Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Shri Gyanarnav Prakarn

Jaigani Shri Yashovi · 2010/01

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. ३ ४ our "गाथानुक्रमणिकाना पत्र पछीनुं अनुसंधान छे ." गाचादिपाद गायांक पत्र पंक्ति गाथादिपाव गायांक पत्र पक्ति गायाधिपाद गाथांक पत्र पक्ति अणुससमयमणंतरियं ३६८ ७९ २ | गंतुमसंखेजाओ ३८१ ८१ जइणेण पराधाओ ३९३ ८४ गहणावेक्खाए तओ ३६९ ७९ ३ भिन्नाई सुहुमयाये ३८२ ८१ बंधो वि वीससाए ३९४ ८१ १२ निसिरिज्जइ नागहियं ३७० ७९ जइणसमुग्धायगइए ३८३ ८१ १३ एगदिसमाइसमये ३९५ ८४ २७ गहणं मोक्खो भासाप्तमयं ३७१ ७९ १६ | पठमसमये चि यजओ ३८४ ८१ १४ ईहा अपोह वीमंसा ३९६ ८५ गहणं मोक्खो भासागहण ३७२ ७९ १६ | मंथंतरेहि तइये ३८५ ८१ १५ | होइ अपोहोऽवाओ ३९७ ८५ ८ गहणनिसग्गपयत्ता ३७३ ७९ २७ दिसिट्ठियस्स पढमी ३८६ ८१ २१ मइपन्नाभिणिबोहिय ३९८८५२ १ तिविहम्मि सरीरम्मि ३७४ ८० होइ असंखेजइभे ३९० ८२ '३ सव्वं वाभिणिबोहिय ३९९ ८५ २४ ओरालियवेउम्विय ३७५ ८० कत्थइ देसम्गहणं ३८८८३ < उग्गहणमोहो ति य ४०० ८६ सच्चा हिया सतामिह ३७६ ८० १२ चउसमयमज्झगहणे ३८७ ८३ ११ अवगमणमवाओत्ति य ४०१ ८६ अर्णाहगया जा तीसु वि३७७ ८० १३ चउसमयविग्गहे सनि ३८९ ८३ १३ तं पुण चउन्विहं नेय ४०२ ८६ १३ कइहि समयेहि लोगो ३७८ ८० ३९१ ८ आएसोत्ति पगारो ४०३ ८६ २७ चउहि समयेहिं लोगो ३७९ ८० ३५१ ८३ २५ खेत्तं लोगालोगं ४०४ ८६ २८ कोइ मंदपयत्तो ३८० ८१ न समुग्घायगइये ३९२ ८४ आएसोत्ति व सुत्तं ४०५ ८७ ARRESS ur ४ १९ | आपूरियम्मि लोगे २० | भासासमसेंदोओ 4 २ १ मर - प्रत्यक्षपरोक्ष- RE भेदेन ज्ञान. हैविध्य, व्यु- तत्त्यनुसा- रेण प्रत्यक्ष- लक्षणम्,गौ- तत्प्रत्यक्षं परोक्षं च, प्रत्यक्षं त्वक्षमात्रजम् ॥ यत्त्विन्द्रियोपलब्धिस्त-त्तन्न, यत् स्पष्टतैव सा ॥ ३॥' तद्ज्ञानं द्वेधा,प्रत्यक्षं परोक्षं चेति,तत्राभुत व्याप्नोति ज्ञानात्मना सवार्थान् , अश्नाति स्वःसमृद्धयादीन्, पालयति भुङ्क्ते वेति 'उणादिनिपातनाद्'अक्षो जीवस्तं प्रति साक्षाद्गतमिन्द्रियनिरपेक्षं वर्तते यत् तत्प्रत्यक्षम् । आह च-"जीवो अक्खो अत्थव्वा वणभाषणगुणनिओ जेण ॥ तं पइ वट्टइ नाणं, जं पच्चक्खं तयं तिविहं ॥ ८९ ॥ ति॥"[जीवोऽक्षोऽर्थव्यापन-भोजनगुणान्वितो येन ॥ तं प्रति वर्तते ज्ञानं, यत्प्रत्यक्षं तत्रिविधम् ] । इत्थं चेदं व्युत्पचिनिमिचमेव । नैश्चयिकं प्रवृत्तिनिमित्तं तदेव च लक्षणम्, 'उत्पत्ताविन्द्रियमनोनिरपेक्षत्वम्' पर्यवस्यति । तेनावध्यादेः क्षयोपशमभावापन्नकर्मपुद्गलजन्यत्वेऽपि तस्य न क्षतिर्वस्तुतस्त- दे॒तोरितिन्यायात्स्वाभिन्नगुणजन्यत्वमेव तस्य । तेन न वक्ष्यमाणपरोक्षलक्षणातिव्याप्तिरिति ॥ एवं च 'आत्ममात्रजन्यत्वम् इति यथाश्रुतमेव ज्यायः। न च सांव्यवहारिकप्रत्यक्षेऽव्याप्तिस्तस्यालक्ष्यत्वाचत्रोपचारेणैव प्रत्यक्षत्वव्यवहाराद्, न हि वाहीको गोव्य- वहाराद् गौरेवायत्त्विन्द्रियोपलब्धिः प्रत्यक्षमित्यक्षपादमतानुयायिनःप्रचक्षते तन्न, इन्द्रियाणामचेतनत्वेनोपलब्ध्य- भावात्तद्विगमेऽपि तदुपलब्धार्थस्मरणनात्मन एव ज्ञातृत्वात् ॥ उक्तञ्च-"कसिंचि इंदिआई, अक्खाइं तदुवलद्धि पञ्चक्खं ॥तन्नो ताई जमचेअणाई, जाणंति ण घडो व्व" ॥९१॥ [ केषाञ्चिदिन्द्रियाणि, अक्षाणि तदुपलब्धिः प्रत्यक्षम् ॥ तन तानि यदचेतनानि, जान- न्ति न घट इव] उवलद्धा तत्थाया, तविगमे तदुवलद्धसरणाओगेहगवक्खोवरमेवि तदुवलद्धाणुसरियाव॥९२॥त्ति'[उपलब्धा तत्रा- त्मा,तद्विगमे तदुपलब्धस्मरणात्।। गेहगवाक्षोपरमेऽपि,तदुपलब्धानुस्मर्तेव] अथेन्द्रियजन्यज्ञानमेव प्रत्यक्षमिति तदपिन समीचीनम्, तस्य परजन्यत्वेनाऽतथात्वात्, न चेन्द्रियजन्यज्ञानत्वमेव प्रत्यक्षत्वं अवध्यादौ तु तदौपचारिकमिति वाच्यम्, लिङ्गाद्यजन्य- तमसम्मताया इन्द्रियोप- लब्धेः तत्त्वं खंडितम् एवामन्द्रिय- 13 जन्यज्ञान- SH त्वस्य च ॥

SEX ॥ सविवरण श्रीज्ञानार्णव तथा ज्ञानविन्दु अंगे प्रकाशकीय निवेदन ।। + ज्ञानपीयूपपिपासु सहृदय सौजन्यशालि विद्वानोना करकमलमा प्राप्त थतो एक जैन ज्ञानकोषोना भूगर्भमा छुपाइ रहेल अणमोल रत्न तुल्य स्वोपज्ञ विवरण समेत श्री ज्ञानार्णव नामनो आ प्रकरणग्रंथ प्रतिभाप्रभावथी पूर्व श्रुत. केवली भगवंतोनी स्मृति करावनार अनेक लक्ष श्लोकोप्रमाण ग्रंथोना प्रणेता, भवविरहाकविभूषित चौदसो चुम्मालीश ग्रंथ. प्रासादोना सूत्रधार भगवान् श्रीहरिभद्रसूरिजीना लघु बांधव तरीके ख्याति पामेला, न्यायविशारद, न्यायाचार्य, कूर्चाल- सरस्वती विरुदधारक महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराजे रचलो छे. ते निर्विवादनिर्णीत सिद्ध वस्तु आ ग्रन्थने मंगलपद्य "ऐन्दवीं तां कलां स्मृत्वा, धीमान्यायविशारदः । ज्ञानार्णवसुधास्नानपवित्राः कुरुते गिरः॥१॥" तथा प्रथम तरंगना अन्तिम प्रशस्तिपद्य 'प्रौढिं ये पियुधेपु जीतविजयप्राज्ञाः । परामैयरु-स्तत्सातीर्थ्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः श्रयन्ति श्रियम् ॥ तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानार्गवे निर्मिते, पूर्णो माष्यवचोमृतैरतितरामायस्तरङ्गोऽभवत् ॥२॥” तथा तेओश्रीना पोताना ज रचेला शास्त्रवार्तासमुच्चयवृत्ति,स्याद्वादकल्पलता, न्यायालोक, ज्ञानबिन्दु विगेरे अनेक ग्रन्थोमा "अधिक मत्कृतज्ञानार्णवा- दवसेयं" इत्यादि वाल्यो पूर्ण साक्षि आपे छे. वळी प्रायः एकाद ग्रंथ अपवादरूप बाद करी तेओश्रीना सर्व ग्रंथोनो BHARASHTRANSRIES .

AR
निवेदनम्॥
प्रकाशकीय
॥१॥
FREERSIR
प्रारंभ ऐंकार पद(सरस्वती बीजक)थी थाय छे तेम आ ग्रंथमा देखातुं होवाथी आ ग्रन्थ तेओश्रीनो ज छे ते निःसंदेह छे.
अर्णव-समुद्र जेम घणा तरंगोथी विभूपित होय छे तेम आ ज्ञानार्णवमा पण ग्रंथकार भगवते अनेक तरंगोनी रचना करी
छे, जो के आज ज्ञानार्णव नामनो एक ग्रंथ दिगम्बरीय साहित्यमा शुभचंद्राचार्थे रचेलो विद्यमान छे अने ते मुद्रित पण
छ, परंतु तेमां कलिकालसर्वज्ञ भगवंत श्रीहेमचंद्रसूरिजीनिर्मित योगशास्त्रना प्रकाशोनी जेम मुख्यतया योगस्वरूप विगेरेर्नु
निरूपण होवाथी तेने योगार्णव-योगप्रदीप-ध्यानशास्त्र विगेरे नामोथी ओळखाववामां आव्यो छे, ज्यारे आ श्री ज्ञानार्णव
प्रकरणY ग्रन्थान्तर्गत अभिधेयने अनुसरतुं ज निःशंक यथार्थ नाम राखवामां आव्युं छे. प्रस्तुत ग्रन्थकारे एक ज्ञानविन्दु नामर्नु
प्रकरण पण रच्यु छ, जे आ साथे संयुक्त छे तेमा सामान्यतः चार ज्ञानोनुं निरूपण करी मुख्यत्वे केवळज्ञान केवळदर्शनना
विषयमा सम्मति गाथाओना अनुसारे अभेदपक्षनुं समर्थन कर्या बाद नयभेदथी विचारो आपतां शासनप्रभावक धुरंधर श्री
सिद्धसेन दिवाकरजी, श्रीमल्लयादिजी, श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमणजी ए त्रणेय प्रभावक आचार्यभगवंतोना विचारोनो समन्वय
कयों छे. आ ज्ञानार्णवमा पांचेय ज्ञानोनो यथार्थ तत्वरूप केवळ अमृत प्रवाहज भरेलो छे. आज्ञानार्णव ग्रंथर्नु अगाध गांभीर्य
माहात्म्य यथार्थ वर्णवq ते विशालू अटवीनो पगथी चाली पार लेवा इच्छता पांगळा माणसनी जेम अमो पामरनी बुद्धिने
अगोचर छ. आ ग्रंथर्नु अगाध अर्थ गांभीर्य स्वरूप जाणी पोतेज स्वोपज्ञ विवरण रच्युं छे.
परम खेदनो विषय तो एटलो ज के आ ग्रंथ वचमां वचमां तेमज अंतभागमा त्रुटितरूपे उपलब्ध थयो छे. साथे परम हर्ष
स्थान ए छे के-हजु पण भन्यजीवोना परमभाग्योदये शासनस्तंभ समा पूर्वना महापुरुषोए रचेला जगदुपकारक शासन-
करनSHARETTERSRURRE
REAS
॥१॥

प्रभावक अबाधित ग्रंथो विश्वमा विद्यमान छ जेना आलम्बनथी पुण्यात्माओ आत्मकल्याणना मार्गे प्रवर्ती रह्या छे. हालमां यावदुपलब्ध सविवरण आ प्रकरण प्रकाशित कयुं छे. आ ज्ञानार्णवनो प्रथम तरंग जे पत्र २७ मे पूर्ण थयो छ ते तो श्री संघना प्रबळ पुण्योदय परिपूर्ण अखंड छे, बीजा तरंगना सविवरण १६ पद्यो सुधी पण अखंड छे. सत्तरमा पद्यना विवरणांशथी २४ मा पद्यना विवरणांश सुधी खंडित छे. सहृदय सुज्ञ वांचकोने अर्थानुसंधानमा क्षति न थाय ते खातर तेमना प्रणीत न्यायालोक ग्रंथ विगेरेथी ते भाग संयोजित करी यथामति संगत कयौँ छ, जे संयोजित पाठ ३५ मा पत्रना वीजा पृष्ठनी पंक्ति अग्यारथी ३७ मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी बीजी पंक्ति सुधी [ ] आवा काटखुण कौंसथी चिन्दित करी आ पुस्तकमा छपायेल छे तेवीज रीते ज्यां ज्यां संयोजित पाठो जोडवामां आव्या छे त्या त्या सर्वत्र ते ज प्रमाणे काटखूण काँसमां दाखल कर्या छे तेज बीजा तरंगना चालीसमा पद्यना चोथा चरणना 'यदृष्टं' ए पदथी प्रारंभी वीजो आखोय तरंग अने जीजा तरंगना चोथा पद्यना विवरणांश सुधीनो खंडित भाग विशेषावश्यक महाभाष्यनी गाथाओ तथा तेना विवरणानुसारे योजित कर्यो छे ते भाग ४७ मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी आठमी पंक्तिथी प्रारंभी ६० मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी वारमी पंक्ति सुधी जोडवामां आव्यो छे. वळी त्रीजा तरंगना २० मा पद्यना विवरणांशथी २९ मी गाथाना विवरणांश सुधी खंडित छे से पण एकोवेरमा पत्रना प्रथम पृष्ठनी वारमी पंक्तिथी प्रारंभी व्याशीमा पत्रना प्रथम पृष्ठनी आठमी पंक्ति सुधी जोडयो छे. ते पछी तेत्रीशमा पद्यना विवरणांशथी आगळनो सर्व ग्रंथ खंडितज छे ते स्थाने दिशासूचन मात्र पंचाशीमा पत्रना बीजा पृष्ठनी नवमी पंक्तिथी प्रारंभी सत्याशीमा पत्रना प्रथम पृष्ठ संपूर्ण सुधी अर्थसूचक पाठ जोड्यो छे. कुल ६० पृष्ठप्रमाण योजित पाठ छे

.
निवेदनम् ।।
प्रकाशकीय
|॥२॥
आ मुद्रित ८७ पत्र एटले १७४ पृष्ठ प्रमाण ग्रंथ भागमा मतिज्ञान प्ररूपणा पण अधूरी रही छे. शेष श्रुतज्ञानादि प्ररूप.
णानो तो अव्यक्त गंध पण आवी शक्यो नथी जथी तेना जिज्ञासुओनी तत्ववोधेच्छा पूर्ण करवाने पूज्यचरण तेओश्रीन प्रणीत
ज्ञानार्णव पीयूषना विन्दुतुल्य (आपणा माटे तो ते पण अर्णवांशज छे) ज्ञानबिन्दु नामर्नु प्रकरण जोडवामां आव्युं छे. आ बेउ
ग्रंथमा आवतो विषय प्रतिपृष्ठ आपेल होवाथी जुदो प्रयास कर्यो नथी.मात्र एकज प्रति उपरथी छपाएल आ ग्रन्थोना संशोधनमा
पूज्य मुनिमहाराज श्री शिवानन्दविजयजी विगेरेए यथाक्षयोपशम प्रयास को छे. शुद्धिपत्रक आप्युं छे. छतां पण
छगस्थ जीवोने भूल थवी सुलभज छे, विगेरे कारणोथी टाइपोना वर्णोना स्थानथी खसी जवाना कारणथी, इस्व, दीर्घ,
इकार, एकार, ऐकार, ओकार, औकार रेफ विगेरेनी उपरनी पांखडीओ खसी जवाथी तेम ज ध+ध,-प+प-ब-व-म+भ-य-थ
विगेरे प्रायः समान आकृतिवाळा वर्णोना फेरफार थई जवा विगेरे कारणोथी थएली अशुद्धिओ विद्वान् पुरुषो सुधारी पांच
अने ते बदल अमोने श्री संघ क्षमा आपशे, तेम श्रीं श्रमण संघ पासे नम्रभाव क्षमा प्रार्थनापूर्वक आ निवेदन पूर्ण
करवामां आवे छ.
+
लि. श्रीसंघचरणकमलोपासिका
श्री जैन ग्रंथप्रकाशक सभा-राजनगर
(अमदावाद)
॥२॥

R . ९ ८७ ७ ७ २ < ज्ञानार्णववृत्तिगतानां योजितपाठगतानां च साक्ष्योद्धृतानां भाष्यगाथानामनुक्रमः। (पंक्तिसंख्यांका द्वयोः पृष्ठयोः सम्मील्य कृतः ॥) गाधादिपाद. पापांक पत्र पक्ति गाथादिपाद गाथांक पत्र पक्ति गाथादिपार गायांक पत्र पंक्ति जं सामिकाल कारण' १२ / जमभिणिबुज्झइतमभिणि ९८ ६. २२ कज्जतया णउ कमसो ११० ९ मइपुवं जेण सुयं ८६ २१ सुयकारणं जओ सो ९९ ६ २४ दव्वसुअं मइपुव्वं । १११ ९ २२ कालदिवजयसामि २२ जइ सुअजक्खणमेयं १०१ १३ दव्वसुअं बुद्धीओ ११२ ९ २५ अंते केवलमुत्तम ८ १ २३ भावसुय भासासाय १०२ १५ भावसुअं मइपुवं ११२ १० जीवो अक्खो मत्थव्या ८९ २ जह सुहमं भाविदिय १०३ १७ सुअविनाणप्पभवं ११३ १० के सिं चि इदियाई ९१ एवं सवपसंगो १०४ २८ अविसेसिया मइच्चिय ११४ १० २२ उवलद्धा तत्थाया ९२ २ १२ मइपुवं सुयमुत्त १०६ < २० सदसदविसेसणाओ ११५ ११ इंदियमणोणिमित्तं ९३ १७ | पूरिज्जइ पाविज्जइ १०६ भेयकयं च विसेसण ११६ १२ १० एगंतेण परोक्खं । ९५ नाणाणण्णाणाणिय १०७ इदियविभागभो वा ११६ १२ १४ सामिताइविसेसा ९६ ३. इह लद्धिमइसुयाई १०८ ९ सोइंदिओवलद्धी होइ ११७ १२ इंदियमणोनिमितं जे १०० सोऊण जा मई इभे १०९ ९ ( पूर्वगत गाथा) mr न ७ ७ २ १० ३ < २२ २ ४ RRISR913 ४ v २८ ५ १ १५ می भाष्य- १४ गाथानुक्रमः १ एतद्ग्रन्थ- स्थविशेषा- वश्यक ॥३॥ २५ ४ می ५ TEACECRETRISRO जे सुअबुद्धिघिट्ट १२९ १५ २१ कत्तो एत्तियभेत्ता १४० १८ इयरत्यवि होज सुअं १२८ १६ पण्णवणिजा भावा १४१ १८ १६ इयरत्यवि भावसुये १३० १६ जं चोद्दसपुबधरा १४२ १८ सह उवलद्धीए वा १३१ १६ अक्खरलंभेण समा १४३ १८ २७ केइ बुद्धिद्दि १३२ १६ १७ जे अक्खराणुसारेण १४४ १९ कि सदो मइरुभयं १३२ १६ २४ केइ अ भासेजंता १४५ १९ १२ सद्दो ता दव्वसुअं १३३ १६ २५ किह मइसुअनाणविउ १४६ १९ १२ भासापरिणइकाले १३४ १७ सामन्ना वा बुद्धी १४७ १९ २४ इयरत्थ वि मइनाणे , १३६ १७ ११ मइसहियं भावसुअं १४८ १९ २५ अहव मइ दव्वसुअ १३६ १७ १७ जे भासइ एयं तअं १४९ २० इयरम्मि वि महनाणे १३७ १७ १९ एवं धणिपरिमाणं १५० २० कह मइसुओक्लद्धा १३८ १८ १० इयरं ति म्इन्नाण १५१ २० १३ तीरति ण वोत्तुं जे १३९ १० ११ ११ | अभिलप्पाणभिलप्पा १५२ २० १५ सो ओवलहि जइ सुयं ११८ १२ २४ सोइंदिनोबलद्धी चेव १२२ १३ के ई बिंतस्स सुर्य ११९ १३ किवा नाणेहिगये १२० १३ १० भणओ सुणओ व सुअं १२१ १३ ११ तु समुच्चयवयणाओ १२३ १३ २६ पत्ताइगये सुयका १२४ १४ भावसुअमक्खराणं १२५ १४ १३ जइ सुअमक्खरलाभो १२५ १४ १६ सो वि हु सुअक्खराणं १२६ १५ दवसुअं भावसुअं १२७ १५ बुद्धिद्दिढे अत्थे १२८ १५ । १३ ( पूर्वगतगाथा) سہ २२अर १ w ६ ५ २ जं भासइ तंपि जओ १५३ २० अन्ने मन्नंति मइ १५४ २२ भावसुआभावाओ १५५ २२ कप्पेज व सो भाव १५६ २२ असुयश्वरपरिणामा १५७ २२ इह इं जेणाहिगओ १५८ २२ ण व दवभावमेत्तेवि १५८ २३ जह वग्गा सुबत्तण १५९ ३३ अह उवयारो कीरइ १६० २३ भावसुयं तेण मइ १६१ २३ भन्ने अणक्खरक्खर १६२ २३ जइ मइरणक्खरच्चिय १६३ २३ सुयनिस्सियधयणाओ १६४ २४ ४ १७ अह सुयओ विविवेगं १६५ २४ २० १४ | मइकाले वि जइ सुर्य १६६ २४ २२ १६ जइ सुयनिस्सियमक्खर १६७२४ २४ २३ भरनित्थरणसमत्था ९४३ २४ २८ २४ जइ तं सुयेण ण तओ १६८ २५ २६ पुबि सुयपरिकम्मिअ १६९ २५ उभयं भावक्खरओ १७० २५ सपरपञ्चायणमो १७१ २६ ३ सुयकारणं ति सदो १७२ २६ न परप्पवोहयाई १७३ २६ २५ दव्वसुअयसाहारण १७४ २६ २७ २७ सा वा सद्दत्थो चिय १७५ २६ २८ मइसुअनाणविसेसो १७६ २७ २४ उग्गहइहवाओ य १७८ २८ अत्थाणं उग्गहणं १७९ २८ १५ सामण्णत्थावग्गहण १८० २८ १७ सामन्नविसेसस्स वि १८१ २८ २५ ईहा संसयमेत्तं १८२ २९ जमणेगत्थालंबण १८३ २९ तं चिय सयथहेऊ १८४ २९ केइ तयन्नविसेसा 16५ २९ २७ कासइ तयन्नवइरेग १८६ ३० सव्यो वि य सोवाओ १८७ ३० ४ काणुवओगंमि घिई १८८ ३० २८ नणु सावायव्भहिया १८९ ३१ ते इच्छंतस्स तुई १९. ३१ १२ NPUR ६ ६ ९ ६ ९९ १५ १४ २३ २५ भाष्य- गाथानुक्रम एतद्ग्रन्थ स्थविशेषा- वश्यक ॥४॥ ९ २ - २. ६ ९ २६ N तुझं बहुअर भेया १९१ ३१ १५. ता भिन्नलवखणा वि हु१९२ ३१ १७ तत्थोग्गही दुरूवो १९३ ३१ २४ वंजिज्जइ जेणत्थो, १९४ ३२ अन्नाणं सो बहिरा १९५ ३२ तकालंमि वि नाणं १९६ ३२ जइ वन्नाणमसंखेज २०० ३२ जं सबहा ण वीसुं २०१ ३२ समुदाये जइ नाणं २०२ ३२ २१ ततू पडोश्यारी २०३ ३२ २२ कहमवत्त नाणं १९७ ३३ लक्खिज्जइ तं सिमिणा १९८ ३३ जग्गतो वि न याणइ १९९ ३३ १४ १४ १८ २२ नयणमणोवजिदिय २०४ ३३ जुज्जइ पत्तविसयया २०५ ३३ पात्रति सद्दगंधा २०५ ३३ जंते पोग्गलगइया २०६ ३४ धूमोव्व संहरणओ २०७ ३४ गेइंति पत्तमत्थं २०८ ३४ लोयणमपत्तविसयं २०९ ३५ उज्झेज पाविउ रवि २१०. ३५ गंतुं ण स्वदेस २११ ३५ जइ पत्तं गेण्वेजउ २१२ ३६ गंतु नेएण मणो २१३ ३७ नाणुग्गहोवघाया २१४ ३७ दव्वं भावमणो या २१५ ३७ सबगो ति य वुद्री २१६ ३७ सन्नवासव्वग्रहण २१६ ३९ दरमणो विन्नाया २१७ ४२ करणत्तणओ तणुसं २१८ ४२ नजइ उवघाओ से २१९ ४२ जइ दव्वमणोतिबलो २२० ४२ नीउं आगरिसिउं वा २२२ ४२ सो पुण सयमुवधायण २३३ ४२ इट्टाणिट्ठाहार २२१ ४३ सिमिणो ण तहाख्वो २२४ ४३ इह पासुत्तो पेच्छइ २२५ ४३ दीसन्ति कासइ फुडं २२६ ४४ न सिमिणबिन्नाणाओ २२७ ४४ ९ २४ ८ RISARGIRIRE १० १५ १७ ४ Mr ६ १ our ॥४॥ k हूँ २२ wr. w सिमिणे वि सुरयसंगम २२८ ४४ सो अन्झवसाणकओ २२९ ४४११ सुरयपडिवत्ति रइसुह २३० ४४ १२ नणु सिमिणगओ वि कोइ २३१ ४ ४ २० जं पुण विन्नाणं तप्फलं २३२ ४४ देहप्फुरणं सहसोइयं च २३३ ४४ २९ सिमिणमिव मन्नमाणस्स २३४ ४५ पोग्गलमोअगदन्ते २३५ ४७. जह देहत्थं चक्खु २३५ ४७ विसयमसंपत्तस्स वि २३७ ४७, १९ समयेमु मणोडव्वाई २३८ ४७ २० देहादणिग्गयस्स वि २३९ ४७ २७ गिज्झस्स जणाणं २४० ४८ तद्दसचिंतणे होज २४१ ४८ १३ समये समये गिण्हइ २४२ ४८ २१ होइ मणोवावारो २४३ ४८ २३ नेयाउ च्चिय जं सो २४४ ४९ १२ जह नयणिदियमपत्त २४५ ४९ २१ विसयपरिमाणमनियय २४६ ४९ २६ अत्थगहणेसु सुज्झइ २४७ ५० कम्मोदयओ व सहा २४८ ५० ११ सामत्थामावाओ २४९ ५.०. १९ तोए ण मल्लगं पिव २५० ९० २८ दव्वं भाणं पूरिय २५१ ५१ सामन्नमणिदेसं २५२ ५१ ११ सद्देत्ति भणइ वत्ता २५३ ५१ २० जइ सद्बुद्धिमेत्तय २५४ ५२ थोवमियं नावाओ २५५ ५२ इय सुवहुणादि काले २५६ ५२ १८ कि सदो किमसद्दो २५७ ५२ २४ किं तं पुत्र गहियं २५८ ५३ अत्थोग्गहओ पुवं २५९ ५३ जइ सहोत्ति न गहियं २६० ५३ सव्वत्थ देसयंतो २६१ ५३ २० अहवसुए च्चिय भणिय २६२ ५३ २४ अहव मइ सुव्वं चिय २६३ ५४ अधि तयं अव्वत्तं २६१ ५१ अत्थोत्ति विसयगहणं २६५ ५४ १३ जेणत्थोग्गहकाले २६६ ५४ २० १ ५ म ३ ७ می ३ भाष्यगाथा- नुक्रमः॥ एतद्ग्रन्थ स्थविशेषा- वश्यक ॥५॥ ११ ५ सामण्णतयण्णविसे २६७ १४ २४ खिप्पेयराइभेओ २८० ५७ १६ । थाणुपुरिसाइकुठु २९३ ६२ १५ अण्णे सामण्णग्गह २६८ ५५ स किमोग्गहोत्ति भण्णइ २८१ ५७ २७ एवं चिय सिमिणाइसु २९४ ६३ १३ तदवत्थमेव तं पुव २६९ ५५ सामण्णमेत्तगहणं २८२ ५८ १२ | उकमओऽइक्कमओ २९५ ६३ भत्थोग्गहो न समयं २७० ५५ ११ सो पुणरीहावाया २८३ ५८ १२ | ईहिज्जइ णागहियं २९६ ६३ १३ एगो वाऽवाओ च्चिय २७१ ५५ १२ तत्तोणेतरमोहा २८४ ५८ १३ । एत्तो चिय ते सव्वे २९७ ६३ १५ सामण्णं च विसेसो २७२ ५५ १३ सव्वत्थेहावाया २८५ ५८ ૨૨ अब्भत्थेवाओ चिय २९८ ६३ १८ केइदिहालोयणपुव्व २७३ ५६ तरतमजोगाभावे २८६ ५९ उप्पलदलसयवेहे व्व २९९ ६४ तं वंजणोग्गहाओ २७४ ५६ सदोत्ति य सुयभणिय २८७ १९ सोइंदियाइभेएण ३०० ६४ अत्थोग्गहो विजवं २७५ ५६ १५ खिप्पेयराइभेओ २८८ ५९ ८ | अठ्ठावीसइभेयं एयं ३०१ ६४ १० तं च समालोयणम २७६ ५६ २१ इय सामण्णग्गहणा २८९ १९ २० केइत्तु वंजणोग्गह ३०१ ६४ २० आलोयणत्ति नाम २७७ ५६ २६ । महुराइगुणत्तणओ महुराइगुणत्तणओ २९० ६. अस्सुयणिस्सियभेयं ३०२ ६४ २० गहियं व होउ तहियं २७८ ५७ वयणतरं तयत्था २९१ ६. चउवइरित्ताभावा ३०३ ६४ ૨૨ मत्थानग्गहसमये २७९ ५७ सेसेसु वि इवाइसु २९२ ६२ ११ । किह पडिकुकुडहीणो ३०४ ६४ २४ RRESSISTAN २ ९ ५ ९ SPE ३ ६ HARASH ७ H ૧૨ FRIE: " २५ जह उग्गहाइसामा ३०५ ६५ अठ्ठावीसइभेयं सुय ३०६ ६५ जं बहुबहुविहखिप्पा ३०७ ६५ १८ नाणासद्दसमूह ३०८६६ १५ खिप्पमचिरेण तं चिय ३०९ ६६ १६ एत्तो चिय पडिववखं ३१० ६६ १८ निस्सिये विसेसो वा ३१० ६६ २० एवं बज्झन्भंतर ३११ ६७ इह संसयादणंत ३१२ ६७ १० नणु संदिदे संसय ३१३ ६७ ११ इह सज्झमोग्गहाइ ३१४ ६७ ૨૨ तहविणाम अब्भुव ३१४ ६८ १० ३१५ ६८ १० ४ ७१ इह वत्युमत्यवयणा ३१६ ६८ ११ | विवरीयवत्युगहणे ३३० ७१ अहवा ण सव्वधम्मा ३१७६८ जइ सो वि तस्स धम्मो ३३१ ७१ १९ जइ एवं तेण तुइ ३१८६८ १९ जोग्याजोगाविसेस ३३२ ७१ २. एगं जाणं सव्व ३२० ६९ काले सिक्खइ नाणं (वृत्ति) १७१ जे संसयाइगम्मा ३२१ ६९ १२ काले य भत्तपाणं २ ७१ २५ पज्जायमासयन्तो ३२२ ६९ १३ एवं समायरन्तो ३ ७१ निण्णयकाले विजओ ३२३ ६९ १८ सयलसुरासुरपणमिय २६ कट्ठयरं वन्नाणं ३२४ ६९ २० सत्तट्ठभवगहण ५ ७१ २७ अहवा जहिंदनाणो ३२५ ७० १५ तत्थ य जरजम्मणमरण, ६ ७१ २८ तुल्लमिणं मिच्छस्स वि ३२६ ७० १९ उग्गहो एक समय ३३३ ७२ जनिण्णओवओगे वि ३२७ ७० २. अत्थोग्गहो जहन्नो ३३४ ७२ १२ अहवा जह सुयनाणा ३२८ ७९ २८ ३३५ ७२ २२ एसा सम्माणुगया ३२९ ७१ पुढे सुणेइ सदं ३३६ ५२ २३ ४ R RECORRECRUS सोत्तापूर्ण पत्ताइ वत्युस्स देसगमग ३ भाष्यगाथा- १६ नुक्रमः ॥ एतद्ग्रन्थ स्थविशेषा- वश्यक ॥६॥ ३ ७४ १७ १८ ५ २७ १९ १२ ६ ५ ७ RSTURE ." पुढे रेणुं व तणुंमि ३३५ ७२ २४ बहुसहुमभावुगाई ३३८ ७२ २५ फरिसागंतरमत्त ३३९ ७३ २६ जेणं जया मणूसा (टोका)१ ७३ परमाणू तसरेणू २ ७३ उस्सेदंगुलमेरो ३ ७३ आयंगुलेण वत्थु ४ ७३ अप्रत्तकारि नयणं ३४० ७३ नणु भणिय मुस्सयंगुल ३४१ ७३ १७ जं तेण पंचधणुसय ३४२ ७३ इंदियमाणे वि तयं ३४३ ७४ तणुमाणं चिय तेणं ३४४ ७४ १२ सीयालोससहस्सा (टोका)१७४ १६ ८ एगवीस खलु लक्खा , २ ७४ १९ इति नयणविसयमाणं २० लक्खेहि एकवीसाए ३४५ ०४ २६ नयणिंदियस्स तम्हा ३४६ ७४ अंजह सुत्ते भणियं १(टो०) ७५ सुत्ताभिप्पाओऽयं ३४७ ७५ वारसहितो सोतं ३४८ ७५ १४ दव्याणमंदपरिणा ३४९ ७५ संखेजइभागाओ ३५० ७५ २० भासासमसेढीओ ३५१ ७६ सेढी पएसपंती ३५२ ०६ ९ मासासमसेठिओ ३५३ ७६ ९ अणुसेढिगमणामो ३५४ ७६ १२ १५ २४ ३६१ ७७ गिण्हइ य काइएणं ३५५ ७६ गिहिज्ज काइएणं ३५६ ७६ बाया न जीवजोगो ३६७ ७६ अह सो तणुसंरंभो ३५८ ७६ कि पुण तणुसरंभेण ३५९ ७७ तणुजोगो च्चिय मणवइ ३६० ७७ तुल्ले तणुनोगत्ते कायकिरियाइरितं ३६२ ७७ अहवा तणुजोगाहिय ३६३ ७८ तह तणुवावाराहिय ३६४ ५८ जह गामाओ गामो ३६५ ८८ केइ एगतरिय आह सुये चियनिसिरइ ३६७ ७९ SSISPEERASHASAIRS ४ ७ ५ १० ॥६॥ .

स्याद्वाद
महात्म्य
पद्यकुसु.
माजलि
॥ स्याद्वादकल्पलतान्तर्गतस्याद्वादमाहात्म्यतपद्यकुसुमाञ्जलिः॥
व्यालाश्चेद् गरुडं प्रमर्पिगरलज्वाला जयेयुर्जवाद्, गृह्णीयुर्द्विरदाश्च यद्यतिहठात् कण्ठेन कण्ठौरवम् ।
सूरं चेत् तिमिरोत्कराः स्थगयितुं व्यापारयेयुर्बलं बघ्नीयुर्वत दुर्नयाः प्रसृमराः स्याद्वादविद्यां तदा ॥१॥
नयाः परेषां 'पृथगेकदेशाः, क्लेशाय नैवाईतशासनस्य । सप्ताचिषा कि प्रसृताः स्फुलिङ्गा, भवन्ति तस्यैव पराभवाय ॥ २ ॥
एक छेकधिया न गम्यत इह न्यायेषु बाह्येषु यो, देशप्रेक्षिषु यश्च कश्चन रसः स्याद्वादविद्याश्रयः ।
यः प्रोन्मीलितमालतीपरिमलोद्गारः समुज्जृम्भते, स स्वैरं पिचुमन्दकन्दनिकरक्षोदाद् न मोहावहः ॥३॥
अभ्यास एकः प्रसद्विवेकः स्याद्वादतत्त्वस्य परिच्छिदाप्यः । कपोपलाद् नैव परः परस्य निवेदयत्यत्र सुवर्णशुद्धिम् ॥४॥
माध्यस्थ्यमास्थाय परीक्ष्यमाणाः क्षणं परे लक्षणमस्य किञ्चित् । जानन्ति तानन्तिमदुर्नयोत्था कुत्रासमा द्राक कुटिलीकरोति ॥५॥
अतो गुरूणां चरणार्चनेन कुवासनाविघ्नमपास्य शश्वत् । स्याद्वादचिन्तामणिलब्धिलुब्धः प्राज्ञः प्रवर्तेत यथोपदेशम् ॥ ६॥
चार्वाकीयमतावकेषिषु फलं नैवास्ति बौद्धोक्तयः, ककन्धूपमितास्तु कण्टकशतैरत्यन्तदुःखप्रदाः ।
उन्मादं दधते रसैः पुनरमी वेदान्ततालद्रमाः, गीर्वाणगुम एवष) तेन सुधिया जैनागमः सेव्यताम् ॥ ७॥
न काकैश्चावकि सुगततनयैर्नापि शशकैर्वकैद्वितज्ञैरपि च महिमा यस्य विदितः।
मरालाः सेवन्ते तमिह समयं जैनयतयः, सरोज स्थाद्वादप्रकरमकरन्दं कृतधियः
॥८॥
कचिद् भेदच्छेदः क्वचिदपि हताऽभेदरचना क्वचिद् नात्मख्यातिः क्वचिदपि कृपास्फातिविरहाः।
कलङ्कानां शङ्का न परसमये कुत्र १ तदहो! श्रिता यत् स्याद्वादं सुकृतपरिणामः स विपुल: ॥ ९॥
CRORERecr
॥ ७॥

૦-૪ ૨૦ ૦-૪ -------- ૫૦૦ - શ્રી જૈન ગ્રન્થ પ્રકાશક સભા પ્રકાશિત ગ્રન્થ - ૧ હરિભદ્રાષ્ટકત્તિ ૩૩ સંવાદ-પાઠમુક્ત ૧૨ હૈમધાતુમાલા ૩૧થી ૩૪ ભાષારહસ્ય પ્રકરણ ટીક, ચમવિ- વૃત્તિ ડે પેપર ૩-૦ ૧૩ જૈનત પરીક્ષા શિક વ્યાખ્યા, તત્ત્વવિવિવરણ સમત- ગેઝપેપર ૨-૮ ૧૪ સભાનું કુપદ્રષ્ટાન્તવિશદીકરણ પ્રકરણનિશાબકતે ૨ સબોધ પ્રકરણ ૨૪-૨૫ મોગદષ્ટિ પામબન્સટી ૨-૮ ૩ હરિભદ્રસૂરિપ્રન્યસંગ્રહ સ્વરૂપ દૂષિતત્વવિચાર ૨૬૧૨૫-૧૫૦-૨૫૦ ગાથાનાં વિગેરે સ્તવન, ૪ હારિભદ્રાષ્ટક પ્રકરણમૂલી દ્રવ્યગુણપર્યાયરાસ, સમ્યક ચોગદષ્ટિ, ૩૫ જ્ઞાનાર્ણવ પ્રકરણ મૂલ ૩૬ થી ૪૬ શ્રી યશોવિજષવાચક ગ્રન્યસંગ્રહ, ૫ સ્પાદરહસ્ય પત્ર સટીક ૦-૧૨ સંયમશ્રેણિ સજઝાય, સ્તવન વિચારાદ ૬ ન્યાયાલોક સટીક સયંત્રણિયંત્રાદિ વિવિધ સંગ્રહ ૭-૮ પાતંજલ યોગદર્શનવિવરણ, નરહસ્ય, ૭ અષ્ટસહીતાત્પર્ય વિવરણ સપ્તભંગીનયન પ્રદીપાદિ ૧૧ ગ્રન્થા ૨–૦ ૨૭ પારમષ સ્વામ્પાય સંગ્રહ [બુક] ૦-૬ ૪૭ વિવરણ ધમપરીક્ષા ટિપ્પણયુક્ત ૪-૫ ૮ મુદ્દઘાત વાગ્યાય ગ્રન્ય સંગ્રહ જેને રાય મુક્તાવલી સટીક ૪૮ અનેકાન્તવ્યવસ્થા પ્રકરણ જન તર્ક ૪-૦ ૯ ચો પત્રકારે ૦-૮ ૨૯ સમ્મતિતક પ્રાકરણ સટીક ૪૯ થી પર. ઉત્પાદાદિસિદ્ધિવિવરણ ૧૦ નવ તતવ વિસ્તરાય પ્રથમ વિભાગ વાદમાલાદિ ૪ ગ્રન્ય સંગ્રહ ૧૧ દંડક વિરતાર્થ ૩૦ ગદષ્ટ્રયાદિનવગ્રન્યપલકારાદિ ૫૩ જમMવ મીમાં ૦-૧૨ ૫૪ જિયુકત મદૂત ૧-૪, પપ પારમ વ્યાખ્યાનમાલા ભેટ,૫૬ ગૃહિનેમિ જેન સ્તવનાદિ સંપ્રહ ૦-૮, ૫૭–૧૮ જ્ઞાનાર્ણવ સટીકા- જ્ઞાનબિભ્ય (૨) પ-૦, ૫૯-૬૦ માગ પરિશુદ્ધિા-યતિલક્ષસસુયઃ સંસ્કૃત છાયા સહિત ૭-૮ ૬૧ ધૂર્તાખ્યાન સંસ્કૃત ૦-૧૨ પ્રાપ્તિસ્થાન-શેઠ ઇશ્વરદાસ મૂલચંદ. કીકાભટ્ટની પિાળ-અમદાવાદ- ૨૦-૦ ૨૮ પારમષ સમુ. ભેગા ૩૦. ૫-૦ SKOREGAR CHECE - ॥ॐ अहे नमः॥ ॥ अनन्तलब्धिनिधानाय सकलविघ्नविच्छिदे श्रीगौतमस्वामिने नमो नमः ॥ सर्वतन्त्रस्थतन्त्र-शासनसम्राट्-चरिचक्रचक्रवर्ति-जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति-प्रौढप्रभावशालि-प्रभूततीर्थोद्वारक- भट्टारक-आचार्यमहाराजाधिराज भीमद् विजयनेमिसरीश्वरसद्गुरुभ्यो नमो नमः ॥ प्रौढप्रतिभावदातसंस्मारितातीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवद्-न्यायविशारद-न्यायाचार्य-कूर्चालसरस्वती- पूर्वधरनिकटकालवर्तिश्रीहरिभद्रमुरिपुङ्गवलघुवान्धवप्रभृत्यनेकविशदाबरुदावलीविभूषित- महामहोपाध्याय-श्रीयशोविजयगणिसन्दृब्धं स्वोपजविवरणसमलङ्कृतम् ॥ श्रीज्ञानार्णवप्रकरणम् ॥ ऐन्दवी तां कलां स्मृत्वा, धीमान्यायविशारदः ॥ ज्ञानार्णवसुधास्नान-पवित्राः कुरुते गिरः ॥१॥ स्पष्टम् ॥१॥ तत्र पूर्व ज्ञानानि निरूपयितुं तद्विभागमाह- ज्ञानं पञ्चविधं प्रोक्तं, मतिः श्रुतमथावधिः ॥ मनःपर्यवसंज्ञं च, केवलं चेति नामतः॥२॥ अत्र स्वाम्यादिनिरूपणसाम्यात् तद्भाव एव शेषज्ञानोत्पत्तेश्चादौ मतिश्रुतयोरुपन्यासः । यदाह भाष्यकार:-" जं सामिकालकारण-विसयपरोक्खत्तणेहिं तुल्लाई । तब्भावे सेसोणि य, तेणाईए मइसुआई॥ ८५ ॥ ति" [यत्स्वामिकालकारण- गलाचरणम मतिभुता- वधिमनापर्य- वकेवलभेदेन ज्ञानस्य पञ्च- विधत्वं मति- श्रुतयोरादा- वुपन्यासे हेतुकथनं तत्र भाष्य- सम्मतिश्च ॥ 9 CHR

भाष्यरा-
सविवरण
श्रीज्ञाना-
पन-
प्रकरणम्॥
म्मत्या
मतिश्रुतयो-
राधुप यास-
हेत्वादिनि-
रूप्य क्रमे
विषयपरोक्षत्वैस्तुल्यानि ॥ तद्भावे शेषाणि च, तेनादौ मतिश्रुते] । अत्र प्राच्यो हेतुरेकत्रोपन्यासेऽन्त्यस्त्वादावुपन्यासे इति ध्येयम् ।
स्वाम्यादिसाम्यं चैवम् । मतिश्रुतयोः स्वामी तावदेक एव । 'जत्थ मइनाणं तत्थ सुअनाणं ।' इति वचनात्
कालोऽप्यनयो नाजीवापेक्षयाऽनाद्यनन्तः, एकजीवापेक्षया च नैरन्तर्येण सातिरेकषट्षष्टिसागरोपमप्रमाणस्तुल्य एव । कारण-
मपीन्द्रियमनाक्षयोपशमादिरूपं द्वयोस्तुल्यम् । सर्वद्रव्यविषयत्व-परनिमित्तत्वाभ्यां विषय-परोक्षत्वयोरपि तुल्यतेति।।नतः
कालेनोक्तरूपेण, विपर्ययेणाज्ञानापत्तिरूपेण, स्वामित्वेन स्वस्वामिनोरभेदाश्रयणादेकस्वामिकत्वेन, लाभेन च युगपत्रयाणा-
मपि लाभसम्भवेन साधादवधेः ॥ तत छद्मस्थस्वामिकत्व-पुद्गलमात्रविषयकत्व-क्षायोपशमिकत्वादिसाधान्मन:-
पर्यवज्ञानस्य ॥तत उत्तमयतिस्वामित्वसाम्यादवसान एव लाभाच्चान्ते केवलज्ञानस्योपन्यासः॥ आह च-"मइपुव्वं जेण सुयं,
तेणाईए मई, विसिट्ठो वा ॥ मइभेओ चेव सुयं, तो मइसमणंतरं भणियं ॥ ८६ ॥ काल-विवजय-सामित्त-लाभसाहम्मओ
वही तत्तो ॥ माणसमिचो छउमत्थ-विसय-मावादिसाममा ॥ ८७॥ अंते केवलमुत्तम-जइसामित्तावसाणलाभाओ ॥ एत्थं च
मइसुयाई, परोक्खमियरं च पञ्चरखं ॥ ८८॥" [ मतिपूर्व येन श्रुतं तेनादौ मतिः ॥ विशिष्टो वा मतिभेद एव श्रुतं, ततो
मतिसमनन्तरं भणितम् ॥ कालविपर्ययस्वामित्वलामसाधर्म्यतोऽवधिस्ततः ॥ मानसीमत छमस्थविषयभावादिसामान्यात् ॥
अन्ते केवलमुत्तमयतिस्वामित्वावसानलामात् ।। अत्र च मतिश्रुते परोक्षमितरच प्रत्यक्षम् ॥] इदश्च पूर्वानुपूर्त्या निरूपणप्रयो-
जकेच्छया विषयोपवर्णनं, अन्यथेच्छाविशेषेण पश्चानुपूर्व्यादिनापि निरूपणसम्भवादन चान्यथा निरूपणस्यासाम्प्रदायि-
कत्वेनानिष्टसाधनत्वान्नान्यादृशेच्छया तदिति ध्येयम् ॥ २ ॥ अथ प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वाभ्यां तद्विलक्षणव्यवस्थामाह-
kॐ**AX-
11TH७
ण चावधि-
मन:पर्यव-
केवलानामु-
पायासे बोज
दर्शित, मति-
श्रतयोः परो-
क्षत्वमन्येषां
प्रत्यक्षत्वञ्च॥
॥ १॥

सविवरण
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥२॥
त्वेन तस्य प्रत्यक्षत्वावश्यकत्वात्प्रत्यक्षपरोक्षातिरिक्तज्ञानस्यालीकत्वात्।।अपि चेन्द्रियमनोनिमित्तं ज्ञानं परोक्षं संशयविपर्ययानध्यव-
सायसम्मवाद्विनिश्चयसम्भवाद्वा साभासानुमानवत्सम्यगनुमानवच्चति हेतोस्तस्य परोक्षत्वसिद्धौ न प्रत्यक्षत्वम् ॥ आह च-
'इंदिअमणोणिमित्तं, परोक्खमिह संसयादिभावाओ। तकारणं परोक्खं, जहेह साभासमणुमाण।।९३॥ ति" [इन्द्रियमनोनिमित्तं,परो-
क्षमिह संशयादिभावात् ॥ तत्कारणं परोक्षं, यह साभासमनुमानम्]। एवं च संशयादिप्रतिबन्धकतावच्छेदकतया सिद्धं प्रत्यक्षत्वमव-
ध्यादिष्वेव व्यवस्थितमिति भावः । ननु तद्वत्ताज्ञानं प्रति तद्विरुद्धनिश्चयत्वेनैव प्रतिबन्धकताऽसिद्धविरुद्धानकान्तिकैश्वानुमितिरेव
प्रतिबद्धयते न त्वनुमित्यनन्तरं सन्देह एवाघीयत इति चेत्,न, तथापि साक्षात्कृतेऽथै सन्देहसामग्रया एवानवतारादित्याशय इत्याहुः।।
वस्तुतइन्द्रियजन्यज्ञानत्वंनप्रत्यक्षत्वं,तन्मतेज्ञानमात्रस्यमनोरूपन्द्रियजन्यत्वात,नचेन्द्रियत्वेनेन्द्रियजन्यत्वं विवक्षितं इन्द्रियत्वस्म
प्रत्यक्षघटितत्वेन तेन रूपेणाहेतुत्वात्पृथिवीत्वादिना साङ्कर्येण तस्याजातित्वादीश्वरज्ञानेऽव्याप्तेश्च,नापि ज्ञानाकरणकज्ञानत्वं जन्यप्रत्य-
क्षस्याऽदृष्टद्वाराऽस्मदादिज्ञानस्येश्वरज्ञानस्य वा जन्यत्वेनाव्याप्तिवारणायादृष्टाद्वारकत्वाशिषणदानस्याऽऽवश्यकत्वेऽपि निदिध्यास-
नद्वारा मननजन्ये तत्त्वज्ञानेऽव्याप्तेः,विजातीयादृष्टद्वारा मननस्य तद्धेतुत्वापेक्षयाविजातीयनिदिध्यासनद्वारैव तद्धेतुत्वौचित्यात,नापि
जन्यधीजन्यमात्रवृत्तिजातिशून्यज्ञानत्वं जन्यर्धामात्रस्यादृष्टद्वारा जन्यधीजन्यत्वात् ,साक्षात्तजन्यत्वाववक्षणेचस्मृतावतिव्याप्तेरह-
टाद्वारकत्वविशेषणे जन्यपदयात्, अनुमित्यादरप्यदृष्टद्वारा हविर्विषयकव्याप्तिज्ञानादिजन्यत्वाच्च,अदृष्टव्यापारानिरूपितजन्य-
धीजन्यतावन्मात्रवृत्तिजातिमचविवक्षणेऽपि जन्यधीमात्रस्य कालिकेन जन्यधीजन्यत्वात् सामानाधिकरण्यप्रत्यासत्या जन्यत्वविव-
क्षावश्यकत्वे जन्यपदवैयर्थ्यात् । किश्चैतानि लक्षणानीतरभेदोपयोगीनि न तु व्यवहारोपयोगीनि,अथोभयोपयोगिसाक्षात्कारित्वमेव
इन्द्रियमनो-
जन्यज्ञाने
परोक्षत्वेऽनु-
मानं दर्शितं,
इन्द्रियजन्य.
ज्ञानत्वस्य
प्रत्यक्षलक्षा-
गत्वेदोषोप-
दर्शनं,ज्ञाना-
करणकज्ञान-
त्वादीनां
प्रत्यक्षलक्ष-
णानां
खंडनम् ॥
॥२॥

साक्षात्का- रित्तस्य स्पष्टतास्व- GRESSES रूपस्य प्रत्य- क्षलक्षणत्वं प्रत्यभिज्ञाया तल्लक्षणमस्तु, तच्च साक्षात्करोमीतिप्रतीतिसिद्धो जातिविशेषो निर्विकल्पकेश्वरज्ञानयोश्च धर्मिग्राहकमानसिद्धं तदिति चेत्, नून स्पष्टतैव तत् साक्षात्करोमि स्पष्टमवैमीतिप्रतीत्योरेकाकारत्वात्केवल कपठनभ्युपगमाद् बानावरणक्षयोपशमविशेषजन्यतावच्छेद- कत्वेन तत्क्षयजन्यतावच्छेदकत्वेन च स्पष्टताद्वयासिद्धिः । स्पष्टतात्वेनानुगतीकृता च स्पष्टता तल्लक्षणमिति ॥ न च प्रत्यभिज्ञाया- मतिव्याप्तिः, तस्याः केवलेन्द्रियसंस्काराजन्यत्वेन स्मृतिव्यावृत्तपरोक्षधीरूपत्वादिति वाच्यम् , तस्या अस्पष्टत्वादिदन्तोल्लेखमात्रे स्पष्टताया अनियामकत्वात्, उक्तश्च-" भवति च परोक्षस्यापि साक्षादिवाध्यवसाये प्रत्यक्षसर्वनाम्ना परामर्श इति । " स्पष्टत्वेन तत्प्रतीतिस्तु सन्निहितविषयत्वादिकमवगाहते, यचिन्द्रियजन्यत्वेन तस्याः प्रत्यक्षत्वमेव लाघवादिन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रत्यक्ष- त्वप्रयोजकत्वात्, न च संस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापतिः, विशिष्टानुभवं प्रत्यव्यवहितविशेषणज्ञानस्य हेतुत्वेन प्रत्यभिज्ञायाः पूर्व नियमतस्तत्तास्मृतिकल्पनेन तस्याः संस्काराजन्यत्वादिति, तदसत्, तत्र नानास्मृतिकल्पनापेक्षया विशेषणज्ञानजन्यतावच्छेदक- प्रत्यक्षत्वाभावस्यैव कल्पयितुमुचितत्वात् प्रत्यभिजानामीत्यनुगतप्रतीतिसाक्षिकजातिविशेषस्य च चाक्षुषत्व-त्वाचत्वादिना साङ्- कर्यभिया प्रत्यक्षव्यावृत्तत्वाच्च, अस्माकं तु तत्तांशे उपनय इतरांशे च सन्निको हेतुरिति प्रत्यभिज्ञायां न कारणान्तरकल्पनागौ- रखम्, भवतां तु प्रत्यभिज्ञात्वावच्छेदेन कारणान्तरकल्पनागौरवम् तत्तासंस्कारस्यैव तचोपनायकत्वाच नोक्तनानास्मृतिकल्पनागौ- खमपि, इन्द्रियनिरपेक्षसंस्कारजन्यत्वस्यैव स्मृतित्वप्रयोजकत्वात्, प्रयोजककल्पनायाः कारणविशेषकल्पनानुपजीव्यत्वेन तद्गौरवस्यादोषत्वादिति चेत्, न, स्मृतिप्रत्यभिज्ञयोविषयतावैलक्षण्यस्य कारणवैलक्षण्याधीनत्वेन तत्र विलक्षणहेतुकल्पनाव- श्यकत्वात्, अत एवाऽसन्निकृष्टेऽपि विषये स एव वहिरनुमीयते स एवार्थः कथ्यत इत्यादि प्रत्यभिज्ञानम्, एवं चेन्द्रियार्थ- अस्पष्टत्वान त्परोक्ष तत्र प्रत्यक्ष- वाभ्युपगमः परस्य खण्डितः॥

स्पष्टताल- सविवरण श्रीज्ञाना- र्थव- अकरणम्॥ ACCRECORN सन्निकर्षोऽपि तत्र संस्कारोबोधकसदृशदर्शनादिहेतुतयोपक्षीयते, तदिदमभिप्रेत्योक्तं " अनुभूततया परोक्षमप्येकं साक्षादि- वाध्यवस्यतः पश्यतश्चापरं प्रत्यभिज्ञैवेयमिति"। अन्यथा प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वयोः साङ्कर्यप्रसङ्गाज्जातेरव्याप्यवृत्तित्वे स्पष्टताया विषयताविशेषरूपत्वे वा किञ्चिदशे परोक्षत्वं किञ्चिदंशे च तस्याः प्रत्यक्षत्त्वम्, साक्षादिवेत्यस्य साक्षात्कारसामग्रीसम्पत्ता- विवेत्यर्थः, अनुमानादेः सर्वथा परोक्षत्वं चासन्निकृष्टांश एच, एवं च प्रत्यभिज्ञात्वमपि तदेवेति विषयताविशेष एव मिथोऽन्तर्भा- वानन्तर्भावौ च विवक्षाधीनावित्यपि वदन्ति । ननु तथापि संशयादीनां लक्ष्यत्वे संशयानध्यवसाययोरस्पष्टयोरव्याप्तिः, अलक्ष्यत्वे च स्पष्टे भ्रमेऽतिव्याप्तिरिति चेत्, न, प्रतिनियतवर्णसंस्थानाद्याकाराभिव्यङ्गथायाः स्पष्टतायास्तत्राभावात्तत्र स्पष्टताप्रतीतेर्तीमत्वात, न च भ्रान्तभ्रान्तिज्ञसाङ्कर्यम्, भ्रान्तिज्ञानस्य तत् स्पष्टतांशे भ्रमत्वेऽपि विषयांशेऽतथात्वात, न च सांव्यवहारिकावग्रहेऽव्याप्तिस्तत्र प्रतिनियतमनुष्यत्वाद्याकाराभिव्यङ्ग्यस्पष्टताया निरपायत्वात् । नन्वेवं सांव्य- वहारिकत्वं यदि व्यवहारनयाभिमतत्वं तदाऽतिप्रसङ्गोऽवध्यादावपि स्पष्टत्वेन तद्व्यवहाराव, अथापारमार्थिकत्वं तदपि तथा कास्न्यैनास्पष्टत्वरूपस्य तस्य विकलप्रत्यक्षेऽभावात् क्षायोपशमिकत्वरूपस्यापितस्य तथात्वात् परजन्यत्वस्यापि तथात्वाद् । वस्तु- तोऽवध्यादेर्गुणजन्यत्वे च मतिश्रुतयोरपि लब्धीन्द्रियगुणजन्यत्वात्पारमार्थिकगुणजन्यत्वाभावस्योभयत्र तुल्यत्वात् । अथेन्द्रियव्य- वहितात्मजन्यत्वं तदिति चेत्, न, कुड्यादेपेटस्येवेन्द्रियस्यात्मनोऽव्यवंधायकत्वादिति चेत्, न, इन्द्रियजन्यस्य सांव्यवहारिकत्वे- नावधिमनःपर्याययोस्तु विकलप्रत्यक्षत्वेन परिभाषणात्, कथमित्यमिति चेत्, न, स्वतन्त्रपरिभाषाया अपर्यनुयोज्यत्वादाभो- गकरणे परानपेक्षत्वं वाऽपारमार्थिकत्वविवक्षायां तन्त्रमिति दिग् ॥३॥ परोक्षलक्षणमाह- RRCHERS क्षणस्य भ्र. मेऽतिव्या- प्तेरवग्र- हेऽव्या- प्तेश्च परि. हार: सा- व्यवहारिक- त्वस्य प्रश्न- प्रतिविषा- नाम्या निर्णयः॥

CREENECORRECERCREE परोक्षं च परापेक्ष-मनुमानादि सर्वथा ॥ येन संव्यहारेणा-ध्यक्षमैन्द्रियकं स्मृतम् (जगुः)॥४॥ परापेक्षं परोक्षं, तत्त्वं चात्मातिरिक्तजन्यत्वं उत्पत्ताविन्द्रियाद्यपेक्षत्वं वाऽस्पष्टत्वं तदिति तु व्यावहारिकाः, तच्चोक्तस्प- ष्टत्वाभावो विषयताविशेषो वेत्यन्यदेतत्,नियतवर्णाद्याकारणाप्रतिभानमिति तु प्राश्वः,तत्रैकान्ततः परोक्षमनुमानादिकम्,इन्द्रिय- जन्यज्ञानस्य सांव्यवहारिकप्रत्यक्षत्वेनातथात्वात, एवञ्चैकान्ततः प्रत्यक्षमप्यवध्यादिकमेवेति स्थितम् । आह च-“एगतेण परोक्खं लिंगिअ-मोहाइअंच पञ्चखं ॥ इंदिअमणोभवं जं, तं संववहारपच्चक्खं ॥९५ ॥ ति" [एकान्तेन परोक्षं लैङ्गिकं, अवध्यादिकं च प्रत्यक्षं । इन्द्रियमनोभवं यत्तत्संव्यवहारप्रत्यक्षम्]। नन्वस्मदादिसाक्षात्कारस्य कुतो नैकान्ततः प्रत्यक्षत्वं विवक्षामात्रस्य वस्तुस्वभा- वस्याकर्तुमन्यथाकर्तु वाऽशक्यत्वादिति चेत्, न, अत्र प्रत्यक्षपरोक्षपदयोस्तद्व्यवहारविषयपरत्वात्, न च निश्चयस्य न व्यवहारोप- योगित्वमिति वाच्यम्,शब्दाभिलापरूपव्यवहारे तस्याप्युपयोगित्वात् यत्तु व्यवहारनिश्चयाभ्यामेवास्य स्पष्टास्पष्टत्वं भेदाभेदवदिति, तदसत, सतोरेव भेदाभेदयोस्ताभ्यामवगाहनात्तयोरसत्करणाक्षमत्वात्, अन्यथा विकल्पव्यवहारेण शशशृङ्गमपि सिद्धयेत्, सिद्धये देवेति चेत्, न, खण्डशः प्रसिद्धेरेव तत्र तत्र सिद्धयर्थत्वात्, अन्यथा “असतो णत्थि णिसेहो" इत्यादि भाष्यविरोधप्रसङ्गादिति वय- मुत्पश्यामः॥ यदि व्यवहारेण न स्पष्टतासिद्धिरपितु संशयाद्यनवतारनियामकत्वेन तदाप्यस्यैकान्तपरोक्षत्वमुक्तरीतिं विना न निवा- रयितुं शक्यम्, एतेन 'वस्तुस्वभावो निश्चयाधीनो व्यवहारस्तु व्यवहाराधीन' इत्युक्तावपि न क्षतिः ॥ नन्वैन्द्रियकज्ञानस्य परो- क्षत्वप्रतिपादनमुत्सूत्रं, सूत्रे तस्य प्रत्यक्षत्वेनैव प्रतिपादनाद् । यदार्षम्-" पञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तम् । तं जहा-इन्दियपच्चक्खं णोइन्दियपञ्चक्खं चेति," तन्न, "परोक्खं दुविहं पण्णत्तम् । तं जहा-आभिणिबोहिअनाणपरोक्खं सुअनाणपरोक्खं चेति" ॥ परोक्षस्य ल. क्षणम्, एका- न्तेन परोक्ष- त्वमनुमाना- दे: अवध्या- देरेकान्तेन प्रत्यक्षत्वं परोक्ष- स्यापोन्द्रि- यमनोजन्य- ज्ञानस्य संव्य- वहारेण प्रत्यक्षत्वा -

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
णेव-
प्रकरणम् ।।
॥ ४ ॥
इन्द्रियन-
ज्ञानस्य प-
रोक्षत्वक-
थनमुत्सूत्र-
मिति प्रश्न-
प्रतिविधा-
नम्, तत्रा-
[ प्रत्यक्षं द्विविधं प्रज्ञप्तं । तद्यथा-इन्द्रियप्रत्यक्षं च नोइन्द्रियप्रत्यक्षं च ॥] [ परोक्षं द्विविध प्रज्ञप्तं । तद्यथा-आभिनिबो-
धिकज्ञानपरोक्षं श्रुतज्ञानपरोक्षं चेति ॥ ] प्रदेशान्तरे तस्य परोक्षत्वेनापि प्रतिपादनात्,न चाभिनिबोधकत्वस्य सामानाधिकरण्येन
परोक्षत्वप्रतिपादनान सूत्रविरोधः, ऐन्द्रियकस्य तस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि लैङ्गिकस्य तस्य परोक्षत्वात् । एवं हि 'इंदिअपचक्खं'-
इत्यत्र प्रत्यक्षपदे न लक्षणाऽक्षप्रतिगतत्वस्य व्युत्पत्तिनिमित्तत्वेऽपि स्पष्टताया एव प्रत्यक्षपदप्रवृत्तिनिमित्तत्वात, अत एवाक्ष-
पदस्येन्द्रियार्थकत्वेऽपि न क्षतिः, प्रतिपूर्वादक्षिशब्दाचव्ययीभावापत्त्यैव नतादृशं रूपं 'अर्श आदेरचोऽसार्वत्रिकत्वात् इत्याहुः ।
ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वेन प्रत्यक्षेऽपि प्रत्यक्षवृत्तेस्तदपीष्टमित्यन्ये, विषयताया वृत्त्यनियामकत्वादिदममुक्तमित्यपरे, तादृशादपि
प्रत्यक्षशब्दात् प्रत्ययान्तरमिच्छन्त्येके, न च लक्षणबाधाल्लक्षणाऽऽवश्यकी, लक्षणासिद्धौ लक्षणवाधस्तत्सिद्धौ च सेत्यन्योन्या-
श्रयादिति चेत्, न, व्यवहारेण तथाबोधसम्भवेऽपि व्युत्पचिनिमित्तमेव प्रवृत्तिनिमित्तं व्यवस्थापयता निश्चयेन तथाबोधाऽ-
सम्भवादुक्तव्यवस्थयैव सूत्रोपपत्तेः,तदिदमभिप्रेत्योक्तं 'तथा च सति मतिश्रुतयोः परोक्षत्वे तस्यापि पारमार्थिकं परोक्षत्वमेवेति'
सामानाधिकरण्येन वाधानवताराच न सामाधिकरण्येन बोधकल्पनापीति प्रतिभाति । यत्तु नोइन्द्रियप्रत्यक्षामित्यत्र नोइन्द्रि-
यपदस्य मनोर्थकत्वात्तन्निमित्तकं ज्ञानं प्रत्यक्षमेवेति, तदनागमिकं, तत्र नोइन्द्रियपदस्येन्द्रियाभावार्थकत्वादन्यथाऽपर्या-
सावस्थायामपि भाविनोऽवधिज्ञानस्यामनस्कप्रत्यक्षस्य चासङ्ग्रहप्रसङ्गादिति ॥ ४॥
नन्वेवं कृता सप्रसङ्ग विभागव्यवस्था, न चेयमुपपत्तिमती मतिश्रुतयोः स्वाम्यादिसाधर्म्यप्रतिपादनेन तदभेदशङ्काया
एवोदयात्, न च भेदगर्भसाधर्म्यज्ञानान तदुदय इति वाच्यम्, असाधारणधर्मज्ञानेन तदुदयादित्यत आह-
1543
न्यपि
शङ्कासमा-
धानाम्या
चर्चितम् ।।
॥ ४ ॥

PRECA RECECESSARS* भाष्यसंवादेन मतिश्रुतयो: स्वाम्यादि- साधाद- भेदेऽपिल क्षणादिस्तो मेदः, मति- भिन्ने स्वाम्यादिसाधा-त्र यद्यपि मतिश्रुते ॥ लक्षणादिकृतो भेद-स्तथापि स्फुटमेतयोः॥ ५॥ साधर्म्य खल्वभेदो वैधयं च भेदः, न चानयोरसमावेशः, प्रमेयत्वादिना सर्वेषां साधम्र्येऽपि मिथो भेददर्शनात्, एवं चमति- श्रुतयोः स्वाम्यादिसाभ्येऽपि लक्षणभेदादविरुद्धो भेदः। उक्तञ्च-“सामित्ताइविसेसा-भावाओ महसुएगया णाम ॥ लक्खणभेआइ- कयं, णाणत्तं तयविसेसेवि ॥ ९६ ॥" [स्वामित्वादिविशेषाभावाद्मतिश्रुतैकता नाम । लक्षणभेदादिकृतं नानात्वं तदविशेषेऽपि ] अथ भेदे लक्षणादिकृतत्वं तज्ज्ञानज्ञाप्यत्वं साध्यसाधनयोरभेदे न सम्भवतीति चेत्, न, श्रुतलक्षणेन श्रुते मतिवैधय॑रूपस्य तस्य मत्यवृत्तिधर्मत्वेन साध्यत्वे तदविशेषाच्छूते श्रुतत्वग्रहेऽपिमत्यवृत्तित्वेन तदग्रहसिद्धसाधनानप्रकाशादिति॥५॥अथलक्षणादयश्च लक्षण-हेतु-फल-भाव-भेदे-न्द्रियविभाग-चल्का-ऽक्षर-मूकेतराणि, तत्र 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात्प्रथमं लक्षणभेदमेवाह- श्रुतं श्रुतानुसारि स्या-न्मतिरन्यत्परोक्षजम् ॥ श्रुतं शब्दात्मकं गौणं, व्युत्पत्त्यात्तु (र्थे तु) लक्षणे ॥६॥ श्रुतानुसारि ज्ञानं श्रुतं, तदननुसारित्वे सतीन्द्रियमनोजन्यं च ज्ञानं मतिः। एवं च-"इन्दियमणोनिमित्तं, जं विन्नाणं सुआणुसारणं । णिययत्युत्तिसमत्थं, तं भावसुअं मई सेसं ॥१००॥" [इन्द्रियमनोनिमित्तं, यद्विज्ञानं श्रुतानुसारेण ॥ निजकार्थोक्तिसमर्थ, तद्भावश्रुतं मतिः शेषम् ॥] इत्यत्र इन्द्रियमनोनिमित्चमिति विशेषणं शेषमित्यत्र योज्यं, श्रुतानुसा- रित्वस्यैव श्रुतलक्षणत्वे निजकार्थोक्तिसमर्थत्ववत्तस्य स्वरूपविशेषणत्वेनाऽव्यावर्तकत्वात् , भुताननुसारित्वस्यावघ्यादाव- तिप्रसक्तत्वेन तद्वारणाय मतिलक्षणे तु तदुपयुक्तमिति, अथ किं तत् श्रुतानुसारित्वं न तावच्छब्दजन्यत्वं शब्दावग्रहादीनामपि तथात्वात् , नापि तद्धीजन्यत्वं तदनुव्यवसायेऽतिव्यासः, नापि पदजन्यपदार्थोपस्थितिजन्यत्वं शाब्दातिरिक्तश्रुतज्ञानाऽव्याप्ते, श्रुतयो- लक्षणभेद- निरूपण, श्रतानुसा- रित्के प्रश्नश्च ।। *

तत्र शब्दज-
सविवरणं
श्रीज्ञाना-
मेव-
प्रकरणम्॥
॥ ५॥
न्यत्वशब्द
धीजन्यत्व-
SRCLEARCCALCARTOO
नापि पदधीजन्यत्वाव्यभिचारिजातिमत्त्वं, शाब्दोपमित्यतिरिक्ताव्याप्तेः, श्रुतनिश्रितमतिज्ञानेऽतिव्याप्तेश्च । स्यादेतत्, श्रुत-
त्वजातिः साक्षात्परम्परया वा पदधीजन्यत्वं न व्यभिचरति, अभिलापप्लाविताना घटत्वादीनामपि पद्मरागत्वादे-
रिवोपदेशसहकृतेन्द्रियवेद्यत्वात, अन्यथा कदाचिदप्यनाकलितघटपदसङ्केतानां घटत्वादिग्रहप्रसङ्गात्, अथ पद्मरागत्वा-
दिकमप्युपदेशासहकृतेन्द्रियवेद्यमेव 'कान्तिविशेषवान्मणिः पाराग' इत्युपदेशस्तु पारागपदवाच्यत्वोपमितावुपयुज्यत इति चेत्,
न, एवं सत्यनाकलितोपदेशानां पद्मरागमहं वेबीत्यनुव्यवसायप्रसङ्गात्परागपदाभिलापप्रसङ्गाच, मतिज्ञानं तु न तथेति
न तत्रातिन्याप्तिः। न च तथापि पदधीजन्यत्वाव्यभिचारिश्रुतनिश्रितत्वजातिमति मतिज्ञानेऽतिव्याप्तिस्तस्य सकेतग्रहशाब्द-
बोधप्रसूतसंस्कारजन्यत्वनियमात्संस्काराद्वारकजन्यत्वविचक्षणे शब्दानुभूतस्मरणाव्याप्तरिति वाच्यम्, जातिपदस्य ज्ञानत्वसाक्षा-
व्याप्यजातिपरत्वे दोषाभावात् , श्रुतनिश्रितस्यापि संस्कारद्वारा श्रुताजन्यत्वाच, अन्यथा तस्य स्मृतित्वापत्तेः, अथ "पुवि
सुअपरिकम्मिअ-मइस्स जं संपयं सुआईअं। तं सुअनिस्सिअं" इत्यागमेन व्यवहारकाले श्रुताननुसारित्वे सति श्रुताभ्या-
सपाटवप्रसूतत्वस्य निश्रार्थत्वे मतेर्दृढतरसंस्कारद्वारा श्रुतजन्यत्वं तस्य निर्वाधमिति चेत्, न, तथाऽभ्यासपाटवपदस्य क्षयो-
पशमपाटवार्थकत्वात्, अन्यथा संस्कारस्यानुभूतमात्रोपनायकतया श्रुतनिश्रिते श्रुताननुभूतानां नानाधर्माणामभानप्रसङ्गाद्, एवं
सूत्रेऽपि परिकामतपदं पटुकृतपरं, मतिपदं मतिलब्धिपरमिति न कोऽपि दोषः, अन्यथा तत्र श्रुतातीतत्वस्यानुक्तिसहत्वात्काल-
व्यवधानस्य विविच्य दुग्रहत्वात्, मैवं, पद्धीप्रयोजकविवक्षारूपश्रुतज्ञानस्य पदज्ञानाजन्यत्वेन श्रुतत्वस्य पदधीजन्यत्वव्यभि-
चारित्वात्पद्मरागत्वादिग्रह इच घटत्वादिग्रहेऽप्युपदेशानपेक्षणाच, नापि सामिलापत्वं, तद्धि साकारत्वं वा शब्दविषयत्वं वामिलाप-
पदजन्यपदा-
योऽपस्थि-
तिजन्यत्व-
पदधीजन्य-
त्वाव्यभि-
चारिजातिम-
HEARS
त्वानां श्रुता
नुसारित्व-
रूपतायाः
खण्डनम् ॥
॥ ५॥

SECREASE योग्यत्वं वा, त्रितयस्य तस्य साकारत्वाच्छब्दविषयत्वादभिलापयोग्यत्वादिदमवध्यादावतिव्याप्त भाषावर्गणादिमतोऽभिला- प्यज्ञानस्यैवामिलाप्यप्रयोजकत्वाच, अथ शब्दोपरागेणार्थावगाहित्वं तत्, तदुपरागश्च संज्ञास्मृतिजन्यतावच्छेदको विषयताविशेषः स च नावध्यादौ तस्य स्मृत्यजन्यत्वाद्, अस्ति च श्रुतज्ञाने सर्वत्र सः पूर्व शब्दार्थयोः सङ्केतग्रहादर्थदर्शनोबुद्धसंस्कारेण प्रति- सम्बन्धिशब्दस्मरणोत्तरमेव तदभ्युगमात्, अत एव घटमनुभवामीति शब्दोपरागेणैव तदनुव्यवसाय इति चेत्, न, ईहादि- रूपमतिज्ञानातिव्याप्तः, संज्ञास्मरणाजन्यशाब्दबोधादावव्याप्तेरवग्रहोत्तरं संज्ञास्मरणाविलम्बेनैवेहादिदर्शनाच्च, एतेन 'शब्दा- नुपरागेणार्थावग्राह्यवृत्तिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्वं तत्' इत्यपि निरस्तमिति चेत्, अत्रोच्यते, पदधीविषयकधीजन्य- त्वाव्यभिचारिजातिमत्त्वं तत् , विवक्षारूपश्रुतस्यापि पदेष्टसाधनताधीरूपपदविषयकधीजन्यत्वादुपदेशनिरपेक्षेन्द्रियजन्यज्ञानस्य च मतिज्ञानरूपत्वेनालक्ष्यत्वात् यद्वा व्यक्तश्रुतस्यैव लक्ष्यत्वेनाऽव्यक्तश्रुताव्याप्त्यभावात्, अथवा शब्दानुपरागेणार्थावग्राह्य- वृतिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तद्, अस्ति हि सर्वत्र श्रुतेऽर्थदर्शनोबुद्धसंस्कारप्रसूतशब्दोपरागशालित्वम्, न तु मति- ज्ञानादौ, अवग्रहादिरूपे तत्र तदभावात्, न च संस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिः, प्रत्यभिज्ञाया इव संस्कारजन्यस्यापि श्रुतवि- शेषस्यातथात्वसम्भवात्, न च संस्कारेणेहाद्युत्पत्तिकाले स्मृत्युत्पत्त्यापत्तिः स्मृतिसामग्रथपेक्षयाऽनुभवसामग्रथा बलवत्त्वाद्, अथवा श्रुतज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमप्रयोज्य एव सर्वत्र श्रुते शब्दोपरागः, अत एवैकेन्द्रियाणां तादृशसंस्कारविरहेऽपि न क्षतिरिति । अर्थावभासिनि श्रुते समानसंवित्संवेद्यतयैव पदोपराग इत्यपरे, प्रत्यक्षे विद्यमानत्वमिव श्रुतज्ञाने पदवाच्यत्वं संसर्गतयैव भासते स एव शब्दोपराग इत्यन्ये, यत्तु शब्दाननुविद्धं ज्ञानमेव नास्ति । तदुक्तं-" न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके, साकारत्व- शब्दविषय. स्वाभिलाप- योग्यत्वश- दोपरागेणा- र्थावगाहित्वे- तदन्यतमरू- पस्य साभि- लापत्वस्य श्रु तानुसारित्व- रूपताया, खण्डनं तत्पति- RECS विधानं च।

EURE
सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
REASORRESPRE
यः शब्दानुगमाहते ॥ अनुविद्धमिव ज्ञान, सर्व शब्देन गम्यते ॥१॥” इति वैयाकरणमतं तदसत्, केवलार्थदर्शनं विना
संस्कारोबोधाभावेन शब्दानि सादर्थभासकसामग्रयैव शब्दावभासाभ्युपगमे चाव्युत्पन्नानामपि तदवभासप्रसङ्गात,
व्युत्पन्नानां विविच्य पदोपरागेणार्थप्रत्ययोऽव्युत्पन्नानां तु सामान्यत इति चेत्, अर्थविशेषे भासमाने शब्दविशेषनिर्भा-
सस्यैव प्रत्यक्षसिद्धत्वादिति दिग्। ननु यद्येते मतिश्रुतलक्षणे तदा, 'अभिणिबुझइत्ति आभिणिवोहिअं, सुणेइ त्ति सुति सूत्रोक्ते
लक्षणे कथं समगसातामिति चेत्, अत्रासाधारणधर्मरूपलक्षणोक्तेस्तत्र च व्युत्पत्तिनिमित्तरूपतदुक्तेः, तथापि श्रूयत इति श्रुत-
मिति कर्मव्युत्पत्त्या शब्द एव श्रुतं स्यात्, न चायमात्मभाव इति चेत्, वक्तृमुखनिर्गतस्य तस्य श्रोतश्रुतज्ञानकारणत्वेन
वक्तश्रुतोपयोगस्य च व्याख्यानादौ शब्दकारणत्वेनोपचारादेव तस्य श्रुतत्वाभिधानात्, परमार्थतस्तु श्रुणोतीते श्रुतमिति
कर्तव्युत्पत्त्या जीवानन्यश्रुतोपयोगस्यैव श्रुतपदप्रवृत्तिनिमित्ताक्रान्तत्वात् ॥ आह च-"जमभिणिबुज्झइ तमभिणियोहो जं सुणइ
ते सुअं भणिों ॥ सई सुणइ जइ तओ नाणं तो नाऽऽयभावो तं ॥ ९८॥ [ यदभिनिबुध्यते तदभिनिबोधो यत् शृणोति
तत् श्रुतं भणितं ॥ शब्द शृणोति यदि सको ज्ञानं ततो नात्मभावस्तत् ] सुअकारणं जओ सो सुअंच तकारणं ति तो तम्मि ॥
कीरइ सुओवआरो, सुअं तु परमत्थओ जीवो ॥ ९९ ॥" [ श्रुतकारणं यतः स श्रुतं च तत्कारणमिति ततस्तस्मिन् ॥
क्रियते श्रुतोपचारः श्रुतं तु परमार्थतो जीवः]त्ति ॥ अत्रापि व्युत्पत्त्यर्थमुपजीव्य जातिगर्भलक्षणे न दोषः ॥ ६ ॥
यथाश्रुतं लक्षणमव्याप्तिप्रसङ्गपरिहाराभ्यां समर्थयति ॥
कथमेकेन्द्रियाणां तद्, नूनं सुप्तयतरिव ॥ भाषाओंत्राद्यभावेऽपि, क्षयोपशमसम्भवम् ॥७॥
शब्दाननु-
विद्धं ज्ञान-
मेव नास्तीति
वैयाकरण-
मतस्य खण्ड-
नम्, प्रकृत-
मतिश्रुतल-
क्षणविलक्ष-
णसूत्रोक-
लक्षणसङ्ग-
तत्वोपवर्णन
च ॥
॥ ६॥

यधप्येकेन्द्रियाणामव्यक्तं श्रुतं नोक्तलक्षणाक्रान्तं तथापि सुप्तयतिश्रुतस्योक्तजातिगर्भलक्षणाक्रान्तत्वाद् व्यक्तश्रुतस्यैव लक्ष्यत्वादा न दोपः ॥ न चाव्यक्तश्रुते मानाभावः ?, खापाद्यवस्थोत्तरमपि व्यक्तीभवद् भावश्रुतं दृष्ट्वा पयसि सर्पिष इव प्रागप्यज्यक्तश्रुतस्यानुमानात, इति सम्मवायः॥ ननु भावश्रुतव्यक्तीभावस्य न तज्जातीयशक्त्यनुमापकत्वं पर्यायव्यक्तेर्द्रव्य- रूगशक्तरेवच्याप्यत्वात,तावतैव सदसत्कार्यवादनिर्वाहात,अन्यथाऽस्मदादीनामपि केवलज्ञानव्यक्तिजातीयतच्छक्तिप्रसगात्,इति पेत, न, मावश्रुतेन तदा स्वकारणक्षयोपशमानुमाने तेन तत्कार्याव्यक्तश्रुतानुमानमित्याशयाद्, वस्तुतः सुषुप्ताधवस्थायामाप धाराप्रवासादिसन्तानोऽव्यक्तचैतन्यप्रयुक्त एवेति तेन तदनुमानम्, अत एव सुप्तमूञ्छितादीनां जलसेकादिप्रतिकारेणा- ज्यक्तचैतन्यमेवाभिव्यज्यत इति अनुभवा, सुपुप्तोस्थितस्य 'सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषम्'इत्यनुभवस्तु नकिञ्चित्पदो- परागेणाऽव्यक्तज्ञानमेवावगाइते । स्यादेतत्, इन्द्रियत्तिनिरोधेन सुपुप्तौ ज्ञानमनुपपन्नं, न च तदैवाघ्राणोपनीतकुसुमगन्धादि- भानापति, जन्यज्ञानत्वावच्छिमं प्रति त्वङ्मनोयोगस्य विजातीयात्ममनोयोगस्य वा हेतुत्वेन तदानीं तदभावे जन्यज्ञानमात्र- स्यैपानुपपतरिति, मैव, द्रव्येन्द्रियोपरोधेऽपि तदानीं भावेन्द्रियज्ञानसम्भवादर्शनावरणकर्मप्रकृतिविशेषरूपायाः सुषुप्तेर्व्यक्तचक्षुर्द- शनादरेवोपघातित्वात् अत एव 'भाषाप्रोत्रलब्धिविरहेण सुप्तयतेरिवैकेन्द्रियाणां भावश्रुतं न भवति'इत्यपि परास्तं,द्रव्येन्द्रियोपरोधे- पि भावेन्द्रियज्ञानाद् भाषाश्रोत्रलब्धिगव्यश्रुतादिवैकल्येऽपितेषां भावश्रुतसम्भवाद्, वृद्धिसङ्कोचनादिनिधानमूलनिधानकामिनी- स्पर्शजनितातिशयलिगकाहारभयपरिग्रहमैथुनसज्ञानां तेषु साक्षादुपलम्भाच॥ आह च भाष्यकार:-"जइ सुअलक्षणमेयं, तो न तमेगिदिआण संभवइ ॥ दधसुआभावम्मि वि, भावसु सुत्तजइणो व्व ॥१०१॥"[यदि श्रुतलक्षणमेतत्ततो न तदेकेन्द्रियाणां लक्षणभेदा- न्मतिश्रुत- योर्भेदप्रसङ्गे श्रुतोक्तलक्ष- णस्याव्या- प्त्यादिपरि. हारेण निष्ट- कनं,एकेन्द्रि- येष्वपि श्रुत- सिद्धिश्च । h सविवरणं श्रीज्ञाना- मेव- प्रकरणम्॥ ॥ ७॥ सम्भवति ॥ द्रव्यश्रुताभावेऽपि, भावश्रुतं सुप्तयतेरिव ] " भावसुअं भासासो-अलद्धिणो जुज्जए ण इयरस्स ॥ भासाभिमुहस्स जयं, सोऊण य ज हवेज्जाहि ॥१०२॥" [ भावश्रुतं भाषाश्रोत्र-लब्धेर्युज्यते नेतरस्य ॥ भाषाभिमुखस्य यत्, श्रुत्वा च यद् भवेत् ] " जह सुहुमं भाविंदिअ-नाणं दुविदिआवरोहे वि ॥ तह दव्वसुआभावे, भावसुअं पत्थिवाईणं ॥ १०३ ॥ [ यथा सूक्ष्म भावेन्द्रियज्ञानं द्रव्यन्द्रियावरोधेऽपि ॥ तथा द्रव्यश्रुताभावे, भावभुतं पृथिव्यादर्दानाम् ] त्ति ॥ परममुनि- वचनप्रामाण्याचदमित्थमवगन्तव्यम् । यत्त्वर्थग्रहणशक्तिरूपस्य लब्धीन्द्रियस्यार्थग्रहणे व्यापाररूपेणोपयोगेन्द्रियेण व्यवधानादहेतुत्वम्, आकरे व्यवस्थापितं च सुषुप्तौ ज्ञानानुत्पत्तिनिर्वाहायार्थग्रहणव्यापाररूपत्वमुपयोगस्य, तत्प्रमाण- निरूपणप्रस्तावाद् व्यक्तज्ञानमाश्रित्यावसेयम्, अन्यथा सामग्रीसत्त्वे उपयोगाभावोऽपि तदानीं कुत इत्यत्र किमभिधानीय स्याद् विना क्षयोपशमवृत्त्यलाभ, तदभावे तु क्षयोपशमविशेषस्यैवोपयोगहेतुतया 'तद्धतोः' इति न्यायेनान्ततस्तद्वारार्थग्रहणहेतु- त्वकल्पनौचित्यात् ॥ स्वत एव केवलिनो विहाय शेषसंसारिणां तारतम्येन द्रव्येन्द्रियेष्वसत्स्वपि लब्धीन्द्रियपञ्चकावरणक्षयो- पशमनिष्पना मतिरस्त्येवेति परममुनिवचनम् ॥ ७॥ नन्वेवमेकेन्द्रियाणामव्यक्तमतिश्रुते इव विनिगमनाविरहादव्यक्तावध्यादिप्रसङ्ग इत्याशङ्कायामाह- न चावध्यादिकं तत् स्या-दागमानुपदेशतः॥ तत्कारणगुणाभावा-दक्षजन्यतया तथा ॥ ८॥ न खल्वेकेन्द्रियाणामव्यक्तं ज्ञानमवध्यादिकं भवितुमति, केवलज्ञानस्य तावत् क्षायिकत्वाद्, अवधिमनःपर्याययोश्च क्षयोपशमस्य तत्कार्यादर्शनेन तेष्वनुपदेशात्, उक्तञ्च-"एवं सव्वपसंगो, न तदावरणाणमक्खओवसमा ॥ मइसुअनाणावरण- एकेन्द्रियेष्व- व्यक्तमति- श्रुतसमर्थनं, तेषु च मति- श्रुतवदव- ध्यादिसंभ- बाशंकानिरा- सश्च ॥ SAEPS* 1E SIROHIRORS A - खआवसमओ मइसुआई ॥१०४॥”[ एवं सर्वप्रसङ्गः न-तदावरणानामक्षयोपशमात् ॥ मतिश्रुतज्ञानावरण-क्षयोपशमतो मतिश्रुते ] चि ॥ अपि चावध्यादौ गुणस्य हेतुत्वात् , तद्विरहादेव नैकेन्द्रियेषु तदुत्पत्तिसम्भवः, व्यक्तावधित्वादेर्गुणजन्य- तावच्छेदकत्वकल्पने चातिगौरवात् , न च व्यक्तमत्यादिकल्पनेऽपि व्यक्तमत्यादाविन्द्रियादिहेतुत्वकल्पने समानं गौरवमिति वाच्यम्, मतिलब्ध्यादावनुगतप्रत्यासत्तिविरहेण, इन्द्रियत्वादिनाऽहेतुत्वे विशिष्यतद्धेतुत्वावश्यकत्वात्, अत्र चानुगतस्य गुणस्य हेतुत्वेन तदसाम्यात्, स्यादेतद्, अवधिज्ञानस्य भवप्रत्ययकत्व-गुणप्रत्ययकत्वाभ्यां द्वैविध्यात्, विजातीयावधिज्ञान एव गुणस्य हेतुत्वात्, तद्विजातीयमव्यक्तं तदेकेन्द्रियाणां भविष्यति, युक्तं चैतत, मतिश्रुतयाईयोरव्यक्तत्वकल्पनापेक्षयैकस्यैवावधेस्तत्त्व- कल्पनौचित्यात, मैवम् , भवप्रत्ययिकेऽपि तत्र गुणस्य हेतुत्वात्तत्र भवनिमित्ततामात्रेणैव तत्प्रत्ययकत्वव्यवहाराद्, भवस्य हेतुत्वेऽपि देवभवादेविशिष्यैव हेतुत्वात् , प्रत्येकमादायोक्तगौरवस्याविशेषाच, किश्चावध्यादेरात्ममात्रजन्यत्वं व्यवस्थितम्, न चैकेन्द्रियाणां ज्ञानोत्पत्तावात्ममात्राधिकार इति न तेषामवध्यादिकमित्याह यम् ॥ ८॥ उक्तो लक्षणभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ हेतुफलभावात्तद्भेदमुपदर्शयति- श्रुतस्य मतिपूर्वत्वं, श्रुतमित्यनयोभिदा ॥ योगपद्यं तु तल्लब्ध्यो-रिष्टमेवोपयोगयोः ॥९॥ 'मइपुव्वगं सुतम् इत्यागमेन हि श्रुतस्य मतिहेतुकत्वं प्रतिपाद्यते, पूर्वपदस्य हेतुत्वार्थकत्वात्, 'सम्यग्ज्ञानपूर्विका पुरुषार्थसिद्धिः' इत्यादौ तथादर्शनात्, पृधात्वर्थस्य कारण एवान्वयात्, तथाहि कारणेनैव सताऽनुप्रेक्षादिकालीनोहापरपर्यायेण मतिज्ञानेन श्रुतज्ञानं पूर्यते वृद्धि नीयत इति यावत्, एवश्च दृढस्मृतिरूपश्रुतज्ञाने ऊहस्य हेतुत्वं पर्यवस्यति, तथाभूतमत्यैव एकेन्द्रियेष्द- वध्यादिज्ञा- नाभावसम- र्थन,हेतुफ- लभावान्स- तिश्रुतयो/- दोपदर्शनोप- क्रमश्च RECE ध

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
णेव-
हेतुफलमा-
वान्मतिश्रुत-
योर्भदोप-
दर्शनं तत्र
प्रकरणम्
॥८॥
चान्यतस्तत्प्राप्यते, गृह्यते परोपदेशश्रवणादिरूपमतेरेव तदाहितसंस्कारद्वारा श्रुतहेतुत्वाद्, एवं च श्रुतमात्र एव द्रव्यश्रुतग्रहणस्य
हेतुत्वं लभ्यते, तथाभूतयैव च तयाऽन्यस्मै तद् दीयते व्याख्यायते, एवञ्च व्याख्यानुकूलश्रुतसङ्कल्पे तदिष्टसाधनतामते-
हेतुत्वं व्यज्यते तथाभूतयैव च मत्या परावर्तनचिन्तनद्वारा गृहीतं श्रुतं स्थिरीक्रियते, इत्थं चाविस्मृत्यनुकूलधारणाव्या.
पाररूपाया मतेरुत्तरकालिकपरिस्फूर्तिरूपश्रुतहेतुत्वं व्यवस्थाप्यते, यद्यपि 'पृपालनपूरणयोः" इतिपाठात्प्राप्त्यादेतद्धात्वर्थत्वम् ,
तथापि प्राप्तिदानयोः पूरणविशेषत्वाद् न किश्चिदनुपपन्नम् , एवञ्च मतिश्रुते कार्यकारणभावादेव परस्परं भिद्यते ॥ अभेदे
सव्येतरगविषाणयोरिव कार्यकारणभावाभावात, आह च-" मइपुव्वं सुअमुत्तं, ण मई सुयपुब्बिआ विसेसोय ॥ पुधि
पालणपूरण-भावाओ जे मई तस्स ॥ १०५॥" [ मतिपूर्व श्रुतमुक्तं, न मतिः श्रुतपूर्विका विशेषोऽयम् ।। पूर्व पालनपूरण-
भावात् यन्मतिस्तस्य ] " पूरिज्जइ पाविजइ, दिज्जइ वा जं मईइ नाऽमइणा ॥ पालिज्जइ अ मईए, गहियं इहरा पणस्सेज्जा
॥१०६॥" [पूर्यते प्राप्यते दीयते वा यन्मत्या नाऽमत्या ॥ पाल्यते च मत्या गृहीतं, इतरथा प्रणश्येत् ॥] यद्यपि प्रागभावा-
वच्छिन्नकालसम्बन्ध एवं पूर्वपदार्थो नतु कारणत्वं गौरवात्, अकारणेऽपि पूर्वपदव्यवहाराच, तथाप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां मतः
श्रुतहेतुत्वावधारणादत्र पूर्वपदस्य कारणत्वे लक्षणा, न चान बीजाभावस्तात्पर्यान्यथानुपपत्तरेवैतद्वाजत्वात्, तथातात्पर्य विन-
तदभिधानस्य निष्प्रयोजनत्वात्, ननु ज्ञानाज्ञानरूपयोमतिश्रुतयोः पृथक् समकालमेव लाभोपदेशात् कथं तयोर्हतुहेतुमद्भावः,
अन्यथाप्रतिपत्ती तु मतिज्ञानलाभकाले श्रुतज्ञानालाभात, श्रुताज्ञानानिहात्तिप्रसङ्गादन्यज्ञानस्याज्ञानानिवर्तकत्वादिति चेत्,
लब्धिरूपमतिश्रुतयोर्लाभस्यैव योगपद्योक्तेः, उपयोगयोस्तु तथास्वाभाव्यात्क्रमोत्पत्तेरेव व्यवस्थितत्वात्, आह च-"नाणाण-
KOREA
पृधात्वर्थ-
प्रपञ्चनं तत्र
भाग्यसंवादः
पूर्वपदस्य
कारणत्वेल-
क्षणायां बी-
जप्रदर्शन-
ञ्च ॥
HERE
॥ ८॥

मतिश्रुतल- उध्यो: सम- कालत्वेन त- योरित्यत्र भाप्यसंवादः मते: भाव- श्रतजन्य F ण्णाणाणि य, समकालाई जओ मइसुआई ॥ तो न सुझं मइपुव्वं, मइनाणे वा सुअन्नाण।।१०७॥ इह लद्धिमइसुआई, समकालाई, नतूबओगो सिं । मइपुव् सुअमिह पुण, सुओवओगो मइप्पभवो ॥ १०८॥ ति ॥ [ज्ञाने अज्ञाने च समकाले यतो मतिश्रुते । ततो न श्रुतं मतिपूर्व मतिज्ञाने वा श्रुताऽज्ञानम् ॥ इह लब्धिमतिश्रुते समकाले, नतूपयोगोऽनयोः । मतिपूर्व श्रुतमिह पुनः, श्रुतो- पयोगो मतिप्रभवः] ॥ ९ ॥ अथ श्रुतस्य मतिपूर्वत्वमिव मतेरपि श्रवणजन्यायाः श्रुतपूर्वत्वमस्तीत्यविशेषं निराकर्तुमाह- न भावश्रुतजन्यापि, द्रव्यश्रुतभवा मतिः॥ न तस्यामस्ति वैजात्य-मुत्कर्षों वा पुरस्कृतः॥ १० ॥ परस्माच्छब्दं श्रुत्वा प्रादुर्भवन्ती मतिर्न भावश्रुतजन्या किं तु द्रव्यश्रुतप्रभवैव, श्रवणानुकूलक्षयोपशमाद्बोधकस्य शब्द- स्यैव तद्धेतुत्वाद्, अन्यादृशश्रुतपूर्वत्वं तु मतेने वारयामः श्रुतोपयोगाच्च्युतस्य मत्युपयोग एवावस्थानाद् ॥ आह च-"सोऊण जा मई भे, सा सुअपुव्य त्ति तेण ण विसेसो ॥ सा दव्वसुअप्पभवा, भावसुआओ मई णत्थि ॥१०९॥" श्रुत्वा या मतिर्भवतां, सा श्रुतपूर्वेति तेन न विशेषः॥सा द्रव्यश्रुतप्रभवा, भावश्रुतान्मतिर्नास्ति।]"कज्जतया ण उ कमसो, कमेण को वा मई णिवारेड्?॥ जं तत्थावत्थाणं, चुअस्स सुत्तोवओगाओ ॥११०॥" [कार्यतया न तु क्रमशः, क्रमेण को वा मति निवारयति ॥ यत्तत्रावस्थानं, च्युतस्य श्रुतोपयोगात् ॥ ]त्ति ॥ यद्यप्यनयोरविशिष्टमपि पौर्वापर्यं भेदकमेव, तथापि वस्तुगत्यनुरोधेनायं प्रयास इति ऋजवः, एकजातीयत्वेऽपि व्यक्तिपौर्वापर्यसम्भवाज्जात्यैव पौर्वापर्यस्य भेदकत्वात् तन्निाहककार्यकारणभावव्यवस्थापन, तन्निर्वाहाय च विशेषसमर्थनं सफलमिति यौक्तिकाः॥ कार्यकारणभावेन भेदनिरूपणौपयिकप्रासङ्गिकसूत्रसमर्थनायेदमिति साम्पदा- यिकाः॥ ननु मतिर्न श्रुतजन्येत्यसङ्गतं श्रुतनिश्रितमतिज्ञानस्य श्रुतजन्यत्वात्, इति चेत्,न, श्रुतप्रसूतक्षयोपशमविशेषस्यैव तद्धेतु- यत्व स शङ्गाऽपाकर- णम् द्रव्य- श्रुतजत्वे सम्मतिः,

मतौ श्रुत
सविवरण
श्रीज्ञाना-
संव-
प्रकरणम्॥
॥९॥
त्वात्, श्रुतजन्यतावच्छेदकजातिकल्पने मानाभावाद्, अस्तु वा तत्र तद्धे तुत्वम्, तथाप्यत्र सामान्यतो हेतुत्वलक्षण उत्कर्ष एव
सामान्यतो भेदोपयोगितया ग्राह्यः, अन्यथा सामानाधिकरण्येन भेदग्रहेऽपि सामान्यतो भेदाग्रहेण न्यूनत्वप्रसङ्गाद्, अपि च
पौर्वापर्येण निरूपणौपयिकोऽपि सामान्यत एवोपजीव्योपजीवकभाव इत्युक्तसूत्रौपयिकतयाप्युक्तोत्कर्ष एव ग्राह्य इति दिग्
॥१०॥ मतिपूर्व श्रुतमित्यत्र व्याख्यान्तरं विदधतां केषाञ्चिन्मते दूषणमाह-
केचिद् द्रव्यश्रुतं प्राहु-मंतिपूर्वं न चापरम् ॥ तेषां भावभुताभावो, निर्बीजा कल्पना पुनः॥११॥
मतिपूर्वं श्रुतमित्यत्र श्रुतपदं द्रव्यश्रुतपरं 'न ह्यविवक्षितं कोऽपि भाषते,' यच्च विवक्षाज्ञानं तत्किल मतिरित्येतन्मति-
जन्यत्वं द्रव्यश्रुतस्यैव व्यवतिष्ठत इति केषाश्चिदाशयः,तेषांविवक्षाज्ञाने प्राप्तमपि भावश्रुतलक्षणमुपेक्षमाणानामन्यत्रापि तदपेक्षाया
अन्याय्यतया भावश्रुताभाव एव प्रसजेत् इति निमग्नाऽनयोविंशेषचिन्ता।आह च-"दव्वसुअंमइपुव्वं,भासइ जनाविचिन्तियं केइ।।
भावसअस्साभावा, पावइ तेसि ण य विसेसो ॥१११॥"[ द्रव्यश्रुतं मतिपूर्व, भाषते यद् नाविचिन्तितं केचित् ॥ मावश्रुत-
स्याभावः प्राप्नोति तेषां न च विशेषः॥ न च मतिशब्दयोरेवात्र भेदचिन्ता सतामौचितीमञ्चति तद्भेदस्यासन्दिग्धत्वेनाचिन्त-
नीयत्वात, न च मतिपूर्वतया द्रव्यश्रुतस्य ततो भेदोऽपि, मतेरपि शब्दपूर्वत्वेनाविशेषाद् ॥आह च-“दव्वसुअं बुद्धीओ, सा वि
तओ जमविसेसओ तम्हत्ति [द्रव्यश्रुतं बुद्धःसापि ततो यदविशेषतस्तस्मात्।।] वस्तुतोऽनयोः सामान्यतो हेतुहेतुमद्भावाभावेन सामा-
न्यतो भेदाऽसाधनाच्यूनत्वमपि, तस्माद् भावश्रुतं मतिपूर्वमित्येव व्याख्यानं सम्यम्, अन्यथा श्रुतपदस्य शब्दे लक्षणा निर्बीजा
स्यात्, तथाहि किमत्रान्वयानुपपत्त्या लक्षणाऽऽश्रीयते, ताानुपपत्त्या वा, नाद्यो भावश्रुते जन्यत्वान्वयस्यावाधात्, न द्वितीयः,
जन्यताव-
च्छेदकवैजा-
त्याभावः म-
तिपर्व श्रुत-
मित्यत्रोत्क-
र्षविशेषादर
व्याख्यान्तरे
दूषणं तत्र
भाष्यस
म्मतिः ॥
॥ ९॥

व्याख्या न्तरे श्रुर्त- HERE 'सुणेइ ति सुअं' इत्यत्र व्युत्पत्यर्थगृहीते शब्दे मतिजन्यत्वतात्पर्यानुपपत्त्या तदाश्रयणस्य वक्तुमयुक्तत्वाद्, भेदचिन्ताया अप्रस्तु- तत्वेन तत्र तज्जन्यत्वतात्पयोनाकलनात, स्यादेतत्, मत्यादीयमानस्य श्रुतस्य शब्दद्वारैव मतिजन्यत्वात्तत्र तत्पूर्वत्वं प्रतिपाद्यमानं श्रुत एव पर्यवस्यतीति, मैवम्, एतादृशमतिपूर्वत्वस्य सर्वत्रासम्भवात्, एतेन द्रव्यश्रुते मतिपूर्वत्वप्रतिपादनस्य भावश्रुतभेदचिन्तौ- पयिकतया नार्थान्तरत्वमित्युक्तावपि न क्षतिः, नन्वेवमत्र द्रव्यश्रुते व्युत्पत्त्यानुसरणमप्ययुक्तमनौपयिकत्वात्, इति चेत्, न, भाव- श्रुतलक्षणत्वेन तस्योपादेयत्वाद् ॥आह च-"भावसुअंमइपुव्वं, दव्वसुअंलक्खणं तस्स॥११२॥[भावश्रुतं मतिपूर्व, द्रव्यश्रुतं लक्षणं तस्य] अत्र लक्ष्यते गम्यतेऽनेनेति लक्षणं लिङ्गमित्यर्थ इत्याहुः, वस्तुतो लक्षणं लक्षणघटकमित्यर्थोऽपि प्रागुक्तरीत्याऽनुसरणीयः, एवञ्च कार्याभूतेन लक्षणघटकेन वा शब्देन स्वकारणीभूतस्य स्वघटितलक्षणलक्ष्यस्य वा विवक्षारूपस्य भावश्रुतस्यैव लक्षणात, तत्र मतित्वप्रतिपादनं परेषां विपरीतमिति ध्येयम् ।। आह च-"सुअविन्नाणप्पभवं, दव्वसुअमियं जओ विचिन्तेउं ॥ पुचि पच्छा भासइ, लक्खिज्जइ तेण भावसुअं ॥११३॥" [श्रुतविज्ञानप्रभवं द्रव्यश्रुतमिदं यतो विचिन्त्य ॥ पूर्व पश्चाद् भाषते, लक्ष्यते तेन भावश्रुतम् ।।]॥११॥ अथ नन्द्यध्ययने मतिश्रुतयोः कार्यकारणभावेन भेदप्रतिपादनानन्तरं स्वस्थाने सम्यक्त्वमिथ्यात्वपरि- ग्रहात्तयोर्भेदप्रतिपादनायेदं सूत्रमस्ति, तद्यथा ॥ "अविसेसिआ मई मइनाणं मइअन्नाणं च, विसेसिआ मई सम्मद्दिहिस्स मई मइ- नाणं, मिच्छादिहिस्स मई मइअन्नाणं ॥ अविसेसिअं सुअं सुअनाणं सुअअन्नाणं च, विससि सुयं सम्मद्दिहिस्स सुअं सुअनाणं, मिच्छदिहिस्स सुअं सुअअनाणंति" [ अविशेषिता मतिर्मतिज्ञानं च मत्यज्ञानं च ॥ विशेषिता मतिः सम्यग्दृष्टेर्मतिर्मतिज्ञानं, मिथ्यादृष्टेमतिर्मत्यज्ञानं ॥ एवं अविशेषितं श्रुतं श्रुतज्ञानं श्रुताज्ञानं च, विशेषितं श्रुतं सम्यग्दृष्टेः श्रुतं श्रुतज्ञानं, मिथ्यादृष्टेः पदस्य द्रव्य- श्रुते लक्षणा- बीजाभावा व्युत्पत्त्यर्था-- नुसरणोपरि मिकफले भा- व्यसंवादः तयोः सम्य- क्त्वमिथ्यात्वे विवेचिते न- न्दिसूत्रम् वादात् ।

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥ १०॥
श्रुतं श्रुताज्ञानम् ] अतोऽत्राप्येनमर्थ भाष्यसम्प्रदायमनुरुन्धानोऽनुविवदिषुराह--
मतिश्रुते निर्विशेष, ज्ञानाज्ञाने विशेषिते ॥ सम्यग्दृशां हि ते ज्ञाने, अज्ञाने कुदृशां पुनः ॥१२॥
सम्यग्दृष्टिमिथ्यादृष्टिभावेनाऽविशेषिता मतिरेवोच्यते न तु मतिज्ञानं मत्यज्ञानं वा, सामान्यपदेन विशेषानभिधानात्,
विशेषाऽभाने सामान्यस्याप्यभानापत्तिः,इति चेत्,न,तथापि सामान्यरूपेण विशेषभानेऽपि विशेषरूपेण तदभानाद्, एवं चाविशेषि-
ता मतिरित्यस्य विशेपबोधकसमभिव्याहारविनिर्मुक्तमतिपदजन्यबोधविषयो मतिरित्यर्थः, न च मतिज्ञानमत्यज्ञानयोरपि वस्तु-
तस्तादृशवोधविषयत्वात्,अविशेषितमतिव्यवहारापत्तिरित्याशक्यम्,मतिज्ञानमविशेषिता मतिरिति व्यवहारोमतिज्ञानत्वावच्छेदेना-
तादृशोधविपयत्वमवगाहते तस्यासम्भवादिति तत्त्वम्, एवं सम्यग्दृष्टित्वविशेषिता मतिमतिज्ञानम्, मिथ्यादृष्टित्वविशेषिता च
मत्यज्ञानं, एवं श्रुतेऽपि ज्ञेयम्।। आह च-"अविसेसिया मइच्चिय, सम्मद्दिहिस्स सा मइनाण।। मइअन्नाणं मिच्छा-दिद्विस्स सुअंपि
एमेव ॥ ११४ ॥"[अविशेषिता मतिरेव सम्यग्दृष्टेः सा मतिज्ञानम् ॥ मत्यज्ञानं मिथ्यादृष्टेः श्रुतमप्येवमेव ॥] अत्र मतिज्ञानम-
त्यज्ञानयोर्मतिरिति सामान्यसंज्ञा, मतिज्ञानं मत्यज्ञानश्चेति विशेषसंज्ञा द्रष्टव्या ॥ १२ ॥ ननु यथैव मतिश्रुताभ्यां सम्य-
ग्दृष्टिर्घटादिकं जानीते व्यवहरति च तथा मिथ्यादृष्टिरपीति कथमेकस्य ज्ञानमपरस्य चाज्ञानमिति व्यवस्थेत्यत्राह-
अविशेषात्सदसतो-भवहेतुतया तथा ॥ यादृच्छिकतयाऽज्ञानं, मिथ्यादृष्टेः फलं विना ॥ १३॥
मिथ्यादृष्टिज्ञानं हि सदसतोर्विशेषं न प्रतिपद्यते,सर्वथा घट एवायामित्यवधारणे पटगतानामपि प्रमेयत्वादीनामतथात्वेनाध्य-
वसायात्, अन्यथा पटगतधर्मद्वारा पटरूपताया अपि तत्र सम्भवे 'सर्वथा घट एव' इत्यवधारणानुपपत्तेः, एवं सर्वप्रकारैर्घटोऽस्त्ये-
अविशेषि-
तमतिश्रत-
योमतिश्रुत-
वे विशेषि-
तयोश्च तयोः
सम्यग्दृष्टेम-
तिश्रुतज्ञा-
नत्वे मि--
थ्यादृष्टमेत्य-
ज्ञानश्रुता-
ज्ञानत्वे
च ।
R
ASRAEHLORS
॥ १०॥

वेत्यवधारणे तत्राऽसतामपि पटत्वादीनामध्यवसायः, अन्यथा सर्वथापदत्यागप्रसङ्गाद्, एवं विपर्यस्तत्वादेव भवकारण तत, भवहेतुपु हिंसादिषु मोक्षहेतुत्वाध्यवसायात, मोक्षहेतुषु वाहिंसादिषु भवहेतुत्वाध्यवसायाद्, यादृच्छिकोपलम्भरूपं च तद्, विरतिलक्षणं फलं विना फलशून्यं च, इत्येतैर्हेतुभिरज्ञानमेवेदम्॥आह च-"सदसदविसेसणाओ, भवहेउजदिच्छिओवलंभाओ॥ नाणफलाभावाओ, मिच्छद्दिहिस्स अन्नाणं ॥ ११५ ॥" [ सदसदविशेषणाद् भवहेतुत्वाद्यदृच्छोपलंभात् । ज्ञानफलाभावाद् मिथ्यादृष्टरज्ञानम् ॥] त्ति ॥ १३ ॥ ननु घट एवायं घटोऽस्त्येवेत्येवमेवाध्यवसायः परेषामपि नतु सर्वथेत्याकारस्तत्र च विशेषणक्रियासङ्गतैवकाराभ्यामन्ययोगव्यवच्छेदात्यन्तायोगव्यवच्छेदयोरेव लाभात्क्क सदसदविशेष इति चेद् १, उच्यते । सर्वथाऽनुपरागेण, घटधीनिमेव नः ॥ कयश्चित्परसत्ताया. आपत्तौ चेन्न तद्ग्रहः ॥ १४ ॥ यदि हि घटे कथञ्चिदन्ययोगव्यवच्छेदः कथञ्चिदेव चास्तित्वात्यन्तायोगव्यवच्छेदोऽध्यवसीयते तदा ज्ञानमेव तत्, अन्यथा त्वज्ञानमेव, नहि घटभिन्ने पटादौ प्रमेयत्वादिनापि योगो घटे व्यवच्छिद्यते, न वा पटास्तित्वादेरपि घटेऽत्यन्तायोगव्यवच्छेद इति । अथ घटे घटभिन्ननिष्ठभेदप्रतियोगितावच्छेदकधर्मवत्तमन्ययोगव्यवच्छेदः, अस्तित्वे च घटनिष्ठात्यन्ताभावाप्रतियोगि- त्वमत्यन्तायोगव्यवच्छेदः सर्वथास्त्येव, नहि तादृशप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्वं तदभावः, येन सर्वथात्वव्याघातः, किन्तु तादृशधर्मवत्त्वाभावः । न च तादृशधर्मवति तादृशधर्माभावो विरोधादप्रतीतेश्व, नच सर्वैः प्रकारैरिति सर्वथार्थः, किन्तु तदभावानधि- करणत्वे सतीति चेत्,न, प्रतियोगिमत्यपि पररूपेण तदभावात्,विशेषग्रहे च कथश्चितपक्षप्रसङ्गाद्, आधकः स्याद्वादरहस्ये विस्तरः ॥१४॥ ननु तत्रापि कथमेतदज्ञानम्, कथञ्चित्पक्षग्रहात्,किञ्चैवमप्यवधारणविनिर्मुक्तं निर्विकल्पकादिकं कथं मिथ्यादृशां न ज्ञानं, मिथ्यादृष्टे- मैतिश्रुतयो- रज्ञानत्वे हे- तवो निरू- पिताः स- वैथाऽनुप- रागे ज्ञान- त्वमन्यथा 156RESCRI16453 त्वज्ञानत्व- मिति दर्शितम् ।।

मिथ्याढष्टि- ज्ञाने व्यव- हारौपयिक सविवरणं श्रीज्ञाना- नव- धकरणम्।। ॥११॥ FROICES ज्ञानत्वं नि- न च स्यात्पदविनिमोकात्तस्याज्ञानत्वं नाम, सम्यग्दृशामपि स्यात्पदविनिर्माण क्वचिदज्ञानदर्शनात्संसर्गतया स्यात्पदार्थविषय- तायास्त्वन्यत्राऽप्यनिवारणीयत्वात्,सम्यग्दर्शनस्यैव तादृशसंसर्गकज्ञानहेतुत्वम् ,इति चेत्,न, तथापि सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिनोऽसंसर्ग- कस्यावग्रहस्याज्ञानत्वप्रसङ्गात, किञ्च संवादिप्रवृत्तिजनकतावच्छेदकं तद्वति तत्प्रकारकत्वलक्षणं' प्रामाण्यं मिथ्यादृशां ज्ञानेऽतिव्याप्तं, अव्याप्तं च सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिसंशयादौ, इति चेद्, उच्यते- ज्ञानं तदपि संवादि-प्रवृत्तिजनकं यतः॥ अज्ञानं बन्धहेतुत्वा-न्मोक्षाऽहेतुतयाऽथवा ॥ १५ ॥ व्यवहारौपयिकं हि ज्ञानत्वं मिथ्यादृशां ज्ञानेऽस्त्येव, तथापि निश्चयतो बन्धहेतुतावच्छेदकमज्ञानत्वमपि तत्राऽस्तीति ज्ञान- मपि तदज्ञानमित्येव निश्चीयते, ननु ज्ञानेऽज्ञानत्वकल्पने मानाभावो मिथ्यादर्शनविशिष्टज्ञानत्वेनैव विशिष्टबन्धहेतुत्वसम्भवात्, इति चेत्, न, मिथ्यादर्शनविशिष्टज्ञानत्वेन ज्ञानविशिष्टीमथ्यादर्शनत्वेन वाहेतुतेत्यत्र विनिगमकाभावाद्, मिथ्यादर्शनज्ञानत्वयोः, सम्बन्धभेदेन व्यासज्यवृत्त्यवच्छेदकताऽसम्भवात्, अन्यथा दण्डविशिष्टचक्रत्वादिनाऽपि हेतुत्वप्रसङ्गात्, न च ज्ञानत्वाज्ञान- त्वयोरसमावेशो पृथग्धर्मयोस्तयोः समावेशाज्जातिसाङ्कर्यस्यापि क्वचिददोषत्वाद्,ननु मिथ्यादर्शनाविरीतकषाययोगानामेव तत्तद्व- न्धहेतुत्वोपदेशात्सामान्यतो बन्धविशेषे मिथ्यादर्शनत्वेन मिथ्यादर्शनजन्यतावच्छेदकजातिव्याप्यजात्यवच्छिन्नं प्रति चमिथ्याद- शनविशेषत्वेनैव हेतुता प्रामाणिकी 'यत्सामान्ययोः' इति न्यायात, ज्ञानं तु तत्सहभूततया तत्राऽन्यथासिद्धमेवेति न तस्याज्ञानत्वेन तद्धतुतेति चेत्, न, मिथ्यादर्शनद्वाराऽज्ञानस्य हेतुत्वे द्वयोर्हेतुत्वसमर्थनात्, अथवा मिथ्यादृष्टिज्ञाने सम्यक्प्रवृत्त्यादिद्वारा मोक्षहेतु- तावच्छेदकज्ञानत्वाभाव एवाज्ञानत्वं, न चोक्तज्ञानत्वव्याप्यत्वमस्यास्त्विति वाच्यम्,सम्यग्दृष्टिसंशयादौ व्यभिचारात्,न चैकवि- श्चयतोऽज्ञा- नत्वम्, पर- प्रश्नपति- विधानञ्च । RAPE CATEGORY ॥ ११ ॥ - भेदभेदान्म- तिश्रुतयो- भैदाभिधान, इन्द्रियवि- भागाद्भेदर- भिधानोप- HERE क्रमश्व ।। शेषवति विशेषान्तराभावेन सामान्यम्भावाभ्युपगमेऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, एकसामान्यवति सामान्यान्तराभावस्यैव स्वीकाराद्, द्वयोः सामान्ययोरेकपदवाच्यतायामेव नयविभागाद्यत्सामान्यवत्येतत्सामान्याभावस्तत्सामान्यमेव मिथ्यात्वोदयजन्यतावच्छेदक, बन्धहेतुतावच्छेदकश्चाज्ञानत्वमेवेति प्राच्यपक्ष एव युक्त इति चेत्,न, अज्ञानत्वेन बन्धाहेतुतायामेतत्पक्षस्यैव युक्तत्वात्, इति दिग्॥ इत्थमेव बन्धहेतुत्वादयो हेतवो ज्ञानत्वगमकाः सम्भवेयुरिति सर्वमवदातम् ॥ १५ ॥ उक्तो हेतुफलभावान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ भेदभेदात्तमभिधातुमाह- वक्ष्यमाणभिदाभाजो-रेतयोरथवा भिदा । विशेषनिश्चये जाति-भेदानुमितिगोचरः॥ १६ ॥ मतिज्ञानस्यावग्रहादयोऽष्टाविंशतिर्भदा, श्रुतज्ञानस्य चाङ्गानङ्गप्रविष्टादयश्चतुर्दश वक्ष्यन्त इति भेदभेदादनयो)दो घटितः, नन्ववान्तरभेदस्य न सामान्यभेदानुमापकत्वम्, अन्यथा पृथिव्याद्यन्यतमभेदस्य द्रव्यभेदानुमापकत्वप्रसङ्गात्, इतिचेत, न, तत्र साध्याभाववति हेतुसन्देहादननुमितेः, अत्र तु साध्याभाववति हेत्वभावनिश्चयेनानुमित्यप्रतिरोधात् व्याप्तिग्राहकादा- गमादेव साध्यसिद्धावपि सिसाधयिषया तदग्रहदशायां वाऽनुमानावतारात्पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन । आह च-भेयकयं च विसेसण-मट्ठावीसइविहंगभेआई [भेदकृतं च विशेषणमष्टाविंशतिविधाङ्गभेदादि]ति ।।वैधय॑मसिद्धमेव सान्यत इत्यप्याहुः॥१६॥ समर्थितो भेदभेदाद् भेद, अथेन्द्रियभेदाद् भेदमभिधातुमाह- अथवेन्द्रियभेदेन, भेदः सिध्येत्तयोद्वयोः॥ श्रुतं पूर्वगते यस्मात् , तदूभेदप्रतिपादनम् ॥ १७॥ स्पष्टः॥ आह च-"इंदिअविभागओवा,मइसुअभेओ जओभिहि॥११६॥" [इन्द्रियविभागतोवा मतिश्रुतभेदो यतोऽभि- RECTOR

RE
इन्द्रियवि-
भागान्मति-
श्रुतभेदामि-
सविवरणं
श्रीज्ञाना-
णेव-
प्रकरणम्
॥ १२ ॥
धाने सा-
हितम् ]त्ति ॥पूर्वगताभिहितं चेदम्-"सोइंदिओवलद्धी, होइ सुअं सेसयं तु मइनाणं ॥ मोचूर्ण दव्वसुअं, अक्खरलंभो अ सेसेतु
॥११७॥ [श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिर्भवति श्रुतं शेषकं तु मतिज्ञानम् ॥ मुक्त्वा द्रव्यश्रुतं, अक्षरलंभश्च शेषेषु ॥ ] ति ॥ १७ ॥
इमामेव गाथां यथाभाष्यं सप्रसङ्गप्रबन्धेन [विवरीपुराह-]
श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धीति-पदार्थ व्याप्तिसिद्धये ॥ द्रव्यभावश्रुते ग्राह्ये, उचिताद्विग्रहदयात् ॥ १८॥
श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरित्यत्र श्रोत्रेन्द्रियेण श्रोत्रेन्द्रियस्य वा उपलब्धिः,इति तत्पुरुषेण भावश्रुतम्, श्रोत्रेन्द्रियादुपलाब्धिर्यस्येत्ति
पहुबीयाश्रयणेन च द्रव्यश्रुतं सगृह्यते,एवमुपयुक्तस्य वदत उभयश्रुतमपि उभयविग्रहाश्रयणाद् ग्राह्यम् ॥१८॥
श्रोत्रेन्द्रियोलब्धिः श्रुतमित्यस्य सावधारणत्वाद्विपरीतावधारणमवबुध्यमानः शङ्कते-
श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिश्चेत्, श्रुतमेवावधार्यते ॥ तद्द्वारकं मतिज्ञान-मुच्छियेत तदा न किम् ॥ १९ ॥
यदि श्रुतमेव श्रोत्रोपलब्धिस्तदा तस्या मतिरूपत्वासम्भवात् श्रोत्रावग्रहाद्यभावेन मतेरष्टाविंशतिभेदाः समुच्छिोरन्, यदि
च सा मतिस्तदैतदुक्त्यसङ्गतिः, उभयं चेत्सङ्करः । आह च-"सोओवलद्धि जइ सुअं,नणाम सोउग्गहादओ बुद्धी ॥ अह
तो ण सुअं, अहोभयं सङ्करो णाम ॥११८॥ [श्रोत्रोपलब्धिर्यदि श्रुतं न नाम श्रोत्रावग्रहादयो बुद्धिः। अथ बुद्धिस्ततो न श्रुतं,
अथोभयं संकरो नाम ] ॥१९॥ अत्रोच्यते--
श्रोत्रोपलब्धिरेवात्र, श्रुतं न श्रुतमेव सा ॥ शब्दः सैवेत्यपव्याख्या, तभेदानधिकारतः॥ २० ॥
अत्र हि गम्य एवकारो विशेषणेन सह योज्यते, तन्महिम्ना च 'चैत्रो धनुर्धर', इत्यत्रेवायोगव्यवच्छेद एव प्रतीयत इति.
PIA
क्ष्योढ़तायाः
पूर्वगतगा-
थाया भा-
प्यानुसार-
विवरणम्॥
SkSRELEASESSAGREE*
.
॥ १२ ॥

है।इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रु- तभेदाभिधा- ने साक्ष्योद्ध- तायाः पूर्व पूर्व- गतगाथाया ॥ RECECESSARELIERSPECIAL श्रोत्रोपलब्धिरेव श्रुतमिति पर्यवसानेऽपि तस्या मतिरूपाया अपि सम्भवान्नोक्तदोषः। आह च-"सोइन्दिओवलद्धी, चेव सुअं न उ तई सुअं चेव ॥सोइन्दिओक्लद्धीवि, काइ जम्हा मइन्नाणं॥१२२॥"[श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव, श्रुतं न तु सा श्रुतमेव । श्रोत्र- न्द्रियोपलब्धिरपि,काचिद्यस्मान्मतिज्ञानम् ] केचित्तु 'श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरित्यत्र केवलबहुव्रीह्याश्रयणेन श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिः श्रुतमेव शब्द एव स च ब्रुवतः श्रूयत इति श्रुतं, शृण्वतस्तु श्रोतुरवग्रहादिना मन्यत इति मतिरित्युभयमुपपन्नम्,उपपन्नाश्चाऽष्टाविंशतिरपि मतेर्भेदा' इत्याहुः, तत्र,धात्वर्थमात्रभेदेन शब्दस्य द्रव्यश्रुतमात्रत्वाप्रतिघाते द्वैविध्याभावात, आह च-"केई बिन्तस्स सुअं, सद्दो सुणउ मइत्ति तं ण हवे ॥जं सब्बोच्चिअ सद्दो, दव्वसुअंतस्स को भेओ?॥११९॥"[केचिद्रुवतः श्रुतं शब्दः शृण्वतो मतिरिति तद् न भवेत् ॥ यत्सर्व एव शब्दो, द्रव्यश्रुतं तस्य को भेदः १] वस्तुतस्त्वेतदवधारणोक्तिर्न मतिश्रुतज्ञानयोर्भेदनिरूपणौपयिकी शब्दभेदनिरूपणं त्वनधिकृतमित्यर्थान्तरम्, यदि च श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदार्थः शब्दविज्ञानमेव कार्यतया चोपचाराच्छब्द एवेत्युच्यते.तदापि वक्तृश्रोगतत्वेन तस्यातिशयाभिधानं श्रुत्वा ध्रुवतश्च सैव मतिः, तदेव च श्रुतमिति साङ्कयम् , पारम्पयं श्रुतो- च्छेदश्च स्यात्,आह च-"किंवा नाणेहिगए, सद्देणं जइ अ सदविचाणं ॥ गहिअंतो को भेओ,भणओ सुणओ च जो तस्स॥१२०॥" [किं वा ज्ञानेऽधिकृते ? शब्देन यदि च शब्दविज्ञानं ॥ गृहीतं ततः को भेदो, भणतः शृण्वतश्च यस्तस्य] " भणओ सुणओ व सुअं, तं जमिह सुआणुसारि विण्णाणं ॥दोण्हं पि सुआईअं, जं विण्णाणं तयं बुद्धी ॥१२१।।" [भणतः शृण्वतो वा श्रुतं, तद्यदिह श्रुतानुसारि विज्ञानं ।। द्वयोरपि श्रुतातीतं, यद्विज्ञानं तबुद्धिः ] किञ्च शब्दविज्ञप्तिः शब्द एवेत्युक्ते किं केन सङ्गतामिति श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धेः शेपाक्षरलाभस्य च शब्दविज्ञानत्वप्रतिपादनेनैव फलतः श्रुतत्त्वप्रतिपादनमनाकाङ्कितमेव श्रोत्रेन्द्रियोपल- भाण्यानुसार रिविवर- णम्॥

म
सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥१३॥
इन्द्रियविभा-
गान्मतिश्रु-
तभेदाभिधा-
ने साक्ष्योद्ध-
तायाः पर्व
मान
गतगाथाया
ब्धौ मतित्वविलक्षणश्रुतत्त्वसिद्धावेव शेषे मतिजिज्ञासाप्रवृत्तेः, अपि च श्रोत्रद्वारिकाप्युपलब्धिर्न शब्द एच, एककारणपरिशेषापातात्
शब्दाजन्यत्वस्य निरमिलापत्वस्य वा व्यावृत्तिरेव श्रुतत्वव्यापिकाऽवधारणफलमेवेति चेत्,न, तथापि व्यापकधर्मपुरस्कारेण तद्धर्म-
वचानिश्चयस्याहत्य व्याप्यधर्मपुरस्कारेण तद्वत्वासंशयानिवर्तकत्वात, अन्यथा इदं द्रव्यमेवेति निश्चये इयं पृथिवी न वेति
संशयाभावप्रसङ्गात्, एवं च शेषेन्द्रियाक्षरलाभे मतित्वशङ्कापि न निवर्तेत तत्र तद्विलक्षणश्रुतत्वाप्रतिपादनाचनियतशब्दजन्य-
त्वप्रतिपादने चोक्त एव दोषः, यत्तु श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदं साभिलापज्ञानपरम्, इति सामिलापज्ञानं श्रुतमेवेति तद्भिन्नं तु
मतिरेवेत्यत्र तुशब्दस्यैवकारार्थकत्वोपपत्तिः, तन्नैतद्व्याख्यानस्येन्द्रियविभागानुपयोगित्वात्, न च तद्विभागलभ्याभिधान-
मेवेदम्, अर्थान्तरत्वात, किञ्चैवं शेषेन्द्रियाक्षरलाभे मतित्वशङ्कानिवृत्तये ' अवखरलम्भो अ सेसेसु ' इत्यभिधानौचित्येऽपि
शेषपदस्य यथावदर्थानुपपत्तरित्यपव्याख्यानमेतत्, ॥२०॥ तुशब्दश्चात्र समुच्चयार्थक एवेति व्याचष्टे-
मतेरपि श्रोत्रधीत्वात्, तुशब्दोऽत्र समुच्चये ॥ नाऽवधारणवन्ध्यत्व-मेकत्रैवावधारणात् ॥ २१ ॥
श्रोत्रावग्रहादिरूपाया मतेरपि श्रोत्रोपलब्धिरूपत्वात्, तुशब्दोऽत्र समुच्चयार्थकः, तथा च श्रोत्रावग्रहादिकञ्च श्रोत्रातिरिक्ते-
न्द्रियजन्यञ्च ज्ञानं मतिः, इति पर्यवस्यति, न चात्रावधारणं सम्भवति सप्रयोजनं वा, एकत्रावधारणादेव विभागोपलम्भादेतादृशतु-
शब्दव्याख्यानादपि स मतिभेदभङ्गानापत्तिं समर्थयति॥आह च-"तुसमुच्चयवयणाओवकाई सोइंदिओवलद्धीवि ॥ मइरेवं सति
सोउग्गाहादओ होन्ति मइभेआ॥॥१२३॥" [तुसमुच्चयवचनाद्वा, काचिच्छोडेन्द्रियोपलब्धिरपि॥ मतिरेवं सति श्रोत्रावग्रहादयो
भवन्ति मतिभेदाः] ॥ २१ ॥ ननु शेषं मतिज्ञानमित्युक्ते पत्रादिगतं अक्षरविन्यासरूपं मतिज्ञानं मा प्रसांक्षीदिति " मोत्तूणं
भाष्यानुसा-
रिविवर-
णम् ॥
CASSES
॥ १३ ॥

Ak HETAH दव्वसु" इत्युक्तं तत्र तस्य द्रव्यश्रुतत्वे कि मानं कथश्च शेषेन्द्रियाक्षरलाभो न मतिरित्याशड्कायामाह- व्यञ्जनाक्षरवद् द्रव्य-श्रुतं लिप्यक्षरं मतम् ।। भावश्रुतं वर्णलाभः, शेषं तु मतिरिष्यते।। २२ ॥ लिप्यक्षरं द्रव्यश्रुतं व्यन्जनाक्षरवदित्यत्र भावश्रुतकारणत्वात्, इतिहेतुर्गम्यः । यदाह-"पत्ताइगयं सुअकारणं ति, सदो व्व तेण दव्वसुअंग भावसुयमक्खराणं, लाभो सेसं मइमाणं ॥१२४॥ [पत्रादिगतं श्रुतकारणमिति शब्द इव तेन द्रव्यश्रुतम्॥भावश्रुत- मक्षराणां, लाभः शेषं मतिज्ञानम् ] ननु द्रव्यश्रुतत्वमत्र साध्यम्, तच्च भावश्रुतकारणश्रुतत्वमेवेति हेतुसाध्ययोरभेद इति चेत्, न, द्रव्यश्रुतव्यवहारीवषयत्वस्यैव साध्यत्वाद्, हेतौ कारणपदस्य नियतान्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वपरत्वाद्वा, ननु भावश्रुतप्रयोजक- त्वमात्र, व्यभिचारि व्यञ्जनाक्षरसाधारणं, परम्परया च न लिप्यक्षरस्य शाब्दज्ञानानुकूलत्वं तादृशानुपूर्वीकलिप्यक्षरज्ञाना- जन्यतादृशानुपूर्वीकव्यञ्जनाक्षरज्ञानोत्तरमेव पदार्थोपस्थित्या शाब्दबोधोदयाद्, न च व्यजनाक्षरेणेव लिप्यक्षरेणापि सममर्थस्य सम्बन्धग्रहात्ततोऽप्याहत्य तदुपस्थितिरिति वाच्यम् , अर्थाव्युत्पन्नानां ततः शब्दस्यैवोपस्थित्याज्यत्रापि तदुप- स्थितिद्वारैव तस्यार्थोपस्थापकत्वाद, साधुत्वाद्यभावेन तस्य शाब्दवोधाहेतुत्वाचेति चेत्, न, व्यजनाक्षरादिव लिप्यक्षरादपि पवाकलितसङ्केतानां झटित्येवार्थोपस्थितेः, साधुत्वस्य सर्वत्रातन्त्रत्वादर्थोपस्थितिकारणतत्कारणसाधारणप्रयोजकत्वस्यैव वा व्यवहारानुकूलत्वात्सम्प्रदायभङ्गस्य विपक्षबाधकतर्कत्वादित्यायूहनीयम्, लब्ध्यक्षरं तु श्रुतानुसारित्वात् , भावश्रुतं न मति- रिति शेष मतिज्ञानमिति सुव्यवस्थितम्॥ आह च-'भावसुअमक्खराणं लाभो सेसं मइन्नाणं ॥ [ भावश्रुतमक्षराणां लाभः शेष मतिज्ञानम् ॥]ति ॥२२॥ ननु यदि शेषाक्षरलाभोऽपि श्रुतं तर्हि श्रुतं श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेवेत्यवधारणं भग्नमित्यत आह- इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रु- तभेदाभिधा- साक्ष्योद्ध- तायाः पूर्व- गतगाथाया भाष्यानुसा- रिविवरणम्।। *14-1* 545

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
णेव-
प्रकरणम्
॥ १४ ॥
श्रुतत्वं न जहात्येव, लब्धिरक्षरगर्भिणी ॥ श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिः सा, यतो योग्यतया स्मृता ॥ २३ ॥
शेपेन्द्रियद्वारकज्ञानेपि प्रतिभासमानमक्षरं श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धियोग्यमिति श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव तत् । आह च-"जइ
सुअमक्खरलाभो, न णाम सोओवलद्धिरेव सुअं॥ सोओवलद्धिरेवक्खराइं सुइसम्भवाओ" त्ति ॥१२५॥॥ [यदि श्रुतमक्षरलाभो न
नाम श्रोत्रोपलब्धिरेव श्रुतम् ॥ श्रोत्रोपलब्धिरेवाक्षराणि श्रुतिसंभवादिति]॥२३॥ नन्वेवं द्रव्यश्रुतस्योपलब्धिविषयस्य तथात्व-
समर्थनेऽप्यक्षरोपलब्धेस्तथात्वमसमर्थितं न खलु सापि श्रोत्रग्रहणयोग्या, न चाभिलापस्य तथात्वे तदाकारपरिणतज्ञानस्यापि तथा-
त्वम् , परिणामपरिणामिनोः सर्वथैकत्वाभावात्, एवं सति केवलबहुब्रीद्याश्रयणप्रसङ्गाच, इति चेत्, उच्यते-शेषाक्षरलाभोऽपि
श्रुतानुसारितया सङ्केतग्रहमपेक्षमाणः साक्षात्परम्परया वा तदनुकूलां श्रोत्रजन्यां पदधियमुपजीवतीति श्रोत्रद्वारिकोपलाब्धरेव
सा, न चेन्द्रियान्तरमपि तत्र द्वारामित्यवधारणानुपपत्तिः, श्रोत्राद्वारकत्वव्यावृत्तरेव तत्फलत्वादस्मादेवावधारणादिन्द्रियाविभागः
सङ्गच्छते, अन्यथा द्वयोरपि मतिश्रुतयोः सर्वेन्द्रियापेक्षाया अविशेषादित्याशयेनाह-
अवधारणमाश्रित्ये-न्द्रियभेदोऽपि युज्यते ॥ उपेक्ष्यमेव व्याख्यान-मतो निरवधारणम् ॥ २४ ॥
तथाविधविरुद्धधर्माध्यासलक्षणभेदोपयिकाऽवधारणेनैव हि मतिश्रुतयोरिन्द्रियभेदो युज्यते, विनाऽवधारणं तदलाभात्, अथ
श्रुतं श्रोत्रोपलब्धिरेवेति सावधारणव्याख्याने शेषाक्षरलाभासङ्ग्रहेणाऽनन्वयात् श्रोत्रोपलब्धिपदस्य तद्योग्यत्वार्थकतया 'अक्खरलं-
भोसेसेसु' इत्यभिधानानुपपत्तेः, न च तत्रोत्सर्गव्याप्तं मतित्वमपोदितुं तदभिधानं, प्रथमार्थानुपपत्तेः, न चाक्षरलामे श्रुताभेदान्वया-
देव तदपवादो, वाक्यभेदप्रसङ्गात्, न च द्वितीयार्थ एवेयं प्रथमा, अक्षरलाभपदस्य श्रुतानुसार्यक्षरलाभपरतया द्रव्यश्रुत इव तत्रापि
इन्द्रियविमा-
गान्मतिश्रु-
तभेदाभिधा-
ने साक्ष्योद्ध-
तायाः पूक-
गतगाथामा
भाष्यानुसा-
रिविवर-
णम् ॥
॥१४॥

मुक्त्वेत्यन्वयसम्भवेऽप्यप्रामाणिकावभाक्तिव्यत्ययकल्पनानाचित्यात, तस्मानिरवधारणव्याख्यानमेव सम्यक् फलतोऽवधारणला- भाचेन्द्रियविभागोपपत्तिरिति चेत्, न, एकाऽवधारणलामेभ्यभजनाशङ्कया तदभिधानात्, अतु एवोभयाव्यभिचारस्थलेऽपि निय- मद्वयाभिधानं तत्र तत्रोपवीक्ष्यते॥२४॥ ननु यदि शेषाक्षरलाभः सर्वोऽपि श्रुतं तर्हि अवग्रहरूपैव मतिः स्यात्, इत्यत आह- भावः श्रुताक्षराणां यः, स एव श्रुतमिष्यते । ईहादयो मतेर्भेदा, नोच्छिद्येरन् कुतोऽन्यथा ॥ २५ ॥ यदि सर्वोऽप्यक्षरलाभः श्रुतं तर्पक्षरानुविद्धा ईहादयोऽपि श्रुतरूपा एव प्रसजेयुरित्यवग्रहैकमूर्तिरेव मतिः पर्यवस्येत्,तस्माच्छ्रुता- नुसार्यक्षरलाभ एव श्रुतमिति ॥ आह च-" सोऽवि हु सुअक्खराणं, जो लाभो तं सुअं मई सेसा ॥ जइ वा अणक्खरच्चि, सा सव्वा ण प्पवत्तेज्जा।।१२६॥" [सोऽपि खलु श्रुताक्षराणां यो लाभस्तच्छ्रुतं मतिः शेषा॥ यदि वाऽनक्षरैव, सा सर्वा न प्रवर्तत] इत्थं व्याख्याता 'सोइंदिओवलम्धीति' पूर्वगतगाथा॥२५॥अथाग्रिमपूर्वगतगाथासम्बन्धाय “दव्वसुअंभावसुअं,उभयं वा किं कह व होज्जत्ति। को वा भावसुअंसो, दव्वाइसुअं परिणमेज ॥१२७॥" [ द्रव्यश्रुतं भावश्रुतं, उभयं वा किं कथं वा भवेदिति।। को वा भावश्रुतांशो द्रव्यादिश्रुतं परिणमेत ] ति ॥ भाष्योक्तां सङ्गतिमनुवदति । द्रव्यभावश्रुते युग्मं, किं कथं वा भवेदिति ॥ कियान् भावभुतस्यांशो-द्रव्यादीत्यनुभाषते ॥ २६ ॥ द्रव्यश्रुतं भावश्रुतमुभयश्रुतं वा किं कथं च तद्भवेत्कियान्वा भावश्रुतस्य भागो द्रव्यश्रुतमुभयश्रुतं वेत्यनुभाषितुमिमां गाथा- माह-पूर्वगतप्रणयनप्रवण:-"बुद्धिदिढे अत्थे, जे भासइ तं सुअंमईसहि॥इयरत्थवि होज सुअं, उवलद्धिसमं जइ भणेज्जा ॥१२८॥[बुद्धिदृष्टेऽर्थे यान्भाषते तत्श्रुतं मतिसहितम् ॥ इतरत्रापि भवेत् श्रुतं, उपलब्धिसमं यदि भणेत्] ॥२६॥ इमामेव व्याचष्टे- CRIM इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रुत- भेदाभिघाने साक्ष्योध्धृता- या: "सोइंदि- ओवलव्धी- ति"पूर्वगत- गाथाया वि- वरणसमाप्तिः भाष्योक्ता- ग्रिमपूर्वगतं- गाथासङ्ग- तिश्व Read - 1 सविवरण श्रीज्ञाना- व- प्रकरणम्॥ ॥ १५ ACKAGESEX बुद्धया बुद्धिगतानन , वदतो ह्युभयश्रुतम् ॥ द्रव्यतोऽनुपयुक्तस्य, भावतो जानतः परम् ॥२७॥ बुद्धया दृष्टानर्थान् मतिसहितान् यान् भाषते तव्यभावलक्षणमुभयश्रुतम्, अत्र बुद्धिशब्दो मतिशब्दश्च श्रुततात्पर्यकः, निरूपणप्रयोजकविवक्षारूपज्ञानस्य प्रयोगसमकालीनोपयोगस्य च मतिरूपस्यासम्भवात्, उभयत्वं चात्र प्रयोगोपयोगाभ्यां बोध्यम्, न तु विवक्षया, तया सहकविशिष्टापरत्वरूपोभयत्वासम्भवात्, अनुपयुक्तस्यैव वदतो द्रव्यश्रुतम्, अथानुपयुक्तस्यैव प्रयोगो भवति नोपयुक्तस्य, प्रयोगकाल एच तदधीनार्थोपयोगस्यासम्भवात, तथा च कथमयं विभाग इति चेत्, न, सोपयोगप्रयोगाभिधि- सया केवलप्रयोगाभिधित्सया च प्रयोगद्वैविध्यसम्भवाद्वर्णादिषुच्छिन्नज्वालादृष्टान्तेनैव वोपयोग इति व्यक्तमध्या- ममतपरीक्षायाम्, तदिदमभिप्रेत्याह-"जे सुअबुद्धिदिढे सुअमइसहिओ पभासई भावे।। तं उभयसुअंभण्णइ, दब्बसु जेउ अणुवउत्तो॥१२९॥"[यान् श्रुतबुद्धिदृष्टान,श्रुतमतिसहितः प्रभाषते भावान्।।तदुभयश्रुतं भण्यते, द्रव्यश्रुतं यांस्त्वनुपयुक्तः] अत्रा- भाषमाणस्यैव श्रुतबुद्ध्या पर्यालोचयतस्तु भावश्रुतमेवेति सामर्थ्यगम्यं, सामर्थ्य च न तत् भावश्रुतमेवेति साध्ये द्रव्योभयश्रुतभिन्न- त्वे सति श्रुतत्वम्, एवकारेण साध्यार्थस्यापि तादृशस्य पर्यवसाने हेतुसाध्याभेदप्रसङ्गात, किन्तु प्रयोगाकालीनश्रुतत्वमेवेति चोध्यम् ॥ सूत्रे तु श्रुतपदस्योभयश्रुतपरतयाऽनुपयुक्तस्य वदतो द्रव्यश्रुतमेवेत्यपि सामर्थ्यगम्यमेव, एवञ्च द्रव्यश्रुतं भावश्रुत- मुभयश्रुतं वा कि कथञ्च भवेदित्याकांक्षाः पूरिताः॥२७॥ अथ द्रव्यश्रुतमुभयश्रुतं वा भावश्रुतस्य कियानंश इत्याकांक्षापूरणोपयिक- मुत्तरार्ध व्याख्यायते तात्पर्यतः- केवलश्रुतकालेऽपि, तदाऽऽत्मन्युभयश्रुतम् । भवेद्यधुपलब्धार्थान् , सर्वान् वक्तुं क्षमेत सः ॥ २८॥ इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रुत- भेदाभिधा- ने 'बुद्धिदि? अत्थे इति पूर्वगत- गाथाया भाष्यानुसा- रिपूर्वार्धविव- रणम् ॥ KAREGRESSOCKEEK इन्द्रियविभा- मान्मतिश्रुत- भेदाभिधाने उक्तपूर्वगत.. गाथोत्तरार्द्ध- CRORSEENESCAPEOk स्य इयरत्थ वि होज सुअं उवलद्धिसमं जइ भणिज्जा ॥१२८ ॥" इत्यस्यायमर्थः, इतरत्र भावश्रुते, भवेद्रव्यश्रुतमु- भयश्रुतं वा, यापलब्धिसमं भणेत् प्राकृतशैल्या सहस्य समभावनिपातनात्समशब्दस्य तुल्यार्थकत्वात्समकालार्थकत्वाद्वो- पलब्ध्या सहोपलब्धितुल्यमुपलब्धिसमकालं वा भणेद्, अत्राद्यन्तयोः सहभावयौगपद्ययोः सामान्येन ग्रहणादीप्सितार्थ- सिद्धिः, तदिदमाह-" इयरत्थवि भावसुए, होज्ज तयं तस्सम जइ भणिज्जा ॥ण य तरइ तत्तियं सो, जमणेगगुणं तयं तत्तो ॥१३०॥"[इतरत्रापि भावश्रुते, भवेत्तत्तत्समं यदि भणेत् ॥ न च तरति, तावत्सःयदनेकगुणं तत्ततः ] " सह उवलध्धीए वा, उपलब्धिसमं तया व जं तुल्लं । जं तस्समकालं वा, ण सव्वहा तरइ बोत्तुं जे ॥१३१॥"[सहोपलब्ध्या वोपलब्धिसमं तदा वा यत्तुल्यम् ॥ यत्तत्समकालं वा न सर्वथा तरति वक्तुम्] एवञ्च द्रव्यश्रुतादुभयश्रुताचानन्तगुणं भावभुतं प्राप्तमिति सम्प्रदायः॥ व्यक्तीभविष्यति चेदमुपरिष्टात, भावश्रुते द्रव्यश्रुतमप्रसक्तमिति सूत्रे श्रुतपदं प्रागुक्तश्रुतपदसमानार्थकमुभयश्रुतपरमेव, न चैवं तच्छब्देन तस्य परामर्शो युज्येत, सूत्रकृतांगतेर्विचित्रत्वात्, न चैकविशेष विशेषान्तरमापादनाहमिति, इतरत्रेत्यस्य केवलभावश्रुतोत्पत्तिकाल इत्यर्थः । एवञ्च तदा भावश्रुतसामग्रीसत्त्वेऽपि द्रव्यश्रुतसामग्र्यभावादुभयश्रुताभावो, न ह्युभयम- तिरिक्तमस्ति, प्रत्येकातिरिक्तसमुदायाभावादित्येतत्तात्पर्यम् ॥२८॥ अथान केषाञ्चिन्मतिश्रुतभेदोपयिक पूर्वार्द्धव्याख्याको- शलमपहस्तयितुमुद्भावयति- मत्या सह तया दृष्टान्, अवतो युभयश्रुतम् ॥ द्रव्यतोऽनुपयुक्तस्य, तदेकालोचनं मतिः ॥ २९ ॥ 'बुद्धिद्दि?' इत्यत्र बुद्धया मत्या दृष्टेष्वर्थेषु मध्ये अत्र 'वर्णेषु क्षत्रियः शूर' इत्यत्रेव मध्यार्थे सप्तमी, एकवचनं बहु- भाष्यानु- सारिविव- रणम् ॥ -

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥१६॥
रन्द्रियविमा-
गान्मतिश्रु-
तभेदाभिधा-
ने उक्तपूर्वग-
तगाथाया
व्याख्याना-
वचनार्थकं जात्यभिप्रायकं वा, बुड्या मत्या दृष्टान् यानर्थान् मतिसहितान् भापत इति सम्मुखीनैव व्याख्या, तच्छुतमुपयोग-
प्रयोगाभ्यामुभयश्रुतं भवति। ननु मतिसाहित्यं कथमर्थानां विशेषणमनन्वयादिति चेत्, अत्राहुः-मईसहियमित्यत्र मत्युपयोगे
वचेमानस्य वक्तुग्रहणात् , तस्य मत्युपयोगसाहित्येनार्थानामपि तदुपर्यत इति । अत एवाह-"केई बुद्धिद्दिद्वे, मइसहिए
भासओ सुअंति॥"[कचिद् बुद्धिदृष्टान् मतिसहितान्माषमाणस्य श्रुतम् ॥] इदं च भाष्यानुरोधादुक्तम्, सूत्रे तु मइसहियमित्यत्र
मतिसाहित्यस्य क्रियाविशेषणत्वलाभान्मत्युपयोगसहितम्, मतिदृष्टार्थभाषणं श्रुतमिति सम्मुखोऽर्थ एव युक्तो, नहि मतिसहिता
भाष्यमाणा अर्थास्तव , अपि तु तादृशः शब्द इति ॥ अत एवाह-तत्सहितं यथा भवत्येवं यान् भावान भाषते इति अनुप-
तस्यैव वदतो द्रव्यश्रुतं, अभाषमाणस्य पदार्थमात्रपर्यालोचनं तु मतिः,इति मतिश्रुतयोभैद इति ॥२९॥ तदेतद्दषयति-
केचिदाहुरिदं, तन्नो, युक्तं भावश्रुतव्ययात् ॥ नाधिक्यं नान्यथात्वं वा, भाषाव्यापारतो मतेः॥ ३० ॥
तदिदं व्याख्यानमयुक्तं भावश्रुतोच्छेदप्रसङ्गात्, नहि प्रयुज्यमानः शब्दो मतिज्ञानं वा तद्, अत एव नोभयं प्रत्येकाभावे
समुदायाभावाद् , आह च-"तत्थ ॥ किं सद्दो मइरुभयं, भावसुअं सव्वहाऽजुत्तं ॥१३२॥ [तत्र किं शब्दो मतिरुभयं, भाव-
श्रुतं सर्वथाऽयुक्तम् ] " सदो ता दव्वसुअं, मइभिनि-बोहि न वा उभयं ॥ जुत्तं, उभयाभावे भावसुअं कत्थ तं किं वा
॥१३३॥ [शब्दस्तावद्र्व्यश्रुतं मतिराभिनिवोधिकं नवा उभयं।। युक्तं, उभयाभावे, भावश्रुतं कुत्र तत्किं वा] न च भाषापरिणति-
काले मतराधिक्यमुपक्षयो वा जायते, न वा भाषारम्भ एवात्र विशेषस्तस्य तत्स्वरूपपरावृत्यसहत्वात्, अन्यथा धावनवल्गनादि-
क्रियानन्त्यान्मतेरानन्त्यप्रसङ्गात्, अथ द्रव्यश्रुतसामग्र्या एव भावभुतसामग्रीत्वान्मतिदृष्टार्थप्रयोगसमानकालीन उपयोगः श्रुतमेव
खण्डन
भाष्यानुसा-
रेण ।
Res
॥ १६ ॥

इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रु- तभेदाभिषा- ने उक्तपूर्व- गाथोत्तराई- व्याख्याना- न्तरस्य मा- तस्य च मतिजन्यतया मतित्वं श्रुतत्वं चेत्युभयमप्यविरुद्धमिति चेत्, न,एवं सति श्रुतोहाद्याभिलापस्थलेऽवध्यादिमूलकाभिलापस्थले च तत्प्रसङ्गात्, तदिदमभिप्रेत्याह-" भासापरिणइकाले, मईए किमहियमहवन्नहत्तं वा-भासासंकप्पविसेसमेत्तओ वा सुअमजुत्तं ॥१३४ ॥" [भाषापरिणतिकाले मतेः किमधिकमथवाऽन्यथात्वं वा ॥ भाषासंकल्पविशेषमात्रतो वा श्रुतमयुक्तम् ॥] ॥३०॥ ननु मतेः श्रुतहेतुत्वात् नावध्यादिस्थले तत्प्रसङ्गः, श्रुतानुसाराभावाच्च नाश्रुताभिलापस्थलेऽपीत्यत आह- मत्या श्रुतानुसारस्या-श्रयणाजन्यते श्रुतम् ॥ इति चेच्छ्रुतसङ्कल्पः, श्रुतमेवावधार्यताम् ॥ ३१ ॥ श्रुतमनुसृत्य मतिज्ञानेन यदि श्रुतज्ञानं जन्यते तर्हि भाषासङ्कल्पोऽपि श्रुतानुसारितया श्रुतमेव स्यात्, न तु मतिरिति बुद्ध्या मतिज्ञानेनेति व्याख्यानमनुपपन्नम् ॥३१ ॥केषाञ्चिदेवोत्तरार्द्धव्याख्यानमधरयति- इतरोत्पत्तिकाले च, श्रुतं स्यादिति दुर्वचम् ॥ भिन्नहेतुकतासिद्धेः, स्वस्वावरणभेदतः ॥ ३२ ॥ इतरत्र केवलमतिज्ञानोत्पत्तिकाले, तदा श्रुतं स्याद्यधुपलब्धिसमं भणेदित्याद्यापादनानई, तदा श्रुतज्ञानसामग्रीविरहनिश्चयेन तदनापत्तेः, भिन्नलक्षणावरणत्वेन द्वयोर्व्यवस्थितत्वात्, न च तदा श्रुतलब्धिसत्त्वाचदापत्तिः, विशेषसामग्र्यभावेन तदभावात्सा च परोपदेशाहद्वचनाद्यनुसाररूपा, अत एवाह-"इयरत्थवि मइनाणे, होज्ज सुअंति किह तं सुअं होइ ।। किह व सुअं होइ मई, सलक्खणावरणभेआओ ॥ १३५॥" [इतरत्रापि मतिज्ञाने भवेच्छ्रतमिति कथं तच्छ्रतं भवति ॥ कथं वा श्रुतं भवति मतिः, स्वलक्षणावरणभेदात् ॥] परव्याख्या बाधकत्व(वाधितार्थ)गोचरा भ्रान्तैव निसर्गात्,इति न किञ्चिदेतत्।।३२।। श्रुतोपलब्धानां तु बहु- त्वादेव कात्स्न्येन वक्तुमशक्यत्वं कौशलमादधानस्य अति वश्रुतंन स्यादेव द्रव्यश्रुतत्वं तु तत्र निगद्यमानं हृद्यमपीत्याशयेनाह- ष्यानुसारि- खण्डनम् ।। LER

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम्॥
॥१७॥
साम्प्रतं शब्दहेतुत्वा-न्मतिर्द्रव्यश्रुतं भवेत् ॥ शुद्धा तु सा तदा तत्स्याद्, यदि ज्ञप्तिसमं भणेत् ॥३३॥
मतिदृष्टानर्थान्मत्युपयोगेन भाषमाणस्य द्रव्यश्रुतरूपशब्दकारणतया मतिद्रव्यश्रुतत्वमास्कन्देदेव, प्रयोगानुकुला च मतिस्तु
तथात्वमनुवीत,यदि नाम मतिमानुपलब्धिसमं भणितुं शक्नुयातू,आह च-"अहव मई दव्वसुअत्तमेउ,भावेण सा विरुज्झज्जा।
जो असुअक्खरलाभौ, तं मइसहिओ पभासेज्जा ॥१३६॥" [अथवा मतिर्द्रव्यश्रुतत्वमेतु, भावेन सा विरुध्येत ॥ योऽश्रुताक्षरलाभस्तं
मतिसहितः प्रभाषेत ।।] "इयरम्मि वि मइनाणे, होज्ज तयं तस्सम जइ भणेज्जा ॥ ण य तरइ तत्तियं सो, जमणेगगुणं
तयं तत्तो ॥ ॥ १३७॥" [इतरस्मिन्नपि मतिज्ञाने, भवेत्तत्समं यदि भणेत् ॥ न च तरति तावत्स यदनेकगुणं तत्ततः ॥]
ननु शुद्धापि मतिः शब्दकारणत्वात्कुतो न द्रव्यश्रुतं, नहि कार्यमजनयतोऽपि कारणस्याकारणत्वं नाम, अरण्यस्थ-
दण्डादर्घटाहेतृत्वप्रसङ्गात्, किश्चैतद्व्याख्यानस्याविरोधाभिधानसावधानत्वेन मतिद्रव्यश्रुतयोर्भेदनिरूपणोपयिकत्वेऽपि मति-
श्रुतयोस्तन्निरूपणानौपयिकत्वमिति चेत्, न, सहकारियोग्यताया एव द्रव्यघटकत्वात्, उक्तातिदेशेन श्रुतेऽपि तद्भेदलाभेन
प्रयोगभेदेन मतिश्रुतयोरपि भेदलाभाच [चानुना विप्रयोगेऽप्यात्मानमलभमानाः शब्दाः पार्वतिच्छायं]॥ [अत्राशुध्धमवभासते]।
ननूपलब्धितुल्यं भाणितुमशक्यमित्यत्र को हेतुरित्यत आह-
अस्वाभाव्याद् बहुत्वाच्च, न सर्वत्र गिरां गतिः॥ अपि प्रज्ञापनीयाना-मनन्तोंऽशो न्यबन्धि यत् ॥३४॥
मत्याधुपलब्धार्थानामनभिलाप्यत्वस्वभावादेव वक्तुमशक्यत्वं, यद्यपि कतिपयास्तैरप्यभिलाप्या एव तथापि श्रुताविषय-
त्वेन तेषामनभिलाप्यत्वं बोध्यं, भाष्ये शेषोपलब्धिपदं वा श्रुतोपलब्ध्ययोग्यत्वपरम्, यत्तु कश्चिदाह न सन्त्येवानभिलाप्या भावा
इन्द्रियविभा-
गान्मतिश्श.
तभेदाभिधा-
ने उक्तपूर्व-
गतोत्तरार्ध.
व्याख्यान
विशेषस्य-
भाष्यानुसा-
रिहृद्यतोप-
दर्शनम् ॥
REASURG
॥ १७॥

इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रु- तभेदाभिधा- ने सर्वार्थानां वक्तुमयो- ग्यत्वं भाष्या- अभिधेयत्वस्य केवलान्वयित्वात, इति, तत्तुच्छं, सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वादित्यत्राभिधाविषयत्वस्य साध्यत्वे सिद्धसाधनादनभि- लाप्यानामप्यनभिलाप्यपदाभिधेयत्वात्, तत्तत्पदबोध्यत्वप्रकारित्वावच्छिन्नेच्छाविषयत्वस्य साध्यत्वे क्वचिदेकस्येव सर्वस्यापि सङ्केतग्रहासम्भवेन विपक्षवाधकतर्कविरहेणाप्रयोजकत्वात्, न च विपक्षस्याभिधानानभिधानाम्यां व्याघात एव तद्बाधकस्ता, अनभिधानेऽपि वस्तुस्वरूपाच्युतेः, अथ न सङ्केतमात्रममिधा, आधुनिकसङ्केतितेष्वपि तत्प्रसङ्गात्, सर्गादौ वाऽस्मदादिसङ्के- तानुत्थानाच, किन्त्वीश्वरेच्छैव सा, तस्याश्च नित्यतया न कारणविरहप्रयुक्तो विरह इति तद्विषयत्वमेव सार्वत्रिकमनुमेयमिति चेत, न, शाब्दबोधानुकूलसङ्केतमात्रस्यार्थोपस्थापकत्वात वात्सर्गादेरसिद्धरीश्वरस्याप्यसिद्धेस्तज्ज्ञानविषयत्वस्येव तदिच्छाविषयत्वस्य साध्यत्वेऽप्युद्देश्यासिद्धस्तदिच्छाविशेषविषयत्वस्य साध्यत्वेअयोजकत्वाद्, अर्थानां बाहुल्येन शब्दानां चाल्पत्वेन सर्वत्र तदप्रसरात, न हि तत्तत्क्षणेष्वेवानन्तेषु विशेषपदप्रयोगः सम्भवी, किमङ्ग शेपेषु भावेषु, न चोलब्धेष्वपि बहुत्वं हेतूभवितुमु- त्सहते, तथापि फलाभावे स्वरूपायोग्यत्वमेव हेतुरिति तत्रास्वाभान्यमेव हेतुरुक्तः, उपायस्योपायान्तरादूषकत्वाद्वा, तदिद- माह-"कह मइसुओवलद्धा, तीरंति न भासिउं बहुत्ताओ ॥ सव्वेण जीविएण वि, भासइ जमणंतभागं सो ॥१३८॥" [कथं मतिश्रुतापलब्धास्तीयन्ते न भाषितुं बहुत्वात् ॥ सर्वेण जीवितेनापि, माषते यदनन्तभागं सः] "तीरंति ण वो जे, सुओबलद्धा बहुत्तभावाओ ॥ सेसोवलद्धभावा साभव्यबहुत्तओमिहिआ ॥१३९॥" [तीयन्ते न वक्तुं, श्रुतोपलब्धा बहुत्वभावात् ॥ शेषो- पलब्धभावाः स्वाभाव्यबहुत्वतोऽभिहिताः]ननु मतिश्रुतोपलब्धार्थानां कथमीदृशं बहुत्वं यदनन्तभाग एव कृत्स्नेनायुषा भाष्यत इति चेत्, उच्यते, तदनन्तभागनिबन्धस्यैव सूत्रोक्तत्वात, आह च-" कत्तो एत्तियमेत्ता, भावसुअमईण पज्जया जेसिं ॥ नुसारिच- चितम् ॥ RECRUAGARRESREGRE 6 16716REMICROSNESS इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रुत. भेदाभिधाने मतिश्रुतोपल- ब्धार्थानन्त- भाग एक भाष्यतइत्य भासइ अणतमागं, मण्णइ जम्हा सुए मणिय॥१४०॥"[कृत एतावन्मात्रा भावभुतमत्योः पर्याया येषाम् ॥ भायतेऽनन्तभागं सविवरणं भण्यते यस्माच्छ्तेऽभिहितम्] "पणवणिज्जाभावा, अणंतभागो उ "अणभिलप्पाणं । पण्णवणिज्जाणं पुण, अणंतभागो सुअनिबद्धो" श्रीज्ञाना- र्णव- २१ ॥१४१॥ [ प्रज्ञापनीया भावा अनन्तभागस्त्वनामिलाप्यानाम् ॥ प्रज्ञापनयिानां, पुनरनन्तभागःश्रुतनिबद्धः ।।] एवं च भागकारेण गुणकारानुमानादनन्तगुणत्वं तेषां सिद्धमिति भावः ॥३४॥ उक्तमेवोपपादयितुमाह- प्रकरणम्॥ अत एव च पूर्वज्ञा, नूनं षट्स्थानगामिनः॥ समाक्षरा अप्यसमाः, श्रुताभ्यन्तरया धिया ॥३५॥ ॥ १८॥ यतोऽभिलाप्यभावानामनन्तभाग एव सूत्रे निबद्धोऽत एव पूर्वज्ञानां।"अणतभागहीणे वा, "असंखिजभागहीणे वा,संखिज्ज- भागहीणे वा, संखेज्जगुणहीणेवा, असंखेज्जगुणहीणे वा, अणंतगुणहीणे वा" इति सूत्रोक्तं हीनत्वघटितं, "अणंतभागब्भहिए वा, असंखेजभागभहिए वा, संखेज्जभागभहिए वा, संखेज्जगुणन्भहिए वा, असंखेनगुणब्भहिए वा, अणतगुणन्भहिए वा" इति सूत्रोक्तं चाधिक्यघटितं षट्रस्थानगामित्वं सङ्गच्छते। सर्वश्रुतार्थनिबन्धे च सर्वेषां साम्यापत्तिः।। ननु हीनाधिकभावः कथं सर्वेषां चतुर्दशपूर्ववित्त्वे । उच्यते, तावदक्षरलामाविशेषेऽपि तदभ्यन्तरमतिवैषम्यात, नन्वेवमपि श्रुतापेक्षया न षट्रस्थानोपनिपातोपि तु मत्यपेक्षयेति चेत्, न, श्रुताभ्यन्तरमतेरपि श्रुतानुसारितया श्रुतस्वरूपत्वात् ॥तदिमाह-"जं चोद्दसपुव्वधरा, छट्टाणगया परोप्पर होति ॥ तेण उ अणतभागो, पन्नवाणिज्जाण जं सुत्तं ॥ १४२ ॥" [ यच्चतुर्दशपूर्वधराः षट्रस्थानगताः परस्परं भवन्ति । तेन त्वनन्तभागः, प्रज्ञापनीयानां यत्सूत्रं ॥] “ अक्खरलंभेण समा ऊणहिआ हुंति मइविसेसेहिं ॥ ते उण(विय)मईविसेसे, सुअनाण- ग्मंतरे जाण ॥ १४३॥” [ अक्षरलाभेन समा ऊनाधिका भवन्ति मतिविशेषैः ॥ तानपि च मतिविशेषान् , श्रुतज्ञानाभ्यन्तरे स्य भाष्या- नुसायुपपा- दनम् ॥ RRC ॥१८॥ MORE HES इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रु. तभेदाभिधा- ने साक्ष्योद्ध SH is a तायाः पूर्व- गतगाथाया जानीहि ॥] " जे अक्खराणुसारेण, मईविसेसा तयं सुअं सव्वं ॥ जे उण सुअणिरवेक्खा, सुद्धं चिय तं मइन्नाणं ॥१४४॥" [येऽक्षरानुसारेण, मतिविशेषास्तच्छुतं सर्वम् ॥ ये पुनः श्रुतनिरपेक्षाः, शुद्धमेव तन्मतिज्ञानम् ॥] अत्र 'सुअनाणं, चेव जाणाहि ॥ [ श्रुतज्ञानमेव जानीहि ] इति पाठमुपेक्ष्य 'सुअनाणभतरे जाण' [ श्रुतज्ञानाभ्यन्तरे जानीहि ] इति पाठकरणं चैवयोवैयर्थ्यांच्छन्दोभङ्गभयादङ्गाभ्यन्तरादिपदवदभेदार्थकस्याभ्यन्तरपदस्यातिसान्निध्यव्यञ्जकत्वाच्छूतपदस्य चतुर्दशपूर्वश्रुतार्थ- कत्वेऽभ्यन्तरपदस्य तज्जातीयत्वबोधकत्वाद्वेत्याहुः ॥ ३५ ॥ ननु पदजन्यं ज्ञानमेव श्रुतं, तदुपजीविज्ञानान्तरं तु मतिरेव, नहि तदुपजीवित्वेन तत्वं नाम, प्रत्यक्षोपजीवित्वेनानुमानस्यापि प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात्, इति चेत्, उच्यते- श्रुतानुसारिणी बुद्धि-मतिरेव यदीष्यते ॥ तदा षट्स्थानता अज्येत्, स्वस्थाने वा मियस्तयोः ॥ ३६ ॥ यदि पदजन्यो बोध एवं श्रुतं तदनुसारिविशेषभानं तु मनसोपनीयमानं मतिरेव, तर्हि श्रुतस्यापि मननलक्षणेन मतित्वा- तदुच्छेदप्रसङ्गे कथं मतिश्रुतयोः षट्स्थाननिवेशव्यवस्था,अस्तु वा तत् श्रुतं तथापि तस्य प्रयोगाधीनत्वात्प्रयोगस्य सङ्ख्येय- वर्पायुपां सङ्ख्येयविषयस्यैव सम्भवात् स्वस्थाने सङ्ख्येयेनैव न्यूनाधि कमावव्यवस्था स्यान्मतिज्ञानस्य च सर्वदा प्रयुज्यमा- नानन्तगुणविषयत्वान्मतिश्रुतयोमिथोऽनन्ततैव सा स्यादिति श्रुतस्य स्वस्थाने मतिश्रुतयोश्च मिथः पट्स्थानोपनिपातोच्छेदः ॥ आह च-"केइ अभासेजंता, सुअमणुसरओ वि जे मइविसेसा ॥ मणति ते मइ चिय, भावसुआभावओ तनो ॥१४५॥ किह मइसुअनाणविऊ, छट्ठाणगया परोप्परं होजा ॥ भासिज्जतं मोत्तुं, जइ सव्वं सेसयं बुद्वी ॥१४६ ॥" [ केचिदभाष्यमाणाः श्रुतमनुसरतोपि ये मतिविशेपाः ॥ मन्यन्ते तान्मातले भावभुताभावतस्तन्नो ॥ कथं मतिश्रुतज्ञानाविदः पट्स्थानगताः परस्पर G भाष्यानुसा- रिविवर- -

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम्॥
॥१९॥
REPRENEUROHI
भवेयुः ॥ भाष्यमाणं मुक्त्वा यदि सर्व शेषकं बुद्धिः॥] एवं च श्रुतादवगंतमिदमिति प्रत्ययाऽविशेषाच्छाब्दबोधस्येव
तदनुसारिणोऽपि श्रुतत्वं निर्वाधं तस्य स्मृतित्वानुमितित्वादिना सहभावाविरोधात्, न चैवमनुमानस्यापीन्द्रियापेक्षया
ऐन्द्रियकत्वं स्याद् , इष्टत्वात, केवलं श्रुतानुसारिणि श्रुतस्येव तत्रेन्द्रियाणां नातिशयेनापेक्षेति तत्त्वम् ॥३६ ॥ तदेवं श्रुतस्वरूपा-
भिधानप्रकारेण बुद्धिद्दिष्टे इत्यादिगाथा व्याख्याता, अथ भाष्यकारोक्तया दिशा मतिश्रुतभेदोन्नयनानुकूलतयेयमेव व्याख्यायते-
बुद्धया सामान्यया दृष्टान्, भाषते सम्भवेन यान् ॥ श्रुतोपयुक्तस्ते तस्य, श्रुतमन्या मतिः स्मृता॥ ३७॥
'बुद्धिद्दिट्टे' इत्यत्र बुद्धि शब्दो मतिश्रुतसामान्यबुद्ध्यर्थको, ‘मतिसहितमित्यत्र' मतिशब्दश्च श्रुततात्पर्यकः, भाषत इत्यत्र
योग्यत्वमाख्यातार्थस्तच्च तद्धे तुविकल्पाश्रयत्वं श्रुतपदश्च भावश्रुतार्थकमिति श्रुतोपयुक्तः सन् बुद्धिदृष्टयदर्थभाषणानुकूलविक-
ल्पवान् यस्तस्य तेा विषयविषयिणोरभेदोपचाराद् भावभुतं भवन्तीति पर्यवसितोऽर्थः॥ इयं ह्यनभिलाप्यविषयिणी श्रुतमन-
नुसृत्यैवामिलापविषयिणी चेति सामान्यबुद्धिदृष्टत्वं चार्थानां श्रुतदृष्टानामपि मतिदृष्टत्वनियमात्सम्मवति । एवञ्च श्रुतोपयुक्तस्यैव
विकल्पयतो मावश्रुतं, तदनुपयुक्तस्यैव तु मतिरिति तयोर्भेदात्तथात्वम् ॥आह च-“सामन्ना वा बुद्धी, मइसुअनाणाई तीइ जे
दिदा ॥ भासइ सम्भवमेत्तं, गहिरं न उ भासणाभित्तं ॥ १४७ ॥ मइसहिअं भावसुअं, तं निययमभासओ वि मइरन्ना ॥
मइसहियंति जमुत्तं, सुओवउत्तस्स मावसुअं॥ १४८॥" [ सामान्या वा बुद्धिर्मतिश्रुतज्ञाने तया ये दृष्टाः ॥ भापते सम्भव-
मात्रं गृहीतं न तु. भाषणामात्रम् ॥ मतिसहितं भावश्रुतं तनियतमभाषमाणस्यापि मतिरन्या ॥ मतिसहितमिति यदुक्तं
श्रुतोपयुक्तस्य भावश्रुतम् ॥] 'सहितमित्यस्य' क्रियाविशेषणत्वे तु भाषणयोग्यत्वस्य धात्वर्थत्वाद्यद्विषयकश्रुतोपयोगस-
इन्द्रियविभा-
गान्मतिश्रु-
तभेदाभिधा-
ने साक्ष्योद्ध-
तायाः पूर्व-
गतगाथाया
भाप्यानुसा-
रिविवर-
Stoga
णम् ॥
॥१९॥

- PRE हितभाषणयोग्यतावान् यस्तस्य ते भावश्रुतमित्यर्थः ॥३७॥ अवधारणविधिमुपदर्य फलितमुपदर्शयति- श्रुतमेव न ते किन्तु, श्रुतं भाषत एव यान् ।। परिणामो ध्वनेरेच, श्रुतं तद्भजना अतेः ॥ ३८॥ यान् सम्भवतो भाषत एव तच्छुतमित्यवधारणं युक्तम्, न तु ते शुतमेवेति अमिलाप्यगोचरया अत्यापि तदवगाहनात्, न च श्रुतोपयोगेन भाष्यमाणाः श्रुतमेवेति कुतो न वक्तुं युक्तं, तेषामेव कदाचिन्मत्यापि भाषणसम्भवात्, एवं च श्रुतं ध्वनि- परिणाम एवं श्रुतोपनीतशब्दगोचररयास्यांतल्पविकल्पत्यनियमान्मतिज्ञानं त्वभिलाप्यानभिलाप्यविषयकमिति तंत्र तद्- भजनेत्यनेन वैधयेणानयोर्भेदः ॥ आह च-"जे भासइ चैव तयं, सुअंतु नउ थासओ सुअंचव ॥ केइ मईए वि दिट्ठा, जं दव्वसुअत्तमुवयन्ति ॥ १४९ ॥ एवं धणिपरिणाम, सुअनाणं उभयहा मइनाणं ॥ जं भिन्नसहावाइ, ताई तो भिण्णरूवाई ॥ १५० ॥" [ यान् भाषत एव तत्, श्रुतं तु न तु भाषमाणस्य श्रुतमेव ॥ केचिन्मत्यागि दृष्टा यद्व्यश्रुतत्वमुपयान्ति । एवं ध्वनिपरिणाम, श्रुतज्ञानमुमयथा मतिज्ञानम् ॥ यद्भिशस्वभावे ते ततो मिनरूपे ॥] ॥ ३८ ॥ इयरत्थवीत्यादि व्याचष्टे- इतरत्रापि शब्दस्य, परिणामांद् भवेच्छूतम् ॥ मत्या श्रुतोपलब्ध्या वा, यदि नाम समं भणेत् ॥३९॥ इतरत्र मतिज्ञाने शब्दपरिणामरूपश्रुतधर्मदर्शनाच्छ्रतत्वं तदा करप्येत यदि तन्त्र यावन्त उपलब्धिविषया अर्थास्तावन्तो भणन- योग्या मवेयुः, न च भणनयोग्याभणनयोग्योभयविषयत्वान्मतेर्मतिश्रुतोभयरूपत्वमस्त्विति वाच्यं, भणनयोग्यानामप्यर्थानां मतिज्ञानेन श्रुतोपलब्ध्येव श्रुतानुसारेणाभाषणात्, तदिवसाह-"इयरं ति मइन्नाणं, तओ वि जइ होइ सद्दपरिणामो ॥ तो तम्मि वि किं न सुअं, भासइ जं नोवलद्धिसमं ॥१५१॥" [इतरदिति मतिज्ञानं ततोऽपि यदि भवति शब्दपरिणामः ॥ ततस्तस्मिन्नपि किं न श्रुतं इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रुत- भेदाभिधाने सादयोधृता. याः पूर्वगत- गाथाया भा- प्यानुसारि- विवरणम् ॥ S SAGROGRESTAURRESS सविवरणं श्रीज्ञाना- र्णव- प्रकरणम्॥ ॥ २० ॥ पूर्व गतगाथाया HORS इन्द्रियविभा- भाषते यद् नोपलब्धिसम] "अभिलप्पाणभिलप्पा, उपलद्वा तस्समं च नो भणइ ॥ तो होउ उभयस्वं, उमयसहावंति काऊणं ॥ १५२ ॥" [ अभिलाप्यानभिलाप्या, उपलब्धास्तत्समं च नो भणति ॥ ततो भवतूभयरूपं, उभयस्वभावमिति कृत्वा ॥] गान्मतिश्रु- तभेदाभिधा- "ज भासइ तं पि जओ, ण सुआदेसेण किं तु समईए ॥ण सुओवलद्धितुल्लंति, वा जओ णोवलाद्वसमं ॥ १५३ ॥” [यद्भापते तदपि यतो न श्रुतादेशेन किन्तु स्वमत्या ॥ न श्रुतोपलब्धितुल्यमिति वा यतो नोपलब्धिसमं ॥]॥३९॥ मतिज्ञाने न शब्दपरि- ने साक्ष्योद्ध- तायाः पूर्व- णामरूपश्रुतसाधर्येण श्रुताशयेतरत्रेत्यायभिधानं श्रुतत्वाभावव्याप्य श्रुतोपयोगासाहित्यनिर्णये तदनुत्थानात्, किन्तु शब्दपरि-17 गामरूपसाधारणधर्मदर्शनात्तदाशङ्कयेत्यतोऽपरथा व्याचष्टे- तदा श्रुतोपयोगः स्या-च्छूतविज्ञप्तिहेतुभिः॥ प्रयोगः स्याद् यदा(द्य) यंतु, नाक्षराद्य(रस्या)नुसारतः॥ ४०॥ भाष्यानुसा- रिविवर- सम्भवेन फलतो वा प्रयोगकाले मतिज्ञानस्य श्रुतोपयोगस्तदा स्याद् यदि श्रुतधीहेतुसनिधानं स्यात्, तदेव चात्र नास्ति, अभिलाप्येऽनमिलाप्ये वा मतिविषयेऽक्षरानुसाररूपसहकारिविरहात, नहि सह कारिसन्निधानानुबुद्धश्रुतलब्ध्या श्रुतोपयोगः स्या- दिति तद्विरहेणैव तत्र तदनापत्तिरिति भावः, एवञ्च इयरत्थवीत्यादौ श्रुतपदं श्रुतोपयोगपरं, उपलब्धिसममिति च श्रुतोपल- ब्धिसमहेतुकमित्यर्थक क्रियाविशेषण, भणेदित्यत्र मतिज्ञानोपयुक्त इतिशेषः।।४ानन्वत्रभाष्यकारव्याख्यान श्रुतोषयुक्तस्य भाषासम्भवः श्रुतमित्येतावदेवास्तु,विषयग्रहणं पुनरनतिप्रयोजनमितिचेत्,न, विषयभेदेन तद्भेदोपदर्शनार्थं तद्ग्रहणादित्याशयेनाह- भेदो विषयभेदेन, हेतुभेदोपजीवि वा ॥ नूनं मतिश्रुते भेत्तुं, दर्शितो व्याख्ययाऽनया ॥४१॥ स्पष्टः ॥ ४१ ॥ अथं विषयताभेदाचद्भेदप्रतिपादनार्थमियमपरथा व्याख्यायते- ॥ २० ॥ णम् ।। RSS 53 श्रुतमेव श्रुतं ज्ञेयं, भाषासम्भवशालि चा ॥ इतरत्र तदापत्ति-भिन्नाऽनुभववगिरा।॥ ४२ ॥ श्रुतोपयुक्तः सन् श्रुतसहितं यथा स्यात्तथा श्रुतसहितान् वा बुद्धिदृष्टान् यानर्थान् सम्भवतो भाषतेऽन्तर्जल्पविकल्पे ज्ञेयाका- रतया परिणामयति तथापरिणामापन्नास्ते तस्य श्रुतमेव, नहि श्रुतविषयता न श्रुतमिति, नन्वेवमभिलाप्यविषयकं मतिज्ञानमपि श्रुतज्ञानसमानाकारमिति तत्रापि कथं न श्रुतत्वं, उच्यते, मतिश्रुतयोः स्फुटमेव विषयतावैलक्षण्यानुभवेन समानाकारताया एवा- सिद्धः, न च विषयाभेदे कथं विषयताभेद इति वाच्यम्, ज्ञानस्वरूपाया विषयतायास्तदभेदेऽपि ज्ञानसामग्रीभेदेन भेदात्, अनु- भवेन न तद्भेदोऽनुभूयत इति चेत्, न, कालविशेषाद्यवभासभेदस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात्, तथा चात्र बुद्धिपदं बुद्धिसामान्याथक, श्रुतपदं च श्रुतोपयोगार्थक, भाषत इति च भाषणयोग्यतावानित्यर्थक, अध्याह्रियमाण एवकारश्च श्रुतमित्यनन्तरं योज्यः । तत्पदञ्च नार्थमात्रपरामर्शकं ते श्रुतमेवेत्यस्य बाधात्, किन्तु भाषासङ्कल्पविषयत्वविशिष्टार्थपरामर्शकं, इतरत्रेति च मतिज्ञानकाल इत्यर्थकं, श्रुतपदं च भावश्रुतार्थकं, उपलब्धिसममिति च समानानुव्यवसायत्वार्थकं साम्यं च सावधिकमिति सन्निधिसिद्धतया मतिज्ञानमेवावधित्वेनोपतिष्ठते, भणेदित्युत्तरं च श्रुतमित्यनुषज्यत इति मतिज्ञालकाले श्रुतज्ञानं भवेद्, यदि मतिज्ञानसमानानु- व्यवसायकं श्रुतं कश्चिदपि भणेदित्युत्तरार्थः, एवं च विषयतावलक्षण्येन कारणभेदानुमानात्तत्र कारणाभावनिश्चयेन कार्यो- त्पत्तिशंकोच्छेद इतिभावः, अथवा श्रुतमिति भावप्रधाननिर्देशाश्रयणादितरत्र मतिज्ञाने श्रुतत्वं तदा स्यादित्याद्यर्थो वोध्यः ॥४२॥ हेतुविषयभेदोन्नयनानुकूलेन प्रकारान्तरेण व्याचष्टे- अथवा बुद्धिदृष्टेऽर्थे, श्रुतं मत्यै(सत्ये)व भासते ॥ इतरत्राप्ययं न्यायो, द्वयोः साम्ये परं भवेत् ॥४३॥ इन्द्रियविभा- गान्मतिश्रु- तभेदाभिधा- ने साक्ष्यो- इतायाः पून वंगतगाथा- या भाष्यानुः सारिविवर- णम् ।

सविवरण
श्रीज्ञाना-
णेव-
प्रकरणम्॥
॥ २१ ॥
द
'बुद्धिद्दिढे अत्थे' इति सप्तम्येकवचनान्तं विशेषणविशेष्यपदद्वयं,जे इति पादपूरणार्थो निपातः, भासइ भासते, तत्पदं प्रसि-
द्धार्थकं प्रक्रान्तार्थकं वा, श्रुतंपदं भावश्रुतार्थकं, 'मइसहिये' इत्यत्र मतिः सहिता कारणत्वेन यस्य तदिति विग्रहः, पौर्वापर्यभावे
मत्या सहितमित्येव वा, एवञ्च बुद्धिदृष्टेऽर्थे सति तच्छ्रुतं मतिहेतुकमेव भासत इति समुदायार्थः॥ न चात्र बुद्धिदृष्टेऽर्थे सती-
त्यभिधानमनतिप्रयोजनं, अस्य मतिसाहित्योपपादनार्थत्वाद् बुद्धिशब्दस्यात्र मत्यर्थकस्य ग्रहणात् श्रुतविषयोपदर्शिकां मतिं श्रत-
मवश्यमपेक्षत इत्यनेन समर्थ्यते, अथवा सप्तमी 'तत्र निष्पुल(ण्य)को हत' इत्यत्रेवाज्ञ सप्तम्या निमित्तत्वाद्विशिष्टे निमित्तत्वस्य
विशेष्यबाधे विशेषणमात्रपर्यवसायित्वात्तच्छब्दसापेक्षत्वेन यदित्यध्याहाराद् बुद्धिदृष्टार्थदर्शननिमित्तं यदिति श्रुतस्वरूपमनूद्य तत्र
मतिसाहित्यनियमविधानमभिधानीयं, ये इति यदित्यर्थकमित्यपि कश्चित्, अन्यत्रापि मतिज्ञानेऽपि भवेत् श्रुतपूर्वकत्वनियम
इत्यर्थाद् गम्यते यदि श्रुतज्ञानं उपलब्धिसमं मतिज्ञानतुल्यं भणेत्, तच्च न भणितं तयोः परस्परं पदस्थानोपनिपातोपदेशात्,
एचवानभिलाप्यविषयकमतिज्ञाने कथञ्चिदपि श्रुतापेक्षाया अभावाद् व्यभिचारेण न तस्य तद्धेतुकत्वमिति भावः ॥ ४३ ॥
उभयश्रुतमतिभेदपरतया व्याचष्टे-
ज्ञात्वा वा श्रुतदृष्टार्थान, ब्रुवतो युभयश्रुतम् ॥ भवेन्मत्युपयुक्तस्य, श्रुतं यदि समं भणेत् ॥ ४४ ॥
बुद्धया श्रुतबुद्धया, दृष्टान् यानर्थान् मतिसहितं श्रुत्तोपयोगेन, भाषते तत् श्रुतं उभयश्रुतमेव,इतरत्र मत्युपयोग-
काले, भवेत् श्रुतपदानुषङ्गात् उभयश्रतं, यापलब्धिसमं मतिसमानाकारश्रुतं श्रुतानुसार, भणेत्कोऽपि कथयेत, श्रुतं
भणेदनुसरेदिति वा, एवं चोभयभेदे सिद्धे प्रत्येकभेदः सुसाधः, उभयभेदकसामग्रीभेदस्यैव प्रत्येकभेदकत्वात्, अथवा मति-
RECENERISARGROCESSORRECTORS
इन्द्रियविभा-
गान्मतिश्रुत-
भेदाभिधाने
साक्ष्योड़त-
पूर्वगतगाथा-
या भाष्यानु-
सारिविवर-
णम् ।।
FIRRIAL
॥ २१ ॥

CAREER वल्कसुम्ब- दृष्टान्तेन म- तिश्रुतभेदो- पपादन, तत्र परविप्र- सहितामत्यस्य श्रुतानुसारेणेत्यर्थकत्वादने एवकारयोजनाच्च श्रुतानुसारेणैव भाषमाणस्योभयश्रुतमित्यर्थः, इत्थं चाग्रे इतरत्र मतिज्ञाने भवेच्छुतानुसारो यदि स्वोत्प्रेक्षामात्रमतितुल्यं श्रुतं भणेचदभणनाच न तदनुसारः, तं विना च न त्वदेकजीवितमुभय- श्रुतमिति भावः ॥ ४४ ॥ प्रकारान्तरेण व्याचष्टे- श्रुतं मत्युपलब्धार्थ, मतिसङ्गतमेव तत् ॥ तादृशं स्यात् तदान्यत्तु, श्रुतं यदि समं भणेत् ॥ ४५ ॥ बुद्धया मतिलक्षणया, दृष्टा विवक्षिता, येास्तान् भाषमाणस्य, मतिसहितमेव द्रव्यश्रुतं भवेत्, इतरत्र श्रुत- विवक्षितप्रयोगस्थले च मतिसङ्गतं श्रुतं तदा स्यात् यदि श्रुतं मतितुल्यं कथयेत्प्रेक्षावान्, तच न कथ्यते श्रुतानुसाराननु- साराम्यां तद्विशेषप्रतिपादनात, अथ चेतरत्र तत्तदा स्याद् यदि श्रुतं मतिसमकालं भणेत्कश्चित्तदेव च भणितुमशक्यं उपयोग- योगपद्यनिषेधात्, एव श्रुतोपयोगकाले मत्युपयोगाभावादेव न मतिसहितश्रुतमित्यर्थः, अथवेतरत्र मतिसङ्गतं श्रुतं तदा स्याद् यदि मत्या सह श्रुतं भणन्मत्युपयोगेन शब्दमुच्चरेदि त्यर्थः ॥ ४५ ॥ तदेवं सप्रसङ्गं पूर्वगतगाथाद्वयव्याख्यानेन समर्थित इन्द्रियभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ वल्कसुम्बोदाहरणात मभिधित्सुः प्रथमं परेषां तदुदाहरणोपन्यासविधि निराकुरुते- केचिदाहुवल्कसमां, मति, सुम्बसमं श्रुतं ॥ तदयुक्तं तथाऽभेदे, श्रुतोच्छेदादिदूषणात् ॥४६॥ केचिद् वदन्ति वल्कसदृशी मतिरेव सुम्बसदृशशब्दसन्दर्भकाले श्रुतत्वमास्कन्दति, तथा च श्रुतपदं कर्मव्युत्पत्त्या शब्दार्थ- कमिति, तदसत, मत्युत्तरं शब्दमात्रस्य भावेऽपि भावश्रुतस्याभावाच्छब्दसन्निधिमात्रेण मतेः श्रुतत्वोपगमेऽतिप्रसङ्गात्साकर्य- प्रसङ्गान्निविशेषभावे विशेषाभिधायकश्रुताप्रामाण्यप्रसङ्गाच । आह च-"अन्ने मन्नति मई, वाय(वग्ग)समा सुवसरिसयं सुत्तं ॥ तिपत्तिख- ण्डनम् ॥ RECTRESSES

वल्कसुम्बो-
दाहरणेन म-
तिश्रुतमेद-
निरूपणेपर-
विप्रतिपत्ति-
साविवरण
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम् ॥
॥ २२॥
.
खण्डनम् ।।
दिलुतोयं जुत्ति, जहोवणीओ ण संसहइ ॥१५४॥" [अन्ये मन्यन्ते मतिर्वल्कसमा सुम्बसदृशं सूत्रम् ।। दृष्टान्तोऽयं युक्तिं यथो-
पनीतो न संसहते]. "भावसुआभावाओ, संकरओ णिबिसेसभावाओ ॥ पुव्वुत्तलक्खणाओ, सलक्खणावरणभेआओ ॥१५५॥"
[ भावश्रुताभावात् संकरतो निर्विशेषभावात् ॥ पूर्वोक्तलक्षणात्स्वलक्षणावरणभेदात् ] ॥ ४६॥
अनेनैव दृष्टान्तेन द्रव्यभावश्रुतयोमतिद्रव्यश्रुतयोश्च भेदनिरूपणाभिप्रायमधरयति-
द्रव्यभावश्रुते भेत्तुं, युज्येत नैतया दिशा ॥ मतिद्रव्यश्रुते वा यद्, ज्ञानभेदेऽत्र मृग्यते ॥४७॥
भावश्रुतं वल्कसमं कारणत्वात् कार्यत्वाच तजनितः शब्दः सुम्ब इति नेत्थमनयोर्भेदोऽभिधेयः। मतिश्रुतभेदचिन्तावसरे
तभेदस्यानधिकृतत्वात्, एवमश्रुतानुसारिणी मतिर्वल्कसमा तज्जनितः शब्दः सुम्बसमः श्रुतानुसारिणी मतिस्तु श्रुतमित्यपि
बचो नोचार्यमाणं चारुतामञ्चति, अनेनोदाहरणेनाधिकृतं मतिश्रुतयोर्भेदमुपेक्ष्य भेदान्तरसाधनेनार्थान्तरप्रसङ्गात् । आह च-
"कप्पेज्जेज व सो भाव-दव्यसुत्तेसु तेसु विण जुत्तो ॥ मइसुयभेआवसरे, जम्हा किं सुअविसेसेण ॥१५६॥” [कल्प्येत वा स भाव-
द्रव्यश्रुतयोस्तयोरपि न युक्तः॥मतिश्रुतभेदावसरे, यस्मात्किं श्रुतविशेषेण ॥] "असुयक्खरपरिणामा, वजा मई वग्गकप्पणा तम्मि॥
दव्वसुयं सुम्बसमं, किं पुण तेसि विसे सेणं ॥१५७॥" [अश्रुताक्षरपरिणामा वा या मतिर्वल्ककल्पना तस्याम् ॥ द्रव्यश्रुतं सुम्बसम,
किं पुनस्तयोविशेषेण ] "इह इंजेणाहिगओ, नाणविसेसो ण व्वभावाणं । नयदव्वभावमित्तेबि, जुज्जए सोऽसमंजसओ॥१५८॥"
[ इह येनाधिकृतो ज्ञानविशेषो न द्रव्यभावयोः ॥ न द्रव्यभावमात्रेपि युज्यते सोऽसमञ्जसतः] ॥४७॥
किञ्च भेदघटितकार्यकारणभावशालिनोरनयोर्न वल्कसुम्बोदाहरणं परमार्थतः सम्भवतीत्युपदिश्य वास्तवव्याख्याप्रकारमाह-
136-51551965
RARMERS
॥ २२ ॥

SIGER मतिश्रत- भेदनिरूपणे वरकसुम्न- दृष्टान्तस्य वास्तवामि- प्रायप्रकटी- करणम् नायं न्यायः पृथग्भावे, तयोर्गुणकथा वृथा ॥ मतिर्वल्कं ततो भाव-श्रुतं सुम्बमिति स्थितिः ॥४८॥ सुम्बवल्कदृष्टान्तो हि कार्यकारणयोरभेदमपेक्ष्य व्यवस्थितः कथं चेतनाचेतनधर्मयोनिशब्दयोर्वक्तुमवकाशं लभेत?, 'अथ आयुर्घतम्'इतिवद्भिन्नयोरपि तन्मयत्वव्यवहारो नानुपन्न इतिचेत्, न, तथापि सम्भवति मुख्यार्थे उपचारकल्पनाऽयोगात्तस्माद्- बल्कसमा मतिः सुम्बसमं तु भावश्रुतं तस्य तत्पूर्वकत्वस्या(मा)गमे व्यवस्थितत्वादिति तदुन्नयन युक्तम् ॥आह च-"णय दव्य- भावमेचे वि, जुज्जए सोऽसमंजसओ॥१५८॥" [न चद्रव्यभावमात्रेऽपि युज्यते सोऽसमञ्जसतः॥] "जह वग्गा सुबत्तण-मुर्वेति सुवं च तं तओणनं ॥ ण मई तहा धणितण-मुवेइ, जं जीवभावो सा ॥१५९॥" [यथा वल्काः सुम्बत्वमुपयान्ति सुम्बं च तत तोऽनन्यत् ॥ न मतिस्तथा ध्वनित्वमुपैति यजीवभावः सा ॥] "अह उवयारो कीरइ, पभवइ अत्यंतरं पि जं जत्तो॥ तं तम्मयं ति भण्णइ, तो मइपुव्वं जओ भणियं ।। १६० ॥" [अथोपचारः क्रियते प्रभवत्यर्थान्तरमपि यद्यस्मात् ॥ तत्तन्मयमिति भण्यते ततो मतिपूर्वं यतो भणितम् ॥] "भावसुअं तेण मई, वग्गसमा मुंबसरिसयं तं च॥ जं चिंतिऊण तया, तो सुअपरिवाडि- मणुसरइ ॥१६१॥"[भावश्रुतं तेन मतिर्वल्कसमा, सुम्बसदृशं तच्च ॥ यच्चिन्तयित्वा तया ततः श्रुतपरिपाटिमनुसरति ।।]॥४८॥ नन्वेतदभिधानस्य हेतुफलभावेन भेदाभिधानात्को विशेष इत्यत्राह- दृष्टान्तेनाऽमुनाऽभेदा-श्लिष्टभेदप्रदर्शनम् ॥ विशेषोऽस्य ततो हेतु-फलभावप्रदर्शनात् ॥ ४९ ॥ हेतुफलभावेन हि भेदमानं साध्यते, अनेन तु भेदाभेद इत्यनयोविंशेपः, तथाहि शुतं मत्यभिन्नत्वे सति तद्भिन्नं, एकद्रव्यत्वे सति तद्धेतुकत्वात्, यद् यदेकद्रव्यत्वे सति यद्धेतुकं तत्तदभिनत्वे सति ततो भिन्नं यथा वल्कैकद्रव्यं सुम्बं वल्क- --

साविवरण
श्रीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम् ॥
॥ २३ ॥
अक्षरानक्ष-
रतो
मतिश्रुत-
भेदनिरूपणे
परविप्रति-
पत्तिखण्ड-
ALEKCISHERECORECARECHES
हेतुकमिति तदभिन्नत्व सति ततो भिन्नमिति, न च भेदमात्रस्याकांक्षितत्वादधिकाभिधाने निग्रहः एकद्रव्यत्वेनाऽभेदोपस्थिती
कथमभेदे भेद इत्याशङ्कायामेतदभिधानाद्.अथवाऽभेदे कार्यकारणभाव एव कथं मतिश्रुतयोः १, इत्याशङ्कोत्थानादेतदभिधानं,
तदुच्छेदश्च वल्कसुम्बयोरिवाऽनुकृतान्वयव्यतिरेकयोस्तयोरभेदेऽपि कार्यकारणभावानुमानाद्, न चार्थान्तरं भेदग्राहकहेतुफलभाव-
ग्रहोपयिकत्वादेवास्य ॥ ४९ ॥ वल्कसुम्बोदाहरणान्मतिश्रतयों:दमभिधायाक्षरानक्षरतस्तमभिधित्सुः परमतं दूषयति-
अनक्षराक्षरभेदा-दुक्ताव(द्भिन्दन्त्य)न्ये मतिश्रुते ॥ तदसत्, साभिलापा य-न्मतिरेवं विलीयते ॥५०॥
मीतज्ञानमूनक्षरमेव, श्रुतज्ञानं तु श्रुतरूपमक्षरवदुच्छ्वसितादि चानक्षरमित्युभयात्मकमित्यनयोर्भेद इति केचिदाहुः, तत्रैवं
सत्ययं स्थाणुवों पुरुषो वेति विकल्परूपाया इहामतरूच्छेदप्रसङ्गात, न हि शब्दनिभासं विना विकल्पत्वं नाम, किञ्चैवमवन-
हवदीहादीनामन्वयव्यतिरेकधर्मपरामर्शित्वरूपो विवेको न स्यात्, अथ सप्रकारकज्ञानत्वेनैव विवेचकत्वं, नतु साक्षरत्वेनेति, ईहादेः
सप्रकारकत्वेऽपि नाक्षरानुगतत्वमिति चेत्, तर्हि श्रुतस्यापि साक्षरत्वे प्रमाणमन्वेषर्णायं, किञ्च ज्ञानविषययोः स्वरूपविशेष एव
प्रकारता, इतीहादौ शब्द एव विशेष प्रकारताख्यामाबिभर्तीति कथमस्यानक्षरत्वं, न चातिरिक्तैव प्रकारतेति युक्तं, 'धर्मिकल्पनातो
धर्मकल्पना लघीयसी'इति न्यायेन ज्ञाने शब्दाकारपरिणामरूपाया एव तस्याः कल्पयितुं युक्तत्वात्, तदिदमाह-"अन्ने अण-
क्खरखर-विसेसओ मइसुआई भिदति ॥ ज मइनाणमणक्खर-मवखरमियरं च सुयनाणं ॥१६२॥" [अन्येऽनक्षराक्षरविशेषतो
मतिश्रुते भिन्दन्ति ॥ यन्मतिज्ञानमनक्षरमक्षरमितरच्च श्रुतज्ञानम् ॥]"जइ मरणक्खरच्चिय, हवेज्ज नेहादओ णिरभिलप्पे ॥
थाणुपुरिसाइपज्जाय-विवेगो किह णु होजाहि १ ॥ १६३ ॥" [यदि मतिरनक्षरैव भवेन्नेहादयो निरभिलाप्ये ॥ स्थाणुपुरुषादि-
नम् ॥
ISCARE
HESARESSESS
॥ २३॥

HESH पर्यायविवेकः कथं नु भवेत् १ ॥५०॥ अथैवं भ्रान्तस्योत्तरं निराकुरुते- श्रुतनिश्रितभावेन, मतिरेषा यदि श्रुतम् ॥ तयवग्रहरूपैव, मातिरन्यच्छ्रुतं भवेत् ॥५१॥ श्रुते हि मतिर्द्विघोपदिष्टा श्रुतनिमित्तमबग्रहादिचतुष्टयमश्रुतनिश्रितमोत्पत्तिक्यादिचतुष्टयं चेति ॥ तत्र चाक्षररूपतया श्रुत- ब्यापारात्मकं श्रुतनिश्रितमीहादिकं श्रुतमेव, मतिस्त्वन्यैवेत्यनक्षरमय्येव सेति पराशयोऽयुक्तः, अवग्रहरूपाया एव मतेः पर्यवसानप्रसङ्गादक्षररूपायाः श्रुतव्यापारात्मकत्वेन श्रुतत्वाद्, आह च-" सुअनिस्सिअवयणाओ, अह सो सुयओ मओ ण बुद्धीओ ॥ जइ सो सुअवावारों, तओ किमन्नं महन्नाणं ? ॥ १६४ ॥" [ श्रुतनिश्रितवचनादथासौ श्रुततो मतो न बुद्धेः ॥ यदि स श्रुतव्यापारः ततः किमन्यन्मतिज्ञानम् ॥] ॥५१॥ अभिप्रायान्तरं निराकुरुते- श्रुतोदितविवेकश्चे-न्मतिरेवं श्रुतोच्छिदा ॥ योगपद्यं दूयोर्भावे, एकदा चोपयोगयोः ॥ ५२ ॥ यदि हि मत्यभावभिया श्रुतानुसारी ईहादिविशेषोऽप्यक्षरात्मकत्वान्मतिरेवेष्यते तद्दनक्षरमेव श्रुतं मृगयमाणस्य कथं तदा- शापूर्तिस्तस्यैवाभावाच्छुतजन्यस्याप्यक्षरात्मकत्वेन मतित्वाद् । अथ स्थाणुपुरुषविवेककाले तदा मतिः श्रुतं चेत्युभयं स्वीक्रियते केव- ला तु मतिरनक्षरैव भविष्यतीति चेत्, न, एवं सति उपयोगयोगपद्यप्रसङ्गाद्,एकतरोत्पत्तिस्वीकारे च 'सावकाशानवकाशयो- रनवकाशो विधिबलीयान् इति न्यायेनान्यत्रानवकाशस्य मतिज्ञानस्यैव स्वीकर्तुं युक्तत्वादिति प्राञ्चः ॥ नन्वयं नात्रोपयुज्यते विधिविषयत्वात्तस्य, तथाहि निर्-सहशब्दयोनिर्धनः सधन इत्यत्रेवाल्पबहुत्ववाचकत्वाद् 'बहुविषयादल्पविषयो विधिलीयान्' इत्यर्थः, एवं च वृक्षरित्यत्र परमपि'एबहुस्मोसि'इति(सिद्धहैम १-४-४)सूत्रं बहुविषयत्वाद् बाधित्वा पूर्वमप्यल्पविषयं 'भिस अक्षरानक्ष- रतो मतिश्रुत- भेदनिरूपणे परविप्रति- पत्तिखण्ड- नम् ॥ GRESERECTEGORIGIKREGN , R अक्षरानम- रतो मतिमत- भेदनिरूपणे परविप्रति- पत्तिखण्ड- नमा - RESER साविवरणं ऐस' इति (२) सूत्रमुपतिष्ठत इत्युपपादितं भवति तथा च परादीनां बलवत्त्वव्याप्ती सावकाशभिन्नत्वं सङ्कोचकविशेषण देयमिति श्रीज्ञाना- व्युत्पादितं भवति,एवं च निरवकाशस्थले सावकाशप्रवृत्तेरसाधुत्वज्ञापकतयाऽस्योपयोगो नतु तत्प्रवृत्तिप्रतिबन्धकतया,अज्ञेनभ्रान्तेन र्णय- वा कृतस्य तादृशप्रयोगस्य साधुत्वप्रसङ्गात, तदसाधुत्वज्ञापकान्तरकल्पने गौरवाद्, व्युत्पन्नस्य तथाप्रयोगकारणविधटकतया मकरणम्॥ तदुपयोग इत्यपि कश्चित् ॥ किश्चाऽवग्रहस्थले सावकाशं मतिज्ञानमपि कथं कल्पनीयमिति चेत्, न, क्लप्तश्रुतकारणाभावात् क्लृप्त ॥ २४ ॥१४ मतिकारणसत्वाच्च, अतिज्ञानमेव तदोत्पत्तुमर्हतीति तात्पर्यात्, अपि चाऽक्षरानुगता श्रुतनिश्रिता मतिः, अन्या त्वश्रुतानिश्रितेत्यभ्यु- पगमे औत्पत्तिक्यादेरपि श्रुतनिश्रितत्वप्रसङ्गादपसिद्धान्तः॥ आह च-"अह सुयओ वि विवेगं, कुणओ ण तयं सुअं सुअं णत्थि ॥ जो जो सुअवावारो, अन्नो वि तओ मई जम्हा ॥ १६५ ॥”[अथ श्रुततोऽपि विवेकं, कुर्वतो न तच्छुतं श्रुतं नास्ति । यो यः श्रुतव्यापारोऽन्योऽपि सको मतिर्यस्मात् ] "मइकाले वि जइ सुअं, तो जुगवं मइसुओवओगा ते ॥ अह नेवं एगयर, पवज्जओ जुज्जए ण सुअं॥१६६॥" [मतिकालेऽपि यदि श्रुतं ततो युगपन्मतिश्रुतोपयोगौ ते ॥ अथ नैवमेकतरं प्रपद्यमानस्य युज्यते न श्रुतम् ] "जइ सुअनिस्सिअमक्खर-मणुसरओ तेण मइचउक्कं पि ॥ सुअनिस्सिअमावन्नं, तुह तंपि जमक्खरप्पभवं ॥ १६७ ॥" [यदि श्रुतनिश्रितमक्षरमनुसरतस्तेन मतिचतुष्कमपि ॥ श्रुतनिश्रितमापन्नं तव तदपि यदक्षरप्रभवम् ] ॥ ५२ ॥ ननु यद्यक्षरानुगतत्वं न श्रुतनिश्रितत्वं तर्हि किमन्यदिति जिज्ञासायामाह- श्रुताऽभ्याससमुद्बुद्ध-क्षयोपशमसम्भवम् ॥ श्रुतानुसारहीनं य-त्तदेव श्रुतनिश्रितम् ॥५३॥ श्रुतानुसारहीनं श्रुतनिश्रितमित्युक्ते औत्पत्तिक्यादावतिब्याप्तिस्तद्वारणाय श्रुताभ्यासेति विशेषणं, यद्यपि “भरनित्थरण- VES ॥ २४॥ HI अक्षरानक्ष- रतो मति- श्रुतभेदनि- है रूपणे श्रु- समत्था, तिवग्गसुत्तत्थगहियपेयाला।।उमओलोगफलबई विणयसमुत्था हवइ बुद्धी।।९४३॥"(आव० भाष्य[भरनिस्तरणसमर्था त्रिवर्गसूत्रार्थगृहीतसारा (प्रमाणा)। उभयलोकफलवती विनयसमुत्था भवति बुद्धिः] इतिवचनाद् वैनयिक्यामश्रुतनिश्रितायामपि श्रुताभ्यासापेक्षास्ति, तथापि श्रुतानुबुद्धक्षयोपशमजन्यावृत्तिश्रुतानुसारहनिवृत्तिजातिमज्ज्ञानत्वं श्रुतोबुद्धक्षयोपशमजन्यत्वाव्य- भिचारि तादृशजातिमज्ज्ञानत्वं वा श्रुतनिश्रितत्वमित्यत्र तात्पर्यम् , अत एवाह "किन्तु सकृच्छुतनिश्रितत्वे सत्यपि बाहुल्यमङ्गीक- त्याश्रुतनिश्रितं तदुच्यत इत्यदोष" इति, इदमेवाभिप्रेत्य चाह भाष्यकारः॥ "जइ तं सुएण ण तओ, जाणइ सुअनिस्सि कहं भणियं ॥ जं सुअकओवयारं, पुचि इण्डिं तयणवेक्खं ॥१६॥" [यदि तत् श्रुतेन न स जानाति श्रुतनिश्रितं कथं भणितं ॥ यत् श्रुतकृतोपचारं, पूर्वमिदानीं तदनपेक्षम् ] "पुचि सुअपरिकम्मिअ-मइस्स जं संपयं सुआईयं ॥ तं निस्सिअमियरं पुण, अणि- स्सिों मइचउकं तं ॥१६९॥"[पूर्व श्रुतपरिकर्मितमतेर्यत्सांप्रतं श्रुताततिम्॥ तनिश्रितमितरत्पुनरनिश्रितं मतिचतुष्कं तत्।। यद्यपि विशेषणधीत्वेन श्रुतानुसारो विशिष्टेऽश्रुतनिश्रितेऽपि पदर्धात्वेन च न श्रुतनिश्रितेऽपि, तथापि श्रुतादवगतमिदमिति प्रतीतिसा- क्षिको विषयताविशेष एव श्रुतानुसारोन ग्राह्यः ॥५३॥ नन्वेवं यदि श्रुतनिश्रिताऽश्रुतनिश्रिता वा मतिरवग्रहरूपा निरभिलापा, ईहादिरूपा च साभिलापा, श्रुतमपि च प्रागुक्तरीत्या द्विविधं तर्हि कोऽनयोर्भेद ? इति सुहृद्भावेन पृच्छाम इति चेत्, उच्यते- द्विविधापि मतिस्तस्मादू, द्विरूपैवेति का भिदा ॥ तद् द्रव्याक्षरभेदेन, भावनीया भिदाऽनयोः॥५४॥ यद्यपि भावाक्षरेणावग्रहेहादिरूपमतेर्भावद्रव्याक्षराभ्यां च श्रुतस्य द्वैविध्यमापततोऽविशिष्टं, तथापि मतौ पुस्तकादिगतं ताल्चा- दिव्यापारजन्यं च द्रव्यश्रुतं नास्त्येव द्रव्यश्रुतस्य द्रव्यमतित्वेनारूढत्वादिति, द्रव्याक्षरेणाऽनक्षरैव मतिः, श्रुतं तु द्रव्यश्रुत- तनिश्रित- त्वश्रुतानि श्रितत्वयो- निरूपणम्॥ RECENT FOTECH । R

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
व-
प्रकरणम्॥
RECENGCRECENGANA
त्वेनापि रुढं तदपि शब्दरूपमक्षरमयम्, उच्छ्वसितांदिरूपं चानक्षरं भावश्रुतमपि विकल्पात्मकत्वाद् भावाक्षरेण साक्षरं,द्रव्याक्षरास्व-
भावत्वाच तेनानक्षरमित्यनयोर्भेदः ॥ तदिदमाह-" उभयं भावक्खरओ, अणक्खरं होज वंजणक्खरओ ॥ मइनाणं सुत्तं
पुण, उभयं पि अणक्खरक्खरओं ॥१७० ॥" [ उभयं भावाक्षरतोऽनक्षरं भवेद्व्यञ्जनाक्षरतः ।। मतिज्ञानं श्रुतं पुनरुभयम-
प्यनक्षराक्षरतः ] ॥५४॥ पर्यवसितार्थमाह-
द्रव्यश्रुतव्यवहृते-र्भावाभावे विभिन्दतः ॥ मतिश्रुते इतरथा, व्यवहारस्य सङ्करात् ॥ ५५ ॥
मतिज्ञानस्य द्रव्यश्रुतव्यवहाराविषयत्वादेव श्रुतज्ञानाद् भेदः, अन्यथा द्रव्यश्रुतमितिवद् द्रव्यमतिरिति व्यवहारः स्यादर्थाऽ-
भेदाद्, अथ भेदेऽपि मतिकारणे शब्दे द्रव्यमतित्वेनाव्यवहारे इच्छैव चीजमित्यभेदेऽपि व्यवहर्तुरिच्छैव नियामिकेति चेत्, न, भेदे-
साधारण्येनापेक्षाया व्यवजिहीर्षावीजत्वाद्, अभेदे तदऽसम्भवाद्, एवं च मतिज्ञानं श्रुतज्ञानाद् भिद्यते द्रव्यश्रुतव्यवहारा-
विषयत्वाद्, अवधिज्ञानवत् , श्रुतज्ञानं वा मतिज्ञानाद् भिद्यते द्रव्यश्रुतव्यवहारविषयत्वाद्, व्यतिरेकेञ्चध्यादिदृष्टान्त इति
प्रयोगः । न च द्रव्यश्रुतव्यवहारविषयत्वं शब्द एवेत्यपक्षधर्मत्वं हेतोस्तथात्वेऽपि हेतौ पक्षीयसाध्यान्यथानुपपत्तिप्रतिसन्धानेन
पक्षीयसाध्यसिद्धः, अत एव जलचन्द्रेण नभश्चन्द्रानुमानमितिप्राश्चः ॥ अस्तु वा द्रव्यश्रुतव्यवहारघटककारणतानिरूपितकार्य-
ताशालित्वादिति हेत्वर्थः ॥५५॥ उक्तोऽक्षरानक्षरभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ मुकेतरभेदात्तमभिधित्सुस्तदर्थमुपन्यस्यापाततो दूषयति-
स्वपरज्ञप्तिहेतुत्वा-त्तयोर्मूकान्यवद्भिदा ॥ चेष्टादिमतिहेतोर-प्यन्यार्थत्वान्न युज्यते ॥५६॥
द्रव्याक्षररूपस्य श्रुतस्य परप्रतीतिजनकत्वान्मतेस्तु तदभावेनात्ममात्रप्रत्यायकत्वान्मूकामूकयोरिव तयोर्भेदमन्येऽभिदधति,
अक्षरानक्ष-
रतो मति-
श्रुतभेदनि-
रूपणसमा-
प्ति: मूकेत
रभेदान्मति-
श्रुतभेदनि-
रूपणम् ॥
-SANESCREERS
॥ २५ ॥

R R P तचिन्त्यम्, यतः श्रुतज्ञानं हि न स्वतः परप्रत्यायकं किं तु श्रुतज्ञानकारणे शब्दे तदुपचारं कृत्वा तस्य परप्रत्यायकत्वमभिधीयत इति परत एव तत्तथा, एवं च करवक्त्रसंयोगादिका अपि चेष्टा अनक्षररूपत्वेन मतिहेतुतां भजन्त्यः परस्मिन् भुजिक्रियादिप्रती- तिं जनयन्ति, इति मतेरपि परतः परप्रत्यायकत्वमविशिष्टम् । आह च-"सपरपञ्चायणओ, भेओ मूएतराण वाभिहिओ ॥ जं मूअं मइनाणं, सपरप्पच्चायगं सत्त॥१७१॥" [स्वपरप्रत्यायनतो भेदो मूकेतरयोरिवाभिहितः॥ यद् मूकं मतिज्ञान, स्वपरप्रत्यायक श्रुतम् ] "सुअकारणंति सद्दो, सुअमिह सो य परवोहणं कुणइ । मइहेअवो वि हि परं, बोहिंति कराइचेट्ठाओ ॥ १७२ ॥" [ श्रुतकारणमिति शब्दः, श्रुतमिह स च परबोधनं करोति ॥ मतिहेतवोऽपि हि परं बोधयन्ति करादिचेष्टाः] "न परप्पबोहयाई, जं दोवि सरूवओ मइसुआई ॥ तक्कारणाई दोण्ह वि, बोहिंति तओ ण भेओ सिं ॥ १७३॥" [ न परप्रबोधके यद् द्वे अपि स्वरूपतो मतिश्रुते ॥ तत्कारणानि द्वयोरपि बोधयन्ति ततो न भेदोऽनयोः ॥] ॥ ५६ ॥ वस्तुस्थितिमुपदर्शयति- परप्रत्यायने शब्दो, ह्यसाधारणकारणम् । चेष्टापि शाब्दहेतुर्वा (त्वात्), तदियं युज्यते गतिः॥५७ ॥ यद्यपि द्रव्यश्रुतं श्रुतज्ञानं जनयितुमान्तरिकान्मतिविवर्तानवग्रहेहादीन् जनयति तथाप्यक्षररूपतया मुख्यत्वात् श्रुत- ज्ञानस्यैव तदसाधारणं कारण, करादिचेष्टास्तु न मतिज्ञानस्यैवासाधारणं कारणं, 'भोक्तुमिच्छत्ययम्' इत्यादिश्रुतानुसा- रिविकल्पस्यापि जनकत्वात, अथवाऽऽचारादिपुस्तकाक्षरस्य गुरुजनोदीरितशब्दस्य वा श्रुतस्य यथा मोक्षं प्रत्यसाधारण- कारणानां क्षायिकज्ञानदर्शनचारित्राणां कारणत्वं न तथा परप्रत्यायिकानां चेष्टादीनामिति विशेषः ॥ वस्तुतः शब्द- स्येव चेष्टादीनामप्यर्थविशेषेण सह सम्बन्धग्रहात्पदार्थोपस्थितिद्वारा शाब्दप्रतीतिजनकत्वमेव, न तु मतिज्ञानजनकत्वं, मुकेतरमैदा- न्मतिश्रुत- भेदनिरूप- णेऽन्याभि- प्रेतमपार- त्य स्वाभी- ष्टस्योप- दर्शनम् ॥ TEE SANGRECORRUCK

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्
॥ २६ ॥
मूकेतरभे-
दान्मतिश्रु-
तभेदनिरू-
पणे चेष्टा-
याः शान्द-
जनकत्व
अत एव शब्दोदीरणासामर्थ्याभावे प्रतिपिपादयिषवस्तथा तथा चेष्टमाना दृश्यन्ते, न च चेष्टादिना व्याप्तिप्रतिसन्धानपुरस्सरमनु-
मितिरेव जन्यते, न तु शाब्दबोध इति वाच्यम्, एवं सति शब्दादप्यर्थप्रतीतिरनुमानेनैवेति गतं शब्दप्रमाणचर्चयैव ॥
अथ शाब्दबोधे पदोपस्थित एवार्थो भासते नतूपस्थितमात्र, अन्यथा घटपदात्सम्बन्धितयोपस्थितस्याकाशस्य शाब्दबोधप्रवेश-
प्रसङ्गात्तथा च चेष्टोपस्थितोऽर्थः कथं शाब्बोधे निविशतामिति चेत्, न, सङ्केतग्रहाधीनोपस्थितिकस्यैव तत्प्रवेशनियमात,
अथ चेष्टादिना शब्दानुमानादेव शाब्दबोधस्तस्यैव तद्धेतुत्वेन क्लप्तत्वाद्, अन्यथा लिप्यक्षरादेरपि तद्वेतुत्वकल्पने गौरवादिति,
तदिदमभिप्रेत्योक्तं "प्रयत्नजन्या शरीरतदवयवक्रिया चेष्टा सा च नाट्यशास्त्रादिसमयबलेन पुरुषाभिप्रायविशेष अर्थविशेषं च
गमयन्ती नागमाद् भिद्यते लिप्यक्षरादर्थप्रतिपत्तिवदिति" इति चेत्, न, चेष्टायाः शरीरवृत्तित्वेन शब्दस्य चाऽऽकाशवृत्तित्वेन
तत्र व्याप्तिग्रहासम्भवात्, चेष्टया तदभिप्रायस्थः शब्दः कल्प्यते, इत्यपि वार्तम् ॥ आकाशं घटमानयेतिशब्दवदित्यनुमित्याद्याक-
लितशब्दस्येव तस्य स्वतन्त्रानुपस्थितत्वेन शाब्दबोधाहेतुत्वात्, किचैतादृशव्याप्तिप्रतिसन्धानं विनापि चेष्टादेराहत्यार्थप्रतीति-
दर्शनात्तस्याः स्वतन्त्रतयैव हेतुत्वं युक्तम्, अथ चेष्टाजन्यज्ञानस्य शाब्दत्वे शब्दात्प्रत्येमीति तत्र प्रतीतिः स्यान तु संज्ञया
प्रत्येमीति चेत्, न, तस्य ज्ञानस्य शाब्दत्वेऽपि शब्दाजन्यत्वात्, तादृशप्रतीतौ शब्दजन्यत्वस्य नियामकत्वात्, अत एव चेष्टायां
लक्षणाभावेऽपि व्यजनयैव बोधकत्वमित्यालङ्कारिकाः॥ तदिदमखिलं चेतसि निधाय वभाषे भगवान् भाष्यकार:-
दव्यसुअमसाहारण-कारणओ परविबोहयं हुजा ॥ रूढं ति व व्वसुर्य, सुअंति रूढा ण दव्यमई ॥ १७४ ॥” [द्रव्यश्रुत-
मसाधारणकारणतः परविरोधकं भवेत् ॥ रूढमिति चा द्रव्यश्रुतं श्रुतमिति रूढा न द्रव्यमतिः ॥] “सा वा सद्दत्थो चिय, तया
व्यवस्था-
पितम् ॥
म
॥२६॥

स विजं तंमि पच्चओ होइ ॥ कत्ता वि हु तदभावे, तदभिप्पाओ कुणइ चिट्ठ ॥ १७५ ॥" [सा वा शब्दार्थ एव तयापि यत्तस्मिन्प्रत्ययो भवति ।। कर्तापि खलु तदभावे तदभिप्रायः करोति चेष्टाम् ॥ ] अत्र शब्दार्थ इति शब्दो वक्तुः समुदीरितव- चनरूपस्तस्यार्थः शब्दार्थः श्रोतृगतज्ञाने प्रतिभासमानस्तदभिधेयवस्तुस्वरूपः श्रुतज्ञानमिति तात्पर्य, तथा च कारणे कार्योपचार आश्रयणीय इति हृदयम् ॥ वस्तुतः शब्दस्यार्थः प्रयोजनमिति सम्मुख एवार्थः ॥ननु मूकेतरभेदस्याऽवधारणगर्भोऽयमर्थः कुतो न स्याद्यत् श्रुतज्ञानं मुखरमेव मतिज्ञाने तु न नियम इति चेत्, न, श्रुतज्ञानस्यापि सर्वस्यामुखरत्वादनन्तभागस्यैव निबन्धादि- योग्यतया मुखरत्वोक्तौ चामिलाप्यानभिलाप्यविषयविभागादनतिरेकप्रसङ्गादितिदिग्। ननु तथापि खपरप्रत्यायकत्वाप्रत्याय- कत्याभ्यां मतिश्रुतहेतूनामेव विशेष उक्तो न तु मतिश्रुतयोः । न च श्रुतमपि शब्दप्रयोगद्वारा परप्रत्यायकमितिवाच्यम्,मतिज्ञानस्यापि तद्वारा तथात्वादितिचेत्,न,स्वकारणद्वारा परस्मै स्वसमर्पकत्वस्य विशेषकत्वात् । असार्वत्रिकमिदमभेदकमिति चेत्, न, तज्जाती- यत्वस्य सार्वत्रिकस्य भेदकत्वात् ॥५७।। उक्तो मूकेतरभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदस्तत्प्रतिपादनेन च कृतं सर्वप्रकारैर्भेदनिरूपणमित्याह- मिथो मतिश्रुतभिदा, तदेवं सर्वहेतुभिः ॥ दिशा प्रदर्शिताऽकम्प-सम्प्रदायपवित्रया ॥ ५८ ॥ स्पष्टः ॥ नवरं प्रदर्शितेति क्तप्रत्ययबलेन मतिश्रुतभेदस्य सिद्धत्वज्ञानेन प्रतिबन्धकजिज्ञासानिवृत्त्या मतिस्वरूपनिरूपण- प्रयोजकजिज्ञासा शिष्याणां कृता भवति ॥ ५८ ।। सविवरणे श्रीज्ञानार्णवप्रकरणे प्रथमस्तरङ्गः सम्पूर्णः॥ पौढिं ये विवुधेषु जीतविजयप्राज्ञाः परामैयरु-स्तत्सातीर्थ्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः श्रयन्ति श्रियम् ॥ तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानार्णवे निर्मिमते, पूर्णे भाष्यवचोमृतैरतितरा-माद्यस्तरङ्गोऽभवत् ॥१॥ मूकेतरमेदा- न्मतिश्रुतमे- दनिरूपण- समाप्तिसर्व- प्रकारमति- श्रुतमेद- निरूपणो- पसंहारः॥

सविवरणं श्रीज्ञाना- र्णव- प्रकरणम्॥ ॥२७॥ ग्रन्थान्तरं रत्नजिघृक्षयाऽन्ये, जडास्तडागं परिशीलयन्ति । रत्नाकर जैनवचोरहस्य, वयं तु भाष्यं परिशीलयामः ॥२॥ नमोऽस्तु भाष्यकाराय, भगवन्मतभानवे ॥ पराहतेषु तर्केषु, भाष्यजीवातुदायिने ॥३॥ ॥ इति श्रीज्ञानार्णवे न्यायविशारदविरचिते मतिश्रुतभेदचिन्ताधिकार. प्रथमस्तरङ्गः सम्पूर्णः ॥ 7062096 COAGRICORRESCARSAGAR प्रथमतरङ्ग- समाप्तिः द्वितीयतर- झारम्भः,तत्र मतिज्ञान- तत्त्व- निरूपण- प्रतिज्ञा ॥ अथ द्वितीयस्तरङ्गः ॥ अथावसरसङ्गत्या मतिज्ञाननिरूपणं प्रतिजानीते । भेदपर्यायसुव्यक्त-मथ तत्त्वनिरूपणात् ॥ निरूप्यते मतिज्ञान-मुद्देशक्रमसङ्गतम् ॥१॥५९॥ अथ ' यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात् पूर्व मतिज्ञानमुद्दिष्टमिति तदेव पूर्व निर्दिश्यते, एवं चोद्देष्टुरिच्छयोदेशक्रमः, उद्देश- क्रमाच निर्देशक्रम इति लभ्यते उद्देश इव निदेशेऽपीच्छेव नियामिकाऽसाम्प्रदायिकत्वेन बलवदनिष्टानुवन्धित्वज्ञानाच्च नोद्देशक्रमवि- परीतक्रमेण निर्देशेच्छेति तु युक्तं, अत्राऽथेत्यनेन प्रतिबन्धकजिज्ञासापगमलक्षणाऽवसरसङ्गतिधोत्यते, तथा चासङ्गताभिधान- शंका निवर्तिता भवति, प्रतिज्ञया च शिष्यावधानं कृतं भवति । तथाह च भाष्यकारोऽपि-"मइसुअनाणविसेसो, भणिओ तल्ल वखणाइभएणं॥ पुचि आभिणिबोहिय-मुद्दिष्टं तं परूविस्स।।१७६॥"[मतिश्रुतज्ञानविशेषो भणितस्तल्लक्षणादिभेदेन । पूर्वमा- भिनिवोधिकमुद्दिष्टं तत्प्ररूपयिष्ये] ॥१॥ तत्र निरूपणं तावत्तत्त्वभेदपर्यायैः कर्तव्यं तत्र तस्य भावस्तत्त्वमिति निरुत्या तत्त्वं सामा- न्यलक्षणं तच्च पूर्व कृतमेवेति भेदनिरूपणमवसरप्राप्तं चिकीर्षुराह- SHREMIEREGARCISES* ॥ २७॥ -- -- मतिभेदप्रभे- दनिरूपणं . तत्र अवग्र- हादीनां लक्षणम् ॥ श्रुतनिश्रितमन्यच्च, तद्विधाऽवग्रहादिभिः॥ औत्पत्तिक्यादिकै दै-रेकैकं स्याच्चतुर्विधम् ॥ २ ॥६॥ तन्मतिज्ञानं द्विविधं श्रुतनिश्रितमश्रुतनिश्रितं च, तत्स्वरूपं च प्रागुक्तं, तदपि प्रत्येकं चतुर्विधं, श्रुतनिश्रितमवग्रहहापाय- धारणालक्षणं,अश्रुतनिश्रितश्चौत्पत्तिकी-वैनयिकी-कार्मिकी-परिणामिकीलक्षणं चेति, यद्यप्यश्रुतनिश्रितेऽप्यवग्रहादिकमस्ति तथापि- 'असाधारणेन व्यपदेश' इति न्यायादित्थं विभागः प्रदर्शितः ॥ २॥ आदिपदेन संक्षिप्योपदर्शितं प्रभेदं प्रपञ्चयति- भिदाश्च ताश्चतस्रोऽव-ग्रहहापायधारणाः॥ औत्पत्तिकी वैनयिकी, कार्मिकी पारिणामिकी ॥३॥६॥ स्पष्टः॥ नवरं पारिणामिकीत्यस्यान्ते चेतीतिशेषः, अत्र च श्रुतनिश्रिताधिकारादवग्रहादिभेदानामेवाधिकारः ।। आह च निर्यु- क्तिकार:-"उन्गह-ईह-वाओ य, धारणा एव होंति चत्तारि ।। आभिणिबोहिअनाणस्स, भेअवत्थू समासेण॥१७८॥" [अवग्रह ईहाऽपायश्च धारणैव भवन्ति चत्वारि ॥ आभिनिबोधिकज्ञानस्य भेदवस्तूनि समासेन], अत्र चकारोऽवग्रहेहादेः पर्यायत्वनिरासेन स्वातन्त्र्यप्रदर्शनार्थः, तत्प्रदर्शकत्वं चास्य भेदार्थत्वादवसेयं, अनुशास्यते च 'चार्थो भेद ' इति, एवकारश्च अवगृहीतमेवेह्यते ईहितमेव निश्चीयते, निश्चितमेवावधार्यत इति क्रमद्योतनार्थः ॥ भेदा एव वस्तूनि विविक्तवस्तुस्वरूपाणि भेदवस्तूनि, तेन भेदस्य पदार्थान्तरत्वनिरासः, समासेनेति विस्तरेणाधिकानामपि सम्भवादितिभावः ॥३॥ अवग्रहादीनां लक्षणमाह- अपग्रहोऽवग्रहः स्या-दीहा भेदगवेषणम् ॥ इदमेवेत्यपायो धी-र्धारणा तदविच्युतिः ॥ ४ ॥६२ ॥ अपकृष्टः सामान्यमात्रावभासी ग्रहोऽवग्रहो निष्प्रकारकं ज्ञानमित्यर्थः, भेदगवेषणं तद्व्याप्यान्वयव्यतिरेकधर्मसम्भवग्रहणमीहा, इदमित्थमेवेत्यवधारणमपायो,निश्चितार्थाविच्युतिर्धारणा,अविच्युतिस्मृतिवासनारूपाणां तिसृणामपि धारणानां विच्युतिविरोधित्वा- REGISCREEKLLY +

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥ २८॥
45RSSIS THAR
नाव्याप्तिः। आह च नियुक्तिकारः॥"अत्थाणं उग्गहणं,अवग्गहं तह विआलणं ईही। ववसायं च अवायं, धरण पुण धारणं विति
॥१७९॥" [अर्थानामवग्रहणमवग्रहं तथा विचारणमीहां।।व्यवसायं चापायं धरणं पुनर्धारणां ब्रुवते] "अत्थाणं उग्गहणम्मि उग्गहो"
इतिपाठे विभक्तिव्यत्ययो द्रष्टव्यः । भाष्यकारोऽप्यभ्यधात्-"सामण्णत्थावग्गहण-मोग्गहो भेअमग्गणमहेहा॥ तस्सा-
वगमोवाओ, अविच्चुई धारणा तस्स ॥ १८०॥" [ सामान्यार्थावग्रहणमवग्रहो भेदमार्गणमथेहा ॥ तस्यावगमोऽपायोऽविच्यु-
तिर्धारणा तस्य] एतेषां लक्षणानां निष्कर्षमग्ने वक्ष्यामः ॥ ४ ॥
अत्र चावग्रहादारभ्य परैः सह बढयो विप्रतिपत्तयः सन्तीत्यवग्रहविषयान्तां तावन्निरोकरोति-
अवग्रहेऽपि सामान्य-विशेष विषयं परे ॥ प्राहुस्तेषामपायस्य, प्रवृत्तिरतिदुर्घटा ॥ ५॥ ६३ ॥
सामान्यमात्रावगाहिज्ञानत्वं नावग्रहत्वं शब्दादिसामान्याविशेषग्रहस्यापि तथात्वात्, किन्तु इदं तदिति वेत्याकारकविमर्श-
पूर्वभाविज्ञानत्वमेव, प्रवर्तते च शब्दोऽयमिति ज्ञानोत्तरं किमयं शांखः शार्गो वेत्यादिविमर्श इति, सोऽप्यवग्रह इति केचिदाहुः,
तन्न, तादृशविमर्शानुपरमेनापायस्य कदाप्यप्रवृत्तिप्रसङ्गाद् , ईहाया अपीहान्तरपूर्वमावित्वेनाऽवग्रहत्वप्रसङ्गात्, सामान्यविशेष-
भानस्यापि सामान्यमात्रभानं विनाऽसम्भवाद्विशेषधर्मभानेविग्रहस्य हेतुत्वादित्यादि बहुतरं वक्ष्यते, आह च-"सामनविसे-
सस्स वि, केइ उग्गहणमुग्गहं चिंति ॥ मइरिदं तयं तिच तन्नो बहुदोसभावाओ ॥१८॥" [सामान्यविशेषस्यापि केचिदवग्रह-
णमवग्रहं युवते ॥ यन्मतिरिदं तदिति च तन्नो बहुदोषभावात् ॥५॥ ईहाविषयिणीं विप्रतिपत्तिं निरस्यति-
इहां संशयमेवाहुः, परे तत्प्रकृतासहम् ॥ हेतूपपत्तिव्यापारा, न चेहा संशयात्मिका ॥६॥॥६४ ॥
मतिभेदप्रसे-
दनिरूपणे
वग्रहादि-
लक्षणे नियु-
क्तिभाष्यसे.
वादः अद-
ग्रहेहाविष-
यविप्रतिफ-
चिनिरास:
॥ २८॥

S मतिनिरू- पणे ईहा- संशययोल क्षणभेदतो भेदस्य व्य- वस्थापनम्।। REFEREST स्थाणुर्वा पुरुषो वेत्यनिश्चयात्मकं संशयमेवेहां केचिदुपयन्ति, ते भ्रान्ताः,ज्ञानाधिकारेञानरूपाया ईहाया उपन्यासायोगाद्, आह च-"ईहा संसयमे, केई न वयं तओ जमन्नाणं ॥ मइनाणंसा चेहा, कहमन्नाणं तई जुत्तं ॥१८२॥[ईहा संशयमानं केचिन्न तत्स यदज्ञानम् । मतिज्ञानांशश्वेहा-कथमज्ञानं सा युक्तम्] संशयेहयो_लक्षण्यं न वीक्षामहे इति चेत्, सोऽयं पुरुषदोषो न तु वस्तु- दोपस्तयोर्भेदस्यानुभविकत्वात्, तथाहि 'एकत्र विधिनिषेधोभयज्ञानं संशयः,' 'हेतूपपत्तिव्यापारप्रवणं ज्ञानमीहा' इति लक्षणभेदा- दनयोभैदः,यदाह-"जमणेगत्थालवण-मपज्जुदासपरिकुंठियं चित्तं ।। सेय इव सन्चप्पयओ,तं संसयरूवमण्णाण।।१८३॥” [यदने कार्थालम्बनमपयुदासपरिकुंठितं चित्तम्॥ शेत इव सर्वात्मतस्तत्संशयरूपमज्ञानम्] "तं चिय सयत्थहेऊ-ववत्तिवावारतप्परममाहं ॥ भूआभूअविसेसा-याणच्चायाभिमुहमीहा॥१८॥"[तदेव सदर्थहेतूपपत्तिव्यापारतत्परममोघम् ॥ भूताभूतविशेषादानत्यागाभि- मुखमीहा] अत्रानेकार्थालम्बनीमत्यत्रालम्बनपर्दैनकालम्बनत्वविवक्षणाद्,अनेकार्थपदेन विरुद्धार्थत्वलाभाद्, “एकविशेष्यकं विरुद्ध- धर्मप्रकारकं ज्ञानं संशय " इति लक्षणं, अपर्युदासपरिकुंठितमिति च स्वरूपाभिधानानुपलक्षणादविधिपरिकुंठितत्वमपि द्रष्टव्यं, 'सय' इत्यादि च, सं सर्वात्मना शेत इवेति संशय इति व्युत्पत्त्यर्थाभिधानं, अत्र विरुद्धनानाधर्मप्रकारकत्वं परस्परग्रहप्रति- बन्धकग्रहविषयतावच्छेदकनानाधर्मप्रकारकत्वं विवक्षितं, तेन तदभावव्याप्तिपर्यवसायिनो विरोधस्य संशयेऽभानेऽपि न क्षतिः, न वा इदं रजतमेतद्रूपवचेति ज्ञानस्य संशयत्वापत्तिः, यत्तु 'एकधर्मिकतत्तदभावोभयप्रकारकज्ञानमेव संशय' इति, तन्न, अयं स्थाणुः पुरुषो वेति भावाभावानात्मकविरुद्धधर्मद्वयप्रकारकज्ञानस्यापि संशयत्वात् , तत्र चतुष्कोटिकसंशयस्यासिद्धत्वादिति दिग् ॥ यच ज्ञानं स्वार्थहेतूपपत्तिव्यापारतत्परं तदीहा, भूताभूतेत्यादिकं च स्वरूपकथनं, तत्र हेतुव्यापारः स्थाणुरयं बल्ल्युपसर्पणकाकादि-

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम्॥
॥ २९॥
निलयादित्याकारः, उपपत्तिव्यापारश्च सम्भवपर्यालोचनं यथा सूर्यास्तसमये महति तमिस्र स्थाणुरयं सम्भाव्यते नतु पुरुषः,
तस्यासम्भवादिति, न चाशुनश्वरज्ञाने कथमेतावत्पर्यालोचनमिति वाच्यं, ईहाया बहुसामयिकत्वाद्, अत एव बहुकालममुमर्थमनुभ-
वामीति प्रतीतिः सङ्गच्छते, एवञ्च हेतूपपत्त्योः परमार्थत एकरूपत्वात्तत्संशयविरोधितद्व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमेव तदीहेत्यायाति,
तत्संशयविरोधिता च तदभावानवगाहित्वेन विवक्षितति न व्याप्यव्याप्यवत्तापरामर्शप्रसूतव्याप्यवत्तानुमितेरपायरूपाया ईहा-
त्वापत्तिः, तत्संशयनिवर्त्तकापायानुकूलपरामर्शत्वं चेहालक्षणं, तेन न तर्काद्यतिव्याप्तिः,स्यादेतत् तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारक
ज्ञानं निश्चयः, स एव चापायः, ईहापि संशयभिमत्वात्तादृश्येवेतीहापाययोः को भेद ? इतिचेत्,न,इदमित्थमेवेत्यनुभवसाक्षिक-
विषयताविशेषवतोऽपायादतादृश्या ईहाया भिन्नत्वात् । तादृशविषयताभावः संशयत्वेन व्याप्त इतिचेत्,न,अवग्रहेण व्यभिचारात,
स्पष्टज्ञानत्वविशिष्टः स तथेतिचेत्,न, तादृशव्याप्तौ मानाभावाद्,अपि चामुमर्थ विचारयामि, अमुमर्थं च निश्चिनोमीति प्रतीतिभ्या-
मीहात्वापायत्वयोः स्फुटमेव स्वतन्त्रतया भानमिति दिग् ॥ ६॥ अपायधारणागतविप्रतिपत्तिनिरासाय परमतमुपदर्शयति-
केचिदन्यविशेषस्या-ऽभावव्यवसितिं जगुः ॥ अपायमिदमेवेति, निश्चयं धारणां पुनः ॥७॥६५॥
'ववसायंमि अवाओ' इत्यत्र विशेषेण एककोटिव्याप्यधर्माभावप्रकारेणावसायो ज्ञानमिति यथाश्रुतार्थभ्रान्ताः पुरुषत्वव्याप्य-
शिरकण्डूयनादिधर्माभाववानयमित्यादिज्ञानमपाय, 'धरणं पुण धारणं बिति' त्ति यथाश्रुतार्थभ्रान्ताश्च तदुत्तरोत्पन्न स्थाणुरेवाड-
यमित्यादिज्ञानं धारणा केचिदाहु। आह च-"केइ तयमविसेसा-वणयणमित्तं अपायमिच्छति ॥ सब्भूयत्थविसेसा-वधारणं धारणं
चिति॥१८५॥" [केचित्तदन्यविशेषापनयनमात्रमपायमिच्छन्ति ॥ सद्भूतार्थविशेषावधारणं धारणा ब्रुवते ॥] ॥७॥ तद्दषयति-
मतिनिरू-
पणे ईहाया
अपायाभे-
दः अपाय-
घारणावि-
प्रतिपत्ति-
निरासश्च॥
CASSRORLDRESS
T
ॐESSES
॥ २९॥

मतिनिरूप- णेऽपाय- धारणाविप्र- तिपत्तिनि- रासः ।। अन्वयाद्व्यतिरेकाद-प्यन्वयव्यतिरेकतः॥ अपायस्योदयात्तन्नो, भिदाः पञ्च स्युरन्यथा ॥ ८॥६६॥ अन्वयधर्मवत्ताज्ञानाद्व्यतिरेकधर्मवत्ताज्ञानादुभयधर्मवत्ताज्ञानाचाविशेषणहीतापायस्यैव प्रवृत्तेरसद्भूतधर्मनिषेधाकलनर्माहा, तज्जन्यनिश्चयश्चापायः, परमित्युक्तेऽन्वयधर्मगवेषणजन्या धारणा न स्यात् । आह च-"कासइ तयन्नवरेग-मेत्तओवगमणं भवे भूए॥ सब्भूअसमन्नयओ,तदुभयओ कासइ ण दोसो॥१८६॥ सव्वो वि य सोवाओ,भेए वाहोंति पंच वत्थूणि।। आहेवंचिय चउहा, मई तिहा अन्नहा होइ ॥ १८७ ॥"[कस्यचित्तदन्यव्यतिरेकमावतोऽवगमनं भवेद् भूते ॥ सद्भुतसमन्वयतस्तदुभयतः कस्यचित्र दोषः ॥ सर्वोऽपि च सोऽपायो भेदे वा भवन्ति पंच वस्तूनि ॥ आहैवमेव चतुर्धा मतिनिधाऽन्यथा भवति ॥ ननु स्थाणुत्व- व्याप्यवक्रकोटरादिमानयमित्यन्वयधर्मज्ञानात् स्थाणुरेवायमित्यपायोस्तु पुरुषत्वव्याप्यकरचरणाद्यभाववानयमितिव्यतिरेकधर्म- ज्ञानात्तु कथं सः, नहि तदभावोऽवयेन व्यतिरेकेण वा स्थाणुत्वव्याप्यो घटादौ व्यभिचारात्, न च पुरुषत्वव्यापककरायभाववत्ता- निश्चयादेव पुरुषत्वाभावज्ञानादभावप्रतिपत्तिा, व्यापकाभावज्ञाने व्याप्याभावज्ञानावश्यंभावनियमादिति वाच्यम्। एवं सत्ययं न पुरुष इत्यपायेऽपि अयं स्थाणुरेवेत्यपायाऽभावात्, न चोक्ताभावविशिष्टसाधारणधर्मवत्ताज्ञानमेव तदपायजनकमिति वाच्यम्,संशय- हेतोः साधारणधर्मवत्ताज्ञानस्य तदानीमननुसरणादितिचेत्, न, एककोटिनियतधर्माभावज्ञानस्याप्यपरकोटिनिश्चायकत्वाद्, अथ- वोक्ताभावज्ञानानन्तरं पुरुषत्वाभावज्ञानाचद्विशिष्टसाधारणधर्मवत्ताज्ञानादेवायं स्थाणुरेवेति निश्चयस्तत्र तावदालोचनरूपाया ईहाया अनुभवसिद्धत्वादिति दिग् । ननु व्यतिरेकधर्मगवेषणमीहेत्यस्य व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमपायोऽसावित्यर्थः, तच्चान्वयेन व्यतिरेकेणा- न्वयव्यतिरेकेण वास्तु,तजन्ययथाभूतार्थज्ञानं तु धारणा इत्युक्तौ को दोषोयेन स्वमतव्यावर्णनमेव भ्राजमानं भवेत्, उच्यते, व्याप्य- TRE *, मतिनिरूप- বাঁs- धारणावित्र- तिपत्तिनि---- सविवरण श्रीज्ञाना- र्णव- प्रकरणम्।। ॥३०॥ VEGORTERS455 धर्मव्यवसितेर्जायमानो निश्चयो यदि धारणाख्यामाबिभृयात्तदा स्मरणस्यादुरुपह्नवत्वेनावग्रह ईहाऽपायो धारणं स्मरणञ्चेति मति- ज्ञानस्य पञ्च भेदाः प्रसजेयुः, एवञ्चागमविरोधः, किश्चैवं धारणाजनकं व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमपाय एवेतीहासंशय एव स्यात्तथा- चोक्तदोषप्रसङ्गः । अथ व्यतिरेकधर्मज्ञानाजायमानो निश्चयोऽपायोऽन्वयधर्मज्ञानाज्जायमानस्तु धारणेति चेत्, न, उभयधर्म- ज्ञानाज्जायमानस्य निश्चयस्योभयरूपत्वप्रसङ्गादुक्तदोषप्रसङ्गाच्च, एतेन व्यतिरेकधर्मावगाही निश्चयोऽपायोऽन्वयधर्मावगाही तु धारणेत्यपि निरस्तम् ॥ ८॥ ननु धारणा नामाविच्युतिस्मृतिवासनालक्षणं मतिभेदान्तरं नास्तीत्यपायविशेष एव स इति न मम भेदपञ्चकप्रसङ्गो व्यक्तिभेदमनादृत्य जातिभेदान्वेषणनिष्ठानां भवतामेव प्रत्युत भेदत्रयप्रसङ्ग इत्याशङ्कते- अविच्युतिरपायो हि, संस्कारो ज्ञानमेव न ॥ अन्योऽपायः स्मृतिस्तेन, चतुर्भेदा मतिः कथम्? ॥९॥६७॥ इह तावद्घटादिके वस्तुनि अवग्रहहापायरूपतयान्तर्मुहूर्तिक एवोपयोगो जायते तत्रापायोत्पत्त्युत्तरं उपयोगसातत्यलक्षणा चाविच्युतिर्भवद्भिः स्वीक्रियते सा तावत्तावत्कालीनापायस्वरूपान्नातिरिच्यते नहि कालभेदेन वस्तुभेदो नाम क्षणभङ्गप्रसङ्गात् या चोपयोगोपरमे सति संख्येयमसंख्येयं वा कालं वासनाऽवतिष्ठत इत्यभ्युपगम्यते सा किं वस्तुविकल्पो वा स्मृतिज्ञानावरण- कर्मक्षयोपशमो वा तज्ज्ञानजननशक्तिर्वा, नाद्य एतावन्तं कालं तद्वस्तुविकल्पायोगात्, नोत्तरौ अज्ञानरूपत्वेन तस्य मति- भेदत्वाऽसम्भवाद्, या चानुभूतस्य कालान्तरोपयोगलक्षणस्मृतिराविर्भवति साप्यन्वयधर्मेणापि निश्चयोऽपाय एवेति त्वदम्यु- पगमादपायान्तरमेवेति अवग्रह ईहाऽपायश्चेति तिस्र एव मतेर्मिदाः सम्भवन्तीति कथं न विभागवाक्याविरोधः । आह् च- "काणुवओगम्मि धिई, पुणोवओगे असा जवाओ॥ तो णत्थि धिई ॥ त्ति ॥९॥ [कानुपयोगे धृतिः पुनरुपयोगे च 15154 7 ॥३०॥ -- मतिनिरूपणे अविच्युति- स्मृतिवासना- नांधारणा त्वव्यवस्था- पनम् ॥ RECRECOGRESERECIRCLECRk सा यतोऽपायः १ ॥ ततो नास्ति धृतिः ॥ १८८ ॥]चि ॥ ९॥ अत्रोच्यते- अविच्युतिनिधारा, वासना ज्ञानकारणम् ।। स्मृतिश्चेदं तदेवेति, धीरतः किन्नु दूषणम् ॥१०॥६८॥ यत्तावदुक्तं उपयोगसातत्यलक्षणाविच्युतिरपायान्नातिरिच्यत इति, तदयुक्तम् , प्रथमापायोत्पत्त्युत्तरं क्वचिदुत्पद्यमानस्य स्थाणुरेवायं स्थाणुरेवायमित्याकारस्यान्तर्मुहूर्तमविच्युतस्य धारावाहिकापायसन्तानस्य प्रथमापायादभ्याधिकत्वात्, न च गृहीत- ग्राहित्वादस्याप्रामाण्यं, अन्यान्यकालविशिष्टत्वेन स्पष्टस्पष्टतरस्पष्टतमभिन्नधर्मकवासनाजनकत्वेन वा भिन्नस्यैव वस्तुनो ग्रहणा- दिति प्राश्चा, वस्तुतो गृहीतग्राहित्वं नाप्रमात्वे तन्त्रं, अपि तु 'तदभाववति तत्प्रकारकत्वम् इति न तस्याप्रामाण्यं इति दिग्॥ वासना च यद्यपि स्वतो न ज्ञानं तथाप्यपायकार्यत्वात्स्मृतिकारणत्वाचोपचारतस्तस्य ज्ञानत्वं, 'इदं वस्तु तदेव, यत्प्रागुपलब्ध मया इत्याकारिका स्मृतिरपि वस्तुनिश्चयमात्रफलादपायादतिरिच्यते, पूर्वापरदर्शनानुसन्धानरूपा हि सेति, तस्मादविच्युतिस्मृति- वासनालक्षणानां तिसृणामपि धारणानां व्यवस्थितत्वान्न विभागव्याघातः। आह च-"भण्णइ इदं तदेवेति जा बुद्धी ॥१८८॥नणु साचायन्महिआ, जओ असा वासणाविसेसाओ॥जा यावायाणन्तर-मविच्चुई सा धिई णाम ॥१८९॥"[भण्यते इदं तदेवेति या बुद्धिः॥ ननु साऽपायाभ्याधिका यतश्च सा वासनाविशेषात् ॥ या चापायानन्तरमविच्युतिः सा धृतिर्नाम] यदि चोक्तरीत्याऽपाय- विशेष एव धारणाभ्युपगम्यते स्मृतिरपि चाधिकाऽभ्युपेयते तदा भेदपञ्चकप्रसङ्गो वज्रलेपायत एव ॥ आह् च-"तं इच्छंतस्स तुहं, वत्थूणि य पंच, नेच्छमाणस्स ॥ किं होउ सा अभावो, भावो नाणं व तं कयरं ॥१९०॥"[ तामिच्छतस्तव वस्तूनि च पंच, नेच्छतः ॥ किं भवतु साऽभावो भावो ज्ञानं वा तत्कतर ] ननु भवतामपि धारणांनां त्रिरूपत्वाद्विभागातिक्रम इति चेत्, न, CASS -

सविवरण
भझिाना-
व-
प्रकरणम्॥
मतिनिरूपण
प्रसङ्गे अव-
ग्रहभेदनि-
रूपणं तत्र
"
व्यज्जना-
धारणात्वेन सर्वासामप्येकीकृत्य ग्रहणाद्, यथा द्विरूपयोरप्यवग्रहयौरवग्रहत्वेन ग्रहणम् , आह च-"तुभं (झं) बहुयरभेआ,
भणइ मई होइ धिइबहुत्ताओ॥ भन्नइ न जाइभेओ, इट्टो मज्झं जहा तुझं ॥ १९१॥" [तव बहुतरभेदा भणति मतिर्भवति
धृतिबहुत्वात् ॥ भण्यते न जातिभेद इष्टो मम यथा तव ॥] “सा भिन्नलक्खणा वि हु, धिइसामनेण धारणा होइ ॥ जह उग्गहो
दुरूवो, उग्गहसामन्नओ इक्को ॥ १९२॥ [सा भिन्नलक्षणापि खलु धृतिसामान्येन धारणा भवति ॥ यथाऽवग्रहो
द्विरूपोऽवग्रहसामान्यत एकः] नन्वपायसन्ततिरूपाविच्युतिः कथं धारणेति चेत्, अपायजन्यत्वाद्धारयामीत्यनुभवाच्च,
स्मृतेरिव प्रत्यभिज्ञाया अपि धारणात्वात्तिमृणां धारणानां ग्रहणे न्यूनत्वमिति चेत्, न, स्मृतिपदेन तत्ताविषयकज्ञानविशेषग्रहणा-
दिति दिग् ॥ १० ॥ तदेवं विप्रतिपत्तीनिराकृत्य विभाग व्यवस्थाप्य प्रागुद्दिष्टमवग्रहं निरूपयति-
तत्र द्विधाऽवग्रहः स्याद्-व्यञ्जनार्थावलम्बनः॥ तत्रेन्द्रियार्थसम्बन्धो-व्यञ्जनावग्रहः स्मृतः॥११॥६९॥
तत्रावग्रहहापायादिषु मतिभेदेषु, अवग्रहो द्विविधो व्यञ्जनावग्रहोऽर्थावग्रहश्च, तत्र प्रथमोपदिष्टत्वाद् व्यञ्जनावग्रहः
प्राग्निरूपणीय इत्यत आह तत्रेति, आह च-"तत्थोग्गहो दुरूवो, गहणं जं होज वंजण-त्थाणं ॥ वंजणओ य जमत्थो, तेणाईए
तयं वुच्छं॥१९॥"[तत्रावग्रहो द्विरूपो ग्रहणं यद् भवति व्यञ्जनार्थयोः॥ व्यञ्जनतश्च यदर्थस्तेनादौ तकं वक्ष्ये ॥] इन्द्रियार्थ-
सम्बन्ध इति तत्समयभावीति तात्पर्यार्थः, योगार्थमाह-स्वयं व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनं, कदम्बकुसुमगौल-
कधान्यमसरकाहलाक्षुरप्राकारमांसगोलकरूपाणामन्तर्निर्धत्तीन्द्रियाणां शब्दादिविषयपरिच्छेदहेतुशक्तिविशेषलक्षणमुपकरणेन्द्रिय
शन्दादिपरिणतद्रव्यनिकरम्बम्, तदुभयसम्बन्धश्च, ततश्च व्यञ्जनेनेन्द्रियेण व्यञ्जनस्यार्थस्य तत्सम्बन्धस्य वाऽवग्रहो व्यञ्जना-
वग्रहलक्ष-
णोपदर्श-
नम् ॥
HERE
ESSACRACROS
॥ ३१ ॥

मतिनिरूपण प्रसङ्गे व्यञ्जनावप्र- हस्यज्ञानत्व- ब्यवस्थाप- नम् ॥ RESSES वग्रह इति मध्यमपदलोपेन समास आश्रयणीया,अर्थभेदेऽपि पदसारूप्येणैकशेषाश्रयणाद् ,एकशेषेण व्यञ्जनानामवग्रह इत्यपि स्यात् ॥ आह च "जिज्जइ जेणत्यो,घडोच्च दीवेण जणं तं च॥ उवगरणिंदियसद्दाइ-परिणयहव्वसम्बन्धो ॥ १९४ ॥" [व्यज्यते येनार्थों घट इव दीपेन व्यञ्जनं तच। उपकरणेन्द्रियशब्दादिपरिणतद्रव्यसम्बन्धः॥] नन्वयं व्यजनावग्रहो न ज्ञानमित्यत आह- स तदन्ते ज्ञानभावा-दव्यक्तं ज्ञानमिष्यते(ताम् ।।अन्यथा प्रागलाभं त-दन्तेपि न जनुर्लभेत् ॥१२॥७॥ व्यञ्जनावग्रहसमयो ज्ञानवान्, ज्ञानोत्पत्तिघटकान्त्यसमयशालित्वात्, यदन्त्यसमये ज्ञानमुत्पद्यते स कालो ज्ञानवान्, यथा ईहाद्यसमयः,इत्यनुमानाद् व्यञ्जनावग्रहस्य ज्ञानत्वसिद्धिः। आह च-"अन्नाणं सो बहिरा-इणं व तकालमणुवलंभाओ॥ण,तदंते तत्तोच्चिय, उवलंभाओ तओनाणं ॥१९५॥"[अज्ञानं स बधिरादीनां वा तत्कालमनुपलम्भात् ॥न, तदन्ते तत एवोपलम्भात्स ज्ञानम्] ननु यदि व्यञ्जनाऽवग्रहो ज्ञानं तर्हि बधिरादीनामपि शब्दादिज्ञानापत्तिस्तत्कालेऽपि तदुपलम्भापत्तिश्चेतिचेत्,न,वधिरादीनांव्यञ्जन- व्यञ्जनपूर्तिघटकशक्त्यभावादच्यक्तत्वेन तदनुपलम्भसम्भवाच्च, आह च-"तकालम्मि विनाणं, तत्थत्थि तणुं ति तो तमन्चत्तं ॥ बहिराईणं पुण सो, अन्नाणं तदुभयाभावा ॥ १९६ ।।" [ तत्कालेऽपि ज्ञानं तत्रास्ति तनु इत्यतस्तदव्यक्तम् ॥ बधिरादीनां पुनः सोऽज्ञानं तदुभयाभावात् ॥] एतेन 'यदन्त्यसमये ज्ञानमुत्पद्यते स कालो ज्ञानवानिति न व्याप्तिः, अवग्रहप्राकाले व्यभि- चाराद्'इति निरस्तं, ज्ञानसामग्रीसम्पन्नत्वस्य हेतुविशेषणत्वाद् , अत एव सर्वेषु शब्दादिद्रव्यसम्बम्धसमयेषु ज्ञानमस्ति ज्ञानोपकारि- शब्दादिद्रव्यसम्बन्धसमयसमुदायैकदेशत्वादविग्रहसमयवदित्यपि प्रयोगः,यदि च कारणसाम्राज्येऽपि प्राक्समयेषु ज्ञानोत्पत्तिर्न स्यात्तन्त्यिसमयेऽपि न स्यादविशेषाद्, आह च-" जइ वाणमसंखज-समयसद्दाइदव्वसम्भावे ॥ किह चरिमसमयसद्दाइ-

मतिनिरूपण
प्रसङ्गे
सविवरणं
श्रीज्ञाना-
णेव-
प्रकरणम्॥
॥३२॥
व्यानावय
हस्य ज्ञानत्व
व्यवस्था-
पनम् ।
दबविण्णाणसामत्थं ॥ २०० ॥" [यदि वाज्ञानमसंख्येयसमयशब्दादिद्रव्यसभावे ।। कथं चरमसमयशब्दादिद्रव्यविज्ञान-
सामर्थ्यम्॥] “जसबहा ण वीसु, सव्वेसु वि तं न रेणुतेल्लं च ।। पत्तेयमणिच्छंतो, कहमिच्छसि समुदये नाणं ॥२०१॥"[यत्सर्वथा
न विष्वक्सर्वेष्वपि तन्न रेणुतैलमिव ॥ प्रत्येकमनिच्छन्कथमिच्छसि समुदये ज्ञानम् ॥] ननु समुदायनिष्पीडनमात्रं न तैलजनकं
येन सिकतासमुदायनिष्पीडनात्तैलानुद्भवदर्शनेन प्रत्येकशक्त्यभावः समुदायशक्त्यभावे प्रयोजकः स्यात्, किन्तु तिलसमुदाय-
निष्पीडनमेव तजनकमिति विषमो दृष्टान्तः, अन्यथा दण्डचक्रादिसमुदाये घटोद्भवदर्शनाद्दण्डादिप्रत्येकसत्वेऽपि सूक्ष्मघटोत्पत्ति-
प्रसङ्गादिति चेत्,न,कारणसमुदयाधीनसाकल्यशालिनि कार्य देशस्य देशोपकारितायामेतदृष्टान्तामिधानस्य न्याय्यत्वाद्॥अत
एवाह-" समुदाये जइ नाणं, देखणे समुदये कहं णत्थि? ॥ समुदाए वाऽभूयं, कह देसे होज तं सयलं १ ॥२०२॥"[समुदाये
यदि ज्ञानं, देशोने समुदये कथं नास्ति? ॥समुदाये वाऽभूतं, कथं देशे भवेत् तत्सकलम् ॥] "तंतू पडोक्यारी, ण समत्तपडो य-
समुदिआ ते उ ॥ सव्वे समत्तपडओ तह नाणं सव्वसमएसु॥२०३॥"[तन्तुः पटोपकारी, न समस्तपटश्च समुदितास्ते तु ॥
सर्वे समस्तपटकस्तथा ज्ञानं सर्वसमयेषु ॥ ] ननु सहस्रतन्तुकपटादौ सहस्रतन्तूनां तत्संयोगानाञ्च हेतुत्वात्, द्वितन्तुकपटादौ च
तन्तुद्वयसंयोगादीनां हेतुत्वादस्तु तत्र खण्डपटोत्पत्तिक्रमेणाखण्डपटोत्पत्तिः, अत्र तु ज्ञानस्य निरवयवत्वात्कथं खण्डज्ञानो-
त्पत्तिक्रमणाखण्डनानोत्पत्तिरिति चेत्, न, असङ्ख्यातसमयनिष्पाद्ये सांशे महति ज्ञानेऽङ्सख्यातानामशानां हेतुत्वाद्, अत एव
महज्ज्ञानमेवाभिव्यज्यते महत्तेजोवन तु सूक्ष्ममेकतेजोजयवंदिति व्यञ्जनावग्रहस्य सूक्ष्मत्वं ज्ञानान्तराणां च महत्त्वमुपपद्यते,
नन्वन्यक्तं ज्ञानं दृष्टविरुद्धमिति चेत्, न, सुप्तमत्तादिसूक्ष्मबोधस्याऽव्यक्तस्य दृष्टत्वाद्, ज्ञानं विना स्वापावस्थायां वचनचेष्टा-
SNER
SECREEN
॥३२॥

मतिनिरूप- णे व्यञ्जना- वग्रहस्य ज्ञा- नत्वव्यव- स्थापनं त- भेदनिरू- पणञ्च ॥ धनुपपत्तेः, अन्यथा काष्ठादीनामपि तत्प्रसङ्गाद, आह च-"कहमव्वचं नाणं, च सुत्तमचाइसुहुमबोहु व ॥ सुत्तादओ सयं चि य, विनाणं नावबुज्झति ॥ १९७ ॥ [ कथमव्यक्तं ज्ञानं च, सुप्तमत्वादिसूक्ष्मवोध इव ॥ सुप्तादयः स्वयमपि च, विज्ञानं नावबुद्ध्यन्ते ] "लक्खिजइ तं सिमिणा-यमाणवयणदाणाइचेट्ठाहिं ॥ जं नाऽमइपुवाओ, विज्चंते वयणचेट्ठाओ ॥ १९८ ॥" [लक्ष्यते तत्स्वमायमानवचनदानादिचेष्टाभ्यः ॥ यद् नाऽमतिपूर्वा विद्यन्ते वचनचेष्टाः] ॥ ननु सुप्ते स्वीयं चेष्टितं कुतो न स्वस्य ज्ञानगोचर इति चेद् , ज्ञानावरणवैचित्र्यात्, नहि जाग्रतापि सर्व स्वीयं चेष्टितं ज्ञायते, मुहूर्तेनाप्यसंख्याताध्यवसायोल्लङ्घनाद् कस्यचिदेव कदाचिदेव वा तदभिव्यक्ते, आह च-"जग्गतो वि न याणइ, छउमत्थो हिअयगोअरं सव्वं ॥ जं तम्झवसाणाई, जमसंखेज्जाई दिवसेण ॥ १९९ ॥ [ जाग्रदपि न जानाति, छद्मस्थो हृदयगोचरं सर्वम् ॥ यत्तद्ध्यवसानानि यदसंख्ये यानि दिवसेन] एवञ्च यथाऽध्यवसायस्थानान्यसंख्येयानि सूक्ष्माण्यपि केवलिदृष्टतया श्रद्धेयानि तथा व्यञ्जनावग्रहज्ञानमपीति भावः ॥ १२॥ अथ व्यञ्जनावग्रहतत्वं निरूप्य तद्भेदानिरूपयति- स चतुर्धी भवेच्चक्षु-मनोवर्जेन्द्रियोद्भवः ॥ उपघातानुग्रहाभ्यां प्राप्यकारीणि तानि यत् ॥१॥ ७१ ॥ सच व्यञ्जनावग्रहश्चतुर्विधोघाणरसनश्रोत्रत्वग्लक्षणेन्द्रियभेदात्, नन्वतेषामेवेन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहो नतु नयनमनसोरित्य- व किं प्रमाणमिति चेत्, तेषां कर्कशकम्बलादिस्पर्शने त्रिकटुकाद्यास्वादने अशुच्यादिपुद्गलाघ्राणे भेर्यादिशब्दश्रवणे चोपघातदर्शना- त चन्दनद्रवादिस्पर्श क्षीरशर्कराधास्वादने कर्पूरपुद्गलाद्याघ्राणे मृदुमन्त्रशब्दाद्याकर्णने चानुग्रहदर्शनात्प्राप्यकारत्वासद्धेः,नयनम- नसस्तुि जलज्वलनाद्यवग्रहेणानुग्रहोपघातादर्शनादतथात्वाद्, आह च-"नयणमणोवजिदिअ-भेआओ वंजणोग्गहो चउहा।।उवधा- -

1
सविवरण
श्रीज्ञाना-
गेव-
प्रकरणम्॥
याणुग्गहओ, जताई पत्तकारीणि।।२०४॥"[नयनमनोवर्जेन्द्रियभेदाद्वयञ्जनावग्रहश्चतुर्धा।उपघातानुग्रहतो यत्तानि प्राप्यकारीणि]
नन्वनुग्रहोपघातौ यदि सुखदुःखविशेषौ न तर्हि तौ प्राप्यकारित्वलिङ्गे यदि तु विषयेन्द्रियसंयोगकार्यविशेषौ तदा ताभ्यां घ्राणादी-
नां स्वहेतुभूतं प्राप्तिमात्रं सिध्यतु न तु प्राप्यकारित्वं,तद्धि वस्तु प्राप्यैव ज्ञानजनकत्वमिति चेत् न, श्रोत्रादीनां प्राप्यकारित्वानु-
माने नयनमनसोचाप्राप्यकारित्वानुमानेऽनुग्रहोपघातव्यावर्णनस्य विपक्षबाधकतर्कप्रदर्शनार्थत्वात्, एवञ्च श्रोत्रादीनि प्राप्यका-
सीणि नयनमनोभिनेन्द्रियत्वाद् व्यतिरेके नयनमनोवीदत्यनुमानमप्यवदातीमतिदिग।।१३॥श्रोत्रघाणयोरप्राप्यकारित्वं निराकुरुते-
दूरार्थग्रहणाच्छ्रोत्र-घ्राणे अप्राप्यकारिणी ॥ स्यातां न ते शब्दगन्धौ,यदि प्राप्नुवतः स्वयम् ॥१४॥७२॥
श्रोत्रवाणे अप्राप्यकारिणी असम्बद्धार्थग्राहकत्वात्, न चायमसिद्धो हेतुः, दूरस्थस्यापि भेर्यादिशब्दस्य श्रवणाद् दूरस्थस्यैव
कुसुमादेः परिमलग्रहणाच्च, न चाचान्यतरकर्मणोभयकर्मणा वेन्द्रियविषययोः संयोगोऽनुभूयत इति केचिदाहुः । आह च-
"जुज्जइ पत्तविसय या, फरिसणरसणे ण सोत्तघाणेसु । गिण्हंति सविसयमिओ, जं ताई भिन्नदसंपि॥२०५॥"[युज्यते प्राप्तविषयता
स्पर्शनरसनयोर्न श्रोत्रघाणयोः । गृहीतः स्वविषयमितो यत्ते भिग्नदेशमपि] तदिदं तदा युज्येत यदि शब्दगन्धयोः स्वकर्मणेन्द्रिय-
प्राप्तिन स्यात्, तथा च दूरस्थावपि तौ तत्रागत्यैव ज्ञानं जनयत इति न किञ्चिदनुपपन्नम् ॥ उक्तं च-"पावंति सद्गंधा, ताई
गंतु सयं न गिण्हंति" ॥२०६॥ [प्राप्नुतः शब्दगन्धौ, ते गत्वा स्वयं न गृणीतः ]ति ॥१४॥ तयोः सक्रियत्वे प्रमाणमाह-
सक्रियौ तौ संहरणाद, वायुना वहनादपि ॥ द्वारानुपाताच्छैलादि-प्रतिघातात्समूर्तिकौ ॥१५॥७३ ॥
संहरणाद् गृ(गोहादिषु पिण्डीभावाद्, वहनादपि वायुना नयनात्, तौ (शब्दगन्धौ)सक्रियौ समूर्तिको चधूमवद्वि-
5*3CURREY
मतिनिरू-
पणे व्यज-
नावग्रहभेद-
निरूपणे
घ्राणादीनां
चतुर्णा
प्राप्यकारि-
त्वं चक्षुर्मन-
सोरप्राप्य
कारित्वञ्च
निरूपितम्।।
NSSISTA+SHRCASS
॥ ३३ ॥

- - मति० व्य० श्रोत्रघ्राण- योरपाप्य- कारित्वस्य खण्डनं श- RA ब्दे आका- शेषेण, द्वारानुपाताद्वा जलवद् वेगवद्विरलद्रव्यस्य पवनाभिमुखमेव प्रसर्पणादनयोः प्रायो द्वारानुधावनमिति बोध्यं, पर्वतादिषु प्रतिस्खलनाद् वा तौ तथा पाषाणवद्, आह च-"जं ते पोग्गलमइआ, सक्किरिया वाउवहणाओ ॥ २०६ ॥ धूमोव्व संहरणओ, दाराणुविहाणओ विसेसेणं ॥ तोयं व णितवाइसु, पडिघायाओ य वाउव्व ॥२०७॥" [ यत्तौ पुद्गलमयौ सक्रियौ वायुवहनात् ॥ धूम इव संहरणतः द्वारानुविधानतो विशेषेण ॥ तोयमिव नितम्बादिषु, प्रतिघाताच्च वायुरिव ॥] ननु पवनोपनीतगन्धवद्व्याणां घ्राणेन सह संयोगोऽस्तु शब्दस्त्वाकाशगुण इति न श्रोत्रेण तस्य मंयोगः प्रत्यासत्तिः किं तु श्रोत्रस्य कर्णशष्कुल्यवच्छिमाकाशरूपत्वाच्छब्दस्य च तद्गुणत्वात्समवाय एव, गतिस्तु तत्र पवनगतैवारोप्यते न तु स्वाभाविकी, स्वाभाविकगतेरन्यगत्यनुविधानानुपपत्तरिति चेत्, न, प्रतिघातजनकत्वेन तस्य द्रव्यत्वसिद्धेः, न च तीव्रतरपवमानस्यैव प्रति- घातजनकत्वं न तु शब्दस्येति वाच्यम्, भर्यादिशब्दजनकपवनसदृशपवनान्तरेणापि बाधिर्याधुदयप्रसङ्गात्, अपि च श्रोत्रमपि नाकाशं बाधिर्याधभावग्रसङ्गात्किन्तु मूर्तमेवन्द्रियमिति न तस्य शब्दो गुणः ॥ किञ्च शब्दस्याकाशगुणत्वे सर्वस्य सर्वशब्दग्रह- णापत्तिः श्रोत्रसमवायाविशेषात, तत्पुरुषीयकर्णशष्कुल्यवच्छिन्नसमवायसम्बन्धावच्छिन्नाधारतायास्तत्पुरुषीयशब्दग्रहं प्रति हेतुत्व- कल्पने महागौरवात्, द्रव्यत्वे तु संयोगेनैव श्रोत्रेण ग्रहणोपपत्तौ न किञ्चिदनुपपन्नं, एवं च शब्दस्य द्रव्यत्वे समवायसमवेतसम- वायप्रत्यासत्यकल्पनया लाघवं द्रष्टव्यं, शब्दस्य मूर्तत्वे तत्साक्षात्कारो न स्याद्विषयतया मूर्तप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति समवाये- नोद्भूतरूपवश्वस्य हे तुत्वादिति चेत्, न, द्रव्यप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति योग्यताविशेषस्यैव हेतुत्वात्स चव्यावृत्तिविशेषः शक्तिविशेषो वेत्यन्यदेतत्, श्रोत्रेन्द्रियव्यवस्थापकत्वेन शब्दस्याम्बरगुणत्वसिद्धिरिति तु मन्दं, इन्द्रियान्तराग्राह्यग्राहकत्वस्यैव भिन्नन्द्रियत्वव्या- शगुणत्वस्य खण्डनश्च ABRASS5- RESS

॥मति. व्य
.
शब्दस्या-
सविवरण
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥३४॥
काशगुणत्व
खण्डने शब्दे
पौवालिकत्वा
NS
भावसाघक-
प्यत्वात्, तत्र गुणप्रवेशस्य गौरवकरत्वात्, एतेन श्रोत्रेन्द्रियं द्रव्याग्राहकं रूपस्पर्शाग्राहकवहिरिन्द्रियत्वाद् रसनवई' इत्यपि
निरस्तं, अप्रयोजकत्वाद् द्रव्यग्रहप्रयोजकात्यासत्याभिधानेन तद्विरहरूपविपक्षवाधकतर्कानुत्थानात् । इत्थं च शब्दो न पौद्ग-
लिकः स्पर्शशून्याश्रयत्वाद्, अतिनिविडप्रदेशप्रवेशनिर्गमयोरप्रतिघातात्, पूर्व पश्चाद्वा(चा)ऽवयवानुपलब्धेः, सूक्ष्ममूर्तान्तराप्रेरक-
त्वाद् , गेगनगुणत्वाचेति हेतवो निरस्ता वेदितव्याः, भाषावर्गणादेस्तदाश्रयस्य स्पर्शवत्वेन स्पर्शशुन्याश्रयत्वस्यासिद्धेः,भि-
न्यादिकमुपभिद्य प्रसर्पिणा मृगमदादिद्रव्येण द्वितीयस्याऽनैकान्तिकत्वात्, तृतीयचतुर्थयोधोकादिना धूमादिना च तथात्वात्,
पञ्चमासिद्धतायास्तु प्रदर्शितत्वात्, उच्छृखलनैयायिकास्तु " निमित्तपवनस्यैव गुणः शब्दः, अत एव निमित्तपवनना-
शात्तन्नाशः, समवायिकारणनाशस्य समवेतकार्यनाशं प्रति हेतुत्वात्, कर्णसंयुक्तनिमित्तपवनसमवायाच्च तद्ग्रहः, न च वीणा-
वेणुमृदङ्गादेरेव कुतो नायं गुण इति वाच्यं, तेषां अननुगतत्वात, निमित्तपवनस्यैवानुगतत्वेन समवायिकारणत्वौचित्यात, तेषां
निमित्तकारणत्वे क्लप्तेऽपि समवायिकारणत्वाकल्पनात्सम्बन्धभेदेन कारणताभेदाद्" इत्याहुः, तदसत्', पवनगुणत्वे शब्दस्य
तत्स्पर्शस्येव स्पार्शनप्रसङ्गात्, तस्य स्पार्शनप्रतिबन्धकत्वकल्पने च महागौरवात, शब्दगुणस्पार्शनजनकतावच्छेदकजात्यभावा-
न दोप इति चेत्, न, तादृशजातेरसिद्धः, गुणचाक्षुषजनकतावच्छेदिकया साङ्कर्यादिति दिग्॥अधिकं स्याद्वादरहस्येऽनुसन्धेयम् ॥
तस्माच्छोत्रघ्राणे अपि प्राप्यकारिणी इति व्यवस्थितम्।। आह च-"गण्हंति पत्तमत्थं, उवधायाणुग्गहोवलद्धीओ.वाहिज्जपूइणासा-
रिसादओ कहमसंबद्धे ॥२०८॥" [गृणीतः प्राप्तमर्थ उपघातानुग्रहोपलब्धेः ॥ वाधिर्यपूतिनासार्शादयः कथमसम्बद्धे]॥१५॥
तदेवं नयनमनोवर्जेन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वं व्यवस्थापितम् । अथ नयनमनसोरप्राप्यकारित्वस्य व्यवस्थापनीयतया मनो-
तूनामव्वा-
करणशब्दस्य
पवनगुणत्व-
खण्डनञ्च
॥३४॥

RECE मतिनिरूपों व्यञ्जनाव- ग्रहनिरूपणे वक्षुषोप्रा- प्यकारित्व- व्यवस्थाप- नम् ॥ दृष्टान्तेन तावचक्षुषोऽयाप्यकारित्वं व्यवस्थापयति- अपायकार्यधिष्ठाना-सम्बद्धग्राहि लोचनम् ॥ अनुग्रहापघाताभ्यां, विषयाद् भाव्यमन्यथा ॥१६॥७४।। चक्षुरप्राप्यकारि अधिष्ठानासम्बध्धार्थग्राहकेन्द्रियत्वाद्, मनोवद्, अधिष्ठानेत्यादिविशेषणेन स्पर्शनादाविन्द्रियपददानेन च प्रदीपप्रभायां व्यभिचारः परिहतः, न चाश्योजकल सम्बद्धार्थग्राहकत्वे तस्य करवालजलावलोकनादिनोपघातानुग्रहप्रसगात्, न चासिद्ध एव तस्योपघातानुग्रहाभावो भूयो भूयः सूरकरावलोकनेन जलावलोकनेन च दाहशैत्यलक्षणतदर्शनादिति वाच्यम्, अव- लोकनानन्तरं चक्षुर्देशं प्राप्तेन मूर्तेन रविकरादिनोपघातस्य सम्भवाजालावलोकनादौ चोपघाताभावेनानुग्रहाभिमानात् स्वतस्तद्देश प्राप्तेन च चन्द्रमरीचिनीलादिनाऽनुग्रहोऽपि भवत्येव, यदि च चक्षुः स्वत एवानुग्राहकोपघातकवस्तुनी संसृज्यानुग्रहोपघातौ लभेत तर्हि सूरकरावलोकनादिव करवालावलोकनादप्यभिघातः स्यात, तदिदमाह-"लोअणमपत्तविसय, मणोव्व जमणुग्गहाइसुनंति ॥ जलसूरालोआइसु, दीसन्ति अणुग्गहविघाया ॥२०९॥ डझेज पाविउं रवि-कराइणा फरिसणं व को दोसो ॥ मन्नेज अणुम्गहं पिवु-बघायाभावओ सोम्मं ॥२१०॥ गंतुं ण स्वदेसं, पासइ पत्तं सयं व णियमोयं ॥ पत्तेण उ मुत्तिमया, उबघायाणुग्णहा होज्जा ॥२११॥" [लोचनमप्राप्तविषयं, मन इव यदनुग्रहादिशून्यमिति ॥ जलसूरालोकादिषु दृश्येते अनुग्रहविधातौ ॥ दयेत प्राप्य रविकरादिना स्पर्शनमिव को दोपः ॥ मन्येतानुग्रहमिवोपघाताभावतः सौम्य!। गत्वा न रूपदेशं, पश्यति प्राप्त स्वयं चा नियमोयं ॥ प्राप्तेन तु मूर्तिमतोपघातानुग्रहौ भवेताम् ॥]॥१६॥ननु नयनान्नायना रश्मयो निर्गत्य प्राप्य च वस्तु रविरश्मय इव प्रकाशमादधति सूक्ष्मत्वेन तैजसत्वेन च तेषां वन्यादिभिर्दाहादयो न भविष्यन्तीति चेत्, न, चक्षुपस्तैजसत्वस्यैवासिद्धेः, तथाहि- T सविवरण भीज्ञाना- मेव- तिनिरूपणे व्यञ्जनावग्र- हनिरूपणे परकल्पितस्य चक्षुषस्तैज- त्वस्य ख- प्रकरणम् ॥ HOMEOPS45 अदृष्टकल्पनापत्ति-स्तैजसत्वे हि चक्षुषः॥ न च तत्साधकं किञ्चिद्-बलवन्मानमीक्ष्यते ॥ १७॥ ७५ ॥ चक्षुषस्तैजसत्वकल्पनेऽनुद्भूतरूपानुद्भूतस्पर्शतेजोन्तरं कल्पनीयमित्यदृष्टकल्पनापत्तिः परमते, न च तत्तैजसत्वसाधकं किञ्चिबलवत्प्रमाणमीक्षामहे, न च चक्षुस्तैजसं रूपादिषु मध्ये रूपस्यैवाभिव्यञ्जकत्वात्प्रदीपवदित्यनुमानात्तत्सिद्धिः, स्वस्पर्शव्य- अकत्वेन प्रदीपदृष्टान्तस्य साधनवैकल्याद्विषयेन्द्रियसंयोगेनानैकान्तिकत्वाद्, द्रव्यत्वे सतीति विशेषणेऽप्यञ्जनविशेषेणानकान्ति- "रूपसाक्षात्कारासाधारणकारण तैजसं रसाव्यञ्जकत्वे सति स्फटिकाद्यन्तरितप्रकाशकत्वात्प्रदीपवद्" इत्यपि निरस्तम् ।। अञ्जनादिभिन्नत्वे सतीति विशेषणदाने चाप्रयोजकत्वाचक्षुःप्रदीपयोरेकया जात्या व्यञ्जकत्वासिद्धेः। एतेन "स्वप्नादिकमिवाञ्जनादिकं सहकृत्य मनसैव साक्षात्कृते निध्यादौ चाक्षुषत्वभ्रम एवैत्युक्तावपि न क्षतिः॥ किं चैवंतवाञ्जनादेः पृथक्झमाणत्वापत्तिः, मनो यदसाधारणं सहकार्यासाद्य बहिर्गोचरांप्रमां जनयति तस्य प्रमाणान्तरत्वनियमात्, न च पटपटलाच्छन्नचक्षुषामञ्जनादिजनितो निध्यादिसाक्षात्कारो न प्रमेत्युक्तियुक्तिसहा, यथार्थप्रवृत्तिजनकत्वेन तत्प्रमात्वस्य व्यवस्थितत्वात्, न च कारणबाधादप्रमात्वं, तस्यै- चासिद्धेः,न च स्वप्नादिवदञ्जनादेनिध्यादिसूचकत्वमेवेति युक्तं व्याप्तिग्रहादिकं विनाऽनुमितिरूपतत्सूचनाऽसम्भवात्, स्वमादिस्थले तु व्याप्तिग्राहकस्वमशास्त्राद्यनुसरणनियमादिति दिग् । ननु चक्षुर्यदि न प्राप्यकारि तदाऽसन्निहितत्वाऽ[विशेषात्कुड्यादिव्यवहितस्यापि ग्रहणप्रसङ्ग इति चेत्, न, अतिसन्निहितस्य गोलकादेखि भित्त्यादिव्यवहितस्यापि योग्यताऽभावादेवाग्रहात् । नन्वग्रावच्छेदे- नैव चक्षुःसंयोगस्य ग्राहकत्वान्न मूलावच्छेदेन तत्संयुक्तगोलकादिग्रहप्रसङ्गः । कुड्यादिव्यवहितानां स्वरूपयोग्यता च स्थैर्यपक्षे न परावर्तते, क्षणिकत्वपक्षेऽप्यप्रत्यासन्नानां सहकारिणां नातिशयजनकत्वं, प्रत्यासत्तिश्च परेषां निरन्तरोत्पादः, अस्माकं तु संयो- SHURSSCRISARRORSANE ण्डनम् ॥ ॥ ३५॥ न मतिनिरू- पणे व्यअ- SEARCH नावग्रह- प्रस्तावे चक्षुषः प्रा- प्यकारित्व- गः,तदुभयमपि कृष्णसारस्यार्थेन न सम्भवतीति चेत्, न, शक्तिप्रत्यासत्त्यैवातिशयाधानाल्लोहाकर्षकायस्कान्तादावतिरिक्तप्रत्या- सत्त्यदर्शनात्सामीप्यविशेषस्य तत्र सम्बन्धत्व चात्रापि तेनैवोपपत्तेः। युक्तं चैतत्, संयोगादिनानाप्रत्यासत्यकल्पनलाघवात, न चवमप्राप्यकारित्वभङ्गा, चक्षुःसंयोगस्य चाक्षुषाजनकत्वेनैव तदुपपत्तेः । वस्तुतः सन्निहितविषयग्रहे व्यवधानाभावकूट एव विषयनिष्ठा योग्यता व्यवहितविषयग्रहे चाञ्जनादिनिष्ठैव शक्तिलक्षणा योग्यता हेतुः, विषयपुरुषादिभेदेन तद्वैचिच्यात । अत एवास्मदादीनामालोकापेक्षयैव विषयग्रहः पेचकादीनां तु न तथेत्युपपद्यते । इत्थं चाव्यवहितचाक्षुषसाक्षात्कारे चक्षुर्व्यवधाना- भावादीनां व्यवहितचाक्षुषे च चक्षुरञ्जनादीनां विलक्षणशक्तिमत्त्वेन हेतुत्वान्न किञ्चिदनुपपन्नम्,भित्त्यादेश्चक्षुःसंयोगप्रतिवन्धकत्वे तु स्फटिकादीनामपि तथात्वप्रसङ्गात्तद्व्यवहितानामप्यनुपलब्धिप्रसङ्गः । प्रसादस्वभाववतां स्फटिकादीनां न नायनरश्मिगति- प्रतिवन्धकत्वमिति चेत्, तर्हि भित्त्यादीनां चक्षुःप्राप्तिप्रतिबन्धकत्यापेक्षया लाघवाचाक्षुषप्रतिबन्धकत्वमेव कल्प्यताम् । स्वप्राची- स्थपुरुषसाक्षात्कारे स्वप्रतीचीवृत्तित्वसम्बन्धेन भित्त्यादीनां तत्त्वसम्भवात् । यदि च तत्तत्क्रियातत्तदुत्तरदेशादीनामेव संयोग- नियामकत्वेनानतिप्रसङ्गाद्भित्त्यादीनां न प्रतिबन्धकत्वमिति विभाव्यते तदा 'तद्धेतोः' (तद्धेतोरेव तदस्तु किं तेन) इति न्यायेन लाघवात्तत्तन्नयनोन्मीलनस्यैव तत्तच्चाक्षुषहेतुत्वमस्तु किमनन्तसंयोगादिकल्पनया, इन्द्रियसम्बन्धत्वेन प्रत्यक्षहेतुत्वकल्पनात्फल- मुखं गौरवं न दोषायेति चेत्, न, इन्द्रियसम्बन्धत्वस्यैकस्याभावेन तथाहेतुताया एवासिद्धेः । तथापि द्रव्यचाक्षुषत्वाद्यवच्छिन्नं प्रति चतुःसंयोगत्वादिना हेतुत्वमनुगतमेवातदुक्तं-मणिकृता 'प्रत्यक्षविक्षेषे इन्द्रियार्थसन्निकर्षविशेषो हेतुरनुगत एवेति' इति चेत्, न, परमाण्वाकाशादौ व्यभिचारात् । न च महत्त्वसमानाधिकरणोद्भूतरूपवत्त्वस्यापि सहकारित्वान्न दोष इति वाच्यम्, समा- स्य खण्ड- नम् ॥ -- --

मतिनिरू-
पणे व्यज-
सविवरणं
श्रीज्ञाना
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥ ३६॥
नावग्रह
प्रस्तावे
चक्षुषः प्रा-
प्यकारित्व-
स्य खण्ड-
SKILARISATSANESS
कलितसकलनेत्रगोलकस्य दूरासन्नतिमिररोगावयविन उपलम्भप्रसङ्गात्, आह च-"जइ पत्रं गेण्हेज उ, तग्गयमंजणरओमलाईयं ॥
पेच्छज्ज जंन पासइ, अपत्तकारि तओचक्टुं ॥ २१२ ॥” [यादे प्राप्तं गृह्णीयाचद्गतमञ्जनरजोमलादिकम् ॥ प्रेक्षेत यन्न पश्यति,
अप्राप्तकारि ततश्चक्षुः ॥] अत्यन्तासत्यभावस्यापि सहकारित्वे चाधिष्ठानसंयुक्ताजनशलाकाया अप्यप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात, अग्रा-
वच्छेदेन चक्षुःसंयोगस्य हेतुत्वेऽप्युदीची प्रति व्यापारितनेत्रस्य काञ्चनाचलोपलम्भप्रसङ्गात, दूरत्वेन नेत्रगतिप्रतिबन्धे च
शशधरस्याप्यनवलोकनप्रसङ्गात् । तदभीषुभिरिव तिग्मकराभाषुभिरपि तदभिवृद्धेश्चाविशेषात, तिग्मत्वेन तिग्मकररश्मीनां तत्प्रति-
घातकत्वे च तदालोकपरिकलितपदार्थमात्राभानप्रसंगादिति रत्नप्रभाचार्यप्रभृतयः(रत्नाकरावतारिकाद्वितीयपरि०
सूत्र ५) इन्द्रियसम्बन्धत्वेन प्रत्यक्षहेतुत्वेऽपि सामीप्यविशेषेण संयोगस्यान्यथासिद्धिरित्यपि युक्तमुत्पश्यामः ॥ प्राप्यकारित्वे
च चक्षुषः शाखाचन्द्रमसोर्युगपद्ग्रहानुपपत्तिः, युगपदुभयसंयोगाभावात् । न च शतपत्रशुविधव्यतिकरण तत्र यौगपद्याभिमा-
न एव क्रमेणैव वेगातिशयादुभयसंयोगेनोभयसाक्षात्कारजननादिति वाच्यम्,चन्द्रज्ञानानुव्यवसायसमये शाखाज्ञानस्य नष्टत्वेन शा-
खाचन्द्रौ साक्षात्करोमीत्यनुव्यवसायानुपपत्तेः, न चामिकतदुभयानुभवजानितसंस्काराभ्यां जनितायां समूहालम्बनस्मृताववानुभ-
वत्वारोपात तथानुव्यवसाय इति साम्प्रतम्, तादृगारोपादिकल्पनायां महागौरवात् । न च तिर्यग्भागावस्थितयोः शाखाचन्द्रमसो-
डुंगपत्संयोग इति साम्प्रतम्, सन्निहितव्यवहितयोर्युगपत्संयोगेऽतिप्रसङ्गात् । नयनान्निासरता नायनेन तेजसाऽर्थसंसर्गसमकाल-
मेव चाह्यालोकसहकारेणान्यचक्षुरारम्भाच्छाखाचन्द्रमसोर्युगपद्ग्रह इत्यपि तुच्छम्,उद्भूतरूपवत्तेजःसंसर्गेणानुद्भुतरूपवत्तेजस
आरम्भानभ्युपगमाद्वाह्यचक्षुषा पृष्ठावस्थितवस्तुग्रहप्रसङ्गाच्चेत्यधिकमत्कृतस्याद्वादरहस्यादवसेयम्(न्यायालोकादुध्धृतम्)
1SRISAR
नम् ॥
॥ ३६॥

मतिनिरूपणे व्यअनावम हप्रस्तावे मनसः प्रा- प्यकारित्व- स्य खण्ड- RECENSE नम्।। द्धृतम्)।किश्च मनोप्राप्यकार्यपि प्रतिनियतस्यैव ग्राहकम् ननु मनसोऽपि सर्वग्राहकत्वप्रसङ्गतो नाप्राप्यकारित्वं किन्तु प्रतिनियतग्रा- हित्वेन] तत्प्राप्यकारि स्यादितिचक्षुषोप्राप्यकारित्वसाधने दृष्टान्तीकृतस्य मनसःसाध्यसाधनोभयवैकल्यमिति चेत्, न, ज्ञेयसम्पर्क- कृतानुग्रहोपघातलक्षणलिङ्गाभावेन तस्य तत्सम्पर्कासिद्वेः,अन्यथा जलज्वलनादिचिन्तया तस्य क्लेददाहादिप्रसङ्गः, अमुकत्र गतं मे मन इति प्रयोगस्य च गत्यर्थानां धातूनां ज्ञानार्थत्वेनैतदर्थग्रहणाय व्यापृतं मे मन इत्यर्थः ॥ आह च-"गंतुं नेएण मणो, संव- ज्झइ जग्गओ व सिमिणे वा ॥ सिद्धमिदं लोअंमिवि, अमुगत्थगओ मणो मित्ति ॥२१॥"[गत्वा ज्ञेयेन मनः, सम्बध्यते जाग्रतो वा स्वमे वा ।। सिद्धमिदं लोकेऽपि अमुकत्रगतं मनो मे इति॥] "नाणुग्गहोवघाया-भावाओ लोअणं व, सो इहरा ॥ तोयजलणाइचिंतण- काले जुन्जेज दोहिंपि।।२१४॥"[नानुग्रहोपघाताभावाल्लोचनमिव तदितरथा॥ तोयज्वलनादिचिन्तनकाले युज्येत द्वाभ्यामपि]॥१७॥ किञ्च भावमनो द्रव्यमनो वा बहिर्गत्वा ज्ञेयेन सम्बध्यत इति विकल्प्य दोषमाह- किञ्च भावमनो गच्छेद-बहिर्द्रव्यमनोऽथवा ॥ नाद्यः शरीरवृत्तित्वा-दात्मनोऽनिर्गमाद् बहिः॥२५॥१८३॥ उक्तविकल्पद्वये हि प्रथमविकल्पो न प्रथते भावमनसश्चिन्ताज्ञानपरिणामरूपस्य जीवानन्यत्वाज्जीवस्य च शरीरमात्रवृत्तित्वेन तद्रूपादीनामिव बहिर्निर्गमासम्भवाद्,आहच-“दव्वं भावमणो वा, वएज्ज जीवो अहोइ भावमणो ॥ देहव्वावित्तगओ, न देहबाहिं तो जुत्तो।।२१५॥"[द्रव्यं भावमनोवा व्रजेज्जीवश्च भवति भावमनः॥देहव्यापित्लान्न देहबहिस्ततो युक्तः॥२५॥ नन्वात्मनः शरीरव्यापित्वमेवासिद्धं सर्वगतत्वादिति चेद्, उच्यते-[*प्रतावस्येह द्वे पत्रे समगाथाश्च गता इति लिखित्वापरावृत्तिश्च कृता] कर्तृत्वं व्योमवन्न स्यात्-सर्वगत्वे किलात्मनः ॥ प्रकृतेरेव कर्तृत्वं, युज्यते न कथञ्चन ॥ २६ ॥४॥ -

श्रीज्ञाना-
चव-
प्रकरणम्।
॥३७॥
आत्मनः सर्वगतत्वे ह्याकाशवत् कर्तृत्वभोस्तृत्वादिकं न स्यात्सर्वगतत्वस्याकर्तृत्वादिव्याप्तत्वाद्, आहच-"सवगओ त्ति य.
बुद्धी, कत्ताभावाइदोसओ तन्नो ॥२१६॥" [सर्वगत इति च बुद्धिःकर्बभावादिदोषतस्तन]। अत्र सांख्याः सगिरन्ते-कूटस्थ-
नित्यत्वश्रुतेरात्मा तावदकारणमकार्य च, कारणत्वेऽपि तस्यानित्यकार्यपरिणामित्वेनानित्यत्वप्रसङ्गाद्, अत एव जन्यधर्मानाश्रयत्वं
कूटस्थपदार्थो गीयते । तदुक्तं-"न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः" इति, आदिकारणं च प्रकृतिरेव।।तदुक्तं-"मूलप्रकृतिरविकृतिरिति"
अचेतनत्वेन चेयं परिणामिनी ततो महदहङ्कोरन्द्रियतन्मात्रमहाभूतानां सर्गः, न च पुरुषार्थप्रयोजकत्वात्प्रकृतिपरिणामस्य
तदनुगुणशब्दादिपरिणाम एवास्तु किमान्तरालिकमहदादितत्त्वेनेति वाच्यम्, तत्सर्गस्य विषयवन्धनार्थत्वात्, न च चितिरेव
विषयसम्बन्धस्वभावा, स्वभावस्यानुच्छेद्यत्वेनानिमोक्षप्रसङ्गात् । न च प्रकृतिरेव तदीयभोगोपकरणसम्पादनस्वभावा, नित्य-
त्वेन तस्याः कदाचिदप्यात्मनो निरुपाधिकत्वाभावेन तत एव, न च घटादिरेवाहत्य तदीयो, दृष्टादृष्टविभागानुपपत्तेः, नापीन्द्रि-
यप्रणालिकयैव चिद्विषयसम्बन्धः, व्यासङ्गायोगाद, नापीन्द्रियमनोद्वारा, स्वप्नदशायां वराहव्याघ्राद्यभिमानिनो नरस्यापि
नरत्वाभिमानानुदयात् , नह्ययं चाह्येन्द्रियवृत्यभावकृतो जाग्रदवस्थायामपि तस्य तनिरपेक्षत्वदर्शनात् , न च मनोविरहकृतः, तस्य
स्वप्नेऽपि व्यापारात्,तस्माद्यद्विरहकृतः स्वप्नेऽभिमानानुदयस्तदतीन्द्रियं तत्कारणमहङ्कारतत्त्वमवश्यमभ्युपेयमिति, न चाहङ्कार-
पर्यन्तव्यापारेणैव चिद्विषयसम्बन्धस्वभावः,सुषुप्त्यवस्थायां तद्व्यापारविरामेऽपि श्वासप्रश्वासप्रयत्नसन्तानावस्थानात, तद् यदेता-
स्ववस्थास्वनुवर्तमानमेकं सव्यापारमवतिष्ठते यदाश्रया चानुभववासना तबुद्धितत्त्वाख्यमन्तःकरणमिन्द्रियमनोऽहङ्कारपरम्परयो-
पारूढोऽर्थः पुरुषस्य भोगाय भवति ॥तदुक्तं-"एते प्रदीपकल्पाः, परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः॥ पुरुषस्यार्थ स्वच्छं, प्रकाश्य बुद्धौ
मतिनिरूपणे
व्यञ्जनावग्र-
हप्रस्तावे
मनसः प्रा-
प्यकारित्व-
खण्डने आ-
त्मनो विभु-
त्वखण्डने
सांख्यप्रश्नः॥
RECORRECOR
SHRESTEE
॥ ३७॥

प्रयच्छन्ति ॥३६॥"इति, तस्मिन्नचेतनेऽपि चेतनत्वाऽभिमानोऽकर्तरि च चेतने पुरुषत्वाभिमानो भेदाग्रहादेव शरीर आत्मत्वाभि- मानवत् । तदुक्तं-"तस्मात्तत्संयोगा-दचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ॥ गुणकर्तृत्वे च तथा, कर्तेव भवत्युदासीनः ॥२०॥" इति, कर्मवासनापि च चुद्धितत्व एव, पुरुषस्त्वनुभवतद्वासनातत्फलैः कर्मतद्वासनातत्फलैश्च निर्लेप एव, आलोचनमिन्द्रियाणां व्यापारी विकल्पस्तु मनसः, अभिमानोऽहकारस्य, 'ममेदं कर्तव्यम्' इति कृत्यध्यवसायश्च बुद्धः, अत्र हि पुरुषोपरागो विषयोपरागो व्यापारा- वेशश्चेतित्रयोंशाः, तत्र ममेति पुरुषोपरागो दर्पणस्येव मुखोपरागो भेदाग्रहादतात्विको, यद्यपि ममेत्यभिमानो न बुद्धधर्मस्तथापीदमा प्रतिनिर्दिष्टस्य विषयस्य ममेत्यत्र पुरुषस्यैव ग्राहकत्वेनाभिमानः पुरुषोपराग एव, इन्द्रियप्रणालिकोपनीतपरिणतिभेद इदमिति विषयोपरागः, मुखनिश्वासोपहतस्य मुकुरस्य मलिनिमोपराग इव पारमार्थिका, एतदुभयोपपत्तौ च कर्त्तव्यमिति व्यापारावेशोऽपि, अस्यायं बुद्धौ विषयोपरागो ज्ञानं, दर्पणप्रतिविम्बितमुखस्य तद्गतमलिम्नैव पुरुषोपरागस्य विषयोपरागेण सह सम्बन्ध उपल- ब्धिरिति, बुद्ध्युपलब्धिज्ञानानां नानन्तरत्वं, तदेवमष्टावपि धर्मा बुद्धेरेव सामानाधिकरण्येनाध्यवसीयमानत्वात्, न च बुद्धिरेव स्वभावतश्चेतना परिणामित्वाद्, उक्तश्च-अध्यवसायो बुद्धि-धर्मो ज्ञान, विराग ऐश्वर्यम् ॥ सात्त्विकमेतद्रूपं,तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥२३॥ इति बुद्धयादयो नैयायिकाभिमता आत्मविशेषगुणा अप्यत्रैवान्तर्भवन्ति, अव्यक्तस्यैव ज्ञानस्य स्मृतिजनकत्वाभ्युपगमेन- केवलं वासनाया एवानभ्युपगमात,एवं आत्मा न कर्तेत्यभिमतमेवास्माकमिति चेत्॥ तदेतदखिलं पवनप्रेरिततूलवत्तरलतरमेव।। कृति- चैतन्ययोः सामानाधिकरण्यानुभवेन चेतनस्यैव कर्तृत्वाव, न चायं भ्रमो, बाधकाभावात,न चाऽऽत्मनः कर्तृत्वे परिणामित्वप्रसङगो बाधकः, बुद्धेः कृतिसमवायेऽपि तस्य बाधकत्वात् परिणामिनो घटादेरकर्तृत्वस्य दृष्टत्वाद् दृष्टविरोधादयमदोष इति तु तुल्यं, कर्तु- मतिनिरू- पणे व्यञ्ज- नावग्रह- प्रस्तावे आत्मविभु- त्वखण्डने सांख्यमत- स्योपवर्ण- नपूर्वकं खण्डनम्॥ CHUNCHES * मतिनिरू- पणे व्य- नावग्रह- सविवरणं भीज्ञाना- णेव- प्रकरणम्॥ ॥ ३८॥ प्रस्तावे रचेतनकार्यत्वादचेतनत्वापत्तिर्वाधिकेति चेत्, न, 'वीतरागजन्मादर्शनाद्' इति न्यायेन तस्यानादित्वस्यैव सिद्धः, बुद्धेरनित्यत्वेन तत्र नानाभवार्जितवासनावस्थानायोगात्प्रकृतेश्च पूर्वबुद्धिवासनानुवृत्त्यभ्युपगमेऽपसिद्धान्ताद् बुद्धिनिष्ठवासनाया अनियामकत्वाच, न च सम्बन्धविशेषान्नियमोपपत्तिः, स्थूलरागे सूक्ष्मवासनाया अप्रयोजकत्वात्, न च प्रकृतौ सूक्ष्मतदम्युपगमेऽपि प्रमाणमस्ति, अन्यथा सूक्ष्मरागादियोगाद् भावाष्टकसम्पन्नतया प्रकृतिरेव बुद्धिर्भवेत, स्थूलतद्योग एव बुद्धिवनियत इति चेत्, तथाप्पप्रामाणिक- सूक्ष्मतदभ्युपगमे घटादावपि तदापत्तिः, तस्य प्रकृतिकार्यत्वात्कारणधर्माणां च कार्ये सक्रमाभ्युपगमात् स्थूलबुद्धिविलयेऽपि सूक्ष्मतत्सचाभ्युपगमानानुपपत्तिरिति चेत्, न, मुक्तावपि तत्सवप्रसङ्गात्, आधिकाराभावान्नायामिति चेत्, नन्वयमधिकारोऽपि धर्माधर्मवासनायोगः, धर्माधर्मों च बुद्धिधर्माविति कथं तत्सचे तद्विलयः, स्थूलताद्विलय एव निरधिकारित्वमिति चेत्,तर्हि स्थूल- बुद्धथनुत्पादसमये सूक्ष्मबुद्धिसत्त्वाभ्युपगमेऽपि तस्या निरधिकारित्वेन कार्याजनकतया संसारोच्छेदप्रसङ्गः, अन्यथा तु मोक्षो- च्छेदप्रसङ्गः । किञ्चैत्रमधिकार एव संसारहेतुरस्तु किं प्रकृत्या,बुद्धिस्तु चेतनैव न तत्वान्तरं, मानाभावात, न च दर्पणे मुखस्येव बुद्धौ पुरुषस्योपरागः सम्भवति,अतालिकस्य सम्भवे शशशृङ्गस्यापि सम्भवप्रसङ्गात्, असतो विज्ञानस्याप्यभावात्तवैज्ञानिका- कारस्यापि दुरुपपादत्वाद्,अन्यथा सर्वदेवासद्भावानापत्तेः,विषयोपरागोऽपि न तत्र सम्भवी,अन्यथा मेवादिज्ञाने मेाद्याकारोऽपि तत्र स्यात्, तस्माद् बुद्ध्युपलब्धिज्ञानशब्दानां पर्यायत्वमेव युक्तं,अहङ्कारोऽपि विकल्परूपो मानस एव व्यापारोऽन्यथा स्वमे यथार्था- हङ्कार इब विपरीताहङ्कारोऽपि न स्याद्, इदं पुनरवशिष्यते यत्कस्यचिदहमिति सङ्कल्पात्स्त्रगुणाभिष्वमपरगुगद्राहेपारणाम: समुज्जृम्भते कस्यचित्तु नेत्यत्र किं नियामकमिति,तत्र तु मानं मोहनीयकर्मण उद्याऽनुदयेएव तन्त्रे,एकस्यापि कषायमोहनीय- आत्मविमु. त्वखण्डने सांख्यमतस्य खण्डनम्।

१ RAKECRENESH कर्मणः क्रोधादिव्यापारभेददर्शनेन भेदकल्पनात्, एवं च कृत्यादीनां चेतनासामानाधिकरण्ये सिद्ध बुद्धयादितत्वकल्पना युक्तिही- नैवेति सङ्क्षपः ॥स्यादेतद्, आत्मनो जन्यधर्माश्रयते कौटस्थ्यविरोधो धर्मधर्मिणारभेदे कार्यानित्यत्वेन कारणस्याप्यानित्यत्वप्र- सगात्, न च तयोरभेद एव युक्तो विरुद्वधर्माध्यासलक्षणस्य भेदस्य घटपटयोरिव प्रत्यक्षसिद्धत्वादिति वाच्यं, श्यामत्वर- तत्वाभ्यां वैधयेऽपि घटस्येव गुणगुणिमावेन गुणगुणिनोरन्योन्याभावायोगादिति, मैवं, आत्मनो नित्यानित्यत्वस्यैव युक्तिसिद्धत्वाद् धर्मधर्मिणार्भेदाभेदस्य सप्रपञ्चं स्याद्वादरहस्ये व्यवस्थापितत्वात्, कूटस्थत्वं तु तत्र समानजातीयद्रव्यपर्या- यद्वाराऽपरिणामित्वं अना(आ)त्मेतरमिन्नत्वं वेति सर्वमत्रदातम् ॥ २६ ॥ सर्वगतत्वे दूषणान्तरमप्याह- सासर्वग्रहोऽप्येवं, नित्यस्यान्यानपेक्षणात् ।। अपेक्षणेऽपि देहस्या-पेक्षायामतिगौरवात् ॥२७॥ ॥८॥ आत्मनः सर्वगतत्वे त्रिभुवनभानादरसञ्चारिपदार्थसार्थप्राप्त्यवश्यम्भावात् मनसः प्राप्यकारित्ववादिनः सर्वोपलब्धिप्रसङ्गः, प्राप्त्यविशेषेपि कतिपयार्थानुपलम्भे चाविशेषात्सर्वानुपलम्भप्रसङ्गः, यदुक्तं-"सव्वासबग्गहण-प्पसंगहोसाइओ वावि ॥२१६॥ [सर्वासर्वग्रहणप्रसङ्गदोपादितो वाऽपि] अथ मनसो बहिरस्वातन्त्र्याद् बहिरर्थग्रहसामग्रीनियमादेव मनसो बहिरर्थग्रह- नियम इति चेत्, तथापि शरीरावच्छेदेनैव सुखादिकमुपलभ्यते न घटाद्यपच्छेदेनेत्यत्र किं नियामकं, आत्मनः स्वगुणजनने शरीरस्यापि सहकारित्वान्नान्यत्र तदुत्पचिरिति चेत्,न,नित्यस्य सहकार्यपेक्षायोगात्, तयाहि, सहकारिणा किं तत्र कश्चिदतिशयः क्रियते न वा, क्रियते चेत्, स किं अर्थान्तरभूतोऽनर्थान्तरभूतो वा, आधे न किञ्चित् कृतं स्यात्, अन्त्ये तु तदनन्तरभूताति- शयकरणे तस्यापि करणप्रसङ्गः । अकरणपक्षे तु न तस्य सहकारित्वम्, अन्यथा जगतोऽपि सहकारित्वप्रसङ्गादित्याहु, ननु सह- मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव- ग्रहप्रस्तावे मनसःपा- प्यकारित्व- खण्डने आ- त्मविभुत्वस्थ खण्डनम् ।। . RU 1 सविवरण श्रीज्ञाना- व- प्रकरणम् ।। ॥ ३९॥ - मतिनिरूपणे व्यअनाव- ग्रहप्रस्तावे मनसः प्रा. प्यकारित्व. खण्डने आ- त्मविभुत्वस्य खण्डनम् ॥ कारित्वं नातिशयजनकत्वं कार्यजन्माजन्मनोः सहकारिसभिधानासनिधानाभ्यामेवोपपत्तावतिशयस्याकल्पनात्, किं त्वेककार्य- कारित्वं, तच्च नित्यत्वेऽप्यात्मनः शरीरे निरावाधमिति चेत्, न, तथापि ज्ञानादावनन्तशरीरादिहेतुत्वकल्पने गौरवात्, आत्मनः शरीरव्यापित्वकल्पनस्यैव युक्तत्वात् ॥२७॥ न चाऽऽत्मनो विभुत्वसाधनसावधानं बलवत्प्रमाणमपि जरीजृम्मत इत्याह-- विभुत्वसाधकं किञ्चित्, प्रमाणमपि नेक्ष्यते ॥ स्वसम्बन्धविशेषेणा-दृष्टं यत्कार्यमर्जति ॥ २८ ॥ ८६ ॥ न ह्यदृष्टस्य कार्यमानं प्रति हेतुत्वात्तस्य च स्वाश्रयसयुक्तसंयोगेनैव हेतुत्वकल्पनादात्मनो विभुत्वसिद्धिः, अध्वंसे व्यभि- चारात् कालिकादिसम्बन्धेनैव तस्य तत्र हेतुत्वौचित्याद्, वस्तुतस्तु कार्यत्वं कालिकसम्बन्धेन घटत्वपटत्वादित्त्ववमननुगतमिति न कार्यतावच्छेदकं, न च कार्यमात्रहेतुत्वे तस्य प्रमाणमस्तीति सुखदुःखयोरेव धर्माधर्मरूपस्यादृष्टस्य हेतुत्वमास्थेयम्, अथ वनेरूद्मज्वलनादावदृष्टमवे नियामकम् । तदुक्तम्। “न ज्वलत्यनलस्तिर्यग्, यदूर्ध्व वाति नाऽनिलः ॥ अचिन्त्यमहिमा तत्र, धर्म एव निबन्धनम् ॥१॥" न च शरीरच्यापित्वे प्राणिनोऽदृष्टस्य वन्यादिसग्बन्धः सम्भवतीति तस्य विभुत्वमेव युक्तमिति चेत्, न, स्वाश्रयसंयुक्तसंयोगसम्बन्धनादृष्टस्य घटादावपि सत्त्वाद् , वशित्वविशिष्ट स्वाश्रयसंयुक्त सयोगसम्बन्धेन तस्य हेतुत्वे तु स्वाश्रयसंयुक्त संयोगविशिष्टवसित्वसम्बन्धेन तथात्वे विनिगमनाविरहात्सम्बन्धविशेषेणैव तद्वैतुत्वौचित्यात, एतेन (यदपि) शत्रुजिघांसया कृतेन श्येनयोगेन यज्वन्येवादृष्टविधानात्तस्य च शत्रावसम्बन्धात्कथमात्मविभुत्वं विना तत्फलोपपत्तिः (तदपि न, शक्तिविशेषरूपस्य कारणत्वस्यासम्बन्धेऽप्यविरोधात्सम्बन्धघटितत्वे घा- तस्य प्रकृते सम्बन्धविशेषकल्पनावश्यकत्वाद्) इति" परास्तम् ॥ २८॥ विभुत्वसाधकान्तरं निराकरोति- HORRORE 544 HER PHERI ॥ ३९ ॥ - CGSORRORESPECASE अथ नित्यमहत्त्वेन, व्योमवद्विभुतास्य चेत् ।। नैवं तत्परिमाणं हि, यदुत्कर्षापकर्षभाक् ॥ २९ ॥ ८७॥ अथ परे प्रतिपादयेयुरात्मनो महत्वं तावनिर्विवादं द्रव्यचाक्षुषप्रति कल्पनीयहेतुभावस्य महत्त्वस्य लाघवेनजन्यद्रव्यसाक्षा- स्कारत्वावच्छिन्नं प्रत्येव हेतुत्वकल्पनात्, आत्मसाक्षात्कारीनाहायात्मनि महत्त्वस्यावश्यकत्वात्, तच्च महत्त्वं न जन्यं, कार्य हि महत्त्वं अवयवबहुत्वजन्यं स्यात्तन्महत्त्वजन्यं वा प्रचयजन्यं वा, न च त्रितयमपि निरवयवस्यात्मनः सम्भवतीति ।। एवं चायं प्रयोगः, आत्मा विभुनित्यमहत्त्वादाकाशवदिति चेत्, अनोच्यते-अत्र हि परमप्रकृष्टपरिमाणवत्त्वलक्षणं विभुत्वं साध्यते, न च नित्य- महत्त्वस्य परमप्रकर्षविपक्षबाधको जागर्ति तर्की, अपकृष्टत्वे तस्य जन्यत्वापत्तिर्वाधिका, गगनमहत्त्वावधिकापकर्षस्य बहुत्वजन्य- तावच्छेदकत्वादिति चेत्, न, परमाणुपरिणामसाधारणतया तस्य कार्यतानवच्छेदकत्वात् परमाणुपरिमाणे व्यभिचारेण त्रुटिमहत्त्वा- वधिकोत्कर्षेण समं सात्तिादृशापकर्षस्य जातित्वासिद्धथा बहुत्वजन्यतानवच्छेदकत्वाच्च, वस्तुत आत्मपरिमाणमपि प्रचयविशेषा- दुत्कर्षापको भजज्जन्यमेवेति हेतोरेवासिद्धिः ॥२९॥ नन्वेवमात्मनः सावयवत्वापत्तिरिति चेत्, किन्चातः। सावयवत्वे सति तस्य कार्यत्वं स्यादिति चेत्, किमिदं कार्यत्वं प्रागसतः सत्तालाभः पूर्वाकारपरित्यागेनोत्तराकारोपादानं वा, नाद्यः, असत उपायसहस्र- णाप्युत्पादीयतुमशक्यत्वात्, अन्यथा शशविषाणस्याप्युत्पत्तिप्रसङ्गात्, अन्त्ये तु तादृशं कार्यत्वमात्मन इष्टमेवेत्यभिप्रेत्याह- एवं सावयवत्वं त-न्नित्यत्वं नैव बाधते ॥ कथञ्चित्परिणामित्वं, विना तन्न घटेत यत् ॥ ३० ॥८॥ न हि सावयवत्वेनात्मनः कथञ्चित्परिणामित्वलक्षणेऽनित्यत्वे द्रव्यैकरूप्यलक्षणनित्यत्वव्याघातः येन प्रतिसन्धानाधभा- वप्रसङ्गः,नच सावयवत्वे तस्य प्राश्रीसद्धसमानजातीयावयवारम्यत्वप्रसक्तिः, अवयवजन्य एव कार्येऽवयवानां जनकत्वात्, अस्य मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव- ग्रहप्रस्तावे मनसः प्रा- प्यकारित्व- खण्डने त्मविभुत्वस्य खण्डनम् ॥ 1%

मतिनिरूपणे
सविवरणं
श्रीज्ञाना
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥४०॥
त्वतथात्वात्, न च तादृशकार्येऽपि घटादौ प्राक्प्रसिद्धसमानजातयिकपालसंयोगारभ्यत्वं दृष्टं, कुम्भकारादिव्यापारान्वितान्मृत्पि-
ण्डात्प्रथममेव पृथुबुध्नोदराद्याकारस्योत्पत्तिप्रतीतेरित्यप्याहुः ॥३०॥ प्रमाणसिद्धेऽर्थे न किञ्चिदन्यद्भाधकमित्यन्यत्रातिदिशति-
मूतत्वादिप्रसङ्गोऽपि, वारणीयोऽनया दिशा ॥ मानराजादरे दुष्टा, हन्तापत्तिर्न पत्तिवत् ॥३१॥८९॥
एवञ्च मूर्तशरीरानुप्रवेशेनात्मनो मूर्तत्वापचिरपि परास्ता, यतः किमिदं मूर्तत्वं इयत्तावच्छिन्नपरिमाणयोगो रूपादिसन्निवेशो
वा, आये इष्टापत्तिः, न ह्यविभुद्रव्यस्य मूर्तत्वं न मन्यते कश्चिद्विपश्चित्, नान्त्यो मूर्तीनुप्रवेशिनो रूपादिमचव्याप्तिविरहान्मनस्येव
व्यभिचारात्,न च मूर्तमहत्येनापि तद्व्याप्तिरस्ति,अप्रयोजकत्वाद्,एवमात्मनो मूर्तद्रव्यत्वेऽचेतनत्वापत्तिरपि परास्ता, सहचारदर्शन-
मात्रेण व्याप्त्यग्रहाद्, अन्यथा विभुत्वेऽप्याकाशादिवत्तथात्वं स्यात्,एवं चबालयुवशरीरपरिमाणभेदेनात्मनो भेदापत्तिः परिमाणभेदे
द्रव्यभेदावश्यम्भावात्, तथाचान्यदृष्टस्यान्यस्य स्मरणानुपपत्तिरित्यधरीकृतं, कथञ्चिद्भेदेऽपि तस्याभेदाभ्युपगमात्सर्पस्येव सफण-
विफणावस्थयोः,अत्यन्तभेदे तु प्रत्यभिज्ञाद्यनुपपचिरित्यन्यत्र विस्तर तथा शरीरखण्डने शरीरव्यापिनो जन्तोरपि खण्डनप्रसङ्ग
इत्यप्यसमीक्षिताभिधानं,शरीरखण्डने कथञ्चित् तत्खण्डनस्येष्टत्वाच्छररिसम्बद्धात्मप्रदेशेभ्यो हि कतिपयात्मप्रदेशानां खण्डितशरीर-
प्रदेशानुप्रवेश आत्मनः खण्डनं, तचात्र विद्यत एव, अन्यथा खण्डितशरीरप्रदेशस्य कम्पोपलब्धिन स्यात्,नह्यात्मविभुत्ववादेपि शरीर
तदवयवं विना वाऽन्यत्रात्मगुणोपलब्धिः,न चखण्डितशरीरप्रदेशोऽपि शरीरमेव,अथ पूर्वावयवसंयोगाविशेषेऽपि संयोगान्तरेणाऽदृष्ट-
वशात् खण्डशरीरद्वयोत्पत्तेर्न दोष इति चेत्, न, एकदा शरीरद्वयोत्पत्तेविरोधादविरोधे वैकदोभयत्र मनःसंयोगविरहात् कथञ्चैक-
दैव तयोः कम्पोपलन्धिः, अदृष्टवश्चात् खण्डितशरीरे मनोन्तरप्रवेशाभ्युपगमात्र दोष इति चेत्, न, तथाप्यात्माविशेषगुणयोग-
व्यञ्जना-
ग्रहप्रस्तावे
मनसः प्रा-
प्यकारित्वस्य
खण्डने आ-
त्मविभुत्वस्य
खण्डनम् ।
CHEESE
॥४०॥

मतिनिरूप- णे व्यञ्जना- वग्रहप्रस्तावे मनसःप्राथ्य- कारित्वख- ण्डने आत्म- पद्यानभ्युपगमसिद्धान्तविरोधात्, अवच्छेदकभेदेन विभुविशेषगुणानामपि युगपदुत्पत्तिरिष्टैव, शब्दस्थले दृष्टत्वादिति चेत्, न,तथापि मुहूतानन्तरमपि छिन्नगोधाशरीरे कम्पोपलब्धिप्रसङ्गात्, तदानीं ततो मनोविगमः कल्प्यत इति चेत्, न, एतादृशकष्टकल्प- नापेक्षया तत्रात्मप्रदेशानुप्रवेशोऽदृष्टवशाच कालान्तरे तत्सट्टनमिति कल्पनाया एव युक्तत्वादिति दिग् ॥ एवमदृष्टवदात्मस- योग विना परमाणुष्वाद्यकर्मानुपपत्तावन्त्यसंयोगं विना तन्निमित्तशरीरानुत्पत्तौ शरीरव्यापित्ववादे सर्वेषामनायाससिद्धो मोक्षः स्यादित्यप्युन्मत्तभापितप्रायं, विभुत्ववादेऽपि सकलपरमाणुग्रहणाभावस्यादृष्टस्वभावाधीनत्वेन शरीरव्यापित्ववादेऽप्यसम्बद्धानाम- पि परमाणूनां स्वभावत एव नियतानां ग्रहणानियतशरीरोत्पत्तेराविरुद्धत्वात्, तदेवमसमुद्धतस्यात्मनः शरीर एव वृत्तिः, समुद्घातमहिम्ना तु बहिरपीति सुव्यवस्थितम्, ॥३१॥ विभुत्वनये तु महतीयमनुपपत्तिरित्याह विभुत्वे पुनरात्मा स्या-देक एवान्तरिक्षवत् ॥ उपपत्तेर्व्यवस्थाया, विविधोपाधिभेदतः ॥ ३२॥१०॥ आत्मनो विभुत्ववादे ह्येकात्मपरिशेषापत्तिरेकत्रैव नानात्मकार्योपपत्ते, एकत्र व्योम्न नानाघटसंयोगवदेकत्रैवात्मनि नानामन:- शरीरेन्द्रियसंयोगानामेकाकाशसमवेतनानाशब्दवचकात्मसमवेतनानासुखदुःखादीनां युगपदुत्पत्तिसम्भवात्, अथावच्छेदकतास- म्बन्धेन शब्दोत्पत्तौ संयोगादिरूपस्यासमवायिकारणस्य नियामकत्वादेकत्रापि व्योम्नि देशभेदेन नानाशब्दोत्पात्तयुज्यतामत्र तु कथामिति चेत्,न, अत्राप्यवच्छेदकतासम्बन्धेनात्मविशेषगुणत्वावच्छिन्नं प्रति प्राणशरीरसंयोगादेरसमवायिकारणस्य नियाम- कत्वात् सुषुप्तिकाले ज्ञानानुत्पत्तिनिर्वाहाय च त्वङ्मनोयोगस्य शरीरनिष्ठतथा हेतुता वाच्या, त्वयाप्यात्मनिष्ठतया तद्धेतुताकल्प- नात्,एवं च परामर्शादीनामपि शरीरनिष्ठतयैवानुमित्यादिहेतुत्वान्न चैत्रशरीरावच्छेदेन परामर्शान्मैत्रशरीरावच्छेदेनानुमित्याद्या- विभुत्वस्य खण्डनम् ।। M 191964 RSS

सविवरण
माझाना-
पव-
प्रकरणम्॥
॥११॥
पत्तिः, वस्तुतश्चत्रपरामर्शसमवायिनि मैत्रे न चैत्रशरीरावच्छिन्नानुमित्यापत्तिः, कार्यतानवच्छेदकरूपणापत्यभावात, न च
तवैकैकात्मस्थलेऽनन्तशरीराणां तत्त्वतत्वेन तत्तदात्मगुणं प्रति हेतुता वाच्या, मम तु समवायेन तदात्मसमवेतगुणत्वावच्छिन्नं
प्रति तादात्म्यसम्बन्धेन तदात्मत्वनावच्छेदकतया तं प्रति च तदात्मशरीरत्वेन हेतुताद्वयं युक्तमेच कल्पनीयं, अथ तदात्मीयत्वं न
तदात्मसंयोगोऽतिप्रसङ्गारिकन्तु तदात्मादृष्टोपगृहीतत्वं तच्चाननुगतमेचेति तवापि नानैव हेतुत्वमिति चेत्, न, स्वसमवेतादृष्टोप-
गृहीतत्वसम्बन्धेन तदात्मव्यक्ति बच्छरीरत्वेनानुगतस्यैव हेतुत्वादिति वाच्यं, शब्दादौ तच्छरीरावच्छिन्नं प्रति तच्छरित्वेन हेतुतया
क्लप्तयैव निर्वाहाद्धतुत्वान्तराकल्पनया ममैव लाघवात, अथवाऽवच्छेदकतया कार्योत्पत्तावपि प्रागभाव एव नियामक इति न किञ्चि-
दनुपपन्नम्, अथादृष्टफलयोः प्रतिनियमदर्शनान्नानात्मानो व्यवस्थाप्यन्तेऽन्यशरीरजनितस्यादृष्टस्यान्यशरीरावच्छेदेन फलजनक-
त्वेऽतिप्रसङ्गाभियामकान्तरस्य चादर्शनादिति चेत्, न, तच्छरीरजनिताऽदृष्टस्य तजन्यशरीरावच्छेदेन फलजनकत्वेऽतिप्रसङ्गाभा-
वात, एवं च जननमरणादिनियमोऽप्युपपादित इति दिग् ॥ नन्विदं भवतामपि समं दूषणं शरीरव्यापिनानात्मकल्पनापेक्षया
विभोरेकस्यैवात्मनाकल्पनौचित्यात,सिद्धान्तविरोधस्त्वावयो।समान एव,एकात्मवादे मोक्षार्थितया कस्यापि प्रवृत्तिर्न स्यात्किञ्चिच्छ-
रीरावच्छेदेन सकलदुःखध्वंसलक्षणस्य मोक्षस्य सिद्धत्वात्सिद्धे इच्छाविरहात, तच्छरीरावच्छेदेन दुःखध्वंसे तु नेच्छा, सर्व दुःखं
नश्यत्विति कामनयैव परिव्रज्यादौ प्रवृत्तरिति समाधानमप्यावयो समानमिति चेत,न, सिद्धिपदप्राप्तीच्छयैव तदुपायेषु प्रवृत्तेः,
प्रत्यभावीदव्यवस्थया च नानात्मनां भेदस्याविभुत्वस्य च सिद्धयोभयनिरासे तात्पर्यात्, नहि दुःखध्वंसार्था पुरुषाणां प्रवृत्तिरपि
तु सुखाथैवेति सर्वमवदातम् । तदेवं भावमनो बहिर्गत्वा वस्तुप्रकाशयेदिति विकल्पो निरस्तः ॥३२॥
मतिनिरू-
पणे व्यञ्चना.
वग्रहप्रस्तावे
मनसःप्राप्य-
कारित्वस्य
खण्डने
आत्म विभु.
त्वस्य ख.
ण्डन, तत्रै.
कात्मवादा-
पत्तिश्च ॥
॥४१॥

मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव- ग्रहप्रस्तावे मनसःप्राप्य. कारित्वस्य खण्डनम् ॥ अथ द्रव्यमनो बहिर्गत्वा प्रकाशयिष्यतीति द्वितीयविकल्पं निराकरोति- बहिर्द्रव्यमनो गच्छे-त्किं यद्धीहेतुरेव न ॥ निमित्तमपि नो तस्या-करणं वा बहिर्गतम् ॥३२॥११॥ काययोगसाचिव्येन जीवगृहीतचिन्ताप्रवर्तकमनोवर्गणान्तःपातिद्रव्यनिकुरुम्बलक्षणं द्रव्यमनःपुद्गलस्कन्धत्वादात्मधर्म- स्य ज्ञानस्य जनकमेव न भवति कथश्चित, अत एव हेतुहेतुमद्भावारिक तद्वहिनिगमचिन्तयाजागलस्तनायमानया । अथ तवापि चक्षुरादिनेव प्रेरितो जन्तुज्ञानं जनयतीति प्रदीपवत्तत्करणं स्यादिति चेत्, तथापि स्थितेनैव तेन ज्ञानं जननीयं स्पर्शनादि- वत्करणत्वादेव च तन्न बहिरेति स्पर्शनादिवदिति सुव्यवतिष्ठते, एवं च शरीरस्थितस्यापि तस्य पमनालतन्तुन्यायेन बहिनिःसरणं भविष्यतीति शङ्का परास्ता । आह च-" दव्वमणो विन्नाया, ण होइ गंतुं वि किं तओ कुणइ।। अह करणभावओ तस्स, तेण जीवो विआणिजा ॥२१७॥" [ द्रव्यमनो विज्ञाव, न भवति गत्वा च किं ततः करोतु ॥ अथ करणभावतस्तस्य, तेन जीवोऽपि विजानीयात् ॥] "करणतणओ तणुसंठिएण, जाणेज फरिसणेणं व ॥ एत्तोच्चिय हेऊओ, न नीइ बाहिं फरिसणं व ॥२१८॥" [करणत्वतस्तनुसंस्थितेन, जानीयात्स्पर्शनेनेव ॥इत एव हेतोर्न निर्गच्छति बहिःस्पर्शनमिव ॥२१८॥]॥३३॥ नन्वनुग्रहोपघाताभा. वान्मनोऽप्राप्यकारीति प्राप्रतिज्ञातं स एव चाऽसिद्धचिन्ताहर्षादिना तदुपघातानुग्रहानुमानादितिभ्रान्तस्याशङ्कां निराचिकीर्षुराह- चिन्ताहर्षादिना जीवो-पघातानुग्रही यदि ॥ किं ताभ्यां ज्ञेयसंसर्गा-न ह्येती मनसो यतः॥३४॥९२॥ परः खल्वेवमनुमन्यते यद्दविल्योरःक्षतादिलिङ्गैर्मनसः शरीरापचयप्रयोजक आत्त द्राभिवृद्धिमहिम्ना च हृद्रोगादिप्रयोजक उपधातो रोमाञ्चेादयाद्यनुमेयो हर्षादिरूपश्चानुग्रहो भवतीति तस्य तदभावाभिधानमसङ्गतमिति । यदाह-"नजइ उवधाओ से, AR RESEAR 1965 ,

मतिनिरू-
सनिकरणं
पणे व्याज-
मीज्ञाना-
ॐALKAR
गेव-
प्रकरणम्॥
।॥ ४२ ॥
नावग्रह-
प्रस्तावे मन-
स. पाप्य-
कारित्वस्य
खण्डनम् ।
RECERCREAK
दोब्बलोरक्खयाइलिंगेहि।।जमणुग्गहो य हरिसा-इएह तो सो उभयधम्मो, ॥२१९॥" [ज्ञायते उपघातस्तस्य दौर्बल्योरक्षतादि-
लिङ्गैः॥ यदनुग्रहय हर्षादि-भिस्ततः स उभयधर्मा तदसतं, यतो द्रव्यमनस्तावन्मनस्त्वपारणतानि पुद्गलसयातरूपं शोका-
दिपीडया हृदयदेशाश्रितनिविडमरुद्ग्रन्थिवज्जीव पीडयेत् तदेव चमनस्त्वंपरिणतेच पुद्गलसङ्घातरूपं हर्षायभिनिवृत्या भैषजव-
ज्जीवमनु गृह्णीयात्तावताज्ञेयनिमित्तकमनोनुग्रहोपघातकताभिधानमिदमयंदाह-"जइ दव्वमणोतिवली,पीलिज्जा हिययनिरुद्धवा-
उच्व । तयणुग्गहेण हरिसा-दओव्व नेएण किं तत्थ॥२२०॥ [यदि द्रव्यमनोऽतिबलि,पीडयेद् हनिरुद्धवायुरिव ॥ तदनुग्रहेण होदय
इव ज्ञेयस्य किं तत्र] अन्तःकरणं हि न बहिर्गत्वा ज्ञेयमर्थ जानाति न वा तत्स्वसमीपमानीय प्रकाशयति न वा ज्ञेयकृतानुग्रहोप-
घातभाग् भवतीति भुजमुत्क्षिप्य वयं वदामो,न तु तजीवस्यानुग्रहोपघातावपि जनयतीति वयं वदामः, पुद्गलेभ्य एव तेन
तल्लाभात्तथा चेदमस्मान् प्रत्यनिष्टोपदर्शनं वादिनोऽविचार्यवादितामेव व्यञ्जयति। यदाह-"नीउ आगरिसिउं वा, न नेअमालंवइ
त्ति णियमोऽयं ॥ तन्नेयकयाजेऽणु-ग्गहोवघायाय ते नत्थिा॥२२२॥ [निर्गत्याकृष्य वा न ज्ञेयमालम्बत इति नियमोऽयम्।।तज्ज्ञेयकृती
यावनुग्रहोपघातौ च तौ न स्तः]"सो पुण सयमुवघायण-मणुग्गहं वा करेज को दोसो। जमणुग्गहोवघाया, जीवाणं पोग्गलेहितो
॥२२३॥ तत्पुनः स्वयमुपघातमनुग्रहं वा कुर्यात्को नाम दोषः॥ यदनुग्रहोपघाती, जीवानां पुद्गलेभ्यः ] ॥३४॥
ननु चिन्तनीयवस्तुसंसर्गादेव हर्षशोकरूपावनुग्रहोपघातौ भविष्यतो न तु द्रव्यमनस इति चेत्,न,एवं सत्योदनादिचिन्तया
बुभुक्षाद्यपगमप्रसङ्गात् । ननु तर्हि द्रव्यमनसस्तद्धेतुत्वे किं प्रमाणमित्यत आह-
देहोपचयदौर्बल्ये, मनःपुद्गलहेतुके ॥ आहारपुद्गलादीनां, तद्धेतुत्वेन निश्चयात् ॥ ३५॥९३ ॥
॥४२॥

* कर शरीरस्य पुष्टिहानी तावत्पुद्गलजन्ये इष्टानिष्टाहाराभ्यवहारेण तदर्शनाद्,अथेष्टादप्याहाराद्रोगिणां पुष्टथदर्शनादनिष्टादपि च भेषजादेस्तद्दर्शनाद् व्यभिचार इति चेत्,न, धातुसाम्यवैषम्यद्वारा तयोस्तहेतुत्वात्, तदिह चिन्ताहर्षसमये जायमाने शरीरपुष्टिहानी पुद्गलसम्बन्धमपेक्षमाणे उपस्थितत्वान्मनःपुद्गलसम्बन्धकल्पनायैव प्रभवतो,नचौदर्याग्निपरिपाकजनितातिशयानामेवाहारपुद्रलानां तद्धेतुत्वावधारणान्नाऽनीदृशानां मनापुद्गलानां तद्धेतुत्वमिति वाच्यम्, स्वत एवातिशयिताना मनापुद्गलानां तद्धेतुत्वौचित्यात्, अन्यथा हृद्ग्रन्थेरपि दौर्बल्यजनकत्वं न स्यात् , ननु चिन्ताहर्षयोरेव साक्षात्तजनकत्वमस्तु किं नानामनःपुद्गलकल्पनया ,वदति च-"चिन्तया वत्स ! ते जातं, शरीरकमिदं कृशम्" इति चेत्, न, एकशक्तिमत्त्वेन पुद्गलत्वेन तद्धेतृत्वकल्पनात्प्रमाणाविरोधेन तत्त्यागायोगात्तयोरपि मनोजन्यत्वेन मनस एव तद्धेतुत्वकल्पनौचित्याच, आकाशवदमूतयोश्चिन्ताहर्षयोने तजनकत्वमिति प्राञ्चः॥ चिन्तयेत्यादिकश्च प्रयोग औपचारिक इति दिग् ॥ तदिदमभिप्रेत्याह-" इछाणिहाहार-भवहारा होन्ति पुट्टिहाणीओ॥ जह तह मणसो ताओ, पोग्गलगुणओति को दोसो ?॥२२॥" [ इष्टानिष्टाहाराभ्यवहारे भवतः पुष्टिहानी । यथा तथा मनसस्ते पुद्गलगुणत इति को दोषः ॥ ] स्यादेतत्, शोकहर्षव्यापारनैरन्तर्येण नाडीविशेषप्रयत्नप्रेरितद्रव्यान्तरादेव तदुपपत्तौ किं मना- कल्पनयेति, मैवं, शोकहर्षादिकार्यजनकानां मनोद्रव्याणामेव कल्पनात्तत्र संज्ञामात्र एव परेषां विवादात्, इष्टानिष्टमनोद्रव्योपादा- ननियम एव कृत इति चेत्, अदृष्टवशादेवेति सर्वमवदातम्, ॥ ३५॥ स्वमविज्ञानेन मनसः प्राप्यकारित्वं सेत्स्यतीति निराकर्तुमाह- मनसः प्राप्यकारित्वं,स्वप्नेनापि न सिद्धयति ॥ यदसौ न तथारूपौ,व्यभिचारादिदर्शनात् ॥३६॥९४ ॥ 'मम मनो मेरौ गत' इति स्वप्नविज्ञानदर्शनान्न मनसः प्राप्यकारित्वं सिद्धयति तस्याप्रमाणत्वात्प्रबोधे तद्विपरीतदर्शनात्, मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव- ग्रहप्रस्तावे- स्वप्नदृष्टांतेन मनसःप्राप्य. कारित्वव्यव- स्थापयितुः खण्डनम् ॥ C ८

सविवरण
भीज्ञाना-
मेव-
प्रकरणम्॥
॥४३॥
नचाशु नमनागमनशीलस्य मनसस्तदा ततः परावृत्त्या तद्विपरीतदर्शनमुपपत्स्यत इति वाच्यं, स्वप्नस्य प्रामाण्यानिश्चयेन तथा-
कल्पनाऽयोगात्तेन शरीरस्यापि तत्प्राप्तिग्रहात, न च सापि सम्भवति, कुसुमपरिमलाद्यजनितश्रमाद्यनुग्रहोपघाताभावादिह स्थितैः
सुप्तस्याञ्चैव दर्शनाच,तदिदमाह-"सिमिणोणतहारूवा,वभिचाराओ अलायचक्कं वावभिचारो असदसण-मुवघायाणुग्गहाभावा
॥२२४॥" [स्वप्नो न तथारूपो व्यभिचारादलातचक्रमिव ॥व्यभिचारश्च स्वदर्शना-दुपघातानुग्रहाभावात्] "इह पासुत्तो पेच्छइ,
सदेहमन्नत्य णय तो तत्था॥णय तग्गयोबघाया-गुग्गहरूवं विबुदस्स ॥२२५॥ [इह प्रसुप्तः प्रेक्षते स्वदेहमन्यत्र न च सकस्तत्र ॥
न च तद्गतोपघातानुग्रहरूपं विबुद्धस्य]॥३६॥ ननु प्रबुद्धस्य हर्षविषादोन्मादमाध्यस्थ्यदर्शनात् स्वप्नेऽपि जिनस्नात्र-तदपाय-
कामिनीकुचकलशसम्पर्कसंस्तारस्वरूपदर्शनाद्यर्थक्रियानुमानात् न तस्य व्यभिचारित्वं भविष्यतीत्यत आह-
हर्षादिकं ज्ञानफलं, स्वमे नैव क्रियाफलम् ॥ तत्सम्भवे बुभुक्षापि, क्षीयेतोदनदर्शनात् ॥३७॥९५॥
न खलु स्वमे जिनस्नात्रादिकरणादेव प्रबुद्धस्य हर्षादिप्रादुर्भावः केनापि स्वमे तत्क्रियाऽदर्शनात्कि तु रागादिमहिम्ना
तदभिमानादेव, दृश्यते हि जागतोऽपि दूराज्जरतीमपि मदिरोन्मादविघूर्णमाननयनां गतिविलासविडम्बितकलहंसगमनां ससम्भ्रमं
निजभुजोत्क्षेपविहितपीवरकुचकलशोलमनामादरेण तरुणीमिव पश्यतस्तरुणस्य हर्षोन्मादादिप्रादुर्भावस्तस्मादिष्टप्राप्त्यादेरिव तद-
भिमानस्यापि सुखादिहेतुत्वमास्थेयो अत एव रागसहकृतस्यैव तस्य तज्जनकत्वाचद्विरहिणो मुनेः स्वमे कामिनीदर्शनादिनापि न
हर्षायुदयोऽपि तु माध्यस्थ्यमेव, मोहहीनस्य स्वम एव न' इति तु न वक्तुं युक्तम्, मोहविगमाधीननिर्मोहत्वस्य दर्शनावरणोदय-
प्रसूतनिद्राद्यविरोधित्वात्, यदि तु स्वमेऽपि सुखादिकं क्रियाफलमिति क्रियैव स्यान्नान्यथा, तदा तदानीमोदनादिदर्शनाद् बुभ्र-
मतिनिरू-
पणे व्यश्चना-
वग्रहप्रस्तावे-
स्वप्नदृष्टांतेन
मनसःप्राप्य-
कारित्व-
व्यवस्था-
पयितुर्मत-
ख ण्डनम्॥
L
SCRIBE
॥४३ ॥

मतिनिरूपणे RECASSACRECENTER क्षाविलयप्रसङ्गे बुभुक्षाक्षामकुक्षेन्द्रिायामेव प्रवृत्तिः स्यान्न तु पाकादाविति विपरीतमेतद्, आह च-"दीसन्ति कासइ फुडं, हरिस- विसायादओ विबुद्धस्स।सिमिणाणुभूअसुह-दुक्ख-रागदोसाइलिंगाई।।२२६॥"[दृश्यन्ते कस्यचित्स्फुटं हर्षविषादादयो विबुद्धस्य।। स्वमानुभूतसुखदुःख-रागद्वेषादिलिङ्गानि] "न सिमिणविन्नाणाओ, हरिसविसायादओ विरुज्झति।। किरियाफलं तु तिची-मदवह- बंधादओणत्थि ॥२२७॥" [न स्वमविज्ञानाद् हर्षविषादादयो विरुध्यन्ते ॥ क्रियाफलं तु तृप्तिमदवधबन्धादयो न सन्ति] ननु कान्ता- दर्शनजन्ये सुखे तदर्शनमात्रं हेतुरस्तु, मोदकभक्षणादिजन्यं तु सुखं कथं स्वमे मोदकज्ञानमात्रादितिचेत,न, अनन्यगत्या स्वमज- नितेष्टप्राप्त्यभिमानस्यापि विलक्षणसुखहेतुत्वस्वीकारात् प्रबुद्धस्य तु स्वमशुभत्वज्ञानस्य तथात्वादिति दिग् ॥ ननु स्वप्नेऽपि कामिनीसुरतादिक्रियाफलं व्यञ्जनविसर्गादि प्रबोधावस्थायामपि साक्षात् दृश्यत एव तत्कथं स्वप्ने क्रियाफलं नास्तीत्युच्यत इति चेत्, न, जाग्रतोऽपि तीव्रमोहाध्यवसायेन व्यञ्जनविसर्गदर्शनाद, स्वप्नेऽपि तस्य तद्धतुकत्वेन क्रियाफलत्वासिद्धेः, अन्यथा स्वप्नविषयीकृतकामिनीनां गर्भाधानादिप्रसङ्गाद्,आहच-"सिमिणे वि सुरयसंगम-किरियासंजणिअवंजणविसग्गोपडिबुद्धस्स वि कस्सइ, दीसइ सिमिणाणुभूअफलं ॥२२८॥"[स्वप्नोऽपि सुरतसङ्गम-क्रियासञ्जनितव्यञ्जनविसर्गः॥ प्रतिबुद्धस्यापि कस्यचित्, दृश्यते स्वप्नानुभूतफलं]"सो अज्झवसाणकओ, जागरओपि जह तिव्वमोहस्स ॥ तिव्वज्झवसाणाओ, होइ विसग्गो तहा सुमिणे ॥२२९॥"[सोऽध्यवसानकृतो जाग्रतोऽपि यथा तीव्रमोहस्य। तीव्राध्यवसानाद्, भवति विसर्गस्तथा स्वप्ने] "सुरयपडिवृत्तिरइ- सुह-गम्भाहाणाइ इहरहा होज्जा ॥ सुमिणसमागयजुवईए, णय जओ ताई तो विफला ॥२३०॥"[सुरतप्रतिपत्तिरतिसुखगर्भाधाना- दीतरथा मवेत्॥ स्वप्नसमागतयुक्तेः, न च यतस्तान्यतो विफला ] ननु व्यञ्जनविसर्गस्य क्रियापूर्वकत्वदर्शनात्कथमध्यवसान- व्यअनाव- ग्रहप्रस्तावे- स्वप्नदृष्टान्तेन मनसः प्रा- प्यकारित्व. व्यवस्था- पयितुर्मत- खण्डनम्॥

सविवरणं
भीज्ञाना
र्णव-
प्रकरणम्॥
GOSSIST
जन्यत्वमिति चेत्, न, तीव्रवेदाध्यवसायजनकबहुतरमनोद्रव्यप्रेरितजीवप्रयत्नादेव तदुपपत्तेदृष्टार्थस्य बाधितुमशक्यत्वात् ॥३७॥
ननु भाविराज्यादिस्वप्नस्य सत्यत्वदर्शनान्मनसो मेरुप्राप्तिस्वप्नोऽपि कथं न तथेत्यत आह-
स्वप्नोऽपि न मृषा कश्चि-न तु सर्व इतिस्थितिः ॥ तेन न प्राप्यकारित्वं, मनसः स समर्थयेत् ॥३८॥१६॥
नहि भाविराज्यादिसूचकस्वप्नस्यार्थक्रियाकारित्वेन प्रामाण्यमिति मेरुगमनादिस्वप्नस्यापि तथात्वं स्यात् अर्थक्रियाकारि-
त्वाभावेन तस्य स्फुटमेवाप्रामाण्यान्न खेकजातीयस्य कस्यचित्प्रामाण्ये सर्वस्य तथात्वं नाम, घटादिचाक्षुषस्य प्रामाण्ये रङ्गे रजत
बुद्धेरपि तथात्वप्रसङ्गाद्,आह च-"नणु सिमिणओ वि कोइ, सच्चफलो फलइ जो जहादिहो।नणु सिमिणम्मि णिसिद्धं, किरिया
किरियाफलाई च ॥२३१॥"[ननु स्वप्नोऽपिकश्चित्सत्यफला, फलति यो यथादृष्टाननु स्वप्ने निषिद्धं, क्रिया क्रियाफलानि च
"जं पुण विन्नाणं, तप्फलं च सिमिणे विबुद्धमेत्तस्स ॥ सिमिणयणिमित्तभावं, फलं च तं को णिवारेइ॥२३२॥"[यत्पुनर्विज्ञानं,
तत्फलं च स्वप्ने विबुद्धमात्रस्य।।स्वप्ननिमित्तभावं, फलं च तत्को निवारयति?] ननु स्वमः सर्वोऽप्यप्रमैव निद्रादोषजनितत्वाद्,
भाविराज्यस्वप्नादीनां तु देहस्फुरणसहसोदितवद् भाव्यर्थानुमापकत्वादेव प्रामाण्यं तत्तच्छास्त्रात्तथाविधव्याप्तिग्रहात्,तदुक्तम्-
'देहप्फुरणं सहसोइअंच, सिमिणो अ काइआईणि ॥ सगयाई निमित्ताई, सुभासुभफलं णिवेइंति ॥२३३॥"त्ति० [ देहस्फुरणं
सहसोदितं च, स्वप्नश्च कायिकादीनि ॥ स्वगतानि निमित्तानि, शुभाशुभफलं निवेदयन्ति] कथं कश्चिदेव स्वप्नः प्रमा नतु सर्व
इत्यभिधीयत इति चेत्, न, 'आरोपे सति निमित्तानुसरणं नतु निमित्तमस्तीत्यारोप' इति न्यायन क्वचिदेव कस्यचिद्दोषत्व-
कल्पनात्, न च तदिति स्थले इदमिति भानात्तस्याप्रमात्वं, स्मृतिप्रामाण्यव्यवस्थापितत्वात, सर्वत्र स्वप्ने तथाभानाभावाद्,
मतिनिरूपणे
व्यञ्जनाव-
ग्रहप्रस्तावे-
स्वप्नदष्टान्तेन
मनसः प्रा.
प्यकारित्व-
व्यवस्था-
पयितुर्मत-
खण्डनम् ॥
NSGER
॥४४॥

मतिनिरू- पणे व्यञ्ज- SPREGALORE दृष्टार्थस्य कथं स्वप्ने भानमिति चेद् ?, एतन्महिम्नेति संक्षेपः॥ ३८॥ ननुस्त्यानर्द्धिनिद्रोदये द्विरदरदनोत्पाटनादिप्रवृत्तेर्मनसः प्राप्यकारित्वव्यञ्जनावग्रही सेत्स्यत इत्यत आह-- स्त्यानधौ श्रवणादीनां, व्यञ्जनावग्रहादयः ॥ भवेयुनं तु चित्तस्य, स्वप्नोऽयमिति जानतः ॥३९॥९७॥ स्त्यानर्धिनिद्रोदये हि प्रेक्षणकरङ्गभूम्यादौ गीतादिकं शृण्वतः श्रोत्रन्द्रियादीनामेवावग्रहो भवति, न तु नयनमनसो,तत्प्राप्य- कारिताया युक्तिरिक्तत्वात्, नन्वेवं बाह्यन्द्रियव्यापारे प्रबुद्धस्य स्वप्नोऽयमिति ज्ञानं कथमिति चेत्, गाढनिद्रोदयपारवश्येन तथा- भिमानाद्, आह च-"सिमिणमिव मन्नमाणस्स, थीणगिद्धिस्स वंजणोग्गहया । होज व ण उसा मणसो, सा खलु सोइंदिआईणं ॥ ॥ २३४ ॥" [स्वममिव मन्यमानस्य, स्त्यानगृद्धेय॑ञ्जनावग्रहता । भवेद्वा न तु सा मनसः सा खलु श्रोत्रेन्द्रियादीनाम्] ननु निद्रोदये कथमीदृशी विशिष्टचेष्टेति चेत्, तदुदयसमयेऽर्द्धचनिनलार्द्धनलसम्पत्तेः ॥ श्रूयन्ते यत्रोदाहरणानि-ग्रामे वचन कोऽप्यासी-त्कौटुम्बिकशिरोमणिः ॥ यस्य जिह्वा पलग्रास-रसव्यसनतत्परा॥१॥ मांसानि खानिर्दोषाणां, यत्र यत्र स पश्यति ॥ और्वानल इवाम्भोधौ, चेतस्तत्रास्य धावति ॥२॥ एष धर्मेधसा दाहे, वन्यदावाग्निरन्यदा ॥ आनीयोपशमं वाग्भि-मैघधाराभि- रञ्जसा ॥३॥ दुर्नीतिदलनान्वीक्षा, दीक्षां दत्त्वा महात्मभिःस्थिविरैः स्थिरतां नीतो, जगद्गीतयशोभरैः ॥४॥ तेनान्यदा विहरता, ग्रामे वचन घातितः। सौनिकैर्महिषो दृष्टो, महिपध्वजमन्दिरे ॥५॥ अभिलाषस्तदा तस्य, तदीयामिषभक्षणे ॥ प्राव- तत हहा कर्म-स्थिति, दुरतिक्रमा ॥ ६॥न न्यवर्चत तस्यासौ, व्यासङ्गेऽपि क्रियान्तरे ॥ कान्तासङ्गं विना याति, न नाम विरहज्वरः ॥ ७॥ तेनैव चाभिलाषेण, स्वापमाष दुराशयः॥ तस्य तत्सहकारेण, स्त्यानद्धिरुदियाय च ॥८॥ महिषध्वजवत् नावग्रह- प्रस्तावे स्त्यानधिनि- द्राप्रकारेण मनसः प्रा- प्यकारित्व- व्यञ्जनाव- ग्रहस्था- पकमत- खण्डनम् ॥ ४

सविवरणं
भीज्ञाना-
०
प्रकरणम्॥
॥४५॥
क्रूर-स्ततश्वोत्थाय शक्तिमान्॥ महिषामिषपिण्डार्थी,ययौ महिषमण्डलम्॥९॥तत्र व्यापाद्य महिषं,मांसलंमांसलम्पटः।मांस भुक्त्वा
न्यदानीय, चिक्षेपोपाश्रयोपरि ॥१०॥ पुनः सुष्वाप पापा स, प्रत्यूषे च प्रबुद्धवान् ॥ स्वप्नोऽयमिति विज्ञाय, तज्जगाद गुरोः
पुरः ॥११॥ उपाश्रयोपरि प्रैक्षि, साधुभिश्च तदा पलम् ॥ पाटलं परिपाकेण, स्त्यानगृद्धिलताफलम् ॥१२।। न्यवेदि तच्च गुरवे-
तेन लिङ्गेन तैस्तदा ॥ धूमेनाग्निरिवाज्ञायि, तस्य स्त्यान िसम्भवः ॥१३॥ सङ्घन स द्रुतं लिङ्ग-मपहृत्य विसर्जितः॥ भस्मच्छ-
नोऽपि नैवाग्निः, स्थाप्यते केलिवेश्मनि ॥१४॥ इति स्त्यानर्युदये प्रथमं मांसोदाहरणम्।। अथ द्वितीयं मोदकोदा-
हरणमुच्यते-भिक्षार्थ पर्यटन प्रामे, कोपि साधुर्व्यलोकत ॥ भाजने स्थापितान् दिव्यान्, मोदकान् मन्दिरे क्वचित् ॥ १॥
सुरभिस्निग्धमधुरा-नुग्रीव तानिमालयन् ॥ स पाप नहि साधूनां, याञ्चापूर्वः प्रतिग्रहः ॥२॥ विच्छेदं न जगामास्याभिला-
वस्तु तदाश्रयः ॥ अविच्छेदेन सुप्तस्य, स्त्यानद्धिरुदियाय च ॥ ३ ॥ रजन्यां तद्गृहं गत्ला, महाद्विप इवाध्य सः॥ अभावूक्षी-
तत्कपाटानि, वृक्षाणीव मदोद्धतः॥४॥ गत्वान्तः कवलीकृत्य, स्वैरं मोदकमण्डली ॥ शेषं पतद्ग्रहे क्षिप्त्वो-पाश्रवं तूर्णमाययौ
॥५॥ स्थाने निधाय सुष्वाप, तं पतद्ग्रहकं पुनः ॥ स्वप्नं ज्ञात्वा बभाषेऽथ, प्रबुद्धस्स गुरोः पुरः॥६॥ भाजनप्रत्युपेक्षायाः,
समये तत्प्रतिलेखने॥ ददृशे मोदकश्रेणी,स्त्यानद्धिरिव पिण्डिता॥७॥गुर्वादिभिस्ततो ज्ञात्वा,तस्य स्त्यानदिदुष्टताम् ॥लिङ्गं पाराश्चि-
कं दवा, तथैवायं विसर्जितः ॥८॥ उक्तं द्वितीयम्।। अथ सृतीय वन्तोदाहरणमुच्यते।।एकः साधुर्दिवा कश्चित्, खोदितः
करिणारिणा, प्रचण्डकरदण्डेन, नारदेनेव गजेता ॥१॥ पलाय स ततः कष्टा-न्मृगो दावानलादिव।। क्रोधोद्धरमनास्तूणे-मुपाश्र-
यमुपाययौ ॥ २ ॥ ज्वलतैव स कोपेन, रात्री स्वापमवीभजत् ॥ तदा सहचरीवास्य, स्त्यानगृद्धिरुपाययौ ॥ ३ ॥
RELEASE
मतिनिरूपणे
व्यञ्जनावग्र-
हप्रस्तावे
मनसः प्रा-
प्यकारित्वा-
रेकायां द-
शितानि-
स्त्यानयु-
दाहरणागि।
CORRECE
॥ ४५ ॥

॥ केशवार्द्धबलेनाथ, मन्यमानस्तृणं जगत् ॥ भक्त्वा पुरकपाटानि, पर्पटानीव तत्क्षणात् ॥ ४॥ गत्वा च हस्तिनः स्थानं, केसरीव स हस्तिनम् ॥ व्यापाद्य दन्तमुशल-द्वयं जग्राह शक्तिमान् ॥ ५ ॥ क्रोधानिमपनीयाऽथ, द्विपवैरनिवारणात् ॥ आगत्योपाश्रयद्वारि, क्षिप्त्वा तत् स्वपिति स्म च ॥ ६॥ उज्ज्वलं रुधिरार्द्र त-दन्तिनो दशनद्वयम् ॥ सपल्लवकषायद्रु-शा- खाद्वयमिवाबभौ ॥ ७ ॥ प्रबुद्धः स तथारूपं, स्वयं स्वप्नममन्यत॥ स्त्यान.चॅम्भितं चास्य, साधवो विविदुः क्षणात् ॥८॥ न हि स्त्यानर्द्धिपायोधि-तरङ्गप्रसरं विना।।डिण्डीरपिण्डसङ्काश-दन्तिदन्तग्रहो भवेत् ॥९॥स्त्यानधैरुदयाद्ग्रस्त-गुणमेनमवेत्य च॥ विससर्ज द्रुतं सङ्घो, लिङ्गमादाय धर्मधीः ॥ १० ॥ उक्तं तृतीयम् ॥ अथ चतुर्थ कुम्भकारोदाहरणमुच्यते-कश्चिदेका कुम्भकारो, गच्छे स्वच्छतरे गुणैः॥ प्रव्रज्यां खलु जग्राह, कुतश्चिदपि कारणात् ॥१॥अन्यदा च प्रसुप्तं तं, स्त्यानर्द्धिरुपतस्थुषी।। पूर्वाभ्यासं ततोऽस्मार्षी मृत्पिण्डप्रोटनश्रमम्॥२॥ततस्तदेकव्यापार-चिन्तासन्तापतापितः॥ शिरांस्यभांक्षीत्साधूनां, मृत्पिण्डानिव दुष्टधीः॥३॥तद्रक्तरक्तधाराभि-धौते(पापो)ऽप्येतस्य चेतसि।।अवर्द्धताहो नितरां,सर्वतः पङ्कसङ्करः॥४॥ साधवोऽपसृताः कोचत्, पाप्मनोऽस्मात्ततो भिया।नहि ज्वलति दावागौ, वने स्थातुं किलोचिती ॥५॥ उदेक्षन्त च ते प्रातः, पाप्मनोऽस्य विजृम्भितम् ।। सर्वतः पृथिवीं दृष्ट्वा, मुण्डमण्डलमण्डिताम् ॥६॥ स्मशानवेश्मार्चनतो, नराणां मुण्डमण्डलैः॥ स्मशानवास एवास्य, श्रेयानिति विचिन्त्य तम् ॥७॥ सङ्घः सद्धर्मनिरत-श्कर्षांपाश्रयाद्वहिः ॥ दूषणस्य फलं मुख्य-माश्रयभ्रंश एव हि।।८।। उक्तं चतुर्थम्।। अथ वटशाखाभञ्जनोदाहरणं पञ्चममुच्यते-साधुर्घामान्तरात्कश्चि-द्भिक्षा लात्वा न्यवर्तत।। तापेनाभिहतश्चैष, क्षुत्तुङ्मयां बाधितस्तराम् ॥ १॥ छायां तां सेवितुं स्निग्धां, शीतला वटभूरुहः॥ कामोपतापहतये, कामिनीमिव कामुकः ॥२।। आगच्छन् मतिनिरूपणे व्यअनावप्र- हप्रस्तावे मनसः प्रा- प्यकारित्वा- रेकायां स्त्या. नयुदाहर- णानि ॥ ॐॐ SCS

सविवरणं
श्रीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥ ४६॥
RSANEERCOREGARIES
शाखया नीचै-रुपतापातिविड्वलः।। अपराद्धो ह्रियेवासौ, खेदं मेदस्विनं दधौ॥३॥अविच्छिन्नेन कोपेन, ततो गत्वा प्रतिश्रयम्।।
क्रमणावश्यकीः कृत्वा, क्रियाः सुष्वाप पापधीः ॥४॥ रजन्यां महतीं शक्ति, स्त्यानद्धैर्बिभ्रदुच्चकैः ॥ अभाङ्क्षी वटशाखां तां
सह धर्मद्रुशाखया ॥५॥ तामानीयाश्रयद्वारि, क्षिप्त्वाऽशेत पुनर्भृशम् ॥ बुद्धः स्वप्नाभिमानी च, जगौ सर्व गुरोः पुरः ॥६॥
द्वारि तां महती शाखां, स्त्यानार्द्धमिव रूपिणीम् ॥ अवेक्ष्य लिङ्गमादाय, गुरुणा स विसर्जितः॥७॥ उक्तं पश्चमम्।। तदे
* एतान्युदाहरणान्यन्यत्र सङ्क्षपत एवम्प्रदर्शितानि-
[१] एकः कौटुम्बिको ग्रामे, मांसमेवात्त्यनेकधा ॥ श्रुत्वा धर्म स केषाश्चित्, समीपे व्रतमग्रहीत ॥ १॥ विचरंश्च
कचियामे, महिषं पिशितार्थिभिः॥ विभिद्यमानमद्राक्षीत्ततोऽभूत्तत्र सस्पृहः ॥ २ ॥ सोऽन्युच्छिन्नतदाकांक्षोऽभुक्तो यातो बहि-
र्भुषम् ॥ सूत्रस्य पौरुपी चान्त्यां, चके सुप्तस्तथा निशि ॥३॥ जातस्त्यानधिरेषोऽथ, गत्वा महिषमण्डलम् ॥ हत्वैकं भुक्तवान् , शेष-
मेत्य शालो( माश्रयस्यो )परि न्यधात् ॥ ४ ॥ ईटहष्टः प्रगे स्वप्न, इत्यालोचितवान्गुरोः ॥ दिशो विलोकने तच्च, मुनिभि-
मौसमीक्षितम् ॥५॥ सोऽथ स्त्यानर्धिमान ज्ञात्वा, लिङ्गपाराश्चिकः कृतः॥ इति प्रथमम् [२] साधुर्भिक्षांभ्रमन्कोऽपि, मोदकान्धीक्ष्य
कुत्रचित् ॥६॥ घिरमैक्षिष्ट गृद्धस्तानलब्ध्वाऽशेत तन्मनाः ॥ जातस्त्यानर्धिरुत्थाय, गत्वा तद्भवनं निशि ॥७॥ भित्त्वा कपाटम.
तिस्म, मोदकानुहृतानथ ॥ पात्रे कृत्वाश्रये प्राप्तः, प्रातः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥ ८ ॥ दृष्टाः पादोनपौरुष्यां, ते पात्रप्रतिलेखने ॥
लिङ्गपाराञ्चिकः सोऽपि, ततो गुरुभिरादधे ॥९॥ इति वितीयम् ॥ [३] एकः साधुर्गतो भिक्षां त्रासितः करिणा ततः।। पलायितः
कथमपि, तस्मिन् रुष्टश्च सुप्तवान्॥१०॥जातस्त्यानधिरुत्थाय गत्वा व्यापाघ त गजम् ॥ आनीय दन्तमुशले, विन्यस्योपाश्रयोपरि
॥११॥ पुनः सुप्तः प्रगे स्थप्नं,न्यायक्रेऽय तपोधनः।। दृष्ट्वा दन्तान्स विज्ञातो,लिङ्गपाराश्चिकः कृतः॥१२॥ इतितृतीयम् []गच्छे महति
कस्मिधित् ,पाबाजीत्कुम्भकारकासुप्तः स्त्यानर्षिभायात्रौ, मृत्तिकाभ्यासतस्ततः।।१३ ॥समीपस्थितसाधूनां, छेदं छेदं शिरां-
मतिनिरू-
पणे व्यञ्ज-
नावग्रह-
प्रस्तावे
मनसः प्रा.
प्यकारिवा-
रकायां स्त्या-
नर्युदाह-
रणानि ।।
KRISHNA
-
॥ ४६॥

(योजितः मेतानि दर्शितानि स्त्यानध्युये पञ्चाऽपि समयप्रसिद्धान्याहरणानि ॥ आहच-"पोग्गलमोअगदन्ते, फरुसगवडसालभञ्जणेचेव। थीणद्धिअस्स एए, आहरणा होन्ति णायव्वा ॥२३५।" [पुद्गलमोदकदन्ताः कुलालवटशालभञ्जने चैव ॥ स्त्यानधेरैतान्युदाहर- णानि भवन्ति ज्ञातव्यानि]||तदेवं जागरे स्वप्ने स्त्यानौं वा मनसःप्राप्यकारिता निषिद्धा,अमुकत्र मे गतं मन इति प्रयोगस्त्वन्यार्थ- कत्वेन समर्थितो,वस्तुतस्त्वयं प्रयोगो भ्रान्तिमूलक एव, चक्षुर्मे चन्द्रं गतमिति प्रयोगवत्, नहि सर्वे लौकिकप्रयोगाः सत्या एव, आह च-"जह देहत्थं चक्, जं पइ चंदं गयंति ण य सच्च।।रुढं मणसो वितहा,ण य रुढी सचिआ सव्वा।।२३६॥"[यथा देहस्थं चक्षुर्यत्प्रति चन्द्रं गतमिति न च सत्यम् ।। रूढं मनसाऽपि तथा, न च रूढिः सत्या सर्वा ] ॥ तदेवं व्यवस्थापिते मनसोऽ प्राप्यकारित्वे पुनः परकृतामाशङ्का परिहरति ।[*प्रतावत्र सवृत्तिषट्पञ्चाशद्गाथायुतानि दश पत्राणि गतानीति लिखितमितियोजितम्] सर्वासर्वग्रहापत्ति-न चित्तेप्राप्यकारिण॥ दृष्टस्यानुपपत्ती, यददृष्टं [*परिकल्प्यते ॥४०॥९८॥ अप्राप्यकारिणि अप्राप्यकारितया सैद्धान्तिकाभ्युपगते चित्ते मनसि, प्रतिवन्दी गृह्णता परेणोद्भाविता सर्वासर्वग्रहा- पत्तिः यदि विषयमप्राप्यैव मनो गृह्णीयादप्राप्तत्वाविशेषात्सर्वस्य ग्रहणं स्यात्, अप्राप्तत्वाविशेषेऽपि यदि कस्यचिदर्थस्याग्रहणं स्यधीः ॥ एकान्ते न्यक्षिपत्तानि शीर्षाणि च वपूंषि च ॥१४॥ शेषा अपमृता भूयः, सुप्तः स्वप्नं प्रगेऽवदत् ॥ मृतान्वीक्ष्याथ साधन्स लिङ्गपाराश्चिकः कृतः ॥१५।। इतिचतुर्थम् ॥ [] वटस्याऽधोऽध्वना कश्चि-द्भिक्षाचर्यागतो मुनिः ॥भृतपात्रो वलन्वेगात् , क्षुत्तुड- ग्रीष्मातापितः ॥ १६॥ तच्छाखायामास्फलितो, रुष्टस्तस्यामसौ निशि ॥ स्त्यानध्र्युदयतो गत्वा, भक्त्वा शाखां समागतः ॥१७॥ विन्यस्योपाश्रयद्वारे सुप्तः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥ प्रातः स्त्यानर्धिमान् ज्ञात्वा लिङ्गपाराञ्चिकः कृतः ॥१८॥ इतिपञ्चमम् ॥ केऽप्याहुः प्राग् यनेभोऽभूत् ,सोऽथ स्त्यानधिमान्नरः ॥ सजातप्राग्भवाभ्यासाद्, यटशाखां ततोऽभनक् ॥ १९ ॥ इति ॥ पाठः) मतिनिरूपणे व्यअनाव. ग्रहप्रस्तावे मनसः प्रा प्यकारित्व- स्थापनाय परकतारे- कायाः परित हारः॥

(योजितः
सविवरणं
पाठः)
भीवाना-
मंत्र-
CONTACale
॥४७॥
तदा तथैवापरस्याप्यग्रहणमिति,सर्वाग्रहण वा स्यादित्येवरूपा,न,यद् यस्मात्कारणात,दृष्टस्यप्रतिनियतार्थग्रहणस्यानुपपत्तौ सत्यां
तदुपपत्तये,अदृष्टं तत्कारणतया क्षयोपशमविशेषाख्यं,परिकल्प्यतेन चैवं प्राप्यकारित्वपक्षेऽप्येवमस्त्वितिवाच्यम्, अनेकप्राप्ति-
कल्पनेऽपि क्षयोपशमविशेषस्य तत्कारणतयावश्यं कल्पनीयत्वनिष्फलस्यगौरवस्यतत्कल्पनापरिपन्थिनः सद्भावाद् ,अप्राप्यकारित्वे
तु प्राप्तकल्पनाल्लाघवस्यानुकूलत्वादिति बोध्यम्॥४०॥मनसो विषयप्राप्त्यभावेऽपि कदाग्रहावेशाद्व्यजनावग्रहं प्रतिपादयन्पर आह-
" विसयमसंपत्तस्स वि, संविज्जइ वंजणोग्गहो मणसोजमसंखेजसमइओ, उवओगोजं च सव्वेसु॥२३७॥
समएसु मणोदव्वाइं, गिण्हए वंजणं च दवाई ॥ भणियं संबंधो वा तेण तयं जुज्जए मणसो ॥ २३८ ॥
व्याख्या-मेर्वादिविषयमप्राप्य गृह्नतोऽपि मनसो व्यञ्जनावग्रहो युज्यते, यस्मात्'च्यवमानो न जानाति' इत्यादिवचना-
सर्वोऽपि छयस्थोपयोगोऽसङ्ख्येयसमयो निर्दिष्टः समये, न त्वेकद्वयादिसमयका, यस्माच्च तेषूपयोगसम्बन्धिष्वसङ्ख्येयसमयेषु
सर्वेष्वपि प्रत्येकमनन्तानि मनोद्रव्याणि मनोवर्गणाभ्यो गृह्णाति जीवा, द्रच्याणि च तत्सम्बन्धो वा प्रागत्रैव भवद्भिर्व्यञ्जनमुक्तं,
तेन तत् द्रव्यं तत्सम्बन्धो वा व्यञ्जनावग्रहो मनसो युज्यते। श्रोत्रादेरप्यसङ्ख्येयसमयगृह्यमाणशब्दादिपरिणतद्रव्याणि तत्सम्ब-
न्धो वा व्यञ्जनावग्रहा, स मनसोऽषि समान इति तथा कि नेष्यत इति पराभिप्रायः ॥ २३७-२३८ ॥
विषयाप्राप्तावपि मनसो व्यञ्जनावग्रहमवस्थाप्यदानी तत्प्राप्त्या तं समर्थयमाह-
देहादणिग्गस्स वि, सकायद्दिययाइयं विचिंतयओ॥ नेयस्स वि संबंधे, वंजणमेयं पि से जुत्तं ॥ २३९ ॥
व्याख्या-देहादनिर्गतस्यापि तत एव मेर्वाद्यर्थमगतस्यापि स्वकायहृदयादिकमतिसाभिहितत्वात्सम्बद्धं चिन्तयतो मनसो
मतिनिरूपणे
व्यअनाव-
अहप्रस्तावें
मनसोऽ प्रा-
प्यकारित्वे
सद्धेऽपि व्य-
FEEG
ACCORE
अनावग्रह-
त्वस्थाप-
नायाभिनि-
वेशिशङ्का
प्रदर्शनम्॥
॥४७॥

क शेयेन स्वकायस्थितहृदयादिना सम्बन्धेऽपि तस्य मनसो व्यञ्जनावग्रहो युक्त उक्तप्रकारेणेत्यर्थः ॥ २३९ ॥ उक्तप्रकाराभ्यां परेण मनसो व्यञ्जनावग्रहे समर्थिते तत्र प्रथमपक्षे प्रतिविधानमाचार्य आह- गिमस्स बंजणाणं, जं गहणं वंजणोग्गहो स मओ ॥ गहणं मणो न गिज्झं, को भागो वंजणेतस्स ॥२४०॥ व्याख्या-स्वपक्षपरपक्षरागद्वेषग्रहाविष्टचित्तेन परेण 'विसयमसंपचस्स वि' इत्यादि यदुक्तं तदसम्बद्धमेव, यतः श्रोत्रादी- न्द्रियचतुष्टयप्रायस्य शब्दादेस्सम्बन्धिनां व्यञ्जनानां तद्रूपपरिणतद्रव्याणां यदुपादानलक्षणं ग्रहणं सव्यअनावग्रहोऽस्माकं सम्मत इति परो जानात्येव, एवञ्च चिन्ताद्व्यरूपं मनो यदि ग्राह्यं स्यात्स्यात्तदा तद्व्यञ्जनं मनसो न त्वेवं, किन्तु अर्थपरिच्छेदकरण- स्वरूपं ग्रहणं मनो न प्राय, अतः को भागः कोऽवसरस्तस्य करणभूतस्य मनोद्रव्यराशेर्व्यञ्जनावग्रहेऽधिकृते, न कोऽपीत्यर्थः ॥२४०॥ 'देहादणिग्गयस्स वि ' इत्यादिना मनसो व्यञ्जनावग्रहप्रसाधनायोक्तो द्वितीयपक्षोऽपि न सङ्गतः, स्वस्य स्वदेशेन सम्बन्धसर्वस्यापि, स्वदेशेन सहासम्बन्धे वस्तुनोऽसत्त्वमापद्येत, न च तावन्मात्रेण मनः प्राप्यकार्युपगन्तुं शक्यम्, तथा सति ज्ञानमात्रस्य स्वदेशात्मसम्बद्धस्य प्राप्यकारिता प्रसज्येत, तस्मात्स्वदेश, परित्यज्य बाह्यार्थापेक्षयैव प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्व- चिन्ता फलवती, बाह्यार्थश्च मनसाऽप्राप्त एव गृह्यत इति तस्याप्राप्यकारित्वनियमे न व्यभिचारः, मनसः स्वकीयहृदयादि- चिन्तायां प्राप्यकारित्वाभ्युपगमेऽपि वा न व्यञ्जनावग्रहसम्भव इति दर्शयन्नाह- तइसचिन्तणे होज, वंजणं जइ तओ न समयम्मि । पढमे चेव तमत्थं, गेण्हेज्ज न वंजणं तम्हा ॥ २४१॥ व्या० स्वकीयहृदयादिदेशचिन्तने सति भवेन्मनसो व्यञ्जनावग्रहः - यदि प्रथमसमय एव तं स्वकीयहृदयादिकमर्थ न (योजितः पाठः) मतिनिरूप- णे व्यअना- वग्रहप्रस्तावे मनसोप्रा- प्यकारित्वे. सिद्धेप्यभि निवेशतो व्यज्जनावग्र- हत्वस्थापना- य परकतारे- कायाः परि- हरणम् ॥ 1 RE सविवरणं भीज्ञाना- नव- प्रकरणम् ॥ ॥४८॥ गृहीयात्, न चैवम्, यतो मनसः प्रथमसमय एवार्थावग्रहो जायतेन तु श्रोत्रादीन्द्रियस्येव प्रथमं व्यञ्जनावग्रहा, क्षयोपशमापाटवेन श्रोत्रादीन्द्रियस्य प्रथमं नार्थोपलब्धिरिति युज्यते तस्य व्यञ्जनावग्रहः, चक्षुरिन्द्रियस्येव पटुक्षयोपशमत्वान्मनसोऽर्थानुपलब्ध- कालाभावेन प्रथममर्थावग्रह एव जायत इति न न्यञ्जनावग्रहस्यावसरम्, अत्र चानुमानप्रकार इत्थम्, इह यस्य ज्ञेयसम्बन्धे सत्यप्यनुपलब्धिकालो नास्ति न तस्य व्यञ्जनावग्रहः, यथा चक्षुषस्तथा मनसः, तस्मान्न तस्य व्यजनावग्रहः, व्यतिरेके तु भोत्रादिदृष्टान्तस्तस्य ज्ञेयसम्बन्धेऽथोनुपलम्भकालसम्भवात्, तत्र व्यञ्जनावग्रहाभ्युपगमः, एवञ्च परोक्तपक्षद्वयस्याप्यघटमान- त्वान्मनसो व्यञ्जनाचग्रहासम्भवमुपसंहरति । 'न वंजणं तम्हत्ति, ' तस्मादुक्तप्रकारेण मनसो न व्यञ्जनावग्रहः ॥ २४१॥ प्रथमसमय एव मनसोऽर्थग्रहणम्भवतीत्यत्रोपपत्तिमुपदर्शयति- समए समए गिण्हइ, दव्वाइं जेण मुणइ य तमत्थं ॥ जं चिंदिओवओगे वि, वंजणाञ्चग्गहेतीते ॥२४२॥ होइ मणोषावारो, पढमाओ चेव तेण समयाओ॥ होइ तदत्यग्गहणं, तदण्णहा न.प्पवत्तेज्जा ॥२४३॥ व्याख्या-येन कारणेन कस्यचिदर्थस्य चिन्तावसरे प्रतिसमयं मनोद्रव्याणि गृह्णाति मनोद्रव्यग्रहणशक्तिसम्पन्नो जीवः चिन्तनीयश्च तथा जानाति, एतत्प्रथमगाथापूर्वार्द्धार्थेन सह द्वितीयगाथाद्वितीयत्तीयचरणार्थी सम्बन्धनीयौ । ततश्च तेन कारणेन प्रथमसमयादेव भवति चिन्तनीयार्थस्य ब्रहणमित्यर्थः।अर्थानुपलब्धिकालस्त्वेकोऽपि समयो नास्ति, कुत्र तस्य व्यञ्जनावग्रह- इति भावः । नन्विन्द्रियव्यापाररहितस्य जीवस्य मनोमात्रेणैवार्थान्पर्यालोचयतो मा भवतु मनसो व्यञ्जनावग्रहः श्रोत्रादी- न्द्रियेणार्थान् गृहतस्तु जीवस्य मनोऽपि तत्र व्यापिपर्तीति तत्र प्रथममनुपलब्धिकालसम्मवाद् व्यजनावग्रहः किन स्यादित्यत आहे, (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव- ग्रहप्रस्तावे उक्षयोपश- मत्वाचक्षुष इव मनसः प्रथमत एवा- थग्राहक- त्वेन व्यञ्ज- नावग्रहा. भाव एवेति प्रदर्शनम्।। ॥४८॥ PECIS (योजितः 'जं चिंदिओवओगे वि' इत्यादि, यस्मात् श्रोत्रादेः शब्दाद्यर्थग्रह्णलक्षणोपयोगकालेऽपि व्यञ्जनावग्रहेऽतीते सति मनसो व्यापारी भवति,यथा केवलेन मनसाऽर्थचिन्तनेविग्रहादारभ्यैव मनोच्यापारस्तथा श्रोत्रादीन्द्रियेण सहापि तस्य व्यापारोावग्रहादारभ्यैव न तु व्यजनावग्रहसमय इति न मनसस्तत्रापि व्यञ्जनावग्रहः । तत्र मनसो व्यञ्जनावग्रहे व्यापाराभ्युपगमे स व्यञ्जनावग्रहो मनसोऽपीति मतेरष्टाविंशतिभेदमिन्नता न स्यात, तस्मात्प्रथमसमयादेव तस्यार्थग्रहणमभ्युपगन्तव्यम् । एवमनभ्युपगमे दण्डमाह- 'तदण्णहा न पवत्तेजत्ति, यदि प्रथमसमयादेव मनसोऽथग्रहणं नेष्यते तदा तस्य मनस्त्वेन प्रवृत्तिरेव न स्यादनुत्पत्तिरेव स्यादि- त्यर्थः, यथा भाषाऽवध्यादीनां भाषमाणावबुद्धथमानलक्षणान्वर्थमुपादायैव प्रवृत्तिस्तथा प्रथमसमयादारभ्य मननलक्षणान्वर्थ- मुपादायैव मनस्त्वेन मनसः प्रवृत्तिः, अन्यथा न स्यादेव मनोऽवध्यादिवत्, तस्मादर्थानुपलब्धिसमयाभावान तस्य व्यञ्जनावग्रहः, श्रोत्रादीन्द्रियव्यापारकाले व्यञ्जनेऽतीत एव मनसो व्यापार इत्यत्राऽऽगमस्यापि संवादः । तदुक्तं कल्पभाष्ये-"अस्थाणं- तरचारी, चित्तं निययं तिकालविसयंति ॥ अत्थे उ पडप्पन्ने, विणिओगं इंदियं लहइ ॥१॥" अर्थे-शब्दादौ श्रोत्रादीन्द्रियव्यञ्जना- वग्रहेण गृहीतेऽनन्तरमावग्रहादारभ्य चरति प्रवर्तते इत्यर्थानन्तरचारि मनः, न तु व्यञ्जनावग्रहकाले तस्य प्रवृत्तिरिति भावा, "त्रिकालविषयं चित्तं,साम्प्रतकालविषयं त्विन्द्रियम्" ॥ २४२-२४३ ॥ अनसोऽर्थानुपलब्धिकालासम्भवं सयुक्तिकं भावयन्नाह- नेयाउ चिय जं सो, लहइ सरूवं पईवसहव्व ॥ तेणाजुत्तं तस्सा-संकप्पियव्वंजणग्गहणं ॥ २४४ ॥ व्याख्या-यस्माज्ञयादेव चिन्तनीयवस्तुन एन मनः स्वरूपं लभते नान्यतः, तस्माद्यदि प्रथमसमयमेव तज्ज्ञेयं नावगच्छेत् तर्हि ततो जेयादुत्पचिरप्यस्य न स्यात्, मनुते मन्यते वा अन इत्येनं सान्वर्धक्रियावाचकशब्दाभिधेयस्य मनसः, प्रदीपयतीति पाठः) मतिनिरूप- णे व्यञ्जना- वग्रहप्रस्तावे मनसोप्रा- प्यकारित्वं मनःशब्दा- न्वर्थनिरू- पणेनागम- संवादेनच निष्टङ्कितम॥ CHURN TREN

सविवरणं
श्रीजाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥४९॥
प्रदीपः, शब्दयति भाषत इति शब्दः, दहतीति दहनः, तपतीति तपनः इत्येवं सान्वर्थक्रियावाचकशब्दाभिधेयप्रदीपादे' प्रदी-
पनादिलक्षणार्थक्रियां कुर्वत एवात्मलाभो नान्यथा, तद्वन्मननादिक्रियां कुर्वत एवात्मलाभः, यथा च प्रदीपस्याप्रदीपनं भाषा-
याश्चाशन्दनमयुक्तं तथा मनसोऽप्यमननमयुक्तं, तेन कारणेन असङ्कल्पितशब्दादिविषयभावपरिणतद्रव्यलक्षणव्यञ्जनग्रहणं
मनसोऽयुक्तम्, किन्तु सङ्कल्पितानामेवार्थावग्रहद्वारेणावगतानामेव शब्दादिद्रव्याणां ग्रहणं युक्तम्,अतोऽर्थानुपलब्धिकालासम्भ-
वान्न मनसो व्यञ्जनावग्रहसम्भव इति ॥२४४॥
उक्तरीत्या नयनमनसोरप्राप्यकारित्वे विस्तरेण प्रसाधितेऽपि नयनस्याप्राप्यकारित्वे दूषणम्पश्यन्पर आह-
जइ नयणिन्दियमपत्त-कारि सव्वं न गिण्हए कम्हा? ॥ गहणागहणं किं कय-मपत्तविसयत्तसामन्ने ॥२४५॥
व्याख्या-यदि नयनेन्द्रियमप्राप्तकारि, तर्हि सर्वमपि त्रिभुवनान्तर्वर्ति वस्तुनिकुरम्बं कस्मान्न गृह्णाति, अप्राप्तत्वस्य
सन्निहित इवान्यत्राप्यविशिष्टत्वात्, अप्राप्तविषयत्वसामान्ये सति कस्यचिद्वस्तुनो ग्रहणं कस्यचिद्वस्तुनोग्रहणमित्येवं ग्रहणा-
ग्रहणं किं कृतं स्यात्, प्राप्यकारित्वे तु येन सह सम्बन्धस्तस्य ग्रहणं येन च तदभावस्तस्यात्रहणमित्युपपद्यत इति ।।२४५॥
तस्मादप्राप्यकारित्वपक्षे चक्षुषो विषयपरिमाणनियमाभाव आपद्यत इत्याह-
[॥२४६॥
विसयपरिमाणमनियय-मपत्तविसयंति तस्स मणसोव्व।। मणसोवि विसयनियमो,न कमइ जओ स सव्वत्थ
व्याख्या-तस्य चक्षुषोऽपरिमितं विषयपरिमाणं प्राप्नोति, अस्यां प्रतिज्ञायां हेतुमाह,अप्राप्तविषयमिति कृत्वा, मनस इवेति
दृष्टान्तः, अत्रानुमानप्रयोग इत्थम्, यदप्राप्तमपि विषयं परिच्छिनत्ति, न तस्य तत्परिमाणं युक्तम्, यथा मनसः, अप्राप्तञ्च-
FFAGAUR
मतिनिरू.
पगे व्यञ्चना-
वग्रहप्रस्तावे
चक्षुर्मनसोर-
प्राप्यकारि-
त्वेव्यवस्था-
फ्तेिपिमनो.
दृष्टान्तेनचः
क्षुषोपिविष---
यमानाभावा
पत्तिरितिप-
रोक्तदोषदर्श-
नम् ॥
~
SCES
॥४९॥

विषयमवगच्छति चक्षुः, तस्मान्न तस्य तत्परिमाणं युक्तमिति । अत्र प्रतिज्ञाहेत्वोरनुपदर्शनश्चावयवत्रयवादिनो मीमांसका- दयोऽप्यत्र चक्षुषः प्राप्यकारित्वमभ्युपगच्छन्तो वादितां बिभ्रतीत्यभिप्रायेण, याद नैयायिकोऽत्र वादी भवेत्तदा चक्षुर्न नियत- विषयपरिमाणं स्यादिति प्रतिज्ञा, अप्राप्तविषयपरिच्छेदकत्वादिति हेतुथोपदर्शनीयौ, अप्राप्तविषयपरिच्छेदकत्वलक्षणहेतुमतोऽपि मनसो नियतविषयपरिमाणत्वेन तदभावलक्षणसाध्यवैकल्यादुक्तानुमाने मनसो दृष्टान्तता न सम्भवतीति सूरिरुत्तरयति-मनसो दृष्टान्तीकृतस्याप्राप्तकारिणो विषयनियमोऽस्त्येव, यतस्तदपि मनः सर्वेष्वर्थेषु न क्रामति न प्रसरतीति ॥२४६॥ एतदेवोपदर्शयति- अत्थगहणेसु मुज्झइ, संतेसु वि केवलाइगम्मेसु ॥तं किं कयमग्गहणं, अपत्तकारित्तसामन्ने ॥ २४७ ॥ व्याख्या-अर्था एव मतेर्दुष्प्रवेश्यत्वाद् गहनानि अर्थगहनानि,तेष्वनन्तेषु,सत्स्वपि विद्यमानेष्वपि,केवलज्ञानावध्याऽऽगमादि- गम्येषु कस्यचिन्मन्दमतेर्मनो मुह्यति कुण्ठीभवति,तान्सतोऽप्यर्थान् न गृह्णातीति तात्पर्यम् , तदेतदर्थानां मनसोऽग्रहणं किं कृतम् , अप्राप्तकारित्वसामान्ये तुल्येऽपि,इति परम्प्रति सरेः पृच्छा, तस्मात्साध्यविकलो दृष्टान्त इति ॥२४७॥ अप्राप्तत्वाविशेषेऽपि यत एव कारणाद्विषयपरिमाणनियमं मनसि परो ब्रूयात्तत एव चक्षुष्यपि विषयपरिमाणनियमस्सूपपाद इत्याशयवान् सरिराह-:: कम्मोदयओ व सहा-वओ व नणु लोयणे वि तं तुल्लं ॥तुल्लो व उवालंभो, एसो संपत्तविसए वि ॥२४८॥ व्याख्या-यत्केपाश्चिदर्थानां मनसोऽग्रहणं तत् तदावरणकर्मोदयाद्वा, स्वभावाद्वा, इति परो ब्रूयात् , नन्वेतल्लोचनेऽपि तुल्यम् , यतस्तदप्यमाप्यकारित्वे तुल्येऽपि कमोदयात् , तत्स्वाभाव्याद्वा कांश्चिदेवार्थान् गृह्णाति न सर्वानिति न परोक्तदूषणम् , अथवा “यत्रोभयोस्समो दोषः,परिहारोऽपि वा समः। नैकापर्यनुयोज्यः स्यात, तादृश्यर्थविचारणे ॥१॥” इति वचनात् चक्षु- ARSA (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव ग्रहप्रस्तावे- चक्षुषोप्राप्य- कारित्वे परो- क्तदूषणान्तः पतिमनो- दृष्टान्तेऽपि विषयनियम- सद्भावेनास- इतिनिरूप- णम् ॥ N

सविवरण
श्रीमाना-
नव-
प्रकरणम्॥
॥५०॥
CLESS
मनसोः प्राप्यकारित्वमभ्युपगच्छतो मते चक्षुषाऽतिसम्प्राप्ताञ्जनादेः किमिति न ग्रहः मनसैकदैव सम्प्राप्तानां घटपटादीनां
किमिति न ग्रहो मेवादेरतिव्यवहितस्यापि ग्राहकस्य मनसो न कुत्राप्यसम्प्राप्तिरिति दोषोद्धाराय कर्मोदयस्य स्वभावस्य वा
प्रतिनियतग्रहणे नियामकत्वं परेण तदुभयप्राप्यकारित्ववादिना वाच्यं तन्नयनस्याप्राप्यकारित्ववादिनाऽपि वक्तुं शक्यमेवेति
दोपपरिहारयोस्समत्वेन नात्र वादिना यत्नो विधेय इति भावः ॥ २४८ ॥ ततश्च यद्वयवस्थितं तदाह-
सामत्थाभावाओ, मणोव्व विसयपरओन गिण्हेइ ॥ कम्मक्खओवसमओ, साणुग्गहओ य सामत्थम् ॥२४९॥
व्याख्या-चक्षुः सिद्धान्तनिर्दिष्टनियतविषयपरिमाणात्परतो न गृह्णातीति प्रतिज्ञा, सामर्थ्याभावादिति हेतुः, मनोवदिति
दृष्टान्तः,तदावरणकर्मक्षयोपशमात्स्वानुग्रहतश्च सामर्थ्य येवप्राप्तेष्वर्थेषु चक्षुषस्समस्ति तेषामप्राप्तानामपि चक्षुषा ग्रहणम्, येषु
चाप्राप्तेषूक्तसामर्थ्य नास्ति तेषां चक्षुषा न ग्रहणमित्यर्थापत्त्या लभ्यते, अनुग्रहश्च चक्षुषो रूपालोकमनस्कारादिसामग्रीतो भवति,
तस्माद्व्यवस्थितमप्राप्यकारित्वं नयनमनसो, स्पर्शनादीनां चतुर्णामेवेन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रह इति तस्य चतुर्विधत्वम् ॥ २४९ ॥
व्यञ्जनावग्रहस्य स्वरूपं नन्द्यध्ययनागमसूत्रे प्रतिबोधकमल्लकोदाहरणाभ्यां "वंजणोग्गहस्स परवणं करिस्सामि पडिबोह-
गदिद्रुतेण मल्लगदिट्टतेण य" इत्यारभ्य "जाहे तं वंजणं पूरिय होइ, ताहे हुँ ति करेइ, नो चेव णं जाणाइ के वेस सद्दाइ
इत्यन्तग्रन्थेन प्रतिपादितं,तदेवमस्य व्यञ्जनावग्रहस्वरूपप्रतिपादकस्य नन्दिसूत्रस्य शेषप्रायः सुगममिति मन्यमानो भाष्यकार:
'जाहे तं वंजणं पूरियं होइ" इत्येतद्व्याचिख्यासुराह-
तोएण मल्लगं पिव, वंजणमापूरियं तिजं भणियं ॥ तं दवमिंदियं वा, तस्संजोगो व न विरुद्धम् ॥२५०॥
ALLARSANELECTRESS
मतिनिरूपणे
व्यञ्जनावा-
•हप्रस्तावे
मनोविषय-
नियमत्वे प-
राभिप्रेतहे-
त्वोत्रेपि स.
मत्वेन परदो-
षपरिहारः,
नयनमनसो-
विना व्यज-
नावग्रहचतु-
विधत्वनि-
ष्टड्कनम्॥
"
RECTRESS
॥ ५० ॥

(योजित:पा- ठ:) मतिनि- व्याख्या-'जं भणियं' यदुक्तं नन्दिसूत्रकारेण, किं तत्, इत्याह, व्यञ्जनमापूरितमिति, केन किंवत् , इत्याह-तोयेन जलेन मल्लकं शरावं तद्वदिति, तस्मिन् सूत्रकारभणिते व्यञ्जनं द्रव्यं गृह्यते, इन्द्रियं वा, तयोर्वा द्रव्येन्द्रिययोः संयोगः सम्बन्धः, इति सर्वथाऽप्यविरोधः, त्रिष्वपि व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनमित्यस्या व्युत्पत्तेर्घटनात् ॥२५०॥ व्यञ्जनशब्दवाच्येषु त्रिष्वपि द्रव्यादिषु प्रत्येकमापूरितत्वे विशेषमुपदर्शयति- दव्वं माणं पूरिय-मिंदियमापूरियं तहा दोण्हं ॥ अवरोप्परसंसग्गो, जया तया गिण्हइ तमत्थं ॥२५१॥ व्याख्या-दव्वंति,द्रव्यव्यञ्जनेऽधिकृते 'जाहे तवंजणं पूरिय होइ' इत्यस्यार्थः शब्दादिद्रव्यस्य प्रमाणं प्रतिसमयप्रवेशेन प्रभूती- कृतत्वात् स्वप्रमाणमानीतं प्रकर्षमुपनीतं स्वग्राहकज्ञानोत्पादे समर्थीकृतमिति यावत्,अथेन्द्रियमितीन्द्रियव्यञ्जनेऽधिकृते तु तदर्थः तदा पूरित व्याप्तं भृतं वासितमित्यर्थः, द्वयोः द्रव्येन्द्रिययोः सम्बन्धलक्षणव्यञ्जनेऽधिकृते पुनः, तयोः परस्परं सम्यक्सम्बन्ध इति तदर्थः, द्रव्येन्द्रियसम्बन्धलक्षणव्यञ्जनपक्षे द्रव्येन्द्रिययोः परस्परमतीवसंयुक्तता वा अङ्गाङ्गीभावेन परिणाम एव सम्बन्धलक्षणव्यञ्जन- स्यापूरणम्, यदोक्तप्रकारत्रयेण त्रिविधमपि व्यञ्जनमापूरितं भवति, तदा तं नामजात्यादिकल्पनारहितं विवक्षितं शब्दाद्यर्थ गृह्णाति, एतच्च 'ताहे हुं ति करेइ' इत्यस्य व्याख्यानं, अयमेवार्थावग्रह एकसामयिका, व्यञ्जनावग्रहस्तु द्रव्यप्रवेशादिरूपत्वादान्तौहूर्तिकः इति ।। २५१ ॥ अर्थावग्रहो यादृशमर्थ गृह्णाति तमुपदर्शयति- सामन्नमणिद्देसं, सरूवनामाइकप्पणारहियं ॥ जइ एवं जं तेणं, गहिये सद्देत्ति तं किह णु ॥ २५२ ॥ व्याख्या सामान्यविशेषात्मकस्य वस्तुनो रूपादेः स्वरूपनामजातिगुणक्रियाद्रव्यकल्पनारहितत्वेन शब्दानभिलाप्यं सामा- रूपणे व्यञ्ज- नावग्रहप्र- स्तावे नन्दिसूत्रो- तपाठपठित- व्यञ्जनशब्द- स्य भाष्यकार व्याख्यानेन द्रव्येन्द्रियस- म्बन्धरूपत्रि विधवाच्यत्व CREATILK प्रदर्शनम् ॥

(योजितःपा-
ठः) मतिनि.
सविवरणं
भीलाना-
नव-
प्रकरणम्।।
॥ ५१ ॥
13
रूपणे अर्था-
वग्रह वि-
षयनिरूपणं
न्यरूपमवैकसामयिकत्वेन विशेषग्रहणाऽसमर्थोावग्रहो गृह्णाति, एवमुक्ते पर आह-यद्येवं व्याख्यायते भवद्भिः तर्हि यन्नन्द्य-
ध्ययनसूत्रे प्रोक्तं "तेणं गहिये सद्देत्ति" उपलक्षणत्वादित्थं सम्पूर्ण द्रष्टव्यम्-“से जहा नामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणेजा
तेणं सद्देत्ति उग्गहिए, न उण जाणइ के वेस सद्दाइत्ति" 'तं किह णु त्ति' तदेतत्कथमविरोधेन नीयते, उपदर्शितनन्दिसूत्रे तन
प्रतिपत्राऽर्थावग्रहेण शब्दोऽवगृहीत इति प्रतिपाद्यते भवद्भिस्तु शब्दाद्युल्लेखरहितं सामान्यमवगृह्णातीत्युच्यत इति विरोधः स्पष्ट
एवेति भावः ॥ २५२ ॥ अत्रोत्तरमाह-
सद्दे त्ति भणइ वत्ता, तम्मत्तं वान सद्दबुद्धीए ॥ जइ होइ सद्दबुद्धी, तोऽवाओ चेव सो होजा ॥ २५३ ॥
व्याख्या-शब्दस्तेनावगृहीत इति यदुक्तं तत्र शब्द इति वक्ता प्रज्ञापकः सूत्रकारो वा भणति प्रतिपादयति अथवा तन्मानं
शब्दमात्रं रूपरसादिविशेषव्यावृत्त्याऽनवधारितत्वाच्छब्दतयाऽनिश्चितं गृह्णातीति, एतावतांशेन शब्दस्तेनावगृहीत इत्युच्यते, न
पुनः शब्दबुद्धथा, शब्दोऽयमित्यध्यवसायेन तच्छब्दवस्तु तेनावगृहीतं, शब्दोल्लेखस्यान्तर्मुर्तिकत्वात्, अर्थावग्रहस्य त्वेकसा-
मयिकत्वादसम्भन इति भावः, यदि भवति शब्दबुद्धिरावग्रहे शब्दनिश्चयस्स्यात्, तदा, अपाय एवासौ भवेत् , न त्वर्थावग्रहः,
निश्चयस्यापायरूपत्वात्, एवं सत्यर्थावग्रहेहयोरभाव एव स्यात्, न चैवं दृष्टमभ्युपगम्यते वा ॥ २५३ ॥
ननु प्रथमसमय एव शब्दोऽयमिति ज्ञानमविग्रहः, ततः माधुर्यादयः शङ्खशब्दधर्मा इह घटन्ते न तु खरकर्कशत्वादयः
शार्ङ्गधर्मा इति विमर्शबुद्धिरीहा, तस्माच्छाल एवायं शब्द इत्यपाय इत्येवमभ्युपगमेनावग्रहेहयोरभावप्रसङ्गः 'तेणं सद्देत्ति
उग्गहिए' इति यथाश्रुतार्थक एवोपपद्यते 'नो चेव णं जाणइ ' इत्यादिरप्यविरोधः, इत्येतत्परोक्तमन्द्य मरिर्दूषयति-
तत्रपरकृत-
विरोधाश-
कापरि.
हारश्च ॥
HAGENCRE
45969
॥५१॥

( योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रह- विषयनिरू- पणे पुनःपर- जइ सहबुद्धिमत्तय-मवग्गहो तब्बिसेसणमवाओ॥ नणु सदो नासद्दो, न य रूवाई विसेसोऽयम् ॥ २५४ ॥ व्याख्या-यदि शब्दोऽयमिति निश्चयज्ञानमप्यवग्रहः शाल एवायं शब्द इत्यादिविशेषज्ञानमवायो भवताऽङ्गीक्रियते, तर्हि मतिज्ञानस्य प्रथमभेदोऽवग्रहो न स्यादेव, विशेषज्ञानस्यापायरूपतया भवताऽपि स्वीकृतत्वेन शब्दोऽयमिति निश्चयस्य शब्द- वलक्षणविशेषग्राहकत्वेनापायत्वस्यैव भावात् , यथा च शब्दत्वस्यावान्तरसामान्यरूपतया शाहत्वादिकं विशेष इति तज्ज्ञानस्या- पायता, यतः शासत्वेनाशाङ्क्षव्यवच्छेद इति कृत्वा शाङ्खत्वं विशेष इति, तथैव महासामान्यस्यावान्तरसामान्यतया शब्दत्वादिक- मपि विशेषस्तेनापि नाशब्दो न रूपादिरयमित्येवमन्यविशेषव्यावृत्तिः क्रियत इति तज्ज्ञानस्यापायतैवेत्याह-'नणु' इत्यादि, नन्वित्यक्षमायां, परामन्त्रणे वा, शब्दत्वस्य रूपत्वादिना विरोधातन्निश्चयेन रूपादिरिति निश्चयस्यावश्यम्भावादित्याह-न च रूपादिरिति रूपादिव्यावृत्तिनिश्चयबलादेव रूपोऽयमिति निश्चयस्ततो नारूपोऽयमिति निश्चयस्ततोऽपायत्वेऽस्य निणींतेऽवग्रहा- भावप्रसङ्गः, अवग्रहत्वेन कक्षीकृतस्यापायत्वस्यैव भावादिति भावः ॥ २५४ ॥ स्तोकविशेषग्राहकत्वेन शब्दोऽयमिति निश्चयस्यावग्रहत्वं ततोऽधिकविशेषग्राहकत्वेन शाङ्क्ष एवायमितिनिश्चयस्यापायत्वमित्ये- वमवग्रहापाययोपियविभागमवलम्ब्यावग्रहसमर्थनं यदि परः कुर्यात्तदा शाङ्खोऽयमितिनिर्णयस्यापि तदुत्तरोत्तरमन्द्रमधुरत्वादि- तरुण-मध्यम-वृद्ध-स्त्री-पुरुषसमुत्थत्वावगाहिनिर्णयापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वमेव स्यादित्यपायाभावप्रसङ्ग इत्याह- थोवमियं नाऽवाओ, संखाइविसेसणमवाओ त्ति ॥ तब्भेयावेक्खाए, नणु योवमेवे त्ति नावाओ ॥ २५५ ॥ अवतरणावेदितार्थेय गाथेति ॥ २५५ ॥ उत्तरज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहिणो निर्णयस्यावग्रहत्वाभ्युपगमे उत्तरोचरज्ञान- कृतयुक्त्या- Sपायाभावा- पत्तिदोषोप- दर्शनम् ॥ ARRESAR

सविवरण
HIS
RECE
श्रीज्ञाना
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥५२॥
स्यापि तदुत्तरोत्तरज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वप्राप्तौ विशेषाणामनन्तत्वेन यदपेक्षयोचरविशेषो न भवत्येवेत्यस्या-
सम्भवेनोत्तरोत्तरविशेषनिर्णयेऽपि तदुत्तरोत्तरविशेषाकासायास्सद्भावतोऽन्तिमविशेषावगमोऽयमेवेति निर्णयस्य कर्तुमशक्यत्वेन
शाङ्खोऽयमित्यादिज्ञानानामपि स्वोत्तरविशेषग्राहिज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वेऽपायाभावप्रसङ्गस्सुस्पष्ट एवेत्याह-
इय सुवहुणावि काले-ण सव्वभेयावहारणमसज्झं ॥ जम्मि हवेज अवाओ, सव्वो चिय उग्गहो नाम ॥२५६॥
व्याख्या-इति शब्द उपदर्शनार्थः, यथा शाह्वोऽयं शब्द इति बुद्धौ शब्दगतविशेषावधारणमिदानीमसाध्यं मन्द्रत्वाद्यु-
त्तरोत्तरबहुविशेषसद्भावात् , तेन स्तोकविशेषग्राहित्वेनेयं नापायः किन्त्ववग्रहस्तथा सुबहुनापि कालेन सर्वेणापि पुरुषायुषा शब्दगत-
मन्द्रत्वाद्युत्तरोत्तराविशेषावधारणं तद्भेदानामनन्तत्वेनासाध्यं, यस्मिन्विशेषावधारणेऽन्यविशेषाकाङ्क्षानिवृत्त्या पायत्वम्भवेत, तस्मा-
त्सर्वोऽपि विशेषावगम उत्तरोत्तरापेक्षया स्तोकत्वाद्भवदभिप्रायेणार्थावग्रह एव स्याच्छब्दोऽयमिति निश्चयवन्नापाय इति ॥२५६॥
अथ शब्द एवायमितिज्ञानमर्थावग्रहतया परसम्मतमपि तदीहापूर्वकमेव ततो नास्यार्थावग्रहत्वसम्भव इत्याह-
किं सद्दो किमसद्दो-त्तणीहिए सद्द एव किह जुत्तं ॥ अह पुवमीहिऊणं, सद्दोत्ति मयं तई पुव्वं ॥ २५७ ॥
व्याख्या-किं शब्दोऽयम्, आहोस्वित्र अशब्दो रूपादिः,इत्येवं पूर्वमनीहितेऽकस्मादेव शब्द एवेति निश्चयज्ञानं कथं युक्तम् ,
विमर्शपूर्वकस्य तस्य तमन्तरेण न सम्भवः, अन्यव्यावृत्तिग्रहणे सत्येव विशेषरूपेण निश्चयः, अन्यव्यावृत्तिग्रहणञ्च न विमर्श विना
विमर्शश्वेहेति, अथ निश्चयकालात्पूर्वमीहित्वा शब्द एवायमिति निश्चयज्ञानं भवतोऽप्यभिमतं तर्हि निश्चयज्ञानात्पूर्वमीहा भवद्वच-
नतोऽपि सिद्धा ॥ २५७ ॥ ततः किमित्यपेक्षायामाह-
(योजित:
पाठः)
मतिनिरूपणे
अर्थावग्रह-
विषयनिरू-
पणे शङ्काप-
रिहारादिप्र-
दर्शनम् ॥
२%
REARROCCASEX
॥५२॥

किं तं पुव्वं गहिय, जमीहओ सद्द एव विण्णाणं ॥ अह पुव्वं सामण्णं, जमीहमाणस्स सहोत्ति ॥२५८ ॥ व्याख्या-शब्द एवायमिति निश्चयस्येहापूर्वकत्वे त्वयाऽभ्युपगते तत्र वक्तव्यं किमीहायाः पूर्व तद्वस्तु प्रमात्रा गृहीतं यस्मिन्नीहिते शब्द एवायमिति निश्चयप्रवृत्तिः ज्ञात एव वस्तुनि भवतीहा नाज्ञात इत्याशयः, उत्तरदानेऽसमर्थे परे स्वयमेवो- त्प्रेक्ष्य तन्मतमाशङ्कते, अथ-ब्रूयात्परः सामान्यं नामजात्यादिकल्पनारहितं वस्तुमात्रमीहायाः पूर्व गृहीतं, यदीहमानस्य शब्द इति निश्चयज्ञानमुत्पद्यत इत्यर्थः ॥ २५८ ॥ अत्र सूरिः स्वसमीहितसिद्धिमुपदर्शयन्नाह- अत्थोग्गहओ पुव्वं, होयब्वं तस्स गहणकालेणं ॥ पुव्वं च तस्स वंजण-कालो सो अत्थपरिसुण्णो ॥२५९॥ व्याख्या-ईहायाः पूर्व यत्सामान्यग्रहणन्तदस्मन्मतेऽर्थावग्रह एकसामायिकः तस्य कालो य एकसमयस्तेनैव ग्रहणकालेन भवताऽपि सामान्यग्रहणकालस्य व्यवहृतावस्मन्मतसिद्धार्थावग्रह एव भवतोऽप्यभिमत इति न शब्दोऽयमिति ज्ञानस्यार्थावग्रह- त्वं स्यादतस्तदनुरोधेनास्मदभिमतार्थावग्रहात्पूर्वमेव भवदभिमतेन ईहायाः पूर्व गृह्यमाणस्य सामान्यस्य ग्रहणकालेन भवितव्यं, अस्मदभिमतार्थावग्रहस्य पूर्व व्यञ्जनकालः व्यञ्जनानां शब्दादिद्रव्याणामिन्द्रियमात्रेणादानकाला, सोऽर्थपरिशून्यः न हि तत्र सामान्यरूपो विशेषरूपो वाऽर्थः प्रतिभाति, तदा मनोरहितेन्द्रियमात्रव्यापारात्, अत ईहायाः पूर्व यत्सामान्यग्रहणमर्थावग्रहत्वे- नास्माभिरुपेयते तत्तथैव भवताऽप्युपेयमिति, तस्यार्थावग्रहत्वे सिद्ध शब्द एवायमिति निर्णयस्यान्वयव्यतिरेकधर्मपर्यालोचनरूपेहो- तरकालभाविनोऽपायत्वमिति ॥२५९ ॥ " न उण जाणइ के वेस सद्दोति" इति नन्दिसूत्रानुरोधाच्छब्दोऽयमिति ज्ञानं प्रथ- मतोऽभ्युपगमनीयमेव अन्यथा तथा सूत्रनिर्दिष्टस्यायुक्तत्वं स्यादित्याशयेन पर आह- (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रह- विषयनिरू- पणे पररूता- रेकापरिहा- रादिप्ररू- पणम् ॥

सविवरण
भीझाना-
व-
प्रकरणम्।
॥ ५३॥
KARNERBSTERS
जह सदोत्ति न गहियं, न उजाणइ जंक एस सदोत्ति ॥ तमजुत्तं सामण्णे, गहिए मग्गिजइ विसेसो ॥२६०॥
व्याख्या-यदि प्रथममेव शब्दोऽयमित्येवं तद्वस्तु न गृहीत, तर्हि ‘न उण जाणइ के वेस सदोत्ति' इति यत् नन्दिसूत्रे
निर्दिष्टं तदयुक्तं, यतः शब्दसामान्ये रूपादिव्यावृत्ते गृहीते सति पश्चान्मृग्यतेऽन्विष्यते विशेषः, 'किमयं शब्दः शाङ्खः उत शार्ङ्ग
इति, 'न उण' इत्यादिना सूत्रे विशेषस्यैवापरिज्ञानमुक्तं, शब्दसामान्यमात्रग्रहणं त्वनुज्ञातमेव, सामान्याग्रहणे विशेषमार्गणासम्भवात्,
विशेपजिज्ञासायां सामान्यज्ञानस्य कारणत्वात् ।। २६० ॥ अत्रोत्तरमाह-
सब्वत्थ देसयंतो, सद्दो सहोत्ति भासओ भणइ॥ इहरा न समयमेत्ते, सद्दोत्ति विसेसणं जुत्तम् ।। २६१॥
व्याख्या-सर्वत्र पूर्वस्मिन् अत्र च सूत्रावयवे, अवग्रहखरूपं प्ररूपयन् भाषकः प्रज्ञापक एव शब्दः शब्द इति वदति, न
त्ववग्रहे शब्दप्रतिभासोऽस्ति, अन्यथा समयमात्रेऽवग्रहकाले शब्द इति विशेषणं न युक्तम्, शब्दनिश्चयस्यान्तर्मुहूर्तिकत्वात्,
सांव्यवहारिकार्थावग्रहमाश्रित्य वा सूत्रमिदं व्याख्यास्यते ॥ २६१ ॥ सूत्रावलम्बिनम्प्रति सौत्रमेव परिहारमाह-
अहव सुए चिय भणियं, जह कोइ सुणेज्ज सद्दमब्वत्तं ॥ अव्वत्तमणिद्देसं, सामण्णं कप्पणारहियं ॥२६२॥
व्याख्या-अथवा सूत्र एव भणितं प्रथममव्यक्तस्यैव शब्दोल्लेखरहितस्य शब्दमात्रस्य ग्रहणम्, तत्प्रतिपादकसूत्रावयवमुल्लि-
खति-जह कोई सुणेज सदमव्यत्तं 'ति अस्य नन्द्यध्ययन इत्थमुपन्यासः " से जहा नामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणे-
ज्जत्ति" तत्राव्यक्तमित्यनिर्देश्य, तदपि सामान्यं, तच्च नामजात्यादिकल्पनारहितम्, शाखशाङ्गभेदापेक्षया शब्दोल्लेखस्याप्य-
व्यक्तत्वमिति नाशङ्कनीयं, सूत्रेऽवग्रहस्यानाकारोपयोगरूपतयैव भणनात्, अनाकारोपयोगो हि सामान्यमात्राविषयक एव,
(योजितः
पाठः)
मतिनिरूपणे
अर्थावग्रह-
विषयनिरू-
पणे परकृता-
रेकापरिहा-
रादिप्ररू-
पणम् ॥
॥ ५३ ॥

( योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रह- विषयनिरू- पणे परकृता- किञ्च शब्दोऽयमित्यस्य प्रथममेव स्वीकारे तस्यापायरूपत्वेन तत्पूर्वानियतयौरवग्रहहयोरभावप्रसङ्ग इत्यस्य पूर्वमुपदर्शितत्वाच न प्रथमं तस्य भावः ॥ २६२ ॥ अथ सूरिरुत्प्रेक्ष्य पराभिप्रायमाशङ्कते- अहव मई, पुवंचिय, सो गहिओ वंजणोग्गहे तेणं । जं वंजणोग्गहम्मि वि, भणियं विण्णाणमब्वत्तं ॥२६३॥ व्याख्या--अथवा परस्यैषा मतिः यदुत सोऽव्यक्तोऽनिर्देश्यादिस्वरूपः शब्दोविग्रहात्पूर्वमेव व्यञ्जनावग्रहे तेन श्रोत्रा गृहीतः, यस्माद्व्यञ्जनाऽवग्रहेऽपि भवद्भिरव्यक्तं विज्ञानमुक्तम्, ज्ञानस्याव्यक्तता चाव्यक्तविषयग्रहण एवोपपद्यत इति भावः ॥ २६३ ।। अत्रोत्तरमाह- अत्थि तयं अब्बत्तं, न उतं गिण्हइ सयपि सो भणियं ॥न उ अग्गहियम्मि जुज्जइ,सहोत्ति विसेसणंबुद्धी २६४ व्याख्या--अस्ति श्रोतुर्व्यञ्जनावग्रहे, तद्,अव्यक्तं ज्ञानं, न पुनरसौ श्रोताऽतिसौक्ष्म्यात् तत् स्वयमपि गृह्णाति संवेदयते, एतच प्रागपि भणितम् “ सुत्त-मत्ताइसुहुमबोहोव्व " इति वचनात्, तथा, “सुचादओ सयं पि य विन्नाणं नावबुझंति" इति वचनाच, तस्माद्वयञ्जनमात्रस्यैव तत्र ग्रहणं, न शब्दस्य, व्यञ्जनावग्रहत्वान्यथानुपपत्तेरेव, न च सामान्यरूपतयाऽव्यक्ते शब्दे- ऽगृहीतेऽकस्मादेव शब्दः इति विशेषणबुद्धिर्युज्यते,अनुस्वारस्यालाक्षणिकत्वं,अस्याः प्रथमतो भावेऽवग्रहकालेऽप्यपायप्रसङ्गः।२६४ व्यञ्जनावग्रहेऽव्यक्तशब्दरूपार्थभाने दोषमुपदर्शयति- अत्थो त्ति विसयगहणं,जइ तम्मिवि सोन बंजणं नाम ॥ अत्थोग्गहो चिय तओ,अविसेसोसंकरो वावि।।२६५॥ व्याख्या-अर्थावग्रहे अर्थ इत्यनेन विषयस्य रूपादिभेदेनानिर्धारितस्याव्यक्तस्य शब्दादेग्रहणममिप्रेतम् , यदि च तस्मि- रेकापरिहा- रादिप्ररू- पणम् ॥ + NE

सविवरणं
श्रीवाना-
नव-
प्रकरणम् ॥
॥५४॥
(योजितः
पाठः)
मतिनिरूपणे
अर्थावग्रह-
विषयनित
पणे परता
RECCAL
नपि व्यञ्जनावग्रहेऽसावन्यक्तशब्दः प्रतिभासत इत्यभ्युपगम्यते, तदा न व्यञ्जनं नाम व्यञ्जनावग्रहो न स्यादित्यर्थः, एवञ्च
व्यञ्जनावग्रहकथैचोच्छिद्येत, व्यञ्जनमात्रसम्बन्धस्यैव तत्रोक्तत्वात् , भवता तु तत्राव्यक्तशब्दरूपार्थग्रहणस्याभिधीयमानत्वात् ,
अव्यक्तशब्दग्रहणेत्वसावावग्रह एव, एवमपि स्त्रोक्तत्वाद् व्यजनावग्रहत्वे द्वयोरपि व्यञ्जनार्थावग्रहयोरविशेष: स्यात्, मेचक-
मणिप्रभावात्सङ्करो वा स्यादिति ॥ २६५ ॥ एतावता व्यञ्जनावग्रहे व्यञ्जनसम्बन्धमात्रम्, अर्थावग्रहे त्वव्यक्तशब्दाद्यर्थस्यैव
ग्रहणं न तु व्यक्तशब्दाद्यर्थग्रहणमिति प्रतिपादितम् , इदानीमर्थावग्रहे युक्त्यन्तरेण व्यक्तशब्दाद्यर्थसंवेदनं निराकरोति-
जेणत्थोग्गहकाले. गणेहावायसंभवो नत्थि ॥ तो नधि सद्दबुद्धी, अहत्थि नावग्गहो नाम ॥२६६ ॥
व्याख्या-येनार्थावग्रहकाले क्रमोत्पित्सुस्वभावानामर्थग्रहणेहापायानां मतिज्ञानभेदानां सम्भवो नास्ति, ततोऽर्थावहे नास्ति
शब्द इति विशेषबुद्धिः, तस्या अपायरूपाया अर्थग्रहणेहापूर्वकत्वात् , अथास्त्यसौ तत्र, तर्हि नायमर्थावग्रहः किन्त्वपाय एव स्यात्,
तथाप्युपगमे त्वर्थावग्रहेहयोरभाव एव स्यात् ॥ २६६ ॥ अर्थावग्रहे शब्द इति विशेषबुद्धथुपगमे दोषान्तरमाह-
सामण्णतयण्णविसे-सेहा-वजण-परिग्गहणओ से ।। अत्थोग्गहेगसमओ-वओगबाहुल्लमावण्णं ॥ २६७ ॥
व्याख्या-अर्थावग्रहकसमये भवतोपगम्यमाना निश्चयरूपा शब्द इति विशेषबुद्धिरकस्मादनुपजायमानाऽव्यक्तशब्दसामान्य-
ग्रहणशब्दसामान्यविशेषशब्दान्यरूपादिविशेषधर्मालोचनलक्षणेहारूपादिविशेषधर्मपरिवर्जनशब्दविशेषधर्मपरिग्रहणतः श्रोतुरुपजा-
यत इत्यर्थावग्रहैकसमये उपयोगबाहुल्यमापन्नम्, न चैतद्युक्तम्, उपयोगयोगपद्याभावप्रतिपादकागमविरोधादिति नार्थावग्रहकाले
शब्द इति विशेषबुद्धिः किन्तु शब्द इति प्रज्ञापको भणतीति सिद्धम् ॥२६७॥अथास्मिन्नेवार्थावग्रहे परवाद्यभिप्रायं निराचिकीर्षुराह-
रेका परि-
हारादिप्ररू
पणम् ॥
HPUR
HARSING
॥ ५४॥

PRAK अण्णे सामण्णग्गह-णमाहु बालस्स जायमेत्तस्स।समयम्मि चेव परिचय-विसयस्स विसेसविन्नाणं॥२६८॥ अन्ये वादिन एवमाहुः-जातमात्रस्य तत्क्षणजातमात्रस्य बालस्य सङ्केतादिविकलत्वेनापरिचितविषयस्य सामान्यमात्रस्या- शेषविशेषविमुखस्याव्यक्तस्य सामान्यस्य ग्रहणमालोचनम्, परिचितविषयस्य तु, समय एवाद्यशब्दश्रवणसमय एव, विशेषविज्ञानं जायते, ततस्तमाश्रित्य "तेणं सद्दे ति उग्गहिये" इत्यादि यथाश्रुतमेव व्याख्यायते न कश्चिदोष इत्याशया२६८॥अत्रोत्तरमाह- तदवत्थमेव तं पुब्ब-दोसओ तम्मि चेव वा समये ॥ संखमहुराइसुबहुय-विसेसगहणं पसज्जेजा ॥२६९॥ 'जेणत्थोग्गहकाले 'इत्यादि 'सामण्णतयण्णविसेसेहा' इत्यादिग्रन्थोक्तपूर्वदोपतस्तदेतत्परोक्तं, तदवस्थमेव दूषितावस्थमेव, नान्यदूपणाभिधानप्रयासोऽत्राभिधेय इत्याशयः, वा अथवा, तस्मिन्नेव समये शब्दोऽयमित्येकोपयोगसमय एव शङ्खमधुरादि- सुबहुविशेषग्रहणं प्रसज्येत, 'न पुण जाणइ के बेस सद्दे' इतिसूत्रावयवस्य सर्वप्रमातृन्प्रत्यविशेषेण प्रवृत्तस्य विरोधेन कस्यचित्प्रथम- समये एव सर्वविशेषविषयकं ग्रहणम्भवत्येवेत्यम्युपगन्तुमशक्यमेव,शब्दरूपधर्मिग्रहणमन्तरेण प्रकृष्टमतेरप्युत्तरोत्तरबहुधर्मग्रहणत्वा- सम्भवादिति ।। २६९ ॥ एकसमये शब्दोऽयमितिविज्ञानमभ्युपगच्छन्तम्प्रति समयविरोधादिदोषान्तरमुपढौकयति- अत्थोग्गहो न समय,अहवा समओवओगबाहुल्लं॥ सव्वबिसेसरगहणं, सव्वा वि महरवग्गहो गिज्झो ॥२७०॥ एगो वाऽवाओ चिय, अहवा सोऽगहियणीहिए पत्तो ॥ उकाम-वइक्कमा वा पत्ता धुवमोग्गहाईणं ॥२७१॥ सामण्णं च विसेसो, सो वा सामण्णमुभयमुअयं वा ॥ न य जुत्तं सव्वमियं, सामण्णालंबणं मोत्तुं ॥२७२॥ विशेषविज्ञानस्यासङ्ख्येयसामयिकत्वेनार्थावग्रहे विशेषविज्ञानाभ्युपगमे “ उग्गहो एक्कं समयं " इति सिद्धान्तनिर्दिष्टः ॥ द्वितीयः तरङ्गः ॥ (योजिता पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रह- विषयक पर- कृतारेका- परिहारादि- प्ररूपणम् ॥ - १० ।

सविवरणं
मीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम्॥
॥ ५५॥
SISTER
सामयिकोऽसौ न स्यात्, अथवा " सामण्ण-तयण्णविसेसेहा ॥२६७॥" इत्यादिपूर्वग्रन्थोक्तं समयोपयोगवाहुल्यं खात्,
अथवा परिचितविषयस्य विशेषविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने परिचिततरविषयस्य तस्मिन्नेव सर्वविशेषग्रहणमनन्तरोक्तं प्रसज्येत,
अथवा सर्वाऽपि मतिरवग्रहो ग्राह्यः प्राप्तः स्यात्, विशेषविषयकत्वेन वा सर्वाऽपि मतिरपाय एव स्यात् , एवं सत्यपायस्यैक-
सामयिकत्वप्राप्तौ "ईहावाया मुहुत्तमन्तं तु" इति विरुध्यते । अथवा तथाऽभ्युपगमेऽनवगृहीतेऽनीहितेऽपायः प्राप्तः। एवश्वावगृहीते
ईहिते चाऽपाय इत्युपपादकस्य सिद्धान्तस्य विरोधा, अथवा पाटववैचित्र्येणावग्रहहाऽपायधारणानां ध्रुवमुत्क्रमव्यतिक्रमौ स्याताम् ।
'पश्चानुपूर्वीभवनमुत्क्रमः,' 'अनानुपूर्वीभावस्तु व्यतिक्रमः,' एवमुपगमे "उग्गहो ईहा अवायो य, धारणा एव होन्ति चत्तारि"
इति परममुनिनिर्दिष्टस्य तेषां क्रमस्य विरोधः स्यात्, तथा यत्प्रथमसमये गृह्यते स विशेष इतिनियमाऽभ्युपगमे सामान्य
विशेषस्स्यात् प्रथमसमये सामान्यस्यैव ग्रहणात् , अथवा प्रथमसमये सामान्यमेव गृह्यत इति वस्तुस्थितिमाश्रित्य भवन्मते
प्रथमसमये गृह्यमाणो विशेषः सामान्यं स्यात्, अथवा सामान्य विशेषश्चेत्युभयं, उभयं वा स्यात, सामान्य सामान्यविशेषोभयरूपं,
विशेषश्च सामान्यविशपोभयरूपः स्यात्, तथाहि, 'अव ईषत् सामान्यं गृह्णातीत्यवग्रह' इतिव्युत्पत्त्या वस्तुस्थितिसमायातं
यत्सामान्यं तत्स्वरूपेण तावत्सामान्यं भवदभ्युपगमेन तु विशेष इत्येकस्यापि सामान्यस्योभयरूपता, तथा योऽपि भवदभ्यु-
पगतो विशेपः सोऽपि त्वदभिप्रायेण विशेषः, वस्तुस्थित्या तु सामान्यम्, इति विशेषस्याप्येकस्योभयरूपता, अर्थावग्रहस्य सामा-
न्यमालम्बनं मुक्त्वा न च युक्तं सर्वमिदम्, अघटमानकत्वात्, पूर्वोक्तस्यापि क्षणस्यात्र प्रसङ्गायातत्वेन न पौनरुक्त्यावहत्वमिति ॥
२७०-२७१-२७२ ॥ प्रथमं सामान्यमात्रग्राहि आलोचनाज्ञानं तदनन्तरं रूपादिविशेषव्यावृत्तशब्दत्वग्राही अर्थावग्रह
।। द्वितीयः
तरङ्गः ॥
(योजितः
पाठः)
मतिनिरूपणे
अर्थावग्रह-"
विषयक पर-"
कृतारेका-
परिहारादि-
प्ररूपणम् ॥
"
961SREESEARCH
॥ ५५ ॥

H है इति केषाश्चिन्मतं निराकर्तुमुपन्यस्यति- केइदिहालोयणपु-ब्वमोग्गहं बेंति तत्थ सामण्णं । गहियमहत्थावग्गह-काले सद्देत्ति निच्छिपणं ॥२७३ ॥ केचिद्वादिन इहास्मिन् प्रक्रमे आलोचनपूर्वमालोचनं पूर्व यत्र स तथा तं आलोचनपूर्वकमित्यर्थः । तथाभूतमवग्रहं ब्रुवते प्रथममालोचनाज्ञानं ततोऽर्थावग्रह इत्येवं व्याचक्षते, तथा च तैरुक्तम्-"अस्ति ह्यालोचनाज्ञानं, प्रथमं निर्विकल्पकम् ॥ बालमूकादिविज्ञान-सदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥१॥" इति तत्र आलोचनाज्ञाने सामान्यमव्यक्तं वस्तु गृहीतं, प्रतिपत्रेति गम्यते, अथानन्तरम्, अर्थावग्रहकाले निच्छिन्नं पृथक्कृतं रूपादिभ्यो व्यावृत्तं शब्दविशेषणविशिष्टं तदेव, गृहीतमित्यनुवर्तते, एवमुपगमे "से जहानामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सई सुणेजा" इत्येतदालोचनाज्ञानापेक्षया नीयते 'तेणं सद्दे त्ति उग्गहिए' एतत्त्व- विग्रहापेक्षयेति सर्व सुस्थम् ।। २७३ ॥ तदेवं वादिनमीषद्ध्मातमज्ञं विज्ञाय परं मार्गावतारणाय विकल्पयन्नाह सरिः- तं वंजणोग्गहाओ, पुव्वं पच्छा स एव वा होना ॥ पुव्वं तदत्थवंजण-संबन्धाभावओ णत्थि ॥२७४॥ तद्भवदुत्प्रेक्षितमालोचनं व्यञ्जनावग्रहात्पूर्व पश्चात्स एव वा भवेत् , स्थानान्तराभावात्, अर्थव्यञ्जनसम्वन्धाभावात्पूर्व तावत्तन्नास्ति, अर्थः शब्दादिविषयभावेन परिणतद्रव्यसमूहा, व्यञ्जनं श्रोत्रादीन्द्रियं, तयोस्सम्बन्धस्य सामान्यविषयग्राह्यालोच- नस्य सर्वत्र सर्वदोत्पत्तिप्रसङ्गपरिहाराय तत्कारणतयाऽवश्यमभ्युपेयत्वेन तदभावे तदसम्भवात्, यद्युक्तालोचनोत्पत्तयेऽर्थव्यञ्जन- सम्बन्धाभाव उपेयते तदा तत्स्वरूपस्य व्यञ्जनावग्रहस्यैवोक्तालोचनात्पूर्व सत्त्वं न त्वालोचनस्य व्यञ्जनावग्रहात्पूर्व सत्त्वमिति प्रथमविकल्पो नात्मानमासादयेदित्याशयः ॥ २७४ ।। व्यञ्जनावग्रहात्पश्चादुक्तालोचनं भवतीति द्वितीयविकल्पमाघकृत्याह- ॥ द्वितीया तरङ्गः॥ ( योजितः पाठः) मति निरूपणे अर्थावग्रह- विषयनिरू- पणे पुनरन्य- कृतयुक्त्या- ssलोचना- पर्वकत्वं- तस्येतिमतं विकल्प्य परास्तम् ॥ -

सविवरणं
भीज्ञाना-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥ द्वितीयः
तरजः॥
(योजितःपा'
ठः) मतिनि-
रूपणे अर्था-
वग्रह वि-
षयनिरूपणं
तत्र पुनरन्य.
सम्मतालो-
चनापूर्वकत्वं
विकल्प्य
परिहृतम् ॥
अत्थोग्गहो वि जं वं-जणोग्गहस्सेव चरमसमयम्मि॥ पच्छा वि तो न जुत्तं, परिसेसं वंजणं होज्जा ॥२७५॥
अर्थावग्रहोऽपि यस्माद्वयञ्जनावग्रहस्यैव चरमसमये भवतीति नितिं प्राग, तस्मात्पश्चादपि व्यञ्जनावग्रहादालोचनज्ञानं
न युक्त, ब्यजनार्थावग्रहान्तरालकालस्यैवाभावेन तदानीं तदुत्पत्तेर्वक्तुमशक्यत्वात्तदेवं पूर्वपश्चात्कालयोस्तत्सत्चनिषेधे पारिशेष्या-
न्मध्यकालवर्ती तृतीयविकल्पोपन्यस्तो व्यञ्जनं व्यञ्जनावग्रह एव भवताऽऽलोचनाज्ञानत्वेनाभ्युपगतो भवेत, एवं च न कश्चिद्दोषः,
नाममात्र एव विवादात् ।।२७५। किञ्च तद्व्यञ्जनकालेऽभ्युपगम्यमानमालोचनं किमर्थस्य व्यञ्जनानां वा, प्रथमपक्षे व्यञ्जनाव-
प्रहत्वाभावान व्यञ्जनावग्रहस्य नामान्तरमप्यालोचनमिति, द्वितीयपक्षेर्थविषयकत्वाभावादन्वर्थादालोचनसंज्ञाभावप्रसङ्ग इत्याह-
तं च समालोयणम-त्थदरिसणं जइ न वंजणं तोतं ॥अह वंजणस्स तो कह-मालोयणमत्थसुण्णस्स ॥२७६॥
तत्समालोचनं यदि सामान्यरूपस्यार्थस्य दर्शनमिष्यते, ततस्तर्हि न व्यञ्जनं व्यञ्जनावग्रहात्मकं भवति व्यञ्जनावग्रहस्य
व्यञ्जनसम्बन्धमात्ररूपत्वेनार्थशून्यत्वात्, अथ व्यञ्जनस्य शब्दादिविषयपरिणतद्रव्यसम्बन्धमात्रस्य तत्समालोचनमिष्यते, तर्हि
कथमालोचनं कथमालोचकत्वं तस्य घटते, तत्र हेतुः अर्थशून्यस्येति, व्यञ्जनसम्बन्धमात्रान्वितत्वेन सामान्यार्थालोचकत्वानुपप-
तेरित्यर्थः ॥२७६॥ नन्वेतदालोचनाज्ञानं शास्त्रान्तरे प्रसिद्धमस्ति तत्किं स्वरूपमुररीकृत्येत्यत्र प्रतिबिधानं वक्तव्यमित्यत्राह-
आलोयणत्ति नामं, हवेज तं वंजणोग्गहस्सेव ॥ होज काहं सामण्ण-ग्गहणं तत्थत्यसुण्णम्मि ॥ २७७ ॥
तस्मादालोचनमिति यन्नाम तदन्यत्र
निर्गतिकं
सत् पारिशेष्यात् व्यञ्जनावग्रहस्यैव द्वितीयं नाम भवेत्, एवं सति भवतो
यदभिमतं सामान्यमात्रग्रहणमालोचनन्तन्न तत् , यतः प्रागुक्तयुक्तिभिः अर्थशून्ये तत्र कथं सामान्यग्रहणं भवेत् तस्मादर्थावग्रह
MARRIORS
THIS
॥५६॥

तरङ्गः ॥ (योजितः ग्रहसमका- एव सामान्यार्थग्राहका, “अस्ति द्यालोचनाज्ञानम्"इत्याद्यपि तमाश्रित्यैव घटत इति ॥ २७७ ॥ ॥ द्वितीयः 'तुष्यतु दुर्जन' इति न्यायेन व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतमित्युपगम्याप्याह- गहियं व होउ तहियं, सामण्णं कहमणीहिए तम्मि॥ अत्थावग्गहकाले, विसेसणं एस सदो त्ति ॥ २७८॥ अथवा भवतु तस्मिन्व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतम् , तथापि कथमनीहितेऽविमर्शिते तस्मिन्नकस्मादेवार्थावग्रहकाले शब्द पाठ) एपः इति विशेषणं विशेषज्ञान युक्तम्, न हि निश्चयो झगित्येवेहामन्तरेण युज्यते, तस्मान्नार्थावग्रहे शब्द इत्यादिविशेषबुद्धि मतिनिरूपणे युज्यते ॥ २७८ ।। अर्थावग्रहसमय एवेहापायौ भविष्यत इति मन्यमानम्परम्प्रत्याह- परस्यार्थाव- अत्यावग्गहसमए, वीसुमसंखेजसमझ्या दो वि॥तक्का-वगमसहावा, ईहा-ऽवाया कहं जुत्ता ? ॥२७९ ॥ अर्थावग्रहसम्बन्धिन्येकास्मन् समये कथमीहापायौ युक्तौ ? इति सम्बन्धः, यतः तर्काध्वगमस्वभावौ, तर्को विमर्शस्तत्स्व लमीहापा भावेहा, अवगमो निश्चयस्तत्स्वभावोऽपायः, द्वावपि चैतौ पृथगसङ्खयेयसमयौ, तथा च यदिदमर्थावग्रहसमये विशेषज्ञानं त्वये- ष्यते सोऽपायः स चावगमस्वभावो निश्चयस्वरूपः, या च तत्समकालमीहाऽभ्युपगम्यते सा तर्कस्वभावानिश्चयात्मिका, तथा च है सम्भावनां विरुद्धनिश्चयाऽनिश्चयस्वभावयोरनयो कस्मिन्नवग्रहसमये भावो युक्तः परस्परपरिहारव्यवस्थितत्वात् , इत्येकानुपपत्तिः। युक्त्या- तथा, अवग्रहस्यैकस्समयः, अनयोश्च पृथक् पृथक् असंख्येयाः समयाः, एवश्च पृथगसंख्येयसमययोरीहापाययोरेकस्मिन् समये पहस्तयति। भावोऽपि समयविरोधान्न सम्भवति, इति द्वितीयानुपपत्तिः ॥ अतोऽत्यन्तासम्बद्धत्वादुपेक्षणीयमेतत् ॥ २७९ ॥ सामान्यमात्रग्राहित्वेऽवग्रहस्स ग्रन्थान्तरोक्तक्षिप्रेतरादिभेदासम्भवाद्विशेषग्राहित्व एव तस्य घटनाद्विशेषग्राह्यवग्रह इति निः- ययोः सत्त्व-

सवितरण
श्रीज्ञाना-
नव-
KRRESS
॥ द्वितीयः
तरङ्गः ॥
(योजितः
पाठः)
अर्थावग्रहे
क्षिप्राक्षि,
प्रादिभेदा.
सम्भवतों
विशेषग्रा-
संख्यप्रेरकान्तर्गतप्रेरकविशेषस्यावशिष्टामाशङ्कामपहस्तयितुं सरिरुपन्यस्यति--
खिप्पेयराइभेओ, जमोग्गहो तो विसेसविण्णाणं ।। जुजइ विगप्पवसओ, सद्दोत्ति सुयम्मि जं केइ ॥२८॥
क्षिप्रेतरादिभेदो यस्मादवग्रहः, ततः शब्द इति विशेषविज्ञानं युज्यते, अर्थावग्रहे इति प्रस्तावाल्लभ्यते, ' तेणं सद्दे त्ति
उग्गहिए' इत्यादिवचनात् यत्सूत्रे निर्दिष्टमिति शेषः, विशेषविज्ञानत्वे हेतुः विकल्पवशतः इहान्यत्रोक्तनानात्ववशतः,
अवग्रहस्य द्वादशभेदोपदर्शनार्थमिह शास्त्रान्तरे तत्त्वार्थादौ चैवमुक्तिः-क्षिप्रमवगृह्णाति १, चिरेणावगृह्णाति २, बह्ववगृह्णाति
३, अब वगृह्णाति ४, बहुविधमवगृह्णाति ५, अबहुविधमवगृह्णाति ६, एवमनिश्रितं ७, निश्रितं ८, असन्दिग्धं ९, सन्दिग्धं १०,
ध्रुवम् ११, अधुवमवगृह्णाति १२ इति । ततः क्षिप्रं चिरेण वाऽवगृह्वातीति विशेषणान्यथानुपपत्त्या ज्ञायते नैकसमयमात्रमान
एवार्थावग्रहः, किन्तु चिरकालिकोऽपि, तथा बहूनां श्रोतृणामविशेषेण प्राप्तिविषयस्थे शङ्खभेर्यादिबहुतूर्यनिर्घोपे क्षयोपशम-
वैचिच्यात् कोऽप्यबहु सामान्यमवगृह्णाति,अन्यो बह्ववगृह्णाति भिन्नांस्तांस्तान् शब्दान्गृह्णाति,अपरः स्त्रीपुरुषवाद्यत्वादिबहुविधवि-
शेपधर्मविशिष्टत्वेन बहुविधमवगृह्णाति, तदन्यस्त्वबहुविधविशिष्टत्वादबहुविधमवगृह्णाति, अत एतस्माद् बहुबहुविधाद्यनेकविकल्प
नानात्ववशादवग्रहस्य क्वचित्सामान्यग्रहणं क्वचित्तु विशेषग्रहणमित्युभयमप्यविरुद्धं, ततो यत् सूत्रे 'तेणं सद्दे ति उग्गहिए'
इतिवचनात् शब्दः इति विशेषविज्ञानमुपदिष्टम् , तदप्यर्थावग्रहे युज्यत एव, इति केचित् ॥ २८० ॥ अनोत्तरमाह--
स किमोग्गहो त्ति भण्णइ, गहणेहाऽवायलक्खणत्ते वि ।। अह उवयारो कीरइ, तो सुण जह जुज्जए सो वि॥२८१॥
बहुशः समाहितमप्यर्थ पुनः पुनः प्रेरयन्तं प्रेरकं साक्षेपं काक्वा सूरिः पृच्छति, किंशब्दः क्षेपे, स पूर्वोक्तो विशेषावगमः,
प्रकरणम्॥
हित्वमेव यु-
RRORIES
SEE
क्तमितिप्रे-
रकविशेषा-
रेकाया: स.
माधानम् ॥
॥५७॥

अवग्रहोऽर्थावग्रहो भण्यते ग्रहणेहापायलक्षणत्वेऽपि, क्षेपार्थककिंशब्दसमभिव्याहारात्कथं ग्रहणेहापायलक्षणत्वे सत्यपि बहुबहु- विधादिविशेषग्राहकत्वेन निश्चयरूपतयाऽपायः सन्नर्थावग्रह इति भण्यते ?, ग्रहणेहयोःपूर्वभावित्वेन अपायस्य स्वस्वभावत्वे- नापायलक्षणत्वं बोध्यम्, स्वस्वरूपस्यापि च लक्षणत्वं भवत्येवायदाह । “विषामृते स्वरूपेण, लक्ष्येते कलशादिवत्।।एवं च स्वस्वभावाभ्यां, व्यज्यते खलसज्जनौ ॥१॥" इति।। बहुबहुविधादिग्रहणस्योक्तलक्षणत्वबलादपायत्वे कथं शास्त्रान्तरेऽ- वग्रहादीनां बह्वादिग्रहणमुक्तम् ?, सत्यमुक्तम्, किन्तूपचारतः बह्वादिग्राहकस्यापायस्य कारणेष्ववग्रहादिषु योग्यतया कार्यस्वरूपम- स्तीति कृत्वोपचारतस्तेऽपि बह्वादिग्राहकाः प्रोच्यन्ते, अथ यदि उक्तन्यायेन त्वयाऽप्युपचारं कृत्वा विशेषग्राहकोऽर्थावग्रह इत्युच्यते, स वाङ्मात्रेण तव न युज्यते, " यत्र मुख्यार्थो न घटते तत्र प्रयोजने सति उपचारः प्रवर्तते," त्वया त्ववग्रहस्य विशेषविषयकत्वोपपादनाय यद्यदुक्तं तदन्यथैव समर्थितमिति प्रयोजनाभावानोपचारो युक्तः, यदि मां शिष्यो भूत्वा पृच्छसि त्वं 'कथमुफ्चारः क्रियमाणो घटत इति ?,' ततः शृणु समाकर्णय, सोऽपि यथा युज्यते तथा कथयामि ।। २८१ ॥ यथाप्रतिज्ञातमेव सम्पादयन्नाह- सामण्णमेत्तगहणं, नेच्छइओ समयमोग्गहो पढमो ॥तत्तोऽणंतरमीहिय-वत्थुविसेसस्स जोऽवाओ ॥२८२॥ सो पुणरीदाऽवाया-ऽवेक्खाओ वग्गहोत्ति उवयरिओ ॥ एस्सविसेसावेक्खं, सामण्णं गेण्हए जेणं ॥२८३ ।। तत्तोऽणतरमीहा, तत्तोऽवाओ य तव्विसेसस्स ॥ इय सामण्णविसेसा-वेक्खा जावंतिमो भेओ ॥ २८४ ॥ इहैकसमयमात्रमानो नैश्चयिको निरुपचरितः सामान्यवस्तुमात्रग्राहकोऽर्थावग्रहः प्रथमः, निश्चयवेदिपरमयोग्यवगम- ॥ द्वितीयः तरङ्गः॥ (योजितः पाठः) मतिनिरूप- णे अर्थावग्र- हे प्रेरकवि- शेषारेका निरस्य व- ASTRORSE हादिग्रा- हित्वोपचा- रोपपादनम्॥

सविवरण श्रीज्ञाना- णेव- प्रकरणम्॥ ॥ ५८ ॥ विषयत्वान्नैनयिकोऽयमुच्यते, ततो नैश्वयिकार्थावग्रहादनन्तरमीहितस्य वस्तुविशेषस्य योपाय. स पुनर्भाविनीमीहामपायं चापे- क्ष्योपचरितोऽवग्रहोऽर्थावग्रहः, स छद्मस्थव्यवहारिभिर्व्यवह्रियमाणत्वाव्यावहारिकोर्थावग्रहः, उपचारे निमित्तान्तरमाह-एस्से- त्यादि, एष्यो भावी योऽन्यो विशेषस्तदपेक्षया येन कारणेनायमपायोऽपि सन् सामान्यं गृह्णाति, सामान्यग्राहित्वात्प्रथमनैश्च- यिकावग्रहवदयमर्थावग्रहः, ततस्सामान्येन शब्दनिश्चयरूपात्प्रथमापायादनन्तरं किमयं शाङ्खः शब्दः शाङ्गों वेत्यादिरूपेहा भवति, ततस्तद्विशेपस्य शाहत्वादेरीहितस्य शाल एवायमित्यादिरूपेणापायश्च निश्चयरूपो भवति, अयमपि च भावितद्विशेषेहा- मपायश्चापेक्ष्य सामान्यालम्बनत्वादुपचारितोविग्रहः, इयं च सामान्यविशेषापेक्षाऽसम्भवत्स्वविशेषान्तरान्त्यविशेष यावद्भवति, अथवा यतो विशेषात्परतः प्रमातुर्विशेषजिज्ञासा निवर्तते तमन्त्यविशेषं यावत् व्यावहारिकार्थावग्रहेहापायार्थ सामान्यविशेषापेक्षा कर्तव्या एवमिहोपचारघटना युज्यते ॥२८२-२८३-२८४ ॥ उक्तगाथात्रयपर्यवसितमर्थमुपदर्शयति- सव्वत्थेहावाया, निच्छयओ मोत्तुमाइसामण्णं ॥ संववहारत्थं पुण, सव्वत्थाऽवग्गहोऽवाओ ॥ २८५ ॥ आदिसामान्यमव्यक्तं सामान्यमात्रालम्बनमेकसामयिकं ज्ञानं मुक्त्वा सर्वत्र विषयपरिच्छेदे कर्तव्ये निश्चयतः परमार्थत ईहापायौ भवतः, ईहा, पुनरपायः, पुनरीहा, पुनरप्यपाय, इत्येवंक्रमेण यावदन्त्यो विशेषः, न त्वर्थावग्रहः, अर्थावग्रहस्तु सामा- न्यमात्रालम्बनमेकसामयिकं प्रथमज्ञानमेव,न तदीहाऽपायो वा संव्यवहारार्थ पुनः सर्वत्र यो योऽपायः स स उत्तरेहापायापेक्षयैष्य विशेषापेक्षया चोपचारतोविग्रहः ॥ २८५॥ यावत्तारतम्येनोत्तरोत्तरविशेपाकांक्षा प्रवर्तते तावदवग्रहा, तरतमयोगाभावे त्वपाय एव भवति न तस्यावग्रहत्वमिति दर्शयति- ॥ द्वितीयः तरङ्गः॥ (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रहे- गाथात्रयेण बहादिग्रा- हित्वोपचा- र उपपादि- तः, गाथा- त्रयेदम्पर्या- र्थश्च नि- रूपितः ॥ ॥ ५८॥ REAM RRCE ॥ द्वितीया तरङ्गः ॥ योजितःपा. तरतमजोगाभावे-वाओ चिय धारणा तदंतम्मि॥ सव्वत्थ वासणा पुण, भणिया कालंतरे सई य॥२८६॥ तरतमयोगाभावे ज्ञातुरग्रेतनविशेषाकाङ्क्षानिवृत्तावपाय एव भवति, तस्यावग्रहत्वाभावात्तन्निमित्तानामीहादीनामभावे तदन्ते धारणा तदर्थोपयोगाप्रच्युतिरूपा भवति, वासना वक्ष्यमाणरूपा कालान्तरे स्मृतिश्चेति धारणाभेदद्वयं पुनः सर्वत्र भवति ॥२८॥ सांव्यवहारिकार्थावग्रहापेक्षयेदानी " तेणं सद्दे ति उग्गहिए ' इत्यादिसूत्रं विशेषविज्ञानपरतयाप्युपपादयितुं शक्यत इत्याह- सद्दो त्ति व सुयभणियं, विगप्पओ जइ विसेसविण्णाणं॥घेप्पेज तं पि जुज्जइ, संववहारोग्गहे सव्वं ॥२८७॥ वा अथवा, शब्द इति सूत्रभणितं शब्दस्तेनावगृहीत इति सूत्रे प्रतिपादितं यदि विकल्पतो विवक्षावशतो विशेषविज्ञानं गृह्येत, संव्यवहारोपग्रहे गृह्यमाणे सति सर्वं तदपि युज्यते ॥ २८७ ॥ व्यावहारिकार्थावग्रहाभ्युपगमे सविशेष गुणमुपदर्शयन्नाह- खिप्पेयराइभेओ, पुव्वोइयदोसजालपरिहारो॥ जुज्जइ संताणेण य, सामण्णविसेसववहारो ॥२८८॥ क्षिप्रेतरादिभेदं यत्पूर्वोदितदोपजालमेकसामयिकसामान्यमात्रग्राहकनैश्चयिकार्थावग्रहव्याख्यातारम्प्रत्यकसामयिकत्वेऽस्य कथं क्षिप्रचिरग्रहणविशेषणं ? सामान्यमात्रग्राहकत्वे च कथं बहुबहुविधादिविशेषणोक्तं विशेषग्रहणं?, तथाऽस्यैव विशेषग्राहकत्वे समयोपयोगबाहुल्यमित्यादिस्वरूपम्, तस्य परिहारो व्यावहारिकार्थावग्रहे सति युज्यते,नैश्चयिकार्थावग्रहवादिभिरपि उपचाराया- वहारिकार्थावग्रहस्यासंख्येयसमयनिष्पन्नविशेषग्राहकज्ञानरूपस्य स्वीकृतत्वेन तत्र क्षिप्रेतरादिभेदस्य बहु-बहुविधादिविशेषणोक्त- विशेषग्राहकत्वस्य सम्भवात्,तस्य चाऽसंख्येयसामयिकत्वेनैकसमयोपयोगवाहुल्यस्यावकाश एव नास्ति, एवं च क्षिप्रेतरादिवि- शेपणकलापो मुख्यतया सांव्यवहारिकार्थावग्रह एव घटते कारणे कार्यधर्मोपचारतस्तु नैश्चयिकाावग्रहेऽपीत्युक्तं प्राग्,सन्तानेन च ठः) मतिनि- रूपणे अर्था- वग्रहस्यनैश्च- थिकव्याव- हारिकभेदी व्युत्पाद्या वग्रहतत्त्व निष्टङ्कनम्॥ CRESENCHAR है सविवरण भीडाना र्णव- प्रकरणम्॥ ॥ ५९॥ 17 सामान्यविशेषव्यवहारो लोकरूढोऽपि व्यावहारिकार्थाऽवग्रहे युज्यते, लोके विशेषोऽप्यपेक्षया सामान्यं, यत्सामान्यं तदप्यपेक्षया विशेषः, इत्येवमन्त्यविशेषं यावत्,एतच्चौपचारिकावग्रहे सत्येव घटते, नान्यथा, ' यदनन्तरमीहादि प्रवृत्तिः सोऽवग्रह' इत्येवमव- ग्रहलक्षणस्य नैश्चयिकावग्रह इव विशेषग्राहिज्ञानेऽपायरूपे औपचारिकार्थावग्रहतया स्वीक्रियमाणेपि भावात् ॥ २८८ ।। ॥इति सविवरणे श्रीज्ञानार्णवे मतिज्ञानाऽऽद्यमेदलक्षणद्विविधावग्रहतत्त्वप्ररूपणात्मको द्वितीयस्तरङ्ग सम्पूर्ण। अथ तृतीयस्तरङ्गः ॥ अथ मतिज्ञानद्वितीयभेदलक्षणामीहां व्याचिख्यासुराह- इय सामण्णग्गहणा-णंतरमीहा सदस्थवीमंसा ॥ किमिदं सद्दोऽसद्दो, को होज्ज व संख-संगाणं १॥ २८९ ॥ इत्येवं प्रागुक्तेन प्रकारेणाभिहिताऽव्यक्तवस्तुमात्रग्रहणलक्षणनैश्चयिकार्थावग्रहशब्दादिसामान्यग्रहणलक्षणव्यावहारिकार्था- वग्रहात्मकसामान्यग्रहणानन्तरमीहा प्रवर्तते, सा सदर्थेमीमांसा, सतस्तत्र विद्यमानस्य गृहीतार्थस्य विशेषविमर्शद्वारेण मीमांसा विचारणा, किमिदं वस्तु मया गृहीतं शब्दोऽशब्दो वेत्येवंस्वरूपा, इयं विचारणा निश्चयार्थावग्रहानन्तरभाविनी, वा अथवा शासशाइयोर्मध्ये कोऽयं भवेत् शब्दः शाङ्खः शाो वा, इयं विचारणा व्यवहारार्थावग्रहानन्तरभाविनी, यद्यपीत्थं विचारणा संशयात्मिका नेहा, तथाप्यनयाऽनन्तरभावी व्यतिरेकधर्मनिराकरणपरः अन्वयधर्मघटनप्रवृत्तचापायाभिमुख एव बोध उपलक्षित ईहा ॥ तद्यथा-"अरण्यमेतत् सवितास्तमागतो, न चाधुना सम्भवतीह मानवः ॥ प्रायस्तदेतेन खगादिभाजा, भाव्यं स्मरारातिसमाननाम्ना ॥१॥” इति ॥ एतेन स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशयानन्तरं पुरुषधर्मव्यतिरेकतः स्थाणुधर्मसमन्वयतश्च प्रायः स्थाणुरेवायमिति नोध ईहेत्युपदर्शितम्भवतीति ॥ २८९ ॥ अथ मतिज्ञानतृतीयभेदस्यापायस्थ स्वरूपमाह- (योजितः पाठः) द्वितीय तरङ्गो पसं. हार तृतीय तरङ्गोपक्रमः मतिज्ञान- निरूपणे दि तीयभेद .. रूप-ईहा.. तस्वनिरू पणम् ॥ **** CCE ॥ ५९ ।।

NECK - महुराइगुणत्तणओ, संखस्सेव त्ति जं न संगस्स ।। विण्णाणं सोऽवाओ, अणुगमवइरेगभावाओ ॥ २९० ॥ व्याख्या-मधुरस्निग्धादिगुणत्वात् शङ्गस्यैवायं शब्दो न शृङ्गस्य इत्यादि यद्विशेषविज्ञानं सोऽपायो निश्चयज्ञानरूपः, तत्र हेतुः, अनुगमव्यतिरेकभावतः इति, पुरोवर्त्यर्थधर्माणामनुगमभावात् तत्राविद्यमानार्थधर्माणां व्यतिरेकभावात्, अनुगमव्यतिरेको अस्तित्वनास्तित्वनिश्चयो । अयं च व्यवहारार्थावग्रहानन्तरभावी अपाय उक्तः। निश्चयावग्रहानन्तरभावी तु श्रोत्रग्राह्यत्वादि- गुणतः शब्द एवायं न रूपादिरिति ।। २९० ॥ अथ मतिज्ञानतुरीयभेदलक्षणां धारणां सभेदामाह- तयणंतरं तयत्था-विचवणं जो य वासणाजोगो । कालंतरे य जं पुण-रणुसरणं धारणा सा उ ॥२९१॥ व्याख्या-तस्मादपायादनन्तरं यत्तदर्थादविच्यवनम्, उपयोगमाश्रित्याभ्रंशः, यश्च वासनाया जीवेन सह योगः सम्बन्धः, यच्च तस्यार्थस्य कालान्तरे पुनरिन्द्रियैरुपलब्धस्यानुपलब्धस्य वा एवमेव मनसाऽनुस्मरणं स्मृतिर्भवति, सेयं पुनस्त्रिविधाऽप्यर्थ- स्यावधारणरूपा धारणा विज्ञेया, वासना च तदावरणक्षयोपशमरूपा ज्ञेया।। २९१ ॥ इदमत्रैदम्पर्य-धारणाया अविच्युतिलक्षणभेदस्य दर्जोिपयोगमाश्रित्याभ्युपगमादेव पराभ्युपगतनिरन्तरसमानविषयकज्ञान- सन्तानलक्षणधारावाहिकज्ञानफलस्य स्थिरार्थग्रहणस्योपपचौ निष्प्रयोजनमेव धारावाहिकज्ञानकल्पनं, पूर्वज्ञानमुत्पाद्य व्युपरतव्या- पारस्य कारणस्य पुनर्व्यापारान्तराभावेन कारणाभावाच न निरन्तरज्ञानसन्तानलक्षणधा(*सप्तचत्वारिंशपत्रादिह यावद्योजितःपाठः) *रावाहिकज्ञानाभ्युपगमो युज्यते न चैकापायोत्पत्तावपि सामग्रीसचात्पुनस्तदुत्पत्तेरवारणीयत्वाचत्सन्तानोत्पत्ति सङ्गतेति वाच्यम्, अपायस्यापायोत्पत्तिप्रतिवन्धकत्वात्प्रागभावस्य तद्वेतुत्वाद्वा पुनस्तदुत्पत्त्यापत्तेरभावात्, अन्यथैकवारं घटोत्पादेऽपि सा- ॥ तृतीय तरङ्गः॥ (योजितः पाठः) मतिज्ञान- निरूपणे अ- पायस्वरूप तृतीयभेदस्य घारणास्व- रूपचतुर्थ भेदस्य तद्भे- HEA -SCREEN दस्य च निरूपणम् ॥ GREER

सविपरणं
भीशाना-
नव-
प्रकरणम्
॥ ६०॥
मग्रीमहिम्ना कपाले पुनस्तदुत्पत्त्यापत्तिप्रसङ्गादिति चेत्, उच्यते, घटोऽयं घटोऽयमित्यनुभवधारादर्शनेन तदपलापो दुष्करोऽपाय-
सचेऽपायान्तरोत्पत्तिप्रतिबन्धस्याप्रामाणिकत्वात् स्पष्टस्पष्टतरस्पष्टतमवासनाजनकत्वेनापायजन्यापायपरम्पराया अवश्याम्युपे-
यत्वादीहावग्रहादिभेद इवापायनानात्वेऽप्युपयोगभेदानापत्तेरेकसन्ततिकैकविषयकज्ञानस्यैवोपयोगत्वात् , तस्य च नानात्वेऽप्ये-
कत्वाविरोधात् ततश्चापायसमानाकारस्मृतिजननी स्मृतिज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमरूपा वासना विजृम्भते, कालान्तरे च तद्विषयिणी
स्मृतिः प्रवर्त्तते इति,यद्यपीयं भिन्नोपयोगरूपत्वाभावानाधिकीभवितुमुत्सहते, तथापि क्षयोपशममहिम्नाऽव्यक्ततया स्थित पूर्वज्ञान-
मेबोद्बोधकवशात् स्मृत्युपयोगरूपतामास्कन्दत्कथञ्चिद्भेदोपविद्धं सन्तानगामित्वलक्षणं भेदमास्कन्दतीति द्रष्टव्यं, ननु स्मृतिर्ने
प्रमाऽतीतश्यामत्वे वर्तमानावगाहिन्याः पाकरक्ते श्यामोध्यमिति प्रतीरिवातीततत्तांशे वर्तमानत्वावगाहिन्यास्तस्या अयथार्थत्वा-
तत्ताविशिष्टस्यानागतवर्तमानस्य वर्तमानत्वानुभववलादननुभूतस्य वा तत्र वर्तमानत्वस्य ज्ञानसामग्रीमहिम्नैव भानात, अन्यथा
विषयस्य वर्तमानत्वाज्ञाने तत्र प्रवृत्त्यनुपपत्तिप्रसङ्गादत एव यदा धूमस्तदा वतिरिति व्याप्त्यप्रतिसन्धानेऽपि ज्ञानसामग्रीमहिम्नैव
वन्यनुमितो वह वर्तमानत्वज्ञानात्तत्र निःशकं प्रवृत्तिरिति चेत्, न,पाकरक्ते श्यामोऽयमिति प्रतीतेरयथार्थत्वासिद्धेरिदानीमयं श्याम
इत्याकाराभावेन तत्र श्यामतांशे वर्तमानत्वानवगाइनात्, अथ प्रकारतया तत्र विद्यमानत्वाभावेऽपि विशेष्यावच्छेदककालाव-
च्छिन्नविशेषणसम्बन्धस्य संसर्गत्वात्संसर्गतया तद्भानात्सा प्रतीतिरयथार्थेति चेत्, तथापि पूर्व श्याम इत्यत्रातीतश्यामतायामिव
स घट इत्यत्राऽप्यतीतधर्मवैशिष्ट्यरूपायां तत्तायां विद्यमानत्वप्रतिसन्धानायोगेन स्मृतियाथार्थ्यस्य बाधितुमशक्यत्वात्कादाचित्क-
सम्बन्धपुरस्कारेणातीतधर्मज्ञानस्याप्यप्रामाण्ये च कादाचित्कसम्बन्धेन सत्प्रतिपक्षितत्वज्ञाने हेतुरपि हेत्वाभासतां भजेव, अपि-
तृतीयस्तर
मतिज्ञान-
निरूपणे
धारणास्व-
रूपचतुर्थ-
भेदावान्तर
भेदतत्त्व-
निरूपणम्॥
PECHECCASINE
॥६०॥

चानुभवस्मरणयोर्विषयकृतविशेषाभावेऽपि प्रत्यक्षज्ञानस्येदम्पदप्रयोगहेतुत्वात्संस्कारजन्यज्ञानस्य तच्छब्दप्रयोगहेतुत्वासदुमया- भिलापवैलक्षण्यात्स्मृतेरप्रामाण्येऽनुभवस्याप्यप्रामाण्यापतिः, स्मृतेर्याथार्थ्यऽप्यनुभवप्रमात्नपारतन्त्र्यादप्रमात्वमितिचेत्,न,अनुमि- तेरपि व्याप्तिज्ञानादिप्रमात्वपारतन्त्र्येणायथार्थत्वप्रसङ्गाद्, अनुमितरुस्पत्तौ परापेक्षा विषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यमेवेति चेत्, न, स्मृतेरप्युत्पत्तावेवानुभवसव्यपेक्षत्वात्स्वविषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यात्,अनुभवविषयीकृतभावावभासिन्याः स्मृतर्विषयपरिच्छेदेऽपि न स्वातन्त्र्यमिति चेत्, तर्हि व्याप्तिज्ञानादिविषयीकृतानर्थान् परिच्छिन्दन्त्या अनुमितेरपि प्रामाण्यं दूर एव, नैयत्येनाभात एवार्थोऽनुमित्या विषयीक्रियत इति चेत्, तहिं तत्तयाऽभात एवार्थः स्मृत्या विषयीक्रियत इति तुल्यमिति न किञ्चिदेतत् ।। वस्तुतः स्मृतित्वप्रमात्वे जन्यत्वप्रयोज्यत्वरूपं नानुभवप्रमात्वपारतन्त्र्यं यदृच्छोपकल्पितं त्वप्रयोजकं, यदि वाऽ- नुभूतधर्माश्रयत्वरूपा तत्ता स्मृतौ भासते इदन्तांशे उद्बुद्धसंस्कारस्यैव तत्तांशे स्मारकत्वात्फलवलेन तथात्वकल्पनाद्धर्मविशेष- मादाय सहप्रयोगस्य समर्थनाद् ,अनुभवस्मरणयोर्विषयकृतविशेषाभावेऽपि संस्कारजज्ञानत्वेन स्मृतेस्तच्छब्दप्रयोगहेतुत्वे तु प्रमुष्टतत्ताकस्मरणादपि तच्छब्दोल्लेखप्रसङ्गात्,अनुभवे यद्धर्मवैशिष्ट्यभानं तस्यातीतत्वं तत्ता स्मृतौ भासत इत्यभ्युपगमे चानाग- तविषयकस्मरणादौ तत्तांशेऽप्ययथार्थत्वप्रसङ्गादिति विभाव्यते, तदाप्यनुभूतधर्मे विद्यमानत्वस्याबाधान तस्या अयथार्थत्वम् ।। सम्पदायानुसारिणस्त्वनुभूयमानत्वलक्षणेदन्तानुभवे भासतेऽनुभूतत्वरूपा च तत्ता स्मृतौ भासतेऽत एव स घट इति स्मृ- त्यभिलापस्य यः प्रागनुभूत इति विवरण सङ्गच्छते, इदन्ताविषयकानुभवादेव च तचाविषयकं स्मरणमुन्मीलति तं विना तु प्रमुष्ट- तत्ताकं तत्, न चानुभूतत्वमेव यदि तत्ता तदा तदवगायनुमितावपि तत्तोल्लेखप्रसङ्ग इति वाच्यम् , उल्लेखो यदि विषयता ॥ मतिज्ञान- मेदधारणा- प्ररूपणाप्र- सङ्गेन प- राभिमत- स्मृत्यप्रामा- ण्याशंका- परिहारः अनुमिति- निदर्शनेन युक्त्या च तत्प्रामाण्य- व्यवस्थापन साम्प्रदायिक- तत्त्वप्रदर्शनंच ११ भीज्ञाना- मंव- प्रकरणम्॥ ॥६१॥ तदा तदभ्युपगमेऽविवादात्, यदि पुनरभिलापस्तदा संस्कारजज्ञानत्वेन तद्धेतुत्वेन तदापत्त्यभावात्, तथाप्यनुभूतो घटोऽनुभूय- मानो घट इत्यनुभवप्रभवस्मरणे तत्तोल्लेखप्रसङ्ग इति चेत्, न, पूर्वानुपस्थितानुभूतत्वानुभूयमानत्वयोरेव तत्तेदन्तापदा- र्थत्वात्, प्रागनुभूतस्यापि कस्यचित् संसर्गत्वस्येव प्रकारत्वस्यापि सम्भवादित्याहुः, इदन्तानुल्लेख्यनुभवप्रभवस्मरणेऽपि तत्ताभानात्स्वसामग्रीमहिम्नैव तत्र तत्ता भासत इत्यन्ये, यत्तु तत्तेदन्ते स्मृत्यनुभवभासिनी अखण्डे एव वस्तुनी, एवं चेदन्तासंस्कारेणेदन्तैव तत्तया स्मयते प्रमुष्टतत्ताकं तु स्मरणं नास्त्येव ॥ हरिहराद्यनुचिन्तनं( ना ) च कविकाव्यमूलज्ञा- नवन्मनःप्रभवेति सर्वा स्मृतिरयथार्थैव, न च क्वचित्प्रमितस्यैवान्यत्रारोपात्कथमन्यत्राप्रमितायास्तत्तायाः स्मृतावारोप इति वाच्यम्, इदन्तायाः पृथग्भानेन विषयकत्वेन प्रत्यभिज्ञायां तत्तायाः अमितत्वात् स्मृताविदन्तायां तत्तारोपसम्भवात, न च स्मृते- भ्रंमत्वे तग्नियामकनानादोषकल्पने गौरवमिति वाच्यम्, इदन्तशि उद्बुद्धसंस्कारस्यैव दोषत्वात्, इदन्तानुल्लेख्यनुभवप्रभव- स्मरणेऽपि तत्तया धर्मान्तरस्यैवावगाहनाभ तस्या याथार्थ्यमिति, तत्तुच्छं, तत्तास्मृतेः पूर्वमिदन्तोपस्थितिं विना तदारोपास- म्भवादिदन्तोल्लेखानन्तरमेव तदारोप इत्यत्र मानाभावाद्, भावे वा इदन्तात्वेन तदुल्लखे विशेषदर्शनादारोपस्यैवाऽसम्भवात्, अपि चदन्ताविषयकसंस्कारस्य स्वरूपत एव तचाविषयकस्मृतित्वावच्छेदेनैव हेतुत्वाव स्मृतौ तत्तयेदन्तामानासम्भवः, तत्तावच्छिन्न- प्रकारताकस्मृतित्वावच्छेदेन तद्धेतुत्वकल्पने तु तत्र तत्तया जगद्विषयकत्वप्रसङ्गात्,तत्तावच्छिन्भेदन्ताप्रकारकत्वस्य च स्वरूपतस्तत्ता प्रकारकत्वापेक्षया गौरवात्, अपि च तचाया अखण्डत्वे स्वरूपतस्तत्प्रकारकत्वावच्छिमं प्रत्येव प्रत्यभिज्ञानसाधारण्येनेदन्तांशे उद्बुद्धसंस्कारस्य हेतुत्वमुचितम्, न च प्रकारतयाऽनुभवत्वावच्छिमं प्रति विषयतया ज्ञानत्वेनैव हेतुत्वात्,अत्यथा दण्डाझानेऽपि ॥ तृतीय- म्तरङ्गःमति- ज्ञाननिरू- पणप्रसङ्गे युक्त्या घा. रणाभेद- रू पस्मृति CACHER प्रामाण्य- व्यवस्था- पन। ICCCCCre ॥ ६१ ॥ + SERECIRCTREK तत्संस्कारादण्डीतिबुद्धिप्रसङ्गात, तत्ताज्ञानं विना कथं तदनुभव इति वाच्यम्, प्रकारतया संस्काराजन्यज्ञानत्वावच्छिन्नं प्रत्येव विषयतया ज्ञानत्वेन हेतुत्वात्, इत्थं च तच्छन्दप्रयोगहेतुतापि तत्ताप्रकारकज्ञानत्वेनैवेति स्मृतिप्रत्यभिज्ञयोस्तचोल्लेख इति न किश्चिदेवत, किंबहुना ? स घटः सोऽयं घट इति स्मृतिप्रत्यभिज्ञानयोस्तत्तांशे समानाकारत्वात्प्रत्यभिज्ञायाः प्रामाण्ये स्मृतेरपि प्रामाण्यं स्मृतेरप्रामाण्ये च तथा प्रत्यभिज्ञाया अपि तथात्वं प्रसजेदिति दुरुद्धरा प्रतिबन्दी,न चेदन्तासंस्कारस्यातीततत्तद्धर्मवैशिष्टय- स्मृतावेव हेतुत्वमिति युक्तं,एकाकारत्वभागप्रसङ्गाद् गौरवाच्च, यत्तु स्मृतेर्याथार्थेऽपि न प्रमात्वं यथार्थानुभवत्वस्यैव तत्चात्, अन्यथा स्मृतेः प्रमात्वे तदसाधारणकारणस्य संस्कारस्य पृथक्प्रमाणत्वप्रसङ्गे मुनिप्रणीतप्रमाणविभागव्याघातग्रसङ्गादिति', तत्तु स्वगृह एव प्रोच्यमानं भ्राजमानतां भजेन तु कथायां, अस्माकंतु प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वाभ्यां द्विधैव प्रमाणविभागाभिधानात्, स्मृतेः परोक्षकुक्षावेव निक्षिप्तत्वान्न किञ्चिदनुपपन्नं ।। तस्मात्सत्यप्रवृचिजनकत्वादनुभवस्येव स्मृतेरपि प्रामाण्यस्य निराबाधत्वात् साधूक्तमवग्रहेहापायधारणाभेदाच्चतुर्विधं मतिज्ञानमिति, अत्र चावग्रहादीन शब्दोदाहरणेन सूत्रकारः प्रतिपाद्य “ एवं एएणं अभिलावणं अव्वत्तं रूवं रसं गंध फास" इत्याचतिदेशसूत्रमाह,ईहादीनामुभयवस्त्ववलम्बनं प्रति नियमकारणं पूरयंस्तदेवानुवदतिस्म भाष्यकार:-"सेसेसु वि रूवाइसु, विसएसु हुन्ति रूवलक्खाई ॥ पायं पञ्चासन्न-तणेणमीहाइवत्थूणि ॥२९२॥ [ शेषेष्वपि रूपादिषु, विषयेषु भवन्ति रूपलक्षाणि ॥ प्रायः प्रत्यासनत्वेनेहादिवस्तूनि ॥] प्रायः 'प्रत्यासत्तिर्हि -बहुभिर्द्धमैः सादृश्यं' तत्प्रतियोग्यनुयोगिनावेव धर्मिणावालम्ब्येहादीनां प्रवृत्तिस्वभाव इति, किमयं स्थाणुरुत पुरुष इतिवत्किमयं स्थाणुरुतोष्ट इति ने- होदयः, उष्ट्रे स्थाणुप्रत्यासत्यभावादत एव श्रोत्रेन्द्रियप्रत्यासन्नवस्तूपदर्शनं बहुशः प्रदर्शितमिति शेषेन्द्रियप्रत्यासम्भवस्तूनि मतिज्ञान- निरूपणप्र- सङ्गस्मृतेः प्रामाण्ये प्र- माणविभाग- व्याघाता- शंकापरिहारः तदुपसंहारः।

सविवरणं भीवाना- णेव- प्रकरणम्।। ॥ ६२॥ तृतीयस्त- रङ्गःमति- ज्ञाननिरू- पणप्रस- थेनेहादि- निरूपणे दृष्टान्ती- सञ्जिवृक्षुराह-" थाणुपुरिसाइकुठ्ठ-प्पलाइसंभियकरिल्मसाइ ॥ सप्पुष्पलणालाइ व, समाणरूवाई विसयाई ।। २९३ ॥" [ स्थाणुपुरुषादिकुष्ठोत्पलादिसम्भृतकरीलमांसादि ॥ सर्पोत्पलनालादिवत्समानरूपादिविषयाणि ॥ ] संभियकरिल्लत्ति संमृतानि संस्कृतानि, करीलानि वंशजालफलानि, स्पष्टमन्यत् ॥४॥ ननु प्रत्यासत्तिर्यदि स्वरूपसतीहानिबन्धमं तःकत्र धर्मिणि दृष्टे सकलतस्प्रत्यासमवस्त्ववलम्बीहोदयप्रसङ्गोऽविशेषात्, न च प्रत्यासत्तिग्रहस्य तद्धेतुत्वान दोष इति वाच्यम्, सद्गर्भायाः सादृश्यरूपप्रत्यासत्तेऽहे संशयाभावात्तत्पूर्वकेहाया अप्रवृत्तेरित्यत आह- सारूप्यज्ञानमीहादौ, कोटिस्मारकतां भजत् ॥ नियन्तुं प्रभवत्युच्चै-रुभयस्यावलम्बनम् ॥५॥ स्थाणुपुरुषयोः सादृश्यज्ञाने सति हि स्थाणुदर्शनोत्तरमुबुद्धसंस्कारेण स्थाणुत्वपुरुषत्वोभयकोटिस्मरणेन तदुभयसहचरित- धर्मवत्ताज्ञानेन दोपमहिम्नाऽसंसर्गाग्रहाच्च संशयोत्पत्तावीहादिप्रादुर्भावाचत्रोभयावगाहित्वं नानियतं, एतेन ' भ्रमसंशयोत्तर- प्रत्यक्षं प्रत्येव विशेपदर्शनस्य हेतुत्वात्सर्वत्र प्रत्यक्षनिर्णये ईहाया हेतुत्वमप्रमाणिकमिति' निरस्तं, संशयोत्तरमेव निर्णया- भ्युपगमाद् , वस्तुतः संशयोत्तरप्रत्यक्षत्वं न विशेषदर्शनकार्यतावच्छेदकं, संशयोत्तरत्वस्य दुर्वचत्वाव, संशयोत्तरं विशेष- दर्शनं विनाऽपि संशयानुत्तरप्रत्यक्षप्रसङ्गाच, संशयानुत्तरप्रत्यक्षे संशयाभावस्य हेतुत्वकल्पनेऽतिगौरवात् प्रत्यक्षनिश्चयत्वाव- च्छिमं प्रतीहाया हेतुत्वस्यैव युक्तत्वात्, ॥५॥ अथ “ से जहा णामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सुमिणं पासिज्जा" इत्यादि सूत्रमनुस- त्येन्द्रियाणामिव मनसोऽप्यवग्रहादयः स्वप्नादौ सम्भवन्तीत्याह- स्वप्नादावपि शब्दादि-विषयाऽवग्रहादयः॥ मनसोऽपि लसन्त्येव, हृषीकव्यापूर्ति विना ॥६॥ कृतप्रत्या- सन्नवस्तु प्ररूणं प्रत्यासत्ति- स्वरूपंच॥ ACK ।। ६२॥

॥ मतिज्ञान- प्रसङ्गे स्वप्न- दृष्टान्तेन मनसोऽपि स्वमादाविन्द्रियव्यापार विनाऽवग्रहादयः प्रादुर्भवन्ति, तथाहि, स्वप्ने गीतादिश्रवणे प्रथममव्यक्तशब्दज्ञानं भवति, ततः किमयं शब्दोऽशब्दो वेतीहा प्रवर्तते, ततः शब्द एवायमित्यपायः, ततश्च धारणेति ॥ एवं जाग्रतोऽपि मनसैव बहलतमे तमसि घटादिपदार्थपर्यालोचनदशायां मानसा अवग्रहादयो द्रष्टव्या' । आह च-" एवं चिय सिमिणाइसु, मणसो सहाइएसु विसएसु ।। होन्तिदियवावारा-भावे वि अवग्गहादीया ॥ २९४ ॥" [ एवमेव स्वप्नादिषु, मनसः शब्दादिषु विषयेषु ॥ भवन्तीन्द्रियव्यापारा-भावेऽप्यवग्रहादयः॥]॥ ६ ॥ अथावग्रहादीनां सूत्रोक्तक्रमनियमे हेतुमाह- व्यतिक्रमोत्क्रमौ नैतै-नैतेषां तत्त्वनिर्णयः ।। नेदृग् ज्ञेयस्वभावोऽपि, तदेते नियतक्रमाः ॥७॥ अनानुपूर्वीभवनं व्यतिक्रमः, पश्चानुपूर्वीभवनमुत्क्रमः, अन्यतरवैकल्यं शून्यत्वमेतैर्वस्तुनस्तत्त्वनिर्णयो न स्यात् , तदेते एव वस्तुनिर्णयाय सर्वेऽपि क्रमनियमेनान्वेषणीयाः, न धनवगृहीतमीबते, धर्मिणोप्रसिद्धौ निरालम्बनविचाराप्रवृत्तेः, न चानी- हित निश्चीयते, तस्य विचारपूर्वकत्वात् , न च विचारं विनाऽपि कारणमहिम्ना तदुत्पादो युक्तो विचारस्यापि तत्कारणत्वेन तद्विरहे कारणमहिम्न एवासिद्धेः, न चानिश्चितं धार्यते, अन्यथा सन्देहादपि तत्प्रसङ्गादिति, वस्तुनोऽपि च सामान्यविशेषरूपः खमावस्तथा ज्ञानयोग्यतयैव व्यवस्थित इति तस्य तथाभावो युक्तः ॥ यदाह-" उक्कमओइक्कमओ, एगाभावे वि वा ण वत्थुस्स ॥ ज सब्भावाहिगमो, तो सव्वे णियमियकमा य ॥२९५॥" [ उत्क्रमतोऽतिक्रमत, एकामावेऽपि वा न वस्तुनः॥ यत्स्वभावाधिगमः, ततः सर्वे नियमितक्रमाश्च ॥ ] “ ईहिज्जइ णाऽगहियं, णज्जइ नाणीहियं न याणायं ॥ धारिज्जइ जं वत्थु, तेण कमोवग्गहाईओ ॥२९६॥” [इयते नाऽगृहीतं, ज्ञायते नानीहितं न चाज्ञातम् ॥ धार्यते यद्वस्तु तेन, क्रमोऽवग्रहादिका मानसाव- ग्रहादिप्ररू- पणं, अवन- हादिक्रम- कारणप्रद- र्शन च ॥

-
।
॥ तृतीयः
तरङ्गः ॥
सचिरनं
भावाना
ब-
प्रकरणम्॥
SECREASE
" एनो चिय ते सम्वे, भवन्ति भिन्ना य व समकालं ॥ न वइकमो य तेसिं, ण अन्नहा नेयसब्भावो ॥२९७॥" [इत एव
ते सर्वे भवन्ति भिन्नाश्च नैव समकालं ॥ न व्यतिक्रमश्च तेषां, नान्यथा ज्ञेयसभावः ॥७॥ नन्वभ्यस्ते पुरुषेऽयं पुरुष इति
प्रथममेव निर्णयः समुन्मीलति, अनुभूते च संस्कारोद्योधात्प्रथममेव स पुरुष इति स्मृतिरुल्लसत्यनुभूयते च झटित्येवायं पुरुषो
निरणायि, झटित्येव चैनमस्मार्षमिति च, तथा च कथमन्यतराभावे न वस्तुभावज्ञानम् ? ॥ आह च-"अब्भत्थेवाओ चिय,
कत्थइ लक्खिज्जइ इमो पुरिसो ॥ अण्णत्थ धारण चिय, पुरोवलद्धे इमं तं ति ॥२९८॥" [अभ्यस्तेऽपाय एव क्वचिल्लक्ष्यते-
ऽसौ पुरुषः ॥ अन्यत्र धारणैव पुरोपलब्धे इदं तदिति ॥] अनोच्यते-
अभ्यस्ते निर्णयस्मृत्यो-लेक्ष्यः सौक्ष्म्येण न क्रमः॥ पद्मपत्रशतच्छेदे, यथा वाज्यत्र बुद्धिषु ॥८॥
उक्तापायस्मृत्योरवग्रहेहादिष्वीहादेः कालसौम्यादलक्षणेऽप्युक्तक्रमस्य प्रमाणसिद्धत्वाम तत्र तदपलापः कर्तुं शक्यः, न हि
पनपत्रशतच्छेदे सत्यपि कालभेदे तदलक्षणेन तदभावो नाम, न वा दीर्घशुष्कशष्कुलीभक्षणे तद्रूपदर्शनतज्जनितशब्दश्रवणतद्गन्धा-
घ्राणतद्रसास्वादनतत्स्पर्शीपलब्धीनां योगपद्याभिमानेऽपि कारणक्रमनियतस्तत्क्रमो प्रमाणसिद्धोऽपि नास्तीति वक्तुं शक्यते,
एकदैकोपयोगस्वभावत्वान्मनसः सर्वेन्द्रियेषु तंदसम्बन्धादाशुसञ्चारित्वेनैव तेनाशुकार्यजननात्, तथा च पारमष-"जो मणे
देवासुरमणुआणं, तंसि तसि समयंसित्ति ॥" ननु भवतां मनसः शरीरव्यापित्वेन सर्वदा सर्वेन्द्रियसंयोगायुगपदनेकज्ञानोत्पनिर्दुर्वारा
तदणुत्वाभ्युपगम एवेन्द्रियेषु तत्संयोगक्रमेण ज्ञानक्रमसम्भवादिति चेत्, न, अणुत्वाभ्युपगमेऽपि तस्य रसनेन्द्रियसंयोगकाले
स्वसंयोगस्य दुर्भिवारत्वाद् युगपदुभयज्ञानोत्पतेरनिवार्यत्वात्, अदृष्टवैचित्र्यमहिम्नैव तद्वारणे च चित्तोपयोगक्रमादेव ज्ञानक्रम
मतिज्ञानप्र-
सङ्गे अवहा-
दिक्रमहेतु-
प्रदर्शनं तत्र
चाम्यस्ते क्र.
माभावशंका
परिहारश्च ॥
ॐISPLASS
॥ ६३॥

॥ मतिज्ञान प्ररूपणप्रस- SECRECRUICAL इति युक्तमभ्युगन्तुमिति दिग् ॥ तदिदमभिप्रेत्याह-"उप्पलदलसयवेहे व्व, दुन्विभावत्तणेण पडिहाई ॥ समयं व सुक्कसक्कु- लिदसणे, विसयाणमुवलबी ।। २९९ ॥" [ उत्पलदलशतवेध इव दुर्विभावत्वेन प्रतिभाति ।। समयं वा शुष्कशष्कुलीदशने विषयाणामुपलब्धिः॥] अभ्यासस्थलेऽप्ययं पुरुष इति निर्णयेऽयं पुरुष इति प्रयोगे कुत इति कस्यचिदाकाङ्क्षायां करचरणा- दिमत्त्वादिति प्रयोगात्तदनुगुणेहादेरनुमानात्तत्र तत्सत्त्वं सिद्धयतीत्यप्याहुः ॥ ८॥ अथ 'भेयवत्थू समासेणं' ति नियुक्तिगाथाs- वयवेनावग्रहादयो मतिज्ञानस्य सामान्यभेदा इत्युक्तमिति विशेषभेदाः किमधिका अपि सम्भवन्तीति शिष्याकाङ्क्षायामाह- श्रोत्रादिभेदात् षोढा स्यु-र्यदर्थावग्रहादयः॥ चतुर्दा व्यञ्जनं तेन, स्युरष्टाविंशतिर्भिदाः ॥९॥ श्रोत्रादीन्द्रियपञ्चकं नोइन्द्रियश्च मन आश्रित्यार्थावग्रहादयश्चत्वारो भेदाः पद्भिः संगुणिताश्चतुर्विशतिर्भवन्ति तत्र च नयनमनोवर्जेन्द्रियभेदाच्चतुर्विधन्यजनावग्रहप्रक्षेपे पूर्वोक्तभेदचतुष्टयापेक्षया विस्तरेण वक्ष्यमाणभेदापेक्षया च सक्षेपेणाष्टा- विंशतिः श्रुतनिश्रितमतिज्ञानस्य भेदाः सम्पद्यन्ते । आह च-" सोइंदिआइभेएण, छव्विहावग्गहादओऽभिहिया ॥ते हुन्ति चउव्वीस, चउन्विहं वंजणोग्गहणं ॥३००॥ अठावीसइभेयं एयं सुअणिस्सि समासेणं ति ॥ [श्रोत्रेन्द्रियादिभेदेन षड्विधा अव ग्रहादयोऽभिहिताः । ते भवन्ति चतुर्विंशतिश्चतुर्विध, व्यजनावग्रहणम् ॥ अष्टाविंशतिभेदमेतच्छ्रुतनिश्चितं समासेन ॥] ॥९॥ अथ केचित्तु चतुर्विधन्यजनावग्रहस्थले औत्पत्तिक्यादिभेदेन चतुर्विधमश्रुतनिश्रितं प्रक्षिप्य सामान्यतो मतिज्ञानस्याष्टाविंश- तिभेदानुपपादयन्ति तन्मतं पूर्वमनूय क्षयति- व्यञ्जनावग्रहस्थाने, चतुर्दा श्रुतनिश्रितम् । केचित् क्षिपन्ति तदस-त्तदन्तर्भूतिसम्भवात् ॥१०॥ सामान्य- तो विशेषत. श्च मतिज्ञान- भेदप्रदर्शनं तत्र परारेका परिहारश्च ॥ FREE तृतीयस्तर- C भगतिज्ञान- सषिवरणं श्रीज्ञाना- गव- प्रकरणम् ॥ ६४ ॥ है न खलु व्यञ्जनावग्रहार्थावग्रहाववग्रहत्वेन रूपेणैकीकृत्योत्पत्तिक्यादिभेदचतुष्टयप्रक्षेपेण श्रुतनिभिताश्रुतनिश्रितसाधारण्येवाटा- विंशतिभेदपरिगणनं युक्तं, औत्पत्तिक्यादीनां चतुर्णा भेदानामवग्रहादिष्वेवान्तर्भावात्, तथा हि 'द्वितीयकुर्कुटमन्तरेण मदीयः कुर्कुटो योद्धव्य' इति रानादिष्टे परीक्षापात्रस्य भरतस्यौत्पत्तिकी प्रादुर्बभूव, तत्र दध्मिातत्वायं स्वप्रतिविम्बं दृष्ट्वा युध्येतेत्य- वगृह्यते, तत्प्रतिविम्बं किं तडागपयःपूरादिगतं तदनुगुणीभवति दर्पणादिगतं वेति तदनन्तरमीयते, ततः कल्लोलादिभिः प्रतिक्षणम- पनीयमानत्वादस्पष्टत्वाच्च जलादिगतं बिम्यं न तथा, स्थिरत्वेन स्पष्टत्वेन चरणघाताद्यन्वीक्षणयोग्यत्वेन च दर्पणगतमेव तत्तथेति निश्चीयते इति । आह च-"केइत्तु वंजणोग्गह-वज्जे छोणमेयम्मि ॥३०१॥ अस्सुअणिस्सिअमेयं. अठावीसइविहन्ति भास- न्ति ।। जमवग्गहो दुभेओ-वग्गहसामनओ गहिओ ॥ ३०२ ॥" [ केचित्तु व्यञ्जनावग्रहवर्जे क्षिप्त्वैतस्मिन् ॥ अश्रुतनिश्रित- मेवमष्टाविंशतिविधमिति भाषन्ते ॥ यदवग्रहो द्विभेदोऽवग्रहसामान्यतो गृहीतः ॥] " चउवइरित्ताभावा, जम्हा ण तमोग्गहाइओ भिन्न ॥ तेणोग्गहाइसाम-नओ अतं तग्गयं चेव॥३०३॥"[चतुर्व्यतिरिक्ताभावाद्,यस्मान तदवग्रहादयः॥ भिन्नं तेनावग्रहादिसा- मान्यतश्चतत्तद्गतमेव ।।] किह पडिकुकुडहीणो, जुज्झे विंधण वग्गहो ईहा।। किं सुसिलिट्ठमवाओ, दप्पणसंकंतबिम्ब ति ॥३०४॥" [कथं प्रतिकुकुटहीनों युध्येत बिम्बेनाऽवग्रह ईहा ।। किं सुश्लिष्टमपायो दर्पणसंक्रान्तप्रतिबिम्बमिति । ] नन्ववग्रहादिभ्य औत्पत्ति- क्यादीनामपि कथञ्चिभेदोऽस्त्येव सर्वथा भेदस्त्ववग्रहोचरविशेषाणामपि नास्त्येवावग्रहत्वेन तयोरभेदादिति चेत्, न, अश्रुत- निश्रितविभाजकोपाधीनामवग्रहादिविभाजकोपाध्यव्याप्यत्वेनोत्तरभेदासम्भवात्, औत्पत्तिक्यादिभेदेन मतिज्ञानस्य साक्षाद्विभागे तु न्यूनत्वापातात, अवग्रहाद्यन्तर्भावेन विभागे त्वाधिक्याद् व्याप्यव्याप्योपाधिना साक्षाद्विभागाऽयोगाच्च, अत एव श्रुत- R प्ररूपणप्रस- ड्रेऽष्टाविश- तिसख्यापू. रणाय परक- ल्पितस्यौ- त्पत्तिक्या- दिक्षेपणस्य तेषामवग्र- हादिष्वन्त- र्भावेन परि- हरणम् ॥ ॥६४॥ S ASHREE निश्रितत्वाश्रुतनिश्रितत्वाभ्यां मतिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्योपाधिभ्यां द्विधा तद्विभागः सूत्रोक्तो न विशीर्यंत, मतिज्ञानत्वेन तयोरभेदेऽपि प्रातिस्विकरूपाभ्यां भेदसम्भवाद्, अवग्रहत्वेनाभिन्नानामिव श्रोत्राद्यवग्रहाणाम् ।। तदुक्तम्-"जह उग्गहाइ- सामण्णए चि, सोइंदिआइणा भेयो ॥ तह ओग्गहाइसामण्णए वि, तमणिस्सिया भिण्णं ।। ३०५॥" [ यथाऽवग्रहादि- सामान्येऽपि, श्रोत्रेन्द्रियादिना भेदः ॥ तथाऽवग्रहादिसामान्येऽपि, तदनिश्रितत्वाद् भिन्नम् ॥] एवं च-श्रुतनिश्रितविभाजको- पाधिभिरौत्पत्तिकीत्वादिभिस्तस्यापि चतुर्दा विभागः सङ्गच्छते । तस्मान्मतिज्ञानस्य श्रुतनिश्रितत्वाश्रुतनिश्रितत्वाभ्यां सामान्यतो द्विधाविभागः, श्रुतनिश्रितस्य चाष्टाविंशतिभेदैरश्रुतनिश्रितस्य च चतुर्भिर्भेदैविशेषविभाग इति विवेकः, अत एव सम्पूर्ण श्रुतनिश्रितं प्ररूप्य ' से किं तं अस्सुअणिस्सिअं' इत्यादिना ग्रन्थेन सूत्रेऽश्रुतनिश्रितप्ररूपणं प्रत्यज्ञायि, अन्यथा तु प्रागेव तदनिरूपणे न्यूनत्वप्रसङ्गः॥ आह च-'अट्ठावीसइभे, सुअणिस्सिअमेव केवलं तम्हा ॥ जम्हा तम्मि समत्ते, पुणरस्सु- अणिस्सि भणि॥३०६॥[अष्टाविंशतिभेदं श्रुतनिश्रितमेव केवलं तस्मात् ॥ यस्मात्तस्मिन्समाप्ते, पुनरश्रुतनिश्रितं भणितम् ॥] ननु मतिज्ञानस्यावग्रहादयश्चत्वार एव भेदा अवग्रहादिभेदास्तु प्रभेदा इति कथमुच्यतेऽष्टाविंशतिमतेर्भेदा इति, सत्यम्, प्रभे- दानामपि भेदत्वेन विवक्षणादाधिक्येऽपि तावतां भेदानां तावदन्यतरत्वेन मतिज्ञानत्वव्यापक(प्य)त्वाद्विभागवचनस्याव्याघाताच सम्प्रदायानुरोधादिकं विनैव हि क्वचिदेतादृशविभागस्याप्रामाणिकत्वमिति, अथवा 'समासेन भेदवस्तूनि' इत्यत्र भेदवस्तुत्वे समासे- नेत्यनुकूलं विशेपणं प्रभेदास्तु बहवोऽपि भवन्तीत्यर्थः ॥१०॥ अथैवमष्टाविंशतिविधत्वं मतिज्ञानस्योपदर्य प्रकारान्तरेण प्रभेदबाडुल्यघटितं बहुभेदत्वमुपदर्शयति- मितिज्ञान- प्ररूपणप्रस- ऽण्टाविश- तिसंख्या- पूरणाय पर- कल्पितस्य अश्रुतनि- श्रितभेद- क्षेपणस्य तेषामवग्रहा- दावन्तर्भाव- प्रदर्शना. स्परिहारः॥ ESS RSSIA

RESS
सविवरणं
श्रीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम्॥
1॥६५॥
नाना-नानाविध-क्षिप्रा-ऽनिश्रिता-निश्चित-ध्रुवैः ॥ षद्भिशच्छतभेदाः स्युः. सेतरावग्रहादिभिः ॥११॥
अवग्रहादयः प्रागुक्तदिशाष्टाविंशतिभेदभाजो बहुबहुविध(धादिभिः)नानानानाविधक्षिप्राऽनिश्रितानिश्चितध्रुवैः सप्रतिपक्षैः
द्वादशभिर्भेदैर्गुणिताः पत्रिंशदधिकानि त्रीणि शतानि भेदा भवन्ति । अत्र बहुबहुविधेतिस्थाने नानानाविधेति बन्धानुलोभ्यादुक्तम् ।
तदाह-"जं बहुबहुविहखिप्पा-णिस्सिअणिच्छियधुवेयरविभिन्ना ॥ पुणरुग्गहादओ तो, तं छत्तीसतिसयभे ॥३०७॥" [यद्
बहुबहुविवक्षिप्राऽनिश्रितनिश्चितधुवेतरविभिन्नाः॥ पुनरवग्रहादयस्ततस्तत्षट्त्रिंशत्रिशतभेदम् ।।]॥११॥ अथ बह्वादीनां स्वरूपमाह-
नानार्थानां बहुत्वं हि, पृथग्जात्यवभासिता॥ नानात्वान्नैवत्वेन न) तज्ज्ञप्ति-बहुत्वं प्रचक्षते ॥१२॥
प्रत्येकं यहुधर्माणां, ज्ञानं बहुविधं मतम् ॥ प्रत्येकं स्वल्पधर्माणां, विज्ञानं तद्विपर्ययः ॥ १३ ॥
क्षिप्रं त्वरितमुत्पन्न-मक्षिप्रं तु विलम्बितम् ॥ अनिश्रितमलिङ्गोत्थं, निश्रितं लिङ्गसम्भवम् ॥ १४ ॥
निश्चितं संशयातीतं, तेन अस्तमनिश्चितम् ॥ सर्वदा यत्तथाग्राहि, ध्रुवं तच्चान्यदाऽध्रुवम् ॥ १५ ॥
बहूनां विषयाणां प्रातिस्विकधर्मप्रकारकग्रहो बहुज्ञानं, यथा तत्त्वं बहुत्वं च 'सकलस्त्रविषयनिष्ठयावदसाधारणधर्मप्रकारकत्वं,'
साकल्यब्चानेकाशेपत्वं, न त्वशेषत्वमात्र, यावत्वं च व्यापकत्वं, तेन घटोऽयमित्याद्यव्यावहारिकावग्रहेऽशेषस्वविषयनिष्ठाशेष-
धर्मग्राहिण्यपि बहुत्वव्यवहाराभावे न क्षतिने वा नानातूर्यजनितेषु शब्देषु कतिपयविशेषावभासेऽपि बहुत्वव्यवहारः, कतिपय-
विशेषावमासेऽपि ततः स्वल्पविशेषापेक्षया बहुत्वव्यवहाराद् , यावत्वमनेकत्वमेव चा विवक्षित, नैश्चयिकार्थावग्रहापेक्षयाऽऽद्य
व्यावहारिकार्थावग्रहेऽपि बहुत्वव्यवहारे तु साकल्यमप्यशेषत्वमेव, अबहुत्वं च तद्भिमज्ञानत्वं,' तत्वं चासाधारणधर्मानुपरागेण
॥ तृतीयः
तरङ्गः॥
मतिज्ञानप्र-
रूपणप्रस
हैविशेषतो
मतिज्ञान-
प्रभेदबहु-
स्वप्रदर्श-
AISAKERSex
नार्थ बहु-
बहुविधादि-
भेदनिरू-
पणं ॥
॥६५॥

॥मतिज्ञान- प्ररूपण. प्रसङ्गे बहु- बहुविधादि. भेदानां लक्ष- णानि तात्प. ASHLORISARS बहुविषयग्राहित्वं 'नानाशब्दा एते' इत्यादिसामान्यज्ञानं हि तदिति, एवम् अशेषस्वविषयनिष्ठानेकासाधारणधर्मव्याप्यवहुतर- धर्मावगाहिज्ञान' बहुविधं, न चैवं बहुविधस्यापि बहुत्वापत्तिस्तल्लक्षणसत्वादिति वाच्यम्, उपधेयसरेऽप्युपाध्योरसङ्करा- द्विवक्षाद्वैविध्येन तत्र द्विधाव्यवहाराच्च, अबहुविधत्वं च न बहुविधभिन्नज्ञानत्वं, बहुज्ञानेतिव्याप्तेः, किन्त्वबहुविधमित्यत्र ननः पदासाश्रयणा'अशेषस्वविषयनिष्ठानेकासाधारणधर्मव्याप्यस्वल्पतरधर्मावगाहित्वं' तदिति, बहुज्ञानेन पृथग्भिन्नजातीय- तया गृहीतेषु नानाशङ्खपणवादिशन्देषु एकैकं शङ्खभेयर्यादिशब्दमाश्रित्य स्निग्धत्वमधुरत्वतरुणमध्यमवृद्धपुरुषवाद्यत्वा- दिबहुविधधर्मवशिष्टयं गृण्हदेव हि बहुविधज्ञानमुदाहियते, तत्र स्निग्धमधुरत्वादिस्वल्पधर्मवैशिष्टथज्ञानश्चाबहुविधमिति । क्षिपत्वं च नाविलम्बितोत्पत्तिकत्वम्, अक्षिमत्वञ्च न विलम्बितोत्पत्तिकत्वं, सामग्रीसग्निथानासनिधानाभ्यां सर्वस्यापि विलम्बिताविलम्बितोत्पत्तिकत्वात्,नापि विमर्शानपेक्षोत्पत्तिकत्वं क्षिप्रत्वम्, अपायस्य सतो विमर्शसव्यपेक्षत्वनियमात्, किन्तु 'झटित्युपनतसामग्रीकत्वं' क्षिप्रत्वं, अतादृशत्वं त्वक्षिप्रत्वमिति ॥ 'झटिति सामग्रथुपनिपातनियामकादृष्टजन्यतावच्छेदकजाति- विशेषवच' क्षिप्रत्वमित्यपि कश्चित्, 'प्रबलतरसंस्काराधीनझटित्युपस्थितिकविमर्शजन्यत्वं' तत्त्वमित्यन्ये ॥ अनिश्रितं लिङ्गानपेक्षोत्पत्तिकं पताकादिनिश्रया देवकुलादिदर्शनवद्, या लिङ्गनिश्रामपेक्षते यद्यप्यन्वयव्यतिरेकधर्मान्वेषणरूपामी- हामपक्षमाणः सर्व एवाऽपायो लिङ्गमपेक्षत एव तथाप्यनुमितिसामग्रीसम्पत्तिरूपा लिङ्गनिश्रा यत्र नास्ति तदनिश्रितं, अन्यत्तु निश्रितमिति ध्येयम् । निश्चितत्वमसन्दिग्धविषयकत्वं 'प्रामाण्यसंशयादिरूपविषयसंशयसामग्रथनास्कन्दितत्वम्', तद्विपरीतत्वमनिश्चितत्वं, ध्रुवत्वं च 'सर्वकालमेझजातीयसामग्रीसमुत्पाद्यत्वम्', अताहशत्वं त्वध्रुवत्वमिति ॥ आह च- र्यप्रकाशन च॥ +

सविवरणं
भीज्ञाना-
णेव-
प्रकरणम्।।
NROLMER
ASSIS
॥ तृतीया
तरङ्गः ॥
मतिज्ञान.
प्ररूपण-
प्रसङ्गे बहु-
नाणासदसमूह, वहुं पिहं मुणइ भिन्नजातीयं ॥ बहुविहमणेगभेयं, एकेकं णिद्धमहुराइ ॥ ३०८ ॥ [ जानाशब्दसमूह,
बहु पृथग्जानाति भिन्नजातीयम् ॥ बहुविधमनेकभेदमे-कैकं स्निग्धमधुरादिम् ॥] "खिप्पमचिरेण तं चिय, सरूवओ जं अणि-
स्सिअमलिंगं । निच्छियमसंसयं जं, धुवमचंतं न य (उ) कयाइ ॥३०९॥" [क्षिप्रमचिरेण तमेव स्वरूपतो यमनिश्रितमलिङ्गम्।
निश्चितमसंशयं ध्रुवमत्यन्तं नतु कदाचित् ॥ ] " एत्तो चिय पडिवक्खं साहिजा [ एतस्मादेव प्रतिपक्षं कथयेद् ] ॥३१०॥"
निश्रितानिश्रितयोश्चायमपि विशेषः, यद् 'अतस्मिंस्तद्धर्मग्रहो निश्रितं' यथा गव्यश्वत्वग्रह इति, इतरचानिश्रितमिति ॥ आह च-
"निस्सिए विसेसो वा ॥ परधम्मेहि विमिस्स, निस्सिअमविणिस्सियं इयरं ॥३१०॥" [निश्रिते विशेषो वा, परधर्मेंविमिश्र
निश्रितमविनिश्रितमितरत् ] स्यादेतत् , बवादयो भेदाः स्पष्टार्थग्राहकष्वपायादिषु सम्भवन्तु, अस्पष्टार्थग्राहिण्यर्थावग्रहे तु कथं
तत्सम्भवः १ न च नैश्चयिकार्थावग्रहे तदसम्भवेऽपि व्यावहारिकार्थावग्रहे तत्सम्मवान्न दोष इत्युक्तमिति वाच्यम्, तथापि व्यञ्ज-
नावग्रहे सर्वथा तदसम्भवेनोक्तसङ्ख्याव्याघातादिति, मैवं, व्यञ्जनावग्रहादीनामप्यपायादिकारणत्वेन तद्गतबहुत्वादिविशेषस्य
योग्यतया व्यञ्जनावग्रहादिष्वपि सत्त्वाद्, 'नह्यविशिष्टात् कारणाद्विशिष्टं कार्यमुत्पत्तुमर्हति' कोद्रवीजादेरपि शालिफलादिप्रसव-
प्रसङ्गादिति सम्प्रदायः। ननु कार्यगतयावद्धमाणां कारणगतत्वाभ्युपगम एव सूक्ष्मतारूपयोग्यतया तत्र तत्सत्वमभ्युपगमाहे
स्यात्, तच्च साङ्ख्यप्रक्रियाषण एव पितं 'अविशिष्टात् कारणाद्विशिष्टकार्यानुत्पत्तिस्तु' तादृशातिशयव्यतिरेकाद्वा तथाविधसह-
कारिव्यतिरेकाद्वेत्यन्यदेव, तथा च कथमेतदुक्तमिति चेत्, न, एकसन्तानगामित्वरूपयोग्यतां पुरस्कृत्य बबादिविशेषस्य व्यञ्ज-
नावग्रहादिषु सम्भवाभिप्रायेण तदभिधानात् । नन्वेवंविधं वैचित्र्यं मतिज्ञानस्य विवक्षाभेदादनवस्थितमित्यनवस्थितो विभागः
NRELECTRES
बहुविधादि-
भेदलक्षण-
सवादा तन्न
चारेकापरि-
हारादिप्ररू.
पणं च ॥
RAKAR
॥६६॥

GES 4 मतिज्ञान- प्ररूपण- प्रसङ्ग तद्रे- दानां निमित्त भेदाद्विभाग- वैचित्र्यं, अ० वग्रहादीनां स्यादिति चेत, सत्यं, सामान्यविशेषभावेन विभागस्य विवक्षाधीनव्यवस्थितिकत्वाद् बाह्यनिमित्तस्यालोकविपयादिकस्य स्पष्टाव्यक्तमध्यमाल्पमहत्त्वसन्निकर्पप्रकपादिभेदेन वैचिच्यादभ्यन्तरनिमित्तस्य चावरणक्षयोपशमोपयोगोपकरणोन्द्रयरूपस्य शुद्धाशुद्धमतिभेदेन वैचित्र्यान्मतिज्ञानस्य नानात्वसम्भवाद् यथोक्तनिमित्तद्वयस्य केनचिद्रूपेण विशेषे तु मतिज्ञानवतां जीवानाम- नन्तत्वात्तेषां क्षयोपशमादिभेदेन मतिज्ञानस्यानन्तत्वात् ,आह च-"एवं वज्झब्भन्तर-णिमित्तवइचित्तओमइबहुत्तं ॥ किंचिम्मेत्त- विसेसेणं,भिज्जमाणं पुणोणतं ॥३११॥" [एवं बाह्याभ्यन्तरनिमित्तवैचित्र्यतो मतिबहुत्वम् ।। किश्चिन्मात्रविशेषेण, भिद्यमान पुनरन- न्तम् ॥] नन्ववग्रहादयः स्पष्टार्थनिर्भासाभावान ज्ञानं,न च संशयाद्यनन्तर्भावात्तेषां ज्ञानत्वमनुमानवदिति वाच्यम्,असिद्धेः,तथाहि, सन्दिग्धे ज्ञानसंशयस्तावद् व्यक्त एव ज्ञानप्रामाण्यसंशयमहिम्ना जनितस्यापि विषयसंशयस्यैकोपयोगसन्तानान्तर्भावित्वेन निश्चय- स्वरूपपरावर्तकत्वात्सन्दिग्धे च कदाचिनिश्चयाद्विपर्ययोऽपि भवत्येव, दोपमहिम्ना विपरीतविशेषदर्शनेन सत्यकोटिज्ञानप्रतिवन्धेड- र्थात्तत्सम्भवात्, अथवेहैव स्पष्टं संशयरूपां गामश्वत्वेनावगाहमानं निश्रितज्ञानं च व्यक्तं विपर्यय एवेति किमितरगवेषणया, नैश्च- यिकोऽर्थावग्रहश्च स्पष्टमनध्यवसाय एवानिर्देश्यसामान्यमात्रग्राहित्वादिति ॥ आह च-"इह संसयादणन्त-ब्भावाओ वग्गहादओ नाणं ॥ अणुमाणमिवाह,ण सं-सयाईसब्भावओ तेसुं ॥३१२॥ नणु संदिद्ध संसय-विवजया संसओत्थ चेहा वि।। वच्चासो वा निस्सि- अ-मवग्गहोऽणज्झवसिअं तु ॥३१३।। "[इह संशयाघनन्तर्भावादवग्रहादयो ज्ञानम् ॥ अनुमानमिवाऽऽह,न,संशयादिसद्भावत- स्तेषु ॥ ननु संदिग्धे संशय-विपर्ययौ संशय इह चेहापि ॥ व्यत्यासो वा निश्रितमवग्रहोऽनध्यवसित तु] अत्राहुन। यदुक्तम्- 'सन्दिग्धे संशयविपर्ययाविति' । तदयुक्तम्-वस्त्वप्रापकसन्दिग्धत्वस्य तत्राभावात्, अन्यादृशसन्दिग्धत्वमात्रेण चाज्ञानतानापत्ते- ज्ञानत्वव्यव- स्थापनं च॥ SRCESS ૧૨ सविवरणं भीशाना णेव- प्रकरणम्॥ ॥ ६७॥ रन्यथा व्यवहारोच्छेदप्रसङ्गात्, न खलु धूमवलाकादेः सकाशात्सम्यग्दहनजलादौ निश्चितेऽपि मुखेन तन्निश्चयं ब्रुवतामपि सर्वषां प्रमातॄणां चेतसि शङ्कामात्र विनिवर्त्तनेन च ते सर्वेऽपि निश्चितं वस्तु न प्राप्नुवन्तीति ॥ वस्तुतः सन्दिग्धस्थले सन्देहाननुविद्ध- स्वरूपो निश्चय एव वस्तुप्रापको ज्ञानप्रामाण्यसंशयाद्विषयसंशयस्तु भिन्नोऽप्यन्तर्गत एवेति, न तत्र निष्कम्पप्रवृत्तिजनकताव- च्छेदकनिश्चयत्वाभावोऽपि सुवचः, ईहायाश्च संशयत्वं प्रागेव निराकृतं, निश्चयादन्यज्ञानमात्रस्यैव संशयत्वेनाज्ञानताभ्युपगमे निश्चयोपादानलक्षणस्यापि सर्वथाऽज्ञानत्वप्रसङ्गे निश्चयस्याप्यज्ञानतापत्तिः, 'न द्यविशिष्टात् कारणात्कार्योत्पत्तिः इति परधर्ममिश्रं च निश्रितं यद्यत्र संगृह्यते तदा तत्र तटस्थतयैव परधर्ममिश्रितत्वं विवक्षणीयं, यथा गौरेवायं केवलमश्व इव प्रतिभातीति न त्वत्यन्तो- परागेणेति, न, तदप्यज्ञानं परधर्माणामाशंकामात्रमेव विमिश्रणम् , अनिश्रिते तु वस्त्वभावस्यैवाशंका न तु परधर्माणामित्यस्या- प्ययमेवार्थः, उक्तोदाहरणे इवार्थसादृश्यस्यैव भानात् , अवग्रहश्च नाऽनध्यवसाय एकोपयोगान्तर्भूतत्वलक्षणयोग्यतया तत्राध्यव- सायसम्बन्धात, अतिमत्तमूच्छितानामेव ज्ञानस्य योग्यतयाऽप्यध्यवसायमस्पृशतोऽनध्यवसायत्वाभ्युपगमाद्, आह च-"इह सज्झमोग्गहाई-णं संसयाइत्तणं ॥३१४॥" [इह साध्यमवग्रहादीनां संशयादित्वम् ] यद्यपीयं वस्तुस्थितिस्तथाप्यभ्युपगम्योच्यते- न निश्रितादयोऽज्ञानं, ज्ञानं यत्संशयादयः॥ वस्त्वेकदेशग्राहित्वं, समानं निश्चयेऽपि नः ॥ १६ ॥ संशयादयोऽपि हि ज्ञानमेव वस्त्वेकदेशगमकत्वाद् , इह हि घटादिकं वस्तु मृन्मयत्वाद्यर्थपर्यायैर्घटकुम्भकलशादिवचन- पर्यायैः परच्यावृत्तिपर्यायैश्वानन्तधर्मांशकं न तु निरंशं, तस्य चैकैकदेशपरिच्छेदं संशयादयोऽपि कुर्वन्त्येवेति तेऽपि ज्ञानमेव, अथ समस्तवस्तुग्राह्येव ज्ञानं न तु तदेकदेशग्राहकमिति चेत्, तर्हि निर्णयोऽपि ज्ञानं न स्याद्, गौरयमित्याद्याकारस्य तस्य 5 ॥ तृतीयः तरङ्गः॥ मतिज्ञानप्र- रूपण प्रसङ्गे तत्र परोक्ता- रेकापरि- हारेण वस्तु- व्यवस्था- पनम् ॥ SAREERESCOREERSAREECHECRECRUCHINE ॥ ६७॥ CURES RESS SECRESS ॥ मतिज्ञान- प्ररूपणप्रस- थे परोक्तारे- कापरिहा- रेण वस्तु- व्यवस्था- पनम् ॥ गोत्वादिवस्त्वेकदेशग्राहित्वात्, देशग्रहणद्वारा तदभिन्नवस्तुग्रहणं च संशयेऽपि तुल्यं, अथ निर्णयेन तथाभूत एवार्थों गृह्यत इति तज्ज्ञानं, संशयादीनां त्वतथाभूतार्थग्राहित्वान्न ज्ञानत्वमिति चेत् , न, अर्थग्राहित्वेनैव तेषां ज्ञानत्वाद्, विशेषाभावस्य सामान्यामावनियतत्वात्सम्यग्दृष्टिसम्बन्धासादितनैश्चयिकज्ञानत्वरूपस्य मतिज्ञानसामान्यस्यैवात्र निरूपयितुमुपक्रान्तत्वात् ॥ न चैवमवग्रहहापायधारणाः संशयविपर्ययानध्यवसायाश्चेति मतिज्ञानस्य सप्तभेदप्रसङ्ग इति वाच्यम् । अनध्यवसायस्याऽवग्रहे, संशयस्येहायां, विपर्यासस्य चापाये व्यक्तमन्तर्भावात्, इत्थं चैतदवश्यमङ्गीकर्तव्यम्, अन्यथा संशयादिकाले सम्यग्दृशामज्ञा- नित्वप्रसङ्गा, एवञ्च-"सम्मदिट्ठी णं भंते ! किं नाणी अन्नाणी ?, गोयमा! नाणी नो अन्नाणी" इत्याद्यागमविरोधः, न चानेन सूत्रेण सम्यग्दर्शनसामानाधिकरण्येनैव ज्ञानित्वप्रतिपादनान्न दोष इति वाच्यम् ॥ च्युतसम्यक्त्वस्य मिथ्यात्वं प्राप्तस्य तत्सामानाधिकरण्येन ज्ञानसत्त्वाद् ज्ञानित्वप्रसङ्गाः। "मिच्छदिट्ठीणं भंते ! नाणी अन्नाणी ?,गोयमा ! नो नाणी नियमा अन्नाणी" इत्याचागमविरोधस्य दुरुद्धरत्वाद् , ज्ञानस्य कालतः सम्यक्त्वनियतत्वप्रतिपादनात्संशयादीनामपि ज्ञानत्वमेव प्रामाणिकं, तदि- दमभिप्रेत्याह-"तहवि णाम ॥ अब्भुवगन्तुं भण्णइ,नाणं चिअ संसयाईआ॥३१४॥ वत्थुस्स देसगमगत्त-भावओ परमयप्पमाण व ॥ किह वत्थुदेसविण्णाण-हेयवो सुणसु तै वोच्छम् ॥३१५॥ इह वत्थुमत्थवयणाइ-पजवाणंतसत्तिसम्पनं ॥ तस्संगदेसविच्छेय- कारिणो संसयाईआ ॥३१६॥ अहवा ण सव्वधम्मा-वभासया तो न नाणमिदुन्ते ॥ नणु निण्णओ वि, तद्देस-मेत्तगाहित्ति अन्नाणं ॥३१७॥” [तथापि नाम ।। अभ्युपगम्य भण्यते,ज्ञानमेव संशयादयः॥ वस्तुनो देशगमकत्वमावतः परमतप्रमाणमिव ।। कथं वस्तु- देशविज्ञानहेतवः, श्रृणु तद् वक्ष्ये ॥ इह वस्त्वर्थवचनादिपर्यायानन्तशक्तिसम्पन्नम् ॥ तस्यैकदेशविच्छेदकारिणः संशयादयः ॥ SSES

। तृतीयः
.
तरङ्गः।
साविवरणं
श्रीनाना-
व-
प्रकरणम्॥
६८॥
अथना न सर्वधर्मावभासकास्ततो न ज्ञानमिष्टं ते ॥ ननु निर्णयोऽपि तद्देशमात्रग्राहीत्यज्ञानम् ॥ ] ॥१६॥
ननु सम्यग्दर्शनकाल इव मिथ्यादर्शनकालेऽपि ज्ञानसामान्यसत्त्वात्कथमयं विभाग इत्यत्राऽऽह-
ज्ञानं मिथ्यादृशां सर्व-मज्ञानमुपवर्णितम् ॥ एकग्रहेपि सर्वस्य, ज्ञानं सम्यग्दृशां ग्रहात् ॥ १७ ॥
मिथ्यादृशां हि संशयादिरूपमतथाभूतं चा सर्वमेवाज्ञानमिति "सदसदविसेसणाओ" इत्यत्र सप्रपञ्च व्यवस्थापितमिति, अत्र
पुनस्तदुपदर्शनं पिष्टमेव पिनष्टि,अत एव "जइ एवं तेण तुहं, अन्नाणी कोवि नत्थि संसारे(री) ।। मिच्छदिट्ठीणं ते, अन्नाणं नाणमि-
यरेसिं॥३१८॥"[यद्येवं तेन तयाज्ञानी कोऽपि नास्ति संसारे(री)। मिथ्यादृष्टीनां तेज्ञानं ज्ञानमितरेषाम् इति प्रतिज्ञाय भाष्य.
कारोऽपि 'सदसदविसेसणाओ' इति गाथामेवानेडितवान् ,सम्यग्दृशस्त्वेकं वस्तु गृह्णतः सर्वग्रहात् ज्ञानमेव सर्वोऽपि बोधः,तथाहि,
इह तावदेकैकं वस्तु समस्तत्रिभुवनमयं अनन्ताऽनन्तानां स्वपर्यायाणामिवान्यव्यावृत्तिरूपाणां परपर्यायाणामपि तत्र वृत्तेः,तथापि परे
पदार्थाः कथं तत्र वर्तिष्यन्त इति चेत्,अभाववृत्तिद्वारा प्रतियोगिनामपि तवृत्तित्वाद्, अभावस्य तत्र विशेषणत्वलक्षणः साक्षात्सम्ब-
न्धा; प्रतियोगिनां तु स्वाभाववृत्तित्वलक्षणा परम्परासम्बन्धः, इत्येव हि विशेषः, एवञ्च याथात्म्येनैकवस्तुज्ञाने सर्ववस्तुज्ञानमिति
नियमः,सर्ववस्तुज्ञान एव चैकवस्तुज्ञानमिति नियम इति ।। " जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ, जे सव्वं जाणइ से एग जाणइ ॥"
इत्यागमो व्यवस्थितः,तथा चैक वस्तु गृह्णतः सर्ववस्तुग्रहो निराबाध एव,अथैवंविधं परिज्ञानं केवलिन एव सम्मवति, नतु सूक्ष्मव्य-
वहितार्थाग्राहिण छमस्थस्येतिचेत्,न,साक्षात्तस्य तथापरिज्ञानाभावेऽपि “जो एगं जाणइ"इत्याद्यागमप्रामाण्याभ्युगमद्वारा तस्यापि
तथा परिज्ञानात् तस्माजाग्रतः स्वपतस्तिष्ठतश्चलतो वा परमगुरुप्रणीतयथोक्तवस्तुस्वरूपाभ्युपगमस्य चेतसि सर्वदेवाविचलनात्
मतिज्ञानप्र-
सङ्गे सम्य-
ग्दशां ज्ञान
मिथ्याहशां
चाज्ञान-
मित्युपपा-
दनम् ॥
३
*
॥ ६८॥

मतिज्ञान- निरूपणप्र- सङ्गे सम्य- सम्यग्दृष्टिः सर्वदा ज्ञान्येव, आह च-"एगं जाणं सव्वं, जाणइ, सव्वं च जाणमेगंति ॥ इय सब्वमयं सव्वं सम्मदि- द्विस्स जं वत्थु ॥३२०॥ [एकं जानन्सर्वं जानाति सर्व च जानन्नेकमिति ।। इति सर्वमयं सर्व सम्यग्दृष्टेः यद्वस्तु] ॥१७॥ तस्मा- तत्त्वाभ्युपगमविशिष्टस्य ग्रहणमात्रस्यैव ज्ञानत्वात्स्थाणौ व्यावृत्तिरूपाणामपि पुरुषत्वादिपर्यायाणां पररूपतया ग्रहेऽपि अनन्त- पर्यायस्यापि वस्तुनः प्रयोजनवशादेकपर्यायग्रहेऽपि याथात्म्याभ्युपगमस्य निरुपप्लवत्वात्सम्यग्दृशो न ज्ञानं प्रच्यवत इत्याह- तत्वोपगममाहात्म्याद, ज्ञानमेवास्य संशये ॥ प्रयोजनवशादेक-पर्यायग्रहणेऽपि च ॥१८॥ न सलु व्यवहारमात्रेणाज्ञानरूपा अपि सम्यग्दृशः संशयादयो निश्चयतो न ज्ञानं, तत्त्वोपगमविशेषितवस्तुधर्मग्रहणस्य तत्रान- पायात्सिद्धान्तनियन्त्रितेन समभिरूढनयेनैवम्भूतार्थाबाधेन तादृशस्यैव ज्ञानस्याभ्युपगमाद्,नचैकपर्यायमात्रग्रहे वस्तुनोऽन्यथाग्र- हात्तस्याज्ञानिवप्रसङ्गः, यतः प्रयोजनवशादनन्तधर्मात्मकेऽपि वस्तुनि यद्यप्यसावेकं पर्यायमासादयति यथा सौवर्णघटे दृष्टे घटार्थी घटत्वमध्यवस्यति सुवर्णार्थी तु सुवर्णत्वं जलानयनार्थी तु जलभाजनत्व मिति व्यवस्यति, उपलक्षणं चेदं, अभ्यासपाट- वप्रत्यासत्यादिभिरपि पर्यायविशेषग्रहाद् यथा ब्राह्मणे द्वारि दृष्टे कोऽप्यभ्यासवशाद् भिक्षुकोऽयमिति जानाति, अन्यस्तु पाटववशाद् ब्राह्मणोऽयमिति, अपरस्तु यस्तदभ्यर्णे भणति स प्रत्यासचिवशान्मदुपाच्यायोऽयमिति, तथापि तदानीं तस्य भावतोऽ- नन्तपर्यायात्मकतया वस्तुग्रहणपरिणामो न क्षीयत इति, तदाह-"जे संसयाइगम्मा, धम्मा वत्थुस्स ते वि पज्जाया ॥ तदहि- गमत्तणओ ते, नाणं चिय संसयाईआ ॥ ३२१॥ पज्जायमासयन्तो, एक पि तओ पओअणवसाओ ॥ तत्तियपज्जायं चिय, तं गिण्डइ भावओ वत्थु ॥३२२ ॥” [ये संशयादिगम्या धर्मा वस्तुनस्तेऽपि पर्यायाः ॥ तदधिगमत्वतस्ते ज्ञानमेव संशयादयः॥ म्हशां संश- यादयोऽपि ज्ञानमित्युप- पादनम् ॥ है ॥ तृतीय- सविवरण भीवाना- म्तरङ्गः मति- नव- ज्ञाननिरू- पणप्रसङ्गे सम्यग्दशा प्रकरणम्॥ ॥६९॥ ACARRANCARE पर्यायमाश्रयन्नेकमपि तकः प्रयोजनवशात् ॥ तावत्पर्यायमेव तद् गृह्णाति भावतो वस्तु ॥] ननु भावतस्तथा ग्रहणं न सार्वत्रिक घटाधुपयोगकाले तदुपयोगानियमादत एव तथाविधागमप्रामाण्याऽभ्युपगमोऽपि न तथेति तद्विशेषितं ग्रहणं ज्ञानमिति पर्यवसि- तार्थानुपपत्तिः, नचाऽभ्युपगमपदेनात्र तद्योग्यतैव विवक्षणीया, सा च सम्यग्दर्शनरूपैवेति सम्यग्दर्शनविशेषितमेव ज्ञानं नैश्चयिक ज्ञानं, अत एव “निन्नयकाले वि जओ, ण तहारूवं विदन्ति ते वत्थु॥ मिच्छविट्ठी तम्हा, सव्वं चिय तेसिमन्नाणं ॥ ३२३॥" [निर्णयकालेऽपि यतो न तथारूपं विदन्ति ते वस्तु ॥ मिथ्यादृष्टयस्तस्मात्सर्वमेव तेषामज्ञानम् ] इति गाथया मिथ्यादृशां निर्णयकाले- ऽपि ज्ञानत्वनियामक तत्त्वाभ्युपगमयोग्यताभावभणनाद्ज्ञानाभावलक्षणमज्ञानमुक्तं,यदुक्तं "कट्ठयरं वन्नाणं,विवज्जओचे मिच्छ- दिट्ठीणं ॥ मिच्छाभिणिवेसाओ, सव्वत्थ घडेव्व पडबुद्धी ॥३२४॥" [कष्टतरं वाऽज्ञानं, विपर्ययत एव मिथ्यादृष्टीनां ॥ मिथ्या- भिनिवेशात्सर्वत्र, घट इव पटवुद्धिः] इति गाथया चाऽभिनिवेशव्यपदेश्यमिथ्यादर्शनरूपायास्तदयोग्यताया एव कष्टतरत्वात्तज्ज्ञान- जनकसम्यग्दर्शनविरोधि मिथ्यादर्शनजन्यं स्वतन्त्रमेवाज्ञानमुक्तं कष्टतरपदेनातिदुस्सहमहादुःखहेतुत्वाभिधानात्तत्त्वाभ्युपगमा- भावनियामकत्वोक्तावपि तस्य स्वतः संसाराहेतुत्वात् , विपर्ययनियामकमिथ्याभिनिवेशोक्त्या फलतस्तद्धेतुभूतमिथ्यादर्शन- सत्ताभिधानाज्ञाननियामकत्वे मिथ्याभिनिवेशयोग्यताविशिष्टस्वरूपज्ञानस्य तत एवातिप्रसङ्गादिति वाच्यम्, सम्यग्दृष्टौ सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य प्रसिद्धत्वेन तमुद्दिश्य सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य प्रश्नप्रतिवचनाऽभावप्रसङ्गाद्विशिष्याज्ञातस्यै- चार्थस्य प्रश्नारोहात् , न चापर्याप्ताद्यवस्थायां सम्यक्त्वकालेऽपि ज्ञानाभावशङ्कया प्रश्नावतारो मनोव्यापाररूपस्य व्यक्तज्ञानस्य तदानीमभावेऽपि ज्ञानसामान्यस्याप्रत्यूहत्वाच्च निर्वचनं फलवदिति वाच्यम् , तथापि विशेषमन्तर्भाव्य निर्वचनस्याऽनतिप्रयोजन- SAREERSEENE सर्व ज्ञानरू. पमेव मिथ्या. दृशां चाज्ञान मित्युप” पादनम् ॥ ॥ ६९ ॥ हूँ . - SCREENSHAHARASHIS त्वात् , न च निर्वचनेनैव विशेषान्तर्भाव इति शङ्कनीयं, मिथ्यादृष्टिसूत्रानुरोधेन तत्र विशेषान्तर्भावावश्यकत्वात् , न च मोक्ष- हेतोः सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य सम्यग्दृष्टौ विशेष्यशङ्काप्रयुक्तशङ्कया प्रश्नस्तन्निर्वचनञ्च सङ्गच्छेते इति वाच्यम्, सम्यग्- दर्शनविशिष्टज्ञानत्वेन मोक्षाहेतुत्वाद्विशिष्टज्ञानत्वेनैव तथात्वात्सामान्यपदेन विशेषप्रश्नानौचित्याच्च, अपि च सम्यग्दृष्टिसूत्रस्थान- नवाक्यद्वये ज्ञानपदस्यैकरूपस्यैव निवेशात्कथं निर्वचनसूत्रयोर्विशेषगर्भत्वं प्रश्नसमानाकारस्यैवोत्तरस्य युक्तत्वात् , नहि भूतले घटोऽस्ति नवेति प्रश्ने भूतले नीलघटोऽस्तीत्युत्तरमुश्चन्ति विपश्चितः, एवञ्च स्वस्थितशकाविरहेअपि शिष्यजिज्ञापयिषोत्थापित- शङ्कया प्रश्न इत्युक्तिरपि न युक्तेति चेत्, न,सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्यैव मोक्षौपयिकतया नैश्चयिकज्ञानत्वात्प्रश्ननिर्वचनवाक्ययोस्तु सामान्यपदगर्भयोरपि विशेपाभिप्रायप्रयुक्ततया विशेष पर्यवसानात्, तथाहि, निश्चयाभिप्रायेण सम्यग्दृष्टिानी नवेति प्रयुक्तस्य प्रश्नवाक्यस्य सम्यग्दृष्टिर्मोक्षौपयिकज्ञानवान्न वेत्यर्थात् ततः सम्यग्दृष्टिन्येिवेति निर्वचनवाक्यस्य सम्यग्दृष्टिोक्षौपयिकज्ञान- वानेवेत्यर्थात् यदभिप्रायेण प्रश्नस्तदभिप्रायेणैवोत्तरप्रदानात, एवं मिथ्यादृष्टिसूत्रेऽपि भावनीयं, न च विशेषाभिप्रायेणापि प्रयुक्तात् सामान्यपदान्न विशेषोपस्थितिरिति शङ्कनीयं, भोजनाभिप्रायेण सैन्धवप्रश्ने तदुत्तरवाक्यस्थसैन्धवपदाल्लवणानुपस्थितिप्रसङ्गा- दिति दिग् ॥१८॥ अथ प्रकारान्तरेण संशयादिकालेऽपि सम्यग्दृशो ज्ञान मिथ्यादृशश्च निर्णयकालेऽप्यज्ञानं समर्थयति- सम्यग्दृशः संशयो वा, ज्ञानं ज्ञानोपयोगतः ।। मिथ्यादृशां किलाज्ञानं, सर्वो बोधस्तमन्तरा ॥ १९ ॥ सम्यग्दृशः संशयः, उपलक्षणाद्विपर्यासानध्यवसायौ च ज्ञानमेव ज्ञानोपयोगात्, 'यो यदुपयुक्तः स तन्मयो' यथेन्द्रज्ञानो- पयुक्तो दरिद्रोऽपीन्द्र एव, वर्तते च सम्यग्दर्शनलाभकाल एव मत्यादिज्ञानलाभात्सम्यग्दृशः सर्वदैव ज्ञानपरिणामरूपज्ञानोपयोग- ॥ मतिज्ञान- प्ररूपणाप्र- सङ्गे सभ्य- ग्दशां संश- यादीनामपि ज्ञानत्वं मि- थ्यादृशांचा- ज्ञानत्वमि- ति युक्त्य- न्तरेणाप्यु- पपादनम् ॥

सविवरणं
तृतीयस्त-
रङ्गः मति-
र्णव-
प्रकरणम्॥
॥ ७०॥
मात्र, तस्मात्तस्य संशयादिकालेऽपि मौलज्ञानोपयोगयोगादप्रत्यूहमेव ज्ञानमिति । तदाह-"अहवा जहिंदनाणो-वओगओ तम्म-
यत्तणं होइ ।। तह संसयाइभावे, नाणं नाणोवओगाओ ॥३२५॥" [अथवा यथेन्द्रज्ञानोपयोगतस्तन्मयत्वं भवति । तथा संशयादि-
भावे ज्ञानं ज्ञानोपयोगात् ] मिथ्यादृशस्तु निर्णयकालेऽपि सम्यग्दर्शनाविनाभाविज्ञानोपयोगयोर(स्याऽ)भावादज्ञानमेव, उपयोग-
ग्राहिणा नयेन तत्कार्यान्तरमनपेक्ष्य तदुपयोगेनैव तन्मयत्वव्यवस्थापनादिन्द्रपदार्थ परमैश्वर्यमनपेक्ष्यैवेन्द्रोपयोगवत इन्द्रत्वाभ्यु-
पगमात् ॥ तदाह-"तुल्लमिणं मिच्छस्स वि, सो सम्मत्ताइभावसुन्नोति ॥ उपओगंमि वि तो तस्स, णिचमन्नाणपरिणामो ॥३२६॥
जं निन्नओवओगे वि, तस्स विवरीयवत्थुपडिवत्ती ॥ तो संसयाइकाले, कत्तो नाणोवओगो से।।३२७॥" [तुल्यमिदं मिथ्यादृष्टेरपि
स सम्यक्त्वादिभावशून्य इति ।। उपयोगेऽपि ततस्तस्य नित्यमज्ञानपरिणामः ॥ यन्निर्णयोपयोगेऽपि तस्य विपरतिवस्तुप्रातिपत्तिः ।
ततः संशयादिकाले कुतो ज्ञानोपयोगस्तस्य ॥] ॥ १९॥ तदेवं साधितमभ्युपगम्यानिश्रितादीनां संशयादिरूपत्वेऽपि सम्यग्दृशां
ज्ञानत्वम् , अथ सामान्यतो ज्ञानाज्ञानरूपाया एव मतेर्निरूपणीयत्वान्न किश्चिद्दष्यतीत्याह-
सामान्यतो निरूप्यत्वा-न्मतेः कापि न च क्षतिः॥ ज्ञानाज्ञानविभागस्तु, ज्ञेयो फलविभागतः ॥ २०॥
इह हि 'आभिणियोहियनाणं, सुअनाणं च' इत्यादिगाथायां श्रुतज्ञानं तावद् योगार्थमात्र पुरस्कारेण ज्ञानज्ञानोभयसाधारणमेव
निर्दिष्टमिति, यथा-'अक्खरसन्नीसम्म' इत्यादिनाऽभिधास्यमानेषु चतुर्दशसु तद्भेदेपु मिथ्याश्रुतस्यैषां ग्रहप्रसङ्गाद्, एवं च मति-
ज्ञानमपि सङ्ग्रहलाघवाद् ज्ञानाज्ञानोभयसाधारणमेवोक्तमिति सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिनां संशयादीनामज्ञानत्वेऽपि न क्षतिरिति।तदाह-
"अहवा जह सुयनाणा-बसरे सामन्नदेसणं भणिों ॥ तह मइनाणावसरे, सब्बमइनिरूवणं कुणइ ॥३२८॥" [अथवा यथा श्रुतज्ञा-
ज्ञाननिरू-
पणप्रस-
जन सम्य.
ग्दशामुपयो-
गप्रकारेण
ज्ञानत्वं मि-
थ्याहशांचा-
ज्ञानत्वमिति-
सगथितम् ।।
RESS
LERS
॥ ७० ॥

नावसरे सामान्यदेशनं भणितम्।।तथा मतिज्ञानावसरे, सर्वमतिनिरूपणं करोति] ज्ञानाज्ञानविभागचिन्तायां तु सम्यक्त्वानुगता मतिर्मतिज्ञानं, मिथ्यात्वविशेपिता तु सा मत्यज्ञानमिति द्रष्टव्यं, 'अविसेसिया मइ'इत्यादिसूत्रेण प्राक्तथाविवेचितत्वाद्॥आह च- एसा सम्माणुगया, सन्या नाणं विवज्जए इयरं।।अविसेसिया मइ च्चिय, जम्हा णिदिट्ठमाईए॥३२९।। [एपा सम्यक्त्वाऽनुगता, सर्वा ज्ञानं विपर्यये इतरत् ।। अविशेपिता मतिरेव यस्मान्निर्दिष्टमादौ ॥] नन्वेतत्सूत्रव्यावर्णन एव मतिज्ञानपदं सम्यग्दृष्टित्वविशषि- तायामेव मती प्रवर्तत इत्युक्तम्, तत्कथमाभिनिबोधिकज्ञानपदेन ज्ञानाज्ञानोभयरूपाया मतेः सङ्ग्रह इति चेत्, सत्यम्-रूढिपुर- स्कारेणैव सम्यग्दृष्टित्वविशेपितं मतिज्ञानं ज्ञानमित्युक्तेयोगार्थमादायोभयसमहाविरोधात्,योगार्थस्य साधारणत्वेऽपि मोक्षसंसार- लक्षणफलभेदेनैव सम्यग्मिथ्यादृष्टिसम्बन्धिनोनियोरनाद्यलौकिकसङ्कतलक्षणज्ञानाज्ञानपदरूढिप्रवृत्तेनिश्चयेन फलवत एव वस्तुनोऽभ्युपगमात्, अत एवाह-"विवरीयवत्थुगहणे, जं सो साहणा विवज्जयं कुणई ॥ तो तस्स अन्नाणफलं, सम्मट्ठिस्स नाण- फलं॥३३०॥" [विपरीतवस्तुग्रहणे, यत्स साधनविपर्ययं करोति ॥ ततस्तस्याज्ञानफलं सम्यग्दृष्टेनिफलम् ॥] विपरीतवस्तु- ग्रहणशीलो हि मिथ्यादृष्टिर्यागीयहिंसादिकं संसारसाधनमपि मोक्षसाधनत्वेनाध्यवस्यतीति विपरीतफलकत्वेन तदज्ञानमिति परिभाष्यते, सम्यग्दृष्टिस्तु यथावद्ज्ञात्वा यथास्थानं साधनं विनियुक्त इति फलवत्चात्तदीयो बोधो ज्ञान xxx (योजितः पाठः)[मेवानिनु सर्वमयं सर्वमेव वस्त्विति भवसिद्धान्ततो मोक्षसाधनस्य सम्यग्ज्ञानादित्रिकस्य सम्यग्ज्ञानादि वन्मिथ्याज्ञानादिरपि धर्म इति सम्यग्दृष्टिना मोक्षसंसिद्धये ।यस्य साधनस्य धर्मोऽङ्गीकृतः मिथ्यादृष्टिनापि तस्यैव धर्मस्तत्सिद्धये स्वीकृतः, धर्मग्रहणद्वारेण च तस्य धर्मिणोऽपि कथञ्चिद्ग्रहणं समस्त्येवेति न मिथ्यादृष्टेविपरीतत्वमिति चेत्, न, सम्यग्दृशां मोक्षफलसा- धकत्वेन ज्ञा- न मिथ्याटशा तदसाधकत्वे- नचाज्ञान- मिति समर्थि- तम् ॥ लेख- पुस्तकेज 'गाथा इतो- ऽष्टपञ्चाशद्वि- शीर्णावृत्ति- सजता" इतिलिखित- मस्ति ॥

S
(योजितः
सविवरण
भीझाना-
णेव-
प्रकरणम्
॥ ७१॥
यतोऽनन्तधर्माऽध्यासितस्यापि वस्तुनो न सर्वेऽपि धर्मा एकमर्थ साधयन्ति, किन्तु यो धर्मो यत्रार्थे योग्यस्स एव तमेवार्थ
साधयति यथा कलशमल्लकादीनां मृद्धर्मत्वे समानेऽपि कलश एव मङ्गलादिकार्येषु व्याप्रियते, एवं यद्यपि मोक्षादिसाधनस्य
मिथ्याज्ञानादिकोऽपि व्यावृत्तिरूपतया धर्मः, तथापि नासौ मोक्षस्य साधकः, किन्तु तद्विपक्षभूतस्य संसारादिकस्यैव, मोक्षा-
देस्तु तत्साधनयोग्यः सम्यग्ज्ञानादिको धर्म एव साधक इति वस्तुस्थितौ मोक्षेऽयोग्यं मिथ्याज्ञानादिकमयोग्यतयाऽपश्यंस्तत्र
व्यापारयति मिथ्यादृष्टिरतस्साधनविपर्ययं कुर्वतोऽस्याज्ञानमेव, तदाह भाष्यकार:-"जइ सो वि तस्स धम्मो, किं विवरीयत्तणं
तितं न भवे ॥ धम्मो वि जओ सव्वो, न साहणं किंतु जो जोग्गो॥३३१॥ जोग्गाजोग्गविसेसं, अमुणंतो सो विवजयं कुणइ ॥
सम्मट्ठिी उण कुणई, तस्स सट्ठाणविणिओगं॥३३२॥” [यदि सोऽपि तस्य धर्मः किं विपरीतत्वमिति तन्न भवेत् ।। धर्मोऽपि यतः
सर्वो न साधनं किन्तु यो योग्यः॥ योग्यायोग्यविशेषमजानन् स(मिथ्यादृष्टिः) विपर्ययं करोति ॥ सम्यग्दृष्टिः पुनः करोति, तस्य
स्वस्थानविनियोगम्] इति । योग्यमयोग्यञ्च धर्म जानन् स्थाने व्यापारयश्च सम्यग्दृष्टिः सम्यगाराधको भूत्वा समीहितफलभा-
ग्भवति ॥ उक्तं च-"काले सिक्खइ नाणं, जिणभणिों परमभत्तिराएण॥ दसणपभावगाणि अ,सिक्खइ सत्थाई कालम्मि ॥१॥
काले य भत्तपाणं, गवेसए सयलदोसपरिसुद्धं ॥ आयरियाईणट्ठा, पवयणमायासु उवउत्तो ।। २ ॥ एवं समायरंतो, काले कालं
विसुद्धपरिणामो ॥ असवन्तजोगकारी, सलाहणिज्जो य भुवणम्मि ॥ ३॥ सयलसुरासुरपणमिय-जिण-गणहरभणियकिरिय-
विहिकसलो ॥ आराहिऊण सम्म-त-नाण-चरणाई परमाई ॥४॥ सत्तट्ठभवग्गहण-भंतरकालम्मि केवलन्नाणं । उप्पाडिऊण
गच्छइ, विहुयमलो सासयं मोक्खं ॥५॥ तत्थ य जर-जम्मण-मरण-रोग-तण्हा-छुहा-भय-विमुक्को ॥ साइ अपजवसाणं,
पाठः) तृ-
तीयस्तरङ्गः
मतिज्ञान-
प्ररूपणप्रस-
ङ्गे सभ्यगढ-
शा ज्ञानस्य
मोक्षसाधक-
त्वं तदनुकू-
लाऽनुष्ठान.
क्रमोपदर्श-
नञ्च ॥
SEASOKES
॥७१॥

॥ SAIRANS कालमणतं सुह लहइ ॥६॥” इति ॥[काले शिक्षते ज्ञानं, जिनभणितं परमभक्तिरागेण ।। दर्शनप्रभावकाणि च शिक्षते शास्त्राणि काले ।। काले च भक्तपानं, गवेषयेत्सकलदोषपरिशुद्धम्।।आचार्यादीनामाय, प्रवचनमातृधूपयुक्तः ॥ एवं समाचरन्काले काले विशुद्धपरिणामः ॥ अस्रवद्योगकारी श्लाघनीयश्च भुवने ॥ सकलसुरासुरप्रणतजिन-गणधरभाषितक्रियाविधिकुशलः ॥ आराध्य सम्यक्त्वज्ञानचरणानि परमाणि ॥ सप्ताष्टभवग्रहणाभ्यन्तरकाले केवलज्ञानम् ॥ उत्पाद्य गच्छति विधुतमला शाश्वतं मोक्षम् ॥ तत्र च जराजन्ममरणरोगतृष्णाक्षुधाभयविमुक्तः ॥ साद्यपर्यवसानं कालमनन्तं सुखं लभते ॥] तेषु मतिज्ञानभेदेषु चतुर्पु अर्थावग्रहादिषु एकसमयोऽर्थावग्रहः, समयः सर्वजघन्यः कालविशेषः, ईहापायावन्तमुहूर्तम्, व्यञ्जनावग्रहव्यावहारिकार्थावग्रहावपि तथैव, अविच्युतिस्मृतिवासनाभेदात् त्रिविधा धारणा, तत्राऽविच्युतिः स्मृतिश्च प्रत्येकमन्तमुहूर्ते भवति, स्मृतिबीजभूता तदर्थज्ञानाव- रणक्षयोपशमरूपा वासना संख्येयवर्षायुषां सत्त्वानां संख्येयं संख्येयं कालम्, असंख्येयवर्षायुषां तु पल्योपमादिजीविनाम संख्येयं कालम्भवति, तदुक्तं नियुक्तिकृता । " उग्गहो एक्कं समयं, ईहा-वाया मुहुत्तमंतं तु ॥ कालमसंखं संखं च, धारणा होइ नायव्वा ॥ ३३३ ॥” इति [ अवग्रह एकं समयं, ईहापायौ मुहूर्तान्तस्तु ॥ कालमसंख्यं संख्यं च धारणा भवति ज्ञातव्या ] नैश्चयिकार्थावग्रह एकसमयः, वासनारूपधारणाम्मुक्त्वाऽन्ये व्यजनावग्रह-व्यावहारिकार्थावग्रहापायाविच्यु- तिस्मृतिरूपा मतिभेदाः पृथगेकमेवान्तर्मुहूतं भवन्ति । यदाह भाष्यकारः॥"अत्थोग्गहो जहन्नो, समयं सेसोग्गहादओ वीसुं । अंतोमुहुत्तमेगं तु, बासनाधारणं मोत्तुं ॥३३४॥" [अर्थावग्रहो जघन्यः समयं शेषाऽवग्रहादयो विश्वक् अन्तर्मुहूर्तमेकं तु वासना- धारणां मुक्त्वा ] इति स्थितिविचारः ॥ नयनमनोभिन्नानां श्रोत्रादीनां चतुर्णामिन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वव्यवस्थापनतस्तेषां (योजितः पाठः) । मतिज्ञान- प्ररूपणप्रस- ऽअर्थावग्र- हादीनां का- लमानप्रद- र्शनं ॥ 1551s R

R-6
( योजितः
पाठः)
॥ तृतीयः
सविवरण
श्रीज्ञाना-
व-
प्रकरणम्॥
॥७२॥
व्यञ्जनावग्रहचतुर्धा नयनमनसोरप्राप्यकारित्वव्यवस्थापनतस्तयोर्न व्यञ्जनावग्रहः, इत्येवं पूर्वमेव निर्णयः कृतः, इदानी तेषु तत्र
विशेष उपदयते-श्रोत्रं स्पृष्टमात्राण्येव शब्दद्रव्याण्युपलभते, तानि घाणेन्द्रियादिविषयीभूतद्रव्येभ्यः सूक्ष्माणि, बहूनि, भावुका-
नि च, विषयपरिच्छेदे घ्राणेन्द्रियादिगणात्पटुतरं च श्रोत्रेन्द्रियम्, घ्राणरसनस्पर्शनेन्द्रियाणि स्वस्त्राविषयं बद्धस्पृष्टं गृह्णन्ति,
घाणस्य चिपयो गन्धः, रसनाया विपयो रसः, स्पर्शनस्य विषयः स्पर्शः । स्पृष्टमित्यालिङ्गितं, बद्धं तु गाढतरमाश्लिष्टमात्म-
प्रदेशैः, नाणेन्द्रियादिविषयभूतानि गन्धादिद्रव्याणि शब्दद्व्यापेक्षया स्तोकानि,बादराणि,अभावुकानि च,विषयपरिच्छेदे श्रोत्रा-
पेक्षयाऽपटूनि च घ्राणादीनि,अत एव बद्धस्पृष्टमेव स्वस्वविषयं गृह्णन्ति,न स्पृष्टमात्रम्, चक्षुरिन्द्रियन्तु अप्राप्तमेव विषयं गृह्णाति,
अप्राप्तत्वाविशेपे कथं न सर्वस्य ग्रहणमिति नाशङ्कचं, यतोऽप्राप्तमपि योग्यदेशस्थमेव पश्यति, नायोग्यदेशस्थमिति, उक्तार्थो-
पोद्वलिका 'पुढे सुणेइ सई' इत्यादिनियुक्तिगाथां सम्बन्धयन्नाऽऽह भाष्यकारः॥ “सोत्ताईणं पत्ताइ-विसयया पुव्वम
त्थओ भणिया ।इह कंठा सहाणे, भण्णइ विसयप्पमाणं च ॥३३५॥ पुढे सुणेइ सदं, रूवं पुण पासइ अपुढं तु ॥ गन्धं रसं च फासं
च, बद्धपुढे वियागरे॥३३६॥ इति, 'पुढे सुणेइ सई' इति नियुक्तिगाथाव्याख्यानरूपाश्चेमा भाष्यगाथाः, तद्यथा-"पुढे
रेणुं व तणुम्मि, बद्धमप्पीकयं पएसेहि ॥ छिकाई चिय गिण्हइ, सहदबाई जं ताई॥३३७॥बहुसुहुमभावुगाई, जं पटुयरं च सोत्त-
विण्णाणं ॥ गंधाईदव्याई, विवरीयाई जओ ताई।।३३८॥ फरिसाणंतरमत्त-प्पएसमीसीकयाइं घेप्पंति ।। पडुयरविण्णाणाई, जं च न
घाणाइकरणाई॥३३९॥"[श्रोत्रादीनां प्राप्तादि-विषयता पूर्वमर्थतो भणिता।इह कण्ठात्स्वस्थाने,भण्यते विषयंप्रमाणं च।।स्पृष्टं श्रृणो-
ति शब्दं रूपं पुनः पश्यत्यस्पृष्टं तु ॥ गन्धं रसं च स्पर्श च बद्धस्पृष्टं व्यागृणीयात् ।। स्पृष्टं रेणुरिव तनौ बद्धमात्मीकृतं प्रदेशैमास्पृष्टा-
मतिज्ञान-
प्ररूपण-
प्रसने इन्द्रि-
याणां विषय-
ग्रहणस्वरू-
पोपदर्शनम्॥
RECESSFRE
॥ ७२ ॥

RECENSESCHOLA न्येव गृह्णाति,शब्दद्रव्याणि यत्तानि।।आत्मागुलेन लक्षमतिरिक्तं योजनानां तु ॥ बहुमुक्ष्मभावुकानि यत्पटुतरं च श्रोत्रविज्ञानम् ।। गन्धादिद्रव्याणि विपरीतानि यतस्तानि ॥ स्पर्शानन्तरमात्मप्रदेशर्मिश्रीकृतानि गृह्यन्ते ॥ पटुतरविज्ञानानि यच न घाणा- दिकरणानि ॥] इति ॥ स्पष्टाश्चेमा गाथाः । नयनं मनश्चाप्राप्तस्यैव वस्तुनः परिच्छेदकारि, तेन नयनं रूपमस्पृ- प्टमेव पश्यति, नयनस्य चात्माङ्गुलेन सातिरेकं योजनलक्षमुत्कृष्टतोऽपि विषयपरिमाणमागमेऽभिहितं, तेनाप्राप्तत्वा- विशेषेऽपि परतो न पश्यति, आत्माङ्गुलोच्छ्याङ्गुलप्रमाणाङ्गुलभेदेनाङ्गुलं त्रिविधं ॥तत्राद्यं “जेणं जया मणूसा, वेसि जे होइ माणरूवं तु ॥ तं भणियमिहायंगुल-मणिययमाणं पुण इमं तु ॥१॥" द्वितीयं तु "परमाणू तसरेणू , रहरेणू अग्गय च वाल- स्स ।। लिक्खा जूया य जवो, अट्ठगुणविवड्डिया कमसो॥२॥” इत्यादिग्रन्थोक्तम्, तृतीयं तु-"उस्सेहंगुलमेगं, हवइ पमाणगुलं सहस्सगुणं ॥तं चेव दुगुणियं खलु, वीरस्सायंगुलं भणियं ॥३॥आयंगुलेण वत्थु, उस्सेहपमाणओ मिणसु देह।नग-पुढवि-विमाणाई, मिणसु पमाणंगुलेणंतिाथा ये यदा मनुष्यास्तेषां यद् भवति मानरूपं तु॥तद्भणितमिहात्मागुल-मनियतमानं पुनरिदं तु।।परमाणु- स्त्रसरेणू, रथरेणुरग्रकं च वालस्याालिक्षा यूका च यवोऽष्टगुणविवर्धिताः क्रमशः॥ उत्सेधाङ्गुलमेकं,भवति प्रमाणागुलं सहस्रगुणम्॥ तदेव द्विगुणितं खलु, वीरस्यात्मागुलं भणितम्॥ आत्मागुलेन वस्तु, उत्सेध(धागुल)प्रमाणतो मिनु देहम्।। नगपृथ्वीविमानानि, मिनु प्रमाणागुलेनेति ॥] उक्तोपपत्तिप्रदर्शिका च भाष्यगाथा यथा-"अप्पत्तकारि नयणं, मणो य, नयणस्स विसयपरिमाणं॥ आयंगुलेण लक्ख, अइरिचं जोयणाणं तु ॥ ३४०॥" [अप्राप्तकारि नयनं मनश्च, नयनस्य विषयपरिमाणम् । आत्मा- गुलेन लक्षमतिरिक्तं योजनानां तु ॥] इति ॥ ननु “ उस्सेहपमाणओ मिणे देई" इतिवचनादेहस्य तावदुच्छ्याङ्गुल- HEACHECK ( योजितः पाठः) मतिज्ञान- विषयमान- निरूपणप्र- स्तावेऽङ्गल- भेदत्रिकस्य तदूगोचर- स्य च प्रदर्शनम्।

-- सविपर भाडाना पर- प्रकरणम्॥ ॥७३॥ है प्रमाणत्वं सिद्धमेव, देइग्रहणस्योपलक्षणत्वात्तत्रस्थमिन्द्रियं तद्विषयश्च गृह्यत इति चक्षुषस्तद्विषयस्य चोच्छ्याङ्गुलप्रेमाणमेयत्वे- नात्मागुलेन नयनविषयपरिमाणकथनमयुक्तमिति चेत्,न, देहग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वास्वीकारेण देहस्यैवोच्छ्याङ्गुलप्रमाणमेयत्त्वे- नेन्द्रियविषयपरिमाणस्यात्माङ्गुलेनैव मेयत्वात्, तदुक्तं भाष्यकृता "नणु भणियमुस्सयंगुल-पमाणओ जीवदेहमाणाइ ।। देहप- माणं चिय तं, न उ इंदियविसयपरिमाणं ॥३४॥" [ननु भणितमुच्छ्या-गुलप्रेमाणतो जीवदेहमानानि॥ देहप्रमाणमेव तद्न त्विन्द्रियविषयपरिमाणम् ] इति, युज्यते चेन्द्रियविषयपरिमाणमात्माङ्गुलेनैव, न तु उच्छ्याङ्लेन, यतः पञ्चार्धपश्चमधनु:- शतादिप्रमाणानां भरतादीनां चायोध्यादिनगर्यः स्कन्धावारश्चात्माङ्गुलेन द्वादशयोजनायामतया सिद्धान्ते निर्णीताः, भरतच- कवाद्यात्मामुलं च प्रमाणागुलं तद् उच्छ्याङ्गुलात्सहस्रगुणं " उस्सेइंगुलमेग हवइ पमाणगुलं सहस्सगुणं " इति वच- नात् , ततश्चायोध्यादिनगर्यः स्कन्धावारश्च उत्सेधाङ्गुलेन पुनरनेकानि योजनसहस्राणि भवन्ति, एवश्वायुधशालादिषु ताडित- भेर्यादिशब्दश्रवणं सर्वेषामिन्द्रयविषयस्योछ्याङ्गुलमेयत्वपक्षे न प्रामोति, यतः श्रोत्रं "चारसहिं जोअणेहिं, सोयं अभिगिण्हए सई" इत्यादिवचनात् द्वादशभ्य एव योजनेभ्यः समागत शब्दं शृणोति न परतः, उक्तपक्षे च एतानि द्वादशयोजनानि किलोच्छ्याङ्गुलेन मीयन्ते, अत उच्छ्याङ्गुलनिष्पमेभ्योऽनेकयोजनसहस्रेभ्यः समागतं भेर्यादिशब्दं कथं श्रोत्रं गृह्णीयात, इष्यते च भरतादिनगरीस्कन्धावारेषु तच्छ्रवणम्,अत आत्माङ्गुलेनैवेन्द्रियाणां विषयपरिमाणं नोत्सेधाङलेनेतिसिद्धम् , तदुक्तं भाष्यकृता "जं तेण पंचधणुसयनराइ-विसयववहारवोच्छेओ ॥ पावइ सहस्सगुणियं, जेण पमाणंगुलं तत्तो ॥३४२ ॥" [यत्तेन पञ्चधनुशतनरादिविषयव्यवहारव्यवच्छेदः ॥ प्रामोति सहस्रगुणितं; येन प्रमाणागुलं ततः॥] इति ॥ (योजितः पाठः)- तीयस्तरङ्गः देहम्योत्से- घागलप्रभा- णत्वादेह- स्थत्वेनेन्द्रि- याणां तद्वि- षयस्य च तन्मयत्व- मेवोचित- मित्यारेका- या युक्त्या- दिभिरपा- करणम् ॥ ॥७३॥ REKHA अनसन M CLES -CE किश्च देहस्यात्मभूतान्यपीन्द्रियाणि सर्वाणि नोच्छ्याङ्गुलेन मीयन्ते यदा तदा कैव कथा तद्विषयाणामुच्छ्याङ्गुलमेयत्वस्य, यता स्पर्शनेन्द्रियमेकमुच्छ्याङ्गुलेन मीयते शेषाणि तु द्रव्येन्द्रियाण्यात्माङ्गुलेनैव मीयन्ते, त्रिगव्यूतादिमानानां युगलधर्मिणां जिहन्द्रियादिमानस्योच्छ्रयालगुलेन ग्रहणे क्षुरप्राकारतयोक्तस्य जिह्वेन्द्रियस्य विशालदेहानुसारित्वेन विशालमुखगतत्वेन विशाल- स्याङ्गुलपृथक्त्वलक्षणो विस्तारो गृह्येत, एवश्चात्यल्पतया सर्वामपि जिह्वां न व्याप्नुयात्, तदव्याप्तौ च सर्वया जिह्वया रसवेदन- लक्षणो व्यवहारो न घटेत, तस्मादात्मागुलेनैव जिह्वादिमानं घटत इति, तदुक्तं भाष्यकृता "इंदियमाणेवि' तयं, भयणिज्ज तिगाउआईणाजिभिदियाइमाणं,संववहारे विरुज्झेजा।।३४३॥"[इन्द्रियमानेऽपि तद् भजनीयं यत् त्रिगव्यूतादीनाम् । जिह्वेन्द्रिया-, दिमानं संग्यवहारे विरुध्येत।। इति,चक्रवर्तिभरतनगर्यादिषु भेर्यादिशब्दश्रवणव्यवहारस्य युगलधर्मिणां रसवेदनव्यवहारस्य चाभा- वप्रसङ्गेनेन्द्रियविषयपरिमाणस्येन्द्रियपरिमाणस्य नोच्छ्याङ्गुलमेयत्वं किन्त्वात्माङ्गुलमेयत्वमेवेति व्यवस्थितौ "उस्सेहपमाणओ मिणे देह" इत्यत्र देहशब्देन देहमानमेव पारिशेष्याद् गृह्यते, किश्च परस्येन्द्रियतद्विषयपरिमाणयोरुच्छ्याङ्गुलमितत्वेापत्तिरेव प्रमाणं न त्वागमवचनं, आगमे तु " इचेएणं उस्सेहंगुलप्पमाणेणं नरेइअ-तिरिक्खजोणिय-मणुस्स-देवाणं सरीरोगाहणाओ मिति ” [ इत्येतेनोच्छ्याङ्गुलप्रमाणेन नैरयिकतियंग्यौनिकमनुष्यदेवानां शरीरावगाहना मीयन्ते ] इत्यस्मिन् शरी- रावगाहनवोच्छ्याङ्गुलमेयत्वेनोक्ता न त्विन्द्रियविषयपरिमाणं, ततस्तदात्माङ्गुलेनैवेति, तदाह भाष्यकृत्-" तणुमाण चिय तेणे, हविज भणियं सुए वि तं चेव ॥ एएण देहमाणाई, नारयाईण मिजंति ।। ३४४ ॥" [तनुमानमेव तेन, भवेद् भणितं श्रुतेऽपि तदेव ।। एतेन देहमानानि,नारकादीनां मीयन्ते ॥] इति । ननु पुष्करवरद्वीपस्य मानुपोत्तरपर्वतद्विधाकृतस्य अर्वाग्भागवर्ति- (योजितः पाठः) देहस्पर्शने- न्द्रिययोरे- वोत्सेधाङ्ग- लमेयत्व- मन्येन्द्रिय- तद्विषया- णामात्माङ्ग- लभयत्वं व्यवस्था- पितम् ॥ ESAR (योजितः पाठः)तृ- तीयस्तरङ्गः नयनवि- सविवरण भीवाना- पर- प्रकरणम्॥ ॥७४॥ SA षयप्रमाण- न्यधै मानुषोत्तरसन्निधावुत्कृष्टे दिवसे कर्कटकसंक्रान्त्यामुदयेऽस्तमये च सातिरेकैरेकविंशतिलौर्योजनानां व्यवस्थितं सूर्य मनु- म्याः पश्यन्ति, यदुक्तं "सीयालीससहस्सा, दो य सया जोयणाण तेवट्ठी । एगवीस सट्ठिभागा, कक्कडमाइम्मि पेच्छ नरा ॥१॥" [ सप्तचत्वारिंशत्सहस्राणि द्वे शते योजनानां त्रिषष्टिं । एकविंशतिं षष्टिभागान्कादौ प्रेक्षन्ते नराः] इति, यथान तथा पुष्करार्धेऽपि मानुपोत्तरसमीपे प्रमाणाङ्गुलनिष्पन्नैः सातिरेकैकविंशतियोजनलक्षैर्व्यवस्थितमादित्यं तत्र दिने तन्निवासिनो लोकाः समवलोकयन्ति, तदुक्तम्-" एगवीसं खलु लक्खा, चउतीसं चेव तह सहस्साई ॥ तह पंच सया भणिया, सत्त साए अइरित्ता ॥१॥ इति नयनविसयमाणं, पुक्खरदीवद्धवासिमणुआणं ॥ पुग्वेण य अवरेण य, पिहं पिहं होइ नायच्वं ॥२॥” इति । [ एकविंशतिः खलु लक्षाणि चतुस्त्रिंशदेव तथा सहस्राणि ॥ तथा पश्च शतानि भणितानि सप्त- त्रिंशतातिरिक्तानि ॥ इति नयनविषयमानं पुष्करद्वीपार्धवासिमनुजानाम् ॥ पूर्वेण चापरेण च पृथक् पृथक् भवति ज्ञातव्यम् ॥] तस्मान्नयनेन्द्रियस्य सातिरेकयोजनलक्षस्वरूपं विषयपरिमाणं यथा प्रज्ञापनादिसूत्रेऽभिहितं तथाऽऽत्माङ्गुलोत्सेधाङ्गुल- प्रमाणागुलानामेकेनापि गृह्यमाणं न युक्तं, प्रमाणाङ्गुलनिष्पन्नस्यापि योजनलक्षस्य तनिष्पन्नसातिरेकैकविंशतियोजनलक्षेभ्य एकविंशतितमभागवर्तित्वेन वृहदन्तरत्वात, तस्मादेकत्र सातिरेकं लक्षम् , अन्यत्र तु सातिरेकैकविंशतिलक्षाणि योजनानां नयन- स्य विषयप्रमाणं त्रुवतः सूत्रस्य पूर्वापरविरोधः, तदाह भाष्यकृत्-"लक्खेहिं एक्कवीसाए, साइरेगेहिं पुक्खरद्धम्मि ॥ उदये पेच्छन्ति नरा, सूरं उक्कोसए दिवसे ॥३४५॥ नयणिदियस्स तम्हा, विसयपमाणं जहा सुएभिहियं ॥ आउस्सेहपमाण-गुलाण एकेण वि न जुत्तं ॥ ३४६ ॥ " [ लक्षैरेकविंशत्या, सातिरेकैः पुष्करार्धे ॥ उदये प्रेक्षन्ते नराः, सूर्यमुत्कृष्टे 96-13 स्य यथा- सूत्रामिदि- तत्वं तथा त्मोत्सेधा- जलप्रमाणा- न्यतमेना-- CIRCRAFRese पि न युक्त. त्वमित्या- शकनम् ।। ॥ ७४ ।।

REGROR दिवसे || नयनेन्द्रियस्य तस्मा-द्विपयप्रमाणं यथा श्रुते भणितम् ॥ आत्मोत्सेधप्रमाणा-जुलानामेकेनापि न युक्तम् ॥] इतीति चेत्, न, सातिरेकयोजनलक्षं नयनविषयप्रमाणे प्रतिपादयतः सूत्रस्याभिप्रायापरिज्ञानात्, तथाहि-स्वयं तेजोरूपप्रकाशरहि- तत्वात्परप्रकाशनीये पर्वतगर्तादिवस्तुन्येव सातिरेकयोजनलक्षं नयनविषयप्रमाणं, न तु स्वयमेव तेजोयुक्तत्वेन प्रकाश्ये चन्द्रार्का- दिके प्रकाशके वस्तुनि, तत्र त्वनियम एव, "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपचिन तु सन्देहादलक्षणम्" इति न्यायाद् व्याख्यानात्सूत्र विषयविभागेन धरणीयं न तूभयपक्षोक्तिमात्रभ्रमितैस्तद्विरोध उद्भावनीयः, तदुक्तं--"जं जह सुत्ते भणिय, तहेव जइ तं विया- लणा नत्थि ।। किं कालियाणुओगो, दिह्रो दिटिप्पहाणेहिं ॥१॥" [यद्यथा सूत्रे भणितं, तथैव यदि तद् विचारणा नास्ति । किं का- लिकानुयोगो, दृष्टो दृष्टिप्रधानः] ॥ इति, इदमेवात्र प्रतिविधानमुपाददे भाष्यकार:-"सुत्ताभिप्पाओऽयं, पयासणिज्जे तयं न उ पयासे ॥ वक्खाणओ विसेसो, न हि संदेहादलक्खणआ ॥३४७॥"[सूत्राभिप्रायोऽयं, प्रकाशनीये तन्न तु प्रकाशे । व्याख्यान- तो विशेषो, नहि सन्देहादलक्षणता ॥] इति । श्रोत्रं मेघगर्जितादिशब्दमुत्कृष्टतो द्वादशयोजनेभ्यः समायातं गृह्णाति, घाणरसस्पर्श- नानीन्द्रियाणि तु गन्धरसस्पर्शलक्षणमर्थमुत्कर्षतो नवयोजनेभ्यः प्राप्तं गृह्णन्ति, अतः परतोऽप्यायातं शब्दादिकमेनानि न गृह्णन्ति, यथा प्रथमप्रावृषि मेघगर्जितादिविषयश्शब्दः प्रथममेघवृष्टौ सत्यां मृत्तिकादिगन्धश्च दूरादप्यागतो गृह्यमाणः समनुभूयते तथैव दूरादागतानां गन्धद्रव्याणां रसोऽपि रसनया सम्बन्धे सति केनचिद् गृह्यत एव, अत एव कटुकस्य तीक्ष्णादेर्वा वस्तुनः सम्बन्धी अयं गन्ध इति वक्तारो भवन्ति, दूरादपि सरित्समुद्रादेमध्येनायातस्य वातादेः स्पर्शोऽपि शीतादिरनुभूयत एव, तदाह भाष्यकार:-" वारसहिंतो सोतं, सेसाई नवहिं जोयणेहितो ॥ गिण्हंति पत्तमत्थं, एचो परओ न गिण्हंति ॥३४८॥ (योजितः पाठः) सूत्राभिप्रा- योपवर्णनेनो- क्ताशङ्का- प्रतिक्षेपः, प्रविभज्य श्रोत्रादिवि- षयपरिमाण- प्रदर्शनञ्च ॥ SORRECREEN ++

( योजितः
पाठः)
तृतीयस्त-
सविचरणं
भीज्ञाना-
ब-
प्रकरणम्॥
॥ ७५॥
STEGORGREATURE
[द्वादशभ्यः श्रोत्रं, शेषाणि नवभ्यो योजनेभ्यः। गृह्णन्ति प्राप्तमर्थ-मितः परतो न गृह्णन्ति ॥] इति। द्वादश-नवयोजनेभ्यः परतः
समागतानि शब्दगन्धादिद्रव्याणि मन्दपरिणामभावेन स्वस्वज्ञानानुकूलपरिणामानासादनतो न श्रोत्रघ्राणादिविज्ञानं जनयन्ति
श्रोत्रादीन्द्रियाण्यपि तथाविधसामर्थ्याभावान्न परतः समागतानि शब्दादिद्रव्याणि गृहीत्वा स्वविज्ञानं जनयन्ति, तदिदं विष-
यपरिमाणमुत्कृष्टत इन्द्रियाणां ज्ञेयं, जघन्येन तु नयनभिन्नेन्द्रियाणां असङ्ख्याततमादगुलासंख्येयभागादागतो विषयो ग्रहणगो-
चरः, तदुक्तं भाष्यकृता दव्वाण मंदपरिणा-मयाए परओ न इंदियबलंपि ॥ अवरमसंखेज्जंगुल-भागाओ नयणवज्जाणं
॥ ३४९ ॥" [ द्रव्याणां मन्दपरिणामतया, परतो नेन्द्रियवलमपि ॥ अपरमसंख्येयांगुल-भागाद् नयनवर्जानाम् ॥]
नयनस्य त्वतिसन्निकृष्टाञ्जनशलाकादेरग्राहकस्य जघन्येनाङ्गुलसङ्ख्येयभागाद्विषयपरिमाणनियमः, मनसस्तु मूर्तामूर्तसम-
स्तविषयकस्यानियमेन दूरे आसन्ने च प्रवर्तमानस्य पुद्गलमात्रनिबन्धनियतत्वाभावात्केवलज्ञानवन्नास्त्येव विषयपरिमाणम्, पुद्ग-
लमात्रनिबन्धनियतश्रोत्रादीन्द्रियप्रभवयोमतिश्रुतज्ञानयोरपि विषयपरिमाणस्य सद्भावान्न ताभ्यां व्यभिचार इति बोध्यम्, तदुक्तं
भाष्यकृता " संखेज्जइभागाओ, नयणस्स, मणस्स न विसयपमाणं ॥ पोग्गलमित्तनिबन्धा-भावाओ केवलस्सेव ॥ ३५०।"
[संख्येयभागतो नयनस्य, मनसो न विषयप्रमाणम् ॥ पुद्गलमात्रनिवन्धा-ऽभावात्केवलस्येव॥] इति, श्रोत्रस्य प्राप्तकारित्वेऽयमपि
विशेषो ज्ञेयः, यदुत, भाषकस्यान्यस्य वा भेर्यादेः समश्रेणिव्यवस्थितः श्रोता भाषकभेर्यादिसम्बन्धिनं भाषकोत्सृष्टशब्दद्रव्याणि
तद्वासिताऽपान्तरालस्थद्रव्याणि चेत्येवं मिश्रं शब्दद्रव्यराशि शृणोति न तु वासकं वास्यमेव वा केवलम्, विश्रेणिव्यवस्थितः
श्रोता तु भाषकोत्सृष्टशब्दद्रव्यैः भेर्यादिशब्दद्रव्यैर्वा वासितानि समुत्पन्नशब्दपरिणामानि द्रव्याण्येव शृणोति, न तु भाषकाद्यु-
RECENERATORS
श्रोत्रादी-
न्द्रियविषय
परिमाणमु-
त्कृष्टतो वि.
भागेनोपद-
ये जघन्येन
तदुपदर्शिवं
नयनस्य तत्र
विशेषः, म-
नसो विषय-
परिमाणा-
नियमः श्रो.
ने विशेषा.
न्तरञ्च ॥
॥ ७५ ॥

KEE (योजितः ACCASSESAX त्सृष्टानि, तेषामनुश्रेणिगामित्वेन विदिग्गमनासम्भवात्, कुड्यादिप्रतिघाततोऽपि न तेषां विदिक्षु गमनमतिसूक्ष्मत्वात, लेष्ट्वादिवा- दरद्रयाणामेव ततो विदिक्षु गमनात्, निसर्गसमयानन्तरश्च समयान्तरेषु तेषां भाषापरिणामेनानवस्थानादेव न स्वतो विदिक्षु गमनसम्भवः "भाष्यमाणैव भापा भाषा, भाषासमयानन्तरं भाषाऽभाव" इतिवचनात्, द्वितीयादिसमयेषु भाषाद्रव्यैर्वासितानि समुत्पन्नशब्दपरिणामानि द्रव्यान्तराण्येव भाषा तामुपादायैय " चउहि समयेहि लोगो भासाए निरंतरं तु होइ फुडो" इति वचनप्रवृत्तिरविरुद्धा, समश्रेणिव्यवस्थितः श्रोता वक्तृनिसृष्टं शब्दं शृणोति, विश्रेणिस्था तद्वासितानि द्रव्याणि द्वितीयसमये विदिक्षु गतानि शब्दस्वभावमापनानि शृणोतीत्येवं समयभेदेऽपि तदनुपलक्षणमतिसौक्ष्म्यात् । घाणादीन्द्रियग्राह्याणां मिश्रस्वभा- वानां गन्धादिद्रव्याणां चादरत्वेनानुश्रेणिगमननियमो नास्तीति, तदुक्तं नियुक्तिकृता "भासासमसेढीओ, सई जं सुणइ मीसयं सुणइ ॥ वीसेढी पुण सद, सुणेइ नियमा पराघाए ।। ३५१॥" इति, भासासमसेढीओ इति गाथार्थोपोबलकं भाष्यगाथात्रयं यथा "सेढी पएसपंती, वदतो सव्वस्स छदिसिं ताओ ॥ जासु विमुक्का धावइ, भासा समयम्मि पढमम्मि ॥ ३५२ ॥ भासा- समसेढिठिओ, तब्भासामीसिय सुणइ सई ॥ तव्वभावियाई, अण्णाई सुणइ विदिसत्थो ॥ ३५३ ॥ अणुसेढीगमणाओ, पति- धायाभावओऽनिमित्ताओ ॥ समयंतराणवत्था-णओ य मुकाई न सुणेइ ॥३५४॥" [भाषासमश्रेणीतः, शब्दं यं शृणोति मिश्रकं शृणोति । विश्रेणिः पुनः शब्दं, शृणोति नियमात्पराधाते ॥ श्रेणिः प्रदेशपंक्तिर्वदतः सर्वस्य षट्सु दिक्षु ताः॥ यासु विमुक्तो धावति भाषासमये प्रथमस्मिन् ॥ भाषासमश्रेणिस्थितस्तद्भाषामिश्रितं शृणोति शब्दम् ॥ तद्व्यभावितान्यन्यानि, शृणोति विदिस्थः ॥ अनुश्रेणिगमनात्प्रतिघाताभावादनिमित्तात् ॥ समयान्तरानवस्थानाच मुक्तानि न शृणोति ॥ ] ॥ इति ॥ व्यक्तार्थमदः ॥ पाठः) श्रोत्रविषय- शब्दतो घ्राणादिग्रा. ह्यगन्धादीना मनुश्रेणिग- मननियमा- भावो विशेष उपपादितः।

सविवरण
भीज्ञाना-
व-
प्रकरणम्॥
॥७६॥
RSS
SHREGACASS
वाग्द्रव्याणामादानोत्सर्गावेवम्, सर्व एव वक्ता कायिकेन योगेन शब्दद्रव्याणि गृह्णाति वाचिकेन च योगेन निसृजति,
प्रतिसमयं गृहाति मुञ्चति चेति, उक्तं च नियुक्तिकृता "गिण्हइ य काइएणं, निसिरइ तह वाइएण जोएणं । एगंतरं च गिण्हइ,
निसिरइ एगंतरं चैव ।। ३५५ ॥” इति, विवेचिता चेयं गाथात्रयेण भाष्यकृता, तद्यथा-"गिहिज काइएणं, किह निसिरइ
वाइएण जोएणं ॥ को वाऽयं वइजोगो, किं वाया, कायसंरंभो?॥३५६।। वाया न जीवजोगो, पोग्गलपरिणामओ रसाइब्ब॥ न
य ताए निसिरिजइ, स चिय निसिरिजए जम्हा।।३५७||अह सो तणुसरंभो, निसिरइ तो काइएण वत्तव्व।।तणुजोगविसेस चिय,
मण-पइजोगत्ति जमदोसो ॥३५८||"[गृह्णाति च कायिकेन, निसृजति तथा वाचिकेन योगेन ।। एकान्तरं च गृह्णाति निसृजत्ये-
कान्तरमेव ॥ गृहीयात्कायिकेन कथं निसृजति वाचिकेन योगेन ।। को वाऽयं वाग्योगः किं वाग्वा कायसंरम्भः॥ वाग् न जीवयोगः,
पुद्गलपरिणामतो रसादिरिव ॥न च तया निसृज्यते, सैव निसृज्यते यस्मात् ॥ अथ स तनुसंरम्भो, निसृजति ततः कायिकेन
वक्तव्यम् । तनुयोगविशेषावेव मनोवाग्योगाविति यददोषः] अत्र सार्धगाथाद्वयं परप्रश्नरूपं तदनन्तरमुत्तरम् , अत्र चेत्थं बृहद्-
वृत्तिः-"अत्र परः प्राह-ननु 'गिण्हइ य काइएणं' इति यदुक्तं तन्मन्यामहे, यतो गृह्णीयात् कायिकेन योगेन वाग्द्रव्याणि भाषका,
नेदमयुक्तं कायव्यापारमन्तरेण तद्ग्रहणायोगात्, यत्पुनरुक्तं 'निसिरइ तह वाइएण जोएणं' इति तदेतन्नावगच्छामा, यतः कथं
नाम निसृजति वाचिकेन योगेन, गृह्यमाणाया वाचो जीवव्यापाररूपयोगाभावान्नैतद् घटत इत्यर्थः, इति संक्षेपेणोक्त्वा विस्तरा-
भिधित्सया प्राह-को वाऽयमित्यादि, वेत्यथवा, किमनेन संक्षेपेण, विस्तरेणापि पृच्छामः, कोऽयं नाम वाग्योगः, येन
निसृजतीत्युक्तं, किं वायत्ति वागेव निसृज्यमाना भाषापुद्गलसमूहरूपो वाग्योगः १, किं वा कायसंरम्मः कायव्यापारस्त-
(योजितः
पाठः)
तृतीयस्त-
रङ्गः ॥
मतिज्ञाननि-
रूपणप्रसङ्गे
इन्द्रियवि-
षयमाननि-
रूपणं तत्र
च शब्द-
द्रव्यादानो-
त्सर्गप्रक्रि-
योपवर्णनम्॥
॥७६ ॥

निसर्गहेतुर्वाग्योगः २, इति विकल्पद्वयम्, तत्र प्रथमविकल्पपक्षं निराकुर्वनाह-'वाया न जीवजोगो' इत्यादि, योगोऽत्र शरीरजीवव्यापारः प्रस्तुतः, स च वाग् न भवति, पुद्गलपरिणामत्वात्तस्याः, रसगन्धादिवत्, यस्तु जीवव्यापाररूपो योगः स पुद्गलपरिणामोऽपि न भवति, यथा जीवाधिष्ठितकायव्यापारः, अपि च 'न य ताएत्ति' न च तया वाचा किञ्चिन्निसृज्यते, तस्या एव निसृज्यमानत्वात्, न च कमैव करणं भवति, अतो वागेव वाग्योग इति प्रथमविकल्पो न घटते, अथ द्वितीयमधि- कृत्याह-' अहेत्यादि ' अथासौ वाग्योगस्तनुसंरम्भः कायव्यापारः, ततः कायिकेन निसृजति इत्येवमेव वक्तव्यं स्यात्, अतः किमुक्तं 'निसिरइ तह वाइएण जोएणं ' इति, अत्रोत्तरमाह 'तणुजोग' इत्यादि, ननु द्वितीयविकल्प एवात्राङ्गीक्रियते, केवलम- विशिष्टः काययोगो वाग्योगतया नास्माभिरिष्यते, किन्तु तनुयोगविशेषावेव कायव्यापारविशेषाबेब मनोवाग्योगाविष्येते, यद् यस्मात्, ततोऽयमदोषः, न हि कायिको योगः कस्याञ्चिदप्यवस्थायां शरीरिणां जन्तूनां निवर्तते, अशरीरिणां सिद्धानामेव तन्निवृत्तेरिति, अतो वाग्निसर्गादिकालेऽपि सोऽस्त्येवेति भावः ॥ ३५६, ३५७, ३५८ ॥ परमार्थतस्सर्वत्र कायिकस्य योगस्य सद्भावेऽप्युपाधिभेदाद्योगत्रयविभजनं नानुपपन्नं, तथाहि, येन संरम्भेण मनोवारद्रव्याणामुपादानं करोति स कायिको योगः, येन तु संरम्भेण वाग्द्रव्याणि मुञ्चति स वाग्योगा, येन च मनोद्रव्याणि चिन्तायां व्यापारयति स मानसिको योग इत्येवमु- पाधिभेदात्रिधा विभक्तः कायिको योगः,तदाह भाष्यकृत् "किं पुण तणुसंरम्भेण,जेण मुंचइ स वाइओ जोगो।।मण्णइ य स माणसिओ, तणुजोगो चेव य विभत्तो॥३५९॥" [किं पुनस्तनुसंरम्येण, येन मुञ्चति स वाचिको योगः। मन्यते च स मानसिक-स्तनुयोग एव च विभक्तः ॥ इति,अनुमानाच्च मनोवाग्योगोभयस्य तनुयोगरूपत्वं,प्रयोगश्च,मनोवाग्योगौ काययोगस्वरूपौ,कायेनैव तद्व्यग्रहणाद (योजितः पाठः) मतिज्ञान- प्रसङ्गे इन्द्रि- यविपयप्ररू- पणप्रस्तावे वाग्योगमनो- योगयोस्त- त्वनिर्णवः ।। - 7 सविवरण भीझाना- ALS गैर- प्रकरणम्॥ ॥७॥ प्राणापानवदिति,न च दृष्टान्तासिद्धिः, प्राणापानव्यापारस्य तनुयोगत्वाभावे योगचतुष्टयप्रसङ्गात्,तदिदमाह भाष्यकृत् "तणुजोगो थिय मण-वइ-जोगा कारण दव्वगहणाओ ॥ आणापाणव्व न चे, तओ वि जोगंतर होजा ॥३६०॥" [तनुयोग एव मनोवा- ग्योगी कायिकेन द्रव्यग्रहणात् । आनप्राणवद् न चेत्सोऽपि योगान्तरं स्यात् ॥] इति,तुल्येऽपि तनुयोगत्वे प्राणापानयोगस्य न पृथग्रहणं मनोवाग्योगयोश्च पृथग्ग्रहणमित्यत्र लोकलोकोत्तररूढतया व्यवहारप्रसिद्धिरेव नियामकं, लोके लोकोत्तरें च कायिक- वाचिकमानसिकयोगानामेव त्रयाणां व्यवहारो न प्राणापानयोगस्य, तदिदमुक्तं भाष्यकृता'तुल्ले तणुजोगत्ते, कीस व जोगंतर तओ न कओ॥ मण-वइजोगा व कया, भण्णइ ववहारसिद्धत्थं ॥३६१॥" [तुल्ये तनुयोगत्वे कस्माद्वा योगान्तरं स न कृतः॥ मनोवाग्योगौ वा कृतौ? भण्यते व्यवहारसिद्धयर्थम् ।।] इति, कायक्रियातिरिक्तं स्वाध्यायविधान-परप्रत्यायनादिकं वाचः, धर्म- ध्यानादिकं मनसश्च विशिष्टं स्फुटं फलं यथोपलभ्यते नैवं प्राणापानयोरित्यस्मात् कारणात्प्राणापानयोगस्य न पृथग्व्यवहारः, किन्तु मनोवाग्योगयोरेव, जीवत्यऽसावितिप्रतीतिजननादिलक्षणं फलञ्च प्राणापानयोगस्य न पृथग्योगत्वप्रयोजकं, तथा सति वावति वल्गतीत्यादिमतीतिफलजननाद्धावनवल्गनादिव्यापारस्यापि पृथस्योगत्वं प्रसज्येतेति, तदाह भाष्यकारः " कायकिरि- याइरितं,नाऽऽणापाणफलं जह वईए। दीसइ मणसो य फडं,तणुजोगम्भतरो तो सो॥३६२॥" [कायक्रियाव्यतिरिक्तं, नाऽऽनप्राण- फलं यथा वाचः । दृश्यते मनसश्च स्फुटं तनुयोगाभ्यन्तरस्ततः सः॥] इति, तनुयोगान्तर्गतत्वेऽपि वाग्योगमनोयोगयोरुपाधि- भेदेन पृथगभिधानमित्येकः पक्षो व्यावर्णितः, अस्ति चात्र स्वतन्त्रावेव वाग्योगमनोयोगाविति तयोः पार्थक्येन विभजनमिति द्वितीयोऽपि पक्षः । स चैवं-कायव्यापारगृहीतेन वाग्द्रच्यसम्हेन सहकारिणा वाग्निसर्गार्थ जीवस्य व्यापारो वाग्योगः, कायव्या- (योजित: पाठः) तृतीय. स्तरङ्गः ॥ वाग्योगमनो- योगयोस्त- नुयोगत्वेऽपि पृथग्ग्रहणं न प्राणापान- R SHRS 4 गस्य तथा- त्वमित्य- त्र युक्तिरुप- दर्शिता । READER ॥ ७७॥ 43 HERECE पारगृहीतेन मनोद्रव्यसमूहेन सहकारिणा वस्तुचिन्तनाय जीवस्य व्यापारो मनोयोगः, प्रथमेन परप्रत्यायनं द्वितीयेन जिन- मूर्त्यादिचिन्तनमित्येवं स्वतन्त्रावेव तौ, यद्यपि प्राणापानद्रव्यसाचिव्यात्तन्मोचने जीवव्यापारः प्राणापानयोग इति सोऽपि स्वातन्त्र्येण पृथग् व्यपदेष्टुं शक्यस्तथापि लोकलोकोत्तररूढव्यवहारसिद्धयर्थ तयोरेव पार्थक्येनाभिधानं न तु स्वतन्त्रस्यापि प्राणापानयोगस्येति बोध्यम् , अत्रार्थे गाथाद्वयं भाष्यस्य यथा-"अहवा तणुजोगाहिअ-वइदव्वसमूहजीववावारो ॥सो वइजोगो भण्णइ, वाया निसिरिजए तेणं ॥३६३॥ तह तणुवावाराहिअ-मणदव्वसमूहजीववावारो ॥सो मणजोगो भण्णइ,मण्णइ नेयं जओ तेणं ॥३६४॥"[अथवा तनुयोगाहृत-वाग्द्रव्यसमूहजीवव्यापारः॥स वाग्योगो भण्यते वाग् निसृज्यते तेन ॥ तथा तनुव्यापाराहृत- मनोद्रव्यसमूहजीवव्यापारः। स मनोयोगो मण्यते, मन्यते ज्ञेयं यतस्तेन ।।] इति, प्रतिसमयं गृह्णाति मुञ्चतीत्येवमेकान्तरं गृह्णाति मुञ्चतीत्येतत्स्वरूपं प्रागुक्तं तत्कथमित्यपेक्षायामुच्यते, यथैकस्माद् ग्रामादन्योऽनन्तरितोऽपि लोकरूढ्या ग्रामान्तरमुच्यते, पुरुषा- द्वाऽन्यः पुरुषोऽनन्तरोऽपि पुरुषान्तरमभिधीयते तथेहापि एकस्मात्समयादन्यः समयोऽनन्तरोपि समयान्तरमुच्यते तेनानुसमयमेव गृह्णाति मुश्चति चेति सिद्धं भवति, तदुक्तं भाष्यकृता-" जह गामाओ गामो, गर्मितरमेवमेग एगाओ। एगंतरंति मण्णइ, समयादणंतरो समओ ॥ ३६५ ॥ [ यथा ग्रामाद् ग्रामः, नामान्तरमेवमेक एकस्मात् ॥ एकान्तरमिति भण्यते, समयादनन्तरः समयः ॥ ] इति, ये तु मन्यन्ते ग्रहणं विसर्जनं च शब्दद्रव्याणामेकैकेन समये- नान्तरितमित्येकान्तरमिति, तेपामेवम्मननं न युक्तं तथा सति अन्तराऽन्तरा विच्छिन्नरत्नावलीरूपो ध्वनिः स्यात्, एवश्वाविच्छेदेने शन्दग्रहणानुपपत्तिप्रसङ्गा, प्रतिसमयग्रहणप्रतिपादकत्वेन प्रतिसमयनिसर्गप्रतिपचितात्पर्यकस्य “ अणुसमयमविरहिअं निरंतर (योजितः पाठः) स्वतन्त्रत्वा- देव वाग्यो- गमनोयोग- योः पार्थ- क्येन विभ- जन न तु प्रा- जापानयोग- स्येतिविचारः प्रतिसमयं गृ- दाति मुश्च- बीत्येतद्वि- HERE चारश्च ॥

HARE
16
सविसरणं
थीवाना-
नव-
प्रकरणम्॥
॥ ७८ ॥
(योजितः
पाठः)
॥ तृतीयः
तरङ्गः ॥
अनुसमय
गृहाति मु-
गिण्हइ " इति सूत्रस्य विरोधश्च, तदाह भाष्यकार:-"केई एगंतरिय, मण्णन्तेगंतरं ति तेसिं च ।। विच्छिन्नावलिरुवो,होइ धणी,
सुयविरोहो य ॥३६६॥"[केचिदेकान्तरितं मन्यन्ते, एकान्तरमिति तेषां च ॥ विच्छिन्नावलीरूपो, भवति ध्वनिः श्रुतविरोधश्च ॥]
इति, ननु "संतरं निसिरह नो निरंतरं निसिरह, एगेणं समएणं गिण्हइ, एगेणं समएणं निसिरह" इत्यादि प्रज्ञापनोक्तसूत्रमस्म-
त्पक्षसमर्थकमपि समस्तीति तत्कथमुच्यते अनुसमयं गृह्णाति मुञ्चति चेति चेत्, उच्यते, अनुसमयग्रहणेऽनुसमयनिसर्गोऽपि युक्त
एव गृहीतम्यावश्यमेवानन्तरसमये निसर्गात, न चैवं 'संतरं निसिरई' इत्यस्यासङ्गतता, विषयविभागेन तदुपपत्तेः, निसर्गो हि ग्रहण-
मपेक्ष्य भवति, यस्मिन् प्रथमादिसमये यानि भाषाद्रव्याणि गृहीतानि न तानि तस्मिन्नेव ग्रहणसमये नैरन्तर्येण निसृजति, किन्तु
ग्रहणसमयादनन्तरसमये निसृजति,यथा प्रथमसमयगृहीतानां न तस्मिन्नेव समये निसर्गः,किन्तु द्वितीयसमय एव, एवं द्वितीयसमय-
गृहीतानां तृतीयसमये, तृतीयसमयगृहीतानां चतुर्थसमये इत्यादि, तदेवं ग्रहणापेक्षया निसर्गः सान्तर एव, द्वितीयादिषु सर्वेष्वपि
समयेषु निरन्तरं तद्भावात्समयापेक्षया तु निसर्गो निरन्तर एव,नागृहीतं कदापि निसृज्यत इति नियमाद् ग्रहणपरतन्त्रतया निसर्गस्ये-
ति 'संतरं तेणं ति प्रज्ञापनायां ग्रहणान्तरितत्वेन निसर्जनं सान्तरमुक्तं, नानिसृष्टं गृह्यत इति नियमस्य तु प्रथमसमये निसर्गमन्तरे-
णापि ग्रहणसद्भावतोऽभावेन खतन्त्रं ग्रहणमिति विषयविभागेन "संतरं निसिरह" इत्युपपद्यते, 'न निरंतरं' इत्यपि निरन्तरशब्दस्य
समशन्दपर्यायत्वेन न ग्रहणसमकालं निसृजति किं तु पूर्व पूर्व गृहीतमुत्तरोत्तरसमयेषु निसृजतीत्येवंपरतयोपपद्यते " एगेणं
समयेणं गिण्हइ, एगेणं समयेणं निसिरइ" इत्यपि आधेनकेन समयेन गृह्णात्येव न निसृजति, द्वितीयादिसमयादारभ्यैव नि-
सर्गस्य भावाद्, पर्यन्तवर्तिना त्वेकेन समयेन निसृजत्येव न तु गृह्णाति भाषाभिप्रायोपरमादित्येवं परतया एकेन पूर्वपूर्वसमयेन
सर
HOPAREEK
भवति चेति
सिद्धान्ते प्र.
ज्ञापनापाठ-
विरोधाप-
त्तिपरिहा-
रेण तत्त्वो-
पपादनम्।।
॥ ७८॥

गृह्णाति, एकेनोत्तरोत्तरसमयेन निसृजतीत्येवम्परतया वोपपद्यत इति, तमिममर्थ प्रतिपादयति भाष्यगायाचतुष्टयं यथा- "आह, सुए चिय निसिरइ, संतरियं न उ निरंतर भणियं ॥ एगेण जओ गिण्हइ, समयेणेगेण सो मुयइ ॥३६७।। अणुसमयमणं- तरियं, गहणं भणियंजओ विमुक्खो वि ॥जुत्तो निरंतरो चिय, भणइ, कह संतरो भाणिओ ॥३६८॥ गहणावेक्खाए तओ, निरंतर जम्मि जाई गहियाई ॥न वि तम्मि चेव निसिरइ, जह पढमे निसिरण नत्थि ॥३६९॥ निसिरिजइ नागहियं, गहणंतरियति संतरं तेणं ॥ न निरंतरंति न समयं, न जुगवमिह होति पजाया ॥ ३७० ॥” [आह, श्रुत एव निसृजति, सान्तरितं न तु निरन्तरं भणितम् ॥ एकेन यतो गृह्णाति, समयेनैकेन स मुञ्चति ॥ अनुसमयमनन्तरितं, ग्रहणं भणितं यतो विमोक्षोऽपि ॥ युक्तो निरन्तर एव, भणति कथं सान्तरो भणितः १ ॥ ग्रहणापेक्षया तको, निरन्तरं यस्मिन्यानि गृहीतानि ॥ नापि तस्मिन्नेव निसृजति, यथा प्रथमे निसर्जनं नास्ति ॥ निसृज्यते नाऽगृहीतं, ग्रहणान्तरितमिति सान्तरं तेन ॥ न निरन्तरमिति न समयं, न युगपदिह भवन्ति पर्यायाः ॥]इति, ग्रहणादेजघन्यमुत्कृष्टश्च कालमानमेवं प्रतिपत्तव्यं, तथाहि-ग्रहणनिसर्गभाषा इत्येवं त्रीण्यपि प्रत्येकं जघन्यत एकसमयानि भवन्ति, ग्रहणनिसर्गोभयन्तु प्रथमसमये ग्रहणं द्वितीयसमये निसर्ग इति कृत्वा द्विसमयम्, निसर्गादभेदेऽपि भापाया भाष्यमाणैव भाषा न तु गृह्यमाणेति निसर्गस्यैव भाषात्वं न तु ग्रहणनिसर्गोभयस्येत्येतत्प्रतिपत्तये पृथगभिधानं, उभयस्य भापात्वे द्विसमयत्वापत्तिः, ग्रहणस्य तु भापाव्युत्पत्तिनिमित्ताभावादेव न भाषात्वं, भाषायाः पृथगग्रहणे तु कश्चित्तदुभयस्यापि योग्यतया भापात्वं प्रतिपद्येत, तत्र ' भासिजमाणा भासा' इत्यागमविरोधः, निसर्गभाषयोरभेदेऽपि मन्दधियः निसर्गकालमानानुक्तिभ्रमोन्मूलनार्थ निसर्गस्यापि पृथग्वचनम्, सर्वाण्यप्येतानि उत्कृष्टतः, प्रत्येकमन्तमुहूर्तकालं ( योजितः पाठः) अनुसमय गृह्णाति मुश्च- तीत्येतत्सं- वादक भाष्य वचनं ग्रह- णादेर्जघन्य- न मुत्छष्टश्च कालमान- मुपपादि- तम् ॥ १४

सविपरणं
भीवाना
क-
प्रकरणम्॥
॥७९॥
तु
भवन्ति, अन्तर्मुहूर्तमपि महाप्रयत्नस्य लघु भवति अल्पप्रयत्नस्य तु बृहत्प्रमाणं भवतीति, उक्तार्थसंवादिन्यौ भाष्यस्येमे गाथे-
"गहणं मोक्खो भासा, समयं गह-निसिरणं च दो समया ॥ होति जहण्णंतरओ, तं तस्स च बीयसमयम्मि ॥ ३७१॥ गहणं
मोक्खो भासा, गहणविसग्गा य होंति उक्कोस ॥ अंतोमुहुत्तमेतं, पयत्तभेएण भेयो सिं ॥३७९॥" [ग्रहणं मोक्षो भाषा समय,
ग्रह-निसर्जनं च द्वौ समयौ॥ भवन्ति जघन्यान्तरतस्तत् तस्य द्वितीयसमये॥ ग्रहणं मोक्षो भाषा ग्रहणविसर्गौ च भवन्त्युत्कर्षतः॥
अन्तर्मुहूर्तमानं प्रयत्नभेदेन भेद एपाम् ॥] इति, प्रथमसमये ग्रहणमेव चरमसमये निसर्ग एव, मध्यसमये तु द्वावपि भवतः, एकस्मिन्
समये कथं तदुभयं विरोधादिति नाशङ्कनीयम्, यस्यैव यस्मिन् समये ग्रहणं तस्यैव तस्मिन्नेव समये निसर्ग इत्युपगमे स्या-
द्विगेधः, न चैवमुपगमः, किन्तु प्रथमसमये यस्य ग्रहणं तस्य द्वितीयसमये निसर्गोऽन्यस्य च तदानीं ग्रहणमित्येवमुत्तरोत्तरस-
मयेऽभ्युपगमे विषयभेदेन विरोधाभावात्, एकस्मिन् समये उपयोगद्वयस्यैवासम्भवो न तु क्रियाद्वयस्य " जुगवं दो नत्थि
उवओगा" इतिवचनादागमे उपयोगद्वयस्यैव योगपद्यनिषेधो न तु क्रियाद्वयस्य, "भंगियसुयं गणतो, वट्टइ तिविहे वि ज्झा-
णम्मि" इत्यादिवचनेन वाक्मनाकायक्रियाणामेकत्र' समये प्रवृत्तिरभ्युपगतैव, 'अगुल्यादिसंयोगविभागक्रिययोः, संघातप-
रिसाटक्रिययोः, उत्पादव्ययक्रिययोश्चैकत्र समयेऽनेकस्थानेष्वागमेऽनुझा विहितैव, तथाऽध्यक्षतोऽपि जिनप्रतिमामर्चयतः पुंसः
एकस्मिन् समये करणभेदेन घण्टिकाचलनधूपदानप्रतिमादिवीक्षणस्तुतिपठनादीनां बह्वीनामपि क्रियाणां युगपत् प्रवृत्तिदृश्यत
इति ॥ तदाह भाष्यकारः " गहणविसग्गपयत्ता, परोप्परविरोहिणो कहं समए॥ समए दो उवओगा, न होज, किरियाणं को
दोसो ॥३७३ ।।" [ ग्रहणविसर्गप्रयत्नौ, परस्परविरोधिनौ कथं समये १ ॥ समये द्वावुपयोगौ न भवेता क्रियाणां को दोषः ]
(योजितः
पाठः)
ग्रहणादेर्ज-
घन्योत्कृष्ट-
कालमानोप-
दर्शने भाष्य-
संवादः एका-
समये क्रिया-
योगपद्या-
'विरोधे
भाप्य-
संवादश्च
॥ ७९ ॥

(योजितः इति, कायिकेन योगेन भाषापरिणमनयोग्यानि द्रव्याणि प्रथमसमये गृहातीति सामान्येनोपदर्शितं परमत्र औदारिकवैक्रियाहारकत- जसकार्मणभेदेन पञ्चविधेषु कायेषु औदारिकवैक्रियाहारकशरीरेषु जीवप्रदेशाः भवन्ति नान्यत्र, तैर्जीवप्रदेशैर्जीवाभिन्नैर्भाषणाभि- प्रायादिसामग्रीपरिणामे सति भाषापर्याप्तिमान् भाषको वाग्द्रव्यनिकुरम्बं गृहीत्वा सत्यां सत्यामृषां मृषां असत्यामृषां चेत्यन्यतमां भाषां भापते निसृजति, तथा चौदारिकशरीरवान् बैंक्रियशरीरवान् आहारकशरीरवान् वा जीवो गृह्णाति मुञ्चति चेति पर्यवसितम्, तदुक्तं नियुक्तिकृता “तिविहम्मि सरीरम्मि, जीव-पएसा हवंति जीवस्स ॥जेहि उगेण्हइ गहणं, तो भासइ भासओ भासं ॥३७४ । ओरालिय वेउन्चिय-आहारओ गेण्हइ मुयइ भासं ॥ सच सच्चामोसं, मोसं च असञ्चमोसं च ॥३७५," [त्रिविधे शरीरे जीव-प्रदेशा भवन्ति जीवस्य ॥ यैस्तु गृह्णाति ग्रहणं,ततो भाषते भाषको भाषास्।। औदारिको वैक्रियआहारकः गृह्णाति मुश्चति भाषाम् । सत्यां सत्यामृपां मृषां चासत्यामृषां च ॥] इति, तत्र सद्भयः साधुभ्यो मुनिभ्यो हिता इहपरलोकाराधकत्वेन मुक्ति- प्रापिका अथवा सद्भयो मूलोत्तरगुणरूपेभ्यो गुणेभ्यो जीवादिपदार्थेभ्यो वाविपरीतयथावस्थितस्वरूपप्ररूपणेन हिता सत्या भाषा १, विपरीतस्वरूपा तु मृषाभाषा २, तदुभयस्वभावा सत्यामृषा ३, या तूक्तत्रितयलक्षणानन्तर्भाविनी आमन्त्रणाज्ञापना- दिविषयो व्यवहारपतितः शब्द एव केवलः साऽसत्यामृषा ४, एताश्चतस्रोऽपि भाषाः सभेदलक्षणोदाहरणा दशवैकालिकनियु- क्त्यादिकसूत्रतोऽवसेयाः, तथा चाह भाष्यकारः "सच्चा हिता सयामिह, संतो मुणओ गुणा पयत्था वा । तव्विवरीआ मोसा, मीसा जा तदुभयसहावा ॥ ३७६ ॥ अणहिगया जा तीसु वि, सदो चिय केवलो असचमुसा ॥ एया सभेयलक्षण-सोदाहरणा जहा सुत्ते॥३७७॥"[सत्या हिता सतामिह, सन्तो मुनयो गुणाः पदार्था वा ॥ तद्विपरीता मृषा, मिश्रा या तदुभयस्वभावा ।। अनधि. ________ 16NESESENCESAREER पाठः) औदारिक- वैक्रियाहार- कान्यतम- शरीरवान् भाषक: स. त्यादिचतु- मैदान्यतम- भाषां गृह्णा ति मुञ्चती- त्यत्र नियु- क्तिगाथा- संवादः स- त्यादिनिरू- THE न क्तौ भाष्य- संवादञ्च ॥

(योजित: साविवरण भीवाना- मेव- प्रकरणम्॥ पाठः) कस्यचिट्ठ- ततुर्भाषा चतुमिस्सम- यैलॊकं व्या- मोति न सा कृता या तिसृष्वपि शब्द एव केवलोऽसत्यमृषा ॥ एता: सभेदलक्षण-सोदाहरणा यथा सूत्रे ॥] इति, औदारिकादिशरीरवता जीवेन मुक्ता भाषा समस्तमपि लोकं व्यामोति, तेन द्वादशभ्योऽपि योजनेभ्यः परतो गतिरस्त्येव शब्दद्रव्याणां, यथा स्वविषयद्वादश- योजनाभ्यन्तरे नैरन्तर्येण तद्वासनासामर्थ्य, तथा बहिरपि केषाश्चिच्छन्दद्रव्याणां कृत्स्नलोकव्याप्तानां,चतुर्दशरज्वात्मक क्षेत्रलो- कश्चतुर्भिस्समणैः कस्यचित्सम्बन्धिन्या भाषया पूर्यते, लोकस्य पर्यन्तवयंसख्येयभागे च समस्तलोकव्यापिन्या भाषाया अपि चरमान्तोऽसंख्येयभागो भवति, तदिदमाह शङ्कासमाधानाभ्यां नियुक्तिकार:-"कईहिं समएहिं लोगो, भासाए निरंतरं तु होइ फुडो । लोगस्स य कइभाए, कइभाओ होइ भासाए ॥३७८॥ चउहि समयेहिं लोगो, भासाए निरंतरं तु होइ फुडो । लोगस्स य चरिमंते, चरिमंतो होइ भासाए ॥३७९॥"[कतिभिः समयैर्लोको भाषया निरन्तरं तु भवति स्फुटः,॥ लोकस्य च कतिभागे कतिभागो भवति भापायाः॥चतुर्भिः समयैलोको,भापया निरन्तरंतु भवति स्फुटः।। लोकस्य च चरमान्ते चरमान्तो भवति भाषायाः] इति, सर्वस्यापि वक्तुर्भापा न लोकं व्यामोति किन्तु कस्यचिदेव, तथा हि-वक्ता द्विविधस्तत्रैकः उरक्षितायुपेतत्वेन मन्दप्रयत्नो वक्ता सर्वाण्यपि भाषाद्रव्याण्यभिन्नानि निसृजति, अन्यस्तु नीरोगतादिगुणस्तावप्रयत्नो वक्ता भाषाद्रव्याणि आदाननिसर्गप्रय- नाभ्यां सूक्ष्मखण्डीकृत्य मुश्चति,अनन्तभाषाद्रव्यस्कन्धाश्रयभूतक्षेत्रविशेषरूपावगाहना वर्गणा असंख्येया गत्वा ततो मन्दप्रयत्न- वक्तुनिसृष्टान्यभिन्नानि भाषाद्रव्याणि भिवन्त, संख्येयानि च योजनानि गत्वा ध्वंसन्ते, उक्तश्च प्रज्ञापनायां भाषापदे 'जाई अभिन्नाई निसिरइ, ताई असंखेजाओ ओगाहणाओ गंता भेयमावजंति, संखिजाई जोयणाई गंता विद्धंसमागच्छति " यानितु महाप्रयत्नो वक्ता प्रथमत एव भिन्नानि निसृजति तानि सूक्ष्मत्वात् बहुत्वाचानन्तगुणवृद्धया वर्धमानानि षट्सु दिक्षु लोकान्तमाप्नु- सर्वस्य तथे- त्यस्योपपा- दकंनियुक्ति- वचनं तथा प्रज्ञापना- वचनश्च RECENE वन्ति, शेपन्तु तत्पराघातवासनाविशेषाद्वासितया भाषयोत्पन्नभाषापरिणामद्रव्यसंहतिरूपया सर्व लोकं निरन्तरमापूरयन्ति, उक्तश्च " जाई भिन्नाई निसिरइ ताई अणंतगुणपरिवड्डीए परिवड्डमाणाई लोयंत फुसन्ति" इति, तदाह भाष्यकार:-"कोई मंदपयत्तो, निसिरइ सयलाई सव्वव्याई ॥ अन्नो तिब्वपयत्तो, सो मुंचइ भिंदिउं ताई ॥३८०॥ गंतुमसंखेजाओ, अवगाहणवग्गणा अभि- नाई । 'भिजति धंसंति य, संखिज्जे जोयणे गंतु ॥३८१॥ भिन्नाइं सुहुमयाए, अणंतगुणवडिआई लोगतं ॥ पावंति पूरयति य, भासाए निरंतरं लोग।।३८२॥" [कोऽपि मन्दायत्नो निसृजति सकलानि सर्वद्रव्याणि।। अन्यस्तीव्रप्रयत्नः, स मुञ्चति भित्त्वा तानि।। गत्वाऽसंख्यया अवगाहन-वर्गणा अभिन्नानि ॥ भिद्यन्ते ध्वसन्ते च संख्येयानि योजनानि गत्वा ।। भिन्नानि सूक्ष्मतयाऽनन्तगुणव- धितानि लोकान्तम्।प्राप्नुवन्ति पूरयन्ति च,भापया निरन्तरं लोकम्]॥ इति,दण्डं प्रथमे समये, कपाटमथ चोत्तरे तथा समये ॥ मन्था- नमथ तृतीये, लोकव्यापी चतुर्थे च।।१॥इत्यादिग्रन्थोक्तेन केवलिसमुद्यातक्रमेण चतुर्भिः समयैः सर्वोऽपि लोको भाषाद्रव्यैरापूर्यत इति केचित्,त्रिभिः समयैः सर्वो लोकः पूर्यत इत्यन्ये,तत्रैवं क्रमः-लोकमध्यस्थितेन महाप्रयत्नभाषण मुक्तानि भाषाद्रव्याणि प्रथम- समय एव पसु दिक्षु लोकान्तमाप्नुवन्ति 'जीवसूक्ष्मपुद्गलानामनुश्रेणिगमनात्,' ततो द्वितीयसमये त एव षट् दण्डाश्चतुर्दिशमे- कैकशोऽनुश्रेण्या वासितद्रव्यैः प्रसरन्तः पड् मन्थानो भवन्ति, तृतीयसमये तु मन्थान्तरैः पूरितैः पूरितो भवति सर्वोऽपि लोका, स्वयम्भूरमणपरतटवर्तिनि लोकान्तेऽलोकस्यात्यन्तं निकटीभूय भाषमाणस्य भाषकस्य त्रसनाड्या बहिर्वा चतसृणां दिशामन्यत- मस्यां दिशि भापमाणस्य भापकस्य चतुर्भिस्समयैलोकः सर्वोऽपि पूर्यते। तदुक्तं भाष्यकृता "जइणसमुग्धायगईए,केई भासंति चउहिं समएहि ।। पूरइ सयलो लोगो, अण्णे उण तीहि समएहिं ॥३८३॥ पढमसमए चिय जओ, मुक्काई जति छदिसिं ताई।। ( योजितः पाठः) भाषया लोकपूतों भाष्यसंवा- दः केवलिस- मुद्धातदिशा चतुर्भिस्स- मयैर्लोकपूर- णमिति मतं तथा त्रिभि. समयरिति- मतं तत्क्रम- श्चत्युभयत्र भाष्यस- वादः॥ न RE RECE सविवरण श्रीज्ञाना- णेव- प्रकरणम्॥ ८१॥ SEASEARCHURNEY वितियसमयम्मि ते चिय, छ इंडा होति छम्मथा ॥ ३८४ ॥ मंथतरेहिं तईए, समये पुन्नेहिं पूरिओ लोगो॥ चउहि समएहि पूरइ, लोगते भासमाणस्स ॥ ३८५ ॥" [ जैनसमुद्घातगत्या, केचिद् भाषन्ते चतुर्भिः समयैः ॥ पूर्यते सकलो लोकोऽन्ये पुनखिभिः समयैः ।। प्रथमसमय एव यतो मुक्तानि यान्ति षट्सु दिक्षु तानि ॥ द्वितीयसमये त एव, षड्दण्डा भवन्ति पंड्- मन्धानः ।। मन्थान्तरैस्तृतीये समये पूर्णैः पूरितो लोकः ॥ चतुर्भिः समयैः पूर्यते लोकान्ते भाषमाणस्य॥] इति ।। अथ लोकान्त- वर्तिनवसनाडीबहिर्व्यवस्थितस्य वा भाषकस्य भाषाद्रव्यैश्चतुर्भिः समयैलॊकपूरणं प्रतिपादितं त्रसनाडीबहिर्विदिग्व्यवस्थितस्य च पञ्चभिः समयैर्लोकापूरणं भवति तदेतत्सर्वं कथं मिलतीति चेत्, अत्रार्थे सविवरणे भाष्यगाथे एव तत्स्वरूपप्रदर्शिके प्रदर्येते, तथाहि-"दिसिवट्ठियस्स पढमोऽतिगमे ते चेव सेसया तिन्नि।। विदिसि ट्ठियस्स समया, पंचातिगमम्मि जं दोणि ॥३८६॥" व्याख्या-वसनाड्या बहिश्चतसृणां दिशामन्यतमस्यां दिशि व्यवस्थितस्य भाषकस्य प्रथमः समयोतिगमे 'नाडीमध्यप्र- वेशे भवति । शेषसमयत्रयभावना तुं 'होइ असंखेजइमे भागे' इत्यादिवक्ष्यमाणगाथावृत्तौ कथमिति चेदित्यादिना वक्ष्यते । लोकान्तेऽपि स्वयम्भूरमणपरतटवर्तिनि चतसृणां दिशामन्यतमस्यां दिशि व्यवस्थितस्य भाषकस्यो धोलोकस्खलितत्वाद्भा- पाद्रव्याणां प्रथमः समयोऽतिगमे लोकमध्यप्रवेशे, त्रयस्तु समयाः शेषास्तथैव, वसनाडीबहिर्विदिग्व्यवस्थितस्य तु भाषकस्य भाषाद्रव्यैः सर्वलोकापूरणे पञ्च समया लगन्तीति विशेषः। कुतः१ इत्याह-'अतिगमम्मिजं दोणि त्ति' विदिशः सकाशाद्भापाद्रव्याणि वसनाडीबहिरेव प्रथमे समये दिशि समागच्छन्ति, द्वितीये तु लोकनाडीमध्ये प्रविशन्ति इत्येवं यस्मादतिगमे नाडीमध्यप्रवेशे द्वौ समयौ लगतः। शेषास्तु त्रयः समयाश्चतुःसमयव्याप्तिवद् द्रष्टव्याः, इत्येवं पञ्चसमयाः सर्वलोकापूरणे प्राप्यन्त इति ॥३८६॥ (योजितः पाठः) लोकान्तव- तित्रसनाडी. बहिर्व्यव- स्थितवक्त- भाषाद्रव्यश्व- तुस्समयैर्लो- कपूरणं त्रस- नाडीवहि- दिस्थितव- क्तृभाषया पञ्चसमय- लॊकपूर- णमित्युप- दर्शनम् ॥

(योजितः पाठः) भा. पायाः त्रि- C अथ शेषसमयत्रयभावनार्थ होइ असंखेजइमे भागे' इत्यादि यदुक्तं तदाह-किञ्च नियुक्तिकृता 'लोगस्स य कइभाए कइ- भाओ होइ भासाए ' इति यत्प्रतिपादितं तद्वयाचिख्यासुभगवान् भाष्यकार आह- " होइ असंखेजइमे, भागे लोगस्स पढमबिइएसु ॥ भासा असंखभागो, भयणा सेसेसु समयेसु ॥ ३९० ॥" व्याख्या-चतुर्दशरज्जूच्छ्रितस्य लोकस्याऽसंख्याततमे भागे भाषाया अपि समस्तलोकव्यापिन्या असंख्याततम एव मागो भवति । कदा ?, इत्याह-प्रथमद्वितीयसमययोः। इदमुक्तं भवति-त्रिसमयव्याप्तौ, चतुःसमयव्याप्ती, पञ्चसमयव्याप्ती च प्रथमममयद्वितीयसमययोस्तावद् नियमेन सर्वत्र लोकासंख्येयभागे भाषाऽसंख्येयभागलक्षण एव विकल्पः सम्भवति, नान्यः । त्रिसमयव्याप्तौ हि प्रथमसमये दण्डषट्कं भवति, द्वितीयसमये तु पड् मन्थानः सम्पद्यन्ते । एते च दण्डादयो दैर्येण यद्यपि लोकान्तस्पर्शिनो भवन्ति, तथापि वक्तृमुखविनिर्गतत्वात्तत्प्रमाणानुसारतो वाइल्येन चतुरङ्गुलादिमाना एव भवन्ति, चतुरादीनि चाङ्गुलानि लोकासंख्येयभागवर्त्तिन्येव । इति सिद्धस्त्रिसमयव्याप्तौ प्रथमद्वितीयसमययोलौकासंख्येयभागे भाषाऽसंख्येयभागः । चतुःसमयव्याप्तावप्येतदित्थमवगम्यत एव, प्रथमसमये लोकमध्यमात्र एव प्रवेशात्, द्वितीय- समये तु वक्ष्यमाणगत्या दण्डानामेव सद्भावादिति । पञ्चसमयव्याप्तिपक्षे तु सुबोधमेव, प्रथमसमये भाषाद्रव्याणां विदिशो दिश्येव गमनात् , द्वितीयसमये तु लोकमध्यमात्र एव प्रवेशात् । तस्मात् व्यादिसमयच्याप्तौ सर्वत्र प्रथम- द्वितीयसमययोर्लोकासंख्येयभागे भाषाया असंख्येयभाग एव भवति । 'भयणा सेसेसु समएसुत्ति' उक्तशेषेषु तृतीय- चतुर्थपश्चमसमयेषु भजना विकल्परूपा बोद्धव्या, क्वापि लोकासंख्येयभागे स एव भाषाऽसंख्येयभाग एव भवति, CARSASSISECUR चतुःपञ्चस- मयलोकव्या- प्तिषु प्रथम- द्वितीयस- मययोलो- कासंख्येय- भागे भाषासं. ख्येयभागस्य नियमोऽन्यत्र तु भजनेत्युप- पावितम् ॥

मर
सविवरण
श्रीज्ञाना-
नव-
प्रकरणम्।।
॥८२ ॥
RECE
क्वचित्पुनर्लोकस्य संख्येयभागे भाषासंख्येयभागः, क्यापि समस्तलोकव्याप्तिः । तथा हि-त्रिसमयव्याप्तौ तृतीयसमये
भाषायाः समस्तलोकव्याप्तिः, चतुःसमयव्याप्तितृतीयसमये तु लोकसंख्येयभागे भाषासंख्येभागः । कथं १, इति चेद्
उच्यते-स्वयम्भूरमणपश्चिमपरतटवर्तिनि लोकान्ते त्रसनाडीबहिर्वा पश्चिमदिशि स्थित्वा ब्रुवतो भाषकस्य प्रथमसमये चतुरङ्गुला-
दिवाल्यो रज्जुदी| दण्डस्तिरश्चीनं गत्वा स्वयम्भूरमणपूर्वपरतटवर्तिनि लोकान्ते लगति, ततो द्वितीयसमये तस्मादण्डादू-
ोधश्चतुर्दशरज्जूच्छ्रितः पूर्वापरतस्तिरश्चीनरज्जुविस्तृतः पराघातवासितद्रव्याणां दण्डो निर्गच्छति, लोकमध्ये तु दक्षिणत
उत्तरतश्च पराघातवासितद्रव्याणामेव चतुरङ्गुलादिवाहल्यं रज्जुविस्तीर्ण दण्डद्वयं विनिर्गत्य स्वयम्भूरमणदक्षिणोत्तरवर्तिनोलॊका-
न्तयोर्लगति । एवं च सति चतुरङ्गुलादिबाहल्यं सर्वतोऽपि रज्जुविस्तणि लोकमध्ये वृत्तच्छत्वरं सिद्धं भवति, तृतीयसमये तूर्खा-
धोव्यवस्थितदण्डाचतुर्दिशं प्रसृतः पराघातवासितद्रव्यसमूहो मन्थानं साधयति, लोकमध्यव्यवस्थितः सर्वतोरज्जुविस्तीर्णा-
च्छत्वरादूर्वाधःप्रसृतः पुनः स एव त्रसनाडी समस्तामपि पूरयति, एवं च सति सर्वापि सनाडी उधिोव्यवस्थितदण्ड-
मथिभावेन तदधिकं च लोकस्य पूरितं भवति । एतचतावत्क्षेत्र, तस्य संख्याततमो भागः । तथा च सति चतुःसामयिक्या
व्याप्तेस्तृतीयसमये लोकस्य संख्याततमे भागे भाषाया अपि समस्तलोकव्यापिन्याः संख्याततमो भाग इति स्थितम् ॥ पञ्च-
सामयिक्यास्तु व्याप्तेस्तृतीयसमये लोकासंख्येयभागे भाषाऽसंख्येयभागः । कुतः १, इति चेत्, उच्यते-तस्यां तस्य दण्डसमय-
त्वात् , तत्र च संख्येयभागवर्तित्वस्य प्रागेव भावितत्वादिति । चतुर्थसमये चतुःसामयिक्यां व्याप्तौ मन्थान्तरपूरणात्समस्तलोक-
व्याप्तिः । पञ्चसामयिक्यां तु व्याप्तौ चतुर्थसमये लोकसंख्येयभागे भाषासंख्येयभागः, तस्यां तस्य मथिसमयत्वात्, तत्र
(योजित
पाठः)
भाषायास्त्रि
चतुःपञ्चसम-
यलोकव्या-
प्तिपु तृतीय-
समयादौ भ-
जनाप्रकार
उपवर्णितः॥
ॐ
PRESEX
॥ ८२॥

RE CHECCASIK च संख्येयभागवर्तित्वस्य प्रागेव भावितत्वादितिीपञ्चमसमये तु पश्चसामयिक्यां व्याप्तौ मन्थान्तरालपूरणात्समस्तलोकव्याप्तिरिति॥ एवं तृतीयचतुर्थपञ्चमसमयेषु भाविता भजना, तद्भावने च व्याख्यातं 'भयणा सेसेसु समयेसु' इति । एतच्च महाप्रयत्नवक्तृनिसृष्टद्रव्यापेक्षयैवोक्तं, मन्दप्रयत्नवक्तृनिसृष्टानि तु लोकासंख्येयभाग एव वर्तन्ते, दण्डादिक्रमेण तेषां लोक- पूरणाऽसम्भवादिति । अथ यद्युक्तप्रकारेण त्रिभिश्चतुर्भिः पञ्चभिश्च समयैर्वाग्द्रव्यैर्लोकः पूर्यते तर्हि चतुर्दशपूर्वविदा श्रुत- केवलिना नियुक्तिकारेण भगवता भद्रबाहुस्वामिना ' चउहिं समएहिं लोगो, भासाए निरंतरं तु होइ फुडो॥ इति किमिति निर्धार्य चतु:समयग्रहणमेव कृतमिति चेत्, सत्यम् , तुलादण्डग्रहणन्यायेन चतुःसमयग्रहणात् त्रयाणां पञ्चानामपि समयानां ग्रहणस्य नियुक्तिकृता विहितत्वादेव ॥ व्यवहारे यथा तुलादण्डमध्यभागग्रहणेन तदाद्यन्तभागयोरपि ग्रहणं विहितमेव, एवमत्रापि विज्ञेय, सूत्रेऽप्येवंविधो न्यायो दृश्यते, यतो भगवतः सूत्रस्य विचित्रा प्रवृत्तिः ॥ उक्तञ्च-"कत्थइ देसग्गहणं, कत्थइ घेप्पन्ति गिरवसेसाई ।। उक्कमकमजुत्ताई, कारणवसओ णिउत्ताई ॥ ३८८ ॥" [ कुत्रचिद् देशग्रहणं, कुत्रापि गृह्यन्ते निरवशेषाणि ॥ उत्क्रमक्रमयुक्तानि, कारणवशतो नियुक्तानि ॥] न चैतादृशदेशनिबन्धः श्रुते न दृष्टो भगवत्यामष्टमशते महाबन्धोद्देशके सत्यपि चतुःसामयिके विग्रहे त्रिसामयिकस्यैव तस्य निबन्धाद्, आह च-"चउसमयमज्झगहणे, तिपंचगहणं तुलाइमज्झस्स ।। जह गहणे पर्जत-ग्गहण चित्ता य सुत्तगई ।।३८७॥" [चतुःसमयमध्यग्रहणे, त्रिपञ्चग्रहणं तुलादिमध्यस्य ।। यथा ग्रहणे पर्यन्तग्रहणं चित्रा च सूत्रगतिः ॥] नयूर्वाधोगतदण्डादन्यद्रव्याणां पराघातो नास्ति ॥ " चउसमयविग्गहे सति, महल्लबन्धमि तिसमयो जह वा ॥ मोत्तुं तिपंचसमए, तह चउसमओ इह णिबद्धो ॥३८९॥” [चतुःसमयविग्रहे सति महाबन्धे (योजितः पाठः) चतुर्भिस्स- मयैर्माषा- द्रव्यैर्लोक- पूरणमिति- नियुक्तिका- रनिर्धारित- चतुस्समय- ग्रहणतोs- पत्रिपञ्च- समयव्या- प्त्योर्लाम उपपादितः॥

सविवरणं
श्रीशाना-
मेव-
प्रकरणम्
॥८३॥
त्रिसमयो यथा वा ॥ मुक्त्वा त्रिपञ्चसमयांस्तथा चतुःसमय इह निबद्धः] यदि पुनरेवं व्याख्यायते चतुर्भिरपि समयैलोको
निरन्तरं स्पृष्टो व्याप्तो भवति, तुरप्यर्थ एवानुक्तत्रिपञ्चसमयसमुच्चये, तदेप्सितार्थलाभो न्यायाश्रयणादिप्रयासं विनेति द्रष्टव्यं,
तुरेवकारार्थ एव, तस्य च निरन्तरमित्यत्राव्यवहितान्वयो भाषयेत्यस्य च कस्यचित्सम्बन्धिन्या भाषयेति विवक्षितमित्यप्याहुः,
लोकस्य च चरमान्ते सर्वलोकव्याप्तिविशिष्टाया भाषायाश्चरमान्तो भवति यदाहुः।। "आपूरियम्मि लोगे दोण्ह, वि लोगस्स तह य
भासाए ॥ चरिमंते चरिमंतो, चरिमे समयम्मि सव्वत्थ ॥ ३९१॥" [आपूरिते लोके द्वयोरपि लोकस्य तथा च भाषायाः॥
चरमान्ते चरमान्तवरमे समये सर्वत्र ॥] अत्र विवक्षयाऽऽदेरप्यन्तत्वाचरमग्रहणमिति तु पक्षद्वयेऽपि सम्मुखम् ॥ २९ ॥
अथ जैनसमुद्घातगत्या चतुर्भिः समयैर्भापाद्रव्यैर्लोकः परिपूर्यत इत्यादेशस्यानादेशत्वं ख्यापयितुमाह-
सर्ववेदिसमुद्घात-गतिरत्र न युज्यते ॥ एकदा षड्दिशां व्याप्तिः, पराघातेन तत्र यत् ॥ ३० ॥
जैनसमुद्घातगत्या हि भाषाद्रव्याणां लोकव्याप्तावङ्गीक्रियमाणायां प्रथमसमये ऊर्ध्वाधोगाम्येव दण्डः स्यान तु षड्दिक
इति पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरदिक्षु विदिक्ष्विव वक्तृनिसृष्टद्रव्याणामगमनेन पराघातवासितद्रव्याणामेव श्रवणान्मिश्रशब्दश्रवणं न
स्यात् ।। श्रूयते च-"भासासमसेढीओ, सई जं सुणइ मीसयं सुणइ॥३५१॥" [भाषासमश्रेणीतः शब्दं यच्छृणोति मिश्रकं शृणोति]
इत्यादावविशेषेण सर्वासु दिक्षु मिश्रशब्दश्रवणमेवेति ।। अथ विदिक्षु नियमेन पराघातवासितशब्दश्रवणाभिधानादिवनियमेन
तत्पर्यवस्यतीत्यनियमोपपादनाय मिश्रशब्दश्रवण समभिधीयत इत्यूर्वाधोदिशोर्मिश्रश्रवणमन्यासु च दिक्षु पराघातवासितश्रवण-
मिति व्याख्यानतो विशेषः प्रतिपद्यत इति चेत्, न, यो धूमवान् सोऽग्निमानित्यत्रेव भाषासमश्रेणीतो यं शब्दं शृणोति तं मिश्र
जैनसमु-
द्घातगत्या
भाषाद्रव्य-
र्लोकपरण-
मित्यादे-
शस्याना-
देशत्वख्या-
-
पनम् ॥
,
RESS
॥ ८३॥

+ + शृणोतीत्यत्र यत्तच्छब्दाभ्यां नियमाभिधानादनियमानुपपत्तेः, अपि चोर्ध्वाधोगमनसमय एव भाषा चतुर्दिशमप्यविशेषण शन्दप्रायोग्यद्रव्याणि पराहत्य द्वितीयसमये मन्थानं साधयतीति त्रिभिरेव समयैस्तस्या लोकव्याप्तिः सम्भवति, न च जीवप्रदे- शानामिव भाषाद्रव्याणामपि लोकव्याप्तौ प्रथमसमये दण्डो द्वितीयसमये कपाटं तृतीयसमये मन्थाश्चतुर्थसमये चान्तरालपूरणमिति वाच्यम् ॥ भाषाद्रव्याणां पराघातसम्भवेनोर्ध्वाधोगमनोत्तरं द्वितीयसमये चतुर्दिक्ष्वनुश्रेणिगमनसमये सर्वतः पराघातवासित- द्रव्याणां मथिभावेन कपाटव्याघातात् ॥ न चैतेषां लोकव्याप्तौ चतुर्दिक्ष्वनुश्रेणिगमनपराघातस्वभावेभ्योऽधिकं नियामकमस्ति, केवली तु द्वितीयसमये केवलज्ञानरूपयेच्छया गुणदोषपर्यालोचनाद् भवोपग्राहिकर्मवशात्स्वभावाद् वा द्वितीयसमये मन्थानं न करोति किन्तु कपाटमेवेति तस्य चतुःसामयिकी लोकव्याप्तिः, अचित्तमहास्कन्धस्तु विस्रसापरिणामेनैव लोकमापूरयतीति द्विती- यसमये तस्य कपाटमात्रभावाच्चतुःसामयिकी व्याप्तिर्विनसापरिणामस्य पर्यनुयोगानहत्वाद्, अथवाऽसौ निजपुद्गलैरेव लोकमा- पूरयति, नतु पराघातेनान्यद्रव्याणामात्मपरिणामं जनयतीति तस्य चतुःसामयिक्येव व्याप्तिर्निजपुद्गलजन्ये मथि निजपुद्गल- जन्यकपाटस्य हेतुत्वा विना तदभावाद्, आह च "न समुग्धायगईए, मीसयसवणं मयं च दंडमि ॥ जइ तो वि तीहि पूरइ, समएहिं जओ 'पराधाओ।।३९२||जइणे ण पराधाओ, स जीवजोगो य तेण चउसमओ॥ हेऊ होजाहि तर्हि, इच्छा कम्मं सहावो वा ॥३९३॥ खंधो वि वीससाए, ण पराघाओ अ तेण चउसमओ॥ अह होज पराधाओ, हविज तो सो वि तिसमइओ ॥३९४॥" [न समुद्घातगत्या, मिश्रकश्रवणं मतं च दण्डे ॥ यदि ततोऽपि त्रिभिः पूर्यते समयैर्यतः पराघातः॥ जैने न पराघातः, स जीव- योगश्च तेन चतुःसमयः॥ हेतुभवेत्तत्रेच्छा कर्म स्वभावोवा।। स्कन्धोऽपि विश्रसयान पराघातश्च तेन चतुःसमयः।। अथ भवेत्पराघातो जैनसमु- दूधातगत्या भाषाद्रव्य- लोकपरण- मित्यादे- शस्थाs- नादेशत्व- 'ख्यापनम्॥

सविवरणं भीज्ञाना- मेव- प्रकरणम्॥ 11८४॥ प्रकारान्तरे- ण चतुभि- स्समर्भािषा- द्रव्यैर्लोक- पूरणमित्या- देशस्य वस्तु- तोऽनादेश- भवेत्ततः सोऽपि त्रिसामयिकः॥] स्यादेतत्-मथिमात्र एव कपाटं कारणमिति कपाटं विना मथोऽभावाचतुःसामयिक्येव भाषाया लोक- व्याप्तियुज्यते, मैवं, मथ्यनुकूलविस्तारे कपाटस्येव पराघातस्यापि शक्तत्वादुभयोरप्येकशक्तिमत्त्वेन मथिहेतुत्वाद्,अत एवापराघातस्य स्कन्धस्य लोकव्याप्तौ कपाटापेक्षेति सिद्धान्तः, अथ जातस्यैव दण्डस्यैव विस्तारे पराघातः क्षमोनतृत्पद्यमानस्य तस्य न वोदासी- नद्रव्यमात्रस्यान्यथा द्वितीयसमय एव लोकव्याप्तिप्रसङ्गात्, न च स्वभावमा समयविलम्बनियामकमतिप्रसङ्गादिति चेत्, तर्हि प्रथमसमये भाषाद्रव्याणां पड्दण्डास्त एव प्रसृमरा द्वितीयसमये षष्मन्थानस्तृतीयसमये चान्तरालपूरणमिति प्रागुक्ता वस्तु- स्थितिरभ्युपगम्यतां, अपराघातद्रव्याव्याप्तावेव दण्डकपाटमन्थानहेतुत्वादिति दिक् ॥ ३० ॥ प्रसङ्गादनादेशान्तरं दूषयति- दण्डमेकदिशं कृत्वा, चतुर्भिः समयैः परे ॥ लोकपूरणमिच्छन्ति, न च युक्त्यागमक्षमम् ॥ ३२ ॥ परे प्रत्युत भाषाद्रव्याणां चतुर्भिः समयैलॊकपूरण इमां प्रक्रियामाहुः, प्रथमसमये तावदूर्ध्वदिशि दण्डो भवति, द्वितीयस- मये च तत्र मन्थाः, अधोदिशि पुनर्दण्डं, तृतीयसमये चोर्ध्वदिश्यन्तरालपूरणमघोदिशि तु मन्थार,चतुर्थसमये तु तत्राप्यन्तरालपरणा- लोकव्याप्तिरिति, तन्मतं न युक्तिं क्षमते, अनुश्रेणिगमनस्वभावानां पुद्गलानामेकयैव दिशा गमनं नान्यत्रेत्यत्र नियामकाभावात, न च वक्तृमुखताल्वादिव्यापाराभिमुख्यमेव नियामकं विश्रेण्यभिमुखे भाषके विश्रेणावपि गमनप्रसङ्गात्, पटहादिशब्दपुद्गलानां वक्तृमुखव्यापारनिरपेक्षतया चतुःसमयानियमप्रसङ्गाच, न चात्र कश्चिदागमोऽप्यस्ति यबलात्तथाव्याप्तिस्वभावः कल्पयितुं शक्येत।। आह च-"एगदिसमाइसमए, दंडं काऊण चउहि पूरेइ ।। अन्ने भणन्ति,तं पि य, नागमजुत्तिरकम होइ ॥३९५॥" [एक- दिक्कमादिसमये, दण्डं कृत्वा चतुर्भिः पूरयति ॥ अन्ये भणन्ति तदपि च नागमयुक्तिक्षमं भवति ॥] ॥३२॥ स्य खण्ड- BRECISANSARSISTERSANSAR FACCUSERS नम् ॥

तदेवं सप्रसङ्गं व्याख्यातं भेदतो मतिज्ञानं, अथ तत्पर्यायानभिधित्सुराह- ईहापोहौ च मीमांसा, मार्गणा च गवेषणा ॥ संज्ञा स्मृतिर्मतिः प्रज्ञा, सर्वमाभिनिबोधिकम् ॥ ३३ ॥ ईहाऽन्वयव्यतिरेकधर्मगवेषणा, अपोहो निश्चयो, मीमांसा विमर्शोऽपायात्पूर्व ईहायाश्चोत्तरः सम्भवसम्प्रत्ययः, मार्गणम- न्वयधर्मान्वेपणं,गवेषणं व्यतिरेकधर्मालोचन,संज्ञाऽवग्रहोत्तरमावी मतिविशेष एव,स्मृतिः पूर्वानुभूतार्थानुसन्धानम्,मतिः कथ चिदर्थपरिच्छित्तावपि सूक्ष्मधर्मालोचनरूपा बुद्धिः, प्रज्ञा विशिष्टक्षयोपशमजन्या प्रभूतवस्तुयथातचालोचनं, सर्वमिदं कथ- श्चिभेदेऽप्याभिनिवोधिकमेव मन्तव्यम् । यदाह परममुनि:-[नियुक्तिगाथा] "ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा च गवेसणा ॥ सण्णा सई मई पण्णा, सबमाभिणियोहियं ॥३९६॥"[ईहापोहो विमी, मार्गणा च गवेषणा।। संज्ञा स्मृतिर्मतिः प्रज्ञा, सर्वमामि- निवोधिकम् ॥] भाष्यकृदप्याह-" होइ अपोहोऽवाओ, सई धिई सन्चमेव महपन्नाईहा सेसा, सव्वं, इदमाभिणिवोहियं जाण ॥ ३९७ ॥ [ भवत्यपोहोपायः स्मृतितिः सर्वमेव मतिप्रज्ञे. ॥ ईहा शेषाणि सर्वमिदमामिनित्रोधिकम् ] अत्र मतिप्रज्ञाभिनिवोधिकवुद्धिलक्षणाश्चत्वारः शब्दा वचनपर्यायास्तमतिज्ञानसामान्याभिधानाद्, अवग्रहादिशब्दाचाऽर्थपर्यायास्त- देकदेशाभिधानाद्, अथवा सर्वेषामपि वस्तूनाममिलापवाचकाः शब्दा वचनपर्यायाः, तदभिधेयार्थस्यात्मभूता भेदास्त्वर्थपर्याया; यथा कनकस्य कटककेयूरादयः, तदाह-" मइपन्नाभिणिवोहिय-बुद्धीओ होन्ति वयणपजाआ॥ जा ओग्गहाइसना, ते समे अत्थपजाया ॥ ३९८ ॥" [ मतिप्रज्ञाभिनियोधिकबुद्धयो भवन्ति वचनपर्यायाः ॥ या अपग्रहादिसंज्ञा ते सर्वे अर्थपर्यायाः ॥] नन्वर्थपर्यायास्तावद् भेदा एव तन्निरूपणं चावाप्रकृतं शब्दभेदादर्थभेदभ्रमनिरासाय मतिपयर्यायज्ञानशब्दाभिधानस्यैवात्र मतिज्ञान- पर्यायकथनं ईहादीनामा- भिनिबोधि- कत्वे भाष्य- संवादः मति- प्रज्ञादीनां वचनपर्याय- त्वमवग्रहा- दीनामर्थ- पर्यायत्वं चेतिप्ररूप- णम् ॥ १५ 1 सविवरण मीज्ञाना- बर- प्रक REAKE प्रकृतत्वात् , यथा न्यायनये "बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यऽनर्थान्तरम्" इति सांख्याभिमतस्य शब्दभेदादर्थभेदस्य निरा- साय ज्ञानपर्यायाभिधानम्, एकरूपेणैकार्थबोधकशब्दद्वयं च पर्याय:, अन्यथा पृथिवीघटशब्दयोरपि पर्यायत्वव्यवहारप्रस- इङ्गादिति, तथा च कथमीहापोहादीनां मतिज्ञानपर्यायत्वमिति चेत्, सत्यं-अवग्रहणादियोगार्थभेदेऽप्यवग्रहादिशब्दानां मतिसामान्यप्रवृत्तिकत्वेन पर्यायत्वात् योगार्थभेदस्यापि पर्यायत्वप्रतिपन्थित्वे घटकलशादिपदानामपि तत्त्वं न स्यात् , न चैवमवग्रहेहादिसङ्करप्रसङ्गः?, अवग्रहादीनां सामान्या दिग्राहित्वेऽप्यन्यक्तव्यक्ततत्तदवभासविशेषेण विशेषात् , नहि यथा- भूतमवग्रहे सामान्यमात्रार्थस्यावग्रहणं तथाभूतमेवेहायां, किन्तु विशिष्टं, विशिष्टतरं विशिष्टतम चाऽपायधारणयो, यथाभूता चेहायां मतिचेष्टा ततो विशिष्टतरा विशिष्टतमा चाऽपायधारणयोर, अविशिष्टतरा चाऽवग्रहे, अर्थावगमनमप्यपायाद्विशिष्टं धारणायां, अविशिष्टमविशिष्टतरं चेहावग्रहयोः, अर्थधारणमप्यवग्रहहापायेभ्यः सर्वप्रकृष्टं धारणायामिति ॥ तदिदमाह-xxx [इयानेवोपलब्धोयं ग्रन्थः,अग्रेतनः समाप्ति यावत्प्रभूततमो ग्रन्थभागः खण्डित इति तद्बुभुत्सनां किञ्चिद्दिक्सूचकप्रायं प्रदश्यते] [सव्वं वाभिणियोहिय-मिहोग्गहाइवयणेण संगहिय।।केवलमत्थविसेसं,पइ भिन्ना उग्गहाईया॥३९९।। [सर्व वाभिनिबोधिक- मिहावग्रहादिवचनेन सगृहीतम् ॥ केवलमर्थविशेष प्रति भिन्ना अवग्रहादयः] अथावग्रहेहापायधारणानामविशिष्टविशिष्टविशिष्टतर- विशिष्टतमार्थप्रतिपादकत्वेन कथं तत्तच्छब्देनाभिनिवोधिकं सगृह्यत इति चेत्, अत्राह-अविशिष्टयौगिकार्थाश्रयणेन सर्वेषामप्येक- वाचकत्वेनाभिनिवोधिकत्वेऽविरोधात् । इदमुक्तं भवति, अवग्रहणमवग्रह इतिव्युत्पत्तिमाश्रित्य सर्वमप्याभिनिचोधिकमवग्रहः,यथा. हि, कमप्यर्थमवनहोऽवगृह्णाति,तयेहापि कमप्यर्थमवगृह्णात्येव, एवमपायधारणे अपि कमप्यर्थमवगृहीत इति सर्वमप्याभिनियोधिकं (योजितः पाठः) ईहापोहा- दोनां मति- ज्ञानपर्याय- त्वस्यावग्र- हणादिता- रंतम्यस्य च व्ववस्था- पनम् । सर्व- म्याभिनि- बोधिकस्या- वग्रहादिश- देन सम. पपादनथ ॥८५॥ HEALANCE Ros FICE (योजितः पाठः) सर्वेषामवग्न- हादीनां प्रं- त्येकमवग्र- हादित्वं तद्रू- सामान्येनावग्रह उच्यते। एवमीहनमीहा मतिचेष्टेतीहाया व्युत्पत्ति, अवगमनमवायोर्थावगम इत्यवायस्य, धरणं धारणा अर्थस्या- विच्युत्यादिस्वरूपमिति धारणायाश्च व्युत्पत्तिमवलम्ब्यावग्रहापायधारणानामपि मतिचेष्टाविशेषरूपत्वात्सामान्यत ईहात्वे अवग्र- हेहाघारणानामप्यर्थावगमात्मकत्वात्सामान्यतोऽपायत्वे अवग्रहहापायानां सामान्यतोऽर्थधरणस्वरूपत्वाद्धारणात्वेन कश्चिद्विरोधः, यथैतेषामवग्रहादीनां सङ्करप्रसङ्गो न भवति तथा प्रागेवोपपादितं पूज्यरित्यलमतिपल्लवितेन । तदिदमाह भाष्यकारः||"उग्गहण- मोग्गहो ति य, अविसिट्ठमवग्गहो तयं सव्वं ॥ ईहा जं मइचेट्ठा, मइवावारो तयं सव्व।।४००॥अवगमणमवाओत्ति य, अत्थाव- गमो तयं हवइ सव्वं ॥ धरणं च धारणत्ति य, तं सव्वं धरणमत्थस्स।।४०१॥"[अवग्रहणमवग्रह इति, चाविशिष्टमवग्रहस्तत्सर्वम् ।। ईहा यद् मतिचेष्टा,मतिव्यापारस्तत्सर्वम्।।अवगमनमवाय इति चार्थावगमस्तद् भवति सर्वम् ॥ धरणं च धारणेति च तत्सर्व धरणम- र्थस्य अथैवं तत्त्वभेदपर्यायैर्व्याख्यातस्वरूपस्यास्याभिनिवोधिकज्ञानस्य समासतो ज्ञेयभेदेन चातुर्विध्यं,यन्नन्दिसूत्रं "तं समासओ चउव्विहं पन्नत्त, तंजहा-दव्वओ, खित्तओ, कालओ, भावओ। तत्थ दव्वओ णं आभिणिवोहियनाणी आएसेणं सव्वदन्वाई जाणइ न पासइ" इत्यादि [तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तं तद्यथा-द्रव्यतः,क्षेत्रतः, कालतो, भावतः। तत्र द्रव्यत आभिनिवाधिकज्ञानी आदेशेन सर्वद्रव्याणि जानाति न पश्यति] अथास्तु पदार्थानां द्रव्यक्षेत्रकालभावभिन्नत्वेन चतुर्विधत्वाज्ज्ञेयचातुर्विध्यं ततो ज्ञान- स्य चतुर्विधत्वे किमायातमिति चेत्, उच्यते, ज्ञानन्तावद्विषयाधीनसचाकं विषयमवगच्छदेव ज्ञानं ज्ञानत्वमृच्छति, तथा चाभिनिबो- धिकमादेशेन द्रव्यादिभेदेन चतुर्विधमपि विषयमवगृह्णातीति विषयभेदेन ज्ञानस्यापि चतुर्विधत्वं सिद्धम् । तदाह-"तं पुण चउविहं ने-य मेयओ तेण जं तदुवउत्तो॥ आदेसेणं सव्वं,दव्वाइ चउन्विहं मुणइ ॥४०२॥" [तत्पुनश्चतुर्विध ज्ञेय-भेदतस्तेन यत्तदुपयुक्तः॥ पस्याभिनि- बोधिकस्य ज्ञेयभेदेन चातुर्विध्ये नन्दिसूत्र- संवादश्च RESEARS M सविवरण बीवाना- भर प्रणम्॥ ॥८ आदेशेन सर्व द्रव्यादि चतुर्विध जानाति ॥ ननु द्रव्यादिचतुर्विधमाभिनिनोधिकज्ञानी जानातीत्युक्तं तत्केन स्वरूपेण, नच किं- ज्ञानस्य ज्ञातव्यप्रकारभेदोऽस्तीति स्वरूपं पृच्छसीति वाच्यं, ज्ञातव्यप्रकारस्य द्वैविध्यात्, तथाहि,ओघादेशो विभागादेशश्च सामा- न्यप्रकारो विशेषप्रकारचेति तदर्थः,अतः केन स्वरूपेणेति प्रश्नः, अत्रोत्तरं, ओघादेशेन सामान्यप्रकारेण, तथाहि, द्रव्यसामान्येन असं- रहयेयप्रदेशात्मको लोकव्यापकोऽमूर्तः प्राणिनां पुद्गलानां च गत्युपष्टम्भनहेतुर्धर्मास्तिकाय इत्यादिना सामान्यप्रकारेण कियत्प- र्यायविशिष्टानि पडपिधर्मास्तिकायादीनि सर्वद्रव्याणि सामान्येनाभिनियोधिज्ञानी जानातीति तयम्।विभागादेशेन विशेषप्रकारेण पुनः सः पर्यायैः केवलिदृष्टैरवच्छिन्नानि सर्वद्रव्याणि न जानाति केवलज्ञानावसेपत्वात्सर्वपर्यायाणामिति, एवं क्षेत्रमपि सर्व सामा- न्यतः कियत्पर्यायावच्छिन्नं सामान्पादेशेन जानाति न विशेषादेशेन सर्वपर्यायविशिष्टं, कालमपि सर्वाद्धारूपं अतीतानागतवर्तमानभे- दतस्त्रिविधं वेत्यादिरूपेण, भावतस्तु सामान्येन सर्वभावानामनन्तभागं, औदयिकक्षायिकौपशमिकक्षायोपशभिकपारिणामिकान्वा पअमावान्सामान्यादेशेन जानाति न परतः॥ एतावत एवाभिनियोधिकविषयत्वात् ॥ इह क्षेत्रकालयोः सामान्येन द्रव्यान्तर्गतत्वे- ऽपि भेदेन रूढत्वात्पृथगुपादानं कृतं ॥ सत्रार्थत्वे वाऽऽदेशस्य त्रादेशतः श्रुतोपलब्धेष्यर्थेषु सर्वद्रव्यादिविषयं मतिज्ञानं प्रवर्तते। नच श्रुनोपलन्धेपर्थेषु ग्राहकत्वेन प्रवृत्तस्य ज्ञानस्य श्रुतज्ञानत्वमेव न्याय्यं न मतिज्ञानत्वमिति साम्प्रतम्, इह पूर्व श्रुतपरिकर्मितमते- रपि साम्प्रतमाभिनिवोधिकज्ञानस्य श्रुतोपयोगमृते तदुपलब्धेष्वर्थेषु तद्वासनामात्रेणैव प्रवृत्तत्वात, यदवादि, "पुचि सुयपरिकम्मि- य-मइस्स जे संपर्य सुयाईयं" इत्यादि,सर्वमप्येतद्भाष्यकारोऽप्याह-"आएसोत्ति पगारो, ओहादेसेण सन्चवाई।। धम्मत्थि- काइयाई, जाणइ न उ सबभेएणं ॥४०३॥ खेतं लोगालोग, कालं सबद्धमन तिविहं ति ॥ पंचोदइयाईए, भावे जं नेयमेवइयं (योजितः पाठः) द्रव्यादि- चतुर्विधमा- भिनिबोधि- कज्ञानी सामान्यप्र कारेण सर्व जानाति न विशेपप्रका- रेण सर्वमि- ति प्रपधि- तम् ।

॥४०४।। आएसोति व सुत्तं, सुओपल सु तस्स मइनाणं ।। पसरइ तंब्मावणया, विणा वि सुत्तानुसारण ॥४०५॥" [आदेश इति- प्रकार ओघादेशेन सर्वद्रव्याणि ।। धर्मास्तिकायिकादीनि जानाति न तु सर्वभेदेन ॥ क्षेत्रं लोकालोकं कालं सर्वाद्धामथवा त्रिविध- मिति ।। पञ्चौदयिकादीन्भावान्यज्ज्ञेयमियद् ॥ आदेश इति वा सूत्रं श्रुतोपलब्धेषु तस्य मतिज्ञानं ॥ प्रसरति तद्भावनया विनापि सूत्रानुसारेण॥] तदेवं मतिज्ञानस्य तत्त्वभेदपर्यायनिरूपणं द्रव्यादिविषयप्ररूपणं च प्रदर्शितम् ॥ अथ सत्पदनरूपणतादिभिनव- भिरनुयोगद्वारैमतिज्ञानं विचार्यते, अनुयोगद्वाराणि च गत्यादिमार्गणाभेदेपु विधीयन्ते, अतः पूर्व द्वाराणि मार्गणाभेदाचोच्यन्ते तत्र सत्पदप्ररूपणता, द्रव्यप्रमाण, क्षेत्र, स्पर्शना, काला, अन्तरं, भागः, भावा, अल्पबहुत्वं चेति नवानुयोगद्वाराणि, अनुयोगो व्याख्यानं तस्य द्वाराणीव द्वाराणि व्याख्यानपुरप्रवेशमार्गाः, मार्गणाथ 'गइ इंदिय काये' इत्यादिगाथोक्ताः, सत्पदाधनुयोग- द्वारावतारस्थानानि, एतेषां स्वरूपं प्रतिपद्यमानप्रतिपन्नजीवानां मार्गणाविचारोऽनुयोगद्वारविचारच महाभाष्यतवृत्त्यादि- भ्यो विशेषजिज्ञासुनाऽवधेयः ॥ तत्र महाभाष्ये पडुत्तरचतुःशततमगाथात आरभ्य त्रिचत्वारिंशदाधिकचतु:शततमी पावदष्टा- निशता गाथाभिस्सत्पदप्ररूपणतादिभिरनुयोगद्वारैमतिज्ञानं चिन्तितम्। तता पट्पष्टयुत्तरपञ्चशततमी गाथा यावत्रयोविंशत्यऽ- धिकशतसंख्यगाथाभिः श्रुतज्ञानं निरूपितम् ॥ ततोऽटोचराष्टशततमी गाथां यावद्विचत्वारिंशदाधिकद्विशतप्रमाणाभिर्गा- थाभिरवधिज्ञानं प्ररूपितम् ॥ ततो द्वाविंशत्युत्तराष्टशततमी गाथां यावचतुर्दशभिर्गाथाभिर्मन:पर्यायज्ञानप्ररूपणा कृता ॥ ततः पत्रिंशदुत्तराष्टशततमी गाथां यावतुर्दशभिर्गाथामिः केवलज्ञानं निरूपितम् ॥] ॥ न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीतं त्रुटितावस्थोपलन्धं श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं समाप्तम्॥ सत्पदमरू- पणताधनुयो- गहारगति- ज्ञानप्ररूप- णस्य श्रुत- ज्ञानादीना चतुर्णा प्रति- पत्तयेमहा- माप्यनि- रूपितप्रति- नियतगाथा- नां च संमू- चनम् 4A H rane HumAh H

प्रमणम्॥
८७॥
-
ALSO
॥ इयता मानार्णवप्रन्यविभागेन मतिज्ञानप्ररूपणमप्यवशिष्टमिति भुतादीनां तत्वबुभुत्सापूरणाय पूज्यप्रणीतमेव तदीय-
विषयविन्दुरूपत्वान्नाम्ना श्रीज्ञान विन्दुप्रकरणमन्यत्र पूर्व विधा मुद्रितमप्येतत्संलगतासत्यापनायेह प्रकाश्यते ॥
॥ अथ श्रीज्ञानबिन्दुप्रकरणम् ॥
ऐन्द्रस्तोमनतं नत्वा, वीरं तत्त्वार्थदेशिनम् ॥ ज्ञानबिन्दुः श्रुताम्भोधेः, सम्यगुध्रियते मया ॥१॥
तत्र ज्ञानं तावदात्मनः स्वपरावभासकोऽसाधारणो गुणः, स चाभ्रपटलविनिर्मुक्तस्य भास्वत इव निरस्तसमस्तावरणस्य
जीवस्य स्वभावभूतः केवलज्ञानव्यपदेशं लभते । तदाहुराचार्याः-" केवलनाणमणतं, जीवसरूवं तयं निरावरणं ।।" इति ।
च स्वभावं यद्यपि सर्वघातिकेवलज्ञानावरणं कात्स्न्येनैवावरीतुं व्याप्रियते, तथापि तस्यानन्ततमो भागो नित्याऽनावृत एवावतिष्ठते,
तथास्वाभाव्यात् ॥ (नन्दीसूत्र ) ' सव्वजीवाणं पि य णं अक्खरस्स अणंततमो भागो णिच्चुग्याडिओ चिट्ठइ, सो वि अ जइ
आवरिज्जा, तेणं जीवो अजीवत्तणं पाविज्जा" इति पार्षप्रामाण्यात् । अयं च स्वभावः केवलज्ञानावरणावृतस्य जीवस्य
धनपटलच्छन्नस्य खेरिव मन्दप्रकाश इत्युच्यते । तत्र हेतुः केवलज्ञानावरणमेव । केवलज्ञानव्यावृत्तज्ञानत्वव्याप्यजातिविशे-
पावच्छिन्ने तद्धेतुत्वस्य शास्त्रार्थत्वात् । अत एव न मतिज्ञानावरणक्षयादिनापि मतिज्ञानाद्युत्पादनप्रसङ्गः । अत एव चास्य
विभावगुणत्वमिति प्रसिद्धिः। स्पष्टप्रकाशप्रतिबन्धके मन्दप्रकाशजनकत्वमनुत्कटे चक्षुराद्यावरणे वस्त्रादावेव दृष्टं, न तूत्कटे
इठ्यादाविति कथमत्रैवमिति चेत्, न, अभ्रायावरणे उत्कटे उभयस्य दर्शनात, अत एवात्र (नन्दी) "सुदु वि मेघसमुदए, होति पभा
पंदसराणं ॥” इत्येव दृष्टान्तितं पारमर्षे, अत्यावृतेऽपि चन्द्रसूर्यादौ दिनरजनीविभागहेत्वल्पप्रकाशवजीवेऽप्यन्यव्यावर्तकचै-
मङ्गलं ज्ञान-
निरूपणे के-
वलज्ञानस्व-
रूपोपदर्श-
ने, जीवस्व-
भावस्य ज्ञान-
स्यानन्ततम-
भागो नि-
त्यानावृत ए-
वेत्यस्य व्य-
वस्थापनमू।
SCREENERGAREERS
॥ ८७॥

**CAPSAREEREGISTRE तन्यमात्राविर्भाव आवश्यक इति परमार्थः । एकत्र कथमावृतानावृतत्त्वमिति त्वर्पितद्रव्यपर्यायात्मना भेदाभेदवादेन निर्लो- ठनीयम् । ये तु चिन्मात्राश्रयविषयमज्ञानमिति विवरणाचार्यमताश्रयिणो वेदान्तिनस्तेषामेकान्तवादिनां महत्यनुपपत्तिरेव, अज्ञानाश्रयत्वेनानावृतं चैतन्यं यत्तदेव तद्विषयतयाऽऽवृतमिति विरोधात् । न चाऽखण्डत्वाद्यज्ञानविषयः, चैतन्यं त्वाश्रय इत्यवि- रोधः, अखण्डत्वादेश्चिद्रूपत्वे भासमानस्यावृतत्वायोगात्, अचिद्रूपत्वे च जडे आवरणायोगात् । कल्पितभेदेनाखण्डत्वादि विषय इति चेत्, न, भिन्नावरणे चैतन्यानावरणात् । परमार्थतो नास्त्येवावरणं चैतन्ये, कल्पितं तु शुक्तौ रजमिव तत्तत्राविरुद्धं, तेनैव च चित्त्वाखण्डत्वादिभेदकल्पना 'चैतन्य स्फुरति नाखण्डत्वाद्'इत्येवंरूपाऽऽधीयमाना न विरुद्धेति चेत्, न, कल्पितेन रज- तेन रजतकार्यवत्कल्पितेनावरणेनावरणकार्यायोगात् । 'अहं मां न जानामि' इत्यनुभव एव कर्मत्वांशे आवरणविषयका कल्पि- तस्यापि तस्य कार्यकारित्वमाचष्टे, अज्ञानरूपक्रियाजन्यस्यातिशयस्यावरणरूपस्यैव प्रकृते कर्मत्वात्मकत्वात्, अत एवास्य सा- क्षिप्रत्यक्षत्वेन स्वगोचरप्रमाणापेक्षया न निवृत्तिप्रसङ्ग इति चेत्, न, 'मां न जानामि' इत्यस्य विशेषज्ञानाभावविषयत्वात्, अन्यथा मां जानामीत्यनेन विरोधात, दृष्टश्चैत्थं 'न किमपि जानामि इत्यादिमध्यस्थानां प्रयोगः । किश्च विशिष्टाविशिष्टयोअंदा- भदाभ्युपगमं विनाध्खण्डत्वादिविशिष्टचैतन्यज्ञानेन विशिष्टावरणनिवृत्तावपि शुद्धचैतन्याप्रकाशप्रसङ्गः, विशिष्टस्य कल्पित- त्वादविशिष्टस्य चाननुभवात्, महावाक्यस्य निधमकब्रह्मविषयत्वं चाग्रे निर्लोठयिष्यामः । एतेन 'जीवाश्रयं ब्रह्मविषयं चाज्ञानम् इति वाचस्पतिमिश्राभ्युपगमोऽपि निरस्तः । जीवब्रह्मणोरपि कल्पितभेदत्वात्, व्यावहारिकभेदेऽपि जीवनिष्ठाविद्यया तत्रैव प्रपश्चोत्पत्तिप्रसङ्गात् । न चाहकारादिप्रपञ्चोत्पत्तिस्तत्रेष्टैव, आकाशादिप्रपञ्चोत्पत्तिस्तु विषयपक्षपातिन्या अविद्याया ईश्वरे स- ज्ञानस्य कय- चिदावृत- त्वानावृतत्व, चिन्मात्रा- श्रयविषयम- ज्ञानमिति विवरणाचा- र्यमतस्य जी- वाश्रयं ब्रह्म- विषयश्चा- ज्ञानमि- तिवाचस्प- तिमिश्रमत- स्य च खण्ड NCE नम् ।

अनेकान्त- वाद एवं ज्ञा- नस्वभाव- प्रभरका 11८८॥ स्वेन तत्रैव युक्तेत्यपि साम्प्रतम्, अज्ञातब्रह्मण एवैतन्मते ईश्वरत्वेऽप्यज्ञातशुक्ते रजतोपादानत्ववत्तस्याकाशादिप्रपञ्चोपादान- त्वाभिधानासम्भवात, रजतस्थले हीदमंशावच्छेदेन रजताभावाऽज्ञानम्, इदमंशावच्छेदेन रजतोत्पादकामेति त्वया क्लप्त शुक्त्यज्ञानं त्वदूरविप्रकर्षण तथा, प्रकृते तु ब्रह्मण्यवच्छेदासम्भवान्न किश्चिदेतत्, अवच्छेदानियमेन हेतुत्वे चाहङ्कारादेरपीश्वरे उत्पत्तिप्रसगादिति किमतिप्रसङ्गेन, तस्मादनेकान्तवादाश्रयादेव केवलज्ञानावरणेनावृतोऽप्यनन्ततमभागावशिष्टोऽनावृत एव वानस्वभावः सामान्यत एकोऽप्यनन्तपर्यायकीर्मीरितमूर्तिमन्दप्रकाशनामधेयो नानुपपन्नः, स चापान्तरालावस्थितमतिज्ञाना- द्यावरणक्षयोपशमभेदसम्पादितं नानात्वं भजते, घनपटलाच्छन्नरवेमंन्दप्रकाश इवान्तरालस्थकटकुट्याद्यावरणविवरप्रवेशात् ॥ इत्थं च जन्मादिपर्यायवदात्मस्वभावत्वेऽपि मतिज्ञानादिरूपमन्दप्रकाशस्योपाधिभेदसम्पादितसत्ताकत्वेनोपाधिविगमे तद्वि- गमसम्मवान्न कैवल्यस्वभावानुपपत्तिरिति महाभाष्यकार, अत एव द्वितीयापूर्वकरणे ताचिकधर्मसन्न्यासलामे क्षायो- पशामिकाः श्रमादिधर्मा अप्यपगच्छन्तीति तत्र तत्र ( योगदृष्टिसमुच्चयादौ) हरिभद्राचार्यनिरूपितम् । निरूपितं च योगय- लकर्मनिर्जरणहेतुफलसम्बन्धनियतसत्ताकस्य क्षायिकस्यापि चारित्रधर्मस्य मुक्तावनवस्थानम् । न च वक्तव्यं केवलज्ञानाव- रणेन बलीयसावरीतुमशक्यस्यानन्ततमभागस्य दुर्वलेन मतिज्ञानावरणादिना नावरणसम्भव इति, कर्मणः स्वावार्यावारक- तायां सर्वघातिरसस्पर्धकोदयस्यैव बलत्वात्, तस्य च मतिज्ञानावरणादिप्रकृतिष्वप्यविशिष्टत्वात् । कथं तर्हि क्षयोपशम इतिचेत्, अप्रेयमहन्मतोपनिषद्वेदिनां प्रक्रिया-इह हि कर्मणां प्रत्येकमनन्तानन्तानि रसस्पर्धकानि भवन्ति, तत्र केवलज्ञा- नावरण केलदर्शनावरणा-ऽऽद्यद्वादशकपाय-मिथ्यात्वे-निद्रौलक्षणानां विंशतेः प्रकृतीनां सर्वघातिनीनां सर्वाण्यपि रसस्पधकानि स्यावृतत्वा- नावृतत्वोप- पत्तिः, मन्द- प्रकाशस्य तस्य नाना- वं क्षयोपश- मप्रक्रियोप- क्रमश्च ।। से ॥८८॥ ESS REACHESHARANACHERS सर्वघातीन्येव भवन्ति, उक्तशेषाणां पञ्चविंशतिघातिप्रकृतीनां देशघातिनीनां रसस्पर्धकानि यानि चतु:स्थानकानि यानि च त्रिस्थानकानि तानि सर्वघातीन्येव, द्विस्थानकांनि तु कानिचित् सर्वघातीनि कानिचिच देशघातीनि, एकस्थानकानि तु सर्वाण्यपि देशथातीन्येव । तत्र ज्ञानावरणचतुष्कदर्शनावरणत्रयसञ्चलनचतुष्कान्तरायपश्चकपुंवेदलक्षणानां सप्तदशप्र- कृतीनामेकद्वित्रिचतुःस्थानकरसा वन्धमाथित्य प्राप्यन्ते, श्रेणिप्रतिपत्तेरांगासां द्विस्थानकस्य त्रिस्थानकस्य चतुःस्थानकस्य वा रसस्य बन्धात् । श्रेणिप्रतिपत्तौ त्वनिवृत्तिवादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेष्वत्यन्तविशुद्धाध्यवसायेनाशुभत्वादासा- मेकस्थानकरसस्यैव बन्धात्, शेषास्तु शुभा अशुभा वा 'बन्धमधिकृत्य द्विस्थानकरसास्त्रिस्थानकरसाश्चतुःस्थानकरसाश्च प्राप्यन्ते, न कदाचनाप्येकस्थानकरसाः । यत उक्तसप्तदशव्यतिरिक्तानां हास्याद्यानामशुभप्रकृतीनामेकस्थानकरसव- न्धयोग्या शुद्धिरपूर्वकरणप्रमत्ताप्रमत्तान्मं भवत्येव न, यदा त्वेकस्थानकरसवन्धयोग्या परमप्रकर्षप्राप्ता शुद्धिरनिवृत्तिवाद- राद्धायाः संख्येयेभ्यो भागेभ्यः परतो जायते, तदा बन्धमेव न ता आयान्तीति ॥ न च यथा श्रेण्यारोहेऽनिवृत्तिवाद- राद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेषु परतोऽतिविशुद्धत्वान्मतिज्ञानावरणादीनामेकस्थानकरसबन्धः, तथा क्षपकश्रेण्यारोहे सू- क्ष्मसम्परायस्य चरमद्विचरमादिसमयेषु वर्तमानस्यातीवविशुद्धत्वात् केवलद्विकस्य सम्भवद्वन्धस्यैकस्थानरसवन्धः कथं न भवतीति शङ्कनीयम् ? । स्वल्पस्यापि केवलद्विकरसस्य सर्वघातित्वात् , सर्वघातिनां च जघन्यपदेऽपि द्विस्थानकरसस्यैव सम्भवान्, शुभानामपि प्रकृतीनामत्यन्तशुद्धौ वर्तमानश्चतुःस्थानकमेव रसं बनाति, ततो मन्दमन्दतरविशुद्धौ तु त्रिस्था- नक द्विस्थानकं वा, सङ्केशाद्धायां वर्तमानस्तु शुभप्रकृतीरेव न बनातीति कुतस्तद्गतरसस्थानकापिन्ता । यास्त्वतिसक्लिष्टे सर्वधातिप्र- कृतिरसस्प- धिकानां सर्व- घातित्वमेव देशघातिना- च रसस्पर्धके- षु सर्वदेशघा- तित्वव्यव- स्थोपपादनं रसस्पर्धकेषु चतु:स्थान- कादिनियमा- नियमप्रदर्श- नश्च * प्रकरमर ॥८९॥ KARENॐeo मिध्यादृष्टौ नरकगतिप्रायोग्या वैक्रियतैजसाद्याः शुभप्रकृतयो नन्धमायान्ति, तासामपि तथास्वाभाव्यान्जघन्यतोऽपि द्विस्था- नक एव रसो चन्धमायाति नैकस्थानक इति ध्येयम् । ननूत्कृष्टस्थितिमा सङ्क्लेशोत्कर्षेण भवति, ततो येरेवाऽध्यवसायैः शुभ- प्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिर्भवति तैरेवैकस्थानकोऽपि रसः किं न स्यादिति चेत्, उच्यते-इह हि प्रथमस्थितेरारभ्य समयसमयवृद्धयाऽ- संख्येयाः स्थितिविशेपा भवन्ति, एकैकस्यां च स्थितावसंख्येया रसस्पर्धकसङ्घातविशेषाः, तत उत्कृष्टस्थितौ बध्यमानायां प्रतिस्थितिविशेषमसंख्यया ये रसस्पर्धकसङ्घातविशेषास्ते तावन्तो द्विस्थानकरसस्यैव घटन्ते नैकस्थानकस्येति न शुभप्रक- तीनामुत्कृष्टस्थितिबन्धेऽप्येकस्थानकरसबन्धः। उक्तं च-"(पंचसंग्रह)उकोसठिईअज्झव-साणेहिं एगठाणिओ होइ।। सुभिआण तं न जं ठिई, असंखगुणिआ उ अणुभागा॥३-६४ ॥ इति” । एवं स्थिते देशघातिनामवधिज्ञानावरणादीनां सर्वघातिरसस्पर्धकेषु विशुद्धाध्यवसायतो देशघातितया परिणमनेन निहतेषु, देशघातिरसस्पर्धकेषु चातिस्निग्धेष्वल्परसीकृतेषु, तदन्तर्गतकतिप- यरसस्पर्धकमागस्योदयावलिकाप्रविष्टस्य क्षये, शेषस्य च विपाकोदयविष्कम्भलक्षणे उपशमे, जीवस्यावधिमनःपर्यायज्ञानचक्षु दर्शनादयो गुणाः क्षायोपशमिकाः प्रादुर्भवन्ति । तदुक्तम्-"णिहएसु सन्चधाई-रसेसु फडेसु देसघाईण ॥जीवस्स गुणा जा- य-ति ओहीमणचरकुमाईआ॥३-३०॥" निहतेषु देशघातितया परिणमितेषु ॥ तदावधिज्ञानावरणादीनां कतिपयदेशघातिरस- स्पर्धकक्षयोपशमात् कतिपयदेशघातिरसस्पर्धकानां चोदयात् क्षयोपशमानुविद्ध औदयिको भावः प्रवर्तते, अत एवोदीयमानां- शक्षयोपशमश्या वर्धमानावधिज्ञानोपपत्तिः । यदा चावधिज्ञानाऽऽवरणादीनां सर्वघातीनि रसस्पर्धकानि विपाकोदयमाग- तानि भवन्ति : तदा तद्विषय औदयिको भावः केवलः प्रवर्तते । केवलमवधिज्ञानावरणीयसर्वघातिरसस्पर्धकानां देशघातितया PिATRESSINESS शुभप्रकृतीनां नकस्थानर- सवत्वमि- त्युपपादनं तत्संबादि- पंचसङ्ग्रह- ग्रन्थपाठः, क्षयोपशम. विचारश्च ॥ + ॥ ८९॥ --- -- PRICE FRESHESHAKRECROREGACCHETHER परिणामः कदाचिद्विशिष्टगुणप्रतिपत्त्या कदाचिच्च तामन्तरेणैव स्यात्, भवप्रत्ययगुणप्रत्ययभेदेन तस्य द्वैविध्योपदर्शनात् । मनःपर्यायज्ञानावरणीयस्य तु विशिष्टसंयमाप्रमादादिप्रतिपत्तावेव तथास्वभावानामेव बन्धकाले तेषां बन्धनात्, चक्षुर्दर्श- नावरणादेरपि तत्तदिन्द्रियपर्याप्त्यादिघटितसामग्र्या तथापरिणामः । मतिश्रुतावरणाचक्षुर्दर्शनावरणान्तरायप्रकृतीनां तु सदैव देशघातिनामेव रसस्पर्धकानामुदयो न सर्वघातिना, ततः सदैव तासामौदयिकक्षायोपशमिको, भावौ सम्मिश्री प्राप्येते, न केवल औदयिक इति उक्तं पञ्चसमहमूलटीकायाम् । एतच्च तासां सर्वधातिरसस्पर्धकानि येन तेनाध्यवसायेन देशघातीनि कर्तुं शक्यन्ते इत्यभ्युपगमे सति उपपद्यते, अन्यथा बन्धोपनीतानां मतिज्ञानावरणादिदेशघातिरसस्पर्धकानामनिवृत्ति- बादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेष्वेव सम्भवासदर्वाग् मतिज्ञानाद्यभावप्रसङ्गः, तदभावे च तद्बललभ्यतदवस्थालामानु- पपत्तिरित्यन्योऽन्याश्रयापातेन मतिज्ञानादीनां मूलत एवाभावप्रसङ्गात् । एवं मतिश्रुताज्ञानाचक्षुर्दर्शनादीनामपि क्षायो- पशमिकत्वेन भणनात्सर्वघातिरसस्पर्धकोदये तदलाभादेशघातिरसस्पर्धकानां चार्वागवन्धादध्यवसायमात्रेण सर्वघातिनो देशघातित्वपरिणामानभ्युपगमे सर्वजीवानां तल्लाभानुपपत्तिरिति भावनीयम् । ननु यदि येन तेनाध्यवसायेनोक्तरसस्पर्ध- कानां सर्वघातिनां देशघतितया परिणामस्तदाग्दिशायां तद्वन्ध एव किं प्रयोजनमिति चेत्, तरिक प्रयोजनक्षतिभिया सा- मग्री कार्य नायतीति वक्तुमध्यवसितोऽसि ? । एवं हि पूर्णे प्रयोजने दृढदण्डनुनं चक्रं न प्राम्येत, तस्मात्प्रकृते हेतुस- माजादेव सर्वघातिरसस्पर्धकबन्धौपयिकाध्यवसायेन तद्वन्धे तत्चदध्यवसायेन सर्वदा तद्देशघातित्वपरिणामे च बाधकामा- वः । तदेवं ज्ञानावरगदर्शनावरणान्तरायाणां विपाकोदयेऽपि क्षयोपशमोऽविरुद्ध इति स्थितम् । मोहनीयस्य तु मिथ्या- क्षयोपशम- प्रक्रियायां चमत्यावर- रणादीनां सर्वघातिर- सस्पर्धकान्य- पि देशघाति- तयैवोपभु- त ज्यन्ते तत्र च परकृता- रेका तत्परि- हारश्च ॥

श्रीज्ञान-
बिन्दु-
प्रकरणम् ॥
11 ९०॥
EARSHAIN
त्वानन्तानुवन्ध्यादिप्रकृतीनां प्रदेशोदये क्षायोपशमिको भावोऽविरुडो, न विपाकोदये, तासां सर्वघातिनीत्वेन तद्रसस्पर्ध-
कस्य तथाविधाध्यवसायेनापि देशघातितया परिणमयितुमशक्यत्वाद्, रसस्य देशघातितया परिणामे तादात्म्येन देशघातिन्या
हेतुत्वकल्पनात् । विपाकोदयविष्कम्भणं तु तासु सर्वधातिरसस्पर्धकानां क्षायोपशमिकसम्यक्त्वादिलब्ध्यभिधायकसिद्धान्त-
बलेन क्षयोपशमान्यथानुपपत्त्यैव तथाविधाध्यवसायेन कल्पनीयम् । केवलज्ञानकेवलदर्शनावरणयोस्तु विपाकोदयविष्कम्भाऽ-
योग्यत्वे स्वभाव एव शरणमिति प्रानः। हेत्वभावादेव नदभावस्तद्धेतुत्वेन कल्प्यमानेऽध्यवसाये तत्क्षयहेतुत्वकल्पनाया
एवौचित्यादिति तु युक्तं, तस्मान्मिथ्यात्वादिप्रकृतीनां विपाकोदये न क्षयोपशमसम्भवः, किं तु प्रदेशोदये । न च सर्वघाति.
रसस्पर्धकप्रदेशा अपि सर्वस्वधात्यगुणधातनस्वभावा इति तत्प्रदेशोदयेऽपि कथं क्षायोपशामिकभावसम्भव इति वाच्यम्,
तेषां सर्वघातिरसस्पर्धकप्रदेशानामध्यवसायविशेषेण मनाग्मन्दानुभावीकृतविरलवेधमानदेशेषातिरसस्पर्धकेवन्तःप्रवेशितानां
यथास्थितस्वरलप्रकटनासमर्थत्वात् । मिथ्यात्वाद्यद्वादशकषायरहितानां शेषमोहनीयप्रकृतीनां तु प्रदेशोदये विपाकोदये
वा क्षयोपशमोऽविरुद्धम् तासां देशघातिनीत्वात, तदीयसवेधातिरसस्य देशघातित्वपरिणामे हेतुश्चारित्रानुगतोऽध्यवसायविशेष
एवं द्रष्टव्यः, परं ताः प्रकृतयोऽध्रुवोदया इति तद्विपाकोदयाभावे क्षायोपशमिके भावे विजृम्ममाणे प्रदेशोदयवत्योऽपि न ता मना-
गपि देशघातिन्यः । विपाकोदये तु वर्तमाने क्षायोपशमिकभावसम्भवे मनाग्मालिन्यकारित्वादेशघातिन्यस्ता भवन्तीति सक्षेपः॥
विस्तरार्थिना तु मत्कृतकर्मप्रकृतिनिवरणादिविशेषग्रन्था अवलोकनीयाः। उता क्षयोपशमप्रक्रिया॥ इत्थं च सर्ववा-
तिरसस्पर्धकवन्मतिज्ञानावरणादिक्षयोपशमजनितं मतिश्रुतावधिमनःपर्यायभेदाचतुर्विधं थायोपचमिकं ज्ञानं,, पञ्चमं च धायिक
मोहनीयप्र-
कृतिषु क्ष-
योपशमव्य-
वस्थोपपा-
दनं क्षयोप-
पशमप्रक्रि
योपसंहा-
रश्च॥ चतु-
विधं ज्ञानं
क्षायोपश-
मिकं पंचम
च क्षायिक
मिति नि-
टकन च ॥
॥ ९०॥

मतिज्ञानल- क्षणोपदर्शनं तत्र श्रुतानुः सारित्वं ल- क्षितं श्रुत- केवलज्ञानमिति पञ्च प्रकारा ज्ञानस्य॥ तत्र मतिज्ञानत्वं श्रुताननुसार्यनतिशयितज्ञानत्वं, अवग्रहादिक्रमवदुपयोगजन्यज्ञानत्वं वा, अवध्यादिकमतिशयितमेव, श्रुतं तु श्रुतानुसायैवेति न तयोरतिव्याप्तिः । श्रुतानुसारित्वं च धारणात्मकपदपदार्थसम्बन्धप्रतिस- न्धानजन्यज्ञानत्वं, तेन न सविकल्पकज्ञानसामग्रीमात्रप्रयोज्यपदविषयताशालिनीहापायधारणात्मके मतिज्ञानेच्याप्तिः। ईहादि- मतिज्ञानभेदस्य श्रुतज्ञानस्य च साक्षरत्वाविशेषेऽप्ययं घट इत्यपायोत्तरमयं घटनामको न वेति संशयादर्शनात, तवनानोऽप्य- पायेन ग्रहणात्, तद्धारणोपयोगे 'इदं पदमस्य वाचकं, अयमर्थ एतत्पदस्य वाच्य' इति पदपदार्थसम्बन्धग्रहस्यापि ध्रौव्येण तज्ज- नितश्रुतज्ञानस्यैव श्रुतानुसारित्वव्यवस्थितेः । अत एव धारणात्वेन श्रुतहेतुत्वात् "मइपुर्व सुअं" इत्यनेन श्रुतत्वावच्छेदेन मतिपूर्वत्वविधिः, “न मई सुअपुब्बिया" इत्यनेन च मतित्वसामानाधिकरण्येन श्रुतपूर्वत्वनिषेधोभिहितः सङ्गच्छते । कथं तर्हि श्रुतनिश्रिताश्रुतनिश्रितभेदेन मतिज्ञानद्वैविध्याभिधानमिति चेद्, उच्यते-स्वसमानाकारश्रुतज्ञानाहितवासनाप्रबोधसमानकालानत्वे सति श्रुतोपयोगाभावकालीनं श्रुतनिश्रितमवग्रहादिचतुर्भेद, उक्तवासनाप्रबोधो धारणादायायोपयुज्यते, श्रुतोपयोगाभावश्च मति- ज्ञानसामग्रीसम्पादनाय, उक्तवासनाप्रबोधकाले श्रुतज्ञानोपयोगबलाच्छूतज्ञानस्यैवापत्तेः, मतिज्ञानसामग्र्याः श्रुतज्ञानोत्पत्तिप्रति- बन्धकत्वेऽपि शाब्देच्छास्थानीयस्य तस्योत्तेजकत्वात्। मतिज्ञानजन्यस्मरणस्य मतिज्ञानत्ववव श्रुतज्ञानजन्यस्मरणमा च श्रुतज्ञान- मध्य एवं परिगणनीयम् । उक्तवासनाप्रबोधासमानकालीनं च मतिज्ञानमौत्पत्तिक्यादिचतुर्भेदम श्रुतनिश्रितमित्यभिप्रायेण द्विधा- विभागे दोषाभावः । तदिदमाह महाभाष्यकार:-"पुचि सुअपरिकम्मिय-मइस्स जं संपर्य सुआईअं॥ तं निस्मियमियरं पुण, आणिस्सिअंमइचउकं तं ॥ १६९॥ (ज्ञानार्णव पत्र २५) इति"। अपूर्वचैत्रादिव्यक्तियुद्धौ त्वौत्पत्तिकीत्वमेवाश्रयणीयम् । १६ निश्रिताड- श्रुतनिश्रित- भेदेन मति- द्वैविध्योप- पादनञ्च॥ + +

भाधान-
RRCॐ
प्रकरणम्॥
ऐन्द्रियकश्रुतज्ञानसामान्ये धारणात्वेन तदिन्द्रियजन्यश्रुते तदिन्द्रियजन्यधारणात्वेनैव वा हेतुत्वात् । प्रागनुपलब्धेऽर्थे
श्रुतज्ञानाहितवासनाप्रयोधाभावेन श्रुतनिश्रितज्ञानासम्भवात, धारणायाः श्रुतहेतुत्व एव च मतिश्रुतयोलब्धियोगपद्येऽप्युपयोगक्रमः
सङ्गच्छते, प्रागुपलब्धार्थस्य चोपलम्भे धारणाहितश्रुतज्ञानाहितवासनाप्रबोधान्वयाच्छुतनिश्रितत्वमावश्यकम् , धारणादिरहिताना-
मेकेन्द्रियादीनां त्वाहारादिसंज्ञान्यथानुपपत्त्यान्तर्जल्पाकाराविवक्षितार्थवाचकं शब्दसंस्पृष्टार्थज्ञानरूपं श्रुतज्ञानं क्षयोपशममात्रजनितं
जात्यन्तरमेव, आसोक्तस्य शब्दस्योहाख्यप्रमाणेन पदपदार्थशक्तिग्रहानन्तरमाकाहाज्ञानादिसाचिव्येन जायमानं तु ज्ञानं स्पष्टधा-
रणाप्रायमेव, शाब्दबोधपरिकरीभूतश्च यावान् प्रमाणान्तरोत्थापितोऽपि बोधः सोऽपि सर्वः श्रुतमेव । अत एव " पदार्थवाक्यार्थ-
महावाक्याथैदम्पर्यार्थभेदेन चतुर्विधवाक्यार्थज्ञाने ऐदम्पर्थिनिश्चयपर्यन्तं श्रुतोपयोगव्यापारात् सर्वत्र श्रुतत्वमेव" इत्यभियुक्तै-
रुक्तमुपदेशपदावो। तत्र "सव्वे पाणा सव्वे भूआ सव्वे जीवा सव्वे सत्ता णहंतव्वा" इत्यादौ यथाश्रुतमात्रप्रतीतिः पदार्थबोधः ।
एवं सति हिंसात्वावच्छेदेनानिष्टसाधनत्वप्रतीतेराहारविहारदेवार्चनादिकमपि प्राणोपघातहेतुत्वेन हिंसारूपत्वादकर्तव्यं स्यादिति
वाक्यार्थचोधः । यतनया क्रियमाणा आहारविहारादिक्रिया न पापसाधनानि, चित्तशुद्धिफलत्वात, अयतनया क्रियमाणं तु सर्व
हिंसान्तर्भावात् पापसाधनमेवेति महावाक्यार्थबोधः । 'आज्ञैव धर्मे सार' इत्यपवादस्थलेऽपि गीतार्थयतनाकृतयोगिकारणप-
दनिषिद्धस्याप्यदुष्टत्वं, विहितक्रियामात्रे च स्वरूपहिंसासम्भवेऽप्यनुबन्धर्हिसाया अभावान दोपलेशस्याप्यवकाश इत्यैदम्पर्यार्थ-
बोधः । एतेषु सर्वेष्वेकदीर्घोपयोगव्यापाराम श्रुतान्यज्ञानशङ्का, ऐदम्पर्यबोधलक्षणफलव्याप्यतयैव श्रुतस्य लोकोत्तरप्रामाण्यव्यव-
स्थितेर्वाक्येऽपि क्रमिकतावद्बोधजनके तथात्वव्युत्पत्तिप्रतिसन्धानवति व्युत्पचिमति पुरुषे न विरम्यव्यापारादिदूषणावकाशः।
शाब्दबोध.
परिकरीभू-
तबोधमा-
त्रस्य श्रुतत्वं
पदार्थबोधा-
दिचतुर्वि-
धवाक्यार्थ-
बोधस्य श्र.
तत्वमुपपा-
दितम् ।
+SHRI
E-EXTE
॥९१॥

- सव्वे पाणा सव्वे भूआ- S सोऽयमिषोरिव दीर्घदीर्घतरो व्यापारो, 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ' इति नयाश्रयणात् । एतेन 'न हिंस्यादित्यादिनिषधविधौ विशेषविधिबाधपर्यालोचनयाजुमितौ व्यापकतानवच्छेदकेनापि विशेषरूपेण व्यापकस्येव शाब्दबोधे तत्तद्विहितेतरहिंसात्वेन वृत्त्यनवच्छेदकरूपेणापि निषेध्यस्य प्रवेश' इति निरस्तम् । उक्तबाधपर्यालोचनस्य प्रकृतोपयोगान्तर्भावस्मदुक्तप्रकारस्यैव साम्राज्यात, तदनन्तर्भावे च तस्य सामान्यवाक्यार्थबोधेन सह मिलनाभावेन विशेषपर्यवसायकत्वासम्भवात् । अव्यवहितद्वित्र- क्षणमध्ये एकविशेषवाधप्रतिसन्धानमेव सामान्यवाक्यार्थस्य तदितरविशेषपर्यवसायकमिति कल्पनायां न दोष इति चेत्, न, द्विवक्षणाननुगमात्, पटुसंस्कारस्य पश्चषक्षणव्यवधानेऽपि फलोत्पत्तेश्य, संस्कारपाटवस्यैवानुगतस्यानुसरणौचित्यात्, तच्च गृहीतेऽर्थे मतिश्रुतसाधारणविचारणोपयोग एवोपयुज्यते, अत एव सामान्यनिषेधज्ञाने विरोधसम्बन्धेन विशेषविधिस्मृतावपि विचारणया तदितरविशेषपर्यवसानम् । अपि च 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यत्र यथा परेषां प्रथमं स्वर्गत्वसामानाधिकरण्येनैव यागकार्यताग्रहोऽनन्तरं चानुगतानतिप्रसक्तकार्यगतजातिविशेषकल्पनं, तथा प्रकृतेऽपि हिंसात्वसामानाधिकरण्येन पापजनकत्व- बोधेऽनन्तरं तद्गतहेतुतावच्छेदकानुगतानतिप्रसक्तरूपकल्पने किं बाधकं, सर्वशब्दवलेन हिंसासामान्योपस्थितावपि तद्गतहेतुस्व- रूपानुबन्धकृतविशेषस्य कल्पनीयत्वात् । सैव च कल्पना वाक्यार्थबोधात्मिकेति न तदुच्छेदः॥ किञ्च पदार्थबोधाद्धिसासामान्येऽनिष्टसाधनत्वग्रहे आहारविहारादिक्रियास्वनिष्टसाधनत्वव्याप्यहिंसात्वारोपेणानिष्टसाधनत्वा- रोपलक्षणतर्कात्मक एव वाक्यार्थबोधः, तस्य युक्त्या विपर्ययपर्यवसानात्मको महावाक्यार्थबोधः, ततो हेतुस्वरूपानुबन्ध- त्रयविषय एव हिंसापदार्थ इत्यैदम्पर्यार्थबोधः, इत्येते बोधा अनुभवसिद्धत्वादेव दुर्वाराः । श्रुतज्ञानमूलोहादेश्व श्रुतत्वं PRE ण हंतव्वा इ. त्यादौपदार्थ- बोधादिच- तुर्विधवा- क्यार्थबोध- स्योपपाद. नम्। RSSION R

श्रुतज्ञानमू-
लोहादेः श्रु-
भीमान-
बिन्दुः
प्रकरणम्॥
॥ ९२॥
मतिज्ञानमूलोहादेर्मतिज्ञानत्यवदेवाभ्युपेयम् । अत एव श्रुतज्ञानाभ्यन्तरीभूतमतिविशेषैरेव षट्स्थानपतितत्वं चतुर्दशपूर्वविदा-
मप्याचक्षते सम्प्रदायवृद्धाः। तथा चोक्तं कल्पभाष्ये-"अरकरलंभेण समा, ऊणहिया हुंति मइविसेसेहिं । ते वि य
मईविसेसा, सुअनाणभंतरे जाण ॥१॥" (विशे. गा. १४३ ज्ञानार्ण प०१८) यदि च सामान्यश्रुतज्ञानस्य विशेषपर्यवसायकत्व-
मेव मतिज्ञानस्य श्रुतज्ञानाभ्यन्तरीभूतत्वमुपयोगविच्छेदेऽप्येकोपयोगव्यवहारश्च फलप्राधान्यादेवेति विभाव्यते, तदा पदार्थ
बोधयित्वा विरतं वाक्यं वाक्यार्थबोधादिरूपविचारसहकृतमावृत्त्या विशेष बोधयदैदम्पर्यार्थकत्वव्यपदेशं लभत इति मन्तव्यम्
परं शब्दसंसृष्टार्थग्रहणव्यापृतत्वे पदपदार्थसम्बन्धग्राहकोहादिवत्तस्य कथं न श्रुतत्वम् ?, "शब्दसंसृष्टार्थग्रहणहेतुरुपलब्धिविशेषः
(त्रिकाल साधारणसमानपरिणामः श्रुतम् ” इति नन्दीवृत्त्यादी दर्शनात् ॥ [ नन्दीवृत्तावयं पूर्णपाठ:-तथा श्राणं श्रुत
वाच्यवाचकभावपुरस्सरीकारेण शब्दसंस्पृष्टार्थग्रहणहेतुरुपलब्धिविशेषः, 'एवमाकारं वस्तु जलधारणाद्यर्थक्रियासमर्थ घट.
शब्दवाच्यम् ' इत्यादिरूपतया प्रधानीकृतत्रिकालसाधारणसमानपरिणामः शब्दार्थपर्यालोचनानुसारीन्द्रियमनोनिमित्तोऽ-
वगमविशेष इत्यर्थः] " साइंदिओवलद्धी, होइ सुझं सेसयं तु मइनाणं ॥ मोत्तूर्ण व्वसु, अस्करलंभो अ सेसेसु ॥११७॥"
(ज्ञानार्ण०प०१२)इति पूर्वगतगाथायामप्ययमेव स्वरसो लभ्यते। तथा चास्या अर्थ:-श्रोत्रेन्द्रियेणोपलब्धिरेव श्रुतमित्यवधारणं,
न तु श्रोत्रेन्द्रियेणोपलब्धिः श्रुतमेति । अवग्रोहादिरूपायाः श्रोत्रेन्द्रियोपलग्धेरपि मतिज्ञानरूपत्वात् । याष्यकार:-
"सोइंदिओवलद्धी,चैव सुअंन उतई सुअंचेव । साइंदिओवलद्धी,वि काई जम्हा मइन्नाणं॥१२२॥"(ज्ञाना०प०१३) शेषं तु यच्चक्षुरा-
दीन्द्रियोपलब्धिरूपं तन्मतिज्ञानं, तुशब्दोऽनुक्तसमुच्चयार्थः, स चावग्रहेहादिरूपां श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिमपि समुचिनोति, यभा-
तत्वं, ततः
श्रुतज्ञानाम्य-
न्तरीभूत-
मतिविशेष-
रेव पूर्व वि-
दषट्स्था-
नपतितत्वं
तत्र संवादो-
,
AREENA
पदर्शनञ्च ॥
॥ ९२॥

श्रोत्रेन्द्रियों- पलब्धेः श्रु- तत्वं द्रव्य- श्रुतं मुक्ता- शेषेन्द्रिय पलब्धेर्मति- त्वमुपपादि- ष्यकार:-"तु समुच्चयत्रयणाओ, काई सोइंदिओवलद्धी वि । मई एवं सइ सोउ-ग्गहादिओ होति मईभेया॥१२३॥" (ज्ञानाना०प० १३) अपवादमाह-मुक्त्वा द्रव्यश्रुतं पुस्तकपत्रादिन्यस्ताक्षररूपं,तदाहितायाः शब्दार्थपोलोचनात्मिकायाः शेषेन्द्रियोपलब्धेरपि श्रुतत्वात् । अक्षरलाभश्च यः शेषेवपीन्द्रियेषु शब्दार्थपर्यालोचनात्मका, न तु कालः, तस्येहेहादिरूपलात्, तमपि मुक्त्वेति सोपस्कार व्याख्येयम् । नन्वेवं शेपेन्द्रियेष्वप्यक्षरलाभस्य श्रुतत्वोक्तेः श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव श्रुतमिति प्रतिज्ञा विशीर्यंत, मैवम्, तस्यापि श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिकल्पत्वादिति बहवः। श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदेन श्रोत्रेन्द्रियजन्यव्यञ्जनाक्षरज्ञानाहिता शाब्दी बुद्धिः, द्रव्यश्रुत- पदेन च चक्षुरादीन्द्रियजन्यसंज्ञाक्षरज्ञानाहिता सा, अक्षरलाभपदेन च तदतिरिक्तश्रुतज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमजनिता बुद्धिगृह्यत इति सर्वसाधारणो धारणाप्रायज्ञानवृत्तिः शब्दसंसृष्टार्थाकारविशेष एवानुगतलक्षणम् । त्रिविधाक्षरश्रुताभिधानप्रस्तावेऽपि संज्ञाव्यजनयोर्द्रव्यश्रुतत्वेन, लब्धिपदस्य चोपयोगार्थत्वेन व्याख्यानात् । तत्र चानुगतमुक्तमेव लक्षणमिति । इह गोवृषन्यायेन त्रिविधोपलब्धिरूपभावश्रुतग्रहणमिति त्वलाकमाभाति । अवग्रहादिक्रमवदुपयोगत्वेनापि च मतिज्ञान एव जनकता,न श्रुतज्ञाने तत्र शाब्दोपयोगलेनैव हेतुत्वात, मतिज्ञाने च-"नानवगृहीतमीह्यते, नानीहितमपेयते, नानपेतं च धार्यते,"इति क्रमनिवन्धनमन्व- यव्यतिरेकनियममामनन्ति मनीषिणः। तत्रावग्रहस्येहायां धर्मिज्ञानत्वेन, तदवान्तरधर्माकारेहायां तत्सामान्यज्ञानसेन वा । इहा- याश्च तद्धर्मप्रकारतानिरूपिततद्धर्मिनिष्ठसिद्धत्वाख्यविषयतावदपायत्वावच्छिन्ने तद्धर्मप्रकारतानिरूपितत दर्मिनिष्ठसाध्यत्वाख्यविष- यतावदीहात्वेन,घटाकारावच्छिन्नसिद्धत्वाख्यविषयतावदपायत्वावच्छिन्ने तादृशसाध्यत्वाख्यविषयतावदीहात्वन वा,धारणायां चा- पायस्य समानप्रकारकानुभवत्वेन,विशिष्टभेदे समानविषयकानुभवत्वेन वा कार्यकारणभावः। तत्रावग्रहो द्विविधो व्यञ्जनावग्रहार्थावग्र- तम्, मतिज्ञा- RELEASE ने अवग्रहा- दीनां का. र्थकारण- भावोप- दर्शनम् ।

613 मोबान- विन्दु- प्रकरणम्॥ ॥९३ ॥ हभेदात्। तत्र व्यञ्जनेन शब्दादिपरिणतद्रव्यनिकुरम्बेण व्यञ्जनस्य श्रोत्रेन्द्रियादेरवग्रहः सम्बन्धो व्यञ्जनावग्रहा, स च मल्लकप्रतिबोध- कदृष्टान्ताभ्यां सूत्रोक्ताभ्यामसङ्ख्ययसमयभावी । तस्यामप्यवस्थायामव्यक्ता ज्ञानमात्रा, प्रथमसमयेऽशेनाभवतश्चरमसमये भवनान्यथानुपपत्त्या भाष्यकृता प्रतिपादिता । युक्तं चैतत्, निश्चयतोऽविकलकारणस्यैव कार्योत्पत्तिव्याप्यत्वाद्, अविकलं च कारणं ज्ञाने उपयोगेन्द्रियमेव, तच्च व्यञ्जनावग्रहकाले लब्धसत्ताकं कथं न स्वकार्य ज्ञानं जनयेदिति, अयमुपयोगस्य कारणांशः । ननु व्यञ्जनावग्रहः प्राप्यकारिणामेवेन्द्रियाणामुक्तो नाप्राप्यकारिणोश्चक्षुर्मनसोरिति तत्र कः कारणांशो वाच्यः ?, यद्यर्थावग्रहस्तहि सर्वत्र स एवास्त्विति चेत्, न, तत्राप्यर्थावग्रहात्प्राग् लब्धीन्द्रियस्य ग्रहणोन्मुखपरिणाम एवोपयोगस्य कारणांश इत्यभ्युपगमात् । न च सर्वत्रैकस्यैवाश्रयणमिति युक्तम्, इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्वव्यवस्थाप्रयुक्तस्य इस्वदीर्घ- कारणांशभेदस्यागमयुक्त्युपपन्नत्वेन प्रतिबन्दिपर्यनुयोगानवकाशात् । अर्थावग्रहः सामान्यमात्रग्रहः, यतः किञ्चिदृष्टं मयान तु परिभावितमिति व्यवहार, स चैकसामयिकः, तत ईहोपयोग आन्तीहर्तिकः प्रवर्तते, स च सद्भूताऽसद्भूतविशेषोपादानत्या- गाभिमुखबहुविचारणात्मकः पर्यन्ते तत्तत्प्रकारेण धर्मिणि साध्यत्वाख्यविषयताफलवान् भवति । अत एव "फलप्रवृत्तौ ज्ञानप्रामा- ण्यसंशयवत्करणप्रवृत्तावपीन्द्रियादिगतगुणदोषसंशयेन विषयसंशयादिन्द्रियसाद्गुण्यविचारणमपीहयैव जन्यते, केवलमभ्यास- दशायां तज्झटितिजायमानत्वात् कालसौक्ष्म्येण नोपलक्ष्यते, अनभ्यासदशायां तु वैपरीत्येन स्फुटमुपलक्ष्यत" इति मलयगिरि- प्रभृतयो वदन्ति । एवं सति स्वजन्यापाये सर्वत्रार्थयाथात्म्यनिश्चयस्येहयैव जन्यमानत्वात् “तदुभयमुत्पत्तौ परत एव, ज्ञप्तौ तु स्वतः परतश्च" इत्याकर (प.१-२०) सूत्रं विरुध्येत,तदुभयं प्रामाण्यमप्रामाण्यं च,परत एवेति कारणगतगुणदोषापेक्षयेत्यर्थः,स्वतः व्यअनार्थी- वग्रहभेदे- नावग्रहरे- विध्यं व्य- जनस्वरू. पद्वैवि ध्यं- व्यअनावग्र- हनिरूपण- श्चततोऽर्था- वग्रहादीनां निरूपणम्। . หมาย ॥ ९३।।

मलयगिरि प्रभृत्यमि- प्रायेण स. परतश्चेति, संवादकबाधक ज्ञानानपेक्षया जायमानत्वं स्वतस्त्वं, तच्चाभ्यासदशायां, केवलक्षयोपशमस्यैव तत्र घ्यापारात् , तदपेक्षया जायमानत्वं च परतस्त्वं, तवानभ्यासदशायां, अयं च विभागो विषयापेक्षया, स्वरूपे तु सर्वत्र स्वत एव प्रामाण्यनिश्चय इत्यक्षरार्थ इति ।" ईहयैव हि सर्वत्र प्रामाण्यनिश्चयाभ्युपगमे किं संवादकप्रत्ययापेक्षया ?, न खल्वेकं गमकमपेक्षितमिति गमकान्तरमप्यपेक्षणीयम् । न चेहाया बहुविधत्वाद्यत्र न करणसाद्गुण्यासाद्गुण्यविचारस्तत्रैवोक्तस्वतस्त्वपरतस्त्वव्यवस्थेति वाच्यम् , ईहायां क्वचिदुक्तविचारव्यभिचारोपगमे आभ्यासिकापायपूर्वहायामनुपलक्ष्यमाणस्यापि तद्विचारस्य नियमकल्पनानु- पपत्तेः । न चोक्तविचार ईहायां प्रमाजनकतावच्छेदको न तु तज्ज्ञप्तिजनकतावच्छेदक इत्यपि युक्तम् , करणगुणादेव प्रमोत्पत्ती तस्यातयात्वात् । न च भाविज्ञानस्यासिद्धत्वादुक्तविचारवत्यापीहया तद्गतप्रामाण्याग्रह इत्यपि साम्प्रतम्, विचारेण करण- साद्गुण्यग्रहे भाविज्ञानप्रामाण्यग्रहस्यापि सम्भृतसामग्रीकत्वादित्यादिविचारणीयम् । ननु भवतां सैद्धान्तिकमते उपयोगे- वग्रहादिवृत्तिचतुष्टयव्याप्यत्वं, एकत्र वस्तुनि प्राधान्येन सामान्यविशेषोभयावगाहित्वपर्याप्त्याधारत्वं वा, तार्किकमते च प्रमेयाव्यभिचारित्वं प्रामाण्यमयोग्यत्वादभ्यासेनापि दुर्ग्रहं, समर्थप्रवृत्त्यनौपयिकत्वेनानुपादेयं च । पौद्गलिकसम्यक्त्ववतां सम्यक्त्वदलिकान्वितोऽपायांशःप्रमाणं, क्षायिकसम्यक्त्ववतां च केवलोऽपायांश इति तत्त्वार्यवृत्त्यादिवचनतात्पर्यपर्यालोचनायां तु सम्यक्त्वसमानाधिकरणापायत्वं ज्ञानस्य प्रामाण्यं पर्यवस्यति,अन्यथाऽननुगमात्,तत्र च विशेषणविशेष्यभावे विनिगमनाविरहः। ज्ञानं प्रमाणमितिवचनं विनिगमकमिति चेत्, तदपि समर्थप्रवृत्त्यौपयिकेन रूपेण विनिगमयेत् न तु विशिष्टापायत्वेनानीदृशेन, 'सम्यक्त्वानुगतत्वेन ज्ञानस्य ज्ञानत्वं, अन्यथा त्वज्ञानत्वं' इति व्यवस्था तु नापायमात्रप्रामाण्यसाक्षिणी, सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिनां पत्रेहयैव- प्रामाण्यनि- श्चयोपगमे रत्नाकरसूत्र- विरोध उप- दर्शितः, जैनाभिमते प्रामाण्या- प्रामाण्य- स्वतस्त्वपर- तस्त्वानैका- न्ते दोषोप- दर्शनम् । RECG - -- भीज्ञान- बिन्दु- प्रकरणम् ॥ ॥ ९४ ॥॥ संशयादीनामपि ज्ञानत्वस्य महाभाष्यकृता परिभाषितत्वात् । न च सम्यक्त्वसाहित्येन ज्ञानस्य रुचिरूपत्वं सम्पद्यते, रुचिरूपं च ज्ञानं प्रमाणमिति सम्यक्त्वविशेषणोपादानं फलादियपि साम्प्रतम् , एतस्य व्यवहारोपयोगित्वेऽपि प्रवृत्त्यनुपयोगत्वात् । न च घटाद्यपायरूपा रुचिरपि सम्यक्त्वमिति व्यवहरन्ति सैद्धान्तिकार, जीवाजीवादिपदार्थनवकविषयकसमूहालम्बनज्ञान- विशेषस्यैव रुचिरूपतयानातत्वात् , केवलं ' सत्संख्यादिमार्गगास्थानस्तन्निर्गयो भावसम्यक्त्वं,' 'सामान्यतस्तु द्रव्यसम्यक्त्व- म्' इति विशेष इति । न च घटाद्यपायेऽपि रुचिरूपत्वमिष्टमेव, सदसद्विशेषणाविशेषणादिना सर्वत्र ज्ञानाज्ञानव्यवस्थाकथनात् , तदेव चप्रामाण्यमप्रत्यूहमिति वाच्यं,अनेकान्तव्यापकत्वादिप्रनिसन्धानाहितवासनावतामेव तादृशयोधसम्भवात् तदन्येषां तु द्रव्यसम्प- क्त्वेनैव ज्ञानसद्भावव्यवस्थितेः । अत एव "चरणकरणप्रधानानामपि खसमयपरसमयमुक्तव्यापाराणां द्रव्यसम्यक्त्वेन चारित्र- व्यवस्थितावपि भावसम्यक्त्वाभावः" प्रतिपादितः सम्मतौ महावादिना। द्रव्यसम्यक्त्वं च, "तदेव सत्यं निःशंकं यजिनेन्द्रः प्रवेदितमिति"ज्ञानाहितवासनारूपं,माषतुषाद्यनुरोधाद् 'गुरुपारतंत्र्यरूपं वा' इत्यन्यदेतत् । तस्मान्नै प्रामाण्यप्रकाराःप्रवृत्यौप- योगिकाः । तद्वति तत्प्रकारकत्वरूपं ज्ञानप्रामाण्यं तु प्रवृत्यौपयिकमवशिष्यते, तस्य च स्वतो ग्राह्यत्वमेवोचितम् । न्यायनयेऽपि ज्ञाने पुरोवर्तिविशेष्यताकत्वस्य रजतत्वादिप्रकारकत्वस्य चानुव्यवसायग्राह्यतायामविवादात् , इमं रजतलेन जानामीति प्रत्य- यात् , तत्र विशेष्यत्वप्रकारत्वयोरेव द्वितीयातृतीयार्थत्वात् , तत्र पुरोवर्ति इदन्त्वेन रजतत्वादिनापि चोपनयवशाद्भासताम् । न चेदन्त्ववैशिष्टयं पुरोवर्तिनि न भासत इति वाच्यम् , विशेष्यतायां पुरोवर्तिनः स्वरूपतो मानानुपपत्तेः तादृशविशेषणज्ञानाभावात् , अन्यथा प्रमेयत्वादिना रजतादिज्ञानेऽपि तथाज्ञानापत्तेः, जात्यतिरिक्तस्य किश्चिद्धर्मप्रकारेणैव भाननियमाच । किश्च प्रामाण्य - उपयोगेऽत्र- ग्रहादिवृत्ति चतुष्टयव्या- प्यत्वादि- लक्षणं सम्य- कत्वसमाना- धिकरणापा- यत्वादिलक्ष- णं च प्रामा- ण्यं न प्र- त्यौपयिक तादृशं च त- द्वति तत्प्रका- रकत्वं स्व- तोग्राह्यमेवे- ति प्रश्नः। ॥१४॥ SCREE K प्रवृत्त्यौप- यिकनिरुक्त- प्रामाण्यस्य CALENCE ज्ञप्तौं स्वत- स्त्वमेवेति प्रश्ननि- गमनम् ।। संशयोत्तरमिदं रजतं न वेत्येव संशयो, न तु रजतमिदं न वा, द्रव्यं रजतं न वेत्यादिरूप इति, यद्विशेष्यकयत्प्रकारकज्ञानत्वावच्छेदेन प्रामाण्यसंशयस्तद्धर्मविशिष्ट तत्प्रकारकसंशय इति नियमादिदन्त्वेन धर्मिभानमावश्यकं,इदन्त्वरजतत्वादिना पुरोवर्तिन उपनयसवाच्च तथाभानमनुव्यवसाये दुरिमिति किमपरमवशिष्यते प्रामाण्ये ज्ञातुम् । न चैकसम्बन्धेन तद्वति सम्बन्धान्तरेण तत्प्रकारकज्ञान- व्यावृत्तं, तेन सम्वन्धेन तत्प्रकारकत्वमेव प्रामाण्यं, तच्च दुग्रहमिति वाच्यं, व्यवसाये येन सम्बन्धेन रजतत्वादिकं प्रकारस्तेन तद्वतोऽनुव्यवसाये भानात् , संसर्गस्य तु तत्वेनैव भानात् । तत्प्रकारकत्वं च वस्तुगत्या तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रकारताकत्वमिति प्रकारताकत्वकुक्षिप्रवेशेनैव वा तद्भानम् । अत एवेदं रजतमिति तादात्म्यारोपव्यावृत्तये मुख्यविशेष्यता प्रामाण्ये निवेशनीयेति मुख्यत्वस्य दुहत्वमित्युक्तेरप्यनवकाशो, वस्तुगत्या मुख्यविशेष्यताया एव निवेशात् , तादात्म्यारोपे आरोप्यांशे समवायेन प्रामा- ण्यसत्वेऽप्यक्षतेश्च । एतेन 'तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकत्वमात्रं न प्रामाण्यं, 'इमे रङ्गरजते' 'नेमे रङ्गरजते' इति विपरीतचतुष्क- भ्रमसाधारण्यात् , किं तु तद्वद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नतत्प्रकारकत्वं, तच्च प्रथमानुव्यवसाये दुर्ग्रहम्' इत्यपि निरस्तम् ॥ वस्तुगत्या तादृशप्रकारताकत्वस्य सुग्रहत्वादेव तद्हेऽनुव्यवसायसामग्रयाऽसामर्थ्यस्य व्यवसायप्रतिबन्धकत्वस्य वा कल्प- नमभिनिवेशेन स्वबुद्धिविडम्बनामात्रं,तथाकल्पनायामप्रामाणिकगौरवात् । एतेन 'विधेयतवाऽनुव्यवसाये स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यभाने व्यवसायप्रतिबन्धकत्वकल्पनापि' परास्ता । तत्र तद्वद्विशेष्यकतोपस्थितितदभाववाद्विशेष्यकत्वाभावोपस्थित्यादीनामुत्तेजकत्वा- दिकल्पने महागौरवात् । यदि च विशेष्यत्वादिकमनुपस्थितं न प्रकारः, तदा विशेष्यतासम्बन्धेन रजतादिमचे सति प्रकारि- तया रजतत्वादिमत्त्वमेव प्रामाण्यमस्तु । एतज्ज्ञानमेव लाघवात्प्रवृत्यौपयिकं । तस्माज्ज्ञप्तौ प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वमेव युक्तम् । स

मवान-
अप्रामाण्य-
परमम्
॥९५॥
स्य तु परतो
ग्राह्यत्वमे-
ISRAER
वेति प्रामा-
ण्यामामा-
अप्रामाण्यं तु नानुव्यवसायग्राह्य, रजतत्वाभाववत्वेन पुरोवर्तिनोऽग्रहणे तथोपनीतभानायोगात, रजतत्वादिमत्तया शुक्त्यादिधी-
विशेष्यकत्वं रजतत्वप्रकारकत्वं च तत्र गृह्यते, अत एव, ' अप्रमापि प्रमेत्येव गृह्यते' इति चिन्तामणिग्रन्थः 'प्रमेतीत्येव
व्याख्यातस्तांत्रिकैः इत्यप्रामाण्यस्य परतस्त्वमेव । न च प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वे ज्ञानप्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः, ज्ञानग्रहे
प्रामाण्यग्रहात्तदग्रहे धर्मिग्रहाभावादिति वाच्यं, दोषात् तत्संशयाद्धमीन्द्रियसन्निकर्षस्यैव संशयहेतुत्वात् । प्राक् प्रामाण्याभावो-
पस्थितौ धर्मिज्ञानात्मक एव वाऽस्तु प्रामाण्यसंशय इति स्वतस्त्वपरतस्त्वानेकान्तः प्रामाण्याप्रामाण्ययोर्जेनानां न युक्त इति
चेद्, अत्र ब्रूमः। रजतत्ववद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नरजतत्वप्रकारताकत्वरूपस्य रजतज्ञानप्रामाण्यस्य वस्तुतोऽनुव्यवसायेन ग्रहणात्,
स्वतस्त्वाभ्युपगमेऽप्रामाण्यस्यापि स्वतस्त्वापाता, रजतभ्रमानुव्यवसायेनापि वस्तुतो रजतत्वाभाववद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नरजतत्व-
प्रकारताकत्वस्यैव ग्रहात्, तत्र चास्माभिरनेकान्तवादिभिरिष्टापत्तिः कर्तुं शक्यते, द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षस्य योग्यद्रव्यप्रत्यक्षीकर-
णवेलायां तद्गतानां योग्यायोग्यानां धर्माणां सर्वेषामभ्युपगमात्, 'स्वपरपर्यायापेक्षयाऽनन्तधर्मात्मकं तत्त्वम् ' इति वासनावत
एकज्ञत्वे सर्वज्ञत्वध्रौव्याभ्युपगमाच, (आचाराङ्ग) "जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ, जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ति" पारम-
र्षस्येत्थमेव स्वारस्यव्याख्यानात् । अवोचाम चाध्यात्मसारप्रकरणे-(प्रवन्ध २) "आससिपाटवाभ्यास-स्वकार्यादिभिरा-
श्रयन् ॥ पर्यायमेकमप्यर्थ, वेत्ति भावाद् बुधोऽखिलम् ।वि. भेदप्र. ३०॥” इति । न चेयं रीतिरेकान्तवादिनो भवत इति प्रतीच्छ
प्रतिबन्दिदण्डप्रहारम् । ननु रजतत्ववद्विशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारत्वयोरेव ज्ञानोपरि भानं, अवच्छिमत्वं तु तयोरेव मिथः संसर्गः,
एकत्र भासमानयोयोर्धमयोः परस्परमपि सामानाधिकरण्येनैवावच्छिन्नत्वेनाप्यन्वयसम्भवादित्येवं प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वं,
AN
ण्ययोः स्व-
-
VERS
तस्त्वपर-
तस्त्यानेका-
न्तो जैनानां
न युक्त इति
प्रश्नपति-
विधानम् ॥
॥ ९५॥

RESS प्रामाण्यस्य ज्ञप्ती स्वत- स्त्वमेवा- प्रामाण्य- स्य परतस्त्व- मेवेति मुरा- अप्रामाण्यस्य तु न तथात्वं, रजतत्वाभावस्य व्यवसायेऽस्फुरणेन तद्विशेष्यकत्वस्य ग्रहीतुमशक्यत्वात्, ज्ञानग्राहकसामन्या- स्तूपस्थितविशेष्यत्वादिग्राहकत्व एव व्यापारादित्येवमदोष इति चेत्, न, प्रामाण्यशरीरघटकस्यावच्छिन्नत्वस्य संसर्गतया भानोपगमे कात्स्न्येन प्रामाण्यस्य प्रकारत्वासिद्धः, अंशतः प्रकारतया भानं च स्वाश्रयविशेष्यकत्वावच्छिन्नप्रकारतासम्बन्धेन रजतत्वस्य ज्ञानोपरि भानेऽपि सम्भवतीति तावदेव प्रामाण्यं स्याद् ॥ अस्त्वेवं ज्ञानग्राहकसामग्यास्तथाप्रामाण्यग्रह एव सामर्थ्यात, अत एव नाप्रामाण्यस्य स्वतस्त्वमिति चेत्, न, एवमभ्युपगमे अप्रमापि प्रमेतीत्येव गृह्यते इत्यस्य व्याघातात्तत्र रजतत्वस्य ज्ञानो- पर्युक्तसम्बन्धासम्भवात, कम्बुग्रीवादिमानास्ति वाच्यं नास्तीत्यादावन्वयितावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताया इव प्रकृते उक्त- सम्बन्धस्य तत्तदवगाहितानिरूपितावगाहितारूपा विलक्षणैव खण्डशः सांसर्गिकविषयतेति न दोष इति चेत्, न, तत्रापि लक्षणादि- नैव बोधः, उक्तप्रतियोगितायास्तु घटो नास्तीत्यादावेव स्वरूपतः संसर्गत्वं, उक्तं च मित्रैः-"अर्थापत्तौ नेह देवदत्त इत्यत्र प्रतियोगित्वं स्वरूपत एव भासत इत्येवं समर्थनात्" वस्तुतोऽस्माकं सर्वापि विषयता द्रव्यार्थतोऽखण्डा, पर्यायार्थतश्च सखण्डेति सम्पूर्णप्रामाण्यविषयताशालिबोधो न संवादकप्रत्ययं विना, न वा तादृशाप्रामाण्यविषयताकबोधो बाधकप्रत्ययं विना,इत्युभयोरनभ्यासदशायां परतस्त्वमेव, अभ्यासदशायां तु क्षयोपशमविशेषसधीचीनया तादृशतादृशेहया तथा तथोभयग्रहणे स्वतस्त्वमेव, अत एव प्रामाण्यान्तरस्यापि न दुहत्वं, स्वोपयोगापृथग्भूतेहोपनीतप्रकारस्यैवापायेन ग्रहणात्, तादृशी च प्रामा- ण्यविषयता नावग्रहमात्रप्रयोज्यत्वेन लौकिकी, नापि पृथगुपयोगप्रयोज्यत्वेनालौकिकी, किन्तु विलक्षणैवेति न किञ्चिदनुपपन्नम- नन्तधर्मात्मकवस्त्वभ्युपगमे।अत एव 'वस्तुसदृशो ज्ञाने ज्ञेयाकारपरिणाम' इति विलक्षणप्रामाण्याकारवादेऽपि न क्षतिः । एवञ्च रिमिश्रम- तस्य खण्डनं अनम्यासद- शायामुभयोः परतस्त्व- मम्यासद- शशायाश्च स्व. 35 तस्त्वम्॥ RESS

-
सविवरण
भीवाना-
णेच-
प्रकरणम्॥
॥ ९६॥
अमेरजतनिमित्तो रजताकारः, संवृतशुक्त्याकारायाः समुपात्तरजताकारायाः शुक्तेरेव तवालम्बनत्वात्, प्रमायां तु रजतनिमित्त
इत्याकारतथात्वस्य, परतास्वतोनहाभ्यां 'प्रामाण्याप्रामाण्ययोस्तदनेकान्त' इति प्राचां वाचामपि विमर्शः कान्त एवेति द्रष्टव्यम् ।
न्यायाभियुक्ता अपि “यथाऽभावलौकिकप्रत्ययस्तद्धर्मस्य प्रतियोगितावच्छेदकत्वमवगाहमान एव तद्धर्मविशिष्टस्य प्रतियोगित्व-
मवगाहते, तथा ज्ञानलौकिकसाक्षात्कारोऽपि तद्धर्मस्य विशेष्यतायवच्छेदकत्वमवगाहमान एव तद्धर्मविशिष्टस्य विशेष्यतादि-
कमवगाहत इति इदन्त्वविशिष्टस्यैव विशेष्यत्वमवगाहेत, इदन्त्वस्य विशेष्यतावच्छेदकत्वात्, न तु रजतत्वादिविशिष्टस्य,
रजतत्वादेरतथात्वाद, इत्थं नियमस्तु लौकिके। तेनोपनयवशादलौकिकतादृशसाक्षात्कारेऽपि न क्षतिः" इति वदन्तो विनोपनयं
प्राथमिकानुव्यवसायस्य प्रामाण्याग्राहकत्वमेवाहुः। यदेव च तेपामुपनयस्याकृत्यं तदेवास्माकमीहायाः साध्यमिति कृतं प्रसङ्गेन ।
प्रकृतमनुसरामः । एताववग्रहहाख्यौ व्यापारोंशी, ईहानन्तरमपाया प्रवर्तते 'अयं घट एवेति,' अत्र चासत्यादिजनित-
क्षयोपशमवशेन यावानीहितो धर्मस्तावान् प्रकारीमवति, तेनैकत्रैव 'देवदत्तोऽयं ब्राह्य गोय' 'पाचकोऽयं' इत्यादिप्रत्ययभेदोपप-
त्तिा। इत्थं च रूपविशेषान्मणिः पद्मराग इत्युपदेशोत्तरमपि तदाहितवासनावतो रूपविशेषाद् 'अनेन पनरागेग भवितव्यम्' इतीहो-
तरमेव 'अयं पद्मराग' इत्यपायो युज्यते, उक्तोपदेशः पद्मरागपदवाच्यत्वोपमितावेवोपयुज्यते । अयं पद्मराग इति तु सामान्यावग्रहे-
हाक्रमेणैवेति नैयायिकानुयायिनः । घट इत्यपायोत्तरमपि यदा किमयं घटः सौवर्णो मातॊ वेत्यादिविशेषजिज्ञासा प्रवर्तते,
तदा पाश्चात्यापायस्योत्तरविशेषावगमापेक्षया सामान्यालम्बनत्वाव्यावहारिकावग्रहत्वं, ततः सौवर्ण एवायमित्यादिरपाया,
तत्राप्युत्तरोत्तरविशेषजिन्नासायां पाश्चात्यस्य पाश्चात्यस्य व्यावहारिकावग्रहत्वं द्रष्टव्यम् । जिज्ञासानिवृत्तौ त्वन्त्यविशेषज्ञानमवाय
ज्ञप्तौ प्रामा-
ण्याप्रामा-
ण्ययोः स्व-
तस्त्वपरत-
स्त्वानेकान्त-
स्योपसंहारः,
अपायस्य
निरूपणं
तस्योत्तर-
विशेकाव.
गमापेक्षया
व्यावहारि-
कार्याग्रहत्त्व-
प्रदर्शनम्॥
॥ ९६ ॥

एवोच्यते नाऽवग्रहः, उपचारकारणामावात् । अयं फलांशः॥ कालमानं त्वस्यान्तर्मुहूर्तमेव, सौदामिनीसम्पातजनितप्रत्ययस्य चिरमननुवृत्तय॑भिचार इति चेत्, न, अन्तर्मुहूर्तस्यासङ्ख्यभेदत्वात्, अन्त्यविशेषावगमरूपापायोत्तरमावच्युतिरूपा धारणा प्रवर्तते, साप्यान्तमौहूर्तिकी । अयं परिपाकांशः । वासनास्मृती तु सर्वत्र विशेषावगमे द्रष्टव्ये । तदाह जिनभद्रगणिक्षमा- श्रमणः, सामनमित्तगहणं, णेच्छइओ समयमोग्गहो पढमो।। तत्तोणंतरमीहिय-वत्थुविसेसस्स जोवाओ।।२८।। लो पुणरहिावाया- वेरकाए ओग्गहोचि उवयरिओ ॥ एस विसेसावरकं, सामनं गिण्डए जेणं ॥२८३।। ततोगतरमीहा, तो आओ अ तबिसे- सस्स ॥ इह सामनविसेसा-चेरका जावंतिमो भेओ ।। २८४॥ सव्वत्थेहोवाया, णिच्छयो मोत्तुमाइसामन्नं ॥ संववहारत्थं पुण, सव्वत्थावग्गहोवाओ ॥ २८५॥ तरतमजोगाभावे-वाओ चिय धारणा तदंतमि ।। सम्वत्थ वासणा पुण, भणिया कालन्तरे सई य ॥२८६॥" (ज्ञानार्णवप.५८-५९)ति ॥ न चाविच्युतेरपायावस्थानात्पार्थक्ये मानामावा, विशेषजिज्ञासानिवृत्त्यवाच्छिमस्वरू- पस्य कथचिद्धिमत्वाद्, अवगृहामि, ईहे, अवैमि, स्थिरीकरोमीतिप्रत्यया एव च प्रतिप्राण्यनुभवसिद्धा अवग्रहादिभेदे प्रमाण, स्मृतिजनकतावच्छेदकत्वेनैव वाऽविच्युतित्वं धर्मविशेषः कल्प्यते, तत्तदुपेक्षान्यत्वस्य... स्मृतिजनकतावच्छेदककोर्टप्रक्शे गौरवादिति धर्मविशेषसिद्धौ धर्मिविशेषसिद्धिरित्यधिक मत्कृतज्ञानार्णवादवसेयम् ॥ तदेवं निरूपितं मतिज्ञानं ॥ तनिरूपणेन च श्रुतज्ञानमपि निरूपितमेवाद्वयोरन्योऽन्यानुगतत्वात्तथैव व्यवस्थापितत्वाब । अन्ये वरपाङ्गादिपरिज्ञान- मेव श्रुतज्ञानमन्यच्च मतिज्ञानमित्यनयोरपि भजनैव, यदुवाच वाचकचक्रवर्ती "एकादीन्येकस्मिन्भाज्यानि त्वाचतुर्य इति" (तत्वार्थ ०१-३१)। शब्दसंसृष्टार्थमात्रग्राहित्त्वेन श्रुतत्वे त्ववग्रहमात्रमेव मतिज्ञानं प्रसज्पेत,धारणोवरं ससमानाकारश्रुतावश्य- मतिज्ञाननि- रूपणे न्या- वहारिका- ऽवग्रहत्व- मवायस्य, अविच्युतेर. पायात्पार्थ- क्यं मति- ज्ञाननिरू- पणतःश्रुत- ज्ञाननिरूप- णातिदेशः॥ RESS है

श्रुतज्ञाननि-
रूपणे शु.
चौहान-
बिन्दु-
प्रकरणम्॥
॥९७॥
तस्य मति-
ज्ञानादभि.
न्नत्वमेवेति-
नव्यमतस्यो.
म्भावकल्पनं तु स्ववासनामात्रविजृम्भितं, शब्दसंसृष्टाया मतेरेव श्रुतत्वपरिभाषणं तु न पृथगुपयोगव्यापकमिति शाब्दज्ञानमेव
भुतज्ञानं न त्वपरोक्षमिन्द्रियजन्यमपीत्याहुः। नव्यास्तु "श्रुतोपयोगो मत्युपयोगान्न पृथक्, मत्युपयोगेनैव तत्कार्योपपत्तौ तत्पार्थ-
क्यकल्पनाया व्यर्थत्वात् । अत एव शब्दजन्यसामान्यज्ञानोत्तरं विशेषजिज्ञासायां तन्मूलकमत्यपायांशप्रवृत्तौ न पृथगवग्रहकल्पना-
गौरवं, शाब्दसामान्यज्ञानस्यैव तत्रावग्रहत्वात् । न चाशाब्दे शाब्दस्य तत्सामग्र्या वा प्रतिबन्धकत्वधौव्यानेयं कल्पना युक्तति
वाच्यम्, अशाब्दत्वस्य प्रतिवध्यतावच्छेदकत्वे प्रतियोगिकोटौ शब्दमूलमतिज्ञानस्यापि प्रवेशात् ,अन्यथा श्रुताभ्यन्तरीभूतमतिज्ञा-
नोच्छेदप्रसङ्गात् । किञ्च शाब्दज्ञानरूपश्रुतस्यावग्रहादिक्रमवतो मतिज्ञानाद्भिन्नत्वोपगमेऽनुमानस्मृतितर्कप्रत्यभिज्ञानादीनामपि
तथात्वं स्यादित्यतिप्रसङ्गः, सांव्यवहारिकप्रत्यक्षत्वाभावस्यापि तेषु तुल्यत्वात् । यदि चावग्रहादिभेदाः सांव्यवहारिकप्रत्यक्ष-
रूपस्यैव मतिज्ञानस्य सूत्रे प्रोक्ता अनुमानादिकं तु परोक्षमतिज्ञानमर्थतः सिद्धमितीप्यते, तर्हि श्रुतशब्दव्यपदेश्यं शाब्दज्ञानमपि
परोक्षमतिज्ञानमेवाङ्गीक्रियता,किमर्धजरतीयन्यायाश्रयणेन । मत्वा जानामि श्रुत्वा जानामीत्यनुभव एवानयोर्भेदोपपादक इति
चेत् न,अनुमाय जानामि स्मृत्वा जानामीत्यनुभवेनानुमानस्मृत्यादीनामपि भेदापत्तेः । अनुमितित्वादिकं मतित्वव्याप्यमेवेति
यदीष्यते,शान्दत्वमपि किंन तथा । मत्वा न जानामीति प्रतीतिस्तत्र बाधिकेति चेत्, न,वैशेषिकाणां नानुमिनोमीति प्रतीतेरिख
शाब्दे तस्या विशेषविषयत्वात् ।नच निसर्गाधिगमसम्यक्त्वरूपकार्यभेदान्मतिश्रुतज्ञानरूपकारणभेद इत्यपि साम्प्रतम्, तत्र निसर्ग-
पदेन स्वभावस्यैव ग्रहणात् । यद्वाचका-(प्रशमरति)"शिक्षागमोपदेश-श्रवणान्येकाथिकान्यधिगमस्य ।। एकार्थः परिणामो,भवंति.
निसर्गः स्वभावश्च॥२२३ ॥ इति" । यत्रापि मतेः श्रुतभिन्नत्वेन ग्रहणं तत्र गोनलीवर्दन्याय एवाश्रयणीयः। तदिदमभिप्रत्याह महा-
पदर्शनम् ॥
PHOREGISTERLARECRUGREE
॥ ९७॥

अवधिज्ञान- निरूपण तत्रावधि- ज्ञानलक्षणे विरोषणानां. व्यावृत्त्युप- वादी सिद्धसेनः (निश्चयद्वात्रिंशिका)"वैयर्थ्यातिप्रसगाभ्यां,न मत्यभ्यधिकं श्रुतम्॥१२॥इति।" इत्याहुःइतिश्रुतज्ञानम्।। "अवधिज्ञानत्वं रूपिसमव्याप्यविषयताशालिज्ञानवृत्तिज्ञानत्वव्याप्यजातिमत्त्वम्।।" रूपिसमव्याप्यविषयताशालिज्ञानं पर- मावधिज्ञानं "रूवगयं लहइ सव्वं" (गा.६८५) इतिवचनात् ,तवृत्तिर्ज्ञानत्वव्याप्याजातिवधित्वमवधिज्ञानमात्र इति लक्षणसम- न्वयः ।समव्याप्यत्वमपहाय व्यापकत्वमात्रदाने जगद्व्यापकविषयताकस्य केवलस्य रूपिव्यापकविषयताकत्वनियमात् तद्वृत्तिकेव- लत्वमादाय केवलज्ञानेऽतिव्याप्तिः, समव्याप्यत्वदाने त्वरूपिणि व्यभिचारात्केवलज्ञानविषयताया रूप्यव्याप्यत्वाचन्निवृत्तिः। न च परमावधिज्ञानेऽप्यलोके लोकप्रमाणासङ्ख्यारूप्याकाशखण्डविषयतोपदर्शनादसम्भवः । यदि तावत्सु खण्डेषु रूपिद्रव्यं स्यात्तदा पश्येदिति प्रसङ्गापादन एव तदुपदर्शनतात्पर्यात् । न च तदंशे विषयबाधेन सूत्राप्रामाण्यं, स्वरूपबाधेऽपि शक्तिविशेषज्ञापनेन फलावाधात् । एतेनासद्भावस्थापना व्याख्याता बहिर्विषयताप्रसञ्जिका तारतम्येन शक्तिवृद्धिश्च लोकमध्य एव सूक्ष्म- क्ष्मतरस्कन्धावगाहनफलवतीति न प्रसङ्गापादनवैयर्थ्यम् । यद्भाष्यं-“वर्ल्डतो पुण बाहि, लोगत्थं चेव पासई दब्धं ॥ सुहुमयरं सुहुमयर, परमोही जाव परमाणुं ॥ ६०६ ॥” इति । अलोके लोकप्रमाणासङ्ख्येयखण्डविषयतावधेरिति वचने विषयतापदं तर्कितरूप्यधिकरणताप्रसञ्जिततावदधिकरणकरूपिविषयतापरमिति न स्वरूपबाधोऽपीति तत्वम् । जातौ ज्ञानत्वव्याप्यत्व- विशेषणं ज्ञानत्वमादाय मत्यादावतिव्याप्तिवारणार्थम् । न च संयमप्रत्ययावधिज्ञानमनःपर्यायज्ञानसाधारणजातिविशेषमा- दाय मनापर्यायज्ञानेऽतिव्याप्तिः,अवधित्वेन साकर्येण तादृशजात्यसिद्धेः । न च 'पुद्गला रूपिण' इति शाब्दबोधे रूपिसमव्याप्य- विषयताकेऽतिव्याप्तिा, विषयतापदेन स्पष्टविशेषाकारग्रहणादिति सझेपः ॥ इत्यवधिज्ञानप्ररूपणम् ॥ दर्शनम् ॥ SANSAREE

श्रीज्ञान-
पिन्दु-
अवारणम्॥
॥ ९८ ॥
RECEREAL
"मनोमानसाक्षात्कारि मनःपर्यायज्ञानम्।” न च तादृशावधिज्ञानेऽतिव्याप्तिः,मनासाक्षात्कारिणोऽवधेःस्कन्धान्तर-
स्यापि साक्षात्कारित्वेन तादृशावधिज्ञानासिद्धेः। न च मनस्त्वपरिणतस्कन्धालोचितं वाद्यमप्यर्थ मनःपर्यायज्ञानं साक्षात्करोतीति
तस्य मनोमात्रसाक्षात्कारित्वमसिद्धमिति वाच्यम्, मनोद्रव्यमात्रालम्बनतयैव तस्य धर्मिग्राहकमानसिद्धत्वात् , बाह्यार्थानां
तु मनोद्रव्याणामेव तथारूपपरिणामान्यथानुपपत्तिप्रसूतानुमानत एव ग्रहणाभ्युपगमात्। आह च भाष्यकार:-" जाणइ बज्झे-
णुमाणेणं ति"(गा.८१४)बाह्यार्थानुमाननिमित्तकमेव हि तत्र मानसमचक्षुर्दर्शनमङ्गीक्रियते,यत्पुरस्कारेण सूत्रे मनोद्रव्याणि जानाति
पश्यति चैतदिति व्यवह्रियते । एकरूपेऽपि ज्ञाने द्रव्याद्यपेक्षक्षयोपशमवैचित्र्येण सामान्यरूपमनोद्रव्याफारपरिच्छेदापेक्षया
पश्यतीति, विशिष्टतरमनोद्रव्याकारपरिच्छेदापेक्षया च जानातीत्येवं वा व्याचक्षते । आपक्षिकसामान्यज्ञानस्यापि व्यावहारि-
कावग्रहन्यायेन व्यावहारिकदर्शनरूपत्वात् । निश्चयतस्तु सर्वमपि तज्ज्ञानमेव, मनःपर्यायदर्शनानुपदेशादिति द्रष्टव्यम् । नव्यास्तु
बाह्यार्थीकारानुमापकमनोद्रच्याकारग्राहकं ज्ञानमवधिविशेष एव, अप्रमत्तसंयमविशेषजन्यतावच्छेदकजातेरवधित्वव्याप्याया एव
कल्पनाधर्मि(कल्पनात)इति न्यायात्। इत्थं हि जानाति पश्यतीत्यत्र दृशेरवधिदर्शनविषयत्वेनैवोपपत्तौ लक्षणाकल्पनगौरवमपि परि-
हृतं भवति । सूत्रे भेदाभिधानं च धर्मभेदाभिप्रायम् । यदि सङ्कल्पविकल्पपरिणतद्रव्यमात्रग्राह्यभेदात्तग्राहकं ज्ञानमतिरिक्तमित्यत्र
निर्बन्धस्तदा द्वीन्द्रियादीनामपीष्टानिष्टप्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात्तजनकसूक्ष्मसङ्कल्पजननपारणतद्रव्यावषयमपि मनःपर्यायज्ञानमभ्यु-
पगन्तव्यं स्यात् ,चेष्टाहेतोरेव मनसस्तग्राह्यत्वात्। न च तेन द्वीन्द्रियादीनां समनस्कतापतिः, कपर्दिकासत्तया धनित्वस्येव,एकया
गवा गोमवस्येव(वा),सक्ष्मेण मनसा समनस्कत्वस्यापादयितुमशक्यत्वात् , तदिदमभिप्रेत्योक्तं निश्चयद्वात्रिंशिकायां महावा-
मनःपर्या-
यज्ञाननि-
रूपणे त-
ल्लक्षणेऽति-
व्याप्त्यादि.
दोपोद्धारः,
मनःपर्याय-
ज्ञानस्याव-
विज्ञानत्व
मेवेतिन-
व्यमतस्यो-
पदर्शनम् ॥
॥ ९८॥

दिना-"प्रार्थनाप्रतिघाताभ्यां, चेष्टन्ते द्वीन्द्रियादयः॥ मनःपर्यायविज्ञानं, युक्तं तेषु न चान्यथा ॥१॥” इति । न चैवं ज्ञानस्य पञ्चविधत्व विभागोच्छेदादुत्सूत्रापत्तिः, व्यवहारतश्चतुर्विधत्वेनोक्ताया अपि भाषाया निश्चयतो द्वैविध्याभिधानवन्नप- विवेकेनोत्सूत्राभावादिति दिक् (इत्याहुः)॥ इतिमनःपर्यायज्ञानप्ररूपणम् ॥ "सर्वविषयं केवलज्ञानम् ॥"सर्वविषयत्वं च सामान्यधर्मानवच्छिन्ननिखिलधर्मप्रकारकत्वे सति निखिलधर्मिविषयत्वम् । प्रमेयवदिति ज्ञाने प्रमेयत्वेन निखिलधर्मप्रकारकेऽतिव्याप्तिवारणायानवच्छिन्नान्तं, केवलदर्शनेतिव्याप्तिवारणाय सत्यन्तं, विशेष्य- भागस्तु पर्यायवाद्यभिमतप्रतीत्यसमुत्पादरूपसन्तानविषयकनिखिलधर्मप्रकारकज्ञाननिरासार्थः । वस्तुतो " निखिलज्ञेयाकारवचं केवलज्ञानत्वं" । केवलदर्शनाभ्युपगमे तु“तत्र निखिलदृश्याकारवचमेव",न तु निखिलोयाकारवचमिति नातिव्याप्तिः। न च प्रतिस्त्र केवलज्ञाने केवलज्ञानान्तरवृत्तिस्वप्राकालविनष्टवस्तुसम्बन्धिवर्तमानत्वाद्याकाराभावादसम्भव:, स्वसमानकालीननिखिलज्ञेयाकारव- वस्य विवक्षणात् । न च तथापि केवलज्ञानग्राह्ये आद्यक्षणवृत्तित्वप्रकारकत्वावच्छिन्नविशेष्यताया द्वितीयक्षणे नाशो, द्वितीयक्षण- वृत्तित्वप्रकारकत्वावच्छिन्नविशेष्यतायाश्चोत्पादः, इत्यमेव ग्राह्यसामान्पविशेष्यताधोव्यसम्भेदेन केवलज्ञाने त्रैलक्षण्यमुपपादित- मित्येकदा निखिलज्ञेयाकारवत्चासम्भव एवेति शङ्कनीयम् , समानकालीनत्वस्य क्षणगर्भवे दोषाभावात् , अस्तु वा निखिलनेया- कारसक्रमयोग्यतावचमेव लक्षणं,प्रमाणं च तत्र'ज्ञानत्वमत्यन्तोत्कर्षवृत्ति, अत्यन्तापकर्षववृत्तित्वात्,परिमाणत्ववद्'इत्याद्यनु- मानमेव । न चाप्रयोजकत्वं ज्ञानतारतम्यस्य सर्वानुभवसिद्धत्वेन तद्विश्रान्तेरत्यन्तापकर्पोत्कर्षाभ्यां विनाऽसम्भवात् । न चेन्द्रियाश्रित- ज्ञानस्यैव तरतमभावदर्शनात्तत्रैवान्त्यप्रकर्षों युक्त इत्यपि शङ्कनीय, अतीन्द्रियेऽपि मनोज्ञाने शास्त्रार्थावधारणरूपे शास्त्रभावना- केवलज्ञान- निरूपणे तल्लक्षणाना मुपदर्शन तत्रातिव्या- प्त्यादिदो- षोद्धास्व केवलज्ञाने प्रमाणोपद निश्च RS

माहिान-
प्रकरणम्॥
॥१९॥
केवलज्ञान-
निरूपणे
केवलज्ञान-
स्थ भावना-
जन्यत्वे
दोषोपद-
शंकः प्रश्न:
अERO
प्रकर्षजन्ये शास्त्रातिक्रान्तविषयेऽतीन्द्रियविषयसामर्थ्ययोगप्रवृत्तिसाधनेऽध्यात्मशास्त्रमसिमातिभनामधेये च तरतमभाव-
दर्शनात् । नन्वेवं भावनाजन्यमेव प्रातिभवत्केवलं प्राप्त, तथा चाप्रमाणं स्यात् , कामातुरस्य सर्वदा कामिनी भावयतो व्यवहितकामि-
नीसाक्षात्कारवद्भावनाजन्यज्ञानस्याप्रमाणत्वव्यवस्थितेः, अथ न भावनाजन्यत्वं तत्राप्रामाण्यप्रयोजकं, किं तु बाधितविषयत्वं,
भावनानपेक्षेऽपि शुक्तिरजतादिभ्रमे बाधादेवाप्रामाण्यस्वीकारात्, प्रकृते च न विषयबाध इति नाप्रामाण्यं, न च व्यवहितकामिनीवि-
श्रमादौ दोषत्वेन भावनायाः क्लृप्तत्वात्तजन्यत्वेनास्याप्रामाण्यं, बाधितविषयत्ववदोषजन्यत्वस्यापि भ्रमत्वप्रयोजकत्वात् , तथा
चोक्तं मीमांसाभाष्यकारेण-'यस्य(त्र) च दुष्टं कारणं यत्र च मिथ्येत्यादिप्रत्ययः स एवाऽसमीचीनो नान्य इति। वार्तिककारे-
णाप्युक्तम-"तस्मादोधात्मकत्वेन,प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता।। अर्थान्यथात्वहेतूत्थ-दोषज्ञानादपोद्यते॥१॥इति"अत्र हि तुल्यवदेवाप्रा-
माण्यप्रयोजकद्वयमुक्तं, तस्माद्वाधाभावेऽपि दोपजन्यत्वादप्रामाण्यमिति वाच्यं, भावनायाः क्वचिदोषत्वेऽपि सर्वत्र दोषत्वानि.
चयात्, अन्यथा शङ्खपीतत्वभ्रमकारणीभूतस्य पीतद्रव्यस्य स्वविषयकज्ञानेऽप्यप्रामाण्यप्रयोजकत्वं स्यादिति न किञ्चिदेतत् , क्ष-
चिदेव कश्चिदोष इत्येवाङ्गीकारात् , विषयबाधेनैव दोषजन्यत्वकल्पनाच, दुष्टकारणजन्यस्याप्यनुमानादेविषयाबाधेन प्रामाण्याभ्युप-
गमात्, अन्यथा परिभाषामात्रापत्तेः। मीमांसाभाष्यवार्तिककाराभ्यामपि बाधितविषयत्वव्याप्यत्वेनैव दुष्टकारणजन्यत्वस्या-
प्रामाण्यप्रयोजकत्वमुक्तं न स्वातन्त्र्येणेति चेत्,मैवम्, तथापि परोक्षज्ञानजन्यभावनाया अपरोक्षज्ञानजनकत्वासम्भवात् । न हि ववय-
नुमितिज्ञानं सहस्रकृत्व आवृत्तमपि वहिसाक्षात्काराय कल्पते। न चाभ्यस्यमानं ज्ञानं परमप्रकर्षप्राप्त तथा भविष्यतीत्यपि शङ्कनीयं,
लखनादकतापादिवदभ्यस्यमानस्यापि परमप्रकर्षायोगात् । न च लङ्घनस्यैकस्यावस्थितस्याभावादपरापरप्रयत्नस्य पूर्वपूर्वातिशयि-
॥९९॥

तलङ्घनोत्पादन एवं व्यापाराधावल्लवयितव्यं तावनादावेव श्लेष्मादिना जाड्यात्कायो लधयितुं शक्नोत्यभ्यासासादितश्लेष्म- क्षयपटुभावश्चोत्तरकालं शक्नोतीति तत्र व्यवस्थितोत्कर्षता, उदकतापे त्वतिशयेन क्रियमाणे तदाश्रयस्यैव क्षयान्न तत्राप्यग्निरूपताप- त्तिरूपोऽन्त्योत्कर्षः, विज्ञानं तु संस्काररूपं शास्त्रपरावर्तनाद्यन्यथानुपपत्त्योत्तरत्राप्यनुवर्तत इति तत्रापरापरयत्नानां सर्वेषामुपयो- गादत्यन्तोत्कर्षो युक्त इति तद्वता भावनाज्ञानेनापरोक्षं केवलज्ञानं जन्यत इति टीकाकृदुक्तमपि विचारसहं, तस्य प्रमाणान्तरत्वा- पत्तेः, मनो यदसाधारणमिति' न्यायात्,अन्यथा चक्षुरादिव्याप्तिज्ञानादिसहकृतस्य मनस एव सर्वत्र प्रामाण्यसम्भवे प्रमाणान्तरो- च्छेदापत्तेः । चक्षुरादीनामेव(वा)साधारण्यात्प्रामाण्यमित्यभ्युपगमे भावनायामपि तथा वक्तुं शक्यत्वात् । एवञ्च परोक्षभावनाया अपरोक्षज्ञानजनकत्वं तस्याः प्रमाणान्तरत्वं चान्यत्रादृष्टचरं कल्पनीयमिति महागौरवमिति चेद्,अनुक्तोपालम्भ एषः, प्रकृष्टभावना- जन्यत्वस्य केवलज्ञानेऽभ्युपगमवादेनैव टीकाकृतोक्तत्वात् । वस्तुतस्तु तज्जन्यात्प्रकृष्टादावरणक्षयादेव केवलज्ञानोत्पत्तिरित्येव सिद्धान्तात्(न्तः)। यैरपि योगजधर्मस्यातीन्द्रियज्ञानजनकत्वमभ्युपगम्यते,तैरपि प्रतिवन्धकपापक्षयस्य द्वारत्वमवश्यमाश्रयणीयम्, सति प्रतिबन्धके कारणस्याकिञ्चित्करत्वात् ,केवलं तैोगजधर्मस्य मन प्रत्यासत्तित्वं,तेन सन्निकर्षण निखिलजात्यंशे निरवच्छिन्न- प्रकारताकज्ञाने षोडशपदार्थविषयकविलक्षणमानसज्ञाने वा तत्त्वज्ञाननामधेये मनसः करणत्वं, चाक्षुषादिसामग्रीकाल इव लौकिकमा- नससामग्रीकालेऽपि तादृशतत्त्वज्ञानानुपपत्तेस्तत्त्वज्ञानाख्यमानसे तदितरमानससामय्याः प्रतिबन्धकत्वं, तत्त्वज्ञानरूपमानससाम- ग्याच प्रणिधानरूपविजातीयमनासंयोगघटितत्वं कल्पनीयमित्यनन्तमप्रामाणिककल्पनागौरखम् । अस्माकं तु दुरितक्षयमात्र तत्र. कारणमिति लाघवम् । अत एव 'इन्द्रियनोइन्द्रियज्ञानासाचिव्येन केवलमसहायमिति' प्राञ्चो व्याचक्षते । स चावरणाख्यदुरित- केवलज्ञान निरूपणे उक्तप्रश्ने टोकाल्दु- क्तरपाकर- णम्, उकृत- प्रश्नप्रति- विधानम्, भावनाज- न्यप्रष्टा- वरणक्षयतः केवलोत्पत्ति- व्यवस्था- पनम् ॥ ।

भीवान- विन्दु प्रकरणम्॥ ॥ १०॥ MOREOGL क्षयोऽपि भावनातारतम्यात्तारतम्येनोपजायमानस्तदत्यन्तप्रकर्षांदत्यन्तप्रकर्षमनुभवतीति किमनुपपन्नम् । तदाहाकलङ्कोऽपि-"दो- पावरणयोहानि-निःशेपास्त्यतिशायनात् ॥ क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो, बहिरन्तर्मलक्षय इति ॥१॥" न च निम्बाद्यौषधोपयोगात्तरतम - भावापचीयमानस्यापि श्लेष्मणो नात्यन्तिकक्षय इति व्यभिचारः, तत्र निम्बाद्यौषधोपयोगोत्कर्षनिष्ठाया एवापादायतुमशक्य त्वात, तदुपयोगेऽपि श्लेष्मपुष्टिकारणानामपि तदैवासेवनात् , अन्यथौषधोपयोगाधारस्यैव विनाशप्रसङ्गात् , चिकित्साशास्त्रं छुद्रिक्तधातु- दोपसाम्यमुद्दिश्य प्रवर्तते, न तु तस्य निर्मूलनाशं, अन्यतरदोषात्यन्तक्षयस्य मरणाविनामावित्वादिति द्रष्टव्यम् । रागाद्यावरणापाये सर्वज्ञज्ञानं वैशद्यभाग्भवतीत्यत्र च न विवादो रजोनीहाराद्यावरणापाये वृक्षादिज्ञाने तथा दर्शनात् । न च रागादीनां कथमावर- णत्वं, कुड्यादीनामेव पौगलिकानां तथात्वदर्शनादिति वाच्यम् , कुड्यादीनामपि प्रातिभादावनावारकत्वात् , ज्ञानविशेषे तेषामावर- णत्ववच्चातीन्द्रियज्ञाने रागादीनामपि तथात्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यामेव सिद्धम् । रागाद्यपचये योगिनामतीन्द्रियानुभवसम्भवात्पौद्ग- लिकत्वमपि द्रव्यकर्मानुगमेन तेषां नासिद्धम् । स्वविषयग्रहणक्षमस्य ज्ञानस्य तदग्राहकताया विशिष्टद्रव्यसम्बन्धपूर्वकत्वानियमात्पी- तहत्पूरपुरुपज्ञाने तथादर्शनादिति ध्येयम्।बार्हस्पत्यास्तु-"रागादयो न लोभादिकर्मोदयनिवन्धनाः, किंतु ककादिप्रकातहेतुका। तथाहि, कफहेतुको रागः, पित्तहेतुको द्वेषा, वातहेतुकश्च मोहः । कफादयश्च सदैव सनिहिताः, शरीरस्य तदात्मकत्वात् , ततो न सार्वज्ञमूलवीतरागत्वसम्भव" इत्याहुः। तद्युक्तम् , रागादीनां व्यभिचारेण कफादिहेतुकवायोगात् , दृश्यते हि वातप्रकृते- रपि रागद्वेषौ, कफप्रकृतेरपि द्वेषमाहौ, पित्तप्रकृतेरपि मोहरागाविति । एककस्याः प्रकृतेः पृथक सर्वदोषजननशक्त्युपगमे च सबषां समरागादिमत्चप्रसङ्गात् । न च स्वस्वयोग्यक्रमिकरागादिदोषजनककफाद्यवान्तरपरिणतिविशेषस्य प्रतिप्राणि कल्पनान्नायं दोष केवलमान- निरूपणे आवरणाख्य- दुरितक्षया- त्यन्तिकत्वे समन्तभद्र- संवादः, रागादीना तत्रावरण- त्वं तेषांक- फादिहेतुक- त्वस्य प्रति ISRHETIRSAGE क्षेपः ।। ॥१००।

PRESERECIRCRECK इति वाच्यम्, तदवान्तरबैजात्यावच्छिन्नहेतुगवेषणायामपि कर्मण्येव विश्रामात् । किं चाभ्यासजनितप्रसरत्वात्प्रतिसंख्याननिवर्तनी- यत्वाच न कफादिहेतुकत्वं रागादीनाम् । एतेन 'शुक्रोपचयहेतुक एव रागो नान्यहेतुक इत्याद्यपि' निरस्तम् , अत्यन्तस्त्रीसेवा- परस्य क्षीणशुक्रस्यापि रागोद्रेकदर्शनात् , शुक्रोपचयस्य सर्वस्वीसाधारणाभिलापजनकत्वेन कस्यचित् कस्याश्चिदेव रागोद्रेक इत्य- स्यानुपत्तश्चैप। न चासाधारण्ये रूपमेव हेतुः, तद्रहितायामपि कस्यचिद्रागदर्शनात् । न च तत्रोपचार एव हेतुः, द्वयेनापि विमुक्तायां रागदर्शनात् । तस्मादभ्यासदर्शनजनितोपचयपरिपाकं कर्मैव विचित्रस्वभावतया तदा तदा तत्तत्कारणापेक्षं तत्र तत्र रागादिहेतुरिति प्रतिपत्तव्यम् । एतेन 'पृथिव्यम्बुभूयस्त्वे रागः, तेजोवायुभूयस्त्वे द्वेषः, जलवायुभूयस्त्वे मोह इत्यादयोऽपि प्रलापा निरस्ताः, तस्य विषयविशेषापक्षपातित्वादिति दिक् । कर्मभूतानां रागादीनां सम्यग्ज्ञानक्रियाभ्यां क्षयेण वीतरागत्वं सर्वज्ञत्वं चानाविलमेव। शौद्धो- दनीयास्तु-"नैरात्म्यादिभावनैव रागादिक्लेशहानिहेतुः, नैरात्म्यावगतावात्मात्मीयाभिनिवेशामावेन रागद्वेषोच्छेदात् संसार- मूलनिवृत्तिसम्भवात्,आत्मावगतौ च तस्य नित्यत्वेन तत्रस्नेहात्तन्मूलतृष्णादिना क्लेशानिवृत्ते । तदुक्तम्-"यःपश्यत्यात्मानं,तत्रा- स्याहमिति शाश्वतः स्नेहः। स्नेहात्सुखेषु तृष्यति,तृष्णा दोषास्तिरस्कुरुते ॥१॥ गुगदी परितृप्य-त्यात्मनि तत्साधनान्युपादत्त ॥ तेनात्माभिनिवेशो, यावत्तावच संसारः॥२॥ इति" । ननु यद्येवमात्मा न विद्यते, किं तु पूर्वापरक्षणवाटतानुसन्धाना: पूर्वहेतु- प्रतिबद्धा ज्ञानक्षणा एव तथा तथोत्पद्यन्त इत्यभ्युपगमस्तदा परमार्थतो न कश्चिदुपकार्योपकारकत्वभाव इति कथमुच्यते "भगवान् सुगतः करुणयासकलसचोपकाराय देशनां कृतवान्"इति,क्षणिकत्वमपि यद्येकान्तेन, तर्हि तत्ववेदी क्षगानन्तरं विनष्टः सन्न कदा- चनाप्यहं भूयो भविष्यामीति जानानः किमर्थ मोक्षाय यतत इति ?,अत्रोच्यते-"भगवान् हि प्राचीनावस्थायां सकलमपि जगदुःखितं केवलज्ञान- निरूपणे शु. कोपचया- दीनां रागा- दिहेतुत्व- प्रतिक्षेप; नै- रात्म्यादि- भावनाया रागादिक्षय. हेतुत्वमिति- बौद्धभतो- पक्रमः । स

विन्दु-
प्रसारणम्।
RECORE
पश्यंस्तदुहिधीर्षया नैरात्म्यक्षणिकत्वादिकमवगच्छन्नपि तेषामुपकार्यसत्त्वानां निष्क्लेशक्षणोत्पादनाय प्रयतते, ततो जातसकल-
जगत्साक्षात्कारः समुत्पन्नकेवलज्ञानः पूर्वाहितकृपाविशेषसंस्कारात् कृतार्थोऽपि देशनायां प्रवर्तते, अधिगततत्तात्पर्यार्थाश्च स्वस-
न्ततिगतविशिष्टक्षणोत्पत्त्ये मुमुक्षवः प्रवर्तन्ते,"इति न किमप्यनुपपन्नमित्याहुः तदखिलमज्ञानविलसितम् ।आत्माभावे बन्धमोक्षा-
धकाधिकरणत्वायोगात्। न च सन्तांनापेक्षया समाधिः,तस्यापि क्षणानतिरेके एकत्वासिद्धे, एकत्वे चाद्रव्यस्यैव नामान्तरत्वात्, स-
जातीयक्षणप्रबन्धरूपे सन्ताने च न कारकव्यापार इति समीचीनं मुमुक्षुप्रवृत्युपपादनम् । अथाक्लिष्टक्षणेऽक्लिष्टक्षणत्वेनोपादानत्वमिति
सजातीयक्षणप्रबन्धोपपत्तिः, बुद्धदेशितमार्गे तु तत्प्रयोजकत्वज्ञानादेव प्रवृत्तिरिति चेत्,न, एकान्तवादेऽनेन रूपेण निमित्तत्वमनेन
रूपेण चौपादानत्वमिति विभागस्यैव दुर्वचत्वात् । अक्लिष्टक्षणे क्लिष्टक्षणत्वेनैवोपादानत्वे आद्याक्लिष्टक्षणस्यानुत्पत्तिप्रसङ्गादन्त्य-
क्लिष्टक्षणसाधारणस्य हेतुतावच्छेदकस्य कल्पने च क्लिष्टक्षणजन्यतावच्छेदकेन साङ्काजन्यजनकक्षणप्रबन्धकोटाकैकक्षणप्रवे-
शपरित्यागयोर्विनिगमकाभावाच । एतेन 'इतरव्यावृत्त्या शक्तिविशेषेण वा जनकत्वम् इत्यप्यपास्तम् । न चैतदनन्तरमहमुत्पन्न-
मेतस्य चाहं जनकमित्यवगच्छति क्षणरूपं ज्ञानमिति न भवन्मते कार्यकारणभावः, नापि तदवगमः, ततो याचितकमण्डनमेतदे-
कसन्ततिपतितत्वादेकाधिकरणं बन्धमोक्षादिकमिति । एतेन उपादेयोपादानक्षणानां परस्परं वास्यवासकभावादुत्तरोत्तरविशिष्टवि-
शिष्टतरक्षणोत्पत्तेः मुक्तिसम्भव' इत्यप्यपास्तम्, युगपदाविनामेव तिलकुसुमादीनां वास्यवासकभावदर्शनात् । उक्तश्च-"वास्य-
वासकयोश्चैव-मसाहित्यान्न वासना। पूर्वेक्षणैरनुत्पनो, वास्यते नोत्तरक्षणः ॥१॥इति"। कल्पितशुद्धक्षणैकसन्तानार्थितयैव मोक्षोः
पाये सौगतानां प्रवृत्तिः, तदर्थैव च सुगतदेशनेत्यभ्युपगमे च तेषां मिथ्यादृष्टित्वं,तत्कल्पितमोक्षस्य च मिथ्यात्वं स्फुटमेव, अधिकं
केवलज्ञान-
निरूपणे
निरुक्तबौद्ध-
मतस्यखण्ड.
नं बौद्धमते
आत्माऽभा-
वे बन्धमोक्ष-
काधिकर-
ण्यासम्भवः
कार्यकारण-
भावाद्यसम्भ-
वश्चा
॥ १०१॥

- लतायाम् । एतेन ' अखण्डाद्वयानन्दैकरसनमज्ञानमेव केवलझानं, तत एव चाविद्यानिवृचिरूपमोक्षाधिगम' इति वेदान्तिम- तमपि निरस्तम्, ताशविषयाभावेन तज्ज्ञानस्य मिथ्यात्वात्, कीदृशं च ब्रह्मज्ञानमज्ञाननिवर्तकमभ्युपेयं देवानांप्रियेण, न केवलचैतन्यं,तस्य सर्वदा सत्वेनाविद्याया नित्यनिधिप्रसङ्गात् ततश्च तन्मूलसंसारोपलन्ध्यसम्भवात्सर्वशास्त्रानारम्भप्रसङ्गाद- नुभवविरोधाच, नापि वृचिरूपं, वृत्तेः सत्यत्वे तत्कारणान्ताकरणाविद्यादेरपि सवस्यावश्यकत्वेन तया तनिवृत्तेरशक्यतया सर्व- वेदान्ताविप्लवापत्ता, मिथ्यात्वे च कथमज्ञाननिवर्तकता । न हि मिथ्याज्ञानमज्ञाननिवर्तकं दृष्टम्, स्वमज्ञानस्यापि तत्त्वप्र- सङ्गात् । न च "सत्यस्यैव चैतन्यस्य प्रमाणजन्यापरोक्षान्तःकरणवृत्यभिव्यक्तस्याज्ञाननिवर्तकत्वावृत्तेश्च कारणतावच्छेदकत्वेन दण्डत्वादिवदन्यथासिद्धत्वेन कारणत्वानगीकारात् , अवच्छेदकस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यस्य वास्तवत्वं न विहन्यते, यद्जतत्वेन 8 भातं तच्छुक्तिद्रव्यमितिवत्, तार्किकैरप्याकाशस्य शब्दग्राहकत्वे कर्णशष्कुलीसम्बन्धस्य कल्पितस्यैवावच्छेदकत्वाङ्गीकारात्, संयो- गमात्रस्य निरवयवे नभसि सर्वात्मना सचेनातिप्रसञ्जकत्वात् । मीमांसकैश्च कल्पितइस्वत्वदीर्घत्वादिसंसर्गावच्छिन्नानामेव वर्णानां यथार्थज्ञानजनकत्वोपगमावनिधर्माणां ध्वनिगतत्वेनैव भानात् , वर्णानां च विभूनामानुपूर्वी विशेषाज्ञानादतिप्रसङ्गात् , वर्णनिष्ठत्वेन इस्वत्वादिकल्पनस्य तेषामावश्यकत्वात् , तद्वदस्माकमपि कल्पितावच्छेदकोपगमे को दोष" इति मधुसूदनतपस्वि- नोऽपि वचनं विचारसह, मिथ्याग्दृष्टान्तस्य सम्यग्दृशां ग्रहणानौचित्यात् , नैयायिकमीमांसकोक्तस्थलेऽपि अनन्तधर्मात्मकै कवस्तुस्वीकारे कल्पितावच्छेदककृतविडम्बनाया अप्रसरात,विस्तरेणोपपादितं चैतत्सम्मतिवृत्तौ। न चोक्तरीत्या वृत्तेरवच्छेदकत्व- मपि युक्तं,प्रतियोगितयाज्ञाननिवृत्तौ सामानाधिकरण्येन समानविशेष्यकसमानप्रकारकवृत्तेरेव त्वन्मते हेतुत्वस्य युक्तत्वात्। अत एव LIST केवलज्ञान- निरूपणे ब- ह्मज्ञानलक्ष- णकेवल- ज्ञानस्यावि. द्यानिवृत्तिल- क्षणमोक्षहेतु- वमितिवेदा. न्तिमतस्य खण्डनं,तत्र: मधुसूदनो. केरपाकरण- ञ्च । E ते श्रीज्ञान- बिन्दु प्रकरणम्॥ ॥ १०२॥ केवलज्ञान- निरूपणे वेदान्तिमत- खण्डने मधु- सूदनोक्तके दान्तप्रक्रि- स्वयमुक्तं तपस्विना सिद्धान्तविन्दौ-'द्विविधमावरण, एकमसचापादकमन्त:करणावच्छिन्नसाक्षिनिष्ठ, अन्यदभानापादकं विष- यावच्छिन्नब्रह्मचैतन्यनिष्ठ, घटमहं न जानामीत्युभयावच्छेदानुभवाद्, आय परोक्षापरोक्षसाधारणप्रमामात्रेण निवर्तते, अनुमितेऽपि नास्तीति प्रतीत्यनुदयात् , द्वितीयं तु साक्षात्कारेणैव निवर्तते, यदाश्रयं यदाकारं ज्ञानं तदाश्रयं तदाकारमज्ञानं नाशयतीति वह्यादौ नियमाद्' इत्यादि, तत्किमिदानी क्षुत्क्षामकुक्षेः सद्य एव विस्मृतं ? येनोक्तवृत्तेरवच्छेदकत्वेनान्यथासिद्धिमाह, एवं हि घटादावपि दण्डविशिष्टाकाशत्वेनैव हेतुतां वदतो वदनं का पिदध्यात् ?, अनयैव भिया "चैतन्यनिष्ठायाः प्रमाणजन्यापरोक्षान्तःकरणवृत्तरेवा- ज्ञाननाशकत्वाङ्गीकारेऽपि न दोषा, पारमार्थिकसत्ताभावेऽपि व्यावहारिकसत्ताङ्गीकारात्। न च स्वमादिवन्मिथ्यात्वापत्तिा, स्व- रूपतो मिथ्यात्वस्याप्रयोजकत्वात, विषयतो मिथ्यात्वस्य च बाधाभावादसिद्धेः, धूमभ्रमजन्यवढ्यनुमितेरप्यवाधिताविषयत याऽ- प्रामाण्यानङ्गीकाराच्च,कल्पितेनापि प्रतिविम्बेन वास्तवविम्बानुमानप्रामाण्याच,स्वमार्थस्याप्यरिष्टादिसूचकत्वाच,क्वचित्तदुपलब्ध - मन्त्रादेर्जागरेऽप्यनुवृत्तेरवाधाचेति" तपस्विनोक्तमिति चेत्,एतदप्यविचाररमणीयम् त्वन्मते स्वमजागरयोर्व्यवहाराविशेषस्यापि कर्तुमशक्यत्वात्, बाधाभावेन ब्रह्मण इव घटादेरपि परमार्थसत्त्वस्याप्रत्यूहत्वाच, प्रपञ्चासत्यत्वे बन्धमोक्षादेरपि तथात्वेन व्यवहार- मूल एव कुठारदानात् । एतेन 'अज्ञाननिष्ठाः परमार्थव्यवहारप्रतिभाससचातत्यिनुकूलास्तिस्रः शक्तयः कल्प्यन्ते, आद्यया प्रपञ्चे पारमार्थिकसत्चप्रतीतिः, अत एव नैयायिकादीनां तथाभ्युपगमः, सा च श्रवणाद्यभ्यासपरिपाकेन निवर्तते, ततो द्वितीयया शक्त्या व्यावहारिकसत्त्वं प्रपञ्चस्य प्रतीयते, वेदान्तश्रवणादभ्यासवन्तो हि नेम प्रपञ्चं पारमार्थिकं पश्यन्ति,किंतु व्यावहारिक- मिति,सा च तत्त्वसाक्षात्कारेण निवर्तते, ततस्तृतीयया शक्या प्रातिभासिकसचप्रतीतिः क्रियते.सा चान्तिमतचरोधेन सह निव- याया अपा- करणम् ॥ AUKRISHRASTRA ॥ १०२।

ARMA SAECEMC तते,पूर्वपूर्वशक्तरुचरोत्तरशक्तिकार्यप्रतिबन्धकत्वाच न युगपत्कार्यत्रयप्रसङ्गा,तथा चैतदभिप्राया श्रुतिः- "तस्याभिध्यानाद् यो- जनात्तत्वभावाद्भ्यश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिरिति"।अस्या अवमय:-"तस्य परमात्मनः,अभिमुखाद्धयानाच्छूषणाम्पासपरि- पाकादिति यावत्, विश्वमायाया विश्वारम्भकाविद्याया निवृत्तिः, आद्यशक्तिनाशेन विशिष्टनाशात्, युज्यतेऽनेनेति योजनं तत्त्व- ज्ञानं तस्मादपि विश्वमायानिवृत्तिः, द्वितीयशक्तिनाशेन विशिष्टनाशात्, तत्वभावो विदेहकाल्यमन्तिमः साक्षात्कार इति यावत्, तस्मादन्ते प्रारब्धक्षये सह तृतीयशच्या विश्वमायानिवृत्तिः,अभिध्यानयोजनाभ्यां शक्तिद्वयनाशेन विशिष्टनाशापेक्षया भूया. शब्दोऽभ्यासार्थक इति इत्यादि"निरस्तम्,अमिध्यानादेयागपरमार्थ सदादौ परमार्थसत्तादिप्रतीत्यभ्युपगमेऽन्यथाख्यात्यापातात् । न च तत्तच्छक्तिविशिष्टाज्ञानेन परमार्थसत्चादि जनयित्वैव प्रत्याय्यत इति नायं दोष इति वाच्यम्, साक्षात्कृततत्वस्य न किमपि वस्त्वज्ञातमिति प्रातिमासिकसचोत्पादनस्थानाभावात, ब्रह्माकारवृत्या ब्रह्मविषयतैवाज्ञानस्य नाशिता, तृतीयशक्तिविशिष्टं त्वज्ञानं यावत्प्रारब्धमनुवर्तत एवेति ब्रह्मातिरिक्तविषये प्रातिभासिकसचोत्पादनादविरोध इति चेत्, न, धर्मसिद्धथसिद्धियां व्याघातात , विशेषोपरागेणाझाते तदुपगमे च ब्रह्मण्यपि प्रातिमासिकमेव सचं स्यात् , तचले कस्यचिदज्ञानस्य स्थितौ विदेह- कैवल्येऽपि तदवस्थितिशङ्कया सर्वाझानानिवृत्ती मुक्तावनाश्वासप्रसगाच । अथ दृष्टिमृष्टिवादे नेयमनुपंपत्तिा,तन्मते हि वस्तु सद् ब्रह्मैव, प्रपनश्च प्रातिभासिक एव, तस्य चामिध्यानादेः प्राक् पारमार्थिकसचादिना प्रतिभासः पारमार्थिकसदायाकारज्ञाना - भ्युपगमादेव सूपपाद इति चेत्, न, तस्य प्राचीनोपगतस्य सौगतमतप्रायत्वेन नव्यरुपक्षिववाद, व्यवहारवादस्पैव तैराहतत्वात् । व्यवहारवादे च व्यावहारिकं प्रपञ्च प्रातिभासिकत्वेन प्रतीयतां तत्वज्ञानिनामत्यन्तभ्रान्तत्वं दुर्निवारमेव । अथ व्यावहारिकस्थापि ॥केवलज्ञान- निरूपणे वेदान्तिमत- खण्डने, तत्र दृष्टिस्टष्टिवा- दमाशझ्य नव्यवेदा- न्त्युपेक्षि- तत्वेन ख- ण्डितवान्।।-- SRIOR १८ माधान प्रकरणम्॥ ॥१.३॥ अपश्चास्य तत्त्वज्ञानेन बाधितस्यापि पारब्धवशेन बाधितानुवृत्त्या प्रतिभासः तृतीयस्याः शक्तः कार्यम्, तैन बाधितानुवृत्या प्रति- मासानुकूला तृतीया शक्तिः प्रातिभासिकस चसम्पादनपटीयसी शक्तिरुच्यते, सा चान्तिमतत्त्ववोधेन निवर्तत इत्येवमदोष इति चेत, न, बाधितं हि त्वन्मते नाशितं, तस्यानुवृत्तिरिति वदतो व्याघातात् । बाधितत्वेन बाधितत्वावच्छिन्नसत्तया वा प्रतिभासस्तत्त्व- ज्ञप्रारम्धकामिति चेत् तृतीया शक्तिय॑र्था, यावविशेषाणां बाधितत्वे तेषां तथाप्रतिभासस्य सार्वज्ञाभ्युपगमं विनानुपपत्तेश, द्वितीय- शक्तिविशिष्टाज्ञाननाशात् सश्चितकर्म तत्कार्य च नश्यति, ततस्तृतीयशक्त्या प्रारब्धकार्ये दग्धरज्जुस्थानीया बाधितावस्था जन्यते, इयमेव नाषितानुवृत्तिरिति चेत्,न,एवं सति घटपटादौ तस्वज्ञस्य न बाधितसवधी, न वा व्यावहारिकपारमार्थिकसत्वधीरिति तत्र किञ्चिदन्यदेव कल्पनीय स्यात्,तथा च लोकशास्त्रविरोध इति सुष्कृतं हरिभद्राचार्यः-(षोडशक १६) "अग्निजलभूमयो यत्,परि- तापकरा भवेऽनुभवसिद्धाः ॥रागादयश्च रौद्रा, असत्प्रवृत्यास्पदं लोके ॥८॥ परिकल्पिता यदि ततो, न सन्ति तपेन कथममी स्यु- रिति ।। परिकल्पिते च तत्त्वे, भवभव विगौ कथं युक्तौ ॥९॥ इत्यादि । तस्माद्भुत्तेर्व्यावहारिकसमयापि न निस्तारः । प्रपश्चे परमार्थदृष्टयेव व्यवहारदृष्टयापि सत्तान्तरानवगाइनादिति स्मर्तव्यम्। किं च "सप्रकारं निष्प्रकार वा ब्रह्मज्ञानमज्ञाननिवर्तकमिति वक्तव्यं, आये निष्प्रकारे ब्रमणि सप्रकारकज्ञानस्यायथार्थत्वान्नाज्ञाननिवर्तकता, तस्य यथार्थत्वे वा नाद्वैतसिद्धिा, द्वितीयपक्षस्तु निष्प्रकारकज्ञानस्य कुत्राप्यज्ञाननिवतकत्वादशनादवानुद्भावनाहेगा"किं च निष्प्रकारकज्ञानस्य कुत्राप्यज्ञाननिवर्तकत्वं न दृष्टमिति शुद्धब्रह्मज्ञानमात्रात्कथमज्ञाननिवृत्तिः १, न च सामान्यधर्ममावाप्रकारकसमानविषयप्रमात्वमज्ञाननिवृत्तौ प्रयोजकं, अत्र प्रमे- यमिति झानेऽतिव्याशिवारणाय सामान्येति, प्रमेयो घट इत्यादावव्याशिवारणाय मात्रेति, तेनेदं विशेषप्रकारे निष्प्रकारे केवलज्ञान- निरूपणे वेदान्तिमत- खण्डने तत्त्व- নানান मायानुवृत्तेः खण्डने, तत्र लोकशास्त्र- विरोधे ह- रिभद्रसूरि- संवादो ब- मज्ञानस्या- ज्ञाननिवर्त- कत्वासम्भ- वश्च ॥ ॥ १०३॥ SHREERS.

KHASRCIAL चानुगतमिति निष्प्रकारकब्रह्मज्ञानस्यापि ब्रह्माज्ञाननिवर्तकत्वं लक्षणान्वयात् । न च सामान्यधर्ममात्रप्रकारकज्ञानेऽव्याप्तिः, इदमानिदं वा, प्रमेयमप्रमेयं वेत्यादिसंशयादर्शनेन (संशयाद्यदर्शनात्सामान्यमात्रप्रकारकाऽज्ञानानङ्गीकारेण ) तदनिवर्तकस्य तस्यासङ्ग्रहादिति वाच्यम् , निष्प्रकारकसंशयाभावेन निष्प्रकारकाज्ञानासिद्धया निष्प्रकारकब्रह्मज्ञानस्यापि तन्निवर्तकत्वायो- गात, एकत्र धर्मिणि प्रकाराणामनन्तत्वे प्रकारनिष्टतया निरवच्छिन्नप्रकारतासम्बन्धेनाधिष्ठानप्रमात्वेन तया तदज्ञाननिवर्त- कत्वौचित्यात् । अधिष्ठानत्वं च भ्रमजनकाज्ञानविषयत्वं वाऽज्ञानविषयत्वं वाऽखण्डोपाधिर्वा ?, न च विषयतयैव तत्त्वं युक्तम्, प्रमेयत्वस्य च केवलान्वयिनोऽनङ्गीकारान्न प्रमेयमिति ज्ञानाद् घटाद्याकाराज्ञाननियत्तिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, द्रव्यमिति ज्ञानात्तदापत्तेरवारणात् । न च तस्य द्रव्यत्वविशिष्टविषयत्वेऽपि घटत्वविशिष्टाविषयत्वात्तद्वारणं, द्रव्यत्वविशिष्ट- स्यैव घटावच्छेदेन घटत्वविशिष्टत्वात्, सत्त्वविशिष्टब्रह्मवत्, विशिष्टविषयज्ञानेन विशिष्टविषयाज्ञाननिवृत्त्यभ्युपगमेऽपि च ब्रह्मणः सचिदानन्दत्वादिधर्मवैशिष्टयप्रसङ्गः । एतेन " अन्यत्र घटाज्ञानत्वघटत्वप्रकारकप्रमात्वादिना नाश्यनाशकभावेऽपि प्रकृते ब्रह्माज्ञाननिवृत्तित्वेन ब्रह्मप्रमात्वेनैव कार्यकारणभावः, न तु ब्रह्मत्वप्रकारकेतिविशेषणमुपादेयं गौरवादनुपयोगाद्विरोधाच" इत्यपि निरस्तम्, विशिष्टब्रह्मण एव संशयेन विशिष्टाज्ञाननिवृत्त्यर्थं विशेषोपरागेणैव ब्रह्मज्ञानस्यान्वेषणीयत्वात्,शुक्तिरजतादिस्थले- पि विशिष्टाज्ञानविषयस्यैवाधिष्ठानत्वं क्लुप्तमित्यत्राप्ययं न्यायोऽनुसर्तव्यः। किं च ब्रह्मणो निर्धर्मकत्वे तत्र विषयवाया अप्यनुप- पन्नत्वात्तीद्वषयज्ञानत्वमपि तत्र दुर्लभ, विषयता हि कर्मतेति तदङ्गीकारे तस्य क्रियाफलशालित्वेन घटादिवजडत्वापत्तेः, तद्वि- पयज्ञानाजनकत्वे च तत्र वेदान्तानां प्रामाण्यानुपपत्तिः । न च तदज्ञाननिवर्तकतामात्रेण तद्विषयत्वोपचारः, अन्योन्याश्रयात् । केधलज्ञान- निरूपणे वे- दान्तिमत- खण्डने तत्र ब्रह्मज्ञानस्या- ज्ञाननिर्वत- कत्वासम्भ- वे ब्रह्मणो ज्ञानविषय- त्वासम्भवो- पपादनम् ॥

-- बिन्दु प्रकरणम्॥ ॥ १०४॥ न च कल्पिता विषयता कर्मत्वाप्रयोजिका, वास्तवविषयतायाः कुत्राप्यनङ्गीकाराव्यावहारिक्याच तुल्यत्वात् । न च ब्रह्मणि ज्ञान- विषयताऽसम्भवेपि ज्ञाने ब्रह्मविषयता तद्विम्बग्राहकत्वरूपाज्या वा काचिदनिर्मचनीया सम्भवतीति नानुपपत्तिः, विषयतैवाकार। प्रतिविषयं विलक्षणः, अत एव ब्रह्माकारापरोक्षप्रमाया एवाज्ञाननिवर्तकत्वं, अज्ञानविष्यस्वरूपाकारापराक्षनमात्वस्य सर्वत्रानुग- तत्वात् । न चेदमित्याकारं घटाकारमिति शकितुमपि शक्यं, आकारभेदस्य स्फुरतरसाक्षिप्रत्यक्षासिद्ध त्वादिति वाच्यम्, ज्ञान- निष्ठाया अपि ब्रह्मविषयताया ब्रह्मनिरूपितत्वस्यावश्यकत्वेन ब्रह्मणि तनिरूपकत्वधर्मसत्वे निर्धर्मकत्वव्याघातात्, उभयनिरूप्य- स्य विपयविषयिभावस्यैकधर्मत्वेन निर्वाहायोगात् । न च ब्रह्मग्यपि कल्पितविषयतोपगमे कर्मत्वेन न जडत्वापात :, स्वसमा- नसत्ताकविषयताया एव कर्मत्वापादकत्वात, घटादौ हि विषयता स्वतमानसत्ताका, द्वयोरपि व्यावहारिकत्वात् , ब्रह्मणि तु परमार्थसति व्यावहारिकी विषयता न तथेति स्फुटमेव वैषम्यादिति वाच्यम्, सत्ताया इव विषयताया अपि ब्रह्मणि पारमार्थि- कत्वोक्तावपि बाधकाभावात्, परमार्थनिरूपितधर्मस्य व्यावहारिके व्यावहारिकत्ववद्वयावहारिकनिरूपितस्य धर्मस्य पारमार्थिक पारमार्थिकताया अपि न्यायप्राप्तत्वात् । सत्ताधुपलक्षणभेदेऽप्युपलक्ष्यमेकमेवेति न दोष इति चेद्, विषयतायामप्येष एव न्यायः । एवं चानन्तधर्मात्मकधर्म्यभेदेऽपि ब्रह्मणि कौटस्थ्यं द्रव्यार्थादेशादन्याहतमेव । तथा चान्यूनानतिरिक्तधर्मात्मद्रव्यस्वभाव- लाभलक्षणमोक्षगुणेन भगवन्तं तुष्टाव स्तुतिकारः (सिद्धसेनद्वात्रिंशिका ४) "भववीजमनन्तमुज्झितं, विमलज्ञानमनन्तमार्जितम् । न च हीनकलोऽसि नाधिका, समतां चाप्यतिवृत्य वर्तसे ॥ २९ ॥ इति" । एतेन " चैतन्यविषयतैव जडत्वापादिका, न तु चिविषयतापि, "यतो वाचो निवर्तन्ते," "न चक्षुषा गृह्यते, नापि वाचा," "तं त्वौपनिषदं पुरुष पृच्छामि" "नावेदविन्मनुते तं केवलज्ञान- निरूपणे के दान्तिमत- खण्डने ब- मज्ञानस्या- ज्ञाननिवर्त्त- कत्वास म्भवे ज्ञाने ब्रह्मनिरूपि- तविषयत्वा- भावव्यव- स्थापनं द्र- व्यादेशादू ब्रह्मकौटस्थ्ये सिद्धसेनसू- रिसंवादः॥ ।१०४॥ TAGRECRUIPE .

केवलज्ञान- निरूपणे वे- दान्तिमतस्व- ण्डने ब्रह्म- बृहन्तं वेदेनैव यद्वेदितव्यम्" इत्याधुभयविधश्रुत्यनुसारेणेत्थ कल्पनात् “फलव्याप्यत्वमेवास्य, शास्त्रवद्भिर्निवारितम्।।"ब्रह्मण्यज्ञा- ननाशाय, वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ॥१॥" इति कारिकायामाप फलपदं चैतन्यमात्रपरमेव द्रष्टव्यं, प्रमाणजन्यान्तःकरणवृत्याभि- व्यक्तचैतन्यस्य शास्त्रे फलत्वेन व्यवहियमाणस्य ग्रहणे तद्वयाप्यताया अन्वयव्यतिरेकाम्यां जडत्वापादकत्वे ब्रह्मण इव साक्षिभा- स्यानामपि जडत्वानापत्तेः, चैतन्यकर्मता तु चिनिनवावच्छेदेन सर्वत्रैवेति सैव जडत्वप्रयोोजका, न च वृत्तिविषयत्वेऽपि चैतन्य- विषयत्वं नियतं वृत्तेश्चिदाकारगर्भिण्या एवोत्पत्तेः, तदुक्तम्-"विषद्वस्तुस्वभावानु-रोधादेव न कारणात् ॥ वियत्सम्पूर्णतोत्पत्ती कुम्भस्यैवं द()शा धियाम् ।।१।। घटदुःखादिहेतुत्वं, धियो धर्मादिहेतुतः॥ स्वतः सिद्धार्थसम्बोध-व्याप्तिर्वस्त्वनुरोधतः ॥२॥ इति," तथा च जडत्वंदुर्निवारमिति वाच्यम्, वृत्युपरक्तचैतन्यस्य स्वत एव चैतन्यरूपत्वेन तद्वयाप्यत्वाभावात् , फले फलान्तरा- नुत्पत्तस्तद्भिन्नानां तु स्वतो भानरहितानां तद्वयाप्तेरवश्याश्रयणीयत्वाद् इत्यादि" मधुसूदनाक्तमप्यपास्तम्, वृत्तिविषयताया अपि निर्धर्मके ब्रह्मण्यसम्भवात्, कल्पितविषयतायाः स्वीकारे च कल्पितप्रकारताया अपि स्वीकारापत्तेः, उभयोरपि ज्ञानभासकसाक्षि- भास्यत्वेन चैतन्यानुपरजकत्वाविशेषात्, ज्ञानस्य स्वविषयानिवर्तकत्वेन प्रकारानिवृत्तिप्रसङ्गभयस्य च विषयताद्यानिवृत्तिपक्ष इव धर्मधर्मिणोर्जात्यन्तरात्मकभेदाभेदसम्बन्धाश्रयणेनैव सुपरिहरत्वात्, कृतान्तकोपस्त्वेकान्तबादिनामुपरि कदापि न निवर्तत इति तत्र का प्रतिकारः । यदि च दृग्विषयत्वं ब्रह्मणि न वास्तवं, तदा सकृदर्शनमात्रेणात्मनि घटादाविव दृगपगमे ऽपि द्रष्टुत्वं कदापि नापै- तीत्यु(त्याधु)क्तं न युज्यते । तथा च-"सकृत्प्रत्ययमात्रेण,घटश्चेद्भासते तदा।।स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं,घटवच्च न भासते॥१॥स्वप्रका- शतया किं ते,तबुद्धिस्तत्त्ववेदनम् ॥ बुद्धिश्वक्षणनाश्येति, चोयं तुल्यं घटादिषु ॥२॥ घटादौ निश्चिते बुद्धिनश्यत्येव यदा घटः।। णि पञ्चदशी- वचनतो त्तिविपयत्व- व्यवस्थापि- काया मधु- सूदनोक्तेः खण्डनम् ॥

मोबान- प्रारणम्॥ ॥१.५॥ केवलज्ञान- निरूपणे वे- दान्तिमत- खण्डने ब्र- झाकारवृत्ति- नाशकख. 96 दृ(इ)ष्टो नेतु तदाशक्य, इति चेत्सममात्मनि॥३॥निश्चित्य सकृदात्मानं, यदापेक्षा तदैव तम् ।। वक्तुं मन्तुं तथा च्यातुं, शक्रोत्येव हि तत्त्ववित्।।४॥उपासक इव ध्याय-लौकिकं विस्मरेद्यदि ॥विस्मरत्येव सा ध्याना-द्विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥५॥"इत्यादि ध्यानदीप- वचनं विप्लवेतेति किमतिविस्तरेण। तस्माद्ब्रह्मविषयाब्रह्माकारावा वृत्तिरविवेचितसारैव । कथञ्चास्या निवृत्तिरिति वक्तव्यं, स्वकार- णाज्ञाननाशादिति चेत् , अज्ञाननाशक्षण इवावस्थितस्य विनश्यदवस्थाज्ञानजनितस्य वा दृश्यस्य चिरमप्यनुवृत्तौ मुक्तावनाश्वासः। उक्तप्रमाविशेषत्वेन निवर्तकता दृश्यत्वेन च निवयतेति दृश्यत्वेन रूपेणाविद्यया सह स्वनिवर्त्यत्वेऽपि न दोषः, निवर्त्यतानिवर्तकत- योरवच्छेदकैक्य एव क्षणभङ्गापत्तेरिति चेत्, प्रमाया अप्रमा प्रत्येव निवर्तकत्वदर्शनेन दृश्यत्वस्य निवर्त्यताऽनवच्छेदकत्वात् । न च ज्ञानस्याज्ञाननाशकतापि प्रमाणसिद्धा, अन्यथा स्वमाद्यभ्यासकारणीभूतस्याज्ञानस्य जागरादिप्रमाणज्ञानेन निवृत्तौ पुनः स्वमाध्या- सानुपपत्तिः, तत्रानेकाज्ञानस्वीकारे त्वात्मन्यपि तथासम्भवेन मुक्तावनाश्वासः, मूलाज्ञानस्यैव विचित्रानेकशक्तिस्वीकारादेकशक्ति- नाशेऽपि शक्त्यन्तरेण स्वमान्तरादीनां पुनरावृत्तिः सम्भवति, सर्वशक्तिमतो मूलाज्ञानस्यैव निवृत्तौ तु कारणान्तरासम्भवात, द्वितीयस्य च तादृशस्यानङ्गीकारान्न प्रपञ्चस्य पुनरुत्पत्तिरिति तु स्ववासनामात्र, चरमज्ञानं वा मूलाज्ञाननाशकं क्षणविशेषो वेत्यत्र विनिगमकामावादनन्तोत्तरोत्तरशक्तिकार्येष्वनन्तपूर्वपूर्वशक्तीनां प्रतिबन्धकत्वस्य, चरमशक्तिकार्य चरमशक्तेः, तन्नाशे च चरमज्ञानस्य हेतुत्वकल्पने महागौरवात्,पूर्वशक्तिनाश इव चरमशक्तिनाशेऽपि पण्डमूलाज्ञानानुवृत्यापत्त्यनुदाराचेति न किञ्चिदेतत्। एतेन "जागरादिभ्रमेण स्वमादिभ्रमतिरोधानमात्रं क्रियते, सर्पभ्रमेण रज्ज्वां धाराभ्रमतिरोधानवत, अज्ञाननिवृत्तिस्तु ब्रह्मात्मै- क्यविज्ञानादेव" इत्यपि निरस्तम् । एवं सति ज्ञानस्याज्ञाननिवर्तकतायां प्रमाणानुपलब्धेस्तन्निवृत्तिमूलमोक्षानाश्वासाद् माभूदुदाह- ण्डने ज्ञान- स्याज्ञान- नाशकत्व. खण्डनम्॥ RALA ॥१०५॥ MEX SECRECAREER रणोपलम्मा,श्रुतिः श्रुतापत्तिश्चैतदर्थे प्रमाणतामवगाहेते एव । तत्र श्रुतिस्तावत्-"तमेव विदित्वातिमृत्युमेति"मृत्युरविद्येति शाने प्रसिद्ध,तथा "तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः"स्मृतिश्च-(गीताअ०७)"देवी ह्येषा गुणमयी,मम माया दुरत्यया ॥ मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते॥१४॥ (अ०५) ज्ञानेन तु तदज्ञानं, येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं, प्रकाशयति तत्परम् ॥१६॥” इत्यादि । एवं "ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति" "तरति शोकमात्मवित्," "तरत्यविद्या वितता हृदि यस्मिन्निवेशिते॥ योगी मायाममेयाय,तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥१॥"इति "अविद्यायाः परं पारं तारयसि" इत्यादिः,श्रुतार्थापत्तिश्च-"ब्रह्मज्ञानाद् ब्रह्मभावः श्रूयमाणस्तद्वयवधायकाज्ञाननिवृत्तिमन्तरेण नोपपद्यत इति ज्ञानादज्ञाननिवृत्तिं गमयति" । " अनृतेन हि प्रत्यूढाः "नीहारेण प्रावृताः,""अन्यथुष्माकमन्तरं," (गीता अ०५) "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं,तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥"इत्यादि श्रुतिस्मृ. तिशतेभ्योऽज्ञानमेव मोक्षव्यवधायकत्वेनावगतम्, एकस्यैव तत्त्वज्ञानेनाज्ञाननिवृत्यभ्युपगमाच, नान्यत्र व्यभिचारदर्शनेन ज्ञान- स्याज्ञाननिवर्तकत्वबाधोऽपीति चेत्, न, एतस्यैकजीवमुक्तिवादस्य श्रद्धामात्रशरणत्वात्, अन्यथा जीवान्तरप्रातभासस्य स्वामिक- जीवान्तरप्रतिभासवद्विभ्रमत्वे जीवप्रतिभासमात्रस्यैव तथात्वं स्यादिति चार्वाकमतसाम्राज्यमेव वेदान्तिना प्राप्तं स्यात् । उक्तश्रु- तयस्तु कर्मण एव व्यवधायकत्वं क्षीणकर्मात्मन एव च ब्रह्मभूयं प्रतिपादयितुमुत्सहन्त इति किं शशशृङ्गसहोदराज्ञानादिकल्पनया तदभिप्रायविडम्बनेन । निर्विकल्पकब्रह्मबोधोऽपि शुद्धद्रव्यनयादेशतामेवावलम्बताम्, सर्वपर्यायनयविषयव्युत्क्रम एव तत्प्रवृत्तेः न तु सर्वथा जगदभावपक्षपातितामिति सम्यग्दृशां वचनोद्गारः ॥ शाब्द एव स इत्यत्र तु नाग्रहः, यावत्पर्यायोपरागासम्भववि- चार सहकृतेन मनसैव तद्ग्रहसम्भवात्, न केवलमात्मनि, किं तु सर्वत्रैव द्रव्ये पर्यायोपरागानुपपत्तिप्रसूतविचारे मनसा निर्विकल्पक केललज्ञान- निरूपणे वेदान्तिम- तखण्डने ज्ञानस्याज्ञा- ननिवर्तकत्वे प्रमाणतया वेदान्त्युपद- शितयोःश्रु- तिश्रुतार्थाप- त्योरेकजीव- वादखण्डने- न जैनेष्टक- मंगतमुक्ति- व्यवधायक. HA परतयानय- नम् ॥

HERE - श्रीज्ञान- विन्दु प्रकरणम्॥ ॥ १०६॥ एव प्रत्ययोऽनुभूयते ।उक्तंचसम्मतौ-"पज्जवणयवुकतं,वत्थू दवट्ठियस्स वत्तव्वं ॥जाव दविओवओगो अपच्छिमवियप्पनिव्य- यणो ॥१-८॥ इति"। पर्यायनयेन व्युत्क्रान्तं गृहीत्वा विचारेण मुक्तं, वस्तुद्रव्यार्यिकस्य वक्तव्यं, यथा घटो द्रव्यमित्यत्र घटत्वविशिष्टस्य परिच्छिन्नस्य द्रव्यत्वविशिष्टेनापरिच्छिन्नेन सहाभेदान्वयासम्भव इति मृदेव द्रव्यमिति द्रव्यार्थिकप्रवृत्तिः, तत्रापि सूक्ष्मेक्षिकायामपरापरद्रव्यार्थिकप्रवृत्तियविद्रव्योपयोगः, न विद्यते पश्चिमे उत्तरे विकल्पनिर्वचने सविकल्पकधीव्यवहारौ यत्र स तथा शुद्धसङ्ग्रहावसान इति यावत्, ततः परं विकल्पवचनाप्रवृत्ते। इत्येतस्याअर्थः ॥ "तत्वमसि' इत्यादावष्यात्मनस्त - तदन्यद्रव्यपर्यायोपरागासम्भवविचारशतप्रवृत्तावेव शुद्धद्रव्यविषयं निर्विकल्पकमिति शुद्धदृष्टौ घटज्ञानाद्ब्रह्मज्ञानस्य को भेदः । एकत्र सदद्वैतमपरत्र च ज्ञानाद्वैतं विषय इत्येतावति भेदे त्वौत्तरकालिकं सविकल्पकमेव साक्षीति सविकल्पकाविकल्पकत्वयोर- प्यनेकान्त एव श्रेयान् । तदुक्तम्-" सविअप्पणिन्धिअप्प, इय पुरिसं जो भगेल अविअप्पं ॥ सविअप्पमेव वा णि-च्छएण ण स णिच्छिओ समए ॥१-३५॥ इति" न च निर्विकल्पको द्रव्योपयोगोऽवग्रह एवेति तत्र विचारसहकृतमनोजन्यत्वानुपपत्तिा, विचारस्येहात्मकत्वेनेहाजन्यस्य व्युपरताकाङ्क्षस्य तस्य नैवीयकापायरूपस्यैवाभ्युपगमात्, अपाये नामजात्यादियोजनानि- यमस्तु शुद्धद्रव्यादेशरूपश्रुतनिश्रितातिरिक्त एवेति विभावनीयं स्वसमयनिष्णातैः । ब्रह्माकारवोधस्य मानसत्वे "नावेदवि- न्मनुते तं बृहंतं वेदेनैव तद्वेदितव्यं" "तं त्वौपनिषदं पुरुष पृच्छामि" इत्यादिश्रुतिविरोध इति चेत्, शाब्दत्वेऽपि “यद्वाचान-पु. दितं,” "नचक्षुषागृह्यते, नापि वाचा,” "यतो वाचो निवर्तन्ते” इत्यादिश्रुतिविरोधस्तुल्य एव । अथ वाग्गम्यत्वनिषेधक श्रुतीनां मुख्यवृत्त्यविषयत्वावगादित्वेनोपपत्तिर्जहदजहल्लक्षणयैव ब्रह्मणि महावाक्पगम्यत्वप्रतिपादनात्, मनसि तु मुख्यामुख्यभेदाभावात् GRESEARCHECK केवलज्ञान- निरूपणे वेदान्तिमत- खण्डने नि- विकल्पकब- मत्रोषस्य शुद्धद्रव्यन- यादेशतास- मर्थनेसाक्षि- तयादर्शित- यारसम्म- तिगाथाया SINER अर्थः, निर्वि- कल्पकद्रव्यो REFE पयोगस्य मानसत्व- समर्थनश्च॥ ॥१०६ ।।

" यन्मनसा न मनुते " इत्यादिविरोध एव ॥ " सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति स मानसीन आत्मा मनसैवानुद्रष्टव्यः " इत्यादि. श्रुतौ मानसीनत्वं तु मनस्पुपाधावुपलभ्यमानत्वं, न तु मनोजन्यसाक्षात्कारत्वं, मनसैवेति तु कर्तरि तृतीया आत्मनोऽकर्तृत्व- प्रतिपादनार्था मनसो दर्शनकर्तृत्वमाह, न करणता, औपनिषदसमाख्याविरोधात् । “ कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिहीं( रित्येतत्सर्व मन एव"इति श्रुती मृद्घट इतिवदुपादानकारणत्वेन मनःसामानाधिकरण्यप्रतिपादनात् , तस्य निमित्तकारणत्वविरोधाच्चेति चेत्, न, कामादीनां मनोधर्मत्वप्रतिपादिकायाः श्रुतेर्मनःपरिणतात्मलक्षणभावमनाविषयताया एव न्याय्यत्वात्, “मनसा खेव पश्यति, मनसा शृणोति" इत्यादौ मनःकरणस्यापि श्रुतेदीर्घकालिकसंज्ञानरूपदर्शनग्रहणेन चक्षुरा- दिकरणसत्त्वेऽपि तत्रैवकारार्थान्वयोपपत्तेः, त्वन्मतेऽपि ब्रह्मणि मानसत्वविधिनिषेधयोवृत्तिविषयत्वतदुपरक्तचैतन्याविषयत्वा- भ्यामुपपत्तेश्व। शब्दस्य त्वपरोक्षज्ञानजनकत्वे स्वभावभङ्गप्रसङ्ग एव स्पष्टं दूषणम् । न च प्रथमं परोक्षज्ञानं जनयतोऽपि शब्द- स्य विचारसहकारेण पश्चादपरोक्षज्ञानजनकत्वमिति न दोष इति वाच्यम्, अर्धजरतीयन्यायापातात् । न खलु शब्दस्य परोक्षज्ञा. नजननस्वाभाव्यं सहकारिसहस्रेणाप्यन्यथाकर्तुं शक्यं, आगन्तुकस्य स्वभावत्वानुपपत्तेः। न च संस्कारसहकारेण चक्षुषा प्रत्यभि- ज्ञानात्मकप्रत्यक्षजननवदुपपत्तिः, यदंशे संस्कारसापेक्षत्वं तदंशे स्मृतित्वापातो यदंशे च चक्षुःसापेक्षत्वं तदशे प्रत्यक्षापात इति भियैव प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरत्वमिति जैनैः स्वीकारात् । “स्वे स्वे विषये युगपज्ज्ञानं जनयतोश्चक्षुःसंस्कारयोरार्थसमाजे- नैकज्ञानजनकत्वमेव पर्यवस्यति, अन्यथा रजतसंस्कारसहकारेणासनिकृष्टेऽपि रजते चाक्षुषज्ञानापत्तेरन्यथाख्यात्यस्वीकारभङ्गप्र- सङ्ग” इति वदस्तपस्वी तूभयात्मकैकज्ञानाननुव्यवसायादेव निराकर्तव्या,अन्यथा रजतभ्रमेऽप्युभयात्मकतापत्तेः,पर्वतो वधिमा- ANSRISRURES केवलहान- निरूपणे वेदान्तिमत. खण्डने ब्रह्म- ज्ञानस्य न मानसत्व किन्तु शा. ब्दत्वमेवेति वेदान्तिप्र- श्नप्रतिवि- धाने तस्य मानसत्व स्थापनं श- ब्दस्य परो- क्षज्ञानजन- कत्वमेवेति स्थापनश्च न MES

न
भीमान-
बिन्दु
प्रकरणम्॥
३१०७॥
केवलज्ञान-
निरूपणे
वेदान्तिम-
तखण्डने पु-
नब्रह्मापरो-
A
क्षज्ञानजन-
नित्यनुमितावपि उभयसमाजादंशे प्रत्यक्षानुमित्यात्मकतापत्तेश्च । अथ मनस इव शब्दस्य परोक्षापरोक्षज्ञानजननस्वभावाङ्गी-
काराददोषः, मनस्त्वेन परोक्षज्ञानजनकता, इन्द्रियत्वेन चापरोक्षज्ञानजनकतेत्यस्ति मनस्यवच्छेदकभेद इति चेत्, शब्दस्यापि
विषयाजन्यज्ञानजनकत्वेन वा ज्ञानजनकत्वेन वा परोक्षज्ञानजनकता योग्यपदार्थनिरूपितत्वम्पदार्थाभेदपरशब्दत्वेन चापरोक्षज्ञान-
जनकतेति कथं नावच्छेदकभेदः । धार्मिकस्त्वमसीत्यादौ व्यभिचारवारणाय निरूपितान्तं विशेषणं, इतरल्यावर्त्य तु स्पष्टमेव ।
एतच्च 'दशमस्त्वमसि' 'राजा त्वमसि' इत्यादिवाक्यादशमोऽहमस्मि राजाहमस्मीत्यादिसाक्षात्कारदर्शनात्कल्प्यते, नाहं
दशम इत्यादिभ्रमनिवृत्तरत इत्थमेव सम्भवात् । साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात्कारिविरोधिज्ञानत्वेनैव विरोधित्वकल्पनात् । न च
तत्र वाक्यात्पदार्थमात्रोपस्थितौ मानसः संसर्गबोध इति वाच्यम्, सर्वत्र वाक्ये तथा वक्तुं शक्यत्वेन शब्दप्रमाणमात्रोच्छेदप्र-
सङ्गादिति चेत्, मैवम्, दशमस्त्वमसीत्यादौ वाक्यात्परोक्षज्ञानानन्तरं मानसज्ञानान्तरस्यैव भ्रमनिवर्तकत्वकल्पनात्, धार्मिकस्त्व-
मसीत्यादौ विशेष्यांशस्य योग्यत्वादेव योग्यपदार्थनिरूपितेत्यत्र योग्यपदार्थतावच्छेदकविशिष्टत्यस्यावश्यवाच्यत्वेन महावा-
क्यादपि तत्पदार्थतावच्छेदकस्यायोग्यत्वेनापरोक्षज्ञानासम्भवाच, अयोग्यांशत्यागयोग्यांशोपादानाभिमुखलक्षणावत्त्वमेव योग्य-
पदार्थत्वमित्युक्तौ च धार्मिकस्त्वमसीत्यादावपि शुद्धापरोक्षविषयत्वे तव्यावतकविशेषणदानानुपपचिः,तथा च योग्यलक्ष्यपरत्वग्रहे
उदाहरणस्थानदौलभ्यं । अयं च विषयोऽस्माकं पर्यायविनिर्माण शुद्धद्रव्यविषयतापर्यवसायकस्य द्रव्यनयस्येत्यलं ब्रह्मवादेन ॥
किन त्वम्पदार्थाभेदपरशन्दत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वोक्तो 'यूयं राजान' इत्यतोऽखिलसम्बोध्यविशेष्यकराजत्वप्रकारकापरोक्ष-
शान्दापत्तिा, तत्र तादृशमानसाभ्युपगमे चान्यत्र कोऽपराधः । एतेन" एकवचनान्तत्वम्पदार्थग्रहणेऽपि न निस्तारः,"एकस्मिन्नेव
कत्वस्य श-
ब्दे व्यवस्था-
पनपक्षे वेदा-
त्याशको-
न्मूलिता ॥
।
AURRER
॥ १०७॥

RSES युयमिति प्रयोगेगतेब,एकाभिप्रायकत्वम्पदग्रहणे च तचदभिप्रायकशब्दत्वेन तत्चच्छाब्दबोधहेतुत्वमेव युक्तम् । अत एव 'वाक्यादपि द्रव्यादेशावखण्डः,पदादपि च पर्यायादेशात सखण्ड: शाब्दबोध'इति जैनी शास्त्रव्यवस्था । तस्माष शम्दस्यापरोक्ष- ज्ञानजनकत्वम् ।एतेन "अपरोक्षपदार्थाभेदपरशब्दत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वं,अत एव शुक्तिरियमिति वाक्यादाहत्य रजतभ्रमनिवृत्तिः, एवं च चैतन्यस्य वास्तवापरोक्षत्वादपरोक्षज्ञानजनकत्वं महावाक्यस्य" इत्यपि निरस्तम्, वास्तवापरोक्षस्वरूपविषयत्वस्य त्वनीत्या तश्चमस्यादिवाक्ये सम्भवेऽपि 'दशमस्त्वमसि इत्यादावसम्भवात,निवृत्ताज्ञानविषयत्वस्य च शाब्दबोधात्पूर्वमभावात् यदा कदाचि- भिवृत्ताज्ञानत्वग्रहणे पर्वतो वद्धिमानित्यादिवाक्यानामप्यपरोक्षस्वरूपविषयतयाऽपरोक्षज्ञानजनकत्वप्रसङ्गात् " यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" "सत्यं ज्ञानमनन्तं" इत्यादिवाक्यानामपरोक्षस्वरूपविषयतयाऽपरोक्षज्ञानजनकत्वे महावाक्यवैयापाताच्च । किश्चैवं घटोऽस्तीतिशाब्दे चाक्षुषत्वमप्यापतेत,अपरोक्षपदार्थाभेदपरशब्दादिवापरोक्षपक्षसाध्यकानुमितिसामग्रीतोऽपरोक्षानुमितिरपि च प्रसज्येत । एवं च भिन्नविषयत्वाद्यप्रवेशेनैवानुमितिसामय्या लाघवादलवत्त्वमिति विशेषदर्शनकालीनभ्रमसंशयोत्तरप्रत्यक्षमा- वोच्छेद इति बहुतरं दुर्घटम् । एतेन"प्रमात्रभेदविषयत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वम्" इत्यपि निरस्तम् , सर्वज्ञत्वादिविशिष्टोऽसि इत्यादि- वाक्यादपि तथाप्रसङ्गात् , ईश्वरो मदभिन्नः, चेतनत्वाद्, मद्, इत्यनुमानादपि तथाप्रसङ्गाचेति । “महावाक्यजन्यमपरोक्षं शुद्धनमविषयमेव केवलज्ञानम्" इति वेदान्तिनां महानेव मिथ्यात्वाभिनिवेश इति विभावनीयं सूरि(सुधी)भिः॥ इदमिदानीं निरूप्यते-केवलज्ञानं स्वसमानाधिकरणकेवलदर्शनसमानकालीनं न वा,' 'केवलज्ञानक्षणत्वं स्वसमानाधि- करणदर्शनक्षणाव्यवहितोचरत्वव्याप्यं न वा ?' एवमाद्याः क्रमोपयोगवादिनां जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादानां, केवलज्ञान- निरूपणे वेदान्तिमत- खण्डनेऽप- रोक्षाभेदपर- त्वेन प्रमात्र. भेदविषयत्वे. न च शब्द- स्यापरोक्ष- ज्ञानजनक- त्वमितित- त्पश्नपति- विधानं वे- दान्तिमत- स्खण्डनस- माप्तिः॥ म

अMAN
भीज्ञान-
बिन्दु-
प्रकरणम्॥
॥ १०८ ॥
युगपदुपयोगवादिनां च मल्लवादिप्रभृतीनां, 'यदेव केवलज्ञानं तदेव केवलदर्शनम्' इतिवादिनां च महावादिश्रीसिद्धसे.
नदिवाकराणां साधारण्यो विप्रतिपत्तयः ॥ यत्तु युगपदुपयोगवादित्वं सिद्धसेनाचार्याणां नन्दिवृत्तायुक्तं तदभ्युपग-
मवादाभिप्रायेण, न तु स्वतन्त्रसिद्धान्ताभिप्रायेण, क्रमाक्रमोपयोगद्वयपर्यनुयोगानन्तरमेव स्वपक्षस्य सम्मतावुद्भावितत्वा-
दिति द्रष्टव्यम् । एतच तत्त्वं सयुक्तिकं सम्मतिगाथाभिरेव प्रदर्शयामः-"मणपज्जवनाणतो, नाणस्स य दरिसणस्स य
विसेसो।।केवलनाणं पुणद-सणंति नाणंति य समाण।।काण्ड२-३॥"युगपदुपयोगद्वयाभ्युपगमवादोऽयम्-मनापर्यायज्ञानमन्तः
पर्यवसानं यस्य स तथा, ज्ञानस्य दर्शनस्य च विश्लेषः पृथग्भाव इति साध्यम्।अत्र च छद्मस्थोपयोगत्वं हेतुर्द्रष्टव्या,
तथा च प्रयोगः-चक्षुरचक्षुरवधिज्ञानानि चक्षुरचक्षुरवधिदर्शनेभ्यः पृथक्कालानि, छद्मस्थोपयोगात्मकज्ञानत्वातू, श्रुतमन:-
पर्यायज्ञानवत् । वाक्यार्थविषये श्रुतज्ञाने, मनोद्रव्यविशेषालम्बने मनःपर्यायज्ञाने चादर्शनस्वभावे मत्यधिजादर्शनोपयोगा-
गिनकालत्वं प्रसिद्धमेवेति टीकाकृतः । दर्शनत्रयपृथकालत्वस्य कुत्राप्येकस्मिन्नसिसाधयिषितत्वात् , स्वदर्शनपृथकाल त्वस्य च
सिसाधयिषितस्योक्तदृष्टान्तयोरभावात्सावरणत्वं हेतुः, व्यतिरेकी च प्रयोगः, तजन्यत्वं वा हेतुा, 'यद्यअन्यं तनतः पृथकालम्
इति सामान्यव्याप्तौ यथा दण्डात् घट इति च दृष्टान्त इति तु युक्तं, केवलज्ञानं पुनदर्शनं दर्शनोपयोग इति वा ज्ञानं ज्ञानो-
पयोग इति वा समानं तुल्यकालं तुल्यकालीनोपयोगद्वयात्मकमित्यर्थः, प्रयोगश्च-केवलिनो ज्ञानदर्शनोपयोगावेककालीनौ,
युगपदाविर्भूतस्वभावत्वात्, यावेवं तावेवं, यथा खेः प्रकाशतापौ । अयमभिप्राय आगमविरोधीति केषाश्चिन्मतं, तानविक्षिपनाह
(सम्मतिः)-" केई मणंति जइया, जाणइ तइआ ण पासइ जिणो ति ॥ सुत्तमवलंबमागा, तित्थयरासायणाभीरू ॥२-४ ॥"
RULESS
केवलज्ञान-
दर्शनयो
दाभेदविचारे
भेदेपिक्रम-
वादि पूज्य
जिनभद्रगणि
क्षमाश्रमणा-
नां योगपद्य-
वादिमल्ल-
वादिप्रभृ-
तोनाम्, अ.
भेद एव
ISREKOIRALARSARLS
तयोरिति-
तदैक्यवादि
सिद्धसेन-
दिवाकराणां
विचारास्त-
त्र सम्मति-
तात्पर्यम् ॥
॥१०८॥

- केचिनिनभद्रानुयायिनो भणन्ति-'यदा जानाति तदान पश्यति जिन' इति । सूत्रं-"केवली णं मते इमं रयणप्पभं पुढवि आयारेहिं पमाणाह हेऊहिं संठाणेहि परिसोरहिं जं समयं जाणइ णोतं समयं पासइ १, इंता गोयमा! केवली ण" इत्यादिकं अवलम्बमानाः। अस्य च सूत्रस्य किलायमर्थस्तेपामभिमत:-'केवली सम्पूर्णबोधः, णमिति वाक्यालङ्कारे । मते इति भगवन् ! इमारत्नप्रभामन्चर्थाभिधानां पृथ्वीमाकारैः समनिम्नोन्नतादिभिः,प्रमाणैयादिभिः, हेतुभिरनन्तानन्तप्रदेशिकैः स्कन्धैः,संस्थानः परिमण्डलादिभिः, परिवारैधनोदधिवलयादिभिः। जं समयं णो तं समपमिति च 'कालाधनारेत्यन्तसंयोगे' (पा.२-३ ५.) इति द्वितीया सप्तमीवाधिका,तेन यदा जानाति न तदा पश्यतीति भावः । विशेपोपयोगः सामान्योपयोगान्तरितः, सामान्योपयोगच विशे- पोपयोगान्तरितः,तत्स्वाभाव्यादिति प्रश्नार्थः ।उत्तरं पुना'हंता गोयमा!'इत्यादिकं प्रश्नानुमोदकं हवेत्येतन्निगमनप्रकारणे, गौतमति गोत्रेणामंत्रणं प्रश्नानुमोदनार्थं पुनस्तदेव सूत्रमुच्चारणीयं हेतुप्रश्नस्य चात्र सूत्रे उत्तरं। "सागारे से नाणे हवइ, अणागारे से दसणे" इति,साकारं विशेपावलम्मि अस्य केवलिनो ज्ञानं भवति, अनाकारमतिकान्तविशेषं सामान्यावलम्बि दर्शनं । न चानेकप्रत्ययोत्प. तिरेकदा निरावरणस्यापि तत्स्वाभाव्यात् । न हि चक्षुर्शनकाले श्रोत्रज्ञानोत्पचिरुपलभ्यते । न चावृतत्वात्तदा तदनुत्पत्तिः, स्वसमयेऽप्यनुत्पत्तिप्रसङ्गात् । न चाणुना मनसा यदा यदिन्द्रियसंयोगस्तदा तज्ज्ञानमिति क्रमः पखाद्यभिमतोऽपि युक्तिमान्?, सर्वाङ्गीणसुखोपलम्भायुपपत्तये मनोवर्गणापुद्गलानां शरीरव्यापकत्वस्यैव कल्पनात् सुषुप्तौ ज्ञानानुत्पत्तये त्वङ्मनायोगस्य ज्ञान- सामान्ये हेतुत्वेन रासनकाले त्वाचरासनोभयोत्पत्तिवारणस्येत्थमप्यसम्भवाच । ततो युगपदनेकप्रत्ययानुत्पत्तों स्वभाव एव कारण नान्यत्, सन्निहितेऽपि च द्वयात्मके विषये सर्वविशेषानेव केवलज्ञानं गृह्णाति, सर्वसामान्यानि च केवलदर्शन मिति स्वभाव केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञान- दर्शनोपयो- गविषये क्र. मोपयोगवा- द्यभिमतप्र- ज्ञापनाविंश- तितमपदसू- त्रार्थ:,क्रमो- पयोगसाघ- कोपपत्त्युपद- शन च ॥ अरब १९

मौजान-
नेर
केवलज्ञान-
निरूपणे
केवलज्ञान-
दर्शनोपयोग-
प्रकरणम्॥
०९॥
विषये युगप-
एवानयोरिति । एते च व्याख्यातारस्तीर्थकराशातनाया अभीरवः तीर्थकरमाशातयन्तो न विभ्यतीति यायत् । एवं हि नि:-
सामान्यस्य निर्विशेषस्य वा वस्तुनोऽभावेन न किछिज्जानाति केवली न किश्चित्पश्यतीत्यधिक्षेपस्यैव पर्यवसानात् । न चान्य-
तरमुख्योपसर्जनविषयतामपेक्ष्योभयग्राहित्वेऽप्युपयोगक्रमाविरोधः, मुख्योपसर्जनभावेनोभयग्रहणस्य क्षयोपशमविशेषप्रयोज्य-
त्वात् , केवलज्ञाने छद्मस्थज्ञानीययावद्विषयतोपगमेऽवग्रहादिसङ्कीर्णरूपप्रसङ्गाद्, उक्तसूत्रस्य तु न भवदुक्त एवार्थः, किं त्वयं,
'केवलीमां रत्नप्रभा पृथिवीं वैराकारादिभिः समकं तुल्यं जानाति, न तैराकारादिभिस्तुल्यं पश्यतीति किमेवं ग्राह्य ?, हंता-एवमिः
त्यनुमोदना, ततो हेतौ पृष्टे सति तत्प्रतिवचनं भिन्नालम्बनप्रदर्शकं तज्ज्ञानं साकारं भवति यतो दर्शनं पुनरनाकारमित्यतो
भिन्नालम्बनावेतौ प्रत्ययाविति' टीकाकृतः । अत्र यद्यपि जं समयं इत्यत्र जं इति अम्भावः प्राकृतलक्षणात् , यत्कृतमित्यत्र जं
कयमिति प्रयोगस्य लोकेऽपि दर्शनादिति वक्तुं शक्यते, तथापि तृतीयान्तपदवाच्यैराकारादिभिलप्सत्तीयान्तसमासस्थयत्पदार्थस्य
समकपदार्थस्य चान्यूनानतिरिक्तधर्मविशिष्टस्य रत्नप्रभायां भिन्नलिङ्गत्वादनन्वय इति यत् समकमित्यादिक्रियाविशेषणत्वेन
व्याख्येयम् । रत्नप्रभाकर्मकाकारादिनिरूपितयावदन्यूनानतिरिक्तविषयताकज्ञानवान् न तादृशतावदन्यूनानतिरिक्तविषयताकदर्श
नवान् केवलीति फलितोर्थः । यदि च तादृशस्य विशिष्टदर्शनस्य निषेध्यस्याप्रसिद्धेनं तनिषेधः "असतो णस्थि णिसेहो" (विशे.
१५७४) इत्यादिवचनादिति सूक्ष्ममीक्ष्यते, तदा 'क्रियाप्रधानमाख्यातम्' इति वैयाकरणनयाश्रयणेन रत्नप्रभाकर्मकाकारा-
दिनिरूपितयावदन्यूनानतिरिक्तविषयताकं ज्ञानं, न तादृशं केवलिकर्तृकं दर्शनमित्येव बोधा, सर्वनयात्मके भगवत्प्रवचने यथो-
पपमान्यतरनयग्रहणे दोषाभावादिति तु वयमालोचयामः । हेतुयोगपद्यादपि बलेनोपयोगयोगपद्यमापततीत्याह-"केवलनाणा-
दुपयोगहय-
वादि-नद
भेदवादिम.
तेनोक्तस्-
T
त्राथः,तद्वि.
पयारेकाप्र-
तिविधान
च ॥
॥ १०९ ॥

. । वरण-पखयजायं केवलं जहा नाणं । तह दंसणं पि जुज्जइ,णियआवरणक्खयस्संते ॥२-५॥" स्पष्टा,नवरं निजावरणक्षयस्यान्त इति दर्शनावरणक्षयस्यानन्तरक्षण इत्यर्थः । न चैकदोभयावरणक्षयेऽपि स्वभावहेतुक एवोपयोगक्रम इत्युक्तमपि साम्प्रतं, एवं सति स्वभावेनैव सर्वत्र निर्वाह कारणान्तरोच्छेदप्रसङ्गात् , कार्योत्पत्तिस्वभावस्य कारणेनैव तत्क्रमस्वभावस्य तत्क्रमणैव निर्वा- ह्यत्वाच । एतेन " सर्वव्यक्तिविषयकत्वसर्वजातिविषयकत्वयोः पृथगेवावरणक्षयकार्यतावच्छेदकत्वादर्थतस्तदवच्छिन्नोपयोगद्वय- सिद्धिः" इत्यप्यपास्तम् । तत्सिद्धावपि तत्क्रमासिद्धेरावरणद्वयक्षयकार्ययोः समप्राधान्यनार्थगतेरप्रसराच । न च मतिश्रुतज्ञाना- वरणयोरेकदा क्षयोपशमेऽपि यथा तदुपयोगक्रमस्तथा ज्ञानदर्शनावरणयोर्युगपत्क्षयेऽपि केबलिनामुपयोगक्रमः स्यादिति शङ्कनीयं, तत्र श्रुतोपयोगे मतिज्ञानस्य हेतुत्वेन शाब्दादौ प्रत्यक्षादिमामश्याः प्रतिबन्धकत्वेन च तत्सम्भवात् । अत्र तु क्षीणावरणत्वेन परस्परकार्यकारणभावप्रतिबध्यप्रतिबन्धकभावाद्यभावेन विशेषात् । एतदेवाह-"भण्णइ खीणावरणे, जह मइनाणं जिणे ण संभवइ ॥ तह खीणावरणिज्जे, विसेसओ दंसणं णस्थि ॥२-६॥" भण्यते निश्चित्योच्यते, क्षीणावरणे जिने यथा मतिज्ञानं मत्यादिज्ञानं अवग्रहादिचतुष्टयरूपं वा ज्ञानं न सम्भवति, तथा क्षीणावरणीये विश्लेषतो ज्ञानोपयोगकालान्य- काले दर्शनं नास्ति क्रमोपयोगत्वस्य मत्याद्यात्मकत्वव्याप्यत्वात्सामान्याविशेषोभयालम्बनक्रमोपयोगत्वस्य चावग्रहाद्यात्मक- त्वच्याप्यत्वात्केवलयोः क्रमोपयोगत्वे तत्त्वापत्तिरित्यापादनपरोऽयं ग्रन्थः । प्रमाणं तु-"केवलदर्शनं केवलज्ञानतुल्यकालोत्पत्तिक, तदेककालीनसामग्रीकत्वात् , तादृशकार्यान्तरवत्", इत्युक्ततर्कानुगृहीतमनुमानमेवेति द्रष्टव्यम् । न केवलं क्रमवादिनोऽनुमान- विरोधः, अपि त्वागमविरोधोऽपीत्याह-"सुत्तमि चेव साइ-अपज्जवसियं वि केवलं वुत्तं । सुत्तासायणभीरू-हि तं च दट्ठन्वयं केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञान- दर्शनयोरुप- योगयोग- पद्यसमर्थ- नं क्रमवादि- नोनुमानाम- मादिविरोष प्रदशनञ्ज॥ CIRCREATE

___
२
विन्दु-
प्रकरणम्॥
को ११०॥
केवलज्ञान-
निरूपणे
केवलज्ञान-
दर्शनयोः
साद्यनन्त-
स्थितिकत्वे-
+
Fe
होइ ॥२-७।।" साद्यपर्यवसित केवलज्ञानदर्शने सूत्रे प्रोक्ते, क्रमोपयोगे तु द्वितीयसमये तयोः पर्यवसानमिति कृतोऽपर्यवसित्ता ?
तेन सूत्राशातनाभीरुभिःक्रमोपयोगवादिभिस्तदपि द्रष्टव्यं । चोऽप्यर्थः । न केवलं "केवली गं भंते इमं रयणप्पमं पुढविं'
इत्याधुक्तसूत्रयथाश्रुतार्थानुपपत्तिमात्रमिति भावः । न च द्रव्यापेक्षयाऽपर्यवसितत्वं समाधेयं, द्रव्यावषयप्रश्नोत्तरा श्रुतेः । न च
'अर्पितानर्पितसिद्धेः' इति तत्त्वार्थ (५२०३१) सूत्रानुरोधेन द्रव्यापणयाऽश्रुतयोरपि तयोः कल्पनं युक्तं,अन्यथा पर्यायाणामुत्पाद-
विगमात्मकत्वाद् भवतोऽपि कथं तयोरपर्यवसानतेति पर्यनुयोज्यम्?, यद्धर्मावच्छिन्ने क्रमिकत्वप्रसिद्धिः तद्धर्मावच्छिन्ने ऽपर्यवसि
तत्वान्वयस्य निराकांक्षत्वात् , अन्यथा ऋजुत्ववक्रत्वे अपर्यवसिते इति प्रयोगस्यापि प्रसङ्गात् , मम तु रूपरसात्मकैकद्रव्यवद क्रम-
भाविभिन्नोपाधिकोत्पादविगमात्मकत्वेऽपि केवलिद्रव्यादव्यतिरेकतस्तयोरपर्यवसितत्वं नानुपपन्नम् । अथ पर्यायत्वावच्छेदकधर्म-
विनिर्मोकेण शुद्धद्रव्यार्थादेशप्रवृत्तेः क्रमैकान्तेऽपि केवलयोरपर्यवसितत्वमुपपत्स्यते, अत एव पर्यायद्रव्ययोरादिष्टद्रव्यपर्यायत्वं
सिद्धान्त गीयते । तत्तदयच्छेदकविनिर्मोफस्य विवक्षाधीनत्वादिति चेत्, किमयमुक्तधर्मविनिर्मोकस्तत्तत्पदार्थतावच्छेदेकविशिष्टयो-
रभेदान्वयानुपपच्या शुद्धद्रव्यलक्षणया, उत उक्तधर्मस्य विशेषणत्वपरित्यागेनोपलक्षणत्वमात्र विवक्षया ?। आये आद्यपद एव
लक्षणायां शुद्धद्रव्यं शुद्धात्मद्रव्यं वाऽपर्यवसितमित्येव बोधः स्यात् , सादित्वस्यापि तत्रान्वयप्रवेशे तु केवलिद्रव्यं सायपर्य-
वसितमित्याकारक एव, उभयपदलक्षणायां तु शुद्धद्रव्यविषयको निर्विकल्पक एव बोध इति केवलज्ञानदर्शने साद्यपर्यवासिते इति
बोधस्य कथमप्यनुपपत्तिः । अन्त्ये च केवलत्वोपलक्षितात्मद्रव्यमात्रग्रहणे तत्र सादित्वान्वयानुपपत्तिः, केवलिपर्यायग्रहणे च
नवविधोपचारमध्ये 'पर्याये पर्यायोपचार' एवाश्रयणीयः स्यादिति समीचीनं द्रव्यार्थादेशसमर्थनं। नियतोपलक्ष्यतावच्छेदकरूपा-
नापि युगप-
दुपयोगव्यव-
स्थापन
॥ ११०॥

954 केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञान- दर्शनयोरु- पयोगाक्रम- वादिमतेन क्रमवादिमतं निरस्य ज्ञान- भावपि सम्मुग्धोपलक्ष्यविषयकतादृशबोधस्वीकारे च 'पर्यायोऽपर्यवसित' इत्पादेरपि प्रसक्तिद्रव्यार्थतया केवळज्ञानकेवलदर्शन- योरपर्यवसितत्वाभ्युपगमे द्वितीयक्षणेऽपि तयोः सद्भावप्रसक्तिः, अन्यथा द्रव्यार्थत्वायोगात् । तदेवं क्रमाभ्युपगमे तयोरागमविरोध इत्युपसंहरन्नाह-" संतमि केवले दं-सणम्मि नाणस्स संभवोणत्थि । केवलनाणम्मि य दं-सणस्स तम्हा अनिहणाई ॥२-८॥" स्वरूपतो द्वयोः क्रमिकत्वेऽन्यतरकालेऽन्यतराभावप्रसङ्गः, तथा चोक्तवक्ष्यमाणदूपणगणोपनिपात:,तस्माद् द्वावप्युपयोगी केवलिनः स्वरूपतोऽनिधनावित्यर्थः । इत्थं ग्रन्थकूदक्रमोपयोगद्वयाभ्युपगमेन क्रमोपयोगवादिनं पर्यनुयुज्य स्वपक्षं दर्शयितुमाह- "दसणनाणावरण-क्खए समाणम्मि कस्स पुचयरो(रं) ॥ होन व समओप्पाओ, हंदि दुवे णत्थि उवोगा ।। २-९ ॥ सामान्यविशेषपरिच्छेदावरणापगमे कस्य प्रथमतरमुत्पादो भवेत् ? अन्य तरोत्पादे तदितरस्याप्युत्पादप्रसङ्गात् , अन्यतरसामय्या अन्यतरप्रतिबन्धकत्वे चोभयोरप्यभावप्रसङ्गात् सव्वाओ लद्धीओ सागारोवओगोवउत्तस्सेति वचनप्रामाण्यात्प्रथमं केवल. ज्ञानस्य पथात्केवलदर्शनस्योत्पाद इति चेत् , न, एतद्वचनस्य लब्धियोगपद्य एव साक्षित्वादुपयोगक्रमाक्रमयोरौदासीन्यात् । योगपद्येनापि निर्वाहेऽर्थादर्शनेऽनन्तरोत्पत्त्यासिद्धेः एकक्षणोत्पत्तिककेवलज्ञानयोरेकक्षणन्यूनाधिकायुष्कयोः केवलिनोः क्रमिको- पयोगद्वयधाराया निर्वाहयितुमशक्यत्वाच । अथ ज्ञानोपयोगसामान्ये दर्शनोपयोगत्वेन हेतुतेति निर्विकल्पकसमाधिरूपच्छद्मस्थ- कालीनदर्शनात् प्रथमं केवलज्ञानोत्पत्तिः केवलदर्शने केवलज्ञानत्वेन विशिष्य हेतुत्वाच्च द्वितीयक्षणे केवलदर्शनोत्पत्तिः, ततश्च क्रमिकसामग्रीद्वयसम्पत्त्या क्रमिकोपयोगद्वयधारानिहि इति, एकक्षणन्यूनाधिकायुष्कयोस्त्वेकक्षणे केवलज्ञानोत्पत्यस्वीकार एव गतिरिति चेत् ,न, "दसणपुव्वं नाणं (२-२२)” इत्यादिना तथाहेतुत्वस्य प्रमाणाभावेन निरसनीयत्वात् , उत्पन्नस्य केवलज्ञानस्य दर्शनयोः के- वलिन्यैक्य- मिति स्क- सिद्धान्तस- मर्थनमेक- क्षणविषमा- युद्दष्टान्तेन क्रमपक्षनि- रासच॥ SAR RECE भीमान- करणम्॥ RECRUIRS क्षायिकभावत्वेन नाशायोगाच । न च मुक्तिसमये क्षायिकचारित्रनाशवदुपपत्तिः क्षायिकत्वेऽपि तस्य योगस्थैर्य निमित्तकत्वेन निमित्तनाशनाश्यत्वात् , केवलज्ञानस्य चानमित्तिकत्वादुत्पत्तौ ज्ञप्तौ चावरणक्षयातिरिक्तनिमित्तानपेक्षत्वनैव तस्य स्वतन्त्रप्रमाण- त्वव्यवस्थितेः, अन्यथा ' सापेक्षमसमर्थम्' इति न्यायात्तत्राप्रामाण्यप्रसङ्गात् । एतेन 'केवलदर्शनसामग्रीत्वेन स्वस्यैव स्वना- शकत्वमिति केवलज्ञानक्षणिकत्वम्' इत्यायपास्तम् , अनैमित्तिक क्षणिकवायोगात्, अन्यथा तत्क्षण एव तत्क्षणवृत्तिकार्य नाशक इति सर्वत्रैव सूक्ष्म सूत्र नयसाम्राज्यस्य दुर्निवारत्वादिति किमतिपल्लवितेन ? । नन्वियमनुपपत्तिः क्रमोपयोगपक्ष एवे- त्यक्रमों द्वावुपयोगौ स्तामित्याशङ्कते मल्लवादी, "भवेद्वा समयमेककालमुत्पादस्तयोरिति” तत्रैकोपयोगवादी ग्रन्थकृत् सिद्धा न्तयति, हंदि ज्ञायता, द्वावुपयोगी नैकदेति, सामान्यविशेषपरिच्छदात्मकत्वात्केवलज्ञानस्य, यदेव ज्ञानं तदेव दर्शनमित्य- व निर्भरः, उभयहेतुसमाजे समूहालम्बनोत्पादस्यैवान्यन दृष्टत्वान्नात्रापरिदृष्टकल्पनाक्लेश इति भावः । अस्मिन्नेव वादे केवलिनः सर्वज्ञतासम्भव इत्याह-"जइ सव्वं सायारं, जाणइ एकसमएण सव्वण्णू।।जुजइ सया ति एवं, अहवा सन्नं न जाणाइ।।२-१०॥" यदि सर्व सामान्यविशेषात्मकं जगत्, साकार तत्तजातिव्यक्तिवृत्तिधर्मविशिष्टं। साकारमिति क्रियाविशेषणं वा । निरवच्छि- नतत्तजातिप्रकारतानिरूपिततत्तद्वयक्तिविशेष्यतासहितं परस्परं यावद्र्व्यपर्यायनिरूपितविपयतासहितं वा यथा स्यात्तथेत्यर्थः । जानात्येऊसमयेन सर्वज्ञः पश्यीत चेति शेषः, तदा सदापि सर्वकालंयुज्यते,एवं सर्नज्ञत्वं सर्वदर्शित्वं चेत्यर्थः । अथवेत्येतद्वैप- रीत्ये, सर्व न जानाति सर्व न जानीयादेकदेशोपयोगवर्तित्वान्मतिज्ञानवदित्यर्थः । तथा च केवलज्ञानमेव केवलदर्शनमिति स्थितम्। अव्यक्तत्वादपि पृथग्दर्शनं केवलिनि न सम्भवतीत्याह-"परिसुद्धं सायारं, अविअत्तं दसणं अणायारं ।। ण य खीणा- केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञान- दर्शनयोरे- क्यमित्यस्मि न्यक्ष एवं सर्वज्ञतास- म्भवस्य यु: क्तितः साधनम् ॥ ॥१११॥ --- वरणिज्जे, जुजह स(सु)वियत्तमविअत्तं ॥२-११॥" ज्ञानस्य हि व्यक्ततारूपं, दर्शनस्य पुनरव्यक्तता । न च क्षीणावरणेऽर्हति व्यक्तताऽव्यक्तते युज्यते,ततः 'सामान्यविशेषज्ञेयसंस्पयुभयकस्वभाव एवायं केवलिप्रत्यया', न च ब्राह्यद्वित्वाद्दाकद्वित्वमिति सम्भावनापि युक्ता, केवलज्ञानस्य ग्राह्यानन्त्येनानन्ततापत्तेः, विषयभेदकृतो न ज्ञानभेद इत्यभ्युपगमे तु दर्शनपार्थक्ये का प्रत्या- शा, आवरणद्वयूक्षयानुभयैकस्वभावस्यैव कार्यस्य सम्भवात् । न चैकस्वभावप्रत्ययस्य शीतोष्णस्पर्शवत्परस्परविभिनस्वभावद्वयवि- रोधः, दर्शनस्पर्शनशक्तिद्वयात्मकैकदेवदत्तवत्स्वभावद्वयात्मकैकप्रत्ययस्य केवलिन्याविरोधात् । ज्ञानत्वदर्शनत्वधर्माभ्यां ज्ञानदर्शन- योर्भेदः, न तु धर्मिभेदेनेति परमार्थः । अत एव तदावरणभेदेऽपि स्याद्वाद एव, तदुक्तं स्तुतौ ग्रन्थकृतव (निश्चयद्वात्रिंशिका) "चक्षुर्दर्शनविज्ञानं, परमाणावौष्ण्यरौक्ष्यवत् । तदावरणमप्येकं, न वा कार्यविशेषतः॥८॥" इति । परमाणावुष्णरूक्षस्पर्शद्ध- यसमावेशवचाक्षुष ज्ञानत्वदर्शनत्वयोः समावेश इत्यर्थः ॥ इत्थं च चाक्षुषज्ञानदर्शनावरणकर्मापि परमार्थत एकं, कार्यविशेषत उपाधिभेदतो वा नैकमिति सिद्धम् । एवमवधिकेवलस्थलेऽपि द्रष्टव्यम् । तदाह-"चक्षुर्वद्विषयाख्याति-वधिज्ञानकेवले ॥शेषवृत्ति- विशेषात्तु, ते मते ज्ञानदर्शने ॥३०॥ इति"। चक्षुर्वचाक्षुपवद्विषयाख्यातिः स्पृष्टज्ञानाभावः अस्पृष्टज्ञाने इति यावत्, भावाभाव- रूपे वस्तुन्यभावत्वाभिधानमपि दोषानावहं, शेषा वृत्तयोऽस्पृष्टज्ञानानि ताभ्यो विशेषः, स्पृष्टताविशेषेण वक्ष्यमाणरीत्या स्पृष्टा- विषयवृत्तित्वव्यङ्गयेन, तस्मात्ते अवधिकेवले ज्ञानपदेन दर्शनपदेन च वाच्ये इत्येतदर्थः ।। क्रमाक्रमोपयोगद्वयपक्षे भगवतो यदापद्यते तदाह-" अद्दिष्टुं अण्णायं, च केवली एव भासइ सया वि॥ एगसमयम्मि हंदी, वयणविगप्पो ण सभवइ।।२-१२॥" आद्यपक्षे ज्ञानकालेऽदृष्टं,दर्शनकाले चाज्ञातं, द्वितीयपक्षे च सामान्यांशेऽज्ञातं विशेषांशे चादृष्टं,एवमुक्तप्रकारेण केवली || केवलज्ञान- निरूपणे ज्ञानदर्शन- योळक्ता- व्यक्तरूप- त्वेन भेद- वादिमतं वे- वलिनि तद- नुपपत्तिप्र- दर्शनेन निरासतम्॥ ॐ भीमान- निन्दु- प्रकरणम्॥ ११२ ॥ CREARN SAKSARS भाषते तत “एकस्मिन् समये ज्ञातं दृष्टं च भगवान् भाषते," इत्येष वचनस्य विकल्पो विशेषो भवदर्शने न भवतीति गृह्यतां । न चान्यतरकालेऽन्यतरोपलक्षणादुपसर्जनतया विषयान्तरग्रहणाच्चोक्तवचनविकल्पोपपत्तिः, एवं सति भ्रान्तच्छद्मस्थेऽपि तथाप्रयो- गप्रसङ्गात् । यदा कदाचित् शृङ्गग्राहिकया ज्ञानदर्शनविपयस्यैव पदार्थस्य तद्बुद्धावनुप्रवेशादिति स्मर्तव्यम् । तथा च सर्वज्ञत्वं न सम्भवतीत्याह-"अण्णायं पासतो, अद्दिष्टुं च अरहा वियाणंतो॥ किं जाणइ किं पासइ, कह सव्वण्णू त्ति वा होइ॥२-१३॥" अज्ञातं पश्यन्नदृष्टं च जानानः किं जानाति किं वा पश्यति? न किञ्चिदित्यर्थः । कथं वा तस्य सर्वज्ञता भवेत् ? न कथमपीत्यर्थः । ज्ञानदर्शनयोपियविधयैकसंख्याशालिवादप्येकत्वमित्याह- केवलनाणमणतं, जहेब तहू देसणं पि पण्णत्त ।। सागारग्गहणाहि य, णियमपरित्तं अणागारं ॥२-१४॥" यद्येकत्वं ज्ञानदर्शनयोन स्यात्तदाऽल्पविषयत्वादर्शनमनन्त न स्यादिति "अणंते केवलनाणे अर्णते केवलदंसणे" इत्यागमविरोधः प्रसज्येत, दर्शनस्य हि ज्ञानाद्भेदे साकारग्रहणादनन्तविशेषवर्ति- ज्ञानादनाकारं सामान्यमात्रावलम्बि केवलदर्शनं, यतो नियमेनकान्तेनैव परीतमल्पं भवतीति कुतो विषयाभावादनन्तता । न च उभयोस्तुल्यविषयत्वानिशेपेऽपि मुख्योपसर्जनभावकृतो विशेष इति वाच्यं, विशेषणविशेष्यभावेन तत्तत्रयजनितवैज्ञानिकसम्बन्धा- वच्छिन्नविषयतया वा तत्र कामचारात् । आपेक्षिकस्य च तस्यास्मदादिबुद्धावेवाधिरोहात् । एतच्च निरूपितं तचं "जं जं जे जे भावे" इत्यादि(आवश्यक नियुक्ति(२८२)गाथाया नयभेदेन व्याख्याद्वयेऽनेकान्तव्यवस्थायामस्माभिः(पत्र ८ पूढ२) अक्रमोपयोग- द्वयवादी तु प्रकृतगाथायां साकारे यद्ग्रणं दर्शनं तस्य नियमोऽवश्यम्भावो यावन्तो विशेषास्तावन्त्यखण्डसखण्डोपाधिरूपाणि जाति- रूपाणि वा सामान्यानीति हेतोस्तेनापरीतमनन्तमित्यकारप्रश्लेषेण व्याचष्टे, क्रमवादे ज्ञानदर्शनयोरपर्यवसितत्वादिकं नोपपद्यत इति केवलज्ञान- निरूपणे क्रमतोऽक मतो वोपयो- गद्याभ्युप- गमे भगव-- तो ज्ञातह- एभाषित्वा- संमवदोष- स्य निरूए- णम् ॥ दि. RARIES, RSAGARLSHE षयसंख्या विचारेणा- पि ज्ञानदर्श- नयोरेक्य- समर्थनन्छ। ॥११२ ।।

RA केवलज्ञान- निरूपणे उ- पयोगक्रम- वादिविहि- तस्य दोपो- क्षेपं परि यदुक्तं तत्राक्षेपमुट्टङ्कथ समाधत्ते-" भण्णइ जह चउनागी, जुज्जइ णियमा तहेव एवं पि । भण्णइ ण पंचनाणी, जहेव अरहा तहेयं पि ॥२-१५॥" भण्यते आक्षिप्यते यथा क्रमोपयोगप्रवृत्तोऽपि मत्यादिचतुर्ज्ञानी तच्छक्तिसमन्वयादपर्यवसितचतुर्ज्ञानो ज्ञातदृष्टभापी ज्ञाता द्रष्टा च नियमेन युज्यते । तथैतदप्येकत्ववादिना यदपर्यवसितत्वादिक्रमोपयोगे केवलिनि प्रेयते, तदपि साव- दिककेवलज्ञानदर्शनशक्तिसमन्वयादुपपद्यत इत्यर्थः । भण्यतेज़ोत्तरं दीयते-यथैवाईन्न पञ्चज्ञानी, तथैवैतदपि क्रमवादिना यदुच्यते, 'भेदतो ज्ञानवान् दर्शनवांश्च,' तदपि न भवतीत्यर्थः । मत्याद्यावरणक्षयेऽप्येकदेशग्राहिणो मतिज्ञानादेरिव, दर्शनावरण- क्षयेऽपि तादृशदर्शनस्य केवलिनि भेदेनानुपपत्तेरिति भावः । इयांस्तु विशेषः-यदभेदेनापि केवलज्ञाने दर्शनसंज्ञा सिद्धान्तसम्मता, न तु मतिज्ञानादिसंज्ञेति, तत्र हेतू अन्वर्थोपपत्त्यनुपपत्ती एव द्रष्टव्ये । अयं च प्रौढिवादा, वस्तुतः क्रमवादे यदा जानाति तदा पश्यतीत्यादेरनुपपत्तिरेव, आश्रयत्वस्यैवाख्यातार्थत्वात् । लब्धेस्तदर्थत्वे तु घटादर्शनवेलायामपि घटं पश्यतीतिप्रयोगप्रसङ्गात् , घटदर्शनलब्धेस्तदानीमपि विद्यमानत्वात् । चक्षुष्मान् सर्व पश्यति, न त्वन्ध' इत्यादौ त्वगत्या लब्धेर्योग्यताया वाऽऽख्या- तार्थत्वमभ्युपगम्यत एव, न तु सर्वत्राप्ययं न्यायः, अतिप्रसङ्गात् । न च सिद्धान्ते विना निक्षेपविशेषमप्रसिद्धार्थे पदवृत्ति - रखधार्यते, षट्षष्टिसागरोपमस्थितिकत्वादिकमपि मतिज्ञानादेर्लब्ध्यपेक्षयैवेति दुर्वचं, एकस्या एव क्षयोपशमरूपलब्धेस्ताव- कालमनवस्थानाव् , द्रच्याद्यपेक्षया विचित्रापरापरक्षयोपशमसन्तानस्यैव प्रवृत्त्युपगमात् । किं त्वेकजीवावच्छेदेनाज्ञानाविरि क्तविरोधिसामग्रवसमवहितपट्षष्टिसागरोपमक्षणत्वव्याप्यस्वसजातीयोत्पत्तिकत्वे सति तदधिकक्षणानुत्पत्तिकस्वसजातीयत्वरूपं तत्पारिभाषिकमेव वक्तव्यं, एवमन्यदप्यूह्यम् । क्रमेण युगपद्वा परस्परनिरपेक्षस्वविषयपर्यवसितज्ञानदर्शनोपयोगी केवलिन्यसा- हरणं । Lik

HA
HAR
श्रीमान-
बिन्दु
प्रकरणम्॥
|| ११३
थत्वान्मत्यादिज्ञानचतुष्टयवन स्त इति दृष्टान्तभावनापूर्वमाह-"पण्णवणिज्जा भावा, समत्सुअनाणदसणाविसओ। ओहिमणपज्ज-
वाण य, अण्णोग्णविलक्खणाविसओ ॥२-१६॥ तम्हा चउविभागो, जुज्जइ ण उ नाणदसण जिणाणं । सयलमणावरणमणं-
तमक्खयं केवलं जम्हा॥२-१७॥"प्रज्ञापनीया शब्दाभिलाप्या भावा द्रव्यादयः समस्तश्रुतज्ञानस्य द्वादशाङ्गवाक्यात्मकस्य
दर्शनाया दर्शनप्रयोजिकायास्तदुपजाताया बुद्धेः विषय आलम्बन, मतेरपि त एव शब्दावसिता विषया द्रष्टव्याः, शब्दपरिक
मणाहितक्षयोपशमजनितस्य ज्ञानस्य यथोक्तभावविषयस्य मतित्वान्मतिश्रुतयोरसर्वपर्यायसर्वद्रव्यविषयतया तुल्यार्थत्वप्रतिपाद-
नाच्च,अवधिमनापर्याययोः पुनरन्योन्यविलक्षणा भावा विषया, अवधे रूपिद्रव्यमानं, मनःपर्यायस्य च मन्यमानानि
द्रव्यमनासीत्यसर्वार्थान्येतानि ।। तस्माचतुर्णां मत्यादीनां विभागो युज्यते तत्तत्क्षयोपशमप्रत्ययभेदात, न तु जिनानां
ज्ञानदर्शनयोः। 'नाणदंसण त्ति' अविभक्तिको निर्देशः सूत्रत्वात् । कुतः पुनरेतदित्यत आह, यस्मात् केवलं सकलं परिपूर्ण ।
तदपि कुतः १ यतोऽनावरणं,न ह्यनावृतमसकलविषयं भवति। न च प्रदीपेन व्यभिचारः,यतोऽनन्तमनन्तार्थग्रहणप्रवृत्तं । तदपि
कुतः १ यतोऽक्षयं,क्षयो हि विरोधिसजातीयेन गुणेन स्यात्तदभावे तस्याक्षयत्वं,ततश्चानन्तत्वमनवद्यमिति भावः । तस्मादक्रमोपयो-
गद्वयात्मक एक एव केवलोपयोगः । तत्रैकत्वं व्यक्त्या, द्वयात्मकत्वं च नृसिंहत्ववदांशिकजात्यन्तररूपत्वमित्येके । माषे स्नि-
ग्धोष्णत्ववद्वयाप्यवृत्तिजातिद्वयरूपमित्यपरे । केवलत्वमावरणक्षयात, ज्ञानत्वं जातिविशेषो, दर्शनत्वं च विषयताविशेषो, दोष-
क्षयजन्यतावच्छेदक इति तु वयम् । ननु भवदुक्तपक्षे ' केवली णं' इत्यादिसूत्रे 'जं समयं ' इत्यादौ यत्समकमित्याद्यों न
सर्वस्वरससिद्धा,तादृशप्रयोगान्तरे तथाविवरणाभावात्,तथा (भगवतीशतक १८ उद्देश १०) 'नाणदंसणठयाए दुवे अहं' इत्याद्या-
केवलज्ञान-
निरूपणे
केनलज्ञान-
दर्शनयोरना-
बरणत्वादि-
समस्वरूप-
त्वेनाण्यैक्य-
मितिसमर्थि-
तम् ॥
LIKEKOIRALARISSAILER
॥ ११३॥

SPEECRORECAS केवलज्ञान- निरूपणेकेव- लज्ञानदर्शन- योरमेदवा- - दिनं प्रत्या- गमविरोधोऽपि, यद्धर्मविशिष्टविषयावच्छेदेन भेदनयार्पणं तद्धर्मविशिष्टापेक्षयैव द्वित्वादेः साकांक्षत्वात्, अन्यथाऽतिप्रसङ्गादि- त्याशङ्कथ युक्तिसिद्धः सूत्रार्थों ग्राह्यस्तेषां स्वसमयपरसमयादिविषयभेदेन विचित्रत्वादित्यभिप्रायवानाह-" परवत्तव्वयपक्खा, अविसुद्धा तेसु तेसु अत्थेसु । अत्थगइओ अ तेसि, विअंजण जाणओ कुणइ ॥२-१८॥" परेषां वैशेषिकादीनां यानि वक्तव्यानि तेषां पक्षा अविशुद्धास्तेषु तेष्वर्थेषु सूत्रे तत्तमयपरिकर्मणादिहेतोर्निबद्धाः। अर्थगत्यैव सामयेनैव तेषामर्थानां व्यक्ति सर्वप्रवादमूलद्वादशाङ्गाविरोधेन ज्ञको ज्ञाता करोति । तथा च 'जं समयं' इत्यादेर्यथाश्रुतार्थे केवली श्रुतावधिमनःपर्याय- केवल्यन्यतरो ग्राह्यः, परमावधिकाधोवधिकच्छमस्थातिरिक्तविषये स्नातकादिविषये वा तादृशसूत्रप्रवृत्तौ तत्र परतीर्थिकवक्तव्य- ताप्रतिबद्धत्वं वाच्यमेवमन्यत्रापीति दिक् । ' केवलनाणे केवलदसणे' इत्यादिभेदेन सूत्रनिर्देशस्यैकार्थिकपरतैवेत्यभिप्रायेणो- पक्रमते-" जेण मणोविसयगया-ण दंसणं णत्थि दब्बजादाणं ।। तो मणपज्जवनाण, नियमा नाणं तु णिदि8 ।। २-१९॥" यतो मनःपर्यायज्ञानविषयगतानां तद्विषयसमूहानुप्रविष्टानां परमनोद्रव्याविशेषाणां बाह्यचिन्त्यमानार्थगमकतापयिकविशेष- रूपस्यैव सद्भावाद् दर्शनं सामान्यरूपं नास्ति, तस्मान्मनःपर्यायज्ञानं ज्ञानमेवागमे निर्दिष्टं ग्राह्यसामान्याभावे मुख्यतया तद्हणोन्मुखदर्शनाभावात् । केवलं तु सामान्यविशेषोभयोपयोगरूपत्वादुभयरूपकमेवेति भावः। सूत्रे उभयरूपत्वेन परिपठितत्वाद- प्युभयरूपं केवलं, न तु क्रमयोगादित्याह(द्विषयभेदाद्वेत्यभिप्रायवानाह)-" चक्खुअचक्खुअवधिके-वलाण समयम्मि दसणवि- अप्पा ॥ परिपठिआ केवलना-णदसणा तेण विय(ते) अण्णा ॥२-२०॥" स्पष्टा । चक्षुरादिज्ञानवदेव केवलं ज्ञानमध्ये पाठात् ज्ञानमपि, दर्शनमध्ये पाठाच दर्शनमपीति परिभाषामात्रमेतदितीति ग्रन्थकृतस्तात्पर्यम् । मतिज्ञानादेः क्रम इव केवलस्याक्रमेऽपि - पादितस्म भगवतीवि. रोषस्य सो. पपत्तिका परिहारः निर्देशभेद- स्य तात्पर्य च ।।

मीज्ञान-
मकरणम्॥
॥ ११४
सामान्यविशेषाजहवृत्त्यैकोपयोगरूपतया ज्ञानदर्शनत्वमित्येकदेशिमतमुपन्यस्यति-"दसणमुग्गहमेनं,घडोत्ति निव्वन्नणा हवइ
नाण ।। जह इत्थ केवलाण वि,विसेसणं इत्तियं चेव ॥२-२१॥" अवग्रहमानं मतिरूपे चोधे दर्शनं,इदं तदित्यव्यपदेश्य,घट इति
निश्चयेन वर्णना तदाकाराभिलाप इतियावत् । कारणे कार्योपचाराच घटाकाराभिलापजनक घटे मतिज्ञानमित्यर्थः । यथाऽत्रैवं(कं)
तथा केवलयोरप्येतावन्मात्रेण विशेषः। एकमेव केवलं सामान्यांशे दर्शनं विशेषांशे च ज्ञानमित्यर्थः। एकदेश्येच क्रमिकमेदपक्षं
दूपयति-" देसणपुच्वं नाणं, नाणणिमित्तं तु दंसणं णत्थि ॥ तेण सुविणिच्छयामो, दंसणनाणा ण अण्णत्तं ॥२-२२।।"
दर्शनपूर्व ज्ञानमिति छनस्थोपयोगदशायां प्रसिद्धम् । सामान्यमुपलभ्य हि पश्चात्सर्यो विशेषमुपलभत इति, ज्ञाननिमित्तं तु
दर्शनं नास्ति कुत्रापि, तथा प्रसिद्धः । तेन सुविनिश्चिनुमः 'दसणनाणा' इति दर्शनज्ञाने नान्यत्वं न क्रमापादितभेद
केवलिनि भजत इति शेषः । क्रमाभ्युपगमे हि केवलिनि नियमाज्ज्ञानोत्तरं दर्शनं वाच्यं, सर्वासां लब्धीनां साकारोपयोगप्राप्त(प्य)-
त्वेन पूर्व ज्ञानोत्पत्युपगमौचित्यात् । तथा च ज्ञानहेतुकमेव केवलिनिदर्शनमभ्युपगन्तव्यं, तच्चात्यन्तादर्शनव्याहतमिति भावः। यत्तु
क्षयोपशमनिवन्धनक्रमस्य केवलिन्यभावेऽपि पूर्व क्रमदर्शनात्तज्जातीयतया ज्ञानदर्शनयोरन्यत्वमिति टीकाकृद्वथाख्यानं, तत्स्व-
भावभेदतात्पर्येण सम्भवदपि दर्शने ज्ञाननिमित्तत्वनिषेधानतिप्रयोजनतया कथं शोभत इति विचारणीयम् । ननु यथा परेषां
कल्पितः क्रमो वर्णनिष्ठो बुद्धिविशेषजनकतावच्छेदकोऽस्माकं च भिन्नाभिन्नपर्यायविशेषरूपा, तथा केवलिज्ञानदर्शननिष्ठस्तादृशा
क्रम एवावरणक्षयजन्यतावच्छेदकः स्यादिति नोक्तानुपपत्तिरिति चेत् , न, वर्णक्रमस्य क्रमवत्प्रयत्नप्रयोज्यस्य सुवचत्वेऽप्यक्र-
मिकावरणक्षयप्रयोज्यस्य केवल्युपयोगक्रमस्य दुर्वचत्वादनन्यगत्याऽक्रमिकादप्यावरणद्वयक्षयात् क्रमवदुपयोगोत्पत्यम्युपगमे
केवलज्ञान-
दर्शनयोग-
दाभेदविचारे
एकदेशोयम-
तेन मतिज्ञा-
नदृष्टान्ततो
ज्ञानदर्शनयो-
भेदविचारः
क्रमिकपक्ष-
निरासश्च ।।
HRAICH
SECRE
॥ ११४॥

। RRCities च तन्नाशकारणाभावादपिकलकारणात्तादृशोपयोगान्तरधाराया अविच्छेदाच "(सव्वस्स वि केवलिणं)जुगवं दो णस्थि उवओगा" (आव०नि०गाथा ९७९)इति वचनानुपपत्तिः। न च ज्ञानस्य दर्शनमेवार्थान्तरपरिणामलक्षणो ध्वंस इत्युपयोगाऽयोगपद्यं साम्प्रतम्, साधनन्तपर्यायविशेषरूपध्वंसस्यैवावस्थितिविरोधित्वादर्थान्तरपरिणामलक्षणध्वंसस्यातथात्वात् । अन्यथा तत्तत्संयोगविभागादि- मात्रेणानुभूयमानघटावस्थित्युच्छेदापत्तः । न च "जुगवं दोणत्थि उवओगा" इत्यस्योपयोगयोर्युगपदुत्पचिनिषेध एव तात्पर्य, न तु युगपद्वस्थानेऽपीत्युपयोगद्वयधाराणां नाशकारणाभावेन सहावस्थानेऽपि न दोप इति साम्प्रतं, अक्रमवादिनाप्येवं क्रमा- वच्छिन्नोपयोगद्वययोगपद्यनिषेधपरत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात् , सूत्रासङ्कोचस्वारस्यादरे “यदेव ज्ञानं तदेव दर्शनम्" इत्यस्मदुक्त- स्यैव युक्तत्वादिति दिक् ।। मतिज्ञानमेवावग्रहात्मना दर्शनं, अपायात्मना च ज्ञानमिति यदुक्तं दृष्टान्तावष्टम्भार्थमेकदेशिना तदृषयन्नाह-" जइ उग्ग- हमित्तं दं-सणंति मण्णसि विसेसिया नाणं ॥मइनाणमेव दंसण-मेवं सइ होइ णिप्फन्नं ॥ २-२३॥" यदि मतिरेवावग्रहरूपा दर्शनं विशेषिता ज्ञानमिति मन्यसे, तदा मतिज्ञानमेव दर्शनमित्येवं सति प्राप्त । न चैतद्युक्तं, “स द्विविधोऽष्ट- चतुर्भेद" इति ( तत्त्वार्थ अध्याय २ सूत्र ९) सूत्रविरोधान्मतिज्ञानस्याष्टाविंशतिभेदोक्तिविरोधाच-"एवं सेसिदियदं-सणंमि णियमेण होइ ण य जुत्तं ।। अह तत्थ नाणमित्त, घेप्पइ चक्खूमि वि तहेव ॥२-२४ ॥" एवं शेषेन्द्रियदर्शनेष्वप्यवग्रह एव दर्शनमित्यम्युपगमेन ( गमे नियमेन ) मतिज्ञानमेव तदिति स्यात् , तच्च न युक्तं, पूर्वोक्तदोषानतिवृत्तेः । अथ तेषु श्रोत्रादिविन्द्रियेपु दर्शनमपि भवज्ज्ञानमेव गृह्यते, मात्रशन्दस्य दर्शनव्यवच्छेदकत्वात् , तद्वयवच्छेदश्च तथान्यवहाराभावात् , केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञान- दर्शनोपयोग- योगपद्यवा- दिमतेन क्रम वाद्यक्तदोष-- परिहार: २ स्तुतोऽभेद- पक्षसमर्थन तत्र चैकदेशि मतनिरस नश्च ।।

भीमान-
प्रकरणम्॥
,
REACHECCANCE
श्रोत्रज्ञानं घ्राणज्ञानमित्यादिव्यपदेश एव हि तत्रोपलभ्यते, न तु श्रोत्रदर्शनं घ्राणदर्शनमित्यादिव्यपदेशः क्वचिदागमे प्रसिद्धः,
तर्हि चक्षुष्यपि तथैव गृह्यतां चक्षुर्ज्ञानमिति. नतु चक्षुर्दर्शन मिति । अथ तत्र दर्शनम्, इतरत्रापि तथैव गृह्यतां, युक्तेस्तुल्यत्वात्।
कथं तर्हि शास्त्रे चक्षुर्दर्शनादिशवाद इत्यत आह-"नाणमपुढे जो अविसए अ अत्थंमि दंसणं होई ॥ मुत्तूण लिंगओ जं, अणागया-
ईयविसएसु ॥२-२५॥" अस्पृष्टेऽर्थे चक्षुपा य उदेति प्रत्ययः स ज्ञानमेव सचक्षुदर्शनमित्युच्यते, इन्द्रियाणामविषये
च परमाण्वादावर्थे मनसा य उदेति प्रत्ययः स ज्ञानमेव सदचक्षुर्दर्शनमित्युच्यते । अनुमित्यादिरूपे मनोजन्यज्ञानेऽतिप्रसङ्गमा-
शङ्कयाऽऽह, अनागतातीतविषयेषु यल्लिङ्गन्तो ज्ञानमुदेति 'अयं काल आसन्नभविष्यवृष्टिकस्तथाविधमेघोन्नतिमत्त्वात,
'अयं प्रदेश आसन्नवृष्टमेघः पूरविशेषवत्त्वाद्' इत्यादिरूपं तन्मुक्त्वा ! इदमुपलक्षणं, भावनाजन्यज्ञानातिरिक्तपरोक्षज्ञानमात्रस्य
तस्यास्पृष्टाविषयार्थस्यापि दर्शनत्वेनाव्यवहारात् । यद्यस्पृष्टाविषयार्थज्ञानं दर्शनमभिमतं, तर्हि मनःपर्यायज्ञानेऽतिप्रसङ्ग इत्या.
शङ्कथ समाधत्ते-" मणपजवनाणं द-सणं ति तेणेह होइ ण य जुत्तं ।। भन्नइ नाणं णाई-दियंमि ण घडादओ जम्हा ॥२-२६॥"
एतेन लक्षणेन मन:पर्यायज्ञानमपि दर्शनं प्राप्त, परकीयमनोगतानां घटादीनामालम्ब्यानां तत्रासवेनास्पृष्टेऽविषये च
घटादावर्थे तस्य भाना(वा)त्, न चैतद्युक्तं, आगमे तस्य दर्शनत्वेनापाठात् । भण्यतेत्रोत्तरम्-नोइन्द्रिये मनोवर्गणाख्ये
मनोविशेषे प्रवर्तमानं मनःपर्यायवोधरूपं ज्ञानमेव, न दर्शन, यस्मादस्पृष्टा घटादयो नास्य विषय इति शेषः, नित्यं तेषां
लिङ्गानुमेयत्वात् । तथा चागमः (विशेषावश्यक गाथा ८१४)-" जाणइ बज्झे णुमाणाओ ति" मनोवर्गणास्तु परात्मगता
अपि स्वाश्रयात्मस्पृष्टजातीया एवेति न तदंशेऽपि दर्शनत्वप्रसङ्गः। परकीयमनोगतार्थाकारविकल्प एवास्य ग्राह्यः, तस्य चोभ-
केवलज्ञान-
निरूपणे:
केवलज्ञान-
दर्शनोपयोग-
प्रसने मति-
ज्ञानदर्शन-
दृष्टान्तेन
तत्त्वनिरू-
PROFILERSARGICCESS
पणम् ॥
॥ ११५॥

यरूपत्वेऽपि छानस्थिकोपयोगस्यापरिपूर्णार्थग्राहित्वान्न मनःपर्यायज्ञाने दर्शनसम्भव इत्यप्याहुः। किंच-"मइसुअनाणणिमित्तो, छउमत्थे होइ अत्थउवलंभो ॥ एगयरंमि वि तेसिं, ण सणं दंसणं कत्तो ॥२-२७ ॥" मतिश्रुतज्ञाननिमित्तश्छमस्था. नामर्थोपलम्भ उक्त आगमे । तयोरेकतरस्मिन्नपि न दर्शनं सम्भवति । न चावग्रहो दर्शन तस्य ज्ञानात्मकत्वात्, ततः कुतो दर्शनं?, नास्तीत्यर्थः । ननु श्रुतमस्पृष्टऽर्थे किमिति दर्शनं न भवेत्तत्राह-"ज पञ्चक्खग्गहणं, ण इंति सुअनाणसमिया अस्था ।। तम्हा सणसदो, ण होइ सयले वि सुअनाणे॥२-२८॥" यस्माच्छ्तज्ञानप्रमिता अर्थाः प्रत्यक्षग्रहणं न यान्ति, अक्षजस्यैव व्यवहारतः प्रत्यक्षत्वात् । तस्मात्सकलेऽपि श्रुतज्ञाने दर्शनशब्दो न भवति । तथा च ' व्यञ्जनावग्रहा- विपयार्थप्रत्यक्षत्वमेव दर्शनत्वम्' इति पर्यवसन्नम् । प्रत्यक्षपदादेव श्रुतज्ञानवदनुमित्यादेावृत्तौ परोक्षभिन्नत्वे सतीति विशेषणं न देयम् “ मुत्तूण लिंगो जं" इत्युक्तस्याप्यत्रैव तात्पर्य द्रष्टव्यम् । इत्थं चाचक्षुदर्शनमित्यत्र नजः पयुदासार्थकत्वादचक्षु. दर्शनपदेन मानसदर्शनमेव ग्राह्य, अप्राप्यकारित्वेन मनस एव चक्षुःसदृशत्वान्न घ्राणदर्शनादीति सर्वमुपपद्यते । तथाचावधि दर्शनमपि कथं सङ्गच्छते, तस्य व्यञ्जनावग्रहविषयार्थग्राहित्वेऽपि व्यवहारतः प्रत्यक्षत्वाभावादित्याशङ्कायाः प्रत्यक्षपदस्य व्यवहारनिश्चयसाधारणप्रत्यक्षार्थत्वात् , अवधिज्ञानस्य च नैश्चयिकप्रत्यक्षत्वाव्याहतेः परिहारमभिप्रयन्नाह-"जं अप्पुट्ठा भावा, ओहिन्नाणस्स होति पचक्खा ॥ तम्हा ओहिन्नाणे,दसणसद्दो वि उवउत्तो॥२-२९॥ स्पष्टा।। उपयुक्तः लब्धनिमित्तावकाशः।। केवलज्ञानेऽपीदं लक्षणमव्याहतमित्याह-"जं अप्पुढे भावे, जाणइ पासइ य केवली णियमा ॥ तम्हा तं नाणं दं-सणं च अविसेसओ सिद्धं ॥ २-३०॥” यतोऽस्पृष्टान् भावान्नियमेनावश्यन्तया केवली चक्षुष्मानिव पुरःस्थितं जानाति केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञान- दर्शनोपयोग- प्रसङ्गे मति- ज्ञानादिदृष्टा- न्तेनतत्व- प्ररूपणम् ॥ RRCES RRHk

TER:
भोशान-
विन्दु-
प्रकरणम्॥
५११६ ॥
पश्यति चोभयप्राधान्पेन, तस्मात्तत्केवलज्ञानं दर्शन चाविशेषत उभयाभिधाननिमित्तस्याविशेषारिसर्छ । मनःपर्याय-
ज्ञानस्य तु व्यन्जनावग्रहाविषयार्थकप्रत्यक्षत्वेऽपि वाह्यविषये व्यभिचारेण स्वग्रामतावच्छेदकावच्छेदेन प्रत्यक्षत्वाभावान दर्शन-
त्वमिति निष्कर्षः ।। अत्र यट्टीकाकृता "प्रमाणप्रमेययोः सामान्यविशेषात्मकत्वेऽप्यपनीतावरणे युगपदुभयस्वभावो चोधः,
छमस्थावस्थायां वनपगतावरणत्वेन दर्शनोपयोगसमये 'ज्ञानोपयोगाभावादप्राप्यकारिनयनमनःप्रमवार्थावग्रहादिमतिज्ञानो-
पयोगप्राकाले चक्षुरचक्षुर्दर्शने, अवधिज्ञानोपयोगप्राकाले चावधिदर्शनमाविर्भवति"इति व्याख्यातं तदर्धजरतीयन्यायमनुहरति,
प्राचीनप्रणयमात्रानुरोधे श्रोत्रादिज्ञानात् प्रागपि दर्शनाभ्युपगमस्यावर्जनीयत्वात् , व्यञ्जनावग्रहार्थावग्रहान्तराले दर्शनानुपलम्भा
तदनिर्देशाच, असङ्ख्येयसामयिकव्यञ्जनावग्रहान्त्यक्षणे "ताहे हुंति करेइ" इत्यागमेनार्थावग्रहोत्पत्तेरेव भणनात् , व्यञ्जना
वग्रहप्राकाले दर्शनपरिकल्पनस्य चात्यन्तानुचितत्वात् ॥ तथा सति तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षादपि निकृष्टत्वेनानुपयोगप्रसङ्गाच,
प्राप्यकारीन्द्रियजज्ञानस्थले दर्शनानुपगमे चान्यत्रापि भिन्नतत्कल्पने न किञ्चित्प्रमाणं, 'नाणमपुढे' इत्यादिना ज्ञानादभेदेनैव दर्श-
नस्वभावप्रतिपादनात, "चक्षुर्वद्विपयाख्यातिः (द्वा-१०-३०)इत्यादिस्तुतिग्रन्थैकवाक्यतयापि तथैव स्वारस्याच्च । छद्मस्थज्ञानो.
पयोगे दर्शनोपयोगत्वेन हेतुत्वे तु चक्षुष्येव दर्शनं नान्यत्रेति कथं श्रद्धेयं ? तस्माच्छ्रीसिद्धसेनोपज्ञनव्यमते न कुत्रापि ज्ञाना-
दर्शनस्य कालभेदः, किं तु स्वग्राह्यतावच्छेदकावच्छेदेन व्यञ्जनावग्रहाविषयीकृतार्थप्रत्यक्षत्वमेव दर्शनत्वमिति फलितम् । यदि
च चाक्षुपादावपि ज्ञानसामग्रीसामर्थ्यग्राह्यवर्तमानकालायंशे मितिमात्रायंशे च 'न दर्शनत्वव्यवहारस्तदा विषयताविशेष एव
दर्शनत्वं, स च क्वचिदंशे योग्यताविशेषजन्यतावच्छेदका, क्वचिच भावनाविशेषजन्यतावच्छेदका, केवले च सर्वाशे आवरण-
केवलज्ञान-
निरूपणे
केवलज्ञान-
दर्शनोपयोग-
प्रसङ्गे मति-
ज्ञानादिदृष्टा-
न्तेन तत्त्वप्र-
रूपणं नव्य-
तार्किकमत-
निष्कर्षश्च ॥
.
CREASE
॥११६॥

॥केवलज्ञान- निरूपणे केवलज्ञानद- शनहयात्मक एक एच केव- क्षयजन्यतावच्छेदक इति प्रतिपत्तव्यं । न च अधेनैव धियां विशेष' इति न्यायादर्थाविशेष ज्ञाने विषयताविशेषासिद्धिरिति शकीयं, अर्थेऽपि ज्ञानानुरूपस्वभावपरिकल्पनाद , अर्थाविशेषेऽपि परैः समूहालम्बनाद्विशिष्टज्ञानस्य व्यावृत्तये प्रकारिता- विशेपस्याभ्युपगमाच । न हि तस्य तत्र भासमानवैशिष्टयप्रतियोगिज्ञानत्वमेव निरूपकविशिष्टज्ञानत्वं वक्तुं शक्यं, दण्डपुरुष- संयोगा इति समूहालम्बनेऽतिप्रसङ्गात् । न च भासमानं यद्वैशिष्टयप्रतियोगित्वं तद्वत् ज्ञानत्वमेव तथा, दण्डपुरुषसंयोगप्रति- योगित्वानुयोगित्वानीति ज्ञाने दण्डविशिष्टज्ञानत्वापत्तेः । न च स्वरूपतो भासमानमित्याधुक्तावपि निस्तारम्, प्रतियोगित्वादेर- तिरिक्तत्वे प्रकारित्वादेनिनिष्ठस्य कल्पनाया एव लघुत्वात् । अनतिरेके तु दण्डदण्डत्वादिनिर्विकल्पकेऽपि दण्डादिविशिष्टज्ञान- त्वापत्तेः। एतेन 'स्वरूपतो भासमानेन वैशिष्टयेन गर्भितलक्षणमपि'अपास्तम् , संयुक्तसमवायादेः सम्बन्धत्वे स्वरूपत इत्यस्य दुर्वचत्वाच । तस्मात्पराभ्युपगतप्रकारिताविशेषवदाकारविशेषः स्याद्वादमुद्रयाऽर्थानुरुद्धस्तदननुरुद्धो वा ज्ञाने दर्शनशब्दव्य- पदशहेतुरनाविलस्तत्समय एवार्थज्ञानयोरविनिगमेनाकाराकारिभावस्वभावाविर्भावादित्येष पुनरस्माकं मनीषोन्मेषः ।। तस्माद्वयात्मक एक एव केवलावबोध इति फलितं स्वमतमुपदर्शयति-"साईअपजवसियं, ति दोवि ते ससमयं हवइ एवं।।परति- त्थियवत्तव्यं, च एगसमयंतरुप्पाओ ॥ २-३१॥" साद्यपर्यवसितं केवलमिति हेतो? अपि ज्ञानदर्शने ते उभयशब्दवाच्य तदिति यावत् । अयं च स्वसमयः स्वसिद्धान्तः । यस्त्वेकसमयान्तरोत्पादस्तयोभण्यते, तत्परतीर्थिकशास्त्रं, नाईद्वचनं, नयाभिप्रायेण प्रवृत्तत्वादिति भावः । एवम्भूतवस्तुतत्वश्रद्धानरूप' सम्यग्दर्शनमपि सम्यग्ज्ञानविशेष एव, सम्यग्दर्शनत्वस्यापि सम्यग्ज्ञानत्यव्याप्यजातिविशेषरूपत्वाद्विपयताविशेषरूपत्वाद्धेत्याह-"एवं जिणपण्णत्ते, सद्दहमाणस्स भावओ भावे ।। पुरिसस्सा- 16 लोपयोग इति निश्चित- श्री सिद्धसेन दिवाकर- सतफलि- तप्रदर्शनम् ॥

श्रीज्ञान- विन्दु- प्रकरणम् ॥ ११७ ॥ मिणिबोहे, सणसद्दो हवइ जुत्तो ॥२-३२॥" जिनप्रज्ञप्तभावविषयं समूहालम्बनं रूचिरूपं ज्ञानं मुख्यं सम्यग्दर्शनं तद्वासनो पनीतार्थविषयं घटादिज्ञानमपि भाक्तं तदिति तात्पर्यार्थः ॥ ननु सम्यग्ज्ञाने सम्यग्दर्शननियमवद्दर्शनेऽपि सम्यग्ज्ञाननियमः कथं न स्यादित्यत्राह-"सम्मन्नाणेणियमे-ण दंसणं दसणे उ भयणिज्ज । सम्मन्नाणं च इम, ति अत्थओ होइ उववणं ॥ २-३३॥" सम्यग्ज्ञाने नियमेन सम्यग्दर्शनं, दर्शने पुनर्भजनीयं विकल्पनीयं, सम्यग्ज्ञानं एकान्तरुचौ न सम्भवति, अनेकान्तरुचौ तु समस्तीति । अतः सम्यग्ज्ञानं चेदं सम्यग्दर्शनं चेत्यर्थः, अर्थतः सामर्थ्य नै (र्थ्यादे)कमेवोपपनं भवति । तथा च सम्यक्त्वमिव दर्शनं ज्ञानविशेषरूपमेवेति नियुंढम् । ( अथ ग्रन्थकृत्मशस्तिः) प्राचां वाचां विमुखविषयो-न्मेषसूक्ष्मेक्षिकायां, येरण्यानी-भयमधिगता नव्यमार्गानभिज्ञाः ॥ तेषामेघा समयवणिजां सम्मतिग्रन्थगाथा, विश्वासाय स्वनयविपणिप्राज्यवाणिज्यवीथी ॥१॥ भेदग्राही(हि) व्यवहृतिनयं संश्रितो मल्लवादी, पूज्याः प्रायः करणफलयोः सीम्नि शुद्धर्जुसूत्रम् ॥ भेदोच्छेदोन्मुखमधिगतः सङ्ग्रहं सिद्धसेन-स्तस्मादेते न खलु विषमाः सूरिपक्षास्त्रायोऽपि (मी) ॥२॥ चित्सामान्यं पुरुपपदभावलाख्ये विशेषे, तद्रूपेण स्फुटमभिहितं साद्यनन्तं यदेव ।। सूक्ष्मैरंशैः क्रमवदिदमप्युच्यमानं न दुष्टं, तत्सूरीणामियममिमता मुख्यगौणव्यवस्था ॥ ३ ॥ तमोऽपगमचिजनुरक्षणभिदानिदानोद्भवाः, श्रुता बहुतराः श्रुते नयविवादपक्षा यथा ॥ तथा क इव विस्मयो भवतु सूरिपक्षत्रये, प्रधानपदवी धियां क नु दवीयसी दृश्यते ॥ ४ ॥ केवलज्ञान- निरूपणे- केवलज्ञान- दर्शनयोरमि- न्नत्मप्ररूप- कसम्मति- गाथाकदम्बो- पसंहारः प्रशस्तौ च स्याद्वादमते नयभेदेन प- क्षत्रयनिर्दी- पताप्ररूपण. मनेकान्त- माहात्म्य- प्रदर्शनश्च ॥ ॥ ११७॥ RRC R C स्वाद्वादमा । हात्म्यं ग्रन्थ- कृतो गुरुपर- म्पराप्रशस्ति- श्च ।। RELESECRECEMC प्रसघ सदसत्त्वयोन हि विरोधनिर्णायकं, विशेषणविशेष्ययोरपि नियामकं यत्र न ॥ गुणागुणविभेदतो मतिरपेक्षया स्यात्पदा, किमत्र भजनोजिते स्वसमये न सगच्छते ॥५॥ प्रमाणनयसङ्गता स्वसमयेऽप्यनेकान्तधी-नयस्मयतटस्थतोल्लसदुपाधिकिर्मीरिता ॥ कदाचन न बाधते सुगुरुसम्प्रदायक्रम, समञ्जसपदं वदन्त्युरुधियो हि सद्दर्शनम् ॥ ६ ॥ रहस्य जानन्ते किमपि न नयानां हतधियो, विरोधं भाषन्ते विविधवुधपक्षे वत खलाः ॥ अमी चन्द्रादित्यप्रभू(कृ)तिविकृतिव्यत्ययगिरा(रो), निरातङ्काः कुत्राप्यहह न गुणान्वेषणपराः ॥७॥ स्याद्वादस्य ज्ञानबिन्दोरमन्दा-न्मन्दारद्रोः कः फलास्वादगर्वः ॥ द्राक्षासाक्षात्कारपीयूषधारा-दारादीनां को विलासश्च रम्यः ॥८॥ गच्छे श्रीविजयादिदेवसुगुरोः स्वच्छे गुणानां गणैः, प्रौढिं प्रौढिमधानि जीतविजयाः प्राज्ञाः परामैयरुः ।। तत्सातीर्थ्यभृतां नयादिविजयप्राज्ञोत्तमानां शिशु-स्तत्त्वं किञ्चिदिदं यशोविजय इत्याख्याभृदाख्यातवान् ९ ॥ इति श्रीज्ञानबिन्दुप्रकरणं समाप्तम् ॥ प्रभूतावधानधारि-कूर्चालसरस्वती-न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महोपाध्यायश्रीयशोविजयग. णिप्रणीते अपूर्णावस्थं सविवरणं १ श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं २ पूर्ण श्रीज्ञानपिन्दुप्रकरणं च सम्पूर्णे AGREE ॥

C शुद्धिपत्रकम् बानार्णव- धानविन्दु ॥ ११८ ॥ पत्र पति पत्रं पंफिः પર ૨૭ ६५ ११ ६६ ACKER ७ । सूचना-पंक्त्यङ्कः चतुर्दशसंख्यां यावत् प्रथमपृष्ठस्य, तदुपरितनी च संख्या द्वितीयपृष्ठस्य ॥ ॥ श्री ज्ञानार्णव-ज्ञानबिन्दु ग्रन्थद्वयशुद्धिपत्रकम् ॥ monococow- पर्व पंकिः शुद्धम् शुद्धम् भशुद्धम् अशुद्धम् स्वार्थशपेण त्वविशेषण २ २३ | निरूपणोपयि निरूपणोपयि १७ २२ मन्धम बन्धन बोधकत्वस्य योधिकत्वस्य ४ १६ | पद्विरा पद्गिरा(भगुरा) २१ १ | निश्चित निधित वृति ज्ञानन्ध वृत्तिज्ञानत्व ६ ९ निवृत्ति सीनवृत्ति २५ ३ | न्यदेत, न्यदेतत्त श्रतस्यो श्रुतस्येष तस्यो १ घयवदिति घण्वदिति ३२ २७ भ्युगम भ्युपगम रेव्यवस्थापित, व्यय७ २० | एवेन्युक्ता एव" इत्युक्ता ३५ २१ विपर्गत विपरीत नचाऽव्यक्त ८ ३ | हङ्कोन्द्रिय रेन्द्रिय ३७ १९ | झानज्ञानो मानाज्ञानो तारानु तात्पर्यानुप ९२८ द्रापारीणाम द्रोहपरिणाम ३८ २७ कचिवज्ञान कचिदज्ञान १२ १५ पतितया घातितथा भयनादेरस भवनोदरस ३९ पोलब्धिः योपलब्धिः मेव ३९ २२ तथात्षाद तथात्याद् १२ २८ योगेन यागेन ३९ २६ | नयस्याकृत्यं नयस्य कृत्य सत्र, सन्न, १३ ५ स्पायु त्यत्तियु ४१ ११ नुपतधेप नुपपत्तेच ततद तद्विषय १३ २०|णिग्गरस त्तीरुपय णिग्गयस्स २७ गुदया १६ १४ तेन अर्भारकः अभीरपः भनुप- अनुपयु- विशेष्याव विशेभ्यताव ६० २५ बनायेन व्यङ्गोन रे व्यय २१ २५ ८ १२ २१ | मधे ९६ २. ९६ २१ LAR गम्यमान पत्र तन्न, एतद ૨૧૨ ૨૨ |॥ ११८॥ Co000000

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Shri Gyanarnav Prakarn

Author
Jaigani Shri Yashovi
Title
Shri Gyanarnav Prakarn
File name
Shri Gyanarnav Prakarn
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2010/01
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
252
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327443
Barcode
99999990003033.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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