो देवाविरति देशपिरतिना ये मेद एक प्रति परिणामि धीमा भमति परिणामि अप्रतिना घे मेंद एक अप्रति समकेति वीजा अप्रति मिष्यास्वी ते मिय्यास्थीना ये भेद एक भग्य वीमा मभम्य ते मभ्यना पे मेद एक मधीमेवी पीजा मपीअमेदी एवी रीते जे जीय जेयो देखाय तेने सेयो माने ए व्यवहार नय से एमज पुनलना मेद फरवा ते फहे छे पुगल ब्रन्यना वे मेद छे एक परमाणु, वीजो खष, संघना ये मेद एफ जीवने लागा ते जीव सहित पीजा जीय रहित ते पो प्रमुख अजीयनो खध दवे जीप सहित खधना ये मेद एफ सूक्ष्म खप पीजो वादर बंध इहा वर्गणानो विचार लखीये छैयें तिहाँ पुनलनी वगर्णा आठछे १ औदारिकवर्गणा २ वैक्रियवर्गणा र आहारकवर्गणा ४ वेजसपर्गणा ५ मापावर्गणा ६ उसासवर्गणा ७ मनोयर्गणा ८ कार्मणवर्गणा-ए माठ वर्गणानां नाम कमां वे परमाणु मेलाथाय स्पारे पणुफखंध कहेयाय प्रण परमाणु मेलाथाय तेवारे श्यणुकसष थाय एम संख्याता परमाणु मिले संख्या ताणुकलप थाय तेमज असंख्याते असख्याताणुकखंध याय तथा अनता परमाणु मिले अनंतागुफखंघ धाय ए खंघते सर्प जीपने मप्रहण योग्य छे अने खेवारें अभम्ययी अनस गुणअधिक परमाणु मेलाथाय तेयारें भौवारिक शरीरने लेवा योग्य वर्गणा याय एमज औदारिकथी मनत गुणा अधिक वर्गणामां दल भेला याय सेवारें वैक्रिय वर्गणा थाय वली वैक्रिय थकी अनत गुणा परमाणु मिले तेयारे आहारफवर्गणा पाय एम सर्य यर्गणाना एफेकयी मनंसगुणा अपिफ परमाणु मिले तेवार ते वर्गणा पाप पटले पहेलीथी मीची.वगणा पीजीयी त्रीजी एम सातमी मनोपर्गणाधी माठमी कार्मणवर्गणार्मा अनंत मन भर-भर-भर 41 गुण परमाणु अधिक छे इहाँ १ औदारिक, २ वैफिय, ३ माहारफ, ४ तेजस, ए पार पर्गणा पादर छे तेमां पांच वर्ण- पे गप-पांच रस-आठ स्पर्श ए पीस गुण छे तथा १ भापा २ उसास ३ मन ४ कार्मण प पार वर्गणा सम्म छे एमा पांच यर्ण-पगप पाच रस-चार स्पर्श-ए सोल गुण छे भने एक परमाणुमा एक वर्ण-एकगंध-एकरस-ये स्पर्श ए पाच गुण छे एम पुनल सपना अनेक भद छे ए व्यवहार नयना छ भेद छे १ शुरुम्पयहार ते आगला गुण ठाणार्नु छोरई मने ऊपरना गुणठाणानु महण करघु ८ अयया शान-दर्शन-पारित्र गुण ते निशयनय एकरूप छे पण ते शिप्यन समजावयाने जूदा जूदा भेद कहेवा ते शुभ प्यपहार छे २ जीवमा अज्ञान राग द्वेप लाग्या छे ते अशुद्ध पणुं छे माटे अशुद्ध म्यवहार ३ जे पुण्यनी क्रिया करवी ते शुम म्यपहार ४ जेयफी जीय पापरूप मशुभकर्म करे ते अशुभ व्ययहार ५ धन-पर-फुडेय प्रत्यक्ष सर्प आपणायी भूदा जूदा छे पण जीयें अज्ञानपणे मापणा करी जाण्या छे ते उपधरित म्यपहार ६ शरीराविक परयस्तु यद्यपि जीयपी जुदी छे सोपण परिणामिक भाव ठोलीपणे एकठा मिली रया छे तेने जीव आपणा करी आणे छे ते अनुप परित व्यपहार जाणपो ए व्यपहार नय कपो इये जु सूत्र नयनो पिधार कहे छे से अतीत काल मने अनागत कानी अपेक्षा न करे पण पर्चमान काले जे पस्तु जेया गुणे परिणमे पर्षे पस्तुने तेपेज परिणामे माने माटे ए नय परिणाममाही छे जेम कोइक जीय गृहस्थ छे पण अतरंग साघुसमान परिणाम के सो वे जीपने साधु कहे अने कोहक जीप साधुने पे ऐ पण मनना परिणाम विपयामिताप सहित छे तो ते जीय अप्रतीज एम ऋजुसूत्रनु मानई छे ते अजुनना पे भेद है एक सूक्ष्म प्रजु सूत्र एम कहे जे सदा काल सर्प यस्तुमा एक पर्वमानसमय यः छ पटले ये जीव गयाकालें अज्ञानी हतो भने अनागत काले मज्ञानी भायें अज्ञानी यशे पम पेलुकाउनी अपेक्षा न करे पण एक पर्चमान समये थे वो तेने सेषो कहे वे सूक्ष्म अनु सूत्र कहिये अने महोरा पायपरिणामप्रहे से स्कूल ऋजुसूत्र नय जाणयो एटले ऋमुसूत्र नय कयो ये शमनय कहे छे ने यस्तु गुणयत मयया निर्गुण ते यस्सुने नामकही बोलावियें जे भापायर्गणायी शब्द पणे पचन गोचर थाय ते शद नय से कारणे अरूपी दम्य वचनयी प्रमाजाय नही पण वचनथी फहेषा शय नय फाहिया जे शन्दनो मर्प होय तेपणो जे वस्तुमा यस्तुपणे पामिये वेवारे से यस्तु शम्वनय कहिये जेम पटनी चेष्टाने करतो होय से घट ए सदनयमा व्याकरणयी नीपना मने मीजा पण सर्व शद लीधा से शन्दनयना पार भेद छ १ नाम २ स्थापना ३ दम्य ४ माय-अने पार निक्षेपाना पण पहिज नाम के १पहलो नाम निक्षेपो ते माकार तपा गुणरहित यस्तुने नाम करी पोलावदो खेम एफ लाफरीनो फटको छेड्ने कोरके वेदने बीय एवं नाम फाई के नाम जीप आण मेम काली दोरीने सांपनी बुनियें फरी घावहणे सेहने सापनी हिंसा सागे ए नाम सर्प ययं एवीज रीते नाम तप अथया नाम सिख म यस प्रमुखने सिलवर एम कही बोलाये छे वे नाम नियेपो कहिये ए सूत्र साखें छे २ स्थापना निक्षेपो कहे छे जे कोइफ पस्तुमा कोहक वस्सुनो आकार देखीने तेइने ते वस्तु कहे जेम चित्राम अथवा फाष्ट पापाणनी भूर्षि वेने घोटा-हामीनो माफार छे वो ते पोसा झापी कहेयाय से स्थापना जाणवी ए स्थापना निक्षेपो नाम निक्षेप सहित होर जेम स्थापना सिम बिनपतिमा प्रमुख ते सदभाव स्थापना पण होय अने असभाष स्थापना पण दोय अनिम मिनमतिमा ते नंदीश्वरीप प्रमुखने विपे, मने जेह वहांनी मिनप्रतिमाते फुत्रिम वे सर्प स्थापना जाणयी जेम पितामनी स्त्री जिहां मांगी होय विहां साधु रहे नही कारण के स्थापना खी छे ते स्त्री सुल्य जाणषी मज जिनमतिमा जिनसमान पाणयी इहा कोइफ अज्ञानी जीय कहे छे, जे स्थापनामा ज्ञानादि गुण नपी तेथी स्थापनाने मानपी पूजमी नही तेने उत्तर कहे ऐ के स्थापनारूप सीमा स्त्रीपणाना गुण नपी तो पण ते विकारतुं कारण थाय छे तेमज जिनप्रतिमां पण घ्याननु कारण छे अने जे एम पुछे के हिंसा याय छे अने भगवते तो दयाने धर्म करो ऐ वेहने पम कहे जे परदेशी राजा केसी गुरुने पांदयाने अर्थे धीजे दीपसे मोहोटा आरंपरपी आग्यो ते पंदनामां हिंसा धयी पण ठाम कारण गणा प्रोटो न थयो यीमो महिनायसीय छ मित्र प्रतियोषवाने पुवलीनो रशस्त कलो के हिंसा को घणी ययी पण ते सामना कारणमा गणी छे एम भाय शुर होय विहां हिंसा लागती नयी अयया फोइफ एम फहे छे थे अमे आपणे स्थानके पेठा नमुत्युण कहिसु अमने धाम यासे ते सरो पण भगवती सूत्रमा भगयानने पंदनाने अधिकारें तो तिहा मह यंदना फरयार्नु फल महो१ कप छे तथा निषेपाने अधिकार एम कसे जे भाय निक्षेपो एफसो याय नही पण नाम स्थापना तथा द्रध्य ए प्रण मिस्या भाप निक्षेपो थाय माटे स्थापना अपाय मानपी एपे ने स्थापना न माने लेने कहियें विधामनी भूर्षिने हिंसाना परिणामपी फाठे वेदने हिंसा जागे मन विनररनाप्याने तिनपतिमा पूजा लाम धाय छे एम युफि फरता तया आगमनी साने पण मिनप्रतिमाने दिनममान माने से आराधक अने से पिनप्रतिमाने न माने तेणे स्थापना निक्षेपो उयाप्यो भने स्थापना उथापी तो उम्प तया भाय निघेपो पापना यिना पाय नही माटे इम्य तथा भाव पण ज्याप्यो एम प्रण निक्षेपा उचाया तेयारे सिसान्न ग्याप्पान माटे जे भिनप्रतिमाने नहीं माने ते पिराधक जाणयो ते स्थापना इतर अने यावत् कधिक ए रमदे ३ दम्प निघेपो फहे छे, जेनो नाम पण होय तया आकार धापना गुण पण होय अने लक्षण होय पण आत्मोप पोग न मिले ते दम्प नियेपो आणयो एटले अझानी जीय ते जीय स्वरूपना उपयोग यिना द्रग्य जीव छे "अणुव भोगोदर्य" इति मनुयोगमारसचनात् यठी कई ऐ जे सिरान्त पांचता पूछता पद अक्षर मात्रा शुद्ध अर्थ करे छे अने गुरमुगे मदईछे पण गुर नि पोतानी सचा मोरस्या यिना सर्प द्रव्य निक्षेपामा छ जे भाय यिना द्रग्यपणो छे ते पुण्पदंपने कारण ऐ पण मोधन फारण नधी पटठे जे फरणीरूप फर वपस्पा करे छे अने जीय अजीप पदार्पनी गता मोदी नधी तेने भगरती राम्रर्मा अमती तथा अपचरफाणी का छे तथा जे एफली पाय फरणी फरे छे अने पोते गापु कहेपाय हे ते मा यादी छे एम उत्सराप्ययन सूयमा फर छे "नमुणीरनयासेण" एयचनें "नाणेणय मुणी दोर' पापनपी ने शानपान ते मुनि छ भने जे अशानी ते मिप्यारयी छे तया कोरक गणितानुयोगना नरक देपलाना वोट ममा पसि प्रायफनो माचार जाणीने फहे ने अमेझानी ये ते पण सानी नयी पण से द्रव्य गुण .

पर्याय जाणे वेने ज्ञानी कहियें श्रीउत्तराध्ययने मोक्षमार्गे कमो छे गाया "एवं पधिहनाणं दवाणयगुणाणय, परमपाणे सपेसिंघ नाण नाणी हिं देसियं ॥ १॥ माटे पस्तु सत्ता आण्या विना शानी समम नही अने नवसस्य मोलसे से समफेति अने पहया ज्ञान दर्शन विना जे कहे के अमे प्यारित्रिमा छये ते पण मृपावादी छे कारण के श्रीउत्तरा प्ययन सूत्र मध्ये की छे मे "नाणं दसण नाणं नाणेण विना न हुँति घरण गुणा" ए वचन छे तेमाटे माज केटलाक ज्ञान हीन क्रियानो मायर देखारे छे ते ठग छ तेहनो सग फरषो नही ए पाह्य करणी अमन्यजीवने पण आवे माटे ए पाय करणी ऊपर राप नही अने मारमानु स्वरूप ओलख्या यिना सामायक पठिकमणा पथक्खाण फरयां से सर्व द्रव्य निक्षेपामा पुण्यालय छे पण संपर नयी श्रीमगवती स्त्र मध्ये कई छे "आया खल्लु सामाइयं" ए आला याची जाणमो धया जीय स्वरूप आण्या विना आप संयम पुण्य प्रकृति से देयताना भवन कारण छे "पुप तवेणं पुप संयमेण देघखोप उययाति नो पेषण आयमावपत्त्ययाप" ए मालायो भगवतीमा कमो छे तथा जे कियालोपी आधारहीन छ भने ज्ञानहीन छ माघ गनी छाजें सिद्धान्त भणे पाचे छे मत पचक्खाण करे छे ते पण ब्रम्य निक्षेपो जाणयो एम श्री अनुयोगद्वारा कई छे ने इमे समणगुणमुफजोगी छकायनिरणुकंपा हयाइय उद्दामा गयाश्व निरकुसा पट्टामट्ठा सुप्पोट्टा ॥ पंडुरपडपा- उरगणा जिणाणमणाणाएसईदा विहरिकण नमओ काल आयस्सगस्स तयईति से है लोगुत्तरिय दघामस्सर्व ।। मय-जेने छकायनी दया नयी घोहानीपेरें उन्मद छे हायीनीपेरें निरंकुश छे पोताना शरीरने घोषता मसलता उजसे फपरे शिणगार करी गन्ना ममस्पमा माचतो स्वेच्छाचारी धीवरागनी माझा भांजसा जे तप क्रिया करे के से पण ब्रम्य निक्षेपामा छे अपपा ज्योतिष वैधक करे छे मने पोताने आचार्य उपाध्याय कहेयरावीने लोकपासे महिमा करे ऐ ते पत्रीबंध लोटा पैया जेवा छे षमा भव भमसे माटे अयंदनीक छे ए सास उत्सराप्ययन मध्ये अनामी मुनिना अध्ययन पकी जाणषी अने सूत्रना अप गुरुमुखे सिस्पाधिना तया नय प्रमाण जाण्या विना निमें आरमाने स्वस्म ओख्या बिना नियुकि विना उपदेश आपे छे पोवे वो संसारमा पुज्या ऐ पण जे तेमनी पासे पेसे में तेमने पण संसारमा पुरावे छे पम प्रश्नव्याकरणसूत्र सपा अनुयोगद्वारसूत्रमा का छे “अजस्थ चेष सोलसमं" इत्यादि भने भगवती सूवमा पण कए छे "मुवत्यो खलु परमो, पीओ निजुप्तिमीसमो मणियो, वामो य निर पसेसो एस विही होइ अणुओगो" भने फेटलाक एम कहे छे से ममे सूत्र पर अर्य करिये ये तो नियुकि वथा टीका ममुसर्नु शु फाम छे वेपण भूपापाद छे फेम के श्रीप्रपनम्याफरणमा "ययणतियं विगसिय” इस्याविक जाण्या विना अने नय निक्षेप जाण्या विना ये उपदेश आपे वे मृपावाद छे एम अनेक सूना का ऐ माटे पहुश्रुत पासे उपदेश सभिलयो श्री पचराध्ययन मध्ये बहुभुतने मेस्नी तथा समुदनी भने कल्यवृक्षादि सोल उपमा दीघी छे ए ब्रम्प निक्षेपो करो ४ भावनिक्षेपो कहे छे जे नाम स्थापना अने द्रम्प ५ प्रण निक्षेपा से एक भावनिक्षेपा विना अशुभ छ जे नाम वया आकार लक्षण गुण सहित वस्तु वे माप निक्षेपो जाणयो उपमोगोमाव इति पचनात् पटले पूजा दान शील तप क्रिया ज्ञान ए सर्य मावनिक्षेप सहित लाभन कारण छे शहाँ कोइ कहशज मनना पारणाम हर करीने जे करिये तेने भाप फहिये एम कहे छे से झूटा छे ए वो सुखनी यायें मिथ्यात्वी पण घणा करे छे ते गणातुं नही इहाँ सूत्रनी साखे पीसरागनी आक्षा हेय उपादेयनी परिक्षा करी अजीवसत्व तया आश्रयवस्व मने पन्धतस्व ऊपर हेय केहता स्वाग भाव अने जीयना स्वगुण से संपर निर्जरा क्या मोक्षवत्य अपरें उपादेय परिणाम ते भाप कहिये एटखे रूपी गुण ते द्रम्य निघेप छे भने अरूपीगुण से भावनिक्षेप छे पटले मन पचन काया खेश्यादिक सूर्य द्रम्य निक्षेपामा छ अने ज्ञान दर्शन पारिन वीर्य ध्यान प्रमुख सर्व गुण मावनिक्षेपामा छे ए भाव निक्षेपो ते नामस्थापना सया द्रव्य सहित दोय पटले पार निक्षेपा का हये पार निक्षेपा पदार्थ ऊपर उगारी देखारे छे नाम जीय ते पेतना भयया मापाने एक पाणने जीव कही योलाये छे नाम निक्षेपे जीय, मूर्ति प्रमुख यापिये ते स्थापना जीव एफेंद्रीयी पपेंद्री पर्यंत सर्व जीव छे पण उपयोग मिले नहि ते दम्यमीय भने मूर्तिमा जीय स्वरूप ओलसी समकितना उपयोगमा छे वे भायजीव एम धर्मास्तिफायादिक दम्यमा पण जाण नामथी धर्मास्तिकाय कही योलाययो तेना नाम धर्मास्तिकाय धर्मास्तिकाय पहया अक्षर उखया रात कारणे काइक यस्तु थापषी से स्थापना धर्मास्तिकाय क्या धर्मास्तिकाय जे असंख्यातप्रदेशी धर्मनग्य छे से दम्य धर्मास्तिफाय प धर्मास्तिफापने जेपारे पठण सहाय गुणनी अपेक्षासहित ओलखिये से भाय धर्मास्त्रि धर्मास्तिकाय इषे कोरफनो साधु एहयो नाम छे से नाम साधु अने स्थापना करिये ते स्थापनासाघु तथा जे पचमहामव पाले रिया मनुधान करे गवतो मामारठीये पण मानायाननो यो उपयोग नोइये तेयो उपयोग न होय ते द्रव्यगा जे भार गरमोशनो गायक पा भार मागुनी फरणी फरे 1 भाय निक्षेपे गाधु कहिये गानो गरिदन पाम से नाम मरिहत भने मरिदतनी प्रतिमा ते धापना अरिहंत जेटलामुपी छमस्य अयम्या मेदप मरिदा भने पायान पाम्या पणे रोकाठोफनो भाय जाणे दरो वे भाय मरिहंत एम सिमां पण फहेयो भाजीरनो शापको नाम भयगा भायें भपीयनो नाम ते नामशान तथा जे ज्ञान पुसामा लस्यु छे ते स्थार नासा रोग पिना गिनातनो भणयो भयर भन्यमविना सयमार मणया तथा सशरीरादिफ ते सर्प द्रव्यशान नगर्नु वान वे भाशान जपा फोर्नु नप पर नाम से नामवप तथा पुनफमां तानी विधार्नु लपन ते धापनातप अने पुण्यरुप माम समरिकम प्रप्पतर जे परवस्तु अपर त्यागनो परिणाम ते भायतप एम संयराविक सर्यमा पार पार निधेगमा नपा श्रीमनुपोगदार मध्य को ठे-पतः "जरप य जाणिमा निफ्णेयं निस्यिये निरयसेम ॥ जरथ पिन मागमा पागनिपिग ताय ॥१॥प पार निर्भपा कामा पटले साल नय फालो तेको ममनिकट नप कहे ऐजे परतुना फेटनाक गुण प्रगया छे अने फेटलाफ गुण प्रगव्या नयी पण अवश्य प्रगरो परवी गातुने यागु फहे गगुना नामातर एक करी जाणे प्रेम जीय पेतन तथा मारमा पहनो एफ भर्प फहे से सममित नय कहिये ए नय एक मैश ओछी यस्तुने पूरे पूरी यस्तु कहे अम वेरमा गुणठाणे फेवली होय | वेहने सिर कहे ए नयना मेद मिलकुल नयी ५ समभिरुट नय कमो हपे पयभूय नय कहे छे जे परतु पोवाने गुणे संपूर्ण छे भने पोतानी किया करे छे तेने ते पस्तु कही घोलाये मेम मोक्षस्थानकें से जीय पहोतो तेने सिख कहे प्रेम पाणीपी भरेलो नीना माथा ऊपर आपतो जल घरण किया करतो तेने पटी कहे ए एवं भूसनय कामो हये सात नयना दृष्टान्त श्रीअनुयोगद्वारसूत्रपी लखिये ,यें प्रेम कोरफ पुरुपे कोइफ वीजा पुरुपने पूरन्यु जे समे फिहाँ यसोछो सेषार ते पुरुपे फाएं हुं लोकमा पसे छु तेयारे अशुद्ध नेगमपाले पुज्यु से लोकना प्रण मेद छे १ अधो लोक २ विछोगेक २ वर्मयोफ तेमां तु किहो रहे छे तेयारे शुद्धनैगमें की जे निछालोकमा घलीपुज्यं से निछोछोकमा असंख्याता मीप समुद्र छे तेमा हुं फयाद्वीपमा रहे छे सेषारे पिशुनैगमें कई जे जयुद्धीपमा रतु छु ते जंयुद्धीपमा खेत्र पणा छे ते सेमा सु फया खेत्रमा रहे छे तेयारे अतिशुरनैगम योत्यो जे भरत क्षेत्रमा रहुं छु क्षेत्रना छ र ऐ से मोहेलो फया बसमा रहे थे वेयारें फट जे मम्म संउमा एंछ एम क्रमे पूछता छेले फसे जे आपणा देशमा रहुं हुं वेयारें फरी पुज्यु ले देशमा तो नगरपाम घणा छे तो तु किदां रहे छ तेपारें फई जे ? अमुक गाममा रहुं हुं ते गाममा पली अमुक पारो तमा अमुक पर पतान्यु तिहा सुघी नैगम नय जाणयो भने संग्रह नययाणे योत्यो जे मारा पोताना शरीरमा वसु बु तथा व्यपहार नयवालो योन्यो जे सयारे पेठो छु पेटलाज विशानामां रईए बने अनुसूय नयबा को जे मारा मास्माना भसंख्याता प्रदेशमा रहुं हुं पली शम्द नय को मारा स्वभावमा रहुँ छु मज समभिन्ना नय कहे मारा गुणमा रहु छ भने एषभूवनयवादी कहे जे शान दर्शनगुणमा पसेई पररांत कमो सेम सर्व वस्तु कहेवं, तथा कोरके प्रदेशमात्र क्षेत्र मंगीकार करी पुज्य मे ए मदेश कया ब्रम्यनो छे देवार नैगमनय योस्यो से छप द्रम्पनो प्रदेश केमके एक आकाश प्रदेशमध्ये द्रव्य मेला छे देवारे संग्रहनय बोस्यो मे काल दम्य तो अप्रदेशी छे ते मादे सर्व छोकमा एक समय सरिखो छे पण से एक भाफाश मन्यना प्रदेशमा जूदो नपी माटे काल पिना पांच म्यनो प्रदेश के वारे व्यवहार नय पोस्यो के जे ब्रम्प मुख्य देखाय छे वेहनो प्रदेश के तेपारें ऋजूसूत्रनय घोल्यो के द्रष्यनो उपयोग देश पुछिये वे प्रम्यनो प्रदेश छे जो धर्मासिकायनो उपयोग देह पुछियें सो धर्मास्तिकायनो प्रदेश छे जो मधर्मासिकायनो सपयोग दे। पुछिये सो अधर्मास्तिकायनो प्रवेश छे वेघारे शब्दनय बोल्यो के जे द्रव्यनो नाम ग पुण्येि ते म्पनो प्रदेश के हवे सममिस नय पोस्यो जे एक आकाश प्रदेश मध्ये धर्मास्तिकायनो एक प्रदेश के अधर्मासिकायनो एक प्रदेश के अने जीपना मनता प्रदेश छे पुनलना पण अनंता प्रदेश छे तेवारे एक भूत नय वोस्यो के प्रदेचने से मम्यनी किया गुण पर्याय भगीकार करी देखिये ते समय से प्रदेश ते द्रन्यनो गणियें ए प्रदे शमो सात नय कमा हखे जीवमा सात नय को छे ममम नैगमनयनी मते जे गुण पर्यायवत शरीर सहित से जीव पटले शारीरमा जे पीजा पुनल सथा धर्मासिकायाविक द्रव्य छे ते सर्व जीवमांज गण्या सेयारे सपहनय पोल्यो जे असख्यात प्रदेशी ते जीप पटले एक माफाचना प्रदेश टस्या पीला सर्पद्रम्य एमां गणाणा तेवारें व्ययहारनय पोस्यो जे विपयलेयी काम यात संभारे वे जीव हा धर्माखिफाय-अधर्माखिकाय आकाश तया पीजा पुनल सर्प टल्या पण पाइन्द्री तया मन अने हेश्या ए पुगत छे से जीपमा गणाणा कारणफे यिपयादिकतो इद्रियो छेछे से जीयपी न्यारा छे पण पहा व्ययहार नय मते जीय मेला लीपा छे वेपारे प्रमुसूत्रनय पोल्यो जे उपयोगपत ते जीव इहां इंद्रियाधिक सर्प टल्या पण भज्ञान तथा जानना मेद टत्या नही हवे शब्द नय बोल्यो जे नाममीय स्याफ्नाजीप द्रष्यजीय भायजीय इहां जीवा गुण-निर्गुणनो मेद पम्पो नही वेपारें सममिरुट नय पोस्यो जे ज्ञानादि गुणयत से जीय तेयारें मतिज्ञान अवज्ञान इत्याविफ साधक भषस्थाना गुण वे सर्व जीय स्वरूपमा आम्या हषे एवमूवनय योस्यो जे अनंतशान अनं तदर्शन मनेत पारित्र शुद्धसघात ते मीप ए नये जे सिद्ध अवस्थामा गुणहता तेजप्रया ए सात नये जीप द्रम्प कहो हषे सात न धर्म कहे छे नैगमनय बोत्यो जे सर्व धर्म से फेमके सर्व माणी धर्मने चाहे छे ए नय मशरूप धर्मने धर्म एहबु नाम कहे हपे संग्रहनय पोल्यो जे परेरायें आपनो ते धर्म एणे अनाधार छोयो पण कुलाचारने धर्म फलो म्ययहार नय योस्यो जे सुखनु फारण ते धर्म पणे पुण्यकरणीने धर्म फरी मान्यो अस्त्रनय मते जे उपयोग सहित पैरागरूप परिणाम से धर्म कहिये ए नयमो यथा प्रवृत्ति करणना परिणाम ममुख सर्व धर्ममा गण्यां ते मिप्या रवीने पण होय हये शमनय योल्यो जे धर्मर्नु मूल समकित छे माटे समफित तेज धर्म वेपारें सममिरुतनय योन्यो जेबीव अजीय नयतस्य सपा छ म्यने ओलसीने जीप सत्ताभ्याचे अजीपनो स्याग करे पहयो ज्ञान दर्शन पारित्रनो शुख निधय परिणाम ते धर्म ए नये सापक सिखना परिणाम ते धर्म पणे लीघा एष भूतनय बोल्यो जे शुलभ्यान रूपातीतजा परिणाम आपकमेणी कर्म अयना फारण ते धर्म जे जीयनो मूलस्वमाष ते यस्तुधर्म जे मोक्षरूप कार्यने करे ते धर्म प साते नये धर्म करो एवं सात नये सिरपणो कहेछ नैगमनयने मते सर्वजीव सिन छे फेमके सर्वजीवना आठरुषकप्रदेश सिद्ध समान निर्मष छे माटे, संग्रहनय कहे जे सर्वजीयनी सत्ता सिद्धसमान छे पणे पर्यायार्थिकनये फरी फर्म सहित भषस्था ते टासीने म्यार्थिक नये फरी अपस्था अंगीकार करी तेषारें म्यवहारनय पोल्यो जे विद्या उब्धि प्रमुख गुणे करी सिद्ध थयो वे सिर ए नये वाप तप प्रमुस भगीकार कसा हये जुसूत्रनय पोस्यो के जेणे पोताना मारमानी सिद्धपणानी सचा ओलखी अने ध्याननो उपयोग पण सेज पर्ने छे ते समय से जीव सिद्ध आणयो ए नये समकेति जीव सिर समान में पम कार्य हवे शब्दनय पोस्यो जे शुद्ध शुध्यान परिणाम नामाविफ निक्षेपें से सिन तेवारें सममिलनय पोस्यो बे फेयरज्ञान केषलदर्शन पयास्यात चारित्र ए गुणे सहित ते सिद्ध जाणवा ए नये तेरमा घनदा गुणठाणाना फेषलीने सिर कमा भने एषभूवनय कहे छे के जेना सकल फर्मषय यया डोकने असे विराजमान अएगुण सपा से सिर जाणया एरीते सिर पर्दै सास नय कया एम सात नय मिस्या समकेति छे अने जे एक नयने प्रहण करे से मिथ्यात्वी छे ए सासे नयासिन ते वधन ममाण छे अने ए सात नयमा कोइपण नयने उयापे सेर्नु पपन मप्रमाण छे इये प्रमाणनो विचार कहे छे प्रमाणना पे भेद छे एक प्रत्यक्षप्रमाण धीचें परोक्षममाण वेमा जे जीय पोताना उपयोगपी म्यने जाणे ते प्रत्यक्ष प्रमाण कहिये जेम फेवली छ द्रव्य प्रत्यक्ष प्रमाणे आणे तथा देखे ते माटे फेयल ज्ञान से सर्पपी प्रत्यक्ष ज्ञान छे भने मनपर्ययशान ते मनो धर्गणा प्रत्यक्ष आणे तया अवपिज्ञान वे पुनल द्रष्यने प्रत्यक्ष जाणे माटे ५ पे ज्ञान देशप्रत्यक्ष छे पीगु छमस्य ज्ञान ते सर्व परोक्ष प्रमाण छे हये परोक्ष प्रमाण कहे छ मतिझाननो अने मुवज्ञाननो उपयोग परोक्ष प्रमाण छे फेमफे जे शाखना पलपी जाणे ते परोष प्रमाण कहिये ते परोक्ष प्रमाणना प्रण मेद छे १ मनुमाणममाण २ भागमममाण ३ उपमानप्रमाण तेमा मनुमाण एटवे कोइक सहिनाण देखीने जे भान पाय जेम धुमाटो देखीने अग्मिनु अनुमान याय अने मागम एटले शाखनी साखथी जे यात जाणिये जेम देवलोक तथा नरक निगोद पिगेरेनो विचार आगमयी जाणिय छये ते आगम ममाण अने कोइफ पस्तुनो एटान्त आपीने यस्तुने ओलखावधी ते उपमान प्रमाण जाणयो ए प्रमाण कमा एये सत् असत् पक्षयी सप्तमंगी कहे छे १ स्यात् केहता अनेकांत पणे सर्व अपेक्षा लेइ जीयद्रव्यमा आपणो द्रम्य आपणो खेत्र आपणो काल आपणो भाष पम आपणे गुण पर्यायें जीय छे वेम सर्व द्रव्य मापणे गुणपर्याय छे ते स्यात् अस्थि नामा पहेलो भागो थयो २ जे जीवमा पीजा पांच ब्रम्यना १ प्रम्य २ क्षेत्र ३ फाल ४ भाय से परदम्यना गुणपर्याय जीयमांनी एटले पर ब्रम्यना गुणनो नास्तिपणो सर्व द्रव्यमा छे ए स्पात् नासि पीजो मांगो पयो न्य स्यगुणे अलि अने परगुणे नाखि ए थे मांगा एफ समये द्रष्यमा छे म जे समये शुद्ध स्वगुणनी अस्ति छे तेज समय परगुणनी नास्ति पण छे माटे अस्ति नास्ति ए पेहुं मागा मेछा छे वे स्यात् अस्ति नास्त्रि पीजो भांगो थयो ४ मस्ति भने नास्ति ए थेटु भागा एफ समयमा छे तो पपने करी अस्ति एदलो योगता असंख्याठा समय छागे तेपी नास्ति भागो तेज पखते कहयाणो नही अने जो नास्ति मांगो फझो तो अस्ति पणो नाल्यो माटे एका अस्ति कहेता धो नास्तिपणो तेज समये द्रव्यमा छे ते नही कहेयाणो माटे मृपावाद लागे तेमज नास्त्रि कहता असिनो मृावाद सागे माटे पपने भगोचर छे एक समयमा पेटु वचन योस्या जाय नही फेमके एक अक्षर बोलता असे स्याता समय छागे छ माटे यधनपी अगोचर छे ते स्यात् अयकम्प ए पोयो भागो कयो ५ ते अपफप्यपणो यस्तुमा अस्थिधर्मनो पण छे माटे स्यात् अस्ति अयकम्य पधिमो भांगो कमो ६ तेमज नास्ति धर्मनो पण अपकम्य पणो घस्तु मध्ये छे माटे स्यात् नाति अयजन्य जो भांगो माणको ७ ते अस्तिपणो सया नास्तिपणो पेटु धर्म एक समये यस्तु मध्ये छे पण पचनपी मयतव्य छे माटे स्यात् अस्ति नालि युगपत् अयफम्प प सातमो भांगो कम्रो हो प सात भांगा नित्य तया अनिस्पपणमा सगारे छे १ स्यात् नित्यं २ स्यात् अनित्यं ३ स्यात् नित्यानित्य ४ स्यात् अयफन्य ५ स्यात् नित्य अयफयं ६ स्यात् अनित्य अयतव्य ७ स्यात् नित्यानित्य युगपत् अवकय एमज एक भनेकना सात भोगा फहेया तथा गुणपर्यायां पण कहेवा केमफे सिद्ध मप्ये नय नथी तोपण सप्तभंगीवो सिममा छे हये सचा मोठसायषाने त्रिभंगीयो कहेछे १ मिप्यास्य दशा ते पापकदशा २ समफित्व गुणठाणाची मांडीने अयोगी । फेयली गुणठाणा सुधीसाधक दशा जाणयी । सर्पकर्मथी रहित ते सिचदशा १ शाननो जाणपणो से जीयनो गुण २ सेनो माता से जीय ३ सेय ते सर्व द्रग्य १ ध्यान से जीवना स्वरूपनो २ ते ध्याननो ध्यातागीय ३ ध्येय आत्मानो स्वरूप १ फर्ता ते जीप २ कर्मते एक मोष पीजो पन्ध ३ किया ते एक सपर पीजी आश्रय १ फर्म ते घेतनाने कर्म । पंधना परिणाम २ कर्मर्नु फल ते पेतनाने जे कर्म पदयनापरिणाम ३ शान चेतना ते जीयनो स्वगुण ते आस्माना पण मेव छे १ अज्ञानी जीप शरीरादिक परवस्तुने आस्मबुनियें फरीमाने ते पहेलो पहिरात्मा २ वह सहित जीय छे ते पण नि सत्तागुण सिर समान छे एटले पोवाना जीयने सिद्ध समान करी प्याये से पीजो अतर आत्मा जाणयो २ फर्मसपाषी केयल ज्ञानपाम्या ते भरिदत सया सिद्ध सर्व परमारमा जाणया प त्रिभंगीनो विचार कयो पटले आठ पक्षनो पिचार फमो एपे एक दम्य मध्ये छ सामान्य गुण छे से कहे छे पहेलो अस्तित्य से ने छ द्रष्य मापणा गुण पर्याय प्रदेशे फरी अति वेमो धर्म मधर्म माकाश भने नीष ए चार द्रष्यमा तीन द्रष्यनो असंख्याता प्रदेश मिल्या खप थाय छे भने माकानो अनस मदेशनो संप धाय अने पुलतमा संघ पवानी शकि छे माटे ए पांच ब्रम्प अस्विकाय छे भने ।

छटो काठ द्रन्यनो समय कोइ कोइयी मिलतो नयी फेमके एक समय विणस्या पछे वीजो समयं आवे छे माटे फाल अस्तिफाय नयी प द्रम्यमा अस्तित्व पणो कमो २ यस्सुस्य फेहता यस्तुपणो कहे छे ते उन्य एए एकठा एफ क्षेत्र मध्ये रमा छे एक आकाश प्रदेशमा धर्मासि फायनो एक प्रदेश रयो छे क्या अधर्मास्तिकायनो पण एक प्रदेश रमो छे अने जीव अनताना अनता प्रदेश रह्या छे पुनल परमाणु अनता रमा छे ते सर्व पोवानी सचा लीधा थका रह्या छे पण कोइ द्रव्य कोइ द्रष्य साये मिली जातो नयी ते पस्तु पणो ५ द्रग्यस्य फेहतां द्रन्यपणो ते सर्व द्रष्यपोसपोतानी क्रिया करे एटले धर्मास्तिकायमा चलणगुण ते सर्व प्रदेश मध्ये ऐ सदा काठे पुगत सथा जीयने पलायया रूपक्रिया करे छे इहाँ कोइ पुछे जे लोकान्त सिरखेत्रमा धर्मास्तिकाय छे ते सिद्धना जीवने पलाययापणो करती नथी ते फेम! तेने उत्सर कहे छे जे सिद्धना जीव अक्रिय छे माटे गलता नपी पण ते क्षेत्रमा जे सूक्ष्म निगोदना जीप तथा पुद्गल छे तेहने धर्मास्तिकाय चलाये छे माटे पोवानी किया करे छ तेमज अधर्मास्तिकाय जीय तया पुग्नउने स्थिर राखवानी क्रिया करे छे तया आकाशद्रष्य ते सर्व द्रव्यने अवगाहना रूपकार्य करे छे यहां कोई पूछे से अठोकाकाशमां तो वीजु कोइ द्रष्य नथी तो अठोकाफाश कया द्रव्यने भषगाह दान मापे छे सेने उत्तर कहे छे जे अलोकाकाशमो मषगाह करवानी शफि तो छोकाकाश जेमीज छे परतु विहां अपगाहनो दान लेनार द्रन्य कोर नयी माटे अवगाहदान करसो नयी भने पुद्गल द्रम्य मिलया विसरपारूप किया फरे छे तथा कालदम्य पर्तनारूप क्रिया करे छे भने जीवद्रव्य ज्ञान लक्षण उपयोगरूप क्रिया करे छे एम सर्व द्रव्य पोताने परिणामी स्वससानी फिमा फरे छे पदन्यत्यपणो कमी ४ प्रमेयस्य केहवा प्रमेयपणो, जे छ द्रव्यमा प्रमेयपणो छ सेनो प्रमाण केयली पोसाना शानथी फरे छे से धर्मासि काय तया अधर्मास्तिकाय अने आकाशास्तिकाय एफेक दम्य छे भने जीय ब्रम्य अनंता छे वेहनी गणति कहे छे संझी मनुष्य संख्याता छे मसंझी मनुष्य असेरख्याता छे नारकी असख्यावा छे देवता असंख्याता छे तिर्यच पपेन्द्री असंख्यामा छे पेंद्री असण्यावा छे सेन्द्री असंख्याता चौरेंद्री मसख्याता छे से यकी पुप्पीकाय असंख्याता अपकाय असंख्याता वेसकाय असंख्याता यायुकाय असंख्याता प्रत्येक वनस्पति जीच असल्यासा ते यकी सिदना जीव जनता ते भकी यादर निगोदना जीय अनंत गुणा पटले यादर निगोद ते कंदमूल आधु सूरण प्रमुख पहने सुइने अग्रभागें अनंता जीप छे ते सिद्धना नीयपी अनंत गुणा छ भने सूक्ष्म निगोद सर्पपी अनंत गुणा छे ते सूक्ष्म निगोधनो विचार कहेछे बेटवा ठोकाकाशना प्रदेश छे वेटला गोला छे ते एफेक गोलामा असस्याता निगोद छे निगोद शयनो अर्प एछे जे अनंता जीयनो पिठभूत एक शरीर तेइने निगोद कहियें वे एकेकी निगोद मध्ये अनता जीप छे ते अतीत फारना सर्व समय तमा अनागतकालना सर्ष समय भने वर्चमान कालनो एक समय वेने मेला करी अनत गुणा । फरिये पटला एक निगोदमा भीष के पटले अनचा जीव छे ए ससारी जीप पकेफाना असंख्याता प्रदेश छे भने पोका । - प्रदेश मनतिकर्मवर्गपा लागी छे ते एफेफ पर्गणा मध्ये अनंता पुनल परमाणु छे एम अनंता परमाणु जीपसाये लाम्या छे ते धकी अनंत गुणा पुनउ परमाणु मीययी रहित छुटा छे गोलाय असखिज्जा, असखनिगोयओ हवइ गोलो । इकिकम्मि निगोए, अनंतजीवा मुणेयवा ॥१॥ अर्थ-लोकमांहे असस्यावा गोला छे पफेका गोला मध्ये असंख्याति निगोद छे एफेक निगोदा अनता जीव छे । सचरससमहिआ, किर इगाणुपाणुम्मिहुति खामवा। सगतिससयतिठुत्तर, पाणु पुण इगमुहचमि ॥१॥ अर्थ-निगोदिया जीय ते मनुप्यना एक उसासमा सत्तर १७ भय सामेरा करे छे भने सस्त्रीससो तिहसेर ३७७३ श्वासोमास एफ मार्चमा थाय पणसविसहस्स पणसय, छचिसा इगमुहुच खुलभवा।आवलियाण दो सय, छपन्ना एगखुज भवे ॥१॥ अर्थ-निगोदना भीय एफ मुहीमा ६५५३५ मय करे भने निगोदनो एफ भघ २५५ मापकीनो छे शुलक भवनो ए प्रमाण हे अस्थि अनताजीषा, जेहिं न पत्तो तसाइपरिणामो । उपमंति चयति य, पुणोवि तस्येव तस्थेव ॥१॥ अर्थ-निगोदर्मा अनता गीय एहया ऐ जे जीव प्रस पणो पहेछा कियार पाम्या नथी अनंतो काल पूर्व गयो भने । अनंतो काल माशे पण ते जीय पारवार विहाज उपमे छे भने तिहास पवेछे एम पक निगोदमा अनता जीव छे ते निगोदना पे भेद छे एक व्यवहारराशीनिगोद अने पीजो अम्यवहारराशीनिगोद वेमा जे पादरएफैद्रीपणो भावें प्रसपणो पामीने पाण निगोदमो आइ पच्या छे ते निगोदिया जीवने व्यवहार राशीया कहियें अने जे जीव कोइपण काठे निगोदमायी निकस्या नयी ते मीय मध्यपहारराशीया कहिये अने हा मनुष्यपणापी जेटला जीप कर्म खपा पीने एक समयमा मोक्ष जाय छे तेटला जीय सेज समये अम्पयहार राशी सूक्ष्म निगोदमापी निकलीने सचा भावे छे जो दशजीप मोक्षजायतो दशजीय निकले कोइक पेठाए मग्यजीय ओछा निफले सो ते ठेकाणे एक पे अमग्य निकले पण ध्यपहारराशीमा जीय कोइ थपे पटे नही पया निगोदना असंख्याता छोकमाहेला गोलाते छ विशीना आल्या पुग्नउने माहारादि पणे छे छे ते सकल गोला कहेयाय भने लोकने मतना मदेशे जे निगोदना गोला रह्या छे तेने प्रण | दिशीना आहारनी फरशना छे मारे विकट गोला कहिये ए सूक्ष्म निगोदमा पांच थावरना सूक्ष्म जीव ते सर्व लोका | काजलनी फुपलीनीपेरे भसाथका म्यापी रमा छे भने साधारणपणो ते मात्र एक पनस्पतिमांजछे पण चार पायरमा नपी ए सूस्म निगोदमा अन्तु दुखि छे वेनुं नदाहरण कहे छे सातमी नरकनु उप्य तेत्रीस सागरोपमर्नु छे तेत्रीस सागरोपमना जेटछा समय थाय वेटला पखत सवमी नरका उत्कृप्टो वेत्रीस सागरोपमने आयुपे कोइक जीय उपसे तेरसा भपमा जेटल छेदन भेदन कुख याय ते सर्व एक? करिये वेथी अनंतगुणं सुख निगोदना जीय एक सम या भोगय छे रटान्त जेम कोइफ मनुप्यने सारा त्रण मोठ लोगनी सुइने अग्नियी तपाधीने कोइक देयता समकाले चोमे तेने मे वेदना पाय तेपी अनत गुणी घेदना निगोद मध्ये छे भने भव्य जीयने निगोदर्नु कारण वे अज्ञान दशा छ माटे तेईनो स्याग करो ए निगोदनो विचार फलो ए सर्व प्रमेयनो प्रमाता मात्मा पोताना ज्ञान गुणे करी प्रमेयनो प्रमाण करे ए ममेयत्व पणो कमो ५ सस्यपणो से छद्रम्य एक समयमा उपजे विणझे छे अनेस्थिरपणे छे उत्पाद व्यय ध्रुवपणो तेहिज सत्पणो (उत्पाद म्ययनुययुर्फ सत्) इति तत्यार्थ पचनात् ते यिस्तारपी कहि देसा छे जे धर्मास्तिकायना असख्याता प्रदेश छे तिहा क प्रदेदामा अगुरुग्घु असंख्यातो छ अने पीजा प्रदेशमा मनंतो अगुरुठघु छे त्रीमा प्रवेशमा असख्यातो अगुरु घु छे एम असंख्याता प्रदेशमा अगुरुलघु पर्याय घटतो यघतो रहे छे ते अगुरुलघु पर्याय चल छे ते जे प्रदेशमा असंख्यातो छे से प्रदेशमा अनसो याय छे भने अनंताने ठेकाणे असख्यातो पाय छे एम छोकप्रमाण असंख्यात मदे शमा सरीखो समकाले अगुरु छषु पर्याय फिरे छे ते जे प्रदेशमा असंस्स्यातो फिटीने अनंतो याय छे ते प्रदेशमा असं स्यातपणानो यिनाश छ भने अनंत पणानो उपअयो छ भने अगुरुलघु पणे गुण नुप छे एम उपभयो विणसवो अने ध्य एत्रणे परिणाम है मधर्मासिकायमा पण ए प्रणे परिणाम असंख्यात प्रवेशे सदा समय समयमां परिणामी रमा छे तेमां पण उपजे पिणशे भने चिररहे छे एम माकाशना मनवा प्रदेशमा पण एक समये प्रण परिणाम परिणमे छे भने जीवना अस स्याता प्रदेश छे ते मध्ये पण उपमे पिणशे थिर रहे तया पुनल परमाणुमा पण समय समय थाय छे भने फाउनो पर्धमान समय फिटीने भतीत काठ याय छे तो ते समयमा पर्वमानपणानो विनाश के अने अतीसपणानो उपजपो छे काल पणे घ्य छे ए स्थूल थकी उत्पाद म्यय भुयपणो कमो अने वस्तुगत मूलपणे ज्ञेयने पठटचे ज्ञाननो पण से | भासन पणे परिणमषो घाय ते पूर्व पर्यायना भासननो व्यय भने अभिनय सेयना पर्याय भासननो उत्पाद समा ज्ञान पणानो ध्रुय प रीते सर्व गुणना धर्मनी प्रवृत्तिरूप पर्यायनो उत्पाद म्यय मीसिद्ध भगवन्तमा पण या रयो छे धर्मास्तिकायना प्रदेशे जे क्षेत्रगत असंख्याता पुन्नत तथा जीयने पहेले समय चलण सहायी पणो परिणमवो हतो अने पीजे समय अनन्त परमाणु तथा अनन्ता जीय प्रदेशने चउण सहायी थयो तेवारें असस्यासा 'चलण सहायनो व्यय भने अनंता घरुण सहायनो उपमयो अने गुणपणे तुप एम धर्मद्रष्य मध्ये उत्पाद व्यय थयी रमो छे तेमज अधर्मा दिक वन्यने विपे पण मायषु तथा पली कार्य कारण पणे उत्पाद व्यय तथा अगुरुलघुना घलणनो उत्पाद म्यय पंचा । तिकार्यने विप कहेव तथा काल दम्य ते उपचार छ तेनु स्वरूप सर्प उपचारथीज फहेवं प रीते सर्व द्रव्यमा सत् पणो छे जो अगुरु एघुनो भेद न थाय तो पछे मदेशनो माहोमांहे मेद कहेवो याय ते माटे अगुरुलघुनो भेद सर्पमा छ अने जेनो उत्पाद म्यय रूप सत्पणो एक छे ते द्रव्य एफ छे तथा जेनो उत्पाद व्यय सत्पणो जूदो ते द्रव्य पण सूदो छे पटले सत् फेहसा सस्वपणो कमो ६ अगुरुग्घुस्प पणो कहे छे जे द्रष्यनो अगुरुलघु पर्याय छे ते छ प्रकारनी हानि वृद्धिफरे वेमा छ प्रकारनी पुरि छे १ अनन्त भागरि २ मसख्यात भागवृद्धि ३ सख्यात मागवृद्धि ४ संख्यात गुणपति ५ असह्यात गुणपति अनंत गुणवृद्धि हषे छ प्रकारनी हानी कहे छे १ अनंत भागहानि २ असस्यात भागहानि ३ संख्यात भागहानि ४ - संख्यात गुणहानि ५ असख्यात गुणहानि ६ अनत गुणहानि परीते इ प्रकारनी वृद्धि तथा छ प्रफारनी हानि ते सर्व द्रन्यमा सदा समय समय धयी रही छे वृद्धि से उपभयो भने हानि ते म्यय कहिये ए अगुरुठघु पणो कमो नहीं गुरु तथा नही उघु से अगुरुलपु स्वभाष कहिये ए सर्व द्रव्य मध्ये छे ते श्रीमगयतीसूत्रं "समदमा सपगुणा सपपपसा सप पज्जया सपना अगुरुल हुआप" मगुरुसघु स्वभायने माधरण नपी तथा भारमा मध्ये जे मगुरुलघु गुण ते आरमाना सर्व प्रदेशे वायफ भाष यये सर्व गुण सामान्य पणे परिणमे पण अधिका ओछा परिणमे नही ते भगुरुलघुगुणनु प्रय न आणां ते मगुरुलघु गुणने गोत्रकर्म रोके छे ए अगुरुरुषु स्वभाय ते सर्व द्रव्यमां छे हये गुणनी भायना कहे छे तिहां मेटला छए म्यमा सरीला गुण छे से सामान्य गुण कहिये भने जे गुण एक अन्यमा छे भने पीजा द्रम्पमा नधी ते विशेप गुण फहिये जे गुण कोइफ ट्रम्पमा छे भने कोइफ म्यमा नपी ते साधारण असाधारण गुण कहियें एम ए छ म्यमा मनव गुण अनन्त पर्याय मनन्त स्वभाष सदा शाश्वता छे जेम श्रीफेयली भगवतें परुप्या से सर्व जेरी छे सेरी सारणा पूर्वक यथार्थ उपयोगपी मुवज्ञानाविकपी यथार्य पणे जाणषा सदहवा ए निमें ज्ञान ते मोक्षनु झारण छे जे मीष ज्ञान पाम्पो से जीष पिरवि फरे छे ते चारित्र कहिये शाननं फल विरतिपणो २ ते मोशन तत्काल कारण छे हवे निधारित्र मने म्यवहार चारित्रनो विचार कहे छे तेमा प्रथम व्यवहार पारित्र ते जे प्राणातिपात विरमण प्रमुख पचमहाप्रतरूप से सचिरति कहिये अने स्यूल प्राणातिपात विरमणप्रताविक मायकना पारमतवे देशपिरति धारित्र आणय प ग्यवहार चारित्र सुख कारण छे एषी करणीरूप प्रायफना धारमत भने यतिनां पांच महाप्रत ते अमम्यने पण माये मेथी देयतानी गति पामे पण सकाम निर्मरानु कारण न थाय इहाँ कोई पूछेके मोक्षनु कारण नथी तो एटर्ख कष्ट शायास्ते करिये तेने उत्तर में स्पाग बुद्धी नि ज्ञानसहित पारित ते मोक्षचं कारण छे माटे नि पारित्र सहित प्यपहार चारित्र पाठवू से निधे चारित्र कहे छे शरीर इन्द्रिय विषय कपाय योग ए सर्ष पर वस्तु आणी छांच्या वया आहार ते पुनल पस्तु जाणी छरियो आत्मा अणाहारी छे ते माटे मुझने आहार करयो घटे नही आधार से पुनल छे मारमा अपुनली छे वे माटे त्याग फरयो तद्रूप जे सप से सप निधे चारित्रा माण चारित्र कहेता चंचलता रहित चिरताना परिणाम अने आत्मस्वरूपने विपे एकत्यपणे रमण तन्मयता स्वरूप विधाति तस्वानुमप ते चारित्र कहिये ते पारिवना व मेद छे एफ देशाविरति पीजो सर्व विरति तिहां देश विरति केहता पायकना पारपत नि सपा म्यवाहारथी फहे छे १माणातिपात यिरमण प्रठ से परजीचते आपणा जीपसरीसो जाणी सर्प जीवनी रक्षा करे ते व्यवहार दया ययी। माटे प्यपहार प्राणातिपातयिरमण मत जाणवु अने जे आपणो जीय फर्मवशपग्यो दुःखी थाय छे ते आपणा जीवने फर्मपंधनयी मुकाय अने आरमगुण रक्षा करी गुणवृद्धि करवी ते स्वदया पंघहेतु परिणति निधारी स्वरूपगुणने प्रगटपणे करवा जे गुण प्रगट भयो ते रालयो पटखे झाने करी मिप्याव टाली आपणा जीवने निर्मल करे से निधेषी प्राणाविपात पिरमण प्रत कहिये -- -- २ मृपावाद विरमणप्रत कहे के सूटु वचन विलकुल बोरघु नही से व्यवहार मृपावाद विरमणप्रत अने जे पर पुन । लादिक वस्तुने आपणी कहेषी ते मृपाषाद यवन छे अने मीषने अमीव कहे तथा अमीयने जीव कहे इत्यादिक | अज्ञान भाव ते सर्व निमें मृपावाद छे अपषा सिद्धान्तना अर्थ खोटा कहे ए मृपावाद घेणे छान्यो ते नि मृपावाद विरमणावत कहियें एटले वीक्षा अवचादानादिक मत जो मांगे तो तेनो मात्र चारित्र मंग थाय पण ज्ञान दर्शननो मंग न माय भने घेणे नि मृपावादनो भग कमो वेणे समकेत सथा ज्ञान मने चारित्र ए प्रणेनो भंग करो तथा मागममा एम का छे ले एक साधुयें घोथो प्रत मग कसो मने एक साधुयें घीयो मृपापाय प्रत मग करो तो जेणे । घोपो व मग फल्मो से मालोषण लड शुभ याय पण जे सिद्धान्तना भर्पनो मृपा उपदेश आपे से बालोषण लीधे पण शुरयाय नहीं २ अपत्तादान विरमण व्रत कहे थे वे पारकु धन वस्तु सुपाये चोरी करे उगवाजी करी लीये ते चोरी छे पटले पारफी यस्तु पीना विधा पिना लेवी नही ए म्यवहारथी अदक्षादान विरमण प्रत जाणवू अने जे पाच इंद्रियना प्रेयीस विषय पाठ कर्म धर्गणा इत्यादिक परवस्तु लेवी नही तथा तेनी बांछा न करवी ते मारमाने मनाए माटे से निछपी मदचादान विरमण मत कहिये हो कोर पूछे जे विषयनी अने कर्मनी बांछा कोण करे छे तेने पर जे पुण्यने या योग्य छे से जीव कर्मनी पांछा करे ऐ जे पुण्यना ४२ मेद छे ते चार कर्मनी शुभ प्रकृति में एटले जे म्यपहार मवचादान सो नपी छेचा पण भतरग पुण्याविकनी घांछा छे तेने नि मदसादान लागे छे ४ मधुन पिरमण प्रत कहे छे से पुरुष परखीनो परिहार करे तथा जे खी परपुरुपनो परिहार करे हा साधुने स्त्रीनो सर्वथा त्याग छे अने गृहस्थने परणेली बी मोफली छे परस्त्रीनो पखाण छे ते ग्यवहारथी मैपुनर्नु पिरमण कहिये अने जे विषयना अमिलापर्नु तया ममता तृष्णानो त्याग परमाष वर्णादिक परद्रष्यना स्वामित्यादिक तेनो अभोगी पणो आरमा स्वगुण ज्ञानादिकनो भोगी छे भने ए पुनसंघ से मनसा जीवनी पठछे सेने केम भोगये ए रीते त्याग ते निधी मैपुन यिरमण कहिये जेणे याम पिपय छांस्पो छे भने असरंग लालप छूटी नयी तो वेहने से मैथुनना कर्म लागे छ ५ परिमह परिमाणमत कहे छे परिग्रह धन-धान्य-दासदासी-चौपद-जमीन-वस-आमरणनो त्याग तेमा साधुने तो सर्पमा परिमहनो स्याग छे तथा आपकने इच्छा परिमाण छे जेटली इच्छा होय वेटलो परिमह मोकठो रासे पीजानी मती करे ए म्यवहारथी कयो भने जे कर्म रागवेप अशानद्रव्य ज्ञानायरणी प्रमुख आठ फर्म भने शरीर इन्द्रियनो परिहार पटले फर्मने परिमह जाणी छाडयो ते निधेषी परिग्रहनो त्याग एटले परयस्तुनी मूर्छा छारपी जेणे मूळ छोडि सेणे परिमह छोयोज छ एम जाण ६ दिशिपरिमाण प्रत कहे छे विहां सिरछि पार दिशी पांचमी अधो छट्ठी मध्ये ए छदिशीना क्षेत्रनो मान करी मोकलो राखे ते ग्यपहारपी दिशी परिमाण कहिये अने पार गतिमा भटफयु ते कर्मनु फल छे एम पाणी यी उदा सीनपणो अने सिर मपस्या उपादेय पणो वे निमें दिशिपरिमाण प्रत कहिये ७ भौगोपभोग परिमाण व्रत कहे ऐ मे एकवार भोगवई से भोग अने जे पारंयार भोगबई ते उपभोग तेनो परि माण करे ते प्ययहार भोगोपभोग व्रत कहिये मने जे व्यवहारनये फर्मनो कर्ता भोका जीव छ भने निधय नये तो कर्मनो कर्ता फर्म छे आत्मा अनादिनो परभाव भोगी थयो छे सेमी परमाघमाहक अने परमाघरक्षफ घयो एटले । आरमानी शायफता मारफता भोग्यता रक्षकता दीगरे कर्ता पणो पीगग्यो सेवारे परभाव कर्ता ययो वे पण परभाष रंगीपणे आठ कर्मनो फर्ता ययो छे पण सचायें तो स्वभाषनो फर्ता छे पण उपगरण अवराणा तेथी स्वकार्य करी शकतो नपी घिमायने करे छे अज्ञान पणे जीयनो उपयोग मस्यो छे पण म्यारो छे पोताना ज्ञानादिक गुणनो कर्ता भोका छे एइयो स्वरूपानुयापी परिणाम ते निधे भोगोपभोग व्रत त्याग जाणवो ८ भनपदण्ड यिरमण प्रत कहे छे से फाम विना जीवनो वध फरवो पारकायास्ते भारभ प्रमुख करपानी आज्ञा प्रमुख आपली से ग्यपहार अनर्य दर भने शुभाशुम कर्म ते मिथ्यात्य अविरति कपाय योगपी पधाय छे तेने जीव आपणा करी जाणे ए नियी अनदर ९ सामायक प्रत कहे छे मनपचनमायाना आरंभ टालीने तेने निरारभपणे पाये से व्यवहार सामायक जाणयो अने जे जीर शान दर्शन पारिन गुण विचारे सर्प जीवना गुणनी सत्ता एफ समान आणी सर्व जीव साथे समता परिणाम व ते निक्षेपी समठारूप सामायक कहिये १० देशायगाशिक प्रत फहे छे से मन वपन फायाना योग एक ठोर करी एफस्थानके देसी धर्म भ्यान करयो से ।

व्यवहार देशायगाशिफ कहिये अने जे मुत शाने करी छ दम्य ओलखीने पांच प्रष्यनो त्याग करे अने झानपंत जीयने ध्याये ते नि देशापगाशिक मत कहिये ११ पोशह मत कहे छे से पार पहोर अथवा माठ पहोर सुधी समता परिणामें सावध छोडी निरारभपणे सिमा ययानमा प्रवसे ते व्ययहार पोशह कहियें मने पोसाना जीपने ज्ञान ध्यानयी पोपीने पुष्ट करे ते निक्षेपी पोशह प्रत फहिये जीयने पोतानां स्वगुणे करी पोपीमे तेने पोशह कहिये १२ प्रतिपिसपिभाग प्रत कहे छे जे पोशहने पारणे अथवा सदा सर्वदा साधुने तथा जैनपर्मि पापकने पोतानी शफिप्रमाणे दान देखु से व्यवहार अतियिसंविभाग कहियें अने पोताना जीपने अयया शिप्यने ज्ञाननु दानते भणवं भणायई मुणवु सुणापवं ते नियी अतियि सविभाग मत कहियें एटले श्रापकना पारमत कक्षा से समफित सहित जे निधे तथा व्ययहारथी पार प्रतधारे ते जीयने पांच गुणगणे देशयिरति नायक कहियें देश फेहतां देशथकी चोरीशी मतिपणो छे माटे अने यतिने सर्वथी प्रतिपणो छे तेथी पांच महाप्रतज छे साधुने पांच महामसमा सर्व प्रत आम्यो ए निधे त्यागरूप ज्ञान ध्यान संपर निर्जरामा यिरवाना परिणाम वे निर्थे चारित्रना एक रस्सर्ग पीजो अपवाद ए वेमार्ग छ तेमा जे रस्कृष्ट तीक्ष्ण परिणाम से उत्सर्ग अने जे उस्सर्ग रासवाने कारणरूप से अपवाद-वध ॥ “संघरणमि असुन, दुन्नपि गिसंसदेतयाणऽहियं ॥ माउर विठ्ठण, ते यहियं असंधरणे" ॥१॥ एटले म्यां मुघी साधक मारने पापफ नपरे त्योसुपी मेहनी नाफही से आदरपो नही अने जो साधक परिणाम रहेता न दीठा वेयारें मेहनी ना ते मापरे सेने अपवादमार्ग पहिये थे भात्मगुण राखपाने करपो के अपवाद मने गुणीने रागे मकिये करपो वे मशस्त्र पवे तो साधन छे भने थे उदेकने असमषापी करतुं से मविचार छे तथा सपलो अने उदेक माटे मशक पणे करघु से परिपाइ ते मम्मे अपवाद मार्ग के परिणाम हर रोम माज्ञायें करवो हवे पार प्यान को १ मार्सम्यान २ रौद्रम्यान १ धर्मध्वान ४ शलप्यान सिहां पहेला घे भ्यान वे अशुभ कहियें मने पाण्छा ये ध्यान से शुद्ध छे तिहां मनमो आहट दोहटना परिणाम ते आध्यान कहिये तेना चार पाया के १ भार मित्र सजन माता पिता श्री पुत्र धन प्रमुख इष्ट वस्तुनो वियोग थयाषी विलाप फरे वे पोलो इष्ट थियो गनामा मातम्यान सथा २ अनिष्ट के मुंगे पुःखना कारण दुश्मन दरिद्रीपणो तया कुपुत्रावि मलयाथी मनमा दुम्स चिंता उपवे वे अनिए संयोग नाम आतम्यान शरीरमा रोग उपना यफा पुखिकरे पिंतापणी करे ते रोगर्षिता नामा मार्तण्यान ४ मनमा आगम्ना वसवनो सोच करे ये आयर्पमा भाकाम करणं आवता पर्पमा अमुक काम फरशु तो अमुक काम यशे अयषा दान सील तपन फस मांगे जे आ भषमा तप कीघो छे माटे मावते भवें इंद्र धक्रय चिनी पदवि मले एपी भागठा मपनी पांग छे ते अप्रशोच मार्सप्यान्नो पोपोपायो जाणवो ए आर्पध्यानना चार मेद फमा ए तिर्वच गतिना कारण हे ए न्यानना परिणाम से पांचमा अथवा सहा गुणठाणा सुपी होय २ कठोरपरिणामर्नु चिंतपन ते रौद्रयान तेमा धार मेद छे १ जीष हिंसाकरीने हर्ष पामे अयवा बीजो कोइ हिंसा करतो होप ने देखी खुशी पाय मयषा युद्धनी भनुमोदना करे से हिंसानुपी रौद्रयान २ गई वोलिने मनमा हर्ष पामे के जुमो में केयोपपदकेषम्यो मारा जदारणानी सपर कोइने पी नही पषो भूपामाद कप परिणाम ते भूपानु पंधी रौद्रम्पान ३ चोरी करी अथवा उगारकरी मनमा सुशी भाप के मारा जेवो भोयपर कोण छे हुँ पारको माल साउ छु पो परिणाम घोरानुवैघि रौद्रध्यान ४ परिग्रह धन धान्य परिवार घणो पधपानी गछप होय ते धन अपया कुटुमने माटे गमे ते पाप करे अमवा धणो परिप्रह मिस्यापी अहंकार करे से परिमह रक्षणानुषंधी रौद्रध्यान प रोमध्यानना चारभेद, कक्षा ए ध्यान नरफगति पमारयानु कारण छे महाभशुभकर्मभर्नु फारण छे ए पांचमा गुण- उम्णा सुपी छे भने छठे गुणाणे पण एक हिंसानुबंधी रौद्रपानना परिणाम कोइफ जीयने होय हपे पर्म ध्यान करेले जे म्यवहार मियारूप कारण से धर्म क्या सज्ञान भने पारिन ए नावानपणे सापन पर्म वथा रममयी मेवपणे ते सपादान शुम पयहार उत्सर्गाऽनुयायी से अपपाद धर्म जाणयो अने अमेदरमयी हे साधन शुभ निमें नये उत्सर्ग धर्म अने (धम्मो परषु सहायो) जे वस्तुनो ससागम शुट परिणामिक स्वगुण प्रवृत्ति कोपिक मनठानंद रूप सिबायस्मायें रह्यो ते पयंत उत्सर्ग उपादान शुद्ध धर्म से धर्मर्नु मासन रमण पफामतापणे चिंतन तन्मयतानो उपयोग एषस्वनो पितषयो ते धर्म प्यान कहिये ना पाया घार छे ते कहेछे १ आशायिपयधर्मभ्यान ते जे पीतराग देवनी माशा साथी करी सईहे पटले भगवते । दम्य साप नय प्रमाण निक्षेपा सहित सिर सम्म निगोद स्वरूप मेम कह्मा वेम सईहे वीतरागनी आशा निस्य अनित्य साक्षाय पणे नि प्यपहार पणे माने सहहे ते आशा प्रमाणे यधार्प उपयोग मासन धयो तेने हर्षे फरी से उपयोग मध्ये निरधार भासन । रमण अनुभपका एफला व मय पणो ते आज्ञापिघपधर्मभ्यान कहिये २ अपायपिपयपर्मभ्यान ते जीपा अशुद्धपणे कर्मना योगयी संसारी अवस्थामा अनेक अपाय फेहतां दूषण छे वे भशान राग दर काय आश्रप ए मारा नपी हु एथफी न्यारो छु हु अनंतशान दर्शन पारिन यीर्यमयी शुद्ध घुद्ध भपिनाशी पुं भज, मनादि, अनंत, अक्षय, अक्षर, अनक्षर, अघल, अफल, अमल, अगम्य, अनमी, अरूपी, अफ- मर्मा, अपपक, अनुदय, अनुदीरक, अयोगी, अभोगी, अरोगी, अमेदी, अवेदी, अछेदी, असेदी, अफपायी, असखाइ, मवेशी, मदारीरी, अणाहारी, अव्यापाप, अनपगाही, मगुरुग्घुपरिणामी, अतेंद्री, अप्राणी, अयोनी, असंसारी, ममर, अपर, अपरपर, मम्यापी, अनानित, अकप, मविरुष, अनामय, अलख, अशोकी, असंगी, अनारक, ठोका छोगायक एयो गुब चिदानद मारो जीप छे पहयो एकाग्रतारूप प्यानवे अपायविषयधर्मभ्यान माणयो २ पिपाविषयधर्मप्यान कहे छे जे एल्यो जीय छे वो पण फर्म घझे दुासी छे ते कर्मनो विपाफ पितवे जे जीवनो शानगुण वे मानापरणी कम दाम्पोछे मने दर्शनावरणी फर्मे दर्शनगुण दाप्यो छे एम आठ फर्म जीयना आठगुण दाम्या के एटछे मा गंमारमा भमतां पका जीवने जे सुखदुरस छे ते सर्व कर्मना कीयां छे मादे सुख उपने रापy नही मने इस सपने दिउगीर घj नही कर्म स्वरूपनी प्रकृति स्थिति रस अने प्रदेशनो वंघ सदय सदीरणा वपा सचा विपपान एकामवा परिणाम ते विपाकधिचयधर्मप्यान ४ सस्थानविषयधर्मप्यान कहे छे ते पनवयजमान छोकन स्वरूप विचारे जे प ठोक ते चउदराज ऊंचो छे वे मध्ये काइक अधिक सात राज अघो लोक छे विधां भवारसो योजन मनुष्प खेन त्रिछो तोक छे ते कपर काइक ऊणो सात राम अप्प लोक छे तेमा सर्न पैमानिक देवता पसे छे अने ऊपरें सिर शिला सिद्धक्षेत्र छेप रीते लोकनु प्रमाण छेप लोफर्नु संस्थान पैशाख छ मनतो काठ मापणा जीवें संसारमा ममता सर्व खोकने जन्ममरण करी फरस्यो छे पई जे लोक स्वरूप या लोकने विपे पंचाखिकायर्नु अवस्थान तथा परिणमन प्रख्यमध्ये गुण पर्यायन अयस्थान तेनो जे एफप्रताये तगमयचिंतवण परिणाम एहजे ध्यान वे संस्थानविषयधर्मभ्यान कहियें ए धर्मप्यानना घार पाया कमा ए धर्मप्यान पोधा गुणाणापी मांठीने सावमा गुणठाणा सुधी छे हवे शलपान करे छे शुलफेहतां निर्मलशुद्ध परमाउँपन विना आस्माना स्वरूपने वन्मय पणे ध्याषे पहप ध्यान वेने शसध्यान कहिये वेदना पाया धार छे से कई छ १ पृषक्स्पषितर्फसमविचार ते पृथक्त्य फेहतां जीवपी अजीप जूदा करपा स्वभाप विभाष वेने जूदा पृथपणे पड़े पण फरषी स्वरूपने विपे पण द्रम्य वा पर्यायनो प्रयपणे ध्यान करी पाम ते गुणमा संक्रमावे अने गुण ते पर्या- यमा संक्रमण फरे परीते स्वधर्मने विपे धर्मातर मेद ते पृथक्त्य कहिये अने तेनो वितर्क ते जे इतक्षाने स्थित उपयोग अने समविचार ते सविकल्पोपयोग एटसे एक विम्या पछि पीजो सियो ने विचार कहिये पटले निर्मल पिकल्प महिल पोगानी गाने प्यारे ते प्यास्ययितर्कमप्रयिपार पेहेलो पायो ए आठमा गुण गणापी मांडी इग्यारमा गुण ठाणा गुपीछे पापिनसभापिगार नामा पीगो पायो फहे ऐ जे जीव आपणा गुण पर्यायनी एकताफरी ध्याये ते आपी in के जीपना गुण पपोय मने जीयते एफन छे अने महारो जीय सिद्धस्वरुप एफज छे एयो एफत्य स्वरूप तमय पणे मनंगा भारम पर्मनी पफ्स्यपणे ध्यान पितर्क फेहवां अवशानायलंगी पणे अने अमयिघार केहता विकास रहित दान माननो गमपांतरें फारणता पिना रपत्रयीनो एफ समपी कारण कार्यता पणे जे घ्यान वीर्य उपयोगनी एफा प्रना ने पपरपपिक मप्रपिपार माणयो ए पायो यारमा गुणठाणे प्यावे ए पेटु पायामां श्रुतज्ञानायलपनी पणो छे पसमापि मनपयय शानोपयोगें यर्मतो जीय फोर प्यान करी मके नही ए ये ज्ञान परानुयायी छे माटे ए ध्यानयी पनपातिपा गार फर्म सपाये निर्मउ फेयल भान पामें पछे वेरमें गुणठाणे ध्यानतरिफा पणे रे तेरमाना भते अने घर दम गुपठाणे पर पाया प्या १ गत्ममित्या ममविपाति पायो कहे ऐ ते मम मन वपन कायाना योग रंघे शैलेशी करण करी अयोगी थाय ने ममसिपाति निममयीप अपठतारूपपरिणाम ते सूक्ष्ममियामप्रतिपाति ध्यान जाणयं इहां सचाये ८५ प्रकृति रही हनी तेमाप ७२ गाये " रहिमकिपानापि पापो कई ऐ जे योग निरुप पीपापछे र प्रति सपापे अकर्मा पाय सर्प मियापी रहित T पाय से समुग्छिन क्रिया निवृत्ति शुलप्यान कहियें ए ध्यान ध्याषता शेष दस सरण रूप निन्या उच्छेदे अवगाहना देहमानमापी पीजो भाग पटारे शरीर मूफी इहांपी सात राज ऊपर छोफने मंते जाय सिद्ध पाय हा शिप्प पूरे ले चीवमे गुणठाणे तो अमिय छे तो सातराज रघो गयो ए क्रिया केम करे छे तेने उत्सर जे सिन सो अक्रिय छ परंतु पूर्व प्रेरणायें तुनीने दृष्टान्ते जीपमा पाउयानो गुण छे धर्मासिकाय मध्ये प्रेरणा गुण छे तेपी फर्म रहित जीय मोक्षेमता छोफने असे मापी रहे यहां कोई पूछे जे आगल संघो अछोक छे वहां किम जातो नयी वेने उपर आगल धर्मालिकाय नभी माटे न जाय वली कोई पुछे जे तो अधोगतियें अथया तिरच्छी गतियें फेम नधी आतो वेने सत्तर जे फर्मना भारथी रहित भयो हल्लयो थयो माटे निपो तथा डावो जिमणो न आय कारण के प्रेरक को नथी तया फपे नही फेमफे मक्रिय छे माटे तथा फोर पूछे जे सिरने कर्म फेम छागता नयी तेने कहे छे जे कर्म तो जीपने अशानथी तमा योगयी लागे छे ते सिखना जीपने मज्ञान तथा योग नमी माटे फर्म छागे नही ए चार ध्याननों अधिकार को हये यली पीमा पार ध्यान कहे छे १ पदस्य २ पिरस्थ ३ रूपस्य ४ स्पातीत तेमा पहेलु पयस्य प्यान कहे छेजे अरिहंसादिक पांच परमेष्ठीना गुण समारे वेनो पिचमा ध्यान करे ते पदस्य ध्यान २ पिरस्य केहतां शरीरमा रग्यो मे मापणों जीप तेमा मरिहत सिर भाचार्य उपाण्याय मने साधुपणाना गुण सर्य छे एल्यो जे ध्यान ते पिरस्य ध्यान अपपा गुपपीना गुण मध्ये एकस्वता उपयोग फरयो से पिंडस्प ध्यान ३ रूपमा रमों भको पण प मारो जीप मरूपी मनी गोपस्नुनी कर गतिगयापायी धया पछे भारमान रूप एफवा पणो पायो जे ध्यान से स्पस्य ध्यान एन पान पर्म पानमा गणपा ५ निरंजन निर्मठ मंम्प पिकप रहित अमेद पफशुदवा कर घिदानंद तस्यामृत भगंग मगर मननगुण पपापण भारमम्मम्पने ध्यान ते रूपातीत ध्यान आणतु इदा मार्गणा गुणठाणा नयममाण मरिमारिक शान पाम मार गई डोटग योग्य थया एफ सियना मूल गुणने पापे ते रूपातीत प्यान जाणयो पर मोशन पारण पान से कयु पर भारना पड़ेगेमा धर्म ध्याननी पार भायना कहेछे १ मीभायना ते सर्व जीव माथे मित्रतानो भाष नियो मानु भर्नु पार पण कोर्नु माई वियगु नही सय जीव अपर हितबुदि सपथी वे मैत्रीभावना २ गुणयंत मन सानारिक गुग कारें राणते पीनी प्रमोदभापना १ जे धर्मयंत पर राग अने मिप्यात्यी ऊपर राग नही तेम मारा नही कारण फ हिमा अपरें पण उधम भीपने करमा अपजे जो उपदेश थफी सारामागे आये तो तेने शुद्ध मार्गे भागपो पदापित-मागे न भाये तोपण देश न रापयो फेमके ते अजाण छे एम समजयु परया में परिणाम ते मापम्पमारना ४ गई जीपनी पोसाने नुस्पनाणी दया पाले कोरने हणे नही तथा जे दुसी अपपा धर्महीन तेहना मारमा मेना गराध्यानो परिणाम तथा धर्महीन जीय देसीने पयो पिंधे से ए जीय पिबारे धर्म पामशे पथाप मान्ममापन पामी सम्प पमने शियारें अपठेरो एयो परिणाम वे पोथी करुणा फेहतो दयामायना ए चार भारना १हये पार भाषना कहे छे दारीर कुटुंय घन परिवार सर्प विनाशी छे जीपनो मूल धर्म अपिनाशी छे एम पिंत पतुं ते पहेली मनित्यभायना २ संसारमा मरणसमये जीपने शरण राखनार कोइ नयी एक धर्मनो शरण छे एवं पिंव पर्यु से पीजी अक्षरण भायना ३ मारा जीवे संसारमा ममता सर्घ भयकीघा ए संसारपी हु फेघारें छुटीश ए संसार मारो नयी हु मोक्षमयी छु एम विचारवं ते त्रीजी संसारभाषना ४ ए माहरो जीप एफलो भोगयो एम चिंतपई से पोपी एकरयभावना ५ मा ससारमा कोइ कोइनो नपी पम पिंतषj ते पाचमी अन्यस्वभावना ६ मा शरीर अपपिन मसम्बनी साण छे रोग-भरापी भयो छे ए शरीरथी ई न्यारो ई एम चिंतयवो छही अशुधिभावना ७ रागहेप अज्ञान मिप्यास्त्र प्रमुख सर्व माधव छे एम चितवतु ते सातमी आप्रवभाषना ८ ज्ञानध्यानमा वर्ततो जीप नया कर्म पाघे नही ते आठमी संपरभावना ९ ज्ञानसहित क्रियाते निर्जरानु कारण छे ते नयमी निर्जराभावना १० पदराज गेफनु स्वरूप विचारवं ते दशमी लोफस्वरूपमायना ११ संसारमा ममता जीयने समफित ज्ञाननी प्राप्ति पामयी दुर्लभ छे अघया समफित पाम्पो पण पारित्र सर्प विरति परिणाम रूप धर्म पामयो दुर्लभ छे से इग्यारमी योधदुर्लभभायना १२ पर्मना फहेणहारगुरु तथा शुद्ध आगमनु सामलषु पहषी जोगयाइ मलपि दोहेली छे से पारमी धर्मदुर्लभमा पना एटछे पार भायना कही ए पारित्रनु स्वस्म संपूर्ण कए एयो समफिन्त सहित ज्ञान चारित्र ते मोहन कारण छे ना ऊपर भव्य माणीयें विशे उद्यम करयो भने जो ते, . Trahimरानी परे गमता र रातोमो गमणि रचो गोधनीफ गम Froinनसास्पिा गरिएम मागममा कम्यो दिदि हामइ तहग माइ । सरहमाणो जीरो, पारइ अपरामर ठाण ॥१॥ -- ! सरनो र भन न परीके नोपण सोपीरागे धर्म फम्रो से रीने पदयगे गद रामनार मगर म्मानको मार पदमी पामे नो माग से 17, २ मीर, ३ पुण्य ४ पाप ५ मामय गंपर रा ८ र ९ मोक्ष- पनाURE भोपन मा भने गगर पा निराए 4 गुण हे पटले नाय मंयर निर्मरा मोधप "मन प प प परिणाम तने गमतिमान कहिये ते ममहित गानभलोन पाय विदा अनुसारको पगि गिरि, अगिहिपर भ इस्थ भरथमि । जइसमेयइयजो, सो उपएसो नओनाम ॥ १ ॥ अपंगना ने पोप सपने में मने पटा पोग्य पारे पपो ने उपदेश से नय उपदेश तमपि पि, सिपवनपतिनगरमाण भाषा स्वागे गेपर मादरे पीगरागना फया भाग से प्रव्य क्षेत्र फाल भायसहित जाणे नामाविचार निक्षेपा पोतानी युद्धियी जाणे सदहे वीतरागना भाख्या भाष ते सत्य छे पषी सहाणा होय २ उपदेशरुचि नयतत्य सथा छ उम्पने गुरु उपदेशथी आणी सदहे से उपदेशरुचि १ आज्ञारुचि ते रागवेप मोह मेमना गया छे अज्ञान मिव्यु छे पहषा मरिहतदेव तेणे जे भाशा कही तेने माने सदहे ते आज्ञारुति ४ सूत्ररुषि १ आचारांग २ सुयगडांग ३ ठगणांग ४ समयायांग ५ भगवती ६ ज्ञावाधर्मकथा ७ सपासकद- शांग ८ अंतगठदशांग ९ अनुचरोवयाइ दशाग १० प्रश्नग्याकरण ११ विपाक ए ग्यार मग तया पारमें अगर टिपाद जेमा घरद पूर्व हसा से हमणा विच्छेद गया छे तपा १ उपचार २ रायपशेणी ३ जीवामिगम ४ पनवणा ५ अबुद्धीपपन्नति ६ घेदपति ७ सूरपन्नति ८कप्पिा ९ कप्पविरंसिया १० पुप्फिा ११ पुप्फजुलीमा १२ य हिदिशा ए पार उपाग जाणया अने १ म्यवहार सूत्र २ मृहत्करूप दशाभुसस्कंध ४ निशीय ५ महानिशीय ६ जीतकल्प ए छ छेदग्रंथ तया १ चौसरण २ संथारापयक्षा ३ तदुलधेयालिया ४ पदाविजय ५ गणियिजय ६ देपिंदपुमो ७ धीरयुओ ८ गापार ९ जोतिफरंट १० आयुःपताण ए पश पयन्नाना नाम तथा १ आव श्यक. २ दशवैकालिक ३ चराम्ययन ४ गोपनियुकि ए पार मूलसूत्र सया १ नंदि २ मनुयोगदार पपिचालीस मागम से १ मूल सूत्र वया २ नियुफि ३ माम्य ४ पूर्णि ५ टीका ए पंचांगीना पचन से जीप माने क्या भागम सामठपानी तथा भणयानी ने पमी चाहना होय ते सूत्ररुषि जाणवी ५ जे जीव गुरुमुसयी एक पदनो सर्प सामलीने अनेक पद सदहे ते पीजरुपि ६ ममिगमरुषि के थे सूत्र सिद्धान्त मपं सहित माणे अने अप विचार सांमलवानी घणी चाहना होय से अमि गमरुधि ७ जे छ दम्पना गुण पर्यापने चार प्रमाण तया सात नये करी जाणे ते विस्ताररुचि ८ मियारुषिते दर्शन ज्ञान पारित्र तप विनय सुमति गुप्ति पान क्रिया सहित मारमधर्म साये जेने रुचि घणी होय ते क्रियारुचि ९ संक्षेपरुषि ते पे अपने ज्ञानमा पोरो कहे यके घणो जाणीने कुमतिमा परे नही जिन मवमा प्रतीति माने ते संक्षेपरुचि १० से पांच अस्तिकायर्नु स्वस्म जाणे मुवज्ञाननो स्वभाष भतरंग सचा सदरे ते धर्मरुषि एवं समकितना भाठ गुण कहे १ निसंका से मिनागम मध्ये सूक्ष्म मर्प कमा ते सांचा सदरे सेमा संदेह आणे नहीं सथा सात मययी पण रे नही २ निफंखा गुण वे पुण्यरूप फखनी चाहना न राखे फेमके जिहां चा तिहां कर्मनो वंध छे माटे ३ निविचिगिष्णगुण ते शुभ अशुम पुनल एकसरिसा छे मां पुण्यना उदयपी शुभयोग मिस्या सुशी पर अहकार न करयो तया पापना उदयची पुससयोग मिस्या दिउगीर यातुं नही ४ अमूट रष्टि गुण ते जे | आगममा सूक्ष्म निगोदना तथा छ द्रव्यना सूक्ष्म विचार करा छे ते सांभरुतो यको मुजाय नही जे पोसानी धारणामां आये ते धारी राखे अने जे धारणामां न आवे तेने सहढे ५ नषयूहगुण जे ए मापणा जीपमा अनस ज्ञानाविक गुण छे से छुपापचा नही शुख सत्ता जेयी नेवी कहेवी राग द्वेप अज्ञान ते कर्मनी उपाधि छे जीव ए उपाधीयी न्यारो छे ५ स्थिरिकरण गुण ते आपणा परिणाम साना स्थिर करवा रगाववा नही अयषा कोइ भम्य प्राणी धर्मथी परतो होय तेने सानदेह उपदेश आपी स्थिरफरयो ७ पास्सस्यसागुण से मेनी सायें ज्ञान ध्यान वप परिकमणो मेलो करता छोइये अने सहहणा पण एफज होय ते आपणो साधर्मिमाइ छे वेनी भफि करपी अथवा सर्व जीवना ज्ञानादि गुण आपणा समान छे माटे सर्प जीप ऊपर दया करवी अथया वीजा जीवना पण आपणा तुत्य ज्ञानादिगुण छे ते जीयने पोपया योग्य शानभ्याननो घणो अभ्यास करावे ८ ममायक गुण ते भगवंतना धर्मनी प्रभावना महिमा करवी अथवा पोताने ज्ञानादि गुणयपारषा दान शील तप भाष पूजा फरी घणी महिमा करणी ए समफितना आठ गुण हये समफितना पाच भूपण कहे छे १ उपशमभावभूपण ते विधेकी प्राणी प्रायें कपाय न करे अने जो कदापित् कपाय करे तो पण तरत मनने पाछोयाले २ माखाभूपण ते भगतना पवन ऊपर शुर प्रतीत राखें भगय जेम आगममा आशा करी म सहहे ३ दयामायभूपण ते सर्व जीव पोताना सरीखा जाणी दया पालषी ४ संपेगभूपण जे संसारथी वया धनपी शरीरथी उदासी पणो राखयो ५ निरयेपभूषण वे इन्द्रियना मुख जीयें अनती पार भोगन्या पण ते दुखना फारण छे एक चिदानद मोक्षमयी मीद्रिय सुखने आपणा करी जाणे ए समफेवना पांच भूपण कथा हये छ आयतन फहे छे १ निश्चयकुगुरु से भगयतना वचनना खोटा अर्य करे खोटी परुपणा करे २ व्यवहारसुगुरु ते योगी संन्यासी ब्राह्मण अने आधारहीन घेपधारी यति तेपण छोडवा ३ निमय फुदेय से जिणे श्रीवीतरागदेवन स्वरूप नपी मायुं ४ व्यपहार कुदेय ते जे सरागीदेय कृष्ण महादेव खेत्रपाल देषी पितर प्रमुख तेपण छोरखा ५ मिथी कुधर्म ते जे एकांत मार्ग यामफरणी ऊपर राप्या छे भतरंगज्ञान नथी मोलस्यो ते ५ व्यपहार कुधर्म ते पारका अन्य दर्सनीना मत सर्य छारवा एटले फुदेय कुगुरु सधा फुधर्मने छोरी शुद्धदेव गुरु तथा धर्म सदहे ते समकितनी सदहणा जाणधी समफितना अमान पन्नवणा सूत्रयी कहे छे परमत्यसथपो वा, सुदिट्ठपरमस्थसेवणापावि । बावन्न कुदसणवज्जणाय समसबहणा ॥ १ ॥ अर्ध-परमार्य छ दम्य नयतस्वना गुण पर्याय मोसन स्वरुप एटले जे परमार्थ सूक्ष्म अर्थ छे ते जाणवानो पणो परपो करे अयया जाणयानी घणी पाहना राखे अने मुष्टि दिवा भली रीते दीठा जाण्या छे परमार्य छ द्रम्य मोष मार्ग जेणे पहया गुरुनी सेया करे पटले ज्ञानी गुरु धारया अने पायन फेहतां मिनमति यतिना नाम धराधीने जे क्षेत्रपाल प्रमुस्सने समफित पिना माने एपा गुरुनो संग पर्ने अने फुदर्शनी जे अन्यमति तेनो सग न करे एवा से परि णाम ते समफितनी सदहणा जाणवी घिरया सावजाओ, कपायहीणा महत्वयधरावि । सम्मदिविविठुणा, कयाविमुरक न पावति ॥ २॥ अर्थ- सायच आरंभयी यिरम्या छे क्रोधादि चार कपाय जीत्या छे भने शुद्ध पांचमहाग्रतपाले छे पण समफित बिना छे ते जीव मोक्ष पामे नहीं हये समफित ते सी यस्तु छे ते पिप गाथा कह छे नयभगपमाणेहिं, जो अप्पा सायवायभावेण । जाणइ मोक्खसरूव, सम्मदिट्ठिउ सो नेओ ॥३॥ अर्थ-नय तथा मंगेकरी तथा प्रमाणेकरी मे पोताना आस्माने जाणे ओलखे स्याद्वाद आठ पक्षे जाणे मने पम स्यावादपणे मोक्ष निफर्माध्यस्थाने पण जाणे परयस्तुने हेय जाणे जीयगुण उपादेय जाणे वेने समकिति जाणवा हपे जीयस्वरूप ध्यान करवाने गाया कहे छे अहमिको खल्ल सुद्धो, निम्ममओ नाण दसण समग्गो।तम्मि दिट्ठिओ तच्चित्तो, सवे ए ए खय नेमि॥४॥ अर्थ-ज्ञानी जीप एदयं प्यान फरे फे ई एफर्छ परपुनलयी न्यारोछु निश्चय नयकरी शुरछु अज्ञानमलयी न्यारोछु निर्मलगुं ममतापी रहित छु ज्ञानदर्शनयी भयो धुं हुमाराज्ञानस्वभाष सहित र्छ हुमारागुणमा रझो छ पेवनागुणवे महारीसचा छे हुंमारामात्मस्वरूपने ध्यावतो सर्प कर्म क्षय करु छ - निरजण निकल अयल, देवअणाइ अणइ अणसं । चेयणलरकण सिद्धसम, परमप्पासिवसत ॥५॥ अर्थ-कर्म ममनथी रहित निरजन हुं कलकरहित ९ मयल केहता पोताना स्वस्पषी कियारे चलायमान थाले नही परमदेय पुनी आदि नपी सया बेनो अंत नयी घेतना लक्षण हुँ सिद्ध समान छु संवसाचा मयी घु जीवादिसरहण, सम्मच एस अधिगमो नाण । तत्येव सया रमण, चरण एसो हु मुरकपहो ॥६॥ अर्थ-जीषादिक ब्रम्म भेषा ठेषा सहावा ते समकित अने छ वष्य मेघा में वेश्या गुणपर्यायसहित जाणे ते शान जाणषु ते ७ ब्रम्प जाणीने मजीवने छारे भने जीपना स्वगुणमा स्थिर ययीने रमे वे चारित्र कहिये ए। ज्ञानदर्शन पारित्र शुबरमत्रयी ते मोधनो मार्ग छे माटे ५ ज्ञानदर्शन चारित्रनो पणो यह करषो परमात्रयी पामीने प्रमाद करयो नही तिहां निश्चय भ्यषहारनी गाया निष्छय मग्गो मुरको, ववहारो पुग्नकारणो वुत्तो । पढमो सवररूवो, आसपहेउ तओ यीओ ॥७॥ अर्थ-निये नयनो मार्ग शान सवारूप ते मोषन कारण छे एटले मोस छे भने म्यवहार किया नय ते पुण्य- कारण कमो पोलो निमयनय संघर में अने निभयसपर निये नय ते एकज छे जूदा नपी वीजो म्यवहार नय ते मामय नवा कर्म लेयामो हेतु छे पटले शुभ पुण्यकर्मनो आमष थाय छे भने अशुभ व्यपहारें मशुम फर्मनो आश्रय याय छे कोई पूछे थे म्पपहार नय आमपनु कारण छे वो अमे म्यवहार नही आदरसे एक निमें मार्ग मावरसं वेने उपर कहे छे जइ जिणमयं पवजह, ता मा ववहारनिच्छपमुयह। एकेणविणा तित्य, छिज्जई अन्नेणओ तच ॥८॥ अर्थ-अहो भव्य प्राणी! जोतमने जिनमतनी चाहना छे अने जो तुमे जिनमतने इच्छो छो मोक्षने थाहो छो वो निः नय अने म्यपहार नय छाग्शो नही एटठे थेछु नय मानजो ध्यपहार नय चारभो भने निश्चय नय सहहजो जो तुमे यपहार नय रयापनो तो जिन शासनना तीर्थनो पच्छेद पाझे जेणे व्यवहार नय नमान्यो तेणे गुरु पदना जिन भहि तप पयसाण सर्प नमान्या एम जेणे आपार उथाप्यो तेणे निमित्त कारण उथाप्यो अने निमित्त कारण विना एफलो उपादान कारण ते सिद्ध नयाय माटे निमिच फारण रूप व्ययहार नय जरूर मानवु भने जो एकलो व्यवहार नय मानियें तो निश्चय नय ओलख्या दिना तत्पनु स्वरूप पाण्यु नही माटे तत्यमार्गअने मोक्षमार्ग ते निक्षय नय विना पामिये नही अने तस्य ज्ञानपिना मोक्ष नपी एटले निश्चयपिना व्यवहार निम्फल छे अने निश्चय सहित ध्यपहार ते प्रमाण छ सेनो दृष्टान्त-जेम सोनाना आभूपणमा उपधातु अथया फिणजो मिल्यो होय तेपण संचा सोनाने भा छेइ रानिये छ भने जो ते फिणजो तया सोनू सूदु फरियें वो सहु कोइ सोनाने ले पण कोर किणजो जे फुधातु से लीये नही तेम निधय नय सोना समान छे माटे निश्चय नय सहित सर्व भला छे भने निश्चय नय पिना सर्व अलेखे छे माटे मागममा निश्चय व्ययहार रूप मोक्ष मार्ग छे फझो पली पारीर पर मोह करे नही ते विपे च्छियो मिजो जाय खओ, जो इह मेहु शरीर । अप्पा भावे निम्मलो, ज पाव मवतीर ॥९॥ अर्थ-मम्य माणी एम चितवे जे प शरीर छीममामो मेदीजमामो क्षययाजामो विणशीजाओ ए माहार शरीर पुदलीक परषरतु छे ते एकदिवसें मूक छे माटे रे प्राणी! तुं मापणी मारमाने निर्मल पणे ध्यान तो संसारपी सरीने कांठो पामीश एहिज अप्पा सो परमप्या, कम्म विसेसोई जायोजप्पा। इयमे देवजाजुसो परमप्पा, वहु तुझे अप्पो अप्पा ॥ १० ॥ अर्थ-प्रो भम्य जीय! एहीम मापणो आरमा छे ते शुर प्रक्ष छे पण कर्मने यश पन्यो जन्ममरण फरे छे पण ए शरीरमा जे जीप छे ते देव छे परमात्मा के माटे तुमे आपणो आस्मा भ्यायो तरण तारण बिहाज. ए मापणो मारमाज छे एम श्री हेमाचार्य वीतराग स्तोत्रमा कमो छे य परारमा पर ज्योति , परम परमेष्ठिनाम् । आदित्यवर्णोतमस , परस्तादामनति य ॥१॥ सर्वे ये नोदमूल्यत, समूला क्लेशपादपा इत्यादि ॥ -परमात्मा छे परमग्योति में पंचपरमेष्ठीपी पण अधिक पूज्य में केम के पंचपरमेष्ठीतो मोक्षमार्गना देसार नारा छे पण मोक्षमा जयापाखो तो मापणो जीप छे भज्ञाननो मिटापनार सब कर्म भेसनो सपाषनार एमो अर्थ- मारमा प्यायो पहिज परम श्रेयन कारण छे शुद्ध छे परम निर्मल छे एडयो मारमा उपादेय जाणी सदहे अने यो । पोतापी निरवाह धाय तेयो त्याग पैरागमा प्रयः एटले धन से परवस्तु जाणी सुपात्रने दान आपे मने इन्द्रियना यिफार ते कर्म यपना कारण जाणी परिहरे शील पाले जे आहार छे से पुनलीफ यस्तु छे शरीर पुष्टीर्नु कारण छे भने शरीरपुष्ट कीपापी इद्रियोना विपयनो पोप याय माटे से परस्वभाव छे भज्ञान संसार, कारण छे माटे माहारनो त्याग फरपो तेने तप कहिये तथा पूजा ते जे श्री अरिहंत दे मोक्षमार्ग उपदेश्यो ते आपणे माण्यो भाटे आपणा उप फारी छे ते उपकारीनी पहुमान सहित भफि करिये माटे श्री अरिहत देवाधिदेवनी पूजा करयी एम दानशील तप पूजा सर्य जीय मजीपर्नु स्वरूप ओलख्यायिना फरवू ते पुण्यरूप इंद्रिय सुखनु कारण छे अने जे जीयने उपादेय करी पांछा यिना करणी करे छे ते निर्जरानु कारण छे एम दयापण श्रीभगवती सूत्रमा सातायेदनी कर्म, कारण छे पटछे सम्यक् ज्ञानीने सर्व फरणी ते निर्जरारूप छे अने ज्ञान विना सर्व करणी पंधनु कारण छे माटे ज्ञाननो घणो भभ्यास फरमो प भगपते सीखामण दीधी छे सधा ज्ञाननु कारण मुत शान छे तेनो घणो माय राखजो श्रीठाणांगा तथा उचराध्ययनमा तथा भगपतीमा १ पाचना २ पृछना ३ परावर्तना ४ अनुमेक्षा ५ धर्मकया ए सिम्झाय भणया गुणधार्नु फल मोक्ष कमो छे सिझाय कर- यापी शानायरणी कर्म सपा केमफे वाचनाची तीर्यधर्म प्रयतै महा निर्भरा याय पूछयापी सूत्र तया अर्थ राख याय मिथ्यात्य मोहनीय सपाचे ते म जेम गर्घ विचार पूछे म वेम समकित निर्मल थाय अने अनुपेक्षा ते मर्प विचारता सात फर्मनी स्थितिना रस पातला फरे अनंतो ससार खपाधीने पातलो करे तया भुत ज्ञाननी माराधनापी अज्ञान मिटे पवा फल फमा माटे यांचया तपा भणयानो घणो उद्यम फरयो केमके आज पांचमा आरामा कोइ केपली नयी सथा मनपर्यवज्ञानी अने अवपिज्ञानी पण नबी एफ मात्र भुवज्ञान सेहिल आगमनो माराधक छे यत'- कत्य अम्हारिसापाणी, तुसमादोस दूसिया। हायणा हाकह हुता, नछु तो जइ जिणागमो ॥१॥ अर्ष-हे भगवंत! अम सरिसा प्राणीनीशी गतियास थे अमें आ दुसम पचमकाठमां अवतार लीपो हा-इति ममे अनाप पु जो जिनराखना कहेला आगम न हो तो आज सु थात पटले आज मागमनोज आधार छे माटे मागम अने आगमधर जे बहुमुस तेनो पणो विनय करयो मागमा विनयनु फल ते साभर अने सांभलवार्नु फल जान छे ज्ञानर्नु फल मोक्ष छे एम मागम सांभली लेया योग्य जो अयोग्य छारजो सदहणा शुद्ध राखजो सदरणा ते मोषनु मूल छे ए इन्द्रिय सुख तो मा जीवें अनंतीवार पाम्या छे परषी शाति-जन्म-योनी कोइ रही नयी जे मापणा जीवे नही करी होय ए जीयने ससारमा भमता अनंता पुनल परावर्तन थया पण धर्मनी जोगयायी मली नही वो हवे मनुष्यभव भाषफकुछ निरोगशरीर पंचेंद्रि प्रगट बुद्धि निर्मल पटछा संयोग मल्या यठी मीमीवरागनी पाणीना केहेनारा शुद्ध गुम्नी जोगषाइ पामीने महो भष्यलोको! तुमे धर्मने विपे विशेष उपम करजो फिरिपी एगी जोगवार | मिलनी दुर्छम छे माटे प्रमाद फरशो नही ए शरीर धन कुटुंग भायुष्य सर्व पपल घण घण जीजे माटे पांच स समयाय कारण मस्या मोक्षरुप कार्य सिद्ध करj ते पंचसमपायना नाम कहे छे १ काल २ स्वभाष । नियति ४ पूर्व फूत ५ पुरुषाफार ए पाच समवाय माने ते समकिति छ पा एक समवाय उत्थापे घेरने मिप्याथी कहियें एम सम्मति सूत्रमा कमो छ कालो सहापनियइ, पुवकय पुरिपकारणे पच । समवाए समत्त, एग ते होय मिच्छच ॥ १॥ अर्थ-काल लम्पियिना मोक्षरुप कार्य सिद्ध थाय नही एटले काल सर्वन फारण छे जे कार्य थानो होय से कार्य ते फाठे याय ए काठ समवाय अगीफार फरी कमो यहां कोई पूछे जे अभम्य जीप मोक्ष केम अता नथी तेने उधर जे अमम्यने फालमले पण ममग्यमा स्वभाव नयी पी मोष जाय नही केमके काल स्वभाव ए पे कारण जोइये तेयारे फरि पूज्यु जे भम्यजीयमा तो मोक्षे जवानो स्वमाय छे तो सर्व भव्य फेम मोक्ष जसा नपी ने उत्तर जे नियति | केहता निधय समफित गुण मागे तेयारे मोक्ष पामे एटले कार स्वभाष नियति एत्रण कारण मान्या तेवारे फरि पूज्यु से समफित आदि फारण सो श्रेणीक राजाने छता सो मोक्ष फेम न पयो तेने उधर में पूर्वकत कर्म घणा हवा अयया पुरुपाकार जे उधम फखो नही फरी पूज्यु ने शाठीमन्द्र प्रमुखें तो नथम घणो कीयो वेर्नु ऊपर जे मना पूर्वकृत शुभकर्म खप्या नहवा माटे पांच समवाय मिस्या कार्यनी सिनि थाय वेयारें फरि पूज्यु जे मरुदेयामावाने तो चार फारण मिस्या पण पापमो पुरुषाफार ग्चम कोर कीपो नही सेने उचर जे क्षपक श्रेणी पयानो रा ध्यान रूप चधम कीपो छे माटे पाप समयाय मीत्या मोषरूप कार्य सिद्ध पाय बेवारें फेयसमाने री सर्व द्रम्य जेम रया छे तेम देखे पटले आकाशद्रम्य लोकालोक प्रमाण छे तेमां अठोका पीजु दम्य फोई नधी लोकाफाशना एफेक प्रदेशे धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकायनो एफेंफ प्रदेश रमो छे तथा अनता जीयना मनतामदेश रमा छे अनता पुद्गल परमाणु रमा छे कालनो समय सर्वत्र पर्चे छे एषे छ दम्पनी फरशना कहे छे धर्मास्तिफायना एक प्रदेशे धर्मास्तिकायना छ प्रदेश फरस्या छे ते आयी रीते के पार दिशिना पार अने पांचमो नीचे छटो ऊपर ए छ प्रदेश फरस्या छे तया एक मूल पोतें प्रदेश एम सात प्रदेशनो संबंध में अने पर्मास्तिकायना एफ प्रदेशने आकाशद्रम्य तया अधर्मास्तिकायना सात सात प्रदेश फरशे छे ते एकम् उना प्रदेशने वीजा द्रम्यनो मूलनो प्रदेश फरशे माटे सात प्रदेशनी फरशना छे अने धर्मास्तिकायना एफ प्रदेशे जीय पुनराना अनंता प्रदेशनी फरसना छे अने छोकने मते जे धर्मास्तिफायना प्रदेश छे तेने आकाशनी फरशना तो टए दिशीनी छे अने एकमूल प्रदेश सुद्धा सात प्रदेशनी फरशना छे भने वीजा द्रम्यनी प्रण विशीनी फरशना छे एम सर्व द्रन्यनी फरशना छे भने आफाशपी धर्म अधर्मनी अवगाहना सूक्ष्म छे धर्म अधर्म द्रम्ययी जीवनी अवगाहना सूक्ष्म छे जीयपी पुगउनी अयगाहना सूक्ष्म छे एम छ दम्यना गुण पर्याय सामान्य स्वमाय ११ छे अने यिशेप स्वमाय दश छे ते श्रीफेयली भगत ज्ञानयी जाणे दर्शनपी देखे ते इग्यार सामान्य स्वमाय फहे छे १ मस्ति स्वभाव २ नास्ति स्वभाव निस्य स्वमाय ४ अनित्य स्वभाव ५पक माप ६ अनेक स्वभाष ७ मेद स्वभाव.८ममेद स्वभाव ९ भम्य स्वभाष १० ममम्य स्वभाष २१ परम

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स्यमाय ए ग्यार सामान्य स्वभाव सर्प द्रम्यमा छे ए सामान्य उपयोग दर्शन गुणपी देखे हये दश विशेष स्वभाव कहे
छे १ घेतन स्वभाय २ अचेतन स्वमाय ३ मूर्ति स्वमाय ४ ममूर्ति स्वभाव ५ एकमदेश स्वभाष ६ अनेकप्रदेश स्वमाष
७ शुद्ध स्वभाय ८ अशुद्ध स्थभाय ९ विभाव स्वभाव १० वपरित स्वभाय ए दश विशेप स्वभाव ते कोइफ म्यमा
कोक स्वमाय छे कोइफ म्यमा कोहरु स्वभाव नथी ए ज्ञानपी जाणे एटले सिद्ध भगयान लोकालोक सर्प ज्ञानोप
योगयी जाणी रया छे दर्शनोपयोगथी देखी रया छे पहया मनत गुणी अरूपी सिद्ध भगवान छे ते समान पोवानी
मारमाने जाणे उपादेय फरी घ्याप ते समफित आणवो
॥दोहा॥
मष्ट फर्म पन दाहके, भए सिट जिनपद । ता सम जो अप्पागणे, पदे ताको ईद ॥१॥
कर्मरोग ओपधसमी, शान सुधारस पृष्टि । शिवसुमामृत सरोपरी, जय २ सम्यक् दृष्टि ॥२॥
एहिज सद्गुरु शीस छे, पहिज शिषपुर माग । जो निज सानाविगुण, फरजो परगुण त्याग ॥३॥
ग्यान वृक्ष सेयो भपिक, चारित्र समफित मूल । अमर अगम पद फल लहो, जिनवर पदयी फूल ॥४॥
संयत ससर छित्तरे, मनशुद्ध फागुण मास । मोटे फोट मरोट मे, पचवा मुस पोमास ॥ ५॥
सुविहित खरतर गउ सुपिर, युगपर जिनर्धदसूर । पुण्य प्रधान प्रधान गुण, पाठक गुणे पंदूर ॥६॥

तास शिप्य पाठक प्रघर, मुमतिसार गुणयत । सफल शाख झायक गुणी, सामुरग जसपंत ॥७॥ वासशिष्य पाठक विनुष, जिनमत परमवजाण । मविककमल प्रतियोषया, राज सार गुरुभाण ॥ ८॥ ग्यानधर्म पाठक प्रपर, शमवम गुणे अगाह । राजहंस गुरु गुरु शकि, सहुजगकरे सराह ॥९॥ सासशिष्य आगमरुचि, बैनधर्मको दास । देवचंद आनंदमें, कीनो प्रथ प्रकाश ॥ १० ॥ मागमसारोबार पह, माकृत सस्कृत रूप । ग्रंप कियो देवचदमुनि, ग्यानामृत रस कूप ॥ ११॥ कसो इस सहाय अति, दुर्गदास शुमषित । समजावन निज मित्रकुं, कीनो प्रय पपिच ॥ १२ ॥ धर्ममित्र जिन धर्म रतन, भविमन समकितपत । शुख अमरपद मोठखण, प्रय कियो गुणवंत ॥ १३ ॥ तस्वग्यानमय ग्रंथ यह, जो पाठा वोष । निजपर सच्चा सब लिखे, श्रोताहे प्रकोप ॥ १४ ॥ साकारण देवर्षद मुनि, कीनो आगम ग्रंप । भणसे गुणसे जे भविक, लहेशे ते शिवपय ।। १५ ॥ कयक शुद्ध भोतारुपी, मिठजो पह संयोग । सत्वग्यान प्रशासहित, पली काय निरोग ।। १५ ॥ परमागमसु राचजो, लहेसो परमानंद । धर्मराग गुरु धर्मसे, परजो ए मुसद ।। १७ ।। ग्रंथ कियो मनरंगसे सितपख फागुणमास । मोमवार अरु तीम तिपि, सफल फली मन मास ॥१८॥ ॥ इति श्रीआगमसारोदार प्रय समाप्त ॥

श्रीपडितदेवचद्रजीकृत-आगमसार । (पत्र ११ दूसरी पष्ठकी पचमी पक्तिकी अशुदि है) तथा कोइ पूछे जे प्रतिमानी पूजातो पहेला मात्रय मध्ये लखी छे सेने फहीये जे तुम्हे मृपापाद पोलो छो इहां मसम्याफरण सून्त्रमा पाठ इम छे नही, तिहाँ पाठ छे ते । लिसीये छे अपिजाणमो परिजाणमो विसयहेउ इमेहिं फारणेहि फि से फरीसण पोक्सरणी पावि पप्पणी फूयसरवलाग चिति धेति खाति आरामविहार थूम पागारदार गोपूर महालगष-रीय सेतु संकम पासाय विफप्प भयण घर सरणि लेण आयण पाय देवकुल चित्तसभाए या आयत णयसई भूमिपर मरवाणं कए हीसंति इहा पांच थावरना पांच आलावा छे वेहने छेडे कोहा माणा माया लोमा हिंसा रती इत्यादि पाठ छे ते जे जीव इंद्रीना सवादने माटे पेईम य कहेता प्रतिमादिक फरे से आश्रय खाते ए पाठ छे पण पूजानो पाठ नथी ते मृषा शामाटे पोठो छो क्या प्रमव्याकरणसूत्रे वीजे सपरद्वारे जे आलापो छे ते लिखीये छे खयगयपपि आयरीय उपम्झाय सेह प्राईमीए तपसि सीस मुख फुल गणसंघ ईयढे निखरष्ठी घेयाचं अणिस्सीमो दसविहंबहुषिह करेई एमाग आधरज प्रमुख यि केहेतां जिनप्रतिमानो धैयाषच करे निर्जराना अधी अमिस्सीमो कहेसा जस कीर्तिनी बांछा रहितयको क्यापच दशमकार सया अनेक प्रकारनो करे इहां चय कहेता प्रतिमा छे तो खोटी फलपना स्यामाटे करो छो वया बीजे प्रमे पूज्यो में अहिंसाना ६० नाम कमा छे अमओ सन्यस्सपि अनापामो चुक्साय विधी पूया विमलप्पमा निम्मल फरीधि एव माइणी निय-गुण निम्मियाई पजय नामामि हुति अहिंसाए तिहां प्रतिमा या पूमानो नाम नथी तेहनो उपर विहां अहिंसानो नाम जाणो वेहनो अर्य देयपूना छे पूषा एहयो दयानो नाम छे तो माण्यो इमस्यों प्ररूपणा करो छो वीमुं पूजा सो श्रीअरिहंत प्रतिमानी ते तो विनय तथा घेयाषच ते मम्भितर तपना मेद छे ते सप मोक्षनो मार्ग में भी सप्सराप्ययन सूत्रे २८ मे अन्य यनें तपने मोक्षना प्यार कारण काया से मध्ये गण्यो छे तथा तो पछे पुख्यो थे वोलनी सवर न होवे ते निचारी पोलीये तथा प्रायके कोणे देहरा कराव्या तथा प्रतिमा पूमी वेहनो उचर श्रीसमवायाग सूत्रे तथा नदी सूत्रे सर्व मागमनो नूप छे ते मध्ये ए पाठ छे तिहा उपासफ दशानो नोंष छे ते आलायो छे ते उखीए के सेकिंते स्वास- गदसामो उपासगदसामुण समणोवासगाणं नगराई उजाणाई पेइमाई वणसंगई समोसरणाई रायाणो अम्मा- पियरो धम्मायरिया धम्मकहामोह लोइमा पारलोईया इहिषिसेसा मोगा परिमार सुअपरिग्गहीया वयोषहाणाइ सीलपयगुणवेर-मण पथक्वाणपोसहोययास परियषणा पडिमा-मओ उघसग्गसंलिहणाओ भचपचारकाणश्या : उ-यगमणं देवलोगगमणं सुकुउपचाया पुण योहि-उाभो भत किरीया आपरिजति ए पाठ है दही पहयाइ पद देहरा वया जिन मतिमा माण ग्यो शाश्य पानो मर्य बीजो याये नहीवननो मपं करे तो पचान बनन-नो । पाठ जूदो छे कोइ सानो अर्थ फरे ते घम्मायरीया ए पाठ जूदो छे जाननो अर्य करे से सुय ए पाठ भूदो छ । पास्ते घेइय शन्दे जिन प्रतिमानो अर्थ छे तथा सुम्हे पुग्यो जे द्वारिका राजमहमें देहरा सथा प्रतिमानो पाठ किहां छ तेस्नो उचर नदीसूने अणुतरोयपाइ तया अंसगरना नोंफ्नो पाठ जो ज्यो तया सुम्हे कहेस्यो इवला पोल उपासफ दशा प्रमुख दीसता नयी तेहनो उत्तर पे नदी तथा समषायांगमे जे पाठ वेहनो कोण सत्यापी फे वे जो ग्यो सया तमे पुरई जे किणे भाषके प्रतिमा पूजी छे वेहनो उत्तर घणे भाषके प्रतिमा पुजी छे ते पाठ श्रीमगयतीस्ने हुँगीया नगरीना आयफो घरणव्या लिहां भमिगय जीवाजीया इत्याविक पाठ पणा छे विहां पहपो पाठ हे असहिजयासुरनागसुषमजक्तरक्ससफिशरफिंपुरिसगरुलगधषमहोरगादी-पहिं देषगणेहिं निगाथा भोपाययणाओ अणतिकम्मणिज्जा निग्गये पाययणेनिस्संकीया निपंखीया लट्ठा गहीयट्ठा इत्यादि जे प्रावक कोई जाविना देयतानो साहज या/ता नयी तो कोई विजा देयतानी पूजा किम करे पहया पायक पे देयने देय चुचि मानता ये वेहनेज पूजे ते नायक, पियर आख्या तेयारे एकयार सर्व एकट्ठा मिस्यां पहयो विचार फल्यो जे पहया निधनो नाम सांभल्यानो पिण महा छाम छे तो वेहनो पांदया जाता सेया फरता तो महानिर्जरा महा पर्ययसान कहेता मोक्ष धाय इम विधारी पो पोसाने घरे गया पछी सूत्रे पाठ छे व्हाया कययलि फम्मा कयकोग्यमगलपा यछिचा शुभा पायेसाइ पयरपरिहीया अप्पामहग्याभरणालंकीयशरीरा सयामोगिहाओ पठिनिक्समति, तिहां नाझा अंघोलकीधा फयपलिकम्मा, ते वेषपूजा कीपीः कयकोउयमगल ते तिलकाविक कर्या पछी यस पेह Ram परली परपी निरुत्या परीने सिखाप राना तपा रिसभदा गुदर नशेठ इम मुभरपुर पदेन gri HITricठ पारा गया ऐ गरे फगरिकम्मा ग्या पर्ण परे मापी साहमीपपल रामा गरे पणा पापारामा ए पाठ से रपादिफ प्रारक मन्य देयती पू न फरे मिनेत वं पा और कारपे कारिफम्मा पाठ फठीयारा प्रमुरा भनेफ धानफे ऐ वेमा लेक माने ने माने जगपा पदप पाठक नीमि पुरा फरी दशे ते तो पाटाने मापीने Tग तोमर नापा पूना परता दोगे तो फापलिफम्मा ए पाठनो पीजो अर्थ शारे सामोपामरोजगदगेजगि पारा मसिमानो पाठ नपी मेनो उपर गे दीवाने उवापठा पया TYPAL नीनो पारा राग गो परे स्पाने रोमने पहेला देहरा प्रतिमाएं से जो नदीय आदी पोनर कालो नाग गमो पर सपा पुगे पुणु ने तीधर महन्यपणे एतां मापु गापी पापक प्रपर दी गोरए पापा पाठ नाना गया पपा गुमे उस्पो ने मरिमा पफेग्नि दल Gim R नावाने भान ने पोते ने फारणे श्रीमगपो तो पिडिमा कही पोछापी (गिवानो नो ने कोर पपन पाने पोनोगे राधा तुमेरिसी पंदना करोगो से दांगी सो जमिणेरा गुगे गोमगारा मनमें नो मिन ऐ गो निनपडिमा पदिता पिण ममारा सननिरनमा गरम गुरना गरनी भाषाला राणी पाठ मनीपत पीण गुम्नो पर मान छे प्रतिमाने बहुमाने सिसनो पहु-मान छे तथा सुधर्मा सामाहिं जिननी दारा छे ते वंदनीक पूजनीक छे ते तो अजीय स्कप छे तथा तुमे लस्यो जे परदेशी राजाए प्रतिमा को न फरी ते परदेशी आवक या पी फेटोक जीव्या छे से तया सर्व पायक एकज करणी को एसो नियम छे वया परदेशीए तथा आणंद पायके कोइक साधुने परिकाम्या नपी माटे तुम्हे साधुने विहराम्यामे दोप मानस्यो ए विचारी ज्यो ज्यो तया छस्यु छे जे सूरीमामे जे प्रतिमा पूजी ते राजधानीना मगठीक माटे पूजाफरी ते तो खोर्ड पोलो जे ए पाठ सूत्रमें नपी सूत्रमें वो पहपो पाउ छे हियाए मुहाए खेमाए निस्सेसाए आणुगामीयचाए भविस्सा निमेयस कोवा मोक्ष भणीए भर्य छे तया पच्चा शब्दे जे इह खोफनो अर्थ छे इम कहे छे से मूह छे दर्दुर देषताने अपिफारे पच्चा सम्पे आयता भवनो अर्थ छे तथा आचारांगसूत्रे जस्सपियिनो तस्स पछापिनो इहां पूर्व शम्चे पूठलो भष पन्छा शम्दे आपतो भय छीपो छ तया ए मषे समकितनो छामतो घणो छ तया तीर्थकर पायानो फलनो पाठ उववाई मध्ये सपा पंचमहा प्रत पास्यानो पाठ आषारांग मम्मे विहां पण हियाए इत्यादिक पाठ छे ते ने ठेकाणे ठाम मानो छो वो जिनप्रतिमा उसमे ना स्याने फहोछो अने किहां जिनप्रतिमा पूजानो पाप कमो नयी अने होयतो देखागो तुमें लिस्यु जे भगवंते हिंसानी ना कही छे वेतो ममे किहो फर्छ जे हिंसा करवी, पण मगर्यते किसे सूत्रे प्रतिमा पूजानी ना कही नथी प्रतिमानी १७ मकारनी पूजा सूत्रे कही छे तथा तुमे मतिमानी पूजा हिंसामा गिणो छो वे इमनपी प्रतिमानी पूजातो पिनय व्या पेयापध धर्ममा छे तया पूजा हिंसामे गणी तो ठाणांगे नदीमें पडती साप्पीने साधु काठे तेमां हिंसा गणी नहीं तथा आचारांगसूत्रे वीया साघु मजाणे पण शर्करानी मूछे छूण धीहरीने पछे जाणे मे लूण पीहरायो से आणी ते पोते सायेते पोते पीये तया पीजा साधु संमोगीने मापे ते साये पीए तथा विपम पाटे पेलने रुखने लताने गुचने अवलंषी उतरे जे पाठ आचारांगसूत्रे छे तया भगवती सूत्रमे साधुना हरस काढे तेहने किया फर्म लागे नहीं था महिनापनी पूतलीमे फवल मुक्या ते माटे धर्ममाटे हिंसाफरी तया सुयुद्धि मंत्रीए पाणी पलटाम्यो ते धर्म माटे करी पिण मनुचि न कमा छे भगवती सूत्रे २५ मे शतके साघु शासन माटे वेसो लेश्या मुके तेइने आराधक को तया जम्दीपन्नातीए निर्वाणमहोच्य कसो छे घूमकर्या ते मिणमचिए धम्मोति एपाठ छे ईम फेटठा पाठ लीखीए अनेक पाठ छे सपा नदी सूत्रे मे आगम कमा ते उत्थापीने ३२ मानोछो ते केनी आज्ञा छे तथा आवश्यकसूत्र परिक्रमणा विना साधु पणो पायक पणो पेज नही ते तुम्हे आवश्यकसूत्र परिकमणो मानता नपी वो भाषकपणो ने साधुपणो केम घराषोछो श्रीभगवतीसूत्र साधु साध्वी भाषक भावीका पचमा आराना छेहता पर्यंत फया छे से तुमारी प्रद्धा हिवां साधु साध्वी कोणछे तथा सूत्रे आचरज उपाध्याय कुल गणनी निमाये विचरे ते मारापक से तमें कोनी निमाये विपरोछो ते लिखग्यो तया श्रीमगवातीसूचे गापा के परमो गीयस्य विहारो, पीयोगीयस्यनीसीओ मणिओ, इचो वइय विहारो, नाणुमामो जिणवरेदि २ पहनो अर्म गीवार्य होय ते पोते विहार करे अथवा गीवानी निसाये विहार फरषो एहपी तीखा विधारनी मरिहते माझा वीपी नभी, वे माटे तुमे किस्या गीतानी निभाये विहार करोडो तपा पोग पापान बहीने सिद्धांत ममे तेपण भाषा भाषा- रांगादिफसूत्र मणे नही ते निशीपा करो छे से मिक्सु मन्नतस्यीय पा गारस्थियया पायर्ण पापई बार जतं साइजति तस्सपोमासीयं परिहार ठाणं से गृहस्थाने सूत्र पंचाये अथया पांचवाने अनुमोदे तेहने चार मासनो पाम्यो चरित्र जाधे वया प्रभम्याकरणसूत्रे मह फेरीसीयं पुण सपनुमासिय जत्थदय्येहिं गुणेहिं पजषेहि कम्मेहि पपिहेहिं आगमेहिं नामाक्खायनियाय उपसग्गवधिअसमास संपिपद जोगउणादि कीरीयाषीहीणसरघाउस रयिमति यमजुतं मासियवं क्या अनुयोगद्वारे ७ नय, ४ निक्षेपा, ३ काल तीन लिंगातीन, जाण्याविना उपदेश देवो ते मारग नपी इत्यादिक अनेक पोसछे ते गीतार्थनी सेघनायी पामीये इतिभद्रं जेके श्रीजिनमतिमानी पूजामध्ये फूल पूजानी शंका फरे सेहने फहीये जे श्रीरायपसेणीसूने १७ मेदी पूजानो पाउछे पुप्फारूपण १ माला रूहण २ तह पनारुहर्ण ३ तथा पुप्फगिह ४ पुप्फपगई ५ पतली पूजा झूलनी छे सेमाटे पूजा छलनी ते प्रमाण छे, तथा श्रीमगषतीस्ने पण सीमाभनी पेरे पूजानी भलामणना पाठ अनेक छे तया ज्ञातासूत्रे द्रौपदीने अधिकारे १७ प्रकारी पूजानो पाठ छे समवायागसूत्रे चौतीस अतिशयने अधिकारे जव्ययलय मासुरदसवमेण जाणु स्सेहप्पमाणमिवणं पुप्फपुजोवयार कोई इत्यादि पाठ छे यहां समघागिसूत्र में देवता मनुष्यनो नाम कझो नपी तथा श्रीउपयाईसने कोणिकने अधिकारे श्रीधीर समोसर्या तेयारे अनेकजन चपाथी निकस्या जे अप्पेगाया पंदण पचियाए मप्पेगइया पूयणवधियाए अप्पेगइयाअसुर्य सुयस्सामो भप्पेगइयाविचटाईमट्ठाओ हेओमाइ य पसिणाई गहिस्सामो, इत्यादि पाठ छे विहां पूयणपतीयाए ए पाठनो मर्यटीका मध्ये पूजन पुष्पमालाविना इम कम्यो छे इहा श्री तीर्थकरने पुष्पनी पूजादीसे छे पपाठ श्रीभगवतीसूत्रेपणछे तया नदीसूत्रे भुतज्ञानने पाठे मे इम मरिईसेहिं भगवतेहिं उप्पल- नाणदेशण परेहि सिाफ निरक्सीय महीम पूईपहिं पाठनो अर्ष टीकाकारे पिणमहीयशम्मे चंदनादि पूाएदि पुप्फमा छादिके फरीने ए पाठ अनुयोगद्वारमध्ये पण छे इम पुष्फपूजाना मनेक पाठ छे ते माटे का न करवी पली केइक इम कहे छे जे फूल पाता जरे से पढावया पण पोवे पूटी चढाषया नही तेपण अपाण्यु कहे जे जे श्रीजीवाभि गमम् तवेगं से विभएरेये पोत्ययरपणगिलपो० रयणं गिहिचा पोत्ययरपण मुयति पो०२ सा पोस्थयरपणं विहा । रेति पो०२ चा पोरघय रयण याएइ पो० २ चा धम्मियं यवसायगेहेतिध० २ पापोत्ययरयण पडिनिक्समति पो०२ घा सीहासणामो अम्मुट्ठति सी० २ चा ययसायसमावो पुरथिमिछेण दारेणं परिनिक्समापु० २ सा घेणेषनंदा पुक्स रणी सेणेय उवागच्छतिन० २ पाणदापुरमरिणी अणुप्पयाणिण करेमाणे पुरस्थिमिल्लेणं तोरणेणं अणुपविसतिम० २६ सा पुरस्थिमिलेणं तिसोपाणपरिस्येण पचोरुहतिप० २ चा हस्थपादं फक्खाछेतिह० २ चा एग मह सेतं रजवामय विमलसछिठपुण्ण मतगयमहामुहागिइसमाणं भिंगारं पगितिप० २ चा जाइ तत्प उप्पलाइ मायसवपचाई सहस्सप पाई लाई गेहधि २ चाणदायो पुक्सरिणिमो पुयुत्तरेइप० २ पानेमेव सिलायतणे तेणेव पाहारेत्यगमणाइ तएणं वैविजयं देखें पधारी सामाणिय साहस्सीमो, जाय अण्णेमहवे वाणर्मसरा देवा देवीमो अप्पेगसिया गप्पलहत्य गता आव सत सहस्स पचहत्यगया विजय देवं पिठिओ अणुगाम० चा न भूटी लीघा छ एमालावे विजयदेव पोखे वायरीमें उवरीने फूल चूंटी लीषा तया सामानिक देवता तया बीजे देवताये पिण ठ पोताना हामी - सीधी छे यहां कोई पूछस्ये मे तिहीं कोई माली नयी ते माटे पोते लिया सेहनो उचर जे माली नथी पिण देवता पाकर जोक पणाछे वेहनेम पासे का न मंगाये, जो पुम्प आण्यानो विपि हो तो पण पोताना हायपी लीधानो विधि छे वे माटे पोते यापरी मध्ये उतरी लीपाछे तथा श्रीरापपसेनी सूत्रे सूरीयाम अधिकारे सतेणं से रियामेदेवे पोस्थयरयणं गिहापो० गिहिचा पोत्यय रयण मुयापोत्यय रयणं विहागवि० चा पोत्ययरयणं पाएति वा० चा धम्मिय थषसायं गिह एगि० वि पोस्थय रयण परिणिक्खमति० चा २ सिंहासणो अग्मुर २ चा पयसाय सभाओ पुररिपमिलेण वारेणं पटिनि पसमाइय० सा जेणेय नंदापोखरणी वेणेष सवागच्छा उ० चा नंदापोक्खरणी पुरपिछमिलेणं वोरणेणं तिसोपाणपटि रूपेण -पोराति २ चाहत्यपार्य पक्खालेद २ चा आयते चोक्ले परमसुइम्प पर्ग सेयमाई रययामय विमल सलिलपुण्णं मत्तगयमुहागितिसमाण भगारं पगिति चा आइ तत्परप्पलाई आपसयसहस्स पचाई गिहति दामो पुक्सरिणीमो पच्चोरुहई० २ था जेणेय सिद्धायपणे वेणेष पहारेत्य गमणाए सपण त सूरियाभ वेषं चचारि सामा णिय साहस्सीओ जाप सोउस आयरक्स देय साहस्सीमोमण्णेय यहवे सरियाभषिमाणे जापदेवा देवीमो मरये- गईया उप्पछहस्यगया जाप सत्त सहस्स पचहत्थगया रियाम देवं पिट्ठो समणुगच्छति ततेण सूरियामदेव पहये आमिमोगिय देवाय देखीओय अत्येगइया कलसहत्यगयाओ जाव अत्येगाया धूपकडुच्छहत्यगया हट तुहा जाय सूरिया देवपिट्टओसमणुगछति वशेणसे सूरियामेदेवे चरहिं सामाणियसाहस्सीहिं आप अण्णेहि- य प-हुदि परियाभषिमाण यासीहि पेवेहिं देवीहिंयसद्धिं संपरिखुढे सपहीए जायणाइयरषेण जेणेच सिद्धाययणे तेणेष गगण निगप पुरप्टिमित दारेण अणुपपिमतिः २ पा गय मिणपडिमार देणेय उयागद मिणपति ना मागेए पमा रेतिका गा २ ओमद-रयर्ग गिहागि० ता २ जिणपतिमाणे लोमहायएण पमजइप० २ गा तिमामा गुभिणापादपणाणेति हाणिया मररोण गोसीसपदणेणं गायाणं अणुलिप्प २ चा जिण परिमा भापौर दगमाइ नुपए गिर्यमेइ० २ ता पुष्फारूवर्ण महारुहणं पूण्णारूण गपारूदणं घण्णाहरण पुरा पत्यारन भामरणादण फरेइ फरेषा भाषचा सत्त विटयग्धारियमादामफलायं करेइ० चा फरगद गदिन परपनामा पिप्रमुपर्ण दमरर फुगुमर्ग मुफ पुष्फ पुजोययारफलिय करेति करेचा निणपडिमाण पुरसो मा महदि माद रपणामपदि मरमनदुलहिं मार मगठे आलिहर जहा सरियय जापदप्पण सयाणवर घणं पद पाणयविनउदटपामगिरपणमतिपिछ काठागुरु पपर गुंदरुणसुम्पपूरमपमपत गंपता माणु पिनि पुरातपिमुपनं पेरायमर्य पुरदुषण पग्गदिप पयचेण पूर्य दावुण मिणयराणं अहसययिमुद्र गप जुदि मा मागिदि पूजा मापयादि पपोप पा पाम आM अपेइ दाहिण माणं परणितटसि निद टु रिमो मुसा पनि गिरिगोरेति २ पा इमि पयाणमर इमि परणमिया करयठपरिग्गदिय सि-रसायस मरधए महिमुपा पपामी गपापुण मरि-तार्ग वारपाण पंदति गर्ममइ० २ चा परायपसेणी सूत्रे पाठछे परियामे गगनपा ऐ मामानिस प्रयुग पागे मंगम्या नयी क्या जयुतीपातीमे जन्माभिरेक नेणेय सीसेन पपुरतेच मागा. या गीरोग गिहाप्ति २ गा बाई सरयाणाई पामार जायसरा पगाई तापगिविता इत्यादि सूत्रमे पाठ हायना पूठ्या फूल लेयाना छे तया कोइक कहसे जे पतो त्या नपी सहेजे पन्या ली छे तेहने कहीये छे ओह हजार गमे सहेजे पन्या पायरी मध्ये हवेज नही क्या नग्गइने अधिकारे नग्गइ राजाए पानी मांज रीयो पोते बूटी लीधी वेपारे फटफ पधे चूंटी लीधी ते पाठ उपधायी मध्ये जोजो अन्नयाणु जुत्वनिग्गओपेय कुसमा पूम-राइणाएगा मजरी गहीया एवंखधावारेण सेणं मजरीपच पयाल लयाइ गहियाइ कठाविसेसोको परिनियचओ पुजा कहे सोरुक्खो ममघेणा दंसीमो कह एसअवत्योभणा तुम्हेहिं एगामजरी गहीया पच्छा सपर्ण गहेतेणं एवं कयो इहा गदीय शवे यूटयानो अर्थ छे तथा कोइ कहेस्ये एतो देयताये को छे से मायके कमानो किहां पाठ नपी तेहने कहीये जे जो देयतानी करणी वाइरे न फरषीतो शकस्तव किमकरे छे त्या मात्र फेम मानो छो साधनो कलस टोलोडो से देवतानी करणी छे तया प्रियामनी पूजानी भलामण द्रौपदीने पाठे छे देवतानी पूजा करणी तथा मनु प्यनो पाठ एकज ऐ ते माटे देयतानी पूजा करणी पापक करे ए मना प्रमाण छे तथा ने फूछ घूटवानी ना कहे ते पीटना जीयनि फीलामना माटे तेयारे फूलनी पूजा किम करी शफे अने फूलनी पूजानो तो सूत्रे पाठ छे तथा जे पूजाने हिंसामे गणे तेने कहिये जे श्रीप्रमव्याकरण सूत्रे प्रथम संघरद्वारे अहिंसा ना ६० नाम कमा छे तिहां पूजा ते दया कही छे से पाठ लिसीये छे अभउ सम्बस्सघि मनाघाओ चुक्खपषची पूया विमलप्पना निम्मल करती पर माइमि नियगुण निम्मीयाइ पजाय नामाणि हुँति अहिंसाए मगघाइए इत्यादि पाठे पूजा ते अहिंसा में गणी छे तो तुम्हे हिंसामे फिम गणोछो तथा भगषप्ती सूत्रे सुर्मयोगं पडुन अणारमी ए पाठ शुभयोग प्रवृचिने आरमनी ना कही छे विनय तया पेयायच ते तपना मेद छे वप मोक्ष मार्ग मध्ये श्रीसत्तराप्ययने २८ में अध्ययने कमो ते तुमे हिंसामें फेम फहोछो तथा विषहार सूत्रे सिर घेयावत्रेण महानिजरा महापज्जवसाण भषति से माटे सिद्ध पेयाषच ते पूजा छे वया कोर पूछे जेभावके प्रतिमा किहां पुखी छे तेहने फहेवो थे श्रीभगवती सत्रे तुंगीपानगरीने आपके पूजा करी छे शंख पुष्कली ये पूजा करी छे तया समयांग सूत्रे हावांगीनी हुरीने अधिकारे सपासक दशानी हुंग मध्ये दश पायकना चस्य पहवो पाठ छे चैत्य तो साधु थाय नही शान थाय नहीं ते सर्वना पाठ मुदा छे तया नदी सूत्रे पिण पाठ छे तया नदी मध्ये के मागम का ते सर्व माने वेष समकिति जाणवो श्रीअनुयोगद्वार सूत्रे निर्यु किनी हा की छे ते नियुक्तिमध्ये पूजाना मनेक अधिकार छे तथा तेवुलवेयालीयपयमानी टीकामध्ये समवसरणना शल सचिच ते ऊपर साधु साध्वी पाछे प्रपचनसारोद्धारनी टीकाये पण ए समत छे तथा कोइ फहस्ये मे इलने मोइ परोयया नहीं वेहने कहीमे गे हीर प्रभमध्ये पाठ छे तथा पागधोवमें चेति श्लोक यास्यायते भावपिन कृत्ये प्रोत पूजावराणी वसे तथा माप पधेतु श्रीधिनषष्ठम हि कत पूजा कुलफेऽपि प्रोत पुष्पाक्षराणि सति तथा हरिभद्र सरि कृस पूजा पचासके जहरेहा तह कीए ए गायाना आसयपी पिण प्रोया झनी हा अणाय छे तथा उमास्वाति पाचक त पूजा पटला पिण एमप जणाय छे ~ इम आणी शासनरुधि । करजो श्रुतसम्पास ॥ पामी चारित्रसपदा । हेसो लीलयिठास ॥ १३ ॥ दीपचद्रगुरुनामने । सुपसायें उल्लास ॥ देवचंद्र भविहितमणी । कीघो प्रयप्रकाश ॥१४॥ मुणसे भणसे जे भषिक । पह मय मनरग ॥ ज्ञानक्रियाअभ्यासता । लहेशे तस्वसरग ॥१५॥ द्वादशसार नयपक छे । मलयादित पर ॥ सप्तशतिनय पाचना । कीपी सिहा प्रसिर ॥१६॥ भल्पमतिना वित्तमें । नाधे ते विस्तार ॥ मुख्यपूलनयमेवनो । भाष्यो असपिचार ॥ १७ ॥ सरसरमुनिपति गच्छपति । भीजिनचंद्रसरीश ॥ वास शीस पाठकमवर । पुन्यप्रधान मुनीश ॥१८॥ तम विनयी पाठकमपर । सुमतिसागर सुसहाय ॥ साधुरग गुणरसनिषि । राजसार उवजाय ॥ १९ ॥ पाठक ज्ञानधर्म गुणी । पाठक मीदीपचंद ॥ तास सीस देवचंदकृत ॥ भणता परमानद ॥२०॥ इति श्रीनयचक्रवियरण समाप्तम्

ए
G
प्राचार्य श्री बिमयपन्द्र गान मगार बयपुर
PYASIS
इति जीवविचारादिप्रकरणसंग्रहः तथा
आगमसार-नयचक्रसारः समाप्तः।

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Jeevvichardiprakaransangrah

Author
Suri, Shri Jindatt
Title
Jeevvichardiprakaransangrah
File name
Jeevvichardiprakaransangrah
Text
OCR done
Citation
1927
Published
2011/08
Publisher
Surat, Shri Jindattsuri Gyan Bhandar Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314031
Barcode
99999990312185.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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