Sanmati Library, Jaipur
Prakrit-dashlakshanjaymala
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श्रीवीतरागाय नमः।
श्रीरयधु-कवि-कृत
दशलाक्षणिकधर्मजयमाला
संस्कृतपूजोष्टक और भाषानुवादसहित
.
(
VAG
प्रकाशक-श्रीजैनग्रंयरत्नाकर कार्यालय, चम्बई।
मुद्रक-"श्रीसरखती"
मुद्रणालय, बम्बई.
=
NASALARINA
आपाढ़, पीरनिर्वाणसंवत् २४४९ । ईस्वी सन् १९२३ ।
द्वितीय संस्करण १०००]
[ मूल्य पाँच माने।
NANMUNAANUMANUNUN
प्रकाशक- नाथूराम प्रेमी, जैनग्रन्यरत्नाकर कार्यालय, हाराबाग-बम्बई। , अनंत बाळकृष्ण घगवे, 'श्रीसरस्वती' मुद्रणालय, ५२४, गिरगांव-मुंबई.
कविका परिचय। दशलक्षणजयमालाके कर्तीका नाम स्यधू या रइधू है । इनके बनाये हुए आदिपुराण नामक प्रन्यसे इसी जयमालाके समान अपभ्रंश भाषामें है और जिसका मेघेश्वरचरित' नामसे उल्लेख किया गया मालूम होता है कि ये संघवीय (संघाधिप ) हरिसिंह पुत्र और देवराजके पौत्र थे- गंदउ सिरिहरिसिंघ संघाहिउ, देवराजसुउ, पवरगुणाहित । जल संताण कईसु अमच्छरू, रबधू संजायउ गुणकोच्छरु । जेण चरिउ उसहेणड केरउ, विरयउ बुहयणमुक्खजणेरउ ॥ ये माथुरसंघ पुष्करगच्छके आचार्य यशःकीर्तिके शिष्य और गुणकीर्तिके प्रशिष्य थे। इन आचार्योंकी गद्दी गोपाचल या ग्वालियरमें थी। जान पड़ता है कि उक कविवरने पीछे जिनदीक्षा ले ली थी और तव उनका नाम सिंहसेन रक्खा गया था।x आदिपुराण खेमसिंह या क्षेमराज नामक एक धनी गृहस्थके निमित्त रचा गया था। उसकी प्रत्येक सन्धिके अन्तमें आदिपुराणको महामव्वखेमसीसाहुणामंकिए ' विशेषण दिया है और एक एक संस्कृत पद्य देकर खेमसिंहका गुणकोर्तन किया गया है। यथा- सर्वज्ञपादार्चनसूरिदाने आभाति यस्यात्र सदैव भूतिः। चित्ते च विज्ञानकळावतारः सोनन्दताच्छी भुवि क्षेमराजः॥ ये क्षेमसिंह साहु जातिके अग्रवाल थे और तोमरवंशके राजा इंगरसिंहके राज्यमें निवास करते थे। इंगरसिंह ग्वालियरके राजा थे। उनकी रानीका नाम चंदादेवी और पुत्रका कीर्तिसिंह था। क्षेमसिंह xजैनहितैषी भाग १३, अंक ३ में सुहद्धर बाबू जुगलकिशोरजीने उक्त मादिपुराणका विस्तृत परि- चय दिया है और अधिकांशमें उसीके आधारसे यह लेख लिखा गया है । परन्तु उसमें जो रइधूको सिंहसेन- का बड़ा भाई बतलाया है, सो ठीक नहीं मालूम होता । हमारे खयालमें रइधू और सिंहसेन दोनों एक ही हैं।
(खेमसी, क्षेमराज और खऊसाहु) के पिताका नाम पजणसाहु, माताका वील्हाही, पितामहका पुण्यपाल और स्त्रीका धनश्री था। धनश्रीके गर्भसे उनके चार पुत्र हुए थे-सहसराज, पहराज, रतिपति और होल। ये (' चारों ही बड़े धर्मात्मा और विद्वान थे । सहसराजने गिरनारको संघ चलाया था और पहराजको राजाने उसकी बुद्धिमत्ताके कारण अपने पास रक्वा था। इन सब पुत्रोंके भी अनेक पुत्र पुत्रियाँ थीं। दशलक्षणजयमालामें उक्त खेमेराजके ही चतुर्य पुत्र होलू साहुका उल्लेख है-" भो खेमसिंहसुय भव्ववि[यजुय होलुव मण इह करहु थिरु । बहुतसे लोग इसका अर्थ 'खेमसिंहका पुत्री होली ' करते है, सो अशुद्ध है। हमने अबकी बार इस अनुवादमें उक्क संशोधन कर दिया है इनका समय विक्रमकी सोलहवीं शताब्दि है। जैनसिद्धान्तभवन भारामें 'ज्ञानार्णध ' प्रन्यकी लेखक-प्रशस्ति में लिखा है- " संवत् १५२१ वर्षे आपाढ सुदी ६ सोमवासरे श्रीगोपाचलढुंगै तोमरवंशे राजा- धिराज श्रीकीर्तिसिंह-राज्यप्रवर्तमाने श्रीकाष्ठासंघे माथुरान्वये पुष्करगणे भ० श्रीगुण- कीर्तिदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीयश-कीर्तिदेवास्तत्पट्टे भ० श्रीमलयकीर्तिदेवास्तत्पढे भ० श्रीगुणभद्रदेवास्तदाम्नाये--" इससे मालूम होता है कि१५२१में तोमरवंशी राजा कीर्तिसिंहका राज्य था और इन्हीं तोमरवंशी की. तिसिंहको आदिपुराणमें इंगरसिंहका पुत्र बतलाया है। इसमें गुणकीर्ति और यशःकीर्तिका भी उल्लेख है । अतः आविपुराण इसी समयसे कुछ पहले वना है, अतएव रइधूका भी समय यही समझना चाहिए। 'दिगम्बरजनप्रन्थकर्ता' और उनके अन्यमें रइधू कविके बनाये हुए नीचे लिखे प्रन्योंका उल्लेख है- श्रीपालचरित्र, प्रद्युम्नचरित्र, व्रतसार, कारणगुणपोदशी, दशलक्षणजयमाला, रत्नत्रयी, मेघेश्वरचरित्र (आदिपुराण), पधर्मोपदेशरत्नमाला, भविष्यदत्तचरित्र, करकंहुचरित्र । ये सब अन्य भी अपभ्रंश भाषामें ही होंगे, ऐसा जान पड़ता है। निवेदक-नाश मप्रेमी।
28 नमः सिद्धेभ्यः अथ दशलाक्षणिकधर्मपूजा श्लोक। उत्तमक्षान्तिमाद्यन्तब्रह्मचर्यसुलक्षणम् । स्थापयेद्दशधा धर्ममुत्तमं जिनभाषितम् ॥१॥ ॐ हीं उत्तमक्षमामार्दवार्जनसत्यशौचसंयमतपस्त्यागार्किचन्यब्रह्मचर्यचक्षणधर्म अत्रावतरावतर । संवौषट् । ॐ ही उत्तमक्षमामादवावसत्यशौंचसंयमतपस्त्यागाकिंच- न्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्म अत्र तिष्ठ, तिष्ठ । ठः ठः।ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशी- चसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यलक्षणधर्म अत्र पम सन्निहितो भव, भव । वषट् ।
अथाष्टकम् ।
पालेयशैलशुचिनिर्गतचारुतोयैः
शीतैः सुगन्धसहितैर्मुनिचित्ततुल्यैः ।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥१॥
ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्माय
जर्क निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
श्रीचन्दनैर्बहलकुङ्कमचन्द्रमिः
संवासवासितदिशामुखदिव्यसंस्थैः ।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥ २॥
ॐ ही, उत्तपक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यव्रह्मचर्यकक्षणधर्माय
चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥
शालीयशुद्धसरलामलपुण्यपुञ्ज
रम्यैरखण्डशशलाञ्छनरूपतुल्यैः।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥३॥
ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्माय
अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा ॥३॥
मन्दारकुन्दवकुलोत्पलपारिजातैः
पुष्पैः सुगन्धसुरभीकृतमूलोकैः ।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥ ४॥
ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्माय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४॥
अत्युत्तमै रसरसादिकसद्यजातै-
नैवेद्यचित्तपरितोषितभव्यलोकैः ।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥५॥
ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यचक्षणधर्माय
नैवेद्यं निषेपामीति स्वाहा ॥५॥
दीपैर्विनाशितसमस्ततमोवितानैः
कर्पूरवर्तिकनकोज्ज्वलभाजनस्थैः।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥६॥
ॐ हीं उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यळक्षणधर्माय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥
.
कृष्णागुरुप्रभृतिसर्वसुगन्धद्रव्यै-
धूपैस्तिरोहितदिशामुखदिव्यधूमः।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥७॥
ॐ हीं उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्माय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७॥
पूगैलवङ्गकदलीवरनालिकेरै-
«द्घाणनेत्रसुखदैः शिवदानदक्षैः।
सम्पूजयामि दशलक्षणधर्ममेकं
संसारतापहननाय क्षमादियुक्तम् ॥ ८॥
ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्मा:
य फळ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८॥
पू० द. पानीयस्वच्छहरिचन्दनपुष्पसारैः शालीयतन्दुलनिवेद्यसुचन्द्रदीपैः। धूपैः फलावलिविनिर्मितपुष्पगन्धैः पुष्पाञ्जलीभिरपि धर्ममहं समर्वे ॥९॥ ॐ ही उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशाचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्यकक्षणधर्माय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥ इति दशलक्षणधर्मपूजा समाप्ता। my
श्रीरयधु-कवि-विरचिता
दशलाक्षणिकजयमाला।
अथ उत्तमक्षमाधौगम् ।
येन केनापि दुष्टेन पीडितेनापि कुत्रचित् ।
क्षमा त्याज्या न भव्येन स्वर्गमोक्षाभिलाषिणा ॥१॥
ॐ ही उत्तमक्षमाधौगाय जलं निवपामीति स्वाहा । ॐ ही उत्तमक्षमाधर्मांगाय
गन्धम् नि । ॐ ही उत्तमक्षमाधर्मामाय अक्षतान् निः। ॐ ही उत्तमक्षमाधौगाय
पुष्पम् निः । ॐ यही उत्तमक्षमाधौगाय चरुम् नि । ॐ हीं उत्तमक्षमाधौगाय
दीपम् नि । औं ही उत्तमक्षमाधौगाय धूपम् निः । ॐ ही उत्तमक्षमाधौगाय फलम्
निः । ॐ ही उत्तमक्षमाधर्मागाय अयं निर्वपामीति स्वाहा॥१॥
ज. ४ अर्थ-कहीं पर किसीदुष्टके द्वारा पीडा होनेपर भी स्वर्ग और मोक्षके अभिलाषी भन्यजीवको क्षमाका त्याग कभी नहीं करना चाहिये ॥१॥ उत्तमखम मद्दउ अजउ सचउ पुण सउच्च संजम सुतओ। चाउ वि आकिंचणु भवभयवंचणु बंभचेरु धम्म जु अखओ ॥१॥ अर्थ-उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शौच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य ये आत्माके अक्षय धर्म हैं । किसी दुष्टपुरुषके अपशब्द कहने, मारने, पीटने, शरीरका घात करने पर भी जो क्रोध नहीं करना, काँका फल जानकर उसको सहना सो उत्तम क्षमा है ॥१॥ मानकषाय ( अहंकार) को छोड़कर नम्रीभूत परिणाम होना सो उत्तम मार्दव है ॥२॥ मायाकषायके अभाव होते हुए जो सरल परिणामोंका होना सो उत्तम आ- जव है ॥३॥ सत्य संभाषण करना उत्तम सत्य है ॥४॥ कोभका त्याग करना उत्तम शौच है । व्यवहारमें स्नानादिक भी शौच कहा है ॥ ५॥ छहकायके जीवोंकी ४
रक्षा करना तथा इन्द्रिय और मनको वशमें करना सो उत्तम संयम है ॥ ६॥ कायो-
त्सर्गादिक करना उत्तमतप है ॥ ७॥ ज्ञानादिकका दान देना उत्तम त्याग है ॥८॥
वाह्याभ्यन्तर परिग्रहोंका त्याग करना उत्तम आकिंचन्यधर्म है ॥ ९॥ स्त्रीमात्रका
त्याग करना अथवा अपने आत्मामें ही बीन होना सो उत्तम ब्रह्मचर्य है ॥१०॥
इन सबमें उत्तम विशेषण सम्यक्त्वसहित होनेके लिये दिया है ॥१॥
उत्तमखम तिल्लोयह सारी । उत्तमखम जम्मोदहितारी॥
उत्तमखम रयणत्तयधारी । उत्तमखम दुग्गइदुहहारी ॥२॥
अर्थ-तीनों लोकोंमें उत्तम क्षमा ही सब धर्मोमें सार है। उत्तम क्षमा जन्ममरण-
रूपी समुद्रसे पार कर देनेवाली है । उत्तम क्षमा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकूचा-
रित्र इन तीनों रत्नोंको धारण करनेवाली है। जहां उत्तमक्षमा होती है वहां रत्नत्रय
होते ही हैं और उत्तम क्षमा नरकादिक दुर्गतिके समस्त दुःखोंको हरण करनेवाली
है ॥२॥
ज.
द०
उत्तमखम गुणगणसहयारी । उतमखम मुणिविंदपियारी ॥
उत्तमखम बुहयणचिंतामणि । उत्तमखम संपज्जइ थिरमणि ॥३॥
अर्थ-उत्तम क्षमा गुणसमूहोंके साथ रहनेवाली है । अर्थात् उत्तम क्षमाके होनेसे
अनेक गुण प्रकट हो जाते हैं। यह उत्तम क्षमा मुनियोंको बढी प्यारी है । श्रेष्ठमुनिजन
इसका पालन करते हैं । यह उत्तम क्षमा विद्वानोकेलिये चिन्तामणि है, अर्थात् चिन्ता-
माणिरत्नके समान इच्छित पदार्थोकी देनेवाली है । इसीतरह विद्वज्जनोंको उत्तम क्ष-
मासे इच्छित ज्ञानादिक माप्त होते हैं । ऐसी यह उत्तम क्षमा चित्तकी एकाग्रता होनेसे
उत्पन्न होती है ॥३॥
५
उत्तमखम महणिज सयलजणि । उत्तमखम मिच्छत्ततमोमणि ॥
जहिं असमत्थह दोस खमिजइ । जहिं असमत्थह णउरूसिज्जा ॥४॥
जहिं आकोसणवयण सहिजइ । जहिं परदोस ण जणि भासिज्जइ॥
जहिं चेयणगुण चित्त धरिजइ। तहिं उत्तमखम जिण भासिजइ ।।५।।
अर्थ--यह उत्तम क्षमा समस्त लोकमें पूजित है और मिथ्यात्वरूपी अन्धकारको
दूर करनेके लिये मणिके समान है । जैसे प्रकाशमान मणिसे अन्धकार दूर हो जाता
है, उसी तरह उत्तमक्षमासे मिथ्यान्व दूर होकर सम्यक्त्व प्रकट होता है। जहां असमर्थ-
जीवोंके दोप क्षमा किये जाते हैं, जहां असमर्थीके ऊपर क्रोध नहीं किया जाता, जहां
आक्रोशवचनोंका ( गाली गलौज आदिका) सहन किया जाता है, जहां दूसरेके दोष
प्रकट नहीं किये जाते और जहां चित्तमें आत्माका चैतन्यगुण धारण किया जाता है
वहां ही उत्तमक्षमा होती है, ऐसा श्रीजिनेन्द्रदेवने कहा है॥४॥५॥
घत्ता।
इय उतमखमजुय णरसुरखगणुय केवलणाणु लहेवि थिरू।
हुइ सिद्ध णिरंजण भवदुहभंजण अगणियरिसिपुंगम जि चिरू॥६॥
द० ज. अर्थ-जिसका निरूपण ऊपर कर चुके हैं ऐसी उत्तम क्षमाके धारण करनेवाले पुरुषको मनुष्य देव और विद्याधर सभी नमस्कार करते हैं और वह अचल केवळ- ज्ञानको पाकर अनेक ऋषियोंमें श्रेष्ठ, संसारके दुःखोंसे रहित होताहुआ निरंजन सिद्ध है और वहांके अनन्तसुख अनन्तकालतक भोगता रहता है । इसरिये सवको उत्तमक्षमा सदा धारण करनी चाहिये ॥६॥ ॐ ही उत्तमक्षमाधौगाय महायं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ ६
अथ मादेवधर्मांगम् ।
मृदुत्वं सर्वभूतेषु कार्य जीवेन सर्वदा ।
काठिन्यं त्यज्यते नित्यं धर्मबुद्धिं विजानता ॥२॥
ॐ व्ही उत्तममार्दवधर्मागाय जलं निर्वपामीति स्वाहा-ॐ ही उत्तममार्दवधर्मागाय
चन्दनं नि । ॐ हीं उत्तममार्दवधर्मागाय अक्षतान निः । ॐ हीं उत्तममार्दवधर्मा-
गाय पुष्पं निः । ॐ ही उत्तममादेवधर्मांगाय नैवेयं निः। ॐ हीं उत्तममार्दवध-
माँगाय दीप नि० । ॐ ही उत्तममादेवधर्मीगाय धूपं नि० । ॐ हीं उत्तममार्दवध-
माँगाय फर्क निः । ॐ हीं उत्तममार्दवधांगाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥
अर्थ-जो धर्मबुद्धिको जानते हैं ऐसे जीवोंको उचित है कि वे समस्त
जीवोंमें सदा मृदुता रक्खें और कठिन परिणामोंका सदा त्याग करें ॥२॥
महउ भवमद्दणु माणणिकंदणु दयधम्मह मूल जि विमलु ॥
सबह हिययारउ गुणगणसारउ ति सउ(?)नओ संजम सयलु॥१॥
ज अर्थ-यह मार्दवधर्म जन्मपरणरूप संसारका नाश करनेवाग है । मानकपा- यको सर्वथा दूर कर देनेवाला है । दयाधर्मका मूळ कारण है । यह आत्माका एक अक्षय और निर्मळ गुण है । समस्त जीवोंका हित करनेवाला है । आत्माके समस्त गुणोंमें सारभूत गुण यही है । इस मार्दवधर्मके होते हुए ही समस्त व्रत और संयम सफल होते हैं ॥१॥ मद्दउ माणकसायविहंडणु । महउ पंचेंदियमणदंडणु॥ मद्दउ धम्मे करुणावल्ली । पसरह चित्तमहीहिं णवल्ली ॥२॥ अर्थ-मादेवधर्म गानकपायको नाश करनेवाला है । तथा पांचों इंद्रिय और मनको निग्रह करनेवाला भी मार्दवधर्म है। इस मार्दवधर्मके प्रभावसे ही इस मनुष्यकी चित्तरूपी पृथ्वीमें . नवीन करुणारूप वेळ फैलती है। भावार्थ-अहिंसाधर्मका कारण करुणा है और करुणा मादेवधर्मसे ही होती है ॥ २ ॥ महउ जिणवरभति पयासइ । मदउ कुमइपसरु णिण्णासह ।। मद्दवेण बहुविणय पवट्टइ । मद्दवेण जण वइरो हट्टइ ॥३॥ ७
अर्थ-मार्दवधर्मसे जिनेन्द्रदेवकी भक्ति प्रकाश होती है और मार्दवधर्म कुम-
तिके प्रसारको नाश करता है, अर्थात् मार्दवधर्म होतेहुए कुमति नहीं रहने पाती।
दर्शन-ज्ञान-चारित्र-विनय और व्यवहार-विनय मार्दवधर्मसे ही बढती है । और
मार्दवधर्मसे कोकमें अनेक तरहके वैर भी दूर हो जाते हैं ॥३॥
महवेण परिणामविसुद्धी । मद्दवेण विहुलोयहु सिद्धी॥
मद्दवेण दोविहु तउ सोहइ । मद्दवेण णर तिजगु विमोइह ॥४॥
अर्थ-मार्दवधर्मसे आत्माके परिणाम अत्यन्त निर्मक हो जाते हैं । मार्दवधर्मसे
इसकोक और परलोकसंबंधी कार्य सिद्ध होते हैं। अभ्यन्तर तप और बाह्य तप दोनों
मादेवधर्मसे ही शोभायमान होते हैं । मादेवधर्मकी ऐसी महिमा है कि इसके होते
हुए मनुष्य तीनों जगतको मोहित कर लेता है ॥४॥
मद्दउ जिणसासण जाणिजइ । अप्पापरसरूव भासिजह ॥
मद्दउ दोस असेस णिवारइ । मद्दउ जम्मउअहि उत्तारइ ॥५॥
..
८
अर्थ-पक जैनशासन ही ऐसा है कि जिसमें मादेवधर्म जाना जाता
अर्थात् दूसरे मतोंमें ऐसे उत्तपधर्मकी गणना भी नहीं की है । इसीके द्वारा आत्माका
और आत्मासे भिन्न पुद्गलादिकका स्वरूप जाना जाता और निश्चय किया जाता है।
एक ही मार्दवगुणके होनेसे दूसरे समस्त दोष दूर हो जाते हैं। यह मार्दवधर्म ही
जन्ममरणरूप समुद्रसे जीवोंको पार करता है ॥५॥
सम्मइंसणअंगु, मद्दउ परिणामु जि मुणहु ।
इय परियाणि वि चित्त, मद्दउ धम्म अमल थुणहु ॥६॥
अर्थ-यह मार्दवधर्म आत्माका एक परिणाम है और सम्यग्दर्शनका अंग
है। ऐसा जानकर अपने चित्तमें इस निर्मल मार्दवधर्मको धारण करो और
सदा इसकी स्तुति करते रहो ॥६॥
ॐ ही मार्दवधर्मीगाय अयं निवपामीति स्वाहा ॥२॥
अथार्जवधर्मागम् ।
आर्जवं क्रियते सम्यग्दुष्टबुद्धिश्व त्यज्यते ।
पापचिन्ता न कर्त्तव्या श्रावकैधर्मचिन्तकैः ॥ ३ ॥
ॐ व्ही उत्तमार्जेवधर्मागाय जकं निवपामीति स्वाहा । ॐ हीं उत्तमार्जवधर्मागाय
चन्दनं नि० । ॐ हीं उत्तमानवधर्मागाय अक्षतान नि । ॐ हीं उत्तमार्जवधर्मागाय
पुष्पं निः । ॐ ही उत्तमार्जवधांगाय नैवेद्यं नि० । ही उत्तमार्जधांगाय
दीपं निः । ॐ ही उत्तमार्जवधर्मागाय धूपं निः । ॐ ही उत्तमानवधर्मागाय फर्क
निः। ॐ ही उत्तमार्जवधर्मागाय अध्य निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥
अर्थ-धर्मका चिन्तन करनेवाले श्रावकोंको उचित है कि वे अपने परि-
णाम सदा सरक रक्खें और दुष्टवुद्धिका सदा त्याग करें, तथा कभी पापरूप
कार्योंका चिन्तवन न करें । यही उत्तम आर्जन धर्म है ॥३॥
धम्मह वरलक्खणु अजव थिरमणु दुरियविहंडणु सुहजणणु ॥
तं इच्छ जि किन्जइ तं पालिजइ तं णि सुणिजइ खइजणणु ॥१॥
अर्थ-धर्मका उत्तम कक्षण आर्जव ही है । मन वचन कायकी सरलताका नाम आजवधर्म है । यह आर्जवधर्म स्थिरमनसे किया जाता है । समस्त पापोंको दूर करनेवाला और सुखको देनेवाके यह आर्जव धर्म ही है । इसलिये समस्त काँके क्षय करनेवाले इस आर्जवधर्मके सेवन करनेकी इच्छा करो, पाकन करो, और ध्यानसे सुनो ॥१॥ जारिसु णियचित्तिहि चिंत्तिजइ । तारिसु अण्णह पुण भासिज्जइ ॥ किजइ पुण तारिसु सुहसंचणु । तं अजवगुण मुणह अवंचणु ॥२॥ अर्थ-जो जीव जैसा अपने चित्तमें चिन्तवन करे, वैसा ही दूसरेके किये कहै और फिर वैसा ही करै, उसको ही समस्त सुखोंका संचय करनेवाला वंचक- तारहित आजवगुण जानो । भावार्थ-सरक परिणामोंसे मनवचनकायकी एकसी क्रिया करके जो दूसरेको धोखा नहीं देना वही आर्जव गुण है ॥२॥ मायासल्लु मणहु णीसारहु । अजवधम्मु पवित्तु वियारहु ॥ बउ तउ मायावियहु णिरत्थउ । अजउ सिवपुरपंथहु सत्थउ ॥३॥ or अर्थ-भो भव्यजनो ! अपने चित्तसे मायाशल्यको निकालकर इस पवित्र आर्जव धर्मका विचार करो । मायावी अर्थात् कपट करनेवाले पुरुषके व्रत करना तप करना आदि सभी व्यर्थ हैं। और यह आजवधर्म मोक्ष जानेके लिये सहायक है। भावार्थ-माया एक शल्य है । शल्य वाणको कहते हैं । हृदयमें चुभा हुआ वाण जैसे दुःखदायी होता है, उसी तरह माया भी दुःखमदा है । इसलिये मायाको चित्तसे निकालकर मोक्षके देनेवाले इस आर्जवधर्मका चितवन करो ॥३॥ जत्थ कुटिलपरिणाम चइजइ । तहिं अजवधम्म जु संपज्जा ॥ दसणणाणसरूव अखंडउ । परमअतिंदिय सुक्खकरंडउ ॥४॥ अप्पे अप्पहु भवहु तरंडउ । एरिसु चेयणभाव पयंडउ । सो पुण अज्जउ धम्मे लव्भइ।अज्जवेण वयरिउमण खुम्भइ॥५॥ अर्थ-जहां कुटिलपरिणामोंका त्याग किया जाता है, वहीं आर्जव धर्म उत्पन्न होता है । अर्थात् कुटिक परिणामोंका त्याग करना ही आर्जवधर्म है । आत्मामें जो इस चैतन्यके ऐसे प्रचण्डभाव उत्पन्न होते हैं जो कि .... L है द० ज० १० सम्यग्दर्शनरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, अविनाशिक, अतीन्द्रिय, परमसुखके स्थानभूत और आत्माको इस संसारसे तारनेवाले हैं, वे परिणाम आर्जवधर्मसे ही प्राप्त होते हैं और आर्जवधर्मके होनेसे शत्रुका मन भी क्षुभित हो जाता है । भावार्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र आर्जेवधर्मसे ही प्राप्त होते हैं । यही आर्जवधर्म संसारसे पार कर देनेवाला है और इस लोकमें भी शत्रु आदिसे बचानेवाला है ॥४॥५॥ घत्ता। अज्जउ परमप्पउ गयसंकप्पउ विम्मित्तु जि सासउ अभओ। तं णिरु झाइज्जइ संसउ हिज्जइ पाविज्जइ जइ अचलपओ॥६॥ अर्थ-अब निश्चयनयसे आर्जवका स्वरूप कहते हैं कि, संकल्परहित, संगरहित, नित्य और अभयस्वरूप जो परमात्मा है, वही आर्जव है । ऐसे परमात्माका संशय- रहित होकर ध्यान करना चाहिये । इसके ध्यान करनेसे अचकपद अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति होती है ।। ६॥ ॐ हीं उत्तमार्जवधर्मागाय अध्ये निपामीति स्वाहा ॥३॥ १०
अथ सत्यधर्मागम् ।
असत्यं सर्वथा त्याज्यं दुष्टवाक्यं च सर्वदा ।
परनिन्दा न कर्त्तव्या भव्येनापि च सर्वदा ॥४॥
ॐ हीं उत्तमसत्यधर्मीगाय जळं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ ही उत्तमसत्य-
धर्मागाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ ही · उत्तमसत्यधर्मागाय अक्ष-
तान् निर्वपामीति स्वाहा । ॐ हीं उत्तमसत्यधर्मागाय पुष्पं निर्वपामीति
स्वाहा । ॐ ही उत्तमसत्यधर्मागाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ ही उत्तम-
सत्यधर्मीगाय दीपं निवपामीति स्वाहा । ॐ व्ही उत्तपसत्यधर्मांगाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा । ओं ही उत्तमसत्यधर्मागाय फर्क निर्वपामीति स्वाहा ।
ओं ही उत्तमसत्यधर्मागाय.अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥
अर्थ-भव्यपुरुषको झूठ बोलनेका और गाली गलौज आदि दुष्टवचनोंका
सर्वथा सदा त्याग करना चाहिये और दूसरोंकी निन्दा करनेका भी त्याग करना
चाहिये । यही सत्य धर्म है ॥ ४॥
६० ज० ११ दयधम्मह कारण दोसणिवारण इहभवपरभवसुक्खयरू। सच्चु वि वयणुल्लउ भुवणि अतुल्लउ वोलिज्जइवीसासघरू॥१॥ अर्थ--सत्यवचन दया धर्मके मूलकारण हैं, समस्त दोपोंको दूर करनेवाले हैं, और इस भव तथा परभवमें सुखके देनेवाले हैं। वचनोंमें उत्कृष्ट सत्य वचन ही हैं। सत्यवचन संसारमें निरुपमेय हैं, अर्थात् सत्यकी तुलना किसीके भी साथ नहीं हो सकते । तथा विश्वासके स्थानभूत हैं। ऐसे सत्यवचन सदा बोलने चाहिये ॥१॥ सच्चु जिसब्वह धम्मह पहाण।सच्चु जि महियलि गरुओविहाण ॥ सच्चु जि संसारसमुद्दसेउ । सच्चु जि सव्वह मणसुक्खहेउ ॥२॥ अर्थ-सत्यधर्म ही समस्तध में प्रधान धर्म है । इस भूमंडलमें सत्यधर्मका विधान ही उत्कृष्ट कहा है। सत्यधर्म ही संसाररूप समुद्रसे पार होने के लिये पुल है, अर्थात् संसारसे पार करनेका कारण है और सत्यधर्म ही निखिक जीवोंके चित्तको सुख देनेवाका है ॥२॥ ११
सच्चेण जि सोहइ मणुवजम्मु । सचेण पवित्तउ पुण्णकम्मु॥
सच्चेण सयलगुणगण महति । सच्चेण तियस सेवा वहंति ।
सच्चेण अणुव्वय महवयाइ । सच्चेण विणासइ आवयाइ ॥३॥
अर्थ-यह मनुष्यजन्म सत्यधर्मसे ही शोभायमान होता है और सत्यसे ही
पवित्र पुण्यकर्मीका संचय होता है । इस सत्यधर्मसे अन्य समस्तगुणोंका समूह पूज्य
गिना जाता है, अर्थात् सत्यधर्मके होनेसे अन्य गुणोंकी महिमा बढती है और इस
सत्यधर्मसे ही स्वर्गनिवासी देवगण मनुष्योंकी सेवा करते हैं । इस सत्यधर्मके होते
हुए अणुव्रत और महाव्रत पालन हो सकते हैं और सत्यधर्मसे ही समस्त आपत्तियां
नाश हो जाती हैं ॥३॥
हियमिय भासिजइ णिचभास । णवि भासिजइ परदुहपयास ॥
परबाहायर भासहु म भव्य । सच्चु जि तं छंडहु विगइगव्व॥ ४॥
अर्थ--अब व्यवहार सत्यधर्मका स्वरूप कहते हैं कि, भो भव्यजीवो ।
सदा हितरूप और परिमित वचन कहो । दूसरेको दुःख पहुंचानेवाले
वचन कभी मत कहो और न दूसरको किसी तरहकी बाधा करनेवाले
वचन कहो । गर्वरहित उपर्युक्त वचनोंका त्याग करो, यही सत्यधर्म है ॥४॥
सच्चु जि परमप्पउ अस्थि इक्क । सो भावहु भवतमदलणअक्क ॥
रुधिज्जड़ मणवयकायगुत्ति । जं खणि फिट्टइ संसार अत्ति ॥ ५ ॥
अर्थ संसाररूप अन्धकारको नाश करनेके लिये सूर्यके समान एक जो
परमात्मा है, वही सत्यधर्म है। ऐसा चिन्तन करो और मन वचन कायकी क्रियाका
रोकना, अर्थात् मनोगुप्ति वचनगुप्ति कायगुप्तिका पालन करना भी सत्यधर्म है ।
क्योंकि यह गुप्तिरूप धर्म जिस क्षणमें होता है, उसी समयमें संसारके समस्त दुःख
दूर हो जाते हैं। यह निश्चय सत्यका स्वरूप जानना ॥५॥
पत्ता।
सच्चु जि धम्मफलेण, केवलणाण लहेइ जणु ।
तं पालहु भो भव्व, भणहु म अलिय उइह वयणु ॥ ६ ॥
अर्थ-भो भव्य ! इस सत्यधर्मके फलसे मनुष्योंको केवलज्ञानकी
प्राप्ति होती है । इसलिये इस सत्यधर्मका पालन करना चाहिये और मि-
थ्यावचन कभी नहीं वोकने चाहिये ॥६॥
ॐ हीं उत्तमसत्यधर्मागाय महाध्य निवपामीति स्वाहा ॥४॥
अथ शौचधागम् ।
बाह्यमाभ्यन्तरं चापि मनोवाकायशुद्धिभिः ।
शुचित्वेन सदा भाव्यं पापभीतैः सुश्रावकैः ॥५॥
ॐ ही उत्तमशौचधागाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ हीं उत्तमशौचधर्मा-
गाय चन्दनं नि०। ॐ हीं उत्तमशौचधर्मागाय अक्षतान् नि०। ॐ हीं उत्तमशौचधर्मा-
गाय पुष्पं नि० । ॐ हीं उत्तमशौचधर्मागाय नैवेद्य नि० । ॐ ही उत्तमशौचधर्मा-
गाय दीपं नि० । ॐ ही उत्तमशौचधर्मागाय धूपं नि० । ॐ हीं उत्तमशौचधर्मा-
गाय फळ नि। ॐ हीं उत्तमशौचधर्मागाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥
अर्थ-जो महाश्रावक पापसे भयभीत हैं, उनको मन वचन कायकी शुद्धता-
पूर्वक वाह्य शरीरादिक और अभ्यन्तर आत्माको सदा उज्वळ रखना चाहिये । यही
शौचधर्म है ॥ ५॥
सउच जि धम्मंगउ तं जि अभंगउ भिण्णंगउ उवओग्गमओ।
जरमरणविणासणु तिजगपयासणुझाइजइ अहणिसि जि धुओ॥१॥
अर्थ-यह शौचधर्मधर्मका एक अंग है। अभंगहै । शरीरसे भिन्न है, अर्थात् यह
शौच शरीरादिकके स्नानसे भिन्नरूप है। यह शौचधर्म ज्ञानदर्शनरूप उपयोगस्वरूप
है । जन्म जरा मरणादिकका नाश करनेवाला है और तीनों जगतका प्रकाश कर-
नेवाला है। इसलिये इस धर्मका निश्चयरूपसे अहर्निश ध्यान करना चाहिये ॥१॥
धम्म सउच्च होइ मणसुद्धइ । धम्म सउच्च वयणधणविद्धइ ॥
धम्म सउच्च लोह वजंतउ । धम्म सउच्च सुतवपहि जंतउ ॥२॥
अर्थ-मनको अन्यन्त शुद्ध रखनेसे यह उत्तम शौचधर्म होता है और यही
शौचधर्म शास्त्ररूप धनकी अत्यन्त वृद्धि करनेसे होता है । अर्थात् शास्त्रज्ञानकी
वृद्धि होनेसे ही शौचधर्मका पालन होता है । यह शौचधर्म उसी मनुष्यक होता है,
जिसने लोभकपायका त्याग कर दिया है और जो श्रेष्ठतप करनेके मार्गमें जा रहा
है, उसके यह शौचधर्म होता है ॥२॥
धम्म सउच्च बंभवयधारणु । धम्म सउच्च मयट्ठणिवारणु ॥
धम्म सउच्च जिणायमभणणे । धम्म सउच्च सुगुणअणुमणणे॥३॥
अर्थ--ब्रह्मचर्यप्रतका धारण करना ही शौचधर्म है और ज्ञानमद, पूजामद, कु-
क, जाति, वळ, ऋद्धि, तप और शरीरका मद निवारण करना अर्थात् इन आगे
ही मदोंको न करना ही शौचधर्म है । जैनशास्त्रोंके पठन करनेसे शौचधर्मका
पालन होता है और उत्तम उत्तम गुणोंके मनन करने व विचार करनेसे शौचधर्म
होता है ॥३॥
धम्म सउच्च सल्लकयचाये । धम्म सउच्च सुणिम्मलभाये ॥
धम्म सउच्च कसायअहावे । धम्म सउच्च ण लिप्पइ पाबे ॥४॥
अर्थ-माया मिथ्या और निदान इन तीनों शल्योंके त्याग करनेसे शौचः
धर्म होता है तथा आत्माके निर्मक परिणाम होनेसे शौचधर्म होता है । क्रोध मान
माया और कोम इन चारों कषायोंका अभाव होनेसे शौचधर्म होता है तथा पाप-
रूपपंकसे लिप्त न होना ही शौचधर्म है ॥४॥
अहवा जिणवरपुजविहाणे । णिम्मलफासुयजलकय ण्हाणे ॥
तं पि सउच गिहत्थह भासिउ।णवि मुणिवरह कहिउ लोयासिउ ॥५॥
अर्थ-निश्चय शौचका कथन करके अब कौकिक शौचको कहते हैं कि-
अथवा जिनेन्द्रदेवके पूजादिक विधानोंमें निर्मळ प्रासुक जकसे जो स्नान करना है,
वह भी गृहस्यों के लिये शौचधर्म कहा है। लोकमें प्रचलित सानादिक शौच गृहस्थों-
के ही लिये है, मुनियों के लिये नहीं है ॥५॥
घत्ता।
भउ मुणिवि अणिच्चल धम्म सउच्चउ पालिजइ एयग्गमणि ।
सुहमग्गसहायउ सिवपयदायउ अण्ण मचिंतइ किंपि खणि ॥६॥
-इस संसारको अनित्य जानकर एकाग्र मनसे इस शौचधर्मका पालन
करो। यह शौचधर्म शुभमार्गका सहाय करनेवाका है और मोक्षका देनेवाला है ।
इसलिये इसको छोडकर अन्य किसीका क्षणभर भी चिन्तन मत करो । इसीका
चिंतन अहर्निश करो ॥ ६॥
ॐ ही उत्तमशौचधर्मागाय महायं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥
अथ संयमधर्मागम् । सयमं दिविधं लोके कथितं मुनिपुङ्गवैः । पालनीयं पुनश्चित्ते भव्यजीवेन सर्वदा ॥ ६ ॥ ॐ ही उत्तमसंयमधर्मागाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । अँ ही उत्तमसंयमधमा गाय चन्दनं नि० । ॐ ही उत्तमसंयमधर्मागाय अक्षतान् नि० । ॐ हीं उत्तमसं- यमधौगाय पुष्पं नि । ॐ ही उत्तमसंयमधर्मांगाय नैवेद्यं नि० । ॐ हीं उत्तमसं- यमधर्मागाय दीपं निः । ॐ हीं उत्तमसंयमधर्मागाय धूपं नि०1ॐ हीं उत्तमसंयम- कांगाय फलं नि । ॐ हीं उत्तमसंयमधर्मागाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ अर्थ-मुनियोंमें श्रेष्ठ ऐसे गणधरादिक देवोंने संयम दो प्रकारका कहा एक बाह्य संयम और दूसरा आभ्यन्तर संयम । सो भन्यजीवोंको अपने चित्तमें दोनों प्रकारका संयम सदा पालन करना चाहिये ॥६॥ संजमु जणि दुलहु तं पाविल्लहु जो छंडइ पुण मूढमई । सो भमइ भवावलि जरमरणावलि किं पावे सो पुण सुगई ॥१॥ ne .
अर्थ-इस संसारमें संयमका प्राप्त होना अत्यन्त दुर्लभ है, इस लिये इस संयमको पाकर जो छोड देता है, वह महामूर्ख है और वह मन्ममरणकी संततिरूप संसारकी अगणित परम्परामें चिरकालतक परि- भ्रमण करता है । और इसतरह संयमरहित संसारमें परिभ्रमण करते हुएको श्रेष्ठ गति फिर कैसे मिल सकती है ? कभी नहीं, इसलिये संयमको पाकर फिर नहीं छोडना चाहिये ॥१॥ संजमु पंचेंदियदंडणेण । संजमु जि कसाय विहंडणेण ॥ संजमु दुद्धरतवधारणेण । संजमु रसचाइवियारणेण ॥२॥ अर्थ-स्पर्शन रसन, घाण, चक्षु, और श्रोत्र इन पांचों इन्द्रियों को वध करनेसे संयम होता है । क्रोधादिक कषायोंके खंडन करने अर्थात् नाश करनेसे संयम होता । दुर्द्धर (जो कठिनतासे धारण किया जाय ऐसे ) तपके धारण करनेसे संयम होता है और तिक्त, कटु, कपाय, मधुर आदिक रसोंके त्याग करने और त्यागके विचार करनेसे उत्तम संयमधर्म प्राप्त होता है ॥२॥ e Rhc ha संजमु उववासविजंभणेण । संजमु मणपसरह थंभणेण ॥ संजमु गुरुकायकिलेसणेण । संजमु परिगहगिह चायएण ॥३॥ अर्थ-चंचलमनका प्रसार रोकनेसे संयम होता है । अत्यन्त कायक्लेश करनेसे संयम होता है । उपवास वेळा तेला आदि करनेसे संयम होता है और परिग्रह ग्रहके त्याग करनेसे संयम होता है ॥ ३॥ संजमु तसथावररक्खणेण । संजमु तिणिजोयणियंतणेण ॥ संजमु सुत्तत्थपरिरक्खणेण । संजमु बहुगमणचयंतणेण ॥ ४ ॥ अर्थ-त्रस और स्थावर जीवोंकी रक्षा करनेसे संयम होता है । मन वचन काय रूप तीन योगोंके नियंत्रणसे संयम होता है। सूत्रोंके अर्थकी परीक्षा करनेसे अर्थात् पठन पाठन और विवेचन करनेसे संयम होता है और अधिक गमनका त्याग अर्थात् थोदा परिमित गमन करनेसे भी संयम होता है ॥४॥ संजमु अणुकंपकुणंतणेण । संजमु परमत्थवियारणेण ॥
जा
१६
संजमु पोसइ दंसणह पंथु।संजमु णिच्छय णरुमोक्खपंथु ॥५॥
अर्थ-अनुकंपा अर्थात् दया करनेसे संयम होता है और परमार्थका विचार
करनेसे संयम. होता है। यह संयम सम्यग्दर्शनके मार्गको पुष्ट करता है और निश्चय
नयसे मनुष्य के लिये मोक्षका मार्ग संयम ही है ॥ ५॥
संजमु विणु णरभव सयलु सुण्ण । संजमुविणु दुग्गइ जिय उपण्ण ॥
संजमु विणुघडियम इत्थ जाउ। संजमुविणु विहलिय अथिआउ॥६॥
अर्थ-विना संयमके मनुष्यभाव ही व्यर्थ है । अर्थात् संयम धारण करनेके
लिये इन्द्रादिकदेव मनुष्यपर्याय पानेकी इच्छा करते रहते हैं । इसलिये मनुष्यभवको
पाकर जो संयम धारण नहीं किया तो उसका यह जन्म व्यर्थ ही गया। इसी
संयमके बिना यह जीव सदा दुर्गतिमें उत्पन्न होता है । इसलिये इस जीवको सदा
ऐसा चिन्तवन करना चाहिये कि विना संयमके मेरी एक घडी भी व्यर्थ न जावे ।
क्योंकि बिना संयमके यह आयु भी निष्फल है ॥ ६ ॥
घत्ता।
इहभव परभव संजमु सरणु हुजउ जिणणाहें भणिओ।
दुग्गइसरसोसण खरकिरणोवम जेण भवारि विसमुहणिओ ॥७॥
अर्थ-श्रीजिनेन्द्रदेवने ऐसा कहा है कि मनुष्यको इस भव और परभवमें संयम
ही शरणं है । दुर्गतिरूप सरोवरके शोषण करनेके लिये यह तीव्र किरण सूर्यके
समान है । संसाररूपी विषम शत्रु इसी संयमके द्वारा नाश किया जाता है।॥ ७॥
ओं ही उत्तमसंयमधर्मागाय महायं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६॥
ज. अय तपोधर्मागम् । द्वादशं द्विविधं चैव बाह्याभ्यन्तरभेदतः। स्वयं शक्तिप्रमाणेन क्रियते धर्मवेदिभिः ॥७॥ ॐ हीं उत्तमतपोधौगाय जळं निर्वपामीति स्वाहा । ॐ प्ही उत्तमतपोधर्मागाय चन्दनं निः । ॐ ही उत्तमतपोधर्मीगाय अक्षतान् नि । ॐ ही उत्तमतपोधर्मागाय पुष्पं नि० । ओं ही उत्तमतपोधर्मागाय नैवेद्यं नि० । ओं ही उत्तमतपेोधर्मागाय दीपं नि० | ओं ही उत्तमतपोधर्मागाय धूपं नि० । ओं ही उत्तमतपोधर्मागाय फर्क नि० । ओं ही उत्तमतपोधौगाय अयं निवपामति स्वाहा ॥ ७॥ अर्थ-बाह्य और आभ्यन्तरके भेदसे तपके दो भेद होते हैं तथा आभ्यन्त- रके छह और बाह्यके छह इसतरह कुळ वारह भेद होते हैं। सो धर्म जाननेवाले भव्य पुरुषोंको यह उत्तम तप अपनी अपनी शक्तिके अनुसार करना चाहिये ॥७॥ गरभवपावप्पिणु तच्च मुणेप्पिणु खचिवि पंचेंदिय समणु । णिव्वेउ पमंडिवि संगइ छंडिवि तउ किज्जइ जाए वि वणु॥१॥ १७ अर्थ-मनुष्यभवको पाकर समस्त. तत्त्वोंका ज्ञान सम्पादन करना चाहिये और फिर पांचों इन्द्रिय और मनके व्यापारको रोककर वैराग्य धारण कर समस्त परि- ग्रहको छोडना चाहिये और पश्चात् वनमें जाकर यह उत्तम तप करना चाहिये ॥१॥ तं तउ जहिं संगइ छडिज्जा । तं तउ जहिं मयणु वि खडिज्जइ॥ तं तउ जहिं णग्गत्तणु दीसइ । तं तउ जहिं गिरिकंदरि णिवसइ॥र अर्थ-वह नप जहाँ बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहका त्याग किया जाता है वहीं होता है। वह तप जहाँ कामदेव वशमें किया जाता है वहां होता है । वह तप वहीं है। कि जहां साक्षात् दिगम्बरपरना दिखाई पडे, अर्थात् विना दिगम्बर मुद्राके तप नहीं हो सकता । और तप वही है कि जिसके करनेमें पहाडकी गुफाओंमें निवास करना पडे ॥२॥ तं तउ जहिं उपसग्ग सहिज्जइ । तं तउ जहिं रायाइ जिणिज्ज।। तउ जहिं भिक्खइ भुंज्जिजइ ।सावयगेह काल णिवसज्जइ ॥३॥ अर्थ-जिसमें अनके प्रकारके उपसर्ग सहन किये जाते हैं वही तप है । तप ज. वह है जहां रागादिक विभाव परिणाम क्षय होते हैं और जिसमें योग्य कालमें श्रावकके घर जाकर मिक्षाभोजन किया जाता है ॥३॥ तं तउ जत्थ समिदिपरिपालणु । तं तउ गुत्तित्तयह णिहालणु ॥ तं तउ जहिं अप्पापरबुज्झइ । तं तउ जहिं भव माणु जिउज्झइ॥४॥ अर्थ-जिसमें पाचों समितियोंका पालन किया जाता है वह तप है । तथा जिसमें मनोगुप्ति वचनगुप्ति और कायगुप्तिका पालन किया जाता है वह तप है। जिसमें अपना आत्मा और आत्मासे भिन्न शरीरादिक पुद्गलोंका ज्ञान होता है वह तप है, और जिसमें संसारके बढानेवाले मान माया क्रोध कोभादिकका त्याग किया जाता है वह तप है ॥४॥ तं तउ जहिं ससरूब मुणिज्जइ । तं तउ जहिं कम्महगण खिज्ज।। तं तउ जहिं सुरभत्तिपयासइ । पवयणस्थ भवियणह पभासइ ॥५॥ अर्थ-जिसमें केवक आत्माके स्वरूपका ज्ञान होता है उसे तप कहते हैं । जिसमें निखिक कौके समूह नाश होते हैं उसको तप कहते हैं। तप वही है १८ कि जिसकी इन्द्रादिक देव भी भक्ति प्रकट करें-स्तुति करें । भव्यपुरुषों के उपकारके लिये शास्त्रोको व शास्त्रोंके अर्थ को सुनाना, पढना पढाना भी तप है ॥५॥ जेण तवे केवलु जि उपज्जइ । सासइ सुक्ख णिच्च संपज्जइ ॥६॥ अर्थ-तप वही प्रशंसनीय है कि जिसके द्वारा केवल ज्ञान ही उत्पन्न हो और नित्य अविनाशी मोक्षसुखकी प्राप्ति हो ॥ ६ ॥ घत्ता। बारहविहु तउवरु दुग्गइपहहरु तं पुज्जिज्जइ थिरमणेण । मच्छरुमयछंडिविकरणइ दंडिवि तंपि धरिज्जइ गउरवेण ॥७॥ अर्थ-यह श्रेष्ठ बारह प्रकारका तप दुर्गतियोंके मार्गको हरग करनेवाला है । इसलिये स्थिर मनसे इसकी पूजा करनी चाहिये तथा मत्सरता और मदको छोड़कर पांचों इन्द्रियोंको वश करके यह उत्तम तपपुरुपोंको वडे गौरवके साथ धारण करना चाहिये ॥७॥ ॐ ही उत्तमतपोधर्मीगाय महार्य निर्वपामीति स्वाहा ॥७॥ .4 द. ज० अथ त्यागधमांगम् । चतुर्विधाय संघाय दानं चैव चतुर्विधम् । दातव्यं सर्वदा सद्धिश्चिन्तकैः पारलौकिकैः ॥८॥ ओं ही उत्तपत्यागधौगाय जळ निवपामीति स्वाहा।ओं ही उत्तमत्यागधर्मागाय चन्दनं नि। ओं ही उत्तमत्यागधर्मागाय अक्षतान् नि।ओं ही उत्तमत्यागधर्मागाय पुष्पम् नि०ओं ही उत्तमत्यागधर्मांगाय नैवेद्यं नि०ओं ही उत्तमत्यागधर्मागाय दीपम् नि०।ओं ही उत्तपत्यागधर्मागाय धूपम् नि०।ओं न्हीं उत्तपत्यागधौगाय फ- कम् नि० । ओं ही उत्तमत्यागधर्मागाय अय॑म् निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ -आहारदान, औषधदान, अभयदान और ज्ञानदान ऐसे दान चार प्रकारका है । सो परलोकका चिन्तन करनेवाले सज्जनोंको उक्त चारों प्रकारका दान मुनि अर्जिका श्रावक और श्राविकाओंके ऐसे चार प्रकारके संघके लिये सदा देना चाहिये ॥ ८॥ चाउ वि धम्मंगउ तं जि अभंगउ णियसत्तिए भत्तिए जणहु । पत्तह सुपवित्तह तवगुणजुत्तह परगइसंवलु तं मुणहु ॥१॥ अर्थ :१९ अर्थ-दानदेना भी धर्मका एक अंग है, इसकिये इसको भक्तिपूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार पूर्णरीतिसे करना चाहिये और तप और गुणोंकर सहित ऐसे पात्र और सुपात्रके लिये सदा करना चाहिये । दान देना ही परगतिके लिये पायेय ( मार्ग खाने योग्य पदार्थ) है, ऐसा जानो ॥ १॥ चाए आवागमण उहट्टइ । चाए णिम्मलकित्ति पवट्टइ ।। चाए अरिंगण पणविइ पाए । चाए भोगभूमिसुह जाए ॥२॥ अर्थ-दानदेनेसे आवागमनका या जन्म मरणका नाश हो जाता है दान देनेसे चारों ओर निर्मक कीर्ति फैकती है । दान देनेसे शत्रुसमूह भी पैरोंपर पटकर नमस्कार करता है और दान देनेसे भोगभूमिके सुख मिकते हैं ॥२॥ चाए विहिज्जइ णिच्च जि विणयं । सुहवयणइ भासेप्पणु पणयं । अभय दाणु दिजइ पहिलारउ । जिम णासइ परभवदुहयारउ ॥३॥ अर्थ-दान देनेमें नित्य ही विनय प्रकट करनी चाहिये और प्रेमपूर्वक शुभ द० २० for वचन कहने चाहिये । चारों दानों में सबसे प्रथम अभय दान देना चाहिये जिससे परभवके समस्त दुःखसमूहका नाश होवे । अर्थात् परभवके दुःख दूर करने- वाला अभयदान ही है, इसलिये यह प्रथम अर्थात् प्रधान दान कहा गया है ॥३॥ सत्थदान वीजउ पुण किज्जइ । णिम्मलणाण जेण पाविजइ ।। मोसह दिजइ रोयविणासणु । कहविण पिच्छइ बाहिपयासणु॥४॥ अर्थ दूसरा दान शास्त्रदान अर्थात्-शास्त्र प्रदान करना, विद्या पढाना, पढते हुपको सहायता करना, पाठशाला खोलना आदि करना चाहिये कि जिससे निर्मक ज्ञानकी प्राप्ति हो । क्योंकि शास्त्रदान या विद्यादानसे निर्मळ केवळ ज्ञान- की प्राप्ति होती है । तीसरा समस्त रोगोंको नाश करनेवाला औषधदान देना चाहिये कि जिससे किसीतरहकी आधि व्याधि उत्पन्न न हो, अर्थात् औषध दान देनेसे सब आधि व्याधि रोगादिक दूर हो जाते हैं ॥४॥ आहारे धणरिदि पवट्टइ । चउविउ चाउ जि एहु पवट्टइ॥ अहवा दुट्ठवियप्पह चाए । चाउ जि एहु मुणहु समवाए ॥५॥ २० अर्थ-आहार दान देनेसे धन ऋद्धि आदिकी वृद्धि होती है।इसप्रकार अभय दान, शास्त्रदान, औषधदान और आहारदान ये चारों ही दान देने चाहिये । यह व्य. वहारत्यागका स्वरूप कहा | अब 'अथवा' करके निश्चय त्यागका स्वरूप कहत हैं कि साम्यपरिणामोंसे जो दुष्टविकल्पोंका त्याग करना है, वही उत्तमत्याग है, ऐसा जानो॥५ पत्ता। दुहियह दिजइ दाणु, किज्जइ माणु जि गुणियणह । दय भावियइ अभंग, देसणु चिंतज्जइ मणह ॥६॥ अर्थ-संसारमें जो दुःखी जीव हैं उनको दान देना चाहिये और जो गुणी पुरुष हैं, अर्थात् जो सम्यग्दर्शनादि गुणोंकर सहित हैं उनका विशेष सत्कार करना चाहिये । समस्त जीवोंपर अटक दयाकी भावना होनी चाहिये और दर्शनकी सदा अभिलाषा रखनी चाहिये । यही त्याग धर्म है ॥६॥ ओं ही उत्तमसत्यधर्मागाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ।। ८॥ :
द. अथाकिंचन्यधांगम् । चतुर्विंशतिसंख्यातो यः परिग्रहभेदतः। तस्य संख्या प्रकर्त्तव्या तृष्णारहितचेतसा ॥ ९॥ ओं ही उत्तमाकिञ्चिन्यधर्मागाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । ओंव्ही उत्तमाकिंचन्यधर्मा- गाय चन्दनं नि० । ओं ही उत्तमाकिंचन्यधर्मागाय अक्षतान् नि० ओं ही उत्तमाकिंच- न्यधर्मागाय पुष्पं नि० । ओंही उत्तमाकिंचन्यधर्मागाय नैवेद्यं नि । ओं ही उत्तमा- किंचन्यधागाय दीपं नि । ओं ही उत्तमाकिंचन्यधर्मागाय धूपं नि०। ओं ही उस- माकिंचन्यधर्मागाय फलं नि । ओंडी उत्तमाकिंचन्यधर्मागाय अयं निर्वपामीति ॥९॥ अर्थ--'जो बाह्य आभ्यन्तर परिग्रहके भेदसे चौवीसप्रकारका परिग्रह कहा है। उसका नियम तुष्णारहित चित्त होकर करना चाहिये ॥९॥ आकिंचणु भावहु अप्पहु झावहु देहह भिण्णउ णाणमओ। णिरुवमगयवण्णउ सुहसंपण्णउ परमअतिंदिय विगयभओ॥१॥ अर्थ-शरीरसे भिन्न, ज्ञानस्वरूप, उपमारहित, वर्णगंधादिक रहित, सुखसे सम्पन्न, २१ परम अतीन्द्रिय और भयादिकसे रहित आत्माका ध्यान करो और यही मर्थात् शुद्ध आत्माका ध्यान करना ही आकिश्चन्य धर्म है, ऐसा चिन्तन करो ॥१॥ आकिंचणु बउ संगह णिवित्ति । आकिंचणुबउ सुहझाणसत्ति ॥ आकिंचणुबउ वियलियममत्ति । आकिंचणु रयणतयपवित्ति ॥२॥ अर्थ-समस्त परिग्रहका त्याग करना आकिंचन्यव्रत है, तथा आत्मामें शुभध्या- नकी शक्ति प्रकट होना सो आकिंचन्यव्रत है । अमत्व परिणामोंका त्याग करना अ- यात् चेतन अचेतनात्म द्रव्योंके अर्जन रक्षणादिककी इच्छाका त्याग करना आकिंचन्य व्रत है । रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यकचारित्रकी प्रवृत्ति करना, अर्थात् इनको धारण करना आकिंचन्यत्रत है ॥ २॥ आकिंचणु आउच्चियइ चित्त । पसरंतउ इंदियवणु विचित्तु ॥ आकिंचणु देहह ह चत्तु । आकिंचणु जं भवसुहविरत्तु ॥३॥ अर्थ-इन्द्रियरूपी विचित्रवनमें यथेष्ट विहार करतेहुए मनको संकुचित करना अ- थात् मनकी प्रवृत्तिको रोकना सो आकिंचन्यत्रत है । तथा शरीरसे स्नेह (ममत्वपरि- he २२ ज. णाम ) छोडना आकिंचन्य है । संसारके सुखोंसे विरक्त होना अर्थात् संसारके सुखोंका और उनके साधनों का त्याग करना सो आकिंचिन्य व्रत है ॥३॥ तिणमत्तपरिग्गह जत्थ णत्थि । आकिंचणु सो णियमेण अस्थि ॥ अप्पापर जत्थ वियारसत्ति । पयडिज्जइ जहिं परमेट्ठिभत्ति ॥ ४॥ अर्थ-जहाँ तृणमात्र भी परिग्रह नहीं है वहीं नियमसे आकिंचन्यत्रत होता है । जहां आन्मा और पर अर्थात् पुद्गलके विचार करनेकी आसक्ति प्रकट होती है तथा जहां पंच परमेष्ठीकी भक्ति की जाती है वही आकिंचन्यव्रत जानना ॥४॥ छडिज्जइ जहिं संकप्प दुट्ठ । भोयणु वैछिज्जइ जहिं अणिट्ठ॥ आकिंचणु धम्मु जि एम होइ । तं झाइज्जइ णिरु इत्थलोइ ॥५॥ अर्थ-जहां दुष्ट संकल्पोंका त्याग किया जाता है और अनिष्ट नीरस भोजन की इच्छा की जाती है वही आकिंचिन्य धर्म है । इस लोकमें निरन्तर इसीका ध्यान किया जाता है ॥५॥ २२ See
यत्ता
एयहु जि पहावे लद्धसहावें तित्थेसर सिवणयरि गया।
गयकामवियारा पुण रिसिसारा वंदणिज्ज ते तेण सया॥६॥
अर्थ--इसी आकिंचिन्यधर्मके प्रभावसे और इसीकी सहायतासे श्रीतार्यकर
परमदेव मोक्ष पधारे हैं। क्या और भी जो कामदेवके विकारोंसे रहित ऋषीश्वर है
घे भी इसी आकिंचिन्यधर्मके प्रभावसे सदा वंदनीय और पूज्य हुए हैं ॥६॥
ओही उत्तमाकिंचन्यधर्मागाय अयं निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥
२३ अथ ब्रह्मचर्यधर्मांगम् । नवधा सर्वदा पाल्यं शीलं सन्तोषधारिभिः ॥ भेदाभेदेन संयुक्तं सद्गुरूणां प्रसादतः॥ १० ॥ ओं ही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय जर्क निर्वामीति स्वाहा । ओं ही उत्तमब्रह्मचर्य- धांगाय चन्दनं नि० औं ही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय अक्षतान् नि। ओं ही उत्तप- ब्रह्मचर्यधर्मागाय पुष्पं नि० । ओं ही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय नैवेद्यं नि० । ओं ही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय दीपं नि० । ऑही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मीगाय धूपं नि० ओं ही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय फर्क नि। ओं ही उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय अयं निवपामी- ति स्वाहा ॥ १०॥ अर्थ-सन्तोषके धारण करनेवाले भव्यजीवोंको श्रेष्ठ गुरुओंके प्रसादसे भेद तथा अभेदरूप नौ प्रकारका शीक या ब्रह्मचर्य सदा पालन करना चाहिये॥१०॥ बंभव्वउ दुद्धरु धारिज्जइ वरु फेडिजइ विसयास णिरु । तियसुक्खइ रत्तउ मणुकरिमत्तउ तं जि भव्व रक्खेहु थिरु ॥ १॥ २३
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अर्थ- हे भव्यपुरुषो ! ब्रह्मचर्यव्रत महा दुर्द्धर है, इसलिये विषयोंकी आशाको
दूर कर इसको भलेप्रकारं अवश्य धारण करना चाहिये और स्त्रीसुखमें लीन हुए
मदोन्मत्त मनरूपी हाथीसे रक्षा करके स्थिर करना चाहिये ॥१॥
चित्तभूमि मयणु जि उप्पजइ । तेण जि पीडिउ करइ अकजइ ॥
तियह शरीरइ णिदिय सेवइ । णियपरणारि ण मूढउ वेयइ ॥२॥
अर्थ-कामदेव चित्तरूपी भूमिमें उत्पन्न होता है, उससे पीडित हुआ मनुष्य
अन्याय और अकार्य करता है, स्त्रियोंके अत्यन्त निन्दित परीरको सेवन करता
है और वह मूर्ख फिर स्वस्त्री और परस्त्रीको भी नहीं देखता ॥२॥
णिवडइ णरइ महादुख भुंजइ । सोहीणु जि बंभव्वउ भंजइ ॥
इय जाणेप्पिणु मणवयकाये । बंभचेरु पालहु अणुराये ॥३॥
अर्थ-जो ब्रह्मचर्यव्रतका पालन नहीं करता वह नीच जीव नरकमें पड़कर
महादुःख भोगता है.। ऐसा जानकर ब्रह्मचर्यव्रतको मनवचनकायके द्वारा प्रेमपूर्वक
पालन करो॥३॥
. ज. २४ तेण सह जि लब्भइ भवपारउ । बभं विण वउ तउ जि असारउ ।। संभव्वय विणु कायकिलेसो । विहल सयल भासयइ जिणेसो॥४॥ अर्थ-समस्त जीव इस ब्रह्मचर्य के होनेसे ही संसार समुद्रसे पार होते हैं। ब्रह्मचर्यके विना व्रत करना, तप करना, सब व्यर्थ है । और विना ब्रह्मचर्यके समस्त कायक्लेश व्यर्थ है, ऐसा श्रीजिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥ ४ ॥ बाहिरफरसोंदियसुह रक्खहु । परम बंभु अभंतर पिक्खहु ॥ एण उवाए लब्भइ सिवहरु । इम रइधू बहुभणइ विणइयरु ॥५॥ बाह्य स्पर्शनेन्द्रियसे आत्माकी रक्षा करो, अर्थात् उससे बचो और भात्मामें ही परम ब्रह्मचर्यको देखो । भावार्थ-आत्मामें कीन होना ही परम ब्रह्मचर्य है, सो बाह्य स्पर्शनेन्द्रियके सुखोंसे बचकर आत्मामें लीन होनेसे ही उसकी प्राप्ति हो सकती है । इसी उपायसे अर्थात् आत्मामें लीन होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती ऐसा उन नामा कवि अतिशय विनयके साथ वारंवार कहते हैं ॥५॥ अथे २४ ese जिणणाह महिन्जइ मुणिपणमिज्जइ दहलक्खणु पालियह णिरु । भो खेमसीहसुय भव्वविणयजुय होलुव मण इह करहु थिरु ॥ ६॥ अर्थ-श्रीजिनेन्द्रदेव भी इस दशलाक्षणिकधर्मकी महिमा वर्णन करते हैं और श्रीमुनिराज भी इसको प्रणाम करते हैं, इसलिये हे भन्यो! इसका नित्य पाळन करो और श्रीखेमसिंहके अतिशय विनयवान् पुत्र होलूके समान अपने चित्तको स्थिर करो ॥६॥ इति श्रीपंडितलालारामजीकृत भापाटीकासहित दशलाक्षणिकधर्मजयमाला समाप्ता। समुच्चय आरती। इय काऊण णिज्जरं जे हंणंति भवपिंजरं । नीरोयं अजरामरं ते लहंति सुक्खं परं ॥१॥ जेण मोक्खफलु तं पाविज्जइ, सो धम्मंगो एहहु किज्जइ । खमखम्मायलु तुंगय देहउ, महउ पल्लउ अज्जउ साहउ ॥ सच्च सउच्च मूल संजम दलु, दुविह महातव णवकुसुमाउलु।
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चउविह चाउ पसारिय-परमलु, पीणियभवलोयछप्पइयलु ॥
दियसंदोह सद्द कलकलयल, सुरणवरखेयर सुहसय फलु ।
दीणाणाहदीहसमाणिग्गहु, सुद्ध सोमतणुमत्तपरिग्गहु ॥
बंभचेरु छायाइ सुहासिउ, रायहंस नियरेहि समासिउ ।
एहउ धम्मरुक्ख लाखिज्जइ, जीवदयावयणहि राखिज्जइ ॥
झाणठाण भल्लारउ किज्जइ, मिच्छामयज पवेस ण दिज्जइ ।
सीलसलिलधारहि सिंचिज्जइ, एम पयत्ते बड्डारिज्जइ ।।
घत्ता।
कोहानल चुक्कउ, होउ गुरुक्कउ, जाह रिसिदिय सिद्धगई।
जगताइ सुहकरु, धम्ममहातरु, देइ फलाइ सुमिट्ठमई ॥
ओं ही उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मेभ्योऽध्ये निवपाषीति स्वाहा ।
अर्थ
इस तरह कमौकी निर्जरा करके. जो भवपीजरेको नष्ट करते हैं वे रोग.
गरिन. अजर और अमर सुखको माप्त करते हैं ॥१॥ जिससे मोक्षफक प्राप्त होता
२५
16 उस धर्मागका पालन करना चाहिए । आगे दशलक्षण धर्मको रक्षकी उपमा देते हुए कहते हैं कि जिस तुंगदेह या बड़े भारी परीवाळे वृक्षका क्षमाधर्म तो मातर या पृथ्वीतल है जिसपर कि यह वृक्ष खड़ा हुआ है, मादेवरूपपल्लव (कोमल पत्ते है, आर्जव शाखायें हैं, सत्य और शौच मूल है, संयम पत्र हैं, दो प्रकार महातपं. रूप पुष्प है, चार प्रकारका त्याग (दान) रूप सुगंध फैल रहा है, मीणित या असम भन्यजन भारे हैं, सुर, नर, और खेचर (विद्याधर ) पक्षी हैं जो कळकळ शब्द करते हैं, सैकड़ों प्रकारके सुख फक हैं, दीन और अनार्थोके दीर्घ श्रमको मिटा- नेवाला जिसका शुद्ध और सौम्य शरीरमात्र परिग्रह (आकिंचन्य ) है, जो ब्रह्म- पर्य रूप छायासे युक्त है और राजईसके समूह जिसके आश्रयमें रहते हैं। इस प्रकार यह दशक्षणधर्मरूप वृक्ष है, इसकी रक्षा करनी चाहिए, वचनोंमें जीवदया रखनी चाहिए, इस वृक्षके नीचे सुन्दर ध्यानका स्थान बनाना चाहिए। यहाँ मिथ्या मतका प्रवेश न होने देना चाहिए और शीलरूपजसकी धारासे इसका सिंचन करना चाहिए । इस तरह प्रयत्न करके इसकी वृद्धि करनी चाहिए । कोरूप अग्निको बुझाओ, गंभीर बनो जिससे श्रेष्ठ गति माप्त हो । सारे जगतको सुखी करनेवाला यह धर्मरूप महाक्ष मीठे फळ देनेवाला है
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मू. 10
पूजापाठके ग्रंथ ।
१ नित्यनियमपूजा संस्कृत और भाषा ।
मू.1)
२ भाषापूजासंग्रह केवल भाष की पुजायें। मू• ॥3)
३. चौवीसी पूजापाठ कविवर वृन्दावनकृत ।
मू. १)
४ तीस चौवीसी पाठ
५ पंचपरमेष्ठीपूजा संस्कृत ( बहुत सुन्दर)। म.)
६ वृहत् निर्वाण विधान । हाल ही छपा है।
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७ पूजा-विधानसंग्रह-सम्मेदशिखर पंचकल्याणक, कर्मदहनादि ५ विधान है, मूल्य ।)
प्रद्युम्नचरित्र ।
बड़ी सरल भाषामें हाल ही छपकर तैयार हुआ है। सुल्छे पो है। शास्त्रसभामें पाँचने लायक है
श्रीकृष्णनारायणंके पुत्रका चरित्र यहुत ही मनोरंजक है । मू० ३॥)
नोट:-हमारे यहाँ सब प्रकारके सब जगहके छपे हुए जैनप्रन्थ मिलते हैं। सूचीपत्र मैंगाइए ।
मेनेजर, जैनग्रन्थरत्नाकर कार्यालय,
हरियाग, पोट गिरगाँव, बम्बई ।
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प्रद्युम्नचरित।
सरल हिन्दी भाषामें सरस और सुन्दर पुराण । श्रीसोमकीर्ति
आचार्यके संस्कृत ग्रन्थका बोलचालको भाषामें-जिसे सब
समझ सकता है-हिन्दी अनुवाद । इसमें श्रीकृष्णनारायणके पुत्र
प्रद्युम्नकुमारका बड़ा ही मनोहर शृंगारादि रसोंसे परिपूर्ण चरित्र
लिखा गया है । शास्त्रसभामें बाँचिए और घर पर भी पढ़कर
जी वहलाइए । खुले पत्रोंपर अच्छे कागज और अच्छे टाइपमें ।
छपा है । मूल्य ३॥) साढ़े तीन रुपया।
मैनेजर, जैनग्रन्थरत्नाकर कार्यालय,
हीराबाग पो० गिरगाँव, बम्बई.
293aards:90
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