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Yogini Tantra

Devadidevmahadev · 2012/10

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- स्वका - भूमिका। विषयों का ही संग्रह है कि जिससे वे शास्त्र मनुष्यमात्रके उपयोगीकहे जा सकें ! और बहुतसे ऐसे भी हैं, जिनकी विधि अधूरी सापेक्ष अथवा क्लिष्ट है, जब कि उनसे फलसिद्धि भी अधिक विलम्यमें होती है । परन्तु इस ग्रंथके द्वारा साधना करनेवाले व्यक्ति अवश्यही हमारे स्वरमें स्वर मिलाकर मुक्तकंठसे यह कहेंगे कि सरल विधान रहते हुएभी उक्त तंत्रके प्रयोग अचिरादेव पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। यह बात आबाल वृद्ध किसीभी छिपी नहीं है कि-बेंगालमें मंत्रशा. कैसा प्रचार है उस प्रान्तके मत्रशास्त्री सिद्धहस्त और बडे बडे विद्वान् होते हैं. वरन यहातक भी कहेजानेमें अत्युक्तिका भय नहीं है फि यावन्मात्र मंत्र तंत्र यंत्रोंका अधिकार आजकल केवल बगालनिवासी मंत्र- वेत्ताओंकेही वाटेमें रहगया है । उन्हीं महात्माओंसे हमने इस सर्वोपयोगी अनर्घ रत्नस्वरूप तन्त्रोत्तम ‘योगिनीतंत्र' को हस्ताधिगत करके प्रकाशित किया । यह ग्रंथ देवगिरामें होनेसे सार्वजनिक नहीं होसकता था यही विचार कर हमने इसका शुद्ध और सरल विस्तृत हिन्दी भाषानुवाद किया । यद्यपि अनुवाद बनाते समय सब ओर दृष्टि रखकर इसको सर्वाङ्ग संदर और सरल बनानेकी यथासाध्य पूर्णचेष्टा की गईहै, तथापि यदिनरधर्मानुसार इसमें कहीं किसी प्रकारकी त्रुटि अवशिष्ट रहगई हो, उसकेलिये हम अपने गुणज्ञ पाठकोंसे क्षमा प्रार्थनापूर्वक निवेदन करते हैं कि यदि आप उसकी सूचना देदेंगे, तो आगामी आवृत्तिमें उस दोपको दूर कर दियाजायगा । उपसंहारमें निवेदन है कि-इस ग्रंथको छापकर प्रकाशित करने और समूश्य वितरण करनेसे संपूर्ण अधिकार परमोदारवर गुणग्राहक विश्वधि- ख्यात श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजीको दिये गये हैं, उन्होंने अपनी अमोघ कृपासे इसको निज " श्रीवेंकटेश्वर " यंत्रालय बंबई में छापकर विविध प्रकार के दानमानसे हमें उपकृत किया है अतएव हम भी भगवान् श्रीमहादेवजीसे उक्त सेठजीकी आयु, यश और लक्ष्मीकी वृद्धिके लिये प्रार्थना करते हैं। सज्जनोंका अनुगृहीत- पं० कन्हैयालाल मिश्र. मोहल्ला दीनदारपुरा, मुरादाबाद.

तंत्ररहस्य। तंत्रशास्त्रके प्रधान प्रधान तीन भेद हैं आगम यामल और तंत्र- वाराहीतंत्रके मतानुसार- 'सृष्टिश्च प्रलयश्चैव देवतानां तथार्चनम् । साधनं चैव सर्वेषां पुरश्चरणमेव च ॥ षटकर्मसाधनं चव ध्यानयोगश्रतुर्विधः। सप्तभिर्लक्षणैर्युक्तमागमं तद्विदुर्बुधाः ॥" सृष्टि प्रलय देवताओंकी पूजा सबका साधन पुरश्चरण षट्कर्मसाधन और चार प्रकारका ध्यानयोग जिसमें यह सात प्रकारके लक्षण हों उसको आगम कहाजाता है. "सर्गश्च प्रतिसर्गश्च मंत्रनिर्णय एव च । देवतानां च संस्थानं तीर्थानां चैव वर्णनम् ॥ तथैवाश्रमधर्मश्च विप्रसंस्थानमेव च । संस्थानं चैव भूतानां यंत्राणां चैव निर्णयः।। उत्पत्तिर्विवुधानां च तरूणां कल्पसंज्ञितम् । संस्थान ज्योतिषां चैव पुराणाख्यानमेव च ।। कोषस्य कथनं चैव व्रतानां परिभाषणम् । शौचाशौचस्य चाख्यानं नरकाणां च वर्णनम् ॥ हरचक्रस्य चाल्यानं स्त्रीपुंसोश्चैव लक्षणम् । राजधर्मो दानधर्मों युगधर्मस्तथैव च ॥ व्यवहारः कथ्यते च तथा चाध्यात्मवर्णनम् । इत्यादिलक्षणयुक्तं तंत्रमित्यभिधीयते ॥"

. - तंत्ररहस्य। सृष्टि, लय, मंत्रनिर्णय, देवताओंका संस्थान, तीर्थवर्णन, आश्रम धर्म, विप्रसस्थान, भूतादिका संस्थान, यत्रनिर्णय, देवताओंकी उत्पत्ति- वृक्षोत्पत्ति, कल्पवर्णन, ज्योतिपसंस्थान पुराणाख्यान, कोषकथन, व्रतकथन, शौचाशौचवर्णन, स्त्रीपुरुपके लक्षण, राजधर्म, दानधर्म, युग- धर्म, व्यवहार और आध्यात्मिक विषयका वर्णन इत्यादि लक्षणोंका जिसमें समावेश हो उसको तंत्र कहाजाताहै. सृष्टिश्च ज्योतिषाख्यानं नित्यकृत्यप्रदीपनम् । क्रमसूत्रं वर्णभेदो जातिभेदस्तथैव च ॥ युगधर्मध संख्यातो यामलस्याटलक्षणम् ।" सृष्टितत्त्व, ज्योतिष का वर्णन, नित्यकर्म, क्रमसूत्र, वर्णभेद, जातिभेद और युगधर्म यह आठ यामलके लक्षण हैं । वाराहीतंत्रके मतानुसार तंत्रके श्लोक सब मिलकर देवलोक ब्रह्मलोक और पातालमें (९) नौ लाख हैं और इस भारतवर्षमें एक लाव ही हैं, इससे- "आगमं विविध प्रोक्तं चतुर्थ चैश्वरं स्मृतम् ॥ कल्पश्चतुर्विधः प्रोक्तो ह्यागमो डामरस्तथा । यामलश्च तथा तंत्रं तेषां भेदाः पृथक्पृथक् ॥ आगम तीन प्रकारके हैं, चौथा ऐश्वर है । कल्पके भी चार प्रकार हैं, यथा आगम डामर यामल और तंत्र यह प्रकार मेद देखा जाताहै, महा- विश्वसारतत्रमें लिखा है- चतुष्पष्टिश्च तंत्राणि यामलादीनि पार्वति । सपलानीद वाराहे विष्णुकान्तासु भूमिषु । कल्पमेदेन तंत्राणि कथितानि च यानि च । पाखण्डमोहनायैव विफलानीह सुन्दरि॥ :- - - तंत्ररहस्य। (७) यामलादिको लेकर चौसठ तंत्र विष्णुक्रान्ता भूमिमें फलदायक है कल्प- भेदम जो सब तंत्र कहे गये हैं, वह पाखण्डियोंको मोहने के लिये हैं उनसे कोई फल नहीं होता। श्रेष्ठता-महानिर्वाण तत्रमें महादेवजीने कहा है.. "कलिकल्मषदीनानो द्विजातीनां सुरेश्वरि । मेध्यामध्यविचाराणां न शुद्धिः श्रोतकर्मणा ॥ न संहिताद्यः स्मृतिमिरिष्टसिद्धिर्नृणां भवेत् । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यं सत्यं मयोच्यते ॥ विना ह्यागममार्गेण कलो नास्ति गतिः प्रिये । श्रुतिस्मृतिपुराणादौ मयेवोक्तं पुरा शिवे । आगमोक्तविधानेन कलौ देवान्यजेत्तुधीः।" कलिदोषसे दीन हुए ब्राह्मण क्षत्रियादिकोंको पवित्र अपवित्रका विचार नहीं रहेगा फिर बेदमें कहे हुए कर्म करके वह किस प्रकार सिद्धिको प्राप्त कर सकेंगे ? इस अवस्थामें स्मृति सहितादिकोंसे भी मनुष्योंकी इष्टसिद्धि न होगी। हे प्रिये ! मै सत्य सत्य ही कहता हु कि, कलियुगमें आगम मार्गके अतिरिक्त दूसरी गति नहीं है। हे शिवे ! वेद स्मृतिपुराणादिके बीचमें मैं कह चुका है कि, कलियुगमें साधक तत्रोक्तविधान द्वारा देवता. ओंकी पूजा करेंगे। कलावागममुल्लङ्घ्य योज्यमार्गे प्रवर्तते । न तस्य गतिरस्तीति सत्यं सत्यं न सशयः॥ कालिकालमें जो आगमको लघन करके अन्यमार्गमें गमन करता है निश्चयही उसकी सद्गति नही होती-यह मै सत्यही सत्य कहता है। निार्यातजातीया विषहीनोरगा इव । सत्यादौ सफला आसन्कलो ते मृतका इव ।।

(८) तंत्ररहस्य। पांचालिका यथा भित्तौ सर्वेन्द्रियसमान्वताः। अमूरशक्ताः कार्येषु तथान्ये मन्त्रराशयः॥ अन्यमन्त्रैः कृतं कर्म वन्ध्यास्त्रीसंगमो यथा। न तत्र फलसिद्धिः स्याछम एव हि केवलम् ॥ कलावन्योदितर्मागः सिद्धिमिच्छति यो नरः। तृषितो जाह्नवीतीरे कूप खनति दुर्मतिः ॥ कलो तंत्रोदिता मंत्राः सिद्धास्तूमै फलप्रदाः। शस्ताः कर्मसु सर्वेषु जपयज्ञक्रियादिषु ।। विषहीन सर्पके समान इस समय वैदिक मंत्र वीर्यहीन होगये है सत्य त्रेता और द्वापर युगमें यह समस्त मंत्र सफल होते थे इस समय मृततुल्य होगये हैं भीतपर लिखी हुई पुतलिये जिस प्रकार समस्त इन्द्रियोंसे युक्त होकरभी अपने कार्यको साधन करनेमें असमर्थ रहती हैं कलियुगमें अन्यान्य सत्र मंत्री प्रायः वैसेही है बंध्या सीके संगसे जिस प्रकार कोई फल नहीं होता वैसेही और मंत्रके द्वारा कार्य करनेसे फलसिद्धि नहीं होती केवल श्रमही होता है । कलिकालमें अन्यशास्त्रोक्तविधिद्वारा जो मनुष्य सिद्धि प्राप्त करनेकी इच्छा करता है वह निर्वाध प्यासा होकर गंगानीके किनारे कुआ खोदताहै तंत्रमें कहे हुए मंत्र कलियुगमें शीघ्र फल देनेवाले हैं जपयज्ञादि समस्त कर्ममें तंत्रोक्त मंत्रही श्रेष्ठ हैं । इसही कारणसे रघुनंदनादि स्मार्तगणोंने तंत्रग्रंथोंको प्रामाणिक माना है गुप्तशास्त्र-हिन्दू और बौद्ध इन दोनों जातियोंमें तंत्रको माना है यधार्थ दीक्षित और अभिषिक्तके सिवाय और किसीको शास्त्रका प्रका' शित करना उचित नहीं है कुलार्णवतंत्र में लिखा हुआ है कि धन दे. स्त्री तंत्ररहस्य। दे और अपने प्राणतक देदे परन्तु इस गुप्त शास्त्रको कभी किसी दूसरे (अनधिकारी) के सामने प्रकाशित न करे। आगमतत्त्वविलासमें निनोक्त नाम लिखे है-यथा-१ स्वतंत्रतंत्र २ पत्कारिणीतंत्र ३ उत्तरतंत्र ४ नीलतंत्र ५ वीरतंत्र ६ कुमारीतंत्र ७ कालीतंत्र ८ नारायणीतंत्र ९ तारिणीतंत्र १० बालातंत्र ११ समया. चार तंत्र १२ भैरवतंत्र १३ भैरवीतंत्र १४ त्रिपुरातंत्र १५ वामकेश्वर तंत्र १६ कुट कुटेश्वरतंत्र १७ मातृकातंत्र १८ सनत्कुमारतंत्र १९ विशुद्धेश्वरतंत्र २० संमोहनदंत्र २१ गौतमीयतंत्र २२ वृहद्गौतमीयतंत्र २३ भूतभैरवतंत्र २४ चामुण्डातंत्र २५ पिंगलातंत्र २६ वाराहीतंत्र २७ मुण्डमालातंत्र २८ योगिनीतंत्र २९ मालीनी विजयतंत्र ३० स्वच्छन्दभैरव तंत्र ३१ महातंत्र ३२ शक्तितंत्र ३३ चिन्तामणितंत्र ३४ उन्मत्तमरवतंत्र ३५ त्रैलोक्यसारतंत्र ३६ विश्वसारतंत्र ३७ तंत्रामृत ३८ महाफेत्कारिणी तंत्र ३९ बारवीयतंत्र ४० तोडलतंत्र ४१ मालिनीतंत्र ४२ ललितातंत्र ४३ त्रिशक्तितंत्र ४४ राजराजेश्वरीतंत्र ४५ महामाहेश्वरीत्तरतंत्र ४६ गवाक्षतंत्र ४७ गांधर्वतंत्र ४८ त्रैलोक्यमोहनतंत्र ४९ हंसपारमेश्वरतंत्र ५० हंसमाहेश्वरतंत्र ५१ कामधेनुतंत्र ५२ वर्णविलास ५३ मायातंत्र ५४ मंत्रराज ५५ कुन्जिकातंत्र ५६ विज्ञानलतिका ५७ लिंगागम ५८ कालो- त्तर ५९ ब्रह्मयामल ६० आदियामल ६१ रुद्रयामल ६२ वृह्यामल ६३ सिद्धयामल ६४ कल्पसूत्राइन ग्रन्थों के अतिरिक्त तंत्रके और भी ग्रंथ पायेजाते हैं । यथा १ मत्स्यसूक्त २ कुलसूक्त ३ कामराज ४ शिवागम ५ उड्डीश ६ कुलोड्डीश ७ वीरभद्रोड्डीश ८ भूतडामर ९ डामर १० यक्ष- डामर ११ कुलसर्वस्व १२ कालिकाकुलसर्चस्व १३ कुलचूडामणि १४ दिव्य १५ कुलसार १६ कुलार्णव १७ कुलामृत १८ कुलावली १९ काली- कालार्णव २० कुलप्रकाश २१ वासिष्ठ २२ सिद्धसारस्वत २३ योगिनी हृदय २४ करलीहृदय २५ मातृकार्णव २६ योगिनीजालकुरक २७ लक्ष्मी- कुलार्णव २८ तारार्णव २९ चन्द्रपीठ ३० मेरुतंत्र ३१ चतुःशती ३२ + कुलाचारपूजामें इसका प्रमाण देखना चाहिये।

तंत्ररहस्य। तत्त्वबोध ३३ महोय ३४ स्वच्छन्दसारसंग्रह ३५ तारापदीप ३६ संकेत चंद्रोदय ३८ पत्रिशत्तत्त्वक ३८ लक्ष्यनिर्णय ३९ त्रिपुरार्णव १० विष्णु- धर्मोत्तर ४१ मंत्रर्पण ४२ वैष्णवामृत ४३ मानसोल्लास ४९ पूजापदीप ४५ भक्ति मंगरी ४६ भुवनेश्वरी ४७ पारिजात ४८ प्रयोगसार ४९ कामरत्न ५० क्रियासार ५१ आगमदीपिका ५२ भावचूडामणि ५३ तंत्रचूडामणि ५४ बृहत् श्रीक्रम ५५ श्रीक्रम सिद्धान्त शेखर ५७ गणेशवि मर्शिनी ५८ मंत्रमुक्तावली ५९ तत्वकौमुदी ६० तंत्रकौमुदी ६१ मंत्र- तंत्रप्रकाश ६२ रामार्चनचंद्रिका ६३ शारदातिलक ६४ ज्ञानार्णव ६५ सारसमुच्चय ६६ कल्पद्रुम ६७ ज्ञानमाला ६८ पुरधरणचंद्रिका ६९ आगमोतर ७० तत्वसार ७१ सारसंग्रह ७२ देवप्रकाशिनी ७३ तंत्रार्णव ७५ क्रमदीपिका ७५ तारारहस्य ७६ श्यामारहस्य ७७ तंवरल ७८ तंत्रप्रदीप ७९ ताराविलास ८० विश्वमातृका ८१ प्रपंचसार ८२ तंत्रसार ८३ रत्नावलीइनके अतिरिक्त महासिद्धिसारस्वतमें सिद्धीश्वर नित्यतंत्र देव्यागम निबंधतंत्र राघानंत्र कामाख्यातंत्र महाकालतंत्र यंत्रचिन्तामणि कालीविलास और महाचीनतंत्रका वर्णन भी पायाजाता है। उपरोक्ततन्त्रोंके सिवाय तन्त्रक ग्रंथ कुछ और भी पायेजाते हैं यथा- आचारसार प्रकार--आचारसारतन्त्र--आगमचंद्रिका-आगमसार -अन्न- दाकल्प- ब्रह्मज्ञानमहातंत्र-ब्रह्मज्ञानतंत्र-ब्रह्माण्डतंत्र-चिंतामणितंत्र-दक्षिणा- कल्प- गौरीकांचलिकातंत्र--गायत्रीतंत्र:-ब्राह्मणोल्लास- गृहथामकतंत्र-ईशान- संहिता-जपरहस्य-ज्ञानानंदतरंगिणी ज्ञानतंत्र 'कैवल्यतंत्र- ज्ञानसंकलिनी- तंत्र--कौलीकार्चनदीपिकाक्रमचंद्रिका कुमारीकवचोल्लास-लिगार्चनतंत्र-निर्वा. णतंत्र- महानियोणतंत्र--बृहन्निर्वाणतंत्र--बरदातंत्र- मातृकाभेदतंत्र- निगमक- पदुम- निगमतत्त्वसार--निरुतरतंत्र पीठमालातंत्र -पुरश्चरणविवेक, पुरश्चरण- रसोल्लास--शक्तिसंगमतंत्र सरस्वतीतंत्र-शिवसंहिता--श्रीतत्त्वयोधिनी-स्वरो दय श्यामाकल्पलता--श्यामार्चनचंद्रिका श्यामामदीप • ताराप्रदीप-- शाक्तानंदतरंगिणी -- तत्त्वानंदतरंगिणी - त्रिपुरासारमुच्चय - वर्णभैरव- वर्णोद्धारतंत्र-चीजचिंतामणितंत्र-योगिनीहृदया-दीपिका यामल इत्यादि।

... .. ... ... ... ... ... ... वाराही तंत्रमें तंत्रोंके नाम और ग्रंथ संख्या भी लिखी है. यथा- तंत्रका नाम. श्लोकोकी संख्या. तंत्रका नाम. श्लोकोंकी संख्या. मुक्तक.. ६०५० दक्षिणामूर्ति शारदा.. १६०२५/कालिका ११०१३ प्रपंच (१) १२३०० कामेश्वरीतंत्र ३००० प्रपंच (२) ८०२७०/तंत्रराज ९०९० प्रपंच (३) ५३१०) हरगौरीतंत्र (१) २२०२० कपिल.. ६०८०) हरगौरीतंत्र (२) १२००० योग १३३११ तंत्रनिर्णय २८ कल्प ५०९० कुब्जिकातंत्र (१) १०००७ कपिल... २८०१२० कुञ्जिकातंत्र (२) ६००० अमृतशुद्धि ५००५ कुरिजकातंत्र (३) वीरागम ६६०६ कात्यायनीतंत्र २४२०० सिद्धसंवरण ५००६ प्रत्यंगिरातंत्र ८८०० योगडामर २३५३३ महालक्ष्मीतंत्र ५५०५ शिवडामर ११००७ देवीतंत्र... १२००० दुर्गाडामर ११५०३ त्रिपुरार्णव सारस्वत ९९८५)सरस्वतीतंत्र २२०५ ब्रह्मडामर ७१०८२ आद्यातंत्र २२९१५ गंधर्वडामर ६००६० योगिनीतंत्र(१) २२५३२ आदियामल ३५२०० योगिनीतंत्र(२) मायामल २२१०० वाराहीतंत्र विष्णुयामल २४०२० गवाक्षतंत्र... ६५२५ रुद्रयामल ५०२०३ गणेशयामल १०३२३ मृडानीतंत्र(१) ४४८० आदित्ययामल १२००० मृडानीतंत्र(२) नीलपताका ५००० मृडानीतंत्र(३) योगार्णव ८३०१/वामकेश्वरतंत्र मायातंत्र ११००० मृत्युञ्जयतंत्र १३२२० ... ... ... .4. ૮૮૦૬ ... ... ... ... ... ६४६५/नारायण... ... ... ... ... ... ... ... ...

(१२) तंत्ररहस्य। वारहीतंत्रमें लिखा हुआ है कि इनके अतिरिक्त बौद्ध और कपिलोक्त उपतंत्र भी अनेक है । जैमिनि वसिष्ठ-कपिल-नारद-गर्ग-पुलस्त्य- भार्गव-सिद्धि-याज्ञवल्क्य- भृगु-शुक्र- वृहस्पति इत्यादि मुनियोंने भी बहुतसे उपतंत्र बनाये हैं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती। हिन्दु लोगों के तंत्र जिसप्रकार श्रीमहादेवजीके बनाये हुए हैं वैसेही बौद्धलोगोंके तंत्रोंको वज्रसत्वशुद्धने बनाया है यह तंत्रमी संस्कृत भाषामें बने हैं इनकी संख्या बहुत है। प्रधान प्रधान बौद्ध तंत्रोंके नाम यहां लिखे जाते हैं यथा -१ प्रमोद महायुग २ परमार्थसेवा ३ पिंडीक्रम ४ सम्पुटो. द्भव ५ हे वन ६ बुद्धकपाल ७ सम्बर तंत्र वा संवरोदय ८ वाराही तंत्र या वाराहीकल्प ९ योगश्वर १० डाकिनीजाल ११ शुक्लयमारि १२ कृष्ण- यमारि १३ पीतयमारि १४ रक्तयमारि व १५ श्यामयमारि १६ क्रिया- संग्रह १७ क्रियाकंद १८ क्रियासागर १९ क्रियाकल्पद्रुम २० क्रियाणव २१ अभिधानोत्तर २२ क्रियासमुच्चय २३ साधनमाला २४ साधनसमु- च्चय २५ साधनसंग्रह २६ साधनरल २७ साधनपरीक्षा २८ साधन कल्पलता २९ तत्वज्ञानसिद्धि ३० ज्ञानसिद्धि ३१ गुहासिद्धि ३२ उद्यान ३३ नागार्जुन ३४ योगपीठ ३५ पीठावतार ३६ कालवीरतन्त्र वा चण्ड- रोषण ३७ वनवीर ३८ वनसत्व ३९ मरीचि ४० तारा ४१ वज्रधातु ४२ विमलप्रभा ४३ मणिकर्णिका ४४ त्रैलोक्यविजय ४५ सम्पुट ४६ मर्मकालिका ४७ कुरुकुल ४८ भूतडामर ४९ कालचक्र ५० योगिनी ५१ योगिनीसंचार ५२ योगिनीजाल ५३ योगाम्बरपीठ ५४ उड्डामर ५५ वसुं- धरासाधन ५६ नौरात्म ५७ डाकार्णव ५८ क्रियासार ५९ यमान्तक ६० मंजुश्री ६१ तन्त्रसमुच्चय ६२ क्रियावसंत ६३ हयग्रीव ६४ संकीर्ण ६५ नामसंगीति ६६ अमृतकर्णिकानामसंगीति ६७ गूढोत्पादनामसंगीति ६८ मायाजाल ६९ ज्ञानोदय ७० वसन्ततिलक ७१ निष्पन्नयोगाम्बर तंत्ररहस्य । (१३) कालतन्त्र--इनके अतिरिक्त हमारे तांत्रिक कवचोंके समान नेपाली बौद्धोंकी भी असंख्य धारणी संग्रह हैं । बौद्धलोगोंके बहुतसे तन्त्र चीनी और तिब्बती भाषामें अनुवादित हो चुके हैं तिव्वतमें तन्त्रको ऋग् युद. कहते हैं । इस ऋग्युद्के ८७ भागहें-इनमें विशेषकरके बौद्धलोगोंके गुप्त क्रिया- कांड, उपदेश स्तोत्र कवच मन्त्र और पूजाविधिका वर्णन है । शिवोक्त तंत्रभी तीन प्रकारके हैं शाक्त शेव और वैष्णव तांत्रिकगण अपनी संप्रदा- यके तंत्रोंको माना करते और उसकेही अनुसार क्रिया करते हैं। समयके परिवर्तनके साथ साथ ऐसा जमाना आया कि आगम या तंत्रके ग्रंथ लोपसे होगये, जिन महाशयों के पास दो चार पोथियां रही चे उनको हवामी नहीं लगने देते थे इस कारण यह ग्रंथलोप होताचला दश बारह वर्पका समय हुआ कि हमारे पूज्यपाद बडे भाता बलदेवप्रसादजी मिश्र महोदयने तंत्रशास्त्र के अनेक ग्रंथ प्राप्त करके स्वयं भी छपाये और अन्य अन्य प्रकाशकोंसे भी प्रकाशित कराये । तब और भी कई एक महा- शयोंने तंत्रशास्त्र के उद्धार करनेका विचार किया परन्तु बहुतसे धूर्तीने इधर उघरका कूडा कर्कट एकत्र करके जालीतंत्र भी प्रकाशित किये। यही कारण है- जो आज दिन अनेक जालीतंत्र प्रचलित दिखाई देते हैं, प्राहकगणको रचित है कि देखभालकर तंत्रकी पुस्तकोंको मोल लियाकरें प्रस्तुत योगिनीतंत्र तंत्रशास्त्रका विख्यात और माननीय ग्रंथ है । इसमें - पट्कर्म के अतिरिक्त उन समस्त पीठस्थानोंका विस्तृत वर्णन है जहापर तंत्रिका साधन करनेसे शीघ्रही प्रयोगकी सिद्धि होती है और साधक अपनी मनोकामनाको प्राप्त होजाता है । आजतक योगिनीतंत्रका, भाषामें अनुवाद नहीं था -केवल मूलमात्रही विकताथा परन्तु तांत्रिकजनोंके उप- कारार्थ "श्रीवेंकटेश्वर" प्रेस बंबईके स्वामी श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्ण दासजीने इसको भाषाटीकासहित छापा और मूल्य भी केवल सात रुपये नियत किया है, अतएव उक्त श्रीमान्को वारंवार धन्यवाद है कि वह लोकोपकारके लिये ऐसे ऐसे कार्य किया करते हैं। पं० कन्हैयालाल मिश्र.

श्री। योगिनीतंत्रकी अनुक्रमणिका । विपय. पटल विषय पृष्ठ १ उपोद्घात-योगिनीतंत्र विषयक देवीका प्रश्न भगवानका उत्तर गुरुमा हिमा गुरुविषयक देवीका प्रश्न गुरुका वर्णन है। २ महाविद्या और चामुडा काली रहस्य विषयक देवीका प्रश्न भगवान्का तद्विषयक यथोचित उत्तर, जपके गोप्य विषयसंबंधी देवीका प्रश्न भगवान् द्वारा मालाओंका वर्णन फिर विशेपजिज्ञासाका प्रश्न और भगवान्का उत्तर तथा मास आदिका पटल. पृष्ठ. वान्का अमोघ उत्तर वर्णित है... २७ ४ पटू कर्म साधनका वर्णन हे ३९ ५ शय्या साधनआदि विविध साधनोंका वर्णन ६ दिव्य भाव और वीर भाव नामक दो योगोका १ वर्णन है... ८० वर्णन है। ३ युद्ध भयरा ज्वरादि रोगनिवृत्तिविषयक दे वीफा प्रश्न ईश्वर द्वारा धारण कवच का वर्णन, जगहश्यकर प्रयोगका प्रश्न और उत्तर कोक्य- मोहन कवचका वर्णन अनेक प्रकारके लाभार्थ देवीका प्रश्न और भग- ... ७ स्वप्नावती मृतसंजीवनी मधुमती और पद्मावती विद्याका वर्णन तथा वशीकरण विषयक प्रश्नो. त्तर वर्णित हैं ८ योगिनियोंकी उत्पत्ति विषयक प्रश्नोत्तर घोर दैत्य विषयक भगवती और भगवानका कथो- पकथन है ९२ ९ भगवानके आचर्यका वर्णन भगवतीके चर- णाधोभागम भगवान्के निपतित होनेका वर्णन १०५ २० भगवान के द्वारा देवीकी स्तुतिका वर्णन और कारणार्णवका वर्णन है ११८ योगिनीतंत्रकी अनुक्रमणिका । (१५) विपय. पटल. पृष्ठ. पटल. विपय. पृष्ठ. ११ स्थानभेदसे मंत्रादिके योगिनीतंत्रके उत्तर खंडकी साधनका फलवर्णन कि- यागया है १२९/ अनुक्रमणिका। १२ मन्त्रसिद्धि प्रतिबन्धक प्रश्न उत्तरमें नरकासुः १ कामरूपके विपयम का- रकी कथा, वसिष्ठजी लीका प्रश्न । इसका और कामाख्याका आ- उनर देते समय भगवान् ख्यान है १४१ द्वारा पीठोके नाम और १३ योगिनी स्त्रीका वर्णन और उनकी दिशाओंका नि- ब्रह्मकर्मसाधनका वर्णन है १५५ र्णय करना पीठोके आ- १४ म्लेच्छगणकी उत्पत्तिका कार और उनके चिह्ना- वर्गन और कामपाल- दिका वर्णन किया गया है २६१ कोंके आख्यानका वर्णन है १६६ २ यात्राविधान द्वादश १५ कामाख्याका वर्णन है १८२ १६ कालीका वर्णन है लग्नोंमें दिशाओंमें गम- १९४ नका विधिनिषेधका योगि- १७ कोलानिपातका वर्णन और कुमारी शिलाका नीविचार योगविवेचन वर्णन किया है नक्षत्रविचार यात्राका- १८ कहोल चरित्रका वर्णन लमें शुभाशुभ शकुननि- और गंगामाहात्म्य तथा र्णय मुहूर्तज्ञान श्राद्धक- मंत्रका वर्णन है तिव्य और उसके आधा- २१५ १९ कालभैरवकी सिद्धिका रसे अन्य कर्तव्य काँका वर्णन महाकालभैरवका विधान किया है २४९ स्तोत्र और भगवतीका ३ कामरूपके वर्णनमें कृट. आशास्यवाद वर्णित हैं. २२५/ स्थों की पूजाविधि योगिनीतन्त्रके पूर्वखण्डकी अनुक्रम- और अनेक तीथाका वर्णन किया गया है २६१ ... ... णिका समाप्त।

योगिनीतंत्रकी अनुक्रमणिका । पृष्ट. अपने पटल विषय पृष्ठ. पटल विषय. ४ देवीका भगवान् विप कर्तव्यवर्णन करते करते यक प्रश्न भगवानका अनेक कुण्डोंका वर्णन प्रत्येक तिर्थस्थानमें किया है ३६२ पृथक पृथक ७ मंत्रोद्वारका वर्णन लेख नामोका वर्णन करना पद्धतिमहालानकी विधि ऋण मोचन माहात्म्य और माहात्म्यका वर्णन सहस्र जन्मार्जित पाप- नाश विषयक देवीका ८ सरस्वती और उसके पा- प्रश्न-इसका उत्तर देते शर्ववर्ती तीथोंका वर्णघोर- समय भगवानके द्वारा पापनिवृत्ति के लिये भ- अश्वक्रान्त तीर्धके माहा गवतीका प्रश्न फिर महा- त्म्यका वर्णन है देवका उत्तर पावफल. अनेक शेल-सरोवर भोगके अन्तर मोक्ष ला. नदी और नदो का वर्ण ४४१ गयाकूपके माहात्म्यको ९ हरिक्षेत्रका वर्णन पोड- वर्णन और तर्पणआदिका शोपचार पूजन विधि। फल-फिर मातृगयाका मणिकूट में विष्णुकी स्थि- वर्णन श्राद्धविधि और तिसंबंधी देवीका प्रश्न माहात्म्य वर्णित हे २९९ उसका उत्तर ग्रंथ माहात्म्य नका ४६५ योगिनीतंत्र के उत्तर खंडकी अनुक्रमणिका समाप्ता । २७५ T भका वर्णन है ... यह वर्णित है ।

|| श्रीः॥ योगिनीतन्त्रम् । भापाटीकासमेतम् । मङ्गलाचरणम् । नोमन्त्रीलघनद्युतिः शुभकरी चन्द्रार्धचूणामणि भक्तातिप्रशमकवृत्तिरनिशं विज्ञानसम्पत्करी । शम्भोर्वक्षसि संस्थिता सुरधुनीकालिन्दिनीसङ्गमा- ल्लोके कौतुकमादधात्यतितरां पायान्मृडानी हि नमा यद्योगिनीतन्त्रमिदं कन्हैयालालेन मिश्रान्वयसम्भवेन । अनूदितं स्वार्यवचोभिरम्यैस्तदस्तु प्रीत्ये प्रथमाम्बिका- याः॥२॥ ॐ कैलासशिखरारूढं शङ्कर परमेश्वरम् । पप्रच्छ गिरिजाकान्तं पार्वती वृषभध्वजम् ॥१॥ मनोहर कैलास-शिखरमें वृषभध्वज परमेश्वर शंकर विराजमान हैं; उसीसमय भगवती पार्वतीने अपने पति महादेवजीसे पूछा ।। १ ।। श्रीदेव्युवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वज्ञानमय प्रभो। सूचितं योगिनीतन्त्रं तन्मे वद जगद्गुरो ॥२॥ माहात्म्यं कीर्तितं तस्य पुरा श्रीशैलमन्दरे । वाराणस्यां कामरूपे नेपाले मन्दराचले ॥३॥ श्री पार्वती बोलीं-हे भगवन् ! हे सर्वधर्मज ! हे सर्वज्ञानमय ! हे प्रभो ! आपने पहिले'श्रीशैल, मन्दर, वाराणसी, (काशी) कामरूप.

योगिनीतन्त्रम।
नेपाल ओर मन्दर पर्वतमें जिसका माहात्म्य कीर्तन करके सूचना मात्र की
थी, वह " योगिनीतत्र " मुझसे कहिये । हे जगद्गुरो | उसके सुननेकी
मेरी इच्छा बरवती हुई हे ॥ २ ॥ ३ ॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि योगिनीतन्त्रमुत्तमम् ।
पावनं परमं धन्यं मोक्षेकफलदायकम् ॥४॥
ईश्वर बोले-हे दवि ! मोक्षफलदायक परमधन्य परमपवित्र और पर-
मोत्तम योगिनीतत्रको मै तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
गोपितव्यं प्रयत्लेन मम त्वं प्राणवल्लभे।
यथान्यो लभते नैव तथा कुरु प्रियंवदे ॥५॥
हे प्रियवदे ! हे प्राणवल्लभे । परमयत्नपूर्वक मुझे और तुम्हें इस तत्रको
गुप्त रखना चाहिये तथा ऐसा यत्न करना चाहिये कि, जिससे इसको कोई
दूसरा ( अनधिकारी) प्राप्त न करसके ॥ ५॥
एतत्तन्वं वरारोहे सुरासुरसुदुर्लभम् ।
कांक्षन्ति देवता सर्वाः श्रोतुं तन्त्रमनुत्तमम् ॥ ६॥
यक्षाद्याः परमेशानि न तेभ्यः कथितं मया।
कथयामि तव स्नेहाबद्धोऽहं परमं त्वया ॥ ७ ॥
हे वरारोहे । सुरासुर दुर्लभ इस सर्वोत्तम तत्रके सुननेकी सभी देवता
और यक्षादिक इच्छा करते हैं, परन्तु हे परमेशानि ! मैने इसको उनसे
भी नहीं कहा, मै तुम्हारे परम स्नेहपाशमें बँधा हूँ, इस कारण तुमसे
कहता हू ॥ ६ ॥७॥
विधत्कान्तिसमानाभदन्तपंक्तिबलाकिनीम् ।
नमामि तां विश्वमातां कालमेघसमद्युतिम् ॥
मुण्डमालावलीरम्यां मुक्तकेशी दिगम्बराम् ॥ ८॥

भाषाटीकासमेत् ।
(३)
जो विश्वमाता और कालमेघके समान कान्तियुक्त हैं, उन काली
देवीको नमस्कार करता हूं, बकपंक्तिके तुल्य बिजलीकी कान्तिके समान
दन्तपंक्ति जिनके मुखमण्डलमें शोभायमान हैं । जो मुण्डमालासे शोमा.
यमान हैं जो दिगम्बरा (नग्न ) खुले केशवाली हैं ॥ ८ ॥
ललजिहां घोररावामारक्तान्तत्रिलोचनाम् ।
कोटिकोटिकलानाथविलसन्मुखमण्डलाम् ॥ ९॥
और चलायमान जिनकी जीभ लहलहाती है-जिनके तीनों नेत्र रक्तवर्ण
हैं और जिनका घोर (विकराल) शब्द है, जिनके मुखमण्डलसे अनन्त
चन्द्रमा निकलते हैं ॥ ९॥
अमाकलासमुल्लासोज्ज्वलत्कोटीरमण्डलाम् ।
शवद्वयाभूषकर्णी नानामणिविभूषिताम् ॥ १० ॥
जिनके शिरमें उज्वल किरीट मण्डल अमावसकी कलाके समान
उल्लसित होकर शोभाविस्तार करता है, दोनों कानोंमें दो शव विभूपित
होरहे हैं, जिनके सब अंग अनेक प्रकारकी मणियोंसे विभूषित हैं ॥ १० ॥
सूर्यकान्तेन्दुकान्तोषप्रोल्लसत्कर्णभूषणाम् ।
मृतहस्तसहस्तु कृतकाची हसन्मुखीम् ॥ ११ ॥
सूर्यकान्त और चन्द्रकान्त मणिसमूहसे जिनका सुन्दर कर्णम्पण
अलंकृत है, जिनकी कमर मृतकों सहस्रों हाथोंफी बनी कोंधनीसे वेष्टित
है, जिनके मुखमण्डलमें अट्टहास्य शोभा पाता है ॥ ११ ॥
सृक्कद्वयगलद्रक्तधाराविस्फारिताननाम् ।
खड्गमुण्डदराभीतिसंशोभितचतुर्भुजाम् ॥ ११ ॥
जिनके दोनों होठोंसे शोणितकी धारा निकलनेके कारण मुखमण्डल
शोभित होरहा है, जिनकी चारों भुजा खड्ग, मुण्ड, वर और अभयदानसे
शोभायमान है ॥ १२ ॥

योगिनीतन्त्रम्। दन्तुरां परमां नित्यां रक्तमण्डितविग्रहाम् । शिवप्रेतसमारूढां महाकालोपरि स्थिताम् ।। १३ ॥ जिनका देह शोणितकी छटासे मंडित है, दंतपक्ति उच्च और विकट , उन परमा और नित्या सनातनी देवीको नमस्कार करताई जो शवप्रेतपर चढी और महाकालके ऊपर स्थित हैं ॥ १३ ॥ वामपादं शवहदि दक्षिणे लोकलाछिताम् ॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशा समस्तभुवनोज्ज्वलाम् ॥ १४ ॥ जिनका वाम चरण शवके हृदयपर स्थित है और जिनके दहिने पैरसे समस्त लोक अलंकृत है (उन शिवरूपिणी. देवीको नमस्कार है) जिनका करोडसूर्यतुल्य प्रकाश है और जो समस्त भुवनको समुज्ज्वल कर रही है ।॥ १४॥ विद्युत्पुंजसमानामज्वलजटाविराजिताम् । रजताद्रिनिभा देवीं स्फटिकाचल विग्रहाम् ॥ १५ ॥ विद्यत्पुंजके समान उज्ज्वल, नटाजालसे विराजित, रजतगिरिके समान शोभायमान और स्फटिकाचलके तुल्य शुक्लवर्ण शरीरको धारण करती हुई ॥ १५ ॥ दिगम्बरी महाघोरा चन्द्रार्कपरिमण्डिताम् । नानालङ्कारभूपाढयां भागवत्स्वर्णतनूरुहाम ॥ १६ ॥ जो दिगम्बर महापौरदर्शन, चन्द्रसूर्यसे भूपित, अनेक प्रकारके आभू- पणोंसे शोभित भास्वर (शुद्ध) सुवर्णसदृश रोमराजिसे विराजित ॥१६॥ योगनिद्राधरां सू— स्मेराननसरोरुहाम् । विपरीतरतासक्तां महाकालेन सन्ततम् ॥ १७ ॥ अशेषब्रह्माण्डमाण्डप्रकाशितमहायलाम् । शिवाभिघोररावाभिवष्टिता प्रलयोदिताम् ॥ १८॥ , " , भापाटीकासमेतम् । जिन योगनिद्रानिरत महादेवका हँसता हुमा मुखकमल समस्त ब्रह्मा- ण्डको प्रकाशित करता है, महाकाल शंकरके विपरीत रतमें जो आसक्त हैं, जो घोर शब्दवाली गीदडियोंसे घिरी हैं, जो प्रलयकालके समान भयानक मात धारण करनेवाली हैं ॥ १७ ॥ १८ ॥ कोटिकोटिशरच्चन्द्रन्यक्कतोनखमण्डलाम् ।, सुधापूर्णशिरोहस्तयोगिनीभिर्विराजिताम् ॥ १९ ॥ आरक्तमुखभीमाभिर्मदमत्ताभिरन्विताम् । घोररूपैमहानादैश्चण्डतापैश्च भैरवेः॥ २० ॥ गृहीतशवकङ्कालजयशब्दपरायणः । नृत्यद्भिर्वादनपरैरनिशञ्च दिगम्बरः ॥ २१ ॥ श्मशानालयमध्यस्थां ब्रह्माापनिषेविताम् ॥ २२ ॥ जो अपने नखमण्डलकी प्रभासे अनन्त शरहतुके चन्द्रमाकी शोभाका तिरस्कार करती हैं, जिनके मस्तकमेण्डल और हाथों में सुधा विराजमान है जो रक्तमुखवाली मदमत्त योगिनीगणोंमें विराजित हैं एवं महानाद घोररूप, प्रचण्डप्रताप, दिगम्बरवेप सदा नृत्यवाघमें निरत शवकंकाल ग्राही (मृतकका खांखड लिये) और जयशब्दपरायण भैरवगणोंसे चेष्टित श्मशानालयके मध्यस्थित और ब्रह्मादि देवताओंसे सेवित हैं (उन महा- काली देवीको मैं नमस्कार करता हूं)॥ १९ ॥ २० ॥ २१ ॥ २२ ॥ अधुना शृणु दवेशि तन्त्रराजं सुदुर्लभम् । कथयामि तव स्नेहान प्रकाश्यं कथञ्चन । अतीव स्नेहसंबद्धभक्त्या दासोऽस्मि ते प्रिये ॥२३॥ हे देवेश्वरी ! अब दुर्लभ तन्त्रराज " योगिनीतंत्र " सुनो! हे प्रिये ! तुम्हारी अतिशय भक्ति और सेहके कारण मैं तुम्हारा दास हूं, अतएय .

योगिनीतन्त्रम् ।
तुम्हारे प्रति मीतिक यह संत्र तुमसे वर्णन करता हूं किन्तु की इसको
प्रकाशन करना ॥ २३॥
गुरुमूलमिदं शास्त्रं गुरुमूलमिदं जगत् ।
गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव शिवः स्वयम् ।
गुरुर्यस्य वशीभूतो देवास्तं प्रणमन्ति च ॥ २४ ॥
हे देवि ! यह शास्त्र और जगत् गुरुमूलक है गुरु ही परब्रह्म और
गुरु ही साक्षात् शिवस्वरूप हैं, गुरु जिसके वशीभूत होते हैं, देवता
उसको प्रणाम करते हैं ।। २४ ॥
कुष्ठव्याधिगलत्पादप्रक्षालनजलं यदि।
पिवेदमृतभावन यः स देवीपुरं व्रजेत् ॥ २५ ॥
महान्याधियुक्त होनेपर भी यदि उन गुरुका चरणामृत पिये, तो
वह
मनुष्य देवपुरीमें जाता है ॥ २५ ॥
सुरा यद्यप्यसंस्कारी गुर्वनुज्ञावलात्पिबेत् ।
प्रायश्चित्तं न तत्रास्ति वेदेऽपि स्थित एप हि ॥२६॥
गुरुकी आज्ञाविधिके वशवत्तौ होकर असस्कृत सुरापान करनेपर भी
उसमें प्रायश्चित्त नहीं है और उसमें चेदनिधिकी अमर्यादाभी नहीं
होगी ॥ २६ ॥
अपि तन्त्रविरुद्ध वा गुरुणा कथ्यते यदि ।
स्वमतं सदृशं वेदैर्महारुद्रवचो यथा ॥
सर्व गुर्वाज्ञया कार्य तत्त्वस्यागमन विना ॥ २७ ॥
गुरु अपना मत जो प्रकाश कर, संत्रविरुद्ध होनेपरभी उसको वेदतुल्य
और महारुद्रदेवके वचनके समान जाने, तत्त्वागमके बिना भी गुरुकी
आज्ञा सब कार्योंमें ही लेनी चाहिये ॥ २७ ॥
अद्वैतं देवतैश्वर्थ न द्वैतं गुरुणा सह ।
नाद्वैतं प्लवते कार्य न समोऽस्तीह भूतले ॥ २८ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(७)
देवताओंका ऐश्वर्य अद्वैत है, गुरुके संग उसका अद्वैतभाव ( अनुपमे-
यत्व ) नहीं है अद्वैत गुरुको और गुरुके कार्यको अतिकम नहीं करसकता
इस भूतलमें गुरुके समान कोई नहीं है ॥ २८ ॥
गुरुगतिर्गुरुर्देवो गुरुर्देवी तथा प्रिये।
स्वर्गलोके मर्त्यलोके नागलोके च वर्तते ॥ २९ ॥
हे प्रिये ! स्वर्गलोक, मर्त्यलोक और नागलोकमें गुरु ही गति, गुरु ही
देव और गुरु ही देवी हैं ॥ २९ ॥
अल्पज्ञोऽनल्पविनो वा गुरुरेव सदा गतिः ।
गुरुवद्गुरुपुत्रेषु गुरुवत्तत्सुतादिपु ॥ ३०॥
गुरु अल्पज्ञानसम्पन्न हों वा बहुज्ञानसम्पन्न हों, परन्तु गुरु ही सद
गति हैं. हे पिये ! समस्त गुरुपुत्र और गुरुपुत्रके पुत्रसे भी गुरुके समान
व्यवहार करे ॥ ३०॥
गुरुपत्नी महेशानि गुरुरेव न संशयः।
गुरोरुच्छिष्टवद्देवि तत्सुत्तोच्छिष्टमेव च ।
भोजनीयं न संदेहोऽस्त्यन्यथा चेदधोगतिः ॥३१॥
गुरुपत्नी भी गुरु है, इसमें कुछ सन्देह नहीं. हे महेशानि ! गुरुकी
उच्छिष्टके समान गुरुपुत्रकी उच्छिष्ट भी भोजन करनी चाहिये, इसमें संशय
न करे, इसमें विकार उत्पन्न होनेपर अधोगति होती है ॥ ३१ ।।
गुरूच्छिष्टं महादेवि ब्रह्मादीनां सुदुर्लभम् ।
गुरूच्छिष्टं तथा प्रोक्तं महापूतं परात्परम् ॥ ३२ ॥
हे महादेवी ! गुरुका उच्छिष्ट ब्रह्मादिकोंको भी दुर्लभ है, गुरुका उच्छिष्ट
महापवित्र और परात्पर (अति दुर्लभ ) वस्तु है ।। ३२ ॥
गुरुणा गुरुपल्या दा गुरुपुत्रेण वा प्रिये ।
भुक्त्वानं मुष्टिमात्र वा योवसेद्वर्षविंशतिम् ।
चिरंजीवी जरारोगविमुक्तोऽथ शिवो भवेत् ॥३३॥

(८) योगिनीतन्त्रम् । गुर्वन्तिके यदि वसेत्पश्चाशद्वपमुत्तमे। भैरवाचारसम्पन्नस्तत्पादपरिचारकः ॥ ३४ ॥ इह भुक्त्वा वरान्भोगानन्ते देविगणे भवेत् । रूपायौवनसम्पन्न रुद्रकन्यागणैः सह । असौ वीरो विहरति यावञ्चन्द्रार्कतारकम् ॥ ३ ॥ हे प्रिये । गुरु गुरुपत्नी वा गुरुपुत्रका दिया मुष्टिमात्र भुक्तावशिष्ट अर्थात् भोजन बचा हुआ अन्न भी मो मनुष्य वीस वर्ष भोजन करता है। वह जरा और रोगसे छूटकर चिरजीवी होता हे और अन्तकालमें शिन हो जाता है ॥ ३३ ॥ हे सत्तमे ! जो मनुष्य भैरवाचारसम्पन्न और गुरुके चरणकमलोंका सेवक होकर गुरुके निकट पचास वर्ष वास करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर अन्नको देवताओंमें गिना जाता है वह वीर जबतक चन्द्र सूर्य और तारे विद्यमान रहते हैं, तबतक रूपयोवन- रुद्रकन्याओंके सग विहार करता है ॥ ३१ ॥ ३५ ॥ प्रातरुत्थाय यो मया गुरवे प्रणतिश्चरेत् । तत्सुतं तनयां वापि प्रणमेद्विधिपूर्वकम् ॥ स सिध्यति वरारोहे नात्र कार्या विचारणा ॥३६॥ हे वरारोहे ! जो मनुष्य प्रात कालमें उठकर गुरुको गुरुके पुत्रको वा गुरकी कन्याको विधिपूर्वक प्रणाम करता है वह अवश्य सिद्ध होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३६॥ यत्राशायां गुरोः स्थान नित्यं प्रातश्च तन्मुखः । गुरुं तद्दयितां पुत्रान्पुत्रीरुद्दिश्य मानवः। प्रणमेद्भक्तिसंयुक्तः स सिद्धो नात्र संशयः ॥३७॥ जिस ओर गुरुका स्थान है, प्रतिदिन प्रातकालमें उसी ओरको मुख रके गरको गाकी पत्नीको वा उनके पुत्रको अथवा उनकी कन्याको

भापाटीकासमेतम् ।
उद्देश्य करके जो मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे प्रणाम करता है, वह इस
लोकमें सिद्ध होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३७॥
गुरोः स्थानं हि कैलासं तत्र चिन्तामणेहम् ।
वृक्षालि कल्पवृक्षालिःलता कल्पलता स्मृता।
जलखातं स्वर्गगङ्गा सर्व पुण्यमयं शिवे ॥३८॥
गुरुगेहे स्थिता दास्यो भैरव्यः परिकीर्तिताः।
भृत्यान्भैरवरूपांश्च भावयन्मतिमान्सदा॥३९॥
प्रक्षिणं कृतं येन गुरोः स्थानं महेश्वरि ।
प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा ॥ ४०॥
गुरुका स्थानही कैलास है, गुरुका गृहही चिन्तामणिका गृह है
गुरुकी वृक्षावलीही कल्पवृशाली है अर्थात् वहाके वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और
गुरुजीके परकी लता कल्पलता हैं. गुरुजीके घरका जल स्वर्गीय गंगा है.
अतएव हे शिवे ! गुरुका समस्तही पुण्यमय है. हे महेश्वार ! मतिमान
मनुष्य विचारते हैं कि. गुरुके घर में स्थित दासी भैरवीतुल्य और सेवक
भैरवरूप हैं । जो गुरुके स्थानकी प्रदक्षिणा करता है वह मनुष्य सप्तद्वीपा
पृथ्वीको प्रदक्षिणा करके उसके फलको पाता है |॥ ४० ॥
श्रीदेव्युवाच ।
गुरुः को वा महेशान बद मे करुणामय ।
तत्त्वादधिक एवायं यस्त्वया परिकीर्तितः॥ ४१ ।।
श्री देवीजीने कहा-हे महेशान ! हे करुणामय ! गुरु कौन हैं ?
उसका स्वरूप मुझसे कहो, आपने तत्त्वज्ञानसेभी गुरुको अधिक कहा है
अतएव इसका विशेष विवरण सुननेकी मेरी इच्छा है । ॥ ११ ॥
ईश्वर उवाच ।
आदिनाथो महादेवि महाकालो हि यः स्मृतः ।
गुरुः स एवं देवेशि सवैमन्त्रेधुना परः॥ ४२ ॥

(१०)
योगिनीतन्त्रम् ।
शैवे शाक्त वैष्णव च गाणपत्ये तथैन्दवे ।
महाशैवे च सौरे च स गुरुर्नात्र संशय ।
मन्त्रवक्ता स एव स्थानापरः परमेश्वरि ॥ ४३ ॥
ईश्वर बोले-हे देवेशि ! हे महादेवि ! जो आदिनाथ महाकाल हैं,
वही इस समय परप गुरु हैं, शैव शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, ऐन्दव,
महाशैव सौरादि मन्त्रमें वही मत्रवक्ता है, अपर गुरु कोई नहीं हैं, इसमें
सन्देह नहीं ॥ ४२ ॥ ४३ ॥
मन्नप्रदानकाले हि मानुषो नगनन्दिनि ।
अधिष्ठानं भवेत्तस्य महाकालस्य शाङ्करि ॥
देचि द्यमानुषी चयं गुरुता नात्र संशयः॥ ४४ ॥
हे परमेश्वरी . हे पर्वतनन्दिनी ! मन्त्र देने के समय वही मानुपरूपसे
मंत्र देते हैं. हे शाकार ! उस समय उन महाकालकाही अधिष्ठान होता
है, इस कारण हे देवि ! गुरुके कर्मको अमानुष जाने। इसमें सन्देह
नहीं ॥४४॥
मन्त्रदाता शिरःपने यज्ज्ञानं कुरुते गुरुः।
तज्ज्ञानं कुरुते देवि शिष्योयं शीर्षपङ्कजे ॥ ४५ ॥
शिवस्वरूप मन्त्रदाता गुरु शिरोरूपपद्ममें जिस प्रकार ज्ञान करते हैं हे
देवि ! शिष्यमी निज शीर्षकमलमें उसीप्रकार ज्ञान करते हैं ॥ १५ ॥
अतएव महेशानि एक एव गुरुः स्मृतः।
अधिष्ठानं भवेत्तस्य मातुषस्य महेश्वरि ।
माहात्म्यं कीर्तितं तस्य सर्वशास्त्रेषु शारि ॥४६॥
अतएव हे महेशानि ! गुरुकोही एकमात्र प्रधान जानना चाहिये । हे
महेश्वार : मत्र देनेके समय उन अमानुष देवका अधिष्ठान होता है है
शाद्वार ! उन गुरुका माहात्म्य सब शास्त्रोंमें कहा गया है ॥ ४६॥

भापाटीकासमेतम् ।
(११)
विशेषमतुवक्ष्यामि माहात्म्यं गुरुगोचरम् ।
पशुमन्त्रमदाने तु मर्यादा दशपौरुषी॥४७॥
मैने तुम्हारे प्रति गुरुका माहात्म्य विशेषरूपसे वर्णन किया है, पशुमंत्र
देनेमें गुरुकी दशपौरुषी मर्यादा है ॥ ४७ ॥
वीरमन्त्रप्रदाने तु पञ्चविंशतिपौरुषी।
महाविद्यासु सर्वासु पश्चाशत्पौरुषी मता ॥ ४८ ॥
वीरमंत्र देनेमें पचीस पौरुषी और सर्व महाविद्यामंत्र देने में पचास
पौरुषी मर्यादा है ॥ ४८ ॥
ब्रह्मयोगप्रदाने तु मर्यादा शतपौरुषी।
ब्रह्मयोगो महादेवि भेरुण्डायां प्रकीर्तितः ॥ ४९ ।।
ब्रह्मयोग देने में शतपौरुपी मर्यादा जाननी चाहिये । हे महादेवि !
भेरुण्डातन्त्रमें ब्रह्मयोग कहागया है ।। ४९ ॥
गुरुपादोदकं पुण्यं सर्वतीर्थावगाहनात् ।
सर्वतीर्थावगाहे तु यत्फलं प्राप्नुयानरः॥ ५० ॥
तत्फलं प्राप्नुयान्मयों पादोदककणाद्गुरोः ।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु योऽभिषेकं ततश्चरेत ॥५१॥
सब तीर्थोसे स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, गुरुका चरणामृत पीनेसे
भी वहीं पुण्य होता है. सर्व तीथों में स्नान करके मनुष्य जो फल पाता
है गुरुके पादोदकका कणमात्र पीनेसेमी वही फल प्राप्त होता है, जो
मनुष्य गुरुके पादोदक ( चरणामृत) में स्नान करता है, उसको एक
कालमेंही सर्व तीथों में स्नान करनेका फल मिलता है ॥ ५० ॥ ५१ ।।
पीतं पूतश्च कुरुते सर्वपापेभ्य एव हि ।
विशेषतो महामाये तत्क्षणाच्छिवतां ब्रजेत् ॥५२॥

(१२)
योगिनीतन्त्रम् ।
पान करनेपर संपूर्ण पापोंसे छूटकर पवित्र होता है । हे महामाये !
विशेषकर इस पाटोदक पीने के फलसे वह तत्काल शिवका स्वरूपलाभ
करता है ॥ ५२ ॥
गुरोः पादरजो मूनि धारयेद्यस्तु मानवः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स शिवो नात्र संशयः॥५३॥
जो मनुष्य अपने मस्तकमें गुरुके चरणकमलोंकी धन धारण करताहै
वह सब पापोंसे छूटकर शिवके तुल्य होता है इसमें सन्देह नहीं ॥५३॥
तेनैव रजसा देवि तिलकं यस्तु कारयेत् ।
चतुर्भुजो न सन्देहः स वैकुण्ठपतिर्भवेत् ॥५४॥
हे देवि ! उस पदरजसे जो तिलक करता है वह चतुर्भुज होकर
वैकुण्ठपति होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ५४ ॥
तद्रजो भक्षितं येन एकस्मिन्दिवसेऽपि च ।
कोटियज्ञोद्भवं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ ५५ ॥
जो मनुष्य एक दिनभी गुरुकी पदरज भोजन करता है वह करोड
महायज्ञ करनेके पुण्यको पाता है इसमें सन्देह नही ।। ५५ ॥
इति ते कथितं देवि रहस्यं गुरुगोचरम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वकीय कुलपौरुषम् ॥ ५६ ॥
हे देवि ! यह मैने तुमसे गुरुका रहस्य कहा स्वकीय कुलपौरुष स्वरूप
इस गुरुतत्वको परमयत्नसहित गुप्त रक्खे ॥ ५६ ॥
इति सर्वतन्त्रोत्तमे श्रीयोगिनातन्ने देवीश्वरसम्पादे
भाषाटीकायां चतुर्विशतिसाहले
प्रथमः पटलः ॥१॥

भापाटीकासमेतम् ।
श्रीदेव्युवाच ।
परमानन्दसन्दोह चराचरजगद्गुरो।
श्रुतं ते गुरुमाहात्म्यं गुह्याद्गुह्यतरं हि यत् ॥ १ ॥
श्रीदेवी बोलीं-हे परमानन्दसन्दोह ! हे चराचर जगद्गुरो महादेव !
आपसे मैंने गुह्यसे भी गुह्यतम गुरुका माहात्म्य सुना ॥ १ ॥
अहञ्च श्रोतुमिच्छामि काली सकलतारिणीम् ।
कथिता सा महाविद्या सिद्धिविद्या च यामले ॥२॥
हे देवे ! अब मै अखिलतारणी कालिका विद्याका विषय सुननेकी अभि.
लाषा करती हूं, उस महाविद्या और सिद्धविद्याका विषय यामलतन्त्र में
कहागया है ॥२॥
महामहाब्रह्मविद्यां चामुण्डातन्त्रगोचराम् ।
आज्ञापय महाकालीरहस्यं कृपया शिव ॥ ३॥
तन्त्रशास्त्रमें महामहा ब्रह्मविद्या और चामुण्डाका विषय वर्णित हुआ
है, हे महादेव ! मेरे प्रति करुणा प्रकाश करके यह कालीरहस्य वर्णन
कालीररस्य
ईश्वर उवाच ।
महामहाब्रह्मविद्या परेय कालिका मता।
यामासाद्य च निर्वाणमुक्तिमेति नराधमः ॥ ४ ॥
ईश्वर चोले-यह महामहा ब्रह्मविद्याही कालिकाविद्या है, नराधम मनु-
प्यमी इस विद्याको प्राप्तहोकर निर्वाण मुक्तिलाभ करने में समर्थ होता है४॥
रहस्यं कथ्यते देवि सर्वलोकास्तथैवच ।
अस्या पासकाश्चैव ब्रह्मविष्णुशिवादयः ॥५॥
कीजिये ॥ ३ ॥

(१९)
योगिनीतन्त्रम् ।
कालिकायाः प्रसादेन सवै मुक्त्यादिभागिनः ।
रहस्यस्य सहस्रावृत्या जप्त्वा वापि कोटिशः॥६॥
हे देवि ! ब्रह्मा, विष्णु और शिवादि सब इन महामहा विद्याके उपा-
सक हैं । हे देवि ! अब रहस्य कहता हूं, समस्त लोकही उपासक होसकते
है कालिकाके प्रसादसे सभी मुक्ति आदिके भागी होसकते हैं, उस कालि-
काविद्याकामंत्र सहस्रवार वा करोडवार जप करे ॥ ५ ॥ ६ ॥
भाग्यवाञायते यस्मात्कालीसाधनतत्परः।
काली च जगतां माता सर्वशास्त्रेषु निश्चिता ॥ ७ ॥
कालीके साधनमें तत्पर मनुष्य उस पुण्यफलसे भाग्यवान् होता है
ही जगत्की माता है यह सब शास्त्रों में निश्चित हुआ है ।। ७ ।।
कालीमन्त्र जपेद्यो हि कालीपुत्रो न संशयः ॥ ८ ॥
जो मनुष्य कालिकाका मन्त्र जपता है, वह कालीका पुत्र है इसमें
सन्देह नहीं ।। ८॥
त्यजसि त्वं परश्चैतत्पुमांसं परमं तथा।
स्वरूपं त्वं वचित्काले त्यजसि त्वं जगन्मयि ।
कालीवियां समासाद्य न त्यक्तुं शक्नुयात्वचित्॥९॥
हे जगन्मयि ! कालीमन्त्रपरायण इस परमपुरुषको तुमभी कदाचित्
त्याग करसकतीहो और कदाचित् स्वरूपत्वभी त्याग करसकता है, किन्तु
कालीविद्या इस पुरुषको प्राप्त होकर कभी त्याग नहीं कर सकती ॥ ९ ॥
गच्छेच्छूद्रस्य शूद्रत्वं ब्राह्मणानां च विप्रता ।
मन्त्रग्रहणमात्रे तु सर्वे शिवसमाः किल ॥ १० ॥

भापाटीकासमेतम। वाराणस्यां समासाद्य गङ्गां चैव तथैव ते। कालीमंत्रमहादेव सर्वे शिवसमाः किल ॥१॥ यह शूद्र और ब्राह्मण यदि वाराणसी नगरी वा गंगाके तटपर कालीमंत्र ग्रहण करें तो वे सब तत्काल शिवके समान होते है ।। ११ ॥ अपि चेत्वत्समा नारी मत्समः पुरुषोऽस्ति चेत् । तस्यैव जननी धन्या पिता तस्य सुरोत्तमः ॥१२॥ हे देवि ! यदि तुम्हारे समान नारी और मेरे समान पुरुष हो तो मनुष्यके माता पिता धन्यवादके योग हो सकते हैं (परन्तु यह सब कालीके मंत्रके रत रहनेसेही होना सम्भव है) अतएव उसकी माता पृथ्वीमें धन्य और उसका पिता सुरोत्तम होता है ।। १२॥ तस्यैव पितरः स्वर्ग यान्ति यस्मात्सुदुर्लभम् । येन भाग्यवगादेवि काली सा त्वं समाश्रिता ॥१३॥ अशंसन्तीह पितरो नराणां पुण्यकर्मणाम् । यदास्माकं कुले पुत्रः कालीमन्त्रमुपाश्रयेत् । तदा मुक्तिपुरी प्राप्य विरेमिम सदैव हि ॥ १४ ॥ जो मनुष्य भाग्यके वश होकर कालीका आश्रम लेता है, उसके पितर दुर्लभ स्वर्गको प्राप्त करते हैं ॥ १३ ॥ पुण्यकारी मनुष्यके पितर कामना करते रहते हैं कि हमारे कुलमें पुत्र कब कालीमन्त्रका आश्रय करेगा; निससे हम मुक्तिको प्राप्त होकर नित्य आनन्द करेंगे ॥ १४ ॥ काली तारा तथा छिन्ना गुरुवे भूपतिस्तथा । एकरूपेण बोद्धव्या भेदेन नरकं व्रजेत् ॥ १५ ॥ काली तारा और छिन्नमस्तादि अन्यान्य महाविद्या गुरु और भूपत्ति इन सबको ही एकरूप जाने; भेदनान करनेसे नरकमें जाना पटता .

योगिनीतन्त्रम।
ताराशिप्यत्यजेत्काली कालीशिप्यस्तु तारिणीम् ।
छिन्नामहिषमर्दिन्योः कदाचित्पूजनं स्मृतम् ॥१६||
किन्तु ताराका शिष्य कालीकी पूजा न करके ताराकीही और
कालीका शिष्य ताराकी पूजा न करके कालीकीही पूजा करै, कभी
(विशेष आवश्यकता होनेपर ) छिन्ना और महिपमर्दनीकी पूजाभी कर
सकता है ॥ १६॥
यदि वा पूजयदेवि नान्यदेवान्प्रपूजयेत् ।
कालीत्वेन च संभाव्य त्वन्यां वा पूजयेच्छिवे ॥१७॥
हे देवि ! यदि पूजाही करे तो अन्यकी पूजा न करके ताराकी काली-
रूपमें और कालीकी तारारूपमें भावना करके अन्यत्र पूजा करनी
चाहिये ॥ १७ ॥
या काली परमा विद्या सैव तारा न संशयः ।
एतयोर्भेदभावेन नानामन्त्रा भवन्ति हि।
उक्तं तत्कालिकाकल्पे ताराकल्पे च ते मया ॥१४॥
जो परमा विद्या काली हैं, वही परमाविद्या तारा हैं, इसमें सन्देह
नहीं इन दोनोंक भेदभावसे नाना प्रकार के मंत्र हुए हैं हे देवि ! मैने
तुमसे कालिकाकल्प और तारकल्पमें वह सभी कहे हैं ।। १८ ।।
श्रीदेव्युवाच ॥
नानाविधानं देवेश कथयस्व प्रियम्बद।
विशेषतो महादेव रहस्यं जपकर्मणः ॥ १९ ॥
श्रीपार्वतीजीने कहा-हे देवेश! हे प्रियम्पद ! आप मुझसे अनेक
प्रकारके विधान कहिये । हे महादेव ! विशेष करके मै जपकर्मका रहस्य
सुनना चाहती हूं ॥१९॥
ईश्वर उवाच ।
वर्णमाला शुभा प्रोक्ता सर्वमन्त्रमदीपनी।
तस्याः प्रतिनिधिदेवि महाशंखमयी ठभा ॥२०॥

भाषाटीकासमेतम् । (१७) ईश्वर ( महादेव ) बोले-हे देवि ! सब मन्त्रोंकी उद्दीपनकारिणी वर्ण- माला ही कल्याणके दायिनी कहकर शास्त्रमें उक्त हुई है, हे महादेवि ! उस वर्णमालाकी प्रतिनिधि महाशंखमयी माला मंगलदायिनी है ॥२०॥ महाशङ्खा करे यस्य तस्य सिद्धिरदूरतः। तदभावे वीरवन्द्ये स्फाटिकी सर्वसिद्धिदा ॥२१॥ जिसके हाथमें महाशंखकी माला है, उसकी सिद्धि निकट ही विद्यमान रहती है, है वीरवन्धे ! उसके अभाव में स्फटिककी मालाको ही सब सिद्धि योंकी देनेवाली जाने ।। २१ ॥ मणिसंख्यां महादेवि मालायाः कथयामि ते। पञ्चविंशतिभिर्मोक्षं पुष्टिदा सप्तविंशतिः ॥२२॥ हे महादेवि ! मालाकी मणिसंख्या कहता हूं. सुनो । पचविंशति (२५) संख्यामें मोक्षलाभ, सप्तविशति (२७ ) संख्या में पुष्टिलाभ ।। २२ ॥ त्रिंशद्भिर्धनसिद्धिः स्यात्पश्चाशन्मन्त्रसिद्धये । अष्टोत्तरशतैः सर्वा सिद्धिरेव महेश्वरि ॥ ३ ॥ तीस संख्यामें धनसिद्धि, पचास संख्या में मन्त्रसिद्धि और हे महेश्वारे ! अष्टोत्तरशत (१०८) संख्यामें सभी कामना सिद्ध होती हैं |॥ २३ ॥ श्रीदेव्युवाच । एतत्साधारणं प्रोक्तं विशेष कामिनां वद ॥ २४ ।। देवी पार्वतीजी बोलीं-हे देव ! यह तो साधारण ही कहा, कामोज- नौके पक्षमें विशेष करके कहो ॥ २४ ॥ श्रीशिव उवाच । दन्तमाला जपे कार्या गले धार्या नृभिः शुमा। दशनर्यदि कर्तव्या मन्त्रसंख्या तथा प्रिये ॥२५॥ २

(१८)
योगिनीतन्त्रम्।
सर्वसिद्धिप्रदा माला राजदन्तेन मेरुणा।
अन्यत्रापि च देवेशि मेरुत्वेनैवमादिशेत ॥ २६ ॥
श्रीमहा-वजी बोले हे प्रिये ! जपविषयमें दन्तमाला ही कर्तव्य है,
उसको गलेमें धारण करनेसे वह शुभसाधिनी होती है, यदि दशनद्वारा
मन्त्रसल्या कर्त्तव्य हो ॥ २५ ॥ तो राजदन्तको मेरु करनेसे उस मालाके
द्वारा सब कामना सिद्ध होती है । हे देवि ! अन्य मालाओंमें भी मेरुके
स्थल में यह राजदन्त श्रेष्ठ हे ॥ २६ ॥
सङ्कल्पवाक्ये या संख्या संख्या तु जपहोमयोः ।
तां शृणुष्व महेशानि क्रमेण कथयामि ते ॥२७॥
हे महेश्वरि । सक्ल्पवाक्य एव जप और होममें जो सरया है, वह
क्रमसे कहता ह सुनो ॥ २७ ॥
शतं सहस्रमयुतं लक्ष कोटिस्तथैव च ।
सर्वत्र परिसंख्येयमविशेष महेश्वरि ॥ २८ ॥ .
विशेषे तु महेशानि विशेषं त्वाचरेत्कचित् ।
शतादिप्रतिसंख्यायामष्टौ तत्राधिकं जपेत् ॥२९॥
हे महेशानि । शत, सहस्र, अयुत, ( दशसहस्र ) लक्ष, और कोटि
सर्वत्र यही सख्या निरूपित हे कहीं भी विशेष नही है ॥२८॥ हे दवि ।
जपरिपयमें कहीं विशष यही हे कि, शतादि सख्यामें अष्ट सख्या अधिक
अधिक अर्थात् सौके स्थानमें एकसौ आठ नप करना चाहिये ॥ २९ ॥
आद्यन्तपर्वद्वितयं हित्वा चाष्टकपर्वभिः ।
जपान्ते च तथा मालां शिवे वे धारयेत्ततः ॥ ३० ॥
आदि और अन्त यह दोनों पी त्यागकर अष्ट पर्यसे जप करना
चाहिये जप पन्त शिवकी माला धारण करे ॥ ३० ॥

भापाटीकासमेतम् ।
रक्तपुष्पायबीजेन घटवाद्यपुरःसरम् ।
देव्यै समर्पयद्धीमान्फलं तज्जपकर्मणः ॥ ३१ ॥
हे देवि ! बुद्धिमान् पुरुष रक्तपुष्पका अर्घ्य बीज और घटद्वारा बाना
यजाकर जपकार्यका फल देवीको समर्पण करे ॥ ३१ ॥
साङ्गोपाङ्गेन देवेशि रहस्यं जपकर्मणः ।
उक्तं सरस्वतीतन्त्रे तस्माज्जानीहि कामिनी ॥३२॥
हे देवेशि ! जपकर्मका साङ्गोपाङ्ग रहस्य सरस्वतीतंत्र में कहा है उससे
मानना ॥ ३२ ॥.
करमाला महेशानि शिवशक्तिक्रमेण च ।
शृणुप्व परमेशानि सर्वमन्त्रप्रसिद्धये ॥३३ ॥
हे महेशानि ! हे परमेश्वार ! सर्व मंत्रसिद्धिके निमित्त शिवशक्तिके क्रमसे
करमालाका विषय सुनो ॥ ३३ ॥
अनामामध्यमारभ्य कनिष्ठादिक्रमेण च ।
तत्पाश्वमूलपर्यन्तं प्रजपेदशपर्वभिः ॥ ३४॥
अनामिकाके मध्यपर्वसे आरंभ करके कनिष्ठादि अंगुलियोंके क्रमसे तर्ज
नीके मूलपर्यंत दश पर्वद्वारा जप करे ॥ ३४ ॥
मध्यमामूलतोवापि मेरुत्वेन समाचरेत् ।
अष्टोत्तरं जपेदेवि आद्यन्तद्वितयं त्यजेत् ।
शिवमाला समाख्याता शक्तिमालां शृणुष्व मे ॥३५॥
मध्यमाके मूलपर्वको मेरुरूपमें विचारे । हे देवि ! अष्टोत्तर अपकालमें
आद्य और अन्तमें यह दो त्याग दे यह शिवमाला कही अब शक्तिमाला
मुनो ॥ ३५ ॥
अनामामध्यमारभ्य कनिष्ठादिक्रमेण च ।
तर्जनीमूलप्रय॑न्तं मजपेद्दशपर्वसु ॥ ३६॥

(२०) योगिनीतन्त्रम्। अनामिकाके मध्यपर्वसे आरभ करके कनिष्ठादिक्रमसे तर्जनीके मूल पर्यत्र दशपर्वद्वारा जप करे ।। ३६ ॥ मध्यमाद्वितयं पर्व तर्जन्याः परमेश्वरि । मेरु जानीहि देवेशि तद्वयं न स्पृशेत्क्वचित् ।।३।। है परमेश्वार ! मन्यमाके दोनों पर्वको तर्जनीका मेरु जानना चाहिवे इस कारण उन दोनोंको पर्श न करे ।। ३७ ।। अष्टोत्तरजपे पर्व आयतं द्वितयं त्यजेत् । नित्यं जपं करे कुर्यान तु काम्यं कदाचन । काम्यं चापि करे कुर्यान्मालामावे च मत्प्रिये ॥३८॥ अष्टोत्तरजपकालमें आद्य और अन्त पर्वको त्याग दे, नित्य जपको ही करमालाद्वारा करना उचित है, किन्तु काम्यजप करना उचित नहीं है। हे प्रिये ! मालाके अभावमें काम्य जप करलेनेमें भी हानि नही है ॥३८॥ नित्यकर्मान्वितो जापो नित्यजाफास ईरितः। स्नानं च तर्पणं होमो बलिस्तृप्तिश्च नित्यतः ॥३९॥ नित्यकर्ममें जो नप करना चाहिये, वही नित्यजप कहाता है स्नान, तर्पण, होम, बलि और तृप्ति यह सब नित्यकर्ममें गिने गये हैं ॥ ३९ ॥ अनुलोमविलोमाभ्यां सर्वमालासु संजपेत् । केवलंचानुलोमेन प्रजपेत्करमालया ॥ ४० ॥ सब मालाओंमें अनुलोम और विलोमद्वारा जप करना चाहिये कर मालासे केवल अनुरोमकेही मानुसार जप करे ।। ४० ।। पुंम प्रजपेदेवि शिवसम्भवमालया। शक्तिमंत्र जपेदेवि शक्तिसम्भवमालया ॥ ४ ॥ हे देवि । शिरमालाद्वारा पुमत्राप और शक्तिमालाद्वारा शक्तिमत्र नपना चाहिये ॥१॥ " (२१) भापारीकासमेतम् । चंद्रमंत्र जपेद्देवि तथैवं वेदमातरम् । सावित्री प्रजपेदेवि करेण शिवमालया ।।४२ ॥ चन्द्रमन्त्र जपेद्देवि कराद्वा शक्तिमालया। सावित्रीजपने शस्ता सर्वदा करमालिका ॥ स्फाटिकीमौक्तिकी कौशीशस्तास्याच्छंखसम्भवाः हे देवि ! चन्द्रमंत्र और वेदमाता सावित्रीका मंत्र करद्वारा जपे और शिवमालासे सावित्रीके मत्रका नप और करद्वारा तथा शक्ति माला चन्द्र का जपे । सावित्रीके मंत्र जपनेमें करमाला अथवा स्फटिकनिर्मित मोतियोंकी कौशी अर्थात् कुशनिर्मित और शंखनिर्मित मालाभी श्रेष्ठ है ।। ४२ ॥ ४३ ॥ वैष्णवे तुलसीमाला गजदन्तर्गणेश्वरे । त्रिपुराजपने शस्ता रुद्राक्षे रक्तचन्दनः॥ ४४ ॥ वैष्णवमंत्रके अपनेमें तुलसीको माला और गणेशजीका मंत्र जपनेमें गजदन्तरचित माला श्रेष्ठ है रुद्राक्ष और रक्तचन्दननिर्मित माला त्रिपुरा देवीके जपमें उत्तम है ।। ४४ ॥ श्मशानोद्भवधत्तूरबीजेधूमावतीजपे। करपर्वसमुद्भूतनाड्या संग्रथिता सती॥ ४५ ॥ और धूमावतीका मंत्र जपनेमें श्मशानोत्पन्न धतूरेकी माला श्रेष्ठ होती है हे महेश्वारे ! करपर्वनिर्मित माला नाडीद्वारा गूंथी जाकर ॥ ४५ ।। शस्ता च बगलामुख्याः सत्यं सत्यं महेश्वरि । असङ्कल्प्यत्व सत्यं स्यान्न्यूनाधिकमथापिवा । न सम्यक्फलभाग्भूयात्तस्मानियमममाचरेत् ॥४६॥ बगलामुखीके मंत्र नपनेमें श्रेष्ठ होती है. हे देवि ! यह मैंने तुमसे सत्म ही कहा है । बिना संकल्प किये जो जप कियाजाताहै अथवा नियमसे (२२) योगिनीतन्त्रम्। कम वा अधिक जो जप कियाजाता है. तो उससे सम्यक् प्रकार फलका भागा नहीं होता, इस कारण नियम बाँधकर जप करें || ४६ ॥ ताम्रपान सर्वञ्च सतिलं जलपूरितम् ॥ ४७ ॥ सकुशं सकलं देवि गृहीत्वाचम्य कल्पतः। अभ्पर्य च शिरपझे श्रीगुरुं करुणामयम ॥४८॥ यक्षाशावदनो वापि देवेन्द्राशामुखोऽपि वा। मासं पक्ष तिथिञ्चैव देषपर्वादिकं तथा ॥ ४९ ॥ आद्यन्तकालमुच्चार्य गोत्रं नाम च कामिनाम् । कर्माण्यद्य करिष्येऽहमशान्यामुत्सृजेत्पयः॥५०॥ सतिल, सदूर्वादल, जलपूरित, सकुश और फलसहित ताम्रपान ग्रहणपूर्वक विधिके अनुसार आचमन और शिरःपद्ममें करुणामय गुरुकी अर्चना करके कौबेरी अर्थात उत्तरदिशामें वा देवेन्द्राशा अर्थात पूर्व दिशामें मुख करके मास, पक्ष, तिथि और देवपर्वादि एवं आद्यन्त काल और यजमानका गोत्र तथा नाम उच्चारणपूर्वक " मै किया जप, करूंगा यह कहकर ईशानकोणमें जल छोड्दे ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ १९ ॥ ५० ॥ चान्द्रः सौरस्तु सर्वत्र चान्द्रः स्यातिथिचोदने । चान्द्रोऽपि मुख्यः सर्वत्र गौणस्तु क्रूरकर्मणि ॥५१॥ चाद और सौरकाल सर्वत्र ही प्रशस्त है, किन्तु तिथिनिर्णयमें चान्द्रकाल प्रशस्त है चान्द्रकाल भी सर्वत्र मुख्य है, किन्तु क्रूरकर्ममें गौण है || ५१ ॥ ऋणदाने तथा दाने प्रौष्ठपद्यादिषु प्रिये। मासोनाक्षविकः प्रोक्तः सावनी वर्षपर्वणि ॥ ५२ ॥ ऋणदान और दानमें तथा प्रौष्ठपधादिमें नापत्रिक अर्थात् नक्षत्रसे होनेवाला मास उक्त होता है सावनमास वर्षपर्वमें उक्त होता है ॥५२॥ 11

भाषाटीकासमेतम् । (२३)
एवं युगे युगे प्रोक्त कलौ सारस्तु सर्वतः ।
सौरे मासि शुभा दीक्षा न चान्द्रे न च तारके ॥५३॥
न सावनो महेशानि यस्मात्सा विफला भवेत् ।
क्रियावती वेदमयी चान्द्रमासेऽपि शस्यते ॥ ५४ ॥
इस प्रकार युगयुगमें उक्त होता है, कलियुगमें सर्वत्र ही सौरमास उक्त
होताहै, सौरमासमें दीक्षा कल्याणदायिनी होतीहै चान्द्र वा नाक्षत्रिक अथवा
सावन मासमें दीक्षामा विधान नहीं है। क्योंकि इन सर मामोंमें दीक्षाग्रह
णसे कुछ फल नहीं होता,वेदमयी क्रिया चान्द्रमासमें भी श्रेष्ठ है ५३॥५४
शुक्लपक्षे शुभ सर्वमशुभं च सितेतरे ।
प्रातःकालं समारभ्य यावन्मध्यदिनं रखें।
तावत्कर्माणि कुर्वीत यः सम्यक्फलमीहते ॥ ५५ ॥
शुलपक्ष सर्वत्र ही शुभ है और कृष्णपक्षको सर्वत्र अशुभ जाने । जो
सम्यक् प्रकार फरकी कामना करे,वह प्रात कालसे आरंभ करके मध्याह-
पर्यन्त सब कार्य करे ॥ ५५ ॥
क्रूरकर्माणि कुर्वीत शेषेऽपि परमेश्वरि ।
गते तु प्रथमे यामे तृतीयप्रहरावधि ॥ ५६ ।।
हानि.
हे परमेश्वरि ! क्रूरकर्म शेषमें भी करनेसे कोई हानि नहीं है, प्रथम
प्रहर गत होनेपर तृतीययामपर्यन्त ॥ ५६ ॥
कालो नक्तं जपस्योक्तः पूजाकालमितः शृणु ॥
अर्द्धयामे गते नक्तमर्द्धयामे स्थिते सदा।
पुजाकाली भवेद्यामश्चतुर्वर्गप्रदः सदा ।। ५७ ।।
श्लिष्टे द्वे घटिके ये तु रात्रेमध्यमयामयोः।
सा महारात्रिरुदिष्टा तत्कृतंकर्म चाक्षयम् ॥ ५८ ॥

(२४) योगिनीतन्त्रम। यद्यज्जातं हुतं यद्यत्कृतं वा मोक्षसाधनम् । नत्सर्वमक्षयं याति तथानन्त्याय कल्पते ॥ ५९ ।। जपका प्रशस्त काल कहा, अब पूजाका समय सुनो । रात्रिका अर्द्ध याम पातनेपर अद्धयाम स्थितिपर्यन्त पूजामा काल है, इस कालमें पूजा करनेसे चतुर्ग धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं । रात्रिके मध्ययामको जो दो पड़ी शेष रहती हैं, उन्हीको महा- रात्रि कहते हैं, महारात्रिमं जो कम किया जाता है, वहीं मोक्षदायक होता । वही सब फल अक्षय होता है और अनन्त पुण्यफलप्रदान कर सकत हे ।। ५७ ॥ ५८ ।। ५९ ।। न नक्तो वैष्णवे सौरे महासोरे च पैतृके । मध्याहं च विना देवि शशाद्धग्रहणाद्विना । दीक्षा कार्या प्रयत्नेन शुक्लपक्षविभेदतः॥६० ॥ वैष्णचकर्म, सौरकर्म, महासौर और पैतृय कर्म रात्रिकालमें करना उचित नहीं ह, हे ददि ! मध्याह्नके अतिरिक्त. चन्द्रग्रहण के अतिरिक्त शुक्ल और कृष्णपक्षके भेदमें यत्नसहित दीक्षा कार्य करे ॥ ६ ॥ मुक्तिकाम. कृष्णपक्षे भुक्तिकामः सिते तथा । भूलिकामेन कर्स य: कृष्णस्थात्पश्चमीदिनात् ।।६१॥ मुक्तिकी कामना करनेवाला मनुष्य कृष्णपक्षमें और भोगकी अभिलाया करनेवाला मनुष्य शुक्लपक्षमें तथा ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाला मनुष्य कृष्णपक्षी पचमीके दिनसे आरम करने कार्य करे || ६१ ॥ शुभकाले शुभ कुर्यादशुभं चापि दुखितः । उपरागे महातीर्थे कालदोषो न विद्यते ॥ २ ॥ शुभकालमें कार्य करनेसे समस्तही शुभ होता ह आतुर मनुष्य अशुभ कालमें भी कर्म करे ग्रहणकाल और महातीर्थम कालदोष नहीं माना जाता ।। ६२ ।। .

भापाटीकासमेतम् । वाराणस्यां विशेषेण सर्वदा सर्वमाचरेत् । सदा कृतयुगं तत्र सर्वदा चोत्तरायणम् ।। ६३ ।। विशेष करके वाराणसीमें सदाही सब काँका अनुष्ठान करे । वहां सदाही सत्ययुग और सदाही उत्तरायण है ॥ ६३ ॥ अविशेषो दिवा रात्रौ सन्ध्यायां च महानिशि । प्रत्यक्ष दृश्यते वहौ मूर्त्या वर्ते पुनः शिवे । काश्याश्च नोदेति कदा सिद्धियोगो वरानने ॥ ६ ॥ विशेषतः दिन रात्रि और संध्या तथा महानिशा इन सबको वहा अवि- शेष अर्थात् समानरीतिसे पुण्यदायक जाने । हे शिवे! वहा यहिमें मूर्त्यावर्त प्रत्यक्ष दिखाई देता है. हे वरानने ! काशीमें कब सिद्धियोग उदय नहीं होता । अर्थात् काशीमें सदैव सिद्धियोग रहता है ॥६४ ॥ द्वित्रिभ्यां क्रोशतः काशी पश्चक्रोशीभवान्तरे । आयामे विस्तरे देवि नित्येयं नित्यदा शुभा ॥६५॥ दो तीन कोशव्यापी काशीका अपस्थान और भावान्तरमें पंचकोशी याने । हे देवि ! दीर्घ और विस्तारमें यह काशी नित्या और नित्यकाल शुभदायिनी है ॥ ६५ ॥ इयं निर्वाणनगरी परंज्योतिर्मयी शिवे । ब्रह्मांडं स्थापयेत्तत्र सकूटं वस्तु मानवम् ॥६६॥ हे शिवे । यह काशी निर्वाणनगरी और परमज्योतिर्मयी है इसमें कूट- वस्तु और मनुष्यके सहित ब्रह्माण्ड स्थापित है ।। ६६ ।। यत्र भ्रमणतो देवि ना निर्वाणमवाप्नुयात । सर्वस्वेनापि कर्त्तव्यं वाराणस्यां द्विजार्पणम् ॥ ६७ ॥ इसमें भमण करनेसे मनुष्य निर्वाणमुक्ति पाता है, वाराणसीमें सर्वस्व दान करके भी ब्राह्मणको संतुष्ट करना चाहिये ॥ ६७ ।।

(२६)
योगिनीतन्त्रम् ।
वाराणस्यां द्विजे दानं ब्रह्मयोग रतिस्तथा ।
निष्कामकर्मबन्धश्च सर्व निर्वाणकारणम् ॥ ६८ ॥
वाराणसीमें ब्राह्मगको दान, अभयांगमें प्रीति, और निष्कामकर्म, यह
सब निर्वाण मुक्ति के कारण हैं ।। ६८ ॥
गंगादिमुक्तिक्षेत्रादौ ज्ञानादेयोंगतस्तथा ।
मृत पूतं नयेत्काशी मुक्तिं मदुपदेशतः ॥ ६९ ॥
न वासोन्यत्र मे यस्मान मुक्तिः काशिकां विना ।
तत्र यद्यत्कृतं कर्म तदनन्तफलप्रदम् ॥ ७० ॥
गंगादि मोक्षपद क्षेत्रादिमें ज्ञानादियोगसे मुक्ति होती है, किन्तु मेरे
उपदेशसे काशी मरे मनुष्यको भी पवित्र करके मुक्तिपदान करती है काशीमें
मेरा वास है, काशीके अतिरिक्त कोईभी मुक्ति देने में समर्थ नहीं है, उसमें जो
ओ कर्म किये जाते हैं,उनसे अनन्तफल प्राप्त हो सकता ॥ ६९ ॥ ७० ॥
अक्षयं हि भवेत्सर्व दृढां सिद्धिमवाप्नुयात् ।
तत्र सांयोगिकं पुण्यं तत्र चैव विमुच्यते ॥ ७१ ।।
तबाह तत्वरूपेण पुष्णामि त्वन्यथा नहि ।
स्वल्पत्वे तियिकालस्य क्रियाकालगतिर्भवेत् ॥
काले खलु समारभ्य त्वकालपि समापयेत् ॥ ७२ ।।
काशीमें किये सभी कर्म अक्षय होते हैं. काशीमही दृढा सिद्धि प्राप्त
होती है, हे शिव ! उसीस्थानमें संयोगिक पुण्य, उसीस्थानमें मुक्ति और
उसीस्थानमें मैं तदासस्वरूपमें पुष्ट होता है, इसमें अन्यथा नहीं है, यदि
तिथिकाल स्वलय हो और इस कारण क्रियाकाल बीतजाय तो कालमें
आरम करके अकालमें समापन करनेसे उसमें दोपका स्पर्श नहीं होता
॥ ७२ ॥ ॥ ७२ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२७) सन्ध्यायां पतितायान्तु गायत्री दशधा जपेत् । ततः कालोचितां सन्ध्यां कृत्वा कर्म समापयेत्॥७३ इत्येवं कथितं तुभ्यं यत्पृष्टं गिरिसम्मवे । इतः परतरं किञ्चित्तव्यास्तव मानसे ।। ७४ ॥ संध्याके पतित होनेपर दशवार गायत्री जपे फिर कालोचिता संध्या करके कर्मसमापन करना चाहिये । ॥ ७३ ॥ हे पर्वतनन्दिनी ! तुमने जो पूछा था. मैने वह सब कहा; इससे अधिक जो तुम्हारे मनमें विद्य- मान हो, सो प्रकाश करके कहो ॥ ७ ॥ इति सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे श्रीयोगिनीतन्ने देवीस्वरसम्वादे भापाटीकायां चतुर्विशतिसाहस्ये द्वितीयः पटलः ॥ २॥ श्रीदेव्युवाच । भगवन्प्रमथाधीश देवदेव जगद्गुरो। युद्धस्य वारणं देव ज्वरदिर्धारणं तथा ॥१॥ क्षिप्रं भवेत्कथं नाथ कृपया परया वद । नाशुत्राता च जगतां त्वां विना परमेश्वर ॥२॥ श्रीदेवीजीने कहा-हे भगवन् ! हे प्रमथाधीश देवदेव जगद्गुरो शंकर ! युद्ध और ज्वरादिका निवारण ॥ १॥ किस प्रकार शीघ्र संपादित होता है, यह मुझसे कृपापूर्वक वर्णन कीजिये । हे नाथ ! हं देव ! हे परमेश्वर ! आपके अतिरिक्त नगत्का शीघ्र रक्षाकरनेवाला कोई नहीं है ॥ २ ॥ ईश्वर उवाच । कथयामि तव स्नेहाकवचं वारणं महत् । युद्धस्य च स्वरादेश्व क्षिप्रं हि नगनन्दिनि । प्राकृतेनैव वाक्येन कथयामि शृणुष्व तत् ॥३॥ " (२८) योगिनीतन्त्रम। ईश्वर पोले-हे पर्वतनन्दिनी ! मैं तुम्हारे स्नेहसे वशीभूत होकर युद्ध और ज्वरादिका शीघ्र निवारण करनेवाला महत्वच प्राकृत वचनोंमें कहता हूं, सो सुनो ॥ ३ ॥ ॐनमो भगवति वजशेखले हन्तु भक्षतु खादतु अहोरक्तं पिब कपालने रक्ताक्षि रक्तपटे भस्माक्षि भस्मलितशरीरे वजायुधप्रकरनिचिते पूर्वान्दिशं बध्नानु दक्षिणान्दिशम्बनातु पश्चिमान्दिशम्बध्नातु नागार्थ धनाय ग्रहपतीन् बनातु नागपटौं बनातु यक्षराक्षसपिशाचान वनात प्रेतभूतगन्धर्वादयो ये ये केचित् पुत्रिकास्तेभ्योरक्षतु उर्ध्व रक्षतु अधो रक्षतु स्वनिकांचनातु जलमहाबले एोहि तु लोटि- लोष्टि शतावलि वजानिवज्रप्रकरे हुँ फट् हीही श्रीफट हुँहुळूफ सर्वग्रहेभ्यःसर्वदुष्टोपद्रवेभ्यो ह्रीं शेषेभ्यो मां रक्षतु॥४ाइतीदं कवचं देवि सुरासुर- सुदुर्लभम् । प्रहज्वरादिभूतेषु सर्वकर्मसुयोजयेत्॥५॥ हे देवि ! इस सुरासुरदुर्लभ कवचको ग्रहज्वरादिमें एवंभूतगणों में और सब कार्यों ही संयोजित करे ॥ ४ ॥ ५ ॥ न देयं यत्र कुत्रापि कवचं मन्मुखान्च्युतम् । दत्ते च सिद्धिहानिः स्याद्योगिनीनां भवेत्पशुः ॥६॥ दद्याच्छान्ताय वीराय सत्कुलीनाय योगिने । सदाचाररतायव निर्जिताशेषशत्रवे ॥७॥ हे शिवे ! मेरे मुखसे निकला हुआ यह कवच जहां तहा नहीं देना चाहिये, देनेसे सिद्धिकी हानि होती है और वह योगिनीगणोंका पशु

भाषाटीकासमेतम् ।
(२९)
होता है ॥ ६ ॥ शान्त, वीर, श्रेष्ठवंशोत्पन्न योगी सदाचारनिरत.
निर्जितशत्रु अर्थात् जिसने शत्रुओंको जीतलिया है, ऐसे मनुष्यको यह
देना चाहिये ॥ ७ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
श्रुतं हि कवचं दिव्यं त्वन्मुखाम्भोजनिर्गतम् ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि जगद्वश्यकरं परम् ।। ८ ।
श्रीपार्वतीजी बोलीं-हे देव ! आपके मुखकमलसे निकला हुआ दिव्य
कवच मैने सुना, अब अतिउत्तम जगद्वश्यकर मन्त्र कर्मादिके सुननेकी
इच्छा करती हूं ॥ ८ ॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि जगन्मोहकरं महत् ।
नारदेन पुरा पृष्टं मयि कैलासमूर्द्धनि ।
कथितं कवचं तस्मै सवमोहकरं मया ॥९॥
ईश्वर बोले-हे देवि ! महत् जगत्मोहकर कवच कहता हू, सुनो
पहिले कैलासशिखरमें नारदजीने मुझसे यह विषय पूछा था, उनसे मैने
सर्वमोहकर कवच कहा था ॥ ९ ॥
तेनैव कवचेनैव नारदो ब्रह्मसम्भवः ।
मोहयामास लोकांस्त्रीन्मित्वा हि कलहप्रियः ॥१०॥
उन कलहप्रिय ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारदजीने उस कवचसेही त्रैलोक्य-
मण्डल भेदकरके मोहित किया था ॥ १० ॥
तदसम्भवमालोक्य विष्णुराह विधेः सुतम् ।
कथं वा मोहितं सर्व पद मे कारणं मुने ॥११॥
उनका यह असम्भन कार्य देखकर विष्णुजीने सन ब्रह्मनन्दनसे कहा
हे मुन ! तुमने किस प्रकारसे इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित किया इसका
कारण कहो ॥ ११ ॥

(३०) योगिनीतन्त्रम्। तत्सर्वमभवद्विष्णौ विष्णुराह समुद्रजाम् । कैलासशिखरासीनं महादेवं जगद्गुरुम् । पप्रच्छ नारदो धीमानसर्वलोकहिते रतः ॥ १२ ॥ विष्णुजीने उन मुनिके निकटसे वह सब प्राप्तकर क्षीरोदनंदिनी ( लक्ष्मी ] से कहा था और सब लोकोंके हितमें निरत बुद्धिमान् नारदजीने कैलासशिखरपर बैठे हुए जगद्गुरु महादेवजीसे पूछा ॥ १२ ॥ नारद उवाच । कालिका या महाविद्या वर्ण्यतां महती प्रभो । किमतस्याः फलं देव किमेतन्मोहनं भवेत् । केनोपायेन समरे आणं मे वद शंकर ॥ १३ ॥ नारदजी बोले-हे प्रमो शंकर | महनी कालिका महाविद्या वर्णन कीजिये । हे देव ! इसका फल क्या है ? यह मोहन कैसा है ? किस उपायसे समरमें रक्षा होती है ! यह सर कहिये ॥ १३ ॥ ईश्वर उवाच । त्रिकाले गोपितं देवि कलिकाले प्रकाशितम् । काली दिगम्बरी देवी जगन्मोहनकारिणी । ततृणुष्व मुनिश्रेष्ठ त्रैलोक्ये मोहनं त्विदम् ।। १४ ॥ ईश्वर बोले-हे देवी! यह सत्य, प्रेता और द्वापर इन तीनों युगमें प्स था कलिकालमें प्रकाशित हुआ है । दिगम्बरी काली देवी जगमो. इनकारिणी है. हे मुनिश्रेष्ठ ! यह वहीं त्रैलोक्यमोहन सुनो ॥ १४ ॥ अस्प कालभैरवऋपिरनुष्टुप् छन्दः- श्मशानकाली देवता सर्वत्र मोहने विनियोगः भाषाटीकासमतम् । (३१) इसके कालभैरवऋषि, अनुष्टुप् छन्दः श्मशानकाली देवता और सर्वत्र मोहनमें इसका विनियोग है ॥ १५ ॥ "ऍहींहहः स्वाहा विवादे पातु मां सदा । कोंदक्षिणकालिकादेवतायै सभामध्ये जयप्रदा।।१६।। हीहीश्यामाङ्गि शत्रु मारय मारय कोंक्ती त्रैलोक्यं वशमानय ही हों की मां रक्ष रक्ष । विवादे राजगेहे च द्वाविंशत्यक्षरा परा ॥ १७ ॥ ब्रह्मराक्षसवेतालात्सर्वतो रक्ष मां सदा । कव जितं यत्र तत्र मां पातु कालका। सर्वत्र रक्ष मां देवि मम मातृस्वरूपिणी ॥ १८ ॥ इत्येतत्परमं मोहं भवद्भाग्यात्प्रकाशितम् ॥ १९॥ हे देवि! तुम्हारे भाग्यसेही यह परम मोहन प्रकाशित हुआ है ॥ १६ ॥ १७ ॥ १८॥ १९॥ सदा यस्तु पठेद्वापि त्रैलोक्यं वशमानयेत् ॥ २० ॥ जो मनुष्य इसका सदा पाठ करता है, वह तीनों लोकको वशीभूत करने में समर्थ होता है ॥ २०॥ इदं कवचमज्ञात्वा पूजयेद्वीरकामिनीम् । सर्वदा स महाव्याधिपीडितो नात्र संशयः । अल्पायुः स भवेद्रोगी कथितं तव नारद ॥ २१ ॥ इस कवचको विना जाने जो वीर कामिनीकी पूजा करता है, यह महाव्याधिग्रस्त होकर पीडित, अल्पायु और रोगी होता है, इसमें सन्देह नही हे नारद ! मैने यह तुमसे कहा ॥ २१ ।। धारणं कवचस्यास्य भूर्जपत्रे विशेषतः । समन्त्रकवचं धृत्वा इच्छासिद्धिः प्रजायते ॥ २२ ।। , -

(३२)
योगिनीतन्त्रम् ।
विशेषत. भोजपत्रपर लिखकर यह कवच मन्त्रसहित धारण करनेसे
इष्टसिद्धि प्राप्त होती है ।। २२ ॥
शुक्लाष्टम्या लिखेन्मंत्री धारयेत्स्वर्ण पत्रके ।
कवचस्यास्य माहात्म्यं नालं वक्तुं महामुने ॥ २३ ॥
मन्त्रवान् मनुष्य शुक्लाष्टमी में इस कवचको लिखके स्वर्णपत्रमें धरकर
इसको धारण कर । हे महामुने ! इस कवचका माहाल्य अनिर्वचनीय'
है ॥ २३ ॥
शिखायां धारयेद्योगी फलार्थी दक्षिणे भुजे ।
इदं कल्पद्रुमो देवि तव स्नेहात्प्रकाशिते ।
गोपनीयं प्रयत्नेन पठनीयं महामुने ॥ २४ ॥
योगी मनुष्य शिखामें और फलार्थी मनुष्य इसको दाहिनी भुजामें
धारण करे । हे देवि ! वह कल्पवृक्षके तुल्य कवच तुम्हारे स्नेहसे
प्रकाशित किया है इसको परमयत्नपूर्वक गुप्त रखकर सदा पाठ
करे ।। २४॥
विष्णुरुवाच ।
इत्येवं कवचं नित्यं महालक्ष्मि प्रगृह्यताम् ।
अवश्यं वशमायाति त्रैलोक्यं ते चराचरम् ॥ २५॥
शिवेन कथितं पूर्व नारदाय फलेप्सवे ।
तत्पाठान्नारदेनापि मोहितश्च चराचरम् ॥ २६,
विष्णुजीने कहा-हे महालक्ष्मी ! इस नित्य कवचको तुम ग्रहण करो
चराचर त्रैलोक्य अवश्य तुम्हारे वशीभूत होगा ॥ २५ ॥ पहिले महा-
देवजीने इसको फलकामी नारदसे कहाथा, नारदने इस कवचका पाठ
करके चराचरको मोहित कियाथा ॥ २६ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
पुरा मुने जगद्वन्ध प्रमश वरप्रद ।
नराणामुपकारार्थ ब्रूहि योग मुविस्तरम् ॥ २७ ॥

भापाटीकासमेतम् । येनाशु लभते राज्यं येनाशु लभते सुतम् । यनाशु लभते ज्ञानं येनाशु लभते धनम् । येनाशु लभते कीर्ति येनाशु लभतेऽखिलम्॥२७॥२८॥ श्रीपार्वतीजी बोली-हे पुरातनमुने! हे जगद्वन्ध ! हे वरप्रद ! हे प्रमथेश ! मनुष्योंके उपकारार्थ जिसके द्वारा तत्काल राज्यलाभ, पुनलाभ, ज्ञानलाभ, धनलाभ, कीर्तिलाभ और जिसके समस्त ही लाभ ही वही योग द्वारा विस्तरसहित वर्णन कीजिये ।। २७ ॥२८॥ ईश्वर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्मांत्वं परिपृच्छसि । उक्तं फेत्कारिणीतन्त्रे नीलतन्त्रे च विस्तरात् ॥२९॥ महादेवजी बोले- हे देवी ! तुमने मुझसे जो पूछा, वह कहता हूं, सुनो, फेत्कारिणतंत्र और नीलतंत्रमें यह विषय विस्तारसहित कहा है ।। २०॥ इदानी विस्तरादेवि कथयामि शुचिस्मिर्ते । उदेति पश्चिमे भानु श्चन्द्रः पतति भूतले । यदि शुष्यति पाथोधिन मिथ्या च कदा च न ॥३०॥ हे शुचिस्मिते ! अब मैं तुम्हारे प्रति वह विस्तारसहित वर्णन करता हूं सुनो । यद्यपि पश्चिम दिशामें सूर्य उदय हो, चन्द्रमा यद्यपि पृथ्वीमें गिर पडे, समुद्र यद्यपि सूखजाय किन्तु तो भी यह सब वचन कभी मिथ्या नहीं होंगे ॥ ३०॥ योगराजो महेशानि त्वन्वर्थोऽयं सदैव हि ॥३१॥ विष्णुचक्रं यथा व्यर्थ त्रिशुलश्च यथा मम । कुलिशं देवराजस्य तथा योगो मयोदितः॥३२॥ हे देवि ! यह योगराज सदा ही अव्यर्थ है , विष्णुका चक्र मेरा ३

,
योगिनीतन्त्रम् ।
त्रिशूल और देवराज इन्द्रका वज जिस प्रकार भव्यर्थ है, ऐसे ही इस मेरे
कहे योगको भी अव्यर्थ जानना चाहिये ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
यथैव निश्चितं देवि ब्रह्मणः कमलासनम् ।
तथैव निश्चितो देवि योगोऽयं नात्र संशयः ॥३३॥
हे देवि । ब्रह्माजीका कमलासन जिस प्रकार निश्चित है. इसी प्रकार
इस योगको निश्चित जानना इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३३ ॥
कल्पवृक्षो यथा देवि ह्याकांक्षापारपूरकः।
अयं योगवरो देवि तथैव परिकीर्तितः ॥ ३४ ॥
हे देवि । कल्पवृक्ष जिस प्रकार आकाक्षाका पूर्ण करनेवाला है, इस
उत्तम योगको भी उसी प्रकार वासनापूरक जाने ॥३४॥
राज्यार्थञ्च कुलार्थश्च सुतार्थ स्वर्णपत्रके ।
आयामप्रस्तृते देवि षोडशाइगुल सम्मिते ॥३५॥
हे देवि ! राज्यार्थ, कुलार्थ और सुतनिमित्त लम्बाई चौड़ाई में सोलह
अगुल परिमाणवाले स्वर्णपत्रके ऊपर ।। ३५ ॥
यज्ञार्थश्च धनार्थश्च कीर्त्यर्थ राजते शुभे ।। ३६ ॥
यज्ञार्थ धनार्थ और कीर्तिके निमित्त चादीके पत्रपर ॥ ३६ ॥
तथा मानमितो देवि तद्वत्ताने विनाशने ।
स्वणे वा परमेशानि अन्यार्थ भूर्जपत्रके ॥ ३७॥
सन्मान वा साम्यताके निमित ताम्रपत्र और अन्य कार्य की सिद्धिके लिये
स्वर्णपत्र वा भोजपत्रपर ।। ३७ ॥
लिखेन्मन्त्रं वरारोहे तारिण्याः सर्वसिद्धिदम् ।
राज्यार्थी च धनार्थी च पुत्रार्थी कीर्तिकामिकः॥३८॥
सर्वसिद्धिप्रद तारिणीकामन रिख । हे वरारोहे ! राज्यार्थी, धनार्थी
और पुनार्थी कीर्तिकी कामना करनेवाला ॥ ३८॥

भापाटीकासमेतम। वित्तार्थी विलिखेदेवि लेखन्या सुमनोहरम् ॥ ३९ ॥ स्वर्णयष्टयाप्टाइगुलया कनिष्ठायाः प्रमाणतः । ज्ञानार्थ कुशमूलेन त्वन्यार्थ दूर्वया लिखेत् ॥ ४०॥ और ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाला मनुष्य कनिष्टाप्रमाण अष्टागुल स्वर्णले- खनीद्वारा यह मंत्र मनोहर रीतिसे लिग्वे । ज्ञानकी इच्छा करनेवाला कुश. मूल और अन्यकामना चाहनेवाला दूर्वाद्वारा लिव ॥ ३९ ॥ ४०॥ आचम्य पुरतो देवि नत्वा च गुरुपादुकाम् । उत्तराशामुखो भूत्वा पृजयित्वा च तारिणीम् ॥४॥ है देवि ! प्रथम आचमन करके गुरकी पादुकाको नमस्कारपूर्वक उत्त- रकी ओरको मुखकरके तारिणीदेवीकी पूजा करे ॥४१॥ कुकुम रोचना जटामांसी चन्दनमेव च । लाक्षा कस्तूरिकाश्मीरं सिन्दूरं च वरानने ॥ ४२ ॥ फिर हे वरानने ! कुंकुम (रोसी) गोरोचना, वालउड, चन्दन, काश्मीर (केशर ) कस्तूरी, लाख और सिन्दूर ॥ ४२ ॥ सर्वमेकीकृतेनादौ षट्कोणं चक्रमालिखेत् । तन्मध्ये विलिखेत्तारा सार्द्धवेदाक्षरी पराम् ।। ४३ ॥ सार्द्धपञ्चाक्षरी वापि तन्मयो वेदिमध्यगम् । साध्यं तत्र लिखेत्साध्यं शृणुत्वं शम्भुवल्लभे ॥ ४४ ॥ यह सब वस्तु एकत करके प्रथम पट्कोण चक्र लिखे, तिसमें अत्यन्त उत्कृष्ट सार्द्धवेदाक्षरी ( साढे चारअक्षरवाली) अथवा सार्द्धपश्चाक्षरी ( साढेपाच अक्षरवाला ) तारादेवीका मंत्र लिवे, तदनन्तर हे शंभुवल्लभे ! इस चक्र के मध्यवेदीमें साध्य विषय अर्थात् वाछित विषय लिख साध्य विषय सुनो ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ .

योगिनीतन्त्रम। अमुकस्थामुकं वाक्यं वशीकुरुच कुर्विति ॥ ४५ ॥ अमुकल्यामुकं वाक्यं वशीकुरु कुरु । अमुकस्यामुळं ज्ञानं सिद्धि . अमुकीनां शुभं पुत्रमुत्पादयोत्पादयेति च । अमुकल्यामुक द्रव्यं देहि देहीति कामिनि ॥ ४६॥ एवमेव क्रमेणैव साध्यं संल्लिख्य यत्नतः। क्लीवहीनान्दीर्घवर्णान्पटकोणे षट्समालिखेत् ॥४७ ॥ इस प्रकार क्रमश यत्नपूर्वक साध्य लिखे, इस पट्कोणम क्लीव हीन दीर्घ वर्णलिग्वे ।। ४६ ॥ ४७ ।। वृत्तमष्टदलं पा सुदृष्टं सुमनोहरम् । अष्टपत्रं लिखेत्तत्र किंजल्कयुगलं युगंम् ।। ४८ ॥ अष्टपत्रे चाष्टवान्वक्ष्यमाणाल्लिखेत्ततः। वाग्भवं भुवनेशानी काम हुँ प्रणवं तथा ।। १९ । मायामन्त्र ततः स्वाहापूर्वादि क्रमतो लिखेत् । चतुरस्त्रं चतुरमेवं यन्त्र समालिखेत् ॥ ५० ॥ इसके पीछे अष्टदल गोलाकार युगलमें युगल रिजरूयुक्त मनोहर पद्म और अष्टपत्रमें अष्टवर्ण लिखे । पूर्वादिक्रमसे वाग्भय, भुवनेशानी काम, प्रणव (ओम् ) एवं मायामत्र और स्वाहा लिम्वना चाहिये चतुष्कोण चतुर्दारयुक्त इस प्रकार यंत्र लिखे ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ज्ञानातौ सिद्धिकार्येषु अन्यत्र त्वमृतोदये। शुरौ शुक्रे तथा सोमे मङ्गले वा बुधेति च । ताराया सानुकूलायां जपेन्मत्रं समाहितः॥५१॥ हुँ भाषाटीकासमेत् । (३७) ज्ञानप्राप्ति और अन्य सिद्धिक विषयमें एवं अन्य शुभकार्यमें, गुरु शुक्र, सोम, मङ्गल वा बुधवारमें अनुकूल तारामें सावधानचितसे मंत्री जपे ॥ ५१ ॥ पीतवस्त्रेण संवेष्टय जंतुना परिवेष्टयेत । पट्टवस्त्रण रक्तेन बध्नीयात्साधकोत्तमः॥ ५२।। हे पार्वती ! पीतवस्त्र और लाक्षासे यह मंत्राधार पात्र वेष्टन करे। साधकोत्तम उसको लालवर्णके रेशमी वस्त्रसे बांध देदे ॥ ५२ ॥ स्वर्णपीठेषु संस्थाप्य संख्यानन्त्वाचरेत्कृती। भूमिस्पृष्टं न चेत्कुर्यान निर्माल्येन संस्कृतम् । विदीर्ण लडितं वापिनैव कुर्यात्कदाचन ॥ ५३ ।। आयामे प्रस्तुते देवि षोडशाङ्गुलमानतः । घटं कुर्यात्प्रयत्नेन सर्वदृष्टिमनोहरम् ।। ५४ ॥ अनन्तर कृती मनुष्य स्वर्णपीठमें उसको स्थापन करके संख्यान अर्थात् योग वा जप संख्या आरंभ करे, उसको की पृथ्वीका स्पर्श वा शिवनि- माल्यका स्पर्श न करावे तथा विदीर्ण न करे. उसको उल्लंघकर जाना भी उचित नहीं है । ह देवि ! लम्बाई और विस्तारमें सोलह अंगुलपरिमाण सर्वजनमनोहर घट यत्नपूर्वक स्थापन करे ॥ ५३ ॥ ५४ ।। राज्यार्थी काश्चनेनैव पुत्रार्थी रजतेन च । तामेण चैव युद्धार्थी मृदान्यत्र घटश्चरेत् ॥ ५५॥ राज्यकी कामना करनेवाला सुवर्णद्वारा, पुत्रकी इच्छा करनेवाला रजत (चांदी) द्वारा, युद्धकी अभिलाषा करनेवाला तामद्वारा और अन्य कामना करनेवाला मृत्तिका (मिट्टी) द्वारा घट प्रस्तुत करावे || ५५ ।। तत्र मुक्ता प्रवालानि माणि रजतकाश्चने । धान्यं छित्वा मुखं तस्य पल्लवैः प्रतिपादयेत् ॥५६॥ -

(३८)
योगिनीतन्त्रम् ।
इस घटमें मणि, मोती, मूंगा, चांदी और सुवर्ण तथा धान्य डाल
मुखमें पञ्चपल्लव प्रदान करे ॥ ५६ ।।
क्षोमयुग्मेन रक्तेन प्रच्छाद्य प्रयत: सुधीः।
अष्टाङ्गुल स्वर्णपत्रे चतुरस्त्रं समन्ततः ॥ ५७ ॥
तदुपरान्त रक्तवर्णके दो रेशमी वस्त्रोंसे यह घट यत्नपूर्वक ढकदे । फिर
अष्टांगुल स्वर्णवस्त्रको चारों ओरसे चौकोना कर ॥ ५७ ॥
तत्र मन्त्रं लिखित्वैवं घटे संस्थाप्य यत्नतः ।
चतुःपष्टयपचारेण यजेत्तारां परां शिवाम् ॥ ५८ ॥
उसपर मंत्र लिखकर इस घटमें यत्नसहित स्थापनपूर्वक चौसठ उपचा-
रोंसे शिवारूपिणी तारादेवीकी आराधना करे ॥ ५८ ॥
होमस्थाने कृते चतुर्विंशत्यगुलकल्पिते ।
अब्जकं पुष्पकं देवि पोडशच्छदमंडितम् ॥ ५९ ।।
किनकर्मण्डितं देवि बलिमादाय पूर्ववत् ।
निवेदयन्महाभक्त्या बलिमन्त्रेण मन्त्रवित् ॥ ६०॥
पञ्चामृतैः पञ्चगव्यैः स्नापयित्वा च पूजयेत् ।
अष्टोत्तरसहस्रन्तु हुत्वा साधकसत्तमः ।
तत्पुटोपरि देवेशि क्षिपेत्पुष्पाक्षतं तथा ॥ ६१ ॥
अनन्तर चौवीस अंगुल पारमाण होमस्थान निश्चित करके पोडशपत्र-
गोभित किजल्कमण्डित अजक पुष्प और बलिद्वारा पूर्ववत् महाभक्ति
क्त होकर मंत्रज्ञ व्यक्ति पलिमंत्रद्वारा पूर्ववत् निवेदन करे पञ्चगव्य और
पंचामृतसे स्नान कराकर पूजा करनी चाहिये । साधकश्रेष्ठ अष्टोत्तरसहस्र.
चार होमाहुति देकर हे देवेशि ! उस पुटके ऊपर पुष्पाक्षत निक्षेप
फरे ।। ५९ ॥ ६० ॥ ६१॥

भापाटीकासमेत ।
(३९)
भूमि ग्राममितां दद्याद्राज्यमिच्छति कामुकः ।
दक्षिणां युद्ध कामी च काञ्चनाश्वौ महेश्वरि ।। ६२ ॥
हे महेश्वार | फिर राज्याभिलाषी ग्रामपरिमिता भूमि युद्धार्थी दक्षिणा
और कञ्चनके बने दो अश्व ॥ ६२ ॥
शालग्रामाशिलामेको स्वर्णरेखाद्यलंकृताम् ।
ज्ञानसिद्धये प्रदद्यात धनार्थी गाश्च काञ्चनम् ॥६॥
ज्ञानार्थी स्वर्णरेखादिद्वारा अलंकृत एक शालग्रामशिला और धनकी
इच्छा करनेवाला गौ एवं सुवर्णकी दक्षिणा देवे ॥ ६३ ।।
भोजयेद्राह्मणान्धीरः कुमारीः कल्पपल्लवे ।
ततस्तु साधयेद्यन्त्रं पुरुषो दक्षिणे भुजे ॥ ६४ ॥
हे कल्पवृक्षके पत्तोंके समान कोमलभुजावाली ! इसके पीछे धीर पुरुष
ग्रामणभोजन और कुमारीभोजन कराये । फिर यह यंत्र पुरुष दक्षिण भुजामें
धारण करे ॥ ६४॥
नारी वामभुजे चैव शिशुवै कण्ठभागकं ॥६५॥
स्त्रिय वामभुजामें और बालक कण्ठमें धारण करे ॥ ६५ ॥
इत्येवं कथितं गरभ्यं न देयं प्राणसङ्कटे ।। ६६ ।।
हे पार्वती ! यह मैने तुमसे राज्यलाभादि मनोहर योग कहा ।
यह प्राणसंझट उपस्थित होनेपर भी किसी अनधिकारीको नहीं देना
चाहिये ॥ ६६ ॥
इति सर्वतन्त्रोत्तम श्रीयोगिनातन्त्रे देवीश्वरसम्बादे भापाटीकायां
चतुर्विशतिसाहले तृतीयः पटलः ॥ ३॥
श्रीदेव्युउवाच ।
देवदेव जगद्वन्द्य सुरासुरनमस्कृत ।
ग्दानी श्रोतुमिच्छामि वीरषट्कर्मसाधनम् ॥ १ ॥

- - योगिनीतन्त्रम् । धन्यं पुण्यवतां राज्ञा राज्यादिकवयोजुषाम् । स्त्रियास्तु सिद्धसंस्थानां सर्वभोगविलासिनाम् ॥२॥ श्रीदेवजीने कहा-हे सुरासुरनमस्कृत ! जगद्वन्ध देवदेव । अब मैं पुण्यवानोंका, राज्यादिव योभोगी ( अत्यन्त सौभाग्यवान् वृद्ध ) गणों का स्त्रियोंका. सिद्धसस्थगणोंका तथा सब भोगविलासियोंमें धन्य और ग्रहणीय पट्कर्मसाधन सुननेकी इच्छा करती हूँ ॥ १ ॥ २ ॥ श्रीईश्वर उवाच । शान्तिवश्यस्तम्भनानि विद्वेषोच्चाटने तथा । मारणं परमेशानि षट्कर्मेदं प्रकीर्तितम् ॥३॥ श्रीईश्वर ( महादेवजी) चोले-हे परमेशानि ! शान्ति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण उच्चाटन और मारण यही छै. कर पद कर्म कहें गये हैं।॥ ३ ॥ तारिणी कालिको छिन्नामधिकृत्य जगन्मये । कथयामि तव स्नेहाद्रुतसिद्विकरं परम् ।। ४ ।। हे जगन्मये ! तारिणी, कालिका और छिन्नमस्ता इनको अधिकार करके तुम्हारे प्रति स्नेहवशतः मै तुमसे शीघ्र सिद्ध कर करनेवाला परम विषय कहता हूँ ॥ ४ ॥ रतिर्वाणि रमा ज्येष्ठा मातङ्गी कुलकामिनी । दुर्गाचैव भद्रकाली कर्मादौ कर्मसिद्धये ॥ ५ ॥ रति, वाणी, रमा, ज्येष्ठा, मातंगी. कुलकामिनी, दुर्गा और भद्रकाली यह कर्मादिमें कर्मसिद्धिका निमित्त होती हैं ।। ५ ॥ षोडशेरुपचारश्च यजेद्वीरः स्वशक्तितः शून्यागार महारण्ये देवतायतनेऽपि वा ॥ ६ ॥ वीर मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार पोडशोपचारसे उनकी पूजा करे । शून्यागार, महारण्य या देवमन्दिर, ॥६॥ - .

करना भापाटीकासमेतम् । (४१) पञ्चकर्माणि कुर्वीत मारणन्तु शवोपरि । तदभावे पितृवने वासांसि कथयामि ते । ७॥ मुख्यं दिगम्बरं ज्ञेयं दीपिचर्म द्वितीयकम। तदभावे रक्तक्षोम नान्यद्वस्त्रं प्रकल्पयेत् ।। ८॥ प्रथमोक्त पाच कर्म करे, किन्तु मारणकर्म शोपरि ( मृतकदे पर) चाहिये । उसका अभाव होनेपर श्मशानभूमिमें मारण करे । वस्त्रका विषय कहता हूं, सुनो । मुख्य तो विश्वस्त्र ( नग्न ) है, दूसरा द्वीपिचर्म अर्थात् वाघी खाल है, इसके अभावमें लालवर्णका रेशमी वस्त्र ग्रहण करे, अन्य वस्त्र निषिद्ध है ॥ ७ ॥ ८ ॥ स्वर्णमादौ द्वितीय च राजतं स्तम्भने शिला । विद्वेषोच्चाटने तानं कपालं मारणे शुभम् ।। ९ । शान्ति सुवर्ण, वशीकरणमें रजत ( चादी ) स्तंभनमें शिला, विद्वे- पण और उच्चाटनमें ताम्र, तथा मारणमें नरक्पाल शुभ है ॥ ९॥ विप्रोन्योऽपि नरः प्रोक्तो युवा वै कृष्णवर्णकः । अदुर्भिक्षव्याधिमृतो माला तस्य शुभावहा ।। १० ॥ ब्राह्मण वा अन्यजातीय कृष्णवर्ण युवा अथवा दुर्भिक्षकी पीडारहित वा निरोग मृतमनुष्यकी अस्थिमाला की शुभदायिनी है ॥ १० ॥ अभावे स्फाटिकी जप्या इन्द्राक्षेर्वाजपेत्प्रिये । मृदो वा कोमले वापि विष्टरे वा सुरेश्वरि ॥११॥ इसके अभावमें स्फटिककी माला वा इन्द्राक्षमालासे जप करे । हे प्रिये सुरेश्वरि ! मिट्टी वा कोमल कुशासनमें ॥ ११ ॥ मुण्डे वाऽयोनिके देवि त्वचि व्याघ्रस्य वा प्रिये । एकहस्ते विहस्ते वा चतुईस्ते समन्ततः॥१२॥ .

(४२)
योगिनीतन्त्रम।
स्थिरासनश्चरेत्सम्यक्स्वाभयं तब चिन्तयेत् ।
भये जाते महेशानि भैरवोक्तमतुं जपेत् ॥१३ ।।
मुण्डमें वा योनिमें व व्याघ्रत्वचा में एक हाथ वा दो हाथ, अथवा चारों
ओर चार हाथ स्थानमें सम्यक् प्रकार स्थिरासन करे । वह अपनी अभय-
चिन्ता करे अर्थात् निर्भय रहे. हे महेश्वार ! भय उत्पन्न होनेपर भैरवोक्त
मंत्रका जप करे ॥ १२ ॥ १३ ॥
विषयुग्मं वजवाले हनयुग्ममतः परम् ।
सर्वभूतानुतः कूर्चमन्त्रान्तो भैरवो मनुः ॥ १४ ॥
वजालमे विषयुग्मः, फिर हनयुग्म और कूर्च मन्त्रके अन्त में भैरवमन्त्र
सर्वभयोंको दूर करता है ॥ १४ ॥
ततो भूतवाल दद्यात्साधको धर्मसम्मितम् ।
अश्वत्थेन महेशानि धर्मकीलकमाचरेत ॥१२॥
अनन्तर साधक मनुष्य धर्मसंमित भूतबलिप्रदान करे । हे महेशानि !
अश्वत्थद्वारा वह धर्मका कीलक स्थापन करे ॥ १५ ॥
सुर्यवारादियोगेन पञ्चकर्माणि चाचरेत् ।
शनों व मारणं देवि निश्चितं वीरवन्दिते ॥१६।।
सूर्यबारादियोगमें पंचकर्मका आचरण करे हे वीरवन्दिते देवि ! शनि
वारमें मारण करना चाहिये || १६ ।।
रात्रियोगे च कर्तव्यं सर्व कर्म शुचिस्मिते ।
प्राग्विद्वान्प्रजपेत्सम्यक्स्वमन्त्रमयुतं शवे ।
प्रयोगस्यफलावाप्तौ स्वस्वरक्षाकरं महत् । १७ ।
रानियोगमें सभी फोफा साधन करना चाहिये । विद्वान् मनुष्य पहिले
नेजमंत्र अयुत (दशसहस्र ) वार शवोपरि जपे। हे शुचिसिते ! प्रयोगकी
कलप्राप्तिके लिये निज निज रक्षाविधान कर्तव्य है ॥ १७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४३)
ततः साध्यदिने मंत्री याममात्रनिशोत्तरम् ।
गणादिपञ्चभिर्देवयजेत्कुलविनाशिनीम् ॥ १८ ॥
इसके पीछे मन्त्रवान् पुरुष रात्रिकालमें प्रहरमात्र बीतनेपर गणादि
पांच देवताओंके सहित कुलविनाशिनी देवीकी पूजा करे ॥ १८ ॥
दिग्बासा गलिताशेषचिकुरः कुलकीलकः ।
शक्तियुक्तो जपेद्विद्यां सदा त्वा मनसा स्मरेत् ॥१९॥
नमहोकर समस्त केश, कुलकर्कालिक और शक्तियुक्त होकर सदा मंत्र
स्मरण करे और मनसे तेरा स्मरण करे ॥ १९ ॥rty
लक्षसंख्यं महेशानि शक्तिपूजापुर:सरम् ।
प्रत्यहं भोजयेद्विमान्कौलिकाद्यान्दिनान्तरे ॥ २० ।
हे महेश्वार ! लक्षवार शक्तिपूजा करने के पीछे नित्य ब्राह्मण को और
दिनान्तर में कुलकौलिकगणोंको भोजन करावे ॥ २० ॥
मांसं मद्यं तथा मत्स्यं हुत्वा बह्रौ शतं शतम् ।
दक्षिणां गुरवे दद्याद्गुरुरूपेण शाम्भवि ॥ २१ ॥
हे शाम्भवि ! मांस मद्य और मत्स्यद्वारा अग्निमें शतशतवार होम करके
गुरुको गुरुतर रूपसे दक्षिणा देवे ॥ २१ ॥
एवमुक्तविधानेन दिग्भ्यो वा वीरपुङ्गवः ।
यदि कुर्यान्महेशानि देवानपि तथा नयेत् ॥ २२ ॥
है महेशानि ! इस प्रकार कहे हुए विधानसे जो वीरश्रेष्ठ यह सब कार्य
फरे, तो दिशाओंसे देवताओं के भी उस स्थानमें बुलानेको समर्थ होस-
कते हैं ॥२२॥
नापेक्षा जायते कान्त चावश्यं फलभाग्भवेत् ।
महाप्रयोगे देवेशि कृष्णच्छागं धलि हरेत् ॥ २३ ॥

- (४४) योगिनीतन्त्रम् । हे कान्ते ! इसमें अपेक्षा वा संशय नहीं है, अवश्यही इसके फलका भागी होगा, हे देवेशि ! महाप्रयोगमें काले बकरेकी बलिप्रदान करे||२३|| पूजान्ते सततं देवि तन्मांसर्वद्विमर्चयेत् । विधिः सर्वत्र कथितो दिव्यवीरपशुक्रमात् ॥ २४ ॥ हे देवि ! पूजाके पीछे उसके माससे अग्मिकी अर्चना करे। दिव्य वीर पशुक्रममें सर्वत्र यह विधि कथन की गई है ॥ २४ ॥ क्रमेण फलमानोति व्यत्यये पातकी भवेत् ।। २५ ।। इत्येवं कथितं तुभ्य सम्यक् षट्कर्मगोचरम् ॥ गोपनीयं खले दुष्टे पशुपामरसन्निधौ ।। २६ ॥ क्रमानुसार कार्य करनेसे फल प्राप्त और भेद करनेसे पापका भागी होता है, यह मैने तुमसे पदकर्मका विषय कहा । खल, दुष्ट और पशु- तुल्य पामर मनुष्यसे इसको छिपावे ॥ २५ ॥ २६ ॥ श्रीदेव्युवाच । सुराद्याः किंविधा देव शक्तिर्वा कीदृशी शुभा। षट्कर्मसु यथायोग्यं वद मे करुणानिधे ॥ २७ ॥ श्रीपार्वतीजीने कहा-हे करुणानिधे ! किस प्रकार सुरगण और किस प्रकार शक्ति कल्याणकारी होती है, षट्कर्मविषयका यथायोग्य यह सब वर्णन कीजिये ॥ २७ ॥ ईश्वर उवाच । माध्वी शान्तिकरी प्रोक्ता वश्ये च स्फाटकी शुभा। स्तम्भने डाकिनी ज्ञेया विद्वेष पैष्टिकी मता ॥२८॥ उच्चाटने तथा गौडी मारणे भैरवी मता। पतासां लक्षणं देवि कथितं कुलमोहने ।।२९ ।।

भापाटीकासमेतम। ईश्वर बोले-शान्तिविषयमें मावी, वशीकरणमें स्फाटिकी, स्तंभनमें हाकिनी, विद्वेषणमें पेटिकी ॥ २८ ॥ उच्चाटनमें गौडि और मारणमें भैरवी शुभकारी होती है. हे देवि । यह सर शक्तियोंके लक्षण कुलमोहनतंत्र कहे हैं ॥२९॥ पद्मिनी शान्तिदा प्रोक्ता वश्ये सा शंखिनी मता। स्तम्भनोच्चाटने देवि प्रशस्ता नागवल्लभा ॥३०॥ पद्मिनी शातिदायिनी, वशीकरण में शंखिनी स्तंभन और उच्चाटनमें नाग- वल्लभा श्रेष्ठ है ॥ ३०॥ मारणे च तथा शस्ता डाकिनी शत्रुमृत्युदा । गौराङ्गी दीर्घकेशी या सदा चामृतभाषिणी ॥ ३१ ॥ और मारणमें डाकिनी शत्रुको मृत्यु देनेवाली होती है, गौरागी, दीर्घ- केशी, सदा अमृतभापिणी ॥ ३१ ॥ रक्तनेत्रा सुशीला च पद्मिनी साधने शुभा। मन्त्रसिद्धिकरी ह्येषा शंखिनी सापि भामिनि ॥ ३२ ॥ रक्तनेत्रा पद्मिनी साधनविषयमें शुभदायिनी होती है, हे भामिनी ! शंखिनी और मन्त्रसिद्धिकरी ॥ ३२ ॥ दीर्घाङ्गी सा शंखिनी स्याजगञ्जनकारिणी । समांगी शूद्रदेही च न खर्वा नातिदीर्घका ।। ३३ ।। दीर्घकेशी मध्यपुष्टा मृदुभाषा च नागिनी । कृष्णाङ्गी च कृशाङ्गी च दन्तुरा मदतापिता ॥ ३४॥ शंखिनी, दीर्घाङ्गी और सरजनोंका मनरंजन करनेवाली है, नागिनी समान अंगवाली शूद्रतुल्य देहधारिणी न बहुत खर्च (ठिगनी) न वहत लम्बी, दीर्घकेशी, मध्यपुष्टा और मीठा बोलनेवाली होती है, कृष्णागी और कृशाही, दन्तुरा, मदता पिता ।। ३३ ।। ३४ ॥ -

-
योगिनीतन्त्रम् ।
द्वस्वकेशी दीर्घघोणा सदा निष्टुरवादिनी।
सदा क्रुद्धा दीर्घदेहा महारावपरायणा ॥ ३५ ॥
निर्लजा हास्यहीना च निद्रालुबहुभक्षिका ।
इयं सा डाकिनी प्रोक्ता मृत्युयोगे प्रशस्यते ॥ ३६॥
हस्वकेशी (छोटे केशवाली ) दीर्घघोणा (बड़े नाशिकावाली ) सदा
निष्ठुर बोलनेवाली, सदा क्रोधित, दीर्घदेहवाली, महाशब्दवाली, निर्लज्ज
हास्यहीन, सदा सोनेवाली और बहुत भोजन करनेवाली को ही डाकिनी
कहागया है, यह डाकिनीही मृत्युयोगमें श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
एतास्तु शक्तयो देवि सर्वजातिसमुद्भवाः ।
सापत्याश्च सुरत्यश्च जातपुत्रादिकाः शुमा।
ग्राह्याः कुलरसैः पूल्या भक्तिभावेन कामिनी ॥ ३७॥
हे देवि ! सर्वजाति में उत्पन्न यही सब शक्ति है, सन्तानवाली सूरति
युक्त और जातपुत्रादि (जिसके पुत्र हैं ) कोही शुभकारिणी होती है यही
सब शक्ति ग्रहण करने योग्य हैं, इन सत्र कामियोंकी कुल रसद्वारा भक्ति-
भावसे पूजा करे ॥ ३७ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
केन केन च मन्त्रण मन्त्री पदकर्मभाग्भवेत् ।
तन्मन्त्र कथय स्वामिन् यद्यहं तव वल्लभा ॥ ३८ ॥
श्रीपार्वतीजी बोली-हे महेश ! हे स्वामिन् ! यदि मैं तुम्हारी प्यारी हूं.
तो मंत्रवान् मनुष्य किस किस मंत्रद्वारा पट्कर्मका भागी होता है, वह मंत्र
मुझसे वर्णन करो ॥ ३८॥
ईश्वर उवाच ।
एकाक्षरं कालिकायास्तारायास्तु विनीलकम् ।
वरोचनीयो हि मतुरेकादशाक्षरः॥ ३९ ॥

.
भापाटीकासमेतम ।
(१७)
सर्वतजोऽपहारी च मनुराख्यात एव च ।
बहुनात्र किमुक्तेन शृणु मत्प्राणवल्लभे ॥ ४० ॥
ईश्वर बोले-कालिकाका बीज एकाक्षर, ताराका बीजर अक्षर, वज्रदै-
रोचनीका बीज एकादशाक्षर || ३९ ॥ यह सर्वतेजोविनशीण मन्त्र कहा
है, हे प्राणवल्लभे ! बहुत कहनेका प्रयोजन नहीं है ॥ ४०॥
केवलं शक्तियुक्तश्च जपेद्देवीं समाहितः ।
अवश्य फलमाप्नोति नान्यथा वीरवन्दिते ॥ ४१ ॥
केवल शक्तियुक्त होकर सावधानचित्तसे देवीका जप करे, हे बीरवन्दिते !
तो अवश्यही फल प्राप्त होगा इसमें सन्देह नहीं ॥ ४१ ॥
खलो यदि फलं प्राप्तः सबलो यदि निष्फल ।
भवेदेतन्महेशानि तदा सर्व वृथा भवेत् ॥ ४२ ॥
यदि खलव्यक्ति फलको प्राप्त हो और सबल यदि निष्फल हो, तो यह
सब वृथा हो सकता है ॥ ४२ ॥
अहं धाता तथा पाता रक्षितोद्योगवान् शिवे ।
तथापि न हि सिद्विःस्यचित्रमेतन्नगात्मजे ॥ ४३ ॥
हे शिवे ! मैं धाता और पाता (रक्षक ) तथा उद्योगी हूं. इसपरभी
यदि सिद्धि न हो तो यह आश्चर्यकी बात कहनी चाहिये । ४३ ।।
एवन्तु मारणं देवि विशेषात्कथयामि ते।
सान्तं वह्निसमायुक्तं वामनेत्रविभूषितम् ॥ ४४ ॥
हे देवि ! मैं तुमसे अन्तयुक्त और बहिसंयुक्त वामनेत्रविभूमित मार-
णका विषय विशेष करके कहता हूं, सुनो ॥४४॥
हीहुँहुं अमुकं मारय स्वाहा ।
कूर्चयुग्मं ततो देवि अमुकं मारय मारय ॥४५॥

(१८) योगिनीतन्त्रम। हीहुहुअमुफ मारय मारय माहा । हे देवि! तदनन्तर कयुक्त अमुक मारय मारय ॥४५॥ चतुर्दशाक्षरो मंत्रः स्वाहान्तः शत्रुनाशकः । खदिरागारमादाय कुजाष्टम्यां विशेषतः ॥ ४६॥ चतुर्दशाक्षर स्वाहान्त मन्त्रको शत्रुनाशक जानना चाहिये । वरके अंगारे लाकर विशेषकर मगलवारकी अष्टमीमें ।। ४६ ॥ लेखयेत्पुत्तली शत्रुस्वरूपां लोहपावके । निशाया मस्तके नेत्रे ललाटे हृदये करे॥१७॥ नाभौ गुह्ये कटौ पृष्ठे क्रमोक्तन पद्धये । मन्त्रवर्णान्समालिख्य प्रतिष्ठां तन कारयेत् ॥४८॥ लोहपात्रपर शत्रुस्वरूप पुतली लिखकर रात्रिके समय मस्तक नेत्र, ललाट, हृदय हाथ ॥ १७ ॥ नाभि, गुह्य, कमर, पीठ और दोनों पैरों में क्रमश मन्त्रवर्ण लिखकर उसकी प्रतिष्ठा करे ।। ४८ ।। संहारमुद्रां बद्ध्वा तु ध्यायदेवीं जयप्रदाम् । दीर्घाकारां कृष्णवर्णा सदोबस्तनमस्तकाम् ॥४९॥ नमुण्डयुगलं हस्ते चर्वयन्ती दिगम्बराम् । शतुनाशकरी देवी ध्यायेच्छत्रुक्षयायच ॥ ५० ॥ तदनन्तर सहारमुद्रा बन्धनकर जयप्रदा देवीका ध्यान करे, दीर्घाकार, कृष्णवर्ण, ऊँचे ऊचे स्तनोंवाली और निनका मस्तक विस्तृत है दिगम्बरा, हाथमें दो नृमुण्ड चर्वण करता हैं शत्रुके क्षयके निमित शत्रुनाशकरी दोका इस प्रकार ध्यान करे || ४९ ॥ ५० ॥ एवं ध्यान्वेष्टकाचूर्णामहस्तेन शाङ्कार। ॐ शत्रुनाशकय नम इति दत्त्वा महेश्वरि ॥५१॥ - - भाषाटीकासमेतम् । (१९) हरिद्राचूर्णसहिता धारां दद्यादनेन तु । अमुकस्य शोणितं पिब पिवेति च तत्परम् । मांसं खादय खादय ह्रीं नमश्चेति मन्त्रतः ॥५२॥ मध्याहे मध्यरात्रौ तु पूजयित्वा शताष्टकम् । जपेदेकादशाहे त्त रोगः स्नानात्र संशयः ॥५३॥ दण्डाधिकेकविशाहे मृत्युरेव रिपोर्धवम् । अथवान्यप्रकारेण शत्रुक्षयमहं वदे॥ ५४ ॥ हे शकार । इस प्रकार ध्यान करके गेरूके चूर्णद्वारा वाम हाथसे "शत्रुनाशकन्यै नमः" इस मन्त्रसे हरिद्रा चूर्णके सहित धारा प्रदान करे । इसके पीछे "अमुकस्य शोणित पिर पिव मास खादय ही नमः" इस मन्त्रसे मध्याह्न वा मध्यरानिमें एक सौ आठ वार पूजा करके जप करे, इस प्रकार करनेसे ग्यारहवें दिनमें निःसन्दह शत्रुको रोग होगा इक्कीसवें दिनके एक दण्ड में रिपु (वैरी) की मृत्यु होगी, इसमें सन्देह नहीं अथवा मैं अन्य प्रकारसे शत्रुमारण कहता हू, सुनो ! ५१ ॥ ५२ ॥ ॥ ५३ ॥ ५४॥ पुंगोशकृत्समादाय मलयेदुष्णवारिणा । विपरीतक्रमणैव जपपूजादिकश्चरेत् ।। ५५ ॥ वृपका गोनर लाकर उष्ण जल्द्वारा उसकी पूजा करे । इसमें विपरीत कमसे जप पूजादिका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५५ ॥ महादेवाय नम इति पुंगोशकृतमाहरेत् । शिवाय नम इति मन्त्रेण पिण्डीकरणमाचरेत् ॥५६॥ पशुपतये नम इति प्राणान्संस्थापयेत्ततः। ४

(५०) योगिनीतन्त्रम् ।
लोहपात्रे महेशानि खादिराङ्गारयोगतः।
शत्रुप्रतिकृति कृत्वा तत्र संस्थापयेच्छिवम् ॥५७॥
"महादेवाय नम" इस मन्त्रसे वृपका गोवर लाकर "शिवाय नम"
इस मत्रसे गठन सपादनपूर्वक “पशुपतये नमः" इस मन्त्रसे प्राण स्थापन
करे । हे महेश्वार ! लोहे के पानमें खरके अगारोंसे शत्रुकी आकृति लिख-
कर वहा स्थापन करे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
ततोध्यायेन्महारुद्रं ध्यानं शृणु समाहिता ।
शत्रोर्वक्षःस्थितं रुद्रं ज्वलदग्निसमप्रभम् ॥ ५८ ॥
इसके उपरान्त महारुद्रका ध्यान करना चाहिये । यह ध्यान सावधान
चित्तसे सुनो शत्रुके वक्षस्थल स्थित प्रज्वलित अमिप्रभ || ५८ ॥
वामहस्ते केशधरं दक्षिणात्प्राणकर्षणम् ।
नरचर्माम्बरं देवं महाव्यालादिवेष्टितम् ॥ ५९ ॥
पिनाकधूगिहागच्छ इत्याद्यावाह्य यत्नतः।
शूलपाणे नम इति स्नापयेत्साधकोत्तमः ॥६०॥
महेश्वरं नम इति पाद्याद्यैः संप्रपूजयेत् ।
ईशानादितथामूर्ति व्युत्क्रमेण प्रपूजयेत् ॥ ६१ ॥
अग्निकोणादिपर्यन्तं सूर्यरीत्या महेश्वरि ।
ॐ शिवाय नमो मूलमष्टाविशतिधाजपेत् ॥६॥
वामहस्तमें शत्रके केशधारी और दक्षिण हाथसे शत्रुके प्राणोंको खेचने-
वाले, नरचर्माम्बर महासर्पादिवेष्टित ॥ ५९ ॥ (रुद्रदेवका ध्यान करें)
"पिनाकधृगागच्छ" इत्यादि मन्त्रसे यत्नपूर्वक आवाहन करके 'शूलपाणये
नमः साधकोत्तम इस मनसे स्नान करावे || ६० ॥ 'महेश्वराय नम
इस मन्त्रसे पायादिद्वारा पूजा करे , फिर अमिकोणादि पर्यन्त सूर्य रीति
द्वारा ईशानादिति व्युत्क्रमद्वारा पूजा करनी चाहिये। 3. शिवाय
नमः" ओम् मूल मत्र अट्ठाईसवार जप करे ॥ ६१ ॥ ६२ ॥

भाषाटीकासमेतम् । हुँ क्षमस्वेति वामेन करेण तु विसर्जयेत् । केशवाजित विष्णो हे हरे सत्य जनार्दन । हंस नारायणाय स्वाहा मन्त्रमेवं सकृज्जपेत् ॥ ६३ ॥ हु क्षमस्व ' इस मन्त्रके द्वारा बायें हाथसे विसर्जन करे, अजित, केशव, विष्णो, हरे, सत्य, जनार्दन, हस नारायणाय स्वाहा" यह मंत्र एकवार जपना चाहिये ॥६३ ॥ हुं नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा इति यः। ॐ शिवाय नमोमन्त्रमपिनित्यं सकृज्जपेत् ॥ ६४॥ 'हुं नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा' यह मंत्र और 'ओम् नमः शिवाय' इस मंत्रका एक बार जप करे ॥ ६४ ॥ एवमेकादशाहेन शत्रून्मादनमञ्जसा । अवश्यं जायते देवि सत्यं सत्यं त्रिलोचने ॥ ६५ ॥ हे देवि ! इस प्रकार करनेसे ग्यारहवें दिन शत्रु एकवारही उन्मादित होजायगा । हे त्रिलोचने ! यह अवश्य ही होगा इसमें सन्देह नहीं॥६५॥ कथयामि महादवि वैरिस्तम्भनमुत्तमम् । कुम्भकारस्य सदनादानयेत्पिठरं शुभम् । एक द्विकं त्रिकं चैव यत्कृतं साधकोत्तमः॥६६॥ आनीय च उखामध्याद्भस्म पर्युषित तथा। निःक्षिप्य पिठरे शुष्कं नालिकापत्रविस्तरम् ।। भस्मोपरिच संस्थाप्य पिठरतं सुरेश्वरि ॥ ऐशान्यां विवरं कृत्वा शनारे महेश्वार ।। ६७ ।। अब शत्रुके स्तभन करनेकी उत्तम विधि कहता हूं सुनो । कुम्हारके परसे यह उत्तम पिठर एक दो अथवा तीन लावै । कुम्हारके न

योगिनीतन्त्रम् ।
भस्म लाकर उनको भर देवें. और उसके ऊपर दूसरे सिकोरे ढकदेवे
साधना करनेवालोंमें श्रेष्ठ पुरुष शनैश्चरके दिन वाटिकाके ईशान कोनमें
एक गढा खोदे ॥ ६६ ॥ ६७ ॥
पुनर्मध्याहकाले च निर्जने सति भामिनि ।
चतुर्दिक्षु वाटिकाया गर्तस्य निकटाप्रिये ॥ ६८ ॥
हे भामिनि । फिर मध्याह्नकालमें निर्जन होनेपर वाटिकाके चारों ओर
गर्तके निकट हो ॥ ६८ ॥
तत्तावतीमह भूमि चौरभ्यो रक्षयामि च ।
प्रफूल्लमनसा देवि चरेद्भूमेः परिग्रहम् ।। ६९ ॥
तिस भूमिको मैं चोरोंसे रक्षा करता हू हे देवि ! इस प्रकार प्रफुल्ल
मनसे भूमिपरिग्रह ॥ ६९ ॥
तावतीश्च ततो भूमिं वामावर्तेन भामिनि ।
परिक्रम्य पुनस्तत्र गर्तस्य निकटं व्रजेत् ।। ७० ॥
हे भामिनि ! उस भूमिके बाई ओर परिक्रमा करके फिर गढेके निकट
जाय ॥ ७० ॥
नत्रैव निर्जन गर्ने शलाका लोहानिर्मिताम् ।
रोपयित्वा तदुपरि पिठरं सशरावकम् ।
संस्याप्य मृद्भिः संपूर्य तद्गत गृहमानजेत् ॥ ७१ ॥
गुप्त रीतिसे उस गढेमें लोहेकी बनी शलाका गाडकर उसके ऊपर शरा-
के सहित पिठर अर्थात् बन्द किया हुआ पात्र स्थानपूर्वक मिट्टीसे उस
गढेको पूर्ण करके घरको चलाजाय ॥ ७१ ॥
गतिस्तम्भो भवेदेवि चौरादीनां तथा खलु ।
अयं योगवरो देवि दुर्लभो वसुधातले ॥ ७२ ॥

-
भापाटीकासमेतम् ।
हे देवि ! इस प्रकार करनेसे चोरादिकी गति रुक जायगी । हे देवि !
यह उत्तम योग पृथ्वीतलमें दुर्लभ है ॥ ७२ ॥
पिशाचभूतवेतालकूष्माण्डब्रह्मरक्षसा।
दानवानां तथान्येषां गतिस्तत्र न जायते ॥७३॥
यह योग करनेसे पिशाच, भूत, वेताल. कृष्माड, ब्रह्मराक्षस, दानव
और अन्यान्य भूतगणोंको वहा गति नहीं होती ॥ ७३ ॥
धनपुत्रसमृद्धिस्तु वईतेहर्निशन्तथा।
दिने दिने धर्मवृद्धिर्जायते नात्र संशयः ॥७॥
दिन रात धन पुत्र और समृद्धिकी वृद्धि तथा दिन दिन धर्ममें बुद्धि
बढती रहती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ७४ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्ने सर्वतन्त्रोत्तमे देवीश्वरसम्बादे चतुर्विंशति-
साहस्ये भापाटीकाया चतुर्थ पटल ॥४॥
श्रीदेव्युवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ लोकानुग्रहकारक ।
साधनं सर्वमन्त्रस्य सर्वाशापरिपूरकम् ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि तद्वदस्व महेश्वर ॥ १॥
श्रीपार्वतीजी बोली-हे सब धर्मों के जाननेवाले लोकानुग्रहकारक भग•
वन् ! मैं सब मंत्रोंके संपूर्ण अंगोंका पूर्ण करनेवाला साधन सुननेकी इच्छा
करती हूं, हे महेश्वर ! सो आप वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच ।
शय्यायाः साधनं ह्यादौ वक्ष्येऽहं परमाद्भुतम् ।
सार्द्धयामगतायान्तु निशायां साधकोत्तमः॥२॥
भूत्वा दिगम्बरः सम्यगाचम्य विधिवत्तदा।
अभ्युक्ष्य मूलमन्त्रेण शय्यायान्तत्र संविशेत् ॥३॥

(५४) योगिनीतन्त्रम्। महदेवनी बोले पहिले मै परम अद्भुत शय्यासाधन कहता हूं, सो सुनो । साधकोत्तम मनुष्य रात्रिका डेढ प्रहर बीतनेपर ॥२॥ नम होकर यथाविधि आचमन पूर्वक मूलमंत्रसे अपने शरीरपर जड छिडककर शय्या. पर जाय ॥३॥ गुरु परगुरुश्चैव परात्परगुरुन्तथा । परमेष्टिगुरुश्चैव वाऽभ्यर्च्य गणेश्वरम् ॥ ४॥ अनन्तर गुरु, परगुरु, परात्परगुरु, परमेष्टिगुरु इन सब गुरु और गणे- श्वरफी वामभागमें पूजा करके ॥ ४ ॥ दक्षिणे च ध्रुवोरूश्मशानावासिने नमः । ततो यमासनायान्ते नमः इत्यर्चयेच्छिवे ।।५।। 'दक्षिणे भुवोरुWश्मशानावासिने नमः । इस मंत्रसे अर्चना करने के पीछे ' यमासनाय नमः' इस मंत्रसे पूजा करे ॥ ५ ॥ शय्यातले देवि प्रणवं वाग्भवञ्च फट ।। लिखित्वाचम्य यत्नेन स्वमन्त्रोक्तविधानतः ॥६॥ प्रणवं मणिपरिश्चवचिणी चेन्महापदम् ।। प्रतिसीरे रक्ष रक्ष मां हुं फट्स्वाहयायुतम् ॥७॥ हे शिवे ! ॐकार और फट् अन्त वाग्मवमंत्र लिखकर आचमनके पीछे निजमन्त्रोक्त विधानानुसार ॐकार और “ मणिधरिश्चैव यक्षिणी चेन्महा- पदम् । प्रतिसीरे रक्ष रक्ष मा हुं फट् स्वाहा " || ६ ॥ ७ ॥ अनेन मनुना देवि शिखां बद्ध्वा विधानतः। अङ्गन्यासकरन्यासौ मातृकान्यासमेव च ॥ ८ ॥ इस मंत्रसे विधिपूर्वक शिखायधन करे, फिर अंगन्यास, करन्यास, मातृकान्यास ॥ ८॥ .

भाषाटीकासमेतम् ।
भूतशुद्वयादिकं कृत्वा हृत्पद्मे परमां शिवाम् ।
ध्यात्वा भक्त्या समभ्यर्च्य मानसः साधकोत्तमः।९।।
और भूतशुद्धादिक समापनपूर्वक हृत्पनमें भक्तिसहित पूजा करके साध.
कोत्तम मनमें परमा शिवाका ध्यान करे ॥९॥
शय्यातलेताप्रणीय मन्त्रीपरि वरानने ।
प्रणवञ्च ततो देघि वटुकेभ्यो नमस्तथा ॥ १० ॥
इति मन्वेण मनसा बटुं पाद्यादिभिर्यजेत् ।
ततस्तु वहिबीजेन समन्ताज्जलधारया ॥ ११ ॥
वहिप्राचीरमाचिन्त्य सङ्कलपश्च समादरात् ।
जप कृत्वा समाथ विधिना परमेश्वरि ।
पुनः संकल्प्य देवेशि कुर्यात्सर्वक्रमं शिवे ॥१२॥
होमश्च तर्पणश्चैव अभिषेकं ततः परम् ।
विप्रस्य भोजनश्चैव अभावे द्विगुणं जपेत ॥ १३ ॥
काश्चनं दक्षिणां दस्वाच्छिद्रावधारणञ्चरत् ।
संमोच्य बटुकं देवि क्षमस्वेति विसर्जयेत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर हे वरानने ! शय्यातले ताप्रणीय । फिर प्रण (ॐकार )
इसके पीछे
बटुकेभ्यो नमः ' मंत्रसे पाद्यादिद्वारा वटुककी पूजा
करनी चाहिये । इसके उपरान्त वनिवीन (रं) द्वारा चारों ओर जल.
धारासे वह्निप्राचीरकी चिन्ता करके यलपूर्वक विधिसहित सर्व समापन कर-
नेपर फिर सक्रिमसे सकल्प, होम, तर्पण और अभिषेक करके ब्राह्मण-
भोजन एवं इसके अभावमें दूना जप करे । हे शिवे ! हे परमेश्वरि ! फिर
सुवर्णकी दक्षिणा देकर अच्छिद्राव अर्थात् छिद्र रहित पात्र धारण करे
फिर बटुक्का स्तव करनेके पीछे क्षमस्व इस मन्त्रसे विसर्जन करे॥१०॥
॥ ११ ॥ १२॥ १३ ॥ १४ ॥

योगिनीतन्त्रम् ।
एवमुक्तं महादेवि शय्यासाधनमुत्तमम् ।
मन्त्रसिद्धिकरं शीघ्रमस्मत्लायुज्यदायकम् ॥ १५ ॥
है महादेवि ! यह मैंने तुमसे शीघ्र सिद्धि करनेवाला अपना सायुज्य-
दायक उत्तम शय्यासाधन कहा ॥ १५ ॥
अथ शृणु विवाटस्य चतुर्वाटस्य साधनम् ।
गत्वा तु त्रिपथं वापि चतुर्मार्ग वरानने ॥ १६ ॥
हे वरानने ! अब त्रिरहे और चौराहे का साधन कहता हूं, सुनो त्रिराहे
वा चौराहेमें जाकर |॥ १६ ॥
प्रणमेद्गुरुमभ्यर्च्य मणिधरीति-मन्वतः।
वद्ध्वा प्रथिन्तु बचान्ते निर्भयः साधकोत्तमः ॥१७॥
गुरुकी अर्चना और प्रणाम करके ( मणिधरी ) इस मंत्रसे ग्रंथिबंधन-
पूर्वक वज्रमंत्रोचारणपूर्वक साधक निर्भय होवे ॥ १७ ॥
श्मशानवासिनो थे ये देवा देव्यश्च भैरवाः।
दयां कुर्वन्तु ते सर्वे सिद्धिदाश्च भवन्तु मे ॥ १८ ॥
फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे कि है श्मशानके रहनेवाले देवा देव
ताओ ! तुम सब मिलकर मेरे ऊपर दया करो और मुझे सिद्धि दो॥१८॥
प्रणमेत्प्रणवाद्यनमतुनानेन भक्तितः ।
ततः पूर्वमुखो वापि उत्तराशामुखोऽपि वा ॥ १९ ॥
उपविश्य समाचम्घ स्वस्ति वाच्य महेश्वरि ।
स्थानं सम्मायं तत्रैव प्रेतबीजं लिखेत्तुधीः ॥२०॥
अनन्तर 'प्रणवादि ' इस मंत्रसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करे । हे महेश्वार !
तदनन्तर पूर्वमुख वा उत्तर मुखाभिमुख बैठकर आचमनके पीछे स्वस्ति-
वाचनपुरः सर स्थानमार्जन करके बुद्धिमान्-साधक उसी स्थानमें प्रेतबीज
लिखे ॥ १९ ॥२०॥

भाषाटीकासपेतम् । (५७) बीजोपरि महादेवि विहितासनमास्तरेत् । तत्रोपविश्य देवेशि हृदीष्टांदेवतां स्मरेत ॥ २१ ॥ हे देवि ! बीजोपरि विहित आसन बिछाय उसके ऊपर बैठकर हृदयमें इष्टदेवताका स्मरण करना चाहिये ॥ २१ ॥ यथेष्टमनसाराध्य ह्यष्टासु च बलिं हरेत् । कालादिभ्यो महेशानि पूजयित्वा विधानतः॥२२॥ मनमें यथेष्ट आराधना करके अष्टदिशामें बलि देकर विधानद्वारा काला- दिकी पूजा करनी चाहिये ॥ २२ ॥ काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी। विप्रचित्ता तथा नीला बलाका च मुनिद्विषा ॥ २३॥ प्रणवादिनमोन्तेन पूजा बल्यादिना स्मृता। संकल्प्याष्टोत्तरशतं जप्त्वाच्छिद्रावधारणम् ॥ कृत्वा स्थानं परित्यज्य स्मरन्देवी गृहं ब्रजेत् ॥२४॥ ओंकारादि अंगोंसहित 'नमोऽस्तु मंत्रसे वलि आदिके द्वारा काली कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी, विप्रचित्ता, नीला, बलाका और मुनिद्विषा इन देवियोंकी पूजा करनेके पीछे अष्टोत्तर शतवार जप करके अच्छिद्रावधारण करे, फिर इस स्थानको छोडकर देवीजीका स्मरण करता हुआ घरको चलाजाय ॥ २३ ॥ २४ ॥ एवमुक्त साधनान्ते सर्वसिद्धिनिषेवितम् । यस्मै कस्मै न दातव्यं साधकानां परं हिनम् ॥२५॥ है देवि ! यह मैंने तुमसे सर्वसिद्धिदायक वाटसाधन कहा । यह सर्व साधारणको नहीं देना चाहिये । यह साधकोंका परम हितकारी है ॥२५॥ .

. (५८) योगिनीतन्त्रम् । अतः परमहं वक्ष्ये विल्यमूलस्थ साधनम् । विल्यमूलं महेशानि समन्ताच्छंकरः स्मृतम् ॥२६॥ अब मै तुमसे बिल्मवृक्षका साधन कहता हूं हे महेशानि ! चारों ओरके बिस्वमूल शंकर स्वरूप कह गये हैं ॥ २६ ॥ जटास्वरूपं देवेशि पर्ण जानीहि सुन्दरि । ऋग्यजुःसामसदृशंत्रिपहि वरानने ॥ २७ ॥ है देवेशि : हे सुन्दरि ! उसके पूर्ण मेरी जटा है । हे वरानने ! उसके दीन पत्ते ऋक यजुः और सामवेद स्वरूप हैं ।। २७ ।। शाखा हि सर्वशास्त्राणि जानीताम्मीनलोचने । कल्पवृक्षसमो बिल्वो ब्रह्मविष्णुशिवादयः । महालक्ष्मीबिल्ववृक्षो जातः श्रीशैलपर्वते ।। २८ ।। शाखाको सर्वशास्त्र जानना चाहिये । हे मीनलोचने ! बिल्ववृक्ष कल्प- वृक्षके तुल्य और ब्रह्मा विष्णु शिवस्वरूप है श्रीमहालक्ष्मीजीने बिल्ववृक्ष होकर ही श्रीशैलर्पयतमें जन्म लिया था ॥ २८ ॥ श्रीदेव्युवाच । कथं सा विष्णुवनिता बिल्ववृक्षो बभूव ह। वृत्तांत परमाश्चर्य वद मे करुणामय ॥ २९ ॥ श्रीपार्वतीजीने कहा-हे करुणामय ! विष्णुकी भार्याने किस प्रकार विस्ववृक्ष होकर जन्म लिया । यह परमाश्चर्ययुक्त वृत्तान्त मै सुनना चाहता हूं सो वर्णन करके मेरा कौतूहल चारितार्थ कीजिये ॥ २९ ॥ ईश्वर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि वृत्तान्तं परमाद्भुतम् । सत्ये तु पूजयामास लिङ्गं रामेश्वराभिधम् ॥ ३० ॥ .

भाषाटीकासमेतम् ।
ज्योतीरूपं मदीयांशं प्रार्थ्य ब्रह्मादिभिः सह ।
तत्र मेऽतुमहाराणी सर्वेषां प्रियतां गता ॥ ३१ ॥
ईश्वर बोले- हे देवि ! यह परमअद्भुत वृत्तान्त कहता हूँ सुनो।
सत्ययुगमें ज्योत्तीरूप मेरे अंश रामेश्वर नामक लिंगकी ब्रह्मादि देवताओंके
सहित देवियों ने पूजा की थी, उनमें मेरे अनुग्रहसे वाणी देवी सबक्री
प्रिया हुई है ॥ ३० । ३१ ॥
विष्णोरतिप्रिया नित्यं सदासाभूत्सरस्वती।
तादृक् प्रीतिन लक्ष्म्याश्च जायते केशवस्य हि॥३२॥
वह सरस्वती विष्णुफी सदा प्यारी हुई है केशवकी लक्ष्मीके प्रति वैसी
प्रीति उत्पन्न नहीं हुई ॥ ३२ ॥
इति चिन्तापरा लक्ष्मीर्ययौ श्रीशैलमुत्तमम् ।
प्राप्यमल्लिङ्गमकान्ते तपस्तेपेऽतिदारुणम् ॥ ३३ ।।
इस कारण लक्ष्मी देवी चिन्तायुक्त होकर उत्तम श्रीशेलपर्वतको गई
वहां मेरे एक लिंगको प्राप्त होकर इन्होंने अत्यन्त दारुण तपस्या आरंभ
की ॥ ३३ ॥
सथापि हृदि नैवाभूत्कृपा मे परमेश्वरि ।
नदा सा वृक्षरूपेण स्थिता लिंगाग्रतः सती ॥३४॥
हे परमेश्वरी ! तोभी मेरी कृपाका न होना देख लक्ष्मी देवी मेरे लिंगके
अगस्थित स्थानमें वृक्षरूपसे अवस्थान करके ॥ ३४ ॥
पत्रः पुष्पैः फले स्वीयः पूजयामास सन्ततम ।
कोरिवर्षे महेशानि ततो मेऽनुग्रहोऽभवत् ॥ ३५ ॥
अपने पत्र पुष्प और फलोंसे निरंतर मेरी पूजा करने लगी । हे महे-
सानि ! तय करोडवर्ष पीछे मेरा अनुग्रह हुआ ॥ ३५ ॥
तेनैवानुग्रहेणैव विष्णोर्वक्षः स्थिताभवत् ।
तत्रैव परमेशानि विदरेत्सा सदैव हि ॥ ३६॥

(६०) योगिनीतन्त्रम् । उसी अनुग्रहके कारण लक्ष्मी विष्णुके वक्षस्थलमें स्थित हुई और वह निरंतर उनके संग विहार करने लगी ॥ ३६ ॥ अतस्तु कारणावि तद्रूपेण हरिप्रिया । सदेव पूजयन्ती मा मद्भक्ता सातुला शिवे ॥ ३७ ।। । हे परमेशानि ! हे देवि ! इसी कारण वह हरिप्रिया उस वृक्षरूपमें सदा ही मेरी पूजा करती रहती हैं. हे शिये ! वह मेरे प्रति अत्यन्त भक्तिमती हे ॥३७॥ अतस्तु वृक्षमास्थाय तिष्ठामि च दिवानिशम् । सर्वतीर्थमयो देवि सर्वदेवमयः सदा ॥ ३८ ॥ श्रीवृक्षः परमेशानि अत एव न संशयः। तत्फलैस्तत्प्रसूनैर्वा तत्पर्यः प्रपूजयेत ॥ ३९ ॥ तत्काष्ठचन्दनर्वापि स मे भक्ता स मे प्रियः ॥ ४० ॥ इसी कारण मे दिनरात बिस्वक्ष का आश्रय करके वास करता ह, परमेश्वारे । हे देवी ! अतएव विस्यक्ष सदा ही सर्वतीर्थमय और सर्वदेव- मय है इसमें सन्देह नही । विल्वपत्र वा बिल्वपुष्प, बिल्य फल अथवा विलयकाठ चन्दनसे जो मेरी पूजा करता है, हे देचि ! वही मेरा प्रिय । और वही मेरा भक्त है ।। ३८ ॥ ३९ ॥ ४०॥ तत्काष्ठचन्दनं भाले यो धारयति संभ्रमात् । मत्त शिवबुद्धया सा नमेहेवि मुदान्विता ॥४१ ।। जो मनुष्य भमसे भी कपालमें विल्वकाठका चदन धारण करता है, उसके देहको शिवतनु जानकर लक्ष्मी देवी हर्षित होकर प्रणाम करती है अतस्तचन्दनं देवि धारयेन्न कदाचन । नत्पत्रं तत्प्रसून वा धारयेत्रकदापिहि ।। ४२ ।।

-
भाषाटीकासमेतम् । (६१)
अतएव हे देवि ! वह चन्दन मनुष्यगण कभी धारण न करे एवं उसक
पन्न वा पुष्प धारण करना भी उचित नहीं है ।। ४२ ॥
विल्वमूले महेशानि प्राणांस्त्यजति यो नरः।
रुद्रदेवो भवेत्सत्यं पापकोटियुतोऽपि सः॥४३॥
हे महेशानि ! जो मनुष्य विल्वमूलमें प्राणत्याग करता है. वह यदि
करोडपापोंसे युक्त तो भी रुद्रदेह धारण करता है इसमें सन्देह नही।।१३।
अतस्तत्साधनं देवि सर्वेषां प्रियकारकम् ।
तत्र गत्वा बिल्वमूलं प्राग्वद्गुरुचतुष्टयम् ॥
अभ्यर्च्य यत्नतो देवि क्षेत्रपालं प्रपूज्य च ॥४४॥
हे देवि ! इस कारण उसका साधन सब देवताओंका प्रिय करनेवाल।
है, उस बिल्वमूल में जाकर पूर्ववत् गुरुचतुष्टय ( चारों गुरु ) की पूजापूर्वक
परमयत्नसे क्षेत्रपालकी पूजा करे ॥ ४४ ॥
क्षेत्रपाल महाभाग श्मशानाधिप सुव्रत ।
सिद्धिं देहि जगत्कर्तः स्थानं देहि नमोस्तुते ॥४५॥
फिर हे क्षेत्रपाल ! हे महाभाग ! हे श्मशानके अधिपति ! हे श्रेष्ठ-
व्रतवाले ! हे जगत्कर्ता ! सिद्धि दीजिये । स्थान दीजिये । आपको
प्रणाम है ॥ ४५ ॥
अनेन प्राणवायेन मनुना प्रणमेत्ततः।
तनः स्थानन्तु संपूज्य लिखेत्तत्र वरानने ॥ ४६॥
वाग्भवं प्रेतबीजश्च पुनर्वाग्भवमेवच ।
तदन्ते मूलमन्त्रश्च विलिखेसाधकोत्तमः ॥ ४७ ॥
प्रणवादि " इस मंत्रसे प्रणाम करे । हे वरानने ! फिर उस स्थानकी
पूजा करके वाग्भव बीज, प्रेतबीज, पुनर्वार वाग्भव वीज और इसके पीछे
साधकोत्तम मूलमंत्र लिख ॥ ४६ ॥ १७ ॥

योगिनीतन्त्रम् ।
पूजयित्वा च कालादीन्र्पूववत्परमेश्वरि ।
संकल्प्याष्टोत्तरशतं जप्त्वाऽच्छिद्रं च धारयेत् ॥४८॥
है परमेश्वरि ! फिर कालादिकी पूजा पूर्ववत् समापन करके संकरपूर्वक
अष्टोत्तरशत जप करनेके पीछे अच्छिद्रावधारण करे ॥४८॥
स्थान परित्यज्य गुरुं संस्मरन् तगृहं व्रजेत् ॥
इत्येवं कथितं तुभ्यं सारासारं परात्परम् ॥१९॥
गोपनीयं सदा भने विशेषात्पशुसंकुले ॥ ५० ॥
इसके उपरान्त उस स्थानको छोडकर गुरुका चिंतन करते करते ही
अपने घर चलाजाय । यह मैने तुम्हारे प्रति सारसे भी सार परसेभी पर
चिल्वसाधन कहा । हे भरे ! यह सदाही भौर विशेषकर पथसंकुलस्थानमें
गुप्त रखने योग्य है ।। ४९ ॥ ५० ॥
इदानीं शृणु देवेशि मुण्टसाधनमुत्तमम् ।
यत्कृत्वा साधको याति महादेव्याः परं पदम् ॥५१॥
हे देवेशि ! अब उत्तम मुण्डसाधन सुनो । साधक यह मुण्डसाधन करके
महादेवीके परमपदको प्राप्त होता है ।। ५१ ॥
नरमाहिषमार्जारमुण्डकानि वरानने ।
अथवा परमेशानि नृमुण्डनयमादरात् ॥ ५२ ॥
हे वरानने ! नरगुण्ड, महिपमुण्ड और मार्जार (विलायका ) मुण्ड
अथवा तीन नरमुण्ड यत्नसहित लावे ।। ५२ ॥
शिवासर्पसारमेयवृषभानां महेश्वरि ।
नरमुण्डं तथा मध्ये पञ्चमुण्डी समीरिता ॥ ५३ ।।
शिया (गीदड ) मुण्ड, सर्पमुण्ड, कुक्कर (कुत्ता) मुण्ड, वृपभमुण्ड
और नरमुण्ड. हे महेश्वरि ! यही पांच मुण्ट हैं ॥ ५३ ॥

"
भापायीकासमेतम् । (६३)
अथवा परमेशानि नराणां पञ्च मुण्डकान् ।
तथा शतं सहस्त्रं वायुतं लक्षं तथैव च ॥ ५४ ॥
नियुतश्चाथ वा कोटिं नृमुण्डान् परमेश्वरि ।
नरमुण्डं स्थापयित्वा प्रोथयित्वा धरातले ॥५५॥
अथवा हे परमेशानि ! पांच नरमुण्डही पांच मुण्ड रूपमें ग्रहण किये
जाते हैं. तथा शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, नियुत वा करोड नरमुण्ड गृहीत
होते हैं. हे परमेश्वरि ! नरमुण्ड पृथ्वीमें गाडकर ॥ ५४ ।। ५५ ॥
वितास्तिप्रमितां वदि तस्योपरि तु कल्पयेत् ।
आयामप्रस्थतो देवि चतुर्हस्तौ समाचरेत् ।। ५६ ॥
स्थापनपूर्वक उनके ऊपर ऊमें वितस्तिपारिमित वेदी बनावे, लम्बाई
और चौडाईमें वह चार हाथकी बराबर होनी चाहिये ॥ ५६ ॥
सहस्राल्लक्षपर्यन्तं हस्तषोडशसम्मिताम् ।
ततः परं महादेवि शतहस्तमिताश्चरेत् ।। ५७ ॥
तस्यान्तुभूतनाथादीश्चतुर्दिक्षु समर्चयेत् ॥ ५८ ॥
सहस्रसे लक्ष मुण्ड पर्यन्त सोलह हाथ वेदी और नियुतसे करोड संख्यक
मुण्डमें २ सौ हाथकी बराबर वेदी बनानी चाहिये। उस वेदीमें चारों
ओर भूतनाथादिकी पूजा करे ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
पूर्वोक्तभूतनाथाय नमोमन्त्रेण देशिकः ।
पाद्यादिभिः पृजयित्वा बाल दद्यात्प्रयत्नतः॥ ५९॥
साधक व्यक्ति पूर्वोक्त भूतनाथजी नमोमन्त्रद्वारा पाद्यादि पूजा करके
यत्नपूर्वक उसको बलि देवे ॥ ५९ ॥
एवन्तु दक्षिणे देवि श्मशानाधिपमादरात् ।
तद्वन्च पश्चिम भागे कालभैरवमुत्तमम् ॥ ६॥

(६४) योगिनीतन्त्रम। इस प्रकार दक्षिण दिशामें श्मशानाधिपति और पश्चिम दिशामें उत्तम कालभैरकी ॥ ६० ॥ श्मशानादुत्तरे तद्वत्पूजयित्वा बलि हरेत् । वैदिमध्ये प्रेतबीज फटकारस्तदनन्तरम् ॥ ६१ ॥ पाद्यादिभिरननैव कुण्डानि परिपूजयेत् ॥ ६२ ॥ और उत्तरमें उसी प्रकार श्मशानकी पूजा करके आदरपूर्वक बलिदान करे वेदीमें प्रेतबीज और फटकार मत्रसे वाद्यादि कुण्डकी पूजा करनी चाहिये ।। ६१ ॥ ६२ ।। नेत्यां ही चण्डिकायै वीजं च विलिखेत्ततः । तत्रैव पूजयेद्भक्त्या भारती शुभ्रविग्रहाम् ॥ ६३ ॥ साधकोत्तम नेत्य कोणमें ही चण्डिकायै' और वीनमत्र लिखकर उसी स्थानमें शुभ्र विग्रहा अर्थात् श्वेत शरीरवाली भारतीकी भक्तिपूर्वक पूजा करे ।। ६३ ॥ वाग्देवतामंगयुतां नमोऽस्तवाग्भवादिना । अनेन मनुनाभ्यर्च्य बलि तस्यै निवेदयेत् ।। ६४ ॥ अगयुक्त वाग्देवताकी नमोऽन्त वाग्भवादिमनसे अर्चना करके उसको बलि निवेदन करनी चाहिये । ६४ ॥ हे वीर सर्वदेवेश मुण्डरूप जगत्पते । दयां कुरु महाभाग सिद्धिदो भव मज्जपे ॥ ६५ ॥ हे चौर । हे सब देवताओंके ईश्वर ! है मुण्डरूप । हे जगत्पते 1 हे महाभाग्यवाले । मेरे जपमें सिद्धि दो ॥६५॥ शवं कुर्यादाहसंस्थं पाशमिन्दुकलान्वितम् ॥ ६६ ॥ इस मत्रसे वेदिकाके ऊपरी भागमें तीन पुष्पाललि देवे। फिर शवको वद्विसस्थ अर्थात् अमिमें स्थापन और पाशको इन्दुकलायुक्त करके ॥६६॥ -

भाषाटीकासमतम् ।
(६५)
मायावीजं कूर्चवीजं फटकारस्तदनन्तरम् ।
पाचादिभिरनेनेष कुण्डानि परिपूजयत् ॥ ६७ ॥
मायाबीज और कूचबीच फटकार मन्त्रद्वारा पाधादिसे कुण्डकी पूजा
करे ॥ ६७॥
नैऋत्यां ह्रींचण्डिकायनमोमन्त्रेण देशिकः।
वायव्यां ह्रींभद्रकाल्यैनमोमन्त्रेण तत्परम् ॥ ६८ ॥
ईशाने च हींदयायैनमोमन्त्रण शाम्भवि ।
अग्नौतु हींचण्डोमायनमोमन्त्रेण साधकः ॥ ६९ ॥
पूजयित्वा बलिं दत्त्वा तदुत्थाय च संमुखे ।
श्मशानवासिनो ये ये देवा देव्यश्च भैरवाः ॥ ७० ॥
दयां कुर्वन्तु ते सर्वे सिद्धिदास्ते भवन्तु मे ।
अनेन प्रणवाद्येनत्रिपुष्पाञ्जलि क्षिपेत् ।। ७१ ॥
साधक "हीं चण्डिकायै नमः" इस मंत्रसे नैर्ऋतकोणमें, फिर ही भद्र-
'काल्यै नमः' इस मन्त्रसे वायुकोणमें 'हीं दयायै नमः" इस मन्त्रसे ईशान
कोणमें 'हीं चण्डोमाय नमः' इस मन्त्रसे ममिकोणमें पूजा करके बलि-
प्रदानपूर्वक उठकर खड़ा हो सन्मुख "श्मशानवासिनो ये ये देवा देव्यश्च
भैरवाः । दयां कुर्वन्तु ते सर्वे सिद्धिदास्ते भवन्तु मे" प्रणवाद्य इस मन्त्रसे
तीन पुष्पाञ्जलि निक्षेप करे ॥ ६८॥ ६९ ॥ ७० ॥ ७१ ॥
वदे स्थानन्तु संपृश्य वशी भव वशी भव ।
विष्टरासनमास्तीर्य उपविश्य महेश्वरि ।। ७२ ॥
अष्टाधिकायुतजपं कृत्वाच्छिदं च धारयेत् ।
नत्वा स्थानं परिष्कृत्य देवीं ध्यायन्गृहं व्रजेत् ॥७३॥

योगिनीतन्त्रम्।
इसके पीछे स्थानस्पर्शपूर्वक ' वशीभव' यह वचन कहे । महेश्वरि !
फिर कुशासन बिछाकर उसके ऊपर बैठ और अष्टाधिक अयुत,(१०००८)
जप करके अच्छिद्रावधारण करे इसके उपरान्त स्थानपरिष्कारपूर्वक देवीको
प्रणाम और ध्यान करके घर चलाजाय ॥ ७२ ॥ ७३ ।।
पुरश्चर्या विधेर्देवि शेषं संशृणु शाम्भवि ।
कीलकं नैव कुर्यात्तु विमुण्डोपरि कर्हि चित ॥ ७४ ॥
हेशाम्भवि देवि ! पुरश्चरणकी विधिके अनुसार अवशिष्ट सुनो । उसमें
त्रिमुण्डोपरि कभी कीलक न करे ।। ७१ ॥
शून्यागारे नदीतीरे पर्वते वा चतुप्पथे।
बिल्वमुले श्मशाने वा निर्जने चैकलिङ्गके ॥ ७५ ।।
एतेषु मोथयेन्मुण्डान्सर्वकामार्थसिद्धये ।
एवं वा प्रोथयित्वा च नारं मुण्डं विधानतः ॥ ७६ ॥
हे देवि ! संपूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके निमित्त शून्यागारमें, नदीके
तस्पर, पर्यत चौराहे वा विल्बमूल अथवा श्मशानमें निर्जनमें वा एक
लिगमें इन सब स्थानों में मुण्डोंको गाढ दें । इस प्रकार नरमुण्ड गाडकर
इसी विधानसे ।। ७५ ॥ ७६ ॥
अनेन सर्वसिद्धिः स्याद्वहुभिः किमु सुव्रते।
इत्येवं कथिनं देवि मुण्डानां साधनं शिव ।
यत्कृत्वा सर्वसिद्धानामधिपो भुवि जायते ॥ ७७ ।।
पूजा करनेपर सर्वसिद्धि होती है । है सुव्रते ! हे शिवे । यह मैंने
तुमसे मुण्डसाधन कहा । इसको साधन करके पृथ्वीमें सर्व सिद्धीश्वर
हो सकता है ॥ ७७ ॥

(६७)
भापाटीकासमेतम् ।
श्रीदेव्युवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वागमविशारद ।
गुरुस्त्वं सर्वमन्त्राणां करुणामृतसागर ॥ १ ॥
.--श्रीदेवीजीने कहा-हे सर्वधर्मज्ञ सर्वागम विशारद भगवन् ! हे करुणा-
सागर ! आप सब मंत्रोंके गुरु हैं ॥ १ ॥
सर्वधर्मकृतां पूज्य योगिहृत्पद्मभास्कर ।
दिव्यभावो वीरभावो महत्त्वेन प्रदर्शित ।
गोप्यं तत्र विशेषेण वद मे चन्द्रशेखर ॥ २ ॥
आपने सर्व साधन किये हैं, योगियों के हृदयरूप कमलके आप सूर्यके
समान प्रफुल्ल करनेवाले हैं, आपने ही दिव्यभाव और वीर भाव दिखाया
है. हे चन्द्रशेखर । अब उसका विशेषरूपसे गोप्य वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
ईश्वर उवाच ।
दिव्यवीरविभेदेन योगोद्वौतु समीरिती ।
तद्योगो ह्यभवत्कौलो दिव्यवीरो महेश्वरि ॥ ३ ॥
ईश्वर बोले कि-दिव्य और वीर भेदसे योग दो प्रकारका है, हे महे-
श्वार ! योगही दिव्य वीर और कौल कहाता है ॥ ३ ॥
तद्योगं हि विना देवि यस्तकर्म समाचरेत् ।
न स योगी भवेद्देवि मुमुक्षुः कुलकामिनि ॥ ४ ॥
तावच्च ते प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा कर्णेऽवतंसय ।
आत्मानं परमं ब्रह्म चिन्तयेदथ वा न चेत् ।। ५
आत्मदेहं स्वेष्टरूपं सदेव परिचिन्तयेत् ।
ब्रह्माण्डश्च तथा सर्व स्वरूपेण विभावयेत् ॥ ६॥

(६८)
योगिनीतन्त्रम् ।
हे देवि ! उस योगके विना जो उस कर्मका आचरण करता है वह
मुमुक्षु योगी नही होता है. हे कुलकामिनि ! मैं वह सब तुमसे कहता हूं
सो सुनकर उसको कर्णभूषण करो। आत्माकी परब्रह्मरूपमें चिन्ता करे
अथवा आत्मदेह ही इष्टरूप है, इस प्रकार निरन्तर चिन्ता करे और
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इष्टरूप है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥४॥५॥६॥
दिव्ययोगमिमं देवि सावधानेन गोपय ।
वीरयोगं शृणुप्वेमं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ ७॥
बिन्दुत्रयं कलाक्रान्तं प्रथमं परिचिन्तयेत् ।
तत्तस्माद्भावयेजातं स्त्रीरूपं षोडशाब्दिकम् ॥ ८॥
हे देवि ! वही दिव्य योग है, तुम इसे सावधानी से गुप्त रखना हे
परमेश्वरि ।सर्वदेवनमस्कृत यह वीरयोग सुनो । प्रथम कलायुक्त तीन बिन्दुकी
चिन्ता करे फिर उससे पोडशवर्षीय स्त्रीरूपकी भावना करे ॥ ७ ॥ ८ ॥
बालार्ककोटिमुज्योतिः प्रकाशितदिगन्तरम् ।
मृ दिस्तनपर्यन्तमूलबिन्दोः समुद्भवम् ।। ९ ।।
इस स्त्रीके करोड पाल सूर्य के समान ज्योतिर्मण्डलसे दिगू मण्डल
प्रकाशित हुआ है, मूर्खादिस्तनपर्यन्त ऊर्वविन्दुसे यह ज्योतिः प्रकाशित
होती है |॥ ९॥
बिन्दर्यावन्मध्यदेह कण्ठादिकीटशीर्षकैः ।
स्तनद्वयन भासन्तं विवलीपरिमण्डितम् ॥ १० ॥
उसका मध्य देह ही मध्य बिन्दु है, वह कण्ठसे कमरके ऊर्च भाग
पर्यन्त है यह दोनों स्तनके भागमें दीप्तिमान् और त्रिवलीसे शोभित
है ॥ १० ॥

भापाटीकासमेतम् ।
योन्यादिकं च पादान्तं कामन्तत्परिचिन्तयेत् ॥११॥
अनन्तर योनि आदि पादान्त पर्यन्तकी एकाग्र चितसे चिन्ता
करे ॥११॥
नानालङ्कारभूपाढचं विष्णुब्रह्मेशवन्दितम् ।
एवं कामकलारूपं आत्मदेहं विचिन्तयेत् ॥ १२ ॥
यह स्त्री अनेक प्रकारके आभूषण धारण किये हुये और ब्रह्मा विष्णु
महेश्वरसे वंदित है, आत्मदेहकी इसप्रकार कामकलारूपमें चिता करे ॥१२
सदैव परमेशानि वीरयोगमिमं शृणु ।
संक्षेपात्कथयिष्यामि तयोराचारमुत्तमम् ॥ १३ ॥
हे परमेशानि ! यही वीरयोग है । अब संक्षेपसे इन दोनोंका उत्तम
आचार कहता हूं सुनो ॥ १३ ॥
मद्यं मांसं तथा मत्स्यं मुद्रा मैथुनमेव च ।
इदमाचरणं देवि पशोनों दिव्यवीरयोः ॥ १४ ॥
मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन. यह आचार पशुभावका है,
दिव्य और बीर भावफा नहीं है ॥ १४ ॥
स देवाचारवान्भूयादिव्यो वीरो महेश्वरि ।
यदि देवान्महेशानि मद्यादि न च लभ्यते ।। १५ ॥
हे महेश्वारे ! दिव्ययोगी और वीरयोगी देवाचारवान् होगा। हे महे
शानि । यदि किसी दिन दैवयोगसे मद्य न मिले ॥ १५ ॥
यस्मिन्नहानि देवेशि तथात्मानं तु भावये ।
तथापि न हि तत्याज्यमिदनाचमनं शिवे ॥ १६ ॥
हे देवेशि ! जो आत्माकी तदादिरूर (भाव ) में भावना करे, तथापि
आचमनका त्याग न करे ॥ १६ ॥

योगिनीतन्त्रम् । महामद्यं विना कौल क्षणार्ध्वं न तिष्ठति । तस्मान्मद्यादिकं देवि सेवितव्यं दिने दिने ॥ १७ ॥ महामद्य विना कौल क्षण भर भी अवस्थित नहीं होता। हे देवि इस कारण प्रतिदिन मद्यादिकी सेवा करे ।। १७ ॥ अतुष्ठान विधि वक्ष्ये शृणु त्वं पर्वतात्मजे । गुरुणा दीक्षितो भूत्वा कोलंन्यासं समाचरेत् ॥१८॥ हे पार्वती । अब अनुष्ठानकी विधि वर्णन करता हूं सुनो। गुरु द्वारा दीक्षित होकर कौलको नाश करना चाहिये ॥ १८ ॥ तद्विधिश्चोत्तरे नन्। एतत्स्यात्तु कुलार्णवे । मयोक्तं तत्क्रमेणव अभिषेकद्वयं चरेत् ॥ १९ ।। नाम लब्ध्वा गुरोश्चापि वृणुयाद्योगमुत्तमम् । दिव्यम्वा वीरयोगम्बा यथाकर्मानुसारतः ॥२०॥ वह विधि उत्तर तन्त्रमें और यह विधि कुलार्णवमें मैने कही है, उसके अनुसार दो बार अभिषेक कर गुरुका नाम ले दिव्य हो वा वीर हो कर्मा नुसार उत्तम योग चरण करे ॥ १९ ॥ २० ॥ तत्क्षणाप्रियतामेत्य मुक्तो भवति कालतः । यस्तु दिव्यो भवेत्सत्यं स विष्णुनात्र संशयः॥२१॥ तत्काल यह योग प्रिय होकर कालानुसार मुक्तिप्रदान करता है जो दिव्य योगी है, वह विष्णु है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २१ ॥ यो रुद्रो भविता शेषे वीर एव न संशयः !. यत्र देशे नरस्तिष्टेदिव्यो, वा वीरपुङ्गवः ॥ २२ ॥ जो वीर योगी है, वह रुद्र है, इसमें सन्देह नहीं हे देवेशि ! जिस देशमें दिव्ययोगी या वीर योगी वास करता है ।। २२ ॥ 1

भापाटीकासमेतम् । (७१)
तत्तत्कुलम्वा देवेशि देशोवा क्षितिराट् स्वयम् ।
सिद्धिक्षेत्रं समुद्दिष्टं समन्ताशयोजनम् ॥ २३ ॥
वही देश और वही कुल (गुरुका वास स्थान ) सब पृथ्वीमें उत्तम
और पुण्यजनक होता है। जहां दिव्य वा वीर वास करता है, वहांके
चारों ओरका दश योजन स्थान सिद्ध क्षेत्र होता है ।। २३ ॥
तत्रैव सर्वतीर्थानि तत्र गङ्गा सरिद्वरा ।
योगिनां दुर्लभं चतत् डाकिनीभिः सरीसृपः॥ २४ ॥
उसी स्थानमें सर्वतीर्थ और उसी स्थानमें सरित् श्रेष्ठ गंगा अवस्थान
करती है । यह स्थान योगिनियोंको भी दुर्लभ और डाकिनी सरीसृप
( कीट पतंगादिक ) ॥ २४ ॥
ब्रह्मराक्षसवेताला कूष्माण्डभैरवैः शिवे ।
गुह्यकैनवैर्वापि मायिभिर्यक्षकिन्नरः ॥ २५ ॥
ब्रह्म राक्षस, वेताल, कूष्मांड, भैरव गुखक, दानव, मायी, यक्ष,
किन्नर ॥ २५॥
रोगे?ष्टमृगैश्चैव दुर्मिक्षनवपीडितम् ॥
अवश्यं मङ्गलं तत्र तत्पुरीपरिवर्द्धनम् ।। २६ ॥
सुभिक्ष क्षममारोग्यमेवं सद्धर्मकोषकः ।
स्फुरन्ति सर्वशास्त्राणि सर्व स्यादपि नित्यशः ॥२७॥
रोग दुष्टजन्तु, दुर्भिक्ष, सर्पकुल इन सबको ही दुर्गम है, वहां अवश्य
ही मंगल विराजमान रहता है । जिस पुरमें दिव्य वीर योगी वास करता
है, उस पुरी में श्रीवृद्धि और समृद्धिकी वृद्धि होती है, वहां मुभिक्ष, क्षेम
आरोग्य और धर्मका कोप स्थित होता है, वहांके निवासियोंको सर्वशास्त्र
स्कृतिको प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥

(७२) योगिनीतन्त्रम् । ब्रह्मविष्णुशिवादीनां सुप्रियः साधकोत्तमः। तरवोऽपि सुजीवन्ति पशुः पक्षी सुजीवति ।। २८ ॥ है प्रिये । वह साधकोत्तम ब्रह्मा विष्णु शिवादिका प्रिय होता है, है देवि । वहा तरुगों की मृत्यु नहीं होती। पशु और पक्षी जीवित रहते हैं ॥ २८॥ कुलधर्मे मनो यस्य स्वधर्मश्च व्यवस्थितः। यत्र कुत्र मृतो देवि दिव्यो वा वीरपुङ्गवः । तत्रैव परमं ज्ञानं कर्णमूले ददाम्यहम् । कुलधर्मस्त्वयं देवि संसेव्यश्चनिरन्तरम् ॥ २९ ॥ निसका कुलधर्म में मन है, जिसकी स्वधर्म व्यवस्था सगत है, उस दिव्य वा वीर पुरुषके जिस किसी स्थानमें मरने पर भी उसके कर्णमूलमें मैं परम ज्ञान देता है । हे देवि ! इस कुलधर्मकी निरन्तर सेवा करनी चाहिये॥२९॥ कुलधर्मपरा देवि सर्वे च त्रिदिवौकसः। मुनयो मानवा नागाः सिद्धगन्धर्वकिन्नराः ॥३०॥ हे शिवे | कुलधर्मनिरत देवगण, मुनिगण, मानवगण, नागगण, सिद्ध- गण, गन्धर्वगण, किनरगण ॥ ३० ॥ ऋषणे वसवो देत्या येऽपि स्युः कुलपुङ्गवाः । कुलधर्मप्रसादेन ते सर्वे कुलनायकाः॥३१॥ रुपिगण, वसुगण, दैत्यगण जो कोई कुल श्रेष्ठ हैं, यह धर्म कर्मके प्रसादसे कुलनायक होते हैं ॥३१॥ इन्द्राद्याः खेचरारूढा भवेयुश्चिरजीविनः । ये यथा मां प्रपद्यन्ते ते तथा फलभागिनः ॥ ३२ ॥ इन्द्रादि देवता और खेचर गण इसमें चिरजीवी हुए हैं, मुझको जो जिस प्रकारसे मनता ह, वह उसी प्रकारसे फलभागी होता है |॥ ३२ ॥ -

भापाटीकासमेतम् ।
(७३)
ब्राह्मणः क्षत्रियो वेश्यो ब्रह्मचारी गृही तथा।
वानप्रस्थो यतिश्चैव भवेयुस्ते कुलातुगाः ॥ ३३ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ब्रह्मचारी. वानप्रस्थ, यती इत्यादि सब ही
कुलानुगामी होंगे ॥ ३३ ॥
तेषां विधि शृणुष्वाद्य मत्तस्त्वं कुलनायिके ।
गुडाकरसेनैव सुरा तु ब्राह्मणस्य च ॥ ३४ ॥
हे कुलनायिके ! उसकी विधि सुनो ? गुड और अदरखका रस मिला-
नेसे ब्राह्मणकी सुरा ॥ ३४ ॥
नारिकेलोदकं कांस्ये क्षत्रियस्य वरानने।
वैश्यस्य माक्षिक प्रोक्तं कांस्यस्थं वरवर्णिनि ॥ ३५॥
कांसीके पात्रमें नारियलका जल क्षत्रियकी और वैश्यकी कांस्यस्थ
माक्षिक (मधु ) सुरा कही गई है ॥ ३५ ॥
मांसं मत्स्यन्तु सर्वेषां लवणाईकमीरितम् ।
भृष्टधान्यादिकं यदच्चर्वणीयं प्रचक्षते ॥ ३६ ।।
सा मुद्रा कथिता देवि सर्वेषां नगनन्दिनि ।
ब्राह्मणी ब्राह्मणस्यैव क्षत्रिया क्षत्रियस्य च ॥ ३७॥
मत्स्य, मांस और लवणाक सभीके पक्षमें समान है, भृष्टधान्यादि
अर्थात् जो भुने हुए चर्वणीय द्रव्य हैं, वहीं मुद्रा कहाते हैं । ब्राह्मणी
जाह्मणके क्षत्रिया क्षत्रियके ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
वैश्या वैश्यस्य देवेशि मैथुने यद्विधिः स्मृतः।
वैश्या वा ब्राह्मणक्षत्रौस्त्रिवर्णानां महेश्वरि ।
क्षत्रिया ब्राह्मणस्यापि कथिता वरवर्णिनि ॥ ३८ ॥
शुदा वा ब्राह्मणादीनां त्रिवर्णानामभावतः ॥ ३९ ॥

. (७१) योगिनीतन्त्रम् । वैश्या वैश्य के मैथुन विषयमें प्रशस्त है। इसके अभावमें वैश्या ब्राह्मण और क्षत्रियके, क्षत्रिया ब्राह्मण के और शूद्रा ब्राह्मणादि तीनों वर्णोके मैथुन- योग्य होती हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ब्रह्मक्षत्रविशाश्चैव आश्रमिणामिदं स्मृतम् । त्रिवर्णविहितानाञ्च यतीनां शृणु सम्प्रति ॥ ४० ॥ वर्णाश्रमी, विष, क्षत्र और वैश्यगणोंकी यह विधि कही गई, अब त्रिवर्णविहित यती गणोंकी विधि सुनो ॥ ४०॥ सहस्रारोपरिबिन्दौ कुण्डल्या मेलनं शिवे। मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्तितम् ॥ ४१ ॥ हे शिवे | सहस्रदल पद्मोपरि विन्दुमें जो कुल कुण्डलिनीका मिलन है वही यतीगणोंका परम मेथुन कहा गया है ।। ४१ ।। अवधूताश्रमी यो हि तस्य वक्ष्ये विधि शृणु । पैष्टिकादीनि सोणि मद्यानि तस्य शाम्भवि ॥४२॥ हे शाम्भवि ! अवधूताश्रमीकी विधि सुनो । पैप्टिकादि सब प्रकार की मद्य उसको सेवनीय है ।। ४२ ।। मत्स्यं मांसं तस्य देवि जलभूचरखेचरम् । पूर्वोक्ता च भवेन्मुद्रा सेविता सादरास्विता ॥ ४३ ।। जलचर, भूचर और खेचर उसका मत्स्य और मास है । पूर्वोक्त मुद्राही उसके पक्षमें सेवनीय है ॥ ४३ ॥ मातृयोनि परित्यज्य मैथुनं सर्वयोनिषु । क्षतयोनिस्ताडितव्या अक्षतां नैव ताइयेत् ।। ४४ ॥ वह मातृयोनि त्यागकर सर्व योनिमें ही मैथुन करे, क्षतयोनि ताडन कर अक्षतयोनिका ताडित करना उचित नही है ॥ १४ ॥ --

.
भापाटीकासमेतम् ।
अक्षताताडनादेवि सिद्धिहानिः प्रजायने ।
द्वादशाब्दाधिका योनिर्यावत षष्टिः प्रजायते ।
तावत्तु मैथुनं तस्या यावच स्यात्स्वयम्भवा ॥ ४५ ॥
हे देवि ! अक्षत योनिक ताडन करनेसे सिद्धिकी हानि होती है द्वादश-
वर्षसे लेकर साठ वर्ष तक प्रसंग योग है योनि पुष्ट होनेपर जब स्वयम्भवा
अर्थात् स्वयं प्रवृत्त हो, उसी समयमें मैथुन श्रेष्ठ हे ॥ १५ ॥
अवधूतसमाचाराः शूद्रे सर्वे प्रकीर्तिताः ।
विशेष मैथुने तस्य कथयामि शृणुष्व मे ॥ ४६॥
अवधूताचार समस्त ही शूद्रके पक्षमें कहा गया है, मैथुनमें उनकी
विशेषता कहता हूं सुनो ॥ १६ ॥
ब्राह्मणी क्षत्रियां वैश्यां त्यक्त्वा तु सर्वजातिषु ।
मैथुनं प्रचरेद्धीमान्देवताभावचेष्टितम् ॥ ४७ ।।
बुद्धिमान् मनुष्य ब्राह्मणी, क्षत्रिया और वैश्या त्यागकर सर्व जाति में
ही दिव्याचारविहित मैथुन करे ॥ ४७ ॥
गृहमेधी भवेच्छूदो नान्याश्रमी भवेत्कदा ।
शूद्रवदन्यजातीनामाचारोऽयं प्रकीर्तितः ॥४८॥
शूद्रही इसमें गृहाश्रमी होगा. अन्यान्य मनुष्य आश्रमी नहीं होंगे,
इसमें अन्यजातिका भी शूद्रवत् आचार कहा गया है ।। ४८ ॥
गुरुवढे त्रिवर्णे तु तथा मातामहे कुले ।
मैथुनं सुसमुद्दिष्टमवधूताश्रमेऽपि च ॥ ४९ ॥
अवधूताश्रममें भी गुरुके समान दो और तीन वर्णमें तथा मातामहके
कुलमें मैथुन कहा गया है ॥ ४९ ॥
काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी भैरवी तथा ।
मातङ्गी च तथा विद्या विद्या धूमावती तथा ॥५०॥

(७६)
योगिनीतन्त्रम् ।
काली, तारा, छिन्नमस्ता, सुन्दरी, भैरवी, मातगी, विद्या, विद्या,
धूमावती ॥५०॥
एतासां साधकाचारश्वावधूतसमः स्मृतः।
सर्वाश्रमे सर्ववणे सर्वयोगे तथा शिवे ॥ ५१ ।।
हे शिवे ! सर्वाश्रम सर्ववर्ण सर्वयोगमें इनके साधनका आचार अवधूतके
समान कथन किया गया है ॥५१॥
सर्वस्थानेषु सर्वत्र न विशेष क्वचिद्भवेत् ।
आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च देहे व्यवस्थितम् ॥ ५२ ॥
सर्वस्थानमें सर्वत्र ही समान है, इसका विशेष कहीं भी नहीं है, आनन्द
ब्रहाका स्वरूप यह देहमें व्यवस्थित है ।। ५२ ॥
एवं विप्रो देवतायै स्वगात्ररुधिरं ददेव ।
शक्तिनाशविकारोऽस्ति स्वदेहरुधिरार्पणे ॥ ५३ ॥
इस प्रकार ब्राह्मण देवताको अपने गात्रका रुधिर दान करे अपने देहका
रुभिर अर्पण करनेसे शक्तिनाश और विकारादि होता है ॥ ५३ ॥
तस्याभिव्यननं द्रव्यं दीयते कुलयोगिभिः।
द्रव्यादिसकलं देखि व्यनकस्यापरार्द्धकम् ॥ ५४ ।।
अन एव कुनयोगीगण इस रुधिरका अभिव्यञ्जक द्रव्य (प्रगट करने
वाली
वस्तु) प्रदान कर सकते हैं हे देवि ! द्रव्यादि सब व्यञ्जक
द्रव्य है, उनका अपरार्द्ध रूप कहा जाता है || ५४ ॥
केवलेनाद्ययोगेन साध्य काल्पायुपासका।
भैरवाय द्वितीयेन शिवत्वं च तृतीयकम् ॥ ५५ ॥
केवल आधयोगद्वारा हो कालीआदिमहाविद्याका उपासक होता है
दूसरे योगों मैरवको तीसरे मोगमें शिफी ॥ ५५ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (७७)
चतुर्थे सर्वसिद्धीशञ्चित्रमेतन्नगात्मजे ।
परेण परतां याति मम तुल्यो न संशयः ॥ ५६ ॥
और चौथे योगमें सर्वसिद्धीश होता है । हे पर्वतनन्दनि ! यह आश्व-
र्यका विषय है-एकसे दूसरेके द्वारा श्रेष्ठताको प्राप्त होकर मेरी समान
होता है, इसमें सन्देह नही ।। ५६ ॥
सेविते कुलतत्त्वे तु कुलतत्त्वसुदर्शिनः।
जायते भैरवास्ते न वेशास्तत्समदर्शिनः ॥ ५७ ।।
कुलतत्त्वदर्शी गण कुलतत्त्वकी सेवा करनेसे भैरव और तत्समवेश
( उन्हीके समान वेश) और उन्हीके समान समदर्शी होते हैं ॥ ५७ ॥
तमः परिवृतं वेश्य यथा दीपेन दृश्यते ।
तथा मायावृतं चित्तं ज्ञानदीपेन दृश्यते ॥ ५८ ॥
अन्धकारसे ढकाहुआ घर जिस प्रकार दीपकके द्वारा दिखाई देता
इसी प्रकार मायावृत चित्त ज्ञानदीपकसे दिखाई देता है ॥ ५८ ॥
निरस्तभेद वस्तु स्यान्मध्यामेध्यादिवस्तुषु ।
जीवन्मुक्तो देहभावो देहान्ते क्षेममाप्नुयात् ॥ ५९ ।
ज्ञानप्रदीप प्रज्वलित होनेपर वस्तुका प्रभेद निरस्त होता है, मेध्य औ
अमेध्य अर्थात् पवित्र और अपवित्र समस्त वस्तुकी भेदबुद्धि तिरोहित होत
है । इस प्रकार जीवन्मुक्त देहभावको प्राप्त होकर देहके अन्तमें पर
मंगलरूप मुक्तिलाभ करता है ।। ५९ ।।
पीत्वा कुलरसं वीरो ब्रह्मध्यानमुपाश्रयेत् ।
ब्रह्मध्यानं महेशानि ब्रह्मनिर्वाणकारणम् ॥६० ॥
वीर योगी कुलरस पानकरके ब्रह्मन्यान आश्य करे, हे महेशानि
ब्रह्मध्यान भी ब्रह्मनिर्वाणप्राप्तिका कारण है ॥ ६० ॥

(७८) योगिनीतन्त्रम् । तच्छृणुष्व महेशानि सारासारं परात्परम् । स्वकीयजीवदेहादिब्रह्माण्डानन्तमेव च ॥ ६१ ॥ एवं हि सकलं देवि देहमहार्णवादि यत् । न चिन्तनीयं तत्सर्वं नास्तीति परिभावयेत् ॥ ६२ ।। वह सारमे भी सार परेसे भी परका विषय सुनो। स्वकीय जीवात्मा और देहादि समस्त ब्रह्माण्ड महार्णवादि जो कुछ है, वह कुछ नहीं । इस प्रकार भावना करके उसकी चिन्ता न करै ॥ ६१ ।। ६२ ।। मात्सीयकं महातेजश्चैतन्यव्यापकं यथा । अहमेव जालरूपश्चाधारो देहवर्जितः ॥ ६३ ॥ मात्सीयकतेजः महातेजः वह चैतन्यव्यापक है, मै जलरूप देहहीन आधार हूं ।। ६३ ॥ आत्मानमपि देवेशि तनेदेन विचिन्तयेत् । ब्रह्मध्यानमिदं प्रोक्तमेतस्थिरतराय च ॥ ६४ ॥ हे देवेशि ? आत्माकी भी उसके भेदमें चिन्ता करै यह मैने स्थिरतर ब्रह्मध्यान कहा ॥ ६४ ॥ सेवन्ते योगिनो द्रव्यं नान्यथा तु कदाचन । क्षणं ब्रह्माहमस्मीति यः कुर्यादात्मचिन्तनम् ॥६५॥ इस ब्रह्मके अतिरिक्त योगीगण अन्य किसी वस्तुको चिन्ता न करे ब्रह्माहमस्मि ' मैही ब्रह्म इं, इस प्रकार जो व्यक्ति क्षणकाल आत्मचिन्ता करता है || ६५ ॥ तत्र दद्यात्फलं देवि तस्यान्ते नैव गम्यते । मया वा ब्रह्मणा वापि विष्णुनापि कथश्चन ॥६६ ॥ हे देवी ! उसीको फल देती हैं, ऐसा न होनेपर मै ब्रह्मा अथवा विष्णु कोई उसको नहीं जान सकता ॥ ६६ ! -

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भापाटीकासमेतम् । (७९)
अत एव महेशानि नित्यकर्म न लोपयेत् ।
द्रव्याभावे महेशानि जलेनापि समाचरत ॥ ६७ ॥
अतएव है महेश्वरि । नित्यकर्मको लोप न करे हे महेशानि ! द्रव्याभावमें
जलद्वारा भी नित्यकर्म करना उचित है ॥ ६७ ॥
अथवा मनसा नित्यं कुलयोगं समाचरेत् ।
वक्ष्येऽयुतविधि भद्र शृणुष्व कमलानने ॥ ६८ ॥
अथवा मनमनमें प्रतिदिन कुलयोगका आचरण करै । हे कमलानने !
मै अयुतविधि कहता ह, सुनो ॥ ६८॥
कुण्डल्या मिलनादिन्दोः स्रवते यत्परामृतम् ।
पिवेद्योगि महेशानि सत्य सत्यं वरानने ॥ ६९ ॥
हे वरानने ! हे भद्रे ! कुलकुण्डलिनीक मिलनेमें बिन्दुसे जो उत्कृष्ट
अमृत टपकता है, वह योगीजन पान करते हैं, यह मैंने तुमसे सत्यही
सत्य कहा है ॥ ६९ ॥
कुलयोगं महादेवी महापानमिदं स्मृतम् ।
पापपुण्यं पशुं हत्वा ज्ञानावनेन शाम्भवि ॥ ७० ॥
परमात्मनि नयेञ्चित्तं पलानीति निगद्यते ॥
मनसा स्वेन्द्रियं सर्व संयतात्मनि योजयेत् ॥ ७१ ।।
मत्स्याशी स भवेद्योगी मुक्तबन्धस्तव प्रिये ।
अशेषब्राह्मणभाण्डं परं ब्रह्मणि संनयेत् ॥ ७२ ॥
हे महादेवि! इस महापानकोही कुलयोग जानना चाहिये । हे शाम्भवि !
ज्ञानरूपी खनद्वारा पापपुण्यरूपी पशु हनन करके चितरूप मास परमात्मामें
नियोजित करे । अपने इन्द्रियग्रामको रोककर आत्मामें योजित करनेसे वह
मत्स्याशी योगी तुम्हारे वानसे मुक्त होता है । हे प्रिये ! अशेष ब्रह्माण्ड.
भाण्ड परमात्मामें नियोजित करै ।। ७० ॥ ७९ ॥ ७२ ॥

(८०)
योगिनीतन्त्रम् ।
परशक्त्यात्मसंयोगो न वीयें मैथुनं स्मृतम् ।
एवन्ते कथितं देवि सारासारं परात्परम् ।
गोपनीयं गोपीनीयं मम सर्वस्वसाधनम् ।। ७३ ॥
परशक्तिके सहित आत्माका संयोगही मैथुन है. है देवि ! यह मैंने
सारसे भी सार परसेभी पर अपना सर्वस्व साधन कहा. इसको गुप्त रखना
चाहिये ॥ ७३ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्ने सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्वादे
चतुविशतिसाहसे भापाटीकाया
पष्टः पटल. ॥ ६॥
श्रीदेव्युवाच ।
नमस्तुभ्यं महादेव संसारार्णवतारक।
जयाशेषजगन्नाथ भक्तवत्सल चेश्वर ॥१॥
परमानन्दसन्दोह कारणानाश्च कारण ।
दिव्यवीरमभेदेन श्रुतं योगद्वयं मया ।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि विद्या स्वप्नवती शुभाम् ।
मृतसञ्जीवनी विद्या तथा मधुमतीमपि ।
आशु फलं साधनश्च वद मे परमेश्वर ॥३॥
श्रीदेवीजीने कहा- हे संसारसागरतारक महादेव ! तुमको नमस्कार है।
परमानन्द सन्दोहकारण ! शंकर ! आप जपयुक्त हों । दिव्य और वीर
भेदसे दो योग सुने । अव शुभकरी स्वप्नावती विद्या, मृतसञ्जीवनी विद्या
और मधुमती विद्या सुननेकी अभिलाषा है; वह सब साधन और साफ-
ल्यसहित कहकर मेरा कौतूहल निवारण कीजिये ॥ १॥ २ ॥ ३ ॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यस्मात्त्वं परिपृच्छसि ॥४॥

भाषाटीकासमेतम् । (८१)
ईश्वर बोले-हे देवि । तुमने मुझसे को पूरा वह कहता हूँ. सुनो ॥ ४ ॥
ओम् ह्रीं स्वपुरावाहिकालि स्वप्ने कथया--
मुकल्यामुकं देहि क्रीं स्वाहा ॥५॥
ओम् ही स्वपुरावाहिकालि स्वप्ने कथयामुकस्यामुक देहि को स्याहा ॥५॥
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य मायावीजं तदन्तरम् ।
तदन्ते स्वपुरावाहि कालीसम्बोधनद्वयम् ॥६॥
स्वप्ने कथय तत्पश्चादमुकस्यामुकन्ततः।
देहि पादात्कालिबीजमन्ते वद्विवधूस्तथा ॥ ७ ॥
पहिले ओम् उच्चारण करके फिर मायावीन तदनन्तर स्वपुरावाहि
कालि यह दो सम्बोधन फिर स्वप्ने कथय अमुकस्यामुकं देहि फिर काली-
बीज फिर वदिवधू अर्थात् स्वाहामत्रपद उच्चारण करै ॥ ६ ॥ ७ ॥
इयं स्वप्नावती विद्या त्रैलोक्ये चातिदुर्लभा ।
महाचमत्कारकरी महाकालेन भाविता॥८॥
यही स्वप्नावती विद्या है, यह विद्या त्रैलोक्यमें दुर्लभ है। यह महा-
कारके द्वारा कथित और महाचमत्कारिणी है ॥ ८॥
अष्टोत्तरशतं नित्यं जपेद्रर्षचतुष्टयम् ।
ततः सिद्धा भवेद्विद्या स्वप्ने तिष्ठति नित्यशः॥९॥
चारवर्षतक एकसौ आठ बार नित्य जपनेपर यह विद्या सिद्ध होती है
और प्रति दिन स्वप्नमें अवस्थिति करती है ॥ ९ ॥
स्वप्ने दर्शयते सर्व यद्यन्मनसि कल्पते ।
मृतसञ्जीवनी विद्यामितः शृणु नगात्मजे ॥ १० ॥
जो जो मनमें कल्पना करी जाती है, वही स्वप्नमें दिखाती है; हे
पर्वतनन्दिनि ! अर मृतसञ्जीवनी विद्या सुनो ॥ १०॥

(८२) योगिनीतन्त्रम् । अमृतं बीजमाभाप्य मृतसञ्जीवनीति च । स्वमंत्राञ्च ततः पश्चान्मृतमुत्थापयत्विमम् ॥ ११ ॥ अमृतबीज "व" कहकर "मृतसञ्जीविनी' यह वाक्य उच्चारणपूर्वक स्वमन्त्र उच्चारणके पीछे मृतमुत्यायत्तिमम् " अर्थात् इस मृतकको उठाओ ॥ ११ ॥ बृहद्भातुबधूमन्ते त्रैलोक्ये चापि विश्रुता। संसुत्तेयं महाविद्या सारासारतरं स्मृतम् ॥ १२ ॥ यह मंत्र, फिर अभिजाया "स्वाहा " मंत्र उच्चारण करै । यह महा- विद्या वाक्य विख्यात है । यह सोती हुई रहती है, इस विद्याको सारसे भी सारतर जाने ॥ १२ ॥ नित्यमष्टोत्तरशतं जपमात्रेण शाम्भवि। सिद्धिदा सा भवेद्विद्या मृतसञ्जीवनी ततः॥ १३ ॥ प्रतिदिन केनल अष्टोत्तर शतवार जप करनेसे ही यह मृतसनीविनी महा- विद्या सिद्धिप्रद होती है ॥ १३ ॥ कालालयं गतो यो वा चिताधूमागतोऽपि वा। स्पृशेच्छवं जपेन्मन्त्रं तदा देवि वरानने । चिरजीवी भवेत्सत्यं नान कार्या विचारणा ॥ १४ ॥ जो यमालय चला गया है, अथवा जिसकी चिताका धुआं उठ रहा है यह विद्या जपपूर्वक उसका शवस्पर्श करनेसे वह चिरंजीवी होता है, हे वरानने ! इसमें कार्यविचारण वा संशय कुछ नहीं है। १४ ॥ वक्ष्ये मधुमती विद्यां सर्वरचनकारिणीम् ॥ १५ ॥ अर सरंजनकारिणी मधुमतीविद्याका वर्णन करता ॥१५॥ श्रीमधुमतीइत्युक्त्वा दिशः स्थावरजंगमाः। सागरपुररत्नानि सर्वेषां कर्पिणीति च ॥ १६ ॥ " भाषाटीकासमेतम् । (८३) ठं ठं स्वाहा महाविद्या वसुचन्द्राक्षरी परा । त्रैलोक्याकर्षिणी विद्या प्रोक्तेयं देवदुर्लभा ॥ १७ ॥ श्रीमधुमति दिशः स्थावर जंगमाः सागर पुररत्नानि सर्वेषां कर्षिणी ठं ठं स्वाहा । इस अष्टादशाक्षरी महाविद्याको उत्कृष्टतर जानना चाहिये यह तीनों लोकका आकर्षण करनेवाली देवदुर्लभ महाविद्या मैंने तुमसे कही ॥ १६ ॥ १७ ॥ एकवर्ष जपेन्नित्यं शतमष्टोत्तरं नरः। ततः सिद्धा महाविद्या सर्वज्ञानप्रकाशिनी ॥ १८ ॥ जो मनुष्य इसको एकवर्षतक एकसौ आठवार नित्य जप करता है, उसको यह विद्या सिद्ध होती है। यह महाविया सर्वज्ञानप्रकाशिनी है॥१८ आकर्षयेत्तुमेरुश्च दिशः सागरमव च । नदी रत्नानि च पुरी स्त्रियः शेलान्वनस्पतीन् ।। अलभ्यानि च द्रव्याणि पातालादिस्थितान्यपि॥१९॥ पुरस्थानं च वृत्तान्तं राज्ञां च विद्विषामपि । नक्तं तल्पे शतं जप्यासिद्धिं प्राप्नोति साधकः ॥२० यह सुमेरु, दिशा, सागर, नदी, रत्न, पुरी, स्त्री, वनस्पति और पाता. लस्थित सब अलभ्य द्रव्योंका आकर्षण करती है । इसके द्वारा राजाका पुर स्थान और वृत्तान्त सभी जाना जा सकता है । साधक मनुष्य रात्रिकालमें शय्यापर सौवार जप करनेसे सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ १९ ॥ २० ॥ श्रीदेव्युवाच । देवदेव जगन्नाथ प्रसीद जगन्नाथ प्रमो। यत्पृष्टं यच्छुतं नाथ श्रोतुमिच्छामि सम्पति । पद्मावर्ती महाविद्या सर्व विद्याविनोदिनीम् ॥ २१ ॥ -

(८४)
योगिनीतन्त्रम् ।
श्रीदेवीजीने कहा-हे देवदेव जगन्नाथ ! आप प्रसन्न हो जाइये । हे
सुमुख ! हे प्रभो ! हे नाथ ! मैंने जो पूछा था. वह तो सुना । अब सर्व.
विद्याविनोदिनी पावती महाविद्याके सुननेकी इच्छा करती हूं ॥२१॥
ईश्वर उवाच ।
कथयामि वरारोहे विद्यां पद्मावती शुभाम् ।
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य मायावीजं तदन्तरम् ।
पद्मावतीपदं देवीसंबुद्धचन्तं समुद्धरेत् ॥ २२ ॥
ईश्वर बोले-हे वरारोहे ! शुभदायिनी पद्मावती विद्या कहता हूं । पहिले
गोंकार सच्चारणपूर्वक फिर मायावीज रहकर सम्योधनान्त पद्मावती देवीका
|द उच्चारण करें ॥२२॥
त्रैलोक्यवार्तामन्ते च कथेयद्वन्द्वमुच्चरेत् ।
स्वाहान्तेयं महाविद्या कथिता कल्पवल्लरी ॥ २३ ॥
फिर त्रैलोक्यवार्ता उच्चारण करके 'कथय कथय यह दो पद उच्चारण-
पूर्वक अन्तमें स्वाहापदका समुद्धार करे। यह मैने तुमसे कसलतातुल्य
महाविद्याका वर्णन किया ॥ २३ ।।
अष्टोत्तरशतं नित्यं जपेद्वर्षद्वयं प्रिये ॥
ततः सिद्धा महाविद्या सर्व वदति साधके ॥ २४ ॥
हे प्रिये ! यह मन्त्र प्रतिदिन एकसौ आठवार क्रमशः दो वर्ष जपने पर
सिद्ध होकर साधकसे सब विषय कहता है ॥ २४ ॥
तल्पे स्थिता भक्तयोगी जन्मन्त्रं शताष्टकम् ॥
जगद्धितस्य वृत्तान्तं तजानाति दिने दिने ॥ २५ ॥
जो भक्त योगी शय्यापर स्थित होकर रात्रिमें एकसौ आठवार जपता है,
वह दिन-दिन जगत्का सम हितकर वृत्तान्त नान सकता है ॥ २५ ॥

भाषाटीकासमेतम् ।
(८५)
ब्रह्मविष्ण्वादिकानां च त्रैलोक्यस्यापि शङ्करि ॥
वृत्तान्तं कथयेत्स्वप्ने विद्या पद्मावती शुभा ॥ २६ ॥
एवं ब्रह्मा विष्णु इत्यादि और त्रैलोक्यका वृत्तान्त भी विदित होता है ।
शुभदायिनी पद्मावती विद्या उससे स्वप्नमें यह सब वृत्तान्त कहती हैं।।२६॥
श्रीदेव्युवाच ।
श्रुतश्च साधनं पुण्यं महाकालेन भाषितम् ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि वशीकरणमुत्तमम् ॥
अल्पसाध्यं महादेव द्रुतसिद्धिकरं महत् ॥ २७ ॥
श्रीदेवीने कहा-महाकालका कहा पवित्र साधन सुना, अब उत्तम वशी
करण सुननेकी अभिलाषा करती हूं, हे महादेव ! जो अल्पसाध्य और
शीघ्र सिद्धिकर है, वही कहकर मेरा कौतूहल चरितार्थ कीजिये ॥२७॥
ईश्वर उवाच ।
तवानुरोधाद्देवेशि कथयामि शृणुष्व तत् ।
पुरा ते कथितं देवि योगिनां ज्ञानसम्भवे ।
संक्षेपादधुना देवि विस्तरात्कथयामि ते ।
गोपितव्यं प्रयत्नेन सर्वदा पशुसंकुले ॥ २८ ॥ २९ ।।
ईश्वर बोले-हे देवेशि ! तुम्हारे अनुरोधसे मैं उसको वर्णन करता हूं
सुनो हे योगिज्ञानप्रदे ! पहिले मैने तुम्हारे प्रति यह वशीकरण संक्षेपसे
कहा है, इस समय वह तुमसे विस्तारसहित कहता हूं। इसको पशुसंकुल
स्थानमें यत्नपूर्वक सदा गुप्त रक्खै ॥ २८ ॥ २९ ॥
कुजवारे नक्तयोगे अमायां च तिथौ नरः॥
शनुनाम लिखित्वा तु वामपादतले न्यसेत् ॥ ३०॥

(८६)
योगिनीतन्त्रम् ।
मंगलवार अमावस्या तिथिफी रात्रिमें मनुष्य शत्रुका नाम लिखकर
वामपादतलमें रक्खै ॥ ३० ॥
तत्पादोपरि देवेशि वाग्भवं प्रजपत्सुधीः।।
अष्टोत्तरशतं देवि तदा वादी वशो भवेत् ॥
अतिमुको भवेच्छत्रुर्थिवादे व्यवहारके ।।
ताक्ष्य दृष्ट्वा यथा सपों जडो भवति कामिनि ॥
तथैव तत्समालोक्य जडो वादी न संशयः ।। ३१ ।।
हे देवेशि ! बुद्धिमान् मनुष्य उस पदके ऊपरी भागमें वाग्भवबीज
एकसौ आठवार जप करनेसे उस प्रतिद्वन्द्वी मनुष्यको वशीभूत करता है।
विवाद (झगड़े) और व्यवहार विषयमें शत्रु अतिशय मूक होता है ।
हे देवि ! गरुडके देखनेसे सर्प जिस प्रकार जड़ होते हैं, वादी उसको देख-
कर उसी प्रकार जड़ होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३१ ॥
तथान्यत्संप्रवक्ष्यामि वशीकरणमुत्तमम् ॥
येन योगप्रभावेन भुवनं वशमानयेत् ॥ ३२॥
अब अति उत्तम अन्य वशीकरण कहता हूं। इस वश्य योगके प्रभावसे
त्रिभुवनको वशीभूत करनेमें समर्थ होता है ॥ ३२ ॥
प्रणवं पूर्वमुद्धत्य सुन्दरी भैरवी तथा।
योगिनीपदतो देवि राजा प्रजा महारथी ॥ ३३ ॥
प्रथम भार उच्चारण, फिर सुन्दरी भैरवी तदनन्तर योगिनी, इस
पदके अन्तमें राजा, प्रना, महारथी ॥ ३३ ॥
वशंकरी तथा प्रोच्य अंइं तथा वदेत् ।
पत्रिंशत्यक्षरो मन्त्रः कथितः कल्पपादपः ॥ ३४ ॥
फिर वशंकरी, यह पद कहकर अंई उं यह सब पद उच्चारण करे,
यह मंत्र छज्यीस अक्षरका है, यह कल्पवृक्षके समान फलदायक है ॥३४॥

भाषाटीकासमतम् । (८७) अनेन मनुना देवि तैलञ्च चन्दनच वा। शताष्टजप्तं तत्तैलं मुखे दद्याद्वरानने ॥ ३५ ॥ हे वरानने ! यह मंत्र तेल और चन्दनसे एकसौ आठ वार जपकर वह तैल मुखमें लगाये ॥ ३५॥ तचन्दनेन तिलकं भाले दद्यानगात्मजे ।। जगद्वश्यक्रियामेतां कृत्वा साधकसत्तमः ॥ ३६॥ चेतु पश्यति यं देवि स वशो नात्र संशयः॥ एवमेव विधानेन देवेन्द्रमपि मोहयेत् । किं पुननिवान्देवि ! सार्वभौमानराधिपान् ॥ ३७ ।। और वही चन्दन कपालमें तिलक करनेपर जगद्वगीकरणका कारण होता है । इस प्रकार करके जिसको देखेगा, वही वशमें होगा, इसमें सन्देह नहीं । हे देवि ! साधारण मनुष्य और सार्वभौम राजाकी तो बात ही क्या कहूं, इसके द्वारा देवेन्द्रको भी मोहित किया जासकता है |॥ ३६॥ ३७ ।। अथोच्यते महादेवि वशीकरणमुत्तमम् । सर्वेषां जगतां देवि मोहन परमाद्भुतम् ।। ३८ ॥ हे महादेवि ! अब अन्य उत्तम वशीकरण कहता हूं, इसके द्वारा संपूर्ण जगत्को परम अद्भुत रूपसे मोह लेता है ॥ ३८ ॥ मन्त्रमादौ प्रवक्ष्यामि सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ॥ ३९ ॥ तव तन्त्रों में जो मन्त्र गुप्त है, उसको प्रथम ही कहता हूं ॥ ३९ ॥ प्रणवं पूर्वमुद्धत्य वदेद्राजमुखीपदम् । पुना राजमुखी प्रोच्य मायावीजद्वयं वदेत् ।। कामचीजं ततः पश्चादेवि देवीपदद्वयम् । महादेविपद पवारेवि देवाधिदेवि च ॥

(८८) योगिनीतन्त्रम् । सम्बोधनान्तं देवेशिपदमेतच्चतुष्टयम् । सर्वजनस्याभिमुखं मम वशं कुरु कुर्विति ।। स्वाहान्तोयं महामन्त्रः सर्ववश्यप्रदो महान्॥४०-४२ प्रथम ॐकार उच्चारण करके फिर 'राजमुखी' यह पद योजन करे । इसके पीछे राजमुखी यह पद कहकर दो मायावीज (ही) मिलावे फिर कामबीज, फिर देवी यह दो पद कहकर इसके अन्तमें महादेवोपद, फिर देवाधिदेवी सम्बोधन यह चारोंपद उच्चारण कर । सर्व जनाभिमुख मम वंश कुरु कुरु । इसके पीछे स्वाहा पद उच्चारण करे, यह सबको वशमें करने- वाला महामन्त्र है ।। ४०-४२ ॥ इति मन्त्रेण शय्यास्थः प्रातः काले महेश्वरि । त्रिवार दक्षहस्तेन मुखं समार्जयेत्कृतीः ॥ ५३॥ एवन्तु प्रत्यहं कुर्याज्जगद्वश्याय कामिनि । अवश्यं जायते वश्यं जगदेतच्चराचरम् ॥ १४ ॥ हे महेश्वरी ! साधक मनुष्य शय्यापर स्थित होकर प्रातःकालमें तीनवार दहिने हाथसे मुख मार्जन करै हे शिवे ! जगत् वशीकरणके निमित्त नित्य इस प्रकारसे जो करता है इसके चराचर जगत् अवश्य उसको वशीभूत होगा. इसमें संदेह नहीं ॥ १३ ॥ १४ ॥ श्रीदेव्युवाच । श्रुतमेतन्महादेव त्वत्प्रसादात्पुरातनम् । स्वप्नावतीच या विद्या कथितावगता मया ॥४५॥ इदानीं श्रोतुमिच्छामि विशेष यत्र यद्भवेत् । तद्वादस्व महादेव यदि तेऽतुग्रहो मयि ॥ ४६॥ श्रीदेवीजीने कहा-हे महादेव ! मैने आपके प्रसादसे यह पुरातन कथा सुनी । आपने मुझसे जो स्वप्नावती विद्या कही, उसको जाना किन्तु अब भाषाटीकासमेतम् । उसकी विशेष विधि सुनना चाहती हूं. यदि मुझपर आपका अनुग्रह हो, तो वर्णन कीजिये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ ईश्वर उवाच । कथयामि शृणु प्राज्ञि विद्या स्वप्नावती पराम् । प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य वधूवीजं समुद्धरेत् ॥ ४ ॥ स्वप्नावतीपदान्ते च स्वप्नं कथय चोद्धरेत् । मायावीज ततः स्वाहा मन्त्रमेतन्नागात्मजे । दिवा भुक्त्वा हविष्यान्नं रात्रौ जप्त्वा सहस्रकम् ४८॥ ईश्वर बोले -हे प्राज्ञि ! अति उत्तम स्वप्नावती विद्या कहता हूं. सुनो। प्रथम ओंकार उच्चारण फिर वधूवीज, फिर स्वन्नावती पदके अन्तमें स्वप्ने कथय यह पद उच्चारण करै तदनन्तर मायावीज, फिर स्वाहा प्रयोग करै । हे पर्वननंदिनि ! यही मन्त्र है, दिनमें हविष्यान्न भोजन पू रात्रिकाल में यह मंत्र हजारवार जप ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ ततः शुद्धायां शय्यायां तदा स्वप्ने हि पश्यति ।। मनसा चिन्तितं यद्यत्तत्सर्व परमेश्वरि ॥ ४९ ॥ अथापरं प्रवक्ष्यामि स्वप्नप्रबोधमुत्तमम् ।। येन विज्ञानमात्रेण सर्व जानाति निश्चितम् ॥ ५० ॥ तो शुद्ध शय्यापर स्वप्नमें वही देखता है. जो जो मनमें चिन्ता करता वह सभी स्वप्नमें देखता है ॥ ४९ ।। हे परमेश्वरि ! अब अन्य उत्तम स्वप्नबोध कहता हूं, जिसके ज्ञानमात्रसे ही मनुष्य सब विषय जान सकता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ५० ॥ प्रणवं प्राक् समुच्चार्य हिलिहूं शूलपाणये ॥ स्वाहान्तोऽय महामन्त्रः प्रोक्तन्ते कमलेक्षणे ॥ ५१ ॥ विधानं पूर्ववत्सर्व जपान्ते प्रार्थनां शृणु ॥ ५२ ।।

(९०) योगिनीतन्त्रम्।
है कमलेक्षणे ! प्रथम ओंकार उच्चारण करके फिर 'हिलिहूँ शूलपाणय'
इसके पीछे 'स्वाहा उच्चारण करे। हे देवि ! यह मैंने तुमसे महामन्त्र
कहा, इसका विधान पूर्वकी समान जानना, अब जपके अन्तमें प्रार्थना
सुनो || ५१ ॥ ५२ ॥
ॐ नमो जगत्रिनेवाय पिङ्गलाय महात्मने ||
वामदेवस्वरूपाय स्वप्नाधिपतये ततः॥
स्वप्ने कथय मे तत्वं सर्व कार्य शुभाशुभम् ।। ५३ ॥
जगत्के अधिपति तीन नेत्रवाले पिगलनेत्र महात्मा वामदेवस्वरूप स्वप्न
के अधिपति आपके निमित्त प्रणाम है सव शुभ अशुभ स्वप्नमें मेरे निमित्त
कथन कीजिये ।। ५३ ॥
इति मन्त्रेण संप्रार्थ सर्व जानाति तत्वतः ।।
एत्तते कथित देवि स्वप्नबोधमनुत्तमम् ॥५४ ॥
रहस्य परमं रम्यं वशीकरणमुत्तमम् ।।
सर्वमेतन्महादेवि सर्वज्ञानप्रदायकम् ॥ ५५ ॥
इस मन्त्रके द्वारा प्रार्थना करनेसे सभी जान सकता है। हे देवि !
यह मैने तुमसे अति उत्तम स्वप्नवोध और परम रहस्य मनोहर वशीकरण
कहा हे महादेवि ! यह सब ज्ञानप्रदान करता है ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
निरन्तरं महादेवि सेवितः सिदिशंकरः।
मधुमत्याः प्रसादेन सर्वोक्तं सर्वयोनिषु ॥५६॥
सिद्धिशङ्कर गण इसकी सदाही सेवा करती हैं मधुमतीके प्रसादसे सर्व
योनिका विषय सर्वथा कहा गया है ।। ५६ ॥
याचन्त परमेशानि तस्मात्त्व समुपाश्रयेत ।
स्वप्नावत्यादिविद्याया यो जपः कथितः प्रिये ॥५७॥

भाषाटीकासमतम् ।
हे परमेशानि। तुम्हारे पूछनेसे यह सब कहा है प्रिये ! सन्नावत्यादि
विद्याके जपका जो प्रकार कहा गया है ॥ ५७ ।।
वर्षसंख्याक्रमेणैव सिद्धिकामस्य शाम्भव ।
त्वं जपन्तु विना देवि फलसिद्धिः समीरिता ॥
सिद्धविद्याप्रभावेन तां सुसिद्धाः सुरासुरैः ।। ५८ ॥
वह वर्षसंख्याके क्रमसे सिद्ध होता है । उस प्रकार जपके विना फल
सिद्धिकी सम्भावना नहीं है। सुरासुर गण सिद्ध विद्याके प्रभावसेही सब
विद्या सिद्ध कर सकते हैं ।। ५८ ॥
इति ते कथितं सम्यग्रहस्यं परमाद्भुतम् ।
गोपनीयं खले दुष्टे पशुपामरसन्निधौ ॥ ५९ ।।
यह मैने तुमसे परम अद्भुत संपूर्ण रहस्य कहा यह खल दुष्ट पशु
और पामर मनुष्यके निकट सदा गुप्त रखनेयोग्य है ॥ ५९ ॥
अन्यथा कुरुते यस्तु स भक्ष्यो डाकिनीगणैः ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गोपनीयं विशेषतः ॥ ६० ।।
जो इसके अन्यथा करता है. उसको डाकिनी भक्षण करती है.
कारण यत्नपूर्वक इसको गुप्त रक्खै ॥ ६ ॥
दद्या न्तिाय दान्ताय सत्कुलीनाय योगिने ।
भक्ताय पापहीनाय साधकाय महात्मने ॥ ६१ ।।
शान्त, चतुर, कुलीन, योगी, भक्त, पापहीन, महात्मा, साधकको यह
प्रदान करना चाहिये ।। ६१ ।।
इति श्रीयोगिनीनन्ः सर्वतन्त्रोत्तमोत्तम देवीश्वरसम्बादे चतुर्विंशति-
साहसे भापाटीकाया सप्तमः पटलः ॥ ७॥

(९२) योगिनीतन्त्रम् । श्रीदेव्युवाच । श्रुतं हि साधनं सर्व त्वन्मुखाम्भोजनिर्गतम् । देवदानवगन्धर्वसिद्धचारणसेवितम् ॥ १ ॥ परमानन्दसन्दोहं सान्द्रानन्दविभूतिदम् । परं पारं परं पुण्यं पवित्रं परमं महत् ॥ २ ॥ योगिन्युत्पत्तिकथनं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् । कथयस्व महादेव केवलानन्दहितम् ॥ ३॥ श्रीदेवीजीने कहा-हे देव ! मैंने आपके मुखकमलसे निकला देव, दानव, गंधर्व, सिद्धि, चारणगणसेवित परमानन्दके पात्र अनेक आनंद और विभूतिके देनेवाले आप परम पार स्वरूप हो। और परम पुण्यस्व- रूप पवित्र और परम महत् सर्वसाधन सुना, अब उपरोक्त गुण समूहयुक्त और त्रैलोक्यको भी दुर्लभ केवलानन्दवर्द्धन योगिनीगणोंकी उत्पत्ति वर्णन कीनिये ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ ईश्वर उवाच । पूर्व यदावयोवृत्तं सर्व तद्विस्मृतं शिवे । अत्यन्तगुह्यं परमं देवासुरयभयङ्करम् ॥४॥ प्राचीनमपि गोप्यं हि सारासारं परात्परम् । शृणु वक्ष्यामि चार्वणि समासेन शिवप्रिये ॥ ५ ॥ गोपनीयं त्विदं भद्रे योनि परनरे यथा ॥ ६ ॥ ईश्वर पोले-हे शिवे ! पहले हम दोनों के पक्षमें जो वृत्तान्त हुआ था यह क्या भूल गई हो ? जो हो, मैं अत्यन्त गुह्य, देवासुरोंको भयंकर अति प्राचीन अतिगोपनीय सारसे भी सार, परेसे भी परे परम विषयका वर्णन करता हूं, हे चावहि ! तुम वह सम सुनो । हे शिवप्रिये ! हे कल्याणि !

भापाटीकासमेतम् । पराये पुरुषसे जिस प्रकार योनि गुप्त रखनी चाहिये, इसको भी उसी प्रकार गुप्त रखने योग्य जानो ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ ब्रह्माण्डस्यायुषः शेषे सर्वसत्वविवर्जितम् । भूम्यादिपञ्चतत्वं तु केवले संस्थित शिवे ॥ ७ ॥ ब्रह्माण्डकी आयुके शेषमें संसार सर्वसत्त्वरहित होनेपर और भूमि मादि पञ्च तत्त्व मात्र केवल आत्मामें अवस्थित होने पर ॥ ७ ॥ त्वां मां विना महेशानि नासीरिकश्चिज्जगत्रये । एतस्मिन्नन्तरे त्वां वै पप्रच्छाहं प्रहासतः॥८॥ हे महेशानि ! तुम्हारे और मेरे अतिरिक्त इन तीनों जगत्में और कुछ नही था, इस अवसरमें मैने हँसकर तुमसे पूंछा ॥ ८॥ ममाधिका योग्यता वा तवापि वा महेश्वरि । इदानीं परमेशानि ! ततो ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ ९ ॥ स्थातुं स्थानं न कुत्रास्ति कुत्र स्थास्यामि भाविनि । यद्यन्मया कृतं सर्व तत्सर्वं गतमेव हि ॥ १० ॥ विवक्तोऽहं सदा देवि भवसंसारकर्मणि । स्थातुं स्थानमिदानीत्वं कल्पयश्व महेश्वरि ॥११॥ हे महेश्वरि ! बोध होता है-मेरी अपेक्षा तुम्हारी योग्यता अधिक है, यह देखो इस समय ब्रह्माण्डमण्डल शून्याकार है, कहीं भी रहनेका स्थान नहीं है हे भाविनि ! अब कहा रहेंगे ? मैने जो किया था, वह सभी विगत हुआ है, तुम जानती हो कि, मै संसारकर्ममें संस्पर्श शून्य रहनेकी सदा ही इच्छा करता हूं, हे महेश्वरि ! अब तुम रहने के लिये स्थानकी क्सना करो ॥९॥ १०॥ ११ ॥ इति श्रुत्वा तदा देवि ! क्रोधेनारुणलोचना उवाच मां निष्ठुरं च दुराचारादिदारुणा ॥ १२ ॥ .

योगिनीतन्त्रम्।
हैं देवि ! तुम जिसको सुनकर क्रोधसे लालनेत्रकर और दुराचारके
कारण कठोर होकर मुझसे अति निष्ठुर वचन कहने लगीं ॥ १२ ॥
यद्यत्कृतं त्वया देव मामुपाश्रित्य सर्वदा ।
मां विना ते महादेव शवत्वमिति निश्चितम् ।।१३।।
हे देव महादेव ! तुम जो करते हो, उसीमें सदा मेरे ऊपर निर्भर
करते हो मेरे विना तुम शव (मृतक) होते हो, इसमें सन्देह नही ॥१३॥
योगे हि ते महेशान मया सर्वमिदं ततम् ।
कल्पितं वत्सरूपेण योग्यता का तवास्ति हि ॥१४॥
तुम्हारे योगमात्रसे मैने यह संसार विस्तारित करके तुम्हारी वत्सरूपमें
कल्पना करी है । तुम्हारी योग्यता क्या है ? ॥१४॥
कारणावस्थयापन्ना सदाहं धाविरूपिणी।
नाकार्य मे हि यत्किञ्चित्सदाहं यक्षरा परा ॥ १५ ॥
। मैं सदाही कारणावस्थापना ( कार्यको उत्पन्न करनेवाली ) विधात.
पिणी हुं, मेरा कुछ भी अकार्य नहीं है ॥ १५ ॥
कार्यभावममापन्ना सदा प्रकृतिरूपिणी ।
तदा ब्रह्मादयः सर्वे सर्वेऽप्याविर्भवन्ति हि ॥ १६ ॥
मैं सदाहीकार्यभावसम्पन्न प्रकृति रूपिणी ई, उस कालमें ब्रह्मादि सब
ही आविर्भूत हुए ॥ १६ ॥
मम मायामयमिदं विश्व देव चराचरम् ।
विक्षेपावरणे भासारंभो हे परमेश्वर ॥ १७ ॥
यह चराचर विश्व मेरीही मायासे निर्मित है! हे परमेश्वर ! मेरी
विपेक्षा और आदरण नामक दो शक्तियोंसे ही जगत्के सब कार्य
साधित होते हैं ॥ १७॥

भापाटीकासमेतम्। (९५)
इति श्रुत्वा वचस्तेऽहं वजतुल्यं सुदारुणम् ।
नावोचं किश्चित्वां देवि स्थिरत्वमभवत्तदा ।। १८ ॥
तुम्हारे इस प्रकार वज्रतुल्य दारुण वचन सुन, उस समय मै तुमसे कुछ
न कहकर चुप रहा ।। १८ ॥
परीतोऽहं सदा देवि दुःखेनान्तरजेन च ।
ततः स्थिरीकृत्य हृदि उपायं तव निग्रहे ॥ १९ ॥
हे देवि । मैने सदा आन्तरिक दुखसे तापित होकर तुम्हारे निग्रहके
निमित्त मनमें एक उपाय स्थिर किया ॥ १९ ॥
जगाम पश्चिमे भागे ब्रह्माण्डस्य वरानने ।
गत्वा तत्र महादेवि निर्जने दारुणं पुरा ।
स्वदेहभस्मना दैत्यं प्रागदृष्टं श्रुतं मुदम्
दानवेन्द्रं महाघोरं घोरनामानमद्भुतम् ॥ २० ॥
अनन्तर मैने ब्रह्माण्डके पश्चिम भागमें जाकर निर्जनमें अपने देहकी
भस्मद्वारा एक दारुण महाघोर घोर नामक अपूर्व अद्भुत दानवेन्द्रको
उत्पन्न किया ।। २०॥ २१ ॥
कोटियोजनविस्तीर्ण द्वात्रिंशल्लक्षपस्थितम् ।
कोटिहस्तं महारौद्रं कोटिलोचनमुज्ज्वलम् ॥ २२ ॥
यह दैत्य लम्बाई में करोट योजन और चौडाई में बचीस लाख योजन
होगा । महाभयंकर करोड हाथ करोड उज्वल नेत्र ॥ २२ ॥
पञ्चाशल्लक्षवदनं ज्वालावलिसमाकुलम् ।
तस्मै दत्त्वा महासिद्धीरणिमाद्या महेश्वरि ॥ २३ ॥
सर्वभाव मत्सहशं तं विधाय सुदारुणम् ।
उल्लासमनसा देवि ह्यागतोऽई तवान्तिकम् ॥ २४ ॥

(९६)
योगिनीतन्त्रम् ।
बदन पञ्चाशत् लक्ष (पचास लाख) और यह वदन ज्वालावलीसे
आच्छन्न था उसको मैं अणिमादि अष्टसिद्धि प्रदानपूर्वक उस दारुण दैत्य
को अपनी समान कर प्रसन्न मनसे तुम्हारे निकट आया ॥२३॥२४॥
सोऽपि तस्थौ दानवेन्द्रोप्रासं कृत्वा जनार्णवम् ।
गण्डूषे द्वे विधायैव सुवेलवेलपर्वतौ ॥ २५ ॥
वह दानवेन्द्र जनार्णव ग्रास और सुवेल तथा वेल पर्वतमें दो गण्डूप
(कुरुले) स्थापित करके रहा ॥ २५ ॥
तदा मम मनो ज्ञात्वा त्वमवादीश्च म प्रति ।
इदानी ब्रह्माण्डमाण्डं जीवहीनमजायत ।। २६ ॥
तब तुमने मेरे मनका भाव जानकर मुझसे कहा था कि हे महादेव !
इस समय ब्रह्माण्डमाण्ड जीवहीन हो गया है ।। २६ ॥
आज्ञापय महादेव पश्यामि सकलं शिव ।
तदा विहस्य मनसा तवोत्कण्ठां विवर्द्धयन् ॥ २७ ॥
हे शिव ! आज्ञा करो मै सन देखू । तब मैंने मनमें हँसकर तुम्हारी
उत्कण्ठा बढाकर ॥ २७ ॥
अवोचं त्वामहं भद्रे त्वागच्छ पश्चिमा दिशम् ।
सर्वत्रात्यत्र देवेशि दृष्ट्वा पश्चाद्गतं मयि ॥ २८ ॥
कहा हे भद्रे ! माओ, पश्चिम दिशामें चले । देवेशि । अन्यत्र सर्वत्र ही
देखकर मेरे पीछे पीछे गमन किया था ॥२८॥
स्त्रीणां स्वभावो देवेशि यत्रैवाधः स्थितो भवेत् ।
तव महती श्रद्धा दृष्ट्वा यातुं सदा भवेत् ॥ २९ ॥
त्रियों का स्वभाव सदा ही अध. स्थित (नीचे स्थित रहनेवाला ) होता
है, वह स्थान देखकर उसमें नानेकी महत् श्रद्धा हुई ॥ २९ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (९७) इति ज्ञात्वा मयोक्तं तनिषेधवचनं शिवे । ततः प्रयोजनाभावात्तव स्वभावतः शिवे ॥३०॥ मैंने यह जानकर वहा जानेमें तुमको निषेध किया फिर प्रयोजनाभाव और आपने स्वभाववश || ३०॥ न गतान्यत्र देवेशि स्थित्वा त्वं च ममान्तिके। महद्धानि च कान्तारे यत्र केदारकेश्वरः ॥ ३१ ॥ अन्यत्र गमन न करके तुम मेरे ही निकट स्थित रही थी। कुछ काल रतिकरके फिर जिस महत् कान्तार स्थानमें केदारकेश्वर हैं ॥ ३१ ॥ तत्र गत्वा महादेवी जगन्मोहनकारिणी। विव्याध देत्यराजेन्द्र कामबाणः सहस्रशः ॥ ३२ ॥ नगमोहनकारिणी तुमने उस स्थानमें जाकर उस दैत्यराजको सहस सहस्र कामवाणसे विद्ध किया था ॥ ३२ ॥ अत उत्थाय दैत्येन्द्रः कामवाणेन विह्वलः। करान्प्रसार्य सकलानाह चाटुवचो भृशम ॥ ३३ ॥ यह दैत्य कामबाणसे विह्वल और उस्थित होकर सब हाथ पसार अनेक चाटु वचन (खुशामदके वचन) कहने लगा ॥ ३३ ॥ घोर उवाच । मम क्रोडे त्वं समागच्छं भव सर्वेश्वरी मुदा। त्राहि मां कामजलधा निमग्नं स्वागदानतः॥ ३४ ॥ किश्चित्कालं न जीवामि त्वां विनाहं कथंचन । आलिंग्य पतिभावेन जीवनं रक्ष सुन्दरि॥ ३५ ॥ इत्यादि चाटुवाक्यस्त्वां मुहुर्मुहुर्जगाद च । ततः सा त्वमवादीच सकटाक्ष शुचिस्मितम् ॥३६॥ ७ (९८) योगिनीतन्त्रम्। घोरने कहा-तुम मेरी गोदीमें आनकर आनन्दसे सेवेश्वरी होओ मैं काम सागरमें निमम हुआ हूं, इस समय तुम अपना अदान करके मेरी रक्षा करो ॥ ३४ ॥ हे तन्वाङ्गि ! मै तुम्हारे विना कभी क्षणमात्र भी जीवित नही रह सकता । हे सुन्दरी ! तुम मुझको पतिभावसे आलिगन करके मेरा जीवित रक्षा करो ॥ ३५ ॥ इस प्रकार अनेक चाटु वचन (प्रेमके खुशामदी वचन ) तुमसे वारम्वार कहने लगा। तब तुमने उससे कटाक्षसहित मुसकुराकर कहा या ॥ ३६ ॥ त्वं सर्वदैत्येन्द्र समस्तभोक्ता त्वं वै वली देवनिकाय एव । त्वं वीर्यवा-सर्वविनाशनश्च त्वां व वरामो यदि तत्करोषि ॥ ३७॥ श्रीदेवीजीने कहा तुम सब दैत्योंके इन्द्र तुम्ही सर्वभोगी तुम्ही देय. ताओंसे बलवान् , तुम्ही वीर्यवान् और सबके विनाश करनेवाले हो यदि तुम मेरा वह कार्य साधन कर सको तो मै तुमको वरूंगी ॥ ३७ ॥ मदीयवृत्तान्तमिह शृणुप्व नावस्थितिः क्वापि भवेन यस्मात् । पुरा प्रतिज्ञा हि मया कृता या तां पालय त्वं यदि मां ग्रहीतुम् ॥ ३८ ॥ तुम मेरा वृत्तान्त सुनो । वह कार्य पूरा न होनेसे में कहीं भी स्थिति नहीं कर सकती। यदि मुझको ग्रहण करनेकी तुम्हारी अभिलाषा हो। तो मैने पूर्वमें जो प्रतिज्ञा की है, उसको पालन करो ॥ ३८ ॥ मनस्तु चैवं खलु दैत्यराज यो मां विनिर्जित्य रणे स्थितः स्यात् । --- भाषाटीकासमेतम् । (९९) स मे तु भर्ता हि न चान्य एव तदादितो युद्धमितः श्रयस्व ॥ ३९ ॥ मेरी प्रतिज्ञा यही है कि, जो मनुष्य रणमें स्थित होकर मुझको परा' जितकर सकेगा अर्थात् जीतलेगा. वही मेरा भर्ता है दूसरा कोई मेरा मा नहीं हो सकेगा। अतएव हे दैत्यराज ! पहिले मुझसे युद्ध करो ॥ ३९ ॥ ईश्वर उवाच । एवं अवाणां त्वां देवि क्रोधेन महता युतः। उच्चैनिभर्सयामास प्रलयाम्भोधिघर्धरम् ॥ ४० ॥ ईश्वर बोले-हे देवि ! जब तुमने यह कहा तव पह भयंकर दैत्य प्रलयपयोधिकी समान महाभयंकर घर्षर शब्दसे तुम्हारी भर्त्सना करने लगा ॥ ४०॥ ततः समुत्थितो घोरः कालरुद्रं च न्यक्कृतः समाहर्तु तदा दैत्यो धावतिस्माखिलं जगत् ॥ ४१॥ इसके उपरान्त महाघोरतर वह घोर दैत्य महाकाल रुद्रको धिक्कार देकर संपूर्ण जगत्का संहार करने के लिये उठकर दौडा ॥ ४१ ॥ तथापि त्वां गृहीतुं स क्षमो नाभूत्कथश्चन । तदा वेगेन महता स गत्वा दानवेश्वरः॥ ४२ ॥ तोभी वह तुमको पकड़ने में किसी प्रकार समर्थ न हुआ। तब वह दानवेन्द्र वेगसे दौडने लगा ॥ ४२ ॥ हस्तामर्षवशात्ते च पर्वताश्चूर्णतां गताः। पदाघातानुपरता मना हि स्युर्जलार्णवे ॥ ४३ ॥ उसके हस्तस्पर्शसे सब पर्वत चूर्ण होने लगे ! पदाघातसे प्रक्षिप्त होकर जलार्णव ( समुद्र) में डूबने लगे ।। ४३ ॥

(१००) योगिनीतन्त्रम् । तदङ्गभ्रमवातेन प्रोच्छलज्जलमण्डलम् । ऊधिश्च कटाहान्तं महाभीमतरङ्गकम् ॥४४॥ ब्रह्माण्डं परिसंव्याप्य भ्रमते स निरंतरम् । धर्त्तकामो महामाये त्वां धर्न न क्षमोऽभवत् ॥ ४५ ॥ उसके अङ्गकी पवनके भ्रमसे जलधिमण्डल उछलकर महाभयंकर तरंगोंके सहित ब्रह्माण्ड के ऊर्धा (ऊपरके अर्ध) कटाहपर्यन्त (आधे भाग पर्यंत) निरंतर परिभमण करनेलगा । हे महामाये ! वह तुम्हारे पकडनेकी इच्छासे दौढ़नेपर भी नहीं पकड सका ।। ४४ ॥ ४५ ॥ अग्रेने त्वां पश्यति स्म केवलं दैत्यपुंगवः ॥ यद्याद्धं कृतं तेन कथितुं नेव शक्यते ॥ ४६ ।। तुमको केवल आगे आगे जाता देखने लगा। उसने जैसा जैसा युद्ध किया, उसका वर्णन नहीं हो सकता ॥ ४६॥ यद्यक्षिप्तं त्वयि शिवे तत्सर्वं भस्मसादतम् । तत्तेजसा महेशानि तत्रापि क्रोधमूच्छितः ॥ ४७ ॥ भवेनिरन्तर दैत्यो घोरो घोरपराक्रमः । आश्चर्य शृणु देवेशि युद्धवृत्तं महोज्ज्वलम् ॥ ४८ ॥ हे शिवे ! तुम्हारे ऊपर उसने जो जो निक्षेप किया वह सब ही भस्म सात् हो गया । हे महेशानि ! तो भी तेजोयुक्त क्रोधमूच्छित हो वह घोर दैत्य कमकमसे घोर पराक्रम प्रकाश करने लगा । हे देवेशि! माश्चर्य मुनो ॥ ४७॥ ४८॥ जलजातात्कटाहातु धूलिरुत्पद्यते भृशम् । एक्मेकाहतो युद्धं कोटिवर्षमभुत्तदा ॥ ४९ ।। उस महा तुमुल (भयंकर ) युद्धकाल में जलजात कटाहसे ढेर ढेर धूलि उठने लगी यह युद्ध एक दिनसे आरम्भ करके करोड वर्ष हुआ " भापाटीकासमेतम् । (१.०१) एवं तत्र महेशानि युद्धकाले भयानुरः । अहं योगं समाश्रित्य अतिसूक्ष्मतरं वपुः ॥ विधाय परमेशानि त्वामाश्रित्य स्थितः सदा ॥ ५० ॥ हेमशानि ! मै ऐसे युद्धकालमें भयातुर होकर योग अवलम्बन पूर्वक सूक्ष्मतर शरीर धारण करके तुम्हारे ही सहारेसे स्थित रहा ॥ ५० ॥ कथश्चिदपि न प्राप्य त्वां धर्तु दैत्यराट् तदा ।। चिन्तयामास च खलु त्वां हन्तुं विविधक्रमम् ॥५१॥ तम दैत्यराम तुमको किसी प्रकार न पाडसकनेसे तुम्हारे हनन करनेके लिये अनेक उपाय विचारने लगा ॥ ५१ ॥ वर्द्धयित्वा शरीरं स्वं घर्षयित्वा च बाहुना। कटाहे मारयिप्यामि महादुष्टां हि त्वामहम् ।। ५२ ।। वह अपना शरीर बढ़ाकर और बाहुद्वारा उसको घर्पणकर चिन्ता करनेलगा मैं महादुष्टस्वभाव नारीको इस कटाह (एक आकार ) में डालकर वध करूँगा ।। ५२ ॥ इति सश्चिन्त्य मनसा वर्द्धयित्वा कलेवरम् । परितं तेन ब्रह्माण्डं घोरो हर्षमुपागमत् ॥ ५३ ॥ इस प्रकार मनमें चिन्ता करके कलेवर बढाने लगा । अपने द्वारा ब्रह्माण्ड परिपूरित हुआ देखकर घोर दैत्य अत्यन्त हर्पित हुआ ॥ ५३ ॥ उवाच त्वां तदा दैत्यो हता याम्यसि कुत्र वा । भवती भृशमालोक्य दैत्यं ब्रह्माण्डपरितम् ।। ५४ ।। तर दैत्यराजने तुमसे कहा- अब अपने आपको हतप्राय देखकर कहा भागोगी ? तुमने दैत्यको निजकलेवरसे ब्रह्माण्डपरिपूरित करता देखकर ॥५४ (१०२) योगिनीतन्त्रम्। त्वयोक्तोऽसौ घोरदैत्यस्तिष्ठ तिष्ठ सुदुर्मते। कथं व्यस्तो भवानातो निहन्मि त्वामहं मुदा ॥ ५५॥ तुमने कहा था-रे दुर्मति घोर दैत्य ! तू ठहर २ घबराता क्यों है ? मै अभी तुझको लीलापूर्वकही मारतीह ॥ ५५ ॥ अधुनेव महादुष्ट जानासि न हि मां कदा । मत्तः सृष्टिः समुत्पन्ना मय्येव प्रविलीयते ॥५६॥ रे महादुष्ट ! अबभी तू मुझको क्यो नहीं जानसका ? मुझसेही सृष्टि उत्पन्न और मुझमेंही लय होती है ॥ ५६ ॥ मयैव पाल्यते सर्व मम मायामयं जगत् ॥ मत्तो नान्यत्किञ्चिदस्ति ब्रह्मवाहं सनातनः ॥५७॥ मैही इस सब संसारको पालती हु यह जगत् मेराही मायामय है मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है, मैंही सनातनब्रह्म ह ॥ ५७ ।। शृणु मूढवरास्माकं परमं मङ्गलं महत् । दुष्टभावेन वा दैत्य शिष्टभावेन वा पुनः ॥५८ ॥ रे मूढमति ! मेरा परममहत् मंगलभाव सुन रे दैत्य ! दुष्टभावसे हो वा शिष्टभावसे हो ॥ ५८॥ भजन्ते मां यथा ये हि तथा कामं ददामि ते । निदानन्तु प्रयच्छामि महाफलमनुत्तमम् ॥ ५९ ।। त्वयाई सेवितो दैत्य बहुकालं न संशयः। समाप्तमेकचित्तेन ममैषा त्वकरोद्यतः ॥ ६० ॥ शिवोऽसि नात्र सन्देहो मत्कृते यच्छ्मस्तव । इदानी पश्य मद्रूपं ब्रह्मानन्दं परं पदम् ॥ ६१ ॥ मुझको जो जिस भावसे भजता है मैं उसकी वही कामना पूर्ण रती हू मे ही अनुत्तम महाफलका निदान स्वरूप ब्रह्मनिर्वाण प्रदान

भापाटीकासमेतम् । (१०३)
करती हूं हे दैत्य ! तेने मेरी बहुतकाल सेवा करी है; इसमें संदेह नहीं । तैंने
मेरे प्रति एकान्त चित्त होकर मुझको प्राप्त करनेकी वासना करी है अतएव
तू निःसन्देह शिव है ! क्योंकि, तैंने मेरे लिये बहुत श्रम किया है। अब तू
मेरा परमपद ब्रह्मानन्दरूप देख ॥ ५९ ॥ ६० ॥ ६१.॥ वि(२५५
यदृष्टवान्पुनः कोऽपि कदाप्याविर्भवेत्किल।
ध्यात्वा यत्परमं रूप.शिव नूनमिति प्रभो॥ १२ ॥
तद्रूपं परमं धाम कालीरूपमिति शृणु ।
इतः परतरं रूपं ब्रह्मणो नास्ति कुत्रचित ।। ६३ ।।
इस शिवमय परमपदका ध्यान करके भी कोई नहीं देख , सकता । वह
तू शीघ्र देख क्योंकि, उसको देखने के लिये और भी कोई प्रकट हो सकता
है । इस प्रकार परमधाम उस कालीरूपको जानना चाहिये । परब्रह्ममें इसकी
अपेक्षा उत्कृष्टतर रूप और कहीं भी नहीं ॥६२॥६॥
इत्युक्त्वा त्वं तदा देवि भवानी भवमोचनी।
ध्यात्वा यत्परमं रुपमहं कालीति वादिनी ।। ६४ ॥
असकृत्परमेशानि जाता त्वं कालिका तदा ।
कृष्णवर्णा महाघोरा महाकालोपरि स्थिता ॥ ६५ ॥
मुण्डमालावली रम्या मुक्तकेशी स्मितानना।
ललजिह्वा रक्तघोरा लोचनत्रयराजिता ॥६६॥
हे देवि ! तर भवमोचिनी भवानी तुमने यह सब वचन कहकर परमरूप
ध्यानपूर्वक 'मैं काली मैं काली' यह वाक्य कहते कहते वाम्वार काली
मूर्ति धारण करी थी, वह काली कृष्णवर्ण, महाघोररूप महाकालके ऊपर
स्थित, मुण्डमालावलीसे मनोहर, मुक्तकेशी स्मितानन ललजिहा और
रक्तवर्ण तीन नेत्रोंसे विराजित ॥ ६४ ॥ ६५ ॥६६॥

(१०४)
योगिनीतन्त्रम् ।
अमाकलासमुल्लासा किरीटोज्ज्वलविहा ।
शिवाकोटिसहस्रेस्तु तेजोमण्डलसम्भवैः ॥ ६७ ॥
महारावैश्चतुर्दिक्षु यतो घोरपराक्रमः।
रश्मिवृन्दसमुद्भता योगिन्यः कोटिकोटिशः ॥६॥
समन्तादोररूपस्था महायुद्धमहोत्सुका।
प्रतिलोमे कूपमध्ये ब्रह्माण्ड कोटिकोटिशः।
भासन्ते सततं देवि सर्वाः सूर्यमयाः पुनः॥ ६९ ॥
किरीट द्वारा उज्ज्वल शरीर और अमाकलाके समान उल्लासित (प्रफुल्ल)
तेजोमण्डलसंभूत, घोररव, घोर पराक्रम करोड सहस्र गीदडियोंसे वेष्टित ।
उस महाकालीके रश्मिबिन्दुसे घोर रूपवाली, महायुद्ध में उत्सुक करोड
करोड योगिनी, चारों ओरमें उत्पन्न हुई। हे देवि ! वह सब योगिनी
सूर्यमयरूपमें दीप्ति पाने लगीं । महाकालीके प्रतिलोम कूपमें करोड़ करोड
ब्रह्माण्ड प्रकाश पाने लगे ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
एवं तां कालिकां दृष्ट्वा मूर्छितो दानवेश्वरः।
प्रतीतोऽसौ महाकाल्या दृष्ट्वा श्रीमुखमण्डलम् ॥७॥
वह दानवेश्वर इस प्रकार उस कालीको देखकर मूर्छित हुआ। महाकाली
का श्रीमुखमण्डल देखनेसे इस दानवको प्रीति प्राप्त हुई ॥७०॥
तत्क्षणादानवाधीशो ब्रह्मज्ञानमवाप्तवान् ।
ततस्तं दानवाधीशं ज्ञानं भक्तं सुनिर्मलम् ।।
जिह्वया लोलया काली चकर्ष च रणान्तरे ।। ७१ ॥
वह दानवाधीश्वर तत्काल ब्रह्मज्ञानको प्राप्त हुआ फिर महाकालीने उस
निर्मल भक्त ब्रह्मज्ञानवान् दानवराजको रणमें लोलजिहा द्वारा आकर्षण
किया ॥ ७१॥

भाषाटीकासमेतम् । (१०५)
ब्रह्माण्डसहितं माता चर्वयित्वा मृतं क्षणात् ।
चकार लीलया काली घोरवाद्यमहोत्सुका।
नानायन्त्रस्य बृहतः पताकाव्यापिका तदा ।। ७२ ॥
और जगन्माताने ब्रह्माण्डके सहित उसको चाबकर क्षणमात्रमें ही वध
कर डाला। अनन्तर महाकालीने लीलापूर्वक बृहत् बृहत् यन्त्रोंका घोर
वाद्य महोत्सव किया और आकाशव्यापी (ध्वजाको उठाकर ) आन्दो.
लित किया ॥ ७२ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्र सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्वादे चतुपिशतिमाहले
भापाटीकाय। अष्टम पटर ॥८॥
ईश्वर उवाच ।
तदृष्ट्वा तु महाश्चर्य भयविह्वलमानसः।
अहं त्वगच्छं सहसा तत्र कान्तारमुत्तमम् ।। १ ।।
ईश्वर बोले-यह महाआश्चर्य वात देखकर मे भयविहल चित्ते उस
उत्तम कान्तारमें सहसा गया ॥ १ ॥
सुषुम्नावर्त्मना देवि तत्र गत्वा मया किल ।
समुद्दिष्टं श्रुतं यद्यत्कथितुं नैव शक्यते ॥ २ ॥
हे देवि ! सुषुम्नावर्म द्वारा उस स्थानमें जाकर मेने जो जो सुना,
उसके प्रकाश करनेको मे समर्थ नहीं हू ॥२॥
सर्वाश्चर्यमयं देवि न दृष्टं न श्रुतं क्वचित् ।
अतीव बृहदाकारा ब्रह्माण्डाः कोटिकोटिशः ॥ ३ ॥
हे देवि ! वह सर्वाश्चर्यमय है, उस प्रकार न कही देखा और न रहीं
सुना । अत्यन्त बृहदाकार करोड करोड ब्रह्माण्डमण्डल ॥ ३ ॥
चरन्ति सर्वदा देवि का संख्यातुं क्षमो भवेत् ।
कोटिकोटिमुखा देवि ! कोटिकोटिभुजास्तथा ॥४॥

(१०६) योगिनीतन्त्रम् ।
सदा विचरण करते हैं, उनकी कौन संख्या कर सकता है ? हे देवि !
यहा करोड करोड मुख और करोड करोड भुजायुक्त ॥ ४ ॥
एवं च विविधाकारा ब्रह्मविष्णुशिवादयः।
महदेश्वर्यसम्पत्राः प्रतिब्रह्माण्डवासिनः॥५॥
विविधप्रकार आकारवारी प्रतिब्रह्माण्डनिवासी ब्रह्मा विष्णु शिवादि
महदेश्चर्यसम्पन्न होकर विचरते हैं ॥ ५ ॥
सर्वाश्चर्यमयं देवि दृष्ट्वा कुशलमानसः ।
सर्व मे विस्मृतं जातं कोऽहं चिन्तापरायणः ॥ ६ ॥
हे देवि ! यह सर्वाश्चर्यमय व्यापार देखकर मेरा मन विहल हो गया
मैं सब भूल गया, तब 'मैं कौन हूँ ?' यह चिन्ता मेरे मनमें उदय
हुई ॥ ६ ॥
अहं का कुत्र चायातः केन पृच्छति कुत्रचित् ।
एवं नानाविधं देवि भुवने विस्मृतः सदा ॥७॥
मैं कौन हूँ ? कहांसे आया हूं. कोई, कहीं भी कुछ नही पूछता, इस
प्रकार मै भुवनको समस्त ही भूल गया ॥ ७ ॥
नानास्थानसंभ्रमश्च नास्ति स्मर्यश्च मे कदा ।
ततश्च कोटिवर्षान्ते प्रातं ते हृदयाम्बुजम् ॥ ८॥
में अनेक स्थानों में भ्रमण करने लगा। मुझको कुछ भी स्मरण नहीं
हुआ, फिर करोड वर्ष पीछे तुम्हारे हृदयाम्बुजको प्राप्त होकर तृप्त
हुआ || ८॥
तत्र गत्वा मया सर्व दृष्टमाश्चर्यमुत्तमम् ।
तत्सर्व परमेशानि कथितुं नैव शक्यते ॥ ९॥
हे परमेशानि ! मैंने उस स्थानमें जाकर जो जो परम सुन्दर, जो जो
आश्चर्य देवा वह मै वर्णन नहीं कर सकता ॥ ९ ॥

भापाटीकासमेतम् । ( १०७) यद्भावार्थोदयं शास्त्रं कारणं सुखमोक्षयोः। परमात्मागमो वेदा जीवो दर्शनमिंद्रियम् ॥ १० ॥ कुछेक वर्णन करता हूं सुनो, सुख और मोक्षका कारण धर्मार्थमय शास्त्र, परमात्मा, आगम, वेद, जीवात्मा, दर्शन, इन्द्रिय ॥१०॥ देहः पुराणमङ्गानि स्मृतयो नियमानि च । तत्रैव सर्वशास्त्राणि लोमादीनि वरानने ॥ ११ ॥ देह पुराणके सब अंग, संपूर्ण स्मृति शाल व लोमादि सर्वशास्त्र वही देखे ॥ ११॥ जीवात्मनोयथा भेदस्तथा वेदागमेष्वपि । पत्राने पत्रमध्ये च पत्रान्ते हृदयाम्बुजे ॥ १२ ॥ समस्त वेदागममें जिस प्रकार जीवात्माका भेद है, वह हृदयाम्बुजमें पत्राग्रमें, पत्रमध्यमें और पत्रान्तमें ॥ १२ ॥ दृष्ट्वा वर्णावली या तु तीव्रतेजोमयी शुभा। शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव वा ॥१३॥ देखने के पीछे तीन तेजोमयी शुभकारी वर्णावली देखी। शिक्षा, कल्प: व्याकरण, निरुक्त, छन्द ॥ १३ ।। अन्यानि सर्वशाखाणि क्षुद्राणि यानि कानि च । किन्तु पूर्णावलोकेन ज्ञातोऽहं कथितं तव ॥ १४ ॥ ज्योतिष और अन्यान्य क्षुद क्षुद्र संपूर्ण शास्त्र अवलोकन किये । फिर मै पूर्णावलोकसे ज्ञात हुआ, सो तुमसे कहता हूं ॥ १४ ॥ ततो मया शतं देवि कणिकान्तमहोज्ज्वलम् । कोटिकोटिदिवानाथनिशानाथसमुज्ज्वलम् ॥ १५ ॥ कोटिकोटिमहावद्वितेजोमण्डलमण्डितम् ।

(१०८) योगिनीतन्त्रम् ।
तन्मध्ये तु मया दृष्टं वर्णपुंज महोज्ज्वलम् ॥ १६ ॥
सूर्यकोटिसमाभासं चन्द्रकोटिसुशीतलम् ।
वहिकोटिमहोज्ज्वालं परं ब्रह्ममयं ध्रुवम् ॥ १७ ॥
सर्वज्ञानभयं देवि सर्वाश्चर्यमयं सदा ।
सर्वयज्ञमयं देवि सर्वतीर्थमयं सदा ।। १८ ॥
सर्वपुण्यमयं देवि सर्वधर्ममयन्तथा ।
ब्रह्मज्ञानमयं देवि ब्रह्मानंदमयं तथा ॥ १९ ॥
प्रमाणं सर्वशास्त्राणां वेदादीनां महेश्वरि ।
प्रमाणं सर्वसत्त्वानां ब्रह्मतेजः परं हि तत् ॥ २० ॥
सर्वमायाबहिर्भूतं सर्वमायानिकृन्तनम् ।
सर्वानन्दमयं देवि ब्रह्मानंदमयं सदा ॥ २१ ॥
पूर्णानन्दमयं देवि ब्रह्मनिर्वाणमुत्तमम् ।
सर्वमायामयं देवि सर्वविद्यामयं पुनः ॥ २२ ॥
सर्वतपोमयं देवि सर्वसिद्धिमयन्तथा।
सर्वमुक्तिमयं देवि सर्ववेदमयं तथा ॥ २३ ॥
सर्वलोकमयं देवि सर्वभोगमयं तथा ।
सर्वशास्त्रमयं देवि सर्वयोगमयं तथा ॥ २४ ॥
दृष्ट्वागममिमं तत्र मम ज्ञानान्धसागरे ।
गता शर्ययोऽद्राक्षं यथा सूर्योदयोज्ज्वलम् ॥२५॥
अभ्यस्तं हि मया सर्व महाकालीप्रसादतः।
दृष्ट्वाभ्यस्तं मया सर्व तत्क्षणान्नात्र संशयः ॥२६॥

.
भापाटीकासमतम् । (१०९)
जिस काणेकामें करोढ करोड दिवानाथ और निशानाथके समान
समुज्ज्वल एवं करोड करोड महावहि तेजोमण्डलसे मंडित महोज्ज्वल वर्ण-
पुज मैने देखा । हे महेश्वार ! उसमें करोड सूर्य के समान दीप्तिशाली
करोड चन्द्रमाके समान शीतल, करोड अग्निके समान महोज्ज्वल, नित्य
परब्रममय, सर्वज्ञानमय, सर्वाश्चर्यमय, सर्वयजमय, सर्वतीर्थमय, सर्वपुण्यमय
सर्वधर्ममय ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मानन्दमय वेदादि सब शास्त्रोंका प्रमाण और सर्व-
विधिसत्वका ब्रह्मतेजमय परम और हितकर प्रमाण देखकर आनन्द प्राप्त
किया । सर्वमायाव हेर्भूत, सर्वमायाका निवर्तक, सर्वानन्दमय, ब्रह्मानन्दमय,
पूर्णानन्दमय उत्तम ब्रह्मनिर्वाण और सर्वमायामय, सर्वविद्यामय, सर्वतपो-
मय, सर्वसिद्धिमय, सर्वमुक्तिमय, सर्ववेदमय, सर्वलोकमय, सर्पभोगमय,
सर्वशास्त्रमय, सर्वयोगमय आगम अवलोकन किया। इससे मेरी अज्ञाना.
न्धसागरकी घोर रात्रि विगत हो गई । मैने सूर्योदयोज्वल ज्ञानका दर्शन
किया। मैने महाकालीके प्रसादसे उन समस्त शास्त्रादिका अभ्यास किया ।
वह सब देखकर मैने तत्काल सका अभ्यास किया। इसमें सन्देह
नहीं ।। २५-२६ ॥
ततः किअल्कपुत्रेषु गत्वा दृष्टं मया किल ।
वर्ण पुजमयं देवि सूर्यकान्तिसमप्रभम् ॥ २७ ॥
न्यायो मीमांसक लाख्यं पातञ्जलं कथा पुनः ।
वैशेषिकं यथापूर्व मया ज्ञातं हि तत्क्षणात ॥ २८ ॥
फिर किजल्कपुञ्जमें जाकर देखा फि, सूर्यकान्तिके समान प्रभासम्पन्न
वर्णपुञ्जमय न्याय, मीमांसा, साख्य, पातंजल, वैशेषिक समस्त शास्त्रसे मै
तत्काल पूर्वके समान ज्ञात हुआ ॥ २७ ॥ २८ ॥
ततो वर्णावली दृष्ट्वा कर्णिकाप्रान्तदेशतः।
शतसूर्यसमाभासां सर्वरजनकारिणीम् ॥ २९ ॥
आयुर्वेदभिषग्वेदो मयाभ्यस्तौ तदेव हि ।
तदन्तरे महादेवि दृष्टा वर्णावली शुभा ॥ ३० ॥

(११०) योगिनीतन्त्रम्।
सहस्त्रादित्यसंकाशा शुद्धवर्णा महोन्ज्वला ।
स्मृतीतिहासौ देवेशि पुराणानि मया पुनः ॥३१॥
तदनन्तर कार्णकाके प्रान्तदेशमें सौ सूर्यके समान दीप्तिशालिनी
सर्वरञ्जनकारिणी वर्णावली देखनेपर आयुर्वेद और भिषग्वेदका अभ्यास
किया हे महादेवि । वर्णावली देखनेके पीछे सहसादित्यसकाश अर्थात्
सहनों सूर्यके सदृश महोज्ज्वल शुद्ध समस्त वर्ण देखनेपर स्मृति,
इतिहास ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥
मयाभ्यस्तं हि तत्सर्व तत्क्षणान्नात्र संशयः ।
तथापि भ्रमदेहो मे न शुद्धयति कदाचन ॥ ३२ ॥
तदन्तरे मया दृष्टं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
ब्रह्मज्ञानं मया देवि ब्रह्मतेजःपरीवृतम् ॥ ३३ ॥
वदान्तमिति विख्यातं वर्णपुजं महत्प्रभम् ।
मधाभ्यस्तं तत्क्षणात्तु तन्महद्भयश्च मोहतः ॥ ३४ ॥
ओर समस्त पुराणोंका अभ्यास किया, इसमें सन्देह नहीं तथापि मेरे
मनका मम शात नहीं हुआ। तदनन्तर करोढ सूर्यके समान प्रभासम्पन्न
ब्रह्मतेज परिवृत्त ब्रह्मज्ञानसपन्न वर्णपुञ्ज महापभायुक्त 'वेदान्त' इस नामसे
विष्यात महाशास्त्रका मैने तत्काल अभ्यास किया ।। ३२-३४ ॥
तदन्तरे मया दृष्टं वर्णपुंजसमुज्ज्वलम् ।
कोटिसूर्यप्रतीकाश चन्द्रकोटिशीतलम् ॥ ३५ ॥
सर्वज्ञानमयं देवि सर्वतीर्थमयं सदा ।
सर्वयज्ञमयं देवि सर्वधर्ममयं तथा ॥ ३६ ॥
प्रमाण सर्वसत्त्वानां शास्त्रादीनां महेश्वरि ।
वेदवतुष्टयं सामाथर्वश्रुग्यजुरुत्तमम् ॥ ३७ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
मयाभ्यस्तं हि तत्सर्व तत्क्षणान्नात्र संशयः।
तथापि न च तृप्तिमें जायते न च तत्क्षणात् ॥३८॥
तदनन्तर वर्णपुलसे समुज्ज्वल, करोड सूर्यके समान दीप्तिमान्, करोड
चन्द्रमाके समान शीतल, सर्वज्ञानमय, सर्वतीर्थमय, सर्वयज्ञमय सर्वधर्म-
मय, सर्वसत्त्व और सर्वशास्त्रका प्रमाणम्परूप साम, अथर्व, ऋक् और
यजुः इन अनुत्तम चारों वेदका मैंने तत्काल अभ्यास किया तो भी उनसे
मेरी तृप्ति न हुई ।॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
सर्वज्ञानसर्वसत्वसर्वसिद्धिमयो ह्यहम् ॥ ३९ ॥
तदनन्तर मैने सर्वज्ञानमय सर्वसत्त्वमय और सर्वसिद्धिमय होकर ३९॥
तदा नमस्कृतां देवि तस्त्वां काली सनातनीम् ।
शिवाभियोगिनीभिश्च नृत्यन्ती ब्रह्मरूपिणीम् ॥४०॥
स्थित्वा स्थित्वा संमुखे मे दृष्ट्वा श्रीमुखमण्डलम् ।
ततठड्डीनमासाद्य द्विदले चागतं मया ॥ ४१ ।।
वेद वेदान्तादि द्वारा नमस्कृत उन सनातनी ब्रह्मरूपिणी महाकाली
देवीको शिवागण ( गीदडी) और योगिनीगणोंके संग नर्तनशील अर्थात्
नाचता हुआ देखा। वह रुक रुककर मेरे सामने नृत्य करने
लगी। फिर उनका श्रीमुखमण्डल देखकर मै उडता हुआ द्विदलपद्ममें
आया ॥ ४० ॥ ११ ॥
आज्ञाचक्रनुवोर्मध्ये महाकाल्या महेश्वरि ।
तदा मम स्मृतिर्जाता ब्रह्मविष्णुकृते पुनः ॥ ४२ ॥
है देवि ! दोनों भौओंके मध्यस्थित महाकालीके आज्ञाचक्रके
(इशारा करनेवाले ) अवस्थितिकालमें ब्रह्मा और विष्णुका मुझको
स्मरण हुआ ॥ ४२ ॥

(११२)
योगिनीतन्त्रम् ।
तन्नृत्यसमये काल्या द्वयोश्चिबुकयोश्च्युतौ।
स्वेदविन्दू महेशानि ताभ्यां जातौ गुणान्वितो॥४३॥
हे देवि ! उन देवीके नृत्यकालमें कालीकी चिबुक (ठोडी ) से दो
बूंदे पसीनेकी गिरी । उन दोनों बूंदोंसे गुणयुक्त ब्रह्मा और विष्णु
उत्पन्न हुए ।। ४३ ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च तो दृष्ट्वा भयकम्पित विग्रहो।
तदा तौ च गतौ तूर्ण नासिकारन्ध्रयोर्द्वयोः ॥४४॥
ब्रह्मा और विष्णुका शरीर इन दोनोंको देखकर भयसे कांपने लगा वह
तत्काल नासिकाके दोनों छिद्रोद्वारा बाहर हो गये ।। ४४ ॥
कल्यास्तदा ततो धाता पिङ्गलायां महेश्वरि ।
इडायाच ततो विष्णुस्तत्र गत्वा च तो शुभौ ॥५॥
महाविडम्बितौ भूतौ दृष्ट्वाश्चर्यमनेकशः।
रुदन्ती सततं देवि विस्मृतं किं भविष्यति ॥ ४६ ॥
फिर विधाता कालीकी पिगला और विष्णु इडा नाडीमें गये। तब
उन दोनोंने महाविडंबित भूतद्वय ( दो प्राणियोंकी महातिरस्कारकी हुई
आकृतियें ) और अनेक आवर्य देखे । तदन्तर ब्रह्मा और विष्णु रुदन करने
लगे । हे महादेवि ! तुम यह बातें कैसे भूलती हो ॥४५॥४६॥
एवमादि रुदन्तौ तौ प्रधावितावितस्ततः।
तावीश्वरों महेशानि महादुःखेन दुःखितौ ॥ ४७ ॥
इस प्रकार महादुःखसे दुखित होकर दोनों रोते हुए इधर उधर दौड़ने
लगे ॥ १७ ॥
ज्ञात्वा महा महेशानि प्राग्गतं विष्णुमन्दिरम् ।
तस्मै दत्तं मया ज्ञानं मन्त्रं परममङ्गलम् ॥ ४८ ॥
हे महेशानि ! मैने यह जानकर प्रथम विष्णु के मंदिरमें जाय उनको
परम मंगल ज्ञानमन्त्र दिया ॥१८॥

भाषाटीकासमेतम् । (११३) तत्क्षणान्मम तुल्योऽसौ वामाले केवलो मम । तस्मै दत्तं सर्वशाखं वाङ्मात्रेणागमं विना ॥ ४९ ॥ यही वह तत्काल मेरे तुल्य होकर वामानमें रहे मैने उनको मागमके अतिरिक्त समस्त शास्त्र वाडमात्र अर्थात् कथनसेही प्रदान किये ॥ १९ ॥ गरुडस्थो महाविष्णहष्टपुष्टो बभूव है। तमादाय गतस्तत्र ब्रह्माण्डे परमेश्वरि ॥५०॥ गत्या तस्मै मया दत्तं मन्त्रं परममद्भुतम् । महाज्ञानी महादेवि तत्क्षणात्सपितामहः ॥ ५ ॥ वह विष्णु गरुडपर स्थित होकर हृष्ट पुष्ट होने लगे । हे परमेधारे ! मेने विष्णुको ग्रहणकर ब्रह्माण्डमें प्रवेशपूर्वक ब्रह्माजीको परम भद्भुत मंत्र दिया । हे महादेवि ! उससे वह पितामह तत्काल महाज्ञानी हुए ॥ ५० ॥ ५१ ॥ मम तुल्यो जायतेऽसौ क्षणाने मम केवलः । स विधिः परमेशानि मम शासनतस्तदा । दत्त्वा तस्मै सर्वशास्त्रं वेदशास्त्रश्च विष्णुना ।। ५२ ।। ब्रह्माजी मेरी समान होकर दक्षिण अंगमें स्थित रहे हे परमेशानि । तब विष्णुने मेरी आज्ञासे विधाताको सर्वशास्त्र और वेदशास्त्र प्रदान किया ।। ५२ ॥ गतव्यथस्तदा ब्रह्मा हृष्टः पुष्टः सदेव हि । अत आदिगुरुस्त्वं हि वर्तते मम सर्वदा ॥ ५३ ॥ फिर व्यथा दूर होनेपर नमाजी परावर हृष्ट पुष्ट होने कगे । अत एव तुम सदाही मेरे आदिगुरु हो ॥ ५३ ॥ तदगीकृत्य तल्ज्ञानं सह ताभ्यो महेश्वरि । परं काल्या मया यातं तेन तेन पथा ह्यनु ।। ५४ ॥ ८ । -- (११४) योगिनीतन्त्रम। हे महेश्वरि ! ब्रह्माजीके उस ज्ञानको अंगीकार करनेपर मैने उनके सहित कालीके पीछे उस उस मार्गद्वारा गमन किया ॥ ५४ ॥ शिवाभियोगिनीभिश्च महानृत्यपरायणा । शतकोटिदिव्यवर्ष नृत्यंति स्म पारत्मिका ॥ ५५ ॥ महाकाली शिवा और योगीनियों के सहित सौ करोड़ दिव्य वर्ष महानृत्यमें आसक्त रहीं ॥ ५५ ।। नानावाद्यमहोल्लासा नानालङ्कारमाथिका। चन्द्रसूर्यवसिौम्यविचित्रश्च प्रसूनकैः ।। ५६॥ उत्थितः पतितः पुष्पैर्दिव्यगन्धैर्महोत्सुका । वीक्षणागोचरेदेवि सदा नृत्यपरा रहः ॥ ५७ ॥ वह परामिका काली अनेक प्रकारके वाजोंकी सहायतासे आनन्दका प्रकाश करने लगी। चन्द्र, सूर्य और अनिके समान विचित्र दिव्य गंध ( अतिशय सुगन्धित ) और पतित तथा जो रष्टिगत न होसके, उन कुसुमसमूहद्वारा क्रीडाशालिनी और अनेक प्रकारके गहनोंसे अलंकृत हो निर्जनमें निरन्तर नृत्य करनेलगीं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ शतब्रह्माण्डसङ्काशैः पताकाभिश्च रंजिता । विचित्राभिश्च बहुभिदृष्ट्वा क्रान्ताभिरेव च ।। ५८ ॥ शत शत ब्रह्माण्डके समान विचित्र अनेक पताकाओंके द्वारा वेष्टित होकर शोभा पाने लगी ॥ ५८ ॥ अतः स्तोतुं समाबद्धा वयं काली करालिकाम् ॥ साश्रुप्लुता गद्गदोक्त्या नतशीर्षाः पुटैः करैः ॥१९॥ तदादी विधिरस्तोषीत्सर्वशास्त्रेण भक्तितः। कोटिवर्ष महेशानि तमुवाच तदा परा ।। ६० ॥ , भापाटीकासमेतम् । (११५) इसके उपरान्त हम नेत्रोंमें जल भर गद्द वचनसे हाथ जोड़ शिर नवायकर कालीकी स्मृति करने लगे। पहिले ब्रह्माजीने भक्तिपूर्वक सर्वशा- स्त्रद्वारा स्तुति करी । तर महाकालीने करोड वर्ष पीछे ब्रमजीसे कहा ॥ ५९ ॥ ६०॥ यद्गुणस्त्वमहो धातः सर्वशास्त्रार्थविद्यतः। अनुसन्धानवेत्तासि सृजकस्त्वं सदा भव ॥ ६१ ।। हे धातः ! तुम अनुसन्धानबेचा अर्थात् मर्मके जानने पाले मौर समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेवाले हो इसकारण तुम सृष्टि करो ॥ ६१ ॥ इत्याज्ञातस्ततो धाता कृतकृत्योऽभवत्तदा । ततोऽस्तोपीन्महाविष्णुः सर्ववेदेन शाम्भषि ॥ ६२ ॥ ब्रह्माजी इस प्रकार आज्ञाको प्राप्त होकर कृतकृत्य हुए फिर महाविष्णु सर्ववेदद्वारा उन परमा महाकालीकी स्तुति करने लगे ॥ ६२ ।। दशकोटचयनानां च ततस्तमब्रवीच्छिवा। वेदज्ञोऽसि महाविष्णो मद्भक्तोऽसि गुणालयः। धर्मज्ञोसि च लोकं त्वं भव सृष्टेर्विवर्द्धकः ॥ ६३ ॥ है महेशानि ! दश करोड वर्ष पीछे शिवाने उनसे कहा हे महविष्णो तुम वेदज्ञ मेरे भक्त, गुणालय और धर्मके जाननेवाले हो, अतएय तुम पालक होकर सृष्टिको बढाओ ॥ ६३ ॥ इत्याज्ञाच्च शिरें कृत्वा कृतार्थोऽसौ जगद्धितः । ततोऽहं परमां नित्यां काली ब्रह्मसनातनीम् ॥ ६४ ॥ तुष्टाव परया भक्त्या आगमेन महेश्वरि । विशत्कोटिवत्सराणां मामुवाच तदा तु सा ॥६५॥ .

(११६) योगिनीतन्त्रम् ।
इस जगत्के हितकारी विष्णु कालीकी यह आज्ञा मस्तकपर धारण
करके कृतार्थ हुए। इसके उपरान्त मै उन परमा, नित्या ब्रह्म सनातनी
कालीकी आगमनद्वारा परम भक्तिसहित स्तुति करने लगा वीस करोड वर्ष
पीछे उन महाकालीने मुझसे कहा ।। ६४ ॥६५॥
काल्युवाच ।
आगमज्ञो महाप्राज्ञो नि योऽसि सदाशिव ।
सगुणस्त्वं महायोगी सृष्टिसंहारको भव ॥६६॥
महाकालीने कहा-हे सदाशिव । तुम आगम, महाप्राज,
निर्माय
(मायारहित ) सगुण और महायोगी हो इस कारण तुम सृष्टिके
सहारक होओ ॥६६॥
एवमानां शिरे कृत्वा पुनस्तुष्टाव तामहम् ।
पञ्चोकोटिदिव्यर्वष मामुवाच ततस्तु सा॥ ६७ ।।
आगमे संस्तुता तेऽहं तुष्टातेऽस्मि सदाशिव ।
कि प्रार्थ्यते महादेव ददामि नात्र संशय ॥ ६८॥
मैं यह आज्ञा मस्तकपर धारण करके फिर उनकी स्तुति करने लगा-
पाच करोट दिव्यरर्पके पीछे मुझसे कहा । मै तुमसे आगमद्वारा स्तुतिको
प्राप्त हुई हू, हे सदाशिर ! तुम क्या प्रार्थना करते हो, मै तुमको वहीं
दृगी, इसमें सन्देह नहीं ॥ ६७ ॥ ६८ ॥
ईश्वर उवाच ।
तिष्ठामि सततं मातस्त्वदीये चरणाम्बुजे ॥ ६९ ॥
ईश्वरने कहा-हे माता | मैं तुम्हारे चरणकमलों में सदा स्थितरह
यही मेरी वासना ॥ ६९ ॥

- भाषाटाकासमेतम् । (११७) श्रीकाल्युवाच । घोरनामा दानवेन यादृग्युद्धं कृतं मया । तत्कोटिकोट्यंशयुद्धं करिष्यत्येव यो मया ॥ ७० ॥ महिषीगर्भसंभूतस्तव रेतःसमुद्भवः। भविष्यति स देवेश महिषासुरनामधृक् । आसुरं भावमासाद्य महायुद्धं करिष्यसि ॥ ७१ ॥ श्रीमहाकालीने कहा--मैने घोर नामक दानवके संग जिस प्रकार युद्ध किया है, तुम्हारे शुक्रसंभूत. महिपीके गर्भसे उत्पन्न जो असुर इस युद्धका करोड करोड अंश युद्ध करेगा, महिषासुरनामधारी वही असुर होगा ॥ ७० ॥ ७१ ॥ तदा तं नाशयित्वाहं भद्रकालीस्वरूपतः। वामाङ्गुष्ठं पदाब्जस्य स्थापयिष्यामि ते हृदि ॥७२॥ तब मैं उसको भद्रकालीरूपसे मारकर चरणकमलका बायो अंगूठा तुम्हारे हृदयपर रक्खूगी ॥ ७२ ॥ इदानी च महादेव मम पादतले सदा । तिष्ठ त्वं शवरूपेण मम ह्यासनतां ब्रज।। ७३ ॥ हे महादेव ! अब तुम शवरूपसे मेरे आसनस्वरूप होओ "और मेरे चरणोंके नीचे स्थित रहो ॥ ७३ ॥ इत्याज्ञप्तो महादेव्या पतितः पदसन्निधौ । दण्डवत्प्रणिपातेन लक्षवर्ष गतस्तदा ॥ ७४ ॥ देवीकी इस प्रकार आज्ञा पाकर मे देवीके पदतलमें पड़ा रहा । दण्ड- वत् प्रणाममें लाख वर्ष बीत गये ॥ ७४ ।। तत्रैवान्तरगात्काली चिद्रूपा ब्रह्मनिष्कला ।

(११८) योगिनीतन्त्रम् । इत्येवं कथितं तुभ्यं योगिन्युत्पत्तिविस्तरम् । गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वेषां साधनोत्तमम् ॥ ५५ ॥ तदनन्तर चित्स्वरूपा ब्रह्मविग्रहा काली उसी स्थानमें अन्तर्धान हो गई । हे देवि ! मैंने तुमसे योगिनीकी उत्पत्तिका वृत्तान्त विस्तार सहित कहा । सर्व प्रयत्नसे इसको सदा गुप्त रखना चाहिये ॥ ७५ ॥ इति श्रीयोगिनीतन्त्रे सर्वतन्त्रोत्तमे देवीश्वरसम्वादे चतुर्विशति साहसे भापाटीकाया नवम पटल ॥९॥ ईश्वर उवाच । उत्थाय च पुनदेवी न सा दृष्टा मया पुनः । कथयन्भृशदुःखातों निमनः शोकसागरे ॥१॥ ईश्वर बोले-हे देवि ! हमने उठकर फिर उन महाकालीको नहीं देखा तब शोकसागरमें निमम हो गये ॥ १ ॥ हामातस्ते मुखाम्भोज कोटिचन्द्रार्कन्यक्कृतम् । कीहकू चरणराजो ते कृपासागरसञ्चयम् ॥ २॥ विस्तृतं परमं रूपं महामायाविमोहनम् । किम्भूतं नखचन्द्राणां ज्योतिः परममंगलम् ॥३॥ कोटिकोटिनिशानाथविगलन्मुखमण्डलम् । किम्भूतं कि भवेन्मातक यातमिदमद्भुतम् ॥ ४॥ हा हा मातरिदं रूपं सच्चिदानन्दमव्ययम् । अस्माकं मातृभावेन न पश्याम: पुनश्च ताम् ।।५।। (और अत्यन्त दुःखार्च होकर उनसे कहने लगे) हा मातः ! आपका मुखकमल करोड करोड चन्द्रमाका तिरस्कार करता है, तुम्हारे परण करुणाके सागर और विस्तारित हैं, महामायाके भी विमोहन और

A
भाषाटीकासमेतम् ।
परमरूपसम्पन्न हैं, आपके नखचन्द्रका मंगलकर ज्योतिः अनिर्वचनीय है,
हे मातः ! क्या हुआ ? क्या होगा ? वह अद्भुतरूप कहां गया ? हा
हा माता ! तुम्हारा वह रूप सच्चिदानन्द और अव्यय है, हम मातृभावसे
अब उसको नहीं देखते ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥५॥
मातृतातविहीनाश्च भ्रमन्ति बालका यथा ।
रुदित्त्वा च रुदित्वा च वयं सर्वे तथायन् ॥६॥
इत्यादिविविधदेवि विलापैः परमेश्वरि ।
नीता' वयं पञ्चलक्षं वर्षाणामम्बुजेक्षणे ॥ ७॥
रुदित्वा पुनरुत्थाय रुदन्तो भृशमुच्चकैः ।
मातर्माता क्व याता त्वमस्माकं किं भविष्यति ॥८॥
पिता माता हीन चालक जिस प्रकार रोते फिरते हैं, हमारी भी वही
अवस्था हुई है, हे परमेश्वार ! हे देवी ! हे कमलेक्षणे ! इस प्रकार अनेक
विलापोंमें हमारे पांच लाख वर्ष बीत गये । एक वार रोते हुए गिरें और
फिर उठकर हे मातः ! तुम कहां गई ? हमारी क्या दशा होगी ? इस
प्रकार चिल्लाकर रोने लगे ॥६-८॥
वयन्ते कथमुत्पाद्य निक्षिप्ता दुस्तरार्णवे।
दयानास्ति ह्यहो मातर्वयन्ते दीनबालकाः ॥ ९ ॥
न पालयसि चेदस्मान्कोवास्मान्पालयिष्यति ।
स्वां विना जननी नास्ति नास्माकं तात,एव च।।१०
स्वामदृष्ट्वा मरिष्यामः सत्यमेव सुनिश्चितम् ।।
मातृतातविहीनस्य बालकस्य च जीवनम् ॥ ११ ॥
कथं भवति हे मातयितां स्वयमेव हि ।
निरुत्सुका हदस्माकं कृपा तस्यास्तदा भवेत् ।
सोवाच योगिनी वाणी महामृतप्रवर्षिणीम् ॥ १२ ॥

(१२०) योगिनीतन्त्रम् । आपने हमको उत्पन्न करके दुस्तर दुःखसागरमें क्यों फेंक दिया ? महो मातः । हम तुम्हारे दीन बालक हैं, तुमको क्या कुछ भी दया नहीं है यदि आप हमारा पालन नहीं करेगी, तो हमारा प्रतिपालन और कौन फरेगा । तुम्हारे अतिरिक्त हमारे माता पिता कोई नहीं है, तुमको न देखनेसे हम सत्य ही मरलॉयगे । इसमें सन्देह नहीं । हे मातः ! आप स्वयं ही विचार करके देखिये कि, माता पिता हीन बालकका जीवन किस प्रकार हो सकता है ? हमारा हृदय इस प्रकारसे शोकसंतप्त और निरु- मुक देखकर वह योगिनी ( महाकाली ) महामृतवर्षिणी वाणी कहने लगे ॥९-१२॥ श्रीकाल्युवाच । मा भयार्त्ता महेशानब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। तिष्ठामि सततं देवा नित्याहुरहमव्यया ॥१३ ॥ श्रीकालीने कहा-हे ब्रह्मन् ! हे विष्णो ! हे महेश्वर ! तुम भयसे दुखी मत होओ। मैं सदा ही स्थित रहती हूं, मे नित्या और अन्यया हूँ १३॥ सच्चिदानन्दरूपाहं ब्रह्मवाहं स्फुरत्प्रभम् । मम नाशो नास्ति कदा निःसन्देहास्तु तिष्ठत ॥१४॥ मैही सञ्चिदानन्दरूप और मैही प्रकाशित कान्तियुक्त ब्रह्म हूमेरा नाश कभी नहीं है, मै सदा स्थित रहती हूं, इसमें सन्देह नहीं ॥ १४ ॥ यदूपं दृष्टमस्माकं युष्माभिः परमं मतम् । ध्यात्वा यद्रूपममलं जपं कुरुत मे मनुम् ॥ १५ ॥ तुमने मेरा नो परम निर्मल रूप देखा है, उसी रूपका ध्यान करके मेरा मंत्र जपते रहो ॥ १५ ॥ तदेव मङ्गलं लाभ भाविष्यति महामभम् । इदान ब्रह्मणो दे विश विष्णो स्थिरो भव ।। १६ ॥ -

-
भाषाटीकासमेतम् । (१२१)
तो तुमको परम मंगल प्राप्त होगा, अब हे विगो ! तुम ब्रह्माजीके
देहमें प्रवेश करके स्थिर रहो ॥ १६ ॥
अहो महेश देवेश ब्रह्मदेहे प्रविश्य तु ।
यावसाष्टिं कुरुष्वेश चेमां ज्ञानक्रियामयीम् ॥ १७ ॥
अहो महेश देवेश ! तुम भी ब्रह्माजीके शरीरमें प्रवेश करो। जबतक
ईश्वर ज्ञान क्रियामयी सृष्टिका आरम्भ न करें. तब तक इनके देहमें वाप्त
करो।॥ १७॥
ईश्वर उवाच ।
इत्युक्त्वा सा महाकाली ददावस्मासु शाम्भवि ।
इच्छाज्ञानक्रियाशक्तीः सर्वकार्यार्थसाधिनी ॥ १८ ॥
ईश्वरने कहा-हे शाम्भवि ! उन महाकालीने यह कहकर हमको सर्व
कार्योंकी साधन करनेवाली इच्छा ज्ञान और क्रियामयी शक्ति दी ॥१८॥
इच्छा तु विष्णवे दत्ता क्रियाशक्तिस्तु ब्रह्मणे ।।
मह्यं दत्ता ज्ञानशक्ति सर्वशक्तिस्वरूपिणी ॥ १९ ॥
तदोवाच महाकाली शृणुध्वं परमेश्वरि ।।
अहं विशामि युष्मासु पूर्णरूपेण शंकरे ॥ २० ॥
अयमेव गुरुदेवः श्रीशिवः परमेश्वरः ॥
अयं हि वक्ता शास्त्राणां नात्यायोपि विधिहरिः।।२१
विष्णुको इच्छा शक्ति ब्रह्माको किया शक्ति औ मुझको ज्ञान शक्ति देकर
है देवी ! उन सर्वशक्तिरूपिणीने हमसे कहा-हे परमेश्वरगण ! मैंने तुम
सबहीमें प्रवेश किया है, किन्तु महादेवमें पूर्णरूपसे प्रवेश किया यह
शंकर ही गुरुदेव श्रीशिप और परमेश्वर हैं। यही सन शास्त्रोंके वक्ता हैं
विधाता वा हरि दूसरा कोई नहीं ॥ १९ ॥ २० ॥ २१ ॥

(१२२)
योगिनीतन्त्रम।
श्रोत्रियाहं हि युष्माकं सर्वेषां नात्र संशयः ।
मोहयिष्यामि ब्रह्माणं विष्णु वापि महेश्वरम् ।। २२॥
मै तुम सबकाही श्रोत्रिया अर्थात् वेदपाठिका है इसमें सन्देह नही मैं
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरको मोहित करुंगी || २२ ।।
ईश्वर उवाच ।
इत्युक्त्वा सा महाकाली ह्यस्मासु च विवेश ह ।
अहञ्च माधवे देहे प्रविष्टो ब्रह्मणस्तदा ॥ २३ ॥
ईश्वर बोले-यह कहकर वह महाकाली हममें प्रविष्ट हुई। तब मैं भी
माधव और विधाताके देहमें प्रविष्ट हुआ ॥ २३ ॥
ततस्तं मोहयामास ब्रह्माणं ब्रह्मविग्रहम् ।
ततो ब्रह्मा स्वयं ज्ञात्वा स्वयं जुहोति चाव्ययाम्२४॥
स्वयम्भूरिति विख्यातं तदा प्रोक्तो न संशयः।
किं करोमि व गच्छामि इति चिन्तासमाकुला२५॥
एवमेव विधाता सा व्युषित्वा परिवत्सरम् ।
जलमेव ससर्जादौ व्यापक परमं महत् ॥ २६ ॥
फिर ब्रह्माजीने ज्ञानको प्राप्त होकर स्वयं अव्यया महाकालीका होम
किया, इसी कारण ब्रह्मा 'स्वयम्भू' नामसे विख्यात हुए हैं, इसमें सन्देह
नही । फिर ब्रह्माने 'कहा जाऊँ ? क्या करूं? इसी चिन्तामें आकुल
हो संवत्सर इसी प्रकार वासकर प्रथम सर्वव्यापक परम महत् जलकी
सृष्टि करी ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥
गुणाभिमानं तत्तोयं कारणार्णवमुल्यणम् ।
तत्र स्थित्वाहेमरूपमसृजद्वीर्यसञ्चयम् ॥ २७ ।।
वह जल गुणाभिमान संपन और वह जल ही महोदत कारगार्णव है
उस कारगार्णमें ही ब्रह्माने हेमरूर वीर्यसञ्चय सूजन किया ॥ २७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (१२३)
तवीर्य बुबुदं यावदनीकं जातमन्तिके।
तत्तद्ब्रह्माण्डमाख्यातं प्लवते कारणावे ॥२८॥
वह वीर्य बुख़ुदाकारमें (जलके फेनकी आकृतिमें ) उत्पन्न हुआ वहीं
'ब्रह्माण्ड' नामसे विख्यात होकर कारणार्णवमें प्लवमान (कारण रूप
सागरमें तैरनेवाला) हुआ ॥ २८ ॥
तत्तद्ब्रह्माण्डरक्षार्थ ब्राह्मणानां वियोगनाम ।
करोमि सततं देवि रुद्रमुर्तिधरः स्वयम् ॥ २९ ॥
हे देवि ! मै स्वयं रुद्रमूर्ति धारणपूर्वक ब्रह्माण्डका रक्षण और वियोग
कार्य सदा संपादन करता हूं ॥ २९ ॥
शूलपाणिर्महादेवि प्रतिब्रह्माण्डपावतः।
एकैक्ररुद्ररूपेण तिष्ठामि सततं शिवे ॥ ३० ॥
हे शिवे महादेवि ! मै प्रतिब्रह्माण्डके पार्श्वमें एक एक रुद्रमूर्ति धारण
पूर्वक शूलपाणि होकर सदा वास करता हूँ ॥ ३० ॥
यथा ब्रह्माण्डयोश्चापि संयोगो जायते न हि ॥
तथा करोमि सततं स्थित्वा तत्कारणार्णवे ॥ ३१ ॥
और उस कारणार्णवमें अबस्थान करके जिससे दो ब्रह्माण्डोंका संयोग
न हो सदा वही करता हूं ॥ ३१ ॥
एवमेव वयं सर्वे ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
प्रतिब्रह्माण्डमध्ये तु प्रातिष्ठन्नात्र संशयः ॥ ३२ ॥
ततो ब्रह्मा जगद्धाता प्रतिब्रह्माण्डमध्यतः ।
प्रविश्यकैकरूपेण ह्यन्यतत्वचतुष्टयम् ॥ ३३ ॥
ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर हम सर्व प्रतिबमाण्डमें इसी प्रकार अवस्थान
करते हैं इसमें सन्देह नहीं । फिर जगद्धाता ब्रह्माजी प्रतिब्रह्माडमें प्रवेश-
पूर्वक एक एक रूपमें अन्य चार तत्त्व ॥ ३२ ॥ ३३ ॥

(१२४) योगिनीतन्त्रम् । भूमिमग्निं तथा वायुमाकाशश्च ससर्ज सः। एतैस्तु पञ्चभिस्तत्वः सी सृष्टिमकारयत् ।। ३४ ॥ ततस्तु भगवान्विष्णुः स्वेच्छया ब्रह्मणस्तदा । ब्रह्मदेहात्समुद्भूय पालयामास त्वां सदा ॥ ३५ ॥ अर्थात् भूमि, अग्नि, वायु और आकाश सूजन करते हैं इन पांच तत्त्व अर्थात् पंच परमाणु द्वारा वह समस्त सृष्टिकार्य संपन्न होता है । तदनन्तर भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे ब्रह्मदेहसे उत्पन्न होकर उस सृष्टिका सदा पालन करते हैं ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ सृष्टिब्रह्माज्ञया देवि प्रतिब्रह्माण्डमध्यतः । पृथक पृथक् समास्थाय विष्णुरूपं ममाभुजम् ॥३६॥ प्रतिब्रह्माण्डमध्ये तु संहरामि पुनः पुनः । अहं हि परमेशानि ब्रह्मदेहं समाश्रितः ॥ ३० ॥ हे देवि ! ब्रह्माकी आज्ञासे सृष्टि हुई। मैं प्रति ब्रह्मांड में पृथक पृथक् महाभुज विष्णुरूपसे अवस्थान करके पालन और रुद्र रूपसे वारंवार संहार करता है। हे परमेशानि! में ही ब्रह्मदेहका आश्रय करता हूं ।। ३६ ॥ ३७॥ एवं किञ्चित्र स्मरसि त्वं हि किश्चिन्महेश्वरि । सर्वकार्य ममैवैतज्जानाति हि जगनिधिः ॥ ३८॥ हे महेश्वार ! क्या तुमको कुछभी स्मरण नही है ! हे देवि ! यह सब कार्य मेरे ही जानने चाहिये । मुझमेही जगत् अवस्थित है ॥ ३८ ॥ जलादिसकलं तत्त्वं ब्रह्माण्डादिकविस्तरम् । देवादिसकलं देवि दिग् विदिक्च चराचरम् ।। ३२॥ कार्यन कारणं देवि तथा विष्णोः समुद्भवः। सर्व जानाति हि ब्रह्मा मत्कृतं मायया पुनः ।। १० ।।

है
भापाटीकासमेतम् ।
सब भलादि तत्त्व और ब्रह्माण्डादि समस्त विस्तार संपूर्ण देवादि
दिशा विदिशा एवं चराचर कार्य और कारण, तथा विष्णुकी उत्पत्ति यह
समस्त ही ब्रह्माजीको मेरी मायासे अवगत है ॥ ३९ ॥ ४० ॥
किन्तु सर्व हि मिथ्येव मातुर्माया हि केवलम् ।
तां मायां हि भजन्त यं तत्परं यान्ति ते नरामा४१॥
किन्तु हे देवि ! यह सभी मिथ्या है । केवल शक्तिमाताकी माया
जाने । जो मनुष्य उस मायाको भजता है, यह इस मायाके पार हो
सकता ॥४१॥
उष्टा सा परमा माया मुक्तिमात्र प्रयच्छति ।
रुष्टा सा परमा माया भूमियोगं प्रयच्छति ॥ ४२ ॥
यदि परमा माया सन्तुष्ट हों तो वह निःसंदेह मुक्ति पाता है । यदि वह
माया रुष्ट हो तो भूमियोग अर्थात् योनियोग प्रदान करती हैं ॥४२॥
तस्याः पादाम्बुजे देवि वश्या मुक्तिः समाश्रिता।
यस्य तुष्टा महादेवी मम माता महेश्वरि ॥ ४३ ॥
ददौ तस्य च तां मुक्ति महामाया च शाङ्करि ॥४४॥
उनके चरणकमलोंमें मुक्ति वश्या रहकर उनको आश्रय कर रही है
महामाया मेरी माता महाकाली जिसपर संतुष्ट होती है, उसीको वह
मुक्ति देती है ॥ ४३ ॥ ४ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
श्रुतं हि सकलं देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर।
अश्रुतं परमं तत्त्वं ब्रह्मादीनामगोचरम् ॥ ४५ ॥
इदानी श्रोतुमिच्छामि यत्प्रोक्तं कारणाणवम् ।
किमाघारं महादेव तदाधारश्च किं वद ॥ ४६॥
सीमानं वद देवेश यदि स्नहोपि मां प्रति ॥ ४७ ॥

- (१२६) योगिनीतन्त्रम् । श्रीदेवीने कहा-हे महेश्वर ! मैंने आपके प्रसादसे सब हो सुना अब जो ब्रह्मादिकको भी ज्ञात नहीं, वह सब अश्रुत वृतान्त सुननेकी इच्छा करती हू। आपने जिस कारणार्णवकी कथा कही, वह किसके आधारसे विद्यमान है वह आधार और उसकी सीमाका वर्णन कीजिये । हे देव ! यदि मुझपर स्नेह हो तो वह सब कहकर मेरा कौतूहल चरितार्थ कीजिये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ १७ ॥ ईश्वर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभम् । अतिगोप्यं सुगोप्यं हि ब्रह्मविष्ण्वाद्यगोचरम् ॥ ४८ ॥ ईश्वर बोले हे देवि ! ब्रह्मादिके अगोचर गुरासे भी गुय अतिगोप्य सुगोप्य शुभकर विषय कहता हूं सुनो ॥ १८ ॥ महार्णवो भवेद्देवि महाकालो महेश्वरः ॥ शून्यरूपं हि क्रीडाथै भत्तारं पर्युकल्पयत् ।। ४९ ।। सैव काली जगन्माता महाकालतुला तु सा॥ भूत्वार्द्धतेजसीरूपा महाकालश्च विभ्रति ॥ ५० ॥ देवि ! महार्णवमें महाकाल महेश्वरका स्वरूप उन जगन्माता फालाने क्रीडाके लिये भर्ताकी शून्यरूपमें कल्पना की । उन जगन्मात्तान ही महाकालके समान होकर अर्द्धतेजोरूपसे महाकालको धारण किया है ॥ १९ ॥ ५० ॥ शून्य रूपा कृष्णवर्णा मता स्यादुर्घतेजसी। सीमा पृष्टा त्वया देवि सैव ब्राँव केवलम् ।। ५१ ॥ वही शून्यरूपा, कृष्णवर्ण और ऊतेजसी कही हैं। हे देवि ! तुम सीमा पूछती हो सीमा केवल ब्रह्मको ही जानो ॥ ५१ ॥ तेजोरूपं ब्रह्मतेजः प्रकाशरूपकन्तथा । तत्प्रकाशं महादेवि व्याप्यव्यापकवर्जितम् ॥ ५२ ।।

भापाटीकासमेतम् । (१२७) तेजोरूप, ब्रह्मसेज और प्रकाशस्वरूप वह प्रकाश व्यापक तथा अव्या पकवर्जित है ॥ ५२ ॥ नाधेयश्चैव नाधारमद्वितीयं निरन्तरम् । इदं हि सकलं देवि सर्व मायामयं पुनः ॥ ५३॥ उस प्रकाशका आधेय और आधार नहीं हैं, वह निरन्तर अद्वितीय है, हे देवि ! यह सभी मथामय है ॥ ५३ ॥ मिथ्यैव सकलं देवि सत्यं ब्रह्मैव केवलम् । इदं हि कथितं तुभ्यं सारासारं परात्परम् ।। ५४ ॥ गृह्याद्गुह्यतरं गुह्यं गुह्याद्गुह्यं महेश्वरि । इदं हि परमं ज्ञानं सर्वमायानिकृन्तनम् ॥ ५५ ॥ दे देवि ! सभी मिथ्या है, केवल ब्रह्म ही सत्य है हे महेश्वार ! यह मैंने तुमसे सारसे भी सार, परसे भी पर, गुझसे भी गुहतर सर्व मायानि- कृन्तन परम ज्ञान का विषय कहा ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ सर्वज्ञानमयं भेदं महामार्तण्डविग्रहः । कोटिकोटिमहादानात्कोटिकोटिमहातपात् ॥५६॥ कोटिकोटिमहाज्ञानात्कोटिकोटिमहाव्रतात् । कोटिकोटिमहातीर्थादवगाहेन चेश्वरि ।। ५७ ।। बहुजन्मव्यतीते तु शृणोति यदि कहिंचित् । तदा मुक्तो भवेदेवि संसारे न पुनर्भवेत् ॥ ५८ ॥ महामार्तण्डविग्रह सब ज्ञानमय भेदमात्र अर्थात् देदीप्यमान सूर्य के समान और ज्ञानद्वार जिसका भेद प्रतीत हो हे महेश्वरि ! करोड करोड महा. दानसे करोड करोड महातपसे, करोड करोड महाज्ञानसे करोड करोड महाव्रतसे करोड करोड महातीर्थावगाहनसे भी इस ज्ञानको उत्तम जानना !

(१२८)
योगिनीतन्त्रम् ।
चाहिये । बहुत जन्म बीतनेपर यदि कोई सुने, तो वह मुक्त होता है उसको
फिर संसारमें जन्म लेना नहीं होता ।। ५६ ॥ ५७ ॥ ५८॥
इत्येवं कथितं तुभ्यं गोपयस्व स्वयोनिवत् ।
यथान्यो लभसे नैव तथा कुरु प्रयलतः ॥५९ ।।
यह मैने तुमसे सब वर्णन किया । इसको अपनी योनिकी समान
गुप्त रखे। जिससे इसको कोई दूसरा न ले सके, अत्यन्त यत्नपूर्वक
वही करे ।। ५९ ॥
गोपनीयं मोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
गोपनीय प्रयत्नेन मम सर्वस्वमुत्तमम् ॥ ६० ॥
उसको यत्नपूर्वक गोपनीय, गोपनीय गोपनीय जानना । मेरा यह
उत्तम सर्वस्वधन गोपनीय है ॥ ६० ॥
दद्याच्छान्ताय धीराय योगिने कुलयोगिने ।
ज्ञानिने देवदेवेशि अन्यथा नरकं व्रजेत् ॥ ६१ ॥
शान्त, धीर योगी, कुलयोगी, ज्ञानी, इन सब मनुष्योंको देना चाहिये।
इसके अन्यथा होनेसे नरकमें जाता है ॥ ६१ ॥
कथितं सारभूतं ते खेलत्खञ्जनलोचने ।
ब्रह्मज्ञानं मया देवि किं भूयःश्रोतुमिच्छसि ॥ ६ ॥
हे खेलतखानलोचने ! हे देवि ! हे देवदेवेशि ! मैंने सारभूत ब्रह्म-
ज्ञान तुमसे कहा । अब अधिक और क्या सुनना चाहती हो ॥१२॥
नातः परतरं किञ्चिद्विद्यते मम मानसे।
गोपनीयं सदा भद्रे पशुपामरसन्निधौ ॥ ६३ ।।
इसकी अपेक्षा उत्कृष्टतर अन्य कुछ भी मेरे हृदयमें नहीं है इसको
पशु और पामरसे छिपावे ॥ ६३ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्रे सर्वतन्त्रोचमोत्तमे देवीधरसम्बादे चतुर्विशति.
साहले भाषाटीकायां दशमः परः ॥ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१२९) श्रीदेव्युवाच । देवदानवगन्धर्वतुरेशपरिपूजित ॥ गणेशनंदिचन्द्रेशगोविन्दविधिवन्दित ॥१॥ श्रीदेवीने कहा-हे देवदानवगन्धर्वसुरेशपूजित ! हे गणेशनन्दिचन्द्रेश गोविन्दविधिवंदित ! ॥ १॥ योगीन्द्रवन्दितपद सर्वलोकगुरो हर। या प्रोक्ता परमा विद्या काली कलुपनाशिनी ॥ २॥ यद्यन्मन्त्र साधनं च पूजनं च पुरस्क्रियाम् । मुद्रा बलिं तथा होमं भावं स्थानं तथैव च ॥३॥ ध्यानं स्तोत्रं च कवचं श्रुतमस्याः पुरा मया। इदानीं श्रोतुमिच्छामि स्थानभेदं महेश्वर ॥ ४॥ हे योगोन्द्रवंदितपद, सर्वलोकगुरो, परमेश्वर, शंकर, हर ! आपने जो कलुपनाशिनी परमा कालीविद्या और जो जो मन्त्रसाधन, पूजन, पुरस्क्रिया मुद्रा, बलि, होम और भाव एवं स्थान ध्यान स्तोत्र और कवच इत्यादि कहा, वह मेंने सब सुना । अब हे महेश्वर ! मैं स्थानभेद सुननेकी इच्छा करती हू || २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ कुत्र वा प्राप्यते मोक्षः कुत्र वा सिद्धिरुत्तमा। झटित्येवं महादेव कृपया वद शङ्कर ॥५॥ कहा मुक्ति प्राप्त हो जाती है, कहा तत्काल उतमा सिद्धि लाभ होती है. हे महादेव शंकर ! यह आप मा पूर्वक कहिये ॥ ५ ॥ यदाश्रितो द्रुतं लोकःस्वकार्यफलमाग्भवेत् । प्रयासस्य च बाहुल्यं हित्वा हि परमेश्वर ॥ ६॥ हे परमेश्वर ! मनुष्य अत्यन्त परिश्रमके विना ही जिसका आश्रय करके शीघ्र स्वकार्यका फल भोगें. वह वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥ or

योगिनीतन्त्रम्।
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि स्थान परमदुर्लभम् ।
द्रुतसिद्धिकरं देवि महामोक्षफलप्रदम् ॥ ७ ॥
ईश्वरने कहा-हे देवि ! शीघ्रसिद्धिकर, महामोक्षफलप्रद, परम दुर्लभ
थानका वर्णन करता हूं सुनो ॥ ७ ॥
कालिकायाः श्मशानाद्धि नान्यत्स्थान प्रशस्यते ।
तत्र यद्यत्कृतं कर्म तदनन्तफलं लभेत् ।। ८॥
कालिकाका श्मशानसे श्रेष्ठ दूसरा कोई स्थान नहीं है, वहां जो जो
कर्म किया जाता है वह अनन्त फल देनेवाला होता है ॥ ८ ॥
तत्र चैका पुरश्चर्या कृता चेत्परमेश्वरि ।
न तु मैवं महादेवि भावयुक्तः सशक्तिकः ॥ ९ ॥
अवश्यं मन्त्रसिद्धिः स्थानात्र चित्रं कथंचन ।
अनन्तफलदा पूजा सर्वत्रैव जले स्थले॥१०॥
हे परमेश्वार ! हे महादेवि ! वहा भावयुक्त और भक्तियुक्त होकर
पुरश्चरण करने पर उसके समान अन्य कार्य नही है उसके द्वारा अव-
श्यही मन्त्रसिद्धि होती है, इसमें कुछ सन्देह नहीं । जलमें व स्थलमें
सवत्र ही ॥ ९ ॥ १० ॥
दिव्यभावेन वा देवि वीरभावेन चद्भवेत् ।
शाक्तं वा वैष्णवं वापि शैवं वान्यं तथा पुनः॥ ११॥
वाराणस्यां जपेद्यावन्मासमात्रं वरानने ।
प्रातः कालं समारभ्य यावमध्यन्दिनं भवेत ॥ १२॥
अवश्यं मन्त्रसिद्धिः स्यात्सत्यमेव सुसिद्धिदे ।
निर्वाणं तस्य देवेशि त्ववश्यं जायतें शिवे ॥ १३ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (१३१) दिव्यभाव वा वीरभावसे पूजा करनेपर अनन्त फलप्रदान करती है । हे सुसिद्धिप्रदे शंकार ! शाक्त हों वा वैष्णव हों, वाराणसीमें प्रातः समयसे आरम्भ करके मध्य दिनपर्यन्त केवल एक महीने जप करनेपर अवश्य ही मन्त्रसिद्धि होती है वह निःसन्देह सत्य जानना । हे देवेशि शिवे ! उसको अवश्य ही निर्वाणमुक्ति होती है ॥ ११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ महाश्मशानं देवेशि आनन्दकाननं तथा । अविमुक्तं महादेवि तथा गौरीमुखं पुनः ॥ १४ ॥ हे अमरेश्वारे ! महादेवी ! महाश्मशान, आनन्द कानन, अविमुक्त और गौरीकानन ॥ १४ ॥ वाराणसी महाक्षेत्रं कालीरूपं परात्परम् । तत्र यद्यत्कृतं देवि किं तस्य कथयामि ते ॥ १५ ॥ तथा वाराणसी, यह परात्पर कालीरूप महाक्षेत्र है, वहा जो जो कर्म किया जाता है उसका फल प्रकाश करनेकी मुझमें सामर्थ्य नही है ॥ १५ ॥ कामरूपे महापूजा सर्वसिद्धिफलप्रदा। नेपालस्य कांचनाद्रि ब्रह्मपुत्रस्य सङ्गमम् ॥ १६ ॥ कामरूपमें महापूजा करनेसे सर्वप्रकारकी सिद्धि और सर्वफल प्राप्त होता है । नेपालका काचनगिरि, ब्रह्मपुत्र संगम ॥ १६ ॥ करतोयो समाश्रित्य यावदिक्करवासिनी। उत्तरस्या कञ्जगिरिः करतोयात्तु पश्चिमे ।। १७ ।। करतोयासे दिक्करवासिनीपर्यन्त और उत्तरमें कसगिरि और तीर्थोष्ठ करतोयाके पश्चिममें ।। १७ ॥

(१३२) योगिनीतन्त्रम् ।
तीर्थ श्रेष्ठा दिक्षु नदी पूर्वस्यां गिरिकन्यके ।
दक्षिणे ब्रह्मपुत्रस्य लाक्षायाः सङ्गमावधि ।
कामरूप इति ख्यातः सर्वशास्त्रेपु निश्चितः ॥ १८ ॥
इक्षुनदीपर्यन्त, पूर्वदिशामें गिरिकन्यकापर्यन्त और दक्षिणमें ब्रह्मपुत्र
और लाक्षा नदीके संगमपर्यन्त स्थान कामरूपके नामसे सब शास्त्रों में
निश्चित हैं ॥ १८॥
ऋणानि त्रीण्यपाकर्तु यस्य चित्तं प्रसीदति ।
स गच्छेत्परया भक्त्या कामाख्यायोनिसन्निधिम्॥१९
पितृऋण, ऋषिऋण और देवऋण यह तीनों ऋण चुकानेमें जिसका
मन प्रसन्न होता है, वह परम भक्तिसहित कामाख्याकी योनिके समीप
गमन करेगा ॥ १९ ॥
। तीर्थयात्रा समासाद्य यदेकोऽप्यत्र गच्छति ॥
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ २० ।।
तीर्थयात्रा अवलम्बन करके जो कोई मनुष्य इस तीर्थमें गमन करता है,
द पदमें उसको अश्वमेधका फल प्राप्त होता है ॥ २० ॥
त्रिंशद्योजनविरतीर्ण दीर्घेण शतयोजनम् ।।
कामरूपं विजानीहि त्रिकोणाकारमुत्तमम् ॥ २१ ॥
हे देवि ! इस उत्तम कामरूपको त्रिकोणाकार देय॑में सौ योजन और
स्तारमें तीस योजन जाने ॥ २१ ॥
ईशाने चैव केदारो वायव्यां गजशासनः।
दक्षिणे सङ्गमें देवि लाक्षाया ब्रह्मरेतसः॥ १२ ॥
ईशानमें केदार, वायुकोणमें गजशासन और दक्षिण में ब्रह्मरेतः अर्थात्
झपुत्रकी राक्षा नदीका संगम है ॥ २२ ॥

भापाटीकासमेतम् । त्रिकोणमेवं जानीहि सुरासुरनमस्कृतम् । तब ये मानवाः सन्ति ते देवा नात्र संशयः ॥ २३ ॥ कामरूपको इस प्रकार त्रिकोण नानना चाहिये, यह स्थान सुरासुर सभीका नमस्कृत है, वहा जो मनुष्य हैं वह देवता हैं इसमें सन्देह नहीं२३॥ तत्र यद्यजलं देवि तत्सर्वं तीर्थमेव हि । उपवीथिश्च वीथिश्च उपपीटंच पीठकम् ॥ २४ ॥ वहा जो जो जल हैं, वह सभी तीर्थ हैं, हे महादेवि ! यहा उपवीथि, वीथि, उपपीठ, पीठ ॥ २४ ॥ सिद्धपीठ महापीठं ब्रह्मपीठं तदन्तरम् । विष्णुपीठं महादेवि रुद्रपीठं तदन्तरम् ॥ २५ ॥ नवयोतिरिति ख्याता चतुर्दिक्षु समन्ततः । तत्र तत्र महापूजोत्तरोत्तरफलाधिका ॥२६॥ सिद्धपीठ, महापीठ, ब्रह्मपीठ, विष्णुपीठ और रुद्रपीठ, यह नव पीठ नव योनि कहकर विख्यात है और इसके चारों और अवस्थित हैं। हे महादेवि ! वह वह महापूजा उत्तरोतर सय स्थानोंमें अधिक अधिक फल देती है ॥ २५ ॥ २६ ॥ द्विगुण द्विगुणं भद्रे फलमेव सुनिश्चितम् । सर्वासाश्चैव विद्यानां सर्वमन्त्रस्य शाम्भवि ॥ २७ ॥ पूजने जपने चैव दिगुणं द्विगुणं फलम् । नवयोनिः समाख्याता कामाख्यायोनिमण्डलम् २८॥ इन सबमें क्रमानुसार दूना दूना फल अवधारित (निश्चय किया हुआ) है । वहा सर्वविध विद्या और सर्वविध मन्त्रको पूजा एवं जप करनेसे दूना -

योगिनीतन्त्रम् ।
दूना फल प्राप्त होता है । हे भरे ! हे शाम्भवि ! कामाया योनिमण्डल
नवयोनि द्वारा विख्यात होता है ॥ २७ ॥ २८ ॥
आयोनिमहिपर्यन्तं या विद्यागन्धमादनम् ।
पञ्चकोशमिदं देवि सर्वेषामेव दुर्लभम् ॥ २९॥
योनिसे महिपर्यन्त और विद्यासे गन्धमादनपर्यन्न यह पाच कोश स्थान
सबको ही दुर्लभ है ॥ २९ ॥
ब्रह्मविष्णुपुरेशाद्यैः सेवितं परमाद्भुतम् ।
देवा मरणमिच्छन्ति का कथा मानुषेषु च ॥ ३० ॥
परम अद्भुत और ब्रह्मा, विष्णु सुरेश्वरादिसे सेवित है, मनुष्यों की बात
तो क्या कहूं देवता भी उस स्थानमें मरनेकी इच्छा करते हैं ॥ ३० ॥
योनिपीठे महेशानि पञ्चकोशमिते शिवे।
ये गच्छन्ति शिवाकारा ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ॥३॥
हे महेशानि ! पाचकोशपरिमित योनिपीठमें जो मनुष्य गमन
रता है, वह शिवतुल्य होता है और मरनेके पीछे फिर जन्म लेना
ही पडता ॥ ३१ ॥
ते च सूर्याकरं क्लेशं न प्राप्तुवन्ति कहिचित् ।
योनिपीठे च निष्पापाये वसन्ति नरोत्तमाः।
ते सर्वे शङ्करा जानास्त्रिनेत्राश्चन्द्रमूर्द्ध जाः ॥ ३२ ॥
वह मनुष्य किश्चित् मात्र भी सूर्यान्मज शनिके क्लेशको प्राप्त नहीं
होता। जो नरोत्तम योनिपीठमें वास करते हैं, वह चन्द्रशेखर और
त्रिनेत्र शंकर तुल्य होते हैं ॥ ३२ ॥
सर्वासाश्चैव विद्यानां सर्वमन्त्रस्य चेश्वरि ।
पूजन जपनश्चेव कुरुते साधकोत्तमः ।
अणिमाद्यष्टसिद्धीनामाश्रयो जायते नरः ॥ ३३ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (१३५)
हे ईश्वरि ! साधकोत्तमगण सर्वविध विद्या एवं सर्वविध मन्त्रकी पूजा
और जप करते हैं। मनुष्यगण इस स्थानमें अणिमादिक आठ प्रकारको
सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥ ३३ ॥
नामध्ये च महादेवि गिरिर्नीलाभिधोज्ज्वलः ।
ब्रह्मविष्णुशिवाकारः सर्वशक्तिमयः पुनः ।। ३४॥
हे महादेवि ! उस योनिपीठमें ब्रह्मा विष्णु शिवाकार सर्वशक्तिमय
नीलनाम उज्वलगिरि विद्यमान है ॥ ३४ ॥
तन्मध्ये परमेशानि मनोभवगुहा परा।
मनोभवगुहामध्ये रक्तपानीयरूपिणी ॥ ३५ ॥
हे परमेशानि ! तिसमें परमोत्तम मनोभवगुहा है । मनोभवगुहामें रक्त
पानीयरूपिणी ॥ ३५ ॥
कोटिलिङ्गसभाकीर्णा कामाख्या कल्पवल्लरी।
तत्तेजसा तु संदीप्ता मनोमवगुहा सदा ॥ ३६॥
कोटिलिग समाकीर्ण कामाख्या नामक कल्पलता विद्यमान है, यह
मनोभवगुहा उसके तेजसे सदा दीप्तिमान रहती है ॥ ३६ ॥
अस्याः स्पर्शनमात्रेण लोहो याति सुवर्णताम् ।
चतुर्हस्तप्रमाणानि समन्तात्पर्वतात्मजे ॥ ३७ ॥
अस्याः स्पर्शनमात्रेण शिवत्वमेति मानवः ।
निष्पापो जायते देवि तत्क्षणानात्र संशयः ।। ३८ ॥
उसके स्पर्शमात्रसे ही लोहा सुवर्ण होता है, हे पर्वतात्मने । वह
चारों ओर में चार हाथ परिमित होगा उसके स्पर्श मात्रसे ही मनुष्य
शिवत्वको प्राप्त होता है और तत्काल निष्पाप होता है इसमें सन्देह
नही ॥ ३७ ।। ३८ ॥
अत्र यद्यत्कृतं कर्म तदनन्तफलं लभेत् ॥ ३९ ॥

। -- (१३६) योगिनीतन्त्रम् । इसमें जो जो कर्म किये जाते हैं। यह सभी अनन्त फलदायक होते हैं ॥ ३९ ॥ तन्मध्ये परमेशानि समन्तावादशांगुलम् । आपातालाद्धदं देवि प्रोच्छल जलमण्डलम् ॥ ४०॥ है परमेशानि देवि ! उसमें चारों ओर द्वादशांगुलपरिमित पाताल पर्यन्त विस्तृत प्रोच्छलित ( उमडते हुए) जल मण्डल हूद (तालाव) विद्यमान है ॥ ४० ॥ तज्जलं परमेशानि ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । ईश्वरं तजलं देवि कारणार्णवसंज्ञकम् ॥ ४१ ॥ हे परमेशानि ! वह नल ब्रह्म, विष्णु, शिवात्मक है । हे देवि ! वह जल ऐश्वरीय और कारणार्णवके नामसे विख्यात है ॥ ४१ ॥ बहु किं कथ्यते देवि तजलं परमामृतम् । शङ्कितेनैव कथितं मानर्जानीहि सुन्दरि ॥ ४२ ॥ हे देवि ! बहुत कहनेसे क्या है, वही जल परमामृत है । सुन्दार ! मैंने यह शंकित होकर ही कहा है तुम जानो ॥ १२ ॥ कांक्षति सततं देवि तजलं सचराचरम् । तज्जलस्पर्शमात्रेण तद्धदस्पर्शनेन च ।। ४३ ॥ तत्क्षणान्मानबो देवि देवो भवति निश्चितम् । पुण्यपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो मवेद्धवम् ॥ १४ ॥ सचराचर अखिल ब्रह्माण्डमंडल्ल उस जलकी आकाक्षा करता है, उस जल और उस हदके स्पर्श करते ही मनुष्य देवता होता है और पाप पुण्यसे छूटकर जीवन्मुक्त होता है, इसमें संदेह नही ॥४३॥४४॥ तद्धदे पूजपेद्यो हितजलेन महेश्वरि ।

भाषारीकासमेतम् । (१३७) जिह्वाकोटिसहस्रेस्तु वक्त्रकोटिशतैरपि ॥ ४५ ॥ वर्णितुं नैव शक्नोमि तत्फलं गिरिनन्दिनि । इदे हस्तं विनिक्षिप्य जलमध्ये महेश्वरि ।। ४६ ॥ अष्टोत्तरशतजपान्महासिद्धीश्वरो भुवि । मन्त्रसिद्धिर्भवत्तस्य तरक्षणानात्र संशयः ॥ ४७ ॥ हे पर्वतनंदिनी ! जो मनुष्य उस हूदकी उसीके जलसे पूजा करता है, उसका जितना फल है, वह मैं करोड हजार जीभ और सौ करोढ मुख प्राप्त होनेपर भी वर्णन करने में समर्थ नहीं हो सकता । हे महेश्वार ! उस हदके जलमें हाथ डालकर एक सौ आठवार जप करनेपर वह मनुष्य पृथ्वीतलमें महासिद्धीश्वर होता है और तत्काल उसके मन्त्रकी सिद्धि होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ १७ ॥ शवो वा वैष्णवो वापि शाक्तो नान्यो महेश्वरि । जप्यते येस्तु मन्त्रो हि तत्क्षणं सिद्धिमृच्छति । अष्टोत्तरशतेनापि नात्र कार्या विचारणा ॥ ४८ ॥ हे देवेशि ! शाक्त वैष्णव व शैव ही क्यों न हो, अथवा अन्य जो कोई हो, वहां जो एक सौ आठवार मन्त्र जपता है, तो तत्काल उसकी मन्त्रसिद्धि होती है इसमें सन्देह नही ॥ ४८ ॥ कुशाम्रोत्थितं तद्देवि पितृभ्यो यः प्रयच्छति । गयाश्राद्धं कृतं तेन नियुताब्दं महेश्वरि ।। ४९ ॥ जो मनुष्य वहां कुशाग्र द्वारा यह जल पितरोंको प्रदान करता है उसके द्वारा ही उसको नियुतान्दव्यापी अर्थात् लक्ष वर्ष पर्यन्त गयाश्राद्ध करनेका फल होता है ॥ ४९॥ एत्तते कथितं देवि कामाख्यायोनिमण्डलम् । संक्षेपेण महेशानि वक्ष्याम्येवं विशेषतः ॥ ५० ॥ " (१३८) योगिनीतन्त्रम् । हे देवि । यह मैने तुमसे कामाख्या योनिमण्डल कहा । हे महेशानि ! अब संक्षेपसे उसका माहात्भ्य कहता हूं ॥ ५० ॥ किन्त्वस्य कथ्यते देवि माहात्म्य च यशस्विनि । तत्र कोटियोगिनीभिः काली वसति तारिणी ॥५१॥ हे परमैश्वर्यसम्पन्न देवी : अब हम उसके माहात्म्यका वर्णन करते हैं तुम श्रवण करो। वहां करोड करोड योनियोंके सहित जगत्तारिणी कालिका वास करती है ॥ ५१ ॥ छिन्नमस्ता भैरवी सा सप्त सात विभेदिता । धूमा च भुवनेशानी मातङ्गी कमलालया॥५२ ॥ भगक्लिन्ना भगधारा तथा चैव भगन्दरी। दुर्गा च जयदुर्गा च तथा महिषमर्दिनी ॥ ५३ ॥ सप्त सप्त विभेदमें छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती भुवनेश्वरी, मातंगी कमलालया, भगक्लिन्ना, भगधारा, भगन्दरी, दुर्गा, जयदुर्गा, महिष- मर्दिनी ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ उपविद्याश्रयाः प्रोक्ताः सर्वाभिस्ताभिरेव च । ब्रह्मविष्णुमहेशादौ महाकाली वसेत्सदा ॥ ५४ ॥ और जो सब उपविद्या हैं, उन सबके सहित एवं ब्रह्मा, विष्णु और महे- शादि देवताओंके सहित महाकाली निरन्तर वहां वास करती है || ५४ ॥ ब्रह्ममुखाश्रयं पीठमुग्रताराधिदेवतम । तत्पीठं द्विविध प्रोक्तं गुप्तं व्यक्त महेश्वरि ।। ५५ ।। हे देवी! उग्रतारा जिसकी अधिदेवता है. वहा ब्रह्ममुखाश्रयपीठ विद्य. मान है वह पीठ दो प्रकार कहा गया है गुप्त और व्यक्त ॥ ५५ ॥ - भापाटीकासमेतम् । (१३९) व्यक्ताद्गुप्तं पुण्यतरं दुरापं साधकोत्तमः। सर्वत्र लभ्यते देवि कुलद्वयविशारदेः ॥ ५६ ।। व्यक्तकी अपेक्षा गुप्तपीठ साधकको अधिकतर पुण्य प्रदान करती है यह गुप्तपीठ दुर्लभ है किन्तु दोनों कुलविशारद अर्थात् विद्यावीरभावापन्न मनुष्यगण सर्वत्र ही उसको लाभ कर सकते हैं ॥ ५६ ॥ मनोभवगुहावहौ देवीशिखरमुन्नतम् । तन्महोप्रमिति ख्यातं पीठं परमदुर्लभम् ।। ५७ ॥ मनोभवगुहाकी अग्निमें देवीका शिखर उन्नत (ऊंचा ) रहता है वह पीठ महोग्रनामसे विख्यात और परमदुर्लभ है ॥ ५७ ॥ सिद्धिकाली ब्रह्मरूपा देवता भुवनेश्वरी। निवसेत्तत्र या काली घोरदत्यविनाशिनी ।। ५८ ॥ उस पीठमें घोर दैत्य विनाशिनी, ब्रह्मरूपा भुवनेश्वरी देवता सिद्धि- काली वास करती है ॥ ५८ ॥ तत्पीठोपरि संविश्य दशधा च जपेन्मतुम् । तदा मन्त्रविशुद्धिः स्थासदेहेन शिवो भवेत् ॥ ५९ ॥ उस पीठके ऊपर बैठ दशवार जप करनेपर उसके मन्त्रकी सिद्धि होती है और उस देहके अन्तमें शिवतुल्य होता है ।। ५९ ॥ यत्फलं ते मया प्रोक्तं वदमध्ये सुलोचने । पादही तत्फलं स्यात्पूर्ण शिवजपार्चने । ६० ।। हे सुलोचने ! मैंने तुमसे हृदमें जिस फलका होना कहा है यह फल पादहीन होता हे और शिपके जप तथा अर्चनासे संपूर्ण होता हे ॥६०॥ अर्ध जालन्धरे ज्ञेयमुड्डीयाने तदर्द्धकम् । अवश्यं मन्त्रसिद्धिः स्यानपाले तिथिवासरे।। ६१॥

(१४०) योगिनीतन्त्रम्। नीलकण्ठसमीपे तु नान कार्या विचारणा। जपेन देवदेवेशि कथितं ते मया मुदा ॥ ६२ ॥ हे देवि ! जालघरमें उससे आधा फल और उड्डीयानमें उससे आधा जाने, नेपालमें नीलकंठके समीप तिथिवामरमें मन्त्र जपनेसे मन्त्र सिद्धि होती है इसमें सन्दह नहीं इस प्रकार जप करनेसे सिद्धि होती हे सो मेने तुम्हारे प्रति वर्णन करके सुनाई ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ त्रयोदशाहे महासिद्धिरकासकानने तथा। दशलक्षेण गङ्गायां सिदिरावश्यक शिवे ॥ ६३ ।। हे देवी देवेभरि । एकाम्रकाननमें तेरह दिन जा करनेसे महासिद्धि प्राप्त होनी हे । हे शिने । गंगाम दशलाख जप करनेसे अवश्य ही सिद्धि लाम करता हे ॥ ६३ ॥ रादायां विकटाक्षायां द्रुतश्च पर्वतात्मजे । लक्षत्रयेण सिद्धिः स्यात्सत्यमेव मुसिद्धिदे ॥ १४ ॥ हे पर्वतात्मने । हे सुसिद्धिदे ! राढा और विकटाक्षामें तीन लाख | जपसे तत्क्षण सिद्ध होता है, इसमें सन्देह नही ॥ ६४ ॥ पुष्कराज्ये च लक्षण प्रयागे विशलक्षलः। कोटिजपावोणगिरी ज्वालायाञ्च द्विलक्षतः ॥ ६५ ॥ पुष्करमें लक्ष जपसे ओर प्रयागमे वीस लाख जपसे, द्रोणगिरीमें करोड जपसे, ज्वालामुखी दोलाख जपसे ॥६५॥ तथैव विरजे क्षेत्र लक्षद्वादशतः शिवे । हिमालये त्रिलक्षेण केदारे पश्चलक्षतः ॥ ६६ ॥ कैलासे दशलक्षेण जयन्त्यां पञ्चलक्षतः। उज्जयिन्या दशाहेन मासेन मन्दराचले ॥ ६७ ।। अवश्यं मन्त्रसिद्धिः स्थाजपनात्पूजनाच्छिवे ।। ६८॥

भापाटीकासमेतम।
विरज क्षेत्रमें बारह लाख जपसे हिमालयमें तीन लाख जपसे केदारमें
पांच लाख जपसे कैलासमें दशलाख जपसे जयन्तीमें पांचलाख जपसे
उज्जयनीमें दशाह ( दश दिनपर्यन्त ) जपसे मन्दराचलमें मासमात्र जपसे
और पूजासे अवश्यही सिद्धिलाभ होता है ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥
इत्येवं कथितं तुभ्यं यत्पृष्टं गिरिसम्भवे ।
मातृजारसमं देवि सर्वदा परिगोपयेत् ॥ ६९ ॥
हे शिवे ! यह मैंने तुम्हारे पूछनेके विषयका उत्तर दिया । यह
मातृजारके समान सदा गुप्त रखने योग्य है ॥ ६९ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्ने सर्वतन्त्रोत्तमोतमे देवीश्वरसम्बादे चतु
विशति साहले भापाटीकायामेकादश पटल ॥ ११ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
भोः स्वामिन्परमानन्द योगिनामभयप्रद ।
कामाख्यायोनिमाहात्म्यं यदुक्तं मे त्वया शिव ॥१॥
श्रीदेवीजीने कहा-भो स्वामिन् ! जो परमानन्दविग्रह ! योगीयोंका
अभयदेनेवाले शिव ! आपने जो कामाख्यादेवीकी योनीका माहात्म्य
वर्णन किया ॥ १॥
सत्यं सत्यं न सन्देहो ह्याश्चर्य सर्वमेव हि ।
तत्वेन तन्मया ज्ञातं कलौं किं न सुसिद्धिदम् ॥२॥
वह सत्य और परमाश्चर्ययुक्त है, उसका तत्त्व वास्तवमें मुझे
अवगत होगया । हे करुणामय ! कलियुगमें किस कारण वह सिद्धि
दायक नहीं होता ॥ २॥
न पश्याम शिवज्ञानं मन्त्रसिद्धिस्तथैव च ।
किमेतत्कारणं नाथ वद मे करुणामय ॥ ३ ॥

(१४२)
योगिनीतन्त्रम।
एक कालमें शिवज्ञान और मत्रसिद्धि यह दोनों क्यों दिखाई नहीं दे
सकते ? हे नाथ ! इसका कारण वर्णन करके मुझको कृतार्थ कीजिये ॥३॥
ईश्वर उवाच ।
नरकासुरनामा तु विष्णुवीर्यसमुद्भवः ।
पृथिवीगर्भसम्भूतो दानवानामधीश्वरः॥४॥
तस्मै विष्णर्ददौ राज्यं कामरूपं महाफलम् ।
पृथिवीवचनात्सोऽपि दानवो युद्धदुर्द्धरः ॥५॥
ईश्वरने कहा-हे देवि ! पृथ्वीके गर्मसे उत्पन्न विष्णुवीर्यप्रादुर्भूत नरका-
सुर नामक एक दानव था, विष्णुने उसको महाफल युक्त कामरूप राज्य
प्रदान किया । पृथ्वीके वचनसे युद्धदुर्द्धर वह दानव ॥ ४ ॥ ५ ॥
किरातर्घटितं जित्वा रणे कामनपोऽभवत् ।
पुनश्च भगवास्तस्मै निवासाय ददौ मुदा ।। ६॥
किरातके युद्ध में जय लाभ करके नृपतिश्रेष्ठ हुआ था. फिर भगवान्
विष्णुने प्रसन्न होकर उसको वास करने के निमित्त ॥ ६ ॥
प्राग्ज्योतिषपुरं ख्यातं कामाख्यायोनिमण्डलम् ।
राज्ञे प्राप्ताभिषेकाय विष्णुः शक्तिं ददावपि ॥ ७ ॥
प्रज्योतिषपुर नामसे विख्यात कामाख्यायोनिमण्डल प्रदान किया ।
उसमें अभिषिक्त हो जानेपर विष्णुने उस राजाकी शक्ति दी ॥ ७ ॥
ततस्तु दर्शयामास मनोभवगुहां हरिः॥
सुस्नातं नरकं तद्वद्विधेयामास वै तदा ॥ ८ ॥
अनन्तर हरिने उसको मनोभवगुहा दिखाई, नरकासुर उसमें स्नान
करके पापरहित हुआ ॥ ८॥

भापाटीकासमेतम् । (१४३)
विष्णुरुवाच ।
कामाख्यायाश्च माहात्म्यं सर्ववेदार्थसम्मतम् ।
ब्रह्मत्वं ब्रह्मणा प्राप्तं विष्णुत्वं च मया पुनः ॥९॥
शिवत्वं च शिवेनैव कामाख्यायाः प्रसादतः।
पूजनीया योनिरियं यत्नात्सर्वात्मभिस्त्वमुम् ॥१०॥
विष्णुने कहा-कामाख्याका माहात्म्य सर्ववेदार्थसम्मत है । कामा-
त्याके प्रसादसे ब्रह्मा ब्रह्मत्व विष्णु विष्णुत्व और शिव शिवत्वको प्राप्त हुए
हैं, अतएव सार्वत्मामें सर्व प्रयत्नसे योनिपूजा करनी चाहिये ॥९॥१०॥
यदा ते सुमुखी माता तदा ते सर्वसम्पदः।
यदा ते विमुखी माता तदा ते न शुभं ध्रुवम् ॥११॥
जन कामाख्या माता तुम्हारे प्रति प्रसन्न होकर सुमुखी हों, तब
तुमको संपत्तिलाभ और जब वह विमुखी हों तब अपना अमंगल जानना
इसमें सन्देह नहीं ॥ ११ ॥
तदेवाहं च त्यक्ष्यामि पुत्रत्वं वेद्यहं पुनः ।।
इति ज्ञात्वा पूजयस्व विशेषेण वदामि किम् ॥ १२ ।।
तब मे भी त्याग करूंगा । मै समस्त ही पुत्रभावको अवगत हूं, यह
जानकर उनकी पूजा कर अधिक और क्या कहूं ॥ १२ ॥
ईश्वर उवाच ।
इत्युक्त्वा स ययौ विष्णुवैकुण्ठं स्वं निकेतनम् ।
नरकापालयामास विष्णूक्तं यद्यदेव हि ॥ १३ ।।
ईश्वर बोले-वह विष्णुदेव यह कहकर अपने स्थान थैकुण्ठपुरमें चले
गये विष्णुने जिस प्रकार आज्ञा दी नरकासुर वह सब प्रतिपालन करने
लगा ॥ १३॥

(१२४)
योगिनीतन्त्रम् ।
एतस्मिन्नन्तरे देवि वृत्तान्तं शृणु दारुणम् ॥ १४ ॥
हे देवि ! इसी समयमें एक दारुण दुर्घटना उपस्थित हुई वह सुनो १४॥
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽतीव सद्यतिः।
तारामाराधयामास तदा नीलाचले मुनिः ॥ १५ ॥
ब्रह्माके मानसपुत्र वसिष्ठजी अतिशय यतो है, वह मुनि उस नीला-
चलके ऊपर ताराकी आराधना करने के लिये आये ॥ १५ ॥
तत्रैवैकदिने देवि यजितुं स सुरेश्वरीम् ।
कामाख्यामण्डले तारां पुरद्वार समागतः।
तत्र तं वारयामास नरको ब्रह्मसम्भवम् ॥ १६॥
हे देवि ! एक दिन वही मुनि उस कामाख्या मण्डलमें सुरेश्वरी ताराकी
पूजा करने के निमित्त पुरद्वार में उपस्थित हुए, वहां नरकासुरने उन ब्रह्म
संभव मुनिवरको निवारण किया, अर्थात् रोका ॥ १६ ॥
नरक उवाच ।
इदानी तिष्ठ विप्र त्वं नायाहि मण्डलान्तरे ।
एषा हि पूज्यते देवी पूजान्ते त्वं गमिष्यसि १७ ।।
नरकने कहा-हे विप्र ! तुम इसी स्थानमें ठहरो,, मण्डलके भीतर मत
आना, यह देखो. हम देवीकी पूजा करते हैं पूजाके पीछे तुम आना॥१७॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य नरकस्य मुनीश्वरः।
द्वादशादित्यलङ्काशो बभूव क्रोधभूछितः।
उवाच नरकं विप्रो वसिष्ठस्ताम्रलोचनः ॥ १८ ॥
मुनीश्वर नरकके इस प्रकार वचन सुनकर क्रोधसे बारह सूर्यके
समान जाज्वल्यमान हुए। और लाल नेत्र करके नरकासुरसे कहने
लगे।॥ १८ ॥

भाषाटीकासमेतम् । वसिष्ठ उवाच । रे पापिष्ठ किमुक्तन्ते ह्ययोग्योऽहं सुदुर्मते । कामाख्यापूजने काले मालभम गृहान्तरे ॥ १९ ॥ वसिष्ठजी बोले-रे पापिष्ठ ! तैने क्या कहा ? रे दुर्मते ! मैं अयोग्य हूं, कामाख्याके पूजनको मै यथासमय गृहान्तरमें नहीं जा सकता ॥१९॥ गन्तुं योन्यन्तरे मूढ भूत्वापि ब्रह्मसम्भवः । इदानीं पश्य वीर्य मे तव नाशकरं महत् ।। २० ।। इत्युक्त्वा च वसिष्ठोऽसौ जमाह पाणिना जलम् । कमण्डलोमहादेवी शशाप दारुणं मुनिः ।।२१।। रे मूढ ! मै ब्रह्मनन्दन ऋपि होकर अन्ययोनिमें पूनाके लिये नहीं जा सकता। अब तू मेरा वीर्य देख । यह महत् वीर्य अवश्य ही तेरा विनाश साधन करेगा। यह कहकर महर्षि वसिष्ठजीने कमण्डलसे कर द्वारा जल ग्रहण करके महादेवीको दारुण शाप दिया ॥ २० ॥ २१ ॥ विसिष्ठ उवाज । अहश्च ब्राह्मणो मातः कामाख्यो ब्रह्मसम्भवः । हित्वा त्वां हि व्रजाम्यद्यान्यथाचेस्क्रियते त्वया । ब्रह्मवधोद्भवं पापं सत्यं तेऽद्य भविष्यति ॥ २२ ॥ एवमत्र महापीठे जपनात्पूजनादपि । सिद्धिर्न जायते कहि काले मद्वचनात्पुनः ॥ २३ ॥ वसिष्ठने कहा-हे मतः कामाख्ये ! मै ब्राह्मण और ब्रह्माका पुत्र हूं, मै, तुमको त्याग कर जाता हूं, तुमने मेरी पूजाका अन्यथा (परित्याग) किया, अत एव अव तुमको ब्रह्मवधका पाप होगा और मेरे वचनसे इस (१४६) योगिनीतन्त्रम् । महापीठमें जप और पूजा करनेपर किसी समय भी वह सिद्धि नहीं होगी |॥ २२ ॥ २३ ॥ ईश्वर उवाच । दत्त्वेम दारुणं शापं त्यक्त्वा तज्जलमुत्तमम् । नीलाचलं परित्यज्य गतोऽसौ खाण्डवं गिरिम् ॥२४॥ ईश्वरने कहा-वह मुनि यह दारुण शाप दे, उस पुण्यालको छोड खाण्डव गिरिमें चले गये ॥ २४ ॥ ततः सा परमा विद्या कामाख्या विश्ववन्दिता। महाज्योतिर्मयी देवी सर्वप्रकाशरूपिणी ॥ २५ ॥ ताप्यत्यऽहनिशं देवि सर्व हि स्वाङ्गतेजसा॥ तत्क्षणात्परिसंदह्य गता कैलासमन्दिरम् ॥ २६॥ तदनन्तर वह विश्ववंदिता, महाज्योतिर्मयी, सर्वप्रकाशरूपिणी परमा विद्या कामाख्या अपने अंगके तेजसे निरन्तर प्रदीप्त हुई और तत्काल उस तेजसे दग्ध होकर कैलास मंदिरमें गई ॥ २५ ॥ २६ ॥ तदेव परमेशानि मनोभवगुहा पुनः । महान्धकारपटलेरावृता तद्वियोगतः॥ २७ ॥ हे परमेशानि देवि ! उनके वियोगसे वह मनोभवगुहा अन्धकार मण्ड- लसे ढक गई ।। २७ ॥ हाहाकारं सर्वलोके मूच्छितो दानवेश्वरः ।। ततस्तां परमां मायां विषण्णवदनां पुनः ॥ २८ ॥ दृष्ट्वाहं परिपप्रच्छ कामाख्यां परिसादरम् ॥ कथं शिवे समायाता त्यक्त्वा तद्योनिमण्डलम्॥२९॥ सर्वलोक हाहाकार करने लगे और वह दानवेश्वर मूर्छित हो गया । तदनन्तर मैने उन परमा माया कामाख्या देवीको दुःखितभन देखकर भापाटीकासमेतम् । (१४७) आदरपूर्वक पूँछा-हे शिवे ! तुम वह योनिमण्डल त्यागकर क्यों माई हो ॥ २८ ॥ २९॥ विषण्णवदना भूत्वा कामाख्ये वद कारणम् ॥ त्वं देवि परमाराध्या स्थीयतां मे हृदि त्वयम् ॥ सर्व प्रतिकरोम्येव विषण्णवदने कथम् ॥ ३० ॥ हे कामाख्ये देवि ! तुम्हारा मुख मण्डल दुःखित देखता हूँ, इसका कारण प्रकाश करो। हे देवि ! तुम परमाराध्या हो, तुम मेरे हृदयमें अवस्थान करो, तुम दुःसितमन क्यों हुई हो, मै सबकाही प्रतीकार करता हूँ ॥३०॥ कामाख्योवाच । वसिष्ठो ब्राह्मणः पुत्रस्तारामाराधितुं मुनिः। मद्योनिमण्डले नाथ द्वारं मे समुपागतः ।। ३१ ॥ कामाख्याने कहा- हे नाथ ! ब्रह्माके पुत्र वशिष्ठ ताराकी आराधनाके लिये मेरे योनिमण्डलमें आये थे ॥ ३१ ॥ प्रातस्तस्मिन्ब्राह्मणो मां जयते मानवेश्वरः। द्वारपालोऽभवद्राजा यावामे पूजनं भवेत् । तावत्कोऽपि न क्षमो हि गन्तुं मद्योनिमण्डलम् ॥३२ एवं नित्य नियमितं नरकेणासुरेण च । ततस्तं वारयामास नरको ब्रह्मानन्दनम् ॥ ३३ ।। प्रातःकालमें ब्राह्मण मेरी पूजा करनेको आया, तब मेरे योनिमण्डलमें कोई भी जानेको समर्थ नहीं होता, जबतक मेरी पूजा होती है, तबतक राजा नरकासुर द्वारपाल के रूपसे स्थित रहता है। नरकासुरने इस प्रकार नित्य नियम कर रक्खा है, नरकासुरने उन आये हुए ब्रह्मनन्दन ऋषिको निवारण किय था ।। ३२॥ ३३ ॥ - .

(११८) योगिनीतन्त्रम्। ततस्तेनैव मुनिना शापो दत्तः सुदारुणः । शापं शृणु महादेव कथने रोदनं मम ॥ ३४ ॥ इसी कारण उन मुनिने दारुण शाप दिया है। हे महादेव ! कहते मुझको रोना आता है, तुम मेरा शाप सुनो ॥ ३४ ॥ ब्रह्मविष्णुपुरेशाद्यैः काक्ष्यते यत्परं स्थलम् । तन्मया विहितं देव को वा पापोऽस्ति मे वद ॥३५॥ ब्रह्मा, विष्णु इन्द्रादि सभी जिस परम स्थलकी आकांक्षा करते हैं, मैंने उस परमस्थलकी कामना करके विहित कार्यही किया है. इसमें मेरा क्या दोष होसकता है ? सो कहो ॥ ३५ ।। त्वां परित्यज्य गच्छामि ह्यन्यथा क्रियते त्वया । ब्रह्मन्ने यद्भवेत्पापं सत्यं तेऽद्य भविष्यति ॥ ३६ ॥ मैं यह स्थान छोड़कर जाता हूं, इस समय मेरी पूजाको अन्यथा किया, अतएव आज तुमको बामणके वध करनेका पाप लगेगा ॥ ३६.॥ एवमत्र महापीठे जपनात्पूजनादपि । सिद्धिन जायते कर्हि काले मदचनात्पुनः ॥ ३७ ।। और मेरे वचनसे इस महापीठमें जप पूजा करनेपर भी वह किसी कालमें सिद्धि नहीं होगी ॥ ३७ ॥ एवमेव मुनेः शापादागताऽहं तवान्तिकम् । कमुपायं करिष्यामि वद मे करुणामय ॥ ३८ ॥ मुनिके इस प्रकार शाप देनेपर मै तुम्हारे पास आई हं, हे कह- णामय ! इसका क्या उपाय करेंगे, कहो ॥ ३८ ॥ ईश्वर उवाच । एवमुक्त्वा रुदन्ती तामाश्वास्य च पुनः पुनः । आगत्याहं योनिपीठे जजाप कालिकामतुम् ॥ ३९ ॥ . "

भापाटीकासमेतम् ।
शापोद्धाराय देवेशि तस्माच्छापाद्विमोचिता।
कामाख्यां स्थापयामास पूर्ववद्योनिमण्डले ॥४०॥
ईश्वर बोले-वह यह सब बातें कहकर रोने लगी । मै वारंवार उसको
आश्वासन (तसल्ली) प्रदान करके योनिपीठमें आया और शापोद्धा.
रके लिये कालिकामन्त्र जपने लगा हे देवेशि ! उसके द्वारा उस शापसे
छुड़ाकर कामाख्या देवीको पहिलेके समान उस योनिमण्डलमे स्थापन
किया ॥ ४० ॥
ततः सा परमा माया महाहर्षमुपागता ।
कलौ किन्तु महेशानि वर्षाणाञ्च शतत्रयम् ।
ब्रह्मशापो महेशानि फलिष्यति सुनिश्चितम् ॥ ४१ ।।
तब वह परमा माया महाहर्षयुक्त हुई किन्तु हे महेशानि ! कलियुगमें
तीनसौ वर्ष ब्रह्मशाप फलेगा, इसमें संदेह नहीं ॥ ४१ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
वशिष्ठेन पुरा शप्ता कामाख्या कामवासिनी ।
नरकस्य प्रसङ्गेन तत्सर्व कथितं त्वया ॥ ४२ ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि शापोद्धारस्य ते कथा ।
कथं पश्च ज्ञातव्यस्तस्यापि लक्षणं वद।
यच्छुत्वा साधवः सर्वे दयामप्यन्ति सर्वदा ॥ ४३ ॥
देशीने कहा-पूर्वकालमें वशिष्ठ सापिने कामवासिनी कामाख्या देवीको
शाप दिया था, वह तो आपने नरकासुरके प्रसंगमें सब कहा । अब मै
तुम्हारे शापोद्धारकी कथा सुनाना चाहती हैं, किस प्रकार शाप जाना
जाता है, उसका लक्षण कहिये। साधुजन उसको सुनकर सदा दया युक्त
• हों॥ ४२ ॥४३॥

. योगिनीतन्त्रम् । ईश्वर उवाच । कुमतेः पुरभूपस्य राज्यनाशो यदा भवेत् । तदिनात्परमेशानि ब्रह्मशापा प्रवर्तते ॥४४॥ ईश्वरने कहा--जव दुर्मति पुरभूपका राज्य नाश होता है, उस दिनसेही ब्रह्मका शाप प्रवृत्त हुआ है ॥ ४४ ।। ततोऽतीव दुराचारो कामरूपे भविष्यति । प्रजापीडा रोगकृत्या बहुदोषो भविष्यति ॥ ४५ ॥ इसी कारण कामरूपमें अत्यन्त दुराचार संघटिन होगा और प्रजा पीडा, रोग कृत्या इत्यादि अत्यन्त दोषपूर्ण व्यापार उपस्थित होगा ॥ ४५ ॥ सदा युद्धं महामाये यदा दुर्वृत्तमेव च । देवदानवगन्धर्वा सदा पीडापरायणाः॥ ४६॥ हे महामये । निरन्तर युद्ध और दुर्वृत्तता प्रवर्तित होगी, देवता दानव और गन्धर्व सदा पीडाको प्राप्त होंगे ॥ १६ ॥ कुपूर्वकुलचन्द्रेण मिते शाके दिवानिशम् । सौमारश्च कुवाचश्च यवनेयुद्धमुल्वणम् ॥ ४७ ॥ भविष्यति कामपृष्ठे बहुसैन्यसमाकुलम् । ततो रणे च सौमार जित्वा यवन ईप्सिनम् ।। ४८ ।। वर्षवाकरोद्राज्यं मकारादिमहीपतिः ॥ ४९ ॥ कुपूर्व कुलचन्द्रमिते शके (अर्थात्-२१२) कामरूप पृष्ठमें सौमार गणोंके सहित कुवाच और यवनोंका बहुसैन्यसंकुल घोरतर युद्ध होगा उस समरमें मकारादि महीपति यवन सौमारगणोंको पराजित करके एक वर्ष राज्य करेंगे ॥ १७ ॥ ४८॥ १९ ॥ तत्सहायं समासाद्य कुवाचः स्वीयराज्यभाक् ॥ वर्षान्ते यवन जित्वा सौमारो राज्यनायकः॥ ५० ॥'

भापाटीकासमेतम् । (१५१)
कुवाच राज उसकी सहायताको प्राप्त होकर अपना राज्य भोगेंगे
फिर एक वर्ष के पीछे सौमार गण यवनोंको पराजयपूर्वक दूर भगाकर राज्य-
नायक होंगे |॥ ५० ॥
कुमारीचन्द्र कालेन्दौ गते शाके महेश्वरि ।
कामरूपे पुनयुद्धसंयोगः सम्भविष्यति ॥ ५१ ।।
हे महेश्वरि ! कुमारी कालेन्दु शाके ( ९०१) बीतनेपर कामरूपमें
फिर युद्ध संयोग संघटित होगा ॥ ५१॥
कामरूपे तथा राज्यं द्वादशाब्दं महेश्वरि ।
कुवाचसंगतो भूत्वा यवनश्च करिष्यति ॥ ५२ ।।
पष्टवर्गपञ्चमादिस्ततः शरीरमिच्छति ।
शामितव्यं कामरूपं सौमारैश्च कुवाचकैः ॥ ५३॥
तदनन्तर कुवाचके सहित मिलित होकर यवनगण बारह वर्ष कामरूपुमें
राज्य करेंगे। फिर कुछ काल पीछे सौमार और कुवाच गणोंमें संधि
(मिलाप) संघटित होकर कामरूपमें शांति स्थापन होगी ॥५२॥५३॥
यवनश्च कुवाचश्च सौमारश्च तथा प्लवः ।
कामरूपाधिपो देवि शापमध्ये न चान्यकः ॥ ५४ ॥
शाप कालमें यवन, कुवाच, सौमार और प्लव कामरूपके अधिपति
होकर राज्यका अधिष्ठान करेंगे ॥ ५४ ॥
एवमेध बहुविधं वक्ष्ये लक्षणमीश्वरि ।
क्रियते सकलं स्पष्टं प्रत्येक परमेश्वरि ॥ ५५ ॥
हे देवेशि ! इस प्रकार बहु प्रकारके लक्षण कहता हूं, सुनो। हे परमे-
श्वार ! यह सभी विषय तुम्हें जानना चाहिये ॥ ५५ ॥

(१५२)
योगिनीतन्त्रम् ।
वशिष्ठस्य तपोदाववह्निः शाम्यति कामिनि ।
भविष्यन्ति च तरवः शालारख्यपर्वतोपरि ॥ ५६ ॥
तदनन्तर वशिष्ठकी तपोदाववति (तपके प्रतापसे प्रादुर्भूत हुई अमि)
शान्त होगी। शालाख्य पर्वतके ऊपर तरुगणोंकी उत्पत्ति होगी ॥ ५६ ॥
स्वर्गद्वारे शिलापाते तत्र वै पुरसन्निधौ ।
कामाख्याकमठे भग्ने उर्वश्या सदृशङ्गमः ॥ ५७ ॥
ब्रह्मपुत्रस्य देवेशि सूक्ष्मधारा तु तस्य च ।
षोडशाब्दे गते शाके भूमहीरिपुचुल्बके ।
विगतो भविता न्यूनं सौमारे कामपृष्ठयोः ॥ ५८॥
उस पुरके समीप स्वर्ग द्वारमें शिलापात होकर कामाख्याका मठ टूटेगा।
उर्वशीके सहित ब्रह्मपुत्रका सगम होकर उस नदकी धारा सूक्ष्म होगी ।
पोडशाब्दशाक ( सोलहवर्प) बीतनेपर राजागण सौमार और कामरूप
पृष्ठसे ममहीरिपुचुल्वकमें जायगे, इनमें सन्देह नहीं ॥५७॥५८॥
षण्मासं तत्र संस्थाय उत्तराकालकोषयोः।
गमिप्यन्ति च राजानः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ५९ ॥
कुवार्यवनेश्चान्द्रबहुसैन्यसमाकुलैः ।
त्रिभिम्लेच्छः रमाकीर्ण महायुद्ध भविष्यति ॥ ६०॥
वहा छ: मास स्थित रहकर बहुसैन्यसमाकुल चान्द्र, यवन और
कुवाच गणोंके सहित युद्धविशारद राजा गण उत्तरकाल और कोष
देशमें जायंगे यहा तीन म्लेच्छोंके सहित एक (संघटित ) तुमुरु
युद्ध होगा ॥ ५९॥ ६० ॥
अश्वमुण्डनरमुण्डेर्गजमुण्डर्विशेषतः ।
लोहित्यो रक्तपूर्णश्च भविष्यति न संशयः ॥ ६१ ॥

'भाषाटीकासमेतम् । (१५३) उस युद्धमें अश्वमुण्ड नरमुण्ड और गजमुण्ड कर्तित होकर पृथ्वी लोहितशोणितसे पूर्ण होगी इसमें संदेह नहीं ॥ ६१ ॥ तदेव परमा माया योगिनीगणवन्दिता। कामाख्या वर्णकश्यामा बलिहस्ता हसन्मुखी ॥२॥ ललज्जिहा मुण्डमाला दिग्वस्त्रा परमास्थिता पर्वतानं समाश्रित्य रक्तपानं करिष्यति ॥ ६३ ।। तब योगिनीगणवन्दिता, श्यामवर्णा, दिग्वस्त्रा, लोलजिह्वा, बलिहस्ता और हसन्मुखी परमा माया कामाख्या पर्वतारका आशय करके रक्तपान करेंगी ।। ६२ ।। ६३ ॥ ततः कुवाचो यवनं हित्वा सौम्यविनाशितः। करतोयानदी यावत्करिष्यति महद्रणम् ॥ ६४ ॥ फिर कुवाचगण सौम्यगणको नष्ट करके यवनगणको परित्याग पूर्वक कर तोयानदीपर्यन्त भूभागमें महा युद्ध करेंगे ॥६४॥ दशाहं तत्र संस्थाय यास्यन्ति पुनरालयम् । ततो विप्रो नृपो भूत्वा कामरूपनिवासिनः ॥ करिष्यति जनान्देवि जपपूजादितत्परान् ॥ ६५ ॥ वहां दश दिन वास करके फिर अपने घर जायंगे तदनन्तर कामरूप निवासी विप्रगण राजा होकर जनोंको जप पूजादिमें तत्पर करेंगे ॥ ६५ ॥ एवं वर्षयं राज्यं कृत्वा दण्डी द्विजो नृपः । भाविष्यति महामाये योनिमण्डलसन्निधौ ।। ६६ ।। दण्डी विम राजा होकर इस प्रकार तीन वर्ष राज्य करके योनिमण्डलके समीप स्थित होंगे ।। ६६ ।। ततो द्वादशदले नाभिः कल्पते पूर्वभूमिपः । पेशानीमागतः कामानेकच्छचं करिष्यति । तद्राज्यं सकलं देवि धर्मेण पालयिष्यति ॥ ६७ ।।

(१५४) योगिनीतन्त्रम् । अनन्तर पूर्व भूमिपति ईशान दिशासे आनकर द्वादशदलमें नाभिकल्पना और कामरूपको एक क्षत्रके अन्तर्गत करेंगे । हे देवि ! तब वह इस सब राज्यको धर्मानुसार पालन करेंगे ॥ ६७ ॥ तत्पत्ती श्यामवर्णा स्यात्सदाराधितपार्वती। विनीतं तनयं साध्वी राजानं राजपुत्रकम् ॥ ६८ उनकी पत्नी श्यामवर्णा साध्वी होफर सदाही पार्वती की आराधना करेगी वह सती एक विनीति राजपुत्र उत्पन्न करेगी ॥ ६८ ॥ तजन्मदिवसादेवि यावत्स्थाद्वादशं दिनम् । तावत्स्पशाचले स्पर्शमणिराविर्भविष्यति ॥ ६९ ॥ हे देवि ! उसके जन्मदिनसे बारहवें दिन स्पर्शाचलमें स्पर्शमणिका आविर्भाव होगा ।। ६९॥ तेनैव धनिनः सर्वे कामरूपनिवासिनः । भविष्यन्ति तदेव स्याद्वसिष्ठशापमोचनम् ॥ ७० ॥ हे देवि ! उसके द्वारा सब कामरूपनिवासी धनवान् होंगे। तब वशिष्ठका शापमोचन होगा ।। ७० ।। ततस्तेजांसि भूयांसि कामाख्यायोनिमण्डले। कामाख्यासनिधाने च भविष्यति कलौ युगे ॥ ७१ ॥ मन्त्रसिद्धिश्च भविता तदैव योनिमण्डले। यथोक्तफलदा देवि कामाख्या हि मविष्यति ॥ ७२ ॥ जडीभूता ब्रह्मशापाद्वर्षाणांच शतत्रयम् । कामाख्या देववन्द्यानिकमला लज्जिता स्वयम् । पूर्ववत्सकलं देवि ततस्तु संभविष्यति ।। ७३ ।।

भापाटीकासमेतम् ।
तदनन्तर कामाख्याके योनिमण्डलमें प्रभूततेजका आविभाव होगा
कलियुगमें तब कामाख्याके समीप योनिमण्डलमें मन्त्रसिद्धि होगी और
कामाख्यामें यथोक्तफलदायक होगी । देवता जिसके चरणकमलोंकी वंदना
करते हैं वह कामाख्या देवी ब्रह्मशापसे तीनसौ वर्ष जडीभूत (जिसमें
देवशक्ति कुछ न हो ) रह कर आपही लजित होंगी । अनन्तर हे देवि !
सभी पूर्ववत् फल सिद्धिके देनेवाले होंगे ॥७१॥७२॥७३॥
एवं कामपरित्राणं संक्षेपात्कथितं मया।
किं श्रोतव्यमितो देवि गिरिजे कथ्यतां त्वया ।।७४।।
हे गिरिने देवि ! यह मैंने तुमसे कामरूपके परित्राण (रक्षा) की
कथा संक्षेपसे वर्णन करी अब यदि तुम कुछ और सुनना चाहती हो
वह कहो ॥ ७४ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्रे सर्वतन्त्रोत्तमोत्तम देवीश्वरसम्बाद
चतुविशतिसाहले भापाटीकायां द्वादशः पटलः ।। १२ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
देवेश परमेशान सर्वज्ञ सर्वपूजित ।
क्व गच्छसि मुहुर्नार्थ कृपया वद शंकर ॥ १ ॥
श्रीदेवी ने कहा-हे परमेशान सर्वज्ञ सर्वपूजित शंकर ! तुम कहाँ कहाँ
नाते हो ? कृपा करके यह मुझसे कहो ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच ।
कोचाख्यानेच देशे च योनिगर्तसमीपतः।
साध्वी सती बालिका हि रेवती जलविस्मृता ॥२॥
म्लेच्छदेहोवा या तु योगिनी सुन्दरी मता।
तत्कुची कठिनौ द्वन्द्वी योनौ तस्याश्च पीनता ॥३॥

(१५४ ) योगिनीतन्त्रम् । अनन्तर पूर्व भूमिपति ईशान दिशासे आनकर द्वादशदल में नाभिकल्पना और कामरूपको एक क्षत्रके अन्तर्गत करेंगे । हे देवि । तब वह इस सन राज्यको धर्मानुसार पालन करेंगे ॥ ६७ ॥ तत्पत्नी श्यामवर्णा स्यात्सदाराधितपार्वती। विनीतं तनयं साध्वी राजानं राजपुत्रकम् ॥ ६८ ॥ उनकी पत्नी श्यामवर्णा साध्वी होकर सदाही पार्वती की आराधना करेगी वह सती एक विनीति राजपुत्र उत्पन्न करेगी ॥ ६८ ॥ तज्जन्मदिवसादेवि यावत्स्यावादशं दिनम् । तावत्स्पशाचले स्पर्शमणिराविर्भविष्यति ।। ६९ ॥ हे देवि । उसके जन्मदिनसे बारहवें दिन स्पर्शाचलमें स्पर्शमणिका आविर्भाव होगा ॥ ६९॥ तनव धनिनः सर्वे कामरूपनिवासिनः । भविष्यन्ति तदैव स्याद्वसिष्ठशापमोचनम् ॥ ७० ।। हे देवि । उसके द्वारा सर कामरूपनिवासी धनवान् होंगे। तब वशिष्ठका शापमोचन होगा ॥ ७० ॥ ततस्तेजांसि भूयांसि कामाख्यायोनिमण्डले । कामाख्यासन्निधाने च भविष्यत्ति कलौ युगे ।। ७१ ॥ मन्त्रसिद्धिश्च भविता तदेव योनिमण्डले। यथोक्तफलदा देवि कामाख्या हि मविष्यति ॥ ७२ ।। जडीभूता ब्रह्मशापाद्वर्षाणांच शतत्रयम् । कामाख्या देववन्द्यानिकमला लन्जिता स्वयम् । पूर्ववत्सकलं देवि ततस्तु संभविष्यति ।। ७३ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(१५५)
तदनन्तर कामाख्याके योनिमण्डलमें प्रभूततेजका आविर्भाव होगा
कलियुगमें तय कामाख्याके समीप योनिमण्डलमें मन्त्रसिद्धि होगी और
कामाख्यामें यथोक्तफलदायक होगी । देवता जिसके चरणकमलोंकी वंदना
करते हैं वह कामाख्या देवी ब्रह्मशापसें तीनसौ वर्ष जडीभूत ( जिसमें
देवशक्ति कुछ न हो) रह कर आपही लजित होंगी । अनन्तर हे देवि !
सभी पूर्ववत् फल सिद्धिके देनेवाले होंगे ॥७१।७२।७३॥
एवं कामपरित्राणं संक्षेपात्कथितं मया।
किं श्रोतव्यमितो देवि गिरिजे कथ्यतां त्वया ॥७४॥
गिरिने देवि ! यह मैने तुमसे कामरूपके परित्राण (रक्षा) की
कथा संक्षेपसे वर्णन करी अब यदि तुम कुछ और सुनना चाहती हो
वह कहो ॥ ७४ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्र सर्वतन्त्रोतमोत्तमे देवीश्वरसम्याद
चतुर्विंशतिसाहस्रे भाषाटीकायां द्वादश. पटलः ।। १२ ।।
श्रीदेव्युवाच ।
देवेश परमेशान सर्वज सर्वपूजित ।
क्व गच्छसि मुहुर्नार्थ कृपया वद शंकर ॥ १ ॥
श्रीदेवीने कहा-हे परमेशान सर्वज सर्वपूजित शंकर ! तुम कहा कहां
नाते हो ? कृपा करके यह मुझसे कहो ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच ।
कोचाख्याने च देशे च योनिगर्तसमीपतः ।
साध्वी सती ब्राझिका हि रेवती जलविस्मृता ॥२॥
म्लेच्छदेहोद्भवा या तु योगिनी सुन्दरी मता।
तत्कुचौ कठिनौ द्वन्द्वौ योनौ तस्याश्च पीनता ॥३॥

(१५६)
योगिनीतन्त्रम् ।।
भिक्षाचारप्रसङ्गेन गच्छामि च दिवानिशम् ।
तत्सन्निधौ महेशानि त्वया मे मरणं महत् ॥ ४ ॥
ईश्वर चौले–योनिगर्तके समीप कोच नामक देश, वहां ब्राझिका साध्वी
सती जलविस्मृता म्वेच्छदेहोद्भवा रेवती, योगिनी नामक सुन्दरी स्त्री थी।
उसके दोनों कुच कठिन एवं योनिमण्डल पीन और मनोहर था मैं भिक्षा-
चार प्रसंगमें दिन रात उसके निकट जाता है । हे महेशानि ! उसके समीप
मेरा यह सब महत् मरण तुल्य बोध होता है ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
कुत्रासीतिक तपस्ततं कथं प्राप्तं महीतलम् ।
त्वया साई रतिर्यस्य नाल्पस्य तपसः फलम् ॥ ५ ॥
तथापि च कृपा तस्यां लक्ष्यते महती मया ।
इदानी किमभूत्सा हि कृपया परया वद ॥ ६ ॥
श्रीदेवीजीने कहा-वह स्त्री कहां थी ? उसने कैसी तपस्या की थी ?
वह किस प्रकार महीतलको प्राप्त हुई ? हे देव ! तुम्हारे संग जिसकी
रतिक्रिया है उसके तपका फल थोडा नहीं है उसपर आपकी महत् कृपा
दिखाई देती है अब वह कैसी हुई है ? हे नाथ ! कृपाप्रकाश पूर्वक यह
मुझसे कहो ॥ ५ ॥ ६ ॥
ईश्वर उवाच ।
नगेन्द्रतनये बाले शृणु मत्प्राणवल्लभे ।
तत्साध्वीचरितं किंचित्कथयामि शुचिस्मिते ॥ ७ ॥
ईश्वर चोले-हे मेरी प्राण-यारी ! हे वाले नगेन्द्रनंदिनि शुचिस्मिते !
उस साध्वीका चरित्र कुछेक कहता हूँ सुनो ॥ ७ ॥
रासक्रीडा कृता सार्द्धमेकाम्रकानने मुदा।
वेदाङ्गसम्भवा साध्वी योगिनी सासुरी मता ॥ ८ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१५७) उसने प्रसन्नचित्तसे आम्रवनमें मेरे संग रासक्रीडा करीथी वह वेदाङ्गसम्भवा योगिनी देवी थी ॥ ८॥ नाभूत्तस्याः सुप्तिमें मक्रियायां नगात्मजे। मामाप्तुमुत्कटं तप्तं त्वियं मे क्षेत्रकामदा ॥ ९ ॥ हे नगनन्दिनी ! मेरे सहित रतिक्रिया में उसकी तृप्ति नहीं हुई ! मेरे लिये उसने उत्कट तपस्या करी थी यह योगिनी मेरी क्षेत्रकाम- दायिनी थी ॥ ९ ॥ एकामगहने देवि पर्वते तीर्थसडकुले । तत्रैको ब्राह्मणो यातो भिक्षार्थ तामुवाच ह ॥ १० ॥ हे देवि ! एकाम्रवनके तीर्थसंकुल पर्वतमें वह तपोनिरत हैं। इसी समय भिक्षाके निमित्त एक ब्राह्मणने वहां आनकर उससे 'भिक्षा मागी ॥ १० ॥ न दत्तमुत्तरं तस्मै भिक्षा तिष्ठतु दूरतः । ततः शशाप विप्रस्तां म्लेच्छतां याहि दुर्मदे ॥११॥ भिक्षा तो दूर रही, उसने उसको उत्तरतक भी नही दिया । तब इस ब्राह्मणने उसको शाप दिया, रे दुर्मते ! तू म्लेच्छ हो ॥ ११ ॥ इत्युक्त्वा स ययौ विप्रो म्लेच्छत्वं प्राप योगिनी। अतोऽर्थिनं समर्थश्चेद्याचितं न ददाति चेत् ॥ १२ ॥ स दुर्गतिमवाप्नोति समर्थो विनयं चरेत् । तस्यास्तु तपसा देवि क्रीतोऽहमभवं सदा ॥ १३ ॥ ब्राह्मण यह वचन कहकर चला गया। योगीनी म्लेच्छत्वको प्राप्त हुई, अतएव हे देवि ! समर्थव्यक्तिसे याचना करनेपर वह यदि याचकको यथाशक्ति नहीं देता तो उसको अवश्य दुर्गति प्राप्त होती है । समर्थन्यक्ति याचकसे विनीतभावका आचरण करे, हे देवि ! मै उसकी तपस्यासे सदाही क्रीत (दास) रहताहूं ॥ १२ ॥ १३ ॥ "

(१५८) योगिनीतन्त्रम् ।
अतस्तया रतिर्याता.मम कामिनि सर्वदा।
तस्याः पुत्रो वेतसिंहो मदुरसा समुद्भवः ॥ १४ ॥
इसी कारण उसके संग मेरा सदा रतिभाव संबंध रहता है। उसके
गर्भ और मेरे औरससे वेनुसिंह नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १४ ॥
एकेन जितवान्कामान्सौमारान्गौडपञ्चमान् ।
विनिजित्य नृपानसनिकः श्रीमान्महामतिः॥१५॥
वह महामति वेनुसिह अकेलेही सौमारगण और गौड पंचमगण तथा
समस्त राजाओंको जीतकर एक प्रधान श्रीमान् राजा हुए थे ॥ १५ ॥
'तस्यापि बहवः पुत्राः पृथिवीपरिपालकाः।
कुवाचा धार्मिकाः सर्वे राजानो युद्धदुर्मदाः॥१६॥
उस वेनुसिंह के पृथ्वीपालक बहुत पुत्र उत्पन्न हुए उनमें सब कुवाच
गणही धार्मिक राजा और युद्धदुर्मद हुएथे ॥ १६ ॥
तेऽपि सर्वे वेनुसिंहे योगमाश्रित्य बिहले।
तिष्ठन्तो व्यक्तरूपेण पदमाकल्पमम्बिके ॥ १७ ॥
वह वेनुसिंह विह्वलतासे योग आश्रय करके आकरपपर्यन्त व्यक्तरूममें
अवस्थान करते हैं |॥ १७ ॥ SHIL AIIVR
झालात्सा माधवी देवि मद्देहे लीनतां गता ॥१८॥
हे अम्बिके ! वह माधवी कालवशात् मेरे देहमें लीन हुई थीं ॥ १८ ॥
यथा जाया नन्दिमाता तथेयं योगिनी मता।
यथा पुत्रो भृङ्गरीटस्तथा चेनुर्ममात्मजः ॥ १९ ॥
जिस प्रकार नन्दिमाता मेरी जाया है इस योगिनीकोभी उसी प्रकार
जानना चाहिये। भूतरीट नैसे मेरा पुत्र है इस बेनुसिंहकोभी उसी
प्रकार बानो ॥ १६॥
वेनुसिंहोऽपि कल्पान्ते परी सिद्धिमवाप्स्यति ॥२०॥

भापाटीकासमेतम। (१५१) वेनुसिंह मी कल्पान्त कालमें परमा सिद्धिको प्राप्त होंगे ॥२०॥ तद्वंशजास्तु राजानः सर्वे कैलासवासिनः । भविष्यति महात्मानो गणेशाः सर्वशालिनः ॥२१॥ रूपयौवनसम्पन्नैर्देवकन्यागणैः सह । विहरन्ति सदा देवि क्रीडन्ते भैरवा यथा ॥ २२ ॥ उसके वंशोत्पन्न सभी कैलासवासी महात्मा राजा और सर्व समृद्धि- शाली गणेश्वर होंगे और वह रूपयौवनसम्पन्न देवकन्याओंके सहित भैरवगणोंके समान आनन्दसे विहार करेंगे ॥ २१ ॥ २२ ॥ यदा यदा ब्रह्मशापः कामाख्यायां भवेत्पुनः । तदा तदावतीर्यासौ स्वस्य कामस्य पालकः। तथा तद्वंशजाः सर्वे भवेयुः कामपालकाः ॥ २३ ॥ जब जब कामाख्यामें ब्रह्मशाप होगा, तब तब ही इन (वेनुसिह ) का अवतार होकर अपने कामरूप पालन करेंगे उसके वंशवाले सभी कामरूपके पालक होंगे ॥ २३ ॥ कल्पान्तमवें देवेशि यावच्छापो विमुच्यते । तावदेव महामाये तद्वीये क्रीडिता ध्रुवम् ॥ २१ ॥ कल्पमेवं महेशानि कलौ वर्षशतत्रयम् । प्राणेश्वरि परेशानि भुङ्क्ते शापं परात्मिका ।। २५ ॥ कामाख्या हि महामाये तदन्ते सफलं भवेत् । एवं ते कथितं देवि ब्रह्मशापविमोचनम् ॥ २६ ॥ और कल्पान्त पर्यन्त जबतक शापविमोचन नहीं होगा, तबतक हे महामाये ! तुम्हारे ही प्रभावसे वह क्रीडा करेंगे । हे महेशानि ! कलिमें तीन सौ वर्षमें इस प्रकार कल्प होता है । हे प्राणेश्वरि ! हे परमेश्वरि । महामाये (१६०) योगिनीतन्त्रम् । शंकर ! परमात्मिका कामाख्या ब्रह्म शाप भोगती है, शापके अन्तमें उसका सभी सफल होगा। हे देवि ! यह मैने तुमसे कामाख्याका शापविमोचन का सब वृत्तान्त वर्णन किया ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ कामाख्या या महेशानि साकल्येन मया ध्रुषम् । तापद्यस्य ब्रह्मशापो निस्कृतिस्तस्य दूरतः ॥ २७ ॥ जो कामारया महामाया प्रतिपादन करी गई है वह अत्यन्त महिमा- वान् है तथापि हे महेशानि ! जिसको ब्रह्मशाप हुआ है, उसकी निष्कृति ( मुक्ति ) दूर स्थित रहती हैं ॥ २७ ॥ तक्षकेणापि दष्टस्य प्रतीकारो हि तत्क्षणात् । ब्रह्मशापप्रसक्तस्य कल्पान्ते स्यात्प्रतिक्रिया॥२८॥ तक्षकके काटनेपरभी तत्काल उसका प्रतीकार हो सकता है किन्तु ब्रह्म शापग्रसित व्यक्तिका कल्पान्त होनेपर प्रतीकार नहीं होता ॥२८॥ नरकान्निप्कृतिर्नास्ति तस्याभावान संशयः । एवं तंदशजाः सर्वे पीडयन्तेऽहनिशं प्रिये ॥ २९ ॥ नानाविधमहोत्पतिवत्स्यात्सातपौरुषम् । तस्मातु ब्राह्मणं दंवि नावमन्येत कुत्रचित् ॥ ३० ॥ हे देवि ! प्रलयके विना उसका छुटकारा नहीं है । हे प्रिये ! ब्रह्मा शापग्रसित मनुष्यके वंशधर भी सातपुरुषा ( सातपीढी ) पर्यन्त अनेक उत्पातोंसे रातदिन पीडित होते हैं इसी कारण हे देवी ! कभी ब्रामणका अपमान न करै ॥ २९ ॥ ३० ॥ सर्वदेवमयो विप्रो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः । ब्रह्मतेजासमुद्भूतः सदा प्राकृतिको द्विजः ॥ ३१ ॥ ब्राह्मण सर्वदेवमय और ब्रह्मा विष्णु शिवस्वरूप है। द्विजगण यद्यपि प्रारतिक अर्थात् पञ्चमृतमय है किन्तु तो भी वह ब्रह्मतेजसे उत्पन्न हुए हैं ।। ३१ ॥

- भाषाटीकासमेत्तम् । (१६१) ब्राह्मणैर्भुज्यते यत्र तत्र भुक्ते हरिः स्वयम् । तत्र ब्रह्मा च रुद्रश्च खेचरा ऋषयो मुनिः ॥ ३२ ॥ पितरो देवताः सर्वे भुञ्जन्ते नात्र संशयः । सर्वदेवमयो विप्रस्तस्मात्तं नावमानय ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणञ्च कुमारीश्च शक्तिमग्निं श्रुतिश्च गाम् । नित्यमिच्छन्ति ते देवा यजितुं कर्मभूमिषु ।। ३४ ॥ जहा ब्राह्मण गण भोजन करते हैं वहा स्थय हरि भोजन करते हैं। और वहीं ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, खेचर, ऋपि, मुनि, पितर और देवता सभी भोजन करते हैं, इसमें सन्देह नहीं अतएव हे देवि ! ब्रामण सर्व देवमय हैं इस कारण तुम कभी उनका अवमान न करना । हे देवि ! देवता गण सदा कामना करते है कि, कर्मभूमीमें ब्राह्मण, कुमारी शक्ति, अमि, श्रुति और गौ इन सनकी नित्य पूजा हो ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ पूजितेका कुमारी चेद्वितीयं पूजनं भवेत् । कुमारीपूजनफल मया वक्तुं न शक्यते ॥ ३५ ॥ कुमार्यः शक्तयश्चापि सर्वमेतञ्चराचरम । एका चेावती देवि पूजिता स्वात्मलोकिता। सर्वा एव परादेव्यः पूजिताः स्युन संशयः॥ ३६ ।। यदि मनुष्य एक कुमारीकी पूजा करे तो उसको महत् फल होता है, हे देवि ! कुमारीपूजनके फलका मैं वर्णन नही कर सकता । हे अम्बिके ! कुमारी और शक्तिगण यह अखिल चराचरस्वरूप हैं, हे देवि ! यदि एक युवतीकी पूजा करी जाय, तो उसीके द्वारा सब देवी पूजित होती हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ११

(१६२) योगिनीतन्त्रम् ।
हुतमेकगुणं वह्नौ दत्तमेकगुणं द्विजे ।
लभ्यते कोटिगुणितं विश्वासान्नात्र संशयः ।
अविश्वासे शतगुणं फलमेव सुनिश्चितम् ॥ ३७ ॥
विश्वासपूर्वक अग्निमें एक गुण होम और ब्राह्मणको एक गुण दान
करनेपर पर करोड गुण फल प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं । अवि-
श्वाससे होम और दान करने पर केवल सौगुणा फल पाता है, यह
निश्चित है ॥ ३७॥
गोग्रासं पावनं लोके सर्वपापनिकृन्तनम् ।
कुमार्य चैव यदत्तं तथा शक्त्यै महेश्वरि ॥ ३८ ॥
हे महेश्वरि ! इस लोकमें गोग्रासदान परम पवित्र कर्म है, उसके
द्वारा सब पाप नष्ट होजात है ॥ ३८ ॥
न नश्यति कदापि तत्कल्पकोटिशतायुते ।
धर्मयोनिहिते देवा धर्मों यज्ञादिको मतः ॥ ३९ ॥
परलोके महानन्धुर्धमो ह्यत्र न संशयः।
कर्मण्येव कृते देवि वदिके बहुजन्मनि ।
ततश्चागमिके धर्म धर्मेणैव प्रवर्तते ॥४०॥
कुमारी और शक्तिको जो दिया जाता है, कल्पकोदिशतायुत (दस-
सौ हजार करोड ) वर्षमें भी वह नष्ट नहीं होता। देवताही धर्मयोनी,
यज्ञादिकही कर्म और परलोकमें धर्मही महाबंधु है, इसमें सन्देह नही ।
हे देवि ! बहुत जन्म वैदिक कर्म करके फिर आगमधर्ममें प्रवृत्त
होगा ॥ ३९ ॥ ४०॥
तत्र सम्प्राप्यते मुक्तिः कर्मबन्धविनाशिनी।
ततस्तु बहुजन्मान्ते ज्ञानमासाद्य मुच्यते ॥ ४१ ॥

7
भाषाटीकासमेतम् । (१६३)
उससे कर्मबन्धनविनाशिनी मुक्ति प्राप्त होती है। आगम धर्ममें प्रवृत्त
रहकर बहुत जन्मोंके पीछे मुक्ति मिलेगी ।। ४१ ॥
कर्मणा लभ्यते भक्तिभक्त्या ज्ञानमुपालभेत् ।
ज्ञानान्मुक्तिमहादेवि सत्यं सत्यं मयोच्यते ॥४२॥
कर्मसे भक्ति,. भक्तिसे ज्ञान और ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त होती है। हे
महादेवि ! यह मैने तुमसे सत्य ही सत्य कहा है ॥४२॥
ज्ञानभावे समुत्पन्ने संप्राप्य ज्ञानमुत्तमम् ।
तदा योगी विमुक्तः स्यादित्याह भगवाञ्छिवः ॥४३॥
भगवान् शिवने कहा है, जब ज्ञानभाव उत्पन्न होता है, तब योगीजन
उत्तम ज्ञान प्राप्त करके मुक्त होते हैं ॥ ४३ ।।
न कर्मणः समारम्भान्नैष्फलं पुरुषोऽश्नुते ।
तस्मात्कर्म महामाये सर्वदा समुपाचरेत् ॥४४ ॥
कर्म करने पर पुरुष गण निष्फलता प्राप्त नहीं करते, अवश्य उसका
फल पाते हैं इस कारण हे देवि ! सदा कर्मका आचरण करना
चाहिये । ४४ ॥ AH का सकo
वैदिकं तान्त्रिकं वापि यदि भाग्येन लभ्यते।
न वृथा गमयेत्कालं यूतक्रीडादिना सुधीः ॥ ४५ ॥
यदि भाग्यसे वैदिक वा तान्त्रिक कर्म कर सके, तो बुद्धिमान मनुष्य
जुए इत्यादिके द्वारा कालातिपात करके वृथा समय नष्ट न करै ॥ ४५ ॥
गमयेदेवतापूजाजपयज्ञस्तवादिना ।
द्विविधश्चैव तत्कर्म वाह्यान्तरविभेदतः ॥ ४६ ।।
देवता पूजा, नप, यज्ञ और स्तवादि द्वारा काल क्षय करें, कर्म दो
कारके हैं, बाह्य और आन्तरिक ॥ १६ ॥

(१६४) योगिनीतन्त्रम्। बाह्यश्चानियमाशक्तं मानसं न तथा पुनः । अशुचिर्वा शुचिर्वापि यत्र कुन स्थलेऽपि वा ॥४७॥ गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्वापि यद्वा यद्वा वरानने । कुर्याच्च मानसं धर्म न दोषो मानसे क्वचित् ॥ १८॥ [ वाह्य कर्म अनियम द्वारा नही किया जा सकता, किन्तु मानसिक वा आन्तरिक कर्म में ऐसा नहीं हे अपवित्र हो वा पवित्र हो जिस किसी स्थलमें स्थिति करते हो, चलते चलते हो, अथवा जो कोई कार्य करते करते हो मानस धर्मका आचरण करै । क्योंकि, मानसमें कोई दोष नहीं है ॥ ४७॥ १८ ॥ सर्वेषां कर्मणां श्रेष्ठ जपज्ञानं महेश्वरि । जपयज्ञो महेशानि मत्स्वरूपो न संशयः ॥ ४९ ॥ हे महेश्वार । जपयन सभी कर्मोंसे श्रेष्ठ है, जप यज्ञ मेरा स्वरूप इसमें सन्देह नहीं ॥ १९ ॥ जपयज्ञे हि तिष्ठेद्यो बाह्ये वा चान्तरोऽपि वा। सर्वदा परमेशानि जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ ५० ॥ नाबमें हो वा अन्तरमें हो, जो मनुष्य जपयज्ञमें नियमासक्त होता है, उसको नि सदेह जीवन्मुक्त जानना चाहिये ॥ ५० ॥ वैदिकास्तान्त्रिका ये ये धर्माः सन्ति महरेवार । सर्वे ते जपयजस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ५१ ॥ है देवि 1 वैदिक हो वा तान्त्रिक हों, जो जो धर्म जगत्में विद्यमान हैं, वह सर जपयज्ञके पोडशाश नहीं होंगे ॥ ५१ ॥ महभूतपिशाचाद्या यक्षरक्षोगणाश्च ये ॥ व्याघ्राद्या जन्तवो देवि तथैव कुपितान्तराः ॥ ५२ ।। ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष और रक्षोगण व्याघ्रादि कुपितान्तर हिंसक जन्तुगण [५२ ॥ นี้

भाषाटीकासमेतम् ।
(१६५)
डाकिन्यो गुह्यकाश्चैव गन्धर्वाश्च सरीसृपाः।
दानवा भैरवा दुष्टा ये वै श्मशानवासिनः ॥ ५३ ।।
ढाकिनीगण, गुह्यकगण, गधर्वगण, सरीसृपगण, दानवगण, भैरवगण
और श्मशानवासी दुष्टगण ।। ५३ ।।
केऽपि नेच्छन्ति तं देवि जापिनं भयविहलाः ।
न स्पृशक्ति च पापानि कदापि साधकं प्रिये ॥५४॥
सबही भयनिहल होकर जपकारी व्यक्तिका दर्शन नहीं कर सकते है
प्रिये ! सब पाप साधक व्यक्तिको कभी स्पर्श नहीं कर सकते ॥ ५४ ॥
फलमेतद्वाचिकस्य जपस्य परिकीर्तितम् ।
तस्माच्छतगुणो पांशुः सहस्रो मानसो मतः ॥५५॥
मै तुमसे वाचिक जपका फल कहता हूं, उपाशु जपसे उसका शत गुण
और मानसिक जपसे उसका सहस्रगुण फल प्राप्त होता हे ॥ ५५ ॥
मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा वाचिको जप ईरितः।
किश्चित्सुश्रवणोपेत उपांशुः परिकीर्तितः ॥५६॥
उच्च वाक्य द्वारा मन्त्रका उच्चारण करनेपर उमको वाचिक जप और
किचित् श्रवणयोग्य जपही उपाशु जप है ॥ ५६ ॥
निजकर्णगोचरो यो मानसः परिकीर्तितः।
याचिकस्तु जपो बाह्यो मानसोऽभ्यन्तरो मतः॥५०॥
और जो अपने कर्णगोचर न हो, वही मानसिकजप है, वाचिक जपही
बाह्य जप और मानसिक जपको ही आभ्यन्तर जप कहते हैं ॥ ५७ ।।
उपांशुमिश्र एव स्यात्रिविधोऽयं जपः स्मृतः।
जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ॥ ५८ ॥
और उपाशु जपको मिश्र जप कहते हैं, इस भाति जप तीन प्रकारका
होता है । जपद्वारा स्तूयमान देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ५८ ॥

योगिनीतन्त्रम्।
प्रसन्ना विपुलान्कामान्दद्यान्मुक्तिश्च शाश्वतीम् ।
साधनश्च जपश्चैव ध्यानं चैव वरानने ।
नाल्पेन तपसा देवि केनापि कुत्र लभ्यते ॥ ५९ ॥
और प्रसन्न होकर विपुल काम्य विषय और अन्त में शाश्वती मुक्ति
मदान करते हैं । हे वरानने ! साधन, जप और ध्यान अल्प तपस्यासे कहीं
भी प्राप्त नहीं होता ॥ ५९ ॥
यदि भाग्येन देवेशि बहुजन्मार्जितेन च ।
प्राप्यते यत्र तच्चेत्तु जन्मनाप्येकमोक्षमाक् ॥ ६० ॥
हे देवेशि । यदि जन्मार्जित पुण्यके बलसे वह सब प्राप्त हों तो एक
जन्ममें ही मोक्ष हो सकता है ॥ ६० ॥
ब्रह्मज्ञानश्च यत्प्रोक्तं समाधिस्तत्प्रकीयते ।
इत्येवं कथितं रम्यं समासेन महेश्वरि।
इतः परं महादेवि किं पुनः श्रोतुमिच्छति ॥ ६१ ।।
जो ब्रह्मज्ञान कहा है, उसीको समाधि कहते हैं हे महादेवि ! यह मैने
तुम्हारे निकट संक्षेपसे मनोहर गुप्त विषय वर्णन किया, अब इसके पीछे
तुम क्या सुननेकी इच्छा करती हो सो कहो ॥ ६१ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्ने सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्पादे चतु
विशति साहले भापाटीकायात्रयोदश पटल ॥ १३ ॥
-
थोदेव्युवाच ।
भो देव परमानंद महायोगेश्वर प्रभो।
शुश्रूषा यत्र में देव कृपया कथ्यतां गुरो॥१॥
श्रुतं विप्रस्य चरितं रेतसस्ते सनातन ।
प्लवश्च यवनश्चैव सौमारश्च महेश्वर ॥ २ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१६७)
तेषां रेतःसमुद्भूता म्लेच्छास्ते कामपालकाः।
कथं जाता महादेव वद मे करुणामय ॥ ३ ॥
श्रीदेवीने कहा-हे महायोगेश्वर परमानन्द देव प्रभो ! मै जो सुनना
चाहती हू, आप कृपापूर्वक उसका वर्णन कीजिये । हे सनातन गुरो ! मैंने
विप्रचारित और आपके वीर्यका तेज सुना । प्लव, यवन, सौमारगणों के
वीर्योत्पन्न म्लेच्छ गण जो कामरूपके पालक हैं. उन्होंने किस प्रकार वहासे
जन्म ग्रहण किया ? आप कृपा करके यह सत्र कहिये ॥१॥२॥३॥
ईश्वर उवाच ।
शाल्वपुत्राश्च बाहीका मृताः कौरवसंयुगे।
नान्यो वंशधरः कश्चित्तवंशे तु त्रिलोचने ॥ ४ ॥
ईश्वर बोले-हे देवि ! शाल्वपुत्र बाहलिकगण कौरवसमरमें निहत
हुए हे, हे त्रिलोचने ! उस वसमें अन्य कोई क्शधर नही था ॥ ४ ॥
तदा बाह्रीकरमणी कीर्भिर्गुणवती शुभा।
युवती सुन्दरी रम्या तपाशीला महामतिः ॥ ५ ॥
पुवेच्छया गता काशी तपस्तेपे दिवानिशम् ।
स्थित्वा विश्वेश्वराने तु द्वारे मे मुक्तिमण्डपे ॥ ६ ॥
उसी समय परम सुन्दरी मनोरमा सुन्दरी युवती महामति तप शीला
गुणवती बाहलिफरमणी कल्याणिनी कीमि पुत्र प्राप्त होनेकी इच्छासे काशीमें
मानकर विशेश्वरके अग्रद्वार मुक्तिमण्डपमें स्थित हो दिन रात तपस्या
करने लगी ॥ ५॥ ६ ॥
तदा बलिसुतो बाणो महाकालो महाबलः ।
सहारपालको देवि शुशुभे तां निरीक्ष्य च ॥ ७ ॥

(१६८)
योगिनीतन्त्रम्।
भदधीकामादाय भैरव काममोहितः ।
कपालमाली मदिरामोदितोन्मत्तवेषवान् ॥ ८ ॥
उसी समय बलिपुत्र बाण और महाबल महाकाल विश्वेश्वरके द्वारपाल
थे, तिनके मध्य मेरे अधिकारमें स्थित भैरव शोभायमान कीर्मिको देखकर
कामसे मोहित हुआ कपालमालाधारी मदिरासे मत्त, उन्मत्त वेशवान् ७॥८॥
तपस्विवेषमास्थाय निर्लजो रतिनायकः।
कीमाता महादेवि बन्धूकामलकद्युतिः ॥ ९ ॥
भैरवो विपुलस्तत्र ततो जातो महाकुशः।
कीमः सुतो महादेवि महाकालस्य रेतसः ॥ १० ॥
तपस्वी वेशधारी, निर्लज्ज रतिनायक भैरवने कीर्मिके संग प्रेम पाशमें
बद्ध होकर सहवास किया । हे महादेवि ! इससे कीर्मिके महाकुंशनामक
एक पुत्र उत्पन्न हुआ । बन्दूकामलक (दुपहरीके पुष्पके समान ) इस
पुत्रकी कान्ति देखनेसे कीर्मि अतिशय आल्हादित हुई । महाकालके वीर्यसे
यह कीर्मिका पुन उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ १० ॥
वात्सल्यं तत्र दृष्ट्वाह तत्पुत्रो भैरवस्य च ।
तयानिशं रति चापि महाङ्कुशमहाभुजम् ।। ११ ।।
राज्याप्ति सह तस्यापि कीमिचेष्टां च शाम्भवि ।
कामरूपांतकः शाल्वो राज्यं प्राप्ती महाइकुशः॥१२॥
भैरवके उस पुत्रको देखनेसे मुझको अत्यन्त वात्सल्य उत्पन्न हुआ। हे
शाम्भवि ! महाभुजशाली महाकुंश अत्यन्त यत्नसहित ललित और पालित
होने लगा। कोमिकी तपस्यासे उसको राज्य प्राप्त हुआ। कामरूपान्तक
शाल्व इस प्रकार महाकुंश रूपमें राज्यको प्राप्त हुआ ॥११॥१२॥

भाषाटीकासमेतम् । ( १६९)
कीमयोंनि समासाद्य कुलाचारपरायणः ।
समर्चयद्यथा काश्यां तथा तत्रापि सर्वदा ॥ १३ ॥
वह शाल्व कीर्मिके गर्भ से उत्पन्न होकर कुलाचारपरायण हुआ और
सदाही काशीमें वास करके तुम्हारी पूजा करने लगा ॥ १३ ॥
त्वत्पूजा तत्र महती भविष्यति दिवानिशम् ।
महाकुशं समुद्भूय काश्यामास्कन्दनं कुतः॥१४॥
ततः प्लवेतिनामा च जगाम मणिमण्डपम् ।
एवं ते कथितं देवि चरितं प्लवसम्मतम् ॥ १५ ॥
हे देवि ! वहा रातदिनही तुम्हारी महती पूजा होगी, इसमें सन्देह
नही । महाकुंशकी उत्पत्तिके पीछे अन्य काशीमें आक्रमण और
आस्कन्दादि कुछ नहीं है। फिर यह प्लवनामसे विख्यात होकर
मणिमण्डपमें गया । हे देवि ! यह मैने तुमसे प्लवचरित्र वर्णन
किया ॥ १४ ॥ १५ ॥
यावनं चरितं किञ्चित्कथयामि शृणुष्व तत् ।
आसीत्रेतायुगे राजा बाहुर्धर्मपरायणः ।
महाबुद्धिमहायोद्धा सूर्यवंशसमुद्भवः ॥ १६ ।।
हे देवि ! कुछेक यवनचरित्र वर्णन करता हूं सो सुनो। त्रेता युगमें
बाहुनामक महावुद्धि महायोद्धा धर्मपरायण सूर्यवंशीय राजा था ॥ १६ ॥
पितृशन्विनिर्जित्य सप्तद्वीपां वसुन्धराम् ।
बुभुजे परम कामं योगध्यानं तु विस्मृतम् ॥ १७ ॥
वह पिताके समस्त शत्रुओंको जीतकर सप्तद्वीपवाली पृथ्वीमें सब परम
भोग्य विषय भोगने लगा। किन्तु योग ध्यानादि सब भूल गया ॥ १७॥

(१७०) योगिनीतन्त्रम् । बहुकाले महामाये ततः स्वमदमोहितः मत्तोधिकोऽधिको राजा नास्तिभूमण्डले धुना ॥१८॥ निपात्य पितृशत्रून्यत्पितृश्राद्धं कृतं मया । एवं जातो ह्यहंकारः सर्वनाशकरो हि यत् ॥ १९ ॥ हे महामाये ! फिर बहुत कालमें वाहुराजा अपने मदसे मोहित होकर विचारने लगा कि इस समय पृथ्वीमण्डलमें मेरी अपेक्षा बलवीर्य वैभवादिसम्पन्न राजा और कौन है ? मैने पिताके शत्रुओंको मारकर तब पितृश्राद्ध किया है, इस प्रकार सर्वनाशकरअहंकार उसके मन में उत्पन्न हुआ ॥ १८ ॥ १९ ॥ तस्मानु पापसञ्चारो जातस्तस्य महीभुजः। पापात्मा यो भवेद्राजा राजता न कदाचन ॥ २० ॥ इसी कारण उस महीभुज राजाको पापका सञ्चार हुआ । जो राजा पापात्मा होता है, उसका राज्य कभी नहीं रहता ॥ २० ॥ अहंकारो युद्धचर्या सदा नैवं व्यवस्थितम् । महापापानि सर्वाणि साङ्गान्येतानि निश्चितम् ॥२१॥ अहंकार और युद्ध, यह सदैव निश्चित नहीं हैं यह सब वीरोंके पक्षमें निन्दनीय, विनाशके हेतु और महादोषाकर हैं ।। २१ ॥ तस्य तेनैव भावेन राजलक्ष्मीर्विनिर्गता। आविर्भूतो हैहयश्च तालजंघा नृपोत्तमाः ॥ २२ ॥ इसी कारण बाहुराजाकी राजलक्ष्मी शीघ्र विच्युत होगई । तत्काल तालजंध और हैहयराजका अविर्भाव हुआ॥ २२ ॥ मन्त्रयित्वा च राजनो लंघयित्वाम्बुधिं तदा । व्यजिताः करदानेन प्रापुरुत्तरकोशलान् ॥ २३ ॥ .

भापाटीकासमेतम् ।
आदौ पराजितस्तैस्तु बाहुमासेन निकृतः ।
जितराज्यो
बाहुराजा
सन्त्रीको वनमायया ॥ २४ ॥
राजाओंने एकत्र मिलित होकर मंत्रणापूर्वक समुद्र लंघन करके
बहुराजको परास्त करनेके पोछे उत्तरकोशलका अधिकार कर लिया
बाहुराज्य क्रमशून्य थे, अतएव एकही मासमें पराजित हुए । हृत राज्य
बाहुराज स्त्रीसहित वनको चले गये ॥ २३ ॥ २४ ॥
ममार तदने बाहुः समस्त निष्प्रभ यथा ।
तत्पुत्र: सगरो धीरो महावीर्य पराक्रमः ।
विसज्जितो तेन भूपौ तालजंघोथ हेहयः ॥ २५ ॥
अवमानाद्वसिष्ठस्य तत्तयोरीहशी गतिः।
पुनश्च नौ च राजानौ यवनो प्राणकातरौ ॥२६॥
वसिष्ठं शरणं यातौ रक्ष रक्षेति वादिनो।
ततस्तान्यवनाविप्रो वसिष्ठस्त्वभयं ददौ ॥ २७ ॥
यहां उन्होंने प्राण त्याग किया, इससे सब ही निस्तेज हो गये।
बाहुका पुत्र सगर, धीर, महावीर्य और महापराक्रमशाली था । उस
भुजबलसे तालजंघा और हैहय गणोंको राज्यसे दूर किया था। उन्होंने
वसिष्ठजीका अपमान किया था, इसी कारण उनकी ऐसी दुर्दशा हुई
थी। इन दोनों यवन राजने प्राणभयसे कातर होकर वसिष्ठके निकट
आगमन पूर्वक रक्ष रक्ष कहकर आश्रय लिया। वसिष्ठने इन यवनोंको
अभयदान दिया ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे भूपः सगरः क्रोधमूच्छितः।
तान्हन्तुकामो नृपतिर्वसिष्ठान्तिकमाययौ ॥२८॥
तं तथाभूतमालोक्य वसिष्ठो ब्रह्मसम्भवः।
उवाच सगरं देवि धर्मज्ञं बाहुनन्दनम् ॥ २९ ॥

(१७२)
योगिनीतन्त्रम् ।
उसी समयमें सगरराज कोधसे मूर्छित हो उनके विनाश करनेकी
इच्छासे वसिष्ठ के समीप उपस्थित हुआ। ब्रह्मसम्भव वसिष्ठ ऋपिने धर्मज
वाहनन्दन सगरराजाको आया हुआ देखकर कहा ॥ २८ ॥ २९ ॥
बाहुनन्दन माहिंसीरभयं दत्तवानहम् ।
तच्छ्रुत्वा स्थगितो राजा बाहुजो ह्यभवत्कृती ॥३०॥
हे वीर वाहुनन्दन ! तुम इनको मतमारना मैने इनको अभय दिया
है । यह सुनकर वाहुराज कृतिवर सगरने स्थगित (आश्चर्यको प्राप्त) होकर
विचार किया ॥ ३० ॥
ब्रह्मवाक्यं वृथा न स्यात्प्रतिज्ञा मेऽपि पूर्वजा।
इदानीं किं करोम्यद्य संकटं समुपस्थितम् ।। ३१॥
मैने पहिले प्रतिज्ञा करी है कि कभी ब्रह्मवाक्यका अपमान नहीं
करागा, अवमै क्या करूं, मुझको विषम संकट उपस्थित है ॥ ३१ ॥
इति सञ्चिन्त्य तत्सर्वं वसिष्ठं स न्यवेदयत् ।
हन्मि तान्मानुषगणान्प्रतिज्ञा मे कृता पुरा ।। ३२ ।।
यह सब विचारकर वशिष्ठजीसे निवेदन किया। मैने पूर्वमें प्रतिज्ञा
की है कि इन सब यवनोंको हनन करूंगा ॥ ३२ ॥
तब त्वद्वचनं श्रुत्वा इतोऽहं किं करोम्यतः।
त्वद्वाक्यमन्यथा कर्तु नाहं शक्तो मुनीश्वर ॥ ३३ ॥
अब आपका वचन सुनकर मै हतबुद्धि हुआ हूं क्या करूं कुछ
स्थिर नहीं करसकता. हे मुनिवर | में आपका वचनभी अन्यथा नहीं
करसकता ॥ ३३ ॥
यदोपाय नो करोषि श्रेयो मे मरणं तदा ।
एवं श्रुत्वा वसिष्ठोसौं सत्वरं प्रत्यभाषत ॥ ३४ ॥
यदि आप इसका उपाय न करेंगे, तो मेरा मरनाही श्रेष्ठ है । यह
वचन सुनकर वशिष्ठने शीघ्र उत्तर दिया ॥ ३४ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१७३)
वसिष्ठ उवाच ।
मा विषादं गच्छ सखे कर्तव्यं यच्छृणुष्व तत ।
तवारातीनिमान्सर्वामुण्डयित्वा शिरांसि तु ।
वेदाचारवाहि नान्देशात्वं कुरु दूरतः ।। ३५ ॥
वसिष्ठजी बोले-हे सखे ! तुम विपाद मत करो । मुझसे कर्तव्य सुनो।
आपने इन सब शत्रुओंका शिरमुण्डन और इनका वेदाचार बहिर्भूत करके
देशसे दूर निकाल दो ॥ ३५ ॥
हिमाद्रेः पश्चिमे भागे देशे तु यवनो नृपः।
इत्थं मे वचनं तिष्ठेत्प्रतिज्ञाऽपि च ते विभो ॥६६॥
शिरसां कृन्तनं युद्धे मुण्डनं तद्वदेव हि ।
वेदेऽपि स्थिरमतद्धि समानं समुदाहृतम् ॥ ३७॥
हिमाचलके पश्चिम भागमें यवन देश है, वहां इनको निकाल दो।
तो तुम्हारी प्रतिज्ञा भी मिथ्या नहीं होगी, क्योंकि शिरछेदन और
शिरमुण्डन एक कार्य है । वेदमें यह दोनों कार्य ही समान कहे गये
हैं ॥ ३६ ।। ३७ ॥
ईश्वर उवाच ।
इत्थं तद्वचनं श्रुत्वा सगरोऽपि तथाकरोत ।
तेऽपि वै क्षत्रियाः सर्वे हेहयास्तालजङ्घकाः।
विडम्यिता विहीनास्ते सदा मुण्डितमस्तकाः ॥३८॥
ईश्वरने कहा-वसिष्ठीका यह वचन सुनकर सगरने भी उनके प्रति
वैसा ही आचरण किया । क्षत्रिय हैह्य और तालजंघगण इस प्रकार
मुंडितमस्तक विडम्बित ( अपमानित ) और हीन होकर ॥ ३८ ॥
सुषेणं मुनिमाश्रित्य सदाचारविवर्जिताः ।
सुषेणस्योपदेशात्ते तपस्तपुः सदाश्रिताः ॥ ३९ ॥

योगिनीतन्त्रम् । सुपेग मुनिका आश्रय ग्रहणपूर्वक सदाचाररहित होकर रहे अनन्तर मुनिके उपदशसे उसने सदा तपस्या करनी आरम्भ की ॥ ३९ ॥ यमाश्रित्य महादेवि स्वेच्छाचारपरायणाः तामसास्ते महादेवि तामसंभावमाश्रिताः ॥ ४० ॥ हे महादेवि ! वह स्वेच्छाचारपरायण थे, अतएव तामस भाव ग्रहण पूर्वक तामसधौ हुए ॥ ४० ॥ संयोगश्च वियोगश्च मन्त्राणाञ्च द्विधा गतिः। सात्विके राजसे देवि संयोगः फलदायकः । बाह्यान्तरवियोगेन संयोगोपि ह्यनुत्तमः। तामसे तु वियोगः स्याद्वाह्यसिद्धिफलप्रदः ॥ ४१ ॥ समस्त मन्त्रोंकी गति सयोग और वियोग भेदसे दो प्रकार है । हे देवि । सात्विक और राजधर्ममें सयोग फलदायक बाह्यान्तर वियोगसहित सयोग भी उत्तम है, तामसमें वियोगबाह्य भी सिद्धिप्रद होता है ॥ ४१ ॥ तामसः परलोके तु बाह्यस्तद्धर्म ईरितः। तेषां तेनैव भावेन प्रसादो मेऽभिजायते । मया दत्तो वरस्तेभ्यः शृणु कामयितुर्वरम् । भुक्ष्वेदानीमिदं राज्यं यवनाभीष्टमेव च ॥ ४२ ॥ तामस परलोको बाह्य धर्म कहा जाता हे उनके इस तामस भावमें ही मेरी प्रसन्नता होती है, मैने उसको वर दिया था, सो उन कामना करनेवाले के वरको सुनो। हे यवनो! तुम इस समय यह राज्य भोग करके अवस्यान करो।॥ ४२ ॥ काले तथन्दष्टनवोन्मिते शाके कलौ युगे । पुण्यदेशाधिपा यूपं भविष्यथ सुनिश्चितम् ॥ ४३ ।।

भाषाटीकासमेतम् । (१७५)
और कलियुगमें इन्दु अष्ट नव शाक अर्थात् नौसौ इक्यासी (९८१)
गत होनेपर तुम निःसन्देह पुण्यदेशके अधिकारी होगे ॥ ४३ ॥
एवमेव महेशानि कामरूपाधिपः शिवे ।
यवनो मत्प्रसादेन तथान्यपुण्यभूमिषु ।
बहुभूपसमाकीर्णः कलौ भुक्त महीं मुदा ॥ ४४ ।।
हे महेश्वार शिवे ! इस प्रकार यवनगण कामरूपके अधीश्वर हुए थे
यवनगण मेरे प्रसादसे कलिकालमें अन्यान्य पुण्यभूमिके अधीश्वर होकर
बहुतर यवनराज प्रफुल्लित चितसे पृथ्वीको भोगते हैं ॥ ४५ ॥
एवं ते कथितो देवि वृत्तान्तो यावनः सदा ।
इदानीं श्रूयतां युद्धे सौमारचरितं तथा ॥ ४५ ॥
हे देवि ! यह मैने तुमसे यावनिक वृत्तान्त कहा। अब सौमारगणोंके
युद्धकं चरित्रकी कथा सुनो ॥ १५ ॥
एकदाऽमरराजस्तु खाण्डवं वनमाययौ ।
विहाय देवराज्यं च कौशलाङ्या सह स्वयम् ॥४६॥
एक दिन अमरराज इन्द्र अमरराज्य छोडकर कौशलाहीके सहित
खाण्डव वनमें गये ॥ ४६ ॥
गतेषु बहुकालेषु क्रीडया देवभूभुजः।
तौर्यविके सम्यगिच्छा जाता बहुविधा तथा ॥४७॥
देवराजने वहां बहुतकाल क्रीडा करी तदनन्तर उनकी तौर्यत्रि-
कादि (गाना नाचना बजाना इत्यादि) विषयमें सम्यक् वासना उत्पन्न
हुई ॥ ४७ ॥
रम्भां तिलोत्तमां काञ्ची कुरङ्गाक्षा मनोहराम् ।
आदिदेश समानीय नृत्यं कर्तुं च रम्भया ॥ ८॥

,
(१७६)
योगिनीतन्त्रम् ।
ततरतेन वृताः सर्वा वेश्या ननृतुरन्विता।
इन्द्र विधिविधानेन तोषयामासुरोजसाः ॥४९॥
अनन्तर देवेन्द्रने रम्भा, तिलोत्तमा, काश्ची, कुरङ्गाक्षी, मनोहरा, इन
सब स्वर्गकी स्त्रियोंको रम्भाके साथ बुलाकर नाचनेकी आज्ञा दी। देव-
राजसे धुलाई हुई अप्सराओंने नाचना आरम्भ किया । अनेक प्रकार के
विधानसे स्वर्गकी वेश्याओंने इन्द्रको सन्तुष्ट किया ॥४८॥४९॥
मोहिता चापि कौशानी देवराजेन सङ्गता।
तासां नृत्यप्रगीतेन कामोद्रकोऽभवत्तदा ॥५०॥
अनन्तर कौशाङ्गी मोहित होकर देवराजस सगत हुई, तब उनके नृत्य
गीत द्वारा इन्द्रको काम उत्पन्न हुआ ॥ ५० ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवि या स्ववेश्या मनोहरा ।
तया रति समकरोदेवेन्द्रो बलसूदनः ॥ ५१ ॥
फिर सुरासुरप्रणम्य दुर्दान्त दनुजशास्ता वलघातक इन्द्रने मनोरमा
नामक स्वर्गवेश्याके प्रति अनुराग प्रदर्शन किया ॥ ५१ ॥
इन्द्रं तद्विधमालोक्य मनो दधे तथा तु सा ।
कामवेगेन विभ्रान्ता स्खलिता नृत्यगीतयोः॥५२॥
इनको इस प्रकार अनुरक्त देखकर उस मनोहरा स्वर्गको वेश्याने भी
इन्द्र के प्रति मनोधारण किया। इससे कामावेशके कारण घबड़ा कर मनो-
हराका नृत्य गीत स्खलित होने लगा || ५२ ।।
रतिधेर्य तयोर्जातं तस्यास्तत्स्खलनं पुन ॥ ५३ ॥
ततस्तस्या मनो ज्ञात्वा कौशाङ्गी क्रोधमूच्छिता।
उवाच निष्टुरां वाणीं शृणु देवि मनोहरे ॥ ५४ ॥
यह देख और उन दोनों की प्रीति उत्पन्न हुई जान कोशङ्गीने
शोध मूति हो निष्ठुर वचनोंके द्वारा मनोहरासे कहा-हे मनोहरे ।
सुनो || ५३ ॥ ५४ ॥

अत भाषाटीकासमेतम् । (१७७) भूत्वा वेश्या महादुष्टा मदतं देवमीहसे ! अतः प्रचलितं चित्तमावयो रतिकर्मणि ॥ ५५ ॥ तू स्वर्गकी महादुष्ट वेश्या होकर मुझमें प्रीति करते हुए देवेन्द्रकी इच्छा करती है इसी कारण हमारे रति कार्यमें विघ्न उपस्थित कराकर उसको भम कर दिया |॥ ५५ ॥ अतो वेश्ये याहि भुवि राजानं पतिमाप्नुहि । एवमुक्तं दुष्टशापं कौशाङ्गीमुखनिःसृतम् । श्रुत्वा च मूच्छिता भूत्वा कोशाङ्गीचरणेऽपतत्॥५६॥ मर्त्यलोकमें जाकर नरपतिको पति प्राप्त करो। कौशाहीके मुखसे निकला इस प्रकार दुष्ट शाप सुनकर मनोहरा मच्छित हो कौशाङ्गीके चरणोंमें गिरगई ।। ५६ ॥ विललाप सुदुःखार्ता धृत्वा च चरणौ मुहुः। ततो जगाद कौशाङ्गी द्वात्रिंशद्धायनं भुवि । भुत्क्वा मनोहरे शापं पूणे स्वास्थ्यं गमिष्यसि॥५७॥ वारम्वार चरण पकड़ कर विलाप करने लगी यह देखकर कौशाङ्गी- को करणा उत्पन्न हुई । उसने कहा तु वतीसवर्ष शाप भोगनेके पीछे फिर सुस्थता लाभ करेगी || ५७ ॥ मन्दाकिन्यां त्यक्ततनुस्ततः स्वर्ग गमिष्यसि । कडूता मोहिनी सा तु धार्तराष्ट्र पतिं गता॥ ५८ ॥ फिर तू मन्दाकिनीमें मनुष्यशरीर छोडकर स्वर्गम जायगी । उस मनोहराने मर्त्यलोकमें कंकती नामक मोहिनी कामिनी होकर धार्तराष्ट्रको पति लाभ किया ॥ ५८ ॥ कौरवे च कुरुक्षेत्रे हते नारिशतं मृतम् । तूर्णञ्च कसती सागाचन्द्रचूडगिरि भिया ॥ ५९॥ १२

(१७८) योगिनीतन्त्रम् ।
अत्युच्चशिखरे तस्य सा तस्थौ भृशदुःखिता।
माता ऋतुं स्वर्गवेड्या द्वितीयदिवसे निशि ।
कामवाणश्च संविधा मूच्छिता तापमागता ॥ ६० ॥
फिर कुरुक्षेत्रके समरमें कौरवोंके निहत होनेपर सौ नारियोंने प्राण
त्याग किया ककती ढरकर शीघ्रतासहित चन्द्रचूडपर्वतमें भाग गई । कंकती
अत्यन्त दुःखित होकर उस पर्वतके अत्यन्त ऊंचे सिखरमें वास करने लगी
एक समय वही स्वर्गवेश्या ऋतुमती होकर दूसरे दिन कामबाणसे विद्ध हो
अत्यन्त सन्तापित हुई ।। ५९ ॥६०॥
इन्द्रो रथसमारूढोऽयादपश्यत्तु सुन्दरीम् ।
सालंकारा कुशद्वीपात्स्मृत्वा तत्पूर्वकारणम् ॥ ६१ ॥
वेदयित्वा च तत्सर्व तां कान्तो काममोहिताम् ।
रतिं कृत्वा गतस्तस्याः सुतोभूच ह्यरिन्दमः ।। ६२ ॥
इसी समय देवराजने रथमें चढकर कुशद्वीपसे गमन करते करते
गहनोंसे युक्त उस सुन्दरीको देखा । उन्होंने पूर्वकारण स्मरणपूर्वक
उस काममोहिता काताको समस्त विदित कराया । फिर आसक्त होकर
उसके संग सहवास किया इसीसे गंधमादनपर्वतमें कंकतीके आरन्दम
नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
कडूत्याः परमेशानि पर्वते गन्धमादने ।
यतो जग्राह तामिन्द्रो द्वितीयदिवसे ऋतौ ॥ ६३ ॥
ततः सोरिन्दमश्चाभून्म्लेच्छाचारपरायणः ।
ध्यावृत्तिरतो घोरः सर्वदा प्राणिहिंसकः ॥ ६४ ॥
सर्यमांसादनो देवि किरातो घटितो यथा ।
सर्वपुण्यवहिर्भूतः सर्वपापसमाकुलः ॥ ६५ ॥

भापाटीकासमतम् । (१७९)
मद्यमांसमदामोदी कदाचारपरायणः ।।
ईदृशं तं सुतं दृष्ट्वा कडूती भृशदुःखिता ॥६६॥
तपस्तपेऽतिगाढं च सारात्सारं परात्परम् ।
तदा तस्याः पुरः स्थित्वा देवराजो जगाद ह ॥६॥
इन्द्रने ऋतुके दूसरे दिन उससे सहवास किया था । इसी कारण आर-
न्दम म्लेच्छाचारपरायण व्याघवृत्तिनिरत घोरतर सब प्राणियोंका हिंसक
मद्य मांस सम्भोगमें आमोदी और किरातके समान सर्वमांसभक्षी । कदा.
चार परायण (निंदित आचारयुक्त पवित्र कर्मसे रहित ) और सर्वप्रकारके
पापोंमें आसक्त हो गया । कंकतीने पुत्रका ऐसा आचरण देख अत्यन्त
दुःखित होकर घोर तप आरंभ किया ॥। तब देवराजने उसके सन्मुख खड़े
होकर कहा ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ ६६ ।। ६७ ॥
इन्द्र उवाच।
किन्निमित्तं तपस्ततं त्वया कंकति मेघद ।
तपसा तेऽतिसंतुष्टो यदीच्छसि ददामि च ॥ ६८ ॥
इन्द्रने कहा हे कंकति ! तुम किस कारण तप करती हो ! मुझसे
कहो । मै तुम्हारे तपसे अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूं। जो इच्छा करोगी
वही दूंगा ॥ ६८॥
कंकत्युवाच ।
सुतस्ते ईदृशो जातः सदा पापपरायणः॥
द्रष्टुं न शक्ता देवेश यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६९ ॥
देवाधिदेव देवेश सुतोयं ते सुराधिप ।
भवेत्सत्यं न सन्देहः पापचारी नराधमः ॥ ७० ॥
यतस्त्वं देवतानाथो विराधोयं सुतस्तव ।
यथेच्छसि तथा नाथ कुरु मां नय हे प्रभो ॥ ७१ ॥

(१८०) योगिनीतन्त्रम् । किंकरीत्वं पार्श्वदेशे किङ्करीत्वे नियोजय । देवाधीश वरो ह्येष नात्यः कामः कदाचन ॥ ७२ ॥ कंकती बोली मेरे गर्भसे तुम्हारी जो सन्तान उत्पन्न हुई है। वह सदा ही पापाचारमें निरत है हे देव ! मैं उसका पायाचार देखनेमें समर्थ नहीं हूं। आप इस विषयमें जो उत्तम हो वहीं कीजिये । हे देवाधिदेव ! देवेश ! तुम्हारा यह पुत्र नराधम होगा इसमें सन्देह नहीं । हे इन्द्र ! आप देव- ताओंके अधिनाथ है। तुम्हारा पुत्र ऐसा नराधम हुआ । इस विषयमें आपकी जो इच्छा हो वह कीजिये मुझको शीघ्र ही जहाँ इच्छा हो वहां ले चलिये इस किंकरीको लेकर किकरी कार्यमें नियुक्त कीजिये । हे देवाधिप ! यही मेरी कामना है । अन्य कामना मेरी नहीं हैं॥६९॥७०।७१॥७२॥ इन्द्र उवाच । शृणु प्रेयसि मद्वाक्यं शापकालो गतस्तव । त्वरित नेप्याम्पधुना त्वामहं सुस्थिरा भव ॥७३॥ इन्द्रने कहा-हे प्रेयसि ! सुनो तुम्हारा शापकाल बीत गया। अब तुझको शीघ्र ही ले जाऊंगा । स्थिर होओ ॥ ७३ ॥ पुत्रस्य पापयोगेन घंशनाशो ध्रुवं भवेत् । अतः शताष्टविंशे च पुरुषे क्षयिते सति ॥ ७४ ॥ सौमारवासिनो भूत्वा वंशे मे राजपुङ्गवाः ॥ ७५ ॥ न्यायबुद्धिमहोत्साहा देवविप्रपरायणाः ॥ भविष्यत्ति न सन्देहो ब्रह्मज्ञा ब्रह्मवादिनः । गच्छन्ति चापि बैकुण्ठे सर्वेस्युर्विष्णुवल्लभाः ॥ ७६ ।। लयमेष्यन्ति तत्रैव यावदाभूतसंप्लवम् ।। ७७ ॥

भाषाटीकासमेतम् ।
पुत्रके पापयोगसे वंशका नाश होता है। अत एव एकसौ अट्ठाईस
पुरुषके क्षय होनेपर त्वदीयगर्भज मद्वेश्यगण सोमारदेशमें वास करके
राजश्रेष्ठ होंगे। वह सब पुण्यश्लोक अर्थात् ईश्वरभक्त धर्मरत सदा-
चारपगयण न्यायबुद्धिसम्पन्न महोत्साहशाली ब्रह्मतत्त्वज्ञ और देव-
द्विजपरायण होंगे। इसमें सन्देह नहीं । वह सभी विष्णुभक्तिपरायण
होकर वैकुण्ठमें जायेंगे फिर जब प्रलय होगी तब वह प्रलयको प्राप्त
होंगे ।। ७४-७७॥
ईश्वर उवाच ।
ततस्तान्तु समादाय जगामेन्द्रो निजालयम् ।
तथा काले तु सौमार: कामरूपाधिपोऽभवत् ॥ ७८ ॥
ईश्वरने कहा तदन्तर इन्द्र उस कंफतीको अपने स्थानमें ले गया
यथाकालमें फेकती गर्भज सौमारगण कामरूपके अधीश्वर हुए ।। ७८ ॥
पूर्वभागे च सौमारः कुवाचः पश्चिमे तथा ।
दक्षिणे यवनस्तद्वदुत्तरे प्लव एव च ॥ ७९ ॥
पूर्व भागमें सौमार पश्चिममें कुवाच दक्षिणमें यवन और उत्तरमें
प्लवगणने राज्य किया था ॥ ७९ ॥
एवमेव महादेवि ते सर्वे कामपालकाः।
एवं ते कथितं देवि सौमारचरितं हि तत् ॥ ८ ॥
है महादेवि ! यह सब कामरूपके पालक हुए थे हे देवि ! यह मैंने
तुमसे सौमारचरित वर्णन किया ॥ ८०॥
इतः किमिच्छसि श्रोतुं यत्त्वया न श्रुतं क्वचित॥८॥
इसके पीछे जो कभी तुमने नहीं सुना ऐसा और क्या सुननेकी
इच्छा है ? सो कहो || ६१॥
इति श्रीयोगि तन्ने मर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्बाद चतुरिति
माहमे भापाटीकायां चतुर्दश. पटल ॥ १४ ॥

(१८२)
योगिनीतन्त्रम् ।
श्रीदेव्युवाच ।
पृच्छामि त्वां रहः किंचित्कामारख्या का बदस्व मे॥१॥
श्रीदेवी ने कहा मै आपसे गुप्त रीतिपर पूंछती हूं हे देव ! कामख्या
किस प्रकार है ! यह मुझसे कहिये ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच ।
या काली परमा विद्या ब्रह्मरूपा सनातनी।
कामाख्या सैव देवेशि सर्वसिद्धिविनोदिनी ॥२॥
ईश्वर बोले-हे देवेशि ! जो ब्रह्मरूपा सनातनी महाविद्या परमेश्वरी
काली है वही सर्वसिद्धि विनोदिनी कामख्या है ॥ २ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
कथं काली ब्रह्मरूपा कामाख्याभूमिहेश्वर ।
सर्व मे कृपया नाथ वद त्वं चन्द्रशेखर ॥ ३ ॥
श्री देवी बोली-हे नाथ ! हे महेश्वर ! हे चन्द्रशेखर ! ब्रह्मरूपा
काली किस प्रकार कामाख्या हुई करूणाप्रकाश करके इसका मुझसे
वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
ईश्वर उवाच ।
यदा सृष्टिः कृता धात्रा स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
तदाहङ्कारदोषेण पूरितोसौ पितामहः ॥ ४ ॥
ईश्वर बोले हे देवेशि ! स्वयम्भू ब्रह्माजीने जब सृष्टि करी तब वह
पितामह अहंकारके दोपसे परिपूर्ण होगये ॥ ४ ॥
अहंकार सर्वनाशकरः सर्वस्व चेश्वरि ।
तेमहंकारमादाय स्थितो ब्रह्मा जगद्विभुः ॥ ५॥
हे ईश्वार ! अहंकार सबकाही नाश करता हैं जगन्निधि ब्रह्मा उस
अहंकारको लेकरही स्थित हुए थे ॥ ५॥

भापाटीकासमेतम् । (१८३) विस्मृतः सर्ववृत्तान्त. कालिकोक्तो हि यः पुरा । केवलाहमतियुतो धाता भूतो हि सर्वदा ॥ ६॥ सर्वकामालयं विश्वं कस्य वा किंनिमित्तकम् । अज्ञात्वेव महादेवि ब्रह्माईकारमोहितः॥ ७ ॥ तं तथाभूतमालोक्य ब्रह्माणं परमेश्वरि । तदेहात्कल्पयामास तदहंकारतः शिवे ॥८॥ दैत्यं परमदुर्द्धर्ष केशिनामानमुद्यतम् । निःसृत्य ब्रह्मणो देहाईत्यः परमदारुणः ॥९॥ धावतिस्म तदा देवि ब्रह्माणं प्रसितुं ततः। ततः पलायनश्चक्रे विष्णुना प्रपितामहः ॥ १० ॥ पूर्वमें महाकालीने जो कहा था वह सब भूल गये ब्रह्माजी केवल अहं. कार मेंही मत्त रहे और सर्व काम भोगालय विश्व किसका है ! इसका क्या होता है इस सत्रका कुछ भी तत्त्व धारण नहीं किया केवल माया- वश अहङ्कारमें पूर्ण होकर ही रहे । हे शिवे ! परमेश्वरी कालीने ब्रह्मा- जीको अहङ्कारमें मग्न देखकर ब्रह्माके देहस्थित अहद्वारसे ही परम दुर्द्ध केशिनामक एक दैत्यको उत्पन्न किया यह दैत्य ब्रह्माजीको ग्रास करने के लिये दौडा यह देखकर ब्रह्मा विष्णुके सहित भागनेमें तत्पर हुए ॥ ६ ॥ ॥७॥ ८॥९॥ १० ॥ ततः केशी महादेत्यः पुरं चक्रे च भारते । कशीपुरमिति ख्यातं तत्र स्थित्वा हि दानवः ॥११॥ चुभुजे सकलं देवि भूर्भुवःस्वश्वराचरम् । ब्रह्माणं जहि शब्दोभूत्सदा ब्रह्माण्डमण्डले ॥ १२ ॥ तदनन्तर केशी दैत्यने एक पुर बनाया यह केशीपुरके नामसे विख्यात है । यह महादानव वहा वास करके भूर्भुवः स्वः इत्यादि अखिन चराचर

(१८४)
योगिनीतन्त्रम् ।
भोगने लगा । "ब्रह्माको वध करों यह शब्द ब्रह्माण्डमें सदा ही उठता
रहा ॥ ११ ॥ १२ ॥
ततो ब्रह्मा जगद्धाता विष्णुना निरहड्कृतिः
अस्तोषीजगतां धात्री काली विघ्नविनाशिनीम् ॥१३।।
जगद्विधाता ब्रह्माजी इस समय अहङ्काररहित होकर विष्णुके सहित
जगन्माता विघ्नविनाशिनी कालीकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥
ब्रह्मविष्णू ऊचतुः ॥
नमः परमकल्याणी प्रणवात्मानमीश्वरीम् ।
निजबीजस्वरूपाञ्च कामबीजस्वरूपिणीम् ॥ १४ ॥
मुण्डमालावलीरम्यां लोलजिहां सनातनीम।
मायावीजस्वरूपां च कूर्चबीजस्वरूपिणीम् ॥ १५ ॥
वन्देहं जगतां धात्री काली कमललोचनाम् ।
घोरघोपां शिवाशब्दां मुक्तकेशी दिगम्बराम् ॥१६॥
नमामि कालिकां देवी महाविघ्नविनाशिनीम् ।
प्रणमामि सदा हृद्गां तां च त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ ७ ॥
ब्रह्मा विष्णु कहने लगे । परम कल्याणी प्रणवात्मा ईश्वरीको नमस्कार
है जो निजत्रीजस्वरूपा और कामवीजस्वरूपिणी हैं। उन्ही मुण्डमाला-
वली द्वारा मनोहर महाकालीको नमस्कार है जो मायानीजस्वरूपा और
कूचनीचस्वरूपिणी हैं। उन्हीं लोलजीभयाली सनातनी जगन्माता कमल-
लोचना कालीमाताकी वंदना करते हैं। जो पोर शब्दवाली तथा सब
गीदडी जिनकी संगिनी हैं । और जो उन्हीकी सदृश शब्द करनेवाली हे
जो खुले बालवाली और नग्न हैं उन महाविविन्ननाशिनी कालिकामाताको
नमस्कार करते हैं। जो भुवनेश्वरी हैं उन विश्वजननी महाकालीको भक्ति
पूर्वक प्रणाम करते हैं ॥ ११ ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१८५) ईश्वर उवाच । एवं स्तुता ततो देवी ब्रह्मणा विष्णुनापि च । महसाकाशवाण्याह किमिच्छसि पितामह । भो विष्णो त्वं महाबाहो किमिच्छसि च तद्वद ॥१८॥ ईश्वर बोले-ब्रह्मा और विष्णुके इस प्रकार महाकालीकी स्तुति करनेपर सहसा आकाशवाणी हुई। है पितामह ! तुम क्या वांछना करते हो भो विष्णु तुम भी क्या चाहते हो ? वह कहो ॥ १८॥ ब्रह्मविष्णू ऊचतुः । जातो दैत्यवरश्चैकः केशीनामा महासुरः। आवयोः सकलं नीतं नित्यं तत्तेन मण्डलम् ॥ १९ ॥ हत्वेदानी तमसुरमावां स्थापय पूर्ववत् । देहि दास्य पदाम्भोजे ह्येतद्धि नौ निवेदनम् ॥२०॥ ब्रह्मा विष्णुने कहा केशिनामक एक दैत्यवर महाअसुरने हमारा सम्पूर्ण जगन्मण्डल हरण किया है । इस समय उस असुरको मारकर हमको पूर्वके समान स्थापन कीजिये ! हे देवि ! आपके चरण कमलों में हमारा यही निवेदन है ।। १९ ॥ २० ॥ श्रीकाल्युवाच । शृणु ब्रह्मत्रहो वाक्यमहंकारो गतस्तव । इदानीं परिसन्तुष्टा जगद्यास्यति तेन्तिकम् ॥ २१ ॥ सर्व मायामयं तत्ते विश्वं नान्यस्य पद्मज । अहंकारन्तु ते दृष्ट्वा विनं दत्तं दुरासदम् ॥ २२ । भया तुभ्यं जगद्धातस्तवाहकारनिर्मितम् ।

(१८६)
योगिनीतन्त्रम् ।
केशिदत्यस्वरूपं तद्धन्मि विघ्नं स्थिरो भव ।
मा भयं कुरु भो विष्णो स्थिरो भव महामते ॥२३॥
कालीने कहा-अहो ब्रह्मन् सुनो । तुम्हारा अहङ्कार दूर हो गया है ।
अब यह जानना यह जगत् भी तुम्हारे अधिकार में होगा। यह मायामय
विश्व अन्यका नहीं है । है पद्मज ! तुम्हारा अहङ्कार देखकर तुम्हारे प्रति
दुष विन प्रदान किया था हे जगद्विधात ! यह विन्न तुम्हारा अहङ्कार
ही केशिदेत्यस्वरूप है। जो हो मैं उसको हनन करूगी तुम स्थिर रहो
भो महामते विष्णो ? तुम भय मत करो स्थिर होओ ॥२१॥२२॥२३॥
ईश्वर उवाच ।
एवमासाद्य आश्वास्य ब्रह्मविष्णू परात्मिका।
हुंकारेणैव तं भस्म चकार दानवोत्तमम् ।
केशिनामासुरं काली विधिमाह ततस्तु सा ॥ २४॥
ईश्वर चोले-परमात्मिका महाकालीने इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णुको
आश्वासन भरोसा देकर हुङ्कारसे ही उस दानवेन्द्र महाअसुरके शरीरको
भस्म किया। तदनन्तर दनुजकुलविघातिनी उग्रतन्धी महाकाली प्राणि-
योंके उत्पन्नकर्ता पितामह ब्रामाजीसे स्नेहमय प्रीतिमय मगलमय उदार वच
नोंके द्वारा कहने लगी ॥ २४ ॥
काल्युवाच ।
अहंकारात्पातकं तं जातं ब्रह्मन्महत्तरम् ।
तत्पापस्यापनोदाय क्रियतां पर्वतोसमः ॥ २५ ॥
भस्मना केशिदैत्यस्य गोग्रासतृणपरितः।
तद्माप्तभक्षणानित्यं गौस्ते पापं क्षयिष्यति ॥२६॥

भापाटीकासमेतम् ।
(१८७)
कालीने कहा हे ब्रह्मन् ! अहकारके कारण तुमको महत्तर पाप उत्पन्न
हुआ है । अतएव अपने उपार्जित उम पापसमूहके दूर करनेको केशिदैत्यकी
भस्मद्वारा एक तृणलतापूर्ण पर्वतकी सृष्टि करो यह पर्वत बहुत गोग्रास
धारण करेगा। गौगणोंके तृण लतारूप गोग्रास भक्षण करने पर तुम्हारा
पाप क्षय होगा ।। २५ ॥ २६ ॥
ईश्वर उवाच ।
एकीकृत्य च तद्भस्म केशिदैत्यशरीजम् ।
कमण्डलुजलक्षेपाञ्चकार पर्वत विधिः ॥ २७ ॥
ईश्वर बोले-विधाताने केशिदैत्यके शरीर की भस्म इकट्ठी करके कम-
ण्डलुका जल छिडकनेसे पर्वतकी सृष्टि की ॥ २७॥
नात्युच्छ्रितं नातिनिम्नं गोग्रासबहुना वृतम् ।
तग्रासभक्षणाद्गौश्च तुष्टः पुष्टो भवेयुवम् ॥ २८ ॥
यह पर्वत बहुत ऊचामी नहीं और बहुत नीचाभी नही है वह बहुत
गोग्रास धारण करता हे उस भस्मजातगोग्रासद्वारा गौगण हृष्ट पुष्ट होने
लगा ॥ २८॥
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अतो गोवर्द्धन नाम पर्वताय ददौ विधिः ।
यथा यथाश्नाति गौश्च तद्मासं पर्वतोत्तमे ।
तथा तथा क्षयं याति पातकं ब्रह्मणः शिवे ॥ २९ ॥
तावत्तु निष्कृतिर्धातुविद्रोवर्धनो गिरिः ।
ततस्तनिष्कृतिस्तस्य ब्रह्मणः परमेश्वरि ॥ ३० ॥
इसी कारण विधाताने इस पर्वतका नाम गोबर्द्धन रक्खा हे शिवे ।
परमेश्वार ! गोगण जिस परिमाणसे ग्रास भक्षण करने लगे। ब्रह्माका भी
उसी परिमाणसे पापक्षय होने लगा इस प्रकार गोवर्द्धनगिरिके द्वारा ब्रह्माने
समस्तपापसे छुटकारा पाया ॥ २९ ॥ ३० ॥

(१८८) योगिनीतन्त्रम् ।
एवमेवापराधस्ते प्राधान्ये यदि जायते ।
तत्फलापोहनं ह्येवं सर्वेषाश्च त्रिलोचने ॥ ३१ ॥
हे शिने ! यदि इस प्रकार प्रधान मनुष्य के निकट तुम्हारा कोई अपराध
हो तो इस प्रकार गोग्रासद्वारा उस पापका पीडन हो सकता है ॥ ३१ ॥
ततो ब्रह्मा जगद्धाता विष्णुश जगतां पतिः।
पुनश्च तत्क्रमेणैव अस्तौषीत्परमेश्वरीम् ॥ ३२ ॥
तदनन्तर जगद्विधाता ब्रह्मा और जगत्पति विष्णुने फिर उसी प्रकार
परमेश्वरीकी स्तुति करी ॥ ३२ ॥
ततः काली जगन्माता तावुवाच किमिच्छथः ।
ददामि वत्सौ तत्सर्व भवन्तौ कातरौ कथम् ॥३३॥
तब जगन्माता कालीने उनसे कहा-हे वत्सो ! तुम क्या इच्छा करते
हो ? कहो । मै तुमको वह सर दूंगी | कातर क्यों होते हो ॥ ३३ ॥
ब्रह्माविष्णू ऊचतुः।
आवयोर्जगताश्चैव मङ्गलाय पदाम्बुजम् ।
महामुक्तिप्रदश्चैव त्वदीयमतिनिर्मलम् ॥ ३४ ॥
अदृश्यमपि गोप्य हि मातुराकारवर्जितम् ।
कथन्तत्पूजयिष्यावः सर्वमङ्गलदायकम् || ३५ ।।
भूमौ स्थान कल्पयस्व यजितु तत्पदाम्बुजम् ।
सर्वदा पूजयिष्यावो महामङ्गलकारणम् ॥ ३६ ।।
आवयोश्चैव सर्वेषां महामुक्तिफलाय च ।
तदावयोदानवाद्याः किं करिष्यन्ति चाशुभम् ।
अवश्यं वै तरिष्यावो दुस्तरं त्वत्पदार्चनात् ॥ ३७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (१८९) ब्रह्मा और विष्णुने कहा हे मातः ! हमारे और जगत्की मंगलके निमित्त तुम्हारे महामुक्तिपद अतिनिर्मल अश्य आकारहीन गोप्य और मंगलदायक अत्युच्च पदोंकी हम किस प्रकार पूजा करेंगे ? आप अपने चरणारविन्दोंके पूजनार्थ पृथ्वीमें स्थानकी कल्पना कीजिये । उसी स्थानमें हम महामंगलके कारणस्वरूप महामुक्तिफलप्रद आपके चरणकमलोंकी पूजा करेंगे। इसके द्वारा हमारे देवताओंका अखिल जीवों का मंगल होगा । तो अशुभकारी सब दानवादि हमारा क्या करसकेंगे? हम तुम्हारे चरणोंकी पूजा करनेके कारण दुस्तरसेमी निस्तार पावेंगे । इसमें सन्दह नही ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ श्रीकाल्युवाच । शृणु वत्स महाविष्णो वचनं परमं महत् । येन हुङ्कारबीजेन चकार भस्म दानवम् ॥ ३८ ॥ केशिमंत्रं महाबीजं शब्दब्रह्मस्वरूपकम् । महातेजोमयं विद्धि तद्वीज परमं पदम् ॥ ३९ ॥ कालोने कहा हे वत्स महाविष्णो ! मेरे परम महत् वचन सुनो जिस हुकार वीजसे दानवको भस्म किया है। केशिमंत्र महाबीजभी शब्द ब्रह्मस्वरूप है। वह बीज महातेजोमय और परम पद है ।। ३८ ॥ ३९ ॥ , केशिपुरे च तद्वीज केशिं हत्वा निवेशितम् । आपाताल क्रोशमानं बीजस्य तेजसा व्रतम् ॥ ४० ॥ केशिको हनन करके केशिपुरमें वह बीज स्थापित किया है। और वह ....मात्र पातालपर्यन्त तेजसे ढक रहा है ।। ४० ॥ अतो हि पूज्यं तत्स्थान महातेजोमयं ध्रुवम् । तत्स्थानं त्वं समागम्य मां पूजय यथेप्सितम् ॥४१॥ इस कारण यह स्थान पूज्य और निन्सदेह महातेजोमय है तुम उसी स्थानमें जाकर यथेच्छरूपसे मेरी पूजा करो ।। ४१ ॥

(१९०) योगिनीतन्त्रम्। अतिसंगुप्तभावेन ईप्सितं प्राप्यते फलम् । देवदानवगन्धर्वैरन्यैरपि महामते ॥ ४२ ॥ वहाँ अत्यन्त गुप्तभावसे पूजा करनेपर अभिलासित फल प्राप्त होता है । हे महामते ! देव दानव गन्धर्व और अन्यान्य सभीको पूजा करने पर वही फल प्राप्त होता है । इसमें सन्देह नहीं ॥ ४२ ॥ यथा न ज्ञायते कैश्चित्तथाची त्वं कुरुष्व मे। सर्वापद्भयः परित्राणं करिष्यामि च ते सदा ॥४३॥ जिससे दूसरा मनुष्य न जान सके, उसी प्रकारसे मेरी पूजा करो ऐसा करनेपर मै तुम्हारी सब आपदाओंसे सदा रक्षा करूंगी ।। १३ ॥ क्रोडास्थानमिदं विष्णोरुक्तं तुभ्यमिदं सदा ॥ इच्छाशक्तिस्तु या दत्ता विष्णवे च मया पुरा ॥४४॥ महालक्ष्मीस्वरूपेण सेवते ब्रह्मसंस्थिता । सेव वृन्दास्वरूपेण पुरेऽत्र संभविष्यति ॥४५॥ यह स्थान विष्णुका क्रीडास्थान है, यह मैने तुमसे निश्चित कहा । मैने पूर्व में विष्णुको इच्छा शक्ति प्रदान की है, वह ब्रह्मसंस्थिता शक्ति ही महालक्ष्मीरूपसे विष्णुकी सेवा करेगी। वही पृन्दास्वरूपसे इस पुरमै वास करेगी ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ 811 वृन्दाया वासतस्तदि पुरं वृन्दावनाभिधम् । तत्पुरे चापि भविता तथा त्वत्क्रीडनं ध्रुवम् ॥ १६ ॥ भूत्वा वृन्दा तरुलक्ष्मीरत्र स्थास्यति सर्वदा। दैत्यविधी हि भविता सर्वदैत्यनियूदनम् ॥ १७ ॥ करिष्ये शृणु वत्सेतद्वचनं मे शुभोदयम् । केशिदत्यवधार्थाय यत्र मे पूजनं कृतम् ॥४८॥ भो ब्रह्मन् ! तुम मेरे शुभकर वचन सुनो । वृन्दाके केशिपुरमें अव- स्थित होने पर उसका नाम वृन्दावन होगा । केशिपरम बन्दाके संग .

भाषाटीकासमेतम् । तुम्हारा विवाह होगा । लक्ष्मी वृन्दा तरूपसे इस स्थानमें निरन्तर बास करेंगी। यद्यपि वहां दैत्योंका विन होगा, किन्तु मै उन सब देत्योंका वध करूंगी । केशि दैत्यके वधार्थ तुम जिस स्थानमें मेरी पूजा करोगे ॥ ४६ ॥ १७ ॥ १८ ॥ युवां वै पश्यतन्तत्र जातं मे योनिमण्डलम् । मम तेजःसमुद्भतं विद्धि तद्योनिमण्डलम् ॥ ४९ ॥ सर्वेषामुद्भवस्थानं योनिरेव न संशयः। जानीहि प्रकृति देवयोनिमेतान्तु मामकीम् ॥ ५० ॥ तुम देखो, उसी स्थानमें मेरा योनिमण्डल उत्पन्न हुआ है । यह योनि- मण्डल मेरे तेजसे उत्पन्न है और इसको सबका उद्भवस्थान जानना जो मेरी प्रकृति है, वही योनिमण्डल है ।। ४९ ॥ ५० ॥ संपूज्य योनि देवेश सृष्टिं कुरु यथार्थतः । कस्मादपि भयं न स्यात्तव क्वापि पितामह ॥५१॥ हे देवेश ! इस योनिमण्डलकी पूजा करके तुम सृष्टि करो। हे पिता- मह ! तुमको कहीं भी नहीं है ।। ५१ ॥ अधिष्ठान ममापि स्यात्तत्र पीठे न संशयः । जानीहि तदधिष्ठात्रीरूपं मेऽतिसुशोभनम् ।। ५२ ।। नित्यं पूजय तद्रूपं कामाख्यायोनिमण्डले। योनिमण्डलमासाद्य कामाख्यां यस्तु पूजयेत् ॥५३॥ सर्वासद्धीश्वरो भूत्वा परत्रेह च मोदते । न भयं तस्य कुत्रापि कस्मादपि प्रजायते ॥ ५४ ॥ उसी पीठमें मेरा अधिष्ठान है, इसमें सन्देह नहीं, उस अधिष्ठानस्वरूप मेरे सुशोभनरूप योनिमण्डलमें नित्य पूजा करो। योनिमण्डलमें जाकर जो मनुष्य कामाख्याकी पूजा करता है, वह सर्वसिद्धीश्वर होकर इस लोक

योगिनीतन्त्रम् ।
और परलोकमें आनन्दलाभ करता है उसको कहीं भी किसीसे भय नहीं
होता ।। ५२ ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
तवान्येषां हितार्थाय स्थापित योनिमण्डलम् ।
पृथिव्यां भारते वर्षे कामरूपं महाफलम् ॥ ५५ ॥
तुम्हारे और अन्य सबके कल्याणके निमित्त योनिमण्डल स्थापित हुआ
है, यह महास्थान कामरूपनामक भारतवर्ष में अवस्थित है ॥५५॥
नवयोनिसमाकीर्ण महामुक्तिफलप्रदम् ।
नवयोन्यात्मके ब्रह्मन्कामरूपे मनोहरम् ॥ ५६ ॥
कामाख्यातेजसादेवि दीप्यते योनिमण्डलम् ।
किन्त्विदानी भवत्पापं न पश्यामि कथञ्चन ॥५७ ॥
यह महालय नवयोनि समाकीर्ण और महाफलदायक है । हे ब्रह्मन् !
नवयोन्यात्मक कामरूपमें कामाख्या तेजसे यह मनोहर योनिमण्डल
दीप्ति पाता है, किन्तु इस समय तुम्हारा पाप कुछ भी नहीं देखती
हूं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
अहंकारात्समुत्पन्नं त्रिविध पातकं तव ।
कायिक वाचिकं चैव मानसश्च तथा पुनः ॥ ५८ ॥
अहङ्कारसे तुम्हारा कायिक वाचिक और मानसिक यह तीन प्रकारका
पाप उत्पन्न हुआ है ।। ५८ ॥
तत्पापाद्योनिपीठ मे न पश्यासि कदाचन ।
तत्पापध्यानधाराभिरन्धीभूतो दिवानिशम् ॥ ५९ ॥
उसी पापके कारण तुम मेरा योनिपीठ नहीं देख सकते हो और उसी
पाएके ध्यानधारामें दिनरात अन्धीभूत हो रहे हो ॥ ५९ ।।
तर वाचनिकं पापं ध्रुवं नश्यति दर्शनात् ।
गोवर्धनस्य परयोरुपायं तच्छृणुष्व में ॥ ६॥

८. भापारीकासमेतम् । (१९३) तहां गोवर्धन के दर्शनसे ही वाचनिक पाप नष्ट होता है अब अन्य दो पापोंके शमन होनेका उपाय कहती हूं सुनो ॥ ६० ॥ नक्षत्रलोकानक्षत्रमेकं तत्र निपात्य च । श्रेष्ठन्तज्ज्योतिषा देव दृष्ट्वा पीठं तपः कुरु॥६॥ नक्षत्रलोकसे ध्यानयोगमें एक नक्षत्र निपातित करके योनिपीठको श्रेष्ठ- ज्योति संपन्न देखकर वहां तप करो ॥६१ ।। यावक्ष्यसि ज्योतिनों मिलितं योनितेजसि । तावत्कुरु तपो घोरं तदन्ते पातकद्वयम् ॥ ६२॥ प्रशाम्यति न सन्देहो वसतिं कुरु सत्वरम् । तस्मिस्तपोवशात्तत्तु केनापि न हि वीक्ष्यते ॥६३॥ जबतक योनितेजमें वह ज्योति मिली हुई दिखाई न दे तबतक घोर पस्या करो तदनन्तर वह दोनों पाप नष्ट होंगे इसमें सन्देह नहीं इस कारण शीघ्र वहां जाकर वास करो। वहां तपोवलसे वह कोई नहीं देख सकेगा ५६२ ॥ ६३ ॥ अपराधाच्छ्यलस्तु भवेद्वै गतिरीदृशी। नक्षत्रस्थापनात्तत्र पृथग्जातिषु वारितः ।। ६४॥ स्थानन्तद्गम्यते वत्स सर्वलोके निरन्तरम् । इत्युक्त्वा विररामासी गगनस्था परात्मिका ॥६५॥ अपराधके पीछे श्रेयोलोभका उपाय इस प्रकार जाने । वहां नक्षत्र स्थापन अन्यान्य जातिमें निषिद्ध है, हे वत्स ! अन्य सब स्थानोंमें ही अन्य सब लोग जा सकते हैं, परामिका गगनस्थिता काली यह सब कहकर विरत हुई ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ काली परमकल्याणी तां नत्वा विधिकेशवो। विस्मयाविष्टमनसौराज्यं तचक्रतुस्ततः ।। ६६ ॥ १३

(१९४)
योगिनीतन्त्रम।
अनन्तर केशव और विधाता परमकल्याणी महाकालीको नमस्कार
करके आश्चर्ययुक्तचित्तसे दोनों विश्वराज्यमें राजत्व करने लगे ॥६६॥
इत्येवं कथितं गुह्यं यत्पृष्ट गिरिसम्भवे ।
प्राचीनमतिगोप्यं हि वृत्तान्तं कुलनायिके ॥६॥
हे गिरिवरात्मजे, कुलनायिके ! तुम्हारे पूछनेके अनुसार यह मैने तुमसे
पुरातन अतिगोप्यगुह्य वृत्तान्त कहा ॥ ६७ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्ने सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्वाद चतुर्विशति-
साहसे भापाटीकाया पञ्चदश पटक ॥ १५॥
श्रीदेव्युवाच ।
श्रुतो हि पूर्ववृत्तान्तः सर्वेषामप्यगोचरः।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि कालीरूपाभवत्कथम् ॥ १॥
श्रीदेवीजी बोलीं-हे त्रिलोचन ! सबके ही अगोचर जो प्राचीन वृत्तान्त
था, वह तो मैने सुना अब कालीरूपा किस प्रकार हुई यह सुननेकी इच्छा
करती हूं ॥१॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि परं गुह्यं ब्रह्मादीनामगोचरम् ।
सारात्सारतरं देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥२॥
ईश्वर बोले-हे देवि ! ब्रह्मादिकोंके भी अगोचर सारसे भी सार मोग-
मोक्षदायक परम और गुह्य विपय कहता हूं, सुनो ॥२॥
एकदा विष्णुब्रह्माणो विरोधं चक्रमिथः।
ईश्वरोऽहमीश्वरोऽहमुक्तवन्तौ जलार्णवे ॥ ३ ॥
एक समय जलार्णवमें ब्रह्मा और विष्णुने "मैं ईश्वर । मै ईश्वर" मह
कहकर आपसमें विरोध आरम्भ किया ॥ ३ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१९५)
तयोः शान्त्यै महेशानि प्रादुर्भूतं जलार्णवे।
अप्रमेयं महालिङ्गमदीय पावनं परम् ॥ ४ ॥
ज्ञानाज्ञानमयं दिध्यं दुनिरीक्ष्यं भयङ्करम् ।
तन्मध्येऽहं रुद्ररूपो वभ्राम वृषवाहनः ॥५॥
दृष्ट्वा तु तदाश्चर्य भयकम्पितविग्रहो।
स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्ररूचतुर्मा पुनश्च तौ॥ ६ ॥
हे महेश्वरि ! उनका झगडा मिटानेके लिये मेरा अप्रमेय ज्ञानाज्ञानमय
दिव्य दुर्निरीक्ष्य भयंकर परमपावन महालिंग जलार्णवसे उत्थित हुआ। मैं
रुद्र रूप और वृषवाहन होकर उसमें भमण करने लगा। यह देखकर वह
दोनों भयसे कांपने लगे और अनेक स्तोत्रों के द्वारा मेरी स्तुति करके फिर
मुझसे कहने लगे ॥ ४ ॥ ५॥ ६ ॥
ब्रह्मविष्णू ऊचतुः।
वद कस्त्वं भीमरूप उत्थितोऽसि जलार्णवे ॥ ७ ॥
ब्रह्मा विष्णुने कहा-हे भीमरूप ! जलार्णवसे उत्थित हुए तुम कौन
हो ? कहो ॥ ७॥
रुद्ररूप उवाच ।
परस्पर विरुद्धचन्तौ युवां दृष्ट्वा जलार्णवे ।
उत्थितोऽहं च भवतोरीश्वरत्वं परीक्षितुम् ॥८॥
रुद्ररूपीने कहा-तुम्हारा परस्पर विवाद देखकर तुम्हारे ईश्वरत्वकी
परीक्षा करनेके लिये मैं इस स्थानमें आविर्भूत हुआ हूं ॥ ८ ॥
इत्युदीरितमाकर्ण्य स्थगितौ ब्रह्मकशवौ ।
निगूढ ध्यानतो ज्ञात्वा सन्तुष्टो माधवोऽभवत् ॥ ९॥
ब्रह्मा और केशव यह बात सुनकर मौन हुए तदनन्तर माधव थ्यान-
योगसे निगढ तत्त्व जानकर परम संतोषको प्राप्त हुए ॥ ९॥

( १९६) योगिनीतन्त्रम् ।
उद्विग्नचेतसा ब्रह्मा ध्यात्वा स ज्ञानमाप्तवान् ।
केवलं रुद्ररूपं मां ज्ञात्वासौ कमलासनः ॥१०॥
विचिकित्सापरो भूत्वा विष्णुमाह तदा विधिः ॥११॥
ब्रह्माजी उद्विमचितसे ध्यान करके कुछ ज्ञानयुक्त हुए और मुझको भली
भाति नही जान सके केवल रुद्ररूपको जानकर संदिग्ध हुए किन्तु यथार्थ
तत्त्व न जानकर विष्णुसे कहने लगे ॥ १०॥ ११ ॥
ब्रह्मोवाच ।
भो विष्णो मत्कपालाद्यो जातो रुद्रोप्यसत्तमः॥१२॥
ब्रह्माजी बोले-भो विष्णो ! मेरे कपालसे जो असत्तम रुद्र उत्पन्न
हुए हैं ॥ १२ ॥
ईश्वर उवाच ।
एवमुक्त्वा चोपहासं कृत्वा चापि विगहर्णम् ।
चकार बहुधा देवि विघ्नं दत्तं सुदारुणम् ॥ १३ ॥
मया तस्मै ब्रह्मणे तद्विहितविनिर्मितम् ।
तद्विघ्नमसुरो भूत्वा मध्याहे च यथा रविः॥१४॥
जातत्रिपुरनानासौ दानवो देहतो मम ।
सर्वेषां सकलं नीतामंद्रादीनां महेश्वरि !
तेन दैत्येन देवेशि ततो जिष्णोर्हतं जगत् ॥ १५ ॥
ईश्वर बोले ! इस प्रकार ब्रह्माजी उपहास और निन्दा करने लगे हे
देवि तब मैने दारुण विघ्न प्रदान किया। वह विन मध्यान्हसूर्यके समान
महासुररूपमें आविर्भूत हुआ। इस दानवका नाम त्रिपुर है । उसने मेरे
देहसे उत्पन्न होकर इन्द्रका इन्द्रत्व और अधिक क्या कहूं, सभीका सन
अधिकार हरण कर लिया ।। १३ ॥ १५ ॥

भापाटीकासमेतम् । (१९७)
गरुडं च विना लक्ष्मीमन्यत्सर्वं हनं वलात् ।
हृतं तेनैव दैत्येन ब्रह्मणः कमलासनम् ॥ १६॥
ततः पलायिता देवा ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः।
हिमालयं समासाद्य विष्णुराह तदा विधिम् ॥१७॥
उस दैत्यने विष्णुका गरुढ और लक्ष्मीके अतिरिक्त सम्पूर्ण जगत्
पलपूर्वक हरण किया । जब उस दैत्यने ब्रह्माजीका कमलासन हरण किया।
तब ब्रह्मा विष्णु इन्द्रादि सब देवता भागकर मेरे यहां (हिमालयमें ) उप-
स्थित हुए और माधवने मेरे सामने ब्रह्माजीसे कहा ॥ १६ ॥ १७ ॥
विष्णुरुवाच ।
शिवनिन्दा कृता धातस्त्वया पूर्व जलार्णवे ॥
तेनैव चापराधन वयं सर्वे प्रपीडिताः॥१८॥
विष्णुने कहा-हे विधाता ! तुमने पहिले जलार्णवमें शिवकी निन्दा
की है, उसी अपराधसे हम सब पीडित हुए हैं ॥ १८ ॥
ततस्तु परमेशानं स्तोप्याम्यत्र गिरी पुनः ।
सर्व स मङ्गलं कुर्याद्भयो मे रोचते हदि ॥ १९ ॥
तो आओ, हम इस कैलासाचलमें उनका संतोपसाधन कर, हमारे
हृदयमें भलीभाति बोध होता है कि वही हामरे सर्व प्रकार मंगल करने
वाले होंगे ॥ १९॥
समाश्रित्य तपस्तेपुर्ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः।
हिमालयं तदा देवाः प्रसादो मे भवेत्तदा ॥ २० ॥
तब ब्रह्मा और विष्णु इत्यादि सब देवता हिमालयका आश्रय कर
तपस्या करने लगे। अनन्तर हिमाचलमें उन्होंने मेरा प्रसाद लाभ किया
अर्थात् मैं उनके प्रति प्रसन्न हुआ ॥ २० ॥

(१९८) योगिनीतन्त्रम् ।
पृथिवीं च रथं कृत्वा चक्रे चन्द्रदिवाकरौ ।
ब्रह्माणं सारथिं कृत्वा वेदात्रज्जूंस्तथैव च ।। २१ ।।
देवान् कृत्वा रथाङ्गानि अश्वाश्चैव तथा पुनः ।
धनुः कृत्वा सुमेरुंच ज्यांच कृत्वा तु वासुकिम्२२॥
विश्वं च सकलं कृत्वा रथस्थं यश्चराचरम् ।
वाणं विष्णुं विधायैव त्रिपुरो भस्मसात्कृतः ॥ २३ ॥
हे देवि ! तदन्तर मैंने पृथ्वीको रथ, चन्द्र सूर्यको चक्र ( पहिये ),
ब्रह्माको सारथी, सब वेदोंको रज्जू, देवताओंको अन्यान्य रथाग और
अध, सुमेरुको शरासन (धनुष ), वासुकीको गुण (डोरा ), चराचर
सम्पूर्ण विश्वको रथस्थ और विष्णुको बाण करके चराचर और देव.
देत्यादिकोंके सहित त्रिपुरासुरको भस्म किया ॥ २१-२३ ॥
चराचरेण सहितं देवदेत्यादिभिः सह ।
मया तत्र महेशानि पुनः सृष्टं जगत्ततः ॥ २४ ॥
हे महेशानि ! तदन्तर मैने फिर वहां चराचर देवदैत्यादिकोंके सहित्
जगत्की सृष्टि करी ॥ २४ ॥
यत्र भस्म कृतं देवि जगदेतच्चराचरम् ।
महच्छ्मशानंतद्विद्धि सर्वेषां लयकारणम् ॥ २५॥
हे देवि ! निस स्थानमें यह चराचर भस्मीभूत किया उस स्थानको सबके
लयका कारण महाश्मशान जानना चाहिये ॥ २५ ॥
मृतानां सर्वदेवानां तेजस्तत्र व्यवस्थितम् ।
पंचक्रोशात्मकं भूत्वा तेजसा जगतां तथा ॥२६॥
निर्माय मायया देहं पुरं तस्य वक्षसि ॥ २७ ॥
वहां समस्त मरेहुए देवताओंका तेज निहित है उस स्थानके ऊपर
भागमें जगत्का तेज और मायाद्वारा पंचकोशात्मक त्रैपुर देह निर्माण
करके ॥ २६ ॥ २७॥

1 भाषाटीकासमेतम् । (१९९) तत्र मृत्युस्थले चाहं तुष्टाव परमेश्वरीम् । तत्तेजसि महाकाली परां चैतन्यरूपिणीम् ॥ २८ ॥ ततस्तेजसि सा काली प्रादुर्भूता परा कला । महाद्वीपप्रमाणतु तेजः कालीति कीर्तितम् ॥ २९॥ वहां मृत्युस्सल में मैं परमा चैतन्यरूपिणी परमेश्वरी महाकालीकी स्तुति करने लगा परमा कला महाकालीका वह तेज महाद्वीपप्रमाण है वह काली' इस नामसे कही जाती है ।॥ २८ ॥ २९ ॥ मुखमात्रं समादृष्टं महाकाल्यास्तु तेजसि । अतो गिरिमुख नाम मुनिभिः परीगीयते ॥ ३० ॥ उस तेजमें महाकालीका मुख मात्र दीखता है इसी कारण मुनियोंने इस स्थानका नाम 'गिरिमुख ' कहा है ।। ३० ॥ तदृष्ट्वा परमेशानि आनन्दो जायते ध्रुवम् । आनन्दकाननं तस्माद्गीयते वेदवादिभिः ।।३१।। हे परमेशानि ! उसको देखनेसे दर्शकके मनमें निश्चयही अतुल आनन्द उत्पन्न होता है, इसी निमित्त ब्रह्मवादी उसको । आनन्द कानन्' कहते हैं ॥ ३१॥ कालीमयं हि तत्तेजः सकलं संबभूव ह । यथा तु सागरे गच्छञ्छीकरः सागरो भवेत् ॥ ३२ ॥ तथा सूर्यादितेजो हि कालीतेजो बभूव ह॥ ३३ ॥ तथा नानाजलं देवि गङ्गायां पतितं यदि । गनेव जायते सर्व तथा तेजा सुरेश्वरि ॥ ३४ ॥ वह सभी तेज कालीमय है । जिस प्रकार जलकी बूंदेभी समुद्रमै गिर- कर सागररूपमें परिणत होती हैं, इसी प्रकार सूर्यादिका तेज भी काली- तेज हुआ है जैसे अन्यान्य अनेक जल गंगामें गिरकर गंगाही (२००) योगिनीतन्त्रम् । होजाते हैं ऐसेही हे सुरेश्वार ! अन्य सब तेजभी कालीमय होते हैं ।। ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ सर्व काल्यभवत्पूर्ण नास्ति भेदो महेश्वरि । सर्वं तदमृतं देवि जानीहि सुरसुन्दरि ॥ ३५ ॥ कालीही पूर्ण तेज स्वरूप है । हे सुरसुन्दार ! उनका भेद दिखाई नहीं देता। हे महेश्वार ! उस सबकोही अमृत नानना चाहिये ।। ३५ ॥ तामहं चानिशं देवि शिरसा धारयाम्यहम् । ततो हि शङ्करत्वं मे निश्चित सत्यमेव हि ॥ ३६॥ हे देवि ! मैं उसको सदाही शिरमें धारण कररहा हूं, इसी कारण मेरा शकरत्व सत्य सत्यही निश्चित हुआ है ॥ ३६ ॥ तो काली शिरसा धार्य पचक्रोशिमयों सदा । अहर्निसं पूजयामि परमानन्दद्वंहितः ।। ३७ ॥ उस पञ्चकोशमयी कालीको शिरमें धारणपूर्वक परमान्दसे वर्द्धित होकर मैं दिन रात उनकी पूजा करता हूं ॥ ३७ ॥ अतो विश्वेश्वरत्वं मे सदेवात्र न संशयः। ब्रह्मविष्ण्वादिकानाञ्च ईश्वरो यःतुरेश्वरि ॥ ३८ ॥ इसी कारण मै विश्वेश्वर हुआ हूं इसमें सन्देह नहीं । हे सुरेश्वारि ! वह विश्वेश्वरही ब्रह्मा विष्णु आदिकके ईश्वर हैं ॥ ३८ ॥ विश्वेश्वरः स एव स्यानापरः परमेश्वरि । केवलानन्दवान्भूत्वा पूजयामि परं सदा । तत्र तस्याः कृपा जाता वाग्भवा याशरीरिणी ॥३९॥ अपर कोई ईश्वर नहीं है।हे परमेश्वार ! मैं केवलानन्दमय होकर सदा उन महाकालीकी पूजा करता हूं उन्होंने यहां मेरे प्रति अशरीरिणी पाणी द्वारा पा प्रकाश करी ।। ३९ ।।

भापाटीकासमेतम् । (२०१)
श्रीकाश्युवाच ।
भो देव परमानन्द ममानन्दः कृतस्त्वया ।
अतः काश्यां मृतानां त्वमानन्दं देहि सर्वदा ॥ ४० ॥
श्रीकालीने कहा-भोपरमानन्ददायक देव ! तुमने मेरा आनंद वर्द्धन
किया है, इस कारण तुम झाशीमें मरे मनुष्योंको सदा ही आनंद प्रदान
करोगे।॥ ४०॥
ईश्वर उवाच ।
इति श्रुत्वा वचस्तस्या मनोहममृतार्णवे ।
ददामि परमं ब्रह्म मुमूर्षोंः कर्णगोचरे ॥४१॥
वाराणस्यां सदा देवि स्थित्वा ध्यानपरः शिवे ।
जले स्थले चान्तरिक्षे वाराणस्यां मृताश्च ये ॥ ४२ ।।
ईश्नर बोले हे शिवे ! महाकालीका यह वचन सुनकरमै अमृतार्णव
में निमम हुआ। हे देवि ! मे वाराणसी ( काशी ) में सदा ही ध्यानपरा-
यण हो वास करता हुआ मुमूर्षुगणोंके कर्णगोचरम परम ब्रह्मज्ञान प्रदान
करता हूं। जो मनुष्य वाराणसीम जलमे स्थलमें वा अन्तरिक्ष (आकाश)
में प्राण त्याग करता है ॥ ११॥ ४२॥
ददामि परमं ब्रह्म तेषां हि कर्णगोचरे ।
हित्वा हि सकलं कर्म सुकृतं दुष्कृतं हि सः।
भवेञ्च ब्रह्मानिर्वाणं ममोपदेशतः क्षणात् ।। ४३ ॥
मे उसके कर्णगोचर में परब्रह्म प्रदान करता हूं वह मनुष्य समस्त पुण्य
और पाप कर्म परित्याग करके मेरे उपदेशसे तत्काल ब्रह्म निर्माण लाभ
करता है ॥ १३ ॥
तत्सर्व-सुकृतं कर्म टुष्कृतं वा महेश्वरि ।
भवेद्भस्म महाकाल्या. प्रसादान्ज्ञानयोगतः ॥ ४॥

(२०२) योगिनीतन्त्रम् । है महेश्वारे । वह सब पुण्य और पापकर्म महाकालीप्रसादलब्ध ज्ञाना- मिसे भस्म हो जाते हैं।॥ ४४ ॥ काशीलग्नं हि यत्किञ्चित्काशी भवति तत्क्षणात् । काशीस्पर्शनमात्रात्तु पापराशिविनश्यति ॥ ४५ ॥ जो कुछ काशीमें लग्न होता है, वह कशीस्वरूप होता है. काशीके स्पर्शमात्रसे ही पापसमूह नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ शूली कर्म दहेकालीतेजः स्पर्शात्क्षणात्तथा । तूलराशि दहत्यग्निः किञ्चित्कालाद्यथा शिवे ॥४६॥ कालीके तेजस्पर्श करनेके कारण शूली महादेव क्षणमात्रमेंही कर्म दहन करते हे हे शिवे ! जैसे अग्नि स्पर्शमात्रसे ही रुईके ढेरको जला देती है ॥ ४६ ॥ तथा दहेत्कर्मराशि काशी जन्मेकतो नृणाम् । काशीस्थानं पुण्यचयं कि वाहं कथयामि ते ॥ ४७ ॥ इसी प्रकार काशी मनुप्यके एक जन्ममें ही सब जन्मोंकी कर्मराशि दम्ब करती हे काशीस्थान पुण्यराशिसपन्न है, हे दवि ! पुण्यराशिकाशीकी कथा में तुमसे क्या कह ॥ १७ ॥ अपि चेत्त्वत्समा नारी मत्समः पुरुषोऽस्ति चेत् । तदा काशीफले किश्चिदेवि वक्तुं क्षमो भवेत् ॥ ४८ ॥ यदि तुम्हारी समान नारी और मेरे समान पुरुष हो, तो काशीका कुझ थोडासा फल वर्णन करनेमें समर्थ हो सकता है ॥४८॥ अण्डजा उप्मजाश्चैव उद्भिजाच जरायुजाः। ते सर्वे मुक्तिमायान्ति काश्याश्चेद्भाग्यतो मृताः॥४९॥ अण्डज, उप्मन, उद्भिज और जरायुज, यह चारों प्रकारके जीव यदि ग्यसे काशी में मेरे, तो सभी मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ४९ ।।

भाषाटीकासमेतम् । (२०३)
इयं वाराणसी देवि महातेजोमयी शुमा ।
युगभेदाजनैरेव दृश्यते हि चतुर्विधा ॥ ५० ॥
कृते रत्नमयी काशी वेतायां स्वर्णजा स्मृता।
द्वापरे सा शिलारूपा कलौ भूमिमयी शुभा ॥५१॥
हे देवि ! यह वाराणसी महातेजोमयी और कल्याण दायिनी है
(सत्य युगमें रत्नमयी, त्रेतामें स्वर्णभयी, द्वापरमें शिलामयी और कलियुगमें
मृण्मयी युगभेदसे यह काशी चतुर्विध दिखाई देती है ।। ५० ॥ ५१ ॥
नातः परतरं क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
सत्यं सत्यं महादेवि शपथेन वदामि ते ॥ ५२ ॥
हे महादेवि ! काशीफी अपेक्षा श्रेष्ठतम क्षेत्र तीनों लोकमें दूसरा नहीं है,
यह में तुमसे सत्यही सत्य शपथ करके कहता हूं ॥ ५२ ॥
संसारवत्मनो देवि मुक्तिमिच्छति यः पुनः ।
पाषाणसदृशो भूत्वा तिष्ठत्काइयां नियंत्रितः ॥ ५३ ।।
जो मनुष्य संसारमार्गमें स्थित होकर मुक्ति पानेकी कामना करता है।
वह पत्थरके समान होकर मनसंयमपूर्वक काशीमें वास करै ।। ५३ ॥
स एव पण्डितो ज्ञानी स एव कुलपावनः ।
साणान्तेऽपि महादेवि काशी न निस्त्यजेद्बुधः॥५४॥
हे महादेवि ! जो मनुष्य प्राणान्त होने परभी काशीको नहीं छोडता,
वही मनुष्य पंडित, ज्ञानी कुलपावन और बोधवान् है इसमें सन्देह
नहीं ॥ ५४ ॥
स एव परमो मूर्खः स एव कुलनाशकः ।
वृथैव मूर्खलोकोयं काशी प्राप्य त्यजेत्तु यः ॥ ५५ ॥

- (२०४) योगिनीतन्त्रम् । जो मनुष्य काशीको प्राप्त होकरके फिर छोड़ देता है उसके समान परम मूर्ख और कुन्नाशक दूसरा नहीं है. मूर्खमनुष्यही झाशीको प्रास होकरके फिर छोड देता है ।। ५५ ॥ बहुभिर्जन्मभिः पुण्यैर्यदि काशी लभेत्पुनः । तदा नैव त्यजेत्काशी प्राणान्तेऽपि कदाचन ।।५६१ बहुत जन्मों के पुण्यफलसे यदि काशी प्राप्त हो, तो फिर प्राणान्त होने- परभी उसको कभी न छोडे ॥ ५६ ॥ अनायासेन संसारसागरं यस्तितीर्षति । स गच्छेदपि यत्तेन मम वाराणप्ती पुरीम् ।। ५७ ॥ जो बुद्धिमान् मनुष्य सहजमें संसार सागरसे पार होने की कामना करै वह यत्नपूर्वक मेरीवाराणसी पुरी में जायँ ॥ ५७ ॥ अन्नं दद्यादन्नपूर्णा ज्ञानं दद्यात्सरस्वती । प्राणान्ते मुक्तिदाताह काश्यां स्थित्वा सदेव हि॥५८॥ वहा अन्नपूर्णा अन्न दान करती हैं, सरस्वती ज्ञान देती हैं और मे [दा स्थिति करके प्राणान्तकालमें मुक्तिप्रदान करता हू ॥ ५८ ॥ एवं ते कथित देवि यत्पृष्ट गिरिजे मयि । परम पावन मोक्ष किमितः श्रोतुमिच्छति ॥५९ ।। हे गिरिजे देवि ! तुमने जो मुझसे पूछा था वह परमपावन मोक्षका विषय मैने तुमसे कहा अब और क्या सुननेकी इच्छा है |॥ ५९॥ इति श्रीयोगिनीतले सर्वतन्त्रोतमोत्तमे देवीश्वरसम्वादे चतु विशति साहस्र भापाटीकाया पोडश पटल, १६॥

भापाटीकासमेतम् । (२०५)
श्रीदेव्युवाच ।
गुरुस्त्वं सर्वलोकानां परमेश पुरातन ।
जगदूर्द्धकलाधीश वद कोलानिपातनम् ॥ १॥
श्रीदेवी बोली-हे पुरातन परमेश | आप सर्वलोकोंके गुरु हैं। हे जग-
के ऊर्चलाधीश्वर ! अब कोलानिपातन वर्णन कीजिये ॥१॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कोलासुरनिपातनम्।
महाकालीप्रसङ्गेन वृत्तान्तमिदमभुतम् ।। २ ।।
ईश्वर बोले-हे देवि ! कोलासुरनिपातन कहता हूँ. सुनो । महाकालीके
प्रसंगमें यह वृत्तान्त परम अद्भुत है ॥ २ ॥
पापं जातं ब्रह्मशापाद्विष्णोरतुलतेजसः।
पीडितस्तेन पापेन तपश्चक्रे स सर्ववित ॥३॥
ब्रह्मशापके बलसे अतुलतेजस्वी विष्णुका पाप उत्पन्न हुआ वह सर्वज्ञ
देव उस पापसे पीड़ित होकर तपस्या करने लगे ॥३॥
हिमालयान्तिके गत्वा पापस्यास्य क्षयामिफाम् ।
अष्टाक्षरी महाविद्या महाकाल्याः सदा जपन् ॥ ४॥
वह हिमालयके समीप जाकर उस पापका क्षय करनेवाली महाकाली
की अष्टाक्षरी महाविद्याका सदा जप करने लगे ॥ ४ ॥
दशवर्षसहस्रान्ते सन्तुष्टाभू-महेश्वरी ।
तस्याः सन्तोषमात्रेण विष्णोर्हदयपङ्कजात् ।
कोलानामातुरो भूत्वा निर्गतः सहसा हि तत ॥५॥
हे महेश्वार ! दशहजार वर्ष पीछे महाकाली सन्तुष्ट हुई। उनके
सन्तोपमात्रसे ही विष्णुके हृदयकमलसे कोलानामक महाअसुर सहसा
निकला ॥५॥

(२०६)
योगिनीतन्त्रम् ।
तेन दैत्येन बलिना सर्व नीतं दुरात्मना।
इन्द्रादिसकलान्देवान्विनिर्जित्य महासुरः।
हृतवावैष्णवं धाम ब्रह्मणः कमलासनम् ॥ ६ ॥
उस दुरात्मा बलवान् दैत्यने इन्द्रादिक देवताओंको पराजित करके
अखिल मण्डल विष्णु वैकुण्ठ ओर ब्रह्माका कमलासन इत्यादि सबही जीत
लिया ॥ ६ ॥
ततो विष्ण्वादयो देवाः काली गत्वा सनातनीम् ।
तुष्टुवुभक्तियोगेन रक्ष रक्षेति वादिनः ॥ ७ ॥
अनन्तर विष्णु इत्यादि देवता सनातनी कालीके निकट जाकर "रक्ष
रक्ष" इत्यादिवचनोंसे भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७ ॥
श्रीकाल्युवाच ।
इदानीं रे वत्स विष्णो हन्मि कोलान्तबान्धवान् ।
कोलानगरमास्थाय कुमारीरूपमास्थिता ॥ ८॥
श्रीकालीने कहा-हे वत्स विष्णु ! अब मै कुमारीरूप धारण करके
फोलानगरीमें जाय उस अमुरकुल पर्वर कोलासुरको सबान्धव हनन
करूगी ॥ ८॥
ईश्वर उवाच ।
एवं श्रुत्वा तु तद्वाणी ब्रह्मविष्ण्वादयः सुराः।
आनन्दजलधौ मनाः शिखिवत्रन्तुर्धनात् ॥ ९॥
ईश्वर बोले-नह्मा विष्णु इत्यादि देवता महाकालीके इस प्रकार वचन
सुन आनन्दसागरमें निमग्न हो धनगर्जना श्रवण कर मोरके समान नाचने
लगे ॥९॥

भाषाटीकासमतेम् । (२०७) ततः काली करालास्या द्विजकन्यास्वरूपतः। गत्वा कोलापुरं देवी कोलासुरसमीपतः। तमयाचत तद्भक्ष्यं कुमारी दैत्यपुङ्गवम् ॥ १० ॥ तदनन्तर करालवदना महाकालीने विप्रकुमारीका रूप धारण करके कोलापुरमें कोलासुरके समीम जाय उस दैत्यराजसे किंचित् भक्ष्य द्रव्य मांगा ॥ १०॥ कास्युवाच । मातृतातविहीनाहं सहायपरिवर्जिता। क्षुधिताह महाराज भोज्यं मह्यं प्रदीयताम् ॥ ११ ॥ कालीने कहा-मै माता पिता हीन और सहायहीन हूं, हे महाराज ! मुझे कुछ भोज्य द्रव्य प्रदान कीजिये ॥ ११ ॥ ईश्वर उवाच । ततः कोलासुरो देवि मायया परिमोहितः। दयया तां करे धृत्वा विवेशान्तःपुरे स्वयम् ॥ १२ ॥ ईश्वर बोले-हे देवि ! तदनतर कोलासुर मायासे मोहित हो कृपापूर्वक उस कुमारीका हाथ पकडकर स्वयं उसको रनवासमें लेगया ॥ १२ ॥ उवाच भोज्यं दास्यामि तुभ्यं तत्ते समीप्सितम् । अत्रोपविश बाले त्वमासने मणिरक्षिते ॥ १३ ॥ और कहा-जो इच्छा है, मै वही भोजन तुम्हें दूंगा। हे बालिके ! तुम इस मणिरंजित आसन पर बैठो ॥ १३ ॥ इत्युक्त्वासौ ददौ भोज्यं नानाविधमनेकशः। भुक्त्वा सा सकलं देवि पुनर्देहीति वादिनी ॥ १४ ॥ पुनदी बहुतरं तच्चापि बभुजे स्वयम् । नाहं तृप्ता बदन्ती तां तदोवाच महासुरः।। १५ ।।

(२०८)
योगिनीतन्त्रम् ।
यह कहकर उस दैत्यने बहुतवार अनेक प्रकारके भोज्य द्रव्य उसको
दिये । बालिकाने उस सबको भक्षण करके कहा-दनसे मेरी तृप्ति नहीं
हुई और भोजन दो। दैत्यराजने फिर बहुत भोजन दिया. उस सबको
भी भक्षण करके कहा-इनसेमी मेरी तृप्ती नहीं हुई उसके यह वचन
सुनकर महाअसुरने कहा ॥ १४ ॥ १५ ॥
यथा तृप्तिर्भवेद्वाले तावद्धि कुरु तत्तथा ।
इत्पुदीरितमाकर्ण्य काली वालस्वरूपिणी ॥ १६ ॥
हे बाले ! जिससे तुम्हारी तृप्ति हो, तुम वही करो । बालस्वरूपिणी
कालीने कोलासुरके यह वचन सुनकर ।। १६ ॥
कोपं हयं हस्तिनश्च रथं सैन्य सबान्धवम् ।
क्षणेन बभुजे काली कोलं चापि महाबलम् ॥ १७ ॥
उसका कोप, घोडे, हाथी, रथ, सेना, बांधव, इन सबको भक्षण कर
महाअसुर कोलासुरको भक्षण करलिया ॥ १७ ॥
कालरुद्रो यथा काले क्षणाल्लोकत्रयं यथा।
तथा कोलापुरं शून्यं कृतं काल्या क्षणाच्छिथे॥१८॥
हे शिवे ! जैसे कालरुद्र क्षणभरमें तीनो लोकोंको महा प्रलयमें संहार
करते हैं ऐसेही महाकालीने क्षणमात्रमें कोलापुरको सूना कर दिया॥१८॥
अथासुरास्तथा नाष्टान्दृष्ट्वा विष्णुमुखाः सुराः।
निरन्तरं पुष्पवृष्टिं चक्रुस्ते नतृतुः परम् ॥ १९ ॥
जगुःसुललितं गीतं देवगन्धर्वकिन्नराः ।
विद्याधरी देवपत्नी किनरीभिः समन्ततः ॥२०॥
तदन्तर विष्णु इत्यादि देवताओंने सब शत्रुओंको मरा देखकर फूलोंकी
वर्षा करी । देव, गंधर्व, किन्नरगण और विद्याधरी किन्नरी तथा देवताओंकी
स्त्रिये हमें भरकर नृत्य करने लगीं ॥ १९ ॥ २० ॥

भापाटीकासमेतम् । (२०९) पूजिता तैः कुमारी सा कुसुमर्नन्दनोद्भवैः । सर्वलोकः पूजिता च कुमारी सा दिने दिने ॥ २१ ॥ फिर सरने मिलकर नन्दनवनोत्पन्न कुसुम चंदनके भारसे उस कुमारीकी पूजा करी । इसके पीछे सन लोक अपने घरमें नित्य कुमारीकी पूजा करने लगे ॥ २१॥ ततः सान्तर्हिता देवि कुमारी ब्रह्मविग्रहा। एवं हि ते मया प्रोक्तं कोलासुरनिषूदनम् ॥ २२ ॥ इसके उपरान्त वह ब्रहरूपिणी कुमारी अन्तर्धान होगई। हे देवि ! यह मेने तुमसे कोलासुरके गरनेका वर्णन किया ॥२२॥ ब्रह्मशापो दुराधर्षों भ्रमतोऽपि न तच्चरेत । वाग्वजञ्च ब्राह्मणानां सदा जानीहि कामिनि ॥२३॥ हे कामिनि ! ब्रह्मशाप दुईप है, भूलकरभी ब्रह्मशापका कार्य न करे, ब्राह्मणके शापका वहन सदा वज्रस्वरूप जानना चाहिये ॥ २३ ।। अतोऽविद्यः सविद्यो वा विप्रः पूज्यः सदा भवेत् ॥ सन्तुष्टे ब्राह्मणे देवि तुष्टा देवा वयं सदा ॥ २४ ॥ इस कारण ब्राह्मणके विद्वान् वा अविद्वान् होनेपरभी वह, देवतुल्य पूज्य है । ब्राह्मणके सन्तुष्ट होनेपर हम सब देवता सदा सन्तुष्ट रहते हैं ॥ २४ ॥ वितुष्टे ब्राह्मणे देवि वितुष्टा वयमेव हि ॥ २५ ॥ हे देवि ! बामणके असन्तुष्ट रहनेपर हमभी असन्तुष्ट रहते है ॥ २५ ॥ यद्यकार्यशतं देवि ब्राह्मणः समुपाचरेत् । आत्मनो हितकामेन तं तथापि न चोत्सृजेत् ।। २६ ।। नापमानश्च कर्त्तव्यं सर्वदा तुरपुङ्गवे । ब्राह्मणः सर्वदेवात्मा मोक्षतेजासमो हि सः॥ २७ ।।

(२१०)
योगिनीतन्त्रम् ।
ब्राह्मण यद्यपि सौ सौ अकार्य करै, किन्तु तोभी अपने हितकी काम-
नासे उसका त्याग वा उसका अपमान करना उचित नहीं है. हे सुरवरे!
ब्राह्मणको सर्वदेवमय और मोक्षतेजके समान जाने ॥ २६ ॥ २७ ॥
अप्रसूतिश्च सा काली कुमारीरूपधारिणी।
ततः प्रभृति देवेशि कुमारी पूज्यते सुरैः॥ २८ ॥
वह काली अप्रसूति कुमारीरूपधारिणी हुई थी इसी कारण तबसे देव-
ताओंने कुमारीपूजा आरभ करी ॥ २८ ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाधः कुमारी पूज्यते सदा ।
अन्ये सर्वे प्रपूज्यन्ते ब्रह्माण्डतलगोचराः ॥ २९ ॥
और तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वरादि ब्रह्माण्डतलनिवासी समस्त
लोकही कुमारीकी पूजा करने लगे ॥ २९ ॥
कुमारीपूजनफलं वक्तुं नार्हामि सुन्दरि।
जिहाकोटिसहरस्तु वक्रकोटिशतैरपि ॥ ३०॥
हे सुन्दार ! मै करोड सहस्र जीभ और मुखोसे भी कुमारी पूनाका
फल वर्णन करने में असमर्थ हू ॥ ३० ॥
तस्माच्च पूजयेद्वाला सर्वजातिसमुद्भवाम् ।
जातिभेदो न कर्तव्यः कुमारीपूजने शिवे ॥ ३१ ॥
हे प्यारी ! इसी कारण सर्वजातीय कुमारीगणोंकी पूजा करनी चाहिये।
हे शिवे ! कुमारी पूजामें जातिभेद नहीं है ॥ ३१ ॥
जातिभेदान्महेशानि नरकान्न निवर्तते ।
विचिकित्सापरो मन्त्रा ध्रुवश्च पातकी भवेत् ।। ३२ ॥
इसमें जातिभेदका विचार करनेपर नरकमें गिरकर फिर नहीं लौट
सकता । मन्त्रवान् मनुष्य संदिग्ध होकर कर्म करनेसे पातकी होता है।
इसमें सन्देह नहीं ॥ ३२॥

.
भापाटीकासमेतम् । (२११)
देवीबुद्धया महाभक्त्या तस्मात्ता परिपूजयेत ।
सर्वविद्यास्वरूपा हि कुमारी नात्र संशयः ॥ ३३ ।।
अतएव महामक्ति धारण करके देवीबुद्धिसे कुमारीकी पूजा करनी
चाहिये । कुमारी सर्वविद्यास्वरूप है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥
एका हि पूजिता बाला सर्व हि पूजिन भवेत् ।
यदि भाग्यवशादेवि वेश्याकुलसमुद्भवाम् ॥ ३४ ॥
कुमारी लभते कान्ते सर्वस्वेनापि साधकः ।।
यत्नतः पूजयेत्तां तु स्वर्णरोप्यादिमिर्मुदा ॥ ३५ ॥
एफ कुमारीकी पूजा करनेसे सब देवी देवताओंकी पूजा हो जाती है ।
हे देवि ! यदि भाग्यसे वेश्याकुलोत्पन्न कुमारी मिल जाय, तो साधक
प्रसन्न हो उसको स्वर्ण, चांदी आदि सर्वस्व प्रदानपूर्वक यल सहित पूजा
करे ।। ३४ ॥ ३५॥
तदा तस्य महासिद्धिर्जायते नात्र संशयः।
महासिद्धिर्भवेदस्थ स एव श्री सदाशिवः ॥ ३६॥
इस प्रकार करनेसे साधकको महासिद्धि होती है और वह श्रीसदाशिव
की समान होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ३६ ॥
लक्षणं तस्य वक्ष्यामि तच्छृणुष्व प्रियंवदे।
वपुस्तस्य महेशानि काञ्चनं परिजायते ।
सर्वसिद्धिथुतो भूत्वा क्रीडते भैरवो यथा ॥ ३७ ॥
कुमारीसाधकके लक्षण कहता हूं, हे प्रियंवदे ! वह तुम सुनो उसका
देह काञ्चनकी समान कातियुक्त होता है और वह मनुष्य सब प्रकारकी
सिद्धिसे युक्त होकर भैरवकी समान विहार करता है ॥ ३७॥
स्वर्ग मत्यै च पाताले गतिस्तस्य सुनिश्चितम् ।
हठात्तु जायते सर्व यद्यन्मनसि वर्तते ॥ ३८ ॥

(२१२) योगिनीतन्त्रम् ।
वह स्वर्ग, मर्त्य और पाताल सर्वत्र ही जा सकता है, जिस समय जो
मनमें हो, तब वैसा ही रूप धारण कर सकता है ॥ ३८ ॥
कायव्यूह समासाद्य सर्वत्र व्यापको भवेत
अव्याहतश्च सर्वत्र पुरन्दरसमः शिवे ॥ ३९ ॥
काया विस्तारको प्राप्त होकर तत्काल सर्वत्र व्यापक होनेकी सामर्थ्य
होता हे इन्द्रकी समान उसकी आज्ञा सर्वत्र ही अटल होती है ॥ ३९ ॥
देवदानवगन्धर्वनागकिनरयोषितः ।
विद्याधरी राजनारी सेवंते तं दिवानिशम् ॥ ४० ॥
देव, दानव, गन्धर्व, नाग, किन्नरोंकी निये, विद्याधरी और राजनारी,
यह सब दिन रात उसकी सेवा करते हैं ॥ ४० ॥
अन्ते च प्राप्यते तेन परं निर्वाणमुत्तमम् ।
कुमारीपूजने काले साधकः शिवतां व्रजेत् ॥४१॥
ओर वह साधक अन्तमें परमनिर्वाणको प्राप्त होता है। कुमारी पूजा-
कालमें साधक शिवत्व लाभ करता हे ॥ ४१ ।।
कुमारी पृज्यते यत्र स देशः क्षितिपावनः।।
महापुण्यतमो भूयासमन्तात्कोशपंचकम् ॥ ४२ ॥
जिस स्थानमें कुमारीकी पूजा होती है। वह स्थान पृथ्वीमें पवित्र है,
वह स्थान चारों ओर पाच कोशसहित पुण्यमय हे ॥ ४२ ॥
कुमारीपूजनं यत्र कुर्याच परमेश्वरि ।
स्फुरत्येद महाज्योतिः प्रत्यक्ष भारते भुवि ॥ ४३ ॥
इस भारतमण्डलमें कुमारीको पूजा करने पर इस कुमारीके देहसे
प्रत्यक्षरूपमें प्रभा प्रकाशित होती हे ॥ १३ ॥
विशम्भरो नाम राजा चैत्रवंशसमुद्भवः ।
अपूजयत्कुमारी तो घेश्याकुलसमुद्भवाम् ।
कांचीनाम्नी कृष्णवर्णी सर्वलक्षणपूरिताम् ॥ ४४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२१३) विशम्भर नामक चैत्रवंशीय राजाने वेश्याकुलोत्पन्न एक कुमारीकी पूजा करी थी, वह कुमारी कांची नानी सर्व सुलक्षण सम्पन्न और कृष्णवर्ग थी।॥ ४४ पूजाकाले महादेवि कांची जाता स्फुरत्मभा । यत्प्रभापटलाच्छन्नो राजा मोक्षमवाप्तवान ॥ ४५ ॥ हे महादेवि ! पूजाकालमें इस कुमारीके कृष्णवर्ण देहसे प्रभामण्डल प्रकाशित होने लगा। राजा उस महाप्रभा मण्डलसे आच्छन्न होकर मोक्षको प्राप्त हुए ॥ ४५ ॥ सम्यक्प्रपूरिता नासीत्कांची ज्योतिर्मयी प्रभा। भूत्वा नित्या हि तत्स्थाने सदागृहाति पूजनम्॥४६॥ यह कुमारी काची प्रभा पूर्ण नहीं थी. किन्तु वह तबसे ज्योतिर्मयी होकर उसी स्थानमें पूजा ग्रहण करने लगी ॥ ४६ ॥ कांचीनाम्नी पुरी जाता तत्स्थानंतु महाफलम्। 3028 मोक्षदा सा पुरी ज्ञेया पंचक्रोशमयी शुभा ॥ १७ ॥ उसी स्थानमें एक काची नामक महाफलदायिनी पुरी हुई । चारों ओर पंचक्रोश सहित वह पुरी कल्याण और मोक्षकी देने वाली है ।। ४७ ॥ गृहन्यापारमन्यच्च तत्र यद्यत्कृतं भवेत् । तत्सर्व पूजन तस्यो चित्रमेतन्नगात्मजे ॥४८॥ हे पर्वत नन्दिनी ! जिस स्थानमें गृहकर्मादि जो जो किया जाता है, उसीसे उसकी पूजा होती है, हे देवि ! यह अति विचित्र है !! ४८ ॥ अतः कांची पुरी देवि वाराणस्या समा शुभा। एवं तु पूजिता वाला काम्पिल्येन महात्मना ।। ४९ ।।

(२१४) योगिनीतन्त्रम् । हे महेशानि ! इसी कारण कांची पुरीको वाराणसीके समान कल्याण दायिनी जाने | पूर्वमें महात्मा काम्पिल्यने इसी प्रकार कुमारीकी पूजा करी थी ॥ ४९॥ काम्पिल्ये नगरे पूर्व समुद्भता वरानने । अद्यापि द्दश्यते लोक शिखारूपण तिष्ठीत ॥ ५० ।। हे वरानने ! पहिले काम्पित्य नामक नगरमें कुमारी देवीकी पूजा हुई । अब भी वह कुमारी शिलारूपसे वहा वास करती दिखाई देती है ॥ ५० ॥ सर्वपुण्यतमो वासः सर्वतीर्थसमाकुलः । सर्वयज्ञयुत्तो देवि वेष्टितश्च महर्षिभिः ॥५१॥ सर्वाश्चर्यसमाकान्तः काम्पिल्ये च पुरे वरे। ये वप्तन्ति महादेवि काम्पिल्यै नगरे शुभे ।। ५२ ॥ इह भुक्त्वा वरान्भोगान्बहुतुष्टिप्रदायकान् । सर्वसम्पत्समाकीर्णा ह्यन्ते देव्याः प्रसादतः। उल्लध्य विष्णुलोकं वै देव्याः स्थान समाप्तुयुः ॥५३॥ वह स्थान परम पूण्यतम वसतिस्थान है, वह सर्व यज्ञयुक्त सर्व तीर्थसमाकुल, ऋषिगणसेवित और सर्वाश्चर्यमय है, हे देवि ! जो मनुष्य काम्पिल्य नगरमें वास करता है, वह देवीके प्रसादसे इस लोकमें सर्व प्रकारके तुष्टिप्रद भोग उपभोग कर और सर्व सम्पत्ति युक्त होता है और परलोकमें ब्रह्मलोक उल्लंघन करके देवीके स्थानको प्राप्त होता है ।। ५१ ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ यदि कामी भवेत्कोऽपि वैकुण्ठं परमं व्रजेत् । मल्लोक वा महेशानि गच्छेन्मे मणिमन्दिरम् ॥५४॥ यदि कोई मनुष्य कामी हो, तो वह वैकुण्ठपुरमें जाता है अथवा मेरे लोकके मणिमन्दिरमें वास करता है || ५४ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२१५)
एवं तेद्य मया प्रोक्तं कुमारीचरितं शिवे।
किञ्चिदेव महामायें पुनः किं परिकथ्यते ॥ ५५ ॥
है शिवे ! यह मैंने इस समय तुमसे किंचित् कुमारीचरितका वर्णन
किया। हे महामाये ! अब क्या कहूं सो कहो ॥ ५५ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्ने सर्वतन्त्रोत्रमोत्तमे देवीश्वरसम्बादे चतु-
विशतिसाहसे भापाटीकायां सप्तदशः पटलः ॥ १७ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
श्रुतं कुमारी चरितं प्राक्तनन्देववाञ्छितम् ।
इदानी श्रोतुमिच्छामि कहोलचरितं परम् ॥ १॥
श्रीदेवीजीने कहा-हे देव । देवतावांच्छित पुरातन कुमारीचरित मुना
अब परमोत्कृष्ट कहोलचरित्र सुननेकी इच्छा करती हूं ॥१॥
आज्ञापय महादेव कृपया परमं हि तत् ।
हित हि सर्वलोकानां योगिना हृदयार्थदम् ॥ २ ॥
हे महादेव ! आप कृपापूर्वक वह सब लोकहितकर योगियोंका हृद-
यार्थप्रद साधुचरित वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
ईश्वर उवाच ।
वेदवेदान्तवेदांगसर्वशास्त्रस्वरूपभाक् ।
सर्वयोगीश्वरस्तीधपूतःसर्वाघवर्जितः॥ ३॥
ईश्वर चोले-वेद वेदान्त और वेदागका तत्त्व जाननेवाले एवं सर्वशा-
सार्थतत्त्वमाही सर्चयज्ञकारी सर्वतीर्थसम्पूत (अथीत् पवित्र ) सब पापोंसे
रहित ॥ ३॥
सर्वविद्यासर्वमन्त्रकृतसिद्धिर्वषीश्वरः।
सर्ववयों मुनिश्रेष्ठः परिवभ्राम मेदिनीम् ॥ ४॥

(२१६) योगिनीतन्त्रम् । सर्व विद्या और मन्त्रद्वारा कृतसिद्धि सबमें श्रेष्ठ ऋषिश्रेष्ठ कहोल ऋषी- श्वर पृथ्वी में भ्रमण करने लगे ॥ ४ ॥ चिन्तामवाप महतीमतीवोद्विग्नमानसः । सहस्रसूर्यसंकाशः स एवासीन्पुरा शिवे ॥५॥ उसी समय उनको एक बड़ी चिन्ता प्राप्त हुई उससे वह अत्यन्त उद्विग्नमन हुए पहले वह सहस्र सूर्यकी समान प्रभायुक्त थे ॥ ५ ॥ चिन्तया परया सोऽभूत्मदीप इव चापरः। तदाकाशसमुद्भूता श्रुता वाणी महर्षिणा॥६॥ इस समय महती चिन्तासे दोपकके शिखाकी समान क्षीण होगये फिर महर्षिने एक आकाशवाणी सुनी ॥ ६ ॥ कहोल याहि पूर्वस्मिञ्छंकर देवशङ्करम् । स गुरुः सर्वसत्त्वानां सकलं ते करिष्यति ॥ ७ ॥ श्रुत्वा तां गागनीं वाणी परमानन्दसंप्लुतः॥ गत्वोवाच कहोलो मे वृत्तान्तं सकलं हि तत् ॥ ८ ॥ "हे कहोल ! तुम पूर्व दिशामें कल्याणकारी शंकर देवके निकट जाओ वह सब जीवोंके गुरु हैं। वही तुम्हारी चिन्ता दूर करके समस्त कार्य संपादन करेंगे यह आकाशवाणी सुनकर उन्होंने आनन्दके साथ जलसे भीज पूर्वदिशामें गमन कर मुझसे सब वृत्तान्त कहा ||७||८॥ ततस्तस्मै मया दत्ता विद्या काली पराकला । चन्द्राक्षरी सर्वज्ञानभावनी चिन्मयी शुभा ॥ ९ ॥ दत्तश्च परमाचारः श्रीमदागमसम्मतः। कथितश्च मया तस्मै कहोल पुत्र तच्छृणु ॥ १० ॥ मनंतर मैंने उनको परमा कला कालीविद्या अर्पण करी । यह विद्या चन्द्राक्षरी और सर्वज्ञानदायिनी चिन्मयी और कल्याणदायक है।

भाषाटीकासमेतम् । (२१७)
और उनको श्रीमदागमसम्मत परम सदाचारभी देकर कहा । हे वत्स
कहोल ! सुनो ॥ ९ ॥१०॥
अननाचारयोगेन गत्वा काली दिगम्बराम् ।
भावयित्वा पूजयेत सर्वाज्ञानविनाशिनीम् ॥ ११ ॥
इस आचार योगसे काशीमें दिगम्बरी कालीके निकट जाकर उन सर्व
अज्ञानविनाशिनीकी पूजा करो।। ११ ॥
ततस्ते संशया नष्टा भवेयुर्भुवनेश्वरे ।
इत्याज्ञप्तः कहोलः स ऋषिर्वेदविशारदः ।
काशी गत्वायजत्काली पञ्चाचारयुत्तो मुदा ॥ १२ ॥
इससे भुवनेश्वरके समीप तुम्हारा सब संशय नष्ट होगा । उन वेदविशारद
ऋघि कहोलने मेरी इस प्रकार आज्ञा पाय काशीमें जाय पञ्चाचारसे संपन्न
होकर कालीकी पूजा करी ॥ १२ ॥
ततस्ते संशया विनाः पलायाश्चक्रिरेऽन्वहम् ।
ऋषेस्तस्य कहोलस्य वेदमूर्तेमहामतेः॥ १३ ॥
इससे महामति वेदमूर्ति कहोलऋषिके सत्र संशय विन दिन दिन
पलायन करने लगे ॥ १३ ॥
ततस्तस्मिन्कृपा जाता महाकाल्या ऋषौ शुभा।
तथा च कृपया युक्तः कहोलऋषिसत्तमः ॥ १४ ॥ ।
तदनन्तर उन ऋषि पर महाकालीको कृपा हुई कालीकी कृपासे ऋषिश्रेष्ठ
कहोल ॥ १४ ॥
आत्मानं कालिकारूपं मेने ब्रह्म सनातनम् ।
ज्ञानमायाविनिधूतमद्वः परमं शिवे ॥ १५ ॥
आत्मस्वरूपको परम ब्रह्म सनातन मायारहित ज्ञाननित अद्वैत
परमकालीरूपको प्राप्त हुए ॥ १५ ॥

(२१८)
योगिनीतन्त्रम् ।
सर्वमायाविनिर्मुक्तो जातः स ऋषिरुत्तमः ।
सर्व ब्रह्ममयं चासीजगदेतचराचरम् ॥ १६ ॥
फिर वह सर्व मायासे छूट और संशयरहित हो इस अखिल चराचर
जगत्को ब्रह्ममय देखने लगे ॥ १६ ॥
आत्मदेहादिकं किश्चिजानाति न च कर्हि चित् ।।
तेनैव ब्रह्मज्ञानेन देहकर्मादिकं खलु ।
भस्मीभूतं महेशानि ऋषेस्तस्य महात्मनः ॥ १७ ॥
वह आत्मदहादि कुछभी नहीं जानसके ब्रह्मज्ञानद्वारा उन महात्मा
ऋषिके देह कर्मादि सभी भस्म होगये ॥ १७ ॥
ब्रह्मभूतः कहोलर्षिर्महाकाल्याः प्रसादतः।
अत्याचारेषु सर्वेषु रतः स्यात्स्फुरते हि सः॥ १८ ॥
एवमेव महाकाली कहोलर्षितुमानिता।
चकार लीन तमृर्षि स्वीयदेहे तु कारणे ॥१९॥
महाकालीके प्रसादसे वह कहोल ऋपि ब्रह्मस्वरूप हुए फिर वह सब
प्रकार अत्याचारमें रत तथा अत्याचारकी स्फूर्ति ( अर्थात् उसका प्रकाश)
पाने लगे। इस प्रकार महाकालीने कहोलमषिके द्वारा पूजित होकर उन
महापको अपने कारण देहमें लीन कर लिया ॥ १८ ॥ १९ ॥
यं यं भावमुपाश्रित्य यजेत्काली हि साधकः ।
प्राप्तुयादचिरात्तं हि महाकाल्याः प्रसादतः ॥ २० ॥
जो साधक जो जो भाव अवलम्बन करके कालीको आराधना करता है।
वह महाकालीके प्रसादसे तत्काल उनको प्राप्त होता है ॥ २० ॥
श्रीदेव्युवाच ।
श्रुतं कहोलचरितं पूर्व विस्मयकारकम् ।
देवासुरमुनीन्द्राणामृषीणां भावितात्मनाम् ॥ २१ ॥

भापाटीकासमेतम।
इदानी श्रोतुमिच्छामि गङ्गां त्रैलोक्यपावनीम्
का विद्यां प्राप्य सा जाता तद्वदस्व मयि प्रमो॥२२॥
श्रीदेवीजीने कहा-हे प्रभो ! मैंने देव, असुर, मुनि और मपियोंको
भी विस्मयकारक पुरातन कहोलचरित्र सुना । अब तीनों लोकको पवित्र
करनेवाली गंगाका विषय सुननेकी इच्छा हुई है । और उन्होंने किस
विद्याको प्राप्त होकर जन्म ग्रहण किया। यह मुझसे विस्तारसहित वर्णन
कीजिये ॥ २१ ॥ २२ ॥
ईश्वर उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
श्रवणात्सर्वपापानि नाशमायान्ति नान्यथा ॥ २३ ॥
ईश्वरने कहा-हे देवि ! जो तुमने पूछा वह सुनो इसके सुननेसे सब
पाप नष्ट हो जाते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥
मन्त्रमादौ प्रवक्ष्यामि त्रैलोक्यपावनाभिधम् ।
महादेवया महाकाल्या महादेवेन भाषितम् ॥ २४ ॥
पहिले देवभायित महादेवी महाकालीका रैलोक्यपावननामक मन्त्र
कहता हू ॥ २४ ॥
निजवीज समुद्धृत्य सम्बोधनपदद्वयम् ।
पुनश्च निजबीजं हि विद्य चापि यशस्करीम् ॥ २५ ॥
निज बीज कहकरके सम्बोधन पदद्वय उद्धारपूर्वक फिर निजवीज उद्धा
फरनेके पीछे यशस्करी परा विद्या उच्चारण करै (?) ॥ २५ ॥
एनां विद्या समाराध्य गङ्गा त्रैलोक्यपावनी।
जटातटे ममास्थायाजपद्रिद्यामहर्निशम् ॥ २६॥
त्रैलोक्यपावनी गंगाने इस विद्याकी आराधना करके मेरे जटातटमें
अवस्थानपूर्वक दिन रात इस विद्याका जप किया ॥ २६ ॥

(२२०)
योगिनीतन्त्रम् ।
तेन सा पावनी गङ्गा मोक्षदा सर्वदेहिनाम् ।
सिद्धमन्त्रप्रभावेन कालीतेजोपबृंहिता ॥२७॥
उसी मंत्रके प्रभावसे पावनी गंगा सब देहधारियोंको मोक्षदायिनी हुई
सिद्धि मंत्र प्रभावसे कालीतेजमें संवद्धित होकर ॥ २७ ॥
अतः सा पावनी भूता मोक्षदा च सदाशिव ।
अतो हि सर्वतीर्थेषु सा विद्या सर्वपूजिता ॥ २८ ॥
और मुक्तिप्रदा हुई हैं, वह सदा पावनी है। हे शिवे ! इसी कारण
वह विद्या सर्वतीर्थो में सदा पूजित है ॥ २८ ॥
माहात्म्यं किमु वक्ष्यामि गङ्गायाश्च सुरेश्वरि ।
यन्नामस्मरणादेव पापिनो मुक्तिभागिनः ॥ २९ ।।
हे सुरेश्वरि ! गंगाका माहात्म्य क्या वर्णन करूं जिनके नामको स्मरण
करते ही पापी मुक्तिलाभ करते हैं ॥ २९ ॥
गंगागगति यो ब्रूयात्पापिनामपि पातकी।
सर्वाश्च पातकाहित्वा स गच्छेद्वैष्णवी पुरीम् ॥३०॥
पापियों में पातकी और अतिपातकी होकर भी जो मनुष्य गंगा गंगा
कहता है उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। और वह विष्णुपुरीमें जाता
है ।॥३०॥
यानि कानि च पापानि प्रोक्तानि च महेश्वरि ।
प्रायाश्चत्तविहीनानि प्रायचित्तपराण्यपि ॥ ३१ ॥
तानि सर्वाणि नश्यन्ति गंगाजलनिषेकतः।
नगा वा पुरादम्बु यत्तद्नंगां प्रसर्पति ॥ ३२ ॥
हे महेश्शार ! जिस पापका प्रायश्चित्त है, वा जिसका प्रायश्चित्त नहीं है,
ऐसे समस्त पाप ही गंगा स्नानसे नष्ट होते हैं, नगरी पुरी वा अन्यान्य
स्थानों से बहता हुआ जल गंगामें गिरने पर ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२२१) सर्व गङ्गा भवत्यैव मन्त्रमाहात्म्यतः शिवे ॥ ३३ ॥ मंत्र माहात्म्यसे वह सब गंगा ही हो जाता है ॥ ३३ ॥ यत्र देशेवसद्गङ्गा स देशः पुण्यभाजनः॥ ३४॥ जिस देशमें गंगा देवी वहती हैं, वह देश पुण्यभाजन है ॥ ३४ ॥ पुण्यक्षेत्रं समुद्दिष्टं पवित्रं योजयद्वयम् । तत्र यत्क्रियते कर्म गङ्गायां तन्त्र संशयः॥ ३५॥ गङ्गायां यत्कृतं देवि तदक्षयफलं भवेत् । साङ्ग वापि विहीन वा कथितं शम्भुवल्लभे ॥३६॥ तत्रस्थाः प्राणिनः सर्वे देवलोकविनिःसृताः। भुक्त्वा च विविधान्भोगान्कृत्वा च सुकृतं सदा । अनायासेन यास्यन्ति स्थान परमदुर्लभम् ।। ३७ ॥ गंगाकी दो योजन दूर तक भूमि पवित्र पुण्यक्षेत्र कहकर निर्दिष्ट है। वहां कोई कार्य करनेपर गंगामें ही वह कार्य किया जाता है इसमें संदेह नहीं गंगामें सांग वा हीन रूपसे जो कुछ किया जाता है वह अक्षयफल- दायक होता है। हे शंमुवल्लभे ! गंगास्थित सब प्राणी देवलोकसे निकल कर गंगावासी हुए हैं। गमावासी विविध भौगोंको भोगते हुए सदा सुकृतिसाधनपूर्वक सहजमें ही शोकादिशून्य परम दुर्लभ स्थानमें जाते हैं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ३७॥ यत्र लोका न शोचन्ति देवर्षिगणसंस्तुते । गङ्गायां त्यजति प्राणान्यस्तु पुण्यस्वभावतः ॥३८॥ ज्ञानतो मोक्षमाप्नोति वैकुण्ठं तदभावतः। स्वलोकाद्या महेशानि गंगयाघविवर्जिताः॥ ३९ ।। हे देवर्षिगणसंस्तुते देवि ! जिस गङ्गातटमें जाकर मनुष्य सोच नहीं करते उस गंगातट पर जो मनुष्य ज्ञानपूर्वक प्राणत्याग करता है वह मोक्षको प्राप्त होता है और अनानसे मरनेपर वैकुंठ प्राप्त होता (२२२) योगिनीतन्त्रम्। है । है महेश्वार ! स्वर्गादि समस्त लोक गंगाद्वारा पापहीन होकर पवित्र स्थान हुए हैं ॥ ३८ ॥ ३९॥ गङ्गामुद्दिश्य यो गच्छन्पथि प्राणान्विमुञ्चति । विष्णुलोकं बहुगुणं पापी चेत्सोऽपि गच्छति ॥ ४० ॥ गंगाके उद्देश्यसे गमन करके मार्गमें प्राण त्याग करनेपर यदि वह पापीभी हो तोमी बहुगुण विष्णुलोकको प्राप्त होता है ॥ १० ॥ तत्तीरे यस्त्यजेत्याणान्यायतोऽन्यायतोऽपि वा। सोऽपि स्वर्गमवाप्नोति सर्वसद्भावसंयुतम् ॥४१॥ जो मनुष्य न्यायसे वा अन्यायसे गंगाके तटपर प्राणत्याग करता है तो वह सर्व फलयुक्त स्वर्गलाभ करता है ॥ ११ ॥ यावदस्थीनि गंगायां स्थीयन्ते हि मृतस्य च । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ४२ ॥ जवतक गंगामें मृतककी अस्थि पड़ी रहती हैं । तबतक सहस्रों वर्षपर्यन्त वह मनुष्य स्वर्गलोकमें पूजाको प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥ गंगाजलसमायोगाम्रियते यत्र कुवचित् । सर्वपापविनिमुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥ ४३ ॥ जो कोई मनुष्य जिस किसी स्थानमें यदि गंगाजलके संयोगसे प्राण त्याग करै तो वह सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें पूजित होता है॥४३॥ गङ्गातीरे चतुर्हस्ते पिण्डं दद्यात्समाहितः । पितृणां निष्कृतिं कृत्वा विष्णुलोके वसेन्नरः॥ १४ ॥ गंगातटमें गंगाप्रवाहके चार हस्त दूर सावधानचित्तसे पितरोंको पिण्ड नेपर पितरोंका छुटकारा होता है। और पिण्ड देनेवाला मनुष्य वैष्णुलोकमें वास करता है |॥ ४४ ॥ गङ्गायां तर्पणं देवि पुण्यवान्यः समाचरेत् । महावृत्तिर्भवेत्सत्यं पितणाञ्च शतारिदका ।। ४५ ॥

भाषाकासमेतम् । (२२३)
जो पुण्यवान् मनुष्य गंगामें पितृतर्पण करता है उसके पितर सौ वर्ष
तक महातृप्त रहते हैं इसमें संदेह नहीं ॥ ४५ ॥
ऋषीणां देवतानाच तथैव समुदाहृतम् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ सन्ध्यायां वा महानिशि४६॥
स्नानं दानं तपो होमं तर्पणं पूजनं शिवे ।
सर्व कुर्यात्तु गंगायां कालभेदं न चाचरेत् ॥ ४७ ॥
ऋषि और देवताओंकीभी इतनी तृप्ति होती है। हे देवि ! दिन वा
रात्रि संध्याकाल वा महानिशा इन सब समय गंगामें स्नान दान नप होम
तर्पण पूजा इत्यादि सब कार्य करे । इसमें कालभेदका विचार नहीं करना
चाहिये ॥ ४६ ॥ १७ ॥
कालभेदं समाचर्य यदि कर्म त्यजेच्छिवे ।
ततस्तु स्थावरो भूयादरण्ये तदनन्तरम् ॥४८॥
दावानीनां शिखाभिर्वा नष्टो ह्यन्येन हेतुना।
तदन्ते परमेशानि चाण्डालो नित्यदुःखितः॥४९॥
हे शिवे ! यदि कालभेद समाचरणपूर्वक अर्थात् गंगाके तटपर रात्रि
आदि कर्मकालके विरुद्धकालमें जानेसे उस कालको कर्मका अयोग्य
समझकर गंगामें कर्म त्याग करे। तो वह स्थावर होकर वनमें जन्म ग्रहण
करता है । तदनंतर दावाग्निशिखा और अनेक प्रकारके कारणों से नष्ट
होता है । हे परमेश्वरि ! उसके उपरान्त वह मनुष्य नित्य दुःखी चाण्डाल
होकर जन्म लेता है ।। ४८ ॥ ४९ ।।
सप्तजन्मसु जायेत तदन्ते रजको भवेत् ।
जन्मत्रयं महेशानि तदन्ते शूद्रयोनिषु ॥५०॥
दशजन्म महेशानि ततो वैश्यत्वमाप्नुयात् ।
ब्राह्मणत्वं ततः प्राप्य लभेत्पुण्यगतिं ततः॥५१॥

(२२४) योगिनीतन्त्रम् ।
सात जन्मतक चाण्डाल होकर फिर तीन जन्म धोबी होता है । इसके
पीछे शूद्रयोनिमें दश जन्म विताफर चार जन्म पर्यन्त वैश्य होता है ।
फिर तीन जन्म क्षत्रिय और फिर ब्राह्मण को प्राप्त होकर पुण्यगति प्राप्त
कर सकता है |॥ ५० ॥ ५१ ॥
गंगायां हरते यो हि यत्क्रिश्चित्परमेश्वरि ।
तस्य मोहान्धतमसो रौरवान्नास्ति निष्कृतिः ॥५२॥
आभूतसंप्लवं यावत्कथितं ते सुरेश्वरि ।
गगातीरे च गङ्गायां प्रतिगृह्णाति यो नरः ।
श्वपचो जायते नित्य दशजन्मनि कामिनि ॥ ५३ ॥
हे परमेश्यार । हे सुरेश्वार ! यदि कोई मनुष्य गगापर किंचितमान
भी द्रव्य हरण करे तो वह प्रलयकालपर्यन्त मोहान्धतमस रौरव नरकमें
गिरता है। किसी प्रकार छुटकारा नहीं पाता हे कुलकामिनि ! जो
मनुष्य गगाके तटपर वा गगामें प्रतिग्रह करता है अर्थात् दान लेता है वह
चाण्डालयोनिमें जन्म लेकर दश जन्म बिताता हे ॥५२॥५३॥
ततो दारिद्रयदोषेण परिभ्रमति मेदिनीम् ।
सप्त जन्म महादेवि तदन्ते निष्कृति व्रजेत् ॥ ५४॥
फिर दारद्रयदोषसे पीदिन होकर सात जन्म पृथ्वीमण्डलमें भमण
करता है । फिर छुटकारा मिलता है ॥ ५४ ॥
एवन्ते कथित तस्या मन्त्रमाहात्म्यमुत्तमम् ।
कालिकाया महेशानि गद्दामाहात्म्पकारणात् ॥५५।।
हे महेशानि ! यह मैने तुमसे गगामाहाल्यके कारण कालिकाका उत्तम
मन्न माहात्म्य कहा ॥ ५५ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२२५) श्रीदेव्युवाच । भो देव परमानन्दं करुणावारिवारिधे । अपारे घोरसंसारे पतितानां महार्णवे। त्वामृते कः समुद्धानन्ते ब्रह्माण्डमण्डले ॥ १॥ श्रीदेवी ने कहा-हे परमानन्द देव ! हे करुणासिन्धो ! अपार और घोरतर संसार सागरमें पडे हुए मनुष्योंका उद्धार करनेवाले आपके अतिरिक्त ब्रह्माण्डमण्डलमें और कौन है ॥ १ ॥ गुरुस्त्वं सर्वसत्त्वानां ब्रह्मादीनां यतो ध्रुवम् । पृच्छामि त्वामतो नाथ कृपया परया वद ॥२॥ आपही ब्रह्मादि सब जीवोंके गुरु हैं हे नाथ । इसी कारण आपसे पूछती हूं कृपा प्रकाशपूर्वक कहिये ॥ २ ॥ श्रुतं सर्व जगन्नाथ त्वन्मुखाम्भोजर्निगतम् । इदानीं श्रोतुमिच्छामि यन्मे मनसि चागतम् ॥३॥ हे जगन्नाथ ! आपके मुखकमलसे निकला हुआ सब विषय सुना अब अपना मनोगत विषय सुननेकी इच्छा करती हूं ॥ ३ ॥ का विद्यां समुपाश्रित्य करालो भैरवः स्वयम् । क्रोधवको भैरवोऽभूत्सर्वसत्त्वभयप्रदः ॥ ४ ॥ कराल भैरव कौनसी विद्याको अवलम्बन करके सर्व जीवोंको भयप्रद क्रोधवक्त्र भैरव हुए ॥ ४ ॥ विद्रवन्ति भयार्ता वै यस्माद्देवासुरादयः। त्यक्त्वा स्वां स्वां श्रियं सत्त्वं पलायन्त इतस्ततः५॥ जिनको देखते ही भयसे कातर हो देव और असुर इत्यादि समस्तही अपना अपना ऐश्वर्य सत्व छोडकर इधर उधर भागते हैं ॥ ५ ॥ तां विद्या श्रोतुमिच्छामि बदनाथ दिगम्बर ।। ६ ।।

(२२६)
योगिनीतन्त्रम।
हे नाथ दिगम्बर | मे उसी विद्याके सुनने की इच्छा करती हूं आप
वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥
ईश्वर उवाच ।
अतिगुह्या महाविद्या गुह्याद्गुह्यतरा हि सा।
ब्रह्मविष्णुशिवादीनां सर्वस्वं जीवनावधि ॥७॥
कथितुं नैव शक्नोमि तां विद्यां परमेश्वरि ।
कथ्यते नाममात्र हि ज्ञायतां कुलभैरवि ॥ ८॥
ईश्वर बोले-हे परमेश्वरी ! वह महाविद्या गुह्यसेभी गुह्य अतिगुहा है ।
वह ब्रह्मा, विष्णु महादेवादिकाभी जीवनसर्वस्व है । अतएव मै
उस
विद्याके
कहने में समर्थ नही हूं हे कुलभैरवि । नाममात्र कहता हूं तुम
जानलो ॥ ७॥ ८॥
या च वै परमेशानि सुन्दरी वरदायिनी ।
विद्याराज्ञी घोरकाली अनिरुद्धसरस्वती ॥९॥
गृहीत्वा तां महाविद्यामादिनाथः स भैरवः ।
महाकालश्रीभैरवात्सद्गुरोः श्रीमुखाच्छिवे ॥ १० ॥
प्राप्तिमात्रान्मनोर्यस्य करालो भैरवः शिवे ।
अकरोत्पूतमात्मानं सर्वस्मादधिकं स्वयम् ।
सर्वसंसारनिर्मुक्तो ब्रह्मादिसुरवन्दितः ॥ ११ ॥
हे परमेशानि ! आदिनाथ वह भैरव महाकालभैरवादि सद्गुरुके
श्रीमुखसे सुन्दरी वरप्रदा घोरकाली अनिरुद्ध सरस्वती नामक श्रेष्ठ विद्याको
प्राप्त हुए । करालभैरव उस विद्याकी प्राप्तिमात्रसेही अपनी आत्माको
पवित्र करके स्वयं ब्रह्मादि देवताओंसे वन्दित और सब संसारसे मुक्त होकर
सबसे श्रेष्ठ हुए ॥ ९ ॥ १०॥ ११ ॥
सतूदयाचले पूर्व तपस्तेपेऽतिदुष्करम् ।
भूत्वोर्द्धचरणो देवि वर्षाणां नियुतद्वयम् ॥ १२ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२२७)
हिमाचले चकलक्ष लक्ष वै मन्दराचले ।
कनकायाश्रमे लक्षमुडीयाने द्विलक्षकम् ।। १३ ।।
पञ्चविंशतिलक्षं च तथा जालन्धर शिवे ।
पुण्यशैले तथा लक्षं पञ्चविंशतिमानतः ॥१४॥
पञ्चविंशतिलक्षं च कामाख्यायोनिमण्डले ।
एवं लेपे तपो घोरं कोटिव सुदुष्करम् ।। १५ ॥
कष्टेन महता देवि करालो भैरवः स्वयम् ।
तथापि तं प्रति प्रीता नाभूत्काली कपालिनी ॥१६॥
वह पूर्व दिशा उदयाचल में जाकर दुष्कर तपस्या करने लगे उन्होंने
अर्वपद अर्थात् ऊपरको पैर करके दो नियुत वर्ष तप किया था हिमाचलमें
एक लक्ष मन्दराचलमें लक्ष कनकाचलमें लक्षवर्ष और उड्डीयानमें दो लक्ष
जालन्धरमें पच्चीस लक्ष पुण्यशैलमें पञ्चीस लक्ष कामाख्या योनिमण्डलमें
पच्चील लक्ष इस प्रकार कराल भैरवने करोड वर्षतक महाकाष्ठसे अत्यन्त
कठिन तपस्या करी थी । किन्तु तो भी काली उनके प्रति प्रसन्न नही
हुई ॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥
ततः स भैरवो देवि गुरोरन्तिकमन्वगात् ।
निवेदयामास तथा वृत्तान्तं तपसः शिवे ॥ १७ ॥
हे शिवे ! इसके पीछे कराल भैरवने गुरुके निकट जाकर तपस्याका
सब वृत्तान्त निवेदन किया ॥ १७ ॥
श्रुत्वा श्रीमानादिनाथो महाकालो महेश्वरः ।
मन्नाथः परमेशानि भावनावशतां गतः ॥ १८ ॥
हे देवि ! यह सुनकर मदीयनाथ श्रीमदादीनाथ महेश्वर महाकाल
चिन्ता करने लगे ॥ १८॥
विना च परमाचारं न हि सिद्धिर्भवेत्किल।
कथं त्वो परमाचार कथयामि समासतः॥ १९ ॥

।
(२२८) योगिनीतन्त्रम्।
जिस परमाचारके बिना वह सिद्धि होनेवाली नहीं है । मै किस प्रकार
उस परमाचारका वर्णन करूं ? ॥ १९ ॥
स एव परमाचार: कालीहृदयसंगतः।
गुह्यातिगुह्यगुह्यश्च ब्रह्मादीनामगोचरः॥२०॥
वह महाकालीके हृदय गत रहता है । वह गुह्यातिगुह्य ब्रह्मादिकोंके भी
अगोचर है ॥ २० ॥
परमुक्तिप्रदः साक्षात्सर्वसिद्धिवरप्रदः ।
कालीप्रत्यक्षबीजोऽयं मम सर्वस्वमेव च ॥ २१ ॥
और सर्वसिद्धिवरप्रद तथा साक्षात् मुक्तिप्रद है। यह कालीका प्रत्यक्ष
बीज भी मेरा सर्वस्व है ॥ २१ ॥
केवलं कथितं सर्व शिवेन सदृशो भवेत् ।
श्रुत्वा शान्तो महायोगी गोपितस्तेन यत्नतः ॥२२॥
यह केवल कथित होनेपर ही उसके सुननेसे शिवतुल्य और सत्वशान्त
महायोगी होता है । इसी कारण यत्नपूर्वक गुप्त रहता है ॥ २२ ॥
आचारार्थ स्वीयपाद कालरुद्रे समर्पितम् ।
मम सर्वस्वकं चेदं निरुदेगोप्यनेन वै ।
संगोप्यानेन परमं तथाचारं सदाचरेत् ॥ २३ ॥
आचार के निमित्त इसका पादांश कालरुद्र में समर्पण किया गया
है । यह मेरा सर्वस्त्र है । इसको प्राप्त होकर ही मैं निरुद्वेग और स्वस्थ.
चित्त हुआ हूं, अत्यन्त गुप्तरीतिसे यत्नपूर्वक इस आचारका अनुष्ठान
करना चाहिये ॥ २३॥
सदाचारस्य सम्प्राप्त्या नस्वज्ञानं महामतिः।
सर्वेषामधिपो भूयादिश्ववन्धः सदाशिवः।
अजरामरतां प्राप्तो महाशान्तः परमेश्वरः ॥ २४ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२२९) सदाचाररतं नित्यं शान्तं दृष्ट्वाप्यहं पुनः । पदं मदीयं गुरुतां दत्वा तस्मै समासतः॥ २५ ॥ अहं तु तस्य देहे वै मुदा तिष्ठामि सर्वदा। सर्वेषान्तु सहस्रारे तिष्ठामि कमले परे ॥ २६ ॥ सदाचारका निगूढ तत्त्वज्ञान प्राप्त होनेपर वह मनुष्य सबका अधीश्वर हामति विश्ववन्ध तथा सदाशिव महाशान्त और परमेश्वर होकर अजर अमरता प्राप्त करता है। तिस आचारमें निरत नित्य शान्त मनुष्यको देखकर मैं अपना पद और गुरुत्व प्रदान करता हूं। मै उसके देहमें सदा ही आनन्दसहित वास करता हूं। मैं सबके सहस्रार कमलमें स्थित रहता ह ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ शिवत्वं प्राप्य तिष्ठामि मामकं सर्वदा ह्यहम् । शिवः शिवोऽहं तु शिवो न भेदः कुत्रचित्सदा ॥२७॥ में बहा शिवस्यमय होकर सदा ही वास करता हूं। मैं शिव । में शिव । में शिव । मेरा कहीं भी किसी समय भेद नहीं है ॥ २७ ॥ ब्रह्मविष्णुशिवादीनां गुरुर्यत्र ततः शिवः ॥ सोऽपि शान्तो महायोगी आचारक्षम एव सः ॥२८॥ नान्यः कश्चित्क्षमः क्वापि सदाचारे कदाचन । शिवस्य कृपया चैव केवलं साधकः क्षमः ॥ २९ ॥ क्षमा सा गिरिजा देवी नान्यः कश्चित्कदाचन । उप्रभावो भीमकर्मा करालो भैरवः सदा॥३०॥ तमेव परमाचारं कथं गोप्तुं क्षमो ह्यहम् । यथा मे कालिकाराध्या तथाचारोऽयमेव हि ॥३१॥ जहा ब्रह्मा विष्णु महेश्वरादिके गुरु हैं। वहीं शिव हैं । इस प्रकार विचारशील यह मनुष्य हो शान्त महायोगी और वही आचारमें समर्थ है

।
(२३०) योगिनीतन्नम् ।
अन्य कोई मनुष्य उस आचारमें समर्थ नहीं है। साधकमनुष्य शिवकी
पाके चलसे ही उसमें समर्थ होता है। और वह गिरिसुता देवी समर्थ
होती है। अन्य कोई नहीं यह भयफर कर्मकारी करालभैरव सदा ही
उग्रस्वभाव हे । तो उस परमाचारके छिपानेमें कैसे समर्थ है ? कालिका
जिस प्रकार मेरी आराधनीय है । यह आचार भी उसी प्रकार है २८-३१
विद्याराज्ञी समाराध्यां दातुं योग्यः कदाप्यहम् ।
योग्यो न परमाचारं दातुं कालीहृदःप्रियम् ॥ ३२ ॥
इति सम्भाव्यादिनाथः करालं भैरवं प्रति ।
आज्ञापयामास पुत्र प्रति गच्छ त्रिलोचनम् ॥ ३३ ॥
आराध्या विद्या राज्ञीके प्रदान करने में में कदाचित् योग्य हू । किन्तु
कालीका हृदयगत आचार प्रदान करनेमें कभी योग्य नहीं हू । श्रीमान
आदिनाथने इस प्रकार विचार कर करालभैरवको आज्ञा दी । हे पुत्र
तुम त्रिलोचनके समीप जाओ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
देवी शिवं समारुह्य तत्रासीत्करुणामयी।
यातो मातुः कालिकायास्ततोसो भैरवः स्वयम्३४॥
वहा करुणामयी काली शिवोपार आरोहण करके स्थित हैं तदनन्तर
भेरव माताफे निकट गये ॥ ३४ ॥
त्यक्त्वा तपस्तु सकलं भावयन्नन्तरात्मना ।
यद्यजतं तपो ह्येवं सर्व जातं वृथा हि तत् ॥ ३५ ॥
ममाभाग्यवशात्सा हि गुर्वाज्ञा विफला भवेत् ।
अतः शरीरं त्यक्ष्यामि न वक्ष्यामि कदाचन ॥३६॥
तपस्या छोडकर अन्तरात्माके सहित जो जो जप किया वह समस्त ही
तपकी समान विफल हुआ। भैरवने मनमें विचारा मेरे दुर्भाग्यके वश
गुरुकी आज्ञा भी विफल हुई इस कारण मे शरीरको त्याग दूगा अब कभी
इस देहका भार वहन नहीं करूगा ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

भाषाटीकासमेतम् ।
प्रतिज्ञामीहशी कृत्वा देहं संत्यक्तमुद्यतः।
तदाकाशसमुद्भूता वाणी जाता मनोहरा ।। ३७ ॥
इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वह शरीर त्यागनेमें उद्यत हुए उसी समय
मनोहर आकाशवाणी हुई ।। ३७ ।।
शृणु त्वं हि महाभाग महात्मन्भैरव स्वयम् ।
तामाज्ञां कथयामि त्वां श्रुत्वा कर्णेऽवतंसय ॥ ३८॥
हे महात्मा करालभैरव ! इस आज्ञाको सुनो। और सुनकर धारण
करो ॥ ३८॥
गुर्वाजा विफला या तु तव वै भैरवोत्तम ।
नाचारेण तपस्तप्तं त्वयात्मज्ञानतः सदा ॥ ३९ ॥
तुम्हारे गुरुकी आना विफल होनेका कारण यह है कि तुमने विना-
आचार केवल आत्मज्ञानानुसारही सदा तप किया है ॥ ३९ ॥
कथं तुभ्यं तु सिद्धिश्च दर्शन धा ददाम्यहम् ।
पुनर्याहि महाकालभैरवं भवनाशनम् ॥१०॥
आदिनाथं तव गुरुं वृत्तान्तं कथयेदृशम् ।
तदावश्यं महाचारं तुभ्यं वै स प्रदास्यति ॥ ४१ ॥
मे तुमको किस प्रकार दर्शन दूं । सुतरा तुमको सिद्धि नही हुई ।
तुम फिर उन आदिनाथ भवनाशन महाकालभैरव गुरुके निकट जाओ
और यह सर वृत्तान्त कहो। वह तुमको अवश्य ही महाचार प्रदान
करेंगे । ४० ॥ ४१॥
तेनैवाचारतो देव ममाराधनमाचर ॥
अचिरात्तत्पदास्यामि यद्यन्मनसि वर्तते ।। ४२ ॥
हे सुवत ! तुम उसी आचरणसे मेरी आराधना करो तो तुम्हारे मनमें
जो जो वर्तमान हे वह सब प्रदान करूंगी ॥ ४२ ॥

(२३२) योगिनीतन्त्रम् ।
कालीतारामहामंत्र हितं मन्त्रञ्च वै ध्रुवम् ।
कुलाचारं विना यो हि जोद्वै नारकी भवेत् ॥ ४३ ।।
कुलाचार के बिना जो मनुष्य कालीताराका महामंत्र जपता है। वह
निःसन्देह नारफी होता है ।। ४३ ॥
कर्थ सिद्धिर्मवत्तस्य मुक्तिस्तिष्ठति दूरतः ॥ ४४ ॥
उसको किस प्रकार सिद्धि हो उसको मुक्ति दूर स्थित रहती है ॥४४॥
एवमाज्ञां महाकाल्या लब्ध्वासौ भैरवोत्तमः।
पुनर्गत्वा च श्रीनाथ आदिनाथ महामभुम् ॥ ४५ ॥
महाकालं महादेवं शून्यरूपं जगद्गुरुम् ।
निवेदयामास तदा यद्यद्वाक्य समीरितम् ॥ १६ ॥
यह भैरवोचम महाकाली इस प्रकार आज्ञा पाकर पुनर्गमनपूर्वक
महादेवाने जो ओ वचन कहें थे यह सब वचन श्रीनाथ महाप्रभु महाकाल
महादेव शून्याप जगद्गुरु आदिनायसे निवेदन किये ॥ ४५ ॥ ४६ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२३३) किया और करालवस्त्रभैरवको क्रोधवक्त्रभैरव यह नाम प्रदान किया॥४८॥ ॥ ४९ ॥ ५० ॥ दिव्यभावं श्रावयित्वा वरिभावं ततः परम् । मदिरां मत्स्यमुद्रां च पात्रं कारणपूरितम् ॥ ददौ तस्मै महाकालः शून्यरूपी गुरुः स्वयम् ॥५॥ उन शून्यरूपी स्वयं गुरु महाकालने उसको दिव्यभाव और वीरभाव प्रदान करनेके पीछे मदिरा मत्स्य और मुद्रा सहित कारणपूरित पात्रका उपदेश दिया ॥ ५१॥ तदानी शुशुभे सर्व जगदेतच्चराचरम् । क्रोधवक्रोऽपि नत्वा श्रीमहाकालीपदाम्बुजम् ॥५२॥ तब चराचर जगत् शोभा पाने लगा क्रोधवक्र भैरवने श्रीमहाकालीके चरणकमलोंमें नमस्कार पूर्वक ॥ ५२ ॥ महाकालस्तदा देवि स्मृत्वा श्रीगुरुपादुकाम् । गुवाज्ञया भावयुक्तः परं स्वीकृत्य कारणम् ।। ५३ ॥ हे देवि!महाकालने भी गुरुपादुकाको स्मरण करके गुरुकी आज्ञासे भाव- युक्त होकर कारण स्वीकार किया ॥ ५३॥ स बुद्धिमांश्च तेजस्वी परमानन्दपूरितः । आनन्दजलधौ देवि निमग्नः क्रोधभूपतिः ।। ५४ ॥ शक्तिपादौ महेशानि भूयो नत्वा गुरोः पदम् । अस्तैषीत्परया भक्त्या संसारे सागरे स्थितः ॥५५॥ फिर बुद्धिमान् तेजस्वी क्रोधवक्त्रभैरव आनंदसागरमें निमम हो शक्ति- पदमें वारम्वार प्रणाम करनेके पीछे गुरुके चरणोंकी वंदना करके संसारमें अवस्थापूर्वक परमभक्तिसहित गुरुकी स्तुति करने लगे ॥५४-५५॥

(२३२) योगिनीतयम् । कालीतारामहामंत्र हितं मन्त्रञ्च वै ध्रुवम् । कुलाचारं विना यो हि जो?, नारकी भवेत् ॥ ४३ ॥ कुलाचारके विना जो मनुष्य कालीताराका महामत्र जपता ह। वह निःसन्देह नारकी होता है ।। ४३ ।। कर्थ सिद्धिर्भवत्तस्य मुक्तिस्तिष्ठति दूरतः॥४४ ॥ उसको किस प्रकार सिद्धि हो उसको मुक्ति दूर स्थित रहती है ॥४४|| एवमाज्ञा महाकाल्या लब्ध्वासौ भैरवोत्तमः । पुनर्गत्वा च श्रीनाथ आदिनाथ महाप्रभुम् ॥ ४५ ॥ महाकालं महादेवं शून्यरूपं जगद्गुरुम् । निवेदयामास तदा यद्यद्वाक्यं समीरितम् ॥ ४६॥ वह भैरवोत्तम महाकालीकी इस प्रकार आज्ञा पाकर पुनर्गमनपूर्वक महादेवीने जो जो वचन कहे थे वह सब वचन श्रीनाथ महाप्रभु महाकाल महादेव शून्यरूप जगद्गुरु आदिनाथसे निवेदन किये ॥ १५ ॥ ४६ ॥ मातुः कृपा महाकाल्या करालो भैरवोधुना। इति मत्वानन्दितःस गुरुर्वे शून्यरूपभाक् ॥ ४७ ॥ कराल भैरवके प्रति महाकाली माताकी कृपा हुई है । यह विचार कर त्यरूपी जगद्गुरुको आनन्द उदय हुआ ॥ ४७ ॥ तदा नियमपूर्व हि करालो भैरवोऽवदत् ॥४८॥ कुलाचारं परं गुप्त कालीत-वोदित हि यत् । महाकालो जगन्नाथोऽभिषिक्तं तच्चकार ह ॥ ४९ ॥ शाकाभिषेकविधिना पूर्णाभिषेकतस्तथा ॥ ददौ नाम करालाय क्रोधवक्रति विश्रुतम् ॥ ५० ॥ तब नियमपूर्वक कालोतन्त्रोदित परम गुप्त कुलाचार कहा | महाकाल बगनाथने शाक्ताभिषेक और पूर्णाभिपे विधिद्वारा उसके अभिषेक भाषाटीकासमेतम् । किया और करालवस्त्रभैरवको कोधयात्रभैरव यह नाम प्रदान किया।॥४८॥ ॥४९॥ ५० ॥ दिव्यभावं श्रावयित्वा वरिभावं ततः परम् । मदिरां मत्स्यमुद्रां च पात्रं कारणपूरितम् ॥ ददौ तस्मै महाकालः शुन्यरूपी गुरुः स्वयम् ॥५१॥ उन शून्यरूपी स्वयं गुरु महाकालने उसको दिव्यभाव और चीरभाव प्रदान करनेके पीछे मदिरा मत्स्य और मुद्रा सहित कारणपूरित पात्रका उपदेश दिया ॥ ५१॥ तदानी शुशुभे सर्व जगदेतच्चराचरम् । क्रोधवक्रोऽपि नत्वा श्रीमहाकालीपदाम्बुजम् ॥५२॥ तव चराचर जगत् शोभा पाने लगा क्रोधवक्र भैरवने श्रीमहाकालीके चरणकमलोंमें नमस्कार पूर्वक ॥ ५२ ॥ महाकालस्तदा देवि स्मृत्वा श्रीगुरुपादुकाम् । गुवौज्ञया भावयुक्तः परं स्वीकृत्य कारणम् ॥ ५३ ॥ हे देवि!महाकालने भी गुरुपादुकाको स्मरण करके गुरुकी आज्ञासे भाव- युक्त होकर कारण स्वीकार किया ॥ ५३॥ स बुद्धिमाश्च तेजस्वी परमानन्दपरितः। आनन्दजलधौ देवि निमग्नः कोधभूपतिः॥ ५४॥ शक्तिपादौ महेशानि भूयो नत्वा गुरोः पदम् । अस्तैषीपरया भक्त्या संसारे सागरे स्थितः ॥५५॥ फिर बुद्धिमान तेजस्वी क्रोधवक्नभैरव आनंदसागरमें निमम हो शक्ति- पदमें वारम्वार प्रणाम करनेके पीछे गुरुके चरणोंकी वंदना करके संसार में अवस्थापूर्वक परमभक्तिसहित गुरुकी स्तुति करने लगे ॥५४-५५॥

(२३४) योगिनीतन्त्रम्। क्रोधवक्त्रभैरव उवाच । नमामि नाथं सुरकल्पवृक्षं गुरुं चिदानन्दमहावतारम। नित्यं हि विज्ञानमनन्तरूपंपरात्परं ब्रह्मशिवस्वरूपम् ५६ क्रोधवक्त्र भैरवने कहा-जो चिदानंदके महावतार सुरकल्पवृक्ष श्रीनाथगुरु विज्ञानस्वरूप आनन्दमय नित्य शिव ब्रह्मस्वरूप परात्पर ॥५६॥ जगत्रिषासं जगदादिमूलमज्ञातमेकं परमात्मसङ्गम् तेजोमयं निकलतत्यभावं क्रियाविहीनं परमं निरञ्जनम्५७ जगदादिमूल जगन्निवास अज्ञात एक, परमात्माके संग तेजोमय निष्फल तत्त्वभाव क्रियाविहीन परमनिरंजन ।। ५७ ॥ प्रपञ्चहीन परिपूर्णभावमाद्यन्तहीन प्रकृतेः परस्तात् । अरूपरूपं स्फुटमेव सत्यं कृपावतार खलु शुन्यरूपम् ५८॥ अनादिसंसारविनाशबीजं परं पवित्र परगोचरं गुरुम् । शिवाभि, केवलानामनन्त्रात्प्रकाशभाव भणमामि नित्यम् ॥ ५९॥ प्रपञ्चहीन परिपूर्णभाव अनाद्यन्त प्रतिसे परे अरूपरूप सत्यस्वरूप कृपावतार शून्यरूप ॥५८॥ अनादि संसार विनाश बीज है । और जो अत्यंत पवित्र और इंद्रियोंसे अग्राह्य हैं उन परम पवित्र गुरुको प्रणाम करता हूं । जो शिवमय कंवल नाममंत्रमें ही जिनका प्रकाशभाव है उन गुरुको नमस्कार करता हूं ॥ ५९ ॥ अणोरणीयान्महतो महीघान्पश्यन्ति त्वामादिधि- दश्च सर्वे । यज्ज्ञान लोचनमेव सत्यं स च प्रविष्ट- स्त्वयि नाथ सत्यम् ॥ ६० ॥ हे नाथ ! हे गुरो ! आदिविदरणीयगण जिनको अणुसे भी अणीयान् और महत्से भी महान् दर्शन करते हैं । तथा जिनका ज्ञानज लोचन ही सत्य है वही आपमें प्रविष्ट हैं ।। ६० ॥

भाषाटीकासमंत्तम । (२३५)
असारसंसारसमुदनावं वन्देहमाद्यं पुरुष पुराणम् ।
त्वमेव कालीपरमार्थबीजं नमाम्यहं त्वच्चरणार-
विन्दम् ।। ६१॥
वहीं असार संसार समुद्रसे तारनेवाले हैं उन आद्य पुरातन पुरुषको मै
नमस्कार करता हूं। और तुम ही परमार्थसे महाकाली चीजस्वरूप हो
आपके चरणकमलों में मेरा नमस्कार है ॥ ६१ ॥
स्तोत्रेणानेन यो भक्त्या त्वां स्तोप्यति च साधकः।
प्रातमध्यादसायाह्ने नस्य मुक्तिप्रदा भव ॥ ६२ ॥
जो साधकोत्तम प्रातः मध्याह्न और सायंकालमें इस स्तोत्रद्वारा भक्ति-
सहित तुम्हारी स्तुति करे । उसको मुक्ति प्रदान करो ॥ ६२ ॥
महाकालभैरव उवाच ।
स्तोत्रेणानेन सन्तुष्टः सदाहं तव पुत्रक ।
गच्छ शीनं योनिपीठं देवी शिखरमाश्रितः ॥ ६३ ॥
भज काली कुलाचारभाववश्यापरायणः ।
अचिराद्वान्छिता सिद्धिर्भविता ते न संशयः ॥६॥
महाकालभैरवने कहा हे पुत्र ! तुम्हारे इस सोत्रसे मैं संतुष्ट हुआ।
तुम शीघ्र योनिपीठमें जाय देवीशिखरमें आश्रय करके कुलाचारभाव
वेश्यापरायण हो कालीका भजन करो। तो बहुत शीघ्र सिद्धिलाभ कर.
सकोगे। इसमें संदेह नहीं ॥ ६३ ॥ ६४॥
वेश्यामध्यगतं वीरं कदा पश्यामि साधकम् ।
एवं वदति सा काली तस्माद्वेश्यापरो भव ॥६५॥
मन्त्राचारे हि सर्वत्र न हि दोषः कदाचन
तस्माद् भ्रान्ति परित्यज्य कुलधर्म समाश्रय ॥६६॥
मंत्राचारमें सर्वत्र ही वेश्या दोपजनक नहीं होती। अतएव भान्ति
त्यागके कुलधर्मका आश्रय करो ॥ ६५ ॥ ६६ ॥

योगिनीतन्त्रम्। भ्रान्तिस्तत्र न कर्तव्या सिद्धिहानिर्यतो भवेत् । विशुद्धचित्तो भूयाच्चेत्सिद्धिः स्यानिकटस्थिता॥६॥ साधनविषयमें भगति सिद्धिकी हानि करती है । अतएव भांति त्याग दे। विशुद्धचित्त हो तो सिद्धि निकट ही वर्तमान है । ६७ ।। ईश्वर उवाच । ततो नत्वा महाकाली गुरुं बहुविध मुदा। योनिपीठं समासाद्य देवीशिखरमाश्रितः।। ६८ ॥ उर्वशीमेनकारम्भापश्चचूडातिलोत्तमाः। पञ्चवेश्यारतो भूत्वा कुलाचारपरायणः । भावशुद्धा महाविद्या जजाप क्रोधभूपतिः ॥ ६९ ॥ विद्याराज्ञी घोरकालीमनिरुद्धसरस्वतीम् । अष्टोत्तरशतेनव तस्य प्रत्यक्षतामयुः ॥ ७०॥ ईश्वर बोले -तदनंतर भैरव महाकाली और गुरुको बहुत बार नमः स्कार करके योनिपीठ आश्रयपूर्वक उर्वशी, मेनका, रम्भा, पञ्चचूडा तिलोत्तमा इन पांच वेश्यामें निरत होकर कुलाचारपरायण हुए अनंतर क्रोधभैरव विद्याराज्ञी घोरकाली और अनिरुद्ध सरस्वती भावशुद्ध महा- विद्याका मंत्र जपने लगे। अष्टोत्तरशतवार जप द्वारा उनकी प्रत्यक्षता लाभ करी ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ ७० ॥ काली करालवदना तेजोरूपा सनातनी। तेजसा परिसंच्छाद्य ब्रह्माण्डमण्डलं सदा ।। ७१ ॥ करालवदना तेजरूपा सनातनी काली तेजसे ब्रह्माण्डमण्डलको आच्छन्न कर रही हैं ॥ ७१ ॥ सदृष्ट्वा सुमहत्तेजो भैरवो भयविहला। अनुपायो भूच्छितः सन्नपतत्पर्वताद्भुवि ॥ ७२ ॥ और भापाटीकासमेतम् । (२३७) वह महज देखकर भैरव भयविहुल मूलित और अनुपाय होकर पर्वतसे पृथ्वीमें गिर गये ॥ ७२ ॥ ततः काली जगन्माता कृपासागरसञ्चया। आश्वास्योवाच तं क्रोध वाचामृतलमानया ॥ ७३ ।। तदनंतर कृपासागरसञ्चया जगन्माता काली वचनामृत द्वारा अभिषिक्त करके उस क्रोधभूपतिको समझाने लगी ॥ ७३ ।। ईश्वर उवाच । समुत्थाय ततो देवी भैरवः पुलकान्वितः। अस्तौषीत्परया भक्त्या नानाविधिविधानतः। मुहुर्मुहुर्ननामासौ ततः कालीमुवाच च ॥ ७४ ।। श्रीईश्वर बोले-तदनंतर भैरवने पुलकित होकर गात्रोत्थानपूर्वक परम- भक्तिसहित अनेक विधिविधानसे कालिकाकी स्तुति करी । और फिर वार- म्घार प्रणाम करके महाकालीसे कहा ॥ ७ ॥ क्रोधवक्त्र उवाच । परं ब्रह्म परं धाम परमात्मा सनातनी। ममाऽभीष्ट प्रयच्छ त्वं सर्वदा मे मनोन्मयि ।। ७५ ।। क्रोधवक्त्र ने कहा-हे मनोन्मयी काली ! आप परब्रह्म परम धाम परमात्मा और सनातनी हैं आप मेरी वांछित अभिलाषा प्रदान कीजिये || ७५ ॥ श्रीकाल्युवाच । ब्रह्मविष्ण्वादिकानाञ्च ब्रह्माण्डान्तरवासिनाम् । नित्यं नियामकस्त्वं हि भव भैरवसत्तम ।। ७६ ॥ श्रीकालीने कहा-हे भैरवसत्तम ! तुम ब्रह्मा विष्णु इत्यादिके और ब्रह्माण्डान्तरवासीके सत्रही नित्य निग्राहक हो अर्थात् सबके पूज्य होओ।। ७६ ॥

(२४०) योगिनीतन्त्रम्।
श्रीभगवानुवाच ।
उड्डीयानस्य देवेशि प्रादुर्भावः कृते युगे ।।
पूर्णशैलस्य संभतिस्त्रेतायुगमुखें ऽभवत् ॥ ५ ॥
दापरे जालशैलस्य कामाख्यस्य कलौ युगे।
घोरस्य कलिपापस्य विनाशाय महेश्वरि ॥ ६ ॥
प्रतिवर्षे पीठयुग्ममुपपीठं तथा च ते !
त्रयं त्रयं महाक्षेत्रं पुण्यारण्यं वय त्रयम् ॥ ७ ॥
श्री भगवान् बोले-हे देवेशि ! सत्ययुगमें उड्डीयान त्रेता युगके मुखमें
पूर्णशैल द्वापर, जालशैल और कलियुगमें कामाख्या प्रादुर्भूत होती है।
हे महेश्वरि । घोरतर कलियुगके पापोंका नाश करनेके लिये प्रतिवर्ष
तुम्हारा दो दो पीठ ओर उपपीठ तीन तीन महाक्षेत्र और तीन तीन
पुण्यक्षेत्र विद्यमान हैं ॥ ५-७ ।।
प्रतिपीठे महादेव प्रतिपीठे चतुर्भुजः।
प्रतिपीठे स्थिता गगा पार्वती प्रतिपीठके ॥८॥
प्रतिपीठमें महादेव प्रतिपीठमें चतुर्भुज प्रतिपीठमें गगा स्थित और प्रति
पीठमें पार्वती विद्यमान हे ॥ ८ ॥
प्रतिपीठे प्रतिक्षेत्र प्रत्यरण्ये तथैव च ।
कलौ गृहात्तुदूरे च तीर्थबुद्धिः प्रजायते ॥९॥
प्रतिपीठमें प्रतिक्षेत्र और प्रति पुण्यारण्यही तीर्थ है कलियुगमें घरसे
दूरदेशमें तीर्थबुद्धि होती हे || ९ ॥
किन्तु तीर्थानि वे सन्तिसर्वाणि स्वस्वभावत !
प्रतिपीठे पृथक्धर्म आचारश्च पृथक पृथक् ॥ १० ॥
किन्तु सर्वतीर्थभावना सिद्ध ही कहे गये हैं । प्रतिपीठमेंही धर्म
और भाचार पृथक् है ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२४१) देशे देशे कुलाचारा मन्तव्याश्चैव हेतुभिः । पृथक्पूजा पृथड़मन्त्रो मत्ये वै तीर्थपीठकम् ॥ ११ ॥ देशके भेदसे कुलाचार हेतद्वारा भिन्न भिन्न हैं । मर्त्यलोक तीर्थ पीठ पूना और मंत्र पृथक् पृथक् हैं ॥ ११ ॥ भद्रपीठं दाक्षिणात्ये मध्यदेशस्य पार्वति । जालन्धरन्तु पाश्चात्यं पूर्णपीठन्तु पूर्वतः ॥ १२ ॥ हे देवि ! मध्यदेशके दाक्षिणात्यमें भद्रपीठ, पश्चिममें नालन्धर, पूर्वमें पूर्णपीठ ॥ १२ ॥ ऐशान्यां पूर्वभागे च कामरूप विभावय । जालन्धरन्तु वायव्ये कोला पुरे तथोत्तरे ॥ १३ ॥ ईशाने चव वेहार महेन्द्र कियदुत्तरे । श्रीहट्ट चापि पूर्वे च ह्युपपीठान्यथो शृणु ॥ १४ ॥ ईशान कोणके पूर्वभागमें कामरूप जानना चाहिये, वायुकोणमें जालन्धर उत्तरमें कोल्हापुर, ईशानमें निहार, कुछ दूर उत्तर में महेन्द्र और पूर्वमें श्रीहट्ट है. अब सर उपपीठ सुनो ॥ १३ ॥ १४ ॥ नौकायानेन देवेशि अष्टषष्टिस्तु योजनम् । विस्तारमोटपीठस्य आयामस्त्रिगुणो भवेत् ॥ १५ ।। हे देवेशि ! नौकायानद्वारा अडसठयोजन विस्तारयुक्त औदपीठ है । इसका आयाम विस्तारसे त्रिगुण है अर्थात् अधिक है ॥ १५ ॥ शकटाकारकं पीठं चतुष्कोणं सुपीठकम् । चतुरिसमायुक्तं धायुबिम्बेन चिह्नितम् ॥ १६ ॥ शकटाकरपीठ पीठयुक्त और चतुष्कोण चारयुक्त वायुविम्बद्वारा चिह्नित ॥ १६ ॥ .

(२४२)
योगिनीतन्त्रम् ।
तीर्थकोटिद्वययुतं सिन्धुभद्रकपीठकम् ।
यत्र सोमेश्वर लिङ्गमादिपीठं तथा परम् ॥ १७ ॥
इसी स्थानमें दो करोड तीर्थयुक्त सिन्धुभद्रक पीठ आदिपीठ
सोमेश्वर लिग ॥ १७ ॥
कामधेनुश्च यत्रैव यत्र चक्रेश्वरो हरः।
क्षेत्र विरजसंज्ञश्च एकादं तदनन्तरम् ॥ १८ ॥
कामधेनु और चक्रेश्वर हर अवस्थित है तदनन्तर विरज क्षेत्र फिर
एकाम्र॥१८॥
भास्करस्य महाक्षेत्र यत्र मातंगशंकरः।
कुशस्थली महापुण्या दण्डकञ्च वनं तथा ॥ १९ ॥
भास्करका महाक्षेत्र और जहा मातंग शङ्कर हैं । तदनन्तर महापवित्र
कुशस्थली और दण्डक वन ॥ १९ ॥
सुमन्तश्च तथारण्यं शिवयूपश्च पूर्वतः।
पश्चिमे धेनुकारण्यं उत्तरे तु गयाशिरः॥२०॥
मुमन्तारण्य और पूर्व दिशामें शिवयूप पश्चिममें धेनुकारण्य उत्तरमें
गयाशिर ॥ २० ॥
दक्षिणे चन्द्रभागा च ओढ़पीठं वरानने ।
त्रिंशद्योजनविस्तीर्णमायामे शतयोजनम् ॥ १॥
दक्षिणमें चन्द्रभागा और ओपीठ है यह विस्तार में त्रिंशत् (तीस )
योजन और दीर्घ में सौ योजन है ॥ २१ ॥
अब कामेश्वरी देवी योनिमुद्रास्वरूपिणी ॥ २२ ॥
भूगोलपीठके तत्र गोलोकेश्वर एव च ।
धर्मपीठं महापीठ यत्र कामेश्वरो हरः ॥ २३ ॥

भाषारीकासमेतम् । (२४३)
इसी स्थानमें योनिमुद्रास्वरूपिणी कामेश्वरी देवी अवस्थित है। वहां
भूगोलपीठकमें गोलोकेश्वर विद्यमान हैं। फिर धर्मपीठ और महापीठ है।
इस स्थानमें कामेश्वर हर स्थित है ॥ २२ ॥ २३ ॥
अविमुक्तं महाक्षत्रं इंसप्रपतनं तथा ।
ब्रह्मयूपस्तु यत्र यत्र श्वेतवटः स्थितः ॥ २४ ॥
तदनन्तर अविमुक्त नामक महाक्षेत्र और हंसप्रपतन है । वहां ब्रह्मयूप
और श्वेतवट विद्यमान है ॥ २४ ॥
कुरुक्षेत्रं तु तत्रैव यत्र मायास्वना नदी।
अयोध्यारण्यकं पुण्यं धर्मारण्यं तथा परम् ॥ २५ ॥
इसी स्थानमें कुरुक्षेत्र और मायास्वना नदी है। तदन्तर पुण्यमय
अयोध्यारण्यक धर्मारण्य ॥ २५ ॥
कचात्मक महारण्य यत्र पातालशङ्करः।
गण्डकी च नदी पूर्व विष्णुयूपश्च पश्चिमे ॥ २६ ॥
दक्षिणे वृषभ लिङ्गमुत्तरे कदलीवनम् ।
एतन्मध्यतमं पीठं चापाकार मनोरमे ॥ २७॥
और कचात्मक महारण्य है इस स्थानमें पातालशंकर स्थित हैं
अनन्तर पूर्ममें गण्डकी नदी और पश्चिममें विष्णुयूप दक्षिणमें वृषभ
लिंग और उत्तरमें कदलीवन है । हे मनोरमे ! यही चापाकार मध्य-
पीठ है ॥ २६ ॥ २७ ॥
जानाम्यह लथा पद्मं रक्तवर्ण विभासते ।
एकादशशतायाम योजनानां तथा नव ॥ २८ ॥
अशीत्यष्टौ च प्रस्तारे त्रिकोणं पीठमुत्तमम् ।
प्रवरं पीठक तत्र पीठश्चाशोकमेव च ।
सीतायाश्च महाक्षेत्रमगस्त्यस्याश्रमतथा ॥ २९ ॥

(२४४)
योगिनीतन्त्रम्।
इस स्थानमें पद्म रक्तवर्ण प्रकाशित होता है। तदनन्तर दैर्ध्य अर्थात्
लम्बाई में ग्यारह सौ नौ योजन और विस्तारमें अट्ठासी योजन त्रिकोण
नामक उत्तम पीठ है वहा प्रवरपीठ और अशोकपीठ विद्यमान है । हे
प्रिये । तदनन्तर सीताका महाक्षेत्र और अगस्त्याश्रम है।। २८ ॥ २९॥
हरस्य परमं क्षेत्र क्षेत्रत्रयमिदं प्रिये ।
माधवारण्यक क्षेनं हरस्यारण्यकं तथा ॥ ३० ॥
अरण्यञ्चैव भर्गस्येत्येवमारण्यकत्रयम ॥ ३१ ॥
और हरका महाक्षेत्र यह तीन क्षेत्र विद्यमान हे फिर माधवारण्यक
क्षेत्र और हरारण्यक एर भारण्य यह तीन आरण्य विद्यमान
हैं ॥ ३० ॥ ३१॥
उत्तरे ब्रह्मक्षेत्रञ्च दक्षिणे सागरोदधिः।
पूर्व चोदयकूटश्च पश्चाच्छ्रीपर्वतं प्रिये ॥ ३२ ॥
उत्तरमें ब्रह्मक्षेत्र, दक्षिणमें सागर, पूर्वमें उदयकूट और पश्चिममें
श्रीपर्वत है ॥ ३२॥
एतन्मध्यतमं पीठं पुण्याख्यं नाम नामतः।
पदात्पादान्तरं यावामध्ये हस्तद्वयान्तरम् ॥ ३३ ॥
शिवरात्रौ च गमन सौरमासेन भासकम् ।
कामरूपं विजानीयात्षट्कोणं च प्रगर्भकम् ॥ ३४ ॥
इन सबके मध्यगत पीठ पुण्य नामसे कही गई है. वहाँ शिवरात्रिमें
सौर माससे मासकी गणनाके अनुसार मध्यभागमें दो हाथके अन्तरसे
और एक्पादसे पादान्तरके अन्तरमें गमन करने से प्राप्त होता है कामरूप
पट्कोण और प्रकृष्ट गर्भक हे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
तत्पुण्यं तत्सम वेत्थ नवव्यूहं त्रिमण्डलम् ।
पर्वतईगभियुक्तं वेदिमध्यं प्रकीर्तितम् ॥ ३५ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२४५) वह कामरूप समान और पुण्यजनक तथा परिमाणमें नौ व्यूह और सीन मण्डल है । उसकी वेदिका मध्य दशपर्वतयुक्त कहा गया है ॥ ३५ ॥ मध्यपीठ महापीठं यत्र कामेश्वरो भवेत् । तत्र पीठे हि देवेशि याति चम्पावती नदी ।। ३६ ॥ वहां मध्यपीठ महापीठ है । उस पीठमें कामेश्वर विद्यमान है। हे देवि । उसी स्थानमें चम्पावती नदी बहती है ।। ३६ ॥ कन्याश्रमं महाक्षेत्र यत्र रुद्रपदद्वयम् । एकाश्रमं परं क्षेत्र यत्र नागाख्यशंकरः ॥ ३७॥ फिर महाक्षेत्र कन्याश्रम है । वहा रुद्रके दो पद विद्यामान हैं । उसी स्थानमें एकाश्रमक्षेत्र है। वहां नागाल्य शंकर विद्यमान हैं ॥ ३७ ॥ मानसं क्षेत्रकश्चैव यत्र विश्वेश्वरो हरः। नाटकारण्यकश्चैव चम्पकारण्यकंतथा ॥ ३८॥ और वही मानस क्षेत्र है। उस क्षेत्रमें विश्वेश्वर हर विद्यमान हैं। इसके पीछे नाटकारण्य और चम्पकारण्यक हैं ॥ ३८ ॥ पिच्छिला वा दक्षिणतो गौतमस्य महाफला। पूर्व स्वर्णनदी यावत्करतोया च पश्चिमे ॥ ३९ ॥ दक्षिणे मन्दशैलश्च झुत्तरे विहगाचलः । प्रस्तारे योजनाई चायामे पञ्च च योजनम् ॥ ४० ॥ अयुतत्रयश्च त्रिस्रोतस्तथा पञ्चोद्भव दश । अष्टकोणश्च सौमारं यत्र दिक्करवासिनी ॥ ४१ ॥ नित्यं वसति सा देवी ज्ञानाद्ध्यानेन मुक्तिदा। तत्र देव्याः प्रसादेन स्थितिं गच्छन्ति नान्यथा॥४२॥ दक्षिणदिशामें गौतमकी महाफला पिच्छिला नदी है। पूर्वमें स्वर्णनदी । पश्चिममें करतोया । दक्षिणमें मन्दशैल और उत्तरमें विहगाचल है । जो कि

(२४६)
योगिनीतन्त्रम्।
विस्तार में आधा योजन और दैर्ध्य में पञ्च योजन है। तीन अयुत
निस्रोत और दश अयुत पञ्चोद्भव है। इसके पीछे अष्ट कोण है।
वहा दिकरवासिनी देवी वास करती है। वहा ज्ञान पूर्वक ध्यान
करनेपर मुक्ति प्राप्त होती है । उस स्थानके निवासी देवीके प्रसादसे
सुखसहित वास करते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ ४० ॥४१॥४२॥
अथोत्तरं नवं पीठ सौमारावधि कथ्यते ।
वसत्यत्र तु प्रत्यक्षं सदा दिक्करवासिनी॥ ४३ ॥
अब निरन्तर जिस स्थानमें दिक्करवासिनी वास करती है वह सौमारसे
आरम्भ करके नवपीठ कही जाती है ॥ ४३ ॥
दिक्करस्य च वायव्ये नीलपीठं सुदुर्लभम् ।
यत्र कामेश्वरी देवी योनिमुद्रास्वरूपिणी ।। ४४ ॥
दिकरके वायुकोणमें अत्यन्त दुर्लभ नीलपीठ है वहा योनिमुद्रास्वरूपिणी
कामेश्वरी देवी है ॥ १४ ॥
पारिजातं महाक्षेत्र यत्रादित्यस्तु शंकरः।
कोषेयस्य पुर क्षेत्र तथा चामरकण्टकम् ॥ १५ ॥
और पारिजात महाक्षेत्र तथा आदित्यशकर विराजमान हैं इसके पीछे
कौपेयका पुर और क्षेत्र तथा अमरकण्टक है ॥ १५ ॥
अरण्यमाश्विनश्चैव गौतमारण्यकं शिवम् ।
अरण्यं शिवनाथस्य शृणु पीठादितः प्रिये ॥ ४६॥
आश्विनारण्य और मगलप्रद गौतमारण्य है फिर शिवनाथका अरण्य
है। हे प्रिये ! वह पीठ आदिसे सुनो ॥ १६ ॥
पूर्व सौरशिलारण्यं पश्चिमे स्वर्णदी शुभा।
दक्षिणे ब्रह्मयूपस्तु उत्तरे मानस सरः ।। ४७॥
पूर्वमे सौरशिलारण्य । पश्चिममें शुभदायक स्वर्णदी। दक्षिणमें ब्रमयूप
और उत्तरमें मानससरोवर है ॥ १७ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२४७) एतन्मध्यगतं पीठं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । सौमाराख्य महापीठं षट्कोणन्तु त्रिमण्डलम् ॥४८॥ यह सबका मध्यगत स्थान भोग मोक्ष दायक है सौमाराख्य महापीठ षट्कोण और त्रिमण्डल है ॥ १८ ॥ सहस्रयोजनायाम हयताम्रश्च पश्चमम् । प्रस्तारे तु व्यामहीनं कोलापीठं प्रकीर्तितम् ॥ ४९ ।। हय ताम्राख्य पंचम पीठ सहस्र योजन व्यायाम युक्त है कोलापीठ व्यायामहीन कहीगई है ।। ४९ ॥ सौमाराख्यं महापीठं शिवतत्पश्च पीठकम् । वक्रशेवेश्वरं लिङ्ग यत्र वे कमला शिला ॥ ५० ॥ तदनन्तर सौमाराख्य महापीठ और शिवतत्प पीठ है फिर वक्र शैवेश्वर लिग है वहां अरुण अवस्थित है ॥ ५० ॥ केदारक्षेत्र प्रथमं यत्र केदारशंकरः। यत्र पिण्डकर क्षत्रेमरुणो यत्र तिष्ठति ॥५१॥ अनन्तर केदार क्षेत्र प्रथम है वहां केदारशंकर शिव हैं उसीके समीप पिण्डफरक्षेत्र है वहां अरुण अवस्थित है || ५१ ॥ दुगारण्यं सोमारण्यं भद्रारण्यं तथैव च । अशीतियोजनं क्षेत्रं षट्राशियोजनायतम् । चौहाराख्यं महाक्षेत्रं यत्र गत्वा न शोचति ॥ ५२ ॥ तदनन्तर दुर्गारण्य सोमारण्य और भद्रारण्य है । इसके पीछे अस्सी योजनतक व्याप्त और तेरसठ योजन व्यायामयुक्त चौहाराख्य महाक्षेत्र है वहां जानेसे शोच नहीं करना पड़ता ॥ ५२ ।। ब्रह्मक्षेत्र कलाक्षेत्र रघुक्षेत्र तथैव च । नन्दनं पारिजातश्च शिवारण्यं तथा परम् ।। ५३ ॥ ।

(२४८) योगिनीतन्त्रम्। तदानन्तर ब्रह्मक्षेत्र कलाक्षेत्र रघुक्षेत्र और नन्दन पारिजात शिवा- रण्य है ॥ ५३॥ देशारण्य ततः प्रोक्तं सप्तपीठमिद प्रिये । पूर्वे तु हीरिका नाम नदी पुण्यतमा स्मृता ॥ ५४ ॥ देशारण्य यह सात पीठ स्थित है । पूर्वदिशामें पुण्यतमा हीरिका नदी है ॥ ५४॥ पश्चिमे नाथकं लिङ्गमुत्तरे किलिपर्वतः । दक्षिणे नाथवृक्षस्तु पीठन्तु परिकीर्तितम् ॥ ५५ ॥ पश्चिममें नाथकलिंग उत्तरमें किलिपर्वत. और दक्षिणमें नाथवृक्ष पीठ कही गई है ॥ ५५ ॥ गोयानन त्रिभिर्मासैस्तथा चैव दिनत्रयम् । मासहीनेन पूर्वोक्तकाले नोपक्रमस्ततः ॥ ५६ । वाराही प्रथमं पीठं द्वितीयं कोलपीठकम् । क्षेत्र कुमारं प्रथम द्वितीय नन्दनायम् ।। ५७ ।। तृतीय शाश्वतीक्षेत्र मातई प्रथम वनम् । सिद्धारण्यं द्वितीयन्तु तृतीयं विपुलं वनम् ॥ ५८ ॥ कोटिशश्च वृत लिङ्गै कोटिकोटिगणेव॒तम् । पञ्चतीर्थ भवेत्पूर्व पश्चिमे धनहा नदी॥ ५९ ।। गोयान (पैलगाडी ) द्वारा तीन मास तीन दिन और नौका द्वारा भासहीन अर्थात् दो मास तीन दिनमें तीनों पीठकी फेरी लग जाती है । वाराही प्रथम पीठ और दूसरी कोल पीठ है । कुमारक्षेत्र प्रथम, नन्दन और शाश्वती क्षेत्र तीसरा है. मातंग प्रथम वन, सिद्धारण्य दूसरा और विपुल वन तीसरा है यह सत्र करोड करोड लिंग और करोडकरोड गणोंसे परिवृत्त । पूर्वमें पंचतीर्थ और पश्चिममें धनदा नदी है।।५६-५९॥

भापाटीकासमेतम् ।
(२४९)
पत्राख्या दक्षिणे चैव तूत्तरे कुरुबकाधनम् ।
एतन्मध्यगतं देवि श्रीपीठं नाम नामतः॥ ६० ॥
दक्षिणमें पत्राख्या वन और उत्तरमें कुरुबका बन है हे देवि ! इन
सबके मध्यगत स्थानका नाम श्रीपीठ विख्यात है ॥ ६०॥
इति श्रीयोगिनी तन्त्र सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे चतुविशतिसाहले
कामरूपपीठाधिकारे प्रथमतमे द्वितीयभागे भाषाटीकायां
प्रथमः पटलः ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
नित्यं निर्वर्त्य स्वगृहे पितृन्नान्दीमुखानपि ।
अभ्यर्य विधिवद्भक्त्या पश्चाद्यानी समाचरेत् ॥ १॥
श्रीभगवान् बोले-अपने घरमें नित्यकर्म समानपूर्वक पितरोंकी पूजा
अर्थात् नान्दीमुख श्राद्ध सम्पन्न करके भक्तियुक्त हो फिर यथाविधि
यात्रा करे ॥ १ ॥
उत्तरस्यां गते शुक्रे सानुकूले शुभे ग्रहे।
गुरुपित्रोरनुज्ञाप्य ब्राह्मणानां विशेषतः ।
भोजयित्वा द्विजानसप्त ततो यात्रा समाचरेत ॥२॥
शुक्रके उत्तरमें अवस्थित होनेपर और सब शुभग्रहोंके सानुकूल
होनेपर गुरु और पिता मातादिकी तथा विशेषतः ब्राह्मणों की अनुमति
अहणपूर्वक सात ब्राह्मणों को भोजन कराकर फिर यात्रा करनी
चाहिये ॥२॥
सिंह धतुषि मेषे च लग्ने सत्पूर्वपीठके।
तुलायां कुम्भमीने च न गच्छेत्पश्चिम बुधः ॥ ३ ॥
बुद्धिमान् पुरुष सिंह धनु और मेष राशिम पूर्वकी और तुला मिथुन
और कुम्भ रासिमें पश्चिम की ओर ॥ ३ ॥
वृषेननायो मकरे न गच्छेदक्षिणालयम् ।
कर्कटे कीटमीने च न गच्छेदुत्तरं सुधीः ॥ ४॥

( २५०) योगिनीतन्त्रम् । वृष कन्या और मकरमें दक्षिणकी और कर्क वृश्चिक और मीनमें उत्तरकी ओर ममन न करै ।। ४ ।। चापे गव्यङ्गनायां च न गच्छेद्वहिकोणकम् । मकरे कर्कट मीने नेत्यां परिवर्जयेत् ॥ ५ ॥ वायव्यां कुम्भमेषेच चापे चैव विवर्जयेत् । सिंह मीने कर्कटेच ह्येशान्यान्तु न चिन्तयेत् ॥६॥ सुधी मनुष्य धनुः वृष और कन्यामें, अग्निकोणकी ओर मकर कर्क और मीनमें, नैर्ऋत कोणकी ओर कुम्म मेष और धनु राशिमें वायुकोणकी ओर तथा सिह मीन और कर्क ईशान कोणकी ओर गमन न करे ॥ ५ ॥ ६ ॥ एतत्स्थूलं विजानीयाद्योगिनी शृणु शंकरि । त गच्छेन्मन्दवारे च पूर्वदेशं मम प्रिये ॥७॥ यह सब स्थूलरूपसे जानना हे शङ्कार ! योगिनीको सुनो है प्रिये ! मन्दवार अर्थात् शनैश्वरके दिन पूर्वदेश ॥ ७ ॥ पश्चिमे सवितुर्वारे दक्षिणां बुधवासरे। कुजवारे चोत्तराञ्च बुध वापि दिशं त्यजेत् ॥ ८ ॥ रविवारको पश्चिम देश, बुधबारको दक्षिण देश और मंगलबारको उत्तर देशमें गमन न करै ॥ ८॥ जीववारे तु नत्या वायव्यां भृगुवासरे । शनिवारे तथैशान्यां सोमे चैव विशेषतः ॥ ९ ॥ वृहस्पतिवारको नर्सत्य कोण में, शुक्रवारको वायु कोणमें, सनिवारको और विशेषतः सोमवारको ईशान कोणमें न जाय ॥ ९ ॥ पूर्वदश महेशानि प्रतिपन्नवमी ह्यसत् । तत्र यात्रा न कर्त्तव्या योगिनीसम्मुखा यतः ॥ १० ॥ " भाषाटीकासमेतम् । (२५१) हे महेशानि ! यात्री लोग पडवा और नवमीको पूर्व दिशामें यात्रा न करै क्योंकि इनमें सन्मुख योगिनी होती है ॥ १० ॥ चतुर्दश्यान्तथा पष्ठयां पश्चिमन्तु विवर्जयेत् । त्रयोदशी च पञ्चम्यां न गच्छेदक्षिणां दिशम् ॥११॥ चौदश और छठमें पश्चिम दिशा तेरस और पञ्चमीम दक्षिण दिशा११ दशम्यां च द्वितीयायां वर्जयेद्राक्षसीन्दिशम् । पूर्णिमा सप्तमी चैव वायव्यां सर्वथा ह्यसत् ।। १२ ॥ द्वितीया और दशमीमें नैर्ऋत दिक् पूर्णिमा और सप्तमीमें वायव्य दिक् ॥ १२ ॥ न गच्छेश्चैव वैशानीममावस्याष्टमीदिने । विष्कम्भः प्रीतिरायुष्मनप्रतिपत्तु विवर्जितः ॥१३॥ और अमावस्या तथा अष्टमीमें ईशान दिक् परित्याग करै । पडवामें वेष्फम्म प्रीति और आयुष्मान् योग वर्जन करें ।। १३ ॥ सौभाग्य शोभनश्चैव द्वितीयास्वतिगण्डकम् । सुकर्मा वैधृतिश्चैव तृतीयायां विवर्जितः ॥ १४ ॥ द्वितीयामें सौभाग्य शोभन और अतिगण्डक वर्जनीय है तृतीयामें सुकर्मा चैधृति ॥ १४ ॥ गण्डो वृद्धि वश्चैव व्याघातश्च तथैव च । चतुर्थी वर्जयेदेखि पञ्चम्यां हर्पण तथा १५ ॥ चतुर्थीमें गण्ड, वृद्ध ध्रुव और व्याघात पंचमीमें हर्पण ॥ १५ ॥ बजः सिद्धिव्यतीपाती षष्ठयां जानीहि शंकार। वरीयान्परिघश्चैव सप्तम्यां परिवर्जयेत् ॥ १६ ॥ पष्ठीमें वज्र सिद्धि और व्यतीपात, सप्तमीमें वरीयान् और परिघ योग वर्जन करै ॥ १६॥ -

(२५२)
योगिनीतन्त्रम् ।
शिवः सिद्धिश्च साध्यञ्च वर्जयेदष्टमीतिथौ ।
नवम्यां शुभशुक्रौ च दशम्या ब्राह्ममेव वा ॥ १७ ॥
अष्टमी शिव सिद्धि और साध्य नवमीमें शुभ शुक्र दशमीमें ब्रह्म १७
एकादश्यां तथैन्द्रन्तु द्वादश्यां वैधृति त्यजेत् ।
उत्तरात्रयं त्रयोदश्यां विशाखायां चतुर्दशीम् ॥ १८ ॥
एकादशीमें ऐन्द्र, द्वादशीमें वैधृति, त्रयोदशीमें उत्तराफाल्गुनी,उत्तरापाढा
र उत्तराभाद्रपदा चतुर्दशीमें विशाखा ॥ १८ ॥
मघादी भरणीश्चैव पौर्णमास्यां विवर्जयेत् ।
पक्षतौ कृत्तिका निन्द्या द्वितीयायान्तु ज्येष्ठका ।
अयात्रिक च नक्षत्रे प्रस्थानं न कदाचन ॥ १९ ॥
पौर्णमासीमें मघा आर्द्रा और भरणीको त्याग दे । प्रतिपत्में कृत्तिका
र द्वितीयामें ज्येष्ठा यह सब नक्षत्र यात्रा वा प्रस्थानमें कभी शुभ
में है ।। १९ ॥
यात्रायान्तु न दुष्टस्य कारणस्य विचिन्तनम् ।
जन्ममासे जन्मदिने जन्मनक्षत्रके तथा।
अष्टम्पांच नवम्याच सदा यात्रा विवर्जयेत् ॥२०॥
यात्राकालमें करणका विचार नहीं करना चाहिये । जन्ममास
मदिन और जन्मनक्षत्रम अष्टमी और नवीमें सदा यानादि
जैत है ॥ २०॥
आपत्काले च यात्रायां सदुपा पश्चिमे मता।
गोधूलिसमयश्चैव पूर्वदेशे प्रशस्यते ॥ २१ ॥
आपत्कालमें पश्चिम ओरकी यात्रामें उपा काल श्रेष्ठ है और पूर्वको
जामें गोधूलिसमय प्रशस्त (उत्तम ) हे ॥ २१ ॥

भाषाटीकासमेतम् ।
(२५३)
मध्याहे दक्षिणे चैव अपराहे तथोत्तरे।
ऐशान्याश्च तथा रात्रौ नयां सन्ध्ययोर्द्वयोः ॥२२॥
मध्याह्के समय दक्षिणमें अपराहकालमें उत्तर रात्रिकालमें ईशान कोन
1दोनों सन्याय त फोन ॥ २२ ॥
मध्यन्दिने तथाग्नये वायव्यां प्रातरेव हि ।
वारुणादिषु योगेषु यथाकालं समाचरेत् ॥ २३ ॥
" मध्य दिनमें अमिकोण, प्रातः कालमें वायुकोण, और वारुणादि योगमें
यथाकालमें यात्रा करे ॥ २३ ॥
विना जन्मदिन तत्र ह्यष्टमी नवमी तथा ।
प्राची दिशं समागच्छेद्यावां कुर्यादङ्मुखः ॥२४॥
इनमें जन्मदिन अष्टमी और नवमीके मतिरिक्त यात्रा करनी चाहिये
उत्तरमुख होकर पूर्वदिशामें ॥ २४ ॥
पश्चिमे प्रामुखः कुर्यादक्षिण पश्चिमामुखः।
उत्तरे दक्षिणमुखो यात्रा कुर्यात्सुसिद्धये ॥ २५ ॥
पूर्वमुख होकर पश्चिम दिशामें पश्चिममुख होकर दक्षिण दिशामें दक्षिण-
मुख होकर उत्तरदिशामें यात्रा करनेसे कार्य सिद्ध होता है अर्थात् निस
समय पश्चिमदिशाको गमन करनेकी इच्छा हो तब प्रथम सर्वाभिमुख हो
कुछ दूर चले, फिर पश्चिमको यात्रा करे दक्षिणको यात्रा करनी हो तो
प्रथम पश्चिमको चलकर फिर दक्षिणको जाय एवं उत्तरको जाना हो तो
प्रथम दक्षिणको चलकर फिर उत्तरको चले तो कार्यसिद्धि होती है ॥२५॥
कुसुमं यावकः शंखो भेरीवाद्यश्च भूमिपः।
गवां शतं रथं यानं दक्षिणे शुभगाः स्मृताः ॥ २६ ॥
सिद्धानं मांसपिण्डञ्च भक्तभाजनमद्भुतम् ।
मत्स्यपिण्डं पराहाराः सर्वे ते दक्षिणे शुभाः॥२७॥

(२५४)
योगिनीतन्त्रम् ।
यात्रा समय दक्षिणभागमें कुसुम ( पुष्प) यावक (कुलमाप) शंख
भेरीवाद्य ( नगाडेका शब्द ) राजा बहुतसी गाये रथ और यान तथा सिद्ध
अन्न मासपिण्ड, भातका पात्र अद्भुत वस्तु मत्स्यपिण्ड और उत्कृष्ट आहार
दक्षिणभागमै शुभ हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥
कन्या वै मिथुनं वेश्या पूर्णकुम्भाः स्त्रियस्तथा ।
चरन्तः पशवोन्यं च वामतः शुभकारकाः ॥ २८ ॥
वामभागमें कन्या दम्पत्ति (स्त्री पुरुष) वेश्या और पूर्णकुम्भ अर्थात् भरा
मा घडा हाथमें लिये स्त्री और चरणशील पशु पक्षीगणोंको शुभकारक
जानना चाहिये ॥ २८ ॥
अग्रे दधि फलं यात्रा शुभदं परिकीर्तितम् ।
यदि कौश्चमयूराश्व युग्मशो यान्ति गच्छतः ।
तदा सिद्धिं विजानीयादन्यथा विघ्नमादिशेत् ॥ २९ ॥
अग्रभागमें दधि और फल शुभदायक है और गमनकालमें दोदा क्रोध
(पक्षिविशेष ) और मोरके गमन करनेसे शुभको प्राप्त होता है, नहीं
तो विघ्नाचरण करते हैं ॥ २९ ॥
गृध्रः श्येनाश्च चिल्लाश्च पार्श्व गच्छन्ति वै यदा।
न कुर्याद्यात्रिको यात्रां वायसे वनसंस्थिते ॥३०॥
यात्राके समय यदि पार्श्वदेशमें गृध्र, श्येन (बाज) और चील
गमन करे, तो यात्रीको यात्रा नहीं करनी चाहिये । यदि कौवा वन-
स्थित ॥ ३०॥
चपुते निष्टरसम्भापं गृहगोधारुतं तथा ।
क्रन्दनं कलह श्रुत्वा न गच्छेत्तु कदाचन ॥ ३१ ॥
गिरे हुए वृक्षपर बैठकर निप्छर भाषण करे, तब और गृहगोधा अर्थात्
घरकी छिपकलीका शब्द सुनकर गमन करना उचित नहीं है रुदन और
कलह सुनकर भी कमी यात्रा न करे ॥३१॥

, भाषाटीकासमेतम् । (२५५) गुर्खादित्ये गुरौ सिंहे शुक्रे चास्तमुपागते । देवतादर्शन यात्रा प्रतिष्ठां चापि यत्नतः ॥ ३२ ।। व्रतारम्भ तथोद्वाहं गृहप्रासादिकं तथा ॥ ३३ ॥ वापीकूपतडागानि यन्त्रस्यारम्भणं तथा । आरम्भो यज्ञवृक्षस्य चारामकरणं तथा ॥ ३४ ॥ देवव्रतवृपोत्सर्ग यज्ञस्यारम्भणं तथा। कर्णवेधश्च वृद्धिश्च स्त्रीणामानयनं त्यजेत् ॥ ३५ ॥ गुर्वादित्ययोगमें और सिंहराशिमें वृहस्पतिके प्राप्त होनेपर, शुक्रके 'अस्त होनेपर देवता दर्शन, यात्रा, और प्रतिष्ठा व्रतारंभ विवाह गृह और प्रासादादि वापी कूप तडागादिका खोदना, यन्त्रारंभ, यनीय वृक्ष लगाना, आरामकरण, देवव्रत, वृपोत्सर्ग यज्ञारंभ, कानछेदन, वृद्धि श्राद्ध और स्त्रीको नहीं लावे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ सुराणां दर्शन पूर्व न कुर्वीत कदाचन । प्रागारम्भं व्रतानाच यात्रा सम्वत्सरात्परम् ॥ ३६ ॥ देवताका दर्शन भी इसमें कभी न करै । व्रतका प्रथमारंभ, यात्रा सम्वत्सरके पीछे ।। ३६ ॥ व्यालवते महापुण्ये तथा नित्यवते च वै । न कालनियमस्तत्र तथा च रोहिणीव्रते ॥ ३७ ॥ शिवरात्रिव्रते चैव प्रयागस्य च मुण्डने । देशदाहे प्रहाणाश्च विशुभं नैव चिन्तयेत् ॥ ३८ ॥ व्यालनत और नित्यत्रत करना चाहिये । इसमें कालनियम नहीं है और रोहिणीवत शिवरात्रिव्रत, प्रयागमें मस्तकमुण्डन और देशदाह इन सब विषयोंमें ग्रहादिके अशुभ होनेपर भी कर्मका आरंभ कर ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ' (२५६) योगिनीतन्त्रम। उज्जयिन्यामर्कशुद्धिर्मध्यदेशे विधोस्तथा । कुजशुद्धिर्जनस्थाने त्वरण्यान्यां बुधस्य च ॥ ३९ ॥ उज्जयिनी में सूर्य शुद्धि, मध्यदेशमें चन्द्रशुद्धि जनस्थानमें कुज (मंगल) शुद्धि, अरण्यमें बुधशुद्धि ।। ३९ ॥ गौडे चान्ये गुरोः शुद्धिः कामरूपे भृगोः स्मृता। मथुरायामर्कजस्य राहोरङ्गे च वंगके ॥ ४० ॥ गौड और आन्ध्रदेशमें गुरुशुद्धि, कामरूपमें शुक्रशुद्धि, मथुरामें शनै- धरशुद्धि अंग और बंगदेशमें राहुशुद्धि शुभकर होती है ॥ १० ॥ धनुर्बाण तथा तद्वदोदपीठे व्यवस्थितम् । जालन्धरे चतुर्हस्तमूर्मिमके पूर्णहस्तकम् ।। ४१ ॥ पंक्तिहस्त कामरूपे सौमारे तारहस्तकम् । कोलपीठे तुर्य्यहस्तं चौहारे द्विगुणं भवेत् ।। ४२॥ ओपीठमें धनुर्वाण स्थित है, जालन्धरमें चार हस्त, ऊर्मिकमें पूर्णहम्त, कामरूपमें पंक्तिहस्त, सोमारमें तारहस्त, (तीनहत ) कोलपीठमें तुर्यहस्त, ( चार हस्त ) और चौहारमें द्विगुण व्यवस्थित है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ महेन्द्रे वे कलाहस्तं श्रीहट्टे वहिहस्तकम् । उपपीठे तु पाताले हस्तमेव हि विद्धि तत् ॥ ४३।। रत्नपीठे तु पस्तं लोहित्याश्चैव तूत्तरे। बलदेवाश्रमे चैव तथा कन्याश्रमेषु च । योगिनीमुखमासाद्य स्नान ध्यान गतिन्त्यजेत् ४४॥ महेन्द्र में कलाहस्त, श्रीहट्टमें वहिहस्तक, एवं उपपीठ और पातालमें एक हस्त जाने । रत्नपीठमें लोहिती के उत्तरमें बलदेवाश्चममें और भापाटीकासमेतम्। (२५७) कन्याश्रममें छै हस्त मवस्थित है। योगिनीके मुखमें गमन, स्नान और ध्यान न करे ॥ १३ ॥ ४४ ॥ यानेनार्द्धफलं विन्द्यात्तथा छन्नं च पादुके । तीर्थयात्राफलं हन्ति व्यायामो मांसभक्षणम् ।। ४५ ॥ यान ( सवारी) द्वारा तीर्थमें जानेसे वा छत्री पादुका इत्यादिको लेकर तीर्थमें जानेसे आधा फल प्राप्त होता है । व्यायाम (कसरत ) और मांसभक्षणसे तीर्थयात्राका फल नष्ट होजाता है ।॥ ४५ ॥ तीर्थ प्राज्यानुषतेन तीर्थस्य च फलं भवेत् । ज्ञानेन तु तदाप्नोति ज्ञानहीनस्य निष्फलम् ॥४६॥ अनुषद क्रमसे अर्थात् किसी और प्रयोजनसे कहीं जानेपर तीर्थकी प्राति होजाय तो तीर्थका फल प्राप्त होता है, ज्ञानपूर्वक ऐसा होनेसे भी वहीं फल प्राप्त होता है और अज्ञानसे यदि दर्शन हो तो वह निष्फल होता है ॥ ४६॥ तीर्थे चाचमनं त्याज्यं पादप्रक्षालनन्तथा। शौचमाचमनं चैव त्वन्यतीर्थप्रशंसनम् ॥ ४७ ॥ तीर्थमें आचमन और पैर धोना, शौच और दूसरे तीर्थकी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये ।। ४७ ॥ अन्यतीर्थरतिं चैव सदा तीर्थेषु दूषणम् । न मलं निर्वपत्तीर्थे न केशं निर्वपेक्वचित् ॥ ४८ ॥ एक तीर्थमें जाकर दूसरे तीर्थमें प्रीति नहीं करनी चाहिये । तीर्थमें मलत्याग और बाल कतरने अनुचित है ।। ४८ ॥ न तीर्थतीरे निवसेदक्षिणेतु विशेषतः। दक्षिणे चैव तीर्थस्य न स्नायाद्धि कदाचन ॥ ४९ ॥ तीर्थके तटमें और तीर्थके दक्षिणमें निवास न करै । तथा तीर्थके दक्षि- णमें मान कमी न करै ।। ४९ ॥ .

(२५८) योगिनीतन्त्रम् ।
तीर्थस्य चोत्तरे भागे चाष्टकोटिसहस्रशः।
वसन्ति तत्र तीर्थानिपुण्यान्यायतनानि च ।
दक्षिणे कुण्डतीर्थस्य सरितो वामतः प्रिये ॥ ५० ॥
हे प्रिये 1 तीर्थक उत्तरभागमें, कुण्डतीर्थके दक्षिणमें और नदीके वाम
भागमें आठ करोडसहस्र तीर्थ और पुण्यायतन अधिष्ठित हैं ॥ ५० ॥
तीर्थेषु ब्राह्मणं नैव परीक्षेच्च कदाचन ।
येषु तीर्थेषु ये देवा ये च तत्र द्विजातयः ।
वन्दितव्याश्च पूज्याश्च तेषां वाक्येन पूतता ॥५१॥
तीर्थमें ब्राह्मणकी परीक्षा कभी न करे, जिस वीमें जो जो देवता और
ब्राह्मण वास करते हैं, वही वन्दनीय और पूजनीय हैं इन ब्राह्मणोंके वच-
नानुसार कर्म करनेसे पवित्र होता है ।। ५१ ।।
न कालनियमः श्राद्धे मधु पिण्डे तु वर्जयेत् ।
तीर्थ गत्वा न दूरे तु वसेत्तीरे विचक्षणः ॥५२ ॥
श्राद्धमें कालनियम नहीं है, पिण्डमें मधु वर्जित है, तीर्थके दूर तटमें वास
न करै ।। ५२ ॥
ग्रहणे चैव तीर्थे च तथा च पितृवासरे ।
यनारम्भे समाप्तौ च भूकम्पे तु विशेषतः ॥ ५३ ।।
ब्राह्मणे दानयोग्यत्वं श्राद्धयोग्यत्वमेव च ।
यदीयते चापरीक्ष्य निष्फलं परिकीर्तितम् ॥ ५४ ॥
तीर्थस्थलम, ग्रहणमें, पितृवासरमें, यज्ञारंभमें, यज्ञसमातिने, विशेष
कर भूमिकम्पमें यह ब्राह्मणगण प्राद्धादिदानमें योग्य है या नहीं है,
इस प्रकार परीक्षाके विना यदि महादान भी करे तो वह भी निम्फल
होता है । ५३ ॥ ५४॥

भापाटीकासमेतम् । (२५९)
नावाहनं न चायं च न चानौ हवनं तथा ।
पवित्र सेचन नैव तथाक्षय्यावधारणम् ॥ ५५ ॥
तीर्थश्राद्धे न कुर्वीत वासःसूत्रप्रदापनम् ।
तत्र सप्तदशापिण्डापिण्डकालेषु निर्वपेत् ॥५६॥
आवाहन, अर्घ्यदान, अग्निमें हवन, पवित्रसेचन, अक्षय्यावधारण,
वाससूत्रपदापन अर्थात् जो पिण्डके ऊपर त्रिगुणित सूत्र रखते हैं,
वह तीर्थश्राद्धमें उचित नहीं है । तीर्थ श्राद्धके समय सत्रह पिण्ट
देवें ॥ ५५ ॥ ५६ ॥
श्राद्धं समाप्य पिण्डं हि न दद्यान्च कदाचन ।
मजनं प्रतिकुण्डे च प्रतितीर्थे च मजनम् ॥ ५७ ॥
दिवसे दश चाष्टौ च पञ्च सप्त त्रयं तथा ।
ततः कृत्वाभिषेकं च तीर्थ च प्रतिपूजयेत् ।। ५८ ॥
श्राद्धसमापन करके फिर पिण्डप्रदान कभी न करे । प्रतितीर्थ और
प्रतिकुण्डमें दश, आठ, पाच, सात वा तीनवार मजन करना चाहिये
इसके पीछे अभिषेक करके तीर्थपूजा करै ।। ५७ ॥ ५८ ॥
लोहित्ये चैव शोणे च गयाया विरजेषु च ।
कन्याश्रमप्वगस्त्ये च पारिया। तथैव च ।। ५९ ॥
मुकुराने तु चैकाने मुण्डनश्च विवर्जयेत् ।
पापराशिस्तु केशाने प्रयत्नेन प्रतिष्ठितः।। ६० ॥
तस्माच्छिखा परित्यज्य कर्णमूले च स्थापयेत् ।
पक्षान्ते चैव मासा ते षण्मासान्ते च वत्सरे ।।६१ ॥
अष्टावष्टौ समान्ते वा मुण्डनश्च पुनश्चरेत ॥ ६ ॥

, , (२६०) योगिनीतन्त्रम् । लोहित्यतीर्थमें, शोणमें, गया, विरजमें, कन्याश्रममें, अगस्त्य में, पारि- यात्रमें, मुकुराग और एकाग्रमें मुण्डन वर्जित है, पापराशि केशाग्रमें अवस्थान करती है, इसी कारण शिखा परित्यागकर कर्णमूलमें स्थापित करे । पक्षके अन्तमें, महीनेके अन्तमें, छ' महीनेके अन्तमें वा वर्षके अन्तमें अथवा आठ आठ वर्षके अन्तमें पुनरि मुण्डन करै ।। ५९-६२ ।। ततः कुशमयं वितं कृत्वा तीर्थे निधाय च । उत्तराभिमुखो भूत्वा बान्धवान्नापयेवुधः॥ ६३ ॥ बुद्धिमान् कुशमय ब्राह्मण निर्माण करके तीर्थमें रक्षणपूर्वक इत्तराभि- मुख हो बाधोंको लान करावै ॥ ६३ ॥ कुशोतीति हि मन्त्रेण त्रिवारं स्नापयेत्कुशे । तीर्थस्यास्य तुरीयाङ्गं फलं प्राप्स्यत्यसंशयम् ॥६४॥ गृहीत्वा तु द्विजक्रोड नामोच्चारणमन्जने । कृत्वा तीर्थफलस्याई ब्राह्मणस्य विधीयते ॥ ६५ ॥ कुशोतीति ' इस मंत्रसे तीनवार कुशद्वारा स्नान करानेपर उस तीर्थ स्नानका तुरीयाग अर्थात् पादफल होगा, इसमें सन्देह नही । बामणका अंगग्रहणपूर्वक नामोच्चारणसे मज्जन करनेपर ब्राह्मणका आधा फल होता है ॥ ६४ ॥६५॥ वरं विक्रयणं मातुर्वरं विक्रयणं पितुः। न स्नापयंञ्चामगोत्रं न तीर्थेषु प्रतिग्रहम् ॥६६ ॥ यद्यपि माता पिताका बेचनाभी अच्छा है तथापि असगोत्रको तीर्थ- मान न करावे और दान भी न ले ॥ ६६ ॥ सिद्धक्षेत्रेषु तीर्थेषु नाशीः कुर्यात्परस्य च । यायादितोऽन्यत्र भुवि तिलं गाश्च विशेषतः ॥ ६७ ॥ .

भाषाटीकासमेतम् ।
न गृहीयात्तु शूद्रस्य न तेन सह वा वसेत् ।
यस्य यज्ञस्य यत्पात्रं तस्य पापेन लिप्स्यते ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन परयज्ञं विवर्जयेत् ।। ६८ ॥
सिद्धक्षेत्र और तीर्थमें पराया आशीर्वाद उचित नहीं है। एक स्थानमें
यदि शूद्र हो, तो अन्यत्र गमन करे, तथापि शूदके तिल और गौ ग्रहण
न करे, क्योंकि वह यज्ञमें ग्रहण करने योग्य नहीं है । जिस यज्ञका नो
पात्र है, उसके ही होनेसे पाप स्पर्श नहीं होता अतएव सर्व प्रयत्नसे पराया
यज्ञ वर्जित है ॥ ६७ ॥ ६८ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्र सर्वोत्तमोत्तम देवीश्वरसम्चादे चतुविशतिसाहसे कामरू
पोधिकारे प्रथमतमे द्वितीयभागे भाषाटीकाया द्वितीय पटल ॥२॥
.
"
श्रीभगवानुवाच ।
कामरूपं महापीठं गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।
सदा च सस्थितस्तत्र पार्वत्या सह शङ्करः॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले-कामरूप महापीठ गुह्यसे भी परमगुह्य है वहा महा-
देवजी पार्वतीके सहित नित्य वास करते हैं ॥ १॥
न चिरात्पूजितो देवस्तस्मिन्पीठे प्रसीदति ।
तत्तु पीठं प्रवक्ष्यामि शृणु त साम्प्रतं प्रिये ॥२॥
वह देवदेव इस पीठमें पूजित होकर शीघ्र प्रसन्न होते हैं। हे प्यारी !
अब उसी पीठका वर्णन करता हूं सुनो ॥ २ ॥
यावाकाले शतनदी लिङ्गकोटिगुणावृता।
वायुकूटस्य चरम धतुर्हस्तप्रमाणतः॥ ३ ॥
वायुकटके अन्तभागमें एक धनुष और एक हाथके प्रमाणसे करोड लिंग-
समावृत शतनदी संयुक्त रहती है ॥ ३ ॥

-
.
"
(२६२)
योगिनीतन्त्रम् ।
वायुरूपी स्थितस्तत्र तस्मानिसृत्य मारुतः।
तं तु वायुं समभ्यर्च्य वायुलोकमवाप्नुयात् ॥ ४॥
पूर्णवायुगिरेः शैलश्चन्द्रकूट इति स्मृतः।
मध्यतश्चैव गोदन्तः क्रान्तो वै दक्षिणे शुभः ॥ ५॥
वहा वायु रूपवान् अवस्थित है, उससे वायु निकलती है, उस वायुकी
अर्चना करने से वायुलोक प्राप्त होता है। वायुगिरिके पूर्वमें चन्द्रकूटशैल)
मध्यमें गोदन्त, दक्षिणमें अश्वक्रान्त ॥ ४ ॥ ५ ॥
माधवश्चन्द्रकूटे तु गोदन्ते च जटाधरः ।
षण्मुखश्च जयन्तश्च ह्यश्वक्रान्ते जनार्दनः ॥ ६ ॥
चन्द्रक्टमें माधव, गोदन्तमें जटाधर, पण्मुख और जयन्त, अश्वक्रान्तमें
जनार्दन अवस्थित हे ॥ ६ ॥
तत्तद्वीजेन मन्त्रेण पूजयेन्मधुपायसे ।
यो वसेतायुकूटे तु धनानामधिपो भवेत् ॥ ७ ॥
चन्द्रशेले निवासातु क्षयी भवति नान्यथा ।
पापी भवति गोदन्ते त्वश्वक्रान्ते तु मुक्तिमान् ॥८॥
उस उस बीजमन्त्र द्वारा मधु और खीरसे उनकी पूजा करें. जो वायु-
कूटमें वास करता है वह धनाधिप होता है. चन्द्रक्ट में वास करनेसे क्षयी
और गोदन्तमें पापी होता हे. अश्वकान्तमें वास करनेसे मुक्तिको प्राप्त
होता है ॥ ७ ॥ ८ ॥
चन्द्रशेलस्य पूर्वे तु किचिदाग्नेयगोचरे ।
लोहित्यमध्ये देवेशि धतुस्त्रिशत्प्रमाणतः ॥ ९ ॥
इन्द्रशेल इति त्यातस्तत्र वासे महाफलम् ॥ १० ॥
चन्द्र शैलसे कुछेक आमेयकोणविभागमें लोहित्य मन्य वाम भागमें तीस
धनु ममाण इन्द्रशैल हे वहा जानेसे महाफल होता है ॥ ९॥ १० ॥

भापारीकासमेतम् । (२६३)
इन्द्रशैलस्य मध्ये तु किश्चिदक्षिणगोचरे ।
उत्तरे चन्द्रशेलस्य त्यजेत्योढा धनुर्बुधः ।। ११ ।।
बुद्धिमान् इन्द्रशैलके किञ्चित् दक्षिणमें चन्द्रशैलके उत्तरमें पोढा अर्थात्
१. धनु परित्याग करे ॥ ११ ॥
धतुस्त्रयश्च प्रस्तारे धतुषः शतकं तथा।
पञ्चविंशति चायामे चन्द्रकुण्डादयं सरः।
तत्र पीत्वा च स्नात्वा स नरः कैवल्यमस्तुते ॥१२॥
विस्तारमें तीन धनुष दैर्ध्वमें एक सौ पचीस धनु प्रमाण चन्द्र
कुण्डनामक सरोवर है, मनुष्य वहा स्नान पान करनेसे कैवल्य लाभ
करते हैं ॥ १२ ॥
चन्द्रतीर्थ महातीर्थ तीर्थ पिण्डारकं समे ।
स्नात्वा चानेन मन्त्रेण ब्रह्महत्या व्यपोहति ॥ १३ ॥
चन्द्रतीर्थ महातीर्थ है, वह और पिण्डारक तीर्थ यह दोनों समान हैं
(चन्द्रतीर्थ महातीर्थ तीर्थ पिण्डारफ समे ) इस मन्त्रसे स्नान करनेपर
ब्रमहत्याका पाप नष्ट हो जाता है ॥ १३ ॥
सुधीशवंशसम्भूत माधवप्रीतिदायक ।
सुधीश्रवणआहादात्पापं हर नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥
भृगुप्राय सगयुक्तं आदिपंक्तिसमन्वितम् ।
तदूर्दै च भृगुद्देण्डी जान्तं शक्तिसुरान्वितम् ।। १५ ।।
नादविन्दुसमायुक्तं पुनर्जातं सुभाविकम् ।
अष्टाक्षरञ्च तन्मन्त्रमुक्त्वा सार्य समापयेत् ॥ १६॥
मेषे मीने पौर्णमास्यां जपन्कामं मर्नु निशि।
स्नात्वा ब्रह्मत्वमाप्नोति दुर्गतिश्च न विन्दति ॥१७॥

7
(२६४)
योगिनीतन्त्रम् ।
सुधीगवंशसम्भूत माधवप्रीतिदायक ॥ सुधीश्रवणआहादात्पापं हर
नमोऽस्तु ते " यह उच्चारण कर भृगुप्राय सर्गयुक्त आदि पंक्ति संयुक्त
है । उसके ऊमें भृगु और दण्डी तथा शक्ति सुरान्तिा जानता है।
फिर नादबिन्दुसयुक्त सुभावित जानता है । अष्टाक्षर इस मंत्रको जपकर
फिर अय॑समापन करै। मेष मीन और पौर्णमासीमें उपयुक्त परिमाणसे
इस मत्रको जपता हुआ स्नान करनेपर ब्रह्मत्व प्राप्त होता है कभी दुर्गति
प्राप्त नही होती ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥
स्नानञ्च दिवसे कुर्यात्महापातकनाशनम् ।
इत्यनेन तु मन्त्रण यः स्नायाचन्द्र पाथसि ॥ १८ ॥
अविच्छिन्ना स्थितिस्तस्य यावत्तिष्ठति मेदिनी।
भवति श्रीचन्द्रभवने शनैर्याति परं पदम् ॥ १९ ।।
दिनमेंही स्नान करना चाहिये । दिनमें स्नान करनेसे महापातक नष्ट
होते हैं. इस मंत्रसे जो मनुष्य चन्द्रतीर्थमें स्नान करता है, वह बीरमनुष्य
जबतक पृथ्वी विद्यमान रहेगी तबतक अविच्छिन्नरूपसे अर्थात् निरन्तर
परमस्थान चन्द्रभवनमें वास करेगा, इसमें संदेह नही और फिर क्रमसे
मुक्तिकोभी प्राप्त करेगा ॥ १८ ॥ १९ ॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे चतुर्धनु-प्रमाणतः।
मानसं नाम तत्तीर्थ सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २० ॥
उसकी दक्षिणदिशाके विभागमें चार धनुःप्रमाण सब पापोंका नाशकर-
नेवाला मानसतीर्थ है ॥ २० ॥
कार्तिक शुक्लपक्षे तु स्नानं तत्र समाचरेत् ।
विष्णुलोकमवामोति मन्त्रेण परमेश्वरी ॥ २१ ॥
हे परमेश्वरि । कार्तिक शुक्लपक्षमें यहां मंत्रद्वारा स्नान करनेसे विष्णु-
लोकको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२६५)
तस्मान्न संशयस्तीर्थ विष्णतुष्टिप्रदायकम् ।
योगज्ञानाप्तये तुष्टये चाय दद्यात्सरित्पतेः ॥ २२ ॥
अतएव यह तीर्थ जो विष्णुका तुष्टिदायक है, इसमें सन्देह नहीं योग
ज्ञान प्राप्ति के निमित सरित्पति के संतोषार्थ अर्घ्य देवे ॥ २२ ॥
तस्य दक्षिणदिग्भागेऽष्टाविंशतिधनुर्मितम् ।
अयुताय सरस्तत्र स्नात्वाच्युतपदं व्रजेत् ।। २३ ।।
उसकी दक्षिण दिशाके विभागमें अट्ठाईस धनुःपारमित अयुत
नामक सरोवर है वहां स्नान करनेसे अच्युतपद ( वैकुण्ठ ) प्राप्त
होता है ॥ २३॥
वर्षासु चतुरो मासान् यस्तत्र स्नानमाचरेद ।
स याति ब्रह्मसदनं मध्याह्ने यदि शङ्कर ॥ २४ ॥
हे शंकार ! जो मनुष्य वर्षाकालमें चार महीने मध्याहसमय वहां स्नान
करता है वह ब्रह्मलोकको जाता है ॥ २४ ॥
स्नात्वा मन्त्रण तत्पश्चादयं दद्यात्तु साधकः ।
अमृताख्यमहापिण्डदानासिद्धिरवाप्यते ।
अमृतेधिवसन्त्सर्व प्राणिनां किल्बिषापहम् ॥ २५ ॥
साधक मंत्र द्वारा स्नान करके फिर अर्घ्य देवे । इसके पीछे अमृताख्य
पिण्डप्रदान करनेसे सिद्धिलाभ ( और देवलोकमें पूजा प्राप्त होती है )
अमृतात्यतीर्थमें वास करनेपर प्राणियोंके पापसे रक्षा होती है ॥ २५ ॥
तदक्षिणे दशधनुःऋणमोचनकं सरः।
गत्वा ऋणत्रयान्मुक्तो भववधं न गच्छति ॥ २६ ।।
उसके दशधनुः दक्षिणमें ऋणमोचनक सरोवर है । वहां जानेसे मनुष्य
पितृऋण, ऋषिऋण और देवऋण इन तीनों ऋणसे छूटकर संसार बंधनसे
मुक्तिलाम करते हैं ॥ २६ ॥

(२६६) योगिनीतन्त्रम् ।
भाडे ललितसप्तम्यां तब स्नात्वा दिव व्रजेत् ।
माघे मासि चतुर्दश्यां स्नात्वा मुक्तिश्च विदन्तिा२७॥
भादोंके महीनेकी रलित सप्तमीमें वहा स्नान करनेसे स्वर्गलाभ और
मायके महीनेकी चौदशमें स्नान करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है ।। २७ ।।
ऋणग्रस्तनरान्सान विविधात्कर्मवन्धनात् ।
ऋणत्रयान्मोचयिता ऋणमोचनकं सरः ॥ २८ ॥
यह मणमोचनक सरोवर इस प्रकार सब ऋणग्रसित मनुष्यों विविध
कर्मवधन और तीनों माणसे मुक्त करता हे ॥ २८ ॥
दक्षिणे त्वश्वक्रान्तस्य किञ्चिदाग्नेयगोचरे।
धनुरर्कप्रमाणेन चाश्वक्रान्ताह्वयं सरः ॥ २९ ॥
अश्वक्रान्तके दक्षिण कुछेक आग्नेयकोणकी दिशामें बारह धनु प्रमाण
अश्वक्रान्त नामक सरोवर है ॥ २९ ॥
नागलोकात्थितश्च कल्किरूपी जनार्दनः।
स्नात्वा तत्रैव विरजे ह्यश्व तीर्थ चकार ह ॥ ३० ॥
कस्किररूपी जनार्दन भगवान्ने नागलोकसे प्रादुर्भूत होकर उस विरजमें
लान करके अश्वतीर्थ किया था ।। ३० ।।
मार्गस्योत्तरभागे तु तत्राय॑ च समाहरेत् ।
गन्धतोपेन क्षीरेणमन्त्रेणानेन यत्नतः ।।३१ ।।
वहा भार्गके उत्तरमें अर्थ्य लाकर गधतोय (जल) और दुग्धद्वारा इस
मत्रसे यत्नसहित पूजा करनी चाहिये ॥ ३१ ॥
ब्राह्मण सेविते पुण्ये वाराणस्याः कलाधिके ।
सक्षीरञ्च गृहाणाऱ्या मुक्ति तत्र भजाम्यहम् ॥ ३२ ॥
अश्वक्रमेण सम्भूत पापविच्युतिकारक ।
अयुत्तैकनिदानाय त्वश्वक्रान्ताय ते नमः ॥ ३३ ॥

भापाटीकासमतेम् ।
(२६७)
सदाचारी ब्राह्मणोंके द्वारा सेवित काशीके उत्कृष्टस्थानमें तुम मेरे प्रदान
किये हुए क्षीरसहित अर्घ्यको ग्रहणकर मुझे मुक्तिलाभ कराओ हे अश्वक्रमो-
स्पन्न ! हे पापविनाशिन् ! आप अश्वक्रान्त और उपासकोंके अभीष्ट-
सिध्यर्थ आप अनेक उपाय करते हैं अतएव आपके निमित्त प्रणाम करते
हैं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
इत्यनेन तु मन्त्रेण स्नात्वा यज्ञफलं लभेत् ।
अश्वमेधादिकं पुण्यं मौसलस्नानमात्रतः॥ ३४ ॥
इस मन्त्र द्वारा स्नान करनेसे यजका फल मिलता है, मौसलतीर्थमें
स्नान मात्रसे अश्वमेधकी अपेक्षा अधिक लाभ होता है ॥ ३४ ॥
विधिवत्स्नानमात्रेण राजसूयफलं लभेत् ।
दानमक्षयतां याति पितृणान्तर्पणं तथा ।। ३५ ॥
विशाखस्थो यदा भानुः कृत्तिकासु च पूर्णिमा ।
स योगः पद्मको नाम ह्यश्वक्रान्ते सुदुर्लभः ॥ ३६ ॥
अश्वक्रान्ताद्देवतीर्थ ततः पैतामहे शुभे ।
स्नानं येच करिष्यन्ति तेषां लोका महोदयाः॥३७॥
और विधिवत् स्नान करनेसे राजसूययज्ञका फल प्राप्त होता है और
पितृतर्पण तथा स्नान करनेसे वह अक्षय होता है। सूर्यके विशाखा नक्षत्र
में स्थित होनेपर और कृत्तिमामें पूर्णिमाके मिलनेपर उसको पयायोग
कहते हैं, अश्वक्रातमें इस योगका प्राप्त होना अत्यन्त दुर्लभ है । अश्व-
फ्रान्तके अन्तर्गत देवतीर्थ है, फिर शुभदायक पैतामहतीर्थ है, जो इस
तीर्थमें स्नान करता है, उसको महल्लोक प्राप्त होता है | ३५-३७ ॥
न स्पृहा तेषु पुण्यस्य कृतस्यापकृतस्य च ।
करिष्यन्ति महेशानि सत्यमेतदुदाहतम् ॥ ३८॥
तीर्थानां परमं तीर्थ लोकेषु त्रिपु विद्यते ।
कार्तिकी तु विशेषेण पुण्यपापहरा परा॥ ३९ ॥

(२६८) योगिनीतन्त्रम् । मन्त्रैदानस्तपोभिश्च यत्कृत्यं जायते द्विजैः। युतस्तु स्नानमात्रेण शुभैरपि सुभावितैः॥ ४० ॥ पातकात सुविनिष्क्रान्ता महापातकिनः प्रिये । उपपातकसंसर्गाः स्वयं मुक्ता भवन्ति ते ॥ ४१ ॥ हे महेशानि ! ( सज्जनगण कहते हैं कि, वहां पुण्यापुण्यकी स्पृहा नहीं करनी चाहिये । यह सब तीर्थ तीनों लोकर्म परमोत्तम हैं, पुण्य पापोंका हरनेवाला कार्तिकी तीर्थ विशेष प्रकारसे श्रेष्ठ है, वहा मन्त्रदान और तप- स्याद्वारा सुकृतिलाभ और स्नानमात्र मंगलकर पुण्यलाभ होता है, तथा उसका दर्शन करनेपर महापातकी पापोंसे रक्षा पाता है । हे प्रिये ! उप- पातकी मनुष्यभी वहां जानेसे मुक्तिलान करते हैं ॥३८-४१॥ तत्रोपवासी यक्षस्य पुण्डरीकस्य यत्फलम् । तत्प्राप्नोति नरः क्षिप्रमनायासेन शङ्करि ॥ ४२ ॥ हे शंकार ! उपवासी पुण्डरीक यक्षने जो फल प्राप्त किया था वहाँ उपवास करनेसे तत्काल मनुष्योंको सहजमें ही वह फल प्राप्त हो सकता है ॥ ४२ ॥ माघे स्नात्वा तिलान्यस्तु प्रयच्छति च सविजे। यथाशक्त्या च भत्तया च स विभोर्भुवने वसेत् ।।४३॥ जो मनुष्य वहा मायके महीनेमें स्नान करके श्रेष्ठ ब्राह्मणका भक्ति- पूर्वक यथाशक्ति तिल दान करता है. यह ईश्वरके भवनमें निवास करता है ॥ १३ ॥ तत्रोपवासं स्नानश्च तद्वै गव्याशनन्तथा । यः करोति नरः सोऽपि मृते स्वर्गमवाप्नुयात् ॥४४॥ जो मनुष्य वहां स्नान उपवास और गोके घृत, दुग्ध, दधि इत्यादिका भोजन करता है, उसको भी मृत्युके पीछे स्वर्ग प्राप्त है ।। ४४ ॥

भाषाटीकासमेतम। (२६९)
वसन्ति तत्समीपस्था ये च तन्नरजातयः।
तेऽपि नस्यानुभावेन स्वर्ग यान्ति न संशयः॥१५॥
उसके समीप जो जो नरजाति वास करती है. उस तीर्थ के प्रभावसे
वह प्राणियोको अगम्य पुण्यवानोंकी अभीप्सित स्वर्गभूमि प्राप्त करती
है. इसमें संदेह नहीं ॥ ४५ ॥
ये यच्छन्ति द्विजेऽप्यर्थ पूजनं ब्रह्मशान्तितः ।
ते मृतासनमारूढाः पद्मासनचतुर्भुजाः।
ब्रह्मणा सह सापुज्यं प्राप्नुवन्त्यपुनर्भवम ॥ ४६ ॥
जो मनुष्य प्राशान्तिमें ब्राह्मणोंको अर्थ (धन) दान करता है और
वहाँ पूजा करता है, वह अन्तममय पशासनमें आरोहणपूर्वक चतुर्भुज हो
अझ सहित मायुज्यको प्राप्त होता है, फिर उसको जन्म लेना नहीं
पड़ना ।। ४६ ॥
प्रायोपवेशं ये तत्र प्रकुर्वन्ति नरोत्तमाः ।
ते सयानेन नरा दिय यान्त्यकुतोमयाः ॥ ४७ ।।
जो मनुष्य वहां प्रायोपवेशन अर्थात् अन्न, जल परित्याग करके
व्रताचरण करता है, वह इसके विमानमें चहकर सर्वत्र निर्भय हो
स्वर्गमें नाता है ।। ४७ ॥
नृत्यन्ति पितरस्तेषां तुष्टाश्चैव पितामहाः।
लभन्ते तर्पणात्तृतिं पितुर्दानात्रिविष्टपम् ॥ १८॥
उसके पितृपितामह संतुष्ट हो हमें भरकर नृत्य करते हैं. यहां तर्पण
करनेसे पितर संतुष्ट और दान करनेसे स्वर्गगामी होते हैं ॥ १८ ॥
स्पृष्टास्तु पापिनस्तत्र मुच्यन्ते भवबन्धनात् ।
ब्रह्मणोऽनुचरो भूयात्तत्र दानान्न संशयः॥४९॥
पापीगण उस स्थानका सर्श करनेपर संसार बनसे छूट जाते हैं
वहां दान करनेसे सदा ब्रह्माका अनुचर होता है इसमें संदेह नहीं ॥४९॥

(२७०) योगिनीतन्त्रम् ।
अश्वक्रान्तमनुप्राप्य न स्नाने न मनोऽमलम् ।
भुक्ते वा यदि वाभुक्त दिवा वा यदि वा निशि॥५०॥
तत्तीर्थ सर्वतीर्थानां स एव प्रवरो मतः ।
पापघ्नं पुण्यजननं प्राणिनां परिकीर्तितम् ॥ ५१ ।।
दिनमें वा रात्रिमें, भोजन किये वा विना भोजन किये अश्वकान्तमें
स्नान करनेसे मन निर्मल होता है. सुतरा ज्ञानको प्राप्त होकर मोक्षलाम
करता है वह तीर्थ सब तीर्थोकी अपेक्षा पापनाशक पुण्यजनक और
श्रेष्ठ है ॥ ५० ॥ ५१ ॥
ये पुनर्भावितात्मानस्तत्र स्नात्वा जनार्दनम् ।
पूजयन्ति यथाशक्ति ते प्रयान्ति त्रिविष्टपम् ॥ ५२ ॥
जो मनुष्य सयत होकर वहा स्नान करने के पीछे जनार्दनकी पूजा करते
हैं, वह स्वर्गको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥
ब्रह्माविष्णुस्तथा रुद्रो नित्यं सन्निहितास्त्रयः।
अवतीर्थे महेशानि नान्यत्पुण्यतमं भुवि ॥ ५३॥
और ब्रह्मा विष्णु तथा रुद्र सदाही उसके समीप रहते हैं, हे महेशानी !
अश्वतीर्थकी अपेक्षा पुण्यतम तीर्थ पृथ्वीमें दूसरा नहीं है ।। ५३ ॥
विरजान्त्वमल तोयं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
ब्रह्मलोकस्ययस्थानं धन्याः पश्यन्तितीर्थकम् ॥५४॥
विरज नामक निर्मल जलयुक्त तीर्थ तीनों लोकमें विख्यात है वहाँ
जानेसे ब्रह्मलोकको सब स्थानोंके दर्शन करनेका फल प्राप्त होता है ॥५४॥
येतु वर्षशतं साग्नि अग्निहोत्रमुपासते ।
कार्तिकी वा महेश्यका तीर्थान्ते सममेव तत् ।।५५।।
एक सौ वर्ष सामिक होकर अमिहोत्रका अनुष्ठान करनेसे जो फल
होता है, कार्तिकी पूर्णिमाको उस तीर्थमें वास करनेसे उसीके समान
फल मिलता है ॥ ५५ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२७१) सर्वयज्ञफलं तुल्यं सर्वतीर्थफलप्रदम् । अन्येषाश्चैव वेदानां समाप्तिस्तेन वै कृता ।। ५६ ॥ अश्वक्रान्ते च यैर्गत्वा सन्ध्या च समुपासिता। सयत्नात हस्तदण्डेन चाश्वक्रान्तजनेन तु ॥ ५७ ॥ भृङ्गारेण करण मृत्मयेनापि शङ्करि । आनीय तजलं पुण्यं कृता सन्ध्या विचक्षणः ॥५८॥ समाधिना समाधेया सप्राणायामपूर्विका । तस्यां कृतायां यत्पुण्यं तच्छृणुष्व वरानने ।। ५९ ।। और वह मनुष्य सर्वयज्ञका, सर्वतीर्थका और सब वेदोंके समाप्त करने का फल पाता है इसमें सन्देह नहीं । जो मनुष्य अश्वक्रान्तमें जाकर सन्ध्योपासन करता है भृङ्गा ( कांसी ) करङ्ग ( कसकुट ) वा मिट्टाक पात्र द्वारा अथवा कांवरमें वहांसे जल लाय समाधिद्वारा प्राणायामपूर्वक संध्योपासन करता है. हे वरानने । उसका फल सुनो ॥ ५६-५९॥ तेन द्वादशवर्षाणि भवेत्सन्ध्या सुवन्दिता। अश्वमेधफलं स्नाने पाने दशगुणं तथा । उपवासेऽप्यनंतश्च प्राप्नोति सुमहत्फलम् ॥ ६० ॥ तीर्थान्तरे गवां कोटिं विधिवद्यः प्रयच्छति । एकाहं यो वसेत्तीर्थ स सर्व तत्फलं लभेत ॥ ६१ ।। हे प्रिये ! उसके द्वारा बारहवर्षकी सन्ध्योपासनका फल प्राप्त होता है । स्नान और उसका जल पीनेसे दशगुणफलका लाभ और वहां उपवास करनेसे महा अनन्तफल प्राप्त होता है ॥६० ॥ ६१ ॥ अर्द्धपादप्रमाणेन यस्तु स्वर्ण प्रयच्छति । स्वर्णमानफलं तस्मै तस्मादद्यामतः परम् ॥ ६२॥ वहां अर्द्धपादके सुवर्णदान करनेसे उसको पूर्णपाद स्वर्णदानका. प्राप्त होता है ६२ ॥

, (२७२) योगिनीतन्त्रम्। चन्द्रशेलं गता धारा जाह्नवी सा प्रकीर्तिता। अश्वतीर्थस्पृशा धारा मजने तु विधीयते ॥ ६३ ।। अश्वतीर्थकी जो धारा चन्द्रशेलका स्पर्श करती है, उसे गगा जानना चाहिये और उसमें स्नान करनेसे भी गगा स्नानका फल मिलता है || ६३॥ चन्द्रशैलस्पृशा धारा सा विज्ञेया सरस्वति ॥६५॥ जो धारा चन्द्रशैलका स्पर्श करती है, उसको सरस्वती जानना चाहिये ॥ ६४ ॥ अश्वक्रांते संगमस्तु वर्षासु च प्रदृश्यते । प्रयान्तं तद्विजानीयात्कार्तिकेषु विशेषतः॥६५॥ वर्षाकाल और विशेषकर कार्तिकमें अश्वक्रांतमें संगम दिखाई दे तो उसको प्रयान्त कहते हैं ॥ ६५ ।। यस्तत्र मुण्डनं कुर्यात् प्रयागसदृशं फलम् । अद्यापि दृश्यते देवि गयाकुण्डे द्विधाकरम् ॥ ६६ ॥ जो मनुष्य वहा मुण्डन करता है, उसको प्रयागमें मुण्डन करानेके समान फल मिलता है । हे देवि ! अबतक गयाकुण्डमें द्विधारा दिखाई देती है ॥६६॥ इह लोके दरिद्रो यो भ्रष्टराज्योऽथवा पुनः । अवश्वक्रान्ते जले गत्वा मर्नु वैष्णवक जपेत् । कृत्वा पूजोपहारश्च देवानां पितृतर्पणम् ॥६७ ।। कृत्वा पिण्डप्रदानन्तु सोचिराजन्मवर्जितः । एकचक्रो भवेद्राजा सत्यमेतत्र संशयः ॥१८॥ जो मनुष्य इस लोकमें दरिद्र वा राज्यभ्रष्ट होते हैं वह अश्वकान्तज. लमें गमनपूर्वक वैष्णवमंत्र जपकर पूजा, उपहार और देवतातर्पण, .

भाषाटीकासमेतम् । (२७३) पितृतर्पण ओर पिण्डदान करनेसे चक्रवती राजा होते हैं, इसमें सन्देह नही ।। ६७ ॥ ६८। इह जन्मनि सौभाग्यं धनं धान्यं बरस्त्रियः। भवन्ति विविधास्तस्य यात्रा कार्तिक कृता ॥६॥ जो कार्तिकमें यात्रा करता है, उसको इस जन्ममें सौभाग्य, धन, धान्य और उत्तम स्त्री मिलती है । ६९ ॥ इदं यावाविधानं यः कुरुते कारयेत वा। शृणोति वा स पापैस्तु सवरेव प्रमुच्यते ॥ ७० ॥ इस यात्राविधानमें जो कुछ कार्य किया जाय, वा कराया जाय, या सुना जाय तो सब प्रकारके पापोंसे मुक्ति प्राप्त होती है ।। ७० ॥ अगस्त्यागमनं येन कृतं यातीह मानवः ब्रह्मक्रियाप्रलोभेन बहुवर्षशतेन च । यात्रां चैवीं तथा कुर्यादेवसंस्कारमाप्नुयात् ॥ ७१ ॥ जो मनुष्य वहा अगस्त्य गमन यात्रा करता है, वह बहुतसे शतवर्ष ब्रामक्रियानुष्ठानके फलको प्राप्त होता है और उसी स्थानमें चैत्रमासकी यात्रा करनेसे देवसंस्कारको प्राप्त होता है ।। ७१ ।। किमन्यत् बहुनोतन न तदस्तीति भाविनि । प्राप्यं संप्राप्यते तेन भवं नायं हि पश्यति ॥७२ सर्वयज्ञफलस्तुल्यं सर्वतीर्थफलप्रदम् । सर्वेपाश्चैव देवानां समष्टिस्तेन वै कृना ॥ ७३ ॥ ये गताश्चाश्वतीर्थे तु सकृत्स्नात्वा यथाविधि । पुत्रिण्या व दुहिता वा वसुभिः साहिताः कुले ॥ ७४ ।। शिखराणां प्रदातृणां युवतीनां न संशयः । मोदते तत्तस्य तु वे सर्वाङ्गं परिपूरितम् ।। ७५ ॥ १८

(२७४)
योगिनीतन्त्रम् ।
हे भाविनी ! बहुत कहने का क्या प्रयोजन है जो कुछ प्रान्य विषय है
वह सबही प्राप्त होजाता है और पापका दर्शन तकभी नहीं होता, इसमें
समस्त यज्ञफल, सर्वतीर्थफल और सब देवताओं के पूजनका फल मिल
जाता है जो मनुष्य अश्वतीर्थमें जाकर विधिपूर्वक स्नान करता है, वह पुत्र
कन्या और बहुत धनसे वर्द्धित होकर कुलमें वास करता है और वह
दाताओंमें प्रबर होता है, तथा स्त्रियों के सहित सर्वाङ्गमें परिपूरित होकर
सुखसे वास करता है, इसमें सन्देह नहीं ।। ७२-७५ ॥
काशीवासं युगान्यष्टौ दिनकं पुरुषोत्तमे ।
तदेव कोटिगुणितं विरजामुखदर्शने ।
तत्सदृश गुणं विन्द्यादश्वतीर्थ क्षणे क्षणे ॥७६ ॥
आठ युग काशीवास और एक दिन पुरुषोत्तमवाससे जो फल होता है,
विरजामुख दर्शन करनेपर उससे करोड गुण फल मिलता है अश्वतीर्थ में
क्षण क्षण उसीके समान फल प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥
एतस्य दर्शनकृतौ नृपसूयलाभः
स्नानं जले दशगुणं तव वाजपेयात ।
गण्डूपमात्रमपिवेत्तु स चाश्वमेधः
सर्वक्रतोरधिकमप्यधिकं भवान्तः ॥ ७७ ॥
अश्वतीर्थका दर्शन करनेसे राजसूय यज्ञका फल वहा स्नान करनेपर
वाजपेययज्ञसे दशगुण और गण्डप (चिल्लू ) मात्र पान करनेसे अश्वमै
घका फल और सर यज्ञोंसे अधिक फल प्राप्त होकर संसार बंधनसे मुक्ति-
लाभ करता है ।। ७७ ॥
इनि श्रीयोगिनीतन्त्रे मर्चतन्योत्तमोत्तम चतुर्विंशतिसाहले
कामरूपाधिकार प्रथमतमे द्वितीयभागे
भाशालीकाया तृतीय पटल ॥३॥

भापाटीकासमेतम् । (२७२)
श्रीदेव्युवाच ।
यदि प्रसन्नो मे नाथ वराहां यदि वाप्यहम् ।
तमेक मे वद विभो कुत्र किनाम ते मतम् ॥ १ ॥
केषु केषु च होमेपु त्वां पश्यन्ति सदा द्विजाः।
नाना च कतमं स्थानं शोभते धरणीतले ॥२॥
श्रीदेवी बोली-हे नाथ ! यदि मेरे ऊपर आप प्रसन्न हैं और मैं यदि
आपकी वराहा ( वरदेने योग्य ) और प्यारी है, तो हे विभो ! आपका
कहा क्या नाम है ? सो कहिये ॥ १ ॥ किस किस स्थानमें ब्राह्मण
आपका दर्शन करते हैं ? आप किस किस नामसे किस किस स्थानमें वास
करके वहा घरणीतलकी शोभा सपन्न करते हैं यह कहकर मेरा कौतूहल
चरितार्थ कीजिये ॥२॥
श्रीभगवानुवाच ।
पुष्कराहं सुरेशानो गयायां वे सुशर्मदः।
कान्यकुब्जे घेदगर्भो भृगुकक्षे पितामहः ॥३॥
श्रीभगवान् बोले-मै पुष्करतीर्थमें सुरेशान, गयामें सुशर्मद, कान्यकु-
जमें वेदगर्भ, भृगुकच्छमें पितामह ॥ ३ ॥
कोयया स्रष्टिकताच नन्दिपुऱ्या बृहस्पतिः।
प्रभासे पद्मजन्मां च स्वर्णनद्यां सुरप्रियः ॥ ४॥
फौधेरीमें सृष्टिकती, नन्दिपुरीमें वृहस्पति, प्रभासमें पनजन्मा, स्वर्ण
नदीमें सुरप्रिय ॥ ४ ॥
द्वारावत्यान्तु वाग्देवो नाटके नाटकेश्वरः ।
नीलाचले व कामेशः पिङ्गलो हस्तिपर्वते ॥ ५ ॥
द्वारावती में वाग्देव, नाटकमें नाटकेश्वर, नीलाचलमें कामेश, हस्तिपर्व-
तो पिङ्गल ॥ ५ ॥

योगिनीतन्त्रम् । कुशावर्ते तु विजयो जयन्तः पुष्पकराचले। भस्माचले भयानन्दश्चन्द्रकूटे च माधवः ॥ ६॥ कुशावर्तमें विजय, पुष्कराचलमें जयन्त, भस्माचलमें भयानन्द चन्द्रकू- टम माधव ॥ ६ ॥ अन्तगृहे पद्महस्तो मंगलायाश्च त्र्यम्बकः। भद्रपीठे च दिव्येशो ह्यश्वक्रान्ते जनार्दनः ॥ ७ ॥ अन्तगृहमें पद्महस्त, मगलामें यम्बक, भद्रपीठमें दिव्येश, अवकान्तमें जनादेन ॥ ७ ॥ अहिच्छत्रे तुलानन्दः श्रीशैले तु जगत्प्रियः। कुशहस्ते पद्मपाणिर्मानशैले मुनीश्वरः ॥ ८॥ अहिच्छत्रमें तुलानन्द, श्रीशैलमें जगत्प्रिय, कुशहस्तमें पद्मपाणि, मान- शैलमें मुनीश्वर ॥ ८॥ श्रीकण्ठे श्रीनिवासश्च श्रूयतां प्राणवल्लभे कन्याश्रमे च रुद्रो वै मैनाके विश्वनादकः ॥ ९ ॥ श्रीकण्ठमें श्रीनिवास, कन्याश्रममें रुद्र, मैनाकमें विश्वनादक ॥ ९ ॥ एकामे चैव नागेशो विरजायां महेश्वरः। मूलिकास्ये तथा विष्णुर्मुहेन्द्र भार्गवस्तथा ॥१०॥ एकानमें नागेश, विरजामें, महेश्वर, मूलिकारूयमें विष्णु, महेन्द्र में भार्गव ॥ १० ॥ कौशिक्यान्तु तथा बोधिरयोध्यायान्तु भार्गवः । मणिकटे हयग्रीतो वराहो जिन्दुपर्वते ॥११॥ कौशिकीमें बोधि. अयोध्या में मार्गव. मणिकटमें हयग्रीव. विन्दपर्वतमें

-
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भापाटीकासमेतम् । (२७७)
जटाधरस्तु गोदन्ते गोमन्ते जांगलेश्वरः ।
परमेष्ठी ब्रह्मपुत्रे विश्वशैले तु गहरः ॥ १२॥
गोदन्तमें जटाधर, गोमन्तमें बागलेश्वर, ब्रह्मपुत्र में परमेष्ठी, विश्वशैल
गहर ॥ १२॥
चित्रशलेतु चित्रेशो देविकायाश्चतुर्भुजः ।
वृन्दावने पद्मपाणिः कुशहस्तस्तु नैमिषे ॥ १६ ॥
चित्रशैलम चित्रेश, देविकामें चतुर्भुज, वृन्दावनमें पद्मपाणि, नैमिष
कुशहस्त ॥ १३ ॥
मन्दरे च महाबोधिोपीन्द्रो हुनुपर्वते ।
भागीरथ्यां पद्मगर्भः काम्पिल्ले कनकप्रियः ॥१४॥
मन्दरमें महागोधि, हनुपर्वत में गोपीन्द्र, भागीरथीमें पद्मगर्भ, काम्पि
छमें कनकाप्रिय ॥१४॥
करणे चैव कामारिकपोते हव्यवाहनः।
वसिष्ठश्चार्बुदे चैव श्वेतनद्या मनोभवः ॥ १५ ॥
करणमें कामारि, कपोतमें हव्यवाहन, अर्बुदमें वसिष्ठ, श्चेतनदीमें
मनोभव ॥ १५ ॥
धवलायां पिनाकी च पिच्छिलायां त्रिविक्रमः।
यज्ञगर्भस्तु आगस्ते उर्वश्यां मधुसूदनः ॥१६॥
घयलामें पिनाकी, पिच्छिलामें त्रिविक्रम, आगस्त्यमें यज्ञगर्म, उर्वशीमें
मधुसूदन ।। १६ ॥
रुक्मिणीशे हरिश्चैव पैतृकेतु रुचिस्तथा ।
गोमन्ते वामनश्चैव काश्यां विश्वेश्वरायः ॥ १७ ॥
रुक्मिणोश, हरि, पैतृको रुचि, गोमन्तमें वामन, कायों में
विश्वेश्वर ॥ १७॥

(२७८) योगिनीतन्त्रम् । प्रजापतिः प्रयागे व विदर्भाया द्विजमियः। गंगाधरो भद्रपीठे मातंगे चैव ज्यम्बकः ॥ १८ ॥ प्रयागमें प्रजापति, विदर्भाम द्विजप्रिय, भद्रपीठमें गगाधर, मातगमें त्र्यम्बक ।। १८॥ त्रिपुरारिनन्दशैले पाण्डुशेले त्रिलोचनः । गंगादे त्रिलोकेशो भित्तिपुर्या दिवाकरः ॥ १९ ॥ नन्दशैलमें त्रिपुरारि, पाण्डुशेलमें त्रिलोचना, गगाहृदमें त्रिलोकेश भिति- पुरीमें दिवाकर ॥ १९ ॥ वमटे मिगिलानाथो दारुशृगे कलानिधिः । महालिगं दारुवने अशोके तु विनाशकः ॥ २० ॥ वमटमें मिगिलानाथ, दारुशृगमें कलानिधि , दारुवनमें महालिग अशोको विनाशक ॥ २०॥ हरिमेनश्चुल्लुकायां पर्णाटे तु ह्यनन्तकः । मार्कण्डेयो वटे चैव इक्षुद्वारे दिवाकरः ।। २१ ॥ चुल्लुकामें हरिसेन, पर्णाटमें अनन्त, वटमें मार्कण्डेय, इक्षुद्वारमें दिवाकर ॥ २१ ॥ गोकर्णे च विकर्णाख्यो मन्दारे मधुसूदनः । अष्टोत्तरशतं स्थानं मया ते परिकीर्तितम् ॥२२॥ गोकर्णमें विकर्ण और मन्दारमें मधुसूदन, यह मैने तुमसे अठोतर शत अर्थात् एक सौ आठ स्थान कहे ॥ २२ ॥ यत्र व मम सानिध्यं नित्यं तु तव सुव्रते। एतेषामपि यस्त्वेकं पश्ये भक्तिमान्नर। नानं विरजसं लध्या मोदते शाश्वतीः समाः ॥२३॥ " नियमापाटीकासमेतम् । (२७२) 'इन सब स्थानोम मेरी और तुम्हारी नित्य समीपता है । हे सुव्रते ! मनुष्य भक्तिमान् होकर यदि इनमेंसे एककाभी दर्शन करै अथवा एकमें भी स्नान करे तो वहां विरजभवनको प्राप्त होकर सदा सुखपूर्वक वास करते है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥ मानसं वाचिकञ्चैव कायिकं यच्च दुष्कृतम् । तत्सर्व वै समं याति नात्र कार्या विचारणा ॥ २४ ॥ और मानसिक, वाचिक्र, तथा कायिक, जो कुछ दुष्कृत (पाप ) हैं वह सभी प्रशमित होजाते हैं, इसमें विचारनेकी कोई बात नहीं है ॥२४॥ यानि तानि च सर्वाणि गत्वा माचक्षते नरः । मोक्षमार्गि भवति च यत्राह नत्र मंस्थितः ॥ २५ ॥ मनुष्य जिस जिस तीर्थमें जाकर मेरा दर्शन करे, मै उसी उसी तीर्थमें स्थित रहकर उनको मोक्ष देता हूं ॥ २५ ॥ पुप्पोपहारेणूंपैश्च ब्राह्मणानाञ्च तर्पणैः । ध्यानेन च स्थिरेणाशु प्राप्स्यते परमेश्वरि ॥ २६ ॥ हे परमेश्वरि ! पुष्प, बलि, उपहार, धूपदान और ब्राह्मणतृप्ति और अचलध्यान मुझको शीघ्र प्राप्त होता है ॥ २६ ॥ अश्वक्रान्तस्योत्तरत ऋणमोचनपश्चिमे। द्वाविंशतिधतुर्मानं क्षेत्र परमदुर्लभम् ॥ २७ ।। क्षेत्रं द्विपञ्चक नाम सर्वदेवनमस्कृत्तम् । पूजयित्वा तत्र रुद्रं ज्योतिष्टोमफलं लभेत् ॥२८॥ अश्वक्रान्तके उत्तरमें और ऋणमोचनके पश्चिममें बाईस धनुपरिमित सर्व देवनमस्कृत द्विपञ्चक नामक एक परमदुर्लभ क्षेत्र है. वहां रुद्रदेवकी पूजा करनेसे, ज्योतिष्टोमका फल प्राप्त होता है ॥ २७ ॥ २८ ॥ " (२८०) योगिनीतन्त्रम्। पण्मासानियताहारी ब्रह्मचर्य समाहितः। उषित्वा तत्र देवेशि प्राप्यते परमं पदम् ॥ २९ ॥ कृते युगे पुष्कराणि त्रेतायो नैमिषं मतम् । द्वापरे तु कुरुक्षेत्रमश्वतीर्थ कलौ युगे ॥ ३०॥ हे देवेशि ! यहां नियताहारसे ब्रह्मचर्य अबलम्बनपूर्वक छः महीने बास करनेपर परमपद प्राप्त होता है । सत्ययुगमें पुष्कर, त्रेतामें नैमिप, द्वापरमें कुरुक्षेत्र और कलियुगमें अश्वतीर्थको श्रेष्ठ जानना चाहिये ॥ २९-३० ॥ तस्मात्तदुत्तरे तीरे साधयेन्मान सेप्सितम् । द्वापरे तु कुरुक्षेत्र तत्र दानेऽक्षयं फलम् ॥ ३१ ॥ अतएव उसके उत्तरतीरमें मनोभिलाभ साधन करे । द्वापरमें कुरुक्षेत्र- तीर्थ श्रेष्ठ है, वहां दान करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है ।। ३१ ॥ दुष्करं पञ्चके दान पञ्चक सर्वदुष्करम् यदन्यत्र कृतं पापं तीर्थ याति च लाघवात् । न तत्तीथे कृतेऽन्यत्र क्वचिदन्यो व्यपोहति ॥ ३२ ॥ पंचकतीर्थमें दान दुप्फर है, पंचकमें सभी दुष्कर माने अन्यस्थानका किया हुआ पार तीर्थमें नष्ट होता है, किन्तु उसो तीर्थमें पाप करने से अन्यत्र कहीं भी नष्ट नहीं होता ॥ ३२ ॥ द्वादशाहं दशाहं वा मासार्द्ध दश चैव वा । रुद्रस्यासिनगता मेरुपृष्ठे यशस्विनी। महादेव ततो देवि प्रणता परिपृच्छति ।। ३३ ॥ अनन्तर यशस्विनी पार्वतीने दशाह, (दशदिन ) द्वादशाह (बारह- दिन ) मासार्द्ध इत्यादिरूपसे मेरुपृष्ठ पर वास करते करते रुद्रके आसना. में बैठ, प्रणत हो महादेवजीसे पूछा ॥ ३३ ॥ -

भापाटीकासमेतम् । (२८१)
श्रीदेव्युवाच ।
जन्मान्तरसहस्रषु यत्पापं पूर्वसञ्चितम् ।
कथं तत्क्षयमाप्नोति तन्ममाचक्ष्व शङ्कर ॥ ३४ !!
देवीने कहा--सहस्रजन्मान्तरका पूर्वसंचित जो पाप है, वह किस प्रकार
क्षयको प्राप्त होता है ? हे शंकर : यह मुझसे वर्णन कीजिये ।। ३४ ।।
श्रीभगवानुवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गृह्यमनुत्तमम् ।
सर्वतीर्थेषु विख्यातमश्वक्रान्तमतः परम् ॥ ३५ ॥
श्रीभगवान् बोले-हे देवि ! परम गुह्यतम विषय कहताहूं, सुनो । देवा-
मिलपित अश्वक्रान्ततीर्थ सब तीर्थोकी अपेक्षा विख्यात है ॥ ३५ ॥
यस्योत्तरे तु गरक्षेत्रं मयोक्तमविमुक्तकम् ।
एतदेव परं ज्ञानमेतदेव परन्तपः ॥ ३६॥
इसके उत्तरमें जो क्षेत्र है, वह मैं तुमसे कहता हूं यह अश्वकान्तही
परमज्ञान और यही परमतरस्या है ॥ ३६ ॥
एतदेव परं ब्रह्म चैतदेव पर पदम् ।
यथा नारायणः श्रेष्ठो देवानां पुरुषोत्तमः ।
यथेश्वराणां गिरिंशः स्नानानामेतदुत्तमम् ।। ३७ ॥
यही परब्रह्म और यही परमपद है । जिस प्रकार देवताओंमें पुरुषोत्तम
नारायण श्रेष्ठ हैं और ईश्वरोंमें गिरीश श्रेष्ठ हैं उसी प्रकार सब स्थानों में
यह अश्वक्रान्तही श्रेष्ठ है ॥ ३७ ॥
दत्तं जप्तं हुतं शेपं तपस्ततं कृतञ्च यत् ।
ध्यानयध्ययनं ज्ञानं सर्व भवति चाक्षयम् ॥ ३८॥
वहां दान, जप, होम, तप, ध्यान, अध्ययन, ज्ञानादि जो कुछ किया
जाता है. वह सर्वदा अक्षय होता है ॥ ३८ ॥

(२८२) योगिनीतन्त्रम्। अश्वक्रान्ते परो योगोयन्वक्रान्त परा गतिः। अश्वक्रान्ते परो मोक्षस्तीर्थ नवास्ति तादृशम् ॥३९॥ अश्वक्रान्तमें परमयोग, अश्वकान्तमें परमगति और अश्वक्रान्तमें परम- मोक्ष प्राप्त होती है, अतएव इसके समान अन्यतीर्थ नहीं है |॥ ३९ ॥ मेरुमन्दरतुल्योऽपि राशिः पापस्य सर्वशः। अश्वक्रान्तं समासाद्य सर्वो व्रजति संक्षयम् ॥ ४० ॥ अश्वक्रान्तमें जानेसे मेरुमन्दराचलके समान समस्त पापराशि क्षयको प्राप्त होती हैं ॥ ४० ॥ अश्वक्रान्तस्थिताः स्पृष्टाः पांसुभिर्वायुनेरितः । यदि दुष्कृतकर्माणो यास्यन्ति परमां गतिम् ॥४१॥ मनुष्य यदि परमपातकी भी हो, तथापि अश्वक्रान्तमें वायुसे उडी धूलि द्वारा स्पृष्ट होकरभी परमग तेको प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥ न सा गतिः कुरुक्षेत्रे गयाद्वारे च पुष्करे। या गतिर्विहिता पुंसां शश्वक्रान्तनिवासिनाम् ॥४२॥ अश्शक्रान्तनिवासी जैसी गतिको प्राप्त होते हे, कुरुक्षेत्र, गयाद्वार और पुष्करतीमें भी वैसी गति प्राप्त नही होती ॥ ४२ ॥ न दानेन तपोभिन यज्ञैर्नापि च विद्यया । प्राप्यते गतिरुत्कृष्टा चाश्वतीर्थे स लभ्यते ॥ ४३ ॥ अश्वतीर्थसे जिस प्रकार श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है, दान, तपस्या, यज्ञ और विद्यासे भी वैसी गति प्राप्त नही होती ॥ ४३ ॥ संसर्गाच्च भवेन्मोक्ष इतरासत्परिग्रहात् । अगस्त्यादपि चाग्न्यादि चेदमेव महत्तरम् ॥१४॥ अश्यतीर्थक ससर्गसे मोक्षलाभ और सत्परिग्रहसे पवित्रगति प्राप्त होती है । अगस्त्यादितीर्थसे भी यह तीर्थ महत्तर हे ।। ४४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२८३)
ब्रह्महा चापि यो गच्छेदश्वकान्तं कदाचन ।
अश्वक्षेत्रस्य माहात्म्यात्तस्य हत्या निवर्तते ।
न तस्य पुनरावृत्तिः कदाचिदपि दृश्यते ॥ ४५ ॥
ब्रह्मघाती मनुष्यभी यदि अश्वकान्तमें नाया करे, तो वह उस माहा-
स्यक बलसे ब्रह्महत्त्याके पापसे छुटकारा पानेमें समर्थ होता है और
फिर उसको कभी जन्मग्रहण करना नहीं पड़ता।॥ ४५ ॥
उत्तर दक्षिण वापि अन्यद्वारं विचिन्तयेत ॥ १६ ॥
सर्वोप्यस्य शुभः कालश्चाश्वकान्ते वरानने ।
महादानेन तल्लाभो यत्फलं लभते नरः ॥ ४७ ॥
हे वरानने ! उत्तर वा दक्षिण अथवा अन्य जो कोई द्वार या जिस
किसी कालमें अश्वक्रान्ततीर्थ शुभकर है अन्यतीर्थमें मनुष्य महादानद्वारा
जो फल लाभ करते हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
अश्वतीर्थे तु काकिण्या दत्तायां लभतेऽक्षयम् ।
एकाहमुपवार या करोतीह मम प्रिये ।
फलं वर्षसहस्रस्य लभते मत्परायणः ॥ ४८ ॥
इस अश्वतीर्थमें एक कोढीमात्र दानकरके उसी प्रकार अक्षय फल
लाभ करसकता है। हेप्रिये । मत्परायण मनुष्य इस स्थानमें केवल एक
दिन उपवास करनेपर सहस्रवपके उपवासका फल प्राप्त करता है ॥४८॥
तीर्थान्तरे गयो कोटि विधिवद्यः प्रयच्छति ।
एकाहश्च वसेञ्चाव तयोस्तुल्य फलं भवेत् ॥ ४९ ॥
तीर्थान्तरमें विधिपूर्वक करोड गोदान करनेसे जो फल होता है, अश्व-
क्रान्तमें एक दिन उपवास करनेसे वही फल प्राप्त होसकता है ॥४९॥
प्रयागे माघमासे तु सम्यक् स्नानेन यत्फलम् ।
तत्फलं कोटिगुणितमश्वतीय क्षणे क्षणे ॥ ५० ॥

(२८४)
योगिनीतन्त्रम् ।
और प्रयागमें माघ मासमें सम्यक्प्रकार स्नान करनेसे जो फल
मिलता है, अश्वतीर्थमें क्षण क्षण उससे करोड करोड गुण फल प्राप्त
होता है ॥ ५० ॥
षष्टिकोटिसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च ।
सेवनाच्चैव मध्याह्ने अपराहे तु शङ्करि ॥ ५१ ॥
हे शकार ! मध्याह्न अपराहकालमें अश्वतीर्थकी सेवा करनेसे तीर्था-
न्तर सेननसे साठ करोड सहस्र और साठ करोड शतगुण फल प्राप्त
होजाता है ॥ ५१॥
मेरुमन्दरतुल्यो हि राशिः पापस्य सर्वशः ।
अश्वक्रान्त समासाद्य सों वजति संक्षयम् ॥५२॥
अवकान्ततीर्थकी सेवासे मन्दराचलकी समानभी सब पापराशि क्षय हो
जाती हैं ॥ ५२ ॥
कीटा: पतङ्गा मशफाश्च वृक्षा
जले स्थले ये विचरन्ति जीवा।
मण्डूकमत्स्याः क्रमशोऽश्वक्रान्ते
त्यक्त्वा शरीरं शिवमाप्नुवन्ति ॥ ५३॥
कीट, पतंग, मशक, वृक्ष और मत्स्य, मण्डूकादि जो जो जीव वहा
जलमें वा स्थलमें विचरते हैं, वह अश्वतीर्थमें देह त्यागकर शिवत्वको
प्राप्त होते हैं अर्थात् शिव होजाते हैं ।। ५३ ॥
यो वसेत्पञ्चके नियंत स गच्छेत्परमां गतिम् ॥५४॥
जो मनुष्य पंचरुतीर्थमें नित्य वास करता है वह परमगतिको प्राप्त
होता है ।। ५४ ॥
सर्वेषामेव लोकानां ब्रह्मलोकस्य चोपरि ।
यदीच्छेत्तत्पदं गन्तुं स क्सेदव दुप्फरम् ॥ ५५ ॥

भापाटीकासमतम् । (२८५)
सब लोकोंके ऊपरी भागमें ब्रह्मलोक अवस्थित पंचकनिवासी मनुष्य
अभिलाषा करनेपर उसी ब्रह्मपदको प्राप्त होसकते हैं ।। ५५ ॥
यथा सुराणां सर्वेपामादिस्तु मधुसूदनः।
तथैव सर्वक्षेत्राणामादिः पञ्चकमुच्यते ॥५६ ॥
जैसे मधुसूदन सब देवताओंके आदि हैं, ऐसेही पञ्चकतीर्थ सन क्षेत्रों में
आदि कहा गया है ।। ५६ ॥
अतुलोमविलोमाभ्यां तथा व्यस्तसमस्तयोः।
स्नातव्यं पञ्चकं यच्च अश्वतीर्थ वरानने ॥ ५ ॥
हे वरानने ! पंचकतीर्थ और अश्वतीर्थमें अनुलोम विलोमके क्रमसे
अर्थात् एकसे अपर और अपरसे प्रथम इस प्रकार और व्यस्त समस्त
क्रमसे स्नान करना चाहिये ।। ५७ ॥
तथैवोत्तरमारण्यं तदेव फलमश्नुते ।
विधिवद्गम्यमानेषु सर्वतीर्थेषु यत्फलम् ।
पञ्चकालोकनादेव नरःप्राप्नोति तत्फलम् ॥ ५८॥
वह उतरारण्य गवन करके उसीके तुल्य फलको प्राप्त होत हैं । विधि-
पूर्वक जाननेसे समस्त तीर्थों का जो फल है, एक पंचकतीर्थके दर्शनमात्र
सेही मनुष्य वह फल प्राप्त कर सकते हैं ॥ ५८ ॥
दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां वे महीतले ।
सानिध्यमन्धतीर्थस्य मुक्तिद्वारसमीपतः।। ५९ ॥
पृथ्वीतलमें दश करोड सहस्र तीर्थ स्थान हैं, अश्वक्रान्ततीर्थमें मुक्ति-
द्वारके समीप उन सबका सानिध्य है ।। ५९ ॥
यावत्तिष्ठन्ति गिरयो यावत्तिष्ठन्ति सागराः ।
तावत् पञ्चकमृत्यूनां ब्रह्मलोके स्थितिमता ॥ ६ ॥
जबतक सब पर्वत और समुद्र अवस्थित है, तबतक पञ्चकमें मरे मनु-
प्यको ब्रह्मलोक लाभ होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ६० ॥

(२८६) योगिनीतन्त्रम् । जन्मान्तरसहस्रश्च आजन्म मरणान्तिकम् । निर्दहेत् पातकं सर्व सकृत् स्नात्वा तु शङ्करि ॥६१॥ हे शकरि ! पचकतीर्थमें एकवार स्नान करनेसे सहस्र जन्मान्तर ओर जन्मसे मरणतक जो पाप संचित हुए है, यह सब भस्म हो जाते योगाभ्यासेन यस्तिष्ठेत्सम्यग्वपश्यं नरः। एकेन जन्मना मुक्तियोग मोक्षश्च विन्दति ।। ६२ ॥ जो मनुष्य पंचकतीर्थमें तीन वर्ष योगाभ्यासकरके अवस्थान करता है, उसको योगाभ्यासके कारण एक जन्ममें ही मोक्ष प्राप्त होता ॥ ६२॥ ऋणमुक्त्यै तु देवेशि समन्तात्पञ्चकं स्मृतम् । ब्रह्मणः सदनं भद्रे प्रसह्यमपि सर्वतः॥३॥ हे देवेशि ! ऋणमोचनकतीर्थके चारों ओर पंचकतीर्थ अवस्थित है और उसके सब ओरही ब्रह्मसदन है ।। ६३ ॥ यत्र स्नानं जपो होम श्राद्धं दानादिकं स्मृतम् । एकैक्रशो महेशानि पुनाति सकलं कुलम् ॥ ६४ ।। यहा स्नान, जप होम , श्राद्ध और दानादि करनेसे वह एक एकही सब कुल के उद्धार करता है ॥ ६४ ॥ अश्वतीर्थे समक्षे तत्किञ्चित्पश्चिमगोचरे । धनुरष्टप्रमाणेन सिद्धकुण्डमिहोच्यते ॥ ६५ ।। अत्र स्नात्वोदकं पीत्वा मुच्यते सर्वपातक। विरामोपोषितनात्र एकरात्रोषितन चा। द्विजातीनान्तु कथितं तीर्थानामिह सेवनम् ॥ ६६ ॥ अश्वतीर्थ के समीप कुछेक पश्चिमदिशामें आठ धनुःप्रमाण सिद्धकुण्ड है, वहा स्नान और जलपान करनेपर सब प्रकारके पातकोंसे छुटकारा

भापाटीकासमतम् । (२८७)
मिलता है। द्विजगण तीनरात वा एकरात उपवास करके इन सब तीर्थोकी
सेवा करै ॥ ६५ ॥ ६६ ॥
यस्य वायुर्वशी भद्रे हस्तपादौ च संयतौ।
अनुलप्य ब्रह्मचारी तीर्थानां फलमाप्नुयात् ।। ६७ ।।
हे भद्रे ! जिसका प्राणपवन वशीभूत है और जिसके हाथ पैर संयत
तथा जो मनुष्य अनुलेन्य अर्थात् तिलकादिधारी और ब्रह्मचारी है वहीं
मनुष्य तीर्थका फल प्राप्त करनेमें समर्थ होता है । ६७ ।।
सिद्धकुण्डं महाभोग देवताभिः सुसंस्कृतम् ।
पुनीहि सर्वपापेभ्यस्तीर्थचर्य नमोस्तु ते ॥ ६८ ॥
"सिद्धकुण्डं महाभोगं देवताभिः सुसंस्कृतम् । पुनीहि सर्वपापेभ्यस्तीर्थ-
र्य नमोऽस्तु ते" ॥ ६८ ॥
इत्यनेन तु मन्त्रेण वैशाखे कृष्णपक्षके।
त्रयोदश्यां स्नानमात्रात्पुनात्युभयतः कुलम् ॥ ६९ ॥
इस मंत्रसे वैशाखमासकी कृष्णपक्षीय त्रयोदशीमें केवल स्नानमात्र
करनेसेही दोनों कुल पवित्र करता है ।। ६९ ॥
पश्चिमे तस्य तीर्थस्य किश्चिद्वाय यगोचरे ।
ततुःषष्टिधतुर्मानं तीर्थ ब्रह्मसरः स्मृतम् ॥७० ।।
कुछेक वायुकोणको उस तीर्थके पश्चिममें चतुःषष्टि अर्थात् चौंसठ धनु-
परिमाण ब्रह्मसरोवर है ॥ ७० ॥
तत्र स्नात्वा पितृन्भक्त्या तर्पयित्वा यथाविधि ।
पापकर्जनपि पितृन्तारयेन्नात्र संशयः ।। ७१ ॥
वहां लान करने और भक्तिपूर्वक यथाविधि पितरोंका तर्पण करनेसे
पापकारी पितरोंको भी सद्गति प्राप्त होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥७१॥

" (२८८) योगिनीतन्त्रम् । स्नात्वा याति द्विजः सम्यक्ततः संस्कारतां व्रजेत् । स्वयं तु ब्रह्मणा (पृष्टं--दृष्टीघट्टमीश्वरप्रियकाम्यया७२ स्वयं तु ब्रह्मणा स्नातं तस्मात्पाधनकारकम् । इत्यनेन तु मंत्रेण स्नानं कृत्वा यथाविधि ॥ ७३ ॥ माघे मासि चतुर्दश्यां शुक्लपक्षे विशेषतः। दत्त्वा दानश्च विधिवद्ब्रह्मलोके महीयते ॥७४ ।। स्वात्वा याति द्विजः सम्यक् ततः संस्कारतां व्रजेत् । स्वयन्तु ब्रह्मणा घट्टमीश्वरः प्रियकाम्यया । स्वयन्तु ब्रह्मणा स्नातं तस्मात्पावनकारकम् इस मंत्रसे यथाविधि स्नान करनेपर विशेषतः माघमासके शुक्लपक्षमें चतुर्द- शीमें विधिपूर्वक दान करनेसे ब्रह्मलोकमें पूजाको प्राप्त होता है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ ७ ॥ इन्द्रकूटस्य कौवेर अशीतिधतुर्मानतः। रामक्षेत्र विजानीयात्तस्य कुण्डं कुले प्रिये ।।७५ ॥ चिल्वकुन्दप्रमाणन्तु स्नात्वाभ्यर्च्य पितॄनपि । तीर्थेभ्यः परमं तीर्थ रामतीर्थ वरानने ॥ ७६ ।। इन्द्रकूटके उत्तरमें अस्सी धनुःप्रमाण राम क्षेत्र है. उसके तटमें वित्वकुन्दप्रमाण वह कुण्ड अवस्थित है, उसमें स्नान और पूजा करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें जाता है, हे वरानने ! रामतीर्थ तीर्थों में परमोत्तम है ।। ७५ ॥ ७६ ॥ ब्राह्मणानचयित्वा तु ब्रह्मलोके महीयते ॥ ७७ ॥ वहां ब्राह्मणकी अर्चना करनेसे ब्रह्मलोकमें पूजाको प्राप्त होता है ।।७७॥ तस्य तीरे महामागे श्रीरामण महात्मना। पितरस्तर्पिताः सर्वे तीर्थवर्य नमोऽस्तु ते ।। ७८ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२८९)
"तस्य तीरे महाभागे श्रीरामेण महात्मना । पितरस्तपिताः सर्वे तीर्थ-
वर्य नमोऽस्तुते" ॥ ७८॥
इत्यनेन तु मन्त्रेण वैशाखे कृष्णपक्षके।
एकादश्यां स्नानमात्रे पुनात्युभयतः कुलम् ॥ ७९ ॥
तस्य पूर्वे नवधनुः सीतातीर्थ वरानने।
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति सशरीरा द्विजातयः ॥८॥
इस मंत्र द्वारा वैशाखमासके शुक्लपक्षकी एकादशीमें स्नानमात्र करनेसे
दोनों कुल पवित्र होते हैं । इस तीर्थक नव धनुः अन्तरमें सीतातीर्थ है,
वहां स्नान करनेसे ब्राह्मणगण सशरीर स्वर्गमें नाते हैं ॥ ७९ ॥ ८० ॥
क्रोश्चचापि माहाश्राद्धे त्वक्षयं समुदाहृतम् ।
सीतया रामभद्रेण निर्मितं तीर्थमुत्तमम् ।।
तस्मात्पुनीहि मां पापान्मोक्षं कुरु सुरार्चिते ।। ८१ ॥
क्रौद्यचापि महाश्राद्धे त्वक्षयं समुदाहृतम् । सीतया रामचन्द्रेण निर्मित
तीर्थमुत्तमम् । तस्मात्पुनीहि मां पापान्मोक्षं कुरु सुरार्चिते ॥ ८१ ॥
मौनी भूत्वा त्रयोदश्यां तत्र स्नात्वा महाफलम् ।
मन्त्रेणानेन तु स्नात्वा रत्नेनार्य प्रदापयेत् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्मलोके वसेन्मृतः ॥ ८२ ॥
इस मंत्र द्वारा त्रयोदशीमें मौनी हो वहां स्नान करनेके अनन्तर
रत्नद्वारा अयप्रदान करनेपर परलोकमें पापोंसे छूटकर ब्रह्मलोकमें वास
करता है || ८२॥
दक्षिणे चैव सीताया धनुर्दशकमानतः।
तत्राभिषेकमात्राच विजयी सर्वदा भवेत् ॥८३ ॥

(२९०) योगिनीतन्त्रम् ।
सीतातीर्थके दक्षिणमें दशधनुः परिमित शोभायमान तीर्थ है, वह तीर्थ
तीर्थों में उत्तम है, उसमें स्नान करनेसे सदा विजयकी प्राप्ति होती है ॥८३॥
तीर्थानां परमं तीर्थ विजयं नाम शोभनम् ।
तत्र लिङ्गं महेशस्य विजयनाम विश्रुतम् ॥ ८४ ॥
सब तीधाम परमोत्तम विजयनामक तीर्थ सुशोभित है । वहां विजय नामसे
विख्यात महेशलिंग है ॥ ८४ ॥
षण्मासानियताहारो ब्रह्मचारी समाहितः ।
उपित्वा तत्र देवेशि मुच्यते सर्वपातकात् ॥ ८५ ॥
उस स्थानमें छः मास नियताहारी ब्रह्मचारी और समाहित होकर वास
करनेपर संपूर्ण पातकोंसे छूट जाता है ॥ ८५ ॥
तीर्थानां परमं तीर्थ योगतीर्थमिति श्रुतम् ।
सर्वपापहरं शम्भोर्निवासः परमेष्ठिनः ॥८६॥
तदनन्तर योगतीर्थ नामसे विख्यात तीथों में एक उत्तम तीर्थ है; उस
स्थानमें परमेष्ठि ब्रह्मा और सब पापोंको हरनेवाले महादेवजी वास
करते हैं ।। ८६ ॥
दृष्ट्वा लिङ्गंतु देवस्य योगीशं नाम विश्रुतम् ।
ईप्सिताँल्लभते कामाबुद्रस्य दयिती भवेत् ॥ ८७॥
वहां योगीश नामक महादेवके लिंगका दर्शन करनेसे सम्पूर्ण ममिल-
पितविषयोंको प्राप्त होकर रुद्रदेवका प्रिय होता है ।। ८७ ॥
मुक्तितीर्थ विजानीहि द्वाविंशति धनुर्मितम् ।
वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण स्नात्वाय विनिवेदयेत् ॥ ८८॥
मोक्षाभिकाक्षिभिर्युक्तर्वन्द्यसे पूज्यसेऽनिशम् ।
योगकुण्डं महाभागं मां पुनात्वमराचित। ॥ ८९ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२९१)
फिर वाईस धनुपरिगित मुक्तितीर्थ है " मोक्षामिकांभिर्युक्तर्वन्यसे पूज्य-
सेऽनिशम् । योगकुण्डं महाभागे मां पुनात्वमरार्चिता " इस मंत्रसे मुक्ति-
तीर्थमें स्नान करने के पीछे अयनिवेदन करै ।। ८८ ॥ ८९ ॥
तस्यातिदूर लोकस्य वृत्तं कुण्डमनुत्तमम् ।
तत्र स्नात्वा तु विधिवत्सन्तर्प्य पितृदेवताः ॥९॥
ब्राह्मणेभ्यःप्रदायाथ दानानि विविधानि च ।
स्नात्वा कोलेन बीजेन तत्त्वेनाय निवेदयेत ॥११॥
लोकवृचनामक मति उत्तम कुण्ड उससे अतिदूर स्थित है वहां स्नाना
करनेसे विधिपूर्वक पितरदेवताओंका तर्पण करके वाषणोंको विविध दान
प्रदानपूर्वक कोलबीजमंत्रद्वारा स्नान करनेके पीछे तत्त्वद्वारा भर्घ्य निवेदन
करै ॥ ९० ॥ ९१॥
पश्चात्कोलेश्वरं दृष्ट्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥ ९२ ॥
इसके पीछे कोलेश्वरका दर्शन करनेपर भवबंधनसे मुक्तिलाम करत-
है ॥९२ ॥
तिथिहस्तमितं कुण्डं देवगन्धर्वसेवितम् ।
कुण्डे सिततृतीयायां प्रामं धान्यं धन लभेव ॥१३॥
फिर पन्द्रह इस्तपरिमित गंधर्वसेचित फुण्ड है, वहां शुक्पक्षकी तीजमें
स्नान करनेसे ग्राम धान्य और धनलाभ होता है ।। ९३ ।।
इन्द्रशैलस्य याम्ये तु धनुर्दादशमानतः ।
सूर्यतीर्थमिति ख्यातं तीर्थानां तीर्थमुत्तमम् ॥ ९४ ॥
इन्द्रशेलके दक्षिण में बारह धनुपरिमित सूर्यतीर्थनामक विख्यात एक
उत्तम तीर्थ है ॥ ९४ ॥
अदृश्यमूर्तिभंगवान् सप्तसतीरथरेतः ।
आस्ते लोकहितार्थाय व्यापी योगततुः स्वयम्॥१५॥

(२९२)
योगिनीतन्त्रम् ।
वहां योगतनु अदृश्यमूर्ति व्यापी सप्तसप्ति ( सूर्यदेव) लोकहितार्थ
स्वयं अवस्थित है ।। ९५ ॥
महाहरश्च निरतं निवासं कृतवानिह ।
तथैव देवताः सर्वास्तस्यों सेव्या: समागताः॥९६॥
जब देवदेव महादेव उस स्थानमें सदा वास करते है, तब सब देवता
वहां सेव्यरूपसे अर्थात् बडेबड़े देवता आते है ॥ २६ ॥
भानुबीजेन तु स्नात्वा ह्ययं तारेण दापयेत् ।
रामक्षेत्रं ततो गच्छेत्साधकः सिद्धिमानसः ॥ ९७ ॥
वहाँ भानुषीजसे स्नान और तारामंत्रसे अर्ध्यप्रदान करना चाहिये फिर
सिद्धिके निमित्त साधक रामक्षेत्रमें जाय ॥ ९७ ॥
दुर्गकूपद्य तत्र ब्रह्मयूपश्च तिष्ठति ।
दुर्गकूपोदकं पीत्वा माघे मासि चतुर्दशी ॥ ९८॥
भवेद्भक्त्या गर्भधरा मन्त्राणामयुतं जपन् ॥
गपं प्रदक्षिणीकृत्य ततः श्राद्ध प्रकल्पयेत् ।। ९९ ।।
पितश्च तारयेत्तेनब्रह्मलोके महीयते ॥ १००।
वहां दो दुर्ग कूप और ब्रह्मयूप अवस्थित है, माघके महीनेकी चौदशमें
भक्तिपूर्वक दुर्गाकूपका जल पीकर अयुत ( दशसहस्र ) मंत्र जपने और
तत्रस्थ यूपकी प्रदक्षिणा करके श्राद्ध करनेपर पितरोंका उद्धार करके ब्रह्म
लोकमें पूजाको प्राप्त होता है । ९८ ॥ ९९ ॥ १०० ॥
काकिनीञ्च न्यसेत्कूपे सुवर्ण रजतं तथा।
यस्य मित्रस्य यद्वित्तं शोधयेत्पूर्वजन्मनि ॥ १०१ ॥
उस कूपमें काकिनी (कौडिय) सोना और चांदी टालनेसे पूर्वजन्मका
मित्रमणादि शोध होता है ॥ १०१॥

भापाटीकासमेतम् । (२९३) ततो गच्छेदिन्द्रशैलं दक्षिणाभिमुखेन तु । मणीश्वरं ततः पश्यनिर्गताच प्रमुच्यते ॥ १०२॥ तदनन्तर दक्षिणाभिमुख हो इन्द्रशैलमें जानेके पीछे मणीश्वरका दर्शन करनेपर मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ १०२ ।। वधवन्धनयुक्तोऽपि युक्तो वाप्युपपातकः । इन्द्रकूटस्थितं दृष्ट्वा मणिनाथं स वायुना। क्षणेन मुच्यते देवि नात्र कार्या विचारणा ॥ १०३ ॥ हे देवि ! मनुष्य वधवन्धनयुक्त वा आपातक युक्त हो । इन्द्रकूटस्थित मणिनाथका वायुसहित दर्शन करनेपर क्षणमात्रमें मुक्तिलाम करता है इसमें सन्देह नहीं ॥ १०३॥ चरमे लोमतीर्थस्य धतुः पश्चप्रमाणतः । नागतीर्थ ततो जातं पृथिव्यां ख्यातिमागतम् ॥१०४ लोमतीर्थके अन्त में पञ्चधनुः प्रमाण पृथ्वीख्यात नागतीर्थ है ॥१०४॥ नागकुण्डे तु वैकुण्ठः स्नात्वा नागान्समर्चयेत् । पुण्यदं सर्वतीर्थेषु सर्पाणां विषनाशनम् ॥ १०५ ॥ "नागकुण्डेतु वैकुण्ठः" इस मंत्रसे स्नानादि करके नागोंकी पूजा करे । यह तीर्थ सर्व तीर्थी पुण्यप्रद है। इसमें स्नानादि करनेसे सर्व प्रकारके पाप नष्ट होते हैं और सोका विष नष्ट होता है ॥ १०५ ॥ स्नानं कुर्वन्ति ये मा भत्तया श्रावणपश्चमीम् । न तेषां तत्कुले पीडा सपः कुर्वन्ति कहिचित्।।१०६।। जो मनुष्य श्रावणकी पंचमीमें भक्तिपूर्वक स्नान करता है। सर्पगण उसके कुलमें कभी पीडादायक नहीं होते ॥ १०६॥ श्राद्धं पितृणां ये तत्र करिष्यन्ति नरा भुवि । ब्रह्मा तुष्टः परं स्थानं दास्यते नात्र संशयः ।।

योगिनीतन्त्रम् । जो मनुष्य वहा पितृश्राद्ध करता है, ब्रह्मा उसके प्रति संतुष्ट होकर परम स्थानप्रदान करते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ १०७ ॥ चन्द्रादुत्तरतःशैलश्चतुःषष्टिप्रमाणतः । जले तत्र गयाकुण्ड क्षेत्रं तीरे तदुच्यते ॥ १०८॥ चन्द्रशैलके उत्तरमें चौंसठ हस्त प्रमाण गयाक्षेत्र है, उसके जलको गया कुण्ड और तीरको गयाक्षेत्र कहते हैं ॥ १०८ ॥ गयाशीर्ष पूर्वभागे धनुर्विशमानतः। यावलोहित्यपर्यन्तमुत्तरे ब्रह्मयोनिकम् ॥ १०९ ॥ गयातीर्थ परं गुह्यं पितृणांचातिवल्लभम् । कृत्वा पिण्डप्रपादन्तु न भूयो जायते नरः॥ ११० ॥ उसके पूर्वमागमें लोहित्यपर्यन्त और उत्तर में ब्रह्मयोनिपर्यन्त बाईस धनु' परिमित पितृवल्लभ परमगुह्य गया तीर्थ है, वहा पिण्डदान करनेसे मनुष्यको फिर जन्मग्रहण करना नहीं पड़ता ॥ १०९ ॥ ११०॥ आगत्येऽस्मिन्गयायाश्च तथा नीलाचले गमे । यात्राभेदे ददेत्पिडं गयामथ सकृत्प्रिये ॥ १११ ।। हे प्रिये ! आगस्त्यमें, गया और नीलाचलमें यात्रा भेदसे पिण्डदान करना चाहिये, किन्तु गयामें केवल एकबार पिण्ड देवे ।। १११ ।। शोचन्ति पितरस्तस्य व्यथा च परिश्रमः । गायन्ति पितरो गीतं कीर्तयन्ति महर्षयः॥ ११२॥ गयां यास्यति यः कश्चित्सोऽस्माकं तारयिष्यति । एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विता॥ ११॥ तेषां तत्समवेतानां योकोऽपि गयां व्रजेत् । सस्मात्सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणस्तु विशेषतः ॥ ११४ ॥ .

भापाटीकासमेतम् । (२९५)
यो दद्याद्विधिवत्पिण्डान्गयां गत्वा समाहितः
धन्यास्तु खलु ते मा गयायां पिण्डदायिनः।
कुलान्युभयतः सप्त समुदृत्य स्वराप्नुयात् ॥ २१५ ॥
गयामें अनेकवार गमन करनेसे परिश्रमके हेतु उसके पितर शौच करते
हैं महर्षिगण कहते हैं कि, पितर यह कहकर गान करते हैं कि, जो कोई
गमनागमनकरकेही हमको तार सकता है. ( अर्थात् गयाकी यात्रासे ही
पितरोंका उद्धार होता है ) मनुष्यगण गुणवान् शीलवान् बहुत पुत्रोंकी
अभिलाषा करते हैं क्योंकि उनमें एक मनुष्य भी गमनागमन करके
हमारा उद्धार कर सकता है। अतएव सभी और विशेषतः ब्राह्मण गण
वहां जाकर सावधान चित्तसे विधिपूर्वक सर्व प्रयत्नसे पिण्डपदान करै
गया, पिण्ड देनेवाले मनुष्य धन्य हैं। वह मातृकुल और पितृकुल
इन दोनों कुलके सात पुरुष पर्यन्त उद्धार करते हैं ॥ ११२ ॥ ११३ ॥
परपिण्डप्रदानं तु नाम्ना वै पायसेन तैः।
कर्तव्यमृषिभिदृष्ट पिण्याकेन गृहेन तु ।। ११६ ॥
तिलपिण्याककैदया भक्तिमद्भिर्नरः सदा।
श्राद्ध तु तत्र कम्पमध्यावाहनवाजतम् ।। ११७ ॥
पायस (खीर ) द्वारा नामोच्चारणपूर्वक परपिण्डप्रदान करना चाहिये ।
ऋषियोंने कहा है कि पिण्याक ( खजूर ) द्वारा वहां श्राद्ध करै।
मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे तिलपिण्याक द्वारा अावाहनवर्जित श्राद्ध
करै ।। ११६ ॥ ११७॥
सूषिकाधकाकैश्च नातुश्यं चरन्ति ते ।
श्राद्धं तत्तीर्थके प्रोक्तं पितृणां तुष्टिंद परम् ॥ ११८ ॥
मूपिक गृध्र और काक जिससे उसको न देख सके इस विषयमें
सावधान रहना चाहिये। इस तार्थमं श्राद्ध करनेसे पितृगणं अतिशय तृप्ति-
लाम करते है ॥ १८ ॥

(२९६) योगिनीतन्त्रम् । कार्य तत्र प्रयत्नेन भुक्तिरेवाथ कारणम् ॥ ११९ ॥ भक्त्या तुष्यन्ति पितरस्तुष्टा ददति कामना। आयुः पुत्रान्धनं धान्य कामांस्त्वन्यास्तथैव च ॥१२० अतएव सर्व प्रयत्नसे इस स्थलमें पितरोंको भोग प्रदान करना चाहिये पितरगण भोग द्वारा सतुष्ट होकर समस्त अमिलपित विषय और आयु, पुत्र, धन, धान्य तथा अन्याय विविधप्रकार काम्य प्रदान करते हैं ॥ ११९ ॥ १२० ॥ भक्त्या चाराधिते रुढ़े नृणां पितृपितामहाः । अकालेऽप्यथवा काले गयाश्राद्धे सती गतिम् ॥१२१॥ वहा भक्तिपूर्वक रुद्रकी आराधना करनेसे पितृपितामहको सद्गति और पीतिलाभ होता है, अकालमें हो, अथवा कालमें हो, मनुष्यगण सदाही गयाथाद्ध करै ॥ १२१ ॥ प्राप्य चैव सदा स्नान कर्त्तव्यं पितृतर्पणम् । पिण्डदानञ्च तैनात पितृणाश्चातिवल्लभम् ॥ १२२ ॥ वहा सदा स्नान और तर्पण करनेसे दोप नही होता । वहा पिण्डदान पितरोंको अत्यन्त प्रिय हे ॥ १२२ ।। पितरो हि निरीक्षन्तो गगनं समुपागता । आशया परया भक्त्या आशामेषां प्रपरयेत् ॥१२३|| गयामें आकाशमण्डलमें पितरगण आनकर प्राप्त होनेकी आशासे अवस्थान करते हैं, अतएव परमभक्ति सहित उनकी आशा पूर्ण करनी चाहिये ॥ १२३ ॥ विलम्यो नेव कर्त्तव्यो न च विघ्नं समाचरेत् । अच्छिन्ना सन्ततिस्तेषां सदा काले भविष्यति ॥१२४ इस विषयमें विलय करना उचित नहीं है विलन करनेसे विघ्न बाधा भापाटीकासमेतम् । (२९७) उपस्थित होती है जो गयामें पिण्डदान करता है उसकी संतान सन्तति सदा अविच्छिन्न रहती है ।। १२१ । पितरः पुत्रदातारो वृद्धिश्राद्धं च कांक्षिणः ।। १२५ ।। वृद्धिश्राद्धाभिलाषी पितरगण पुत्रदान करते हैं ॥ १२५ ।। तन तेषां च तदेय यथोक्तेन विधानतः । अतः श्राद्धं पुरा प्रोक्तं स्वयमेव स्वयम्भुवा । तेनतत्सत्वर कार्य द्विजैः पितृपरायणः ॥ १२६ ।। तीर्थक्षते गृहे वापि संक्रान्तौ ग्रहणेपि वा । विषवे तु तथान्यत्र जन्मनक्षत्रपीडने । एते वै श्राद्धकालाः स्युः पुरा स्वायम्भुवोऽब्रवीत१२७ अतएव कमी उनको निराश न करे। पूर्वकालमें भगवान् स्वयम्भूने स्वयं अन्तश्राद्धका विषय कीर्तन किया है, पितृपरायण द्विजगण यह कार्य शीघ्र संपादन कर, तीर्थमें, अक्षतमें वा गृहमें, संक्रमणकालमें, ग्रहणमें वियुवकालमें जन्मनक्षत्र यह सब प्रशस्तश्राद्धकाल है, ऐसा भगवान् स्वय- म्भूने कहा है ॥ १२६ ॥ १२७ ॥ कृते श्राद्धे न वै पुंसां पीडा भवति देहजा। इहामुत्र कृतं वापि सर्व त्यजति दुष्कृतम् ॥ १२८ ।। पीडा याम्या न भवति ग्रहचौरनृपादिजा। दुष्कृतं नश्यते सर्व परत्र च गति शुभाम् ॥ १२९ ॥ लभते नात्र सन्देहः प्रजापतिवरो यथा . कामेश्वरी सप्त वेद त्वश्वक्रान्तं तु कार्तिक ।।१३०॥ मातृमुख्यं गयाश्राद्धं पितमुख्यन्तु चान्यतः। पिण्डामोडशषदद्याद्वहुलं कारयत्सुधीः ॥ १३१ ।। -

(२९८)
योगिनीतन्त्रम् ।
श्राद्ध करनेसे मनुष्यको देहज पीडा नहीं होती और इस लोक
तथा परलोके समस्त पाप यमयातना और ग्रह चौर नृपादिकी करी पीडा
एवं दुष्कृत नष्ट होते है तथा वह परलोकमें शुभगतिको प्राप्त होता है
इसमें सन्देह नहीं। जैसे प्रजापतिका वर व्यर्थ नहीं होता, ऐसेही यह सब
भी कभी व्यर्थ होनेवाला नहीं है । कामेश्वरी सप्तवेद और अश्वक्रान्तमें
कार्तिकमें जाना चाहिये। गयाश्राद्ध, मातृमुख्य, अन्यत्र श्राद्ध पितृतुल्य
जाने । बुद्धिमान् पहिले सोलह पिण्ड देकर फिर बहुत पिण्ड देवे ॥१२८॥
॥ १२९ ॥ १३० ॥ १३१ ॥
पातयेत्क्षीरधाराश्च ह्यारुह्य सोमपर्वतम् ।
साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
मया गयां समासाद्य अपनीतमृणत्रयम् ।। १३२ ॥
तदनन्तर "हे ब्रह्माविष्णुमहेश्वरादिका देवताओ ! मै गया मानकर
तीनों ऋणसे मुक्त हुषा तुम साक्षी हो ओ" इस मन्त्रसे सोमपर्वतपर आरो
हण करके दूधको धार गिरावै ।। १३२ ॥
ततो भेर्यादिशब्देन चारुह्य शिविकां नरः ॥१३३॥
फिर मेरी इत्यादिका शब्द करके मनुष्य पालकीमें चढे ॥ १३३ ॥
गृहं गत्वा समभ्यर्च्य गृहदेवीं यथाविधि ।
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चादक्षय्यमुपधारयेत् ।। १३४ ॥
अनन्तर घर जाकर यथाविधि गृहदेवीकी पूजा कर फिर ब्राह्मण भोजन
करानेके पीछे अक्षयावधारण करै ॥ १३४ ॥
भुक्षीत ब्राह्मणेः साई दक्षिणामुपपादयेत् ।। १३५ ।।
तदनन्तर ब्राह्मणों के संग भोजन कर दक्षिणा देवे ।। १३५ ॥
अस्मिपिण्डप्रदानेन चागस्ये विरजेषु च।
दशाश्वमेधिके चैव तथा विष्णुपदेषु च ॥ १३६ ॥

"
भापारीकासमेतम् । (२९९)
गयातीर्थमें, आगस्त्यमें और विरज तथा दशाश्वमेधिक एवं
विष्णुपदमें ॥ १३६ ॥
एकत्र पिण्डदः कश्चित्पुनः श्राद्धं विवर्जयेत् ।
पुनराकर्षणं कृत्वा शापः पतति मूर्द्धनि ॥ १३७ ।।
जो एकत्र पिण्डदान करे तो पुनः श्राद्ध न करे, पुनरि आकर्षण कर-
नेसे मस्तकपर शाप पड़ता है ।। १३७ ॥
त्रिदिन पातयेत्पिण्ड गयायाञ्च विशेषतः।
ततो मातृगयायाश्च त्वेकाहमपि पातयेत् ।
आगस्त्ये विरजे चैव पातयेच्च दिनत्रयम् ॥ १३८ ।।
विशेषकर गयामें तीन दिन पिण्डदान करे । फिर मातृगयामें एक
दिन पिण्ड देना चाहिये । आगस्त्य और विरजमें तीन दिन पिण्ड
देवे ॥ १३८॥
इति योगिनीतन्त्रे सर्चतन्त्रोनमोत्तमे कामरूपाधिकारे चतुर्विंशतिसाहले
द्वितीयभागे भापाटीकायां चतुर्थः पटलः ॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
ततः प्रभाते विमले साधकः सिद्धमानसः ।
सोमशेलस्य चैशात्यां दृष्टिमारान्तरे प्रिये ।
मानशैलं ततो गत्वा गच्छंद्वाराणसी सरः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले-हे प्रिये ! तदनन्तर विमल प्रातःकालमें सिद्धाभिलाषी
साधक सोमशेलके ईशानकोणमें दृष्टिमात्र अन्तर अवस्थित मानशैलमें गमन
पूर्वक वाराणसीसरोवर में जाय ॥ १॥
मणीश्वरस्य चैशान्ये किश्चित्पूर्वादिगोचरे ।
धनुःसप्तान्तरे चैव कुण्ड वाराणसीयकम् ॥२॥
मणीश्चरके ईशानकोण किंचित् पूर्वकी ओर सात धनु के अन्तरमै
वाराणसीयक कुण्ड है ॥ २॥

(३००) योगिनीतन्त्रम् । द्वाविशद्धतुरायाम सर्वदेवेश्च संयुत्तम् । देवी त्रिपथगा तत्र गोमती च सरस्वती ॥३॥ वह लम्बाई में बाईस धनुकी बराबर हे उसमें देवता सदाही स्थित रहते । देवी त्रिपथगामिनी गोमती, सरस्वती ।। ३ ।। करतोया दिव्यनदा लोदित्यो घर्घरस्ततः । सरयूधूतपापा च नर्मदा च महानदी ॥ ४ ॥ करतोया, दिव्यनद, लो हत्य, घर्घरा,सरयू और निधौतपाप महानदी नर्मदा || ४ ॥ दृषद्वती देविका च तथा चर्मण्वती नदी । कृष्णवेणी तथा पुण्या शोणः श्यनो महानदः ॥५॥ कावेरी यमुना चैव ये चान्ये नातुकीर्तिताः । मम प्रीत्यर्थमायान्ति कुण्डं वाराणसीयकम् ॥६॥ दृपद्धती, देविका, चर्मण्यती, पुण्यदायिनी, कृष्णबैणी, महानद, शोण, और श्येन, कावेरी, यमुना और अन्यान्य अनेकों नद नदी मेरी प्रीतिके निमित्त वाराणसीयक कुण्डमें आनकर स्थित रहती हैं ॥ ५॥ ६ ॥ उदधिहरं चैव क्षीरोदा तथा पयः । घृतोदश्चैव मद्योदो दद्धयोदश्चैव सागरः ॥ ७ ।। हदाश्च सरितश्चैव तीर्थानि विविधानि च । मधुमास चतुर्दश्यां समायान्ति न संगयः ॥ ८॥ वैशाखस्य तृतीयायां समायान्ति सुमध्यमे । स्नात्वा तब दिवे यान्ति यावदाभूतसंप्लवम् ॥९॥ उदधि और गहरगण, क्षीरोद, पयोद, घृतोद, मद्योद, दयोद और सागर समस्त हद सरिद्ण और विविध रीर्य यह सभी चैत्रमासकी

भापाटीकासमेतम। (३०१)
चौदश और वैशाखमासकी तृतीयाको वहां आते हैं. इसमें सन्देह नहीं
वहां स्नान करनेपर प्रलयकालतक स्वर्ग भोगता है ॥ ७॥ ८॥९॥
जगन्माये जगदीपे जगत्पापप्रणाशिनि ।
अमृतं देहि मे वाराणासि कुण्ड नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥
जगन्माय जगदीपे जगत्पापप्रणाशिनि । अमृतं देहि में वाराणासि
कुण्ड नमोस्तुते" ॥१०॥

(३०२) योगिनीतन्त्रम्।
हे मणिकर्णे सुरश्रेष्ठे मणीश्वार और मणिप्रिये । अपने स्थानमें वास
करते हुए मेरे सब पापोंको हरण करो तुम्हें प्रणाम है ॥ १५ ॥
मन्त्रेणानेन तु स्नात्वा प्रणिपत्य प्रपूजयेत् ॥ १६ ॥
इस मन्त्रसे स्नान और प्रणाम करके पूजा करे ।। १६ ॥
ऐशान्यां मणिशैलस्य मङ्गला नाम वै नदी।
क्षीरनीरवहन्तीत्वं पापौघाच पुनीहि माम् ॥ १७ ॥
मणिपर्वतके ईशानकोणमें जो मगलानाम नदी है वह क्षीरके समान
जल बहाती हुई मेरे पापसमूहोंको दूर करै ॥ १७ ॥
स्नात्वा मन्त्रेण देवेशी प्रणिपत्य प्रसादयेत ।
मणीश्वरं ततो गत्वा क्षालयेन्मतुमुच्चरन् ।
स्पृष्ट्वा द्वितीयकेन तृतीयेनाभिपूजयेत् ॥१८॥
इस मन्त्रसे प्रणाम करके प्रसन्न करै। फिर मणीश्वरमें जाकर प्रथम
मत्र उच्चारणपूर्वक प्रक्षालनानन्तर दूसरे मन्त्रद्वारा स्पर्श करके तीसरे मत्रसे
पूजा करे ॥ १८॥
कलाहस्तद्वयोशेन सिदिक्षेत्रमिहोच्यते ।
हसोासनमारूढो रश्मिविन्दुसमायुतः ।। १९ ॥
अपनी पूर्ण कलाओं तथा दोनों हाथोंसे यह सिद्धिक्षेत्र कहलाता है।
इसमें सूर्य की किरणोंकी सक्षेपसे स्थिति है और इनमें आसनके ऊपर विरा-
जमान हसस्वरूपका अर्काप्रदानपूर्वक ध्यान करना चाहिये ॥ १९ ॥
मन्त्रोऽयं देवदेवस्य ऋषिर्गर्ग उदाहृतः ।
छन्दोनुष्टुभवो देव इष्टार्थे विनियोजयेत् ।। २० ।।
दवदवका यह मन्त्र गर्गऋपिने कहा है इसका छन्द अनुष्टुप्. भव इसके
देवता ओर इष्टार्थ (इष्टसिद्धि ) में इसका विनियोग करे ॥ २० ॥

भापाटीकासमेतम् । (३०३)
उद्यकिरीटेन्दुकलं सदेव
विभर्ति वैयाघ्रततुं चतुर्भिः।
शूलञ्च यं यः परमञ्च वजं
रक्तं त्रिनेत्रं परमं मृगं च ॥१॥
मध्ये देवं पूजयेत्कृत्तिवासं
भीमं देवं तत्पुरस्ताद्धरश्च ।
भवं साम्ब शक्रमध्ये विसंज्ञ
पश्चादेवं वामनं कालसंज्ञम् ।। २२ ।।
जिन देवके किरीटस्थित मणिसे सबकी किरणछटा प्रकाशित होती है ।
जिन्होंने अपने देहमें व्याघ्रचर्म धारण किया है, जो शूल, वर, अभय और
वज इन चारोंसे शोभायमान हैं जो लालवर्णके तीन नेत्रोंसे विराजित हैं
और मृगस्थ अंग भयानक मूर्ति हैं, उन परमदेवकृत्तिवास हर महेश्वरकी
मध्यभागमें पूना करे। फिर कालसंजक वामनकी पूजा करनेके पीछे ॥
॥ २१॥ २२॥
यजेच्छक्ती: पद्मपत्रेषु देवी
वाराणसीकीर्तितयोः पुरस्तात् ।
श्रीकण्ठायतद्वहिः संयजद्वै
गृहान्पश्चात्तत्पुरस्तादिंगीशान् ॥ २३ ॥
वामनन्तः पूजितः स्यापिनाकी
दाक्षे भागे कमला सर्वतश्च ।
सिद्धेशाख्यादग्रतश्च प्रपूज्या
स्वैः स्वमन्त्रैः स्वीयकल्पोदितैश्च ॥ १४ ॥

(३०२)
योगिनीतन्त्रम् ।
हे मणिकणे सुरश्रेष्ठे मणीश्वार और मणिप्रिये ! अपने स्थानमें वास
करते हुए मेरे सब पापोंको हरण करो तुम्हें प्रणाम है ॥ १५ ॥
मन्त्रेणानेन तु स्नात्वा प्रणिपत्य प्रपूजयेत् ।। १६ ॥
इस मन्त्रसे स्नान और प्रणाम करके पूजा करै ॥ १६॥
ऐशान्यां मणिशैलस्थ मङ्गला नाम वै नदी।
क्षीरनीरवहन्तीत्वं पापौघाच्च पुनीहि माम् ॥ १७ ॥
मणिपर्वतके ईशानकोणमें जो मंगलानाम नदी है वह क्षीरके समान
जल बहाती हुई मेरे पापसमूहोंको दूर करै ॥ १७ ॥
स्नात्वा मन्त्रेण देवेशी प्रणिपत्य प्रसादयेत ।
मणीश्वरं ततो गत्वा क्षालयेन्मनुमुच्चरन् ।
स्पृष्ट्वा द्वितीयकेनैन तृतीयेनाभिपूजयेत् ॥ १८ ॥
इस मन्त्रसे प्रणाम करके प्रसन्न करै। फिर मणीश्वरमें जाकर प्रथम
मंत्र उच्चारणपूर्वक प्रक्षालनानन्तर दूसरे मन्त्रद्वारा स्पर्श करके तीसरे मंत्रसे
पूजा करे ॥ १८॥
कलाहस्तद्वयांशेन सिद्धिक्षेत्रमिहोच्यते ।
हसोऽासनमारूढो रश्मिबिन्दुसमायुतः॥ १९ ॥
अपनी पूर्ण कलाओं तथा दोनों हाथोंसे यह सिद्धिक्षेत्र कहलाता है।
इसमें सूर्यको किरणोंकी संक्षेपसे स्थिति है और इनमें आसनके ऊपर विरा-
जमान हंसस्वरूपका अर्घ्यप्रदानपूर्वक ध्यान करना चाहिये ॥ १९ ॥
मन्त्रोऽयं देवदेवस्थ ऋषिगर्ग उदाहृतः ।
छन्दोनुष्टुभवो देव इष्टार्थे विनियोजयेत् ॥ २० ॥
देवदेवका यह मन्त्र गर्गऋपिने कहा है इसका छन्द अनुष्टुप्, भव इसके
देवता और इटार्थ (इष्टसिद्धि ) में इसका विनियोग करें ॥ २० ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(३०३)
उद्यकिरीटेन्दुकलं सदैव
विभर्ति वैयाघ्रतनुं चतुर्भिः।
शूलश्च यं यः परमञ्च वजं
रक्तं त्रिनेत्रं परमं मृगं च॥१॥
मध्ये देव पूजयेत्कृत्तिवासं
भीमं देवं तत्पुरस्ताद्धरञ्च ।
भवं साम्बं शक्रमध्ये विसंज्ञ
पश्चाद्देवं वामनं कालसंज्ञम् ॥ २२॥
जिन देवके किरीटस्थित मणिसे सबकी किरणछटा प्रकाशित होती है ।
जिन्होंने अपने देहमें व्याघ्रचर्म धारण किया है, जो शूल, पर, अभय और
वज इन चारोंसे शोभायमान हैं जो लालवर्णके तीन नेत्रोंसे विराजित हैं
और मृगस्थ अंग भयानक मूर्ति हैं, उन परमदेवकृत्तिवास हर महेश्वरकी
मध्यभागमें पूजा करे। फिर कालसंज्ञक वामनकी पूजा करनेके पीछे ॥
॥ २१॥ २२ ॥
यजेच्छत्ती: पद्मपत्रेषु देवी
वाराणसीकीर्तितयोः पुरस्तात् ।
श्रीकण्ठायतद्वहिः संयजढे
गृहान्पश्चात्तपुरस्तादिगीशान् ॥ २३ ॥
वामेऽनन्तः पूजितः स्यापिनाकी
दाक्षे भागे कमला सर्वतश्च ।
सिद्धेशाख्यादग्रतश्च प्रपूज्या
स्वः स्वमन्त्र: स्वीयकल्पोदितैश्च ॥४॥

. (३०४) योगिनीतन्त्रम। मणिनाथश्चादिलिब्रह्मपाषाणमक्षयम् । ऐशान्यां मङ्गला देवि चैतन्मध्यगतं प्रिये ॥ २५ ॥ वहां स्थित वाराणसी कीर्ति शक्ति सबकी पद्मपत्रमें पूजा करके बहिर्भा- गमें श्रीकण्ठादिकी पूजापूर्वक तत्पुरस्थित दिगीशगण और वामभागमें अनं- तकी पूजा कर, दक्षिणभागमें पिनाकी और सर्वतः कमलादेवी तथा आदिमें सिद्धशाख्य देवता इन सब देवताओं के कल्पोक्त स्वस्वमंत्रद्वारा पूजा करके मणिनाथ आदिलिग अक्षय ब्रह्मपापाण इनकी पूजा करे. हे देवि ! ईशान कोणके भागमें मंगला देवी अवस्थान करती है यह मध्यतम क्षेत्र है । ॥ २३ ॥ २४ ॥ २५ ॥ कोशत्रयमिदं क्षेत्र मणिपीठं सुरार्चिते। दक्षवके च कामेशी हयग्रीवन्तु पश्चिमे ॥२६॥ हे देवताओंसे पूजित ! यह मणिपीठ क्षेत्र तीन कोशमें व्याप्त है। इसके दक्षिणमुखमें, कामेशी पश्चिममें हयग्रीव ॥ २६ ॥ उत्तरं कमलं लिङ्गमुत्तराया समुद्भवः। पूर्ववत्रे च विरजा उत्तरे कीलकोद्भवम् ।। २७ ॥ उत्तरमें उत्तरासमुद्भूत कमललिग है । पूर्वमुखमें विरजा, उत्तरमें कील- कोद्व ॥ २७॥ अन्यत्र कोटिद्वितयं सर्व वामोद्भवं भवेत् । रमणायाः समुद्भूतं कुण्डं पञ्चशतं शतम् ॥ २८ ॥ अन्यत्र वामोद्भव दो करोड कुण्ड हैं और रमणासंभव पांचसौ कुण्ड हैं ॥ २८ ॥ सार्द्धकोटिस्तथा लिङ्गं त्रिशतं च कलौ युगे। भूम्यन्तरस्थं लक्ष्यश्च सार्द्धलक्ष जले प्रिये ॥ २९ ॥ .

भापाटीकासमेतम् । (३०५)
और डेढ़ करोड लिंग है, परन्तु कलियुगमें तीन सौ लिंग वर्तमान है
हे प्रिये ! भूमिके अन्तरमें लक्ष जलमें डेढ़ लाख ॥ २९ ॥
द्विलक्ष पर्वते चैव पञ्चलक्षं गुहासु च ।
भूमिपीठे लक्षसप्तं वृक्ष मूले तु लक्षकम् ॥ ३०॥
पर्वतमें दोलाख, गुहोंमें पांच लाख, भूमिपीठमें सात लाख वृक्षमूलमें
लाख ॥ ३० ॥
कुण्डमध्यगतं लिंगमर्द्धलक्ष तथैव च ।
संध्यासन्ध्यांशके चैव कुण्डं लोहित्यपावनम् ॥३१॥
कुण्डगें अर्द्धलक्ष लिंग हैं और सन्न्यासन्च्यांशको पवित्र लौहित्य कुण्ड
जानना चाहिये ॥ ३१॥
नवेन्दुशाके देवेशि विदितं सर्वमेव तु।
ज्यंशं सन्ध्यांशके चैव यदा शूद्रो भवेन्नृपः ॥ ३२॥
नवेन्दु (१९) शामें वह सर्वत्र विदित हुआ है तीसवें शाकेकी
संधिमें जर शुद्ध राजा हो ॥ ३२ ॥
तदा कामेश्वरी देवी स्फुटिता मध्यमांशतः।
अन्ते शाकेश्वरीनैवस्फुटिता मध्यमेशके ॥ ३३ ॥
तब कामेश्वरी देवी मध्यमांशमें प्रकाशमान होगी । फिर मध्यमांशमें
शाकेश्वरी प्रकट होगी ।। ३३ ॥
अन्त्याशे चैव शाके च सुव्यक्ता उर्वशी तदा ।
भूशाक माधवे व्यक्ता सुधांशे विरजा प्रिये ।। ३४ ॥
अन्त्यांश शाकेमें उर्वशी देवी सुव्यक्ता (प्रकट) होगी। भूशाकके
मध्यमांशमें विरजा प्रकट होगी ॥ ३४ ॥
फल दिव्येश्वरत्वं यद्राजस्येन लभ्यते ।
तत्फलं प्राप्यते देवि पूजनाद्वन्दनाप्रिये ॥ ३५ ॥

.
योगिनीतन्त्रम् ।
हे देवि ! राजसूयद्वारा जो दिव्येश्वरत्वफल प्राप्त होता है वहा पूजा
बन्दनादि करनेसे वही फल प्राप्त करसकता है इसमें सन्देह नहीं ॥३५॥
वायव्ये मानशैलस्य वराहो नाम पर्वतः ॥ ३६॥
हे प्रिये । मानशैलके वायुकोणमें बराहनामक एक पर्वत है ॥ ३६ ॥
तस्य पूर्वे दक्षिणे च नरनारायणं सरः।
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च विष्णुलोके महीयते ॥३७॥
उसकी पूर्वदक्षिण दिशामें नरनारायणसरोवर है, वहा स्नान पान कर'
नेसे स्वर्ग लोक प्राप्त होता हे ॥ ३७ ॥
तस्य पश्चिमतीरे च लिंगं सोमेश्वरं हरम् ।
तीर्थ प्रभासनामानं मृतानां मुक्तिदं परम् ॥ ३८॥
उसके पश्चिमतटमें सोमेश्वर लिग शिव विद्यमान हैं उस तीर्थका नाम
प्रभास हे यह तीर्थ मरेहुए मनुष्योंको परलोकमें मुक्ति देता है ॥ ३८ ॥
देवनात्कृतपिण्डानां कामपूरकृतं नृणाम् ।
तत्र वैनायक तीर्थ वायव्ये धनुरष्टकम् ॥ ३९ ॥
पितृगणके क्रीडाकरने और पिण्डग्रहण करनेसे मनुष्यों के मनोरथोंको
पूर्णकरनेवाला वहा वायुकोणमें अष्टधनु परिमित वैनायक तीर्थ है ॥३९॥
सशतं धनुरायामं प्रभासं तीर्थमुत्तमम् ।
वायव्ये तस्य देवेशि धनुरर्कप्रमाणतः॥४०॥
तीर्थ विन्दुसरः पुण्यं स्नानात्पातकनाशनम् ।
•, मणिसोमाचलान्तेन धनुः साहस्रपञ्चकम् ॥ ४१ ।।
प्रभासतीर्थ शतधनुः लम्बाईसे युक्त है। हे देवि ! उसके वायुकोण में
पारह धनु पारमित बिन्दुसरोवरनामा पापनाशक अत्युत्तम पवित्र तीर्थ
विद्यमान है, वह मणि सोमाचलपर्यन्त पाच हजार भनुः फैला हुभा
हे॥४०॥ ४१ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(३०७)
भूलिंगे च भवेत्कोटिज्यामिता च सरस्वती।
धातुष्कोकिलकः शम्भुर्लक्ष: कालिरुदाहृता ॥१२॥
भूलिगमें करोडधनुःपारमित सरस्वती है, यहा धनुष्कोफिलफ शम्भु
ओर रक्षकालिका स्थित हैं ॥ ४२ ॥
नाटकाचलपूर्वे तु मतगो नाम पर्वतः ।
अचलं यावदग्नौ तु शिवस्यान्तर्गदं स्मृतम् ॥ ४३ ॥
नाटकाचर के पूर्वमें मतङ्ग नामक पर्वत है, यहा अचलपर्यन्त स्थान
शिवका अन्तगृह कहा गया है ॥ ४३ ॥ ५
अन्तहमृता ये च यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
अक्षयं सत्कृतं तत्र यत्कृतश्च तदक्षयम् ॥४४ ॥
जो मनुष्य अन्तर्गहमें प्राणत्याग करता है वह अक्षय ब्रह्म सनातन
पदको प्राप्त होता है और वहा जो कुछ सत्कार्य करै वह सब अक्षय
होता है ॥ ४४ ॥
मणिशैले स्थिता ये च ये मृतास्ते पुनर्भवाः।
तत्र दानं कुरुक्षेत्रसमं भवति नान्यथा ॥ ४५ ॥
जो मणिशैलमें वास करता है, उसको फिर जन्म लेना नहीं पढता
वहा दान करनेसे कुरुक्षेत्रकी समान फल मिलता है इसमें सन्देह
नहीं ॥ १५॥
अश्वतीथेन्द्रमध्ये तु ब्रह्मावधिरुदाहृतः।
वराहस्य मुखे तोयं दृष्ट्वा मत्स्योदरी तदा ।
आपाढे वर्षणे विष्णोर्यदा मत्स्योदरं भवेत् ॥ ४६॥
अश्वतीर्थेन्द्रमध्यमें ब्रह्मावधि कहागया है, तब वराहके मुखमें जल और
मत्स्योदरीका दर्शन करै। आषाढ वर्षणकालमें जब विष्णुका मत्स्योदर
होता है ॥ ४६ ॥

(३०८) योगिनीतन्त्रम् । तदा सर्वप्रयत्नेन स्नानं कुर्यान्मम प्रिये । शतजन्मकृत पापं स्नानानश्यति निश्चितम् ।। ४७ ॥ तब सर्वप्रयत्नसे वहा स्नान करना चाहिये । इस स्थानमें सौ जन्मके क्येि पाप नि सन्देह नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥ भाद्रे वा श्रावणे वापि तदाद्धि लभेत्फलम् । कात्तिके दृश्यते किचित्फलं दशगुणोत्तरम् ॥ ४८ ॥ भाद्र वा श्रावणमें आधा फल होता है । कार्तिकमें उसका दशगुणसेभी अधिक फल प्राप्त होता हे ॥ १८ ॥ हस्ताचलस्य पूर्वे तु किचिदेशान्यगोचरे । भस्माचलं स्थिरं भूत्वा समीक्षकाममुच्चरन् ॥ १९ ॥ हस्ताचलके पूर्व कुछेक ईशानकोणकी ओर स्थिर मत्रोचारणपूर्वक भस्माचलका दर्शन करै ॥ ४९ ॥ कीलकाचरमे भागे नाक्रान्तं सूत्रमापते ॥५०॥ कीलकके अन्त्यभागमें आक्रान्त भाकर्षण किये हुएका सूत्रपात न करे ॥ ५० ॥ तत्क्षेत्रस्योत्तरे भागे धनुरर्कप्रमाणतः। उर्वशीति समाख्याता सर्वकिल्बिषनाशिनी।। ५१ ॥ उस क्षेत्रके उत्तरभागमें वारह धनु प्रमाण सब पापोंका नाश करनेवाला उर्वशीतीर्थ है ॥ ५१ ॥ माघे मालि सिते पक्ष द्वादश्याच समाहितः। स्नात्वाश्वमेधजं पुण्यं लभते संक्रमेषु च ॥५२॥ वहा मायके महीनेकी शुक्लद्वादशीमें और सक्रातिमें सावधान होकर स्नान करनेसे अश्वमेधकी तुल्य फल प्राप्त होता है ।। ५२ ॥

भापाटीकासमेत्तम् ।
दिनक्षये च ग्रहणे न स्नायाद्धि कदाचन ।
नाशोऽपि ज्येष्ठपुरस्य धनस्य परमेश्वरि ॥ ५३ ॥
हे परमेश्वरी ! सायकाल वा ग्रहण में वहां कभी स्नान न करे, ऐसा
करनेसे ज्येष्ठ पुत्र और धनका नाश होता है ।। ५३ ।।
तारं श्रवणशुन्यश्च वाराहं सशिखीस्थितः ।
समार्णको वगिजायानन्तोऽयं च प्रकीर्तितः ॥ ५४॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रसरोसि च ।
उर्वश्यन्तानि सर्वाणि पापं हर नमोऽस्तु ते ॥ ५५ ॥
ताराश्रवणशून्य शिखीसहित वाराह समार्णक और वहिजाया यह
अनन्त कहाते हैं । समुद्रसे लेकर सरोवरोंतक पृथ्वीमें जितने तीर्थ है, वह
सन उर्वशीतीर्थतक मेरे पापोंको दूर कर, उनको प्रणाम है ॥ ५५ ॥ ५५ ॥
मन्त्रेण विधिवत्स्नात्वा चौत्तराशामुखेन तु ।
वारुणेन च मन्त्रेण दद्यादय विभूतये ॥५६॥
इस मन्त्रद्वारा उत्तर मुख हो विधिपूर्वक स्नान करके विभूतिके
निमित्त वारुणमन्त्रसे अर्घ्य देवे ॥ ५६ ॥
पूर्वाशामजनं कृत्वा महाऽलक्ष्या विमुच्यते ।
धनं धान्यं प्रजावृद्धिः कुवराशाविमज्जनात् ।। ५७ ॥
पूर्वाभिमुख होकर स्नान करनेसे दरिद्र दूर होता है, उत्तराभिमुख
होकर मजन करनेसे धन धान्य और प्रजाकी वृद्धि होती है ॥ ५७ ॥
तस्याः पूर्वे चार्कधतुरयुताशं तथा परम् ।
सूर्यतीर्थमिति ख्यातं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ५८॥
उसके पूर्वमें बाहर धनु परिमित दशसहस्र देवताओंकोभी दुर्लभ
विख्यात सूर्यतीर्थ है ॥ ५८ ॥
ऋषयः सिद्धगन्धास्तीर्थानि च सरांसि च ।
माहात्म्यमतुलं तस्य सूर्यकुण्डस्य शङ्करि ॥ ५९ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३११) आँवलेको मुखमें रखकर स्नान करनेसे अपुत्रमनुष्यको पुत्र प्राप्त होता है और वह पुत्र पृथ्वीका पति राजा होता है || ६४ ॥ चैत्रे सितत्रयोदश्यां स्नात्वा राज्यश्च विन्दति । वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण कामनाय निवेदयेत् ॥ १५ ॥ कामकुण्ड महाभाग देवीभिः संस्कृतः स्वयम् । प्रयच्छ कामान्सकला-पापाच त्राहि सर्वतः ॥ ६६ ।। चेतक महीनेकी शुक्लत्रयोदशीमें मान करनेसे राज्य प्राप्त होता है 'कामकुण्ड महाभाग देवीभिः संस्कृतः स्वयम् । प्रयच्छ कामान्सकलान् पापाच त्राहि सर्वतः " इस मंत्रसे अर्घ्य निवेदन करे ।। ६५ ॥ ६६ ॥ सूर्यतीर्थ चार्घ्यदानं यः करोति वराङ्गने । शतमष्टोत्तरश्चापि सहस्रमयुतं तथा। द्वादशाष्टौ तु देवेशि चाश्वमेधफलं लभेत् ॥ ६७ ॥ हे शोभायमान अंगवाली ! जो मनुष्य सूर्यतीर्थमें अटोचरशतसहस था अयुत अथवा द्वादश या आठ अर्घ्य देता है, वह अश्वमेधके फलको पाता है ।। ३७ ॥ माघे वा फाल्गुने वापि स्वाहार्य सप्तमोदिने । स्नात्वा ख्युदये काले कुष्ठी पापाद्विमुच्यते ॥ ६८॥ माघ वा फाल्गुनमें सप्तमीके दिन सूर्योदयकालमें मान करनेपर अर्थ देचे तो कुष्ठी मनुष्य पापोंसे छूट जाता है ॥ ६८ ॥ अपुष्पिता च विशाहाद्या नारी परमेश्वरि । तत्राभ्यार्घ्यदानेन सा नारि पुष्पिता भवेत्॥९॥ हे परमेश्वरी ! जो नारी अपुष्पिता है, अर्थात् समयपर ऋतुमती नहीं होती, वह पूजापूर्वक अर्घ्यदान करनेसे वीस दिनमें ऋतुमती होती है ।। ६९॥

योगिनीतन्त्रम्। ऋषिगण, सिद्धगण और गन्धर्वगण समस्ततीर्थ और सरोवर सभी उस सूर्यकुण्डके समीप स्थित हैं || ५९ ॥ भृग्वन्तं गगनं देवि भृगुस्वार्गान्तिको मतुः। स्नाने च पूजने चाय स्तुतौ च विनियोजयेत् ॥६०॥ हे देवि । भृगवन्त गगन एव भृगुस्वर्गान्तिक मनु स्नान, पूजन, अर्घ्य और स्तबमें विनियोग करे अर्थात् भृगुसपुटित ओंकारसे स्नान आदि करे ॥ ६० ॥ मासि चेने च माघेच सप्तम्यां रविवासरे । स्नात्वा सर्वमवाप्नोति सूर्यलोकश्च विन्दति ॥ ६१ ॥ चैत्र और माघमासकी सप्तमीमें रविवार के दिन स्नान करनेसे मनुष्य सूर्यलोकको प्राप्त होता है ।। ८१ ।। रक्तांशो विशसम्भूत महापातकनाशन । हरमानससौभाग्य पापं हर नमोऽस्तु ते ।। ६२ ॥ हे रक्ताशु ! हे विशसे उत्पन्न ! हे महापातकों के नाशकर्ता । हे शिव मनस्वरूप ! हे महाभाग्यवाले । मेरे पापोंको हरो तुमको प्रणाम हे||६२॥ मन्त्रेणानेन संपूज्य प्रणति समुपाचरेत् । तत्पूर्वे वै पञ्चधनुः कामाख्यं नाम वे सरः! तत्र स्नात्वा त्रयोदश्यां सर्वान्कामानवाप्नुयात्।।६३॥ इस मत्रसे पूजा और प्रणाम कर, उसके पूर्वभागमें पचधनु पारमित कामाख्यानामक सरोवर है वहा त्रयोदशीमें स्नान करनेसे समस्त कामना प्राप्त होती हैं ।। ६३॥ धात्रीफलं मुखे कृत्वा यस्तु स्नानं समाचरेत् । अपुत्रो लभते पुनं राजानं पृथिवीपतिम् ।। ६४ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३११) ऑक्लेको मुखमें रखकर खान करनेसे अपुत्रमनुप्यको पुत्र प्राप्त होता है और वह पुत्र पृथ्वीका पति राजा होता है ॥ ६४ ॥ चैत्र सितत्रयोदश्यां स्नात्वा राज्यञ्च विन्दति । वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण कामनाय निवेदयेत् ॥ ६५ ।। कामकुण्ड महाभाग देवीभिः संस्कृतः स्वयम् । प्रयच्छ कामान्सकलान्पापाच त्राहि सर्वतः ॥६६॥ चैतक महीनेकी शुक्लत्रयोदशीमें मान करनेसे राज्य प्राप्त होता है 'कामकुण्ड महाभाग देवीभिः संस्कृतः स्वयम् । प्रयच्छ कामान्सकलान् पापाच्च बाहि सर्वतः" इस मंत्रसे अयं निवेदन करे ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ सूर्यतीर्थ चायंदानं यः करोति वराङ्गने । शतमष्टोत्तरश्चापि सहस्रमयुतं तथा। द्वादशाष्टौ तु देवेशि चाश्वमेधफलं लभेत् ॥ ६७ ॥ हे शोभायमान अंगवाली ! जो मनुष्य सूर्यतीर्थमें अष्टोत्तरशतसहस्र वा अयुत अथवा द्वादश या आठ अर्घ्य देता है, वह अश्वमेधक फलको पाता है ॥२७॥ माघे वा फाल्गुने वापि स्वाहाध्य सप्तमोदिने । स्नात्वा स्युदये काले कुष्ठी पापाद्विमुच्यते ॥ ६८॥ माघ वा फारगुनमें सप्तमीके दिन सूर्योदयकालमें स्नान करनेपर अर्य देवे तो कुष्ठी मनुष्य पापोंसे छूट जाता है ॥ ६८ ॥ अपुष्पिता च विशाहाद्या नारी परमेश्वरि । तत्राभ्यार्घ्यदानेन सा नारि पुष्पिता भवेत्॥६॥ हे परमेश्वरी ! जो नारी अपुष्पिता है, अर्थात् समयपर ऋतुमती नहीं होती, वह पूजापूर्वक अर्घ्यदान करनेसे वीस दिनमें ऋतुमती होती है । ६९॥

(३१२) योगिनीतन्त्रम् । योऽयं तु मातपात्रेण चादित्यस्य तु शङ्करि । सप्तजन्मनि दारिद्रयमृतलो चाभिजायते ॥ ७० ॥ हे शंकार । मिट्टीके पात्रमें सूर्यको अर्घ्य देनेसे सात जन्म श्रीमान्के पर जन्म लेकर दरिद्रता प्राप्त नहीं होती ॥ ७० ॥ भूतापत्या च या नारी त्वह्नि संपूज्य भास्करम् । करवीरण वाण तथा धात्रीफलेन च । करवीरशतं दत्त्वा नापुत्री जायते क्वचित् ॥ ७१ ॥ मृतापत्या नारी ! ( अर्थात् जिसकी सन्तान मर जाती हो ) दिनमें कनेरके सहित आकके फूल वा धात्रीफलके सहित शत करवीरद्वारा सूर्यकी पूजा करनेसे पुत्रवती होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ७१॥ अभावे करवीरस्य पत्राण्यपि निवेदयेत् । रक्तं रुद्रजटश्चैव रक्तश्च करवीरकम् ॥७२॥ कनेरके अभावमें कनेरके पतेभी निवेदन करै। रक्तरुद्रजटा (लालरुद्र- जटा) और लाल कनेर ॥ ७२ ।। तथा रक्ततया देवि शस्तं भास्करपूजने । सर्वेषाञ्चैव पुष्पाणां श्रेष्ठश्च करवीरकम् ॥ ७३ ॥ तथा अन्यान्य रक्तपुष्प सूर्यको पूजामें प्रशस्त होते हैं, वह सब पुप्पोंमें कनेरका पुष्प श्रेष्ठ है ।। ७३ ॥ एकंच करवीरश्च रक्तपद्मसहस्रकम् । प्रतिपुष्पं चाश्वमेधफलं सम्यक्प्रजायते ॥ ४ ॥ एफ कनेर हजार रक्तपनके समान है प्रतिपुष्पमें अश्वमेधका फल प्राप्त होता है ।। ७४ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन करवीरेण पूजयेत् । अमावे करवीरस्य निवारं वाग्यतः स्मरेत् ।। ७५ ॥

-
भापाटीकासमेतम् ।
(३१३)
इस कारण सर्व प्रयत्नसे कनेरके पुष्पद्वारा पूजा करनी चाहिये । कने-
रके अभावमें मौन धारणपूर्वक तीनबार कनेरको स्मरण करै ॥ ७५ ॥
उच्चरकरवीरेति न तथा कोटिजाप्यतः।
प्रीतिः स्यात्करवीरस्य न तथा याति भास्करमा७६॥
'करवीर' यह वाक्य उच्चारण करनेसे करोड जपके समान फल
होता है, करवीरसे सूर्यदेवकी जैसी प्रीति होती है, अन्यपुष्पसे वैसी नहीं
होती ॥ ७६ ॥
संवत्सरस्य मध्ये तु चैकदा सप्तमीव्रतम् ।
सूर्यतीर्थे पुमान्कृत्वा पुनाति कुलसप्तकम् ॥ ७७ ॥
सम्वत्सरके बीच सूर्यतीर्थमें एकयार सप्तमीका व्रत करनेसे सातों कुलको
पवित्र करता है ।। ७७ ॥
अपराहं परं कालं विजानीहि व्रतस्य च ।
न्यूनातिरिक्त देवेशि न सिद्धिर्जायते भुवि ।। ७८ ॥
अपराहही व्रतका श्रेष्ठ काल जानना चाहिये. हे देवेशि ! उसमें कम
अधिक होनेसे पृथ्वीमें सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।। ७८ ॥
द्विपक्व वर्जयेद्यस्माद् पृतश्चैव कलायकम् ।
कशेरुशृङ्गबरेच लवणञ्च कषायकम् ॥ ७९ ॥
अम्लव तथा तिक्तं दूषितञ्च न भक्षयेत् ।
शिलापात्रे च भोक्तव्यं रौप्यतामे कदाचन ।। ८०॥
द्विपकं कलाय ( सतीनक) और घृतवर्जित है कशेरु, अदरख लवण,
ऊपाय खट्टी और तीखी तथा दूषित वस्तुका भोजन न करै पत्थरके वर्तनमें
भोजन करै चांदी और तांबेके पात्रमें कभी भोजन न करै ॥ ७९ ॥ ८० ॥

योगिनीतन्त्रम् । मदनस्य दक्षभागे धनु:पंक्तिप्रमाणतः । तीर्थ गङ्गासरिनाम तत्र स्नात्वा महत्फलम् ॥ ८१॥ गङ्गातीरे नरः स्नात्वा पितन देवांश्च तर्पयेत् । ब्रह्मलोक समाप्नोति रविसंक्रमण ग्रहे ॥ ८२ ॥ मदनके दक्षिणभागमें दशधनु प्रमाण गंगासर नामक तीर्थ है, उसमें रनान करनेसे फल दशधनु प्रमाण होता है । गंगासर तीन रविसंक्रमण और ग्रह्णकालमें स्नान करनेपर देव पितरका तर्पण करनेसे ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ विष्णुपादरजोद्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि । धर्मद्रवे सरिच्छेष्ठे त्राहिमा सर्वपातकात् ॥ ८३ ।। तुलायां मकरे चैव शुक्लाष्टम्याडच भामिनि । स्नानमात्रं नरः कृत्वा विष्णुलोके महीयते ॥ ८४ ॥ तुला मकर और शुक्लाप्टमीमें "धर्मद्रवे सरिच्छेठे त्राहि मां सर्व पातकात्." इस मंत्रसे स्नान करनेपर विष्णुलोको पूजाको प्राप्त होता है ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ तस्य दक्षिणदिग्भागे धनुरष्टप्रमाणतः। आगस्त्यं परमं तीर्थ मृतानां भुक्तिमुक्तिदम् । यो गत्वा मज्जते मर्त्यः सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात् ॥८५|| उसके दक्षिणभागमें आठ धनुः प्रमाण आगस्त्यनामक परम तीर्थ है. उसमें प्राणत्याग करनेसे मनुष्य भोग तथा मोक्षको प्राप्त होते हैं, जो मनुष्य वहा जाकर मज्जन करता है वह सर्वज्ञत्वको प्राप्त होता है।८५॥ स्वयं देवो महादेवो विष्णुस्तत्र च संस्थितः । कामाख्यायाश्च क्रीडार्थमागस्त्यं कुण्डमुत्तमम्।।८।। सर्वपापहरं शुद्धं विष्णुब्रह्मादिभिर्युतम् ।

भाषाटीकासमेतम् ।
देवदानवविद्याधरवन्दितं सर्वकामदम् ॥ ८७ ॥
मानारत्नादिभिर्नद्धं सोपानं सुमनोहरम् ।
शल्यस्योत्पाटनं कुण्डं महादेव्याश्चतुष्टयम् ।।८८॥
वहा स्वय महादेव और विष्णु स्थित हैं, कामारयानी कौडाके निमित्त
सर्वपापहर, विशुद्ध ब्रह्मा, विष्णु इत्यादि देवताओंसे सेवित विद्याधरवन्दित,
सर्पकामनादायक नानारत्नसम्पन्न मनोहर सोपानयुक्त पुण्यतम आगस्त्य
कुण्ड विधमान है महादेवीके चारों कुण्ड दुख विनाश करनवाल
हैं ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ ८८ ॥
माघे च कार्तिके चैव शुक्लपक्ष वरानने ।
दशम्यां स्नानमात्रेण पुष्करस्य फलं लभेत् ॥ ८९ ॥
हे वरानने ! माघ या कार्तिक शुरूपक्षकी दशमीमें स्नान मात्र कर-
पुष्कर तीर्थका फल प्राप्त होता है ।। ८९ ॥
शतजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ।
सहस्रजन्मजं पापं विपुवे च दिनक्षये ॥ ९ ॥
और सौ जन्मका क्रिया हुआ पाप तत्काल नष्ट होता है और विषुव
और तिथिक्षयमें हजार जन्मका पाप नष्ट होनेपर पुण्यलोक लाभ करता
है ।। ९० ॥
पौषे च कर्कटे चैव कृष्णाष्टम्यां महेश्वरि ।
स्नानश्च वर्जयेदेवि भार्याहानिर्भवेद्यतः ॥ ११ ॥
हे महेश्वरी ! पौष, कर्कट और कृष्णाष्टमीमें स्नान न कर, हे देवि
ऐसा करनेसे भार्याकी हानि होती है ।। ९१ ॥
यथा वराणसी पुण्या तथा पुण्या न संशयः ।
गृह्यतीर्थ परं देवि नाव कार्या विचारणा ॥ ९२ ॥

(३१६)
योगिनीतन्त्रम् ।
वाराणसी जिस प्रकार पुण्यमयी है यह भी वैसेही है इसमें सन्देह
नहीं । हे देवि ! यह परमगुह्यक्षेत्र है ॥ ९२॥
एतद्गुह्यतमं क्षेत्रमेतद्गुह्यतरं परम् ।
यत्र गत्वा नरः सद्यो मुच्यते सर्वपातकः ॥ ९३ ॥
यह तीर्थ परमगुह्यतम है, इसमें गमन करनेसे मनुष्य तत्कालही सब
पापोंसे छूट जाते हैं ।। ९३ ॥
तत्र देवो महादेवो यत्र देवी सरस्वती ।
गङ्गादिसरितः सर्वाः समुद्राः सप्त चैव हि ॥९४ ॥
यहा महादेव देवी सरस्वती, गगादि सरिद्गण, सात समुद्र ।। ९४ ॥
नदाः शोणादयो यत्र तीर्थानि च सरासि च ।
किम्वा वामे परीतस्य कुण्डस्य परमेष्ठिनः ।
न शक्यो विस्तराद्वक्तुं मया जलजलोचने ॥ ९५ ॥
शोणादि नद और सब तीर्थ तथा सब सरोवर परमेष्ठीके कुण्डके वाममें
विराजित हैं । हे कमल के समान नेत्रोंवाली 1 मे अब विस्तार सहित
वर्णन करनेमें असमर्थ हू ॥ ९५ ॥
यथा चराचरं सर्व त्रैलोक्यं त्रासयल्लघु ।
तथा त्रायस्व मां नित्यं तीर्थवर्य नमोऽस्तुते ॥ ९६ ।।
तस्य क्षेत्रस्य चाग्नेये किश्चित्पश्चिमगोचरे ॥
एकविशद्धनुर्मानं वासर्व नाम तीर्थकम् ॥ ९७ ॥
यथा चराचर सर्व त्रैलोक्य वासयेलघु । तथात्रायस्व मा नित्य
तीर्थपर्य नमोस्तुते " इस मन्त्रसे वहा पूजार्ष्यादि प्रदान करे । उस क्षेत्रके
आमेय कोणमें कुछेक पश्चिमकी ओर इक्कीस धनु परिमित वासर नामक
तीर्थ है ॥ ९६ ॥ ९७ ॥

-
भापाटीकासमेतम् ।
(३१७)
वासवे परमे तीर्थ स्नात्वाभ्यर्च्य च वासवम् ।
शबीजेन देवेशि चेष्टं हि सदनं व्रजेत् ।
वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण पृथ्व्यां त्वध्ये निवेदयेत् ॥ ९८ ॥
वासवाख्य महातीर्थ सर्वपापप्रणाशनम् ।
भवाम्भसि निमज्ज्याथ यथोक्तफलदो भव ॥ ९९ ।।
परम तीर्थ वासवमें स्नान और शक्रवीजसे वासव (इन्द्र) की पूजा
करके अभिलपितस्थानके जानेमें समर्थ होता है " वासवाख्यं महातीर्थ
सर्वपापप्रणाशनम् । भवाम्भसि निमज्ज्याथ यथोक्त फलदो भव" इस
मन्त्रसे अये निवेदन करना चाहिये ॥ ९८ ॥ ९९ ॥
तस्य पश्चिमतो देवि नातिदूरे व्यवस्थितम् ।
धनुः सप्तप्रमाणेन रम्भातीर्थ महेश्वरि ।। १०० ।।
हे महेश्वरि । उसकी पश्चिम दिशामें थोड़ीही दूर स्थित सात धनुः
प्रमाण रम्भानामक तीर्थ है ॥ १० ॥
रम्भातीर्थ नरः स्नात्वा रूपवानभिजायते ।
भळ सह मृता यापि ज्ञानानारी पतिव्रता ।
रम्भालोकश्च तदनु तदन्ते भवन हरेः ॥ १०१ ॥
मनुष्य रम्भातीर्थमें स्नान करके रूपवान् होते हैं । पतिव्रता नारी
माके सहित वहां ज्ञानपूर्वक प्राणत्याग कर पहिले रम्भालोक और फिर
हरिके लोकमें जाती है ॥ १०१ ॥
याति नास्त्यत्र सन्देहः शेषे च गुरुवासरे।
ब्रह्मकर्मसमुद्भूते सर्वकामप्रदे शुभे ॥ १०२ ॥
कामगवे नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात ।
स्नात्वा तु येन रम्भायै मन्त्रेणाऱ्या निवेदयेत्॥१०॥

(३१८) योगिनीतन्त्रम् ।
वहा गुरुवारमें "ब्रह्मकर्मसमुद्भूते सर्वकामप्रदे शुभे । कामद्रवे नमस्तेस्तु
त्राहि मा भवसागरात् । इस मंत्रसे स्नान करके रम्भाको अर्घ्यप्रदान
करै ।। १२ ।। १०३ ॥
क्षेत्रस्य पश्चिमे भागे धनुत्रिंशत्प्रमाणतः ।
तत्रैव रुक्मिणीकुण्डं स्नात्वा ब्रह्मपुरं व्रजेत् ॥१०॥
क्षेत्रके पश्चिमभागमें त्रिशत् ( तीस ) धनुः प्रमाण उसी स्थानमें रक्मि-
णीकुण्ड है वहां स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मपुरमें जाता है ॥ १० ॥
मुखस्य क्षालनं कृत्वा नारी वा पुरुषोपि वा।
रूपवान् परलोके तु जायते नात्र संशयः ॥ १०५ ।।
पुरुष हो वा स्त्री हो इस तीर्थमें मुख धोनेसे परलोकमें रूपलाम करते
हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ १०५॥
स्नान कन्दर्पबीजेन शृणु क्षालनमन्त्रकम् ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानःक्षालितं वदनं त्वयि ।
रूपवानाश्विनोर्याति रूपं सत्येन देहि मे ॥ १०६ ।।
फन्दर्प बीज मन्त्र से स्नान करना चाहिये "ब्रह्मविष्णुमहेशानः क्षालितं
वदनं त्वयि । रूपवानाचिनोति रूपं सत्येन देहि मे । यही मुखप्रक्षालनका
मन्त्र है ।। १०६॥
तस्य क्षेत्रस्य वायव्ये धनुरटकसम्मितम् ।
पितृणां परमं तीर्थ स्नानाद्याति परां गतिम ॥ १०७ ॥
उम क्षेत्रके वायव्यमें अष्ट धनुः पारमित पितृगणोंका परमतीर्थ है वह-
स्नान करनेसे परमगति प्राप्त होती है ॥ १०७ ।।
पितृतीर्थ महाभाग स्वयं देवाप्टसत्कृत ।
तृप्तिहतोर्महाभाग अघोरान्मां पुनीहि ताः ॥ १०८॥

भापाटीकासमेतम। "पितृतीर्थ महाभाग स्वयं देवाप्टसत्कृत । तृप्तिहेतोर्महाभाग अबोरान्मां पुनीहि ता." ॥ १०८॥ अत्र स्नात्वा च मन्त्रेण पितृमेधफलं लभेत । आगस्त्यस्य तु दक्षे च गत्वा स्नात्वा सुतl च॥१०९ धनुर्वेदप्रमाणश्च गवाक्षगति वै सरः। तत्र गत्वा च सप्तम्यां पितृणामनृणो भवेद ॥ ११ ॥ इस मंत्रसे वहां स्नान करनेपर पितृमेध यज्ञका फल मिलता है। आगत्यके दक्षिणमें जाय स्नान, तर्पण करनेके पीछे चार धनुःप्रमाण गवाक्षगति तीर्थमें जानेपर पितरोंकेऋणसे मुक्त होता है ॥ १०९ ॥११०॥ गयातीर्थ महातीर्थ पितॄणां नास्ति तत्समम् । पावनं सर्वतीर्थेषु मां पुनीताति पापतः ॥ १११ ॥ गयातीर्थ महातीर्थ है, इसकी समान पितरोंका उद्धार करनेवाला दूसरा तीर्थ नहीं है यह सब तीर्थों में पवित्र है। सो मुझे पापसे पवित्र करो ।। १११ ॥ अनेन कृत्वा स्नानं तु धृत्वा वै धौतवाससी। विधाय तिलकं दद्यात् कुर्यात्क्षेत्रे प्रदक्षिणम् ॥११२॥ इस मंत्रसे स्नान करके उठने पर धुले वस्त्र पहर तिलक लगाकर क्षेत्रकी प्रदक्षिणा करे ॥ ११२ ॥ गत्वा दशाश्वक्षेत्रे च पिण्डं दद्यात्समाहितः । तत्र पोडशकवि पितृन् संतर्पयेद्बुधः ॥ ११३ ॥ फिर दशाश्वक्षेत्रमें नाकर सावधानचित्तसे पिण्ड देना चाहिये । हे देवि ! पण्डितगण पोडगोपचार द्वारा पितरोंकी पूजा करै ॥ ११३ ॥ क्षीरेण मधुना चैव पादापनयनेन च ।

योगिनीतन्त्रम्।
वहा गुरुवारमें "ब्रह्मकर्मसमुद्भते सर्वकामप्रदे शुभे । कामद्रवे नमस्तेस्तु
त्राहि मा भवसागरात् । इस मत्रसे स्नान करके रम्भाको अर्घ्यप्रदान
करे ॥ १२ ॥ १०३ ॥
क्षेत्रस्य पश्चिमे भागे धनुखिशत्प्रमाणतः।
तव रुक्मिणीकुण्डं स्नात्वा ब्रह्मपुरं व्रजेत् ॥१०॥
क्षेत्रके पश्चिमभागमें त्रिशत् ( तीस ) धनु प्रमाण उसी स्थानमें रुक्मि-
णीकुण्ड है वहा स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मपुरमें जाता है ॥ १०४ ॥
मुखस्य क्षालनं कृत्वा नारी वा पुरुषोऽपि वा।
रूपवान् परलोके तु जायते नात्र संशयः ॥ १०५ ।।
पुरुष हो वा स्त्री हो इस तीर्थमे मुख धोनेसे परलोकमें रूपलाम करते
इसमें सन्देह नही ।। १०५॥
स्नानं कन्दर्पबीजेन शृणु क्षालनमन्त्रकम् ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानःक्षालितं वदनं त्वयि ।
रूपवानाश्विनोति रूपं सत्येन देहि मे ॥ १०६ ।।
कन्दर्प बीज मन्त्र से स्नान करना चाहिये "ब्रह्मविष्णुऽमहेशाने क्षालितं
वदन त्वयि ! रूपवानाश्विनोर्याति रूप सत्येन देहि मे । यही मुखप्रक्षालनका
मन्त्र है ॥ १०६॥
तस्य क्षेत्रस्य वायव्ये धनुरष्टकसम्मितम् ।
पितृणां परमं तीर्थ स्नानाद्याति परागतिम् ॥ १०७ ।।
उस क्षेत्रके वायव्यमें अष्ट धनु' पारमित पितृगणोंका परमतीर्थ है वह-
स्नान करनेसे परमगति प्राप्त होती हे ।। १०७ ॥
पितृतीर्थ महाभाग स्वयं देवाप्टसत्कृत ।
तृप्तिहेतोर्महाभाग अघोरान्मां पुनीहि ताः ॥ १०८ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३१९) "पितृतीर्थ महाभाग स्वयं देवाप्टसत्कृत । तृप्तिहेतोर्महाभाग अघोरान्मां पुनीहि ताः" || १०८ ॥ अब स्नात्वा च मन्त्रण पितृमेधफलं लभेत । आगस्त्यस्य तु दक्षे च गत्वा स्नात्वा सुतl च॥१०९ धतुर्वेदप्रमाणश्च गवाक्षगति वै सरः। तत्र गत्वा च सप्तम्यां पितॄणामतृणो भवेत् ॥ ११० ॥ इस मंत्रसे वहां स्नान करनेपर पितृमेध यज्ञका फल मिलता है आगत्यके दक्षिणमें जाय स्नान, तर्पण करनेके पीछे चार धनुःप्रमाण गवाक्षगति तीर्थमें जानेपर पितरोंकेऋणसे मुक्त होता है ॥ १०९ ॥११०॥ गयातीर्थ महातीर्थ पितृणां नास्ति तत्समम् । पावनं सर्वतीर्थेषु मां पुनीताति पापतः ॥१११ ॥ गयातीर्थ महातीर्थ है, इसकी समान पितरोंका उद्धार करनेवाला दूसरा तीर्थ नहीं है यह सब तीर्थों में पवित्र है। सो मुझे पापसे पवित्र करो ॥ १११ ॥ अनेन कृत्वा स्नानं तु धृत्वा वै धौतवाससी। विधाय तिलकं दद्यात् कुर्यात्क्षेत्रे प्रदक्षिणम् ॥११२॥ इस मंत्रसे स्नान करके उठने पर धुले वस्त्र पहर तिलक लगाकर क्षेत्रकी प्रदक्षिणा करे ।। ११२ ।। गत्वा दशाश्वक्षेत्रे च पिण्डं दद्यात्समाहितः। तत्र पोडशकदेवि पितृन संतर्पयेबुधः ॥ ११३ ।। फिर दशाश्वक्षेत्रमें नाकर सावधानचितसे पिण्ड देना चाहिये । हे देवि ! पण्डितगण पोडशोपचार द्वारा पितरोंकी पूजा करे || ११३ ॥ क्षीरेण मधुना चैव पादापनयनेन च ।

(३२०) योगिनीतन्त्रम् ।
दक्षिणादिक्रमाच्चात्र एकैकाहस्तकान्तरे।
देवीषोडशकं तत्र प्रतिदेवी समर्चयेत् ॥ ११४ ॥
तदनन्तर क्षीर मधु और पादपानयन द्वारा ( गंगाजल ) से भर्चना
करे । इस स्थानमें एक एक हस्तप्रमाण पोडश (१६) देवी है, दक्षि.
णादिक्रमसे उन सब देवियों की पूजा करनी चाहिये ॥ ११४ ॥
गयाकूपे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवमुमापतिम् ।
आत्मानं तारयेत्सद्यो दशपूर्वान्दशापरान् ॥ ११५ ॥
मनुष्यगण गयाकूपमें स्नान और देवदेव उमापतिका दर्शन करके
आत्माका तारण और ऊपर नीचेके दश दश पुरुष पवित्र करतेहैं।।११५॥
विष्णुब्रह्मा च रुद्रश्च अगस्त्यश्च शतक्रतुः।
क्रौश्चश्चैव गणेशश्च कुमारश्च प्रजापतिः ॥ ११६ ॥
विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, अगस्त्य, शतकतु, ( इन्द्र) गणेश, क्रौंच कुमार
प्रजापति ॥ ११६ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३२१) येऽस्मत्कुले च पितरो लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ।। ये चाप्यकृतघुडाश्च ये च गर्भाद्विनिम्मृताः॥११९॥ येषां पाणिग्रहो नैव येऽग्निदग्धास्तथापरे । भूमौ दत्तेन तृष्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम् ॥१२०॥ हमारे कुलमें जिन पितरोंकी पिण्डोदकक्रिया लुप्त हुई है, जो जो मुण्डन होनेसे प्रथम ही मरगये हैं वा जो जो मनुष्य गर्भनिःसृत हैं जिन जिनका विवाह नहीं हुआ है, जो मनुष्य अनिमें दग्ध हुए हैं वह सब इस भूमिमें दिये पिण्ड द्वारा तृप्त और तृप्त होकर परम गतिको प्राप्त हों।।११९.१२० पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । माता पितामही चव तथैव प्रपितामही ॥ १२१ ॥ तथा मातामहश्चैव प्रमातामह एव च । ये च सिंहव्याघ्रहतास्त्वन्यश्च प्रहताश्च ये । दंष्ट्रभिः शृद्धिभिर्वापि तेषां पिण्ड ददाम्यहम् ॥१२२॥ पिता, पितामह, प्रपितामह, माता पितामही, प्रपितामही तथा माता- मह, प्रमातामह और जो कोई सिह व्याघ्रादि द्वारा अथवा अन्य हिंस- कादि द्वारा वा दाढ और सींगवाले जन्तुके द्वारा मरे है मै उनको पिण्ड देता हूं ॥ १२१ ।। १२२ ।। अग्निदग्धाश्च ये केचिन्नाग्निदग्धास्तथापरे । विद्युच्चौरहता ये च तेषां पिण्डं ददाम्यहम् ।।१२।। जो कोई अमि द्वारा वा अन्य भाति आमेयादिद्वारा एवं विद्युतादि द्वारा मरे हैं मैं उनको पिण्ड देता हूं ॥ १२३ ॥ पशुयोनिं गता येच पक्षिकीटसरीसृपाः। अथवा वृक्षयोनिस्थास्तेषां पिण्डं ददाम्यहम्।।१२४॥ -

(३२२)
योगिनीतन्त्रम्।
जो पशुयोनि वा पक्षी कीट सरीसृपादि योनि अथवा वृक्ष योनिको प्राप्त
हुए हैं मै उनको पिण्ड देता हूं ॥ १२४ ॥
असंख्यजनसंस्था ये ये नीता यमशासनम् ।
तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम् ॥ १२५ ।।
जो असंख्यजन संस्थित हैं ( अर्थात् जो बहुत से लोगोंको पालन करने-
वाले हैं ) वा जो युद्धादि द्वारा यमसदनमें गये हैं मै उनका उद्धार होनेके
निमित्त यह पिण्ड देता हूं ॥ १२५ ॥
जात्यंतरसहस्राणि भ्रमन्ति स्वेन कर्मणा।
मनुष्यान्तर्गता ये च तेषां पिण्डं ददाम्यहम् ॥१२६॥
| जो अपने कर्म के फलसे सहस्रों जातियों के अन्तरमें घूमते है जिन्होंने
मनुष्य जन्म लिया है, मै उनको यह पिण्ड देता हूं ॥ १२६ ॥
अन्येषां यातनास्थानां प्रेतलोकनिवासिनाम् ।
तेषामुद्ररणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम् ॥ १२७ ॥
जो अन्य प्रकारके यातना स्थानमें स्थित हैं; जो प्रेतलोक निवासी हैं,
उनके उद्धारके निमित्त मै यह पिण्ड देता हूँ॥ १२७ ॥
येऽवान्धवा बान्धवाश्च येऽन्यजन्मनि वान्धवाः ।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा ॥ १२८ ॥
जो बाधव वा अबाधव अथवा जो अन्य जन्ममें बाधव थे, इस पिण्ड-
द्वारा वह सब तृप्तिलाभ करै ।। १२८ ॥
ये ये पितृकुले जाताः कुले मातुस्तथैव च ।
गुरुश्वशुरचन्धूनां घे चान्थे बान्धवाः स्मृताः ॥१२०॥
ये ये कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदाराविवर्जिताः।
क्रियालोपहता ये च जात्यन्धाः पंगवस्तथा ॥१३०॥

. भापाटीकासमेतम् । विरूपा आमगर्भाश्च येच जाता::कुले मम । तेषां पिण्ड मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठताम् ॥ १३१॥ जिन्होंने पितृकुल मातृकुल, गुरुकुल, श्वशुरकुल वा बन्धुकुलमें जन्म लिया है, अथवा अन्यरूपमें बांधव और जिस कुलमें पिण्डलोप हुआ है उस कुलके औरजो पुत्र स्त्री हीन हैं, जिनके कुलमें क्रियालप्त होगई है जो जन्मान्ध और जो पंगु हैं जो विरूप वा सगर्भ हैं, जिन्होंने मेरे कुलमें जन्म लिया है, मैं उनको पिण्ड देता हूं भक्षयरूपक माप्त हो ॥ १२९ ॥ १३० ॥ १३१॥ ये बान्धवा ये पितृवंशजाता मातुस्तथा वंशभवा मदीयाः । कुलद्वयेऽस्मिन्मम दासभूता भूतेस्तथैवामृतसेवकाश्च ॥ १३२ ।। मित्राणि सख्यः सुहृदश्च सर्वे स्पृष्टाश्च दृष्टाध कृतोपकाराः। जन्मान्तरे ये मम संगताश्च तेभ्योन्तिमं पिण्डमहं ददामि ॥ १३३ ॥ जो बांधव और पितृवंशोत्पन्न तथा मातृवंशोत्पन्न है, जो हमारे मदि- काय, हमारे दोनों कुलमें जो दास, सूत, भृत्य और सेवक है, एवं मित्र, ससा परसखा वृक्ष पुष्प दुष्ट और उपकार करनेवाले तथा जो जन्मान्त रमें मेरे दास भूतहैं मै उनको यह अंतिम पिण्ड देताहूं ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ सूर्यकुण्ठस्य वायव्ये धनर्दण्डान्तरे स्थितः। देवो गदाधरस्तव प्रणिपत्य प्रदापयेत् ॥ १३४ ॥ सूर्यकुण्डके वायव्यकोणमें धनुईण्डान्तरमें गदाधरदेव स्थित हैं, उनको प्रणाम करके पिण्डदान करै ।। १३४ ॥ . - - (३२४) योगिनीतन्त्रम् । साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानपुरोगमाः । मया गयां समासाय पितृणां निष्कृतिः कृता॥१३५।। आगतोऽहं गयां देव पितृकार्ये गदाधर । त्वमेव साक्षी भगवानतृणोऽहं ऋणत्रयात् ॥ १३६॥ देवगण, ब्राह्मणगण और वसुगण तुम मेरे साक्षी हो, मैंने गयामें आनकर पितरोंका छुटकारा किया । हे गदाधर ! मै पितृकार्यके लिये गया में आया हूं हे देव ! तुम साक्षी होओ, मे तीनों ऋणसे मुक्त हुआ ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ पितृपिण्डस्य मध्ये तु पिण्डं दद्याच्च षोडश । वर्नुलं कारयत्पिण्डं क्षीरधारा सुपातयेत् ॥ १३७ ।। पितृपिण्डके मध्य में सोलह पिण्ड देवे । पिण्ड गोलाकार करके उनमें दूधकी धार छोड़े ॥ १३७ ॥ गदाधरस्य वामेतु नाति दरेण शङ्करि । तत्र मातृगया देवि दक्षिणेन सुतीर्थकम् ॥ १३८ । तथा गदाधरं देवं केशवं पुरुषोत्तमम् । तं प्रणम्य प्रयत्नेन न भयं जायते नृणाम् ॥ १३९ ॥ हे शंकार ! गदाधरके वामभामें थोड़ीही दूर मातृगया और दक्षिणमें सुतीर्थक है, वहां गदाधर देव केशव पुरुषोत्तमको यत्नसहित प्रणाम करनेसे मनुष्यको फिर जन्म लेना नहीं पड़ता ॥ १३८ ॥ १३९ ।। मौनादित्यं महात्मानं कनका विशेषतः। दृष्ट्वा मौनेन विप्रर्षिः पितृणामनुगो भवेत् । ब्रह्माणं पूजयित्वा च ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ।। १४० ।। विप्रपिंगण महात्मा मौनादित्यका और विशेषकर कनकादित्यका

.
भापाटीकासमेतम् । (३२५)
मौनावलम्बनसे दर्शन करके पितरों के अनुगामी होते हैं, वहा ब्राह्मणों की
पूजा करनेसे ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ १४० ॥
उर्वश्या दक्षिणे तीरे या शिला तुङ्गगा प्रभा।
सा विज्ञेया च गायत्री पूजयेद्गन्धचन्दनः॥ १४१ ॥
उर्वशीके दक्षिणतीरमें जो (उन्नत और प्रकाशवान् ) शिला है, उसीको
गायत्री जानना चाहिये, गन्ध चन्दनादिद्वारा उसकी पूजा करै ।। १४१ ॥
प्रातरुत्थाय गायत्रीमुपागम्य तु नामशः ।
सन्ध्यां कृत्वा प्रयत्नेन सर्ववेदफलं लभेत् ।। ११२ ॥
प्रात कालमें उठकर गायत्री के समीप गमनपूर्वक परमयत्नसे संध्या करने
पर चारों वेदका फल प्राप्त होता है ॥ १४२ ।।
सावित्रीश्चैव मध्याहें दृष्ट्वा यज्ञफलं लभेत् ।
दशाश्वमेधे धनदो देवदेवो जनार्दनः॥१४३॥
और मध्याहमें सावित्रीका दर्शन करनेपर यज्ञका फल पाता है । दशा-
समेधमें धनदत्तदेवदेव जनार्दन स्थित हैं ॥ १४३ ॥
तत्र पिण्डप्रदानेन तृप्तिर्भवति शाश्वती ॥ १४४ ॥
वहा पिण्डदान करनेसे नित्य तृप्तिलाम होता है ॥ १४४ ॥
गयायां पितरूपण देवदेवो जनार्दनः
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्ष मुच्यते वै ऋणत्रयात् ॥ १४५ ॥
गयाधाममें देवदेव जनार्दन पितृरूपसे स्थित हैं उन पुण्डरीकाक्ष देवका
दर्शन करनेपर तीनों ऋणसे छुटकारा मिलता है ॥ १४५ ।।
दृष्ट्वा पितामह देव सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४६ ॥
मनुष्यगण वहा पितामहदेवका दर्शन करके सर पापोंसे
जतो
हैं ॥ १४६ ॥

(३२६) योगिनीतन्त्रम् । मकरे वर्तमाने च ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः । दुर्लभं त्रिषु लोकेषु आगस्त्ये पिण्डपातनम् ॥ १४७ ।। मकर संक्रमण और चन्द्र सूर्यके ग्रहणकालमें आगस्त्य तीर्थमें पिण्डदान करनेका सुअवसर प्राप्त होना तीनों लोको दुर्लभ है ॥ १४७ ॥ आत्मजो वा तथान्यो वा गयाकूपेऽश्वमेधिके । यत्रामा पातयेत्पिण्ड त नयेद्ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १४८ ॥ आत्मज हो वा अन्य हो गया कूरके अश्वमेधिकमें जिस नामसे पिण्ड निक्षेप करेगा उसको शाश्वत ब्रमधाममें लेजायगा, इसमें सन्देह नहीं ॥ १४८॥ तद्ब्रह्मकल्पितं स्थानं विप्रा ब्रह्मप्रकल्पिताः । पूजितः पूजिताः सर्वे पितृभिःसह देवताः ॥ १४९ ॥ बसकपित विप्रगण उस ब्रह्मकल्पित स्थानमें पूजित पितरोंके सहित देवताओंके द्वारा पूजित होते हैं । १४९ ॥ तर्पयेत्तु गयाविप्रान्हव्यकव्यविधानतः । दानं चैव परित्यागो गयायान्तु विधीयते ॥ १५० ।। गया हत्य कन्य विधानसे ब्राह्मणोंको तृप्त करे । गया में दान करना पादिये ।। १५०॥ यः करोति महादानं वृपोत्सर्ग करोति यः । दशाश्वमेधिके चैव पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १५१ ।। जो मनुष्य दशाश्वमेधिमें महादान वा वृपोत्सर्ग करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ १५१ ॥ चतुःपष्टिनुमान क्षत्रमागस्त्यमीरितम् । पञ्चपञ्चाशतं तीर्थमुक्तं तीर्थ सुमध्यमे ।। १५२ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (३२७) हे सुमध्यमे ! आगस्त्यक्षेत्र चौंसठ धनुःपारमित है, उसमें पञ्चपञ्चाशत् (५५) तीर्थ हैं ॥ १५२ ॥ उर्वशी च तथा सूर्यः कामः पुत्रश्च वासवः । आगस्त्यश्चाश्वमेधश्च तीर्थसारो गयाबिलः ॥१५३।। हे देवि ! उर्वशी, सूर्य, काम, पुत्र, वासव, आगस्त्य, अश्वमेध और गयाचिवल यह सब तीर्थसार हैं ॥ १५३ ॥ उद्बन्धनमृता ये च गलपाशान्मृताश्च ये । चितिं स्पृष्ट्वा च या नारी क्रिया तेषां न विद्यते । नान्त्येष्टिनं च दाहश्च नाशौचं तेषु विद्यते ॥ १५४ ।। जो किसी प्रकारके बंधन द्वारा और जो फासीसे मरे हैं. निन स्त्रियोंने चिताका स्पर्श किया है उनका अन्त्येष्टि, दाह, अशौच और क्रियादि नही है ।। १५४ ॥ आगस्त्ये च गयायाश्च क्रियां कुर्यात्रिरात्रकम् । अमायाश्च समारभ्य कुञ्चैिव त्रिरात्रकम् ॥१५५॥ आगस्त्य और गयाम तीन रात क्रिया करनी चाहिये अमावस्यासे आरम्भ करके तीन रात क्रिया करे ॥ १५५ ॥ अन्यत्र च क्रिया तेषां यः करोति स दुर्मतिः । विफला च क्रिया तेषां चरेच्चान्द्रायणं व्रतम् । ततः शुद्धिमवाप्नोति अन्यथा नारकी भवेत् ।।१५६॥ जो दुर्मति अन्यत्र उनकी क्रिया करता है, उसकी वह क्रिया विफल होती है, वह चन्द्रायण व्रत करके शुद्ध होघे, नही तो नारकी होता है ॥ १५६ ॥ अश्वतीथे कृतं पापं गयायान्तु विनश्यति । गयायो यत्कृतं पापं रामक्षेत्रे विनश्यति ॥ १५७ ।।

(३२८)
योगिनीतन्त्रम्।
अश्वतीर्थमें पाप करनेसे वह गयामें नष्ट होता है और गयामें पाप
करनेसे रामक्षेत्र में नए होता है ॥ १५७ ।।
रामक्षेत्रे कृतं पापं मणिकटे विनश्यति ।
मणिकूटे कृतं पापं नीलशैल विनश्यति ।। १५८ ।।
नीलशैले कृतं पापमन्तगेंहे विनश्यति ।
अन्तगेंहे कृतं पापं सोमतीर्थे विनश्यति ॥ १५९ ॥
रामक्षेत्रमें पाप करनेसे वह मणिकूट में नष्ट होता है मणि कुटमें पाप
करनेसे नील शैलमें ओर नीलमें पाप करनेसे अन्तर्गहमें नष्ट होता है,
अन्तर्गेहका किया पाप सोमतीर्थमे नष्ट होता हे ||१५८॥१५९॥
सोमतीर्थ कृतं पापं मङ्गलायो व्योपोहति ।
मङ्गलायां कृतं पापनागस्त्ये तु विनश्यति ॥ १६०॥
सोमतीर्थका किया पाप मङ्गलामें दूर होता हे और मगलाका किया
पाप आगस्त्य में नष्ट होता हे ॥ १६० ॥
आगस्त्ये यत्कृतं पापं मन्दो तद्विनश्यति ।
मन्दरे यत्कृतं पापं वज्जलेपे विनश्यति ॥ १६१ ॥
आगस्त्यका किया.पाप मन्दरमें नष्ट होता है और मन्दरका किया पाप
वज्रलेपमें नष्ट होता ह ॥ १६१ ॥
वज्रलेपाच्च यत्पापमश्वकान्ते विनश्यति।
अश्वकान्ते कृतं पापमुश्यां तद्वयपोहति ॥१६॥
वज्रलेपका किया पाप अश्वक्रातमें नष्ट होता है और अश्वकान्तका
किया पाप उर्वशी नष्ट होता है ॥ १६२ ।।
माहात्म्यश्रवणे नाथ संहिताश्रवणेन वै ।
दिन नयेन्महेशानि रानौविष्णुं विचिन्तयेत् ।
कृत्वा वासन्तु तत्रैव नक्तं भोज्यं न वे भवेत् ॥१६॥

भाषाटीकासमेतम् । (३२९) हे महेशानि ! माहात्म्य और संहिता सुननेमें दिन बितावै और रात्रि में विष्णुका चिन्तन करै । वहा वास करके रात्रिमें भक्षण न करै ॥ १६३ ॥ ततोऽन्यदिवसे काल्या चागस्त्ये स्नानमाचरेत् १६४ तदन्तर अन्य दिनमें काल्या आगस्त्य तीर्थमें स्नान करै ।। १६४ ॥ भस्माचलं स्पृशी धारा सा विज्ञेया सरस्वती। तत्र गत्वा महेशानि अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १६५ ।। जो धरा भस्माचलका स्पर्श करती है, वहा सरस्वती है. हे महेशानि ! वहा गमन करनेसे अभिष्टोमयज्ञ करनेका फल प्राप्त होता है ।। १६५ ॥ विष्णोर्वक्षः स्थिते भद्रे मकरन्दप्रिये शुभे । जन्मजन्मार्जितं पापं हर मे परमेश्वरि ॥ १६६ ।। हे भद्रे ! तुम विष्णुके वक्षस्थलमें स्थित हो और मकरन्दकी प्रिया हो । हे परमेश्वरि ! मेरे जन्मजन्मार्जित पापोंको दूर करो ॥ १६६ ॥ स्नायादनन मन्त्रण कार्तिकीच विशेषतः ।। १६७ ॥ इस मंत्रद्वारा स्नान और विशेषकर कार्तिकीमें स्नान करै ।। १६७ ॥ देवस्य पूर्वभागे तु वापी तिष्ठति शोभना । तस्याः स्वच्छोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥१६८ । देवके पूर्वभागमें शोभना वापी स्थित है, उसका स्वच्छ जल पीनेसे फिर जन्म लेना नहीं पड़ता अर्थात् मोक्ष होजाता है ॥ १६८ ॥ आग्नेये भस्मशैलस्य धतुरष्टप्रमाणतः। पिशाचमोचनं नाम तीर्थ परम पावनम् ॥ १६९ ॥ हे करपाणी ! भस्मशैलके आनेय कोणमें अष्ट धनुःप्रमाण पिशा चमोचन नामक परम नीर्थ है ॥ १६९ ॥ पिशाचमोचने तीर्थे पूजयश्चैव शुलिनम् । इदं देवस्य तल्लिनं कपीश्वरमुत्तमम् ॥ १७० ।

(३३०)
योगिनीतन्त्रम् ।
इस पिशाच मोचनक नामक तीर्थमें भगवान् त्रिलोचन ( शिव ) की
पूजा करै यही देवाधिदेव ( महादेवका ) कपर्दीश्वर नामक लिङ्ग
है ॥ १७०॥
वायव्ये भस्मकूटस्य धतुःपंचप्रमाणतः ॥ १७१ ॥
भस्मकूटके वायु कोणमें पांच धनुः परिमाण ॥ १७१ ॥
कपाललोचनं नाम तीर्थेभ्यस्तीर्थमुत्तमम् ।
पूजनी प्रयत्नेन स्तोतव्यं विविधस्तवः ॥ १७२ ॥
कपाललोचन नामक उत्तम तीर्थ है वहां परमयत्नसहित विविध स्तुति
और पूजा करै ॥ १७२ ॥
कपालं पतितं तस्य स्थाने च मम तुन्दरि ।।
तस्मिन् स्नातो वरारोहे ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।।१७३॥
कपालेश्वरमीशानमस्मिस्तीर्थे व्यवस्थितम् ।।
तस्योत्तरे धतुः पञ्चमिते वै कपिला शिवे ।।
तत्र स्नात्वा वरारोहे मुच्यते भवबन्धनात् ॥१७४॥ से
हे देवि ! वहाँ मेरा कपाल गिरा है वरारोहे ! उसमें स्नान करनेसे
ब्रह्महत्याका पाप नष्ट होता है, इस तीर्थमें कपालेश्वर ईशानमें स्थित हैं।
हे शिवे ! इसके उत्तर भागमें पंचधनुः प्रमाण कपिलातीर्थ है, हे वरारोहे !
उसमें स्नान करनेपर मनुष्य संसारके बंधनते छूटजाता है।।१७३॥१७॥
कपिलादतीर्थेस्मिन्स्नात्वा संयतमानसः।
वृषध्वजं शिवं दृष्ट्वा सर्वपज्ञफलं लभेत् ॥ १७५ ।।
हे प्यारी ! संयतमन हो इस कपिलाहद तीर्थमें स्नान करनेके पीछे
वृपध्वजका दर्शन करनेसे सर्व यजके फल को प्राप्त होता है ॥ १७५ ॥
पूर्वाशाभिमुखेनैव आरोहेद्भस्मकृटकम् ।
वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण पूजयित्वा प्रशस्पते ॥ १७६ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (३३१)
वृषाचल नमस्तेऽस्तु धर्ममार्गत्रिविष्टप।
आरोहयामि शिखरं भस्मकट नमोऽस्तुते ॥ १७ ॥
पश्चिमाभिमुखं यस्तु आरोहेपर्वतं यदि।
दशजन्मकृतं पुण्यं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ १७८ ॥
पूर्वमुख हो भस्मकूटमें आरोहण करे, हे वृपाचल ! तुमको नमस्कार है
है धर्ममार्गके वैकुण्ठ । मै शिखरपर चढ़ता हु, हे मस्मकट ! आपको
प्रणाम है. इस मन्त्रसे पूजा करनेपर पुण्यलोक प्राप्त होता है यदि कोई
पश्चिम मुख होकर पर्वतपर आरोहण करे तो उसके दश जन्मका किया
पुण्य तत्काल ही नष्ट होता है ।। १७६ ॥ १७७ ॥ १७८ ॥
उत्तराभिमुखो यश्च यस्त्वैशान्यसुसंमुखः।
धनं पुत्र कलवञ्च सर्व नश्यति तत्क्षणात् ॥ १७१ ॥
जो उत्तरकी ओर वा ईशान कोणकी ओरको मुख करके आरोहण
करता है, उसका धन और पुत्रकलत्रादि (स्री आदि) तत्काल सब
नष्ट होते हैं ।। १७९ ॥
अन्यद्वारं प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभम् ।
वृषध्वजस्य माहात्म्यं शृणु देवि वरानने ॥ १८० ॥
संयुक्ता सोमवारेण ह्यमावस्या भवेद्यदि।
तदाभस्माचलं गत्वा देवमभ्यर्च्य यत्नतः।
कुलैकशिमुद्धृत्य स गच्छेत्परमं पदम् ॥ १८१ ॥
हे वरानने देवि ! गुह्यसे भी गुह्य शुभकारक वृषध्वजका माहात्म्य सुनो
मनुष्य सोमवारयुक्त अमावस्याको भस्माचलमें जाय यत्नसहित देवताओंकी
पूजा करनेसे इक्कीस कुलका उद्धार करके स्वयं परमपदको प्राप्त होता
है॥ १८० ॥ १८१॥

(३३२)
योगिनीतन्त्रम्।
गन्धाः स्नापयेल्लिई कमले: सुमनोहरैः।
पञ्चामृतेन तोयेन चन्दनेन विलेपयेत् ॥ १८२ ॥
मनोहर कमल और गन्धादिद्वारा उस लिगको स्नान कराने के पीछे
उसका पचामृत जल चन्दनसे विलेपन करे ।। १८२ ।।
महात्मना ततः कार्य मासाने प्रतिपर्वणि ।
बिल्वपत्रेण संपूज्य रत्नतोयेन स्नापयेत् ॥ १८३ ॥
तदनन्तर महीनेके पीछे प्रतिपर्वमें रत्नतोयद्वारा स्नान कराकर बेल
पत्रसे पूजा करे ॥ १८३॥
प्रसादेन तु मन्त्रेण रुद्रपुष्पेण पूजयेत् ।
बन्धूकेन जयन्तेन मालूरेण विशेषतः ।। १८४ ॥
फिर प्रसाद मन्त्र और रुद्रपुष्प ब-धूक ( दुपहरिया ) जयन्त और
विशेषकर विजोरेसे पूजा करे ।। १८४ ॥
ध्येयः प्रीतो देवदेवः पिनाकी
प्राशूनीप्यमानस्तृतीयः
लोलेः साक्षात्सर्वपापौघहर्ता
पञ्चास्य वै धारयन्देवदेवः ॥ १८५॥
बिभ्रदेहे चर्म वैव्याघ्रकाण्ड
भूत्या शुभ्रं चन्द्रकान्तं वपुश्च ।
देच्या गात्रे नीलदेहो मुखश्च
स्पृष्ट्वा पाणि पाणिना सुप्रसन्नः ॥ १८६ ।।
तदनन्तर देवदेव पिनाकी चपल त्रिनेत्रद्वारा दीप्यमान सर्वपापौष हता
देवदेव पचमुख. व्याघ्रचर्म, विभूतिशुभ, चन्द्रमाद्वारा मनोहर शरीर,
हायसे देवीका हाथ स्पर्श करनेवाले नीलदेह महेश्वरका ध्यान
करे ॥ १८५ ॥ १८६ ॥

भापाटीकासमेतम् । पत्रेषु पूजयेदेता देवताः परमेष्ठिनः । धाम धर्म तथा सूक्ष्म विष्णुं नारायणं हरम् ॥१८७॥ विज्ञेयं विरजं विश्वं मध्यादि प्रतिपूजयेत् । शक्ती संपूजयेच्चैव रामाद्याः प्रोक्तलक्षणाः ॥ १८८ ॥ बाह्ये संपूजयेद्भक्त्या श्रीकण्ठाद्याश्च तद्वहिः । पीठेशांश्च तथा बाह्ये पीठेशांश्चानतोऽर्चयेत ॥१८९॥ फिर पत्रादिद्वारा परमेष्ठी, देवगण धाम, धर्म सूक्ष्म, विष्णु नारायण हर, विरज और विश्वादिकी पूजा करे, तदनन्तर उक्त लक्ष्मण रामादि शक्तियोंकी भक्तिपूर्वक बहिर्देशके पूजा करे, इसके पीछे बाहर श्रीक- ण्ठादिकी ओर अग्रभागमें पीठेशगणोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ १८७ ॥ ॥ १८८॥ १८९ ॥ त्रयम्बकेण मन्त्रेण पूजयेत्कमला विना । नन्दीशं मुकुटश्चैव दिक्पालान्पूजयेत्क्रमात ॥१९॥ म्यक मन्त्रसे कमलाके अतिरिक्त नन्दीश मुकुट और क्रमानुसार दिक्पालोंकी पूजा करे ।। १९० ॥ एवं संपूज्य देवेशं पूजाभिक्तिमान्नरः । प्रणम्य परमेशानमिदं स्तोत्रमुदाहरेत् ॥ १९१ ।। इस प्रकार मनुष्य भक्तिमान् होकर देवेश परमेशानकी पूजा करके यह स्तोत्र पढे ॥ १९१ ॥ ओं नमस्ते विश्ववर्णाय हिरण्याय कपर्दिने । हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नमः॥ १९२ ।। ईशान वचसम्भूत हरिकेश नमोस्तुते । नमो बालार्ककर्णाय ज्वलद्रूपधराय च ॥ १९३ ।।

योगिनीतन्त्रम् ।
नमोऽशुद्धाय शुद्धाय सौभगाय क्षयाय च ।
भवांगाऽमितकेशाय मुक्तकेशाय वै नमः ।। १९४ ॥
नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च ।
वर्णाश्रमेण विधिवत्पृथक्कर्मप्रवर्तिने ।। १९५ ॥
नमः शोशीयशोशाय करणाय च ते नमः।
श्वेतपिगलनेवाय कृष्णवक्रेक्षणाय च ॥ १९६ ॥
धर्मकामार्थमोक्षाय सर्वपापहराय च ।
नमस्त्रिशूलहस्ताय उमाकान्ताय वै नमः ॥ १९७ ।।
ईशानवकसम्भूत हरिकेश नमोऽस्तु ते ।
प्रसीद पार्वतीकान्त उमानन्दाय वै नमः॥ १९८ ॥
जो विश्ववर्ण, हिरण्य हिरण्यकर्ण, हिरण्यकृतचूड और हिरण्यपति है,
उनको मै नमस्कार करता हू. हे ईशान ! वासभूत ! हे हरिकेश !
आपको नमस्कार करता हू जो वालार्क कर्ण है अर्थात् जिनके कर्ण वाल
सूर्यके समान हैं, जिनका रूप प्रकाशित है, जो शुद्ध स्वरूप अशुद्ध सौभग
और अक्षय हैं, उनको मैं नमस्कार करता हू जो भवाग, अमितकेश और
मुक्तकेश हैं, उनको मे प्रणाम करता है। जो पट्कर्ममें सन्तुष्ट त्रिकर्म
निरत और जो वर्णाश्रमके विधिपूर्वक पृथक् पृथक् कर्ममें प्रवर्तित होते हैं,
उनको मै प्रणाम करता है । नो शोशीय, शोश और करण रूप है, मै
उनको प्रणाम करता है । जो श्वेत पिगल नेत्र और जिनका मुख और
नेत्र कृष्ण है । जो धर्म अर्थ काम और मोक्षस्वरूप तथा सब पापोंके हरने
वाले हैं जो त्रिशूलहस्त और उमाकान्त हैं, मै उनको प्रणाम करता हूँ।
हे ईशानके मुखसे उत्पन्न ! हे हरिकेश ! मै तुमको प्रणाम करता है
हे पार्वतीकान्त ! प्रसन्न होओ हे उमानन्द | मै तुमको नमस्कार करता
1॥ १९२ ॥ ९३॥९४ ॥९५ ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ ९८॥

भाषाटीकासमेतम् । (३३५)
ततोऽतुज्ञा समादाय कृताञ्जलिपुटस्तदा।
प्रणम्य पूजयित्वा च इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥ १९९ ॥
अनन्तर हाथ जोडकर आज्ञा ग्रहण करने के पीछे प्राणाम भौर पूजा
करके यह मत्र उच्चारण करै ॥ १९९ ॥
उमानन्द नमस्तेऽस्तु पार्वतीप्रीतिवर्द्धन ।
निर्विघ्ना यातु मे सिद्धिर्यस्मात्पूजा कृताद्य मे॥२०॥
जगन्नाथ प्रसादेन श्रीमत्कामेश्वरं शिवम् ।
देवेश पूजयाम्यद्य आज्ञया ते महेश्वर ।। २०१ ।।
हे उमानन्द । तुमको नमस्कार है । हे पार्वतीकी प्रीति बढानेवाले !
मै इस समय आपकी पूजा करता है आप मेरी सिद्धि निरविन कीजिये
हे महेश्वर ! हे देवेश ! हे जगन्नाथ । मै आपके प्रसाद और आपसी
आज्ञासे अब श्रीमत्कामेश्वर शिवकी पूजा करता हू ।। २०० ॥ २०१ ।।
प्राच्या तस्य समभ्यच्यों विष्वक्सेनी जनार्दनः।
देवस्य पश्चिमे भागे मातंगं नाम क्षेत्रकम् ।
धतुविशमानन तत्र वासान शोचति ॥ २०२ ॥
उसके पूर्वभागमें विष्वक्सेन जनार्दनकी पूजा करै ॥ देवके
दक्षिणभागमें मातग नामक क्षेत्र है, उसका परिमाण बाईस धनुः है,
बहा वासकरनेसे शोककी प्राप्ति नही होती ॥ २०२॥
तत्र यत्पातकं चीर्ण ब्रह्महत्यासमं भवेत् ।
तञ्च यत् सुकृतं किश्चिदग्निष्टोमफलप्रदम् ॥ २०२ ॥
वहा यत्किचित् सामान्य पाप करनेसेभी ब्रह्मवधके इस्य होता है
भौर वहा कुछ थोडासा पुण्य करनेपर वह अग्निष्टोमकी तुल्य फल प्रदान
करता है ॥ २०३ ॥

(३३६) योगिनीतन्त्रम्। मातंगी पूजयेत्तत्र गन्धायैर्भक्तिमान्नरः । मायावीजेन देवेशि भावेन सुसमाहितः ॥ २०४ ॥ मनुष्यगण भक्तिमान् और भावपूरित होकर सावधान चित्तसे गन्धादिद्वारा मायाबीजसे उसीस्थानमें मातंगीकी पूजा करै ।। २०४ ॥ तवस्थो मन्दरं पश्येदक्षिणाभिमुखस्तु यः। स सर्वकुलमुद्धत्य ब्रह्मलोके महीयते ॥ २०५॥ दक्षिणाभिमुख होकर वहां मन्दरका दर्शन करनेसे सर्वकुलका उद्धार करके ब्रह्मलोकमें पूजाको पाप्त होता है ।। २०५ ।। नमो मन्दरशलाय विष्णुरूपाय वेधसे । तं दृष्ट्वाथ स्वर्गसंस्थो भवत्पापव्यपोहनात् ॥ २०६॥ मैं मन्दरशैलमें विष्णुरूप विधाताको नमस्कार करताहूं उनके दर्शन संसारके सब पाप दूर करनेपर स्वर्ग प्राप्त होता है ॥ २०६ ॥ वीक्षेत्सन्ध्याचलं पश्चादिने मन्त्रमुदीरयेत् । युगकोटिसहस्रषु यत्पापं समुपार्जितम् ।। क्षयोस्ति गजवके च साक्षी भव मतंगज ॥ २०७॥ फिर दिनमें संध्याचलका दर्शन करके पीछे यह मन्त्र उच्चारण करें जो पाप हजारों करोडों युगोमें इकट्ठे किये हैं, वह गजवक्त्रमें क्षयहोजाते हैं, हे मातंगी ! तुम साक्षी हो । २०७ ॥ ततोऽध्य भानवे दद्यात्तिलवारिकुशान्वितम् । उत्थाय प्रणिपातेन दद्यादाचमनीयकम् ।। २०८॥ इस मंत्रसे तिल, जल, कुश, युक्तकरके सूर्यनाराणको अर्घ्य देवे । फिर प्रणामपूर्वक उठकर आचमन प्रदान करना चहिये । २०८ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(३३७)
आदित्यस्य व्रताने तु चार्घ्यदाने विशेषतः ।
उपविश्य ततो दद्यादन्यत्रोत्थाय दापयेत् ॥ २०९ ॥
आदित्यके व्रतांगमें और विशेषतः अर्घ्यदानमें बैठकर दान करे अन्यत्र
उठकर अर्घ्य देना चाहिये । २०९ ॥
अधोमुखश्चार्घ्यपात्रं दत्वाऽान्ते विचक्षणः ।
तत्र चण्डेश्वरं सूर्य प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥ २१० ॥
अधोमुख अर्घ्यपात्रमें अर्घ्यदान पूर्वक, बुद्धिमान् मनुष्य वहांके चंडेश्वर
सूर्यको प्रणाम करके विसर्जन करे ।। २१० ॥
दशाश्वमेधे नैऋत्ये दक्षिण्ये मम सुन्दरि ।
इक्षुक्षेपान्तरे यच्च संस्थितं कलिपर्वतम् ॥ २११ ॥
तबारोहणमात्रेण सुकृतश्च विनश्यति ।
दुखितं लिप्यते गात्रे कलिः स्पृशति नान्यथा॥११२
हे सुन्दरी ! दशाश्वमेधके नैर्ऋत और मेरे दक्षिण इक्षुक्षेपान्तर (जितने
स्थानमें एक गन्ना रक्खा जाय) में जो कलिपर्वत स्थित हैं उसपर आरोहण
करते ही संपूर्ण पुण्य नष्ट होकर दुःख प्राप्त होता है और गामें कलिका
स्पर्श होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २११ ॥ २१२ ॥
कलिः स्पृशति या धारां सा धारा मम वाहिनी ।
सर्व कलिमलं तीर्थ तथैनं परिवर्जयेत ॥ २१३ ।।
कलि जिस धाराको पर्श करता है । उस धाराको मेरी ही वाहिनी जाने
यह तीर्थ सर्वत्रही कलिमलमय है अतएव इसको परित्याग करे ॥२१३॥
मन्दरस्य हि चैशान्यां धनुः षोडशकोन्मितम् ।
चक्रतीर्थ महातीर्थ सर्वपापप्रणाशनम् ।
, ग्रहोपदोषजश्चैव पातकं यत्कृतं बहु ॥ २१५ ॥

योगिनीतन्त्रम् ।
कृष्णे शुक्ल चतुर्थ्याश्च दृष्ट्वा सिंह च चन्द्रकम् ।
तदोषाः पातकं यच्च सर्व स्नानाद्विनश्यति ॥२१५॥
मन्दरके ईशान कोणके सोलह धनुः परिमाण सब पापों का नाश करने-
वाला चक्रतीर्थ है इस महातीर्थमें शुक् अथवा कृष्णपक्षकी चतुर्थीको और
सिंहके चन्द्रमा देखकर लान करनेसे ग्रहोपदोपजात (क्रूरग्रह जनित
पीडा आदि ) सब पातक नष्ट होते हैं ॥ २१४ ॥ २१५ ।।
अस्थीनि पातयेद्यस्तु सप्तरात्रौ मम प्रिये ।
चक्राङ्कितं भवेद्देवि नात्र कार्या विचारणा ॥ २१६ ॥
हे प्यारी! जो मनुष्य सात रात्रि अस्थिपातन करते हैं । अर्थात् जो
मनुष्य उस तीर्थमें सात रातमें अस्थि ढाल देते हैं तो वह चक्राङ्कित होते
हैं। इसमें सन्देह नहीं है ।। २१६ ॥
चक्रतीर्थे व्रतं यत्तु गोपीचन्दनधारणात् ।
प्राप्नोति तत्फलं जन्तुम॒तौ हरिपुरं व्रजेत् ॥ २१७ ॥
'चक्रतीर्थमें व्रत धारण करनेसे गोपीचन्दन धारण करते उसका अक्षय
फल पाता है । और मरनेपर हरिपुर में जाता है ॥ २१७ ॥
द्वारकायां समुद्भूत द्विजन्म भवसागरात् ।
तीर्थराज नमस्तेऽस्तु वाहि मां भवबन्धनात् ॥२१॥
हे द्वारकामें प्रकट हुए हे द्विजन्मा ! हे तीर्थराज ! आपको प्रणाम
है । मेरा भवबन्धन और संसारसागरसे रक्षा करो ॥ २१८ ॥
स्नात्वा तु मन्त्रेणानेन सवित्रेध्ये निवेदयेत् ।
चक्रतीर्थ नरः स्नात्वा विधातारं प्रपूजयेत् ।
दश पूर्वान् दश परान् आत्मानश्चैव तारयेत् ॥२१९॥
इस मन्त्रसे स्नान करनेके पीछे सूर्यदेवको अर्घ्य देवे । मनुष्यगण चक्र
तीर्थमें स्नान करके विधाताकी पूजा करनेसे दश पहिले और दश पिछले
पुरुषोंका तथा अपना तारण करने में समर्थ होते हैं ॥ २१९ ॥

भावाटीकासमेतम्। चक्रतीर्थ स्पृशन् शैलं नन्दनं नाम पर्वतम् । धनुर्द्विषष्टिमानञ्च पश्चिमेनेव सुन्दरि ।। २२० ॥ जिस शैलने चक्रतीर्थ पर्श किया है उसका नाम नन्दन पर्वत है उसका परिमाण बासठ धनु है । हे सुन्दरी ! उसके पश्चिममें ॥२२०॥ जनार्दनश्च देवेश कलौ बौद्धस्वरूपिणम् । तं दृष्ट्वा मुच्यते पापैर्महायोरः सुदारुणैः ॥ २२१ ॥ देवेश्वर जनार्दन स्थित हैं। यह कलियुगमें बुद्धरूपी हैं उनका दर्शन करनेपर महाधोर दारुण पापसे छुटकारा मिलता है ।। २२१ ॥ कर्कश पौडवर्द्धश्च या शिलाचक्र उद्यता। मन्दरस्य च पाश्चात्ये शुभशैलस्य भाविनि । जनार्दनस्य चितश्च रूपश्च परिकीर्तितम् ।। २२२ ॥ चक्रतीर्थ, जो शिला प्रगट हुई है वही पौण्ड्रवर्द्ध हे भाविनी । मन्दरके पाश्चात्य और शुभशेलके दक्षिणमें जनार्दनके रूपका चिह कहा गया है ॥ २२२ ॥ उत्तरे तस्य शैलस्य ऐशान्यां विरजा तथा । दक्षिणे गजशैलस्य पश्चिमे शंभ्रलिङ्गकः ॥ २२३ ॥ उत्तरकी ओर उसी शेलके ईशान कोणमें विरजा है, गजशेलके दक्षिण और पश्चिममें शैभ्रलिंगक है ॥ २२३ ॥ एतन्मध्यतमं क्षेत्रमागस्त्यं नाम वै मया। एवं शतमित क्षेत्र मत्सम्भवमुदाहृतम् ॥ २२४ ॥ इसका मध्यगत क्षेत्र आगस्त्य नामसे विख्यात है इस ओर इस प्रकार शतपरिमित क्षेत्र मत्संभव अर्थात् मुझसे उत्पन्न हुए जाने ॥ २२४ ॥ असंशयं विजानीयादन्यल्लोहितमुच्यते। तब पिण्डप्रदानेन पितां परमा गतिः ॥ २२५॥ ।

(३४०) योगिनीतन्वम् । अन्य दिशामें लोहिततीर्थ है। वहां पिण्डदान करनेसे पितरोंको परमगति प्राप्त होती है । इसमें सन्देह नही ।। २२५ ॥ जनार्दनस्य हस्ते च स्वाहापिण्डं समर्पयेत् ॥ एष पिण्डो मयादत्तस्तव हस्ते जनार्दन ॥ २२६ ॥ परलोकगतायाथ त्वं मे दाता भविष्यसि । कलिशेपस्य पूर्वे तु धतुरष्टप्रमाणतः ॥ २२७ ॥ सा शिला प्रेतभावेन पितृणां तारणाय च । तत्र पिण्डप्रदानेन न प्रेतो जायते क्वचित ।। २२८ ॥ जनार्दनके हाथमें स्वाहापिण्ड समर्पण करे. हे ननार्दन | मै आपके हाथमें यह पिण्ड समर्पण करता हूं। मेरे परलोक जानेपर आप यह मुझको प्रदान करना कलिशेषके पूर्वमें अष्टधनु परिमाण वह शिला पित. रोंको तारनेवाली होती है। वहा पिण्डदान करनेसे कोई भी प्रेतत्वको प्राप्त नही होता ॥ २२६ ॥ २२७ ।। २२८ ॥ चक्रवतीर्थस्य चाग्नेये धतुर्द्वन्दप्रमाणतः। लिङ्गलौलं परं तीर्थ तिलदुग्धः प्रतर्पयेत् ॥ २२९ ।। चक्रतीर्थक अमिकोणमें दो धनु.परिमाण लौललिगनामक परम तीर्थ है। तिलसे पूजा करके दुग्धसे उसकी तृप्ति साधन करै ॥२२९॥ जनाईनं ततो वीक्ष्य मुच्यते वै ऋणत्रयात || २३० ॥ तदनन्तर जनार्दनका दर्शन करनेपर तीनों ऋणसे मुक्त होता है॥२३०॥ कलिद्वापरयो सन्धौ धनुर प्रमाणतः। शुक्रेण स्थापितं लिङ्गं शुक्रेशं नामतः श्रुतम् ॥२३१।। देवं शुक्रेश्वरं दृष्ट्वा को न मुच्यते बन्धनात् ।

भाषाटीकासमेतम् । (३४१) गोलेश्वरं ततो दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ २३२ ॥ अङ्गारेशं च सिद्धेशं गयादित्यं गजं तथा । मार्कण्डेयश्वरं दृष्ट्वा पितृणामतृणो भवेत् ॥ २३३ ॥ कलि औरद्वापरके सन्धिकालम शुक्रके द्वारा एक लिंग स्थापित हुआ है। इसी कारण इस लिंगका "शुक्रेशलिग" यह नाम है । वहा शुक्रेश्वर देवका दर्शन करके किसने बन्धनसे मुक्ति लाभ नहीं की है ? फिर गोलेश्वरका दर्शन करनेपर ब्रह्महत्याके पापसे रक्षा होती है । तदन्तर अङ्गारेश सिद्धेश गयादित्य गज और मार्कण्डेयेश्वरका दर्शन करनेपर पितृऋणसे उद्धार होता है ।। २३१ ।। २३२ ॥ २३३ ॥ गयागोलेश्वरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा देवं जनार्दनम् । एतत्र किम पर्याप्तं नृणां संशुद्धिकारणम् । ब्रह्मलोक प्रयान्तीह पुरुषाश्चकाविंशतिः ।। २३४ ।। इसके पीछे गयामें गोलेश्वर और जनार्दनदेवका दर्शन करनेसे केवल पितृमणही शोध नहीं होता वरन् इससे इक्कीस पुरुप पर्यन्त ब्रह्मलोकमें गमनकरते हैं ॥ २३४ ॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रं सरांसि च । चक्रतीर्थ गमिप्यन्ति वारमेकं दिनदिने ।। २३५ ॥ समुद्र, सरोवर इत्यादि पृथ्वीमें जो जो तीर्थ हैं । वह सब प्रतिदिन एक एक वार चक्रतीर्थमें जाते हैं ॥ २३५ ॥ पृथिव्यां च गयां पुण्यां गयायां कूपकं गया । कूपादष्टगुणं देवि श्रेष्ठा मातृगया शुभे ।। २३६ ।। पृथ्वीमें गया पुण्यतम है गयाभी कृपगया और हे देवि ! कूपसे मातृगयाको अष्टगुण श्रेष्ठ जानना चाहिये ।। २३६ ।।

(३४२)
योगिनीतन्त्रम् ।
पुत्रो मातृगयां गत्वा ह्यनृणो भवति क्षणात् ।
गयायां पिण्डदानश्च पितृणामनृणो भवेत् ॥ २३७ ॥
पुत्रगण मातृगयामें गमन करके उऋण होते है। गया, पिण्डदान
करनेसे पितरोंका ऋण दूर होता है ॥ २३७ ।।
गयान्तं पिण्डदानञ्च गयान्तं तीर्थमेव च ।
पञ्चकान्तं कामरूपं पिच्छिलान्तं सरिच्छुभे ।
जनार्दनस्य हस्ते तु पिण्डं दद्यात्स्वकं नरः ॥ २३८ ॥
गया पिण्डदान करनेसे पिण्डदान शेष होता है। गयामें गमन
करनेसे तीर्थगमन शेष होता है । कामरूपमें गमन करनेसे पंचक
और पिच्छलामें गमन करनेसे सरित् शेष होता है । अन्यत्र गमन
करना नहीं पड़ता । हे शुभे ! मनुष्यगण जनार्दनके हाथमें निज पिण्ड
प्रदान करै ।। २३८॥
विरजे च तधाचाश्वे कर्णिवामे च सोसके।
जीवत्पिण्डप्रदानेन त्वल्पायुर्जायते नरः ॥ २३९ ।।
विरज अश्वक्रान्त कीर्ण वाम और सोमकमें जीवित पिण्डप्रदान
फरनेसे मनुष्य अल्पायु होते हैं ॥ २३९ ॥
यत्रागस्त्ये महाक्षेत्रे दद्यात्पिण्डं स्वकं तु यः।
मासयाधिक वर्षमायुषो वर्द्धते क्रमात् ॥ २४० ॥
जो मनुष्य अगस्त्य महाक्षेत्रमें . निजपिण्ड प्रदान करता है। उसकी
एक वर्ष में दोमास आयु बढती है ॥ २४ ॥
स्वहस्ते न वृषोत्सर्ग च करोत्योर्द्धदैहिकम् ।
फलंपरत्रचामोति न संदेहो महेश्वरि ।
बहुपुत्रे चैकपुत्रे पुत्रे वा योगसेविते ॥ २४१ ॥
क्षयं कुष्ठं गते पुत्रे त्रिपुत्रे वा महेश्वरि ।
चत्वारिंशत्परो देवि स्वयमात्मक्रियाचरेत् ॥ २४२ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (३४३) हे देवि ! जो मनुष्य अपने हाथसे अपना औदैहिक वृपोत्सर्ग करते है वह परलोक जानेपर उसको प्राप्त होते हैं इसमें सन्देह नहीं। हे महे. श्वार : बहुपुत्र वा एकपुत्र अथवा योगसेवितपुत्र क्षयकृष्ण गतपुत्र वा तीन पुत्रोंके विद्यमान होनेपर चालीस वर्षकी आयुवाला मनुष्य दान और वृपो. त्सर्गादि आत्मक्रियाका अनुष्ठान करे ॥ २४१ ॥ २४२ ॥ दानश्चैव वृषोत्सर्ग कुन्निव दशाहिकम् । दम्पत्योर्जीवतोः कुर्य्यावृषोत्सर्गद्वयं सदा ॥ २४३ ॥ केवल दशाहिक (दशवां) कार्य न करे दम्पतीमें स्त्री और पुरुप दोनोंके बचे रहनेपर दो वृपोत्सर्ग करे ॥ २४३ ॥ एकत्र मण्डले कुण्डे वृपोत्सर्ग पृथक् चरेत् । मृते कुय्यादकगुण जीवितोऽष्टगुणं फलम् ।। २४४॥ एकत्र मण्डल और एक ही कुण्डमें पृथकू दो वृपोत्सर्ग करने चाहिये । मरेकी अपेक्षा जीवितके वृपोत्सर्गसे अष्टगुणा अधिक फल प्राप्त होता है ॥ २४४॥ परगोत्रकृतं चैव स्वल्पाल्पं फलमाप्नुयात् ॥ २४५ ॥ पराये गोत्रके निमित्त वृपोत्सर्ग करनेसे अल्प स्वल्प फल होता है ॥ २४५ ॥ उद्यतस्तु गयां गन्तुं श्राद्धं कृत्वा घृतेन तु । विधाय कार्पटीवेषं ग्रामस्यास्य प्रदक्षिणम् । कृत्वा प्रामान्तरं कृत्वा श्राद्धशेषस्य भोजनम् । कृत्वा प्रदक्षिणं गच्छेत्प्रतिग्रहविवर्जितः ॥ २४६ ॥ गया जाने के लिये उद्यत होकर विधानपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये तद. नन्तर मामान्तर गमन करके श्राद्धशेषभोजन पूर्वक प्रदक्षिणा करनेके पीछे प्रतिग्रहहीन होकर गमन करे ॥ २४६ ॥ गृहाचारत्निमात्रञ्च आगस्त्यगमने सति । स्वर्गारोहणसोपान पितृणान्तुपदेपदे ।। २४७ ॥

(३४४) योगिनीतन्त्रम् । आगस्त्य नानेके समय घरसे अरनिप्रमाण स्थानकी प्रदक्षिणा करके गमन करना चाहिये । तो पद पदमें पितरोंके स्वर्गारोहण सोपान व्यवस्थित होते हैं ॥ २४७ ॥ दिवा च सर्वदा रात्रौ आगस्त्ये प्राकृद्भवेत । अश्वतीर्थे कृतं श्राद्धं नीलकूटे च पञ्चके । रामाश्रमे सोमकूटे पितृछाद्धं दिव नयेत् ॥ २४८ ।। आगस्त्यमें सदा ही दिन वा रात्रिमें श्राद्ध करे अश्वतीर्थ-नीलकट पञ्चक वामाश्रम और सोमकूटमें श्राद्ध करनेसे पितृगण स्पर्गमें जाते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ २४८ ॥ आगस्त्ये मुण्डनं कृत्वा दृष्ट्वा देवं जनार्दनम् । आरुह्य मन्दरं शेलं पुनाति कुल सप्तकम् ॥ २४९ ॥ आगस्त्यमें मुण्डनानन्तर जनार्दनदेयका दर्शन करके मन्दर शैलमें आरोहण करनेपर सात कुल पवित्र होते हैं ।। २४९ ॥ साम्वत्सरं गयाश्राद्धं पार्वण प्रतिपर्वणि । निरामिष कृतश्राद्धं तथा च विषुवद्वये ॥ २५० ॥ सपिण्डाः पितरस्तस्य निराशाः सततं गताः । आमश्राद्धे आममांतं प्रदद्यादविचारतः ॥ २५१ ॥ प्रतिपर्वमें साम्वत्सर पार्वण गयाथाद्ध और विपुवद्वय अयन सक्रातिमें निरामिषश्राद्ध करनेसे उसके सपिण्डपितरगण और अन्यान्य पितरगण निराश होकर गमन करते हैं। हे प्रिये ! आमश्राद्धमें आममास (कच्चामास) प्रदान करना चाहिये इसमें विचार न करे ॥ २५०॥ २५१ ।। पितरोधोमुखगतास्तिष्ठन्ति न मम प्रिये । सामिषन्तु कृतं श्राद्धं यस्तु भुइक्त निरामिषम् २५२

भाषाटीकासमेतम् ।
(३४५)
पितृगण अधोमुख होकर अवस्थान करते हैं। सामिषश्राद्ध करके जो
मनुष्य निरामिष भोजन करता है ।। २५२
तामित्रं नरकं गच्छेपितृभिः सह नान्यथा ।
दीर्घ तनुमयं कुर्य्याद्गृहीत्वा मम शाङ्करि ॥२५३ ॥
वह पितरोंके सहित तामिस्रनाम नरकमें जाता है । हे शाङ्कार !
इसलिये दीर्घतनुमयवत करै ॥ २५३ ॥
श्राद्धाचारं विना कुर्याद्मतमतन्मम प्रिये ।
निरामिषः कृतीयेन कुच्छ्रिाद्धं निरामिषम् ॥२५४॥
भोक्ता निरामिष भुक्ते सामिषं न कदाचन ।
सद्यो निमन्त्रयेच्छाद्धे कर्म कुर्याद्विचक्षणः ॥ २५५॥
यह व्रत श्राद्धाचारके विना संपादन करै । जो निरामिषभोजी
है। वह निरामिष श्राद्ध करें। वह निरामिय भोजन करै। कभी
आमिप भोजन न करै । विचक्षणगण श्राद्धमें कर्म करके सग्रही निमंत्रण
करै ।। २५४ ॥ २५५ ॥
शूदेण निन्दितं विप्र श्राद्धयज्ञादिकेषु च ।
ब्राह्मणं भोजयेद्यस्तु भुक्ते विष्ठाञ्च शाकरि ।। २५६ ॥
श्राद्धयज्ञमें शूदनिन्दित ब्राह्मणको भोजन करानेसे वह विष्ठाभोजन
करता है ॥ २५६ ॥
माहिष बृहदाजश्च एणं वा चामरंतथा।
गौधं कूर्मश्च शाल्वञ्च शाशक सौकरतथा ।
वाराहश्च तथा मेषं श्राद्धे देयानि सर्वशः ॥ २५७ ॥
माहिप, बड़े बकरेका मांस, ऐण (मांसविशेष ) चामर गोहका मांस
कूर्म शास्व कछुए और हिरणका मांस) खरगोशका मांस, सूफर मांस
और चराहमांस तथा मेषमांस, यह सब श्राद्धमें देवे ॥ २५७ ॥

(३४६) योगिनीतन्त्रम् । न कलौ तु गवां मांस सारमेयश्च तत्त्वतः। हीनेन्द्रिय छागलश्च न वृष्यं तश्च वर्जयेत् ॥ २५८ ।। कलियुगके अतिरिक्त अन्ययुगमें नीलगोमास और श्वानका मास वर्जितहै । हीनेन्द्रिय छागल (छोटी बकरी ) वर्जित है ॥ २५८ ॥ कृष्णच्छागस्य मांसेन पितृन्यस्तु प्रतर्पयेत् । निराशाः पितरो यान्ति शापं दत्त्वासुदारुणम्र५९॥ जो काले बकरेके माससे पितरोंका सर्पण करता है, उसके पितर दारुण शाप दे निराश होकर चले जाते हैं ॥ २५९ ॥ हीनेन्द्रियच्छागांसः पितृन्यस्तुप्रतर्पयेत् । महाभयंकरं प्रोक्तं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ २६०॥ हीनेन्द्रिय छागमासद्वारा पितृतर्पण करनेसे वह महाभयंकर होता हे इस कारण उसको त्यागदेना चाहिये ॥ २६०॥ माहिषेण द्वादशाब्दं तृप्तिर्भवति शाश्वती। साम्वत्सरन्तु चाजेन छागैः षट्शेलजेसमाः॥२६१ ।। पितरगण महिषमासद्वारा बारह वर्ष, बकरेके माससे एकवर्ष शैलेय छागमाससे छ वर्ष ॥ २६१ ॥ चामरेण शतं वर्ष साहस्र गोधिकामिषः। षण्मासश्च वरारोहे कौम मासमात्रकम् ॥ २६२ ॥ चामरके माससे सौ वर्ष, गोहके माससे हजार वर्ष, कछुएके माससे केवल एक महीने ॥ २६२ ॥ वाराहेण तु षण्मासं शाशकेन नवैव तु । द्वाविंशन्मासकेनैव क्षुद्रवाराहकैस्तथा। शताब्द चामरेणेव स्थूलमासन्तु वर्जयेत् ॥ २६३ ।। "

भापाटीकासमेतम् । (३४७)
वराह मांससे छै महीने, खरगोशके मांससे नौ महीने और क्षुद्रवराहसे
बाईस महीने, तृप्त रहते हैं चामरके मांससे १०० वर्षतक तृप्त रहते हैं
पितृतर्पणमें स्थूल मांस वर्जित हैं ॥ २६३ ॥
यत्तु त्यक्तं भवेत्पुंभिश्चतुर्भिः षभिरेव च ।
अतिस्थूलमिति प्रोक्तं तदिदं पूर्वसूरिभिः ॥ २६४ ॥
दश मनुष्योंने जिसका निषेध किया हो उसको विद्वानोंने अतिस्थूल
कहनेका निर्देश किया है सो इस अतिस्थूलका भी परित्याग कर देना
उचित है ॥ २६४ ॥
माहिषस्य च गव्यस्य वाराहस्य मम प्रिये ।
मार्गस्य बृहदाजस्य स्थूलस्यापि हि शस्यते ॥२६५॥
महिष मास (नीलगोमास) वराहमास, मृगमांस और बड़े बकरेका
मांस स्थूल होनेपर भी प्रशस्त है ।। २६५ ॥
खाङ्गं पाश्चनखं भक्ष्यमभक्ष्यं खड्गसंयुतम् ।
चतुर्नखं वारिजातं वर्जयेच्च मम प्रिये ॥ २६६ ॥
गोधिका स्वर्णखङ्गश्च चामरं कृष्णमेव च ।
वर्जयेत्कूर्मके विद्वान्यदि चक्रेण चिह्नितम् ॥ २६७ ॥
गेंडेका मास और पञ्चनख मांस भक्षण करना चाहिये । सहसंयुक्त
मास, चतुर्नख वारिजात मांस, वर्जित है यदि चक्रचिह्नसे चिहित हो, तो
विद्वान्गण गोधिका स्वर्ण खल्ल (गेंडेकी जाति विशेष ) चमर कृष्ण और
कर्म त्याग दें ॥ २६६ ॥ १६७ ।।
सिंह शुभं रोहितश्च राजीव चित्रकन्तथा ।
महाशल्क पौष्ठिकश्च पार्वतीयं च मत्स्यकम् ॥२६॥
बृहद्रोहितमत्स्यश्च वृहत्मोष्ठीकमेव च ।
वृहच्छल्कञ्च चित्रच्च प्राद्धे यत्नेन भोजयेत् ॥ २६९ ॥

(३४८) योगिनीतन्त्रम्। बृहद्रोहितमत्स्य, सिह, शुभ, वृहमोठीमत्स्य (पाठीनमरस्य) बृहत्शरक और चित्रमत्स्य, श्राद्धमें यत्नसहित देवे ॥२६८॥२६९॥ मत्स्यांश्च शल्कहीनांश्च सर्पाकारांश्च वर्जयेत् । शल्कहीनस्य मध्ये तु प्रदेयं कचकद्वयम् ॥ २७० ।। प्रेतोधानादिकं यच्च विकृताकारवञ्च यत् । सास्यापीवरांश्चैव रजनीश्च विवर्जयेत् ॥ २७१ ।। सर्पाकार शल्कहीन ( लम्बीजातकी पतली मछली) मत्स्य वर्नित हैं शल्कहीनमें दो कवच प्रदान करने चाहिये प्रेतोधानादिविकृताकार सर्पमुख (पुष्ट ) और रजनीमत्स्य वर्जित हैं ॥ २७० ॥ २७१ ॥ जीवाशे सेलुकञ्चैव पद्मक कुकुमन्तथा। स्वर्णकं प्रन्थिवर्णश्च श्राद्धे यत्नेन वर्जयेत् ।। २७२ ।। जीवाश, सेलुय, ( सिघाडामछली) पद्मक ( पद्माख ) कुंकुम, स्वर्णक और ग्रंथिवर्ण यह सब श्राद्धमें यत्नपूर्वक वननीय हैं ।। २७२ ॥ धूम्रश्च पञ्चकदलं शरीकीटसंयुतम । महिप्यास्तु घृतं क्षीरं तळं श्राद्ध विवर्जयेत् ।।२७३॥ धूम्र, पञ्चकदल, शर्करा, कीटसयुक्त माहित, दूध और घृत यह सब श्राद्धमें वर्जित हैं ॥ २७३ ।। नारिकेलश्च तालश्च खजूरं पीनसन्तथा । तकं घृत विना क्षीरं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ २७४ ॥ नारियल, ताल, खजूर, पीनस ( पिडाल ) तक ( मट्ठा ) घृत क्षीर को छोड़ यत्नपूर्वक अवश्य परित्याग करे ।। २७४ ॥ प्रदीप वर्जयेद्न्धं वा प्रत्यक्षतेलकम् । कुसुम्भं नालिकाशाकं मालतीकुसुमन्तथा ।। २७५ ।। - "

भाषाटीकासमेतम् ।
(३४९)
वृद्धिश्राद्ध पंकजच करवीराणि वर्जयेत् ।
न प्रदद्यात्तु गाङ्गेयं पद्मं रक्तजलोद्भवम् ॥ २७६ ॥
छेदयुक्तदीप, प्रत्यक्ष तैल, कुसुम्भ, नालिकाशाक, मालतीकुसुम,
पकजद्रव्य और कनेर यह सब वृद्धिश्राद्धमें वर्जित हैं. गागेय और
लालकमल प्रदान नहीं करना चाहिये || २७५ ॥ २७६ ॥
विना वस्त्रेण यच्छाद्धं विना यज्ञोपवीतकैः।
विना तिलेन देवेशि विना गव्येन निष्फलम् ॥२७७||
वस्त्र, यज्ञोपवीत, तिल और गव्यके विना श्राद्ध करनेसे वह
निष्फल होता है ॥ २७७ ॥
अभावे चैव वस्त्रस्य कुशमाल्यं निवेदयेत् ।
अभावे यज्ञसूत्रस्य सूत्रयुग्मन्तु विन्यसेत् ॥ २७८ ॥
वस्त्रके अभावमें कुश माल्य यज्ञसूत्र के दो सूत्र निवेदन करै ।। २७८ ॥
शूद्रश्राद्धे च स्त्रीश्राद्धे यज्ञसूत्रं विवर्जयेत ।
ताम्बूलेन कृतं श्राद्धं विना चूर्णेन शाङ्करि ।
अभावे जीवकं दद्यात्पायसं मधुसंयुतम् ॥ २७९॥
शूद्रश्राद्ध और स्त्रीश्राद्धमें यज्ञसूत्र वर्जित है चूर्णके विना तांबूल देवे
अमावमें जीवक देना चाहिये श्राद्धमें मधुसंयुक्त खीर प्रदान करे ॥२७९।।
एकजातीयपात्रे तु दद्यादन्नं समाहितः।
दैवतं प्रथमं दद्यारिपतपात्रे निवेदयेत् ।। २८० ॥
सावधान होकर एक जातीयपात्रमें निवेदन करना चाहिये पहिले
देव और फिर पितृपात्रमें निवेदन करे ॥ २८० ॥
पितृशेषन्तु देवे तु पुनरत्नं कदाचन ।
आमश्राद्धे निरग्नेस्तु नान्नं प्रक्षालयेत्वचित ॥ २८१ ॥

योगिनीतन्त्रम् । पितृशेष कभी दैवमें प्रदान न करे, अमिहीन आम श्राद्ध में कभी अन्न प्रक्षालन न करे ।। २८१ ॥ वृद्धौ च क्षालयेदन्नं संक्रमे ग्रहणेषु च । अष्टमुष्टिप्रमाणेन ब्राह्मणे चैककंक्रमात् । अतोधिकञ्च न्यूनश्च न दद्याच्छाद्धकर्मणि ॥ २८२ ॥ वृद्धि ग्रहण और संक्रामणमें अन्नक्षालन कर ब्राह्मणको आठ मुष्टि प्रमाण अन्न देवे । श्राद्धकर्म में इससे अधिक वा कम प्रदान न करे ।। २८२ ॥ यः श्राद्धं पद्मपत्रे च करोति सुमनोहरे। वर्षाणान्तु शतं सायं तृप्तिर्भवति नान्यथा ॥ २८३ ।। मनोहरपद्मपत्रमें श्राद्ध करनेपर सौवर्षतक पितरगण तृप्त रहते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ २८३॥ अश्वत्थस्य छदे देवि ब्रह्मपात्रे च शाङ्करि । षण्मासं जायते तृप्तिरनन्तं वटपत्रके ॥२८४ ॥ हे देवि शांकरि ! पीपलके पत्ते और ब्रह्मपात्रसे 2 महिने तथा वट पत्रसे अनन्त तृप्तिलाभ करते हैं ॥ २८४ ॥ मासैकं ताम्रपाने च रुक्मपावे तु वत्सरम् । रौप्ये दशगुणं प्रोक्तं खड़पात्रे शतोत्तरम् ॥ २८५॥ ताम्रपानसे एकमास, स्वर्ण पानसे एक वर्ष चादीके पात्रसे इसकी अपेक्षा दशगुण और खङ्ग पात्रसे शतगुण तृप्ति लाभ करते हैं ॥ २८५ ॥ एकजातीयपात्रे तु मुताहे श्राद्धकर्मणि । पार्वणे च तथा वृद्धौ पृथक् जातींश्च यो यजेत् ।।२८६॥ मरणदिन और श्राद्ध कर्ममें एकजातीय पात्र, पार्वण और वृद्ध श्राद्ध पृथक् जातीय पात्रकी योजना करे ।। २८६ ॥ सम्वत्सरं भवेत्तावत्रीहश्चैिव नियोजयेत् । वर्षाद्भवति यो व्रीहिःप्रेतश्राद्ध तु तं त्यजेद ॥२८७|| . भापाटीकासमतेम् । एक वर्षकी वीहिप्रदान करनी चाहिये, किन्तु एक वर्षका नीहि प्रेत- श्राद्ध में वर्जित है ॥ २८७ ॥ धान्यं वर्षासमुद्भूतं चणकं तिलयावके । यज्ञादौ च तथा श्राद्धे द्विः स्विन्नं परिवर्जयेत् ॥२८८ वर्षा उत्पन्न हुआ धान्य तिल यव और चने यह सर दो बार पक्क करके यज्ञादि तथा श्राद्धमें प्रदान न करे ॥२८८ ॥ यष्टिधान्यं राजधान्यं वृहद्धान्यश्च वल्लभे । सोमधान्यं शिन्नधान्यं वाङ्गं वै रक्तशालिकम्॥२८९।। केतकी कलविश्च धान्यं नारायणन्तथा । माधवञ्च प्रदीपञ्च विष्णुधान्यं च वल्लभम् ॥ २९० ।। भोग्यधान्यमशोकश्च नागाक्षं पञ्चकन्तथा । धान्यानि श्राद्धयोग्यानि वेदेषु कथितानिहि ॥२९१ ।। यष्टिधान्य, राजघान्य, बृहद्धान्य, सोमघान्य, शिनधान्य, बंगधान्य ( यह सब धान्योंकी संज्ञाविशेष है) रक्तशालि (सही) केतकी, कल. विंक, नारायणधान्य, माधवधान्य । प्रदीप विष्णुधान्य, वल्लभ भोग्य- धान्य, अशोक, नागाक्ष, पश्चक यह सब धान्य योग्य कहकर वेदमें निश्चित हुए हैं इस कारण इनका श्राद्धकर्म में व्यवहार करे २८९॥२९०॥२९१॥ गोधूमांश्च यवांश्चैव अपूपांश्च महेश्वरि । नीवारांश्च तथा श्राद्ध देवधान्यं तथापरम् । वसन्ते रोपित धान्य यत्नेन च विवर्जयेत्॥ २९२॥ हे महेश्वरि ! गेहूं, नौ, अपूप (धृतपक ) नीवारा ( मुनिअन्न ) और देवधान्यका श्राद्धमें व्यवहार करे । वसन्तकालमें लगाया हुआ धान्य यत्नपूर्वक परित्याग करे ॥ २९२ ॥ - (३५२) योगिनीतन्त्रम् । तदन्नभक्षणादेव पापं संक्रमते नृणाम् । भक्षणे श्रवणान्नस्य दरिद्रश्चाभिजायते ॥ २९३ ।। वह अन्न भक्षण करनेसे पाप आक्रमण कर लेता है, श्रवणका अन्न भक्षण करनेसे मनुष्य दरिद्री होता है ।। २९३ ॥ भक्षणे सोमधान्यस्य व्रतं चान्द्रायणञ्चरेत् । भक्षणे वृद्धधान्यस्य विभवो जायते किल ॥ २९४ ॥ सोम धान्य भक्षण करनेसे चान्द्रायणवतका अनुष्ठान करे और वृद्ध- धान्य भक्षण करनेसे विभव (धन) प्राप्त होता है ॥ २९४ ॥ राजधान्य स्निग्धधान्यं भक्षणाद्विष्णुलोकभाक् । रक्तशाल्योदन भुक्त्वा विजयं श्रियमाप्नुयात् ॥५९५ राजधान्य और स्निग्यधान्यं भक्षण करनेसे विष्णु लोकको प्राप्त होता है। रक्तशालि ( सट्ठी ) भक्षण करनेसे विजय और श्री प्राप्त होती है || २९५॥ नारायणं माधवं च भोगश्च मम सुन्दरि । धान्यन्तु यादव भुक्त्वा नरः ख्यातिमवाप्नुयात् २९६ नारायण, माधव, भोग और यादव धान्य भक्षण करके मनुष्य ख्याति लाभ करते हैं ।। २९६ ॥ निमन्त्रितं ब्राह्मणश्च यदि श्राद्ध विवर्जयेत् । दारुणं नरकं गच्छेद्यावदाभूतसप्लवम् ॥ २९७ ॥ निमंत्रित ब्राह्मणको श्राद्धमें छोड़नेसे प्रलयकालपर्यन्त दारुण नरकमें जाता है ।। २९७ ॥ निमन्त्रितो यः स्वगृहे भुड़क्त विमः कथञ्चन । स गच्छेत्कालसूत्रञ्च सौकरी योनिमाविशेत् ॥२९८॥ यदि निमंत्रित ब्राह्मण कदाचित् अपने घर भोजन करे तो निर्म-

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भापाटीकासमेतम् ।
त्रण देनेवाले कालस्त्र नरक लाभ कर फिर शूकरमी योनिको प्राप्त होता
है ॥ २९८ ॥
निमंत्रितो व्रतस्थश्च ब्रह्मचर्य च वा पुनः ।
नातिकामेच्च तं श्राद्धे न दोषो मधुभक्षणे ॥ २९९ ॥
अतएव निमंत्रित, व्रतस्थ और ब्रह्मचारी ब्राक्षणका कभी त्याग न करे,
श्राद्ध में मधुभक्षणसे दोष नही होता ॥ २९९ ॥
सद्याकृतं सदाधान्य मांसं तैलं तथैव च ।
व्रतस्थभक्षणे देवि न दोपः पितृयज्ञके ॥३०॥
व्रतस्थमनुष्यके पितृयजमें सद्यः कृत (तत्काल सम्पन्न किया ) धान्य
मास ओर तेल भक्षणसे दोष नहीं होता ॥ ३०० ॥
गयाश्राद्धे प्रेतपक्षे तथानुमरणे प्रिये ।
तीर्थप्राद्धे वै ग्रहणे न जिनेत्पिण्टकं प्रिये ॥ ३०१ ॥
हे प्यारी ! गयाश्राद्धमें, प्रेत पक्षमें, अनुमरण अर्थात् एकके
अनतर दूसरेके मरणमें, ग्रहण और तीर्थ श्राद्धमें पिण्डको सूंघना
उचित नहीं है ॥ ३०१ ॥
मुक्तितीर्थ विना विप्रा नानुगच्छेत्स्वकं पतिम ।
पृथकूचितानानुगच्छेन्मुक्तिमार्गेषु सर्वदा ।। ३०२ ।।
वाक्षणी मुक्ति तीर्थके अतिरिक्त अपने पतिका अनुगमन न करे ।
मुक्तिमार्गमें सदाही पृथक् चितासे अनुगमन न करके एक चितामें ही आरो.
हण करना चाहिये ॥ ३०२ ।।
क्रिया कार्या दशाहेचान्यत्र तु निवारकम् ।
उद्वन्धनमृत चव तथा जलगते शवे ॥ ३०३ ॥
शवे पर्युषिते चैव क्षयकुष्ठिशवे तथा ।
नातुगच्छेच्च ब्राह्मण्या मुक्तितीर्थाहते प्रिये ॥ ३०४ ॥

(३५४) योगिनीतन्त्रम् । हे प्यारी ! बामणी मुक्ति दायक अतिरिक्त बन्धन द्वारा मृतक शव, नलमें पड़ा हुआ मृतक शरीर, बासी शव और क्षयकुष्ट युक्त शवका अनुगमन न करे ।। ॥ ३०३ ॥ ३०४ ।। बहुपुत्रा लगर्भा च तथा चव रजस्वला । पतिता कलहाढयाचाप्यसती न कदाचन ॥ ३०५॥ ततोऽतुगमनार्थश्च एकाहं स्थापयेच्छवम् । अनुगच्छेत्परेाश्च दोपस्तन न जायने ॥ ३०६ ॥ विदेशमरणे चैव मर्चर्यद्वस्तु विद्यते। तव्यं हृदये कृत्वा क्षत्रादीनामतुव्रजेत् ॥ ३०७ ॥ बहुत पुत्रवाली. गर्भवती, रजस्वला, पतित और कलहरत, तथा असती नारी कभी अनुगमन न करे । अनुगमनके लिये शव एक दिन रक्षित हो सकता है, इसके पीछेवाले दिन अनुगमन करनेसे दोप नहीं होता क्षत्रिय इत्यादि तीनों वर्णकी यही विधि निर्दिष्ट है कि, यदि पतिका विदेश में मरण हो तो पतिकी जो वस्तु निकट विद्यमान हो उसी वस्तुको हृदयमें धारण करके अनुगमन करे ॥३०५||३०६॥३०७॥ भावानुरंजितावाथ सती शूद्रा भवेक्वचित् । तस्यातुमरणं कुर्याद्वैश्यस्य च विधिः स्मृतः॥३०॥ शूद्र स्त्री यदि अन्तःकरणसे प्रेम करनेवाली होकर सती हो तो वह अनुमरण कर सकती हे वैश्याकी भी यही विधि कही गई है ॥३०८॥ तृतीयायां मृतो भर्ता चतुर्थी वाप्यनुव्रजेत । भर्तुरेव तिथौ तस्या- कुर्यात्साम्वत्सर बुधः ॥३०९॥ भर्ता यदि तीजमें मरा है तो चौथमें भी अनुसरण कर सकती है। जिस तिथिमें सामीकी मृत्यु हो, वर्ष दिनके पीछे उसी तिथिमें पिण्डदान करना चाहिय ।। ३०९॥

। भापाटीकासमेतम् । एकत्र मरणे देवि पिण्डमेकत्र निर्वयेत् । युगपत्कारयेच्छाद्धं समाप्येवं न दोपभाक् ॥ ३१० ॥ है देवि ! एकत्र मरणमें एकत्र पिण्ड देवे और एक साथही श्राद्ध करना चाहिये इसमें हानि नहीं है ।। ३१० ॥ दम्पत्योश्चैव पिण्डश्च वर्तुल कारयेन्नरः । वस्त्रेण वरणं कुर्यान्मधुक्षीरं निपातयेत् ॥ ३११ ॥ पति पलीका पिण्ड गोलाकार करके उसे वस्त्रसे ढके, फिर उसके ऊपर शहर और दूध डाले ।। ३११ ॥ न पिण्डेन सह क्षीरं शुप्कादं न कदाचन । माहिप्याद्यं च न घृतं धात्री च लकुचं तथा ॥ ३१२ ॥ दाडिमं बीजपूरश्च झुर्धारुकफलन्तथा । जम्बूफलश्च पद्माक्षं कदली रामकं त्यजेत् ।। ३१३ ॥ पिण्डके सहित दूध, सूखा आम, घृत, भैसका घृत, आंवला लकुचा दाडिम, विजौरा नींबू ऊर्वारुक, जम्बूफल (जामन कच्ची ) पाख, कदली और रामक कभी प्रदान न करे ॥ ३१२ ॥ ३१३ ॥ कशेरुश्च युगानश्च कपिलाक्षीरमेव च । तथा जम्बूफलं पकं श्राद्धे देयानि यत्नतः ॥ ३१४ ॥ कशेरु, युगान, कपिला गायका दूध, पकी हुई नामन, पूर्वक देवे ॥ ३१४ ॥ ब्रह्मण्यं समधुक्षीरं मूलके करमर्दकम् । बिल्वश्च तिन्दुकश्चैव मधुकं मधुरी तथा । जम्बफलश्च पद्माक्षं जीवन्तीश्च नियोजयेत् ॥ ३१५ ॥ सुपारी, मधु, क्षीर, मूली, करमर्दक, वेल तिन्दुक. मधु, सरभरी जामनका फल, पद्माख और जीया, यह सब निवेदन कर ॥ ३१५ ।। श्राद्धमें यत्न , , योगिनीतन्त्रम् । ब्राह्मणः क्षत्रियवैश्यः श्राद्धं सुचवसोदितम् । कुलधर्मानुसारेण दातव्यं मन्त्रपूर्वकम् ॥ ३१६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य यह तीन वर्ण कुल धर्मानुसार गुरुब्रह्मणादिकी अनुमति लेकर मंत्रपूर्वक सुचवसोदित श्राद्ध कर ॥ ३१६ ॥ विभिर्वरयं शूद्रविप्रानुशासनात् । मन्त्रवणश्च विधिवद्वद्विपाकविवर्जितः ॥ ३१७ ॥ पुष्करादिषु तीर्थेषु पुण्येष्वायतनेषु च । शिखरेषु गिरीन्द्राणां पुण्यदेशेषु शाङ्करि ॥ ३१८ ॥ सरित्सु पुण्यतोयेषु सरस्सु च नदेषु च । सङ्गमे नदीनाश्च सागरेषु च सप्तम् ।। ३१९ ॥ देवतायतने गोष्ठे धात्रीमूले तथैव च । दिव्यपादपमूलेषु तुलसीमध्यमेषु च ।। ३२० ॥ दशाणेषु कुमार्येष मागधेषु कुशेषु च। विरजस्योत्तरे तीरे लोहितस्य च दक्षिणे ॥३२॥ दक्षिणे नर्मदायाश्च आगस्त्यस्य च दक्षिणे। पूर्वेषु करतोयाया न देयं श्राद्धमुच्यते ॥ ३२२ ॥ शूदगण ब्राह्मणोंकी आज्ञानुसार विधिपूर्वक मंत्रहीन और वहिपाका वर्जित अर्थात् कच्चे अन्नसे श्राद्ध करै । शास्त्रके जाननेवालोंने कहा है कि, पुष्करादितीर्थ पवित्र गृह, पर्वतके शिखर, पुण्यदेश, समस्त सरिता पवित्र जलबाली नदी, सरोवर और नद, नदियोंके संगम, सप्त, सागर, देवगृह, गोष्ठ, धात्रीमूल, आँवलेकी जड, दिव्यपादप मूल, तुलसीके मध्यस्थल, दशाणदेश, कुमारी, मगध और कुश विरनके उत्तर तीर, लोहितके दक्षिण नर्मदाके दक्षिण और आगस्त्यके दक्षिण तथा करतोयाकी पूर्वदिशामें श्राद्धदान न करै ।। ३१७-३२२ ॥ . १ भाषाटीकासमतम् । (३५७) श्राद्ध देयं वदन्तीह मासि मासि उपक्षये । पौर्णमासीषु च श्राद्धं कर्तव्यत्वक्षगोचरे ॥ ३२३ ॥ पण्डितोंने कहा है कि, महीने महीने अमावस्या में श्राद्ध करना चाहिये । पौर्णमासीको अक्षगोचरमें श्राद्ध करना चाहिये ॥ ३२३ ॥ नित्यं श्राद्धं सदेवश्च मनुष्यैः सह गीयते । नैमित्तिकं सुरैः श्राद्धं नित्य नमित्तिकन्तथा ॥३२॥ काम्यानि यानि श्राद्धानि प्रतिसम्वत्सरं द्विजः। वृद्धिश्राद्धं च कर्त्तव्यमुक्तकर्मादिकेषु च ॥ ३२५ ॥ नित्यश्राद्ध देवसहित नैमित्तिक श्राद्ध मनुष्यसहित और नित्यनैमित्तिक सुरसहित करना चाहिये। ब्राह्मणगण काम्य श्राद्ध प्रतिवर्ष करें और कर्मानुसार वृद्धि श्राद्ध करें ॥ ३२४ ॥ ३२५ ।। तब स्नानं हि जानीहि मातृपूर्व तु शंकर। कन्यागते सवितरि दिनानि दश पञ्च च । पार्वणेन विधानेन श्राद्धं कुर्याद्विचक्षणः॥ ३२५ ॥ हे शकार ! उसमें मातृपूर्व स्लान जानना चाहिये । सूर्यके कन्या राशिमें जानेपर पन्द्रह दिन पण्डितगण पार्वण विधानानुसार श्राद्ध करे ॥ ३२६॥ यो ददाति गुडेमिश्रान्तिलान्या श्राद्धकर्मणि । मधुना मधुमिश्राणि चाक्षयं तत्प्रचक्षते ॥ २२७ ॥ श्राद्धकर्ममें मन्त्रसहित गुडमिश्रित तिलदान करनेसे वह अक्षय होता है ॥ ३९७॥ कृत्तिकासु पितृनचर्य मुक्तिमाप्नोति मानधः। अपत्यकामो रोहिण्यां सौम्ये तेजस्विता लभेत्॥३२ .

सौम्यमें पूजा (३५८) योगिनीतन्त्रम्। मधासु च प्रजा पुष्टिं सौभाग्यं फल्गुनीषु च । अन्येप्वपि च ऋक्षेषु कर्त्तव्यं कामचारतः ।। ३२९ ।। कृत्तिकामें पितरों की पूजा करनेसे मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। रोहिणीमें पूजा करनेसे अपत्य ( सन्तान) लाभ, करनेसे तेजस्विता, मघामें प्रजा, फाल्गुनीमें पुष्टि और सौभाग्य लाभ होता है अन्य नक्षत्रोंमें भी अपनी इच्छानुसार पितरोंका तर्पण करना चाहिये ॥ ३२८ ॥ ३२९ ॥ अपि ये पितरौ यस्य मृताः शस्त्रेण वाहवे । तेन कार्य चतुर्दश्यां तेषां तृप्तिमभीप्सता ॥ ३३० ॥ जिसके पितृगण युद्धमें शस्त्रसे मरे हैं चतुर्दशीमें तर्पण करनेसे उनको विशेष तृप्ति लाभ होती है ॥ ३३० ॥ यदा पञ्चदशी श्राद्ध कर्त्तव्यं काम्यभावतः। चतुर्दश्यां समेतञ्च षोडशश्राद्धमिष्यते ॥३३१ ॥ जब काम्यभावसे पन्द्रह श्राद्ध करे । चतुर्दशीमें समवेत प्रकार अर्थात् दोनों विधियों से संयुक्त सोलह श्राद्ध करें ॥ ३३१ ॥ दशम्यादिकमारभ्य पञ्चम्यादिकमेव च । तदा वज्यं चतुर्दश्यां तिथौ देवान्समाचरेत् ॥३३२॥ दशमी इत्यादिसे आरम्भ करके पञ्चमी इत्यादि वर्जित हैं, चतुर्दशी तिथिमें देव श्राद्ध करना चाहिये ॥ ३३२ ।।

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भापाटीकासमेतम् । (३५९)
नित्यश्राद्धे तर्पणे च सुरा!नित्यपूजने ।
भोजने ब्राह्मणानाञ्च दक्षिणा न हि विद्यते ॥ ३३४ ॥
नित्यश्राद्ध, तर्पणमें देवअर्चनामें, नित्यपूजामें और ब्राह्मणभोजनमें
दक्षिणा नहीं है ।। ३३४ ॥
श्राद्धाशक्ती प्रेतपक्षे ब्रह्मणान्मोजयेत् प्रिये ।
देवेभ्योन्नं जलं दद्यादेवमन्यन्निवेदयेत् ॥ ३३५ ॥
हे प्रिये । प्रेतपक्षके श्राद्ध में असमर्थ होनेपर ब्राह्मणभोजन करावे,
देवताओंको अन्न जल देवे ।। ३३५ ॥
पित्रोश्च जीवतोदेवि यज्ञादौ श्राद्धवासरे।
भोजयेद्भक्ष्यभोज्यैश्च फलेश्च विविधैरपि ॥ ३३६ ॥
है देवि ! जीवित मातापिताके यज्ञादिमें श्राद्धके दिन भक्ष्य भोज्य
और विविधफल भोजन करावे | इसका आशय यह है कि, मातापिताके
यज्ञवाले दिन जिसका हमें श्राद्ध करना है, ऐसे भाता आदिका श्राद्ध
उपस्थित होजाय तो उसमें ब्राह्मणको विविधप्रकारके फलोंका भोजन
करायै ॥ ३३६ ॥
अमोजिते हतो यज्ञः श्राद्धश्चापि हतं भवेत् ।
वृद्धिश्राद्धे पार्वणे च नित्यवाद्धे विवर्जयेत ।
ब्राह्मणानां बहूनां च भोजनं च महेश्वरि ।। ३३७ ॥
भोजन न करानेसे यज्ञ और श्राद्ध समस्तही नष्ट होता है, वृद्धिश्राद्ध
और पार्वणमें नित्यश्राद्ध तथा बहुत ब्राह्मणोंको भोजन कराना वर्जित
है ।। ३३७॥
राजसूयाश्चमेधाद्यैर्यदीच्छेहुलभं पदम् ॥ ३३८ ॥
गयां गंगा तथा गत्या कुर्याच्छाद विधानतः।
अप्यंबुशाकमूलान्न सक्नुभिर्यवकन्दकः ॥ ३३९ ॥

(३६०)
योगिनीतन्त्रम् ।
राजसूर्य अश्वमेघादि दुर्लभ पदकी इच्छा हो तो गंगा और गयामें
जाकर शाक, मूल, अन्न, सत्तू और यवद्वारा विविधपूर्वक श्राद्ध
कर ॥ ३३८ ॥ ३३९ ॥
तावपितृपुरी शून्या यावद्विष्णोःप्रबोधनम् ।
प्रबोध समलिक्रान्ते पित्रा वा देवतैः सह ।
निश्वस्य प्रतिगच्छन्ति शापं दत्त्वा सुदुष्करम् ॥३४०॥
जबतक विष्णुका प्रबोधन न हो अर्थात कार्तिक शुक्ला एकादशी नही
आती, तबतक पितृपुरी शून्य रहती है । प्रबोधना होनेसे पितृ और देवता
दारुण शाप देकर निश्वास परित्यागपूर्वक लौट जाते हैं ॥ ३४०॥
गयाश्राद्धं गयास्नान तथा च तिलतर्पणम् ।
खपात्रेण देवेशि जीवपित्रा विवय॑ते ॥ ३४१ ॥
हे देवेशि ! जिसके पित्रिगण जीवित हों वह गयाश्राद्ध, गयास्नान
और खड्गपात्रमें तिलतर्पण न करे ॥ ३४१ ॥
सोमवार त्वमायां च मौनस्नानं विवर्जयेत् ।। ३४२।।
सोमवार और अमावस्यमें मौनस्नान वर्जित है ।। ३४२ ।।
यस्य माता मृता देवि तस्य मातुर्गया प्रिये ।
गदि प्रेतः पिता देवि पितृव्यमरणेऽपि च ।
मातापित्रोर्जीवतोरप्यविचार्य गयो व्रजेत ॥ ३४३ ॥
हे देवि ! जिसकी माता मरगई है, उसकी मातृगया होती है।
हे देवि ! पिता यदि प्रेत हो वा पितृव्यका मरण हो तो गयामें जाय । पिता
माताके जिवित होनेपर विनाविचार किये गयामें न जाय ॥ ३४३ ॥
पितुः पिण्डं प्रदद्यात्तु भोजयेच्च पितामहम् ।
प्रपितामहपिण्डंच ह्येव शास्त्रेषु निश्चितम् ॥ ३४४ ॥

भाषाटीकासमेतम् ।
(३६१)
मृतेयु पिण्ड दातव्यं ब्राह्मणांचापि भोजयेत् ॥३४५॥
पितृपिण्ड, पितामहपिण्ड और प्रपितामहका पिण्ड देकर ब्राह्मण भोजन
करावे. शास्त्रमें इस प्रकार निश्चित है कि, मरनेपर पिण्ड देना और ब्राह्म-
णभोजन करना चाहिये ।। ३४४ ॥ ३४५ ॥
दक्षिणापूरणं सिद्धं विरिक्तं शुभलक्षणम् ।
शुचिं देशं विरिक्तिं च गोमयेनोपलेपयेत् ।। ३४६॥
पावके भूमिभागे च पितृणां नैव निर्वपः ।
शयनीयगृहे देवि ! आगारश्च विवर्जयेत् ॥ ३४७ ।।
दक्षिणदिशाकी ओरसे परिपूर्ण शुभलक्षणयुक्त अतएव उत्तम और
पवित्र एकान्त स्थानको गोबरसे लीपकर अमिवेष्टनपूर्वक पितरोंकी स्थिति
करे। हे देवि! शयनागारमें पितरोंकी स्थापना करनी उचित नहीं
है ॥ ३४६ ॥ ३४७ ॥
भिक्षुको ब्रह्मचारी च भोजनार्थमुपस्थितः ।
श्राद्धेषु तूपविष्टेषु यथाकामं प्रपूजयेत् ॥३४८ ॥
भिक्षुक ब्रह्मचारी इत्यादिके भोजनार्थ उपस्थित होनेपर श्राद्ध करने
बाला यथाकाम उनकी पूजा करे ॥ ३४८ ॥
सहक्रियां देशकालो द्रव्यब्राह्मणसम्पदः ।
पञ्चैते च पितृन् हन्ति तस्याने हेतुविस्तरात् ॥३४९
क्रिया, देश, काल, द्रव्य और ब्रामणसम्पत्, यह पांचों पितरोंको
निहत करते हैं उनके अंगमें विस्तारहेतु विद्यमान है ॥ ३४९ ॥
अपि वा योजयेद्देवं ब्राह्मणं वेदपारगम् ।
भूयांसि देवि काणि मानवश्च करोति यः ॥३५० ॥

भापाटीकासमेतम् । (३६३)
उसके वायुकोणमें बारह धनुः प्रमाण सब पापों का नाश करनेवाला
ब्रह्मकुण्डनामसे विख्यात सरस्तीर्थ है ॥ ३ ॥
किं जपैः किं तपोभिश्च किं दानः किं सुतैरपि ॥
ब्रह्मकुण्डे नरः स्नात्वा सिदि विन्दति तत्क्षणात् ॥४||
जप, तप, दान और पुत्रसे क्या प्रयोजन है ? मनुष्य ब्रह्मकुण्डमें खान
करके तत्काल सिद्धिलाभ कर सकते हैं ॥ ४ ॥
ईश्वरानुज्ञया पूर्वमुषितं ब्रह्मणा पुरा ।
स्नानार्थ संप्रधावन्ति तत्तीर्थ देवदानवाः ॥ ५ ॥
ऋषयः सिद्धगन्धवस्तीर्थानि च सरांसि च ।
माहात्म्यमुत्तमं तस्य ब्रह्मकुण्डस्य सुन्दरि ॥ ६॥
पूर्वकालमें ईश्वरकी आज्ञासे ब्रह्माजीने इसमें प्रथम वास किया था
फिर देव, दानव, ऋषि, सिद्ध और गन्धर्वगण इसमें स्नान करनेके लि
धावमान हुए थे ! सम्पूर्णतीर्थ और मव सरोवर इसमें स्थित रहते हैं. ।
सुन्दार ! इस ब्रह्मकुंडलतीर्थका माहात्म्य सर्वोत्तम जानना चाहिये ॥५॥६।
स्नात्वा तारेण विधिवदानं दद्याद्यथाविधि ।
मणिकाननरत्नानि यथाविभवमात्मनः ॥ ७ ॥
वहा तारामन्त्रसे विधिवत् स्नान करनेके पीछे यथाविधि दा
करे । अपने विभवके अनुसार मणि, रत्न, कश्चन इत्यादिका दान करन
चाहिये ॥ ७ ॥
सम्भवे सति यो मोहान्न स्नाति च नराधमः ।
पच्यते नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ८॥
जो नराधम संभव होनेपर भी इस तीर्थमें स्नान नहीं करता, वा
चौदह इन्द्र के कालपर्यन्त घोर नरकमें पडफर दुःख भोगता है ॥ ८ ॥

,
(३६२) योगिनीतन्त्रम्।
न काममभवच्छाद्धं तन्त्रेणापि समापयेत् ।
वैश्वेदेवस्य चारम्भे तन श्राद्धं विवर्जयेत् ॥ ३५१ ॥
अथवा इसमें वेदके जाननेवाले ब्राह्मणको नियुक्त करे। हे देवि । मेरे
कार्य बहुत हैं जो इस प्रकार मनमें समझता है, उसका श्राद्ध परिपूर्ण
नहीं होता। ऐसा होनेसे तन्त्रद्वारा भी कार्यसमापन करना चाहिये
वैश्वदेवकी पूजा आरम्भमें वह श्राद्ध वर्जित है ॥३५०॥३५१॥
प्रासादकरणे चैव यावायां गृहकर्मणि ।
न विद्यते श्यामपक्षे तन्त्रस्नानं विवर्जयेत् ॥ ३५२ ॥
स्थान का निर्माण करना, यात्रा और गृहकार्य तथा तन्त्र मान कृष्ण-
पक्षमें नहीं करना चाहिये ॥ ३५२ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्र सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्बादे चतुविशतिसाहले कामरू-
पाधिकारे द्वितीयभागे भापाटीकाया पञ्चम
पटल
श्रीभगवानुवाच ।
द्वितीये सुदिने देवि यत्कृत्यं श्रणु पार्वति ।
चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापविमुच्यते ॥ १॥
श्रीभगवान् बोले-हे देवि पार्वती! अब दूसरे दिन जो करना चाहिये, वह
सुनो । मनुष्यगण चक्रतीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे छूट जाता है ॥ १ ॥
लोहित्यदक्षिणं गत्वा वायव्ये कोलपर्वतः ।
तस्य पश्चिमदिग्भागे महानाथो महाबलिः ॥२॥
फिर लोहित्यके दक्षिण में नाकर वायुकोणके कोलपर्वत में जाय उसकी
पश्चिमदिशामें महाबलि पाण्डुनाथ हैं ।। २ ।।
तस्य वायव्यभागे तु धनुदशकं सरः।
ब्रह्म कुण्डमितिख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ३ ॥

' भापाटीकासमेतम्। उसके वायुकोणमें बारह धनुः प्रमाण सब पापों का नाश करनेवाला ब्रह्मकुण्डनामसे विख्यात सरस्तीर्थ है ॥ ३ ॥ कि जपैः किं तपोभिश्च किं दानः किं सुतैरपि ॥ ब्रह्मकुण्डे नरः स्नात्वा सिदि विन्दति तरक्षणात् ॥४॥ जप, तप, दान और पुत्रसे क्या प्रयोजन है ? मनुष्य ब्रह्मकुण्डमें लान करके तत्काल सिद्धिलाम कर सकते हैं ॥ ४ ॥ ईश्वरानुज्ञया पूर्वमुषितं ब्रह्मणा पुरा । स्नानार्थ संप्रधावन्ति तत्तीर्थ देवदानवाः ॥ ५ ॥ ऋषयः सिद्धगन्धवस्तीर्थानि च सरांसि च । माहात्म्यमुत्तमं तस्य ब्रह्मकुण्डस्य सुन्दरि ॥६॥ पूर्वकालमें ईश्वरकी आज्ञासे ब्रह्माजीने इसमें प्रथम वास किया था, फिर देव, दानव, ऋपि, सिद्ध और गन्धर्वगण इसमें स्नान करनेके लिये धावमान हुए थे ! सम्पूर्णतीर्थ और मव सरोवर इसमें स्थित रहते हैं. हे सुन्दारे ! इस ब्रह्मकुंडलतीर्थका माहात्म्य सर्वोत्तम जानना चाहिये ॥५॥६॥ स्नात्वा तारेण विधिवदानं दद्याद्यथाविधि । मणिकाभ्रनरत्नानि यथाविभवमात्मनः ॥ ७॥ वहा तारामन्त्रसे विधिवत् स्नान करने के पीछे यथाविधि दान करे । अपने विभवके अनुसार मणि, रत्न, कञ्चन इत्यादिका दान करना चाहिये ॥ ७॥ सम्भवे सति यो मोहान्न स्नाति च नराधमः । पच्यते नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥८॥ जो नराधम संभव होनेपर भी इस तीर्थमें स्नान नहीं करता, वह चौदह इन्द्रके कालपर्यन्त घोर नरकमें पड़कर दुःख भोगता है ॥ ८ ॥ ! "

(३६४) योगिनीतन्त्रम् ।
तस्य दक्षिणदिग्भागे धनुः पञ्चप्रमाणतः।
लोहित्यं नाम तत्तीर्थ स्नानानश्यति पातकम् ॥९॥
उसकी दक्षिणदिशाके विभागमें पाच धनु प्रमाण लौहित्यनामक तीर्थ है,
उसमें स्नान करनेसे पातक नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
स्नानेन तीर्थराजस्य तथा सर्वाघसंक्षयम् ।
तीर्थराजसर' पुण्यं सर्वतीर्थफलप्रदम् ॥ १० ॥
तीर्थराजमें स्नान करनेसे समस्त पाप क्षय होते हैं, तीर्थराज सरोवर
पुण्यतीर्थ और सब तीयोंका फल देनेवाला है ॥ १० ॥
भूतले यानि तीर्थानि सरितश्च सरांसि च ।
विशन्ति सर्वतीर्थानि सरितश्च सरांसि च ॥ ११ ॥
पृथ्वीतल में जितने तीर्थ, सरित् और सरोवर हैं, वे सब तीर्थराजमें
स्थित हैं ॥ ११ ॥
राजा समस्ततीर्थानां सागरः सरितां पतिः।
तस्मात्समस्ततीर्थेषु श्रेष्ठोऽसौ सर्वकामदः ।। १२ ॥
समुद्र जिस प्रकार समस्त नदियोंका पति है ऐसे ही यह तीर्थ समस्त
तीर्थोंमें श्रेष्ठ और कामनाओंका देनेवाला है ॥ १२ ॥
तमोनाशं यथा ज्योतिर्भास्करे छुदिते प्रिये ।
स्नानेन तीर्थराजस्य तथा सर्वाघसंक्षयम् ॥ १३ ॥
है न्यारी ! जैसे सूर्यदेवके उदित होनेपर समस्त अन्धकारका नाश हो
जाना है और ज्योति उदय होती है, इसी प्रकार तीर्थराजमें स्नान करनेसे
सब पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्यका उदय होता है ॥ १३ ॥
तीर्थराजसमं तीर्थ न भूतं न भविष्यति ।
अधिष्ठानं सदा यस्य प्रभोनारायणस्य वै ।
का शक्नोति गुणान् वक्तुं तीर्थराजस्य मे प्रिये ॥१४॥

भापारीकासमेतम् । (३६५)
हे प्रिये ! तीर्थराजके समान तीर्थ न हुआ न होगा, वहां नारायण
देव सदाही वास करते हैं । हे देवि ! तीर्थराजका गुणवर्णन करने में कौन
समर्थ होसकताहै ? ॥ १४ ॥
विनवत्ययुतानि यत्र तीर्थानि सन्ति वै।
तस्मात्स्नानश्च दानश्च होमं जाप्यं सुरार्चनम् ।
यत्किञ्चिक्रियते पुण्यं चाक्षयं भवति प्रिये ॥ १५॥
वहां तिरानवें हजार तीर्थ निरन्तर अवस्थान करते हैं, इस कारण उन
तीयोंमें स्नान, दान, होम, जप, देवताओंका पूजन जो कुछ किया जाय,
वह सब अक्षय फलदायक होताहै ॥ १५ ॥
नमस्ते ब्रह्मपुत्राय नमः शन्तनुसूनवे ।
त्रिजन्मजञ्च यत्पापं हर मे लोहितात्मक ॥ १६ ॥
हे ब्रह्मपुत्र ! हे शन्तनुकुमार ! मै तुम्हें प्रणाम करताहूं तुम
लोहितात्मा हो ! मेरा तीन जन्मका जो संचित पाप है उसको तुम
हरण करो ॥ १६ ॥
इत्यनेन तु मन्त्रेण स्नात्वाय विनिवेदयत् ।
पूजयेत्परया भत्तया मन्त्रेणानेन भामिनि ॥ १७ ॥
तीर्थराजवरं षष्ठं हंसं वामाक्षिसंयुतम् ।
शमनं हृदयं वह प्रियाधुववपुः सरः॥१८॥
इस मंत्रसे स्नान करके अर्घ्य निवेदन करे । हे भामिनि ! फिर "तीर्थ
राजयरं पष्ठं हंस वामाक्षिसंयुतम् । शमनं हृदयं वहेः प्रियाध्रुववपुः सरः"
इस मंत्रसे परमभक्तिसहित पूजा करे ॥ १७ ॥ १८ ॥
तस्य दक्षिणतो भागे नातिदूरे च संस्थितम् ।
कुलं धान्वन्तरं यावद्विष्णुकुण्डमिति श्रुतम् ॥ १९ ॥
उसके दक्षिणभागमें थोड़ीही दूर विष्णुकुण्ड नामक विख्यात
तीर्थ स्थित है ॥ १९॥

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(३६४) योगिनीतन्त्रम् ।
तस्य दक्षिणदिग्भागे धतुः पश्चप्रमाणतः।
लोहित्यं नाम तत्तीर्थ स्नानानश्यति पातकम् ॥९॥
उसकी दक्षिणदिशाके विभागमें पांच धनुःममाण लौहित्यनामक तीर्थ है,
उसमें स्नान करनेसे पातक नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
स्नानेन तीर्थराजस्थ तथा सर्वाघसंक्षयम् ।
तीर्थराजसरः पुण्यं सर्वतीर्थफलप्रदम् ॥ १० ॥
तीर्थराजमें स्नान करनेसे समस्त पाप क्षय होते हैं, तीर्थराज सरोवर
पुण्यतीर्थ और सब तीयोंका फल देनेवाला है ॥ १० ॥
भूतले यानि तीर्थानि सरितश्च सरांसि च ।
विशन्ति सर्वतीर्थानि सरितश्च सरांसि च ॥ ११ ॥
पृथ्वीतल में जितने तीर्थ, सरित् और सरोवर हैं, वे सब तीर्थराजमें
स्थित हैं ॥ ११ ॥
राजा समस्ततीर्थानां सागरः सरितां पतिः ।
तस्मात्समस्ततीर्थेषु श्रेष्ठोऽसौ सर्वकामदः ॥ १२ ॥
समुद्र जिस प्रकार समत नदियोंका पति है ऐसे ही यह तीर्थ समस्त
तीथों में श्रेष्ठ और कामनाओंका देनेवाला है ॥ १२ ॥
तमोनाशं यथा ज्योतिर्भास्करे झुदिते प्रिये ।
स्नानेन तीर्थराजस्य तथा सर्वाघसंक्षयम् ॥ १३ ॥
है न्यारी ! जैसे सूर्यदेवके उदित होनेपर समस्त अन्धकारका नाश हो
नाना है और ज्योति उदय होती है, इसी प्रकार तीर्थराजमें स्नान करनेसे
सब पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्यका उदय होता है ॥ १३ ॥
तीर्थराजसमं तीर्थ न भूतं न भविष्यति ।
अधिष्ठानं सदा यस्य प्रभोनारायणस्य वै ।
कः शक्नोति गुणान् वक्तुं तीर्थराजस्य मे प्रिये ॥१४॥

भाषाटीकासमेतम् ।
हे प्रिये ! तीर्थराजके समान तीर्थ न हुआ न होगा, वहां नारायण
देव सदाही वास करते हैं । हे देवि ! तीर्थराजका गुणवर्णन करनेमें कौन
समर्थ होसकताहै ? ॥ १४ ॥
बिनवत्ययुतानि यत्र तीर्थानि सन्ति वै।
तस्मात्स्नानञ्च दानश्च होम जाप्यं सुरार्चनम् ।
यत्किञ्चिक्रियते पुण्यं चाक्षयं भवति प्रिये ॥ १५ ॥
वहा तिरानवे हजार तीर्थ निरन्तर अवस्थान करते हैं, इस कारण उन
तीर्थोंमें खान, दान, होम, जप, देवताओं का पूजन जो कुछ किया जाय,
वह सब अक्षय फलदायक होताहै ॥ १५ ॥
नमस्ते ब्रह्मपुत्राय नमः शन्तनुसूनवे ।
त्रिजन्मजञ्च यत्पापं हर मे लोहितात्मक ॥ १६ ॥
है ब्रह्मपुत्र ! हे शन्तनुकुमार ! मैं तुम्हें प्रणाम करताहं तुम
लोहितात्मा हो! मेरा तीन जन्मका जो संचित पाप है उसको तुम
हरण करो ॥ १६ ॥
इत्यनेन तु भन्वेण स्नात्वाय विनिवेदयेत् ।
पूजयेत्परया भक्त्या मन्त्रेणानेन भामिनि ।। १७ ॥
तीर्थराजवरं षष्ठं हंसं वामाक्षिसंयुतम् ।
शमन हृदयं वझेः प्रियाध्रुववपुः सरः ॥१८॥
इस मंत्रसे स्नान करके अर्घ्य निवेदन करे। हे भामिनि ! फिर "तीर्थ
राजवरं षष्ठं हंस वामाक्षिसंयुतम् । शमनं हृदयं वहे. प्रियाध्रुववपुः सरः"
मंत्रसे परमभक्तिसहित पूजा करे ।। १७ ॥ १८ ॥
तस्य दक्षिणतो मागे नातिदूरे च संस्थितम् ।
कुलं धान्वन्तरं यावद्विष्णुकुण्डमिति श्रुतम् ॥ १९ ॥
उसके दक्षिणमागमें थोड़ीही दूर विष्णुकुण्ड नामक विख्यात
तीर्थ स्थित है ॥ १९ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(३६७
तत्राभिषकमात्रण रुद्रलोकं स गच्छति ।
शिवकुण्डे चतुर्दश्यां मासि मासि मम प्रिये ।
स्नात्वारुणोदये काले न प्रेतो जायते भुवि ॥२५॥
वहां स्नान मात्रसे ही रुद्रलोकमें जाता है. हे प्यारी । प्रति महीनेकी
चतुर्दशीको अरुणोदयकालमें शिवकुंडमें स्नान करनेसे उसको प्रेत होकर
फिर पृथ्वीमें जन्म लेना नही पड़ता ॥ २५ ॥
तीर्थानां परमं तीर्थ विष्णुस्नानसमुद्भवम् ।
सरित्पते नमस्तेऽस्तु त्राहि मां त्वं शिवप्रिये ॥ २६ ॥
हे सब तीथोंके परमतीर्थ ! विष्णुके स्नानसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है ।
हे नदियोंके अधिपति ! तुम महादेवके प्रीतिपात्र हो, इस कारण मैं तुम्हें
प्रणाम करता हूं, तुम मेरी रक्षा करो ॥ २६ ॥
स्नात्वा चानेन मन्त्रेण हंसेना निवेदयेत् ।
ततो व्रजेत्पाण्डुशैलं गन्धतोयेन स्नापयेत् ।
पूजयेत्कमलैः श्वेतः करवीरैः सितैः शुभैः ।। २७ ।।
इस मन्त्रसे स्नान करके हंसमन्त्र द्वारा अर्घ्य निवेदन करे, तदनन्तर
पाण्डुशलमें जाकर सुगंधितनल द्वारा स्नान कराकर शोभायमान श्वेत
कमल और श्वेत कनेरसे पूजा करे ॥ २७ ॥
विष्णवे पादमाभाष्य पाण्डुनाथाय सत्पदम् ।
जपाद्यश्च नतिः पश्चादुद्धरेजनकादिषु ॥ २८ ।।
इसके उपरान्त मन्त्रोच्चारणपूर्वक पांडुनाथ विष्णुकी पूजा करके प्रणाम
करनेसे जानकादि पिताका रद्वार होला है ॥ २८॥
चतुर्दशाणों मन्त्रोयं शिखान्तं समुदीरितम् ।
नारदोऽस्य ऋषिश्छन्दो गायत्री देवता हरिः।
विनियोगश्च सर्वार्थ काम्येषु च विशेषतः ॥ २९ ॥

(३६६)
योगिनीतन्त्रम् ।
विष्णुकुण्डे नरः स्नात्वा वीक्षते पाण्डुशौनकम् ।
गुरुचारुशिलारूपमरे मंजु समन्वितम् ।
पञ्चानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः ॥२०॥
विष्णुकुण्डमें स्नानकरके अग्रभागमें मजुयुक्त गुरु चाह शिलारूप
पाण्डुशौनकका दर्शन करनेसे मनुष्य पाच अश्वमेधके फलको प्राप्त
होते हैं ॥ २०॥
प्राणस्थं सर्वभूतानां योनिश्च सरितां पतिः ।
विष्णुकुण्ड नमस्तेऽस्तु त्राहि मां सर्वकिल्धिपात्॥२१॥
हे विष्णुकुण्ड । तुम सब प्राणियोंके माणरूपसे अधिष्ठित और
सबके उत्पत्तिस्थान तथा सब नदियों के स्वामी हो, मै तुम्हें नमस्कार
करताई, तुम सब पापोंसे मेरी रक्षा करो ॥ २१ ॥
स्नात्वानेन वरारोहे चैकादश्याश्च फाल्गुने ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वदुःखविजितः ॥ २२ ॥
वृन्दारकसमः श्रीमान् रूपोवनगर्वितः।
विमलेनार्कवर्णेन दिव्यगन्धर्वसेविना
कुलकविशमुद्धृत्य विष्णुलोकञ्च गच्छति ॥ २३ ॥
इस मत्रसे फाल्गुनके महीनेकी एकादशीमें स्नान करनेपर समस्त
दुःख और पापोंसे मुक्त एव देवतुल्य श्रीमान् और रूपयौवन सपन्न
तथा विमल सूर्यके समान प्रमायुक्त और गधोंके द्वारा सेवित होकर
इक्कीस कुलका उद्धार करके विष्णुलोकमें जाता है ॥ २२ ॥ २३ ॥
तस्य दक्षिणकाष्ठायां किश्चित्यगोचरे ।
एकादशधनुमान शिवकुण्डमिति श्रुतम् ॥ २५ ॥
उसके दक्षिणकी ओर कुछेक नैर्ऋतकोणमें ग्यारह धनुः प्रमाण
विल्यात शिवकुण्ड है ॥ २४ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३६७) तत्राभिषेकमात्रेण रुद्रलोकं स गच्छति । शिवकुण्डे चतुर्दश्यां मासि मासि मम प्रिये । स्नात्वारुणोदये काले न प्रेतो जायते भुवि ॥ २५ ॥ वहां स्नान मात्रसे ही रुद्रलोकमें जाता है. हे प्यारी ! प्रति महीनेकी चतुर्दशीको अरुणोदयकालमें शिवकुंड में स्नान करनेसे उसको प्रेत होकर फिर पृथ्वीमें जन्म लेना नहीं पड़ता ।। २५ ॥ तीर्थानां परमं तीर्थ विष्णुस्नानसमुद्भवम् । सरित्पते नमस्तेऽस्तु त्राहि मां त्वं शिवप्रिये ॥२६॥ हे सब तीथोंके परमतीर्थ ! विष्णुके स्नानसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है । हे नदियों के अधिपति ! तुम महादेवके प्रीतिपात्र हो, इस कारण मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं, तुम मेरी रक्षा करो ॥ २६ ॥ स्नात्वा चानेन मन्त्रेण हंसेनाध्य निवेदयेत् । ततो व्रजेत्पाण्डशैलं गन्धतोयेन स्नापयेत् । पूजयेत्कमलैः श्वेतः करवीरः सितैः शुभैः ॥२७॥ इस मन्त्रसे स्नान करके हंसमन्त्र द्वारा अर्घ्य निवेदन करे, तदनन्तर पाण्डुशलमें जाकर सुगंधितनल द्वारा स्नान कराकर शोभायमान श्वेत कमल और श्वेत कनेरसे पूजा करे ॥ २७ ॥ विष्णवे पादमाभाष्य पाण्डुनाथाय सत्पदम् । जपाद्यश्च नतिः पश्चादुद्धरेजनकादिषु ॥ २८ ॥ इसके उपरान्त मन्त्रोचारणपूर्वक पांडुनाथ विष्णुकी पूजा करके प्रणाम करनेसे जनकादि पितरोंका उद्धार होता है ॥२८॥ चतुर्दशाणों मन्त्रोयं शिखान्तं समुदीरितम् । नारदोऽस्य ऋषिश्छन्दो गायत्री देवता हरिः। विनियोगश्च सर्वार्थ काम्यषु च विशेषतः ॥ २९ ।।

(३६८) योगिनीतन्त्रम् ।
जिन सब मन्त्रों का वर्ण चतुर्दश हैं, उनको शिखान्त उच्चारण करना
चाहिये । उनके ऋषि नारद, छन्दः गायत्री, देवता हार एवं सर्वार्थमें और
विशेषकर काम्यार्थमें विनियोग होता है ॥ २९ ॥
श्वेतश्च द्विभुजं विष्णुं शङ्खचक्रलसत्करम् ।
सर्वलोकेश्वर देव देवगन्धर्वसेवितम् ।
ध्यानं कृत्वार्चयेद्धीमा पूर्वपात्रादितः क्रमात् ॥ ३० ॥
फिर बुद्धिमान मनुष्य श्वेत पर्ण दो भुनवाले शंखचक्र जिनके हाथमें
शोभित हैं, ऐसे सब लोकोंके ईश्वर बरदेनेवाले देवता और गन्धोंसे सेवित
विष्णुका ध्यान करके पूर्वपात्रादि क्रमसे पूजा करे ॥ ३० ॥
लक्ष्मी सरस्वती गङ्गां यमुना नर्मदां शिवाम् ।
वालाच कमलाश्चैव तथा संकर्षणादिकम् ।
दिक्पतींश्च प्रहांश्चैव विष्वक्सेनं प्रपूजयेत् ॥ ३१ ॥
इसके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा, यमुना, नर्मदा, शिवा, बाला,
कमला और संकर्षणादि दिक्पतिगण ग्रहगण और विष्वक्सेन इन सबकी
पूजा करे ॥ ३१ ॥
लोहिते विधिवत्स्नात्वा पाण्डुनाथ प्रपूजयेत् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥ ३२॥
फिर लोहित्यमें विधिपूर्वक स्नान करके पांडुनाथकी पूजा करनेपर संपूर्ण
पापोंसे छूटकर विष्णुलोको ऐश्वयोंका उपभोग करता है ।। ३२ ।।
मन्वन्तरगतं सायं जरामृत्युविवर्जितः।
पुण्यक्षयादिहागत्य कुले सर्वगुणान्विते ॥ ३३ ॥
जन्मपारिग्रहं कृत्वा प्रेतो भवति वैष्णवः ।
मन्त्र जप्यायेदेवमिष्टमन्त्रेण पूजयेत् ॥ ३४ ॥

-
भापाटीकासमेतम् । (३६९)
इसके पीछे, जरा मृत्यु विवर्जित हो वह मनुष्य एक मन्वन्तरके
कालपर्यन्त अवस्थित रहकर पुण्यक्षय होनेपर फिर इस लोकमें सर्वगुण
युक्त सत्कुलमें जन्मग्रहणपूर्वक फिर प्रेत होकर वैष्णवपदको प्राप्त होता
है ॥ ३३ ॥ ३४॥
पाण्डुनाथ नमस्तेस्तु नमस्ते मोक्षकारक।
त्राहि मां सर्वलोकेश विष्णुरूप नमोऽस्तु ते ॥३५॥
निर्मलानन्दसंकाश नमस्ते पुरुषोत्तम ।
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पाण्डुनाथ नमोस्तु ते ॥ ३६॥
नमस्ते हेमग म नमस्ते गरुडध्वज ।
ब्रह्मरूप नमस्तेऽस्तु नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ३७ ।।
नमस्तेऽञ्जनसङ्काश नमस्ते भक्तवत्सल !
पाण्डुनाथ नमस्तेऽस्तु त्राहि त्राहि नमोऽस्तु ते ॥३८
नमस्ते विवुधावास नमस्ते विबुधप्रिय ।
नारायण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥ ३९ ॥
नमस्ते विबुधश्रेष्ठ नमस्ते कमलोद्भव ।
चतुर्मुख जगद्धाम पाण्डुरूप नमोऽस्तु ते ॥१०॥
नमस्ते नीलमेघाभ नमस्ते विदशार्चित ।
त्राहि विष्णो जगन्नाथ पाण्डुरूप नमोऽस्तु ते ॥ ४१ ।।
नरसिंह महावीर्य बाहि मां दीप्तलोचन |
विष्णुरूप नमस्तेऽस्तु पाण्दुनाथ नमोस्तु ते ॥ ४२ ॥
इन मन्त्रों द्वारा पांडनाथकी अर्चना करके इस मन्त्रसे पूजा करे
॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ३७॥ ३८॥ ३९ ॥ ४०॥ ११ ॥ ४२ ॥

. (३६८) योगिनीतन्त्रम् । जिन सब मन्त्रोंका वर्ण चतुर्दश हैं, उनको शिखान्त उच्चारण करना चाहिये । उनके ऋषि नारद, छन्द: गायत्री, देवता हरि एव सर्वार्थमें और विशेषकर काम्यार्थमें विनियोग होता है ॥ २९ ॥ श्वेतश्च द्विभुज विष्णुं शवचक्रलसत्करम् । सर्वलोकेश्वरं देवं देवगन्धर्वसेषितम् । ध्यानं कृत्वार्चयेद्धीमा पूर्वपात्रादितः क्रमात् ॥ ३० ॥ फिर बुद्धिमान् मनुष्य श्वेत पर्ण दो मुनवाले शंखचक्र जिनके हाथमें शोभित हैं, ऐसे सब लोकोंके ईश्वर वरदेनेवाले देवता और गन्धोंसे सेवित विष्णुका ध्यान करके पूर्वपात्रादि क्रमसे पूजा करे ॥ ३० ॥ लक्ष्मी सरस्वती गङ्गां यमुनां नर्मदां शिवाम् । बालाश्च कमलाञ्चव तथा संकर्षणादिकम् । दिक्पतींश्च प्रहांश्चैव विष्वक्सेनं प्रपूजयेत् ॥ ३१॥ इसके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा, यमुना, नर्मदा, शिवा, बाला, कमला और संकर्षणादि दिक्पतिगण ग्रहगण और विष्वक्सेन इन सबकी पूजा करे ।। ३१ ॥ लोहिते विधिवत्स्नात्वा पाण्डुनाथं प्रपूजयेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥३२॥ फिर लोहित्यमें विधिपूर्वक स्नान करके पाडुनाथकी पूजा करनेपर संपूर्ण पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें ऐश्वयोंका उपभोग करता है ॥ ३२ ॥ मन्वन्तरगतं सायं जरामृत्युविवर्जितः । पुण्यक्षयादिहागत्य कुले सर्वगुणान्विते ॥ ३३ ॥ जन्मपारिग्रहं कृत्वा प्रेतो भवति वैष्णवः । मन्त्र जप्यार्चयेदेवमिष्टमन्त्रेण पूजयेत् ।। ३४ ॥ , भापाटीकासमेतम् । इसके पीछे, जरा मृत्यु विवर्जित हो वह मनुष्य एक मन्वन्तरके कालपर्यन्त अवस्थित रहकर पुण्यक्षय होनेपर फिर इस लोकमें सर्वगुण युक्त सत्कुलमें जन्मग्रहणपूर्वक फिर प्रेत होकर वैष्णवपदको प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ ३४॥ पाण्डुनाथ नमस्तेस्तु नमस्ते मोक्षकारक। त्राहि मां सर्वलोकेश विष्णुरूप नमोऽस्तु ते ॥३५॥ निर्मलानन्दसंकाश नमस्ते पुरुषोत्तम । नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पाण्डुनाथ नमोस्तु ते ॥ ३६॥ नमस्ते हेमगर्भाभ नमस्ते गरुडध्वज । ब्रह्मरूप नमस्तेऽस्तु नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ३७॥ नमस्तेऽञ्जनसङ्काश नमस्ते भक्तवत्सल । पाण्डुनाथ नमस्तेऽस्तु त्राहि त्राहि नमोऽस्तु ते ॥३८॥ नमस्ते विबुधावास नमस्ते विबुधप्रिय । नारायण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥ ३९ ॥ नमस्ते विबुधश्रेष्ठ नमस्ते कमलोद्भव । चतुर्मुख जगद्धाम पाण्डुरूप नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ नमस्ते नीलमेघाम नमस्ते त्रिदशार्चित । त्राहि विष्णो जगन्नाथ पाण्डुरूप नमोऽस्तु ते ॥ ४१ ॥ नरसिह महावीर्य त्राहि मां दीप्तलोचन । विष्णुरूप नमस्तेऽस्तु पाण्डुनाथ नमोस्तु ते ॥ ४२ ॥ इन मन्त्रों द्वारा पाडुनाथकी अर्चना करके इस मन्नसे पूजा करे ॥ ३५॥ ३६ ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥४१॥ ४२ ॥ २४ (३७०) योगिनीतन्त्रम् । देवस्य नैर्ऋते भागे धतुः पञ्चप्रमाणतः । अश्वत्थचिहित क्षेत्र धर्मक्षेत्र प्रकीर्यते ॥ ४३ ॥ पाण्डनायके नै कोणमें पंच धनुःप्रमाण अश्वत्थ चिहित क्षेत्र भव. स्थित है । इसको धर्मक्षेत्र जानना चाहिये ॥ ४३ ॥ संहितां प्रजपत्तत्र गीतशास्त्रश्च संजपेत् । चतुर्युग्मेन संजप्य मन्त्रेणैव तु तत्फलम् ॥ ४४ ॥ लभते नात्र सन्देह एकावर्ते सहस्रकम् । क्षेत्रस्यारोहणादेधि कुरुक्षेत्रफलं लभेत् ॥१५॥ वहां संहिताजप और गीतशास्त्रका जप करना चाहिये । चतुर्युग्म अर्थात् आठवार जप करनेसे सब मंत्र प्राप्त होते हैं इसमें सन्देह नहीं यहां एकवार पाठ करनेसे अन्यत्र पाठका सहस्रगुण फल प्राप्त होता है, हे देवि ! इस क्षेत्रमें आरोहण करनेसे कुरुक्षेत्रके तुल्य फल मिल- ताहै ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ देवस्य पूर्वभागे तु धनुरेकप्रमाणतः। स्वच्छाकृतिश्चारुशिला सा लक्ष्मीः परिकीर्तिता ॥४६ देवके पूर्व भागमें उतने धनुःप्रमाण स्वच्छाकृति एक मनोहर शोभायमान शिला प्रतिष्ठित है वही लक्ष्मी है ॥ १६ ॥ श्रीबीजेन समभ्यर्च्य मालनीकुसुमैर्यजेत ॥ ४७ ।। श्रीबीजसे मालतीकुसुमद्वरा उनकी पूजा करै ॥ १७ ॥ विष्णुकुण्डे ततः स्नात्वा लक्ष्मी पूज्य विधानतः । पौर्णिमास्यां तुला तु लक्ष्मीस्तस्याचला भवेत् ४८ विष्णुकुण्डमें स्नान करनेके पीछे विधिपूर्वक लक्ष्मीको पूजा करनी चाहिये । जो मनुष्य तुलाके सूर्य और पौर्णमासीमें उनकी पूजा करता उसकी लक्ष्मी अचल होती है ।। ४८ ॥ है

भाषाटीकासमेतम्।
तस्य दक्षिणदिग्भागे नातिरे च शांकार।
कोलक्षेत्र विजानीहि धनुरष्टप्रमाणकम् ।। ४९ ॥
हे शाङ्करि ! उसकी दक्षिणदिशामें थोडीही दूर आठ धनुःप्रमाण कोलक्षेत्र
जानना चाहिये ॥ ४९ ॥
अश्वत्थमूले देवेशं कृष्णचारुशिलामयम् ।
लोको दृष्ट्वार्चयेद्भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति ॥५०॥
जो मनुष्य पीपलकी जडमें स्थित मनोहर कृष्णशिलामय देवेश्वरका
दर्शनकरके भक्तिपूर्वक पूजा करताहै वह विष्णुलोकमें जाता है ॥ ५० ॥
ब्रह्मकूटस्य धनदे श्रीकुण्डं नाम वै सरः।
धतुर्युग्मप्रमाणेन तत्र स्नात्वा श्रियं लभेत् ॥ ५१ ॥
ब्रसकूटकी उत्तर दिशामें दो धनु प्रमाण श्रीकुण्डनामक सरोवर है
वहा सान करनेसे श्रीलाभ होती है ।। ५१ ॥
चैत्रे शुक्कदशम्याञ्च एकादश्यां सितेतरे ।
स्नात्वा मन्त्रेण श्रीतीथें गतिमामोत्यनुत्तमाम् ॥५२॥
चैत्रशुक्लदशमीके दिन और कृष्णपक्षकी एकादशी में श्रीतीर्थमें स्नान
करनेसे उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ ५२ ।।
श्रीरस्तु भगवच्छेष्ठ आरोग्यविजयप्रद ।
श्रियं देहि यशो देहि पापं हर नमोऽस्तु ते ।। ५३ ।।
श्रीस्तु भगवच्छ्रेष्ठ । भारोग्य ! और विजयके देनेवाले ! मुझको
श्री और यश दो तथा मेरे पापोंको हरण करो, मे मापको नमस्कार
करताहूँ इस मंत्रसे श्रीकुण्डमें स्नान करे ।। ५३ ॥
तस्य पूर्वे च द्वाविंशद्धनुर्माप्रमाणतः ।
तीर्थ कनखल प्रोक्तं महापातकनाशनम् ॥ ५४ ॥

-
भाषाटीकासमेतम् । (३७३)
हे देवि ! उसकी पूर्वदिशामें सात धनुःपमाण त्रैलोक्य विख्यात परमेष्ठि
ब्रह्माका पुष्करनामक तीर्थ है, यह तीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला
और मरेहओंको मुक्ति देनेवाला है । जो मनुष्य मनमें भी पुष्कर तीर्थको
स्मरण करता है वह सब पापोंसे छूटकर इन्द्रके सहित आनन्दको भोगता
है इसमें सन्देह नहीं ॥ ५९॥६०॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः ।
उपासेत सिद्धसंघा ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् ।। ६१ ॥
देव, गन्धर्व, यक्ष उरग और राक्षसगण वहां आनकर पायोनि ब्रह्माजी
की उपासना करते हैं ॥ ६१॥
तत्र स्नावा भवन्मुक्तो ब्रह्माण परमेष्ठिनम् ।
पूजयित्वा हि वरदं ब्रह्माणश्च प्रपश्यति ॥ ६२॥
वहा स्नान करनेसे मनुष्य मुक्ति पाते है. वहा परमेष्ठिकी पूजा करके
वरदायक ब्रह्माजीका दर्शन करे ॥ ६२ ॥
तदाभिगम्य देवेशं पुरहूतमनिन्दितम् ।
सुरूपो जायते मर्त्यः सर्वान्कामान्समश्नुते ।
हे पुष्कर महाभाग नमस्ते च त्रिपुष्कर ॥ ६३ ॥
हुं हूँ ही सरितां नाथ पापं मे हर पुष्कर ।
अनेन स्नानं कुर्यात्तु त्वन्तेनाय निवेदयेत् ॥ ६४ ॥
तर अनिन्दित देवराज पुरन्दरका दर्शन करनेसे मनुष्य उन्ही के स्वरू
पको प्राप्त होकर सर्वकामना भोगते हैं। "हे पुष्कर महाभाग नमस्ते च
त्रिपुष्कर ! हुं हूँ ही सरिता नाथ पार से हर पुष्कर" इस मन्त्र से स्नान
करके फिर अय निवेदन करे ॥ ६३ ॥ ६४ ॥
पुष्करस्य च नम्रत्ये किचिदाम मम प्रिये ।
धनुर्विशतिमानेन तीर्थ बदरिकाश्रमः ॥६५॥

(३७२) योगिनीतन्त्रम्। उसके पूर्व में बाईस धनु-प्रमाण कनखल नामक महापापोंका नाश करने वाला तीर्थ अवस्थित है ॥ ५४ ॥ वैशाखस्य तृतीयायां शुक्लपक्षे विशेषतः । दक्षिणामूर्तिमन्त्रेण स्नात्वा स्वर्गे महीयते ।। ५५ ।। वैशाखके महीनेकी शुक्ल तृतीयामें दक्षिणामूर्तिमत्रद्वारा उसमें स्नान करनेसे स्वर्गलोकमें ऐश्चयाँका उपभोग करता है ।। ५५ ॥ सरिच्छष्ठ महाभाग देवगन्धर्वसेवित । दशजन्मार्जितं पापं हर तीर्थ नमोऽस्तु ते ॥ ५६ ॥ हे सरित्पति । हे महाभाग ! हे देवता और गधों से सेवित ! हे तीर्थवर्य । मेरे दश जन्मके संचित पाप हरण करो तुम्हें प्रणाम है इस मंत्रसे स्नान पूजा और प्रणामादि करै ॥ ५६ ॥ तस्य दक्षिणभागे तु पर्वते च मनोहरे । धनुर्वेदप्रमाणश्च चम्पकेशं समर्चयेत् ।। ५७ ।। उसके दक्षिणभागके मनोहरपर्वतमें चार धनु प्रमाण दूर स्थित चम्प- केश्वरकी पूजा उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कनखलं भावसंयुतः । मुच्यते सर्वपापैश्च ब्रह्मलोकं ब्रजेद्यतः ॥ ५८ ।। मनुष्यगण पवित्र भावयुक्त होकर कनखलमें स्नानादि समापन करने पर सपूर्ण पापोंसे छूट ब्रह्मलोकमें जाता है ।। ५८ ।। तस्य पूर्वे शुभे देवि धतुःसप्त प्रमाणतः। तीर्थ लोक्यविख्यातं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ ५९ ।। पुष्करं सर्वपापानं मृतानां ब्रह्मलोकदम् । मनसा संस्मरेद्यस्तु पुष्करन्तु महेश्वरि । मुच्यते पातकैः सर्वैः शक्रेण सह मोदते ॥ ६ ॥ करै ।। ५७ ॥

भाषादीकासमेतम् । (३७३) हे देवि ! उसकी पूर्वदिशामें सात धनुःममाण त्रैलोक्य विख्यात परमेष्टि ब्रह्माका पुष्करनामक तीर्थ है, यह तीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला और मरेहओंको मुक्ति देनेवाला है । जो मनुष्य मनमें भी पुष्कर तीर्थको स्मरण करता है, वह सब पापोंसे छूटकर इन्द्रके सहित आनन्दको भोगता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ तत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः । उपासेत सिद्धसंघा ब्रह्माणं पद्मसम्भवम् ।। ६१ ॥ देव, गन्धर्व, यक्ष उरग और राक्षसगण वहां आनकर पायोनि ब्रह्माजी की उपासना करते हैं ।। ६१॥ तत्र स्नावा भवन्मुक्तो ब्रह्माण परमेष्ठिनम् । पूजयित्वा हि वरदं ब्रह्माणश्च प्रपश्यति ॥ ६२ ॥ वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मुक्ति पाते हैं. वहां परमेष्ठिकी पूजा करके वरदायक ब्रह्माजीका दर्शन करे । ६२ ।। तदाभिगम्य देवेशं पुरहतमनिन्दितम् । सुरूपो जायते मर्त्यः सर्वान्कामान्समस्तुते । हे पुष्कर महाभाग नमस्ते च त्रिपुष्कर ।। ६३ ।। हुं हूं ही सरितां नाथ पापं मे हर पुष्कर। अनेन स्नानं कुर्यातु त्वन्तेनाय निवेदयेत् ॥ ६४ ॥ तब अनिन्दित देवराज पुरन्दरका दर्शन करनेसे मनुष्य उन्हीके स्वरू. पको प्राप्त होकर सर्वकामना भोगते हैं । "हे पुष्कर महाभाग नमस्ते च त्रिपुष्कर ! हुं हूँ हौ सरितां नाथ पापं मे हर पुष्कर" इस मन्त्रसे स्नान करके फिर अर्घ्य निवेदन करे ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ पुष्करस्य च नैर्ऋत्ये किश्चिद्वामे मम प्रिये । धनुर्विशतिमानेन तीर्थ बदरिकाश्रमः ॥ ६५ ।।

(३७४) योगिनीतन्त्रम् । हे प्यारी ! पुष्करके नैर्ऋत कोणमें कुछेक घाममागको अठाईस पनुः परिमित वदरिकाश्रम तीर्थ है । ६५ ।। तब गत्वार्चयदेवं नारायणमनामयम् । गोसहस्रफलं प्राप्य स्नात्वाभ्यर्य हरेर्दिने ॥ ६६ ।। नारायणस्याश्रमे तु यः कुर्याद्रोहिणीव्रतम् । एकेन शतकोटीनां व्रतेन फलमाप्नुयात् ॥ ६७॥ वहां जाकर अनामय नारायणदेवकी पूजा करे । वहां हरिक दिन सान करनेके पीछे पूजा करनेसे सहस्र गोदान का फल होता है। जो मनुष्य नारायणके आश्रममें रोहिणीवतका आचरण करता है, वह उसी एक व्रत द्वारा सौ करोड़ व्रतका फल पाता है ॥ ६६ ॥६७ ॥ तत्र लिङ्ग महेशस्य विभाण्डकामिति श्रुतम् । समभ्यर्य प्रसादेन रुद्रत्वमधिगच्छति ॥ ६८ ॥ पञ्चगोदावरं तीर्थ ब्रह्मायेः सेवितं परम् । पूजयित्वा तत्र रुद्रं प्रसन्नं परमेश्वरम् ॥ ६९ ।। आराधयामास हरं पञ्चाक्षरपरायणम् । पूजयित्वा नमस्कुर्याद्गोशतानी फलं लभेत् ॥ ७० ॥ वहा विमाण्डक नामसे विख्यात महादेवका एक लिंग है, प्रसाद मंत्रसे उसकी पूजा करनेपर रुद्रत्व लाभ होता है। पञ्च गोदावर तीर्थ अत्युत्तम है। ब्रह्मादि देवता इसकी सेवा करते हैं, वहां प्रसन्न परमेश्वर रुद्रदेवकी पूजा करके पञ्चाक्षर मन्त्र से हरिकी आराधना करे फिर नमस्कार करनेपर सौ गोदानका फल प्राप्त होता है ।। ६८ ॥ ६९ ॥ ७० ॥ पुष्करस्य च पूर्वे तु कुमारं नाम वै सरः । कुमारतीथे यः स्नायादाणपत्यश्च विदन्ति ॥ ७१ ।। .

भाषाटीकासमेतम् । (३७५) पुष्करकी पूर्वदिशाम कुमारनामक सरोवर है, वहां स्नान करनेसे गाणपतित्व प्राप्त होता है ॥ ७१ ॥ कुमारतीर्थस्थानेये पञ्चाशदरायतम् । नरनारण्यक देवि सर्वदेवगणैर्वृतम् ॥ ७२ ॥ कुमारतीर्थक अग्निकोणमें पचास धनुःप्रमाण नरनारण्यक तीर्थ है, हे देवि ! यह सदाही सब देवताओंसे घिरा रहता है ॥ ७२ ॥ कुमारेश पुरेवास विष्णो प्रेयस्थिते रतः । ॐ ओ ई हूं जगद्वयात पापं हर कुमारक ।। ७३ ॥ अनेन मजनं कृत्वा सुरेशाय निवेदयत । इसमंत्रसे मजन करके सुरेशार्य निवेदन करै ।। ७३ ॥ तत्र देवो महादेवः स्थाणुरित्यभिधीयते । त दृष्ट्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते तत्क्षणानरः ॥ ७४ ॥ वहां देवदेव महादेव स्थाणु' इस नामसे अभिहित होते हैं मनुष्यगण उनका दर्शन करनेपर तत्काल सब पापोंसे छूटते हैं ॥ ७४ ॥ चम्पकेशस्य धनदे धतुर्द्विषष्ठिमानतः । तद्वनं चम्पकं नाम सिद्धब्रह्मर्षिवन्दितम् ॥ ५ ॥ पुण्यमायतनं विष्णोस्तवास्ते पुरुषोत्तमः। ब्रह्मकूटस्य धनदे शिलापश्चकमध्यगम् ॥ ७६ ॥ दुर्गापं महाकूप सर्वतोद्वारमेव हि। दशाक्षरेण मन्त्रेण स्नात्वा कामानवाप्नुयात् ॥७॥ चंपकेश्वरके उत्तरमें बासठ (६२) धनुःपरिमाण चम्पकनामक चन है, सिद्ध और ब्रह्मर्पि सदा उसकी सेवा करते हैं, वह विष्णु का पवित्र गृह है, वहां पुरुषोत्तम बास बरते हैं ब्रह्मकूटको उत्तर दिशमें शिलापंचके मध्यगत दुर्गाकूप है, इसको एक महाप (३७६) योगिनीतन्त्रम् । जानना चहिये । इसके सव और दरवाजा है, दशाक्षरमंत्रसे उसमें स्नानकरनेपर संपूर्ण कामना प्राप्त होती है । ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ दुर्गाकूपे तथाटम्यां स्नात्वा काममतुं जपत् । त्रिः कृत्वा पञ्चमं वाथ कृष्णाविजयपुष्पकैः। पूजयित्वा नरस्तत्र पीलूश्रुतिधरो भवेत् ॥ ७८ ।। अष्टमीको दुर्गाकूपमें स्नान करनेके पीछे काममंत्र जपनेसे और कृष्ण विजय पुष्पद्वारा तीननार वा पांचवार पूजा करनेसे मनुष्यगण पीलश्रुतिधर होता है । ७८ ॥ काकवन्ध्या तु या नारी मृतापत्या च या भवेत् । सापि सन्ततिमाप्नोति शरत्काले विशेषतः॥७९॥ वन्धूकैः पूजयेत्तत्र देवी कामेश्वरी यदि। बिल्वपत्रेण देवेशि शाश्वती सिद्धिमाप्नुयात् ॥८॥ काकवन्ध्या वा मृतापत्या ( जिसकी संतानमरजाती है ) नारी यदि शरत्कालमें पूजा करै तो उनको संतान प्राप्त होती है, वहां कामेश्वरी देवीकी बन्धूक और बिल्वपत्र द्वारा पूजा करनेसे शाश्वती सिद्धि लाभ होती है ॥ ७९ ॥ ८॥ साधयेदीप्सितान्कामांस्तत्र सिद्धिश्च विन्दति ॥८॥ और समस्त अभिलपित कामना प्राप्त करके सिद्धि प्रास होती है ॥८॥ कौलश्च विष्णुशैलञ्च परमेशि च शङ्करः । ईशश्च पातिजातश्च कुमारश्च गणेश्वरः। नीलश्च श्वेतभुनीत उत्तरे ह्यचला:स्थिताः ॥ ८२ ॥ हे परमेशि। कोल पर्वत, विष्णु शैल, ईश, पारिजात कुमार, गणेश्वर, नील श्वेतमुनीत यह सब पर्वत उत्तरमें अवस्थित हैं ।। ८२ ॥ -

भापाटीकासमेतम् । (३७७)
मध्ये विष्णुस्तथा स्थाणुः पर्वतोऽथ बलस्तथा।
कमलश्च शिखा चैव कपोतो मरुताचलः ॥ ८३॥
मध्यमें विष्णु, स्थाणु, बल, कमल, शिखा, कपोत, मरुताचल ।। ८३॥
पूर्वस्मिन्पातुकूपादिः पर्वतः परिकीर्तितः।
आग्नेये चाचलो देवि हस्तिको विकर्णकः।
अमाचलो दक्षिणे तु मरुबकः प्रजेश्वरः ।। ८४ ॥
पूर्वमें पातुकूपादि अचल हैं, हे देवि ! आग्नेयकोणमें हस्तिकर्ण और
विकर्ण हैं दक्षिणमें अमाचल, मरुबक, प्रजेश्वर ॥ ८४ ॥
धुमन्तः कनकश्चैव वायव्ये नीललोहितः॥
कामाह्वयो मानशैलो वहिरिन्द्रः शतक्रतुः ॥ ८५ ॥
द्युमन्त और कनक है । वायुकोण में नीललोहित, मानशैल, कामाहय,
वह्नि, इन्द्र, शतक्रतु ॥ ८५ ॥
लोहितः कमलश्चैव नेते नितिस्तथा।
गन्धवों लाक्षणश्चैव पिशाचो विहमाचलः ॥८६॥
लोहितक और कमल है । नैर्ऋत कोण में नैति गन्धर्व लाक्षण पिशाच
और विहगाचल है ॥ ८६ ॥
पश्चिमे ब्रह्मयूपश्च हयमेधो गिरीश्वरः।
उत्तरे उत्तरश्चैव तथा चोत्तरपाण्डुका ॥८७ ॥
पश्चिममें ब्रह्मयूप हयमेध और गिरीश्वर है, उत्तरमें उत्तर उत्तर-
पाण्डुक ।। ८७॥
":
आदित्यो वायुकोणे तु वायुर्भल्लातकस्तथा ।
धनदश्च महीधश्च जनकश्च नलस्तथा ॥ ८८ ॥
और आदित्य हैं । वायुकोणमें वायु, भल्लातक धनद, महीध्र. जनक
और नल ॥ ८८॥

(३७८) योगिनीतन्त्रम् । ऐशान्यां मण्डलश्चैव त्वश्वक्रान्तः सचन्द्रकः । यमश्चित्रवहश्चैव ग्रहश्चव यथाक्रमात् ॥ ८९ ।। ईशानकोणमें मण्डल, अश्वक्रान्त, चन्द्रक, यम, चित्रमह, और ग्रह हैं ॥ ८९ ॥ ततो गच्छेन्नीलशैलं मध्याह्ने परमेश्वरि । अष्टम्याश्च त्रयोदश्यां चतुर्दश्यामथापि वा।। ९०॥ विषुवे अयने वाथ रविसंक्रमणे तथा । पूर्वद्वारि यदा गच्छेदाप्नुयाद्विपुलं धनम् ॥ ९१ ॥ हे परमेश्वार ! फिर मध्याह्नकालमें नीलशैलमें गमन करे, अष्टमी, तेरस, चौदस विषुव ( संक्राति पुण्यकाल ) अयन वा संक्रमणमें पूर्वद्वारमें जानेपर विपुल धन प्राप्ति होता है ॥ ९० ॥ ९१ ॥ उत्तरे मुक्तिकामस्तु राज्यकामस्तु पश्चिमे । यदा दक्षिणमार्गेण आरोहन्नीलकूटकम् । हतराज्यो भवेद्राजा त्वन्येषां जायते क्षयः ॥ ९२ ॥ मुक्तिकी कामना करनेवाला मनुष्य उत्तर दिशा होकर, राज्यकी अभिलाया करनेवाला मनुष्य पश्चिम दिशाके द्वारा और हतरास्य मनुष्य दक्षिण दिशाके द्वारा नीलकूटपर आरोहण करनेसे क्रमानुसार मोक्ष, राज्य और पुनर्वार राज्यको प्राप्त होता है, अन्य दिशाके द्वारा आरोहण करनेसे क्षयको प्राप्त होता है ।। ९२ ॥ ऐशाने तु यदा गच्छेद्विपुलां श्रियमाप्नुयात् । वायव्ये चाग्नित्ये महद्भयकरं भवेत् ॥ १३ ॥ यदि ईशान कोणके द्वारा आरोहण करे तो विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है । वायव्य, आग्नेय और नमत्यमें आरोहण करनेसे महाभय उप- स्थित होता हे ।। ९३ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३७९) नीलं दशभुजं शान्तं मणिकुण्डलमण्डितम् । नागहारोत्तरीयाढच वृषभस्थं विचिन्तयेत् ॥ ९४ ॥ नीलदेवकी दश भुज, शान्त, मणिकुण्डलमंडित नागहारोचरीय (सपाकी माला और वस्त्र धारण करनेवाले ) बैलपर स्थित जानकर भावना करे ॥ ९४ ॥ पूजयेद्वद्विबीजेन नमस्कृत्वा विधानतः । मन्त्रेणारोहयेच्छेलमश्वमेधफलं लभेत । प्राग्द्वारण गृहस्थस्तु आरोहेन्नीलपर्वतम् ।। ९५ ॥ फिर वहिवीजसे पूना करनेके पीछे विधिपूर्वक नमस्कार करके मन्त्र द्वारा शैलपर आरोहण करनेसे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है । गृहस्य पूर्व- द्वारसे नीलपर्वतपर आरोहण करे ॥ ९५ ॥ नीलाचल महाबाहो धर्मकामार्थमोक्षद । आरोहामि त्वच्छिखरं प्रसीदाघ हराशु मे ॥ ९६ ॥ हे अव्यय नील ! हे महाबाहो ! हे धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके देने- वाले ! मैं शिखरपर आरोहण करता हूं मेरे पापोंको हरो और प्रसन्न होओ ॥ ९६ ॥ दूर्गाकूपे तु पूर्वस्यां देवमानातकेश्वरम् । धनुस्त्रयान्तरे देवि पूजयत्केशवादिना ॥ ९७ ॥ हे देवि ! दुर्गाकूपकी पूर्वदिशामें तीन धनु के अन्तरमें आम्रातकेश्वर केशवादिके सहित पूजा करे ॥ ९७ ॥ तस्य देवस्य याम्ये तु धनुरष्टान्तरे प्रिये । गजाननं कृष्णवर्ण पूजयेद्गणनायकम् ॥ ९८॥ हे प्यारी ! उसकी दक्षिण दिशामें आठ धनु के अन्तरमें स्थित गजाकार कृष्णवर्ण गणनायककी पूजा करनी चाहिये । ,

(३८०)
योगिनीतन्त्रम् ।
तस्य पूर्वेणव धनुः प्रमाणे स्यात्रिविक्रमः।
तं प्रणम्य नरो भक्त्या सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥१९॥
उसके एक धनुःप्राण पूर्वभागमें त्रिविक्रम देव स्थित है, मनुष्य भक्ति
पूर्वक उनकी पूजा करनेसे सपूर्ण कामनाओं को प्राप्त होते हैं ॥ ९९ ॥
तस्यांशपञ्चकं यावत् धनुषो हि प्रमाणतः ।
चत्वारिंशद्वनर्मान सौभाग्यं नाम वै सरः ॥ १०० ।।
क्रीडापुष्करिणी सा तु कामाख्यायाः सुरेश्वरि ।
शक्रेणोपासितः पूर्व सहदेवः प्रजापतिः ॥ १०१ ॥
वह धनु प्रमाण स्थान उनके पञ्चमांशमें अवस्थित है तदनन्तर चालीस
धनु प्राण सौभाग्य नामक सरोवर है। हे सुरेश्वरी ! वही कामाख्या
देवीकी क्रीडापुष्करिणी है, वहा पहिले इन्द्रने देवताओंके सहित मिलित
होकर प्रजापतिकी पूजा करी थी ॥ १०० ॥ १०१॥
तस्य पश्चिमतीरे तु स्नात्वा तत्र च मण्डलम् ।
कृत्वा सम्यग्विधानेन उपवासं एमाचरेत् ॥ १०२॥
उसके पश्चिमतट में स्नान करनेके पीछे प्रदक्षिणा करके विधिपूर्वक बहा
उपवास करे ॥ १०२॥
पञ्चकेऽति तथा प्राप्ते जले स्नात्वा विधानतः।
क्रीडापुष्करिणीं गत्वा कामेशी यस्तु पूजयेत् ।
पितासन्तारयत्याशु देवीलोके प्रमोदते ॥ १०३ ॥
अन्य दिन पंचके जलसे विधिपूर्वक स्नान क्रीडा, पुष्करिणी गमन
करनेके पीछे कामेश्वरीकी पूजा करनेपर मनुस्य पितरोंको तार देवीलोकमें
जाकर आनन्द प्राप्त करता है ॥ १०३ ॥

भापाटीकासमेतम् । (३८१) सौभाग्यसरिदावर्ते विमले मानसप्रिये । नमोकारो वषट् स्वाहा पापं हर नमोस्तु ते । मन्त्रण मजनं कृत्वा कामेनायें निवेदयेत् ॥ १०४ ।। सौभाग्यसरिदाव विमले मानसप्रिये । नमोङ्कारौ चपट् स्वाहा पापं हर नमोस्तुते" इस मन्त्रद्वारा मज्जन करनेके पीछे काममंत्रसे अर्घ्य निवेदन करना चाहिये ॥ १०४ ॥ ऐशान्ये तस्य कूपस्य लोहित्यो नाम वै सरः। स्नात्वा ध्रुवेण देवेशि मुच्यते भवबन्धनात ।। १०५ ॥ इस कुण्डके ईशानकोणमें लोहित्यनामक सरोवर है, हे देवेशि ! वहां ध्रुवमंत्रसे स्नानकरनेपर मनुष्य संसारके बंधनसे छूट जाता है ।। १०५ ॥ अग्निकुण्डं कालहस्तं यामलं नाम वै सरः। तत्र स्नात्वा च पावन रूपवान् जायते भुवि ।।१०६ तदनन्तर अग्निकुण्ड, कालहस्त और यामल नामक सरोवर है, वहां पार्श्वमन्त्रसे स्नान करनेपर पृथ्वीमें रूपवान् होकर जन्मग्रहण करता है ॥१०६ ॥ पञ्चहस्तं तु नत्ये सौभाग्ये परमेश्वरि । गङ्गासारं विजानीयात्सर्वतीर्थोद्भवं जलम् ॥ १०७ ॥ हे देवि ! उसके नैर्ऋत्यकोणमें पंचकहस्त गंगासरोवर है, उसमें सर्व तीर्थसंमूत जल विद्यमान है ॥ १०७ ॥ कोलामध्यगतं कुण्ड सौभाग्यं परिकीर्तित्ततम् । तिनाकोटयर्द्धकोटी च दिवि भुत्यन्तरिक्षके ॥१०८।। सौभाग्ये तानि सर्वाणि मन्दीभूते दिवाकरे । तस्मात्समाचरेत्स्नानं कर्तव्य मकर रवौ ॥ १०९ ॥ तुलाविषुवसंक्रान्त्यादिषु यः स्नानमाचरेत् । अभायों लभते भार्या देवीलोके प्रमोदते ।। ११० ॥

(३८२) योगिनीतन्त्रम् । कोलाके बीचवाले तीर्थका नाम सौभाग्य कहागया है, स्वर्ग, आकाश और पृथवीमें साडेतीन करोड कुण्ड है, उन सबकोही सौभाग्य जाने । सूर्यदेवके मकरगत होने और दिवाकरके मन्द होनेपर उनमें सान करना चाहिये । तुला विषुव संक्रमण (अयनसंक्रान्ति ) में वहा मानकरनेसे भार्याहीन मनुष्य भार्या प्राप्तकरके देवीलोकमें गमनपूर्वक मनान्द भोगते हैं ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ ११० ।। गोधिकाकररूपेण व्यक्ताव्यक्तशिला च या अनन्ताख्यं विजानीयात्कुण्डं तस्योपरि प्रिये ॥११॥ हे प्रिये | गोधिकाकाररूपा (गोयके आकार ) जो न्यक्ताव्यक्त शिला है, वही अनन्ताख्य कुण्ड है ॥ १११ ॥ अनन्तात्पश्चिमे पार्श्वे पूर्वे कृष्णशिला च या। वराहत विजानीयात्सर्वतीर्थोद्भवं जलम् ॥ ११२ ॥ उसके ऊपरिभाग और पूर्वपार्श्वदेशमें जो कृष्णवर्ण शिला है, वही वराहकुण्ड है उसमें सर्वतीर्थसंभूत जल विद्यमान है ॥ ११२ ॥ तुलायां वाथ कन्यायां शुक्लाष्टम्यां विशेषतः । स्नात्वा संवीक्षयेद्देवीमग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ११३॥ तुला वा कन्यामें और विशेषकर शुक्लाष्टमीमें स्नान करनेके पीछे देवीका दर्शन करनेसे अमिष्टोमयज्ञके फल को प्राप्त होता है ॥ ११३ ॥ तर्पयेत्पितृदेवांश्च काम्यानन्यांश्च तर्पयेत् । सर्वतीर्थेषु देवेशि न कुर्यात्काम्यतर्पणम् ॥ ११ ॥ वहा पितरोंका तीर्पण और अन्यान्य काम्यतर्पण करना चाहिये । हे देवेशि ! सब तीर्थों में काम्यतर्पण न करै ।। ११४ ॥ कुण्डेत्र चाश्वक्रान्ते चाप्यगत्स्ये च प्रयागके

"
भाषाटीकासमेतम् । (३८३)
वाराणसीदे चैव भार्गवे मेरुपुष्करे।
गङ्गाहद ब्रह्मसरे दुर्गाकूपे च भावयेत् ॥ ११५ ॥
इस कुण्डमें, अश्वतीर्थ, आगस्त्य प्रयाग वाराणसीहद, भार्गव
मेरु पुष्कर, गंगाहूद, ब्रमसर और दुर्गाकूपमें काम्यतर्पण करना
चाहिये ॥ ११५ ॥
पृथ्वीप्रदक्षिणे यच्च फलं प्रोक्तं महर्षिभिः ।
तत्फलं प्राप्यते तस्य कुण्डस्यैव प्रदक्षिणे ॥ ११६ ॥
हे देवि ! महर्षियोंने पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करनेका जो फल कहा
इस कुण्डकी प्रदक्षिणा करनेसे वही फल प्राप्त होता है ।। ११६ ।।
कुण्डस्यानेयभागे च तुलादूरे व्यवस्थितम् ।
कुम्बलाख्यं शिवं दृष्ट्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥११७॥
कुण्डके अग्निकोणमें तुलापरिमित (एक प्रकारकी नाप ) दूरमें अव-
स्थित कम्बलात्यशिवका दर्शन करनेपर मनुष्य संसारवन्धनसे छूट
जाता है ॥ ११७॥
स्वरेण भावयुक्तेन नत्यन्तेन प्रपूजयेत् ।
नमो नमस्ते देवेश मन्त्रविद्भिःसुपूजित
लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु अनन्त पुरुषोत्तम ।
देवदानवगन्धर्वैः सदाचितपदाम्बुज ।
नमः कमलनाभाय कमलापतये नमः ॥ ११९ ।।
भावयुक्त चित्त द्वारा काममंत्रसे प्रणाम पूर्वक पूजा करनी चाहिये
हे देवाधिदेव ! भाप मन्त्रोंसे पूजित और आभूषणों से अलंकृत हैं. हे पुरु-
पोत्तम ! आप लक्ष्मीके पति और अनन्त हैं देवता दानव गंधर्व आपके
चरणोंको पूजा करते हैं, आप कमलनाभ और कमलाके पति, मै आपको
नमस्कार करता हूं ॥ ११८ ॥ ११९ ॥

. (३८४) योगिनीतन्त्रम् । कृष्णाकृति विष्णुरूपं नमस्कृत्वा मम प्रिये । स्तुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा ततो देवीगृहं ब्रजेत् ॥१२०॥ इस मंत्रसे कृष्णाकृति विष्णुरूपको नमस्कार स्तुति और प्रदक्षिणा करके फिर देवीगृहमें गमन करे ॥ १२० ॥ कृत्वा शवासनं जप्त्वा वीक्षेत्तारेण शाङ्कार । स्पृष्ट्वा मदनप्रायेण नमः कामेन शाङ्कार ॥ १२१ ।। पञ्चामृतेन तोयेन स्नापयेत्सुशुभेजलैः । मूलमन्त्रेण चाचम्य मंत्रेण च विमार्जयेत ॥ १२२ ॥ हे शाङ्करी ! वहां जाय, शवासनमें जाय, जपकर तारामंत्रसे वीक्षण ( देखना ) और मदनप्राय मंत्रसे स्पर्श और काममंत्रसे नमस्कार करके पञ्चामृत जल और शुद्ध वार द्वारा स्नान करावे फिर मूल मंत्रसे आचमन और पत्रमंत्रसे मार्जन करके ॥ १२ ॥ १२२ ॥ कामतन्वं कुशीतेन लिखेद्रक्षो मम प्रिये । वामे कामं लिखित्वा तु तत्र पूजां समाचरेत् ॥१२३।। दक्षिण भागमें कुशीत (लालचन्दन ) द्वारा कामतंत्र लिखना चाहिये वाममें कामतंत्र लिखकर वहां पूजा करे ।। १२३ ॥ देव्यङ्गे चित्रके पुष्टिमणौ खड्ने च शां श्मशाने च महालिङ्गे प्रतिमायां जलं तपा। शालग्रामे यन्वतन्ने मण्डलञ्च विसर्जयेत् ॥१२॥ देवीके अंगमें, चित्रपटमें, पुष्टिमणिमें, खड्गमें, श्मशानमें, महालिंगमें, प्रतिमामें, जलमें, मंत्रमें, तंत्रमें, शालग्राममें, मंडल वर्जित है ॥१२॥ महाहोमे मण्डलकृन्महापातकमाप्नुयात् । न ग्रहाति च तत्पूजां पदं त्यक्त्वा व्रजेत्पुरम्॥१२५॥ " भाषाटीकासमेतम् । (३८५) महामोहमें मंडल करनेसे महापातक प्राप्त होता है उसमें मंडल करनेपर वह स्थान छोड़कर अपने घरको चला जाय ॥ १२५ ॥ न च योन्यन्तरगतं श्मशानस्य च पूर्वतः। महामण्डलकं देव्याः संस्थितं तत्र पूजयेत् ॥ १२६ ।। अन्ययोनिमें भी मंडल न करे श्मशानके पूर्वमागमें देवीका महामंडल स्थित है, वहां पूजा करे ॥ १२६ ॥ सप्ताशीतिधतुर्मानलक्षरक्तशिला च या। अष्टहस्तं सपुलकं लिङ्गं लक्षार्द्धसंयुतम् ॥ १७ ।। चतुर्हस्तसमक्षेत्रे पश्चिमे योनिमण्डलम् । बाहुमात्रमितश्चैव प्रस्तारे द्वादशांगुलम् । आपातालं जलं तत्र योनिमध्ये प्रतिष्ठितम् ॥१२८॥ सत्तासी (८७) धनुः परिमाण जो लक्ष रक्तशिलायुक्त और सपुलक (आठ हाथ परिमित दिव्य ) लिगयुक्त चतुर्हस्तसम क्षेत्र पश्चिममें अव- स्थित है वही योनिमंडल है. वह योनिमध्ये वाहुमात्र परिमित है, विस्तार में बारह अगुल जल पातालपर्यंत प्रतिष्ठित है ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ सर्वशी यमुनापारा कावेरी च सरस्वती। ब्रह्मकुण्डे समुद्भूतं मणिकूटे च निर्मलम् ।। १२९ ।। याति नास्त्यन्न सन्देहो गत्वा वाराणसीदे। प्लावित्वा मण्डलं देव्या व्यक्तं ब्रह्मसरे प्रिये ॥१३०॥ उर्वशी, यमुनाधारा, कावेरी और सरस्वतीने ब्रह्मकुण्डसे निकलकर मणिकुण्डमें गमन किया है, इसमें संदेह नहीं । तदनन्तर वाराणसी इदमें जानेके पीछे देवीका मण्डल प्लावित (धोय ) करके ब्रह्मसरोवरमें प्रगट हुई हैं ॥ १२९ ॥ १३० ।।

(३८६) योगिनीतन्त्रम् । मासत्रयाधिक षष्ठिवर्षे शुष्कवला भवेत् । द्विमासं विदिनञ्चैव निर्विघ्नं तिष्ठति ध्रुवम् । षण्मासं सुस्थिते देवि महाविपत्करी स्मृता ॥१३१॥ साठ वर्ष तीन महीनेमें शुष्कवला (जिसका रजोवल विनष्ट होगया हो) होती है वह दोमास तीनदिन निर्विघ्न अवस्थित होती है छैमास भवस्थिति करनेपर विपत्कारी हो जाती है इसमें सन्देह नहीं ॥ १३१ ।। कुल्यधारा यदा शुष्का विण्मूत्रं सन्त्यजेदहिः । वर्षे वर्षे शुकधारा यदा भवति शंकरि ॥ १३२ ॥ बाह्यदेशे च दुर्भिक्ष रोगोभवति निश्चितम् । गर्भ शुष्के राज्यनाशः सर्वशुप्के फलं शृणु ॥ १३३ ।। जब कुल्य (नहर ) की धारा सूखती है. तब बाहर मलमूत्र त्यागना चाहिये । हे शंकार ! जय वर्ष वर्ष में शुष्कधारा होती है, तब बाह्य देशमें दुर्भिक्ष और रोग होता है इसमें सन्देह नहीं । गर्भ शुष्क होनेपर राज्यनाश और सर्वशुष्क होनेपर उसका फल सुनो ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ राज्यभ्रष्टो भवेद्राजा परराष्ट्रसमागमः। एवं बहुविधा दोषा सम्भवन्ति वरानने ॥ १३४ ॥ शान्तिं कुर्याद्विधानेन दोषप्रशमनाय वे। घृतप्लुनः करवीरः द्विलक्षं होममाचरेत् । पायस रक्तपद्मा ह्यथवा श्रीफले सुधीः ॥ १३५॥ उससे राजा राज्यभष्ट और परराष्ट्रसमागम अर्थात् अपने राज्यमें दूसरे राजाका अधिकार होता है । इस प्रकार अनेक माँतिके दोष संघटित होते हैं उनमें शान्ति करनी चाहिये बुद्धिमान् घृतप्लुत करवीर (घृतमें मिलाकर कनेरके फूलों ) से दो लक्ष होम करै । अथवा लाल कमल, खीर, वा श्रीफल ॥ १३४ ॥ १३५ ।। , भाषाटीकासमेतम् । (३८७) किम्वा बिमधुभिर्भद्रे गोधामासद्धिलक्षकम् । त्रिमधुर्मेलनाधत्स्याच्छर्करामधुसर्पिषाम् ॥ १३६ ॥ किम्वा त्रिमधुद्वारा वा गोधामांस (गोयकामांस) द्वारा यह.दो लक्ष होम करे। शर्करा, मधु और घृत यही तीन मिलनेसे इनको त्रिमधु कहते हैं ॥ १३६ ॥ आवर्जितेन क्षीरेण कृतयुक्तेन होमयेत् ।। १३७ ।। घृतयुक्त आवर्मित क्षीरद्वारा होम करे ॥ १३६ ॥ अनन्तस्य पश्चिमे च असिनाम्ना स्थिता नदी। तस्या धारा पश्चिमे या सा भवेद्वरुणा नदी। तस्याः स्वच्छोदकं पीत्वा न पुनर्जायते भुवि ।।१३८॥ फिर अनन्तकी पश्चिम दिशामें असिनामक एक नदी है, उसके पश्चिममें लो धारा है उसका नाम वरुणा नदी है, उसका स्वच्छ जल पीनेसे फिर पृथ्वीमें जन्म लेना नहीं पड़ता ॥ १३८ । सिद्धेश्वरं कोटिलिङ्गं हेरुकं मुक्तिमण्डलम् । तथा वाराणसीक्षेत्र देव्या ह्यन्तहं स्मृतम् ।। १३९ ।। सिद्धेश्वर, कोटिलिग, हेरुक, मुक्तिमण्डल, वाराणसी क्षेत्र, यह सब देवीके अन्तर्गृह कहे गये हैं ॥ १३९ ॥ पुस्तके प्रतिमायां च स्थण्डिले च महेश्वरि पादुकायां चित्रपटे तथा खड्नेऽनले जले ॥ १४० ॥ पुस्तक, प्रतिमा, स्थण्डिल, पादुका, चित्रपट, ख, अनल, जल॥११. लौहित्ये चैव गङ्गायां सागरे तीर्थसङ्गमे । प्रतिपीठे बिल्वमूले लिङ्गस्था देविमर्चयेत् ।। १४१ ।। कथ्यते या कालशिला तत्पीठं मणिपूरकम् । अन्तहे महापीठे तदेव मणिपीठकम् ।। १४२ ॥

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,
(३८८)
योगिनीतन्त्रम्।
लौहित्य, गङ्गा, सागर, तीर्थसंगम, प्रतिपीठ, बिल्वाल और
विल्वमुखमें लिगस्था देवी की पूजा करनी चाहिये । जिसको कालशिला
कहते हैं, वही मणिपूरक पीठ, अन्तर्गृह महापीठ और वहीं मणिपीठ
कही गयी है ॥ १४१ ॥ १४२ ॥
शिलायां पर्वतामेच तथा पर्वतगहरे ।
नित्यश्च पूजयेदेवी नरो भक्तिसमन्वितः।
वाराणस्यां पूर्णफलं द्विगुणं पुरुषोत्तमे ॥ १४३ ॥
मनुष्यगण भक्तियुक्त होकर शिलामें, पर्वताममें, पर्वतके गहरमें
नित्य ही देवीकी पूजा करें। वाराणसीमें देवीकी पूजा सम्पूर्ण फल-
दायिनी और पुरुषोत्तममें उससे दूना फल प्रदान करती है ॥ १४३ ॥
सर्वक्षेत्रे च तीर्थे च कालगिरिसमं फलम् ।
कौमारेऽष्टगुणं प्रोक्तं चौहारे तत्सम फलम् ॥ १४४ ॥
समस्त क्षेत्र और तीर्थमें पूजा करनेसे कालगिरिकी समान फल होता
है कौमारमें अष्टगुण और चौहारमें उसीके समान फल होता है ॥१४॥
आर्यावर्ते मध्यदेशे ब्रह्मावर्ते श्रीहट्टके ।
मणिपूरसमं देवि पूजिता फलदायिनी ॥ १४५ ॥
हे देवि ! आर्यावर्त, मध्यदेश, ब्रह्मावर्त और श्रीहट्टमें मणिपूरको समान
फलदायिनी होती हैं ॥ १४५ ॥
आगस्त्ये चाश्वमेधिके चतुर्गुणफलं भवेत् ।
तस्य चतुर्गणं देवि जल्पेश्वरे च निश्चितम् ॥१४६॥
आगस्त्य और आश्वमेधिकमें उससे चतुर्गुण और जरूपेश्वर में उससे
चतुर्गुण फल निर्दिष्ट है ॥१४६॥
विराजते यत्र योनिः फलं दशगुणं स्मृतम् ।
तस्य चतुर्गुणं देवि एकाने परमेश्वरि ॥ १४७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (३८९)
जहा योनि विराजित है, वहां उससे दशगुणफल प्राप्त होता है । हे
परमेश्वरि ! एकाममें उससे चतुर्गुण ॥ १४७ ॥
मणिकटे शतगुणं मणिशेले सहस्रकम् ।
जले स्थले चाश्वतीथे युक्तं दशगुणं फलम् ॥ १४८ ॥
मणिकूट में उससे शतगुण, मणिशैल में उससे सहस्रगुण, अश्वतीर्थमें जलमें
वा स्थलमें उससे दशगुण फल कहा गया है ॥ १४८ ॥
जले स्थले काम्यरूपे पूजनाच्च समं फलम् ।
कामरूपे यथा विष्णुः सर्वश्रेष्ठो महेश्वरि ।
कामरूपे तथा देविपूजा सर्वोत्तमा स्मृता ।। १४९ ॥
कामरूपके जलस्थलमें सर्वत्र पूजासे समानफल प्राप्त होता है । हे महे-
श्वरि ! जिस प्रकार विष्णु सर्वश्रेष्ठ और लक्ष्मी सर्वोत्तम है ऐसे ही काम-
रूपमें देवीकी पूजा सर्वोत्तम होती है ॥ १४९ ॥
कामरूपं देविक्षेत्र कुत्रापि तत्सम न च ।
अन्यत्र विरला देवी कामरूपे गृहे गृहे ।। १५० ॥
कामरूप देवीक्षेत्र है, उसकी समान अन्यत्र कहीं नहीं है, देवी अन्यत्र
विरला है, किन्तु कामरूपमें घरपर विराजमान है ॥ १५० ॥
कामाख्यायां महामायां यः पूजयति मानवः ।
सर्वकाममिह प्राप्य परलोके शिवो भवेत् ॥ १५१ ।।
जिस मनुष्यने कामाख्या में माहामायाकी पूजा की है उसनेही इसलोको
सर्व काम और परलोकमें शिवका स्वरूप लाभ किया है इसमें सन्देह
नहीं ॥ १५१ ॥
न हि तत्सदृशं कार्यमन्यत्र भुवि विद्यते।
वाञ्छितार्थ नरो लब्धा चिरायुर्भवति ध्रुवम् ॥१५२॥

, (३९०) योगिनीतन्त्रम्। उसके समान कार्य अन्यत्र और कहीं भी नहीं है, उससे मनुष्य वांछि- तार्थ प्राप्त करके चिरायु हो सकता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ १५२.॥ ... स्नानकाले चार्द्धरात्रे महापूजासमापने। सानिध्य महामायाया नैवः गच्छेत्स्पृशेन च ॥१५३ सिद्धिकी कामना करनेवाला मनुष्य स्नानकाल आधीरात और महापूजाके अवसान समयमें महामायाके निकट गमन वा स्पर्श न करै ॥ १५३ ॥ कुमारणे महाष्टम्यां निशायाश्च दिनक्षये । युगादौ कार्तिके मासि देवों पश्येन वै नरः ॥ १५४ ॥ कुमारणमें, महाष्टमीमें, रात्रिमें दिनक्षय अर्थात् सायंकालमें युगादिमें और कात्तिकमासमें देवीका दर्शन न करें ।।१५४ ॥ देव्या नीराजनं शूद्रो ह्यारति वा प्रपश्यति । रूपवान् स भवेदेवि सद्गतिं लभते ध्रुवम् । विधवा ब्राह्मणी पश्येन्महामायाश्च सर्वदा ॥ १५५ ॥ जो शूद्र देवीको नीराजन वा आरतियुक्त दर्शन करते हैं, वह रूपवान् होकर सद्गति प्राप्त करते हैं विधवा ब्राह्मणी सदाही महामायाका दर्शन मारै ॥ १५५ ॥ स्नानकाले च मध्याह्न निर्माल्यस्य विसर्जने । न पश्येच स्त्रियो देवी युवत्यश्च विशेषतः ॥ १५६ ।। स्तानके समय, मध्याहमें, निर्माल्य विसर्जन के समय स्त्रीगण और विशेष पर युनतीगण देवीका दर्शन न करै ॥ १५६ ॥ पोषाष्टम्यां नवम्याच त्रयोदश्यां तथैव च ।' •न गच्छेत्पार्वतीगेह कर्कटाद्यदिनत्रये ।। कालेप्वेतेषु स्पृष्टायां शापश्चायुक्षयं लभेत् ।। १५७ ॥ .1 - भापाटीकासमतम् । (३९१) पौयके महीनेकी अष्टमी, नवमी और त्रयोदशीमें, कर्कटे आदि तीन दिन, पार्वतीके गृहमें गमन करै। इन सब कालमें सर्य करनेसे शाप प्राप्त और दर्शन करनेसे आयुः क्षय होती है ॥ १५७ ॥ दीक्षितस्यार्चना शस्ता नादीक्षितस्य चैव हि । अत एव च दीक्षार्थी रक्ताम्बरधरस्तथा ॥ १५८ ॥ रक्तचन्दनभूषाढयः नागस्तिलकक्रियः। मृदुचर्मण्युपाविश्य दीक्षां गृहाति भक्तितः ॥ १५९ ॥ दीक्षितमनुष्यकेही पक्षमें पूजादि प्रशस्त है अदीक्षित के पक्षमें यह सब प्रशस्त नहीं है । इस कारण दीक्षाप्रार्थी मनुष्य भक्तिभावसे लाल वस्त्र । पहर और लालचन्दनसे विभूपित हो नागज (नागकेशर ) का तिलक धारणकर कोमल आसन पर बैठे ॥ १५८ ॥ १५९ ॥ दीयने परमं ज्ञानं क्षीयते पापबन्धनात् । . अतो दीक्षेति नाम्ना च ख्यायते तत्त्वचिन्तकैः॥१६० परमज्ञान देती है और पापबन्धनक्षय अर्थात् छेदन करती है, इसीकारण तत्त्वचितक ऋषियों ने इसका (दीक्षा ) यह नाम प्रसिद्ध किया है ॥१६० मनसा क्रियया वाचा यच्च पापमुपाजितम् । निःशेष नाशयित्वा च परं ज्ञानं प्रदास्यति । अतोदीक्षेति लोकेऽस्मिन् कीर्त्यते शास्त्रकोविदः१६१॥ मन कर्म और वचनसे जो पाप उपार्जन किया है. यह निःशेषरूपसे नष्ट करती है और परमज्ञान देती है. इसी कारण शास्त्र जाननेवालोंने लोको इसका 'दीक्षा' यह नाम कहाहै ॥ १६१ ॥ विज्ञानफलदा चाये द्वितीये लयकारिणी। तृतीये मुक्तिदा प्रोक्ता ततो दीक्षेति गीयते ॥ १६२ ।। -

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(३९२)
योगिनीतन्त्रम् ।
प्रथम विज्ञान फलको देनेवाली, दूसरे लय करनेवाली और तीसरे
मुक्ति देनेवालीहै, इसी निमित्त लोकमै 'दीक्षा' यह नाम गाया
जाताहै ॥ १६२ ॥
द्विधा दीक्षा च साधारा निराधारा तथैव च ।
नित्ये नैमित्तिके काम्ये यस्यां चैवाविकारिता॥१६३॥
दीक्षा दो प्रकारकी है, साधारा और निराधारा नित्य नैमित्तिक और
फाम्यमें जिसकी अधिकारिता है ॥ १६३ ॥
साधारा चैव सा मोक्ता निराधारा च मुक्तिदा।
निर्मला सा च विज्ञेया कथ्यते तत्त्वचिन्तकैः ॥१६४]
कुण्डश्च मण्डलं कृत्वा सत्पात्रेभ्यः प्रदीयते ।
ततो दीक्षा फलवती ह्यन्यथा विफला भवेत् ॥१६५॥
(वही साधाराहे ) जो मुक्तिदा है, अतएव निर्मलाको निराधारा
जानो । कुण्ड और मण्डलकी रचना करके सत्तात्र में दीक्षाप्रदान करनेसे
वह फलवती होती है, अन्यथा विफल होती है ॥ १६४ ॥ १६५ ।।
अपात्रेभ्यः प्रदत्ता च दीक्षा सापि महेश्वरि ।
मनोव्यापारमात्रेण निर्वीर्या भवति ध्रुवम् ॥ १६६ ॥
अपात्रमें दीक्षाप्रदान करनेसे मनके व्यापारमात्रसेही (मनो योग पूर्व
विचार करनेसे ) वह निवार्य होजाताहै, इसमें सन्देह नहीं ।। १६६ ॥
अपुत्रो मृतपुत्रश्च कुण्डो वा वामनस्तथा।
कुनखो श्यावदन्तश्च त्वधिकाङ्गः स्त्रियाजितः ।
आचार्यो यो भवेदेवि तत्सकाशात्कदाचन ।। १६७ ।।
हे देवि ! अपुत्र, मृतपुत्र, कुण्ड ( संज्ञाविशेष ) वामन (बौना)
कुनखी, श्यावदन्त अधिकाग स्त्रीजित (स्त्रीके वशीभूत रहनेवाला)
आचार्य के निकट से दीक्षा ग्रहणकरनी उचित नहीं है ॥ १६७ ॥

भापाटीकासमेतम।
सुमूर्तिश्च कुलीनश्च ज्ञानाचारो गुणैर्युतः ।
समयाचारविञ्चैव मन्त्रं दद्याद्विचक्षणः ॥ १६८ ॥
सुमूर्ति, कुलीन, ज्ञानाचार, गुणवान् और समयाचारका जाननेवाला
मी दीक्षा प्रदान करे ॥ १६८ ॥
न गृहीयादेवि दीक्षा सत्यमेतद्भवीमि ते।
मातामहापितुश्चैव मन्त्रं न गृहीयानरः।
स्वमलधं स्त्रीप्रदत्तं संस्कारेव शुध्यति ॥ १६९ ॥
पिता और मातामहके निकटसे मत्र ग्रहण करना उचित नहीं है ।
स्वप्नलब्ध और स्त्रीका दिया मन्त्र संस्कार द्वारा शुद्ध होता है ॥१६९ ॥
स्वप्नलब्धमन्त्रसिध्य गुरोःप्राणं निवेशयेत् ।
वटपन्ने कुंकुमेन लिखित्वा ग्रहणं तथा ।
ततः शुद्धिमवाप्नोति अन्यथा विफलं भवेत् ॥१७०॥
स्वप्नलब्ध मन्त्र सिद्ध करना हो तो कलशमें गुरुका प्राण निवेशित
करे । तदनन्तर वरपत्रपर रोलीसे लिखकर ग्रहण करे, इसीसे मन्त्र शुद्ध
होता है, नहीं विफल हो जाता है ॥ १७ ॥
अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ।
रवेः संक्रान्तिदिवसे युगादौ च सुरेश्वरि ।। १७१ ।।
मन्वन्तरासु तिथिषु चतुर्दश्यष्टमीषु च ।
महापूजादिने वापि शिप्यशुद्धिदिनेषु च ।
गृहीयात्मयतो भूत्वा भक्तिश्रद्धासमन्धितः॥ १७२ ॥
भक्ति श्रद्धायुक्त मनुष्य सयत ( एकाग्र) मनहोकर अयनमें विपुवमें
चन्द्र सूर्यके ग्रह्ण में, रविकी संक्रान्तिके दिन, युगादिमें, मन्वन्तर में,
चतुर्दशी और अष्टमी तिथिमें महापूजा वा शिष्य शुद्धिके दिन दीक्षा
ग्रहण करे ॥ १७१ ॥ १७२ ॥

- (३९४) योगिनीतन्त्रम् । देवीपूजाविधौ यस्तु मतुप्यो भक्तितत्परः। स एव दीक्षा नान्यस्तु सर्वशास्त्रार्थतत्परः ॥ १७३ ।। जो मनुप्य देवीकी पूजा में भक्तितत्पर होता है। उस सर्वशास्त्रार्थ- तत्पर मनुष्यको दीक्षा ही सकल जाननी चाहिये ॥ १७३ ।। चैत्रे दुःखाय दीक्षा स्याद्वैशाखे सर्वसिद्धिदा। ज्येष्ठे मृत्युप्रदा सा स्यादापाढे बहुवत्सका ॥ १७४ ॥ चैत्रमें दीक्षा दुःखदायक, वैशाखमें सर्वसिद्धिदेनेवाली ज्येष्ठ में मृत्यु देने. ली. आषाढमें बहुवत्सदायिनी ।। १७४ ॥ श्रावणे बहुहानिः स्याद्भाद्रे च दुःखदा मता। आश्विने सर्वसिद्धये सा कार्तिके ज्ञानवृद्धिदा॥१७५॥ श्रावणमें बहुत हानिकरनेवाली, भाद्रमें दुःखदायिनी. आश्विनमें सर्वसिद्धि नेवाली और कार्तिकमें ज्ञानकी वृद्धि देती है ॥ १७५ ॥ शुभकृrमार्गशीर्षे च पौपे ज्ञानविनाशिनी । माघे च मेधावृद्धिः स्यात्फाल्गुने सर्वसस्यकृत् ॥१७६ अगहनमें शुभकारी, पौपमें ज्ञाननाशिनी, माघमें मेधा (बुद्धि) की वृद्धि करनेवाली और फाल्गुनमें सर्वसस्य (धान्य ) दायिनी होती है॥ १७६ ॥ ग्रहणे च महातीर्थे नास्ति कालस्य निश्चयः । गयायां भास्करक्षेत्रे विरजे चन्द्रपर्वते ॥ १७७ ॥ कोकणे च मतंगे च तथा कन्याश्रमेषु च । नं गृहीयात्ततो दीक्षा. तीर्थेवेतेषु पार्वति । । कर्तव्य दीक्षितः शिष्यगुरोः शासनमुत्तमम् ॥.१७८॥ । ग्रहण और महातीर्थमें कालनिर्णय नहीं हैं, गया, भास्करक्षेत्रमें, विरजमें, चन्द्रपर्वतमें, कोङ्कगमें, मतंगमें - और कन्याश्रममै - इन , सब .

भाषाटीकासमेतम् । (३९५) तीथोंमें दीक्षाग्रहण न करें दीक्षित शिष्य गुरुकी उसम आज्ञा प्रतिपालन करै ॥ १७७ ॥ १७८॥ देवताहृदयो यः स्याद्गुरुपूजापरायणः ॥ पुरश्चरणचारी स्याद्विशुद्धात्मा जितेन्द्रियः ॥ १७९ ।। जो शिष्य इष्टदेवताको हृदयमें रखकर गुरुपूजापरायण पुरश्चरणकारी विशुद्धामा और जितेन्द्रिय होता है ॥ १७९ ।। मन्त्रयन्त्रपुराणानि भारतश्च गयादिषु । गच्छत्यधीते-विधिवद्गुरुणाऽऽज्ञापितः सदा ।।१८०॥ वही यथार्थ शिष्य है वह गुरुकी आज्ञाग्रहण करके मंत्र, यन्त्र पुराणादि अध्ययन और भारतादिपाठ तथा गयागमनादि सभी कार्य करता है ॥ १८॥ न स्त्रीहिंसा च कर्त्तव्या प्रसङ्गं च महेश्वरि ।। १८१ ।। हे महेश्वरि । स्त्रीहिसा और स्त्रीप्रसग उसको नहीं करना चाहिये १८१ सयवं चक्रवाकञ्च क्रौञ्च पारावतं तथा । नीलशैलादि शैलश्च सदा तस्य प्रियो भवेत् ॥१८२॥ यव, चक्रवाक, क्रौच. पारावेत और नीलशलादि पर्वत उसके प्रिय होते हैं ॥ १८२ ॥ इत्येवं दीक्षिते लोकै कर्त्तव्यं कर्म नित्यत्तः । रात्रौ सुखेन भोक्तव्यं ध्यात्वा संपूज्य यत्नतः ॥१८३ दीक्षितमनुष्य इसपकार दिनकी विधि समापन करके पूजा ध्यान करता हुआ रात्रिम यत्नसहित भोजन करै ॥ १८३ ॥ ततोपि पूर्वदिवस हविष्य वा निरामिणम् । भुक्त्वा परस्मिन्दिवसे हविष्याशनमाचरेत् ॥१८४|| (३९६) योगिनीतन्त्रम् । उसके पूर्वदिनमें हविष्य निरामिष भोजन करके दूसरे दिन हविष्य करे ।। १८४॥ चलं पक्त्वा तु भागाई देवताये निवेदयेत् । तदई गुरवे दद्याच्छिष्टं तु स्वयमेव हि ।। १८५ ॥ चरु पकनेके पीछे देवताको अर्धभाग निवेदन करके उसका अर्द्ध भाग गुरुको दे अवशिष्ट स्वय गुरुके सहित भोजन कर ॥ १८५ ॥ भुज्याञ्च गुरुणा साई सर्वदीक्षास्वयं विधिः । मन्त्रं दत्वा गुरुश्चैवाप्युपवासी यदा भवेत् ।। १८६ ॥ मोहान्धकारनरके कृमिर्भवति नान्यथा । दीक्षा कृत्वा यदा मन्त्री तूपवासं चरेद्यदि । तस्य देवः सदा रुष्टः शापं दत्त्वा व्रजेत्पुरम् ॥१८७॥ सर्वदीक्षामेंही यह विधि हे । गुरु मन्त्र देकर यदि उपवास करै तो वह मोहान्धकार नरकम कमि होकर वास करते हैं और शिष्य यदि दीक्षाग्रहण करके उपवास करै तो देवता उससे रुष्ट हो उसको शाप देकर अपने स्थानको चले जाते हैं ॥ १८६ ॥ १८७ ।। इति श्रीयोगिनीतन्त्र सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे चतुर्विंशतिसाहले द्वितीयभागे भापाटी काया पाठ पटल ॥ ६ ॥ श्रीभगवानुवाच । शोमने निर्जने देशे निगूढे शुभमण्डपे ॥ पुष्पप्रकरसंकीर्णे गन्धपुष्पादिवासिने ॥ १ ॥ तृतीयवर्जिते देशे पशुदृष्टिविवर्जिते । फलिकादौ ततो मन्त्री मन्त्रं सम्यक्समुद्वरेत् ॥२॥ श्रीभगवान् बोले-तदनन्तर मन्त्री शिष्य शोभायमान, निगूढ, निर्जन, तृतीयवर्जित, पशुदृष्टिरहित अर्थात् जहा पशुकी दृष्टि न ,

भापाटीकासमेतम् । (३९७)
पड़ती हो पुप्पोंसे समाकीर्ण, गंधपुष्पादिसे सुगंधित प्रदेशमें, सुभमण्डप
और फलिकादि तीर्थ आदिमें मंत्रका उद्धार करै ॥ १ ॥ २ ॥
समुद्वारं विना यन्त्रमत्यल्पफलदं मतम् ।
यन्त्र समुद्धरेन्मन्त्रं सम्पूर्णफलदं स्मृतम् ॥ ३ ॥
यंत्रके विना उद्धार करनेसे अल्पसेभी अल्पफल होता है और यंत्र में
समुद्धार करनेसे संपूर्ण तथा पूरित फल प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
न भूमौ बिलिखेद्वर्ण पुस्तके तु समालिखेत ।
न भूमौ पुस्तकं स्थाप्यमाहरेड्डाकिनी यतः ॥ ४ ॥
भूकम्प अहणे चैव त्वक्षर वाथ पुस्तकम् ।
भूमौ संस्थाप्य दवशि स मूखों जन्मजन्मनि ।
परं भवति देवेशि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥५॥
भूमिमें वर्ण न लिखकर पुस्तकमें लिखे, पुस्तक भूमिमें न रखे, ऐसा
होनेसे डाकिनी हरण करती है । हे देवेशि ! भूकम्पमें, ग्रहणमें पुस्तक वा
अक्षर भूमिमें रसनेसे जन्म जन्ममें मूर्खता प्राप्त होती है इस कारण हे
देवेशि 1 कदाचित् ऐसा कार्य न करै ।। ४ ॥ ५ ॥
वंशेन न लिखेद्वर्ण तस्य हानिर्भवेद्धवम् ।
ताम्रसूच्या हि विभव भजते त्वक्षय नरः ॥ ६॥
जो मनुष्य चाँसकी लेखनीसे वर्ण लिखता है, उसकी निश्चयही हानि
होती है, तावेकी सुईसे लिखनेपर अक्षय विभव मिलता है ॥६॥
महालक्ष्मीप्रदा चव सुवर्णस्य शलाकिका ॥
बृहनलस्य सूच्या वै मतिवृद्धिश्च जायते ॥ ७ ॥
सुवर्णकी सलाईसे महालक्ष्मी लाभ और वृहत् नलकी सूचीसे मतिकी
वृद्धि होती है ॥ ७ ॥

(३९८) योगिनीतन्त्रम्।
तथैवाग्निमये देवि पुत्रपौत्रधनागमः।
रैत्येन विपुला लक्ष्मीः कांस्येन मरणं भवेत ॥ ८ ॥
हे देवि ! अग्नि मय (सुवर्ण आदि ) से पुत्रपौत्रलाभ और धनागम
और पीतल द्वारा विपुल लक्ष्मीलाभ होती है, कासीद्वारा मरण होता है।।८
अष्टांगुलप्रमाणेन दशाङ्गुलमितेन वा ।
चतुरङ्गुलसूच्या वा यो लिखेत्पुस्तकं शुभे ।
तत्तदक्षरसंख्याने स्वल्पायुाति वै दिने ॥९॥
आठ अगुल वा दश अगुल या चार अगुल सूचिद्वारा पुस्तक लिखने
पर उसके अक्षरों की सख्यानुसार दिनदिन अल्पायु होती है ॥ ९ ॥
मानं वक्ष्ये पुस्तकस्य शृणु देवि समासतः ।
मानेनापि फलं विन्धादमाने श्रीहता भवेत् ॥ १० ॥
हे कल्यणी ! पुस्तकका परिमाण सक्षेपसे कहताई सुनो । परिमाणके
अनुसार पुस्तक लिखनेसे फललाभ और विना परिमाण करके पुस्तक
लिखनेसे लक्ष्मी नष्ट होती है ॥ १० ॥
हरतमात्र मुष्टिमानमावाद्यं द्वादशाङ्गुलम् ।
दशाङ्गुलं तथाष्टौ च ततो हीन न कारयेत् ॥ ११ ॥
हस्त मात्र और मुष्टिमात्र बहि पर्यन्त द्वादशागुल (गारह अगुल) मथवा
दशगुल और आठअगुल, इससे कम न करै ॥ ११ ॥
वेधद्वयं सुष्टिहस्ते पाहुमात्रे चिरन्तनम् ।
समभागे महेशानि हस्तादावुपबन्धकम् ॥ १२ ॥
अष्टाङ्गुलं परित्यज्य मध्ये वेध च कारयेत् ।
प्रादेशादो भवेद्राजा द्यड्गुले वा समाचरेत् ॥१३॥

भापाटीकासमेतम् । (३९९) मुष्टि हाथ अथवा बारमात्रके मध्यमें वेध करे। यह वेध वीचमें आठ अंगुल छोड़के करना कर्तव्य है, तथा समभागमें उसका बन्धन नियत करे अथवा बारह अंगुलमें बंधनका स्थान बनावै । इस प्रमाणसे पुस्तक बनाकर पूजन करनेसे राज्यलाभ होता है ॥ १२ ॥ १३ ॥ आद्यतयोः पुस्तकस्य यस्तु वेधं न कल्पयेत् । भार्याहानिर्भवेदाशु धनानां वा क्षयो भवेत् ॥ १४ ॥ नो मनुष्य पुस्तकका आदि अन्त वेध न करता है उसकी तत्काल भार्याहानि वा धन क्षय होता है ॥ १४ ॥ भूजे वा तेजपत्रे वा ह्यथवा तालपत्रके। नात्यंतं गुरु देवेशि पुस्तकं कारयेत्प्रिये ॥ १५ ॥ भोजपत्र वा तेजपत्रपर अथवा तालपत्रपर विचित् गुरु करके भी पुस्तक करावे ।। १५ ॥ सम्भवे स्वर्णपत्रे च ताम्रपत्रे च शांकरि । अन्यवृक्षत्वक्षु देवि तथा केतकिपत्रके ॥ १६ ॥ मृत्ताम्रपात्रे रौप्ये वा वटपत्रे वरानने। अन्यपत्रे बहुदले लिखित्वा यः समभ्यसेत् ॥ १७ ॥ हे प्रिये ! सम्भव हो तो स्वर्णपत्र वा ताम्रपत्रपर पुस्तक लिखनी चाहिये । अन्य वृक्षकी छालपर, केतकीपत्रपर, मृत्पत्रपर, ताम्रपत्र, रौप्य (चादी) पत्रपर, वा वटपत्रपर, या अन्य बहुत दलवाले पत्रपर लिखकर जो भभ्यास करता है ॥ १६ ॥ १७ ॥ स दुर्गतिमवाप्नोति धनहानिर्भवेद्भवम् । देवस्य लिखनं कृत्वा यः पठेद्रमहा भवेत् ॥ १८ ॥ उसकी निःसन्देह धनहानि होती है वह दुर्गतिको प्राप्त होता है देवको लिखकरके जो पाठ करता है वह ब्रह्मघाती होता है ।। १८ ॥

(४००)
योगिनीतन्त्रम।
पुस्तकं वा गृहे स्थाप्यं वज्रपातो भवेद्धृवम् ।
दग्धरन्ध्रे भवेत्पीडा वर्तुलं शुभदं भवेत् ।
चतुष्कोणे विप्लवस्तु त्रिकोणे मरणं भवेत् ॥ १९ ॥
यह पुस्तक घर में रखनेसे उसमें वज्रपात होता है, दग्ध करके रन्ध्र
करनेसे पीडा होती है अर्थात्-किसी शलाकाको गरमकर उसको पुस्तक
में छेदनेसे अतिशय दुखकी प्राप्ति होती है । गोलाकार रन ही शुभ-
दायक है। चतुष्कोणमें विप्लव ( लूटमार आदि ) और त्रिकोण रन्ध्रमें
मृत्यु होती है ॥ १९॥
सत्येऽक्षरे स्थितः शम्भुः शुलपाणित्रिलोचनः ।
प्रजापतिपरे च त्रेतायां सूर्य एव च ।
कृते युगे पिनाकी च कलौ लिप्यक्षरे हरिः ॥ २० ॥
सत्ययुगमें अक्षरमें शूलपाणि त्रिलोचन शंभु, द्वापर में प्रजापति,
त्रेतामें सूर्य, कृतयुगमें पिनाकधारी और कलियुगके बीच लिप्यक्षरमें
हरि अधिष्ठित हैं ॥ २० ॥
आरम्भे च समाप्तौ च लिखितं प्रतिपूजयेत् ।
हरिश्च गन्धपुष्पाद्यैर्वस्त्रैश्च सुमनोहरैः ॥२१॥
यावदक्षरसंख्यानं प्रतिपत्रे च शाङ्कार ।
भवेद्युगसहस्राणि स्वर्गलोके वसेचिरम् ॥ २२ ॥
लिखनेके आरम्भ और समाप्तमें मनोहर गन्ध पुष्प वस्त्रादिद्वारा हरिकी
पूजा करने से प्रतिपन्नमें जितनी अक्षर संख्या है, उतने ही सहस्रयुग स्वर्ग-
लोकमें वास करता है ॥ २१ ॥ २२ ॥
वेतनं यश्च गृहीयाल्लिखित्वा लेखनस्य च ।
यावदक्षरसंख्यानं तावञ्च नरके वसेत् ॥ २३ ॥

भापाटीकासमेतम्। (४०१) पुस्तक लिखकर चेतन ग्रहण करनेसे जितने अक्षर पुस्तकमें विद्यमान रहते हैं. उतनेही काल पर्यन्त नरकमें वास करना पडता है ॥ २३ ॥ व्यञ्जनं क्षतमारूद वामनेवेन्दुसंयुतम् । महाबीज विजानीयाज पान्मुक्तिमवाप्नुयात ॥ २४ ॥ चन्द्रबिन्दुसंयुक्त "माँ" यह महाबीज समझना चाहिये, इसका जप करनेसे मुक्तिलाभ अवश्य होता है ।। २४ ।। प्रणवात्प्रणवं वक्ष्ये वषडन्ते च ठद्वयम् । स्वयं वदेत्स्वरान्ते च नतिश्चैव प्रदात्मकम् ॥ २५ ॥ आद्यमेव गृहस्थस्य प्रणवं सर्वमन्त्रके। आद्यन्तयोस्तु प्रणवो ह्यात्मज्ञानविवृद्धये ॥ २६ ॥ प्रवण (ओंकार ) के पीछे प्रणव उच्चारण करै, फिर वपट् इसके पीछे ठ द्वयका उच्चारण करके हृदयात्मक मन्त्रसे नमस्कार करै। गृहस्थके सन मन्त्रों के आदिमें ओंकार लगावे । आदिमें और अन्त्यवर्णके पीछे ओंकारका उच्चारण करना आत्मज्ञानकी वृद्धिके निमित्त होता है ॥ २५ ॥ २६ ।। मन्त्रविद्याविभागे तु द्विविधं जायते प्रिये । मन्त्राः पुंदेवताः प्रोक्ता विद्या स्त्रीदेवताः स्मृताः२७॥ महाविद्या विभक्त होकर दो प्रकार होती है, पुंदेवताके उद्देशसे जो भयुक्त (जो पुरुष स्वरूप देवताके एिमित्त प्रयोग किया जाय) होता है. वही मन्त्र और स्त्रीदेवताके उद्देश्यसे नो प्रयुक्त होता है वही विद्या है ॥ २७ ॥ घुमन्त्रा हुँ फडन्ताः स्युः द्विठान्ताश्च स्त्रियो मताः। नपुंसका नमोऽन्ताः स्युर्मनवश्च विधा मताः ।। २८ ।। पुंदेवताके मन्त्रान्तमें हुं फट कहा जाता है और स्त्री देवताफे मन्त्रान्तमें उद्वय कहा जाता है, नपुंसक मन्त्रके अन्तमें नमः यह पद कहा जाता २६ . (४०२) योगिनीतन्त्रम् । है। इस प्रकार विभक्त होनेके कारण मन्त्र तीन प्रकारके जानने चाहिये ॥ २८ ॥ एतच्छ्न्या भवेद्विद्या महाशब्देन कीर्तिता। परमेष्ठी ऋषिश्छन्दो गायत्र्याः समुदाहृतम् । देवता त्रिपुराख्याता सर्वार्थे विनियोजयेत् ॥ २९ ॥ यह शून्यविद्या महाशब्दसे कही जाती है। परमेष्ठी ऋपि, गायत्री इसका छन्द, देवता त्रिपुराख्या और इसका सर्वार्थमें विनियोग है ॥२९॥ विधिना स्थापयेद्देवी पाणिना प्रथम प्रिये ! मुखप्रक्षालनं कृत्वा पुनः स्नानं समाचरेत् ॥ ३० ॥ हे प्यारी ! देवीको विधिपूर्वक स्थापित करके प्रथम हाथसे मुख प्रक्षा- लनपूर्वक पुनर स्नान करावै ॥ ३० ॥ दिनद्वयान्तरे देवि उथायाष्टदिनान्तरे। तैलेनोद्वर्त्तनं कुर्यात्कषायेनातिरुक्षयत् ॥ ३१ ॥ हे देवि ! फिर दो दिनके अन्तरसे उठकर आठ दिनके पीछे तैल द्वारा उद्वर्तन करके कपायद्वारा अतिरुक्ष करै ॥ ३१ ॥ पक्षान्ते चैव मासान्ते महास्नानं समाचरेत् । मूलचीजेन देवेशि द्रव्यमन्त्रेण वा प्रिये ॥ १२ ॥ वैदिकेनाथ मन्त्रेण मायया वा समाचरेत् । कलशैः स्नापयेत्पश्चादय॑स्नानमनन्तरम् ।। ३३ ।। पक्षके अन्तमें और महीनेके अन्तर्मभी देवीको महास्नान कराना चाहिये । हे देवि ! मूल बीजमन्त्र से वा द्रव्यमन्त्रसे अथवा दैनिक मन्त्रसे या मायामन्त्रसे देवीको स्नान करावे । फिर कलशसे मान कराकर अर्यसे स्नान करावे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ।

भापाटीकासमेतम् ।
अय॑स्रानं ततः कृत्वा पुनः स्नानं करोति च ।
देवीलोकाच्च्युतिर्भूयाद्धनहानिश्च जायते ॥ ३४ ॥
अर्घ्य खान कराने के पीछे फिर स्नान करानेपर वह देवीलोकसे गिरता
है और उसके धनकी हानि होती है ॥ ३४ ॥
वारिणा प्रथम स्नानं क्षीरण तदनन्तरम् ।
दधिकृतस्य पिण्डे द्वे शर्कराश्च गुडं मधु ।
तिलक्षीरर्दधितिलमधुक्षीरेण स्नापयेत् ॥ ३५ ॥
जलसे प्रथम स्नान, फिर दूधसे, इसके पीछे दहीसे, फिर दो घीवे
पिण्ड, शर्करा, गुड, मधु, तिल, क्षीर, दधि, तिल और मधु, क्षीरसे क्रमश
स्नान करावे ॥ ३५॥
उष्णोदकं फलश्चैव तथा चैव कुशोदकम् ।
गन्धोदकश्च रत्नानामुदकं पुष्पतीयकम् ।
विल्वोदकं सप्तपत्रं रक्तपुष्पोदकं तथा ॥ ३६ ॥
स्वर्णशङ्खोदकञ्चैव ताम्राधारमनन्तरम् ।
घटोदकं कुशश्चैव अर्यस्नानं समाचरेत् ।। ३७ ॥
फिर उष्णजल, फल, कुशजल, सुगंधितजल, रत्नजल, पुप्पोदक,
विल्वोदक, सप्तपत्र, रक्त पुष्पोदक, स्वर्णशंखोदक, तानाधार, घटोदक
(पड़ेका जल) और कुशद्वारा क्रमानुसार अर्घ्य स्नान कराना
चाहिये ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
पञ्चगव्येन यो देवीं तथा दुग्धकुशोदकः।
स्नापयोद्विविधैर्मन्त्रब्रह्मस्नानं हि तत्स्मृतम् ॥३८॥
पञ्चगव्य द्वारा, दुग्ध कुशयुक्त जल द्वारा, अनेक मन्त्रोंसे देवीका स्नान
करानेपर वही ब्रह्म स्नान कहा जाता है ॥ ३८ ॥

(४०४) योगिनीतन्त्रम् ।
कपिलापश्चगव्यन तथा क्षीरयुतेन च ।
स्नानं शतगुणं प्रोक्तं तथा चक्षुरसेन च ॥ ३९ ॥
हे देवि ! क्षारयुक्त कपिला पचगव्य द्वारा और इक्षु (गन्ना) के रससे
स्नान करानेपर शतगुण फल प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥
क्षीरेण स्नापयेद्यस्तु श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।
कामाख्या विधिवद्देवि सुरलोके महीयते ॥ ४० ॥
हे देवि ! जो मनुष्य श्रद्धा भक्तियुक्त होकर क्षीरसे कामाख्या
देवीको स्नान कराता है, वह देवलोकमें पूजाको प्राप्त होता है, इसमें
सन्देह नही ॥ १० ॥
घृताभ्यगेन देवांगं घृतेन विधिवत्मिये ।
दशपूर्वान्दशपरानात्मानश्च विशेषतः।
भवार्णवात्समुद्धृत्य दुर्गालोके महीयते ॥ ४१ ॥
हे देवि ! घृत द्वारा विधिपूर्वक देवीके अगमें अभ्य ( उबटन) कराने
पर पूर्व दशपुरुप और पीछेके दशपुरुष तथा अपनेको ससार सागरसे उद्धार
करके दुर्गालोकमें जाता है ॥ ४१ ॥
स्नापयेद्विधिवद्यस्तु दना दूर्वाक्षतन च ।
राजतेन विमानन शिवलोके महीयते ॥ १२॥
जो मनुष्य दधि और अक्षतसे देवीको विधिपूर्वक स्नान कराता है वह
विमानमें विराजित होकर शिवलोकमें जाता है ॥ १२ ॥
कामाख्यां स्नापयद्यस्तु नवीनेचरसेन च ।
गरुडेन विमानेन विष्णुना सह मोदते ॥ १३ ॥
जो मनुष्य नवीन इक्षुरससे देवीको स्नान कराता है वह गरुडके विमा
नमें चढकर विष्णुके सग प्रमोद करता है ॥ १३ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४०५) स्नापर्यञ्चैव यो दुर्गा गन्धचन्दनवारिणा। चन्द्रांशुनिर्मला श्रीमांश्चन्द्रलोके महीयते ॥४४॥ जो मनुष्य गंध चन्दनके जलसे दुगदिवीको सान कराता है, वह चन्द्रां- दुतुल्य निर्मल और श्रीमान् होकर चन्द्रलोकमें जाता है ॥ १४ ॥ सुगन्धिपुष्पतोयेन स्नापयित्वा नरः कचित् । नागलोकं समासाद्य क्रीडते सह पन्नगः ॥ ४५ ॥ जो मनुष्य सुगन्धित पुप्पोंके जलसे देवीको स्नान करानेसे नागलोकमें जाकर पन्नगोंके सहित क्रीडा करते हैं ॥ ४५ ॥ स्नापयित्वा तु कामेशी द्रुतं यो हेमवारिणा । सौवर्णयानमारूढो मोदते वसुभिः सह ॥ ४६॥ जो मनुष्य परिश्रुत (जिप्तमें कि सुवर्ण गरमकरके वुझाया गया हो, अथवा जो मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित हो) हेमनलसे कामाख्या देवीको स्नान कराते हैं, यह सुवर्णविमानमें चढकर वसुगणोंके सहित प्रमोदको माप्त होता है ॥ ४६॥ रत्नोदकेन विधिवस्तापयेद्यस्तु मानवः । स दिव्ययानमारुह्य मोदते हरिणा सह ॥ ४७ ॥ जो मनुष्य रत्नोदकद्वारा विधिपूर्वक देवीको स्नान कराते हैं, वह दिव्य विमानमें आरोहण करके हरिके संग आनंद भोगते हैं ॥ १७ ॥ द्रोणपत्र विल्वपत्रं करवीरोत्पलानि च । स्नानकाले प्रयोज्यानि देवीप्रीतिकराणि च ॥४८॥ खानके समय द्रोणपत्र ( दोनावृक्ष के पत्ते ) घेलपत्र, कनेर और कमल प्रदान करनेसे वह देवीकी उत्तम प्रीति करानेवाले होते हैं ॥ १८ ॥ एषामेकतमं स्नानं दत्त्वा वे श्रद्धयान्धितः । भगवत्यै नरो भक्त्या विष्णुलोके महीयते ।। ४९ । .

(४०६)
योगिनीतन्त्रम्।
मनुष्य श्रद्धायुक्त और भक्तिमान् होकर इन सब स्नानों में से एक प्रका-
रका सान करानेपरभी विष्णुलोक गमनपूर्वक पूजित होता है ॥ १९ ॥
स्नापयेद्यस्तु वै देवीं नरः कर्पूरवारिणा।
सयाति परमं स्थानं यत्र कामेश्वरी स्थिता ॥ ५० ॥
जो मनुष्य कपूरके जलसे देवीको स्नान कराता है वह कामेश्वरीके
अधिष्ठित परमस्थानमें जाता है ॥ ५० ॥
पिततुद्दिश्य यो देवी क्षीरेण मधुनाथवा ।
स्नापयेदिधिवद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ।। ५१ ॥
जो मनुष्य पितरोंके उद्देश्यसे क्षीर ( दुग्ध) वा मधुद्वारा भक्तिपूर्वक
देवीको विधिवत् लान कराता है, उसके पुण्यका फल सुनौ ॥ ५१ ।।
तृप्ता भवन्ति पितरम्तस्य वर्षशतद्वयम् ।
पञ्चामृतस्य प्रत्येक फलानाञ्च शतं शतम् ॥
शनश्च वारिकुम्भानां महास्माने नियोजयेत् ॥५२॥
उसके पितर उसके द्वारा दो सौ वर्पतक तृप्त रहते हैं। पञ्चामृतका एक
एक शत शत फल शत वारिकुम्भ (जलके घडे ) महासानमें नियोजित
फरै अर्थात् जलके कई सौ कलशद्वारा स्नान करानेसे जो पुण्य लाभ
होता है वह फल पञ्चामृतके किञ्चिन्मात्र स्नान करानेसेही प्राप्त हो जाता
है ॥ ५२ ॥
अपा कुम्भशतेनैव तैलस्यापि त्रिभिः पलेः।
मांजिष्ठं तु महास्नानमेवमाहुर्मनीषिणः ॥ ५३ ।।
सौ घडे जल, और तिल पल (चार तोले ) तेल और मजीठसे स्नान
करानेपर मनीषिगण उसीको महास्नान कहते हैं ।। ५३ ॥
मध्यमं तु तदन स्नानं यच विधीयते ।
तदई तु कनिष्ठं स्यादतो हीन न कारयेत् ॥ ५५ ॥

भापाटीकासमेतम् । (४०७) उससे आधे द्वारा मध्यम स्नान और उससे आधे द्वारा लान करानेपर कनिष्ठ लान होता है, इससे कम कराना उचित नहीं है ॥ ५४ ॥ एवं यः कारयेत्स्नानं नरः कश्चित्कदाचन । सप्तजन्मकृतात्पापात्तत्क्षणादेव हीयते ॥ ५५ ॥ जो मनुष्य कभी ऐसा स्नान कराता है, वह तत्काल सात जन्मके किये पापोंसे छूटजाता है ॥५५॥ आयुर्बलं यशो वर्चः सौभाग्यं पुष्टिरेव च । स्नापयित्वा तु कामाख्या लभते नात्र संशयः ॥५६|| कामाख्या देवीको स्नान कराकर मनुष्य आयु, बल, यश कान्ति, सौभाग्य और पुष्टिलाभ करते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ५६ ॥ एवं यस्तु महास्नानं करोति भक्तिमानरः। शरीरारोग्यमायुष्यं प्राप्नोति श्रियमुत्तमाम् ॥ ५७ ।। नो मनुष्य भक्तिमान् होकर इस प्रकार महास्नान कराते हैं, वह शारीरिक, आरोग्य, आयु और उत्तम स्त्री प्राप्त करते हैं ।। ५७ ॥ दशतोलकमानेन द्रव्याणां तु पृथक्पृथक् । चतुस्तोलिकया वाथ हीनलानं विधीयते ॥ ५८ ॥ प्रत्येकमें दश तोले भर पृथक् द्रव्यसे अथवा और स्थानमें प्रत्येक चार तोले भर पृथक् द्रव्यसे हीनस्नान कहाता है ।। ५८ ॥ मुखमष्टाइगुलं तस्य एकविंशाइगुलोदरम् । अरनिमात्रकोत्सेध मणिकुण्डं तदुच्यते ॥५९।। जिसका मुख आठ अंगुल, उदर इक्कीस अंगुल और जिसका अरलि मा उत्सेध (विस्तार ) है, उसकोमणिकुंड कहते हैं ॥ ५९॥ गवाक्षमार्गे सुर्यस्य या रश्मिः सा हि लेखिका । लेखिकाष्टौ भवेद्धूलिधूलिरष्टौ च सर्षपः ॥ ६० ।।

(०८) योगिनीतन्त्रम्।
खिडकीके भार्गमें जो सूर्यको किरणें जाती हैं वही लेखिका है, आठ
लेखिकामें एक चूलि, आठ धूलिमें एक सरसों ।। ६० ।।
सर्षपाणां चतुष्केण रक्तिकेत्यभिधीयते ।
रक्तिकानां विंशकन्तु पादकं परिकीर्तितम् ॥ ६१ ॥
चार सरसोंमें एक रत्तिमा और बीस रत्तिकामें एक पादक कहा
गया है ॥ ६१॥
तोलिकैका चतुप्पादैःममृतिस्तच्चतुष्टयात् ।
प्रसूती द्वे कर्षकं च द्वे कर्षे तु पलं भवेत् ॥ ६२ ॥
चार पादमें एक तोलिका चार तोलिकामें एक प्रसूती दो प्रस्तीमें
एक कर्पक (आठ तोले ) दो कर्षकमें एक पल || ६२ ॥
पलान भवेन्मुक्तिर्द्विमुक्तिर्मुडकं मतम !
एवं स्नानं ततः कृत्वा गात्रं सम्माजयेत्सुधीः ॥६३॥
आधे पलमें एक मुक्ति और दो मुक्तिों एक गुडक होता है । इस
प्रकार सान कराकर बुद्धिमान् भनुप्य गात्रमार्जन कर ॥ ६३ ॥
चन्दनेन सुगन्धेन कारयेत्तिलक सुधीः।
कटिसूत्रं च वस्खञ्च यज्ञसूत्रं निवेदयेत् ॥ ६४ ॥
तदनन्तर सुगन्धित चन्दनसे तिलक करदेनेपर कटिसूत्र, वस्त्र और
यज्ञसूत्र निवेदन कर ॥ ६४ ॥
मयूरपिच्छसङ्काशं स्निग्धचारुसुकेशिकम् ।
लम्बोष्ठीं चिन्तयेद्देवी रक्तनेत्रां सुवाससम् ॥ ६५ ॥
मोरके पूछके समान कान्तिवाली स्निग्ध (चीकने ) शोभायमान
केशसम्पन्न लम्बोष्ठी ( लम्बे होठवाली ) उत्तम वस्त्र युक्त देवीकी
चिन्ता कर ॥६५॥

वस्त्रकी पूजा भाषाटीकासमतम् । (४०९) यच्च वै लोहितं चास्यं सुव्यक्तं कजलप्रभम् । त्रिपुरेशि समाख्यातं त्रैलोक्यनिलयं परम् ॥ ६६ ॥ सम्भुक्तं नरकेशेन पूर्ववक्रमनुत्तमम् । मृत्तिकायों महेशानि लक्ष्मीकामो विभावयेत् ॥६॥ हे त्रिपुरेश्वरि ! जो लोहित और सुव्यक्त कजलप्रभ है अर्थात् जिनके मुखकी आभा श्यामवर्ण है, वह त्रिलोकिके निवासस्थानरूप वक्त्र नामसे विख्यात है । इस अति उत्तम वक्त्रको पहिले नरकेश्वरने सम्भोग किया था है देवेशि । लक्ष्मीकी कामना करनेवाला मनुष्य इस मृत्तिकास्थित करै ।। ६६ ॥ ६७ ॥ करालं यतु वै वकं कृष्णं दक्षिणगोचरम् । कामाख्येति च विख्यातं दिव्यदंष्टासमन्वितम् ॥६८ सर्वसिद्धिप्रदश्चैव सर्वार्थस्य च साधकम् । देवस्य दक्षिणेनैव पीतवत्र विचिन्तयेत् ॥ ६९ ॥ दक्षिण दिशामें दिव्य दाढोंसे युक्त कराल कृष्ण वक्त्र है, वह कामाख्या वस्त्र नामसे विख्यात है वह सर्वसिद्धिदायक और सर्वार्थसाधक है है देवके दक्षिणभागमें पीतवक्त्रकी चिन्ता करै ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ कौबेरीनिलयं यच्च वदनं श्यामलं शिवम् । शतवीताङ्गाभिधं यदद्भुतं भुवनेश्वरि ॥ ७० ॥ अव्यक्तं रुचिरं दिव्यं कुब्जिकावदनोत्तमम् । नरकेशन सम्भुक्तं ध्येयं विजयकांक्षिभिः॥ ७१ ॥ हे भुवनेश्वरी! उत्तर दिशामें जो श्यामल कल्याणकारी अद्भुत वदन है, उसीको शतवीताङ्ग नामसे विख्यात जानना चाहिये, विजयकी इच्छा -- (४१०) योगिनीतन्त्रम् । करनेवाले मनुष्य अव्यक्त, रुचिर दिव्य और उत्तम नरकेशकर्तृक सम्भुक्त कुन्जिकावदनका ध्यान करै ॥ ७० ॥ ७१ ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं ताम्बूला मनोहरम् । सर्वज्ञानमयं ज्ञेयं कालं वागीश्वरीमुखम् ॥ ७२ ॥ शुद्धस्फटिकके समान प्रभासंपन्न, सर्वज्ञानमय, काल वागीश्वरीके मुखको ताबूल और अदरक संयुक्त जानना चाहिये ॥ ७२ ॥ वृषभांकेण भृङ्गण निपीतं मधुसञ्चयम् । ईशानं वदनं देव्याश्चिन्त्यं सर्वज्ञतार्थिभिः ॥ ७३ ।। वृषभके अंकवाले भौरेद्वारा जिसका मधुपान किया गया है उस ईशान नामक देवीके मुखकी सर्वज्ञामिलापी मनुष्य सदा चिन्ता करै ॥ ७३ ॥ सूर्यकोटिसहस्रांशु यद्वक्त्रं तुर्द्ध प्रिये पीठ कामेश्वरं तद्वद्विज्ञेयं परमं महत् ।। ७४ ॥ हे प्यारी! करोड सूर्यके समान प्रकाशमान अगाडीवाला जो वक्त्र है, उतको परम महत् पीठ कामेश्वरीका मुख जानना चाहिये ।। ७४ ॥ परं ज्योतिर्मुखं भद्र नरकेशेन चुम्बितम् । भवाम्बुधिविनाशाय केवल तद्विभावयेत् ॥ ७५ ।। हे कल्याणी ! नरकेश्वरके चुंबन किये परम ज्योतियुक्त मुखका ध्यान करनेपर मनुष्य संसारबन्धनसे छूट जाता है |॥ ७५ ॥ त्रिपुरा देवता चास्य कामाख्यास्य गणाम्बिके। एता मण्डलसंस्थाश्च देव्यः शक्तिसमन्विताः ॥६॥ हे गणमाता ! कामात्याका देवता त्रिपुरा है, यह सब शक्तियुक्त विय कामाख्या मंडलमें स्थित है ।। ७६ ॥ सिंहचर्मोत्तरासंगा कामाख्या विपुलादरी। वैयाघ्रचर्मवसना तथा चैव हरोदरी ॥ ७ ॥ .

भाषाटीकासमेतम् । (४११) परमानन्दसम्भूता साट्टहासा महोत्सवा। सुनन्दालोकनप्रीता व्यक्ताष्टादशलोचना ॥७८ ।। चारुमाणिक्यसंपूर्णकुण्डलद्वयशोभिता। रौद्राकारस्तथा रौद्री भंगालियुतमालिका ॥ ७९ ॥ मुकुटामस्थशुभ्रांशुः कमलज्योतिराजिता । नानामणिगणाकीर्णकण्ठभूषणधारिणी ॥ ८० ॥ मृणालकोमलैः स्निग्धा युक्ता द्वादशवाहुभिः। अस्थिरत्नांचितेर्दिव्यः पद्मकर्दममालिभिः॥ ८१ ॥ कर्तृकाशवदम्भोलिसूत्रचक्रांशुमांस्तथा। षभिश्च बाहुभिर्धत्ते दक्षिणैर्बाहुभिः शृणु ।। ८२ ॥ कोदण्डमुण्डखट्वांगमृणालनलिनीव्रजम् । कपालं पुस्तकं घण्टां मुण्डमालानिवीतिनीम् ॥८॥ तुलाकोटिपराकान्ता पादपद्मचराश्रिता । सिंहासनोर्द्ध संसुप्ता शवासनकृताश्रया ॥ ८४ ॥ मणिप्रभाविधानेन शिवेन परमेष्ठिना । नवकेशेन संश्लिष्टा कामाख्या परमेश्वरी ॥ ८५ ॥ कामाख्या देवी सिंह चर्मका परिधान करनेवाली एव बड़े उदरवाली हैं उनका वस्त्र व्याघ्रचर्मनिर्मित है तथा वह सबका भक्षण करती हैं, आनन्द मृति अनेक उत्सवोंसे युक्त, अतएव अट्टहास्य करनेवाली हैं, उनके अष्टा दश नेत्र हैं, उनके दोनों कुण्डल उत्तम सपियों से जटित हैं, रौद्र आका रवाली भृङ्गाक्षकी माला धारण करती हैं, अनेक मुकुटोंकी ज्योतिसे अलं कृत तथा कमलोंकी ज्योतिसे सुशोभित हैं, अनेक प्रकारकी मणियोंसे जर हुए आभूषणोंको कण्ठमें धारण करती है, कमलके समान कोमल उनके

(४१२) योगिनीतन्त्रम् ।
चारह भुजा है, मनोहर केश है तथा मुण्डमाला हृदयमें विराजमान है,
सिंहासनके कार आसीन और शयन करते हुए शवके ऊपर अधिष्ठित हैं
एवं वोह कामाख्या परमेश्वरी तेजस्वी महादेवसे आलिंगित हैं और उनके
चरणोंकी पूजा प्रभावशाली देवता करते हैं और उनके वक्षःस्थलमें दिव्य
कमलों की माला लंबायमान होकर शोभा विस्तार करती है, तथा वे दक्षिण
भाग और वामकी छ: भुजाओंमें धारण करती हैं, सो सुनो । कोदण्ड,
मुण्ड, खट्वांग, मृणालनाल, नीरज, कपाल और पुस्तिका, घंटा, मुण्डमाला
मालिका और धनुर्वाण वर और अभय यह सब धारण करके शोभा
पाती हैं ॥ ७७-८५॥
एवं ध्यान न्यसेदेवि मातृका परमेश्वरीम् ।
सनामग्रहनक्षत्रं श्रीकण्ठन्यासपूर्वकम् ।
पीठन्यासं कलान्यासं मन्त्रन्यासं समाचरेत् ॥८६॥
इस प्रकार मातृका परमेश्वरीका ध्यान करै । नामग्रह, नक्षत्रयुक्त श्रीक-
ण्ठन्यासपूर्वक कलान्यास, पीठन्यास और मंत्रन्यास करके ॥ ८६ ।।
यंत्र संस्थाप्य दशधा संस्कृत्य च यथाविधि ।
विकिराविकिरेत्तत्र पीठपूजां समाचरेत् ॥ ८७ ॥
दश प्रकारसे यंत्रस्थापनपूर्वक यथाविधि संस्कार करके तथा विकिर.
द्रव्य प्रक्षिप्त करके पीठ पूजा संपादन करे ॥ ८७ ॥
पूर्वादिक्रमयोगेन गणेशश्च गणाधिपम् ।
गणनाथ गडक्री गदी सर्गान्तिको मनुः ।। ८८ ॥
पूर्व श्रियं पूजयेच्च गोवर्ट
तदनन्तरम्।
मन्त्रान्तरेण दीघेण तारयुक्तेन चार्चयेत् ॥ ८९ ॥
अनन्तर पूर्वादिकमसे गणेश, गणाधिप, गणक्रीडकी सर्गान्तिक मंत्र
द्वारा पूजा करे ! पूर्वमें श्रीदेवीकी और फिर गोषटकी पूजा करनी
चाहिये । तारयुक्त दीर्घ मंत्रान्तर द्वारा यह पूजा करै ॥ ८८ ॥ ८९॥

भापाटीकासमेतम् । (४१३" क्रीडासरो दक्षिणे तु मन्दरं वामनेत्रकम् । रश्मिविन्दुसमायुक्तं लोहजङ्घन्तु पश्चिमे । नारसिंहेन बीजेन क्षेत्रेशं परिपूजयेत् ।। ९० ।। दक्षिणमें क्रीडासरोबर, मन्दर और वामनेत्रक हैं पश्चिममें रश्मिमिन्दु संयुक्त लोहनंघ है । नारसिह मन्त्रसे क्षेत्रेश्वरकी पूजा करै ।। ९० ॥ उत्तरे भूतनाथश्च मन्दरण समन्वितम् । मौरीपुत्रश्च बटुकं तथा समयपुत्रकम् ।। ९१ ॥ ज्ञानपुत्रं समयपुत्र पूर्वादिषु च वै क्रमात् । हंसत्यनेन मन्त्रेण ध्यात्वा रक्तेन चार्चयेत् ॥ ९२ ॥ उत्तरमें पूर्वादिक्रमसे मन्दरयुक्त भूतनाथ गौरीपुत्र, बटुक, समयपुत्रक, ज्ञानपुन और समयपुत्र हैं। 'हंस' इस मंत्रद्वारा इनका ध्यान करके रक्त- मन्त्रसे पूजा करै ।। ९१ ।। ९२ ।। शान्तिकानां द्वारपालं तथा बिन्दुकला परा। निवृत्तिश्च कला पश्चात्प्रतिष्ठा च कला ततः ॥९३ ।। मायाबीजेन पूर्वादिं तत्र वै हेतुकादिकम् । हेतुकं त्रिपुरघ्नश्च अग्निवेतालकं तथा ॥ ९४ ॥ वायव्यादिक्रमेणैव कालश्चैव करालकम् । एकपादं तथा भीमं चतुर्णा गगनं मनुः ॥ ९५ ॥ असिताङ्गादयश्चेव ब्राह्मीसिद्धयादिसंयुताः। चचिकादशकं पूज्यं षट्कोणे भूभगादितः ॥ ९६ ॥ फिर शान्तिगणोंके द्वारपाल और परमा बिन्दुकला फिर निवृत्तिकला और इसके पीछे प्रतिष्ठा कला है मायावीजद्वारा वहां इन सबकी और

(४१४)
योगिनीतन्त्रम् ।
हेतुकादिक हेतुक, त्रिपुरम और अभिवतालककी पूजा करै । फिर वायव्या
दिक्रमसे काल, करालक, एकपाद और भीम चार देवताओंकी गगनमंत्रसे
पूजा करै । तदनतर समस्त षट्कोणमें भागादि क्रमसे असितालादि और
सिद्धियुक्त ब्रह्मादि चर्चिक और दशककी पूजा करै ।। ९३-९६ ।।
षट्कोणाग्रे च मदनं रतिपुत्री सुपार्श्वयोः।
पञ्चबाणांस्तथा चाग्रे ग्रहाश्चैव च दिक्पतीन् ॥ ९७ ॥
षट्कोणाग्रमें मदन, रतिपुत्री, दो सुपार्श्वमें पंचवाण अग्रमें ग्रहगण और
दिक्पतिगण इन सबका ॥ ९७ ॥
आसनं पूजयित्वा चाप्युपर्युपरि भावतः।
ध्यात्वा चारोपयेदेवीमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ ९८॥
ध्यान करने के पीछे आसनकी पूजा करके ऊपरके भावसे आरोपण
करे । फिर देवीके प्रति यह मत्र उच्चारण करना चाहिये ॥ ९८ ॥
पोहि परमेशानि सान्निध्यमिह मण्डले ।
कुरुष्व जगतां मातः संसारार्णवतारिणी ॥ ९९ ॥
महापद्मवनान्तःस्थे कारणानन्दविग्रहे ।
शब्दब्रह्ममयि स्वच्छे कामेश्वरि प्रप्तीद मे ।। १०० ॥
हे परमेश्वार ! तुम माओ और इस मण्डलमें सन्निधि करो, हे जगत्की
माता ! तुम ससारसागरसे तारनेवाली हो, महाकमल वनमें तुम्हारी स्थिति
है, तुम्हारा शरीर आनन्द देनेवाला है. हे स्वच्छ कामेश्वरी ! तुम शब्द-
ब्रह्मस्वरूपिणी हो सो तुम मेरे ऊपर प्रसन्न होओ ॥ ९९ ॥ १०० ॥
आवाहयामि कामेशमिति मन्त्रण शाडूरि।
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ॥ १०१ ॥
पशूनां पतये चैव सर्वानन्दात्मने सदा।
त्रिजटाय विशीर्षाय त्रिशूलवरधारिणे ॥ १०२ ॥

. भाषाटीकासमंतम् । (११५) त्रिनेत्राय त्रिकालाय त्रिपुरनाय वै नमः। नमश्चण्डाय मुण्डाय विश्वदण्डधराय च ॥ १०३ ॥ लोहिताय च धूम्राय नीलकण्ठाय वै नमः। नमस्त्रिपुररूपाय विरूपाय नमो नमः। सूर्याय सूर्यपतये सिद्धनाथाय वै नमः ॥१०४ ।। इस मंत्रमें जो नाम हैं उनके साथ नमः शब्दका उच्चारण कर उक्त मन्त्र द्वारा कामेश्वरका आवाहन करै ॥ १०३-१०४ ॥ तस्मादरण्योत्तरतो नातिदूरे व्यवस्थिता । खर्वा श्वेता कृष्णवर्णा गोधिकायाः शिला यतः । पश्चिमे तु शिवस्तस्य पूर्वपूर्व विजानत ॥ १०५ ॥ उस वनके उत्तर में थोड़ी ही दूर खर्व श्वेत कृष्ण वर्ण गोधिकाकी शिला है, उसके पश्चिममें शिव हैं, इस प्रकार पूर्व पूर्व में व्यवस्थित जानो ॥ १५० ॥ गयातीर्थश्चाप्युदरे चोत्तरे परिकीर्तितम् । चतुर्वर्गप्रमाणेन शीर्षे चव गयाशिरः। १०६॥ शीर्षपाश्र्वे रामगया रामपिण्डन्तु दक्षिणे । पुच्छे तु मानसं तीर्थ दक्षिणे तु महानदी ॥ १०७ ॥ उदरमें उत्तर भागमें गयातीर्थ है, चतुर्वर्गप्रमाणसे शीर्ष ( मस्तक) में गयाशिर, पार्श्वमें रामगया, दक्षिणमें रामपिण्ड और पुच्छमें मानस तीर्थ है । दक्षिणमें महानदी है ॥ १०६ ॥ १०७ ॥ तत्र स्नानं प्रकुर्वीत विधिपूर्वेण कर्मणा। तस्योत्तरे विषक्षेपयुगस्यैवान्तरे प्रिये ॥ १०८॥ तीर्थप्रेतशिलास्यश्च श्राद्धे स्वर्ग नयेपितृन् ।

(४१६) योगिनीतन्त्रम् ।
महानद्यां कृते श्राद्धे पितरः स्वर्गमाप्नुयुः ॥ १०९ ॥
तथाक्षयवटे श्राद्धी ब्रह्मलोकं नयेत्पितन् ।
गयातीथे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ११ ॥
यहां विधिपूर्वक कर्म करके स्नान कर। उसके उत्तरमें दो गन्नोंके
रखने योग्य लंबी भूमिमें प्रेतशिलाख्य तीर्थ है, वहां श्राद्ध करनेसे पितरोंको
स्वर्ग प्राप्त होता है । महानदीमें श्राद्ध करनेसे पितर स्वर्गमें जाते हैं, अक्ष.
यवटमें श्राद्ध करनेसे पितृगण ब्रह्मलोकमें गमन करते हैं, मनुष्य गयातीर्थ
में स्नान करके सब पापोंसे छूट जाते हैं ॥ १०८-११० ॥
आत्मयोनिमहेशानि गयायान्तु तिलविना ।
पिण्डनिर्वपणं शेषमपि कुर्वन्ति मानवाः ॥ १११ ॥
हे महेशानि ! आत्मसम्बन्धी मनुष्य गयामें तिलके विना शेष पिण्ड
( दान ) करै ॥ १११॥
पश्चिमे वासुदेवस्य धनुरष्टादशान्तरे ।
दीर्घाकारं पञ्चकोणमुत्तरं मुनिसंस्कृतम् ॥ ११२ ॥
वासुदेवके पश्चिममें अठारह धनुके अन्तरपर दीर्घाकार मुनिसंस्कृत
पञ्चकोण उत्तर ॥ ११२ ॥
उत्तरे मानसे श्राद्धी न भूयो जायते नरः।
दक्षिण कोटिलिङ्गस्य चतुष्कोणश्च यः शिवः ॥११३॥
दक्षिणं मानसं तद्धि सर्वपापप्रणाशनम् ।
दक्षिणे मानसे श्राद्धी ब्रह्मलोकं नयेपितृन् ॥ ११४॥
उचर मानसमें श्राद्ध करनेसे मनुष्योंको फिर जन्म लेना नहीं पड़ता।
कोटिलिंगके दक्षिण चतुष्कोण को शिव हैं, वही सब पापोंका
नाशक दक्षिण मानस है । दक्षिणमानसमें श्राद्ध करनेसे पितरोंको ब्रह्मलोक
माप्त होता है ।। ११३ ॥ ११४ ॥

भापाटीकासमेतम् । (११७)
महानद्यां कृते श्राद्ध ब्रह्मलोकं नयेत्पितॄन् ।
श्राद्धी रामहदे देवि ब्रह्मलोकं नयेत्पितन् ॥ ११५ ।।
महानदीमें श्राद्ध करनेसे पितर ब्रह्मलोकमें जाते हैं, रामहदमें श्राद्ध
करनेसे पितर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं ।। ११५ ॥
गयाशिरे पिण्डदानाद्यापुच्छे तथोत्तरे।
त्रिदिनं पातयत्पिण्डं कुलश्चैव समुद्धरेत् ॥ ११६ ॥
कांक्षन्ति पितरः पुत्रानरकाद्भयभीरधः ।
गयां गच्छति यःकश्चिन्नरोऽस्मान्तारयिष्यति ॥११७॥
गयाशिरमें और उत्तरमें, गयापुच्छमें यदि तीन दिन पिण्डदान और
पिण्डपातन करै, तो अपने कुलका उद्धार करसकता है । पितरगण नरकके
भयसे भीत होकर पुत्रोंकी कामना करते हैं कि, उनमें कोई एक गयामें
जाकर हमारा उद्धार करसकता है ॥ ११६ ॥ ११७ ॥
पश्चिमे कामनाथस्य सप्तधन्वन्तरे स्थिताम् ।
दृष्ट्वा दिर्घेश्वरी देवी सर्वकामफलप्रदाम् ।
पष्टिवर्षसहस्राणि देववद्भुवि मोदते ॥ ११८ ॥
कामनाथके पश्चिम सात धनुके अन्तरमें स्थित सर्वकामफलप्रद दीर्घेश्वरी
देवीका दर्शन करनेपर साठ हजार वर्षतक देवतुल्य होकर पृथ्वीमें
महाआनंदसे समय बिताता है ॥ ११८ ॥
मायाबीजेन देवेशीमष्टम्यां प्रति पूजयेत ।
सर्वविद्यामवाप्नोति वश्यानामग्रणीभवेत् ।। ११९ ॥
हे देवेशि ! मायावीजमंत्रद्वारा अष्टमीमें पूजा करनेसे सर्व विद्या प्राप्त
होकर बहुत मनुष्योका अग्रणी होता है ।। ११९ ॥
कल्पवृक्षं ततो गत्वा तिन्तिडीसंज्ञकं तरुम् ।
प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा मन्त्रणानेन पूजयेत् ॥ १२० ॥

(४१८)
योगिनीतन्त्रम् ।
ओं नमो व्यक्तरूपाय सर्वदेवस्तुताय च ।
शिवाधिष्ठानरूपाय तिन्तिडीवृक्षरूपिणे ॥ १२१ ॥
फिर विन्तिड़ी नामक कल्पवृक्षके निकट जाय और तीनवार प्रदक्षिणा
करके "ओं नमो व्यक्तरूपाय सर्वदेवस्तुताय च । शिवाधिष्ठानरूपाय
तिन्तिडीवृक्षरूपिणे" इस मंत्र से पूजा करै ।। १२० ॥ १२१ ॥
प्रशस्तः सर्वमन्त्रेषु काम्ये मोक्षे च दक्षिणे ।
वामहस्तस्य संस्पर्श मालायां ग्रहणे तथा ॥ १२२ ॥
उक्त मंत्र काम्य मोक्ष और दक्षिणमें सब कार्योंमें ही श्रेष्ठ है। वाम
हस्तसे स्पर्श करके माला ग्रहण करनेपर ॥ १२२ ॥
भृगतश्च परैः स्पृष्टश्छिन्ने सम्वत्सरान्तरे ।
संस्कुर्यान्मालिकां देवि ताम्रपात्रे निवेशयेत ॥१२३॥
पृथ्वीमें गिरनेपर दूसरेसे छुई जानेपर छिन्न होजानेपर अथवा एक वर्षकी
पुरानी होनेपर मालाका संस्कार करना चाहिये । हे देवि ! यदि मालाका
संस्कार करना हो तो प्रथम इस मालिकाको तावेके पात्रमें रखकर॥१२३॥
गायत्र्या प्रथम प्रोक्ष्य पञ्चगव्यैरनन्तरम् ।
पश्चात्तेनैव मन्त्रण हुँ सिध्ये नम इत्युत ॥ १२४ ।।
गायत्रीद्वारा प्रक्षालनपूर्वक पंचगव्य प्रदान करके फिर उसी मंत्रसे
और 'हुँ सिध्यै नमः। ॥ १२४ ॥
गन्धोदकेन तत्पश्चाद्गन्धपुष्पैः पृथग्विधः।
कुम्भत्रयेण संस्थाप्य रक्तपुष्पैः प्रपूजयेत् ॥ १२५ ॥
इस मन्त्रद्वारा गंधोदक (सुगंधितजल) में फिर पृथक् प्रकारसे रक्त
गन्ध पुष्पमें तीन घटके ऊपर स्थापन करके रक्तपुष्पसे पूजा करै ॥१२५॥

भापाटीकासमेतम् । (४१९) यवक्षारबलिं दत्वा देवप्राणं निवेशयेत् । तदानीयस्पृशेन्मालामन्तरिक्षेषु विन्यसेत ॥ १२६ ।। अनन्तर यवक्षारकी बलि देकर देवप्राण निवेशित करै, तब माला लाय स्पर्श करके आकाशकी ओर लंबायमान रक्ख ॥ १२६ ॥ आनीय रावी पीठे च स्थापयेन्मालिकां ततः। गन्धचन्दनकं दत्वा तथा दुर्वाक्षतानि च । पुनस्य पीठे च तद्रात्रे च निवेशयेत ॥ १२७ ॥ इसके उपरान्त रात्रिकाल माला लाकर पीठमें स्थापन कर, फिर गन्ध- चन्दन और दूर्वाक्षत प्रदान करके उसी रात्रिको फिर देवपीठमें निवे- शित करै ॥ १२७ ॥ शतं साहस्रकश्चैव अयुतं नियुतं तथा । लक्षञ्चैव तथा कोटिं जपहोमस्य मानकम् ।। १२८ ॥ प्रतिमाने चाष्टहस्तं सर्वपर्वणि संजपेत् । अथवा चाप्टमिजिस्त्रीणि तत्रापि योजयेत् ॥१२९॥ फिर शत, सहस्र, अयुत, नियुत, लक्ष वा करोड जप होम करना चाहिये । यह नाला परिमाणमें आठ हाथ होगी। सर्व पर्वमें ही आठ अथवा तीन बीज संयोग करके जप करै ॥ १२८ ॥ १२९ ॥ माले माले महामाले सर्वकस्वरूपिणि । चतुर्वर्गस्त्वयि त्यस्तस्तन्माले सिद्धिदा भव ॥१३॥ पुष्करीसखिबीजस्त्वं सूक्ष्म सूक्ष्मान्वितं तथा । आकाशशशिसंयुक्तं सिध्य हृदय संज्ञकम् ।। १३१ । हे महामाले ! माले ! तुम सर्वस्वरूपिणी हो, तुम्हारे विष धर्म, अर काम, मोक्ष यह चारोंवर्ग अघिष्ठित है, इस कारण तुम सिद्धि प्रदान

(४२०)
योगिनीतन्त्रम् ।
तुम अतिसूक्ष्म पुप्फारवीजसे निर्मित हो आकाश और शशियुक्त हो
अत' सिद्धि प्रदान करो ॥ १३०॥ १३१ ॥
एप पश्चाक्षरो मन्त्रो मालायाः परिकीर्तितः ।
अहणे स्थापने चैव पूजन विनियोजयेत् ॥ १३२ ॥
यही मालाका पञ्चाक्षर मन्त्र कहा गया है । ग्रहण स्थापन और पूज-
नमें इसका विनियोग करै ॥ १३२ ॥
शिव जपादौ विन्यस्य जपान्ते तु स्तुतिं पठेत् ।
बलिदानं ततः कुयादद्याविभवमात्मनः ।
अनुलोमविलोमेन मूलमन्त्रेण पूजयेत् ॥ १३३ ।।
नपके, आरम्भमें शिवको स्थापन करके जपके अन्तमें स्तुतिपाठ करना
चाहिये । फिर अपने विभवके अनुसार पूजोपहार बलि इत्यादि देवे । फिर
अनुलोम विलोमके क्रमसे अर्थात् प्रथम क्रमानुसार पश्चात् विपरीत विधिसे
मूलमन्त्र द्वारा पूजा करै ।। १३३ ॥
अम्चे अम्बिके मन्त्रण तथा पौराणिकन च ।
जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ॥१३४ ॥
फिर अम्बे अम्बिके इस पौराणिक मन्त्रसे पूजा करके स्तुति पाठ
करै । स्तुति यथा, हे कामेशी ! हे चामुण्डे ! तुम्हारी जय हो ! हे भूता.
पहारिणी ! ॥ १३४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४२१)
मायाजये जये जम्भे भूताक्षि क्षुभितेऽक्षये।
महामाये महेशानि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १३६ ।।
हे भीमरूपे ! हे शिवे ! हे विद्ये ! हे कामेश्वरी ! तुमको प्रणाम है । हे
मायाजये ! हे जये ! हे जम्भे । हे भूताक्षी ! हे क्षुभीवे ! हे अक्षये ! हे
महामाये । हे महेश्वरी | हे कामेश्वरी मै तुमको प्रणाम करता हूं॥१३६॥
भीमाक्षि भीतिदे देवि सर्वभूतक्षयंकार ।
कराली विकराली च कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१३७॥
हे भीमाक्षी ! हे भीतिदे ! देवि ! हे सर्व भूतोंको क्षय करनेवाली !
तुम कराली और विकराली हो, हे कामेश्वरी ! तुमको मै प्रणाम
करता हूं ॥ १३७ ।।
काली कराली विक्रान्त कामेश्वरि हरप्रिये ।
सर्वशास्त्रांबुधे देवि कामेश्वरि नमोस्तु ते ॥ १३८ ॥
हे करालविक्रान्ते ! हे हरप्रिये ! हे कामेश्वरी ! हे काली ! हे सर्यशास्त्र-
रूपिणी ! हे देवि ! हे कामेश्वरि ! मैं तुमको प्रणाम करता हूं॥१३८॥
कामरूपप्रदीपा च नीलकूटनिवासिनी ।
निशुम्भशुम्भमथनि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १३९ ।।
तुम्ही काम रूप प्रदीपा और तुम्हीं नीलाचल निवासिनी हो हे शुम्भ.
निशुम्भमथनी ! हे कामेश्वरी ! मैं तुमको प्रणाम करता हूं ॥ १३९ ।।
कामाख्ये कामरूपस्थे कामेश्वरि हरप्रिये ।
कामांश्च देहि मे नित्य कामेश्वरि नमोऽस्तु त ॥१४०
हे कामरूपमें स्थित ! हे कामाख्ये ! हे हरप्रिये ! हे कामेश्वरी ! मेरी
मनोकामना सदाही पूर्ण करो। हे कामेश्वरी ! मैं तुमको प्रणाम करता
रुधिरासवपानाढयवने विभुवनेश्वरि ।
महिषासुरसंहर्षि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १४१ ॥

(४२०) योगिनीतन्त्रम् । तुम अतिसूक्ष्म पुष्करिवीजसे निर्मित हो आकाश और शशियुक्त हो अतः सिद्धि प्रदान करो ॥ १३० ॥ १३१ ॥ एष पश्चाक्षरो मन्त्रो मालायाः परिकीर्तितः । ग्रहणे स्थापने चैव पूजने विनियोजयेत् ॥ १३२ ॥ यही मालाका पञ्चाक्षर मन्त्र कहा गया है। ग्रहण स्थापन और पूज- नमें इसका विनियोग करै ॥ १३२ ॥ शिव जपादौ विन्यस्य जपान्ते तु स्तुतिं पठेत् । बलिदानं ततः कुय्यदद्याद्विभवमात्मनः । अनुलोमविलोमेन मूलमन्त्रण पूजयेत् ।। १३३ ।। नपके, आरम्भमें शिवको स्थापन करके जपके अन्त में स्तुतिपाठ करना चाहिये । फिर अपने विभवके अनुसार पूजोपहार बलि इत्यादि देवे । फिर अनुलोम विलोमके क्रमसे अर्थात् प्रथम क्रमानुसार पश्चात् विपरीत विधिसे मूलमन्त्र द्वारा पूजा करै ।। १३३ ।। अम्चे अम्बिके मन्त्रण तथा पौराणिकन च । जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि ॥ १३४ ॥ फिर अम्बे अम्बिके इस पौराणिक मन्त्रसे पूजा करके स्तुति पाठ करै । स्तुति यथा, हे कामेशी ! हे चामुण्डे ! तुम्हारी जय हो ! हे भूता. पहारिणी! ॥ १३४ ॥ जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते । विश्वमूर्ते शुभे शुद्धे विरूपाक्षि त्रिलोचने ॥ १३५ ॥ तुम्हारी जय हो । हे सर्वगते देवि ! तुम्हारी जय हो । हे कामेश्वार ! तुमको प्रणाम करता हूं! हे विश्वमूर्ते ! हे अभे ! हे शुद्धे । हे विरू- पाक्षि ! हे त्रिलोचने ।। १३५ ॥ भीमरूपे शिवे विद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ।

भाषाटीकासमेतम् । (४२१) मायाजये जये जम्भे भूताक्षि क्षुभितेऽक्षये । महामाये महेशानि कामेश्वर नमोऽस्तु ते ॥ १३६ ॥ हे भीमरूपे ! हे शिवे ! हे विद्ये ! हे कामेश्वरी ! तुमको प्रणाम है। हे मायाजये ! हे जये ! हे जम्भे ! हे भूताक्षी ! हे क्षुभीवे ! हे अक्षये ! हे महामाये । हे महेश्वरी ! हे कामेश्वरी मै तुमको प्रणाम करता हूँ॥१३६॥ भीमाक्ष भीतिदे देवि सर्वभूतक्षयंकरि । कराली विकराली च कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१३७।। हे भीमाक्षी ! हे भीतिदे ! देवि ! हे सर्व भूतोंको क्षय करनेवाली ! तुम कराली और विकराली हो, हे कामेश्वरी ! तुमको मै प्रणाम करता हू ॥ १३७ ॥ काली कराली विकारते कामेश्वरि हरप्रिये । सर्वशास्त्रांबुधे देवि कामेश्वरि नमोस्तु ते ॥ १३८ । हे करालविक्रान्ते ! हे हरप्रिये ! हे कामेश्वरी ! हे काली ! हे सर्वशास्त्र- रूपिणी ! हे देवि ! हे कामेश्वार ! मैं तुमको प्रणाम करता हूं॥१३८॥ कामरूपप्रदीपा च नीलकूटनिवासिनी। निशुम्भशुम्भमथनि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १३९ ।। तुम्हीं काम रूप प्रदीपा और तुम्ही नीलाचल निवासिनी हो हे शुम्भ निशुम्भमथनी । हे कामेश्वरी ! मैं तुमको प्रणाम करता हू ॥ १३९ ॥ कामाख्ये कामरूपस्थे कामेश्वरि हरप्रिये । कामांश्च देहि मे नित्य कामेश्वरि नमोऽस्तु त ॥१४० हे कामरूप में स्थित ! हे कामाख्ये ! हे हरप्रिये ! हे कामेश्वरी ! मेरी मनोकामना सदाही पूर्ण करो। हे कामेश्वरी! मैं तुमको प्रणाम करता हूं ॥ १४०॥ रुधिरासवपानाढयवने त्रिभुवनेश्वरि । महिषासुरसंहर्षि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १४१ ।।

(४२२)
योगिनीतन्त्रम।
हे रुधिरासवपानाव्यवदने भुवनेश्वार ! हे महीपासुरकाविनाशिनी । हे
देवि कामेश्वार ! मै तुमको प्रणाम करताहूं ॥ १४१ ॥
छागतुष्टे महाभीमे कामाख्ये सुरवन्दिते ।
जय कामप्रदे तुष्टे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १४२ ।।
हे महाभीमे ! छागतुष्टे ! हे सुरवन्दिते ! हे कामाख्ये ! तुम्हारी जय हो ।
हेकामप्रदे ! हे तुष्टे ! हे कामेश्वरि ! मे नुमको नमस्कार करताहूं।।१४२॥
भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः।
अष्टम्याश्च चतुर्दश्यां उपवासी नरोत्तमः ॥ १४३ ॥
संवत्सरेण लभते राज्यं निष्कंटकं पुनः ।
य इदं शृणुयाद्भक्त्या तव देवि समुद्भवम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति ॥१४४ ॥
इस प्रकार कामाख्याकी स्तुति करनेसे संपूर्ण अभिलाषा पूर्ण होती है
जब राजा राज्य भष्ट हो, तो नियम धारणपूर्वक पवित्र होकर अष्टमी, नवमी
और चतुर्दशीमें उपवास करनेसे एक वर्ष मेंही निष्कण्टक राज्यको फिर
प्राप्त होता है । हे देवि ! यह तुम्हारी उत्तम स्तुति जो मनुष्य भक्तिसे
सुनता है, वह सब पापोंसे छूटकर परम निर्वाण लाम करता
है॥ १४३ ॥ १४४ ॥
कामेश्वरी देवि सुरासुरप्रिये
प्रकाशिताम्भोजनियन्त्रिते नमः।
सुरारितेजोवधतुष्टमानसे
त्रयीमये देवि नमामि तुभ्यम् ।। १४५॥
हे सुरासुरप्रिये ! हे देवि कामेश्वरी ! हे प्रकाशितमुखाम्भोजे ! हे
नियन्त्रिते देवि ! मैं तुमको नमस्कार करताहूं । हे सुरारितेजोवधतुष्ट
मानसे | हे त्रयीमये देवि ! मैं तुमको प्रणाम करता हूं ॥१४५॥

भापाटीकासमेतम् । (४२३) सितासिते रक्तपिशङ्गविग्रहे रूपाणि यस्यास्तव भान्ति सर्वतः । करे कपाले कविकल्पितानि शुभाशुभानामयिते नमामि ॥ १४६ ।। हे सितासिते ! हे शोणितपिशङ्गविग्रहे ! अर्थात् रक्तके समान शरीरकी आभाव ली देवि! तुम्हारे अनेकरूप प्रति भात होते हैं, एवं कर और कपालमें शुभाशुभका विकलल्पित रूप (प्रकाशित ) होता है, हे देवि कामेश्वरि । में तुमको प्रणाम करता हूं ॥ १४६ ॥ कामरूपसमुद्भूते कामपीठावतंसके। विश्वाधारे महामाये कामेश्वरि नमोस्तुते ॥ १४७ ॥ हे कामरूपसमुद्भूते ! हे कामपीठावतसरूपिणी । हे विश्वाधारे । हे महामये । हे कामेश्वरि देवि ! मै तुमको प्रणामकरताहूं ॥१४७ ।। अव्यक्तविग्रहे शान्ते सन्तते कामपरिते । कालगम्ये परे श्रान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तुते ॥ १४८॥ हे अव्यक्तविग्रहे ! हे शान्ते ! हे सन्तते । हे कामरूपिणी ! हे काल- गम्ये परमे ! हे श्रान्ते हे कामेश्वरि मै तुमको नमस्कार करता हूं ॥१४८॥ त्वं सुषुम्नान्तरालस्या चिन्त्यसे ज्योतिषानध। प्रणतोऽस्मि पर वीरां कामेश्वरि नमोऽस्तु ते॥१४९।। जो सुपुम्नाके अन्तरालमें स्थित ज्योतिरूपीणी होकर योगियों के द्वारा चिन्तित होती है अर्थात् योगीजन जिनकी चिन्ता करते है उन परमा वीर कामेश्वरी देवीको मै प्रणाम करता हूं ॥१४९॥ दंष्ट्राकरालवदने मुण्डमालोपशोभिते । सर्वतः सर्वगे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते॥

.
(४२४) योगिनीतन्त्रम् ।
हे कामेश्वार ! मैं तुमको नमस्कार करताहूं । हे दंष्ट्राकरालयदने ! हे
मुण्डमालासुशोशिसे ! हे सर्वतः सर्वगे ! ॥ १५० ॥
प्रत्यूषे स्नानकाले च भोजने दन्तधावने ।
तथा विगतवस्त्रे च दशनं नैव संस्पृशेत् ॥ १५१ ॥
हे देवि ! कामेश्वरि ! मै तुमको प्रणाम करताहूं, इस प्रकार कामेश्वरी
की स्तुति और नमस्कार करना चाहिये स्वानकालमें, प्रातःकालमें भोजन
और दन्तधावनमें, वस्त्र बदलनेमें दांतोंको सर्श न करे ।। १५१ ॥
चैत्रमासे त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां वृषस्य च ।
न स्त्री देवों स्पृशेजातु त्यजेत्स्पृष्टेहि दर्शनम् ॥ ५२
चैतके महीनेकी त्रयोदशीमें और वृष अर्थात् ज्येष्ठके महीनेकी चतुर्दशीमें
स्त्रिये देवीको स्पर्श न करे और इन दिनों में दर्शनभी न करै ॥ १५२ ॥
दर्शने भयदं विद्याच्छापः पतति मूर्द्धनि ।
एवं ज्येष्ठसिताप्टम्यां कुमार वलोक्यते ॥ १५३ ॥
दर्शन करनेसे भय उपस्थित जौर मस्तकपर शाप पडता है । इसी
प्रकार ज्येष्ठके महीनेकी शुक्लाष्टमीमें कुमारगण दर्शनभी न करै ।।१५३॥
कुमार्यश्च सुरूपाश्च साधको न कदाचन ।
न रात्रौ संस्पृशेन्नारी बलि वै न स्पृशेत्क्वचित् ।
लिङ्गस्थाञ्च महादेवी कदाचिदपि न ब्रजेत् ॥१५॥
और सुरूपा कुमारीगण देवीका दर्शन न करै साधकभी रात्रीकालमें
रीका स्पर्ग न करे, और पूजाके द्रव्यका स्पर्श न करावै । लिगस्थिता
हादेवीके निकट कभी गमन न करै ॥ १५४ ॥
विप्राणां क्षीरवलयः शाल्यनं वाथ पायसम् ।
घृतप्लुतं चय॑फलं पुष्पं तस्य पृतान्वितम् ॥१५५॥

भापाटीकासमेतम् । (४२५) दद्यात्क्षीरश्च दुग्धानं भक्तानं वा निवेदयेत् । शाल्यन्नं वाथ समधु कृसरं खण्डमोदकम् ॥ १५६ ।। क्षीरभोग, शालिअन्न, खीर, घृतप्लुत चळफल (तली हुई खिचरी) और घृतयुक्त पुष्प. क्षीर, दुग्धान्न, भक्तान्न (भात) मधुसहित कसर (तिलयावक) औरर खंडमोदक यह सब द्रव्य ब्राह्मण निवेदन कर सकते हैं ।। १५५ ॥ १५६ ॥ राज्ञी हि पशवः शस्ता वैश्यानां व्रीहयस्तथा । क्षौद्र वृषलजातीनां सर्वेषां पशवोऽथवा ॥ १५७ ॥ राजाओंको पशु प्रदान, वैश्यगणको ब्रीहिदान और सब शूद्रोंको मधु- दान वा पशुप्रदान करना चाहिये ॥ १५७ ॥ निवेदयेच्छोणतुण्डं मानुषं वा लुलायकम् । वाराहं वा छागलं वा चामरं वरुणं तथा । मेपश्चाथ वराहश्च गोधिकाश्च निवेदयेत् ॥ १५८ ॥ अथवा शूद्रगण शोणतुण्ड ( वानर ) मनुष्यबलि वा महिपबलि या वराह, छागल, चामर, वरुण किंवा मेपके सह वराह वा गोषिका (गोय) निवेदन करें ॥ १५८॥ चामरणाश्च दशकांच्छागलके विशिष्यते । दशाभिश्छागलैरेव कूर्म एका प्रशस्यते ॥ १५९ ।। दश चामरसे एक छागल विशेष होता है और दश छागलकी अपेक्षा एक कूर्म प्रशस्त होता है ॥ १५९ ॥ कूर्मस्य च शतेनापि शशक विशिष्यते । शशकानां सहस्रात्तु वराहस्तु विशिष्यते ॥ १६० ॥ सौ कूर्मसे शशक (खरगोश ) प्रशस्त और हजार शशकसे एक वराह श्रेष्ठ होता है ।। १६०॥ --

(४२६)
योगिनीतन्त्रम्।
द्विसहस्रबराहभ्यो माहिपं श्रेष्ठमुच्यते।
दे सहने लुलायस्य खड्गमेकं विशिष्यते ॥ १६१ ॥
दो हजार वराहसे एक महिप श्रेष्ठ और दो हजार महिपसे एक गेंडा
श्रेष्ठ है ॥ १६१॥
खङ्गिनां तु सहस्रात्तु मानुषं चातुर्ल फलम् ।
द्विसहस्रमनुष्येषु शोणतुण्डः प्रशस्यते ॥ १६२ ॥
हजार गेंडेकी अपेक्षा एक मनुष्यसे अतुल फल होता है और दो हाजर
मनुष्योंसे एक शोणतुंड (वानर ) श्रेष्ठ है ॥ १६२ ।।
वे शते शोणतुण्डेभ्यः श्वेतग्रीवः प्रशस्यते ।
श्वेतग्रीवशताच्चापि गोधिका वरा मता ॥ १६३ ॥
दो सौ शोणतुण्डकी अपेक्षा एक श्वेतग्रीव श्रेष्ठ है और हजार श्वेत-
ग्रीवकी अपेक्षा एक गोधिका ( गोय) श्रेष्ठ है ॥ १६३ ॥
गोधिकानां शतादेवि नरस्य च कुमारकः ।
पशूनाश्चैव षण्मासात्परतोपि बलिर्भवेत् ।। १६४ ॥
शतगोधिकासे एक नरकुमारको श्रेष्ठ जानना चाहिये । पशुगणकी आयु
छ मासकी होनेपर ही वलिके योग्य होती है ॥ १६४ !!
श्वेतो वा छागल कृष्णो द्विवर्षात्परतो यदि।
संजाते गुग्गुलुश्राद्धे शोणाख्यं जम्बुकं तथा ।।१६५॥
स्नान गन्धमृगञ्चैव छागं वै पार्वतीयकम् ।
मूषकश्च करालश्च क्षुद्रमार्जारमेव च ॥१६६॥
कृष्णश्वेत छाग, दो वर्षका होनेपर और शोणाख्य जंयुक, खानगन्ध,
मृग, पार्वतीय छाग, यह सब गुग्गुलुश्राद्ध होनेपर पलिके योग्य होते हैं ।
भूपक, कराल, क्षुद्रमार्जार ॥ १६५ ॥ १६६ ॥

. गृध भापाटीकासमेतम् । (४२७) काकोलं कालविङ्कञ्च राजहंसश्च शारिकम् । कोकिलं शुकगृधं च मयूर चित्रकं तथा ॥ १६७ ॥ काकोल, (द्रोणकाक) कलविंक ( चटक ) राजहंस, शारिक, शुका । कोकिल मयूर, चित्रक ॥ १६७॥ अश्वश्च वेणुपृष्ठश्च कृष्णपारावतन्तथा । बृहत्कपोतकश्चैव खजरीटं तथैव च ॥ १६८ ॥ बकश्चैव बलाकश्च प्रयत्नेन विवर्जयेत । संहारे बलिदानेन स्त्रियं तु न विचारयेत् ॥ १६९ ॥ अश्व, वेणुपृष्ठ. कृष्ण पारावत (काला कबूतर) बृहत् कपोत (बड़ा) कबूतर) खञ्जरीट ( ममोला) यक, वालक, इन सबका यत्नपूर्वक त्याग करै बलिदानमें स्त्रीप्रदान करनेसे उसके पापका विचार करना नहीं पड़ता ॥ १६८॥ १६९ ॥ मिथुने दीयमाने तु न दोषो जायते प्रिये । श्मशाने महिषं दद्यादेवकस्य च सन्निधौ ॥ १७० ।। मिथुन प्रदान करनेसे उसमें दोप नही होता है, हे प्यारी ! श्मशानमें देवताके समीप महिप प्रदान करना चाहिये ॥ १७० ।। स याति ब्रह्मलोकश्च शिववभुवि मोदते । अन्तर्गदे तु यो हन्यात्स याति ब्रह्मशाश्वतम् ॥१७१।। ऐसा होनेसे वह ब्रह्मलोकमें जाता है और पृथ्वीमें शिवकी तुल्य प्रमोद करता है, अन्तर्गृहमें मारता है, उसको शाश्वत ब्रह्मपद प्राप्त, होता है ॥ १७१ ॥ अद्यापि दृश्यते ब्रह्म यस्तु दक्षिणतः प्रिये । यतते नात्र सन्देहो ज्ञानदाता सदाशिवः ।। १७२ ॥

(४२६)
योगिनीतन्त्रम् ।
द्विसहस्रवराहेभ्यो माहिष श्रेष्ठमुच्यते।
द्वे सहने लुलायस्य खड्गमकं विशिष्यते ॥ १६१॥
दो हजार वराहसे एक महिप श्रेष्ठ और दो हजार महिपसे एक गेंडा
श्रेष्ठ है ॥ १६१ ॥
खजिनां तु सहस्रात्तु मातुषं चातुले फलम् ।
द्विसहस्रमनुष्येषु शोणतुण्डः प्रशस्यते ॥ १६२ ।।
हजार गेंडे की अपेक्षा एक मनुष्यसे अतुल फल होता है और दो हाजर
मनुष्योंसे एक शोणतुंड (वानर ) श्रेष्ठ है ॥ १६२ ॥
दे शते शोणतुण्डेभ्यः श्वेतग्रीवः प्रशस्यते ।
श्वेतग्रीवशताञ्चापि गोधिकैका वरा मता ॥ १६३ ॥
दो सौ शोणतुण्डकी अपेक्षा एक श्वेतग्रीव श्रेष्ठ है और हजार श्वेत.
ग्रीवकी अपेक्षा एक गोधिका (गोय ) श्रेष्ठ है |॥ १६३ ॥
गोधिकानां शतादेवि नरस्य च कुमारकः।
पशूनाश्चैव षण्मासात्परतोपि बलिर्भवेत् ॥ १६४ ॥
शतगोधिकासे एक नरकुमारको श्रेष्ठ जानना चाहिये । पशुगणकी आयु
छै मासकी होनेपर ही वलिके योग्य होती है ।। १६४ ।
श्वेतो वा छागल कृष्णो द्विवर्षात्परतो यदि ।
संजाते गुग्गुलु श्राद्धे शोणाख्यं जम्बुकं तथा ॥१६५।।
स्नानं गन्धमृगश्चैव छागं वै पार्वतीयकम् ।
मूषकञ्च करालश्च क्षुद्रमार्जारमेव च ॥१६६।।
कृष्णश्वेत छाग, दो वर्षका होनेपर और शोणाख्य जंबुक,
खानगन्ध,
मृग,
पार्वतीय
छाग, यह सब गुग्गुलश्राद्ध होनेपर बलिके योग्य होते हैं ।
म्पक, कराल, क्षुद्रमार्जार ॥ १६५ ॥ १६६ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४२७)
काकोलं कालविच राजहंसश्च शारिकम् ।
कोकिलं शुकगृधं च मयूर चित्रकं तथा ॥ १६७ ॥
काकोल, (द्रोणकाक) कलविंक ( चटक ) राजहंस, सारिक, शुका ।
गृध, कोकिल मयूर, चित्रक ॥ १६७ ॥
अश्वञ्च वेणुपृष्ठश्च कृष्णपारावतन्तथा।
बृहत्कपोतकश्चैव खञ्जरीटं तथैव च ॥ १६८॥
बकञ्चव बलाकञ्च प्रयत्नेन विवर्जयेत ।
संहारे बलिदानेन स्त्रियं तु न विचारयेत् ॥ १६९ ॥
अश्व, वेणुपृष्ठ. कृष्ण पारावत (काला कबूतर) बृहत् कपोत (बड़ा)
कबूतर) खजरीट ( ममोला) वक, बालक, इन सबका यत्नपूर्वक त्याग
करै बलिदानमें स्त्रीप्रदान करनेसे उसके पापका विचार करना नहीं
पड़ता ॥ १६८ ॥ १६९ ।।
मिथुने दीयमाने तु न दोषो जायते प्रिये।
इमशाने महिषं दद्यादेवकस्य च सन्निधौ ॥ १७० ।।
मिथुन प्रदान करनेसे उसमें दोष नहीं होता है, हे प्यारी ! श्मशानमें
देवताके समीप महिंप प्रदान करना चाहिये ।। १७० ॥
स याति ब्रह्मलोकश्च शिववभुवि मोदते ।
अन्तर्गृहे तु यो हन्यात्स याति ब्रह्मशाश्वतम् ॥१७॥
ऐसा होनेसे वह ब्रह्मलोकमें .जाता है और पृथ्वीमें शिक्की तुल्य
प्रमोद करता है, अन्तर्गहमें मारता है, उसको शाश्वत ब्रह्मपद प्राप्त,
होता है ॥ १७१ ॥
अद्यापि दृश्यते ब्रह्म यस्तु दक्षिणतः पिये।
यतते नात्र सन्देहो ज्ञानदाता सदाशिवः ॥ १७२ ॥

(४२८) योगिनीतन्त्रम् । हे प्रिये ! अब भी दक्षिण दिशामें ब्रह्म दिखाई देता है, वहां शिवकी उपासना करनेसे अवश्य ज्ञान देते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥१७२॥ तस्मादक्षिणकर्णेन भूमौ पतति वै नरः। महापातक युक्तोऽपि युक्तो वाप्युपताकैः ॥ १७३ ॥ इसी कारण दक्षिण कोंमें मनुष्य भूमिपतित होते हैं, महापातकयुक्त हो वा उपपातकयुक्त हों ॥ १७३ ॥ श्मशाने बलिदाने तु मुक्तो गच्छेच्छिवालयम् । अकामो वा सकामो वा प्राणांस्त्यजति तत्र वै । त्यक्तदेशोपि भवति स्वयमेव गणेश्वरः ॥ १७४ ।। श्मशानमें बलिदानसे मुक्त होकर शिवालयमें जाते हैं, अकाम हो वा सकाम हो, वहां प्राण त्याग करके उस देशके परित्याग करनेपर स्वयं गणेश्वर होते हैं ॥ १७ ॥ परदेशान्जितं वाथ कृत्वा दत्वा बलिं नृपः। महापातकिनं चौरं मूर्ख वा चैकवीरकम् । ब्रह्माद्विषं स्त्रीजितं च प्रयत्नेन न योजयेत् ॥ १७५ ।। राजागण परदेशसे आये हुए महापातकी, चोर, मूर्ख, वा वंशके एक मान वीर, स्त्रीजित, ब्रह्मद्वेपी, इन सबको यत्नपूर्वक परित्याग करै ।।१७५॥ मणिमुक्तासुवर्णादि देवे दत्तं तु यद्भवेत् । न निर्माल्य द्वादशाहं ताम्रपात्रं तथैव च ॥१७६॥ मणि, मुक्ता, प्रवाल (मूंगा) सुवर्णादि और ताम्रपान, देवताको दिया जानेपर बारह दिनतक निर्माल्य न करै अर्थात् देवस्नानसे अन्यन्न - -

भाषाटीकासमेतम् । (४२९)
पट्टी शटी च षण्मास नैवेद्यं दत्तमानतः ।
मोदकं कृसरञ्चैव यामाद्धन महेश्वरि ।। १७७ ।।
पट्टी (रेशम और साटी (साडी) की छः महीने देवस्थानमें रक्षा
करनी चाहिये । नैवेद्य (केवल दानमात्र) मोदक तथा कसर (खिचडी)
अर्द्धप्रहर रह सकता है ॥ १७७ ॥
पट्टवस्त्रं त्रिमासाच्च यज्ञसूत्रमहः स्मृतम् ।
यावदुणं भवेदन्नं परमानं तथैव च ॥ १७८ ॥
रेशमीन वस्त्र तीन महीने. यज्ञसूत्र एकाह (केवल एक दिन ) अन्न
और परमान्न जबतक उप्ण रहे, ( इसके पीछे निर्माल्य करै) ॥१७८॥
मस्तकं रुधिरञ्चैव अर्धरात्रेण पार्वति ।
मुहूर्त दधि दुग्धश्च आज्यं यामेन शांकरि ॥ १७९ ॥
मस्तक और रुधिर आधीरात पीछे, दही और दूध मुहूर्त्तकालपीछे
आज्य (धृत ) एक प्रहर पीछे ॥ १७९ ॥
करवीरमहोरावं बिल्वपत्रं तथैव च ।
जपाबन्धूकमाल्यश्च निर्माल्यं साईमासकम् ॥१८॥
कनेर और बेलपत्र अहोरात्रमें नपामाल्य और बन्धकमाल्य डेढ महीने
पीछे ॥ १८०॥
माल्यं वै करवीरस्य पद्मानां विल्वकस्य च ।
मासान महेशानि ताम्बूलं दत्तमात्रतः ॥ १८१ ॥
करनेकी माला, पद्मकी माला, महीनेके मन्तमें और वेलकी माला,
भाधा महीनेके अन्त में, और तांबूल केवल देते ही निर्माल्य करै ॥१८॥
खरं पनसं द्राक्षां मातुलुङ्गश्च शावकम् ।
कदली नागरंगञ्च तथा जांबूफलानि च ।
शालूक मधुकश्चैव प्रयत्नेन निवेदयेत् ॥ १८ ॥

,
(४३०)
योगिनीतन्त्रम् ।
खजूर, पनस, दाख, मातुलुङ्ग, शावक, कदली, (केला)
नागरइभ, जंबूफल, शालूक और मधुक यह सब यत्नपूर्वक निवेदन
करे ॥ १८२ ॥
फलं बिल्वस्य दाडिम्ब जयन्ती कर्कटी तथा ।
त्रिपुरश्चैव वाताकी देवीप्रीतिकराणि च ॥ १८३ ॥
न निर्माल्यश्च दाडिम्ब तथा बिल्वफलं प्रिये ।
सौगन्धिकश्चैव दलं प्रयत्नेन नियोजयेत् ॥ १८४ ॥
विल्वफल, दाडिमी, जयन्ती, (नादेई ) ककडी, त्रिपुर, वाकी
(बतिया ) यह सब देवीकी प्रसन्नता करनेवाले हैं । हे प्रिये !
दाडिमी और बेल निर्मात्य नही है । सौगंधिक दल यत्नपूर्वक
नियोजित करै ॥ १८३ ॥ १८४ ॥
कदली चीजपूरञ्च दुग्धं पक्वं निवेदयेत् ।
कन्दुप कशेरुश्च जम्बबालं प्रियं भवेत् ॥ २८५ ॥
विजौरा निंबूका दल दूधमें पकाकर निवेदन करना चाहिये कन्दु
पक्च- कशेरु और जंववाल (फल विशेष ) देवीकी प्रसन्नता करानेवाले
है ।। १८५ ॥
आर्द्रकं लवणश्चैव जीरकं पिप्लीयकम् ।
जातीकोप तिन्दुकञ्च देव्याः प्रियतर महत् ॥१८६ ॥
अदरक, लवण. नीरा, पीपल, जीया और तिन्दुक देवीको महा-
प्रियकर हैं ॥ १८६ ॥
रामरम्भाफलं पुष्पं कदली धूम्रतापिताम् ।
न योजयेन्महादेव्यै उत्पलस्य च वीजकम् ।
धान्यं श्रावणकं मत्य द्विःस्विन्नश्च विवर्जयेत् ॥१८७॥

भाषाटीकासमेतम् ।
(४३१)
रामरम्भाफल (शरीफा ) पुष्प, कदली और उत्पलबीज धुएमें तपाकर
देवीको प्रदान न करै। दोवारमें पकाये श्रावणके धान्य और मर्त्य
वर्जित है ॥ १८७ ॥
नारिकेलं सुवणाभं नारिकेलञ्च वामकम् ।
निवेदयेन्महादेव्यै तोय तस्य विशेषतः ॥ १८८ ॥
नारियल और भूरानारियल, वामक और विशेषतः नारियलका जल
महादेवीको निवेदन करै ॥ १८८ ॥
नारिकेलश्च भाण्डीरं देवश्राद्ध विवर्जयेत् ।
वकुलस्य फलं पक्वं पद्मस्य च फलं तथा ॥ १८९ ।।
नियोजयेन्महादेव्यै चान्द्रायणफलं लभेत् ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि पुप्पाध्याय समासतः ॥१९॥
देवश्राद्धमें नारियल और पिण्डखजूर वर्जित हैं महादेवीको पका हुआ
वकुलका फल और पद्मफल प्रदान करनेसे चान्द्रायण व्रतका
फल प्राप्त होता है हे देवि ! संक्षेपसे पुष्पाध्यायका विवरण कहता हूं
सुनो ॥ १८९ ॥ १९० ॥
ऋतुकालोद्भश्चैव मल्लिकाजातिपुप्पकैः ।
सितरक्तस्तथा पुष्पैनलिः पद्मश्च पाण्टुरैः।। १९१॥
किंशुकैस्तगरेश्चैव जपाकनकचम्पकैः ।
वकुलेश्चैव मन्दारैः कुन्दपुष्पैः कुरण्टकैः ॥ १९२ ॥
यथा ऋतुसमुत्पन्न, चमेली, जाति, सफेद और लालपुष्प और
नील पाण्डुरपद्म, किशुक, तगर नपा, कनक; चम्पक, बकुल मन्दार
कुन्दपुष्प कुण्टक ॥ १९१ ॥ १९२ ॥
धत्तूरकादियुक्तश्व बन्धूकागत्यसम्भवः।
मदनैः सिन्धुवारश्च दुर्वाकुरदलस्तथा ॥ १९३ ॥

(४३२) योगिनीतन्त्रम् । धतूरा, गुरदुपैरी, अशोक, मदन. निर्गुण्डी, कोमल दूर्वाकुर॥१९३॥ पत्रेश्च तुलसीनाच बिल्वपत्रः सुकोमलैः। करवीररय माध्यस्य सहस्राणि ददाति यः। सकामान्प्राप्य चाभीष्टान्देवीलोके महीयते ॥१९४|| तुलसीपत्र और अत्यन्त कोमल वेलपत्रसे देवीकी पूजा करनी चाहिये जो मनुष्य हनार कनेर और कुन्दपुष्प देवीको प्रदान करता है वह संपूर्ण अभीष्ट और कामनाको प्राप्त होकरदेवीके लोकमें जाताहै ॥ १९४ ॥ एकं स्यात्करवीरं तु पद्मानां द्विसहस्रवत् । निर्माल्यं न ऋते दद्यात्पुष्पाणि वनजानि च॥१९५॥ एक कनेरका पुष्प दो हजार कमलके समान है, बनके पुष्ष विना उत्सर्ग किये कभी देवीको प्रदान न करै ।। १९५ ।। न शक्नुवन्ति वे देव्याः संगृहीतुं समुद्यता । एकैकं कुसुमं यक्षा रक्षन्ति दश वै यतः ॥ १९६ ॥ तथा यक्षाङ्गनाः पञ्च सर्वतः कुसुमावृताः तस्मादाहृत्य कुसुमं दद्याद्देवानिपतृनपि ॥ १९७ ॥ क्योंकि देवियें इस पुष्पके आकर्षण करने में उद्यत होकर समर्थ नहीं होती। दश दश यक्ष और पाच पाच यक्ष स्त्रिया एक एक कुशुमकी रक्षा करती हैं, इस कारण कुसुम लाकर देवता और पिरोंको प्रदान कर॥ १९६ ॥ १९७ ॥ कुर्यात्पुष्पगृहं तव कामाख्योपरि शंकरि । इह कामानवाप्नोति दुगालोकेमहीयते ॥१९८॥ हे देवि ! वहा एक पुष्प गृह बनाना चाहिये । इस प्रकार पुष्प प्रदान करके इस लोकमें संपूर्ण कामनाको प्राप्त हो दुर्गालोक्में जाकर आनन्द समभोग करता है ।। १२८ ॥

। भाषाटीकासमेतम् । (४३३) 'करवीरसजातीयं पूजयेद्यस्तु शाङ्करि । अग्निष्टोमफलं लब्ध्वा सूर्यलोके महीयते ॥ १९९ ॥ हे शंकार ! जो मनुष्य कनेर और तज्जातीय पुष्प द्वारा पूजा करता है वह अमिष्टोमके फलको प्राप्त होकर सूर्यलोकमें जाता है ॥१९९।। पूजयित्वा नरो भक्त्या चण्डिको पद्ममालया। ज्योतिष्टोमफलं प्राप्य सूर्यलोके महीयते ॥ २०० ॥ मनुष्यगण भक्तिपूर्वक पदामालासे चण्डिकाकी पूजा करके ज्योति प्टोमके फलको प्राप्त होते हैं और सूर्यलोकमें जाकर पूजाको प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥ घकपुष्पसजातीयं तथा रुद्रजटस्य च । वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति नान्यथा ॥२०१॥ वकपुष्प और तज्जातीय पुष्प तथा रुद्रजटासे पूजा करनेपर बाजपेय यज्ञका फल मिलता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २०१ ॥ सर्वेषामेव पुप्पाणां प्रवरं नीलमुत्पलम् । नीलोत्पलसहस्रेण यस्तु मालां प्रयच्छति । दुर्गायां विधिवदेवि तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २०२ ॥ नील कमल सब पुष्पोंमें श्रेष्ठ है, जो मनुष्य सहस्र नील कमलोंकी माला दुर्गादेवीको विधिपूर्वक प्रदान करता है उसका पुण्यफल सुनो २०२॥ वर्षकोटिसहस्राणि वर्षकोटिशतानि च । देव्यास्त्वतुचरो भूत्वा रुद्रलोके महीयते ॥ २०३॥ वह सौ करोड और हजार करोड वर्ष देवीका अनुचर होकर रुद्रलोकमें पूजित होता है । २०३॥ वक्रधान्योद्भवं यच्च सूक्ष्मधान्योद्भवंतथा । राजधान्योद्भवञ्चैव रक्तधान्योद्भवं तथा ॥२०४ ॥ २८ .

(४३४)
योगिनीतन्त्रम् ।
शस्तं तण्डुलमक्षुण्ण सप्ताष्टनवसंख्यया।
दूर्वाडकुरसमेतश्च भगवत्यै निवेदयेत् ।
अष्टम्यां वा नवम्यां वा सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥२०५॥
वक्रयान्योत्पन्न, सूक्ष्मधान्योत्पन्न, राजधान्योत्पन्न और रक्तधान्यो।
स्पन्न (सारत चावल ) प्रशस्त है, उनके सप्त अष्ट नवसंत्यक तण्डुल
दुवापुरके सहित अष्टमी नवमीमें प्रदान करनेसे अश्वमेधका फल प्राप्त
होता है ।। २०४ ॥ २०५ ॥
गन्धानुलेपनं दत्त्वा ज्योतिष्टोमफलं लभेत् ।। २०६॥
देवीको गन्धानुलेपन प्रदान करनेसे ज्योतिष्टोम यनका फल मिरता
है ॥ २० ॥

भाषाटीकासमतम् । (४३५) ; पद्मं दूर्वाडकुरश्चैव तुलसीदलमेव च। आशु पर्युषितं न स्यात्कुसुमं चैव शाङ्करि ॥२१॥ पन दूर्गाकुर और तुलसीदल दूपित नहीं होते । हे शाङ्कार ! कुचम शीघ्र ही बासी नहीं होते ॥ २१० ॥ नार्चयेन्झिटिपुष्पेण पीतेन नगरेण च । श्वेतौडेण च कृष्णेन विजयेन न चार्चयेत् ॥ २११ ।। झिण्टी पुष्प, पीततगर, श्वेत ओडू और कृष्ण वर्ण के विजय पुष्पसे पूजा करै ।। २११ ॥ विलक्षं प्रजपेन्मन्त्रं पुरश्चरणणसिद्धये ! न्यासश्च तर्पणश्चैव होम पंक्त्यष्टकं चरेत् । . जितेन्द्रियो महेशानि सोऽग्निष्टोमफलं लभेत् ॥२१२॥ पुरश्चरणसिद्धिके निमित्त तीन लक्ष मन्त्रजप, न्यास, तर्पण, होम और पंक्त्यष्ट (एक सौ आठ) का अनुष्ठान करनेसे वह जितेन्द्रिय मनुष्य अमिष्टोमके फलको प्राप्त होता है ।। २१२ ॥ शुक्लपक्षे नवम्यां चाप्यष्टम्यां परमेश्वरीम् । त्रिकालं पूजयेद्यस्तु चतुर्दश्यां मम प्रिये ॥ २१३ ॥ हे प्यारी ! जो मनुष्य शुक्लपक्षकी अष्टमी नवमी और चतुर्दशीको तीनों कालमें परमेश्वरीकी पूजा करता है ।। २१३ ॥ स गच्छति परं स्थानं यत्र देवी व्यवस्थिता । संक्रीडय तत्र सुचिरं राजा भवति भूतले ॥ २१४ ।। वह मनुष्य देवीके अधिष्ठित परमस्थानमें जाता है, और वह चिरका- लक्रीडा करके पृथ्वी राजा होकर जन्म लेता है ॥ २१४ ॥ 'स्नात्वोपवासनियमः पूजाजागरमार्जनः। ।

.
योगिनीतन्त्रम् ।
शस्तं तण्डुलमक्षुण्णं सप्ताष्टनवसंख्यया ।
दूर्वाकुरसमेतश्च भगवत्यै निवेदयेत् ।
अष्टम्यां वा नवम्यां वा सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥२०५॥
वक्रधान्योत्पन्न, सूक्ष्मधान्योत्पन्न, राजधान्योत्सन्न और रक्तधान्यो'
त्पन्न (साबत चावल ) प्रशस्त है, उनके सप्त अष्ट नवसंख्यक तण्डुल
दूर्वाकुरके सहित अष्टमी नवमीमें प्रदान करनेसे अश्वमेधका फल प्राप्त
होता है । २०४ ॥ २०५ ॥
गन्धानुलेपनं दत्त्वा ज्योतिष्टोमफलं लभेत् ॥ २०६॥
देवीको गन्धानुलेपन प्रदान करनेसे ज्योतिष्टोम यज्ञका फल मिलता
है ।। २०६ ॥
कुंकुमेन विलिप्याय गोसहस्रफलं लभेत् ।
चन्दनागुरुकपूरैः शुक्लपुष्पैः सकुंकुमैः ।
विलिप्तां पूजयेदुगामग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ २०७ ॥
और कुंकुमविलेपित अर्घ्यदान करनेसे सहस गोदानका फल प्राप्त
होता है । चन्दन, अगर, कपूर और कुंकुम विलिप्त शुक्ल पुप्पद्वारा
दुर्गादेवीकी पूजा करनेसे अमिष्टोमका फल प्राप्त होता है ॥ २०७ ॥
निम्बपत्रश्च कुन्दश्च तमालामलकीदलम् ।
कहार तुलसीश्चैव पद्मश्चाहानिपुष्पकम् ॥ २०८ ।।
निम्बपत्र, कुन्द, तमालदल, आमलकी दल, कलार, तुलसी, पम
और अहानिपुष्प, यह सब पुप्प ॥ २०८ ॥
एतत्पर्युषितं न स्याद्यच्चान्यत्कलिकात्मकम् ।
न दूप्येच्छिन्नभिन्नश्च जातीपुष्पञ्च शाङ्कार ।। २०९ ॥
और अन्यन्य कलिकात्मक पुष्प पर्युषित (बासी) नहीं होते । हे
शाङ्कार ! छिन्न भिन्न जाती पुष्प ॥ २०९ ॥

भाषाटीकासमतम् । (४३५) पद्मं दूर्वाड्कुरश्चैव तुलसीदलमेव च । आशु पर्युषितं न स्यात्कुसुमं चैव शाङ्करि ॥२१॥ पन दूर्वाकुर और तुलसीदल दूषित नहीं होते । हे शाकार ! कुसुम शीघ्र ही बासी नहीं होते ॥ २१० ॥ नार्चयेन्झिटिपुष्पण पीतेन नगरेण च । श्वेतोड्रेण च कृष्णेन विजयेन न चार्चयेत् ।। २११ ॥ झिण्टी पुष्प, पीततगर, श्वेत ओडू और कृष्ण वर्णके विजय पुष्पसे पूजा करै ॥ २११ ॥ विलक्षं प्रजपेन्मन्त्रं पुरश्चरणणसिद्धये ! न्यासश्च तर्पणश्चैव होम पेक्त्यष्टकं चरेत् । जितेन्द्रियो महेशानि सोऽग्निष्टोमफलं लभेत् ॥२१२॥ पुरश्चरणसिद्धिके निमित्त तीन लक्ष मन्त्रजप, न्यास, तर्पण, होम और पंक्त्यष्ट ( एक सौ आठ ) का अनुष्ठान करनेसे वह जितेन्द्रिय मनुष्य अमिष्टोमके फल्को प्राप्त होता है ।। २१२ ॥ शुक्लपक्षे नवम्यां चाप्यष्टम्यां परमेश्वरीम् । त्रिकालं पूजयेद्यस्तु चतुर्दश्यां मम प्रिये ॥ २१३ ।। हे प्यारी ! जो मनुष्य शुक्लपक्षकी अष्टमी नवमी और चतुर्दशीको तीनों कालमें परमेश्वरीकी पूजा करता है ।। २१३ ॥ स गच्छति परं स्थानं यत्र देवी व्यवस्थिता । संक्रीड्य तत्र सुचिरं राजा भवति भूतले ॥ २१४ ॥ वह मनुष्य देवीके अधिष्ठित परमस्थानमें जाता है, और वह चिरका- लक्रीडा करके पृथ्वीमें राजा होकर जन्म लेता है ॥ २१४ ॥ स्नात्वोपवासनियमः पूजाजागरमार्जनः।

योगिनीतन्त्रम्।
सर्वकालेषु सर्वेपु कामी यस्तु पूजयेत ।। २१५ ॥
विमानवरमारुह्य ध्वजमालाकुलं तथा
ब्रह्मलोकं नरो याति मोदते शाश्वती समा॥२१६।।
जो मनुष्य सदा ही स्नान उपवास और नियमपरायण होकर पूजा
जागरण और मार्जनादि द्वारा कामेश्वरीकी पूजा करता है वह वजा.
मालासे शोभायगान विमानपर चढकर ब्रह्मलोक जाय सदा आनन्द
भोगता है ॥ २१५ ॥ २१६ ॥
सदा भक्तिरतो भूत्वा तस्माद्विभवबिस्तरः।
पूजयेत्सततं दुर्गा महापुण्यफलेच्छया ॥ २१७ ॥
इस कारण सदा भक्तिनिरत होकर वैभवविस्तारके अनुसार महा-
फल प्राप्त होनेकी इच्छासे दुर्गादेवीकी पूजा करे ॥ २१७ ।।
अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखे प्रिये।
मासैश्चतुर्भिर्यत्पुण्यं विधिनाऽऽपूज्य चण्डिकाम् ।
तत्फलं लभते देवीं नवम्यां कार्तिकस्य च ॥ २१८॥
मासि चाश्वयुजे देवीं शुक्लपक्षे महेश्वरीम् ।
नवम्यां पूजयेद्यस्तु तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २१९ ॥
हे पडशीतिमुख अर्थात् छियासी मुखवाली प्रिये ! अयन, विपुषे
(पुण्यकाल ) और चार मासमें विधिपूर्वक चण्डिकाकी पूजा करके जो
फल मिलता है, कार्तिकके महीनेकी नवमीमें देवीकी पूजा करनेसे वहीं
फल मिल जाता है, आश्विनमासके शुक्लपक्षकी नवमीमें देवीकी
पूजाका फल सुनो ॥ २१८ ॥ २१९ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च ।
तत् फलं समवाप्नोति नात्र किंचित् प्रपद्यते ॥२०॥

भाषाटीकासमतेम् । (४३७) हजार अश्वमेध और सौ वाजपेयका जो फल है वही फल प्राप्त होता है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ २२० ॥ हनूमत्तश्चोत्तरे च एकविराद्धर्मितम् । मुक्तिमण्डपिकं नाम स्थान परमदुर्लभम् ।। २२१ ॥ हनूमत् तीर्थक उत्तरमें इक्कीस धनुःप्रमाण मुक्तिमण्डपिनामका एक परम दुर्लभ स्थान है ॥ २२१ ॥ स्थित्वा तु प्रजपेत्तत्र परां गतिमवाप्नुयात । ततः कृताञ्जलिर्मुद्रां कृत्वा देवी प्रसादयेत ॥२२२।। वहां स्थित होकर जप करने से परमगति प्राप्त होती है। फिर हाथ जोड़कर मुद्राद्वारा देवीको प्रसन्न करावे ॥ २२२ ॥ नमस्ते सर्व देवेशि भक्तानां भयहारिणि । संसारसागरे मनं त्राहि मां परमेश्वरि ॥ २२३ ॥ हे सर्व देवेशि ! हे भक्तों का भय हरनेवाली! मै तुमको नमस्कार करताहूं । मैं संसार सागरमें मम हूं। हे परमेश्वार ! मेरी रक्षा करो२२३ एवं प्रसाथ तां देवी दण्डवत्प्रणिपत्य च । ततोऽर्चयेद् गुरुं भक्त्या पुष्पगन्धानुलेपनैः ॥ २२४ !! इस प्रकार देवीको प्रसन्न कराकर दण्डवत् प्रणाम करे । फिर भक्ति- सहित, पुष्प, गंध और अनुलेपन द्वारा गुरुकी पूजा करके ॥२२४॥ कुमारी भोजयेत्तत्र जागरं कारयनिशि। माहात्म्यश्च महादेव्याःगीतिकाश्चापि कारयेत्।।२२५ वहां कुमारी भोजन कराय रात्रि जागरण करे । महादेवीके माहा- स्यका पाठ और गीत गवावै ॥ २२५ ॥ ध्यायंस्तुवन्परां देवों निनयेद्रजनी बुधः। मासि मासि तथाष्टम्यां चतुर्दश्यां विशेषतः ॥२२६।।

(४३८) योगिनीतन्त्रम् । गोधूलिसमये देवी नयेत्कामेश्वरालयम् । रथे वा शिविकायां वा दृष्ट्वा तत्र कदाचन । सर्वपापविनिर्मुक्तो देवीलोके महीयते ॥ २२७ ।। इस प्रकार ध्यान और स्तवादि द्वारा बुद्धिमान् मनुष्य देवीको प्रसन्न करे प्रति महीनेकी अष्टमीमें और विशेषकर चतुर्दशीको गोधूलि समयमें रथ वा पालकीपर चढाकर महादेवीको कामेश्वरालयमें लेजाय । यहा देवी का दर्शन करनेपर संपूर्ण पापोंसे छूटकर देवीलोकमें जाता है ॥ २२६ ॥ २२७ ॥ मुक्तिनण्डपिकां नीत्वा पूजयेद्यस्तु शाङ्करि । दशाश्वमेधे यत्पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ २२८ ॥ जो मनुष्य देवीको मुक्तिमण्डपमें लेजाकर पूजा करते हैं, वह दशाश्व- मेधके पुण्य फलको प्राप्त होते हैं. इसमें सन्देह नहीं ॥ २२८ ॥ न कुर्यादिवसे यात्रां न च रात्रौ महानिशि। शरत्कालस्य सप्तम्यां गच्छेन्नगरदक्षिणे। सायंकाले महेशानि सर्वयज्ञफलं लभेत् ।। २२९ ।। दिनमें, रानिमें, महानिशामें देवीको लेकर यात्रा न करे । शरत्कालकी सप्तमीको संख्याके समय नगरके दक्षिण भागमें देनीको ले जाकर पूना करनेसे सब यज्ञोंका फल मिल जाता है ।। २२९ ॥ अष्टम्यां पूजयित्वा च नवम्यां स्रोतसो जले। यश्चैव सापयेद्देवी दिवसे च न दुप्यति ॥ २३०॥ अष्टमीमें पूजा करके नवमीमें स्रोतके जलसे देवीको स्नान करावे । दिनमें स्नान करानेसे दोपका निमित्त नहीं होता ॥ २३० ॥ सतः स्पृष्ट्वा रथे देवों न शोको जायते भुवि । स्कन्धे देवीं वहेद्यस्तु अश्वमेधः पदेपदे । तस्मात् प्रयत्नतो गुर्वी शिविकां कारयेद्बुधः।।२३१।।

भावाटीकासमेतम् । (४६९) तदनन्तर रथमें स्थित देवीको स्पर्श करनेसे पृथ्वीमें फिर शोककी प्राप्ति नहीं होती नो शिनिकास्थित देवीको कधेपर लेजाता है, उसको पद पद पर अश्वमेधका फल प्राप्त होता है, अतएव यत्नपूर्वक देवौकी पालकी रडी बनावे ॥ २३१ ॥ त्रिंशद्धन्वन्तरे देव्याः नानार्थ पर्वतन्तथा । पश्येत् कामेश्वरं देव भूमिपीठे व्यवस्थितम् ।। २३२॥ तीस धनुके अन्तरमें देवीके लानार्थ पर्वत अवस्थित है, वहा भूमिपीठमें भवस्थित कामेश्वर देवका दर्शन कर ॥ २३२ ॥ तस्योत्तरे कामसरो भानुहस्तप्रमाणतः। तत्र कामासनं जप्त्वा स्नात्वा कामानवाप्नुयात् २३३ उसके उत्तरमें बारह हस्त प्रमाण कामसरोवर स्थित है, वहा खान करनेके पीछे काम और आसन मंत्रका जप करनेसे संपूर्ण कामना प्राप्त कर है ॥ २३३ ॥ कामकुण्हे नरः स्नात्वा यः पश्येत् काममीश्वरम् । न तस्य पुनरावृत्ती रुद्रलोके महीयते ।। २३४ ॥ जो मनुष्य कामकुण्डमें स्नान करके कामेश्वरका दर्शन करता है उसको फिर पुनरावृत्ति करनी नहीं पडती, यह रुद्रलोकमें पूजाको प्राप्त होता है ॥ २३४ ॥ चतुर्भुजं शूलहस्तं खट्वाङ्गश्च वराभयम् । पद्मस्थं पूजयेद्देवं सर्वपापप्रणाशनम् । दाक्षणामूर्तिमन्त्रेण पूजयेच प्रसादयेत् ॥ २३५ ॥ चतुर्भुज, शूल हस्त खष्ट्वाङ्ग वराभयधारी पद्मस्थित देवकी पूजा करनेसे संपूर्ण पाप नष्ट होता है । दक्षिणामूर्तिमंत्रसे कामेश्वरीदेवकी पूजा और उनको प्रसन्न करै ॥ २३५ ॥ सकता (४४०) योगिनीतन्त्रम्। ओं नमःशिवाय तनिशामयाय नमः शिवाय शिवार्चिताय तुभ्यं कृपापराय नमो मायागहनाश्रयाय नमोऽस्तु शोषाय महान्धकाराय नमः शरण्याय नमो गणाय नमोऽस्तु भीमगणातुगाय नमोऽस्तुनानाभुवनादिको ॥ २३६ ॥ साक्षात् काल रानिरूपसर्वपूजित परमकृपालु मायाके अधिपति और शेषस्वरूप अथवा महाअन्धकाररूपी शरणागतोंका उद्धार करनेवाले गणाधिपति और अनेक लोकोंका विधान करनेवाले ऐसे श्रीमहादेवजीको नमस्कार है ।। २३६॥ स्नापयित्वा घृतक्षौद्रर्गन्धेीपैश्च पूजयेत् । कनकैबिल्वपत्रैश्च रक्तरुद्रजटेरपि । जयशब्देस्तवैश्चैव नानानैवेद्यवेदनः ॥ २३७ ।। इस मंत्रसे स्नान कराकर घृत, मधु, गंध, दीपादि द्वारा पूजा करें कनक, बिल्वपत्र, लाल रुद्रजटासे एवं जयशब्द स्तव और नाना मकारकी नैवेद्य निवेदन करके ॥२३७॥ चत्रे मासि त्रयोदश्यां शुक्लायां काममीश्वरम् । ये पश्यन्ति सुरश्रेष्ठं ते यान्ति परमं पदम् ॥ २३८ ॥ चैतके महीनेकी शुक्लत्रयोदशीमें पूजा करके मनुष्य सुरेश्वर कामेश्वरका दर्शन करता है वह परम पदको प्राप्त होता है ॥ २३८ ॥ - भाषाटीकासमेतम् । (१४१) अष्टमीकी रात्रिमें कामेश्वर देवको कामेश्वरी गृहमें लेजाकर वहा देवीके सहित उनकी पूना करनेसे अमिष्टोमका फल प्राप्त करता है इसमें सन्देह नहीं ॥ २३९ ।। दर्शनात् फलमाप्नोति दृष्ट्वा कामेश्वरी ततः। यं यं प्रार्थयते तत्र तत्तदेव न संशयः ।। २४०॥ वहा कामेश्वरीका दर्शन करनेसे जिस जिस फलकी प्रार्थना करता है। उस सबको प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ २४० ॥ कम्बलस्यत्ववामे च देवीदेवेन सगता। धतुरष्टान्तरे भद्रे यजेत् कोटीश्वरी पराम् ॥ २४१ ।। कम्पलके दक्षिणमें अष्टधनुके अन्तरमें कोटीश्वरी देवी देवके सहित एकत्र वास करती हैं, वहा परमा देवी कोटीश्वरीकी पूजा करनी चाहिये ॥ २४१॥ दृष्ट्वा च न स्पृशेदेवीं पुनार्थी न कदाच न । सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते ॥ २४२॥ पुत्रकी कामना करनेवाला मनुष्य वहा देवीका दर्शन करे, सर्श कमी न करें। इस प्रकार वहा देव और देवी कोटीश्वरीकी पूजा करनेपर सब पापोंसे छूट, रुद्रलोकमें जाकर पूजाको प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २४२ ॥ इति योगिनीतन्त्र सर्वतन्त्रोत्तमोत्तमे चतुर्विशतिसाहले द्वितीयभागे भापारीकाया सप्तम पटल ॥ ७ ॥ श्रीभगवानुवाच । ततोऽस्मिन् दिवसे देवि प्रायादाकाशवाहिनीम् । लोकचक्षुरिति ख्यातां सर्वपापहरो शुभाम् ॥ १॥ देव्या दक्षिणतश्चैव इक्षुक्षेपद्वयान्तरे। विधारा दृश्यते तत्र मध्यधारा सरस्वती॥२॥ "

(४४२) योगिनीतन्त्रम् ।
श्रीभगवान् बोले-हे देवि ! अन्नर इसी दिन सब पापोंका नाश
करनेवाली कल्याणदायिनी लोकचक्षु इस नामसे विख्यात आकाशवाहिनीमें
गमन करै वहां देवीके दक्षिणकी ओर इक्षुक्षेपद्वयान्तर ( जितने
स्थानमें दो गन्ने रक्खे जाय ) में त्रिधारा दिखाई देती है, उसकी मध्य
धाराका नाम सरस्वती है ॥ १ ॥ २॥
दक्षिणे वारुणा धारा उत्तरे यामुना स्मृता।
यामुने च कृते स्नाने मुच्यते घोरकिल्बिषात ॥३॥
दक्षिणमें वारुणाधारा उत्तरमें यमुनाको धारा बहती है, यमुनाकी
धारामें स्नान करनेपर मनुष्य घोर पापोंसे छूट जाता है !! ३ ॥
सरस्वत्यां कृतस्नानो विष्णुलोके महीयते ।
वारुणायां कृतस्नानो मुक्तिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥४॥
सरस्वतीकी धारामें खान करनेसे विष्णुलोकमें पूजाको प्राप्त होता है ।
वारुणामें खान करनेसे उत्तम मुक्ति प्राप्त होती है ॥ ४ ॥
त्रिधारासङ्गमो यत्र अनन्तः परिदृश्यते ।
आकाशगङ्गा सा देवी महापातकनाशिनी ॥ ५ ॥
जहा विधारा अन्तरूपमें दिखाई देती है, उसीको महापातक नाशिनी
देवी आकाशगंगा जानना चाहिये ॥ ५ ॥
नमो देवि सहस्राक्षे भवबन्धप्रणाशिनि।
नीलशैलस्थिते भद्रे पापं मे हर जाह्नवि ।
स्नान चानेन कृत्वा तु शब्दबीजेन पूजयेत् ॥ ६ ॥
हे देवि सहस्राक्षे । तुमको नमस्कार है । तुम्ही संसारबंधनका नाश
करनेवाली हो, हे कल्याणी ? जाहवी ! तुम्ही नीलशैलमें स्थित हो।
मेरे पापोंको हरो, इस मंत्र द्वारा स्नान करके शब्दवीज मंत्रसे पूजा
-
कर ॥ ६ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४४३) तस्याः कौवरदिग्भागे नातिदूरध्यवस्थितः । शुभ्राकृतिश्चारुरूपो वासुदेवः प्रकीर्तितः ॥७॥ उसकी उत्तर दिशामें थोडी दूर शुभारति मनोहररूप वासुदेव अव- स्थित हैं ।। ७ ॥ स्मरेण पूजयेल्लिङ्ग गन्धाद्यैः पायसैरपि । द्वादश्यां कात्तिके मासि दृष्ट्वा मुक्तिश्च विन्दति । रात्री जागरणादत्र मुच्यते सर्वपातकम् ।। ८ ॥ स्मरमंत्रसे गंधपुष्पादि और खीर द्वारा लिंगकी पूजा करे । कार्तिके महीनेकी द्वादशीमें उसका दर्शन करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। यहां रात्रि जागरण करनेपर समस्त पातकोंसे छुटकारा मिलता है ॥ ८ ॥ दक्षिणे चैव गङ्गायाश्चतुर्धन्वन्तरे स्थितः। महाश्मशाने भगवान् क्रीडते स्त्रीगणेः सह ॥९॥ गंगाके दक्षिण चार धनुके अन्तरमें अवस्थित भगवान् महाश्मशानमें स्त्रियों के सहित क्रीडा करते हैं ॥९॥ तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयः सहचारणाः । प्रसादनार्थ देवस्य नित्यमायान्ति चाहताः ॥ १० ॥ देवता, गंधर्व, ऋपि और चारणगण देवकी प्रसन्नताके अर्थ सदा ही आदरसे आते हैं ॥ १० ॥ तबाराध्य महादेवं भावभूतैर्गणेश्वरम् । प्राप्तवान् गाणपत्यं हि देवानामपि दुर्लभम् ॥ ११ ॥ वहा भक्तिभावसे महादेव गणपतिकी आराधना करनेपर देवदुर्लभ गाणपत्य प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ अद्यापि दृश्यते तत्र प्रत्यहं महदद्भुतम् । निःक्षिप्य मानुषास्थीनि भस्मीभूतः प्रजापतिः॥१२॥ १

(४४४) योगिनीतन्त्रम्।
अन भी यहा महत् अद्भुत दिखाई देता है। मनुष्योंकी अम्बि दाल-
नेसे भस्मीभूत होकर प्रजापति होते हैं ॥ १२ ॥
तत्र गत्वा महादेवं यः पूजयति मानवः ।
दिव्यलोकमवाप्नोति भिन्नदेहो न सशयः ॥ १३ ॥
जो मनुष्य वहा जाकर महादेवजीकी पूजा करता है, वह अन्यदेहमें
दिव्यलोकको प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ १३ ॥
कार्तिक मासि शुक्लायां चतुर्दश्यां विशेषतः ।
संपूज्य तत्र देवेशं सर्वप्रीतं पितामहम् ।
भवेत्मीत्या तु सर्वेषां रुद्रस्यानुचरो भवेत् ।। १४ ॥
कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें विशेषकर चतुर्दशीमें सर्वप्रीत पितामह देवे-
श्वरकी पूजा करनेपर उनकी प्रीतिसे रुद्रका अनुचर होता हे ।। १४ ॥
व्यंशश्च दृश्यते तत्र उत्तराग हरं श्रुतम् ।
पश्चिमाई हेरुकश्च विष्णुरूपिणमव्ययम् ॥ १५॥
भैरवी दक्षिणांशश्च त्रिपुरेत्यभिधीयते ।
प्रदानेन तु मन्त्रेण पूजयेत्परमेश्वरम् ।
वाजिमेधस्य यज्ञस्य लभते फलमुत्तमम् ॥ १६ ॥
महादेवके वहा तीन अंश दृष्टिगत होते हैं उत्तरांग हर, पश्चिमाग
अविनाश नित्यबुद्ध विष्णु अथ च दक्षिणाश भैरवीको जाने प्रदानमन्त्र
द्वारा महादेव परमेश्वरकी पूजा करनेसे अश्वमेध यज्ञके उत्तम फलकी
प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥ १६ ॥
कुलायेन त्रिकुण्डेन पूजयेद्भक्तिमानरः ।
महाविद्यामवाप्नोति पूजनान्नात्र संशयः ॥ १७ ॥
भक्तिमान् मनुष्य कुलादि त्रिकुण्डमत्रसे पूजा करनेपर पूजाके फलप्ते
महाविद्याको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ १७ ॥

भापाटिकासमेतम् । (४४५)
हेरुकं दशवर्णेन वासुदेवस्वरूपिणम ।
सर्वलोकेश्वरो याति जातिश्रेष्ठोभिजायते ॥१८॥
वासुदेवरूपी हेरुककी द्वादशवर्णमन्त्रसे पूजा करनेपर सर्वलोकोंका
ईश्वर और जाति श्रेष्ठ होकर जन्म ग्रहण करता है ॥ १८ ॥
रुधिरैमासमद्यैश्च पूजयेत्परमेश्वरीम् ।
रजन्यां संप्रदद्यात्तु कूर्ममांसं कदाचन ॥ १९ ॥
रुधिरमांस और मद्य द्वारा परमेश्वरीकी पूजा करे रात्रिमें कूर्मका मांस
कभी प्रदान न करै ॥ २९ ॥
चामरं मद्गुरं मत्स्यं प्रयत्नेन विसर्जयेत्
चिश्चां मुक्त्वा नीलशैवं विशाकं वा प्रमादतः ।
महाभयंकर विन्द्यात्स्पृष्ट्वा शापं प्रयच्छति ॥२०॥
चामर और मद्गुर मत्स्य यत्न पूर्वक त्याग दे मूलसे भी नीलशेव
(शाकविशेष ) वा चिश्चाशाक भोजन करनेसे महाभय उपस्थित होता है.
इससे देवता शाप देते हैं ॥ २० ॥
न स्पृशेत्सप्तरात्रश्च शाकं कामेश्वरि प्रिये ।
चान्द्रायणत्रयं कृत्वा ततः शुद्धिर्भविष्यति ॥ २१ ॥
हे प्रिये कामेसरी ! सात रात्रि शाकस्पर्श न करे ऐसा होनेसे तीन
चान्द्रायण व्रत करके तब शुद्ध हो सकता है ॥ २१ ॥
राजीव रजनी चैव शाकं चामरसम्भवम् ।
मुक्त्वा प्रमादतो देवि तदेवं व्रतमाचरेत् ॥ २२ ॥
राजीव, रजनी और चामर संभव शाक मूलसेमी भोजन करनेपर तीन
चाद्रायण व्रत कर॥ २२ ॥
कर्कन्धुं शर्करायुक्तं दम्भशाकं तथैव च ।
कूष्माण्डं पार्वतीञ्चैव दूरतः परिवर्जयेत् ॥ २३॥

(४४६) योगिनीतन्त्रम् । अष्टम्याच नवम्यान त्रयोदश्यां विशेषतः । एकविंशतिसूत्रेण तथा त्रिगुणितेन च ।। २४ ॥ त्रिगुणत्येकयोगेन पदे तु शिकं मतम् । कोशतः पट्टसूत्रेण अभावे रक्तकं न्यसेत् ॥ २५ ॥ कर्कन्धू और शर्करायुक्त दम्भशाक तथा पार्वतीय कूष्माण्ड (पहाडी पेठा) विशेषतः अष्टमी नवमी और त्रयोदशीमें यत्नपूर्वक त्याग दे इक्कीस सूत्रके तीन गुण मिलनेपर त्रिशकमला होती है। कोषके रेशमीन डोरेसे और इसके अभावम रक्तक सूत्र लाल सन) से माला गूथें ॥ २३ ॥ २४ ॥ २५ ॥ अन्य न दर्शयन्मालां न स्पृशेद्वामपाणिना। वानप्रस्थो यतिश्चैव ब्रह्मचारी तथा प्रिये । विष्णुमन्त्रस्य जाप्ये तु सुमन्त्रस्यापि च प्रिये ॥२६॥ वामहस्ते ततो धृत्वा सप्तबीजाक्षरं प्रिये ।। सञ्जपेदक्षिणेनैव प्रतिवीज वरानने ॥ २७ ॥ दूसरेको वह माला न दिखावै और उसको बायें हाथसे स्पर्श न करे बानप्रस्थ, यती और ब्रह्मचारी विष्णुमंत्रका जपपूर्वक वायें हाथसे पकडकर सप्तबीजाक्षर जप करनेके पीछे दक्षिणहाथसे प्रति बीजका जप करें ।। २६ ॥ २७ ॥ वरदाय गृहद्वारे तिन्तिडीकाय नमः। सहस्रान्मुच्यते पापान्जीर्णत्वचमिधोरगः ॥२८॥ 'गृहद्वारे वरदाय तितिन्डीकाय वै नमः, इस मंत्रका हमारवार नप कर- नेपर पुरानी त्वक् (कंचली) से सर्पके समान पापोंसे मुक्त होता है ॥२८॥ कामेश्वरस्य पृष्ठे तु यावत्सिद्धेश्वर स्थितः । तदन्तर्गतखण्डं च छायारुद्रः प्रकीर्तितः ॥ २९ ।।

- - भाषाटीकासमेतम् । (४४७) कामेश्वरके पश्चात् भागमें जहां सिद्धेश्वरस्थान 'छायारुद्र' नामसे कहा गया है ॥ २९ ॥ स्थाने चाव सदाच्छाया जायते च महेश्वरि । यः करोति वृषोत्संग तस्मिन्क्षेत्रे वरानने। अग्निष्टोमशतं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥३०॥ छाया इस स्थानको कभी नहीं छोड़ती। हे वरानने ! उस क्षेत्रमें वृपो सर्ग करनेसे शतअमिष्टोमका फल प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं॥३०॥ माघे मासि महेशानि च्छायारुद्रे तिलविना । पिण्डनिर्वापणं कृत्वा पिलणामनृणो भवेत् ॥ ३१॥ हे महेशानि ! छाया रुद्रक्षेत्रमें माघमासमें तिलके अतिरिक्त पिण्ड प्रदान करके मनुष्य पितृऋणसे मुक्त होते हैं ॥ ३१ ॥ ततो विन्ध्याचलं गत्वा कृष्णा रक्ता च या शिला। विन्ध्येशी सा समाख्याता प्रजयेत्कमलादिना ॥३२॥ फिर विंध्याचलमें जाकर जिस रक्तवर्ण शिलाका दर्शन करेगा, वही विन्ध्येश्वरी नामसे विख्यात है कमलादिद्वारा उसकी पूजा करनेके पीछे ॥ ३२ ॥ कामेश्वर्याश्च मन्त्रण सा पूज्या परमेश्वरि । गवामयुतदानेन यत्फलं यत्र पार्वति । तत्फलं लभते सत्यं विन्ध्येशीदर्शनेन च ॥ ३३ ।। कामेश्वरी मंत्रसे फिर पूजा करे । हे परमेश्वरि ! हे पार्वती ! अयुत (दशहजार ) गोदान करनेसे जो फल होता है, विंध्याचलमें विध्येशीका दर्शन करनेसे वही फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ तस्याः पूर्वोत्तरे देशे इक्षुक्षेपशताधिके । आकाशगङ्गा चिह्न तु या शिला सुरदीर्घिका ॥३४॥ .

(४४८) योगिनीतन्त्रम् ।
दक्षिणेन च तस्याग्रं किंचिदुच्चे च संस्थिता।
या ख्याता ललिता कान्ता ब्रह्महत्यापहारिणी ॥३५॥
उसके पूर्व उत्तर देशमें शतइक्षुक्षेप जितने स्थानमें सौ गन्ने रक्खे जा
सके ) के अन्तरमें आकाशगंगाचिहित जो सुरदीर्घिका शिला है, दक्षिणमें
उसका अप्रभाग कुछेक ऊंचे में स्थित रहताहै उस मनोहर ब्रह्महत्याका पाप
निवारण करनेवाली शिलाका नाम ललिता है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
अश्वत्थं नन्दिरूपश्च मूले कूर्माकृतिः शिला।
दृष्ट्वा नरश्च तं देवं न पश्यत्येव पातकम् ॥ ३६ ॥
वहा नन्दिरूप अश्वत्थ है उनके मूलमें कूर्माकृति शिला अवस्थित है
मनुष्यगण उन देवका दर्शन करनेपर सब पातकोंसे छूट जाते हैं ॥३६॥
तत्र योनिगत लिङ्गं चतुर्हस्तप्रमाणतः ।
नतः प्रदीपिकाकारं कुण्डं सर्वाधनाशनम् ।
तत्र व्यासेश्वरं देवं दृष्ट्वा निर्याति पातकम् ॥ ३७ ।।
वहा चार हत्त प्रमाण योनिगत लिङ्ग और प्रदीपाकार सब पापोंका
नाश करने वाला एक कुण्ड है, वहां व्यासेश्वर देवका दर्शन करनेपर
मनुष्य पापोंसे छूटनाता है ॥ ३७॥
व्यासतीर्थे नरः स्नात्वा ललिता योभिपूजयेत् ।
अश्वमेधसहस्रस्य तत्फलं लभते महत् ॥ ३८॥
| जो मनुष्य व्यासतीर्थमें स्नान करने के पीछे ललिताकी पूजा करता है
बह हजार अश्वमेघ के महाफलको प्राप्त होता है ३८ ॥
विशद्धन्वन्तरे प्राच्या वनदो नाम दाडिमः।
पद्मपत्राकृतिदलो निर्यासनोपचितिनः ॥ ३९ ॥
तस्य मूले स्थिता देवी उच्चावरणरूपिणी।
तस्याः सम्पृजनादेव ग्रहदोषैर्न लिप्यते ॥ ४० ॥

८ भाषाटीकासमेतम् । (१४९) उसके पूर्वकी ओर बीसधनुके अन्तरमें वनदा नामक निर्यासपरिचिहित (अर्थात् किसी अमोघा चिहविशेषसे युक्त) पद्मपत्राकृति पत्र युक्त एक दाडिम्य वृक्ष है उसके मूलदेशमें उच्चारणरूपिणी देवी स्थित है, उनकी पूजा करनेसे मनुष्य ग्रहदोषसे लिप्त नही होता ॥ ३९ ॥ ४० ॥ वृक्ष स्पृष्ट्वा भक्तिमती वन्ध्या गर्भधरा भवेत् । छिन्त्रहस्तो लभेद्धस्तं कालेनाङ्गं लभेत्पुनः ॥ ४१ ॥ वंध्या स्त्री भक्तिमती होकर उस वृक्षका स्पर्श करनेसे गर्भवती होती है, छेन्नहस्तको हस्तलाभ और कालक्रमसे अन्य हीनाङ्ग भी लाभकर सकता है ॥४१॥ दाडिमस्य च पूर्वे तु नातिदूरे प्रतिष्ठितम् । नवहस्तमितं रन्धं तद्देवं भुवनेश्वरम् । पूजयेत्कामबीजेन विजयी जायते नरः॥ ४२ ॥ दाडिम्बकी पूर्वदिशामें थोड़ी ही दूर नव हाथकी बरावर रंध्र प्रतिष्ठित है रहा भुवनेश्वर देव अवस्थित हैं, कामबीज मंत्रसे उनकी पूजा करनेपर मनुष्य विजय प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ तस्य वायव्यभागे तु अगस्त्यस्याश्रमे शुभे । देवं गदाधरंतत्र पूजयेत्कुसुमादिना ॥४३ ।। उसके वायु कोणमें अगस्त्यके शुभकर आश्रममें गदाघर देव अवस्थित हैं कुसुमादि द्वाराउनकी पूजा करे ॥ ४३ ॥ नातिदूरे तु देवस्य या शिलाश्वेतमुज्ज्वलम् ।। जल्पेशं तं महालिङ्ग पूजयेत्ताबदुञ्चरन् ॥ ४४ ॥ सौभाग्ये विधिवत्स्नात्वा जल्पेश यस्तु पूजयेव । अग्निष्टोमफलं तस्य भविष्यति मम निये ।। ४५ ॥

(४५०) योगिनीतन्त्रम् । उसके थोड़ीही दूर जो श्वेतवर्ण उज्ज्वल शिला है वही जल्पेश महालिग है मंत्रोचारणपूर्वक उनकी पूजा करे । सौभाग्यसे विधिपूर्वक स्नान करनके पीछे जल्पेशकी पूजा करनेपर उसको अग्निष्टोमका फल प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ ४५ ॥ पश्चिमे तस्य पातालभुवनाधिपचिद्वितम् । एकविंशतिभूभागे स्थितस्तत्र सदाशिवः ॥ तं प्रणम्य नरो भक्त्या न भूयो जायते क्वचित्॥४६॥ हे प्यारी ! उसके पश्चिममें पातालभुवनाधिप नामक सदाशिव हैं मनुष्य भक्तिपूर्वक यदि उनकी पूजा और प्रणाम करे तो फिर उनको कभी जन्म लेना नहीं पड़ता || ४६ ॥ तस्य देवस्य भूभागे शङ्करी कालहस्तके । गोविन्दपर्वते रम्ये शुक्लवर्णन या शिला ॥ ४७ ॥ हे शंकार ! उन देवके कालहस्तक भूभागमें मनोहर गोविन्दपर्वतमें शुक्लवर्ण जो शिला है ॥ ४७ ॥ गोविन्दं तं विजानीयात्पूजयेद्धरिवासरे। तस्य पूर्वे नवधनुर्या शिला शोणसत्रिभा॥ शरणेशी समाख्याता महापातकनाशिनी ।। ४८ ॥ उसको गोविन्द जानना चाहिये हरिवासर (एकादशीविशेष) में उसकी पूजा करे । उसके पूर्वमें नवधनु-परिमित शोणवर्ण जो शिला है वह पातकनाशिनी शरणेशीके नामसे विख्यात है ॥ ४८ ॥ शिवाचले च तुझं च प्रकटाख्या परा शिवा । ताश्च संपूज्य यत्नेन महतीं श्रियमाप्नुयात् ॥ ४९ ॥ उच्चतर शिवातलमें प्रकट नामक परमा शिवा है यत्नपूर्वक उनकी पूजा महती लक्ष्मी प्राप्त होती है || ४९ ॥

भापाटीकासमेतम् । (४५१)
विन्ध्याचलस्योत्तरे च इपक्षेपनवान्तरे।
महालक्ष्मीः स्थिना तत्र सितपुष्पेण पूजयेत् ॥५०॥
विन्ध्याचलके उत्तरकी ओर नव इक्षुक्षेप (नौ गन्नेके प्रमाणकी बराबर
के अन्तरमें महालक्ष्मी अवस्थित है श्वेतपुष्पोंसे उनकी पूजा करे ॥५०॥ .
श्रीपर्वते महेशानि श्रीकुण्डे स्नानमाचरेत् ।
स्नात्वा कुण्डे ध्रुवे नाम पौर्णमास्यां तथाश्विने ॥
दृष्ट्वा सम्पूजयेद्भक्त्या धरण्यामीश्वरो भवेत् ॥ ५१ ।।
हे महेशानि ! श्रीपर्वतके श्रीकुण्डमें स्नान करके आश्विनमासक
पौर्णमासीको ध्रुवकुण्डमें स्नान करनेके पीछे भक्तिपूर्वक पूजा करनेस
धरणीश्वर होता है ॥ ५१॥
गौतमस्याश्रमं गत्वा संपूज्य वृषभध्वजम् ।
नरोन निरयं गच्छेत्पापस्यात्र क्षयो भवेत् ।। ५२ ॥
गौतमके आश्रममें जाय वृषभध्वजकी पूजा करनेसे मनुष्योंको फिर
नरक भोगना नहीं पड़ता। उनके सब पाप क्षय होजाते हैं ।। ५२ ॥
पश्चिमादुत्तरं तावद्यावदक्षिणमानसम्
तदन्तरगते क्षेत्रे नातिदूरे च शाङ्करि ।
गत्वा तत्र समभ्यर्च्य ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥ ५३॥
हे शांकार | उसके थोड़ीही दूर पश्चिम और दक्षिण मानसमें एक
क्षेत्र है वहां जाकर पूजा करनेसे ब्रह्मलोक प्राप्त होता है | ५३ ॥
तत्रैव सरसस्तीरे हंसतीर्थमनुत्तमम् ।
द्वादशादित्यमभ्यर्य उत्तमा दीप्तिमाप्नुयात् ॥५४॥
उसी सरोवरके तीरमें अतिउत्तम हंसतीर्थ है वहां द्वादशादित्य
(वारह सूर्य) की पूजा करनेसे उत्तम दीप्ति प्राप्त होती है ॥ ५ ॥

योगिनीतन्त्रमा रेवंतं पूजयित्वाथ गतिं प्राप्नोत्यनुत्तमाम् ।। अभ्यर्येन्द्र महेश्वर्य गौरि सौभाग्यमाप्नुयात् ॥५५॥ फिर रेवन्तदेवकी पूजा करनेसे उत्तम गति प्राप्त करता है । हे गौरि ! वहा इन्द्रदेवकी पूजा करने पर महा ऐश्वर्य और सौभाग्य प्राप्त होता है ॥ ५५ ॥ सर्वान्कामानवाप्नोति संपूज्य पुरुषोत्तमम् । नारायणं तु संपूज्य नराणामधिपो भवेत् ॥ ५६ ।। पुरुषोत्तमकी पूजा करनेसे संपूर्ण कामना प्राप्त होती है । नारायणकी पूजा करनेसे मनुष्योंका अधिपति होता है ॥ ५६ ॥ दृष्ट्वा नत्वा नारसिहं संग्रामे विजयी भवेत् । वराह पूजयित्वा तु भूमि राज्यमवाप्नुयात् ॥ ५७ ॥ नरसिंहका दर्शन और प्रणाम करनेसे संग्राममें विजयी होता है । वराहदेवकी पूजाकरनेसे भूमिका राज्य प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ सोमनाथं समभ्यर्च्य रुद्रलोके महीयते । पाण्डुकूटस्य या धारा सा धारा नर्मदा नदी । तस्यां स्नात्वा चतुर्दश्यां वाजिमेधश्च विन्दति ॥५८॥ सोमनाथकी पूजा करनेसे रुद्रलोकमें जाता है । पाण्डुकूटकी जो धारा है, वही नर्मदा नदी है. उसमें चतुर्दशीको स्नान करनेसे अश्वमेधका फल मिलता है ॥ ५८॥ शिवविष्ण्वोर्मध्यगता या च योनिर्विनिःसृता। महानदी सा विज्ञेया सर्वपापप्रणाशिनी ।। ५९ ॥ शिव और विष्णुके मध्यगत होकर जो योनि निकली है, उसीको पापोंका नाश करनेवाली महानदी जानना चाहिये ॥ ५९ ॥ । सब

भाषाटीकासमेतम् ।
नितम्बधनयोर्मध्ये साधारा परमेश्वरि ।
मङ्गला नाम मा धारा सर्वमंगलकारिणी ॥ ६ ॥
हे परमेश्वर | नितम्ब और धनके मध्य जो धारा है, वहीं सर्वमंगल
कारिणी मंगला नदी है ॥ ६०॥
बिल्वश्रीपर्वतान्ते च या धारा सा सरस्वती।
तस्याः स्वच्छोदकं पीत्वा कवीनामग्रणीभवेत् ॥६१॥
बिल्व और श्रीपर्वतके मध्यमें जो धारा अवस्थित है, वोही सरस्वती
नामसे प्रसिद्ध है उसका निर्मल जल पान करनेसे कवीश्वरोंमें अग्रणी
होता है ।। ६१ ॥
मतंगस्य च या धारा नर्मदा सान संशयः ।
कामकुण्डस्य या धारा कामगंगा समुच्यते ॥ ६२ ॥
मतंगकी नो धारा है, वही नर्मदा है, इसमें सन्देह नहीं। कामकुण्डकी
जो धारा है, वही कामगंगाके नामसे कही गई है ॥ ६२ ॥
कामाख्यायाश्च या धारा सा गंगा परिकीर्तिता।
नन्दिकुण्डस्य या धारा सा ज्ञेया च मधुस्रवा ॥६॥
कामाख्याकी जो धारा है वहीं गंगा नामसे कही गई है। नंदिकुण्डकी
नो धारा है उसको मधुश्रवा जानना चाहिये ।। ६३ ।।
कामधेनोश्च या धारा सा विज्ञेया सुधर्मिणी।
पद्मशैलस्य मा धारा सा गंगा उर्वशी स्मृता ॥ ६४ ॥
कामधेनुकी नो धारा है, वहीं सुधर्मिणी है, पद्मभेलकी जो धारा है
बह उर्वशी गंगाके नामसे विख्यात है ॥ ६४ ॥
नीलकुण्डल्य या धारा सुभद्रा परिकीर्तिता।
च्यासकुण्डस्य या धारा चन्द्रभागा च सा स्मृता॥६५॥

(४५४) योगिनीतन्त्रम्। नीलकुण्डकी जो धारा है, उसका नाम सुभद्रा है। व्यास कुण्डकी जो धारा है, वह चन्द्रभागा है ॥ ६५ ॥ शकशेलस्य या धारा उर्वशी सा निगद्यते । सोमकुण्डस्य या धारा नदी वैतरणी च सा ।। ६६ ॥ शकशेलकी जो धारा है, वह उर्वशी नामसे कही जाती है। सोमकुडकी धाराका नाम वैतरणी है ॥ ६६ ॥ यमशैलस्य या धारा सा च गोदावरी स्मृता । भण्डीशस्य च या धारा स्नात्वा पीत्वा प्रणम्य च ॥ अग्निष्टोमशतस्यापि लमते फलमुत्तमम् ।। ६७ ।। यम शेलकी धारा ही गोदावरीके नामसे कही जाती है। भण्डीश्वरकी धारामें स्नान उसका जलपान और उसको प्रणाम करनेसे सौ अमिष्टोमका उत्तम फल मिलता है ।। ६७ ॥ धर्मारण्यं ततो गत्वा स्नात्वा रामहदे प्रिये । कोटिलिगं ततः पश्येत्प्रापयेदामरी तनुम् ॥ ६८ ॥ फिर धर्मारण्यमें जाय रामहदमें स्नान करने के पीछे कोटिलिगमा दर्शन करनेपर देवदेह प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥ कामस्येवोत्तरे देशे त्रिशद्धन्वन्तरे मिये। कोटिलिगं तु यः पश्येद्वाजपेयफलं लभेत् ॥ ६९ ॥ कामके उत्तर देशमें तीस धनुके अन्तर पर कोटिलिंग अवस्थित कुड उसका दर्शन करनेसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है ॥ ६९ ॥ प्राणदण्डाय नित्याय नमस्ते लोहिताय च । नमः सहस्रशीर्षाय कोटिलिंग नमोऽस्तु ते ॥ ७० ॥ नमो गिरिपते नित्यं गिरिवृक्षप्रियाय च । नमो यज्ञाधिपतये कोटिलिग नमोऽस्तु ते ॥ ७१ ।।

भाषाटीकासमेतम् । (४५५)
पापियों के लिये यमरूप अविनाशी और लोहितवर्ण प्रभुको नमस्कार है
हे करोडों लिंगोंके धारण करनेवाले इंश ! आपके सहल सिर हैं अतएव
हम आपको नमस्कार करते हैं हे कैलाशनाथ ! कैलाशके वृक्ष आपको
प्रिय हैं और आप यजोंके अधिपति है हम आपको नमस्कार करते
हैं ।। ७० ॥ ७१॥
इत्यनेन तु सम्पूज्य जपापुष्पैः प्रपृजयेत् ।
पायसञ्च बलिं दत्त्वा स्तुत्वा जप्त्वा विसर्जयेत्॥७२॥
इस मंत्रसे जपापुष्पद्वारा पूजा करके पायम (खीर ) बलि प्रदानपूर्वक
स्तुति और जप करके विसर्जन करे ।। ७२ ॥
तस्य दक्षिणपाइँन या शिला पार्श्वसंगता।
वेताले त महादेवं वामे विष्णुं द्विकर्णकम् ॥
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु पठेन्मन्त्रमनन्यधीः ॥ ७३ ॥
उसके दक्षिणभागमें पार्श्वसंगता अर्थात् पार्श्वमे सटीहुई जो शिला है,
उसको वेताल महादेव और वामभाग स्थित वेतालको द्विकर्णक जानना
चाहिये । पुष्पान्जलि ग्रहण करके अनन्य चितसे यह मंत्र पढ़े ॥ ७३ ॥
धर्मकामार्थमोक्षाय राय कथनाय च ।
सांख्याय सख्यिमुख्याय वेतालाय नमो नमः॥४॥
कृष्णाजिनोत्तरीयाय पीतवस्त्रधराय च ।
ब्रह्मा त्वमेव विश्वेश ब्रह्मरूप नमोऽस्तु ते ॥ ७५ ॥
आप धर्म अर्थ काम और मोक्षसरूप हैं, आपही ब्रह्मा शिव और
ब्रह्मसरूप हैं आपका दुकूल कृष्ण मृगचर्मका और यज्ञोपवीत पीला है,
आप दुष्टोको दुःख देनेवाले और सांख्य तथा मुख्य सांख्य एवम्
बेतालस्वरूप हैं इसलिये हम आपको भक्तिभावपूर्वक नमस्कार करते
हैं ॥ ७४ ॥७५॥

(४५६)
योगिनीतन्त्रम् ।
तस्यापतो ब्रह्मयोनि गत्वा तम्मन्त्रमुञ्चरन् ।
ब्रह्मयोनि विशेषस्तु न पुनयोनिमाविशेत् ।। ७६ ॥
इस मंत्रसे पूजादि करे। उसके अग्रभागमें ब्रह्मयोनि है, वहां गमन
पूर्वक मंत्रोच्चारण करके पूजा करनेसे फिर योनिमें प्रविष्ट होना नहीं
पड़ता ॥ ७६ ॥
तिर्यग्योनि न गच्छेतु ब्रह्मणः पदमाविशेत् ।
शिववल्लभदेश तु मोक्षमार्गनिबोधके ।। ७ ।।
प्रसन्नीदेवदेवेश त्राहि मां योनिसङ्कटात् ।
निःसृतो ब्रह्मयोनेस्तु गणेशं द्वारि पूजयेत् ॥७८ ॥
महाकायं शिलोच्छेष्ठ मन्त्रणानेन साधकः ॥ ७९ ।।
वह कभी तिर्यग् ( कीट पतंगादि ) की योनिको प्राप्त नहीं होता, वह
निःसन्देह ब्रह्मपदको प्राप्त करता है। ब्रह्म योनिसे निकल कर साधक
मोक्षमार्गका योधक और शिवयलभ देशमें (जहा शिव विद्यमान है)
'प्रसन्नो भव देवेश त्राहि मां योनिसङ्कटात्' इस मंत्रसे द्वार स्थित शिलोछेष्ठ
महाकाय गणेशकी पूजा करे ।। ७७-७९ ॥
नमो लम्बोदर श्रेष्ठ देवानामिष्टदायक ।
अखिलाख्य प्रभो नाथ नमस्ते योनिसङ्कट ।। ८० ॥
हे लम्बोदर ! आपका सुन्दररूप है, आप देवताओंके अभीष्टको सिद्ध
करते हैं, हे अखिलेश्वर ! हे योनिसंकट ! आपको नमस्कार है ॥८०॥
ततो गच्छेन्मुक्तिमार्ग शक्रस्याभिमुखे यदि ।
वामदक्षिणपाश्वे द्वे युगे वै सत्यसम्भवे ॥ ८॥
ऊर्द्ध कृतयुगश्चैव पाश्वे त्रेता च द्वापरः।
पलिबके स्थित लिङ्गं गुप्ताख्यभुवनेश्वरम् ।।
तं प्रणम्य नरो भक्त्या प्राप्नुयादेश्वरं पदम् ॥ ८२ ॥

भापाटीकासमेतम्।
(४५७)
(• इस मंत्रसे उनको प्रणाम करे ) फिर इन्द्र के निकट जाकर
मुक्तिमार्गमें नाता है। वामपार्श्व और दक्षिणपामें सत्य सम्भव दो
युग हैं. ऊमें कृतयुग, पार्वमें त्रेता और द्वापर है। बलिवक्त्र स्थित
गुप्ताख्य भुवनेश्वर लिगको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके मनुष्य ईश्वर के पदको
प्राप्त होते हैं ॥ ८१ ॥ ८२ ।।
चतुर्युगं नमस्कृत्य स्पृष्ट्वा देवं कपर्दिनम् ।
न जायते पुनर्गमे युगदोन लिप्यते ॥ ८३ ॥
चारों युगको नमस्कार और कपर्दिदेवको स्पर्श करके मनुष्योंको फिर
गर्भ जन्मग्रहण करना और युगदोपमें लिप्त होना नहीं पड़ता ॥ ८३ ।।
युगानामधिपः सो हि जगजातिस्वरूपधृक् ।
तधुगे यत्कृतं पापं त्राह्यतः परमेश्वर ॥ ८४ ॥
संभृति तिपय्यप्तिः त्रेतायुग नरेश्वरः।
तयुगे यत्कृतं पापं तब्धपोहतु भूमिजम् ॥ ८५ ॥
सत्यसाधन सत्यश्व नरनारायणात्मकः ।
हेतुभूतः कृतादीनां सत्यधर्म नमोस्तु ते ॥ ८६ ॥
जो जगजातिस्वरूपधारी युगाधीश्वर हैं, वही भरण पोषण में पर्याप्त और
त्रेतायुगके नरेश्वर हैं-वही सत्यसाधनमें सत्य और नरनारायणात्मक
हैं वही कृतादिके हेतुभूत हैं हे परमेश्वर ! तुम मेरी रक्षा करो। हे ईश्वर !
तुम्हीं मेरे उन उन युगोंके किये भूमिज पाप नष्ट करो, हे सत्यधर्म
तुम्हें प्रणाम है ।। ८४ ॥ ८५॥ ८६ ॥
विजयादौ चार्य राज्ञो युगचक्रावलीश्वर ।
नमामि सततं भक्त्या पापं हर नमोऽस्तु ते ॥ ८७ ॥

(४५८)
योगिनीतन्त्रम् ।
है युगचक्रावलीश्वर ! आपही विजयादिमें राजाओंके द्वारा उपासित
होते हैं, मैं आपको भक्तिसे प्रणाम करता हूं मेरे पाप हरो ॥ ८७ ।।
पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण पूजयेञ्च कपर्दिनम् ।
राजसूयाश्वमेधस्य तत्फलं प्राप्नुयानरः ।। ८८ ॥
इस प्रकार स्तुति और प्रणाम करके पंचाक्षरमंत्रसे कपर्दिदेवकी पूजा
करनेपर मनुष्य राजस्य और अश्वमेध यज्ञके फलको प्राप्त होते हैं ।।८८॥
कामधेनु ततो दृष्ट्वा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
पूजयित्वा नमस्कृत्य ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः॥ ८९॥
तदनन्तर काधेनुका दर्शन करके मनुष्य सर्वकामनाओंको प्राप्त होते हैं।
उसकी पूजा और नमस्कार करके फिर ब्राह्मणोंको भोजन करावे ॥ ८९ ॥
सौरभेयि नमस्तुभ्यं किमगे कामचारिणि ।
धेनुरूपा च सा देवी मम पापं व्यपोहतु ॥ ९० ॥
हे गोरूपा देवि ! तुम सुरभी और अपनी इच्छानुसार विचरनेवाली हो,
हम तुम तुम्हें प्रणाम करते हैं, तुम हमारे पापोंका नाश करो ॥ ९० ॥
सन्दिष्टा च कुरुक्षेत्र राहुप्रस्ते दिवाकरे ।
तुलापुरुषदानेन यत्फलं समुदाहृतम् ।
तत्फलं समवानोति कामधेनोश्च दर्शने ॥ ९१ ॥
( इस मंत्रसे प्रणाम और वन्दना करे ) कुरुक्षेत्रमें सूर्यग्रहण के समय
तुलापुरुषदान करनेपर जो फल होता है, कामधेनुका दर्शन करनेपरभी वही
फल प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ९१ ॥

भापाटीकासमेतम् । (४५९)
दक्षिणां गुरवे दद्यात्सवित्रेऽष्य निवेदयेत् ।।
शान्ति कृत्वा ततो देव्या आसनं विदधीत च ॥१२॥
हे देवि ! फिर गुरुको दक्षिणा देकर 'सूर्यको अर्घ्य देवे | इसके पीछे
शान्ति कर के एकाप्रचितसे आसन करै ॥ ९२ ॥
उत्थाय सूर्य संवीक्ष्य पठेन्मन्त्रद्वयं मिये।
नमोऽस्तु काल्यै गिरिजाये कामेश्वर्यै नमोऽस्तु ते॥९३
फिर उठकर सूर्यका दर्शन पूर्वक दो मंत्र पढे "नमोऽस्तु काल्यै गिरि-
जाये कामेश्वर्यै नमोऽस्तु ते" ॥ ९३ ॥
"नमोस्तु देव्यै गिरिसम्भवायै
नमोऽस्तु गौप्य वृजिनान्तकायै।
अतीथें तीर्थनिष्ठेभ्यो व्यासादिभ्यो नमो नमः।
गणेभ्यो रक्षकेभ्यश्च क्षत्रेशेभ्यो नमो नमः।
पौंड्रविन नमस्तेऽस्तु नमस्ते कालभैरव ॥
नमस्ते दक्षिणामूर्त दण्डपाणे नमोऽस्तु ते॥
"हे कालि ! हे गिरिजा ! तुम सब कामनाओंकी पूर्ण करनेवाली हो,
इसलिये हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। गौरि ! तुम पापियोंका विनाश
करनेवाली हो, तीर्थों की प्रतिष्ठा करनेवाले व्यास आदि महर्षियोंको भी
नमस्कार करते हैं, अथ च गणों के अधिपति और संरक्षकोंको भी नमस्कार
है. हे दण्डपाणि ! हे कालभैरव ! आप दक्षिणमूर्ति हैं। और दुष्टोंके
कार्यमें विघ्नकर्ता हैं अतएव आपको नमस्कार है" ॥
तीर्थ गत्वोपवासश्च श्राद्धं च जपकर्म च ।
करिष्यतीति विश्वास एतसिद्धेस्तु लक्षणम् ॥ ९४ ॥
तीर्थमें नाकर उपवास, श्राद्ध, जपकर्म और विश्वास करै । यही सब
सिद्धिके लक्षण है ॥ ९४ ॥

योगिनीतन्त्रम् ।
श्रीदेव्युवाच ।
यो नरः पापकर्मा च क्षेत्रेऽस्मिन्निवसेत्सदा ॥
सुरादिपातकाद्धोरात्स कि मोक्षं गमिष्यति ।। ९५ ।।
श्रीदेवीजी बोली-जो मनुष्य पापकर्मा होकर इस क्षेत्रमें वास करता
है, वह मनुष्य क्या उन घोर पातकोंसे मोक्ष पासकता है ? ॥९५॥
ईश्वर उवास ।
पुण्यक्षेत्रे स्थितो यो वे पातके तु रतः सदा ।
तिर्यग्योनि प्रविश्याथ वर्षाणामयुते वसन् ।। ९६ ॥
ईश्वर बोले-जो मनुष्य सदा पापकर्ममें रत होकर पुण्यक्षेत्रमें वास
करता है, वह दशहजारवर्ष तिर्यफयोनिमें प्रवेश करके ।। ९६ ॥
पुण्येपुरे च तत्रैव ज्ञानं सम्पद्यते ततः ।
मोक्ष प्राप्नोत्येव सोऽपि गुह्यमेतन्ममप्रिये ॥ ९७ ॥
तदनन्तर, उत्तमपुरमें वास करने के पीछे वहा ज्ञानको प्राप्त
होकर मोक्ष प्राप्त करता है. हे प्रिये ! यह मेरा गुह्य विषय जानना
चाहिये ।। ९७ ॥
मुलभोऽन्यत्र लौहित्ये पश्चरथानेषु दुर्लभः ।
अगस्त्यतीर्थे लोहित्ये मणिकर्णहदे तथा ।
अपुनर्भवे चन्द्रकुण्डे स्थानपञ्चकमीरितम् ॥ ९८ ॥
हे देवि ! अन्यत्र वास सुलभ है, किन्तु लौहित्य, अगस्त्य तीर्थ,
मणिकर्ण हृद अपुनर्व और चन्द्रकुण्ड इन पाच स्थानोंमें वास
दुर्लभ है ॥ ९८ ॥
अक्षतेन विशेषेण शतमार्गसहस्रकैः।
क्षेत्रबाह्यस्थितैः शून्यः गणेश्चैवाभिरक्षिताः ॥ ९९ ॥

.
भापाटीकासमेतम् । (४६१)
तीर्थके शतसहस्र मार्गमें, क्षेत्रके बाहर और शून्य मार्गमें अक्षत शरीर
से अवस्थित होकर रक्षकगण विशेषरूपसे तीर्थ करते हैं ॥ ९९ ॥
कालाख्यो रणभद्रश्च सौरभश्च महाबलः ।
वेतालश्च विकण्टश्च एते पूर्व स्थिता गणाः ॥१०॥
काल, रणभद्र, महाबल सौरभ, वेताल, विकंट यह गण पूर्वदिशामें
अवस्थित है। १०० ॥
एकजंघोनलश्चैव कर्दमालितविग्रहः ।
घण्टाकर्णस्ततोद्धश्च दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः ॥१०१॥
एकजंघ, नल, कर्दमालिप्तविग्रह, घण्टाकर्ण, यह गण अर्व और
दक्षिण पामें स्थित हैं ।। १०१ ॥
बलनाशो भीषणश्च पश्चिमायां व्यवस्थितः ।
पञ्चमो लोहिताक्षश्च नन्दनञ्च तथा मतः ।। १०२ ॥
बलनाश और भीपम पश्चिम दिशा में अवस्थित हैं। पञ्चम, लोहिताक्ष,
नन्दन || १०२ ॥
केशवश्चक्रपाणिश्च धनदस्योत्तरा गणाः ।
मधुनो मधुकश्चैव जयन्तश्च मधुश्रियः ॥ १०३ ॥
केशव चक्रपाणि यह उत्तरमें अवस्थित हैं। मधुन, मधुक, और
मधुश्रीक जयन्त ॥ १०३ ॥
अविशेषेण रक्षन्ति त्रयः कामेश्वरी स्थिताः।
गणेशः कालदन्तश्च विकर्णश्च कपिध्वजः।
द्वारं रक्षति वै सर्व मण्डपञ्च स्वयं हरः ॥ १०४ ॥
यह तीन जन कामेश्वरीके समीप रहकर तीर्थरक्षा करते हैं। गणेश,
कालदन्त, विकर्ण और कपिध्वज यह सत्र द्वारकी रक्षा करते हैं, स्वयं
महादेवजी मण्डपकी रक्षा करते हैं ॥ १०४ ॥

(४६२) योगिनीतन्त्रम्। कन्दपों मकरन्दश्च प्रबलश्चानुदोधरः। सोमश्च विपुलश्चैव अश्वतीर्थे स्थिता गणाः ॥ १०५ ॥ कन्दर्प, मकरन्द, प्रबल, अनुदोधर, सोम और विपुल यह गण अश्व- तीर्थमें स्थित हैं ।। १०५॥ शतसाहस्रयक्षिण्यो मुक्तिद्वारस्य रक्षकाः । दशसाहस्रकश्चैव अन्तर्गहस्य रक्षकम् ॥ १०६ ॥ शतसहस्र यक्षिणीगण मुक्तिद्वारकी रक्षा करती हैं । दशसहस्र यक्षिणी अन्तर्गेहकी रक्षा करती हैं ॥ १०६ ॥ कुब्जतीर्थ ततो ह्यष्टौ सहस्रर्दशभिर्युतः। ती प्रसादकरणे धर्मारम्भे विशेषतः। व्रतयज्ञसमारम्भे विनानि निवसन्ति वै ॥ १०७ ।। दशसहस्रयक्षिणी कुब्जतीर्थको रक्षा करती है, तीर्थमें, प्रसादकरणमें विक्षेपकर धर्मारम्भमें व्रत और यज्ञारम्भमें विघ्न उपस्थित होते हैं ॥१०७॥ तेषां संपूजनं चादौ बलिभिर्मोदकादिभिः अन्यथा जायते विघ्नमिति जानीहि मे प्रिये ॥१०८॥ उनकी मोदकादि बलिद्वारा प्रथम पूजा करनी चाहिये, अन्यथा होनेपर विघ्न उपस्थित होता है ॥ १०८ ॥ अथापराणि विनानि शरीरे निवसन्ति वै । ज्ञानघ्नानि मनःस्थानि शृणु तानि मम प्रिये ॥१०९॥ हे प्यारी ! अन्य सब विन शरीरमें वास करते हैं सब विन्न ज्ञाननाशक है वह तुम सुनो ॥ १०९॥ कश्चिन्निवतको देवि तथा कश्चित्प्रर्वत्तकः॥११० ॥ हे देवि ! कोई निवर्चक कोई प्रवर्तक ॥ ११० ॥ .

.
भाषाटीकासमेतम् । (४६३)
सनिकर्ष विदुरं वा सहस्र लक्षमेव वा ।
पापानुस्मरणश्चैव आलस्यश्चापि दूषणम् ॥ १११ ॥
सन्निकर्ष और विदूर सहस्र और लक्षवार पापानुस्मरण,
आलस्य,
परदूषण ॥१११॥
शोकमोहजराव्याधिस्तारुण्यं धननाशकम् ।
कलई भार्यया सार्द्ध दुर्भिक्ष गृहसंकटम् ॥ ११ ॥
शोक, मोह, जरा, व्याधि, तारुण्य धननाश, भार्याके संग कलह,
दुर्मिक्ष, गृहसंकट ॥ ११२ ॥
नानाव्रतसमाकीर्ण धार्मिकोस्मीति मानसः।
प्राप्तशोकं त्वधर्मस्य करणे हीनपातकम् ।। ११३ ।।
बहुव्रतानुसरणमें धार्मिक इस प्रकार बुद्धि, प्राप्त शोकत्व ( मनो ग्लानि
आदि ) अधर्म करनेमें पापहीनताका ज्ञान ॥ ११३ ।।
वृक्षपत्रञ्च तुलसी धात्री वृक्षफलं तथा ।
शालग्रामशिलाखण्डं प्रतिमा दारुजां तथा ॥ ११४ ॥
तुलसीको वृक्षपत्र, धात्रीको वृक्षफल जानना, शालग्रामको शिला खण्ड
जानना प्रतिमा काष्ठबुद्धि ॥ ११४ ।।
मानुषं ब्राह्मणश्चैव स्वयम्भु वतुल शिवम् ।
शंख शम्यूकभेदञ्च खड्ग मांसादिसम्भवम् ॥ ११५ ।।
ब्रामणको मनुष्य जानना, स्वयम्भू शिवमें वर्नुलत्व ( गोलपिण्ड )
बुद्धि, शंखमें शम्बूक विशेषत्व ज्ञान (जीव विशेष ) गेंडे में मांससंभव
ज्ञान ॥ ११५॥
दृष्ट्वा परंभवेदेवं तीर्थजातं जलं तथा ।
गंगायां वा नदीरूपं पुण्यक्षेत्रश्च भूमिका ॥११६ ॥
तीर्थमें जलबुद्धि, गंगामें नदी बुद्धि, पुण्यक्षेत्रमें भूमिथुद्धि ॥ ११६ ॥

- योगिनीतन्त्रम् । इत्येतानि च विनानि संयान्ति च पुनः पुनः। मन एवान नित्यं स्यान्मान एवात्र कारणम् मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ११७ ।। यह सब विघ्न वारम्बार उपस्थित होते हैं । मनही नित्य, मनहीं उसमें कारण और मनही मनुष्यों के बंधमोक्षका हेतु है ॥ ११७ ॥ तनिष्ठं तत्परं जातं तन्मुख्य दुःखकारणम् । चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थ स्नाने निषिध्यते ॥ ११८ ।। मनस्थित दुष्टभावमें निष्ठा, तत्परता और ( समीप) होनेपर वह दुःखका कारण होता है, मनस्थिन दुष्टभाव तीर्थस्नान करनेमें निषेध करता है ॥ ११८ ॥ पठेद्यः शृणुयाद्वापि भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । पुत्रार्थी लभते पुत्र कीत्यर्थी कीर्तिमाप्नुयात ॥११९॥ जो मनुष्य इसको पढ़ता है वा सुनता है, वह भोग और मोक्ष दोनोंही पाता है. पुत्रका चाहनेवाला पुत्र, कीर्तिकी इच्छा करनेवाला कीर्ति प्राप्त करता है ॥ ११९ ॥ विद्यार्थी लभते विद्यां जयार्थी लभते जयम् । ब्रह्महत्यादिपापञ्च निर्मूलं नाशमाप्नुयात् ।। १२० ॥ वन्ध्यापि लभते पुत्र कन्या विन्दति सत्पतिम् । मोक्षार्थी लभते मोक्ष भोगार्थी भोगमाप्नुयात्॥१२१।। काव्यार्थी च कवित्वञ्च सारं निःसार आप्नुयात् । ज्ञानार्थी लभते ज्ञान सर्वसंसारमुदरम् ॥ १२२ ।। इद स्वस्त्ययन धन्यं योगिनीनाम तन्त्रकम् । नाकाले मरणं तस्य श्लोकमेकं तु यः पठेत् । श्लोकार्द्धपठनादस्य ग्रहदोपक्षयो भवेत् ।। १२३ ।।

भापाटीकासमेतम् । (४६५) विद्यार्थी विद्या, जयकी इच्छा करने वाला जय, वंध्या पुत्र, कन्या- सत्सति, मोक्षकी कामना करनेवाला मोक्ष, भोगकी अभिलाषा करनेवाला भोग, कान्यार्थी अर्थात् कविताकी इच्छा करनेवाला सारासार कविता, तथा ज्ञानकी चाहना करनेवाला सर्व संसारमुद्र ज्ञानको प्राप्त होता है और ब्रह्महत्यादिके पाप करनेवाले उन सब पापोंसे छूटजाते हैं। यह योगिनीतन्त्र स्वस्त्ययन और धन्य है, इसका केवल एक श्लोकमात्र पाठ करनेसे अकालमें मृत्यु नही होती। आधा श्लोकमात्र पढ़नेसे दुष्टग्रह क्षय होते हैं ॥ १२० ॥ १२१ ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ इति श्रीयोगिनीतन्त्रेसर्थतन्त्रोत्तमोत्तमे विशतिसाहने द्वितीयभागे भापाटीकाया अष्टम पटल ॥६॥ श्रीभगवानुवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि निर्मलं भुवि दुर्लभम् । लिङ्गैः शताष्टकर्युक्तं हरिक्षेत्रसमं शुभम् ॥ १॥ विष्णुपुष्करके क्षेत्र तीर्थाष्टशतसंयुतम् । हृष्टपुष्टजनाकीर्ण नरनारीसमन्वितम् ॥ २ ॥ विद्वन्निकरभूयिष्ठं धनधान्यादिसंयुतम् । गृहाणां गोपुरैर्युक्तं भुवि प्राकारभूषितम् ॥३॥ नानामणिगणाकीर्ण नानारत्नोपशोभितम् । पुराट्रालकसंकीर्ण वीथीभिः समलंकृतम् ॥ ४॥ राजहंसनिभैः शुभैः प्रासादैरुपशोभितम् । स ततोपि जलधात सुराभाण्डमिवाशुचिः ॥ ५॥ यदि वसति गुहायां पर्वताने चिरंपा। यदि धरति त्रिदण्डं भस्म वाच्छादन वा। ३० योगिनीतन्त्रम्। यदि पठति पुराणं वेदसिद्धान्ततत्त्वं । यदि हृदयमशुद्धं सर्वमेतद्विरुद्धम् ॥ ६॥ श्रीभगवान् वोले-हे देवि ! सुनो । पृथ्वीमें दुर्लभ अत्यन्त निर्मल हरिक्षेत्रके समान शुभकर आठ सौ ( ८००) लिंगयुक्त और आठ सौ (८००) तीर्थसमन्धित विष्णुपुष्करनामक एक पुण्य क्षेत्र है। इस स्थानमें हृष्ट पुष्ट मनुष्य भरे हुए हैं । वहा दिव्य कान्ति नर नारी और बहुतसे विद्वान् वास करते हैं । यह स्थान धनधान्य और चौराहों द्वारा सुशोभित घरोंसे परिपूर्ण और अनेक प्रकारके रत्न तथा मणियोंसे शोभायमान है । इसस्थानमें अटारियोंसे युक्त बाजार और जलसे धुले हुएकी सदृश सफेद आकारवाले प्रासाद ( महल ) शोभा पाते हैं। यदि मन शुद्ध हो ता सभी स्थानों में पुण्यजनक होता है और यदि मन अशुद्ध हो तो सुरा ( शराब ) के पात्रके समान सदाही अशुद्ध रहता है। यदि मनुष्य पर्वताय वा पर्वतकी गुहामें वास, त्रिदण्ड धारण, भस्मलेपन, एवं वेदसिद्धान्ततत्त्व और पुराणका पाठ करें, किन्तु (तो भी) मनके अशुद्ध होनेपर यह सब कार्य निष्फल और विरुद्ध होते हैं ॥१६॥ न तीर्थानि न दानानि न व्रतानि न चाश्रमाः । दुष्टाशयो दुष्टरतिः प्रणष्टो व्याधितो यथा ॥ ७ ॥ उनके तीर्थ, दान, बत, आश्रम सब निष्फल हैं। दुष्ट आशा और दुष्ट रति (प्रीति ) मनुष्योंको व्याधिक समान नष्ट करती है |॥ ७ ॥ इन्द्रियाणि वशीकृत्य यत्र तत्र वसेन्नरः । तत्र तस्य कुरुक्षेत्रं प्रयागं पुष्करं गया ॥८॥ इस कारण इन्द्रियोंको वशीभूत करके जिस किसी स्थानमें मनुष्य वास करे, वही उसको कुरुक्षेत्र, प्रयाग और गयास्वरूप है ॥ ८ ॥ न लंघयेत्पानधर्म देशधर्म न लंघयेत् । यस्मिन्पीठे य आचारःस आचारो विधिः स्मृतः॥९॥ - , ,

भाषाटीकासमेतम् । (४६७)
(पानधर्म) जो सदासे चला आया हो और देशधर्म उलंघन न करे,
जिस पीठमें जो आचार निर्दिष्ट है उस पीठमें वही विधि है ॥ ९ ॥
स्पृष्टास्पृष्टं योनिदोषाः पानदोषो न गण्यते ।
विवाहव्यत्ययस्तत्र परिवित्तिर्न दुष्यति ॥ १० ॥
शयनश्चैव शेषं तु स्त्रीजनासत्तितो भवेत् ।। ११ ।।
स्पृष्टास्पृष्ट ( स्पर्श किया और न किया) मौर योनिदोष तथा पान
दोष गिनने योग्य नहीं है विवाह व्यत्यय और परिवित्ति अर्थात् पडेफे
रहते छोटे का विवाहदोपका निमित्त नहीं होता। स्त्रियों के निकट स्थित
होनेपर कथोपकथन शयनादि दूषणीय नहीं है ॥ १० ॥ ११ ॥
जालन्धरे महेशानि दूषयेन्मत्स्यासकम् ।
पादुकायो विशुद्धिश्च शुभ्रं तक्रञ्च गर्हितम् ॥ १२ ॥
हे महेशानि ! जालन्धरमें मत्स्य, मांस और पैरोंमें पादुका पहरना
तथा शुभ तक गर्हित है ॥ १२ ॥
पूर्णसन्ध्या सुधर्मेण कालधर्मों न विद्यते ।
सर्वेशो योगिनीपीठे धर्मः करातजो मतः ॥ १३ ॥
पूर्णसन्ध्या पीर कालधर्म नहीं है। सर्वेश योगिनीपीठमें किरात धर्म
प्रचलित है ॥ १३ ॥
कामरूपेण संन्यासस्तथा दीर्घ मतं प्रिये ।
न त्यजेत्सामिपं देवि ब्रह्मचर्यमतो न च ॥ १४ ॥
कामरूपमें दीर्घतम संन्यास है. है देवि ! हे प्रिये । वहाँ मामिप (मांस)
परित्याग न करे सुतरा ब्रह्मचर्य मत नहीं है ॥ ११ ॥
संसर्गापातक नेव स्त्रीध धर्ममाश्रय ।
न शुक्रदर्शन स्त्रीणां ताम्ब्लाशा सदा भवेत् ॥ १५ ॥
स्त्रियोंके धर्मकर्ममें पातकका संसर्ग नहीं है, स्त्रियों के पक्षमें शुक्र दर्शन
नहीं है वह सदा पान चावै ॥ १५ ॥

(४६८) योगिनीतन्त्रम् । हंसपारावतं भक्ष्यं कूर्मवाराहमेव च । कामरूपे परित्यागादुर्गतिस्तस्य सम्भवेत् ॥ १६ ॥ कामरूपमें हंस, पारावत, कर्म (कछुआ ) और वराह (सूअर ) भक्षण करे, इन सबका त्याग करनेसे वहां दुर्गति प्राप्त होती है ॥१६॥ हीनाचारस्तु सौमारे सर्वाशी सर्वविक्रयी। तत्र नारी सदा रुद्धा तत्र राजा सुपुण्यवान् ॥ १७ ॥ सौमारमें मनुष्य हीनाचार, सर्वभक्षी और सर्वविक्रयी है वहां की स्त्रिये सदा निरुद्ध (परतन्त्रतासे नियमित ) और राजाको पुण्यवान् जानना चाहिये ॥ १७ ॥ कोल्वपीठे जातिधर्मान्स्वजात्युक्तेन वर्तयेत् । धर्माधर्मविचारेण स्वरूपं स्वनिरूपकम् ॥ १८ ॥ कोल्वपीठमें अपनी जातिके कहे मतसे जातिधर्म प्रवर्तित होता है। धर्माधर्म आचार में वह स्थयं निरूपण और आचरण करते हैं ॥ १८ ॥ महेन्द्रे चैव योगी च ब्रह्मज्ञानी सुबुद्धिमान् । श्रीहट्टे पानवैपुल्यं न चानस्य परिक्रयः ॥ १९ ॥ महेंद्र में श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्रह्मज्ञानी योगी वास करते हैं। श्रीहट्टपान बहुल (जहां लक्ष्मीकी अधिकता हो ) वहां अन्नपरिक्रिय नहीं है अर्थात् अन्नप्राप्ति के लिये किसी प्रकारकी चिन्ता करनेका अवसर नहीं है॥१९॥ एतत्सर्व समाख्यातं यत्पृष्टं हि त्वयाधुना। नाशिप्ये च प्रदातव्यं देवव्राह्मणनिन्दके ॥ २०॥ पिशुने नैव दातव्यं वेदभक्तिविवर्जिते । दातव्यं भक्तियुक्ताय स्वधर्मनिरताय च ॥ २१॥।

भाषारीकासमेतम् । (४६९)
हे देवि ! इस समय तुमने जो पूछाथा, वह मैने सब वर्णन किया । यह
बामण निन्दक, अशिष्य, खल, वेदभक्तिरहित मनुष्योंको कभी प्रदान न
करे. भक्तियुक्त और स्वधर्ममें निरत मनुष्यको देवे ॥२०॥२१॥
नील रक्तस्तथा शुभैःप्रासादरुपशोभितम् ।
रक्षितं शस्त्रसंघेश्च परिखाभिरलंकृतम् ।। २२ ॥
हे देवि ! नील रक्त और सफेदवर्णके प्रासादमण्डल ( महलोंके समूह)
से शोभायमान, शस्त्रोंसे रक्षित, परिखा (खाई ) से अलंकृत ।। २२ ।।
सित रक्तस्तथा पीतैः कृष्णश्चान्यश्च वर्णकैः।
धूम्रः समीरणबूं मैः पताकैश्च स्वलंकृतम् ॥ २३ ॥
सफेद, लाल, पीली, काली और धूम्रादि विविध वर्णकी पताकाओं से
शोभायमान ॥ २३ ॥
नित्योत्सवप्रमुदितं नानावादिवनिःस्वनम् ।
वीणावेणुमृदङ्गैश्च क्षेपणीभिरलंकृतम् ॥ २४ ॥
अनेक बाजोंकी ध्वनिसे शब्दायमान, नित्योत्सवसे प्रमोदित, वीणा,
वेणु, मृदंग, और क्षेपणी ( पट्टी) से अलंकृत ॥ २४ ॥
देवतायतनैर्दिव्यैः प्रकृष्टोद्यानमण्डितः।
पूजावेचिपरचितः सर्वतः समलंकृतम् ॥ २५ ॥
दिव्य देवतायतनयुक्त, अनेक उद्यानोंसे मंडित, विविधपूजोपकरण
( पूजाको सामग्री ) से सर्वत्र शोभायमान ॥ २५ ॥
स्त्रियम्तत्र प्रमुदिता दृश्यन्ते ततुमध्यमाः।
हारभारांचितमीवाः पद्मपत्रायतेक्षणाः ॥२६॥
अपुनर्मवनामक एक मनोहर पुण्यप्रद तीर्थ क्षेत्र है, वहांकी निय
मध्यमतनु और सदा प्रमुदित दिखाई देती हैं, इन आयतलोचना स्त्रियों
की ग्रीवा मनोहर हारसे गोभायमान हैं ॥ २६ ॥

(४७०)
योगिनीतन्त्रम् ।
पीनोन्नतकुचद्वन्द्वाः पूर्णचन्दसमाननाः।
स्थिरालकाः कपोसाढयाः काञ्चीनूपुरनादिताः॥२७॥
मुकल्पचारुजघनाः कर्णान्तायतलोचनाः।
नानाजलाशयैश्वान्य. पद्मिनीशतमण्डितः ॥ २८॥
सरोवरमनोज्ञेश्च प्रसन्नसलिलैस्तथा
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा नीलोत्पलैः शुभैः ॥२९ ।।
कदम्यैश्चक्रवाकैश्च तथैव जलकुक्कुट।
कारण्टवोत्करहसस्तथैव स्थलचारिभिः ॥ ३० ॥
उनके दोनों कुच पीन और उन्नत मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान कपोल
मनोहर अरुकावली स्थिर जघनदेश अत्यन्त शोभायमान और मनोहर तथा
दोनों नेत्र कानोंतक विस्तृत हैं उनकी काची और नूपुरकी धनिसे शब्दा
यमान होकर यह स्थान मनुष्योंका मन हरण करता है और यह स्थान
सैकडों कमलोंसे शोभायमान निर्मल जलवाले जलाशय सरोवरोंसे अत्यन्त
मनोहर है यह जलाशय कुमुद पुंडरीक नील कमल इत्यादि शोभायमान
कमलोंसे और कदंब, चक्रवाक, जलमुर्गा वा कारण्डव हंस इत्यादि मनो.
हर कलकंठ जलचरगणोंसे अलंकृत रहते हैं ॥ २७-३०॥
एवं नानाविधवृक्षः पुण्यैर्नानाविध रवैः।
नानाजलाशयश्चान्यैः शोभितं तत्समन्ततः ॥ ३१ ॥
यह सब जलाशय तटस्थ विविधकलकंठ पक्षियोंसे शब्दायमान और
नवीन फूले हुए वृक्षोसे शोभायमान है, तथा यह स्थान अन्यान्य अनके
नलाशयोंसे अलंकृत रहता है ॥ ३१ ॥
आस्ते तत्र स्वयं देवो हयग्रीवो जनार्दनः ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि सरितश्च सरोसि च ।
पुष्करिण्यस्तडागानि वाप्यः कुण्डाश्च सागराः ॥३२॥

भाषाटीकासमेतम् । (४७१) वहां स्वर्य देव जनार्दन हयग्रीव वास करते है। पृथ्वीतलमें जो कुछ तीर्थ, सरित्, सरः और पुष्करिणी, तडाग, वापी. कुण्ड और . तेभ्यः पूर्व समाहत्य जलानि च पृथक्पृथक् । सर्वलोकहितार्थाय रुद्रः सोमो गणैः सह ।। ३३ ।। उनमेंसे पृथक्पृथक् जल लाकर सर्वलोकोंके हितार्थ सर्व गणसहित रुद्र और सोम इस स्थानमें वास करते हैं ॥ ३३ ॥ तीर्थ पुनर्मवो नाम तस्मिक्षेत्रे वरानने । चकार कामिभिः सार्द्ध तत्पुनर्भवमुच्यते ॥३४॥ हे वरानने ! उस अपुनर्भवतीर्थक्षेत्रमें काम्यवस्तुओंको भोग करके भी वास करनेसे फिर जन्म लेना नहीं पड़ता, इसीकारण इस स्थानका नाम अपुनर्भव हुआ है ॥ ३४ ॥ अस्मिश्च विपुले क्षेत्र माघे मासि मम प्रिये। यस्तत्र यात्रां कुरुते विपुले विजितेन्द्रियः। विधिवत्सरति स्नात्वा ततः श्रद्धासमन्वितः ॥३५॥ देवानुषीन्मनुष्यांश्च पित-सन्तर्पयेत्ततः। तिलोदकेन विधिवन्नामगोत्रविधानतः । स्नात्वैवं विधिवत्तत्र सोश्वमेधफलं लभेत् ।। ३६ ॥ हे प्यारी ! माधके महीनेमें जितेन्द्रिय होकर जो मनुष्य इस विपुल तीर्थ क्षेत्रमें यात्रा करता है और श्रद्धा भक्तियुक्त होकर सरोवरके जलमें विधिपूर्वक स्नान करनेके पीछे देवता, ऋपि, मनुष्य और पितरों का तर्पण तथा विधिपूर्वक नाम गोत्र विधानसे तिलोदक स्नान करता है उसको अश्वमेधका फल मिलता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ग्रहोपरागे विपुवे संक्रान्त्यामयने तथा ।

(४७२) योगिनीतन्त्रम् । युगादौ पडशोत्याञ्च तथान्यस्मिन्छुभे तिथौ ॥३७॥ यस्तत्र दानं विप्रेभ्यः प्रयच्छति धनादिकम् । अन्यतीर्थाच्छतगुणं फलं प्राप्नोति मानवः ।। ३८ ॥ ग्रहण, विषुव, संक्रान्ति, अयन, पडशीति युगादि (छियासी युगादि तिथियों) में और अन्यान्य शुभ तिथिमें जो मनुष्य वहां ब्राह्मणोंको धनादि दान करता है वह अपरापर तीथोंकी अपेक्षा शत. गुण फल पाता है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ पिण्डं तत्र प्रयच्छन्ति स्वपितृभ्यः सरस्तटे। पितॄणामक्षयां तृप्तिं तत्कुर्वन्ति न संशयः ॥ ३९ ॥ जो मनुष्य वहां सरोवर के किनारे पितरोंको पिण्ड देता है, उनके द्वारा उसके पितरोंकी अक्षय तृप्ति होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ धतुषाष्टप्रमाणञ्च कुण्डमानं प्रकीर्तितम् । वराहकामयोर्मध्ये तत्तीर्थ सर्वकामदम् ॥ ४०॥ वराह और कामरूपके मध्य स्थित सर्व कामदायक उस कुंडका परि- माण आठ धनु है ॥ १० ॥ पुनर्न भवनं यस्मादपुनर्भवनामकम् ।। तत्र स्नात्वा नरो याति भास्करस्यालयं प्रति ॥४१॥ उसमें स्नानादि करनेसे पुनर्भव अर्थात् पुनर्जन्म नहीं होता, इसी कारण उसका नाम अपुनर्भव है, वहां स्नान करके मनुष्य सूर्यसदनमें जाता है ।। ४१॥

भाषाटीकासमेतम् । (४७३) हे तीर्थराज ! तुम्हारे जलमें स्नान करनेसे फिर जन्म नहीं होता, इसी कारण मै तुम्हारे जलमें सान करता हूं. तुम मेरे पापोंको दूर करो. इस मन्त्रसे स्नान करके त्रिलोचन देवका दर्शन करे ॥ ४२ ॥ गोकर्णश्च विकर्णश्च योगीशं सर्वकामदम् । गोकर्ण वृपभाकारं विकर्ण पुरुषाकृतिम् ।। ४३ ॥ तदनन्नर गोकर्ण सर्वकामपद योगीश और विकर्ण है। गोकर्णका आकार बैल के समान और विकर्णका आकार पुरुष के सदृश है ॥ ४३ ॥ अधस्ताच्चैव योगानां योगज्ञानं ततः परम् । उत्तरे च सरस्तीरे पर्वते भद्रकाशके ॥ १४ ॥ इस स्थानमें योगीशका दर्शन करनेसे योगियोंको परमयोग ज्ञान प्राप्त होता है । सरोवरके उत्तरीयतटमें भद्रकाश पर्वतके ऊपर ॥ १४ ॥ या शिला पौत्रवित्ता च मध्ये शोणच्युतिः प्रिये । पञ्चधन्वन्तरे यावत्क्षेत्रं स्यादरवीथिकम् ॥ ४५ ॥ पौत्रविता शिला और मध्यभागमें शोणच्युति शिला है, उसके पंच धनुः अन्तरमें हरवीथि नामक विख्यात क्षेत्र है ॥ ४५ ॥ तस्याः शैवशिलायास्तु स्वभागे देवतात्रयम् । सम्पाद्य विधिवद्भक्त्या गन्धैः पुप्पैः पृथग्विधैः। चतुर्दश्याञ्च मिथुने मृते मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ४६॥ उस शैवशिलाके नियमित भागमें यह तीन देवता है ! भक्तिपूर्वक आपा. ढके महीने में गंधपुष्पादिसे पूजा करनेपर मोक्ष प्राप्त होता है, तथा चढ- देशीके दिन मृत्यु होनेसे भी मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥ ४६॥ विशलाभयहस्ताय जटाभारविधारिणे । वृषध्वजाय देवाय गोकर्णाय नमो नमः ॥ ४७ ॥ युगरूपाय देवाय चन्द्रहस्ताय विष्णवे ।

(४७४)
योगिनीतन्त्रम् ।
गदाशाकहस्ताय विकर्णाय नमो नमः ॥ १८ ॥
महेशाय वृषस्थाय ज्ञानरूपाय ज्ञानिने ।
धर्मज्ञाय सुरूपाय योगीन्द्राय नमोस्तु ते ॥४९॥
गोकर्णका प्रणाम यथाः-'त्रिशलाभयहस्ताय जटाभारविधारिणे ।
वृषबजाय देवाय गोकर्णाय नमो नमः" | विकर्णका प्रणाम यथाः-
"युगरूपाय देवाय चन्द्रहस्ताय विष्णवे । गदाशाकहस्ताय विक-
र्णाय नमोनमः" योगीन्द्रका प्रणाम यथाः "महेशाय वृषस्थाय ज्ञानरूपाय
ज्ञानिने । धर्मज्ञाय सुरूनाय योगीन्द्राय नमोऽस्तु ते ॥४७॥४८॥१९॥
अपुनर्भवपूर्वे तु नवधन्वन्तरात्परम् ।
सप्तधन्वन्तरं यावत्कुण्डं वाराणसीयकम् ।
तत्र स्नात्वा महेशानि मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥५०॥
अपुनर्मवके पूर्वभाग नवधनुके अन्तरपर सात धनुः पर्यन्त विस्तृत
वाराणसीयक कुंड है. हे महेशानि ! वहां स्नान कर मरनेसे मोक्ष प्राप्त
होता है ।। ५० ॥
चत्रे कामत्रयोदश्यां मनानेनानेन यत्नतः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स गच्छेद्वह्मणः पदम् ॥५१ ।।
चैतके महीनेकी कामत्रयोदशीमें मंत्रपूर्वक वहां स्नान करनेपर सब पापोंसे
छूटकर ब्रह्मपद प्राप्त होता है । ५१ ॥
सर्वतीर्थेषु यः स्नानं कृतं वर्षशतैरपि ।
सकृदाराणसीकुण्डे तत्फलं लभते क्षणात ॥ ५२ ।।
सब तीर्थोमें सौ वर्ष लान करनेसे जो फल होता है, वाराणसीकुंडमें
एकवार स्नान करके तत्काल वही फल मिलता है ।। ५२ ॥
तस्य पूर्वे पञ्चधतुदैर्घ्यमानेन शाङ्करि ।
मार्कण्डेयवदो नाम तत्र स्नात्वा व्रजेच्छिवम् ॥५३॥

भापाटीकासमेतम। (४७५)
है शांकार ! उसके पूर्व में पांच धनुके अन्तरपर मार्कडेय हुद है, वहां
स्नान करनेसे शिवत्व लाभ होता है ।। ८३ ॥
उत्तरे सरस्तीरे मार्कण्डेश्वरसंज्ञितम् ।
ये वा पश्यन्ति च नात्वा कुण्डे माहेश्वरं ततः ॥५४॥
आदित्यमचिंतं तत्र देवदेव त्रिलोचनम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विमानवरमास्थितः ॥ ५५ ॥
गीयमानीथ गन्धर्वः शिवलोकं ब्रजेत्तु वै ।
तिष्ठत्यत्र प्रमुदितः कल्पमेकं वरानने । ५६ ॥
सरोवरके उत्तर तटमें मार्कडेय नामक महेश्वर है । इस सरोवरमें सान
करके देवदेव त्रिलोचन और आदित्यकी पूजा करनेपर मनुष्य सब पापोंसे
छूट जाता है और उत्तम विमानमें बैठ गन्धोंके द्वारा उपगीयमान
होकर शिवलोकमें जाता है. हे वरानने ! वहां प्रमुदित चित्तसे एफकल्प
वास करता है ।। ५४ ॥ ५५ ॥ ५६ ॥
मार्कण्डेयो मुनिश्रेष्ठस्तपस्तेपे महामतिः ।
मार्कण्डेयद्वदो नाम पापं मम दो हर ॥ ५७ ॥
मार्कण्डेय महामुनिने प्रथम तपश्चर्याका आचरण किया था, ऋषिश्रेष्ठ
महामुनि मार्कण्डेय यहा तप करनेसे उसका मार्कण्डेय हद नाम हुआ है.
हे सरोवर ! तुम हमारे हृदयके पापोंको हरो ॥ ५७ ।।
अनेन मजनं कृत्वा कुर्यान्मुण्डस्य मुण्डनम् ।
श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नेन चोपवासं समाचरेत् ॥ ५८ ।।
इस मंत्रसे मजन करके मस्तक मुंडन करावे उसी स्थानमें यत्नसहित
श्राद्ध और उपवास करना चाहिये ॥५८॥
नतः प्रभाते विमले नित्यं निर्वर्त्य साम्प्रतम् ।
गोकर्णस्य विकर्णस्य नातिदूरे महेन्धार ॥ ५९ ॥

. (४७६) योगिनीतन्त्रम् । हे महेश्वार ! तदनन्तर विमल प्रात'कालमें नित्यकर्म समापनपूर्वक गोकर्ण और विकर्ण थोडी ही दूर अपस्थित हैं ॥ ५९ ॥ कुण्डं ब्रह्मसरो नाम एकविशतिमानतः। तत्र स्नात्वा श्रमहरं न पुनर्भवमादिशेत् ॥६० ॥ इक्कीस धनु प्रमाण ब्रह्मसरोवर नामक एक तीर्थ है, उस पापहरनेवाले तीर्थमें स्नान करनेसे पुनर्जन्म नही होता ॥ ६० ।। मुक्तये सर्वपापानां ब्रह्मणा निर्मितं पुरा। ब्रह्मकुण्ड महाभाग त्राहि मां भवसागरात् ॥ ६१ ॥ समस्तपातकोंसे मुक्तिलाभ होनेके लिये ब्रह्माजीने प्रथम इसको निर्माण किया था अतएव ब्रह्मकुड नामक सरोवर ! तुम संसारसागरसे हमारी रक्षा करो ॥६१।। स्नात्वा चानने मन्त्रण सरसोस्यैव पश्चिमे । कृष्णाख्यशैलरूपश्च वराहो नाम नामतः ॥ ६२ ।। इस मत्रसे वहा स्नान करे। इसी सरोवरके पश्चिममें सित कृष्णाख्य शैलरूप वराहनामक देवता है ।। ६२ ॥ त प्रणम्य नरो भक्त्या विष्णुलोके प्रमोदते ॥ ६३ ॥ उनको भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाकर आनन्द लाभ करता हे ॥ ६३।। पिशंगरोमाञ्चिततूलकाय दंष्ट्राग्रभागे च धराधराय नीलाचलोद्भासिकलेवराय महावराहाय नमो नमस्ते ६४ जिनके रोम पिशा वर्ण हैं जिनके दातोंके अग्रभागके ऊपर भूमडल विरा- जित है, नीलाचलके समान जिनका शरीर है ऐसे वराहको नमस्कार है इस मनसे उनको प्रणाम करे।। ६४ ॥ गोकर्णस्य तदेशान्यामिक्षुक्षेपत्रयान्तरे । सदने पर्वते रम्ये गत्वा पश्येच्च शङ्करम् ।। ६५ ।। .

- भाषाटीकासमेतम् । (४७७) गोकर्णके ईशान कोणमें, जितने स्थानमें तीन गन्ने रक्खे जासकें इतने अन्तरपर रम्यपर्वतमें जाकर मन्दरस्थित शकरका दर्शन करे ॥ ६५ ॥ केदाराख्यं महादेवं सर्वदेवनमस्कृतम् । तं लिङ्गमव्ययं दृष्ट्वा श्रद्धया सुसमाहितः॥ ६६ ॥ पूजयित्वा तु तं भक्त्या गन्धैः पुष्पैमनोहरः। धूपैपिच नैवेद्यनमस्कारैस्तथा स्तवैः ॥ ६७ ।। दण्डवत्प्रणिपातैश्च नृत्यगीतादिभिस्तथा । सपृज्य तं विधानेन शिवलोकं व्रजेन्नरः॥ ६८ ॥ वही सर्वदेवनमस्कृत केदाराख्य महादेव हैं उस अव्ययलिगका दर्शन करनेपर श्रद्धा भक्तियुक्त और सावधान हो भक्तिपूर्वक मनोहर गध, पुप्प धूप, दीप, नैवेद्य, नमस्कार, स्तव, नृत्य, गीत और प्रणामादि द्वारा यथा विवि उनकी पूजा करनेसे मनुष्य शिवलोकमें जाता हे ॥६६॥६७||६८॥ मदन सागरश्रेष्ठ सुखसौभाग्यदायक। आरोहयामि शिखरं पापं हर नमोऽस्तु ते ॥ ६९ ॥ हे सागर श्रेष्ठ मदन ! तुम सुख और सौभाग्यके देनेवाले हो । मै तुम्हारे शिखरपर आरूढ होता हँ, तुम हमारे पापका विनाश करो तुम्हें प्रणाम है ॥ ६९ ॥ पूर्वाशाभिमुखो भूत्वा गत्वा कुर्यात्प्रदक्षिणम् । क्षणेनैव समुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति ॥ ७० ।। इस मन्त्रद्वारा पूर्वाभिमुख हो प्रदक्षिणा करनेपर सन पापोंसे रक्षा पाकर शिवलोकमें जाता है ॥ ७० ॥ शिवं शुक्लवर्ण श्वेतवृषभारूढं पद्मासनस्थं । श्वेतनागयज्ञोपवीतिनं वरदाभयहस्तं ।

(४७८) योगिनीतन्त्रम् । सोमसूर्याग्निचक्षुषं जटामुकुटचन्द्रशेखरम् ॥ सितभस्मांगलेपनं अर्द्धनारीश्वरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं । सद्योजातवामदेवतत्पुरुषाधोरेशानाभिधम् । पश्चिमे डमरुखङ्गादिधारिणं खद्गगो. क्षीरयोवर्णमुत्तरे वामदेवकम् । शंखचक्रधारिणं तप्तहेमाभवर्ण पूर्वे तत्पुरुषं गदापद्मधरं परं स्वच्छ- सिन्दूराभं दक्षिणेऽघोरं त्रिशूलधर कपिलविटङ्कदंष्ट नीलमेघाानोपम ॥ ७१ ॥ केदाराख्य शिव शुक्लवर्ण, सफेद वैलपर चढे, पद्मासनस्य श्चेतनाग यज्ञोपवीतधारी वरदाभयहस्त अर्थात् हाथोंमें वर और अभय लिये सोम सूर्याग्नि चक्षुः जटामुकुट चन्द्रशेखर, श्वेतभस्मानुलेपन, अर्द्धनारीश्वर, पंचवक्त्र, त्रिनेत्र, तत्पुरुष, वाम, ईशान, सद्य:पश्चिम, शंख चकमारी, खन गोक्षीर वर्ण उत्तर. वामदेव, डमरू खड्गादिधारी, तपे हुए सुवर्णके समान वर्ण, पूर्व, गदा पद्मधारी, परमस्वच्छ सिन्दूराभ. दक्षिण, अघोर त्रिशूल, कपिल विटंकदंष्ट्र गौर नीलमेघाझनोपम हैं ॥ ७ ॥ एवं केदाराख्यं शिवं ध्यात्वा शिवतन्त्रोक्तेन मागण पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तन्मन्वेण पूजयेत् ॥ ७२ ।। इस प्रकार केदाराख्य शिवका ध्यान करके शियतन्त्रोक्त मंत्रद्वारा पुष्पा. अलि ग्रहणपूर्वक प्रतिमंत्रसे पूजा करे ॥ ७२ नमश्चन्द्रार्द्धचूडाय नमः खष्ट्वांगधारिणे । नमोऽस्तु शूलहस्ताय केदाराय नमो नमः ॥ ७३ ।। - '

भापाटीकासमेतम् । (४७९)
जिनके मस्तकके ऊपर अर्धचन्द्रमा विराजमान है जो खट्वांग धारण
कर रहे है और जिनके हाथमें त्रिशूल है ऐसे केदारजीको नमस्कार
है ॥ ७३ ॥
सर्वलोकेश्वरं देवं मोक्षकारणमव्ययम ।
निष्कलं परमं देवं प्रणतोऽस्मि पुरातनम् ।। ७४ ॥
सर्वलोकेश्वर, देव, मोक्षकारण, अव्यय, निष्कल, परमपुरातन देवको
मैं प्रणाम करताहूं ॥ ७४ ॥
सर्वेषामव गोतारं नमस्ने शम्भुमव्ययम् ।
शब्दातीतं गुणातीतं नमस्ते शम्भुमव्ययम् ॥ ७५ ॥
सबके रक्षा करनेवाले अव्यय शंभुको नमस्कार है । शब्दातीत गुणा.
तीत अव्यय शंभुको नमस्कार है ।। ७५ ॥
इति प्रसादनं कृत्वा केदारस्य च पश्चिमम् ।
गत्वा ब्रह्मवट वृक्षमच्छिद्रमवधारयेत् ॥ ७६ ॥
इस प्रकार स्तुति और प्रणामद्वारा उनको प्रसन्न करे । तदनन्तर
केदारकी पश्चिमदिशामें ब्रह्मवट वृक्षके समीप जाकर अच्छिद्रावधारण
करना चाहिये ॥ ७६ ॥
केदारश्च नमस्कृत्य कल्पवृक्षं ततः पुनः।
दशजन्मार्जित पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ ७७ ॥
इस प्रकार केदार और कल्पवृक्षको नमस्कार करनेसे दश जन्मके
इकडे पाप तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ७७ ।।
नमोऽन्यक्तस्वरूपाय महामलयवासिने ।
महेन्द्रस्योपरिष्ठाय न्यग्रोधाय नमो नमः ॥७॥
हे अव्यक्तरूपवान् ! हे महामलयाचलके ऊपर निवासकरनेवाले ! हे
महेन्द्रोपरि स्थित 1 न्यग्रोध ! मै तुम्हें प्रणाम करताहूं। इस मन्त्रसे बट-
वृक्षको नमस्कार करे ॥ ७८ ॥

भापाटीकासमेतम् । (४८१)
केदारभुदकं पीत्वा कामधेतुं स्पृशेद्यदि ।
पूजयेत्केश भक्त्या न भूयो जायते कचित् ॥८५॥
केदारोदकपान कामधेनुको सर्श, और भक्तिपूर्वक केशवकी पूजा
करनेसे फिर कभी जन्म लेना नहीं पड़ता ।। ८५॥
अनुत्तमोत्तम क्षेत्र शेलं मन्दरकं प्रिये ।
ककुदेश्वरं हरं दृष्ट्वा स याति परमां गतिम् ।। ८६ ॥
हे प्यारी ! मन्दारक शैल अति उत्तम क्षेत्र है, यहा फकुदेश्वर हरका
दर्शन करनेसे परम गति प्राप्त होती है ॥ ८६ ॥
ब्रह्मेश्वरश्च तत्रैव होममध्ये प्रतिष्ठितः।
ब्रह्मेश्वरं नमस्कृत्य ब्रह्मज्ञानमवाप्नुयात् ॥ ८७ ।।
वही ब्रह्मेश्वर होममें प्रतिष्ठित है ब्रक्षेश्वरको नमस्कार करनेसे ब्रह्मज्ञान
प्राप्त होताहै ॥ ८७॥

(४८०) योगिनीतन्त्रम् ।
केदारस्य च कैबेर इक्षुक्षेपत्रयान्तरे ।
पौष्पके नगरे क्षेत्र कमलाक्षहरं भजेत् ।। ७९ ॥
केदारकी उत्तरदिशा में तीन इक्षुक्षेपके अन्तरपर पौषक नगर क्षेत्रमें
कमलाक्ष हरको भजन करे ॥ ७९ ॥
संसारसागरे मग्न पापग्रस्तमचेतनम् ।
त्राहि मां भगनेत्रन त्रिपुरारे नमोस्तु ते॥८० ॥
नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च ।
त्रिपुरारे नमस्तेऽस्तु कमलेश नमोऽस्तु ते ॥ ८१॥
हे त्रिपुरारि । पापद्वारा ग्रसेहुए अतएव ससारसागरमें निमम हुए
अचेतनकी रक्षा करो हे शा तमूर्ति शिव ! तुम सब पापोंका नाशकरनेवाले
हो. हे त्रिपुरारि । हे फमलेश्वर ! मै तुम्हें प्रणाम करता हू इसमत्रसे
उनकी पूजा और प्रणाम करे ।। ८० ॥ ८१ ॥
दक्षिणे कल्पवृक्षस्य इक्षुक्षेपान्तरे प्रिये ।
छत्राकारो गिरियोऽसौ स गिरिः पारियारकः।
तस्यारोहणमात्रेण न पुनर्जायते भुवि ।। ८२ ॥
अनन्तर कल्पवृक्षके दक्षिणमें एक इक्षुक्षेपके अन्तरपर छत्राकार जो
गिरि वह पारियात्रक गिरि है, इसपर आरोहण करनेसे पुनर्जन्म नहीं
होता ॥ ८२ ॥
अष्टषष्टिषु शैलेषु मध्ये ह्यत्युनतो गिरिः।
मन्दराख्यं तु तं शैलं गत्वा तत्र समाहितः ॥ ८३ ॥
पूर्वभागे च शैलस्य स्थितो मधुरिपुरिः।
दर्शनात्तस्य देवस्य कुलानां तारयच्छतम् ॥ ८४ ॥
यह अडसठ शैलोंमें ऊँचा है । फिर मन्दराख्यशैलमें जाय, सावधान
होउसके पूर्वभागस्थित मधुारेषु हरिका दर्शन करनेसे सौ कुलोका उद्धार
होता है ॥ ८३ ॥ ८४ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४८१) केदारमुदकं पीत्या कामधेनुं स्पृशेद्यदि । पूजयेत्केशवं भक्त्या न भूयो जायते क्वचित् ॥८५॥ केदारोदकपान कामधेनुको सर्श, और भक्तिपूर्वक केशवकी पूजा करनेसे फिर कमी जन्म लेना नहीं पड़ता ।। ८५ ॥ अनुत्तमोत्तम क्षेत्र शैलं मन्दरकं प्रिये । ककुदेश्वरं हरं दृष्ट्वा स याति परमां गतिम् ॥ ८६ ।। हे प्यारी | मन्दारक शैल अति उत्तम क्षेत्र है, वहा फकुदेश्वर हरका दर्शन करनेसे परम गति प्राप्त होती है ॥ ८६ ॥ ब्रह्मेश्वरश्च तत्रैव होममध्ये प्रतिष्ठितः। ब्रह्मेश्वरं नमस्कृत्य ब्रह्मज्ञानमवाप्नुयात् ॥ ८७ ॥ वही ब्रह्मेश्वर होममें प्रतिष्ठित है ब्रह्मेश्वरको नमस्कार करनेसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होताहै ॥ ८७॥ भावभूतेश्वरं दृष्ट्वा कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । मुच्यते पापसंधैश्च शिवलोके महीयते ॥ ८८ ॥ फिर भावभूतेश्वर देवका दर्शन और प्रदक्षिणा करनेपर सब पापोंसे छूट जाता है तथा शिवलोकको प्राप्त होताहै ॥ ८८ ॥ संपूजयेच्छिवं यस्तु मन्दरे क्षेत्रपर्वते । तस्य जन्मार्जितं पापं दर्शनाद्याति संक्षयम् ॥ ८९ ॥ जो मनुष्य मन्दर और क्षेत्रपर्वतमें शिवकी पूजा करता है, केवल दर्शनमानसे उसके नार्जित पाप नष्ट हो जाते हैं ॥८९॥ प्रयागे सङ्गमे स्नात्वा यत्फलं लभते नरः। तत्फलं लभते चायं सहागुणमेध दि॥९० ॥ धर्मेश्वरस्य देवस्य कुपस्तिष्ठति चामतः। ३१

(४८०) योगिनीतन्त्रम् ।
केदारस्य च कैचर इक्षुक्षेपत्रयान्तरे।
पौष्पके नगर क्षेत्रे कमलाक्षहरं भजेत् ॥ ७९ ॥
फेदारफी उत्तरदिशामें तीन इक्षक्षेपके अन्तरपर पौप्पफनगर क्षेत्रमें
कमलाक्ष हरको भजन करे ॥ ७९ ॥
संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम् ।
त्राहि मां भगनेत्रन्न त्रिपुरारे नमोस्तु ते ॥८॥
नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च ।
त्रिपुरारे नमस्तेऽस्तु कमलेश नमोस्तु ते ॥ ८१ ॥
हे त्रिपुरारि ! पापद्वारा असेहुए अतएव संसारसागरमें निमग्न हुए
अचेतनकी रक्षा करो हे शान्तमूर्ति शिव ! तुम सब पापोंका नाशकरनेवाले
हो. हे त्रिपुरारि ! हे कमलेश्वर ! मै तुम्हें प्रणाम करता हूं इसमंत्रसे
उनकी पूजा और प्रणाम करे ।। ८० ॥ ८१ ॥
दक्षिणे कल्पवृक्षस्य इक्षुक्षेपान्तरे प्रिये ।
छत्राकारो गिरियोऽसौ स गिरिः पारियात्रकः ।
तस्यारोहणमात्रेण न पुनर्जायते भुवि ॥ ८२ ॥
अनन्तर कल्पवृक्षके दक्षिणमें एक इक्षुक्षेपके अन्तरपर छत्राकार जो
गिरि वह पारियात्रक गिरि है, इसपर आरोहण करनेसे पुनर्जन्म नहीं
होता ॥ ८२ ।।
अष्टषष्टिपु शैलेषु मध्ये प्रत्युन्नतो गिरिः।
मन्दराख्यं तु तं शैलं गत्वा तत्र समाहितः॥ ८३ ॥
पूर्वभागे च शैलस्य स्थितो मधुरिपुर्हरिः।
दर्शनात्तस्य देवस्य कुलाना तारयच्छतम् ।। ८४ ॥
यह अडसठ शैलोंमें ऊँचा है । फिर मन्दराख्यशैलमें जाय, सावधान
होउसके पूर्वभागस्थित मधुरिपु हारका दर्शन करनेसे सौ कुलोंका उद्धार
होता है ॥ ८३ ॥ ८ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (४८१) केदारमुदकं पीत्वा कामधेनुं स्पृशेद्यदि । पूजयेत्केशवं भक्त्या न भूयो जायते क्वचित् ॥८५॥ फेदारोदकपान कामधेनुको स्पर्श, और भक्तिपूर्वक केशवकी पूजा करनेसे फिर कमी जन्म लेना नहीं पड़ता ।। ८५ ॥ अनुत्तमोत्तम क्षेत्रं शैलं मन्दरकं प्रिये । ककुदेश्वरं हर दृष्ट्वा स याति परमां गतिम् ॥ ८६ ॥ हे प्यारी ! मन्दारक शैल अति उत्तम क्षेत्र है, वहा फकुदेश्वर हरका दर्शन करनेसे परम गति प्राप्त होती है ॥ ८६ ।। ब्रह्मेश्वरश्च तत्रैव होममध्ये प्रतिष्ठितः। ब्रह्मेश्वरं नमस्कृत्य ब्रह्मज्ञानमवाप्नुयात् ॥ ८७ ॥ वही ब्रह्मेश्वर होममें प्रतिष्ठित है ब्रह्मेश्वरको नमस्कार करनेसे नमज्ञान प्राप्त होताहै ॥८७ ॥ भावभूतेश्वरं दृष्ट्वा कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । मुच्यते पापसंघेश्च शिवलोके महीयते ।। ८८ ॥ फिर भावभूतेश्वर देवका दर्शन और प्रदक्षिणा करनेपर सब पापोंसे छूट जाता है तथा शिवलोकको प्राप्त होताहै ॥ ८८ ॥ संपूजयेच्छि, यस्तु मन्दरे क्षेत्रपर्वते । तस्य जन्मार्जितं पापं दर्शनाद्याति संक्षयम् ॥ ८९ ॥ जो मनुष्य मन्दर और क्षेत्रपर्वतमें शिवकी पूजा करता है, केवल दर्शनमात्रसे उसके जार्जित पाप नष्ट हो जाते हैं ।।८९|| प्रयागे सङ्गमे स्नात्वा यत्फलं लभते नरः। तत्फलं लभते चायं सहस्रगुणमेव हि ॥ ९० ॥ धर्मेश्वरस्य देवस्य कूपस्तिष्ठति चामतः।

(४८२) योगिनीतन्त्रम् । तत्र स्नानेन देवेशि पिण्डनिर्वपणेन च । गोसहस्रफलं सम्यक् लभते च वरानने ॥ ११ ॥ मनुष्यगण प्रयागके संगममें स्नान करके जो फल प्राप्त करते हैं, वह अग्रभागमें धर्मेश्वरका कूप प्रतिष्ठित है, उसमें स्नान और पिण्डदान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ९० ॥९१ ॥ पारियानस्योत्तरतो धनुर्विशान्तरे प्रिये । कपिलस्याश्रमे रम्ये संपश्येत्कपिलेश्वरम् ॥१२॥ हे घरानने ! पारियात्रके उत्तरमें वीस धनुपके अन्तरपर मनोहर कपिलाश्रममें कपिलेश्वरका दर्शन करके ॥ ९२ ॥ तं संपूज्य वरो भक्त्या विष्णुलोके महीयते। पारिया स्थितं देवं सर्वाघभयनाशनम् । नास्ति किश्चिद्भयं तस्य घोरे संसारसागरे ॥ ९३ ॥ भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनेसे विष्णुलोकमें पूजाको प्राप्त होता है । पारियानस्थित सर्वपापनाशक देवका दर्शन करनेसे उस मनुष्यको पोरसंसारसागरसे भी कुछ भय नहीं रहता ॥ ९३ ॥ पिशाचमोचनं नाम तीर्थ तस्य च पूर्वतः । धनुरेकादशान्ते च तत्रास्ते कालभैरवः ॥ ९४ ।। उसके पूर्व की ओर ग्यारह धनुके अन्तरमें पिशाचमोचननामक तीर्थ है, वहां कालभैरव अवस्थित है ॥ ९४ ।। कृष्णं गौरवृषाकारं पूर्वभागगतं प्रिये । पिशाचमोचने तीर्थे पूजयामास शूलिनम्.॥ ९५ ॥ इस पिशाचमोचननामक तीर्थके पूर्वभागस्थित वृषभाकृति कृष्ण गौर शूलि महादेवकी पूजा करे ॥ ९५ ॥ .

भाषाटीकासमेतम् । (४८३) इत्थं देवस्य तल्लिङ्गं कपर्दीश्वरमुत्तमम् । पूजनीयं प्रयत्नेन स्तोतव्यं विविधैः स्तवैः॥९६ ॥ इसी प्रकार उनका कपर्दीश्वरनामक उत्तम लिंग है यत्नपूर्वक विधिध स्तवोंसे उसकी पूजा करे ॥ ९६ ॥ "व्याघेश्वरस्य देवस्य दक्षिणे वरवणिनि । स्वयम्भूस्तत्र लिङ्गं वै देवानामपि दुर्ल मम्" ॥ लिङ्गं पूर्वमुखं तत्त श्रेष्ठस्थानमुदाहृतम् । कृत्तिवासेश्वरं प्राप्य संसारे विगतज्वरः ।। ९७ ॥ हे वरवर्णिनि ! व्यानेश्वरके दक्षिणस्थित देवताओंको भी दुर्लभ स्वयंभू- लिंग पूर्वमुखमें प्रतिष्ठित हैं, इस स्थानको अत्यन्त श्रेष्ठ जानना चाहिये कृत्तिवासेश्वर देवका दर्शन करनेसे संसारज्वर दूर होता है । ९७ ॥ संसारभयनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः। सुखेन मुक्तिमायान्ति यथाईन्ते यतस्तथा ॥ ९८ ॥ संसारमय और सब पापोंसे छूटकर सुखसहित यथायोग्य मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥ ९८॥ व्याघेश्वरस्य चैशान्ये धतुर्दशकमानतः। कृत्तिवासेश्वरं प्राप्तलिंगयोनिप्रतिष्ठितम् । कृत्तिवासेश्वरं देवं दृष्ट्वा चैव पुनःपुनः ।। ९९ ॥ यदीच्छेत्तारकं ज्ञानं शाश्वतं चामृतं पदम् । एतत्सर्वेश्च कर्त्तव्यं यदीच्छेत्परमात्मन ॥१०॥ न्यानेश्वरके ईशानकोणमें दश धनु प्रमाण कृत्तिवासेश्वरकी लिंग योनि प्रतिष्ठित है। मनुष्य यदि आत्माके तारनेवाले शाश्वत अमृतपद स्वरूप योगिनीतन्त्रम् । ज्ञानकी कामना करे तो कृत्तिवासेश्वर देवका वारंवार दर्शन करे। यह सब कार्य सभीको करने चाहिये ॥ ९९ ॥ १०० ।। मदलाचलस्येशाने इषुक्षेपत्रयान्तरे । बाणेश्वरस्तु विख्यातः सप्तपातालभेदकः ॥ १०१॥ मदलाचलके ईशानकोणमें तीन इक्षुक्षेपके अन्तरपर सप्तपाताल भेदक विख्यात बाणेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है ॥ १०१ ।। वत्सरं तत्तु लिङ्गानां सर्वेषामुत्तमोत्तमम् । तत्प्रणम्य नरो भक्त्या वत्सरान्मुच्यते परम्॥१०२॥ यह वत्सरलिंग सबसे उत्तमोत्तम है, इसको भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य एक वर्षमेंही मुक्त होता है ॥ १०२ ॥ तस्य देवस्य वायव्ये नानावर्णा तु या शिला। गरुडाख्यं महालिंग पूजयेद्गरुडं नरः ॥ १०३ ।। उन देवके वायुकोणमें नानावर्णकी जो शिला है, वही गरुढ़ाख्य महा- लिग है, मनुष्य गरुडदेवकी पूजा करें ॥ १०३ ।। 'दर्शनात्तस्य देवस्य गोशतस्य फलं लभेत् ॥ १०४ ॥ उन देवका दर्शन करनेसे सौ गोदानको फल प्राप्त होता है ॥१०॥ नमस्ते पक्षिराजेन्द्र वासुदेवहिते रत । अनुज्ञा देहि पक्षीश त्वमेतदर्शनं प्रति ।। १०५ ।। वासुदेव विष्णु भगवान के हितकर्ता हे पक्षिराज ! मैं तुम्हें प्रणाम कर- ताहूं तुम इसका दर्शन करनेके लिये मुझे आज्ञा दो ॥ १०५ ॥ प्रणिपत्य पठेन्मन्वं पश्चिमस्यान्तरे महत । विष्णोरायतनं प्राप्य नर: शिवजले शुभे। स्नात्वाचमुण्डनंकृत्वाध्यात्वाविष्णुक्षपेनिशाम् ॥१.६ - , भापाटीकासमेतम् । (४८५) इस मंत्रको पढ़कर प्रणाम करे, फिर पश्चिमकी और विष्णुके मन्दिरमें जाय स्नान करनेपर मुण्डनपूर्वक विष्णुका ध्यान करके रात्रि बितावे ॥ १०६॥ ततः प्रभाते देवेशि मणिकूटस्य चोत्तरे । वल्लभाख्या नदी पुण्या सर्वपापप्रमोचनी । १०७ ॥ हे देवि ! फिर प्रभातकालमें, मणिकूटके उत्तरको ओर सन पापोंका नाश करनेवाली वल्लभा नदी बहती है ॥ १०७ ॥ तत्र स्नात्वा चतुर्दश्यां माघे वा फाल्गुनेथ वा । वल्लभायाश्च देवेशि महापातकनाशनम ॥ १०८॥ उस पवित्र नदीमें माघ वा फाल्गुनके महीने की चतुर्दशीमें खान करनेसे महापातक नष्ट होते हैं ॥ १०८ ॥ वल्लभायां नरः स्नात्वा नीलकण्ठस्य दर्शनात् । न स्पृशन्तीह पापानि सप्तजन्मकृतान्यपि ॥ १०९ ॥ वल्लभामें स्नान करनेके पीछे नीलकंठका दर्शन करनेसे मनुष्यों के सात जन्मकृत पाप नष्ट होते हैं ॥ १०९॥ तस्मिस्तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा सादरमाधवम् । यत्र तत्र स्थितो वापि संसारे न पुनर्विशेत् ॥ ११० ।। उस तीर्थमें स्नान करनेके पीछे आदरपूर्वक माधवका दर्शन करनेपर वह निस किसी स्थानमें क्यों न रहे, उसको फिर संसारमें प्रवेश करना नहीं पड़ता ॥ ११०॥ संसारे सर्वतस्तस्य गङ्गा त्वायतनं भवेत् ॥ १११ ॥ संसारके सर स्थानही उसको गगायतन (देवलोक वा गंगातट) स्वरूप होते हैं ॥ १११॥ वराहविवरं दृष्ट्वा नरव्रज्या महानदी। अशोककमलसनाता कोलदण्डविनिःसृता ॥११२।। --

(४८६)
योगिनीतन्त्रम् ।
फिर वराहविवरका दर्शन करे। तदनन्तर महानदी नरज अशोक
कमलसंजाता यह कोलदण्डसे निकली हैं ॥ ११२ ॥
नन्दिनी पङ्कजा चैव नदी मधुमती परा।
मणिकूटे च संयाता तस्य तत्राधिकं फलम् ॥११३॥
फिर नन्दिनी, पंकना, और परमोत्तम मधुमती नदी है, यह
नदी मणिकूटसे उत्पन्न है उसमें स्नान करने से अधिकतर फल लाभ
होता है ॥ ११३ ॥
नमोस्तु ते पुण्यजले नमः सागरगामिनि ।
नमस्ते पापविमले नमो देवि शिवप्रदे ।। ११४ ॥
तुम्हारा जल पवित्र है, तुम्हारी गति सागरपर्यन्त है, तुम पापोंका
नाश कर निर्मल बनाके कल्याणदेती हो इस कारण तुम्हें प्रणाम है ॥११४
अपुनर्भवजले स्नात्वा विशेगोकर्णमीश्वरम् ।
स्वर्गद्वारं च तत्रैव इमं मन्त्रमुदीरयेत् ॥ ११५ ॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः सर्वदेवनिरूपितः ।
स्वर्गद्वारं महापुण्यं समारोहेसुदुर्लभम् ॥ ११६ ॥
इस मंत्रसे अपुनर्भवजलमें स्नान करके ईश्वर गोकर्णमें प्रवेश करै ।
उसी स्थानमें सर्गका द्वार है, यह ब्रह्मा विष्णु और रुद्रादि सब देवता-
ओंने निरूपण किया है । उस महापचित्र दुर्लभ स्वर्गद्वारमें आरोहण
करना चाहिये ॥ ११५॥ १६ ॥
दशलक्षणयुक्ताय चतुष्पादाय चारवे ।
अयं ददामि धर्माय स्वर्गद्वारनिवासिने ॥ ११७ ।।
वहां यह मंत्र उच्चारण करै कि, जिनमें धर्मके दश लक्षण विद्यमान हैं
जो चतुष्पाद और पवित्र विग्रहवान् हैं और जिनका निवास स्वर्गद्वारमें
है ऐसे धर्मके निमित्त मैं अर्ध्य प्रदान करता हूं ॥ ११७ ॥

भापाटीकासमेतम् । (४८७) तत्र गत्वा युग्महस्तं नमस्कुर्यादतन्द्रितः। इदे वाराणसीये च मार्कण्डेयसरे तथा । स्तात्वा कामेश्वरं दृष्ट्वा कल्पवृक्षं नमेत्ततः ॥ ११८ ।। स्नात्वा पश्चादुर्लभायां ततो हरिगृहं व्रजेत् । योऽची तीर्थे च विधिवत्करोति नियतेन्द्रियः। कुलैकविंशमुद्धृत्य विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ११९ ।। इस मंत्रसे अर्घ्य दे हाथ जोड़कर नमस्कार करे फिर वाराणसीके ह्रद और मार्कण्डेय सरोवरमें मान करके कामेश्वरका दर्शन करे और कल्पवृक्षको प्रणाम करके फिर दुर्लभामें स्नानकर हरिगृहमें जाय । जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर इस तीर्थमें पूजा करताहै, वह इक्कीस कुलका उद्धार करके विष्णुलोकको प्राप्त होताहै ।। ११८ ॥ ११९ ॥ मणिकूटस्य पूर्वे तु नातिदूरे महेश्वरि । विष्णुपुष्करकं नाम सर्वतीर्थोद्भवं जलम् ॥ १२० ॥ हे महेश्वरि ! मणिकूटके पूर्वमें थोड़ीही दूर विष्णुपुष्करनाम: सर्वतीयोंके जलसे परिपूर्ण एक तीर्थ है ॥ १२० ॥ तत्र स्नात्वा वरारोहे विपुलां लभते श्रियम् । पुष्कराकारमास्थाय स्थितोऽसौ वसुधातले ॥ १२१ । हे वरारोहे ! वहां स्नान करनेसे विपुल श्री प्राप्त होतीहै और व पुष्कर अर्थात् पातुल्य रूप धारण करके पृथ्वीतलमें स्थित है ॥ १२१ मर्त्यलोकहितार्थाय पापं मे हर पुष्कर । स्नात्वा चानन मन्त्रेण वारुणं तत्र संजपेत् ॥१२२१ मर्त्यलोकहितार्थाय पापं मे हर पुष्कर" इस मंत्रसे स्नानपूर्वक रुण मंत्रका जप करे ।। १२२ ॥

(४८८)
योगिनीतन्त्रम् ।
" दद्यादयश्च विधिवदारोहेदपि कूटकम् ।
मणिकूटाचले विष्णुईयग्रीवस्वरूपधृक् " ।
शतवाहुप्रमाणश्च अचलाऽटसहस्रकम् ।
मन्त्रेणारोहयेदेवि पीतपुष्पेण पूजयेत् ॥ १२३ ।।
फिर विधिवत् अर्यपदानपूर्वक कूटारोहण करे विष्णु मणिकूटाचलमें
हयग्रीवका रूप धारण करके अवस्थित हैं । वहा शतबाहुप्रमाण आठ
सहस्स पर्वत हैं, मंत्रोच्चारणपूर्वक उनमें आरोहण करके पीले पुष्पोंसे पूजा
फरनी चाहिये ।। १२३ ॥
ततः स विष्णुदेहं द्वारिकं तत्र प्रसादयेत् ।। १२४ ॥
फिर वह मनुष्य विष्णुदेह द्वारिक (द्वारपालको) प्रसन्न करे ॥१२॥
दण्डहस्त महाबाहो कालदैत्यनिषूदन ।
द्वारपाल नमस्तेऽस्तु प्रवेशं देहि मे सदा ॥१२५॥
हे दण्डहस्त महाबाहो ! काल दैत्यनिषूदन द्वारपाल ! मैं तुमको
नस्मकार करता है, तुम मुझको द्वारप्रदान करो ॥ १२५ ॥
पीतञ्च द्विभुजं शान्तं मणिकुण्डलमण्डितम् ।
चक्रबाणधरं शुक्नं समन्तात्परिवेष्टितम् ॥ १२६ ।।
सर्वलक्षणसम्पन्नं मणिशेलं त्रिलोचनम् ।
ध्यात्वा तत्पीठके मन्त्रमारोहेच्छिखरं तदा ॥ १२७ ॥
पीतवर्ण, द्विभुज, शान्तति मणिकुण्डलमण्डित, चक्रवाणधारी,
शुश चारों ओर परिवेष्टित, सर्वरक्षणसम्पन्न, मणिशल, त्रिलोचनका
प्यान करके उनकी पीठ में मत्रपाठ करके शिखरपर आरोहण
करे ।। १२६ ॥ १२७ ॥

भापाटीकासमेतम् । (४८९) मणिकूट गिरि श्रेष्ठ पीतवर्ण त्रिलोचन । त्वदद्यारोहणं कृत्वा द्रक्ष्यामि भवनं तथा ॥ १२८ ।। हे गिरिश्रेष्ठ मणिकूट ! तुम्हारा पीतवर्ण और तीन नेत्र हैं अब हम तुम्हारे ऊपर आरोहण करके मंदिरोंका दर्शन करते हैं ॥ १२८ ।। तं पूर्वाभिमुखेनैव उत्तराभिमुखेन वा । आरोहेन्मणिशैलश्च वर्जयेदन्यदिङ्मुखम् ॥ १२९ ॥ पूर्वकी ओर मुखकरके और उत्तरकी ओर मुखकरके मणिशैलमें आरोहण करे, अन्यदिशामें मुखकरके आरोहण न करे ॥ १२९ ॥ गत्वा विन्ध्याचलं पश्चात्कृत्वा तं त्रिप्रदक्षिणम् । प्रविश्य संयतो भूत्वा धौतवासा जितेन्द्रियः । मूलेन नापयेद्देवं सौगन्धिकजलैः शुभैः ॥ १३ ॥ कर्पूरवासितः स्निग्धैः सुगन्धिकुसुमादिभिः ॥ चन्दनागुरुपद्मानि यानि काम्यानि कानि चित् । कृत्यानि कुण्डमालिख्य तज्जले स्नानमाचरेत् ॥१३॥ अनन्तर विन्ध्याचलमें नाकर तीनबार प्रदक्षिणा करे । फिर धुलेवस्त्र पहर जितेन्द्रिय और एकाग्रचित्तहोकर मूलमंत्रद्वारा कपूर वासित सुगंधित- जलसे देवताको स्नान कर चन्दन अगर पद्मादिद्वारा काम्य कार्य समापन पूर्वक कुण्ड लिखकर उस जलसे स्नान करावे ॥ १३० ॥१३१ ॥ सितामलजलैश्चैव तोयः कोप्णोदकेन च । उष्णेन वारिणा चैव क्रमात्पञ्चामृतेन च ॥ १३२ ॥ शुदामलजल ( मलहीनजल ) कुछेक उष्ण जलसे, उष्णजल और पंचामृतसे ॥ १३२ ॥ त्रिसितेन विगन्धेन बिजलेन मम प्रिये । प्रीत्यर्थ तस्य देवस्य स्नानं देवि समाचरेत् ॥१३३।।

(४९०)
योगिनीतन्त्रम् ।
निसित, त्रिगध और त्रिजलसे स्नान करावे प्रिये ! इसके द्वारा देवता
अत्यन्त प्रसन्न होता है ॥ ३३ ॥
विलितं चन्दनं पद्म उशीरं परिकीर्तितम् ।
नित्यं मलयज मयं विगन्धं सुमनोहरम् ॥ १३४ ॥
चन्दन, पद्म और खस इन तीनों के मिलनेका नाम त्रिसित है नित्य-
गध, मलयजगध और मयंगध इनका नाम विगध है ॥ १३४ ॥
तीर्थोदकं गागतोयं कर्पूरस्योदकं तथा ।
विजलश्च मदेशानि स्नापयेदन्यरान्तरे ॥ १३५ ॥
तीर्थोदक, गगाजल और कर्पूरोदक इनका मिलानाही त्रिअल है । इन
तीनोंसे एकके अनन्तर दूसरेसे स्नान करावे ॥ १३५ ॥
स्नापयित्वा यथोक्तन तथा स्नानं समाचरेत् ।
अर्द्धस्नान ततः कुर्याद्विधिज्ञः परमेश्वरि ।। १३६ ॥
इस प्रकार ययोतक्रमसे स्नान कराकर स्नानाचरण करे । हे परमेश्वार !
इसके पीछे निमिका जाननेवाला मनुष्य अर्धस्नान करावे ॥ १३६ ।।
अष्टोत्तरसहस्रेस्तु सुवर्णघटितर्घटैः।
तण्डुलैः स्नापनं कुर्यात्कर्पूरादिविमिश्रितम् ।। १३७ ॥
इसके उपरान्त सुवर्ण निर्मित घटसे एक सौ आठ तण्डुलयुक्त कर्पूरादि,
मिश्रित स्नान करावे ।। १३७ ।।
अशक्तस्तु शतं कुर्याद्दशधा सुरसुन्दार।
ताना राजतर्वापि अथवा सति सम्भवे ।
मातिकैर्वा घटेः स्नानमशक्तस्तु समाचरेत् ॥१३८॥
असमर्थ मनुष्य दशबार स्नान कराचे । जो मनुष्य सुवर्णनिर्मित घटसे
स्नान करानेमें असमर्थ हे वह चादी, ताबा वा सभव होनेपर भी मिट्टीके
घटसे भी स्नान करासकता है ॥ १३८॥

।
भापाटीकासमेतम् । (४९१)
स्नानात्पूर्व महेशानि तीर्थ गत्वा महेश्वरि ।
तस्माच जलमाहृत्य कुम्भे कृत्वा विधानवित् ॥१३९
हे महेशानि ! स्नानके पहिले तीर्थ में जाय उसका जल लाकर घटमें
रक्खे ॥ १३९ ॥
गन्ध पुष्प ततो दत्त्वा पुनर्मन्त्रं जपेत्ततः।
अमृतीकरणं कुर्यान्मुद्रां तत्र च दर्शयेत् ॥ १४० ॥
फिर गंधयुष्पादिमदानपूर्वक यथाविधि मंत्र जपकर अमृतीकरण और
मुद्रामदर्शन करे ॥ १४ ॥
षडङ्गं विन्यसेत्तत्र अवगुण्ठय ततोर्चयेत ।
महोत्सवं ततः कृत्वा स्नानार्थ देवदक्षिणे ।
स्थापयेत्स्नानशेषे तु देवबुद्धया क्षिपेत्तनौ ॥१४॥
फिर पडङ्गविन्यास और अवगुंठन (आवेष्टन ) प्रदानपूर्वक अर्चना
करने के पीछे महोत्सव करके स्नानार्थ देवको दक्षिणमें रक्खे इसके पीछेही
स्नान करावे । खानशेष होनेपर देवताके शरीरमें जलनिक्षेप करना
चाहिये ॥ १४१ ॥
उद्वर्तनं प्रतिदिन कर्तव्यश्च दिनान्तरे ।
दिनत्रयान्तरे वापि सर्वकाले विशेषतः ॥१४२ ॥
प्रतिदिन दिनान्तरमें उद्वर्तन (चिकने द्रव्यादिका मलना ) अर्थात् /
उबटन करना चाहिये । विशेषकर सदाही तीन दिनके अन्तरसे उद्वर्तन
करे ॥ १४२ ॥
तिलोद्भवेन तैलेन सुगन्धेन मम प्रिये ।
पलेन च पलान तदद्धनापि यत्नतः ।
स्ने है रजनीभिश्च तण्डुलोद्वर्तनादिमिः ॥ १४३ ॥

(४९२)
योगिनीतन्त्रम्।
संस्थाप्य देवदेवेशं विल्वपत्रेण शांकरि ।
संघृष्टगावं पत्री अपामार्गस्य मूलकै ।
गुच्छकर्नलपुष्पस्य कूछ कुन्मिहेश्वरि ॥ १४१ ।
हे प्यारी ! पल, पलार्द्धपरिमित सुगन्धित तिलके तेलसे अथवा चिकने
तण्डुलादिद्वारा देवदेवको वेलपत्रमें स्थापन करके उद्वर्तन करे । चिर-
चिरेके पत्ते वा जढसे अथवा नलपुष्पकी कुर्चक (कंची) द्वारा कूर्चन
(कुंचा ) करे ॥ १४३ ॥ १४४ ॥
कुशेन चामरणाथ गोवालेन विशेषतः ।
उशीरं कूर्चकं दत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४५॥
कुश, चामर, गोवाल (तन्तुविशेष) और विशेषकर खसको कूर्चक
प्रदान करके सब पापोंसे छूट जाता है ॥ १४५ ।।
दत्त्वा गोवालकं कूच सर्वान्पापान व्यपोहति ।
दत्वा च चामरं कूच श्रियमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥१४६॥
गोवालक ( तन्तु विशेष ) की कूर्चक (कूची ) दान करनेसे सब पाप
नष्ट होते हैं । चामर कूर्चकप्रदान करनेसे अत्युत्तम श्री मिलती है॥१४६॥
न वराहस्य रोमेण न वंशेन कदाचन ।
गवयस्य तथाश्वस्य रोमन्तु परिवर्जयेत् ॥१७॥
वराहरोम, वंशगवय (गौके समान मृगविशेष ) रोम, तथा अश्वरोम
वर्जित है ॥ १४७॥
लिने वा प्रतिमायां वा शालग्रामे तथैव च ।
न कूर्चयेत्प्रतिदिन पश्चाहे सप्तमे तथा ॥ १४८ ।।
हे प्यारी ! लिग वा प्रतिमा अथवा शालग्राममें प्रतिदिन कूर्च नहीं
करना चाहिये । पांच वा सात दिनके पीछे ॥ १४८॥

- भापाटीकासमेतम् । (४९३) मासान्ते वाथ पक्षान्ते कूर्चयन्मम सुन्दार । अयने विषुवे चैव भौमवारे दिनक्षये ॥ १४९ ।। महीने वा पक्षके अन्तमें कूर्चन करे । अयनमें, विपुव (संक्रान्ति, पुण्यकाल) में, मंगलवारमें दिनक्षयमें ॥ ११९ ।। द्वादश्यां राहुग्रस्ते च तैलस्नान न कारयेत् ॥१५॥ द्वादशी और ग्रहणमें तैलस्नान न करावे ॥ १५० ॥ नैव तं कूर्चयदेवि न वराङ्गे मुखे ततः। नासिकान्ते तथा गुह्य लिङ्गे च पुलकेषु च । १५१ । हे देवि ! वराह (मस्तक ) मुख, नासिकान्त. गुह्य, लिंग वा पुलकमें कूर्चन न करे ॥ १५१ ॥ वस्त्रेण मार्जयेदेवि कासिनाथ चन्दनः। रक्तवस्त्रे भवेत्कुष्ठी पांडव्याधिमवाप्नुयात् ॥ १५२ ।। हे देवि ! कार्पासवस्त्र वा चन्दनद्वारा मार्जन करे । लालवस्त्रसे मार्जन करनेपर कोढी और पाण्डुरोगसे ग्रसित होता है ॥ १५२ ॥ पट्टैश्चक्षुषमाप्नोति नीलरक्तः क्षयं व्रजेत् । परिधाप्य ततो वस्त्रं स्वर्गसूबद्वयं तथा ॥ १५३ ॥ कटिवेष्टनकं दद्यान्नानारत्नादिभूषणम् । परिधान विधायेवं स्नान या कुरुते नरः ।। १५४ ॥ पूजाकाले भोजने च स्नाने चैव विशेषतः। सोपि नाशमवाप्नोति धननाशं तथैव च ॥ १५५ ॥ रेशमीन वनद्वारा मार्जन करनेसे चाक्षुष्य (निर्मलदृष्टि ) लाम होती है, और नीले वा लाल पटद्वारा मार्जन करनेसे क्षयको प्राप्त होता है फिर वस्त्र पहिराने के पीछे स्वर्गसूत्रद्वय ( बहुमूल्य दो वस) और कटि- (४९४) योगिनीतन्त्रम् । वेष्टन तथा रत्नादिभूपण प्रदान करे । इस प्रकार पहराकर वा पूनाकाल, भोजन और विशेषकर स्नानके समय नो मनुष्य स्नान करता है वह नाशको प्राप्त और उसका धन नष्ट होता है ॥ १५३ ॥ १५४॥ १५५ ।। मलयोक्षेन गन्धेन गोपीचन्दनकेन वा । बिल्वकाष्ठोद्भवेनाथ तुलसीकाष्ठकेन वा ॥ १५६ ॥ पद्मकेन तमालेन तथा रोचनयाथ वा । विधाय तिलकं देवि श्रेष्ठ मेव क्रमेण च ॥ १५७ ।। फिर मलयजगंध, अथवा गोपीचन्दन, वित्वकाठोद्भव चंदन, वा तुल. सीकाठोद्भव चंदन, या पद्मक, तमाल, वा ( गोरोचन ) द्वारा तिलक कररावे इनमें पूर्वपूर्वको श्रेष्ठ जानना चाहिये ॥ १५६ ॥ १५७ ॥ चतु:समश्चातिसमं द्विसमञ्च सुरेश्वरि । अत्रालिप्य ततोदेह अयनेन विसर्जयेत् ॥ १५८ ॥ हे सुरेश्वरी ! चतुःसम (बराबर चार वार ) वा (बराबर दो वार) देवताकी देहको लेपन करे । अयनकालमें यह आलेपित वर्जित जानना चाहिये ॥ १५८॥ शीत रात्रौ पुनः स्नाननानुलिप्य सुगन्धिभिः। ललाटे तु विशेषेण वराङ्गेन कदाचन ॥ १५९ ॥ शीतकालकी रात्रिमें पुनः स्नान के समय सुगंधि अनुलेपन अनुचित है, विशेषरूपसे ललाटदेश वा उत्तमांगमें कभी अनुलेपन उचित नहीं है ॥ १५९ ॥ चतुः समञ्च बिसमं द्विसमञ्च सुरेश्वरि । पादे पृष्ठे तथा नेत्रे न दद्यादतुलेपनम् ॥ १६० ॥ हेसुरेश्वरी! चतु:सम (चारवार बराबर) वा त्रिसम ( तीन वार बराबर) वा द्विसम (दो चार बराबर ) रूपसे चरण पृष्ट और नेत्रमें लगावे ।। १६०॥

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भाषाटीकासमेतम् । (४९५)
चक्षुर्लग्ने हतालक्ष्मीः मुखलग्ने हतत्रिका।
दरिद्रः करलग्ने च पदलग्ने धनक्षयः ।। १६१ ॥
नेत्रोंमें लगानेसे लक्ष्मीनाश, मुखमें लगानेसे श्री (श्रेष्ठता) नाशकर
(हस्त ) में लगानेसे दरिद्र और पैर छगानेसे वनक्षय होता है ।।१६१॥
लिंगस्य पुलकान्ते तु न दद्याचन्दनं प्रिये ।
पद्मपत्रे बिल्वपत्रे करवीरदले तथा ।
तत्र दद्याञ्चन्दनश्च लिंगे च सति सम्भवे ।। १६२ ।।
नेत्राणि नाञ्जयेदेवि कजलेश्च विशेषतः ।
मालतीपत्रसम्भूतं तिलतलेन चायसे ।
तापयेत्पातयेद्देवि कजलं तत्प्रकीर्तितम् ।। १६३ ॥
हे प्रिये ! लिंगके पुलकान्तमें चन्दन प्रदान करना उचित नहीं है
हे देवि ! लिंग और तत्पुलकमें संभव होनेपर पद्मपत्र, बिल्वपत्र वा क
नैरके दलमें चन्दन दान करै । हे देवि ! नेत्रांजन विशेषकर कजल.
द्वारा नही करना चाहिये। मालतीके पत्तोंका बना वा लोहनिर्मित
पात्रमें तिल तेलद्वारा तापित करके निक्षेप करनेसे वही बज्जल कह
गया है ॥ १६२ ॥ १६३ ॥
नीराजनंन यः पूजां करोति वरवणिनि ।
अमृतं प्राप्नुयात्सोऽपि इह लोके परत्र च ॥ १६४ ॥
हे वरवर्णिनि ! नीरांजनद्वारा जो पूजा करता है, वह इस लोक और
परलोकमें अमृत (मुक्ति) प्राप्त करता है ॥ १६४ ॥
अथ शुद्धजलं यस्तु योन कुत्सुिरार्चिते।
सोऽपि मूढो भवेद्रोगी क्षिप्रं वा नाशमाप्नुयात् ॥१६५
हे सुरार्चिते देवि ! जो मनुष्य देवपूजामें जल शुद्धि नहीं करता वह
रोगी होकर शीघही विनागको प्राप्त होता है ॥ १६५ ॥

(४९६) योगिनीतन्त्रम्। लिङ्केवा प्रतिमाय वा पूर्वमेव मम प्रिये । नरेः संमार्जयेद्यन्त्रं कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् ॥ १६६ ॥ हे प्यारि ! लिग वा प्रतिमाके प्रथमही जलद्वारा यंत्र मार्जन करके प्रदक्षिणा करनी चाहिये ॥ १६६ ॥ संस्पृशत्प्रतिमा भद्रे माश्च लिंगस्वरूपिणम् ॥ १६७ ।। हे कल्याणी! प्रतिमा और लिंगरूपी मुझको स्पर्श करे ।। १६७ ॥ नमो नारायणायेति ये वदन्ति मनीषिणः । कि कार्य बहुमंत्री मन्त्रविभ्रमकारकैः ॥ १६८ ॥ जो बुद्धिमान् मनुष्य "नमोनारायणाय" यह मंत्र उच्चारण करता है उसको विभमकारक बहुत मंत्रोंसे क्या प्रयोजन है ॥ १६८ ॥ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः । यजस्तेनैव मन्त्रेण सूक्तेन पुरुषेण वा ॥ १६९ ॥ "नमो नारायणाय" यह मंत्र सत् और सर्वार्थ साधक है । इस मंत्र वा वा पुरुष सूक्तमंत्रसे यजन करै ।। १६९ ॥ द्वादशाक्षरबीजेन कृष्णबीजेन पूजयेत् । व्यस्तन च समस्तेन अनुलोमविलोमकैः॥ प्रयुक्तैर्वहुभिर्मन्त्रविष्णुमन्त्रेण चैव हि । तत्रार्कचन्द्रवहीनां मण्डलानि विचिन्तयेत् ॥ १७० ॥ ततो विचिन्त्य हृदयमोङ्कार ज्योतिरूपिणम् । कर्णिकायां समासीनं ज्योतिरूपस्वरूपिणम् । अष्टाक्षरं ततो मन्वं प्रवदन्ति यथाक्रमम् ॥१७१।। द्वादशाक्षर वीज और कृष्णवीज मंत्रसे पूजाकर । व्यस्त समस्त अनुलोम और विलोमद्वारा विहित बहुत मंत्र और वैष्णवमंत्रसे पूजा भाषाटीकासमेतम् । (४९७) करनी चाहिये । उस मणिकूटमें चन्द्र सूर्य और अग्निमण्डलकी चिन्ता करके हृदय मंत्र और ज्योतिरूपी ओंकार मत्र तथा कर्णिकामें समासीन ज्योतिरूपस्वरूप अष्टाक्षरमन यथाक्रमसे उच्चारण करे ॥ १७० ॥ १७१ ॥ केशवादि पुरः कृत्वा द्वादशाक्षरके न्यसेत । चतर्भुज महासत्वं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ १७२ ॥ चिन्तयित्वा ततो योगं ज्योतीरूपं सनातनम् । तत आवाहयेन्मन्त्रैः क्रमशोधितमानसः ॥ १७३ ॥ फिर केशवादिका पुरस्कार (संस्करण ) करके द्वादशाक्षर मंत्र न्यास करे तदनन्तर क्रमानुसार शुद्धमन होकर चतुर्भुज महासत्व करोडसूर्य के समान प्रमाशील योग ज्योतिरूप सनातनको चिन्ता करके आवाहनमंत्र उच्चारण करे ॥ १७२ ॥ १७३ ॥ मीनरूपो वराहश्च नारसिंहोथ वा पुनः। आयातु देवो वरदो मम नारायणोऽप्रतः ॥ १७४॥ सुमेरोः पादपीठे च पद्मकल्पितमासनम् । सर्वसत्त्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन ॥ १७५ ।। मीन, वराह और नरसिह, यह देवता नारायणरूप आगमन करे और समस्त जीवों ( प्राणियों ) के हितके निमित्त पधारकर हे मधुसूदन ! सुमेरुपवर्तके ऊपर पद्मासनमें आप विराजित होकर अभीष्टसिद्धिकरिये यही आवाहनका मंत्र है ॥ १७४ ॥ १७५ ॥ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय । अध्याध्यं हृषीकेशाय विष्णवे नमः ॥ १७६॥ इत्यय॑म् । त्रिलोकीके स्वामियों के भी स्वामी देवादिदेव ऐसे हे स्पीकेश 1 हे विष्णो ! हम आपको प्रणाम करते हैं आप इस अर्यको ग्रहण करें। इस मंत्रसे अर्घ्य देना चाहिये ॥ १७६ ॥ ३२ । योगिनीतन्त्रम् । स्वपाचं पादयोदेव पद्मनाभ सनातन । विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन ॥ १७७ ।। इति पाद्यम् । हे विष्णु ! अपने चरणकमलों से उत्पन्न हुए पायको, हे कमलनेत्र ! हे पमनाम ! हे अविनाशिन् ! आप ग्रहण करे । इस मंत्रसे पाद्य देना चाहिये ॥ १७७ ॥ मधुपर्क महादेव ब्रह्माटोः कल्पितं तव । मया निवेदितं भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम ॥ १७८ ॥ इति मधुपर्कम् । हे पुरुषोत्तम भगवन् ! ब्रह्मादि देवताओंके द्वारा यह मधुपर्क आपके निमित कल्पना किया गया है । सो हे महादेव ! आप इसे ग्रहण करें । इस मंत्रसे मधुपर्क देवे ।। १७८॥ मन्दाकिन्यास्तु ते वारि शुभं पीत्वा हराशुभम् । गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् ॥१७९॥ इत्याचमनीयम् । पापोंका हरनेवाला मन्दाकिनीका निर्मल जल भक्तिभावपूर्वक आपके आचमन के लिये हम निवेदन करते हैं आप ग्रहण करें, इस मंत्रसे आच मनपदान करे ॥ १७९ ॥ त्वमापः पृथिवी चैव ज्योतिस्त्वं वद्विरेव च । लोकसम्यित्तिमात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् ॥१८०॥ इति स्नानम् । आप जल, पृथिवी, ज्योतिः (प्रकाश) और अमिस्वरूप हैं, केवल सदाचार करनेहीके लिये हम गुद्वजलसे आपको स्नान कराते हैं, इस यन्त्रसे स्नान करावे ॥ १८० ॥ 1 1 . भापाटीकासमेतम् । (१९९) बहुचित्रसमायुक्ते यज्ञसूत्रविभूपिते स्वर्णसूत्रप्रभेदेन वाससी तव केशव ॥ ८१ ॥ बहुमूल्य एवम् यज्ञसूत्रसे समलंकृत सुवर्ण अर्थात् कलावत्के कामसे युक्त ऐसे दो वस्त्र हे केशव ! मै आपके निमित्त प्रदान करता हूं इस मन्त्रको पढकर दो वस्त्र देने चाहिये ।। १८१ ॥ शरीरं ते लेपयामि चेष्टास्वैव च केशव । मया निवेदितान् गन्धान्प्रतिगृह्यानुमन्यताम्॥१८२॥ इति विलेपनम् । हे केशव ! मैं उत्तमोत्तम सुगन्धित द्रव्योंसे तुम्हारे शरीरका लेपन करता हूं, अतएव मेरे दियेहुए इन सुगन्धित द्रव्योंको ग्रहण करके तुम अपने शरीरमें लेप करो । इससे उबटन दान करे ॥ १८२ ।। 'ऋग्वेदादिगमन्त्रेभ्यः शोधितं पद्मयोनिना। सावित्रीग्रन्थिसंयुक्तमुपवीतमनक्षतम् । सूर्यश्चन्द्रश्च विद्युच्च त्वमेवाग्निस्तथैव च । त्वमेव ज्योतिषां ज्योतिदीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥१८३॥ ऋग्वेदोक्त मन्त्रोंसे ब्रह्माजीके द्वारा शुद्ध कियेहुए, खण्डरहित सावि- त्रीकी ग्रन्थिसे युक्त इस दीपकको तुम ग्रहण करो हे देव ! तुम्हीं सूर्य चन्द्रमा पृथ्वी विद्युत् (विजली ) तथा अमिरूप हो अथ च तुम्हीं सब ताराओंके अधिपति हो। इस मन्त्रको पढ़कर दीपदान करना कर्तव्य है ।। १८३ ॥ अन्नं पञ्चविधश्चैव रसैः षडभिः समन्वितम् । मया निवेदितं भक्त्या नैवेद्यं तव केशव ॥ १८४ ।। इति नैवेद्यम् ।

(५००) योगिनीतन्त्रम। हे केशव ! छ: प्रकारके रसोंके स्वादसे युक्त पांच प्रकारके अन्नसे निर्माण किये हुए नैवेद्यो मे भक्तिपूर्वक निवेदन करता हूं इसे आप ग्रहण करे । इससे नैवेद्य प्रदान करे ॥ १८४ ॥ पूर्वे चैव वसंदेवो याम्ये संकर्षणो वसेत् । प्रद्युम्नः पश्चिमे चैव तथैशान्य त्रिविक्रमः॥ १८५ ।। पूर्वमें देव, दक्षिणमें संकर्षण, पश्चिममें प्रद्युम्न तथा ईशानकोणमें त्रिवि क्रम वास करते हैं ॥ १८५ ॥ तथा च वासुदेवस्य गरुडं पुरतो न्यसेत् । तथा महागदाश्चैव न्यसेदेवस्य दक्षिणे ।। १८६॥ ततस्तु वेदधतुषी न्यसेदेवस्य वामतः । दक्षिणे वसुधा देवो वाड्मयं तत्र विन्यसेत ॥ १८७ ॥ और गरुड बासुदेवके आगे वास करते हैं। तदनन्तर महागदा दक्षि णमें, वाममें वेद और धनुः वासुधादेवी और धर्मकी इस प्रकार चिन्ता करके न्यास करे ॥ १८६ ॥ १८७ ।। श्रीस्तु दक्षिणतः स्थाप्या पुष्टिं स्वोत्तरतो न्यसेत् । वनमःलाश्च पुरतः श्रीवत्सं कौस्तुभ ततः । विन्यसेद्धृदयादीनि विन्यसेञ्च चतुर्दिशम् ॥१८८॥ लक्ष्मीको दक्षिण दिशामें रखकर पुष्टिको अन्य दिशामें न्यास करके प्रथम वनमाला फिर श्रीवत्स कौस्तुभ और हृदयमें चारों ओर विन्यास करे ॥ १८८॥ ततोऽपि देवदेवस्य कोणेनैव तु विन्यसेत् । ईशान पूजयेत्पीठे तच्छत्तीरपि बाह्यतः ॥ १८९ ॥ तदनन्तर देवदेवको कोणमें विन्यास करके पीठेशान और उनकी सन IR को बाहिरी भागमें पूजा करके ।। १८९ ॥

. भाषाटीकासमेतम् । ग्रहांश्च दिक्पतींश्चैव दद्यात्पुष्पबलिवयम् । एवं संपूज्य देवेशं मण्डपस्थं जनार्दनम् ॥ १९ ॥ ग्रह और दिवसालोंका तीन पुष्पबलिप्रदान करे । इस प्रकार मण्डपस्थ जनार्दन देवकी पूजा करनेपर मनुष्यगण अभिलषित कामनाको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नही ।। १९० ॥ अनेनेव विधानेन मण्डपस्थं हयाननम् । पश्येत्तु पूजितं यस्तु न विघ्नं विष्णुमव्ययम् ॥ १९१ ॥ जो मनुष्य इस प्रकारके विधानसे मण्डलस्य अन्यय विष्णु हयग्रीव देवकी पूजा और उनका दर्शन करताहै, उसको कोई विघ्न नही होता ॥ १९१ ॥ सकृदयचितो येन विधिनानेन केशवः । जन्ममृत्युजराभीतः सः विष्णोः पदमाप्नुयात् १९२ इस विधानद्वारा केशवदेवकी केवल एकहीवार पूजा करनेसे यह मनुष्य जन्म जरा (बुढापा) और मृत्युको भयसे हीन होकर विष्णु के पदको प्राप्त होता है ॥ १९२ ॥ यः स्मरेत्सततं भक्त्या हयग्रीवमतन्द्रिनः। द्वे सन्ध्ये अन्वहं तस्य श्वेतद्वीपः प्रकल्पितः ॥१९३|| जो मनुष्य भक्तिमान् और सावधान होकर सदा हयग्रीव देवको स्मरण करता है मैं उसके लिये दो संख्याको चिन्ता करके 'श्वेतद्वीप निर्माणकर रखता हूं ॥ १९३ ।। ॐकारादिसमायुक्तो नमस्कार प्रदीपितः । सारश्च सर्वतत्त्वानां मन्त्र इत्यभिधीयते ।। १९४ ।। जो ओंकारादिसंयुक्त, नमस्कारादियुक्त, सन तत्वोंका सार हो उसीको मंत्र कहाजाता है ॥ १९४ ।।

- भापाटीकासमतेम् । (५०३) जिनकी अनन्त मूर्ति हैं, जिनका चित अतिशय निर्मल है जिनकी भुजा सहस्र हैं स्वयं विधाता और सहस्रों किरणों के धारण करनेवाले हैं सुन्दर मूर्ति ऐसे हयग्रीवको मै प्रणाम करताहू ॥ २०१॥ विशालदेहाय विशुद्रकर्मणे समस्तविश्वातिहराय शम्भवे । नमोस्तु सूर्यानलतीक्ष्णतेजसे हयास्यरूपाय नमो नमस्ते ॥ २०२॥ हे विशालदेह ! हे विशुद्धकर्मन् ! हे समस्त विश्वका दुःख हरनेवाले ! हे शंभो ! हे सूर्याग्निके समान तीक्ष्ण तेजवाले ! हे हयास्य रूप ! मै तुमको वारम्वार नमस्कार करताहूं ॥ २०२ ॥ अनादिदेवाचलशेखर प्रभो नमो विभो भूतपते महेश्वर । मरुत्पते सर्वपते जगत्पते नमोनमस्तेभगवन्महेश्वर २०३ 1. हे अनादिदेव ! हे अचलशेखर ! हे प्रभो ! हे भूतपते ! हे विभो ! हे महेश्वर ! हे मरुत्पते ! हे सर्वपते हे जगत्पते ! हे भगवन् ! हे महेश्वर ! मै तुमको निरन्तर नमस्कार करता हूं ॥ २०३ ।। जलेश नारायण विश्वशङ्कर क्षितीश विश्वेश्वर विश्वलोचन । शशाङ्कसूर्यायतविश्वमूर्तये हयास्यरूपाय नमो नमस्ते ॥ २०४ ॥ हे जलेश! नारायण ! हे विश्वके कल्याणकर्ता ! हे क्षितीश ! हे विश्वेश्वर ! हे विश्वलोचन ! हे शशाक सूर्य समायतमूर्ते ! हे यास्यरूप ! मैं तुमको वारम्वार प्रणाम करता हूं ।। २०४ ॥ श्वेताय भक्ताभयकारणाय विद्याक्षिणे चैव चतुर्भुजाय । लोहित्यक विवुधेश्वराय तुरङ्गकण्ठाय नमो नमस्ते२१५ - 1 योगिनीतन्त्रम् । अनेनैव विधानेन मण्डपस्थं हयाननम् । पूजयित्वा तु देवेशि गन्धं पुष्पं निवेदयेत् ।। १९५ ॥ हे देवेशि ! इस विधानसेही गंध पुष्प प्रदानपूर्वक यथोक्तकमसे मण्डपस्थ हयानन देवकी पूजा करे ॥ १९५ ॥ एवमस्य प्रकुर्वीत यथोद्दिष्टक्रमण तु। मुद्रा तत्र निवनीयाद्यथोक्तक्रमयोगतः॥ १९६ ।। जपञ्चैव प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् । अष्टाविंशतिरष्टौ वाथाष्टोत्तरशतं तथा ॥ १९७ ।। तदनन्तर कहे हुए क्रमसे मुद्रावधन और मूल मत्रसे जप करना चाहिये आठ, अट्ठाईस वा एकसौ आठमार ॥ १९६ ॥ १९७ ।। काम्ये चैवाधिकं कुर्यालक्षकोट्यधिक प्रिये । श्रीवत्सं पद्मशझेच गदा गरुतमेव च ॥ १९८ ॥ चक्र चन्द्र च शाईच ह्यष्टौ मुद्राः प्रकीर्तिताः। अर्चनीयं न जानन्ति हरमन्त्रान् यथोदितान् ।।१९९॥ हिरण्यगर्भमन्त्रेण पूजयेत्परमेश्वरम् । वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण परमेशं समर्चयेत् ॥ २००॥ और काम्यकर्ममें लक्षजप, करोड नप करना चाहिये। हे प्यारी ! पम, चक्र, श्रीवत्स, गदा, गरड, चद्र, शंख और शारंग यह आठ प्रकारकी मुद्रा जाननी चाहिये। यदि कोई अर्चनाका मंत्र नहीं जानता हो तो यह 'दिसण्यगर्भ इस मंत्रसे परमेश्वरको पूजा करे वृक्ष्यमाण मंत्रसे परमेश्वरकी अर्चना करनी चाहिये ॥ १९८ ॥ १९९ ॥ २०० ॥ नमोऽस्त्वनन्ताय विशुद्धचतसे नमःस्वरूपाय सहस्रबाहवे । सदसरदिमप्रवणाय वेधसे हयास्यरूपाय नमो नमस्ते॥२०१ भाषाटीकासमतेम् । (५०३) जिनकी अनन्त मूर्ति हैं, जिनका चित्त अतिशय निर्मल है जिनकी भुजा सहस्र हे स्वय विधाता और सहस्रो किरणों के धारण करनेवाले हैं सुन्दर मूर्ति ऐसे हयग्रीवको मै प्रणाम करताहू ।। २०१॥ विशालदेहाय विशुद्रकर्मणे समस्तविश्वातिहराय शम्भवे । नमोऽस्तु सूर्यानलतीक्ष्णतेजसे हयास्यरूपाय नमो नमस्ते ।। २०२ ॥ है विशालदेह ! हे विशुद्धकर्मन् ! हे समस्त विश्वका दुख हरनेवाले ! हे शभो ! हे सूर्यामिके समान तीक्ष्ण तेजपाले ! हे हयास्य रूप ! मे तुमको वारम्वार नमस्कार करताहू ॥ २०२ ॥ अनादिदेवाचलशेखर प्रभो नमो विमो भूतपते महेश्वर । मरुत्पते सर्वपते जगत्पते नमो नमरतेभगवन्महेश्वर ००३ हे अनादिदव ! हे अचलशेखर ! हे प्रभो । हे भूतपते ! हे विमो । हे महेश्वर ! हे महत्पते ! हे सर्वपते हे जगत्पते ! हे भगवन् । हे महेश्वर । मै तुमको निरन्तर नमस्कार करता ह ॥ २०३ ॥ जलेश नारायण विश्वशङ्कर क्षितीश विश्वेश्वर विश्वलोचन । शशाङ्कसूर्यायतविश्वमूर्तये हयास्यरूपाय नमो नमस्ते ॥ २०४ ॥ हे जलेश ! नारायण ! है विश्वके कल्याणकर्ता ! है क्षितीश । हे विश्वेश्वर ! हे विश्वलोचन : हे शशाफ सूर्य समायतमतें । हे हयास्यरूप । मैं तुमको वारम्बार प्रणाम करता ।। २०४ ॥ श्वेताय भक्ताभयकारणाय विद्याक्षिणे चैव चतुर्भुजाय । लोदित्यक विबुधेश्वराय तुरङ्गकण्ठाय नमो नमस्ते२०५ ।

(५०२) योगिनीतन्त्रम् । अनेनैव विधानेन मण्डपस्थं हयाननम् । पूजयित्वा तु देवेशि गन्धं पुष्पं निवेदयेत् ॥ १९५ ॥ हे देवेशि ! इस विधानसेही गंध पुष्प प्रदानपूर्वक यथोक्तकमसे मण्डपस्थ ह्यानन देवकी पूजा करे ॥ १९५ ॥ एवमस्य प्रकुर्वीत यथोद्दिष्टक्रमण तु। मुद्रा तत्र निबधीयाद्यथोक्तक्रमयोगतः ॥ १९६॥ जपश्चैव प्रकुर्वीत मूलमन्त्रण मन्त्रवित् । अष्टाविंशतिरष्टौ वाथाष्टोत्तरशतं तथा ।। १९७ ॥ तदनन्तर कहे हुए क्रमसे मुद्राबंधन और मूल मत्रसे जप करना चाहिये आठ, अट्ठाईस वा एकसौ आठवार || १९६ ॥ १९७ ॥ काम्ये चैवाधिक कुर्याल्लक्षकोट्यधिक प्रिये । श्रीवत्सं पद्मशङ्केच गदा गरूडमेव च ॥ १९८ ।। चक्रं चन्द्रं च शाईच ह्यष्टौ मुद्राः प्रकीर्तिताः। अर्चनीयं न जानन्ति हरेमन्त्रान् यथोदितान् ।।१९९॥ हिरण्यगर्भमन्त्रेण पूजयेत्परमेश्वरम् । वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण परमेशं समर्चयेत् ॥ २० ॥ और काम्यकर्ममें लक्षजप, करोड जप करना चाहिये। हे प्यारी ! पद्म, चक्र, श्रीवत्स, गदा, गरड, चंद्र, शख और शारंग यह आठ प्रकारकी मुद्रा जाननी चाहिये। यदि कोई अर्चनाका मंत्र नहीं जानता हो तो वह 'हिरण्यगर्भः इस मंत्रसे परमेश्वरकी पूजा करे वक्ष्यमाण मंत्रसे परमेश्वरकी अर्चना करनी चाहिये । १९८ ॥ १९९ ॥ २० ॥ नमोऽस्त्वनन्ताय विशुद्रचेतसे नमःस्वरूपाय सहस्रबाहवे। सहस्रारदिमप्रवणाय वेधसे दयास्यरूपाय नमो नमस्ते॥२०१ भाषाटीकासमतेम् । (५०३) जिनकी अनन्त मूर्ति हैं, जिनका चित्त अतिशय निर्मल है जिनकी भुजा सहस्र हैं स्वयं विधाता और सहस्रों किरणों के धारण करनेवाले हैं मुन्दर मूर्ति ऐसे हयग्रीवको मैं प्रणाम करताहू ॥ २०१॥ विशालदेहाय विशुद्रकर्मणे समस्तविश्वातिहराय शम्भवे । नमोऽस्तु सूर्यानलतीक्ष्णतेजसे हयास्यरूपाय नमो नमस्ते ॥ २०२ ॥ है विशालदेह ! हे विशुद्धकर्मन् ! हे समस्त विश्वका दुःख हरनेवाले ! हे शंभो । हे सूर्याग्निके समान तीक्ष्ण तेजवाले ! हे हयास्य रूप ! मे तुमको वारम्वार नमस्कार करताहू ॥ २०२ ॥ अनादिदेवाचलशेखर प्रभो नमो विभो भूतपते महेश्वर । मरुत्पते सर्वपते जगत्पते नमो नमस्तेभगवन्महेश्वर २०३ हे अनादिदेव 1 हे अचलशेखर ! हे प्रभो ! हे भूतपते ! हे विभो ! हे महेश्वर ! हे मरुत्पते ! हे सर्वपते हे जगत्पते ! हे भगवन् ! हे महेश्वर ! मै तुमको निरन्तर नमस्कार करता हूं ॥ २०३ ॥ जलेश नारायण विश्वशङ्कर क्षितीश विश्वेश्वर विश्वलोचन । शशाङ्कसूर्यायतविश्वमूर्तये यास्यरूपाय नमो नमस्ते ॥ २०१ ॥ है जलेश! नारायण ! हे विश्वके कल्याणकर्ता ! हे क्षिता ! ह विश्वेश्वर ! हे विश्वमोचन ! हे शशाक सूर्य समायतमूत ! हे हयाभ्यरूप ! मैं तुमको वारम्बार प्रणाम करता हूं ॥ २०४ ॥ श्वेताय भक्ताभयकारणाय विद्याक्षिणे चैव चतुर्भुजाय । लोहित्यक विबुधेश्वराय तुरङ्गकण्ठाय नमो नमस्ते२१५ (५०४) योगिनीतन्त्रम् । हे श्वेतरूप ! हे भक्तों को अभय दान देनेवाले ! हे लोहित्यकारी ! हे समस्त देवताओंके अधीश्वर ! हे हयग्रीव ! मै तुमको वारम्वार प्रणाम करता हु ॥२०॥ शक्राय चैव मणिपर्वतमन्दिराय पीताक्षपक्षिसहिताय च मुक्तिदाय । भक्तोस्मि ते पुस्तकधारिणेऽह पितसमभ्युद्धर देवदेव ॥ २०६ ।। शकके निमित्त मणिपर्वतमें मन्दिर करनेपालेके निमित्त पीताक्ष पक्षिसे सहितके निमिन मुक्तिदाताके निमित्त पुस्तकधारिके निमित्त नमस्कार है. हे पितरोंके उद्धार करने वाले ! देवदेव मैं आपका एकान्त भक्त हूं मेरे पितरोंका उद्धार करो ( मै तुमको प्रणाम करता हूं)। २०६ ॥ शुद्धाय मुक्तादिविभूषिताय प्रलम्बयाहे कमलासनाय । ततो घनाशाय पुरांतकाय हयास्यरूपाय नमोनमस्ते२०७ हे शुद्ध ! हे मुक्त ! हे, मणिरंजित ! हे प्रलम्बवाहो ! हे कमलासन ! हे पापों का नाश करनेवाले ! हे पुरघातक ! हे हयास्यरूप ! मैं तुमको वारम्पार प्रणाम करता हूं ॥ २०७ ॥ जयति वरदपाशः पुस्तकव्यस्तहस्तो विधृततिससरोजो मोक्षदोनन्तमूर्तिः। शशधरशुभमूर्तिर्भुक्तिमुक्तिप्रदायी प्रणतसुरनरेभ्यो वाजिवको मुरारिः॥२०८।। जिनके समस्त हाथ पाश पुस्तक ग्रहण वरदेने सितसरोजधारण और मोक्ष देनेमें व्यग्र रहते हैं। जिनकी मंगलमय मूर्ति चन्द्रमाके सदृश है। जो भोग मोक्ष देते हैं । जिनको सुरनरादिक सभी प्रणाम करते हैं उन वाजिवक्त्र मुरारिकी जय हो ॥२०८॥ -

भापाटीकासमेतम् । (५०५)
इडासुर हयग्रीव मुरारे मधुसूदन ।
मणिकूटकृतावास हयग्रीव नमोऽस्तु ते ।। २०९।।
हे इडासुर ! हे हयग्रीव ! हे मुरारे ! हे मधुसूदन ! हे मणिकूटमें
वास करनेवाले ! हे हयग्रीव ! मै तुमको नमस्कार करता हूं ॥ २०९ ॥
जन्मकोटिकृतं पापं कल्पकोटिकृतं तथा ।
हयास्यदर्शनादेव नेयाद्भास्करजाद्भयम् ॥ २१० ॥
सैकड़ों करोड कल्प और करोड जन्ममें किये समस्त पापोंसेही मे
हयग्रीवका दर्शन करके छूट गया अब मैं सूर्यपुत्र शनैश्वरका भय नहीं
करता ॥ २१० ॥
स्तुतेः पाठं सप्तवारं पठित्वा तत्र भक्तितः।
प्रदक्षिणात्रयं कुर्यात्पद्माकारं नमेत्ततः ।। २११ ।।
हे देवि । यह स्तोत्र सातबार पढने के पीछे तीन बार प्रदक्षिणा करके
पमाकारको प्रणाम करे ॥ २११ ॥
दक्षिणादुत्तरं गत्वा देवस्य च महेश्वरि ।
हस्तांजलिं ततो बद्धा भ्रामयित्वा नमेत्ततः॥२१२ ॥
हे महेश्वार ! दक्षिणसे जाकर हाथ जोड भमगपूर्वक नमस्कार करना
चाहिये ।। २१२ ॥
प्रत्येक प्रणमेदेवि दण्डवत्प्रणिपातयेत् ।
न यो नमेद्रमित्वा च ह्यपराधो भवेत्तदा ॥ २१३ ।।
हे देवि ! प्रत्येकमणाममें दण्डवत् प्रणिपात करे । जो मनुष्य भमण
करता हुआ प्रणाम नहीं करता है, उससे अपराध होता है ॥ २१३ ॥
अवद्धाञ्जलिना यस्तु नमस्कारं करोति सः।
मोहान्धकारनरके पच्यते नात्र संशयः ॥ २१४ ॥

(५०६) योगिनीतन्त्रम्। जो मनुष्य विना हाथजोडे प्रणाम करता है, वह घोरतर मोहान्यनर- कमें गिरकर दुःख भोगता है इसमें सन्देह नहीं ॥ २१४ ॥ पत्रान्तरे च प्रणमेनमूर्धा न च क्षिति स्पृशेत् । शपन्ति देवतास्तस्य विफलं परिकीर्तितम् ।। २१५ ॥ जो मनुष्य मस्तकसे पृथ्वीका विना स्पर्श किये पत्रान्तरमें (किसी आव- रणके ऊपर ) प्रणाम करता है, देवता उसको शाप देते हैं और उसका सब कुछ निष्फल होता है ॥ २१५ ॥ प्रणामो देवदेवस्य यावत्यो मूर्तिकाः प्रिये । शरीरे वा महेशानि तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २१६ ॥ हे प्यारी महेशानि ! वहा देवदेवकी जितनी मूर्ति हैं, उनको प्रणाम करनेसे लो पुण्यफल होता है, सो सुनो ॥ २१६ ॥ यावन्तो रेणवस्तस्य यावतिष्ठति तत्र वै। , तावद्वर्षसहस्राणि ब्रह्मलोके महीयते ॥ २१७ ॥ उसका परिमाण यह है कि, रेणु जितने काल अवस्थित होते हैं, उत- नेही सहसतक वह बमोफमें जाकर ऐश्वर्य भोगता है ॥ २१७ ।।

भापाटीकासमेतम् ।
(५०७)
श्रीमगवान् बोले- हे महाभागे देवि ! वेदसन्निभ आगम स्वरूप प्रति-
सम्भवशास्त्रद्वारा प्रतिष्ठापित अर्थात् शास्त्रोंका सिद्धान्त प्राचीन वृत्तान्त
कहता हूं सुनो ॥२१९॥
प्रवृत्ते च महायज्ञे प्रासादे देवनिर्मिते ।
चिन्तयात्तों महीपाल प्रतिमार्थमहनिशम् ॥ २२० ।।
देवनिर्मित प्रासादमें यज्ञके आरम्भ होनेपर महीपाल प्रतिमाके लिये
दिन रात चिन्ता करने लगे ॥ २२० ॥
केनोपायेन देवेशं सर्वेश लोकपावनम् ।
सर्गस्थित्यन्तकर्तारं पश्यामि पुरुषोत्तमम् ॥ २२१ ।।
महाराज इन्द्रद्युम्नने मनमें विचारा कि, मैं किस उपायसे उन देवे.
श्वर सर्वेश्वर लोकपावन सृष्टि स्थिति सहारकारी पुरुषोत्तमका दर्शन
पाऊंगा? ॥२२१॥
चिन्तादुःखमयो राजा न शेते स्म दिवानिशम् ।
नभुङ्क्ते विविधान्भोगान च स्नानं प्रसाधनम्।२२२॥
इस प्रकार चिन्ताकुल राजाने दिनरात शयन विविधभोगोंका भोगना
भोजन स्नान और मण्डन प्रसाधनादि (अलंकारको किया ) छोड़कर
चिता करी ॥ २२२ ।।
शैलशृङ्गस्तीपि प्रशस्तो वा महीतले ।
विष्णोः प्रतिमयोग्याय सर्वलक्षणलक्षितः॥ २२३ ।।
कि, पर्वतका शृंग हो वा वृक्षही हो विष्णुको प्रतिमाके निमित्त पृथ्वी
तलमें जो सर्वलक्षणसम्पन्न और प्रशस्त होगा ।। २२३ ।।
एतैरेव प्रमाणन्तु दयितं यत्तुरार्चनम् ।
तत्केन वा करिष्यामि चाज्ञापयतु मे प्रभो ॥२२॥

(५०८) योगिनीतन्त्रम्। वहीं देवपूजामें प्रिय और प्रमाणसिद्ध होगा. वह मै किस प्रकार सम्पादन करूंगा प्रभु मुझको आजा दीजिये ॥ २२४ ।। कुशानास्तीर्य सुप्त्वा च इन्द्रद्युम्नो महाबलः । हरिध्यानपरो भूत्वा सुवाप नियतेन्द्रियः॥ २२५ ।। यह विचार महागल इन्द्रद्युम्न कुश निकाय नियतंद्रिय और हरिके ध्यानमें रत होकर सोगये ।। २२५ ॥ सुप्तस्य तस्य नृपतेर्वासुदेवो जगद्गुरुः। आत्मानं दर्शयामास सुप्ते तस्मै च चक्रभृत् ॥२२६॥ राजाके सोजानेपर जगद्गुरु चक्रधारी वासुदेवने उनको दर्शन दिया२२६ भाषाटीकासमेतम् । (५०९) हे राजन् ! हे धीर! इस स्थानमें जो जगत्पूज्य सनातनी प्रतिमा स्थापन करोगे, उसका उपाय मैं तुमसे कहता हूं सुनो ।। २३० ॥ सागरस्य जलस्यान्ते नानाद्मविभूषिते । वीचीभिहन्यमानस्तु न चासो कम्पते द्रुमः ॥२३१॥ सागरके नानाद्रुमविभूषित जलान्तभागमें तरंगोंके द्वारा हन्यमान होकर भी जो वृक्ष कम्पित न हो ।। २३१ ।। गत्वा परशुहस्तश्च ऊम्मिमन्तं ततो व्रजेत् । एकाकी विरही राजन्सत्यं पश्यसि पादपम् ॥२३२॥ हे राजन् ! तुम अगेले वेगसे विचरण करते करते परशु हाथमें लिये अमिमान् समुद्रतटपर जाकर निःसन्देह वृक्ष देखोगे ।। २३२ ।। इति कश्चित्समालोच्य छेदयन्नविशङ्कितः। पश्चिमायतनं वृक्ष प्रातरद्भुतदर्शनम् । छित्वा तैलरसं दत्त्वा तदा भूपाल चानय ॥ २३३ ॥ कुरु तत्प्रतिमां दिव्यां जहि चिन्तां विमोहिनीम् । एवमुक्त्वा महाबाहुरंतर्धानं गतो हरिः ॥ २३४ ॥ तुम मेरे वचनकी आलोचना कर निसंग हो, पश्चिमायतन (जो पश्चि- ममें स्थित हो) वह अद्भुत दर्शनवृक्ष प्रातःकालमें छेदन करके लाओ. फिर तेलरसप्रदानपूर्वक उसको लाकर उसके द्वारा दिव्यप्रतिमा निर्माण करो । अब तुम विमोहिनी चिन्ता मत करो। यह कहकर महाबाहु हरि अन्त. र्धान होगये ॥ २३३ ।। २३४ ॥ स चापि स्वप्नमालोच्य पर विस्मयमागतः। तां दिशं समुदीक्ष्यैव स्थितस्तद्गतमानसः ।। २३५॥ व्याहरन्वैष्णवं मन्त्रमुक्तश्चैव तदात्मकम् ।

(५१०)
योगिनीतन्त्रम् ।
प्रभातायां रजन्यां तु स ततोनन्यमानसः ॥२३॥
स स्नात्वा सागरे रम्ये यथाविधि महायशा ।
तं ददर्श महावृक्षं परं तेजस्विनं द्रुमम् ॥ २३७ ।।
मोहान्तकं दुरारोहं पुण्यं विफलमेव च ।
महोच्छायं महाकायं प्रसुप्तश्च जलान्तिके ॥ २३८ ॥

.
(५१०) योगिनीतन्त्रम् ।
प्रभातायर्या रजन्यां तु स ततोनन्यमानसः ॥२३६।।
स स्नात्वा सागरे रम्ये यथाविधि महायशाः ।
तं ददर्श महावृक्षं परं तेजस्विनं दुमम् ॥ २३७ ।।
मोहान्तकं दुरारोहं पुण्यं विफलमेव च ।
महोच्छ्रायं महाकायं प्रसुप्तश्च जलान्तिके ॥ २३८॥
फिर वह राजामी स्वप्नकी आलोचना करके विस्मित हुआ। फिर वह
एकाग्रचित्तसे तदात्मक वैष्णवमंत्र उच्चारणपूर्वक उसी दिशाको देखता
रहा । रात्रि बीतकर प्रभात होनेपर अनन्यमन उस राजाने मनोहर समु.
द्रके तटपर जाय नलान्तिकमें प्रसुप्त तेजस्वी, मोहान्तक; दुरारोह पुण्य-
विफल, महाकाय महोच्च उसी महावृक्षको देखा ॥ २३५ ॥ २३८ ॥
नीलरत्नाध्यवर्णाभं नामजातिविवर्जितम् ।
नरराजस्तथा विष्णोर्दुमं दृष्ट्वा मुदान्वितः ॥ २३९॥
यह वृक्ष नीलोज्ज्वलवर्ण और नाम जाति वर्जित है. नरराज इन्द्रद्युम्न
विष्णुका यह वृक्ष देखकर प्रसन्न हुए ॥ २३९ ॥
चिच्छेदासौ परशुमा निशातन तदेव हि ।
सप्तधा द्रुमराजं तं पातयामास भूतले ॥२४० ॥
और परशुसे काट उस द्रुमराजको सात खंडमें विभक्त करके भूमिमें
गिरादिया ॥ २४० ॥
ओदशे मूलभागं कल्पयामास वै विभुः ।
तदूर्द्धखण्ड काश्मीरे कबन्धाकारमेव च ।। २४१ ॥
आदित्यं तं विजानीयाद्रामण स्थापितं पुरा।
शोणादित्यं तदूर्वानं शुक्रेण स्थापितं प्रिये ॥२४॥

भापाटीकासमेतम।
देवदेव विभुने ओड्देशमें उसके मूलकी कल्पना करके वहां मूर्तिस्था-
पन करी । उसका ऊर्वखंड कबन्धाकार था, रामने उसको काश्मीरदेशमें
आदित्यरूपसे स्थापित किया ! हे प्यारी ! उसका अर्वभाग शुककर्तृक
शोणादित्यरूपमें स्थापित हुआ है ॥ २४१ ॥ २४२ ॥
शिलारूपं महेशानि स्थापितं गुरुणा ततः।
भागद्वयं कामरूपे भागे मलये गिरी ।। २४३ ॥
हे महेशानि ! तदूर्व भाग गुरुको कर्तृकशिलारूपमें स्थापित हुआ-
उसके दो ऊर्ध्व भाग 'कामरूपमें, उसके पीछेका एक भाग मलय
गिरिमें ॥ २४३ ॥
मणिकूटे ततोर्द्धश्च स्थापितं वरुणेन हि ।
प्राच्यां नन्दीशमैशान्ये मत्स्याक्षो नाम माधवः २४४
शिलामयो दारुमयः कुबेरेणैव स्थापितः।
महावराहनामा च योऽष्टादशभुजेर्युतः ॥२४५ ॥
तदूर्वभाग वरुणने पूर्वदिशामें मणिकुटमें नन्दीशरूपसे स्थापन किया ।
ईशानकोणमें कुबेरने 'मत्स्याक्षनामक शिलामय दारु (काछ) मय माधवको
स्थापित किया । महावराहनामक और अठारह भुजा युक्त॥२४४॥२४५||
हयाख्यो मणिकूटे च माधवाख्यो व्यवस्थितः ।
सम्भवः कथितो देवि प्रापणं शृणु पार्वति ॥ २४६ ॥
मणिकूट में हयाख्य और मानव नामक विभु अवस्थित है । हे देवि !
संभव अर्थात् उत्पत्ति कहीगई है । अब प्रापण अर्थात् उपहार द्रव्य
सुनो ॥ २४६ ॥
इगुदीफलविल्वानि बदरामलकानि च ।
खजूरै पनसश्चैव तथा तालफलानि च ॥ २४७ ॥

(५१२) योगिनीतन्त्रम् । ' इगुदी फल (जियापोता या हिंगोट) वेल • बदर (वेर) आमला खजूर पनस तालफल ॥ २४७ ॥ दाडिमं कदलींचैव प्रयत्नेन नियोजयेत् । लकुचं मधुकं युक्तं तथा पूगफलानि च । वीरपूरश्च मधुरं कर्कन्धूश्च निवेदयेत् ॥ २४८ ॥ दाडिम और कदली यत्नपूर्वक नियोजित करे, लकुच (बडहल अथवा उचकुच) मधुक ( महुआ ) सुपारी विजोरानीबू मधुर और फर्कन्धू उन्नाव या छोटावर) निवेदन करे ।। २४८ ।। मूलकस्य च शाकञ्चराजकस्य तथैव च । फलं यस्य विशालश्च तस्य शाकं प्ररोहकम्॥२४९॥ मूलीका शाक राजकशाक जिसका फल बढा हो उसका शाक और लिका (कली) [ २४९ ॥ वास्तुकस्य च शाकञ्च पालङ्गस्य मम प्रिये । विलयानि प्रियाण्यन्यान्यथो वे तिन्तिडीफलम्।।२५० वास्तुकशाक (बथुआ ) पलङ्गशाक तिन्तिडीफल अर्थात् इमली॥२५० कूष्माण्डं पार्वतीयश्च तथा चारणसम्भवम् । कदलं वरिपूरच रामक पौत्र तथा । अकालपनसश्चैव तथान्यदपि वर्जयेत् ॥ २५१ ॥ पार्वतीय कूष्माण्ड (पेठा) चारणसम्भव कदल (फल विशेष ) जोर मोरानीवू रामक (कूठ) और पौत्रिक ( कौरामक्सीका शहद ) अकाल नस ( वडहल ) इस प्रकार अन्यान्य फल वर्जनीय हैं ।। २५१ ॥

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भाषाीकासमेतम् ।
धान्यानाञ्च प्रवक्ष्यामि उपयोगांश्च शाङ्करि ।
एकचित्तं समाधाय प्रापणं शृणु पार्वति ।। २५२ ॥
हे शाकार ! अब धान्योंका प्रयोग कहताह. एकाग्रचित्तसे सुनो २५
सोमधान्यं बृहद्धान्यं रक्तशालिकमेव च ।
राजधान्यं षष्ठिकश्च देववल्लभकं तथा ॥ २५३ ॥
सोमधान्य (समा) बृहद्धान्य लाल सट्ठी, राजधान्य (श्यामाक
पष्ठिक (सट्टो) देववल्लभ ॥ २५३ ॥
चणकं कोद्रवश्चैव वर्जयेन्मम सुन्दरि ।
क्षारश्च कृष्णक्षीरश्च वर्ण वै मार्तिकोद्भवम् ॥ २५४ ।।
चना, कोदों यह सब धान्य वर्जित हैं। हे सुन्दरि ! क्षार कृष्णक्षी
मूर्तिकोद्भववर्ण ॥ २५४ ॥
लवणं प्राचि सम्भूतं तथोत्तरसमुद्भवम् ।
पशूनाश्च प्रवक्ष्यामि वन्यानां ग्रामवासिनाम् ॥२५५॥
वर्णक प्राच्य और उत्तरसम्भूत लवण (खारी अथवा नमक जो
खानिज नहीं है) को प्रयोग न करे। अब ग्राम और वनके पशुओंका
प्रयोग कहताहूं सुनो ॥ २५५॥
येन यान्युपभोग्यानि यव्यं देवि पयोमृतम् ।
मार्ग मात्स्यं तथा छागं शालन शाशकं तथा।।२५६॥
पतैस्तु प्रापणं दद्याद्विष्णोश्चैव प्रियकरम् ।
माहिष वर्जयन्मांसं क्षीरं दधि वृत्तं तथा ॥ २५७ ॥
गायका दूध, मृग, मत्स्य, छाग, शालन (एक प्रकारको मछलीका ।
मांस ), खरगोशमा मासप्रदान करनेसे विष्णु प्रसन्न होते है । महियमांस,
दूध, दही और घृत वर्जित है ॥२५६ ॥२५७ ॥

योगिनीतन्त्रम् ।
पाक्षिणात्र प्रवक्ष्यामि ये प्रयोच्या मम प्रिये ।
हारितञ्च मयूरं च नायक वार्तकं तथा ॥ २५८ ।।
कपिलश्चैव चापश्च काककुक्कुटको शिरः।
वन्यकुक्कुट कश्चैव शरारूश्व कपोनकः ॥ २५९ ॥
पक्षिगणोंमें जो प्रयोज्य हैं । सो कहताहं, सुनो । हारीत ( हरियल)
मोर नायक (पक्षिविशेप) वत्तक कपिल (पीली) चाष नीलकण्ठ या
(खुटवडई) काक कुक्कुट (मुर्गा ) शिर वन्यकुक्कुट शरा कपोतक
(जंगली कबूतर अथवा पंडाफता) ॥ २५८ ॥ २५९ ॥
बिल्वका कुलिकश्चैव रक्तपुच्छश्च टिटिभः ।
कृष्णमत्स्याशनं चैव पत्रिणां च विशिप्यते ॥२६॥
बिल्वक, कुलिक, रक्तपुच्छक, टिट्टिम, कृष्णमत्स्याशन गह सब
पक्षियोंमें श्रेष्ठ है ।। २६० ॥
अभक्ष्यश्चैव मांसश्च यद्वा पश्चनखस्य च ।
चित्रमत्स्य रोहितश्च मांसकं च विवर्जयेन ॥२६१ ।।
अमक्ष्य पंचनखमास, चित्रमत्स्य, रोहितमास यह सब वर्जित हैं।२६१
महाशल्यश्च राजोव सिंह महेश्वरि ।
मात्स्यान्येतानि देयानि विमालीश्च विवर्जयेत॥२६२
जालपादाश्च सकुलान्देवि वाराहकं तथा ।
कौसु-नशाकं पिण्या रक्तपादाश्च केसरान्।।२६३॥
महाशल्य ( मेंडक ) राजीव सारस और सिंह क देना चाहिये ।
विभाली, जलपाद (हंस) शउल मउली, और वाराहक नहीं
देवे। साधकोत्तम कौसुन्तशाक ( शाक विशेष ) खजूर रक्तपाद
केशर ॥ २२२ ॥ २६३ ॥

भापाटीकासमेतम् ।
शोभाञ्जनं रक्तशलं कौमुकं तिन्दुकं तथा ।
पूतिकं कानकञ्चैव वर्जयेत्साधकोत्तमः ॥ २६४ ॥
सहजना, रक्तगेलु, केंद,, तेंदुआ, पूतिक और कानक त्यागदै ॥२६४
यथोक्तं साधयेन्मत्रं योगी ध्यानपरायणः ।
अभक्ष्यं वर्जयेत्सर्व देवताध्यानसाधने ॥ २६५ ।।
योगी जन ध्यानपरायण होकर सन देवताओंके साधनमें अमश्य-
त्यागपूर्वक ।। २६५॥
हविष्याशी शुचिभूर्वा मन्त्रतन्त्रविशारदः।
अहर्निशं जपेद्विद्यातद्गतेनान्तरात्मना ॥ २६६ ॥
हविष्याशी, पवित्र और मंत्रतंत्रविशारद हो अन्तरात्माके सहित
एकाग्रचितसे रात दिन विद्याका जप करे ॥ २६६ ॥
स भवत्कालिकापुत्रः सर्वतो निर्भयो भवेत् ।
रहरयं परमं देवि तव स्नेहात्प्रकाशितम् ।। २६७ ॥
तो वह मनुष्य कालिकाका पुत्र और सर्वत्र निर्भय होता है। हे देवि !
यह मैने तुम्हारे प्रति सेहके कारण रहस्य प्रकाशित किया ।। २६७ ॥
इति श्रीयोगिनीतन्त्र सर्वत जोत्तमोत्तमे देवीश्वरसम्वादे चतुविशतिसा-
हसे द्वितीयमागे मुरादाबाद निवासी-कान्यकुब्जकुल
कमर दिवाकरभुवनविरयातस्वर्गीयमिश्रसुखानन्द
सूरिसूनुपण्डितकन्हैयालाल कृत भाषाटीका
रममम पिटर ...
कार्तिक शुक्लपक्षे तु नवबाणांकभूमित (संवत १९५९)
वर्षे विक्रमभुपस्प त्रयोदश्यां गुरोदिने ॥ १ ॥

योगिनीतन्त्रम् । कन्हैयालालमित्रो के योनिनीत्याख्यतन्त्रके । तान्त्रिकाणां प्रमोदाय भापोटीका व्यधामहम् ॥२॥ नराणामल्पविषया मतिर्भवति सुस्फुटम् । अतोत्र स्खलनं यत्स्यात्तत्क्षन्तव्यं सुहजनः ॥३॥ गूढभावसमायुक्तं तन्वमेतत्सुदुर्लभम् । परोपकारिण श्रीम.क्षेमराजक्षितिस्पृशे ॥४॥ मुद्रणार्थ समूल्यं च विक्रयार्थ समर्पितम् । ईश्वरश्चानुकूल्यं च भजत्विति शिवं सदा ।। ५ ॥ श्री श्रीजगदम्बार्पणमस्तु । समाप्तोऽयं ग्रंथः।

Yogini Tantra

Author
Devadidevmahadev
Title
Yogini Tantra
File name
Yogini Tantra
Text
OCR done
Citation
1978
Published
2012/10
Publisher
Mumbay.,kalyan Gangavishnu
Language
Sanskrit
Pages
556
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313565
Barcode
99999990322240.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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