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Parasarsmiriti
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॥ श्रीः॥
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पराशरस्कृतिः
२
अर्थात्-
(धर्मशास्त्रीयलघुपाराशरी)
मरत.मुबोध भापाटीका महित.
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जिमको
शिवाल-गणेशीलार ने
सकीय "समीनागयए"चमानः
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दुरादाराद
मुदत कराकर प्रसादिया.
यान, १२..
सावकारप्रकाराने बधन साह
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॥ श्रीगणेशायनमः॥ * लघुपाराशरीस्मृतिः - *EO*OOD दो०-परब्रह्म देवर्षिगण, गुरु चरणन शिर नाय । पाराशरिभाषा करों,विधि हरिहर उरलाय ॥१॥ AAAA अथातो हिमशैला देवदारुव- न्यर्क सन्निभःप्रत्युवाच महातेजाः नालये । व्यासमेकाग्रमासीनम- श्रुतिस्मृतिविशारदः॥ ३ ॥ पृच्छन्नृषयःपुरा ॥१॥ तदनंतर शिष्यों सहित, श्रुति स्मृतिके पूर्वकाल में हिमाचल के शिखरपर यथार्थ जानने वाले, महातेजस्वी, अ- देवदास के तरुवरोंसे अलंकृत वन विषः नि सूर्य के समान प्रकाशमान, श्रीच्या य पवित्र स्थान में एकाग्र चित्त बैठे जी ऋषियों के वचन को सुनकर बोले३ श्रीव्यासजी महाराज से ऋषियों ने न चाहं सर्वतत्वज्ञकथंधर्म वदा- प्रश्न किया ॥१॥ म्यहम् । अस्मत्पितैव पृष्टव्य इति 'मानुषाणां हितं धर्म वर्तमाने व्याससुतोऽवदत् ॥४॥ कलौयुगे। शौचाचारं यथावच्च वद मैं सब धर्मों के तत्वों को नहीं जान- ता, किस प्रकार धर्मकहूँ, अतएव हमारे सत्यवतीसुत ॥ २ ॥ पितासे पूछना चाहिये इसप्रकार व्यास हे श्रीव्यासजी ! कलियुग के वर्तमान जीने कहा ॥ ४ ॥ होने पर जो धर्म, शौच, तथा आचार ततस्ते ऋषयःसर्वे धर्मतत्वार्थकां- मनुष्यों को हितकारी हैं वह यथावत् क्षिणः ऋषिव्यासं पुरस्कृत्य गता ( विधिपूर्वक ) हम से कहिये ॥ २ ॥ बदरिकाश्रमम्॥५॥ तच्छ्रुत्वाऋषिवाक्यं तु सशिष्यो- तब धर्म तत्व के जानने की इच्छा २ लघुपाराशरी। अ०१ करनवाले वे सब ऋषि व्यास जी को अथ संतुष्टहृदय पराशरमहा- आगे करके बदरिकाश्रम को गये। ५॥ मुनिः।आह सुस्वागतंबृहीत्यासी- लंकृतम् ।नदी प्रस्रवणोपेतं पुण्य- नो मुनिपुंगवः॥१०॥ तीर्थोपशोभितम् ॥६॥ तदनंतर संतुष्ट है हृदय जिनका, ऐसे महामुनि पराशरजी बोले कि-तुम भ. वह आश्रम नाना प्रकार के पुष्पों की ली प्रकार कुशल पूर्वक आये ॥१०॥ लताओं से परिपूर्ण, फल पुष्पों से अलं. कुशलं सम्यगित्युक्त्वा व्यासः कृत, नदी और झरनों से विभूषित, प- वित्र तीर्थों से शोभित ॥ ६ ॥ पृच्छत्यनंतरम् ॥ यदि जानासि मृगपक्षिनिनादाढ्यं देवताय- मे भक्तिं स्नेहादा भक्तवत्सल ११ तनावृतम् । यक्षगंधर्वसिद्धैश्व नृत्य कुशल प्रश्न के अनन्तर सब प्रकार कुशल है! ऐसा कहकर व्यासजी ने गीतैरलंकृतम् ॥७॥ पूछा कि- हे भक्तवत्सल ! यदि आप मृग और पक्षियों के शब्दोंसेपूरित, देव मेरी भक्ति जानतेहैं, तो या मेरेस्नेह से ११ मन्दिरों से आवृत, यक्ष, गंधों के नृत्य धर्म कथय मे तात अनु- गान से शोभित और सिद्धगणों से अलंकृत था॥७॥ ग्राह्योह्यहं तव॥श्रुता मे मानवाध- तस्मिन्नृपिसभामध्ये शक्तिपुत्रं मा वाशिष्ठाः काश्यपास्तथा १२ पराशरम् । सुखासीनं महातेजा- जिये, क्योंकि मैं आप का कृपापात्र हूँ, हे तात! मुझ से धर्मों का वर्णन की- मुनिमुख्यगणावृतम्॥८॥ । अतएव आप को मुझ पर अवश्य कृपा उस आश्रम में ऋषियों की सभा के करनी चाहिये, मैंने स्वायंभुव मनु,पशि- विपय मुख्य, मुनिगणोंके मध्य में सुख , कश्यप ॥ १२ ॥ पूर्वक बैठे हुए, शक्ति ऋषि के पुत्र,महा गार्गीया गौतमायाश्च तथा तेजस्वी मुनिवर पराशरजीका ॥८॥ कृतांजलिपुटोभूत्वा व्यासस्तु चोशनसा स्मृताः । अत्रेर्विष्णो. ऋपिभिः सहाप्रदक्षिणाभिवादैश्च श्र संवादक्षादगिरसस्तथा॥१३॥ स्तुतिभिः समपूजयत्॥६॥ तथा गर्गाचार्य, गौतम, शुक्राचार्य, अत्रि,विष्णुक्राषि,संवर्त, दक्ष, अंगिरा १३ व्यासजी ने ऋषियों सहित हाथ जोड़, प्रदक्षिण आभिवादन और स्तुति पूर्वक | शातातपाच्च हारीताद्याज्ञव- पूजन किया ॥९॥ ल्ल्यात्तथैव च । आपस्तंवकृता- ( भा०टी०) নিয়মঃ ... धर्माःशंखस्य लिखितस्य च॥१४॥ ब्रूहि धर्मस्वरूपज्ञ सूक्ष्म स्थूलं और शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, च विस्तरात् । व्यासवाक्यावसा- आपस्तंष, शंख, लिखित ॥ १४ ॥ नेषु मुनिमुख्यः पराशरः॥ १८॥ कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेत- हे धर्मस्वरूपके जानने वाले ! चारों सान्मुनेः । श्रुता ह्येते भवत्प्रोक्ताः वर्णोंमें धर्मके जानने वालों करके करने श्रीतार्थामे न विस्मृताः॥१५॥ योग्य जो सूक्ष्म और स्थूलधर्महैं, उनका कात्यायन,वाल्मीकि आदि ऋषियोंके विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिये, व्यासजी कडेहुए धर्मशास्त्र और आप के कहेहुए के वचन के अनंतर मुनिवर पराशरजी १८ वेदोक्त धर्म श्रवण किये हैं, वे संपूर्ण धर्म धर्मस्य निर्णयं प्राह सूक्ष्मं स्थूलं मुझको विस्मरण नहीं हुए ॥ १५ ॥ आस्मिन्मन्वंतरेधर्माः कृतत्र- च विस्तरात् ॥ १६ ॥ सूक्ष्म और स्थूल धर्मोंका निर्णय विस्ता- तादिके युगे । सर्वे धर्माः कृते र पूर्वक वर्णन करने लगे ॥ १९ ॥ जाता:सर्वे नष्टाः कलौयुगे॥३६॥ वक्ष्यमाणधर्मतत्वग्रहणाय किंतु इस मन्वंतरके विषय कृतयुग और श्रोतृसावधानतां विधते। प्रेतादि युगों के जोरधर्म थे, उन२युगों में शाक्त विशेष होने के कारण उन२धर्मों शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि शृण्वंतु का बर्ताव रहा और अबकलियुग में शक्ति मुनयस्तथा। कल्पे कल्पे क्षयः की हानि होने के कारण वे सम्पूर्ण धर्म सत्याब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥२०॥ लुप्त होगये ॥१६॥ वक्ष्यमाण धोका तत्व ग्रहण करनेके लिये श्रोता- चातुर्यसमाचारंकिंचित्सा ओको सावधान होनाचाहिये। धारण वद। चतुर्णामपि वर्णानां हे पुत्र ! तथा हे मुनियों ! सुनो,कल्पर कर्तव्यं धर्मकोविदः ॥ १७॥ मे प्रलय होताहै तथापि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, विद्यमान रहतेहैं ॥ २० ॥ अतएव चारों वर्गों का पृथकर मुख्य धर्म तथा चारों वर्गों का मिश्रित धर्म श्रुतिस्मृतिसदाचारनिणेता- (सत्य वोलना, चोरी न करना, रश्च सर्वदा। न कश्चिद्धेदकर्ता च पर स्त्रियोंको मातृवत् देखना,हिंसा न करना वेदस्मता चतुर्मुखः ॥ २१ ॥ इत्यादि धर्म जो सब वर्णोको कर्तव्यहैं | और वे सर्वदा ( सबकल्पों की आ- उनको मिश्रित धर्म कहते हैं ) वर्णन की दिमें ) श्रुति, स्मृति और सदाचारका जिये ।। १७ ॥ निर्णय करतेहैं परन्तु वेदका कर्ता कोई
४
लघुपाराशरी।
नहीं, ब्रह्माजी कल्प की आदिमें पूर्ववत् | दापरेशंखलिखिताःकलो पारा-
वेदको स्मरण करके मनु तथा ऋषियोंके शराःस्मृताः। त्यजेद्देशं कृतयुगे
द्वारा प्रकाशित करतेहैं ॥ २१॥
तथैव धर्मान्स्मरति मनुःकल्पा- त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् ॥ २५ ॥
तरेन्तरे। अन्ये कृतयुगे धर्मात्रेता के कहे हुए धर्म मुख्य रहे, अब कलियुग
द्वापर में शंख और लिखित ऋषियों
यां दापरेपरे ॥ २२॥ में पराशरके कहेहुए धर्म अत्यंत उपयोगी
और कल्परके विषय जोरमनु होतेहैं हैं । संसर्ग दोष लगने के कारण कृतयुग
वेभी उसी प्रकार पूर्वकी नाई धर्मों को में पाप करनेवाले के देशकोभी त्याग देते
स्मरण करके प्रवृत्त करते हैं,युगोंके अनु- थे, त्रेता में ग्रामको ॥ २५ ॥
सार शक्ति की वृद्धि और हानिके कारण
द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारं तु
कृतयुग में मनुष्यों के धर्म और प्रकार
के, त्रेतामें और प्रकार के और द्वापर, कलौयुगे।कृते संभाषणादेव त्रेता-
और प्रकार के रहे।॥ १२ ॥
यां स्पर्शनेन च ॥ २६ ॥
अन्ये कलियुगे नृणां युगरू द्वापर में पाप करनेवाले के कुल यात्र
पानुसारतः॥ तपः परं कृतयुग त्रे को छोड देते थे और कलियुग में केवल
तायां ज्ञानमुच्यते ॥ २३ ॥
कर्ता को छोडते हैं, कृतयुग में पापी के
संभाषण ही से पतित होजाता था, प्रेता
अब कलियुग में मनुष्योंकी शक्ति के
अनुसार ऋषियों ने और प्रकार के धर्म में स्पर्श से ॥२६॥
वर्णन किये हैं, कृतयुगमें शक्ति विशेष
दापरेवन्नमादाय कलो पतति
होने के कारण तप श्रेष्ठ रहा, त्रेता में ज्ञान॥ कर्मणाकृते तात्क्षणिकः शाप-
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेव कलो- तायां दशभिर्दिनैः ॥२७॥
युगे । कृते तु मानवाधर्मास्त्रेतायां
द्वापर में अन्न लेकर पतित होता था
गौतमाः स्मृताः॥२४॥ और कलियुग में कर्म करके पतित होता
द्वापर में यज्ञकी विशेषता रही, अब है, कृतयुग में तत्काल शाप लगताथा
कलियुगमें शरीरादिक की शक्ति न्यून त्रेता में दशदिन में ॥ २७ ॥
होनेके कारण केवल दान की अधिकता
है, कृतयुग (सत्ययुग) में मनुजी की दापरे चैकमासेन कलौ संवत्सरे-
मुख्य रहे, त्रेता में गौतम के ॥ २४ ॥ ग तु। अभिगम्य कृते दानं त्रे-
१ "युगरूपानुहासत." इत्यपि पाठान्तरम् ।।
तास्वाहूय दीयते॥ २८ ॥
( भाटी०)
विशिष्ठधर्मशास्त्र ।
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द्वापर में एक मासमें शापका फल होता | युगे सदा । कृते त्वस्थिगताः
था और अब कलियुग में वर्ष भर में शाप
प्राणास्त्रेतायां मासमाश्रिताः।३२॥
फलता है, कृतयुग में श्रद्धाकी अधिकता
कलियुग में कुमारी भी संतान
के कारण आप जाकर दान देते थे, त्रे.
उत्पन्न करती हैं, कृतयुग में प्राण आस्थ
ता में बुलायकर श्रद्धा पूर्वक देते थे २८
गतथे और त्रेतामें मांसके आश्रय रहे ३२
दापरे याचमानाय सेवया दीयते
द्वापरे रुधिरं चैव कला त्वन्ना-
कलौ। आभिगम्याचमं दानमाहूः दिपु स्थिताः।युगे युगे च ये धर्मा-
यैव तु मध्यमम् ॥ २६॥
द्वापर में गचना करने वाले को श्रद्धा द्वापरमें प्राण रुधिरके आश्रयथे और अब
स्तत्र तत्र च ये दिजाः॥३३॥
करके देतेथे और कलियुगमें सेवा कराफर
दान देते हैं। आप जाकर दानदेमा उ-
कलियुगमें अनादिक में स्थित हैं अर्थात्
त्तम है, बुलाकर देना मध्यम है ॥२९॥ अन्नादिक की प्राप्ति न होनेसे पाण
अधमं याचमानाय सेवादानं तु हैं और उन २ युगोम युगानुरूप जोर
नष्ट होजाते हैं प्रत्येक युगमें जोर धर्म
निष्फलम् । जितोधर्मोह्यधर्मेण ब्राह्मण है ॥ ३३ ॥
सत्यं चैवानृतेन च ॥ ३०॥ तेषां निंदा न कर्त्तव्या युग-
याचना करनेसे देना निकृष्टदान है रूपा हि ते द्विजाः। युगे युगे तु
और सेवा कराकर दान देना निष्फल सामर्थ्य शेष मुनिविभाषितम३४
है। कलियुग में धर्मका अधर्मसे पराजय
होजाता है और सत्यका झूठ से पराजय क्योंकि-आचरण करने वाले वे ब्राह्मण
उनकी निंदा नहीं करनी चाहिये,
होता है ॥ ३० ॥
युगानुसार हैं'। जिस२ युग जैसीर
जिताश्चौरैश्चराजानः स्त्री- सामर्थ्य रही वैसे ही पायश्चित्तादिधर्म मनु
भिश्व पुरुषाजिताः सीदति चा- गौतमादि मुनीश्वरोंने वर्णन किये ॥३४॥
ग्निहोत्राणिगुरुपूजाप्रणश्यति ॥ पराशरेण चाप्युक्तं प्रायश्चित्तं
राजाका बहुधा चारों से पराजय विधीयते। अहमद्यैव तत्सर्वमनु-
होता है और पुरुषों का स्त्रियों से स्मृत्यब्रवीमि वः ॥ ३५ ॥
तिरस्कार होता है, कलियुग में अग्निहोत्र-
और मुरुपूजनादि नष्टप्राय होजाते हैं । प्रायश्चित्तादि धर्मोंको स्मरण करके तुमस
अब मैं पराशरजी के कहे हुए संपूर्ण
कुमार्यश्च प्रसूयते तास्मन्काल- | कहताहूं ॥ ३५ ॥
लघुपाराशरी। अ०१ चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वंतु - देवं च षट्कर्माणि दिने दिने३६ पिपुंगवाः । पराशरमतं पुण्यं प स्नानपूर्वक संध्योपासन तथागायच्या- वित्रं पापनाशनम् ॥ ३६.॥ दिमंत्रोंका जप,हवन, देवपूजन, अतिथि चिंतितं ब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्था- नित्य करने चाहिये ॥ ३९ ॥ सेवा और बलिवैश्वदेव, ये षट् कर्म पनाय च । चतुर्णामपि वर्णाना- इष्टोवा यदि वा द्वेष्योमूर्खः माचारो धर्मपालकः ॥ ३७॥ पंडितएव वा। संप्राप्तेवैिश्वदे- हे मुनीश्वरों ! परम पवित्र पापोंका | बांते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ४० माश करने वाला पराशरजीका संमत चारों वर्णीका आचारजी ॥ ३१ ॥ मित्र हो वा शत्रु, मूर्ख हो वा पंडित, अतिथि के लक्षणों से संपन्न जो पुरुष ब्राह्मणों के निमित्त तथा धर्म स्थापन वालवैश्वदेव के अंत में आवै , उसकी करने के लिये चिंतन किया गया सेवा करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ४. तिसको श्रवण कसे, आचार चारों वर्णी के धर्मों का पालन करने वाला है, क्योंकि- दूराच्चोपगतं श्रांतं वैश्वदेव आचरण विना किये केवल धर्मके कथन- उपस्थितम् । अतिथिं तं विजानी- मानी से धर्मका पालन नहीं होसक्ता३७ . यानतिथिः पूर्वमागतः ॥ ४१॥ आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मः दूर से आया हुआ और थका हुआ पराङ्मुखः। पट्कर्माभिरतोनित्यं जो पुरुष वलिवैश्वदेव के अंत में आकर उपस्थित हो उसको अतिथि जानना देवतातिथिपूजकः । हुतशेष तु चाहिये जो कभी पहिलेभी आया हो भुजानो ब्राह्मणोनावसीदति३८ वह अतिथि नहीं है ।। ४१ ॥ जिनका देह आचार से भ्रष्ट है अर्थात् नैकग्रामीणमतिथिं संगृहीत जिन्होंने धर्माचरण का त्याग करदिया है उन से धर्म पराङ्मुख होजाना है। कदाचन। अनित्यमागतोयस्मा- जो ब्राह्मण नित्य षट्कर्म में निरन, दे तस्मादातथिरुच्यते ॥ ४२ ॥ बता और अतिथियों का पूजन करने एक ग्राम के रहनेवाले को आतिथ्य वाला और होम के शेषका भोजन करने के लिये कभी ग्रहण न करै, क्योंकि- वाला है, वह दुःखको प्राप्त नहींहोता।।३८ पहिले कभी उसका दर्शन नहीं हुआ संध्यास्नानं जपोहोमो देवता है, इसकारण से उसे अतिथि कहत. ४ २ नां च पूजनम् । आतिथ्यं वैश्व अतिथिं तत्र संप्राप्तं पूजयेत् ४ (भा टी. ) विशिष्टधर्मशास्त्र। स्वागतादिना। तथासनप्रदानेन ! वीज को अच्छे खेत में बोर्वे और पादप्रक्षालनेन च ॥ ४३॥ धनका दान सुपात्र को दे, अच्छे क्षेत्रमें वोया हुआ अन्न और सुपात्रको दिया अपने स्थान पर प्राप्त हुए अतिथिको कुशल प्रश्नादि पूर्वक आसन देकर और हुआ दान, नष्ट नहीं होता ॥ ४७॥ चरण प्रक्षालन करके पूजन करै ॥४३॥ नपृच्छेद गोत्राचरणं न स्वा- श्रद्धया चान्नदानेन प्रियप्रश्नो- ध्यायं श्रुतं तथा। हृदये कल्पयेद् सरेण च । गच्छतश्चानुयानेन प्री- देवं सर्वदेवमयोहि सः॥ ४८ ॥ तिमुत्पादयेद् गृही ॥ ४४ ॥ अतिथि से गोत्र,आचरण तथा आपने गृहस्थी को उचित है, कि-श्रद्धापूर्वक किया है, इत्यादिक प्रश्न न करै क्योंकि- किन २ शाखों का अध्ययन वा श्रवण अमदान देकर और प्रेम पूर्वक कुशल अतिथि देवस्वरूप होता है इसकारण प्रश्न करके जाते हुए अतिथि को कुछ उसे देववत् जानकर उसका सन्मानकरी।। दृरतक पहुंचाकर प्रीति उत्पन्न कर४४ अपूर्वः सुव्रती विना ह्यपूर्वश्राति- अतिथिर्यस्य भग्नाशोगृहात्त- थिस्तथा । वेदाभ्यासरतो नित्यं तिनिवर्तते । पितरस्तस्य नाश्नं- ति दशवर्षाणि पञ्च च ॥ त्रयोऽपूर्वे दिनेदिने ॥४॥ मुंबनी अर्थात् यम,नियमादि युक्त नथा जिस के घरसे अतिथि निराश होकर चांद्रायणादि व्रतोंका करनेवाला ब्राह्मण, फिर जाताहै उस के पितर पंदरह वर्षतक अतिथि, तथा वेदाभ्यासी, ये तीनों उसके दियेहुए श्राद्ध संबंधी अन्नादिको दिनर अपूर्व ही हैं अर्थात् ये तीनों नि- को ग्रहण नहीं करते ॥ ४५ ॥ त्य सन्मान के योग्य हैं ।। ४९ ॥ काष्ठभारसहस्रेण घृतकुंभश- वैश्वदेवे तु संप्राप्ते भिक्षुकेगृह- तेन च । अतिीर्यस्य भग्नाश- मागते । उद्धृत्य वैश्वदेवार्थ भि- स्तस्य होमोनिरर्थकः ॥ ४६॥ क्षां दत्वा विसर्जयेत् ॥५०॥ जिसके स्थानसे अतिथि निराशगयाहो उसका सहस्त्रभार काष्ठ और सौ कलश याद वलिवैश्वदेव के आरंभ करने धृतसे होम करना निरर्थक है ।। ४६ ॥ के समय कोई भिक्षुक अर्थात् संन्यामी सुक्षेत्रे वापयेत् बीजं सुपात्रे ब्रह्मचारी तथा अतिथि अपने स्थान पर आवै तौ वलिवैश्वदेव के निमित्त निक्षिपेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे अन्नको अलग- करके शेष अन्न में से च छुप्तं दत्तं न नश्यति ॥४७॥ भिक्षा देकर भिक्षुक को विसर्जन करै१० अ०१ ८ लघुपाराशरी। यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्न ऐसा संन्यासी सन्मान करने योग्य नहीं है। स्वामिनावुभौ । तयोरन्नमदत्वाच वैश्वदेवकृतं पापं शक्तोभिक्षु- भुक्त्वा चांद्रायणं चरेत् ॥५१॥ व्यपोहितुम् । न हि भिक्षुकृतं दोष यति और ब्रह्मचारी ये दोनों पक्वान | वैश्वदेवोव्यपोहति ॥ ५५ ॥ की भिक्षा के अधिकारी हैं उनको अन्न वलिवैश्वदेव संबंधी पाप को भिक्षुक दिये विना भोजन करके चांद्रायण व्रत दूर करसक्ताहै, भिक्षुक के सन्मान करने करने से शुद्ध होता है ।। ५१ ।। से वलिवैश्वदेव की विधि में कुछ त्रुटि रह- दद्याच्च भिक्षात्रितयं परिवाट जावे तो वह पाप भिक्षुक (अतिथ्यादि ब्रह्मचारिणाम् । इच्छया च ततो जिनका वर्णन पूर्व होचुका ) के सन्मान करने से शांत होजाता है परंतु वलिवैश्व- दद्यादिभवे सत्यवारितः॥५२॥ देव के कारण भिक्षुक का सन्मान सम्य. संन्यासी और ब्रह्मचारियों को तीन मिक्षा अवश्य देनी चाहिये यदि अधिक बलिवैश्वदेव नष्ट नहीं करसक्ता ॥५५॥ क प्रकार से न हो तो उसके दोष को ऐश्वर्यवान् हो तो निरंतर इच्छापूर्वक अकृत्वा वैश्वदेवं तु ये भुजते भिक्षा देदे ॥५२॥ यतिहस्ते जलं दद्याद्रेक्ष्यं द- दिजातयः । तेषामन्नं न भुंजीत यात्पुनर्जलम् । तद्भक्ष्यं मेरुणा काकयोनि ब्रजंति ते॥५६ ॥ तुल्यं तज्जलं सागरोपमम् ॥५३॥ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, वलिवैश्व- देव विना कि भोजन करते हैं, वे का. यति के हाथ में प्रथम जल दे तदनंतर क योनि को प्राप्त होते हैं, अतएव उनके भिक्षा दे फिर जल दे, ऐसा क्रम है वह अन्नका भोजन करना योग्य नहीं है ५६ भिक्षाका अन्न सुमेरु पर्वत के तुल्य है और वह जल समुद्र के तुल्य है ॥५३॥ अकृत्वा वैश्वदेवंतु मुंजते ये द्विजाधमाः। सर्वे ते निष्फलाझे- यस्यच्छत्रं हयश्चैव कुंजरोहस- याः पतंति नरकेऽशुचौ ॥ ५७॥ मृद्धिमत् । ऐंद्रस्थानमुपासीत त- जो द्विजाधम वलिवैश्वदेव किये विना स्मात्तं न विचारयेत् ॥५४॥ भोजन करते हैं उनके सव कर्म निष्फ- जिस संन्यासी के पास छत्र और हाथी ल होजाते हैं और वे अशुचि नाम नर- घोडा आदि वाहनों और वह समृद्धि- कमें पड़ते हैं। ५७ ॥ मान् इंद्र के स्थान का अनुभव करता हो वैश्वदेवविहीनाये आतिथ्येन तो उसको संन्यासी न विचारै अर्थात् बहिष्कृतः। सर्वे ते नरकं यांति Murpan M
(भा टी.)
विशिष्टधर्मशास्त्र।
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काकयोनि ब्रजति च ॥५८॥ चौरोवा यदि चांडालः शत्रुर्वा
जो बलिवैश्वदेव क्रिया करके पिघातकः वैश्वदेवेतुसंप्राप्तेसोऽ.
हीन हैं और अतिथि सेवामी नहीं क तिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ ६२॥
रते वे संपूर्ण पुरुष नरक को प्राप्त होते
हैं और नरक भोगने के पश्चात् काक
चोर हो वा चांडाल, शत्रु हो वा पिट-
योनिको प्राप्त होतेहैं ॥५८ ॥
घाती जो वलिवैश्वदेवके समय प्राप्त हो
वह अतिथि स्वर्गमाप्ति कराने वाला है।
शिरोवेष्ट्य तु योभुक्ते दक्षिणा-
भिमुखस्तु यः ॥वामपादकर स्थि- वेदपारगम् । अदत्त चान्नमात्रं तु
न गृह्णाति तु योविप्र अतिथि
ला तबै रक्षांसि भुंजते ॥५६॥
जो मनुष्य शिरको वस्त्रादिसे वेष्टित मुक्ता मुक्ते तु किल्विषम्॥६॥
करके तथा वाम चरण पर हाथ धरकर
जो ब्राह्मण वेदपारंगत अतिथि को
दक्षिण दिशाको मुख करके भोजन कर-ग्रहण नहीं करते और उसे बिना अन्न
जल दिये भोजन करतेहैं वे पापका मो.
तेहैं, उसको राक्षसी भोजन कहते हैं, अ-
र्थात् वह भोजन तामसी होजाता है
जन करतहैं अर्थात् वे पुरुष पापी हैं॥६॥
यतये कांचनं दत्वा तांबूलं ब्रह्म-
ब्राह्मणस्य मुख क्षेत्र निरूपमम-
चारिणे । चौरेभ्योप्यभयं दत्वा
कंटेकम् ।वापयेत्सर्ववीजानिसा-
दातापि नरकं ब्रजेत् ॥६०
कृषिः सर्वकामिका ॥ ६४॥
संन्यासीको सुवर्णादिक धनका दान ब्राह्मण का मुख अनुपम कंटकादिसे
करनेसे तथा ब्रह्मचारी को तांबूल देनेसे रहित उत्तमक्षेत्रहै उसमें संपूर्ण वीनों को
और चोरोंको अभय दान देनेसे दाता बोवै वह ब्राह्मणके मुखरूपी कृषि संपूर्ण-
भी नरक को प्राप्त होता है ॥६० ॥ कामनारूप फलोंकी उत्पन्न करनेवाली है।।
शुक्लवस्त्रं च यानं चतांबूलं धातु- सुक्षेत्रे वापयेदीजं सुपात्र निक्षि-
मेव च। प्रतिगृह्य कुलं हन्यापति- | पेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रेच ह्यु
गृह्णाति यस्य च ॥६॥ तन्न विनश्यति ॥६५॥
संन्यासी आदिक श्वेनवस्त्र, वाहन और • पुरुष को उचित है, कि-श्रेष्ठ क्षेत्र में
तांबूल तथा धनादिक को प्रतिग्रह लेकर बीज बोवै और सुपात्र को धनका दान
अपने और जिस से प्रतिग्रह लेते हैं उ- दें अच्छे खतमें और सुपात्र में वोयाहु-
सके भी कुलका नाश करते हैं ॥ ६१॥ आ बीज नष्टनहीं होना ॥६५॥
१० लघुपाराशरी। अ०१ AMAAN प्रजाकी रक्षा अवताहनधीयाना यत्र भैक्षच है किन्तु पृथ्वी शूरवीर राजाओं करके रादिजाः ॥ तं ग्रामं दंडयाजा भोगने योग्यहै अतएव खड्ग करके जीती चौरभक्तप्रदोहि सः॥६६॥ पुष्पं पुष्पं विचिनुयान्मूलच्छेदं जिस ग्राममें व्रत और वेदाध्ययन रहित नकारयेत्। मालाकारइवारामे न ब्राह्मण भिक्षावृत्ति करते हैं उस ग्राम को राजा दंडदे, नहीं तो वहराजा चोरोंको यथांगारकारकः ॥ ६ ॥ भाग देनेवाला होगा क्योंकि-जिसप्रकार जैसे माली उपवनमें से पुष्प फलादि- धर्मानुसार प्रजा राजाको षष्ठांश भाग को को ग्रहण करता है किंतु अग्नि लगा- देती है उसीप्रकार तपस्वीब्राह्मणों को ने वालेकी नाई वृक्षों का मूल छेदन नहीं क्षत्रियादिकों से भाग मिलना चाहिये करता उसी प्रकार राजा को उचित है, यदि क्षत्रियादिक ब्राह्मणों की आजीवि- कि-प्रजा से थोडा २ अपना भाग लेकर का सेवादिक न करेंगे तो ब्राह्मण अ- करै सर्वापहारी नहो ।।६९॥ वश्य ही भिक्षा वृत्ति करेंगे अतएव वे लाभकर्म तथा रत्नं गवांच परि- प्रामवासी क्षत्रिय वैश्यादिक राजाकरके पालनम् । कृषिकर्म च वाणिज्य दंड देनेके योग्य हैं ॥ ६६ ॥ वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥७॥ क्षत्रियोहि प्रजारक्षन शस्त्रपाणिः व्याज लेना, रत्नोंका क्रय विक्रय प्रदंडवान् । निर्जित्य परसेन्यानि करना, गोपालन अर्थात् गौओंकी रक्षा क्षितिं धर्मेण पालयेत्॥ ६७॥ करना और उनसे जो वृषभादिक उत्प- क्षत्रिय हाथ में शस्त्र ग्रहण किये हुए खेतीऔर व्यापार करना यह वैश्य की न हों उनको बेचकर आजीविका करना दुष्टों को उग्र दंड देकर प्रजा की रक्षा वृत्ति है ॥ ७० ॥ करताहुआ शत्रु सेनाको जीतकर पृथ्वी का धर्म से पालन करै ।। ६७॥ शूद्रस्य द्विजसुश्रूषा परमोधर्म- न श्रीःकुलकमायाता भूषणो- उच्यते । अन्यथा कुरुते किंचित्त- ल्लिखितापि वा ।खड्गेनाक्रम्य - अवेत्तस्य निष्फलम् ॥७१॥ जीत वीरभोग्यां वसुंधराम्॥६॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीनों वर्गों अपने कुलके क्रमानुसार प्राप्त हुई जो की सेवा करकै निर्वाह करना शूद्रका लक्ष्मी है वह लक्ष्मी वीरता न होने के परम धर्म है, अन्य क्रियाओंके करनेका कारण स्थिर नहीं है और न भूषण शूद्र को अधिकार नही है ।।७१ ॥ धारण करने से क्षत्रिय की शोभा होती लवणं मधुतलें चदधित घन
( भा०टी० )
विशिष्टधर्मशास्त्र ।
११
के
पयः। नदुष्येच्छूद्रजातीनांकु इसके अनंतर कलियुग में गृहस्थ
त्सिर्वेषु विक्रयम् ॥ ७२ ॥
कम आचार और यथा शक्ति चारों वर्ण
लवण, मधु (शहत ) तेल तथा दही तथा चारों आश्रमोंका मिश्रित धर्म ॥
महा और घृत दुग्धादि संपूर्ण रसोक तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्व पराशर वचो-
वेचने से शूद्रजातिको दूषण नहीं लगता॥ यथा । षट्कर्मसहितोविप्रः कृषि-
विक्रियन्मद्यमांसानिह्यभक्षस्य कर्म च कारयेत् ॥२॥
च भक्षणम् । कुर्वनगम्यागमनं जैसाकि-पराशरजीने कहा है वर्णन
शूद्रः पतति तत्क्षणात् ॥७॥
करते हैं। जो ब्राह्मण षट् कर्म करके युक्त
हो और कृषि करता हो ॥१॥
मद्य वा मांसको बेचने से और अभ-
क्षुधितं वृषितं श्रांतं बलीवईन
क्ष्य वस्तु के भक्षण करने से तथा अगम्या
स्वीमें गमन करने से शुद्धी तत्काल पनित योजयेत् । हीनांगं व्याधितक्लीवं
होजाता है ।। ७३ ॥
वृष विप्रो न वामेत् ॥ ३॥
कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीग वह भूखे प्यासे और थके हुए बैल
मनेन च । वेदाक्षरविचारेण शूद्र-
को हल में न जाड़े, अंगहीन, रोगी,
तथा नपुंसक बैल को न जोतै ॥३॥
स्य नरकं ध्रुवम् ॥७४॥
स्थिरांग नीरुजं तृप्तं सुन पंढ-
इतिश्रीपाराशरीये धर्मशाने
वर्जितम् । वाहयदिवसस्याई
प्रथमोऽध्यायः॥१॥
पश्चात्स्नानं समाचरेत् ॥ ४ ॥
कापला अर्थात् सुवर्ण के समान रंग
जो दृढ अंगवाला, रोग रहित, तृप्त
वाली गौ का दुग्धपान करने से और
ब्राह्मणीमें गमन करने से तथा वेदाक्षर
(छकाहुआ) पुष्ट और नपुंसकता रहित
का विचार करने से
को निश्चय
हो उस वृषभको मध्यान्ह पर्यंत जोतकर
नरककी प्राप्ति होती है ।।७।।
कार्य ले अधिक कार्य न ले उसके उप.
रांव स्नानादिक कर्म करै ।। ४।।
इतिश्रीपाराशरीये धर्मशाने भाषा काया
जपं देवार्चन हामं स्वाध्याय
चैवमभ्यसेत् । एकदित्रिचतुर्विप्रा.
अतः परं गृहस्थस्य कर्माचारं भोजयेत्स्नातकान दिजः॥५॥
कली युगे। धर्म साधरणं शक्त्या
जप, देवपूजन और होम तथा वेदाध्य-
चातुर्याश्रमागतम् ॥ ५ ॥ यनका अभ्यास करता रहै,एक दो तथा
प्रथमोऽध्याय ॥१॥
१२ लघुपाराशरी। अ०२ . तीन वा चार स्नातक (पूर्ण ब्रह्मचर्य हल में चार वृषभ जोतनेवाले दयाहीन करके गृहस्थाश्रम को प्राप्त होने वाले ) समझे जाते हैं और दो वृषभ जोतनेवाले ब्राह्मणों को भोजन करावै ॥५॥ गोहिंसक हैं, दो वृषभ वाले हल से प- स्वयं कृष्टे तथाक्षेत्रे धान्यैश्च हर भर दिनचढे पर्यंत जाते और चार स्वयमर्जितैः । निर्वपेत्पंचयज्ञांश्च वृषभ वाले से मध्यान्ह तक जोत ॥९॥ कृतुदीक्षां च कारयेत् ॥ ६ ॥ षड्गवं तु त्रियामाहेऽटभिः जो धान्य अपने जोते हुए खेत में पूर्ण तु वाहयेत् । न याति नरके. उत्पत्र हुए हों अथवा अपने परिश्रमसे ब्वेवं वर्तमानस्तु वैदिजः॥१०॥ संचय किये हो उन धान्यों से पंचयज्ञको छह वृषभों को हल में जोतकर तीस- करता रहै और विशेष यज्ञादिकोंको रे प्रहर पर्यंत कार्य ले और आठवृषभ भी करै ॥६॥ वाले हल से सायंकाल तक जोते , इस तिलारसानाविक्रेया लोहलाक्षा- प्रकार वृत्ति करने वाला ब्राह्मण नरक दयस्तथा। विश्च फलपुष्पानि में नहीं जाता ॥ १० ॥ नीलरक्तांशुकानि च ॥ ७॥ दानं दद्याच्च वै तेषां प्रशस्त ब्राह्मणों को उचित है, कि-तिल और स्वर्गसाधनम् । संवत्सरेण पत्याएं संपूर्ण प्रकारके रस तथा लोह लाक्षादिक मत्स्यघाती समाप्नुयात् ॥११॥ फल पुष्प तथा नील वा रकवर्ण के वस्त्रों ऐसे ब्राह्मणों को दान द वह दान का विक्रय न करै ।। ७॥ प्रशंसनीय और स्वर्गका देने वाला है ब्राह्मणश्चेत्कृषिकुर्यात्तन्महादो- जो पाप वर्षभर में मत्स्यघात करने से षमाप्नुयात् । हलमष्टगवं धर्म्य होता है ।। १ ॥ षड्गवं मध्यमं स्मृतम् ॥८॥ अयोमुखेन काष्ठेन तदेकाहेन ब्राह्मण को खेती करने में बड़ा पाप लांगली। पाशकोमत्स्यघातीच होता है परंतु जिस हल में आठ वृषभ व्याधः शाकुनिकस्तथा ॥१२॥ हो वह हल धर्मपूर्वक उत्तम है और छह वही पाप जिस हल के अग्र में वृषभवाला मध्यम है।॥ ८॥ लोहा लगा हो उस हल से जोतनेवाले चतुर्गवं नृशंसानां दिगवं- को एकही दिन में होता है,विना अपराध वृषघातिनाम् । दिगवं वाहये- फांसी देनेवाला, मत्स्यपाती, मृगादिकों त्पादं मध्याह्न तु चतुर्गवम् ।। घात करने वाला ॥१२॥ के काष्ठ (भा टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र १२ , प्रदाता कर्षकश्चैव पंचैते सम- भेदन (विदीर्णता) होता है और हलके भागिनः। कंडनी पेषणी चुल्ली द्वारा कृमि इत्यादिक असंख्यजीव जंतु मरते हैं ॥ १५ ॥ उदकुंभी च माजनी॥ १३ ॥ कर्षकः खलु यज्ञेन सर्वपापैः और जो कृषि करने वाला ब्राह्मण दान न देता हो ये पांचों पाप करन में प्रमुच्यते । योन दद्याद् द्विजाति- समान हैं , ओखली , चक्की , चूल्हा भ्योराशिमूलमुपागतः ।। १६ ।। तथा जल भरे हुए पात्रों के रखने का इन पापों से छूटने के निमित्त खेती स्थान और वुहारी ॥ १३॥ करने वाले को यज्ञादिक अवश्य करने पंचसूना गृहस्थस्य अहन्य- चाहिये वा जो कृषि करने वाला अन्नकी हनि वर्तते । वैश्वदेवोबलिभिक्षा राशि का प्रथम भाग सुपात्र ब्राह्मणों गोग्रासोहंतकारकः ॥१४॥ को नहीं देता॥ १६ ॥ इन पांचों वस्तुओं के द्वारा नित्यपति सचौरः सच पापिठो ब्रह्मनंत हिंसा होती है यदि गृहस्थी नित्यप्रति विनिर्दिशत् । राज्ञे दत्वा तु षड्- बलिवैश्वदेव और देव पूजन करता रहै भागं देवानां चैकविंशकम् १७ और भोजन करने से पहिले जो भोजन उसे चोर और महापापी तथा ब्रह्म- रसोईघनेहों उन सब में से थोड़ार भा-हिंसाकरने वाले के समान जानना चा- जन गोत्रों को भी सत्कार पूर्वक दिया हिये, कृषि करने वाला छठाभाग राजा करै तथा देव पितरों के निमित्त भी को दे और इक्कीसवां भाग देवतों के सोलह ग्रास की इंतकार निकाल कर अर्पणकरै ॥ १७॥ सुपात्र ब्राह्मण तथा गौ आदिक को विप्राणांत्रिंशकंभाग सर्वपापैः दिया करै ॥१४॥ प्रमुच्यते । क्षत्रियोपिकृषि कृत्वा गृहस्थः प्रत्यहं कुर्यात्सूनादोन देवान्विप्रांश्च पूजयेत् ॥ १८ ॥ लिप्यते। वृक्षं छित्वा महीं मिला और तीसवां भाग ब्राह्मणों को दे हत्वा च कृमिकीटकान् ॥१५॥ तो वह संपूर्ण पापों से छूटता है, यदि तो वह गृहस्थी ऊपर कहे हुए हिंसा- क्षत्रिय खेती करै तो वह भी इसी प्रकार ओं के दोष से लिप्त नहीं होगा का देवना और ब्राह्मणादिकों का भागदे।१८। करनेमें वृक्षों का छेदन और पृथ्वी का वैश्यः शूद्रस्तथा कुर्यात्कृषिवा-
अ०३
लघुपाराशरी।
ANIMAL
णिज्यशिल्पकम् । विकर्म कुर्वते होते हैं, वैश्ष पंद्रहदिन पर्यंत अपवित्र
शूदा दिजसुश्रूपयोज्झिताः॥१६॥ रहता है और शूद्र की शुद्धि एक मास
में होती है ऐसा पराशरजी का वचन है ।२।
वैश्य और शूद्रभी कृषि वाणिज्य
और शिल्पकर्म करै, जो शूद्र ब्राह्मण
उपवासेन विप्राणामंगशुद्धि-
क्षत्रिय वैश्यों की सेवा का त्याग न जायते। ब्राह्मणानां प्रसूतौ तु
करके निषिद्ध कर्म करते हैं ॥ १९॥ देहस्पर्शी विधीयते ॥ ३ ॥
भवत्यल्पायुपस्ते वै निरय यां- ब्राह्मणों के अंग की शुद्धि उपवासादि-
त्यसंशयम् । चतुर्णामपि वर्णा- को करके होजाती है और जिन ब्राह्मणों
नामेषधर्मः सनातनः ॥२०॥
के स्थान में जन्म का पुत्रादिक के
सूतक हुआ हो उन ब्राह्मणों के देह
इतिश्री पाराशरीये धर्मशास्त्रे स्पर्श करने का दोष नहीं है ॥३॥
द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ जातो विप्रो दशाहेन दाद-
उनकी आयु स्वल्प होती है और वे शाहेन भूमिपः। वैश्यःपंचदशा-
नरक को प्राप्त होते हैं इस में संदेह नहीं, हेन शूद्रोमासेन शुध्यति । ४॥
चारों वर्गों का यही सनातनधर्म है २०
जन्म सूतक में ब्राह्मण दशदिन में
इति श्रीपाराशरीये धर्मशास्त्र भाषा कार्या
और क्षत्रिय बारह दिन में तथा वैश
पंद्रह दिन में और शूद्र, एक मास में
अतः शुद्धिं प्रवक्ष्यामि जनने शुद्ध होता है ॥ ४ ॥
मरणे तथा। दिनत्रयेण शुद्ध्यति एकाहाच्छुद्धयते विप्रो योग्नि-
ब्राह्मणाः प्रेतसूतके ॥१॥
वेदसमन्वितः। ध्यहाकेवलवेद.
इस के अनन्तर जन्म और मरण में स्तु हीनोहि दशभिर्दिनैः ॥५॥
जो मूतक और आशौच होता है उसकी जो ब्राह्मण वेदपाठी हैं और नित्य
शुद्धि को कहते हैं, मृतक के आशौच अग्निहोत्र करते हैं वे एकदिन में ही
में ब्राह्मण तीनदिन में शुद्ध होते हैं १ शुद्ध होजाते हैं और जो केवल वेद ही
क्षत्रियोदादशाहेन वैश्यः पं. करके युक्त हैं वे तीन दिन में
शुद्ध
चदशाहकैः। शूद्रः शुति मी- दोनों करके हीन हैं वे दश दिनतक अ-
होते हैं और जो वेद तथा अग्निहोत्र
सेन पराशरवचोयथा ॥२॥
शुद्ध रहते हैं ॥५॥
और सत्रिय बारहदिन में शुद्ध जन्मकर्मपरिभ्रष्टः संध्योपास-
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
१५ (भा०टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र । नवर्जितः। नाम धारकविप्रस्तु में कहलातीहै पांचवीं पीढी वाला पुरुष दशाहं सूतकी भवेत् ॥ ६॥ धनादिक के भाग का अधिकारी नहीं है इसलिये उसे दश दिन तक का सूतक नहीं जो ब्राह्मण अपने जन्म समय से ही होता,क्योंकि-चौथी पीढीके उपरांत वंश नित्य नैमित्तिकादिक कर्मों से हीन और संध्योपासन भी नहीं करते ऐसे संज्ञा होतीहै ॥ ९ ॥ चतुर्थे दशरात्रं स्यात्तणनि- नाम धारक ब्राह्मण ( जो केवल नाम मात्र ही से ब्राह्मण कहलाते हैं ) दश शातिपंचमे । पष्ठे चतुरहाच्छु- दिन पर्यंत अशुचि रहते हैं ॥ ६ ॥ द्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात् ॥१०॥ अजागावो महिष्यश्च ब्राह्मणी चौथी पीढी वाला पुरुष दश दिन में, नवसूतिका। दशरात्रेण संशुच्चेद् पांचवीं पीढ़ी वाला छहदिन में,छठी पीढ़ी भूमिस्थं च नवोदकम् ।७॥ वाला पुरुष चारदिन में और सातवीं पी. दी वाला तीनदिन में शुद्ध होताहै॥१०॥ बकरी, गाय, भैंसे तथा प्रस्ता ब्राह्मणी और भूमिपर स्थित वर्षा का भृग्वाग्निमरणे चैव देशांतरमृते नवीन जल ये सब दशदिन में शुद्ध तथा । बाले प्रेते च संन्यस्ते स. होते हैं ॥ ७॥ द्यः शौचं विधीयते ॥ ११ ॥ एक पिंडास्तु दायादाः पृथग्दा- जो पुरुष पर्वत से गिरकर तथा अभि रनिकेतना। जन्मन्यपि विपत्तों में जलकर मृत्यु को प्राप्त हुआहो अथवा च तेषां तत्सूतकं भवेत् ॥८॥ जिस की मृत्यु परदेश में हुईहो उसके सू. तक में और बालक वा सन्यासीकी मृत्यु सपिंड दायाद अर्थात् धनादिक का भागलेने वाले जो पुत्र पौत्रादिक होते होने में शीघ्र शुद्धि होतीहै ॥ ११ ॥ हैं उन के स्थान पृथक् २ हों तो भी जन्म देशांतस्मृतः कश्चित्सगोत्रः और मरण में उनको आशौच होता है। श्रूयते यदि । न त्रिरात्रमहोरात्रं तावत्तत्सूत्रकंगोत्रे चतुर्थपुरुष- सद्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥१२॥ ण तु । दायादिच्छेदमाप्नोति पं. को प्राप्त हुआहो तो तीन दिन का आशौच यदि कोई सगोत्री देशांतर में मृत्यु चमोवात्मवंशजः ॥ ६॥ नहीं होता किंतु जब उसकी मृत्यु का वृ. गोत्र में भी दशही दिन तक का सूतक तोत श्रवण करै तव शीघ्र स्नान करने रहताहै चौथी पीढीतककी संतान अर्थात् से एक दिन रात में ही शुद्ध होजाताहै।१२। एक प्रपितामह तक की संतान एक गोत्र देशांतरगतोविप्रः प्रयामात् अ०३ - के १६ लघुपाराशरी। कालकारितात् । देहनाशमनुप्रा- यदिचारमासमें गर्भगिरे तो उसे गर्म- तस्तिथिन ज्ञायते यदि ॥१३॥ सावकहतेहैं और पांचवें वा छठे मासमें गर्भ गिरनेको 'गर्भपात' कहते हैं । तद- जो ब्राह्मण परदेश में जाकर कालवश नंतर छठे माससे दशमें मास पर्यंत प्रसव से मृत्युको प्राप्त हुआ हो याद उस कहलाता है प्रसवमें दश दिनका सूतक मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो ॥१३॥ मानना उचित है ॥ १७॥ कृष्णाष्टमीत्वमावास्या कृष्णा दन्तजाताह्यजाताश्च कृतचडा. चैकादशीच या। उदकं पिंडदा- संस्थिताः अग्निसंस्करणं तेषां नं च तत्र श्राद्धं च कारयेत् ॥१४॥ तो कृष्णपक्षकी अष्टमी वा अमावास्या त्रिरात्रमशुभिवेत् ॥ १८॥ तथा कृष्णपक्ष की एकादशी को उसके जिन बालकोंका दूडाकर्म होगया हो निमित्त जलदान और पिंडदान तथा उनके दांत जमे हो वा न जमे हों उन श्राद्ध करै ॥१४॥ बालकोंकी मृत्यु होने में अग्निसंस्कार अजातदंता ये वाला ये च ग-शौच मानना उचितहै ॥ १८ ॥ करना चाहिये और तीनदिन का आ- भौदिनिसृताः । नतेषामग्निसं- आदताज्जन्मतः सद्य आचू. स्कारोनाशौचं नोदकक्रिया।१५ डान्नैशिकी स्मृता । त्रिरात्रमुप- जिनबालकों के दांत नहीं जमे हों औरजो गर्भ से उत्पन्न होतही मृत्युकोमाप्त हुएहों नीतस्य दशरात्रमतः परम्॥१६॥ उन का अग्निसंस्कार और आशौच तथा दांत जमेन से पूर्व मृत्यु हो तो शीघ्र जल दान नहीं होता ॥ १५ ॥ स्नानमात्र से शुद्धि होजातीहै और चूडा- यदिगर्भोविपद्मत स्रवते वापि कर्म से पहिले मृत्युहो तो एक दिन रात योषितः। यावन्मासस्थितो गर्भो में शुद्धि होती है। यज्ञोपवीत होनेसे पूर्व मृत्यु हो तो तीन दिन में शुद्धि होती है दिनंतावत्तु सूतकम् ॥ १६ ॥ और यज्ञोपवीत होनेके अनंतर दशदिन यदि गर्भस्राव तथा गर्भपात हो तो में शुद्धि होती है ॥ १९॥ जितने मासका गर्भ हो उतने ही दिनों ब्रह्मचारी गृहे येषां हूयते च हुता- का मूतक होताहै ॥ १६॥ आचतुर्थाद्भवेत्तावः पातः पंच तेषां सतकं भवेत् ॥२०॥ शनः। संपर्क चेन्न कुर्वति न मपष्ठयोः। अतऊर्ध्व प्रमूतिःस्या जिन के घरमें कोई पुरुष ब्रह्मचारी हों दशाहं मूतकं भवेत् ॥ १७ ॥ तथा जिनके घर निन्य-प्रति अग्निहोत्र (भाटी.) विशिष्टधर्मशास्त्र । होता हो और प्रसूता स्त्री से स्पर्शादिक उत्पन्न न करे तोप्राप्तव में माता दशदिन न करत हों तो उनको मृतक नहीं होता २० में शुद्ध होती है और पिता स्नानमात्र संपर्कादुष्यते विप्रोजनने से शुद्ध होजाता है ॥ २४ ॥ मरणे तथा संपर्काच्च निवृत्तस्य सर्वेषां शावमाशोचं माट- न प्रेतं नैव सूतकम् ॥२१॥ पित्रोस्तु सूतकम् । मृतकं मासु जन्म और मरण में ब्राह्मण प्रसूता स्त्री खेस्यादुपस्पृश्य पिताशतिः२५ और मृतक के स्पर्शादिक करने से दक्षित मृतक का आशौच तो कुटुम्बमात्र होता है जो स्पर्शादिक नहीं करता उसे को होता है और जन्मसूतक माता पिता जन्म वा मरण में सूतक नहीं होता ॥२१॥ दोनों को होता है, तिस में भी सूतक शिल्पिनः कारुका वैद्या दासी विशेष करके माता ही को लगता है दासाश्च नापिता राजानःश्रोत्रि- क्योंकि-पिता तो केवल आचमन करने ही से शुद्ध होजाता है ॥ २५ ॥ याश्चैव सद्यःशौचाः प्रकीर्तिताः। यदि पन्यां प्रसूतायां संपर्क- शिल्पवृत्ति करने वाले कारक (ह सवाई आदिक) तथा वैद्य, दासी तथा कुरुते द्विजः। सूतकं तु भवेत्तस्य दास, नाई, राजा और वेदपाठी ये यदि विप्रश्व वेदवित् ॥२६॥ सम्पूर्ण शीघ्र शुद्ध होजाते हैं ॥ २१ ॥ जो ब्राह्मण प्रसूता स्त्री से संसर्ग सत्रतः सत्रपूतश्च आहिता- करता है उसे सूतक अवश्य होता है, ग्निश्च यो दिजः।रोज्ञश्च सूतकं चाहे वह ब्राह्मण वेदों का जानने वाला भी क्यों न हो ॥ २६ ॥ नास्ति स्नानपूताः प्रकीर्तिताः२३ जो ब्राह्मण व्रतोंकरके युक्त तथा संपर्काज्जायते दोषो नान्यो- यों करके पवित्र है और नित्य अग्नि- दोषोस्ति वैदिजे। तस्मात्सर्वप्र- होत्र करता है उस ब्राह्मण को क्या यत्नेन संपर्क वर्जयेदुधः॥२७॥ राजाको सूतक नहीं होता क्योंकि यह ब्राह्मण को संसर्ग ही से दोष होता सब स्नान ही करके पवित्र होजाते हैं। है याद वह संसर्ग न करै तौ कुछ दोष प्रसवे गृहमेधी तु न कुर्यात्सं- नहीं होता, अतएव संपूर्ण यत्नों करके करं यदि। दशाहाच्छुध्यते माता विद्वान् को संसर्ग का त्याग करना लवगाह्यपिताशुचिः ॥ २४॥ चाहिये ॥ २७ ॥ यदि गृहस्थी वर्णसंकर सन्तान को विवाहोत्सवयज्ञेषु वंतरामृतसू- लघुपाराशरी। अ०३ तके । पूर्वसंकल्पितं द्रव्यं दीय- सरा जो रण में सन्मुख स्थित रहकर मानं न दुष्याति ॥ २८॥ मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥ ३१॥ यदि विवाह उत्सव, और यज्ञादिक यत्र यत्र हतःशूरः शत्रुभिः के मध्य में किसी सपिंडादि के मृत्यु परिवेष्टितः।अक्षयांल्लभते लोकान होने के कारण सूतक होजाय तो पहिले यदि क्लीवं न भाषते ॥ ३२ ॥ से संकल्प किया हुआ द्रव्य जो किसी को देने के निमित्त रक्खा है दूषित वीर नपुंसकता के वचन नहीं बोलते शत्रुओं से घेरे जाने पर भी जो शूर नहीं होता है ॥ १८ ॥ वे चाहे जिस (शुद्ध वा अशुद्ध) स्थान में अतरा तुदशाहस्य पुनर्मरण- मारे गये हों परन्तु निश्चय अक्षय लोको जन्मनी । तावत्स्यादशुचिविनों को प्राप्त होते हैं ॥ ३२ ॥ यावत्पूर्वं न गच्छति ॥ २६ ॥ संन्यस्तंब्राह्मणं दृश्वा स्थाना- यदि दश दिन के मध्यमें किसी दूसरे चलति भास्करः । एषमे मंडलं पुरुष का जन्म वा मृत्यु हो तो ब्राह्मण उसी समय तक अशुचि रहता है जिस भित्वा पर स्थानं प्रयास्यति ३३ समय तक पहिले पुरुष के जन्म वा मृत्यु संन्यासी, ब्राह्मण को देखकर सूर्यभी से अशुचि रहता हो ।। २९ ॥ अपने स्थान से चलायमान होजाता है ब्राह्मणार्थ विपन्नानांगवार्थ प्रा- कि-यह मेरे मंडल को भेदन करके प- पदायिनाम् । आहवेषु विपन्नाना- रमपद को प्राप्त होगा।॥ ३३॥. मेकरात्रमशौचकम् ॥३०॥ यस्तु भग्नषु सैन्येषु विद्वत्सु जिनकी मृत्यु ब्राह्मण और गौ के समंततः। परित्राता यदा गच्छे- निमित्त हुई हो अथवा जो संग्राम में मृत्यु त्स च क्रतुफलं लभेत् ॥ ३४ ॥ को प्राप्त हुए हों उनका आशौच एक दिन जोरण में (शस्त्र प्रहारादिक से व्या- रात का होता है ॥ ३० ॥ कुल होकर) भागती हुई सेनाकी रक्षा द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमंड करताहै वह यज्ञ के फल को स होताहै। लभेदिनौ। परिवाड्योगयुक्तश्न यस्य क्षतावृतं गात्रं शरमुद्गर- रणे चाभिमुखोहतः॥३१॥ यष्टिभिः । देवकन्यास्तु तं वीरं संसार में ये दो पुरुष सूर्यमण्डल की हरंति रमयति च ॥ ३५ ॥ भेदन करके ब्रह्मलोक को जाते हैं एक रण में जिसका शरीर शूल, मुद्र सौ योग करके युक्त संन्यासी और द्- (मूंगरी) और यष्टि (लाठी ) आदिकों (मा०टी०) विशिष्टधर्मशाख । १९ से क्षत (भम ) हुआ हो उसवीर को दे- यस्याहवे तु प्रविशेत वक्रम् । वकन्या लेजाती हैं और रमण करती हैं। तत्सोमपानेन किलास्य तुल्यं, देवांगना सहस्राणि शूरमायो- संग्रामयज्ञे विधिवञ्चदृष्टम् ॥३॥ मम भर्ती ममेति च ॥ ३६ ॥ संग्राम में जिम वीरके मस्तक से रु- घिर बहकर मुखमें प्रवेश करै उस के संग्राम में मृत्यु को प्राप्त हुए शूरवीर निमित्त वह रुधिर का पान करना संग्रा- को देखकर सहस्रों देवांगना 'यह मेरा मरूपी यज्ञ में विधि पूर्वक सोमपान करने पतिहो' इस प्रकार कहती हुई शीघ्रना की समान है इस में संशय नहीं ॥३९॥ पूर्वक दौड़कर उस के पास आती हैं १६ यं यज्ञसंस्तपसाच विप्राः, अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये बहंति स्वगैषिणोयत्र यथैव यांति । क्ष- द्विजातयः । पदे पदे यज्ञफल- णेन यांत्येव हि तत्र वीराः प्राणा-मानुपूाल्लभंति ते ॥ ४० ॥ न्सुयुद्धेन परित्यजन्ति ।। ३७॥ जो ब्रामण, क्षत्रिय, वैश्य,मृत्युको मा- स्वर्ग की इच्छा करने वाले ब्राह्मण सहुए अनाथ ब्राह्मणको अपने स्कंध अनेकों यज्ञ और तपके द्वारा जिस प्रकार पर धारण करके लेजाते हैं उन को - (विमानादिकों का सुख भोगते हुए ) मानुसार एक २ चरणपर एक २ या जिस स्थान (स्वर्ग) को प्राप्त होते हैं का फल प्राप्त होता है अर्थात्-मृत्युको उसी प्रकार ( आनंद युक्त )उस (स्वर्ग) प्राप्तहुए अनाथ ब्राह्मण को जो स्मशान में स्थान को रण में प्राणत्याग करने वाले लेजाते हैं उन को बहुत पुण्य प्राप्त होता है। वीर क्षणमात्र में प्राप्त होजाते हैं।॥३७॥ न तेषामशुभं किंचित्पापं वा जितेन लभ्यते लक्ष्मीर्मूतेनापि शुभकर्मणाम् । जलावगाहनाचे- वरांगनाः । क्षणचंसिनिकाये. षां सद्यः शौचं विधीयते ॥१॥ स्मिन्का चिंता मरणे रणे ॥३८॥ जो मृत्युको मासहुए अनाथ बामणको रण में विजय प्राप्त होने से लक्ष्मीकी स्कन्धपर धारण करके चलते हैं उन प्राप्ति होती है और मृत्यु प्राप्त होने से सत्कर्म करने वाले पुरुषोंको कुछ पाप देवांगनाओं (अप्सराओं) की प्राप्ति होती वा अशुभ नहीं होता, केवल जल में है, फिर युद्ध में मृत्युको प्राप्त होनेसे इस दिनानही करने से उन की शीघ्र शुद्धि क्षणभंगुर देहकी क्या चिंता है ।। हो जाती है ॥४१॥ ललाटदेशे रुधिरं श्रवच्च, असगोत्रमबंधुंच प्रेतीभूतं दिजो लघुपाराशरी। त्तमम् । वहित्वा च दहित्वा च प्रेतीभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो- प्राणायामेनशुध्यति ॥ ४२ ॥ ज्ञानदुर्बलः । अनुगच्छेन्नीयमानं जो अपना सगात्र वा बंधु न हो ऐसे मृ- त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ ४६ ॥ त्युको प्राप्त हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणको स्कंधपर जो ज्ञानहीन ब्राह्मण मृतक शूद्रके सा- धारण करके ले चलने से तथा उसको थ जायतो तीनदिन पर्यत अशुद रहताहै।। दाह करने के आशौचस केवल प्राणाया- त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदी म ही के करने से शुद्ध होजाताहै ॥ ४२॥ अनुगम्येच्छया प्रेत ज्ञातिमज्ञा- गत्वा समुद्रगाम् ।प्राणायामशतं तिमेव वा । स्नात्वा सचैल स्पृष्ट- कृत्वा घृतं पाश्य विशुद्धयति ।। वाग्नि घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति४३ फिर तदनन्तर तीन दिनके पश्चात् समु- निस मृतकहुए पुरुषके पाछे अपनी द् गामिनी नदीके तटपर स्थित होकर इच्छा से जाय यदि वह पुरुष अपनी सौ माणायाम करके और घृत का भोज- जातिका हो वा अन्य जानिका हो परन्तु न करके शुद्ध होताहै ॥४७॥ उसके पीछे जाय तो जानेसे वस्त्रों सहि तस्माद् द्विजोमृतं शूद्रं न स्पृ. त स्नान करके अग्नि का स्पर्श करे और शेन चदाहयेत् । दृष्टे सूर्याव- धृत चाख तब शुद्ध होजाताहै ॥ १३॥ लोकेन शुद्धिरेषा पुरातनी ४८ क्षत्रियं मृतमज्ञानाबाह्मणोयो- इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्र- नुगच्छति । एकाहमशुचिर्भूत्वा तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ पंचगव्येन शुध्धति ॥ ४४ ॥ इस कारण से ब्राह्मण मृतक शूद्र का जो अज्ञानी ब्राह्मण मृतक क्षत्रियके साथ स्पर्श तथा दाह क्रिया न करै । मृतक जायतो एकदिन अशुचि रहकर तदनंतर शूद्रका दर्शन करके सूर्यनारायणका पंचगव्यस शुद्ध होताहै ॥४४॥ दर्शन करने से शुाद होतीहै ।। ४८ ॥ शंव च वैश्यमज्ञानाद् ब्राह्मणो- इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्ने भाषाटीकाया ह्यनुगच्छति । कृत्वा शौचं दि. तृतीयोऽध्याय ॥३॥ रात्रं च प्राणायामान षडाचरेत् ॥ अतिक्रोधादात्मानं वा द्वेषादा अज्ञानी जो ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त, यदि वा भयात् । उध्नीयास्त्री हुये वैश्यक साथ जायतो दीदिन रात अशुचि रहकर छह प्राणायाम कर- पुमान्वा गतिरषा विधीयते॥१॥ नेसे शुद्ध होताहै ।। ४ ।। जा.पुरुष वा स्त्री अतिक्रोध तथा (भा टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र। द्वेप से अथवा लोक भयादिके कारण ' गंतारः पाशच्छेदकराश्च ये ॥५॥ से अपने आप को फांसी आदि देकर जो ब्राह्मण उस मृतक को स्पर्श करते मारडालै तो उसकी गति इस प्रकार हैं वा श्मशान को ले जाते हैं तथा दाह की होतीहै ॥ १ ॥ करते हैं अथवा उसके पीछ जाते हैं या पूयशोणितसंपूर्ण लंधेतमसि जो पाशच्छेदन करते हैं ॥ ५ ॥ मज्जति । पष्ठिवर्पसहस्राणि नरक तप्तकृच्छ्रेण शुद्धास्ते कुपुत्री- प्रतिपद्यते॥ २॥ ह्मणभोजनम् । अनुडत्सहितां वह पीब और रुपिर से परिपूर्ण अंध-गां च दद्युर्विप्राय दक्षिणाम्॥६॥ कार युक्त तम नामक नरक में दूवनाहै वे तप्त कृच्छ्र व्रत करके और सुपात्र और उस नरक में साठ सहस्र वर्ष पर्यंत ब्राह्मणों को भोजन करा कर तथा सुपा- निवास करताहै ॥ २॥ त्र ब्राह्मण को एक बैल और गौ दक्षिणा नाशौचं नोदकं नाग्नि नाव- देकरशुद्ध होते हैं ॥ ६ ॥ पातं च कारयेत् । वोढारोग्निप्र- व्यहमुष्णं पिवेदारि व्यहमु- दातारः पाशच्छेदकरास्तथा ३ ष्णं पयः पिवेत् । व्यहमुष्पंपिवे- उसका आशौच नहीं मानना और सर्वाियुं भक्षेद् दिनत्रयम् ॥७॥ जलक्रिया वा अग्निक्रिया चा अश्रुपात पर्टपलं तु पिवेदंभास्त्रिपलं तु नहीं माना उसके ले जानेवाले और दा- पयः पिवेत् ।पलमेकं पिवेत्सर्पि- ह करने वाले और पामच्छेदन (फां- स्तप्तकृच्छं विधीयते ॥ ८ ॥ सी काटना) करने वाले॥ ३ ॥ तप्तकृच्छ्रेण शुद्धयंतीत्येवमाह तप्त कुछ व्रत करने वाला पुरुष तीन अब तप्त कुछ व्रत की विधि कहतेहैं ।। प्रजापतिः। गोभिर्हतं तथोबद्धं दिन पर्यंत छहर पल उष्ण नल पीचे ब्राह्मणेन तु घातितम् ॥ ४॥ तदनंतर तीन दिनपर्यंत प्रति दिन चार २ तप्त कुच्छ्रवत से शुद्ध होते हैं यह ब्रह्मा पल उष्ण दुग्ध पान करै उसके पश्चात् तीन दिन पर्यंत एकर पल उष्ण घृत पान जी ने कहा है । जिस को गौवों ने करै फिर तीन दिन तक वायु का भो. मारा हो वा जो फांसी को प्राप्त हुआ हो अथवा जिस को ब्राह्मणों ने मारा हो। जन करै अर्थात् निर्जल व्रत कर यह तस कृच्छ्रका विधान है ॥७॥८॥ संस्पृशंति तु ये विप्रा वोढार- योवै समाचरोदिमः पतितादि- श्राग्निदाश्रये । अन्ये ये चानु -एक पल चार तोले का होता है।
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लघुपाराशरी।
प्वकामतः पंचाहं वा दशाहं वा छः मास संसंग होनेपर दो चांद्रायणकरे।
दादशाहमथापि वा ॥४॥ शुद्धयर्थमष्टमे चैव परमासा-
जो ब्राह्मण विना इच्छा पतितादिकों कृच्छ्रमाचरेत् । पक्षसंख्याप्रमाणे-
से ५ दिन १० दिन वा १२ दिन ॥९॥ न सुवर्णान्यपि दक्षिणा॥१३॥
मासार्द्धमासमेकं वा मासद्धय-
यदि एक वर्ष पर्यंत संसर्ग रहै तो
मथापिवा । अब्दार्द्धमब्दमेकं वा छः मास तक कृच्छ्र व्रत करै और
भवेदूर्व हि तत्समः॥१०॥
जितने पक्षसंसर्ग रहाहो उतने ही सुवर्ण
की दक्षिणा दे तब शुद्ध होता है, पूर्वोक्त
अथवा १५ दिन तथा एक वा दो
प्रकार से पहिलापक्ष ५ दिन का ऐसे
माम तथा छः मास एक वर्ष अथवा
ही १० । १२ । १५ दिन १ मास ।
एक वर्ष से अधिक समय पर्यन्त संसर्ग
करे तो एक वर्ष से अधिक संसर्ग करने क्रमसे ८ पक्षनानो ॥ १३ ॥
२। मास । ६।मास । और १ वर्ष के
से वह ब्राह्मण उसी के तुल्य पतित
होजाता है ॥१०॥
ऋतुस्नाता तु या नारी भर्ता-
त्रिरात्रं प्रथम पक्षे दितीये कृच्छ्र- रनोपसर्पति।सा मृता नरकं याति
माचरत् । तृतीये चैव पक्षे तुक | विधवा च पुनः पुनः॥१४॥
च्छं सांतपनं चरेत् ॥११॥
जो ऋतु के पश्चात् स्नान करके स्त्री
भती के समीप नहीं जाती वह-मृत्यु
यदि पांच दिन पतितादिकों से संसर्ग
होतो उसकी शुद्धि के निमित्त तीन दिन
अनंतर नरक को प्राप्त होती है और
नरक भोगने के
पश्चात् वारंवार विधवा
संसर्ग रहे तो कृच्छ्वन करै बारहदिन
संसर्ग रहे तो वप्त कृच्छ्र करै ॥११॥
ऋतुस्नातांतु योभाया सन्निधौ
चतुर्थे दशरात्रं स्यात्पराकःपंच- नोपगच्छति। घोरायां भ्रूणहत्या.
मे मतः।कुर्याचांद्रायणं षष्ठेसप्तमे यां युज्यते नात्र संशयः॥ १५ ॥
वैदवद्वयम् ॥१२॥
और जो पुरुष अपनी ऋतुस्नाता स्त्रीके
पद्रहदिन संसर्ग रहने में दश दिन समीप नहीं जाता वह बडीघोर गर्भहिंसा
पर्यंत उपवास करै और एक मास पर्यंत के पाप से युक्त होता है इस में संशय
संसर्ग रहै तो पराक बन कर दो मास नहीं है ॥ १५ ॥
सा होनेपर चांद्रायण बन कर और दरिदं व्याधितं धन भतारं याव-
के
पर्यंत उपवास करै और जो दश्च दिन होती है ॥ १४ ॥
(भा टी.) विशिष्टधर्मशास्त्र । २३ MAAMAA मन्यते । सा शुनी जायते मृत्वा पातने। प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति त- शूकरी च पुनः पुनः॥ १६ ॥ स्यास्त्यागोविधीयते ।। २०॥ जो स्त्री अपने दरिद्री, रोगी, वान जितना पाप ब्रह्महिंसा में होता है भी पति का अनादर करती है वह मृत्यु उससे द्विगुणा पाप गर्भपात करने में के पश्चात् वारंवार कूकरी वा शूकरी होता है उसका प्रायश्चित्त नहीं है अतएव की योनि को प्राप्त होतीहै ।।.६ ॥ उस स्त्री का त्यागही करना योग्य हैर पत्यौ जीवतिया नारी उपोष्य ओघवाताहृतं वीजं यस्य क्षेत्रे व्रतमाचरेत् । आयुष्यं हरते भर्तुः प्ररोहति।सक्षेत्री लभतेवीज नवी- सा नारी नरकं व्रजेत् ॥ १७ ॥ जीभागमहति ॥ २१॥ पति के जीवित रहते जो स्त्री निराहार जल और वायु के वेग से किसी व्रत करती है वह पति की आयु को मनुष्य का गज किसी दूसरे मनुष्य के न्यून करती है और मृत्यु को प्राप्त हो- खेत में आकर उत्पन्न होजावै तो उस कर नरक को प्राप्त होती है।॥ १७॥ बीज के फलका भागी खेतवाला ही अपृष्ट्वा चैव भतारं या नारी होताहै वीजवाले को भाग नहीं मिलता। कुरुते व्रतम् । सर्व तदाक्षसान्गच्छे- तद्वत्परस्त्रियः पुत्रौ दौ सुतौ दित्येवं मनुस्त्रवीत् ॥ १८॥ कुंडंगोलको । पत्यौ जीवति कुंड- जो स्त्री पति की विना आजा लिये वन स्तु मृते भर्तरिगोलकः॥२२॥ करती है उसका फल राक्षस लेजाते हैं इसीप्रकार कुंड और गोलक ये दो अर्थात् वह व्रत निष्फल होता है ऐसा पुत्र जो परस्त्री से उत्पन्न होते हैं उस मनुजी ने कहा है ।। १८॥ स्त्री के ही पुत्र हैं, वीर्यदान करनेवाले के बांधवानां सजातीनां दुर्वृत्तं नहीं । पतिके जीवित रहते . जारजात कुरुते तु या। गर्भपातं च या कु-पुत्र को कुण्ड कहते हैं और पति की र्यान्न तां संभापयत्क्वचित् ।१६। गोलक कहते हैं ।। २२ ।। मृत्यु होने के पश्चात् जारजात पुत्रको जो स्त्री अपने बांधवों से अथवा अ- पने जाति वालों से दुराचरण करते है औरसःक्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रि- तथा जो स्त्री गर्भपात करती है उस स्त्री मैकः सुतः। दद्यान्माता पिता से कभी सम्भाषण न करै ।। १९ ॥ वापिस पुत्रोदत्तकोभवेत् ॥२॥ यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भ औरस, क्षेत्रन नथा दत्तक और २४ लघुपाराशरी। AA AAAAAAAAAAAAAL कृत्रिम यहभी पुत्र हैं, माता वा पिनाने जो बड़ा भ्राता कुबड़ा, बौना, नपुसक जो पुत्र किसी पुरुषको दियाहो वह अथवा स्पष्ट न बोलनेवाला मूर्ख तथा दत्तक पुत्र कहलाता हे ॥ २३ ॥ जन्मांध और बहिरा वा गूंगा हो तो पििवत्तिः परीवेत्ता यया च परिवेदन का दोष नहीं है ।। २६ ।। परिविद्यते । सर्वेते नरकं यांति पितृव्यपुत्रः सापत्नः परनारी- दातायाजकपंचमाः ॥ २४ ॥ सुतस्तथा। दाराग्निहोत्रसंयोगे परिवित्ति और परिवेत्ता तथा जो न दोपः परिवेदने ।। २७ ॥ कन्या परिवेत्ता से विवाहीजाय, कन्या यदि चचा वा ताऊ का पुत्र, सपत्री दान करनेवाला और याजक (विवाह का पुत्र अथवा अन्य स्त्री से उत्पन्न कराने वाला । ये संपूर्ण पुरुष नरक में हुआ पुत्र बड़ा भ्राता हो तो सन्तानो. जाते हैं। बड़े भ्राता के विवाह होने स्पत्ति वा अग्निहोत्र के लिये विवाह कर- से पूर्व छोटे भ्राता का विवाह हो तो लेने में कुछ दोष नहीं ॥ २७ ॥ बड़े भ्राता को परिवित्ति और छोटे नष्टे मृते प्रबजिते क्लीवे च प- भ्राता को परिवेत्ता कहते हैं ॥ २४ ॥ तिते पतौ ॥ पंचस्वापत्सु नारीणां द्वौ कृच्छ्रौ परिवित्तेस्तु कन्यायाः पतिरन्योविधीयते ॥२८॥ कृच्छ्रएव च । कृच्छातिकृच्छ्रौ जिस कन्या का वाग्दान होगया हो दातुस्तु होता चांद्रायणं चरेत् ॥ और विवाह न हुआ हो, ऐसी दशा में जो बड़े भ्राता के विवाह होने से उसका पति यदि नष्ट होगया हो ( अ- पहिले छोटे भ्राता का विवाह हुआ हो थात्-कहीं चलागया हो और पता न तो उसके दोषकी निवृत्तिके निमित्त वे लगै ) वा मृतक होगया हो, या स. दोनों भ्राता दो २ कृच्छ्व्रत करें और न्यासी हो जाय अथवा नपुंसक हो तो वह विवाहित कन्याएक कृच्छ्र व्रत करै इन पांच आपत्तियों में उस कन्या का और कन्यादान करने वाला कृच्छ्र और दूसरे पति के साथ विवाह करदेना अतिकृच्छ्र व्रत करै और होता चांद्रायण चाहिये ॥२८॥ व्रत करै ॥२५॥ मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्यत्र- कुब्जवामनपंडेषु गद्देषु जडेट ते स्थिता ।सा मृतालभते स्वर्ग च । जात्यंधे वीधरे मुके न दोपः यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥२६॥ परिविंदतः ॥ २६ ॥ पनिक मृत्युको प्राप्त होनेके अनंतर ( भा. टी.) विशिष्टधर्मशास्त्र। जोत्री ब्रह्मचर्य नियममें स्थित रहती है जिस ब्राह्मणको भेड़िये, कुत्ते, तथा वह मृत्युहोने के पश्चात इसप्रकार स्वर्ग गीदड आदिन काटाहो वह स्नानकरके को प्राप्त होता है जैसे ब्रह्मचारी स्वर्ग : गायत्री का जपकरै, क्योंकि-गायत्री को प्राप्त होते हैं । ॥ २६ ॥ परम पवित्र और वेदोंकी माता है ॥१॥ तिस्रः कोटयोधकोटीच यानि गवां शृंगोदकस्नानान्महान- लोमानि मानवे । तावत्काल वसे- द्योस्तु संगमे। समुद्रदर्शनादापि स्वर्गे भतारं यानुगच्छति ॥३०॥ शुना दष्टः शुचिर्भवेत् ॥ २॥ पतिकी मृत्यु होनेके अनंतर जो स्त्री जिसको श्वान आदिकोंने काटा हो सती होकर पति के साथ जातीहै वह स्त्री ' वह गोशृंगसे शुद्ध कियेहुए जलसे स्नान जितने मनुष्य के शरीरमें रोम होते हैं करनेसे तथा पवित्र नदियों के संगममें एतने वर्ष पर्यंत स्वर्ग वास करतीहै, अ- (जहां दोपवित्र नदी मिली हों। स्नान र्थात् सती स्त्री साढेतीन फराह वर्ष करने से अथवा समुद्रका दर्शन करने पर्यंत स्तर्गमें निवास करतीहै ॥ ३० ॥ से भी शुद्ध होजाता है ॥२॥ व्यालग्राही यथा व्यालं बला- वेदविद्या व्रतस्नातःशुना दटोदि दुद्धरते विलात् । एवं स्त्री पतिम- जोयादि । सहिरण्योदके स्नात्ता द्धृत्य तेनैव सह मोदते॥३१॥ घृतं पाश्य विशुद्ध्यति । ३॥ इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे यदि वेदाध्ययन रूप व्रत करके युक्त ब्राह्मण को कुत्ते ने काटा हो तो वह चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ जिस प्रकार सर्पको पकड़ने वाला सुवर्ण से शुद्ध किये हुए जल से स्नान करके और घृत भोजन करके ( सपेरा ) सर्पको बलकरके विल (भ है) मेंसे निकाल लेताहै इसी प्रकार वह शुद्ध होता है ॥३॥ स्त्री अपने पतिका पापोंसे उद्धार करके सवतस्तु शना दष्टोयस्त्रिरात्रमु- उसके साथ आनंद करतीहै ॥ ३१ ॥ पावसेत् । घृतं कुशांदकं पीत्वा इतिधीपाराशरीये धर्मशाल भाषाटीकायां व्रतशेपं समापयत् ॥ ४॥ चतुर्थोऽध्याय ॥ ४॥ जो ब्राह्मण तीन दिन का व्रत कर रहाहो और उसको कुत्ता काटै तो वह वृकश्वानशृगालादि दष्टो घेत और कुशोदक का पान करै तब यस्तु दिजोत्तमः। स्नात्वा जपे- शुद्ध होता है ॥ ४ ॥ स्मगायत्री पवित्रां वेदमातरम् ।। अवतः सबतोवापि शुनादष्टो-
लघुपाराशरी।
AAAAAAAAAAAA
भवेद्विजः। प्रणिपत्य भवेत्पूतो जिस ग्राम में श्रेष्ठ ब्राह्मण न हों और
वित्रैश्चक्षुनिरीक्षिनः ॥ ५॥
किसी ब्राह्मण को कुत्ता काटै तो वह
निस ब्राह्मण को कुत्तेने काटाहो वह शीघ्र शुद्ध होजाता है ॥ ६॥
स्नान पूर्वक वृषभ की प्रदक्षिणा करके
व्रतीहो अथवा अवती परंतु ब्राह्मणों
को प्रणामकरके उनकी दृष्टिमात्र से शुद्ध हतोयदि !आहिताग्निम॑तोविनो-
चांडालेन श्वपाकेन गोभिर्विप्रै-
होजाता है ॥ ५॥
शुनाघातावलीढस्य नखैर्विलि- विषेणात्मा हतोयदि ॥१०॥
जो अग्निहोत्री ब्राह्मण चांडाल वा
खितस्य च । आद्भिः प्रक्षालन प्रो.
श्वपचके हाथ से मारागया हो अथवा
क्तमग्निना चोपचूलनम् ।।६। उसे गौ वा ब्राह्मणों ने मारा हो तथा
जिसको श्वान ने चाटा हो वा घा उसने स्वयं विष खाकर आत्मघात
हो उसे जलसे प्रक्षालन करै और अग्नि किया हो ॥१०॥
से तप्त करै तौ शुद्धि होती है ॥ ६ ॥
दहेत्तं ब्राह्मणं विप्रोलोकाग्नौ
ब्राह्मणी तु शुना दष्टा जवुकेन मंत्रवजितम् । स्पृष्ट्या चोह्य च
वृकेण वा । उदितं ग्रहनक्षत्रं दग्ध्वा च सपिंडेषु च सर्वदा॥११॥
दृष्ट्वा सद्यः शुची भवेत् ॥ ७॥
तो उसके सपिंडों में से जो पुरुष
जो ब्राह्मणी को श्वान, शृगाल, तथा इसकी क्रिया करै वह उस ब्राह्मण को
वृकादि ने काटाहो तो वह उदय होते बिना मंत्र के लौकिक अमि में दाह करै
हुए सूर्यचंद्रादि ग्रहों और नक्षत्रों का और उसे स्पर्श करके तथा उसके विमान
दर्शन करनेसे ही शुद्ध होजानी है ॥७॥ को उठाके और दाह करके ॥ ११ ॥
कृष्णपक्षे यदा सोमोन दृश्येत प्राजापत्यं चरेत्पश्चादिप्राणा-
कदाचनायां दिशं बजते सोमस्तां मनुशासनात् ।दग्धास्थीनि पुन-
दिशं चावलोकयेत्॥८॥ नीला क्षारैःप्रक्षालयेद् द्विजः।१२
जो कदाचित् कृष्णपक्षमें चंद्रमाका ब्राह्मणों की आज्ञा से प्राजापत्यव्रत
दर्शन न हो तो जिस दिशा में उस दिन करे और दाह करने के अनन्तर उसकी
चंद्रमा उदय हो उसदिशा का दर्शन करै।। अस्थियों को दूध में धोवै ॥ १२ ॥
असबाह्मणके ग्रामेशुना दष्ट स्वेनाग्निना स्वमंत्रेण पृथगेतत्पु-
दिजोत्तमः वृष प्रदक्षिणीकृत्य स- नदेहेत् ।आहिताग्निदिजःकश्चि-
द्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥ ९॥ प्रवसन कालचोदितः॥ १३ ॥
( भा०टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र । AAAAAAAA फिर उन अस्थियों को मंत्रपूर्वक और सौ नाभि पर तथा दोसी उदर अपनी ( गार्हपत्य ) अग्नि में पृथक् दाह पर स्थापन करे और आठ डालिये करै, हे सुनीश्वरो! जो अग्निहोत्री ब्राह्मण दोनों दृषणों (अण्डकोश) पर और प्रदेश में कालवश से ॥ १३ ॥ पांच लिंग पर रक्ख ॥ १७ ॥ देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याग्निर्व एकविंशतिमरुभ्यां दिशतं सते गृहे । प्रेताग्निहोत्रसंस्कारः जानुजंघयोः पादांगुष्ठेषु पइदद्या- श्रूयतां मुनिपुंगवाः ॥१४॥ द्यज्ञपात्रं ततोन्यसेत् ॥ १८॥ मृत्यु को प्राप्त हुआ हो और उसकी इक्कीस ऊरु नितवों (के नीचे) और अग्निहोत्र करनेकी आग्नि उसके घरपर दोसौं जानु और जंघाओं पर और छह स्थित हो तो उसका अग्नि संस्कार जिस चरण के अंगूठों पर धारण करै, तदन- प्रकार होना चाहिये सोश्रवण करो १४ न्तर अग्निहोत्र के पात्रों को स्थापन करै ।। कृष्णाजिनं समास्तीर्य कुशस्तु शय्यां शिश्ने विनिक्षिप्य पुरुषाकृतिम् । पट्शतानि शतं चैव अरणिं मुष्कयोरपि। जुहूं च दक्षि- पलाशानां च बुंततः॥ १५॥ णे हस्ते वामे तूपभृतं न्यसेत्१६। चिता की भूमिपर कृष्णमृगचर्म को शिश्न में शय्या को और अण्डकोश विछायकर उसके ऊपर कुशाओं का में अरणिको स्थापन करै,दक्षिण हस्त में पुरुषाकार बनावै और उस कुशा पुरुष जुहू (बुवा) और वाम हस्त में उपभृत पर सातसौ ढाककी डालिये इसप्रकार को स्थापन करै ॥ १९ ॥ स्थापन करै॥१५॥ पृष्ठे तूलू खलं दद्यात्पृष्ठे च मृशलं चत्वारिंशच्छिरेदद्याच्छतं केठेतु न्यसेत् । उरसि क्षिप्य दृषद तंड- विन्यसेत्।बाहुभ्यांदशकं दद्यादं लाज्यतिलान्मुखे ॥ २० ॥ गुलीषु दशैव तु ॥ १६ ॥ पृष्ठतल में उलूखल और मूसल रक्खे चालीस तो शिरपर स्थापन करे और हृदय में दृषद् (सिल) स्थापन और सी कंठ में, दश भुजाओं पर कर तथा मुखमें चावल घृत और तिल ॥ धारण करै और दश अंगुलियोंपर रक्खै॥ श्रोत्रे तु प्रोक्षणीं दद्यादाज्य- शतं तु जघने दद्याद्विशतंतू-स्थाली च चक्षुषोः। कर्णे नेत्रे मुखे दरेतथा । दद्यादष्टौ वृषणयोः पंच प्राणे हिरण्यशकलं न्यसेत् २१ मेद्रे तु विन्यसेत् ॥ १७॥ और कर्ण में प्रोक्षणी और आंखों ८ . लघुपाराशरी। अ०६ 4MARA में आज्यस्थाली स्थापन करै और कर्ण, जो अपनी बुद्धिके अनुसार अन्यथा नेत्र,तथा मुख और नासिका में सवर्ण का कर्म करत हैं, वे स्वल्पायु होते हैं और खण्ड रक्खे ॥२१॥ अशुचिनामक नरक को प्राप्त होते हैं । अग्निहोत्रोपकरणमशेष तत्र इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकाया पचमोऽध्यायः ॥५॥ विन्यसेत् । असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहेत्येकाहुति सकृत् ।। २२॥ अतःपरं प्रवक्ष्यामि प्राणिहत्या- दद्यात्पुत्रोथवा भ्राताप्यन्योवा- सुनिष्कृतिम् । पराशरेण पूर्वोक्तां पि च बान्धवः । यथा दहन मन्वपि च विस्तृताम् ॥ १॥ संस्कारस्तथा कार्य विचक्षणैः२३ इस के अनंतर प्राणिमात्र की हिंसा का प्रागश्चित्त कहते हैं, जो कि-पराशर इसप्रकार अग्निहोत्र की सम्पूर्ण वस्तु जाने पूर्व वर्णन किये हैं और मनुजी ने वहां पर स्थापन करके उस मुतक अग्नि- होत्री का पुत्र वा भ्राता तथा जो कोई भी विस्तार पूर्वक कहे हैं ॥ १ ॥ उसका बांधव हो वह ' असा स्वर्गाय क्रौंचसारसहसांश्च चक्र लोकाय म्वाहा' इस मंत्र से एक आहुति वाकं च कुक्कुटम् । जालपादं दे, तदनन्तर दाह संस्कार की विधि के चशलभं हत्वाहोरात्रतः शुचिः।। अनुसार उसकी दाह क्रिया करै॥२३॥ कुंज, सारस, इंस, चकुवा, कुक्कुट और ईदृशं तु विधिं कुर्याद् ब्रह्मलोक- जाळपाद अर्थात् जिन पक्षियों के चरण गतिस्मृता। दहति ये दिजास्तं तु जुडे हुए हों तथा टिड्डी इन में से किसी ये यांति परमां गतिम् ॥ २४ ॥ को मारकर एक दिनरात के उपवास से शुद्ध होता है॥२॥ इसप्रकार विधि करने से उस मृतक को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है और बलाकाटिट्टिभौ वापि शुकपारा- जो ब्राह्मण उसको दाह करते हैं वे भी वतावपि पाठीनबकघाती चशु- परम गति को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ यते नक्तभोजनात् ॥३॥ अन्यथा कुर्वते कर्म वात्मबुद्ध्या बालकी (बमली) टटीरी, तोता तथा प्रचोदिताः। भवंत्यल्यायुषस्त वै पारावत मछली और वगला इनमें से कि. पतंति नरकेऽशुचौ । २५ ॥ सी भी जीवकी हिंमा करने वाला नक्त भोग्न व्रत (दिन में भोजन न करना, इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे रात्रि में एकवार भोजन करना) से शुद्ध पंचमोऽध्यायः॥५॥ होता है।॥३॥ ।
(भा टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र । २९ वृककाककपोतानां सारी तित्तिर भेरुंडचापभामांश्च पारावतक- घातकः। जलमध्यउभे संध्ये प्रा- पिंजलौ । पक्षिणां चैव सर्वेपाम- णायामेन शुद्धयति ॥ ४॥ होरात्रमभोजनम् ॥ ८॥ भेडिया, काक, कबूतर, मैना, तीतर, भेरुंड, नीलकंठ, भास और पारा- इनमें से किसी जीव की हिंसाकी हो वन कपिजल तथा सम्पुर्ण पक्षियों में से तो दोनों संध्याओं के समय जल में जिसने किसी एक की हिंसा की हो वह स्थितहोकर प्राणायाम करनेसेशुद्धहोताहै एक दिन रात निराहार व्रत करने से गृध्रश्येन शशादीनामुलक शुद्ध होता है ।। ८॥ स्य च घातकः अपक्काशीर्दिनं ति- हत्वा मूपकमार्जारसजागर- छेदात्रौ मारुतभोजनः ॥ ५ ॥ हुंदुभान् । कृसरं भोजयेविना- जिसने गिद्ध, बाज, खरगोश तथा लोहदंडं च दक्षिणा ॥६॥ उलूक ( उल्लू) की हिंसा की हो वह चूहा, बिल्ली, सर्प, अजगर तथा जल- दिनभर पकान भोजन न करै और सर्प इनमें से किसी की हिंसा हुई हो तो रात्रि में वायु भक्षण करके स्थित रहै सुपात्र ब्राह्मणों को खिचडी का भोजन अर्थात्- कुछ भोजन न करै ॥५॥ कराने और लोह दंड की दक्षिणा देने चटकाया मयूरस्य कोकिला | मे शुद्ध होता है ॥९॥ खंजरीटके । लाविका रक्तपक्षषु - शिशुमारं तथा गोधां हत्वा शुद्धयते नक्तभोजमात् ॥ ६ ।। कूम च शल्लकम् । वृताकफल- चटका, मयूर, कोकिला, ममोला तथा भक्षी वाप्यहोरात्रण शुद्धचति१० लाविका ( बटेर ) और लाल पंख वाले शिशुमार, गोह तथा कच्छप और पक्षियों में से किसी एक की हिंसा हुई | शिल्लू सांप इनमें से किसी एक को हो तो नक्त भोजन व्रत मे शुद्ध होता है। मारकर वा बैंगन के फल को खाने कारंडवचकोराणां पिंगलाकुर- वाला अहोरात्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है । रस्य चाभारद्वाजादिक हत्वाशि- | वृकजम्बुकक्षाणां तरक्षणां च वं संपूज्य शुद्धयति ॥ ७॥ घातकः। तिलप्रस्थं दिजे दद्या- मुर्गावी, चकोर, चामचिड (चिमगा- दायुभोदिनत्रयम् ॥ ११ ॥ दर) टटीरी तथा पपीहा इन में से किसी भेडिया, गीदड, ऋच्छ तथा व्याघ्र का बध हुग हो तो शिवजी का पूजन को मारकर,सुपात्र ब्राह्मण को एक प्रस्थ करने से शुद्ध होता है ॥ ७ ॥ १ प्रस्थ ६४ तोले का होता है
लघुपाराशरी।
अ०६
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निलंद और तीनदिन पर्यंत निर्जलदत की हिंसा करनेवाला गायत्री का जप
कर तो शुद्ध होता है ॥ ११ ॥ करताहुआ अहोरात्रवत करै॥१४॥१५॥
गजस्य च तुरंगस्थ महिपोष्ट्रस्य शिल्पिनं कारुकं शूद्रं स्त्रियंवा
घातने । प्रायश्चित्तमहोरात्रत्रिसं यस्तु घातयेत् । प्राजापत्यदयं
ध्यमवगाहनम् ॥ १२॥ कृत्वा वृषेकादश दक्षिणा १६
हाथी, घोड़ा, भैंसा तथा ऊंट की शिल्पी, कारुक ( कारीगर ) शूद्र
हिंसा होगई होय तो अहोरात्रवन करे तथा स्त्री को मारनेवाला पुरुष दो प्राजा-
और तीनों संध्याओं के समय स्नान करै।। पत्यबूत करके ग्यारहवृषभों का दान
कुरंगंवानरं सिंह चित्रंव्याघ्रंच करने से शुद्ध होताहै ॥ १६ ॥
घातनम् । शुध्यते सत्रिरात्रेण वैश्यं वा क्षत्रिय वापि निर्दोष
विषाणां तर्पणेन च ॥ १३॥ योभिघातयेत् । सोतिकृच्छ्रदयं
मृग, वानर तथा सिंह, चीता वा कुर्याद्गोविंशदाक्षिणां ददेत् १७
व्याघ्रकी हिंसा करके तीनदिन पर्यंत निरपराधी वैश्य वा क्षत्रिय की हिंसा
उपवास करै और सुपात्र ब्राह्मणों को करके दो अतिकृच्छ्र वून करै और बीस
भोजन जिमावै ॥ १३ ॥
गौ दक्षिणादे ॥ १७॥
मृगरोहिद्धराहाणां भवेर्वस्त- वैश्यं शूदं क्रियासक्तं विकर्मस्थं
स्य घातकः अफालकृष्टमश्नीया- द्विजोत्तमम् । हत्वा चांद्रावणं त-
दहोरात्रमुपोष्य सः ॥ १४ ॥ स्य त्रिंशद्गाश्चैव दक्षिणा॥ १८॥
एवं चतुष्पदानां च सर्वेषी ब अपने धर्म की क्रिया में आसक्त वैश्य
नचारिणाम्। अहोरात्रोपितस्ति- वा शूद्रको तथा कुकर्मी ब्राह्मण को मार-
ठेज्जपन्वै जातवेदसम् ॥ १५॥ करने से शुद्ध होता है ।। १८ ।।
कर चांद्रायणव्रत करके तीस गोदान
जिसने मृगरोहित ( मृगी या रोहू चांडालंहतवान्कश्चिद् ब्राह्मणो-
मछली) सूकर तथा भेड़ और बकरे
की हिंसा की हो वह अहोरात्र उपवास
यदि कंचन । प्राजापत्यं चरेत्कृ-
कर और चिना हळसे जोतेहये अन्न च्छं गोदयं दक्षिणां ददेत् ॥१६॥
(नीवारादि ) को भक्षण करके शुद्ध जो किसी ब्राह्मण से चांडाल की
होता है इसीमकार संपूर्ण चतुष्पद और हिंसा हुई हो तो वह कृच्छ्र और पाजा-
बनचर जन्तुओं में से किसी एक जन्तु पत्य व्रत करके दो गौदक्षिणा दे।॥१९॥
भाटी०) विशिष्टधर्मशास्त्र । AAAA AAAAA AALA AAMALAAAA क्षत्रियणापि वैश्येन शूद्रेणैवे- करे और (जितने चरण चला हो उतने ) तरेण च । चांडालस्य बधे प्राप्त गायत्री मंत्रोंका स्मरण करने से शुद्ध होता है ॥ २३ ॥ कृच्छ्रार्द्धन विशुद्धयति ॥ २० ॥ चांडाल दर्शने सद्य आदित्यम- जो क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र अथवा किसी अन्य जाति ने चांडाल की हिंसा वलोकयेत् । चांडालस्पर्शने चैव की हो तो वह अर्द्धकुच्छ व्रत करके सचैल स्नानमाचरेत् ॥ २४॥ शुद्ध होता है ॥ २० ॥ चांडाल का दर्शन करके शीघ्र सूर्य चोरः श्वपाकश्चांडालोविप्रे- का दर्शन करै और चांडाल का स्पर्श पाभिहतोयदि । अहोरात्रोपितः करके वस्त्रों सहित स्नान करै तब शुद्ध होता है ॥ २४ ॥ स्नात्वा पंचगव्येन शुद्धयति२१ चांडालखातवापीपु पीत्वा च जो किसी ब्राह्मण ने चोरी करने. वाले श्वपच वा चांडाल की हिंसा की हो सलिलं दिजः। अज्ञानाच्चैकनक्तेन तो वह स्नान पूर्वक अहोरात्रव्रत करके वहोरात्रेण शुद्धयति ॥ २५ ॥ पंचगव्य पान करने से शुद्ध होता है २१ यदि ब्राह्मण क्षत्रिय वा वैश्य विना- श्वपाकं चापि चांडानं विप्रः जाने चांडाल की बनाई हुई चावडी में संभाषते यदि । दिजसभापणं कु- भोजन करके ( दिन में भोजन न करके जलपान करने तो एकवार रात्रि में र्यात्सावित्री च सकृज्जपेत् २२ एक दिन रात होता है ॥१५॥ यदि कोई ब्राह्मण श्वपच वा चांडाल से संभाषण करे तो वह ब्राह्मण दुसरे चांडालभांडं संस्पृष्ट्वा पीला ब्राह्मण से संभाषण करके एकवार कूपगतं जलम् । गोमूत्र यावका- गायत्री मंत्र का जप करै ।। २२ ॥ हारस्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् २६ चांडालैः सह सुप्तं च त्रिरात्रमुप- चांडालघटसंस्थं तु तत्तोयं पि- वासयेत् । चांडालैकपथं गत्वा वते द्विजः। तत्क्षणाक्षिपते यस्तु गायत्रीस्मरणाच्छुचिः॥ २३॥ प्राजापत्यं समाचरेत् ॥ २७ ॥ जो चांडालों के साथ एक स्थान जिस कुवे में चांडाल के पात्र से छुआ वा एक वृक्षकी छाया में सोया हो तो हुआ जल गिरा हो उस कुए के जलको तीन दिन रात पर्यंत उपवास करै और पीकर तीन दिन पर्यंत गोमूत्र पान एक मार्ग में चांडाल के साथ चल स्नान और यव का भोजन करने से शुद्ध होता में शुद्ध लघुपाराशरी। है ( इस से प्रकट हुआ कि-जिस कुए में तथा दानेन शक्तितः । ३१॥ यवनों का पात्र जो चांडालके समान है। जो ब्राह्मण,क्षत्रिय, तथा वैश्य अन्त्य- पडना हो उस कुए का जल भी अपेय जों (रजकादिनों ) के पात्र का जल, है। जो ब्राह्मण चांडालके घड़े का जल दही तथा दुग्ध विनाजाने पान करले तो पीकर तत्काल उगल देवा वमन करके ब्रह्मकूर्च उपवास करने से शुद्ध होता है निकालदे तो वह प्राजापत्यव्रत से शुद्ध और शूद्र एक दिन उपवास करने से होता है ॥ २६ ॥ २७ ॥ | तथा यथाशक्ति सुपात्र ब्राह्मणोंको दान यदि नक्षिपते तोयं शरीरेयस्य देनेसे शुद्ध होता है ॥ ३० ॥ ३१ ॥ जीर्यति। प्राजापत्यं न कर्तव्यं कृ भुक्ते ज्ञानाद्धिजश्रेष्ठश्चांडा- च्छं सांतपनं चरेत् ॥ २८॥ लानं कथं च न । गोमूत्रयावका- यदि उस जलको न उगले और वह हारो दशरात्रेण शुद्धयति ३२॥ जल शरीर में पचजाय तो प्राजापत्य से जो ब्राह्मण अज्ञान से चांडालका अन्न शुद्ध नहीं होता, कुच्छ्र सांतपन करने से भोजन करले तौ दशदिन पर्यंत गोमूत्र शुद्ध होता है ।। २८ ॥ और यवका भोजन करनेसे शुद्ध होताहै।। चरेत् सांतपनं विप्रःप्राजापत्य- एकैकं ग्रासमश्नीयाद्दामत्रे मनंतरः। तदर्धेतु चरेद्वैश्यःपादं यावकस्य च।दशाहं नियमस्थ- शूद्रस्य दापयेत् ॥ २६॥ स्य अतं तत्तु विनिर्दिशेत्।३३॥ ब्राह्मणको उसकी शुद्धि के निमित्त प्रतिदिन दशदिन पर्यंत गोमूत्र और कृच्छ्र सांतपन करना चाहिये और यत्रका एक २ ग्रास भक्षण करके नियम त्रियको प्राजापत्यव्रत करना चाहिये ' में स्थित रहकर व्रत को समाप्त करै तो वैश्यको उसकी शुद्धिके निमित्त अर्थमा- दशदिन में शुद्ध होता है ॥ ३३ ॥ जापत्य करना उचित है और शुद्र चौ. थाई पाजापत्य करनेही शुद्ध होजाताहै आविज्ञातस्तु चांडालोयत्र भांडस्थमंत्यजानां तु जलं दधि वेश्यान तिष्ठति। विज्ञातउपसंन्य- पयः पिवेत् । ब्राह्मणःक्षत्रियो वै. स्य द्विजाः कुर्युरनुग्रहम् । ३४॥ वैश्यः शूद्रश्चैव प्रमादतः॥ ३०॥ जो विना जाने हुए किसीके घर पर चाण्डाल स्थित हो और वह घरवाला ब्रह्मकूर्चीपवासेन द्विजातीनां तु उसके जानने के अनन्तर उसे निकालदे निष्कृतिः । शूद्रस्यचोपवासेन तौ जिस के घरपर चाण्डाल रहा था उस : क्ष-
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भाटी.)
विशिष्टधर्मशास्त्र ।
३३
पर ब्राह्मण कृपा करें ॥ ३४ ॥ कमि आदिकोंन दूपिन किया हो ऐसे
मुनिवक्तोद्गतान्धर्मान् गायतो- ! अन्न का भोजन न करे । दही दूध नीनर
वेदपारगाः। पतंतमुद्धरेयुस्तं ध-
पल और घृत एकपल इसप्रकार भो-
जम करें ।। ३८॥
मज्ञाः पापसंकटात् ॥ ३५ ॥
अर्थात् मुनियों के मुख से कहे हुए
भस्मना तु भवेच्छुद्धिरुभयोः
धर्मों को गायकर वेदपारगत धर्मज्ञ कांस्यताम्रयोः । जलशोचेन
ब्राह्मग पतित होते हुए उस पुरुष को त्राणां परित्यागेन मृण्मयम्॥३६
पापके दुःख से उद्धार करें ॥ ३५ ॥ अब जिस स्थान में चांडाल स्थित
दना च सर्पिपा चैव क्षीरगो- रहा हो उस स्थान में स्थिन द्रव्यों की
मूत्रयावकम् । मुंजीत सह मृत्यैश्च कासी और तांत्र की शुद्धि भस्म मे होती
तथा उस स्थान की शुद्धि कहते हैं,
त्रिसंध्यमवगाहनम् ॥ ३६॥ है और वस्त्रों की शुद्धि जल से होती है
अब उस पतितका प्रायश्चित्त कहते हैं, तथा मृत्तिका के पात्रों का त्यागदेना
अपने कुटुम्ब और भृत्यादि सहित दधि- उचित है ॥ ३९ ॥
घृत
और
दुग्ध के साथ यवान भोजन कुसुभगुडकासिं लवणं तैल
करै और गोमूत्र पान करै , तथा त्रि-सर्मिपी। दारे कृत्वा तु धान्या-
काल में स्नान करै तो शुद्ध होता है
व्यहं भुजीत दनाचव्यहनि दद्यादेश्मनि पावकम् ॥४॥
जीत सर्पिषा व्यहं क्षीरेण भुंजीत तैल, घृत तथा धान्यादिकों को घरके
कुसुम्भ, गुड, कपास और लवण,
एकेकेन दिनत्रयम् ॥३७॥ द्वार से बाहर निकालकर घरमें अनि
तीनदिन दही से खाय और तीन देदे, अर्थात्-घरकी संपूर्ण भूमि को
दिन घृत के साथ भोजन करै और तीन आनि से तप्त करै ॥ ४० ॥ .
दिन दुग्ध से भोजन करै, एकर से तीन एवं शुद्धस्ततः पश्चात्कुर्याद्वा-
दिन भोजन करै ॥ ३७॥ ह्मणतर्पणम् । त्रिशतं गावृपं चैक
दधि क्षीरस्य त्रिपलं पलमेकं दद्यादिप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ४१ ॥
घृतस्य तु । दृष्टस्यान्नंन मुंजीत तदनन्तर घर को गोमयादि से शुद्ध
करके और आप पूर्वोक्त व्रतसे शुद्ध हो-
नोच्छिष्टं कृमिदूपितम् ॥ ३८॥
कर उसघरमें सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन
जिसपुरुषका अंतःकरण दुष्टहो उस कराकर उन्हें तनिसौ और एक वृक्ष द-
का अन तथा उन्छिट अन्न और जो क्षिणा में दे॥४१॥
लघुपाराशरी। अ०६ पुनर्लेपनखातेन होमजाप्येन तौ जानने के पश्चात् जो प्रायश्चित्त शुद्धयति । आधारेण च विप्रा- पहिले चांडाल के अज्ञात स्थित रहने में कहा है उससे आधा प्रायश्चित्त करै पां भूमि दोषो न विद्यते॥ ४२ ॥ केवल गृहदान न करै और संपूर्ण प्रा- लीपने, खोदने तथा होम, अप यश्चित्त करै ॥ ४५ ॥ इत्यादिक करने से भी भूमि शुद्ध होती गृहस्याभ्यंतरं गच्छच्चांडालो- है और ब्राह्मणों के आधार (आसना- दिक ) से भूमि दोष नहीं होता अर्थात | यदि कस्य चितातमागारादिनिः- यदि लिपी हुई भूमि के ऊपर ब्राह्मण सार्य मृद्भांडं तु विसर्जयेत्॥४६॥ बैठजाय तो अशुद्ध नहीं होती, अन्य यदि किसी के घरके भीतर कोई जाति की स्थिति से भूमि अपवित्र होती चांडाल चला जावै तो उसे घरसे बाहर है इसकारण उसे फिर शुद्धकरना चाहिये।। निकालकर मिट्टी के पात्रों को त्यागदे४६ चांडालैः सह संपर्क मासं रसपूर्ण तु मृद्भांडं न त्यजेत्तु मासार्द्धमेव वा । गोमूत्रया- कदाचनागोमयेन तु संमिर्जलैः वकाहारोमासार्द्धन विशुद्ध्यति।। प्रोक्षेद्गृहं तथा ॥ ४७ जो १मास वा १ पक्ष पर्यंत चांडालों जो मिट्टीके पात्र घृतादिक रसों से के साथ संसर्ग रहै तो अर्द्धमास पर्यंत परिपूर्ण हों उनको न त्यागै, तदनंतर गोमूत्रपान और यवाहार करने से गोमय ( गौका गोवर ) और जल से शुद्ध होता है ॥ ४३ ॥ घर को लीपै ॥४७॥ रजकी चर्मकारी च लुब्धकी ब्राह्मणस्य व्रणदारे पूयशोणि- वेणुजीविनी । चातुर्वर्णस्य तु आहे तसंभवे । कामिरुत्पद्यते यस्य प्राय- ह्यविज्ञाता तु तिष्ठति ॥४४॥ चित्तं कथं भवेत् ॥४८॥ याद ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा (प्रश्न) याद ब्राह्मण के व्रण में पीव शूद्र के घरमें धोवन, चमारी तथा लुब्ध. और रुधिर हो और कृमि उत्पन्न होजायँ की ( व्याधकी स्त्री) अथवा बांसका तो उसका प्रायश्चित्त क्या है ? ॥४८॥ कार्य करनेवाली बिन जाने रहै ॥४४॥ गवां मूत्रपुरीषेण दधिक्षीरण ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात्'- सर्पिषा। व्यहं स्नाता च पीत्वा वोक्तस्यार्द्धमेव तु । गृहदाहं न कृमिदष्टः शुचिर्भवेत् ॥४६॥ कुर्वीत शेषं सर्वं च कारयेत् ४५ उत्तर ) जिस ब्राह्मण के व्रण में (भा टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र। कृमि ने काटा हो वह गौके मूत्र, गोवर, और ब्राह्मण उसे ' अच्छिद्रमस्तु ' दही, दूध और घृम में तीन दिन स्नान कहदें तो वह सम्पूर्ण कर्म निष्छिद्र हो- करके और इन्ही पाचों वस्तुओं को जाता है । व्याधि, व्यसन, थकावट तथा मिलाकर पान करने से शुद्ध होता है !४६ दुर्भिक्ष अथवा किसीका भयहो तौ ५३ क्षत्रियोपि सुवर्णस्य पंचमाषान् उपवासोबतोहोमोदिज संपा- प्रदायतु।गोदक्षिणांतु वैश्यस्या- दितानि वा। अथवा ब्राह्मणास्तु- प्युपवासं विनिर्दिशेत् ॥५०॥ष्टाः सर्वे कुर्वत्यनुग्रहम् ॥ ५४॥ और यदि क्षत्रिय के व्रण में कृमि जो उपवास, व्रत तथा होम इत्या- पढगये हों तो सुपात्र ब्राह्मण को पांच दिक ब्राह्मणों की आज्ञासे किये जायें माशे सुवर्ण दान देकर तथा वैश्य गोदान और वे विधिपूर्वक न होसकें तब यदि और उपवास करके शुद्ध होता है ५० सम्पूर्ण ब्राह्मण प्रसन्न होकर उस उप- शूद्राणांनोपवासः स्याच्दो- वासादि करने वाले पर अनुग्रह करके दानेन शुध्यति । अच्छिदमिति ‘अच्छिद्रमस्तु ' यह वचन कहैं ॥५॥ सर्वान कामानवामोति दिजस- यदाक्यं वदंति क्षितिदेवताः५१ प्रणम्य शिरसा ग्राह्यमग्निष्टो-पादितैरिह । दुर्वलेऽनुग्रहः प्रोक्त- मफलं हि तत् । जपच्छिद्रं तप- स्तथा वै बालवृद्धयोः ॥ ५५ ॥ छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि ॥५२॥ नाओं की प्राप्ति होती है । दुर्वल तथा तौ उन उपवासादिकों से संपूर्ण काम. शूद्रको उपवास करने की आज्ञा नहीं है वह केवल दान देने ही से शुद्ध योग्य है ॥ ५५ ॥ वृद्ध के ऊपर कृपा करनी होजाता है जब ब्राह्मण' अच्छिद्रमस्तु ऐसा वचन उच्चारण करें तब मस्तक ततोऽन्यथा भवेद्दोषस्तस्माना नवाय कर और प्रणाम करके उस वच- नुग्रहःस्मृतः। स्नेहादा यदि वा नको ग्रहण करने से अग्निष्टोम यज्ञका लोभायादज्ञानतोपि वा ॥५६॥ फल होता है। जपमें तथा तप में अथवा इन के सिवाय और किसी पुरुषपर व्रत यज्ञ में छिद्र हो ॥५१॥५१॥ होम आदिक में अनुग्रह करने से दोष सर्व भवति निश्छिदं ब्राह्मणे- होता है। स्नहस वा लोभसे अथवा भय रुपपादितम् ।व्याधिव्यसानि नि- से तथा अज्ञान से ॥ ५६ ॥ श्रांते दुर्भिक्षे ह्यथवा भये ॥५३॥। कुर्वत्यनुग्रहं ये तु तत्पापं तेषु ग- बालक और है लघुपाराशरी । अ०६ , च्छति । स्वस्थस्य मूढा कुर्वति तेषां वाक्योदकेनैव शुद्धचति वदंत्यनियमं तु ये ॥ ५७॥ मलिनाजनाः । ब्राह्मणायानि जो अनुग्रह करने है वे उस पतितके भाषते मन्यते तानि देवताः६१ पाप में भागी होते हैं, जो मन्दबुद्धि मलिन (पापी पुरस) उन ब्राह्मणे पुरुष स्वस्थों के लिये नियमका उपदेश के वाक्यरूप जलसे शुद्ध होते हैं, उत्तम नहीं करते ॥ ५७॥ ब्राह्मण जो वचन कहते हैं उसे देवता ते तस्य विघ्नकर्तारः पतति नर- भी मानते हैं ॥ ६१ ॥ केऽशुचौ ॥ स्वयमेव व्रतं कृत्वा सर्वदेवमयोविप्रोन तद्वचन- ब्राह्मणं योवमन्यते ॥ ५८ ॥ मन्यथा । उपवासात्रतं चैव स्नानं उनके प्रायश्चित्त में विघ्न करनेवाले तीर्थ जपस्तपः ॥ ६२ ॥ वे पुरुष अशुचि नाम नरक में गिरते हैं वेदाभ्यासी सदाचारयुक्त ब्राह्मण सर्व जो पुरुष ब्राह्मण से आज्ञालिये बिना अपने आप ही प्रायश्चित्त के निमित्त देवमय हैं, उनका वचन मिथ्या नहीं होता वे ब्राह्मण जिसके उपवास व्रत, व्रत करते हैं ॥ ५८॥ वृथा तस्योपवासःस्यान्नस पुण्ये इत्यादि को ।। ३२ ॥ तथा स्नान, तीर्थ अथवा जप तप नयुज्यते । स एव नियमोग्राह्यो विप्रैः संभाषितं यस्य संपूर्ण यमेकोपि वदेद्विजः ॥ ५६ ॥ तस्य तत्फलम् । अन्नाद्य कीटसं- उनका व्रत निष्फल होता है उनको युक्ते मक्षिका केशदूषिते ॥६३॥ उस व्रतका पुण्य नहीं होता।जिस नियम (व्रत ) के करने के निमित्त एक ब्राह्मण यह संपूर्णहो ऐसा कहदेते हैं उन उप- भी आज्ञादे वह नियम करने योग्यहै॥५९॥ वासादिकों के करनेवाले को पूर्णफल कुर्यादाक्यं द्विजानांतु अन्य- मक्षिका ( मक्खी )आदिने दूषित किया प्राप्त होता है जिस अन्नादिकों को काम वा था भ्रूणहा भवेत् । ब्राह्मणा- हो तथा केश पडा होतो उसे निकालकर।। जंगमं तीर्थतीर्थभूता हि साधवः॥ तदंतरा स्पृशेचापः तदन्नं भ. श्रेष्ठ ब्राह्मणों का वाक्य अवश्य मानने योग्य है उनका वचन उल्लंघन करने से विप्रः पादं हस्तेन संस्पृशेत्॥६४॥ स्मना स्पृशेत् । भुंजानश्चैव यो- गर्भ हिंसा का पाप होता है ब्राह्मण जं- गम ( घर बैठे कृतार्थ करने वाला) तीर्थ | स्वमुच्छिष्टमसौ भुंक्त योभक्त है और साधु भी तीर्थ हैं ॥ ६० ॥ भुक्तभाजने। पादुकास्थोन भुजी- (भा०टी०) विशिष्टधमशास्त्र । ३७ त पर्यकस्थः स्थितोपि वा ॥६५॥ शुद्धोगा जो शुद्धि व वनन्यायें वही शुद्धि जलसे हाथधाव और उस अन्नपर उस अन्न की करे, गो द्रोण भर अब किंचिन्मात्र भस्म डाले तो वह अन्न शुद्ध को काक वा श्वान ने चाटा हो तोडगा होता है जो ब्राह्मण भोजन करता हुआ अन्न का त्याग नहीं कर किंतु प्राण हाथ से चरणको स्पर्श करता स्पर्श करता है अथवा उसकी जैनी शुद्धि बन जावें वैमी शुद्धि करले ॥ १८॥ भोजन किये हुये पात्र में भोजन करता : है वह अपना उच्छिष्ट भोजन करता है। वेदवेदांगविविधर्मशास्त्रानु- खडाऊं पहिरे हुए तथा पलंगपर बैठे हुये पालकैः । प्रस्थाद्वात्रिंशतिद्रोणः अथवा खडे होकर भोजन करै ६४॥६५ स्मृतोदिप्रस्थआढकः॥ ६६ ॥ श्वानचांडालहक्चैव भोजनं वेद और वेदांगके जानन वाले और परिवर्जयेत् । यदन्नं प्रतिापद्धं धर्मशास्त्र के अनुकूल आचरण करनेवाले ब्राह्मणों ने कहा है, कि-बत्तीस प्रस्थ स्यादनशुद्धिस्तथैव च ॥६६॥ का एकद्रोण होता है और दो प्रस्थका जिस भोजन पर भान वा चांडालकी आढक कहाजाता है ।। ६९॥ दृष्टि पडीहो उसे त्यागदे। जो अन्न निषि- ततोद्रोणाढकस्यान्नंश्रुतिस्मृ- द्ध है और उनकी शुद्धि ।। ६६ ॥ यथा पराशरेणोक्तं तथैवाहं वदा: ढंतु गवानातं खरेण वा ७० तिविदोविदुः । काकश्वानावली- मिवःशित द्रोणाढकस्यान्नं काक- द्रोण और आढकभर अन्न को जो श्वानोपघातितम् ॥६७॥ काक वा श्वान ने चाटाहो अथवा गो जिसप्रकार पराशर जी ने कही है वा गधेने मघा हो नौ ॥ ७० ॥ उसीमकार मैं तुम्हारे प्रति कहता हूं । स्वल्पमन्नं त्यजेदिनः शुद्धि- जो द्रोण और आढ़कभर शृतअन्न (द्र- गाढके भवेत् ॥ अन्नस्योद्धृत्य वपक्वान्न जैसाकि खीर इत्यादि ) को तन्मात्रं यच्चलालाहतं भवेत् ७१ काक वा श्वान ने दुपित किया हो तो।। उसमें से किश्चिन्मात्र अन्न को त्याग केनेदं शुध्यते चेति ब्राह्मणेभ्यो- करदन से शुद्धि होजानी है, ऐसा श्रुति निवेदयेत् । काकश्वानावलीढं और स्मृति के जाननेवालोंने कहा है, जितने अन्न में उसकी राल टपकी हो तु द्रोणान्नं न परित्यजेत् ॥६८॥ उतने अन्न को निकालकर शेष को ७१ उस अन्न को ब्राह्मणों के निवेदन १.आठ तालको १ प्रनि और ६४ प्रमृतिका करके उनसे पूछे कि यह अन्न किमप्रकार आटक होना है ॥ -~-
लघुपाराशरी।
अ०७
सुवर्णोदकमभ्युदय हुताशेनै अब इसके अनंतर द्रव्यों की शुद्धि
व तापयेत् । हुताशनेन संस्पृष्ट- जिमप्रकार पराशरजी ने कही है वर्णन
करते हैं, काष्ठ के पात्रों की शुद्धि
सुवर्णसलिलेन च ॥ ७२ । उनको छीलडालने से होजाती है।।१।।
विप्राणांब्रह्मघोषण भोज्यं भवति मार्जनाद्यज्ञपात्राणां पाणिना
स्नेहोवा गोरवत्क्षणात्॥सोवापि यज्ञकर्मणि । चमसाना खुवाणां
तत्रशुद्धिः कथं भवेत्॥७३॥ च शुद्धिरुष्णेन वारिणा ॥ २॥
सुवर्ण के जलसे छिड़ककर आग्निसे
और यज्ञके कर्म में यज्ञपात्रों की शुद्धि
तप्त करै , क्योंकि-अनि से सन्तप्त करने हाथ से मार्जन करदेने से होती है,
से, सुवर्णका जल छिड़कने से और तथा चमस और अवे की शुद्धि उष्ण
ब्राह्मणों के वेदोच्चारण करने से वह जलसे होती है ॥२॥
अन्नभक्षण करने के योग्य होजाता है।। भस्मना शुध्यते कांस्यं ताम्र-
घृतादिक स्नेह अथवा गोरस (दुग्ध ) मम्लेन शुद्धयति । रजसाशुध्ध-
यदि अशुद्ध होगये हों तो उनकी शुद्धि ते नारी विकलं यानगच्छति ॥
किस प्रकार होती है ॥७२॥७॥
अल्पं परित्यजेत्तत्र स्नेहस्यो- नदीवेगेन शुध्येत लेपोयदि न
सावनेन च ॥ अनलज्वालया
.दृश्यते । ३ ॥
कांसी के पात्र भस्म से और ताम्र
शुद्धिोरसस्य विधीयते ॥७॥
पात्र खटाई से शुद्ध होते हैं , जो स्त्री
इतिश्रीपराशरीये धर्मशास्त्रे नीच जाति से संग न करे तो रजो.
षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ वती होकर शुद्ध होजाती है। और यदि
उसमें से थोड़ासा निकाल कर स्नेह नदी में किसी अशुद्ध वस्तु का लेपन
दिक को उछालकर शुद्ध कर और गोरस होय तो वह वेग अर्थात्-प्रवाह से
को तप्त करके शुद्ध करले ॥ ७ ॥
शुद्ध होती है ॥ ३॥
इतिश्रीपराशरीये धर्मगाने भाषाटाकाया
वापीकूपतडागेषु दूषितषु कथं
चन । उद्धृत्य वै कुम्भशतं पंच-
वचोयथा ।दाखाणान्तु पात्राणां
वापी, प तथा तड़ागादिक किसी
तत्क्षणात् शुद्धिरिष्यते ॥ १ ॥
प्रकार से अशुद्ध होगये हों तो उनमें से
षष्ठोऽध्याय ॥६॥
अथातोद्रव्यशुद्धिस्तु पराशर- गव्येन शुद्धयति ॥ ४ ॥
(भा०टी० ) विशिष्टधर्मशास्त्र। ३९ सौघड़े जल निकालकर पंचगव्य से यः करोत्येकरात्रेण वृपलीसे- शुद्ध होते हैं ॥ १॥ अष्टवर्पा भवेद्गौरी नववर्षा च त्रिभिर्विशुद्धयति ॥ ६ ॥ वनं दिजः। सभैक्ष्यभुग्जपन्नित्यं रोहिणी । दशवर्षा भवेत्कन्या यदि कोई ब्राह्मण एक रात्रिभी वृष. अत ऊर्च रजस्वला ॥५॥ ली का सेवनकरैतौ भिक्षान भोजन और आठ वर्ष की कन्याको गौरी और नौ गायत्री मंत्रका जप करता हुआ तीनवर्ष वर्षकी कोरोहिणी कहते हैं और दशवर्षकी में शुद्ध होता है ॥ ९ ॥ कन्या कहलाती है उसके उपरांन रज अस्तंगते यदा सूर्ये चाण्डालं स्वला होती है ॥५॥ प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां चैव कथं शुद्धिविधीयते ॥ १० ॥ पतितं स्त्रियम् । सूतिकांस्पृशते न प्रयच्छति । मासि मासि रज- (प्र.) जो ब्राह्मण सूर्य अस्त होनेके स्तस्याःपिवन्ति पितरोनिशम्॥ अनंतर चांडाल पतित ( अपने कर्मोको जो पुरुष बारहवें वर्ष तक कन्यादान छोडकर अन्य जानिका कर्म करनेवाला) नहीं करता तो उसके पितर प्रत्येक मास वा सूतिका स्त्री का स्पर्श करै तौ किस- में उस कन्याके रजका पान करते हैं !! प्रकार शुद्ध होता है ? ॥१०॥ माता चैव पिता चैव ज्येष्ठोभ्राता. जातवेदं सुवर्ण च सोममार्ग तथैव चात्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट- विलोक्य च । ब्राह्मणानुमतश्चैव वा कन्यां रजस्वलाम् ॥ ७ ॥ स्नानं कृत्वा विशुद्ध्यति ॥११॥ रजस्वला कन्याको देखकर माता पिता । (उ.) ब्राह्मणकी आज्ञा से स्नान और बड़ा भ्राता ये तीनों नरक को करके तदनंतर अग्नि सुवर्ण और चंद्रमा प्राप्त होते हैं।॥७॥ का दर्शन करै यदि उस समय चंद्रोदय यस्ता समुदहेकन्यां ब्राह्मणो- न हुआ होतो जिस दिशा में चंद्रमा हो मदमोहितः । असंभाष्योगपां- उस दिशाका दर्शन करै !॥ ११ ॥ तेयः सविप्रोवृषलीपतिः॥८॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्रा- जो ब्राह्मण अज्ञानसे उस कन्याको विवाहै उससे संभाषण करना योग्य नहीं ह्मणी ब्राह्मणी तथा। तावत्तिष्ठेन्नि- बह वृषलीपति कहाता है अतएव पंक्ति राहारा त्रिरात्रेणैव शुद्ध्यति १२ सं बाहर करने योग्य है ॥ ८॥ जो दो रजस्वल्लाब्राह्मणी परम्परम्पर्ष r है अ०७ AAAA लघुपाराशरी। करें तो पन्येक तीनदिन बन करने से वृत्तौ तु दैवपित्र्यादिकर्म च॥१६॥ शुद्ध होती है ॥ १२ ॥ रजस्वला चौथे दिन स्नान करकै शुद्ध स्पृट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्म. होती है और रजकी निवृत्ति (रुकावट) णी क्षत्रिया तथा। अर्द्धकृच्छंच- होनेपर देवकर्म तथा पितृकर्म करै १६ रेत्पूर्वा पादमेकंत्खनन्तरा।।१३।। रोगेण यद्रजः स्त्रीणामन्वहं तु प्रवर्तते । नाशुचिः सा ततस्तेन यदि ब्राह्मणी और क्षत्रिया रजस्वला होकर परस्पर ( आपस में ) एक दुमरी यस्मादैकारिक मतम् ॥ १७ ॥ को स्पर्श करलेय तो ब्राह्मणी अर्द्धकृच्छ रोगके कारण जिस स्त्रीके प्रति दिन और क्षत्रिया चतुर्थाश ( चौथाई ) कृच्छू रजः स्राव ( रजका निकलना) होय वह करके शुद्ध होनी है ॥ १३ ॥ स्त्री उस रजसे आवित्र नहीं होती है क्योंकि वह रज विकारका है ॥ १७ ॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्म- णी वैश्यजा तथा। पादहीनं चरे- साधाचारान तावत् स्यादजो- त्पूर्वा पादमेकमनन्तरा ॥ १४॥ यावत्प्रवर्तते। रजोनिवृत्तौ गम्या स्त्री गृहकर्मणि चैव हि ॥१८॥ यदि ब्राह्मगी और वैश्यकी पुत्री रज- जबतक रजकी प्रवृत्ति रहती है तब- खला होकर परस्पर एक दूसरीको स्पर्श करलय तो ब्राह्मणी पादौन ( पौन ) तक स्त्री सत्कर्म में अधिकारिणी नहीं कृच्छ्र व्रत करकै और वैश्य पुत्री चौथाई होती है और पति के सहवास योग्य तथा गृहके कार्य करने के योग्य भी नहीं कृच्छ्रव्रत करकै शुद्ध होती है । १४ ॥ होती है ॥१८॥ स्पृष्ट्वा रजस्वलान्योन्य ब्राह्म- प्रथमेहनि चाण्डाली द्वितीये णी शूद्रमा तथा। कृच्छ्रेण शुद्ध्य- ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी प्रोक्ता ते पूर्वा शूद्रा दानेन शुध्यति १५ चतुर्थेऽहनि शुद्धयति ॥ १६ ॥ यदि ब्राह्मणी और शूद्रपुत्री रजस्वला स्त्री रजस्वला होने पर प्रथम दिन चां- होकर परस्सर एक दूमरीको स्पर्श कर-डाली सदृश, द्वितीयदिन ब्रह्महत्यारीकी लेय तौ ब्रामणी पूर्ण कृच्छ्व्रत करके सदृश, वतीय दिन ( धोविन ) की स- और शुद्रपुत्री दान करके शुद्ध होती है। दृश और चौथे दिन शुद्ध होजाती है १९ स्नाता रजस्वला या तु चतु- आतुरेस्नान उत्पन्ने दशाकृत्वो थहनि शुध्यति । कुंर्यादजोनि- ह्यनातुरः। स्नात्वा स्पृशेदेनंततः ( भाटी.) विशिष्टधर्मशास्त्र। शुद्धचेत् स आतुरः ॥ २० ॥ पर ) शुद्ध होजाता है और यदि मदिरा रोगयुक्त श्री रजस्वला होजाय और का स्पर्शमात्रभी होगया होय तौ वार अनि यदि रुग्ण अवस्था में ही उसके स्नान डालकर मांजने से शुद्ध होता है।॥२३॥ का दिन आजाय तो कोई नीरोग व्य गवा त्रातानि कांस्यानि श्व- ति क्रमसे दशवार स्नान कर २ के काकोपहतानि च । शुद्धयन्ति उसको स्पर्श करै तब वह रोगयुक्त स्त्री दशभिः क्षारैः शूद्रोच्छिष्टानि शुद्ध होजाती है ॥२०॥ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः शुना यानि च ॥ २४ ॥ गौओं करकै संघहुए, काकके चोंच शदेण वा द्विजः। उपोष्य रज- कगाएहुए और शान करके चाटेहुए 'नीमेकां पंचगव्येन शुद्धयतिर तथा शुद्र के उच्छिष्ट ( जूठे ) करेहुए यदि किसी उच्छिष्ट (जठमुख ) कांसी के पात्र दशवार खटाई आदि क्षार शूद्र अथवा श्वानसे स्पर्श करकै कोई पदार्थ से रगड़कर धोनेसे शुद्ध होते हैं । किसी ब्राह्मण को स्पर्श करलेय गण्डूषपादशौचं च कृत्वा वै तो वह ब्राह्मण एकरात्रि उपवास करने कांस्यभाजने। षण्मासान भुवि के अनन्तर पश्चगव्य भक्षण करके शुद्ध होता है ॥२१॥ निक्षिप्य उद्धृत्य पुनराहरेत्।।२५॥ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण स्पर्श यदि किसी कांसी के पात्र गण्डूप (कुल्ला ) कराहोय या पैर धोये होय तो स्नानं विधीयते । तेनोच्छिष्टेन उस पात्रको छ: मास पर्वत पृथ्वी में संस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत्२२ गड़ा रक्खै और तदनन्तर उखाड़कर अनुच्छिष्ट शूद्रके स्पर्श होजानेपर व्यवहार में लावै ॥ २५ ॥ ब्रामणको स्नान करनेका विधान है और आयसेष्वपसारेण सीसस्या- यदि कोई उचिट शूद्र स्पर्श करलेय तौ ग्नौ विशोधनम् । दन्तमस्थि त- माजापत्य व्रत करें ॥११॥ था शृंगरौप्यं सौवर्णभाजनम् २६ भस्मना शुद्धयते कांस्यं सुरया मणिपात्राणि शंखश्चेत्येतानप्र- यन्न लिप्यते । मुरामात्रेण संस्पृ- क्षालयेजलैः । पापाणे तु पुन - एं शुद्धयतेऽन्युपलेपनैः ॥२३॥ टिरेषा शुद्धिरुदाहृता ।। २७॥ जिस कांसीके पात्र में मदिराका स्पर्श लोहपात्रको दूर करदेनेसे और सीसे के न हुभा हो वह भस्म से (राखसे मांजने पात्र को अग्नि में तपाने से तया दांत ६ लघुपाराशरी। । अस्थि, सींग, चांदी, सुवर्ण, मणि और मूंज, उपस्कर (शिल -वटनी ऊखली पत्थर के पात्र और शंख इनकी जल से धो- आदि ), शूर्प (छाज) सन, फल, चर्म लेने पर शुद्धि होजाती है और पाषाण के तण, काठ, रस्मी इनकी जल छिडकन पात्र को जल से धोने के अनन्तर मांज से शुद्धि होती है ॥ ३१ भी लेना चाहिये, ऐसा करनेपर ही तूलिकाद्युपधानानि रक्तवस्त्रा. शास्त्र में उसकी शुद्धि कही है ॥२६।२७ दिकानि च । शोषयित्वार्कतापेन मृण्मये दहनाच्छुद्धिर्धान्यानां प्रोक्षणाच्छुद्धतामियुः॥३२॥ मार्जनादपि ॥ २८॥ तोसक, तकिया आदि शय्या की सा- मृत्तिकाके पात्रकी जलाने से और धा- मग्री लालनस्त्र आदि धूप में सुखाकर जल न्योंकी मलकर धोने से शुद्धि होती है। छिडकने से शुद्ध होजाते हैं ॥ ३२ ॥ अद्विस्तु प्रोक्षणं शौचं बहूनां मार्जारमक्षिकाकीटपतंगकृमि- धान्यवाससाम् ।प्रक्षालनेन त्वल्पा- दर्दुराः । मेध्यामेध्यं स्पृशन्त्येव नामद्भिः शौचं विधीयते ॥२९॥ नोच्छिष्टान्मनुरब्रवीत् ॥ ३३ ॥ बिडाल, मक्षिका, कीट, पतंग, कीडे बहुतसे धान्य और वस्त्रोंकी जल छि: और मेंडक, यह सब सदा शुद्ध अशुद्ध डकलेने मात्र से शुद्धि होती है और थोडे धान्य तथा वस्त्र होय तो उनकी धोने से वस्तुओं का स्पर्श करते हैं, इस कारण शुद्धि होती है ॥ २९ ॥ इनके स्पर्श से कोई वस्तु अपवित्र नहीं होती है, ऐसा मनुनी का मत है ३३ वेणुवल्कलक्षीराणां क्षौमका- महीं स्पृष्ट्वा गतं तोयं यश्चा- पासवाससाम् । और्णनेत्रपटानां प्यन्योन्यविनुष । भुक्तोच्छिष्टं तथा च प्रोक्षणाच्छुद्धिरिष्यते ॥३०॥ स्नेहं नोच्छिष्टं मनुरवीत्॥३४॥ बाँस,वल्कल (भोजपत्रादि), फटे वस्त्र, जो जल पृथ्वी को स्पर्श करके अन्यत्र रेशमीवस्त्र, सूतीवस्त्र, ऊनीवस, और जलमें मिलगयाहै और जो एकसे उछटकर नेत्रपट 'सन के वस्त्र, की प्रक्षालन करने अन्यके ऊपर गई हुई छीटें हैं यदि भुक्तो- से शुद्धि होती है ॥ ३० ॥ च्छिष्ट (भोजन करकै बचा हुआ) होय तो मुंजोपस्कराणां शणस्य छिष्ट स्नेह (घृत, तैल आदि) भी अशुद्ध भी अपवित्र नहीं होता है इसीप्रकार भुक्तो- फलचर्मणाम् । तृणकाष्ठादिरज्ञ- नहीं होता है ऐसा मनुजी का मत है। नामुदकाभ्युक्षणं मतम् ॥ ३१॥ ताम्बून्लेक्षुफले चैत्र भुक्तस्नेहानु- (भाटी.) विशिष्टधर्मशास्त्र । लेपनामधुपर्केच सोमे चनोच्छि-सीअंगके उच्छिष्ट होजानेपर, असत्य ष्टं मनुरब्रवीत् ॥ ३५ ॥ बोलनेपर और पतितों के साथ भाषण करनेपर दाहिन कर्णका स्पर्श कर,क्योंकि ताम्बूल, इक्षुफल (गन्ना), जिसमें से कुछ कार्य में लायागया है ऐसा तैल अग्नि, जल, वेद, चन्द्रमा, सूर्य वायु और अनुलेपन (चन्दनादि ) मधुपर्क यह सब ब्राह्मणों के दाहिने कर्ण में स्थित रहते हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ तथा सोमरस में उच्छिष्टता नहीं होती है ऐसा मनुजीका कथन है ॥ ३५॥ प्रभासादीनितीर्थानि गंगाद्याः रथ्याकर्दमतोयानिनाव-पन्या- सरितस्तथा। विप्रस्य दक्षिणे कर्णे स्तृणानि च । मारुतार्केणशुध्य- सानिध्य मनुस्खवीत् ॥ ४० ॥ न्ति पक्केष्टकचितानि च ।। ३६ ॥ प्रभास आदि तीर्थ, और गंगा आदि रथ्या (गली-मार्गआदि) की कीच करती हैं, ऐसा मनुजी का कथन है ।। नदियें ब्राह्मण के दक्षिण कर्ण में निवास और जल, नाव, मार्ग और तृण तथा और पक्की ईटों की चिनाई यह सब देशभगे प्रवासे वा व्याधिषु वायु और सूर्य के संयोग से शुद्ध होते हैं । व्यसनेष्वपि । रक्षेदेव स्वदेहादि अदुष्टाः सन्तता धारा वातोडू- पश्चाद्धर्म समाचरेत् ॥ ४ ॥ वाश्च रोमवः। स्त्रियोवृद्धाश्च बा देशका नाश होनेके समय, परदेशमें लाश्च न दुष्यन्ति कदाचन॥३७॥ रोगयुक्त होनेपर और आपत्तियों के चारों ओर फैली हुई जलकी निर्मल समय प्रथम सबप्रकार से अपने शरीर धारा और वायु से आकाश में उड़ाई की रक्षा करै तदनन्तर धमाचरण करै ।। हुई धूलि, वृद्ध स्त्री और बालक यह येन केन च धर्मेण मृदुनादा- कदापि दक्षित ( अपवित्र) नहीं होते हैं। रुणेन वा उद्धरेदीनमात्मानं सम- क्षुते निष्ठी बने चैवदन्तोच्छिष्टे र्योधर्ममाचरेत् ॥ ४२॥ तथानृते । पतितानां च संभाषे अपने ऊपर आपत्ति आनेपर कोमल वा कठोर जिस किसी उपायसे भी होसके दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ॥ ३८॥ प्रथम अपने दीन (आपत्ति प्रस्त)आत्मा अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसू- का उद्धार कर, तदनन्तर समर्थ होकर र्यानिलास्तथा । एते सर्वेऽपिवि-धर्माचरण करै ।। ४ ।। प्राणां श्रोत्रे निष्ठन्ति दक्षिणे ३९ आपत्कालेतु सम्पासे शौचा- डीकलेने पर, कनेपर, दानोंसे कि- चारं न चिन्तयेत्। आत्मानमुद्ध- .
४४ AMA AAAA लघुपाराशरी। रेत्पश्चात्स्वस्थोधर्म समाचरेत ४३. यहांसे आगै, वह पापी पुरुष धर्मज्ञ ब्राह्मण के पास किसप्रकार जाय सो इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ कहते हैं-न्यायमार्ग से अपने पास आये आपत्तिकाल के प्राप्त होनेपर शौचा- हुए पापी को ब्राह्मण व्रतकी आज्ञार्दै चार का विचार न करै, प्रथम अपना सद्योनिःशंसये पापे न भुंजी- उद्धार कर तदनन्तर स्वस्थ होकर धमा- तानुपस्थितः । मुंजानोवर्द्धयेत्पा- चरण करै ।। ४३ ॥ पं पर्षद्यत्र न विद्यते ॥४॥ इतिश्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे भाषाटीकाया यदि पाप का निश्चय होजाय तोधर्मज्ञ सप्तमोऽध्याय ॥७॥ ब्राह्मणों के अर्थ उस पाप को बिना गवां बन्धनयोक्तेषु भवेन्मृत्यु- निवेदन करे भोजन न करै, यदि परिषद (धर्मज्ञ ब्राह्मणों की मण्डली) के समाप रकामतः । अकामात्कृतपापस्य बिनाजाय भोजन करलेय तौ पाप की प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ॥१॥ वृद्धि होती है ॥ ४॥ यदि कोई गौ (बैल-या-गैया )बाँध- शंसये तु न भोक्तव्यं यावत्का- ने के खूटेमें बँधी हुई (किसीप्रकार की यविनिश्चयः। प्रमादस्तु न क- अज्ञात पीडा को पाकर ) अकायतः मरण को प्राप्त होजाय तौ तिस तव्योयथैवाशंसयस्तथा ॥५॥ अकामकृत पापका प्रायश्चित्त किसम- यदि पापमें संदेह होय तो जबतक नि. कार होना उचित है ॥ १॥ श्चय न होजाय तबतक भोजन न करे, वेदवेदांगविदुषां धर्मशास्त्रं वि. और जबतक निश्चय न होय तबतक जानताम् । स्वकर्मरतविप्राणां असावधान भी नहीं रहना चाहिये ५ स्वकं पापं निवेदयेत् ॥२॥ कृत्वा पापं न गृहेत गुह्यमानं वेद वेदांग के जाननेवाले, धर्मशास्त्र विवर्द्धते । स्वल्प वाथ प्रभूत वा के पारदर्शी सदा याग, यज्ञ और याजन धर्मविद्भ्योनिवेदयेत् ॥ ६॥ ( यज्ञ कराना) आदि अपने कर्ममें किया हुआ पाप थोड़ा हो चाहें अ. तत्पर ब्राह्मणों से अपना पाप कह २ धिक हो उसको कदापि छिपावै नहीं अतऊद्धवप्रवक्ष्यामि उपस्थान- किन्तु धर्मज्ञ ब्राह्मणों से निवेदन करदेय स्य लक्षणम् । उपस्थितोहि न्या- क्योंकि -छिपाने से पापकी वृद्धिहोतीहै।। येन व्रतादेशनमहति ॥ ३ ॥ तेहि पापकृतां वैद्या हन्तारश्चै- (भा टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र । व पाप्मनाम् । व्याधितस्य यथा अ अर्थात् साष्टांग प्रणाम करै और कुछ कहै वैद्या बुद्धितन्तोरुजापहा ॥७॥ नहीं ॥ १० ॥ जिस प्रकार बुद्धिमान् वैद्य रोगी पुरुष सावित्र्याश्चैव गायत्र्याः स- के रोगको नष्ट करदेता है तिसी प्रकार ध्योपास्त्यग्निकार्ययोः। अज्ञा- योग्यपुरुष के अर्थ अपना निवेदन करने नाकृपिकारोब्राह्मणा नाम- पर वह उस पापको नष्ट करदेता है ॥७॥ धारकाः॥ ११ ॥ प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने ड्रीमान जो वेद और गायत्री को नहीं जानते सत्यपरायणः। मुहुरार्जवसम्पन्नः हैं, सन्ध्योपासना और अग्नि में आहुति शुद्धिं गच्छेत मानवः ॥ ८ ॥ दान नहीं करते हैं। सदा केवल खेती (परिषद् की आज्ञा के अनुसार ) का कार्य करनेमेंही तत्पर रहते हैं वह पाप करनेवालेका उचित प्रायश्चित्त हो नाममात्र के ब्राह्मण हैं ॥ ११ ॥ जानेपर ( पापकी दारुण) लज्जासे युक्त अवतानाममंत्राणां जातिमात्रो- सत्यव्रत परायण, सरलस्वभाव पुरुष पजीविनाम् । सहस्रशः समेतानां शुद्धि को प्राप्त होता है ॥ ८॥ परिषत्वं न विद्यते ॥ १२ ॥ सचैल वाग्यतःस्नात्वा क्लिन्न- व्रत मात्र से रहित और जाति के वासाः समाहितः । क्षत्रियोवाथ नाममात्र से जीविका करनेवाले जो वैश्योवा ततः पर्षदमावजेत्॥९॥ ब्राह्मण हैं वह सहस्रों इकट्ठे हों तो भी क्षत्रिय हो चाहें वैश्य हो, पापक परिषद् नहीं कहासती है ॥ १२ ॥ संसर्ग होतेही मौन धारणकरकै वस्त्रों यदन्ति तमोमूढाः मूर्खाधर्मम- सहित स्नान करै और तिस गीले वस्त्र तदिदः । तत्पापं शतधा भूत्वा को पहिनेहुए ही सावधानतासे परिषद् तदक्तुरधिगच्छति ॥ १३॥ के पासजाय ॥१॥ अज्ञान रूप अंधकार से मूह धर्मशास्त्र के उपस्थाय ततःशीघ्रमातिमान् न माननेवाले मूर्ख ब्राह्मणप्रायश्चित्त की धरणी ब्रजेत् । गात्रैश्च शिरसा चै- व्यवस्थादें तो पापी पाप से छूटजाताहै वन च किंचिदुदाहरेत् ॥ १०॥ परंतु वह पाप सौगुना होकर व्यवस्था देनेवालोंके शरीर में प्रवेश कराते हैं१३ जहांतक होसके शीघ्रता के साथ परिषद् के समीप जाकर विनयपूर्वक अज्ञात्वा धर्मशास्त्राणि प्राय- शिर और शरीर से पृथ्वी में प्राप्त होय श्चित्तं ददाति यः। प्रायश्चित्ती लघुपाराशरी। भवेत्पूतः किल्विष परिपद्रजेत् १४॥ ति परिपदम् । मारुताकादिसंयो जो धर्मशास्त्र को न जानकर प्रायश्चित्त गात्यापं नश्यति तोयवत्॥१८॥ की व्यवस्था देते हैं, पापी पुरुष तो वायु और मूर्य के संयोग से सूखे उस व्यवस्था के अनुसार शुद्ध होता है हुये जलकी समान पाप नष्ट होजाते हैं परन्तु वह पाप व्यवस्था देने वाली उस ! और न वह पापक के शरीर में रहते परिषद् के शरीर में प्रवेश करता है १४ हैं न परिषद् के शरीर में प्रवेशकरते हैं। चत्वारोवा त्रयोवापि यं ब्रूयु- चत्वारोवा त्रयोवापि वेदवन्तो वैदपारगाः। स धर्म इति विज्ञेयो ऽग्निहोत्रणः। ब्राह्मणानां सम- नेतरैस्तु सहस्रशः ॥१५॥ र्था ये परिषत्सा विधीयते॥१६॥ चार अथवा तीन वेदवेत्ता ब्राह्मण वेदज्ञ, अग्निहोत्र करनेवाले, ब्राह्मणों जो व्यवस्था देते हैं वहही धर्म है अन्य में समर्थ पांच वा तीन पुरुषों की परि- सहस्रों पुरुषों का बाक्य भी धर्म नहीं षद् कहाती है ॥ १६ ।। होसक्ता ॥ १५ ॥ अनाहिताग्नयो येऽन्येवेदवे- प्रमाणमार्ग मार्गन्तो ये धर्म दाङ्गपारगाः। पंच त्रयो वा धर्म- प्रवदन्ति बातेपामुद्विजते पापं स- ज्ञाः परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२०॥ दूतगुणवादिनाम् ॥ १६ ॥ वेद वेदांगके पारगामी जो धर्मज्ञ प्रमाण के मार्ग को ढूंढते हुए जो धर्म- ब्राह्मण आहितानि (अग्निहोत्र करनेवाले) शास्त्र की व्यवस्था देते हैं, उनसे पाप नहीं हैं, ऐसे पांच वा तीन पुरुषों के भय मानता है और वहही वास्तविक समूह को परिषद् कहते हैं ॥ २० ॥ धर्मके कहनेवाले हैं ॥ १६ ॥ मुनीनामात्मविद्यानां दिजाना यथाश्मनि स्थितं तोयं मारुता- केण शुद्धयति । एवं परिषदादेः नामकोऽपि परिषद्भवेत् ॥ २१ ॥ यज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषु स्नाता- शानाशयेदेव दुष्कृतम् ॥१७॥ ध्यान, धारणादि के द्वारा आत्मतत्व जिसपकार शिला पै स्थित जल वायु को जाननेवाले मुनि, यज्ञ करनेवाले और मूर्य के द्वारा सूखजाता है तिसी- और देवताओं के व्रत करनेवाले तथा प्रकार परिषद् की आज्ञा ( व्यवस्था) स्नातक ( वेदाध्ययन के अनंतर समा. से पापों का समूह नाशको प्राप्त होता है। वर्तका अंगरूप स्नान करनेवाला : इन नैव गच्छति कतारनैव गच्छ- में से एक पुरुषभी परिषद् होसक्ता है ।।
(भा०टी०) विशिष्टधर्मशास्त्री पंचपूर्व मया प्रोक्तास्तेषां चास- यथा पंडोऽफलःत्रीषु यथा गौ- भवे त्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टया ये रुपराफला । यथा चाज्ञे फलं दानं परिपत्सा प्रकीर्तिता ॥ २२ ॥ तथा विप्रोऽनृचोऽफलः॥२६॥ ऊपर कहचुक हैं कि-पांच ब्राह्मणों जैसे नपुंसक का स्त्री संभोग निष्फल की परिषद् होती है, परंतु वेदज्ञ पांच होता है , जैसे ऊपरभूमि निष्फल है ब्राह्मण न मिलैं तौ शास्त्रोक्त निजवृत्तिों और जैसे मूर्ख को दानदेना निष्फल संतुष्ट सीन ब्राह्मणों की भी परिषद् । है जैसे ही वेदमंत्रों को न जाननेवाला होसक्ती है ।। २२ ॥ ब्राह्मण निषिद्ध है ॥ २६ ॥ अत ऊर्द्ध तु ये विप्राः केवलं चित्रकर्म यथानेकैरंगैरन्मील्य- नामधारका परिषत्वं न तेष्वस्ति ते शनैः। ब्राह्मण्यमपि तदत्स्या- सहस्रगुणितेष्वपि ॥ २३ ॥ संस्कारैर्विधिपर्वकैः ॥ २७॥ इनके सिवाय जो केवल नाममात्र जिसपकार चित्रकारीका काम बहुत ब्राह्मण हैं (वेदन नहीं हैं ) वह सहस्रों से अंगप्रत्यंगों के गठन से क्रम करके हों तो भी परिषद् नहीं होसक्ती २३ उन्मीलित होता है तिसीप्रकार विधिपूर्वक यथा काष्ठमयोहस्ती यथा चर्म-करेहुए गर्भाधानादि संस्कारोंसे ब्राह्मण- त्वं प्रकाशित होता है ।। २७ ॥ मयोमृगः ब्राह्मणास्त्वनधीयान-- प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये दिजा- स्त्रयस्ते नामधारकाः॥ २४ ॥ जैसा काठका इस्ती, जैसा चर्म रचित नामधारकाः। ते दिजाः पापक- मृग, वेदको न जाननेवाला बासी र्माणः समेता नरकं ययुः ॥२८॥ तेसाही है, यह तीनों केवल नाममात्र जो नाममात्र के ब्राह्मण प्रायश्चित्त धारण करनेवाले ॥२४॥ की व्यवस्था देते हैं वह पापकर्मी हैं और ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा सब नरकगति को पाते हैं ॥ २८ ॥ कूपस्तु निर्जलः। यथा हुतमनग्नौ ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञ- च अमन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥२५॥ रताच ये । त्रैलोक्य धारयन्त्येते जैसा शून्य ग्राम, जैसा निर्जल कूप, पञ्चेन्द्रियरताश्रयाः ॥ २६ ॥ और जैसा अग्निरहित भस्म के डरमें, ढरमें जो ब्राह्मण वेद पढ़ते हैं और जो हवन करना निष्फल है, तैसेही वेदमन्त्रों पञ्चयज्ञ करने में नत्पर रहते हैं,वह ही त्रि. को न जाननेवाला ब्राह्मण भी निष्फलहै। लोकीको धारण करते है और पश्चेन्द्रिय
?
लघुपाराशरी।
परायण मनुष्यों के आश्रय हैं ॥ २९॥ (गधैया) को दुहेगा ? अर्थात् कोई नहीं।
संप्रणीतः श्मशानेपु दीप्तोऽ- धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा-
ग्निः सर्वभक्षकः । तथैव ज्ञानवा- दिजाः। क्रीडार्थमपि यद्व्युः स
न विप्रःसर्वभक्षोऽपि दैवतम्॥३०॥ धर्मः परमः स्मृतः॥३४॥
जिसप्रकार मंत्रों से संस्कार किया द्विज धर्मशास्त्ररूप रथप चढकर और
हुभा अग्नि श्मशान में सर्वभोक्ता है तिसी वेदरूपी खड्ग को धारण करके हास्यस
प्रकार ब्रह्मज्ञान के द्वारा संस्कार को भी जो कुछ कहदै उसको परम धर्म जान।।
प्राप्त हुआ ब्राह्मण सर्वभुक और देवरूप चातुर्वेद्योऽविकल्पीच अङ्गवि-
होता है॥३०॥
द्धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रामिणो मु-
अमध्यानि च सर्वाणि प्रक्षि-
ख्याः परिषदेषा दशावरा ॥३५॥
पन्त्युदके यथा । तथैव किल्विषं चारों वेदों का वेत्ता, निश्चित ज्ञान
सर्व प्रक्षेप्तव्यं द्विजेऽमले ॥३१ ॥ सम्पन्न वेदके अंगों का पारदर्शी और
जिसप्रकार संपूर्ण अपवित्र पदार्थ धर्मशास्त्र पढानवाला इकला ही श्रेष्ठ प.
जल में डाले जाते हैं तिसी प्रकार संपूर्ण रिषद् होसक्ता है, प्रधान आश्रमी दन
पापों को निर्मल ब्राह्मण में डालै ३१ हो तो भी मध्यम परिषद् होती है ३५
गायत्रीरहितोविप्रः शूद्रादप्य-
राज्ञां चानुमते चैव प्रायश्चित्तं
शुचिर्भवेत् गायत्री ब्रह्मतत्वज्ञाः द्विजोवदेत् । स्वयमेव न वक्तव्या
संपूज्यन्ते द्विजोत्तमाः ॥३२॥ प्रायश्चित्तस्य निष्कृतिः। ३६ ॥
गायत्रीरहित ब्राह्मग शूद्रकी अपेक्षा राजाकी आज्ञाक अनुसार ब्राह्मण
भी अपवित्र है, गायत्री और ब्रह्मतत्वज्ञ व्यवस्था देय, अपने आप कदापि व्य.
ब्राह्मण श्रेष्ठ और पूजनीय हैं ॥ ३२ ॥ वस्था न देय ॥ ३६ ॥
दुःशीलोऽपि दिजः पूज्या न ब्राह्मणांश्च व्यतिक्रम्य राजा
शूद्रोविजितेन्द्रियः। कः परित्यज्य यत्कर्तुमिच्छति । तत्पापं शतधा
दुष्टांगां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ३३ भत्वा राजानमुपगच्छति ॥३७॥
ब्राह्मण दुःशील होय तो भी उसका ब्राह्मणकी सम्मति विना राजा कोई
करै, शूद्र जितेंद्रिय होय तौभी व्यवस्था देदेय तो उस पापीका पाप
उसका पूजन न करै, कोन पुरुष दुषित सौगुना बढकर रानाके शरीरमें प्रवेश
अंग गौ को त्यागकर सुशीला गर्दभी करना है ॥ ३ ॥
(भा.दी०) विशिष्टधर्मशाखा प्रायश्चित्तं सदा दद्यादेवताय पिवन्तीषु पिवेत्तीय संविशन्ती- तनाग्रतः। आत्मानं पावयेत्प- षु संविशत् । पतितां पंकमग्नां श्चाजपन वै वेदमातरम्॥३८॥ वा सर्वप्राः समुद्धरेत् ॥ ४२ ॥ देवमंदिरके सन्मुख बैठकर ब्राह्मण गौ के जलपान करने पर जलपान व्यवस्था देय, तदनन्तर वेदमाता गायत्री करे, गौ के शयन करनेपर शयन करे, का जप करके अपनेको शुद्ध करै ।। गौ के गिरपड़ने पर अथवा पंक (कीच) सशिख पवनं कृत्वा त्रिसंध्यम- में अदनानेपर सवप्रकार से शक्ति करके वगाहनम् । गवां गोष्ठे वसेदात्रौ उसको उठावै ॥ ४२ ॥ दिवा ताःसमनुब्रजेत् ॥ ३९॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा यस्तु प्रा. प्रायश्चित्त करने के समय प्रथम शिखा णान्परित्यजेत्। मुच्यते ब्रह्महत्या- सहित शिरका मुण्डन करावे, त्रिकाल दुर्गोतागोब्राह्मणस्य च ॥४३॥ में स्नान करकै दिन में गौके पीछे किरै गौ और ब्राह्मण के लिये जो पुरुष और रात्रि के समय गोशाला में शयन करे।। प्राण त्यागकरता है, प्राणों को लगाकर उष्पोवार्षति शीते वा मारुते भी मौ और ब्राह्मणों की रक्षा करने- वाति वा भृशम् । कुर्वीतात्म- वाला वह पुरुष ब्रह्महत्यादि सरप्रकार नत्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः४० के पापों से छूटजाता है ॥ ४३ ॥ गरम वायु चलै, चाहे श्रीतल वायु गोबधस्यानुरूपेण प्राजापत्यं चले, चाई औधी चलती होय और विनिर्दिशेत् । प्राजापत्यन्तु यत्- चाहै वर्षा होती होयपरन्तु अपनी रक्षा की ओर ध्यान न देकर शक्ति के अनुः कृच्छं विभजेत्तचतुर्विधम् ॥४४॥ सार गौ की रक्षा करै ॥ ४०॥ गोवध प्रायश्चित्त के निमित्त एक आत्मनो यदि वान्येषांगृहे क्षेत्रे. प्राजापत्य व्रत करनेकी व्यवस्था देय, ऽथवा। खले भक्षयन्ती न कथये- प्राजापत्य नामक कृच्छ्र व्रतको चार भाग में विभक करै ।। ४४ ॥ पिवन्तं चैव वत्सकम् ॥४१॥ एकाऽहमेकभुक्ताशी एकाहं- अपने या अन्य के घरमें, अथवा खत में अथवा खच ( पैर में या नक्तभोजनः । अयाचिताश्येकम गौ धान्यादि कुछ खाती होय तो कुछ हरेकाहं मारुताशनः॥४५॥ बोले नहीं, बछड़ा गौ का दुग्ध पीता होय एक दिन एक भुक्त (एक पाक भो- तो भी कुछ न कहै ।। ४१ ॥ जन करै ) एक दिन रात्रि में भोजन है
लघुपाराशरी।
करै, अयाचित ( विनार्मागाहुआ ) ड्राह्मणभोजनम् । विप्राय दक्षिणां
पदार्थ भोजन करै और एक दिन वायु दद्यात्पवित्राणि जपेद्विजः ४६
सेवन करकै रहै ।। १५॥
ऐसे चारों प्रकारके प्राजापत्य व्रतका
दिनदयं चैकभक्तोदिदिन न-
अनुष्ठान पूर्ण होने पर ब्राह्मणोंको भो.
तभोजन दिनदयमयाची स्या- जन करा और दक्षिणा देय, ब्राह्मण
द् दिदिनं मारुताशनः॥४६॥ पवित्र मंत्रोंका जप करे ॥ ९ ॥
दूसरे प्रकार के प्राजापत्यका यह नियम ब्राह्मणान भोजयित्वा तु गो.
है, कि-दो दिन एक मुक्त रहै,दो दिन नःशुद्धो न संशयः॥५०॥
रात्रि में भोजन करे, दो दिन अयाचित
इतिश्रीपाराशरीयेधर्मशास्त्रे
वस्तु भोजन करे और दो दिन वायु
ऽहमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
सेवन करकै रहै ॥ ४६॥
ब्राह्मणों को भोजन कराक गोषध
त्रिदिनं चैकमुक्ताशी त्रिदिनं करने वाला शुद्ध होजायगा इस में को-
नक्तभोजनः । दिनत्रयमयाची संशय नहीं है ॥५०॥
इतिश्री पाराशरीये धर्मशास्त्र भाषाटीकाया
स्यात्रिदिनं मारुताशनः॥४७॥
तीसरे प्रकार के प्राजापत्यका पह
नियम है कि-तीन दिन एक भुक रहै, गवांसंरक्षणार्थाय न-दुग्योध-
तीन दिन रात्रि भोजन करे, तीन दिन बंधयोः ।तषं तुनत विद्याका-
अयाचित पदार्थ का भोजन करें और
तीन दिन वायु सेवन करके रहै || मात् कामकृतं तथा ॥१॥
चतुरहस्त्वेकमोजी चतुरहं नक्त
रक्षा करनेकी इच्छासे यदि गौ को बां-
धानाय अथवा रोककर रक्खाजाय तो
भोजनाचतुर्दिनमयाची स्याचतु- दोष नहीं है, उस अवस्थामें गौका मरण
रहं मारुताशनः ॥४८॥ होजाय तोभी वह कामकृत वा अकामकृत
चौथे प्रकारका प्राजापत्य यह है, कि- गोबध नहीं कहानासक्ता ॥ १ ॥
चार दिन एकभुक्तरह,चार दिन रात्रि में अंगुष्ठमात्रःस्थूलोवा बाहुमात्रः
भोजन करे चार दिन अयाचित वस्तु भो- प्रमाणतः। आद्रस्तु सपलाशश्व
जन करै, और चार दिन वायुसेवन कर- दण्ड इत्यभिधीयते ॥ २ ॥
कै रहै ॥ ४८॥
अंगूठेकी समान स्थूल ( मोटा) एक
प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्या- हायका लंबा, गीला और पत्तों से युक्त
मष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
( भाटी.) विशिष्टधर्मशास्त्र। ५१ की शाखा दण्ड कहाताई ॥२॥ योक्तदामकडोरैश्च कंठाभरण- दंडादूर्वं यदन्येन प्रहाराद्यदि भूषणैः ।गृहे चापिवने वापिबद्धः पातयेत् । प्रायश्चित्तं तदा प्रोक्तं स्याद्गोप॑तोयदि ॥७॥ दिगुणं गोबधेचरेत् ॥ ३॥ रस्पी, जोतकी रस्सी और घण्टा आ. इस कहेहुए दण्डकी अपेक्षा बड़े दण्डे दि कण्ठके भूगण से बहुए गौ (बैल या से जो पुरुष गौको ताड़ना करै तो उस गैया) का घरमें अथवा वनमें मरण हो को प्रायश्चित्त करना चाहिये और यादे जाय तो उसको बन्धन कहते इ. यह दो उस प्रहारस गौका मरण होजाय तो प्रकारका होता है एक कामकृत और दुगना प्रायश्चित्त करे ॥३॥ दुसरा अकामकृत ॥ ७॥ रोधबंधनयोक्ताणि घातश्चेति : तदेव बंधनं विद्यातामाकाम- चतुर्विधम् । एकपादं चरेद्राधेदी कृतं च यत्। हले वा शकटे पंक्ती पादौ बंधने चरेत् ॥४॥ योक्तेषु : पृष्ठे वा पीडितोनरैः ॥ ८ ॥ तु त्रिपादस्याचरेत् सर्व निपातने। गोपतिर्मुत्युमाप्नोति योक्तीभव- गोघाटे वा गृहे वापि दुर्गेष्वप्य- ति तद्वधः । मत्तः प्रमत्तउन्मत्त- समस्थले ॥५॥नदीष्वथ समदेषु श्रेसनोवाऽप्यचेतनः ॥ ६ खातेप्यपदरीमुखे।दग्धदरोस्थि- कामाकामकृतःक्रोधोदंडे«न्याद- तागावःस्तंभनादोध उच्यते॥६॥ थोपलैः। प्रहता वा मृतावापि रोप-बन्धन-जोत और घात इन तद्धि हेतुर्निपातने ॥ १० ॥ चारमकारसे गौको पीड़ा देने पर पाय मूर्षितः पतितो वापि दंडेना वित्त करै । गोको रोकने पर एक पाद, मिहतः स तु । उत्थितस्तु यदा बांधने पर दो पाद, जोतने में तीन पाद और प्रहार से प्राणवध करने में संपूर्ण गच्छेत्रांच सप्तदशाथ वा॥११॥ चतुष्पाद प्रायश्चित्त करै, गौओंको चरा- ग्रास वा यदि गृहणीयात्तोयं ने स्थानमें, गृहमें, घरमें, दुर्गम स्थान वापिपिवेद्यदि। पूर्वव्याभ्युपसृष्ट- में, नदीमें समुद्रमें, गड़हेमें, गुहामुखम, और चलते हुए स्थानमें स्थित गोत्प्रायश्चित्तं न विद्यते॥१२॥ नेसे मरण होजाय तो उसको रोष का यदि पत्त, प्रमत्त, उन्मत्त, चेनन वा अचेतन होकर कामान (इच्छासे ) ६२ लघुपाराशरी। अ०९ AAAAAAAAA । या अकामकृत (अनिच्छासे) क्रोध कर- पादे वस्त्र युगं चैवद्विपादकां- कै दंड या पत्थरके द्वारा गौके ऊपर प्र- स्यमाजनम् । त्रिपादे खोपं हार करै, उससे अत्यन्त पीडित होय या गौ मरणको प्राप्त होजाय तो उसको दद्याचतुर्थे गोदयं स्मृतम् ॥१५॥ निपातन वा प्रहार के द्वारा गोषध कहने एकपाद प्रायश्चित्त में वस्त्रका जोड़ा, हैं । दण्डके प्रहार से पीडित होकर यदि दोपाद प्रायश्चित्त में कांसी का पात्र, गौ मूर्छित होजाय या गिरपड़े और पादोन (पौन ) प्रायश्चित्त में एक वृष फिर उठकर चलनेलगे अर्थात्-गौ यदि और चतुष्पाद पूर्ण मायश्चित्त में दो प्रहारकी पीड़ासे मुक्त होजाय तो पायाच गौ देय ॥ १५ ॥ र नहीं होताहै ८॥९॥१०॥१०॥१२॥ निष्पन्नसर्वगात्रस्तु दृश्यते पिंडस्थे पादमेकं तु दौपादौ वा सचेतनः। अंगप्रत्यंगसंपूर्णो- गर्भसंते । पादोन व्रतमुद्दिष्टं ह- दिगुणं गोव्रतं चरेत् ॥ १६ ॥ वा गर्भमचेतनम् ॥ १३ ॥ अंग प्रत्यंग युक्त गौके संपूर्ण चेतन पिण्हरूप गौका गर्भ नष्ट करनेपर गर्भ को गिराने से गोवध से दना प्रा- एक पाद, गर्भ में स्थित बछड़े के हाथ यश्चित करै ।। १६ ॥ पैर आदि अंग उत्पन्न होगए हों उसको पाषाणेनैव दडेन गावोयेना- नष्ट करनेपर दोपाद, और चननता हीन मिघातिताः। शृंगभंगे चरेत्पाद पूर्णशरीर गर्भ के वत्स को नष्ट करनेपर दौपादौ नेत्रघातने ॥ १७।। तीनपाद व्रतका अनुष्ठान करै ॥१३॥ पाषाण अथवा दण्डसे प्रहार करके पादेंगरोमवपनं द्विपादेश्मश्रु जो पुरुष गौ के सींग तोड़देय तो एक- पोपि च । त्रिपादे तु शिखावज पाद,और नेत्रफोडदेय तौ दोपाद व्रत करें। सशिखं तु निपातने॥१४॥ लांगूले पादकृच्छं तु दीपादाव- एकपाद व्रत करने में शरीर के रोम स्थिभंजने । त्रिपादं चैत्र कर्णेतु द्रक, दो पाद प्रायश्चित्त में श्मश्र (दादी चरेत्सर्व निपातने ॥ १८॥ मूछ ) पर्यन्त मुण्डन करावै पादोन उस महार से पूंछ तोड़देय तो एक (पौन ) प्रायश्चित्त में शिखा को छोड़कर पाद कृच्छ्व्रत, हड्डी टूटजाय तो दोपाद समस्त मुण्डन करावे और निपातन अ- कृच्छ्रव्रत, कान टूटजाय थात् चतुष्पाद पूर्ण प्रायश्चित्त करना होय कृच्छ्रवत और संपूर्ण शरीर भन्न होजाय तौ शिखासहित संपूर्ण मुण्डन करावे ॥ तो पूर्ण चतुष्पाद व्रत करै ॥ १८ ॥ तौ तीन पाद
(भाटी०)
विशिष्टधर्मशास्त्र ।
शृंगभंगेस्थिभंगे च कटिभंगे का कोई अंग हीन रहजाय तौ गोहत्या
तथैव च । यदि जीवति षण्मा-
पापके प्रायश्चित्त से आधा प्रायश्चित्त करें।
सान्प्रायश्चित्तं न विद्यते । १६ ॥
काष्ठलोष्ठकपापाणैःशस्त्रेणैवो-
सींग टूटनाय, हड्डी टूटनाय अथवा
द्धतोबलात् ।व्यापादयति योगां
कमर टूट जाय और उसके अनन्तर यदि तु तस्य शुद्धिं विनिर्दिशत् २३॥
गौ छः मास पर्यन्त जीवित रहै तौ मा कोई उद्धत पुरुष काष्ठ (काठ ) लोष्ठ
यश्चित्त नहीं होता है ।। १९ ॥ (डेला आदि ) पाषाण अथवा शस्त्र
व्रणभंगे च कर्तव्यःस्नेहाभ्यं से बल पूर्वक ( जबरदस्ती ) गोहत्या
गस्तु पाणिना। यवसथोपहर्त- करै तौ बहु कियप्रकार शुद्ध होसक्ता है
सो कहते हैं ॥ २३ ॥
व्योयावदृढवलोभवेत् ॥ २०॥
चरेत्सांतपनं काष्ठे प्राजापत्यं तु
प्रहार से गौ के शरीर में घाव होजाय
तो जबतक वह अच्छा नहीं होय तबतक
लोष्ठके । तप्तकृच्छ्रे तु पाषाणे
अपने हाथ से उस व्रण में घृत तैलादि शस्त्रेणैवातिकृच्छकम् ॥ २४ ॥
लगाता रहै, वह गौ जिस समय पर्यन्त काष्ट से हत्या करनेपर सान्तपन व्रत,
हद और बलवान् न होय तबतक उसके लोष्ठ से हत्या करनेपर प्राजापत्य व्रत,
लिये हरी हरी घास ला ला कर खिलावै । पाषाण से हत्या करनेपर तप्तकृच्छ्र और
यावत्संपूर्णसागस्तावत्तं पोष-" शस्त्र से गोहत्या करनेपर अतिकृच्छ्र
येन्नरः ।गोरूपं ब्राह्मणस्याग्रेनम-
व्रतका अनुष्ठान करै ॥ २४ ॥
स्कृत्य विसर्जयेत् ॥ २१॥
पंचसांतपने गावः प्राजापत्ये
जबतक गौ नीरोग नहीं होय तबतक तथा त्रयः । तप्तकृच्छ्रे भवत्यष्टा-
उसका पोषण करै तदनन्तर ब्राह्मण को वतिकृच्छ्रे त्रयोदश ॥ २५ ॥
नमस्कार करकै उस नीरोग गौ को सान्तपन व्रतमें पाँच गौ, प्राजापत्य
छोड़देय ।। २१॥
में तीन गौ, तप्तकृच्छ्र में आठ गौ और
यद्यसंपूर्णसर्वांगोहीनदेहोमवे- अतिकृच्छ्र व्रत में तेरह गौ दानकरना
तदा । गोघातस्य तस्याई प्राय- चाहिये ।। २९ ॥
श्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥ २२ ॥
प्रमापणे प्राणभृतां दद्यात्तत्त-
उस गौ के अंग यदि पहले की सपान
तिरूपकम् । तस्यानुरूपं मूल्यं
पूर्णरीति से आगेग्य नहीं होय, शरीर वा दद्यादित्यब्रवीन्मनुः॥ २६ ॥
लघुपाराशरी।
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गो आदि के प्रायश्चित्त के परिमाण, दन परतीन पाद और एक साथ इन
के अनुमार उमके अनुरूप ( उसी प सब पापोंके करने पर पूर्ण चतुष्पाद
रिमाण की) गौ आदि पुण्य कर अथवा ' प्रायश्चित्त करै ।। २९ ।।
उसके ही अनुमार मूल्य ( कीमत ) दे दहनात्तु विपद्येत अनड्वान्यो
देय, भगवान मनुनी का ऐसा कथन है ।।
क्तपंत्रितः । उक्तं पराशरेणैव
अन्यत्रांकनलक्ष्मभ्यां वाहने
; कपादं यथा विधिः ॥ ३०॥
मोचने तथा । सायं संगोपनार्थ
। बन्धनकी दशाम अथरा खुले हुए दु-
च न दुष्येदोधबंधयोः॥२७॥ । हनके समय गौ का मरण होजाय तो वि-
भार वा गाडी आदि लेचलने लिय धि पूर्वक एक पाद प्रायश्चित्त करें , ऐसा
घरनेको छोड़ने के लिये और सायंकाल- पराशर ऋषिने कहा है ॥ १० ॥
को रक्षाके लिये गोके शरीरमें यदि कोई रोधनं बंधन योक्तं भारः प्रहरणं
विशेष चिन्ह करनका रोध वा बन्धन तथा|दुर्गप्रेरणयोक्तं च निमित्तानि
कराजाय तो उससे कोई दोष नहीं हो
ता है।। २७॥
बधस्य षट् ॥३१॥
अतिदाहतिवाहे च नासिका धिक भार लादना, प्रहार और नोतकर
रोध, बन्धन, योक्त (जोतना),अ-
भेदने तथा। नदीपर्वतसंचारे प्रा-
नदी पर्वतादि दुर्गम स्थानों में लेजाना,
यश्रित्तं विनिर्दिशेत् ॥२८॥ इन छःओं में प्रत्येक वधका कारण है।
दाग देने के समय यदि अधिक दग्ध
बंधपाशमुगुप्तां गोम्रियते यदि
होजाय, अतिअधिक बोझ ले जाने के लिये गोपशुः । भवने तस्य पापस्या-
लादाजाय यदि नाथा जाय, अथवा
यदि कष्टदायक नदी पर्वन मार्ग प्रायश्चित्ता मर्हति ॥३२ ।
जाया जाय तो प्रायश्चित्त करना चाहिये
यदि कई गौ रस्सी में बंधे हुए मा-
णत्याग करदेय तौ गृह के स्वामी को
अतिदाहे चरेत्पादं द्रौपादौ अर्दकच्छ्र व्रत करना चाहिये ॥ ३२ ॥
वाहने चरेत् । नासिक्यपादहीनं
न नारिकेलर्नच शाणवालैन
तु चरेत्सव निपातने ॥ २६ ॥
चापि माँजैन चबधशृंखलैः। ए.
अधिक दग्ध करनपर एकपाद,अधिक तेस्तु गावोननिबंधनीयाबधातु
बोझा लादने पर दो पाद,नाषिका छ तिठेत्परशुं गृहीत्वा ॥ ३३॥
॥ २८॥
(भा०टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र । AAAAAAAAAAL -- नारिंकल (नाग्यिल ) की रस्सी, आराधितस्तु यः कश्चिद भिन्न सनकी रस्सी, मुंजकी रस्सी अयना कोह की जंजीर से गौ अथवा कृषको कक्षोयदा भवेत् । श्रवणं हृदयं कदापि न बाँधै और यदि बाँध भिन्नं मग्नोवा कृपसंकेट।। ३७॥ फरसा हाथ में लिये सर्वदा समीप बैठा रहै। कूपादुत्क्रमणं चैव भग्नोवा कुशैः काशैश्च बघ्नीयाद् गो-ग्रीवपादयोः । सएव म्रियते तत्र पशु दक्षिणामुखम् । पाशलग्ना-त्रीपादांस्तु समाचरेत् ॥ ३८॥ ग्निदग्धेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते।। विपशि से उद्धार करने के लिये सब. गौ अथवा अन्य पशुको दक्षिणमुख प्रकार की चेष्टा कग्नेपर भी यदि पूर्वोक्त करकै कुश अथवा काँस से बाँध, यदि किसी कारण से गो का वक्षस्थल, कान उसमें अग्नि लगकर पशुका शरीर जल- अथवा हृदय सा कोई भाग भम होजाय जाय तो प्रायश्चित्त करने की विधि अथवा यदि गौ किसी कृप आदि में नहीं है ॥ ३४ ॥ गिरपडे और उसको तिम कूपमें से निका यदि तत्र भवेकाष्ठं प्रायश्चित्तं लनेझे समय पैर अथवा प्राधा टूटजाय और इसकारण तत्काल या कुछकालके कथं भवेत्। जपित्वा पावनी देवी , अनन्तर गौ का मरण होजाय तो उसके मुच्यते तत्र किल्विषात् ॥ ३५॥ पापसे मुक्त होने के लिये तीनशद पाय- यदि उस स्थानमें तृण होय और उस श्चित करें ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ रस्सीमें लगीहुई अग्नि तृणों में लगकर कूपखाते तटीबंधे नदीबंधे प्र- पशुका प्राणान्त करदेय तौ पवित्र करने पाली गायत्री का जपान पासुचा पानीयेषु विपन्नानां प्राय- मुक्ति होती है ॥ ३५॥ श्चित्तं न विद्यते ॥ ३६॥ प्रेरयन् कूपवापीषु वृक्षच्छेदेषु सरीवर नदी के बँधे हुए घाट पै, प्रपा क्ष के समीप के गहडे ( चौपच ) पातयनागवाशनेपु विक्रीणस्त- पौ) ओं पे जलपान करने के लिये तःप्राप्नोति गोवधम् ॥ ३६ ॥ जाकर यदि गौ का मरण होजाय तो किसीमकार का प्रायश्चित करने की विधि कूप अथवा तालाब में गौ को प्रेरण कर. नेपर, वृक्ष काटकर गौ के ऊपर डालनेपर नहीं है ।। ३९ ।। अथवा किसी गोभक्षक के हाथ गौ वच कूपखात तटीखाते दीर्घखाते देनेगर पूर्ण गोहत्या का पाप होना है। तथैव चा स्वल्पपु धर्मखातेपु प्राय- लघुपाराशरी। AAAAAAAAAAA श्चित्तं न विद्यते ॥४०॥ यदि वाणों से ग्राम पीडित होय, घर कूप के समीपका गडहा, नदी वा टूटकर गिरपडै वा अतिवृष्टि होय इन तीनों जलाशय के समीप का गडहा, दीर्घखात में किसी कारण से गौ का मरण होजाय ( बडागडहा ) वा साधारण जल पीने तो पायश्चित्त नहीं होता है ॥ ४३ ॥ का गडहा इन में गिरकर गौ का मरण संग्रामेपहतानां च ये दग्धावे-- होजाय तो उसके निमित्त किसीप्रकार श्मकेषु च । दावाग्निग्रामघातेपु का प्रायश्चित्त न करै ।। ४० ॥ प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४४॥ वेश्मदारे निवासेषु योनरः खा- जो गौ संग्राम में, घरमें अनि लगने तमिच्छति । स्वकार्य गृहखातेषु के समय ग्राम को किसी के घेर लेनेपर प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥ ४१ वा दावाग्नि (दौं से भस्म होजाने से घरके द्वारपर अथवा घरके भीतर मरण को माप्त होय उनका प्रायश्चित्त यदि कोई गडहा खोदै, अथवा अपने नहीं होता है ।। ४४ ।। प्रयोजन के लिये वा सर्व साधारण के यंत्रितागौ चिकित्सार्थ गूदग- निमित्त वा स्थान बनाने के निमित्त भविमोचने । यत्ने कृते विपद्येत गडहा खोदै और यदि उसमें गिरकर प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥ ४५ ॥ गौ का मरण होजाय तो प्रायश्चित्तक यदि चिकित्सा करने के लिये गौ को रना चाहिये ॥४१॥ किसी प्रकार की पीडा दीजाय अथवा निशि बंधनिरुद्धेषु सर्पव्याघ्र- (दूषित) गर्भ दूर करना होय, उसमें शक्तिके अनुसार यत्न करने परभी याद हतेषु च । अग्निविद्युद्धिपन्नानां गौ का मरण होजाय तो प्रायश्चित्त नहीं प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥ ४२ ॥ होता है ॥ ४५ ॥ रात्रि में गौ कोबाँधकर रोककै रख व्यापन्नानां बहूनां च रोधने लने पर यदि सर्पके काटने से वा आनि बधनपि वा। भिषामिथ्याप्रचा- तथा वज्राघात (विजली मिरने) रेण प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।४६॥ यदि उस गौ का मरण होजाय तौ प्राय- श्चित करने की आवश्यकता नहीं है ४२ एक स्थान में बाँधकर वारोककर रक्खा बहुत सी गौ अथवा बैलों को यदि ग्रामघात शरौघेण वेश्म भंगनि- होय और यदि अनभिज्ञ ( अनजान ) पातने। अतिवृष्टिहतानांच प्राय- चिकित्सक से चिकित्सा कराने में गौ वा वृषभ का मरण होजाय नौ गोवध का वित्तं न विद्यते ॥४३॥ पायश्चिच करै ।। ४६ ॥
(भा टी.) विशिष्टधर्मशास्त्र। गोवृषाणां विपत्तौ च यावंतःप्रेः- हते तु रुधिरं दृश्यव्याधिग्रस्तः क्षका जनाः ॥ अनिवारय तां कृशोभवेत् । लाला भवति दृष्टेषु तेषां सर्वेषां पातकं भवेत्॥४७॥ एवमन्वेषणं भवेत् ॥ ५० गौ अथवा बैक की अपमृत्यु (अकाल- ग्रासार्थ चोदितोवापि अधान मृत्यु) के समय जो अपने नेत्रोंसे देखक- नैव गच्छति । मनुना चैवमेकेन र भी उस को तिस आसन मृत्युसे हु- टाने की चेष्टा नहीं करते हैं उन सा सर्वशास्त्राणिजानता। प्रायश्चित्तं को गोहत्या के पापका भागी होना पड़ता तुतेनोक्तंगोप्नश्चांद्रयणं चरेत्५१ है ॥ १७ ॥ गौका मरण होने पर उसके रुधिर के एकोहतोयैर्वहुभिःसमेतैर्न ज्ञायते चिन्हसे हत्याकारी को जाने अथवा उन यस्य इतोभिघातात् । दिव्येन सब में जो रोगीहोजाय,दुर्वल(शुष्कमुख) तेषामुपलभ्य हंता निवर्तनीयो- होय, देखते ही मुख से लार टपकने लगे जो ग्रासके निमित्त प्रेरणा करने पर भी नृपसन्नियुक्तैः॥४८॥ मार्गको नजाय इस प्रकार हत्याकारी का यदि बहुत से पुरुष एकत्र इकट्ठे होक ! अन्वेषण करे, सर्वशास्त्रोंको जानने वाले र किसी गौ अथवा बैलके ऊपर डेले प- अद्वितीय भगवान् मनुने गोहत्यामात्रमें त्थर आदि फेंकक पीड़ा दें और उससे यदि पशुका मरण होजाय और हत्या चान्द्रायण चूतका अनुष्ठान करने की व्य- करने वाले का निश्चय न हासकै तौ वस्था दी है ॥५०॥५१॥ राजा अपने कर्मचारियों के द्वारा उन में केशानां रक्षणार्थाय द्विगुणं से प्रत्येक को शपथ दिलाकर उस पशु- व्रतमाचरेत् । द्विगुणे व्रतआदिष्टे की हत्या करने वाले का निश्चय करै।४८ दक्षिणा दिगुणा भवत्।। ५२॥ एका चेहहुभिः काचिदेवाया- गोहत्या के प्रायश्चित्तके समय जो के पादिता कचित् । पादं पादं तु श रखना चाहै उस को द्विगुण प्रायश्चि- हत्यायाश्चरेयुस्ते पृथक्पृथक्४६ त करना चाहिये और द्विगुण प्रायश्चि- यदि बहुतसे पुरुषों के आघातसे किसी ये ॥१॥ च की द्विगुण दक्षिणा भी देनी चाहि- एक गौ का मरण हुआ होय तो उन प्रहार करने वालोंमें प्रत्येक को अलग राजा वा राजपुत्रोवा ब्राह्मणो- गोवधका चतुर्थाश प्रायश्चित्त करना वा बहुश्रतः । अकृत्वा वपनं तेषां चाहिये ।। ४९ ॥ प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ॥ ५३॥ ८
लघुपाराशरी।
अ०९
राजा-राजपुत्र वा बहुज्ञानी ब्राह्मण के अरण्डेषु विशेषतः ॥ ५७॥
शोका मुंडन न कराकरभी प्रायश्चित्त कर-
यह स्त्रियरात्रिमें गोशालामें शयन और
सक्ता है।॥५३॥
दिनमें गौके पीछे२ गमन न करें, विशेष
यस्य न द्विगुणन्दानकेश- करकै नदीपै, जनसमूह केस्थानमें और
श्वपरिक्षितःतत्पापं तस्य तिष्ठेत जंगलमें जाना उनके लिये अनुचितहै।।
त्यक्त्वा च नरकं ब्रजेत् ॥५४॥ न स्त्रीणामजिनं वासोबतमेवं
जो पुरुष केश रक्ख और द्विगुण माय- समाचरेत् । त्रिसंध्यं स्नानमि-
चित्त न करै वा द्विगुण दक्षिणा नहीं देय त्युक्तं सुराणामर्चनं तथा ॥५८॥
तौ उमका पाप नष्ट नहीं होता है औरएसी
स्त्रीकदापि मृगचर्म न ओढे, तीनोंका-
व्यवस्था देनेवाला नरकगति को प्राप्त लमें स्नान और देवपूजन करै ॥ ५८ ॥
होताहै ॥ ५४॥
यत्किंचित् क्रियते पापं सर्व
वन्धुमध्ये व्रतं तासां कृष्णचां-
केशेषु तिष्ठति । सर्वान्केशास- दायणादिकम् । गृहेषु सततं तिष्ठे-
मुद्धृत्य छेदयेदंगुलदयम् ॥५५॥
च्छुचिनियममाचरेत् ॥ ५६ ॥
स्त्रियें कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रतोंको
जो कुछपाप कियाजाता है वह सब
केशोंमें वासकरता है इसकारण संपूर्ण
वान्धवोंक मध्यमें हीकरें, उनको सदागृह
फेशोंको हाथ पकड़कर अग्रभागके दोर
में स्थित रहकर सकल पवित्र नियमोंको
अंगुल केश कटवादेय ॥ ५५ ॥
पालन करना चाहिये ॥ ५९॥
एवं नारी कुमारीणां शिरसो.
इह योगोषधं कृत्वा प्रच्छाद-
मुंडनं स्मृतम् । न स्त्रियां केशवप- यितुमिच्छति।सयाति नरकं घोर
नं न दूरे शयनासनम् ॥५६॥ कालसूत्रमसंशयम् ॥ ६० ॥
यह व्यवस्था केवल कुमारी और सघ जो इस लोकमें गोबध करके उसको
वा (जिनका पतिजीवित है एसी ) गुप्तरखने की इच्छा करताहै,वह निःसन्देह
स्त्रियोंके निमित्त हीहै, इन स्त्रियों के संपूर्ण कालसूत्र नामक घोर नरकको प्राप्त
मुण्डन और दूरस्वतन्त्रशयन अथवा होता है ।। ६० ॥
स्वतन्त्र भोजन विधान नहींहै ॥५६ ॥ विमुक्तोनरकात्तस्मान्मर्त्यलोके
नगोष्ठे वसेदात्रौन दिवागा प्रजायते । क्लीवोदुःखी च कुष्ठी
अनुब्रजेत् । नदीषु संगमे चैव च सप्तजन्मानि वै नरः॥६१॥
(भाटी.)
विविधधर्मशास्त्री
उस भयानक नरक से छूटने पर भी वढावै,अमावास्याके दिन कुछ भोजन न
उसको फिर मनुष्य योनिमें जन्मधारण करै यह चान्द्रायणकी विधि है ॥२॥
कर बहिरा, दुःखी और कुष्ठरोगी होकर
कुक्कुटांगप्रमाणं तु प्रासं वे
क्रमसे सातजन्म वितानेपडते हैं॥६॥
परिकल्पयेत् । अन्यथा जातदो-
तस्मात्प्रकाशयत्पापं स्वधर्म
सततं चरेत् । स्त्रीबालमृत्यगोभ-
पण न धर्मोन च शुद्यते॥३॥
ग्रास मुर्गीके अण्डकी वगवर बहा
त्येष्वतिको विवर्जयेत् ॥६२॥ चनाव जो पुरुष इसके अन्यथा करै उसको
इति श्रीपाराशरीये धर्मशास्त्र न शुद्धजाने न धर्माचरण करनेवाला
नवमोऽध्यायः ॥९॥ जाने ॥३॥
इसकारण पाप करकै उसका कदापि प्रायश्चित्ते ततवीर्णे कुर्याद्वा-
छुपा नहीं, प्रकाश करदय और स्त्री,
बालक,भृत्य, गौ तथा ब्राह्मण के ऊपर ह्मणभोजनम् । गोदयं वस्त्रयुग्म
कदापि कोप न करै ॥ ६॥ च दद्यादिप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ४ ॥
इति श्रीपाराशराये धर्मशास्त्र भापाटीकाया प्रायश्चित्त का कार्य यथावत् होमाने
पर ब्राह्मणोंको भोजन करावै, और म-
चातुर्वर्णेषु सर्वेषु हीयं प्रोक्ता त्येक ब्राह्मणको दोगी तथा एक मोड़ा
चांडालींवा श्वपाकी वा ह्यनु-
चैत्र शुद्धौ चांद्रायणं चरेत्॥१॥ गच्छति योदिजः। त्रिरात्रमुपवा-
ब्राह्मण क्षत्रियादि चारों वर्गों के पाप
से छूटनेका उपाय कहते हैं, अगम्य स्था-
सीच विप्राणामनुशासनात् ॥५॥
नमें गमन करने पर जोपाप होते हैं चां ब्राह्मण, चाण्डाली वा श्वपाकी के
द्रायणवतका अनुष्ठान करकै उससे मुक्ति विर्षे गमन करने पर ब्रह्मणकी आया
होतीहै ॥ १॥
के अनुसार तीन रात्रि उपवास करै ५
एकैकं ह्रासयेद्यासं कृष्ण शु- सशिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्य
के च वर्द्धयेत् । अमावस्यां न द्वयं चरेत् । ब्रह्मकूर्च ततः कृत्वा
मुंजीत ह्येष चांदायणे विधिः।२। कुर्याब्राह्मणतर्पणम् ॥ ६ ॥
कुष्णपक्षमें प्रतिदिन एकर ग्रास कम फिर शिखा माहित मुण्डन कराकर
करै और शुक्रपक्षमें प्रतिदिन एकरग्राम- 'दो माजापत्य व्रत कर, नदन तर विधि
नवमोऽध्यायः ॥ ९॥
,
तु निष्कृतिः । अगम्या गमने, वस्त्रदक्षिणा देय ॥ ४ ॥
६० लघुपाराशरी। पूर्वक ब्रह्मकूर्च (गौका मूत्र,दधि , दुग्ध, स्वसुतां तथा। एतास्तु मोहितो. धृत और कुशोंका जल इन सबको विधि गत्वा त्रीणिकृच्छ्राणि संचरेत्११ पूर्वक पान ) करकै, भोजनादि से ब्रा. प्रणों को तृप्त कर ॥६॥ अपनी माता, भगिनी और पुत्री के विषं अज्ञान से गमन करकै तीन कृच्छ्र गायत्रीं च जपेन्नित्यं दद्याद्- व्रत करै ॥ ११ ॥ गोमिथुनद्वयम्। विप्राय दक्षिणां चांद्रायणत्रयं कुर्याच्छिश्नच्छे- दद्याच्छुद्धिमामोत्यसंशयम्।७। देन शुद्धयति। मातृष्वसृगमे चैव तदनन्तर निरन्तर गायत्री का जप करें ब्राह्मणको गोमिथुन ( एक गो एक आत्ममेद्रनिकेतनम् ॥ १२॥ बैल) दक्षिणा देकर निःसन्देह शुद्धिको तदनन्तर वह पुरुष तीन चान्द्रायण प्राप्त होता है ॥७॥ व्रत करके अपनी लिनेन्द्रिय को काट- क्षत्रियोवाथ वैश्योवा चांडली. डाले और माताकी बहिनके विर्षे गमन गच्छतोयदि । गोदयं दक्षिणां करकै भी लिङ्गेन्द्रियको काटदालने पर ही शुद्धि होती है ॥ १२॥ दद्याच्छुद्धिं पाराशरोब्रवीत्॥८ क्षत्रिय अथवा वैश्य यदि चाण्डाली अज्ञानेन तु योगच्छत्कुर्याच्चांदा- से गमन करें तो दो गौ दक्षिणा देकर यणद्वयम् दशगोमिथुनं दद्याच्छु- शुद्धि होतीहै ऐसा पाराशरजीका कथनहै।। द्धिं पाराशरोऽब्रवीत् ॥ १३ ॥ प्राजापत्यद्धयं कुर्याद्दद्यादोमि अज्ञानसे यदि माताकी बहिनके विर्षे थुनं तथा|श्वपाकीमथ चाण्डाली गमन करै तौ दो चान्द्रायण बन कर शूद्रो चै यदि गच्छति ॥६॥ और ब्राह्मणों को दस गौ और दस दो माजापत्य व्रतकरै और ब्राह्मण है ऐसा पाराशर जी का कथन है १३ वृषभ दान करकै देय तब शुद्धि होती को गोमिथुन दानदेय शूद्र यदि श्वपाकी पितृदारान्समारुह्य मातुराप्तां वा चाण्डाली से गमन हरै तौ ॥९॥ प्राजापत्यं चरेत्कृच्छं चतुर्गो-1 च भाटजाम् । गुरुपत्नीं स्नुषां मिथुनं ददेत् ॥ १०॥ चैव भ्रातृभा तथैव च ॥१४॥ एक माजापत्य कृच्छ्र व्रत करे और मातुलानीं सगोत्रां च प्राजा- ब्राह्मणको चार गो मिथुन दान देय ॥ | पत्यत्रयं चरेत् । गोदयं दक्षिणां मातरं यदि गच्छेत्तु भगिनीं दत्वा मुच्यते नात्र संशयः।१५।
(भा०टी.) নিষিমান্ত। . जो पुरुष पिनाकी स्त्री सौतेली माता) माप्त होनेके समय और कोई आक्रमण मानाकी सखी, भ्रानाकी पुत्री, गुरुकी। । हमला ) करनेवाला बन्दी करके ले. स्त्री, पुत्रकी स्त्री, भ्राताकी स्त्री, मातुल- जाय उस समय, सदा अपनी स्त्रीकी (मामा ) की स्त्री तथा अपने गोत्रकी ओर दृष्टि रक्ख ॥ १८॥ किसी कन्या के साथ गमन करै वह चांडालैः सह संपर्क या नारी तीन प्राजापत्य व्रत करे और तदनन्तर कुरुते ततः। विप्रान्दश वरान् गत्वा दो गौ दक्षिणा देय तब निःसन्देह शुद्ध स्वयं दोपंप्रकाशयेत् ॥ १६ ॥ होजाता है।॥ १४ ॥१५॥ जो स्त्री किसी चाण्डाल के साथ सह- पशु वेश्यादि गमने महिष्यु- वास करै वह दश श्रेष्ठ ब्राह्मणों के पास ष्ट्रीकपींस्तथा। खरींच शूकरी जाकर अपना दोष प्रकाशिन करे।॥१९॥ गवा प्राजापत्यं समाचरेत् १६ आकंठसंमिते कूपे गोमयोद- पशु, वेश्या, महिषी, (अस), मष्ट्री ककर्दमे । तत्रस्थित्वा निराहारा ( ऊंटनी), वानरी, गर्दभी और शूकरी वहोरात्रेण निष्कमेत् ॥ २० ॥ से गमन करकै प्राजापत्यव्रत करै १६ सशिखं वपनं कृत्वा मुंजीयाद्या- गोगामी च त्रिरात्रेण गामकां कौदनम् । त्रिरात्रमुपवासित्वा ब्राह्मणेददेत् । महिप्युष्ट्रखरी- त्वेकरात्रं जले वसेत् ॥ २१॥ गामी त्वहोरात्रेण शुद्धयति १७ गोवर के जल और कीच से भरे गौके विर्षे गमन करने पर तीनरात्रि हुए रूप में कंठ पर्यंत मग्न होकर बिना उपवास करकै ब्राह्मणको एक गौदान भोजन करे हुए तहां एक रात्रिदिन रह कर निकले हुए यव भोजन करै, तद- देय । महिषी, उष्ट्री और गर्दभीके साथ नन्तर तीन गत्रि उपवास करके एक गमन करने वाला एक रात्रि दिन उप रात्रि जल में वास करै ।। २१ ॥ वास करके भी शुद्ध होजाता है ॥१७॥ शंखपुष्पी लतामूलं पत्रं वाकु डामरे समरे वापि दुर्भिक्षे वाज- समं फलम् । सुवर्ण पंचगव्यं च नक्षये । वंदिग्राहे भयार्ते वासदा क्वाथायित्वा पिवेजलम् ॥२२॥ स्वसी निरीक्षयेत् ॥१८॥ फिर शंख पुष्पी औषषिकी जड़,पत्ते मारामारी काटाकाटी के समय, युद्ध फूल, फल और सुवर्ण तथा पश्चगव्य के समय, दुर्भिक्ष के समय, जनपक्ष इन सबको एकत्र पीसकर औटावै, तिस (हैजा महामारी आदि) के समय भय का जल पान करै ।। २२ ॥
अ० १० " र्वक ६२ लघुपाराशरी। एकभक्तं चरेत्पश्चाद्यावत्पुष्पव- कैद करकै, भय दिखाकर और बलपू- ती भवेत्। व्रतं चरति तद्यावत्ताव- ( जवरदस्ती ) अन्य पुरुषों करके जो स्त्री भोग करीगई है, पाराशर कहते संवसते बहिः॥ २३॥ कि-वह स्त्री कृच्छ्र सांतपन व्रत करके तदनन्तर जबतक रजस्वला होय शुद्ध होती है ॥ २६ ।। तबतक एक अन्नका पकाहुआ भोजन सकढुक्ता तया नारीनेच्छंतीपा- दिन में एक बार पावै और जबनक यह पकर्मभिः । प्राजापत्येन शुद्ध्येत व्रत पूर्ण नहीं होय तबतक घरसे बाहर निवास करें ॥ १३ ॥ ऋतुप्रस्रवणेन च ॥ २७॥ प्रायश्चित्ते ततश्वीरें कुर्याद्वा जो स्त्री स्वयं इच्छा न करती हुई ह्मणभोजनम् । गोदयं दाक्षिणां पापकर्म पुरुषों करके बलपूर्वक एकवार भोगीहुई है वह प्राजापत्य करके और दद्याच्छुद्धिः पाराशरोबवीत् २४ ऋतुधर्म होनेपर शुद्ध होजाती है ॥२७॥ इसप्रकार प्रायश्चित्त की समाप्ति हो- पतत्यर्द्ध शरीरस्य यस्य भा- जाने पर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दो गौ दक्षिणा देय इसमकार प्रायश्चित्त र्यासुरां पिवेत् । पतितार्द्ध शरीर- करने पर भुद्धि होती है ऐसा पाराशर स्यनिष्कृतिन विधीयते ॥२८॥ जीका कथन है ।। २४ ॥ जिसकी स्त्री मुरा (मदिरा) पान चातुवर्यस्य नारीणां कृच्छं- करती है उसका आधा शरीर पतित चांदायणव्रतम् । यथाभूमिस्तथा होजाता है और जिसका आधाशरीर पतित होजाता है उसकी शुद्धि नहीं नारी तस्मात्तां न तु दूषयेत्॥२५॥ होता है अर्थात् निःसन्देह नरक गति चारोवों की स्त्री दोषयुक्त होनेपर को प्राप्त होती है ॥ २८॥ कृच्छ्चान्द्रायण व्रत करै, भूमि और स्त्री गायत्री जपमानस्तु कृच्छ् सां- दोनों समान हैं इसकारण उनको दूषित न करै ।। २५॥ तपनं चरेत् ॥ २६ ॥ वंदिग्रामेण याभुक्ता हत्वा कृच्छ्र सान्तपन व्रत करने के समय निरन्तर गायत्रीका जप करता रहै २९ बवा वलाद्या ठत्वासांतपनं गोमूत्रं गोमयं क्षीरंदधिसर्पिः कृच्छं शुद्धयेत्पाराशरोब्रवीत् २६ जो स्त्री बंदी करकै अन्यके द्वारा उप- कुशोदनम् । एकरात्रोपवासश्च भेग करीगई है, अथवा प्रहार करके कृच्छं सांतपनं स्मृतम् ॥ ३०॥ .
('भा टी.) বিম্বিয়াল্প। ३ गौका गोवर-मूत्र व दही-धृत दिताडिता आदितीयं गता चैव और कुशका जल पान करके एकरात्रि पुनरागमनं भवेत् ॥ ३४ ॥ उपवास करना, कच्छू सान्तपन कहाना जो स्त्री मद वा मोहसे अथवा क्रोध है।॥ ३०॥ दण्ड से ताडन करने से बिना किसीके जारेण जनयेद्गर्भ मृते त्यक्ते पास जाके चलीआवै ॥ ३४ ॥ गते पतौ । तांत्यजेदवरेराष्ट्रे प दशमे तु दिने प्राप्ते प्रायश्चित्तं तितां पापकारिणीम् ॥३१॥ न विद्यते । दशाहं न त्यजेन्नारी पतिके परदेश जानेपर अथवा पति त्यजेन्नष्टां श्रुतां तथा ॥ ३५॥ को त्याग करके या पतिका मरण होने यदि उस स्त्रीको गयेहुए दश दिन के अनन्तर जो स्त्री अन्य पुरुष संयोग होजाय तो प्रायश्चित्त करना नहीं चाहिये से गर्भ धारणकरै उस पतित पापचारि- क्योंकि-दश दिन तक स्त्रीको न त्यागे णीको अन्य राज्य में लाकर छोड़आवै।। परन्तु नष्टा सुनी जायतो उस को ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत्परपुं- त्यागदे ॥ ३५ ॥ सासमन्विता।सा तु नष्टा विनि- भर्ता चैव चरेत्कृच्छ्रे कृच्छार्द्ध चै- र्दिष्टा न तस्या गमनं पुनः ३२ व बान्धवाः। तेषां भुक्ता च पी- यदि कोई ब्राह्मणी परपुरुषके साथ लाच अहोरात्रेण शुधति ३६ चली जायतो उसको नष्ट जाने, वह उस स्त्री कापति कृच्छवत और पतिक फिर लौटकर पतिके घर में नहीं बांधव अर्द कृच्छ्व्रत करें और उसकेघर आसक्ती है ॥ ३२ ॥ जिसने भोजन कियाहो वा जलपान कि- कामान्मोहाच या गच्छेत्त्यक्त्वा याहो वह अहोरात्र से ( एकरातदिन बन्धून सुतान्पतिमासापि नशा परे भोजन न करने ) से शुद्ध होता है ।३६। लोके मानुषेषु विशेषतः ॥ ३३॥ ब्राह्मणी तुयदा गच्छेत्परपुंसा काम अथवा मोह के वशीभूत होकर विवर्जिता। गत्वा पुभिःसमं याति कोई स्त्री पति, पुत्र और बांधवोंको त्या- त्यजेयुस्तांतु गोत्रिणः॥३७॥ गकर चली जायतौ वह परलोक में वि- जो ब्राह्मणी निषेध करने पर भी (अग्य) शेषतः मनुष्य समाज (इसलोक ) में पुरुषके संग चलीजाय वह यदि दूसरे नष्ट होजाती है ॥ ३३॥ पुरुषका संग करके शीघ्र उसी अपने मदमाहगता नीरा क्रोधादण्डा- | पनिके समीप आवेनौ सगोत्रीउसे त्यागहें।।
लघुपाराशरी।
अ०११
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पुंसोयदि गृहं गच्छेत्तदा शुद्धं स्नानसंध्यार्चनादिभिः॥ ४२ ॥
गृहं भवेत्। पितृमातृगृहं यच्च जा- जप होमदयादानैः शुध्यन्ते बा-
रस्यैव तु तद्गृहम् ॥ ३८॥ ह्मणाः सदा। आकाशं वायुरग्नि-
यदि वह जार पुरुषके घरमें चलीआवे श्रमेध्यं भूमिगतं जलम्।।नदुष्यं-
तो वहघर और उसस्त्रीके पिता-और तिच दर्भाश्च यज्ञेषु च मसास्तथा।
माताका घर अशुद्ध होजाते हैं ।। ३८ ॥
इति श्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे
उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात्पंचग-
दशमोऽध्यायः ॥१०॥
व्येन सेचयेत्।त्यजेच मृण्मयं पात्रं और इतरबन्धु अहोरात्र व्रत करके और
वस्त्रं काष्ठं च शोधयेत् ॥ ३६॥ पंचगव्य पान करकै वथा उपवास व्रत-पु.
उस घरको खोदकर पीछे पंचगव्यसे ण्य-स्नान-संध्या-पूजन-आदि से और जप
छिड़के और मिट्टी के पात्रोंको फेंकदे वस्त्र
होम-दया-दान-इन से ब्राह्मण आदि
तथा काष्ठके पात्रोंको शुद्ध करै ॥३९॥ शुद्ध होते हैं, आकाश -पवन अग्नि और
संभाराञ्छोधयेत्सर्वान्गोकेरी- पृथ्वी में पड़ा हुआ जल तथा कुशा ये
इसमकार अशुद्ध नहीं होते जैसे यज्ञों
श्व फलोद्भवान् । ताम्राणि पंच में चमसा ( पात्र विशेष ) अशुद्ध नहीं
गव्येन कांस्यानिदश भस्माभिः॥ होता है ॥ १२ ॥ ४३ ।।
तथा फलकी सामग्रियों को गोके चर्व-
इति श्रीपाराशरीये धर्मशास्त्रे
रसे, तांवकी वस्तुको पंचगव्यसे और
कांसीकी वस्तुको दशबार भस्मलगाकर अमेध्यरतोगोमांसं चांडालान-
शुद्ध करना चाहिये ॥४०॥
मथापि वा।यदि भुक्तं तु विप्रेण -
प्रायश्चित्तं चदिप्रोब्राह्मणरुपपा-
दितम् । गोदयं दक्षिणां दद्यात्या-
च्छं चांद्रायणं चरेत् ॥ १॥
अशुद्ध पदार्थ, वीर्य, गौका मांस और
जापत्यदयं चरेत् ।। ४१॥ चांडालका अन यदि इन वस्तुओंको
वहब्राह्मण ब्राह्मणों के कहेहुए प्रायश्चित्त ब्राह्मण ने भक्षण करलिया हो तो उस.
को करै और दो गौ दक्षिणा दे तथा दो की चांद्रायणव्रत करनेसे शुद्धिहोतीहै ॥१॥
प्राजापत्य व्रत कर॥४१॥ तथैव क्षत्रियोवैश्यस्तदर्धेतु स-
इतरेषामहोरात्रं पंचगव्यं च माचरेत् ।शूद्रोऽप्यव यदा भुक्ते प्रा-
शोधनम् । उपवासैर्वतैः पुण्यैः जापत्यं समाचरेत् ॥ २ ॥
दशमोऽन्याय ॥१॥
AAAAAA (भाटी.) বিঘিামায়। तथा यदि क्षत्री ने इनको खा किया शुद्धयते नात्र संशयः ॥ ६ ॥ हो तो अर्द्ध चांद्रायण व्रत कर और शूद्र सांप नोला बिलाव इन्होंने जिम भी इसी प्रकार खालेनो प्राजापत्य व्रत अन्नको उच्छिष्ट ( जूठा) कियाहो निल करकै शुद्धि होती है ॥२॥ और कुशाका जल छिडक ने से उम पंचगव्यपिवेच्छूद्रो ब्रह्मकूर्च | अन्नकी शृद्धि होतीई इस में संशय पिवेदिजः।एकदित्रि चतुर्गाश्च नहीं है ॥ १ ॥ दद्यादिप्राद्यनुक्रमात् ॥ ३॥ शूद्रोप्यभोज्यं भुक्त्वान्नं पंच- और शूद्र पंचगव्यको पान करे और गव्येन शुद्धयति । क्षत्रियोवापि द्विज ब्रह्म कूर्च को पात्र और ब्राह्मण वैश्यश्च प्राजापत्येन शुद्ध्यति॥७ आदि चारों वर्ण क्रमसे एक दो तीन शूद्रभी अभाज्य अन्नको स्वाकर पंच और चार गौओं का दान करें ॥ ३ ॥ गव्य से शुद्ध होता और क्षत्रिय और शूदान्नं सूतकस्यान्नम भो- बैश्य यदि अभोज्य अन्न को खाल तो ज्यस्यान्नमेवच शंकित प्रतिपि- माजापत्य व्रत करने से शुद्ध होते ।। ७ ॥ द्धान्नं पूर्वोच्छिष्टं तथैवच ॥४॥ एकपंक्त्युपविष्टानां विप्राणां शूद्रका अन्न सूनकका अन्न और अ सहभोजने । यद्ये कोपित्यजेत भोज्य ( जिसका भोजन करना मन हो) पात्रंशेपमन्नं न भोजयेत् ॥ ८॥ का अन जिस में कुछ अशुद्ध आदिकी संग भोजन करते और एक पंक्ति में शंका हो वह अन्न निषिद्धों का अन्न ब्राह्मण वैठे हुए ब्राह्मणों में से यदि एक और उच्छिष्ट अन्न ॥ ४ ॥ भी पात्र को त्याग दे अर्थात्-भोजन यदि भुक्तं तु विप्रेण अज्ञाना करते से खड़ा होनायता सब ब्राह्मण दापदापिवा । ज्ञात्वा समाच. शेष अन्न को न खाय ॥ ८ ॥ रेत्कृच्छं ब्रह्म कृचतु पावनम्।।५।। मोहाझुंजीत्यस्तत्रपंक्ताबुच्छि- इन अन्नाको अज्ञानसे वा विपत्ति पड़ ष्टभोजने । प्रायश्चित्तं चरेदिनः ने के समय ब्राह्मण खाले तो उसको कृच्छं सांतपनं तथा ॥ ६ ॥ जानकर कृच्छ्वत करै और पवित्र कर उस पक्तिमें उच्छिष्ट भोजन को जो ने वाले ब्रह्मकूर्च व्रत को भी करै ।।५।। अज्ञानता से खाता खाता है वह व्रह्मण सांत व्यालैनकुलमाजोरै स्नमुच्छि- पन कृच्छू प्रायश्चित्त करै ॥ ९ ॥ टितं यदा । तिलदर्भो दकै प्रोक्ष्य पीयपंश्वेतलशुनंताकफलगू- अ० ११ लघुपाराशरी। जने । पलांडं वृक्षनिर्यासंदेवस्वं. घी--ध-तेल-तेल से पका गुड कवकानिच ॥ १०॥ इनको नदी के तटपर जाकर शूद्रके पात्र में भी खाले ॥ १४ ॥ पेवची-स्वेतलहसन-वेंगन, गाजर मद्यमांसरतंनित्यं नीचकर्म प्र- ( सलजम) वृक्षका गोंद-देवताका द्रव्य कवक ( पृथवी की ढाळ ) ॥१०॥ वर्तकम् ।तंशूद्रवर्जयेदिपः श्वपा- उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरमज्ञानाटुंजते कमिवदूरतः ॥ १५ ॥ दिजः। त्रिरात्रमुपवासेन पंच. जो शूद्र मदिरा और मांस में रत हो गव्येन शुद्धयति । ११॥ और नीच कर्म में वर्तता हो उस शूद्रको ऊंटनी और भेड़का दूध इनको जो श्वपाक के समान दूरसेही वर्जदे ॥१५॥ द्विज अज्ञानता से खाता है यह तीन रा- दिजशुश्रूषणरतं मद्यमांसविव- त्रि उपास और पंचगव्यसे शुद्ध होता है। र्जितम् । स्वकर्मनिरतन्नित्यंत मंडूकं भक्षयित्वातुमूपिकामांस शूदन्नत्यजेद्विजः ॥ १६ मेवच । ज्ञात्वाविप्रस्त्वहोरात्रं या द्विजोंकी सेवा में तत्पर मदिरा और वकान्नेनशुद्धयति ॥ १२॥ मांस विवर्जित और अपने कर्ममें तत्पर मेंडक और मूमे के मांसको जानकर जो शूद्र उनका ब्राह्मण त्याग न करै१६ ब्राह्मण खावतो अहोरात्र जौ खाकर अज्ञानार्बुजतेविप्राः सूतके- शुद्ध होताहै ॥१२॥ मृतकेपिवा । प्रायश्चित्तं कर्थतेषां क्षत्रियश्चापिवैश्यश्च कियावतो वर्णेवणे विनिर्दिशेत् ॥ १७॥ शुचित्तौ । तद्गृहेषुदिजैर्भोज्यं जो ब्राह्मण अज्ञानसे सूतक वा मृतकम हव्यकव्येषु नित्यशः ॥ १३॥ ने कहाहै ॥१७॥ जीमते हैं उनका प्रायश्चित्त वर्ण २ में जो क्रिया वाले क्षत्रिय वैश्य और गायच्याऽष्टसहस्रेण शुद्धिः शुद्ध व्रत ( आचरण ) करतहैं उनके घर हव्य और कव्य ( यज और आद) स्याच्छूद्रसूतकोवैश्ये पंच सहस्रेण में सदा भोजन करें ॥ १३ ॥ त्रिसहस्रेण क्षत्रिये॥१८॥ घृत क्षीरंतथातैलंगुडतैलेन पा शूद्रकेसनको आठ हजार गायत्री से वैश्यके में पांच हजार गायत्री से और चितम् ।गवानदीतटविप्रो मुंजी- क्षत्रियके में एक हजार गायत्री से शुद्धि यात् शूद्रभाजने ॥ १४॥ होती है ॥ १८ ॥ में AAAA ( भा०टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र। ब्राह्मणस्य यदा मुंक्ते देसहस्रं शूद्रकन्यासमुत्पन्नोब्राह्मणेन- तुजापयेत् । अथवावामदेव्येन तुसंस्कृतः । असंस्काराद्भवेद्दासः साम्ना चैकेन शुद्धयति ॥१॥ संस्कारादेवनापितः ॥ २३ ॥ यदि ब्राह्मणके मूनक खायतो दो जो संतान ब्राह्मण से शूद्रकी कन्या हजार गायत्री जपे अथवावामदेव ऋषिके में पैदा हो यदि उसका संस्कार न होय कहेहुऐ एक सामवेदसेहीशुद्ध होता है। तो वह दास ( धीमर ) और संस्कार शुष्कानगोरसंस्नेहं शूद्भवेपेण | होयता नापित (नाई । होताहै ॥२॥ आहृतं । पक्कं विप्रगृहे मुंक्त भी क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायांसमुत्पन्न- ज्यंतं मनुरवीत् ॥ २०॥ स्तुयःसुतः।सगोपालइतिख्यातो शूद्रका अन्न और गोरस और स्नेह भोज्योविगैर्नसंशयः॥ २४ ॥ ( घीआदि ) येसव यदि शूद्रके घर क्षत्रियसे जो पुत्र शुद्रकी कन्या में लाकर ब्राह्मण के घरपर पककर खा पैदा हो उसे गोपाल करते हैं उसके यहाँ यतो वह भोजन के योग्य है यह मनुनी ब्राह्मण निःसंदेह भोजन करें ॥ २४ ॥ ने कहा ॥ २० ॥ वैश्यकन्यासमुद्धृतोब्राह्मणेनतु आपत्कालेतु विप्रेण मुक्तं संस्कृतः। सह्यकिइतिनेयो भो. शूद्रगृहे यदि मनस्तापेनशुद्धघेत ज्योविगैर्नसंशयः ॥ २५ ॥ द्रुपदां वासकृज्जपेत् ॥ २१ ॥ वैश्य की कन्या में जो पुत्र ब्राह्मण यदि आपत्काल में ब्राह्मणने शूद्रके से पैदाहो और जिम के संस्कार भी घर भोजन करलिया होयतो मनके प-हों उसे अधिक कहते हैं उसके य-भी चात्तापसे शुद्ध होताहै ना एकवार द्रुप- ब्राह्मण निःसंदेह भोजन करै ॥ २१ ॥ दा मंत्र का जपै ॥११॥ भांडस्थितमभोज्येषु जलं दधि दासनापितगोपाल कुलमि- त्रार्द्धसीरिणः। एतेशूद्देषुभोज्या- घृतपयः। अकामतस्तुयोभुक्ते प्रा- यश्चित्तं कथं भवेत् ॥ २६ ॥ न्नाय श्वात्मानं विधीयते ॥२२॥ जिनका भोजन अनुचित है उनके पात्र दास - नाई-गोपाल कुलका मित्र में रक्खे जल-दही-घी-ध-इनको अर्द्धसीरी (किसानका साझा) इतनों का जो खाता है उसका प्रायश्चित्त कैसे हो। और अपने आप को ऐसे निवेदन कर ब्राह्मण क्षत्रियोवैश्यः शूद्रोवा दे कि मैं आपका हूं, उसका अन्नभोजन के योग्य है ।। १२॥ उपसर्पतिब्रह्मकोंपवासेनयाज्य लघुपाराशरी। अ० ११ LAAAAAA वर्णस्य निस्कृतिः ॥ २७॥ आधे अंगूठे भर गोमय ॥ ३१ ॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र जो खांय क्षीरंसप्तपलंदद्याद् दधित्रिपल तो यज्ञ के योग्य तीनों वर्गों का प्राग- मुच्यते । घृतमेकपलदद्यात्पल- श्चित्त ब्रह्म कूच उपवाससे शुद्ध होता है। मेकं कुशोदकम् ॥ ३२ ॥ शूद्राणांनोपवासः स्याच्छूदो- सानपल दूध तीन पल दही एक दानेनशुद्धयति । ब्रह्मकूर्चमहो- पलपी और एक पल कुशाका जल हा ।। रात्रं श्वपाकमपिशोधयेत्।।२।। गायत्र्यादायगे.मूत्रंगंधदारति और शूद्रों को उपवास नहीं करना गोमयम् । आप्णायस्वतिचक्षीरं चाहिये कि तु शुद्रदान से ही शुद्ध हो दधिकाव्णस्तथादधि ।। ३३ ॥ ताई अहोरात्र का उपगस श्वपाक को भी शुद्ध करसक्ता ई॥ २८ ॥ गायत्री पढ़कर गोमूत्र ले गंधद्वारा गोमुत्रगोमयक्षीरं दधिर्सीपः | इस मंत्रमे गोबर-आप्यायस्व इस मंत्रसे दूध दधिक्राव्ण इस से दही ले ॥३३॥ कुशोदकम् । निर्दिष्ट्रपंचगव्यं च तेजोसिशुक्र मित्याज्यंदेवस्य- पवित्रं पापशोधनम् ॥ २६॥ वाकुशोदकमपंचगव्यमृचापूर्त- गोमूत्र-गोचर-दूर-दही-धी-कुशा- स्थापयेदग्निसन्निधौ ॥ ३४ ॥ काजल-यह पवित्र और पापों का नाश. करने वाला पंचगव्य करा ॥२९॥ तेजोसिशुक्र--इस मंत्रसे घी देवस्यत्वा गोमृत्रंकृष्णवर्णायाःश्वताया- इस मंत्रसे कुगाका जल-इसप्रकार ऋ- चा से पवित्र करे हुए पंचगच्यको अ- चैवगोमयम् । पयश्चताम्रवर्णा नि के समीप रक्ख ॥ ३४ ॥ यारक्तायागृह्यतेदधि ॥ ३० । काली गौका गोमूत्र,मफेद गौकागो केतिमंत्रयेत् । सप्तावरास्तुयेदर्भा आपोहिष्ठेतिवालोड्यमानस्तो वा, तांत्रके रंगकी गौंका का दूध, लाल गौका दी॥३०॥ अच्छिन्नाग्राः शुकत्विषः ।३५ । कपिलायाघृतंग्राह्यं सर्वकापि आपाहिष्ठा इस मत्रसे चलावे मान- लमववा । मत्रमेकपलंदद्यादंगु- स्लोके इस मंत्रसे मथे कमस कम सात शार्द्ध तुगोमयम् ॥३१॥ और जिन के, अग्रभाग हो और जो कपिलाका घी लेना अथवा कपिला | तोते की रंगकी हैं ॥ ३५ ॥ ही के मावस्तु लेवे, एक पट गौ मूत्र एतैरुढत्यहोतव्यं पंचगव्यं - ( भाटी) . विशिष्टधमशास्त्र यथाविधि । इरावतीइदंविष्णुर्मा | गोमूत्रमें वरुण गोवर में अग्नि दधि नस्तोके.चशंवती ॥ ३६॥ में पवन दुध में चन्द्रमा घीमें सूर्य का निवास कहा है॥४०॥ उन कुशाओंमे उठाकर विधि से चगव्यका होम करै इरावनी-इदंविष्णु- पिवतःपनितंतोयंभाजने मुख- मानस्तोके, शंवतो ॥ ३६ ॥ निःमृतम् । अपयं तद्विजानीया- एताभिश्चैवहोतव्यं हुतशेप- मुक्त्वा चांदायणं चरेत् ॥४१॥ पिवेदिजः।आलोड्यप्रणवेनैव जल पीने हुए मनुप्यके मुखमे निक- निर्मथ्य प्रणवेनतु ॥ ३७॥ लाहुआ जल पात्र में गिरपडे नो वह ज. ल पीने के अयोग्य है यदि उस पाले नो इन ऋचाओं से होम करे और शेपको चांद्रायणवन करै ॥ ४ ॥ द्विज पान करै डॉकारसे ही चलाकर और डॉकार से मथकर ।। ३७ ॥ कूपेचपतितं दृष्ट्वा श्वशृगालो उद्धृत्यप्रणवेनैव पिवेच्चप्रणवे च मटं। अस्थि चर्मादि पतिताः नतु । यचगस्थिगतं पापं देहेनि- पीत्वा मेध्या अपोदिजः ॥४२॥ ठतिदेहिनाम् ॥ ३॥ कूप में पड़े हुए कुत्ता गीदह वंदर हाड़ और ओंकार से उठाकर ॲकारले चर्म इनको देखकर और उस अशुद्ध ज- ही पीये, जो त्वना और हाड़ों में देह लको पीकर ॥ ४२ ।। धारियों का पाप टिकता ॥ ३८॥ नारं तु कुष्ण का विवराह ब्रह्मवर्चरहेत्सर्वं यथैवाग्निरि- खरोष्टकं । गावयं सौप्रतीकं च वन्धनम् । पवित्रंत्रिपुलोकेषु दे- मयूर खड्गक तथा ॥ ४३॥ वताभिरधिष्ठितम् ॥ ३६॥ और गनुप्य का देह कौआ विष्टा उसको ब्रह्मर्व इस प्रकार दग्ध क मुकर गधा ऊंट गाय ( नीलगाय) हाथी रताहै जैसे आनि ईधनको भस्म करती मोर गेंडा ॥ ४३ ॥ है तीनों लोको में पवित्र और देवताओं वैयाधमासिहंवा कृपे यदि से अधिष्ठित ( जिस में देवता ) पं निमज्जति। तडागस्यापिदुष्टस्य चगव्य होताहै ॥ ३९ ॥ पीतस्यादुदकंयदि ॥४४॥ वरुणश्चैवगोमूत्र गोमयेहव्य- भेड़िया रीछ सिंह य यदि रूपमें डूब- वाहनः । दन्निवायुः समुद्दिष्टः जाय और निषिद्ध तालाब का जलभी सोमः क्षीरेघृते रविः॥ ४०॥ यदि पियाजा नो ।। ४४ !!
अ०११ लघुपाराशरी। प्रायश्चित्तं भवेत्पुंसः क्रमेणेतेन | परान्ने नोपजीवति ॥४६॥ सर्वशः। विप्रः शुद्धयेत्रिरात्रेण | दूसरों का पकाया हुआ अन्न न खावे क्षत्रियस्तु दिनदयात् ॥ ४५। इसको मुनियों ने पापाक निवृत्ति कहा है और जो आप पांचयज्ञ करके सब पुरुषोंका क्रमसे यह प्रायश्चित्त है पराये अन्न से जीवे ॥४९॥ कि ब्राह्मण तीन रात्रि, क्षत्रिय दो दिन के उपवाससे शुद्ध होता है ।। ४५ ॥ सततंप्रातरुत्थाय परपाकरत- एकाहेन च वैश्यस्तु शूद्रो | स्तुसः।गृहस्थधर्मोयोविप्रो ददा- नक्तेन शुद्धयति । परपाक नि | तिपरिवर्जितम् ॥५०॥ और निरंतर प्रातःकाल उठकर परपाक त्तस्य परपाकरतस्य च ॥ ४६ ॥ वैश्य एक दिनके, उपवास से में रत हो और गृहस्थ धर्म में जो ब्राह्मण शूद्रनक्त ( रातका भोजन से शुद्ध होता है जो हो और दान से वर्जित हो अर्थात् नले ॥ दृमरे का बनाया हुआ न खाता ऋषिभिर्धर्मतत्त्वजैरपचः परि- ओर जो खाता हो ऐसे दो प्रकार के। कीर्तितः। युगे युगेतु ये धर्मा. अपचस्यचभुक्त्वान्नं दिजश्वां- स्तेषु तेषु च येदिजाः। ५१ ॥ द्रायणं चरेत् । अपचस्यतुया- धर्म तत्वके ज्ञाता ऋषियों ने उसे नन्दातुरस्यकुतः फलं ॥ ४७ ।। अपच कहा है युग२ में जो धर्म हैं और युगर में जो द्विज हैं ॥५१॥ अपचका अन्न खाकर द्विज चांद्रायण तेपांनिंदानकर्तव्या युगरूपा- व्रतकरै अपच को दान जो दे उसके दाता को फल नहीं होता ॥ ४७ ॥ हितद्विजाः । हुंकारंब्राह्मणस्यो दाताप्रतिगृहीता च दौतोनिः क्त्वातूंकारं च गरीयसः ॥५२॥ रय गामिनौ । गृहीचाग्नि समा-चाहिये क्योंकि वे ब्राह्मण युगके अनुरूपहें उन ब्राह्मणों की निन्दा नहीं करनी रोप्य पञ्चयज्ञान्ननिर्वपेत् ॥४८॥ अत्यन्त बड़े ब्राह्मण को हुंकार और वोह दाता और ग्रहण करनेवाला यह त्वं कार (हूं वा तू ) कहकर ॥ १२ ॥ दोनों नरक गामी होते है अग्निहोत्र का स्नात्वातिष्ठन्नहः शेषमभि- नियम करके ग्रहण पंचयज्ञ न करै ४८ वाद्यप्रसादयेत्। ताडयित्वातृणे- परपाकनिवृत्तोसौ मुनिभिः नापिकंठेववापिवाससा ।। ५३ ॥ परिकीर्तितःपंचयनान्स्वयं कृत्वा जितना दिन शेषहो उतने दिन स्नान --- उपबास॥ ५४ ।। ( भा०टी० ) विशिष्टधर्मशास्त्र । कर बैठा रहै और ममस्कार करके दश हजार गायत्रीका अभ्यास परम प्रसन्न (राजी) करै तृणसभी ब्राह्मण शुद्धि करनेवाला है ।। ५७ ।। को ताड़नकर और ब्राह्मण के कंठ में इनिपाराशरीयधर्मशाने भाषाटाकाया एकादशोऽध्याय वस्त्रभी बांधकर ॥ ५३॥ विवादेनापिनिर्जित्यप्रणिपत्य | दुःस्वप्नंयदिपश्येत्त्वांतेवाक्षो- प्रसादयेत् । अवगूर्यलहोरात्रं र कर्मणि । मैथुनेप्रेत धूनेच स्नान त्रिरात्रंक्षितिपालने ॥ ५४ ॥ मेनविधीयते ॥१॥ और ब्राह्मण को विद्यासे जीतकर वमन, क्षारकर्म, मैथुन , प्रेनका धुओं नमस्कार करके प्रसन्न करे और झिटककर इनका स्वप्न देखे तो स्नान कहा है । अहोरात्र और पृथ्वीपर गिरा कर त्रिरात्र अज्ञानात्माश्यविण्मूत्रंसुरासं- स्पृष्टमेवच । पुनः संस्कारमहति अतिकृच्छं च रुधिरे कृच्छो त्रयोवर्णादिजातयः ॥ २॥ भ्यंतरशोणिते। नवाहमतिकच्छ्री अज्ञानसे विष्ठा, मूत्र और जिम में स्यात्पाणिपूरान्नभोजनः॥५५॥ मदिरा मिलीहो उसको खाकर तीनों और रुधिर निकालनेपर अतिकृच्छ्र द्विजाति फिर संस्कार के योग्य होते. २ और रुधिर न निकाले तो कृच्छ करे-जो 'अजिनं मेखला दंडोभैक्षचर्या- नौ दिनतक अंजलि भर अन्न खाया व्रतानिच । निवर्त्ततेदिजातीनां जाता है वह अतिकृच्छ होता है॥५५॥ पुनः संस्कारकमीण ॥३॥ त्रिरात्रमुपवासःस्यादतिकृच्छ्रः द्विजातियों के फिर (दुवारा) संस्कार सउच्यते । सर्वेषामेवपापानांसंकरे कर्म में मृगछाला ( मंजकी) कोंदनी समुपस्थिते ॥५६॥ दण्ड, भिक्षाका मांगना ये सब निवृत्त या तीन रात उपवास करै उसे अत होजाते हैं ॥ ३ ॥ कृच्छ्र कहतेहैं यदिसब पापोंका संकर विण्मूत्रस्यचशुद्धयर्थप्राजापत्यं होजायतो ॥ ५६ ॥ समाचरेत् । पंचगव्यंच कुर्वीत. दशसाहस्र मभ्यस्ता गायत्री स्नात्तापीत्वाशुचिर्भवेत् ॥ ४ ॥ शोधनं परम् । विष्टा और मूत्र इनको खाकर पाना- इति पाराशरीये धर्मशास्त्र पत्य करें और पंचगव्य बनावं स्नान एकादशोऽध्यायः करके पंचगव्यको पीकर शुद्ध होता है।
१७
यत्तद्भ्यां च इति केचिदिच्छन्तीति प्रदर्शितम् ।।
डाजव्यक्तानुक्तेरनिती द्वयजवरार्धतः ।
द्वितीयाच्च तृतीयाच्च शम्बबीजात् कृषौ स्मृतः ।।
कृमो योग इति प्रोक्तं संख्यायाश्च गुणान्नतः ।
समयाद् यापनायां च निष्कोषे चैव निष्कुलात् ।।
निष्पत्राच सपत्राच तथातिव्यथने मतः ।
सुखप्रियादानुलोम्ये शूलात् पाके च कीर्तितः ॥
प्रातिलोम्ये तु दुःखाच सत्यादशपथे स्मृतः ।
मद्रभद्राद् वापनेऽर्थे डान्प्रत्यय उदाहृतः ॥
स्थादवान्तरदीक्षादेश्वरतीत्यर्थके दिनिः।
प्रमाणे शन्शदन्ताच्च विंशतेश्च डिनिः स्मृतः ।।
अप्रपश्चाड्डिमच् पोको जाताद्यर्थे मनीषिणा ।
इस्वार्थके च सम्प्रोक्तः कुत्वास्तु प्रत्ययो डुण्च् ॥
वदस्मिन्नस्तिनिवृत्तनिवासादूरसम्भवाः ।
एष्वर्थेषु ड्मतुप् प्रोक्तः कुमुदानडवेतसात् ॥
ब्यड्यतो प्रत्ययौ दृष्टे वामदेवादिति स्मृतम् ।
अप्रसिद्धादपत्या८ पाण्डोर्यण समुदाहृतः ॥
राजार्थकेऽपि संप्रोत्तस्तथैष प्रत्ययो बुधैः ।
चातुरर्थिकशब्दाच्च नङशादाबलच स्मृतः ।।
ड्बुन्पत्ययस्त्वसंज्ञायां विंशतस्त्रिंशतश्च सः ।
अष्टाचत्वारिंशतश्च चरतौ परिकीर्तितः॥
इवार्थे तु शिलायाश्च ढप्रत्यय उदाहृतः ।
अपत्यार्थे प्रत्ययो ढक् भवेत् स्त्रीप्रत्ययान्ततः ॥
यज्भ्यः स्त्रीलिङ्गशब्देभ्य अनिनन्तावितस्तथा ।
काश्यपे दत्तपुत्रे तु विकर्णाच्च कुपीतकात् ।।
१८
शुभ्रादिभ्यो ध्रुवश्वापि कल्याण्यादेस्तथैव च ।
मातृष्वसृपदात् तद्वत् पितृष्वस्पदात् तथा ।।
कुलटाया विकल्पेन दुष्कुलाच्च विधीयते ।
दृष्टेऽर्थे कळिशब्दाच्च ढगग्नेर्देवतार्थके।
नद्यादिभ्यस्तथा प्रोक्तो जाताद्यर्थे विपश्चिता ।
तूदीशब्दादभिजने कपिज्ञात्योस्तु कर्मणि ।।
धान्यानां भवने क्षेत्रे ब्रीहिशाल्योरपीष्यते ।
ढकञपत्यमित्यर्थे स्यादपूर्वपदाद कुलात् ।।
कञ्यादिभ्यस्तु जातादौ वहत्यर्थे धुरस्तथा ।
कुलात् कुक्षेश्च ग्रीवाया श्वास्यलङ्कारकेंऽर्थक
अपत्यार्थे चतुष्पाभ्यो ढप्रत्यय उदाहृतः ।
गृष्टयादिभ्यस्तथैवेष्टोऽवतुष्पाकुचनेऽपि च ॥
संस्कृते क्षीरशब्दाच्च संख्यादेश्वतुरर्थकात् ।
कोशशब्दाच्च सम्भूते इत्यादेस्तु:मवार्थतः ।।
एणीपदाद् विकारेऽर्थे निवासे वर्मतीषदात् ।
पथ्यादिभ्यस्तु साध्व] हितादौं पुरुषात् स्मृतः ।।
तदस्य सम्भवेदर्थे परिवायाश्च कीर्तितः ।
'अधीते वेद इत्यर्थे डिनुक छगलिनः स्मृतः ।।
अपत्यार्थे तु गोधाया टूक्मत्यय उदाह ।
अपत्ये कुत्सिते वाच्ये स्मृतोरणाप्रत्ययः किल ।।
फाण्टाहतेम मिमताम्मतः सौवीरगोत्रमात् ।
अरण्यात्तु भवेऽर्थेऽपि णप्रत्ययासः I
क्रीडायां च प्रहरणे थे शीले त्राकिलो मत
लब्धार्ने त्वन्नशब्दाच्च-स माता
हितार्थे सर्वशब्दाच्च गच्छत्यर्थे पथध हि
यथाकथाचशब्दाच्च देयेऽर्थे च स्मृतो अयम् ।।
१५.
प्रज्ञाश्रद्धादिशब्देभ्यो मत्वर्थे च तया स्मृतः ।
समूहार्थे तु पर्शोश्च स्प्रत्यय उदाहतः ।।
पुराणप्रोतकल्पेषु बामणेषु णिनिः स्मृतः ।
अधीते वेद इत्यर्थे 'काश्यपात् कोशिकादपि ॥
कलापिशब्दात् तद्वत् स्यात् वैशम्पायनशिष्यतः ।
वेदे वाच्ये शौनकादेः 'पाराशयेशिलालितः।
नटसूत्रे मिथुस्त्रे वाच्ये तु णिनिरिष्यते ।
कुर्वादिभ्यो ण्य एव स्यादपस्यार्थ इतारितम् ।।
सेनान्ताल्लक्षणाच्चापि कारिणः कुरुनादितः ।
प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु दित्यादिभ्यो विधीयते ॥
सहाशादेव संप्रोको बस्योंदिचतुष्टये।
साध्वर्थे समवैत्यर्थे प्रोक्तः परिषदो हि सः॥
भूतार्थे चैव षण्मासागण्यत् प्रत्यय उदाहस ।
सदस्यास्तीति'चार्थे तु कैशभ्यां च त इरितः ।।
स्वार्षे नवात् तनन् प्रोक्तों नमावः प्रकृतेरपि।
मत्वर्थे चापि तप्प्रोक्त पर्वणों मरुतश्च हि ॥
तमप् तु स्यादतिशय तिङन्ताच्य विधीयते ।
सोऽस्यावयव इत्यथै संख्यायास्तथाविष्यते ।
विमज्योपपदे द्वयर्थवचो तरविण्यते ।
समूहाथै प्रामजनबन्धु यस्ता तथा गजात् ।।
सहायाच्च तथा स्वार्थ देवाद भावेऽपि श्रीतिता
तेनैकादिगितीहाथै ससिंध परिकीर्तितः ॥
तथापादानपञ्चम्याः स्मृतोऽहोयरहोस्तु ।
अर्थतृतीयाया अप्पय प्रस्थयों मत:।।
भतिग्रहे चाबको परिक
सधैव हीयमाने योग सिस्मृतः
लघुपाराशरी। अ०१२ है वह मूह बड़ा पापी और ब्रह्महत्या- भिक्षुर्महोदधिः।दृष्टमात्राः पुनंत्येते रा कहाहै ॥ ३९ ॥ तस्मात्पश्यत्तु नित्यशः॥ ४४ ॥ भाजनेषु च तिष्ठत्सु स्वस्तिकु- अग्नि की चित्ति (होम ) जो करै वंति ये दिजाः। न देवास्तृप्तिमा- कपिलागौ, यज्ञ करने वाला राजा, भि. यान्ति निराशाःपितरस्तथा।४० क्षुक, समुद्र, यह देखने से ही पवित्र करते भोजन करते हुए जो ब्राह्मण स्वस्ति | है तिससे इन को नित्य देखे ॥ ४४ ॥ ( कल्याणहो ) कहते हैं उसपर देवता दप्त अराणं कृष्णमार्जारं चंदनं नहीं होते और पितरभी निरास होजाते हैं। सुमणिंघृतम् । तिलान्कृष्णाजिनं अस्नातावै न भुजति अजश्वा- छागं ग्रहे चैतानि रक्षयेत्॥ ४५ ॥ ग्निमपूज्य च । न पर्णपृष्ठ मुंजी-| अरणि, काला विलाव, चंदन, उत्तम- त रात्रौ दीपं विनातथा॥४१॥ मणि, घी, काली मृगछाला, बकरी, बिना स्नान किये, और विना अग्नि | इन की घर में रक्षा करै ॥ ४५ ॥ पूजे, भोजन न करे और पत्ते की पीठ, गवों शतं सैकवृपं यत्रतिष्ठत्यय- पर और रात्रि में दीपक के बिना भो. न्त्रितम्। तत्क्षेत्रं दशगुणितं गो- जन न करै ।। ४१ ॥ यहस्थस्तु दयायुक्तोधर्ममेवा- चर्मपरिकीर्तितम् ॥ ४६॥ जहां सो गौ और एक बैल ये दम नुचिंतयेत्। पोष्यवार्थसिद्धयर्थ गुने अर्थान् दशहजार गौ और दशवेल न्यायवर्ती स बुद्धिमान् ॥४२॥ बिना बांधे टिके, उस क्षेत्र को गोचर्म दया वाला गृहस्थ धर्म की ही चिन्ता कहते हैं ।। ४६ ॥ करै अपने पोष्यवर्ग ( पुत्र वा भृत्य ब्रह्महत्यादिभिर्मयोमनावाका- आदि ) इन के प्रयोजन सिद्धि के लिये बुद्धिमान् सदैव न्यायसे वर्ते ॥ ४२ ॥ यकर्मभिः। एतद्गोचर्मदानेन मु- न्यायोपार्जितविनेन कर्तव्यं च्यते सर्वकिल्विषैः ॥ १७ ॥ ह्यात्मरक्षणम् । अन्यायेन तु यो- इस गोचर्ममात्र भूमि के दान से जीवेत्सर्बकर्मबहिष्कृतः॥४३॥ मनुष्य मन वाणी देह और कर्मों से किये न्यायसे संचय किये द्रव्य से अपनी ब्रह्महत्या आदि पापों से छूटताहै ॥४७॥ कुटुंबिने दरिद्राय श्रोत्रियाय रक्षा करनी जो अन्याय से जीताहे वह सब धर्मों से बाहर अनधिकारी) है ४३ विशेषतः । यद्दानं दीयते तस्मै अग्निश्रितपिलासत्री राजा- नहानं शुभकारकम् ।। ४८॥
७७ ( भा०टी०) विशिष्टधर्मशास्त्र। कुटुम्बी, दरिद्र, विशेषकर, वेदपाठी विद्यमानेषु हस्तेषु ब्राह्मणो- इनको जो दान दिया जाताहे वही शुभ ज्ञानदुर्बलः । तोयं पिवति वस्त्रेण का करने वाला ॥४८॥ बापिकूपतडागाद्यैर्वाजपेयश- | श्वयोनौ जायते ध्रुवम् ।। ५३ ॥ तैर्मखैः। गांकोटिप्रदानेन भूमि- हाथों के विद्यमान रहत जो अज्ञानी हर्ता न शुद्धयति ॥ ४६॥ ब्राह्मण पात्र में मुख लगाकर जल पीना है वह निश्चय करके कुत्तकी योनि में भूमि का हरने वाला मनुष्य वान- पैदा होता है।। ५३ ।। डी-कूप तालाव आदि से और सौ:.. बाजपेय यज्ञोंसे और कोटि गौ देनेमे यस्तु क्रुद्धः पुमानत्याज्जायां भी शुद्ध नहीं होता ॥ १९ ॥ यस्तु अगम्यतामापुनीरच्छतिचे- अष्टादश दिनादास्नानमेव देनां विषमध्ये तु श्रावयेत्॥५४॥ रजस्वला। अतऊर्ध्वं त्रिरात्रं स्या. जो मनुप्य क्रोध में आकर अपनी दुशनानामुनिरब्रवीत् ॥ ५० ॥ स्त्रीको ऐमा कहै तू मेरे गमन करने के यदि जो दर्शनसे अठारवें दिन से योग्य नहीं है और फिर उस स्त्रीकी इ- पहिले आगे कहे चांडाल आदि का सच्छा करे तो इसबात को ब्राह्मणोंको शे रजस्वचा स्त्री कर तो स्नानहीकर सुनादेय ॥ ५४॥ और अठारह दिन से आगे तीनरात उ-. श्रांतः क्रुद्धस्तमोंधोवा क्षुत्पिपा. पवास करै यह उशना मुनिने कहाहे ।६० युगयुगद्वयंचैव त्रियुगं च चतु- सा भयादितः। दानं पुण्यमकृत्वा युगम् । चांडालसूतकोदक्या प- वा प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५५॥ तितानामधःक्रमात् ॥५१॥ थका-वा क्रोधी अज्ञानम अन्धा क्षु- धा और प्यास मे दुःखी वह ब्राह्मण चार दिन आठ दिन बारह दिन सोलह दिन क्रमसे चांडाल सूतिका रज- पुण्य न कर नो तीन दिन स्वला पतिन रजस्वला इनके॥५१॥ प्रायश्चित्त करें ॥ १५ ॥ ततः सन्निधिमात्रेण सचैल उपस्पृशेत्रिपवणं महानाप- स्नानमाचरेत् । स्नात्वावलोक- संगमे । चीते चैव गां दद्याद येत्सूर्यमज्ञानात्स्पृशते यदि।९२॥ ब्राह्मणान्भोजयेद्दश ॥५६॥ समीप रहै तौ वस्त्रांसहित स्नान करे और त्रिकाल महानदी (गङ्गाआदि) यदि अनानसे स्पर्शभी करले नौ स्नान के संगम ( मेल ) में स्नान और आचम- करक सूर्य का दर्शन करै ॥ २५ ॥ न करें और प्रायश्चित्त किय पीछे प्रि- दान और लघुपाराशरी। अ० १२ के अन्न को काल गोदान करे और दश ब्राह्मण भिगोकर स्नान, ये एक कृच्छका फल जिगावे ॥५६॥ देने है ॥ ६॥ दुराचारस्य विप्रस्य निषिद्धाच- दियोजनं तीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकं रणस्य च । अन्नं भुक्त्वा दिजः | प्रकल्पितम् । गृहस्थः कामतः कुर्यादिनमेकमभोजनम्॥ ५७॥ कुर्यादेतसः स्खलनं यदि॥६१॥ दुराचारी और निषिद्ध आचरण के और दो योजन तक तीर्थ की यात्रा करने वाले ब्राह्मण के अन्न को खाकर को भी एक कुच्छू मानाहै-याद गृहस्थी द्विज एक दिन भोजन न करै ॥ १७॥ पुरुष अपने वीर्य को गिराताह ॥११॥ सदाचारस्य विप्रस्य तथा वेदां- सहस्रं तु जपेद्देव्याःप्राणाया- गवेदिनः। भुक्त्वान्नं सुच्यते पा- मैत्रिभिः सह। चतुर्विद्योपपन्नस्तु पादहोरात्रांतरान्नरः॥ ५८॥ विधिवद्ब्रह्मघातके ।। ६२॥ वह तीन प्राणायाम करे और एक उत्तम आचरण का की और वेदांत का जानने वाला ब्राह्मण हजार गायत्री जपे विधि से जो चारों विद्याओंसे युक्तहो और ब्रह्महत्या करे तो।। खाकर मनुष्य अहोरात्र के अन्तर में पाप से छूटताहै ॥१८॥ समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चित्तं स- ऊोंच्छिष्टमधाोच्छिष्टमन्तारे- मादिशेत् ॥ ६३ ॥ सेतुबंधपथे क्षमृतौ तथा। कृच्छत्रयं प्रकुर्वीत | भिक्षां चातुर्वण्र्यात्समाचरेत् । आशौचमरणे तथा ॥ ५६ ॥ वर्जयित्वा विकर्मस्थान छत्रोपा- अर्ध्व (बड़े ) के उच्छिष्ट को वा अधः नहर्जितः । अहंदुष्कृतका वै (छोटे) के उच्छिष्ट को और अन्तरि- महापातककारकः॥ ६४ ॥ क्ष में जो मरै उसके अशौच के अन्नको उसे सेतुबंधरामेश्वरपर जानाप्रायश्चित्त और मृतकके अशौच भोजन को खाकर बो से भिक्षा मांगे ॥ ६३ ।। कु. बतावे और वह सेतुबंध के मार्ग में चारों तीन कृच्छ्र व्रत करै ॥५६॥ मार्गियों को छोड़ दे और छत्री जूता न कृच्छं देव्ययुतं चैव प्राणाया- रक्स-और ऐसे है कि मैं खोटे कर्म मशतद्वयम् । पुण्यतीर्थनार्दशिराः | का करने वाला और महापातकी हूं६४ स्नान द्वादशसंख्यया ॥६॥ गृहदारेषु तिष्ठामि भिक्षार्थीब्रह्म- दश इनार गायत्री-दो सै प्राणाया- घातकः। गोकुलेषु वसेच्चैव ग्रामेष्ठ म, और पवित्र तीर्थ में बारह बार शिर नगरेषु च । ६५ ।।
७९ AAAA AAAAAAAA (भा. टी.) विशिष्टधर्मशास्त्र । मैं ब्रह्महत्यारा भिक्षा के लिये तुम्हारे णभोजनम् । गाश्चै वैकशतं दद्या- घर के द्वारपर खड़ा हूं और गोशाला चातुर्विद्येषु दक्षिणाम् ॥७० ॥ ग्राम नगर इन में बसे ॥ ६ ॥ तपोवनेषु तीर्थेषु नदीप्रस्रवणे जिमांच और चार विद्यावाले ब्राह्मणों पुत्र और भृत्यों समेत ब्राह्मणों को पुच । एतेषु ख्यापयेन्नैनः पुण्यं को सौ १०० गौ दक्षिणा दे ॥ ७० ॥ गत्वा तु सागरम् ॥६६॥ ब्राह्मणानां प्रसादेन ब्रह्महातु तपोवनों में तीर्थों में नदी के जहां विमुच्यते। विंध्यादुत्तरतोयस्य सं- प्रवाहों वहां इन में अपने पाप को जताता वासः परिकीर्तितः ॥ ७१ ॥ हुआ पवित्रसागर पर जाकर ।। ६६ ॥ ब्राह्मणों की प्रसन्नता से ब्रह्महत्या से दशयोजनविस्तीर्ण शतयो- छूटजाताई विन्ध्याचलसे उत्तर जो बस जनमायतम् । रामचन्द्रसमादिष्टं / ता है ।। ७१ ॥ नलसंचयसंचितम् ॥ ६७॥ पराशरमतं तस्य सेतुबंधस्यदर्श- दशयोजन चौड़ा और सौ योजन नात् । सवनस्थां स्त्रियं हत्वा ब्र- लम्बा रामचन्द्रजी के कहने से नल महत्याव्रतं चरेत् ॥ ७२ ॥ वानर के बनाए हुये ॥ १७ ॥ उसे पराशर ऋषिने सेतुबंध का दर्शन सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां कहाई - प्रमति में, टिकी स्त्रीको मारकर व्यपोहति। सेतुं दृष्ट्वा विशुद्धा- ब्रह्महत्या में कहहुए व्रत को करै ।।७।। स्मा त्ववगाहेत सागरम् ॥६॥ | सुरापश्च द्विजः कुर्यान्नदीं गत्वा समुद्र के सेतु को देखकर ब्रह्महत्या समुद्रगाम् । चांद्रायणे ततश्वीरें को दूर करता है, सेतु को देख विशुद्ध कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ।। ७३ ॥ मन होकर सागर में स्नान करै ॥६८॥ मदिरा पीनेवाला द्विज समुद्र में जा- यजेत वाश्वमेधेन राजातु टने वाली नदी पर जाकर चांद्रायण व्रत थिवीपतिः। पुनः प्रत्यागतोवेश्म- करके ब्राह्मणोंको जिमावे ॥ ७३ ॥ -वासार्थमुपसर्पति ॥ ६६॥ अनदुत्साहितां गां च दद्यादि- और पृथ्वीका पति राजा ब्रह्महत्या प्रदक्षिणाम्। मुरापानं सकृत्कृत्वा करे तो अश्वमेधयज्ञ करै फिर लौटकर अग्निवर्णां सुरां पिवेत् ।। ७४ ॥ घर में वाम करने के लिये आवै ॥६९ एक वैल सहित एक गौ ब्राह्मणों को सपुत्रः सहभृत्यश्च कुर्याद्ब्राह्म- दक्षिणा दे-एक वार मदिग को पाकर लघुपाराशरी। अ० १२ अग्नि के समान है रंग जिसका (अत्यन्त इस प्रकार पाप लगते है जैसे जल उष्ण ) ऐमी मदिरा को जो पाये ७४ | में तेलकी बूंद-चांद्रायण-यावक (जी सपावयेदिहात्मानमिहलोके | कोही खाना ) और तुलापुरुष ।।७८ ।। परत्र चा अपहृत्य सुवर्णन्तु ब्राह्म गवां चैवानुगमनं सर्वपापप्र- णस्य ततः स्वयम् ॥ ॥ ७५ ॥ प्रणाशनम् । एतत्पाराशरं शास्त्र वह इस लोक और परलोक में अप- श्लोकानांशतपंचकम् ॥ ७९ ॥ ने आत्मा को पवित्र कर ब्राह्मणके सुवर्ण गौओं के पीछे गमन ये सब पापो को चुगकर आपही ॥७९॥ को नाश करने वाले है यह पराशर गच्छेन्मुशलमादाय राजानं ऋषि का कहा धर्मशास्त्र जिस में पांचसो स्ववधाय तु। ततःशुद्धिमवाप्नोति ५०० ॥ ७९ ॥ दिनवत्या समायुक्तं धर्मशा- राज्ञा सौमुक्तएव च ॥ ७६ ॥ स्वस्य संग्रहः । यथाध्ययनकर्मा- मूसल को अपने मारने के लिये ले णि धर्मशास्त्रमिदं तथा 1201 कर राजा के समीप जाय, समीप जाय, फिर राजा से मरकर यह शुद्ध होताहै और मुक्ति वानव ९२ श्लोकहैं और धर्मशास्त्र को भी प्राप्त होता है ।। ७६ ॥ का यह संग्रह ( इकट्ठा करना) है जैसे अध्ययन के कर्म हैं वैसाही यह धर्म- कामतस्तु कृतं यत्स्यान्नान्यथा- in com बधमर्हति । आसनाच्छयनाद्या अध्येतव्यं प्रयत्लेन नियत नात्संभापात्सहभोजनात्॥७७॥ स्वर्गकामिना । याद जानकर कग होय तो मारने के इतिश्रीपाराशरीयधर्मशास्त्रेसकलप्रायश्चित्त योग्य है अन्यथा नहीं है एक जगह आ निर्णयोनामद्वादशोऽध्यायः ॥१२॥ सन से-सोने से, गमन से, बोलने से ।। स्वर्ग की इच्छा करने वाले पुरुषको संक्रामंतीह पापानि तैलविंदू- | यह यत्न से पढ़ना चाहिये ।। रिखांभसिाचांद्रायणं यावकं च तु इतिश्रीपागशरीये धर्मशास्त्रे सकलप्रायश्चित्त निर्णयोनाम द्वादशोऽध्याय ॥ १२॥ लापुरुषएव च ॥७८॥ समाप्तोऽयंग्रन्थः
भावे कर्मणि चाप्यर्थे स्तेनाद् यन् प्रत्ययो मनः ।।
मासान्ताद् वयसि द्योत्ये द्विगोर्यपत्ययो भवेत् ।
भाहतत्वप्रशस्तत्वविशिष्टाचापि रूपतः ॥
कंशंभ्यां चापि मत्वर्थे यस्प्रत्यय उदाहतः ।
कर्णाशब्दात्तु मत्वर्थे युस्प्रत्यय इतीरितम् ।।
कंभ्यामपि तद्वत् स्यात् तयाहंशुभमोरपि ।
तदस्त्यादिचतुष्केऽर्थे त्वश्मादेस्तु र ईरितः ॥
मत्वर्थे तूषशब्दाच सुषिमुष्कमधोरपि ।
हस्वार्थे तु कुटीशब्दाच्छमीशुण्डादपि स्मृतः ॥
अमीषः शरणे रण स्याद् भत्वं चास्य प्रकीर्तिनम् !
रूपप् च प्रत्ययः प्रोक्तः प्रशंसायां च कुत्सने ॥
हेतो व नृनाममा सप्यः स्यादागतेऽर्थके।
षष्ठयन्ताद् भूतपूर्वेऽर्थे रूप्यपत्यय इप्यते ।।
सप्तम्यन्तादिदंशब्दात् कालेऽर्थे हिल विधीयते ।
तथैवोकै किमादेस्तु कालेऽनयननेऽपि च ॥
प्राणिसादात मस्त्यर्थे लक्ष्प्रत्यय इतारितम् ।
क्षुद्रजन्तूपतापेभ्यः सिमादिभ्यस्तष पं ॥
बत्सांसाभ्यां कामवति बलायपि मागिन् ।
मस्वथें चापि केशाद् वो सोशपत्रापि दृश्यते ॥
गाण्डीशब्दादजगवात् संज्ञायां पायते ।
तुस्यत्वे तु क्रियायाश्च पतिपयम ईरितः ।।
गुणादिमिश्च तुल्यत्व साः तत्र ।
भईवेऽपि क्रियायाश्च वतिप्रत्यय इरितः ॥
पतुए स्थाद् यत्तदेतेभ्यः परिमाण इतीरितम् ।
भाने वाच्ये वुशब्दाच वयपत्यय ईरितः ।।
देशे वाच्चे शिवाचा. वय इष्यते ।