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Samarsaram

Ganga Vishnu Shri Krishna Das · 2012/08

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भूमिका। OMG- ARY. भारतकी भूमिरत्नगर्भा कहीजाती है, वास्तवमें यह उपाधि सत्त्व- शून्य नहीं है । अवश्यही इसके सुविशाल गर्भमें अनन्त रत्नराशि संस्थापित है किन्तु रत्न कहनेसे हीरा-लाल-पन्ना आदि मूल्यवान् कंकर पत्थर ही केवल रत्न मानलियेजॉप सो बात यहां नहीं है। ऐसे पत्थर रल तो अन्यत्र भी उपलब्ध होसकते हैं परन्तु भारतभूमिके पवित्र गर्भमें ' नवरल, नररत्न, नारीरल, विद्यारल, वस्तुरल और ग्रन्थ रत्नादि ' अमूल्प और बहुमूल्य विविध रल वह भरेहुए हैं, जिनकी अन्यत्र उपलब्धि असाध्य ही नहीं, असम्भव भी है यहाँके किसीएक रलको उठाकर अवलोकन कीजिये-एक एक रत्नमें अनेकानेक सद्- गुण प्रतीत होते हैं। यदि भारतीय रत्नराशिका मदर्शन करायाजाय तो उसके लिये घमारी आयोजनकी आवश्यकता है। इस क्षुद्रकाय भूमिकास्थलमें प्रदर्शिनी तो क्या, रिलनाम संग्रह करनेका भी सुमबन्ध नहीं होसकता है। और सब छोड़कर यदि अन्यान्य रत्नोंके अतिरिक्त यहाँ केवल अन्यरलोका ही प्रदर्शन कराना चाहें तो उसके लिये भी आज आव. श्यक समय, सामग्री और स्थल नहीं है और न उनकी सूचीमात्र ही यहाँ देसकते हैं । इस कामके लिये मद्रचित "भारत रत्न" नामक पुस्तक आवश्यक है । फिन्तु ग्रन्थरलोमसे नमूनेका जो एक रल आज हमारे हाथमें है, फेवल उसीका यहां कुछ परिचय देना उचित, आव- श्यक और लाभदायक समझते हैं। इस ग्रन्थरवका नाम-"समरसार" है। इसको श्रीरामचन्द्र सोम. याजीने स्वरशास्तोंका सार लेकर ८५ पचाशी श्लोकोंमें संग्रह किया है इसमें छोटे छोटे और उपयोगी केवल दश प्रकरण वर्णन किये । १४) भूमिका। फर्ण, कंठ, करांगुलीय भूपणाम जड़न योग्य यह एक छोटासा किन्तु अमूल्य रत्न है । यद्यपि समरको लक्ष्यदेवर युद्धोपयोगी सारका इसमें संग्रह किया है तथापि समरके सिवाय सासारिक कार्यों में भी यह मंग्रह बहुत उपयोगी और आवश्यक है। युद्धके निमित्त यात्रा करनेवाले दो नशामसे विजयश्री किसको मिलेगी ? किससमय किसप्रकार गमन करनेसे क्म सेनावाला राजा कैसे जीत सकेगा ? असंख्य सेनासे घिराहुआ क्षुद्रकाय क्लिा किस बलके आश्रयसे अट्टट रहसकेगा? एक बलवान् मलरो मुठभेर होजाने- पर निर्बल मल्ल क्सि युक्तिसे उसे चित्त करेगा ? अभियोगमें फंसेहुए दो अभियुक्तोसे न्यायालयमे कौन बरी होगा ? शास्त्रार्थ करतेहुए दो दिग्विजयी विद्वाना में किसका पक्ष मान्य रहेगा ? किस साल संवत्, दिनमे कौन वस्तु कितनी महँगी, सस्ती विकसकेगी ? कौनसा सेवक, स्वामीको सम्पत्ति सुख देनेवाला होगा ? अथवा क्सि नौकरकी योजनासे मालिकको रणग्रस्त होना पड़ेगा ? दिन रातमें मनुष्यका मन किस किस बातपर कब क्व चलायमान होगा ? किस समय कौन काम परनेसे क्या लाभालाभ मिलेगा ? किस खर• सचालनकी रीतिसे दम्पतिप्रेम प्रगाढ होगा ? और वर्प दो वर्ष वा दश वीस वर्पतक जीवित रहने अथवा कबतक मरजानेकी चितासे निश्चित होनेका किरा , सरल उपायसे निश्चय होसकेगा ? (कहातक गिना ) इत्यादि इत्यादि अनेको बातोका विचार समरसारमे भले प्रकार वर्णन किया है। और सर्वतोभद्र जैसे कोई कोई मकरण तो इसमें ऐसे है जिनसे एकही प्रकरणसे अगणित वातोंका क्षयोद्भव शुभाशुभ सत्य विदित होता है। विशेष महत्व और आरामकी बात इसम यह अधिक है कि वर्ष जन्मपत्रादि देखने, गणितकरने और पतदा पोथी ढूँढनेकी इसमें विशेष मासा भूमिकी । शट नहीं करनी पड़ती है जो कुछ अच्छा पुरा फल हो चटपट मालूम होजाताहै । और वह सच्चा मिलता है। कितने बड़े गौरवकी बात है कि एक छोटेसे ग्रन्थमें संसारका महोपकार करनेवाले बड़े बड़े काम भरेहुए हैं । यह सब कुछ होनेपर भी आजतक यह ग्रन्थ भापार्टीका । साहित कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। इस ग्रन्थपर संस्कृतमें दो टीका माप्त हुई हैं। प्रथम भरतटीका है और दूसरी रामटीका है किन्तु इन दोनों उत्तम टीकाओंके होने परभी किसी किसी स्थलमें यह ग्रन्य ऐसा अड़जाता है कि विद्वानोंको भी इसके चलानेमें कुछ श्रम करना पड़ता है। अत एव विद्वान्से लेकर सर्वसाधारणपर्यन्त यह ग्रन्य सबके उपयोगम आसके ऐसा होनेके लिये श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजीके आग्रह और चौमूं राजके आश्रित ज्योतिपरल पं० झुथालालजीकी अनुमतिसे मैंने इसकी कई- एक हस्तलिखित प्राचीन प्रतियों एकत्र करके संस्कृतटीका और भापाटीका सहित इसे तयार किया है। यह ग्रन्थ सर्वसाधारणको समझमें सरलतासे आसके और इसका असली आशय स्पष्टरूपसे विदित होसके इसलिये इसमें कई प्रकारके उदाहरण, उपदेश, चत्रा, अन्वयांक और टिप्पणी आदि संयुक्त करके इसको सर्वांगसुन्दर बनानेकी पूरी चेष्टा की है। भामा सम्बईक "प्रोप्दकटेवर " प्रेस्फे अयक्ष श्रीमान्द्र सेठ खेमराजजीके भाग्यमास्करको उदित खखे ।आपने भारतीय अन्यरत्नोंके अस्तित्वकी रक्षा निमित्त मुक्तहस्त धनध्यय करनेमें पका प्रण किया है। समरसार जैसे अमाप्य अन्यरत्नों का सम्माप्त होना आप. हीके सदिचारका फल है।

मूभिका। यदि विद्वान् लोग स्थिरतासे इसका आद्योपान्त अवलोकन और अनुशीलन करेंगे तो देश और ग्रन्थका बड़ा उद्धार होनेके साथही इसके तयार करनेमें मुझे जो आयोजन और परिश्रम करनापड़ा है वह सफल होकसता है। आशा है कि, विद्वान् लोग इस ओर.अवश्य ध्यान देंगे और इसमें भ्रम या दृष्टिदोषसे कहीं कुछ भूल हुई हो तो उसकी क्षमा करेंगे। मैं इस ग्रन्यका सर्वाधिकार सेठ खेमराज श्रीकृष्णदास अध्यक्ष श्रीवेङ्कटेश्वर " स्टीम प्रेस बम्बईको सादर समर्पित करता हूं और कोई महाशय इसके छापने आदिका साहस न करें नहीं तो लाभके बदले हानि उठानी पड़ेगी। शुभेच्छुक-हनूमान् शर्मा, जयपुर-सिटी, समरसारकी-विषयानुक्रमणिका । Letendore- - पृष्ठाङ्क । विषय, १ भूबल -- नेके लाम " विषय, पृष्ठाङ्क मङ्गलाचरण मात्रा स्वरादि २९ श्रीमहादेवही स्वरशास्त्रको पूर्णतया योगस्वर वर्णस्वरोंका विशेष पाल '३१ जानते हैं २ युद्ध आदिमें योधाओंका जय स्वर शास्त्रज्ञराजा अकेलाभी करोडों पराजय साम्य ज्ञान 1३२ शत्रुओंको मारसकता है ३ जय पराजय चक्र अनंधिकारीको स्वरशास्त्र नहीं बालकुमार इत्यादिस्वरके वशसे बताना अधिकारी शिष्यको स्वरशास्त्र बता दिशास्वर चक्र राशिस्वर चक्र जयपराजय चक्रोपक्रम रविहतदिशा जयपराजयचक र रविहतदिक्चक्र जयपराजयका दूसरा चक्र १०-१३ चन्द्रहत विदिशा और उनके स्वामी इल अकुल-कुलाकुल गण चन्द्रहतदिक्वक फुलाफलादि चक्र १५/गूढाक्ष्यकैनुहत दिग्विदिशा वर्णस्वर " गूढचक्र ४१ २० सूर्य और चन्द्रमाके पृष्ठ दिशा- दूसरा दिमें होनेसे जप और पराजप" ক্লাব সিয়াহী कायुक्त सहरक स्वामी आदि और उदय प्रहराशिनाशादिकका स्वरचक २३ योगिनीबल হােষ্টি এবং २४ योगिनीवास चक द्वादशान्दादिफारवर का २८ योगिनियोंके नाम . , वर्णस्वर चल " ४७ " -- विषयाममणिका। विषय, पृष्ठाइ । विषय. पृष्ठाव. राहमुक्त योगिनियोका बल ४७ चन्दस्वर ज्ञान चक्र रविआदिवारोंमें वर्जनीय कालाई रविआदिनाडीके स्वरमे युद्धके प्रहराध आरमहोनेमे जय अर्धयामकालचक्र ४९ रवि आदिनाडीके स्वरमें प्रश्नविशेष खास वारोंमें अर्घयामका भोग ५० सूर्यचन्द्रनाडीके चलनेने कर्तव्य ८५ कामदिक्चना ५१ रविनाडीवहनमें स्त्रियोंका दावण " युद्धमे छोडनेयोग्य होश "वशीकरण वारप्रवृत्तिजाननेकी रीति ५२ मदनयुद्ध विरुदयाम गूढराहरविआदिमें युद्ध जएकेलिये स्वरबल करनेपर प्रहारके स्थल ५३ औपधादिको मुखमे रखकर युद्ध प्रहों की स्थितिसे प्रहारके स्थल ६४ करनेमें युद्धमें जय युद्धमें अहिचक्रविरह त्याज्यनक्षन ५७ युद्धमें जयके लिये कोटचक वार दिक्सूल ५८ कोटचाके दिन ९७-९८ नवग्रहोंका अपने २ भोग किये कर सौम्याहोंकी स्थितिसे दुर्ग- जाते नक्षत्र में अश्विनीआदि भग और रक्षादि २७ नक्षत्रोंका अवान्तर भोग ६० कोटचक्रके स्वरूप चन्द्रसूर्याधिष्ठितनक्षत्रान्तर्भाग चक्र १३ सर्वतोभद्र चक्र राहकालानलपक ६४ वाशीमग्रह वेध सवकह चक्र ६६ ऋणधनशोधन हसचारोक्तिपूर्वक स्वरवलज्ञान ७०ऋणधनसाधनचक्र पृथ्व्यादि तस्ववहन फल ७६ आतुर साध्यासाध्यज्ञानचक्र १२२ हत्कमलपत्रमे रविचन्द्रवहन छायापुरुषदेखनेका प्रकार १२३ पूर्वक माणवायुके सचारमे दूसरे शकुन अर्धघटयादिज्ञान ७७ प्रन्थकी समाप्ति इत्यनुक्रमणिका।

मी समरसारम्
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् ।
नत्वां गुरून्समालोक्यं स्वरशास्त्राणि भूरिशः ।।
. वक्ष्ये युद्धजयोपायं धार्मिकाणां महीक्षिताम् ॥ ३॥
नत्वा भत्तया महेशानं सर्वसिद्धिविधायकम् ।
व्याख्या समरसारस्य संग्रहाख्या प्रकाश्यते ॥१॥
टीका समरसारस्य रामेण भरतेन च ॥
याऽकारि तत्संग्रहोऽत्र यथायोग विधीयते ॥२॥
(संस्कवटीका ) अहं रामो वाजपेयी धार्मिकाणां धर्मा-
स्मनां महीक्षितां भूपानां युद्धजयोपायं वक्ष्ये कथयिष्ये । कि
कृत्वा राख्नत्वा नमस्कृत्य । पुनः किं रुत्वा भूरिशः बहुशः
बहूनि स्वरशास्त्राणि समालोक्य सम्यग्विचार्य, युद्धे जयः युद्ध-
जयः युद्धजयस्योपायःयुद्धजयोपायः तं युद्धजयोपायम्, स्वर-
शास्त्राणि स्वरपन्थान् पूर्वाचार्यकतान् । गृणन्ति हितमुपदिशन्ति
ते सुरवस्तान्गुरुन् ॥१॥
(भाषाटीका):गुरुओंका नमस्कार करके बहुतसे स्वरशास्त्रीको
भले प्रकार देखकर धार्मिक राजाओंके युद्धमें जय होनेका उपाय
कहताई ॥१॥

विषयाहकमणिका। विषय, पृष्ठान. । विषय, पृष्ठाक- राहमुक्त योगिनियोंका बल ४७चन्द्रस्वर ज्ञान चक्र ७८ रपिआदिवारों में वर्जनीय कालाई रविआदिनाडीके स्वरमे युद्ध के प्रहराध आरभहोनम जय अर्धयामकालचक ४९ रवि आदिनाडीले स्वरमे प्रश्न विशेष" खास वारों में अर्धयामका भोग १० सूर्यचन्द्रनाडीके चलने कर्तव्य ८५ ककुभदिक्चक ११ रविनाडीवहनमें स्त्रियोंका द्रावण युद्धमे छोडनेयोग्य होरा वशीकरण वारप्रवृत्तिजाननेकी रीति ६२/मदनयुद विरुद्धयाम गूढराहुरविआदिमें युद्ध जएकेलिये स्वरबल करनेपर प्रहारके स्थल ५३ औषधादिको मुखमें रखकर युद्ध प्रहोंकी स्थितिसे प्रहारके स्थल करनेमें युद्ध में जय युद्धमे अहिचविरुद्ध त्याज्यनक्षत्र ५७ युद्ध में जयके लिये कोटचक्र वार दिशूल ५८ कोटचकेके चित्र नवग्रहोंका अपने २ भोग किये कर सौम्यग्रहोंकी स्थितिसे दुर्ग- जाते नक्षत्रमें अधिनीआदि भा और रक्षादि २७ नक्षत्रोंका भवान्तरमोग ६० कोटचक्रके स्वरूप १०० चन्द्रसूर्याधिष्ठितनक्षत्रान्तर्भाग चक ६३ सर्वतोभद्र चक्र राहुकालानलचक्र ६४ वशीघ्रग्रह मेध अवकहड चक्र ६६ भगधनशोधन इसचारोक्तिपूर्वक स्वरबलझान ७० भणधनसाधनचक्र पृथ्व्यादि तत्ववहन फल ७६ मातुर साध्यासाध्यज्ञानचक्र १२२ प्रस्फमलपनम रविचन्द्रवहन छायापुरुषदेखनेका प्रकार पूर्वक प्राणवायुके संचारमे दूसरे शहन १२५ अर्धघट्याटिनान ७७ प्रन्यकी समाप्ति १२७ इत्यनुक्रमणिका।

श्रीः।
भड अर्थी समरसारम् -
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् ।
नत्वां गुरून्समालोक्य स्वरशास्त्राणि भूरिशः।
वक्ष्ये युद्धजयोपायं धार्मिकाणी महीक्षिताम् ॥ १॥
नत्वा भक्या महेशानं सर्वसिद्धिविधायकम् ।
व्याख्या समरसारस्य संग्रहाख्या प्रकाश्यते॥१
टीका समरसारस्य रामेण भरतेन च ॥
याऽकारि तत्संग्रहोत्र यथायोग विधीयते ॥२॥
(संस्कृतटीका ) अहं रामो वाजपेयी धार्मिकाणां धर्मा-
त्मनां महीक्षितां भूपानां युद्धजयोपायं वक्ष्ये कथयिष्ये । कि
कृत्वा गुरून्नत्वा नमस्कृत्य । पुनः किं कृत्वा भूरिशः बहुशः
बहूनि स्वरशास्त्राणि समालोक्य सम्यग्विचार्य, युद्धे जयः युद्ध-
जयः युद्धजयस्योपायः युद्धजयोपायः ते युद्धजयोपायम्, स्वर-
शास्त्राणि स्वरग्रन्थान पूर्वाचार्यकतान् । गृणन्ति हितमुपदिशन्ति
ते गुरवस्तान्गुरुन् ॥ १ ॥
(भाषाटीका):गुरुओंका नमस्कार करके बहुतसे स्वरशास्त्रोंको
भले प्रकार देखकर। धार्मिक राजाओंके युद्धमें जय होनेका उपाय
कहताहूं ॥१॥

समरसार- बहुधा विदधे सदाशिवोऽचे स्वरशास्त्राणि तदेकवा- क्यतां तु । भगवानंयमेवं वेद सम्यग्गुरुमाग्नु- गतोऽपरन्तु लोकः ॥२॥ सदाशिवः महादेवः अत्र युद्धभयोपानिमित्तं बहु- प्रकारं बहूनि च स्वरशास्त्राणि स्वरग्रन्यान् विदथे चकार कतवान् । अयमेव भगवान् सदाशिवः तदेकवाक्यतां तेषां अन्धानां स्वरशास्त्राणाम् एकवाक्यताम् ऐकमत्यं वेद जानाति । अपरोस्मदादिलोकः अल्पबुद्धिः गुरुमार्गानुगतः गुरूपदिष्टं मार्गम् अनुगतो भवति गुरूपदिष्टमार्गानुसारी भवति शुरूपदि- टमेव जानाति न त्वन्यत् ॥ २॥ यहाँ सदाशिवने बहुत स्वरशाखोका विधान किया है और वहीं शिवभगवान् उनकी एकवाक्यताको भी भलेप्रकार जानते हैं। बाकी हमलोग तो गुरुमार्गानुगतहैं अर्थात् गुरुसे शिष्य और शिष्यसे प्रशिष्य जानते हैं ॥२॥ वक्ष्याम्यहं यदिहे किंचन सर्वसामेतावदेवं परि- चिन्त्यं नृपः प्रवृत्तः। एकोपि" कोटिभटलोलपतङ्ग- दीपलीलां मुदानुभवतु स्फुटकौतुकेन ।। ३॥ अहम् आचार्यः इह अस्मिन् ग्रन्थे यकिञ्चन सर्वसारं सर्वपां ग्रन्थानां सारं सारभूतं वक्ष्यामि कथयिष्यामि एता- वदेव सम्यक् परिचिन्त्य विचार्य योद्धं प्रवृत्तः चलितः एकोपि नृपः कोटिभटलोलपतंगदीपलीलां मुदा आनन्देन स्फुट- कौतुकेन प्रत्यक्षकौतुकेन अनुभवतु अनुभवं करोतु । कोटिभटा- ।

संस्कृतटीका-भाषांटीकासमेतम् । स्व एवालोलाः चंचला पतंगा दीपे पतनशीलास्वेपी लीलाम् अनुभवतु । कोर्थः यथा पतंगा,ज्वलद्दीपोपरि दूरतः समागत्य निपतन्ति तथा अभिप्रायम् एकं राजानम्। उपरिवहवः शूराः शत्रवः सन्निपत्य पतंगवद्भस्मीभयन्तीत्यर्थः ॥ हम यहाँ 'जो कुछ सर्वसार कहते हैं. फेवल उसीको चिन्तन . करके राजा युद्धमें प्रवृत्त हो तो जैसे दीपकके ऊपर अगणित पतंग अपने आप पड़कर भस्म होजाते हैं और दीपक तमाशा देखता रहता है. वैसेही, वह अकेला राजा भी' करोंडों चंचल योद्धाओंके बीच खुडा रहकर. उस: दीपककी लीलाके आनन्दका अनुभव करसंकृता हैं. अर्थात उसपर करोड़ों योद्धा टूटपडे तौभी, वही जीत सकता है ।।३।। नैतदेयं दुविनीतार्य जातु ज्ञान [प्तं तद्धिं सम्यक्फ- • लाय । अस्थाने हि स्थाप्यमानैव वाचां देवी कोपी- निर्दहे नी चिराय || एतत्स्यरज्ञानं दुविनीताय दुष्टार्य शिष्याय 'जातु, कदा- चिन्न देयम् । तत्तु ज्ञानं गुप्त , रुतं सव सम्यक् फलार्य भवेत् सम्यक्फलतीत्यर्थः । अस्थाने दुष्टे शिष्ये स्थाप्यमाना दीयमांना वाचा, देवी सरस्वती कोपाद कोधात् । शिष्यं भस्मीकुर्यानो चिराय नो विलम्बेन शीघ्रमेव ते भस्मी- कुर्यात् ॥ ४॥ 7 'इस स्वरज्ञानको दुष्टशिष्यको कदापि न देना चाहिये और इसको अच्छे-फलके वास्ते गुप्त रखना चाहिये । यदि अपात्रको देदिया जाय तो वह सरस्वती देवीके कोपसे, विना. विलम्ब भस्म होजाता है ॥ ४ ॥ निर्दहेढुष्टं

-
(४)
समरसार-
विनयावनताय दीयमानो घंभवेत्कल्पलते सत्फ-
लायें । उपकृत्यनुचिन्त्यकानि शास्त्राण्युपकारस्य
पदं हि साधुरेखें ॥५॥
विवाविनीताय नताय विनयनम्राय शिष्याय दोयमाना
कल्पलतेव कल्पवृक्षलतेव सत्कलाय उत्तमफलाय भवेव
समर्था स्यात् । कुतः यतः शान्त्राणि उपकत्यनुचिन्त्य-
भवन्ति उपकत्यानुचिन्त्ययन्ति तानि उपलत्यनुचिन्त्य
कानि । उपकारस्य पद स्थान साधुरेव भवेन्नान्यः । तस्मात
साधोरेव उपकारः कर्तव्यः न दुष्टस्य । दुष्टस्योपकाराद्वैपरीत्यं
भवति ॥ ५॥
विनयसे झुकेहुए शिष्यको देनेसे अच्छे फलके वास्ते कल्प:
लताफी तरह बढता है । क्योकि चिन्तन करने योग्य शास्त्रोंका
उपकार करनाही उचित है । और उपकारके योग्य साधु ही
१२
जयपराजयचक्रमाह १,
५मे५ गं ३गा ३ गतिस्ते६९८६ ८६८धि'
९ तद्धः सर्गपण्डान्विताः काद्याख्यालीप्ते उभ-
मपि सुभटयो मवर्णोत्थसंख्ये । चारशेपेप्यशे
विजयपरिभवो दा ८प्तिशेपे" न० व ४ स्तेमा५सा
७ ली ३ का रिश्ता क्रमत इह मतोऽग्योऽय
इत्युक्तैमाद्यः ॥६॥

-- संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । " कादयोंका ९ शादयोंका पादयः पंच ५ कीर्तिताः। यादयोऽष्टौ ८ तथापाहर्गणकैर्बुद्धिमत्तरैः॥" कादयः अंका नवसंख्यका ज्ञेयाः तथा च क3--ख२-१३ fire ५४-५-६-छ ज ८ झ ९ दादयो नव ज्ञेयाः।- १२-१३-८४-१५-त६-२७-२८-५९ । तथा पादयः पंच ज्ञेयाः प3-फर-बर--भ४-म५-1 तथा यादयोऽष्टी ज्ञेयाः य-र२-ल ३-३४-श५-१६-स७-ह अक्षरः अंकाः बुद्धिमद्भिःअस्मिन्मन्थे ज्ञेयाः सर्वत्र । अन्यत्रापि "कटपयवर्गनवनवपञ्चाट, न-भ-ज्ञाः शून्यबोधकाः इति। " अन्यत्रापि-" कादिर्नवाका नवयदिरङ्काः पादिश्शरा यादि भवन्ति चाप्टौ।" ने शून्ये स्वराश्च शून्याः। इति । शम्मेगंगा इत्यादीनाम् अंकानाम् अधः-सर्गो विसर्गः अः। चत्वारश्च नपुंसकाः' इति वचनाद पग्ढा क क लु. ल. एतान्विना त्यक्त्वा, अन्यान् (स्वरान् अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं) एतान् तदयस्तेषाम् अंकानामधः एकादशसु कोष्ठेपु तिर्यक् लिखेत् । पुनस्यालीपु तिसृषु पंक्तिपु तदधः कावान् ककारः आदः येषां ते काद्याः वर्णाः डकारत्रकार- वर्जिताः हकारान्ताच तॉष्ठिखेत् । सुभट्योः शोभनभटयो शोभनशूरयोः नाम्नि ये वर्णाः स्वराश्च भवन्ति तेपाम् अंकाः एकीकर्तव्या। एवं द्वयोः अंकान् पृथक् पृथक् एकीसत्य पनि ..

समरसार- द्वान्यों भजेत् । यस्मिन्नेकशेपो भवति तस्य विजयीयत्र शून्यं तत्र पराजयः। पुनस्तं एवांकाः पृथक् पृथक् स्थाप्या भक्ता अष्टभक्ताः। भक्ते सति शेषांकाः यदि ऐते' भवन्ति । एते के-नव स्ते ६ मा ५ सा ७ ली ३ का परि २' एषाम् अंकानां मध्ये यस्य योधस्य अंकः अग्यः अग्रिमः भवति तस्याये च जेता यस्याने यः स जेता । एवमपि ज्ञेयम् । इति आदोः पण्उितैः ॥ बारह, आडी और सात उभी रेखा खींचकर प्रथम पंक्तिके ग्यारह कोठोंमें 'शं ५ मे ५ गं ३ गा ३ ग ३ ति ६ स्ते ६६८ ह ८६ ८ धि ९, यह लिखें । और इन अंोंके नीचे सर्व (विसर्ग ) और पण्ड (नकलल ) विना अच् ( अआइईउऊए ऐओऔअं) स्थापन करें और उनके नीचेकी पंक्तियोमें बिना क स ग आदिको लिखै तो " जयपराजयचक्र है । यह चक नीचे स्पष्ट लिखा है। इस चक्रसे योद्धाओंके नामके अक्षरीसे उठी हुई संख्यामे दोका भाग देने से यदि शेप रहे तो विजय और अशेप (०) रहे तो पराजय होता है। यदि उसी संख्या आठमा भाग दे और 'नव स्ते ६ मा ५ साली ३या १रि२१ इनमेसे कोई अंक वचे तो जिससे जिसका गागे हो उसीका विजय होता है, ऐसा पूर्वाचायोंने कहा है। उदाहरण। ग्रंयका आगय अच्छी तरह समझम आनेके लिये उदाहरण देना उदिन होता है । विन्तु उदाहरणरे पहले ग्रन्थकारके पारिभाषिक जाता संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । संख्यांक आदि विदित करना अत्यावश्यक है । क्योंकि मार्गभेद जान- लेनेसे गतिमें भ्रम या रुकावट नहीं होता है। प्रायः ज्योतिपनन्योंके गणितमें एक-दो-तीन-आदि संख्या- वाची अंकोंमें एकदिव्यादि अथवा भूभुजभुवानादि शब्द व्यवहृत किये जाते हैं । किन्तु समरसारकारने गोप्य और लाधवके लिये कटपयक्रम रचफर [क १-ख २-ग ३-४-ड ५-च ६-छ ५ज -झ ९१८ १-४२- ३-८४-ण ५-त ६-य ७-द ८-ध ९ । प-१-फ २- ३-भर-म५- । य१र २-ल ३-च' ४-श५-१६-स ७-ह ८ ] इन अंकोंसे एक दो तीन चार आदि संख्या के अंकलिये है। और जहाँ ९ से ऊपर 'दश, बारह, बीश या सौ दोसौ, हजार आदि' अधिक संख्या लिखनेका प्रयोजन पडा है वहाभी संकानां वामतो गतिः' मानकर इन्हीं अंकोंसे संख्यात्मक अंक लिये है। यथा-न० ४ १ से १०-२२थ ७ से १२-१४ र २3 २ से २२४-और लं ३ बो ४ द ८ र २ से २८४३ इत्यादि । इनके अतिरिक्त संख्यावाची और अक्षर यथास्थान पर चक्रोंमें दिये गये है। स्मरण रखने की बात है कि, चक्रोंसे अंक लेते समय प्रकरणके अनुसार वर्ण और मात्रा दोनों के संख्यावाची अंक लिये जाते है। बस अब इसका उदाहरण देते है।" । ऊपर जो लिखागया है कि, योदाओंके नामके अक्षरोंसे उठीहुई संख्या २ का भाग दे तो यहाँ इसके अनुसार राम और रावण इनका जय पराजय देखनेके लिये " नाममें रेफ, आकार, मकार, असार यह चार अंक है। चकमें इन अंकोंके ऊपरग३-मे५-शं. शं ५ यह अंक है। अतः इन सबको जोडनेते अठारह होते है । ऐसेही रावण" नाममें रेफ, आकार, वकार, अकार, णकार, अकार यह छ. अंक हैं। और चक्रमें इन अोंके ऊपर 'गं ३-मे ५-गं ३-शं ५- मेशा यह अंक है अतः इन सबको जोडनेसे उन्धीस होते- (८ समरसारं- हैं। इन १८ और २६ में पृथक् पृथक् ख अर्थात् दोका भाग देनेसे दोनों ही शेप नहीं बचता है । अतएव राम और रावणकी साम्यता आती है। (कदाचित इस उदाहरणसे कोई यह सन्देह करें कि राम- रावण तो रामका विजय हुआथा। यहां साम्यता क्यों हुई । इस- लिये सूचित करना पडता है कि यह साम्यता अनुचित न होनेपरभी आगे चक्रांतरसे रामकाही जय आता है। जयपराजय चक्रम् १. गा ति द ह स्ते ६ ३ ८ ९ अ आ RA Arry उ 15 ए ऐ ओ ओ भं क ख ग थे च ज झ ट ४ पण त थ न प ब ढ म र व स ह . न सा CA का १ ० . AN दाते शेषे० इसके अनुसार दोनोंका जयपराजय जाननेके लिये पहलेकी भांति राम रावणकी नामाक्षर संख्या १८।२६ में आठका भाग दिया तो २१२ शेष रहनेसे यहांभी साम्यताही है ।। ६ ॥ पुनः जयपराजयचकमाह । अङ्कौस्तुलारिभजतीधभुगानकाः स्यू रूपै १२ ई- तोऽक्षरमिती रहित विधार्य । तस्मात्पुन ८ हति- . -- संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । शेषबहुत्त्वतः स्योती स एव बलपैः सुधियों विधेयः॥७॥ तु ६ ला ३रि २ भ१ज ८ ती६ घ ९ भु४ मा ३ न० का ३' एते अंका एकादशसु कोठेप तिर्यक लेख्याः। पुनस्तदधः अकढम -आखणय -इगतर -ईघथल -उचदव-ऊछ धश एजनप -ऐझपस -ओटफह -औठन -अंडम इति क्रमेण वर्णा लेख्याः। पुनः द्वयोः अक्षराणां च स्वराणां च अंकान् तुलारिभजतीत्यादिकान् विचार्य स्थानद्वये भिन्न भिन्न लेख्यम् । पुनः रूपैः द्वादशभिः पृथक् पृथक् रहितं वर्मितं विधाय कृत्वा । द ८ हृतिशेपबहुत्वतः देन अष्टभिर्हरेत् हुने सति यस्यांकबाहुल्यम् अवशिष्टं भवति तस्य जयो भवति । यस्य स्वल्पाको भवति तस्य पराजयो भवति । सुधिया सुबु- दिना राज्ञा युद्धादौ स एव बलपः सेनापतिविधेय इति ॥ ७॥ तु ६-ला ३-रि २- भ४-ज-ती-ध ९-भु ४-गा ३- न०-कार- इन अंकोंको पहलेकी भांति ग्यारह फोठोंमें लिख- कर उनके नीचे पूर्वोक्त अच् आदि लिखे तो " जयपराजय बनजाता है । इन अंकोसे दोनों योद्धाओंके नामाक्षरोंकी पृथक् पृथक सरल्या आवे उसमें बारह घगवे और शेपमें आठका भाग दे तो जिसका शेष बहुत हो उसीका जय होता है। अतएव सुन्दर बुद्धिवाला राजा इसमकार विचार कर सेनापति नियत करे ॥ ७॥ उदाहरण। जिस प्रकार पहले (५-मे५-गर-गा-३ ) से अंक लियेये उसी प्रकार यहाँभी तुलारिभजहीसे राम-रावण-के अंक लिये तो चक्र समरसारं- T र २- आ३- म६-, रामके १७ और गा३३८- अ६ ३- अ६-, रावणके २८ आये। इनमें पृथक् पृथक् बारह घटाये तो रामके ५-रावणके १६ बचे । फिर इन ५। १६ में आठका भाग दिया तो रामके ५ और रावणके रहे अतएव यहाँ, श्रीरामचन्द्रकांही जय प्राप्त होता है।॥७॥ पुनः जयपराजय चक्रम् । भ गा रि २ be न ती ६ का १ veut ८ ९ . इ ई क घ व झ ट 10 ड त थ न प फ ब भ म म अ य र व श प -- स ० two अथापर जयपराजयचक्रमाह । वर्गाएकांकां दशतिघासकालारितद्युतौँ । नाम्रो सभाजितायां स्याद्विजयोऽधिकशेप ॥ ८॥ अकचटतपयशाः ' अष्टौ वर्गा अष्टसु कोटेषु कमेण लेख्याः कथं तदाह-प्रथमकोटे अकारायाः पोडशस्वरा लेख्याः । द्वितीयकोष्ठे कर्गः (क स ग घ.) तृतीय- - संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (११) कोष्ठे चवर्गः (च छ ज झान) चतुर्थकोठे स्वर्गः (टट ढण) पंचमकोठे तवर्ग: ( त थ द ध न ) पठे पवर्गः (प माय मम) सप्तमे यवर्गः (य र ल व ) अष्टमे शबंगः (श पस THTT ई) एवम् अष्टांना वर्माणों वर्णान अधो लिखित्वा अष्टसु कोठेषु, पुतस्तेषां को छानामुमरि 'दशतिघासका लारि२ एते अंकासक्रमेण लेख्याः। युन: इयोर्योपयो नो वर्णानां स्वराणां च अंकयुति पृथक पृथक् विधाय कृत्वा सेन सन- भिहरेव । यस्य नानि अधिकाक शेषस्तिष्ठति तस्य विजयः यस्य न्यूनांकस्तस्य पराजय इति ॥ ८॥ द-श-ति-पा-स-का-ला-रि ' इन अोंके नीचे अवर्गादि क्रमसे आठ वर्ग लिखें तो "जयपराजयचक्र बनजाता है, इसमे भी पूर्ववत् दोनोंके नामाक्षरोंसे अक लाकर पृथक् पृथक सातका भाग दे तो जिसका शेप अधिक रहै उसीका जय होता है ॥ ८॥+ + उपरोक्त शंमेगंगे-अकास्तुलारि-वर्गाष्टकाका-' दिसे दो योद्धाओंके जय पराजय विदित हानेका उल्लख कियागया है कि तु दोदोसबधी यापी, स्थायी, वादी, प्रतिवादी और मल्लादिकोंमेभी इनकायोजना हासकताहै। किसी बातपर दो शास्त्री अडरहेहैं इनमें किसका पक्ष रहेगा, कुछ घरेलू झाडा ঔষধ এখী সাধারণ লেদ ল' জাল, দিন গুলি मनुष्योंने प्रण ( शत) वदी है, इनमें किसको लाभ होगाइयादि १ बातोंका इनसे समुचित निश्चय होसकता है। प्रतीतिके लिये तीन उदाहरण दते हैं। यथा-धर्मप्रदीपको निस्तब्ध या प्रदीप्त करनेके लिये माधव और यादव शास्त्रीमें शास्त्रार्थ चलरहाहै इनमें किसका पक्ष सत्य रहेगा ? यह जाननेके लिये। २ " T (१२) समरसार-- उदाहरण। यथा 'राम-रावण' के नामाक्षरों की संख्या लानेमें रामका रेफ सप्तमवर्गीय है और इसका अंक ला से ३ है । आकार प्रथमवर्गीय है इसका अंक दकारसे ८ है ! मकार पष्ठवर्गीय है इसका अंक ककारसे १ है । अकारका पूर्ववत् ८ है । इसभाँति रामनाम संख्या २० है और रावणमें इसी. मकार र ३-आ ८-३-अ८-पर-अ८-' नाम संख्या ३४ इन दोनों २० १ ३४ में सातका भाग दिया तो शेष ६६६ बचनेसे परस्परमें साम्यता आती है ॥ ८॥ ९ १ ५ . - १ -'शंमेगंगा' के अनुमार'म-आ-ध-अ-व-अ' माधवको सख्य २९ और 'य-आ द अ-न-अ यादवकी संख्या २६ इन २९।२६ में २ का भागदियातो माधवका ? और यादबका ० इस शेषमें माधवका अधिक शेष रहनेसे इसीका पक्ष सत्य रहेगा। दुकान के आय व्यय विषयपर गोपी और हरी मुकदमा कररहे हैं इनमें कौन जीतेगा ? यह जानने के लिये 'तुलारिभजती' के अनुसार 'ग-ओ-प-ई- गोपीको सख्या १३ 'ह-अ-रई' हरीकी सख्या १५-इन १३ । १५ में पृथक् २ बारह घटाये तो १ १ ३ रहे इनमे आठका भाग दिया तो ११३ शेष रह- नेसेहरीका शेष अधिका है अतएव हरी मुकदमा जीतेगा। बेगसे बहतीहुई गगामे इस तीरसे उस तीरपर शीघ्र तैरकर जानेके लिये कछिया और बछिया में सो सौरपयोंका शर्त वदी है। इनमे किसको लाभ होगा यह जाननेके लिये 'वर्गा- टकांका' के अनुसार क अ छ इ-य-आ' कछियाको सख्या ३८ और व-अ छ-र-य आ ' बछियाको सख्या ३४ इन ३८१३४ मे ७ का भाग दिया तो १६ शेष रहनेसे बलिया शीघ्र तैरकर १-०) पारितोषिक पावेगा। इन उदाहरणोमें पृथक् २ चक्रोसे जो अक लिये हैं सो केवल दिखाने के लिये लिये हैं । पृथक् र लेनेका कोई नियम नहीं है । किमीमी एक चक्रसे सर बातें देखी जासक्तीहैं।

संस्कृतीका-भाषाटीकासमेतम् । अपरं जपपराजयवक्रम् । द ६. ७ १ ३ अआइई मर ट प उ. ठ २ ल लाल ए ऐ ग द स ओ औ अं -4 श ध व ह र ण न म 11 - इति समरसारे जयपराजयचिन्तामकरणम् । कुला-कुल-कुलाकुलमणमाह । मूलाभिजिदम्बुपोड दशमी पष्टी द्वितीया बुधो राज्ञोः सन्धिकरः कुलाकुलगणः स्थानोर्जयार्थे कुलः । मासाख्यास्थितभाँनि शेषतिथयो युग्माः कुजो भार्गवः संघो न्यो" कुलसंज्ञको विजयते। तस्मिन्प्रयातो" ध्रुवमें ॥ ९॥ मूलम्, आद्रों, अभिजित, अंबुपः, शतभिषा एतानि उडूनि नक्षत्राणि; पठी, द्वितीया, दशमी एताः तिथयः बुधवासरश्च कुलाकुलगणः, अयं योद्धुमिच्छतोईयोः गतो, 1 - . PRAMMARo- - - , - (१४) समरसार-1 भूपयोः सन्धिकरः प्रीतिकरः स्यात् । मासाख्यास्थितभानि चैत्रादिमासानाम् आख्या नामानि-तैर्नामभिः स्थितानि भानि तानि कानि ? चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वापाढा, श्रवणः पूर्व- भाद्रपदा, अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरः, पुष्यः, मघा, पूर्वा- फाल्गुनी एतानि मासाख्यास्थितभानि, शेपतिथयो युग्माः चतुर्थी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी, कुनः भौमवारः भार्गवः शुक्रवारः कुलगणः, अय स्थानोः स्थायिनः जयार्थ जयार्थी भवति । अन्यः शेषतिथिवारनक्षत्रसमूहः अकुलगणः। सांकः ? प्रतिपत, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या एताः तिथयः। रवि-चन्द्र-गुरु-शनयो वाराः। भरणी, रोहिणी, पुनर्वसु, श्लेषा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती, उ. पा, उ. भा, उ. फा, अयं तिथिवार- नक्षत्रसमूहः अकुलगणः । अस्मिन् गणे प्रयातो यायी विजयते विजयं पामोति ॥ ९॥ मूल, आर्द्रा, अभिजित्, शतभिषा, यह नक्षत्र-दशमी, पष्टी, द्वितीया, यह तिथि और वुधवार-इनकी कुलाकुल सज्ञा है । इसमें युद्धकी इच्छा करनेवाले राजाओंके परस्परमें सन्धि होजाती है। और महीनोंके नामवाले-चित्रा, विशाखा, जेष्टा, पूर्वापाढ, श्रवण, पूर्वाभाद्रपद, अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिर, पुप्य, मघा और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र, त्या शेफ्युम यती, मामी, शादी, रतुर्दशी, तिथि और मगल, शुक्र वार इनकी संज्ञा है। इसमें 'स्याई (जिसपर दूसोने चढाई की है और वह अपने राज्यमें बैठा है उस ) राजाका जय होता है, और अन्यसंघ-भरणी, रोहिणी, पुनर्वसु, - , , .

संस्कृतटीका मापाटीकासमेतम् । आश्लेषा हस्ते, स्वाती, अनुराधा, धनिष्ठी खेती, उत्तरांपाद, उत्तरा- भाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी प्रतिपदा, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावास्या-सूर्य, चन्द्र, गुरु, शनि इनकी "अकुल संज्ञा है। इसमें युद्धरिम्भ हो तो यायो राजाको निश्चय विजय होता है ।। ९rr- -1-1 :-* कुला: कुल-कुलाकुलगणचक्रम् । म. आ. भ. श.-२१४६।-बुध. कुलाकुलगणः सन्धिः। . जयः ॥ चि. वि. जे.पूषा.ध.पू. भा. अधि.कृ. स्थायि- कुलगणः ए. पुष्य, म, पूफा.-१।८।१२।१४ मं.शु. भ.रो.पु.ल.उफा.ह.स्वाऽनु.उपा.प.उभा.रे.अकुलगणः यीपि, १३५१७।६।१।१३।१५।३० म.चं..श. -- जयः। १ . .. -सकलस्वरशिरोमणि वर्णस्वरमाह। पंचोंणेस्वरीः कछडधभवमुखेप्पणभव्याने स्युनन्दोदेस्तिथेस्ते, तिथिकपिलवतोप्यन्तराभोग; भाजः । नामों" बालः कुमारो युवसजरमृतास्त्वादि- वात्स्वरास्ते" सिद्धयुत्को"युवान्तो ऽपय इत.. रयोयुर्खयता" द्विण्मृताचि ॥१०॥ पश्चाणेइस्वराः मण-एअत्याहारानभूताः ये स्वराः अ इ उ-अणत्याहारः ए ओ इति एड्भत्याहारः एवम, .. - समरसार- अइ उ ए ओ इति पंच स्वराः क छ ध म वाः मुखे आदौ येपान्ते तेषु पञ्च स्वराः लेख्याः । केषु वर्णेषु तदाह-अकारस्याधः क-छ-ड-ध-भवाः वर्णाः लेख्याः। इकारस्यापः ख-ज-ढ-न-म-श-वर्णाः लेख्या: । उकारस्पाय ग-झ-त-प-य-प वर्णा लेख्याः । एकारस्याधः घ-ट-थ-फ-र-स- वर्णाः लेख्याः। ओकारस्वाधः च-ठ-द-ब-ल-ह-वर्णा लेख्याः। ते स्वराः नन्दादितिथेः स्युः कथं तदाह - प्रतिपदा, पष्ठी, एकादशी आसां तिथीनाम् अकारः। द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी, आमाम् इकारः। तृतीया- इटमी- त्रयोदशीनाम् उकारः। चतुर्थी- नवमी- चतुर्दशीनाम् एकारः । पंचमी- दशमी- पूर्णिमातिथीनाम् ओकारः । तिथिकपिलवतः तिथीनां कपिलवः एकादशांशप्रमाणेनैकैकस्वरभोगः । ततथैकैकस्यां तिथावेकैकस्वरभोगः घ.५५. २७ एवमहोरात्रव्यापिन्यां पटि- घष्टिकात्मकायां नन्दायां प्रातरारराय पञ्चघटिकादिकाले अकारस्य भोगः । तदनु तावत्येव काले इकारस्य । तथैव उए ओ एपांतावति तावति काले भोगः । एवं पञ्चस्वरभोगकाल: घी २७ पल १६ पुनरकारादिः पंचस्वराणामेतावत्येव काले भोगस्तेन भुक्तघटयः ५४ पलानि ३२ पुनरकारभोगस्ता- पत्येव पंचघटयादिकाले तेन पष्टिघटिकाः अहोरात्रजाः पूर्णन्ते । पुनर्भदायां तिथौ प्रातरारायेकारस्य भोगः। तत उका रादीनाम् । एवं जयायामुकारादीनाम् । रिफायामेकारादी- - - संस्कृतटीका-भाषाटोकासमेतम् । (१७) नाम् । पूर्णायामोकारादीनाम् । यस्य स्वरस्य या तिथिस्तस्य त्रिभोगोऽन्येपां द्विििरति भावः। सम्प्रति स्वरावस्थामाह-नाम्न इति । स्थापियाम्पादि- नाम्नार्य आवो वर्णस्तत्वामी यः अकरादिः पंचानांमध्ये स्वरः स बालः, तदग्रिमः कुमारः, तदम्यो युवा, वृद्धः तदम्यो अग्यो मृतः एवं ग्राह्याः । स्वरादिकानामच्युतादिनानां तु वर्गाभावाव आकारादिरेव वर्णस्वरो प्रायः । एतत्फलमाह-सिद्धीति । बालस्वरभोगकालारधकार्यात् कुमारस्वरभोगकालारयकार्य- ऽधिका सिद्धिः। एवं कुमारकाला युवकाले सिद्धचाधिक्य- मिति युवस्वरान्तः सिद्धेकपः । इतस्योवृद्धमृतयोः सिद्धेस- कर्पः । इति स्वयुवस्वरभोगकालं ज्ञात्वा कार्यारम्भः कार्यः । एतत्कृत्यमाह-युद्ध्यतामिति । शत्रोताचि मृतस्वर- भोगकालोदये युद्ध्यतां युद्धं कुर्वतां स्वयुक्सरे च तदा जप इति भावः । उनच-" शवोमुत्युस्वरे प्राप्ते यूनि माने स्वकी- यके । तत्काले प्रारभेद्युद्धं विजयो भवति ध्रुवम् ॥३॥ तथा च बालस्वराघुदये रुत्पविशेपे फलमुक्तं नरपतिजयचर्या- याम्-" किश्चिलाभकरो वाल: कुमाररत्व लाभदः सर्वसिदि। युवा प्रोक्तो वृद्ध हानिमते क्षयः ॥ यात्रायुद्धे विवादे च नष्टे दृष्टे रुजान्विते । बाल: 'सरो भवेढुष्टो विवाहादि- शुभेऽशुभे ॥ २ ॥ सर्वेषु शुभकार्येषु यात्राकाले तथैव च कुमारः कुरुते सिद्धि संग्रामे सक्षतो जयः ॥ ३ ॥ शुभाशुभेषु - . . (१८) समरसार- सधु मंत्रयंत्रादिसाधने । सर्वसिद्धिं युवा दत्ने यात्रायुद्धे विशे- पतः॥ ३ ॥ दाने देवार्चने दीक्षागृहमंत्रभकलने । वृद्धस्वरो भवेद्रव्यो रणे भङ्गो भयं गमे ॥ ४ ॥ विवाहादि शुभं सर्व संग्रामाघशुभं तथा । न कर्तव्यं नृभिः किञ्चिजाते मृत्युः स्वरो- दये ॥ ५ ॥ मृतो वृद्धतथा पालः कुमारस्तरुणः स्वरः । यथोत्तरबलाः सर्वे ज्ञातव्याः सरवदिभिः ॥ ६॥" इति । यत्र नन्दादितिथीनां कपिलवो यल्लिखितस्तत्पष्टिपटिकात्मकतिथि- भोगेन न्यूनाधिके तु त्रैराशिकमूत्यमिति ॥ १० ॥ अ-इ-उ-ए-ओ-' यह पांचांस्वर ड-ग-अ-बिनाक-छ--ध-भ-च प्रमुख वॉके स्वर है । अथात् ' कधभव ' इन अक्षरोंका अ स्वरहै। (१) अइउपओ यह पाचो स्वर सर्वत्र व्याप्त है। अतएव केवल इन्हीं पाचोरे सम्यय ज्ञानसे मनुष्य सर्व शुभाशुभ कथनमें समर्थ होसकता है । अपना प्रयोजन साधनेवालोंको उचित है कि जो कार्य देव, तात्र, शक्ति और गध आदि जिसकिमी सम्बन्धी हो उसको उसी देव, शक्ति, गन्धादिक उदयस्वरमे करे तो कार्यको सिद्धि होसकती है। यथा ब्रह्मासम्बन्धी प्रयोगादि ' अ ' मे, विष्णुसम्बन्धी 'इ' मे, रुद्र सम्बन्धी 'उ' में सूर्यसम्बन्धी 'ए' मे और चंद्रसम्बन्धी 'भो करनेसे सिद्धि होती हैं। ऐसेही ' अ ' में इच्छा, 'इ' ज्ञान, श्रद्धा, और 'ओ' मेधा यह शक्ति फलीभूत होती है । 'अ'ग चौकार, '' में अर्द्ध, 'उ' में त्रिकोण, 'ए' में पदकोण, और 'ओ' में वर्तुलाकार चत्र में पूनादिक उचित है। के उदयमे पृथ्वीगत, ' के उदयमे जलगत, '' के उदय, अग्निगत, '९' के उदयमे वायुगत और 'ओ' के उदयमें आकाश (६ ) गत प्रश्न होतेहैं । और 'अ'गन्ध,३' रस, 'उ'रूप, 'ए' स्पर्श, और औ' में शब्दविषयक प्रदन कहे जाते हैं । इस प्रकार अका. रादि स्वरोंके उदयम तत्तासम्बन्धी प्रदनों शुभाशुभ पहना चाहिये। में प्रभा, ''मैं . - - संस्कृतीका-भाषाटीकासमेतम् । (१९) .'खजबनमश' इनका इ स्वर है। 'गझतपयष' इनका उ स्वर है। 'घट्थ फरस, इनका ए स्वर है । और 'चठदवलह ' इनका ओ स्वर है। ऐरोही नन्दाआदि तिथियोंक भी यही स्वर हैं, यथा-गन्दा ११६ । ११ का अ-भद्रा२।७।१२ का इ-जया ३।८।१३ काउ,- रिक्ता ४।९।१४ का एक और पूर्णा ५ । १० । १५ का ओ स्वर है। और नंदाआदि प्रत्येक तिथिमें तिीयके सर्वमान घटी, पलके 'एकादशांश" प्रमाणसे इसी प्रकार यही स्वर अंतर स्वर होते हैं। (याद तिथि ६० घड़ी प्रमित हो तो उसका एकादशांश ५ घडी २७ पल होताहै और यदि तियि न्यूनाधिक हो तो एकादशांशभी न्यूना- धिक होताहै।) अतः ६० घडी मामत नन्दातिथिमें प्रातःकालसे आरंभ करके ५१२७१ तक अकार स्वर । पांच घडी सत्ताईम पलसे १० १५४ तक इकार स्वर और पीछे इसी तरह उकार एकार और ओकार सर होते हैं । और ऐसे ही फिर इतनी इतनी घडी पलादिक अंतरसे अड्डएओ और फिर अस्वर होजाते हैं । ऐसे ही सब तिथि- याम जानने चाहिये। नोमके आदिवर्णका जो स्वर है उस स्वरसे आदि लेकर पांचों स्वर चाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत होते हैं। यया नामादिवर्ण (२)'क' का 'अ'बाल, इ, कुमार, 'युवा १ नाम वह लेना चाहिये जिसके सवारण आदमी सोताटुआ जाग उटे, यदि रिमी भादीके अधिक नाम निरुल चुके हों तो उनमें जो वर्तमानमें नाम हो वा लेना चाहिये । (२) नामका आदि वर्ण यदि सयुक्ताक्षर हो तो उसमें प्रथम अक्षरका स्वर लेना चाहिये । यथा श्रीधर' मेंश, 'कृष्ण में क, 'प्रद्युम्न ' में प, आदि-और यदि आदिवर्ण 'अठाएओ' में हो, तो उममे वही ले लेना चाहिये । पया- 'अपुत' में अ, ईश्वर' , 'उत्तानपाद ' में उ, एकवती' में ए, और ओंकार' में ओ, इत्यादि। . -- . (२०) समरसार- 'ए' वृद्ध और 'ओ' मृत होताहै । ऐसेही 'ख का'ई'बाल, कुमार 'ए युवा ''ओ' वृद्ध और 'अ'मृत होताहै । इसी प्रकार सबसे जानना चाहिये (१)। युरा स्वरके अंत तक सिदिम उत्कर्पता और वृद्ध, मृत में अपचय होता है अर्थात् बालसे कुमार श्रेष्ठ और कुमारसे युवा अधिक श्रेष्ट होता है और इनसे वृद्ध नेष्ट और वृद्धसे मृत अधिक नेष्ट होता है। यह फल जानना चाहिये। यदि अपना युवा और शत्रका मृत स्वर जानके युदारंभ किया जाय तो सिद्धि होती है ॥ १० ॥ वर्णस्वरचक्रम् । बाल कुमार युवा वृद्ध मृत ६ ए ओ क सर ग घ च झ ट ज द न to her त थ घ प व भ म य व श स नन्दा मद्रा जया रिक्ता पृर्ण १६/११२१७१०३२८१३४१९/१४/५/१०॥१५॥ (१) जिस नामका जो स्वर हो वह बाल, दूसरा कुमार, तीसरा तरुण, चौथा वृद्ध और पाचवा मृत होता है। यथा--रामका 'ए' स्वर है अत इनका 'ए' बाल, 'ओ' कुमार 'अ' युवा 'ए' वृद्ध और 'ए मृत स्वर है। यह चश्मे स्पष्ट लिखा है।

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (२१), वर्णस्वरचक्रम् । 17. स्व. I बाल युमा 22 मृत व. घ एआ इउ ए ओ अ कथा ए सइओ अ गए भी घ ए ओ अ! च ओ अ६ पाउ फाएओ घो उस भाउए आ इस चक्रस सब पणाकबाल, कुमार, यु वृह, मृतस्वर यह स्पष्ट जाने जाते है। एआ याए छाउ रएभी ठ ओ अ ल ओ अ इ उ ए. वा घाइएभी प[3ए भी ताएओ अ साए आ[13 घाए ओइ दओ अचाए भा। . अकारादीनां महाशिकेशवं ननद्राशाबुदयं चाह । भौमेनयोज्ञशशिनाचे गुरोमँगोस्तें क्षेत्रे शने- रुदयिनोऽथ नवांशकेऽजात् । भारे २४ करे २१ तु परतोत्तिमभादिसप्तस्वादित्यतैस्त्विमुसी अपि पंचके ॥ ११ ॥ पूर्वश्लोकन वर्णस्वराः कथिताः । अनेन श्लोकन ग्रहराशि- नक्षत्रस्वराः पोच्यताम् । भीमेनयोः भीमभास्करयो भने (२२) समरसारं- राशी मेपवृश्चिकसिंहेषु अकार उदयी भवति । शशिनोः बुधचन्द्रयोः क्षेत्रे मिथुन-कन्या-कर्क-राशिपु इकारस्पोदयः । गुरोबृहसतेः धनुर्मानयोः उकार उदयं भानोति । गोः शुक्रस्य क्षेत्रे तुलाबृपयोः एकारस्पोदयः । शनेः क्षेत्र मकरकुम्भयो: ओकारस्योदयः । एतेषां राशीनां स्वामिनो ये ग्रहाः अकारादीनां स्वामिनो भवन्ति । एवं ग्रहराशिस्वराः प्रोक्ताः । अथ नवांशेशत्वमाह। अजान्मेपादारपि भारे चतुर्विंशतिनवां- शानां मध्ये मेपस्य नवांशाः वृपस्य नवांशाः मिथुनस्य पडशा- स्तेपु यस्य जन्म भवति तस्याकारः स्वामी । परतः इकारादौ करे२१ एकविंशतिनयांशा ज्ञेयाः। इकारे मिथुनस्य त्रयोंशाः, कर्कस्य नवांशाः, सिंहस्य नवांशाः उकारे कन्यायाः नवांशाः, तुलायाः नवांशाः, वृश्चिकम्य अयोशाः। एकारे बृश्चिकस्य पडशाः धनुपो नवांशाः मकरस्य पडशाः । ओकारे मकरस्य त्रयोशाः, कुंभस्य नवांशाः, भीनस्य नवांशाः । एवम् अंश- स्वराः प्रोकाः । अथ नक्षत्रस्वराः भोच्यते । अन्तिमभादि- समसु रेवत्यादिसमसु नक्षत्रेषु अकारः स्वामी । आदित्यतः पुनर्वसुतः इउमुखाः इकारोकारायाः । उक्तं च-पुनर्वसुतः पंचसु इकारः । उत्तराफाल्गुनीतः पंचसु उकारः । अनुराधातः पंचसु एकारः । श्रवणादिपंचसु ओकार: स्वामी । नक्षत्र- स्वर इत्यर्थः ॥ १३॥ मंगल, सूर्य, बुध, चन्द्र, वृहस्पति, शुक्र और शनि इन ग्रह वारायः तथा इनकी राशियोंके अ-इ-उ-ए-ओ यह क्रमसे , संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (२३) उदयस्वर होते हैं । एवं मेष राशिसे चौबीस और बाकीके इक्कीस २ नवांशामें अ-इ-उ-ए-ओ नवांशेश होतेहैं। और रेवती आदि सातमें अ तथा पुनर्वसु आदि पांच रे में क्रमसे इ-उ-ए-ओनक्षत्रस्वर होतेहैं । यह सब नीचेके चक्रमें स्पष्ट लिखे हैं ॥ ११ ॥ प्रहराशिनवांशनक्षत्राणां स्वरचक्रम् । अ इ आ वारा: भाम, सूर्य, बुध. चंद्र गुम. शुक्र शनि. मेप, पृश्नि-पन्या, मि धनुर्मान. धूप, तुला. मरर, क, सिंह. थुन, कर कुम्म. मे. ९पृ.९ मि. ३ क्-कन्या तु. वृश्चिक ६,म.३i.९ नवांशाः मिथुन ६ र सिं.९९ पृश्चि.३ ३.९ म. मी.९ निक्षराणि रेवन्याटि पुनर्वसु- उ.फा. अनुराधा प्रणादि आदि ५ ७ ५ उदाहरण । ग्रहस्वर-“देवदत्तका " ग्रहस्वर क्या है ? यह जानने के लिये देदोचाची रेवती इसके अनुसार रेवतीकी मीन राशि है और मीनका सामी वृहस्पति है अतः चक्रम बृहस्पति उकारके नीचे होनेते देव- दत्तका ग्रहस्तर उकार है। राशिम्बर-नीयायीयू ज्येष्ठाके अनुमार यजदत्त वृधिक गारी होती है और चम्म वृश्चिक राशि अयारफे नीचे है अतः यादतका गाशेम्बर अहे।

(२४) समरसार- नक्षत्रस्वर-गोशाशीशु शतभिषके अनुसार 'श्रीनिवास" का शतभिषा नक्षत्र है और यह चक्रम ओकारके नीचे है । अतः श्रीनिवासका नक्षत्रस्वर ओ है। दादशाव्दादीन् पञ्चस्वराणामाह । रूपान्देपंथ हायनतुषु च ते तत्काथ भागान्तरा- भुत्यौवाच्यऽपरेयने व इरिमों कृष्णान्ययोः पक्षयो।राधे भाद्रपदे सहस्य इरिपापाढे नभस्यु- मधौ पौपे थैरपि शुक्र उर्ज उदयी" माघान्त्ययो"- रो" स्तथा ॥ १२॥ अस्मिन् श्लोके द्वादशवार्पिक स्वर-वार्षिकस्वरा-ऽस्यनक्षत्र- स्वर-ऋतुस्वर-मासस्वर-पक्षस्वरानाह-रूपाब्दाः दादशान्दा- स्तेषु रूपान्देषु द्वादशतु वपुप्रभवादिषु अकार उदयी भवति । प्रमाथ्यादिषु द्वादशवप इकारः स्वामी । खरादिद्वादशवत्स- रेषु उकार स्वामी। शोभनादिपु द्वादशवर्षे पु एकारः स्वामी। राक्षसादिषु द्वादशवर्षषु ओकारः स्वामी । येषु वत्सरेषु यस्य जन्म भवति तेषां संवत्सराणां यः स्वामी भवति । सरमारस्य द्वादशाब्दिकस्वरो यालादिः ज्ञातव्यः । अथ वार्षिकस्वरमाह-भभवादयपु अकारादया उदयं प्रानुवन्ति । प्रभववर्षे अकारः सामी, विभववर्षे इकारः स्वामी, शुक्लप ओकार: स्वामी, प्रमोदवर्षे एकारः स्वामी, प्रजापति ओकारः स्वामी, पुनः अंगिरति वर्षे अकारः, श्रीमुखवर्षे इकारः, भाववर्षे उकारः, युवसंवत्सरे एकारः, " - संस्कृत टीका-भाषाटीकासमेतम् । (२५) धातृसम्वत्सरे, ओकारः । एवम् ईश्वरादिवर्षेषु पंचसु अका- रायाः । पुनः चित्रभान्यादिपंचसु अकाराद्याः । हेमलम्बादि- पंच वर्षेषु अकारायाः । पुनः शुभकदादिपंचसु अकारागाः। पुनः पिंगलादिपंचसु अकारावाः । पुनः दुंदुत्यादिपंचसु वर्षेषु अकाराद्याः स्वामिनः । एवं पंचसु वर्षेषु अकारायाः स्वामिनो भवन्ति ।' तत्कायभागान्तराभुत्त्या 'तेपां कायभागः एकादशांशः स एवान्नरामुक्तिः । अन्तरोदयाः दादशवापिक- स्वरे अंतरामुक्त्या अंतरोदयेन स्वरा ज्ञातव्याः । तमेवान्तर- माह-एको वर्षः, एको मासः, दिनद्वयम् , जयश्चत्वारिंशदयः, अष्टविंशत्पलानि । एवं पुगदिशवारं स एव । एतापन्निादश- वर्षस्प अस्वरे अन्तरोदयः । अथ वर्पस्वरे अन्तरोदयः-एको मासः, दिनद्वयं, जयश्चरिंशदघटया, अष्टात्रिंशत्पलानि । एवं पुनपिशवारम् एतावद्भिर्मासदिनपटीपलैः अन्तरोदयः स्यात् । अथ ऋतुस्वरमाह-वसन्तुमारस्य दिसततिभिर्दिनः एकैकस्य ऋोरुदयः स्यात् । वसन्तोः पष्टिदिनानि, ग्रीष्मर्ताः द्वादशदिनानि यावदकारस्योदयः । मीष्मतारष्टचत्वारिंशदिनानि वर्षश्चितुर्विशतिदिनानि यादिकारस्योदयः । वर्षाः पति- शदिनानि, शरतोः पत्रिंशदिनानि यावदुकारस्योदयः । शर- हतोश्चतुशितिदिनानि, हेमन्तस्याप्टनत्वारिंशदिनानि यावरे- कारस्योदयः । हेपन्तस्य द्वादशदिनानि, शिशिरतोंः पटिदिनानि यावदोकारस्योदयः । एवम् मन्तुस्वराः मोक्ताः। ऋतुस्वरमध्ये एकादशांचनान्तरोदयः-दिनानि पद, द्वात्रिंशद यस्यः, त्रिच- बारशालानि, अनेन प्रमाणन एकादशाननरोदयाः भान्ति । - " (२६) समरसार- अथायनस्वरमाह-अयाचि दक्षिणायने अपरे सौम्यायने तु अ-इ-इमी स्वरौ भवतः । उक्तं च-दक्षिणायने अकारः स्वामी, उत्तरायणे इकारः सामी । अस्मिन्नयने स्वरे अन्त- रोदयः-पोडशदिनानि, एकविंशतिघंटयः, एकोनपञ्चाशत्त- लानि । अथ पक्षस्वरमाह-इमौ अकारेकारस्वरी रुष्णान्ययोः पक्षयोः स्वामिनी भवतः । उक्तं च ष्णपक्षे अकारस्वोदयः शुक्लपक्षे इकारस्योदयः । अत्र पक्षस्वरे अन्तरोदयः एक दिनम्, एकविंशतिघटिकाः, एकोनपंचाशसलानि, अनेन प्रमा- णेन एकादशांतरोदया भवन्ति । अथ मासस्वरमाह-राधे वैशाख, तथा भाद्रपदे, सहसि मार्गशीर्ष अकारः स्वागी । इपे आश्विने, आपाढे, नभस्ये पावणे इकार उदयं प्रासोति । मधी चैत्रे, पोपे च उकार उदयी भवति । अथानन्तरं शुक्रे ज्येष्ठे, ऊर्ने कार्तिक एकार उदयी भवति । माधः प्रसिद्धः अन्त्यः फाल्गुनः तयोः माघान्त्योः ओकार उश्यं पामोति । अगापि मासस्वरे अन्तरोदयः पूर्ववज्ज्ञातव्यः, दिनद्वयं, त्रिचत्वारि- शघट्यः, अष्टात्रिंशत्सलानि । अनेन श्लोकेन द्वादशादिक- वार्पिकायनऋतुमासपक्षस्वराः सान्तरोदयाः कथिताः। दिनस्व- रघटीस्वरौ पंचाणेड' इति श्लोकेन पूर्वमेव कथितौ ॥१२॥ प्रभवादि बारह बारह संवत्सराम अ-इ-उ-ए-ओ यह क्रमम द्वादशवार्षिक स्वर होते हैं। और प्रभव विभा आदि प्रत्येक वपमें अ-र आदि पांचा स्वर वार्षिक स्वर होते हैं। और वसन्त आदि पद ऋतुआम इनकं ३६० दिनांक पंचमांश (बहत्तर दिन ) प्रमाणसे अ-३ आदि पांचा स्वर ऋतुम्घर होते हैं। तथा इन - संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (२७) दादशवार्षिक, वार्षिक और ऋतुस्वरांके मध्यमें एकादशांग प्रमाणसे यही स्वर अंतरस्वर होत है। (दादावार्षिकका १ वर्ष, १ मास २ दिन ४३ घडी, ३८ पल एकादशांश होता है। वार्षिकका १ मास, २ दिन, ४३ घडी, ३८ पल, एकादशांश होता है:-और+ऋतु स्वरका ६ दिन, ३२ घडी, ४३ पल, ३८ एकादशांश होता है।) दक्षिणायनका अ और उत्तगयणका इ, यह अयनस्वर होते है । एवं कृष्णपक्षका अ, और शुक्लपक्षका इ, यह पक्षस्वर होते हैं। और वैशाख, भाद्रपद, मार्ग- शीर्षका अ-आपाढ आश्विन, श्रावणका ई-चैत्र, पौषका उकार्तिक ज्येष्ठका ए; और माघ, फाल्गुनका ओ, यह मासस्वर होते हैं। इनमें भी (अयनका १६ दिन, २१ घडी, ४९ पल एकदशांग होता है। पक्षस्वरका १ दिन २१ घडी, ४९ पल एकादशांश होता है, और मासका २ दिन ४३ घडी ३८ पल एकादशांश होता है)। + ऋतुगणना-सौरमान और चान्द्रमान दोनोसे कोजाती है, यधा सौर- मानके अनुसार-" मृगादिराशिद्वयभानुभोग पटक ऋतूना शिशिरो वसन्त । ग्रीष्मश्च वर्षाः शरदश्च तद्धमन्तनामा कयिनोऽन घट ॥ १ ॥ "-मृगादि दो दो राशियों के भानुभोगस शरदादि छ. स्तु होते हैं । यथा-मकर कुभको सूर्यमे शिशिर, मीन मेषमै वसन्त, वृक्ष मिथुनमे ग्रीष्म, कर्क सिंहमें वर्षा, कन्या तुलाम शरद, और दृश्चिक धनमे हेमन्त रतु होती है । एव चान्द्रमानके अनुसार- " मधुश्च माधवश्व वसन्ताइन् । शुक्रश्च शुचिश्व प्रैष्मावृतू । नमश्च नभ- स्यश्च वार्षिकाहत । इषधोजश्च शारदाइन् । सहश्च सहस्यश्च हेमन्तिकात । तपश्च तपस्यश्च शैशिरात् । इति श्रुतौ । "-चन वैशाखमे वसन्त, नेष्ट आपादमें प्रोप्म, श्रावण भाद्रपदमे वर्षा, आश्विन कार्तिकमे शरद्, मृगशिर पौषगे हेमन्त और माघ फाल्गुनमे शिशिर ऋतु होती है। "श्रौतस्मातक्रिया सर्वाः अर्याचान्द्रमसर्तुषु । तदभाव तु सौतुष्विति ज्योतिविदा मतम् ॥ १ ॥" श्रौत और स्मात कर्म चार अनुगे और अन्य सौर-तुर्म करने चाहिये ऐसा ज्योतिषि- योका मत है । "वर्षायनयुगपूर्वकमरसौरान ' इनि सिद्धातशिरोमगौभास्क- राचार्यणोतम् । ॥ युगर्वक वर्ष, अपन और ऋतु यह यहा सौर मानने चाहिये । अतएव उपरोक्त उदाहरण समरमान से दिया गया है।

द्वादशान्दिकस्वरचक्रम् पार्पिकस्वरचक्रम अयनस्वरम ऋतुस्वरचकम् पक्षस्वरचनम् (२८) १ प अ। इ37आ अ ३ अइ3/एआ इ 3 नभव ओ का.मा.का. प्रमा. मर शोभ, राक्षस म. त्रि.गु./म.प्र. विभव विक.नंदन क्रोधी नल अं. श्री भा यु.धा. वृप. विजय विधा पिग, | ई. व/प्र. वि.. प्रमोद चिन. जय पराभ काल चि मु. ता. पा.व्य. प्रजाप, सुभा. मन्म. प्रवंग सिद्धा. म. म. वि. वि. स. अंगि. तारण दी. कील. शेट्टी श्रीमु. पाथ. हमल. सौम्य दुर्म, व्यय विन्द्र यावा हुंदुभि शु. युवा मनि निसा विरोध गधिर की सौ मा वि. (प.भ.आग. न. चिरा. पृच प्रमाथी कोधन वि.म. मि गै. दुर्म बा विक्र./शुमह आनंद श्रय, दु. म. र. को आयो १२ १२ १२ રરરરર दक्षिणायने समरसार- उत्तरायण वसन्तताः ६. दिनानि, प्रोप्मताः १२ यावत् ग्रोप्मताः ४८ दिनानि, वपत्ताः २४ यावत् वर्पताः ३६ दिनानि, शारदृताः ३६ यावत् शरदतीः २४ दिनानि, हेमन्तस्य ४८ यावत् हमन्तस्य १२ दिनानि, शिशिरतोः ६० यावत पौ. भान प. मासस्वरचक्रम। धाना गर्वधागवरी परिध रता. भा.मा- आ. वै. श्रा.आ. अ स्वर मास .. . संस्कृतीका-भापार्टीकासमेतम् । (२९) मात्रास्वरायाह । मात्रां नाममुखार्णव तु तदमंत्रादिसिद्धौ हलच्- संख्यैक्य तप" संख्ययोऽक्षु मि यशो: कायेन मि" जीवाष्णुभे"। पिण्डामाँत्रिकणिकैक्यमहते शेपे" चमूसत्कृतौ मात्राणेग्रहपिण्डजीवभगृहाने- क्यान्म हँ यौगिकः ॥१३॥ मात्रास्वर-जीवस्वर-योगस्वर-पिण्डस्वरानाह । नाममुखा- जैव मात्रादयश्च ज्ञेयाः । नाममुखे नामादौ य. अर्णो वर्णस्त- जाता एतादृशी या मात्रा तदच् मात्रास्वर इत्यर्थः । सः मानास्वरो मन्त्रादिसिद्धौ शुभः । मात्रास्वरबले मन्त्रादिसाधन कर्तव्यम् । तदुक्तम्-“साधनं मन्त्रयन्त्रस्य तन्त्रयोग च सर्वदा । अधोमुखानि कार्याणि मात्रास्वर वले कुरु ।" इति । जीवस्वरानयनार्थ - हलचसंख्यैक्य कर्तव्यम्, अक्षु स्वरेषु तपसंख्यया पोडशसंख्यया ग्राह्याः । यशोः यवर्गशवर्गयोः भि- संख्या चतुस्संख्या ग्राह्याः । कादो वर्ग - कवर्ग - चवर्ग टवर्ग - तवर्ग - पवगैपु मिसंख्याः पंच पञ्च संख्या ग्राह्याः । नानो ये हलः अचश्च तेषां कथितन मेणागतसंख्यायामज्झलयो- रैक्यं जीवस्वरो भवति, स च शुभे मङ्गलकत्ये ग्राह्यः । पंचा- धिका चेत् संख्या, तदा पंचभिर्भागोऽनुपविष्टोऽपि कार्यः । भागे यःशिष्टोकः तत्संरय एवाकारादिपु पंचसु स्वरो माहाः। शून्य- , समरसारं- शेपे तु पंचमः ओकार एवं ग्राह्यः। जीवस्वरफलं चोक्तं परो- दये-"खानपानादिकं सर्व वस्त्रालङ्कारभूषणम् । विद्यारम्भ विवाहं च कुर्याज्जीवस्वरोदये । " इति । मात्रिकवर्णिकैश्य- मात्रिको मात्रास्वरः वर्णिको वर्णस्वरः, तत्संख्ययोरक्यं म ५ 'हृते शेषः, स पिंडाच् पिण्डस्वरः भवतीति संबंधः । स च सेनायाः सलती सत्कारे सज्जीकरणे ग्राह्यः । उक्तं च - शत्रूणां देशभंग व कोटयुद्धं च वेष्टनम् । सेनाध्यक्षस्तथा मंत्री कर्तव्यः पिण्डकोहये । " इति । यदा यस्य पिंडो युवा स्वरो भवति तदा तस्य सेनाधिपत्य दातव्यम् ! यौगिकस्वर- माह-मात्राणेति, मानास्वरवर्णस्वरौ प्रागुनौ, महस्वरस्तु तन्नामराशिग्रहणसम्बन्धात्, पिण्डस्वरः प्रायुक्तः, जीवस्व- स्थ, भं जन्मनक्षत्र, तदधिपस्वरः गृह राशिस्तस्य च यः अन् एप मात्रादि-स्वराणां याः संख्यास्तासामैश्यं तत्पंचभिर्भक्तं शिष्टो यौगिकः स्वरः । तत्कलं " योगेन साधयेद्योग देहस्थं ज्ञानसंभवम् । इति । , नामके आदिवर्णकी जो मात्रा हो वही मात्रास्वर होता है। यह मंत्रादि साधनमें उपयोगी है। अ आ इ ई आदि स्वरांकी संख्या १६, कवर्गकी ५ चवर्गकी ५, टवर्गकी ५, तवर्गकी ५, पवर्गकी ५, यवर्गकी और शवर्गकी ४ इस प्रकार संख्या मानकर नामके स्वर और व्यंजनकी संख्याका योग करनेसे जीवस्वर होता है। याद संख्या ५ से अधिक हो तो ५ का भाग देनेपर शेप ' जीवस्वर' संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । होता है। यह शुभ कार्योंमें अच्छा है। मानास्वर और वर्णस्वरकी संख्याके योगों ५ का भाग देनेसे जो शेष रहै वह पिण्डस्वर होता है। यह सेनाके सत्कार (सागत, सनावट, सेनापति आदि) में उपयोगी है और मात्रा, वर्ण, ग्रह, पिण्ड, जीव, नक्षत्र और राशि इनके स्वरोंकी संख्याके योगमे ५ का भाग देनेसे जो शेप रहे वह योगिक- स्वर होना है ॥ १३ ॥ उदाहरण । मात्रास्वर-रामके आदिवर्ण रफारमें आ मात्रा होनेरो रामका अकार मात्रा स्वर है। जीवस्वर-नामनाममें रेफ २ आकार २ मकार ५ अकार १ की संख्याके योग १० में ५ का भाग देनेसे शेष शून्य बचता है अतः रामफा ओकार जीवस्वर है । पिण्डस्वर-रामका वर्णवर एकार चतुर्थ होनेरो ४ संख्या है। और मानास्वर अकार प्रथम होनेसे १ संख्या है। अतः इनके योग में ५का भाग दिया तो शेप शून्य रहनेमे रामा ओकार पिण्डस्वर है। योगिकस्वरामका मानास्पर प्रथम होनेसे १ संख्या, वर्णस्वर एकार चतुर्य होनेसे ४ संख्या महस्वर ( रामकी तुला राशि होनेसे तुलाधिप शुकफा) एकारकीर संख्या, पिंडस्वर ओकारकी ५ संख्या, जीरस्वर ओकारकी ५ संरया नक्षत्रस्वर (गमके चित्रा नक्षत्रका) उफारकी ३ संख्या और राशिस्वर (तुलागशिका एकारस्वर) की संख्या, इस प्रकार माना १ वर्ण, ग्रह , पिण्ड ५, जीव ५. नक्षत्र ३, राशि ४ इन सबकी संरुपाओके योग २६ में ५ का भाग देनेसे शेष १ रहा अतएव गमका अफार पगिफस्वर है ॥ १३ ॥ योगस्वरवर्णम्परयोविशेषफलमाह । योगाचा योगभननं यांची सर्वमावहे । विशेपतश्च संग्राम स हि सर्वस्वराग्रणीः ।।१४।।

(३२) समरसारं- योगाचा-योगस्वरेण; योगस्सरबले सति योगभजनं योग- साधनं कर्तव्यम् । वर्णाचा-वर्णस्वरेण; वर्णसरबले सति सर्व- कर्म आवहेव कुर्यात् । विशेषतः संग्रामं कुर्यात् । यतः सर्व- स्वराणां मध्ये अयणीमुख्यः । तस्मायदा वर्णस्वरो युवा भवति तदा सर्वकर्मसाधने अतीय शुभतरः ॥ १४ ॥ योगस्वरम योगमार्ग साधन ओर वर्णस्वरमें सब कायाका साधन करना चाहिये । विशेषकरके संग्राम करना चाहिये, क्याकि यही सब स्वराम अग्रणी है।॥ १४ ॥ युद्धादौ भदादीनां जय-पराजय-साम्य-ज्ञानमाह । तेपामचा लयभरायमिति ईलां च नानोरला तु मिलिता महता पृथक्सा । हीना मृति विजयमाई तथाधिकों सा तुल्यों समं च समेरं यदि वापि संधिम् ॥ १५॥ तेषाम् अ इ उ ए ओ इति प्रागुताना पचाना स्वराणां तत्सम्बन्धिनी मितिः संख्या ल ३- य 1- भ४- रा २-य १ एवंरूपा स्यात् । तेन अफछडधभवानांल इति त्रिसंख्या । इखजठनमशानां य इति एका सख्या । उमझतपयपाणा भ इति चतुःसंख्या । एघटथफरसानां रा इति द्वितस्पा । ओचठदबल- हानां य इति १ संस्था भवति । नानोपयोर्जयपराजयज्ञान- मिष्टं तन्नाम्नोथै हलः स्वरा वर्णाश्च तेपा सम्बन्धिनी मा संग्व्या लयभरायेत्युक्ता प्रतिस्वर मिलिता सती पृथपंचभिहता च या स्यात्सा संख्या चेदितरापेक्षया होना, तदा तन्मृति हीननाम संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । संख्यस्प मरणमाह । इतरापेक्षयाधिका चेत्सा तदा विजयमाह । सा संख्येतरेतरं तुल्या समा चेत्तुल्यं समरं संयाममाह । यदि वा पक्षांतरे सन्धि यो राज्ञोहि । अत्र वर्णसंख्यावहणे निषिद्ध- वर्णानां डकारणकारादीनां नाम्नि संभवे शून्यमेव ग्राह्यं न कदाचित्संख्या । इति ॥ १५॥ पूर्वोक रीतिके अनुसार पांच कोठोम ल ३-य १-भ४-रा२-प? यह अंक लिखकर इनके नीचे अ इ उ ए ओ और क ख ग घ च आदि वर्ण लिखै तो जयपराजय देखनेका चक्र बन जाता है। इस चक्रसे दोनों योद्धाओंके नामके स्वर और व्यंजनों की संख्या लेकर उसमें पृथक् पृथक् ५ का भाग दे तो जिसका शेष न्यून हो उसका पराजय और जिसका शेष अधिक हो उसका विजय होता है। यदि बराबर बचै तो समान युद्ध होता है । अथवा सन्धि हो जाती है ॥१५॥ उदाहरण राम-रावण, नामाम र २-आ ३--म १-३- रामनाम संख्या ९ एवं र २-आ3- ३-४३-० अ३- रावण नामसंख्या १४ इन ९ १४ में पृथक् पृथक् ५ का भाग दिया तो ४-४ शेष रहे अतएव युद्धमें साम्यता प्राप्त होती है।

(३४) समरसार-- जयपराजयचक्रम्। य १ भ४ य १ tyy उ ए ओ क छ ड । ख ज ग शतपथ चठद धभव नमा पयप इति समरसारे स्वरभेदजयपराजयमकरणम् । वालकुमारादिस्वरवशावलमाह । पूर्वादिदिश्वन्तरगोश्च तेऽर्चः सुखं जयेथूनि जयस्तु घातातं । स्यादाद्ययोान्तिमयों: स्वशत्रबलाबला- भ्यां भुवमादंदीत ॥१६॥ तेऽचः अकाराद्याः स्वराः पूर्वादिदिक्षु अन्तः अन्तरिता लेख्याः । एकां दिशं विहाय लेपास्तदेवाह । पूर्वस्यां दिशि अकारः । दक्षिणस्यां दिशि इकारः । पश्चिमायां दिशि उकारः। उत्तरस्यां दिशि एकारः 1 मध्ये ओकारः लेख्यः। पस्य योद्धः वर्णस्वरो युवा यस्यां दिशि भवति संग्रामे तस्यां दिशि ..

संस्कृतटीका-भोपाटीकासमेतम् । तस्प योद्धः जयः स्यात् । आधयोः बालकुमारयोः स्वरी यदिशि तदिशि स्थितस्य योद्धः पाताजयः । आदौ पात: पश्चाजयः स्यात् । अन्तिमयो स्वरयोः वृद्धस्वर-मृतस्वरयोन जयः । तस्मात् स्वशत्रुबलाबलास्यां भुवम् आददति । यस्पां दिशि स्वस्य आत्मनो बली भवति शत्रोः अवलो भवति तां भूमि संग्रामे आदीत । एवं रुते सति जयो भवति अन्यथा पराजयः ॥१६॥ पूर्वादि दिशाओंमें और मध्यमें वे स्वर स्थित रहते हैं । यथा पूर्वमें अ, दक्षिणमें इ, पश्चिममें उ, उत्तरमें ए और मध्यमें ओ है । अत: युवा स्वरकी दिशा में स्थित होकर युद्ध करनेसे मुखसे जय होता है। और बाल कुमारकी दिशामें घातसे जप होता है । एवं वृद्ध-मृतकी दिशाम पराजय होता है । अतएव अपनी बलकारफ और शत्रुको निर्वलकारक भूमिमें स्थित होना उचित है ।। १६ ॥ उदाहरण। दिशास्वरचक्रम् । पूर्व, अ उत्तरे ए राम-रावण-का ए- कार स्वर है और यह इनका बालस्वर है। इसकी दिशा उत्तर है। और (इकार इनका युवास्वर दक्षिणम है, अतएव दोनों का ही दक्षिण दिशाम बल है ॥ १६॥ मध्ये, ओ दक्षिणे ३ पश्चिमे, उ समरसार- जयपराजयचक्रम् । य १ य १ उ ए ओ कछड (ख जढ गझत चरथ चठ धभव नमा पयप इति समरसारे स्वरभेदजयपराजयप्रकरणम् । : बालकुमारादिस्वरवशाभूबलमाह । पूर्वादिदिक्ष्वन्तरगोश्च तेऽचः सुखं जयेथूनि जयस्तु घातात् । स्यादाद्ययोनौन्तिमयों: स्वशत्रबलाबला- भ्यां भुक्मादेदीत ॥ १६ ॥ तेऽचः अकारायाः स्वराः पूर्वादिदिक्षु अन्तः अन्तरिता लेख्याः । एका दिशं विहाय लेख्यास्तदेवाह । पूर्वस्यां दिशि अकारः । दक्षिणस्यां दिशि इकारः । पश्चिमायां दिशि उकारः। उत्तरस्यां दिशि एकारः । मध्ये ओकारः लेख्यः। यस्य योद्धः वर्णस्वरो युवा यस्यां दिशि भवति संग्रामे तस्यां दिशि :

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । तस्या योद्धः जयः स्यात् । आवयोः बालकुमारयोः स्परौ यदिशि तदिशि स्थितस्य योद्धः घाताजपः । आदौ घात: पश्चाजयः स्यात् । अन्तिमयोः स्वरयोः वृद्धस्वर-मृतस्वरपोर्न जयः। तस्मात् स्वशत्रुघलाबलात्यां भुवम् आददीत । यस्यां दिशि स्वस्य आत्मनो बली भवति शेवो अबलो भवति तां भूमि संपामे आददीत । एवं कृते सति जयो भवति अन्यथा पराजयः ॥ १६॥ पूर्वादि दिशामें और मध्यमें वे स्वर स्थित रहते हैं । यथा पूर्वमें अ दक्षिणमें इ, पश्चिममें उ, उत्तरमें ए और मध्यमें ओ है । अत: युवा स्वरकी दिशामें स्थित होकर युद्ध करनेसे सुखसे जय होता है। और बाल कुमारकी दिशामें धालसे जय होता है । एवं वृद्ध-मृतकी दिशामें पराजय होता है । अतएव अपनी बलकारक और शत्रुको निर्वलकारक भूमिमें स्थित होना उचित है ।। १६ । उदाहरण। दिशास्वरचक्रम् । पूर्वे, अ उत्तरे दक्षिणे राम-रावण का ए- कार स्वर है और यह इनका बालस्वर है। इसकी दिशा उत्तर है। और इकार इनका युवास्वर दक्षिणमें है, अतएव दोनों का ही दक्षिण दिशामें बल है ।। १६ ॥ मध्ये, ओ पश्चिमे, उ (३४) समरसार- जयपराजयचकम् । इ ड ओ कछड सजद गझत वथ चठद धभव नमश पयप फर सवल है इति समरसारे स्वरभेदजयपराजयप्रकरणम् । बालकुमारादिस्वरवशाद्भूबलमाह । पूर्वादिदिक्ष्वन्तरगाँश्च तेऽर्चः सुखं जयेथूनि जयस्तु घातात् । स्यादाययोनीन्तिमयों: स्वशडबलाबला- भ्यां भुवमादेदीत ॥ १६ ॥ तेऽवः अकारायाः स्वराः पूर्वादिदिक्षु अन्तः अन्तरिता लेख्पाः। एका दिशं विहाय लेख्पास्तदेवाह । पूर्वस्यां दिशि अकारः । दक्षिणस्यां दिशि इकारः । पश्चिमायां दिशि उकारः। उत्तरस्यां दिशि एकारः । मध्ये ओकारः लेपः। यस्प योद्धः वर्णस्वरो युवा यस्यां दिशि भवति संग्रामे तस्यां दिशि संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । तस्य योद्धः जयः स्यात् । आद्ययोः बालकुमारयोः स्वरौ यदिशि तदिशि स्थितस्य योद्धः घालाजयः । आदौ पातः पश्चाजयः स्यात् । अन्तिमयोः स्वरयोः वृद्धस्वर-मृतस्वरयोर्न जयः । तस्मात स्वशत्रुबलाबलारयां भुवम् आददीत । यस्पां दिशि स्वस्य आत्मनो बली भवति शत्रोः अवलो भवति तां भूमि संग्रामे आददीत । एवं कते सति जयो भवति अन्यथा पराजयः ॥ १६ ॥ पूर्वादि दिशाओमें और मध्यमें वे स्वर स्थित रहते हैं। यथा पूर्वमें अ, दक्षिणमें इ, पश्चिममें उ, उत्तरमें ए और मध्यमें ओ है। अतः युवा स्वरकी दिशामें स्थित होकर युद्ध करने मुखसे जय होता है। और बाल कुमारकी दिशामें घातसे जय होता है। एवं वृद्ध-गृतकी दिशामें पराजय होता है । अतएव अपनी बलकारक और शत्रुको निर्वलकारक भूमिमें स्थित होना उचित है ॥ १६ ॥ । उदाहरण। दिशास्वरचक्रम् । पूर्वे, अ राम-रावण-का ए. | कार स्वर है और यह | इनका बालस्वर है। इसकी | दिशा उत्तर है। और | इकार इनका युवास्वर दक्षिणमें है, अतएव दोनों- का ही दक्षिण दिशामें उत्तरे ए मध्ये, ओ दक्षिणे इ पश्चिमे, उ समरसार- ऐशानीतः सितकुजशनिरविखगराशयः प्रतीचीन्दोः। गुरुगृहयोरक्ष उदगदिशोजगृहयोस्तु वायव्याम् ॥१७॥ रविचन्द्रहति विवक्षुस्तनद्गृहराशीनां दिग्विशेषे निवेश- माह । ऐशानीतः ईशानकोणमारत्य एते राशयो भवन्ति । कोऽर्थः-ईशानकोणे सितराशिः वृपस्तुला च बलिनी भवतः। पूर्वरयां दिशि भीमराशी मेपवृश्चिको बलिनौ भवतः । शनि- राशी मकरकुम्भी आमेय्यां बलिनी भवतः । रविराशिः सिंहा दक्षिणे च बलीस्पात । इन्दोः प्रतीची दिक् चन्द्रराशिः कर्कः पश्चिमायां बली स्यात् । गुरुगृहयोः अक्ष उदक् दिशा ज्ञातव्यो। धनुपो राशेनिप्रतिदिन ज्ञातव्या । मीनराशेश्चोतरा दिग ज्ञेया। ज्ञगृहयोः बुधराश्योः मिथुनकन्ययोः वायव्यदिगु ज्ञेया। एतामु दिक्षु एतेपाराशीनां वासः स्यादित्यर्थः ॥ १७ ॥ ईशानसे आरंभ करके शुक्र, भीम, शनि और सर्पकी सारी बल- वान् होती हैं अर्थात् ईशानमें वृप तुला, पूर्वम वृश्चिक मेप, अग्निमें मकर कुम्भ, दक्षिणम सिंह राशि बलवान होती है । तथा पश्चिमम कर्क, नैऋत्यमें धन, उत्तरमें मीन और वायव्यमें कन्या मिथुन राशि बलवान होती है ।। १७॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । राशिस्वरचक्रम् । ई. वृष, तुला पूर्व मेप, वृश्चिक, आ.म. कुं: उत्तर मीन दक्षिण सिंह वाय.मि.कन्या पश्चि० कर्क म.ध धनु. रविहतां दिशमाह । द्वितीययामादत एव यामे यामे तृतीयां च तत- स्ततीयाम । अर्का प्रतीचीप्रभृतीनिहन्तिं प्रागन्त्य- यामायुगेने याम्याम् ॥ १८॥ अर्कः सूर्यो दिने द्वितीययामाईतः द्वितीयश्चासौ यामाई- चेति द्वितीययामाईस्तस्मात् । द्वितीययामस्प प्रथमातिक्रमणे कारणाभावात् । प्रथमस्याई तदारस्य प्रथमयामस्य द्वितीय- यामाईमारयेत्यर्थः । यामे यामे प्रहरे पहरे तृतीयां तृतीयां दिशं हन्ति । कां दिशमारण्यत्यपेक्षायां प्रतीचोप्रातोरिति । सर्वदिगपेक्षपा बहुत्वम् तेन प्रथमाहितीपयामयोरन्त्याद्यान्यां प्रतीचीम् । द्वितीय तृतीपान्त्यापायाम् उत्तरम् । तृतीय- तुर्यान्त्याबायां प्राचीम् । चतुर्थप्रथमान्त्यावाश्यां याम्यां (३८) सेमरसार- दक्षिणा दिशे हन्ति । प्रागन्त्ययोर्यः प्रथमप्रहरस्य प्रथमाः अन्तस्य चतुर्थप्रहरस्य द्वितीयार्द्धस्तयोयुग तेन प्रथमचतुर्थ- यामयोः प्रथमद्वितीयाईयुग्मेन याम्यां हन्तीति भावः। एवं रविदग्धा दिशः तत्काले शुभकर्मसु त्याज्याः॥ १८॥ सूर्य दिनमें प्रथम महरके दूसरे यामाईसे दो दो यामाद्रॉमें अर्थात प्रथममहरका अन्त्य यामाई और द्वितीय प्रहरका आद्य यामाई इस ऋमसे पूर्व आदि तीसरी तीसरी दिशाका निहत (घात ) करता है। अतः प्रथम प्रहरका आधयामार्द्ध और अन्त्य ( चतुर्थ) प्रहरके अन्त्य यामाई में दक्षिण दिशाका घात करता है ॥ १८॥ उदाहरण । रविहतदिक्चक्रम् । जो दिशा सूर्यसे निहत पूर्व ६-७ हो रही हो उस दिशामें दक्षिण १-८ यामादॉम यात्रा युद्ध आदि नहीं पश्चिम २-३ ने. फरना चाहिये। यथा मध्यास समय उत्तर दिशा रविहत है तो इस दिशाम यात्रा नहीं करनी चाहिये। अथवा इस समय इस दिशाम स्थित होकर गत वा युद्धादि भी नहीं करना चाहिये। चन्द्रहता विदिग्दिशरवद्राशीचाह । ईशाद्विदिशा चन्द्रो यामे यामें निहन्ति वृपकुंभौं । मृगसिंहो पन्विनमथ कन्यामिथुनो कमेणव ॥ १९॥ आ. उत्तर ४-५ संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (३९) चन्द्रः यामेयामे.पहरेपहरे ईशादिविदिशां वृषकुम्भौ, मृग- सिंही, धनुः, कन्यामिथुने क्रमेण हन्ति । तदेवाह-चन्द्रः स्वोदपालथमप्रहरे ईशानकोणे स्थितो पराशि तथा च कुम्भ- राशि हन्ति । द्वितीयमहरे अभिकोणे स्थिती मकर राशि तथा च,सिंहराशि हन्ति । तृतीयपहरे नैकत्यकोणे धन राशि हन्ति । चतुर्थप्रहरे वायुकोणे कन्याराशिं तथा च मिथुन राशि हन्ति । एते राशयो यासु दिक्षु तासु स्थित्वा युद्धं न कुर्यादित्यर्थः१९॥ ईशानसे आरम्भ करके सब कोणाम प्रहर प्रहरमें चन्द्रमा अपने उदयसे क्रमसे उक्त राशियोंका घात करता है । यथा ईशानमें वृष कुम्भ राशिवालोंका, अग्निमें मृग ( मकर ) सिंहवालोंका, नैर्ऋत्यमें धनवालोंका , और वायव्यमें कन्या मिथुनवालोंका घात करता है ! अतएव यह राशि जिस कोणमें हो उस कोणमें स्थित होकर युद्धादि नहीं करना चाहिये ॥ १९ ॥ आ. पृ. २०११ चन्द्रहतदिकचक्रम। ब उदाहरण। यथा चैत्र शुक्ल ९ को कर्कका चन्द्रमा है। और मनमोहनको सिंह राशिका अग्निकाणमें घात होता है। अतएव आमेयस्थ होकर मनमोहनको युद्रादि करना उचित नहीं है।।१९।। वा. प.

:
(४०)
समरसार-
गृहापरास्यकेतुहतदिग्विदिश आह ।
गूढाख्योऽप्रहरैराग्नेयीतस्तथा दिवा निशि च ।
पष्टीं पष्टी हन्यात् तन्मुखयानाँ शुभी ने रणे ॥२०॥
गूढाख्यः गूढनामग्रहभेदः अष्टभिर महरैः आग्नेयोतः
अगिकोणतः दिवा दिवसे निशि रात्री वा पठी पठौदिशं हन्याव
घातयेत् । तत्सम्मुखं यात्रा शुभा न स्यात् । संग्रामे एतन्न
शुभम् । तदेव प्रकटयति । प्रथमेऽईयामे गूढो आनेयों दिशं हन्ति ।
द्वितीयेऽर्द्धयामे उत्तर दिशं हन्ति । तृतीयेऽईयामे नैऋत्यां
दिशं हन्ति । चतुर्थेऽईयामे पूर्वी दिशं हन्ति । पञ्चमेऽईयामे
वायवी दिशं हन्ति । षष्ठेऽर्द्धयामे दक्षिणं दिशं हन्ति । सममेऽई-
यामे ईशान दिशं हन्ति । अष्टमेऽर्द्धयामे पश्चिमां दिशं हन्ति । एवं
रात्रावपि ज्ञेयाः । एता दिशो विदिशश्च दिवानिशं युद्धयात्रायां
वाः। तस्य संमुखे यात्रा न कर्तव्या, संग्रामो न कर्तव्यः॥२०
।
ग्रहभेद नाम जो गढाख्य है यह दिन रात्रिम अर्द्ध अर्द प्रहरमें
आग्नेय दिशासे छठी छठी दिशाका घात करता है । यया-प्रथम
प्रहरसे आरंभ करके पहले यामाईमें आग्नेयका, दूसरेमें उत्तरका, तीस-
में नेत्यका, चौथेमें पूर्वका, पांचवेमें वायव्यका, छठमें दक्षि-
णका, सातवेंमें ईशानका और आठवमें पश्चिम दिशाका दिनमें और
ऐसे ही रात्रिम घात करता है। अतएव रणमें इसके सन्मुख यात्रा
शुभ नही होती है ॥ २० ॥

संस्कृतटीक:-भाषाटीकासमेतम् । गूढचक्रम् । पूर्व ४।१२ उदाहरण । आ. यथा-रामको रणके निमित्त १३९ । दाक्षण यात्रा करनी है तो दिनवा रात्रि में तीसरे प्रहरका उत्तराद्ध द. ६।१४ त्यागकर यात्रा करनी उचित है। रणके अतिरिक्त मल्लयुद्ध वा द्यूत नै. आदिमें भी यह बल उपयोगी है. ३।११ + + + २।१० वा. १३१५ पश्चि.८।१६ रविचन्द्रयोः पृष्ठदिगारिस्थितौ जयपराजयों चाह । पृष्ठेऽौं' यदि दक्षिणपि पुरतश्छायाँथ वामें जयः किंवकै वतीह यायिनि" विधौ वाहस्थिते स्थायि- नि" । छाया पृष्टगदक्षिणों निशि शशी वामेऽग्रतो वो जयो यातुश्चन्द्रवहे" परस्य तु खेमिः शैशीष्टः क्षयी ॥ २१ ॥ यायिनः स्थायिनोऽपि अर्को यदि दिने पृष्टे, स्वपृष्ठप्रदेशे दक्षिणप्रदेशे स्याचदा छाया पुरतः स्वायप्रदेशे वामप्रदेशे वा पतेत् तदा यायिस्थायिनोर्जयः । किन्त्वयं विशेषः । अर्के वहति दक्षिणभागस्ये पिंगलारूपरविनाइयां प्राणवायौ वहत्य च पृष्ठदक्षस्थे यायिनि जयो न स्थायिनि । पृष्ठदक्षिणस्थे विधौ चन्द्रमसि वाहस्थिते वहति वामभागस्थेडापचन्दनाडयां भाणवायी वहति स्थायिनि जयः । निशि राची शशी .

समरसार--
चन्द्रो निजवामे अग्रतो वा चेनदा छाया स्वपृष्ठदेशे स्वदक्षिण-
प्रदेशे च गच्छति तदा यायिस्थायिनोजर्यः । किंवयं विशेषः।
बामापतो गते चन्द्रे चन्द्रनाडी वहति च यातुर्जयो न स्थायिनः।
परस्य स्थायिनस्तु वामायगे चेत्सूर्यनाडीवहति च न यायिनः ।
क्षयी क्षीणः शशी चन्द्रो वाम एवेष्टः ॥ २१ ॥
यदि सूर्य पृष्ठभाग (पीठपीछे ) या दक्षिण भागमें हो तो छाया
आगे वा बांयी तर्फ होती है। उस समय युद्ध करनेसे स्थायी और यायी
दोनोंका जय होता है। किंतु यदि उस समय सूर्यनाड़ी दक्षिण स्वर
चलता होगा तो यायी (चलनेवाले ) का जय होता है । और चन्द्र
वामस्वर चलता होगा तो स्थायी (स्थित रहनेवाले)का जय होता है।
ऐसे ही रानिमें चन्द्रमा बाँपी तर्फ वा आगे हो तो छापा दक्षिण का
पृष्ठ भागमें होती है । उस समय युद्ध करनेसे दोनोंका जय होता है ।
किंतु यदि उस समय चन्द्रनाड़ी वामस्वर चलता होगा तो यायी और
सूर्यनाही दक्षिणस्वर चलता होगा तो स्थायी राजाका जय होता है।
और क्षीण चन्द्रमा वाम भागमें शुभ होता है ॥ २१ ॥
उदाहरण ।
सूर्य-रामके पृष्टभाग और रावणके दक्षिण भागमें होनेसे छाया
अप्रभाग और वामभागमें है सो दोनोंका जय प्राप्त होता है, किन्तु
रामका स्वर दक्षिण चल रहा है । अर्थात् नासिकाके दक्षिणछिद्रसे श्वास
चल रहा है अतएव रामचन्द्रका ही जय होगा। मल्लयुद्धादिमें भी यह
उपयोगी हो सकता है।
मागादिदिगवस्थितचंद्रवशात्स्थायियायिनोनयपराजयम् ।
प्राचीमुदीची वा चन्द्रे गते स्थायी जयी भवेत् ।'
'प्रतीचीदक्षिणादिक्स्थे यायी विजयमामुयात् ॥ २२ ॥

संस्कृतीका-भाषार्टीकासमेतम् । प्राची पूर्वदिश गते चन्द्रे उदीची उत्तर दिशं गते चन्द्र उत्तरायणे च सति तदा स्थायी जयी भवेत् । प्रतीची पश्चिमा दिक् दक्षिणा अवाची दिक्ते प्रति गते चन्द्रे दक्षिणा- यने सति तदा यायिनो जयो भवेत् ॥ २२ ॥ पूर्व और उत्तर दिशाम चन्द्र हो तो स्थायी राजाका जय होता है। और दक्षिण तथा पश्चिम गत चन्द्र हो तो. यायी राजाका जय होता है ।। २२ ॥ वायुबलमाह। वायुः पृष्ठे दक्षिणे च वहन्सूचयतें बलम् । सम्मुखीनच वामश्च भटानां भगसूचकः ।। २३ ।। पृष्ठे दक्षे च वहन् वायुर्वलं सूचयते । यथा प्राङ्मुखस्य पाश्चात्यो दाक्षिणात्यो वायुबलसूचकः । संमुखीनः सम्मुखे वहन्यामश्च भटानां योधानां भंग पराजय सूचयति ॥ २३ ॥ द्वंद्वयुद्धके समय पीठकी ओर और दक्षिण मागकी और वायु चले तो युद्ध करनेवालेको बल देती है। और सम्मुख तथा वामभागकी वायु चलै तो योद्धाओके भंग होनेकी सूचना देती है ॥ २३ ॥ उदाहरण । यथा-पूर्वकी और और पश्चिमकी और मुख करके युद्ध करते समय यदि पश्चिम वा दक्षिणाकी ओरसे हवा चलरही हो तो पूर्वकी ओर मुख करके जो युद्ध करता है उसीका जय होगा। यह वायु बल मल्लयुद्धमें विशेष उपयोगी है ॥ २६ ॥ राहुबलमाह। प्रावातान्तकशम्भुपाशिहुतभुपौलस्त्यरक्षोदिशो योमारगुरहि पाशिककुभोऽसौ पटिपंछी निशिं । . -- -

।
:
(४२),
समरसार-
चन्द्रो निजवामे अग्रतो वा चेत्तदा छाया स्वपृष्ठदेशे स्वदक्षिण-
प्रदेशे च गच्छति तदा यायिस्थाथिनोजयः । किवयं विशेपः।
यामाग्रतो गते चन्द्रे चन्दनाडी वहति व यातुर्जयो न स्थायिनः।
परस्य स्थायिनस्तु वामानगे चेत्सूर्यनाडीवहति च न यायिनः ।
क्षपी क्षीणः शशी चन्द्रो वाम एवेष्टः ॥ २१ ॥
यदि सूर्य पृष्टभाग (पीठपीछे) या दक्षिण भागमें हो तो छाया
आगे वा बांयी तर्फ होती है । उस समय युद्ध करनेसे स्थायी और यायी
दोनोंका जय होता है। किंतु यदि उस समय सूर्यनाड़ी दक्षिण स्वर
चलता होगा तो यायी (चलनेवाले) का जय होता है । और चन्द्र
वामस्वर चलता होगा तो स्थायी (स्थित रहनेवाले ) का जय होता है।
ऐसे ही रात्रि में चन्द्रमा बाँची तर्फ वा आगे हो तो छाया दक्षिण वा
पृष्ठ भागमें होती है । उस समय युद्ध करनेसे दोनोंका जय होता है।
किंतु यदि उस समय चन्द्रनाड़ी वामस्वर चलता होगा तो यायी और
सूर्यनाड़ी दक्षिणस्वर चलता होगा तो स्थायी राजाका जय होता है।
और शीण चन्द्रमा वाम भागमें शुभ होता है ॥ २१ ॥
उदाहरण ।
सूर्य-रामके पृष्ठभाग और रावणके दक्षिण भागमें होनेसे छाया
अग्रभाग और वामभाग है सो दोनोंका जय प्राप्त होता है, किन्तु
रामका स्वर दक्षिण चल रहा है । अर्थात् नासिकाके दक्षिणछिद्रसे श्वास
चल रहा है अतएव रामचन्द्रका ही जय होगा। मल्लयुद्धादिमें भी यह
उपयोगी हो सकता है।
• प्रागादिदिगवस्थितचंद्रशास्थायि गायिनोयपराजयम् ।
प्राचीमुदीची वो चन्द्रे गते स्थायी जयी भवेत् ।'
प्रतीतीदक्षिणादिक्स्थे यायी विजयमाप्नुयात् ॥ २२॥

संरकृतीका-भाषाटीकासमेतम् । (४३) पाची पूर्वदिश गते चन्द्रे उदीचीम् उत्तरां दिशं गते चन्द्र उत्तरायणे च सति तदा स्थायी जयी भवेत् । प्रतीची पश्विमा दिक् दक्षिणा अवाची दिक्तेप्रति गते चन्द्रे दक्षिणा- येने सति तदा यायिनी जयो भवेत् ॥२२॥ पूर्व और उत्तर दिशाम चन्द्र हो तो स्थायी राजाका जय होता है। और दक्षिण तथा पश्रिम गत चन्द्र हो तो. यापी राजाका जय होता है ॥२२॥ बायुबलमाह। वायुः पृष्ठे दक्षिणे च वहन्सूचयते वलम् । सम्मुखीनच वामश्च भटानां भङ्गसूचकः ॥२३॥ पृष्ठे दक्षे च वहन् वायुर्वलं सूचयते । यथा प्रामुखस्य पाश्चात्यो दाक्षिणात्यो वायुर्वल सूचकः । संमुखीनः सम्मुखे वहन्यामश्च भटानां योधानां भंग पराजय सूचयति ॥ २३ ॥ इंद्रयुद्रके समय पीटकी ओर और दक्षिण भागकी ओर वायु चले तो युद्ध करनेवालेको बल देती है। और सम्मुख तया वामभागकी वायु चले तो योद्धाओंके भंग होनेको सूचना देती है ॥ २३ ॥ उदाहरण। -पूर्वकी ओर और पश्चिमकी ओर मुस करके युद्ध करते समय यदि पश्चिम वा दक्षिणकी ओरसे हवा चलरही हो तो पूर्वी ओर मुस परके जो युद्ध करता है उसीका जय होगा। पह वायु बल मल्लयुदमें विशेष उपयोगी है ॥ २३ ॥ राहुबलमाह। प्राग्वातान्तकशम्भुपाशिहुतभुपौलस्त्यासादिशो योमाईरगुरहि पाशिककुभोऽसा पष्टिपटी निशि। । यया- समरसारं- पृष्ठे दक्षिणतः शुभो द्विघटिकोऽसौ" तुर्यतुर्या- अजनीशॉवाक्पवनेन्द्रराक्षसहिमम्वनिप्रतीचीदिशः।२४ अगुः राहुः अलि दिने प्राक् पूर्वदिशं प्रथमेऽई- पहरे याति । द्वितीयाईप्रहरे राहुर्वायुदितं याति । तृती- याचपहरे अन्तकदिर्श-दक्षिणदिशं याति । चतुर्थेईपहरे शम्भु- दिशम् ईशानकोणं याति । पंचमेर्द्धयामे पश्चिम दिशं याति । पष्ठेर्द्धप्रहरे हुतभुग्दिशम् अग्रिकोणं याति । सममेहरे पौल- स्त्पदिशम् उत्तर दिशं याति । अष्टमेईपहरे रक्षोदिशं निति दिशं याति । एवं दिनेप्यर्द्धयामराहुः । अथ पाशिककुभः पाशी चरुणस्तस्य दिशं पश्चिम दिशमाराय निशि रात्री.पठों पछी दिशं याति राहुः । तत्र कममाह-रात्री प्रथमाईप्रहरमाराप पश्चिमाग्रिकोणोत्तरनैऋत्यपूर्ववायुदक्षिणेशानेषु राहुति । अयं पृष्ठे दक्षिणतः शुभः । असौ विघटिको राहुः तुर्यतुर्यो चतुर्थी चतुर्थी दिशं ब्रजति । तस्य ऋगमाह-ईशानकोणे, अवाचि दक्षिणस्या, परने वायुकोणे, इन्द्रे पूर्वस्यां दिशि, राक्षसे निति- कोणे, हिमगोरुतरे, अमिकोणे, प्रतीच्या च, एतासु दिनु घटिकाद्वयन एकैको दिशं याति । पुनर्भध्याह्नोत्तरसंन्यावधि एवं वसनकमः ॥२४॥ राहु दिनमें-पूर्व, वायु, दक्षिण, ईशान, पश्चिम, अग्नि, उत्तर और नात्य इन दिशाओम क्रममें आधी आधी महमें जाता है। .

।
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् ।
और यही राहु रात्रिमें-आधी आधी प्रहरमें पश्चिम दिशासे आरंभ
करके छठी छठी दिशामें जाता है। यह पृष्ठ तथा दक्षिण शुभ होता है ।
और यही राहु - ईशानसे चौथी चौथी दिशा अर्थात् - ईशान,
दक्षिण, वायु, पूर्व, नैर्ऋत्य, उत्तर, अग्नि और पश्चिम दिशाओम दोदो
घडीमें गमन करता है ॥२४॥
"
दिवाराहुचक्रम् ।
निशि राहुचक्रम् ।
द्विघटिक गहुचक्रम् ।
१३
१२ पूर्व ७-८
घडी
द
दक्षि.
३
उत्तर एवमव क्रमेश
मध्याहोत्तर
१२ श्रमति
७
३
७
वा
पत्रि, १५ १६॥
१०
६
वा. २ पधि.५ ने दावा
उदाहरण
रंगनाथजीको पूर्वदिशामें जाना है । अतएव राहुबल प्राप्त होनेके
लिये प्रातःकालसे दूसरी और तीसरे प्रहरके पूर्वार्द्ध में वा रात्रिम पहली
और चौथीके पूर्वाद में गमन करना शुभ है । अथवा शीघ्रता हो तो
प्रातःकालसे तीसरी चौथी वा पन्द्रहवी सोलहवीं घडीमें गमन करना भी
श्रेष्ठ है । धूत आदिम भी राहुबल देखना आवश्यक है ॥ २४ ॥
योगिनीबलमाह ।
प्राक्सामानलरक्षोऽवाक्पाशीरेशदिक्षु दन्तिः ।
तिथिभिस्तिथिपदतोऽप्रहरै रिनवतुं योगिनी'
शस्तों ॥२५॥

समरसार- .. - ܝ प्राक् पूर्वदिक, सोम उत्तरदिक, अनलदिगग्रिकोणः। रक्षोदिक् नैकत्यकोणः, अवाक् दक्षिणादिक, पाशी पश्चिमा दिक, इरो वायुदिक, ईशा ईशानदिक् एतासु दिक्षु प्रतिपदमारस्य दर्शान्तैः तिथिभियोगिनी भ्रमति । तदाह-प्रति- पनवम्यां पूर्वदिशि, द्वितीयादशम्यां चोत्तरदिशि, तृतीपैकादश्यां चामिकोणे, चतुर्थी द्वादश्यां च नितिकोणे, पंचम्यां त्रयो- दश्यां च दक्षिणस्यां दिशि, पठयां चतुर्दश्यां च पश्चिमायां, सप्तम्यां पूर्णिमायां च वायव्याम्, अष्टम्याममायां चैशानकोणे योगिनी धमति । तिथिपदतः विथिस्थानात् अप्रहरैयोगिनी अष्टसु अर्द्धप्रहरेषु पूर्वक्रमेणैव भमति । सा योगिनी इनपद सूर्ववत् पृष्ठदक्षिणतः शुभा भवति ॥ २५ ॥ प्रतिपदासे आदि लेकर अमावस पर्यन्त पूर्व, उत्तर, अग्नि, नैत्य, दक्षिण, पश्चिम, वायव्य और ईशान इस क्रमसे इन दिशाओम योगिनी भ्रमण करती है। अर्थात् प्रतिपदा और नवमीको पूर्वम, २-१० को उत्तरम, ३ -११ को अनिमें, ४-१२ को नैऋत्यमें, ५- १३ को दक्षिणमं, ६-१४ को पश्चिममें, ७-१५ को वायव्पमें और ८- ३० को ईशानमें योगिनी रहती है। और वियिके आरंभसे लेकर अष्टमांश प्रमाण आधी आधी महरसे उपरोक्त दिशाक्रमानुसार एक ही तिथिम आठी दिगाओम योगिनी भ्रमण करती है। और सूर्यकी तरह पृष्टकी तथा दक्षिणयोगिनी उदाहरण। रंगनाथजी त्रयोदशीको पूर्वको यात्रा करेंगे अतएव १३ को योगिनीका निवास दक्षिण दिशाम दाहिना है तो श्रेष्ठ है। यदि संस्कृतटीका-भोपाटीकासमेतम् । (७) त्रयोदशीको न जाय और दशमीको ही जाना पडै तो उस दिन पूर्वमें योगिनी समुख होनेसे शुभ नहीं है। किन्तु तिथिपदतः इसके अनुसार दशमीकी तीसरी प्रहरके पूर्वार्द्धमें दक्षिण और उत्तरार्द्धमें, पश्चिममें योगिनी रहती है। अतएव उस समय गमन करनेसे योगिनी बल श्रेष्ठ रहता है ।। २५ ॥ -- योगिनीवासचक्रम् । निथिपदतो योगिनीचक्रम् । ईशा. तिथि-१-९/३-११ अग्नि ८ यामा. ईशान, १- यामा. १३-यामा. पूर- अनि १-यामाई उन्तर प्रतितिया अष्टमाशेन भ्रमति । ५-यामा दाक्षिण वाय. पश्चि, नत्र. ७न्या. वायव्य ६-यामाई ४-या, पश्चिम, नैन्य- " योगिनीनामान्याह । ब्राह्मी कौमारी बाराही वैष्णव्यथेन्द्री च । स्याचं- डिका च माहेश्वरी महालक्ष्म्यभिख्या च ॥२६॥ नाही, कौमारी, वाराही, वैष्णवी, शेन्द्री, चण्डिका, माहेश्वरी और महालक्ष्मी यह प्रतिपदादि क्रमसे उनके नाम है ।। २६ ॥ राहुयुक्तयोगिनीबलप्रशंसामाह । पृष्ठे दक्षे योगिनी राहुयुक्तां यस्यैको ये शलक्ष निहन्ति । श्रेष्ठं सर्वेभ्यो" बलेभ्यस्तदेततं संक्षेपो" ऽयं सर्वसारों"ऽभ्यधायि" ॥२७॥ .. - - , (४८) समरसारं- पृष्ठे पृष्ठभागे, दक्षे दक्षिणभागे राहुयुक्ता योगिनी यस्य भवेदयम् एकः शूरः शत्रूणां लक्षं निहन्ति मारयति । तदेतद्यो- गिनीराहुबलं सर्वेयः श्रेष्ठम् । पया अयं संक्षेपः सर्वसारः सर्व- बलसारः अपधायि कथितः एतद्वचनं राहुयोगिन्योः प्रशंसा- मात्रमेव ॥ २७ ॥ जिमके राहुयुक्त योगिनी पृष्ठकी या दक्षिण होय तो वह मनुष्य अकेला ही लाख शत्रुओंको मार सकता है । अतएव यह राहुयोगिनी बल सब बलास श्रेष्ठ है। मैंने इसको सबका सार लेकर संक्षेपसे कहा है ॥२७॥ उदाहरण। श्रीमान् देवीसिंह महोदय चत्रकृष्ण पञ्चमीको उत्तर यात्रा करेगे। अतएव यदि उस दिन एक प्रहर दिन चढे पीछे दूसरे प्रहरके पूर्वाईमें गमन को तो राहुयुक्त योगिनी पीठपीछेकी होगी और इसका फल बहुत उत्तम है ॥ २७ ॥ ख्यादिवारेषु युद्धे चयनिकालापहरानाह । हालान्तकाभसख-यामदलैस्तु कालः मुर्यादिवासर- गतो युधि वर्जनीयः। भासारमेदलति यामदलानि भानुवारक्रमाद िनरैः स्वहितार्थमुझेत् ॥ २८ ॥ युधि संग्रामे हा ८-लां ३-त ६-का भ४-१७-१२- यामद । अनिरसचन्द्रवेदशैलानिमितः यामदलेः यामाई कालः कालवेलाम्यः । सूर्यादिवासरगतः पर्जनीयः । रवि- 'वासरे अष्टमोऽर्द्धप्रहरस्त्याज्यः, चन्द्रे तृतीयाईप्रहरस्त्याज्पः, संस्कृतीका-भाषाटीकासमेतम् । भौमे पठोऽपहरस्त्याज्यः, बुधे प्रथमोऽर्द्धप्रहरस्त्याज्यः, गुरौ चतुर्थाईप्रहरस्त्याज्यः, शुक्रे सप्तमोऽईपहरस्त्याज्यः, शनी द्वितीयोईप्रहरस्त्याज्यः। कालवेलाख्योईप्रहरः युद्धे वर्जनीयः, भा४-सा ७-र २-मे ५-६८-ल३-ति ६-यामदलानि भानुवार- क्रमान:स्वहितार्थमुझेव । रविवारे चतुर्थोऽर्दयामस्त्याज्यः । चन्द्रे सप्तमोईयामस्त्याज्यः, भौमे द्वितीयः, बुधे पंचमः, गुरौ अष्टमः, शुक्रे तृतीयः, शनौ पठः । एतेऽर्द्धयामाः संग्रामे सदा त्याज्याः॥२८॥ , . सूर्य आदि वारोंमें क्रमसे ह ८-ल ३- त ६-क १-भ ४-स-७ ख२ यह अर्द्धयाम अर्थात् रविवारको आठवां यामाई, चंद्रको तीसरा, मंगलको छठा, बुधको प्रथम, गुरुको चौथा, शुक्रको सातवां और शनिको दूसरा अईयाम काल युद्धमें वर्जनीय है । और सूर्यादि वारोंमें क्रमसे भा ४-सा ७-२-मे ५-८-ल३- ति ६-इन प्रहरीका अर्थात् सूर्यको चौथा, चंद्रको सातवां, भौमको दूसरा, बुधको पांचवां, गुरुको आठवां, शुक्रको तीसरा और शनिको छठा अर्द्धयाम काल अपने हितके निमित्त त्यागदेना उचित है ॥२८॥ अर्द्रयामकालचक्रम् । अर्द्धयामकालचक्रम् । दालतका १४ ससभा ४सा ७/१२म ५.दल ३ निद शुश. श. सू. ४ . मानलेना चाहिये। इन ४७ पलोको १५ मे रटाया ता १४।१३ हुए-इस (५२) समरसार वारप्रवृत्तिके आरंभसे लेकर जितनी गत घटी हो टनको दोसे गुणा कर पाँचका भाग देनेसे जो लब्धि हो वह वारपति (जिस दिन जो वार हो उस ) से आदि लेकर सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु और मंगल इस क्रमसे बारहोरा होती है। यह अपनी राशि स्वामीका जो ग्रह शत्रु हो उस ग्रहकी होरा हो तो युद्धमें वर्जित है ॥ ३० ॥ उदाहरण । यथा-रविवारको वारके आरंभसे लेकर इष्टघटी ५।०० गत है अतः ५ को दोसे गुणा किया तो १० हुए । इनमें ५ का भाग दिया तो २ लब्ध हुए अतएव वारपति सूर्यसे आरंभकरके दी पर्यंत गिने तो सूर्य और शुक्रकी होरा गत होकर बुधकी होरा वर्तमान हुई है। अरिखगस्य-इसके अनुसार श्री संग्राम सिंहकी राशि कुम्भ है। इसका स्वामी शनि है और शनिके सूर्य चन्द्र मंगल, शत्रु हैं +चारप्रवृत्तिजाननेकी क्रिया-"पादौनरेखापरपूर्वयोजनः पर्युताना स्थितयो दिनाधत । ऊनारिफास्तद्विवरोर. पर्व तथाधो दिन शनम् १॥' अपने चतुर्थांश करके हीन जो रेखाके पर पूर्व योजनोंकी पल उनको पंद्रहमें लोड वा घटाकर दिना से अतरित करे । यदि वह अक दिनास ऊन वा अधिक हो तो सूर्योदयसे पाडे वा पहले वारप्रवृत्ति होती है। यथा-३४११ दिनमानके दिन काशीम वारप्रवृत्ति देसनी हो तो रेसापुर-कुरक्षेत्रसे काशी ६१ योजन है ! इन ६३ को चतुर्थांशसे ऊनित किया तो ४७ योजन हुए-यही पर दिनार्ध १७१९ से अतरित किया तो रा४९ । हुर दिनासे १४६१ शन्यून था अतएव सूर्योदयसे २ वटी ४९ पल पीछे वारप्रवृत्ति होगी इसप्रकार वारप्रति जानन पाठकोको बडा लेश दीसंगा अतएव यह सुगमतर राति स्मरण माना। चाहिये कि सर्वदा और सर्वन प्रात कालोबजे वारप्रवृत्ति होती है।

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । अतएव उपरोक्त गणनानुसार जिस दिन जिस समय सूर्य, चन्द्र, मंगलकी होरा हो उस समय युद्धमें नहीं जाना चाहिये ॥३०॥ वामांसेऽत्रं विरुद्धयामदलजः प्राग्भागर्के गूढजो राहोः स्यातुं कुचाधेरै श्रुतिशिरोहस्ते प्रहारो खेः। चन्द्रादास्यभुजदये प्रहरणं शत्रुग्रहस्यापि तु स्याँडातः किल होरयाँ हदि मुखेखगादियुद्धे ध्रुवम् ।। विरुद्धयामगूढराहुरव्यादिषु युद्धाचरणे प्रहरस्थलान्याह वाईप्रहरादी एषु अङ्गेपु युद्ध पाता भवति । तदाह-विरुद्ध- यामदलजः विरुद्ध यामदलं यामाई तस्मिातः विरुद्धयाम- दलजः प्रहार:-योद्धः वामांस वामस्कन्चे स्यात् । गूडजः अर्थप्रहरजः प्राग्भागके शरीरपूर्वभागके स्यात् । राहोर, पामजः कुचाधरे कुचयोः अधरमश च स्यात् । खेः हता दिक् श्रुतिशिरोहस्ते घातं करोति । चन्द्राचन्द्रहता दिक् भुज- दये घातं करोति । शत्रुग्रहस्य होरा हृदि मुखे च पातं करोति। खाइदियुद्धसमये ध्रुवं निश्चयेन ज्ञेयम् ॥ ३१॥ युद्धके समय उपरोक्त यामाई, गव, राहु आदिमें यदि यामाई वरुद्ध हो अर्थात् श्रेष्ठ न हो तो शरीरके वामस्कंध, गूढ विरुद्ध हो तो शरीरके अर्ध्वमागमें, राहु विरुद्ध हो तो कुचोपर, सूर्य विरुद्ध है सो कान शिर और हायॉपर, चन्द्रमा विरुद्ध हो तो सम्मुख तथा दोनों भुजाओंपर और होरा विरुद्ध हो अर्थात् शत्रुग्रहकी होरा हो तो ख और हृदयपर खादिक युद्र में निश्चय महार होता है ॥ ३१॥ , समामारं- उदाहरण। उपरोक्त वातव्यवस्था दो प्रकारने मंटित होती है। एक तो यह कि विरुद्ध यामादिम आयेहुए युद्धप्रवृत्त याहाके लिये देवनसे कोई पृछे कि, इसक अंगमें कहाँपर बात होगा नो वह पहले ही कह सक- ताई कि अमुक स्थानपर घात होगा । अर्थात्-जगे मन्मुप मर्यमें गया है तो कान, शिर और हाथापर प्रहार होगा। इत्यादि। और दृम यह भी है कि, अपना शत्रु यदि विरुद्ध यामादिम आयहि और वह विन्दता अपनको विदित है तो उक्त स्थानपर धात कग्नेगे शत्रुपर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है । यथा-राहु विहमें आया तो कुचॉपर बात करनेमे अधिक प्रभार पड़ सकता है । इसके अतिरिक्त-मलयुद्ध में अनुकूल यामदलादिमें उपस्थित एक मलको यदि दृमरे मटका विरुद्ध यामदलादिमें उपस्थित होना विदित है तो यह उक्त स्थानाम चोट लगानेसे विजयी होमकना है। यथा-चन्द्र विभड हो तो मुस और हृदयपर चोट मारनेमे दमग मल मीघ्र पगनित हो सकता है ।। ३१॥ ग्रहस्थित्या प्रहारस्थलान्याह । लग्नाद्राशेनं पुसः करिएकपिनयाधोदभामातेसंस्थाः खेटा इन्युनवापि द्विपमथ सही मूनि के सह- स्के । वोजे चोरुदेशे गुर्दै इति तदनुं ग्रन्थि- दो"गण्डभागे" वास्तु:सुः स कालः खलसमनि- झगः कर्णकण्ठे शये चैः ॥३२॥ "लग्नादाशेश्च पुस शशि १ रवि १२ शिव ११ दिग् १० व्योमगो ९द्रीपचंद ४ स्थानेष्वर्थ ५४ ६ सस्था रविशशिकुजविःपूज्यशुकादिखेटा । मात कुर्युयथोक्ता शिरसि च बदने प्रदेशे स मुधिं वक्षायूप्रदेशे गुद इति तदनु प्रथिदोगदमागे ॥ ३२ ॥ इतिपाठान्तरम् । स संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । पुंसः पुरुषस्य जन्मलमा जन्मराशेश्च क - रिपु १२.. कपि ११-नया १०-धो ९-६८ - भा ४- मा ५ - ६ एपु- प्रथम, द्वादशैकादश, -दशम, -नवाद, -चतुर्थ, पंचम, -पयेषु स्थानेषु स्थिताः नवापि खेटाः व्यादिग्रहाः मल्लयुद्धे एवंगेपु अवयवेधु द्विपं शत्रु कमात् मूर्ति मस्तक, वक्के मुखे, सहत्के सहृदयमुखे, वक्षोजे स्तने, ऊरुदेशे, गुदे, तदनु पश्चात् यन्थ्योः, दो जे, गंडभागे कपोले शत्रुम् एतेषु शरीरस्थानेषु ग्रहाः घात कुर्युः । उक्तं च-यो योद्धा युद्धं कर्तुं प्रवृत्तस्तस्य जन्मराशिस्यो भास्करो भवति स तस्य शत्रोः मस्तके पातं करोति । योद्ध- जन्मराशितो द्वादशे जन्मलमतो द्वादशे वा चन्द्रः स्थितो भवति तदा तस्य शत्रोः मुखे घातं करोति । यदा योद्धः एकादशे भौम: स्थितो भवति तदा तस्य शत्रोः हृदये घातं करोति । यदा योहः दशमे बुधग्रहो भवति तदातस्य शत्रोः वक्षःस्थले धातं करोति । यदा योद्धर्नवमे गुरुग्रहो भवति तदा तस्य शत्रोः ऊरुदेशे घात करोति । यदा योद्धरष्टमे गुयहो भवति तदा तस्य शत्रोः गण्डभागे घातं करोति । यदा योचतुर्थे शनिग्रहो भवति तदा तस्य शत्रोः गुदे घात करोति । यदा योद्धः पंचमे राहुः स्थितो भवति तदा तस्य शत्रोः भुजायां पातं करोति । यदा योद्धः पठे केतुग्रहों भवति तदा तस्य शत्रोः कपोले पालं करोति । पात: सूनुः; सकालः, ख २-ल ३- स७ -मनिशगः कर्ण-कण्ठे शये च । युदं कर्तुं प्रवृत्तस्य वास्तुः वास्तुस्वामी गृहारंभलस्वामी गृहप्रवेशल स्वामी का पहः खगतः द्वितीयस्थाने स्थितः तदा समरसार-- तस्य शत्रोः कर्णे घातं करोति । युद्धं कर्तुं प्रवृत्तस्य सूनुः जेठ- पुत्रोत्पत्तिलमेशस्तु ग्रहः ले-तृतीये स्थितस्तदा तस्य शत्रोः कठे घातं करोति । योद्धः सकालराशेः अष्टमस्वामी समः सहम- स्तदा तस्य शत्रोः अनिशं निरन्तरं शये हस्तपृष्ठे च घात करोति । इति ॥ ३२॥ युद्ध करनेवालेको जन्मलम वा जन्मराशिसे 'युद्धकै समय ' सूर्या- दिग्रह क १-रिपु १२-कपि ११-नय १०-५९-६ ८ मा ४- मा ५-त ६-इन स्थानोंमें हो तो क्रमसे शत्रुफे मस्तक, मुख, हृदय, वक्षःस्थल, उरु, गुदा, प्रन्थि, भुज और कपोल इनमें घात करती हैं। अर्थात् अपने जन्मलग्न वा जन्मराशिसे सूर्य प्रथम हो तो शत्रके मस्त- करें, चन्द्रमा बारहवें हो तो मुखपर, भौम ग्यारहवें हो तो हृदयमें बुध दशवें हो तो वक्षस्थल, ( कुचस्थान ) में, गुरु नौवें हो तो ऊरु (जंघा ) में शुक्र आठवें हो तो गुदापर, शनि चौथे हो तो ग्रन्यिभाग (गोड़ों) में राहु पांचवें हो तो भुजाओंपर और केतु छठे हो तो कपोल ( गालोंपर ) सहसा धात करता है । और गेहारम्भ या गृहप्रवेश लग्नका स्वामी उस समय दूसरे हो तो कानोंपर, ज्येष्ठ पुत्रके जन्मलनका स्वामी तीसरे हो तो फॅटीपर और अपना अष्टमेश सातव हो तो शत्रुके हाथ और पीटपर निरन्तर घात करता है ॥३२॥ उदाहरणा यथा लक्ष्मणसिंहका राशीश मंगल युद्धके समय कुंभराशिपर होनसे लक्ष्मणसिंहको ग्यारहवां है अतएव यह शत्रुके हृदयमें घात करता है। वास्तु-गृहप्रवेशलग्न वृपका स्वामी शुक्र युद्धके समय वृषका होनेसे लक्ष्मणसिंहको दूसरा है अतएव यह शत्रुके कानोंपर घात करता है। लक्ष्मणसिंहके ज्येष्ठ पुत्रका जन्मलोग सूर्य युद्ध के समय मिथुनका होनेसे संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । लक्ष्मणसिंहको तीसेरा है अतएव यह शके कंठोंमें धाव करता है। और अष्टमेश युद्ध के समय तुलाराशिका होनेसे लक्ष्मणसिंहको सातवां अतएव यह शत्रुके पीठपर निरन्तर घात करताहै ॥ ३२ ॥ जन्मलंग्गजन्मराशेी ग्रहस्थितिषशाच्छरीरधातचक्रम् । १।१२।११/२० ९ ६ (७ ना. इति समरसारे गृहयामाईयोगिन्यादिसहमहारलक्षण- कथनप्रकरणम् । युद्धेहिचकविरुद्धत्याज्यनक्षत्राण्याह । आदिभिस्त्रिनाड्योमहिचक यद्येकनाड्यां स्युः। नामार्कचन्द्रभानि प्रपने तदहंस्त्यजेधनात् ॥३३॥ आदिमिरिति । यस्मिन् दिने आदिनक्षत्रैर्नाडीत्रयनि- मिताहिचके एकस्यां नाइयां जन्मभं नामभं वा सूर्याधिक्षित भं चन्द्राधिष्ठितं भं च त्रीण्यपि स्युस्तदहस्तद्दिनं मंधने युद्ध यलात्यजेत् । यत्रा , पूर्वाफाल्गुनी, उनराफाल्गुनी, अनु- राधा, ज्येठा, धनिष्ठा, शतभिपक्, भरणी, रुचिका एलानि नक्षत्राणि एकनाडीस्थानि ९, पुनर्वसु-मघा-हस्त-विशाखा- मूल-श्रवण-पूर्वाभाद्रपदा-अश्विनी-रोहिणीति द्वितीयनाडीस्थ- भानि९, शेषाणि पुष्प-श्लेपा-चित्रा-स्वाती-पूर्वापाढोचरापादो- तराभाद्रपदा-रेवती-मृगशीर्षाणि १ भानि तृतीयनाडीस्थानि। - .

समरसार- अत्र-एकनाड्यां नामार्कचन्द्रभानि यस्मिन्दिने त्रीण्यपि एकस्यां नाड्यां स्युस्तहिने युदं वय॑मित्यर्थः ॥ ३३ ॥ आर्द्रा आदि नक्षत्रोंसे नीचे लिखे अनुसार तीन नाडीका अहि (सर्प) चक्र बनावे । उस चक्रमें यदि एकही नाडीमें नामनक्षत्र यह सूर्यनक्षत्र और चन्द्रनक्षत्र यह तीनों जिस दिन हों तो वह दिन युद्ध- यात्रामें यत्नसे त्याग देना चाहिये ४ ॥ ३३ ॥ उदाहरण यथा-चैत्र शुक्ल सप्तमा बुधवार मृगगिर नक्षत्रफ दिन 'राजसिंहया जन्मनक्षत्र चित्रा, और सूर्य नक्षत्र रेवती, एवं चंद्रनक्षत्र मृगशिर है' तो यह तीनों नक्षत्रही अंतिम (तीसरी) एक नाडीमें स्थित है अत- एष रानसिंहको युद्धयात्राके निमित्त यह दिन त्यागदेना चाहिये।॥३३॥ . चारदिक्शूलमाह । शनिचन्द्रौ' गुरुः सूर्यसिता कुजबुधौ त्यजेत् । चतुर्दिक्षु निपिद्धार्द्धयामें शूलं विशेषतः ॥ ३४ ॥ शनिचन्द्रौ वारी पूर्वस्यां त्यजेत् । गुरु दक्षिणस्यां त्यजेद। रविभुगुवारी पश्चिमायाँ त्यजेत् । भीमबुधवारी, उत्तरस्यां त्यजेत् । चतुर्दिक्षु एवं क्रमेण ज्ञातव्यम् । निषिद्धाईयामे यस्मिन् वासरे योऽईयामो निषिद्धो भवति स त्याज्या भवति xयह स सकार एकनाडीचक युदयात्राके सिवाय अन्यतमीदेखा जाता है।

संस्कृतरीका-भाषाटीकासमेतम् । तस्मिन्नईयामे वारशूले च गमनं विशेषेण वर्जयेत् । उक्त च-शनिवासरे पठे यामा, चंद्रयासरे सप्तमे यामार्दै पूर्वस्यां दिशि न गच्छेत् । रविवासरे चतुर्थेऽईयामे, शुक्रवासरे तृतीय- यामार्दै पश्चिमां दिशं न गच्छेत् । गुरुवासरे अष्टमयामार्दै दक्षिणां दिशं न गच्छेत् । भीमवासरे द्वितीययामाई, बुधवासरे पंचमयामार्दै उत्तरां दिशं न गच्छेत् । एतेऽईपहराः विशेषतो वयाः, सामान्यतस्तु नदिनानि सकलान्येव वानि ॥३४॥ शनिवार व सोमवारको पूर्वमें, गुरुवारकोदक्षिणमे, रविवार व शुक्र- वारको पश्चिममें और मंगलवार व बुधवारको उत्तरमें नहीं जाना चाहिये और जिन वारोंके जो निषेध अर्द्धयाम हो उनमें दिक्मूलको विगेप- कर त्याग देना चाहिये। तथा-शनिको छठे और चन्द्रको सात यामा- में पूर्वमें नहीं जाना चाहिये । गुरुको आठ गामाईम दक्षिण नहीं जाना चाहिये । सूर्यको चौये, शुक्रको तीसरे यामार्समें पश्चिमम नहीं जाना चाहिये । और मंगलको दूसरे तथा बुधली पाच यामा- में उत्तरमें नहीं जाना चाहिये ॥ ३४ ॥ दिशूलचक्रम। श.चं.पू. ६-७ दक्षिण गुरु उदाहरण। गणेशप्रसाद मिश्र गुरुवारको दक्षिणमें जाना चाहते है किन्तु उस दिन दक्षिण दिरशूल रहनेसे वह दिन गम्पूर्ण निपिट है ।दिक ९. भी. सू.शु.प. ४-३ (६०) समरसार- शूलमें बहुधा लोग वारमवृत्तिसे दोष मानकर स्योदयसे घड़ी दो घडी आगे पीछे भेज देते है । किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिये। दिक्शूला- दिमें सूर्योदयसे ही वारारंभ मानना चाहिये । यदि गणेश प्रसादको गुम्बारके दिनहीं जाना आवश्यक हो तो आठवां अर्द्धयाम त्यागकर फिर जाना चाहिये ॥ ३४ ॥ नवग्रहाणां स्वस्वभुज्यमाननक्षत्रेऽश्चिन्यादि- सप्तविंशतिनक्षत्राणामयान्तरभोगमाह । धीनां भभुक्तनाड्यो नसाप्तिपरिशेपयोगतः सदपि । तत्काले शशिभमिति रव्यार्या गतिनुतिलवस्तु घटिकेह ॥ ३५॥ भभुक्तनाउचो नक्षत्रस्य भुक्तपदिकाः धीना नरगुणिताः कार्याः ततो नखाता विंशतिभक्ताः कार्याः। यहायते तानि गतनक्षत्राणि भवन्ति । तनक्षत्रमार+प यनक्षत्र दिने भवति । यतारिशिष्टं भवति तनात्कालिकनक्षत्रं ज्ञातव्यम् । एवं वाका- लिफ-शशिभमिति-नत्कालिकचन्द्रनक्षतं प्रमाण मानोः सर्व- संघटिकाः सप्तविंशतिमि जिनाः । सम्धे मति नक्षत्रपटिका भाजिता गतं भवेद । सगानां सर्पघटिकाः पूर्वोक्तमहिता भवन्ति । गतिनुनिलयः नक्षप्रगतिः । यावत्सूर्यभीमादीनां महाणां याः माघटिमा भवन्ति घट्यात्मक प्रमाणं भवति- तासां पटराटिका प्रमाणं भवति । पूर्व याः घटिका नक्षत्रस्य गता भवन्ति ताः घटिकाप्रमाणेन भाजयेत,-पा गतघटिकाः :

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (६१) भवन्ति, ता धीमा नवगुणिता नखाप्ताः लम्धं गतनक्षत्राणि भवन्ति, शेष वर्तमानं भवति । एवं सूर्यचन्द्रौ विचारणीयौ कस्मिन्नक्षत्रे तात्कालिको भवेतामित्यर्थः । सूर्यादिभोग्यनक्ष- त्राणांन्तभोग्यकालः पष्टयंशः ॥ ३५ ॥ जिस किसी नक्षत्रपर कोईभी ग्रह जितने समयतक स्थित होता है उतनेही समयमें उस एकही नक्षत्र के बीच सत्ताइसों नक्षत्रों के अन्तर- भोग होते हैं। नक्षत्रपर जिस समय ग्रह स्थित हो उस समयसे लेकर अपने इष्टके रामपतक जितना व्यतीत हुआ हो वह भयात होता है। और आरंभसे अन्ततक जितना नक्षत्र हो वह भभोग होता है। एवं भभोगमें ६० का भाग देनेसे जो लब्धि हो वह पष्टयंश होता है। भभोग चाहे घट्यात्मक (पूरा६० घरी वा न्यूनाधिक) हो, चाहे दिनात्मक हो और चाहे मासात्मक हो-उस सम्पूर्ण मानको ६० घटी और उसके पष्टचंशको एक घटी मानकर उस पष्टयंशका भयातमें भाग देना चाहिये । स्मरण रखनेकी बात है कि, भयात और पश्चंश दोनॉफी विपल करके भाग देना चाहिये। भाग देनेसे जो लब्धि हो पद भभुक्त नाडी होती हैं । उन भभुक्त नाडियोंफो नौसे गुणाकर पीसका भाग देनसे जो लब्धि हो वह ग्रहके वर्तमान नक्षत्रसे आरंभ कर गणना करनेसे गत नक्षम होते है । और जो शेष दो वह वर्तमान नक्षत्र होते हैं। तात्कालिक चन्द्र नक्षनसे और इसी प्रकार सूर्यादि ग्रहोंके नक्षत्र प्रत्येक नक्षत्र में सब नानोंके अन्तरमोग होते हैं ॥३५॥ . उदाहरण। संवत् १९६७ शके १८३२ कार्तिक कृष्णाष्टमी मंगलबारको ४९ घटी २१ पलके इष्टपर चन्द्रसूर्यके नक्षत्रांतरभोग जानते हैं । अनः उस समरसार- दिन पुनर्वसु २१५६ और दूसरे दिन पुष्य १७ है । अतएव चन्द्र- नक्षत्र पुष्यम अन्तम्भोग जाननेके निमित्त उपरोक्त इष्टपर गणित कर- नेसे ४६ घटी ३५ पल भयात । ५८ घटी ११ पल भभोग और वटी ५८ पल ११ विपल षष्टचंश आता है। इस पष्टयंश ५८६११ के विपलपिण्ड ३४९१ का भयात ४६२५ के विपलपिण्ड १६७१०० में भाग दिया तो ४७१५२ भभुक्तनाड़ी प्राप्त हुई। इन ४७१५२ भभुक्त नाड़ियोंको नौसे गुणा किया तो ४३०१४८ हुए । इनमें २० का भाग दिया तो २१ लब्ध हुए और १०४८ शंप रहे । यहाँ वर्तमान पुण्यनक्षत्र है अतएव पुष्यसे लेकर अश्विनीतक २१ अन्तरभोग होचुके और वर्तमान भरणी है। इसी प्रकार सूर्यनक्षत्रका अन्तरभोग देखना है तो कार्तिक कृष्ण ५ रविवारको ४९।८ के समय स्वातीपर सूर्य आया है और कार्तिक शुक्ल ४ रविवारको ६६३२ पर्यन्त रहा है । अतएव इस सम्पूर्ण कालको पष्टि- घटयात्मक मानके गणित करनेसे सूर्यका-२ दिन घटी १३ पल भयात । १३ दिन १७ घटी २४ पल भभोग। और १३ घटी १७ पल १५ विपल पष्टवंश आता है । इस १३३१७१२५ पट्यशके विपलपिण्ड ४७८४४ का भयात २१०११३ फे विपलपिण्ड ४३२७८० में भाग दिया तो ९१३ भभुक्त नाडी प्राप्तहुई । इन ९ । ३ भभुक्त नाडियाको नौसे गुणा किया तो ८११२७ हुए-इनमें २० का भाग दिया तो? लब्ध और ११२७ शेष रहे । यहाँ सूर्यका वर्तमान नक्षत्र स्वाती है । अतः स्वातीसे ज्येष्ठातक ४ अन्तरभोग होचुके और वर्तमान मृल है। स्मरण रखने की बात है कि, जिस ग्रहका जो वर्तमान नक्षत्र हो उसीमे गिनना चाहिये अधिनीसे कदापि नहीं गिनना चाहिये बस इसी प्रकार भौमादि सब ग्रहोंके होसकते हैं । यहाँ केवल सूर्यचन्द्रकाही भयोजन है। इसलिये और ग्रहोंके उदाहरण नहीं दिये हैं ॥३५ ।।

चन्द्राधिष्ठितपुप्यनक्षत्रस्यांतर्भागचक्रम् ।
काक
२३/४/५/६७/८/९/२०११,१२१३/१४,२५/१६/१७२८/१९२०२१
१३ २०५६
सेम पू3 चिस्वा वि ऽनुज्ये मूउपशपूर अभक रोम आपु
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् ।
सूर्याधिष्टितस्वातिनक्षत्रस्यांत गचक्रम् ।
२३४
म्या विऽनु जे मू]
उधपूरे अभकारो मृआयुशम पू उह चि
मा
(६३)

(६४) समरसारं-- राहुकालानलचक्रमाह । पक्षों जीवों वलितगतिना राहुणेतोडुलोका गम्यो ऽस्तस्तद्युतमुडुशयं कर्तरीयस्तसंज्ञे । स्थायीनो' याय्युडपत्तिरि मौ जीवगौ तज्जयायें प्रेताजग्में किमपि तु वर कर्तरी जग्धतश्च ॥३६॥ वलिता विपरीता वका गतिर्यस्य ताहशेन राहुणा इस मुक्ता ये उडूनां नक्षत्राणां लोकास्त्रयोदश जीवपक्ष । राहु भुक्तत्रयोदशभानि जीवपक्षसंज्ञानि स्युरित्यर्थः । गम्यस्तु प्रयो दशनक्षत्रात्मकः पक्षोऽस्तो मृतसंज्ञकः । तेन राहुणा युतमु नक्षत्रं कर्तरीसंज्ञम्, शयं पंचदशं तु ग्रस्तसंज्ञ स्यात् । स्थाय इनः सूर्यो ज्ञेयः। यायी उडुपतिश्चन्द्रो ज्ञेयः। इमौ रवीन्द्र जीवपक्षे गती तयोः स्थायियायिनोः क्रमाजयाय भवतः धीत्राभेत्यादि पूर्वश्लोकोतरीत्या नीतयोस्तनक्षत्रस्थितखी. न्दोस्तु तत्कालं जयपराजयज्ञानम् । प्रेतान्मृतनक्षत्रात् जग्ध ग्रस्त पंचदशं नक्षत्र क्रिश्चिद्वरं श्रेठम् । जापाद्रस्तात्कतरीसंज्ञ राहुभुज्यमानं भं श्रेष्ठमित्यर्थः । इति राहुकालानलः ॥ ३६ ॥ राहुके वर्तमान नक्षत्रको छोड़फर विलोम गाना फरके तेरह नक्षत्र जीवपक्षके, तथा ऋमगणनासे आगेर तेरह नक्षन मृतपक्षके और राहुयुक्त नक्षत्र क्र्तरी तथा उससे पन्द्रहवां नक्षत्र प्रस्तगतका होताहे । इनमेंसे जीवपक्षके नक्षत्राम यदि मर्य हो तो स्थायी और चन्द्र हो तो यायीका जय होताह । शेप मृत, ग्रस्त, कर्तरीम-मृतगे अस्त अच्छा होता और प्रस्तमे फतरी अच्छा होताहे ॥ ३६ ।।

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (६५) उदाहरण। यथा-संवत् १९६८ श्रावण शुक्ल एकादशी शनिवारको अश्विनीपर राहु, जेठापर चन्द्रमा और श्लेपापर सूर्य है। अतः अश्विनी नक्षत्रपर राहु होनेसे अश्विनी कर्तरीसंज्ञक और भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृग- शिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त और चित्रा यह १३ भुक्त नक्षत्र जीवपक्षके हैं। एवं खेती, उत्त- राभाद्रपद, पूर्वाभाद्रपद, शतभिपा, धनिष्ठा, श्रवण, अभिजित, उत्तरा. पाढ, पूर्वापाड, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा और पिशाखा यह १३ भोग्यनक्षत्र मृतपक्षके हैं । तया स्वाती ग्रस्तसंज्ञक है ।। यहाँ इस दिन चन्द्रमा जेष्ठानक्षत्र पर होनेसे मृतपक्षका है । और सूर्य क्षेषा नक्षत्रपर होनेसे जीवपक्षका है, अतः स्थायीका विजय आता है। यदि इसी दिन यायीका विजय देखना होतो धीमाभभुक्त० के अनुसार इस दिन १५१२२ के इटपर जेष्ठानक्षत्रमें १७ अन्तरभोग व्यतीत होजानेसे जमासे पुनर्वसु तक १७ अन्तम्भोगहो चुके और वर्तमान पुष्यका भोग है, अतएव पुष्प जीवपक्षमें आजानेसे १५।२२के समय यायीको विजय प्राप्त हो सकता है ।। ३६ ।। अश्विनीकर्तरी । राहुकालानलचकम् । प्रस्त स्वाती. २।३।४५ ६.७/८/९१०/१२१२१३/ सं. रे. उ. पू.श.ध.प्र. अ. उ. पू. म. जे. नु, वि. मो. ११२३४५ ६७८९ २०११२२ १३, सं.

- ~ - संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (६७)" श्लेषान्त भपादा नक्षत्रचरणाः भवन्ति । यथा-अ इ उ एकत्ति- कापादाः, भो वा वि बु रोहिणीपादाः, वे यो का की मृगशिरः- पादाः, कु घ ङ छ आपादाः, के को ह ही पुनर्वसुपादाः, हु- हे हो डा पुण्यपादाः, डि डु डे डो श्लेषापदाः । एक्सन्ये पामपि। एवं च अनेन प्रकारेण अन्येषु पंचविंशतिकोए मटपरतः वर्णा लेख्याः पुनः इकारायैः स्वरैयुक्ताः कार्याः । अथ तबाह- मि दि पिरिति, मुटु पु रु तु, मे टे पेरे ते, मोटो पो रो तो । एवं क्रमण वर्णी लेख्याः। यत्र मध्यकोठे पुकारः तत्र पणठा लेख्याः । पितृभतः मघामाराय आदिदैवं विशासति चतुभिर्वणः नक्षत्राणि भवन्ति । तथा च नयभजखा लेख्याः । पूर्वोक्तकमेण इकाराः स्वरैर्युक्ता वर्णी लेख्याः कथं ? तत्राह- नि यि मि जि खि, तु यु भुजु खु, ने ये भे जे खे, नौ यो भी जो खो। यत्र कोष्टेषु भुकारः तत्र धफडा लेख्याः । मैत्र- मनुराधामारय हरिभमवधिः श्रवणपर्यन्नं चतुर्भिश्चतुर्भिवण: नक्षत्राणि भवन्ति । पुनः गसुदचलास्तथैव लेख्याः। पुनरिका- रायः स्वरैः संयुक्ता लेख्याः । कथं तत्राह-गि सि दि चि लि, र सुदुचुल, गे से दे चे ले, गो सो दो चौ लो । एवं यत्र दुकारः तत्र थझ त्र वर्णा लेख्याः। एवं चतुभादनिष्ठातः भरणी- पर्यन्त नक्षत्राणि भवन्ति ॥ ३७॥ ३८॥ ..

-- (६८) समरसारं- पाँच पाँच कोठोकी पाँच पक्ति बनानेसे पच्चीश कोष्ठक बन जाते है। उन (१) पचीस कोठोंकी प्रथम पक्तिम अव-क हड लिखें । और उसके नीचेकी पंक्तियोंमे अके नीचे इ-उ-ए-ओ लिखकर व कह ड को इ आदि स्वरोसे युक्त करके लिखै । और इनके मध्यकोष्टमें जहाँ "कु" लिखा है उसमें 'घडउ' लिखै तो ऐसा लिखनेसे उर्धाधः पक्तियाम कृत्तिकासे आदि लेकर लेपापर्यन्त चार चार चरणगत वर्ण होजाते है । (२) ऐसे ही फिर पच्चीस कोठामें मदप र-त-लिखकर उनके नीचेकी पक्तियाम इनको इ आदि स्वरोंसे युक्त कर लिखें । और इनके बीचके 'पु' युक्त कोष्ठमे पणठ' लिखे तो मघासे लेकर विशाखा तक उसीमकार चरणगत वर्ण होते है। (३) फिर ऐसे ही पच्चीस कोठाम न य भ-ज ख लिखकर इनके नीचेकी पक्तियों में इनको इ आदि स्वरोंसे युक्त लिखे और 'भु' युक्त मध्य कोष्ठम धफद्ध' लिखे तो अनुराधासे लेकर श्रवण तक चरणगत वर्ण होते है । (४) और फिर ऐसे ही पच्चीस कोठामे ग स द च र लिखके नीचेकी पक्तियोम इ आदि स्वरोसे युक्त लिखकर 'हु' युक्त मध्य कोष्ठ 'थन लिसे तो धनिष्ठासे भरणी तक चरणगत वर्ण होते है। (यह सब नाम और नक्षन ज्ञानके उपयोगी है ) ॥ ३७॥ ३८ ॥ - संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । अषकहड़चक्रम् । व क म प M त ។ श १ ३ ३१४चा वि कि हिडि मि १४५ टि पि रिति 4. म उ टु पुष तु ३ १-४ के २ AM ओ वो को हो डो मोटो पो न य भ ग स च ३४ऽश्वि ३४ऽभि ३ नि । यि भि जि खि गि १) सि दि चिलि नु मुधफदा जुखु गु सु चु ल ने ये भे नो यो भो जोखो गो दो चोलो ३ भ रसार- उदाहरणा इस चक्रमे नाम और नक्षत्रका सम्यक् ज्ञान होनेके निमित्त सः अक्षराके पास एक, दो, तीन चार संख्या लगाकर चार चार संख्या अन्तरपर नक्षत्रका नाम रस दिया है, इससे नाम नक्षत्र और रादि देखनेमें सुगमता होती है । यथा-प्रथम कोष्टम अ की १ संख्या है तो उसके नीचे २। ३।४ । होनेसे अ इ उ ए कृत्तिरा नक्षत्र होता है। इसी प्रकार नाम देखना हो तो अच्युत, ईश्वर, उर्ध्वबाहु, एव प्रती, 'नाम कृत्तिकाके होते है । ऐसे ही और भी देखे जाते है ॥ ३७॥३८]] इति समरसारे नामनक्षत्रज्ञानादिप्रकरणम् । हंसचारोक्तिपूर्वक स्वरवलज्ञानमाह । नागैर्नीचौनधिज्ञाश्रयनशुकॉमितः श्वासपर्यायकै- चात्यंध्र वाँतोऽनलोम्बुक्षितिरपृथगुपयतराधोप्यूर्जु खे। व्यत्यासाोवनीतो हृदयकमलेजे पत्रै एकत्र तेन श्वासी नानाधिसंख्याननरसँकमलेऽहनिशोस्त्रि- भ्रमोऽत्र ।। ३९ ॥ हृदयकमले अष्टदले पूर्वदिशातः एकैकस्मिन्दले पत्रे एकत. रार्दै मूलमाराय नागैः त्रिशद्भिः श्वासपर्यायका अचम् आकाश- तत्त्वं चलति । कथं वाति अपृथक् वाति संलग्नमैव संधौ वाति । पुनर्नीचैः ६० पष्टिसंख्यैः श्वासपर्यायैः उपरि ऊई वातो वायु वत्वं वाति चलति । निधि ९० मिनर्नवतिपरिमितेः श्वासपर्यायः ॥ .. संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। १७१ अन्तरा तिर्थक् अनलः अमितत्सं वाति चलति । पुनः ज्ञाश्रयः १२० विंशत्यधिकशतपरिमित । श्वासपर्यायः अधो- भागे अंबुतत्वं जलतत्वं वाति चलति । पुनः नशुक १५० मितैः श्वाशपर्यायः ऋजुत्वं शुद्धमार्गे सति क्षितिः पृथ्वीतत्त्व वाति चलति । पुनः इतरार्दै पत्रानोदाराय अपनीतः मध्यात् पृथ्वीतत्त्वात् व्पत्यासावपरीत्यात् पृथ्वीतत्वम् ऋजुमार्गेण नशुक १५० मितैः श्वासपर्यायः बाति चलति । पुनस्तदुपरि विंशत्यधिकशतामितः श्वासपर्यायैः अधोभागे अम्बुतत्त्वं वाति चलति । पुनर्नवतिमितैः श्वासपर्यायः अन्तरा तिर्यक् अग्रि- तत्वं चलति । पुनः पदिसंख्याकः खासपर्यायः उपरि ऊई वायुतत्त्वं चलति । हृदयकमलजे एकत्रपत्रे एवं क्रमेण स्यात् । प्रथमं कमलस्य पूर्वभागस्थे पत्रे वायुवति । पुनः अमिकोणस्थे पत्रे वायुति, पुनः दक्षिणस्थपने वायुवाति । पुनः निनिस्थपत्रे पायुति, पुनः पश्चिमस्थ, पुनः वायव्यस्थ, पुनरुत्तरस्थे, पुनरीशानस्थे पने वायुवाति । एवं क्रमेण तत्वं चलति । तत्र तत्त्वानां चलने विशेपमाह । आकाशतत्त्वमनंगुलं चलनि । चतुरंगुलपर्यंत वायुतत्त्वं चलति । अष्टांगुलपर्यंत पह्नितत्व चलति । पोटशांगुलपर्यंत जलतत्त्वं चलति । द्वादशांगुलपर्यंत पवीतत्त्वं चलति । तेन वायुचलनेन नानाधि ९०० संख्या: .. , - (७२) समरसारं- खासपर्यायाः एकस्मिन्पत्रे भवन्ति । संपूर्णम्-अष्टदले कमले ननरसिसंख्याः ७२०० द्विसप्ततिशतसंख्याः शासपर्यायाः भवन्ति । एकैकस्मिन्पत्र सार्द्धद्वयटिकायाः तत्वानि चलंति । एवमष्टसु पत्रेषु विंशतिपदिका भवन्ति । एवमहर्निशोः दिनराज्योः विमो भवति । विशतिपटिकाभिः त्रिवारं नमो ज्ञेयः । एवं सम्पूर्णमहोरात्र त्रिवारचमेण २१६०० निःश्वाससंख्यात्मिका पष्टिपटिका ज्ञातव्याः ।“एकविंशत्सहस्राणि पशनानि तथो- परि । हंसहसेति हंसेति जीवो जपति नित्यशः॥" इति ॥ ३२ ॥ हृदयमें आठपत्रोका अष्टदल कमल है । उस कमलके पूर्वाद दिशाक्रमसे प्रथम पनमें ३० श्वास चलै इतनी देरतक नासारंध्रसे लगा हुआ आकाशतत्त्व चलता है । फिर ६० श्वास चलै इतनी देरतक उपरकी तर्फ होकर वायुतत्त्व चलता है । फिर ९० श्वास चले इतनी देरतक तिर्ण होकर अमितत्त्व चलता है। फिर १२० श्वास चले इतनी देरतक अधोरूपसे जलतत्त्व चलता है । फिर १५० श्वास चले इतनी देरतक सरल मार्गसे पृथ्वीतत्त्व चलता है । यह पत्रके एक तरफमें मूलसे चलकर ऊपरफो गये है । और उपरसे चलकर पत्रके दूसरी तर्फमें, इसीप्रकार पृथ्वीतत्त्वसे विपरीत होकर मूलतकचलते है अर्थात १५० तक पृथ्वी, १२० तक जल, ९० तक आगे, ६० तक वायु और ३० तक आकाश तत्त्व चरता है । (इस संचालनके विपपमें ३१० M संस्कृत टीका-भाषाटीकासमेतम् । (७३) अधो लिखित चक्र और टिप्पणी + देखना बहुत आवश्यक है)। इस भांति यह पांचों तत्त्व आगे पत्रोंपर चलते है। इनमें एक पत्रकी श्वाससंख्या ९०० अर्थात् अढाई घडी और आठों पत्रोंकी श्वास- संख्या ७२०० अर्थात् बीस घडी होती है । और इनके तीन वार भ्रमण करनेसे अहर्निश (दिनरात्रि) की श्वाससंख्या २१६०० अर्थात् ६० घडी होती है ॥ ३९ ॥ भाग्नेय 37१५०१५. १२.२० ६.वा वा६. १५.४१५. ११० जज १२. १. आअ९० वावा. ..taaois) आ आ ६० या वाद भा. १२० जाज१२० ३० २०० १२० मा माम নি . १५०१४१५० १२० जज १२० (१५.४३१५० उत्तर ६०वा वा६०/ astele os आ . /nehe ue . ६.वावा. ३२. जाज१२० (१५-१८१५० on Rakes . htra or oh •JE.. . । ०१४ thani Dar नेत्य वायु १ पधिम + पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च । मध्ये पृथ्वी मधवाप ऊर्ज वहति चानल. तिर्यवायुप्रवाहच नमोवहति सामे ।। १ ॥ धामे वा दक्षिणे नापि धराष्टागुलदीर्घिका । पोडशोगुलमाप स्युस्तेजश्च चतुरगुलम् ॥ २ ॥- (७४) समरसार- प्रागादिदिक्पत्रगामिनि प्राणवायौ यादृक् चित्तवृनिस्तामाह । इन्द्रादिदिग्दलचरे अंसने रणाय भोक्तुं रुपे ऽथ विपयाय मुदे गाय । चेतोभवेत्कृपयितुं च नृपास्प- दाय पनव्यान्तरचरे तु मुंदे परस्मै ॥४०॥ इन्दादिदिग्दलचरे श्वसने पूर्वादिदिक्पगने वायौ एवं फल भवेत् । पूर्वपत्रश्वसने वायौ चरति सति रणाय मनो भवेत् । द्वादशागुलदी स्याहायुध्यांमागुन हि ॥ ३॥ पृषी पीता सिन बार रक्तवर्णो धनजय. 1 मारतो नौलजीमूत आकाशो वर्णपथक. ॥ ४ ॥पृथिव्यादि। त्रितन दिनमासाब्दकः फलम् । शोभन च तथा दुष्ट व्योममालवहिमि. [[॥ पृथ्वीजले शुभे तत्वे तेजो मिथ्रफलोदयम् । हानिमृत्युकरौ पुसामुभौ हि व्योम- मारती ॥६॥ पार्थिव सतत युद्ध सन्धिर्भवति वारणे । विजयो वहित वन वायो भगो मृतितसे ॥ ७ ॥ हसचारस्वरसरेण येन ज्ञान त्रिकालजम् । पच- तत्वेषु भेदोऽय कथित पूर्वसूरिभिः ॥ ८॥ इन सबका आशय यह है कि, पचभूतात्मक मनुष्य शरीरकै हृदयमे आठ पत्रोंका एक कमल होताहै । उस कमलो आठो पत्रोपर टपरोक्त क्रमानुसार सदेव दिनरात वायु चलता रहताहै । उस वायुमै पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकार यह पाचो तब उपरोक्त नियमानुसार चलते रहते हैं और इनके सचालनसे सब प्रकारका शुभाशुभ फल विदित होता है। किंतु शोचनीय स्थल है कि इनका सचालन कैसे विदित होसकताहै। यदि प्रात कालसे गतकालका हिसाब लगा. कर केवल उसी के अनुसारतत्वसवाचन मान लिया जाय तो वास्तविक राव- ज्ञान असभव प्रतीत हो सकता है । अतएव वास्तविक तत्वज्ञानके निमित्त " मध्ये पृथ्वी अधश्चापः "।"धराष्ट्रागुलदीविका " इत्यादिक उपायोंका आश्रम लेना समुचित है। यद्यपि बहुत कालतक स्वराभ्यास किये बिना सम्यक्तत्वज्ञान नहीं होता है तथापि जब यह निश्चय है किदयकमलपर ममण करनेवाला वायु -- संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (७५) अग्निकोणे वायौ चरति मोक्तुं मनो भवेत् । दक्षिणपत्रे पायौ चरति रुपे कोधाय मनो भवेत् । निक्रतिकोणे वायौ चरति विर्षयभोगाय मनो भवेत् । पश्चिमपत्रे वायो चलति सति मुदे सन्तोपाय मनो भवेत् । वायुकोणपने वायौ चलति सति गम- नाय मनो भवेत् । उत्तरपत्रे वायौ चलति रुपयितुं रुपां कर्तु -- -नासिकाके वाम या दक्षिण किसीमी एक छिद्र से बाहर निकलता रहता है और इसीसे तत्वज्ञान क्यिा जासकता है। तब इस कागके लिये उपरोक्त यह, युक्तिया बहुत ही उपयोगी हैं कि नासिकाफे दक्षिण वा वाम किसी भी छिद्रसे निकलता हुआ वायु (वास) यदि लिदके बीचसे निकलता हो तो पृथ्वीतब चल. ता है। यदि हिमके अधोभागसे अर्थात् ऊपरवाले ओष्टको स्पर्श करता हुआ । निकलता हो तो जलतत्त्व चलता है। यदि छिद्रके ऊर्बभागको स्पर्श करता हुआ निकलता हो तो अग्मितन्न चलता है। यदि छिद्रसे तिर्थ होकर निकलता हो तो वायुतत्व चलता है और यदि एकदिसे बढकर क्रमसे दूसरेसे निकलता हो तो आकाशतत्व चलता है ऐसा जानना चाहिये । अथवा सोलह शगुलका एक राकु बनाकर उसपर ४ अगुल ८ अगुल १ अगुल और १६ अगुलके अतरपर रई वा अत्य तमदवायुप्रवाहसे हिल सके ऐसा और कुछ पदार्य लगाके उस शझो अपने हाथमें लेकर नासिकाले दक्षिण वा वाम किसी भी छिद्रसे श्वास चल रहा हो उसके समीप लगाकरके तत्वकी परीक्षा मरे । यदि आप अगुलतक वायु बाहर जाता हो तो पृथ्वीतत्व समझना चाहिये। यदि सोलह अंगुरता वायु बाहर जाना हो तो जलतन्त्र समाना चाहिये । यदि चार अगुलतक वायु बाहर जाता हो तो अमिताद समझना चाहिये । यदि • भारह अगुलतक बाहर जाता हो तो वायुतच समझना चाहिये । यदि अगुल “प्रमाण न हो तो आकाशतत्व समझना चाहिये । इसप्रकार तबसचालन विदित करके शुभाशुभ फल जानना चाहिये ।

(७८) । समरसार- श्रेयः कल्याणं स्यात् । यदि एकस्यां चान्यां सौयाँ नाडयां शिखी वह्नितत्त्वं पंचयर्दिनपंचकं बहेत् तदा मृत्यु विजानी- यात् । तदुक्तं स्वरोदये-" आदौ चन्द्रस्सिते पक्षे भास्करस्तु सितेतरे । प्रतिपादितोऽहानि त्रीणि त्रीणि क्रमोदयः ॥ १ ॥ चन्द्रोदये यदा सूर्यश्चन्द्रः सूर्योदये यदा । अशुभं हानिदेगः शुभं सर्व निजोदये ॥ २ ॥ शशाङ्क चारयेद्रात्री दिवाचार्यों दिवाकरः । इत्यायामरतो नित्यं स योगी नात्र संशयः॥३॥" ॥ इति ॥ ४२ ॥ उपरोक्त अष्टदलकमलके दो दो • पत्रोंपर सूर्य चन्द्रमा पांच पांच घडी चलते है । ( यथा दक्षिणनाडीके एक एक पत्रमे अढाई अढाई घडी चलनेसे दोना पत्रोपर पांच घडी सूर्य चलता है। ऐसे ही वाम नाडीके दोनी पत्राम पांच घडी चन्द्रमा चरता है । फिर वैसे ही ५ घडी सूर्य और ५ घडी चंद्रमा चलता है । इस प्रकार २० घडीमें संपूर्ण कमलम चलकर रानिदिनमें तीनबार भ्रमण कर जाते है ) । यहाँ एक घडीका प्रमाण इस प्रकार मानना चाहिये कि-दी अक्षरके दशवार उच्चारण करनेम जितनासमय लगे उतने समयका एक अमु (माण वा श्वास) होता है। ऐसे ३६० श्वास जितनी देरमें चलै उतनी देरकी एक घडी होती है। ऐसी पांच पांच घमें सूर्य (दक्षिणस्वर)चंद्र ( वाम- स्मर) चलते हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे तीन तीन दिन चंद्रमा और सूर्य समरसार- क्रमसं चलते है यदि यह प्रातःकालके समय नियमित दिनों चलें तो कल्याणकारक होते हैं। और यदि पांच दिनतक एक नाडीमें आग्नि- तत्त्व चले तो मृत्यु होजाती है । ॥ ४२ ॥ शुक्लपक्षे चन्द्रस्वरज्ञानचक्रम् । तिथER २३४५६७/८ १०११११२११३/१४१५१ (भम् कृष्णपक्षे सूर्यस्वरज्ञानचक्रम् । ३ ( शुरूपक्षे ) प्रतिपत्रिपु चद्गम्य चतुर्थ्याविपु भास्वत, | सप्तम्यादित्रिषु विधोशिम्यात्रिषु मास्वत. ॥१॥ ततत्रिषु विधो प्रावस्यादुदय. स्वै रवैरपि । (कृष्णपक्ष) प्रतिपत्रिषु सूर्पत्य चतुर्यात्रिषु चन्द्रमा ॥ २ ॥ सप्तम्यादिनिधु रवैर्दशम्यात्रिषु चद्गमा । ततलिए रवे: प्रास्यादुदये से शुभे इमौ ॥ ३ ॥ प्रतिपत्प्रसुतिरेव ज्ञेय । पंचपचरटीमामादेकैकस्य हि यो भवेत् । आदी चन्द्रस्ततस्सूर्यरिसतेऽन्येऽस्ततो विभुः ॥ ४ ॥ सूचना-इस प्रकरणमें जो तिथिका उदय लिया गया है वह पचागस्थ तिथिके उदयानुसार नहीं लेना चाहिये। जिस दिन जो तिथि हो रसीको आजके प्रातःकालसे लेकर कल्ह (आगामी) मात.काल पर्यन्त मानना चाहिये । और उन्ही ६० घडिमोमें उपरोक्त नियमानुसार चद्रसर और सूर्यस्वरका उदय मानना चाहिये।" सूर्यो- दयादारम्य प्रवृत्तिरतर , न तिघ्युदये "। -- (८०) संस्कृतीका-भापाटीकाममेतम् । तिययः शुक्ले पंचवट्यात्मस्वग्चारचक्रम् । सू च च सू च च. सू. च सूचमूच प्रतीपदा घ च सू च स चमू च द्वितीया घ 1 ८ स्व च.सू सू तृतीया घ चतुर्थी स्व सू चम च 'मू च मू ५ च स्वसू. च सू च सू चमू च मू पचमा घ ५ स्व सू च सू चमू च सू च मू. पटा ध ५ सप्तमी स्व च सू च सू च सू च सूचसू च सू. घ स्व च सुच सू च सू च सूच सूच अष्टमी घ ५ ५ ५ स्वच सू च सूच च नवमी घ ५ स्व स च मू च सू च सू च मच मू दशमी ५ घ स्व सूचसूच सू च सू च सू च सूच एकानी घ ५ ५ मूच सूच मूच स्वमूच सूचम च द्वादशी घ ५ ५ स्वचम् च मूच चमू चम चमू नयादशा घ स्व च सूचसूच सू चमू च सूच चतुर्दशी घ स्व चमू च सू च सू चमूच सून म. पूर्णिमा aaaaaaaa/11421 . 41-1410 . L ८ न . प و نادانی ده ५ ध संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । तिथयः कृष्णे पंचघट्यात्मकस्वरचारचकम् । সারৎ स्व सनसूच. सूच_सून. सूचसूच. द्वितीया |स्व. सूप (सूचि, सूचस, च. स्व. च. तृतीया स्व.सूच सूच. सू सू च. सूचसू च. प चतुर्थी च सूचस घ सच सच पचमी यटी स्व.च सू. चि., घ ५ सप्तमी सक्षमी स्वसूच सच सूचस् च च सभ प -- नवमी य घ ५ 4 मू प प्रया 112 1416101-26 पता --- (८२) समरसारं-- रव्यादिवहने युद्धादारसमे जयमाह । अऽग्नितत्त्ववहने हरिहेलया य- धेकोऽपि हन्ति सुबहून किमुताँ चित्रम् । शून्ये रिपून स्पृतनामपि वाहक्षे निक्षिप्य विक्षिपति लक्षमरीन क्षणेन ॥ ४३ ॥ अर्के सूर्यनाड्याम् अमितत्त्वं वहति चेत्तदा हरिहेलया विष्णुलीलया सिंहलीलया वा एकोऽपि भटः सुबहून्योधात हन्ति अत्र किं चित्रम् किमाश्चर्यम् । शून्ये शून्यनाडयां रिपून शनिक्षिप्य संस्थाप्य । स्वपृतना स्वकीयां सेना वाहपक्षे या नाडी चलति तत्र निक्षिप्य संस्थाप्य लक्षम् अरीन् शत्रून् एकेन क्षणेन विक्षिपति नाशयति ॥ ४३ ॥ यदि सूर्यनाडीमें अमितत्त्व चलता हो तो सिंहकी लीलाकी तरह अकेलाभी अच्छे अच्छे बहुत योद्धाओंको मार सकता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । और जिस तर्फका स्वर नहीं चलता हो उस तर्फ शत्रुको और वाहपक्ष अर्थात् जिस तर्फका स्वर चलरहाहो उस नर्फमें अपनी सेनाको स्थापन करे तो क्षणभरमें बहुत शत्रुओका नाश कर सकता है ।। ४३ ॥ ख्यादिनाडीबहने प्रश्नविशेषमाह । प्रश्ने चंद्रवहे तु वामगनरेणोक्ते जयो निश्चित सूर्य दक्षगतेनं कृच्द्रविजयी शून्यस्थळूते क्षतिः।

संस्कृतटीका-भापाटीकासमंतम्। (८३) सूर्ये चेद्विपमाक्षरीणि शैशिनि व्रते सौनि ध्रुवं जैतीसौ पुरतोपि वामगइव स्यात्पृष्ठंगो दक्षिणः॥४४॥ प्रश्नकाले चन्द्रवहे सति चन्द्रनाड्यां वहत्पां सत्यां वाम- भागस्थितनरेण उक्त कथिते सति निश्चितं जयो भवति । सूर्ये सूर्यनाडयां वहत्यां सत्यां दक्षिणभागे गतेन नरेण प्रश्न उक्ते सति लच्छविजयी कष्टेन विजयी स्यात् । शून्यनाडीमागे स्थित्वा चेहूतः पृच्छति तदा क्षतिहानिर्वाच्या 1 सूर्ये सूर्य- वहने दक्षिणनाडीवायौ चलति सति दूतो विपमाक्षराणि ते कथयति । शशिनि चन्द्रबहे वामनाडीवायो चलति सति समानि अक्षराणि वदति तदा असौजेता ध्रुवं निश्चयेन जयति । यः पुरतः अमनो भूत्वा पृच्छति स वामभागस्यो ज्ञातव्यः। यः पृष्ठगः सन् पृच्छति स दक्षिणभागस्या ज्ञातव्यः । उक्तंच- " जवामाग्रतो दूतो ज्ञेयो वामपथस्थितः । पृठे दक्षे तथा- अवस्थादशाहस्थितो मतः ॥ पूर्णनाडीस्थितो दूतो यत्पृच्छति शुभाशुभम् । तत्सर्व सिद्धिमायाति शून्ये शून्यं न संशयः ॥ सूर्ये चेद्विपमारर्णान्समरांनिशाकरे ! वाहस्थे भास्करे दूतस्तदा लाभोऽन्यथा न हि ॥ " इति ॥ १४ ॥ मनके समय चंदस्वर चरता हो और पृच्छक वाम भागमें सटा होफर पूछे तो निश्प जय होता है। और सूर्पस्या परना हो (८२) समरसार- रव्यादिवहने युद्धाचाराभे जयमाह । अर्केऽग्नितत्त्ववहने हरिहेलयां य- घेकोऽपि हन्ति सुबहून किमुतात्रं चित्रम् । शून्ये रिपून स्वैपृतनामपि वाहपंक्षे निक्षिप्य विक्षिपति लक्षमरीन् क्षणेन ॥४३॥ अर्के सूर्यनाउचाम् अमितत्त्वं वहति चेचदा हरिहलया विष्णुलीलया सिंहलीलया वा एकोऽपि भटः सुबहून्याधान हन्ति अब किं चित्रम् किमाश्चर्यम् । शून्ये शून्यनाडयां रिपून शन्निक्षिप्य संस्थाप्य । स्वपृतनां स्वकीयां सेनां वाहपक्षे या नाडी चलति तत्र निक्षिप्य संस्थाप्य लक्षम् अरीन शत्रून् एकेन क्षणेन विक्षिपति नाशयति ।। ४३ ॥ यदि सूर्यनाडीमें अमितत्त्व चलता हो तो सिंहकी लीलाकी तरह अकेलाभी अच्छे अच्छे बहुत योद्धाओंको मार सकता है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । और जिस तर्फका स्वर नहीं चलता हो उस तर्फ शत्रुको और बाहपक्ष अर्थात् जिस तर्फका स्वर बलरहाहो उस तर्फमें अपनी सेनाको स्थापन करे तो क्षणभरमें बहुत शत्रुओका नाश कर सकता है।॥१३॥ रव्यादिनाडीवहने प्रभविशेषमाह । प्रने चंद्रबहे हुँ वामगनरेणोक्त जयो निश्चित सूर्य दक्षगतेनं कृच्द्रविजयी शून्यस्थते क्षतिः ।

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (८३) सूर्य चेदिपमाक्षरीणि शशिनि व्रते समाँनि ध्रुवं जैतीसौ पुरतोपि वामग इव स्यात्पृष्ठंगो दक्षिणः॥४४॥ प्रश्नकाले चन्द्रवहे सति चन्द्रनाडयां वहत्यां सत्यां वाम- भागस्थितनरेण उक्ते कथिते सति निश्चितं जयो भवति । सूर्य सूर्यनाट्यां वहत्यां सत्या दक्षिणभागे गतेन नरेण प्रश्न उक्त सति कच्छविजयी कष्टेन विजयी स्यात् । शून्यनाडीभागे स्थित्वा चेहूतः पृच्छति तदा क्षतिहनिर्वाच्या । सूर्ये सूर्य- बहने शक्षिणनाडीवायौ चलति सति दूतो विषमाक्षराणि ब्रूते कथयति । शशिनि चन्द्रबहे वामनाडीवायो चलति सति समानि अक्षरााण वदति तदा असा जता ध्रुवं निश्चयेन जयति । यः पुरतः अग्रतो भूत्वा पृच्छति स वामभागस्थो ज्ञातव्यः। यः पृष्ठगः सन् पृच्छति स दक्षिणभागस्यो ज्ञातव्यः । उक्तंच- " ऊर्यवामायतो दूतो ज्ञेयो वामपयस्थितः । पृष्ठे दक्षे तया- ऽवस्थादशवाहस्थितो मनः ॥ पूर्णनाडीस्थितो दूतो यत्पृच्छति शुभाशुभम् । तत्सर्व मिद्धिमायाति शून्ये शून्यं न संशयः ।। सुर्य चेद्विपमान्वर्णान्समवानिशाकरे । वाहस्ये भास्करे दूतस्तदा लामोऽन्यथा न हि ॥ " इति ॥ १४ ॥ मनके समय चंद्रस्वर चलता हो और पृच्छा वाम भाग पहा होपर पूरे तो निश्चय जय होना है। और मृपम्बर चलना हो (८४) समरसार- और पृच्छक दक्षिण भागमें खडा होकर पूछे तो कष्टसे जय होता है। यदि शून्यभाग अर्थात् जिस तर्फका स्वर नहीं चलता हो उस तर्फमें खडा होकर पूछे तो हानि होती है । यदि सूर्य (दक्षिण) नाडीमें विषम और चद्र (वाम ) नाडीम समाक्षर उच्चारण करे तो अवश्य जय हाता है । यहाँ सम्मुखहो उसको वामभागमें और पृष्ठगत स्थित हो दक्षिणभागमे जानना चाहिये ॥१४॥ प्रश्ने परं विशेपमाह। प्रश्नः श्वासांतर्गमे चेन्नयः स्यौद्भङ्गो निर्यात्यत्र सूक्ष्मं तदेतत् । लामः पुत्रोंदेश्च वाहस्थदूते पृच्छे- त्युक्तः शून्यगे स्यादसिद्धिः ॥ ४५ ॥ प्रष्टव्यस्य निश्वासादानाकाले चेत्स्रष्टा पृच्छेचदा नस्य जयः । अनिश्श्वासवायौ निर्याति बहिर्भवति भगः स्याद । तेदतत्सूक्ष्म स्वरयोगान्तरेत्यः । किंच पुत्रादेः पदार्थस्येष्टलाम उक्तः । कथामित्याह-वाहस्थेति । दूते पृच्छके वाहस्थे वहना- डीप्रेदशमन्थे सति तथा शून्यस्थे दूते पृच्छति असिद्धिः स्यात् । तथाचोक्तम्-" श्वासप्रवेशकाले तु दूतो वाञ्छति जालितुम् तत्सर्व सिद्धिमायाति निर्गमे नासि सुन्दरि " इति ॥ ४५ ॥ जिस समय श्वास भीतर जारहाहो उस समय पृच्छक प्रश्न करे । जय और बाहर आरहा हो उस समय प्रश्न पर तो हानि होती है फिन्तु यहाँ यह विचार बडा सस्म है । यदि जिम तर्फका स्व - संस्कृत टीका-भाषाटीकासमतम् । चलरहाहो उस तर्फ खडा होकर पुत्रादिकों का मन करे तो लाभ होता है । और जिस तर्फका सर नहीं चलताहो उस तर्फ से पूछे तो कार्य नहीं होता है।॥ १५ ॥ सूर्यचंद्रनाडीवहने कर्तव्यकाण्याह । चंद्रे हे नृपविलोकनगेहवेशपट्टाभिपेकमुसकर्मभवे- च्छुभ यत् । सौरे हुँ मजनवधूरतिभुक्तियुद्धमुख्यं भवेदशुभकर्मफलाये सत्यमें ॥४६॥ चन्द्रे वहे इति । चन्द्र बहे चन्द्रसम्बन्धिान वामनाडी- बहने नृपस्य राज्ञो विलोकनम्, गेहप्रवेशो गृहप्रवेशः, पट्टामिपेको नृपाणामेतन्मुखम् एतदादिकं यत्कर्म शुभं तव शस्तं भवेत् । सौरे तु सूर्यनाडयां दक्षवहने तु मज्जनी लानं, वधुतिः भुक्ति जनं, युद्धम् एतदादिकं कर्म अशुभं सिद्धयति । यत्कर्म तदिह फलदं भवेद । सत्यमिति पुयनुकूलम् । उक्तंच-" यात्राकाले विवाहे च परालंकारभूषणे । शुभ- कर्मणि संधौ च प्रवेशे च शशी शुभः ॥ १ ॥ विग्रहे दात- युद्धेषु स्नानभोजनमैथुने । व्यवहारे भये भने भानुनाडी परा- स्पते ॥२॥ होमश्च शांतिक व दिव्योपाधरंसायनम् । विद्यारंभ स्थिरं कार्य कर्तव्यं च निशाकरे ॥३॥ मारणं मोहन संभ विदेपोचाटनं वशम् । प्रेरणार्पणं क्षोभ भानु- भाडयुदये कुरु ॥ ४ ॥" इति ॥ ४६॥ . . - ३ . (८६) समरसार- चन्द्रस्वरमें राजदर्शन, गृहमवेश और राज्याभिषेकादि शुभकमार्फ सिद्धि होती है और सूर्यस्वरमें-स्नान, स्वीसंभोग, भोजन और युद्ध आदि अशुभ काँकी सिद्धि होती है ॥४६॥ + रतिविधि विवक्षुस्तत्र स्त्रीणां मुख्यं द्रावणमाह । वहति शंशिनि वाँश्चेदंगनायो नरस्य घुमणिमनु कृशानुस्तत्र काले रतेषु । सवैति मदनवारा निर्झर सार्थं पुंसा यदि शिखिनवनीताशक्तिवद्भाविता स्यात् ॥४७॥ अंगनायाः स्त्रियः शशिनि चन्द्रनाडयां वहति सति वाः जलतत्त्वं चेदाति । नरस्य पुरुषस्य द्युमणिः सूर्यनाडी तम् अनु लक्षीरुत्य इशानुः अमितत्वं चैदाति । पुरुपस्य सूर्य- नाडौवहने अमितत्त्वं वाति । तत्र काले रतेषु प्रारब्धेषु सत्सु सा योपित मदनवारा कंदर्पजलानां निरं सवति । अथ यदि पुंसा मा योपित् नवनीताशक्तिवद्राविता स्यात-यथा अग्नि- संयोगे नवनीत द्रवति तथा पुंसा भाविता वशीकता-योपिन्म- दनजलानां निरं सवति । बलहानिर्भवति, योपित्पराजयो भवति, पुरुषस्य जयो भवति ॥ ४७ ॥ + इस स्वर प्रसगमें जहा जहा चद्रस्वर, सूर्यस्वर,चद्रनाडी, सूर्यनाडी, बद्रे वहे. सूर्ये वहे-और चदचारे सूर्यचारे, इत्यादि वाक्योंका जो उपयोग किया गया है इन सरका यही प्रयोजन है कि नाकके दक्षिण और वाम दोनों हिदोंसे किसीभी एकसे श्वासको हवा सदैव बाहर निकलती रहीहै । अतएब वह हवा दक्षिण दिसे निकलरहाहो तबतो सूर्य और वामछिदस निकल रहींहो तब चद्र स्वर जानना चाहिये ।। F -- संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (८७) यदि जिस समय स्त्रीका चन्द्रसर चलरहा हो और उसमें जलतत्त्वं चलताहो + और पुरुषका सूर्यस्वर चलरहा हो और उसमें अग्नितत्त्व चलताहो तो उस समय रति (मैथुन-संभोग) करनेसे-जैसे अनिसे नवनीत (मक्खन, लुनी धी) गलकर बह जाताहै वैसेही वह खी, पुरुपसे द्रावित होकर मदनजल त्याग करदेतीहै । एवं निर्बल आर पराजित होजाती है ॥४७॥ वशीकरणमाह । सुप्तायां निजवदुषणरश्मिनाड्या चंद्र चेहनगतं पिवेत्तदानीम् । आमृत्योर्वशयति तामियं च कांत चन्द्रेण धुमणिवह मुहुः पिबन्ती ॥ १८॥ सुप्तायाः स्त्रियः भर्ता निजबहदुष्णरश्मिनाडया स्त्रियश्चन्द्र वहनगत चन्द्रनाडीवायु तदानीं पियेत् । कोऽर्थः ? भर्चा स्वदक्षिणनाडचा थियो वामनाडौं पिबेत् तदा तांत्रियं आमृत्यो। मृत्युपर्यन्तं वशयति वशीकरोति । इयं च योपित्स्वचंद्रनाडया भर्तुः धुमणियह सूर्यनाडीवायु मुहुः वारं पार पिचन्ती सती तदा आमृत्योर्मृत्युपर्यन्तं भर्तारं वशपति ॥४८॥ भर्ताका सूर्यनाडी चलती हो अर्यात् दक्षिणस्वर चलरहा हो और मौके समीप शयन करतीहई स्वीका चंद्र (वामसर ) चल. । +इन्ही हावर, सूरियों की स्पोज, वायु और पाकाला यह पांचों तत्व उपरोस हसपारो निपमानुसार चलते रहने । इनका मनु लस सरलसाप्य नहीं है। मियाहार विहारादि दोशेस मान चलता आदमी ही यदि नाक पकड़कर सिदासिद कहने में तत्पर होनाप तो शास्त्रको ककित कर- नेके सिवाय दूसरो पल प्रतीत होता है। + (८८) समरसार- रहा हो तो भर्ता अपने दक्षिणस्वरसे वीके वामस्वरका पान कर तो स्त्री मरणपर्यंत वश होजाती है ऐसे ही यदि स्त्री अपने वामस्वरसे भर्ता (पति) के दक्षिण स्वरका वारंवार पान फरै तो पुरुप मृत्युपर्यंत वशीभूत होजाताहै ॥४८॥ मदनयुद्धमाह । मोहनं मदनयुद्धमूचिरे तत्संधारण इवात्रं चेदलम् । प्रोक्तमेतदुपैति मैथुनं द्रौवयेत्तदुबैलां सुविह्वलाम्॥४९॥ मोहनं सुरतं, बुधाः मदनयुद्ध कंदपयुद्धम् ऊचिरे कथया- मासुः । कोऽर्थः-तत्र कंदर्पयुद्धे सुधीः बुधः रणे संग्रामे इव बलम् आचरेद अंगीकुर्यात् । यथा रणे स्वरबलविचारः क्रियते तथा सुरतेऽपि स्वरबलं विचारणीयम् । किं कुर्वन् प्रोक्तं बलं यदा अंगीकुर्वन् सन् मैथुनं सुरतं उपैति प्रामोति तदा सुविह्वलाम् अबलां त्रियं द्रावयेव निर्वलां कुर्यादित्यर्थः ॥४९॥ सुंदर बुद्धिवाले पण्डित लोग मोहन (सीसंयोग) को मदनयुद्ध कहतेहै । इस युद्धमेंभी संग्रामकी तरह उक्तस्वरबल लेना चाहिये । यदि स्वरबल लेकर मैथुन करे तो मदबिवला अबलाको दायित करके निर्बल कर सकता है ॥४९॥ तविधये स्वरबलमाह । स्वरच्छायांनिलार्केन्द्योगिनीराहुभूवलैः । अन्यैश्च द्यूतमावनिमयत्येव धनं बहुँ ।। ५०॥

संस्कृतटीका-भांपाटीकासमेतम् । स्वरः बालः कुमारको वर्णस्वराः, छाया सूर्यचन्द्रयो- श्छाया, अनिलो वायुः, अर्कः सूर्यः इन्दुः चन्दः योगिनी प्रसिद्धा, राहुभूबलानि च एतेषां बलैः अन्यैश्च चलैः काल- चारार्द्धमहरहोरादीनां पलान्यादाय तैलैः सहायधूतं कीटा- विशेषम् आबधन् कुर्वन् तदा बहु धनं जपत्येव ॥ ५० ॥ " हीरणहुंफट्स्वाहा" (इविद्यूतमंत्रः)। बाल कुमारादि वर्णस्वर, सूर्यचन्द्रादिकी छाया, वायु, सूर्य, चन्द्र, योगिनी, राहु और भूवल इत्यादि सब बलोंको विचारकर यदि द्यूतक्रीडा करै अर्थात् जूआ खेले तो बहुत धनको जीत सकता है ॥५०॥ इति समरसारे तत्वविचारस्वरकथनप्रकरणम् । भक्ष्यधारणादिना जयसाधनान्यौपधान्याह । आस्ये तालजंटाथ केतकिदलं शीर्पचे खाजूंरके मूले- ऽस्थ इंपुल्लंगन संघृतेर्मुक्तरैजीर्णेश्च तैः। कंसायुत्तर- मूलिंकानिरशनः पुण्यार्क आत्ता धृता जग्धा वा सह तंदुलांबुभिरैथो पाठा जटापीहशी ।। ५१॥ भास्ये मुखे ताल जटा तालवृक्षस्य मूलं स्थाप्प, केतकी- दलं केतकीपत्रं शीर्प मस्तके धार्यम्, सारके मूले सरस्य वृक्षस्य मूले अंकस्ये सति इपु:याणा न लगे । अथवा सघृतानि इमानि तालमूलं, केतकीपत्रं, सारमूलम् इमानि भुक्कानि यावर उदरे जाणानि न भवति तापत् स च नाणो न लगेदन कंसारी हॉसेति प्रसिदा सता, तस्या उत्तरदिस्स्या मुलिका -- समरसारं- मूलं निरशनैः शनाबुपोप्य पुष्यायोगे आना गृहीता धृता शरीरे । सह तंदुलाम्बुभिर्जग्धा खादिता वा शरीरे शरीरवार- णाय स्यात् । अथ पाठा जटापि । पाठा प्रसिद्धा तन्मूलमपि ईदृक् शनिवारे निरशनैः पुरुषेण पुण्यार्के ग्राह्यम् । सघृततंडुल- जलेन वा सह भुक्तश्वेत्तदापि बाणो न लगेत् ॥ ५३॥ मुख में तालकी जड, शिरमें केतकीके पात और गोदमें खजूरकी जड लगावे तो वाण नहीं लगता है । अयका इन सबको धीमें मिलाकर खाजाय तो जबतक इनका अजीर्ण रहै तबतक बाण नहीं लगता अथवा कंसारीकी उत्तरदिशाकी तर्फकी जडको शनिवारके दिन उपवास करके पुष्यसहित इतवारके दिन लाकर धारण कर तो वाण नहीं लगता है । अथवा धीमें और आंवलोंके पानीय सहित खावै तौ भी वाण नहीं लगता है । अथवा पाठाजटाको इसी प्रकार धारण करें वा खावे तौभी वाण नहीं लगता है ॥५१॥ अंकोला लक्ष्मणों पुंखो सपाक्षी शिखिचूलिका। विष्णुकांता काकजंघा नीली देवी चे पाटला ॥५२॥ भुजास्यमूर्धी भुक्ता तजटैकीपि वारयेत् । रैणेदारुणशस्त्रोधं यावजीर्यति नोदरे" ॥ १३ ॥ अंकोलः प्रसिद्धः, लक्ष्मणा पुरुषाकारमूलीपधिविशेषः, पुंखा शरपुंखा, मप्पाक्षी-सर्पनेत्राकृतिपुष्पा, शिखिचूलिका मयूरशिखा, विष्णुकान्ता, नीलपुष्पा-प्रसिद्धा, काकजंघा सदाकारा, नीली प्रसिद्धा,देवी सहदेवी, पाटला प्रसिदैव तज्जटा एतासामौषधीनां मूलानि तन्मध्ये एकापि जटा भुजे बाहौ धृता आस्ये मुखे वा धृता शिरसि स्थिता वा सादिता वा रणे संग्रामे - संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । दारुणं शखौच तीक्ष्णशस्त्रसमूह वारगेद । कियत्कालमित्यपे- क्षिते यावदिति । यावत्पर्यन्तमुदरे न जीयति । भुक्तपक्षे चैतत् । धारणपक्षे तु यावद्धारणं तावच्छचवारणम् ॥ ५२ ॥५३॥ अकोहर, लक्ष्मणा (सफेद कटेली), शरपुंखा, साक्षी, मयूर- शिखा, विष्णुकान्ता, काकजंघा, नीली, सहदेवी और पाटली यह भौषध भुन, मुख और मस्तक लगावे । अथवा इनमेंसे किसी भी एफकी जडको खाले तो जबतक वह नहीं पचे तबतक रणमें दारुण शखोंके समूहको निवारण करती है ॥५२॥५३॥ स्वर्णाभा सिंहिकाकिण्यों सिंहीपृष्टः सतज्जटः । अंतस्थः पारः सिस्थमुद्री जयद आस्यर्गः॥ ५४॥ स्वर्णाभा स्वर्णवत्तीतवर्णा या सिंही काकिणी कपईकस्त- स्मिन् सिंही कंटकारी वन्मूलरसेन घृष्टः सिंहीजटासहितः पारदः सोऽन्तरस्थो मध्यस्थः । सिक्थेन मुद्रमीणकेन मुदितः । आस्यगो मुसस्थो जयदः रणादौ विजयदाता ॥ ५४ ॥ सोनेके रंग जैसी पीली, सिंहीनामकी कौडीमें फटेलीके पत्ते और जडके रसमें घोटा हुआ पारा भरकर गुटिफा बनावे और उस गुटि- काको संग्रामके समय मुखमें रक्खे तो जय होता है ॥५४॥ चक्रमर्दकंगोजिहाशिखिचूडजिटास्वपि । एकैका वादजयदा पुष्यत्तिास्यमूद्धगों ॥ ५५ ॥ चक्रमर्दऽको चकवंदा, गोजिता गोभी, शिसिचूड़ा मयूर- शिखा, एतास मध्ये एकैका जटा पुष्पार्कयोगे आता गृहीता भास्यगा मूर्द्धगा वादनपपदा ॥ ५५ ॥ . J " समरसार- चकवंद (पॅवाड ), गोभी, मयूरशिखा इनमें से किसी एकी जद पुण्यार्कके दिन ग्रहण करके मुख, अयवा मस्तकमें धारण करे तो वादमें जय होता है ॥५५॥ 'विशेष' ऊपर जो औपाधि + कहींगई है इन सबको उपाडने लाने - .ईश्वरी ब्रह्मदडी च कुमारी चैष्णवी तथा । वाराही वजिणी चडी तथा रुद्रजटाभिधा ।। १ । लागली सहदेवी च पाठा राजी पुनर्नवा । मुद्गरी भूतकेशी च सोमराजी हनूजटा ॥ २ ॥ श्वेतापराजिता गुजा श्वेत्ता च गिरिकणिका । भुद्रिका शखिनी चव विडगी शरपुखिका ॥ ३ ॥ खरा फेतको ताडी पूगी स्थानारिकेलिका । अजन काचनारश्च चमोऽस्मतक. बहू ॥ ४ ॥ अपामा- गौ च ब्रह्मवृक्षो वटस्तथा । शतमूली बलायुग्म गोजिल्लोपलसारिका ॥५॥ अष्टलोहा रसा वनी हरिद्रा तालक शिला । एतावोषधयो दिव्या जयार्थ सम- हेदुध. ॥ ॥ सर्जरी मुखमध्यस्था कटिबदा च केसको । मुजदडस्थितस्ताल सर्वशस्त्रनिवारण. ॥७ । दक्षबाहुस्थितश्चाको वामेंदुईदये धरा । रुद्र पृष्ठ- स्थितो युद्धे वनदेहो भवेनर ॥ ८ ॥ (यामले ) सिंही व्याधी मृगी हसी चतुर्थेव कपर्दिका । एतासा लक्षण वक्ष्ये प्रभाव च यथाक्रमम् ॥१॥ सिंही सुवर्णवर्णा च व्यानी धूम्रा सरेखिका । मृगी तत्र विजानीयात्पीतपृष्ठी सितो. दरा ॥ २ ॥ हसी जलतरा श्वेता विदता नातिदाधिका । एवं विशेषान्विज्ञाय तत् कर्म समाचरेत् ॥ ३॥ औषधी सिंहिका नाम तस्या मूलस्य यो रस ! सिंहीकपर्दिकामध्ये क्षेप्यस्तन्मूलसयुत ॥ ४ ॥ विधाय वदन तस्या सिक्थेन च समन्वित । अस्या वस्थिताया तु सिंहबजायते नर ॥ ५ ॥ व्याघ्री- रसैन सधृष्ट पारदो मूलसयुत । पूर्ववत्साधयेयाघी फल चैव तथाविधम् ॥ ६॥ सामूत्रेण समिना मृतिकारससयुता । मृगशिष्य क्षिरेमाया तस्या कलमत शृणु in मुखमध्ये स्थिताया च वशीभवति मानव । रतिकाले मुखस्थाया बालाप्राणहरों -नर दाहसपादोरसैपुष्ट पारदो मूलसयुत । हसीमध्ये क्षिदीमान् मुखस्था सर्व सिद्धिदा ।। ९ ।। इति ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । भार ग्रहण करनेकी यह विधि है कि जिस किसी दिन पुष्य नक्षत्र और इतबार हो उसके प्रथम दिन शनिवारको उपवास करके शुभ समयमें इच्छित औषधिको नाल सुपारी और अक्षतादिसे "ॐ नमो नाराय- णाय स्वाहा " इस मंत्रसे न्यौतकर रविवारके दिन औषधिके समीप जाकर खैरीकी खुंटीसे खोदके “ ॐ को अनु हुं फट् स्वाहा " यह मंत्र ॐ कुमारजननीय स्वाहा महण करके " ॐ सर्वार्थसाधनीयस्वाहा " इस मनसे ले आये और फेर यथासमय काममें लेवे तो यथोक्त फल होता है ।। इति समरसारे औपधप्रकरणम् । इस मंत्री बोलता हुआ उपाडकर यायिस्थायिनोर्जयपराजयौ विवक्षुः कोटचक्रमाह । भास्राणि प्रलिखेदुपर्युपरि च त्रीणीशदिइयग्निभाद्- वाह्यात्रीणि लिखतिराच्छिवभतोप्यन्याँ च सौर्प बहिन आग्नेयादिति पित्तो यमदिशि न्यस्यन्बहिः सप्तम मैवादासवतोऽन्ययोःखयबहिई मध्यमेतश्च दरें ॥५६॥ भवर्णेन चतु:सख्या लक्ष्यते । ततः भास्त्राणि चतुरस्राणी- त्यर्थः । तानि उपर्युपरि च त्रीणि । एकस्य चतुरस्रस्य लघुनः उपरि महदन्यल्लिखेत । तदुपरि च ततोऽविकमन्यदेवं त्रीणि लिखेदित्यर्थः । तत्र च मध्यस्थं चतुरस्र कोटसंज्ञम्, तेषु त्रिष्यपि चतुरस्रेषु ईशदिशि ऐशान्याम् अग्निभारुत्तिकानक्षत्रमारण्य बालाचतुरसादारश्य त्रिपपि ऐशान्यामन्तर्विशति नीणि मृग- शिरोऽन्नानि लिखेति 'शिष्यनिमन्त्रणे लोट् । अन्तरात मध्य- वर्तिनश्चतुरस्रात शिवभमा तदारस्य त्रीणि भानि ऐन्यां प्राच्या समरसार- दिशि चतुत्रत्रयायेखामध्यस्थानेषु बहिनिस्सरन्ति लिख । सार्पमाश्लेषां बहिबाह्यचतुरस्त्रादपि बाहिः प्राच्यमेतल्लिख । इत्प मुनव प्रकारेण आयात्कोणादाराय पितृतो मघानक्षत्रायम- दिशि दक्षिणस्यां सप्तमं विशाखा बहिन्यस्य लिख । मैत्रादनु- राधाभादासवतो धनिष्ठाभाच अन्ययोनेक्रत्यवायव्ययोः कोणयोः प्राग्वल्लिखेति सम्बन्धः । एवं दिग्विदिग्बाह्यचतुष्कत्रयेण सय २ द्वादशभानि बहिःचतुरले लिखितानि स्युः। मध्ये चतुरने च दं ८ दिग्विदिकस्थतया अष्टौ स्युः । अन्तः मध्यचतुरने च दं ८ अष्टौ भानि स्युः। एवं कोटचके साभिजिति अष्टाविंशति- भानि लिखितानि स्युः चक्रम् ॥५६॥ [ यहा जो कोटचकके विषयमें वर्णन किया जाता है इसी चक्रको एक इस प्रकारका किला समझो कि मानो किसी जगह एक राजाका सेना आदि जन समूह सहित पुर, आवश्यक सामग्री सहित बसा हुआ है (१) उसके चारो तरफ चार कूटका एक सुविशाल किला वा परकोग खडा हुआ है (२) और उस परकोटेके बाहर चौतर्फ अन्य सेना आदि जनसमूह उपस्थित होनेका स्थल है (३) इस प्रकार यह फिला तीन भागोमे विभाजित होरहा है। अर्थात् (१) भीतर गढप- तिका जनसमूह सहित पुर (२) बीचमं परकोटा और (३) बाहर अन्य सेना आदि है । अतएव इन्हीं तीन विभागोंपर लक्ष्य देकर भावाणि भलिखे' इसके अनुसार तीनरेखात्मक चतुरष चक संघ. टित कियागया है । उसमें प्रथम रेखात्मक भीतरकी तरफ के स्थलको मध्य चा अंतर । द्वितीय रेसात्मक परकोटेको-चप्रकोट प्राकार वा चपमध्य । और तृतीय रेखात्मक वाह्यस्थलको बाह्य और वेष्टक .

-- तो" कोटचक्र संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । इन नामोंसे उल्लेख किया गया है। अतएव ग्रहस्थित्यनुसार फल देख नेमें इसका स्मरण रखना चाहिये। भात्र अर्थात् चार कोणका तीन रेखात्मक चक्र बनावै। और उसके ईशानकोणमें बाहरवाली रेखासे आरंभ करके कृत्तिकादि तीन नक्षत्र लिखे। फिर पूर्वकी तर्फ भीतरवाली रेखासे आरंभ करके आासे तीन नक्षत्र लिखे और इन तीनोंसे बाहर श्लेषा लिखैः फिर ऐसेही अग्निकोणमें मवा आदि तीन नक्षत्र और दक्षिणमें हस्त से तीन लिखें। यहां बाहर विशाखा लिदै, फिर ऐसेही नैऋत्यकोणमें अनुराधा आदि तीन लिखे और पश्चिममें पूर्वापढादि तीन लिखे और बाह्यभागमें श्रवण लिखे और वायव्यमें धनिष्ठा आदि तीन नक्षत्र लिखै और उत्तरमें उत्तराभाद्रपदादि तीन लिखे और बाह्यभागमें भरणी लिखें बन जाता है । इसमें १२ बााके ८ मध्यके और ८ अन्तरके नक्षत्र होते हैं ॥५६ ।। कोणंभानि प्रवेशे स्युदिशांन्यानि निर्गमे । पष्टंपठं सप्तकेषु मध्ये स्तम्भचतुष्टयम् ॥ ५७॥ कोणा ईशानायाः तत्र लिखितानि यानि रुचिका, मघा, अनुराधा, धनिष्ठादीनि त्रीणि त्रीणि भानि कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरः, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा-एतानि द्वादश- कोणभानि तानि ग्रहाणां कोटप्रवेशे भवन्ति । प्रवेशतया लिखि- तत्वात् । अन्यानि पुनर्वसु, पुष्य, श्वेषा, चित्रा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ, अभिजित, श्रवणं, रेवती, अश्विनी, भरणी, एतानि चतसए प्राच्यादिदिक्षु स्थितानि द्वादशभानि

समरसार-
निर्गमे गृहाणां स्युः । निर्गमतया लिखितत्वात् । सप्तकेषु अधि-
नीपुष्पस्वात्यभिजिदादिषु चतुर्पु चतुर्दिक्षु स्थितिषु प्रथमाव
यत्पष्टं पठं यथा अश्चिन्यादिसप्तसु नक्षत्रेषु पठम् आर्द्रा ।
पुष्पादि समसु नक्षत्रेषु पष्ठं हस्तः । स्वात्यादिसप्तसु नक्षत्रेषु
पठं पूर्वाषाढः । अभिजिदादिसप्तसु नक्षत्रेषु पष्ठम् उत्तरा-
भादपदा एतानि चत्वारि भानि मध्ये कोटस्थं भचतुष्टयं स्तंभ-
संज्ञं स्यात् ।। ५७ ॥
चारों कोणके बारह नक्षत्र प्रवेशके होते हैं। अन्य बारह नक्षत्र
निर्गमके होते हैं । और अश्विन्यादि सात सातमें छठे छठे चार नक्षत्र
बीचमें स्तम्भके होते हैं ॥ ५७ ॥
उपलक्षणमेव कृत्तिकादौ प्रथम दुर्गर्भमे वैरिभवाँ।
ग्रहचक्रमुडुंस्थमालिख दै चतुरस्र परणं च मध्यम
स्यात् ॥५८॥
इदं पूर्वश्लोके कृत्तिकादिभलेखनमुक्तम्, तदुपलक्षणमेव न तु
नियमेनोनम् । कृचिकादौ च लेख्ये प्रथम दुर्गस्थानं दुर्गर्भ
पूर्वोक्तादवकहडचक्राज्ज्ञातव्यम् । दुर्गनक्षत्र कोणभम् ईशान-
कोणे लेख्यम् । अथवा वैरिभं शत्रुभम् । अवकहड चकोत्थं तदा
ईशानकोण लेख्यम् अन्यानि प्राग्वल्लेख्यानि । तेषु च भेषु
ग्रहच सूर्यचन्द्रादिनवग्रहान् उडुस्यनक्षत्रगततया लिखेत् ।
समस्तमहाः स्वस्वभुज्यमाने नक्षत्रे स्थाप्या इत्यर्थः । अथ
कोटचके मध्यमं चतुरस्रं वरणं प्राकारस्थानीयं भवेत् ॥ ५॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (९७) ऊपर जो कृत्तिका आदि लिखा है वह केवल उपलक्षण है। (ऐसा नियम नहीं है कि कृत्तिकासे आदि लेकरही लिखना) दुर्ग (किला) वा वैरीका जो नक्षत्र हो उसीसे आरंभ करके उपरोक्त रोतिके अनुसार " फोटचक" में नक्षत्रोंको लिखे । और जिस नक्षत्र- पर जो ग्रह हों उनकोभी उन नक्षत्रोंपर स्थापन करै । इस चक्रमें 'बीचका चतुरस्र जो है यह प्राकारस्थानीयहै ॥ ५८ ॥ कोटचस्य चिनम् । tattit (९८) समरसारं- कोटचक्रम। आ पूस पु न पु आ मृ tu संवत् १९६८ शं १८३३के आश्विन शु १० दशमी चन्द्रवार पात्र पुञ्ज "नाम कल्पित किलेपर न स्थिति देखनी है अतः पात्रपुनाके नामन वि उत्तराफाल्गुनीको ई. नकोणमें स्थापन का उपरोक्त क्रमानुर "कोटचक्र" निर्मा किया तो इसम तयार हुआ हचि स्वा ch अ उ म हा पू उ ऽभि अनु श्रप वा मू बुधाउ ऽनु गुरु वि उचंद्र ad चि स्वा केतु श श उभि श्र पु ऽश्चि भ आ क शनि रो भीम मू

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (९९)
उसदिन हस्तपर सूर्य, उत्तरपाढपर चन्द्रमा, रोहिणीपर मंगल,
उत्तगफाल्गुनीपर बुध, विशाखापर गुरु, उत्तराफाल्गुनीपर शुक्र,
'कृत्तिकापर शनि, अश्विनीपर राहु और स्वातिपर केतु है । अतएव
'इनकोभी कोटचक्रमें यथास्थानपर स्थापना किया तो फलदेखनके उप-
योगी चक्र तयार होगया ॥ ५८ ॥
-
क्रूरसौम्यग्रहावस्थित्या दुर्गभंगरक्षादिकमाह ।
कूरा अंतर्बाह्यगोः सौम्यखेटो दुर्गे भैगो वेष्टके वैपरी-
त्यात् । क्रूरा मध्ये वप्राः सौम्यखेटा भेदो भंग-
श्रा युद्ध विनापि ॥२९॥
क्रूराः पापग्रहाः अत्यन्तरे । बाखमाः सौम्यखेटाः शुभग्रहाः
तदा दुर्गभंगः कोटभंगो भवति । वैपरीत्यादेवं वेष्टकभंगः । कथं-
शुभग्रहाः अध्यंतरगाः पापग्रहाः बाह्यस्थाः स्युस्तदा वेष्टकानां
भगः । क्रूरा मध्ये सौम्यखेटा वागाः कोटबाह्यस्थाः अत्र योगे
युद्धं विनापि भेदो भंगश्च भवति ॥ ५९ ॥
दूरग्रह कोटके भीतर हो और सौम्यग्रह कोटके बाहर हो तो
फिलेका भंग होता है (१) यदि इससे विपति अर्थात् सौम्यग्रह
भीतर हों और पाप ग्रह बाहर हो तो वेष्ट अर्थात् आये हुए राजाकी
सेनाफा भंग होता है (२) और ग्ग्रह मध्यमें अर्याद परकोटेके
भीतर और सौम्यग्रह कोटपर हों तो विनायुद्धही भेदसे भंग
होजाता है (३) ॥ ५९॥

(९८) समरसार- कोटचक्रम। " पात्र पुन पु पु आ मृ संवत् १९६८ शके १८३३के आश्विन शुक्ल १० दशमी चन्द्रवारको नामक कल्पित किलेपर ग्रह- स्थिति देखनी है अतएव पाचपुचोके नामनक्षत्र वि उत्तराफाल्गुनीको ईशा नकोणम स्थापन करके क्रमानुसार कोटचक्र " निर्माण- भी किया तो इसप्रकार हचिस्वा उ पू मू उपरोक्त र श ऽभि थप वा तयार हुआ मू शुक्र उनु बुधाउ पूर्य वि to उचद्र चि स्वा केतु भि न पूम ऽधि पु उ आ कृ शनि रो भीम मू संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (९९) उसदिन हस्तपर सूर्य, उत्तरपाढपर चन्द्रमा, रोहिणीपर मंगल, 'उत्तगफाल्गुनीपर बुध, विशाखापर गुरु, उत्तराफाल्गुनीपर शुक्र, कृत्तिकापर शनि, अश्विनीपर राहु और स्वातिपर केतु है। अतएव इनकोभी कोटचक्रमें यथास्थानपर स्थापना किया तो फलदेखनेके उप- योगी चक्र तयार होगया ॥ ५८ ॥ कूरसौम्यग्रहावस्थित्या दुर्गभंगरक्षादिकमाह । कूरा अंतर्वाह्यगौः सौम्यखेटी दुगै भैगो वेष्टके वैपरी- स्यात् । क्रूरा मध्ये वप्रगाः सौम्यखेटा भेदो भंग- श्चात्र युद्धं विनापि ॥ ५९॥ राः पापग्रहाः आयन्तरे । बाह्यगाः सौम्यखेटाः शुभग्रहाः तदा दुर्गभगः कोटभंगो भवति । वैपरीत्यादेवं वेष्टकभंगः। कथं- शुभग्रहाः अध्यंतरगाः पापग्रहाः बाह्यस्थाः स्युस्तदा वेष्टकानां भंगः । कूरा मध्ये सौम्येखेटा वगाः कोटबाह्यस्याः अब योगे युद्धं विनापि भेदो भंगच भवति ।। ५९ ॥ फूरग्रह फोटके भीतर हो और सौम्यग्रह फोटफे बाहर हो तो फिलेका भंग होता है ( १ ) यदि इससे विपत्ति अर्थात् सौम्यमह भीतर हों और पाप ग्रह यादर हों तो वेष्ट अर्थात् आये हुए राजापी सेनाफा भंग होता है (२) और दूरग्रह मध्यमें अर्याद परफोटेके भीतर और सौम्या पोटपर हों तो विनायुदही भेदसे भंग होजाता है (३) (९८) समरसार- कोटचक्रम। । पात्र पुञ्ज पु पु आ मृ हचिस्या संवत् १९६८ शके १८३३के आश्विन शुक्ल १० दशमी चन्द्रवारको नामक किल्पित किलेपर ग्रह- स्थिति देखनी है अतएव द पात्रपुञ्जोंके नामनक्षत्र वि उत्तराफाल्गुनीको ईशा नकोणमे स्थापन करके क्रमानुसार कोटचक" निर्माण किया तो इसप्रकार तयार हुआ। उ मू उपरोक्त श पू उ ऽभि अनु ध श्रप वा जे ऽनु शुक्र चुधाउ सूर्य वि ह चि स्वा केतु धश अभि पू.म ऽधि पु भ आ कृ शनि रो भौम मू

भीतर और सौम्यग्रह पोटपा हो तो विनायुही भेदमे भंग
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (९९)
उसदिन हस्तपर सूर्य, उत्तरपाढपर चन्द्रमा, रोहिणीपर मंगल,
उत्तगफाल्गुनीपर बुध, विशाखापर गुरु, उत्तराफाल्गुनीपर शुक्र,
कृत्तिकापर शनि, अश्विनीपर राहु और स्वातिपर केतु है। अतएव
इनकोभी कोटचक्रमें यथास्थानपर स्थापना किया तो फलदेखनेके उप-
योगी चक्र तयार होगया ॥ ५८॥
कूरसौम्यग्रहावस्थित्या दुर्गभंगरक्षादिकमाह !
कूरा अंतर्वारगोः सौम्यखेटा दुर्गे भैगो वेष्टके वैपरी-
त्यात् । कूरा मध्ये वप्रगाः सौम्यखेटी भेदो भंग-
श्वान युद्धं विनापि ॥ ५९॥
ऋराः पापग्रहाः अत्यन्तरे । बाह्यगाः सौम्यखेटाः शुभयहाः
तदा दुर्गभंगः कोटभंगो भवति । वैपरीत्यादेवं वेष्टकभंगः। कथं-
शुभयहाः अत्यंतरगाः पापग्रहाः बाह्यस्थाः स्युस्तदा वेष्टकानां
मंगः । कुरा मध्ये सौम्येखेटा वप्रगाः कोटयाह्यस्थाः अत्र योगे
युद्ध विनापि भेदोभंगश्च भवति ।। ५९ ॥
पूरग्रह फोटके भीतर हो और सौम्यग्रह फोटफे बाहर हो तो
फिलेका भंग होता है ( १ ) यदि इससे विपरात अर्थात् सौम्यग्रह
भीतर हों और पाप ग्रह बाहर हो तो वेष्ट अर्याद आये हुए गजाकी
सेनाफा भंग होता है (२) और यूरग्रह मध्यमें अर्यात् परफोटेक
होजाता है(३)॥१९॥

(१००) समरसार- उदाहरण । इस कोटमसंगके उदाहरणों में भापाटीकामें जहां जहां (१)(२) आदि संख्याके अंक दियेगये हैं तहां तहांसी स्थितिके अनुसार उदा- हरणरूप चक्र लिख दिये हैं । अतएव इन चक्रांकी स्थितिके अनु. सारही सर्वत्र फल जानना चाहिये ।। ५९ ॥ (३) सोभ्य पुरयायभन सोम्य RE GSTE299 सौम्य हामा भेद भग दुर्गभग व्यत्यासे त्वांवेटकस्यैव भंगो दुर्गे भनेऽप्युद्भवे नात्र मिथ्यां । प्राकारेंऽतः क्रूरखेटा बहिश्चेत्सौम्याः कृच्छादुर्गभंगैस्तदानीम् ॥ ६ ॥ व्यत्यासे उक्तपरीत्ये आवेष्टकस्यैव भंगः । कथं शुभ- प्रहाः कोटमध्यस्थाः । पापग्रहाः वागाः कोटस्थाः । तदा दुर्गे भमेपि आवेष्टकस्यैव भंगः । अत्र मिथ्या न-सत्यमेव वदेत् । प्राकारे मध्यकोटे, अंतःकोटमध्ये रखेटाः पाप- ग्रहाः । बहिश्चेत्सौम्याः शुभग्रहाः तदानी कृच्छ्रात्कष्टादुर्ग- भंगो वाच्यः ॥६०॥ , संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (१०१) विपरीत अर्थात सौम्यग्रह कोटके भीतर हों और पाप ग्रह कोटपर हों तो किला टूटजाय तौभी बाहरकी सेनाकाही नाश होता है (१) और 'परकोटेपर तथा परकोटेके भीतर तो पापग्रह हों और परकोटेसे बाहर सौम्य ग्रह हो तो कष्टसे फिलेका भंग होता है ॥ ६ ॥ उदाहरण। (२) साम्य सो. भय टुगपि TATARAMMAR था यमनामम। + वप्रे वाद्ये करखेटोच. मध्ये सौम्या खंडिः स्यान्न दुर्गस्य भंगः । वप्रे सौम्या अन्तरा बाह्यतश्च क्रूरी भंगः सैन्यन्योः स्याइयोस्तु ॥६॥ वो, पाये कूरग्रहाचेत्स्युः । मध्ये सौम्यास्तदा दुर्गे खंडिमात्रं स्यान्न दुर्गस्य भंगः । व सौम्याः । अन्तरा बाह्यतथ क्रूराः कुरखेटाः तदा दयोः स्थापियायिसन्ययोः भंगः स्पात् ॥ ६ ॥ यदि पापग्रह परकोटेपर और बाहर हो और मोम्यग्रह भीतर हो तो दुर्ग वंडितमात्र होजाता है। टूट नहीं सकता है (१) और मोम्पग्रह तो किलेपर अर्थात् परकोटेपर हों और कराह वाहर और भीतर हो तो यापी (चटाईकरके आनेगला राजा) की और स्थायी (दुर्गाधीग. राजा) की दोनोंगी सेनाका भंग होता है ।। ६१ ॥ १964

(१०२)
.समरसार-
उदाहरण ।
MUL
कर
साम्य
कर
स्थायी
सदिमास्याबदुर्गस्य महः।
द्वयोः सैन्ययोग।
-
-
वप्रेकर बाह्यमध्ये तुं सौम्योस्तुल्यं युद्धं खंडिपा-
तोऽन्वहं च 1 व बाह्येऽन्तर्यदा करसौम्याः वारे युद्ध
स्यांद्वयोर्भग एव ॥ ६२॥
वो कूराः। बाह्यमध्ये तु सौम्यग्रहाश्वेचदा तुल्यं युद्ध
समयुद्धं द्वयोः सैन्ययोर्भवति । अन्वहं प्रतिदिनं च दुर्गे
खंडिः पतेत् । अथचेदने प्राकारे, बाह्ये बहिर्देश, अन्तः
दुर्गमध्ये च यदि क्रूरसौम्या मिलिता ग्रहाः स्युस्तदा घोरे युद्ध
द्वयोरपि भंग एवं स्यात् ।। ६२॥
यदि परकोटेपर क्रूर ग्रह हों और बाहर तथा भीतर सौम्यग्रह हो
तो तुल्य ( बराबर ) युद्धहोता है और प्रतिदिन किला टूटताभी
रहता है। (१) और बाहर भीतर तथा कोटपर तीनोंही जगह कर
और सौम्यग्रह मिलहुए हों तो घोर युद्ध होकर दोनोंका नाश
होजाता है ॥ ६२॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (१०३)
उदाहरण ।
सौम्य
र सौम्य
भर
सोम्य
तुल्ययुद्धम्
अन्वस्चखडियात
घोर युद्ध क्योभग
तुल्या बायतश्च चेत्कुरसौम्याः
सन्धिर्वाच्यो यायिदुर्गेशयोस्तु।
तुल्याः समरसौम्याः पापमहाः शुभग्रहाः बाह्ये देश
अन्तर्देशे च स्पुस्तदा यायिदुर्गेशयोः सन्धिः भीतिर्वाच्यः ।
यदि कोटके बाहर और कोटके भीतर दोनों जगह कूर और
सौम्पग्रह तुल्य हों अर्थात् वाहर जितने क्रूर ग्रह हों उतनेही सौम्यग्रहभी
हों। और भीतर जितने सौम्यग्रह हों उतनेही दूरग्रह हों तो स्थायी
(दुर्गाधीश) और याची दोनो राजाओंमें सन्धि (राजीनामा) होजाता है ।
-सोग्य
सोम्य
या यनुगशयस्तुगाच स्यात् ।

(१०४) समरसार- ज्ञारौ स्तंभः प्रवेशेपि वा चेचंद्रो जीवत्पक्षर्गः स्यात्प्रवेशे ॥ ६३॥ रुंन्ध्याहु वो कुलोषऽथ युद्धं व्यत्यासे नीतस्थसैन्य विदध्यात् । दिक्ष्वी- ज्यारो काव्यवास्थसौम्यौ दुर्गे भंगं निर्दिशन्ति क्रमण ॥६॥ ज्ञो बुधः आरो भौमः । एती चेत्स्तंभनक्षत्रगती स्तः । प्रवेशकोणभेषु मध्ये कस्मिंश्चिद्वा स्याताम् । चन्द्रस्तु राहु- कालानलचके वा जीवत्पक्षगानि नक्षत्राणि तेषां मध्ये कस्मिं- श्चित्स्यात् प्रवेश कोणनक्षत्रे वा स्यात्तदा दुर्ग रुन्ध्यात् ॥ ६३॥ यायी स्वसैन्येनारिदुर्गम् अकुलौघे अकुलगणे रुन्ध्यात वेष्ट- येत् । अकुलौघश्च-भरणी, रोहिणी, पुनर्वसु, श्लेपा, पूर्वा- फाल्गुनी, हस्त, स्वात्यनुराधो-त्तराषाढा, धनिष्ठो-जराभाइ- पदा, रेवतीसंज्ञानि १२ भानि । प्रतिपदा, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, नवम्येकादशी, त्रयोदशी, पंचदश्यधतिथयः । रवि, सोम, शनि, गुरु ४ वारा इति । अथ व्यत्यासे सति तु अन्तःस्थस्य स्थायिनः सैन्यं यायिना सह युद्धं विदध्यात् । व्यत्यासश्चैवं बुधभौमौ स्तम्भरूं न स्यातां न प्रवेशः किन्तु निर्गमः । चन्द्रो मृतगो न तु जीवत्पक्षगः न च प्रवेशः किन्तु निर्गमः कुलगणे च तदा स्थायी युद्धयेत । दिक्षु प्राच्यादिषु चतसृषु दुर्गस्य ईज्यो गुरुः, आरो भौमः, काव्यः शुक्रः, वक्रस्थसौम्यो वक्रीवुधः एते चेत्क्रमेण स्युस्तदा तस्मिन्दुर्गे भंग दिशान्ति ॥ ६४ ॥ , संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (१०५) । ऊपरके चक्रोंमें तो दोनों ओरकी सेना तया किलेका भंग होना न होना विदित कियागयाहै । अब नीचे चक्रोंसे कोटको घेरनेका तया आई हुई सेनाको परास्त करनेके लिये आक्रमण करनेका समय सूचित किया जाताहै । ' यदि बुध और मंगल स्तंभके नक्षत्रों में अथवा प्रवेशके नक्षत्रों में हों और चन्द्रमा जीवपक्षके नक्षत्रोमें अथवा प्रवेशके नक्षत्राम हो तो ऐसे समय में यायी (चढाईकरके आनेवाला) राजा अपनी सेनासे किलेपर आक्रमणकरे ।(१) अथवा " अकु. लगण" जो ऊपर १० वें श्लोकमें कहचुके हैं उसमें किलेपर आक्रमण करे (घेरलेवे ) । (२) और इससे विपरीत अर्थात् बुध भौम तो निर्गमनक्षत्रों में हो और चंद्रमा मृतपक्ष वा निर्गम नक्षत्रों में हो तो स्थायी (फिलेका अधिपत्ति ) राजाआईहुई सेनाको परास्त करनेके लिये उप- रोक्त समयमें अपनी सेनाको युद्ध करनेके लिये आज्ञा देवे । कुलगण" में युद्धका आरम्भ करे। (४) यदि पूर्वमें गुरु, दक्षिणमें कुज, पश्चिममें शुक्र और उत्तरमें वक्री बुध हो तो यह निज निज दिशाका नाश करते हैं ॥ ६३ ॥ ६ ॥ उदाहरण । (३) अथवा" यायो-दुर्गहन्ध्यात् । ज्य 000000000 अथवा यु म चन्द्रप्रवेशक्षा अपया जीवपक्ष चो (१०६) समरसारं- मृतपक्षवाचन्द्रः निर्गमावुन. अतस्थ सैन्य युद्धे निर्गमा मामः नियोजनीयम् । SORT 호호호 : .. यत्र क्रूरस्तेन युक्तः शशी वां खण्डिस्तत्रैतत्पंथे च प्रवेशः । कुराः स्तंभक्षे यदांतस्तदानी दुर्ग मुक्त्वा याति दुर्गाधिनाथः ॥ ६ ॥ यत्र प्राच्यादिदुर्गरेखास्थले क्रूरग्रहस्तेन ग्रहण करेण युक्तः शशी चन्द्रो वा तत्र दुर्ग खढिः पतेत् । एतस्य करस्य मार्ग बाह्यसैन्यप्रवेशो दुर्गे भवेत् । यदा कुराः संभनक्षत्रे अन्त- मध्ये स्युस्तदानी दुर्गाधिनाथो ग्रहवशात् तदुर्ग त्यक्त्वा याति ततः पलायत इत्यर्थः ॥ ६५ ॥ कोटपर जिस जगह दूरग्रह हो, अथवा जिस जगह दूरयुक्त चंद्रमा हो तो (१)उसी जगहसे कोट खंडित होताहै। अतःरसी मार्गसे प्रवेशहोगा और यदि क्रूरग्रह स्तंभके नक्षत्राम भीतरहों तो (२) दुर्गाधिनाय किलेको छोड़कर भागनाता है ।। ६५ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (१०७)
उदाहरण ।
कर
सडिस्त
पथप्रवेश
EERadha
दुर्गाधिनायाभुर्गत्यस्त्वा
निर्गयः वाह्यगे बैंक्रितश्चेतं क्रूरः खडि निश्चित
तत्र कुर्यात् । वप्रस्थीतहन्ति मध्य प्रवेशा पनी
चेदन्ति वाह्यस्थसैन्य ॥ ६६ ॥
निर्गत्यक्ष निर्गमनक्षत्रे बाह्यगे बाह्यावर्तमाने निर्गमनक्षत्रे
वकी क्रूरग्रहो यदि स्याव तत्र स्थाने निश्चितं खडि कोटभंग
कुर्याद । वमस्यः कोटस्थो वक्री कुरभेद्भवति तदा अंतः
कोटमध्ये हन्ति नश्यति । मध्ये कोटमध्ये प्रवेश प्रवेशनक्षत्रे
चेदकी क्रूरस्तदा बाह्यस्थसैन्यं यायिसैन्यं हन्ति ।। ६६॥
यदि बाहरफ निर्गम नक्षत्रपर यकी क्रूरग्रह हो तो उसी जगहसे
कोटको खण्डित करते हैं। (१) और यदि फोटपर पकी फरमह
हों तो कोटके भीतरवालोंका नाश करते हैं। (२) और जो फोटो
भीतर प्रवेशके नक्षत्रोंपर वक्री रग्रह हों तो बाहरवाली सेनाका (३)
नादा करते हैं ॥६६॥

(१०८) समरसार- (१) (२) वीग निर्गमनक्षत्रस्य वहीर अव सहि अतत्य इन्ति (३) बाह्य स्थसग्य हति घकोम्रो दुर्गे तदीशभजयोरिति कोटयोस्तु भंगं विचार्य दिशि तत्र लगंतु बाया। आभ्यंतरी बलपभोत्थित- चक्रदोषे सेनान्यमन्यमुपदिश्य दिशोप्यतुं ॥ ६७॥ दुर्गस्य एतदीशस्य दुर्गेशस्य च ये मे तयोरेशान्यादौ लिखनेन इत्यमुना प्रकारेण उत्पने कोटचक्रे तयोः प्रागुक्त- प्रकारेण भंग विचार्य यस्यां दिशि भंगसंभावना तस्यां संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (१०९) दिशि बाह्या यायिनो लगन्तु तत्र लगाव दुर्ग गृहंतु । आत्यं- तरादुर्गाधिपास्तु स्वबलपो यः सेनापतिस्तस्य यद्भवत उत्थितो यः कोटचक्रदोपस्तस्मिज्ञाते अन्यसेनापतिम् उपदिश्य नाम- पूर्वकं कृत्वा दिशोऽपि दुर्गज्ञा अवन्तु रक्षन्तु । एतदुक्तं भवति-एतग्रन्थकतोक्तप्रकारेण यायिस्थायिनावुभा- वपि जयतः ॥ इति ॥ ६७ ॥ दुर्ग और दुर्गेश इन दोनोंके नामके नक्षत्रोंसे उपरोक्त रीत्यनुसार दो चक्र बनाकर उसी उपरोक्त क्रमानुसार कोटका भंग होना निश्चय करके उसी उसी जगहपर यायी (बाहरवाला ) राजा अपनी सेनाको लगावै तो किला टूटजाता है । और इसीप्रकार स्थायी (भीतरवाला) राजा अपने सेनापतिके नक्षत्रसे विचार कर देखे और फिलेका भंग होनाही प्राप्त हो तो उस मेनापतिको बदलकर दूसरा सेनापति नियत करे और जिस दिशाम फिलेका भंग आवे उस दिशाको रक्षा करै ।।६७॥ इति समरसारे+कोटचक्रप्रकरणम् । . + अथात सप्रवक्ष्यामि कोटचाम्य निर्णयम् । स्नोकारि. पुरते पन भरिसन्यपराभवम् ॥ १ ॥ यस्याश्रयमलादेव राज्य कुवति भूतो । विमह चतु- राशासु सीमास्थैः शनुमि सह ॥ २ ॥ विपर्म दुर्गमं घोर चक्र मीरमया- यहम् । कपिशान्तु शोमाढय रौदाहालकमडितम् ॥ ३ ॥ प्रनोली यस्य काला स्थात्परिखा कालरूपिणी । रणपर्नुहनाटोर डिसीप्रपत्रितम् ॥४ ॥ मुद्दाले. मुरः पाशः कुतरीन शरः । सयुतः मुमटःशूररेनि दुर्ग समादिशेत् ॥५॥ (इन वाक्योसे विदित होगा कि प्राचीन कालमें की फोट बनाये जागये । अस्तु )। उपरोकचोयुक्तालगाइ-" बुभन्दुनीवाथ सदा नौरमा । मान्यरराष्ट्रमायाः पेतुः मरमा मT:II १॥ मरभंगो जपः- मताः (११०) समरसार- सर्वतोभद्रचक्रमाह। पूर्वोदीचीलिलालीनयनयगणिताः कंदकोप्टेप्वथै- शोत्कोणतोयस्वरान्वयुद्धतं इह दिगालीए भान्यं- तरातुं । नारीवर्णान्पुरोक्तानवकहडमुखानंतरास्मा- दृपादीने खेटासंबंधिवारैः सह लिख च तिथी मध्येतो नंदिकादीनें ॥ ६८ ॥ ऐन्यादि मध्यभचतु- प्कवेधतो वेधादिशेत्क्रमशः । घङ, पण धर्फढां थझभौमिति सर्वतोभदौ ॥ ६९॥ नय १० नय १० गणिता दशदशगणिताः पूर्वोदीचीः पूर्वाश्च उदीच्यश्च पूर्वोदीच्यः ताः पूर्वोदीचीः पूर्वोत्तराः आलीः पंक्तीलिख । अथानंतर कंद ८१ कोठेषु एकाशीति- कोष्ठेषु ईशात् ईशकोणतः कर्णेः कर्णमार्गः तोय १६ स्वरान थोडशस्वरान् अकाराचाँल्लिखेत् । अन्तरा मध्ये वह्नयु- डुतः लतिकादितः सप्त सप्त नक्षत्राणि दिगालिपु दिसं- क्तिषु पूर्वादिदिक्षु लिखेत् । पुनः पूर्वोक्तान पूर्वोक्तनारी २० वर्णान् विंशतिवर्णान् अवकहडमुखान् अस्माद स्थानात -सौम्युमिमिश्रफल मतम् । विचार्य कुरत युद्ध कोटचके स्वरोदयी ॥२॥ बाह्यम मध्यमेतस्याः करा हानिकरा मताः । बादमे मध्य तत्स्था. सौम्या विजयमादिशेत् ॥ ३ ॥ दुर्गमध्ये गते सूर्ये जलदोषः प्रजायते । चद्र भगः कुजे दाहो बुधे बुद्धिबला नरा. ॥ ४ ॥ वाक्पनी दुगमध्यस्ये मुमिक्ष प्रचुर जलम् । चलचित्तनराः शुके मृत्युरोगी शनैश्चरे ॥५॥ राहीमध्यगते दुर्गे भेदभङ्गो महद्भयम् । केनौ म पगले तर विशदान गढारिप ॥१॥ एव कोटबायपि ज्ञेयम॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (१११)
अधः अन्तरामध्ये लिखेद । चतुर्दिक्षु वै सव्येनोच्यते । पूर्वस्या
दिशि समसु कोप्टेषु कृत्तिकादीनि सप्तनक्षत्राणि लेम्पानि ।
तदधः पंचसु कोष्टेषु अवकहडान लिखेत् । पुनः दक्षिणस्यां
दिशि मघादीनि सप्तनक्षत्रानि लेख्यानि । तदधः पंचसु कोठेषु
मटपरता लेख्या: । पुनः पश्चिमायां दिशि सप्तसु कोठेषु अनु-
'राधातः सप्त नक्षत्राणि लेख्यानि । तदुपरि नयमनसा लेख्याः।
पुनरुत्तरस्यां दिशि पनिष्ठातः सप्त नक्षत्राणि लेख्यानि । तदुपरि
गशदचला लेख्याः । तदंतरा (मध्ये) वृपादीनि त्रीणि, सिंहा-
दीनि त्रीणि, वृश्चिकादीनि त्रीणि, कुंभादीनि त्रीणि, पूर्यादि-
दिक्षु लिखेत् । पुनः मध्यतः नन्दादितियान लिखेत् । अंकैः
सह खेटासम्बन्धिपारैः सह खेटानां अचः वास्तत्सम्ब-
निधनो ये धारास्तैः सह तिथीन लिखेद । रविभौमयोः अकारः
स्वरस्तस्य वारी रविभौमौ नदायां लेख्यौ । बुधचन्द्रयोः इका-
रस्तत्सम्बन्धिनौ वारी बुधचंद्री भद्रायां लेख्यो । गुरोः स्वर
उकारस्तस्माद्गुरुर्जयायां लेपः । शुक्रस्प एकारस्तरमा-
च्छुको रिक्तायां लेख्यः ॥ ६८ ॥ ऐन्द्रयादिमध्ये पद-
चतुष्कं नक्षत्रचतुष्टयं तस्य वेपतः क्रमाव पडला, पणठां,
'धफहां, थझनां वर्णानां वेधमादिशेत् । तदेवाह-आविधे
सति पान्छा विक्षन्ते, हस्तवेधे पणठा विद्धचन्ने, पूर्यापाढायेथे
धफढा विद्यन्ते, उत्तराभाद्रपदावेधे थाना विध्यन्ते इति सर्व-
तीभई धरूव क्षेयम् ॥ ६९ ॥

. (११०) समरसार- सर्वतोभद्रचक्रमाह। पूर्वोदीचीलिखालीयनयगणिताः कंदकोष्ठबथै- शोत्कोणेतोयस्वरान्वह्नयुद्धत इह दिगालीषू भान्य- तरा हुँ । नारीवा पुरोक्तानवकहडमुखानंतरास्मा- दृपादी खेटासंबंधिवारैः सह लिख चै तिथीनं मध्यंतो नंदिकादीने ॥ ६८ ॥ ऐन्धादि मध्यभचतु- प्कवेधतो वेधमौदिशेत्क्रमशः । पछी पणठी धर्फढां थानमिति सर्वतोभदौ ॥ ६९ ॥ नय ३० नय ३० गणिता दशदशगणिताः पूर्वोदीचीः पूर्वाश्च उदीच्यश्च पूर्वोदीच्यः ताः पूर्वोदीचीः पूर्वोचरा: आली: पंक्तीलिख । अथानंतरं कंद ८१ कोष्ठेषु एकाशीति- कोष्ठपु ईशात् ईशकोणतः कणेः कर्णमार्गः तोप १६ स्वरान 'पोडशस्वरान् अकाराद्याल्लिखेत् । अन्तरा मध्ये वह्नय- डुतः कचिकादितः सप्त सप्त नक्षत्राणि दिगालिपु दिवयं- तिषु पूर्वादिरिक्ष लिखेत् । पुनः पूर्वोक्तान पूर्वोकनारी २० वर्णान् विंशतिवर्णान् अवकहडमुखान् अस्माद स्यानाव -सौम्पमित्रमिश्रफल मतम् । विचार्य पुरते चुद फोटचके स्वरोदयी ॥ २ ॥ वायम म-यमेतम्या. करा हानिकरा मना । बाधम मय तम्या मोम्पा विजयमादिशेत् ॥ ३ ॥ दुर्गमध्ये गते सूर्ये जलदोष प्रनायते । चद्रमा पुजे दाहो बुधे बुद्धिबला नरा ॥ ४ ॥वापनी दुर्गमयाय मुभिक्ष प्रचुर जलम् । चलचित्तनरा शुक्र मृयुरोगी शनभरे १५॥ राहीम यगने दुर्गे भेदमलो महङ्ग्यम् ।। केतो म पगते तत्र विपदान गढापि ॥६॥ एव कोटबायपि झयम।। ।

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम्। (१११)
अधः अन्तरामध्ये लिखेद । चतुर्दिक्षु वै सम्पनोच्यते । पूर्वस्या
दिशि सप्तसु कोष्ठेषु कृत्तिकादीनि सप्तनक्षत्राणि लेख्यानि ।
तदधः पंच कोटेषु अवकहडान लिखेत् । पुनः दक्षिणस्या
दिशि मघादीनि सप्तनक्षत्रानि लेख्यानि । तदधः पंचसु कोठेषु
मटपरता लेख्याः । पुनः पश्चिमायां दिशि सनम कोठेपु अनु-
राधातः सप्त नक्षत्राणि लेख्यानि तदुपरि नयभजखा लेख्याः।
पुनरुत्तरस्यां दिशि पनिष्ठातः सम नक्षत्राणि लेख्यानि । तदुपरि
गशदचला लेख्याः तितरा (मध्ये) वृपादीनि त्रीणि, सिंहा-
दोनि त्रीणि, वृश्चिकादीनि त्रीणि, कुंभादीनि त्रीणि, पूर्वादि-
दिशु लिखेद । पुनः मध्यतः नन्दादितिथीन लिखेद । अंकः
सह खेटासम्बन्धिवारैः सह सेटानां अचः तरास्तत्सम्ब-
निधनो ये वारास्तैः सह निधीन लिखेद । रविभौमयोः अकारः
स्वरस्तस्य पारी रविभौमौ नंदायां लेख्यो । बुधचन्द्रयोः इका-
रस्तत्सम्बन्धिनी बारी बुधचंदो भदायां लेरपी । गुरोः स्वर
उकारस्तस्माद्गुरुयायां लेपः । शुक्स्प एकारस्तस्मा-
छुको रिक्तायां लेख्यः ॥ ६८॥ ऐन्त्रचादिमध्ये पद-
चतुष्कं नक्षत्रचतुष्टयं तस्य वेधनः क्रमाव पडछ, पणठा,
'फटां, थझनां वर्णानां देवमादिशेद । तदेवाह-आदविये
सति पञ्छा विपन्ने, हस्तवेधे पणठा विद्धचन्ने, पूर्वापाराधे
पफटा विद्धपन्ते, उत्तराभाद्रपदावधे थाना विध्यन्ते इति सई-
तोभद्रं वेधस्त झेपम् ॥ ६९ ॥

(११२) समरसारं-- पूर्वसे और उत्तरसे आरंभ करके दश दश रेखा खीचनेसे ८१ कोठे बन जाते हैं । उन कोठामें ईशान कोणसे आदि लेकर कोणों कोणोंके कोष्ठोंमे 'अआइई' आदि सोलह स्वर लिखे। और ऊपर ऊपरकी चौतरफकी दिक्पंक्तियोंके जो सात सात कोठे है उनमे कृत्तिकादि अट्ठाईस नक्षत्र लिखे। इनके नीचेके चौतर्फके पांच पांच कोटोंमें उपरोक्त अवकहड-मटपरत-नयभजख-गशदचल-यह वीस वर्ण लिखे। और इनके नीचे जो तीन तीन कोठे हैं उनमें वृपादि बारह राशि और ग्रह लिखे । इनके नीचे जो एकएक कोठे है उनमे स्वर- संबंधी वारों सहित नन्दादि तिथि लिखे ॥ ६८ ॥ और इसके अति- रिक्त पूर्वादि दिशाओंमें जो बीच बीचके भचतुष्क है उनमें क्रमसे पूर्वकमे घडछ, दक्षिणमे पणट, पश्चिममे धफड और उत्तरको थशन लिखे तो वेधोपयुक्त नीचे लिखेअनुसार " सर्वतोभद्रचक्र" बन जाता है।॥ ६९॥ प्रथमाय्यभस्थखेटो विध्येत्कोणस्थितांनश्चतुरः। तिथिमपि पूर्णी न शुभं क्रूरैजवेधःशुभैःशुभंजः॥५०॥ प्रथमाम्पमस्थखेदः कोणस्थितान् चतुरः अचः विध्येत् । यथैशान्यां प्रथम नक्षत्र भरणी तदम्यभं रुचिकास्थो ग्रहः .ईशानकोणस्थान् अ, उ,ट, ओ स्वरान् पूर्णा तिथींश्च विद्धयेवा आमेव्याम् आमघास्थो ग्रह आमेयस्थान आ, ऊ, ल, औ स्वरान् पूर्णातिथीश्च विद्धयेत् । नयां विशाखानु- राधास्थो ग्रहः नैऋतिस्थान इ, क, ए, अं स्वरान् पूर्णा- तिथान विद्धयेत् । वायव्यां श्रवणधनिष्ठास्थो ग्रहः वायव्य- स्थान ई, क, पे, अः स्वरान् पूर्णातिथींश्च विद्धचेत् । तत्र क्रूरचेषः न शुभः, शुभकतवेधस्तु शुभदः ॥ ७० ॥ -- १शन्य राष्ट्र केन्वारा: मराः । २शेषाशुभाः किरयुगा दुधः क्षीणवद्रोदि मरी ॥३यदि इस चकमा मंसारचर"या "मनारदीपरावना" का जाप संस्कृतीका-भाषाटीकासमेतम् । (११३) कोणस्थ प्रयमनक्षत्र-और अश्य (आगेका) भ नक्षत्र इन दोनों नक्षत्रोंपर कोई ग्रह स्थित हो तो कोणत्य चारों स्वरोंको तया पूर्णा तिथिको वेधताहै । यया-ईशान कोणमें मथम नक्षत्र भरणी और अम्पम कृत्तिकापर कोई ग्रह हो तो उस कोणके अ, र, ल, ओ इन चारों स्वरोंको एवं पूर्णा तिथिको वेधता है । अग्निकोणमें ऐसेही आर्दा, मघापर कोई ग्रह हो तो आ, ऊ, लू, औ और पूर्णातिथिको वेधताहै। नत्यमें विशाखानुराधास्य ग्रह इ, ऋ, ए, अंसहित पूर्णाको वैधता है और वायव्यमें श्रवणधनिष्ठास्थ ग्रह ई, ऋ, ऐ, अः इन स्वरोंको और पूर्णातिथिको वेधताहै। यह वेध यदि क्रूर १ ग्रहोंका हो तो अशुभ और सौम्य २ ग्रहोंका हो तो शुभ होताहै ॥ ७० ॥ मियुन केक मकर ८ (११४) समरसार- वक्रशीघ्रग्रहवेधमाह ! वक्री दक्ष कर्णगत्यार्थ वाम शीघ्रों विध्येदीक्षतेग्रे समस्तु । नित्यं को राहुकेतू इनेन्, 'शीघौ नित्यं दृग्व्यधौ तुल्यरूपौ ।। ७१ ॥ वकी शुभोऽशुभो वा कर्णगत्या कोणरीत्या दशं स्वपश्चा- झागं विध्येत् । वक्रगतित्वं च सूर्यः स्वस्थानासंचमे पष्टे वा स्थाने स्यात् । अथ शोधगतियहो वाम स्वाग्रिमभाग कोण- रीत्यैव विध्येत् । शीघ्रपतिलं चार्के द्वितीयस्थानगे समः सम- गतिस्तु ग्रहः अग्रे स्वसम्मुखे नेक्षते । अतः सम्मुख एव तदृष्ट- रूपो येयः । अथ नियतशीघ्रग्रहानाह-नित्यमित्यर्दैन । राहुकेतू नित्यं सर्वकाले वकावतोऽनयोर्दक्ष एव कर्णगत्या वेधः । खाँदू नित्यं शीघ्रगती अतोऽनयोश्च वामवेधः । हरव्यधी दृष्टिवेधी तुल्यरूपौ सर्पकाले समानफलावेव नान्यथा भवतः ॥ ७१ ॥ वक्री ग्रह दक्षिण कर्णगति ( कानकी तर्फ होकर तिर्की दृष्टि) से और शीघ्रगति ग्रह वामणगतिसे वेधता है और सम (न वक्री न शीघ्र ) ग्रह सम्मुख वेधताहै ।-राहु केतु नित्य ही वक्री रहतेहे और सूर्य चद्र नित्यही शीघ्र रहतेहे अतएव राहु केतु सदैव दक्षिण वर्ण- गतिसे और सूर्य चंद्रमा सदैव वाम वर्णगतिसे वेधतेहै ॥ ७१ ॥ उदगार्थविनाशरोगमृतिदा विध्यंत एकादयो वर्णे हानिरुडौ भ्रमोऽचि तु सेजो विद्ध"तिथी भीरपि । -तो कोई अ युक्ति न होगी। क्योकि इसका सघटन अट्ठाईसों नझनोस हुआ है और ससारके या मात्र पदायोंके नामाक्षर अहाईसों नक्षत्रों के अतर्गत है, अत नक्षवेधानुसार वस्तुमात्रका क्षयोद्भव विदित हो सकता है।

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । रोशौ विघ्नततिचे पंचसु मृतिविध्य ज्ञईज्यः सितः । प्रज्ञा सर्वसुखं रतिं विदधते वका अतीप्टौं ईमे ॥ ७२॥ एकादयो महा विध्यन्त उद्वेगार्थविनाशरोगमृतिदा भवन्ति । एकपापग्रहवि नरे उद्देगः, द्विग्रहवेधेनार्थविनाशो द्रव्यहानिः, त्रिग्रहवेधेन रोगः, चतुहवेधेन मरणं भवति । वर्णे अक्षरे पाप- 'ग्रहविद्देन हानिः द्रव्यहानिः बलहानिः पक्षहानिर्वा, उडौ नक्षत्रे पापविद्धे नमः चित्तामणं भवेत् । अचि स्वरे पापविद्ध रुजः रोगो भवति । तिथौ पापविद्धे भी भयं स्यात् । राशौ पापविद्ध विनततिः विघ्नपरंपरा भवति । पंचसु वर्णनक्षत्रस्वरतिथिराशि एककाले विद्धेषु मृतिमरणं भवति । ज्ञः बुधो वेधेन प्रज्ञा बुद्धिं ददाति, ईज्यो गुरुर्वेधेन सर्वमुखं ददाति, सितः शुको वेधेन रति प्रीतिं ददाति । इमे शुभयहाश्चेद्दकाः विषन्ते तार्ह अतीप्टाः अत्यन्त श्रेष्ठाः ॥ ७२ ।। यदि एक पापग्रह वेपता हो तो उद्वेग, दो वेधते हो तो अर्थनाश, तीन वेधते हों तो रोग और चार ग्रह वेधते हों तो मृत्यु होती है । वर्ण ( नामाक्षर ) का वेध हो तो द्रव्यनाश, नक्षवेध हो तो भ्रम, स्वरवेध हो तो रोग, तिथिवेध हो तो भय और राशिवेध हो तो विनपर विघ्न होता है और यदि इन पांचोंकाही वेध हो तो मृत्यु होती है + । यदि वैधकर्ता बुध हो तो बुद्धि, गुरु हो तो सर्वसुख और शुक्र हो तो + इस घेधसे मनुष्योका सुख, दु.ख, हानि, लाभ, रोगका हाम, वृद्धि और यावन्मात्र वस्तु पदार्थोका क्षय उत्पत्ति एव व्यापारिक वस्तुओंका महर्ष समर्थ (तेजी मी ) आदि सब कुछ देया जासकताहै । इसीसे यह 'संसारचक' कहासकता है। -

।
(११६)
समरसारं-
रति ( स्त्रीसंभोग) की प्राप्ति होती है और यदि यह वक्री हो तो
अत्यंत अच्छे होते हैं ॥ ७२ ॥
क्रूरा वक्रेतीव दुष्टा रविः स्याद्यद्राशौ सौ दिक्स-
दिश्यास्तमेति । प्राच्या ईशाशास्थिताश्च कमोध्य
सर्वाशासु ज्ञायता बुद्धिमद्भिः ।। ७३ ॥
कुरा के पापग्रहाः वक्रिणः अतीव दुष्टाः स्युः। रवि-
स्मिन्नाशौ स्यात् यदिग्लिखितेषु राशिपु स्यात् । यथा
पाच्यां वृपमिथुन कर्कटा लिखितास्तेषां मध्ये देकस्मित्राशी
तिष्ठेचदा सा प्राच्यादिदिक सदिश्या 'दिशि भवं दिश्यं
नक्षत्र, स्वर, वर्ण, राशि, तिथिवारादि तेन सह वर्तत इति
सदिश्या आशा नक्षत्रापर्युक्ता सा दिगस्तगा स्यादित्यर्थः ।
विदिक्षु ये स्वराधास्ते कथमस्तगता ज्ञेया इत्यपेक्षायां विदिशां
विश्वेवांतर्भावमाह-प्राच्या इति । ईशाशा ऐशानी तत्र स्थिताः
अत्र प्राच्या प्राचीविष्णता झेपाः । आगयीस्था दक्षिणदि-
म्गताः याः । एवं ननिस्थाः प्रतीचीगताः । वायव्यस्था
उदीचीगता ज्ञेयाः॥ ७३ ॥
दूरग्रह वक्री होकर वेध फरते हो तो अत्यंत दुष्ट होते हैं। पर्य
वृपाद निम रागिपर स्थित हो और यह गगि जिम दिशामें हो
तो उस राशिक तर्फको दिया पवं म्बर, वर्ण, नानादि गय अस्त
होते हैं । ( १ ) और कोणस्य स्वग्वर्णादि उक्त दिशा माथ अस्त
होते हैं । यथा ईशानकोणम्य पूर्व, अग्निकाणम्य दक्षिणा, नर्मत्य-
कोणस्य पश्चिममें और वायुकोणम्य उत्तम मानसर अम्त समझे
जाने हैं। (३)॥ ७३ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (११७) ': उदाहरण! : : यथा सूर्य पराशिपरहै तो पूर्वदिशाके स्वर वर्ण नक्षत्र राश्यादि सब अस्तहैं। अतः अस्त दिशाका फलभी नीचे लिखे अनुसार होताहै।।७३॥ अस्ताशास्थाजाद्यैः क्रूरव्यधवेशात्फलं वाच्यम् । उदिताशास्थैः सौम्यव्यध इवं फलमदिशेच्छेष्ठम्७४॥. अस्ताशा सूर्याक्रान्ता दिक् तस्यां स्थितरजायैः सवर्ण- क्षतिथिवारैः कूरपहवेधबद्दष्टफलं पापम् । उदिताशा सूर्या- कान्तदिग्व्यतिरिक्ता तत्र स्थितैः स्वराः सौम्यग्रहवच्छेष्ठ फलम् अस्ताशास्थाः सरफला अप्यमकलाः। उदिताशास्था- स्वसलला अपि सत्कला इत्यर्थः ॥ ७९ ॥ अस्त दिशामें स्थित स्वरादिकोंका करवेधकी भाँति नेष्टफल और उदित दिशाम स्थित स्वरादिकोंका सौम्यवेधकी भांति श्रेष्ठ फल कहना चाहिये अर्थात् शुभ फल देनेवाले स्वर जो वर्णादि वे यदि अस्त दिशा में हो तो अशुभ फल देतेहैं और अशुभ फल देनेवाले स्वरवर्णादि उदित दिशामें हों तो शुभ फल देते हैं ।। ७४ ॥ हानी रुकलहोपि पीडित इह स्याजन्मभेऽस्मात्रये कमर्मासिद्धिरथो भिदा चयमिते द्रव्यायः स्याजये । गोरे" देहरुजैः शरे सुखहती राज्ञीय देशोडुनि' झुण्णे जात्यभिपेकयो रेपि तयोस्तत्तद्यं निर्दिशेत्७५ इह सर्वतोभद्र जन्मनक्षत्रे पीडिते फरमहविद्ध हानियादः, रुक रोगः, कलहो मित्रायः, एतानि फलानि भवन्ति। अस्मा- जन्मभानये १० दशमझे पीडिने कर्मामिद्धिः कर्म यत्सर्नु- मिष्टं तस्यासिद्धिः । अयो तन एवं चप १६ मिने पोडश- , : (११८) समरसार- संख्याक विद्ध भिदा भेदः इष्टवर्गेण सह । जये १८ अष्टादशसंख्ये तु विद्ध द्रव्यक्षयः । गौरे २३ त्रयोविंशतितमे विद्ध देहरुजः। शरे २५ पंचविंशतिमे विढे सुखहतिः सुखनाशः। अथ राज्ञो देशोडुनि अवकहड़चके यत्तु देशनक्षत्र तस्मिन् विद्ध । तथा जात्यभिपेकयोः जातिः क्षत्रियत्वादिः तद्भ अवकहड़ क्वजम् । एतसक्रजमेव यद्राजाभिषेककालीननाम- नक्षत्रमेतदभिषेकमम् । एतेषु विद्धेषु तत्सम्बन्धिनां देश- जाति- राज्यानां भयं निर्दिशेत् ॥ ७५ ॥ इस सर्वतोभद्मं यदि जन्मनक्षत्र वेधा गया हो तो हानि, रोग और क्लेश यह होतेहै । यदि जन्मक्षसे दशवा वेधित हो तो कर्मकी आसिद्धि होतीहै । यदि जन्मनक्षनसे सोलहवा नक्षत्र वेधित हो तो भेद (परस्परभेद-अविश्वास ) होताहे । यदि अगरहवा वेधित हो तो द्रव्य क्षय होताहै । तेईसवा वेधित हो तो देहमे रोग होता और पच्चीसवा नक्षन वेधित हो तो सुसहानि होतिहि । यदि राजाके देशका अथवा राज्याभिोक्का वा पिसी जातिका नक्षत्र विद्ध हो तो उस उस देश, गम्य वा जातिको भय होताद । यह सब नाम नक्षत्र पूर्वोक्त अवकडचक्रसे देखलेने चाहिये ॥ ७ ॥ इति समरमारे सर्वतोभद्रप्रकरणम् । * विरयात सर्वतोभद्र चक लोयदीपम् । यस्मिन्नु न भिा यस्ततो वधनप भवेत् । प्रहश्विशनात वामसम्मुखदरिण॥१॥ मुक मोर तथा पाल विद्रगहण भम् । गुभाबपु कापु वजनीय प्रयनन ॥२॥ मूर्यमुक्ता उदीयत सूर्यगस्तास्तगामिन । महा द्वितीयग सूर्य पुरदिगा इजादय ॥२॥ समा तृतीया या मदा भानी चतुथग । वका म्यापर वतिवाऽष्ट सभमे ।। ५ ॥ नाम दशम भानी नायते पुस्लिामी दादशीकादश सुर्षे मजने शोधता पुन ॥५॥ अस्यता पुनगो द्रनगता ग्रहा अवर्गादि-

"
,
-
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् ।
ऋणधनशोधनमाह ।
साध्यांको अकठवादयस्ततत्तुं नगभूभानुनिन्नगादाप्तो ।
रुरुमननरयनभवाःसाधके ऋणमधिकशेपतो दाप्तौ७६
साध्यस्य सम्बन्धमाह्यस्य दासदासीशिष्यादेमसम्बन्धि-
नोंकाः साध्यंते । तत्रैवं-त, त६, तुं६, न०, ग३, भू ४,
भा४, नु०, नि०, न०, गा३,अकठबादयस्तत्सम्बन्धिनश्चाङ्काः
साध्यनामाक्षरस्वरसम्बन्धिन एकीकता दा ८ मा अष्टभक्ता
यदिशेषांकः साधकनामाक्षरांकसंख्याष्टभागावशिष्टांकादूनस्तदा
साध्यस्य साधकः नाणप्रदः । अधिक तु गृह्णाति । साधकः
साध्याणमिति भावः । साधकांस्तु तत्र वर्गास्त एव तदंकास्तु
रु२, रु२, म५, न०, न०, २२, य१, न०, भ४, १४,
गाः३, एते एकादश । अत्रापि साधकनामाक्षरसम्बन्ध्यंका एकी-
रुता अष्टभकाः साध्याङ्कादधिकशेपे साध्यस्य ऋणमदः' साथ-
कोऽल्पे तु गृह्णाति ॥ ७६ ॥
ग्यारह कोठोंमें त ६-त ६-तुं ६-१०-ग ३-भू ४-मा ४-
नु०-नि०-न-गा ३ यह साध्यके अंक लिखकर इनके नीचे अक-
ठबादि अर्यात् 'अआइईउऊपऐओओओं कखगघङ चछजझम टठडढण
तथदधन पफवभम यरलव शपसह-पह लिखै और ऐसेहीर २-१२-म-
५-०-१०-२२-य १-न-भर-व गा-३-यह साधक अंक
-स्वरोदी द्वारेकवेधे द्वयोर्यधः । स्वरयुक्तात्मनो वेधशानुस्वारविसर्गयोः॥६॥ यी
शसौपती व ज्ञेयो डौ परस्परम् । एकेन तिय इयं शुभाशुमागन्य जा
प्रश्नकाले भवेशिन यलग्न ग्पेनीः । तदुष्ट शोमनं सौम्यामधर्मियफल मता
मडलं नगर प्रामो दुर्ग देवालयः पुरम् । रैरमपनो विन विनस्पति न
सशयः ॥ ९॥ल माई रसो धान्य गजवादि चतुष्पदम् । सर्व महतो यानि
पर फरो व्यवस्थितः ॥ १०॥

(१२०) समरसार- लिखकर इनके नीचेभी वही अक्ठ्यादि लिखे तो "ऋणधन " चक बनजाता है। इस चमसे साध्य और साधक के नामाक्षरोंकी संख्या लेकर उसमे आठका भाग दे तो जिसका शेप अधिक बचे,वह ऋण- प्रद होता है । ७६ ॥ उदाहरण । जैसे-'राम सीता' का धनर्ण देखना है तो यहाँ गम साधक और सीता साध्य है । अतएव साधक रामनामक र०-आ २-म ५-१२ इन अंकोंका योग १ है और साध्य-सीत्तानामके स०-ई०- ३ आ ६-अंकोंका योग ९ है । इन ९ । ९ दोनामे आठका भाग देनेसे १।१ बचता है । अतएव राम-सीता-दोनों समान है। साधक वह कहा जाता है जो किसी व्यक्तिविशेष वा वस्तुविशेषसे अपना कार्य साधन करे और साध्य यह कहाजाना है जो साधकके कार्यविशेषमें उपयुक्त हो यथा स्वामी साधक, सेवक साध्य, पति साधक, पत्नी साध्य, गुरु साधक, शिष्य साध्य इत्यादि इत्यादि ॥७६॥ 6 मणधनसाधनचक्रम् । साध्या तत तन गभूमा नु नि नि, गा) का' ३ अआ[11/13/0ऐ ओ औ अ क | सगड | च | छजशन 12 जडण/न । थ/धन पफ य मयर लव साधारुगननारायनाभ गा काका: २ १ ४।४३ आतुरसाध्यासाध्यादिप्रश्ने तज्ज्ञानमाह । काहादतोऽक्षु च विसर्गनपुंसकोनेप्वंकॉस्तुलारिभ- सतीभृगुकानकोः स्युः । दूतातुराहयतदैक्यदभक्त- शेपे जीवेद्दी"समधिके म्रियते समोने ॥ ७७ ॥ .

.
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (१२१)
कात् ककारात्-ठात् ठकारात्-बात् बकारात्-वर्णा
लेख्याः । विसर्गनपुंसकोनेषु-विसर्गः अः, नपुंसकाः ऋकलल
एतैः व्यतिरिक्तषु, अधः कठवादयो वर्णा लेख्या वोपरि तु६-
ला ३-रि २-भ ४-स-ती ६-४-१३-का १-न-
काः १-अंकाः स्युः लेख्याः भवन्ति । दूतः पृच्छकः आतुरो
रोगी तयोः आह्वयं नाम तस्य अंकैक्यं पृथक् पृथक् कर्त-
व्यम् द ८ भक्तम् अष्टभक्तं, दूतांकशेपाददिनो रोगिणोके सम-
पिके अधिक सति रोगी जीवेत् । दूतांकशेपारोगिणोंके समे
हीने च सति रोगी म्रियते ॥ ७७ ॥
विसर्ग ( अ.) और नपुंसक (ऋऋलट ) इनके अतिरिक्त और
जो-अफठवादि स्वर व्यंजन है इनको तु ६-ला ३-रि २-४-स
७-ती ६-४-गु ३-का १-न-का १-इनके नीचे लिखे तो
"आतुरसाध्यासाध्यज्ञानचक्र" बन जाता है । इसमें दूत (प्रच्छक)
और आतुर (रोगी) के नामाक्षरोंकी संख्या लेकर उनमें पृथक्
पृथक् आठका भाग देनेसे दूतफे शेपसे रोगीका शेष अधिक हो तो
रोगी जीता है और यदि दूतके शेपसे रोगीका शेप सम वा न्यून
हो तो रोगी मरजाता है ॥ ७७॥
उदाहरण।
यथा देवदत्त तो रोगी है और इसके अच्छे होने न होनेके विषयों
यज्ञदत्त पूंछता है तो-रोगी देवदत्तका नामांक(६४-ए-४ च ४-अ६-
द ४-अ ६-त् ७-त ५-अ ६-) संख्यायोग १८ । और दूत
वा मच्छक यज्ञदत्तका नामांक-(प.-अ६-ग ३-१०-अ६-दर-
अ- ७- ७-अ६-) संख्यायोग ४२ है। इनमें आठका
भाग दिया तो दूत - रोगी ३-शेष रहा । यह इतके शेपसे रोगीका
शेष अधिक है अतएव गेगी देवदत्त जीवेगा ॥ ७॥

1 (१२०) समरसारं- लिखकर इनके नीचेभी वही अकठवादि लिखे तो “ऋणधन " चक्र वनजाता है । इस चक्रसे साध्य और साधकके नामाक्षरोंकी संख्या लेकर उसमें आपका भाग दे तो जिसका शेष अधिक बचे वह ऋण- प्रद होता है ॥ ७६॥ उदाहरण! जैसे-'राम सीता' का धनर्ण देखना है तो यहाँ राम साधक और सीता साध्य है । अतएव सापक रामनामक र०-आ२-म ५-अ २ इन अंकोंका योग ९ है और साध्य-सीतानामके स०-ई०-त ३- आ ६-अंकोंका योग ९ है । इन ९ १९ दोनामें आठका भाग देनेसे १११ वचता है । अतएव राम-सीता-दोनों समान हैं। साधक यह कहा जाता है जो किसी व्यक्तिविशेष वा वस्तुविशेपसे अपना कार्य साधन करे और साध्य वह कहाजाता है जो साधकके कार्यविशेषमें उपयुक्त हो यथा स्वामी साधक, सेवक साध्य, पति साधक, पत्नी साध्य, -गुरु साधक, शिष्य साध्य इत्यादि इत्यादि ॥७॥ ० क ऋणधनसाधनचक्रम् । साध्यांतततिन [गभू भानुनि काः अआइई उ ए ऐ ओ औ अं कास गड च छ ज झ बट वाड | ण त थ द ध न , पक पभ म य र ल व श | 4 | सह नन रयानाभागा कोकाः|२१२१५ आतुरसाध्यासाध्यादिप्रश्ने तज्ज्ञानमाह । काहादतोऽक्षु च विसर्गनपुंसकोनेप्यंकॉस्तुलारिभ- सतीभृगुकानकाः स्युः । दूतातुराहयत्तदैत्यदभक्त- शेपे जीवेद्दी समधिके म्रियते समोने ।। ७७ ॥ . ० द४-अ६-त् ७-त ७-अ ६-) संरयापोग १८ । और दूत वा मच्छक यज्ञदत्तका नामांक-(म-अ६-ग३-१०-अ६-दर- भाग दिया तो दूत-रोगी३-दोष रहा । यह दूत के दोपसे रोगीका शेष अधिक है अतएव गेगी देवदत्त जीवेगा ॥७॥ संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (१२१) कात् ककारात्-ठार ठकारात्-बात् बकारात्-वर्णा लेख्याः । विसर्गनपुंसकोनेपु-विसर्गः अः, नपुंसकाः कटल एतैः व्यतिरिक्तेषु, अधः कठवादयो वर्णा लेख्या वर्णोपरि तु६- ला ३-रि २-भ ४-स७-ती ६-४-गु३-का १-न- काः-अंकाः स्युः लेख्याः भवन्ति । दूतः पृच्छकः आतुरो रोगी तयोः आह्वयं नाम तस्य अंकैक्यं पृथक् पृथक् कर्त- व्यम् द ८ भक्तम् अष्टभक्तं, दूतांकशेपागदिनो रोगिणोंके सम- धिके अधिक सति रोगी जीवेत् । दूतांकशेपादोगिणोंके समे हीने च सति रोगी म्रियते ॥ ७७ ॥ विसर्ग (अ) और नपुंसक (ऋकलल) इनके अतिरिक्त और जो-अकठ्यादि स्वर व्यंजन हैं इनको तु ६-ला ३-रि २-भ ४-स ७-ती ६-भृ ४-गु ३-का १-न-का १-इनके नीचे लिखे तो 'आतुरसाध्यासाध्यज्ञानचक" बन जाता है। इसमें दूत (प्रच्छक) और आतुर (रोगी) के नामाक्षरोंकी संख्या लेकर उनमें पृथक् पृथक् आठका भाग देनेसे दूतके शेपसे रोगीका शेप अधिक हो तो रोगी जीता है और यदि दूतके शेषसे रोगीका शेपे सम वा न्यून हो तो रोगी मरजाता है ॥ ७७॥ उदाहरण। यथा देवदत्त तो रोगी है और इसके अच्छे होने न होने के विषय में यज्ञदत्त पूंछता है तो-रोगी देवदत्तका नामांक(६४----- . मत ७-अ६-.) संख्यायोग १९ है। इनमें आठका (१२२) समरसारं- आतुरसाध्यासाध्यज्ञानचक्रम् । तुला / र२ भ. स. तोइ भृगु का न० • का आ उ ए ऐ ओ ओ म क ग घ छ ज झ म ट ठ ड ण त द भ न प क ब म य र च रा द रुग्णप्रश्न एव विशेषमाह । प्रश्नाझलां च प्रमितिः कयुक्तां भूयोरनिना लह- तार्थ शेपे । के"जीवितं"खे निरुंनो तिनं भवेच्च तिथ्यों मरणाभिधायाम ॥ ७८॥ प्रश्नस्य प्रश्नवाच्यस्य दूतोक्तस्य येऽचोहलश्च तेषां प्रमितिः प्रमाण के 1 नैकेन युता । भूयः पुनः रे २ण द्वाायां गणिता। ले ३ न त्रिभिर्भता तच्छेषं च यरकं तदा रुग्णस्य जीवित निर्दिशेत । दयोस्तु शिष्टयोनितरां रोगं विनिर्दिशेत । ने० शून्ये तु शेपे तन्मरणं वदेत् । तदपि वर्णस्वरवशाचा मृत- तिथिस्तस्यामेव वदेत् ॥ ७८ ॥ प्रश्नके समय प्रच्छक जो कुछ कहै उस क्यनके अच् और हदयी उपरोक्तक्रमानुसार जितनी संख्या हो उसमें १ मिराफर दसे गुणादे और तीनका भागदे यदि १ रोप वर तो रोगी जीता है। २ बचे तो गेग बहता है। और ० बचे तो रोगी मम्जाता है। परो ही वर्णस्वरके वशसे मृततियिका विधान कर। अर्थात् वर्णस्वरसे जो गृतवर हो उसी स्वरकी तिथियो मरणतिथि जान ।। ७८॥

संस्कृत टीका-भोपाटीकासमेतम् । उदाहरण। जैसे देवदत्तने यज्ञदत्तके विपयमें कहा कि " यज्ञदत्त कब अच्छा होगा " तो इस कथनके अक्षरोंके संख्यांकयोग ९९ में एक युक्त १०० करके दोसे गुणा किया तो २०० हुए । इनमें तीनका भाग दिया तो २ शेष रहा। अतएव यज्ञदत्तके रोग बढरहाहै । यदि यह जानना हो कि, यज्ञदत्त किस तिथिको मरेगा तो "मर- णाभिधायां" के अनुसार यज्ञदत्तका वर्णस्वर उकार है और उका- रसे मृत्युस्वर इकार है अतएव इकारकी जया ३॥ ८ ॥ १३ तिथि होनेसे यज्ञदत्त जया तिथिमें मरेगा । इसी प्रकार मृतपुरुपोंकी भी मृत- तिथि विदित होतीहै ।। ७८ ॥ इति समरसारे ऋणधनातुरसाध्यासाध्यादिप्रकरणम् । भविष्यदर्थसूचकं छायानरं पश्यति तत्लकारमाह । प्रातः पृष्ठगते रवांवनिमिपं छायां गले स्वां चिरं हट्सोई नयनेन यत्सिततरं छायानरं पश्यति । तत्क- गीसकरास्यपाचहदयाभावेक्षणेकश्चिदिग्भूरामाशि- समौः शिरोविगैमतो मासांस्तु पर्दै जीवैति ॥ ७९ ॥ प्रातःकाले मेघावीरनाच्छादित रवी पृष्टमते अनावृते स्थले स्थिलाक पृष्टभागे रुत्वा प्रत्यङ्मुखस्तिष्ठन् । अनिमिपं- निमपशून्यै चक्षुपी कुन सन स्वस्विकीयां चिरं चिरकालं गल- स्थले इष्टदेव ताशी अनिमिपे एव नेत्रे ऊर्वप्रदेश नयन् । सित- तरमु-अतिशयैन श्वेतं छापानरं छायापुरुपं पश्यति । एवंप्रका- रेण शरदादिसितविमलरात्रिषु छायापुरुषो दृश्यते । एवं दृष्टे पुरुष फलमाह-तरिति । तस्य छायानरस्य कर्णाभावदर्शने द्रष्टा भक वर्षाणि दादशवर्षाणि जीवति । द्रष्टा अंसकरपास्यपादों

समरसारं-
आतुरसाध्यासाध्यज्ञानचक्रम् ।
तुला ३, २२ भ४ स. ती भृ४ | २३ कार न० का
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रुग्णप्रश्न एव विशेषमाह ।
प्रश्नाज्झलां चं प्रमितिः कयुक्तो भूयोरनिना लह-
तार्थ शेपे" के जीवितं खे' निरुजो मृतिनै भवे
तिथ्यों मरणाभिधायाम् ।। ७८ ॥
प्रश्नस्य प्रश्नवाच्यस्य दूतोक्तस्य येऽचो हलश्च तेषां प्रमितिः
प्रमाणं के १ नैकेन युता । भूयः पुनः रे २ ण द्वाश्यां गुणिता।
ले ३ न त्रिमिक्ता तच्छेयं च यदेकं तदा रुग्णस्य जीवितं
निर्दिशेत् । योस्तु शिष्टयोनितरां रोगं विनिर्दिशेत ।
ने० शून्ये तु शेषे तन्मरणं वदेत् । तदपि वर्णस्वरवशाया मृत-
तिथिस्तस्यामेव वदेत् ॥ ७८ ॥
प्रश्नके समय मच्छक जो कुछ कहै उस कथनके अच् और हल्की
उपरोक्तक्रमानुसार जितनी संख्या हो उसमें १ मिलाकर देसे
गुणादे और तीनका भागदे यदि १ शेप बचे तो रोगी जीता है।
२ बचें तो रोग बढता है। और बचे तो रोगी मरजाता है ! ऐसे
ही वर्णस्वरके वशसे मृततियिका विधान करें। अर्थात् वर्णस्वरसे जो
मृतस्वर हो उसी स्वरकी तिथिको मरणतिथि जाने ॥ ७॥

00 संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । उदाहरण । जैसे देवदत्तने-यज्ञदत्तके विषयमें कहा कि " यज्ञदत्त कब अच्छा होगा " तो इस कथनके अक्षरोंके संख्यांकयोग ९९ में एक युक्त? करके दोसे गुणा किया तो २०० हुए । इनमें तीनका भाग दिया तो २ शेष रहा । अतएव-यज्ञदत्तके रोग बढरहाहै । यदि यह जानना हो कि, यज्ञदत्त किस तिथिको मरेगा तो " मर- णाभिषायां " के अनुसार यज्ञदत्तका वर्णस्वर उकार है और उका- स्से मृत्युस्वर इकार है अतएव इकारकी जया ३। ८ । १३ तिथि होनेसे यज्ञदत्त जया तिथिमें मरेगा। इसी प्रकार मृतपुरुपोंकी भी मृत- तिथि विदित होतीहै ॥ ७८ ॥ इति समरसारे ऋणधनातुरसाध्यासाध्यादिप्रकरणम् । भविष्यदर्थसूचकं छायानरं पश्यति तत्लकारमाह । प्रातः पृष्ठगते खावनिमिपं छायां गले स्वां चिरं दृष्ट्वाई नयनेन यत्सिततरं छायानरं पश्यति । तत्क- सकरास्यपार्श्वहृदयाभावेक्षणेकश्विदिग्भूरामाक्षि- समोः शिरोविगैमतो मासांस्तु पर्दै जीवति ॥ ७९ ॥ प्रातःकाले मेघारिनाच्छास्ति रवी पृष्ठगते अनावृते स्थले स्थित्या पृष्ठभागे कृत्वा प्रत्यङ्मुखस्तिष्ठन् । अनिमिपं- निमपशून्ये चक्षुपी कुर्वन् सन् खा स्वकीयां चिरं चिरकालं गल- स्थले दृष्ट्वैव ताशी अनिमिपे एव नेने ऊर्वप्रदेशं नयन् । सित- नरम्-अतिशयेन वेतं छायानरं छायापुरुपं पश्यति । एवंप्रका- रेण शरदादिसितविमलरात्रिषु छायापुरुपो दृश्यते । एवं दृष्टे पुरुपे फलमाह-तदिति । तस्य छायानरस्य कर्णाभावदर्शने द्रष्टा अर्क- वर्षाणि द्वादशवर्षाणि जीवति । द्रष्टा अंसकरदयास्यपाहृदय- MH (१२४) समरसार- बिना छायापुरुषदर्शने क्रमादायुर्वर्षाणि सम ७, दश १०,एक 3, त्रि३, दि २ संख्यानि जीवतीति मम्बन्धः । शिरोविगमतः अशिरस्कच्छागापुरुपदर्शने पण्मासान् जीवतीति श्लोकार्थः । अन स्वसंकेतितवर्णलक्ष्या संख्यां परित्यज्य अर्कादिमंज्ञाग्रहो लोकप्रसिद्धिमाश्रित्य ।। ७९ ॥ प्रातःकालके समय सूर्यको पीठदेवे. पश्चिमाभिमुख खड़ा होरर अनिमिप (पलक न मिले ऐसी) दृष्टिसे अपनी छायाको गलस्थलके पास बहुत देरतक देखे । फिर नेत्रोंको सहसा ऊँचे लेजाय अर्थात आकाशको देखे तो एक अत्यंत सफेद छायाका पुरुष दीखताहे । उस छायापुरुषके यदि कान न दीखें तो बारह वर्पतक, अंस (कंधे ) न दीखें तो सात वर्षतक, हाय न दीखें तो दश वर्षतक, मुख न दीखे तो एक वर्षतक, पार्श्व (पाशू ) न दीखें तो तीन वर्ष- तक, हृदय न दीखे तो दो वर्षतक और शिर न दीखे तो छ: महीने पर्यन्त छायापुरुषको देखनेवाला मनुष्य जीवित रहता है।॥ ७९ ॥ अत्रैव विशेषमाह। हृद्रंध्रदृष्टयां मुनिसंख्यमासानं द्विदेहदृष्टौ तु मृति- स्तदेवं । सम्पूर्णदृष्टौ तु न वपमध्ये रोगो मृतिन्नेति' बदन्ति सत्यमें ॥ ८॥ छायापुरुषस्य हृदये चेगन्धं श्यते तदा सलमासान जीवति शरीरद्वयं चेद् दृश्यते छायापुंसः तदा तदानीमेव मरणं जानी- यात् । सम्पूर्णे तु छायापुरुपे दृष्ट्वे वर्षमध्ये रोगो मरणं च न भवेदिति सत्यं ज्ञेयम् ॥ ८॥ यदि उस छायापुरुषके हृदयम छिद्र दीखे तो सात महीने पीछे और दो शरीर दीख तो उसी समय मृत्यु होती है । यदि छायापुरुष सागो- - संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (१२५) पांग सम्पूर्ण दीखे तो एक वर्ष किसी प्रकारका रोग वा मृत्यु कुछ नहीं होता है । यह सत्य कथन है ,।। ८०-11 . छायापुरुषप्रमंगेन शकुनान्तरमाह । स्नातस्य पूर्व कर्णादेः शोपे प्रागुंतवत्फलम् । सर्वांगाईस्य दृच्छोपे पण्मासाभ्यन्तरे मृतिः ॥ ८ ॥ स्नातस्य कृतस्नानमात्रस्य पुंसः कर्णादेः कर्णासहस्तमुख- पाचहृदयादीनां प्रथमतः इतरांगेत्यः पूर्व शोपे पूर्वश्लोकोक्तं फलं योज्यम् । यथा कर्णशोपे द्वादश वर्षाणि, अंसशोपे सप्त वाणि, हस्तशोपे दश वर्षाणि, मुखशोपे एक वर्षे, पार्श्वशोपे त्रिवर्षाणि, हृदयशोपे युग्मवर्षाणि जीवनम् । साँगाईत्य हृच्छोपे हृदयस्थले प्रथमतः शोपणे पण्मासमध्ये तस्य पुंसः मरणं विनिर्दिशेत् ॥ ८१ ॥ स्नान करचुकनेपर यदि पहले कादि सुखजाँय तो उपरोक्त तुल्य फल जानना अर्थात् सब शरीर तो भीगा रहै और कान पहले ही सूख- जॉय तो बारह वर्ष, कंधे सूखजाँय तो सात वर्प, हाथ सूखें तो दश वर्ष, मुख सूखे तो एक वर्ष, पार्श्व सूखें तो तीन वर्ष और हृदय सुसे तो वह मनुष्य दो वर्ष तक जीवित रहता है । और यदि केवल हृदयस्थल ही पहले सूरखजाय तो छ: महीने के भीतर मृत्यु होजाती है ॥ ८१ ॥ अन्यदाह। हस्ते न्यस्ते शिरंसि यदि न छिन्नदण्डोऽस्य हप्पः प्रण्मासान्तन मरणभयं सैम्पुटे हस्तयोस्तु । भ्यस्तेशी यदि चे कदलीकोरकाभं तदंतएं नोभीस्तरति सैलिले चेतवशेफो न मृत्युः ॥८२॥ शिरसि स्वकीये रम्ने न्यस्ते यदि छिन्नदण्डो न दृश्यते 4

Samarsaram

Author
Ganga Vishnu Shri Krishna Das
Title
Samarsaram
File name
Samarsaram
Text
OCR done
Citation
1937
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,venkateshwar Steame Press
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311369
Barcode
99999990320264.00
Scanning centre
Banasthali University
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