Sanmati Library, Jaipur
Shanti-sopan
Front matter
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श्री ३० ज्ञानानंद जी न्यायती द्वारा अहिला प्रचा.
रणी सभा काशीके लिये अहिंसा प्रेस भदैनी घाट-काशी
से मुद्रित।
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पुस्तक मिलने का पता:-
मेनेजर अहिंसा प्रचारिणी सभा,
काशी।
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* अहिंसा ग्रन्थमाला, प्रथम पुष्प । *
शान्ति-सोपान
परमानन्द स्तोत्र, स्वरूप-संबोधन, सामायिक.पाठ
मृत्यु-महोत्सव और समाधि-शतक का
भावानुवाद।
श्री ब्रह्मचारी ज्ञानानन्द जी कृत ।
प्रकाशिका-
श्री अहिंसा प्रचारिणी सभा, काशी।
श्रावण
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श्री वीर नि० सं० २४४८।
ग्रन्थ सूची- पृष्ठ- १ से 8 तक १०-२३ ॥ १-परमानन्द-स्तोत्र २-खरूप-संबोधन ३-सामायिक-पाठ ४-मृत्यु-महोत्सव ५-समाधि-भातक २६-४३ " ४४-१२६ ॥
शानं न किं किं कुरुते नराणाम् ।
समर्पण।
श्रीमान् माननीय महानुभाव न्यायाचार्य
पंडित गणेश प्रसाद जी वर्णी
संस्थापक स्याद्वाद,महाविद्यालय काशी
घ सत्त-सुधा-तरंगिणी पाठशाला
सागर के कर कमलों में लघु
लेखक द्वारा सादर
समर्पित।
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जयति जगति जिन शासनम् । भूमिका। साहित्य-सेवी, शिक्षित-समुदाय इस बातको भली-भांति जानता है कि संसार के समस्त रसों में शांति रस सब से ऊंचे दर्जे का है। क्रोधादि कपायों के प्रचण्ड संताप से जब किसी को प्रात्मा तप्त हो जाया करती है तब बड़ी २ नदियों की निर्मल धारायें, शीतल चंदन, चन्द्रमा, खस, केवड़े और मलयगिरि की प्रातःकालीन शिशिर सुगंधित निर्मल अनिल प्रादिक सब मिल कर भी उस संताप को दूर करने में समर्थ नहीं हुआ करते । उस संताप के नष्ट करने की शक्ति यदि किसी में होती है, तो वह केवल संसार के स्वभावको जान- ने वाले लरल चित्त सज्जनों के सुधा-नावी उपदेश में होती है। इसी एक रामबाण औषधि के सेवन से यह क्रोधादि कंपाय का भयंकर हार्दिक रोग शांत हो सकताहै। प्रवल से प्रवल प्रतापी योद्धा बड़ी २ तोप, तलवार और मशीनगनों का भय दिखा कर मो जिस मस्तक को रंचमात्र नीचा नहीं कर सकते, उली उन्नत मस्तक को महर्षि पुरुष, प्रशम-पीयूप- पोपक एक-दो वाक्य सुना कर उरणों में झुका लिया करते । इस प्रकार संसार भर को वश करने में समर्थ और बिना प्रयत्न हमेशा पाल रहने वाले शांतिमय शस्त्र की महिमा में और अधिक कुछ न लिख कर प्रत पुस्तक शांति-सोपान के (विषयमें हम यह सूचित कर देना आवश्यक समझते हैं कि इस - (२) पुस्तक में जिन परमानंद स्तोत्र, श्रीश्रकलंक देव विरचित खरूप-संबोधन मृत्यु महोत्सव व श्रीपूज्यपाद स्वामी रचित समाधि-शतक, नामक ग्रन्थों का सरल अनुवाद प्रकाशित किया गया है, वे चारों ही ग्रन्थ शांति. रस की पुष्टि करने में एक से एक उत्तम हैं। . प्रथम अन्थ परमानंद स्तोत्रमें यद्यपि केवल २४ ही श्लोक हैं। किन्तु ये थोड़े से ही पध, जब सब तरफ से चित्त-वृत्ति. को हटा कर मनन किये जाते हैं तब आत्मा में विचित्र भानंद उत्पन्न कर देते हैं । इस स्तोत्र के रचयिता का नाम यद्यपि हमें मालूम नहीं हो सका किन्तु इस बात को प्रकाशित किये विना हमसे नहीं रहा जाता कि जिन महानुभाव के द्वारा इस स्तोत्र की रचना हुई है उन्होंने केवल अपनी इस कृति से ही परमात्मपद की झलक दिखाने का कार्य कर दिया है। दूसरा स्वरूप-संवोधन ग्रंथ दि० जैन न्याय शास्त्रों के प्रसिद्ध कर्ता श्री अकलंक भट्टाचार्य का बनाया हुआ है। जिस प्रखर आचार्य ने न्याय, विनिश्चयालंकार. सरीखा अद्भुत ग्रंथ ३०,००० हजार श्लोकों में लिखकर समाप्त किया है और अष्टशती व राजवार्तिक सरीखे अनेक महत्व पूर्ण विशाल ग्रंथ रचकर अपनी अलौकिक विद्वत्ताका परिचय दिया हैं उन्हीं श्राचार्य महाराज ने इस छोटे से युक्ति पूर्ण ग्रंथ को केवल २५ श्लोकों में रचकर यथेष्ट भोजन.. कराने के. उत्तम पान का बीड़ा खिलाने सरीखा काम कर दिया है। . अंथ कर्ता महानुभाव ने इस छोटे से अध्यात्म ग्रंथ में भी बाद (३) न्याय विषयक लेखनशैली की अद्भुत छटा दिखाये बिना नहीं छोड़ी। तीसरा सामायिक पाठ फेवला १२ श्लोकों में किसी महात्मा ने ऐसासुन्दर बनाया है कि भान पूर्वक पढ़ने से राग-द्वप की कालिमा का बोध करा देता है। चौथे: मृत्यु-महोत्सव ग्रंथ में हमने १८ मूल श्लोको के अतिरिक्त पूर्व में ७ श्लोक श्री रत्न फरंड श्रावकाचार में से भी सम्मलित कर दिये हैं। दिन-रात मौत से डरते रहने पाले संसारी जीवों के लिये मृत्यु महोत्सव के २५. श्लोक बड़े काम पी चीज है। इन श्लोकों को ध्यान पूर्वक पढ़ कर मनन करने से विवेकी पुरुषों का मृत्यु का भय वास्तव में दूर हो सकता है। पांचवा-समाधि-शतक ग्रंथ सर्वार्थ सिद्धि व जैनेन्द्र व्याकरण के सूत्र कर्ता श्री पूज्य पाद प्राचार्य के द्वारा १०५ श्लोकों में रचा गया है इस अपूर्व प्रन्थ के एक अनुभव पूर्ण श्लोक द्वारा ग्रंथ कर्ता महाराज ने जिस प्रशम-पीयूप का पान कराया है उसका पता पाठकों को इस ग्रंथ का मनन करने से ही लग सकता है । भयंकर सांसारिक दुःखों के रूप में पड़े हुए जिस पुरुष को अपनी आत्मा के उद्धार की उत्कट इच्छा हो उसको दुम्न कूप ले घाहर निकलने के वास्ते रज्जु (रस्सी) का काम देने के लिये यह ग्रंथ निःसन्देह समर्थ समझना चाहिये। तथा संसार के समस्त दुखों की (४) असली जड़ का पता लगाना हो और उस जड़ को काट डालने की जिसकी इच्छा हो उसका कार्य इस ग्रंथ के "मूलं संसार दुःखस्य; देह एवात्मधीस्ततः । त्यस्त्वनां प्रविशेदन्तर्बहिरव्यापृतेन्द्रियः ॥१५॥ केवल इस श्लोक के अर्थ को मनन करके तदनुकूल क्रिया करने ले चल जावेगा। इस प्रकार इन पांच छोटी २ पुस्तकों को शांतरस की। पोषक समझ कर भावानुवाद करके शांति लोपान के नाम से प्रकाशित कर दिया है। यदि पाठक महाशयों को हमारा यह प्रयास पसंद श्रावेगा तो आगामी और भी कोई पुस्तक अध्यात्म रसिक पाठकों की सेवा से समर्पित करने की चेष्टा की जायगी। मानवश यदि किसी श्लोक भाव व्यक्त करने में शुद्धि रह गई हो तो पाठक महोदय उसे सूचित करें। मिती श्रावण शुक्ला.१५ वी० सं० २४४८, प्रशम-पीयूष-पिपासु- ब्रह्मचारी-ज्ञानानंद । खजांची की नशियां-जयपुर। SEKSE श्री परमानन्दाय नमः। शान्ति-सोपान * परमानन्दस्तोत्र परमानंदसंयुक्तं, निर्विकारं निरामयं । ध्यानहीनान पश्यन्ति, निजदेहे व्यवस्थितं ॥१॥ अर्थ-परमानन्द युक्त रागादिक विकारों से रहित, ज्व- रादिक रोगों से मुक्त और निश्चय नय से अपने शरीर में ही 'विराजमान परमात्मा को ध्यानहीन पुरुष नहिं देख सकते। अनंतसुखसंपन्नं, ज्ञानामृतपयोधरं । : अनंतवीर्यसंपन्नं, दर्शनं परमात्मनः ॥२॥ अर्थ-अनन्त सुखविशिष्ट, ज्ञानरूपी अमृत से भरे हुए समुद्र के समान और अनन्त वल युक्त परमात्मा का स्वरूपं सम- झना चाहिये। निर्विकारं निराबाधं, सर्वसंगबिबर्जितम् ।
२ .. शान्तिसोपान परमानंदसम्पन्न, शुद्धचैतन्यलक्षणम् ॥३॥ अर्थ-रागादिक विकारों से रहित, अनेक प्रकार की सांसा- रिक बाधाओं से मुक्त, सम्पूर्ण परिग्रहों से शून्य, परमानन्द विशिष्ट, शुद्ध केवल ज्ञान रूप चैतन्य ही परमात्मा का लक्षण मानना चाहिये ॥३॥ : उत्तमा स्वात्मचिंतास्यान्मोहचिंता च मध्यमा। अधमा कामचिंता स्यात्, परचिंताऽधमाधमा-४ अर्थ अपनी आत्मा के उद्धार की चिंता करना उत्तम चिंता है, प्रकृष्टमोह अर्थात् शुभराग वश दूसरे जीवो के भले करने की चिंता करना मध्यम चिंता है, काम भोग की चिंता चिंता है और दूसरों के अहित करने का विचार करना अधम से भी अधम चिंता है ॥ ४॥ निर्विकल्पसमुत्पन्न ज्ञानमेव सुधारसं । विवेकमजुलिं कृत्वा तत्पिति तपस्विनः ।। करना अधम १ अर्थ- आत्मा के असली स्वरूप को विगाड़ने वाले अनेक प्रकार के संकल्पविकल्पों को नाश करने से जो. ज्ञानरूपी श्र- मृत उत्पन्न होता है उसको तपस्वी महात्मा ही विवेक रूपी अंजुलि से पीते हैं Mir "परमानन्दस्त्रोत्र। सदानन्दमयं जीवं यो जानाति, स पण्डितः। स सेवते निजात्मान, परमानन्दकारणम् ॥६॥ अर्थ-जो पुरुष निश्चय नय से सदा ही आत्मा में रहने वाली परमानन्द दशा को जानता है वही वास्तव में पंडित है और वही पुरुष अपनी आत्मा को परमानन्द का कारण समझ • कर वास्तव में उसकी सेवा करनी जानता है। नलिन्यां च यथा नीरं, भिन्नं तिष्ठति.सर्वदा । अयमात्मा स्वभावेन, देहे तिष्ठति निर्मल ७ अर्थ-जैसे कमल पत्र के ऊपर पानी.की बूंद कमल से हमेशा भिन्न रहती है, उसी प्रकार यह निर्मल आत्मा शरीर के भीतर रह कर भी स्वभाव की अपेक्षा शरीर से सदा भिन्न ही रहता है अथवा कार्माण शरीर के भीतर रह कर भी कार्माण. शरीरजन्य ,रागादि मलों से सदा अलिप्त रहता है॥७॥ द्रव्यकर्ममलैर्मुक्तं भावकम बिवर्जितम् । नोकर्मरहितं विद्धि, निश्चयेन चिदात्मनः ॥८॥ अर्थ-इस चैतन्य प्रात्मा का स्वरूप निश्चय करके ज्ञाना- 'घरणादि रूप द्रव्यकर्मों से शून्य, रागादिरूप भाव कर्मों से रहित व औदारिक वैक्रियिक आदि शरीररूप नोकर्मों से रहित जानना चाहिये। . . ।
CC शान्तिसोपान। un आनन्दं ब्रह्मणोरूपं, निजदेहे व्यवस्थितम् । ध्यानहीनान पश्यन्ति, जात्यन्धाइव भास्करम् ९ अर्थ-इस परम ब्रह्म रूप परमात्मा के श्रानन्दमय व- रूप को शरीर के भीतर ही मौजूद होते हुए भी ध्यान हीन पुरुष नहीं जानते हैं, जैसे अन्मांध पुरुष सूर्यको नहीं जानता है। तद्धयानं क्रियते भव्यमनायेन बिलीयते । तत्क्षणं दृश्यते शुद्धं चिच्चमत्कारलक्षणम् १० माक्षके इच्छुक भव्य जीवों को वही ध्यान करना चाहिये जिसके द्वारा यह चंचल मन स्थिर होकर परमात्मस्वरूप में विशेष रूपसें लीन हो जावे, यो कि जिस समय इस प्रकार का ध्यान होता है उसी समय चैतन्यचमत्कारस्वरूप परमात्मा का साक्षात् दर्शन होता है। ये ध्यानशीला मुनयः प्रधाना स्तदुखहीना नियमाद्भवन्ति । सम्प्राप्य शीघ्रं परमात्मतत्वं व्रजन्ति मोक्षं क्षणमेकमेव ॥११॥ : जिन मुनियों का उत्सम ध्यान करना ही. खभाव पड़ गया है वे मुनिपुंगव कुछकाल में ही नियम से सर्वदुःखों ५ परमानन्दस्त्रोत्र। से छूट कर अहंत स्वरूप परमात्मपदको प्राप्त हो जाते हैं और बाद में अयोगकेवली होकर क्षणमात्र में अपकर्म रहित अविनश्वर मोक्षधाम में सदा के लिये जाविराजमान होते हैं ॥११॥ आनन्दरूपं परमात्मतत्व, समस्तसंकल्पविकल्प मुक्तं स्वभावलीना निवसन्ति नित्यं जानाति योगी स्वयंमव तचं ॥१२॥ निज स्वाभाव में लीन हुए मुनि ही परमात्माके समस्त संकल्पों से रहित परमानंदमय खरूप में निरंतर तन्मय रहते हैं। और इस प्रकार के योगी महात्मा ही आगे कहे जानेवाले परमात्म-स्वरूप को स्वयं जानते हैं ॥१२॥ चिदानन्दमयं शुद्ध निराकारं निरामयं । अनन्तसुखसम्पन्नं सर्वसगविवर्जितम् ॥१३॥ लोकमात्रप्रमाणोत्यं निश्चये न हि संशयः । व्यवहारे तनूमात्रः कथितः परमश्वरैः ॥१४॥ श्री सर्वश देव ने परमात्मोका स्वरूप चिदानंदमय शुद्धः रूप-रस,गंध स्पर्शमय प्राकार से रहित, अनेक प्रकार के रोगों से सर्घथा शून्य, अनंतमुखं विशिष्ट व सर्व परिगृह ६ शान्तिसोपान। रहित बताया है। और निश्चय नयसे.आत्मा वा परमात्मा का प्राकार लोकाकाश के समान असंख्यात प्रदेशी तथा व्यवहार नयले कर्मोदय से प्राप्त छोटे व बड़े शरीर के समान बताया है॥ १३ ॥ १४॥ यत्क्षणं दृश्यते शुद्धं तत्क्षणं गताबिनमः । स्वस्थचितः स्थिरीभूत्वा, निर्विकल्पसमाधिना१५ इस प्रकार ऊपर कहे हुए परमात्माके स्वरूप को योगी पुरुष जिस समय निर्विकल्पसमांधिके द्वारा (ध्याता-ध्येय-ध्यान की अभिन्न रूप एक अवस्था हो जाने से ) जान लेता है उस समय उस योगी का चित्त रागादि जन्य आकुलता से रहित स्थिर होता है और उसकी आत्मा को अनादि काल से भ्रम में डालने वाले श्रज्ञानरूपी पिशाच का नाश हो जाता है। उस समय वह निश्चल योगी ही भागे कहे जाने वाले विशेषणों से विशिष्ट हो आता है। स एव परमं ब्रह्म, स एव जिनपुंगवः । स एव परमं तत्वं, स एव परमो.गुरुः॥१६॥ स एव परमं ज्योतिः, स एव परमं तपः । स एव परमं ध्यानं, स एवं परमात्मनः॥१८॥ स एव सर्वकल्याणं, स ए व सुखभाजनम् ।
परमानन्दस्रोत्र। स एव शुद्धचिद्रपं, स एव परमः शिवः ॥१८॥ .'' स एव परमानन्दः, स एव मुखदायकः । स एव परचैतन्यं, स एव गुणसागरः ।१९।। अर्थ-अर्थात् वह परमध्यानी योगी मुनि ही परमब्रह्म तथा धातिया कमों को जीतने से जिन, शुद्धरूप हो जाने से परम श्रात्मतत्त्व, जगतमात्र के हितका उपदेशक हो जाने से परमगुन, समस्त पदार्थों के प्रकाश करने वाले शान से युक्त हो जाने से परमज्योति, ध्यान ध्याता के अभेदरूप हो जाने से शुमा ध्यान रूप परमध्यान, व परम तप कप परमात्मा के पास्तविक स्वरूपमय हो जाता है तथा वही परमध्यानी मुनि ही सर्व प्रकार के कल्याण से युक्त, परमसुख का पात्र, शुद्ध विद्रुप, परमशिव कहलाता है और यही परमानंदमय, सर्व सुखदायक, परमचैतन्य श्रादि अनंतगुणों का समुद्र हो जाता है। १६ ॥ १७ ॥ १८ ॥१६॥ परमाल्हादसम्पन्नं, रागद्वेषविवर्जितम् । अर्हन्तं देहमध्ये तु, योजानाति स पण्डितः॥२०॥ अर्थ:इस प्रकार ऊपर कहे हुए परम आल्हादयुक्त, राग-द्वेष शुन्य, अर्हन्त देव को जो ज्ञानी पुरुप अपने देहरूपी मंदिर में विराजमान देखता व आनता है, वही पुरुष वास्तव में पंडित कहा जा सकता है ॥ २०॥ ,, ! । .
शान्तिसोधान। आकाररहितं शुद्धं, स्वस्वरूपव्यवस्थितम् । सिद्धमष्टगुणोपेतं, निर्विकारं निरंजनम् ॥२१॥ अर्थ-इसी प्रकार अरहंत भगवानके स्वरूप की तरह सिद्ध परमेष्ठी के स्वरूप को · रूपरसादिमय श्राकार से रहित, शुद्ध, निज स्वरूप में विराजमान, रागादि विकारों से शून्य. कर्म-मल से रहित, क्षायिक सम्यग्दर्शन, केवल शान, केवल दर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व, अन्यावांध, गुरुलघुत्व और अवगाहना रूप अष्ट गुणों से सहित चितवन करे। तत्सदृशं निजात्मानं, प्रकाशाय महीयसे । सहजानंदचैतन्यं, यो जानाति स पंडितः॥२२॥ सिद्ध परमेष्ठी के समान तीनलोक व तीनों कालवर्ती समस्त अनंत पदार्थों का एक साथ प्रकाश करने वाले केवल ज्ञान श्रादि गुणों की प्राप्ति के लिये जो पुरुष अपनी आत्मा को भी परमानंदमय, चैतन्यचमत्कारयुक्त जानता है, वही वास्तव में परिंडत है। पाषाणषु यथा हेम. दुग्धमध्ये यथा धृतं । तिलमध्ये यथा तैलं, देहमध्ये तथा शिवः। काष्टमध्ये यथा वन्हिः, शक्तिरूपेण तिष्ठति । अयमात्मा शरीरेषु, यो जानाति स पण्डितः॥२४॥ - 8 परमानन्दनोत्र। अर्थ-जिस प्रकार सुवर्ण-पाषाणमें सोनागुप्त रीतिसे छिपा रहता है, तथा दुग्ध में जैसे घृत व्याप्त रहता है, तिल में जैसे तैल व्याप्त रहता है उसी प्रकार शरीर में परमात्मा को विराज- मान समझना चाहिये। अथवा जैसे काष्ठ के भीतर अग्नि शक्तिरूप से रहती हैं उसी प्रकार शरीर के भीतर शुद्ध प्रात्मा को जो पुरुष शक्ति रूप से विराजमान देखता है वही वास्तव में पण्डित है ॥ २३ ॥ २४ ॥ शुभं भूयात् ॥
॥ श्रीः॥ , श्री भट्टाऽकलंकप्रणीत-स्वरूपसम्बोधन मुक्ताऽमुक्तकरूपोयः, कर्मभिः संविदादिना। अक्षयं परमात्मानं, ज्ञानमूर्ति नमामि तम् ॥१॥ अर्थ-मंगलाचरण करते हुए श्री अकलंकभट्टाचार्य कहते हैं कि जो अविनश्वर ज्ञानमूर्ति परमात्मा झानावरणादि द्रव्यकर्मों से, रागादिक भावकों से व शरीररूपनोकर्म से मुक्त (रहित ) है और सम्यग्शान आदि अपने स्वाभाविक गुणों से मुक्त (युक्त ) है उस परमानंदमय परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं। अर्थात् उपर्युक्त तीन प्रकार के कर्मों को नष्ट कर देने के कारण जो मुक्तरूप है और अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंत- वीर्य, आदि गुणों से युक्त होने के कारण जो अमुक्त रूप है और शान ही जिसकी मूर्ति है उस अविनश्वर परमात्मा को इसमें नमस्कार किया गया है। मीमांसक परमात्मा को कर्म रहित नहीं मानते इस लिये उनके मतको निराकरण करनेके लिये कर्म-मुक्त विशेषण दिया गया है, नैयायिक व पैशेषिक, मुक्तजीव में शानादि विशेष गुणों का भी प्रभाव मानते हैं इस लिये ज्ञानादि से अमुक्त विशेषण दिया है,कोईरमतावलम्वी मुक्तिसे फिर वापिस he-more--- ----- - स्वरूप-सम्बोधन । . 1 . श्राना मानते हैं इस लिये अक्षय विशेषण दिया गया है, सांख्य मतावलम्बी परमात्मा को ज्ञान रहित मानते हैं इसलिये शान- मूर्ति विशेषण दिया गया है । और मुक्तामुक्ताकहने से स्याद्वाद की सिद्धि.भी.की गई है तथा आगे भी प्रायः प्रत्येक श्लोक में स्याछाद की सिद्धि की जायगी ॥१॥ सोऽस्त्यात्मा सोपयोगोऽयं क्रमाद्धेनुफलावहः । यो ग्राह्योऽग्राह्यनाद्यन्तःस्थित्युत्पत्तिव्ययात्मकः२ अर्थ-वह परमात्मा'श्रात्मरूप होने से कारण स्वरूप है, और शान-दर्शन-रूप होने से कार्य स्वरूप भी है। इसी तरह केवल शानके द्वारा जानने योग्य होने से ग्राह्य स्वरूप है, और इन्द्रियों के द्वारा न जानने योग्य होने से अग्राह्य स्वरूप भी है। द्रव्यार्थिक नयको अपेक्षा नित्यरूप है, और परिणमन शील होने से पर्यायार्थिक नयको अपेक्षा उत्पाद-विनाश स्व- "भाव भी है। इस प्रकार परमात्मा में अनेक तरह से अनेकांत पना सिद्ध होता है ॥ २॥ : प्रमेयत्वादिमिर्धमैरचिदात्मा चिदात्मकः । ज्ञानदर्शनतस्तस्माचेतनाचेतनात्मकः ॥ ३ ॥ अर्थ-प्रमेयत्वादिक धर्मों की अपेक्षा से वह परमात्मा अचेतन रूप है और ज्ञान दर्शनको अपेक्षा से चेतनरूप भी शान्ति-सोपान। है अर्थात् दोनों अपेक्षाओं से चेतन अचेतन स्वरूप है। भावार्थ-श्रात्मा में एक चेतना नामका गुण है जिस गुणकी ज्ञान व दर्शन ये दो प्रर्यायें होती हैं। और इस चेतना गुण अथवो इसकी ज्ञान-दर्शन पर्यायोकी अपेक्षा से ही श्रात्मा चेतन कहलाता है, इस चेतना गुण के अतिरिक्त आत्मा में और जो प्रमेयत्व (जिसके होने से वस्तु शान का विषय होती है) श्रादि अनंत गुण ऐसे हैं जो कि पुद्गलादि अचेतन पदार्थों में भी पाये जाते हैं उन गुणों की अपेक्षा श्रात्मा एवं परमात्मा को अचेतन भी कह सकते हैं और इसी लिये श्रात्मा में चेतनपना व अचेतनपना सिद्ध होता है ॥ ३ ॥ ज्ञानाभिन्नो न चामिन्नो,भिन्नाभिन्न कथंचन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं, सोऽयमात्मेति कीर्तितः ॥४॥ अर्थ-वह परमात्मा ज्ञान से भिन्न है और शान से भिन्न नहीं भी है अर्थात् शान से कथंचित् (किसी अपेक्षा से) भिन्न है सर्बथा (सब अपेक्षाओं से) भिन्न नहीं है। इसी प्रकार वह परमात्मा शान से भिन्न है और शान से अभिन्न नहीं भी है अर्थात् शान से कथंचित् अभिन्न है सर्वथा अभिन्न नहीं है, क्योंकि पहले पिछले सब शानों का समुदाय ही मिल कर आत्मा कहलाता है। भावार्थ- श्रात्मा नित्य परिणमनशील पदार्थ है और उसमें अनंत गुण हैं जिनमें ज्ञान गुण एक ऐसा है कि जो हमारे - खरूप-सम्बोधन। १३ अनुभव में आता है और जिसके द्वारा हम अपने व दूसरे के आत्मा को जान सकते हैं इस कारण शान गुण को ही यहां आत्मा कहा गया है, दूसरी बात यह है कि यह शान या चेतना गुण आत्मा में हमेशा रहते हुए भी परिणमता (बदलता) रहता है इस कारण किसी एक समय के शानमात्रही श्रात्मा न होने से ज्ञान से प्रात्मा भिन्न है और सर्व समयों के शानों का समुदाय रूप होने से मान से आत्मा अभिन्न है इसी का- रण शान से आत्मा को सर्वथा भिन्न वा अभिन्न न मानकर कथंचित् भिन्न अथवा अभिन्न माना गया है॥४॥ स्वदेहप्रमितश्चायं, ज्ञानमात्रोऽपि नैव सः। ततःसर्वगतश्चायं, विश्वव्यापी न मर्वथा ॥ ५ ॥ अर्थ-वह परहंत परमात्मा अपने परम औदारिक शरीर के बरावर है और घरावर नहीं भी है अर्थात् समुद्घात (मूल शरीर में रहते हुए भी श्रात्मा के प्रदेशों का कारण विशेष से कार्मण आदि शरीरों के साथ वाहर निकलना)अव- स्था में जिस समय केवली भगवान की आत्मा के प्रदेश संपूर्ण 'लोकाकाश में फैल जाते हैं उस समय प्रात्मा औदारिक शरीर के बराबर नहीं है। इसी तरह वह परमात्मा ज्ञानमात्र है और शान मात्र नहीं भी है अर्थात् शान गुण को मुख्य करके व अन्य समस्त गुणों को गौण करके यदि बिचारा जाय तो आत्मा या परमात्मा शान मात्र दृष्टि में आता है और यदि अन्य गुणों १४ शान्ति-सोपान.। को मुख्य किया जाय तो ज्ञानमात्र दृष्टि में नहीं भी प्रांता है। इसी तरह ‘जब केवलशान के द्वारा सम्पूर्ण लोक व अलोक को जानने की अपेक्षा लेते हैं तब परमात्मा को सर्व- गत भी कह सकते हैं क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ परमात्मा से गत अर्थात् शात हैं और सम्पूर्ण पदार्थों को जानते हुए भी श्ररहंत परमात्मा अपने दिव्य औदारिक शरीर में ही स्थित . रहता है इस लिये वह विश्वव्यापी नहीं भी है। भावार्थ-परमात्मा में उपर्युक्त धर्म कथंचित् सिद्ध होते हैं, सर्वथा सिद्ध नहीं होते ॥ ५॥ नानाज्ञानस्वभावत्वादकोऽनेकोऽपि नैव सः । चैतनकस्वभावत्वादेकानेकात्मको भवेत् ॥६॥ अर्थ-उस आत्मा में मतिज्ञान, (इन्द्रिय व मन से वस्तु को जानना) श्रुतशान (मति शान से जाने हुए पदार्थ के सम्बन्धीको जानना) आदि अनेक शान होते हैं तथा और भी सम्यत्क्व ( सञ्चा विश्वास) चारित्र (सध्या आचरण ) आदि अनेक गुण होते हैं जिनके कारण यह आत्मा यद्यपि अनेक रूप. हो रहा है. तथापि अपने चेतन स्वरूप की अपेक्षा एकपने को नहीं छोड़ता। इसलिये इस आत्मा को कथंचित् एक.रूप भी जानना चाहिये और कथंचित अनेक रूप भी जानना चाहिये। : . भावार्थ:-जैसे एक पुरुष एक खरूप होकर भी पिता पुत्र चचा, भतीजा आदि रूप कहलाता है क्योंकि पिता की अपे- . खरूप-सम्बोधन। १५ क्षा उसको पुन, और पुन की अपेक्षा उसी को पिता, भतीजे की अपेक्षा चचा और चचा की अपेक्षा भतीजा कहते हैं। उसी तरह एक आत्मा यात्मपने की अपेक्षा एक स्वरूप होकर भी अपने धर्मों की अपेक्षा अनेक रूप कहा जाता है ॥६॥ नाऽवक्तव्यास्वरूपाधै निर्वाच्यःपरमावतः। तस्मान्नैकान्ततोवाच्या नापि वाचामगोचरम्॥ अर्थ-वह श्रात्मा अपने स्वरूप की अपेक्षा वक्तव्य (कहे जाने योग्य ) होने से सर्वथा श्रवक्तव्य (न कहे जाने योग्य ) भी नहीं है। और पर पदार्थों के स्वरूप की अपेक्षा प्रवक्तव्य होने से सर्वथा वक्तव्य भी नहीं है। भावार्थ-प्रत्येक पदार्थ अपने धर्मों की अपेक्षा से कहा जाता है या पुकारा जाता है परके धर्मोकी अपेक्षा से नहीं व्यवहार किया जाता जैसे कि आम का फलं, आम के नाम से कहा जाता है केला अमरूद आदि के नाम से नहीं कहा जाता। इस लिये प्रत्येक वस्तु में अपने स्वभाव से कहे जाने की योग्य- ता व अन्य पदार्थों के स्वभाव से न कहे जाने की योग्यता समझते हुए आत्मा में भी ऐसाही समझना चाहिये। स स्यादिधिनिषेधात्मा खधर्मपरधर्मयोः । समूर्तिर्बोधमूर्तित्वादमूर्तिश्च विपर्ययात् ॥८॥ अर्थ-वह आत्मा अपने धर्मों का विधान करनेवाला -- शान्ति-तोपान। व अन्य पदार्थों के धर्मों का अपने में निषेध करनेवाला है और शान के आकार होने से वह प्रात्मा मूर्तिक तथा पुद्गलमय शरीर से भिन्न होने के कारण प्रमूर्तिक है। भावार्थ-आत्मा में जैसे स्वरूप की अपेक्षा विधिरूप धर्म है वैसे पर के स्वरूप की अपेक्षा निषेधरूप धर्म भी है। क्योंकि जैले ज्ञानादिक भात्मिक धर्मों की अपेक्षा आत्माकी सत्ता सिद्ध होती है वैसे रूपरसादिक पुगल के धर्मों को अपेक्षा आत्मा की सत्ता नहीं सिद्ध होती । इसके अतिरिक्त, ज्ञान को पुंज होने के कारण जैते श्रात्मा मूर्तिक कहा जा सकता है उली तरह पुद्गल परमाणुओं का बना हुआ न होने से अमू- तिक भी कहलाता है ॥ ॥ इत्याद्यनेकंधर्मत्वं बंधमोक्षौ तयोः फलम् । आत्मा स्वीकुरुते तत्तत्कारणैः स्वयमेव तु ॥९॥ अर्थ-इस प्रकार पहले कहे हुए क्रमके अनुसार यह श्रात्मा अनेक धर्मों को स्वयं धारण करता है और उनके धर्मों के फल स्वरूप वंध व मोक्ष रूप भी कारणाधीन स्वयं परिण- मता है। भावार्थ-यह आत्मा राग-द्वेषादि कारणों से कर्म का गंध करके पराधीन व दुःखी भी अपने आप ही होता है, और प्रान, ध्यान, जप, तप, आदि कारणों से बंध अवस्था को नष्ट करके मुक्ति को प्राप्त कर स्वाधीन भीखयंही हो जाता है।
खरूप-सम्वोधन। कर्ता यः कर्मणां भोक्ता, तत्फलानां स. एव तुं । बहिरन्तरुपायाभ्यां तेषां मुक्तत्वमेवाहि ॥१०॥ :, 'अर्थ- जो प्रात्मा वाह्य शत्रु मित्र श्रादि व अंतरंग राग खेप आदि कारणों से शानावरणादिक कर्मों का कर्ता व उनके सुख दुःखादि फलों का भोक्ता है, "यही आत्मा वाथ स्त्री; पुत्र, धन, धान्यादि का त्याग करने से कर्मों के कर्ता भोक्तापने के व्यवहार से मुक्त भी है। अर्थात् जो संसार दशा'. में कर्मों का कर्ता च भोक्ता है घंही मुकंदशा में कर्मों का का भोका नहीं भी है ॥ १० ॥ संददृष्टिज्ञानवारित्रमुपायः स्वात्मलंब्धये । तत्वे याथात्म्यसस्थित्यमात्मनो दर्शन मंतम् ॥११॥ यथावस्तुनिर्णीति सम्यग्ज्ञानं प्रदीपवत् । . तत्स्वार्थव्यवसायात्मकथञ्चित्पमितेः पृथक् ।१२।। दर्शनज्ञानपर्यायेत्तरोत्तरमाविषु स्थिरमालम्बनंयद्धा माध्यस्थ्यं सुखदुःखयोः ।१३।। ज्ञाता दृष्टाऽहमेकाऽहं, सुख दुःखे न चापर। इतीदं आवनादान्य, चारित्रमर्थवापरम् ॥१४॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्शान और सम्यकचारित्र ये तीनों अपने शुद्ध आत्मखरूप की प्राप्ति अर्थात् संसारसे मुक्त अथवा १८ शान्ति-सोपान । होने के कारण हैं, जिनमें से आत्मा के वास्तविक स्वरूप या सात तत्वों के सच्चे धंद्धान को तो सम्यग्दर्शन कहते हैं। पदार्थों के वास्तविकंपने से निर्णय करने को सम्यग्ज्ञान कहते है। यह सम्यग्शान दीपक की तरह अपना तथा अन्य पदार्थों का प्रकाशक होता है, और अशान निवृत्ति रूप जो फल है. उससे कथञ्चित् भिन्न भी है। स्त्री, पुत्रादिक वाह्य पदार्थों की-मोह-ममता को त्याग कर जो अपनी ही क्रम २ से होने. वाली ज्ञान दर्शनादिक पर्यायों में श्रात्मा के उपयोग का स्थिर होना है. उसे सम्यक् चारित्र. कहते हैं । सांसारिक सुख दुःखोंमें मध्यस्थभाव रखने को सम्यक् चरित्र कहते हैं, या, मैं ज्ञाता दृष्टा हूं अपने कर्त्तव्य के फ़ल स्वरूप सुखदुःखों का भोगने वाला स्वयं अकेलाही हूं वाह्य स्त्री पुत्रादि पदार्थों का मेरे से कोई संबंध नहीं है , इत्यादि अनेक प्रकारकी शुद्ध आत्म स्वरूप में तल्लीन कराने वाली भावनाओं की दृढ़ता को भी सम्यक चारित्र कहते हैं ॥ ११ ॥ १२॥ १३ ॥ १४॥ तदेतन्मूलहेतोः स्यात्कारण सहकारकं । तहामु देशकालादि तपश्च बहिरंगकम् ॥१५॥ अर्थ:--सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान व सम्यकचारित्र को जो ऊपर के श्लोकों में मोक्ष प्राप्ति का मूल कारण बताया है उनके सहकारीफारण बाह्यदेश कालादिक व अनशन, अवमोदर्य श्रादि वाह्य तप समझने चाहिये। .. 14 - खलंप-सम्बोधन । .. भावार्थ-मोक्ष प्राप्ति में जैसे रत्नत्रयं अंतरंग कारण है धैसे ही उत्तम क्षेत्र दुःखमंसुखमा कालव वर्षभनाराचसं- हननं उपवास श्रादि तप वाह्य कारण हैं ॥ १५ ॥ इतीदं सर्वमालोच्य, सौस्थ्ये दौस्थ्ये च शक्तितः। आत्मानं भावयेन्नित्यं. रागद्वेषविवर्जितम् ॥१६॥ अर्थ-इस प्रकार तर्क वितर्क के साथ आत्म स्वरूप को अच्छी तरह जान कर सुख में व दुःख में यथाशक्ति आत्मा को नित्य ही राग-द्वेष रहित चितवन करना चाहिये अर्थात् मुख सामिग्री के मिलने पर राग नहीं करना चाहिये और अनिष्टं समागम में द्वप नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये सब इए अनिष्ट पदार्थ यात्मा की कुछ भी हानि नहीं कर सकते। इनका सम्बन्ध केवल शरीर से रहता है ऐसा विचार रखना चाहिये ॥१६॥ कषायै रञ्जितंचतस्तवं नैवावगाहते। नीलीरक्तेऽम्बर रागा; दुराधेयो हि काकुमः॥१७॥ अंर्थ-क्रोधादि कपायों से रंजयामान हुए मनुष्य का चिंत्त वस्तुके असली स्वरूपको नहीं पहिचान सकता, जैसे कि नीले कपड़े पर केसर का रंग नहीं चढ़ सकता। भावार्थ-वस्तुके यथार्थस्वरूपको जानने का यत्न करने से भी पहले हृदय से क्रोधादि कंपायों को दूर करना । २०. शान्तिसोपान चाहिये तभी.वस्तु का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकेगा। जैसे. अग्नि से जली हुई भूमि में अंकुर नहीं उगता, वैसे ही कपाय से दुग्ध हृदय में धर्माकुर नहीं उगता इस दृष्टान्त को भी हृदयंगम करके प्रत्येक पुरुष को निरन्तर. कपायों को दूर करने के लिये पूर्ण प्रयत्न करते रहना चाहिये । जिससे कि वे संसार, सागर में डूबी हुई अपनी आत्मा का उद्धार कर सके ॥ १७॥ ततस्त्वं दोषनिर्मुक्त्यै, निर्मोहो सव सर्वतः। उदासीनत्वमाश्रित्य तत्वावंतापरी भव ॥१८॥ अर्थ-आचार्य व्यवहारी - जीव.से कहते हैं कि हे.माई जवे राग-द्वेष के विना दूर किये. अात्महित नहीं हो सकता तव तुमको राग व पनष्ट करने के लिये शरीरादिक पर पदार्थों का मोह त्याग कर और संसार शरीर व भोगों से उदासीन भाव धारण करके तत्त्व विचार में तन्मय रहना चाहिये ॥१८॥. हेयोपादेयतस्वस्य, स्थिति विज्ञाय हेयतः। 'निरालम्बों भवान्यस्मादुपेये सावलम्बनः॥१९॥ अर्थ-हेय (त्यागने योग्य ) व उपादेय (ग्रहण करने योग्य ) पदार्थों का स्वरूप जान कर हेय वस्तु को त्यागना चाहिये व उपादेय वस्तु का ग्रहण करना चाहिये। भावार्थ-जो स्त्री, पुत्र, धनधान्य, शत्रु मित्रादि पदार्थ -- Ap- • २१ खरूप-सम्बोधन। श्रात्महित के चाधक घ राग-द्वप के बढ़ाने वाले हैं उनसे सम्बन्ध छोड़ना चाहिये और संसारी जीवों को एक मात्र पंच परमेष्ठी का शरण ग्रहण कर शान ध्यानादि में तन्मय रहना चाहिये ॥१६॥ . - खं परं चेति वस्तुत्वं, वस्तुरूपेण भावय । उपेक्षाभावनोत्कर्षपर्यन्ते शिवमाप्नुहि ॥ २० ॥ अर्थ-अपनी आत्मा के व पर पदार्थों के असली स्वरूप का वार २ चितवन करना चाहिये, और- समस्त संसारी पदार्थो की इच्छा का त्याग करके उपेक्षा भावना.( राग-द्धप के त्याग की भावना ) को, बढ़ाते २ मोक्ष - पद प्राप्त करना चाहिये ॥ २० ॥ माक्षेऽपि यस्यनाकांक्षा स मोक्षमधिगच्छति । इत्युक्तवाहितान्वेषी,कांक्षा न स्वापि योजयेत्२१ अर्थ जब किसी साधु महात्मा पुरुष के हृदय से मोक्ष की भी इच्छा निकल जाती है तभी उसको मुक्ति प्राप्त हो सकती है इस सिद्धान्त वाक्य के ऊपर ध्यान देते हुए श्रात्म- हिन के इच्छुक जीवों को सभी पदार्थों की इच्छा का त्याग करना चाहिये। भावार्थ-किसी भी पदार्थ की प्राप्ति प्रयत्न करने से होती है इच्छामात्र से नहीं होती, यहां तक कि मोक्ष की इच्छा २२ शान्ति-सोपान । - करने से मोक्ष भी प्राप्त नहीं होता, किन्तु इच्छा करने से 'मोक्ष प्राप्ति में उलटी वांधा उपस्थित होती है, इसलिये प्रात्मा का हित चाहने वाले पुरुषों को इच्छा सर्वथा त्याज्य सम- झना चाहिये ।। २१ ॥ सापि च स्वात्मनिष्ठत्वात्सुलभा यदि चिन्त्यते। आत्माधीने सुखे तात; यत्नं किं न करिष्यसि।२२। अर्थ-यदि कोई यह कहें कि इच्छा करना तो अपने आधीन होने से सुलभ है किन्तु फल प्राप्ति अपने प्राधीन ने होने से कठिन है इसलिये इच्छा किसीभोवस्तु की जा सकती है, ऐसा कहने वाले को प्राचार्य करुणा पूर्वक कहते हैं कि हे भाई, जैसे इच्छा करना श्रात्माधीन होने से सुलभ हैं वैसे ही परमानन्द मय सुख का पाना भी तो श्रात्मा के ही प्राधीन है इसलिये तुम उस सुख की प्राप्ति का प्रयत्न ही क्यों नहीं करते, जिससे कि संसार के झगड़ों से छूट कर हमेशा के के लिये निराकुलित हो जाओ ॥ २२ ॥ खं परं विद्धि तंत्रापि; व्यामोह छिन्धि किन्त्विमम्। अनाकुलस्वसंवेद्य, स्वरूपे तिष्ठ केवले ।२३॥ अर्थ-श्राचार्य कहते हैं कि मुक्ति प्राप्त करना भी अपने ही श्राधीन समझ कर स्व और पर को जानना चाहिये तथा पाहा पदार्थों के मोह को नष्ट करना चाहिये, और प्राकुलता स्वरूप-सम्बोधन। २३ - . रहित स्वानुभवगम्य केवल अपने निज स्वरूप में ही स्थिर होना चाहिये ॥ २३ ॥ स्वःवं स्वन स्थितं स्वस्मै स्वस्मात्स्वस्याविनश्वरे। स्वस्मिन्ध्यात्वालभेत्स्वेत्थमानंदममृतं पदम् २४ अर्थ-इस श्लोक में प्राचार्य श्रात्मा में ही. सातो कारक सिद्ध करते हुए कहते हैं कि व्यवहारी जीवों को अपने ही श्रात्मा में अपने ही श्रात्महित के लिये अपने ही द्वारा अपने श्राप ही अपना.ध्यान करना चाहिये, और अपने ही ध्यान से उत्पन्न हुए परमानन्द्र.मय अविनश्वर पद को प्राप्त करना चाहिये ॥२४॥ इति स्वतत्वं परिभाव्यवाड्मयं, यं एतदाख्याति शृणोति चादरात् । कगति तस्मै परमार्थ सम्पदं, स्वरूपसंबोधनपंचविशतिः ॥२५॥ अर्थ-श्री अकलंक भट्टाचार्य उपसंहार करते हुए ग्रन्थ' का महात्म्य वर्णन करते हैं कि जो पुरुषः पच्चीस श्लोकों में कहे हुए इस स्वरूपः सम्बोधन ग्रन्थ को पढ़ेंगे ' सुनेंगे और इसके वाक्यों द्वारा कहे हुए, आत्म तत्व का वारंवार मनन करेंगे उनको यह ग्रन्थ परमार्थ की सम्पत्ति अर्थात् मोक्षपद प्राप्त करावेगाः॥२५॥ . , .
॥ श्रीः॥ सामायिक-पाठ। सिंद्धव तुवची भक्त्या, सिद्धान् प्रणमतः सदा। सिंद्धकार्याः शिवं प्राप्ताः,सिद्धिं ददनु नोऽव्ययाम्? अर्थ-श्री सिद्ध परमेष्ठी व जगत सिद्ध सभी पदाथों के कहने वाले जैन आगम को अथवा श्रागम के मूलकर्ता श्री अरहंत भगवान् को भक्ति पूर्वक नमस्कार करके व उनके बताये हुए मार्ग पर चल करके जिन पुरुषों ने संसार-दुःख के नष्ट करने रूप कार्य सिद्ध कर लिया है, ऐसे जीवन्मुक्त अरहंत देव व मोक्ष प्राप्त सिद्ध परमेष्ठी, हमको भी अविनश्वर पद प्राप्त करावे भावार्थ-जिन पुरुषों ने श्री अरहंत देव व सिद्ध परमेष्ठी के अपना आदर्श मान कर व उनके बताये हुये मार्ग का श्रव- लम्बन लेकर अंरहंत व सिद्ध पद प्राप्त किया है वे हमको भी उसी-अविनश्वर-पद के मार्ग पर लगावें। इस श्लोक में यह वात भी बता दी गई है कि मोक्ष प्राप्ति का एक मात्र उपाय श्री अरहंत व सिद्ध परमेष्ठी को आदर्श मान कर उनके बताये हुए मार्ग का अवलम्बन करना ही है ॥ १.॥ नमोऽस्तु धौतपापेभ्यः सिद्धभ्य ऋषिसंसदि ।
૨૫ ": . सामायिक-पाठ। सामायिकं प्रपद्यऽहं, भवभ्रमणसुदनम् ॥ २॥ अर्थ-समस्त कर्म:कलंक.को नष्ट कर देने वाले श्री सिद्ध परमेष्ठी को अत्यन्त भक्ति सहित अपने मनो मंदिर में विराज मान करके महर्षि पुरुषों के रहने योग्य कोलाहलादि ले रहित पवित्र स्थान में स्थित होकर संसार दुःख को नाश करने वाली तथा परमानन्द पद को प्राप्त कराने वाली सामायिक को मैं प्रारम्भ करता हूं ॥२॥ साम्यं में सर्वभूतेषु, वैरं मम न केनचित । आशा सवीं परित्यज्य, समाधिमहमाश्रये ॥३॥ अर्थ-सामायिक करते समय ऐसी भावना करनी चाहिये कि सम्पूर्ण जीव मात्र में मेरी समता रहे, वैर भाव 'किसी के साथ भी न हों, और समस्त सांसारिक इच्छाओं को त्याग कर मैं निरन्तर श्रात्मध्यान में तल्लीन रहूं ॥३॥ रागद्वेषान्ममत्वादा, हा मया ये विराधिताः । क्षमंतु जंतवस्ते मे, तेभ्यः क्षमाम्यहं पुनः॥४॥ . - अर्थ-अनादि काल से अव तकः संसार चक्र में भ्रमण करते हुए मैंने राग-द्धषवामोह वश जिन जीवों का घात.किया है उन से मेरी अति विनय पूर्वक परोक्ष प्रार्थना है कि वे 'मुझे क्षमा करें मुझे स्वयं भी अपनी प्रवादि काल से अब तक
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शान्ति-सोपान।
निरंतर बनी रही धुई अपनी इस दुर्बुद्धि का अत्यंत खेद है.।
इसके अतिरिक्त जिन जीवों से मेरे प्रति कुछ अपराध बन
गया होगा. उनको.भी मैं सरल हृदय से क्षमा करता हूँ ॥.४ ॥
मनसा वपुषा बाचा, कृतकारितसम्मतैः ।
रत्नत्रयमवंदोष, गहें निंदामि वर्जये ॥ ५॥
अर्थ-सामायिक में यह भी विचारना चाहिये कि मन
वचन काय से की हुई कृत कारित व अनुमोदना के द्वारा जो
मैंने अपने रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान व सम्य-
फूचारित्र में दोष लगाया है उसकी मैं गर्हा व निंदा करता हूं
और उस दोषका परित्याग करता हूँ॥५॥
तरश्चं मानव दैवमुपसर्ग सहेऽधुना।
कायाहार कषायादीन, सत्यजामि त्रिशुद्धितः॥६॥
अर्थ-तिर्यञ्च मनुष्य : व देवों से किये हुए उपसर्ग:को.
भी शांति पूर्वक सहन करने के लिये मैं इस. समय तैयार हूं.
और शुद्ध मन बचन काय पूर्वक शरीर ले ममत्व त्यागता हूं।
सामायिक के काल तक श्राहार व अन्य परिग्रहों को छोड़ता
हूं, तथा क्रोधादिक कपायों को अपना शत्रु समझ कर यथा
शक्ति त्यागना चाहता हू॥६॥
रागं द्वष भयं शोक,प्रहपौत्सुक्यदीनताः।
व्युत्स्रजामि त्रिवा सर्वमरत रतिमेव च ॥ ७ ॥
सामायिक-पाठ। :२७ . अर्थ-राग, द्वोप, भय, शोक, हर्ष, उत्सुकता, दीनता रति श्रादि सभी दोषों को मैं आत्मघातक समझ कर मन वचन काय से सामायिक के काल तक त्यागता हूव हमेशा के लिये इनको त्यागने योग्य शक्ति प्राप्त करना चाहता हूं ॥७॥ जीवते मरणे लाभेलामे योगे विपर्यये। वंधावरौ सुख दुःखे, सर्वदा समता मम ॥८॥ अर्थ-जीवन मरण में,लाभ अलाभ में,संयोग थियोग में, शत्रु मित्र में, व सुख दुःख में, मेरे सदा समता भाव रहे ऐसा विचार करना चाहिये व सामयिक में इसी प्रकार का समता भाव रखना चाहिये ।।।। आत्मैव मे सदा ज्ञाने, दशने चरणे तथा । प्रत्याख्याने ममात्मैव, तथा संवरयोगयोः ॥९॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र व सम्यक त्याग में और कर्मों के रोकने व. ध्यानादि करने में मेरे एक आत्माही शरण है। भावार्थ-आत्मा की शुद्ध दशा हो जाने पर ये संवगुण प्राप्त हो जाते हैं अथवा ये सब गुण श्रात्मा की शुद्ध देशा से भिन्न नहीं है इस लिये श्रात्मा शुद्ध होने पर इनकी प्राप्ति के लिये पृथक् प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है ।। ६ एकों मे शाश्वतश्चात्मा, ज्ञानदर्शनलक्षणः । ३ - . . शान्तिसोपान, शेषा बहिर्मवा भावाः सर्वे संयोगलक्षणाः॥१०॥ अर्थ-शानदर्शनस्वरूप एक नित्य आत्माही वास्तव में मेरी निधि है, वाकी कमों के संयोग से होने वाले जो 'क्रोध मान माया लोभ राग द्वप आदि परिणाम हैं या स्त्री, पुत्र धन, धान्यादिक वाह्य पदार्थ हैं वे सब मुझसे भिन्न हैं उनसे मेरा वास्तव में कोई सम्बन्ध नहीं है,। १० ॥ संयोगमूला जावेन, प्राप्ता दुःखपरम्परा। तस्मात्मयोगसंबंध,त्रिधासर्वत्यजाम्यहम् ॥११॥ अर्थ-इस मेरी, श्रात्मा ने अनादि काल से अब तक शानाचरणादि कमों के संयोग से ही संसार में रुलते २ बहुत दुःख पाये हैं इस लिये अब मैं मन बचन काय से कर्म संबंध को ही त्यागता हूँ । इत्यादिक भावनाओं व विचारों द्वारा सामायिक करते समय अपने,मन:को हित अहितका विवेचक घनाना चाहिये ॥११॥ एवं सामायिकात्सम्यक्, सामायिकमखंडितम् । वर्त्तते मुक्तिमानिन्या वशीभूतायते नमः ॥१२॥ अर्थ-इस प्रकार सामायिक पाठमै कही हुई रीतिके अनु सार परम अखंडित सामायिक को करने से जो.महात्मा पुरुष मुक्ति रूपी स्त्री के वशीभूत हो गये हैं अर्थात् जिनको मुक्ति प्राप्त हो गई है उनको मैं वारंवार नमस्कार करता हूं, १२ ॥ - ॥ श्राः ॥ ॥ मृत्यु-महोत्सव । सल्लेखना किसे कहते हैं और यह कव की जाती है उपसर्गे दुर्भिक्ष, जगसि रुजायाँ च नितीकारे। धर्मायः तविमोचनमाहुः सल्लेखनामाः ॥१॥ अर्थ-जिसका कुछ प्रतीकार या इलाज न किया जांसके ऐसे किसी भयंकर सिंह श्रादिद्वारा खाये जाने प्रादिके उपसर्ग प्राजाने पर, जिसमें शुद्ध भोजन सामिग्री न मिल सके ऐसे दुष्काल के पढ़ जाने पर, जिसमें धार्मिक व शारीरिक क्रियाये यथोचित नीति से न पल सके ऐसे बुढ़ापे के. श्राजाने पर, तथा किसी असाध्य रोग के हो जाने पर, धर्म की रक्षा के लिए शरीर के त्याग करने को व यथाशक्ति कपायोके मन्द करने को महात्मा पुरुप सल्लेखना या समाधि मरणं कहते हैं। '. आगेके श्लोकों में बताये हुए कारणों से इस मृत्यु अवस्था' को दुःखदायक न समझ कर एक प्रकार का उत्सव या महो- त्सव समझना चाहिये, क्योंकि यह समय श्रीयु पर्यन्त अभ्यास किये हुए शान, ध्यान, जप, तप, आदि शुभ कार्यो' की परीक्षा का है और किये हुए शुभ कार्यों के फल की प्राप्ति का है, जैसे चीर पुरुष बहुत काल तकशस्त्र विद्या का अभ्यास कर. युद्ध में जाते समय ही मानता है और मरने का भय ३० शान्ति-सोपान। नहीं करता, उसी तरह इस ज्ञानी पुरुप को भी मृत्यु समय में कुटुंवियों आदिक से व शरीर से मोह त्यागने में बहादुरी दिखानी चाहिये ॥१॥ तप के फल स्वरूप समाधि मरण के लिये प्रयत्न अंतःक्रियाधिकरणं,तपः फलं सकलदर्शिनःस्तुवते । तस्मायावद्विभव, समाधि मरण प्रयनितव्यम् ।।२।। अर्थ-श्रायु पर्यन्त किये हुए तप का फल श्री श्ररहंत देव ने अन्त समय में होने वाला समाधि सरण कहा है इसलिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति को लगा कर समाधि मरण करने में,परम प्रयत्न करना चाहिये। भावार्थ-जैसे बहुत काल तक शास्त्राभ्यास करके भी परीक्षा के समय अनुत्तीर्ण (फेल) हो जाने वाला छात्र प्रशंसा का पात्र नहीं होता, अथवा युद्ध में हार जाने वाले सिपाही की जैसे कोई वड़ोई नहीं करता उसी तरह वायुपर्यन्त तप आदि करके भी जो पुरुष मरण समय में शरीर के या सवंधियो के मोह में विह्वल हो जाते हैं, उनका तप या शाना- दिक पाना प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। इसलिए अन्त समय में शरीर को कारागृह (कैदखोने) और संबंधियों को पहरेदार के समान समझ कर दोनों से प्रेम त्यागना चाहिये • क्योंकि तप, ज्ञान, ध्यान श्रादि उत्तम कार्यों के करने से परलोक में मिलने वाली जो उत्तम विभूति है उसके शीघ्र मृत्यु-महोत्सत्र। ३१ प्राप्त होने में शरीर व सम्बन्धी वाधक होते हैं ॥२॥ समाधि मरण के समय का कर्तव्य । स्नहं बैरं संगं, परिग्रहं चापहाय शुद्धमनाः। स्वजनं परिजनमपि च, क्षात्वा क्षमयेत् प्रियंबचनः अर्थ--समाधि मरण के समय शुद्ध मन पूर्वक मित्रों से प्रेम, शत्रुओं से वैर व स्त्री-पुत्रादिक से पति-पिता श्रादि का संबंध त्याग कर और सर्व प्रकार की चेतन-अचेतन परिग्रह से अर्थात् गाय, भैंस, दासी, दास, रुपये, पैसे, घर, चार आदि से स्वामीपने की बुद्धि का त्याग करके सम्पूर्ण कुटुम्बियों व अन्य मेल मिलापी जनों से मिष्ट वचनों द्वारा क्षमा करानी चाहिए, और स्वयं भी सब से क्षमा-भाव धारण करना चाहिए। भावार्थ-गृहवास को सराय में किये हुए पड़ाव के समान या एक वृक्ष पर किये हुए अनेक पक्षियों के वसेरे के समान समझ कर अपने को अकेला ही समझना चाहिये, मुसाफिर खाने की भीड़ को भाई, बंधु, ताऊ, चचा, पुत्र, मिन आदि समझ कर पाकुलित होने से इस जीव का कोई भी लाभ नहीं होता है। इसलिये उक्त विचारों के द्वारा सब से मोह त्याग कर आनन्द पूर्वक इस जीर्ण, शीर्ण, दुर्गन्धमय व रोग ग्रसित शरीर से कूच करने के लिये तैयारी करनी चाहिये ॥३॥ --
शान्ति-सोपान।
मृत्यु-महोत्सव की तैयारी।
आलोच्य सर्वमनः कृतकारितमनुमतं च नि-जं।
ओरापयन्महावतमामरणस्थायि निःशेषम् ॥४॥
अर्थ- घायु पर्यन्त मन-वचन-कीय सेव कृत, कारित,
अनुमोदना (करना-कराना. सुशी-मनाना,) से संचय किये,
हुए समस्त पाप कार्यों की आलोचना (निंदा) कर के भरण
पर्यन्त के लिये समस्त महाव्रता (अहिंसा, सत्य, श्रचौर्य,
ब्रह्मचर्य व परिग्रह त्याग ) को धारण करना चाहियेः॥ ४॥
दम
शोकं भयमवसाद क्लेदं कालुष्यमरतिमपि हित्वा ।
सत्त्वोत्साहमुर्दीय च, मनः प्रसाध्यं श्रुतैरमृतः॥५॥
अर्थ-समाधि मरण के समय कायरपने के व दुःख के
कारण भूत शोक, भय, खेद,ग्लानि, कलुषताव अरति (वेचैनी)
आदि को त्याग कर अपने पराक्रम और उत्साह को पूर्ण रूप
से प्रकट करना चाहिये, और अमृतोपम शास्त्र-वचनों का
रसास्वाद करते रहना चाहिये ॥ ५॥
ESSA
समाधि मरण की विधि।
1..
आहारंपरिहाप्यच क्रमशः स्निग्धं विवर्द्धयेत् पानं ।
स्निग्धंच हापयित्वा. तरपानं परयेट क्रमशः ॥६॥
मृत्यु-महोत्सव । खरपानहापनामपि, कृत्वा कृत्योपवासमपि शक्त्या। पञ्चनमस्कारमनास्तनुं त्यजेत् सर्वंयत्नेन ॥७॥ अर्थ-समाधि मरण करते समय शरीर से ममत्व घटाने के लिये क्रम से पहले श्राहार का त्याग करके दुग्ध पान का अभ्यास करना चाहिये, पश्चात् दुग्ध का भी त्याग करके छाछ या गर्म जल के पीने का अभ्यास करना चाहिये, यादमें शक्ति पूर्वक जलादिक सभी वस्तुओं का त्याग करके उपवास करते हुए तथा सर्व यत्न से पंच परमेष्ठी के गुणों का ध्यान करते हुये शरीर को छोड़ना चाहिये ॥ ६॥ ७ ॥* मोक्ष नगर के लिये कलेवा । मृत्युमार्गे प्रवृत्तस्य, वीतगगो ददातु मे । समाधियोधपाथेयं, यावन्मुक्तिपुरी पुरः ॥८॥ अर्थ-श्री वीतराग सर्वश देव से प्रार्थना है कि मृत्यु महो- त्सव कपी कार्य में लगे हुए मुझको स्वरूप की सावधानी व रत्नत्रय की प्राप्तिरूपी पाथेय (कलेवा) देखें, जिससे कि मैं मोक्ष नगर में जा पहुँचूं। 1 . - * नोट-उपयोगी व प्रकरण योग्य समझ कर श्री रत्नकरंड श्रावका चार के ये उपर्युक्त ७ श्लोक भी मृत्यु महोत्सव के साथ में लगा दिये हैं। ३ -- -- ३४ शान्ति-सोपान । * भावार्थ-अरहंत देव .अादि की प्रार्थना या भक्ति करने से यद्यपि साक्षात् मोक्ष प्राप्ति नहीं होती, तथापि पुण्य बन्ध पूर्वक परंपरा हो सकती है ॥ ८ ॥ मरने में भयं क्यों किया जाय । कृमिजालशताकीर्णे, जर्जरे दहपजरे - भज्यमाने न भतव्य, यंतस्त्वं ज्ञानविग्रहः ॥९॥ अर्थ-मरण के भय को दूर करने के लिए मरते समय आत्मा को ऐसे समझना चाहिये कि हे श्रात्मन् ! तू तो ज्ञान रूपी दिव्य शरीर का धारी है इसलिये सैकड़ों कीड़ों के समूह से भरे हुए इस जीर्ण, शीर्ण, शरीर रूपी पीजरे के नाश होते समय तुझे कदापि भय करना उचित नहीं है। भावार्थ-यह विचारना चाहिये कि अनादि काल से संसार चक्र में भ्रमण करते २ ये हाड़ मांस के शरीर तो तें ने इतने पा लिये हैं, यदि वे सब इकट्ठे हो सकते तो उनसे यह सम्पूर्ण तीन लोक भर जाता, अव एक शरीर के नष्ट होने में भी दुःख मानना या भय करना योग्य नहीं है ॥ ४॥ नये नगर को गमन । ज्ञानिन भयं भवेत्कस्मात्याप्त मृत्यमहात्सवे । स्वरूपस्थः पुरं याति देहो देहान्तरस्थितिः॥१०॥ अर्थ-हे ज्ञानी आत्मन् ! इस मृत्यु रूप महोत्सव के प्राप्त ३ - ... . . . मृत्यु-महोत्सव। ३५. होने से तू क्यों भय करता है, क्योंकि इस मृत्युः के द्वारा तो तू अपने ज्ञानादिक स्वरूप में स्थित रहता हुआ शरीरान्तर रूप नये नगर को गमन करता है। '. भावार्थ-मृत्यु जब आत्मा की शान। दर्शन आदि पूजी को नहीं छीनती किन्तु उसको इस जीर्ण शरीरः रूपी टूटी फूटी झोपड़ी से निकाल कर नवीन शरीर रूपी मनोहर महल में पहुंचाती है तब उसको भयकारी या दुःखंदाई, न समझ कर हितकारी ही समझना चाहिये ॥ १० ॥ मरण से स्वर्ग के मुखं। मुदत्तं प्राप्यते यस्मात् दृश्यते पूर्वसत्तमैः। भुज्यते स्वर्भवं सौख्यं, मृत्युभीतिःकुत सताम् ११ अर्थ-महात्मा पुरुष कहते हैं कि जब मृत्यु के द्वारा जन्म. भर दिये हुए दानों के फल स्वर्गादिक के सुख प्राप्त होते. तब मृत्यु जैसे उपकारी मित्र से भय करना कैसे उचित हो सकता है ॥११॥ मृत्यु भूपतिका स्वागतः।। आग दुःखसतप्तः प्रक्षिप्तो देहपंजरे । नात्मा विमुच्यतेऽन्येन, मृत्युभूमिपति बिना॥१२॥ 'अर्थ-समाधि मरण करते समय विचारना चाहिये कि " - शान्ति-सोपान कर्म रूपी शत्रु ने मुझे इस देह रूपी पीजरे में लाकर बंद कर रक्खा है जिसके कारण मैं गर्भ में से लेकर अब तक.अनेक प्रकार के दुःख भोग रहा हूँ इस शरीर को मैंने जन्म भर. उत्तम भोजन कराये अच्छेश्वस्त्र पहिनाये और अनेक प्रकार की.सुख सामग्री प्राप्त कराई स्वयं अनेक प्रकार की लोभादि कषायों से संतप्त रहकर धन कमा २ कर इसको अनेक प्रकार के आराम दिये किन्तु इस कृतघ्न ने मुझे कभी सुख न दिया अच्छे भोजनों का मल मूत्र रुधिर श्रादि बना कर उनमें मुझको सड़ाया, दिव्य से दिव्य वस्त्रों को इसने बदबू दार बनाया संसार के अनेक जीवों से झूठे नाते जुड़वाये इत्यादि अनेक दुःखों के कारण मैं इससे तंग आ गया हूं मौर.मृत्यु रूपी वलवान राजा के विना और कोई इस दुष्प शरीर रूपी. पिशोच से मुझे बचाने के लिये समर्थ नहीं है इंसं लिये स्वयं ही मेरे पास आये हुए मृत्यु महाराज को मुझे बड़ा उपकार मनाना चाहिये ॥ १२॥ मृत्यु-मित्र। सबंदुःखप्रदं पिंडं, दूरीकृत्यात्मदर्शिभिः । मृत्युमित्रप्रसादन, प्राप्यते सुखसम्पदः ॥ १३ ॥ :: अर्थ-आत्म-दर्शी शानी पुरुष रूपी मित्र के प्रसाद से सवं दुःखों को देने वाले इस देह रूपी पिंड को त्याग कर सुख सम्पत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् गर्भ से लेकर मरण पर्यन्त . - ..
. . मृत्यु-महोत्सव । इस अपवित्र शरीर में निवास कर के जीवों को जो अनेक दुःख भोगने पड़ते हैं उन सबसे छुड़ा कर स्वर्गादिक सुख को प्राप्त कराने के लिये मृत्यु ही. समर्थ है इसी लिये. ज्ञानी पुरुष मृत्यु.को मित्र के समान जानते हैं ॥ १३ ॥ मृत्यु कल्प वृक्ष। मृत्युकल्पदुमे प्राप्त यनात्मार्थो न साधितः । निमग्नो जन्मजंबाले, स पश्चात् किं करिष्यति.१४॥ . अर्थ-जिस पुरुप ने मृत्यु रूपी कल्प वृक्ष को प्राप्त करके भी अपनी आत्मा का हित साधन नहीं किया वह फिर संसार रूपी कीचड़ में फंस कर अर्थात् दुर्गति में जाकर पाये हुये नीच शरीर में कैद हो जाने के बाद अपना क्या कल्याण कर सकेगा! :: भावार्थ-मरते समय जो जीव अपने परिमाणों को विशुद्ध रखता है वह उत्तम गति को प्राप्त होता है और जो मोह माया में फंसा कर मरता है वह दुर्गति में जाता है। इसलिये मरते समय जैसे बने वैसे प्रयत्न : पूर्वक विशुद्ध परिमाण रहने चहिये ॥ १४॥ ": "विना प्रयत्न सुन्दर शरीर व उत्तम इन्द्रियों की प्राप्ति जीर्ण देहादिकं सर्व, नूतनं जायते यतः । स मृत्युः किं न मोदाय,सतां सातोत्थितियथा१५ ६ - शान्ति-सोपान । अर्थ-जिस मृत्यु के द्वारा जीर्ण-शीर्ण शरीर व शिथिल इन्द्रियां छूट जाती हैं और नवीन शरीर व उत्तम इन्द्रियां प्राप्त हो जाती हैं । साता वेदनीयाकर्म के उदय को भाँति उस मृत्यु के श्राने पर जीवों को क्या हर्ष नहीं मानना चाहिये ? किन्तु अवश्य मानना चाहिये। भावार्थ-जैसे साता वेदनीय कर्मके उदय (फलदेने से जीवों को अनेक प्रकार की सांसारिक सुख सामिग्री प्राप्त होती हैं । उसो तरह मृत्यु होने पर भी परलोक में व इस भव में किये हुए पुण्य कर्मों का उत्तम फल मिलता है। इसलिये जैसे साता कर्म के उदय को संसारी जीव, चाहते हैं वैसे ही मृत्यु आने पर उसका भी हर्ष मानना चाहिये ॥ १५ ॥ सुख दुःख आत्मा को होता है न कि शरीर को। सुखं दुःखं सदा वत्ति देहस्थश्च स्वयं व्रजेत् । मृत्युभीतिस्तदा कय जायते परमार्थतः ॥१६॥ अर्थ-सुख दुःख का अनुभव शरीर में स्थित जो आत्मा है उसको होता है, शरीर को नहीं होता, और मुत्यु समय स्वयं शरीर से निकल कर परलोक में जाता ही है, यही रह कर शरीर की तरह नष्ट होता नहीं, फिर मृत्यु का भय वास्तव में किसको माना चाहिये ? अर्थात् किसी को भी मानना नहीं चाहिये, क्योंकि जिस आत्मा को सुख दुःख होता है उसका तो मरने से कुछ बिगड़ता नहीं, और जो शरीर नष्ट होता है, ? - मृत्यु-सहोत्सव। ३४ उसको मुख दुःसका ज्ञान नहीं, इस लिये विना शानके शरीर को भय भी नहीं लग सकता, आत्मा शरीर के मोह से भय करता है सो उसको नवीन शरीर मिल जाने के कारण भय उचित नहीं ॥१६॥ मृत्यु, शानो को प्रमोद और अज्ञानी को शोक का कारण है। समागसक्तचित्तानां मृत्युर्मीत्यै भवेन्नृणाम् । मोदायते पुनःसाऽपि. ज्ञानवैगग्यवासिनाम् १७॥ अर्थ-जिन पुरुषों का चित्त संसार में आसक्त हो रहा है उनके लिये मृत्यु भय का कारण है और जो महात्मा पुरुष प्रात्मशान में तल्लीन हैं तथा संसारसे उदास हैं उनको मृत्यु के धानेका भो हर्प होता है, शोक नहीं होता ॥ १७ ॥ देहाधिपति को बेरोक यात्रा। पुराधीशो यदा याति सुकृतस्य.बभत्सया । तदासो वार्यत केन प्रपञ्चः पाञ्चभौतिकै॥१८॥ 4 अर्थ-इस शरीर रूरी.नगर का मालिक यह आत्मा किये हुए पुरुष के फलको प्राप्त करने की इच्छा से जव परलोक यात्रा करता है तब यह पंच भूतमय शरीर उसको कदापि नहीं रोक सकता। भावार्थ-जब तक इस जीव के इस लोक सम्बधो आयु ४० शान्ति-सोपान । । ३ का उदय रहता है तभी तक शरीर आत्मा को कैद कर सकता है, और जिस समय यह श्रायु समाप्त हो जाती है व दूसरी श्रायुका उदय, प्रांजाता है उस समय प्रात्माको परलोक जाने से शरीर तो क्या बड़े २इन्द्रादिक भी नहीं रोक सकते ॥११॥ मृत्यु समय को पीड़ा शानी को वैराग्य का कारण है। मृत्यु काले सतां दुःखं, यद्भवेद व्याधिसभवम् । देहमाहविनाशाय, मन्य शिवसुखाय च ॥ १९ ॥ अर्थ-मृत्यु समय में जो प्रायः रोग संबंधी पीड़ा होती है उसको भी ज्ञानी पुरुष शरीर से मोह त्यागने में कारण मानते हैं और परलोक के उत्तम सुखों का निमित्त जानते हैं, क्योंकि अनेक प्रकार के रोगों से.जीर्ण शीण दुर्गन्धित शरीर में निवास करने से उनका इस तरह की अरुचि हो जाती है जैसी कि एक उच्चकुलीन पवित्र पुरुष को चाण्डाल श्रादि के दुर्गन्धं मय घिनावने घर से होती है ॥ १६ ॥ मृत्यु, को ज्ञानी सुख और अज्ञानी दुःख का कारण मानते हैं। ज्ञानिनाऽमृत संगाय मृत्युस्तापकरोऽपि सन् । आमकुम्भस्य लोकेऽस्मिन् भवत्पाकविधियथार अर्थ-अज्ञानी जीवों के मृत्यु दुःखदाई मालूम देने पर भी शानी पुरुषों को सुधामय सुखका कारण मालूम होती है। .
मृत्यु-महोत्सव।
४१
क्योंकि वे जानते हैं कि जब तक कच्चा घड़ा अग्नि में नहीं
पकाया जाता तब तक उसमें जैसे अमृत स्वरूप जल नहीं
भरा जाता, उसी प्रकार मरण समय में होने वाले रोगादिको
की पीड़ा को शांति पूर्वक सहे विना स्वर्ग मोक्ष के सुख नहीं
मिल सकते, ऐसे विचारों के कारण ही शानी पुरुषों को मरण
का दुःस्त्र नहीं होता ॥२०॥
कठिन तप व समाधि मरण के फल की समानता ।
यत्फलं प्राप्यते सद्भितायासबिडंबनात् ।
तत्फलं सुखसाध्यं स्यान्मृत्युकाले समाधिना॥२१॥
अर्थ--जो फल बड़े बड़े व्रती पुरुपों को कायक्लेश आदि
तप, व्रत आदि के धारण करने से प्राप्त होता है वह फल अंत
समय में सावधानी पूर्वक किये हुए समाधि मरण से जीवों
को सहज में ही प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ-जो आत्म विशुद्धि अनेक प्रकार के कठिन व्रता-
चरण व तप करने से होती है वह मरण-समय में कुछ काल
तक ही शांति धारण करने व संसार का मोह त्यागने से प्राप्त
हो जाती है ।। २१ ॥
शांति पूर्वक मृत्यु का फल ।
अनात भान्मयों शांति, न तिर्यग् नापि नारकः
धर्मध्यानी पुरो मर्यो ऽनशनी त्वमरेश्वरः ॥२२॥
૪૨ शान्ति-सोपान। अर्थ-जो पुरुष अंत समय में भारी रौद्र परिणाम न कर के शांति पूर्वक मरण करता है वह तिर्यञ्चगति व नरकगति में नहीं जाता, और जो ज्ञानी जन धर्म ध्यान पूर्वक उपवास कर के परलोक यात्रा करते हैं वे स्वर्ग के इन्द्रादि उत्तम पदों को प्राप्त करते हैं ॥ २२॥ समाधि मरण से ही ब्रत, तप व शास्त्रज्ञान सफल होते हैं । तप्तस्य तपसश्चापि, पालितस्य बनस्य च । पठितस्य श्रुतस्यापि, फलं मृत्युः समाधिना ॥२३॥ : अर्थ-बहुत काल तक किये हुए उग्र तपों का, पाले हुये बतों का और निरंतर अभ्यास किये हुए शास्त्र ज्ञान का एक मात्र फल शांति पूर्वक आत्मानुभव करते हुए समाधि मरण करना है "भावार्थ-यदि कोई पुरुष श्रायु पर्यन्त तप करके, व्रत पाल के व शास्त्राभ्यास करके भी मरण समय में मोह को घंटा कर शांत परिणाम न कर सका तो उसका व्रतादिक पालले का सब परिश्रम एक तरह से व्यर्थ ही समझना चाहिये ।। २३ ॥ नवीन से प्रेम और पुराने से अरुचि अतिपरिचितेष्वज्ञानव भवेत्प्रीतिरिति हि जनवादः चिरतरशगरनाशे, नवतरलाभे च किं भीरुः ॥२४॥ अर्थ संसारी जीवों का प्रायः ऐसा नियम है कि वे . . .
मृत्यु-महोत्सव । ४३ अच्छी से अच्छी वस्तु का भी अत्यंत परिचय होने पर एक प्रकार से तिरस्कार करने लगते हैं, और नवीन वस्तु चाहे "अच्छी भी न हो तो भी उसमें प्रीति किया करते हैं, इस नियम को लेकर शास्त्रकार संलारी जीवों से कहते हैं कि भाई मरने से तो तुम्हें पुराना शरीर छूट कर नवीन शरीर मिलता है फिर तुम मरने से क्यों डरते हो॥ २४ ॥ स्वर्गादत्य पवित्रनिर्मलकुले संस्मयमाणा जनैः। दत्वा भक्तिविधायिनां बहुविधं बाच्छानुरूपं धनम् भुक्त्वा भांगमहर्निशं परकृतं स्थित्वा क्षणं मण्डले। पात्रावेशविसर्जनामिव मृति सन्तोलमंते स्वतः२५ अर्थ-पहले श्लोकों में बताया है कि जो ज्ञानी महात्मा पुरुष मरण समय में धर्म ध्यान पूर्वक शान्तचित्त से व्रत उपवासादि करते हुये शरीर छोड़ते हैं। वे वर्गों में जाकर इन्द्रादिक की सम्पत्ति को प्राप्त करते हैं, अब इस श्लोक में बताते हैं कि वे ही पुण्यात्मा पुरुष वर्ग की आयु समाप्त कर बड़े २ पवित्र जगत पूज्य उत्तम कुलों में अवतार लेकर अनेक उत्तम पुरुषों से पूजे जाते हैं अर्थात् तीर्थंकरादि पद प्राप्त करते हैं, और कुछ कालं पृथिवी मंडल में विराजमान रहकर पुण्योदय से उपार्जित अनेक उत्तमोत्तम भोगों को निरंतर भोगते हुये तथा भक्त पुरुषों को मनोवांछित फल देते हुए, अंत में तप करके जगत को एक प्रकार को नाटक सा दिखा कर व अनादि कालीन कार्माण शरीर के संबंध को भी छोड़ कर परमानन्द मय परमपद को प्राप्त हो जाते हैं ॥ २५॥. इति शुभम् ।
॥श्रीः॥ समाधि-शतक श्री पूज्यपाद खामी विरचित । मोक्षार्थी पुरुषों को मोक्ष का स्वरूप बताने की इच्छा रखने वालेश्री पूज्यपादस्वामी प्रारम्भ में मंगला चरण रूप श्री सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार करते हैं:- येनात्मा बुध्यतात्मैव, परत्वेनैव चापरम् । अक्षयाऽनन्तबोधाय, तस्मै सिद्धात्मने नमः॥१॥ अन्वयार्थ-(येन श्रात्मा श्रात्मा एव अबुध्यत) जिसने आत्मा को श्रात्मा ही जाना है (च अपरं परत्वेन एव) और पर को पर रूप से ही जाना है (तस्मै अक्षयानन्तबोधाय सिद्धात्मने नमः ) उस अविनश्वर व अनन्त शान घाले सिद्ध परमेष्ठी को लिये नमस्कार हो ॥१॥ श्री भरहंत परमेष्ठी को नमस्कार । जयन्ति यस्या ऽवदतो जपि मारती, विभूतयस्तीर्थकृतो ऽप्यनीहितुः।
समाधि-शतक । ४५. शिवाय धात्रे सुमताय विष्णवे, जिनाय तस्मै सकलात्मने नमः ॥२॥ अन्वयार्थ-(अवदतः अपि अनीहितुः अपि यस्य तीर्थ- श्रतः) तालु, ओष्ठ आदि के द्वारा बचन को उच्चारण नहीं करते हुए भी और जगत के हित की इच्छा न रखते हुये भी जिस तीर्थंकर भगवान की (भारती विभूतयः जयन्ति) बाणी की-सब जीवों का हित प्रतिपादन रूपी-विभूति अथवा पाणी और समवशरणादि विभूति जय को प्राप्त होती हैं। (तस्मै शिवाय धात्रे सुगताय विष्णवे जिनाय सकलात्मने नमः अस्तु) उस कल्याणरूप, असि, मसि, कृषि आदि के उपदेश द्वारा अगत का उद्धार करने वाले, भनन्त चतुष्टय को प्राप्त करने वाले, केवल ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों में व्या- पने वाले, और घातिया कर्मों को जीतने वाले, दिव्य शरीर धारी परमात्मा के लिये नमस्कार हो ॥ २॥ प्रन्थ बनाने की प्रतिज्ञा । श्रुतेनं लिंगेन यथात्मशक्ति समाहितान्तः करणेन सम्यक् । समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां, विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये॥३॥ अन्वयार्थ-अब इष्टदेव को नमस्कार करने के अनन्तर 1 Anim- ४६ शान्तिसोपान। (विविक्त आत्मानं) कर्ममल रहित आत्मा के स्वरूप को (श्रुतेन लिंगेन समाहितान्तः करणेन सम्यक समीक्ष्य ) शास्त्र द्वारा, हेतु के द्वारा, और एकाग्र मन से प्राप्त किये अनुभव के द्वारा सम्यक् प्रकार जानकर (कैवल्य सुखस्पृहाणां) सकल कर्म के प्रभाव रूप कैवल्य पद और अनंत 'सुख की इच्छा रखने वालों के लिये ( यथात्मशक्ति अंभिधास्य) अपनी ज्ञानशक्ति को न छिपाकर कहूंगा ॥ ३ ॥ आत्मा के भेद। बहिरन्तः परश्चति, त्रिधात्मा सर्व देहिषु । उपयात्तत्र परमं, मध्योपासादहिस्त्यजेत् ॥ ४॥ अन्वयार्थ-(सर्व देहिषु बहि अन्तः च परः इति विधा आत्मा) सर्व जीवों में बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा इस प्रकार आत्मा को तीन अवस्था होती हैं। (तत्र मध्योपा- यात् बहिः त्यजेत् परमं उपेयात् ) उनमें अन्तरात्माको साध- नरूप मानकर वहिरात्मा अवस्था को छोड़ना चाहिये और परमात्म अवस्था को प्राप्तकरना चाहिये। भावार्थ-प्रत्येक संसारी जीव मिथ्यात्व अवस्था में बहि- रात्मा, सम्यक्त्व प्राप्त होनेपर अंतरात्मा, केवल ज्ञान प्राप्त हो जाने पर परमात्मा हो सकता है। अभव्य जीवों में भी अन्तरा- मावस्था और परमात्मावस्था शक्ति रूप से है परन्तु अभव्यों में इन दोनों अवस्थाओं के व्यक्त होने की योग्यता नहीं है।
समाधि-शतक। यदि ऐसा न माना जायगा तो फिर अभव्योमें केवल ज्ञाना- वरणीय फर्म का वन्ध व्यर्थ हो जायगा। सर्वज्ञ में भी भूत- प्रज्ञापननय की अपेक्षा वहिरात्मावस्था व अंतरात्मावस्था सिद्ध होती है। इन तीनों अवस्थानों में से जिन संसारी जीवों के बहिरामावस्थो व्यक्त हो रही है उनको प्रथम सम्य- ग्दर्शन प्राप्त कर वहिरावस्था को त्याग अपनी अन्तरात्माव- स्था व्यक्त करनी चाहिये ॥४॥ प्रत्येक अवस्था का लक्षण । बाहिरात्मा शरीगर्दा, जातात्मभ्राल्लिगन्तरः। चित्तदोषात्मविभ्रान्तिः, परमात्मातिनिर्मलः ॥५॥ अन्वयार्थ-( शरीरादौ जातात्मभ्रान्तिः वहिरात्मा) शरीर और आदि शब्द से लिये हुए बचन व मन में उत्पन्न हो रहा है आत्मा का भ्रम जिसको वह वहिरात्मा है (चित्त- दोषात्मविभ्रान्तिः शान्तरः) और जिसको चित्त के विकल्प रागादिक दोप व आत्मा के खरूप के विषय में कुछ भी भ्रान्ति अर्थात् अज्ञान नहीं है वह अंतरात्मा है (अतिनिर्मलः परमा- त्मा) और जिसको आत्मा अत्यन्त निर्मल हो गई है वह पर- मात्मा है ॥ ५॥ परमात्मा बाचक नाम । निर्मला कवला शुद्धो, विविक्तः प्रभुरव्ययः । - .
शान्ति-सोपान परमेष्ठी परात्मति, परमात्मेश्वरो जिनः॥६॥ अन्वयार्थ (निर्मलः) कर्मरहित (केवलः) शरीरादि संबंध रहित (शुद्धः) द्रव्यकर्म व भाव कर्म के नाश हो जाने से परम विशुद्धता युक्त (विविक्तः) शरीर और कर्म दोनों से रहित (प्रभुः) इन्द्रादिक का स्वामी (अव्ययः) प्राप हुए अनंत चतुष्टय से च्युत नहीं होने वालो (परमेष्ठी ) इन्द्रादि- क से भी वन्दनीक परमपद में स्थित रहने वाला (परमात्मा) संसारी जीवों से उत्कृष्ट जिसका आत्मा है। (ईश्वरः) अंतरंग अनंत चतुप्रय और वाह्य समवशरणादि ऐश्वर्य से जो युक्त है (जिनः) कर्मों को जीतने वाला (इति-परमात्मा) इस प्रकार बहुत से परमात्मा के वाचक शब्द होते हैं ॥ ६॥ बहिरात्मा की शरीरोदिक में आत्म वुद्धि होने का हेतु। बहिगत्मेन्द्रियद्वार,रात्मज्ञानपराङ्मुखः । स्फुरितश्चात्मनो देहमात्मवेनाऽध्यवस्यति ॥७॥ अन्वयार्थ-(इन्द्रियद्वारैः "वहिथग्रहणे " स्फुरितः वहि- रात्मा आत्म ज्ञानपराङ मुखो "भवति") इंद्रियों के द्वारा वाद्य पदार्थों को ग्रहण करने में ही लगे रहने के कारण यह वहिरात्मा आत्म ज्ञान से पराङ्मुख रहता है ( "ततएव " च श्रात्मनः देह नात्मत्वे न अध्यवस्यति") और इसी लिये अपने शरीर को आत्मा समझता है ॥ ७ ॥ - समाधि-शतक। ४६ . . . आत्मा में मनुय्यादिक की कल्पमा । नरदेहस्थमात्ममान, मविद्वान् मन्यते नरम् । तिर्यञ्चं तिर्यगङ्गस्थं, सुराङ्गस्थं सुरं तथा ॥८॥ नारकं नारकांगस्थ, नं: स्वयं तत्वतस्तथा। अनन्तानन्तधीशक्तिः,स्वसंवेद्योऽचलस्थितिः॥९॥ अन्वयार्थ (अचिहान् नरदेहस्सं आत्मानं नरं) बहिरा- त्मा मनुष्य के शरीर में स्थित श्रात्मा को मनुष्य और (तियं- हुगस्थं तिर्यञ्च तथा सुरास्थं सुरंमन्यते) तिर्यञ्च के शरीर में स्थित प्रात्मा को तिर्यश्च तथा देव के शरीर में स्थित प्रात्मा देव मानता हैं। (एवमेव नारकाहस्थं श्रात्मन नारक मन्यते ) इसी. प्रकार ,नारको के शरीर में स्थित श्रात्मा, को नारकी मानता हैं (तत्त्वतः स्वयं तथा न ) परन्तु यह श्रात्मा परमार्थ से स्वयं ऐसानहीं है। भावार्थ-मनुष्य गति मनुष्य प्रायु प्रांदिक कर्मों के. उदय के निमित्त से ही जीवों में मनुप्य तियश्च आदि का व्यवहार होता है वास्तव में यह जीव कर्म.. निमित्त विना स्वयं मनु- प्यादि रूप नहीं है किंतु.यह वास्तव में (अनन्तानंतधोशक्तिः स्वसंवेद्यः अचलस्थितिः) अनन्तानंत ज्ञानवाला अनन्तान्त बल वाला तथा अपने द्वारा ही जानने योग्य और अपने स्व- ४ शान्ति-सोपान। - रूप में ही निश्चल स्थित रहने वाला है ॥ ॥॥ पर के शरीर में परात्म धुद्धिः। स्वदेहसदृशं दृष्ट्वा, परदेहमचेतनम् । परात्माधिष्ठितं मूदः, परत्वेनाऽध्यवस्यति ॥१०॥ • 'अन्वयार्थ ( मूढःस्वदेहसदृशं परात्माधिष्ठितं अचेतनं परदेहं दृष्ट्वा परतत्वेन अध्यवस्यति )बहिरात्मा अपने शरीर के समान दूसरों की आत्मा से युक्त दूसरों के अचेतन शरीर को भी दूसरों का आत्मा समझा है अर्थात् चहिरात्मा जैले अपने शरीर को अपना- श्रात्मा मानता है उसी प्रकार स्त्री पुत्रादिक के शरीरकोनी पुत्रादिक काश्रात्मा मानता है ॥१०॥ ऐसा मानने से क्या होता है। स्वपराभ्यवसायन, देहेष्वविदितात्मनाम् । वर्तते विभ्रमः पुंसां, पुत्रभार्यादिगोचरः ॥११॥ अन्ववार्य-(अविदितात्मनां पुंसां देहेषु स्वपराध्यवसायेन पुत्रभार्यादि गोचरः वर्तते) अात्मस्वरूप को नहीं जाननेवाले पुरुपों को अपने और परके शरीर में ही अपनी और परकी श्रात्मा के निश्चय होने से पुत्र स्त्री आदि के विषय में विभ्रम होता है। अर्थात् मूढ़-जोव अपने शरीर के साथ स्त्री पुनादि के शरीर के सम्बन्ध को ही अपनी प्रात्मा का सम्बन्ध सस- .
समाधि-शतक। ५१ झता है और इसी लिये उनको अपना उपकारक समझता है तथा उनके संयोग में सुखी व वियोग में दुःखी होता है ॥१२॥ ऐसे बिभ्रम से और क्या होता है। अविद्यासंज्ञितस्तस्मात्संस्कारो जायते दृदः । येन लोकोऽङ्गमेव स्वं पुनरप्यभिमन्यते ॥ १२ ॥ अन्वयार्थ (तस्मात् अविद्यासंशितः दृढ़ःसंकारराजायते) उस विभ्रम से अज्ञानात्मक दृढ़ संस्कार उत्पन्न हो जाता है (येन लोकः अंगं एव पुनः अपि स्वं अभिमन्यते) जिसके कारण यह संसारी जीव अपने शरीर को ही फिर परलोक में भी अपना आत्मा मानता है। अर्थात् शरीरको आत्मामाननेका यह मिथ्या संस्कार परलोक में भी श्रात्माके साथ जाता है १२॥ देह में आत्म बुद्धि होने से और क्या असर होता है। . देहेस्वबुद्धिरात्मनं युनक्त्येतेन निश्चयात् । स्वात्मन्येवाऽऽत्मधीस्तस्मादियोजयतिदेहिनम्१३ अन्वयार्थ-( देहे स्वबुद्धिः निश्चयात् श्रात्मानं एतेन युनक्ति) शरीर में आत्मबुद्धि रखनेवाला पहिरात्मा, निक्षय से अपनी आत्मा को शरीर से सम्बन्ध करता है (स्वात्मनि एव प्रात्मधीः तस्मात् देहिनं वियोजयति) और अपनी आत्मा में ही आत्मबुद्धि रखने वाला सम्यग्दृष्टि अन्तरात्मा, अपनी ઘર शान्ति-सोपान . श्रात्मा को शरीर से पृथक् करता है। अर्थात् शरीरको प्रात्मा मानने से आत्मा के साथ नवीन २ शरीरों का सम्बन्ध होता रहता है जिसके कारण यह सूढ जीद निरंतर संसारमें रुलता है और जब शरीरादि से ममत्व छूट कर आत्मा में ही आत्म वुद्धि उत्पन्न हो जाती है तब यह जीव सम्यग्दष्टि अंतरात्मा हो जाता है और ध्यानादिक का सतत अभ्याल करके शरी- रादिक से सम्बन्ध छुड़ाकर अपने आत्माको मुक्त कर लेता है १२॥ शरीर को प्रात्मा मानने वाला पर करुणामाव । देहेष्वात्मधिया जाता पुत्रमार्यादिकल्पना। सम्पत्तिमात्मनस्ताभिर्मन्यत हा हंत जगत्॥१४॥ अन्वयार्थ-(देहेषु अात्मधिया पुत्रभार्यादिकल्पना जाता) शरीर मे आत्म बुद्धि होने से पुत्र, स्त्री आदिक की कल्पना होती है ( हा हतं जगत्ताभिः श्रात्मनः सम्पतिं मन्यते) खेद है कि इस प्रकार मोह से अपने असली आनंद को भूल कर यह मूढजीव स्त्री पुत्राद्विक के द्वारा ही अपने को समृद्धिशाली मानता है। अर्थात् जब तक इस संसारी जीवको मिथ्यात्व के उदय से अपनी अनंत चतुष्टयरूपी सम्पत्ति का ज्ञान नहीं होता तब तक यह स्त्री, पुत्र, धन, धान्यादिक वाद्यपदार्थों को ही अपने मान कर उनमें रमा.रहता है और मिथ्या अहं. कारवश सुख दुःख मानता रहता है ॥ १४ ॥ बहिरात्मा को अन्तरात्मा होने की शिक्षा। मूलं संसारदुःखस्य, देह एवात्मधीस्ततः 4 .
. . समाधि-शतका ५३ त्यस्तैनां प्रविशेदन्तर्बहिरव्याप्तेन्द्रियः ॥ १५ ॥ अन्वयार्थ-(देहे आत्मधीः एव संसारः दुःखस्य मूलं ) शरीर में आत्मवुद्धि का होना ही संसार के दुःखों का मूल कारण है (ततः एनां त्यक्त्वा बहिः अव्यापृतेन्द्रियः अन्तः विशेत्) इसलिये शरीर में श्रात्म बुद्धि को छोड़ कर और इन्द्रियों को वाह्य विषयों से रोक कर अंतरंग में प्रवेश करना चाहिये। भावार्थ-जितने भी संसार के प्रपंच हैं वे सब इस शरीर के साथ हैं, जब तक जीव इस शरीर को अपना मानता रहेगी तब तक वह संसार के दुःखदाई जंजाल से कभी नहीं छूट सकता ! इसी कारण इस अपूर्व गून्थ में ग्रन्थ- कार ने समस्त दुःखों की जड़ जो शरीर में आत्मबुद्धि का होना है उसके छुड़ाने के लिये ही अधिक जोर दिया है ॥१५॥ मत्तश्च्युत्वेन्द्रियदारे, पतितो बिषयवहम् । तान् प्रपद्याहमिति मां, पुरा वेद न तत्त्वतः ॥१६।। अन्वयार्थ:-(अहं पुरा मत्तः च्युत्वा इन्द्रियद्वारै विषयेषु पांततः) अन्तरात्मा अपनी पहली अवस्था को विचारता है कि मैं अनादिकाल से अब तकं व्यर्थ ही अपने स्वरूप से ध्युत होकर इन्द्रियों के द्वारा विषय कूप में पड़ा रहा ( तान् अहं इति प्रपद्य तत्वतः मां न वेदः) और उन विषयों को ही . .
शान्ति-सोपान । - अपना स्वरूप समझ कर वास्तव में अपनी आत्मा को श्राज तक मैंने नहीं पहिचाना। भावार्थ-जब तक जीव को अपनी असली रत्नत्रय रूप वा अनंत चतुष्टय रूप सम्पत्ति का परिक्षान नहीं होता तब तक ही वह वाह्य विषयों को सुखदायक समझता है और जब इसे अपने असली सुधारसका कुछ भी खाद श्रा जाता है तब बाह्य विषय उसे विष सरीखे मालूम पड़ने लगते हैं । इसी कारण जो जीव प्रथम विषय भोगों को सुख रूप मान कर सेवन करता था वही अब पहले भोगे हुए विषयों पर भी पश्चात्ताप करने लगता है ॥१६॥ आत्मज्ञान का उपाय। एवं त्यकत्वा बहिर्वाचं, त्यजेदन्तरशेषतः । एष योगः समासेन, प्रदीपः परमात्मनः ॥१७॥ अन्यवयार्थ-( एवं वहिर्वाचं त्यक्त्वा अन्तः अशेषतः त्यजेत् ) आगे के श्लोकों में कही जाने वाली रीति के अनु- सार बाह्य बचन को छोड़कर अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन धान्यादिक मेरे हैं इस प्रकार के मिथ्या 'प्रलाप को त्याग कर, अन्तरंग वचन को भी समस्त रूप से छोड़ना चाहिये, अर्थात् मैं सुखी हूँ, दुखी हूं, दूसरों का गुरु हू, व शिष्य हूं, इस प्रकार के श्रात्मविषयक मिथ्या विकल्प रूप अंतरंग बचन को भी छोड़ना चाहिये (एष समासेन योगः परमात्मनः प्रदीपः) यह संक्षेप
५५
.
समाधि-रातक।
से कही हुई वाह्य व अभ्यन्तर के वचन के त्याग रूप, चित्त
को विषयों से रोकने वाली समाधिही वास्तव में परमात्म-
स्वरूप को प्रकाशने के लिये दीपक के समान है ॥ २७
बार्य वचन को छोड़ने का उपाय |
यन्मया दृश्यते रूप, तन्न जानाति सवर्था
जानन दृश्यते रूप, ततः कन बबीम्यहम् ॥१८॥
अन्वयार्थ-(मया यत् दृश्यते, तत् सर्वथा न जानाति)
इन्द्रियों के द्वारा मुझे जो शरीरादिक रूपी पदार्थ दिखाई
देते हैं, वे किसी भी पदार्थको विल्कुल नहीं जानते ( जानत
रूपं दृश्यते न) और जो पदार्थों को जानने वाला चेतनद्रव्य
श्रात्मा है, वह मुझे इन्द्रियों से दिखाई नहीं देता (ततः अहं
केंने ब्रवीमि ) इस लिये में बात चीत करूं तो किससे करू।
भावार्थ-जो अपने अभिप्राय को समझे उसी के
साथ बात चीत की जा सकती है, लकड़ी पत्थर आदि
जड़ पदार्थों से कोई वचन व्यवहार नहीं करता, इस बात को
लेकर अंतरात्मा अपने मन को समझता है कि दूसरों का
आत्मा तो मुझे दिखाई देता. ही नहीं और शरीर दिखाई देता
है । वह कुछ जानता नहीं, फिर मैं शरीरादिक जड़ पदार्थोसे
क्या वात करू? अर्थात् मुझको चुप चाप रहना ही मुनासिव
है । ग्रन्थकार ने इस श्लोक में बचन गुप्ति पालने का और
विह्य को झंझटों से छूटने का एक उत्तम उपाय बताया है ॥१८॥
५६. शान्ति-सोपान। अंतरंग वचन को छोड़ने का उपाय यत्परैः प्रतिपाद्योव्ह, यत्परान् प्रतिपादये। उन्मत्तचष्टितं तन्मे, यदहं निर्विकल्पकः ॥१९॥ अन्वयार्थ-(अहं परैः यत् प्रतिपादये) में अध्यापकों से पढ़ने योग्य हूं', अथवा मैं शिष्यों को पढ़ाता हू; इसी प्रकार और भी मैं सुखी हूँ; दुःखी हूं, राजा हूं, रंक हू', इत्यादि अनेक प्रकार के आत्म विषयक संकल्प विकल्पों का जो करना है (तन् मे उन्मत्तंचेष्टितं, यत् अहं निर्विकल्पका ) वह सब मेरो पागलों सेरोखी चेष्टा है क्योंकि मैं तो वास्तव में निर्वि: कल्पक है। भावार्थ-जीव का असली वरूप- इन अनेक प्रकार के बचन विकल्पों के गोचर वास्तव में न होने पर भी जो यह मूढ़ जीव भ्रम वश सुखी-दुःखी, राजा-रंक: गुरु-शिष्य, आदि की अनेक मिथ्या कल्पनाये श्रात्मा में करता रहता है, यही अंतरंग वचन-विकल्प हैं जो कि श्रात्मा के लिये अत्यन्त दुखदाई हैं, इसलिये अपनी आत्मा को वास्तव में इन विकल्पों से रहित समझ कर इन विकल्पों को छोड़ना चाहिये ।। १६ ।। .. विकल्प रहित आत्मा का असली स्वरूप। यदग्राह्यं न गृहाति, गृहीतं नापि मुंञ्चति । .: जानाति सर्वथा सबै तत्स्वसंवेद्यमरम्यहं ॥२०॥ ..
समाधि-शतक ५७ अन्वयार्थ ( यत् भग्नाांन" एहातिः) जो शुद्ध श्रात्मा; अप्राधे रागद्वेषायिक को तो ग्रहण नहीं करता और ( गृहीतं न अपिमुञ्चति.) ग्रहण किये हुए केवल ज्ञानादिक का त्याग नहीं करता किन्तु (सवं सर्वथा जानाति.) सम्पूर्ण पदार्थों को सर्व प्रकार से जानता है (अहं तत् स्वसंवेद्य अस्मि ) मैं वही अपने द्वारा ही अनुभव में आने योग्य चेतन सव्य हूं । भावार्थ:-जब तक यह श्रात्मा केवल धान, केवल दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिकचारित्र आदि अपने असली गुणों को विकसित न करके रागी द्वेषी बना रहता है तब तक यह अशुद्ध कहलाता है और जब राग वषादि विभावों को छोड़ कर अपने असली गुणों को प्राप्त कर लेता है तब सम्पूर्ण पदार्थों का केवल ज्ञातामात्र रह जाता है बाह्य पदार्थों वा अपने रागादिकं विकारों का कभोका नहीं रहता, और यही जीव' का असली खरूप है।। २०॥ आत्मज्ञान होने से पूर्व की चेष्टा । उत्पन्नपुरुषप्रान्तेः, स्थाणा यद्धद्विचेष्टितम् । तद्वन्म चेष्टितं पूर्व, देहादिष्वात्मविप्रमात् ॥२१॥ अन्वयार्थ (स्थाणी उत्पन्नपुरुषभ्रान्तेः यद्वत् विचेष्टितम्) स्थाणु में पुरुष की भ्रान्ति हो जाने वाले मनुष्य की जैसी चेष्टा होती है (देहादिषु अात्मविभ्रमात् मे पूर्व तद्वत् चेष्टितम्) शरीरादिक में प्रात्मा काभ्रम रहने से, मेरी भी पहले शरी- रादिक के विषय में वैसी ही चेष्टा धी। है
'शान्ति-लोपाल।
.
में
भावार्थ-जैसे कोई पुरुष भ्रम से वृक्ष के ढूंठ को मनुष्य
मान कर उसके उपकारादि करने का विचार करने लगता
है उसी प्रकार में भी भ्रम से, पहले शरीरादिक :को-आत्मा
मान कर उनके उपकारादिक में लगा हुआ था. ॥ २१ ॥ ::
आत्मशान होने के बाद की चेष्टा ।
यथाऽसौ चष्टते स्थाणी, निवृत्त पुरुषाग्रहे।
तथाचष्टाऽस्मि देहादौ, विनिवृत्तात्मविभ्रमः ॥२२
...अन्वयार्थ (असौ स्थाणौ पुरुषाग्रहे निवृत्ते यथा चेष्टते)
यह मनुष्य स्थाणु पुरुष का भ्रम दूर होने पर जिस.प्रकार
उपकारादि के त्याग की चेष्टा करता है .( देहादौ विनिवृत्ता
त्मविभ्रमः तथा चेटः प्रास्मि) शरीरादि में आत्म-भ्रम दूर
होने पर मैं भी. उसी.प्रकार चेष्टा करने लगा हूं।
भावार्थ-जव स्थाणु को स्थाणु, पहिचान कर उसमें से
पुरुष विषयक अशान दूर हो जाता है तब वह .शानी मनुष्य.
उसके विषय में उपकारादिक की कल्पना भी छोड़ देता है.
क्योंकि उपकार करने को विचार स्थाणु को 'पुरुष मान कर
हुआ था वाद में निश्चय होने पर वह पुरुष निकला नहीं, तब
उपकार किसका किया जाता, इसी तरह इस जीव को जयः
सम्यत्व हो जाने से शरीरादि में आत्म-भ्रम नहीं रहतां तब
यह हदय से शरीर के संस्कारादि करने में भी उपेक्षा करने
लगता है ॥ २२ ॥
समाधि-शतक।
शुद्ध आत्मात्रीश्रादि लिंग और एकत्य आदिसंरया नहीं है।
येनात्मनाऽनुभूये हमात्मनैवात्मनात्मनि ।
सोऽहं न तन्न सा नासौ. नको न हो न वा बहा२३
अन्यवार्थ-(येन श्रात्मना धान्मना अात्मनि एव प्रात्मना
अहं अनुभूये ) जो मैं चैतन्य स्वरूप प्रात्मा अपनी आत्मामें हो
अपने स्वसंवेदनशान करके अपनी धात्मा को सनुभव करता
(सोऽहं, न तत्, न सा, न असौ, न एकः, न बौ, वा न
पहुः ) यह शुद्धस्वरूप में आत्मा, न तो नपुंसक हूँ, न श्री
है, न पुरुष, न एक रुप,न दो रूपन बहु रूप है।
भावार्थ-जीच में स्त्री पुरुप आदिक को व्यवहार
केपल शरीर के सम्बन्ध को लेकर होता है और एक पने
दो पने बहु पने का व्यवहार गुण-गुणी की भेदाभेद विवक्षा
को ले कर होता है। शुद्ध प्रात्म के अनुभव की दशा
शरीर की कल्पना है और न भेदा-भेद की विवक्षा है वहां तो
केवल यह आत्मा अपने मानानंद रस का परम कृप्ति के साथ
पान करता रहता है, इसलिये वहां ये पाय कल्पना नहीं
उठती ॥ २३ ॥
में न
है
::
शुद आत्मा का खरूप।
यदभावे सुषुप्तोऽहं, यद्भावे व्युत्थितः पुनः।
अतीन्द्रियमनिर्देश्य, तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ॥२४॥
शान्ति-लोपामा अन्वयार्थ-(यदभावे अहं सुपुप्तः, पुनः यद्भावे व्युत्थितः) जिस शुद्ध आत्म खरूप के प्राप्त न होने से मैं अब तक सोता रहा, और श्रव जिसके प्राप्त होने से जाग गया हूँ, (श्रहंतत् अस्मि ) मैं उसी शुद्ध स्वरूप वाला हूं ( "तच्च" अतीन्द्रियं, अनिर्देश्य, स्वसंवेद्यं ) और वह शुद्ध स्वरूप न इन्द्रियों से जानने योग्य है, और न बचन से कहने योग्य है किन्तु अपने, आप ही अंनुभव में आने योग्य है। भावार्थ-जब तक इस जीव को अपने शुद्ध खरूप की प्राप्ति नहीं होती तव तक यह एक प्रकार की प्रज्ञान निद्रा में पड़ा रहता है, और जब अज्ञान का नाश होकर शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है तभी यह वास्तव में जोगतो हुआ कह- लाता है ।। २४ ॥ शुद्धात्मखरूप का संवेदन करनेवाले की आत्मा में रागा दिक का अभाव हो जाने से शत्रु-मित्र की कल्पना नहीं रहती, अब इसी बात को दिखाते हैं। क्षीयन्तेऽत्रैव रागाद्यास्तत्त्वतो मां प्रपश्यतः । बांधात्मानंततः कश्चिन्न मे शत्रु न च प्रियः ॥२५॥ अन्वयार्थ (तत्त्वतः बोधात्मानं मां प्रपश्यतः " मम " अत्र एव रागाद्याः क्षीयन्ते) वास्तव में शुद्ध शोन स्वरूप अपनी मात्मा का अनुभव करने लगने से इसी जन्म में रागद्वेष .
समाधि-शतक। ६१ आदि नष्ट हो जाते हैं। ततः न मे फश्चित् शत्रुः न च. प्रियः) इस लिये न कोई मित्र मालूम पड़ता है.और न कोई शत्रु दिखाई देता है। भवार्थ-जव तक इस जीवको अपने चिदानंदमय सुधा- रस का स्वाद नहीं आता तब तक यह वाह्य पदार्थों को अपनी रागद्वेषादि रूपी अग्नि के शमन करने का उपाय ससझ, उनकी प्राप्ति के लिये भटकता फिरता रहता है, और अनुकूल सामग्री के वाधक-साधक जीवों को शत्रु-मित्र मानता रहता है, और जव इसको अपने स्वाभाविक सुधारस का स्वाद पाने लगता है तव वाह्य पदाथों में व उनके साधक-बाधक जीवों मैं इसकी उपेक्षा बुद्धि हो जाती है। इस कारण उस समय यह म तो किसी को मित्र समझता है और न शत्रु मानता है, क्योंकि मित्र की पल्पना राग-द्वप के कारण होती है और उपेक्षा होजाने से राग-द्वष वाह्य पदार्थों में उसके रहते नहीं ॥ २५ ॥ अब किसी ने यह प्रश्न किया कि तुम्हारा कोई शत्रु-मित्र नहीं रहता, किन्तु तुमको दूसरे पुरुष तो शत्रु-मित्र मान सकते हैं ? एसी का उत्तरः, खात्म संवेदन पाला हल प्रकार देता है। मामपश्यन्नयं लोको, न मे शत्र नं च प्रियः। मां प्रपश्यन्नयं लोको, न मे शत्र नं च प्रियः॥२६॥ यद्यपि ऐसी दशा में . शान्ति-सोपान । अन्वयार्थ-(मां अपश्यन् अयं लोकः : न मे शत्रुः नच प्रियः) मेरे स्वरूप को बिना जाने यह जगत् मुले शेत्रु अथवा मित्र नहीं मान सकता (मां प्रपश्यन् अयं लोक न में शत्रुः न च प्रियः) और मेरे स्वरूप को जान कर भी यह जगत मुझे शत्रु वा मित्र नहीं मान सकता। भावार्थ-खात्म संवेदी का यह कहना है कि परिचित व्यक्ति में ही शत्रु वा मित्र की कल्पना हुआ करती है अपरि- चित में नहीं होती, इसलिये प्रथम तो.ये संसारी जीव मेरे स्वरूप को जानते ही नहीं तब फिर मेरे. में ये शत्रु मित्र को कल्पना ही क्याकर सकते हैं, और कदाचित् यह माना जाय कि जानते हैं तो भी इनको शुद्धात्म स्वरूप का अनुभव हो जाने से मेरे में उपेक्षा बुद्धिं उत्पन्न हो जायगी, तब भो ये मुझ में शत्रु-मित्र की कल्पना नहीं कर सकेंगे।' बहिरामावस्था का त्याग और परमात्मपंद की भावना का उपदेश । त्यक्त्वैवं बहिरात्मानमन्तरात्मव्यवस्थितः। भावयेत्परमात्मानं सर्वसंकल्पवर्जितम् ॥२७॥ अन्वयार्थ (एवं बहिरात्मानं त्यक्त्वा अन्तरात्मव्यवस्थि- नः सर्वसंकल्पवर्जितं परमात्मानं भावयेत्) इस प्रकार पूर्व लिखे क्रमानुसार बहिरात्मपने का त्याग करके अन्तरात्मा बनना चाहिये और सब प्रकार के संकल्प विकल्पों से रहित . . . :
समाधि-शतक। प्रमात्मपद की प्राप्ति के लिये भावना करनी चाहिये ॥२७॥ . परमात्मपद की भावना का फल । सोऽहमित्यात्तसंस्कारस्ताम्मन् भावनया पुनः। तत्रैव दृढसंस्काराल्लमते ह्यात्मनि स्थितिम्।२८॥ अन्वयार्थ ('पुनः तस्मिन् भावनया सः अहं इति आस- संस्कारः) यार २ परमात्मपद की भावना करते रहने से। "वह परमात्मा मैं ही हू" इस प्रकार का दृढ़ संस्कार आत्मा में उत्पन्न हो जाता है (तत्र एव दृढ़संस्कारात् हि आत्मनि स्थितिं लभते.) और परमात्म स्वरूप का उढ़ संस्कार उत्पन्न होने से यह जीव निश्चय से अपने शुद्ध खरूप में स्थिर हो जाता है। - अभ्यास जब भावार्थ-उक्त प्रकार की दृढ़ भावना के इस जीव की परमात्मपद के साथ एकत्व वुद्धि हो जाती है तब यह जीव अपने को केवल शानमयी व अनंतसुख सम्प- न्नं समझने लगता है, और जब यह अपने को सर्वक्ष व अनंत सुखी मानने लगता है, तब छोटे-मोटे काल्पनिक सुख के कारण भूत वाह्य पदार्थों से इसका ममत्व स्वयं ही छूट जाता है जिसके कारण इसके राग-द्धष मंद होते २ नष्ट हो जाते हैं और इसको परमात्म पद की प्राप्ति हो जाती है ॥ २८ ॥ । . यहां किसी का प्रश्न है कि : परमात्मा-की भावना करना तो :
६४ शान्ति-सोपान। बड़ा कठिन है तब फिर जीवों की परमात्म-भावना में प्रवृत्ति क्यों होती है ? इसका उत्तर रूप श्लोक कहते हैं। मूढ़ात्मा यत्र विश्वस्तस्ततो नान्यद् भयास्पदम् । यतो मीतस्ततो नान्यदमयस्थानमात्मनः ॥२९॥ अन्वयार्थ-(मूढ़ात्मा यत्र विश्वस्तः ततः अन्यद् भया- स्पदं न) यह मूढ़ जीव जिन, शरीरस्त्री पुपादिक वाह्य पदाथा का विश्वास करता है, वे ही सबसे अधिक इसके लिये दुःख के कारण हैं इनके समान और कोई इसके लिये दुःखदाई नहीं है ( यतः भीतः ततः अन्यद् अभयस्थानं आत्मनः न ) और जिस परमात्म स्वरूप के संवेदन करने में यह जीव भय करता है दुःख मानता है; उसके समान और कोई पदार्थ आत्मा के लिये सुखदाई नहीं है। भावार्थ-जिस प्रकार सर्प से काटे हुए पुरुष को कडुवा नीम भी स्वादिष्ट मालूम देता है उसी तरह बिषय फपायों में फंसे हुये पुरुष को शरीरादिक बाह्य पदार्थ मनोहर दिखाई देते हैं और जैसे ज्वर की बीमारी में उत्तम मिठाई भी अरुचि. कर मालूम होती है उसी तरह मूढ़ जीव को परमात्मा का अनुभव करने में भी - कष्ट मालूम देता है, किन्तु वास्तव में देखा जाय तो परमात्मानुभव के समान सुखदाई और शरी- रादिक के समान दुःखदाई और कोई नहीं है। क्योंकि यह जीव अनादिकाल से अब तक शरीरादिक को आत्मा मान है 4- समाधि-शतके। ६५ कर तथा परमात्मा का स्वरूप न पहिचान कर ही दुःख भोग रहा है ॥ २६॥ । परमात्मपद की प्राप्ति का उपाय । सर्वेन्द्रियाणि संयम्य, स्तिमितेनान्तरात्मना । यत्क्षणं पश्यतो भांति, तत्तत्वं परमात्मनः ॥३०॥ अन्वयार्थ:-(सर्वेन्द्रियाणि संयम्य स्तिमितेन अन्तरा- मना क्षणं पश्यतो यत् भाति तत् परमात्मनः तत्त्वम् ) सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने २ विषयों से रोक कर स्थिर मन के द्वारा अनुभव करने से जो चिदानन्दमय आत्मस्वरूप प्रतिभास में प्राता है, वही परमात्मा का असली स्वरूप है। भावार्थ-परमात्मपदकी प्राप्ति के लिये इन्द्रियों को बाह्य विषयों से रोकना चाहिये और मन को परमात्म स्वरूप की भावना में तन्मय करना चाहिये ॥ ३० ॥ परमात्मपद की प्राप्ति के लिये किसकी उपासना करना चाहिये? यः परात्मा स एवाह, योऽहं सं परमस्ततः । अहमेव मयोपास्यो, नान्यः कश्चिदिति स्थितिः३१ अन्वयार्थ-(यः परात्मा; स एव अहं; यः अहं स परमः) जो. परमात्मा है वहीं मैं हूं, अथवा जो मैं हूं; वही परमात्मा ६६ शान्ति-सोपान। है (ततः अहं एव मया उपास्यः; अन्यः कश्चित् न इति स्थितिः) इस लिये मैं ही अपने द्वारा उपासना करने योग्य हूं अन्य कोई मेरे द्वारा उपास्य नहीं है। भावार्थ-सिद्ध परमेष्ठी के समान अपनी प्रात्मा को भी शुद्धं बुद्ध मानकर जेवयह अन्तरात्मा काभेद,भावना करते २ अपने शुद्ध स्वरूप में लीन हो जाता है तभी परमात्म-पद को प्राप्त कर सकता है इस लिये मुक्त-प्रद प्राप्त करने के लिये निश्चय नय से ध्यान करने योग्य या उपासना करने योग्य अपना शुद्धात्मा ही समझना चोहिये ॥ ३१ ॥ इसी बात को दिखाते हैं। प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं, मां मयैव मयि स्थितम् । बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि, परमानंदनितम् ॥३२॥ अन्वयार्थ (श्रहं मयि स्थितं चोधात्मनं परमानंदनिवृतं मां विषयेभ्यः प्रच्याव्य मया एव प्रपन्नोऽस्मि) मैंने अपने में ही विराजमान शान खरूप व परमानंदसम्पन्न छापने आत्मा को विषयों से छुड़ाकर अपने पापही प्राप्त किया है। भावार्थ-जिस परमात्म पद या मुक्त पद को यह जीव प्राप्त करना चाहता है। वह परमात्मपद शक्ति रूप से इस प्रात्मा में ही है। और उसके उद्योग से ही इसको प्राप्त हो सकता है। किसी ईश्वर आदि के पास वह संग्रह रूप से समाधि-शतक। . मौजूद नहीं हैं जिसको कि यह प्रसन्न होकर अपने. सेवकों को दे सके। दूसरे परमात्माओं से हम केवल इस विषय में यही लाभ उठा सकते हैं कि श्ररहंत (जीवनमुक्त ) श्रवरथा में दिये हुए परमात्म पद के साधनभूत उनके उपदेश का मनन करें और जिस ध्यान मुद्रा से उन्हों ने परमात्म पद प्राप्त किया है उस दिव्य देह का या उसकी प्रतिबिच का चित्र अपने हृदय पर अंकित करें और बाद में अपनी भी उसी प्रकार की ध्यान.. मुद्रा बनाकर तथा उनके बताये हुए साधनों को उपयोग में लोकर स्वयं परमात्म पद प्राप्त करें ॥३२॥ आत्मा को शरीर से भिन्न न जानने से हानि । यो न वेत्ति परं देहा, देवमात्मानमव्ययम् । लभते स न निर्वाणं, तप्त्वाऽपि परमं तपः॥३३ अन्वयार्थ-(एवं यः अव्ययं आत्मानं देहात् परं न वेत्ति, सः परमं तपः तप्त्यानपि निर्वाय न लभते) इस पूर्वोक्त कथनानुसार जो पुरुष अपने अविनश्वर आत्मा को शरीर से भिन्न नहीं मानता हैं वह उन तप को करके भी मुक्ति को नहीं प्राप्त कर सकता। भावार्थ-जो पुरुष श्रात्मा के असली स्वरूप को न जान- कर इस नश्वर शरीर को ही प्रात्मा. मान रहा है वह मुक्ति को भी अन्य वाह्य पदार्थों की तरह विषय-सुख का साधन समझ कर यदि उसकी प्राप्ति के लिये कठिन से कठिन तप भी' शालि-सोपान। करे तो क्या उसको मुक्ति मिल सकती है ? ॥३३॥ यहां किसीकी शंका है कि मुक्तिके लिये तो बड़े २ कठिन तप करने बताये हैं और कठिन तप करनेसी चित्त में खेद होता है तब फिर तरकरनेसे मुक्ति कैसे प्राप्तहो सकती है? उत्तर- • आत्म देहान्तर ज्ञानजनिताल्हाद निवृतः । तपसा दुष्कृतं घोरं,भुजानोऽपि नखिद्यते ॥३४॥ अन्वयार्थ-(श्रात्म देहान्तर ज्ञाननिताऽल्हादनिर्वृतः तपसा घोरं दुष्कृतंभुलानः अपि न खिद्यते ) जो पुरुष आत्मा और शरीर कोभेद ज्ञान से उत्पन्न हुए आनंद में मग्न हो रहा.है वह तप के द्वारा उदय में लाये हुए दुःखदाईसे दुःख- दाई कर्मों के फल को भोगते हुए भी दुःखी नहीं होता है। भावार्थ-जिस समय इस..जीव के अनुभव में श्रात्मा और शरीर भिन्न २ दिखाई देने लगते हैं उस समय इसकी समस्त चिंताएं दूर हो जाती हैं क्यों कि जितने भर भी संसार के दुःख हैं वे सव शरीर को अपना जानने से ही होते हैं । भूख, प्यास, रोग, शोक व जीने मरने के दुःख शत्रु, सर्प आदि का भय, गर्मी-सर्दी को वाधा, इन्द्रियों के विषय की चाह आदि की अनेक भयंकर से भयंकर आपत्तियां इस जीव को शरीर के संबंध से ही उठानी पड़ती है, इस लिये जिस समय इस शरीर को भी यह प्रात्मा भिन्न समझ लेता है उस समय समाधि-शतक। ६६. इन सब आपत्तियों से छूट जाने के कारण इस जीव को एक अलौकिक आनंद प्राप्त हो जाता है, और अपनी इस परम- सुख-दायिनी भेद-भावना की दृढ़ताके लिये उस दशा में यह जीव कायल शादि तप करके शरीर कोजान २ कर कृश करता है और सफलता पाने पर श्रानंद मानता है, इसी कारण उसे तप करते हुए, खेद नहीं होता ॥३४॥ 'इसी कथन की पुष्टि। गग द्वेषादि कल्लोलै, रललं यन्मनोजलम् । स पश्यत्यात्मनस्तचं तत्तत्वं नेतरोजनः॥३५॥ अन्वयार्थ-( राग पादिकल्लोलैः यन्मनोजलं अलोलं स आत्मनः तत्त्वंपश्यति, तत् तत्त्वं इतरः जनः न) रागदप आदिक कल्लोलो करके जिसका मन रूपी जल चंचल नहीं हुआ है वही पुरुप आत्मा के स्वरूप को जान सकता है, इस आत्म-स्वरूप को रागीद्वेषी पुरुष नहीं पहिचान सकता। भावार्थ-अनादि काल से यह जीव शरीरादि वाहा पदार्थों में श्रात्म बुद्धि किये हुए है और ये बाह्य पदार्थ श्रात्म- स्वरूप न होने के कारण कर्मानुसार बाह्य निमित्त को लेकर मिलते विछुड़ते रहते हैं, इस लिये जिस बाह्य निमित्त से . अनुकूल विषयों की प्राप्ति होती है उसमें राग और जिसके निमित्त से इष्ट वस्तु का विच्छेद व प्रतिकूल वस्तु का संबंध होता है इससे यह जीव द्वेप करता रहता है और इस राग ७० शान्ति-सोपान । ष रूपी अग्नि से निरंतर दग्ध रह कर अपने वास्तविक आत्म स्वरूप को नहीं पहिचानता ।इस लिये आत्मस्वरूपकी प्राप्ति के लिये राग द्वष का नाश करना सबसे आवश्यक है' जो पुरुष इनका नाश कर देता है वह परमात्म पद पा सकता है जो नहीं करता वह नहीं पा सकता। वह श्रात्मा का खरूप क्या है अविक्षिप्तमनस्तस्त्र. विक्षिप्तं भ्रान्ति रात्मनः । धारेयत्तदविक्षिप्तं,विक्षिप्त नाश्रयेत्ततः॥३६॥ अन्वयार्थ-(श्रविक्षिप्तमनःश्रात्मनः तत्त्वं,विक्षिप्तंभ्रान्तिः) अविदित अर्थात् रागादिरहित तथा देह व आत्मा के अभेद . शान से शून्य अपने शुद्ध स्वरूप में निश्चल जो मन है वही श्रात्मा का स्वरूप है इसके विरूद्ध जो विक्षिप्त अर्थात् रागादि परिणत व देह धात्मा को एक जानने वाला भ्रांत मन है वह आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं है। (ततः अविक्षिप्तं तत् धारयेत् विक्षिप्त न आश्रयेत् ) इस लिये अविक्षिप्त मन को धारण करना चाहिये और विक्षिप्त मन का आशय नहीं करना चाहिये। भावार्थ यह है कि उपयोग रूप जो भाव मन है वह झानात्मक होने से आत्मा का ही स्वरूप है। जिस समय वह धान स्वरूप भाव-मन रागादि रहित होकर शरीरादि बाध पदार्थो को श्रात्मा से भिन्न अनुभव करने लगता है तथा
समाधि-शतक।
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प्रात्म-ध्यान में तन्मय हो जाता है उस समय उस मन को
श्रात्मा का निज स्वरूप समझना चाहिये । और रागादि युक्त
भाव मन को शान स्वरूप होते हुए भी विकारी होने के कारण
आत्मा का निज स्वरूप नहीं मानना चाहिये।' इस लिये
श्लोक के उत्तराद्ध में कहा है कि मनसे रागादि विक्ष पोको
दूर करके उसको शुद्ध करना चाहिये ॥३६॥
मन में विफप क्यों होता है ?
अविद्याऽभ्याससंस्कार रवशं क्षिप्यते मनः ।
तदेव ज्ञानसंस्कारैः, स्वतस्तत्त्वेऽवतिष्ठते ॥३७॥
अन्वयार्थ (अविद्याभ्याससंस्कारैः मनः अवशं क्षिप्यते)
शरीरादिक को श्रात्मरूप जानने वाले अज्ञान के अभ्यास से
उत्पन्न हुये मलिम संस्कारों के द्वारा मन, श्रात्मा के वश में न
रह कर विक्ष को प्राप्त हो जाता है ('तदेवं शान संस्कारैः
स्वतः तत्त्वे अवतिष्ठते) और वही मन भेद-शान से उत्पन्न
मुये उत्तम संस्कारों के द्वारा स्वयं ही प्रात्मखरूप में स्थिर
हो जाता है।॥ ३७ ॥
विक्षेप व अविक्षप से क्या फल होता है।
अपमानादयस्तस्य, विक्षेपो यस्य चेतसः।
नापमानादयस्तस्य, न क्षेपो यस्य चेतसः ॥३८॥
७२ शान्ति-सोपान। अन्वयार्थ-(यस्य चेतसः विक्षपः तस्य अपमानादयः) जिसके मन में विक्षप होता है उसी के चित्त में मान-अपमान आदि को कल्पना होती है । यस्य चेतसः पान, तस्य अप- मानादयः न ) और जिसके मन में विप नहीं होता उसका अपमानादि की तरफ ध्यान भी नहीं जाता। भावार्थ-जब तक हमारे मन में मान-अपमान से हर्ष- विषाद होता है तब तक समझना चाहिये कि राग-द्ध पारि कषायों ने हमारे मन को विक्षिप्त कर रक्खा है, और जब मान-अपमान आदि को कल्पना हदय से निकल जाती है उस समय इन विक्षपों से मनको रहितमानना चाहिये ॥२॥ अपमानादिक के दूर करने का उपाय । यदा मोहात्मजायते, राग-द्वषो तपस्विनः । तदेव भावयेत्स्वस्थमात्मानं शाम्यत्तः क्षणात् ३९ आन्वयार्थ-(यदा तपस्विनः मोहात् राग-द्वेषी प्रजायेते, तदा एव स्वस्थं आत्मानं भावयेत्, क्षणात् शाम्यतः) जिस समय किसी तपस्वी मुनि के हृदय में मोह के उदय से राग- द्वेष उत्पन्न हो जावें उस समय उसको अपने शुद्ध आत्म- स्वरूप की भावना करनी चाहिये, इस प्रकार वार २' प्रात्मख- रूप को भावना करने से ही राग-छष क्षण भर में शांत हो जावेंगे। भावार्थ-ये राग, द्वप, क्रोध, मान, माया, लोभ आदिक -- समाधि-शतक ७३ एक प्रकार के मानसिक रोग हैं जो कि अज्ञानके द्वारा शरीर, स्त्री, पुत्रादिकों को आत्मरूप मानने से तथा पंचेन्द्रियों के विषयों की प्राप्ति-अप्राप्ति से, उत्पन्न होते हैं, शुद्ध आत्म- स्वरूप का चितवन करना ही इनको निमल करने के लिये एक मात्र रामबाण औषधि है। इन रोगों का निदान (मूलकारण) श्रात्मस्वरूप का ज्ञान है। इसलिये इस अशान का नाश किये बिना इन रोगों की जड़ नहीं जा सकती ॥ ३६ ॥ राग-द्वष का विषय व उनका विपक्ष दिखाते हैं:- यत्र काये मुनेः प्रेम, ततः प्रच्याव्य देहिनम् । बुद्ध्या तदुत्तमे काये, योजयेत्प्रेम नश्यति ॥४०॥ अन्वयार्थ-(यंत्र काये मुनेः प्रेम, बुद्धया ततः देहिनं प्रच्याव्य तत् उत्तमे कार्य योजयेत् ,प्रम नश्यति ) जिस शरीर में तथा इन्द्रियों के विषयों में मुनिका प्रमं है, अर्थात् आत्म- बुद्धि हो रही है, विवेक शान के द्वारा उन शरीरादिको से आत्मा को पृथक् करके उस प्रेम को चिदानन्दमय उत्तम आत्मरूपी कार्य में लगाने से बाह्य विषयों का प्रम नष्ट हो जाता है। भावार्थः -जब तक इस जीव को अपने ज्ञानानंदमयं परम मनोहर उपवनमें क्रीड़ा करने का अवसर प्राप्त नहीं होता, तब तक यह अत्यन्त घृणित स्त्री आदि के शरीर व अन्य पंचेन्द्रियों । . M ।
ဖြည့် शान्ति-सोपान। के विषयों में ही लुभाया रहता है तथा अपने मल-मूत्र वं अस्थिपंजर के पिंड रूप शरीरको ही वार २ देख कर प्रसन्न होता रहता है। यदि यह जीव किसी प्रकार अपने दर्शन मोहा- दिक का उपशम करके अपने शांत सुधारस का एक बार भी खाद ले ले तो इसकी इन वाह्य विषयों में कदापि रुचि न रहे और बहुत काल तक इसे जंगत-जाल में फंसना न पड़े।४०॥ इस भ्रमात्मक प्रेम के नाश होने से क्या होता है ? आत्मविभ्रमजं दुःखं, मात्मज्ञानात्प्रशाम्यति । नायतास्तत्र निर्वान्ति, कृत्वाऽपि परमं तपः॥४१॥ अन्वयार्थ (मात्मविभ्रम दुःखं आत्मज्ञानात् 'प्रशाम्यति) शरीरादिक में आत्मा का भ्रम होने से जो दुःख होता है वह आत्मज्ञान होने से नष्ट हो जाता है । (तत्र अयताः परमं तपः अपि कृत्वा न निर्वान्ति ) इसलिये जो पुरुष प्रात्म खरूप के ज्ञान प्राप्त करने में प्रयत्न नहीं करते वे दुर्धर तप को करके भी निर्वाण को प्राप्त नहीं कर सकते। भावार्थ-मुक्ति प्राप्ति के लिये आत्म-झान की प्राप्ति पूर्वकं किया हुआ तप ही कार्यकारी है, इसके विरुद्ध आत्मा व उसमें उत्पन्न हुए रागादिक विकारों के वास्तविक स्वरूप को बिना जाने जो पुरुष ऊटपटांग पंचाग्नि श्रादिक तप किया करते हैं वे उसी प्रकार नासमझ समझे जोया करते है जिस प्रकार कि बुखार की बीमारी में बवासीर की दवाखाने वाले - : . ' ..
समाधि-शतक। ७५ घेवकूफ माने जाया करते हैं ॥ ४१.॥. शरीरारिक को आत्मा मानने वाला तप करके क्या फल चाहता है? . - शुभं शरीरं दिव्याँश्च, विषयानभिवाञ्च्छति। उत्पन्नात्ममति देहे, तत्वज्ञानी ततश्च्युतिम्।।४२॥ अन्वयार्थ-(देहे उत्पन्नात्ममतिः शुभं शरीरच दिव्यान् विषयान् अभिवाञ्च्छति) शरीर में जिसको आत्म-बुद्धि हो रही है वह पुरुष तप करके देवों के सुदर शरीर को व स्वर्गों के दिव्य विषयों को ही चाहता है, (तत्त्वज्ञानी ततः,च्युतिम् । और जो तत्त्वज्ञानी है वह ऐसे शरीर व विषयों से भी छूटना चाहता है। भावार्थ-पहिरात्मा स्वर्गादिक के मिलने को ही परम-पद की प्राप्ति ससझता है इसलिये केवल' स्वर्गादिक की लालसा से ही पंचाग्नि आदि तर के द्वारा कायक्लेश करता हैं और जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान जाता है उसको स्वर्गों के विषय-भोग भी अन्य विषयों की तरह दुःखदाई मालूम पड़ते हैं इसलिये वह सम्यग्दृष्टिं पुरुष उन स्वर्गादिक के विषयों की इच्छा न करके परमानंदमय मोक्षपद की इच्छा रखता है॥ ४२ ॥ .
७६ शान्ति-सोपान। किसको कर्म-बंध होता है और किसको नहीं होता? परत्राहम्मतिः स्वस्मा,च्च्युतो बध्नात्यसंशयम् । . स्वास्मिन्नहम्मतिश्च्युत्वा, परस्मान्मुच्यते बुधग४३। 'अन्वयार्थ-(परत्र अहम्मतिः स्वस्मात् च्युतः असंशयं बध्नाति) जिसको शरीरादिक पर पदार्थों में आत्म-बुद्धि हो रही है वह अपने स्वरूप से च्युत रह कर निःसंदेह शाना- वरणादिक कर्मों का बन्ध करता है ( स्वस्मिन् अहम्मतिः बुधः परस्मात् च्युत्वा मुच्यते) और जिसको आत्मा में ही आत्म बुद्धि उत्पन्न हो गई है वह ज्ञानी अंतरात्मा शरीरादि के संबंध से छूटकर मुक्त हो जाता है ॥४॥ बहिरात्मा किसको आत्मा मानता है व अंतरात्मा किसको? दृश्यमानमिदं मूढस्त्रिलिंगमवबुध्यते । . इदमित्यवबुद्धस्तु, निष्पन्नं शब्दवर्जितम् ॥४४॥. अन्वयार्थ-(मूढः दृश्यमानं त्रिलिंगं इदं प्रववुध्यते.) मूढ़ बहिरात्मा इस त्रिलिंगात्मक शरीर को ही आत्मा मानता है (अवयुद्धः शब्दवर्जितं तुनिष्पन्न इदं इति अवबुध्यते) और झानी अंतरात्मा नामादि.. विकल्पों से रहित अनादि सिद्ध आत्मा को ही आत्मा मानता है ॥ ४४ ॥ यदि अंतगत्मा आत्माकोही प्रात्मा मानता है तो फिर वह अपने को याद्य पदार्थों का कर्ता-भोक्ता क्यों मानता है ?
समाधि-शतक। जानन्नप्यात्मनस्तत्वं, विविक्तं भावयन्नपि । पूर्वविभ्रमसंस्काराद्, भ्रान्ति भूयोऽपिगच्छति।४५ अन्वयार्थ-(प्रान्मनः तत्त्वं जानन अपि, विविक 'भाव. यन् अपि ) अविरत सम्यपि अंतरात्मा, आत्मा के स्वरूप को मानते हुए भी तथा अन्य पदार्थों से भिन्न आत्मा की भावना करते हुए भी (पूर्व बिभ्रम संस्कारात् भूयः अपि भ्रान्तिं गच्छति ) पूर्व घहिरात्मावस्था के भ्रामक संस्कारों के कारण फिर भी भ्रान्ति को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ-अविरत सम्यग्दृष्टि अंतरात्मा को यद्यपि विचार काल में वाद्य पदार्थों के कर्ता-भोक्तापने का भ्रम नहीं होता तथापि अनादि कालासे सतत अभ्यास में आये हुए मिथ्या- त्व अन्य संस्कारों के असर से साधारण. अविचारित कार्यों में उसको कदाचित् कर्ता-भोक्ता पने का व्यामोह भी हो जाता है इसी कारण उसके शानचेतना (शुद्धात्मा का अनुभव) के सिवाय कर्म-चेतना (कापने का अनुभव ) व कर्मफल- चेतना (भोक्तापने का अनुभव') भी मानी गई है ॥४५॥ इन भ्रामक संस्कारों के दूर करने का क्या उपाय है? अचेतनामिदंदृश्य, मंदृश्य चेतनं ततः .... क्वरुष्यामिक्व तुष्यामि, मध्यस्थो हं भवाम्यतः४६ अन्चवार्थ-(इदं दृश्यं अचेतनं, चेतनं अदृश्यं नतः के . M ५ । , शान्ति-सोपान। रुष्यामि.क.तुष्यामि ).'अन्तरात्मा को निरंतर यह विचारते.. रहना चाहिये कि यह जितना भी दृष्टिगोचर जगत् है, यह सब अचेतन है और जो चेतन है वह धिगीचर नहीं है। इस लिये मैं किस पर तो रोष (क्रोध) करूं और किस पर संतोप करूअर्थात् किसी से भी.राग-द्वेष न करके ( अतः अहं मध्यस्थः भवामि ) मुझे मध्यस्थ रहना ही उचित है। भावार्थ- सम्यग्दृष्टि-अन्तरात्मा को पूर्वमें कहे हुए: कर्ता- भोक्तापने आदि के अनेक मिथ्याभ्रामक संस्कारों को दूर करने के लिये निरन्तर यह विचार करते रहना चाहिये कि जिन वाह्य पदार्थों का मैं अपने को कर्ता व भोक्ता मानता हूँ, अथवा जिनको देख कर क्रोधादि. करता हूं, वे सब पदार्थ जड़रूप हैं मेरे खरूप से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसे जड पदार्थों पर रोष करना व संतोष करना मुझे कदापि उचित नहीं हैं, इसलिये इन सब बाह्य पदार्थो पर.माध्यस्थ्य भाव रखना ही योग्य है ॥ ४६॥ बहिरात्मा.व.अंतरात्मा किंस. २ वस्तु का त्यागाव : ग्रहण करते हैं ? त्यागादाने बहिर्मूदः, करोत्यध्यात्ममात्मवित् । नान्तर्बहिरुपादान, न त्यागो निष्ठितात्मनः ४७ अंन्वयार्थ-(मूढ़ः बहि त्यागादाने करोति, आत्मवित् अध्यात्म) मूढ़ बहिरात्मा द्वषके उदयसें बाह्य अनिष्ट पदार्थों .. २ TER समाधि-शतक ७४ .. . का त्याग करता है और रोग के उदय से वाह्य इष्ट पदार्थीको ग्रहण करता है तथा आत्म स्वरूप को जानने वाला अंत. रात्मा अन्तरंग राग-द्वषादिक' का त्याग करता है और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र आदि निज भावों का ग्रहण करता है। (निष्टतात्मनः अन्तः बहिः न त्यांगन उपा. दानं ) और अपने शुद्ध खरूपं में स्थित'नों कृतकृत्य संघ परमात्मा है वहान बाह्यः आभ्यन्तर' किसी पदार्थ का त्याग करता है और न किसी का ग्रहण करता है। ... : भावार्थ:-परमात्मा बाघ पदार्थों का त्याग-ग्रहण तो पहले अंतरात्मअवस्थामेहीं छोड़ देता है और रागादिक अंत- रंग कषायों का त्याग व केवल ज्ञानादिक निज गुणों के ग्रहण करनेसेही वह परमात्म-पद प्राप्त करता है इसलिये उसे अब कुछ त्यागना व ग्रहण करना याको नहीं रहता ॥ ७ ॥ अंतरात्मा को अंतरंग रागादिक का त्याग व सम्य- ग्ज्ञानादिक.का ग्रहण किस प्रकार करना '-- चाहिये ? . .. युजीत मनसाऽत्मानं,वाक्कायाभ्यां वियोजयेत्। मनसा व्यवहारं तु, त्यजेद्राक्काययोजितम् । ४८॥ अन्वयार्थ (आत्मानं मनसायुजीत,वाक्कायांभ्यां वियो- जयेत् ) आत्मा को मानसशान के साथ तो तन्मय करना चाहिये और बचन व कार्य की क्रियाओं से रोकना चाहिये।
म शान्ति सोपान, वाक्काययोजितं. व्यवहारं तु मन तात्यजेत् ) और बचन व काय से किये हुए कार्य को भी मन से चिंतवन न करे। भावार्थ-रागादिक के त्यागने व सम्यग्शादिक के प्राप्त करने के लिये अन्तरात्मा को बचन व काय की क्रियायें छोड़ते जाना चाहिये, और मन के द्वारा निरन्तर आत्म-चितवन करते रहना चाहिये । तथा वचन व काय की कोई आवश्यक क्रिया यदि करनीभी पड़े तो उसमें मन नहीं लगानाचाहिये। यहां कोई प्रश्न करता हैं कि स्त्री-पुत्रादिक के साथ ... तो कायकी चेष्टाव वचनालाप करते समय सुख होता है तब फिर वचन-काय के व्यापार त्यागने से क्या लाभ है ? उत्तर- जगद्देहात्मदृष्टीना, विश्वास्य रम्यमेव वा । स्वात्मन्येवाऽऽत्मदृष्टीनांक्व विश्वासात्ववा रतिः४ अन्वयार्थ (देहात्मदृष्टीनांजगत् विश्वास्य रम्यं एवं वा शरीर में आत्मदृष्टिं रखने वाले वहिरात्मा जीवों को यह स्त्री पुत्र, धन्य धान्यादिक का समूहरूप. संसार विश्वास-पात्र मनोहर मालूम देता है, (स्वात्मनि एव आत्मदृष्टीनां. विश्वातः कं वा रति) किन्तु आत्मा में ही आत्मदृष्टिं रखने वालें, ज्ञानी. पुरुषों को इस प्रपंचरूप: संसार में न विश्वास होता है और नारति ही होती है। IM भावार्थ-जब तक इसंजीव को अपने वास्तविक स्वरूप 40 समाधि-शतक। १ का ज्ञान न होकर देह भादिक पर पदार्थों में आत्मबुद्धि बनी रहती है तभी तक उसे वाह्य पदार्थ मनोहर मालूम देते हैं, अथवा उस को उन में विश्वास रहता है और जब उस पुरुष को स्वपर का वास्तविक ज्ञान हो जाता है तब उसे निजानंद को छोड़कर वाय पदार्थों में रमने की कदापि - इच्छा नहीं होतो, बाह्य विषय उसे एक नीरस व दुखद् मालूम देने लगते हैं। अंतरात्मा को मन-वचन-काय की प्रवृत्ति कैसी रखनी चाहिये? आत्मज्ञानात्परं कार्य, न बुद्धौ धारयच्चिरम् । कुर्यादर्थवशाकिञ्चिद्वाक्कायाभ्यामतत्परः॥५०॥ अन्वयार्थ-(आत्मशानात्परं कायं बुद्धौ चिरंनधारयेत्) प्रात्मशान के सिवाय अन्य कार्यों को बहुत काल तक बुद्धि में धारण नहीं करना चाहिये । (अर्थवशात् किंचित् वाकाया- भ्यां अतत्परः कुर्यात् ) प्रयोजन वश यदि वाह्य कार्य कुछ करने हों तो उन्हें केवल बचन व काय से करने चाहिये, उनमें मन से भासत नहीं होना चाहिये। भावार्थ-मोक्ष के इच्छुक झानी पुरुषों को अपना मुख्य लक्ष्य तो प्रात्मोद्धार ही रखना चाहिये, मानसिक उपयोग को वाघ कार्यों में न लगाकर निरंतर आत्म-हित के कार्यों में ही लगाना चाहिये और अपने व पर के उपकार वश यदि कुछ
शान्ति-सोपान
: वाह्य कार्यकरने भी पड़े तो उनमें विशेष उपयोग न लगा.
कर आवश्यक समझ,वचन व काय से कर देना चाहिये ॥५०॥
अंतरात्मा वाह्य विषयों में आसान होकर आत्म स्वरूप के
विषय में क्या विचारता है ?
-
यत्पश्यामीन्द्रियैस्तन्मे, नारित यन्नियतेन्द्रियः ।
अन्तःपश्यामि सानन्द, तदस्तु ज्योतिरुत्तमम् ५१
अन्वयार्थ-(यत् इन्द्रियः पश्यामि तत् मे नास्ति ) जिस
शरीरादिक को मैं इन्द्रियों के द्वारा देखता हूँ वह मेरा स्वरूप
नहीं है। (नियतेन्द्रियः यत् उत्तम. ज्योतिः सानंदं अंतः
पश्यामि तत् अस्तु.).इन्द्रियों को वाह्य विषयों से रोक कर
स्वसंवेदम ज्ञान के द्वारा जिस परमानन्दमय अतीन्द्रिय ज्ञान
' स्वरूप उत्तम ज्योति को मैं अंतरंग में देखता हू', वही वास्तव
में मेरा स्वरूप है।
भावार्थ-जव वाह विषयोले उपेक्षा कर अंतरात्मा आत्म-
स्वरूप के चितवन में तन्मय हो जाता है। उस समय उसको
परमानन्दमयी श्रात्मज्योति साक्षात् सरीखी प्रतिभासित होने
लगती है। और वह अपने उसी चिदानंदानुभव, में मग्न रहने
लगता है। वाय-विषयों की निकटता. - होने पर भी उनकी
तरफ उसका ध्यान नहीं जाता ॥५॥
. . समाधि-शतक । यदि परमानन्दमयी ज्योति आत्माका निज स्वरूप है तो उसका अनुभव करते समय कट क्यों होता है ? सुखमारब्धयोगस्य, बहिर्दुःखमथात्मनि । बहिरेवासुखं सौख्य, मध्यात्मभावितात्मनः॥५२॥ अन्वयार्थ-(प्रारब्धयोगस्यं वहिः सुखं भथ आत्मनि दुःखं ) जो पुरुष प्रात्म स्वरूप की भावना करना प्रथम ही प्रारम्भ करता है। उसे प्राचीन संस्कारों के कारण बाहा विषयों में सुख और श्रात्म बिचार में दुख मालूम होता है। (भावितात्मनः बहिः एव असुखं अध्यात्म सौख्यं) और जिसको निरंतर भावना करते रहने से आत्म स्वरूप का प्रतिभास हो जाता है। उसे चाह्य विषयों में दुःख और आत्म चितवन में सुख होने लगता है। भावार्थ-आत्म चितवन करना प्रारम्भ कर देने पर भी जब तक भावना करने वाले को आत्म स्वरूप की पहिचान नहीं होती, तब तक उसे आत्मिक श्रानन्द न आने से बाह्य विषय मनोहर जान पड़ते हैं। तथा श्रात्म विचार करना एक प्रकार की झंझट दिखाई देती है। और जब उसे अभूतपूर्व परमानन्दमय श्रात्म स्वरूप का अनुभव होने लगता है। तब वह उसमें ऐसा मग्न होता है कि उसे. बाह्य विषय, विष सरीखे मालूम देने लगते हैं । जैसे कोई पुरुष जन्म से ही अपने पास के खारे कुएं का पानी पीता रहा हो और उसको .
शान्ति-सोपान कुछ दूर से निर्मल शीतल मिष्ट जल के कुवें का पानी लाकर पीने को कहा जाय तो जाते समय उसे खेद होने के कारण अपना खारी कुवां ही अच्छा मालूम देगा। क्यों कि पास के सारी कुवे पर जाते समय मार्ग को धूप सहनी नहीं पड़ेगी। किन्तु जब वह दूर वाले कुवे के निर्मल-शीतल-स्वादिष्ट जल को पीवेगा, तब उसे अपने पास का नारी कुवां बहुत बुरा मालूम देने लगेगा और मार्ग की थकावट को यह भूल जायगा॥५३॥ अात्मस्वरूप की भावना किस प्रकार करनी चाहिये। तद्ब्रयात्तत्परान्पृच्छेत्तदिच्छेत्तत्परोमवेत्। येना विद्यामयंरूपं,त्यक्त्वा विद्यामयं ब्रजेत् ।५३। अन्वयार्थ-(तद्व्यात, तत् परान् पृच्छेत्, तत्. इच्छेत् तत्परो भवेत्) प्रात्मस्वरूप की ही बात दूसरोंसे कहनी चाहिये, मात्मखरूपको ही दूसरों से धूछना चाहिये, उसी आत्मस्वरूप की प्राप्तिकी निरंतर इच्छारखनी चाहिये, और श्रात्म-स्वरूपके चितवन में ही प्रतिसमय तन्मय रहना चाहिये। (येन विद्या- मयं रूपं त्यक्त्वाविद्यामयं ब्रजेत् )जिससेकि अक्षानमय अवस्था छूट कर ज्ञानमय-मात्मस्वरूपकी प्राप्ति हो। भावार्थ-जैसे किसी धनिक वृद्धपुरुषका अत्यन्त प्रेमपात्र एकमात्र विवाहित पुत्र विनाकहे परदेशचलाजावे तो बह पूर्व समाधि-शतका . पुरुष जिससे बात करने का अवसर मिलताहै तो अपने पुत्र की ही बातकरताहै, किलोसे कुछ पूछता है. तो अपनेगुनके आने की हो बात पूछता है। यदि किला वस्तु को इच्छा करता है तो एक मात्र अपने प्रिय पुत्रके माने की ही इच्छा करताहै। पदि किसी का चितवन भी करता है तो उसी अपने प्रेम पात्र पुत्र का करता है। सारांश यह है कि जैसे उस वृद्धपुरुष के चित्त से उसका पुत्र किसो क्षण भी पृथक नहीं होता, इसी प्रकार आत्म-खरूप की प्राप्ति के लिये निरन्तर चेष्टा करनी चाहिये। अबानी और कानी आत्मा किसको मानते हैं? शरीरे वाचि चात्मानं,संधत्ते वाक्शरीरयो । मान्तोऽमान्तःपुनस्तत्त्वं,पृथगेषां विबुध्यते।५४॥ अन्वयार्थ-(वाक्शरीरपोभ्रान्तःशरीरे वाचि च आत्मानं संधत्ते ) वचन और शरीर के वास्तविक स्वरूप को न जानने वाला भ्रान्त बहिरात्मा शरीर और बचन को ही आत्मा जानताहै । (अभ्रान्तःपुन.एषांतत्त्वं पृथक बियुध्यते) और शानी। पुरुष शरीर,बचन व प्रात्माके स्वरूपको पृथक् २ जानता है। शरीरादिक को आत्मा मानने वाला बहिरात्मा जिन थाल विषयों में आसक्त हो रहा है,वे इसके हितकारक नहीं हैं। न तदस्तीन्द्रियार्थषु. यत् क्षेमं करमात्मनः । तथापि रमते बालस्तत्रैवाज्ञानभावनात् ॥५५॥ 1 शान्ति-सोपान । अन्वयार्थ (इन्द्रियार्थेषु तत्न अस्ति यत् प्रात्मनःक्षेमकर); पंच इन्द्रियों के विषयों में ऐसी कोई भी विशेषता नहीं है. जिससे कि आत्मा का कुछ भला होसके ।(तथापि बाल प्रज्ञा-.. नभावनात् तत्र एवं रमते) खेदहै कि यह संसारी जीव तीमा अज्ञानवश उन विषयों में ही रमता है। भावार्थ-सब तरह से हानिकारक, अनित्य, ज्ञानीपुरुषोंके द्वारा निषिद्ध, इन्द्रियों के विषयों में भी जो इस जीवको आनंद श्राने लगता है वह सब अज्ञानकी ही महिमा है। अनादिकालीन मिथ्यात्ववश जीव क्या करते हैं ? चिरसंषुप्तास्तमसि, मृदात्मानःकुयोनिषुः । अनात्मीयात्मभूतेषु, ममाहमितिजागृति ॥५६॥ अन्वयार्थ-(मूढ़ात्मानःसमसि कुयोनिषु चिरं सुषुप्ताः) ये मूद संसारी जीव मिथ्यात्वके उदयवश अनादि कालसे तो निगोदा- दिक कुयोनियोंमें निवास कररहेहैं, अर्थात् अचेत पड़े सोरहेहैं। (अनात्मीयात्मभूतेषु मम अहं इति जागृति)यदि कदाचित्कर्मोदय से ये जीव मन सहित संशीभी होजातेहैं तो मानसिक संकल्प: विकल्पों के द्वारा प्रत्यक्षभिन्न स्त्रीपुत्रादिक संबंधियोंको भी अपने मानकर अनेक प्रकारके प्रपंच में पड़े रहते हैं। भावार्थ-निगोंदादिक. पर्यायों में तो ज्ञानकी अत्यन्त न्यूनतासे यह जीव अनेकदुःख भोगताहीहै किन्तु पहली पर्यायों ...
समाधि-शतक। से विशेषज्ञानवान मनसहित पंचेन्द्रिय होने पत्भी रागळेपनाह- वश दूसरों को अपने मान दुःखी हो रहता है। वहिरामावस्था को त्याग कर अपने व पर के शरीर को इस प्रकार मानना चाहिये। पश्यन्निरंतरं दहमात्मनोऽनात्मचनमा । अपगत्मधियाऽन्येषांमात्मतञ्च व्यवस्थितः॥५७॥ अन्वथार्थ-(श्रात्मतत्वे व्यवस्थितः श्रात्मनः देहं निरं- तरं अनात्मचेतसा पश्येत् ) श्रात्म स्वरूप में स्थित होकर अपने शरीर को निरंतर अपने से भिन्न समझना चाहिये । (अन्येषां अपरात्मधिया) और स्त्री-पुत्रादिक दूसरे जीवोंके शरीर को उनको श्रात्मासे भिन्न मानना चाहिये । भावार्थ-देह के साथ आत्मा की अभेद-बुद्धि अनादि- काल से हा रही है। निरंतर उत्तम २ उपदेशों के मिलने पर भो, इसा व्यामोह का मिटना कष्ट साध्य समझ कर, ग्रंथ. कार बार २ अनेक प्रकार से इसो वात को दिखाते हैं। यहां कोई प्रश्न करता है कि जैसे अपने वास्तविक स्वरूप को स्वयं जानना चाहये, वैसे ही दूसरों को भी बताना चाहिये, या नहीं ? उत्तर- . -- अज्ञापितं न जानन्ति,यथा मां ज्ञापितं तथा। मढ़त्मानस्ततस्तेषां, वृथा में ज्ञापनश्रमः॥५८
शान्ति-सोपान ।
३
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अन्वयार्थ-( सूढात्मानः यथा मां अशापितं न जानन्ति
तया ज्ञापितं ) तत्वज्ञानी अंतरात्मा कहता है-अपने मन
को समझाता है कि जैसे ये मूढ़ अज्ञानी जीव मेरे स्वरूप
को बिना बताये नहीं जानतें, वैसे ही बताने से भी नहीं जान
सकेंगे। (ततः तेषांझपनश्रमःमे वृथा) इसलिये उनके बोध
कराने के लिये जो मेरा खेद करना है, यह वृथा है।
भावार्थ-बहुत से शानो पुरुष दूसरों को उपदेश करने
में इतने व्यग्र हो जाते हैं कि उपदेश न मानने पर अधीर हो
उठते हैं। और वस्तुस्वरूप को भूलकर सुनने वालों से कषाय
करने लगते हैं। जिसके कारण वे दूसरों के हित करने के भ्रम
से पड़ कर अपना अहित कर लेते हैं। ऐसे पुरुषों के प्रतियोध
के लिये ही यह उपयुक्त श्लोक ग्रंथकार ने लिखा है। जिसके
लिखने का यह श्राशय है कि परोपदेश की प्रवृत्ति का होना
शानी जीवों को शुभ कषाय रूप समझना चाहिये और अपनी
शुद्ध परिगति को प्राप्त करने को योग्यता होते समय इसको
भी वाधक ही समझना चाहिये । इस शुभ प्रवृित्ति के व्यामोह
में पड़ कर आत्महित,को कदापि भूलना नहीं चाहिये ।
इसी बातकी दूसरी तरदले कहते हैं।
यद्बोधयिनुमिच्छामि, तन्नाहं यदहं पुनः
ग्राह्यं तदपि नान्यस्य, तकिमन्यस्य बोधयो५१॥
अन्वयार्थ-(यद्योधयितुंइच्छामि तत् नअहं, पुनःयत् अहं
. . समाधि-शतक.। 8 तत् अंपिअन्यस्य ग्राह्यं तत् अन्यस्य किं वोधये) जिस देहादिक के स्वरूपको मैं संसारी जीवोंकोसुनाना चाहताहूँ अथवा वेसु-, नना चाहते हैं वेदेहादिक तो मेरे स्वरूप नहीं हैं। और जो मेरा- वास्तविक परमानंदमय स्वरूप है उसको ये मूढजीच जान नहीं सकते, इसलिये अव मैं इनको क्या समझाऊं। भावार्थ-ज्ञानी अंतरात्मा परोपदेश करने की अनुचित लालसावन्यनतासे छूटने के लिये फिरअपनी आत्माको समझाता है कि हे आत्मन् , यदि तू इन सारी जीवोंको उपदेशभी देगा तो शरीरादिक जड़पदार्थों के विषयमें अथवा संसार दशाके विषयमें देसकता है।क्योंकि श्रात्माका शुद्धस्वरूप तो एक प्रकार से वचनद्वारा कहाभी नहीं जासकता और इन्द्रियोंसे सुनकर, ग्रहण भी नहीं किया जासकता, और संसारके दुःखों का व शरीरादिक का अनुभव इनजीवों को स्वयंही हो रहा है फिर तू इनको उपदेश देनेके झंझट में पड़कर व उपदेश न मानने से खिन्न होकर व्यर्थ ही पाकुलित क्यों होता है। 8 बहिरात्मा.व अंतरात्मा किसमें संतुष्ट होते हैं.? बहिस्तुष्यति मूदात्मा,पिहित ज्योतिरन्तरे । तुष्यत्यन्तः प्रबुद्धात्मा,बहिावृत्तकोतुकः।६। अन्वयार्थ-(मूढ़ात्मा अंन्तरे पिहित ज्योतिः वहिः तुष्य- ति) मोह करके जिसकी अंतरंग ज्ञान ज्योति 'आच्छादित हो शान्ति-सोपान। रही है वह मूढ़ बहिरात्मा शरीरादिक याच विषयों में हो संतुष्ट रहता है। (वहिावृत्तकौतुकः प्रबुद्धात्मा अन्तः तुप्यति) और जिसका बाध विषयों में अनुराग नहीं रहा, यह शानो अंतरा- त्मा अपने अंतरंग श्रात्म-स्वरूप में हो संतुष्ट होता है। तत्त्वज्ञानी दहिरारमाफी दंशा पर विचार करता है। न जानन्ति शरीराणि. सुखदुःखान्य बुद्धयः। निग्रहाऽनुग्रहधियं,तथाप्यंत्रव कुर्वत ॥ ६१ ॥ अन्वयार्थ-(शरीराणि सुखदुःखानि न जानन्ति ) यद्यपि औदारिकादिक शरीर जड़रूप होने से सुख-दुःख को नहीं आ. नते (तथापि अयुद्धयः अत्रैव , निग्रहानुग्रहधियं कुते ) तो भी मूढ़ बहिरात्मा इन शरीरों से राग-द्वेष करता है और द्वेष- घश भूखामरके शरीर को दुःन देना चाहता है तथा राग यश अनेक प्रकार, के भूषण-पत्र पहिन कर शरीर को सुखी करना चाहता है। भावार्थ-अंतरात्मा विचारता है कि देखो,ये संसारी प्राणी कितने मूढ़ हैं; कि जो शरीर अड़रूप है उसको भी राग-द्वेष- यश सुखी-दुःखी करने की चेष्टा करते हैं। . संसार व मोक्ष कब होता है? स्ववुहया यावद्गृहीयात्कायवाक्चेतसां त्रयम् । संसारस्तावदतेषां,मेदाम्यासे तुनिवृतिः ॥६२॥ .
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समाधि-शुवक ।
अन्ययार्थ-कायचाक चेतसां धयं यावत् स्वशुद्धों
गृण्हीयात् तावत्संसारः) जब तक मन-वचन-कायका भात्म-
धुद्धिसे ग्रहण किया जायगा, तब तक ही संसार समझना
चाहिये । (एतेषां भेदाभ्यासे तुनितिः) और इन तीनों मन-
पचन-कार्यों का मात्मा से पूर्ण रूप से भेद भान होने पर
जीय की मुक्ति समझनी चाहिये ।
अर्थात् जब तक यह जीव मन-वचन काय व इनके निमित्त
से होने वाले रागादिक विकारों व अन्य बाह्य कार्यों को अपने
समझता रहता है तब तक यह जीव संसारी है और जब मन,
पचन, काय"न तीनों को तथा इनके निमित्त से उत्पन्न हुए
राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि विकारोंको व स्त्री-
पुमादिक बाह्य पदार्थों को यह जीव पूर्णरूप से भिन्न समम
लेता है तय मुक्ति का पात्र थम जाता है।
शरीर और आत्माका भेदज्ञान होने से यह जीव शरीर,की
हढ़ता आदिसे मात्मा की रदता भाविक नहीं मानता।
घनेवस्त्रे यथाऽऽत्मानं, न घनंमन्यते तथा ।
घनेस्वदेह प्यात्मानं, न धनं मन्यते बुधः॥३॥
जाणे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं, न जीणंमन्यते तथा ।
जाणे खंदहेऽप्यात्मानं नजीर्णं मन्यते बुंधा६४॥
रक्त वस्त्रं यथाऽऽत्मानन रक्तं मन्यते तथा ।
रक्ते स्वदहेऽप्यात्मानं, न रक्तं मन्यते बुधः॥६५॥
६२ शान्ति-सोपान नष्टे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं, न नष्टं मन्यते तथा । नष्टेस्वदेहेऽप्यात्मानं, न नष्टं मन्यते बुधः।६६। अन्वयार्थ-बुद्धिमान पुरुष जैसे दृढ़ या मजतूत कपड़े को पहिनकर आत्मा को बलिष्ठ नहीं मानता. वैसे ही शरीर के पुष्ट होने से प्रात्माको पुष्ट नहीं मानता ॥ ६३ ॥ वस्नके पुराने होजानेपर जैसे आत्माको जीर्ण नहीं मानता वैसेही शरीरके कृश या वृद्धहोजाने परमात्माको कृशया वृद्ध नहीं मानता॥६॥ रंगे हुए वस्त्र पहिनकर जैसे आत्माको रंगी हुई नहीं मानता, उसी तरह केशर चन्दनादि से शरीरको रंगकर भी श्रात्माको रंगी हुई नहीं मानता ॥६५॥ इसीप्रकार जैसे वस्त्रके नष्ट होजाने पर भी आत्माको नष्ट नहीं मानता, वैसेही शरीरके नष्ट होने पर भी श्रात्माको नष्ट नहीं मानता ॥६६॥ भावार्थ-ज्ञानी पुरुष इस शरीरकोनष्ट वस्त्रके समान सम- झतेहैं, जैसे वस्त्रों के ग्रहण व त्यागमें अन्यजीवों को आत्मा के जीवन-मरणका भ्रम नहीं होता,वैसे ही ज्ञानीपुरुषों को शरीर के ग्रहण व त्यागमें भी आत्माके जीवन-मरण का भ्रम नहीं- होता ॥६६॥ . . . परमवीतरागता रूप शांतदशाको कौन प्राप्त कर सकता है। यस्य सस्पन्दमाभाति, निस्पन्देन समं जगत् । अप्रज्ञमकियामागं, स शमं याति नेतरः१६७॥
समाधि-शतंक। अन्वयार्थ-(यस्य श्रप्रशंप्रक्रियाभोगं सस्पंदं जगत् निस्पं- देन समं श्राभाति) जिस ज्ञानी पुरुपको शानरहित, आचरण आदि क्रियारहित, तथा सुख आदि के अनुभवरूप भोगरहित. यह शरीरादि रूप जीवके निमित्त से अनेक चेष्टा करने वाला जगत् , निस्पंद-निश्चेष्ट लकड़ी पत्थर सरीखा मालूम पड़ने लगताहै.वही पुरुष परम वीतराग शान्त अवस्थाको प्राप्त कर सकता है। इस परमबीतराग अवस्था को अनेक प्रकार के प्रपंच में फंसे हुए मूढ़ बहिरात्मा जीव नहीं प्राप्त कर सकते ॥ ६ ॥ बहिरात्मा अपने स्वरूप को क्यों नहीं पहिचानता ! शरीरकंचुकेनात्मा, संवृतो ज्ञानविग्रहः । नात्मानबुध्यते तस्माद्ः भ्रमत्यातिचिरंभवे ॥६॥ अन्वयार्थ-(शरीरक चुकेन संवृतः ज्ञानविग्रहः प्रात्मा आत्मानं न बुध्यते तस्मात् भवे अतिचिरं भ्रमति) शान हो है शरीर अथवा स्वरूप जिसका ऐसायहात्मा कार्माणशरीर रूपी कांचली से ढका हुआ है। इस लिये अपने वास्तविक स्वरूप को न जानकर अनादि काल से संसार चक्र में भ्रमण करता फिर रहा है। यहां पर पांचली को केवल इष्टान्त मात्र सगझना चाहिये । जिस प्रकार सर्प के केवल ऊपरी भाग में शान्ति-सोपान। वृक्ष की छाल की तरह कांचली रहती है, शरीर के अंदर नहीं रहतो; उस प्रकार प्रात्मा के साथ,कार्माणशरीर (सूक्ष्म शरीर) का सम्बन्ध नहीं समझना चाहिये । किन्तु संसारी आत्मा और कर्म को इस प्रकार मिला हुआ मानना चाहिये जिस प्रकार दूध में मीठा वा पानी में नमक मिल जाता है। प्रथया असे खाद की दवा बनाते समय पारे और गंधक को पीसकर एकमेक करने पर दोनों की अवस्था बिल्कुल कजल सरीखी हो जाती है। पारे की सफेदी व चमक और गंधक का पीला. पन न जाने कहां चला जाता है । इसी प्रकार आत्मा के साथ कर्मों का सर्वांश सम्बन्ध रहने पर दोनों के गुण विकृत रहते हैं। प्रात्मा का अनंत दुख-सुख रूप परिणत रहता है और भी सम्यक्त्वादि गुणों की यही हालत.रहती है ॥६॥ बहिरात्मा शरीर को प्रात्मा क्यों समझता है ! प्रविशद्गलतां ब्यूहें,देहे ऽणूनां समाकृती। स्थितिभ्रान्त्या प्रपद्यन्ते, तमात्मानंमबुद्धयः ।६ अन्वयार्थ-(अबुद्धयः प्रविशंद्गलतां अंगूनां व्यूहे देहे समाकृतो स्थितिम्रान्त्यातं आत्मनं प्रपद्यन्ते) मूढ़ बुद्धि वाले पहिरात्मा जीव निरंतर प्रवेश करने वाले वीर्ण होने 'याले पुद्गलं परमाणुओं के समूह रूप शरीरको आत्माके समान आकार वाला देख कर तथा शरीर व आत्मा की एक क्षत्र में स्थिति होने के कारण उत्पन्न हुए भ्रम से. शरीर को ही प्रारमा जानने हैं। ..
समाधि-शनका । भावार्थ-यदि इस शरीर का असली स्वरूप विचार कर देखा जाय तो यह घृणिनपुद्गल परमाणुओं के अके सिवाय और कुछ नहीं मालूम देता और जिन परमाणुओं से यह पना है ये भी इसमें शुरूसे अंत तक हमेशा नहीं रहते. किन्तु प्रति- पाय शरीर में नवीन-नवीन परमाणु आकर मिलते रहते हैं, और पुराने परमाणु निकलते रहते हैं । शरीर की यह दशा होते हुए भी आत्मा के समान आकार घाला होने से तथा पाताकाल से शरीर घ प्रात्मा की एक क्षण में स्थिति रहने से मूढ़ बहिरात्मा इस शरीर को ही प्रात्मा मानता है।६६ शरीर के धौले श्रात्माको पृथक् माननेका उपदेश । गौरःस्थूल कृशावाहमित्यङ्गेन विशेषयन् । आत्मानं धारयेन्नित्यं, केवलज्ञप्तिविग्रहम् ॥७०॥ अन्वयार्थ (अहं गौरस्थूिल वारशःइति अंगेन विशेषयन् केपलमप्तिविप्राईआत्मानं नित्यं धारयेत् ) मैं गोरा हूं, स्थूला । प्रथया रुश है, इस प्रकार शरीर के धर्मोसे पृथक् समभाकर आत्माको नित्य ही केवलज्ञान स्वरूप अथवा रागादिक से भिन्न एकमात्र ज्ञानस्वरूप पा फेवलज्ञान रूपी शरीर विशिष्ट मानना चाहिये ॥ ७० ॥ मुक्ति प्राप्त करने की योग्यता फद आती है ? मुक्तिरेकान्तिकी तस्य, चित्ते यस्याञ्चलाधतिः। तस्य नै कान्तिकी मुक्ति, यस्य नास्त्यचलाधतिः७१ M H ६६ शान्ति-सोपान। अन्वयार्थ (यस्य चित्ते श्रचला धृतिः, तस्य एकान्ति- को मुक्तिः) जिस पुरुष के चित्त में प्रात्मस्वरूप की निश्चल स्थिति है । उसको नियम से मुक्ति प्राप्त होती है। ( यस्य प्रच- ला धृतिः नास्ति, तस्य एकान्तिको मुक्ति नास्ति) और जिस पुरुष को प्रात्म स्वरूप में निश्चल स्थिति नहीं है उसको सुक्ति कदापि नहीं हो सकती। भावार्थ-यह जीव श्रात्म स्वरूप में निश्चल होकर तन्मय होने से हो मुक्ति का पात्र होता है। बिना आत्मस्थिरता के मुकि प्राप्त नहीं हो सकती। - मोक्ष के इच्छुक पुरुषों को क्या करना चाहिये ? जनेभ्यो वाक्ततः स्पन्दो,मनसश्चित्त विभ्रमाः। भवन्ति तस्मात्संसर्ग, जनैयोगी ततस्त्यजेत् ७२ अन्वयार्थ (जनेभ्यः वाक, ततः मनसः स्पन्दः; तस्मात् चिरुविनमाः भवन्ति, ततः योगी जनैः संसर्ग त्यजेत ) जगत के जीवों से मिलने पर बचन की प्रवृत्ति होती है, बचन'को प्रवृत्ति होने से मनमें व्यग्रता होती है और व्यग्रता होने से मन विक्षिप्त सरीखा होजाताहै,इसलिए श्रात्महित या मोक्षपद । के इच्छुक योगी पुरुषों को व्यवहारी जनों का संसंग सर्व- , या छोड़ना उचित है।
। समाधि-शतक। नगर व वन की कल्पना किसके हृदय में होती है ? ग्रामोऽरण्यमिति इंधा, निवासोऽनात्मशिनाम् । दृष्टात्मनां निवासस्तु,विविक्तात्मैव निश्चिल।७३। अन्वयार्थ- (ग्रामः अरण्यं इति द्वेधा निवासः अनात्म- दर्शिनाम् ) यह नाम है अथवा यह! वन है, इस प्रकार दो तरह के स्थान की कल्पना आत्म दर्शी वहिरात्मा जीवों को ही होती है। (हयात्मनो निवासातु विविक्तः निश्चलः श्रात्मा एव ) और आत्मखरूप को जानने वाले झोनी पुरुषों का निवास स्थान वास्तव में उनका रागादि रहित निश्चल आत्माही होता है। क्योंकि आत्मज्ञानी पुरुष निरन्तर अपने प्रात्म गुणों के अनुभव में ही रमे रहते हैं इस लिये उनका ध्यान बाह्य प्राम,बन आदि स्थानोंकी तरफ नहीं जाता,परमा- नन्द मय निज आत्मा को ही ये एक प्रकार का मनोहर उपबन समझते हैं ॥७३॥ शरीर को आत्मा व श्रात्माको आत्मा मानने से क्या होता है? देहान्तरगत बीजं, देहेऽस्मिन्नात्मभावना । बीजं विदेहनिष्पत्तरात्मन्येवात्मभावना।७४ । अन्वयार्थ-(अस्मिन् देहे आत्म भावना देहान्तरगतेः वीजं) इस शरीर में आत्मा की भावना करना परलोक गमन का कारण है। ( आत्मनि एव श्रात्मभावना बिदेह निष्पत्तेः बीजं) और इस आत्मा में ही आत्मा की भावना करना मोक्ष प्राप्ति का कारण है।
६८ शान्ति-सोपान। भावार्थ-जो पुरुष शरीर को ही निश्चय से आत्मो सम- झता है वह निरंतर नवीन २ शरीर धारण करता रहता है और जो पुरुष श्रात्मा को ही निरंतर आत्म रूप से चितवन करताहै वह मुक्तरूप शुद्ध आत्मा हो जाता है ॥७॥ आत्मा का गुरु कौन है? नयत्यात्मानमात्मैव, जन्मनिर्वाणमेवच । गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्तिपरमार्थतः।७५ अन्वयार्थ-(आत्मा एव आत्मानं जन्म निर्वाणं च नयति) आत्माही आत्मा को जन्म रूपी संसार में रुलाता है और स्वयं ही संसार से पार करके मोक्ष पद प्राप्त कराता है। (तस्मात् प्रात्मनः सुरुः श्रात्मा; परमार्थतः अन्यः न अस्ति) इस लिये आत्मा का गुरु आत्मा ही है, अन्य कोई वास्तव में गुरु नहीं है। भावार्थ-श्रात्महित के उपदेशक श्राचार्यादिक गुरुओं का सच्चा उपदेश सुन कर भी जबतक यह जीव विषय- कषायादिक का त्याग नहीं करता है तबतक बराबर संसार सागर में रुलता रहता है और कभी-कभी प्राचार्यों के उपदेश सुने विना भी विषय-कषायादिक त्याग करके मोक्ष पद प्राप्त कर लेता है। इस लिये वास्तव में आत्मा को स्वयं अपना गुरु अपने को ही मानना चाहिये ।।७॥
समाधि-शतक।
88
है?
यहिरात्मा को मरने ले शय क्यों
लगता
हदात्मबुद्धिहादावुत्पश्यन्नाशमात्मनः ।
मित्रादिभिर्वियोगं च,विमतिमरणादशभृमा७६ ।
अन्वयार्थ-(देहादौ दात्मबुद्धिः पात्मनः नाशं मित्रा-
दिभिः वियोगं च उत्पश्यन् मरणात् भृशं विभेति) शरीरादिक
मैं जिसकी दृढ़ आत्मबुद्धि हो रही है वह पुरुष शरीर छूटते
समय आत्मा का नाश मानकर तथा मित्रादिको से वियोग
हुआ जानकर, मरण से अत्यन्त भय खाता है।
भावार्थ यद्यपि इस वर्तमान शरीर को छोड़कर दूसरा
'शरीर प्राप्त करना पुराने कपड़े को उतार कर नवीन कपड़े
बदलने के समान है, इसमें भय करने की वा दुःख मानने की
कोई भी बात नहीं है । तथापि जो अशानी जीव इस शरीर
को आत्मा समझे हुए हैं और मित्र वर्ग में अत्यन्त मोहित
हो रहे हैं उनको भरने से अत्यन्त भय लगता है। और इस
भय लगने का मूल कारण वास्तव में उनका ही उपयुक्त
अज्ञान है ।।७६॥
सानी पुरुष को मरने से भय क्यों नहीं होता?
'आत्मन्येवात्मधारन्यां, शरीरगतिमात्मनः ।
मन्यते निर्भयं त्यक्त्वा, वस्त्रं वस्त्रान्तरग्रहम् ।७७॥
। शान्ति-सोपान अन्वयार्थ-(श्रात्मनि एष आत्मधीः शरीरगतिं आत्मनः अन्यां वस्त्रं त्यक्त्वा वस्त्रान्तर प्रहं "इव" निर्भयं मन्यते) जिसको आत्मा में ही प्रात्मबुद्धि हो गई है वह ज्ञानी पुरुष शरीर के विनाशको आत्मासे भिन्न मानता है और मरने-जीने को पुराने घन को उतार कर नवीन वस्त्र बदलने की तरह समझ कर निर्भय रहता है ॥७॥ एक साथ व्यावहारिक व पारमार्थिक कार्य क्यों नहीं सिद्ध होते? व्यवहारे सुषुप्तो यः स जागांत्मगोचरे। जागर्ति व्यवहार स्मिन, सुषुप्तश्चात्मगोचरे।७८ अन्यवयार्थ-(यः व्यवहार सुपुप्तः सः श्रात्मगीचरे नागर्ति)ो व्यवहार के कार्यों में सोता है अर्थात् उनसे उदासीन रहता है वह आत्मानुभव के विषय में जागता है। अर्थात् उसमें तन्मय रहता है । (अस्मिन् व्यवहारे यः जागति सः आत्मगोचर सुषुप्तः) और जो पुरुष व्यावहारिक कार्यों में तन्मय रहता है वह प्रात्मानुभव से कोसों दूर रहता है। भावार्थ-जीवों के चित्त की वृत्तिं एक समय में विरुद्ध दो कार्यों में नहीं लग सकती, जिस समय में मन विषयों में फँसा रहेगा, उस समय आत्महित के कार्य उसे अच्छे नहीं लगेंगे और जिस समय प्रात्म हित की तरफ मन का झुकाव होगा, उस समय उसे विषय-वाय विष सरीखे लगने . सांगे ॥
- १०१ समाधि-शतक । जीव को मुक्ति कब प्राप्त होती है ? आत्मानमन्तरेदृष्ट्वा, दृष्ट्वा देहादिकं बहिः। तयोरन्तरविज्ञानादभ्यासादच्युतोभवेत् ॥७९॥ अन्वयार्थ-( आत्मानं अन्तरे दृष्ट्वा, देहाहिक बहिः दृष्ट्वा, तयोः अन्तरनिशानात् अभ्यासात् अच्युतः भवेत् ) आत्मा को अंतरंग में देखकर और शरीरादिक को बाह्य जानकर, शरीर और आत्मा की भिन्नता का दृढ़ ज्ञानाभ्यास करते २ जीव मुक्त होजाता है। भावार्थ-जब इस जीव को आत्मा और शरीर का भेद स्पष्ट मालूम देने लगता है तब यह शारीरिक क्रियाओं से उपेतो करने लगता है और सम्यकशानादिक आत्मिक गुणों की प्राप्ति और वृद्धि के लिये प्रयत्न करने लगता है। इसी तरह करते २ जप सम्पूर्ण देहादि संबंधी क्रियाओं को छोड़कर अपने सर्व आत्मिक गुणों का पूर्ण विकाश कर लेता है तब यह जीव मुक्त हो जाता है। शानी पुरुष जगत् को कैसा जानते हैं ? पूर्वदृष्टात्मतत्त्वस्य, विभात्युन्मत्तवज्जगत् । खभ्यस्तात्मधिय पश्चात्,काष्ठपाषाणरूपवत् ८० अन्वयार्थ--(धात्मतत्वस्य,पूर्वजगत् उन्मत्तात् विभाति स्वभ्यस्तात्मधियः पश्चात् काष्ठपाषाणरूपवत् ) जिसने अपने
१०२
शान्ति-सोपान ।
प्रात्मस्वरूप को जान लिया है उस ज्ञानी पुरुष को
पहले यह जगत् उन्मत्त सरीखा मालूम देने लगता है; और
जब आत्म अनुभव का और भी अधिक दृढ़ अभ्यास हो जाता
है तब उस महापुरुष को यह जगत् काष्ठ-पाषाण सरीखा विल्कु-
ल निश्चेष्ट दिखाई देने लगता है।
भावार्थ-जब इस जीव को देह व श्रात्मा का भेदशान
होने से अपने परमानन्दमय चैतन्य चमत्कार स्वरूप आत्मदेव
का दर्शन होने लगता है उस समय वह शानी पुरुष इंस
अपूर्व अानन्द से जगत के जीवों को बंचित देखकर उनकी
दशा पर करुणा करता हुशा विचार करता है कि देखो, ये
संसारी प्राणी कितने मूर्ख हैं ! कि इस अपूर्व आनन्द को प्राप्त
करने की योग्यता रखते हुए भी इस सुधारस के स्वाद से
वंचित रहते हैं और अत्यंत घृणित व नीरस विषय-भोगों को
भोग. कर अस्थि (हाड़) चाबने वाले श्वान की तरह आनन्द
मानते हैं। पीछे वही शानी पुरुष त्रात्म स्वरूप के अनुभव में
अत्यन्त तन्मय हो जाता है तब उसका ध्यान जगत के जीवों
की तरफ बिल्कुल भी नहीं रहता, इस लिये वह जगत को
काष्ठ-पत्थर आदि की तरह निश्चेष्ट-क्रियाशूल्य ही समझता
है अर्थात् आत्म स्वरूप में तन्मय हो जाने पर जगत विषयक
करुणा भाव भी उसके हृदय से निकल जाता है, उस समय
वह ध्यानी, महात्मा राग-द्वप रहित वीतराग दशा को प्राप्त
हो जाता है।
.
.
समाधि-शतके। १०३ शरीर व आत्मा की भेद-भावना के बिना मुक्ति नहीं होती। शृण्वन्नप्यन्यतः काम, वदन्नपि कलेवरात् । नात्मानं भावयद्भिन्नं, यावत्तावन्न मोक्षमाझ्८१ अन्वयार्थ-(कलेवराद भिन्नं आत्मानं, अन्यतः एवन् अपि, पदन अपि, यावत् भिन्नं न भावयेत् , तावत् मोक्षमाक् न) "शरीर से आत्मा भिन्न है।" इस बात को उपाध्याय आदिक गुरुत्रों से सुनकर भी तथा इसी बात को दूसरों से बार-बार कहते रहने पर भी जब तक भेद शान की दृढ़ भावना नहीं की जाती,तब तक मुक्ति नहीं हो सकती। भावार्थ-आत्मा और शरीर के भेद की कथा को तोते की तरह कहने-सुनने मात्र से विशेष फल की प्राप्ति नहीं हो सकती, किन्तु सुकौशलमुनि की तरह इस प्रकार की भेद- भावना होनी चाहिये जिससे कि व्याघ्रादि दूर जीवों के द्वारा शरीर के भक्षण किये जाने पर भी आत्मा में बाकुलता न होवे । अथवा पांडवों की तरह शरीर के जलते रहने पर भी राग उत्पन्न न होवे । इस प्रकार की दृढ़ भेद-भावना से ही वास्तव में मोक्ष की प्राप्ति होती है। आत्मा को शरीर से भिन्न मानना कत्र सार्थक होता है ? तथैव भावयेद् देहाब्यावृत्यात्मान मात्मनि । यथा न पुनरात्मानं,देहे स्वप्नेपि योजयेता८२॥
१०४ शान्ति-सोपान अन्वयार्थ-( देहात् व्यावृत्य प्रात्मानं आत्मनि तथैव भावयेत् ,यथा पुनः स्वप्नेऽपि देहे आत्मानं न योजयेत् )शरीर से मित्न मानकरात्रात्मा की आत्मा में इस प्रकार दृढ़ भावना करनी चाहिये जिससे कि स्वप्न में भी शरीर में श्रात्मा का प्रतिभास न होने पावे ॥२॥ भावार्थ--किसी वस्तु का संस्कार हृदय से पूर्ण निकला हुधा तभी समझना चाहिये जब कि स्वप्न में भी उस संस्कार का असर हृदय पर न होने पाये। इसी बात को लेकर इस श्लोक में बताया गया है कि वास्तव में श्रात्मा को शरीर से भिन्न मानना तभी सार्थक होसकता है जव कि स्वप्न में भी शरीर और आत्मा के एकपनेका ज्ञान न होने पावे। मोक्ष प्राप्तिमें पाप और पुण्य दोनों प्रतिबंधक जानने चाहिये। अपुण्यमवतः पुण्यं, बतौक्षस्तयो य॑यः । अबतानीव मोक्षार्थी, बतान्यपि ततस्त्यजत्।८३। अन्वयार्थ (अबूतैः अपुण्यं, व्रतैः पुण्यं, तयोः व्ययः मोक्षः, ततः मोक्षार्थी अत्रतानि इव ब्रताति अपि त्यजेत् ) हिंसादिक अवतों से पाप होता है; अहिंसा आदिक व्रतों से पुण्य होता है और पुण्य व पाप दोनों के नाश से मोक्ष होता है । इस लिये मोक्ष के इच्छुक पुरुषं को अव्रतों की तरह ब्रतों को भी छोड़ना 'चाहिये।
समाभि-शतक!
भावार्थ:-मोक्ष प्राप्ति के लिये जैसे हिंसाविक पाप कार्य
प्रतिबंधक हैं उसी तरह अहिंसाविक प्रतंबा दया भाव आदिक
पुण्य कार्य भी प्रतिबंधक है। इस लिये मोक्ष के इच्छुक पुरुषों
को लोहे व सोने की बेड़ी के समान. पापय पुण्य दोनों को
छोड़ कर केवल अपने शुदात्मा के अनुभव में तन्मय होना
चाहिये। यही इतनी यात और जानने की है कि जब तक
शुद्धात्मा में सन्मय होने को योग्यता न होवे तय- तक पुण्य
कार्यों को कदापि नहीं छोड़ना चाहिये। क्योंकि यदि शुषों
पयोग में स्थिर हुए बिनाही शुभोपयोग को छोड़ दोगे तो हम
दोनों उपयोगों के न रहने से चित्तवृत्तिपापकार्यों की तरफ
मुंक जायगी, जिससे आत्माको और भी अधिक दुःख सहने
पड़ेंगे। इसलिये शुषोपयोग के अभाव में अहिंसादिक की
भावना रूपं शुभोपयोग को ही परंपरा मुक्तिका कारण समझ
कर इस्तावलम्बन समझना चाहिये।
..
"
,
पार-पुण्य के त्याग करने का कम
अवतानि परित्यज्य,चतेषु परिनिष्ठितः।
त्यजेत्तान्यपि संप्राप्य परमं पदमात्मनः॥८४)
अन्वयार्थअग्रतानि परित्यज्य, प्रतेपु: परिनिष्ठितः
आत्मनः परमं पदं सम्प्राप्य तानि अपि त्यजेत्) हिंसादिक
मतों को छोड़कर अहिंसारिक प्रतों में स्थिर - होना नाहिये
शान्ति-सोपान अर्थात् उनको पालन करना चाहिये । पश्चात् राग-द्वेष रहित साक्षात् वीतराग पद की प्राप्ति हो जाने पर प्रतो. को भी छोड़ना चाहिये । अर्थात् बीतरोग दशा प्राप्त होने पहले अहिंसादिक ग्रतों को नहीं छोड़ना चाहिये ॥४॥ दुःस्त्र का मूल कारण व मोक्ष का बांधक कौन है यदन्तजल्पसमपृक्तमुत्प्रेक्षाजालमात्मनः । मुलं दुःखस्य तन्नाशे, शिष्टमिष्टं परं पदम् ॥८५॥ अन्वयार्थ-(यत् अन्तर्जल्पसम्पृक उत्प्रेक्षाजालं. मा. त्मनः दुःखस्य मूलं तत्राशे इष्ट परं पदं शिष्ट) अंतरंग वचन व्यापार करके सहित जो. अनेक प्रकार का.. कल्पना जाल यही वास्तव में प्रात्मा के लिये दुःख का मूल है इस संकल्प विकल्प रूप कल्पना जाल के नाश होने पर ही. वास्तव में परम.पद की प्राप्ति हो सकती है। भावार्थ:-परमानन्द मय चैतन्य. चमत्कार स्वरूप निज आत्म द्रव्यको पहिचान कर जो यह जीव व्यर्थ हो अपने आत्मा को मुखी व दुखो, राजा:रंक, सबल-निर्वल मानता रहता है तथा इन्हीं बातों को लेकर जो और भी अनेक प्रकार : संकल्प-विकल्प करता है यह.सब प्रपंच. ही इस जीव के संसारमें भटकनेका मूल कारण है। और इस प्रपंचको छोड़ने से ही इसको मुक्ति प्राप्त हो सकती है।
समाधि-शतका १०७६ कल्पनाबालके नाश करने का क्रमः। अबती बतमादाय, बती ज्ञान परायणः । परात्मज्ञानसम्पन्नः, स्वयमेव परो मवेत ॥८॥ अन्वयार्थ-(अव्रती व्रतं मादाय, प्रती पानपरायणः, परात्मझानसम्पन्नः स्वयं एव परः भवेत् ) अनती अवस्था में उत्पन्न होने वाली कल्पनाओं को तो व्रत..प्रहण : करके नाश: करे; और व्रती अवस्था में होने वाली कल्पनाओं को शान- भावना में तन्मय होकर नाश करे, पश्चात् अहंत अवस्था में- सर्वज्ञ पद प्राप्त करके कम से मुक्ति मंदिर में अनन्त काल तक जा निवास करें। भावार्थ-गृहस्थ अवस्था में खी-पुत्र, धन-धान्यादिक के प्रपंच में पड़े रहने से जो अनेक प्रकारके इष्टानिष्टं संकल्प विकल्प उठते रहते हैं । साधु पद ग्रहण करके पहले तो इन गृहस्थ सम्बन्धी विकल्पों का त्याग करना चाहिये, पश्चात् साधु अवस्था में भी पीछी:कमण्डलु, शिष्य-पशिष्य आदि के निमित्त से जो विकल्प उठते हैं उनको निरन्तर झानाभ्यास वा.आत्मभावना में लीन होकर छोड़ना चाहिये, इसी प्रकार कम से शुक्ल ध्यान द्वारा अहंत पद प्राप्त कर सिद्धन करना चाहिये ।
१०. शान्ति-सोपाना साधुपेश धारण करने मात्र से मुक्ति नहीं हो सकती। लिंग दहाश्रितं दृष्टं,देह एवात्मना भवः । न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये लिंगकृताग्रहाः ८७ अन्नयार्थ-(लिंगं देहाश्रितं दृष्ट, देह एव आत्मनः भवा तस्मात् ये लिंग फंताग्रहाः तेभवात् न मुध्यन्ते ) जटा धारण करना अथवा नग्न रहना आदिक जो भेष हैं वे सब शरीर के आश्रित हैं और शरीर के निमित्त से ही प्रात्मा संसारी कहलाता है। इसलिये केवल भेष मात्र से ही मुक्ति प्राप्त करने का आग्रह करने वाले पुरुष संसार से मुक्त नहीं हो सकते। भावार्थ- बहुत से अज्ञानी साधु दुराग्रह यशः सम्यग्ज्ञान, ध्यान आदि के बिना केवल वेश मात्र को ही मुक्ति का कारण मान-बैठते हैं, ऐसे पुरुषों को समझाने के लिये आचार्य महा. राज. कहते हैं, कि केवल वेशं मात्र से मोक्ष प्राप्ति का आग्रह करना मूर्खता है, साधु वेश धारण करके उस पद के योग्य शान-ध्यान आदि के करने से ही धास्तव में आत्म हित सकता है । यहां पर एक बात यह और जानने की है कि जिस प्रकार बहुत से अज्ञानी साधुओं को वेंश मात्र का पक्ष होता । ऐसे ही बहुत से दुर्विदग्ध पुरुषों को ज्ञान मात्र का पर्व भो होता है। अर्थात् जैसे कोई २ पुरुष शान के बिना साधु- देश मात्र से मुक्ति मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास करते है जैसे ही बहुत से पुरुष साधु वेश के बिना जान मात्र से ही ". समाधि-शव मोक्ष प्राप्ति का खप्न देखा करते हैं, यह भी ऐसे पुरुषों का केवल भ्रम मात्र है, जिस प्रकार सम्यग्ज्ञान, मोक्ष प्राप्ति में साधक है उसी प्रकार द्रव्य चारित्र भी साधक है, केवल एकान्त मानने का प्रन्थकार ने.निषेध किया है। इसी भाव का एक यह काव्य श्री अमृतं चा, स्वामी ने समयसार के कलशों में लिखा है- मग्नाः कर्म नयावलम्बन परा, शानं न जानन्ति य-1 मग्ना शाननवैषिणोऽपि यदति, स्वच्छन्दमन्दोद्यमाः ॥ विश्वस्योपरि ते तरन्ति सततं, शानं भवन्तः स्वयं । ये कुर्वन्ति न कर्म जातु न वशं,यान्ति प्रमादस्य च ॥१॥ अर्थात्-जो पुरुष शान वरूप आत्मा को न जानकर कैरल वाह्य क्रियाकांड को ही मुक्ति का कारण जान उसमें हो तन्मय रहते हैं वे भी संसार में इंघते हैं और जो शुद्ध आत्म स्वरूप की प्राप्ति हुए बिना ही मिथ्या ज्ञान के कुतकों में पड़ कर व्यवहार चारित्र को सर्वथा" छोड़ देते हैं ये भी संसार में ही डूबते हैं । किन्तु जो पुरुष शुद्ध आत्म स्वरूप को प्राप्ति हो जाने पर उसमें तन्मय होते हैं अर्थात् जिनकी निश्चय सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्रमय एक अभेदरूप परिणति हो जातीहै वे संसारसे पार होतेहैं। पेसो अवस्था होने पर व्यवहार चारित्र का छूटनो कार्यकारी है और जब तक यह परम शांत दशा प्राप्त न हों तब तक भमाद रहित होकर व्यवहार रत्नत्रय का धारण करना अत्यंत मावश्यक है। - शान्ति:-सोपान उत्तम जाति में उत्पन्न होने मात्र से मुक्ति नहीं हो सकती। जाति देहाश्रिता दृष्टा, देह एवाऽऽत्मनो भवः। न मुच्यन्त भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहा।८८ अन्वयार्थ-(जातिःदेहाश्रता दृष्टा, देह एवं आत्मनः भवः, तस्मात्ये जाति कृता प्रहाः, ते भवात् न मुच्यन्ते) ब्राह्मण आदि जांतियां शरीर के आश्रित हैं और शरीर ही प्रात्मा के लिये संसार है इस लिये जिनको जातीय पक्ष को अनुचित दुराग्रह होता है वे संसार से मुक नहीं हो सकते। यहां पर भी यह बात विशेष जानने की है कि यद्यपि प्रामण, क्षत्रिय, वैश्य इन उत्तम जातियों में उत्पन्न हुए पुरुषों को ही मुक्ति प्राप्त हो सकती हैं अन्य को नहीं हो सकती, तथापि झुक्ति प्राप्ति के शान-ध्यानादि साधन किये बिना ही केवल उत्तम जाति में उत्पन्न होने मात्र से मुक्ति मानना भ्रम यहां भी श्राचार्य महाराज ने “वर्णानां ब्राह्मणो गुरु काशी. मरणान्मुक्ति इस प्रकार मिथ्या एकान्त छुड़ाने के लिये यह श्लोक लिंखा है ॥ मिथ्या शास्त्रोका दुराग्रह करनेसे भी परमपदकी प्राप्ति नहीं होती जातिलिंगबिकल्पेन, येषां च समयाग्रहः । तेजपि न प्राप्नुवन्त्येव, परमं पदमात्मनः ८९ समाधि-शवक। अन्वयार्थ-(येषां जाति लिग बिकल्पेन समयान ने ऽपि आत्मनः परमं पदं न प्राप्नुवन्त्येव ) जिन पुरुषों को पूर्व में कहे हुए जाति और लिंग के विषय में शास्त्र प्रतिपादित होने का आग्रह है अर्थात् घालणत्व श्रादि जाति में उत्पन्न होने मात्र से अथवा किसी एक वेश मात्र के धारण करने से ही मुक्ति हो जाती है इस प्रकार के कथन घाले शास्त्रों को प्रमाण मानकर जो पुरुष अनेक प्रकार के दुराग्रह करते रहते है वे भी आत्मा की शुद्ध अवस्था को नहीं प्राप्त हो सकते। बिना मोह मंद हुए बाय चारित्र कार्यकारी नहीं। यत्त्यागाय निवर्तन्ते, भोगेभ्यो यदवाप्तये । प्रीति तत्रैव कुर्वन्ति, द्वेषमन्यत्र माहिनः ९० अन्वयार्थ ( यस्यागाय यदयाप्तये भोगेभ्यः निवर्तन्ते, मोहिनः तत्रैव प्रीति अन्यत्र पं कुर्वन्ति) शरीरादिक पर- पदार्थो से ममत्व दूर करने के लिये तथा चीतराग अवस्था की प्राप्ति के लिये बहुत से पुरुष विषय-भोगों को छोड़ कर साधु हो जाने पर भी पश्चात् मोह के उदय से शरीरादिक में प्रीति व योतरागता के साधनों से दूप करने लगते हैं भावार्थ-अंतरंग राग-ष-मोह के शांत हुए बिना यदि कोई पुरुष किसी उत्तेजना श्रादि के कारण विषयभागों को छोड़ कर मुनि बूत भी धारण कर लेता है तो शोध हो फिर है .. ११२ शान्ति-सोपान । पतित हो जाता है। ऊपर से मुनि सरीखा धेश रखकर भी यह शरीर में अथवा भोजनादिक में प्रीति रखने लगता और जिल बोतराग दशा को प्राप्ति के उद्देश से उसने मुनि व्रत लिये थे उसले वा उसके साधन भूत शान, ध्यान आदि से पराङ्मुख रहने लगता है इस प्रकार, मोह के उदय से क्रोधादि अंतरंग परिग्रहों को न छोड़ सकने के कारण वह दुःखी ही रहता है, इस लिये आत्म हित, के इच्छुक पुरुषों को पहले मोह मंद करने के लिये प्रयत्न करना चाहिये और जितना २ मोह मंद होता जाय, उतना २ व्यवहार चारित्र बढ़ाते आना चाहिये। शरीर में आत्मा के भ्रम होने का दृष्टांत । अनन्तरज्ञः सन्यले, हाँट पंगायथाऽन्ध के। संयोगाद् दृष्टिमंगेपि, संधत्तेतहदात्मनः ।। अन्वयार्थ-(अनन्त रशः संयोगात् यया पंगोष्टिं अन्ध- के संधत्ते, तद्वत् श्रात्मनः दृष्टिं अंगे अपि संधत्ते) लंगड़े और अंबे के भेद को न जानने वाला पुरुष जैसे लंगड़े की रधि को अंधे में आरोपित करता है वैसे ही आत्मा और शोर के भेद को न जानने वाला पुरुष प्रात्मा की दृष्टि को शरीर में आरोपित करता है। भावार्थ-जैसे अंधे के कंधे पर' लंगड़ा चढ़ा हुआ जा रहा हो अर्थात् अन्धे को लंगड़ारास्ता बताता जा रहा हो
समाधि-शतक ।
११३,
और अन्धा अपने पैरों से चलता जा रहा हो, ऐसी दशा में
कोई पुरुष अपने नेत्रों की मंद ज्योति से यदि लंगड़े को न
देसकर यह समझे कि यह चलने वाला पुरुपही अपनी आंखों
से देखकर जा रहा है तो यह उस मंद ज्योति वाले का जानना
जिस प्रकार ठीक नहीं है उसी प्रकार आत्मा व शरीर का
संयोग होने से जो पुरुष शरीर को ही प्रात्मा समझता है
उनका भी वह शान ठीक नहीं है।
अंतरात्मा को शरीर में श्यान्मा का भ्रम नहीं होता।
दृष्टभेदो यथा दृष्टि, पङ्गारन्धेन योजयेत् !
तथा न योजयेद्देहे,दृष्टात्मा दृष्टिमात्मनः९२
अन्वयार्थ-(टभेदः यथा पंगोः दृष्टिं अन्धे न योजयेत्
तथा दृष्टात्मा आत्मनः दृष्टिं देहे न योजयेत् ) लङ्गड़े व अन्धे
के भेद को जानने वाला जैले लंगड़े को अन्धा नहीं समझता
है उसी प्रकार आत्मा व शरीर का भेद जानने वाला पुरुष
श्रात्मा को शरीर नहीं समझता है । अर्थात् जिस पुरुष को
अन्धे व लंगड़े के भेद की तरह शरीर व आत्मा का भेद
मालूम पड़ जाता है वह शरीर को प्रात्मा न समझ कर
क्षान, दर्शन, सुख, वीर्य प्रादि गुणों के पुज को आत्मा
समझना है।
४
है
११४ शान्ति-सोपान। कौन पुरुषं किस अवस्था को भ्रम रूप समझता है सुप्तोन्मत्ताधवस्थैव, बिभमोडनात्मदर्शिनाम् बिस्मोऽक्षीणदोषस्य,सर्वावस्थात्मदर्शिनः।९३ अन्वयार्थ-(अनात्मदर्शिनां सुप्तोन्मत्ताद्यवस्था पवविक्रमः श्रात्मदर्शिनः क्षीणदोषस्य सर्वावस्था विभ्रमः | अथवा आत्म दर्शिनां सुप्तोन्मत्ताद्यवस्था एव-"अपि,विभ्रमः न,सर्वावस्था- त्मदर्शिनः अक्षीण दोषस्य विनमः यात्मस्वरूप को न जानने पाले वहिरात्मा पुरुषों को केवल सुप्त व उन्मत्त अवस्था ही भ्रमरूप मालूम देती है किन्तु आत्मदर्शी पुरुष को रागी पुरुषों की.सर्व ही अवस्थायें भ्रम: रूप मालूम देती हैं। अथवा इस.. श्लोक का दूसरा अर्थ यह है कि अत्मिदर्शी पुरुषों की सुप्त (निद्रावस्था) व उन्मत्त अवस्था भी भ्रम रूप नहीं होती, और देहादिक की सम्पूर्ण अवस्थात्रों को आत्मा, की नव- स्थायें जानने वाले रागी पुरुष की सुप्त व उन्मत्त सर्व ही अवस्था भ्रम रूप होती हैं। भावार्थ-व्यवहारी जन तो स्वप्नके ज्ञान को या उन्मत्त- पागल पुरुष के ज्ञान को या उसकी क्रियाओं को ही मिथ्या समझते हैं किन्तु श्रात्म दर्शी पुरुष प्रपंच में फंसे हुए बहिरा- मा पुरुषों की समस्त क्रियाओं को ही भ्रम रूप समझते हैं क्यों कि व्यवहारी जन चाहे शुभ कार्य करें:चाहे अशुभ कार्य फरें कोई भी कार्य उनका राग-द्वेष के बिना नहीं होता, समाधि-शतका और जिन कार्यों में राग-द्वेष लगा हुआ है वे संब कार्य परमार्थडष्टि से श्रम रूप हैं आत्म स्वभाव नहीं है, इसी से आत्मदर्शी पुरुप व्यवहारी जीवों के समस्त कार्यों को भ्रम रूप समझते हैं। दूसरा अर्थ संस्कृत टीका में इस श्लोक का यह भी दिया है कि श्रात्मदर्शी पुरुषों की सुप्त व उन्मत्ता दि अवस्था भ्रम रूप नहीं होती।क्योंकि जो पुरुष श्रात्मरसमें भीगे हुए हैं अथवा यो कहिये कि जिनको परमानन्द मयं आत्मिक सुधारस के पान करने का अभ्यास पड़गया है। उनको जब इन्द्रियों की शिथिलता से निद्रा आ जाती अथवा खान-पान की प्रतिकूलताःव रोग आदि से कदाचित मूर्छा भी आजाती हैं तो भी उनकी आत्मानुभव की वासना नहीं छूटती। इसलिये ऐसे. आत्मदर्शी पुरुषों की सुप्त व उन्मत्त अवस्थामी भ्रमरूप नहीं होती,यदि वे सुप्त व उन्मत्त श्रवस्थायें भ्रम रूप होती हैं तो शरीरादिक बाह्य पदार्थों की समस्त अवस्थाओंको आत्मरूप समझने वाले बहिरात्मा पुरुषों की ही होती हैं। कर्म-बन्ध किससे छूटता हैं और किससे नहीं छूटता विदिताऽशेष शास्त्रोजपि न जाग्रदपि मुच्यते । देहात्मदृष्टि, ज्ञातात्मा सुप्तोन्मत्तोऽपिमुच्यते ।९४॥ अन्वयार्थ (देहात्मदृष्टि: विदिताशेषशास्त्रः अपि, जाग्रत शान्ति-सोपान। अपि न मुच्यते, -ज्ञातात्मा सुप्तोन्मतः श्रापि मुच्यते) जिस पुरुष की शरीरादिक बाह्य पदार्थों में आत्मष्टि है वह संपूर्ण शास्त्रों को जानता हुश्रा तथा. जागता हुश्रा भी कर्म-बन्ध से नहीं छूटता और जो पुरुष आत्मज्ञानी है उसके सोते हुए भी तथा मूच्छित अवस्था में भी.कर्म निर्जरा होती रहती है। भावार्थ-शरीर व आत्मा के भेद मान विना कोरा तोते की तरह रट कर प्राप्त किया शास्त्र ज्ञान आत्म हितका साधक नहीं है और आत्मज्ञान होने पर सुत व मूछित अव- स्था भी आत्मा की हानि करने में समर्थ नहीं है। मन किस वस्तु में लीन होता है ? यत्रैऽऽवाहितधीः पुंसः, श्रद्धा तत्रैव जायते । यत्रैव जायते. श्रद्धा, चित्तं तत्रैव लीयते ।९५। अन्वयार्थ (पुसः यत्र एव हितधीः तत्र एवं श्रद्धा जायते, यंत्र एवं श्रद्धा जायते, तत्र एव चित्तलीयते) पुरुष की जिस पदार्थ में बुद्धि लग जाती है उसी में उसको श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है और जिस पदार्थ में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है उसी में उसका मन रम जाता है। भावार्थ-जिस पुरुषको जो बस्तु प्रिय मालूम देतीहै उसी घस्तु को ग्रहण करने की उस पुरुष की इच्छा होती हैं और जिसके ग्रहण करने की इच्छा होती है उसी वस्तु. में उसका मन हर समय लीन होता है । इस नियम के अनुसार जिल
समाधि-शतक।
पुरुष को श्रात्मानुभव करना अच्छा लगता है उसको श्रात्मा-
नुभव करते रहने की ही निरंतर इच्छा रहती है और इसी
कारण उसका मन प्रात्मानुभव में ऐसा तन्मय रहता है कि
स्वप्न में भी श्रात्मानुभव से अलग होना नहीं चाहता। इसके
विरुद्ध जिस पुरुप को विषयों से प्रीति है उसका मन निरंतर
विषयों में ही फंसा रहता है और इसी कारण यदि उसको
शास्त्र ज्ञान भी हो जाता है तो वह कार्यकारी नहीं होता!
मन किस वस्तु से उदास नहीं होता?
यत्रैवाऽहितधीः पुंसः, श्रद्धा तस्मान्निवर्तते।
यस्मान्निवतते श्रद्धा, कुतश्चित्तस्य तल्लयः १९६॥
अन्वयार्थ-(पुसः यत्र एव अहितधीः तस्मात् श्रद्धा
निवर्तते, यस्मात् श्रद्धा निवर्तते चित्तस्य तल्लयः कुतः)
पुरुष की जिस वस्तु में अनुपकारक बुद्धि होती है अर्थात्
जिस वस्तु को वह हितकारी नहीं समझता उस वस्तुमें
उसकी रुचि नहीं होती, और जिस वस्तु में रुचि ही नहीं
है उस वस्तु में मन कैसे लग सकता है ? अर्थात्-जैसे किसी
पुरुष को यदि विषय-कृपायों से बचना हो, तो पहले उसे
विषय-फपायों को दुःखदाई समझना चाहिये, क्योंकि जब
उसकी बुद्धि में विषय-कपाय दुःखदाई मालूम देने लगेगे तब
स्वयं ही उसफी रुचि उनसे हट जायगी, और रुचि हटने से
मन विषय-कपायों के सेवन करने से उदास हो जायगा ।६६
शान्ति-सोपान। ध्येय को ध्यातासे भिन्न मानकर भी ध्यान करना उत्तम ही है। भिन्नात्मानमुपास्यात्मा, परोभवति तादृशः । वत्तिर्दीपं यथोपास्य,भिन्ना भवात तादृशी।९७ अन्वयार्थ-(श्रात्मा भिन्नात्मानं उपास्य तादृशःपरम्भवति, यथा भिन्ना वतिः दीपं उपास्य तादृशी भवति) यह जीव अपने से भिन्न अहंत-सिद्ध स्वरूप परमात्मा की उपासना करके उनही सरीखा अहंत सिद्ध रूप परमात्मा हो जाता जैसे कि वत्ती,दीपक से भिन्न होकर भी दीपक की उपासना से दीपक स्वरूप हो जाती है। भावार्थ-परमात्मा को भिन्न मानकर भी उसका ध्यान- मनन आदि करो तो भी प्रात्मशुद्धि होती है। यहां ग्रंथकार का आशय यह है कि जबतक "जो परमात्मा है वही मैं हूं।" और "जो मैं हूं,वही परमात्मा है।" इस प्रकार ३१ वे श्लोकमें कहे अनुसार ध्याता-ध्यान-ध्येय को एक रूप मानकर ध्यान करने की योग्यतान होवे तवतक ध्याता-ध्येयकी भेद-भावनासे ध्यान करनेको भी हेय नहीं समझना चाहिये,किन्तु भेद-भावना से किये हुए ध्यान के द्वारा भी प्रात्मा का बहुत हित होता है। यही समझना चाहिये। . ध्य य को ध्याता से अभिन्न मानकर ध्यान करने का, हष्टान्त पूर्वक समर्थन । उपास्यात्मानमेवात्मा, जायते परमोऽथवा । माथित्वाऽऽत्मानमात्मैव,जायते ग्नि यथा तरु९८ समाधि-शतक। ११६ अन्वयार्थ-(अथवा श्रात्सा श्रात्मानं एच उपास्य परमः जायते,यथा तरुः आत्मा श्रान्मानं एव मथित्वा अग्निः जायते) अथवा श्रान्मा अपनी ही उपासना करके परमात्मा हो जाता है । जैसे चांसका नृक्ष घांसके साथ ही रगड़ खाने से अग्नि- रूप हो जाता है। भावार्थ-यदि आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को ही ध्येय समझ कर उसमें ही तन्मय होकर अभेदरूप से ध्यान करता है । तो परमात्मपद प्राप्त कर लेता है। जैसे कि वांस, वांस के साथ ही रगड़ खाने से अग्निरूप हो जाता है । हम ॥ भेदाभेद का उपसंहार। इतीदं भावयन्नित्यमवाचां गोचरं पदम् । स्वतएव तदाप्नोति,यतोनाऽऽवलतेपुनः॥१९॥ अन्वयार्थ-(इति इदं नित्यं भावयेत्, स्वतःएव तत्वाचा गोचरं पदं प्राप्नोति यतः पुनः न श्रावर्तते) अव श्राचार्य महाराज भेदाभेद का उपसंहार करते हुए लिखते हैं। कि श्रात्म स्वरूप को भिन्न रूप अथवा अभिन्नरूप मानकर निरन्तर भावना करनी चाहिये । जिससे कि वचनके अगोचर उस परमात्म पद्को, प्राप्ति होवे जिससे कि फिर छूटना नहीं होता और संसार के दुःख भोगने नहीं पड़ते।
-- शान्ति-सोपाना मात्मा भूत अतुष्टय से उत्पन्न नहीं है और संसार अवस्था में सर्वथा शुद्ध नहीं है। यदि ! अयत्नलाध्यं निर्वाणं, चित्तत्वं भूतज अन्यथा योगतस्तस्मान्न,दुःखं योगिनां क्वचित्। अन्धयार्थ-(यदि चित्तत्त्वं भूतज "वहि, निर्वाणं अपन साध्यं, अन्यथा योगतः तस्मात् योगिनां क्वचित् दुःखं न) यदि कदाचित् चैतन्यस्वरूप आत्म तत्त्वकी उत्पत्ति चार्वाक के मतानुसार पृथिवी,जल,अग्नि और वायु इन चार भूतों से ही मानली जाय तो फिर मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने की कुछ आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि जब भूत, चतुष्टयसे उत्पन्न हुआ शरीर ही प्रात्मा मान लिया गया तो शरीर के नाश को ही मोक्ष मानना पड़ेगा और जब कि शरीर का नाश, श्रायु समाप्त होने पर स्वयं ही हो जाता है तव फिर उसके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ सिद्ध होता है। इसलिये मोक्ष पुरुषार्थ को ध्यान में रखते हुए चार्वाक की इस मन-ग. दन्त कल्पना को ठीक नहीं समझना चाहिये। दूसरे यदि चैतन्य स्वरूप श्रात्मा को सांख्यमत के अनुसार सर्वथा स्वभावसिद्ध शुद्ध स्वरूप ही मान लिया जाय तो भी मोक्ष प्राति के लिये पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि आत्मा की अशुद्ध रूप संसार अवस्था से शुद्ध रूप समाधि-शतक मोक्ष अवस्था के प्राप्त करने के लिये ही शान-ध्यान, अप-सप भाँदि पुरुषार्थ या उद्योग की आवश्यकता होती है. और यदि भात्मा को अनादि सेही सर्वथा शुद्ध स्वरूप मान लिया जाय तो.फिर.मोक्षप्राप्ति के लिये किया हुधा सब परिश्रम व्यर्थ पड़ जाता है,इसलिये यह साख्यमतका कथन भी युक्ति संगत नहीं जानना चाहिये। हां,यदि जीवन्मुक्त रूप अरहंत अवस्था की अपेक्षा प्रात्मतत्त्व को शुद्धखरूप माना जाय तो यह बात बन सकती है और इस दशा में मोक्ष भी अप्रयत्न सिद्ध बन सकता है। क्योंकि सर्वस:रूप अरहन्त केवली का आत्मा भी शुद्ध हो जाता है और मोक्ष प्राप्ति के लिये अव-वे कोई बुद्धि- पूर्वक प्रयास भी नहीं करते, इसलिये उनकी मुक्ति भी अरहंत अवस्था की अपेक्षा बिना प्रयत्न के कही जा.सकती है, इसके अतिरिक्त अरहंत अवस्या से नीचे के गुणस्थान वालें जो मुनि हैं उनको ध्यानादिक के करने से ही अरहंत अवस्था पूर्वक मुक्ति प्राप्त होती है इसलिये मुक्ति के लिये प्रयत्न करना भी भावश्यक सिद्ध होता है। यहां कदाचित यह शंका हो सकती कि प्रयत्नसिंद्ध मुक्ति मानने में तो प्रयत्न करते समय कष्टं भोगना पड़ेगा और जिस कार्य के करने में प्रथम ही कष्ट भोगना पड़े, उसमें पीछे से सुल क्या मिल सकता है ? इस प्रश्न का खुलासा उत्तर यही है कि मुक्ति प्राप्ति के लिये कठिन से कठिन तप व ध्यान आदि करते हुए भी महर्षिजन खेद नहीं मानते किन्तु अपने लक्ष्य की सिद्धि होते देख तप-ध्यान &
१०६
शान्ति-सोपान ।
आदि करने में आनंद मानते हैं, क्योंकि वे शरीर को श्रात्मा
ले भिन्न समझते हैं इस लिये शरीर के कृशाहोने से उन को
खेद नहीं होता।
शरीर के नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता।
स्वप्ने दृष्टेबिनष्टेजपि,न नाशोऽस्ति यथाऽऽत्मनः
तथा जागरदृष्टेपि, विपर्यासाविशेषतः ॥१०१।
अन्वयार्थ-(स्वप्ने दृष्टे विनष्टे अपि यथा प्रात्मनः नाशः
न अस्ति, तथा जागरद्दष्टे अपि, विपर्यासाऽविशेषतः)
स्वप्न में शरीर के नाश होने पर भी जैसे प्रात्मा का नाश नहीं
होता; उसी प्रकार जागृत अवस्था में भी शरीर के नाश होने
पर प्रात्माका नाश नहीं होता।
यहां यह शंका हो सकती है कि स्वप्न में 'तो भ्रम से
शरीर के नाश के साथ आत्मा का नाश मालूम पड़ता है? इस
के उत्तर में जागृत, अवस्था में भी शरीर के नाश के साथ,
श्रात्मा के नाश को भ्रमरूप ही समझना चाहिये, क्योंकि जैसे
झोपड़ी के जल जाने पर भी .आकाश नहीं जलता वैसेही.
शरीर के नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता। हां!
स्वप्न अवस्था में शरीर का भी नाश, भ्रम रूप है। जागृत
अवस्था में भरते समय शरीर के परमाणु बिखर कर अवश्य
अलग-अलग हो जातेहैं अर्थात् उनको शरीररूपस्कन्ध पर्याय.
वास्तव में नष्ट हो जाती है। किन्तु आत्मा का अभाव दोनों
१
समाधि-शतक।
१०७
अवस्थाओं में नहीं होता। आत्मा की सिद्धि अष्ट सहनी,
प्रमेय कमल मार्तण्ड आदि ग्रन्थों में बिस्तार पूर्वक की है
यहां खंडन-मंडन के विषय पर दृष्टि नहीं दी गई है।
कायक्लेशादि करके आत्मा को शरीर से भिन्न जानने का
अभ्यास करना चाहिये।
अदुःखभावितं ज्ञानं, क्षीयते दुःखसन्निधौ ।
स्माद यथावलं दुःखैरात्मानं भावयेन्मुनिः।१०२।
अन्वयार्थ (अदुःखभावितं ज्ञानं दुःखसन्निधौ क्षीयते,
तस्मात् यथावलं.आत्मानं दुःखै भावयेत् ) सुकुमारता पूर्वक,
विना काय-क्लेश आदि तप किये, जो शरीर व भात्मा का
र भेदशान होजाताहै वह उपसर्ग,परिषह आदि कष्टोंके मानेपर
नष्ट भी हो जाता है। इस लिये मुनि-जनों को यथा शक्ति
कायक्लेश आदि तप करके ही शरीर से भिन्नामात्मस्वरूप की
भावना करनी चाहिये।
भावार्थ-जिसको अनेक प्रकार केभियंकर कष्टों के आने
पर भी शरीर का मोह उत्पन्न न होवे, वही सच्चा भेदज्ञानी
समझा जा सकता है और यह वात तभी हो सकती है जब
शरीर को खयं अनेक प्रकार के कष्ट देकर निराकुल रहने का
अभ्यास किया जावे।
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१०८
शान्ति-सोपान।
श्रात्मा के चलने पर शरीराक्यों चलता है?
प्रयत्नादात्मनो वायुरिच्छाद्वेष प्रवर्तितात् ।
वायो शरीरयन्त्राणि, वर्तन्ते स्वेषु कर्मसु।।१०३॥
अन्वयार्थ-(इच्छावषप्रवर्तितात् आत्मनः प्रयत्नात्
घायुः"चलति",वायोःशरीरयन्त्राणि स्वेषु कर्मसु वर्शन्ते ) राग
द्वेष से उत्पन्न हुए आत्मा के प्रयत्न से शरीर के भीतर
वायु चलती है.और वायुकेि चलने से शरीर व इन्द्रियरूपी
यन्त्र अपना २ कार्य करने लगते हैं।
भावार्थ-यहां पर किसी की यह शंका थी कि अब शरीर
घे श्रात्मा बिल्कुल भिन्न २ पदार्थहें तब आत्मा की इच्छा के
आधीन शरीर का गमन क्यों होता है ? अथवा जिधर को
आत्मा।जाता है, जीवित अवस्था में उधर को ही शरीर क्यों
जाताहै ? इसी शंका के उत्तर में यह श्लोक लिखा गया है कि
पहले श्रात्मा से राग द्वष के वश प्रयत्न पैदा होता है, वह
प्रयत्न शरीराके भीतर की वायु को इच्छित स्थान की तरफ
को चलाता है और वायु रेलगाड़ी की तरह शरीर को उधर
ही बैंच कराले जाती है।
शारीरिक क्रियाओमे बहिरात्मा ही सुख मानता है।
तांन्यात्मनि समारोप्य, साक्षाण्यास्ते सुखं जडः।
त्यक्त्वाऽऽरोपं पुनाहान प्राप्नोति परमं पदम्१०४
समाधि-शंतका १०६ अन्वयार्थ-(जडः साक्षाणि तानि आत्मनि :समारोप्य सुखं आस्ते,विद्वान् पुनः आरोपं त्यक्त्वा परमं पदम् प्राप्नोति) मूर्ख पुरुष इन्द्रियों सहित उन औदारिकादि शरीरों को आत्मा मानकर सुख मानता है और शानो पुरुष शरीर व इन्द्रियों में प्रात्मा का संकल्प त्यागकर परमपद को पाता है। अर्थात् मूढ़ बहिरात्मा, शरीर व इंद्रियों की अनेक क्रिया- भों को भात्माएकी ही क्रिया जानकर, सुल मानता है, किन्तु शानी पुरुष ऐला नहीं मानते। अंध का उपसंहार। मुक्त्वा परत्र एरबुद्धिमहंधियं च, संसारदुःखजननी जननाद्विमुक्तः । ज्योतिर्मयं सुखमुपैति परात्मनिष्ठस्- तन्मार्गमेतदाधिगम्य समाधितन्त्रम् ॥१०॥ अन्वयार्थ-(.तनमार्ग' एतत् समाधितन्त्रं अभिगम्य परात्मनिष्ठः संसारदुःखजननी परत्र परबुद्धिं अहंधियं च मुक्त्वा जननाद्.विमुक्तः ज्योतिर्मयं सुखं उपैति) भावार्थ-ग्रन्थकर्ता श्रीपूज्यपादास्वामी ग्रंथ का उपसंहार करते हुए कहते हैं कि परमानन्द मय शुद्ध आत्मा की प्राप्ति के उपायभूत इसाशांतिमय आत्मखरूपके प्रतिपादक.समाधि: तन्त्र शास्त्रको जानकर परमात्मा की भावना में रित पुरुष
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शान्ति-सोपान!
संसार के दुःखों को उत्पन्न करने वाली पर पदार्थों में
परमात्मबुद्धि व आत्मबुद्धि को त्यागकर संसारसे मुक्त होता
है और मानानन्दमय सुखनिधि स्वरूप परमात्मपदः को प्राप्त
होता है ॥ इतिशुभम् ॥.
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आहिंसा भूतानां, जगति विदितं ब्रह्म परमम् ।
इस पुण्य पृथिवी पर कभी सव में अहिंसा भाव था।
राजा प्रजा पशु पति तक पर पड़ा प्रेम प्रभाव था ।
हिंसक विरोधी जीव भी थे शांत,तज वीभत्सको।
थी गौ पिलाती सिंह को पय, सिंहनी गोवत्स को ॥
नियमावली
श्री आहिंसाप्रचारिणी सभा, काशी।
वर्तमान जनता में दया, क्षमा, परोपकारता आदि
नियोचित गुणोंके स्थान में हिंसकता, क्रूरता, नृशंसता
श्रिादि दुर्गुणों की बेहद बाढ़ को देखकर दुगुणों को दूर
कर उक्त गुणों के पुनरुत्थान के लिये इस सभा का जन्म
हुआ
१) मुख्योद्देश्य-अहिंसा ( दयाधर्म) का सर्वत्र प्रचार
करना तथा हिंसा व उसके कारणों को रोकने का
उद्योग करना।
२) साधन-(१) आनरेरी प्रचारक मण्डल, (२) 'साप्ता-
हिक अहिंसा पत्र, (३) उपदेशक विभाग, (४)
ट्रेक्ट विभाग, (१) शाखासमायें।
नियम सभासदी-प्रत्येक देशवासी और प्रत्येक धर्मा-
नुयायी महाशय (१)मांस भक्षण, मध (शराव ) पान
है।
व शिकार खेलने का त्याग करने पर, (२) चरबी
चमड़ा.व. हड्डी का व्यापार न करने पर और
(३) अहिंसा के पूर्ण अर्थ से सहमत होने पर इस
सभा के सभासद हो सकते हैं।
फीस सभासदी।
( १ ) जो महाशय १०००) या अधिक, एकमुश्त प्रदान
करेंगे,वे परम सहायक होंगे।
( २ ) जो महाशय १००) एकमुश्त प्रदान करेंगे वे स्थायो
सभासद होंगे।
( ३ ) जो महाशय ५):रु वार्षिक प्रदान करेंगे वे साधारण
सभासद होंगे। उक्त महाशयों के पास इस सभा. के
समस्त ट्रेक्ट व साप्ताहिक अहिंसा पत्र बिना मूल्य
भेजे जायगे । प्रत्येक महाशय केवल २) वार्षिक
देकर भी साधारण सभासद हो सकते हैं किन्तु उन
को इस सभा के समस्त ट्रेक्ट ही बिना मूल्य भेजे
जायगे।..
( ४ ) विशेष रूप से. अहिंसा प्रचार करने वाले महाशय
आनरेरी सभासद बनाए जासकेंगे।
( ५ ) साप्ताहिक .. अहिंसा . . पत्र का मूल्य ३॥) रुपया
वार्षिक है।
मैनेजर,
श्री अहिंसा प्रचारणी सभा,
काशी।।