Hindi Sahataya Samalayan

Lalanchandrika

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ॐ नम:श्री ज्योतिःस्वरूप परम परमात्मा सूर्यनारायणाय नमोनमः ३०० नमः ॥ ललनचन्द्रिका का निवेदन विदित हो कि यह पारावार रहित घोर संसार में एक से एक महान विद्वान ज्ञानवान गुणवान् चतुर सुजान लोग हो गये हैं यथा श्री व्यासदेव जी महाराज महान् कुशल कवि कि जिन्हों ने अठारह पुराण रचकर जगत् को मुक्ति मार्ग व हरिभक्ति का प्राप्त होना सूचित किया अथवा शुकदेव जी महाराज कि जिन्हों ने भागवत द्वारा राजापरीक्षितको मोक्षपदवीका प्रधान बनाया अथवा बाल्मीकि जी जिन्हों ने अपने बुद्धि बिक्रमसे बाल्मीकीय रामा- यण कल्पित कर इस जगत् के उद्धारणार्थ एक नौका बनायदी इत्यादि अनेकों मुनी अनेकों गुनी अनेकों कविजन अनेकों बुध सुजन अपनी अपनी युक्ति बुद्धिवल से सनातन उस परब्रह्म परमात्मा के गुणानुवाद गाते ही चले आते अरु नहीं अघाते तो फिर इससे यही जानाजाता है कि इस असार संसार में यह महादुर्लभ मनुष्य चोला पायकर केवल परमात्मा के गुणानु- वाद ही गान करना कथन करना स्मरण करना व सुनना यकसार है और सब असार है क्योंकि हरिभजन का वो प्रताप है कि साक्षात् हरिस्वरूप जीव को बनाय इस जगत् के आवागमन के महान् दुःखों से छुड़ाय देता है । अतएव । इसी कारण से इस ललन सरीखी मतिवाले ललन ने अपनी तुच्छ लघु बुद्धि के अनुसार आप महाशयों की परम अनुग्रह वा आशीर्वाद से यह ललनसागर में का एक चतुर्थ विभाग कि जिसमें बारह खरिक अकार से हकार पर्यंत वर्ण सम्बंधी शब्दों में अनेक २ ललनचन्द्रिका। भावालंकार नायकाभेद संपन्नित अनेक रसों से चुचुहाते हुये जमक प्रिय विधानिक पूर्वार्द्ध में तो अनूठे अनूठे कवित्त और उत्तरार्द्ध भाग में अन्योक्तिक कवित्तों की श्रेणी अमित भाव सुख सृजेणी, यथा, पक्षीविलास,व, प्रसून प्रकाश, वाना किराना, व, मसालादि अनुमाना, विटप वर्णना, व, साग भाजी विष- ना, व्याख्यान तरुफलान, व, रंग गणना विधान, पात्रण शैली, व, नखशिख गैली, तंडुलादि अनाज जाति वर्णन, व, प्रकरण वस्त्रन, संख्या मिष्टान्न, व, निमकीन सामान, पात्र सृजायक शस्त्र सूचनिका, लोह पात्रस्य गणनिका, आभूषण प्रसंग, व, रत्नादिकनु तरंग, गोटा किनारी बाना, व, भूमिका विसांतखाना इत्यादि अनेक प्रसंगों में अनेक नायका भेद, अनेक रस भावालंकारों में अतिशय रँगीले ढंगीले, व, छबीले फबीले, व, चटकीले मटकीले, व, रसीले सुख सरसीले प्रबंधों में अनोखे अनोखे कवित्त मुद्रित हैं बनाया अब आप समस्त गुणज्ञ कविजन व महाशयों सज्जनों व सर्व साधारणों से मुझ अल्पज्ञ की ये सविनय प्रार्थना है कि कदापि किसी पद में व कोई शब्द में, व, कहीं अर्थ भाव प्रबंध में, या, छापे ही में छपजाने की अनुचिता से कहीं पर अशुद्धता हो गई होय तो आप महाशयों को जरूरी कपट रहित हो उचित है कि मुझे अपना लघु (छोटा) ललन जानकर क्षमापन करें अथवा पत्र द्वारा ज्ञात करा देने का उद्योग करें मैं उनको अनेकों आशीर्वाद व धन्यवाद देकर अपने आप को कृतार्थ करूंगा। अग्रे प्रार्थनावत् सर्व सज्जनों को प्रकट किया जाता है कि पुस्तकेतो कवित्तोंकी अनेकों छापी गई हैं परन्तु इस प्रकरण संबं.

निवेदन। धिक कि जिसमें सिलसिलेवार समस्त स्वर व्यञ्जनिक शब्दों स- म्पत्रित कि जिनमें क्रिया तक अन्य वर्ग की न छुइजाय ऐसी पुस्तक कवित्तों की आज तक कोई नहीं देखने में आई थी सो हे महाशयो मेरी इस जीजान मारी महागूढ़ मेहनत पर ध्यानधर आप सज्जनोंको मुझे यही आशीर्वाद सच्चे हित चित्त से देना चाहिये कि ऐसे ऐसे अमित प्रकार के अपूर्व सुखदायी पदार्थ आपकी सेवा में मैं सदैव सनातनही निवेदनकर अपने आप को कृतार्थ समझा करूं ॥ यथा ॥ दोहा॥ सुजनन की आशीश से होत सुजन अल्पज्ञ। यहि कारण विनवत ललन कृपा करहु सर्वज्ञ ॥ १ ॥ कवि न कछुक पंडित न कछु बुधिबल विद्या हीन । ललनमती अघ कर्मबश सकल कलामति छीन ॥२॥ औगुन गठरी शिर धरे मन माया में मेल । ललन वनों विहस्त चहूं विपय असत रचि खेल ॥३॥ गुरु गोविंद की कृपा बश धौ तुब आशिष पाय । ललनहुँ की बनिजाय कछ कह अचरज अधिकाय ॥४॥ इंदिज दीन अकिंचनहि बुधि विद्या हतमान । मेरिह सब बनिजा जो तुम वहु ललन मुहि जान ॥५॥ इति ॥ आपका पंडित ललनपिया शर्मा सारस्वत अष्टवंश भारद्वाजी फर्रुखाबाद मुहल्ला मित्तूकुंचा निवासी।।

४ ललनचन्द्रिका। अब इस ललनचन्द्रिका के संकेतिक नियमों को सरल विघिसे सूचित करते हैं। इस पुस्तक में जो कि टीका कवित्तों का किया गया है उसका यह नियम संकेत रक्खा है कि पहिले तो कवित्त लिखा है और जिस आशय पर जो कवित्त बांधा गया या बँधा है सो आशय प्रसंग में मुद्रित कर दिया है पश्चात् कवित्त में जो जो मिलेहुये शब्द हैं उनकी संधि प्रकरण से रूप खोल दिया और + इस तरह का चिह्न लगायदिया है तिस पीछे उसी कवित्त का टीका किया गया है, और फिर, सरल से सरल विधि शब्दों का अर्थ समझ लेने की यही रक्खी गई है कि कवित्त और टीका दोनों के शब्दों पर अंक चिह्नित कर दिये गये हैं ताकि सर्वसाधारण भी जिस शब्द का अर्थ जानना चाहें तो अङ्कगणनाके मिलान करने से हरेक पद का भाव रस व अर्थ जान सक्ने हैं क्योंकि यह प्रसिद्ध बात है कि जो जानै सो मान ॥ जब तक किसी पद का अर्थ व भाव न जाना जाय तब तक कुछ उसका स्वाद नहींआवता और न कुछ मनको आनंद प्राप्त होता है । इसी हेतु अपनाप- रिश्रम सुफल करने के वास्ते और आप महाशयों के प्रसन्नार्थ टीका करके यह पुस्तक प्रतिष्ठित रईस लखनऊ के मुंशी नवल- किशोर साहब (सी, आई,ई) के सुशील पुत्र भार्गव कुल मुकुट- मणि धर्मपारायण मुन्शी प्रागनारायण साहब की सेवा में मैंने निवेदन करदी है सो उन्हीं की सहायता व अनुग्रहसे प्रकाश की गईहै यह ललनसागरके दश हिस्सों का यह एक चतुर्थ भागहै। यह ललनचन्द्रिका क्या है आनंदमन्दिका है पीयूषवृन्दिका है इसकी चसक लेते ही हृदयाम्बुज प्रफुल्लित हो उठता है । लीजिये लीजिये इस रसको भी पीजिये और सुख से तृप्त हुजिये।।

ललनचन्द्रिका का समर्पण ॥ मियवर कविता रसिक शिरोमणि श्रीमान् महामान्याधीश गोदिज धर्मपालनीय धर्मधुरीण धर्मावतार अखिल गुणग्राही गुणि गुणहित उत्साही प्रतिष्ठित प्रधाननीय परम सुखद स्थल मल्लापूर जिला खीरी अवध शा- रदा समीप निवासी श्री वर यशेश ठाकुरेश राउ साहब श्रीमुने. श्वर बख्श सिंह समीपेषु॥ महाशय यह तो मैं जानता हूं कि ऐसे तो आपने अनेकों क्रीट कुंड- लादि आभूषण पहिर डाले होंगे परन्तु फिर भी मैं आप को अ- नन्य हरिभक्त गुणग्राही जानकर यह एक छोटी सी गरीवामऊ प्रेमपुरित उत्साह अंकुरित यथोचित मुकुटमौरी सटीक ललनच- न्द्रिका रूपी भेंट जिसमें कि अनेक चित्र विचित्र हरि चरित्र रूपी अनमौलिक काव्य संबंधिक ललित रत्न मद्रित हैं आप की सेवा में निवेदन करता हूं सो इसे आप प्रीति पूर्वक प्रमोद मानयुति अंगीकार कर अपने भक्ति शिरोमणि मुकुट की चन्द्रिका बनाय पहिरियगा॥ यथा॥ दोहा । तव प्रसाद सत्संग फल प्रथम कमाई मोर । अन धनदा पितु ललन के करत समर्पण तोर ॥१॥ गौर और विधि करिय कछु गुनिन गरीब निवाज । तौ तब ललने का न फल हो सहजहि सुख ताज ।।२।। अथ आशीर्वाद ॥ चिरंजीव हो ललन वृधि कुल जिय कोटि बरीस । फूलहु फलहु हमेश लहि मम अशीश बकसीस ॥३॥ वहीं आपका पंडित ललन पिया शर्मा सारस्वत अष्टवंश भारद्वाजी फर्रुखाबाद मुहल्ला मित्तूकूचा निवासी ॥ damPHIROEnemumeewang

ललनचन्द्रिका का मङ्गलाचरण ॥
बंदना श्री गणेशजी की।
(१) सवैया किरीट छन्द ॥
१
३
आदि गणेश बुधेश सुखेश विशेष सुवेष यशेश जनायक। ।
वेश कलेश अंदेश दली अभिषेक अनन्द हमेश करायक ॥
देश नरेश धनेश खगेश दिनेशरु शेष पजेश धियायक । जै
ललनेश जलेश तपेश महेश उमा सुत सिद्धिविनायक ।। इति ।।
२३
१
६
३
४
६
६
-
१४
टीका ॥१॥ प्रथम (पूजनीय) गणनके स्वामी, बुद्धि व सुखके स्वामी, अत्यन्त
कारिके, जेसुन्दर वस्त्राभूषण तिन्हैं धारण किये हुये, कीर्तिके स्वामी, (जो) जाने
जाते हैं।। (और) दुःस्वादि चिन्ता रूपी, स्थल के दूर करनेवाले, (व) सदैव सुख
(
का तिलक करावनेवाले॥(और) संसारमें राजाओं, कुबेर गरुड़, सूर्य, अरु
शेषजो पृथ्वी भार धारी (व) ब्रह्मादि (देवतों करके) बन्दनीय।। (और) अल्पज्ञों
(व) सेवकों के स्वामी, यज्ञ मंत्रादि के स्वामी महादेव पार्वती जी के पुत्र जो
गणेशजी महाराज सर्वसिद्धी देनेवाले (उनकी) जर यानी म होय ॥१॥इति।।
AMESonawanemunita

ललनचन्द्रिका प्रारम्भः॥ बासुकिशय्या॥ अवर्ग ॥ कवित्त ॥ २॥ १ ६ ९ १८ ३० ३३ आली आवलोकी आज अबला अनोखी असि आनन अनूप अमि आकरीहि आमाही । अंजन अँजाये अक्षु अजब अदा अधीक अरु अवलोकन हुँ अलबेलि आला ही॥अधर अनूठे अलगारन अरुणताई अमृतावली अगार आदरहिं आ- था ही। अंगअंग अतन अभूषण अनन्त अँगे ललन अधिष आभा अकथित आंकाही॥ इति ।। सखि प्रति हरिवचनम् ॥ अथ प्रकरण संधि ॥ अमृत+अग्रे+अवली-अमृतावली। टी० ॥२॥ (हे) सखि आज मैंने ऐसी अद्भुत सुन्दरी देखी ( कि जिस्का) अत्यंतसुन्दर मुख अमृत समूह की शोभा को प्रगट करै था। (और) नेत्रों में अंजन लगाये (तिसकी) अतिशय आश्चर्यमय शोभा और सुन्दर अनोखी चितवन भी थी॥(और जिसके) अजूबा होंठोंपर अत्यन्तकरके ललिआई (मानो) वे अनुमान सुधा पंक्तियों का स्थल सुशोभित हो रहा था और जिसके) प्रतिअंग में कामदेव (कीफवन) अनेक (रत्नजटित) गहिने पहिरेहुये प्यारीप्यारी शोभा की स्वामिनी कि जो कहने में न आसके जचती भई ।। इति ।। १ ॐ ६ ९ १० २६ [n. ललनचन्द्रिका। सखि शीक्षा॥ अवर्ग। कवित्त ॥३॥ १ ट २ ११ २१ ३२ आज अवलोको आली अलवेलो आचरण आनिआनि अबला अगार अधिकारी को। अगम अगाध अन्य आमहि अकिंचनासि ओछे अपनाये अंग आपदा अगारी को। अङ्क अंगना अपन अनादरै अग्र अग्र अतनै अंगावै अरी असन अनारी को। आदरादराहि अलगावत ललन असि अञ्जुलदे अब सौ में अरसी अचारी को ॥ इति ।। सखि प्रति सखि वचनम् ॥ अथ प्रकरण संधि । आदर+अग्रे+अदराहि-आदरादराहि । अकिंचन+अग्रे+असि-अकिंचनासि ।। ३॥ प्रसंग । एक सखी अपनी परम सहेली से अपने हितू गोपाल लाल की सच्ची मित्रताई अरु हित की सगाई की सदैव बड़ाई किया करती थी एक दिन कहीं उसने रसिकशिरोमणि भक्तमाल कृष्ण- चन्द्र भगवान् को किसी अन्य सखी के रह जाते हुये देख अपनी हितू से आन हरिका उरहनादै चिलावा देती भई कि तें तो हरिकी बड़ी प्रशंसा किया करतीथी। १ ६ टी० ॥३॥ (३) मधि इस समय (त) और और सस्त्रियों के घर जानवाले ललनचन्द्रिका। १० ११ ( २६ २९ का अद्भुत बरताव देखा। (जो पराये रूपहीका अधिक से अधिक ऐसालोगी(व दरिद्री) है (तिस) हलके मनुष्य से प्रीति करने में शरीर को आगे चल दुःस्स(ही मिल- शाहै देख पाहिले तो)। अपनी सगी ६ लावते पीछे फिर अपमान करै हैं (सो इसमें तेरा कुछ दोष नहीं है) हे प्यारी कामदेवही ऐसा प्रवल है जो इस जादान को अंगीकार कराय देता है। सन्मान कर जो)परित्याग कर (तो) से नादान रसरहित विचार करने वाले को परब सहुँ में भी दूरही से प्रणाम करना चाहिये । इति ।। अथ सखि शृंगारिके पटरंग वर्णन ॥ रंगानुमान संख्या ॥२४॥ अवर्ग कवित्त ॥४॥ आवी आफतावी अवरई अंजनी अजीब अँगिरि अँगूरी भासमानी अमदिया। ऑबई अमौआ अकरोटी अगरै अनूप आगी अलवानी अफसानी अछ अल्सिया।। अरुण अंजीरी अर्गजी अपूर्व अम्बरी अनक्की अतेव अल्बुवारिया अनारिया। अल्किया अनन्त अम्बाभिराम अंग अंग आभरन अँगे असि ललना अजूबिया ॥ इति । अथ संधिप्रकरण अम्बर+अग्रे+अभिराम अम्बराभिराम॥ इस कवित्त में कोई क्लिष्ट शब्द न होने से इसका अर्थ नहीं किया गया क्यों- कि केवल भी रंगों के नाम मुद्रित हैं तिन्हैं सभी जानते होंगे ॥ इति । अथ तलि श्रृंगार बर्थन ॥ वस्त्ररंगानुमान संख्या ॥१६॥ अवर्ग कवित्त ॥५॥ आली अलमस्त अंग ऑगियां अनूठि अति अरुण अँगूरी औ अंजीरि अम्बईसी हैं। अंबरी अबीरी अमरूदी अरु अर्गजीहु अनकी अनारी अस्पोटी आगईती हैं। आछी अलवानी आस- १ ६ ६ ३ ललनचन्द्रिका। मानी अल्सिया अजीब आबी आफतानी अंजनी भगाईनी हैं अति अभिराम आमरन अप्सरा अनूप ललननिया अपूर्व अदा अबईसी हैं। इति ॥ सखि प्रति सखि वचनम् ॥ प्रसंग॥५॥श्रीरामचन्द्र महाराज के विवाह में जनकपुर की सलोनी सुकुमार सालिम इस प्रकार शृंगार साज सुहावती भई कैसी शोभा है कि टी० ॥५॥ (१) साखि अतिशय शोभा से भरी हुई देवांगना (कि जिनके) मद से भरे हुये शरीरों पर (इस कवित्त के तीन चरणों में मुद्रित जो रंग इन ३ इन रंगों की) अत्यन्त अनोखी अँगियां (व) अतिशय सुन्दर आभूषणों (से शोभायमान और फिर कैसी हैं कि) बाल्यावस्था यानी छोटी उमर की प्यारी अर्बनतरह की अद्भुत शोभाओं से (शोभायमान होती मई) इति ।। आशीर्वाद ॥ इवर्ग ॥ कवित्त ॥६॥ ६ ६ ९ ६ १ १८ इंगित इमहिं इतिहास इहिदेशनादि इतरलोकान ईश इक- छत राजहो । इकाइक इकटक ईश्वरीहि इच्छासन इत्थमहिं इन्द्र इव इकबाल बाजहो ॥ इन्दीवरनैनी इन्दुआननीहु इक्षुतनी इन्द्रासन इन्द्र इमु इदानी इकाज हो । इल्महु इमारत इजारदार इखित्यारे ललन इच्छाइवत ईक्षण दराज हो । इति ।

१ २ ५ ६ ९ १९ २० २१ २७ ललनचन्द्रिका। अथ संधि प्रकम् ॥ दहि देशन+आदि-इहि देशनादि १॥ इन्द्र+आसनः वासन॥ २॥ नृप प्रति बुध वचनम् ॥ जी० ॥६, (हे राजन हमारे इस) व्याख्यान का यही प्रयोजन है (कि) इन दे- ॥ शनको आदि देकर सम्पूर्ण भुवनौंके मनुष्यों के स्वामी है निष्कंटक (चक्रवर्ती) राज्यकरो। (और) यही प्रकार परमेश्वर की दृढ़ कृपासे एकाएकी (शीघ्र) सुर- पति समान भाग्यशाली होहु ॥ कमलके सदृश नेत्र (ब) चन्द्रमा सरीखा मुख ऊख (गन्ना)के समान दुवरीपतरी (रसीली रंगीली स्त्री व) सुरराज सरीखा आसन (व) पुरन्दर के बाहन सम ऐरावत हस्ती इसीसमय यहफल प्राप्तहोय । (और विद्यारूपी सुन्दरगृह आपकी मलकियतमें बशीभूत होय (व) तुम्हारी इच्छानु- सार बहु पुत्रों का दर्शन होय ॥ इति ॥ अथ सखि समूह श्रृंगार छवि वर्णन ॥ अथ रंगानुमान संख्या॥४॥ नामानि ॥ इमली १ ईशपातिया २ इंटिया ३ इलायचिया ॥४॥ इवर्ग कवित्त ॥७॥ इन्दुमुखि इन्दुतनि इन्दुभालि ईंगुरीहु इतिरी इंटैली इक इकअलकावली । इमृतसरीइमारती इजार इच्छित इरानियाँ इजार का ईमिली इवासली ॥ इन्दीवरनैनी इमु इंजनी इलीम- दार इक्षुबदनहुँ, इलेमासियाम्बरामली । ईशपातियारी ईटिया इलाचियाहु इस्तेमालिया इमान ललनेश इश्कियाकली ॥ इति॥ प्रसंग ॥७॥ श्रीकृष्णचन्द्र भगवान् के बिवाह ३ + १० १२ २२ १९ २ ३ ६ ६ ११ १३ ललनचन्द्रिका। में भीष्मक नरेश नगर की सलोनी सुकुमार सखियाँ जिस प्रकार शृंगारसज श्रीकृष्ण मुरारिकी शोभा दे- खने आवती भई तिन की छटा वर्णन ॥इति॥ अथ संधि प्रकरण ॥ अलक+अग्रे+अवलीअलकावली।इव+अग्रे+असली इवासली।। इलोमासिया+अग्रे+अम्बर =इलोमामियाम्बर+अग्रे+अमली = इलोमा- सियाम्बरामली ।। इश्किया+अग्रे+अकली इश्कियाकली। टी० ॥७॥ (कोई) चन्द्रमुखी (कोई) मयंकवतशरीर की युतिवारी (कोई) निशाकर सदृश अमृतयुत मस्तक पर लाल बेंदी लगाये (कोई की) इतर लपेटी धुंधुरवारी हरेक अलकोंकीपंक्ती। (कोई के तनपै) अमृतसरदेशके बनावटकी सुत्थन (जिनमें) मनमाने ईरानदेशीय असली इमली कैसे हरेरंग के कमरबन्द (शो- भायमान)॥ (कोई) ऐसी कमल सरीखे नेत्रवाली सुरमा (व काजर लगाये कोई) वेदपाठिनी (कोई) गन्नासरीखी दुबरी पतरी बनेचुनेसुन्दरवस्त्र (आ- ) भूषण धारण किये)। (कोई) ईशपाती रंग के (कोई) ईंटसरीखे रंग के (कोई) इलायची के रंग से (वस्त्र धारण किये) पतिव्रता (सुधा) पुत्रवती (कोई) चट- कीली मटकीली चतुरसखी (सुहापती भई)॥इति ॥ नायकानां छबिवर्णन उवर्ग कवित्त ॥८॥ अथ रङ्गानुमान संख्या नामानि ऊदा १ उन्नाबी २ उरदई ॥३॥ उत्तूदार ऊदिया उरोजिनी उरोजों उत उन्नती उतंगता उमंग- ती उरातरी । उलहे उरुज उमराई उमुदाई उग उभ्रउभ्र उम्भरान उत्तमोजिआररी ॥ उद्यत उनाबी उम्र उरदी उछाहनीहुँ उलकापु- २६ १ ६ ६ ११ २० १९ १८ ललनचन्द्रिका १ ३ ६ रीक ऊजनी उमूल उत्तरी । ऊजरोनमत्ति भाह उर्वशी उजागरीक ललना उला उम्रऊपर उदाररी ॥ इति ॥ अथ संधि प्रकरण ॥ उत्तम+अ+उजियार-उत्तमोजियार॥१॥ ऊजर+अग्रे+उनमत्त-ऊजरोनमत्त २॥ प्रसंग ॥८॥श्रीकृष्णचन्द्र भगवान की बरातिनु दे- वांगनों की छबि वर्णन कैसी शोभा है कि किसीके तो। सखिपति सखि वचनम् ॥ टी० ॥ ८॥ उत्तूकरी हुई ऊदेरंगकी अँगियाँ कुचौं पर वृद्धी व उचाहट बढ़ती हुई (जोस भरी) प्रकाश होती हुई । (और जिनके) अमीरी ऐश्वर्य अच्छाई से भरे हुये तुहायमान प्रकाश है बैंकर सुन्दर छटा को प्राप्त सुशोभित होतेहुये। (और)उत्सा- ही(मन पसन्दी) पोशाक सुन्दर उन्नाबी रंग की उलकापुरकी तरंदाजी (क) उत्तर के पहिराव की शोभायमान । गौवर्णमस्तानी शोभा अप्सराओं की शोभा- यमान पुत्रों करके सुशोभित वित्तबाहर उदारचित्त (देखाती हुई)॥इति।। उवर्ग कवित्त ॥६॥ उरोज वर्णन॥ उनमत्तता उदित उन्नती उरोज धहु उन उमराइया उरूज उ- लहेउतै । उर्वरा उदर उतपन्ने उसु उसलान उदै उसुदाइयां उमंग उवहे उतै ॥ उक्तिकै उमेश उभै उत्तम उजागरहि उत्तमांग उपरल ऊदे उमहे उतै । उर्वशी उरै धौं उडनाह उदयागिरिहि उच्चरै ल- लन उपमेशहैं उहे उतै ॥ इति ॥ २५ ३२ १ ६ ३४ २८ ३३ ६ ललनचन्द्रिका। अथ संधि प्रकरण ॥ उमा+ईश-उमेश ॥१॥उत्तम+अग्रेन आंग-उत्तमांग ॥२॥ उपमा+अग्रे ईश-उपमेश ॥३॥ नायका प्रति नायक वचन ।। प्रसंग ॥६॥ कोई एक नायक किसी सुरूपवती सखी की सुन्दरताई देख कर एक नायना से पूछे है कि उस सुन्दरी के। टीका ॥ ९ ॥ कुचौंपर छो (ब) मस्तानापन प्रकाशित है अथवा सुन्दर अमीरी ऐश्वर्य शोभायमान हैं। (अथवा) वीज उपजाऊ धरती रूपी इदपर दो कमल प्रकाश कै उपमें हैं (अथवा) सुन्दरताइयों की वृद्धी उन्मता को प्राप्त हैं। अथवा यह वाहिये कि दै सुन्दर शिवमूर्ति शीशपर अदी पार दिये सुशो- भित शोभायमान हैं । (कि) अप्सरा के उरोज हैं अथवा चन्द्रमा के (दै) उदय थल हैं याने प्रकाश होने के पर्वत हैं (अथवा) ललन (पिया कबि) का कथन है कि वही निजु उपमा के स्वामी (की मूर्ति हैं) ।। इति ।। नायकानां शृङ्गारवर्णन ॥ अथ रङ्गानुमान संख्या ॥३३॥ घनाक्षरी कवर्ग कवित्त ॥ १० ॥ कुन्दनी कपूरिआ कदाम्बिा कपासी कल क्युलई करीली काकरेजी कंजई कराल । कन्नकी कमी कारि कीरी कुल क्यों- डईड्ड कम्लगट्टई कनीजी कस्तुरी काही कमाल ॥ का नी क. सारी कांचकी कचूमरी कशीशि कत्थै कचनारी कपसी कनेरि कौड़ियाल । कोकी कारचोबी किर्मिची करेलि केशरीहु कोऊ के ललन कपड़े कुसुम्भि कज्जराल ॥ इति ।।

१६ ललनचन्द्रिका। प्रसंग॥१०॥ इस कवित्त में भी कोई गूढार्थ न होने के कारण से टीका नहीं किया क्योंकि इसमें केवल रंगी हुई पोशाकौंके कवर्गी रंगोंके नाम वर्णन हैं। इति । सुरसवारिकखगनामानि वर्णन ।। अथ खगानुमान संख्या॥ ३२ ॥ कवर्ग कवित्त ॥ ११॥ कोकिला करारी कुर्सी काकातूहु कीर काक कौडिल कटाई कठफुर्वा किनयानुरी । कांकुल कुरंगी करियलिया करोरी कंध कजरी ककेरि केरि कांकड़ा कुजानुरी ॥ कुमुही कुलंग कटनास कुञ्जली कपोत कल्पुंछी कुम्हारी ककरील कर्करानुरी । कन्दुल कराकुल कनिक कल्हर्क कल ललन कहत कोई कृष्ण कोई कान्हुरी ।। इति ॥ प्रसंग ॥११॥ इस कवित्त में केवल देवतों की सवारी के कवर्गी पक्षियों के अनेक नाम वर्णन हैं कोई गढ़शब्द नहीं है इसीसे इसका अर्थ नहीं लिखा।इति। अथ कपोत जाति वर्णन ॥ अथ जाति अनुमान संख्या ॥ ३१ ॥ कवर्ग कवित्त ॥१२॥ काविली कमाऊ केरि कालेहू कलांख कल क्योंडई कमी काही कल्सिरे किनारिये । कल्दुमे कपासी काकरेजी कञ्जई क- राल कड़ी बाज कागदीहु कासनी कपूरिये ॥ क्योलई कशीशी कचकमरे कौड़ील कुल किर्मिची कुसुम्भी कलपोटिये कुम्हारिये। कप्सिआहु किस्मिसी कमर्रवन्द कुन्दनीहुँ कत्थई ललन किस्म को कपोत कुम्रिये ॥ इति ॥

७ १३ १ २१ ललनचन्द्रिका। प्रसंग॥ १२॥ इस कवित्तमें केवल ककाररूपीक- बूतरोंकी जाति वर्णन हैं। अर्थकी कुछ नावश्यकता नहीं है सर्व साधारण भी समुझसक्के हैं इसीसे टीका नहीं कियागया॥ कुचि वर्णन॥ शङ्काभाव ॥ कवर्ग कवित्त ॥ १३॥ कुमकुम कँदलइ केरि कलई कनक कलश कि कामदेव का कुचि कर्कसी। कैधों कामरिषु कैयौं कन्दुक कलित कैधौं कान्ति के कँगूरनहिं केरि क्रान्ति कलसी ॥ कुविधिक कृतिक कन्दर्प के नगारे कैधौं कैधौं ककमण्डल कुरूखिकर वटसी। ललन कनिष्ठि- क कनिष्ठिक कि कुम्भ कम्बु कैयौं कामिनी की काय कौनकर कृत्तसी ॥ इति ॥ अथ दूती प्रतिनायक वचनम् ॥ प्रसंग ॥ १३ ॥ किसी सुन्दरी के कुचिकी शोभा देखकर नायक को शंका होने से नायका प्रति प्रश्न करै है कि॥ टी० ॥ १३ ।। कँदला किये हुये कुमकुमा ( हैं या ) सोने के कलशीपर कुंदन की कलई है अथवा मन्मय (व ) कमल (या)कठोर स्तन हैं ।। अथवा (दुइ) शिवमूर्ति व सुन्दर गर्दै या शोभाके शिखरोंकी सुन्दर सी छटा हैं ।। अथवा कामदेव के औंधे (व उलटाये धरे हुये) नगाड़े व ब्रह्माकी उल्टी (व उल्टीकग्वट ३१ १ ३ ४ १ न ललनचन्द्रिका से औंधाई धरी हुई) नोबी हैं अथवा छोटी छोटी प्यारी (सुन्दर) कलशी (अथवा चिकने चिकने)शंख या सुकुमारी के उरःस्थल पर किसके हाथ की कारीगरी है ।। इति ॥ अथ सखि श्रृंगार वसनरंग वर्णन॥ रंगानुमान संख्या ॥२१॥ खवर्ग ऋषित ।। १४॥ खासी खानीखम वासी जीमखापी खापराई खासी खासईक खीरी खारुआई साकोसी। वीरई खजूरी खीलदार खपरील खुली खुशरंग खानेदार नै खड़ियारोसी ॥ खंती खामसूई खंजनी खफीफ खाजलई स्वैरिया सधारी वारी ख्युरी खरबूजीसी। खुसहाल ललना खशीन निधि खींच नीच खिलतें खड़ी खरीसी खालिक खयालीसी।। इति ॥ प्रसंग।। १४॥ इस कचित्त में निम्नलिखित खवर्गी रंगोंकी पोशाकै पहिरकर श्रीकृष्णचन्द्र भगवान के वि- वाह में भीष्मक नगर की सलोनी सखियां जिस प्रकार से सुहायमान होतीभई तिनके कपड़ोंके केवल रंगरूप वर्णन हैं। कोई ऐसा शब्द नहीं है जोकि समझ में न आयसकै इसीहेतु इसका टीका नहीं कियागयाहै। इति।। नायकानां श्रृंगार वर्णन॥ रंगानुमान संख्या ।। २३॥ खवर्ग कवित्त ॥ १५॥ खारई खुलासा खाई खजूरिया खरेति खासे खामसूई खुले खापरी भारिया । खोली खोपराई खाकी खिर्नी, सर्बुजी खरी लि वीमलापी खैरुआहु वाली खस खासिया॥ खंजनी खसीस खीरी ललनचन्द्रिका। खंती खीरिया खमीरि खाकसीऊ खाजलई खुनई खमीरिया । खुशी हाल खिल्तें खींच खींच के खड़े ललन खारदार खाँड़े खनकावे खल मारिया ।। इति॥ अथ संधिविवर्ण ।। स्वरा+अग्रे+इति । वति ॥ १ ॥ प्रसंग॥ १५॥ इस कमित्त में श्रीकृष्ण चन्द्र महा. राजके बराती व योधान की अनेक खवर्गी रंगकी छ- बीली पोशाक वर्णन है इसीसारमा रो सरलता जानकर इसका अर्थ नहीं किया ।। इति ॥ नायकानां श्रृंगार वर्णन अथ रंगानुमान संख्या ॥ २४ ॥ गवर्ग कवित्त ॥ १६ ॥ गुंजई गुलाबी गुलखैरा गु लम्हेंदियादि गुले सपतालू गुल्दु, पैरिया गिरंटई । हाँ गिरुआरे गुलेचीनियाँ गुभीले गुल छब्बी गंदुमी गुलेहजारी गुलतुर्रई ।। गुलेनार गुल्फिरंगि गंधकि गोलई गूढ़ गुलाबासि गोमे गाजरी गहीरगंगई । गन्नई गंभीर रंग गेंदई गसेसु गात ललनगुपाल गुण गावें गति गर्भई ॥इति।। अथ संधिप्रकरण गुलम्हेंदिया अग्रे+आदि = गुलमोंदियादि॥१॥ प्रसंग॥१६॥ इस कवित्त में सखियों के गकार रूपी रंगों की रंगबिरंगी पोशाकों का वर्णन है कोई गू- दार्थ न होनेसे टीका नहीं किया। इति ॥ नायका छवि वर्णन ॥ गवर्ग कवित्त जलहरण दंडक ॥१७॥ गोरेगोरे गानुरी गई गहरी गंभीर गोलगोल गपालन २० লালখানা। ७ गुलाब गुम गति गइ । गोरी गुलबदन गजब गजगामिनिसी गहे गरवीली गुनगूढ प्रामनी गुनइ ॥ गोलमोल गोरोदर गुल गुल मादीगुल गुलूबंद गुंजिका गरे गहिर गुहरइ । ललना गिरंटपट गात गुलेजारिया से गहिगहे गण्डेदार गोट गुठ गज- ३० रइ ॥ इति॥ ३ ६ १६ अथ संधिप्रकरण । गोरा+अ+उदर = गोरोदर ॥ १ ॥ सखिपति हखिचनम् ॥ संग ॥ १७॥ एक सुकुमारी सखीको देख श्रीप्रभु. एक दूतीसे उसकी प्रशंसा करते भये कि वह ॥ टी०॥१७॥(जैसी सुन्दर सखी है कि जिसक) उज्ज्वल उज्ज्वल शरीरपर अधिकसे अधिक सुन्दरता गुलाई लिये हुये कपोलोदी कलिआईपर गुलाब के फूलकी रंगत व शोभालज्जित होता है। फिर वो कैसीहै)सुन्दरी(कि जिसका)फूलोंसा कोमलतन औ) अनूठी हस्तीसी चालढाल धारण किये हुये (और) समस्त गुणोंके समूह स भरी हुई सोहावनी हुई ।। ( और जिसका ) सुडौल गौरवर्ण पेट ( मानोगु. ( सानुली ) बोमल पुलों की मादी (अजिसके ) गलेमें गुंज (व) गुनूबन्द नामक गहना अमोलिक मालियोंका ( सोहायमान )॥(फिर वो कैमीहै कि जिस ) स्त्री के शरीरमें रविकार चटकीले रंगके रेशमीरन (जिनमें) कितादार गोटा गजरा टैकेहुये (लोहायमान है ) ॥ इति ।। नायकानां छवि वर्णन॥ घवर्ग कवित्त जलहरण दंडक ॥ १८ ॥ योग्योर धांवगे जिरील धुबनील पनि घुटना घुमारदार घि- ४ ३ ६ ललनचन्द्रिका। २१ १ ६ रित घुमाउधन । घुनुकधुनुक चूँघुरु घमोरें घटिक्षर घनन घनन घननाना घननानानन ॥धुंधुटा घिरान घनघोरि घुमड़न घर घुसि घुघुवारी घारौं घरनीअजगरन । ललन प्रिया घमण्डघाती घबरानघटी घोटनु घुटे मील घुमसन घेतलन ॥ इति ॥ टी० ॥ १८ ॥ (कैसी सखियाँ सुन्दर श्रृंगार सजे हैं कि) बड़ेबड़े लहँगा धुंधचीके रंगसरीखे पहिरेहुये (अरु) बहुतसी घेरदार अत्यंत फैलाव के पैजामे (व इजारे पहिरेहुये) ॥ ( और बहुतोंकी कमरमें ) करधनी (जिनके) घुघुरुषों (वबोर या बटानोंकी) घुनघुनाहट निम्न लिखित शब्दों सी यथा घननघनन धननाना घननाना नन होरहीहै ॥ (और बहुतों के शशिमुखपर ) यूंघुट की अतिशय झाई (मानों) श्यामताका घर (तिसमें) लहिराती हुई टेढ़ीबेंडी (धूघर- वारी) नागिनीसी अलकै चोट करै हैं ।। (और फेर कैसी स्त्री हैं) भोलीभाली मनोहर अभिमानरहित सावधानचित्त ( कायम मिजाज ) जिलाकरेभये यहा चिमित्कारी उपानह (पहिरेहुये सोहावती हुई)॥ इति ।। देव सवारीन के चवर्गी पक्षी नामानि वर्णन ।। अथ खगानुमान संख्या॥ १५ ॥ चवर्ग सवैया ॥ १६॥ चकवा चकई चिरुटा चिरई चढ़ चाल चकोरन चाँगलिया। चिमगादर विर्कुट चर्य चढ़े चअना चुउँ चूं चपला चिरिया ॥ चदरा चिनियाँ चिनको चिकडी चख चट च.बक चिमिखिया । वबाहु चितौन चुभी ललनै चल्देव चौ चक चातुरिया ॥इति।। ॥ ॥ १ २२ २ ३ ६ ललनचन्द्रिका। प्रसंग॥ १६॥ श्रीमाधो मुकुंद मधुमदन बनरे के विवाह की शोभा देखनेके तई देवता अपने २बाहनोंपर जो इस सवैया के तीन चरणों में देवतों की सवारी के अनेक चवर्गी पक्षियों के नाम मुद्रित हैं तिनपर सवार होकर नृप भीष्मक नगर को प्रावते भये इसी से इस सवैयाके त्रिपादका अर्थ नहीं किया अग्रे चतुर्थ पदका भाव लिखते हैं। टी० ॥१९॥ ( देवगण निम्न लिखित पक्षियों बैठेहुये) कृष्णचन्द्रभगवान् की(करूणानिधि) चितवन प्यारी रीतिसे चुभी हुईका चतुर (सपानी ) देवसैन्या रसग्रहण कर चक्रिा होतीभई (छकित होनीमई ) ॥ इति ।। नायकानां श्रृंगार छटा वर्णन। अथरंगानुमान संख्या ॥१३॥ चवर्गकवित्त ॥२०॥ चुन्नई चकोतरई चम्पई चभंकवत नई चुनर चारु चंदनी चुभीलियाँ । चीकने चनाकी चीर चिंचिनीक चोरें चित चन्द्र चाँदनी चमेलि चादरें चुहीलियाँ । चाँवली चिरायतई चूरिया चमाकेदार चारखनू चाकल चौतनियाँ बहीलियाँ । चम्बुली चिनाबी चुस्त चोली चटकीलि चुनी ललना चतुर चौरें वित्त चरवीलियाँ ।। इति ॥ प्रसंग ॥२०॥ (श्रीकृष्णचन्द्र भगवान्की ससुराली सलोनी सुकुमार सखियों की शोभा वर्णन करते हैं कोई कोई तो)॥ १ ३ ५ ६ १९ २५ resupertuentary २३ २ २ ६ वी०॥ २०॥ चुन्नी सरीखे रंगकी (ब) चकोतरा के रंगसी (ब) आबदार चपई रंगकी (ब) चूनासे रंगकी (ब) चन्दनके रंगसी सुन्दर मनचुभतीहुई चूनरें (धारण किये हुये और कोई कोई)। साफ चनाके रंग सराखे (ब) इमली के रंगसे मनहर लेनेवाले (ब) चमेली के रंगले चन्द्रचांदनी सरीखे शोभायमान रूपसे (और कोई) रंग चुचुनातीहुई चादरें ( पहिरेहुये ) ।। (और कोई कोई) चावलकरंगसे (व) चिगनीले रंग सरीखे छादार चूड़िया नामक वस्त्र (ग्रहण किये और कोई) चारखाना की घेरदार सोहायने सलुश्रा अथवा झूलानामक फनोई (सजेहुये और कई कोई के पारमें) बुला देश (ब) चनादेश की रंगाव- रंगी तंग अँगियां कसी हुई चंचल सथानी सखियां चित्तोंको चोरावती भई।। इति॥ ) कुलटा नायक। छवर्ग सवैया॥२१॥ ६ १६ १९ २२ २५ छहरी छिति पै ललनै पनकी छवि छाजतियाँ छहरांय छला छइ । छनकैरि छये छचोर छड़ीलिहि छर्लछटीलि छतीसि छुये छकागइ ॥ छमरि छमाक्यहिदार छड़ाछड़ छागलियाँ हुँ छ- जीलि छलापइ । छपकाहु छल छनकील छला छन छैल छ- मंकिछमेकि छटा नइ ॥ इति ॥ सखिप्रति हरिवचनम् ॥ प्रसंग ॥२१॥ एक नवयौवन बाली सखी कि जिस की चाहनामें महाराज का मन रमित होरहाथा उसके ललनचन्द्रिका । रूपकी प्रशंसा किसी एक दूती से करते हुये कैसी वो सलोनी नारि है कि जिसके शरीरपर ।। १ ३ ६ १ ११ टी० ॥२१॥ लड़कपन की सोहावती हुई प्रभा (और) छलों से भरी हुई सो. हायमान पृथ्वीमंडल में विख्यात । (फिर वो चौकन्नी व होशियार कैसी है कि जिस के के) छांहके छोरको छूतेही भागजातीहै (याने अपनी छांह किसी को नहीं दवा. वने देती है) लाखों में एकछटी होशियार दुबरी पतरी शरीर की शोभासे मनको छकितकर जातीभई ॥ (और जिसके पैरों में) आवाजदार छड़ा नामक आभूपण (व) सुहावनी छागलें नामक आभरण मन को छलने वाली सोहायमान ।। (और हाथों में आभूषण) छाप छन्न आदि (व अँगुलियों में) बाजने छल्ले मन हरेलेते हैं (इसभांति) छबीली की शोभा नई मांतिकर प्रकाश होरही है ।। इति ।। नायकानां छवि वर्णन ॥ अथ रंगानुमान संख्या ॥ १० ॥ ॥ जवर्ग कवित्त ॥२२॥ १ ३ ६ ११ १६ जोगिया जचील जाफरानि जामुनीजमंक जालई अँभीरिया अँगालि जामदानियाँ । जुग्नुई जुहान जरबख्तिया जुलूसजोते जकसी जुलूसी जाली जौजई जुगानियाँ ॥ जूफई जमाके जोर जोंकई जमीनी जोट जागी जोमती जहूर ललना जवानियाँ । जोति की जुन्हाई जानों जामिनीश जगमगात जौवन जमीली जूथ जुवती जुरानियाँ ॥ इति । ३० है ६ ललनचन्दिका। प्रसंग॥२२॥ श्रीरामचन्द्र महाराज के बिवाह में जो जनकपुर की सुकुमारियां जमाहुई रही तिनकी शृं- गार शोभा वर्णन कैसे कैसे बसन अाभरणोंसे सुहावती भई कोई कोई तो॥ टी० ॥२२॥ जचेहुये जोगियारंग (कोई) जाफरानी (व) जामुन के रंग स- रीखे बैंजनी बसन पहिरेहुये (कोई) जालीके जंभीरी रंग सरीखे (कोई) नीने जंगाली जामदानी वसनके ।। (कोई केजुगुन्) पटविजना सरीख चमकदार दिखाई परे (व) जरी जरवख्त कामके शोभाभरे हुये (कोई) जालीपरके बनेचुने (कोई) जौजई रंगके (कोई अमोल) पुरानीचालके ॥ (कोई) जूफई रंगके पट पहिरेहुये (कोई) गाड़े जोंकई रंगके (कोईके) मटीले रंगके जोड़े मदसे भरीहुई शोभा(नाजो अदा)तरुण स्त्रियां ।। (जिनकी) छविकी फवन मानों चन्द्रमा के समान सोहाय- मान रूप भरी (यहिभांति) वृन्द अबलानके जमाहोतेभये ।। इति ।। शठ नायक। जवर्ग कवित्त ।। २३॥ जुलमी जनावै जोर जागतीकलाहि जासु ज्वानियाँ जमीलो जोम ललना जशोदाको । जासन जुहारबोहु जानिये जुलूम जीय जोरे जो जमात जोहै जूवतीनु जुवा को ॥ जौवनजुल- सी जोय जाइये जमून जनि जोहि जौन जायगो जो जादवेश जराको। जौबन जवालक जमंकैगो जमैसो जब जोरलेगो जुगतहि जुदवैगो जुटाको ।। इति ।। ३ 8 ६ २ ६६ ३ ६ ९ १६ ललनचन्द्रिका। सखि प्रति सखि वचनम् ॥ प्रसङ्ग॥ २३ ॥ एकसखी अपनी परमसहेली से न- न्दललनकी बुराई करती भई कि ॥ टी० ॥२३ ।। यशोदाजी का कुँवर ज्वानीके मदसे भराहुआ जिसकी अाज कल) प्रारब्धकला जोर है अतीकरनेवाला जुलुम जोते फिरैहै ॥ उससे दंड वत् मणाम करना भी (मानो) मनको विपत्ति विसावनाहै जोकि ग्वाल समाज संग लिये तरुण स्त्रियों को ताकता फिरै है।। (हे) सुरूपवती नारि (तू) यमुनाको न जैये जोबो मोहन (तुझे) जराभी देख लेयगो॥ (नौ) दूसरोंकारूप विगारनेवाला यमराज के समान घेर लेयगो (और) यदि अपनाप्रयोजन काढलेयगो ( फिर पीसे) प्रीति छोड़देयगो (याने जोड़ा बिछुराइ देयगो)॥ इति ।। निर्गुणब्रह्म भगवत्प्रधानता वर्णन ॥ जवर्गकबित्त २४॥ जुलुम जवालको जवालीजूथ जंगजित जतन जतनमय जुक्ती जंत्र जरमाँ । जग्मग जितेन्द्रिजशीजोहेना जुहात जग ललन जुलूस जोति जोतिराज नरमाँ । जापनेश जोगियानु जीवनेशु जादोपति जापत जहान जन जननि जठरमाँ । जीवटजवर जर- दार जोरावर नर जांचो जौनजौन जिये जानौ जनगरमाँ ॥इति। टी० ॥२४॥ ( वो प्रभु सर्व शक्तिमान है जो) अभिमान नाशक समर में दुष्ट समूहका जीतनेवाला (और) चतुराई (व) मंत्ररूपी धनमें हरएक विधिसे व्याप्त ।। तेजस्वी विषय राहत कीर्तिवान (कि जिस सरीखे ) वैभवका छोटा व थोड़ा चि. १ ६ २२ १९ १ ३ ६ १ १० ललनचन्द्रिका। २६ २९ ३२ मित्कार भी (कोई) देवता व जगत के मनुष्य में ढूंढ़ने से नहीं दिखलाई देता है ।। (फेर प्रभु कैसा है कि जपौंकास्वामी योगधारियों का जीवनधन यदुवंशियों का रक्षक (जिसका कि) संसारी मनुप्य माता के गर्भनिवास में (अत्यन्त खेदपाय) स्मरण करते हैं। दृढ़ हिम्मतवाला ऐश्वर्यवान पराक्रमी (ऐसा जो) परमपुरुष (उसको) जाननेवालोंमें जिसजिसने स्मरण किया है ( उन्हीं पुरूषों को) जीवित जानना चाहिये ।। इति ॥ मध्यानायका॥ भवर्गकवित्त २५॥ ४० ६ झांझरी झरोखे झुकि झूमझूम झांकिझांकि झमक झकानी री झपट झिझकीलीसी। झीनिही झकोरनी सुझीनोही झगा झमके झुलनी झमाकेदार झिल्मिली झकीलीसी॥झांझझनकार झारि झनक झकोरी झम झोरती झुमाय झोंक झोरनी झपीली सी । झुकतीझुकाती झट झांकिही झकाय झक झपकै न झांकी झरिललनाझरीलीसी।। इति ।। दूतीप्रति नायकवचन ॥ ३६ १ ३ ६ ९ टी० ॥ २५॥ एकसखी) मकरी के छिद्रों से झुककर मस्त है है देखिदेखि जल्दी से सकुचाती हुई छविकीरमक देखावती भई । हलकीसी ओढ़नी (ब) सुन्दर सोफियाना सनका (और) टिमाकदार सुन्दर बन चुनी अगिया पहिरे ।। (और पगामें) शब्द करती हुई झांझोंके शब्दकी झवाग्न (हृदयको , शीघ्र - २० ललनचन्द्रिका। ३३ १ ३ ६ २२ २८ १३ १६ ३४ कझोरती (व) मोहित करती (और) फहरान चूनरी से लसित । शीघ्रही अँक अँक एकवार सुन्दर शोभा दिखाय (वो) पुत्रवती फिर न देखाती भई ।। इति ॥ धीरानायका॥ टवर्गकवित्त २६॥ टेढ़नुटिढ़ाई हरी टूटती टिदाईसन टूटीजो टिमांकु टांकसों टकैन टोभिये । टांकुनी टटोल टेंकटेक टेव टोलीटंचुटोना साहिया टकोर टूमै टिकु टेमिये । टांठगीटांठेही टीपुटीपु टीकतीन टपुटावरी नटांचु वीरिटोंकन टटोलिये। टकुटकु टोटा टारूटोलाहू टुकोनों टीकटोहुटुक नंदललनहिं टंटा टारिये ॥ इति । सखिप्रतिसखिवचनम् ॥ प्रसङ्ग ॥२६॥ एकसखी अपनी मानवती सहेली से जिसकी पतिसे लड़ाई होगई थी उसको शिक्षा देती भई कि हे सखि देख कहीं॥ टी० ॥ २६ ॥ खोटोंकी खोटाई कहीं क्रोध करने से जाती है टूटीहुई जोके (प्रीतिहै सो) मानरूपी टांके से नहीं सी सकैहै (नमानैतौ) सीदेखु । (औरजोनू) टोनासाही कहिये जो बेदाग निश्चलकी ठसक रक्खा चाहती हो (तो) इससमय चित्त स्थिरकरु (फेरि) धीरे धीरे समूह शुभ प्रकृतियोंको ग्रहण कर (जिससे कि मनकी फटीहुई प्रीति टॅकजायसो) सूजी ढूंढ़नी चाहिये ।। (क्योंकि अपनी प्रीति अपने आपही) मजबूत करने से मजबूत होयगी लिखरखु लिखरख मैं तुझसे कहती है अल मत (३) प्यारी लड़कपनको न ग्रहणका (मेरी) शिक्षापर ध्यान ३ ६ १० १२ १६ २३ ३२ ललनचन्द्रिका। २६ ३४ १ ३ w e ९ १८ २४ धरू देख देख प्रीतिरूपी हानी को दूरकर (अरुफिरनू अपने ) मोहल्लेको भी अं. गुरी नचानेवाला समझ तनक ईश्वरका स्मरण करु इस लड़ाई, पर धूरडारु (दूरकर) इति ॥ अधीरानायका॥ उवर्गकवित्त २७॥ ठालेही ठूलेहीमांझ ठूठीही ठिकावै ठप ठगईठगौनी ठगनी ठी- करा ठठाऊंगी। ठगनी ठगोरी ठाहे ठोंकती ठठेगी ठंठ ठोंकठोंक ठो- ली ठीक ठोकरी ठिकाऊंगी। ठाकुरी ठिकावै ठुकरावै ठावे ठाली ठठ ठाँठरीठठेत उड़ीठोरै ठुनकाऊंगी। ठानिये ठठोली ठहरायजोलल- न ठीक ठकुरानी ठाकुरसौं ठेंग ना ठगाऊंगी। इति ।। प्रसङ्ग ॥ २७॥ एकदूती किसी सखीका फजीता क- रनेको उसके भवन में आय कुछ कहती भई उसका क- थन सुन क्रोधित है वो बोलतीभई कि अरी प्रपंचिनि त मुझे॥ दूंती प्रतिसखिवचनम् ॥ टी० ॥२७॥ बिना बातही में वृथा दोष लगावै है फरेबों से छलनेवाली (जो मुझसे) प्रपंच फैलावैगी (तो) ईंट (पथरा) झुरायमारूंगी। (अरी)बदचलनी फ- फ- रेविनि नारि कुचाल फैलावती है झींकती फिरैगी मारे (लातोंकी) ठोकरों से सीधी करदेउँगी ।। ठकुराइत दिखावैहै पैरोंसे पृथ्वी खोदे डार है झूठमूठका जाल फैलावै ये झांखर सरीखा शरीर लिये खड़ी है सो इसीजगह तोमरोग्डा- १ ६ १६ ललनचन्द्रिका। ३८ ४ ६ het रौंगी (मसककै घरदेवगी) । (उससे) सीकर जो कोई बिल्कुल नादान हो( मैतो) श्यामा श्यामकी शपथ खाती हूं (मेरातो) सींगभी (तुझसे) नहीं ठगावनेवालाहै (जोतू कहतीहो कि यह कुछ मुझे देदिवायकै दवजाय सो ऐसा बर्ताव मुझसे कभी न होयगा) इति ॥ दूतीनिन्दा॥ वर्गकवित्त २८॥ डहकै डकैती डींग डोले डोलडाल डटे डोंगपनो डालरी डिगाये डिगयेना । डोमनी डिवोनी डील डांकिनी डरोनीडर डोरिहि डराय डुबजायगी डुवैयेना। डिंभैगीवो डंभन डटीली डूंगरिन डंभ डुकीडुकीना डगरीडगरी डसैयेना। डिौतौ डाकोरजीपै ललना डिगाउरीजो डोंगिहू डुवायनाहिं डिगरी हुँ येना ॥ इति । सखिप्रतिसखिवचनम् ॥ प्रसङ्ग ॥ २८ ॥ एकदूती किसी सुकुमार सलोनी यौवनाङ्गना को देखि उससे स्नेहकर अपना प्रयोजन निकालने के वास्ते रोज उसके घर जानेलगी पश्चात् किंचित् काल के कहीं दूसरी दूतिका ने भी उसके रूप की सुन्दरताई देखपाई और उससे मिलनेकी युक्ती फै- लावती भई भेदलगावने पर उसे मालूम हुआ कि इस सुरूपवती से तो किसी दूसरी दूती से मित्रताई होर- ही है अतएव उसके निकलावने के वास्ते उपाय कर सुन्दरी समीप जाय ये कहती भई कि यह प्रपंचिनि जो ३३ ललनचन्द्रिका। कि तेरेपास आया करती है हे प्यारी तू इसे नहीं जा- नती है यह जो तुझसे ॥ १ ३ ११ २९ टी० ॥२८ ।। बड़ी बड़ी बातें माराकरती है (सो अपनी ) घात लगाये फिरै है अरीप्यारी लड़कपन मतकरवैठिये इसके चलायेपर चलनजइये । शरीर की ख्वारीकरायदेनेवाली (ये) म्लेच्छिनी कुरूपिनी (जिसके देखने से)शंका भी शंकितहोय है दूसरेसे प्रीति पुरवाय आपअलगहोजायगी ( इससे अपने कुल की मर्यादा में ) कलंकमतलगाइये । वह पर्वतकेसमान फरेबों से भरीहुई अ- नेक झूठी बातों को बनावेगी गली गली (घरघर ) में बखानीभई है उसकेकब्जे में मत अइये । (और जो तेरा मन किसी पर चलायमान होई रहा होय तौ सुनु जो) मन चलायमान करै तौ प्यारी श्रीकृष्ण महाराजपै मोहित हो याने श्रीकृष्ण जी से मिल ( तौ तेरी) नैया पार होजाय तथा आवागमन से छूटजाय मनो- कामना को प्राप्त होजाय याने डिगरी फ़तेयाव होजाय)॥ इति ।। प्रौढ़ा धीरानायका॥ ढवर्गकबित्त २६ ॥ ३ ६ १३ ११ ढीलकै हँगीले ढंग ढोटाबो ढपोरशंख ढाँकटोंक ढाई ढीठ ढिठाई ढपारकै । ढांढतो ढपोरै दुलढावतो ढबीलो ढव ढीलेही ढबैगो ढवि ढाबहि ढुंढारकै ॥ ढोरिये ढिंढोरो नाहिं ढोंगपनै ढारदर ढाढस ढ- हाई ढोंग ढोंगिया ढिारकै । ढांकेहि है ढोल ढीलरो ढंगी लल- नि ढांढीहूंडी न ढंग टुरको वारकै ॥ इति ॥ २७ १ ३ ६ ६ १२ ३२ ललनचन्दिका। सखिप्रति सखिवचनम् ॥ प्रसङ्ग ॥ २६ ॥ एकसखी अपनी नगर निवासि. नि मिलापिनिसे कृष्ण महाराज का उरहना दै कहती भई कि॥ टी० ॥२९॥ नन्दके ललन नासमुझ नादानने सुन्दर चालचलनों को छों. इकर कुचलनों को धारण कर नटखटने अपनीबँधीहुई मर्यादाको बिगाड़ रक्खा है। अपन मतलबी दाँव घात लगाये ( युवतिन के पिछाड़ी लगा ) अनु. चित करता चारोंतरफफिरै है (सो हेसखी अवमुझे कोई) मेलका मकान ढूंढकर (गोकुल का बास) छोड़तेही बनेगा॥ (इतनी बात अपनी सहेलीसे कहतेतो कह गई परन्तु फेर कृष्णके भय से शंकित है उससे यह उपदेशिक प्रार्थना करती भई कि कहीं) मूर्खताकी ओर दुलकर ( इसबातकी कहीं ) मुनादी न पीटदीजिये (याने किसी से कहना मती क्योंकि आजकल मैं ) छल रचनेवारे नटखटना. गरनटके मारे सावधानीकरके रहितहोरहीहूं याने चित्तसावधान नहीं है (क्योंकि अपना ) फटा ढोल मढ़ानेही से ठीक बोलताहै याने अपनी जाती हुई लाजपर अपने आपही परदा डारना उचित होताहै प्यारी मैं बहुतही ढूंढ़हारी ( परन्तु कोई ) सीजा मकान मिलने का नहीं लगा है (इसीसे चुपचाप बैठी हूं) इति ।। नायकानां श्रृंगार वर्णन अथरंगानुमान संख्या २१ ॥ तवर्गकवित्त ३०॥ तीखेतीखे ताखी तीव्रतूसिया तमाली तिली तामबूलियातरी- फि तोंबई तलीसिया। तोरी तामखूई तूनी तीतुरी तयूसी तूली तोफा तिल्समाती तासुबादलाई तूतिया ॥ तांबरीक तेजपाति तो ४१ ६ ६ १० ११ ललनचन्द्रिका। तोसकी ललन तेज तीतुली तिलोरिपसी तामड़ई तेलिया। ताजे ताजे तेवरा तमंकते तरंग तूल तेजसी तपेस्वी तन तोपे तरुणी तिया ।। इति॥ प्रसङ॥३०॥ श्री सौभाग्यदशरथ चपनन्दन केश- कन्दन रघुनन्दन के विवाह समाजमें इसप्रकार सोरह श्रृंगार बत्तीसो याभूषण रलकार सखि सुकुमार बि. दार सँभार सुधार पुरनारि आवती भई कोई कोई तो॥ १ ६ com ९ १९ २१ टीका३०॥ तेज तेज ताखी रंगके (ब) गहिरे तूसी रंगके (व) घोर स्याह रंगके (व)तिल सरीखे रंगके (ब) पानके रंग सरीखे (व) उत्तम तोंबी के रंग सरीखे (व) तलीसके रंग सरीखे ॥ (व) तोरई के रंग सरीखे (व) तमाकू के रंग के (ब) तुन रंगसे (व) तीतुर रंग सरीखे (व) मोर या तयूसी रंगके (व) तूलीवसन (ब) सुन्दर बनेचुने जरीतास बादलाई कामदार तूतिया रंगके ॥ (व) तांबे रंग के समान (ब) तेजपात के रंग सदृश (ब) तोसक सरीखी छपावट के प्यारे (व बढ़िया तीतुली के रंग सरीरवे (व) तिलोरी परख सरीखे (व) तामड़ई रंग के (ब) तेन के रंग से ॥ नई तरताजी बनीहुई पोशाक शोभा की अत्यन्त फवन से भरी सुरूपवती प्रतापमती युवा अवस्था में प्राप्त अबला अंगन पै शरण किये हुये सो- हायमान होती भई ॥ इति ।। तुरंगरंग वर्णन अथ रंग व जाति अनुमान संख्या ॥ २३॥ तवर्गकवित्त॥३१॥ तांबई तयूसी तूसी ताखी तेलिया तराल तोतई तमाली तूनी १ ३ ६ ६ ३४ ललनचन्द्रिका। तीतुरी तिलंगहैं। तोफई ललन तीव्र तोवई तिलक्खा ताजी तल्त- रातमीस तोपे तान्दत तरंगहैं। तीतुली तजेबी तूलि तामड़ा त- रैल तुर्की तेंदुई तुपकी तर वारी तनेतंगहैं। तकत तमकत तड़क्कत तुरकत तुनकत तनक्त तरकत तुरंगहैं ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥३१॥ श्रीकृष्ण महाराज के विवाहमें जौ- न आयेहुए थे तिन बरातियों की सवारी के घोड़े जो कि इस कवित्त के तीन चरणों में रंग वर्णन हैं इन इन रंगों के घोड़े सुन्दर जीन तंगादि साजों से सजेहुए सुहायमान होते भये इसी कारणसे तीन पादों का अर्थ नहीं किया (अग्ने चतुर्थ पादका अर्थ लिखते हैं कैसे घोड़े रहे) (कोई तो) चारोतक देखतेहुये ( कोई ) तेजचालसे दौड़ते हुए (कोई ) उछाले भरते हुए (को- ई) बाग तोर ( कोई ) हींसने वाले ( कोई ) क्रोधी व रिसहे (कोई ) जोममरे लड़ने वाले (लड़ाका) घोड़े इस इस भाँति (सुहावते भये) इति ॥ विपलब्धानायका॥ थवर्गकवित्त ॥३२॥ २ ३ ६ १० थोरी थिरु थोरी थिरु थाहत हूं थाह थम थानहिं थपायकै थि- ललनचन्द्रिका। ११ ३२ रौंगीहौं थिरौंगीहौं । थलक थुराउनाहिं थूनिहीं थपाकु थुआ थोक थापरा थमात थायही थपौंगीहौं ॥ थिरकुल थारो थिर थोरहू नतू थपक थाथोही थपाको थाहू हूं नाथुरौंगीहौं । थूथूथू थुका- येहू थवैगी तौ थुरील नाहिं थानापती थांम थप ललनै थलों- गाहीं ॥ इति ॥ प्रसङ्ग॥ ३२॥ (एकसखी अपने सनेही श्रीकृष्ण भगवान् से मिलनेको अत्यंत व्याकुल रही इतने में ए- क दूती जो कि उसे जानती थी आवती भई उस की बिद्धलताको देख उपदेश दै हिम्मत बँधाय ये कहती भई कि प्यारी तू इतनी क्यों घबराई जाती है)। सखिपति सखिवचनम् ॥ १ २ ९ १८ २३ टीका ॥ ३२ ॥ तनक सावधान हो धीरज बांध मैं खोज लगावती हूं ठहरना तेरे घरपै बोलायबैठार तब मानौंगी तब मानौंगी ॥ (दर्शी हुईबातकी कुदर न ( कर याने किसीको ) प्रगट न करु ( जैसे) मिट्टी के ढेर के सहारे की लगाई हुई टेकनी व थुनीपर बड़ा छप्पर इस्थित होजाताहै ( उपाय ऐसी ही वस्तु है ) मैं भेद लगाय ही कर तब निचली है बैठोंगी ।। (और) तेरो (जो ) चंचल (श्रीकृष्ण- मित्र ) विराजमान हैं तू ( उन्हें) देखु थोरा न समझिये ( यानी उनका हर एक कामिनीपर मनचलायमान रहता है इसीसे मैं जौन ) वडाचतुर भेदी विदित ( उसे ) ढूंढ़ती हूं कोई यतनकरने से वैठ न रहूंगी ।। राम राम राम (छी छी छी)(हे) नादान फजीहतकरायेद् तो नहीं बनेगी ( इससे अपना) मन रोंक ३४ ललनचन्द्रिका। चुपकी है बैठ प्यारी मैं उपाय करती हूं ( सिद्धिही होयगा गड़हा खोदती है हूं पानी मरगया जो मरगया भरगया तो भरगया धीर्य्यरख )) इति ॥ तुरङ्ग जाती व शोभावर्णन ॥ दवर्गकवित्त ॥३३॥ । ३ ६ १ 1 दुलदुल दमीले से दमीले दामवार दीर्घ दादुरी दिलावर दवंग दुति दामेहें। दीनता दुराते दरशाते दम खम्दराज दन्तिया दुपाद ! द दामिनी दवामें हैं ॥ दुलरत बुल्लराते दौर दुलकी दुनाते दन्द द्वन्दते दताते दीप्ति दिव्यतामें हैं । दुम्मन दवावै दुवरई हृदहां हग दम दमका ललनता दिखरामें हैं ॥ इति॥ प्रसङ्ग ॥३३॥ (श्री अवध नरेश दशरथ महारा- ज घिराजके सुत मर्यादा पुरुषोत्तम अवतारीश्रीराम- चन्द्र महाराज के विवाह में जौन जौन प्रकार के तुरंग श्रावते भये तिनका रंग रूप छल बल वर्णन कि को- ई तो)॥ टीका ॥ ३३ ॥ दुलदुल नामक घोड़े बड़े बड़े दमदार बड़े मोलके मटील रंग के हिस्मतार अत्यंत शोभाको प्राप्त हैं । (कोई) स्वस्ती को दूर करते हुये (चंचल) महा पराक्रमों को दिखाते हुये ( कोई ) युवाअवस्था को मात दो पैरों से खड़े होकर चपला की चंचलताको लज्जित करै हैं । अपने स्वामियों का लाइ जना- वतेहुये छिनमें दुलकी नामक चाल ( व छिनमें ) सर्पट चालको चल अनेक ऊ- धमों से अधम मचावते हुये सुन्दरता में सुहायमान होरहे हैं ।। ( कोई ) पूंछों को १ ६ १० २२ ललनचन्द्रिका। ३६ ३ ६ ६ १८ दबकाये हुये शरीरसे रुष्टपुष्ट छिनमें नेत्रों को चमकावते फिरावते हुये लड़कपन को प्रकाश कर है ।। इति ॥ अधीरानायका॥ धृष्टनायकसंवाद ॥ धवर्गकवित्त ॥३४॥ धांधली धरौगे धाम धाओधमकाओनाहिं धांकरीधुबैगीधोख धांधके धंधेयोना । धायधाय धरधर धमकत धमाधमै धीमेहधुरील नतु धानपान ध्यैयोना ॥ धूहधां धमैगी धूमधामधरधूमसह धूर- ताधकोगे धूरि धुंधरी धुरैयोना । ध्यानीही धतीहै धूरधानीही ध्वनैको धूर्त ध्यायेही ललन धर्म धूमीही धियोना ॥ इति ।। प्रसंग ॥ ३४ ॥ (एकप्तमय यमुना किनारे एक स्थलपर दशपांच सखियों का चन्द खड़ाहुना देखकर रसिक शिरोमणि कृष्णमहाराज उनके समीप जातेभये सो गोपाल लालजीको भावते देख और उनको चंच- ल रसिक जानकर सखियाँ इस प्रकार बोलती भई कि महाराज)॥ ६ टीका ॥३४ (क्या कुछ ) तकरार करनेवाले ही अपनेघरको चलेजाओ धमकीमतदिखलावना (नहीं तो तुम्हारा) नीचपन बहाबहाफिरैगा (कहीं) झिगड़े के भरोसे ( हमारे समाज के भीतर ) न घुसि आवना ।। (ऐसी)जल्दी जल्दी करकरके जोरशोरसे उछलते कूदते हो (कि) कुछ शरीर का होश ही १४ ३८ ललनचन्द्रिका। १८ २१ २३ नहींहै (कुछ हमैं ) धानपान सरीखा कोमल मतसमझना ॥( जो नहीं मानौगेतौ) भली चंगी तरह से मारधार मच जायगी मूर्खता करौ हौ ( कहीं मार तोर की ) घोर धूरसे ( रेणुका से) धुरिआय मत जैयो ॥ (तुम्हारी) प्रकृति जानी हुई है फजिहतखोरा हौ कौन मुड़खपराव तुम से करै (क्योंकि ) कुचाली (व) नादान को पूजेही से भलाई है ( अपनी) बनीबनाईबात मतीबिगार डारियो॥ २६ ३५ इति ।। अविसारिका नायका॥ नवर्ग कवित्त ॥ ३५॥ १ ६ २२ ३६ नागरी नवेली नेक नागिनि नागिनि निशि नगरि निवास्यु नैन न्यूनरी नवाई तँ । नौकर निकर नृप नुक्श निहरत नित नू- तनी नवीनी का निरखि नियराई ते॥ निलयनिरासिक निवास नीपनेहो नेमनेकियां नगीनी नेकनजरी नुमाँई तैं। ललन न. रायण सौं नीरजनैनी नमूद नेह निबहन निधि नोखी निरखाई तें॥ इति ॥ प्रसङ्ग॥३५॥ कोई एक सुकुमार सलोनी सखी श्री कृष्ण महाराजसे मिलने की एक पहर रात्रिपर्यंत तक की अवधि बांध अपने घरको सिधारती भई दैवयोग से वो कुछ ऐसे फँसाव में फँसजाती भई कि वो अपने नियत किये हुए समयपर न पहुँचसकी तब महाराज निराश है अपने मकानके किवाँर बंदकर सोयजातेभये ललनचन्द्रिका। ३६ इधर जब अर्द्धरात्रि का समय नियराना तब उस अ- बलाको अवकाश मिलने पर याद आई कि मैं तो कृष्ण भगवान से मिलने का वचन दे आई थी अगर मैं न पहुँचं तौ गोपाललाल जी कहीं मुझसे खेद न मानने लगै मन में कहने लगी कि खैर देरहोगई तो होजाने देउ लेकिन महाराज के पास चलना निश्चय चाहिये ऐसा समझकर अकेले ही चलदेती भई कृष्ण द्वारप- हुँचकर दरवाजा बंद देख सांकरी खटखटावती भई कि हरि सांकरी का शब्द सुनकर किवार खोल उसी सु. न्दरीको अनुचित समय आई हुई देख बड़ा आश्चर्य कर उससे पूछते भये कि॥ सखिप्रतिहरिवचनम् ॥ । T १ ३ ६ ९ १२ १६ २२ २३ टीका ॥ ३५॥ (हे) नवीनि सुन्दरि (तैंनेऐसी) विकराल रात्री को कुछ भी नहीं ख्यालकिया ( क्या ) ग्रामवासियों के नेत्रों में तैंने धूल झोंकदीनी ( जो कि तू यहां तक चलीआई और किसीने तुझे नहीं देखपाया अथवा ) ॥ अनेक राज पहरूये (ऐसीऐसी) पेंचीदाबातों व ऐबौं को हमेश देखाही करते हैं (सो तेरी हे ) नवयौवनि क्याकोई नईरास्ता देखीभई थी (जोमेरे ) तू पासतक च- लीआई ।। (मैं तो बिल्कुल ना उम्मेद होगया था लेकिन तुझने मुझ सरीखे) बे उम्मेदवाले या बे आशवालेके मकान में सुंदर विश्राम लेने का प्रण पूराकिया (सो यह तो) तैंने बहुतभलाई करी (और) अनुग्रह प्रगट करी है (अरी) अ- नमोल कमल सरीखे नेत्रोंवाली प्यारे परमेश्वर की शपथ (करकहताहूं कि तुझ सरीखी) प्रीतिके निबाह की अद्भुत सागरी (मुझे एक) तुहीं देखपड़ी है। इति।। २६ २९ ४० ललनचन्द्रिका। कलहांतरितानायका॥ पवर्ग कवित्त ॥३६॥ ८ १० w or ३ १६ ११. . प्रीति पुजपुष्करी पुनीत प्रेम पूरी पय पुनि पी प्यारे पहीं पराइये पराई क्यों। पावसेश पिकी पाय पूजी ना प्रपूर्ण प्यास पु- पेश पराग पै प्रफुल्लता न पाई क्यों॥ पूतरी प्रवीनता पुरातन प्र- वीनपन प्रबल पाण्डित्त पुजी पुती पण्डिताई क्यों। पाले पोढ़ परीरी प्रपञ्ची पैन पण्डित पै ललनु प्रतीतु प्रिय पूरिही पराई क्यों ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥३६॥ (चन्द्रावलि सखी जोकि श्रीकृष्ण भगवान् को परमप्रियाथी और तैसेही चन्द्रावलि को भी भगवान् परमप्रियथे कभी आँखों अोट न होतीथी सो एकरोज भगवान् से रुष्टहोकर अपनेघर चलीआ- वती भई तिसकी एक परममित्र सहेलीने उसको इधर उधर फिरते हुये देखकर उससे पूंछतीभई कि हे प्यारी तू ऐसी होकर कि)॥ सखिप्रति सखिवचनम् ॥ ३ ५ टीका ॥३६॥ प्रीति जो कि स्नेह है (ब) प्रेम जो कि सांचीलगन लिस की सुन्दर व निर्मल पूर्ण क्षीरसागरी फिर (आज अपने ) प्राणप्यारे पिया से फटी फटी काहे फिररही है ।। ( देख पपीहा एक स्वाति बुंद के कारण प्रभुसे स्नेहयुत रटलगाय पावस ऋतुमें मनोरथको पाय संतुष्टता को प्राप्त होता है तेरा कैसा पिया ललनचन्द्रिका। २१ २२ २८ ३२ है कि ) पावस ऋतुका स्वामी कि जिस पावसमें कोटिन स्वातिबिंदु उपजते हैं (हे) मृदुबैनि पपीहनी (शिसको) प्राप्तकर ( तेरी ) मीतिरूपी सम्पूर्णवृष्णा नहीं पूर्ण हुई (अथवा देखु भँवरा पुष्पका सुगंधि रसग्रहण करके संतुष्ट होता है और फिर तुझे तो कैसा पिया मिलाहै जोकि) कोटिन रसीले पुप्पोंका रचने वाला (तिसकी) सुगंधी से तेरेमनको आनन्द नहीं माप्त हुआ ॥ (जो मैं कहूं तू कुछ नादानहै सेतो तू) चतुराई की पुतली (व) छोटेरन से चतुराई चालांकी से भरी है ( और अवतो ) अत्यन्त गुणोंकरके संपन्नित है ( फिर तेरी ऐसी) बुद्धिमानी कहाँ खोगई ॥ ( इतनी वार्ता अपनी सहेली की सुनकर चन्द्रावलि उ- त्तर देती भई कि नू नहीं जान है कि मैं ) छलबल रचनेवालों में तो अत्यन्त निपुण के अच्छी तरह से वशमें फँसीहूं सौ प्यारी ( इसबातपर तू ) ख्यालकर (कि) ऐसेनादानसे ( भलाईही काहोगी )॥भीति कैसे निबहेगी ॥ इति ॥ सचिमतिसविशिक्षा ।। फवर्ग कवित्त ।। ३७॥ १ ૨૨ फरेफरे फतुओं फरेबन फवाती कुर फूलिही फिरै फनफनातिया फजीतीसी । फूहरपनादि फट्टई फली फिरि फैल फनों फटकारी फन्द फारी फहरीलीसी॥ कमांक डूंकनीहुँ फाल फरमावनीहुँ फोकटी फसाद लिफिरती फवीली सी। फेंकु कंद ललने फणीश पति कांसु फेरि फँसरी फिकिर फूंकजावहीं फलीतीली॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥३७॥ एक सखि जोकि कुकृतत्रत पारायणि ४२ ललनचन्द्रिका। और विमुखि नारायणथी उसकी परम मित्र सहेली उसे उपदेश देतीभई कि अरी कुचालिनि॥ ईश्वरका स्मरण कियाकर कि जिससे परिणाम बने और भलाई होय स्थाके वास्ते अपनी अनमोल मनुष्य योनिको बरबा- दन कर देखु अबभी सोच समुझ॥ सखिपति सखिवचनम् ॥ १ ३ १२ १३ १८ २३ ३२ टी० ॥ ३७॥ मैं सांचकहतिहूं (कि तू ) भलेचङ्गे छल कपटों से भरीहुई दुर्दशाकरीहुई फजिहन के समान अभिमानभरी डोलती है ॥ ( और ) कुकर्मा- दि (व) झूठवचनादि ( व ) कलहरूपी गुणों से भरीहुई ( और ) सुन्दर गुणों से रहित (व) फौरेबोंकी प्रवाह धारा ( होरही है )॥ (व) झाड़फूंक करनेवाली (फाल ) गुप्तहाल खोलनेवाली (निरर्थक) राहचलतू झगड़े करने- वाली सौखीन सरीखी (बनी)फिररही है ॥ सो प्यारी ( अब इन ) कुचालवल- नों को परित्यागकर श्रीकृष्णचन्द्रभगवान् को रिझाउ तौफिर ( जो तू ) चि- न्तारूपी जाल में फँसरही है ( उनसे ) छूटहीजाय ॥ ( अथवा तेरी चिन्तारूपी फांसी मशाल के तरह जल भस्म होजाय ) ॥ इति ।। अधीरानायका॥ बवर्ग कवित्त ॥ ३८॥ १ ६ बीर बिगरैल बनवारी वो बिहारी बड़ बाटबिच बादनुबिवादनु बढ़ावतो। बावरी बनाय बिदराय विचकाय बक बधुटी बिलोकती बिलोकतै बनावतो ॥ बांधो वा प्रजेश बैर बिकट विहद विधि ललनचन्द्रिका। ४३ बरसाने बसिहौं बिषाद ब्रज बावतो। बरण बताऊंगी विवस्था वृषभानसुतै बाँकुरो ललन ब्रज बसिबो बिहावतो॥ इति ॥ सखिप्रति सखिवचनम्॥ प्रसङ्ग॥३८॥एकसखी अपनी परमसहेलीसे श्रीकृष्ण- चन्द्र का उरहना दै अपनी व्यवस्था कहती भई कि॥ १ ३ ६ ६ १० १३ १५ २० टी० ॥ ३८॥ (हे) प्यारी कृषण बड़ा कुचाली है रास्ताचलते झगड़े करत है ॥ (कभी मुझे) बुराभलाकह ओंठोंसेचिढ़ाय बकझक पागलसी बनाय देता है ( सो ये दशा ) व्रजकी स्त्रियां देखाकरती हैं ( औ मुझे भी ) देखतेही बनावता है। उस गोपाललाल ने ( मुझ से ऐसी) महाभारी अथाह शत्रुता कररक्खी है ( सो अब मैं ) राधिकानगरी में जायरहूंगी ( काहेसे कि अब ) प्रजके निवास से खेद होता है । (और) राधिकाजी महारानी से समस्त दशा कहसुनावोंगी कि कुचाली नन्दको कुवर व्रजमण्डलका निवास ( मुझसे.) छो- ड़ावता है ।। इति ॥ प्रोषितभर्तृकानायका॥ बवर्ग कवित्त ।। ३६॥ ३४ १ ६ ५ ११ बानक बिगारो बिध बिलमो बिदेश बर बाबुल बखरी बैस वृ- थहि बिहातुरी । बीररी बिराहिनी बियोगिनी बिहाल बहु बिरहा बिहद्द बिथा बक बगरातुरी। बेपरा विहंगम बनायो वो विधातही ने बनै ना बनाये विधि बात ना बिसातुरी। बैरी विनतन बेधना १९ २१ २४ ४४ ललनचन्द्रिका। ४० बिलंद री ललन बावरीवनी बिना बिहारी बिलखातुरी ॥ इति ।। प्रसङ्ग ॥३६॥ (कोई एक पति वियोगिनि से एक सखी अपने पियाकी वियोगरूपी दुःखकी अवस्था व. न करती भई कि)॥ सखिपति सखिवचनम् ॥ २ ३ ४ ५ ६ ९ ११ १८ २८ ३१ ३४ । टी० ॥ ३९ ॥ ब्रह्माने मेरेतुखकाबनाव विध्वंसकरदिया ( मेरा ) पिया (था सो) परदेश छायरहा मातापिताके घर में मेरी उमर निप्पयोजन बीती जाती है । (हे ) प्रिय वियोगवति मैं भी दुःस्वसेसंपन्नित अत्यन्त कुदशा को प्राप्तहूं (और ) पिया के विछोह का अतिशय कठिन खेद बढ़ताजाय है । उस ब्रह्मा ने ( मुझे)बिन पंखों का पक्षी रचा है ( इसी से ) न कोईयुक्ती चला- ये चलै न कुछ प्रयोजन बने है । (अरु) हे प्यारी शत्रु कामदेवकी व्यथा अत्यं- त वृद्धी को प्राप्त होरही है ( सो मैं ) प्यारे कृष्ण विदून सुधिबुधि विसराये हुये विलाप को कररही हूं ॥ इति ॥ शस्त्रनामानि ॥ अथ शस्त्रानुमान संख्या ॥ ११ ॥ बवर्ग कवित्त ॥४०॥ बल्लम बुलंदी बांकु बांकुरी विळूह बूह बानेहु बखाने बंद बंड- खहु बारे हैं । बस्तर बलाके वाण बीपल बुझाके बृद्धि बहल व- लाके ब्रह्म बाण व्यवहारे हैं। विजई विनाशी वपु वर्षे बर्छियां विपुल ललनु बलीसुबीर बेहद विहारे हैं। बाद वकवादन बढैयाहू बिदूनबात बलभद्र वैरी बहु बदन विदारे हैं ।। इति ॥ प्रसङ्ग ॥४०॥ श्रीरुक्मिणी महाराणी के विवाह ४५ ललनचन्द्रिका। समरमें श्रीकृष्णमहाराज व बलदेवजी महाराज के स- न्मुख जोन प्रकार करके शिशुपाली सैन्याके शूरवीर नानाविधानके अस्त्रशन लेकर आय लड़ेरहे उन अस्त्रों के इस कवित्त में नाम वर्णन हैं इसी से सरलता जान इसकी भाषा नहीं करी॥ इति ॥ देवयान खगवर्णन ॥ अथ खगानुमान संख्या॥२६॥ बवर्ग कवित्त ॥४१॥ बदक बीला बाज बबई बटेर वा बिनता विहि बृन्द बृषभ विकासहीं । बाजे बुलबुल बया निहँग बुंदीला बौधि बावर व बे- सरा विलंगनी बिलासहीं ॥वई विपुल बगरेल बनमर्ग बैरी वै- गमा विलाई बाघ विमलित बाजहीं। ललन बिनोदवत बरगैलि बैजनादि बाजे बाजे वीर बांके वाहन बिराजहीं ॥ इति ॥ प्रसङ्ग॥४१॥ इस कवित्त में केवल कृष्णमहाराजकी घरातमें जो देवगण आये रहे उनकी सवारियों के अने. क खगादि नाम वर्णन हैं इली से टीका नहीं किया।इति। देवयान पक्षी वर्णन ॥ अथ खगानुमान संख्या ॥१६॥ बवर्ग सवैया ॥४२॥ बैठे बकासर बंथर बीर बिसांतिनु वर्कुलं बृन्द बनाये । बिन्दुकि बाज बजूल बढ़ी बिगरा बुटही बरटानु बकाये । वायस बास वि. राजबहू बिजहाबर बाघ विमान बसाये । बीन बजावत वै ललनेश विहारि ब्रजेश विनोद बढ़ाये । इति ॥ टी०॥ ४२ ॥ इस सबैया छंद में केवल देवसवारियों के पलियों के नाम वर्णन हैं इस कारण से इसका अर्थ नहीं किया ॥ इति ॥

ललनचन्द्रिका। देवसवारिक पशु वर्णन ॥अथ पशु अनुमान संख्या ॥ १२ ॥ बवर्ग कवित्त ॥४३॥ बांकुरे बराह सिंह बाधन बलीन बृन्द बिज्जुन बहूत बैठ बीर ब- करानबर । बेहरै बराह विपखापरान बिकराल बीछी विषवारन वि. लारन वथानवर ॥ बेहद बली बृकोदरान बांदरानि बहु विपुल वि. नोदी बनमानुप बखानबर । बृषन विराजे बाजे ललन विशालबाजे वर्ण वर्ण बाहन विलासिया विमानबर ॥ इति ॥ टी०॥४३॥ इस कवित्त में भी केवल देवबाहनों के नाम वर्णन हैं इसी से इसका टीका नहीं किया॥ इति ।। श्री रुक्मिणी शोभावर्णन॥ भवर्ग कवित्त॥४४॥ १ २ ६ १० २१ २३ २४ ३२ ३७ ३६ भोरीमोरी भामिनीहुँ भामनी भरील भाह भीनेमीने भूपनान भूषित भलीमली । भक्भकी भभूक भूर भावनी भवाती भाहें भावों भभकाती भांतिभांति भर्म भर्मली। भागवंत भी ललन भोगवति भेषभल भाल भल्मलाहट मलाइयां भ्रमंतली। भानु हुँ भुलावे भुर- मावै भैरवीभटून भीष्मकजा भागवान भामा भक्तवत्सली ॥ इति ॥ सखिप्रति सखिवचनम् ॥ टी० ॥४४॥ सोहावनी शोभा से भरी हुई अत्यंतसीधी सुकुमारि सुन्दर से सुन्दर आभरण (पहिरेहुये) सुघररीतिसे दर्शातीभई ॥ अत्यन्त जागतीहुई सलो- नी छवोंकी अनेक कलाओं के सारोंको दर्शवतीहुई बहुआश्चर्यों से संपनित सुहायमान ॥ नसीबवर निश्चय करके प्रिय सुखभोगोंको विहारनेवाली उच्चललाद १ ६ १८ ललनचन्द्रिका। ४७ ३६ कीर्तीकी सुघराई से भरीहुई ( कि जिसकी शोभाको देख ) सूर्यनारायणमी विमोहित होजाते हैं ( और ) सम्पूर्ण देवांगना सुधिबुधि भूलिजायँ ( ऐसी) भाग्यशाली भीमकराजाकी कन्या कृष्ण भगवान् की प्यारी की (शोभाद- र्शाती भई )॥ इति॥ आनन्द संमुहिता नायका॥ भवर्ग कवित्त ॥४५॥ ६ १ ६ १२ ३० भोरभयो भोरी भइ भाषितरी भानु भाह भाग भौन भामिनिरी भीरभदु मेरेगी। भुरमी भ्रमानी भरतारभग्नि भाँपहिगी मिटयो भूलैगी भौंरि भौरहू अमेरेगी ॥ भलिभलिभांति भारी भौभयंक भानतिहूं भग्नत भलाई भरै भाभई मैंभेरेगी । ललनि भवेश भक्त भजु भूरि भोगप्रद भंजौ भगवान भाषु भीरु भमेरे रैगी ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥ ४५ ॥ एकदूती किसी एक सुकुमारिसुन्द- रीको घरकी चोराचोरी से उसे श्रीकृष्णमहाराज के रंगमहल में पधराय इस प्रकार शिक्षादेकर कि देखु हे प्रिये से मुंहअँधियारे गुपचुप अपने भवन को यहां से चलीजइये ऐसा कहकर अपने घर को जाय सुचित्त निद्रा में प्राप्त होतीहुई प्रातस्समय जागने पर कृष्ण भगवान् के समीप चलती भई भानुउदयपर हरिमंदिर में पहुँच क्या देखैहै कि वो सखी अबतक अपने भवन को नहीं पधारी है तब तौ चक्रित होय उस सुकुमारि १ ३ ६ ६ ९ ललनचन्द्रिका। प्रति यह कहती भई कि अबतक तू अपने घरको नहीं गई अरी उठ देखुतो॥ सखिप्रति दूतिकावचनम् ॥ टीका ॥ ४५ ॥ अरी सीधेनुभाववाली सवेरा होगया सूर्यनारायण किरण उदय होयआई अरीयारी (तू) घरको पधार ( नहीं तो फजिहत हो. जायगी जो मार्ग में ) स्त्रियोंकासह मिलजायणा ॥ कौनभूलमें भूलीहै (तेरी) ) ननँदी देखलेयगी (तौ फिर) हे रूपरसलोभिनि मधुकरी मिलना भूल जायगी यह कृष्णरूपी मधुकर भी हाथसे जातार हेगा ॥ अच्छीअच्छी तरहसे कहूं हूं कि अ- त्यन्त बड़ा भयदायक डर है ईश्वरहि रक्षाकरै (आजकुछ तुझे) क्लेश मिलनेवाला है ॥ ( इस से हे ) प्यारी कृष्णचरण सेवकिनि (तू ) सर्व सुखदेनेवाले (जो गो- पाललाल हैं तिनका ) स्मरणकर ( अथवा ) कृष्णमहाराज सेही कह (कि मेरे । ऊपर ) जो आपत्य होनेवाली है उसे दूश्करो ( यानी मेरी फजिहत न हो सो । उपाय मुझे बतलाइये जिससे कि मैं निर्भय घर पहुँचजाऊँ)॥ इति । पक्षीनामानि वर्णन ॥ अथ खगानुमान संख्या ॥ १३ ॥ भवर्ग कवित्त ॥ ४६॥ ३६ ३६ ३ ५ ६ ६ ९ १२ १५ भीनेभीने भ्रमर भ्रमंत भंगिया ममेर भीरमार श्रृंगराज भाट भर्भरातु हैं। भारथ मुँगेला मल सुरजैट भाइभाते भीना भुसकैटा भांतिभांति भन्मनातु हैं ॥ भद्रकुल भोलेभोले भामनीक भाम. नीक भामिनी भ्रमाती भ्रम भुजंग भुलातुहें । भावते ललन भजु भगवंत भंज भार भव भय भूरि भाग भागते भगातु हैं ।। इति ।। ३२ ४६ ललनचन्द्रिका। प्रसङ्ग ॥४६॥ जिस समय कि श्रीकृष्ण भगवान के समीप श्री रुक्मिणी महाराणीका भेजा हुआ हरीदास विप्रपातीले द्वारिका को चलता हुआ तो मार्ग में इस इस प्रकारके पक्षियों के मुखसे हरिकीर्तनरूपी शब्द सुनकर प्रसन्न होताभया ॥ इति ॥ उमाप्रतिशिव वचनम् ॥ ३ ६ क २० २३ टीका ॥ ४६ ॥ [ कहीं तो ] सुन्दरसुन्दर भँवरा [ कहीं ] लाखोरके बन्द [कहीं] बहुत से भंगराजनामक पक्षी विचररहे [कहीं] भाटनामकपक्षी बोलरहे [ कहीं ] भारथ [व] भुरजैटा [कहीं] सुहावनेभाद्र [व] सुन्दरसमुँगेला [कहीं] भीना [व] तरह तरह के भुसकैटा चहकरहे ॥ भोली भोली सूरतवाले भद्रकुल[व] सुहावनी सुहावनी भामिनी मनका खेद हरैहैं [ कहीं] भुजंगा भ्रमण करते ॥ प्री- तिसे प्रिय घनश्यामको स्मरण करते हुये [कि जिस स्मरण से ] संसाररूपी म. हाभयदायक पातक खंडखंड है नशिजाते हैं [ इसमकार पक्षियों को देखकर द्विज प्रसन्न होताभया] ॥ इति । पक्षी नामानि वर्णन ॥ अथ खगानुमान संख्या ॥ २६ ॥ मवर्ग कवित्त ॥४७॥ मोरी मोर मुनियाहू मैनी मैनाहूं मराल मुरग मँडूक मान पु- करी मुदामहा । मारची मछाकुल महूक मगचिकनीहुँ मुरी मु- सरिहा महरि मुंडिया महा। मालिनी मयूर पंस्त्रि मुरुक मनोहरीहु मुंगही महोवरी मुँचील मदुकुला महा । मांगली मन्हूसी मुरगावीहू ममाखमनुं ललन मतंग मोद मोहित महा महा ।। इति ।।

५० ललनचन्द्रिका। प्रसङ्ग॥४७॥ इस कवित्त में केवल पक्षियों के नाम वर्णन हैं इसीकारण से टीका नहीं किया। इति ॥ भौढारतिप्रीता नायका॥ मवर्ग कवित्त ॥४॥ ३ ६ १ 8 २१ मोद्यो मनमोहन मुरारि मन मोर मीत माधुरी मनोज मूर्ति मो. हिनी महानरी । मृदु मुसक्यान मानों महा मार मानमनी मंजुल मजान मिलि मुख मंजु मानरी ॥ मालाकारिया मोहालि मुकतनु मालमणि मालामालसे महँगि मोति मकुनानरी । मलया महक माथ मुकुट सुरलि मुख मधुवनमें ललन मुँहि मुलकानरी॥ इति ॥ २६ ३९ ३५ सखिप्रति सखिवचनम् ॥ ६ ९ १६ २१ २४ टीका ॥४८॥ अरी मित्र सुन्दर कामदेव [व] अतिशय मोहनी मंत्रों से भरी हुई सी सूरत । मीठी मंद हसन साक्षात् अत्यन्त कामदेवकी छविकी पद्धति [ आनसान ] से भरी सुन्दर सुखोंसे सम्पन्नित [ ऐसा ] शोभित वदन सुहाय- मान ॥ जो किसीको नसीब न होसके ऐसे मोती मँणियों के मालाओं के द्वंद [व]! अमितधनसे अमोल गजमुक्तों की [ मालापहिरे ] । [व] चन्दनसे सुगांधित [तन ] मस्तकपर मुकट [क्रीट ] आनन में वंशी [अधरोंपर धारण किये ] हे सखि [श्राज] मोंको वृन्दावनके बीच नन्दकुवर देखाई पड़ा [ उस] मन मो. . हनेवाले मोहनने मेरा चित्त चोरायलिया। इति ।। ३२ ३४ ललनचन्द्रिका। मानवती नायका॥ मवर्ग कवित्त ४६॥ १ २६ मानुमानु मानिनी मनोहरी मयंकमुखी मानके मनैबे में महा- तम महातु है । मानहुँ न मानहुँ श्रीमाधरीजी मोर मती मंदै मु- दिताई मलिनता महिंगातु है ॥ मीतरी मिलापै में मजातु मजा मंजु महा मूजिवामूजिब मूल मनमां मुलातु है । माधो मोहिनी मुलायमी ललनि मेंदु मत मानुज में मुख्य मृदुताहि मामुलातु है ॥ इति ॥ श्री राधिका प्रति सखिवचनम् ।। प्रसङ्ग॥४६॥ एकसमय श्रीराधिकाजी महराणी कृष्णभगवान से मानकर बैठतीभई कि एक दूती श्री- कृष्णमहराज की तरफसे आनकर यह प्रार्थनाकर उप- देशिक वचन कहतीभई कि॥ इति । सखि प्रति दूतिका वचनम् ॥ १ ५ ६ १० टीका ।। ४९ ॥ [३] मानकरनेवाली [ रूठनेवाली] चितचोरिनि चन्द्रव- दनी [ मेरी शीक्षा ग्रहणकर ग्रहणकर [ देख] पद्धति युन सत्कार से बड़प्प. न ब है। [आगे] प्यारी मेरी सलाह मानने न माननेका [ तुम्हैं अख्त्यार है परन्तु न मानने से ] सुख घटता है [ और ] दुःख बढ़ता है ॥ [ क्योंदि] ] प्यारी सुखप्यारै में अत्यन्त श्रेष्ठ आनन्द प्राप्त होता है [ और मेरे कहने का] उचित अनुचित सार [ आपके ] हृदयमें मालुम होना होगा। [हे] मिये कृष्ण १९ ५२ ललनचन्द्रिका। २९ ३० ३२ चितचोरनि नम्रताको न दूरकर मनुष्य के तनमें [ केवल ] शीन ही एक मूल पदार्थ है ।। इति ॥ वैसिकनायका॥ कवित्त यवर्ग ५०॥ . ३ ४ ६ ७ १६ २१ यादवेश यारवास येहिही यकीने यशु योवनयाकूत यावरीही युति यारभे। यदिहि युबाई योमी यन युक्ति यंत्र योगे यादतै युगुल यारी योगी येतवार मे ॥ यातोही यकंती योंहीं यकायक यादगारि यक ना यामिनि याम योगयुग्मकारभे। येहोयों यरू- जन यथोचित यरूजकै ललन यदु युवती यरै यमानमारभे इति ॥ हरिप्रति सखिवचनम् ॥ २६ २ ३ ६ १० । टीका ॥ ५० ॥ [हे ] स्याम सनेही [ तुमको ] यही भलाई करनी उचितथी [कि ] हीरारूपीयौवनकी उमंगही पर मित्रबने ।। जबतो युवाअवस्था प्राप्तथी [याने मेरी ज्वानी चढ़ी हुई थी तवतो तुम्हारे ] उपाय [व] चतुराईरूपी टोना क- रनेसे [ हम तुम ] दोनों प्रीति करतेही विश्वास करनेके समतुल्य भये [ याने यकीन करने के लायकहुये ] अजीओ प्यारे यथायोग्य सुखरूपी ऐश्वर्यों को [ मेरेसंग] भोगकर [ अब तुम और और ] यादवौंकी स्त्रियोंसे प्रीतिकर ऐसे [ बेनियत होगय हो। [कि कहांतो इसप्रकार एकदमसेही [मेरी] सुरत बिसराय दीन्हीं है [ कि अंब कभी कोई ] रात्रिके एक पहरके [वास्तेभी] नहीं दोनोंजने मिलसक्ते हैं ।। इति ।। २९ ३१ ३३ ३५ ४१ " ३ १ ५ ललनचन्द्रिका। शान्तिरस॥ वर्ग सवैया ५१॥ राम रसायन राचु रँगील र रुज रंकित रांड़ रजोवति। राख- हि रज्जु रघुपति सों रति रांध रमैं रिरियावति रोवति ॥ रास रहस्य रमापति के रुचि राज रजै रमणी ललनै रति । रारि रुदै रघुनायक राजिवलोचन रामक रोजहि रोजति ॥ इति ॥ उपदेश॥ ३ ६ ६ है १५ २३ २५ टीका ॥ ५१ ॥ [हे] प्यारे सुखकाधाम [ जो] रामनाम है [तिसको] भजु व [ स्मरणकरु तौ] विधवा मासिकधर्माणी स्त्री के नीच दर्शन तुल्य [ जो] दरिद्ररूपी रोग हैं [ सो] दूरहोजाय । [ और जो ] रामचन्द्र महराज से प्रीति- रूपी लव [ डोर] लगावै [ तौ जितनी ] विपत्ती हैं [ सब ] विलाप करती झी- कती फिरै ॥[जो] परमेश्वर के गुणानुवाद में रमै [ तौ] मनमानी नरदेव पदवी [ व ] सुन्दर स्त्री [ व ] संतानादि सुख [व] हरिपदभक्ती प्राप्तहोय । [और जो ] कमलसरीखे नेत्रवाले सबमें वर्तमान रामचन्द्रमहराज [ तिनका- प्रेमरूपी ] व्रत धारण करने से [ संसाररूपी जंजालकी ] व्यथा मिटजाय है [आवागमन से रहित होजाय है ] ॥ इति ॥ अनुकूल नायक ॥ वर्ग कवित्त ५२॥ रामसोंह रावरी रटतु रोप रोंप कर रंक रहूं रूपरस रसना रसी- लीको । रीति रति रोचतही रोचतहौं रीतिरस राग रंग रंग रुचि ३१ १३ ५४ ललनचन्द्रिका। २४ ४० ३ ६. ६ राखत रुचीली कोललने री रमणीक रमणी रमणकार रोषरांधि रहतरी रागियारतीलीको । रामक रसिकरति रामकि रुचिक रुख रोमरोम रमों रूप राधिका रँगीलीको॥ इति । सखि मति हरिवचनम् ॥ प्रसङ्ग ॥५२॥ किसी समय एकसखी श्रीकृष्णम- हराजसे कुछ प्रीति मार्गका उरहना देतीभई तब मदन- गोपाललालजी उससे उत्तरमें ये कहतेभये कि तू ऐसी बात मुझसे मतकहु॥ टीका ।। ५२ ॥ हे प्यारी [ मैं तो ] हाथ उठाय उठायकर परमेश्वर की क- समखात हौं [कि मैं तो सदैव ] सुन्दर छवि [व] सुखरूपी मीठेवचनों का लोभी रहताहूं।[और जो मुझसे ] प्रीतिरूपी बर्ताव वर्ते है [ उससे मैं भी ] मे. ] [ मरूपीबर्ताव करताहूं [और ] स्नेहरूपी आनन्दसे संपन्नितकर इच्छाकरनेवाली । का मनोरथ पूराकरूहूं । अरी प्यारी [ मैं तो] सुशील स्त्रियों से प्रीतिकरनेवाला [और ] हे सुकुमारि क्रोधरूपी व्याधा दूरकर [जो ] प्रीतिवाली है [ उससे मैं सदैव ] प्रीति करताहूं। [व] प्रेमियोंकी प्रीतिमें रमनेवाला [ व ] वांछि- तार्थी की मनशा पूर्ण करनेवाला [ऐसे जो सर्व गुणोंसे संपन्नित मेरी परमप्रिया] प्रेमवती बृषभानदुलारीका गुण [चालचलन मेरे] रोंयाँ रोंयाँ में रमिरहा है।।इति॥ प्रौढ़ा अधीरा नायका॥ लवर्ग:कवित्त ५३॥ ९ १८ २९ ३९ ४० ४२ १ ५ लाडिलो लड़ावै लाड़ लाड़िली लड़ाई लड़े ललनी ललन ललनचन्द्रिका। ५५ १० १२ १३ २३ पन लेति लरिकांई को । लखलखु लोचनहिं लहु लहु लाभालाभ लोक लाज लिपृ लंघुलच्छन लुगाई को॥लाहत लडैती लाल लाहुनी लकीर लय लेनुलागि लली लंगरील लम्पटांई को। ली पतु ललन लागी लातों लतियावै लेउ लालीहू लखाहु लठियाउ लँगराई को।। इति ॥ सखि प्रति सखिवचनम् ॥ प्रसङ्ग ।। ५३॥ एक समय ललितासखी महराजसे रूठकर मानकर बैठतीभई तो उसके मनावने को एक दूती जायकर यों उपदेशिक प्रार्थनाकर कहती भई कि देखु॥ ६ १२ २० २३ २४ २५ २६ टीका ॥ ५३॥ [हे] दुलारी [ तेरेसँग] लालजी तो [वड़ा] प्यारकरते हैं [और तू उनसे नित्य ] मानकर है [ झगड़ाकरैहै और नादान लड़कपन का बर्ताव ग्रहण किया करैहै। [अपने] नेत्रोंसे देख देखु हानिलाभका सोच विचार कर [ और ] संसारकी लज्जाको गहु [ कुचलन] स्त्रियों सी प्रकृती दूरकरु [ सोंचु] प्यारी गोपाललाल [तो] विश्वासरूपी लीक खींचकर [ तेरेसँग] प्रीत करते हैं [ और ] नादान [नूअब ] ओछे व खोटे चाल चलनों को ग्रहणकरैहै । ये देख [अपने प्यारेसे बढ़ी हुई प्रीति को पैरोंसे ठोंकराय मिटायेडारैहै [ इन ] खोटी प्रकृतियों को छोड़ कुछ भलाई [ करके दिखाउ [ तब मैं जानू तू च- तुर है ] ॥ इति ।। ३२ १ ३ ६ १० १५ २१ २९ ३० ३८ ललनचन्द्रिका। उपदेश॥ श्री हनुमान ध्यान विनय ॥ लवर्ग कवित्त ५४॥ ललित ललाट लटों लसित लवन्नताई लोललोल लोचन ल खन लोचवालहै । लाललाल ललिताङ्ग लहरी ललकि लाल लकदक लुगराहु लहरात लालहै ॥ लंकृत लँगोट लंक लालई लँगील लस लैलहो लहातो लेप लेपित लदालहै । लाहुनि ल- हान लहु ललन लगाउ लव लाडिलो लँगूरपति लकुटिया वाल है ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥५४॥ श्री हनुमानजी महाराज की कैसी शोभा है कि जिनका ॥ उपदेश ॥ टीका ॥ ५४॥ सुन्दर उच्चभाल केशोंपर सुन्दरता सुहायमान सुभग सुभग नेत्र नम्रतावत् चितवन । अरुण अरुण सुन्दर शरीरपर मनभावती ललियाई सोहायमान अनमोल साजों से सजा अरूणवर्ण का पटुका धारण किये ॥ कमर में सुहावनी रक्त लुंगीकी कछनी काछे यथोचित् चिमित्कारिक (शरीरमें ) अ. तिशय सिंदूर रंगका लेप लगाहुआ तथाचोलाचढ़ाहुआ। (ऐसे जो मन वांछितप्रद पवनकुमार हैं तिनसे हेमन ) नादान अानन्द भरे आनन्दों को प्राप्तकरा चाहे (तौउनसे) सुरतलगाव [ किनसे जोकि प्राणजीवन वानरों के स्वामी गदा धारण करने वाले हैं। इति ॥ १ ३ ६ ९ १० २६ २८ ३४ ललनचन्द्रिका। लक्षितानायका॥ सवर्ग कवित्त ॥ ५५ ॥ ३ aur ९ ११ १९ । सुन्दरि: सुजान स्यानसदन सलोनी मुठि स्यामसों सनेहिक सगाइऐसगावैगी। सांवरे सुशील सन सुनऊंसदेश सुनु सोंचु सा- गरी समुझ सुखन स्वजावैगी ॥ सारी सुकुमारनी सनेहिन सलो- नेहिं की सांझही सकारे सुनुगत सो सुनावगीसंगहों सिधाऊं ल- लने सरा सबाऊंसव संक सियराऊं सांची सर्वहि सुझावैगी।इति।। सखिप्रति सखिवचनम् ॥ प्रसङ्ग ॥ ५५ ॥ कोई एक दूती किसी एक सुकना- रिनौयौवना से बहु प्रकार चतुराई चलांकी से भरेहुये वचनोंकी रचना कर नयता से कहती भई कि ॥ १ २ ४ ६ १२ टीका।।५।। (हे) सुरूपवति सुन्दर रसीलीशोभावाली चतुराई की स्थली ज्ञान- वती कृष्णमहराज से स्नेहकरने के योग्य (जो) मीति है (सो) करैगी । (जो तू अंगीकार करै तो मैं ) सुन्दर सुभाववाले गोपाललाल से खबर करूं (हे) बुद्धि की सरिता ख्यानकर विचार देखु (जो मेरी शिक्षाको मागी तौ) बहुत से प्रान- न्द प्राप्त होयँगे। (और तू किसी तरहका संकोच न कर यह ) समस्त ब्रज अ- बला कृष्णहिं की मिलापिनी हैं ये समाचार ( तुझे) आजैकल में मालुम होगा- यगा । (तू किसी तरहसे घबराइये मत ) (हे ) प्यारी मैं तेरेसँग चलकर सकन बर्ताव बताय (तेरा) डर मिस यदूंगी (तब तुझे मेरा कहना ) सब सच्चा पा- लूम परैदा ।। इति॥

ललनचन्द्रिका। पक्षीनामानिवर्णन ॥अथखगानुमानसंख्या॥२८ ।। सवर्ग कवित्त ।। ५६ ॥ संकुली सुगंधिका सुनारिका ससैनासिपा संबुलादि सूरीसन कुनि स्याहती तरा। सौला सुरभृगि सोनचिरई मुआसफेद सर्च सूली सनपिङकी सुवाक सुंदरा ॥ सुभ्र सुकमारी सुरखाव सक- खोर सुठि सुतरमुरग सीलबाज़ श्यामचिल्हरा । सीनेबाज सारस सीमुर्ग सिकरा समूह श्यामा श्याम सुमिरै ललन सुख सा: गरा ॥ इति ॥ टीका ।। ५६ ।। इसकबित्त में केवल पक्षियोंहीं के नाम वर्णन हैं इससे टीका नहीं किया। इति॥ कपोतजातिवर्णन ॥ अथ क०जात्यनुमानसंख्या ॥ २३ ॥ सवर्ग कवित्त ।। ५७॥ सालिसी सुरंग सीमतनिये सजांहपुरी सेवती सिराजी स्याह सोसई सुहाने हैं। सुंदरासहावी सुहे सीनेवाज़ सर्वती सुन्हैरासेख संदली सँजाफदार स्याने हैं। सुर्ख सब्ज सिर्जे सुलेमानी सो. सनी सफेद सुमई सरोजी सुभ्र ललन सुध्याने हैं । सुन्दर सलो- नियाँ सकील सान सो हैंसुभ श्यामा श्याम श्यामा श्याम सोधे सुख साने हैं ।। इति ॥ प्रसङ्ग ॥ ५७ ॥ इस कबित्त में केवल कबूतरों की जाति वर्णन है इससे सरलताजान इसका टीका नहीं किया। इति॥ शृंगारवर्णन ॥ अथ रंगानुमानसंख्या ॥ २७ ॥ सवर्ग कवित्त ॥५८॥ साजि स्यातरीसपेद सोसनी सुन्हैरी सब्ज़ सर्दई सिंगर्ससुर्ख AAD ५६ सलनचन्द्रिका। सोसनी सुझालुकी । सेवती सिंदूरी सूही सहतूती संतरई संदली सहावी सुलेमानी सपतालुकी॥ सीपिकी सिराजी सो सागौनी सर्बती सुस्याह सूसी साठनी सुरंग सोसई सुढालुकी । सल्मकी सितारी सारी सोरहू सिंगारवारी ललन सहेलि सोहँ सगरी सुवा- तुकी॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥५८॥श्रीकृष्णचन्द्र महराज के विवाहमें जो भीष्मक नगरकी नागरी सर्व गुणआगरी रूपउ- जागरी शोभाकी सागरी भरी सुहागभागरी नानाप्र- कारके श्रृंगार साजकर आईरही तिनकी पोशाकों के केवल रंग इस कवित्त में वर्णन हैं इसी से टीका नहीं किया ॥ इति ॥ सखिशृंगार वर्णन ॥ अथ रंगानुमानसंख्या ॥ १५ ॥ सवर्ग कवित्त ।। ५६॥ सेवती सफेद मुर्ख संदली सुन्हैरी सब्ज सर्बती सहावीसुही सुर्मई सुहानसो । सोजनी सिराजी सुलेमानी सोसहीसी स्याह सारी सुभकारी सीससाजी सखियानसों। सोलहूसिंगार सुकुमार सो सम्हार साज सोहत समाज सर्व सुन्दरी सुजानसो। सिरसों सरीर सबी सुन्दर सरूप सुभ्र ससिही समान सान ललन सवा- नसो॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥५६॥ इस कवित्तमें भी रंगीन वस्त्रों के नाम व सखियों की सूक्ष्म शोभा वर्णन है कोई क्लिष्ट शब्द न होने के कारण से टीका नहीं किया ॥ इति ६० ललनचन्द्रिका। विपलब्धानायका॥ हवर्ग कवित्त ॥ ६०॥ ३ १ १० ११ . हहरै हिवारी हहकारनी हुजूम हवा हेरी हे हितूनि हियहूलत ह- मार है। हमरे हितूहीरी हटायो हमसोहिं हेत होनहार हाँसी हाह- जारन हँसार है। हाल हमझोली हेलि मेली ललनौ हमेश हा. लि ही हवेली हेच होवती हिकार है । हिया हिलकावन हिलोरन हनावत हौं हेरति हरी हिरात हाथ ना हजार है ॥इति ॥ सखिप्रति सखिवचनम् ॥ २६ ३३ ३६ ३४ ३ ५ १० १५ २३ टीका ॥६॥ अरी सहेली (तुझने ) देखा (यह जो) अतिशय उत्पातका- (क) शीतकारी पवन के झरोखे झकोरै हैं सो मेरे हृदयको बड़ी पीड़ा होती है ।। (काहेसे ) प्यारी मेरे ( जो) सनेही है ( उन्हीने ) मुझसे प्रीति दूरकर रक्खी है ( सो मैं जानो हैं कि मेरी ) हसी होनेवाली है हँसनेवाले ( जगमें) व- हुश हैं हाय ॥ (वो मेरी) बराबरवाली (व मेरी) मिलने हिलनेवाली सनेहिनी (व) लघुवैसिनी भी (मुझे कृष्ण से रहित देख ) नित्यप्रति दुरागी ( और मेरा जो ) हृदय रूपी घर है (सो.) पित होरहा है बुरी बदनामी होती है।।(ऐसी) दुःखों की लहरों में ( मेरा मन वूड़ रहा है (कि) मैं कृष्णमहराज को खोज. ती फिरती हूं (अह) बो हजार (सहस्त्र) हाथ तक ( करतक) नहीं दिखाई पर हैं ।। इति ॥ ) ( ) કરે ललनचन्द्रिका। पक्षीनामानिवर्णन ॥अथ खगानुमानसंख्या ॥१४॥ हवर्ण सवैया।। ६१॥ हंस हँसै हिंसके हिंसकन् हबुआंय हमीर हजारनहीं। होरिल होर हवूहवकात हजारहु दास्तह हुदहुदहीं ॥ हस्नहुसेन हरेवनहुर्फ हरीहर हर्दिय हुक्करहीं। हेल हुकै हलुआंगिहरी हरएक ललन हरपेंहियहीं ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥६१ ॥ इस सवैयामें केवल पक्षियों के नाम व उनके बोलचालों का वर्णनहै कोई गूढ़ शब्द न होने से इसका टीका नहीं किया। इति ॥ खगनामवर्णन ॥ अथ पक्षीअनुमानसंख्या ॥ २६ ॥ गवर्ग व घवर्ग कवित्त ॥६२ ॥ गण गउगाई गोरखा गरिल गौरियान गिद्ध गिरगिटी गुना गुंजरी गहागरी । गुलई गुंदीला गारादल गुलबदनादिगाहे गिल गिल गिरदानियाँ गहवरी ॥ घाघर घुरीला घसियारी घमछई घामा घुग्घू घुनखावा घनई घरैलघोररी । घुड़हाघेतल घोसलीन घीK घीधनेहि घनश्याम ललन घोषे घरी घरी घरी॥ इति ॥ प्रसङ्ग॥६२॥ इस कवित्तमें भी केवल पक्षियों के नाम वर्णन हैं इसीसे इसका अर्थ नहीं कियागया॥इति देववाहनीय खगनामानि ॥ अथ विहंगानुमानसंख्या॥२०॥ चौवर्गा॥छ.ज.म.ट, कवित्त ॥ ६३॥ छांकर छजोहे छैल छपका छवीलेछज छांगुली छिकुई छिर्नखीनु छिन्नपंखीपर । जूथजमे जलासिंधु जुम्मस जलकुक्कुट जलमुरगा- बी जुगुनूई जुर्रा जल्लगर ॥ झीनेझींगुरी अँगारझामके मँगा झ- मक झीनीझीनी झालरें झकोस्ती मलाझलर । ट्विंयां टिकई ट- ललनचन्द्रिका। टीरि टिपरैलि टिटिहरि ललनहुँ टीपटापटेरै टुकहरीहर ।। इति ॥ प्रसङ्ग ॥६३ ॥ इस कवित्तमें भी केवल पक्षियोंके नाम वर्णन हैं कोई क्लिष्ट पद न होने से टीका नहीं हुआ॥ इति ॥ सुरसवारिकखगनामानि ॥ अथ विहंगनामानुमानसंख्या॥७॥ दिवर्गाठ.ड.कवित्त ॥ ६४ ॥ ठुमुकु ठुमकुठुमुकत ठये ठीक ठीक ठोंकर ठवत ठर ठहरठहरके। ठिकरई ठेगरीनु ठाठठठके ठछैन ठनक ठनक ठनकै ठुनकठर । ड- मरूली डूंमाडोंज हुँइपुंछीडोंगरीनु डोलें डोलडाल डटे डटाडट डर- के। डांगरे न डांगरे डिगें न डग डग डारे डोरीहि डाकोरजीसों ललन पियरकै ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥६४॥ इस कवित्त में देवगण ईश्वर का स्मरण करतेहुये जिन वाहनीय विहंगमोंपर सवार हो- कर हरिदर्शनार्थ आवते भये केवल तिन पक्षियों का नाम वर्णन है इससे टीका नहीं किया॥ इति ॥ देववाहनीय पशुपक्षीवर्णन ॥ पक्षी व पशु अनुमानसंख्या ॥१२॥ चौवर्गा थ. द. ध. न. कवित्त ॥ ६५ ॥ थिरिक थिरिक थुन्थुन थिरक ललन थिर्क थर थरर थोम शृथु- नंगथामियां । दिव्य दिव्य दिग्गज दुदंत दंतिया दराज देवदल दामिनते दुगुण दिपामियाँ ॥धूतीह धर्मकै धाप धापीहू धपाहें धर धोविन धमाके धाके धूमधाम धामियाँ । नीलकंठ नरकुली नील बांदरान नाक नकुत्रानिकुही नाग नौअन निनामियाँ इति।। प्रसङ्ग ॥६५॥ इस कवित्त में केवल सुरसवारियों ललनचन्द्रिका। के पशु पक्षियों का नाम वर्णनहै गढार्थिक शब्द न जा- नकर इसका टीका नहीं किया ॥ इति ॥ देवयानपक्षीनामानि ॥ अथवगानुमानसंख्या॥ २३ ॥ द्विवर्गा प. फ. कवित्त ॥६६॥ पीलूहू परेवापाखी पनडुब्बिया पतारी पिडुखी पतेरा पाढ़ा पे- पनु पयामहीं । पीलख पतैनाहुँ पतंग पिटुकी पिपीलपीन पुंज पूंगे पैन पंडुक पुगामहीं ॥ फूल घिहू फलेन फूलमुर्ग फुदकून फांदे फीलमुर्ग फाकता फरे फड़ामहीं । फुलालैन फुलवरी फरा- सीसि फर्द पट फलुई फबील फ ललनाभिरामहीं ॥ इति ॥ टीका ।। ६६॥ इस कवित्त में भी केवल देवतों की सवारी के पक्षियों का नाम वर्णन है इसी से इसकी भाषा नहीं हुई ।। इति.।। सखिशृंगार प्रभावर्णन ॥ अथ रंगानुमानसंख्या ॥८॥ बहुवर्गी कवित्त ॥ ६७॥ ४ ३ ६ २३ झिल्मिली झलक्की झीनी झांगुली झमाकेदार झामई झम- क झक्क झाड़दार भाउकी। टूली टापटी ठठूअ ठप्पेदार ठीकरीहु टसरी डोरई ढांकपाटनी ढराउकी ।। ललना. दुधील दूबी द्योलई दमंकवत दारमी दराज दाखियाहु दम्दमाउकी । धारे धूपछांहीं धोती धानियां धमारधर धीहें धीरवंत धूमधाम धक्यकाउकी॥इति।। प्रसङ्ग ॥६७॥इस इस प्रकार सखियाँ श्रीगोपा- ललाल के बिवाह में श्रृंगार साज श्रावती भई॥ सखिप्रति सखिवचनम् ॥ टीका॥६७॥ (कोईतो) बनीचुनी छबिदार सुन्दर महीन बसन की अँगुलिया १ ६४ ललनचन्द्रिका। १० ३१ ३४ (कोई ) साफ चमकदार बेलबूटे छपी झाऊ सरीखे रंगकी (सारी)पहिरे हुये। (कोई) टूलीरँगकी (ब) टापटी परकी ( ब ) ठटुआ छोहुये वस्त्र (व) गेरूमई (कोई ) सूती रेशमी टसरी (व) डोरिपा (व) ढाँकापाटन की सुडौल सीहुई।।( कोई ) सखी दूधिया रँगसी (कोई) घासके रँगसी (कोई) जर्द चिमित्कारी () गहिरी गुलेसप्तालू (कोई) अनार के सुमन से गहिरी । धीर्यवान स्त्री न नामकारके आभूषण संपन्नित रेशमी धूपछाही (व) तेज धनिआई रैंगसी सारियां पहिरेहुये सोहावती मई ॥ इति ॥ खगनामानिवर्णन ॥ अथ विहंगमानुमानसंख्या ॥ २१ ॥ दिवर्गील. र. कवित्त ॥ ६८ ॥ लावा लमदुमी लेल लाललाल लालसर लामल हटोरा लहि बुड़िया लसालसे । लग्घड़ ललाम लिजुकुल लालमुआ लख लीलकंठ लिटुक लखोरहू लखातसे ॥ रामचिरई खीना खरव रा- जरहिं रूरूरइदासी रामा राजते रसालसे राधावरी राधावर लल- न स्टनरहै राजाजी स्टा रामराम रसारामसे ।। इति ।। प्रसङ्ग ॥६८॥ इस कवित्त में केवल पक्षियों के ना- म वर्णन हैं इसीसे टीका नहीं किया ॥ इति ॥ सखिशृंगारवर्णन ॥ अथ रंगानुमानसंख्या ॥ १७॥ दिवर्गी न. प. कवित्त ॥ ६ ॥ नर्गिसी नवीनियां नखूनिहू नईनईहि नैनसुखी नैनूनीमई न याव नीलकी। नीलीहू नरिंजीनोखी नर्यली निराली नीप ललना नुकीली नीकी नेहे नज़रीलकी। पीयरी पलासी पापुलैनियां प- तंगी पुनि पोहकी पियाजी पाकपानकी पिपीलकी । पनई पुदीनि raiy ललनचन्द्रिका। की पिंडोरी पिस्तई पुनीत प्रीते पुःखराजी प्रियाँ पटका पुरी- लकी॥ इति ॥ सखिश्रृंगार ॥ अब रंगानुमानसंख्या ॥ १७ ॥ चौवर्गी फ.व. भ. म. कवित्त ॥ ७० ॥ फलालैनि फुल्बरीक फरासीसि फाकताई फालसाई फावती फवन फहरानसी।बैंजनी विशाल बूंदवार बादलाई बर बादली बदामिया वसतिह बखानसी ॥ भँवरीलि भाँगी भड़कीली भड़- कीली भल भोरी भोरी भली भली ललना भुलावसी।मूंगई मजी- ठी मुलतानिया मयूरपंखि मासिया मलीदी मखलूलिया महा- नसी॥ इति॥ सखिशृंगार ॥ अथ रंगानुमानसंख्या ॥ १५ ॥ चौवर्गी म. र. ल. ह. कवित्त ॥ ७१ ।। माठहू पिलामी मौठी मल्मली मरीनि मंजु मोमई मजील मा. निकीहु मोतिया महा । रोरिकी रँगेरे रंग रीति रीति राचे रुचि राखी राती रूपहरी राजती रहा रहा।लाल लंकलाटी लीला ल- सहि ललीत लख ललन लहाते लाखी लगरा लहिलहा । हरे हरताली हर्दि हिमिजी हजारहान हेमी हुरमतियाहु ही हमेल ही- रहा ॥ इति॥ सखिशृंगार।। अथरङ्गानुमान ॥ १६ ॥ दोहा॥ माठ पिलामी मलमली मंजु मरीनि मटेल । मोमी माजीमानकी महा मोतिया मेल ॥१॥ रोरि रुपहिली रोचकी राखी रङ्ग रंगेर।। ६ ललनचन्द्रिका। लाल लहरिया लीलई लाखी ललित लुंगेर।। २ ।। हरित हजारी हिरमिजी हरताली हरदेल । हेमी हुरमतिया हिये हीरन हार हमेल ॥३॥ इति ॥ कपोत जाति वर्णन॥ अथक० जात्यनुमान संख्या ॥ २९ ॥ दिवर्गी ख. ग. कवित्त ।। ७२ ॥ खाखी खूबसूर्त खिर्केबंद खुर्दनुखे खूब खैरिये खतंगे खिम्से खि- निये खरेसे हैं। खारिये खजूरी खोपरै खड़ील खाखसीन खंजनी खसीस खाजी खम्सई खुलेसेहैं ॥ गिराबाज गोले गुन्जागन्नई गुलाबी गण गेंदई गुटुर्र गूहँ यूँ यूँ गाजरेसे हैं । गंडेदार गुलेदार गुलेखार गंदुमीये गेहुयें ललन गूढ गुनन गरेसे हैं ॥ इति ॥ अथक० जात्यनुमान संख्या॥३०॥ कपोतजाति कवित्त ॥ ७३ ।। चीनी चप चित्तीदार चुहरे चमेलियेच चुन्नई चुटीले चंदान नौ ललन प्रिया । चम्पई चंदनिये चौंरीले चांदतारा चारु चितले छतीले जागजरचेहू जोगिया॥जंगली जलौनी ज़रदक्खहु जलं- धरीक झप्पेदार टाटीटारु टीकेदार टर्किया । ठाठिया ठियारे ठक् ठक् ठीकठीक डंडबाज डीलडौल डोंगे ढिठयारे ढवीटाखिया॥इति ॥ अथक० जात्यनुमान संख्या॥३४॥ कपोतजाति कवित्त ॥७४॥ तामड़े तिलक्खे ताखी तालमार तहेवंद तीरा तसी तेलिया तमोलिया तमीले हैं। तीतुरी तिलेचाताजी थिरोड़ान ललन जूदेल्हीवार दोंगिया दुवाजहू दमीले हैं ॥ दुम्मेदरखंब दुपहरिये धुरील धूमे नीरजी निसाउड़ी निलाम्बरीक नीले हैं। पम्बई पिल:

६७ ललनचन्द्रिक।। क्ख पुंज पेशौरीक पाय मोज फाकसी फतोईदार फूल पग पीले हैं। इति ॥ अथक० जात्यनुमान संख्या ॥ ३५ ॥ कपोतजाति कवित्त ॥ ७५ ।। विद्रुमी बदामी बहु बबरे बगूलईक भूरेभीरई ललनु मंजु मो- दते महासु । मूंगई मिथील मोठई मकोइ मोमियारु मोचेमानू मै- नाजाद मोतीचूर मैदुमासु ॥ मासल मटीले महामखियारे मासी मुख मोजेदार मंगसी ममोलेहू मुंगेरियासु । मोजेगर्क रामपुरी येलचिये हू हरेरे लल्सिरे ललांख लप लप लाखीलाल लम्दुमासु ॥ इति श्री पण्डित ललनपिया विरचित ललनचन्द्रिका पूर्वार्द्ध विभागसम्पूर्णम् शुभमस्तु ॥

'श्रीकृष्ण
(ITATUTEmaimmam
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HONOLOnmom ललनलहरी॥ अर्थात् ललनसागरके चौथेभागकाहिस्सादोयमकी भूमिका ॥ इस विभाग में अन्योक्तिक श्रेणी अमित भाव सुख सृजेणी तथा पक्षीविलास, व प्रसूनप्रकाश, बानाकिराना, व मसालादि अनुमाना, विटप वर्णना, व सागभाजी विवर्णना, व्याख्यानतरु फलानु, व रङ्गगणना विधान, पात्रणुशैली, व नकसिक गैली, तंडुलादि अनाजजाती वर्णन, व प्रकरण वस्त्रन, संख्या मिष्टान, व निमकीनसामान, पात्रसृजायक शस्त्रसूचनिका, व लोहपात्रस्य गणनिका, आभूषण प्रसंग, व रत्नादि तरंग, गोटा किनारी बाना, व भूमिका विसांतखाना इत्यादि अनेक रँगीले देंगीले, व छ- बीले फवीले, व चटकीले मटकीले, व रसीले सुखसरसीले भावों में अनूठे अनूठे कवित्त अनेकनायकालंकार सम्पन्नित मुद्रित हैं यह ललनचन्दिकाका उत्तरार्द्ध द्वितीयभाग है यथानामा तथा गु- णा यह ललनलहरी क्या है आनन्द की छहरी है रसोंमें गहरी है और भावों में जहरी है, अर्थोंकी नहरी और गूढ़तामें कहरी है, सोंगोंसे बहरी शुभ योगोंमें ठहरी है, भाआमरण पहरी और प्रभुपद सेवा की महरी है कि जिसको पढ़तेही मन लहराने ल- गता है प्रिय महाशयो लीजिये लीजिये इसकी लहरों में गोता लगाइये और अपने दुखरूपी तनमनका मैल धो बहाइये हरियश गुणगाइये मजेउड़ाइये कुछ बहुतमोल भी नहीं है मत सकुचाइये लोभको हटाइये मोल बिसाइये और इसे पढ़कर जो कुछ मुखउठा- इये सो मुझे लिखपठाइये ता कि मैं आपको कोटिशय धन्यवाद दै अपने आपको कृतार्थ समझू ज्यादा क्या लिखू ॥हरि ॐ तत्सत् ॥

अथ ललनचन्द्रिका का उत्तरार्द्धभाग ललनलहरीका मङ्गलाचरण ।। दोहा॥ अग्रणीय अग्रहि सुमिरि गौरी ललन गणेश॥ ब्रह्मा विष्णु महेश पद नमो शारदा शेश॥१॥ गुरु गोविंद दशरथ ललन सिय रुक्मिणीधनेश ॥ वेद विबुध कमला चरण वन्दहुँसंत सुरेश ॥२॥ ललनचन्द्रिकाजमकप्रिय द्वितिय विमामविशाल ॥ रचहुँ ललनलहरीललितं अन्योक्तिक पदमाल॥३॥ कृति नन्दन वन वाटिका कवित सुमनवर अङ्ग । अलंकार सौरभ ललन हाव भाव रस रङ्ग ॥४॥ पात पुनीत प्रसंग भल अर्थअनुप हरियालि ॥ शाखाशब्द सुहावने ललन मनोहर चालि॥५॥ भेद नायका रूपरस बहुप्रसंग शुभ ढंग ॥ ललन सुघरई सम्पनित मृदु मन मौज तरंग॥६॥ म २ ६ १० २० २३ ३४. ललनलहरी। अथवन्दनाश्रीगणेशजीकी॥ कवित्त ॥७६ ॥ वंदत प्रथम गणईश ईशपुत्र पद ऋद्धि सिद्धि नवौ निद्धि दासी नित जाके हैं । विष्णु औ विरचि शेश शंकर सुरेश देव अग्रणीय थापे सुख भौन वसुधाकेहैं ॥ चारिफल मनशाके दाता नंत वित्त वर ज्ञानगूढ़ वृद्धिबुद्धि रक्षक लज्जाके हैं। ललन उ- माके प्रभुताके सिन्ध बांके हम सेवक सदाके शम्भु लाडिले ल- लाके हैं। इति ॥ अथ सन्धि प्रकरणम् ॥ दाता+अग्रे+अनन्त-दातानन्तः ॥ अर्थदाता (देनेवाले ) अर्थ अनन्त (अत्यंति अपार) टीका ॥७६।। पहिले गणन के स्वामी श्री महादेवजी के ललन (जो गणेशजी महाराज हैं तिनके) चरणों को प्रणाम करतहूं (कैसे गणेशजी हैं) जिनकेपास आठो अणिमादिक ऋद्धि सिद्धि व नवो निद्धि सदैव चाकरीरहेहैं । (और ) विष्णुभ- गवान् व ब्रह्माजी व महिभारधारी शेषजी व महदेवजी व तेंतीसकोटि देवता व दे- वराज इन्द्र ने आनन्दरूपी धनके स्थल (जो गणेशजी हैं तिन्हें) आदिपूजनीयकर स्थापित कररक्खाहै ॥ (फेर गणेशजी कैसे हैं कि) अर्थ धर्म काम मोक्ष वाञ्छित फलोंरूपी श्रेष्ठ धन व विमलज्ञान व तीक्ष्ण सुमती के अत्यति देनेवाले ( और भक्तोंकी लज्जा जो पति इज्जत रखनेवाले हैं ।। पार्वतीजी के पुत्र प्रताप में अथा समुद्र ऐसे जो श्रीमहादेवजी के प्राणप्यारे कुंवर श्री गणेश जी महाराज हैं हम तिनके सनातन के दास हैं ।। इति ॥ १ २ ३ १० 87 ७२ ललनलहरी। ललनचंद्रिका द्वितीयविभागः ललनलहरीप्रारम्भः॥ ॥७७॥ मानवतीनायका मालिनी दूतिका प्रसंग पुष्पोंका॥ अथपुष्पानुमान ॥२४॥ जाही॥१॥ जुही ॥२॥वेला ॥३॥ केतकी॥ ४॥ नि- वारी॥५॥चंपा॥६॥ चांदिनी ॥७॥ विप्रगुक्रान्ता (व) कोइलिया॥८॥मालती॥६॥चमेली॥१०॥ सेवती॥११॥ इश्कचा॥१२॥ मयूरपंखीव मोरपंखी॥१३॥ मोतिया॥१४॥ दोनामरुआ॥१५॥ वसंती व जर्द चमेली ॥१६॥ गुलछब्बो व गुलशब्बो॥ १७॥ गुलाब ॥ १८॥ मोगरा ॥ १६॥ कदंब ॥ २०॥गुलेदावली॥२१॥गुलेहजारा॥२२॥पियावांसा॥२३॥ गुलेकचनार ॥२४॥ इति अन्योक्निककवित्त ॥ जाहीहू जुहीरी बेला केतकी निवारी वीर चंपतौ चांदनि विष्णु- क्रान्त छविछाईहै । रूपमाल ती च मेली सेवती हरीति वर तेरे इश्क- पेंचा में मयूरपंखि न्याई है ॥ भनत ललन मोतिया वसंत ही गु- लाव बौरी गुलछब्बो मारूआ ली निदुराई है। मो गरा परो कदंब दावदी हजाराबार पिया वास धाना कचनारिना भलाई है।।इति।। प्रसङ्ग॥७७॥ किसी एक समय चन्द्रावलि सखी कृष्णचन्द्र भगवानसे रूठि बैठी दिनभर होगया कि महाराजकी सेवामें न पहुँची सायंकाल के समय जोकि एक मालिनी सुमन आभूषण लेकर श्रीराधिकाजी के १ १८ २७ २९ ३७ ३९ ४०

ललनलहरी।
वास्ते आया करतीथी तिसकी मार्फत श्रीकृष्ण महारा.
ज उसे बुलवावते भये वो नारायण की आज्ञा ग्रहणकर
उसके पास जाय कर यह कहती हुई कि अरी प्यारीतू
ऐसी नादानी करती है कि बिना बातके वास्ते महाराज
से रूठ बैठतीहै चल तुझे महाराजने बुलायाहै परन्तु
क्रोधवश उसने उसके वचन का कुछ उत्तर नहीं दिया
तो दूतीने अपने मनमें ये अनुमान किया कि मालम
परैहै कि एकतो चन्द्रचांदनी छिटक रहीहै और दूसरे
गर्मी का मौसमहै अपने अपने भवन द्वारपर सबलोग
बैठेहुये हँस बोल रहेहोंगे उनके देखलेनेकी लज्जा से
यह नहीं चलतीहै और न कुछ उत्तर देतीहै परन्तु
उस समय घंटे सवाव घंटे में अँधियारी होजानेवाली
थी ऐसा विचार कर संसारी वार्ताओंको कर उतना
समय गुजारती भई जब अँधेरी रात होजाने परभी
कुछ उसने चलने का विचार नहीं किया तबतो वो
दूती चन्द्रावलि के प्रति फिर इस प्रकार कवित्त दि.
रचि वचन कहती भई कि॥
सखि प्रति मालिन दूतिका वचनम्
टीका ।। ७७ ॥ अरी प्यारी यहवार्ता भी ( तैंने ) देखी ( कि खरे. पाम
॥
आये हुये मुझे ) कितना समय व्यतीतहोगया कि चन्द्रउजियाली भी समाप्तहों
अँधेरा होगयाहै ।। ( परंतु फिर भी तू कुछ चलने का विचार नहीं करती )
और (हे) सखि सुन्दरि कृष्णमिलापिनि (यू) केवलश्याम सुन्दरहीसे ( प्रीति )
सेवन करनेवालीदै सो (तेरें) सनेहरूपी जालमें (उन) मोर मुकुटधारी गोपाल लाल
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ललनलहरी। का ( मन फँसरहाहै और इसमें जो कुछ मेरा कहना झूठ मानती होय सौ सू खुद ) इंसाफ़ करलेनेवाली है ॥ (इतना दूतीके कहने पर भी कुछ उसने उत्तर न दिया तो फेह वो इसप्रकार कहतीभई कि हे प्रिया सेरी प्रीति के बारे में तो जब कभी मुझसे महाराजसे बातचीत होती है तब वोतो तेरी बड़ी प्रशंसा किया करते हैं और ) नन्दललन (यह ) कहाकरतेहैं ( कि वो ) मेरी प्रिया स्त्रियों में शिरोमणि ( मेरे ) हृदयमें बसीरहतीहै ( सो अरी) नासमुझ रूपवती (तेने) भनी कठोरता धारण कररकरवीहै ।। (देख तेरी खुशामद करते करते) मेरा गला पड़गया ( और ) हजारों वक्त (तेरे) पैर छुये (परन्तु तू न मानी अब भी सोच समझले ) प्रीतम के निवासको चलु (औरजो) नहींचलैगी (तौ हे ) नादान इस्त्री (इसमें ) अच्छाई नहीं होयगी ।। इति ।। विपलब्धा नायका॥ चिरीमारिनिदूतिका ॥ पक्षीविलास अथखगानुमान संख्या ॥ २४ ॥ लवा ॥१॥ लाल ॥ २॥ तूती॥३॥ फाक्ता ॥ ४॥ कैवर ॥५॥ बटेर ॥६॥बाज॥७ झांक ॥ ८ कोकिला ॥६॥चं- डूल ॥१०॥ अगिन ॥११॥ बहिरी ॥ १२॥ समन ॥ १३ ॥ तीतुर ॥ १४ ॥ छौंना ॥ १५ ॥ मैंना ॥ १६ ॥ ममांख ॥ १७॥ तोता व सुवा ॥ १८॥ बया १६ ॥ काकातुआ ॥ २०॥ मराली व हंसनी॥२१॥ मोर॥२२॥भुजैली॥ २३॥ तिलोरी॥२४॥ अन्योक्तिक कवित्त ॥ ७८ ॥ लवालाई लालकाहिं तू ती भईफाकतासो कैबेर बटेर बाजआई न पाई मौन । झांके को किला गई चेंडूल अग्न रीति जाहि ५ ६ १० १७ १५ २१ ललनलहरी। २३ २६ ३३ ४१ बहिरीगई समन ती तुरी मिताई छौन ॥ मैंनाहीं ममांख समुहायगी ललनके न तो ते बया नेह का हरीसों रिपुताई बौन । काकातू म- राली मोर सुयशु भुजैली घोर अपनो ति लोरी हित विरचै बुराई कौन ॥ इति ॥ प्रसङ्ग ॥७८ ॥ एक चिरीमारिनि दूतिका जोकि श्रीकृष्ण महाराज के दरबारमें नित्यप्रति हाजिरी दि. या करतीथी उससे किसी एक सुन्दरी से स्नेह उत्पत्ति होनेसे रोज सत्संग होने लगा तो दूती प्रतिदिन सखि प्रति श्यामसुयश वर्णन करहरि अनुरागमें उसका मन रमण कराय देती भई तो एक समय उस सखीने दूतीसे कहा कि ऐसीभी कभी कृपाकर कि मेरे यहां भी महाराज को बुलाय लाउ ऐसेही जब कभी वो हरि चरित्र सुनाया करै तब तब वो महाराजके मिलने की अभिलाषा जता- या करै एक दिन कहीं दूतीने करारकर लिया कि आज मैं जाय महाराज को बुलाय तुझसे मिलायेदेतीहूं ऐसे कहकर वो तो महाराज के घरकोगई वहां बैठे२ उसे दो पहरव्यतीत होगये कि महाराजको एकान्तमें न पाउने से प्रार्थना करने का अवकाशन मिला और उस सखीने हरि श्रागमनकी खुशीकेमारे अपनाघर चोवाचन्दनसे लिपाय सुन्दर सेज सजाय सोरहु श्रृंगार बत्तीसौ आभू- पण सजकर बैठे बैठे हरिदर्शनाभिलाषामें दुइपहर बि- ताय देती भई महाराज के न आवने पर उस सखी के ललनलहरी। मनमें यह निश्चय होता भया कि वो दूती मेरी मुँहदेखी कहिकर चलीगई जो महाराज को बोलाय लावना होता तौ अब तक दश दफा आय जाती मैंने नाहकके वास्ते इतना परिश्रम किया अब इस शृंगाररस का भोगने वाला कौन है फिर मनै मन में सोचकर कहने लगी खैर न होय चलौ अपनी दूसरी सहेलीही से मिलिआऊं जो श्रृंगार करना तो सुफल होय घरमें ताला लगाय चलदेती भई अन जब उस दूतीने महाराज का ए. कान चित्त देख अवकाश पाया तब उस सखी की प्रीतिरूपी विकलता का हाल कहि सुनाया भगवान तो भक्तवत्सल हैं अपने वियोग में व्याकुल जान दूती को संग लेकर उस सखीके घरपर जोई आये तो क्या देखते हैं कि उसके घरमें ताला पड़ा है सखी का कुछ पता निशान न पायकर दूती प्रति रिसाय अपने घरको लौट चलते भये दूतीने कई एक दफे तीर पड़ोस में पुकाराभी उसे न पाउने से महाराज के पहुँचायने को गोकुलपुरी में आग श्रीहरि को पहुँचाय अपने घरको चलने लगी तो मार्ग में सोंची कि ये सखी तो बड़ी ओछी है इस से प्रीति करना अच्छा नहीं अगर वो अपने मकान पर आगई हो तो उसकी प्रीति को नम- स्कार कर देना चाहिये कि इतने में सायंकाल होजाने पर वो सखी अपनी सहेली के यहां से अपने घर आ- वती भई दूती उसका खुला दरवाजा देख उस के घर जाय उसकी नादानी बताय समस्त व्यवस्था सुनाय ३ ६ ६ १ ललनलहरीं। यों कहती भई कि तैंने जो मुझसे कहाथा कि कृष्ण महाराज को मेरे पास बुलाय लाइये सो मैंतो॥ सखि प्रति चिरीमारिनि दूतिका वचनम् ॥ टीका ।। ७८ ॥ लालजीमहाराज को बुलायलाई (और ) से सखि कहीं अंत चलीगई मैं कितनीवार बड़े जोर से पुकारकर थकगई (तुझे)मकानपर नहीं पाया(तब बड़ेजोर ) मैंश्रीगोपाललालको लौटार लेगई)॥अरी चांडालिनी तू किसकेघर मिलनेको चली गई थी आगीपरै इस वर्तावपर(वस अब तू श्यामके व मेरे)मनसे उत्तरगई सखी (तूने) नंदलालसे प्रीति तोरलई (तबमानी)। (ऐसा दूतीका वचनसुन सखिशंकित है विनयवत् समस्त हाल वर्णनकर यों कहतीभई कि) मैंने नहीं जाना (कि तू इतनी देरकरके महाराजको बुलाय लावैगी तो मैं कहीं ना जाती खैर अब मेरा अपराध क्षमाकर अब तू कल महाराजको बुलाय लइये इतनासुन दूती बोलती भई कि मैं अब न बुलाय लावोंगी क्योंकि एकदफे तो मैं महाराजसे झूठी पर चूकीहूं और अब) मेरी आंख नन्दलालके नहीं सामने होसक्तीहै तेरे संग( मैंने)मीति क्या करी (च- परे ) कृष्ण महाराजसे दुश्मनाई भईजातीथी । (और जो मैं तेरे साथ फेर ऐसा क तौ) हे मेरी गोरी क्याक्या तू (मुझे) बहुतसा इनाम वकसीस दैदेयगी -(हे) सखि ( ऐसी) प्रीति तो अपनी घरमें उठाय रक्खो (मैं दरगुजरी तुम्हारे पीछे नारायण से) विरोध विगार कौन पैदाकरै ।। इति !! विरह निवेदन भाव ॥ प्रोपितपतिकानायका॥ पंसारिनि दूतिका जिला किराने का ॥ अथमसालानुमानसंख्या॥३१॥ जून (व) निमकपांचौ ॥५॥राई॥६॥ स्याह मिरच॥७॥ ३१ ३३ ६० - ललनलहरी। सुर्व मिरच ॥८॥ सफेद जीरा ॥६॥कालाजीरा ॥१०॥आ- जमोद व अजमोद ।। ११ छोटी हड़ ॥ १२॥ बड़ी हड़ ॥१३॥ काकरासिंही॥१४॥ सोंठ घारकी॥१५॥ सोंठ बैतरा॥१६॥रस- वत (व)रसौत ॥१७॥छोटी पीपल ॥ १८ ॥वड़ी पीपल॥१६॥ कस्तूरी ॥ २०॥ बालछड़ ॥२१॥मुलहट्टी (व) मुरैठी ॥२२॥ तून ॥२३॥तज ॥२४॥ कत्था ॥२५॥ सुपियारी (व) सुपारी ॥२६॥ हालों ॥ २७॥ किसमिस ॥२८॥ धनियां ॥ २६ ॥ जाफल (व)जायफल ॥३०॥करपूर (व) कपूर॥३१॥ अन्योक्तिककवित्त ॥ ७॥ ११ ३ ६ १ १४ ३९ वारुंनोनराईमिर्चजीरा तो उदास किमि सखिआज मोदमोर हरिसौं हिरायगो । का करा सिंहिककुल सोंठिहुयबैठरहि रसवत् कहुजी पी पर वसआयगो ॥ ललन कस् तू री बाल मुलहठ्ठीतू न तज कत्थो सुपियारी हाल किस्मिस् छिपायगो । धनियां दुरौ न मोहिं जा फल चहेंगी ते सो करपूरदूंगी शोच सगरो नशायगो॥इति ॥ विरहिनी प्रति पंसारिनि दूतिका वचनम् ॥ प्रसङ्ग ७९ ॥ एक पंसारिन दृतिका और किसी एक परमसुंदरी से परस्पर परममित्रता थी रोज सत्संग रहा करताथा एकदिन पंसारिन दूतिका उसके घर आनि उसका मन उदास देखकर अपने मनमें शंका करती भई कि मालूम होताहै मेरी सुकुमारि सहेलीको ७६ ललनलहरी। किसीकी नजर होगई है उसकी नजर उतारने के वा- स्ते इरादा कर यूं पूंछती भई कि ॥ सखिप्रति पंसारिन दूतिका वचनम् ॥ १ है ५ ६ ९ १ टीका ।। ७६ ।। (हे) प्यारी इससमय तेरा मन क्यों मलीन है नारायण की कसम (तुझे उदास देखकर) मेरे(भीमनका) सुख जाता रहा ( तुझे किसी की नजर तो नहीं होगईहै ) नोनराई मिर्च उतारर्दू (वताउसो)। मर्दानेकुलकी (जाई यह ) कौनचरित्र रचकर चुपचाप रखामोश हुई बैठी है खुशीसे ( मुझे ) जतायदे ( तेरा किसी) पराये पिया से तो मन नहीं फँसगया है।।अरी तैं कैसी नादान स्त्री जो तें अपनी जिद्दको नहीं दूरकरती ( हे ) लाड़िली ( मुझसे ) कहिदे (ये) भेद कौनबहानेसे छिपसकैगा ।। सखि मुझसे मत छिपाउ जिस बातकी तू चाहना करती होयगी उसे (मैं)पूराकर देउँगी (और ये तेरा) दु:ख सब दूरहोजायगा। इति ॥ प्रौढ़ा परकिया नायका॥ मालिनिदूतिकाज़िलावृक्षों का॥ अथ विटपानुमान संख्या ॥२१॥ आम॥१॥ इमली॥२॥आमिला॥३॥शरीफा॥४॥सर- स (व)सिरस (क) सिरसा ॥ ५॥ बड़ (व) बरगद ॥६॥पा- कर (व) पकरिया ॥७॥सरों॥८॥ सफरी (व) अमरूद ।। है। बेरझरबेरी (व) बेल ॥१०॥ जामुन ॥ ११॥ अनार ।। १२॥ अनेक प्रकारिक नीबू यथा बिहारी॥१३॥कठा ।।१४॥ कशमीरी ॥ १५॥ कागदी॥ १६॥ खट्टा ॥ १७॥ गलगल ॥

ललनलहरी। १८॥बिजौरा ॥ १६ ॥ इत्यादि तोर (व) तिनस ॥२०॥ सैजन (व) सैंजना ॥ २१ ॥ इति । अन्योक्लिक ॥ कवित्त ॥८॥ १ ३ ur ११ ४१ जानेंनाहि आमजन इमि लीलानूप रचु तोर आमिलेते मन मोर दून द्वैगयो । चाल जो शरीफी सुख सरसै सजनि बड़ पाक- रके तोहि जी अँदेशन्यून द्वैगयो॥ सरो अवकाज मम साफरी बँधायनाथी बेरवेर कहूंथी ये का जिमून द्वैगयो । मो आनारिको मिलैगो नन्दको ललन किम हौलदिल मुहि विहारी विदून है गयो ॥ इति ॥ (मालिनि दृतिका प्रति सखि वचनम् ) प्रसंग ॥८०॥ एक सखी नारायण की परमदर्शना. भिलाषिन उस मालिनदूती से जो कि श्रीकृष्णजी से मि. लनेके वास्ते प्रतिदिन कहा करती थी उससे यह क- हतीभई कि॥ टीका ।। ८०॥(अरी बीर कोई ) ऐसा सुन्दरउपाय करु (कि जिसमें)कोई आदमी जाननपावै तेरे आनमिलनेसे मेरे जीको हिम्मत बँधगई ।।(क्योंकि ) हे सखि भलमंसीही के चलन में अत्यंत आनन्द उपजैहै तुझे मिलकरके ( मेरे ) मनका खटका जातारहा यानी थोड़ा होगया ।। (बस मैंने जानलिया कि मेरा) अबकाम सिदहोजायगा मेरेतो कुछ बनाये नहीं बनता था वारंवार कहा करती थी ( कि.) यह क्या खराबी पैदा होगई है ।। ( काहेस कि ) मुझसरीखी कुबु- १ ३ ६ - ललनलहरी। ३६ द्धिनीको नंदलाल काहेको मिलेंगे मेरे तो मन में गोपाललाल विना हौला समाय गयाथा ( यानी मैं उनके बगैर सिड़नसी होरहीथी)।।इति ।। प्रोषितपतिका नायका॥ पनसारिन दूतिका प्रसंग किराने का ॥ अथ किरानानुमान संख्या ॥ २६ ॥ जावित्री॥१॥कामराज॥२॥सज्जी॥३॥सनाय॥४॥ अगर ॥ ५॥ तगर ॥ ६॥ त्रिफला याने हड़बड़ी॥७॥ बहेरा। ८॥ आमला। हड़छोटी॥१०॥सरफोंका॥ ११॥ लोहवा- न (व) लोबान ॥ १२ ॥ तेजपात ॥ १३ ॥ मैंनसिल ॥१४॥ करपूर (व) कपूर ॥ १५॥ छोटेबड़े गोखुरू ॥ १६॥ सोंफ ॥ १७॥नोंनपांचौ यथा सेंधा॥१८॥ काला ॥१६॥ साम्हर ।। २०॥छाटा (व) खारी॥ २१॥ विड़नाना॥२२॥ जीरास्याह ॥ २३ ॥ जीरा सफेद ॥ २४ ॥ जरिश्क ॥ २५ ॥ आजमाइन (व) अजमाइन ॥ २६ ॥ मैंनफल ॥ २७॥ अजमोद ॥ २८ ॥ तोतिया (व) तृतिया॥२६॥ इति ॥ अन्योक्निक कवित्त ॥८१॥ ३ २ 10. १७ १२ १३ १८ जावित्रीरी कामराज सज्जी है सेना अगर त्रिफलादि सर फोंका दार लैहदाय के। लोहबानते तगर तेजपाते मैनशिल उर करपूर देंगे गोखरू से जाय कै ॥ सोफियानी नून भई जीरा जरि इश्क के माहिं आजमाइन री हाय मैनफल तायकै।आजमोद हो तोतिया पास जो ललनपियाकारो निमकैहराम करतोका आयकै ॥ इति ।। ३५ ४६ ललनलहरी। प्रसंग॥ ८५ ॥ एकविरहिनी जोकि अपने पति वियोगमें अत्यन्त खेदित यौवन उमंगसे भर रहीथी ति- सको कामोद्दीपन करनेवाली जो वर्षाऋतु उन्द बलाह- कोले पूरित उस समय उस रूपवती नवयौवना को देख कर उसकी मित्र मालिन दूती ने अपने मनमें यह वि. चार किया कि कहीं इस सुकुमारि पर किसी रसिक जनकी दृष्टि न पड़जाय तो फिर ये हाथ से बेहाथ हो जायगी इसी कारण उसकी सहायक बनकर उससे ये कहिती भई प्यारी देखु इल समय जो घनघुमंडनि सुखमंडनि छवि नभमंडल छाई है और इसी दल बादल के साथ ॥ सखिपति पंसारिन दूतिकावचनम् ॥ १ ३ टीका ।। ८१॥ जो काम देवने (अपनी ) सैना (एसी) सजाई है (कि) तीन २ ६ फलके (पैनी)धारवाले बाण ग्रहण किये है अरी अबला (तू इस वक्त यहांसे) सालीजा ॥ मदनके बाण लोहे के बारणों से भी अत्यंत पैने हैं ( वो तेरे ) हृदयको गजके खरों के समान ( दागों से चिह्नित कर ) पूर्ण बिदीर्ण करदेयँगे ।। (पेसा २१ सुनकर बो) नाजुक बदनी (जिसका कि) चाहरूपी (विथा) में जी जलाहुआ (दुखित हुई अपने मनै मनमें ) छोटी व थोरी होजाती भई ठंढी श्वांसें भरकर (क- हिती भई कि) अरीवीर मन्मथने ( अपने ) बाणोंको पैनाय कर ( मुझ जली हुई को मानकर फेर ) जलाया (तथा आजमाया क्या करूं अफसोस है)। प्यारी इस समयतो तब सुख प्राप्तहोता जो कहीं ( मेरा) प्यारापिया ( मेरे )ती.

ललनलहरी। ८३ रहोता (तौफिर यह ) कालेमुहका दगाबाज ( मनोज ) यहां प्रानकर ( मेरा) क्या बनायलेता ॥ इति ।। ॥ शीक्षाभाव।। ॥ मध्या धीरानायका॥ ॥ कबडिनि दूतिका प्रसंग सागतरकारीका ॥ अथसागानुमानसंख्या ॥ २५ ॥ बैंगन ॥१॥तोर (द) तोई॥२॥आंवला (ब) और ॥३॥आसकी फलियां ॥ ४॥ सलगम ॥ ५॥ भिंड ॥६॥ भिंडी॥७॥बंधागोभी॥८॥आलू॥६॥ परबर ॥ १०॥ करे- ला (व) करेल ॥११॥ अरवी (ब)घुइँयां ॥१२॥ सागपालका। १३॥कचनारकीकली ॥ १४ ॥ लौकी ॥ १५॥ वाहुबाहु की बियां ॥१६॥ करमकल्ला ॥ १७॥ सोयाका साग॥१८॥ लह- सुन ॥ १६॥ पियाज ॥२०॥ मूलकंद यथा सकरकंद ॥२१॥ जिमीकंद ॥ २२ ॥ संत ॥ २३॥ मोरी (क) मूली॥२४॥ साग- चका ॥२५॥ । अन्योटिक कविच ८२॥ वैगन रहे हैं दिन तोर आमिले की आस सलगमहीय भिन्ड बन्ध गये आलरी । पर बर लेख ही करेल उनको री ते तो अरबी मिली पै वो पालक कचनालरी ॥ लौकी कहु बाहुबाहु ललन लागी सराहु कर्म कला सोया नीक लहि सुनी वालरी अवतो पि आज मिलु मूलि बात भोरी सुनु चूका जो समय न हाथा तिहुँकालरी।। इति ॥ ३ ६ ૨ ६ २ १५ १८ १९ २० २१ २२ । ललनलहरी। प्रसंग ॥८२॥ एक समय ललिता सखी श्रीकृष्ण महराज से मानकर बैठती भई उसको मनावने के वास्ते कबड़िन दूती आन कर यह कहती भई कि ॥ ॥ सखि प्रति कबड़िन दूतिका वचनम् ॥ १ टीका ।। ८२ ॥ अरी प्यारी गोपाललाल जी महाराज तेरे आनमिलन की आशाके दिवस शुमार कर रहे हैं (और ये हाल हो रहाहै कि जिनके ) हृदयमें बाल बांधे दुखोंके वृन्द विधगये हैं। परंतु देख ( इतनी खैरियत व) कुशल (है कि) कृष्ण महाराजका हृदय कड़ाहै तू ऐसी अजूबा स्त्री ( उनके ) पालेपड़ी है तिसपरभी वह (तुझसरीखी ) नादानसे निवाह करने वाले हैं।। (मैंतेरी कुछ भी बड़ाई नहीं करतीहों वो जो तुझसे) नन्दलाल की लगन लगगई है (उ. सकी ) भलाई वा बड़ाई करु (और तेरी) करनी का फल बह अच्छाहै (याने तू नशीब वरहै ) अरी प्रिया ( तैंने मेरी वात ) देखी सुनी ॥(खैर जो कुछ भया सो भया) अबतो (तू) इस समय पिया से ( चलकरके ) भेटकरु मेरे मुख्य वचनपर ध्यानदे (क्योंकि) गया वक्त (किर) तीनोंकाल नहीं मि नस काहै।।इति।। ॥ विश्रब्ध नवोढ़ा नायका॥ ॥ काछिन तिका॥ ॥ प्रसंग ऋतुफलानि ॥ ॥ अथ फल अनुमान संख्या ॥२०॥ मकुइँयां ॥१॥फालसे॥२॥सरफारेवड़ी॥३॥खिरनी (व) खिन्नी॥४॥करौंदरा (ब) करौंदा॥५॥अंगूर॥६॥ वदी (व) बेरझरबेरी॥७॥जामुन (व)जमुनी॥८॥नींबू ॥६॥अम्बु (व) ४६ ललनलहरी । आम ॥१०॥अमरूद ॥११॥मीठा (व) मिट्ठा॥१२॥ बिही। १३॥सेव॥१४॥नास्पाती॥१५॥नारंगी (व) नरंगी॥१६॥ अनार॥१७॥वेल ॥१८॥खरबूजा ॥१६॥ चकोतरा॥२०॥ ॥ अन्योक्लिक कवित्त ॥८३॥ नाहीं तो मकैयां फालसे न सफोरेउड़ी न खिरनी करौंदा ना अंगूर गदराने हैं । बेरवदीहू नाहिं जामुनी न नींबू नाहिं अम्बु अमरूद नाहिं मीठा मनमाने हैं। विही सेव नासपाति निपट न- रंगी नाहिं नोखी ना अनार है न वेल गुठलाने हैं। खर्बुजा सृजाने हैं चकोतरा न ध्याने अलि ललन पनै में स्थान रतिक दृढ़ाने हैं। इति ॥ नवोढ़ाप्रतिकाछिनिदूतिकावचनम् ॥ प्रसंगार्थ ८३॥ कोई एक लघु अवस्था वाली सखी जोकि रतिभाविक चिह्नों से रहित उसकी अत्यन्त चा- लांकीकी चतुरई देखकर एक काछिनि दूतिका जोके निम्नलिखित इसकवित्तमें फलोंके नाम, तिनकी अंतसे आदि के फलकी समता देकर उससे इस प्रकार प्रष्ण करती भई॥कि हे सखि इन समताओं मेंसे एक चिह्न भी तेरे शरीर पर भाषित नहीं होते हैं परंतु तुझे ल- ड़कपनमेंही रति संबंधी चतुरई याद होगई है सो तुझे कौन चतुरके सतसंगसे ये गुण प्राप्त हुआहै। इति । ॥ अज्ञात यौवना नायका॥ ॥ मुगलानी दूतिका प्रसंग मेवाका ।। ॥ अथ मेवानुमान संख्या ॥१३॥ अकरोट ॥१॥किसमिश॥२॥ गफली (व) मूंगफली ६६ ललनलहरी। ॥ पिस्ता॥४॥वादाम॥५॥छुआरा॥६॥चिलगोजा॥७॥ मीठा (ब)दार्मी अनार॥८॥अंजीर॥६॥ गरी (व) गोला॥ १०॥ आवजोश ॥ ११ ॥ अंगूर ॥ १२॥ लीची ॥१३॥ ॥ अन्योक्लिक कवित्त ॥८४॥ ६ १५ १९ १८ २९ ४६ अकरोटै किसमिसि इद मूक फली वाल पिस्ताँ ठां बदाम भइँ छुआरा सी शालेरी। चिलगोजौं ? अनारि मायके जननि तातु होय अनजीरा रहें फेरनासम्हालेरी ॥ गोरी गरियात हाय पीर तो सहीनजाय आव जोश हानी कहा फोड़ा अंगुराले री। ल- लनि निकाम मोरि लीबीभई बात गोरि कै कछु यतन वीर वैद्य धौं दिखाले री ।। इति ॥ प्रसंग ॥ ८४ किसी एक केलिरस भाव भेदके न जानने वाली सुन्दरी को अपने उरोज आदरसहो प्रा- उने पर इस्तन इस्थलके खेदकी ब्यथासे पीड़ितहो एक अपनी परम सनेहिन मुगलानी दूतिकाके पास आनकर एकांतमें उससे ये पूछती भई कि । मुगलानीदूतिकाप्रतिसखिवचनम्॥ टीका ॥८॥ हे सखि (कुछ मुझे समझ नहीं पड़ता कि मेरा) उरस्थल साल कौन कारण से दुखताहै (मैं) मौन गहे ( बैठी सकाय सी गईहूं मेरी ) छातियोंकी जगह (बदअर्थ सूजना खराबी आम अर्थ सब विलकुन वद अग्रे श्राम तिस्का हुआ बदाम अर्थ ) सबसूज गई हैं छुइजाने पर (हृदय पर) आरा सा चल १ ३ ५ ६ ११ १२ ललनलहरी। २४ २६ રે રે ४१ ४६ जाय है पारा एक लोहे का शस्त्र है जिस्से काष्ठादिक चीरा जाता है। री- वीर (जो मैं ) नादान बनकर रुदन करूं (तो मैं ) नैहर ( में अपने बाबुल की परम लाड़िली हूं जो कहीं मेरी व्यथा को जान पावै तौ मेरे) माता पिता घब- राय जावें फिर किसी के समझाये नहीं समझै ।। श्ररी सखि (मैं) ठंढी श्वासैं भरा करती हूं दईरेदई ( अब मुझसे ) दुःख नहींसहन कियाजाता है ( मेरी मुख की ) शोभा (तनुकी ) उमंग घटगई है क्या जाने ( मेरे दो ) फुड़ियां निकल आई हैं ।। अरी प्यारी सखी वृथाकेवास्ते मेरी बदनामी हुई जाती है (तू) सखि कोई उपाय बताउ या ( कोई ) हकीम को दिखवाय दे ॥ (कि जिस में मेरा दुख दूरि होजाय ) इति ।। ॥शंकाभाव ॥ परकिया नायका॥ ॥ रंगरेजिन दूतिका प्रसंग रंगोंका।। ॥ अथ रंगानुमान संख्या ॥ १८ ॥ सेवती ॥ १ ॥ गुलाबी ॥ २॥ और गुलाबी शब्दों से गुल अ- लग करदेने से निकला आवी॥३॥अरुण यानी गहिरागुलाबी ४॥शर्वती ॥ ५ ॥ बांसी।। ६॥सेत (क) सफेद ॥७॥ लाल (ब) सुर्ख ॥ ८॥ सुन्हैला ॥६॥ अवोरी ॥ १०॥ स्याम (क) काला॥ ११॥ पियरो (क)पीला॥ १२॥ पड़ोरी (व) पिंडोली १३॥ गेहुंआं॥१४॥ किशमिसी ॥१५॥ सोसनी॥ १६॥क सीसी॥१७॥ सुलेमानी॥१८॥ अन्योक्लिक कवित्त ।। ८५॥ ६ सेवती गुलाबी हरी अम्बुज अरुण पाद शर्वती वचनवारि grappeares ललनलहरी। १० ११ १ ४३ ४६ बंशुरी बजैयाको । सेतमेत लाल सुन हेरी ए आवीरि बर मदन जगावै श्याम बर्ज यदुरैयाको ॥ पियरो पड़ोरी गात गेंहुआं होरंग मोर किस्मिसी मिलौंगी नंदललनै कन्हैयाको ॥ दुखसों सनीक शीश आफत चढ़ी है मोर सांचु मुले मानी मोहिं डरहै घरैयाको ॥ इति ॥ ॥ रंगरेजिनि दूतिका मति सखिवचनम् ।। १ ३ ६ . २१ टीका ॥८॥ येरी सुन्दर सखी आउ ( मेरी विथाको ) समुशकर देख( मेरा जो)गुल अग्रे आवी इन दो शब्दों का एक शब्द बना ।। गुलाबी ।। गुल अर्थ फूल यहां फूल की कोमलता लीगई और गुल शब्द को उरदू में माशूक तथा यार के वास्ते बांधते हैं तो गुल शब्द का अर्थ हुआ फूल से कोमन शरीरवाला मित्र और आबी+अर्थ श्यामवर्ण क्योंकि अावी रंगभी कुछ श्यामताई लियेहुये होता है तो अब दो शब्दों से बनाया जो एक शब्द गुलाबी तिसका अर्थ हुआ श्यामवर्ण वाले मित्र श्रीकृष्ण शर्बत सरीखे मीठे शब्दोंवाली वंशी के बजानेवाले (तिनके मैं ) लाल कमल सरीखे चरणों को सेवन किया.करती हूं ( सो उन के वियोग में ) मेरा (जो) गेहूंकी रंगत सरीखा शरीर था ( वो) पीला पड़गया है ( अब उस पर बांसुरी बजाय सुनाय कर ) मनमोहन वृथा के वास्ते ( मेरे तन में ) काम उद्दीपन किया करै है ( इस से हे प्यारी तू ) गोपाल लाल यदुवंशमणि को मना करदे (कि यहां पर मुरली ना बजाया करें वैसेही मेरे तो) शिर पर खेद से भरी हुई विथा सवार है मेरा (वचन ) सत्य ही जानना (क्योंकि अपने ) घरवालों २२ ३२ ललनलहरी। opana का मुझे (ऐसा खौफ ) तथा भय है (कि ) कौन बहाने से नन्दनन्दन श्रीकृष्ण महाराज से भेदूंगी (तू कोई ऐसी यतन कर कि जिस में मुझे श्याम सुन्दर मदन- लाल का दर्शन होजाय ।। इति ।। ॥ उद्दीपन विभाव।। ॥ अनुसयना नायका॥ ॥कसेरिन दूतिका प्रसंग वरतनों का ॥ ॥ अथ पात्रानुमान संख्या ॥ १४ ॥ कलछी॥१॥ लोटा ॥२॥चिमटा ॥३॥ बटुआ॥ ४॥. घंटा॥५॥ घड़ियाल ॥६॥ कड़ाही॥७॥ पतीली॥८॥क. टोरी (व) कटोरा॥६॥पान्दान ॥१०॥शमेदान ॥११॥ परात ॥१२॥थाली॥१३॥ आचमनी॥१४॥ ॥ अन्योक्तिक कवित्त ॥८६॥ कल छीकही मिलन आजै मन लोटा काह चिमटायआई हरि बटुवा प्रसाद री ॥ घंटाघरियाल करे शुम ना कड़ाही कर पतीलीकरत बात नेकही प्रमाद री॥काटोरीकपट जिन पानदान पायो तिन समै दान मोद हेत देत लेत शादरी। आजको पै- रात घनि थाली सुख आचमनि नंदकोललन मेलो मेटिकै बि- खादरी ॥ इति ॥ प्रसंग॥८६॥ कोई एक कशेरिन दूतिका एक प.. रम सुंदरीकी शोभाको देख मोहितहो यह विचार करती भई कि इस सुशीलाका महराजसे दरश परश होयतो ५ ७ ६ १२ १ २२ १७ २३ २६

ललनलहरी।
वो बड़ाही गोदान इससे प्रीति प्रचार अन्टन रूपी
हरि चरित्रों का रस चाय उसका मन अपने हाथ में
लेकर सोचली गई कि सब इससे अनुसभीय चलने के
वास्ले पाहमा दाहिया उभार लीर पड़ोस वाली स्त्रियोंने
उस प्रचिले स्तुकुमारी का अत्यन्त सतसंग देखकर
उसके भवनों जाकर उसले कहती भईलिहेनिया
तू इस प्रचिन के को न पड़ने पहनो देश वाखानी
कलंकही निशानी हे वादाराला तुरूचिताय देनी
हैं उनका वचन सुन उल नुकतावा मिलबा प्रेमप्री-
लि उस पर था सब जाता रहा जब उनकी संपतित्या.
ग करने में चिन्तित क्षेती गई देशमोगले उमदूती ने
दूसरेही दिन कहीं सुकुमारिकारने पहिदिया कि चल
सखी आज तुझे श्रीकृष्ण महाराज की भेंट काय लार्ड
तो उस्ल सुकुमार ने वही अबकाश उचित जानकर उस
को फटकारा बतलाया कि वारदार व ऐमा मुंह से
वचनमत निकालना मेंश्या चिली परपुरुषसे मिलनेवा.
लियों मेंहूं मेरे यहां भय कमी न्द भाउमा वह अपना
सा मुख ले कर महान शोक में भरकार उहि चलती भई
रात्रिभर उस इस सोचमेकित समय कृपए महराज
के पास चलकर उसके प्रसा होने का कोई उपाय
गी ऐसेही सारी हाल बीत जाती भई इधर इस हरि
दरशनाभिलाषी सुकुमारिकाने विचारा कि यह मौका
महराजसे मिलने का बड़ाही अच्छाहै क्योंकि आज तो
मैंने उसे ललकारही दियाहै अगर भली मानस होगी
aime

ललनलहरी। तवतो मेरे घरही न आयेगी और जो अवगी भी तो अब जल्दी उसका कोई बात कहनेका मुझसे मुंह न ए- ड़ेगा अतएव सघाशृंगार साज सायंकालहीको श्याम सुन्दर के सदन में पहुंचती गई तो कृष्ण पन्द्र महराज उसदूतीके मुखले प्रशंसा सुनीहुई सखीको जान आदर देतेभये रौनिगार युगुलाकात में निवास कर प्रातःकाल ताओंकी छांह छादित सामों लोकलाज डर के मारे वह सुकुमारिका महराज से घरजाने की आज्ञा मांगती भई कि हेभगवन जैसे कि मैं अपने घरसे छिपकर आई हूं वैसेही मुझे अँधेरोहि अँधेरे घर पहुंच जाना चाहिये तौ महराजकी भाच्यानुसार मंदिर को लिधारती भई उ. धर देव योगसे वह दूतीभी निज भवन से चली हरि समीप जातीथी भारगमें दोनों का भंटा होताभया दूती उसकी चतुताई व स्मानयन को देख चिकितहो अंगुरी दमन दवाय उसके गुन्गुन माययों कहती भई कि। । समिति के मेशिन सानिया बननम् ।। ३ टीका६॥श्रदीप्यारी काल (तुझने श्रीकृष्ण महारामते) मिनाने के वास्ते शिलानधारमाही (और मेरे ) बनेभाउनेहीपर क्या तेरा)नी लोटपोट हो- चने . गया कृष्णामहाराजको मिलाई (बाज तो कुछ )मिठाई बटवावनी चाहिये ।। हे सारेख (लू घड़ी बुद्धिवान् है देश्य जौन ) थोड़ेही घमण्ड में हुदय को पुष्ट करके (अपनी फजिहत कराय लेते और ) मुनादी पिटवाय देते हैं (सो) अच्छा नहीं करने ( उन की ) पद्धति घटनाती है ।। हे सखि ( और जौन तुझ सहरीली चार १ १८ २५ १२ ललनलहरी। ४ . हैं ) जिन्हकामन साफ है उन्हींको ( तुम शरीखा ) सनमान मिलता है ( क्योंकि जो कोई किसी को) आनन्दरूपी रसको देता है पुण्यके समतुल्य है (उस को प्राप्त करते ही मन ) मोद को ग्रहण करता है ।। (बस मैं तुझ से और ज्यादा क्या कहूं यही वारंवार कहती हूं ) अरीवीर परन्तु आज के दिन की रात्रि परम सुखदाई रही ( कि तैंने अपने मन की ) दुविधा दूरकर नारायण से मिलकर आनन्द की थाह ली ( और अमित सुख ) ग्रहण किया ॥ ऐसेवचनों को सुनाय दूती उस सखी से अपना मेल कर लेती भई ।। इति।। ॥ उपदेश। ॥ युक्ता उत्कंठा नायका॥ किसानिन दूतिका प्रसंग तंडुलजातियों का ।। ॥ अथ तंडुलजातिकानुमान संख्या ।।८।। चाउर (व) चावल ॥ यथा ॥ अंजना॥१॥ स्यामजीरा॥२॥ गोरिया ॥३॥ केतकी ॥ ४॥ रहिमुनियां ॥ ५ ॥ हंसराज ॥६॥ बांसमती॥७॥साठी ॥८॥ इत्यादिक ।। ॥अन्योक्लिक कवित्त ॥८७॥ धारे चाउ रहु वीर अंजनादि साजकर श्याम जीरा मोहिबेको वानकै बनाउरी॥गोरिया यह बात में केतकीहु बार कही रहि मनु वाँ न तोर कस तो स्वभाउरी॥जीवन को सुख बोल हंस राज मन को जो मीते ते कहब वास मती अनखाउ री॥साठी बाँकी प्रीति जोहै नन्दकेललन सन धीर राखु मिलि हैं री जो तो सत भाउ री।। इति ॥ २ ३ १२ १२३ २५ २६ २६ १३ २९ ३१ ४१ .

१
२
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६
१०
ललनबहरी।
६३
प्रसंग ८७॥कोई एक परम सुंदरी श्याम सुन्दरके
वियोगमें भरी शृंगारको त्याग कियेहुये अपने गृह में
मलीन मन करे बैठी थी कि उतनेमें एक उसकी परम
मित्र किसानिन दूतिका आनकर उसका हाल बेहाल
देख यह उपदेश दे कहती भई कि अरी प्यारी इन बा-
तोंमें क्या रक्खाहै कि जो तूने अपना शृंगार करनाभी
छोड़ दियाहै क्या इस कृत्यसे भगवान् प्रसन्न होयँगे
नहिं २ ऐसानहीं करना चाहिये देखु॥
सखिपति किसानिन तिका वचनम् ।।
टीका।। ८७ ॥ श्ररी सखि(अपनेमनमें) काजर आदिविविध शृंगारों के सामने
का)उत्साह ग्रहण कियेरहु कृष्णमहाराजका मन बशीभूतकरनेको उपायतो करू।
हे सखि मैंने अनेकोंही दफे येही शीक्षा करी (परन्तु) तेरे चित्तमें ( मेरीसिखा.
वनकुल ) नहीं दृढ़ानी ( यह ) तेरी कैसी भादसहै। भरी वीर ( इस )भिन्दगी
का मानन्द सिना बोलनाही है ( भौर अपने ) जी का जोकि भेद है ( सो अपने )
मित्रही से कहा जाता है ( मुझसे ) छिपाउनेपर आमादा यानी आरूढ न हो।
अरी प्यारी जाके (तुझने) नन्दनन्दन से सुन्दर प्रेम कियाहै ( नौ सावधानरहु
यानी ) हिम्मत बांधु जोके तेरी सच्ची लगन है ( तो निश्चय रखु तुझे जकरही
महराज ) मिलनायँगे ।। इति ।
॥ उपदेश।
॥धीरानायका॥
॥ किसानिन इतिका प्रसंग अनाज नामानि वर्णन ॥
॥अथ नाजानुमान संख्या १२॥
मक्का व मकाई जन्हरी २ वाजरा३ धान तिल५ गेंहू

cud ललनलहरी। जउ७ अरहर ८ चांवल ६ उरद १० सामा ११ गसूर १२ ॥अन्योक्ति सिंहावलोकन कवित्त । म || ३ १२ १४ । १ छोरिये मकार नाप्रपंचतादि जून दरी या जरा कुत्य धान्य तिलहू नजोरिये ॥जोरिय सनेह उणेहु जउवह है सुख आरि हरि रोप हनुमदनु वटोरिये ।। टेरिये हरी चाउलि ललनै मिलाप को उर दर्शनामिलाप ले ना मुल मोरिय ॥ गोरिमन सामागर जीदै चिन चोरिये री चोरियजभूर आंट गाव न छोहिये । प्रसंग।।८८ ॥ एक लभव विशावानुनी श्रीकृष्णा महराजरो रुष्टित होय मात्र मनाय बैठी तिरको एक किसांनिन दूतिका जायकारको उपदेश देती भई कि ! ससिप्रति किमानिन दक्षिका वचनम् ।। ६ ८ है १६ ॥ टीका ।। ८८ ॥ ( अनि जलो त कुछ ) नादान है न की किन है जोक बेढंगापनको नहीं छोड़ती ऐसे खोटे धन के ( चाल चलन को महान तिलभर यानी जानी नहीं जानाकारना चाहिये। (औरको कुल जमा इक- ट्ठीही किया चाहती होइ या ) कुछ जानन्द भोगने की इजा है ( तो अपने ) हृदयकली घर में प्रीतिको इकार (और) मा म राजा वैरी (यानी उनके अनुचित जो के ) गुरुता ( है निको ) दूरकार के सामुखों को ग्रहणकरिये ॥ ( अथरा ) दे सखि माने) प्यारे के मिलने के वास्ते ( जो ) मीति रूपी लग्न है ( तिम्को) धारण करू ( क्योंकि ) मनमें हरिदर्शनों चाह रखकर मह नहीं फेरना चाहिये ( याने रुची वा लालसा ना हटानी चा.

ललनलहरी। हिये)।( सब अनाजों में सांबा नामक अनाज का दाना बहुतही छोटा होता है सो दूनी कहनी भई कि) साली सांमा भरगी याने थोड़ा भी ( मनको)म- तीहटाउना चित्तलगायकर ( उनका ) मन अपने हाथमे ले ले ( और तेरे जो मन में बसाहुग ) मुख्य विचावट की मैलहै (उस्तो) निकालडाल ( परन्तु तेरेजो सनेही ) श्री कृष्णचन्द्र भगवान है ( उनको कभी ) नहीं त्याग करना चाहिये ।। इति ॥ ॥ चित्र दर्शन ॥प्रेमवती नायका॥ समता सक्षेतिक उदाहसलील अथ समतानुमान संख्या ॥ २८ ॥ मधुप (ब) मीरा १ अप्रियल पानी अाका चारा २ के- सर ३ मकसकृत ४ धतुं (ब) घना ५ मैल (व) कामदेव ६ मीन (ब) मधली ७ज (ब) अम्बारह (क) कपल ८ जाडू (ब)टना निशिर यानी बॉण कालदेली १० शुक (ब) सु- वा ११ सोगनी कमी १२ शिभाकल यानी कुंदरु १३ गजमु- क्ला १४ विनी (व) चिकनावट १५ अनुषता १६ कं () संख १७ सपा यानी वेल १८ सुवालि (क)कारखनाल १६ - पकमली (ब) बलामी कली २० बुति (घ) मारा २१ चन्द्र- मा २२ मृगपाद २३ त्रिवलित (व)निवली २४ कुंड (व) गढ़हा २५ सुभा (क) अहत २६ सिंह (क)शेर २७ केल या- नी केला २८॥ नखशिख वर्णन अन्योक्लिक कवित्त ।। ८६ ॥ मधुप गणागि थल के रतिलक बाप कुंडल मकरकृत धनु ३ ६ ललनलहरी। . १८ २१ २३ - खंड मैनके ॥ मीन कंजु ग्रहजादू विशिप मनोज शुक मोयनीक चौरि बिम्ब मुक्का मकुनैनके ॥ चीकनी अनूप कम्बु वृषभ मृनालि चंपकलि दुति अर्धचन्द्र भृगपादजैनके ॥ ऋवलित कुंड सुधा सिंह केल अम्बोरुह ललन पिछान चित्र येही प्रदचैनके ॥इति॥ प्रसंग॥८६॥ जिस समय बाणासुरकी पुत्री ऊषा ने श्रीकृष्णात्मज श्रीप्रद्युम्नपुत्र श्रीअनरुद्दजी महराज को स्वप्न में देख व्याकुल होती भई उस समय उस्की परम सहायक स्यान सागरी चित्रलेखा चाकरी ने भेद जाना तब उसै समस्त देवनाओं वा मुनिजनों वा रा. जाओं की तस्वीरों को खींच खींच कर दिखलाय फेर पीछेसे श्रीरूपराज राजेश्वर श्रीअनरुद्दजी महराजका चित्र लिख दिखलाय पूछतीभई कि हे प्यारी देख प. हिचानु तेरा चित्त चुरावनेवाला यह तो नहीं है तिस चित्रकी विचित्र छटा वर्णन ऊपा प्रति चित्रलेखा दूनी का वचन ।। १ ॥ टीका || ८६ || भौरों सरीखे काले भँवराले बाल महाअमृतका चबूतरा here न ९ १० ऐसा मस्तक (तिसपर) केसर के टीकेका चिह्न कानों में) मगर के आकार सरीखे वाले (विराजमान मानों) कामदेव के धनुषके (दो) टुकड़े होय ऐसी भौहे ।। पछली से चंच न.कमलसे सुन्दर नैन जादूटोनाकाघर ऐसी चितवन मदनके बा. णों सी पलकें सुया कैसी नासिका मोइनदार कचौरी से प्रफुल्लितगाल कुंदुरू ललनलहरी। ३२ के के फलसे अधिक अरुण अधर (होंठ) हाथियों से (उत्पत्यभयेहुये) मोती याने गजमुक्ता सरीखे दांत ॥ चिकनी चांगिली चिबुक ( ठोड़ी) अलबेली मुसक्यान शंख सदृश सुडौल गरदन बैलसे विशाल ऊंचे ऊंचे कंधे ( शाने ) कमलकी डांडीसी लंबी लंबी भुजा बांह) (कोमल कोमलसे हाथ) चमेनीकी कलियोंसी अंगुलियां (नखों की) शोभा ( मानों अष्टमी की रात्रि सरीखे) आधेअङ्गवाला चन्द्रमा (तिसका समूह सोहायमान ) भृगुमुनि चरण चिह्नित (भगवान् के जाये हुये श्रीप्रद्युम्नजीके पुत्र श्रीअनरूद्धजी महाराज जिनके पेट पर ) तीनतीन बल पड़े हुए (तोंदीमानों) अमृत का तालाब चीते (शेरसे पतली कमर ) केला सतीखी चिकनी जांधें कमलसरीखे कोमल चरण ( इसप्रकार श्री अनिरुद्ध जीका चित्र लिखकर चित्रलेखादूती ऊषाको दिखाय यूंछनी भई कि हे पारी ) परख ले (तेरे) सुःख देने वाले (मीतम) प्यारे की यही तसवीर है ।। इति ।। ॥ मानीनायक। ॥ वजाजिन दूतिका प्रसंग कपड़ोंका ॥ ॥ अथ वस्त्रानुमान संख्या १६ ।। तन्जेव ॥१॥ मार्कीन।। २॥ पिलाम॥३॥तूल व टूला॥१॥ नैनसुख ॥ ५॥ दरेस ॥ ६॥ गाढ़ा॥७॥ अतलस ॥ ८॥ जा- ली॥६॥निवाड़ (व)निवार।। १०॥कमरख ॥ ११ ॥डोरिया ॥ १२॥कामदनी ॥ १३ ॥मलमल ॥ १४ ॥नाखूना॥१५॥ खासा॥१६॥दुशाला॥१७॥मालीदा(व) मलीदा॥१८॥ साठन।। १ ।। ॥ अन्योक्रिक कवित्त ॥१०॥ हीनी तन जेब मार कीन है पिलाम तूल नैन सुख निदरेसे ६ ३ २ A ललनलहरी। १७ રે રે ३४ ३९ दरश तिहारे को ॥ गाढ़ा विरहा दुसाह अति लसि शोक मांहि जाली ना ललन बात तो बिनु निवारे को ॥ कम रखी डोरि यार काम दानियां विचारु मलमल पाण ती ना खून करडारे को ।। खासा है दुशाला माल साउनी जरूर चही बाला यों रसाल नाहिं मिलिहै निहारेको ॥ इति ।। प्रसंग ॥६०॥ कोई एक परम सुकमारि सलोनी सुंदरी श्रीकृष्ण महराज के दरशन वियोगसे दुखित एक अ. पनी सगीसहेली सनेहिन बजाजिन दूतिका की मार्फत महराजके पास संदेसा भेजकर वुलवावतीभई वह दूती अपनी सहेलीकी पठाईहुई श्री गोपाललाल महराजके समीप आनकर यह कहती भई कि हे भगवान जल्दी चलकर अब अपनी दर्शनाभिलाषिन वियोगिनीको द- शन दीजिये आपके मारे उसकी यह दशा होरही है कि हरिप्रति बाजिन दृषिका वचनम् ।। १ ३ ५ ६ ९ १० ॥ टीका ॥ ९० ।। कामदेवकी ( विथा ने जिसको) अत्यन्त पीला कर दिया है शरीर की शोभा जातीरही है आपके दरशनरूपी अानन्दरो निरादर कि- येहुयेसे ( जिसके ) नेत्र ( होरहे हैं )। जुदाईरूपी कराल विधासे महा दुःख में भरीहै (सो हे ) प्यारे (मेरा) वचन झूठ मत (जानियो) आप के बगैर (उस का दुःख) कौन दूरकरेगा ।। (हेमित्र अपने )सनेहियों की कामना पूरीकरनेवाले सोचलीजिये ( जो मेरे कहने पर भाप) वामनी ख्याल करोगे ( नो मुझे ददिशा २९ ३३ ३४ ललनलहरी। ad है कि आपके दुःखमें वो) नारि हाथ मीन मांजकर कहींकुछ उत्पात न करवः ।। (दुशाला अर्थ दो वस्तु जिसै सालैं व सनावहैं क्या लज्जा और काम ये म. ध्या को सतावहैं तो दुशाला कहिले से यहां मध्यानारका जाननी चाहिये सो दूती कहती भई कि हे महराज ये ऐसा ) सुन्दर मध्यानायका (सरीखा) धन निश्चय कर प्राप्त (क) कबजे करलेना चाहिये ऐसी सुन्दर स्त्री ( फिर कभी ) नहीं आपके हाथाबैगी ॥ इति ।। ॥क्रिया विदग्धानायका॥ ॥ हलवाइन दृतिका प्रसंग मिठाईका ।। ॥ अथ मिठाईनामानुसंख्या ॥ १२ ॥ रसडोबी ॥१॥अमृती (व) अमिरती॥२॥कपूरकंद॥३॥ वरफी॥४॥मोहन भोग ॥५॥ हलवा ॥ ६॥ गुलाबजामुन ॥७॥मोदक यानी लड्डु ॥ ८॥ निवासा (व) अंदरसा॥६॥ मिसरी॥ १०॥ बतासे॥११॥ मीग (व)बूरा॥१२॥ अन्योक्तिक कवित॥ ९१॥ रस डोवी वाके अस अमृती सुनाये बैन वचन क पूर कंद कीन्हों वस हानही ॥ जोहती अवर फी नकी मोहनभोग वात हलवेहिसे प्रतीत आपुन सो घालही ॥ गुले आव जामुन री मोदको निवासाभयो सोई नंदललनने घाल यह चालही ॥ वा. तन के मिस री यों ढवतासे आन दिग वरवस मीठा मुख लैलियो ३ ५ ६ ९ १७ २० ३० गुपालही ।। इति ।।

१०० ३ ६ १३ १४ ) ३४ ललनलहरी। हलवाइन दूतिका प्रति सखि वचनम् ।। ॥ टीका ९१ ।। श्रीसखि (आज मैं ) श्रीकृष्ण के प्रेम में ऐसी मोहित होगई (कुछऐसे ) सुधासरीखे वचन कहे ( सो वह ) बाते क्या ( थीं मानों) मिठाई से भरी हुई होय (तिनकरिकै मेरामन) तुरतै वशीभूत करलिया ॥ और (जो कहूं कि कुछ भुझे ) शुभाशक मालूम पड़ा हो (सो कुछ) गोपाललाल ने विषय रूपी प्रसंग चलायानथा धीरे २ अपना विश्वास ( मेरेमन में ) बँधाय दिया ।। (गुल अग्रे आब तिस का हुआ गुलाब + गुल अर्थ-मित्र और भाव अर्थ शोभा (अदा) और गुल शब्दको उरदूमें मित्र ( व ) यार के वास्ते बांधते है तो गुलशब्दका अर्थ हुवा कृष्ण सो हे सखि ) कृष्ण की शोभा ( मेरेमन में बलाई ( और ) सुख प्राप्तहुआ इसनेमें नन्दनन्दन ने ऐसी घात करी (कि)! बातों २ के बहाने अरीसखि ऐसे ढंगसे ( मेरे ) पास आयकर कृष्णचन्द्र ने अचानक ( मरे) मुँहका चूंमा लेलिया ।। (हे सखि वो नन्दललन तो बड़ाही नटखट है ) इति ।। ॥ संघट्टन भाव ॥ ॥मानवती नायका॥ ॥ हलवाइन दृतिका प्रसंग मिठाई का।। ॥अथ मिठाईनामानु संख्या॥१४॥ मनोहरी (व) रसफेनी॥१॥ खाझा ॥२॥ लड्डू ॥३॥ खोवा॥ ४ ॥ रसगुल्ला (व) जलाव ॥५॥ पापर (व) पापड़ ॥६॥सेउ॥७॥ तिकोना॥८॥ मठरी ॥६॥स्वाल ॥१०॥ बरफी ॥ ११॥गुपचप ॥१२॥ जलेबी॥१३॥ पेड़ा॥ १४ ॥ ४१ १ ६ ६ १० १७ ललनलहरी। ॥ अन्योक्निक कवित्त ॥१२॥ लेमान मनोहरी हरीसों जनि खाझाकर लाय हित लडू वर खोयारसचाहे है ॥ पा परों कहोतो हौंतो सेउ सुख स्यानी भई ललन पिया को त्याग तीको नाहिं लाहे हैं। मट्ठरीका बुधि तोरि स्वाल यह तोसों मोर वर फी न कोऊ अस जाको तुहि डाहे है। गुप्चुप जा ले बी आउ साज पट शोक ढाउ मोरे सँग चालु प्रभु पेंड़ा तुव गाहे है ।। इति ॥ प्रसंग ॥४२॥ एक समय वृषभान किशोरी श्री राधिकाजी श्रीकृष्णचन्द्र भगवान से रूठकर मानकर बैठतीभई तो प्रभुने अकुलाकर एक परमचातुरी हल- वाइन दूतिका को प्रिय महरानी के मनावने के वास्ते भेजा वह दूती श्री कीरतिकुमारी हरिप्यारी के पास आनकर यह उपदेश देनी भई कि॥ प्रियपति हलवाइन दूतिका वचनम् ।। ६ ९ १० ११ टीका।। ६२ ।। मनके हरनेवाली (मेरी सीखको) ग्रहणाकर गोपाललाल जीसे मत तकरार कर (देख)ल तथा मोदक (सरीखामीठा)श्रेष्ठ सनेह जोड़कर(उसका) स्वाद नहीं चावैहै।। (तू)क है तो मैं (तेरे) पैरों पडूं मौज उड़ाउ (आनन्दभोग ) चतुरा (ढकर फिर) नादान बनीजाती है स्त्रीको (अपने) तिको छोड़देना नहीं हैकर ) ' उचित है ।। मेरा तुझसे यह प्रश्न है (यानी मैं यह तुझसे पूछूई) क्या तेरी मति कुंद होगई है (क्या तेरी अकिल जातीरही बुद्धि पथरायगई है ) ऐसा हरेक कोई का २१ १०२ ललनलहरी। पिया नहीं (होयगा)जिसको कि तू जलावे ।। (खैर जो कुछ हुआ उसे भूलजाब ४१ ४४ अब) प्यारी चुपचुगाते से जायकर कपड़ों को उठाय पहिरकर आयजा ( और ५२ ६४ सोचको दूरकर मेरे साथ चल कृष्णमहाराज तेरा आसरा ताक रहे हैं ।। इति । परकिया नायका॥ ठठेरिन दूतिका प्रसंगपात्र रचनीय शस्त्रोंका ॥ अथ पात्र शस्त्रानुमान संख्या ॥ १४ ॥ सांचा ॥१॥ ढाल ॥२॥डोल ॥३॥ मटीना (व) मटकैन घड़ा (व) गगरा ॥ ४ ॥ निहाई ॥ ५ ॥ परकाल ॥ ६ ॥ ढक्कन ॥७॥ घर्राने की ( व ) फुकनी ॥ ८ ॥ केरी (व ) कैंची॥ ६ । हथोड़ी (व ) हांथोड़ी ॥ १० ॥ साखिा (व) सून (व ) डोरा ॥११॥छेनी॥ १२॥ चीतकी (व) चीतकी (व)कमल ॥१३॥ कतरनी॥१४॥ अन्योक्ति कवित्त ॥ ६॥ sr २९ ३१ सांचा ढालि आऊं डोलबांधि आऊं मिलवेको माटीनाकरीने वचतूल दै प्रतीतेको। होइना निहाईतै वदीहू परकालकहूं ढक्कन परैगोनाक्यहूते वा फजीतै को॥ बेटी तैं घराने की बहू है अमीराने केरि हांथोरीनबात वीर सारिखो सुप्रीत को। अछेनीक चीतको क- तरनी कुरीत को ललन सों सुनीतको पुराइयो मुरीतैको ॥ इति।। प्रसङ्ग ॥ ६३ ॥ कोई एक नवीना यौवना सुन्दरी श्यामसुन्दर केवियोगमाली अपनी परमसनेहिन ठठे.

ललनलहरी। १०३ रिन दूतिका से यह कहती भई कि हे सखि अबतो मु. झसे यह श्रीकृष्णके विछोहरूपीदुःख सहन नहीं किया जाताहै कोई यत्नसे तू मुझे उनको मिलायदे नहीं तो मेरेप्राणोंपर बीतती मालूम होती है उसने उसकी आ- कुलता को देखकर यह कहा कि हे प्यारी नारायण से मिलाय देना यहतो कोई बड़ी बात नहीं है परंतु काम वो करना कि जिसमें मेरा तेरा दोनोंका फजिहता न होने पावे क्योंकि मैं पचास घरकी जानेवालीहूं आजतक किसीने मेरे ऊपर अँगुली नहीं उठाय पाई है लेकिन खैर मैं तेरी व्याकुलता देखकर और तेरे कहनेपर में कुछ तेरे वास्ते उपाय करूंगी और कृष्ण महाराजसे मिलाय भी दूंगी लेकिन अपने मनकी बात किसी को प्रगट न करना इस भांति उसको धीर बँधाय समझाय बुझाय यों कहकर चलदेती भई कि हे सखि ॥ सखिप्रतिठठेरिनदूतिका वचनम् ।। १ २ ५ टीका ।। ६३ ।। सीजा लगाय आऊं (और उनके) मिलनेका ढंग जमायाऊं (तब तुझसे कहूंगी लेकिन हे प्यारी कहीं मुझको इसतरह की) लम्बी चौड़ी बातों से विश्वास को दिलाय ( मेरीबात में कहीं ) धूरमति मिलाय दीजिये ।। (का हेसे यह बातें बहुत कठिन हैं मैं ) ठीक २ कहती हूं (कही) अत्यना बदनामी न होजाय (तौफिर) किसी से उस बदनामी वा फजिहनपर परदा भी डाले ना डाला जायगा ।। (क्योंकि) तू नामजद कुलीन की पुत्री है (और) अमीरोंके घर की पतोहहै ( हा शब्द आश्चर्य को दरशाता है इसीसे कदागया है कि ) देख १३ १९ २० ललनलहर। समुझले सखी स्नेहका करना कुछ) हँसी खेल नहीं है। क्योंकि) भलाइयों का विचारना बुराइयों से बचना नेक चाल चलनों से प्यारे स सच्चाबरतावकर निबाह करना ( कुछलड़कों का खेलनहीं अपना मन देकर परायामन बस करना यह बड़ी मुशकिल बात है)। इति ।। परकिया प्रोपितपतिका नायका॥ लोहारिन दूतिका प्रसंग लोहपात्रोंका।। अथ लोह शस्त्र व पात्रानुमान संख्या ॥ १३ ॥ सूजा ॥१॥ कीली (ब) कील ॥२॥ तकुवा ॥३॥ कड़ाही॥ ४॥ कुंजी॥५॥ कुफल (व) ताला॥६॥जंजीर ॥७॥ सँड़सी॥८॥ चलनी॥६॥ तवा (व) तावा ॥१०॥ तसला॥११॥ कबजा ॥ १२॥ कल हरेक प्रकार की ॥१३॥ कुल्हाड़ी॥१४॥ अन्योक्लिक कवित्त ॥ १४ ॥ उन सूं जाकहु इमु कीलिकोउमेतु वीर तक वाके हाथहै कड़ा ही तुम राखिये । युक्तिकुंजिसों टटोल कुफ्ल कठिनाई खोल प्रेम की जंजीरसों सँड़सि रस भाखिये ॥ की जैना कुचलनीहि तवा लीजै तस लाय घात कबजामें मन लै यों अभिलाखिये । हैना वाहि कल छिन नन्दकेललन सुनु विरहाकुल्हाड़ी हनि ताहि सुख माखिये ॥ इति ॥ लोहारिन दूतिका प्रति सखिवचनम् ॥ प्रसंग॥४॥कोई एक विरहिनी सुन्दरी नारायण ४ ६ ३ १ २१ २९ ललनलहरी। के वियोग में अतिव्याकुल है एक अपनी सुखद सहे- ली लोहारिन दूतिका से हाथ जोड़ विनती करके यह कहती भई कि अब मुझसे विरह वेदना का दुख नहीं सहन किया जाताहै आज तू जाकर श्रीगोपाललालको बुलाय लाउ॥ १ २ ३ ६ में ३० ३२ Rhey टीका ।। ६४॥(हे) सरिख ( कुछ उनकी ) ऐसी मति फेरदे (और) श्रीकृष्ण महाराम से जायकर कहु (कि) भलाई बुराई वा ताकघात (सब) उसके जिम्मे है आप अपना जी मजबूत रक्खो ॥ ( परंतु ) यतनरूपी तालीसे दूंडकर ( उन के रुकावटरूपी) कठिन ताले को बोल नेहरूपी सांकरमें फांस (तब अपना) मतलब जाहिर करना ।। (देखकहींकुछ) अनुचित नकरबैठिये (अपने) वश में ( उनका) जी करके (खूब) अजमाय लेना तैसाही दांव लगाय (तब कुछ ) ऐसी प्रार्थना करना (कि)॥ सुनो नन्दनन्दन( तुम्हारे विना ) उसको घडीभर को चैन नहीं जुदाई रूपीकुल्हाड़ी से घायल है तिसको (अद आप चलकर) आनन्द(देने को) चाउ करिये ।। इति ॥ मध्यमानलाजवती नायका और।। उत्साहवर्द्धक परकियानायका॥ सुनारिन दूतिका का संघटन प्रसंग आभूषणोंका ॥ अथआभूषणानुमान संख्या ॥१४॥ भूमड़ १ कटियां २ बेना ३ बाली ४ वाला ५ पात. पत्ते ६ तरकी ७ मुरकी हैकल : जुगुन १० चन्दनसेनीहार ११ धुक- धुकी १२ बहूंटा १३ जोसन १४ ॥

- १ ३ ६ ९ १४ १२ १२ २१ ४३ ललनलहरी। ॥ अन्योक्तिक कवित्त ॥६५॥ नासमुझ मरककीवात कटिया जीतौल वे नाहै अजान स्यान गाठरी गंभीरता। वारीही रही रीबाला पातरही बुद्धि तोर तरक मुरक रसकी नजांच शीरता॥ हैकल जु गुनु न चन्दनमे निहार गात उर धुकधुकी वासि तकैना अधीरता । बहू टाल देतिरही जो सनित नेहसन नन्दकोललन मेलु यही नारि वीरता॥इति ।। सखिप्रति सुनारिन दृतिका वचनम् । प्रसंग॥६५॥कोई एक नायक किसी एक परम सुन्दरी से प्रीति करनेको महाव्याकुलथा अनेकों उपाय किया करै परंतु वो उसके हाथ नहीं आवै एक दिन वो सुनारिन दूतिका जोकि बड़ी होशियारथी उसे बोलाय कर अपने दुःखकी व्यवस्था सुनावता भया तब वो दूती उसको अपने साथमें उसी सुकुमारी के मकान पर लैगई नायकने सब कुछ संकोतिक वचनोंसे अपनी प्रीति प्र. गट कर दिखाई परंतु उस चातुरीने उसका आदर नहीं किया औ न कुछ मुंह से बोली ऐसा बरताव देखकर दूतीने नायकको तो इशारा देकर उसके घरसे उठाय दिया और उसके बाद दूती उस सुकुमारी को एकांतमें लेजाय यह कहती भई कि॥ १ ३ टीका ॥९५॥ (हे सखि तू) पंचकी बातको नहींसमझती (अपने) तराजूरूपी मनमें अजमाय देखु अरी ( अब तू कुछ ) अनारिन नहीं है चतुरता ( ब ) गहur ७ है ललनलहरी। आपनकी गठरी है।।( परन्तु फिरभी) हे सरिख नादान ही बनी है (तू कुछ आदिमी नहीं)तेरी ओछीही मति है (तू) मीतिकी छेड़छाड़ (व) रसाई (सुशीलता) को जानतीही नहीं ॥ ( हे प्यारी तू अपने चाहनेवाले के मनकी) घबराहट को नहीं देखती है (उसे) जैन जोकुछ विचारती होय (सो) नहीं है देखु चन्दन सरीखा सफेद सफेदरंग तो शरीरका ( होगयाहै और तेरी जुदाई की विथा के मारे उसके ) कलेजे में धकधका सनाय रहा है ।। (अरी सखि आदमी का चोलापायंकर कुछ पराये दुख दर्दको भी विचारना चाहिये देखु अब कुछ मेरे प्रावनेका भी ख्याल कर जो कुछ मैं कहूं उसको मान सुनु) जोकि (तेरी) प्रीति से भरा नंदका प्यारा ( जिसको कि तू) वहुतसा टालाबाला बतलावती रही है ( उस्से अब ) मिनु गोरी ( तेरी) येही सूरवीरता का भलमंसी है ।। इति ।। उत्साहवर्द्धक नायक ॥ सुनारिनदूतिका प्रसंग आभूषणों का।। अथ आभूषणी अनुमान संख्या ॥ ६ ॥ धातुनाम २।। सोना १ कुंदन २ बाला १ ती २ विचकनी ३ विजुलीका बाला ४ मछली ५ बाली ६ सजा ७ कुटिला (व) करनफूल ८ ॥ अन्योक्लिक कवित्त ॥ १६ ॥ पात॥ ६ or ३ १ ३ ललन सोवर्ण रंग कुन्दन सों भूरभाह जिलाकीन्ह मानों मंजु गातकी गुरोलीमें। वालवाहै वाला वाल तर्किजात नैकहीमें मुखलावै विचकन तुरतै ठठोली में ॥ विजुलीसी चम्कजात १६ १५ ललनलहरी। २६ ६ ३ ३६ आवैनाहींहाथ छांह मीन मतिवारी भारी चातुरता बोलीमें। देख स वजाकी झांकी कुटिलानो मोर मन पातपात वारं टोली मिलै जोवो होली में ॥ इति ॥ अथ सुनारिनदूतिका प्रति नायक वचनम् ॥ प्रसंग ॥६६॥ एक समय श्रीकृष्ण महराजने कहीं एक अत्यंत सुन्दरी चातुगिरी चंचलता सागरी रूप नव नागरी को देख प्रसन्नहो एक सुनारिन दूतिकासे यह कहते भये कि आज मैंने एक ऐसी अनोखी अबला अवलोकी है कि जिसकी निकाई कुछ कही नहीं जाती २ ३ ६ ९ टीका ।। ९६ ॥ (है) सखि वो ( ऐसी) सुंदरि अबला है (कि) प्यारा सोने सरीखा ( तो शरीरका) वर्ण (और) कुंदन से भी ज्यादा चिमत्कारी (छवि) साक्षात मालूम होताहै (कि ) सुंदर शरीर की गुरावट पर सिकल की हुई हो।। (और फिर उसका तीक्षा स्वभाव कैसा है यानी तुनुक मिज़ाज ऐसीहै कि ) हँसी करतेही उसीसमय मुंहको विगाड़ लेती (और) थोड़ीहीसी बाल में चिड़ जाती(व) में खका होजाती है।। (वा) चपलासी छिपजाती परछाहीं (जिसकी) पकड़े न पकड़ाई देती मछली सरीखीचंचल बुद्धिवाली बोलचाल में अत्यन्त चतुराई (भरीहुई ऐसी)॥सहित वजहदारी याने शोभावारी गूरत देखकर मेरा जी चलायमान यानी उसपर डिग जाताभया ( सो हे सखि मैं अपना ) तनमनधन अर्पण तथा नि- छावर करदूं जोकियो अबला (मुझेइस) फाग के मौसम में मिलजाय ॥ इति ।। २३ २५ ३६ ३ ११ १६ १८ २.२ ललनलहरी। गणिका सामान्या मानवती नायका॥ सुनारिनितिका प्रसंग गहिनोंका। अथ अभरण अनुमान संख्या ॥१४॥ कड़ा १ चूड़ी २ पछेली ३ पहुंची ४ चुहेदन्तीकी पहुंची ५ आशी ६ भुंदरी वा अंगूठी ७ छल्ला = तोड़ा जंजीर १०माला ११ दुलरी १२ हमेल १३ करधनी १४ ॥ अन्योक्लिक कवित्त॥१७॥ नाकर कड़ाकुड़ी री रूपमद चूरभई हैपछेलिमतिकी नपहुंची वावातको । वही दत्त दीवो गृह आवै जो आरस तजु द री न मुख छलु कैना कछु घातको॥ तोड़े नहिंथोरै मन प्रेमकी जंजीर गांस मालनिधि मीत पाइ कीजै रस नातको । दुलरी दुलारी ते वोनंदकोललन प्यारो लीजैरी हमेल कर धनी रतिजातको ।। प्रसंग ॥ ९७॥किसी एक समय चन्द्रावलि सखी के वहां गये हुये भगवान को श्रीराधिका जी महारानी ने कहीं जान लिया तो इस बात पर क्रोध कर खटपाट लै रोषभवन में जाय प्राप्त होती भई तो श्रीकृष्ण चन्द्र महाराजने एक परम चातुरी चालांक लोनारिन दूतिकाको बुलवाय हाल सुनाय महारानी के मनावने (व) बुलवाचने के वास्ते उससे कहा वह दूती महाराज को धीरज बँधाय अपने संग में लेकर श्रीनियाजीके घर पर पहुंचती भई महारानी को कोपमंदिर में पड़ा देख बड़ी सावधानी और बुद्धिमानी की चतुरता से ३२ ३ १ ११० ललनलहरी। श्री रषभानदुलारी से विनयवत प्रार्थना कर यों कहती भई कि॥ ६ ६ २१ २.३ टीका॥९७||अरीप्यारी (तू अपने पिय प्यारे से बहुत) तनातुनी मतकर(अपने) स्वरूपकेगुमानमें बेहोशहुई है (तेरी ऐसी) पिछली बुद्धिहै याने जिस काम कोना करके फिर उसीको करती है (और पहिले) उसख्यालको यानीपरणामको नहीं बिचारती । हेप्यारी (देखतेरे मनाउने और अपना अपराध क्षमापन करावने को तेरेपास साक्षात् महराज आयेहैं उठकर महराज का सत्कार करू क्योंकि) जो कोई (अपने) मकानपर चलकराव ( तो फिर उसको तो जरूरही ) सनमान देना चाहिये (अबइस) आलस्यस्पीरुकावट यानी अपने मनके मैलको दूरकरदे मुंहको मत छिपाउ ( उनकेमनको) कोई यनसे अपनेवसमें क्योंनहींकरलेती है।। (प्यारी प्रीतिको) छुड़ायकर (उनका) जी नथोड़ाकारू नेहरूपी सांकरमें फांसकर (ऐसे) गुणरूपीतालेबर मित्रको प्राप्तकर उस्से) हितरूपी सगावट (क) नातेदारी ही करनी चाहिये ॥ हे मिय तू (उनकी ) प्यारी ( है और ) वोनन्दजीकोकुँवर (तेरा ) दुलाराहै ( सोऐसे ) प्रीतिरीतिके स्वामीकोतो ( हृदयकी ) माला करलेना चाहिये ।। इति ॥ ॥धीरामानवती नायका॥ ॥ सुनारिनि दूतिका प्रसंग भूपणोंका ।। ॥ अथ आमरण अनुमान संख्या ॥ १४ ॥ पायजेब १ कड़ा वा खडुआ २ चूरी ३ तोड़ा ४ छागल ५ बिछुवा ६ नहियां ७ पलनियां ८ बोर ९ चुटकी १० तोर ११ भलका १२ मोर व मोरनी १३ टुर्रा (व) टोर १४ ॥ ४६ ६ ३ ६ १६ ललनलहरी। ॥ अन्योक्तिक कवित्त ॥१८॥ पाय जेब परिबो तिहारोही सकलभांति कड़ाकुड़ी भल का भ- लाई किन्ह पाई है। परचूंरी सब कृत्य तोड़ा जिन्ह नेह जोर छाग लीन कुयशु बिबन बुराई है ॥ नहियां असत्य गोरि पालनियां झूलें वो रिमीत नन्दकोललन येही सुघराई है।।देखुशिशुपनतोर चुटकीले मन मोर मो सिख बटोर तोर मान अनन्याई है ॥ इति।। प्रसंग ॥ ९८॥ एक सखी के मनाउने से जब . षभान नन्दिनी कीर्तिकुमारी श्रीराधिकाजी महरानी नहीं मानी तब दूसरी स्यान सदनी सुनारिनि दूतिका प्रियाजी के पास जायकर यो प्रार्थना सुनाय कहिती भई कि हे प्यारी अबकी बार तो तैने बड़ीहठ कीन्हीं है अब तेरे मन में क्या है देखु कृष्णचन्द महराज तुझे मनाउने के वास्ते तेरे पास चलकर खुदही आये और तैंने उनको निरासकर लौटाल दिया फिर अब क्या तू चाहती है कि वह मेरे पैरों पड़ें तो यह बात तुझे उचित हैनहीं ऐसा नहीं चाहिये वो तेरे स्वामी हैं। १ ३ ६ १५ १६ टीका ।। ६८॥ (हेप्यारी, सब तरहसे (अपनेपतीके) पांउ पड़ना तुझी को शोभादेय है (बहुत) सनातुनी में कौन अच्छाई है (और कलेशको करके) किसने नामवरी प्राप्तकीहै ।अरीप्रिया(मैं) सबस्तरहके वर्ताव देखचुकीहूं जिन्होंने प्रीति करके छोड़दीनी (उनको) खानेको बदनामी (और) बिछाने को बदी(व) खुटाई ही मिलती है ॥ हे प्यारी (मेराकहिना) झूठ नहीं है वोही (सुखरूपी) पालनोंमें १८ ३० ललनलहरी। ३३ विराजा करती हैं (जोकि) नन्दलाल जी से प्रीति किया करती हैं (और इससं- सार में नारायण से जो हेन रखना है सबारहकी ) इसी में अच्छाई है ॥ तेरा लड़कपन देखकर मेरा जी बसोटा करे? यानी दुग्धा करता है (इस्से अब) मेरी शिक्षाको ग्रहण कर तेहा (इस तरहका) हठना न्याय से बाहर है।। ( आगे जो तुझे अच्छा लगै सो कर तु अपने मनकी मालकिन है और में क्याकहूँ ।। इति ॥ रतिप्रिया नायका जौहरिनि दूतिका प्रलंग धातुरनोंका ।। अथधातु रत्नानुमान संख्या।॥ १५ ॥ पैसा १ रुपिया २ गिन्नी३ अशर्फी चुनीपन्नावहीर(व) हीरा ७ पुपराज ८ गोमेदक : नीलक व नीलम १० फि रोजा १९ लाल १२ लैहसुनियां१३ मुक्कामोती१४प्रवाल (ब) मूंगा १५ इति ॥ दुग्धगुण ॥ चौ०॥ स्वादिक सुखद विपुल वलदाई । पैतमान औपध नहिंभाई।। अन्योक्लिक कवित्त ॥ ६ ॥ पै सारु पियाके हित गिन्निये अशरफी ना पैहै व्यय व्याज युति रतिको अनंदरी ॥ चुनी वात चितैदीन पन्नामें ललनि टीपु हीर सुख लाहै तव भानिये जो कंद री॥ पुष्पराजआननि गौमेदक प्र- ताप घन नातो बल नीलकीहो मदन गयंद री॥ चाहिये फीरोजा वीर लालकाहिंलहि सुनी मुक्ता बलदा प्रवाल रंग हो अमंदरी॥ इति॥ ३ ५ ६ २२ રે રે ४१ ४२ --

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ललनलहरी।
प्रसंग॥६६॥ श्रीभगवान् तो सनातन भक्तवत्सल
हैं जभी कोई सखी सच्चे प्रेमसे स्मरण करै तभी उसके
घरमें जाय पहुंचे तब श्रीराधिका जी महरानी की जो
प्रिय सहेली किसी के यहां कृष्णमहराज को देखपावें
उसीसमय प्रियाजी से जाय कहि सत्रहाल सुनाया करें
अपने प्रीतमका भेद और २ सखियों को जान लिया
देखि खेदित है जबमहराज रात्रिको सुख शय्यापर
हुआकरैं तब श्री प्रियाजी महानी महराज की सेवा
करते पर ये प्रार्थना करि कहाकरें कि हे भगवन् श्राप
पराये घरों में क्यों जाया करते हो मुझे इस बात
को सुन करिके बड़ाही खेद होताहै क्योंकि परनारियों
से रतिकरने में काम
की हानी औ बल बुद्धी औ मुखकी
शोभा जाली रहती है तो उससमय पर कोई महरानी
की साखी सहाई तो होती न थी महराज प्रियाकी बातों
को हँसी में उड़ाय भूठी बनायदिया करते थे एकदिन
कहींकोई एक नियाजीकी चाकरी कहीं चन्द्रावलिसखी
के यहां गई तौक्या देखा कि वो अपनी सेज सजाय चुली
थी और अपना श्रृंगार कर रहीथी उसको मालूम पड़
गया कि इस के यहां आज महराज की अवाई मालूम
होती है सोई वहांसे चुप चुपाते चल कर महरानी से प्राय
खबर करती भई कि देखभ्यारी आज तो कृष्णचन्द्र
महराज चन्द्रावलिके यहां जानेवाले हैं उसको में सेज
सजाये श्रृंगार करते हुई देख आई हूं तअज्जुब नहीं की
मुझे वहांमे आने में इतनी देरहुई है चाहेबो वहां पहुंच
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ललनलहरी। भीगये हों ऐसा सुन महरानी श्रीश्यामसुन्दरको पकड़ लेने की ताक में उसीदम सखी के संगमें चन्द्रावली के मकानको चल देती भई जो चन्द्रावलिने महारानी को आउतेहुये पहिले तो दूरसे देखा तब तो उसे मालूम हुवा कि महराज आवते हैं बड़ी प्रसन्न हुई फूली ना समा. ये थोड़ी दूर चल आवने पर क्या देखती है कि महः राज तो हैं नहीं ये तो प्रिया जी मालूम होती है तबतो उसके प्राण हवा होगये और इसने ये समझा कि ऐ. सातो नहीं हुवा कहीं महरानीजी को आज श्रीकृष्ण चन्द्र का मेरे यहां का आउना मालुम होगया होय त. भी तो मेरे घरको आरही हैं आज नारायण कुशल करै तौ मेरी लज्जा बचै नहीं तो आज कुछ मेरे वास्ते बुराई जरूर होने वाली है होश फाक्ता होगये सक्ते के आलममें आगई दिल धड़कने लगाहाथ मलने लगी परन्तु अपनी स्वामिनी समुझ कर और कुछ मनको सावधान कर पचास कदम चलकर बड़ेही आउ आ- दरसे महरानी जी का हाथ से हाथ पकड़ अपने घरमें लाय रत्नजटित सिंहासन पर बैठार बड़े सत्कार युति सेवामें ततपर होकर यों कहिती भई कि हे प्यारी आज तो मेरे बड़ेही भाग हैं जो आपने मुझे घर बैठे दरशन दिये आज किधरको यह चन्द्रमा उदयहो पाया और महरानीने जो उसके यहां देखा तौ महराजका कुछ पता निशानही न था अब तो वो अपने मनै मन में शोचने लगी कि मैं तो पकड़ने महराजको आई थी सो वोतो ललनलहरी। हैं नहीं और मेरे बैठे पर वो आयभी गये तो क्याहोगा वो उल्टबड़ा मेरेही ऊपर बांधेंगे मुझे देख वो यही क- हिने लगेंगे कि मैं तो तुमारे ही कारणसे यहां चला आयाहूं ये तो कुछभी न हुआ अब क्या करनाचाहिये परंतु प्रियाजी तो बड़ी चतुरथीं उसी छिन चतुराई के साथ एक अद्भुत युक्ती रचकर कहने लगी कि हे सखि राति मैंने एक ऐसी सुन्दर बात श्रीकृष्णचंद्र महराजके मुखारविन्दसे सुनीरही सो उस खुशीके आनन्दको तुझे सुनाउने आईहूं तबतो इसकी घबराहटका खेद सब जा- तारहा और अत्यन्त खुशी होइ महरानीके पीछे पड़जा- तीमई किबो कौनसी बातहै आप मुझे जरूर सुनाइये प्रियाजीने उसका मन अपनेकाबूमें करके कहा कि हेसखि तु नहींमानती है तोमैं तुझे सुनाऊंहूं सुनु यह बात है कि मैं महशजसे हमेशः उरहनादिया करतीथी कि आप पर- स्त्रियों के यहां जाया करतेहौ तौ वो सदैव मुझे अँठाय लिया करतेथे कल के दिन फिर मैंने कुछ हाल सुनकर रातको उनसे कहा तौये मेरे भाग्यकी बातहै कि रात उन्होंने अपने मनका सञ्चाभेद मुझसे कहिदिया कि हे प्रिया औरतो मैं कहीं नहीं जाताहूं जोकभी जाताभीहूं तो तुम्हारी जो परम प्रिय चन्द्रावलि सखीहै वो मुझ सेमी सनेह मानती है जब तब कभी उसके घरतो मैं जरूर चला जाताहूं और ये भी कहाथा कि कल में उसके यहां जाऊंगासो अभीतक महराज तेरे यहां आये नहीं इसका क्या कारण है मैंतो उनकेही सबबसे आज ललनलाहरी। तेरे यहां आईहूं तो चन्द्रावलि को नियाजीका वचन सुनकर यह निश्च यहुआ क्या आश्चर्म है जो मह- राजने यह बात कहिदीहोय झ्योंकि वोतो रसिक शि. रोमणि हैं ऐसा जानकर हँसपड़ी और हाथ जोड़कर महरानीजी से कहने लगी कि हे प्यारी सच है जैनी कि अाप की ममता मेरे ऊपर रहा करती है वैलिहि आपकी सगी समझकर मेरे ऊपर महराज भी कृपा किया करते हैं भाने को तो जरूर कहाथा लेकिन अभी आये नहीं है ऐसा उसके मुखसे सुनकर सोई महरानी उस्से पंछने लगी कि भला सखी यह तोमुझे बतलाब कि हमारे महराजको अपने यहां बुलायकर कुछ उन की खातिर भी करती है या कि उनको बेसनमानहीं भेज दिया करती है चन्द्रावलि हाथ जोड़ कर कहिने लगी कि महारानी जी आप केसी बात कहिती हैं ऐसी भी कोई मुर्ख होयगी कि जिस्के यहां साक्षात् महाज पथा। और फिर उनकी कोई खातिर वा सम्मान न करे महरानी पंचने लगी तोतू क्या खातिर उनकी कर- ती है सो बतलाउ महरानीकी बातों में आनकर चन्द्रा- चलि हैखिकर प्रियाजी का हाथ पकड़ उठ खड़ी हुई और कहने लगी चलो दिखलाऊं जहां के रंगमहल में महराजके वास्ते शय्या सजीथी और खातिरदारीके अ- नेकमानान मेवा मिष्ठान इतर इलाची पान रखथे जाय दिखलाये महरानीने सब सामानों पर नजर डाली तो करा देखा कि और सब चीजें तो मौजूद हैं परंतु रति ११७ ललनलहरी। कराके वास्ते जीन बलदायक पदार्थ जो दूधहै सो नहीं है ऐसा देख उसको धिकार दै कहिती भई कि बस इसी तरह की खातिरदारी कीजाती है त केलि रसके स्वाद को क्या जानैं तू बड़ी गवारहै वो मुसिक्यायकर कहिने लगी कि महरानी कौनसी बात की कमताई है सोतो कहिये तब प्रियाजी उस्ले यों कहतीभई कि ३ २३ टीका !! ६६ ।। अरीसखि दूध तो मँगाउ महराज के वासो (वोकुछ रूकने लगी तो महारानी ने कहा नहीं २ वह कुछ) निसपयोजनीय (वस्तु) मती समझिये (जो कुछ के तेरा खर्चा पड़ेगा सो वह ) खची भाग संयोग का सुखरूपी सूद सहित (तुझे) मिल जायगा ।।अरीप्यारी (मैंने तुझे लाखों बात मेंसे ) छटीहुई (यहएक) शिक्षारूपी औषधी बतलायदीहै ( अपनी पुस्तक वा बही के ) पत्रा व पन्ना में लिख रखु जो कुछ के गोपाललालको (दूधके पिलाने में तुझे) आनन्द का सार प्राप्त होय सोनो (कलह मिलकरके मुझसे) कहिना (कियह) मजाथा ॥ ( पुप्प एक नक्षत्र कानामहै और नक्षत्रोंका राजा चन्द्रमा है तिस सरीखा जिसका मुख होय उस कहिय पुष्पराज आननि सोई म हरानी कहितीभई कि) हेसखि चन्द्रमुखी गोमे- दक कहिये गऊ के मेदेका निकसा हुआ जो दूधहै ( उसमें ) बड़ा ऐश्वर्य (ब) गुण है (और जो स्त्री अपने मित्र को रति के पश्चात् दुग्य गृहण करावती) नहीं है तो ( उसके पतिके शरीर का जो ) हाथी ( सरीखा बलवान ) कामदेवका बन व ताकत है ( सो थोड़ेही दिनों में ) निर्वन होजाताहै ( यानी जो पुरुप रतिकरने के पीछे दूध नहीं पीता है सो थोड़ेही दिनों में नपुंशक हो जाता है इसे )। के राषि ( यह शिपावन कल पंगझे आजही वालो नहीं देनीई ) देन्तु सुनने ललनलहरी। ( लालजी महराजको प्रतिदिन (दूध पिलावना ) उचित है (वोदूध कैसा गुणदा- ( यकहै कि) अत्यन्त ताकत देनेवाला ( और ) मूंगे के समान लालरंगत करके बदनकी ताकत पर ) चिमित्कार कर देता ।। इति ।। परिहास्य शिक्षा॥ गुप्तानायका॥ गोटेवारी दूतिका प्रसंग गोटा किनारी ।। अथ गोटा किनारी जात्यानुमानसंख्या ॥ १० ॥ गोटा १ पट्ठा २ दाख (व) डोरी ३ पट (व) पटनी ४ किरन ५ बादला ६ धनुष ७ कैतून ८ बनत ६ क तावत् ॥ १० इति ॥ ॥ अन्योक्लिक कवित्त ॥ १०० ॥ १ ३ ५ ६ १३ ૨ ३४ गुटियाले दाम पट गंगयमुनी विहारु पठिया लेनंग गोटयाल नवचालकी । बा दलाल होपरैगो रसिक दृगनु धनु शर रूप साज चालें चढ़ पालकी कई तूने सुन्दर बनतके बनाये जोड़ । सो सज कलातूरी योवनरसालकी ॥ जल्विहारमांहि जोहि नंद केललन मिल करिहैं गुपाललालजूसों जैगुपालकी ॥ इति ।। अथ संधिप्रकरण ।। कल+अग्रे+आवतू कलावन् ॥ १॥ सखिप्रति गोटेवारी दूतिका की उक्ति !! प्रसङ्ग १०० ॥ कोई एक गोटेवारिन दूतिका एक नवयौवना सुशीलासुकुमारीपर अपनी मतलबी रङ्गत चढ़ाउतीभई उसकी बहुतसी प्रशंसाकर यहकहती भई फिहे सखि कलकेरोज जलविहारका मेलाहै सो नहीं दे- ३ ६ ललनलहरी। १११ खनेको चलैगी वहांतो बड़े बड़े अच्छे रसिकजन और अनेकों एकसे एक रूपवतीस्त्रियां अपने २ परम अनूठे शृंगारादिकों को साजकर आया करती हैं और कृष्ण महाराजभी अपनी सलोनी शोभा सजायकर आवते हैं ऐसा सुन कर उसने कहा तबतो जरूर चलंगी दूनी उसकी मंशा पायकर बोल उठी तो बनलाऊंतिमढंग से चलु कि॥ टीका ॥१०० ॥ (हे सखि खर्चके वास्ते को कुछ) रु.ये गोटमघुरस ने (और) गंगायमुनी यानी सुनहिले पहिने काम के कपड़े पहिनने (और कोहएक ) अनी साथवाली थोड़ीउम्रकी नई शोभावाली स्त्री साथ में ले ॥काहेसे (किवा मेला है ) उस समाज में रसिकों कहिये इश्कवा ों की भांखोंस चोटें होवेहींगी (सो) यौवनरूपी धनुष वा ग सजायकर पीनसपर सवार हो ( हम तुम सबजनी ) चलें ।। (और) हे सखि तुझने कई एक जो अच्छी २ बनावट की पोशाकें बनाई हैं तिनमें से पहिरकर (मेरेवरपर ) से कलह आउ (तो हे ) सुन्दर रूपवाली ।।( उस ) जल विहारके मेलेमें नन्दकुँवर कन्हाई को ढूंढकर मिलकरके ( उनसे हम तुम भी) रामराम करेंगी। उपदेश। उत्साहवर्द्धनीनायका॥ विसातिन दूतिका॥ प्रसङ्ग विसातखानेका वस्तुअनुमान संख्या ॥ १३ ॥ कंधी व ककही १ डोरी डोरा २ आइना व शीसा ३ मिंगरफ ३ १२० ललनलहरी। व सेंदूर ४ डविया ५ काजर व सुमी ६ मिस्त्री व मंजन ७ मोती ८ जोर व चूड़ी बट्टा १० सूई ११ पेंचक १२ ती १३ ॥ अन्योक्तिक प्रणोत्तरी कवित्त ॥१०॥ am ६ २३ १० २३ लीजिपे वितातन का कही प्रेम डोरी भन आई साहिं ध्यान वात मोर जा निहोरेकी। शुभ संग रक डबियाले उर वाक्य मोर कज राखे कौन मिसी मोती मनजोरेकी ॥ बट्टा जो लगाहि सुई सीखना सिखैयेकी हौं येचच की कहनजानिये छछोरेकी । तर कना मोरीही ललन यह पक्षकी कि मोती मिनुप्रीति वृथा जूनि जग थोरेकी ॥ इति॥ सखिप्रति विनातिन दूतिका वचनम् ।। प्रसङ्ग ॥ १०१ ॥ कोई एक नवयौवना सुकुमारी को कहीं किसी बिसातिन दूतिका से जान पहिचान होगई जब किसी राह बाट में मिल जाया करे तो राम रमौल होनेपर वह सुकुमारीले हमेशा श्रीकृष्ण महा- राजके मिलनेको कहाकरै परन्तु वो सुनकर चुप रहि जाया करतीथी एकदिन कहीं वो दूती बाजार किली बिसांती की दूकानपर कुछ सौदालेरही थी इलने कहीं वो सुकुमारी उसके नजर पड़ी तो उसको देखकर बो बिसातखाने के जिलेमें उससे यह कहतीमई कि ॥ १ टीका ।। १०१ ॥ (हे सखि गृभी ) कलमोन लेले (उपका क्या कहती हे O ललनलहरी। १ १३ १९ १ (दू०व०) प्रीतिरूपी सुन्दर डोरी (बड़ामें बांधने को उसने कुछ उत्तर नहीं दिया सौ फिर दूतीबोली कि) मेरी यह बिनती का वचन (तेरे) ख्याल में नहीं आया !! ( पुनः सखीबोली क्या कहा दू०२०) सुन्दर मूक्ष्म सत्संग (यह) मेरा वचन मन में रखले (है) मेरी प्यारी (महाराजसे, प्रीति करनेमें (तू) किस कारणसे ( अपने मनमें ) आंट (व)रुकवद रखती है ।। ( इस बात में तू निसारखातिररहु कि) जिसमें बदनामी होजाय सोसलाह मैं (कभी नहीं देऊंगी (और येचपंच व ओछी सन्नाट देना आल्छीबुद्धिवालों का काम ॥(फिर) मेरी प्यारीनारि मेरीतो छेड़छाड़ इम प्रसंगकी है यानी (कोई ) प्यारे मित्र के स्नेहविना (मह) संसारो थोड़े दिनों की मनु. प्य के चालेकी जिन्दगी निकल ही है ।। इति । प्रसंग कविजनान।। अब पुराचीन कविनन नामानि वर्णनानुमान ॥३०॥ बेनी १ व २ भगवन्न ३ द्विजदेव ४ पदमाकर. ५. शम्भु सुन्दर ७ नवीन ८ ठाकुर नाथ १० नौनिधि ११ अनन्त १२ सुवा १३ दयानिधि १४ घन मानइ १५ तुलसी १६ निवान १७ दाम १८ ब्रह्म १६ मणिदेश २० महादेन २१ अगवेग २२ हरिचन्द २३ चन्द्र २४ शेखर २५ अवापि २६ मंग२७ शिव ५८ दयाल २६ ललन ३०॥ इति ।। अन्योक्लिक कवित्त ।। १८२ ।। वेनीके मु देव भगवन्त द्विजदेव सेवी पद्माका अर्थ शम् चक्र पर पायो है । सुन्दर नवीन अग्त्स दालनन नाथ नौनि अनल देवन मुहायो दयानिधि बनानन्दिनलमीनि- १२२ ललनलहरी। १३ १ ३ ६ १२ वाजै दाल ब्रह्म मणिदेव महादेव जिन्ह आयो है। अजवेश हर चन्द्र शेखर अधारि गंग शिव सो दयाल देव दूजो ना गनायो है। इति॥ श्रीमहादेव प्रभाव वर्णन ॥ टीका ॥१०॥ ( कैसे महादेवजी महाराज हैं कि जिनको ) वह श्रेष्ठ सुन्दर स्वामी पृथिवी के देवता ब्राह्मणों को पूजनेकाले भगवान् ने कमल पुप्पसमूह से पूजकर महादेवजी से सुदर्शनचक्र वरदानमें प्राप्तकिया। (और फिर कैसे महादेव जी हैं ) उत्तम (व) पुनीत उंचीपदवी (व) पुत्र के देनेवाले स्वामी (व) नवो निदी और अथाह सुन्दर आनन्द के देनेवाले हैं।। (तथा ) कृपा के सागर अ- त्यन्त आनन्द स्वरूप जचे हैं (अस) सेवकोंपर कृपा करें व उद्धार कर हैं जिन को पूर्णब्रह्म सच्चिदानन्दने देवतों में शिरोमणि भारी देवता स्थापित किया है ।। अपूर्व स्वामी महादेव चन्द्रमा ललाट गंगाजी के धारण करनेवाले ( पम जो) सक्षम हैं विन्द सरीखा दया करनेवाला दूसरा देवता नहीं कहागया है ।। प्रसंगकविजनानु॥ अथ कविनामानि वर्णनानुमान ॥ १५ ॥ श्रीपति १ रघुराज २ ऋपिनाथ ३ कविराज ४ श्रीधर ५ सर. दार ६ सुमारख ७ आलम ८ दिन ९ पण्डित १० नरेन्द्र ११ छ- नियाल १२ परमेश १३ ललनेश (ब) लतून १ . पारन १५ इति ॥ अन्योक्लिकमवेया॥ १०३ ॥ ४६ १३ श्रीपति श्रीरघुराज करे ऋषि नाथ वही कवि राज करेंया। श्री ललनलहरी। १२३ ३३ १ ३ ६ ६ ९ धर औ सरदार मुमारख दा कुल आलम आश पुरैया। धौ दिन पंडित बोध नरेन्द्र सिंहौ छतिपाल सुमेरु सृजैया। वो परमेश सदा ललनेश प्रदा मुख पारस पुंज पुजैया ।। इति ।। श्रीगामचन्द्र प्रताप वर्णन ॥ टीका।। १०३ ॥ श्रीरामचन्द्र महाराजही धनवान कासकै हैं । लथा सल्ला में शिरोमाण व कवियों में प्रधान वोही करने वाले हैं ।। और मुखिया चिरंजीवों में लक्ष्मी के स्वामी समस्त संसार की मनसा पूरी कर देनेवाले (और मुमारख याने अचल आनंदका सुख ) देनेवाले हैं ॥ अथवा ब्राह्मण व ज्ञाता (व) बुद्धिमान साक्षर व विवेकी ब ढा व बलवान् व छत्रधारियों में शिरोमणि पैदा करनेवाले हैं। व पितारूपी परमेश्वर सदैव आनन्दरूपी पारस का समूह के मात करराय देनेवाले हैं।। इति ।। प्रसंगकविजनानु॥ अथ कविनामानि वर्णनानुमान ॥ २२ ॥ प्रेम १ मकरन्द २ वादेव ३ वीर ४ श्याम ५ रामनाथ ६ रस. खानि ७ राज महाराज देवकीनन्दन १. गिरिधरदास ११ विनोद १२ महाकवि १३ शिव १४ शेषजी १५ नरेश १६ म. एडन १७दिगपाल १८ मोदकवि १६ ललन २० सपणा २१ गोपाल २२ ।। इति ॥ अन्योकिक कवित्त ॥ १०४।। प्रेम मकरन्द सो पसन्द बलदेव वीर श्याम राम नाथ रमवानि निधि मोदके राजन के राज महराज देवकी दवा गिरिवर हा- २ २ ३ ललनलहरी। सनकी आश दा विनोदके ॥ महाकवि वानी शिव भुजगनेरश भनि मण्डनकरत दिग पालहू प्रमोदके । अवधललन भक्त भूषण गोपाल माहि भेद जौन मानें तासु नाशें सुख गोदके ॥ इति ।। श्रीरामचन्द्र व कृष्णचन्द्र महिमा वर्णन ।। १ २ ११ १७ १८ टीका ॥१०॥ शेषावतारी बलदाऊजीके भ्राता श्रीकृष्णाचन्द्र व श्रीरामचन्द्र जी स्वामी सर्वरसोंकेस्थल व आनन्द के सागर प्रीतिरूपी वासना सेही प्रसन्न होते हैं । राजन के राजा महाराजन के महाराजा देवकी के पुत्र गोवर्द्धन पर्वग के धारण करनेवाले सबकों की आनन्दरूपी कामना के देनेवाले हैं । महान कवि, सरस्वनी, महादेव, शेषजी वनकरने हैं व दशादिशानके पालक आन. न्दपूर्वक सिद्ध करते (व) मानते हैं ।। रामचन्द्रजी न दासों के आभू बाम शुण- चन्द्र में जोकोई फर्क समझताहै शिसके सर्वश्रानन्दभाग और गोदी के पुत्र विनाश हो जाते हैं ।। इति ।। दो० श्रीनन्हेमन गरके शिव भगीने रूपात ।। पितु ज्वालापरसादमम लम्बन नाम दिजगात ॥ १ ॥ इति श्रीखलनचन्द्रिकापरिनललनपियाशासारस्वत अष्टवंशमारदा जीकर वावाद मुहल्लामितचानिवामी हुमरी वनायकप्रसिद्ध कविविवितकवित्तलतिका सम्पूर्णव गुणम् ॥ L

Lalanchandrika

Title
Lalanchandrika
File name
Lalanchandrika
Text
OCR done
Language
Sanskrit
Pages
123
Library
Hindi Sahataya Samalayan
Classification
Literature
DLI number
486430
Barcode
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